एकादशं पर्व
पद्मप्रभं सुपद्माभं पद्माङ्कं प्रणमाम्यहम्। पद्मसंचारिचरणं पद्मालिङ्गितवक्षसम् ॥१॥
अर्थ: उन पद्मप्रभ जिनदेव को मेरा प्रणाम है जो लक्ष्मी के दाता है, जिनका शरीर लाल कमल के जैसी कान्ति वाला हैं, जिनके वक्षःस्थल में लक्ष्मी का निवास है और केवलज्ञान होने के बाद विहार के समय जिनके चरण-कमलों के नीचे देवता-गण कमलों की रचना करते हैं ॥१॥
अथाप्राक्षीद्गणाधीशमिति मागधनायकः। तदानीं यादवेशानां का भूतिः क्व स्थितिर्वद ॥२॥
तदाकर्ण्य गणाधीशोऽवादीद्गम्भीरया गिरा। शृणु श्रेणिक वक्ष्यामि यदूनां चरितं वरम् ॥३॥
अर्थ (श्लोक 2 से 3): इसके बाद श्रेणिक महाराज ने गौतम भगवान् को पूछा कि प्रभो ! जिस समय की यह कथा है उस समय यादवों के कैसी विभूति थी और वे कहाँ रहते थे। इसके उत्तर में गौतम स्वामी ने अपनी गंभीर ध्वनि से कहा कि श्रेणिक, अब यादवों का पवित्र चरित कहा जाता है। उसको तुम सावधान चित्त से सुनो ॥२-३॥
प्रबुद्धोऽन्धकवृष्णिस्तु दत्त्वा राज्यं स्वसूनवे। समुद्रविजयाख्याय प्राव्राजीद् गुरुसंनिधौ ॥४॥
समुद्रविजयो यावत्पाति राज्यं जयोद्धुरः। वसुदेवस्तदा क्रीडां कर्तुकामोऽभवन्मुदा ॥५॥
गन्धवारणमारुह्य चलच्चामरवीजितः। वदद्वाद्यः स्वसैन्येन स रन्तुं याति कानने ॥६॥
नानाभरणभाभारभूषितोदारविग्रहः। निर्विशन्तं विशन्तं च कामिन्यो वीक्ष्य व्याकुलाः ॥७॥
अर्थ (श्लोक 4 से 7): एक दिन अंधकवृष्टि ने संसार से विरक्त होकर अपने बड़े पुत्र समुद्रविजय को सब राज्य सौंप दिया और आप गुरु के निकट जा दीक्षित हो गया। राज्य अब जयी समुद्रविजय करने लगा। समुद्रविजय का छोटा भाई वसुदेव था। एक दिन वह गंधसिन्धुर नाम के हाथी पर सवार हो, सेना-सहित उत्सव के साथ क्रीड़ा करने के लिए वन को गया। उसके ऊपर चमर ढुल रहे थे और भाँति-भाँति के भूषणों से विभूषित, स्वभाव-सुन्दर उसके शरीर की अपूर्व ही शोभा थी। उसे देखकर शहर की कामिनियाँ बहुत व्याकुल हुई ॥४-७॥
गृहकार्यं परित्यज्य ता भर्तृभोजनादिकम्। स्तन्यदानं शिशूनां च यान्ति तं द्रष्टुमाकुलाः ॥८॥
इति लोकाः समावीक्ष्य सर्वं भूपं न्यवेदयन्। नृपोऽप्येतत्समाकर्ण्य तद्रक्षामकरोत्कृती ॥९॥
यथेष्टं निःकुटे क्रीडां कर्तुं संस्थाप्य भूपतिः। कुमारं बहिरुद्याने गच्छन्तं च न्यवारयत् ॥१०॥
अर्थ (श्लोक 8 से 10): उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर वे अपने घर गृहस्थी के कामों को छोड़कर उसको देखने के लिए बाहर आ गई और तो क्या, वे उसे जब आता सुन पाती तभी अपने पति-देवों को भोजन आदि करते और बाल-बच्चों को दूध पीते छोड़कर बाहर भाग आती थीं। यह हाल देखकर शहर के लोगों ने राजा से प्रार्थना की और राजा ने भी उनकी प्रार्थना पर उचित ध्यान देकर अब से घर के बगीचे में ही क्रीड़ा करने का प्रबंध कर कुमार को उद्यान जाने से रोक दिया ॥८-१०॥
क्रीडन्तं निःकुटे तं च समाख्यात्क्षुब्धमानसः। दासो निपुणमत्याख्यो बहिर्याननिषेधनम् ॥११॥
अर्थ: एक दिन कुमार अपने बाग में क्रीड़ा कर रहा था। इसी समय निपुणमति नाम नौकर ने आकर
श्रुत्वावादीत्स केनाहं निषिद्ध इति चेटकम्। सोऽवोचत्तव निर्याणकाले त्वद्रूपवीक्षणात् ॥१२॥
योषाः शिथिलचारित्राः कामेन कवलीकृताः। तत्र लज्जाविमुक्ताङ्गा विपरीतविचेष्टिताः ॥१३॥
पीतासवसमाः कन्याः सधवा विधवाश्च ताः। लोकैर्वीक्ष्येति विज्ञप्तो भूपालः स तथाकरोत् ॥१४॥
अर्थ (श्लोक 11 से 14): राजकुमार से वन जाने से रोके जाने की बात कह दी। सुनकर उससे वसुदेव ने पूछा कि मुझे वन जाने से किसने रोका है? उत्तर में उसने कहा कि प्रभो! जिस समय आप वन को जाते हुए शहर से निकलते हैं, उस समय आपके रूप-सौन्दर्य को देखकर शहर की नारियों का चरित्र शिथिल हो जाता है। वे कामदेव का ग्रास बन जाती हैं और लाज-शर्म छोड़कर विपरीत चेष्टायें करने लगती हैं। कन्या, सधवा और विधवा सभी ऐसी देखने लगती हैं मानों उन्होंने मदिरा ही पी ली है। यह देखकर शहर के लोगों ने राजा से प्रार्थना की और राजा ने ही उनकी प्रार्थना पर से आपको उद्यान जाने से रोक दिया है ॥११-१४॥
कुमारो बन्धनं ज्ञात्वा स्वस्य तद्वाक्यतो निशि। निर्ययौ नगरात्साश्वः सुविद्यासाधनच्छलात् ॥१५॥
स एकाकी श्मशानेऽथ शवं संभूष्य भूषणैः। प्रज्वाल्य वह्निना तं चालक्ष्योऽगाद्रूपसागरः ॥१६॥
क्रामन् क्रमेण स क्षोणीं क्रमाभ्यां विजयं पुरम्। प्राप्य मूले स संतस्थे श्रान्तोऽशोकंतरोः परे ॥१७॥
अर्थ (श्लोक 15 से 17): निपुणमति के इन वचनों से वसुदेव ने अपने आपको बन्धन में पड़ा समझा। इसके बाद एक दिन रात को किसी विद्या साधने के बहाने से घोड़े पर चढ़कर राजकुमार नगर से बाहर निकल गया। वह वहाँ से सीधा मसान भूमि में पहुँचा। वहाँ उसने एक मुर्दे को अपने सब वस्त्र-आभूषण पहिना दिये और बाद उसे जलाकर आप, आगे चल दिया। धीरे-धीरे वह विजयपुर पहुँचा। वह बहुत थक गया था, इसलिए अपनी थकावट दूर करने को वहाँ एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठ गया ॥१५-१७॥
निमित्तसूचितं मत्वा वनेट् तं मगधाधिपम्। अबूबुधन्नृपस्तस्मै सोमलाख्यां सुतां ददौ ॥१८॥
विश्रम्य कानिचित्त्र दिनानि गतवांस्ततः। पुष्परम्ये वने तत्र विमदीकृत्य वारणम् ॥१९॥
चिक्रीड स तमालोक्य क्रीडन्तं गजतं खगः। जहार विजयार्धाद्रौ नीतः स तेन तत्क्षणे ॥२०॥
अर्थ (श्लोक 18 से 20): वहाँ मगध देश के राजा की ओर से एक भील रहता था। दैवयोग से इसके वहाँ पहुँचते ही भील को निमित्तज्ञानी के बताये हुए निमित्त की सूचना मिली। अतः वह राजा के पास गया और उसने राजा को वसुदेव के आने की खबर की। राजा उसी समय वहाँ आया और वसुदेव को बड़े भारी ठाट-बाट के साथ नगर में लिवा ले गया। इसके बाद उसने उसके साथ अपनी सोमला नाम पुत्री का ब्याह कर दिया। ब्याह के बाद कुछ दिनों तक कुमार ने वहीं विश्राम किया। पश्चात् वहाँ से चलकर वह पुष्परम्य नाम वन में पहुँचा। वहाँ एक वनेले हाथी को मद-रहित कर-उसका मद उतारकर वह आनंद-चैन से उसके साथ क्रीड़ा करने लगा। वन-गज के साथ क्रीड़ा करता हुआ उसको देखकर एक विद्याधर विजयार्द्ध पर्वत के किन्नर गीतपुर में ले गया ॥१८-२०॥
तत्र किंनरगीताख्ये पुरे चाशनिवेगतः। जातां पवनवेगायां सुतां स परिणीतवान् ॥२१॥
अर्थ: वहाँ अशनिवेग और पवनवेगा की पुत्री श्यामा के साथ उसका ब्याह हो गया। श्यामा का दूसरा
दिनानि कतिचित्तत्र स्मरस्मारणतत्परः ।
तया स्थितं जहाराशु तं खगोऽङ्गारकः खलः ॥२२॥
दत्तान्तशाल्मलिर्ज्ञात्वा हृतं तमसिपाणिका।
अन्वियाय खगं वीक्ष्य सा तस्मादमुचद्यदुम् ॥२३॥
विद्यया पर्णलघ्व्यासौ तया प्रहितया धृतः।
चम्पापुरीसरोमध्ये पपात जिनमानसः ॥२४॥
अर्थ (श्लोक 21 से 24): नाम शाल्मलिदत्ता भी थी। श्यामा के साथ कामक्रीड़ा करता हुआ कुछ दिनों तक वह वहीं रहा परन्तु एक दिन उसे वहाँ से रात के समय एक दुष्ट अंगारक नाम विद्याधर हर ले गया। यह देख श्यामा तलवार लेकर उसके पीछे-पीछे भागी। तब अंगारक डरा और श्यामा के डर के मारे उसने वसुदेव को आकाश से नीचे छोड़ दिया। यह देख श्यामा ने पर्णलघ्वी विद्या भेजी। उसने जाकर जिनदेव को हृदय में धारण करने वाले वसुदेव को नीचे गिरने में सहारा दिया, ताकि वह आसानी से चंपापुरी के तालाब में जाकर पड़ा-उसे कुछ भी तकलीफ न हुई ॥२१-२४॥
ततो निर्गत्य चम्पायां गतो गन्धर्वविद्यया ।
प्रसिद्धां श्रुतवान्कर्णे कन्यां गन्धर्वदत्तिकाम् ॥२५॥
प्राप्य गन्धर्वदत्तायाः स्वयंवरसुमण्डपम् ।
तत्र स्थितवतीं कन्यां कुमारो वीक्ष्य चागदीत् ॥२६॥
देहि वीणां च निर्दोषां सुतन्त्रीकां सुमानजाम् ।
यतस्ते वाञ्छितं वाद्यं वादयामि सुपण्डिते ॥२७॥
अर्थ (श्लोक 25 से 27): इसके बाद वह तालाब से निकलकर चम्पापुरी में गया। वहाँ गंधर्वदत्ता का स्वयंवर था। गंधर्वदत्ता गान विद्या में बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। स्वयंवर का हाल सुनकर वसुदेव भी तत्काल स्वयंवर-मंडप में पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने गंधर्वदत्ता से कहा कि सुपण्डिते, दोष-रहित, अच्छे तारों वाली और ठीक प्रमाण की बनी हुई एक वीणा दो, ताकि जैसी तुम चाहती हो मैं वैसी ही उसे बजा सकूँ ॥२५-२७॥
तया तिस्रश्चतस्रश्च दत्ता वीणाः स निन्दयन् ।
प्राप्य घोषवतीं वीणां निर्दोषां वीक्ष्य संजगौ ॥२८॥
संताड्य तां सुमानेन गेयं तद्वाञ्छितं जगौ ।
जित्वा तां चारुदत्तेन दत्ता सोऽप्यवृणोत्तदा ॥२९॥
अर्थ (श्लोक 28 से 29): यह सुन उसने वसुदेव को तीन-चार वीणायें दीं, पर वसुदेव ने उन सब में कोई न कोई दोष बता कर वे वापस लौटा दीं। तब गंधर्वदत्ता ने उसे घोषवती नाम वीणा दी, जो बिल्कुल निर्दोष थी। उसे लेकर कुमार ने बजाना शुरू किया और बड़े अभिमान के साथ उसने जैसा कि गंधर्वदत्ता चाहती थी वैसा ही बजाकर सुनाया। जिससे वह बहुत ही प्रसन्न हुई और साथ में वसुदेव के ऊपर तन-मन से निछावर भी हो गई ॥२८-२९॥
एवं खगाचले सप्त शतानि सुखभोगिनाम् ।
कन्याः प्राप स पुण्येन पुण्यात्किं दुर्लभं भुवि ॥३०॥
ततो निवृत्य भूभागेऽरिष्टनाम्नि पुरे प्रभोः ।
हिरण्यवर्मणः पुत्री पद्मावत्यां च रोहिणी ॥३१॥
अर्थ (श्लोक 30 से 31): इस प्रकार कुमार के द्वारा जीती गई अपनी कन्या का चारुदत्त ने उसके साथ ब्याह कर दिया। कुमार भी इस ब्याह से अतीव प्रसन्न हुआ एवं विजयार्द्ध पर्वत पर उस पुण्यात्मा ने विद्याधरों की और सात सौ कन्याओं के साथ विवाह किया। सच है कि पुण्य का उदय होने पर संसार में कुछ भी मिलना दुर्लभ नहीं रह जाता। वहाँ से चलकर वह अरिष्टपुर नाम नगर में आया। यहाँ का राजा था हिरण्यवर्मा और रानी थी पद्मावती। उनके रोहिणी नाम एक पुत्री थी ॥३०-३१॥
रोहिणीवाभवत्तस्याः स्वयंवरकृते नृपान्। समाहूतान्विमुच्यासौ गतं तत्रावृणोच्च तम् ॥३२॥
सोत्कण्ठिताऽकरोत्कण्ठे मालां तस्य विकुण्ठहृत्। तथा वीक्ष्य स भूपालाः क्षोभं भ्रान्ताश्च लेभिरे ॥३३॥
समुद्रा इव संहारे समुद्रविजयादयः। तदा विभिन्नमर्यादा आहर्तुं तं समुद्ययुः ॥३४॥
योद्धुं हिरण्यवर्मापि वसुदेवः समुद्ययौ। सोऽपि स्वनामसंयुक्तं बाणं भ्रातरमक्षिपत् ॥३५॥
अर्थ (श्लोक 32 से 35): वह चाँद की रोहिणी के तुल्य थी। वहाँ उसका स्वयंवर था और देश-विदेश के राजा उसमें उपस्थित थे। वसुदेव भी उस स्वयंवर में गया और अपने योग्य स्थान पर जाकर बैठ गया। इसके बाद रोहिणी स्वयंवर-मंडप में आई और उसने सब राजाओं को छोड़ते हुए, चले जाकर वसुदेव को पसंद किया और बड़ी भारी उत्कंठा के साथ उसके गले में वरमाला पहिना दी। यह देख उन सब राजाओं में बड़ा क्षोभ मचा, युद्धकला में समुद्र के जैसे उमड़ने वाले समुद्रविजय आदि सब राजा उस समय मान-मर्यादा छोड़कर युद्ध के लिए तैयार हो गये। इधर हिरण्यवर्मा और वसुदेव भी निकल कर मैदान में आ डटे। इस समय समुद्रविजय को अपना परिचय देने की इच्छा से वसुदेव ने वह बाण चलाया जिस पर वसुदेव का नाम लिखा था ॥३२-३५॥
समुद्रविजयो लब्ध्वा शरमक्षरसंयुक्तम्। वाचयित्वा कुमारं तं निश्चिकायानुजानुजम् ॥३६॥
संगरं वारयित्वा स कनीयांसं सहानुजैः। आशिष्य परमां प्रीतिं समुद्रविजयोऽगमत् ॥३७॥
दशार्हास्तद्विवाहस्योत्सवं चक्रुर्मुदावहाः। ततस्तौ प्रौढरङ्गेण दम्पती निन्यतुः सुखम् ॥३८॥
अर्थ (श्लोक 36 से 38): उस बाण को देखकर समुद्रविजय ने उसी समय युद्ध बन्द करवा दिया। इसके बाद वह अपने सब भाइयों सहित वसुदेव से मिलकर परम प्रीति को प्राप्त हुआ। पश्चात् सब भाइयों ने बड़े हर्ष के साथ वसुदेव का ब्याह-महोत्सव किया। अनन्तर प्रौढ़ राग-रंग से वे दोनों दम्पती सुख चैन से सुख भोगने लगे ॥३६-३८॥
सुस्वप्नसूचितं देवी रोहिणी च कदाचन। शुक्रस्वर्गाच्च्युतं दध्रे सुरं गर्भे समुन्नतम् ॥३९॥
ततः क्रमेण नवमे मासे सासूत सत्सुतम्। बलभद्राभिधं रम्यं बलानां नवमं मतम् ॥४०॥
ततः सौरीपुरं प्राप्ता यादवाः सकलाः शुभाः। वसुदेवयुतास्तत्र सुखं तस्थुः स्थिराशयाः ॥४१॥
अर्थ (श्लोक 39 से 41): एक दिन शुभ स्वप्नों को देखने के बाद रोहिणी देवी ने शुक्र स्वर्ग से चयकर आये हुए एक उन्नत देव को गर्भ में धारण किया और क्रम से जब नौ महीना पूरे हो गये तब बलभद्र नाम के नव में बलदेव को जन्म दिया। बलभद्र रूपशाली और जगत् को आनंद देने वाला था। इसके बाद गंभीर आशय वाले वे सब यादव वसुदेव-सहित सुख से सूरीपुर में रहने लगे ॥३९-४१॥
कदाचिदथ कंसेन जरासंधदिदृक्षया। राजगृहे ययौ योद्धा वसुदेवो विदांवरः ॥४२॥
जरासंधस्तदा भूपानित्याज्ञापयति स्म च। सुरम्यविषयान्तःस्थपोदनाख्यपुरेश्वरम् ॥४३॥
अर्थ (श्लोक 42 से 43): एक दिन जरासिंध को देखने की इच्छा से विदांवर वसुदेव वीर कंस के साथ राजगृह नगर आया। वहाँ इसी समय जरासिंध ने सब राजाओं के लिए यह आज्ञा निकाली थी कि जो कोई नृपति सुरम्यदेश के पोदनापुर के राजा सिंहरथ को बाँधकर मेरे आगे ले आएगा उसे मैं कलिंदसेना के गर्भ
शत्रुं सिंहरथं जित्वा बद्ध्वानीय ममाग्रतः।
यो मुञ्चति सुतां तस्मै नाम्ना जीवद्यशोऽभिधाम् ॥४४॥
जातां कालिन्दसेनायां सार्धं दास्यामि नीवृता।
इति वीक्ष्य नृपाः पत्रमालिकां च व्यरंसिषुः ॥४५॥
अर्थ (श्लोक 42 से 45): से उत्पन्न हुई जीवद्यशा नाम अपनी पुत्री के साथ-साथ आधे राज्य का स्वामी बना दूँगा। सारांश यह कि जो सिंहरथ को पकड़ ले आयेगा उसे मैं अपना आधा राज्य दूँगा और उसके साथ अपनी पुत्री भी ब्याह दूँगा ॥४२-४५॥
वसुदेवकुमारस्तां गृहीत्वा निर्गतो बलैः।
विद्यासिंहरथेनाशु जित्वा सिंहरथं पृथुम् ॥४६॥
कंसेन बन्धयित्वा तमर्पयामास भूपतिः।
सोऽपि तस्मै सुतां दातुमीहते स्म सुनीवृता ॥४७॥
अर्थ (श्लोक 46 से 47): इस आज्ञा को पाकर और राजा लोग तो चुप-चाप अपने घर पर ही बैठे रहे किसी की हिम्मत सिंहरथ को बाँध लाने की न हुई परन्तु वसुदेव से न रहा गया। वह जरासिंध के आज्ञापत्र को पाते ही उसी समय कुछ सेना को साथ लेकर कंस सहित वहाँ से निकल पड़ा और विद्या-बल से सिंहों का रथ बना, उस पर चढ़ बात ही बात में उसने सिंहरथ को बाँध लिया और लाकर जरासिंध को सौंप दिया। तब जरासिंध अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उसे कन्या और आधा राज्य देने को व्यवस्था करने लगा ॥४६-४७॥
स दुष्टलक्षणां ज्ञात्वा तां जरासंधमब्रवीत्।
अनेनैव रिपुर्बद्धः श्रुत्वेति स व्यतर्कयत् ॥४८॥
कोऽयं किमाभिधानोऽस्य कुलं किमिति भूभुजा।
पृष्टे च सोऽवदन्नाथाहं च मन्दोदरीसुतः ॥४९॥
अर्थ (श्लोक 48 से 49): परन्तु वसुदेव ने पुत्री को कुलक्षणा जान कर जरासिंध से कहा कि शत्रु को मैंने नहीं बाँधा है किन्तु बाँधा है मेरे इस मित्र ने। इसलिए आप इसको ही पुत्री दीजिए। यह सुन जरासिंध मन ही मन सोचने लगा कि यह कौन है? इसका नाम क्या है? और न जाने इसका कुल कैसा है? इसके बाद उसने कंस से पूछा कि तुम्हारे माता-पिता कौन हैं ? कंस ने उत्तर दिया कि नाथ, मैं मन्दोदरी का पुत्र हूँ ॥४८-४९॥
मन्दोदरी समाहूता तदा तेन महीभुजा।
सा मञ्जूषां समादायागता मुक्त्वाथ तां जगौ ॥५०॥
वहन्तीं देव कालिन्द्यां मञ्जूषां प्राप्य तत्र च।
दृष्टोऽयं वर्धितः कंसनाम्ना मातेयमस्य वै ॥५१॥
मञ्जूषान्तस्स्थपत्रं स गृहीत्वावाचयत्तराम।
इत्युग्रसेनभूपस्य पद्मावत्याः सुतोऽप्ययम् ॥५२॥
विततार सुतां तस्मै राज्यार्धं स प्रहृष्टधीः।
कंसोऽपि वैरतः सैन्यैर्मथुरां समियाय च ॥५३॥
अर्थ (श्लोक 50 से 53): यह सुनकर जरासिंध ने मंदोदरी को बुलाया। वह अपने साथ में एक सन्दूक लेकर आई और उस सन्दूक को राजा के आगे रखकर बोली कि महाराज ! यह यमुना के प्रवाह में बहता हुआ आकर दैवयोग से मेरे हाथ लग गया था और इसी में मैंने इसे पाया था। इसलिए जन्म देने वाली तो इसकी यही माता है, पर पालने-पोषने के लिहाज से देखा जाये तो मैं भी माता हूँ। मैंने इसका कंस नाम रक्खा है परन्तु इस मंजूषा में इसके साथ एक पत्र और मिला था। उसके बाँचने से मालूम हुआ कि यह उग्रसेन राजा और पद्मावती रानी का पुत्र है। मंदोदरी के अन्तिम वचनों से जरासिंध को संतोष हुआ और उसने हर्षित होकर उसे आधे राज्य के साथ अपनी कन्या ब्याह दी ॥५०-५३॥
बन्धयित्वा स कोपेन गोपुरे पितरौ न्यधात्।
स्वपुरं वसुदेवोऽथ तेनानीतः स्वभक्तितः ॥५४॥
अर्थ: इसके बाद कंस, पिता से अपने वैर का बदला लेने के लिए बहुत-सी सेना सहित मथुरा आया और क्रोध के वश हो, माता-पिता को बाँधकर उसने शहर के दरवाजे में कैद कर दिया। कंस की वसुदेव पर बड़ी भक्ति हो गई थी, अतएव उसने वसुदेव को अपने यहाँ बुला लिया ॥५४॥
अथो मृगावतीदेशे दशार्णनगरे नृपः।
देवसेनः प्रिया तस्य धनदेवी धनप्रिया ॥५५॥
तयोः सुता शुभालापा देवकी कोकिलस्वना।
दापिता वसुदेवाय कंसेन महदाग्रहात् ॥५६॥
ततः क्रमेण संभूता देवक्यां युगलात्मना।
षट् सुताः सप्तमः कृष्णोऽजायताद्भुतविक्रमः ॥५७॥
पिता रामेण संमन्त्र्य भयात्कंसस्य गोकुले।
यशोदानन्दगोपाभ्यां तं वर्धनाय दत्तवान् ॥५८॥
कालेन पुण्यतस्तत्र वृद्धोऽसौ वृद्धबुद्धिमान्।
चाणूरेण समं कंसं निगृह्य सुखमाश्रितः ॥५९॥
अर्थ (श्लोक 55 से 59): मृगावती देश में दशार्ण नाम एक नगर है। वहाँ का राजा देवसेन था और उसकी रानी का नाम था धनदेवी। वह इन्द्र की इन्द्राणी जैसी थी। उनके एक पुत्री थी। उसका नाम था देवकी। उसका कोयल के जैसा सुंदर स्वर था। वह बहुत ही अच्छा आलाप लेती थी। कंस ने बड़े भारी आग्रह से देवकी वसुदेव के लिए दिलाई थी। इसके बाद क्रम से वसुदेव के निमित्त से देवकी के तीन बार दो-दो करके छह पुत्र पैदा हुए और बाद सातवाँ पुत्र कृष्ण पैदा हुआ। कृष्ण बड़ा पराक्रमी था। कृष्ण का जन्म होते ही वसुदेव बलभद्र की सलाह से, कंस के भय के मारे, गोकुल में नंदगोप और यशोदा के यहाँ गये और वहाँ कृष्ण नारायण को इसलिए छोड़ आये कि जिसमें निर्भीकता से उसका पोषण हो। कृष्ण का नंदगोप के यहाँ बड़ी अच्छी तरह पालन होता रहा। वह थोड़े ही दिन में खूब होशियार हो गया। वह बहुत ही बुद्धिमान् था। इसके बाद वह चाणूर और कंस का निग्रह करके पूर्ण सुख के साथ रहने लगा ॥५५-५९॥
रूप्याद्रौ रथचक्रादिनूपुरेऽथ पुरे पतिः।
सुकेतुस्तत्प्रिया प्रीता स्वयंशोभा स्वयंप्रभा ॥६०॥
तयोः सुभामा सत्याभा सत्यभामा सुताजनि।
या रूपेण शचीं नूनमधः कुरुत इत्यलम् ॥६१॥
अर्थ (श्लोक 60 से 61): रूपाचल पर्वत पर एक रथन्नूपुर नाम पुर है। वहाँ का सुकेतु नाम राजा था। उसकी प्रिया का नाम था स्वयंप्रभा। वह सुकेतु को बहुत ही प्यारी थी और अपने रूप-सौन्दर्य से खूब सुशोभित थी। उसके एक पुत्री थी। उसका नाम था सत्यभामा। वह सुभामा थी-सुन्दर कान्ति और श्री वाली थी। वह अपने रूप से इन्द्राणी को भी नीचा दिखाती थी ॥६०-६१॥
तादृशीं तां समालोक्य भूपो नैमित्तिकं मुदा।
निमित्तकुशलाख्यं चेत्यप्राक्षीत्कस्य वल्लभा ॥६२॥
जनितेयं स आलोच्यावोचद्देवी भविष्यति।
त्रिखण्डाधिपतेः श्रुत्वा दूतप्रेषणपूर्वकम् ॥६३॥
वैकुण्ठाय सुकेतुस्तां दत्त्वा निर्वृतिमाप च।
कृष्णोऽपि तां समालभ्य भेजे भोगं भवोद्भवम् ॥६४॥
अर्थ (श्लोक 62 से 64): उसको ऐसी सुन्दरी और कान्ति वाली देखकर उसके पिता सुकेतु ने निमित्तकुशल नाम निमित्तज्ञानी को पूछा कि सत्यभामा किसकी वल्लभा होगी। नैमित्तिक ने उत्तर दिया कि वह तीन खण्ड के स्वामी कृष्ण नारायण की पट्टरानी होगी। यह जान कर सुकेतु ने दूत के हाथ भेंट वगैरह
मथुरायामवस्थाप्योग्रसेनं नरनायकम्।
सौरीपुरं गताः सर्वे यादवाः कृष्णसंयुताः ॥६५॥
अर्थ (श्लोक 62 से 65): भेज कर सत्यभामा का कृष्ण के साथ ब्याह कर दिया। इसके बाद वह तो संसार से विरक्त हो गया और कृष्ण नारायण सत्यभामा को पाकर सांसारिक सुख भोगने लगा। इसी समय उग्रसेन राजा को मथुरा का राजा बना कर कृष्ण-सहित सबके सब यादव सौरीपुर चले आये ॥६२-६५॥
अथ राजगृहाधीशः श्रुत्वा कंसस्य पञ्चताम्।
जीवद्यशोमुखात्तूर्णं यादवेभ्यश्चुकोप सः ॥६६॥
आहवाय सुतान्सोऽपि प्रेषयामास यादवैः।
युद्धे ते भङ्गतां नीता दैवपौरुषविक्रमैः ॥६७॥
प्राहिणोत्स सुतं ज्येष्ठमपराजितनामकम्।
षट्चत्वारिंशदधिकं युद्धानां च शतत्रयम् ॥६८॥
अर्थ (श्लोक 66 से 68): इसके बाद जीवद्यशा नाम अपनी पुत्री के मुंह से राजगृह के राजा जरासिंध ने जब कंस का मरण सुना तब उसे यादव लोगों पर बड़ा भारी क्रोध आया। उसने उसी समय यादवों के साथ युद्ध करने को अपने पुत्रों को भेजा परन्तु वे यादवों के दैव और पौरुष के सामने ठहर न सके-सब नष्ट हो गये। यह देखकर जरासिंध के क्रोध का कुछ पार न रहा। तब उसने तीन सौ छियालीस योद्धाओं को साथ देकर, यादवों को तहसनाश करने के लिए, अपराजित नाम अपने बड़े पुत्र को भेजा ॥६६-६८॥
विधाय यादवैः सार्धं सोऽपि भङ्गं गतः क्षणात्।
पुनः संनह्य संप्राप्तो यादवान्सोऽपि दुर्धरः ॥६९॥
आगच्छन्तं पुनस्तं ते श्रुत्वा कालबलार्थिनः।
सौरीपुरं च मथुरां व्याजहुर्यादवाः क्षणात् ॥७०॥
आयान्तं तदनु क्रोधात्तं निवार्य च मायया।
देवताः प्रेषयामासुर्यादवान्पश्चिमां दिशम् ॥७१॥
अर्थ (श्लोक 69 से 71): लेकिन यादवों की शूरता के सामने उसकी भी कुछ न चली-वह भी युद्ध-स्थल की बलि हो गया। इस दुख-मय समाचार को सुनकर तो वह दुर्द्धर्ष वीर स्वयं ही कवच वगैरह पहिन कर तैयार हुआ और यादवों के साथ लड़ने को गया। जरासंध को आया सुनकर यादव लोग बड़े डरे और वे सौरीपुर तथा मथुरा को भाग गये। यह देख जरासिंध ने उनका पीछा किया, परन्तु देवों ने माया के द्वारा जरासिंध को तो पीछे लौटा दिया और यादवों को पच्छिम दिशा में सुदूर समुद्र तट पर भेज दिया ॥६९-७१॥
ततः कंसारिरात्मीयं विधातुं विधिवद्व्यधात्।
स्थानमष्टोपवासं चोदधेः पार्श्वे महामनाः ॥७२॥
नैगमाख्योऽमरस्तत्र तदागत्य च माधवम्।
अबीभणदिति स्पष्टं विशिष्टशुभनोदितः ॥७३॥
अश्वाकृतिधरं देवमारुह्य जलधौ तव।
गच्छतः पत्तनप्राप्तिर्भविता भोगिमर्दन ॥७४॥
वाहारूढे च कंसारौ जलधौ सति धावति।
द्विधाभावं गतोऽब्धिश्च यावन्नूतनवृद्धिभाक् ॥७५॥
अर्थ (श्लोक 72 से 75): इसके बाद मनस्वी कृष्ण नारायण ने समुद्र में मार्ग पाने की इच्छा से जैसी विधि से होने चाहिए, आठ उपवास किये। पुण्योदय से उसके पास नैगम नाम एक देव ने आकर कहा कि भोगियों-साँपों को मर्दित करने वाले निर्भय प्रभो! आप इस अश्व-भेष-धारी देव पर सवार होकर समुद्र में जाइए वहाँ आपको स्थान मिलेगा। यह सुनकर नारायण ने वैसा ही किया-वह समुद्र में गया। उस समय समुद्र का जल उसके लिए स्थल के जैसा हो गया। सारांश यह कि समुद्र में जहाँ से नारायण जाता था वहाँ का जल इधर-उधर दोनों ओर को हटता जाता था। नारायण शान्ति के
सुनासीराज्ञया तत्र किन्नरेशः पुरीं व्यधात्।
नेमीश्वरकृते चापि योजनाद्वादशायताम् ॥७६॥
अर्थ (श्लोक 72 से 76): साथ वहाँ पहुँचा जहाँ कि इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने नेमिनाथ प्रभु के लिए बारह योजन-अड़तालीस कोश की-लम्बी-चौड़ी नगरी रची थी ॥७२-७६॥
भास्वद्रत्नमयो यत्र शालस्तां परिवव्रके।
तुङ्गतोरणसत्तम्भप्रतोलीपरिखान्वितः ॥७७॥
मध्येपुरं यदूनां च बान्धवानां नरेशिनाम्।
सभिव्यानां च लोकानां गृहाणि विदधुः सुराः ॥७८॥
क्वचित्सरः क्वचिद्वापी क्वचित्श्रीजिनमन्दिरम्।
क्वचिज्जनाश्रयं तुङ्गं विदधे धनदो महान् ॥७९॥
अब्धिखातिकया वेष्ट्या नानाद्वारावलीयुता।
द्वारिकेति गता ख्यातिं पुरी लेखपुरीव या ॥८०॥
अर्थ (श्लोक 77 से 80): कुबेर ने नगरी के चारों ओर चमकते हुए रत्नों का विशाल कोट और कोट में सुन्दर थंभों वाले दरवाजे बनाये थे और उसके चारों ओर खाई खोद दी थी। उस नगरी के भीतर देवताओं ने प्रभु के बन्धु यादव राजाओं के लिए सुन्दर महल बनाये और अन्य जन के लिए मकान वगैरह की रचना की थी। कुबेर ने कहीं तालाब, कहीं बावड़ियाँ और कहीं श्री जैनमन्दिरों की रचना की थी। वह नगरी समुद्र-रूप खाई से बेढ़ी हुई थी और नाना दरवाजों से युक्त थी। इसलिए उसकी द्वारिका नाम से प्रसिद्धि हुई ॥७७-८०॥
तत्र यादवभूपालाः समुद्रविजयादयः।
कंसारिणा समं सर्वे निवसन्ति स्म वेश्मसु ॥८१॥
अथ तत्र सुखासीनः समुद्रविजयो जयी।
अजय्यो दस्युवर्गेण जितात्मा जितमत्सरः ॥८२॥
विशुद्धो धर्मधीर्धीरो विद्वान्विबुधवन्दितः।
सधृतिर्धर्मकर्माढ्यो धराधीशः समृद्धिभाक् ॥८३॥
भेजे भोगान्सुभव्यात्मा भवहर्तुः सुभक्तिमान्।
शुशुभेऽत्र भवान्भर्ता भुवो भ्राजिष्णुभूतलः ॥८४॥
अर्थ (श्लोक 81 से 84): वह इन्द्रपुरी के जैसी देख पढ़ती थी। बल्कि वह अपनी संपत्ति से उसको भी नीचा दिखाती थी। वहाँ देवताओं के बनाये हुए महलों में समुद्रविजय आदि यादव राजा कृष्ण सहित आनंद-चैन से रहते थे। वहाँ सुखपूर्वक रहने वाले समुद्रविजय की अपूर्व ही शोभा थी। वह विजेता था, किसी के द्वारा जीता नहीं जाता था, जितेन्द्रिय और मान-मत्सर-रहित था, विशुद्ध था, धर्मबुद्धि था, धीर था, विद्वान् था, देवता-गण द्वारा सेवित था, संतोषी था, धर्म-कर्म में लीन था, समृद्धिशाली था, पृथ्वी का पति था, भोगी और भव्यात्मा था, संसार के शत्रु जिनदेव का पूरा भक्त था, आदर योग्य था, पृथ्वी का पालक था और कान्तिशालियों का भूषण था ॥८१-८४॥
तज्जाया जगदानन्ददायिनी दानदायिका।
शिवादेव्यभिधा दक्षा दधाना विशदां मतिम् ॥८५॥
अनङ्गेन कृतावासा रतिवेगा रतिप्रदा।
आसीद्या सुभगा भूषा धिषणाम्बुधिपारगा ॥८६॥
अर्थ (श्लोक 85 से 86): उसकी जाया थी शिवादेवी। वह सारे संसार को आनंद और दान देने वाली थी, चतुरा थी और निर्मल बुद्धि वाली थी। कामदेव ने उसे रति समझ कर अपना आवास बना लिया था। वह रति-प्रदा थी-अपने पति को खूब रमाती थी। वह सुन्दरियों का भूषण थी और ज्ञान-समुद्र के पार पहुँची हुई थी। उसका स्वर तो इतना अच्छा था कि उसके सामने कोयल का स्वर भी अच्छा नहीं मालूम पड़ता था। मानों इसलिए कालेपने को स्वीकार कर विचारी कोयलें वन में जाकर रहने लगी
यस्याः स्वरेण संक्षुब्धाः कोकिलाः खलु भास्वराः। श्यामला वनमाभेजुर्निर्जितानामियं गतिः ॥८७॥
अर्थ (श्लोक 85 से 87): हैं और है भी ठीक कि दूसरों द्वारा जीते गये हुओं की ऐसी ही गति होती है ॥८५-८७॥
यत्पादपद्ममालोक्य त्रपापन्नानि सज्जनैः। संगं गतानि पद्मानि लज्जया जडसंगमः ॥८८॥
रम्भास्तम्भोपमौ यस्या ऊरू सरसकोमलौ। मदनागारसिद्ध्यर्थं स्तम्भायेते स्म सुस्थिरौ ॥८९॥
गम्भीराभाच्छुभा नाभिर्यस्यास्तु सरसीसमा। सावर्ता केशमीनाङ्का मदनद्विपकेलिभा ॥९०॥
यस्या वक्षसि वक्षोजौ क्ष्माभृताविव दुर्गमौ। कामिनां मारभूपस्य स्थितये दुर्गतां गतौ ॥९१॥
यस्या वदनशुभ्रांशोः शोभां वीक्ष्य विधुन्तुदः। बालच्छलात्समायात इव तद्ग्रहणेच्छया ॥९२॥
स्वर्णाभरणशोभाढ्यौ कर्णौ यस्या विरेजतुः। श्रुतिसंस्कारयोगेन संस्कृतौ श्रुतिसंमदौ ॥९३॥
एवं तौ दम्पती भोगान्भुञ्जानौ प्रविभासुरौ। शर्ममग्नौ वराकारौ रेजतुस्तत्र सद्धिया ॥९४॥
अर्थ (श्लोक 88 से 94): उसके चरण-कमलों को देखकर कमलों को इतनी लज्जा हुई कि वे जाकर जल में रहने लग गये। सच है कि लज्जा के मारे ही लोग जड़ों की संगति करते हैं, जैसे कि कमलों ने जड़ (जल) की संगति की है। उसके उरुस्थल केले के थंभों की तरह सरस और कोमल थे। वे ऐसे जान पड़ते थे मानों कामदेव के महल के लिए सुस्थिर खंभे ही बनाये गये हैं। उसकी नाभि बहुत ही गंभीर (गहरी) थी, कान्तियुक्त और सुहावनी थी। वह सरसी (तलइया) की समता करती थी। सरसी में जल होता है, उसमें लावण्यरूप जल था। सरसी में आवर्त होते हैं, वह भी शंख, चक्र आदि चिह्न-रूप आवर्त वाली थी। सरसी में मछलियाँ होती हैं, उसमें भी रोमराजि-रूप मछलियाँ थीं। सरसी हाथियों की केलि से शोभित होती है, वह भी कामदेव-रूप हाथी की केलि से सुशोभित थी। उसके दुर्गम पहाड़ों की तरह कुच थे। वे ऐसे जाने जाते थे कि मानो कामी पुरुषों के काम-भूप को रहने के लिए किले ही बनाये गये हैं। उसका मुख ठीक चन्द्रमा के समान था और उसके ललाट के ऊपरी भाग में सुन्दर बाल बिखरे हुए थे, जान पड़ता था कि उसकी मुखच्छवि को देखकर उसको ग्रसने की इच्छा से राहु ही आ गया है। उसके दोनों कान सोने के भूषणों से विभूषित थे और शास्त्र सुनने से जो संस्कार होता था उसके सम्बन्ध से वे संस्कृत थे। इस तरह वे दम्पती आनंद से सुख भोगते थे और अपनी उत्तम बुद्धि से प्रभासुर हुए अपूर्व शोभा पाते थे ॥८८-९४॥
अथैकदा सुधर्मेशो जिनोत्पत्तिं विबुध्य प्राक्। प्राहिणोत्तत्र यक्षेशं षण्मासान् रत्नवृष्टये ॥९५॥
शक्रेण प्रेषितो यक्षो रत्नवृष्टिस्तदालये। षण्मासाद्गर्भतः पूर्वं विदधे धर्मधीः स्वयम् ॥९६॥
खात्पतन्ती तदा रेजे रत्नवृष्टिः प्रभासुरा। आयान्ती स्वर्गलक्ष्मीर्वा लक्षितुं जिनमातरम् ॥९७॥
अर्थ (श्लोक 95 से 97): एक समय सौधर्म इन्द्र ने अवधिज्ञान से जिनदेव के गर्भागमन को जानकर छह महीने पहले से ही रत्नों की बरसा करने के लिए वहाँ कुबेर को भेज दिया। धर्मबुद्धि कुबेर ने भी इन्द्र की आज्ञानुसार प्रभु के गर्भ में आने के छह महीने पहले से जन्म तक-पंद्रह महीने-बराबर रत्नों की बरसा की। आकाश से गिरी हुई उन दिव्य रत्नों की बरसा ऐसी जान पड़ती थी मानों जिन-माता को देखने के लिए स्वर्ग की लक्ष्मी ही आ रही है या यों कहिए कि सारे आकाश को घेर कर पड़ती हुई
सा नभोऽङ्गणमापूर्य पतन्ती रुरुचे तराम्।
ज्योतिर्मालेव चायान्ती दिदृक्षुर्जिनमन्दिरम् ॥९८॥
रुद्धं च रत्नसंघातैः शातकुम्भभरैस्तथा।
जगुरङ्गणमावीक्ष्य जना धर्मफलं तदा ॥९९॥
अर्थ (श्लोक 95 से 99): वह रत्नों की बरसा ऐसी शोभती थी मानों जिनमन्दिर को देखने की इच्छा से ज्योतिषी देवताओं की पंक्ति ही आ रही है। रत्नों की बरसा से, भगवान् के महल का आँगन परिपूर्ण हो गया था। उस महल के शिखरों पर सोने के कलश जड़े हुए थे। उसे देखकर लोगों से यही कहते बनता था कि यह सब धर्म का फल है ॥९५-९९॥
अथैकदा शिवादेवी सुषुप्ता शयनोदरे।
निशात्यये ददर्शैतान् स्वप्नान्षोडश संमितान् ॥१००॥
ऐन्द्रं गजेन्द्रमैक्षिष्ट समदं मन्द्रबृंहितम्।
गवेन्द्रं सुसुधापिण्डमिव पाण्डुमुद्धुरम् ॥१०१॥
इन्दुच्छायं मृगेन्द्रं सोच्छलन्तं रक्तकन्धरम्।
पद्मां स्नाप्यां सुरेभाभ्यां कुम्भाभ्यां पद्मसंस्थिताम् ॥१०२॥
दामनी कुसुमामोदालग्ननानामधुव्रते।
ताराधीशं स्ववक्त्राब्जमिव तारासमन्वितम् ॥१०३॥
भास्वन्तं धूतसद्ध्वान्तं स्वर्णकुम्भमिवोद्धुरम्।
शातकुम्भमयौ कुम्भौ स्तनकुम्भाविवोन्नतौ ॥१०४॥
नेत्रायतिं झषौ पद्मे दर्शयन्ताविवात्मनः।
पद्माकरं सुपद्मोत्थकिञ्जल्कपरिपिञ्जरम् ॥१०५॥
लोलकल्लोललीलाढ्यं जलधिं मन्द्रनिस्वनम्।
सिंहासनं समुत्तुङ्गमेरुशृङ्गमिवोन्नतम् ॥१०६॥
पुत्रसूतिगृहाभासं विमानं विपुलश्रियम्।
भुजंग भुवनं भूमिमुद्भिद्य निर्गतं शुभम् ॥१०७॥
निधानमिव रत्नानां राशिं शुभ्रभराश्रितम्।
धनंजयं प्रतापं वा स्वसूनोर्धूमवर्जितम् ॥१०८॥
गजाकारेण वक्त्राब्जे विशन्तं तं ददर्श सा।
स्वप्नान्ते स्वपतो बुद्ध्वा विनिद्रनयनाम्बुजा ॥१०९॥
अर्थ (श्लोक 100 से 109): एक दिन शिवादेवी शय्या पर सुख की नींद सोई हुई थी। रात का पिछला पहर था। उस समय उसने सोलह स्वप्नों को देखा। वे स्वप्न ये थे। ऐरावत हाथी, बैल-जो खूब मदोन्मत्त उन्मत्त स्कंध वाला और सुधा के पिंड जैसा सफेद था, चन्द्रमा की छाया के जैसा मृगेन्द्र (सिंह)-जो छलांग मारता हुआ और जिसकी लाल कंधरा थी, लक्ष्मी-जिसका कि कमलयुक्त कुंभों द्वारा दो हाथी अभिषेक कर रहे थे, दो मालायें-जिन पर फूलों की सुगंध से भौंरे आकर गूँजते थे, चाँद-जो तारों से युक्त और शिवादेवी के मुख-कमल के तुल्य था, सूरज-जो अँधेरे को दूर करने वाला और सोने के कलश सरीखा था। सोने के दो कुंभ-जो शिवादेवी के कुच-कुंभों की तरह उन्नत थे, दो मछलियाँ-जो ऐसी मालूम होती थीं कि शिवादेवी के विस्तृत नेत्र ही हैं, पद्माकर-(तालाब) जो कमलों की केसर से पीला हो रहा था और चंचल तरंगों से परिपूर्ण था, समुद्र-जो गंभीर शब्दमय था, सिंहासन-जो ऊँचे सुमेरु पर्वत के शिखर की तरह उन्नत था, विमान-जो पुत्र के प्रसूति-गृह के तुल्य और विपुल श्री का स्थान था, धरणेन्द्र का भवन-जो ऐसा जान पड़ता था मानों पृथ्वी को चीरकर ही बाहर निकला है रत्नों की राशि-जो खजाने-सी जान पड़ती थी और जो किरणों के पूर से भरपूर थी, अग्नि-जो निर्धूम थी और ऐसी मालूम पड़ती थी कि मानो पुत्र का प्रताप ही है। इसके बाद ही उसने एक हाथी को अपने मुँह में प्रवेश करते हुए देखा ॥१००-१०९॥
ध्वनद्भिस्तूर्यसंघातैः प्रत्यबुद्ध ततश्च सा।
श्रृण्वती मङ्गलोद्गीतिं देवस्त्रीणां सुमङ्गला ॥११०॥
मातस्तमो निशाजातमुद्भिद्योदेति भानुमान्।
त्वन्मुखेन यथा याति तामसं मानसे स्थितम् ॥१११॥
करान्प्रसारयन्नुच्चैरुदितोऽयं दिवाकरः।
जगत्प्रबोधमाधत्ते तव गर्भर्भको यथा ॥११२॥
अर्थ (श्लोक 110 से 112): इन स्वप्नों को देखने के बाद ही उसकी निद्रा तो भंग हो ही गई थी कि इसी समय प्रातःकालीन बाजों की और देवांगनाओं द्वारा गाये गये मंगल गीतों की सुंदर ध्वनि उसके कानों में पड़ी। उसे सुनकर मंगलमयी शिवादेवी प्रबुद्ध हुई। उसे प्रबुद्ध देख देवाङ्गनाओं ने उसकी स्तुति करना आरंभ किया कि हे मातः! जिस तरह तुम्हारे मुख की प्रभा से मानसिक अँधेरा (अज्ञान) नष्ट हो जाता है उसी तरह रात के अँधेरे को नष्ट कर यह सूरज उदित हो आया है और तुम्हारे गर्भस्थ बालक की तरह अपनी किरणों को विस्तृत कर संसार को प्रबोध देता है, लोगों को मार्ग सुझाता है ॥११०-११२॥
सुप्रभातं तवास्तूच्चैः कल्याणशतभाग्भव।
अर्कं प्राचीव सोषीष्ठाः सुतं भवनभासकम् ॥११३॥
इति श्रुते प्रबुद्धा सा प्राग्बुद्धा स्वप्नदर्शनात्।
उत्तस्थे शयनाच्छीघ्रं हंसी वा सैकतस्थलात् ॥११४॥
प्रातर्विधिविधानज्ञा सुस्नाता प्राप्तमङ्गला।
पश्यन्ती दर्पणे वक्त्रं संस्कृता वरभूषणैः ॥११५॥
समुद्रविजयाभ्यर्णं तूर्णं गत्वा नता सती।
स्वोचितेन नियोगेन स्वोचितं स्थानमासदत् ॥११६॥
प्रफुल्लवदनाम्भोजा करकुड्मलधारिणी।
यथादृष्टसुस्वप्नानां फलं पप्रच्छ भूपतिम् ॥११७॥
अभाणीद्भूपतिर्भद्रं भुञ्जानो भुवनेश्वरः।
प्रिये प्रीतिकरे स्वप्नफलं शृणु सुबोधतः ॥११८॥
अर्थ (श्लोक 113 से 118): देवी, तुम सैकड़ों कल्याणों को प्राप्त करो और तुम्हारे लिए यह सुप्रभात शुभ हो। तुम उसी तरह पुत्र को जन्म दोगी जिस तरह कि पूर्व दिशा सूरज को जन्म देती है। तुम्हारा पुत्र तीन लोक को प्रकाशित करेगा। देवांगनाओं के इन मनोहर शब्दों को सुनकर बालू के जैसी स्वच्छ रूई की श्वेत-कोमल शय्या पर से शिवादेवी उठीं। इसके बाद उसने स्नान आदि प्रभात-संबंधी सब क्रियाएँ करके और दर्पण में अपना मुँह देखकर वस्त्राभूषण धारण किये और वह सती समुद्रविजय महाराज के पास गई। उन्हें नमस्कार कर वह उनके साथ आधे सिंहासन पर बैठ गई। इस समय उसका मुख कमल के जैसा खिल रहा था। उसने हाथ जोड़कर स्वप्नों का सब हाल महाराज से कहा और उनसे उनका फल पूछा। उत्तर में पुण्यात्मा समुद्रविजय ने कहा कि प्रीति देने वाली प्रिये, तुम ध्यान से इन स्वप्नों का फल सुनो ॥११३-११८॥
सूनुस्ते भविता देवि गजदर्शनतो वृषात्।
जगज्ज्येष्ठो महावीर्यो मृगारेर्दामवीक्षणात् ॥११९॥
धर्मतीर्थकरो लक्ष्म्याभिषेकं मेरुमस्तके।
आप्तासौ पूर्णचन्द्रेण जनाह्लादी च भास्करात् ॥१२०॥
अर्थ (श्लोक 119 से 120): पहले स्वप्न में तुमने जो हाथी देखा है उसका यह फल है कि तुम्हारे पुत्र होगा। बैल देखने से वह संसार भर में श्रेष्ठ होगा। सिंह देखने से पराक्रमी, महान् वीर्यशाली होगा। माला देखने से धर्म-तीर्थ का प्रवर्तक होगा। अभिषिक्त होती हुई लक्ष्मी के देखने से उसका सुमेरु के शिखर पर अभिषेक होगा। पूर्ण चाँद देखने से वह संसार को आल्हादित करेगा। सूरज देखने से दीप्तिशाली, भासुर होगा। कुंभ देखने से निधियों का भोक्ता और मछलियों देखने से सुखी होगा। तालाब देखने
भास्वरः कुम्भतः प्रोक्तो निधीनामीशिता सुखी। सरसा लक्षणाकीर्णोऽब्धिना स केवलेक्षणः ॥१२१॥
सिंहासनेन साम्राज्यं भोक्ता नाकविमानतः। नाकादस्यावतारः स्यात्फणीन्द्रभवनेक्षणात् ॥१२२॥
सोऽवधिज्ञाननेत्राढ्यो रत्नराशेर्गुणाकरः। निर्धूमज्वलनालोकात्कर्मकक्षहुताशनः ॥१२३॥
गजाकारं समादाय त्वद्गर्भेऽवतरिष्यति। सोऽरिष्टनेमिसन्नामा धर्मसद्रथवर्तनात् ॥१२४॥
अर्थ (श्लोक 119 से 124): से नाना लक्षणों वाला और समुद्र देखने से केवलज्ञानी होगा। सिंहासन देखने से साम्राज्य का भोक्ता होगा। विमान देखने से वह स्वर्ग से आएगा। धरणेन्द्र का भवन देखने से अवधिज्ञान का धारक होगा। रत्नराशि देखने से गुणी का आकर होगा और निर्धूम आग देखने से वह कर्मों को जलाने के लिए आग के तुल्य होगा। वह हाथी के आकार को लेकर तुम्हारे गर्भ में आवेगा और धर्म-रूपी समीचीन रथ को प्रवर्तने के कारण उसका अरिष्टनेमि नाम होगा ॥११९-१२४॥
श्रुत्वा सा प्रमदापूर्णा फलं स्वप्नसमुद्भवम्। हर्षोत्कर्षितचेतस्का दधौ रोमाञ्चितं वपुः ॥१२५॥
कार्तिकोच्च्वलपक्षस्य षष्ठ्यां चाथ निशात्यये। उत्तराषाढनक्षत्रे तद्गर्भे संस्थितिं व्यधात् ॥१२६॥
तदा ज्ञात्वा सुराः सर्वे स्वस्य चिह्नेन सत्वरम्। आगत्य गर्भकल्याणं कृत्वागुः स्वं स्वमास्पदम् ॥१२७॥
श्रीः श्रियं ह्रीस्त्रपां धैर्यं धृतिः कीर्तिः स्तुतिं मतिम्। बुद्धिर्लक्ष्मीश्च सौभाग्यं दधुस्तस्यामिमान्गुणान् ॥१२८॥
अर्थ (श्लोक 125 से 128): इस प्रकार स्वप्नों का फल सुनकर शिवादेवी बहुत हर्षित हुई। उसके रोमाञ्च हो आये। हर्ष से उसका चित्त गद्गद हो गया। इसके बाद कार्तिक सुदी छठ के दिन, पिछली रात में, उत्तराषाढ़ नक्षत्र में, शिवादेवी ने गर्भ धारण किया। उस समय प्रभु को गर्भ में आया जान कर अपने-अपने चिह्न सहित देवता गण आये और गर्भकल्याणक का उत्सव करके अपने-अपने स्थान को चले गये। प्रभु जब से गर्भ में आये तभी से लेकर इन्द्र की आज्ञा से छप्पन दिक्कुमारियाँ उनकी माता की सेवा करती थीं। वे गर्भ-समय के योग्य क्रियाओं द्वारा सेवा करने में बहुत ही दक्ष थीं। श्रीदेवी ने प्रभु की माता को श्री दी और ह्री देवी ने त्रपा (लाज) दी। धृति देवी ने धैर्य दिया और कीर्ति देवी ने कीर्ति दी एवं बुद्धि देवी ने बुद्धि दी और लक्ष्मी देवी ने सौभाग्य दिया। सारांश यह कि उक्त छह देवियों ने प्रभु की माता को उक्त छह गुण दिये ॥१२५-१२८॥
काश्चिन्मज्जनकरिण्यः काश्चित्ताम्बूलदायिकाः। मङ्गलं कुर्वते काश्चित्काश्चित्संस्कारसाधिकाः ॥१२९॥
काश्चिन्महानसे पाकं कुर्वते रचयन्त्यपि। शय्यामुच्छीर्षवस्त्राढ्यां पादसंवाहनं पराः ॥१३०॥
काश्चित्सिंहासनं चारु चक्कलाकलितं दधुः। काश्चित्सुगन्धद्रव्याणि पुरन्ध्रय इव वै ददुः ॥१३१॥
काश्चिदाभरणोद्भासिकरास्तस्याः पुरः स्थिताः। कल्पवल्ल्य इवाभान्ति भाभारवरभूषणाः ॥१३२॥
अर्थ (श्लोक 129 से 132): इनके सिवाय कोई शिवादेवी की आँखों में अंजन आँजती थी, कोई पान लगा कर देती थी, कोई मंगलगीत गाती थी, कोई उसके शरीर का संस्कार करती थी, कोई रसोई बनाती थी, कोई कोमल वस्त्रों की शय्या बिछाती थी, कोई उसके पाँव दबाती थी, कोई उसके बैठने के लिए मनोहर सिंहासन पर गद्दी तकिया वगैरह डालती थी, कोई पुरंध्री की तरह सुगन्ध द्रव्य चन्दन, कर्पूर वगैरह का लेप करती थी, कोई उसके आभूषणों को लिए खड़ी हुई ऐसी मालूम पड़ती थी मानों दीप्ति के
काश्चिद्वासांसि क्षौमाणि प्रसूनस्तबकावहाः ।
माला रेजुर्ददत्योऽत्र व्रतत्य इव विस्तृताः ॥१३३॥
उत्खातासिकराः काश्चिच्छरीररक्षाविधौ यताः।
तदभ्यर्णे स्थिता रेजुश्चञ्चला इव खस्थिताः ॥१३४॥
चन्दनच्छटयाच्छन्नमच्छिन्नमणिभूतलम्।
काश्चित्कुर्वन्ति कम्राङ्गाश्चन्दनागलता इव ॥१३५॥
पुष्पस्वस्तिकमाभेजुः सुभुजैर्भोगदायिकाः।
काश्चिद्द्वारां सुशोधिन्या शुद्धां कुर्वन्ति कोविदाः ॥१३६॥
काश्चित्पक्वान्नसंपन्नमोदकौदनपायसम्।
पूपांश्च मण्डकाखण्डखज्जकामृतशर्कराः ॥१३७॥
सूपशाल्यन्नमुद्गान्नं नानाव्यञ्जनसंयुतम्।
दधीनि पिच्छिलान्याशु शुद्धदुग्धानि सद्रसान् ॥१३८॥
प्राज्यमाज्यं करम्बं च कर्पूरलवणान्वितम्।
शक्रस्य दुर्लभं तक्रं ददते मातृभुक्तये ॥१३९॥
पादप्रक्षालनं काश्चित्काश्चिदादर्शकं ददुः।
वक्त्रेक्षणाय चान्द्रं वा बिम्बमिद्धं धरागतम् ॥१४०॥
पुष्पमालां करे कृत्वा मातुरग्रे स्थिता बभुः।
काश्चिच्छाखिसुशाखा वा सेवां कर्तुमिहागताः ॥१४१॥
मुकुटं कुण्डले काश्चित्काश्चिद्धारलतां शुभाम्।
ददते कण्ठिकां काश्चिच्छाखा वा कल्पशाखिनः ॥१४२॥
पुष्परेणुसमाकीर्णां क्षरन्मुक्ताफलाविलाम्।
महीं मार्जन्ति काश्चिच्च स्वर्णरेणुसुसंकराम् ॥१४३॥
पटुघोण्टाफलाखण्डखण्डान्येलालवङ्गकैः।
नागवल्लीदलान्यन्या ददुर्नगलता इव ॥१४४॥
अर्थ (श्लोक 133 से 144): पूर से विभूषित कल्पलता उसे भूषण ही दे रही है, कोई उसे रेशमी वस्त्र देती थी, कोई फूलों की गूँथी हुई मालाएँ देती हुई बेल-सी जान पड़ती थी, कोई तलवार उठाये हुए प्रभु की माता के शरीर की रक्षा के लिए उसके पास पहरा देती थी वह ऐसी जान पड़ती थी मानों बिजली ही है, कोई चन्दन के जल से मणिजड़ित भूतल को सींचती हुई ऐसी शोभती थी मानों चंदन वृक्ष की लता ही है, कोई भोग्य-वस्तुओं को देने वाली फूलों के चौक पूरती थी, कोई पृथिवी को शोधने वाली भूमि को साफ करती थी-झाड़ती-बुहारती थी, कोई प्रभु की माता को खाने के लिए अच्छे-अच्छे सब प्रकार के पकवान मोदक, व्यंजन आदि देती, कोई उसके पाँव धोती थी, कोई मुँह देखने के लिए पृथ्वीतल पर आये हुए चन्द्रमा के जैसा उसे दर्पण देती थी, कोई हाथ में पुष्पों की माला लेकर प्रभु की माता के आगे खड़ी हुई ऐसी शोभती थी मानों उसकी सेवा करने को यहाँ किसी वृक्ष की शाखा ही आ गई है, कोई उसे मुकुट और कोई कुण्डल पहनाती थी, कोई उसके कण्ठ में हार पहनाती हुई कल्पवृक्ष की शाखा जैसी शोभती थी, कोई पुष्पों की धूल (केसर) से भरपूर अतएव सोने की धूल से धूसरित जैसी और जिस पर इधर-उधर मोती बिखर रहे हैं ऐसी पृथ्वी को साफ करती थी, कोई सुपारी, इलायची, लोंग आदि से सुसज्जित पान देती थी-वह ऐसी जान पड़ती थी मानों नागबेल ही है, कोई स्वर्ग की गणिका उत्तम हाव-भावों को दिखाती हुई उसके सामने नृत्य करती थी, कोई उसके मन को आनन्दित करती थी, कोई मनोहर कामधेनु का रूप धर कर प्रभु की माता को उत्तम-उत्तम वस्तु देती थी, कोई माता की प्रीतिपात्र बनी हुई सुशोभित होती थी, कोई उसके शरीर की रक्षा करती थी, कोई उसके हाथ से वस्तु लेती थी, कोई उसके मन को पुष्ट करती-बढ़ाती थी, कोई उत्तम-उत्तम वार्तालाप द्वारा उसके साथ विचार करती थी, कोई उसके मल को स्वच्छ करती थी, कोई उसके मोहभाव को उत्तेजना देती थी, कोई चोर आदि के भय से उसकी आत्मा को छुड़ाती थी,
नर्नर्ति नाकगणिका वरहावभावा वर्वर्ति मातृहृदयानगता च काचित् ।
संबोभवीति कमनीयसुकामधेनुः संजोहवीति वरकामगुणं च काचित् ॥१४५॥
बाभायते मातृमता च काचित्पापायते मातृतनं च काचित् ।
लालायते मातृकराच्च वस्तु दाधायते मातृमनश्च काचित् ॥१४६॥
मीमांसते ताममरी सुदाम्ना दीदांसतेऽन्या च मलं सुमातुः ।
शीशांसते मोहभरं च काचिद्भीभत्सते दस्युदरं च काचित् ॥१४७॥
दीप्रैः सुदीपैः सुरकामिनी च काचित्सुभक्तिं निशि जैनमातुः ।
चर्कर्ति काचिद्वरवस्त्रदत्तिं शक्राज्ञया नाकवधूः समस्ता ॥१४८॥
अर्थ (श्लोक 129 से 148): कोई रात के समय दैदीप्यमान दीपकों द्वारा उसकी भक्ति करती थी और कोई सुन्दर-सुन्दर वस्त्र प्रदान करती थी। तात्पर्य यह कि इन्द्र की आज्ञा से सब देव-कन्याएँ जिनमाता की नाना भाँति से सेवा-शुश्रूषा करती थीं ॥१२९-१४८॥
नररूपं समादाय नर्नर्ति सुरनर्तकी। तच्चेष्टितं प्रकुर्वाणा हासयन्त्यखिलाञ्जनान् ॥१४९॥
कदाचिज्जललीलाभिः कदाचिद्वरनर्तनैः । रमयन्ति स्म तां देव्यः सेवासक्तसुमानसाः ॥१५०॥
गीतगोष्ठीं गता माता देव्या साकं रसान्विता । कदाचिद्विविधा वार्ता विदधे शुद्धमानसा ॥१५१॥
दिक्कुमारीसमं राज्ञी कालमित्थं निनाय च। सा बभार परां कान्तिं कला चान्द्रमसी यथा ॥१५२॥
अर्थ (श्लोक 149 से 152): इसी प्रकार कुछ देवियाँ मनुष्यनी का रूप धरकर वहाँ आती और नाना तरह के हाव-भाव विलास के साथ नृत्यकर सब, जनों को हँसाती और आनंद में मग्न कर देती थीं। देवियाँ जिनमाता की सेवा में इतनी लवलीन थीं कि वे जिस तरह बनता उसके चित्त को सदा ही खुश रखती थीं। वे कभी,जल-लीला से और कभी नृत्य के हास-विनोद से प्रभु की माता के दिल की रमाती थीं और शुद्ध मन वाली जिनमाता भी उनकी गीत-गोष्ठी में जाकर उन देवियों के साथ नाना तरह की रस भरी बातें करती थी। शिवादेवी ने इस तरह से दिक्कुमारियों के साथ बहुत-सा काल बिताया। इस समय वह अपनी कान्ति से चन्द्रमा की कला के जैसी सुशोभित होती थी ॥१४९-१५२॥
अभ्यर्णे नवमे मासेऽन्तर्वत्नीमथ सदसैः। देव्यस्तां रमयामासुर्गद्यपद्यैर्वराक्षरैः ॥१५३॥
अर्थ: इसी प्रकार आनंद-चैन से धीरे-धीरे आठ महीने बीतकर नौवाँ महीना लग गया। इस समय वे देवियाँ गर्भिणी जिनमाता को रस-पूर्ण और उत्तम रचना वाले गद्य-पद्य सुनाती थी और उसका चित्त प्रसन्न करती थीं। इसके सिवाय वे प्रभु की माता से गूढ़ अर्थ वाले प्रश्न पूछती थीं और जिनमाता उनका उत्तर करती थी। किसी ने पूछा कि हे माता!
पुष्पावगुण्ठिता का स्यात्का शरीरपिधायिका । का देहदाहिका देवि वदाद्याक्षरतः पृथक् ॥१५४॥
अर्थ (श्लोक 153 से 154): पुष्पों से गूँथी गई क्या चीज होती है ? शरीर को कौन ढँकता है ? और शरीर को क्षीण कौन करता है ? इन तीन प्रश्नों के ऐसे उत्तर दीजिए। जिनका पहला अक्षर ही केवल दूसरा-दूसरा हो ॥१५३-१५४॥ उत्तर में माता ने कहा-स्रक् (माला) त्वक् (खाल), रुक् (रोग)। किसी ने पूछा-
पुष्पावगुण्ठिता का स्यात्का शरीरपिधायिका। का देहदाहिका देवि, वद्याद्याक्षरतः पृथक्॥१५५॥
अर्थ: सांसारिक दुखों की दूर कौन करता है ? पैरों बिना कौन चलता है ? और लोगों को संतोष कौन देता है ? इन प्रश्नों के ऐसे उत्तर कीजिए जिनका आदि व्यंजन ही केवल दूसरा-दूसरा हो ॥१५५॥ उत्तर में माता ने कहा-जिन (अर्हन्त), स्वन (शब्द), घन (मेघ)। किसी ने पूछा अच्छा माता
आद्यन्तरहितः कोऽत्र कः कीलालसमन्वितः।
वक्त्रादुत्पद्यते कोऽत्र कथयाद्याक्षरैः पृथक् ॥१५६॥
अर्थ: इस लोक में आदि-अन्त रहित कौन है ? जल-युक्त क्या होता है ? और मुँह से क्या उत्पन्न होता है ? इन प्रश्नों के ऐसे जबाब दीजिए जिनके पहले के अक्षर ही दूसरे-दूसरे हों ॥१५६॥ उत्तर में माता बोली-संसार, कासार (तालाब) और व्याहार (वचन)। किसी ने पूछा-
नरार्थवाचकः कोऽत्र कः सामान्यप्ररूपकः।
का व्रते प्रथमा ख्याता कीदृशी त्वं भविष्यसि ॥१५७॥
अर्थ: नर-पुरुष अर्थ का वाचक कौन है ? सामान्य को कहने वाला कौन है ? पहले व्रत में क्या माना गया है ? और तुम कैसी होओगी? ॥१५७॥ उत्तर में माता ने कहा-ना (नृ शब्द), क, दया और नाकोदया (स्वर्ग से चय कर आये हुए पुत्रवाली)। तात्पर्य यह कि ‘नृ’ शब्द की प्रथमा विभक्ति का एक वचन ‘ना’ और ‘क’ शब्द का ‘कः’ दोनों एकत्र लिखने से हुआ ‘नाकः’। फिर दया शब्द का ‘द’ आगे होने से ‘क’ के आगे वाले विसर्ग का हो गया ‘ओ’ तब अन्त के प्रश्न का उत्तर ‘नाकोदया’ हो गया। किसी ने पूछा-
सुखप्ररूपकं किं स्यात्का भाषा च कृपातिगा।
भुजप्ररूपकः कः स्यात्कः सेव्यो जनसत्तमैः ॥१५८॥
अर्थ: सुख का प्ररूपक कौन है ? कृपा-विहीन कौन-सी भाषा होती है ? भुजाओं को कहने वाला कौन है ? उत्तम पुरुष किस की सेवा करते हैं ? ॥१५८॥ माता ने उत्तर दया-शम्, अदया (जो दया बिना बोली जाती है), कर और शमदयाकर (समताभाव और दया का आकर)। किसी ने पूछा- वित्त को कहने वाला कौन-सा शब्द है? योद्धाओं को युद्ध से कौन-सा पद मिलता है
वित्तप्ररूपकं किं स्यात्पदं संग्रामतः खलु। कः स्यात्संग्रामशूराणां कः स्यादर्जुनपाण्डवः ॥१५९॥
अर्थ: ? और अर्जुन को क्या कहते हैं ? ॥१५९॥
पानाथेऽपि च को धातू रक्षणार्थेऽपि को मतः। कः सामान्यपदाभ्यासी कृशानुः कोऽभिधीयते ॥१६०॥
आद्याक्षरं विना पक्षी कः को मध्याक्षरं विना। भुक्त्यर्हः कोऽन्त्यमुन्मुच्य संबुद्धिः पानरक्षणे ॥१६१॥
अर्थ (श्लोक 160 से 161): पीने अर्थ में जिसका कि लोट के मध्यपुरुष के एक वचन में पिब रूप होता है, कौन-सी धातु है? तथा रक्षण अर्थ में कौन धातु है? और सामान्य पद को कहने वाला कौन है ? तथा कृशानु किसे कहते हैं ? इन प्रश्नों के ऐसे उत्तर दीजिए जिनका मिला हुआ पद पहले अक्षर के बिना पक्षी का कहने वाला हो, बीच के अक्षर बिना भोग्य पदार्थ को कहने वाला हो और अन्त के अक्षर को छोड़ देने से वही पीने और रक्षण अर्थ में जो धातुएँ हैं उनसे निष्पन्न शब्दों का सम्बोधन का रूप हो जाय ॥१६०-१६१॥
वसुसंख्या तु काप्त्यर्थधातुरूपं च किं लिटि। किं कलत्रं सुवर्णं किं कं कैलासं वदाशु भोः ॥१६२॥
अर्थ: वसु को कहने वाली संख्या कौन है ? प्राप्ति-अर्थ वाली धातु का लिट् में क्या रूप होता है ? स्त्रीलिंग का बोधक कौन है ? सोना और कैलाश किसे कहते हैं ? ॥१६२॥
किं निश्चयपदं लोके कस्तिरश्चां लघुर्वद। शुभः को मोक्षसिद्धयर्थं को भवेत्सर्वदाहकः ॥१६३॥
अर्थ: निश्चयवाचक पद कौन है ? तिर्यञ्चों में छोटा कौन है ? मोक्ष सिद्धि के लिए उपयुक्त कौन है? और सबको जलाने वाली क्या चीज होती है ? ॥१६३॥
कृष्णसंबोधनं किं स्यात्किं पदं व्यक्तवाचकम्। के गर्वाः को विधीयेत वादिभिर्निगमश्च कः।
प्रसिद्धोऽथ भुजंगेशोऽहंकारवादकस्तु कः ॥१६४॥
अर्थ: कृष्ण का सम्बोधन क्या होता है ? व्यक्त को कहने वाला पद कौन-सा है? गर्व कौन से हैं ? वादी लोग क्या करते हैं ? प्रसिद्ध निगम (गाँव) कौन-सा है ? भुजगेश और अहंकार को कहने वाले कौन से शब्द हैं ? ॥१६४॥ माता ने उत्तर दिया-अ, हि, मदा (आठ मद), वाद, अहिमदाबाद, अहि, मद।
इष्टानिष्टं दहेत्सर्वं देवो दाहकरस्तथा। अन्धकृद्धृततेजस्कः स भाति भूधरोदरे ॥१६५॥
अर्थ: देव इष्टानिष्ट सबको जलाता है तथा सबको दाह उत्पन्न करता है। उसने तेज धारण किया, वह लोगों को अंधा बनाता है और पर्वत के उदर में चमकने लगता है। माता ने कहा देव के स्थान पर दव होना चाहिए। दव का अर्थ अग्नि है जो इष्टानिष्ट को जलाता है ॥१६५॥
रम्यं काय फलं मातः सर्वेषां तोषदायकम्। जिनचक्रिबलादीनां पदस्य सकलोन्नतेः ॥१६६॥
अर्थ: जिन, चक्रवर्ती, बलभद्र आदि सबको पूर्ण उन्नति के पद का सन्तोष देने वाला रमणीय फल क्या है, सो कहो ॥१६६॥ माता ने उत्तर दिया, अमृत-मोक्ष।
अम्बास्य विपुलं सर्वमेनोवृन्दं जनोद्भवम्। त्वं भवसारनीरेशं विधुंतुदसमं शुभे ॥१६७॥
जय देवि जगन्नाथ पुत्रहेतो शुभानने। जगतत्रयवधूरूपसीमे कोकिलनिःस्वने ॥१६८॥
अर्थ (श्लोक 167 से 168): इनमें कोई माता से विन्ती करती थी कि माता, तुम लोगों के पाप-समूह को दूर करो। वह उन्हें बहुत दुख देता है और उनकी आत्मा को चन्द्रमा को ग्रसने वाले राहु की भाँति ग्रसता है। कोई माता का जय-जयकार बोलती थी कि सुहावने मुँह वाली माता, तुम्हारी जय हो, देव और जगत् के स्वामी पुत्र को पैदा करने वाली, तीन लोक की सारी स्त्रियों के रूप की सीमा तथा कोयल के जैसे कंठ वाली हे माता, तुम जयवन्त रहो ॥१६७-१६८॥
एवमुत्तरपद्यानि ताभिर्गूढार्थकानि च।
प्रयुक्तानि तया शीघ्रं कथितानि विशेषतः ॥१६९॥
बुद्धिः स्वाभाविकी तस्या नानाप्रश्नोत्तरक्षमा।
भूषोनालकृता रेजे मणिना हारयष्टिवत् ॥१७०॥
बभार गर्भजं तेजो निसर्गरुचिर्जिता।
राज्ञी रत्नमयं धाम भूर्यथाकरगोचरा ॥१७१॥
पीडा च गर्भजा तस्या नाभूत्स्वप्नेऽपि दुर्बहा।
वह्निकान्तिरिवादर्शे प्रतिबिम्बाकृतिं गता ॥१७२॥
मा भूद्भङ्गस्त्रिवल्याश्चोदरे ऽस्याः पूर्ववत्स्थितेः।
न कृष्णत्वं कुचद्वन्द्वचूचके हंसवद्गतेः ॥१७३॥
न पाण्डु वदनं जातं तस्या आलस्यसंततिः।
ववृधे चार्भको गर्भे तथापि सुखकारकः ॥१७४॥
अर्थ (श्लोक 169 से 174): इस प्रकार देवियों ने जिनमाता से गूढ़ अर्थ वाले बहुत से प्रश्न किये और माता ने उनका अति शीघ्र और उचित उत्तर किया। उसकी बुद्धि स्वभाव से ही नाना प्रश्नों के उत्तर करने को समर्थ थी। वह प्रभु को गर्भ में लिये ऐसी शोभती थी जैसी कि मणियों के द्वारा हारलता शोभती है। स्वभाव से ही तेजशाली उसके शरीर की शोभा गर्भ के तेज से और भी बढ़ गई थी, जैसे कि स्वभाव से कान्तिमय खान की शोभा रत्नों की कान्ति से और भी बढ़ जाती है। गर्भ के निमित्त से उसे कभी स्वप्न में भी कोई दुर्बह पीड़ा न हुई। ठीक ही है कि क्या मनोहर दर्पण में पड़ा हुआ आग का प्रतिबिम्ब उसे जला सकता है? उसका गर्भ दुर्बह नहीं हुआ था। न उसकी त्रिवली का भंग हुआ था और न उसके कुचों के चूचक काले पड़े थे, न उसका मुँह पीला हुआ था और न उसे आलस ही आता था। उसकी हंस के जैसी पहले गति थी वैसी ही अब थी, उसमें कुछ भी फर्क नहीं हुआ था। तात्पर्य यह कि दुख की बात तो दूर रही, पर ज्यों-ज्यों उसका गर्भ बढ़ता जाता था त्यों-त्यों वह उसके लिए सुखकर होता जाता था ॥१६९-१७४॥
अथैवं नवमासेषु गतेषु सुषुवे सुतम्।
श्रावणे शुक्लपक्षे सा षष्ठ्यां चित्रागते विधौ ॥१७५॥
देवी देवीभिरुक्ताभिः सेविता सुतमाप सा।
पद्मबन्धुं यथा प्राची नलिनं नलिनीव च ॥१७६॥
त्रिभिर्बोधैः समायुक्तः शिशू रेजे शुभैर्गुणैः।
मन्दं मन्दं ववौ वायुस्तदा सद्गन्धबन्धुरः ॥१७७॥
संमार्जितरजोराजीर्भूरादर्शसमा बभौ।
विकसन्नवनीरेजोरोमाञ्चान्वितविग्रहा ॥१७८॥
देवानामासनान्युच्चैरकस्मात्प्रचकम्पिरे।
तदा शिरांसि जिष्णूनां धुन्वन्मौलिमणीन्यभुः ॥१७९॥
कल्पे घण्टाघनारावः सैंहशब्दश्च ज्योतिषि।
भेरीध्वनिरभूद्वाने भवने शङ्खनिस्वनः ॥१८०॥
अर्थ (श्लोक 175 से 180): इस प्रकार धीरे-धीरे आनंद-चैन से जब नौ महीना पूरे हो गये तब सावन सुदी छट के दिन, चित्रा नक्षत्र में, उस महादेवी शिवादेवी ने पुत्र-रत्न को जन्म दिया, जैसे पूर्वदिशा सूरज को जन्म देती है। पुत्र जन्म से ही तीन ज्ञान का धारक था और गुणों का पुंज था। प्रभु के जन्म-समय मंद-मंद सुगन्धित वायु चल रही थी। पृथ्वी धूल-रहित दर्पण की तरह निर्मल हो गई थी। खिले हुए नील कमल उसके रोमाञ्च के जैसे जान पड़ते थे। भगवान् का जन्म होते ही एकाएक देवताओं के आसन कंपित हो उठे। उनके मुकुट अपने आप नम गये एवं बिना बजाये ही कल्पवासियों के यहाँ घंटों का नाद, ज्योतिषियों के यहाँ सिंह-नाद, व्यन्तरों के यहाँ दुंदुभियों का शब्द और भवनवासियों के यहाँ
तदुत्पन्नं तदा सर्वे श्रुत्वा चाकस्मिकं ध्वनिम्।
विज्ञाय जन्म देवस्य बभूवुर्हर्षिताननाः ॥१८१॥
अर्थ (श्लोक 175 से 181): शंख-नाद होने लगा। जिसका सुनकर उन्होंने प्रभु के जन्म का निश्चय किया और वे बड़े भारी हर्षित हुए ॥१७५-१८१॥
ततोऽपीन्द्राज्ञया सुज्ञा निर्ययुर्निजधामतः।
स्वस्वासनसमासक्ताः ससुरासुरनायकाः ॥१८२॥
वियतस्तेऽवतीर्याशु तत्पुरं सपुरंदराः।
सुराः प्रापुः प्रमोदेन कुर्वन्तो भूमिमेजयम् ॥१८३॥
शक्राज्ञया शुची शुद्धा प्राविशत्प्रसवालयम्।
ततोऽदर्शि तया माता सुतेन सममञ्जसा ॥१८४॥
जिनस्य जननीं गूढा त्रिः परीत्यानमच्छची।
तस्थौ मातुः पुरो देशे पश्यन्ती परमं जिनम् ॥१८५॥
कराभ्यां तं समादाय मुक्त्वा मायामयार्भकम्।
शची पुरंदराभ्यर्णं जगाम सुसुरीस्तुता ॥१८६॥
अर्थ (श्लोक 182 से 186): इसके बाद इन्द्र की आज्ञा से सब देवगण इन्द्र के साथ-साथ अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर स्वर्ग से आकाश-मार्ग द्वारा पृथ्वीतल पर उतर कर द्वारिका में आये। इस समय उनके आनंद का कुछ पार न था। वहाँ आकर इन्द्र की आज्ञा से गुप्त भेष में इन्द्राणी प्रसूति-गृह में गई और वहाँ प्रभु-सहित शिवादेवी को देखकर उसने उन्हें नमस्कार किया। इसके बाद वह प्रभु को सतृष्ण लोचनों से निरखती हुई जिन-जननी के सामने खड़ी हो गई और जिनमाता के पास एक मायामयी बालक को सुलाकर उसने प्रभु को गोद में उठा लिया और उन्हें वह बाहर इन्द्र के पास ले आई ॥१८२-१८६॥
पुरंदरकरे प्रीता ददौ दीप्ता सुनन्दनम्।
तमर्भकं समादाय सोऽपि मेरुमुपस्थितः ॥१८७॥
मेरौ च पाण्डुकेऽरण्ये पाण्डुकायां सुरोत्तमाः।
शिलायां स्थापयामासुः सिंहपीठे जिनार्भकम् ॥१८८॥
शातकुम्भमयैः कुम्भैः क्षीराब्धिसुपयोभृतैः।
अष्टाधिकसहस्रैश्चास्नापयन्तं सुरोत्तमः ॥१८९॥
गन्धोदकेन संबन्ध्य बन्धुरं श्रीजिनोत्तमम्।
संबंधन्तः स्वयं पूताः सुरास्तेनाभवन्मुदा ॥१९०॥
शची संस्कारयोगेन संस्कृत्य तं जिनेश्वरम्।
तद्रूपसंपदं तृप्ता पश्यन्ती नाभवत्तदा ॥१९१॥
अर्थ (श्लोक 187 से 191): प्रभु को लाकर उसने बड़ी भारी भक्ति और प्रीति से इन्द्र की गोद में दे दिया। इन्द्र प्रभु को गोद में ले सुमेरु पर्वत पर ले गया। वहाँ उसने पाण्डुकवन की पाण्डुकशिला पर जो अनादि से एक सिंहासन के जैसी है, विराजमान कर क्षीरसागर के जल से भरे हुए सोने के एक हजार आठ कलशों द्वारा प्रभु का अभिषेक किया। अभिषेक के बाद प्रभु के गंधोदक को अपने-अपने मस्तक पर चढ़ा सब देव-गण पवित्र हुए। उन्होंने प्रभु के स्नान के जल से अपने कर्म कलंक को बहा दिया। अनन्तर इन्द्राणी ने प्रभु के शरीर को पोंछ कर उन्हें दिव्य वस्त्र और आभूषण पहिनाये। इस समय प्रभु के शरीर का सौंदर्य इतना बढ़ गया था कि इन्द्राणी उसको देखकर तृप्त ही नहीं होती थी ॥१८७-१९१॥
शक्रस्संस्तोतुमुद्युक्तस्तं शचीसंगतः शुभम्।
निःस्वेदास्पदनैर्मल्यविपुलक्षीरशोणित ॥१९२॥
आद्यसंस्थानसंस्थात आद्यसंहननोत्तम।
सौरूप्यपरिपूर्णाङ्ग सौरभ्यभरभूषित ॥१९३॥
अर्थ (श्लोक 192 से 193): इसके बाद इन्द्राणी के साथ इन्द्र ने प्रभु की स्तुति करना आरंभ की कि प्रभो, आप स्वेद-रहित हैं, मल-रहित निर्मल हैं, विपुल हैं, आपका रुधिर दूध के जैसा सफेद है, आपका पहला संस्थान
अष्टाधिकसहस्रेण लक्षणेन सुलक्षित। उपमातीतवीर्येश हितप्रियवचःपते ॥१९४॥
दशातिशययुक्ताय ते नमोऽस्तु शिवात्मज। अरिष्टचक्रनेमीशे श्रेयोरथसुनेमये ॥१९५॥
स्तुत्वेति ताण्डवं कृत्वा मघवा साध्वविघ्नहृत्। सुरौघैरङ्कमारोप्य तमागान्नगरीं प्रति ॥१९६॥
अर्थ (श्लोक 192 से 196): और पहला संहनन है और आप सर्वोत्तम हैं। तात्पर्य यह कि आपको सब मोक्ष-सामग्री प्राप्त है। स्वामिन्! आपका शरीर सुन्दरता से परिपूर्ण हैं, नाना तरह की सुगन्धि से विभूषित है तथा एक हजार आठ लक्षणों से युक्त है। प्रभो! आप उपमा-रहित निरुपम हैं, वीर्य के भण्डार हैं, हित, मित और प्रिय वचनों के बोलने वाले हैं, अतः प्रभो आपको मैं नमस्कार करता हूँ! आप शिवादेवी के पुत्र हैं और दस अनोखी बातों-अतिशयों से सुशोभित हैं, अरिष्ट-समूह को दूर करने वाले हैं और कल्याण-रथ की धुरा हैं, अतः हे प्रभो, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। इस तरह प्रभु की स्तुति कर इन्द्र ने खूब ताण्डव नृत्य किया ॥१९२-१९६॥
पितृभ्यां मघवा दत्त्वा देवदेवं जगन्नुतम्। नटित्वा नटवन्निन्ये निर्मलं भोगसंपदम् ॥१९७॥
नियोज्य सुरसंघातान् रक्षणे दक्षिणोऽप्यगात्। नेमिस्तु नम्रनाकीशसेवितो ववृधे तराम् ॥१९८॥
अर्थ (श्लोक 197 से 198): इसके बाद वह प्रभु को गोद में लेकर देव-गण के साथ वापस द्वारिका को चला आया। वहाँ आकर उसने देवों के देव और जगत् पूज्य प्रभु को उनके माता-पिता को सौंपकर उनके आँगन में खूब नृत्य किया। इसके बाद वह भाँति-भाँति की निर्मल भोग-सम्पदा की योजना कर और प्रभु की रक्षा के लिए देवों को नियुक्त कर स्वर्ग को चला गया ॥१९७-१९८॥
कलया कान्तितः कम्रः परः कुमुदबान्धवः। विधुवद्ववृधे शुद्धोदधिं संवर्धयन्सुधीः ॥१९९॥
नेमिर्नानानिमिषनिकरैः संगतो वृद्धिमाप्य रिङ्खन्क्षोण्यां क्षितिपतिभिर्वीक्षितः क्षिप्रगत्या।
स्वस्याङ्गुष्ठेऽमृतमयमहान्नादमास्वादयंश्च पादस्थैर्यं तदनु सुगतिं संगतोऽभूत्कुमारः ॥२००॥
अर्थ (श्लोक 199 से 200): इधर देवों द्वारा सेवित नेमिप्रभु कला और कान्ति से बढ़ने लगे। वे मनोहर थे, श्रेष्ठ और संसार के बन्धु थे-जिस तरह चाँद समुद्र को वृद्धिंगत करता है उसी तरह वे भी संसार में सिद्धि को वृद्धिंगत करते थे। प्रभु के साथ देव-गण बच्चों का सा रूप धर-धरकर खेलते थे और उन्हें जिस तरह होता खुश रखते थे। प्रभु जब लड़खड़ाते हुए पृथ्वी पर चलते तब बहुत ही सुशोभित होते और महाराज उन्हें देखकर अति हर्षित होते थे। प्रभु विनोद करते हुए अपने अंगूठे को मुँह में दे लेते थे और उससे अमृतमय आहार का स्वाद लेते थे ॥१९९-२००॥
वक्त्रं यस्य महेन्दुसुन्दरतरं पद्मस्य पत्रे इव नेत्रे कर्णयुगे सुकुण्डलयुते भालं विशालं महत्।
बाहू कल्पतरू इवार्थजनकौ वक्षः सुरक्षाक्षमम् कूलं वाञ्जनपर्वतस्य परमा नाभिर्गभीरा शुभा ॥२०१॥
अर्थ: इसके बाद प्रभु के पाँव कुछ जमने लगे, वे अच्छी तरह दृढ़ता से पाँव जमाकर सुन्दर चाल से चलने लगे। प्रभु का मुँह पूर्ण चाँद से भी सुन्दर था, नेत्र कमल के जैसे थे। कान कुण्डलों से सुशोभित थे। प्रभु का मस्तक (ललाट) खूब विशाल था। उनके बाहु (हाथ) कल्पवृक्ष की तरह मनोरथों के साधक थे। उनका वक्षःस्थल रक्षा के लिए पूर्ण समर्थ था। वह अंजन पर्वत के तट जैसा
काञ्चीदामगुणोत्कटा स्फुटकटिः स्तम्भोपमोरू परौ
जङ्घे विघ्नहरे सुहस्तिकरवत् पादौ च पापापहौ।
पद्माभौ नखराः समृक्षविशदा वैदग्ध्यमैश्यं महत्
स श्रीनेमिजिनेश्वरो जगदिदं पातु प्रभाभासुरः ॥२०२॥
अर्थ (श्लोक 201 से 202): था। उनकी नाभि सुहावनी और गंभीर थी। कटिभाग करधौनी से सुशोभित था। उनके उरु स्तंभ के समान थे। जाँघें सुन्दर हाथी की सूँड के जैसी और विघ्नों को हरने वाली थीं। कमल जैसी आभा वाले उनके पाँव पाप की हरने वाले थे। उनके नख नक्षत्र के जैसे चमकते हुए थे। वे प्रभु महान् पांडित्य-पूर्ण, अतुल ऐश्वर्य के धारक और अनुपम प्रभा-मण्डल से शोभामान् थे। वे श्री नेमि जिनेश्वर संसार की रक्षा करें ॥२०१-२०२॥
इति श्रीभट्टारकशुभचन्द्रप्रणीते ब्रह्म० श्रीपाल साहाय्यसापेक्षे श्रीपाण्डवपुराणे महाभारतनाम्नि
यादवद्वारिकाप्रवेशश्रीनेमीश्वरोत्पत्तिवर्णनं नामैकादशं पर्व ॥२०३॥