पाण्डव पुराण (आचार्य शुभचन्द्र), हिन्दी अनुवाद सहित | Pandav Puran (Acharya Shubhachandra)

एकादशं पर्व

पद्मप्रभं सुपद्माभं पद्माङ्कं प्रणमाम्यहम्। पद्मसंचारिचरणं पद्मालिङ्गितवक्षसम् ॥१॥

अर्थ: उन पद्मप्रभ जिनदेव को मेरा प्रणाम है जो लक्ष्मी के दाता है, जिनका शरीर लाल कमल के जैसी कान्ति वाला हैं, जिनके वक्षःस्थल में लक्ष्मी का निवास है और केवलज्ञान होने के बाद विहार के समय जिनके चरण-कमलों के नीचे देवता-गण कमलों की रचना करते हैं ॥१॥


अथाप्राक्षीद्गणाधीशमिति मागधनायकः। तदानीं यादवेशानां का भूतिः क्व स्थितिर्वद ॥२॥

तदाकर्ण्य गणाधीशोऽवादीद्गम्भीरया गिरा। शृणु श्रेणिक वक्ष्यामि यदूनां चरितं वरम् ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): इसके बाद श्रेणिक महाराज ने गौतम भगवान् को पूछा कि प्रभो ! जिस समय की यह कथा है उस समय यादवों के कैसी विभूति थी और वे कहाँ रहते थे। इसके उत्तर में गौतम स्वामी ने अपनी गंभीर ध्वनि से कहा कि श्रेणिक, अब यादवों का पवित्र चरित कहा जाता है। उसको तुम सावधान चित्त से सुनो ॥२-३॥


प्रबुद्धोऽन्धकवृष्णिस्तु दत्त्वा राज्यं स्वसूनवे। समुद्रविजयाख्याय प्राव्राजीद् गुरुसंनिधौ ॥४॥

समुद्रविजयो यावत्पाति राज्यं जयोद्धुरः। वसुदेवस्तदा क्रीडां कर्तुकामोऽभवन्मुदा ॥५॥

गन्धवारणमारुह्य चलच्चामरवीजितः। वदद्वाद्यः स्वसैन्येन स रन्तुं याति कानने ॥६॥

नानाभरणभाभारभूषितोदारविग्रहः। निर्विशन्तं विशन्तं च कामिन्यो वीक्ष्य व्याकुलाः ॥७॥

अर्थ (श्लोक 4 से 7): एक दिन अंधकवृष्टि ने संसार से विरक्त होकर अपने बड़े पुत्र समुद्रविजय को सब राज्य सौंप दिया और आप गुरु के निकट जा दीक्षित हो गया। राज्य अब जयी समुद्रविजय करने लगा। समुद्रविजय का छोटा भाई वसुदेव था। एक दिन वह गंधसिन्धुर नाम के हाथी पर सवार हो, सेना-सहित उत्सव के साथ क्रीड़ा करने के लिए वन को गया। उसके ऊपर चमर ढुल रहे थे और भाँति-भाँति के भूषणों से विभूषित, स्वभाव-सुन्दर उसके शरीर की अपूर्व ही शोभा थी। उसे देखकर शहर की कामिनियाँ बहुत व्याकुल हुई ॥४-७॥


गृहकार्यं परित्यज्य ता भर्तृभोजनादिकम्। स्तन्यदानं शिशूनां च यान्ति तं द्रष्टुमाकुलाः ॥८॥

इति लोकाः समावीक्ष्य सर्वं भूपं न्यवेदयन्। नृपोऽप्येतत्समाकर्ण्य तद्रक्षामकरोत्कृती ॥९॥

यथेष्टं निःकुटे क्रीडां कर्तुं संस्थाप्य भूपतिः। कुमारं बहिरुद्याने गच्छन्तं च न्यवारयत् ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 8 से 10): उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर वे अपने घर गृहस्थी के कामों को छोड़कर उसको देखने के लिए बाहर आ गई और तो क्या, वे उसे जब आता सुन पाती तभी अपने पति-देवों को भोजन आदि करते और बाल-बच्चों को दूध पीते छोड़कर बाहर भाग आती थीं। यह हाल देखकर शहर के लोगों ने राजा से प्रार्थना की और राजा ने भी उनकी प्रार्थना पर उचित ध्यान देकर अब से घर के बगीचे में ही क्रीड़ा करने का प्रबंध कर कुमार को उद्यान जाने से रोक दिया ॥८-१०॥


क्रीडन्तं निःकुटे तं च समाख्यात्क्षुब्धमानसः। दासो निपुणमत्याख्यो बहिर्याननिषेधनम् ॥११॥

अर्थ: एक दिन कुमार अपने बाग में क्रीड़ा कर रहा था। इसी समय निपुणमति नाम नौकर ने आकर


श्रुत्वावादीत्स केनाहं निषिद्ध इति चेटकम्। सोऽवोचत्तव निर्याणकाले त्वद्रूपवीक्षणात् ॥१२॥

योषाः शिथिलचारित्राः कामेन कवलीकृताः। तत्र लज्जाविमुक्ताङ्गा विपरीतविचेष्टिताः ॥१३॥

पीतासवसमाः कन्याः सधवा विधवाश्च ताः। लोकैर्वीक्ष्येति विज्ञप्तो भूपालः स तथाकरोत् ॥१४॥

अर्थ (श्लोक 11 से 14): राजकुमार से वन जाने से रोके जाने की बात कह दी। सुनकर उससे वसुदेव ने पूछा कि मुझे वन जाने से किसने रोका है? उत्तर में उसने कहा कि प्रभो! जिस समय आप वन को जाते हुए शहर से निकलते हैं, उस समय आपके रूप-सौन्दर्य को देखकर शहर की नारियों का चरित्र शिथिल हो जाता है। वे कामदेव का ग्रास बन जाती हैं और लाज-शर्म छोड़कर विपरीत चेष्टायें करने लगती हैं। कन्या, सधवा और विधवा सभी ऐसी देखने लगती हैं मानों उन्होंने मदिरा ही पी ली है। यह देखकर शहर के लोगों ने राजा से प्रार्थना की और राजा ने ही उनकी प्रार्थना पर से आपको उद्यान जाने से रोक दिया है ॥११-१४॥


कुमारो बन्धनं ज्ञात्वा स्वस्य तद्वाक्यतो निशि। निर्ययौ नगरात्साश्वः सुविद्यासाधनच्छलात् ॥१५॥

स एकाकी श्मशानेऽथ शवं संभूष्य भूषणैः। प्रज्वाल्य वह्निना तं चालक्ष्योऽगाद्रूपसागरः ॥१६॥

क्रामन् क्रमेण स क्षोणीं क्रमाभ्यां विजयं पुरम्। प्राप्य मूले स संतस्थे श्रान्तोऽशोकंतरोः परे ॥१७॥

अर्थ (श्लोक 15 से 17): निपुणमति के इन वचनों से वसुदेव ने अपने आपको बन्धन में पड़ा समझा। इसके बाद एक दिन रात को किसी विद्या साधने के बहाने से घोड़े पर चढ़कर राजकुमार नगर से बाहर निकल गया। वह वहाँ से सीधा मसान भूमि में पहुँचा। वहाँ उसने एक मुर्दे को अपने सब वस्त्र-आभूषण पहिना दिये और बाद उसे जलाकर आप, आगे चल दिया। धीरे-धीरे वह विजयपुर पहुँचा। वह बहुत थक गया था, इसलिए अपनी थकावट दूर करने को वहाँ एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठ गया ॥१५-१७॥


निमित्तसूचितं मत्वा वनेट् तं मगधाधिपम्। अबूबुधन्नृपस्तस्मै सोमलाख्यां सुतां ददौ ॥१८॥

विश्रम्य कानिचित्त्र दिनानि गतवांस्ततः। पुष्परम्ये वने तत्र विमदीकृत्य वारणम् ॥१९॥

चिक्रीड स तमालोक्य क्रीडन्तं गजतं खगः। जहार विजयार्धाद्रौ नीतः स तेन तत्क्षणे ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 18 से 20): वहाँ मगध देश के राजा की ओर से एक भील रहता था। दैवयोग से इसके वहाँ पहुँचते ही भील को निमित्तज्ञानी के बताये हुए निमित्त की सूचना मिली। अतः वह राजा के पास गया और उसने राजा को वसुदेव के आने की खबर की। राजा उसी समय वहाँ आया और वसुदेव को बड़े भारी ठाट-बाट के साथ नगर में लिवा ले गया। इसके बाद उसने उसके साथ अपनी सोमला नाम पुत्री का ब्याह कर दिया। ब्याह के बाद कुछ दिनों तक कुमार ने वहीं विश्राम किया। पश्चात् वहाँ से चलकर वह पुष्परम्य नाम वन में पहुँचा। वहाँ एक वनेले हाथी को मद-रहित कर-उसका मद उतारकर वह आनंद-चैन से उसके साथ क्रीड़ा करने लगा। वन-गज के साथ क्रीड़ा करता हुआ उसको देखकर एक विद्याधर विजयार्द्ध पर्वत के किन्नर गीतपुर में ले गया ॥१८-२०॥


तत्र किंनरगीताख्ये पुरे चाशनिवेगतः। जातां पवनवेगायां सुतां स परिणीतवान् ॥२१॥

अर्थ: वहाँ अशनिवेग और पवनवेगा की पुत्री श्यामा के साथ उसका ब्याह हो गया। श्यामा का दूसरा


दिनानि कतिचित्तत्र स्मरस्मारणतत्परः ।
तया स्थितं जहाराशु तं खगोऽङ्गारकः खलः ॥२२॥

दत्तान्तशाल्मलिर्ज्ञात्वा हृतं तमसिपाणिका।
अन्वियाय खगं वीक्ष्य सा तस्मादमुचद्यदुम् ॥२३॥

विद्यया पर्णलघ्व्यासौ तया प्रहितया धृतः।
चम्पापुरीसरोमध्ये पपात जिनमानसः ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 21 से 24): नाम शाल्मलिदत्ता भी थी। श्यामा के साथ कामक्रीड़ा करता हुआ कुछ दिनों तक वह वहीं रहा परन्तु एक दिन उसे वहाँ से रात के समय एक दुष्ट अंगारक नाम विद्याधर हर ले गया। यह देख श्यामा तलवार लेकर उसके पीछे-पीछे भागी। तब अंगारक डरा और श्यामा के डर के मारे उसने वसुदेव को आकाश से नीचे छोड़ दिया। यह देख श्यामा ने पर्णलघ्वी विद्या भेजी। उसने जाकर जिनदेव को हृदय में धारण करने वाले वसुदेव को नीचे गिरने में सहारा दिया, ताकि वह आसानी से चंपापुरी के तालाब में जाकर पड़ा-उसे कुछ भी तकलीफ न हुई ॥२१-२४॥


ततो निर्गत्य चम्पायां गतो गन्धर्वविद्यया ।
प्रसिद्धां श्रुतवान्कर्णे कन्यां गन्धर्वदत्तिकाम् ॥२५॥

प्राप्य गन्धर्वदत्तायाः स्वयंवरसुमण्डपम् ।
तत्र स्थितवतीं कन्यां कुमारो वीक्ष्य चागदीत् ॥२६॥

देहि वीणां च निर्दोषां सुतन्त्रीकां सुमानजाम् ।
यतस्ते वाञ्छितं वाद्यं वादयामि सुपण्डिते ॥२७॥

अर्थ (श्लोक 25 से 27): इसके बाद वह तालाब से निकलकर चम्पापुरी में गया। वहाँ गंधर्वदत्ता का स्वयंवर था। गंधर्वदत्ता गान विद्या में बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। स्वयंवर का हाल सुनकर वसुदेव भी तत्काल स्वयंवर-मंडप में पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने गंधर्वदत्ता से कहा कि सुपण्डिते, दोष-रहित, अच्छे तारों वाली और ठीक प्रमाण की बनी हुई एक वीणा दो, ताकि जैसी तुम चाहती हो मैं वैसी ही उसे बजा सकूँ ॥२५-२७॥


तया तिस्रश्चतस्रश्च दत्ता वीणाः स निन्दयन् ।
प्राप्य घोषवतीं वीणां निर्दोषां वीक्ष्य संजगौ ॥२८॥

संताड्य तां सुमानेन गेयं तद्वाञ्छितं जगौ ।
जित्वा तां चारुदत्तेन दत्ता सोऽप्यवृणोत्तदा ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 28 से 29): यह सुन उसने वसुदेव को तीन-चार वीणायें दीं, पर वसुदेव ने उन सब में कोई न कोई दोष बता कर वे वापस लौटा दीं। तब गंधर्वदत्ता ने उसे घोषवती नाम वीणा दी, जो बिल्कुल निर्दोष थी। उसे लेकर कुमार ने बजाना शुरू किया और बड़े अभिमान के साथ उसने जैसा कि गंधर्वदत्ता चाहती थी वैसा ही बजाकर सुनाया। जिससे वह बहुत ही प्रसन्न हुई और साथ में वसुदेव के ऊपर तन-मन से निछावर भी हो गई ॥२८-२९॥


एवं खगाचले सप्त शतानि सुखभोगिनाम् ।
कन्याः प्राप स पुण्येन पुण्यात्किं दुर्लभं भुवि ॥३०॥

ततो निवृत्य भूभागेऽरिष्टनाम्नि पुरे प्रभोः ।
हिरण्यवर्मणः पुत्री पद्मावत्यां च रोहिणी ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 30 से 31): इस प्रकार कुमार के द्वारा जीती गई अपनी कन्या का चारुदत्त ने उसके साथ ब्याह कर दिया। कुमार भी इस ब्याह से अतीव प्रसन्न हुआ एवं विजयार्द्ध पर्वत पर उस पुण्यात्मा ने विद्याधरों की और सात सौ कन्याओं के साथ विवाह किया। सच है कि पुण्य का उदय होने पर संसार में कुछ भी मिलना दुर्लभ नहीं रह जाता। वहाँ से चलकर वह अरिष्टपुर नाम नगर में आया। यहाँ का राजा था हिरण्यवर्मा और रानी थी पद्मावती। उनके रोहिणी नाम एक पुत्री थी ॥३०-३१॥


रोहिणीवाभवत्तस्याः स्वयंवरकृते नृपान्। समाहूतान्विमुच्यासौ गतं तत्रावृणोच्च तम् ॥३२॥

सोत्कण्ठिताऽकरोत्कण्ठे मालां तस्य विकुण्ठहृत्। तथा वीक्ष्य स भूपालाः क्षोभं भ्रान्ताश्च लेभिरे ॥३३॥

समुद्रा इव संहारे समुद्रविजयादयः। तदा विभिन्नमर्यादा आहर्तुं तं समुद्ययुः ॥३४॥

योद्धुं हिरण्यवर्मापि वसुदेवः समुद्ययौ। सोऽपि स्वनामसंयुक्तं बाणं भ्रातरमक्षिपत् ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 32 से 35): वह चाँद की रोहिणी के तुल्य थी। वहाँ उसका स्वयंवर था और देश-विदेश के राजा उसमें उपस्थित थे। वसुदेव भी उस स्वयंवर में गया और अपने योग्य स्थान पर जाकर बैठ गया। इसके बाद रोहिणी स्वयंवर-मंडप में आई और उसने सब राजाओं को छोड़ते हुए, चले जाकर वसुदेव को पसंद किया और बड़ी भारी उत्कंठा के साथ उसके गले में वरमाला पहिना दी। यह देख उन सब राजाओं में बड़ा क्षोभ मचा, युद्धकला में समुद्र के जैसे उमड़ने वाले समुद्रविजय आदि सब राजा उस समय मान-मर्यादा छोड़कर युद्ध के लिए तैयार हो गये। इधर हिरण्यवर्मा और वसुदेव भी निकल कर मैदान में आ डटे। इस समय समुद्रविजय को अपना परिचय देने की इच्छा से वसुदेव ने वह बाण चलाया जिस पर वसुदेव का नाम लिखा था ॥३२-३५॥


समुद्रविजयो लब्ध्वा शरमक्षरसंयुक्तम्। वाचयित्वा कुमारं तं निश्चिकायानुजानुजम् ॥३६॥

संगरं वारयित्वा स कनीयांसं सहानुजैः। आशिष्य परमां प्रीतिं समुद्रविजयोऽगमत् ॥३७॥

दशार्हास्तद्विवाहस्योत्सवं चक्रुर्मुदावहाः। ततस्तौ प्रौढरङ्गेण दम्पती निन्यतुः सुखम् ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 36 से 38): उस बाण को देखकर समुद्रविजय ने उसी समय युद्ध बन्द करवा दिया। इसके बाद वह अपने सब भाइयों सहित वसुदेव से मिलकर परम प्रीति को प्राप्त हुआ। पश्चात् सब भाइयों ने बड़े हर्ष के साथ वसुदेव का ब्याह-महोत्सव किया। अनन्तर प्रौढ़ राग-रंग से वे दोनों दम्पती सुख चैन से सुख भोगने लगे ॥३६-३८॥


सुस्वप्नसूचितं देवी रोहिणी च कदाचन। शुक्रस्वर्गाच्च्युतं दध्रे सुरं गर्भे समुन्नतम् ॥३९॥

ततः क्रमेण नवमे मासे सासूत सत्सुतम्। बलभद्राभिधं रम्यं बलानां नवमं मतम् ॥४०॥

ततः सौरीपुरं प्राप्ता यादवाः सकलाः शुभाः। वसुदेवयुतास्तत्र सुखं तस्थुः स्थिराशयाः ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 39 से 41): एक दिन शुभ स्वप्नों को देखने के बाद रोहिणी देवी ने शुक्र स्वर्ग से चयकर आये हुए एक उन्नत देव को गर्भ में धारण किया और क्रम से जब नौ महीना पूरे हो गये तब बलभद्र नाम के नव में बलदेव को जन्म दिया। बलभद्र रूपशाली और जगत् को आनंद देने वाला था। इसके बाद गंभीर आशय वाले वे सब यादव वसुदेव-सहित सुख से सूरीपुर में रहने लगे ॥३९-४१॥


कदाचिदथ कंसेन जरासंधदिदृक्षया। राजगृहे ययौ योद्धा वसुदेवो विदांवरः ॥४२॥

जरासंधस्तदा भूपानित्याज्ञापयति स्म च। सुरम्यविषयान्तःस्थपोदनाख्यपुरेश्वरम् ॥४३॥

अर्थ (श्लोक 42 से 43): एक दिन जरासिंध को देखने की इच्छा से विदांवर वसुदेव वीर कंस के साथ राजगृह नगर आया। वहाँ इसी समय जरासिंध ने सब राजाओं के लिए यह आज्ञा निकाली थी कि जो कोई नृपति सुरम्यदेश के पोदनापुर के राजा सिंहरथ को बाँधकर मेरे आगे ले आएगा उसे मैं कलिंदसेना के गर्भ


शत्रुं सिंहरथं जित्वा बद्ध्वानीय ममाग्रतः।
यो मुञ्चति सुतां तस्मै नाम्ना जीवद्यशोऽभिधाम् ॥४४॥

जातां कालिन्दसेनायां सार्धं दास्यामि नीवृता।
इति वीक्ष्य नृपाः पत्रमालिकां च व्यरंसिषुः ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 42 से 45): से उत्पन्न हुई जीवद्यशा नाम अपनी पुत्री के साथ-साथ आधे राज्य का स्वामी बना दूँगा। सारांश यह कि जो सिंहरथ को पकड़ ले आयेगा उसे मैं अपना आधा राज्य दूँगा और उसके साथ अपनी पुत्री भी ब्याह दूँगा ॥४२-४५॥


वसुदेवकुमारस्तां गृहीत्वा निर्गतो बलैः।
विद्यासिंहरथेनाशु जित्वा सिंहरथं पृथुम् ॥४६॥

कंसेन बन्धयित्वा तमर्पयामास भूपतिः।
सोऽपि तस्मै सुतां दातुमीहते स्म सुनीवृता ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 46 से 47): इस आज्ञा को पाकर और राजा लोग तो चुप-चाप अपने घर पर ही बैठे रहे किसी की हिम्मत सिंहरथ को बाँध लाने की न हुई परन्तु वसुदेव से न रहा गया। वह जरासिंध के आज्ञापत्र को पाते ही उसी समय कुछ सेना को साथ लेकर कंस सहित वहाँ से निकल पड़ा और विद्या-बल से सिंहों का रथ बना, उस पर चढ़ बात ही बात में उसने सिंहरथ को बाँध लिया और लाकर जरासिंध को सौंप दिया। तब जरासिंध अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उसे कन्या और आधा राज्य देने को व्यवस्था करने लगा ॥४६-४७॥


स दुष्टलक्षणां ज्ञात्वा तां जरासंधमब्रवीत्।
अनेनैव रिपुर्बद्धः श्रुत्वेति स व्यतर्कयत् ॥४८॥

कोऽयं किमाभिधानोऽस्य कुलं किमिति भूभुजा।
पृष्टे च सोऽवदन्नाथाहं च मन्दोदरीसुतः ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 48 से 49): परन्तु वसुदेव ने पुत्री को कुलक्षणा जान कर जरासिंध से कहा कि शत्रु को मैंने नहीं बाँधा है किन्तु बाँधा है मेरे इस मित्र ने। इसलिए आप इसको ही पुत्री दीजिए। यह सुन जरासिंध मन ही मन सोचने लगा कि यह कौन है? इसका नाम क्या है? और न जाने इसका कुल कैसा है? इसके बाद उसने कंस से पूछा कि तुम्हारे माता-पिता कौन हैं ? कंस ने उत्तर दिया कि नाथ, मैं मन्दोदरी का पुत्र हूँ ॥४८-४९॥


मन्दोदरी समाहूता तदा तेन महीभुजा।
सा मञ्जूषां समादायागता मुक्त्वाथ तां जगौ ॥५०॥

वहन्तीं देव कालिन्द्यां मञ्जूषां प्राप्य तत्र च।
दृष्टोऽयं वर्धितः कंसनाम्ना मातेयमस्य वै ॥५१॥

मञ्जूषान्तस्स्थपत्रं स गृहीत्वावाचयत्तराम।
इत्युग्रसेनभूपस्य पद्मावत्याः सुतोऽप्ययम् ॥५२॥

विततार सुतां तस्मै राज्यार्धं स प्रहृष्टधीः।
कंसोऽपि वैरतः सैन्यैर्मथुरां समियाय च ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 50 से 53): यह सुनकर जरासिंध ने मंदोदरी को बुलाया। वह अपने साथ में एक सन्दूक लेकर आई और उस सन्दूक को राजा के आगे रखकर बोली कि महाराज ! यह यमुना के प्रवाह में बहता हुआ आकर दैवयोग से मेरे हाथ लग गया था और इसी में मैंने इसे पाया था। इसलिए जन्म देने वाली तो इसकी यही माता है, पर पालने-पोषने के लिहाज से देखा जाये तो मैं भी माता हूँ। मैंने इसका कंस नाम रक्खा है परन्तु इस मंजूषा में इसके साथ एक पत्र और मिला था। उसके बाँचने से मालूम हुआ कि यह उग्रसेन राजा और पद्मावती रानी का पुत्र है। मंदोदरी के अन्तिम वचनों से जरासिंध को संतोष हुआ और उसने हर्षित होकर उसे आधे राज्य के साथ अपनी कन्या ब्याह दी ॥५०-५३॥


बन्धयित्वा स कोपेन गोपुरे पितरौ न्यधात्।
स्वपुरं वसुदेवोऽथ तेनानीतः स्वभक्तितः ॥५४॥

अर्थ: इसके बाद कंस, पिता से अपने वैर का बदला लेने के लिए बहुत-सी सेना सहित मथुरा आया और क्रोध के वश हो, माता-पिता को बाँधकर उसने शहर के दरवाजे में कैद कर दिया। कंस की वसुदेव पर बड़ी भक्ति हो गई थी, अतएव उसने वसुदेव को अपने यहाँ बुला लिया ॥५४॥


अथो मृगावतीदेशे दशार्णनगरे नृपः।
देवसेनः प्रिया तस्य धनदेवी धनप्रिया ॥५५॥

तयोः सुता शुभालापा देवकी कोकिलस्वना।
दापिता वसुदेवाय कंसेन महदाग्रहात् ॥५६॥

ततः क्रमेण संभूता देवक्यां युगलात्मना।
षट् सुताः सप्तमः कृष्णोऽजायताद्भुतविक्रमः ॥५७॥

पिता रामेण संमन्त्र्य भयात्कंसस्य गोकुले।
यशोदानन्दगोपाभ्यां तं वर्धनाय दत्तवान् ॥५८॥

कालेन पुण्यतस्तत्र वृद्धोऽसौ वृद्धबुद्धिमान्।
चाणूरेण समं कंसं निगृह्य सुखमाश्रितः ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 55 से 59): मृगावती देश में दशार्ण नाम एक नगर है। वहाँ का राजा देवसेन था और उसकी रानी का नाम था धनदेवी। वह इन्द्र की इन्द्राणी जैसी थी। उनके एक पुत्री थी। उसका नाम था देवकी। उसका कोयल के जैसा सुंदर स्वर था। वह बहुत ही अच्छा आलाप लेती थी। कंस ने बड़े भारी आग्रह से देवकी वसुदेव के लिए दिलाई थी। इसके बाद क्रम से वसुदेव के निमित्त से देवकी के तीन बार दो-दो करके छह पुत्र पैदा हुए और बाद सातवाँ पुत्र कृष्ण पैदा हुआ। कृष्ण बड़ा पराक्रमी था। कृष्ण का जन्म होते ही वसुदेव बलभद्र की सलाह से, कंस के भय के मारे, गोकुल में नंदगोप और यशोदा के यहाँ गये और वहाँ कृष्ण नारायण को इसलिए छोड़ आये कि जिसमें निर्भीकता से उसका पोषण हो। कृष्ण का नंदगोप के यहाँ बड़ी अच्छी तरह पालन होता रहा। वह थोड़े ही दिन में खूब होशियार हो गया। वह बहुत ही बुद्धिमान् था। इसके बाद वह चाणूर और कंस का निग्रह करके पूर्ण सुख के साथ रहने लगा ॥५५-५९॥


रूप्याद्रौ रथचक्रादिनूपुरेऽथ पुरे पतिः।
सुकेतुस्तत्प्रिया प्रीता स्वयंशोभा स्वयंप्रभा ॥६०॥

तयोः सुभामा सत्याभा सत्यभामा सुताजनि।
या रूपेण शचीं नूनमधः कुरुत इत्यलम् ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 60 से 61): रूपाचल पर्वत पर एक रथन्नूपुर नाम पुर है। वहाँ का सुकेतु नाम राजा था। उसकी प्रिया का नाम था स्वयंप्रभा। वह सुकेतु को बहुत ही प्यारी थी और अपने रूप-सौन्दर्य से खूब सुशोभित थी। उसके एक पुत्री थी। उसका नाम था सत्यभामा। वह सुभामा थी-सुन्दर कान्ति और श्री वाली थी। वह अपने रूप से इन्द्राणी को भी नीचा दिखाती थी ॥६०-६१॥


तादृशीं तां समालोक्य भूपो नैमित्तिकं मुदा।
निमित्तकुशलाख्यं चेत्यप्राक्षीत्कस्य वल्लभा ॥६२॥

जनितेयं स आलोच्यावोचद्देवी भविष्यति।
त्रिखण्डाधिपतेः श्रुत्वा दूतप्रेषणपूर्वकम् ॥६३॥

वैकुण्ठाय सुकेतुस्तां दत्त्वा निर्वृतिमाप च।
कृष्णोऽपि तां समालभ्य भेजे भोगं भवोद्भवम् ॥६४॥

अर्थ (श्लोक 62 से 64): उसको ऐसी सुन्दरी और कान्ति वाली देखकर उसके पिता सुकेतु ने निमित्तकुशल नाम निमित्तज्ञानी को पूछा कि सत्यभामा किसकी वल्लभा होगी। नैमित्तिक ने उत्तर दिया कि वह तीन खण्ड के स्वामी कृष्ण नारायण की पट्टरानी होगी। यह जान कर सुकेतु ने दूत के हाथ भेंट वगैरह


मथुरायामवस्थाप्योग्रसेनं नरनायकम्।
सौरीपुरं गताः सर्वे यादवाः कृष्णसंयुताः ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 62 से 65): भेज कर सत्यभामा का कृष्ण के साथ ब्याह कर दिया। इसके बाद वह तो संसार से विरक्त हो गया और कृष्ण नारायण सत्यभामा को पाकर सांसारिक सुख भोगने लगा। इसी समय उग्रसेन राजा को मथुरा का राजा बना कर कृष्ण-सहित सबके सब यादव सौरीपुर चले आये ॥६२-६५॥


अथ राजगृहाधीशः श्रुत्वा कंसस्य पञ्चताम्।
जीवद्यशोमुखात्तूर्णं यादवेभ्यश्चुकोप सः ॥६६॥

आहवाय सुतान्सोऽपि प्रेषयामास यादवैः।
युद्धे ते भङ्गतां नीता दैवपौरुषविक्रमैः ॥६७॥

प्राहिणोत्स सुतं ज्येष्ठमपराजितनामकम्।
षट्‌चत्वारिंशदधिकं युद्धानां च शतत्रयम् ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 66 से 68): इसके बाद जीवद्यशा नाम अपनी पुत्री के मुंह से राजगृह के राजा जरासिंध ने जब कंस का मरण सुना तब उसे यादव लोगों पर बड़ा भारी क्रोध आया। उसने उसी समय यादवों के साथ युद्ध करने को अपने पुत्रों को भेजा परन्तु वे यादवों के दैव और पौरुष के सामने ठहर न सके-सब नष्ट हो गये। यह देखकर जरासिंध के क्रोध का कुछ पार न रहा। तब उसने तीन सौ छियालीस योद्धाओं को साथ देकर, यादवों को तहसनाश करने के लिए, अपराजित नाम अपने बड़े पुत्र को भेजा ॥६६-६८॥


विधाय यादवैः सार्धं सोऽपि भङ्गं गतः क्षणात्।
पुनः संनह्य संप्राप्तो यादवान्सोऽपि दुर्धरः ॥६९॥

आगच्छन्तं पुनस्तं ते श्रुत्वा कालबलार्थिनः।
सौरीपुरं च मथुरां व्याजहुर्यादवाः क्षणात् ॥७०॥

आयान्तं तदनु क्रोधात्तं निवार्य च मायया।
देवताः प्रेषयामासुर्यादवान्पश्चिमां दिशम् ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 69 से 71): लेकिन यादवों की शूरता के सामने उसकी भी कुछ न चली-वह भी युद्ध-स्थल की बलि हो गया। इस दुख-मय समाचार को सुनकर तो वह दुर्द्धर्ष वीर स्वयं ही कवच वगैरह पहिन कर तैयार हुआ और यादवों के साथ लड़ने को गया। जरासंध को आया सुनकर यादव लोग बड़े डरे और वे सौरीपुर तथा मथुरा को भाग गये। यह देख जरासिंध ने उनका पीछा किया, परन्तु देवों ने माया के द्वारा जरासिंध को तो पीछे लौटा दिया और यादवों को पच्छिम दिशा में सुदूर समुद्र तट पर भेज दिया ॥६९-७१॥


ततः कंसारिरात्मीयं विधातुं विधिवद्व्यधात्।
स्थानमष्टोपवासं चोदधेः पार्श्वे महामनाः ॥७२॥

नैगमाख्योऽमरस्तत्र तदागत्य च माधवम्।
अबीभणदिति स्पष्टं विशिष्टशुभनोदितः ॥७३॥

अश्वाकृतिधरं देवमारुह्य जलधौ तव।
गच्छतः पत्तनप्राप्तिर्भविता भोगिमर्दन ॥७४॥

वाहारूढे च कंसारौ जलधौ सति धावति।
द्विधाभावं गतोऽब्धिश्च यावन्नूतनवृद्धिभाक् ॥७५॥

अर्थ (श्लोक 72 से 75): इसके बाद मनस्वी कृष्ण नारायण ने समुद्र में मार्ग पाने की इच्छा से जैसी विधि से होने चाहिए, आठ उपवास किये। पुण्योदय से उसके पास नैगम नाम एक देव ने आकर कहा कि भोगियों-साँपों को मर्दित करने वाले निर्भय प्रभो! आप इस अश्व-भेष-धारी देव पर सवार होकर समुद्र में जाइए वहाँ आपको स्थान मिलेगा। यह सुनकर नारायण ने वैसा ही किया-वह समुद्र में गया। उस समय समुद्र का जल उसके लिए स्थल के जैसा हो गया। सारांश यह कि समुद्र में जहाँ से नारायण जाता था वहाँ का जल इधर-उधर दोनों ओर को हटता जाता था। नारायण शान्ति के


सुनासीराज्ञया तत्र किन्नरेशः पुरीं व्यधात्।
नेमीश्वरकृते चापि योजनाद्वादशायताम् ॥७६॥

अर्थ (श्लोक 72 से 76): साथ वहाँ पहुँचा जहाँ कि इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने नेमिनाथ प्रभु के लिए बारह योजन-अड़तालीस कोश की-लम्बी-चौड़ी नगरी रची थी ॥७२-७६॥


भास्वद्रत्नमयो यत्र शालस्तां परिवव्रके।
तुङ्गतोरणसत्तम्भप्रतोलीपरिखान्वितः ॥७७॥

मध्येपुरं यदूनां च बान्धवानां नरेशिनाम्।
सभिव्यानां च लोकानां गृहाणि विदधुः सुराः ॥७८॥

क्वचित्सरः क्वचिद्वापी क्वचित्श्रीजिनमन्दिरम्।
क्वचिज्जनाश्रयं तुङ्गं विदधे धनदो महान् ॥७९॥

अब्धिखातिकया वेष्ट्या नानाद्वारावलीयुता।
द्वारिकेति गता ख्यातिं पुरी लेखपुरीव या ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 77 से 80): कुबेर ने नगरी के चारों ओर चमकते हुए रत्नों का विशाल कोट और कोट में सुन्दर थंभों वाले दरवाजे बनाये थे और उसके चारों ओर खाई खोद दी थी। उस नगरी के भीतर देवताओं ने प्रभु के बन्धु यादव राजाओं के लिए सुन्दर महल बनाये और अन्य जन के लिए मकान वगैरह की रचना की थी। कुबेर ने कहीं तालाब, कहीं बावड़ियाँ और कहीं श्री जैनमन्दिरों की रचना की थी। वह नगरी समुद्र-रूप खाई से बेढ़ी हुई थी और नाना दरवाजों से युक्त थी। इसलिए उसकी द्वारिका नाम से प्रसिद्धि हुई ॥७७-८०॥


तत्र यादवभूपालाः समुद्रविजयादयः।
कंसारिणा समं सर्वे निवसन्ति स्म वेश्मसु ॥८१॥

अथ तत्र सुखासीनः समुद्रविजयो जयी।
अजय्यो दस्युवर्गेण जितात्मा जितमत्सरः ॥८२॥

विशुद्धो धर्मधीर्धीरो विद्वान्विबुधवन्दितः।
सधृतिर्धर्मकर्माढ्यो धराधीशः समृद्धिभाक् ॥८३॥

भेजे भोगान्सुभव्यात्मा भवहर्तुः सुभक्तिमान्।
शुशुभेऽत्र भवान्भर्ता भुवो भ्राजिष्णुभूतलः ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 81 से 84): वह इन्द्रपुरी के जैसी देख पढ़ती थी। बल्कि वह अपनी संपत्ति से उसको भी नीचा दिखाती थी। वहाँ देवताओं के बनाये हुए महलों में समुद्रविजय आदि यादव राजा कृष्ण सहित आनंद-चैन से रहते थे। वहाँ सुखपूर्वक रहने वाले समुद्रविजय की अपूर्व ही शोभा थी। वह विजेता था, किसी के द्वारा जीता नहीं जाता था, जितेन्द्रिय और मान-मत्सर-रहित था, विशुद्ध था, धर्मबुद्धि था, धीर था, विद्वान् था, देवता-गण द्वारा सेवित था, संतोषी था, धर्म-कर्म में लीन था, समृद्धिशाली था, पृथ्वी का पति था, भोगी और भव्यात्मा था, संसार के शत्रु जिनदेव का पूरा भक्त था, आदर योग्य था, पृथ्वी का पालक था और कान्तिशालियों का भूषण था ॥८१-८४॥


तज्जाया जगदानन्ददायिनी दानदायिका।
शिवादेव्यभिधा दक्षा दधाना विशदां मतिम् ॥८५॥

अनङ्गेन कृतावासा रतिवेगा रतिप्रदा।
आसीद्या सुभगा भूषा धिषणाम्बुधिपारगा ॥८६॥

अर्थ (श्लोक 85 से 86): उसकी जाया थी शिवादेवी। वह सारे संसार को आनंद और दान देने वाली थी, चतुरा थी और निर्मल बुद्धि वाली थी। कामदेव ने उसे रति समझ कर अपना आवास बना लिया था। वह रति-प्रदा थी-अपने पति को खूब रमाती थी। वह सुन्दरियों का भूषण थी और ज्ञान-समुद्र के पार पहुँची हुई थी। उसका स्वर तो इतना अच्छा था कि उसके सामने कोयल का स्वर भी अच्छा नहीं मालूम पड़ता था। मानों इसलिए कालेपने को स्वीकार कर विचारी कोयलें वन में जाकर रहने लगी


यस्याः स्वरेण संक्षुब्धाः कोकिलाः खलु भास्वराः। श्यामला वनमाभेजुर्निर्जितानामियं गतिः ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 85 से 87): हैं और है भी ठीक कि दूसरों द्वारा जीते गये हुओं की ऐसी ही गति होती है ॥८५-८७॥


यत्पादपद्ममालोक्य त्रपापन्नानि सज्जनैः। संगं गतानि पद्मानि लज्जया जडसंगमः ॥८८॥

रम्भास्तम्भोपमौ यस्या ऊरू सरसकोमलौ। मदनागारसिद्ध्यर्थं स्तम्भायेते स्म सुस्थिरौ ॥८९॥

गम्भीराभाच्छुभा नाभिर्यस्यास्तु सरसीसमा। सावर्ता केशमीनाङ्का मदनद्विपकेलिभा ॥९०॥

यस्या वक्षसि वक्षोजौ क्ष्माभृताविव दुर्गमौ। कामिनां मारभूपस्य स्थितये दुर्गतां गतौ ॥९१॥

यस्या वदनशुभ्रांशोः शोभां वीक्ष्य विधुन्तुदः। बालच्छलात्समायात इव तद्ग्रहणेच्छया ॥९२॥

स्वर्णाभरणशोभाढ्यौ कर्णौ यस्या विरेजतुः। श्रुतिसंस्कारयोगेन संस्कृतौ श्रुतिसंमदौ ॥९३॥

एवं तौ दम्पती भोगान्भुञ्जानौ प्रविभासुरौ। शर्ममग्नौ वराकारौ रेजतुस्तत्र सद्धिया ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 88 से 94): उसके चरण-कमलों को देखकर कमलों को इतनी लज्जा हुई कि वे जाकर जल में रहने लग गये। सच है कि लज्जा के मारे ही लोग जड़ों की संगति करते हैं, जैसे कि कमलों ने जड़ (जल) की संगति की है। उसके उरुस्थल केले के थंभों की तरह सरस और कोमल थे। वे ऐसे जान पड़ते थे मानों कामदेव के महल के लिए सुस्थिर खंभे ही बनाये गये हैं। उसकी नाभि बहुत ही गंभीर (गहरी) थी, कान्तियुक्त और सुहावनी थी। वह सरसी (तलइया) की समता करती थी। सरसी में जल होता है, उसमें लावण्यरूप जल था। सरसी में आवर्त होते हैं, वह भी शंख, चक्र आदि चिह्न-रूप आवर्त वाली थी। सरसी में मछलियाँ होती हैं, उसमें भी रोमराजि-रूप मछलियाँ थीं। सरसी हाथियों की केलि से शोभित होती है, वह भी कामदेव-रूप हाथी की केलि से सुशोभित थी। उसके दुर्गम पहाड़ों की तरह कुच थे। वे ऐसे जाने जाते थे कि मानो कामी पुरुषों के काम-भूप को रहने के लिए किले ही बनाये गये हैं। उसका मुख ठीक चन्द्रमा के समान था और उसके ललाट के ऊपरी भाग में सुन्दर बाल बिखरे हुए थे, जान पड़ता था कि उसकी मुखच्छवि को देखकर उसको ग्रसने की इच्छा से राहु ही आ गया है। उसके दोनों कान सोने के भूषणों से विभूषित थे और शास्त्र सुनने से जो संस्कार होता था उसके सम्बन्ध से वे संस्कृत थे। इस तरह वे दम्पती आनंद से सुख भोगते थे और अपनी उत्तम बुद्धि से प्रभासुर हुए अपूर्व शोभा पाते थे ॥८८-९४॥


अथैकदा सुधर्मेशो जिनोत्पत्तिं विबुध्य प्राक्। प्राहिणोत्तत्र यक्षेशं षण्मासान् रत्नवृष्टये ॥९५॥

शक्रेण प्रेषितो यक्षो रत्नवृष्टिस्तदालये। षण्मासाद्गर्भतः पूर्वं विदधे धर्मधीः स्वयम् ॥९६॥

खात्पतन्ती तदा रेजे रत्नवृष्टिः प्रभासुरा। आयान्ती स्वर्गलक्ष्मीर्वा लक्षितुं जिनमातरम् ॥९७॥

अर्थ (श्लोक 95 से 97): एक समय सौधर्म इन्द्र ने अवधिज्ञान से जिनदेव के गर्भागमन को जानकर छह महीने पहले से ही रत्नों की बरसा करने के लिए वहाँ कुबेर को भेज दिया। धर्मबुद्धि कुबेर ने भी इन्द्र की आज्ञानुसार प्रभु के गर्भ में आने के छह महीने पहले से जन्म तक-पंद्रह महीने-बराबर रत्नों की बरसा की। आकाश से गिरी हुई उन दिव्य रत्नों की बरसा ऐसी जान पड़ती थी मानों जिन-माता को देखने के लिए स्वर्ग की लक्ष्मी ही आ रही है या यों कहिए कि सारे आकाश को घेर कर पड़ती हुई


सा नभोऽङ्गणमापूर्य पतन्ती रुरुचे तराम्।
ज्योतिर्मालेव चायान्ती दिदृक्षुर्जिनमन्दिरम् ॥९८॥

रुद्धं च रत्नसंघातैः शातकुम्भभरैस्तथा।
जगुरङ्गणमावीक्ष्य जना धर्मफलं तदा ॥९९॥

अर्थ (श्लोक 95 से 99): वह रत्नों की बरसा ऐसी शोभती थी मानों जिनमन्दिर को देखने की इच्छा से ज्योतिषी देवताओं की पंक्ति ही आ रही है। रत्नों की बरसा से, भगवान् के महल का आँगन परिपूर्ण हो गया था। उस महल के शिखरों पर सोने के कलश जड़े हुए थे। उसे देखकर लोगों से यही कहते बनता था कि यह सब धर्म का फल है ॥९५-९९॥


अथैकदा शिवादेवी सुषुप्ता शयनोदरे।
निशात्यये ददर्शैतान् स्वप्नान्षोडश संमितान् ॥१००॥

ऐन्द्रं गजेन्द्रमैक्षिष्ट समदं मन्द्रबृंहितम्।
गवेन्द्रं सुसुधापिण्डमिव पाण्डुमुद्धुरम् ॥१०१॥

इन्दुच्छायं मृगेन्द्रं सोच्छलन्तं रक्तकन्धरम्।
पद्मां स्नाप्यां सुरेभाभ्यां कुम्भाभ्यां पद्मसंस्थिताम् ॥१०२॥

दामनी कुसुमामोदालग्ननानामधुव्रते।
ताराधीशं स्ववक्त्राब्जमिव तारासमन्वितम् ॥१०३॥

भास्वन्तं धूतसद्ध्वान्तं स्वर्णकुम्भमिवोद्धुरम्।
शातकुम्भमयौ कुम्भौ स्तनकुम्भाविवोन्नतौ ॥१०४॥

नेत्रायतिं झषौ पद्मे दर्शयन्ताविवात्मनः।
पद्माकरं सुपद्मोत्थकिञ्जल्कपरिपिञ्जरम् ॥१०५॥

लोलकल्लोललीलाढ्यं जलधिं मन्द्रनिस्वनम्।
सिंहासनं समुत्तुङ्गमेरुशृङ्गमिवोन्नतम् ॥१०६॥

पुत्रसूतिगृहाभासं विमानं विपुलश्रियम्।
भुजंग भुवनं भूमिमुद्भिद्य निर्गतं शुभम् ॥१०७॥

निधानमिव रत्नानां राशिं शुभ्रभराश्रितम्।
धनंजयं प्रतापं वा स्वसूनोर्धूमवर्जितम् ॥१०८॥

गजाकारेण वक्त्राब्जे विशन्तं तं ददर्श सा।
स्वप्नान्ते स्वपतो बुद्ध्वा विनिद्रनयनाम्बुजा ॥१०९॥

अर्थ (श्लोक 100 से 109): एक दिन शिवादेवी शय्या पर सुख की नींद सोई हुई थी। रात का पिछला पहर था। उस समय उसने सोलह स्वप्नों को देखा। वे स्वप्न ये थे। ऐरावत हाथी, बैल-जो खूब मदोन्मत्त उन्मत्त स्कंध वाला और सुधा के पिंड जैसा सफेद था, चन्द्रमा की छाया के जैसा मृगेन्द्र (सिंह)-जो छलांग मारता हुआ और जिसकी लाल कंधरा थी, लक्ष्मी-जिसका कि कमलयुक्त कुंभों द्वारा दो हाथी अभिषेक कर रहे थे, दो मालायें-जिन पर फूलों की सुगंध से भौंरे आकर गूँजते थे, चाँद-जो तारों से युक्त और शिवादेवी के मुख-कमल के तुल्य था, सूरज-जो अँधेरे को दूर करने वाला और सोने के कलश सरीखा था। सोने के दो कुंभ-जो शिवादेवी के कुच-कुंभों की तरह उन्नत थे, दो मछलियाँ-जो ऐसी मालूम होती थीं कि शिवादेवी के विस्तृत नेत्र ही हैं, पद्माकर-(तालाब) जो कमलों की केसर से पीला हो रहा था और चंचल तरंगों से परिपूर्ण था, समुद्र-जो गंभीर शब्दमय था, सिंहासन-जो ऊँचे सुमेरु पर्वत के शिखर की तरह उन्नत था, विमान-जो पुत्र के प्रसूति-गृह के तुल्य और विपुल श्री का स्थान था, धरणेन्द्र का भवन-जो ऐसा जान पड़ता था मानों पृथ्वी को चीरकर ही बाहर निकला है रत्नों की राशि-जो खजाने-सी जान पड़ती थी और जो किरणों के पूर से भरपूर थी, अग्नि-जो निर्धूम थी और ऐसी मालूम पड़ती थी कि मानो पुत्र का प्रताप ही है। इसके बाद ही उसने एक हाथी को अपने मुँह में प्रवेश करते हुए देखा ॥१००-१०९॥


ध्वनद्भिस्तूर्यसंघातैः प्रत्यबुद्ध ततश्च सा।
श्रृण्वती मङ्गलोद्गीतिं देवस्त्रीणां सुमङ्गला ॥११०॥

मातस्तमो निशाजातमुद्भिद्योदेति भानुमान्।
त्वन्मुखेन यथा याति तामसं मानसे स्थितम् ॥१११॥

करान्प्रसारयन्नुच्चैरुदितोऽयं दिवाकरः।
जगत्प्रबोधमाधत्ते तव गर्भर्भको यथा ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 110 से 112): इन स्वप्नों को देखने के बाद ही उसकी निद्रा तो भंग हो ही गई थी कि इसी समय प्रातःकालीन बाजों की और देवांगनाओं द्वारा गाये गये मंगल गीतों की सुंदर ध्वनि उसके कानों में पड़ी। उसे सुनकर मंगलमयी शिवादेवी प्रबुद्ध हुई। उसे प्रबुद्ध देख देवाङ्गनाओं ने उसकी स्तुति करना आरंभ किया कि हे मातः! जिस तरह तुम्हारे मुख की प्रभा से मानसिक अँधेरा (अज्ञान) नष्ट हो जाता है उसी तरह रात के अँधेरे को नष्ट कर यह सूरज उदित हो आया है और तुम्हारे गर्भस्थ बालक की तरह अपनी किरणों को विस्तृत कर संसार को प्रबोध देता है, लोगों को मार्ग सुझाता है ॥११०-११२॥


सुप्रभातं तवास्तूच्चैः कल्याणशतभाग्भव।
अर्कं प्राचीव सोषीष्ठाः सुतं भवनभासकम् ॥११३॥

इति श्रुते प्रबुद्धा सा प्राग्बुद्धा स्वप्नदर्शनात्।
उत्तस्थे शयनाच्छीघ्रं हंसी वा सैकतस्थलात् ॥११४॥

प्रातर्विधिविधानज्ञा सुस्नाता प्राप्तमङ्गला।
पश्यन्ती दर्पणे वक्त्रं संस्कृता वरभूषणैः ॥११५॥

समुद्रविजयाभ्यर्णं तूर्णं गत्वा नता सती।
स्वोचितेन नियोगेन स्वोचितं स्थानमासदत् ॥११६॥

प्रफुल्लवदनाम्भोजा करकुड्मलधारिणी।
यथादृष्टसुस्वप्नानां फलं पप्रच्छ भूपतिम् ॥११७॥

अभाणीद्भूपतिर्भद्रं भुञ्जानो भुवनेश्वरः।
प्रिये प्रीतिकरे स्वप्नफलं शृणु सुबोधतः ॥११८॥

अर्थ (श्लोक 113 से 118): देवी, तुम सैकड़ों कल्याणों को प्राप्त करो और तुम्हारे लिए यह सुप्रभात शुभ हो। तुम उसी तरह पुत्र को जन्म दोगी जिस तरह कि पूर्व दिशा सूरज को जन्म देती है। तुम्हारा पुत्र तीन लोक को प्रकाशित करेगा। देवांगनाओं के इन मनोहर शब्दों को सुनकर बालू के जैसी स्वच्छ रूई की श्वेत-कोमल शय्या पर से शिवादेवी उठीं। इसके बाद उसने स्नान आदि प्रभात-संबंधी सब क्रियाएँ करके और दर्पण में अपना मुँह देखकर वस्त्राभूषण धारण किये और वह सती समुद्रविजय महाराज के पास गई। उन्हें नमस्कार कर वह उनके साथ आधे सिंहासन पर बैठ गई। इस समय उसका मुख कमल के जैसा खिल रहा था। उसने हाथ जोड़कर स्वप्नों का सब हाल महाराज से कहा और उनसे उनका फल पूछा। उत्तर में पुण्यात्मा समुद्रविजय ने कहा कि प्रीति देने वाली प्रिये, तुम ध्यान से इन स्वप्नों का फल सुनो ॥११३-११८॥


सूनुस्ते भविता देवि गजदर्शनतो वृषात्।
जगज्ज्येष्ठो महावीर्यो मृगारेर्दामवीक्षणात् ॥११९॥

धर्मतीर्थकरो लक्ष्म्याभिषेकं मेरुमस्तके।
आप्तासौ पूर्णचन्द्रेण जनाह्लादी च भास्करात् ॥१२०॥

अर्थ (श्लोक 119 से 120): पहले स्वप्न में तुमने जो हाथी देखा है उसका यह फल है कि तुम्हारे पुत्र होगा। बैल देखने से वह संसार भर में श्रेष्ठ होगा। सिंह देखने से पराक्रमी, महान् वीर्यशाली होगा। माला देखने से धर्म-तीर्थ का प्रवर्तक होगा। अभिषिक्त होती हुई लक्ष्मी के देखने से उसका सुमेरु के शिखर पर अभिषेक होगा। पूर्ण चाँद देखने से वह संसार को आल्हादित करेगा। सूरज देखने से दीप्तिशाली, भासुर होगा। कुंभ देखने से निधियों का भोक्ता और मछलियों देखने से सुखी होगा। तालाब देखने


भास्वरः कुम्भतः प्रोक्तो निधीनामीशिता सुखी। सरसा लक्षणाकीर्णोऽब्धिना स केवलेक्षणः ॥१२१॥

सिंहासनेन साम्राज्यं भोक्ता नाकविमानतः। नाकादस्यावतारः स्यात्फणीन्द्रभवनेक्षणात् ॥१२२॥

सोऽवधिज्ञाननेत्राढ्यो रत्नराशेर्गुणाकरः। निर्धूमज्वलनालोकात्कर्मकक्षहुताशनः ॥१२३॥

गजाकारं समादाय त्वद्गर्भेऽवतरिष्यति। सोऽरिष्टनेमिसन्नामा धर्मसद्रथवर्तनात् ॥१२४॥

अर्थ (श्लोक 119 से 124): से नाना लक्षणों वाला और समुद्र देखने से केवलज्ञानी होगा। सिंहासन देखने से साम्राज्य का भोक्ता होगा। विमान देखने से वह स्वर्ग से आएगा। धरणेन्द्र का भवन देखने से अवधिज्ञान का धारक होगा। रत्नराशि देखने से गुणी का आकर होगा और निर्धूम आग देखने से वह कर्मों को जलाने के लिए आग के तुल्य होगा। वह हाथी के आकार को लेकर तुम्हारे गर्भ में आवेगा और धर्म-रूपी समीचीन रथ को प्रवर्तने के कारण उसका अरिष्टनेमि नाम होगा ॥११९-१२४॥


श्रुत्वा सा प्रमदापूर्णा फलं स्वप्नसमुद्भवम्। हर्षोत्कर्षितचेतस्का दधौ रोमाञ्चितं वपुः ॥१२५॥

कार्तिकोच्च्वलपक्षस्य षष्ठ्यां चाथ निशात्यये। उत्तराषाढनक्षत्रे तद्गर्भे संस्थितिं व्यधात् ॥१२६॥

तदा ज्ञात्वा सुराः सर्वे स्वस्य चिह्नेन सत्वरम्। आगत्य गर्भकल्याणं कृत्वागुः स्वं स्वमास्पदम् ॥१२७॥

श्रीः श्रियं ह्रीस्त्रपां धैर्यं धृतिः कीर्तिः स्तुतिं मतिम्। बुद्धिर्लक्ष्मीश्च सौभाग्यं दधुस्तस्यामिमान्गुणान् ॥१२८॥

अर्थ (श्लोक 125 से 128): इस प्रकार स्वप्नों का फल सुनकर शिवादेवी बहुत हर्षित हुई। उसके रोमाञ्च हो आये। हर्ष से उसका चित्त गद्गद हो गया। इसके बाद कार्तिक सुदी छठ के दिन, पिछली रात में, उत्तराषाढ़ नक्षत्र में, शिवादेवी ने गर्भ धारण किया। उस समय प्रभु को गर्भ में आया जान कर अपने-अपने चिह्न सहित देवता गण आये और गर्भकल्याणक का उत्सव करके अपने-अपने स्थान को चले गये। प्रभु जब से गर्भ में आये तभी से लेकर इन्द्र की आज्ञा से छप्पन दिक्कुमारियाँ उनकी माता की सेवा करती थीं। वे गर्भ-समय के योग्य क्रियाओं द्वारा सेवा करने में बहुत ही दक्ष थीं। श्रीदेवी ने प्रभु की माता को श्री दी और ह्री देवी ने त्रपा (लाज) दी। धृति देवी ने धैर्य दिया और कीर्ति देवी ने कीर्ति दी एवं बुद्धि देवी ने बुद्धि दी और लक्ष्मी देवी ने सौभाग्य दिया। सारांश यह कि उक्त छह देवियों ने प्रभु की माता को उक्त छह गुण दिये ॥१२५-१२८॥


काश्चिन्मज्जनकरिण्यः काश्चित्ताम्बूलदायिकाः। मङ्गलं कुर्वते काश्चित्काश्चित्संस्कारसाधिकाः ॥१२९॥

काश्चिन्महानसे पाकं कुर्वते रचयन्त्यपि। शय्यामुच्छीर्षवस्त्राढ्यां पादसंवाहनं पराः ॥१३०॥

काश्चित्सिंहासनं चारु चक्कलाकलितं दधुः। काश्चित्सुगन्धद्रव्याणि पुरन्ध्रय इव वै ददुः ॥१३१॥

काश्चिदाभरणोद्भासिकरास्तस्याः पुरः स्थिताः। कल्पवल्ल्य इवाभान्ति भाभारवरभूषणाः ॥१३२॥

अर्थ (श्लोक 129 से 132): इनके सिवाय कोई शिवादेवी की आँखों में अंजन आँजती थी, कोई पान लगा कर देती थी, कोई मंगलगीत गाती थी, कोई उसके शरीर का संस्कार करती थी, कोई रसोई बनाती थी, कोई कोमल वस्त्रों की शय्या बिछाती थी, कोई उसके पाँव दबाती थी, कोई उसके बैठने के लिए मनोहर सिंहासन पर गद्दी तकिया वगैरह डालती थी, कोई पुरंध्री की तरह सुगन्ध द्रव्य चन्दन, कर्पूर वगैरह का लेप करती थी, कोई उसके आभूषणों को लिए खड़ी हुई ऐसी मालूम पड़ती थी मानों दीप्ति के


काश्चिद्वासांसि क्षौमाणि प्रसूनस्तबकावहाः ।
माला रेजुर्ददत्योऽत्र व्रतत्य इव विस्तृताः ॥१३३॥

उत्खातासिकराः काश्चिच्छरीररक्षाविधौ यताः।
तदभ्यर्णे स्थिता रेजुश्चञ्चला इव खस्थिताः ॥१३४॥

चन्दनच्छटयाच्छन्नमच्छिन्नमणिभूतलम्।
काश्चित्कुर्वन्ति कम्राङ्गाश्चन्दनागलता इव ॥१३५॥

पुष्पस्वस्तिकमाभेजुः सुभुजैर्भोगदायिकाः।
काश्चिद्द्वारां सुशोधिन्या शुद्धां कुर्वन्ति कोविदाः ॥१३६॥

काश्चित्पक्वान्नसंपन्नमोदकौदनपायसम्।
पूपांश्च मण्डकाखण्डखज्जकामृतशर्कराः ॥१३७॥

सूपशाल्यन्नमुद्गान्नं नानाव्यञ्जनसंयुतम्।
दधीनि पिच्छिलान्याशु शुद्धदुग्धानि सद्रसान् ॥१३८॥

प्राज्यमाज्यं करम्बं च कर्पूरलवणान्वितम्।
शक्रस्य दुर्लभं तक्रं ददते मातृभुक्तये ॥१३९॥

पादप्रक्षालनं काश्चित्काश्चिदादर्शकं ददुः।
वक्त्रेक्षणाय चान्द्रं वा बिम्बमिद्धं धरागतम् ॥१४०॥

पुष्पमालां करे कृत्वा मातुरग्रे स्थिता बभुः।
काश्चिच्छाखिसुशाखा वा सेवां कर्तुमिहागताः ॥१४१॥

मुकुटं कुण्डले काश्चित्काश्चिद्धारलतां शुभाम्।
ददते कण्ठिकां काश्चिच्छाखा वा कल्पशाखिनः ॥१४२॥

पुष्परेणुसमाकीर्णां क्षरन्मुक्ताफलाविलाम्।
महीं मार्जन्ति काश्चिच्च स्वर्णरेणुसुसंकराम् ॥१४३॥

पटुघोण्टाफलाखण्डखण्डान्येलालवङ्गकैः।
नागवल्लीदलान्यन्या ददुर्नगलता इव ॥१४४॥

अर्थ (श्लोक 133 से 144): पूर से विभूषित कल्पलता उसे भूषण ही दे रही है, कोई उसे रेशमी वस्त्र देती थी, कोई फूलों की गूँथी हुई मालाएँ देती हुई बेल-सी जान पड़ती थी, कोई तलवार उठाये हुए प्रभु की माता के शरीर की रक्षा के लिए उसके पास पहरा देती थी वह ऐसी जान पड़ती थी मानों बिजली ही है, कोई चन्दन के जल से मणिजड़ित भूतल को सींचती हुई ऐसी शोभती थी मानों चंदन वृक्ष की लता ही है, कोई भोग्य-वस्तुओं को देने वाली फूलों के चौक पूरती थी, कोई पृथिवी को शोधने वाली भूमि को साफ करती थी-झाड़ती-बुहारती थी, कोई प्रभु की माता को खाने के लिए अच्छे-अच्छे सब प्रकार के पकवान मोदक, व्यंजन आदि देती, कोई उसके पाँव धोती थी, कोई मुँह देखने के लिए पृथ्वीतल पर आये हुए चन्द्रमा के जैसा उसे दर्पण देती थी, कोई हाथ में पुष्पों की माला लेकर प्रभु की माता के आगे खड़ी हुई ऐसी शोभती थी मानों उसकी सेवा करने को यहाँ किसी वृक्ष की शाखा ही आ गई है, कोई उसे मुकुट और कोई कुण्डल पहनाती थी, कोई उसके कण्ठ में हार पहनाती हुई कल्पवृक्ष की शाखा जैसी शोभती थी, कोई पुष्पों की धूल (केसर) से भरपूर अतएव सोने की धूल से धूसरित जैसी और जिस पर इधर-उधर मोती बिखर रहे हैं ऐसी पृथ्वी को साफ करती थी, कोई सुपारी, इलायची, लोंग आदि से सुसज्जित पान देती थी-वह ऐसी जान पड़ती थी मानों नागबेल ही है, कोई स्वर्ग की गणिका उत्तम हाव-भावों को दिखाती हुई उसके सामने नृत्य करती थी, कोई उसके मन को आनन्दित करती थी, कोई मनोहर कामधेनु का रूप धर कर प्रभु की माता को उत्तम-उत्तम वस्तु देती थी, कोई माता की प्रीतिपात्र बनी हुई सुशोभित होती थी, कोई उसके शरीर की रक्षा करती थी, कोई उसके हाथ से वस्तु लेती थी, कोई उसके मन को पुष्ट करती-बढ़ाती थी, कोई उत्तम-उत्तम वार्तालाप द्वारा उसके साथ विचार करती थी, कोई उसके मल को स्वच्छ करती थी, कोई उसके मोहभाव को उत्तेजना देती थी, कोई चोर आदि के भय से उसकी आत्मा को छुड़ाती थी,


नर्नर्ति नाकगणिका वरहावभावा वर्वर्ति मातृहृदयानगता च काचित् ।
संबोभवीति कमनीयसुकामधेनुः संजोहवीति वरकामगुणं च काचित् ॥१४५॥

बाभायते मातृमता च काचित्पापायते मातृतनं च काचित् ।
लालायते मातृकराच्च वस्तु दाधायते मातृमनश्च काचित् ॥१४६॥

मीमांसते ताममरी सुदाम्ना दीदांसतेऽन्या च मलं सुमातुः ।
शीशांसते मोहभरं च काचिद्भीभत्सते दस्युदरं च काचित् ॥१४७॥

दीप्रैः सुदीपैः सुरकामिनी च काचित्सुभक्तिं निशि जैनमातुः ।
चर्कर्ति काचिद्वरवस्त्रदत्तिं शक्राज्ञया नाकवधूः समस्ता ॥१४८॥

अर्थ (श्लोक 129 से 148): कोई रात के समय दैदीप्यमान दीपकों द्वारा उसकी भक्ति करती थी और कोई सुन्दर-सुन्दर वस्त्र प्रदान करती थी। तात्पर्य यह कि इन्द्र की आज्ञा से सब देव-कन्याएँ जिनमाता की नाना भाँति से सेवा-शुश्रूषा करती थीं ॥१२९-१४८॥


नररूपं समादाय नर्नर्ति सुरनर्तकी। तच्चेष्टितं प्रकुर्वाणा हासयन्त्यखिलाञ्जनान् ॥१४९॥

कदाचिज्जललीलाभिः कदाचिद्वरनर्तनैः । रमयन्ति स्म तां देव्यः सेवासक्तसुमानसाः ॥१५०॥

गीतगोष्ठीं गता माता देव्या साकं रसान्विता । कदाचिद्विविधा वार्ता विदधे शुद्धमानसा ॥१५१॥

दिक्कुमारीसमं राज्ञी कालमित्थं निनाय च। सा बभार परां कान्तिं कला चान्द्रमसी यथा ॥१५२॥

अर्थ (श्लोक 149 से 152): इसी प्रकार कुछ देवियाँ मनुष्यनी का रूप धरकर वहाँ आती और नाना तरह के हाव-भाव विलास के साथ नृत्यकर सब, जनों को हँसाती और आनंद में मग्न कर देती थीं। देवियाँ जिनमाता की सेवा में इतनी लवलीन थीं कि वे जिस तरह बनता उसके चित्त को सदा ही खुश रखती थीं। वे कभी,जल-लीला से और कभी नृत्य के हास-विनोद से प्रभु की माता के दिल की रमाती थीं और शुद्ध मन वाली जिनमाता भी उनकी गीत-गोष्ठी में जाकर उन देवियों के साथ नाना तरह की रस भरी बातें करती थी। शिवादेवी ने इस तरह से दिक्कुमारियों के साथ बहुत-सा काल बिताया। इस समय वह अपनी कान्ति से चन्द्रमा की कला के जैसी सुशोभित होती थी ॥१४९-१५२॥


अभ्यर्णे नवमे मासेऽन्तर्वत्नीमथ सदसैः। देव्यस्तां रमयामासुर्गद्यपद्यैर्वराक्षरैः ॥१५३॥

अर्थ: इसी प्रकार आनंद-चैन से धीरे-धीरे आठ महीने बीतकर नौवाँ महीना लग गया। इस समय वे देवियाँ गर्भिणी जिनमाता को रस-पूर्ण और उत्तम रचना वाले गद्य-पद्य सुनाती थी और उसका चित्त प्रसन्न करती थीं। इसके सिवाय वे प्रभु की माता से गूढ़ अर्थ वाले प्रश्न पूछती थीं और जिनमाता उनका उत्तर करती थी। किसी ने पूछा कि हे माता!


पुष्पावगुण्ठिता का स्यात्का शरीरपिधायिका । का देहदाहिका देवि वदाद्याक्षरतः पृथक् ॥१५४॥

अर्थ (श्लोक 153 से 154): पुष्पों से गूँथी गई क्या चीज होती है ? शरीर को कौन ढँकता है ? और शरीर को क्षीण कौन करता है ? इन तीन प्रश्नों के ऐसे उत्तर दीजिए। जिनका पहला अक्षर ही केवल दूसरा-दूसरा हो ॥१५३-१५४॥ उत्तर में माता ने कहा-स्रक् (माला) त्वक् (खाल), रुक् (रोग)। किसी ने पूछा-


पुष्पावगुण्ठिता का स्यात्का शरीरपिधायिका। का देहदाहिका देवि, वद्याद्याक्षरतः पृथक्॥१५५॥

अर्थ: सांसारिक दुखों की दूर कौन करता है ? पैरों बिना कौन चलता है ? और लोगों को संतोष कौन देता है ? इन प्रश्नों के ऐसे उत्तर कीजिए जिनका आदि व्यंजन ही केवल दूसरा-दूसरा हो ॥१५५॥ उत्तर में माता ने कहा-जिन (अर्हन्त), स्वन (शब्द), घन (मेघ)। किसी ने पूछा अच्छा माता


आद्यन्तरहितः कोऽत्र कः कीलालसमन्वितः।
वक्त्रादुत्पद्यते कोऽत्र कथयाद्याक्षरैः पृथक् ॥१५६॥

अर्थ: इस लोक में आदि-अन्त रहित कौन है ? जल-युक्त क्या होता है ? और मुँह से क्या उत्पन्न होता है ? इन प्रश्नों के ऐसे जबाब दीजिए जिनके पहले के अक्षर ही दूसरे-दूसरे हों ॥१५६॥ उत्तर में माता बोली-संसार, कासार (तालाब) और व्याहार (वचन)। किसी ने पूछा-


नरार्थवाचकः कोऽत्र कः सामान्यप्ररूपकः।
का व्रते प्रथमा ख्याता कीदृशी त्वं भविष्यसि ॥१५७॥

अर्थ: नर-पुरुष अर्थ का वाचक कौन है ? सामान्य को कहने वाला कौन है ? पहले व्रत में क्या माना गया है ? और तुम कैसी होओगी? ॥१५७॥ उत्तर में माता ने कहा-ना (नृ शब्द), क, दया और नाकोदया (स्वर्ग से चय कर आये हुए पुत्रवाली)। तात्पर्य यह कि ‘नृ’ शब्द की प्रथमा विभक्ति का एक वचन ‘ना’ और ‘क’ शब्द का ‘कः’ दोनों एकत्र लिखने से हुआ ‘नाकः’। फिर दया शब्द का ‘द’ आगे होने से ‘क’ के आगे वाले विसर्ग का हो गया ‘ओ’ तब अन्त के प्रश्न का उत्तर ‘नाकोदया’ हो गया। किसी ने पूछा-


सुखप्ररूपकं किं स्यात्का भाषा च कृपातिगा।
भुजप्ररूपकः कः स्यात्कः सेव्यो जनसत्तमैः ॥१५८॥

अर्थ: सुख का प्ररूपक कौन है ? कृपा-विहीन कौन-सी भाषा होती है ? भुजाओं को कहने वाला कौन है ? उत्तम पुरुष किस की सेवा करते हैं ? ॥१५८॥ माता ने उत्तर दया-शम्, अदया (जो दया बिना बोली जाती है), कर और शमदयाकर (समताभाव और दया का आकर)। किसी ने पूछा- वित्त को कहने वाला कौन-सा शब्द है? योद्धाओं को युद्ध से कौन-सा पद मिलता है


वित्तप्ररूपकं किं स्यात्पदं संग्रामतः खलु। कः स्यात्संग्रामशूराणां कः स्यादर्जुनपाण्डवः ॥१५९॥

अर्थ: ? और अर्जुन को क्या कहते हैं ? ॥१५९॥


पानाथेऽपि च को धातू रक्षणार्थेऽपि को मतः। कः सामान्यपदाभ्यासी कृशानुः कोऽभिधीयते ॥१६०॥

आद्याक्षरं विना पक्षी कः को मध्याक्षरं विना। भुक्त्यर्हः कोऽन्त्यमुन्मुच्य संबुद्धिः पानरक्षणे ॥१६१॥

अर्थ (श्लोक 160 से 161): पीने अर्थ में जिसका कि लोट के मध्यपुरुष के एक वचन में पिब रूप होता है, कौन-सी धातु है? तथा रक्षण अर्थ में कौन धातु है? और सामान्य पद को कहने वाला कौन है ? तथा कृशानु किसे कहते हैं ? इन प्रश्नों के ऐसे उत्तर दीजिए जिनका मिला हुआ पद पहले अक्षर के बिना पक्षी का कहने वाला हो, बीच के अक्षर बिना भोग्य पदार्थ को कहने वाला हो और अन्त के अक्षर को छोड़ देने से वही पीने और रक्षण अर्थ में जो धातुएँ हैं उनसे निष्पन्न शब्दों का सम्बोधन का रूप हो जाय ॥१६०-१६१॥


वसुसंख्या तु काप्त्यर्थधातुरूपं च किं लिटि। किं कलत्रं सुवर्णं किं कं कैलासं वदाशु भोः ॥१६२॥

अर्थ: वसु को कहने वाली संख्या कौन है ? प्राप्ति-अर्थ वाली धातु का लिट् में क्या रूप होता है ? स्त्रीलिंग का बोधक कौन है ? सोना और कैलाश किसे कहते हैं ? ॥१६२॥


किं निश्चयपदं लोके कस्तिरश्चां लघुर्वद। शुभः को मोक्षसिद्धयर्थं को भवेत्सर्वदाहकः ॥१६३॥

अर्थ: निश्चयवाचक पद कौन है ? तिर्यञ्चों में छोटा कौन है ? मोक्ष सिद्धि के लिए उपयुक्त कौन है? और सबको जलाने वाली क्या चीज होती है ? ॥१६३॥


कृष्णसंबोधनं किं स्यात्किं पदं व्यक्तवाचकम्। के गर्वाः को विधीयेत वादिभिर्निगमश्च कः।
प्रसिद्धोऽथ भुजंगेशोऽहंकारवादकस्तु कः ॥१६४॥

अर्थ: कृष्ण का सम्बोधन क्या होता है ? व्यक्त को कहने वाला पद कौन-सा है? गर्व कौन से हैं ? वादी लोग क्या करते हैं ? प्रसिद्ध निगम (गाँव) कौन-सा है ? भुजगेश और अहंकार को कहने वाले कौन से शब्द हैं ? ॥१६४॥ माता ने उत्तर दिया-अ, हि, मदा (आठ मद), वाद, अहिमदाबाद, अहि, मद।


इष्टानिष्टं दहेत्सर्वं देवो दाहकरस्तथा। अन्धकृद्धृततेजस्कः स भाति भूधरोदरे ॥१६५॥

अर्थ: देव इष्टानिष्ट सबको जलाता है तथा सबको दाह उत्पन्न करता है। उसने तेज धारण किया, वह लोगों को अंधा बनाता है और पर्वत के उदर में चमकने लगता है। माता ने कहा देव के स्थान पर दव होना चाहिए। दव का अर्थ अग्नि है जो इष्टानिष्ट को जलाता है ॥१६५॥


रम्यं काय फलं मातः सर्वेषां तोषदायकम्। जिनचक्रिबलादीनां पदस्य सकलोन्नतेः ॥१६६॥

अर्थ: जिन, चक्रवर्ती, बलभद्र आदि सबको पूर्ण उन्नति के पद का सन्तोष देने वाला रमणीय फल क्या है, सो कहो ॥१६६॥ माता ने उत्तर दिया, अमृत-मोक्ष।


अम्बास्य विपुलं सर्वमेनोवृन्दं जनोद्भवम्। त्वं भवसारनीरेशं विधुंतुदसमं शुभे ॥१६७॥

जय देवि जगन्नाथ पुत्रहेतो शुभानने। जगतत्रयवधूरूपसीमे कोकिलनिःस्वने ॥१६८॥

अर्थ (श्लोक 167 से 168): इनमें कोई माता से विन्ती करती थी कि माता, तुम लोगों के पाप-समूह को दूर करो। वह उन्हें बहुत दुख देता है और उनकी आत्मा को चन्द्रमा को ग्रसने वाले राहु की भाँति ग्रसता है। कोई माता का जय-जयकार बोलती थी कि सुहावने मुँह वाली माता, तुम्हारी जय हो, देव और जगत् के स्वामी पुत्र को पैदा करने वाली, तीन लोक की सारी स्त्रियों के रूप की सीमा तथा कोयल के जैसे कंठ वाली हे माता, तुम जयवन्त रहो ॥१६७-१६८॥


एवमुत्तरपद्यानि ताभिर्गूढार्थकानि च।
प्रयुक्तानि तया शीघ्रं कथितानि विशेषतः ॥१६९॥

बुद्धिः स्वाभाविकी तस्या नानाप्रश्नोत्तरक्षमा।
भूषोनालकृता रेजे मणिना हारयष्टिवत् ॥१७०॥

बभार गर्भजं तेजो निसर्गरुचिर्जिता।
राज्ञी रत्नमयं धाम भूर्यथाकरगोचरा ॥१७१॥

पीडा च गर्भजा तस्या नाभूत्स्वप्नेऽपि दुर्बहा।
वह्निकान्तिरिवादर्शे प्रतिबिम्बाकृतिं गता ॥१७२॥

मा भूद्भङ्गस्त्रिवल्याश्चोदरे ऽस्याः पूर्ववत्स्थितेः।
न कृष्णत्वं कुचद्वन्द्वचूचके हंसवद्गतेः ॥१७३॥

न पाण्डु वदनं जातं तस्या आलस्यसंततिः।
ववृधे चार्भको गर्भे तथापि सुखकारकः ॥१७४॥

अर्थ (श्लोक 169 से 174): इस प्रकार देवियों ने जिनमाता से गूढ़ अर्थ वाले बहुत से प्रश्न किये और माता ने उनका अति शीघ्र और उचित उत्तर किया। उसकी बुद्धि स्वभाव से ही नाना प्रश्नों के उत्तर करने को समर्थ थी। वह प्रभु को गर्भ में लिये ऐसी शोभती थी जैसी कि मणियों के द्वारा हारलता शोभती है। स्वभाव से ही तेजशाली उसके शरीर की शोभा गर्भ के तेज से और भी बढ़ गई थी, जैसे कि स्वभाव से कान्तिमय खान की शोभा रत्नों की कान्ति से और भी बढ़ जाती है। गर्भ के निमित्त से उसे कभी स्वप्न में भी कोई दुर्बह पीड़ा न हुई। ठीक ही है कि क्या मनोहर दर्पण में पड़ा हुआ आग का प्रतिबिम्ब उसे जला सकता है? उसका गर्भ दुर्बह नहीं हुआ था। न उसकी त्रिवली का भंग हुआ था और न उसके कुचों के चूचक काले पड़े थे, न उसका मुँह पीला हुआ था और न उसे आलस ही आता था। उसकी हंस के जैसी पहले गति थी वैसी ही अब थी, उसमें कुछ भी फर्क नहीं हुआ था। तात्पर्य यह कि दुख की बात तो दूर रही, पर ज्यों-ज्यों उसका गर्भ बढ़ता जाता था त्यों-त्यों वह उसके लिए सुखकर होता जाता था ॥१६९-१७४॥


अथैवं नवमासेषु गतेषु सुषुवे सुतम्।
श्रावणे शुक्लपक्षे सा षष्ठ्यां चित्रागते विधौ ॥१७५॥

देवी देवीभिरुक्ताभिः सेविता सुतमाप सा।
पद्मबन्धुं यथा प्राची नलिनं नलिनीव च ॥१७६॥

त्रिभिर्बोधैः समायुक्तः शिशू रेजे शुभैर्गुणैः।
मन्दं मन्दं ववौ वायुस्तदा सद्गन्धबन्धुरः ॥१७७॥

संमार्जितरजोराजीर्भूरादर्शसमा बभौ।
विकसन्नवनीरेजोरोमाञ्चान्वितविग्रहा ॥१७८॥

देवानामासनान्युच्चैरकस्मात्प्रचकम्पिरे।
तदा शिरांसि जिष्णूनां धुन्वन्मौलिमणीन्यभुः ॥१७९॥

कल्पे घण्टाघनारावः सैंहशब्दश्च ज्योतिषि।
भेरीध्वनिरभूद्वाने भवने शङ्खनिस्वनः ॥१८०॥

अर्थ (श्लोक 175 से 180): इस प्रकार धीरे-धीरे आनंद-चैन से जब नौ महीना पूरे हो गये तब सावन सुदी छट के दिन, चित्रा नक्षत्र में, उस महादेवी शिवादेवी ने पुत्र-रत्न को जन्म दिया, जैसे पूर्वदिशा सूरज को जन्म देती है। पुत्र जन्म से ही तीन ज्ञान का धारक था और गुणों का पुंज था। प्रभु के जन्म-समय मंद-मंद सुगन्धित वायु चल रही थी। पृथ्वी धूल-रहित दर्पण की तरह निर्मल हो गई थी। खिले हुए नील कमल उसके रोमाञ्च के जैसे जान पड़ते थे। भगवान् का जन्म होते ही एकाएक देवताओं के आसन कंपित हो उठे। उनके मुकुट अपने आप नम गये एवं बिना बजाये ही कल्पवासियों के यहाँ घंटों का नाद, ज्योतिषियों के यहाँ सिंह-नाद, व्यन्तरों के यहाँ दुंदुभियों का शब्द और भवनवासियों के यहाँ


तदुत्पन्नं तदा सर्वे श्रुत्वा चाकस्मिकं ध्वनिम्।
विज्ञाय जन्म देवस्य बभूवुर्हर्षिताननाः ॥१८१॥

अर्थ (श्लोक 175 से 181): शंख-नाद होने लगा। जिसका सुनकर उन्होंने प्रभु के जन्म का निश्चय किया और वे बड़े भारी हर्षित हुए ॥१७५-१८१॥


ततोऽपीन्द्राज्ञया सुज्ञा निर्ययुर्निजधामतः।
स्वस्वासनसमासक्ताः ससुरासुरनायकाः ॥१८२॥

वियतस्तेऽवतीर्याशु तत्पुरं सपुरंदराः।
सुराः प्रापुः प्रमोदेन कुर्वन्तो भूमिमेजयम् ॥१८३॥

शक्राज्ञया शुची शुद्धा प्राविशत्प्रसवालयम्।
ततोऽदर्शि तया माता सुतेन सममञ्जसा ॥१८४॥

जिनस्य जननीं गूढा त्रिः परीत्यानमच्छची।
तस्थौ मातुः पुरो देशे पश्यन्ती परमं जिनम् ॥१८५॥

कराभ्यां तं समादाय मुक्त्वा मायामयार्भकम्।
शची पुरंदराभ्यर्णं जगाम सुसुरीस्तुता ॥१८६॥

अर्थ (श्लोक 182 से 186): इसके बाद इन्द्र की आज्ञा से सब देवगण इन्द्र के साथ-साथ अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर स्वर्ग से आकाश-मार्ग द्वारा पृथ्वीतल पर उतर कर द्वारिका में आये। इस समय उनके आनंद का कुछ पार न था। वहाँ आकर इन्द्र की आज्ञा से गुप्त भेष में इन्द्राणी प्रसूति-गृह में गई और वहाँ प्रभु-सहित शिवादेवी को देखकर उसने उन्हें नमस्कार किया। इसके बाद वह प्रभु को सतृष्ण लोचनों से निरखती हुई जिन-जननी के सामने खड़ी हो गई और जिनमाता के पास एक मायामयी बालक को सुलाकर उसने प्रभु को गोद में उठा लिया और उन्हें वह बाहर इन्द्र के पास ले आई ॥१८२-१८६॥


पुरंदरकरे प्रीता ददौ दीप्ता सुनन्दनम्।
तमर्भकं समादाय सोऽपि मेरुमुपस्थितः ॥१८७॥

मेरौ च पाण्डुकेऽरण्ये पाण्डुकायां सुरोत्तमाः।
शिलायां स्थापयामासुः सिंहपीठे जिनार्भकम् ॥१८८॥

शातकुम्भमयैः कुम्भैः क्षीराब्धिसुपयोभृतैः।
अष्टाधिकसहस्रैश्चास्नापयन्तं सुरोत्तमः ॥१८९॥

गन्धोदकेन संबन्ध्य बन्धुरं श्रीजिनोत्तमम्।
संबंधन्तः स्वयं पूताः सुरास्तेनाभवन्मुदा ॥१९०॥

शची संस्कारयोगेन संस्कृत्य तं जिनेश्वरम्।
तद्रूपसंपदं तृप्ता पश्यन्ती नाभवत्तदा ॥१९१॥

अर्थ (श्लोक 187 से 191): प्रभु को लाकर उसने बड़ी भारी भक्ति और प्रीति से इन्द्र की गोद में दे दिया। इन्द्र प्रभु को गोद में ले सुमेरु पर्वत पर ले गया। वहाँ उसने पाण्डुकवन की पाण्डुकशिला पर जो अनादि से एक सिंहासन के जैसी है, विराजमान कर क्षीरसागर के जल से भरे हुए सोने के एक हजार आठ कलशों द्वारा प्रभु का अभिषेक किया। अभिषेक के बाद प्रभु के गंधोदक को अपने-अपने मस्तक पर चढ़ा सब देव-गण पवित्र हुए। उन्होंने प्रभु के स्नान के जल से अपने कर्म कलंक को बहा दिया। अनन्तर इन्द्राणी ने प्रभु के शरीर को पोंछ कर उन्हें दिव्य वस्त्र और आभूषण पहिनाये। इस समय प्रभु के शरीर का सौंदर्य इतना बढ़ गया था कि इन्द्राणी उसको देखकर तृप्त ही नहीं होती थी ॥१८७-१९१॥


शक्रस्संस्तोतुमुद्युक्तस्तं शचीसंगतः शुभम्।
निःस्वेदास्पदनैर्मल्यविपुलक्षीरशोणित ॥१९२॥

आद्यसंस्थानसंस्थात आद्यसंहननोत्तम।
सौरूप्यपरिपूर्णाङ्ग सौरभ्यभरभूषित ॥१९३॥

अर्थ (श्लोक 192 से 193): इसके बाद इन्द्राणी के साथ इन्द्र ने प्रभु की स्तुति करना आरंभ की कि प्रभो, आप स्वेद-रहित हैं, मल-रहित निर्मल हैं, विपुल हैं, आपका रुधिर दूध के जैसा सफेद है, आपका पहला संस्थान


अष्टाधिकसहस्रेण लक्षणेन सुलक्षित। उपमातीतवीर्येश हितप्रियवचःपते ॥१९४॥

दशातिशययुक्ताय ते नमोऽस्तु शिवात्मज। अरिष्टचक्रनेमीशे श्रेयोरथसुनेमये ॥१९५॥

स्तुत्वेति ताण्डवं कृत्वा मघवा साध्वविघ्नहृत्। सुरौघैरङ्कमारोप्य तमागान्नगरीं प्रति ॥१९६॥

अर्थ (श्लोक 192 से 196): और पहला संहनन है और आप सर्वोत्तम हैं। तात्पर्य यह कि आपको सब मोक्ष-सामग्री प्राप्त है। स्वामिन्! आपका शरीर सुन्दरता से परिपूर्ण हैं, नाना तरह की सुगन्धि से विभूषित है तथा एक हजार आठ लक्षणों से युक्त है। प्रभो! आप उपमा-रहित निरुपम हैं, वीर्य के भण्डार हैं, हित, मित और प्रिय वचनों के बोलने वाले हैं, अतः प्रभो आपको मैं नमस्कार करता हूँ! आप शिवादेवी के पुत्र हैं और दस अनोखी बातों-अतिशयों से सुशोभित हैं, अरिष्ट-समूह को दूर करने वाले हैं और कल्याण-रथ की धुरा हैं, अतः हे प्रभो, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। इस तरह प्रभु की स्तुति कर इन्द्र ने खूब ताण्डव नृत्य किया ॥१९२-१९६॥


पितृभ्यां मघवा दत्त्वा देवदेवं जगन्नुतम्। नटित्वा नटवन्निन्ये निर्मलं भोगसंपदम् ॥१९७॥

नियोज्य सुरसंघातान् रक्षणे दक्षिणोऽप्यगात्। नेमिस्तु नम्रनाकीशसेवितो ववृधे तराम् ॥१९८॥

अर्थ (श्लोक 197 से 198): इसके बाद वह प्रभु को गोद में लेकर देव-गण के साथ वापस द्वारिका को चला आया। वहाँ आकर उसने देवों के देव और जगत् पूज्य प्रभु को उनके माता-पिता को सौंपकर उनके आँगन में खूब नृत्य किया। इसके बाद वह भाँति-भाँति की निर्मल भोग-सम्पदा की योजना कर और प्रभु की रक्षा के लिए देवों को नियुक्त कर स्वर्ग को चला गया ॥१९७-१९८॥


कलया कान्तितः कम्रः परः कुमुदबान्धवः। विधुवद्ववृधे शुद्धोदधिं संवर्धयन्सुधीः ॥१९९॥

नेमिर्नानानिमिषनिकरैः संगतो वृद्धिमाप्य रिङ्खन्क्षोण्यां क्षितिपतिभिर्वीक्षितः क्षिप्रगत्या।
स्वस्याङ्गुष्ठेऽमृतमयमहान्नादमास्वादयंश्च पादस्थैर्यं तदनु सुगतिं संगतोऽभूत्कुमारः ॥२००॥

अर्थ (श्लोक 199 से 200): इधर देवों द्वारा सेवित नेमिप्रभु कला और कान्ति से बढ़ने लगे। वे मनोहर थे, श्रेष्ठ और संसार के बन्धु थे-जिस तरह चाँद समुद्र को वृद्धिंगत करता है उसी तरह वे भी संसार में सिद्धि को वृद्धिंगत करते थे। प्रभु के साथ देव-गण बच्चों का सा रूप धर-धरकर खेलते थे और उन्हें जिस तरह होता खुश रखते थे। प्रभु जब लड़खड़ाते हुए पृथ्वी पर चलते तब बहुत ही सुशोभित होते और महाराज उन्हें देखकर अति हर्षित होते थे। प्रभु विनोद करते हुए अपने अंगूठे को मुँह में दे लेते थे और उससे अमृतमय आहार का स्वाद लेते थे ॥१९९-२००॥


वक्त्रं यस्य महेन्दुसुन्दरतरं पद्मस्य पत्रे इव नेत्रे कर्णयुगे सुकुण्डलयुते भालं विशालं महत्।
बाहू कल्पतरू इवार्थजनकौ वक्षः सुरक्षाक्षमम् कूलं वाञ्जनपर्वतस्य परमा नाभिर्गभीरा शुभा ॥२०१॥

अर्थ: इसके बाद प्रभु के पाँव कुछ जमने लगे, वे अच्छी तरह दृढ़ता से पाँव जमाकर सुन्दर चाल से चलने लगे। प्रभु का मुँह पूर्ण चाँद से भी सुन्दर था, नेत्र कमल के जैसे थे। कान कुण्डलों से सुशोभित थे। प्रभु का मस्तक (ललाट) खूब विशाल था। उनके बाहु (हाथ) कल्पवृक्ष की तरह मनोरथों के साधक थे। उनका वक्षःस्थल रक्षा के लिए पूर्ण समर्थ था। वह अंजन पर्वत के तट जैसा


काञ्चीदामगुणोत्कटा स्फुटकटिः स्तम्भोपमोरू परौ
जङ्घे विघ्नहरे सुहस्तिकरवत् पादौ च पापापहौ।
पद्माभौ नखराः समृक्षविशदा वैदग्ध्यमैश्यं महत्
स श्रीनेमिजिनेश्वरो जगदिदं पातु प्रभाभासुरः ॥२०२॥

अर्थ (श्लोक 201 से 202): था। उनकी नाभि सुहावनी और गंभीर थी। कटिभाग करधौनी से सुशोभित था। उनके उरु स्तंभ के समान थे। जाँघें सुन्दर हाथी की सूँड के जैसी और विघ्नों को हरने वाली थीं। कमल जैसी आभा वाले उनके पाँव पाप की हरने वाले थे। उनके नख नक्षत्र के जैसे चमकते हुए थे। वे प्रभु महान् पांडित्य-पूर्ण, अतुल ऐश्वर्य के धारक और अनुपम प्रभा-मण्डल से शोभामान् थे। वे श्री नेमि जिनेश्वर संसार की रक्षा करें ॥२०१-२०२॥


इति श्रीभट्टारकशुभचन्द्रप्रणीते ब्रह्म० श्रीपाल साहाय्यसापेक्षे श्रीपाण्डवपुराणे महाभारतनाम्नि
यादवद्वारिकाप्रवेशश्रीनेमीश्वरोत्पत्तिवर्णनं नामैकादशं पर्व ॥२०३॥

द्वादशं पर्व (भाग 1/2)

सुपार्श्वं पार्श्वकर्तारं सुपार्श्वं पार्श्ववर्तिनाम्।
स्वस्तिकोद्भासिपादान्तं स्तौमि सत्पार्श्वसिद्धये ॥१॥

अर्थ: उन सुपार्श्व प्रभु की मैं स्तुति करता हूँ जो जीवों का हित करने वाले हैं, जिनके प्रभाव से जाति-विरोधी जीव भी अपने वैर-विरोध को छोड़कर मित्र बन जाते हैं और जिनके चरण-कमलों में साथिया का चिह्न है। वे मुझे संसार-समुद्र के पार पहुँचावें ॥१॥


अथैकदा सभायां स यादवानां विधेः सुतः।
समागतो नतो नम्रैः सोत्कण्ठैर्माधवादिभिः ॥२॥

सत्यभामाशुभाभोगभवनं भासुरं गतः।
तयापमानितः प्राप पत्तनं कुण्डिनं मुनिः ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): एक समय यादव-गण अपनी सभा में बैठे हुए थे, इतने ही में वहाँ नारदजी आ गये। उन्हें आया देख कृष्ण आदि सब यादव-गण उठ खड़े हुए और सबने उनका स्वागत कर विनीत भाव से उन्हें नमस्कार किया। इसके बाद वे महल में सत्यभामा के पास गये। सत्यभामा ने उनका यथोचित आदर नहीं किया। इससे असन्तुष्ट हो वे एकदम कुंडिनपुर को चले गये ॥२-३॥


तत्र च श्रीमतीभीष्मसुतां तां रुक्मिणोऽनुजाम्।
रुक्मिणीं वीक्ष्य दक्षः स सहर्षोऽभूत्स्वमानसे ॥४॥

पुण्डरीकाक्षमाक्षोभ्य नारदस्तत्प्रवार्तया।
प्रेरितो बलदेवेन स चचाल सुकुण्डिनम् ॥५॥

स नियुज्य निजां सेनां तत्पुरागमनाय च।
हलायुधेन तत्रापच्छिशुपालेन वेष्टितम् ॥६॥

अर्थ (श्लोक 4 से 6): वहाँ पहुँच कर उन्होंने भीष्म और श्रीमती की पुत्री, रुक्मी की छोटी बहन रुक्मिणी को देखा। उसे देखकर वे मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए। वहाँ से वे फिर कृष्ण के पास द्वारिका आये। यहाँ आकर उन्होंने रुक्मिणी की सारी कहानी कृष्ण को सुनाई, जिससे कृष्ण के हृदय में उसके प्रति राग हो गया और वह उसे चाहने लगे। यह बात बलदेव के कान में पहुँची। उनने कृष्ण को कुंडिनपुर जाने की प्रेरणा की। कृष्ण उन्हें साथ लेकर कुंडिनपुर पहुँचे। कृष्ण चलते समय अपनी सब सेना को भी कुंडिनपुर आने का आदेश कर गये थे, अतः उनकी सेना भी अति शीघ्र ही वहाँ पहुँच गई। उधर रुक्मी ने पहले ही से शिशुपाल को रुक्मिणी देने का वचन दे रक्खा था, अतः शिशुपाल पहले से ही कुंडिनपुर घेरे हुए था ॥४-६॥


रुक्मिणीं रुक्मभूषाभां नागवल्लीसुरालये।
गतां वर्धापनव्याजाज्जहार मधुसूदनः ॥७॥

ज्ञापयित्वा हृतां तां तान्कम्बुशब्देन तौ द्रुतम्।
अचलां चालयन्तौ च चलतुश्चञ्चलात्मकौ ॥८॥

रुक्मी मद्रीसुतस्तावच्छ्रुत्वा तद्धरणं हठात्।
तौ चेलतुर्घनाटोपघोटकैर्द्विरदैः समम् ॥९॥

अर्थ (श्लोक 7 से 9): इन्हीं दिनों एक-दिन सोने के जैसी आभा वाली रुक्मिणी नागदेव की पूजा के लिए नाग-मन्दिर को गई हुई थी। वहाँ उसे कृष्ण नारायण ने हर लिया और इसकी उसने शंख-ध्वनि द्वारा औरों को भी सूचना कर दी। इसके बाद ही कृष्ण और बलदेव दोनों भाई वहाँ से चल दिये। उन वीरों के चलने से पृथ्वी भी चलती हुई सी जान पड़ती थी। उधर जब शंख-ध्वनि से रुक्मिणी के हरे जाने की रुक्मी और शिशुपाल को सूचना मिली तब वे दोनों भी बहुत-सी सेना को साथ लेकर कृष्ण और बलदेव


प्राङ्नियुक्तं बलं तावद् द्वारिकातः समागमत्।
वैकुण्ठ बलदेवाभ्यां युयुधाते च तौ मदात् ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 7 से 10): के साथ युद्ध करने को निकले। इधर द्वारिका से आई हुई कृष्ण की सेना पहले से ही तैयार थी, अतः कृष्ण और बलदेव के साथ उन दोनों मतवालों का युद्ध छिड़ गया ॥७-१०॥


उभयोः सैन्ययोर्वीरा वल्गन्ति विगलच्छराः।
वदन्तो विविधां वाणीं विदन्तो मृतिमात्मनः ॥११॥

रुक्मिण्या दर्शितं विष्णू रुक्मिणं स्वसहोदरम्।
प्रबध्य नागपाशेन स्वरथाधोऽक्षिपत्तराम् ॥१२॥

दमघोषसुतं क्रुद्धं शतदोषापराधिनम्।
हरिर्हरिरिवात्यर्थं जघान करिणं क्रुधा ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 11 से 13): दोनों ओर के योद्धा खूब ही वीरता से शत्रु-दल के योद्धाओं को ललकार कर बाण छोड़ते थे। सबने दृढ़ता से युद्ध कर अपनी मृत्यु निश्चित कर रखी थी, कोई भी पीछे पाँव देने की तैयार न था। इसी समय युद्ध करता हुआ रुक्मी कृष्ण के सामने आ गया। रुक्मिणी ने यह देखकर अपने पिता का कृष्ण को परिचय दिया। फल यह हुआ कि उसको रुक्मिणी के आग्रह से कृष्ण ने मारा तो नहीं परन्तु नागपाश से बाँध कर अपने रथ में डाल दिया। इसके बाद सैकड़ों अपराधों के अपराधी तथा क्रोध से तप्त शिशुपाल को हरि (कृष्ण) ने मार कर एक क्षण ही में धराशायी कर दिया, जैसे कि हरि (सिंह) हाथी को मार कर बात को बात में ही धराशायी कर देता है ॥११-१३॥


संगर रणतूर्येण तूर्णितां स निषिद्ध्य च।
सबलः सह सैन्येनोर्जयन्तगिरिमासदत् ॥१४॥

उत्साहेन समुत्साही विवाह्य विष्टरश्रवाः।
तां द्वारिकां पुरीं प्राप पताकाकोटिसंकटाम् ॥१५॥

अथैकदा मुदा दूतं दुर्योधनमहीपतिः।
प्राहिणोच्च हृषीकेशमिति शिक्षसमन्वितम् ॥१६॥

गत्वा दूतः स विज्ञप्तिं चर्करीति स्म सस्मयः।
इति वैकुण्ठ सोत्कण्ठमकुण्ठो भविता सुतः ॥१७॥

यदि ते प्रथमं पुत्री ममापि भविता यदि।
तयोर्विवाह इत्येवं भवतान्नियमस्त्विह ॥१८॥

श्रुत्वा तद्वचनं विष्णुस्तथेति प्रतिपद्य च।
संमानितस्ततो दूतो हास्तिनं गत्वात्क्षणात् ॥१९॥

अर्थ (श्लोक 14 से 19): इसके बाद रणभेरियों के शब्द से शब्द-मय युद्ध को उसी समय बन्द कर वह बली सेना को साथ लेकर गिरनार पर्वत पर आया। वहाँ उसने रुक्मिणी को उत्साह देकर, समझाकर उसके साथ विवाह कर लिया और बाद वह फहराती हुई करोड़ों ध्वजाओं से परिपूर्ण द्वारिका चला आया। एक दिन प्रसन्नचित्त दुर्योधन ने समझा कर एक दूत को कृष्ण नारायण के पास भेजा। दूत ने जाकर नारायण को सूचित किया कि प्रभो! दुर्योधन महाराज ने आपके पास मुझे यह समाचार देकर भेजा है कि यदि आपके पहले पुत्र और मेरे पुत्री हो या मेरे पुत्र और आपके पुत्री हो तो उन दोनों का परस्पर विवाह सम्बन्ध हो-इसमें कोई रुकावट न हो। यह सुन उत्तर में नारायण ने कहा कि ठीक है जैसी दुर्योधन महाराज की इच्छा है, मुझे स्वीकार है। इसके बाद कृष्ण ने दूत का योग्य आदर-सत्कार कर उसे वहाँ से विदा कर दिया। दूत वहाँ से चलकर अति शीघ्र हस्तिनापुर आ गया ॥१४-१९॥


ततस्तु मदनं लेभे रुक्मिणी वैरिणा हृतम्।
जातमात्रं खगेशेन पालितं परमोदयम् ॥२०॥

अर्थ: इसके बाद कृष्ण के रुक्मणी के गर्भ से प्रद्युम्न का जन्म हुआ परन्तु दैवयोग से उसे जन्म समय में ही कोई वैरी हर ले गया और विजयार्द्ध पर्वत पर रहने वाले किसी विद्याधर के यहाँ उस


तत्र लाभाञ्शुभान्लब्ध्वा षोडशाब्दे च षोडश।
नारदेन समानीतो गृहं तस्थौ च मन्मथः ॥२१॥

अर्थ (श्लोक 20 से 21): महाभाग का पालन-पोषण हुआ। वहाँ वह सोलह वर्ष की अवस्था तक रहा और उसने वहाँ सोलह लाभ भी प्राप्त किये। इसके बाद वहाँ से उसे नारदजी द्वारिका पुरी को ले आये और वहाँ वह भाग्यशाली आनंद-चैन से रहने लगा ॥२०-२१॥


सत्यभामा सुतं शीघ्रं सुषुवे सातसंगता।
भानुं भानुमिव प्राची प्रध्वस्ततिमिरोत्करम् ॥२२॥

अथैकदा सभास्थाने भुञ्जन्तो भोगसंपदम्।
स्थिता अर्धार्धसाम्राज्यं पाण्डवाः कौरवाश्च ते ॥२३॥

सुखतः समयं निन्युः समयज्ञा नयान्विताः।
अर्धराज्यं प्रकुर्वाणाः पाण्डवाः पटुपण्डिताः ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 22 से 24): प्रद्युम्नकुमार के जन्म के बाद ही सुखिनी सत्यभामा ने भानुकुमार को जन्म दिया, जिस तरह पूर्व दिशा भानु (सूरज) को पैदा करती है। भानु अँधेरे को दूर करता है, वह भी अपने शरीर की प्रभा से अँधेरे को दूर करता था। भाँति-भाँति की सम्पत्ति द्वारा आधे-आधे राज्य को भोगते हुए पाण्डव और कौरव एक समय सभा-भवन में बैठे हुए थे। इस सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि पाण्डव बड़े चतुर और विद्वान् थे। वे समय की कदर करते थे और लक्ष्मी से युक्त थे ॥२२-२४॥


कौरवाः कौरवं कृत्वा परर्द्धिमसहिष्णवः।
दुर्योधनादयस्तस्थुः कौशिका इव भास्करम् ॥२५॥

दुष्टा दुर्योधनाद्यास्ते विधातुं संधिदूषणम्।
उद्युक्ता व्यक्तवाक्येन वदन्ति स्मेति दुर्नयाः ॥२६॥

वयं शतमिमे पञ्च कथमर्धार्धभागतः।
साम्राज्यं भुज्यते भङ्क्त्वा सर्वैरन्याय इत्ययम् ॥२७॥

पञ्चोत्तरशतं भागान्कृत्वा साम्राज्यमुत्तमम्।
भोक्ष्यामहे वयं वर्या नान्यथा न्यायविच्युतेः ॥२८॥

प्रचण्डाः पाण्डवाः पञ्च कथमर्धस्य भागिनः।
साम्राज्यस्य शतं सम्यग्वयं किंचार्धभागिनः ॥२९॥

इति दूषणदुष्टाङ्गा योद्धुं संनद्धमानसाः।
दुर्योधनादयो योधा विदधुः संधिदूषणम् ॥३०॥

अर्थ (श्लोक 25 से 30): अतः आधे राज्य को संभालते हुए सुख से अपना समय बिताते थे परन्तु कौरवों का स्वभाव इनसे बिल्कुल ही विपरीत था। वे हमेशा दूसरों की सम्पत्ति को देखकर जला करते थे। उनका अदेख-सखाभाव बड़ा प्रबल था। प्रजा उनसे असंतुष्ट रहा करती थी। वे सूरज को दोष देने वाले उल्लू की तरह सत्पुरुषों को दोष देते थे। अतः वे दुष्ट आपस की सन्धि तोड़ने के लिए तैयार हो गये और उन अन्यायियों ने खुल्लमखुल्ला कह दिया कि हम सौ भाई है और ये केवल पाँच ही है, फिर आधे-आधे राज्य को कैसे भोग सकते हैं-यह सरासर अन्याय है। चाहिए तो ऐसा कि कुल राज-पाट के एक सौ पाँच भाग किये जायें और इन्हें पाँच तथा हम लोगों को सौ भाग दिये जायें। भला, विचार कर तो देखिए कि पाँच के लिए आधा राज्य और उनसे बीस गुने लोगों के लिए भी उतना ही राज्य। यह अन्याय नहीं तो और क्या है? इस तरह दोषों के भण्डार और मन ही मन युद्ध करने को तैयार उन दुष्ट दुर्योधन आदि ने परस्पर के प्रेम सूत्र की तोड़ डाला ॥२५-३०॥


क्रुध्यन्ति स्म महाक्रोधाद्बुधा अपि विरोधिनः।
पाण्डवास्तद्वचः श्रुत्वा भ्रुकुटीभीषणाननाः ॥३१॥

अर्थ: दुर्योधन आदि की ऐसी विषभरी बातों को सुनकर-यद्यपि पाण्डव पण्डित थे और वैर-विरोध से दूर थे तो भी भीमसेन आदि को बड़ा क्रोध आया और भौंहें चढ़ जाने से उनके मुँह भीषण


चत्वारश्चतुराश्चोचुश्चालयन्तोऽचलां चिरम्।
अचला भीमसेनाद्याः संचरन्त इतस्ततः ॥३२॥

काकैरिव वराकैः किं सदा शङ्कासमाकुलैः।
एभिरस्मासु शक्तेषु सत्सु सर्वैरपि स्फुटम् ॥३३॥

अर्थ (श्लोक 31 से 33): हो गये। वे आवेश-वश इधर-उधर घूमने लगे, जिससे अचला (पृथ्वी) भी हिल गई। इसके बाद वे बोले कि हमेशा ही सशंकित रहने वाले और कौओं की तरह दीन ये विचारे हम सरीखे शक्तिशाली पुरुषों के होते हुए भला कर ही क्या सकते हैं और यह बात कुछ छुपी नहीं, स्वयं वे भी जानते हैं ॥३१-३३॥


तदा भीमोऽवदद्भ्रातर्भस्मयामि क्षणार्धतः।
इमान् दहेन्न किं दाह्यं विस्फुलिङ्गस्फुरद्रुचिः ॥३४॥

शतमप्येकवारेण क्षणादुत्क्षिप्य सागरे।
क्षिपामि क्षीणचित्तानामेषां भीमोऽगदीदिति ॥३५॥

अशीशमत्तदा भीमं भीतिदं भीषणाकृतिम्।
ज्येष्ठः सामोक्तिभिर्नीरैर्ज्वलन्तं ज्वलनं यथा ॥३६॥

अर्जुनोऽर्जुनवद्दीप्तो जज्वल क्रोधवह्निना।
दीप्तेन कौरवोक्तेन दारुणा ज्वलनो यथा ॥३७॥

बाणेनैकेन शक्तेन शतमेषां सुदारुणः।
दारयेयं दृषत्खण्डो यथा काकशतं सकृत् ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 34 से 38): भीम ने कहा कि भाई युधिष्ठिर, यदि आपकी आज्ञा हो तो इन दुष्टों को अभी क्षणभर में ही भस्म कर दूँ क्योंकि आग का एक छोटासा कण भी धधककर बड़े-बड़े जंगलों को जला डालता है। या कहो तो हीन विचार वाले इन सौ के सौ को ही एकदम उठा कर समुद्र में फेंक दूँ और इनका काम तमाम कर दूँ। भीम को इस तरह से क्रोधित देखकर युधिष्ठिर ने उसे मधुर वचनों द्वारा शान्त किया, जिस तरह कि जलती हुई आग पानी से ठंडी की जाती है और जिस तरह काठ का निमित्त पाकर आग जल उठती है उसी तरह कौरवों के इन वचनों को सुनकर अर्जुन (सोने) की तरह दीप्त अर्जुन की क्रोधाग्नि भी भभक उठी। वह बोला कि जिस तरह सैकड़ों कौओं को एक साथ ही भयभीत कर देने के लिए एक ही पत्थर का टुकड़ा काफी होता है उसी तरह शक्तिशाली मेरा एक ही बाण इन सौ को ही एकदम भयभीत कर देने के लिए काफी है ॥३४-३८॥


इमे तावन्मदान्मुक्तमर्यादाश्च भवन्त्यहो।
नाहं क्रुद्धोऽर्यमा यावत्तमांसीव घनानि च ॥३९॥

इत्युक्त्वाथ पृथुः पार्थः करे कोदण्डमादधत्।
प्रचण्डेन सुकाण्डेन संयोज्य समरोद्यतः ॥४०॥

तथास्थं तं विलोक्याशु स्थिरधीश्र्च युधिष्ठिरः।
अवारयद्धैर्वाक्यैर्यतः सन्तो विरोधहाः ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 39 से 41): उसके सामने इनकी कुछ भी न बन पड़ेगी। ये लोग मदोन्मत्त होकर तभी तक मर्यादा को लाँघते हैं जब तक कि अँधेरे को दूर करने वाले सूरज की तरह तेजशाली मैं क्रुद्ध नहीं हुआ-मेरे क्रोध के सामने इनकी कुछ भी कला काम न आएगी, जिस तरह कि सूरज के सामने अँधेरे की कुछ भी नहीं चलती। इसके साथ ही पार्थ ने हाथ में धनुष उठाया और उस पर बाण चढ़ा कर वह युद्ध के लिए उद्यत हो गया। उसकी उस समय की अवस्था को देखकर स्थिर बुद्धि युधिष्ठिर ने उसे शान्ति से समझा कर रोका और है भी यही ठीक कि सज्जन पुरुष विरोध को दूर करने वाले होते हैं ॥३९-४१॥


अवदन्नकुलः कौल्यः कुलशालं समूलतः।
निर्मूल्य कौरवाणां हि निःफलं च करोम्यहम् ॥४२॥

अर्थ: इसके बाद कुलीन नकुल बोला कि मैं इसी समय इन कौरवों के कुलरूपी शालवृक्ष को जड़


कौरवा वा पतङ्गा वा मयि चापि धनंजये।
स्वयं निपत्य भूतित्वं यास्यन्ति यत्नतो विना ॥४३॥

सहदेवोऽवदद्धीरः केऽमी कौरवभूरुहाः।
मया परशुना छिन्नाः क्व स्थास्यन्ति विनश्वराः ॥४४॥

अर्थ (श्लोक 42 से 44): से उखाड़ नष्ट किये देता हूँ। ये तो पतंगों के समान हैं और मैं हूँ इनके लिए आग के तुल्य, अतः प्रयत्न के बिना ही ये अभी जलकर खाक हुए जाते हैं-इनमें से एक भी बचने का नहीं। इसी बीच में सहदेव भी बोल उठा कि ये कौरव-वृक्ष तो चीज ही क्या हैं मेरे द्वारा कुल्हाड़े से काटे जाने पर ये विनश्वर ठहर ही कहाँ सकते हैं ॥४२-४४॥


उत्क्षिप्य बाहुदण्डेन खण्डयित्वा च खण्डशः।
कौरवांश्च दिगीशानां बलिं दास्यामि दिङ्मुखे ॥४५॥

पिशुनाञ्शून्यतापन्नान्कौरवान्गर्व्विणोऽखिलान्।
यावन्न विदधे तावत्स्वास्थ्यं मेऽत्र कुतस्तनम् ॥४६॥

दर्पिणोऽमी सुसर्पाभाः स्थितेन च गरुत्मता।
मया ते किं करिष्यन्ति रुट्फणाफूत्कराः खलाः ॥४७॥

इति तौ वीतहोत्राभौ ज्वलन्तौ ज्वालयानिशम्।
युधिष्ठिरसुमेघेन शमं नीतौ वचोजलैः ॥४८॥

इति ते पूर्ववत्सर्व्वे शमं प्राप्ता युधिष्ठिरात्।
शुद्धा युद्धमतिं हित्वा तस्थुः सुस्थिरमानसाः ॥४९॥

भुञ्जन्तो भोगिनो भोग्यां भुवं भीतिविवर्जिताः।
नयन्ति स्म नृपाः कंचित्समयं स्मेरचक्षुषः ॥५०॥

अथ दुर्योधनो योद्धा दुर्बुद्धिः शुद्धिवर्जितः।
दधौ धर्मात्मजादीनां हतौ मतिं वृषातिगाम् ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 45 से 51): मैं अभी अपने बाहु-दंडों से कुल्हाड़े को उठाता हूँ और इनके टुकड़े-टुकड़े करके दिशाओं के स्वामी दिगीशों को बली दिये देता हूँ। सच कहता हूँ कि ज्ञान-शून्य, पिशुन और महान् अभिमानी इन कौरवों को जब तक मैं गर्व-रहित न कर दूँगा तब तक मुझे चैन ही न पड़ेगी। ये अभिमानी साँप के समान हैं और मैं हूँ इनके लिए गरुड़ के समान, फिर ये मेरे सामने फण उठा कर चाहे कितनी ही फुँकार क्यों न करें पर इनका कुछ वश नहीं है। आखिर इन्हें ही प्राणों के लाले पड़ेंगे। इस प्रकार क्रोध से आग के समान जलते हुए इन दोनों को भी युधिष्ठिर-रूप मेघ ने अपने वचन-रूपी जल को बरसा कर शांत किया। इस तरह युधिष्ठिर के समझाने पर वे चारों भाई पहले की तरह ही शान्तचित्त हो गए और युद्ध की कामना छोड़कर, स्थिर-चित्त से, राज्य को भोगते हुए, निर्भय हो अपना समय योग्य कार्यों में बिताने लगे। इधर दुर्बुद्धि तथा कलुषित-चित्त दुर्योधन युधिष्ठिर आदि को मारने की चिंता में अपनी धर्मशून्य-बुद्धि को व्यय करने लगा। वह हमेशा इसी चिंता में रहता था कि जिस तरह हो सके पाण्डवों का विध्वंस करूँ ॥४५-५१॥


अन्यदा पत्तने तेन च्छलेनोच्छलितात्मना।
लाक्षामयं क्षणैः सार्धं क्षणेन विदधे महत् ॥५२॥

क्वचिद्विकटकूटेन संकटं प्रकटं स्फुटम्।
टङ्कोत्कीर्णमिवाभाति सुघण्टाटङ्कितं गृहम् ॥५३॥

जालिकाजालसंपूर्णं क्वचित्प्रदेशम विस्तृतम्।
पाण्डवानां सुजालं वा व्यभाज्ज्वलनसंनिभम् ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 52 से 54): एक बार उस उद्धत-आत्मा ने कपट से एक लाख का महल बनवाया। वह बड़ा सुन्दर और अति शीघ्रता से बनवाया गया था। उस पर बड़े ऊंचे और विशाल कूट बनाये गये थे और उन कूटों पर सुन्दर कलश चढ़ाये गये थे। वे उस पर ऐसे शोभते थे मानों सूरज जड़ दिये गये हैं। उस महल में विस्तृत और लम्बी-चौड़ी जाली लगाई गई थी, वह ऐसी जान पड़ती थी मानों पाण्डवों को फँसाने के लिए आग की समता करने वाला जाल ही लगाया गया है ॥५२-५४॥


क्वचित्कटाक्षक्षेपाय गवाक्षं क्षणसुन्दरम्।
तेषां गोहतयेऽक्ष्णां च दक्षः सममकारयत् ॥५५॥

क्वचित्तद्गृहमाभाति तरत्तोरणसुश्रिया।
अतो रणच्छलं द्रष्टुं निर्मितं मूर्तिमद्रणम् ॥५६॥

सुस्तम्भस्तम्भितं क्वापि वेश्मस्तम्भनविद्यया।
स्तम्भितुं वैरिणो नूनं सुस्तम्भमिव सुस्थिरम् ॥५७॥

क्वचिद्विचित्रचित्रेण चित्रितं च कुमित्रवत्।
चित्रं यथा सुभित्तौ च चमत्कारकरं हि तत् ॥५८॥

प्रतोलीपरिखापूर्णं वप्रप्राकारशोभितम्।
जतूद्वसितं वेगाद्विदधे कौरवाग्रणीः ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 55 से 59): उसमें छोटे-छोटे और सुन्दर झरोखे थे, मानों उनकी दीप्ति को हरने के लिए उसने अपने नेत्र ही खचित करवा दिये थे। उस पर रत्नों के तोरण बंधे हुए थे, अतः उनसे उस महल की एक भिन्न ही शोभा थी और ऐसा भान होता था कि मानो दुर्योधन ने पाण्डवों का रण-छल देखने को यह मूर्तिमान् रण ही तोरण के छल से यहाँ खड़ा किया है। उसके थंभे ऐसे जान पड़ते थे मानों बैरियों को बाँधने के लिए स्तंभन-विद्या के रूप में खड़े किये गये सुदृढ़ स्तंभ ही है। उसमें चित्र-विचित्र चित्र लगे हुए थे, उनसे जाना जाता था कि वे शत्रु ही खचित कर दिये गये हैं। उनको देखने से चित्त में एक भिन्न ही स्फूर्ति पैदा होती थी। उसमें नाना रास्ते थे। वह खाई से घिरा हुआ था। उसके चारों ओर कोट बना हुआ था, जिससे उसकी एक सबसे निराली ही छटा थी-शोभा थी। अधिक क्या कहा जाये वह सब तरह सुशोभित था-उसमें किसी भी बात की कमी न थी। इस अपूर्व महल को कौरवों के अगुआ दुर्योधन ने बनवाया था। इसके बनवाने में उसे बहुत देर न लगी थी ॥५५-५९॥


ततस्तृप्तिं वितन्वानं पितामहमवीवदत्।
कौरवा विनयावासा नयेन नतमौलयः ॥६०॥

पितामह सुगाङ्गेय गङ्गाजलसुनिर्मल।
निर्मितं सद्म निश्छद्म भक्त्यास्माभिः स्मयावहम् ॥६१॥

यदुत्तुङ्गसुशृङ्गेण गगनं गन्तुमुद्यतम्।
जेतुं जित्वरशीलानां सुराणां सौधसंततिम् ॥६२॥

यत्स्तम्भबाहुयुग्मेन ग्रहीतुं परवेश्मनाम्।
संपदां सुपदापन्नं विपद्द्वारं रराज च ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 60 से 63): इसके बाद दुर्योधन आदि कौरव शान्त-चित्त भीष्म पितामह के पास गये और उन्होंने विनय के साथ उन्हें मस्तक नवाकर कहा कि गंगा के जल समान निर्मल-चित्त पितामह, हम ने भक्ति से प्रेरित होकर सब तरह से सुसज्जित एक महल बनवाया है। वह इतना विशाल और ऊँचा है कि अपने शिखरों से आकाश को छूता है। महाराज, उसे देखने से ऐसा जान पड़ता है कि मानों वह विजयी देवताओं के महलों की संतति को जीतने के लिए जाने की तैयारी ही कर रहा है। वह अपने थंभों-रूप हाथों से ऐसा जान पड़ता है कि मानों उनसे शत्रुओं के मलों की सम्पत्ति ही हरना चाहता है ॥६०-६३॥


अट्टालिकाललाटेन शुभ्रच्छेभाललामकम्।
यद्वत्तदृद्धिसंपन्नं यथात्र कौरवं कुलम् ॥६४॥

कदाचिन्त्रिशि संखिन्नो निशानाथोऽवतिष्ठते।
यदुत्तुङ्गसुशृङ्गाग्रे ग्लानिहान्यै क्षणं क्षणी ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 64 से 65): अपने शिखर रूप मस्तक से वह इतना शोभाशाली और सुन्दर जान पड़ता है और लोगों को भ्रम में डाल देता है कि कहीं ऋद्धि-सम्पन्न कौरवों का कुल ही तो नहीं है। उसके शिखर बड़े ऊँचे हैं, अतएव वहाँ आकर अपनी मार्ग की थकावट दूर करने को कभी-कभी खेद-खिन्न चाँद रात में


यत्पताकापटेनाशु पवनोद्भूतवेगिना।
नाकिनः स्थितये तूर्णमाकारयति शुद्धितः ॥६६॥

सुस्तम्भैः स्तम्भकैर्नॄणां जनाश्र्चर्यैर्जनाश्रयैः।
विशाखाशिखरैः क्षिप्रं क्षिणोति खेड्गृहांश्च यत् ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 64 से 67): ठहर जाता है। उसके शिखरों में जो ध्वजायें लगी हुई हैं वे जिस समय हवा के वेग से फड़-फड़ाती हुई फहराती हैं तब ऐसा मालूम होने लगता है कि वह महल अपने हृदय में स्थान देने के लिए इन ध्वजाओं-रूप हाथों के इशारे से स्वर्ग के देवताओं को ही बुलाता है। सुस्थिर थंभों वाले और लोगों को आश्रय देने वाले उस महल के बाण के जैसे तीखे शिखरों द्वारा आकाश में विचरने वाले ग्रह-तारागणों के विमान घिस जाते हैं और क्षीण हो जाते हैं ॥६४-६७॥


देवेदं सदनं सम्यक्सिद्धिदं निर्मितं मया।
पाण्डवानां निवासाय तेभ्यो दातव्यमञ्जसा ॥६८॥

युधिष्ठिरः स्थिरं स्थेयांस्तत्र तिष्ठत्वहर्निशम्।
प्राज्यं राज्यं प्रकुर्वाणः किरंस्तेजो दिशो दश ॥६९॥

वयं च स्वगृहे स्थित्वा स्थिरा राज्यार्थलाभतः।
सुखं तिष्ठाम उन्निद्राः समुद्रा इव निश्चलाः ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 68 से 70): देव, यह उत्तम और सिद्धि-साधक महल हमने पाण्डवों के लिए बनवाया है, अतः इसे अब उनके रहने के लिए दे दीजिए। महाराज, हम चाहते हैं कि स्थिर-चित्त युधिष्ठिर दशों दिशाओं में अपने तेज को फैलाकर, सुख-शान्ति से राज्य करते हुए इस नये महल में रहें और हम सब राज की आय से सुख भोगते हुए समुद्र की तरह अचल और चिन्ता-रहित हो, स्थिर-चित्त से अपने ही महल में रहें ॥६८-७०॥


इत्याकर्ण्य सुगाङ्गेयो गिरं जगावुदारधीः।
यत्त्वयोक्तं तदेवेष्टं मम मान्यं मनोगतम् ॥७१॥

तव यन्मन्त्रणं मान्यं मह्यं तद्रोचते ध्रुवम्।
यदेकत्र स्थितित्वं हि परं वैरस्य कारणम् ॥७२॥

य एकत्र स्थिता गेहे ते विरोधं प्रकुर्वते।
विरोधहानयेऽत्यन्तं पृथग्गेहस्थितिर्वरा ॥७३॥

कुटुम्बकलहो यत्र तत्र स्वास्थ्यं कुतस्तनम्।
यथा भरतचक्रीशश्रीबाहुबलिनोर्ननु ॥७४॥

पृथक्स्थितौ शुभं सारं सुखसंततिरुन्नता।
राज्यभोगो भवेच्छुभ्रोऽविरोधश्चक्षुषोरिव ॥७५॥

अर्थ (श्लोक 71 से 75): कौरवों के इन मधुर वचनों को सुनकर उदार-बुद्धि और सरल-चित्त पितामह बोले कि जो तुमने कहा वह ठीक है, तुम्हारी बात मेरे गले उतर गई। तुमने जो कुछ सलाह दी वह मुझे पसंद आई है। कारण कि मैं जानता हूँ कि तुम्हारा एक जगह रहना परम वैर का कारण हैं। जहाँ मन में कुछ मैल रहता है वहाँ जरा-जरा सी बातों पर से वैर-विरोध खड़ा हो जाता है। इसलिए वैर-विरोध मिटाने के लिए तुम्हारा जुदा-जुदा रहना ही अच्छा है। जहाँ परिवार के लोगों में लड़ाई-झगड़ा हुआ करता है भला, वहाँ सुख हो ही कहाँ से सकता है। देखिए, भरत चक्रवर्ती और बाहुबली ने इसी कौटुम्बिक कलह से क्या कुछ फल उठाया था। अतः तुम लोगों का जुदा रहने में ही सुख है और ऐसी ही हालत में राज्य सुख से भोगा जा सकता है। देखिए, नेत्रों के रहने के स्थान जुदे-जुदे हैं, इसलिए उनमें कुछ विरोध नहीं है ॥७१-७५॥


इति निश्चित्य गाङ्गेयस्तानाहूय सुपाण्डवान्।
अवदद्राजशार्दूलो मत्या सुरगुरुपमः ॥७६॥

अर्थ: इस प्रकार निश्चय करके बुद्धि में बृहस्पति तुल्य, राजसिंह भीष्म पितामह ने पाण्डवों को


पाण्डवाश्चण्डकोदण्डाः प्रचण्डाखण्डलोपमाः । यूयं शृणुत सद्वाक्यं सातसिद्धयर्थमञ्जसा ॥७७॥

उत्तमे निर्मिते धाम्नि नूतने सत्तनुपमे । स्थितिं कुरुत शीघ्रेण यूयं विघ्नौघहानये ॥७८॥

भिन्नं स्थिता भवन्तोऽत्र सुखसंदोहभागिनः । भवितारो न भेतव्यं भवद्भिर्भयतायुतैः ॥७९॥

अर्थ (श्लोक 76 से 79): बुलाया और उनसे कहा कि धनुष-विद्या में निपुण और इन्द्रतुल्य पाण्डव-गण, तुम मेरे वचनों को ध्यान देकर सुनो। वे तुम्हारे लिए सुख के कारण होंगे। तुम किसी अच्छे मुहूर्त में, बहुत जल्दी, सुन्दर शरीर के जैसे इस नये महल में रहने लगो। देखो, इसमें रहने से तुम्हारे सभी झगड़े-टंटे तय हो जायेंगे, फिर किसी से कोई प्रकार का वाद-विवाद या व्यर्थ का वितण्डा न होगा। देखो, तुम लोग जुदा रहने में कुछ भी भय न करो। मैं तो जानता हूँ कि तुम्हें जुदे रहने में ही सुख होगा। पाण्डव गुरु आज्ञा के प्रतिपालक और गुणों से पूर्ण थे ॥७६-७९॥


इत्युक्तास्ते युताः सातैर्गुरुप्रामाण्यपूरिताः । प्रतस्थिरे गृहं गन्तुं गुणैरापूरिताशयाः ॥८०॥

ततो भेर्यो भयोन्मुक्ता भेणुर्गुम्भाभिभाषणाः । दध्वनुः पटहव्यूहाः सस्वरुर्वशजाःस्वराः ॥८१॥

नटा नेदुः समुद्भिद्रोमपुलका विपुलामलाः । मृदङ्गतालकंसालवीणाघुर्घरिकान्विताः ॥८२॥

मङ्गलानि सगेयानि जगुर्गीतानि नायकाः । कामिन्यः कलनादेन कलयन्त्यश्च तद्गुणान् ॥८३॥

इत्थं यथायथं योग्याः कुर्वन्तो दत्तविस्तृतिम् । समङ्गलाः समापुस्ते सुमुहूर्त्ताह्नि तद्गृहम् ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 80 से 84): वे उसी समय शुभ मुहूर्त और शुभ दिन दिखवा कर अपने घर को चले गये और जब वह शुभ दिन आया तब उन्होंने शुभ मुहूर्त में नये महल में प्रवेश किया। उनके प्रवेश समय बड़ा महोत्सव मनाया गया था। उस समय भेरियों का सुहावना और महान् शब्द दसों दिशाओं में गूंज रहा था। नगाड़ों की गर्जना हो रही थी। वंशी की सुरीली आवाज से कर्ण-कुहर गूंज रहे थे। रोमाञ्च हुए नट-गण विशाल मृदंग, ताल, कंसाल, वीणा आदि वादित्रों की लय के साथ मनोहारी नृत्य करते थे। कामिनी-गण अपने सुन्दर नाद से पाण्डवों के गुणों को गाती थीं। गायक-गण सुहावने मंगलगीत गाते थे। इस तरह बड़े ठाट-वाट के साथ यथायोग्य दान देते हुए उन मंगल-मूर्तियों ने नये महल में प्रवेश किया ॥८०-८४॥


तत्र स्थिता ददुर्दानं मानं सत्कुलवासिनाम् । चक्रुः पूजां सुपूज्येषु पाण्डवाः स्थिरमानसाः ॥८५॥

मुग्धाः शुद्धधियो धर्म्यं कुर्वन्तः कर्म कोविदाः । सातमास्तिष्ठुवानास्ते स्थितिं भेजुर्भयातिगाः ॥८६॥

तेषां दम्भमजानन्तो निर्दम्भारम्भभागिनः । तस्थुस्तत्र हि को वेत्ति दारुमध्यस्य रिक्तताम् ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 85 से 87): वहाँ रहते हुए वे स्थिर-चित्त पाण्डव गरीबों को दान देते थे और ऊँच कुली लोगों का उचित आव-आदर और मान-सम्मान करते थे एवं वे पूज्य पुरुषों की पूजा-प्रभावना में भी कभी आगा-पीछा नहीं सोचते थे। वे शुद्ध बुद्धि से धर्म-कर्म का निर्वाह करते थे। उनको कभी भी धर्म-कर्म में प्रमाद तथा आलस नहीं सताता था। तात्पर्य यह कि वे विद्वान् वहाँ सुख का अनुभव करते हुए निर्भयता से रहते थे। उन्हें न तो किसी बात का भय था और न चिन्ता ही। वे सरल चित्त थे, अतः उन्होंने कौरवों के इस कपट-माया-जाल को बिल्कुल ही नहीं जाना। अतएव वे वहाँ सरलता का


कथं कथमपि ज्ञात्वा विदुरो जतुनिर्मितम्।
सदनं सदयो दीप्रस्तत्कापट्यमचिन्तयत् ॥८८॥

युधिष्ठिरं समाहूय वचनं विदुरोऽवदत्।
तत्कैतवमजानानं जानानं जिनसद्रुचिम् ॥८९॥

वत्स सज्जन विश्वास्या दुर्जनाः सज्जनैर्न हि।
अन्यथा ददते दुःखं दन्दशूका इवोद्धुराः ॥९०॥

विश्वास्या मुखमिष्टाश्चान्तर्मला निखिलाः खलाः।
सेवालिनस्तु पाषाणा यथा पाताय केवलम् ॥९१॥

अर्थ (श्लोक 85 से 91): व्यवहार करते हुए सुख से रहने लगे और है भी ऐसी ही बात कि काठ की भीतरी पोल को कौन जान सकता है कि उसमें क्या भरा है परन्तु धीरे-धीरे किसी तरह विदुर को यह पता लग गया कि यह महल लाख से बनाया गया है। विदुर दयालु था और तेजशाली था। अतः कौरवों के मायाजाल को समझ कर उसने कौरवों के कपट से अज्ञात तथा जिनदेव में सच्ची श्रद्धा रखने वाले युधिष्ठिर को बुलाकर कहा कि वत्स, सज्जनों को सज्जनों पर ही विश्वास करना चाहिए, दुर्जनों-दुष्टों पर नहीं। नहीं तो उनके द्वारा वैसे ही दुख सहने पड़ते हैं जैसे कि साँप के द्वारा। देखो, ऊपर से मीठे बोलने वाले और भीतर से महा मैले इन दुष्टों से सज्जनों को हमेशा दूर ही रहना चाहिए नहीं तो दुख अवश्यंभावी है-जैसे कि काई चढ़े हुए पत्थर पर भूल से भी यदि पैर पड़ जाये, तो भी उस पर से अवश्यंभावी पतन होता ही है ॥८५-९१॥


राजभिर्न च विश्वास्यं परेषां हृदयं खलु।
परे तत्र कथं पुत्र विश्वास्याः स्युः सुखार्थिभिः ॥९२॥

न विश्वसन्ति भूपालाः सुतं तातं च मातरम्।
भ्रातरं भामिनीं तत्र कथमन्यान्खलाञ्जनान् ॥९३॥

अतस्त्वया न विश्वास्याः कौरवाः कलिकारिणः।
भवतो धाम्नि संस्थाप्य मारयिष्यन्ति दुर्धियः ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 92 से 94): पुत्र, देखो नीति कहती है कि राजा लोगों को कभी दूसरे के हृदय का विश्वास नहीं करना चाहिए, फिर जो सुखी होना चाहते हैं उनके लिए भला शत्रु का विश्वास तो करना ही कैसे उचित हो सकता है और भी सुनो कि राजा-गण स्त्री-पुत्र, माता-पिता, भाई-बहिन आदि किसी का भी विश्वास नहीं करते, तब वे दूसरे दुष्ट पुरुषों का भरोसा तो करें ही कैसे। इसलिए तुम इन कलहकारी कौरवों का विश्वास मत करो। ये दुर्बुद्धि तुम्हें इस महल में रख कर मार डालेंगे और तुम्हारे कुल का सर्वस्व नष्ट कर देंगे ॥९२-९४॥


लाक्षागृहमिदं भद्र निर्मितं केन हेतुना।
न जानीमो वयं नूनमेषां को वेत्ति छद्मताम् ॥९५॥

दिवा स्थितिविधातव्या जातुचिन्नात्र सद्मनि।
स्थितिश्चेद्दुर्गमं दुःखं भविता भवतामिह ॥९६॥

वनक्रीडापदेशेन प्रतिघस्रमघस्मरैः।
वने रन्तुं प्रगन्तव्यं भवद्भिर्भाग्यभोगिभिः ॥९७॥

अर्थ (श्लोक 95 से 97): भद्र! यह महल लाख से बनाया गया हैं-यह तो मुझे निश्चय हो गया, पर किस मनोरथ से ऐसा किया गया इसका मुझे अभी निश्चित पता नहीं है। सो ठीक ही है कि इन माया-जालियों के मायाजाल को कोई जल्दी से नहीं जान सकता। मेरे कहने का मतलब इतना ही है कि तुम लोग कदाचित् भी इस महल में न रहो। नहीं तो तुम्हें बड़े भारी दुस्सह दुख का सामना करना पड़ेगा और एक उपाय करो कि तुम लोग प्रतिदिन क्रीड़ा के बहाने वन में जाया करो और सो भी बड़ी सावधानी से। वहाँ विघ्नों को दूर करने के लिए दिन-भर आनन्द-पूर्वक समय गुजारा करो। तुम लोगों से


आ वासरं विशालेऽस्मिन्विपिने रन्तुमिच्छया।
विघ्नौघहानये स्थेयं भवद्भिर्वैरदर्पहैः ॥९८॥

त्रियामायां सुमित्रैश्च पवित्रैत्र सद्धिया।
जाग्रद्भिः सुस्थिरं स्थेयं युष्माभिर्निश्चलात्मकैः ॥९९॥

अर्थ (श्लोक 95 से 99): और ज्यादा कहने की कोई जरूरत नहीं हैं क्योंकि तुम स्वयं ही बैरियों के गर्व को खर्च करने वाले हो। परन्तु जब रात हो जाये तब यहीं आकर अपने निश्चल स्वभाव से जागते हुए समय बिताया करो ॥९५-९९॥


नेत्रान्ध्यमेडतां कर्णे गले घुर्घुरतामपि।
कुर्वन्ती देहसंस्थैर्यं सुषुप्तिर्मरणायते ॥१००॥

इत्थं विदुरभूपेन वने स्थित्वा स्थिराशयाः।
पाण्डवाः शिक्षयित्वाथ वनं जग्मे सुबुद्धिना ॥१०१॥

अर्थ (श्लोक 100 से 101): जागने की जरूरत तुम्हें इसलिए है कि नींद में मनुष्य मरे सरीखा हो जाता है। उसे कुछ भी सुध-बुध नहीं रह जाती, उसके नेत्र बन्द हो जाते हैं, कान बहिरे हो जाते हैं, गला घर-घर करने लगता है और शरीर बिल्कुल शिथिल हो जाता है। इस प्रकार विदुर ने वन में स्थिराशय पाण्डवों को सब बातें खूब समझा दीं। इसके बाद वह सद्बुद्धि अपने महल को चला आया ॥१००-१०१॥


स तत्र चिन्तयंश्चित्ते चिरं चतुरमानसः।
पाण्डवानां सुखोपायं समास्तेऽपायवर्जनम् ॥१०२॥

तावता विदुरस्यासीत्सुरङ्गाखनने मतिः।
तया यतो भवेत्तेषां निर्गमो विधुरे स्थिते ॥१०३॥

खातज्ञानिति संचिन्त्य पप्रच्छ स्वच्छमानसः।
आहूयादातपरां शिक्षां सुरङ्गाखनने स च ॥१०४॥

ते खातज्ञास्ततस्तूर्णं सन्निशान्तस्य कोणके।
सुरङ्गां कर्तुमुद्युक्ता रेभिरेऽचलचित्तकाः ॥१०५॥

द्राघीयसीं सुरङ्गां ते गमने निर्गमे पराम्।
गूढां गूढतराम्मूढा विधाय विदधुस्ततः ॥१०६॥

ज्वालितेऽपि निशान्तेऽस्मिन्धार्तराष्ट्रैः सुराष्ट्रगैः।
निर्गच्छन्तु ततस्तूर्णं पाण्डवाःसत्पथाखिलाः ॥१०७॥

इति तां रङ्गतस्तूर्णं सुरङ्गां तद्गृहान्तरे।
निर्माप्य विदुरस्तस्थौ शर्मणा चिन्तयातिगः ॥१०८॥

अर्थ (श्लोक 102 से 108): इतने पर भी विदुर की फिक्र नहीं गई और वह पाण्डवों को सर्वनाश से बचाने की फिक्र में हमेशा रहने लगा। वह चतुरमना सदा इसी सोच-विचार में रहा करता था कि पाण्डव-गण किस तरह सुखी हों। इसके लिए उसके विचार में यह उपाय आया कि महल से लेकर जंगल तक एक सुरंग बनवा दी जाये तो किसी तरह की आपत्ति पड़ने पर पाण्डवगण उसके द्वारा निकल कर बच सकते हैं। यह सोचकर उस शुद्ध हृदय ने चुपचाप सुरंग खोदने वालों को बुलाया और उन्हें उसके खोदने की सब विधि समझा दी। सुरंग खोदने वाले भी महल के एक कोने में से सुरंग निकाल देने को तैयार हो गये। कारण कि वे इस काम में अति प्रवीण थे। उन्होंने गुप्त रीति से थोड़े ही दिनों में इतनी बड़ी भारी सुरंग खोद कर तैयार कर दी जो आने और जाने के लिए काफी थी। सुरंग खुद कर जब तैयार हो चुकी तब विदुर ने सोचा कि यदि कभी कौरव-गण इस लाख के महल में आग भी लगा दें तब भी पाण्डव सुरंग-मार्ग से निकल जायेंगे और अपने प्राणों की रक्षा कर लेंगे। इसमें अब तनिक भी सन्देह नहीं है। इस तरह आनन्द के साथ विदुर ने लाख के उस महल में जो कि कौरवों ने पाण्डवों के साथ छल करने के लिए बनवाया था, सुरंग बनवा दी और कौरवों से पाण्डवों को निर्भय कर दिया। इसके बाद उसने पाण्डवों के सम्बन्ध की बिल्कुल ही चिन्ता छोड़ दी-वह निश्चित ही सुख


स्वयं न लक्षिता तेन पाण्डवानां सुखात्मनाम्। सुरङ्गा ज्ञापिता नैव प्रच्छन्ना पिहिताभवत् ॥१०९॥

अर्थ (श्लोक 102 से 109): से अपना काल बिताने लगा परन्तु उसने वह सुरंग स्वयं न तो देखी और न सुखी पाण्डवों को ही दिखलाई। कारण वह तैयार होते ही किसी को बिना दिखाये ढक दी गई थी ॥१०२-१०९॥


पुनस्ते पाण्डवास्तत्र विषादमदवर्जिताः। अध्युषुर्व्यसनातीता युताः प्रीतिभरेण च ॥११०॥

ते हायनमितं कालं कलयन्तः कलोन्नताः। सकलाः सकला भूपा आसते स्माम्बया सह ॥१११॥

दुष्टेन धार्तराष्ट्रेण धृष्टेनानिष्टचेतसा। लाक्षाधाममहादाहश्चिन्तितस्तद्वधकृते ॥११२॥

ज्वालिते ज्वलनेनाशु जतुवेश्मनि विस्तृते। ज्वलिष्यन्ति तदन्तःस्थाः पाण्डवाश्चण्डमानसाः ॥११३॥

अर्थ (श्लोक 110 से 113): इसके बाद पाण्डव शोक, विषाद, मद आदि से रहित हो, बिना कष्ट के, प्रीति के साथ उस महल में निवास करने लगे और इस प्रकार कुन्ती-सहित वहाँ रहते उन्हें एक साल बीत गया। उन्हें वह बिल्कुल ही नहीं जान पड़ा क्योंकि वे बहुत सी कलाओं के विज्ञ थे, अतः उनका काल शान्ति और प्रेम के साथ बीतता था। इधर धृतराष्ट्र के दुष्ट और कलुषित-चित्त पुत्र दुर्योधन ने पाण्डवों को मार डालने के लिए उस लाख के महल में आग लगाने की फिक्र की-उसने सोचा कि इस महल में आग लगा देने पर लाख पिघल जायेगी और तब उसमें रहने वाले ये दुष्ट-चित्त पाण्डव अवश्य ही जल कर भस्म हो जायेंगे। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ॥११०-११३॥


इति संमन्त्र्य सद्योध्रा स्वतन्त्रेण सुमन्त्रिणा। दुर्योधनेन क्रुद्धेन चिन्तितं मारणं हृदि ॥११४॥

क्षणेन क्षणदायां स दिवाकीर्तिं सुकीर्तिमान्। अकीर्तयद् गृहध्वंसं ज्वलितेन कृशानुना ॥११५॥

जनंगम जनैर्गम्यं मन्दिरं सुन्दरं त्वरम्। ज्वालय ज्वलनेनाशु ज्वलता च मदाज्ञया ॥११६॥

दास्यामि ज्वालिते वत्स मन्दिरे वाञ्छितं तव। यत्तुभ्यं रोचतेऽस्माभिस्तद्देयं याचनां कुरु ॥११७॥

मा विलम्बय शीघ्रेण दहनं देहि मन्दिरे। ग्रामधामरमावाञ्छा वर्तते चेत्तवाधुना ॥११८॥

अर्थ (श्लोक 114 से 118): मंत्री के साथ इस प्रकार विचार जब वह निश्चित कर चुका तब उसने अर्ककीर्ति नाम के एक कीर्तिशाली कोतवाल को रात में बुलाकर कहा कि तुम इसी समय पाण्डवों के महल में आग लगाकर उसे भस्म कर डालो। तुम्हें इस काम में देर न करना चाहिए, यह मेरी आज्ञा है। इस महल में किसी के लिए आने जाने की रुकावट नहीं है, अतएव अति शीघ्र इसे भस्म कर दो। तुम कुछ भी आगा पीछा मत सोचो। इस काम को ठीक-ठीक हो जाने पर मैं तुम्हें वही दूँगा जो तुम चाहोगे। या अभी माँग लो जो तुम्हें रुचता हो। काम हो जाने पर मैं वह तुम्हें अवश्य दे दूँगा। समझ गये। सच तो यह है कि यदि तुम्हें धन-सम्पदा, जागीर आदि वैभव प्यारा हो तो विलम्ब न कर जल्दी जाओ और महल में आग लगा दो ॥११४-११८॥


इत्युक्ते सोऽवदद्वाणीं किमुक्तं नृपसत्तम। न युक्तं युक्तियुक्तानामिदं संनिन्दितं बुधैः ॥११९॥

अर्थ: दुर्योधन के इन अनिष्ट वचनों को सुनकर कोतवाल बोला कि नृपसत्तम, यह आप क्या कहते हैं। न्यायी पुरुषों को ऐसा अन्याय करना बिल्कुल ही उचित नहीं है। विद्वान् लोग ऐसी बातों की बड़ी निंदा करते हैं। सुजीवन, यह जो लोग धन का संग्रह करते हैं वह जीवन के लिए ही न करते


धनसंग्रहणं नृणां जीवितार्थं सुजीवनम्। तज्जीवितं क्षणस्थायि क्षणिकं तृणबिन्दुवत् ॥१२०॥

स्वापतेयमपि स्वापसदृशं सारवर्जितम्। मेघवृन्दसमं नित्यं क्षणिकं दृष्टनष्टकम् ॥१२१॥

रमार्थं मारणं पुंसां सा रमा विरमा मता। परं प्राणिवधात्पापं पापाद्दुर्गतिरुत्तरा ॥१२२॥

वसुना तेन किं साध्यमसुमन्नाशकारिणा। रमयालमतो नाथ किंचिदन्यत्प्रकाशय ॥१२३॥

अर्थ (श्लोक 119 से 123): है। परन्तु विचार कर देखने से जाना जाता है कि यह जीवन भी तो ओस की बूँद की तरह क्षणिक है-नाश होने वाला है और स्वयं धन भी स्वप्न की तरह असार और देखते-देखते नष्ट हो जाने वाला है। यह मेघ-पटल की भाँति एक क्षण में ही नष्ट हो जाता है और जिस लक्ष्मी का लोभ देकर आप मुझे इन महा पुरुषों को मार डालने के लिए कह रहे हैं भला वह लक्ष्मी भी तो किसी के साथ हमेशा रमने वाली नहीं है व्यभिचारिणी स्त्री के जैसी है। वह इस घर से उस घर और उस घर से इस घर मारी-मारी फिरा करती है। महाराज ! जीव-घात से होने वाले पाप-बन्ध से जीव की दुर्गति होती है। अतः उस धन से भी क्या लाभ जिसके द्वारा जीवों के प्राण पीड़े जायें। इसलिए प्रभो धन-सम्पदा की बात तो रहने दीजिए और जो आज्ञा हो सो कहिए ॥११९-१२३॥


श्रुत्वा दुर्योधनः क्रुद्धः प्रसिद्धः पापकर्मणि। पापच्यते स्म दासेर किमिदं कथितं त्वया ॥१२४॥

सत्प्रेषणकराः प्रेष्या विशेषाः सर्वतः सदा। इत्युक्तियुक्तिसंपत्तिं सफलां कुरु कोविद ॥१२५॥

जानीयात्प्रेषणे भृत्यान्बान्धवान्विधुरागमे। मित्राणि चापदाकाले भार्याश्च विभवक्षये ॥१२६॥

प्रमाणीकृत्य मद्वाक्यं ममादेशं च मानय। यथा ते संपदां प्राप्तिरन्यथानर्थसंगमः ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 124 से 127): कोतवाल के इस उत्तर को सुनकर दुर्योधन के क्रोध की सीमा न रही। वह आपे से बाहर हो गया। पाप करने में अग्रणी वह क्रोध के साथ बोला कि नीच तू यह क्या कहता है। जरा संभल कर बोल। सच्चा और सबसे उत्तम सेवक वही है जो मालिक की आज्ञा पालने में कभी आगा-पीछा नहीं करता। अतएव तुझे ऐसा ही बर्ताव करना चाहिए और इसी में तेरी भलाई छिपी हुई है। वह भी इस समय प्रकट हो जाएगी। क्या तूने नहीं सुना है कि काम पड़ने पर नौकरों की, संकट पड़ने पर भाई-बन्धुओं की, आपत्ति के समय मित्रों की और धन-हीन दरिद्री हो जाने पर भार्या की खूब पहिचान हो जाती है-उनके स्वभाव का इन समयों में अच्छा परिचय मिल जाता है। अतएव तुझे मेरी आज्ञा के अनुसार चलना चाहिए। ऐसा करने से तुझे सम्पत्ति मिलेगी और इसके विपरीत करने से विपत्ति का पहाड़ तेरे सिर पर टूट पड़ेगा ॥१२४-१२७॥


श्रुत्वेति तलरक्षः स सुपक्षस्तु सुलक्षणः। लक्षीकृत्य निजात्मानमाचख्यौ मरणे द्रुतम् ॥१२८॥

नृप देहि श्रियं स्फीतां हर वा मम सांप्रतम्। कुरु प्रसादं क्रोधेन मृत्युभाजनमेव वा ॥१२९॥

दत्स्व राज्यं दयां कृत्वा सर्वं वा हर भूपते। मां मानय मनोहारिन् मूर्धानं छिन्धि वा नृप ॥१३०॥

अर्थ (श्लोक 128 से 130): दुर्योधन के इन क्रोध भरे और उत्तेजित करने वाले वचनों को सुनकर सत्याग्रही कोतवाल अपने आपको मौत के हाथ में सौंप बोला कि राजन् ! मुझे मार डालो चाहे जीता रहने दो, धन-दौलत दो चाहे मेरी और हर लो, मुझे अपनी प्रसन्नता का पात्र बनाओ चाहे क्रोध का, कृपा करके राज्य दो चाहे मेरा सर्वस्व हर लो, मेरा मान-सम्मान करो चाहे मस्तक काट डालो परन्तु देव, कपट


न युक्तं दहनं देव सद्मनश्छद्मना मम।
व्यरंसीदिति संभण्य तलरक्षी दयार्द्रधीः ॥१३१॥

कुद्धेन स च निर्धाट्य विबन्ध्य तलरक्षकम्।
स जडे निगडे कृत्वा कारागारेऽप्यचिक्षिपत् ॥१३२॥

अर्थ (श्लोक 128 से 132): से मैं पाण्डवों के सुंदर महल में आग नहीं लगा सकता। यह कहकर वह दयालु कोतवाल बिल्कुल चुप हो गया, उसके मुँह से फिर एक शब्द भी न निकला। कोतवाल के इस उत्तर से दुर्योधन का क्रोध एकदम उभर आया और उसने उसे खूब मजबूत साँकल से बँधवाकर जेलखाने में डलवा दिया ॥१२८-१३२॥


पुरोधसं द्विजं क्षिप्रमाकार्य कौरवाग्रणीः।
वसनस्वर्णभूषाद्यैर्मानयित्वा नृपोऽवदत् ॥१३३॥

पुरोधः पृथिवीख्याता भूदेवा देववन्मताः।
कुर्वन्तो भूमिकार्याणि यूयं भवत सिद्धये ॥१३४॥

मदिष्टं शिष्टकार्यं च संगोप्यं परमार्थः।
त्वया कर्तव्यमेवात्र सत्कार्तव्यविधायिना ॥१३५॥

जातुषं धाम धीमंस्त्वं धम मद्धृतिहेतवे।
विधातव्यमिदं कार्यमस्माकं सूखसाधनम् ॥१३६॥

यदीप्सितं गृहाण त्वं कुरु कार्यं क्षणार्धतः।
इत्युक्त्वा तं प्रतोष्याशु वाञ्छितैर्धनसंचयैः ॥१३७॥

तद्दाहार्थं समादेशं भूदेवाय ददौ नृपः।
तथात्वं सोऽपि संलुब्धो लोभतः प्रतिपन्नवान् ॥१३८॥

अर्थ (श्लोक 133 से 138): इसके बाद कौरवाग्रणी दुर्योधन ने अपने पुरोहित की बुलवाया और वस्त्राभूषण आदि से उसका सम्मान कर उससे कहा कि पुरोहितजी, तुम सारे जगत् में प्रसिद्ध हो और पृथ्वी पर देव-तुल्य हो। वह इसलिए कि तुम लोगों के सब काम कर देते हो। आज हमारा भी एक काम आ पड़ा है, सो तुम उसको भी कर दो तो बड़ी कृपा हो। महाराज, मैं जिस काम को आपसे कराना चाहता हूँ वह बहुत ही गुप्त काम है। मेरा विश्वास है कि उसे तुम्हीं कर सकते हो क्योंकि उत्तम काम तुम सरीखे पुरुषों के द्वारा ही पूरे पड़ते हैं। वह कार्य यह है कि यह जो पाण्डवों का लाख का महल है इसे तुम रात में आग लगा कर फूँक दो। इससे मुझे बड़ा सन्तोष और सुख होगा। यदि आप मन चाहा पुरस्कार चाहते हो तो क्षणभर में ही इसे भस्म कर दो। यह कह कर दुर्योधन ने उन्हें मुँह माँगा धन देकर संतुष्ट कर दिया और महल जला डालने की उनसे स्वीकारता ले ली। लोभी द्विज ने भी लोभ के वश हो यह अनर्थ करना स्वीकार कर लिया ॥१३३-१३८॥


अहो लोभो महान्यापो लोभात्किं न प्रजायते।
दुष्षमं विषमं कार्यं धिक् पुंसां लोभिनां लघु ॥१३९॥

इन्दिरा सुन्दरा नैव मन्दिरं दुष्टकर्मणः।
तदायत्ताः प्रकुर्वन्ति किमकृत्यं न देहिनः ॥१४०॥

भ्रातरं पितरं पुत्रं मित्रं भृत्यं गुरुं तथा।
लक्ष्मीलुब्धा नरा घ्नन्ति भूपतिं चान्यमानवम् ॥१४१॥

अर्थ (श्लोक 139 से 141): हाय, यह लोभ इतना बड़ा पाप है कि इसके बराबर दूसरा कोई पाप नहीं। इस लोभ से अत्यन्त कठिन और दुख-मय कार्य हो जाते हैं। अतः लोभी पुरुषों के लोभ को धिक्कार है, एक बार नहीं, सौ बार नहीं किन्तु असंख्य और अनंत बार धिक्कार हैं। यह लक्ष्मी सुख देने वाली है, जो ऐसा कहते हैं वे भारी भूलते हैं किन्तु यह तो खोटे कर्मों की खान है। इसके अधीन होकर लोग क्या-क्या दुष्कृत्य नहीं करते। जरा ही सोचो तो मालूम होगा कि इससे ही संसार के सारे अनर्थ होते हैं और तो क्या लोभी पुरुष भाई-बहिन, माता-पिता, स्त्री-पुत्र, नौकर-चाकर, गुरु और राजा आदि किसी


पद्मासद्माश्वदन्त्यादीनौरस्त्या नरपुङ्गवाः ।
दीक्षेप्सवो विमुच्याशु वन्यां वृत्तिं प्रभेजिरे ॥१४२॥

अर्थ (श्लोक 139 से 142): को भी मारने से नहीं हिचकते। एक जमाना था जबकि ऐसे भी नर-पुंगव हो गये हैं जिन्होंने दीक्षा की इच्छा से लक्ष्मी, महल, हाथी-घोड़े आदि सब सम्पत्ति को जलाञ्जलि दे वन्यवृत्ति अर्थात् नग्न दिगम्बर भेष को पसंद किया था ॥१३९-१४२॥


सूत्रकण्ठो विकुण्ठः स हठाद्दुर्लण्ठमानसः ।
लक्ष्मीलोभेन संजातस्तद्धामदहनोद्यतः ॥१४३॥

तद्धामसंनिधिं धृष्टो धाष्ट्र्येन विदध ध्रुवम् ।
इत्वाथ ज्वलनं क्षिप्रं चतुःपार्श्वे स वाडवः ॥१४४॥

दुर्जनाः किं न कुर्वन्ति स्वीकृतं दुष्टमानसाः ।
किं न खादन्ति वै काकाः किं न जल्पन्ति वैरिणः ॥१४५॥

अर्थ (श्लोक 143 से 145): इसके बाद वह जनेऊधारी मूढ़ तथा जड़ द्विज लक्ष्मी के लोभ में फँसकर पाण्डवों के महल को जलाने के लिए तैयार हो गया और जाकर उस दुष्ट ने महल के चारों ओर आग लगा दी। सो ठीक ही है कि दुष्ट, दुर्जन जन कौन-से अनर्थ नहीं करते, कौआ कौन-सी वस्तु को नहीं खाता और वैरी कौन-सी बात को नहीं कहता। भावार्थ यह कि दुर्जन सभी अनर्थों को कर डालते हैं, कौआ विष्टा वगैरह सब कुछ घृणित वस्तु खा जाता है और वैरी जो मन में आता सो कह डालता है ॥१४३-१४५॥


स दुष्टोऽनिष्टसंनिष्ठः क्लिष्टचेता हुताशनम् ।
दत्त्वा समाटितः क्वापि शुभं चेतः क्व पापिनाम् ॥१४६॥

जज्वाल ज्वलनो ज्वाल्यं वेश्म संदीप्य ज्वालया ।
गगनं गतया तूर्णं दाहकानां तु का कृपा ॥१४७॥

लाक्षागृहं दहज्ज्वालालीढं च विपुलात्मकम् ।
दीदीपे दाहको दीप्रो दीप्यते किं न दाहकः ॥१४८॥

अर्थ (श्लोक 146 से 148): इसके बाद वह दुष्ट, अनिष्टकारी और कलुषित-चित्त पुरोहित न जाने कहाँ चला गया। ग्रन्थकार कहते हैं कि पापियों का चित्त कभी शुभ नहीं हो सकता। इधर आग आकाश तक उठने वाली अपनी भयंकर ज्वाला से महल को खूब जलाने लगी। ठीक ही है कि आग लगा देने वाले पुरुषों में दया नहीं होती। इस समय उस लम्बे-चौड़े और ज्वाला से खूब घिरे हुए महल को जलाती हुई आग अत्यन्त दीप्त हो रही थी, दूर-दूर से उसका उजेला देख पड़ता था। सो ठीक ही है कि जलाने वाली आग स्वयं भी तो जलती है। अतः उसका इतना तेज हो जाना कोई बात नहीं है ॥१४६-१४८॥


ततः सुप्ता नराधीशास्तदा पञ्चापि पाण्डवाः ।
जजागरुर्न सुश्रान्ता निद्रा हि मरणायते ॥१४९॥

लक्ष्यीकृताग्निना लाक्षा विपक्षेव क्षणार्धतः ।
ज्वलन्ती ज्वालयामास वस्तु वेश्मगतं वरम् ॥१५०॥

कथं कथमपि प्रायः प्रीताः पञ्चापि पाण्डवाः ।
जजागरुर्महाज्वालालीढसद्देशभित्तयः ॥१५१॥

उत्निद्रा ददृशुर्ज्वालां ज्वालायन्तीं निकेतनम् ।
परितो जतुसंदीप्तां चलां कल्पान्तजामिव ॥१५२॥

अर्थ (श्लोक 149 से 152): परन्तु ऐसे समय में भी पाण्डव लोग जाग्रत नहीं हुए। लोग कहते हैं कि नींद शान्ति है-विश्राम है परन्तु उनका यह भ्रम है क्योंकि नींद विश्राम नहीं किन्तु सुध-बुध भुला देने वाली एक तरह की मौत ही है। इधर आग ने लाख को शत्रु की तरह अपना लक्ष्य बना कर क्षणभर में ही महल की सब सुन्दर-सुन्दर वस्तुएँ जला-कर भस्म कर दीं। धीरे-धीरे जब उसकी महाज्वाला से महल की सारी दीवालें जलने लगी और उसकी आँच का उन पर कुछ असर हुआ तब पाण्डव जाग्रत हुए और


इतस्ततः प्रपश्यन्तो निर्गमोपायमात्मना।
नाशक्नुवन्पदं दातुं क्वापि ज्वालाकरालिते ॥१५३॥

तडत्तडत्प्रकुर्वन्तीं स्फोटयन्तीं सुभित्तिकाम्।
ज्वालां ककुप्सु संप्राप्तां ददृशुः पाण्डवास्तदा ॥१५४॥

अर्थ (श्लोक 149 से 154): जाग्रत होते ही उन्होंने देखा कि लाख के संयोग से खूब ही प्रदीप्त हुई आग की ज्वाला सब ओर से महल को जला रही है। जान पड़ता है मानों वह प्रलय की ही अग्नि है। उन्होंने अपने निकलने के लिए इधर-उधर बहुत उपाय किये परन्तु आग की ज्वाला के मारे उन्हें कहीं भी पाँव देने को जगह न देख पड़ी। उस समय पाण्डवों ने देखा कि तड़तड़ाती हुई भीतों को ढाहती हुई ज्वाला सब दिशा में फैल रही है, ऐसी जरा भी जगह नहीं बची है जहाँ उसने अपना साम्राज्य न जमा लिया हो ॥१४९-१५४॥


अनवेक्ष्य सुधर्मात्मा धर्मपुत्रः सुधर्मधीः।
हेतुं निर्गमने गम्यं सस्मार श्रीजिनेशिनः ॥१५५॥

अपराजितमन्त्रेण मन्त्रयित्वा स्वमानसम्।
युधिष्ठिरः स्थिरं तस्थौ स्थाम्ना स्थगितमानसः ॥१५६॥

अर्थ (श्लोक 155 से 156): इधर-उधर बहुत देखने पर जब कहीं से भी उन्हें निकलने का उपाय न देख पड़ा तब धर्मात्मा और धर्म-बुद्धि युधिष्ठिर स्थिर-चित्त से श्रीजिनेन्द्र का स्मरण करने लगे उनके नाम की माला जपने लगे। वह पंच नमस्कार मंत्र से अपने मन को मंत्रित करके अपने तेज से आग को भी दबाकर स्थिर हो बैठ गये ॥१५५-१५६॥


अहो कर्मक्रियां पश्यन्नजय्यां सज्जनैरपि।
फलन्तीं फलमुत्कृष्टं तत्कर्म कुरुषे कथम् ॥१५७॥

कर्मणा कलिताः सन्तः सन्तः सीदन्ति संसृतौ।
कर्मणां पाकतः पुत्राः सागराः किं न दुःखिताः ॥१५८॥

अर्ककीर्तिः क्षितौ ख्यातो बन्धनं जयतो गतः।
कर्माण्यन्ये न किं प्राप्ता बन्धनं भुवि भूमिपाः ॥१५९॥

अर्थ (श्लोक 157 से 159): वे विचारने लगे-आश्चर्य है कि कर्म इतने विकट हैं कि उन पर सज्जनों का भी वश नहीं चलता-उन्हें वे भी नहीं जीत सकते और उसके तीव्र फल को भोगते हैं। फिर भी हे आत्मन्! तू इन कर्मों को क्यों करता है, अब तो इनसे अपना पिंड छुड़ा। इन कर्मों के कारण ही सत्पुरुष संसार में दुख उठाते हैं। देखो, इन्हीं के फल से तो सगर के पुत्र दुखी हुए और इन्हीं के जाल में पड़कर जगत् प्रसिद्ध अर्ककीर्ति जो कि भरत चक्रवर्ती का पुत्र था, जय सेनापति द्वारा बँधन में पड़ा ॥१५७-१५९॥


ज्वलनं ज्वलनं प्राप्ताः कर्मणा वयमप्यहो।
अतः कर्मच्छिदं देवं स्मरामो विस्मयातिगाः ॥१६०॥

अर्थ: इसमें बिल्कुल सन्देह नहीं है तथा इनके सिवाय और-और राजा लोग भी इन्हीं के प्रेरे हुए संसार में वध-बंधन आदि के दुखों के भोक्ता हुए हैं एवं खेद की बात है कि हम भी इन्हीं दुष्ट कर्मों की कृपा से आज आग के मुँह में आ पड़े हैं और इन्हीं की कृपा से यह हमें जलाकर भस्म किये देती है। इसलिए अब विस्मय को दिल से निकाल कर हमें इन दुष्ट कर्मों के छेदने वाले प्रभु का स्मरण करना चाहिए ॥१६०॥


इति संचिन्तयंश्चित्ते स्थिरो ज्येष्ठो विशिष्टधीः।
तावता सहसा बुद्धा कुन्ती संप्राप्तचेतना ॥१६१॥

अर्थ: इस प्रकार विचार कर विशिष्ट-बुद्धि युधिष्ठिर बैठे ही थे कि इतने में सहसा संतप्त-चेतना कुन्ती जाग उठी और वह जलते हुए महल के आगे आकर उपस्थित हुए दुर्गम दुखों को देख रोने लगी कि


ज्वलत्सा सदनं वीक्ष्य रुरोद विशदाशया।
अग्रतो दुर्गमं दुःखं वीक्षमाणा व्यवस्थितम् ॥१६२॥

अर्थ (श्लोक 161 से 162): हाय! मैंने ऐसा कौन-सा निकृष्ट कर्म किया है, जिसके प्रभाव से मुझे ऐसा भारी दुस्सह दुख-रूप फल मिला है। आश्चर्य है कि ये लोग जिस पाप के फल से तीव्र दुखों को भोगते हैं फिर भी उसी पाप को करते हैं ॥१६१-१६२॥


अहो मया कृतं दुष्टं कर्म किं कलुषात्मकम्।
यत्प्रभावादिदं लब्धं फलं प्रविपुलं परम् ॥१६३॥

अहो पापस्य पाकेन पापच्यन्ते परा नराः।
पुनस्तदेव कुर्वन्ति धिगज्ञानं जनोद्भवम् ॥१६४॥

किं कुर्मः क्व प्रयामः क्व तिष्ठामः समुपस्थिते।
वीतहोत्रे विशुद्धेऽस्मिन्गेहे प्रज्वलति स्फुटम् ॥१६५॥

रुदन्तीं तां तदा कुन्तीं कृन्तन्तीं कुन्तलान्निजान्।
निषिद्धय निर्भयो भीमः समुत्तस्थे निजासनात् ॥१६६॥

इतस्ततो भ्रमन्भीमोऽभीतात्माऽभ्रष्टभानुकः।
लेभे धरागतां पुण्यात्सुरङ्गां देशनामिव ॥१६७॥

ततस्तन्मार्गतस्तूर्णं निर्जग्मुर्गमनोत्सुकाः।
सुस्नेहाः स्नेहतः कुन्त्या चिन्तयन्त्या जिनं च ते ॥१६८॥

क्षणात्ते क्षिप्तचेतस्का लङ्घयित्वा गृहं गताः।
वनं भव्या भवं भुक्त्वा यथा यान्ति सुनिर्वृतिम् ॥१६९॥

अहो पश्यत पुण्याढ्याः शुद्धं सुश्रेयसः फलम्।
अज्ञातात्र सुरङ्गापि दर्शिता येन तत्क्षणम् ॥१७०॥

वृषाद्द्वारीयते वह्निर्जलधिः स्थलति ध्रुवम्।
चित्रं मित्रायते शत्रुर्नागो महालतायते ॥१७१॥

अर्थ (श्लोक 163 से 171): अहो धिक्कार है लोगों के इस अज्ञान को जिसके पंजे में फंस जाने से उन्हें कुछ भी हित-अहित का विवेक नहीं रह जाता। अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ, जबकि सब ओर से खूब ही जल रही इस भयंकर आग में यह महल बिल्कुल ही जला जा रहा है। ऐसी हालत में मैं कहाँ ठहर कर अपने प्राणों को बचाऊँ। मुझे तो कुछ उपाय ही नहीं सूझ पड़ता है। इस तरह विलाप करती हुई कुन्ती को भीम ने समझाया और वह निर्भय अपने आसन से उठकर इधर-उधर रास्ता शोधने लगा। आग इस जोर से बढ़ रही थी कि डर के मारे उसके शरीर की कान्ति भी फीकी पड़ गई। पुण्ययोग से इसी समय उसे सच्चे उपदेशक के जैसी वह सुरंग मिल गई जो कि पृथ्वी के भीतर ही भीतर विदुर ने खुदवाई थी। परस्पर के स्नेह से भरे हुए वे सब पाण्डव जिन भगवान् को हृदय में धारण करने वाली कुन्ती-सहित उस सुरंग के रास्ते से बाहर निकल अति शीघ्र वहाँ से चलकर वन में पहुँच गये-जैसे कि भव्य-पुरुष थोड़ी ही देर में संसार को नाश कर मुक्ति में पहुँच जाते हैं। पुण्य का फल कितना मनोहर और अच्छा है कि जिसके प्रसाद से अनजानी सुरंग भी वक्त पर हाथ आ गई। इसी पुण्य से आग जल हो जाता है, समुद्र थल हो जाता है, शत्रु मित्र और साँप गिजाई हो जाता हैं ॥१६३-१७१॥


ततस्ते पाण्डवास्तूर्णं गत्वा प्रेतवनान्तरे।
अशर्मकलितास्तस्थुः कुन्तीयुक्ताः सुयुक्तितः ॥१७२॥

तत्र भीम उपायज्ञो मृतकानां गतात्मनाम्।
षट्कं स्वयं गृहीत्वाशु गत्वा लाक्षागृहान्तिकम् ॥१७३॥

अर्थ (श्लोक 172 से 173): इसके बाद वे विपन्न पाण्डव कुन्ती-सहित मसान भूमि में पहुँचे। वहाँ पहुँच कर उपाय खोज निकाल ने में प्रवीण भीम ने अपनी रक्षा के लिए एक नई ही युक्ति खोज निकाली और उसने उसे कार्य-रूप में परिणत भी कर दिया। वह मसान भूमि से छह मुर्दे उठा ले जाकर उन्हें अति शीघ्र जलते हुए लाख के महल में डाल आया। इसलिए कि जिससे लोग समझें कि पाण्डव जल कर मर


अक्षिपत् क्षणतः क्षूणो न लक्ष्यो नरनायकैः।
तत्र तूर्णं विनिवृत्तस्ततः सल्लक्षणान्वितः ॥१७४॥

अलक्ष्यास्ते विलक्ष्यास्ते क्षितौ क्षितिपन्दनाः।
एकत्रीभूय निर्जग्मुरहार्या इव जङ्गमाः ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 172 से 175): गये। उसे किसी ने भी देख न पाया और वह अति शीघ्र पीछा लौट आया। इसके बाद वे राज-नन्दन पाण्डव चुप-चाप वहाँ से चल दिये। वे जाते हुए ऐसे शोभते थे मानों पहाड़ ही चलते हैं ॥१७२-१७५॥


तत्र प्रातस्तदा जातं द्रष्टुं तान्पाण्डुनन्दनान्।
धार्तराष्ट्राः समाजग्मुर्मुखतो दुःखभाषणाः ॥१७६॥

सर्वस्मिन्नगरे तद्धि विज्ञाय नागरोत्कराः।
हाकारमुखरा मुख्या दुःखं भेजुरतित्वरा ॥१७७॥

किमद्य नगरे जातं सुजात्यजनवर्जनम्।
अहो दुःखं खरं क्षिप्रं क्षिप्तं केनात्र पापिना ॥१७८॥

पाण्डवाः खलु पाण्डित्यमटन्तः पटुमानसाः।
प्रचण्डाश्चण्डकोदण्डा घटिताः शुभकर्मणा ॥१७९॥

पराक्रमसमाक्रान्तनिःशेषभुवनेश्वराः।
अनुल्लङ्घ्याः सुलङ्घ्यास्ते कथं जाताः स्वकर्मभिः ॥१८०॥

विदग्धास्ते कथं दग्धा धिग्वैदग्ध्यं तवाधुना।
विधे विधुरतां नीता ईदृशा हि नरास्त्वया ॥१८१॥

संदिग्धं मानसं मेऽद्य जातमस्ति सुचिन्तनात्।
ईदृशाः केन दह्यन्ते विदग्धाः कर्मणेति च ॥१८२॥

किं ते दग्धा न वा दग्धा विदग्धा मम मानसम्।
संदिग्धमीदृशानां हीतीदृशं मरणं कथम् ॥१८३॥

पुण्यवन्तः पुमांसस्तु प्रायशो नाल्पजीविनः।
तथापि नेदृशो मृत्युर्महतां जायते लघु ॥१८४॥

अर्थ (श्लोक 176 से 184): उधर जब हस्तिनापुर में सबेरा हुआ तब ऊपर से दुख का ढोंग दिखाते हुए कपटी कौरव पाण्डवों को देखने के लिए आये। धीरे-धीरे यह बात सारे नगर में फैल गई। इस अनहोनी बात की सुनकर नगर के सब लोगों को बड़ा दुख हुआ-सबके हृदयों में वज्र से भी भयंकर चोट लगी। उनके मुँह से निकली हुई हाहाकार की ध्वनि ने सारे नगर को शोक-पूरित कर दिया। वे लोग तीव्र दुख के आवेग से रोते और कहते थे कि आज इस नगर में समझ लो कि श्रेष्ठ और सज्जन पुरुषों का नाम शेष ही हो गया है। न जाने किस दुष्ट वैरी ने इन सत्पुरुषों को काल के मुँह में पहुँचा दिया है। पुण्य से पाण्डव कितने अच्छे पण्डित, शान्ति, निर्मल-चित्त, तेजस्वी और धनुष-विद्या-कुशल थे। वे कितने पराक्रमी थे। उनके पराक्रम के आगे सभी शीश झुकाते थे। उन्होंने अपने पराक्रम से सब राजाओं-महाराजाओं पर विजय पाली थी। आश्चर्य है कि ऐसे पराक्रमी और महाभागों को भी दुष्ट कर्मों ने अपने जाल में फंसा लिया-वे भी इनके पंजे से न छूटे। अहो, कर्म, तेरी चतुराई को धिक्कार है, असंख्य और अनंत बार धिक्कार है जो तूने ऐसे अच्छे विद्वान् और बुद्धिमान् पाण्डवों को भी भस्म कर दिया एवं पांडवों के वियोग से दुखी होकर कोई कहता था कि विचार करने से मुझे यह सन्देह होता है कि ऐसे विद्वान् और व्यवहार-कुशल पाण्डव कैसे भस्म किये गये और क्यों किये गये। मुझे यह भी सन्देह है कि ऐसे उत्तम पुरुषों का इस रीति से मरण हो। इसका कोई विशेष कारण नहीं जाना जाता और एक बात यह भी है कि, पुण्यात्मा पुरुष प्रायः, करके हीन आयु वाले नहीं होते और जो होते भी हैं उनका इस तरह से मरण नहीं होता ॥१७६-१८४॥


अहो अद्य पुरं जातं निःशेषं चोद्द्रसं लघु।
उद्द्रसे च पुरे स्थातुं वयं शक्ताः कथं ननु ॥१८५॥

अर्थ: देखो, आज सारा नगर कैसा बुरा उजाड़ सा देख पड़ता है। हा, अब ऐसे ऊजड़ नगर में भला


अद्यैव मेघवद्ध्वस्तो मेघेश्वरमहीपतिः। अद्यैव शान्तिचक्रीशः शान्तिं यातो महीतले ॥१८६॥

अद्यैव शान्तनुः श्रीमानातोऽस्माकं सुदुःखतः। महाभ्यासस्तु स व्यासः किमद्यासौ मृतिं गतः ॥१८७॥

अद्यैवाहो मृतिं यातः प्रकटं पाण्डुपण्डितः। इति ते रुरुदुः पौराः पाण्डवेषु गतेषु च ॥१८८॥

अर्थ (श्लोक 185 से 188): हम लोग कैसे रह सकेंगे। आज तो ऐसा दीखता है कि मानों मेघ की समता करने वाला मेघेश्वर नरेश आज ही मृत्यु का ग्रास बना है और आज ही शान्तिनाथ चक्रवर्ती ने इसे अनाथ किया है। क्या हम लोगों के दुख को देख न सकने के कारण आज ही शांतनु राजा और व्यास काल-कवलित हुए हैं। क्या सचमुच आज पाण्डु की मृत्यु हुई है। तात्पर्य यह कि पाण्डवों के गुप्त रूप से चले जाने और उनकी जगह मुर्दे देखने से नगरवासी लोगों ने बड़ा विलाप किया ॥१८५-१८८॥


मिलच्छोको गलनमोदो गाङ्गेयो गुणगौरवः। किंवदन्तीमिमां श्रुत्वा मुमूर्च्छ मतिमोहतः ॥१८९॥

मूर्च्छया मोहितः सोऽपि मृत्युसख्य्येव प्राप्तया। हरन्त्या चेतनां चिन्त्यां सातां छेत्तुमवाप्तया ॥१९०॥

शनैः शनैर्गता मूर्च्छा तद्देहाच्छीतवस्तुतः। अलक्ष्मीरिव चोत्तस्थे गाङ्गेयः शोकसंगतः ॥१९१॥

अर्थ (श्लोक 189 से 191): जब गांगेय ने इन सब बातों को सुना तब उसका मन शोक से भर आया। उसके चेहरे पर बड़ी उदासी छा गई। तीव्र मोह के कारण उसे मूर्छा आ गई वह बेहोश हो गया। जान पड़ता था मानों उसके शरीर से मृत्यु ही लिपट गई है और है भी ऐसा ही कि मृत्यु मूर्च्छा की सखी ही है, तब उसका वहाँ भ्रम होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मृत्यु से जिस तरह मनुष्य सब सुध भूल जाता है उसी तरह मूर्च्छा से भी भूल जाता है अतः मूर्छा के समय मृत्यु का भ्रम होना बहुत ही वाजिब है ॥१८९-१९१॥


स सिञ्चञ्छोकसंतप्तो धरामश्रुसुधारया। रुरोद हृदये खिन्नः प्रस्विन्नः शोकवारिभिः ॥१९२॥

अहो सुताः कथं दग्धा विदग्धाः सर्ववस्तुषु। युष्मदृते कथं सातमस्माकं शङ्कितात्मनाम् ॥१९३॥

भवादृशां कथं युक्ता पञ्चता पावकाद्भवेत्। मृत्युश्चेत्संगरे युक्तं वैरिवृन्दमदापहे ॥१९४॥

अथवा धर्मयोगेन दीक्षया शिक्षयाथ वः। संन्यासेनात्मसाध्येन मृत्युर्युक्तो न चान्यथा ॥१९५॥

अर्थ (श्लोक 192 से 195): इसके बाद चंदन आदि शीतोपचार से उसकी मूर्छा दूर हुई और वह दरिद्र की तरह शोक में डूबा हुआ उठा। शोक से संतप्त होने के कारण उसके नेत्रों से आँसुओं की धारा वह निकली, वह शोकरूप वारि (जल) से एकदम सरोवर के जैसा हो गया। उसके हृदय में बड़ा खेद हुआ। वह विलाप करने लगा के पुत्र, तुम तो सब बातों को जानते-समझते थे, फिर इस तरह कैसे जला दिये गये! क्या तुम्हें इस बात का कभी भान ही न हुआ था। कहिए तो अब तुम्हारे बिना हमेशा दुखित रहने वाले हम लोग सुख कैसे पा सकेंगे। हमें इस बात में सन्देह है कि भला, तुम सरीखे पुण्य-पुरुषों की मृत्यु आग से क्यों कर हुई। चाहिए तो यह था कि यदि तुम्हारी मृत्यु ही इस समय होती तो वह बैरियों के मद को उतार देने वाले युद्ध में होती अथवा धर्मधारण के साथ दीक्षा और आत्म-साध्य संन्यास के द्वारा तुम्हारी मृत्यु होती। इसके सिवाय और तरह से तुम्हारी मृत्यु होना बहुत ही बुरा हुआ। जान पड़ता है कि तुम लोगों की इन दुष्ट कौरवों ने ही जला दिया है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। पापी पुरुषों की बुद्धि पाप-रूप ही होती है, उसमें हित-अहित के विचार की तो गंध ही नहीं रहती और ऐसा


वैरिविभिः कौरवैश्चाहो यूयं दग्धा भविष्यथ।
पापिनां पापरूपाही प्रज्ञा विज्ञानवर्जिता ॥१९६॥

अर्थ (श्लोक 192 से 196): ही हुआ भी है ॥१९२-१९६॥


गाङ्गेयवत्कथां द्रोणः श्रुत्वा मूर्च्छामवाप च।
उन्मूर्च्छितो विलापेन मुखरं दिक्त्रयं व्यधात् ॥१९७॥

अहो कौरवपापानामनुष्ठानं कुचेष्टिनाम्।
शिष्टातिगमनिष्टं च नन्विदं निश्चितं बुधैः ॥१९८॥

तदा कौरवभूपालान्बभाण भयवर्जितः।
द्रोण इत्थं न युक्तं भोः कुलक्रमविनाशनम् ॥१९९॥

खलीकुर्वन्ति लोका हिखलाः स्खलितमानसाः।
सज्जनान्कटुकान्किं न यथा कुमारिकारसः ॥२००॥

इति निर्भर्त्सिता भूपा अधोवक्त्रास्तु कौरवाः।
अभवन्निर्दयानां हि का त्रपा धर्मधीश्च का ॥२०१॥

तदा लोकाः समागत्य वह्निविध्यापनं व्यधुः।
शोकार्ता अर्तितः किं न कुर्वन्ति दुष्करं क्रियाम् ॥२०२॥

केचिद्धेणुर्भयग्रस्ता इति लोकाः सुलोकनैः।
लोक्यन्तां तच्छरीराणि मृतावस्थां गतानि च ॥२०३॥

तदा तानि विलोक्याशु केचिदूचुः शुचं गताः।
अयं युधिष्ठिरः स्थेयानयं भीमो महाबलः ॥२०४॥

सार्जवश्चार्जुनो वर्यो नकुलोऽयं सुनिर्मलः।
देवसेवावहश्चायं सहदेवः शुभाशयः ॥२०५॥

सतीयं सुकुमाराङ्गी कुन्ती सत्कुन्तला वरा।
निर्मला विपुलाप्येषां जननी दग्धदेहिका ॥२०६॥

विदग्धा अर्धदग्धानि मांसपिण्डोपमानि च।
शवानि तानि संवीक्ष्य बभूवुस्तत्समा इव ॥२०७॥

अर्थ (श्लोक 197 से 207): पाण्डवों की मृत्यु का हाल सुन गांगेय की तरह द्रोणाचार्य को भी मूर्च्छा आ गई और वह शोक से विलाप करने लगे जिससे दसों-दिशायें शब्द-मय हो गई। उन्होंने सोचा कि नीच काम करने वाले पापात्मा कौरवों ने ही यह शिष्टों के विरुद्ध अनिष्ट काम किया है औरों से ऐसा अनिष्ट होना असम्भव नहीं तो असाध्य अवश्य है। द्रोण से रहा न गया और उस निर्भय ने कौरव-राजाओं से खुल्लमखुल्ला कहा कि आप लोगों को इस तरह से अपने कुटुम्ब का विनाश कर देना उचित न था परन्तु दुष्ट-चित्त खल पुरुषों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे सज्जनों को भी दुर्जन बना देते हैं, जैसे कि तूमड़ी का रस मीठी से मीठी चीज को भी कड़वा बना देता है। द्रोण के इस तिरस्कार से कौरवों ने अपना सिर नीचा कर लिया, वे बहुत ही लज्जित हुए। फिर ऊँचा मुँह करने का भी उनका साहस न हुआ। सच तो यह है कि कहीं निर्दय पुरुषों के भी लाज और धर्म-बुद्धि हो सकती है। इस वक्त चारों ओर से नगर के लोग आ गये और उन्होंने महल की आग बुझाई। शोक से पीड़ित हुए पुरुष क्या कठिन काम नहीं करते किन्तु जब जैसा मौका आता है तब वैसा ही उन्हें करना पड़ता हैं क्योंकि शोक करके बैठ जाने से भी तो काम नहीं चलता। वे आग बुझाने वाले उन मुर्दों को देखकर बोले कि देखो ये पाण्डवों के मुर्दा शरीर पड़े हुए हैं। उस समय उन मुर्दों को देखकर कोई शोकातुर बोला कि यही स्थिर-चित्त युधिष्ठिर हैं, यह महाबली भीम हैं, यह सरल-चित्त अर्जुन हैं और यह निर्मल नकुल तथा देवताओं द्वारा सेव्य और पवित्र हृदय वाले सहदेव हैं और यह सुकुमार अंग तथा सुंदर बालों वाली अबला इनकी जननी कुन्ती का मुर्दा शरीर पड़ा है। देखो, यह सती कितनी निर्मल और विशाल हृदय वाली थी एवं वे सब विदग्ध पुरुष, अध-जले मांस के पिंड समान उन मुर्दों को देखकर उनके जैसे ही अध-जले हो गये-उन्हें बड़ा भारी शोक हुआ ॥१९७-२०७॥


पुनः पुनः परावृत्य कुणपान्यावनान्नृपाः। आलोक्य निश्चिता जाताः पाण्डवा ज्वलिता इति ॥२०८॥

तन्निश्चये तदा लोकास्तद्दिने पानभोजनम्। व्यापारं पण्यवीथीनां तत्यजुर्गृहकर्म च ॥२०९॥

हाकारमुखरा लोका हाकारमुखराः स्त्रियः। तदाभवन्महाशोकाद्दाहाकारमुखरं पुरम् ॥२१०॥

गान्धारी लब्धसंतोषा समृद्धा सर्वराज्यतः। सुतवर्धापनव्याजात्तदा चक्रे महोत्सवम् ॥२११॥

अर्थ (श्लोक 208 से 211): वे लौट-लौटकर उन मुर्दों को देखने लगे और बड़ी देर तक देख भालकर उन्होंने यही निश्चय किया कि पाण्डव ही जल गये हैं और इस निश्चय के अनुसार ही शोक के मारे उन लोगों ने उस दिन खाना, पीना और अपना व्यापार धंधा भी बन्द कर दिया। सब लोग दुख से व्याकुल हुए बैठे रहे। अधिक क्या कहें उस दिन शोक के मारे क्या पुरुष, क्या स्त्रियाँ, क्या बाल-बच्चे यहाँ तक कि पशु पक्षी तक-सबकी हाय-हाय की ध्वनि से सारा शहर गूंज रहा था। भावार्थ यह कि उस दिन का दृश्य शोक का बड़ा भारी भयंकर दृश्य था, जो हृदय को विदार कर टुकड़े करने वाले वज्र-प्रहार के जैसा था। उधर पाण्डवों की मृत्यु सुन धृतराष्ट्र की रानी गांधारी को बड़ा भारी संतोष हुआ। सम्पूर्ण राज्य मिल जाने की खुशी में उसने पुत्र की बधाई के बहा ने खूब उत्सव मनाया ॥२०८-२११॥


तद्वार्ता विस्तृतां लोके संप्राप्तां द्वारकां पुरीम्। दाशार्हाः शुश्रुवुर्भोजाः प्रलम्बघ्नश्च केशवः ॥२१२॥

समुद्रविजयः श्रीमान्समुद्र इव विस्तृतः। रुड्वाडवाग्निना क्षुब्धश्चचाल रूक्सुवीचिमान् ॥२१३॥

हलायुधो महायोद्धा समृद्धो विविधायुधः। युद्धार्थं स च संनद्धो बली कोऽत्र विलम्बते ॥२१४॥

अर्थ (श्लोक 212 से 214): धीरे-धीरे पाण्डवों के जल-मरने की बात सारे संसार में फैल गई और कुछ समय में वह द्वारिका पुरी में समुद्रविजय आदि दसों भाइयों और बलभद्र नारायण के कानों में पड़ी। उसको सुनकर उन्हें भी बड़ा भारी रंज हुआ। अतएव भयानक बड़वानल से क्षोभ को प्राप्त हुए समुद्रविजय से न रहा गया-कौरवों का यह अन्याय उनसे न सहा गया। अतः वे समुद्र की तरंगों की तरह सेनारूप तरंगों से लहराते हुए द्वारिका से हस्तिनापुर की ओर रवाना हुए और इसी प्रकार सब तरह से समृद्ध, भाँति-भाँति के आयुधों वाला महान् योद्धा, बली बलभद्र भी युद्ध के लिए उसी वक्त तैयार हुआ और है भी ठीक ही कि जो बलवान् होता है वह ऐसे समय कभी विलम्ब नहीं कर सकता। इसी प्रकार अनेक शत्रुओं को जड़ मूल से उखाड़ फेंक देने वाले और सिंह के जैसे पराक्रमी कृष्ण नारायण ने भी कवच पहनने को अभिमान से अपने हाथ पसारे और कवच पहिन कर वह युद्ध के लिए तैयार हो गया ॥२१२-२१४॥


दामोदरस्तदा दर्पाद्दारितानेकशात्रवः। करं व्यापारयामास संनाहे सिंहविक्रमः ॥२१५॥


शोकसंतप्तसर्वाङ्गा बाष्पपूरितलोचनाः। दुन्दुभिं दापयामासुः संगराय च यादवाः ॥२१६॥

अर्थ: इस घटना को सुनकर और सब यादवों को भी बड़ा दुख हुआ। उन सबका शरीर भी शोक से संतप्त हो उठा। उनके नेत्रों में आँसू भर आये और कौरवों के इस अन्याय से वे बहुत ही क्षुब्ध हुए। अतः उन्होंने युद्ध के लिए रण-भेरी बजवाई-युद्ध की घोषणा कर दी। उस भेरी के शब्द को सुनकर कुछ पंडित लोगों को क्षोभ हुआ और वे समुद्रविजय, कृष्ण और बलदेव के पास आकर


तद्भेरीनादतः क्षुब्धा विबुधा बोधवेदिनः ।
दाशार्हाश्च हृषीकेशं बलमभ्येत्य चाभणन् ॥२१७॥

किमर्थमयमारम्भो विज्ञाप्यं श्रूयतामिति ।
योग्ये समुद्यमो युक्तो विदुषां चान्यथा क्षितिः ॥२१८॥

हृषीकेशोऽगदीद्दीप्तो दीप्त्या भास्करसंनिभः ।
कौरवानत्र चानीय क्षिपामि वडवानले ॥२१९॥

अर्थ (श्लोक 215 से 219): उनसे कहने लगे कि आप लोगों का योग्य बात के लिए उद्योग करना अच्छा ही है। विद्वानों को चाहिए भी ऐसा ही, नहीं तो मरण के सिवाय और कोई दूसरा फल नहीं हो सकता है। यह सुनकर अपनी दीप्ति से सूरज की तुलना करने वाला नारायण बोला कि मैं कौरवों को यहाँ बाँध लाकर बड़वानल में डाल दूँगा अथवा युद्ध में जीत कर उनके टुकड़े-टुकड़े करके दिशाओं की बलि चढ़ा दूँगा ॥२१५-२१९॥

द्वादशं पर्व (भाग 2/2)

अथवा खण्डशः क्षिप्रं खण्डयित्वाखिलान्रिपून् ।
आजौ जित्वा स्वजय्योऽहं दास्यामि ककुभां बलिम् ॥२२०॥

दग्ध्वाथ पाण्डवांश्चण्डाः क्व ते स्थास्यन्ति कौरवाः ।
मयि क्रुद्धे समृद्धे च मृगारौ द्विरदा इव ॥२२१॥

दुर्योधनादयो रङ्कास्तावद्गर्जन्ति जर्जराः ।
यावन्मां न च पश्यन्ति दर्दुरा वा भुजंगमम् ॥२२२॥

अर्थ (श्लोक 220 से 222): मैं सच कहता हूँ कि जिस तरह से सिंह के क्रुद्ध होने पर हाथियों की कहीं भी जंगल में रहने को जगह नहीं मिलती उसी तरह मुझ सरीखे समृद्धशाली के क्रुद्ध होने पर पाण्डवों को मारने वाले चंड कौरव कहाँ रहेंगे-उन्हें कहीं भी जगह न मिलेगी-वे भागे-भागे फिरेंगे। सुनिए ये रंक और जर्जर बिचारे कौरव तभी तक गरजते हैं जब तक कि इन्होंने मुझे नहीं देखा। कौन नहीं जानता कि मेंढक तब तक ही टरटर किया करते हैं जब तक कि वे साँप का दर्शन नहीं करते ॥२२०-२२२॥


निशम्येति वचस्तस्य कश्चिद्विबुधसत्तमः ।
उवाच वचनं वाग्मी विदिताखिलविष्टपः ॥२२३॥

नृपेन्द्र छिद्रमावीक्ष्य छलनीया महाद्विषः ।
घटिका छिद्रतो नूनं जलं हरति निर्जला ॥२२४॥

निश्चिद्राः कष्टतः साध्या दुर्लक्ष्या विबुधैरपि ।
मुक्ताफलानि प्रोतानि निश्चिद्राणि भवन्ति किम् ॥२२५॥

अर्थ (श्लोक 223 से 225): कृष्ण के इन वचनों को सुनकर सम्पूर्ण बातों का ज्ञाता एक वाग्मी बोला कि नृपेन्द्र, यह सब तो ठीक है परन्तु नीति यह है कि छिद्र पाकर ही बैरियों के साथ छल करना चाहिए। देखिए खाली घड़ी के छिद्र को पाकर ही उसके छिद्र द्वारा उसमें जल भर जाता है। बिना छिद्र पाये वैरी अतीव कष्ट-साध्य होते हैं। वे देवताओं के द्वारा भी पराजित नहीं किये जा सकते। कहिए क्या छेद के बिना भी कहीं सूत में मोती पोये जा सकते हैं ॥२२३-२२५॥


अद्य कौरवाः संदृप्ताः संक्लृप्तजयसद्बलाः ।
शरीरजैर्बलैर्मत्ता घोटकाद्यैर्विशेषतः ॥२२६॥

मानयन्ति न ते मत्ताः परान्बलविवर्जितान् ।
जानन्तश्च यथा तूर्णं नरा मद्यसुपायिनः ॥२२७॥

अर्थ (श्लोक 226 से 227): देखिए, इस समय कौरव-गण भारी अभिमान से भर रहे हैं, उनके पास खासी विजयी उत्तम सेना है। उन्हें अपने शारीरिक बल का भी बड़ा भारी मद है। विशेष कर उन्हें अपने घोड़े, हाथियों आदि का बहुत घमण्ड है। अतः जिस तरह मदिरा पीने वाले मनुष्य जल्दी किसी को दबते नहीं हैं उसी तरह वे मत वाले भी वैरी को बल-रहित जान कर बिल्कुल नहीं दबेंगे-आपका कुछ भी भय न मानेंगे। इतने पर भी कौरवों को जरासंध का सहारा है। इसलिए ये और भी उद्धत हो रहे हैं। जिस


जरासन्धाश्रयाद्दृप्ता बलीयन्ते स्म कौरवाः। नृत्यन्ति दर्दुरा नागमूर्ध्नीव नागतुण्डिकात् ॥२२८॥

अर्थ (श्लोक 226 से 228): तरह कि नागदमनी (सर्प का जहर उतारने वाली जड़ी) के सहारे को पाकर मेंढक साँप के सिर पर नाचने लगते हैं ॥२२६-२२८॥


जरासन्धाश्रयात्पूज्याः पूजितास्ते नरेश्वरैः। यथा शिरसि सामान्याः स्थिताः कुन्तलराशयः ॥२२९॥

अतो गन्तुं न युक्तं ते कौरवैर्बुद्धिसागर। योद्धुं सत्रं पवित्रात्मन् कार्यं कालविलम्बनम् ॥२३०॥

जरासन्धसमं युद्धं यदा तवं भविष्यति। तदा ते तव निग्राह्या वैरिणो हितसिद्धये ॥२३१॥

इदानीं कौरवैः सार्धं कृते युद्धे स क्रुध्यति। तदुत्थापनतः कार्यं किं भवेत्सुप्तसिंहवत् ॥२३२॥

अतः स्वास्थ्येन संस्थेयं स्थिरैश्च स्थिरमानसैः। भवद्भिरिति संप्राप्ते काले नेष्यति तत्क्षयम् ॥२३३॥

विदुषा वारिताः सर्वे यादवा विबुधा वराः। श्रेयांस इति संतस्थुर्जानन्तो वैरिविक्रियाम् ॥२३४॥

अथ ते पाण्डवाश्चण्डा दन्तावलकरोत्कराः। पराक्रमसमाक्रान्तदिक्चक्राश्चक्रिविक्रमाः ॥२३५॥

ऐन्द्रीं दिशं समालम्ब्य परावृत्तसुवेषकाः। प्रच्छन्ना निर्गता भस्मच्छन्नपावकवद्द्युताः ॥२३६॥

कुन्तीगतिविशेषेण मन्दं मन्दं व्रजन्ति ते। स्वस्थाः संशुद्धिसंपन्नाः पाण्डवास्तत्त्ववेदिनः ॥२३७॥

श्रान्तायामथ तस्यां ते श्रान्ताः स्थितिकराः स्थिराः। स्थितायामुपविष्टाश्चोपविष्टायां पटुद्यमाः ॥२३८॥

अर्थ (श्लोक 229 से 238): आज कल वे जरासंध के सहारे से राजाओं महाराजाओं द्वारा उसी तरह पुज रहे हैं, जिस तरह कि उत्तमांग (मस्तक) का आश्रय पा करके केश-राशि पुजती है। अतः बुद्धिसागर और पवित्रात्मन्! आपको इस समय कौरवों के साथ युद्ध करने को जाना उचित नहीं जान पड़ता है। कौन नहीं जानता कि धीरे-धीरे ही सब काम अच्छे बनते हैं। आप अभी कुछ दिन ठहर जाइए। बाद जब जरासंध के साथ आपका युद्ध होगा तब आप बड़ी आसानी से ही इन का निग्रह कर सकेंगे और इसी में आपका हित है। यदि आप हट कर इसी समय ही कौरवों के साथ युद्ध ठानेंगे तो जरासंध भी क्रोधित होकर युद्ध के लिए उठ खड़ा होगा तब यह कार्य सोते हुए सिंह को जगाने के जैसा ही होगा। इसलिए स्थिर-चित्त और धैर्यशाली कृष्ण, आप अभी धीरज धरें। बाद जब समय आवेगा तब मैं स्वयं ही उन सबका विध्वंस कर दिखाऊँगा। इस तरह उस विद्वान् के समझाने पर यादव लोग युद्ध करने से रुक गये क्योंकि वे वैरी की विक्रिया को जानते थे, व्यवहार के जानकार और स्थिर-चित्त एवं धैर्यशाली थे। उधर पाण्डव भेष बदल कर भस्म से ढकी हुई आग की तरह छुपे हुए वहाँ से पूर्व दिशा की ओर चले आये। वे बड़े तेजस्वी थे, उनकी भुजायें हाथी की सूँड के जैसी खूब मजबूत थी। उनके पराक्रम से दसों-दिशायें व्याप्त हो रही थीं। उनका विक्रम चक्रवर्ती के जैसा था। उनके साथ में उनकी माता कुन्ती थी, अतः वे कुन्ती की गति के अनुसार ही धीरे-धीरे चलते थे। वे निर्मल हृदय वाले तथा तत्त्ववेदी उसके थक जाने पर जब वह खड़ी हो जाती तब आप भी खड़े हो जाते और जब वह बैठ जाती तब आप भी बैठ जाते ॥२२९-२३८॥


शनैः शनैर्व्रजन्तस्ते संप्रापुः सुरनिम्नगाम्। अगाधां जलकल्लोलमालिनीं मलहारिणीम् ॥२३९॥

अर्थ: इस प्रकार धीरे-धीरे चलते हुए वे कुछ काल में गंगा नदी के पास पहुँच गये। गंगा अथाह जल


यत्कूले कल्पशालाभाः शालाः शाखासमुन्नताः। विशालाः फलिनः फुल्लाः सुमनः शोभिता बभुः ॥२४०॥

अर्थ (श्लोक 239 से 240): से भरी हुई थी और अनन्त लहरों से लहरा रही थी। उसका प्रवाह मंद और बड़ी गंभीरता से बह रहा था। उसके किनारे पर कल्प-वृक्ष के समान ऊँची-ऊँची शाखाओं वाले और विशाल शालवृक्ष थे। वे खूब ही फले-फूले हुए थे। अतः उनसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥२३९-२४०॥


सावर्तनाभिका लोलजलकल्लोलबाहुका। सत्स्थूलोपलवक्षोजा कूलद्वयपदावहा ॥२४१॥

प्रत्यन्तपर्वतस्थूलनितम्बा निम्नगामिनी। महाहृदमहावक्षाः सरोजाक्षी सदाजडा ॥२४२॥

समीनकेतना हंसगामिनी पक्षिसद्गिराः। सीमन्तिनीव या भाति भासुरा देवनिम्नगा ॥२४३॥

अर्थ (श्लोक 241 से 243): वह स्त्री के तुल्य जान पड़ती थी। स्त्री के नाभि होती है, उसके भी भँवर-रूप नाभि थी। स्त्री के बाहु होते है, उसके कल्लोल-रूप बाहु थे। स्त्री के कुंच होते हैं, उसके भी बड़े-बड़े पत्थर-रूप कुच थे। स्त्री के पाँव होते हैं, गंगा के दोनों तट ही पाँव थे। स्त्री के नितम्ब होते हैं, उसके भी नजदीक के पहाड़-रूप नितम्ब थे। स्त्री मंद-मंद चलती हैं और वह भी मंद-मंद बहती थी। स्त्री के वक्षःस्थल होता है, उसके महाह्रद-रूप वृक्षःस्थल था। स्त्री के नेत्र होते हैं, उसके भी कमल-रूप नेत्र थे। स्त्री जड़-मूर्ख-होती है, वह भी जड़-जल युक्त थी। स्त्री अपने कपोल आदि पर बनाये हुए मीन, केतु वगैरह चिह्नों से युक्त होती हैं, उसमें भी मीन, केतु वगैरह थे। स्त्री हँस के जैसी चाल चलती है अर्थात् हंसगामिनी होती है वह भी हंसगामिनी थी-उसमें हंस विचरा करते थे। स्त्री मधुर वचन बोलती है, वह भी पक्षियों के कलरव शब्द द्वारा मधुर शब्द कर रही थी। तात्पर्य यह कि वह स्त्री से किसी भी बात में कम न थी ॥२४१-२४३॥


तामगाधां समावीक्ष्य संतर्तुं विषमां समाम्। अक्षमाः क्षणतः खिन्ना विश्रब्धास्तत्र पाण्डवाः ॥२४४॥

कैवर्त्तानर्तने शक्तांस्तस्या उत्तरणक्षमान्। समाहूय समाचख्युरिति तूर्णं सुपाण्डवाः ॥२४५॥

धीवरा धृतिमापन्ना द्रुतं च तरणीं तराम्। समानयत सुव्यक्तां समुत्तरणहेतवे ॥२४६॥

इत्युक्ते तत्क्षणात्तैश्च समानीता विच्छिद्रिका। तरणी तरणोपायं सूचयन्ती तरन्त्यपि ॥२४७॥

तदा ते तां समारुह्य प्रविष्टा देवनिम्नगाम्। कुन्त्या सह सुकुन्ताह्तहस्ता व्यस्तविषादकाः ॥२४८॥

अर्थ (श्लोक 244 से 248): उसको अथाह और पार होने के लिए विषम देखकर, पाण्डव असमर्थ हो उसके किनारे पर ठहर गये और पार पहुँचा देने के लिए एक धीवर को बुला कर उससे बोले कि भाई, तुम अति शीघ्र अपनी नौका ले आओ और हमें गंगा पार कर दो परन्तु ध्यान रखना कि नौका ऐसी हो जिसके द्वारा हम सकुशल और जल्दी से पार पहुँच जायें। उनके वचन के सुनकर वह धीवर उसी समय अपनी नौका ले आया। नौका छिद्र रहित थी और पानी पर तैरती हुई तैरने के उपाय को बताती थी। पाण्डव कुन्ती-सहित नौका में सवार हो, अथाह गंगा के भीतर चले। कुन्ती भय से कभी-कभी उन लोगों का हाथ पकड़ लेती थी, उसे बहुत भय मालूम पड़ता था। पाण्डव निडर थे ॥२४४-२४८॥


प्रविवेश तरीमध्येसलिलं पाण्डवान्विता। चलत्कल्लोलमालाभिर्वहन्ती सुवहा वरा ॥२४९॥

अर्थ: थोड़े ही समय में उठती हुई कल्लालों (तरंगों) के सहारे सीधी बहती हुई, नौका बीच धार में


मध्येगङ्गं गता साप्यग्रे गन्तुं न क्षमाऽभवत् अस्थिराऽपि स्थिरा तत्र स्थिता स्थगितसद्गतिः ॥२५०॥

चालितानेकधा तैश्च न चचाल चलात्मिका। पदं दातुमशक्ता सा कीलितेव स्वकर्मणा ॥२५१॥

अरित्रैर्वाह्यमानापि विविधैर्निश्चलं स्थिता। भर्त्स्यमाना कुभार्येव पदं दत्ते न सा तरीः ॥२५२॥

नान्योपायैश्च कैवर्तैश्चालितापि न साचलत्। यथा कालज्वराक्रान्ता सत्तनुस्तनुतां गता ॥२५३॥

भो कैवर्ताश्च का वार्ता चलती चालितापि सा। दुर्मेधेव सुशास्त्रे वा तरणी न चलत्यतः ॥२५४॥

कैवर्ता वर्तनावर्त्या पृष्टाः पाण्डवभूमिपैः। इति ते वचनं प्रोचुः श्रुत्वा पाण्डवसद्गुरः ॥२५५॥

स्वामिन्नत्र जले नित्यवासिनी जलदेवता। तुण्डिकाख्या क्षितौ ख्याता समास्ते चामृताशिनी ॥२५६॥

सा शुल्कं याचते युष्मान् नियोगान्नियमस्थिता। अतस्तस्यै प्रदायैतन्नौश्चाल्या निश्चलं स्थिता ॥२५७॥

नाथास्माकं न दोषोऽयं न दोषो भवतामपि। नियोगाद्याचतेऽप्येषा नियोग ईदृशो भवेत् ॥२५८॥

नियोगिनो नियोगेन शुल्कसंग्रहणोद्यताः। शुल्कं लात्वा प्रमुञ्चन्ति नरान्न्यायोऽत्र संमतः ॥२५९॥

अतो दत्त्वा शुभं शुल्कं तुण्ड्यै तद्योग्यमुन्नतम्। चालितव्यं भवद्भिश्च न विलम्बो विधीयताम् ॥२६०॥

अर्थ (श्लोक 249 से 260): पहुँच गई और वहाँ पहुँच कर वह अटक गई, यद्यपि वह चंचल थी परन्तु गति के रुक जाने से बिल्कुल ही अचल हो गई। उस वक्त धीवर ने बहुत ही प्रयत्न किया परन्तु वह बिल्कुल ही न चली, एक पैड भी आगे वह न बढ़ सकी। वह ऐसी हो गई मानों कर्म के द्वारा कील ही दी गई हो। बेचारे धीवर ने नाना भाँति के सैकड़ों उपाय किये पर वह बिल्कुल ही न चली-जैसी की तैसी अचल बनी रही, जिस तरह कि दंडों के द्वारा मारी-पीटी गई हठी स्त्री एक पाँव भी आगे नहीं बढ़ती, वहीं की वहीं मचला करती है। या यों कहिए कि जिस तरह कालज्वर के वश होकर क्षीण हुआ शरीर बिल्कुल ही नहीं चल सकता, चाहे उसके लिए कितने ही उपाय क्यों न किये जावें। उसी तरह नौका चलाने के लिए वह धीवर सब यत्न कर-करके थक गया परन्तु नौका वहाँ से तिलमात्र भी न बढ़ी। यह देखकर पाण्डवों ने कहा कि भाई, बात क्या है। यह नौका इतने उपायों से भी क्यों नहीं चलती। यह इस समय ऐसी अटक कर क्यों रह गई, जैसी कि उत्तम शास्त्रों में खोटी बुद्धि अटक कर रह जाती है-आगे नहीं चलती। पाण्डवों के वचनों को सुनकर उत्तर में धीवर ने कहा कि स्वामिन्! इस जगह एक जलदेवी रहती है। उसका नाम है तुंडिका। वह जगत् प्रसिद्ध और अमृत का आहार करने वाली है। इस समय वह इस नौका को रोककर आप लोगों से अपने नियोग के अनुसार भेंट माँगती है। अतः आप इसे इसका हक देकर नौका को चलती करवा दीजिए। प्रभो! देखिए इसमें न तो आपका दोष है और न मेरा ही किन्तु यह अपना नियोग (हक) चाहती है। न्याय भी ऐसा ही है कि हकदार लोग अपने हक को लेकर ही मनुष्यों को छोड़ते हैं। इसलिए अब आप देरी न कीजिए किन्तु इसे इसका हक देकर यहाँ से जल्दी चलिए और यहाँ से जल्दी चल देने में ही आपका हित है ॥२४९-२६०॥


नृपोऽभाणीन्निराश्यैवं कैवर्तान्वार्तयोद्यतान्। अत्र देयं न किंचिद्वै नैवेद्यं विद्यते ध्रुवम् ॥२६१॥

अर्थ: यह सुनकर नौका को चलाने के लिए तैयार हुए धीवर से युधिष्ठिर ने कहा कि इस समय यहाँ


सरित्तटे घटिष्यामः समाट्य पटवो वयम्। नैवेद्यं दीपनं रम्यमाज्यपायसमिश्रितम् ॥२६२॥

दत्त्वास्यै मानयिष्यामो नैवेद्यं विदितात्मकम्। पवित्रं सज्जनैर्मान्यं गत्वा च सरितस्तटे ॥२६३॥

सलिले विपुलेऽत्रैव न लभेमहि धीवराः। किं च लभ्यं प्रदातव्यं न्यायोऽयं विश्रुतो भुवि ॥२६४॥

अर्थ (श्लोक 261 से 264): तो हमारे पास कुछ भी नहीं है। इसलिए यहाँ से किनारे तक चलो। वहाँ पहुँच कर हम नाना प्रकार के पकवान तैयार करेंगे और फिर यहाँ आकर आदर के साथ देवी को भेंट चढ़ा देंगे। भला, इस बात को तुम्हीं कहो कि इस अथाह जल-प्रदेश में हमें क्या चीज मिल सकती है ? और यदि तुम्हें कोई चीज यहाँ मिल सकती हो तो तुम्हीं ला दो और जब कोई चीज मिल ही नहीं सकती तब क्या भेंट कर सकते हैं ॥२६१-२६४॥


धीवरा धृतये प्रोचुः श्रुत्वा वाक्यं नरेशिनः। श्रोतव्यं श्रूयतां श्रोतःसुखकृद्देववल्लभ ॥२६५॥

न तृप्यति पयःपूरैः सज्जितैः खज्जकैरपि। प्राज्यैराज्यैर्वरान्नैश्र्च पक्वान्नैस्तुण्डिकासुरी ॥२६६॥

निरवद्यैः सुनैवेद्यैः सद्यो मद्यैर्न तृप्यति। तुण्डिका चण्डिका खण्डप्रचण्डबलितृप्तिका ॥२६७॥

मनुष्यमांसतो मत्ता तृप्तिमेति बुभुक्षिता। अतो नरं संप्रदाय तृप्तिमेतु सुतत्त्वतः ॥२६८॥

तृप्तामेनां विधायाशु यात यूयं सरित्तटम्। अन्यथानर्थसंपत्तिरित्यवादित्सुधीवरः ॥२६९॥

अर्थ (श्लोक 265 से 269): युधिष्ठिर के इन वचनों को सुनकर धीवर बोला कि महाराज, देववल्लभ प्रभो, कृपा कर मेरी एक बात सुनिए। वह यह है कि यह तुंडिका देवी पकवानों से तृप्त नहीं होती हैं किन्तु देव, इसे सन्तोष होता है मनुष्य-बलि से। यह जब-जब भूखी होती है तब-तब मनुष्य के मांस से ही सन्तुष्ट होती है और वस्तुओं से न जाने इसे क्यों सन्तोष नहीं होता। अतः आप भी इसे मनुष्य मांस से तुष्ट कीजिए। महाराज, देर न कर इसे जल्दी से मनुष्य-बलि देकर पार चलिए, नहीं तो बड़ा भारी अनर्थ होगा ॥२६५-२६९॥


निशम्यैवं वचस्तस्य संक्षुब्धाः पाण्डुनन्दनाः। अतर्कयन्निजं वीक्ष्य मरणं समुपस्थितम् ॥२७०॥

अहो वामे विधौ नूनं कथं दुःखक्षयो भवेत्। कर्मतो बलवान्नान्यो वर्तते भववासिनाम् ॥२७१॥

पूर्वं कौरवसंघेन सत्रं युद्धे जयं गतः। ततः प्रज्वलिता लाक्षागृहाद्वैर्बहिर्निर्गताः ॥२७२॥

इदानीं तरणीयोगे स्वयं च समुपस्थिते। वयं तुण्ड्याः स्वयं यामो मरणं शरणं द्रुतम् ॥२७३॥

अर्थ (श्लोक 270 से 273): उस धीवर के ऐसे विकट उत्तर को सुनकर युधिष्ठिर आदि बड़े क्षोभ को प्राप्त हुए और अपनी मौत को सामने आ खड़ी हुई समझ कर वे यों विचार करने लगे कि अहो, जब कर्म ही टेढ़ा है-विमुख है तब भला हमारा दुख से पिंड छूट ही कैसे सकता है और इसलिए कहा जाता है कि संसारी जीवों के लिए कर्म जितना बलवान् होता है संसार में उतना बलवान् दूसरा और कोई भी नहीं होता। देखो, इस दैव की विचित्रता कि पहले तो हम लोगों की कौरवों के साथ युद्ध होने पर विजय हुई और बाद जब लाक्षागृह में आग लगा दी गई तब वहाँ से भी जीते जागते हम लोग सुरक्षित निकल आये और इस समय उसी दैव के प्रेरे हुए इस नौका में बैठकर अपने आप ही मरने के लिए इस तुंडिका के शरण में आ गये ॥२७०-२७३॥


महानिष्टाद्विनिःक्रान्ता लघुतो मृत्युभागिनः। उदन्वज्जलमुल्लङ्घ्य यथा जलबिले मृतिः ॥२७४॥

कर्मण्युपस्थिते कोऽत्र बली कैवर्तहस्ततः। च्युतो जाले गतो मीनस्तच्च्युतो गलितो विना ॥२७५॥

अर्थ (श्लोक 274 से 275): आश्चर्य है कि बड़े-बड़े अनिष्टों से तो बच आये परन्तु जरा से अनिष्ट से मृत्यु के ग्रास बने जाते हैं। तब तो यही कहना होगा समुद्र को पार करके अब यहाँ छोटे से पल्वल (क्षुद्र जलाशय) में हम लोगों की मृत्यु होगी। सच है कि कर्म के आगे किसी का बल नहीं चलता है। इसके बल के आगे सभी थककर बैठ जाते हैं। देखो, यह तो वही बात हुई कि धीवर के हाथ से किसी तरह मछली छूट पाई तो जाकर जाल में फंस गई और जाल से भी जैसे तैसे छूटी तो बगुले ने उसे अपना आहार बना लिया ॥२७४-२७५॥


इत्यातर्क्य नृपो ज्येष्ठोऽलोकयद्भीमसन्मुखम्। इति कर्तव्यतामूढो व्यूहगूढो वृषात्मकः ॥२७६॥

नृपोऽभणद्भयाक्रान्तो विपुलोदर सोदर। उदीर्यं दरनिर्णाशे वचो वीर त्वयाधुना ॥२७७॥

अन्यच्च चिन्तितं कार्यमन्यच्च समुपस्थितम्। अनिष्टं राजकन्येष्टो विप्रो वा व्याघ्रभक्षितः ॥२७८॥

अर्थ (श्लोक 276 से 278): इसके बाद युधिष्ठिर ने एक दृष्टि भीम की ओर डाली और इति कर्तव्यता से विमूढ़ हुए उस धर्मात्मा ने कहा कि विपुलोदर भाई भीम, इस भय से छुटकारा होने का कोई उपाय जान पड़े तो बतलाओ। देखो, क्या तो विचार किया था और क्या अनिष्ट सिर पर आकर पड़ा है। यह तो वही बात हुई कि विचारा ब्राह्मण राज-पुत्री की इच्छा से तो घर बाहर हुआ और रास्ते में उसे खा लिया व्याघ्र ने ॥२७६-२७८॥


मध्यविघ्नविनाशाय कोऽप्युपायो विधीयते। न मे स्फुरति शान्त्यै स चिन्तया धीर्हि नश्यति ॥२७९॥

भीमोऽभाणीद्भयातीतो भृकुटीकुटिलाननः। नृपावसरमवेक्ष्य कृतं कार्यं सुबुद्धिना ॥२८०॥

एको हि निरवद्योऽत्रोपायोऽपायविवर्जितः। पोस्फुरीति मम स्फूर्तिकीर्तिसंपत्तिदायकः ॥२८१॥

येनोपायेन नाकीर्त्तिर्नापमानो न निन्द्यता। न हानिः स प्रकर्त्तव्यः सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥२८२॥

अर्थ (श्लोक 279 से 282): अतः इस विघ्न को दूर करने का कोई उपाय करो और सो भी जल्दी करो। नहीं तो अभी थोड़ी ही देर में हम लोगों का सर्वनाश हो जाना संभव है। मैं बहुत विचार करता हूँ, पर मेरी समझ में कुछ भी उपाय नहीं आता। सच है कि चिंता से बुद्धि नष्ट-भ्रष्ट हो जाती हैं। इस पर निर्भय भीम ने कहा कि पूज्यपाद, अवसर देखकर ही बुद्धिमानों को काम करना उचित है। देखिए इस सम्बन्ध में मैंने एक निर्दोष उपाय सोचा है और उसमें कोई आपत्ति भी नहीं है। हाँ, उससे मेरी कीर्ति अवश्य होगी। महाराज, इस उपाय से न तो अपयश होगा और न अपमान ही एवं निंदा और हानि भी इस उपाय के करने से न होगी। इसलिए इसे कार्य-सिद्धि के लिए आप जल्दी कीजिए ॥२७९-२८२॥


स्फुरज्जराज्ज्वराक्रान्तः कैवर्तो विकृताकृतिः। दरिद्रो दुर्भगो दीनो दुःखदग्धो दयातिगः ॥२८३॥

इमं हत्वा बलिं दत्त्वा तोषयित्वा च तुण्डिकाम्। तरिष्यामो वयं नावा सरितं श्रमवर्जिताः ॥२८४॥

अर्थ (श्लोक 283 से 284): वह उपाय यह है कि यह धीवर जरा-ज्वर का प्रेरा हुआ है, बदसूरत और दरिद्र है, दुखी है, निर्दय है, अतः इसी को मारकर और देवी को बलि से तुष्ट कर आगे चलिए। रही नौका चलाने की बात


भीमं भीमवचः श्रुत्वा कैवर्तः कम्प्यमानसः।
चकम्पे कर्तनां प्राप्त इवैतत्क्षीणदीधितिः ॥२८५॥

सोऽवोचद्धीवरो धीमान्विदग्धः शुद्धमानसः।
हते मयि नरेन्द्राद्याहते वा किं भविष्यति ॥२८६॥

भूप किं तु विशेषोऽस्ति मदृते सरितस्तटम्।
को नेता भवतां नूनं यातु त्रिपथगास्थितिः ॥२८७॥

भवतामपकीर्तिस्तु भविता संततं नृप।
नृपेण धीवरो ध्वस्त इति लोकापवादतः ॥२८८॥

तुभ्यं च रोचते राजन् यावज्जीवं सरित्स्थितिः।
चेत्तर्हि वाञ्छितं स्वं त्वं विधेहि विधिवद्ध्रुवम् ॥२८९॥

अस्मत्कल्पास्तु युष्माकं विधास्यन्ति कदाचन।
नोत्तारं सुरह्रादिन्या भीताः किं यान्ति तत्पदम् ॥२९०॥

अर्थ (श्लोक 283 से 290): सो आप इसका बिल्कुल ही भय मत करिए। मुझे भरोसा है कि हम लोग अनायास ही नौका की चला ले जाकर पार पहुँच जायेंगे। भीम के इन भयानक वचनों को सुनकर विचारा धीवर तो काँपने लग गया-उनके होश-हवाश उड़ गये उसका हृदय मानो करोत से चीर सा दिया गया हो। उसके चेहरे की सब कान्ति नष्ट हो गई। तात्पर्य यह कि उसे अपने प्राणों के लाले पड़ गये। वह कहने लगा कि धीमान्, शुद्ध हृदय वाले नृपेन्द्र, मेरे मारे जाने और न मारे जाने से तो कुछ भी हानि न होगी परन्तु इतनी बात अवश्य होगी कि मेरे मर जाने पर आपको पार कोई नहीं पहुँचावेगा। मेरे बिना आपकी इस गंगा में ही स्थिति होगी और इस लोकापवाद से आपकी बड़ी भारी अपकीर्ति भी होगी कि देखो राजा ने पार उतारने वाले बेचारे गरीब धीवर को भी मार डाला-भला करते बुरा कर दिखाया। राजन्! यदि आपको जीवन भर गंगा में ही रहना अच्छा लगता हो, तो भले ही अपने विचार माफिक काम कीजिए। मुझे मार कर देवी को तृप्त कीजिए परन्तु ध्यान रखिए कि ऐसा करने से फिर हमारे कुल के लोग कभी भी आप लोगों को इस गंगा के पार न पहुँचावेंगे। भला! आप ही सोचिए कि क्या एक बार धोखा खाया पुरुष फिर उसी मार्ग को जाता है ? ॥२८३-२९०॥


तदाकर्ण्य कृपाक्रान्तो ज्येष्ठो भीममबीभणत्।
हा वत्स वत्स हा स्वच्छसदिच्छाछन्नमानस ॥२९१॥

किमुक्तमिदमत्यर्थं यदुक्त्या कम्पतेऽखिलः।
प्रेतराजाद्यथा कायः कोमलः किल कर्मकृत् ॥२९२॥

त्वं वेत्ता विदुषां मान्यो विपुलस्य फलस्य च।
श्रेयःकिल्विषयोर्नूनं शुभाशुभफलात्मनोः ॥२९३॥

दयावान्यो भवेद्भीरुर्भववाद्भ्रमणाभासुरात्।
स एव सुखमाप्नोति शुभपाक इव निश्चितम् ॥२९४॥

यो हन्ति निर्दयो जीवान्यमातीतो मदावहः।
स याति निधनं धृष्टो धनश्रीरिव दुर्धिया ॥२९५॥

अर्थ (श्लोक 291 से 295): धीवर की इन बातों को सुनकर दयालु युधिष्ठिर ने भीम से कहा कि भाई, इतने चतुर होकर भी तुम यह क्या कहते हो। तुम्हारे इन वचनों को सुनकर हम लोगों का तो दिल दहल गया, जिस तरह कि यम का नाम सुनते ही कर्म का रचा हुआ. कोमल शरीर दहल जाता है। तुम्हें ऐसी बात कभी अपने मुँह से भी नहीं निकालनी चाहिए। तुम तो स्वयं ही सब कुछ समझते हो और विद्वान् लोगों में आदर पाते हो। फिर तुमसे इस विषय में और अधिक क्या कहा जावे। पुण्य और पाप का क्रम से शुभ और अशुभ या यों कहिए कि सुख और दुख-रूप फल मिलता है। यह तुम अच्छी तरह जानते हो। इस विषय में भी तुम्हें समझाना नहीं है। देखो, जो दयालु संसार परिभ्रमण से डरता है वह पुण्योदय से प्राप्त होने वाली सम्पदा की तरह ही सुख को पाता है और जो निर्दय व्रत वगैरह


अयं तु धीवरोऽधृष्टः क्षुधाखिन्नः सुखातिगः।
पापार्तस्तृप्तिनिर्मुक्तः कथं हन्यो दयालुभिः ॥२९६॥

उपकारपरोऽस्माकं ह्रादिनीतारणे क्षमः।
नायं हन्यः कथं हन्या उपकारकरा नराः ॥२९७॥

विपुलोदर विद्वांस्त्वमन्योपायमुपायवित्।
विचारय विचारज्ञ यत्स्याम सुखिनो वयम् ॥२९८॥

अर्थ (श्लोक 291 से 298): को न पाल कर मद के आवेश में जीवों को मारता है वह ढीठ पुरुष दुर्बुद्धि से नष्ट होने वाली सम्पदा की तरह नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है-दुखी होता है, उसे कभी सुख नहीं मिलता है। विचार कर तो देखा कि यह धीवर कितना गरीब है, भूख से खेद-खिन्न होने के कारण कितना दुखी है, पाप से पीड़ित और असन्तुष्ट है। इसलिए दयालु भाई, इसे मारना कैसे उचित हो सकता है। दूसरे यह कि यह हम लोगों को गंगा पार ले जा रहा है, इसलिए हमारा उपकारी है। फिर तुम्हीं बताओ कि कहीं उपकारी को भी मारा जाता है ? भाई, इसे मारना किसी तरह भी उचित नहीं है। तुम कोई दूसरा उपाय सोचो, जिससे हम सब सुख से पार पहुँच जावें ॥२९१-२९८॥


इत्याकर्ण्य सुवेगेन वायविर्वचनं जगौ।
विहस्य हर्षसंयुक्तो निर्मलोऽद्भुतविक्रमः ॥२९९॥

त्वं नाथ देहि निस्तन्द्रस्तुण्डीतृप्त्यर्थसिद्धये।
संगराकुशलं कौल्यं नकुलं कुलपालिनम् ॥३००॥

सहदेवं दयातीतं व्यतीतं कुलपालनात्।
हत्वा दत्स्व सुशुल्कार्थं तुण्ड्यै तृप्तिसमृद्धये ॥३०१॥

अनयोरेकतो नाथ बलिं दत्वा सुखाश्रिताः।
व्रजामः सरितस्तीरं पुण्यवायुप्रणोदिताः ॥३०२॥

अर्थ (श्लोक 299 से 302): यह सुनकर अद्भुत पराक्रमी, भीम मुस्करा कर बोला-तो प्रभो! आप निश्चिंत होकर इस तुंडिका को तृप्त करने के लिए युद्ध-अकुशल, नकुल को या दया-रहित और कुल की रक्षा के लिए असमर्थ सहदेव को मारकर भेंट दे दीजिए। इन दोनों में से किसी एक को बलि देकर पुण्य-रूप वायु की सहायता से सुख से पार चले चलिए, विलम्ब न कीजिए ॥२९९-३०२॥


निशम्य महतां मान्यो मोहितो महिमाश्रितः।
इति ज्येष्ठो विशिष्टात्माचष्टे स्म वचनं वरम् ॥३०३॥

हा तात तात भीमेति भणितं किं भयावहम्।
आत्मजाविव संप्रीताविमौ मोहकरौ मम ॥३०४॥

मया कथं प्रहन्येते सोदरौ दरदारकौ।
इमौ निजातदेशीयौ सदा प्रीतौ सुखात्मकौ ॥३०५॥

इमौ हत्वा गतेऽस्माकमपकीर्तिं दुरुत्तराम्।
करिष्यन्ति यतो लोका आबालं लोकपालिनः ॥३०६॥

अर्थ (श्लोक 303 से 306): यह सुनकर महिमाशाली और महान् पुरुषों द्वारा मान्य युधिष्ठिर को मूर्च्छा सी आ गई और वह विशिष्टात्मा भीम से बोला कि हा तात भीम! तुम्हारे मुँह से इतनी भयानक बात कैसे कही गई। मुझे तो ये दोनों भाई पुत्रों की भांति प्यारे हैं-इन पर मेरा कितना प्रेम है, यह तुम नहीं जानते ? हाय! सुख से रहने वाले प्यारे भाइयों को मैं कैसे मार सकता हूँ ? ये तो मुझे मेरे प्राणों से भी कहीं ज्यादा प्यारे हैं और इन्हीं के भरोसे मैं निर्भय हो रहा हूँ। फिर तुम्हीं बताओ कि इनको मारना क्या उचित है ? नहीं, भीम, ऐसी बात मत कहो, ऐसा करने से बड़ा अन्याय होगा-इस अन्याय की कुछ सीमा ही न रह जायेगी। देखो, यदि हम यहाँ से इनको मारकर जायेंगे तो सब लोग धिक्कार देंगे और अपयश का पटह पीटेंगे। वे कहेंगे कि देखो, यह राजा अपने जीवन को प्यारा समझ कर अपने छोटे भाइयों को मारकर देवी को भेंट दे आया है। ओह! दया बिना जीते रहने को धिक्कार है। जिसके


भूपोऽयमनुजौ दत्त्वा देव्यै दीप्तकरौ गतः। वल्लभं जीवितं मत्वा धिग्जीव्यं सुदयातिगम् ॥३०७॥

हे भीम हे दयातीतमानसातिभयंकर। न भण्यं भणनं भव्य यत्र जीवदया न तत् ॥३०८॥

अन्योपायं समाचक्ष्व विचक्षण सुखप्रदम्। श्रुत्वेति वायविर्वाचमुवाच चतुरोचिताम् ॥३०९॥

अर्थ (श्लोक 303 से 309): हृदय में दया नहीं उसका जीना व्यर्थ है, किसी भी काम का नहीं। हे निर्दय और हे भयंकर विचार को हृदय में जगह देने वाले भीम, ऐसा वचन भूल कर भी कभी अपनी जीभ पर न लाना, जिसमें कि दया न हो। भाई, तुम्हें हमेशा दयापूर्ण वचनों का ही व्यवहार करना चाहिए। क्या दया से सने हुए अच्छे वचनों की कमी है। यदि नहीं है तो फिर निर्दय वचनों का प्रयोग ही क्यों करते हो। मेरे विचक्षण भाई, कोई अच्छा उपाय बताओ जो सुखकर हो ॥३०३-३०९॥


नन्वेवं रोचते तुभ्यं न चेत्पार्थः समर्थवाक्। तत्तृप्त्यै दीयतां देव यथा सा स्यात्सुविघ्नहा ॥३१०॥

श्रुत्वैवं स निजं शीर्षमाकम्प्य सुकृपापरः। अवादीद्विदिताशेषवृत्तान्तः श्रीयुधिष्ठिरः ॥३११॥

हा भ्रातः पावने भीम विपुलोदर सुन्दर। किमिदं गदितं निन्द्यं त्वया दीप्तिसुखापहम् ॥३१२॥

प्रचण्डः पाण्डवः पार्थः प्रसिद्धः पृथिवीभुजाम्। अजेयः परिपन्थीशैर्धनुर्वेदविशारदः ॥३१३॥

अस्मिन्सति निजं राज्यं कदाचित्पुनरेष्यति। यतोऽयं दोर्बली बाल्याद्विग्नयं प्रापयन्द्धिषः ॥३१४॥

शब्दवेधी सुधामुष्कः सधर्मा धृतिधारकः। धनंजयो धृतानन्दो न हन्तव्यः कदाचन ॥३१५॥

अर्थ (श्लोक 310 से 315): यह सुनकर चतुर भीम बोला कि देव, यदि आपको मेरी यह बात भी नहीं रुची तो आप देवी को तृप्त करने के लिए समर्थ अर्जुन को भेंट में दे दीजिए, ताकि देवी कोई विघ्न न उपस्थित करे। भीम के इन वचनों को सुनते ही युधिष्ठिर का मस्तक घूम गया और वह सम्पूर्ण बातों को समझ ने वाला दया-मय बोला कि गंभीराशय भाई भीम, तुम यह क्या निंद्य वचन कहते हो। इससे तो हमारी सब सुख-शान्ति धूल में मिल जायेगी। देखो तो भला, यह पार्थ कितना तेजस्वी है। इसको सब राजा महाराजा जानते और मानते हैं। इसे कोई वैरी न ही जीत सकता। यह अजय्य और धनुर्वेद-विशारद हैं। इसके जीते रहने से तो कभी अपना राज्य वापस फिर भी अपने हाथ आ जायेगा। क्या तुम नहीं जानते कि यह बालकाल से ही प्रचंड बलशाली भुजाओं वाला है और शत्रुओं का शत्रु है। उनको काल के गाल में पहुँचा देने के लिए समर्थ है। यह शब्दवेध में अतीव प्रवीण पण्डित है, अच्छा धनुर्धर है, धर्मात्मा और धीर-वीर है। इसलिए यह कभी मार डालने के योग्य नहीं है, अतः इसे नहीं मारना चाहिए ॥३१०-३१५॥


एवं चेज्जननी देया कुन्ती कमलकोमला। यतः स्वास्थ्यं च सर्वेषां पाण्डवानां हितात्मनाम् ॥३१६॥

मा भणीद्भीम सद्‍भ्रातरित्येवं जननी यतः। मान्या जनैः सदा पूज्या जन्मदात्री दयावहा ॥३१७॥

अर्थ (श्लोक 316 से 317): यह सुन भीम बोला कि अच्छी बात है आप किसी को भी नहीं मारना चाहते तो कमल की तरह कोमल माता कुन्ती को ही देवी को भेंट कर दो, जिससे और सब पाण्डव आपत्ति से छुटकारा पालें। इसके उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा कि मेरे भाई भीम, ऐसा मत कहो। देखो, यह अपनी जननी है, जन्म देने वाली है, अतएव सदा ही पूजे जाने योग्य है। दयालु हैं, दया की मूर्ति है और सब लोग


यया वयं निजे गर्भे नवमासान्धृता पुनः। जन्मलाभं शुभं दत्त्वा क्षालिताः पालिताः पुरा ॥३१८॥

अर्थ (श्लोक 316 से 318): इसे मानते हैं। भाई, विचारो तो इसने हमें नौ महीने अपने गर्भाशय में रक्खा है और फिर जन्म देकर बड़े भारी कष्टों से हमें पाला-पोषा है ॥३१६-३१८॥


जननीयं जगन्मान्या कथं हिंस्या हितार्थिभिः। यतस्तु जगति ख्यातैर्माता तीर्थं प्रकथ्यते ॥३१९॥

त्वं कृपासागरो नित्यं न्यायवेदी विचक्षणः। धर्माधर्मविवेकज्ञो लोकज्ञो लोकनीतिवित् ॥३२०॥

त्वत्समो विनयी लोके द्वितीयोऽत्र न विद्यते। अद्वितीयपराक्रान्तिर्यद्युक्तं तद्विधेहि भोः ॥३२१॥

ततो युधिष्ठिरेशेन विशिष्टेन हितैषिणा। स्वचित्ते भावितं भव्यं सुभाषं भयानये ॥३२२॥

भीमेन भूरिशो भक्ता भ्रातरो दर्शिता वराः। हतये जननी चापि तन्न युक्तं हि भूतले ॥३२३॥

पार्थिवः पतनोद्युक्तः स्वयमप्सु सुपावनः। आहूय बान्धवान्युक्त्या शिक्षया समयोजयत् ॥३२४॥

भवद्भिर्भ्रातरो भक्त्या भजनीया सदाम्बिका। जननीभक्तितो लभ्या यतः सर्वार्थसंपदः ॥३२५॥

अर्थ (श्लोक 319 से 325): अतः जो सुखी होना चाहते हैं उन्हें संसार भर द्वारा मान्य जननी को मारना कभी भी उचित नहीं है। देखो, संसार के प्रसिद्ध पुरुषों ने तो जननी को तीर्थ बताया है और हम उसे-मार डालें, यह कहाँ तक योग्य और न्याय्य बात है। भाई भीम, तुम तो दया के सागर हो, न्याय के जानकार और प्रवीण हो, धर्म और अधर्म का अन्तर समझते हो तथा लोक-व्यवहार और लोकनीति को भी जानते हो और मेरा तो यह विश्वास है कि तुम्हारे समान लोक में न तो कोई विजयी है और न चतुर ही। तुम अद्वितीय पराक्रमी हो। अतः हे भाई तुम युक्ति-युक्त विचारपूर्ण बात कहो और वैसा ही उपाय भी करो। इसके बाद विशिष्टात्मा और हितैषी युधिष्ठिर ने भय को दूर करने के लिए मन ही मन यह भव्य विचार किया कि भीम ने जो प्यारे भाइयों की तथा पूज्या जननी को मारने के लिए कहा वह तो ठीक नहीं है किन्तु इस समय मुझे स्वयं अपनी ही बलि दे डालना कहीं अधिक उचित है। यह सोचकर वह पवित्रात्मा स्वयं अपनी बलि देने के लिए तैयार हुआ। उसने अपने भाइयों को कहा कि भाइयों तुम लोग हमेशा भक्ति और मान के साथ माता की सेवा करना। देखो, माता की सेवा से सब मनोरथ सिद्ध होते हैं और मनचाही सम्पत्ति मिलती है ॥३१९-३२५॥


तथा परोपकारेण प्रीणनीयाः परे जनाः। परोपकारनिष्ठानां विशिष्टत्वं यतो भवेत् ॥३२६॥

कौरवा न च विश्वास्या विश्वे विश्वासघातकाः। आशीविषा इवात्यर्थं तद्विश्वासे कुतः सुखम् ॥३२७॥

तथावसरमासाद्य विपाद्य कौरवान्खलान्। स्वनीवृति स्थितिं भव्या भजताद्भुतविक्रमाः ॥३२८॥

अर्थ (श्लोक 326 से 328): अतः तुम कभी माता की सेवा से विमुख न होना तथा परोपकार से तुम हमेशा लोगों को प्रसन्न रखना। देखो, जो परोपकारी होते हैं, परोपकार करते है वे संसार के सरताज बन जाते हैं। तुम लोग कभी कौरवों का विश्वास नहीं करना क्योंकि वे सब बड़े विश्वासघाती हैं, दूसरों के मनोरथों में बाधा डालने वाले हैं। अधिक क्या कहें वे आशीविष साँप के समान हैं। उन पर विश्वास करने से तुम्हें कभी सुख नहीं हो सकेगा किन्तु इसके विपरीत मौका पाकर तुम कौरवों के वंश का विध्वंस करके अपने अद्भुत पराक्रम से सारे देश पर अधिकार जमाना और सुख-पूर्वक रहना। युधिष्ठिर ने सुशिक्षित और दक्ष भीम आदि को इस तरह खूब समझाया ॥३२६-३२८॥


इति शिक्षां प्रदायाशु सुशिष्यान्दक्षमानसान्। नीरार्द्रवस्त्रतः स्नात्वा परिहृत्य मनोमलम् ॥३२९॥

युधिष्ठिरः स्थिरो ध्याने विशुद्धो धर्ममानसः। रागद्वेषविनिर्मुक्तः पञ्चसन्नतिभावुकः ॥३३०॥

शत्रौ मित्रे तथा बन्धौ समतारसमुद्वहन्। विवेचयन्निजात्मानं वपुषः सुस्पृहातिगः ॥३३१॥

द्विधा संन्यासभावेन भावयन्परमं पदम्। बभूव भवभीतात्मा प्रपश्यन्भङ्गुरं जगत् ॥३३२॥

क्षान्त्वा क्षमाप्य सद्‌भ्रातॄन् नत्वा च जननीं तदा। बलिं दातुं स्वमात्मानं यावदुद्युक्तमानसः ॥३३३॥

अर्थ (श्लोक 329 से 333): इसके बाद वह गीले वस्त्र से शरीर को साफ कर, मन के मैल को धोकर ध्यान में स्थिर हो गये और पंच परमेष्ठी का नाम जपने लगे। इस समय उनके मन में रागद्वेष को बिल्कुल ही जगह न थी, अतः शत्रु-मित्र, भाई-बन्धु सब पर उनका एक सा भाव हो गया था। वह शरीर से भिन्न आत्मा की भावना करते थे तथा इच्छाओं के जाल को तोड़कर निरीह हो गये थे। वह संसार को विनश्वर और परम पद को नित्य-रूप में देखते थे और इसी कारण वह दो प्रकार का संन्यास धारण करके निर्भय हो गये थे। इसके बाद उन शुद्धमना ने अपने सब भाइयों की क्षमा कर उनसे क्षमा करवाई और माता को नमस्कार किया। अब वह बली युधिष्ठिर अपनी बलि देने को तैयार हुए ॥३२९-३३३॥


रुरुदुस्तावता तूर्णं भीमाद्या भयवेपिनः। अहो दैव त्वयारब्धं किमिदं दुःखकारणम् ॥३३४॥

अचिन्तितं दुराराध्यं दुःसाध्यं विधुराकुलम्। दैव त्वया समानीतमिदं कार्यं सुदुस्सहम् ॥३३५॥

गत्वा देशान्तरे स्थित्वा कियत्कालं तु पापिनः। धार्तराष्ट्रान्रयावृत्त्य हनिष्यामो महाहवे ॥३३६॥

वयं मनोरथारूढा गूढा इति कुदैवतः। अन्यावस्थां समापन्ना धिग्दैवं पौरुषापहम् ॥३३७॥

अर्थ (श्लोक 334 से 337): यह देख भय के मारे काँपते हुए भीम आदि सब भाई बड़े दुखी होकर बोले कि दैव आपने यह क्या दुख का कारण उपस्थित कर दिया है, जिसको कि हमने कभी स्वप्न में भी नहीं विचारा था। यह बात बड़ी दुराराध्य, दुःसह तथा कष्ट-मय है। देव, आपका यह प्रयत्न हमारे लिए असह्य है, हमें बड़ा दुख हो रहा है। हमारी तो यह इच्छा थी कि हम लोग अपना वनवास समाप्त कर फिर वापस जायेंगे और इन दुष्ट कौरवों को घोर युद्ध करके यमराज का ग्रास बनायेंगे। सो हम तो इच्छा ही करते रह गये और देव ने एक दूसरी ही अवस्था सामने खड़ी कर दी। इस देव को धिक्कार है जो पुरुषार्थ को जगह ही नहीं देता ॥३३४-३३७॥


विललाप पुनः कुन्ती करुणाक्रान्तचेतसा। दैवस्य दूषणं दुष्टं ददती दुर्दशाहता ॥३३८॥

हा पुत्र हा पवित्रात्मन् करुणारससागर। राज्यार्ह राज्यभाग्भव्य नव्यभावविदां वर ॥३३९॥

अर्थ (श्लोक 338 से 339): इन सबकी यह दशा देख दैव को दूषण देती हुई, करुणा से पूर्ण-चित्त कुन्ती भी इस दुख दशा से पीड़ित होकर विलाप करने लगी। हा पुत्र, हा पवित्रात्मन्, हा करुणरस से कोमल-चित्त, हा राज्ययोग्य, हा राज्य भोगने वाले भव्य, हा भव-भाव विदांवर, हा बाहुबल से वैरियों को खंडित करने वाले युधिष्ठिर, तुम्हारे बिना अब कुरुजांगल देश को कौन पालेगा। पुत्र, शत्रुओं की मारकर अब राज्य को तुम्हारे बिना कौन हस्तगत करेगा क्योंकि तुम्हारे सिवाय दूसरा कोई भी ऐसा नहीं है


दोर्दण्डखण्डिताराते त्वां विना कुरुजाङ्गले।
अचलापालने कोऽत्र भविता भाववेदकः ॥३४०॥

हत्वा शत्रून् विधातुं च राज्यं करतलस्थितम्।
कौरवं त्वां विना पुत्र क्षमः कोऽन्योऽत्र जायते ॥३४१॥

रुदन्ती हृदयं दोर्भ्यां ताडयन्ती तडित्प्रभा।
सा मुमूर्च्छ महामोहान्मोहो हि चेतनां हरेत् ॥३४२॥

यावदुन्मूर्च्छिता कुन्ती तावद्दोर्भ्यां युधिष्ठिरः।
संपीड्य हृदयं नद्यां पतितुं च समीहते ॥३४३॥

अर्थ (श्लोक 338 से 343): जो कौरवों का ध्वंस करने के लिए समर्थ हो। इस प्रकार बिजली की प्रभा के समान प्रभा वाली कुन्ती रोती हुई और हाथों से छाती पीटती हुई मोह के वश हो, मूर्छित हो गई। सच है मोह चेतना-सुध-बुध हर लेता है। कुन्ती तो इधर मूर्छित ही पड़ी थी कि इतने में युधिष्ठिर जल में कूद पड़ने के लिए उद्यत हुए ॥३३८-३४३॥


तस्मिन्नवसरे भीमो बभाण भयवर्जितः।
स्वामिन्निष्टे स्थिरं तिष्ठ पाहि पृथ्वीं सुपावनीम् ॥३४४॥

कुरुवंशन्नभश्चन्द्र जहि शत्रुगणांश्च माम्।
आज्ञापय नराधीश गङ्गायां पतनकृते ॥३४५॥

पतित्वा तुण्डिकां तूर्णं तोषयिष्यामि दानतः।
बलेर्बलिन्यमास्ये च मात्मानं देहि मा वृथा ॥३४६॥

पश्यामि पौरुषं तस्या विधाय वरसंगरम्।
तयाथ घनघातेन घातयित्वा महासुरीम् ॥३४७॥

इत्युक्त्वा स ददौ झम्पां विधाय सरितः पयः।
त्वं गृहाण गृहाणेति भणन्भीतिविवर्जितः ॥३४८॥

पतितं तं समालोक्य विदधुः परिदेवनम्।
युधिष्ठिरादयः कुन्त्या हाकारमुखराननाः ॥३४९॥

हा भीम हा महाभाग हा सद्भूज पराक्रम।
परोपकारपारीण क्षय्यपक्षक्षयंकर ॥३५०॥

त्वया शून्यं कृतं सर्वं त्वां विना शून्यमानसाः।
वयं जातास्तरिष्यामः कथं वै दुःखसागरम् ॥३५१॥

अर्थ (श्लोक 344 से 351): इसी समय भय से विह्वल होकर उनसे भीम बोला कि स्वामिन्! आप तो स्थिर रहकर पृथ्वी का पालन कीजिए और शत्रुओं को यम का घर दिखाइए। हे कुरु-वंश-रूप आकाश के चंद्रमा, आप मुझे गंगा में कूद पड़ने की आज्ञा दीजिए। मैं अपनी बलि से तुंडिका को सन्तुष्ट कर दूँगा। इस पर युधिष्ठिर ने कहा कि भाई भीम, तुम्हें व्यर्थ यम के मुँह में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। भीम ने कहा कि मैं उस महासुरी तुंडिका के साथ अपने वज्र के जैसे हाथों के प्रहारों के द्वारा युद्ध करके अभी उसे पद-दलित किये देता हूँ और देखता हूँ कि उसका पुरुषार्थ कितना है। यह कहकर निर्भय भीम ने देवी से कहा कि “देवी! लो मेरी बलि लो, मुझे ग्रहण करो”। इसके बाद वह गंगा के अथाह जल में कूद पड़ा। उसे सचमुच ही कूदा हुआ देखकर युधिष्ठिर आदि रोने लगे और कुन्ती भी हाहाकार करती हुई विलाप करने लगी। हा भीम, हा महाभाग, हा पराक्रमशाली भुजाओं वाले, हा परोपकारपारीण और हा शत्रुपक्ष के विध्वंसक भीम, तुमने हमारे लिए सारा जगत् सूना कर दिया। तुम्हारे बिना हमें यह सारा जगत् सूना देख पड़ता है। तुम्हारे बिना हमारा मन विचार-विमूढ़ हो गया है। कहो अब हम इस दुख-रूपी सागर को तुम्हारे बिना कैसे पार करेंगे ॥३४४-३५१॥


तत्क्षणे तरणिस्तूर्णं ततार सरितो जलम्।
तीरं गत्वा समुत्तीर्णाः पाण्डवाः शोकसंगताः ॥३५२॥

अर्थ: उधर भीम ज्यों ही गंगा में कूदा कि देवता ने नौका की छोड़ दिया। फिर क्या था थोड़ी ही देर में नौका पार पहुँच गई और शोक सागर में डूबे हुए दुखी चार पाण्डव भी कुन्ती सहित गंगा के पार पहुँच गये परन्तु वे भीम के वियोग से बड़े दुखी थे। अतएव वे विचक्षण बार-बार भीम की


तद्दुःखक्षणसंक्षिप्ता वीक्षमाणा विचक्षणाः।
विपुलोदरसंलग्नां कोपतुण्डां सुतुण्डिकाम् ॥३५३॥

असातशतसंतप्ताः स्मरन्तो भीमसद्गुणान्।
बाष्पपूर्णेक्षणाश्चेलुर्नवमुत्तीर्य ते पथि ॥३५४॥

एतस्मिन्नन्तरे तुण्डी मकराकृतिधारिणी।
महाभीमाकृतिं भीमं वीक्ष्य वेगाद्दधाव च ॥३५५॥

अर्थ (श्लोक 352 से 355): ओर देख रहे थे। इस समय महान् दुख से उनका हृदय जला जा रहा था। भीम के गुणों का स्मरण कर उनकी आँखों में आँसू भर आते थे परन्तु दैव-वश वे कर कुछ नहीं सकते थे। आखिर नौका में से उतरकर उन्होंने अपना रास्ता लिया ॥३५२-३५५॥


क्रुद्धो युद्धाय संनद्धो बंधयित्वा वधाकृतिम्।
अखण्डां तुण्डिकां दृष्ट्वा बभूव स जले तरन् ॥३५६॥

अन्योन्यं पादघातेन घातयन्तौ रुषा ततौ।
युयुधाते जले भीमौ मल्लाविव सुनिष्ठुरौ ॥३५७॥

तुण्डीं तुण्डेन संहत्य शतखण्डमखण्डयत्।
अखण्डः स प्रचण्डात्मा सुखण्डीमिव हण्डिकाम् ॥३५८॥

तुण्डी प्रचण्डकोपेन व्यन्तरी मकराकृतिः।
अगिलद्गलितानन्दमखण्डं पाण्डुनन्दनम् ॥३५९॥

क्रुद्धो भीमः स्वहस्तेन विपाट्य जठरं हठात्।
तुण्ड्या उत्पाटयामास पृष्ठास्थि स्थिरसंगतम् ॥३६०॥

विह्वलीकृत्य सा मुक्ता व्यन्तरी तेन सद्रुचा।
पलायिता गता क्वापि मुक्त्वा त्रिपथगापथम् ॥३६१॥

अर्थ (श्लोक 356 से 361): महान् भयंकर भीम के गंगा में कूदते ही तुंडी मगर का रूप कर उसकी ओर दौड़ी। उसको अपनी ओर आती हुई देखकर भीम को बड़ा भारी क्रोध आया। वह जल पर तैरता हुआ उसके साथ युद्ध करने लगा। भीम का और तुंडी का आपस में पैरों के आघातों द्वारा खूब ही युद्ध हुआ। जान पड़ता था कि मानों जल के ऊपर रोष के भरे दो निष्ठुर मल्ल ही लड़ रहे है। इस समय अखण्ड और प्रचंडात्मा भीम ने पावों के प्रहार द्वारा तुंडिका को अधमरा कर दिया, जिससे वह बड़ी क्रुद्ध हुई और उसने भीम को एकदम ही निगल लिया। तब भीम के भी क्रोध की सीमा ही न रही और उस वीर ने अपने हाथ के वज्र जैसे प्रहार के द्वारा उसका पेट ही फाड़ डाला तथा उसकी पीठ की हड्डी को जो कि खूब ही मजबूत और वज्र के जैसी थी, उखाड़कर फेंक दिया और आप आराम के साथ उसके पेट से बाहर निकल आया। देवी भीम की भयानक मार से अत्यन्त विह्वल हो गई। उससे जब कुछ भी न बन पड़ा तब वह गंगा के उस मार्ग को छोड़कर उसी समय भाग गई ॥३५६-३६१॥


ततो भीमो भुजाभ्यां तामुत्तीर्याध्वानमाययौ।
तावता ददृशे तैश्च पराङ्मुखविलोकिभिः ॥३६२॥

आयान्तं तं समावीक्ष्य युधिष्ठिरः स्थिरव्रतः।
तस्थौ बन्धुजनैः सत्रं कुन्त्या हर्षितवक्त्रया ॥३६३॥

ततस्तेषां महाभीमश्चरणान्नंनमीति च।
स्म समालिङ्ग्य तत्कण्ठमुत्कण्ठितमना महान् ॥३६४॥

अर्थ (श्लोक 362 से 364): इस प्रकार-उसे पराजित कर भीम हाथों से गंगा को तैरकर आ गया। उसे आता हुआ देखकर, लौट-लौटकर पीछे की ओर देख रहे स्थिर व्रत युधिष्ठिर आदि पाण्डव और प्रसन्न-मुख कुन्ती सब वहीं ठहर गये। भीम ने जाकर उन सबके चरणों को नमस्कार किया और बड़ी भारी उत्कंठा के साथ गले लग कर उन सब का आलिंगन किया। इसके बाद उससे युधिष्ठिर ने पूछा कि भाई, तुम इतनी गहरी अथाह गंगा को हाथों से कैसे तैर आये और तुमने हाथों से ही उस दुष्ट तुंडिका को कैसे जीता? इसके उत्तर में भीम ने कहा कि पूज्यवर! मैं आपके पुण्य के प्रभाव से ही हाथों के प्रहार से


क्व जाह्नव्यतिगम्भीरा कथं तीर्णा सुदुस्तरा। भुजाभ्यां निर्जिता तुण्डी त्वया कथं सुमारुते ॥३६५॥

इत्युक्ते तैर्बभाणासौ तां विभज्य सुतुण्डिकाम्। घातैः सरिज्जलं तीर्त्वात्रागतोऽहं भवद्वृषात् ॥३६६॥

अर्थ (श्लोक 362 से 366): तुंडिका को हरा कर गंगा को तैर कर यहाँ आया हूँ ॥३६२-३६६॥


अन्योन्यं नृपनन्दनाः समुदिताश्चानन्दयन्तः परान् तीर्त्वा देव सरिज्जलं प्रविपुलं जित्वामरीं तुण्डिकाम्।
प्राप्ताः सद्द्विजयं विजय्यजयिनो जित्वा विपक्षांक्षणात्। धर्मस्यैव विजृम्भितेन भविनां किं किं न बोभूयते ॥३६७॥

अर्थ: इस प्रकार अथाह गंगा को तैर कर, तुंडी देवी को जीतकर तथा शत्रुओं पर विजय लाभ कर वे जयशील पाण्डव परस्पर में खूब ही आनन्दित हुए। भव्यजीवो! देखो, यह सब धर्म का ही प्रभाव है और हैं भी ऐसा ही कि यदि धर्म का समागम हो तो जीवों को भला क्या-क्या सम्पति नहीं मिल सकती-धर्मात्माओं को सब सम्पदायें अपने आप खोज कर उनकी सेवा में उपस्थित हो जाती है। तात्पर्य यह कि धर्म के प्रभाव से जीवों को सब कुछ मिल जाता है-कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता ॥३६७॥


धर्मो यस्य सखा सुखं खलु वरं प्राप्नोति स श्रेयसे धर्मो यस्य शुभः स भाति भुवने भाभिन्नदुस्तामसः।
धर्मो यस्य स रक्षकः क्षितितले संरक्ष्यते सोऽमरैः धर्मो यस्य धनं समृद्धिजजननं संमह्यते धार्मिकैः ॥३६८॥

अर्थ: जिसे धर्म से प्रेम होता है वही संसार में सुख पाता है, वही मोक्ष के लिए प्रयत्न कर सकता है और वही अपने शरीर की प्रभा से अँधेरे को दूर करता है अर्थात् देवताओं जैसे सुन्दर तेजशाली शरीर को पाता है। उसकी देव रक्षा करते हैं, जिसका कि धर्म सहायक होता है। उसी को धन-समृद्धि मिलती है और वही उत्तम-उत्तम पुरुषों द्वारा पूजा जाता है ॥३६८॥

त्रयोदशं पर्व

चन्द्रप्रभं सुचन्द्राभं चन्द्रचर्चितपद्युगम्।
चन्द्राङ्कं चन्दनैश्चार्च्यं नौमि नानागुणाकरम् ॥१॥

अर्थ: उन चन्द्रप्रभ भगवान् को प्रणाम है जो गुणों के भण्डार हैं, जिनके चरणों में चन्द्रमा का चिह्न है, जिनके शरीर की प्रभा चन्द्रमा की प्रभा के समान है, जो चन्द्र द्वारा पूजे जाते हैं और जिन की चन्दन आदि उत्तम द्रव्यों के द्वारा पूजा होती है। वे हमें शान्ति दें, हमारे कर्म-कलंक को दूर करें ॥१॥


अथ ते पाण्डवाश्चण्डा द्विजवेषधरा वराः।
कुन्तीगतिविशेषेण संजग्मुश्च शनैः शनैः ॥२॥

ततः कौशिकसन्नामपुरीं प्रापुर्नरेश्वराः।
या स्वर्गतश्च्युतानीव धत्ते गेहानि सत्प्रभा ॥३॥

योच्चैः शालच्छलेनाशु जेतुं त्रिदिवपत्तनम्।
उत्तस्थे सुस्थिता भूमौ नभःस्थं विगताश्रयम् ॥४॥

अर्थ (श्लोक 2 से 4): इसके बाद उन तेजस्वी पाण्डवों ने ब्राह्मण का रूप बनाया और कुन्ती की गति के अनुसार धीरे-धीरे चलकर वे लोग कौशिकपुरी में आये। कौशिकपुरी सब तरह शोभा से युक्त थी। उसमें जो उत्तम-उत्तम विशाल महल बने हुए थे वे स्वर्ग से च्युत होकर वहाँ आये हुए विमान से देख पड़ते थे। उनकी सुन्दरता स्वर्ग के विमानों जैसी थी। उस नगरी का कोट बहुत ऊँचा था। अतः जान पड़ता था कि मानों उसने पृथ्वी का आधार पाकर इस कोट के बहाने से आकाश में निराधार ठहरे हुए स्वर्गों को जीतने के लिए ही जाने का इरादा किया है ॥२-४॥


तां पाति सुपतिः श्रीमान्सुमतिश्रुतिकोविदः।
सुवर्णो वर्णनातीतवर्ण्यो वर्णाभिधो नृपः ॥५॥

तत्प्रिया सुप्रिया भाति भूषिता च प्रभाकरी।
यस्या मुखेन्दुना क्षिप्तं तमः पुरि न विद्यते ॥६॥

अर्थ (श्लोक 5 से 6): उसके स्वामी का नाम वर्ण था। वर्ण राजा श्रीमान् था, सुमति था, शास्त्र का ज्ञाता और उत्तम वर्ण का था। उसका रूप-सौन्दर्य वर्णनातीत था-उसका कोई वर्णन ही नहीं कर सकता था। उसकी रानी का नाम प्रभाकरी था। वह भी अपने पति के जैसी ही थी। अतएव वर्ण उस पर खूब ही प्यार करता था। उसके शरीर की कान्ति सब ओर फैल रही थी, जिससे उसकी खूब शोभा हो रही थी। उसका मुँह चाँद के जैसा था, अतः उसकी ज्योत्स्ना के मारे कौशिकपुरी में कभी किसी जगह अँधेरे को जगह न मिलती थी, सब जगह हमेशा ही प्रकाश रहता था ॥५-६॥


तयोर्वरात्मजा रम्या सुनेत्रा कमलाभिधा।
कमलेव महारूपा सुगुणोदधिसंस्थिता ॥७॥

सैकदा प्रमदोद्यानं विशदश्रीनगोत्तमम्।
चम्पकाचिन्त्यसज्जातिसुजातिसुमनश्चितम् ॥८॥

अर्थ (श्लोक 7 से 8): वर्ण और प्रभाकरी के एक पुत्री थी। उसका नाम था कमला। कमला का रूप कमला (लक्ष्मी) के जैसा ही था। वह रूप-सौन्दर्य की सीमा थी। उसके नेत्र बहुत ही सुहावने थे, उन्हें देखने वाले की तृप्ति ही नहीं होती थी। वह गुणों की समुद्र थी। उसका शरीर तेज-शाली था। अतः वह तेज की दूसरी मूर्ति सी देख पड़ती थी ॥७-८॥


जगामोत्कण्ठिताकुण्ठा सोत्कण्ठतमनोभवा।
लुठन्ती भासुरं तेजस्तेजोमूर्तिरिवापरा ॥९॥

अर्थ: एक दिन उस मुग्धा के मानस में वनक्रीड़ा की उत्कंठा हुई और वह अपनी सखी-सहेलियों को साथ लेकर निर्मल, श्रीयुक्त, उत्तम वृक्षों वाले और चंपक आदि भाँति-भाँति के फूलों से सुंदर प्रमद


सखीभिः सह संक्रीड्य सब्रीडापीडमण्डिता।
कानने तत्र खेलाभिर्दोलभिः कृतकौतुका ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 9 से 10): नाम उद्यान में गई और वहीं जाकर उसने सखियों के साथ खूब क्रीड़ा की एवं उस लज्जा-रूप भूषण से विभूषित सुन्दरी ने झूले में झूल कर बहुत आनन्द-विनोद किया ॥९-१०॥


सा दूरतो ददर्शांशु प्रासादं विशदात्मिका।
सुधाधौतं समृद्धं च शातकुम्भसुकुम्भकम् ॥११॥

तस्या जिगमिषा तत्र वन्दितुं श्रीजिनेश्वरान्।
अभूत्तावत्समापुस्ते पाण्डवा जिनमन्दिरम् ॥१२॥

दृष्ट्वा चान्द्रप्रभं चैत्यं स्नात्वा ते प्रासुकैर्जलैः।
निस्सहीति पदं प्राप्ताः पठन्तो विविशुर्गृहम् ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 11 से 13): इसके बाद कमला ने दूर से एक जिन मन्दिर को देखा। वह बिल्कुल सुधा के जैसा सफेद था, समृद्धशाली था। उस पर सोने के सुन्दर कलश चढ़े हुए थे। उसे देखकर जिन भगवान् की वन्दना करने के लिए जाने की उसकी इच्छा हुई। इसी समय पाण्डव भी उस जिनमन्दिर के पास आये। उसमें चन्द्रप्रभ की मनोज्ञ प्रतिमा को देखकर और प्रासुक जल से स्नान कर पवित्र हो, निःसहि-निःसहि कहते हुए उन्होंने मंदिर में प्रवेश किया ॥११-१३॥


संपूज्य जिनपं तत्र वन्दित्वा स्तोतुमुद्यताः।
विचित्रैः स्तोत्रमन्त्रैस्ते पवित्रैः परमोदयैः ॥१४॥

जिनेन्द्र जय सज्जन्तुजीवन त्वं जयोद्यत।
अजय्य जय द्विट्तेजो जय जन्मअपहानिशम् ॥१५॥

चन्द्रप्रभ त्वया क्षिप्तश्चन्द्रमा भासया सदा।
लाञ्छनच्छलतः पादेऽन्यथा किं सोऽवतिष्ठते ॥१६॥

केवलज्ञाननेत्राढ्यो जगदुद्धरणक्षमः।
त्वं पाह्यस्मान्कृपापारमितः पापाज्जगद्गुरो ॥१७॥

अर्थ (श्लोक 14 से 17): भगवान् की पूजा-वन्दना करके वे, पवित्र, परमोदय और विचित्र स्तोत्र-मंत्रों के द्वारा उनकी भक्तिभाव से स्तुति करने लगें कि जिनेन्द्र, भव्यों के जीवनाधार और जन्म-मरण के दुखों को हरने वाले प्रभो! तुम्हारी जय हो। सदाकाल धर्म का उपदेश करने को उद्यत, अजय्य और शत्रु-समूह को जीतने वाले चन्द्रप्रभ भगवन्, आपके कान्तिशाली शरीर की प्रभा ऐसी है कि उससे आपने चाँद को भी जीत लिया है और प्रभो, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है, नहीं तो चंद्रमा चिह्न के बहाने भला आपके चरणों की सेवा ही काहे को करता। प्रभो, आपकी जय हो। आप केवलज्ञान के स्वामी हैं, संसार के उद्धारक हैं, कृपा-पारंगत हैं। अतः स्वामिन्! आप हमारी रक्षा करो। हमें संसार से पार कर इन दारुण दुखों से हमारा पिंड छुड़ाओ। इस प्रकार भक्तिभाव से प्रभु की स्तुति कर उन्हें बड़ा आनंद हुआ। उन्होंने खूब पुण्य-कर्म का बंध किया ॥१४-१७॥


स्तुत्वेति जनितानन्दास्तेऽमन्दानन्दभूषिताः।
यावत्तिष्ठन्ति तत्रायात्कमला वन्दितुं जिनम् ॥१८॥

सखीभिः सह संफुल्लनयना तारहारिका।
नदनूपुरसंनादनिर्जिताखिलकोकिला ॥१९॥

स्खलन्ती सा नितम्बस्य भारेण कटिमेखलाम्।
दधाना मन्दसद्गत्या जयन्ती दन्तिनीगतिम् ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 18 से 20): इसके बाद वे पुण्यात्मा वहाँ बैठे ही थे कि इतने में वहीं सखी-सहेलियों सहित प्रभु की वन्दना करने के लिए कमला भी आ गई। उसके नेत्र-कमल खिल रहे थे और गले में मनोहर हार पड़ा था। वह अपने बिछुओं के शब्दों के द्वारा कोयलों के कंठों की लज्जित करती थी। उसके नितम्ब बड़े भारी. भार वाले थे, अतः वह स्खलित चाल से चलती हुई अपनी मंद गति से हथिनी की गति को


जिनेन्द्रभवनस्यान्तः सा प्रविश्य सुखोन्नता। ववन्दे विधिना देवान्प्रतिकृत्या समास्थितान् ॥२१॥

सुगन्धैर्बन्धुरैर्गन्धैः शुद्धैर्लब्धमधुव्रतैः। चन्दनैश्चर्चयामास सा जिनेन्द्रपदाम्बुजम् ॥२२॥

मन्दारमल्लिकावप्रकेतकीकुन्दपङ्कजैः। चम्पकैश्चार्चते स्मासौ जिनेन्द्रपदपङ्कजम् ॥२३॥

धूपैर्धूपितदिक्चक्रैः फलैः प्रविपुलैर्जिनम्। संपूज्य निर्गताद्राक्षीत्पाण्डवान्पावनान्वरान् ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 18 से 24): जीतती थी। उसकी कमर करधनी से सुशोभित थी। वहाँ आकर वह जिनभवन के भीतर गई। वहाँ जाकर उस सुखिनी ने जैसी विधि से चाहिए प्रभु की भक्तिभाव से वन्दना की और बाद उसने सुगन्धित चन्दन के द्वारा जिस पर के भौंरे गूंज रहे थे, प्रभु के चरण कमलों की पूजा की, उनके चरण-कमलों में मंदार, मल्लिका, केतकी, कुंद, कमल, चंपक आदि के उत्तम-उत्तम सुगन्धित पुष्प चढ़ाये, उसने सब दिशाओं को सुगन्ध-मय कर देने वाली धूप को आग में खेकर अपने कर्म-जाल को जलाया और मनोहर, उत्कृष्ट फल प्रभु की भेंट रक्खे। तात्पर्य यह कि उसने आठ द्रव्यों से प्रभु की खूब भक्ति के साथ गुण गा-गा कर पूजा की ॥१८-२४॥


तत्र स्थितं स्थिरं धाम्ना धर्मपुत्रं सुरूपकम्। विलोक्यातर्कयन्नूनं तद्रूपेण वशीकृता ॥२५॥

कोऽयं सुरः सुरेशो वा फणीशो रजनीकरः। सुरो वेमे नराः केऽत्र सुराः किं सूरसत्प्रभाः ॥२६॥

आज्ञातं नेत्रनिर्मेषैर्नरोऽयं कोऽपि सत्प्रभः। विनानेन कथं प्राणान्दधे धृतिविवर्जिता ॥२७॥

इति स्मरशरैर्भिन्ना प्रस्खलत्पदपङ्कजा। गृहं गन्तुं न शेके सा हतेव हतमानसा ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 25 से 28): इसके बाद वह जिनभवन से बाहर निकली और वहाँ उसने पवित्र पाण्डवों की देखा। उनमें तेजशाली और रूप-सौन्दर्यशाली युधिष्ठिर को देखकर वह उनके अतिशय सुन्दर रूप पर मोहित हो गई और मन ही मन विचारने लगी कि यह कौन हैं ? सुर है या सुरेश, चाँद है या सूरज, नागेन्द्र है या किन्नरदेव। ये मनुष्य से देख पड़ते हैं पर देवताओं के जैसी ही इनकी प्रभा है, अतः सुर के जैसे देख पड़ते हैं। लेकिन वास्तव में ये हैं कौन इतने विचार के बाद नेत्रों के पलक झपकने के कारण उसने पक्का निश्चय कर लिया कि यह कान्तिशाली कोई पुण्यात्मा पुरुष ही हैं। इन पुण्यात्मा ने मेरे मन को बिल्कुल ही चुरा लिया है, अतः मैं इनके बिना बिल्कुल ही अधीर हूँ। अब इन प्राणों की मैं मन के बिना कैसे रक्षा करूँगी। इस प्रकार वह काम के बाणों के द्वारा बिल्कुल ही जर्जरित हो गई, जिससे उसे वहाँ से घर जाना तक मुश्किल हो गया। वह पैर रखती थी कहीं, पर वह जाके पड़ता था और ही कई क्योंकि उसका मन बिल्कुल ही उसके काबू में न रह गया था ॥२५-२८॥


सखीभिर्वाह्यमाना सा समाप सदनं हठात्। सालसा तत्र नो भुङ्क्ते न वक्ति हसति क्षणात् ॥२९॥

ईक्षते क्षणातः खिन्ना रोदिति स्वपिति स्वयंम्। उत्तिष्ठते स्वयं स्थित्वा हसित्वा पतति स्वयम् ॥३०॥

अर्थ (श्लोक 29 से 30): वह जैसे-तैसे सखियों के सहारे, उनकी जबरदस्ती से महल तक पहुँची। वहाँ वह सालसा न तो कुछ खाती थी और न बोलती-चालती ही थी, न हँसती थी और न किसी की ओर को देखती थी किन्तु खेदखिन्न होकर कभी रोने लगती और कभी सो जाती, कभी उठ बैठती और कभी बैठे-बैठे हँसती हुई स्वयं ही गिर पड़ती। कमला की ऐसी अवस्था देखकर उसकी माता ने सखियों


ईदृशां सुदृशीं मारावस्थासंस्थायिनीं सुताम्। माता संवीक्ष्य पप्रच्छाज्ञासीत्तच्चेष्टितं तदा ॥३१॥

निवेदितस्तया भूपस्तच्चेष्टां क्लेशकारिणीम्। उक्त्वा तान्मन्त्रिभिस्तूर्णं समाह्वयत पाण्डवान् ॥३२॥

आगता मिलिता राज्ञा ते प्राप्तशुभभोजनाः। मानिता वरवस्त्राद्यैस्तत्र भेजुः परां स्थितिम् ॥३३॥

ततोऽसौ धर्मपुत्रं तं संप्रार्थ्यार्थसमन्विताम्। सुतां तस्मै ददौ प्रीत्या कमलां विधिनामलाम् ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 29 से 34): वगैरह से पूछकर उसकी ऐसी बुरी हालत होने के कारण को जान लिया और फिर जाकर उसने सब हाल अपने स्वामी वर्ण से कह सुनाया। सुनकर वर्ण ने उसी समय मंत्रियों को बुलाया और उन्हें पुत्री की क्लेश-मय दशा बताकर उसने पाण्डवों को बुला ले आने के लिए भेजा। पाण्डव आकर राजा से मिले। राजा ने भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से उनका जैसा चाहिए उचित आदर किया। अतः वे प्रेम के वश हो वहीं ठहर गये। इसके बाद वर्ण राजा ने युधिष्ठिर महाराज से कन्या के लिए प्रार्थना की और उनकी अनुमति पाकर शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक उनके साथ कमला का प्रेम विवाह कर दिया और साथ में उन्हें बहुत धन भी दिया ॥२९-३४॥


ततः सोऽपि तया साकं भेजे भोगान्सुभासुरान्। दिनानि कतिचित्तत्र स्थितः कुन्त्या स्वबान्धवैः ॥३५॥

एकदा धर्मपुत्रं तं वर्णोऽप्राक्षीच्छृणु प्रभो। कस्त्वं कैषा नरा एते के कुतोऽत्र समागताः ॥३६॥

समाकर्ण्य नृपोऽवादीद्वर्णाकर्णय कौतुकम्। वयं पाण्डुसुता दग्धाः कौरवैर्निर्गता गृहात् ॥३७॥

द्वारावत्यां वरोऽस्माकं समुद्रविजयो महान्। मातुलस्तत्सुतो नेमिस्तीर्थकृत्सुरसंस्तुतः ॥३८॥

वैकुण्ठबलदेवौ चास्माकं तौ स्वजनौ मतौ। वयं तद्दर्शनोत्कण्ठास्तत्राटिष्याम उल्बणाः ॥३९॥

इति सर्वस्वसंबन्धमभिधाय समुद्यताः। मुक्त्वा तां तत्र निर्जग्मुः सवृषाः सत्यवादिनः ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 35 से 40): कमला का पाणिग्रहण कर पाण्डव भी उसके साथ दिव्य भोगों को भोगते हुए माता और भाइयों सहित वहाँ कितने ही दिनों तक रहे। इसी बीच में एक दिन उनसे उनके ससुर वर्ण ने पूछा कि प्रभो! आप कौन हैं, आपके साथ यह कौन है ? और ये दूसरे चार पुरुष कौन हैं ? आप सब यहाँ आये कहाँ से हैं ? वर्ण के इन प्रश्नों के उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा कि महाराज, आप हमारे कर्म-कौतुक की बात सुनिए- हम पाँचों पाण्डु पण्डित के पुत्र पाण्डव हैं, हमें कौरवों ने जलाकर मारना चाहा था और हमारे महल में आग लगा दी थी परन्तु पुण्ययोग से हम वहाँ से निकल आये- हमें कोई कष्ट नहीं हुआ और अब हम द्वारिकापुरी को जा रहे हैं। द्वारिका के राजा समुद्रविजय हमारे मामा हैं और उनके पुत्र नेमिनाथ तीर्थंकर तथा कृष्ण, बलदेव हमारे बन्धु हैं। उनके दर्शनों की हमें बहुत ही उत्कंठा लग रही है। इसलिए यहाँ से हम द्वारिका को जायेंगे। इस प्रकार अपनी सारी बातें कह कर वे धर्मात्मा और सत्यवादी कमला को वहीं छोड़कर वहाँ से चल दिये ॥३५-४०॥


देशे देशे महीयन्ते महान्तो महितैर्नरैः। पाण्डवाः परमोत्साहाः सदाचारविचारिणः ॥४१॥

आसनं शयनं यानं निघसो वसनाप्तिता। सर्वमेतद्धि सुप्रापमासीत्तेषां वृषोदयात् ॥४२॥

अर्थ (श्लोक 41 से 42): इसी प्रकार वे सदाचारी और विचारशील तथा परमोत्साही पांडव और भी जहाँ जहाँ गये वहाँ-वहाँ के माननीय पुरुषों ने उनका खूब सत्कार किया। वे जहाँ पहुँचते थे पुण्योदय से उन्हें वहाँ सब कुछ सामग्री मिल जाती थी। आसन, शयन, सवारी, आहार वगैरह सब कुछ ले-लेकर लोग


विक्रमाक्रान्तदिक्‌चक्राः सुक्रमाः क्रमतो नृपाः।
चेक्रीयन्ते सपर्यां च वर्या वर्यजिनेशिनः ॥४३॥

अर्थ (श्लोक 41 से 43): स्वयं ही उनके सामने आ जाते थे। उनका विक्रम दसों दिशाओं में व्याप्त हो रहा था। रास्ते में उन्हें जहाँ-जहाँ जिनमंदिर मिलते थे उन्हें वे पूजते हुए आगे को जाते थे ॥४१-४३॥


सपुण्याः क्रमशः प्रापुर्भूपाः पुण्यद्रुमं वनम्।
पुण्यद्रुमैः समाकीर्णं विस्तीर्णं पूर्णशोभया ॥४४॥

वनमध्ये शुभाभोगाः शरदभ्रनिभाः शुभाः।
शातकुम्भसुकुम्भैश्च शोभिता व्योमसंगताः ॥४५॥

ध्वनद्दुन्दुभिसद्ध्वाना जयकोलाहलाकुलाः।
अमला विपुला भव्यैर्भूषिता भूषणाङ्कितैः ॥४६॥

आसेदिरे सुप्रासादाः सदानन्दाकराः सदा।
पाण्डवैः प्रीतचेतस्कैर्धर्मामृतसुपायिभिः ॥४७॥

पाण्डुपुत्राः पवित्रास्ते मात्रा चित्रसुभित्तिकान्।
जिनागारान्समावीक्ष्य तदन्तर्विविशुर्मुदा ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 44 से 48): इस प्रकार धीरे-धीरे वे वृक्षों से परिपूर्ण और शोभा के स्थान पवित्र पुण्यद्रुम नाम वन में पहुँचे। उस वन के ठीक बीच में बहुत से जिनमंदिर थे। वे खूब लम्बे-चौड़े पूरे विस्तार को लिए हुए थे, शरद काल के मेघों जैसे स्वच्छ थे, आकाश तक ऊँचे तथा सोने के सुन्दर कलशों से सुशोभित थे। दुंदुभियों के गंभीर शब्द से वे शब्द-मय हो रहे थे और जय शब्दों का उनमें कोलाहल हो रहा था। वे निर्मल और विशाल थे, भाँति-भाँति के भूषणों से विभूषित भव्यों से सुशोभित थे और जीवों को नित्यानंद के दाता थे। उनको दूर से देखकर धर्मामृत के पिपासु पाण्डव प्रसन्न होते हुए उनकी ओर गये। वहाँ चित्रों से चित्रित भीतों वाले उन जिनालयों को देखकर उन्होंने हर्ष के साथ, माता-सहित उनमें प्रवेश किया ॥४४-४८॥


हट्टहाटककोटीभिर्घटिताः सुघटाः शुभाः।
संजाघटति यत्रस्थाः सच्चेतांसि सुदेहिनाम् ॥४९॥

स्वार्णरूप्याः सुरूपभाः पावनाः परमोदयाः।
प्रतिमाः प्रेक्ष्य ते प्रीतिमापुः पावनपुण्यकाः ॥५०॥

ततः पुष्पफलाद्यैस्ते चायन्ते स्म शुभार्चनैः।
जिनान्यतो जनानां हि जायते पुण्यजीवनम् ॥५१॥

नत्वा स्तुतिशतैः स्तुत्वा प्रानमन्नग्रमस्तकाः।
पाण्डवास्ताञ्जिनान्भक्त्या सद्धर्मामृतलालसाः ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 49 से 52): सोने के घरों से सुसज्जित उन सुन्दर जिनालयों में प्रवेश कर उन्हें अपूर्व आनंद हुआ। इसके बाद जब उन पुण्यात्माओं ने उन मंदिरों में विराजमान सोने और चाँदी की अतिशय रूपवाली, पवित्र परमोदय वाली प्रतिमाओं का दर्शन किया तब उनके आनंद की कुछ सीमा ही न रह गई। इसके बाद उन्होंने फल-फूल आदि द्रव्यों के द्वारा जिनबिम्बों की अतीव भक्ति-भाव से पूजा की क्योंकि पुरुषों को पवित्र जीवन प्रभु की पूजा के फल से ही मिलता है। उन्होंने सैकड़ों स्तोत्रों के द्वारा स्तुति कर मस्तक झुका कर प्रभु को प्रणाम किया ॥४९-५२॥


वन्दित्वा सद्गुरून् रम्यान् गुणगौरवसंगतान्।
गम्भीरास्तत्र पप्रच्छुर्जिनपूजाफलं च ते ॥५३॥

अर्थ: इसके बाद सच्चे धर्म को चाहने वाले उन पाण्डवों ने गुण-गौरवशाली, गंभीर और सम्यग्ज्ञानी गुरु की वन्दना करके उनसे जिन-पूजा के फल को पूछा। उत्तर में मुनि बोले कि भव्य, सुनिए मैं पूजा के फल को कहता हूँ, अतः इधर ध्यान दीजिए। जो भव्यजन सदा बड़ी भक्ति के साथ जिनपूजा करते हैं उन चतुर पुरुषों को जिनेन्द्र देव की पूजा से और तो क्या परम पद भी मिल जाता है, उनके


मुनिर्वाचं जगौ भव्याः शृणुतार्चनसत्फलम्।
यार्चा चतुरचित्तानां ददाति परमं पदम् ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 53 से 54): सभी दुख दूर हो जाते हैं और वे आत्मिक सुख को भोगने लगते हैं। उन्हें फिर कभी दुख, कष्ट आदि का सामना नहीं करना पड़ता ॥५३-५४॥


रजोमुक्त्यै भवेद्धारा वारां दत्ता जिनाग्रतः।
सौगन्ध्याय शुभामोदो गन्धो देहे सुयुक्तिभिः ॥५५॥

अक्षता अक्षता दत्ताः कुर्वन्त्यक्षतसुश्रियम्।
पुष्पस्रजः सृजन्त्याशु स्वःस्रजं देहिनां सदा ॥५६॥

उमास्वाम्याय नैवेद्यं दत्तं स्याद्देवपादयोः।
दीपो दीप्तिकरः पुंसां जिनस्याग्रेऽवतारितः ॥५७॥

विश्वनेत्रोत्सवाय स्यात्सुधूपोऽगुरुसंभवः।
फलं फलति संफुल्लां मुक्तिलक्ष्मीं सुलिक्षताम् ॥५८॥

अनर्घ्येण महार्घ्येण ये यजन्ति जिनेश्वरान्।
ते प्राप्नुवन्ति चानर्घ्यं पदं देवनरार्चितम् ॥५९॥

इति पूजाफलं श्रुत्वा श्रावकास्ते महाश्रियः।
जहर्षुर्हर्षपूर्णाङ्गा आमर्षोज्झितमानसाः ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 55 से 60): देखो, जो जिन भगवान् के चरण कमलों के आगे जलधारा देता है उसकी कर्मरज उपशान्त हो जाती है। जो सुगन्धित चन्दन चढ़ाता है उसे सुगन्धित शरीर का लाभ होता है। अक्षत चढ़ाने वाले को अक्षय सुख मिलता है। जो पुष्पों से पूजा करता है उसे स्वर्ग में दिव्य फूलों की मालायें पहनने को मिलती हैं। नैवेद्य पूजा का फल धन-दौलत की प्राप्ति और दीप पूजा का फल शरीर में दीप्ति होना है। अगुरु-चंदन की धूप से जो प्रभु की पूजा करता है उसे नेत्रों को सुहावना शरीर मिलता है। फल की पूजा का फल यह है कि उसे मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और अर्घ्य से जो पूजा की जाती है उसका फल होता है देवों द्वारा पूज्य अनर्घपद का लाभ। इस तरह मुनिराज के मुख-कमल से पूजा के फल को सुनकर महान् श्रीशाली और क्रोध आदि कषायों से रहित अतएव निर्मल-चित्त, श्रावक व्रती पाण्डव हर्ष से गद्गद् हो गये, उनके रोमाञ्च हो आये ॥५५-६०॥


ततस्ते क्षान्तिका वीक्ष्य समक्षं लक्षणान्विताः।
प्रवन्द्य पुरतस्तस्थुः कुन्ती तत्पार्श्वमास्थिता ॥६१॥

तत्रैका लक्षणैर्लक्ष्या चञ्चलाक्षा सुपक्ष्मला।
कटाक्षक्षेपणे दक्षा मङ्क्षु क्षेमक्षमावहा ॥६२॥

क्षपणात्क्षीणसर्वाङ्गा चररक्षक रक्षिता।
शिक्षमाणाक्षराण्याशु कुन्त्यैक्षि वरकन्यका ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 61 से 63): इसके बाद पाण्डवों ने नाना लक्षणों से लक्षित एक आर्यिका को देखा। वे उसे नमस्कार कर उसके आगे बैठ गये और कुन्ती एक ओर बैठ गई। वहीं एक कन्या बैठी हुई थी। वह सुंदर लक्षणों से युक्त थी। उसके नेत्र चंचल थे और उनकी सुन्दर पलकें थीं। उसकी चितवन मन को मुग्ध कर देती थी। चंचलता, प्रेम और क्षमा का वह भण्डार थी। प्रोषध से उसका शरीर बहुत कृश हो रहा था। वह अच्छे सुशील रक्षकों द्वारा रक्षित थी। लिखना पढ़ना उसने अभी आरंभ ही किया था ॥६१-६३॥


तदा कुन्ती समुत्तुङ्गा क्षान्तिकां संयमश्रियम्।
अप्राक्षीत्क्षान्तिकेऽक्षणे नत्वा विज्ञप्तिमाश्रिता ॥६४॥

धर्मध्यानधरा धीरा धुरीणा धर्मकर्मसु।
तपस्तपति सत्साध्वी कन्येयं केन हेतुना ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 64 से 65): उस सुन्दरी कन्या को देखकर कुन्ती ने आर्यिका को नमस्कार कर पूछा कि आर्यें! धर्मध्यान को धारण करने वाली और धर्म-कर्म में धुरीण यह साध्वी कन्या जो तप तपती है, इसके तप तपने में कारण क्या है? क्योंकि ऐसी विषम यौवन अवस्था में जिसमें कि काम का खूब जोर रहता है,


हेतुं विना न वैराग्यं जायते विषमे परे।
यौवने वयसि स्फारे कामेन कलिताङ्गके ॥६६॥

रक्ताम्बरधरा केन हेतुना वनवासिनी।
दीक्षां विना भवत्पार्श्वे तिष्ठति स्थिरमानसा ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 64 से 67): कारण के बिना वैराग्य नहीं हो सकता। अतः इसके वैराग्य का कोई न कोई कारण अवश्य ही होना चाहिए। यह रंगीन वस्त्र पहिने हुए है, अतः अभी दीक्षित नहीं हुई है परन्तु फिर भी यह स्थिरमना आपके पास वन में किस कारण से रहती है ॥६४-६७॥


वधू कर्तुमनाः साध्वी कुन्ती तां चारुचक्षुषा।
ईक्षांचक्रेऽनिमेषेण तरत्तारसुलोचनाम् ॥६८॥

अक्षूणेनेक्षणेनासौ वीक्षमाणा युधिष्ठिरम्।
तस्थौ तेनापि संवीक्ष्य पश्यता तन्मुखाम्बुजम् ॥६९॥

कटाक्षक्षेपतः सापि दत्ते स्म निजमानसम्।
भूपावेक्षणतः सोऽपि ददौ तस्यै स्वमानसम् ॥७०॥

अन्योन्यमिति संपृक्तौ मनसा तौ चलात्मना।
वचसा वपुषा वक्तुं नाशनुवतां च सेवितुम् ॥७१॥

तावता गणिनी प्राह ज्येष्ठा श्रेष्ठे समासतः।
शृण्वस्याश्चरितं चित्रं चीयमानं सुचेष्टितैः ॥७२॥

अर्थ (श्लोक 68 से 72): उसके रूप-सौंदर्य को देखकर कुन्ती की इच्छा उसे अपनी वधू बनाने की हुई। अतएव उस साध्वी ने उस चंचल नेत्रों वाली कन्या को अपने मनोहर चक्षुओं की एक टक दृष्टि से देखा। उधर वह कन्या भी अपनी चंचल दृष्टि से बैठी-बैठी चुपचाप युधिष्ठिर को देख रही थी और युधिष्ठिर भी कन्या के मुख-कमल की ओर दृष्टि डाल रहे थे। फल यह हुआ कि अपनी-अपनी दृष्टि के साथ युधिष्ठिर ने कन्या को और कन्या ने युधिष्ठिर को अपना-अपना मानस दे दिया। वे चंचलात्मा मन ही मन एक में एक खूब मिल गये। केवल शरीर से एक दूसरे का सेवन और वचन से आपस में बातचीत न कर सके। इतने में कुन्ती के प्रश्नों के उत्तर में आर्यिका ने कहा कि देवी, इसका चरित बड़ा विचित्र है। मैं थोड़े में कहे देती हूँ। तुम ध्यान देकर सुनो ॥६८-७२॥


कौशाम्ब्यामत्र सत्पुर्यामजर्यायां वरार्यकैः।
वर्यायां धुर्यसद्धैर्यसुचर्याश्रितसच्छ्रियाम् ॥७३॥

विन्ध्यसेनो नृपोऽभासीत्सुखेन शुभसंश्रितः।
विन्ध्यसेनाभवत्तस्य प्रिया सुप्रीतमानसा ॥७४॥

तत्सुता सुगुणापूर्णा वसन्ताद्यन्तसेनका।
सुरूपा सदृशा साध्वी कलाविज्ञानपारगा ॥७५॥

नृपेणैषा सुमन्त्र्याशु विचकल्पे सुकल्पनैः।
साकल्या पाणिपीडार्थं युधिष्ठिराय महीभुजे ॥७६॥

अनेहसा ततो दग्धाः पाण्डवाः कौरवेशिभिः।
श्रुताः श्रुतौ जनैः सर्वैर्दुःखसंपीडितात्मभिः ॥७७॥

अर्थ (श्लोक 73 से 77): इस पुरी का नाम कौशाम्बी है। इसमें उत्तम-उत्तम जनों का निवास है। यह उनके धैर्य, चातुर्य और उत्तम आचरण से शोभित है। यहाँ का राजा विंध्यसेन है। वह पुण्यात्मा है और उसका मुँह चंद्रमा के जैसा है। उसकी रानी का नाम विंध्यसेना है। वह सदा प्रसन्नचित्त रहती है, अतएव उन दोनों में बड़ी गाढ़ी प्रीति है। उनके एक पुत्री है। उसका नाम बसंतसेना है। वह सर्वगुण-सम्पन्न, सुन्दरी, सुन्दर नेत्रों वाली, साध्वी, कला-विज्ञान में पारंगत यही वह कन्या है। राजा ने विचार करके इसके सम्बन्ध में यह निश्चय कर लिया था कि भाँति-भाँति के भूषणों से विभूषित इस सुन्दरी कन्या का ब्याह मैं युधिष्ठिर के साथ करूँगा परन्तु थोड़े ही समय में लोक में फैलती हुई यह अफवाह सुनी गई जो कि बहुत ही दुख देने वाली है। वह यह कि कौरवों ने पाण्डवों को महल में आग लगा कर जला दिया है ॥७३-७७॥


श्रुत्वैवातर्कयच्चित्ते किमिदं च विरूपकम्। भर्तृदग्धिभवं जातं किल्बिषं चात्र कारणम् ॥७८॥

अन्येति चिरं चित्ते चिन्तितं चतुरेच्छया। युधिष्ठिरं विना नाथं न करिष्ये परं नरम् ॥७९॥

अयं दग्धस्ततस्तूर्णं करिष्ये परमं तपः। यतो नाप्नोमि कर्मैतन्निन्द्यं सर्वैर्भवे भवे ॥८०॥

दीक्षोद्यतां समावीक्ष्य पित्राद्या दुःखपूरिताः। एनां संवेगसंपन्नां बोधयामासुरुन्नताम् ॥८१॥

सुते पल्लवसत्पाणे परे कमलकोमले। हिमांशुवदने पद्मपादे सन्नादसुन्दरे ॥८२॥

क्वायं ते कोमलः कायः क्वेवं च दुष्करं तपः। शक्यं दन्तैर्यथा लोहहरिमन्थनमन्थनम् ॥८३॥

समीहसे च चेद्दीक्षां कियत्कालं स्थिरा भव। क्षान्तिकाभ्यर्णतस्तूर्णं सुश्रुतिं शृणु सर्वदा ॥८४॥

वृषतस्तव निर्विघ्नः कदाचित्स भविष्यति। ईदृशः खलु सुश्रेयान् स्वल्पायुर्न प्रजायते ॥८५॥

सति जीवति तस्मिंश्च तेनोपयममङ्गलम्। प्राप्य सौख्यं समासाद्य स्थिरा भव सुवासिनि ॥८६॥

अथान्यथा प्रव्रज्यां तां गृह्णीयाः प्रार्थितेति च। स्थिरा स्थिता ममाभ्यर्णे कुर्वन्ती तनुशोषणम् ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 78 से 87): उसे सुनकर वसन्त सेना ने मन में सोचा कि पति का जल-मरना बहुत ही बुरा हुआ परन्तु इसमें मेरे पाप के उदय के सिवाय और कुछ भी कारण नहीं है। इस चतुरा ने तब इस बात पर बहुत विचार कर स्थिर किया कि मैं अब युधिष्ठिर के सिवाय और किसी को अपना स्वामी नहीं बनाऊँगी। वह जल चुके हैं, अब मिलने के तो है नहीं, अतः मैं अब उत्तम तप ही तपूँगी। जिससे अब आगे और किसी भव में ऐसे निंद्य कर्म का बंध न हो। यह सोचकर जब यह दीक्षा लेने को तैयार हुई तब इसके पिता आदि को बड़ा दुख हुआ और संसार से भयभीत हुई बसन्तसेना को उन्होंने बहुत समझाया कि बेटा! पत्तो की तरह बड़े कोमल तुम्हारे हाथ हैं, चाँद के जैसा सुहावना तुम्हारा मुँह है और कमल के जैसे कोमल पाँव हैं। तात्पर्य यह कि तुम्हारा सारा शरीर ही अत्यंत कोमल है, सुकुमार है। फिर ऐसे कोमल शरीर से इतना भारी दुष्कर तप भला कैसे होगा। क्या कहीं मछली भी अपने दाँतों से लोहे के चने चबा सकती है अथवा हे मधुरभाषिणी पुत्री! यदि तुझे दीक्षा ही लेना है तो कुछ दिन और ठहर जा और किसी आर्यिका के पास सच्चे शास्त्र का अभ्यास कर। कदाचित् तेरे पुण्य-प्रताप से ही युधिष्ठिर निर्विघ्न हो, उनके ऊपर आई हुई आपत्ति टल गई हो। तू इतनी जल्दी क्यों करती है। देख, ऐसे पुण्यात्मा पुरुषों की थोड़ी आयु नहीं होती, वे दीर्घजीवी होते हैं। यदि वे जीवित होंगे तो सुवासिनी पुत्री, तू उनकी पत्नी होकर उनके साथ आनन्द-चैन से घर गृहस्थी के सुखों को भोगना और नहीं तो दीक्षा लेकर तप तपना। पर अभी कुछ दिनों के लिए मेरा कहना मान जा और दीक्षा मत ले ॥७८-८७॥


एषा संयममिच्छन्ती रसत्यागविधायिनी। कायोत्सर्गकरा तन्वी चकार दुर्धरं तपः ॥८८॥

लसच्छीलसलीलाढ्या सुचारुचरिता चिरम्। शुद्धसिद्धान्तसंसिद्ध्यै शुश्रावैषा शुभं श्रुतम् ॥८९॥

अर्थ (श्लोक 88 से 89): इस प्रकार माता-पिता के समझाने से बसन्त सेना समझ गई और इसने कुछ दिन के लिए दीक्षा लेने का अपना इरादा बदल दिया परन्तु यह हमेशा मेरे पास आकर कायक्लेश करके शरीर को सुखाया करती है। यह संयम पालती है, रसपरित्याग तप तपती है और कायोत्सर्ग करके कठोर तप


विन्ध्यसेनसुताथेत्यचिन्तयच्चेतसि स्फुटम्। किमियं सुगुणा कुन्ती किमेते पञ्च पाण्डवाः ॥९०॥

अथ सा प्राह कन्येति का त्वं सुन्दरि मन्दिरे। गुणानां श्रेयसाकीर्णे प्रकीर्णकधमिल्लके ॥९१॥

अर्थ (श्लोक 88 से 91): किया करती है। यह साध्वी है-शीलवती है। इसका चरित बिल्कुल निर्दोष है एवं यह शुद्ध सिद्धान्त को जानने के लिए सदा अच्छे-अच्छे शास्त्रों को सुना करती है। इधर बसंतसेना ने मन में सोचा कि कहीं यही सुगुण कुन्ती और ये पाँच पाण्डव ही तो नहीं हैं ॥८८-९१॥


का त्वं सर्वगुणाकीर्णा क एते पञ्च पूरुषाः। वद वत्से विचारज्ञे यथावद्भक्तवत्सले ॥९२॥

साऽभाणीत्कन्यके शीघ्रं शृणु तत्त्वं मयोदितम्। वयं तु ब्राह्मणाः सर्वे ब्रह्मविद्याविशारदाः ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 92 से 93): आखिर वह अपनी उत्सुकता को न दाव सकी और वह बोली कि गुणों की खान पुण्यात्मा और चमर के जैसे बालों वाली महाभाग देवीजी, आप कौन हैं और सर्व-गुण-सम्पन्न ये पाँचों कौन हैं? विचार-शील माताजी, आप मुझसे सब बातें कहें। कुन्ती बोली कि बेटी, सुनो मैं तुम्हें सब बातें बताये देती हूँ। हम सब ब्राह्मण हैं-ब्रह्मविद्या के जानकार दैवज्ञ हैं ॥९२-९३॥


दैवज्ञास्ततस्तेन मदुक्ते निश्चयं कुरु। हसित्वेत्यवदत्कुन्ती तत्संजीवनसिद्धये ॥९४॥

हे पुत्रि त्वं पवित्रासि पुण्यासि त्वं महाशुभे। गुणज्ञासि गुणाधारे परमासि महोदये ॥९५॥

शुद्धं धारय शीलं त्वं यावज्जीवं च जीवनम्। प्रव्रज्याशां परित्यज्य स्थिरा भव गृहिव्रते ॥९६॥

कदाचित्तव पुण्येन ते भविष्यन्ति जीविनः। तादृशां मरणं कर्तुं न क्षमन्ते सुरा अपि ॥९७॥

इति श्रुत्वा तदा कन्या गतच्छाया विषण्णधीः। आर्तध्यानेन संतप्ता विन्ध्यसेनसुताभवत् ॥९८॥

मनोमत्तगजेन्द्रं सा निरुद्ध्य च दुरुत्तरम्। तपस्यन्ती तपस्तस्थौ निन्दन्ती कर्म प्राक्तनम् ॥९९॥

अर्थ (श्लोक 94 से 99): इसलिए पुत्री, मैं जो कुछ कहूँ तुम उस पर पूरा भरोसा करना। अपनी सब बातें कहकर कुन्ती ने बसन्तसेना से हँस कर कहा कि पुत्री, तुम पवित्र हो, पुण्यात्मा हो, सुन्दरी सुहावनी हो, गुणज्ञा और गुणाधार हो, उत्तम और महोदया हो, अतः जन्मपर्यन्त शील को धारण करो और दीक्षा की आशा छोड़कर श्रावक के व्रतों में मन को स्थिर करो। सम्भव है तुम्हारे पुण्य से पाण्डव अवश्य ही जीवित होंगे क्योंकि ऐसे महान् पुरुषों को मनुष्य तो क्या देवता भी नहीं मार सकते हैं। यह सुनकर कान्ति-हीन और खेदखिन्न बसन्तसेना आर्तध्यान से संतप्त हो उठी परन्तु उसने अपने मनरूप मत्त गजेन्द्र को रोका और अपने पूर्व कर्म की निंदा करती हुई वह कठोर तप तपने लगी ॥९४-९९॥


ततस्ते पाण्डवाश्चेलुश्चण्डाः कुन्त्या समं मुदा। लोकयन्तोऽखिलाँल्लोकाँल्लसल्लीलाविलासिनः ॥१००॥

शृङ्गाग्रलग्नसत्संगिमृगाङ्कं रङ्गसंगतम्। त्रिशृङ्गाख्यं परं द्रङ्गं जग्मुस्ते पाण्डुनन्दनाः ॥१०१॥

तत्पतिः पतितानेकपरिपन्थिजनोत्करः। दोर्दण्डमण्डितश्चाभूत्प्रचण्डश्चण्डवाहनः ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 100 से 102): इधर प्रतापी पाण्डव कुन्ती-सहित वहाँ से चलकर नाना विनोदों में मस्त हुए और प्रकृति की सुन्दरता को देखते हुए त्रिशृंग नाम नगर में आये। यह नगर बड़ा सुंदर था। इसके महल-मकान इतने भारी ऊँचे थे कि उनके शिखरों पर आकर चन्द्रमा विश्राम करता था। यहाँ का राजा चंडवाहन था। उसने अपने भुजा-रूप दंडों के द्वारा बड़े-बड़े बैरियों का सर्वनाश कर दिया था, अतः वे भुजायें उसका


प्रेयसी परमानन्दा सुपदा तस्य शोभते।
विमला विमलाभासा नाम्ना च विमलप्रभा ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 100 से 103): भूषण हो गई थीं। उसकी प्रिया विमलप्रभा थी। वह नित्य आनन्दित रहती थी। उसका शरीर कान्ति का पुंज था, निर्मल था और उसके पाँव अतीव सुन्दर थे ॥१००-१०३॥


तयोः पुत्र्यो दश ख्याताः संख्यावत्यः सुशिक्षिताः।
तासां ज्येष्ठा सुगम्भीरा गुणज्ञाभूद्गुणप्रभा ॥१०४॥

द्वितीया सुप्रभा भासा सुप्रभा तृतीया पुनः।
ह्री श्री रतिस्तथा पद्मेन्दीवरा सप्तमी मता ॥१०५॥

विश्वा विश्वगुणैः पूर्णा तथाश्चर्याभिधानिका।
अशोका शोकसंत्यक्ता दशमी सुषमावहा ॥१०६॥

ता यौवनजवायत्ता रूपसौभाग्यशोभिताः।
भूपो वीक्ष्य निमित्तज्ञमप्राक्षीत्सुखसिद्धये ॥१०७॥

आसां को भविता नाथः कथ्यतां वितथातिगः।
स ब्रूते स्म निमित्तेन युधिष्ठिरं वरं वरम् ॥१०८॥

ताश्च तत्पतिमुन्निद्रा निश्चित्य सुखतः स्थिताः।
तद्वार्तामन्यथा श्रुत्वा समासन्दुःखिताः पुनः ॥१०९॥

अथ तत्र पुरे श्रीमान्मित्राभो मित्रवर्धितः।
प्रियमित्राभिधः स्वेभ्यः श्रेष्ठी श्रेष्ठगुणाग्रणीः ॥११०॥

दयिता सौमिनी तस्य तयोर्जाता सुता वरा।
मृगनेत्रा पवित्रान्तःशुद्धा नयनसुन्दरी ॥१११॥

सुन्दरा सुन्दराकारा सेन्दिरा गुणमन्दिरा।
पूर्वं युधिष्ठिरायासौ पित्रा दत्ता निमित्ततः ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 104 से 112): चंडवाहन और विमलप्रभा के दस पुत्रियाँ थीं। वे सब सुशिक्षिता, विदुषी थीं। उनमें सबसे बड़ी पुत्री का नाम था गुणप्रभा। वह गंभीर थी और गुणज्ञा थी। बाकी की और नौ पुत्रियों के नाम ये थे- सुप्रभा, ह्री, श्री, रति, पद्मा, इन्दीवरा, विश्वा, आश्चर्या, अशोका। ये सभी गुणवती परम शोभा की स्थान थीं, रूप-सौभाग्य से सुशोभित थीं और यौवन अवस्था को प्राप्त हो चुकी थीं। एक दिन उन सबको यौवन-अवस्था में देख राजा ने एक निमित्तज्ञानी से पूछा कि इनका स्वामी कौन होगा। निमित्त-ज्ञानी ने निमित्तज्ञान से कहा कि महाराज, इनका वर युधिष्ठिर नाम पाण्डव होगा। यह बात सुनकर उन गुणवती कन्याओं ने युधिष्ठिर को ही अपना पति निश्चित किया और वे सुख से वहीं रहने लगीं परन्तु कुछ दिनों बाद उन्हें पाण्डवों के सम्बन्ध में कुछ और ही बात सुन पड़ी, जिससे वे बहुत ही दुखी हुईं। यहीं एक सेठ और था। उसका नाम प्रियमित्र था। वह धनी था, श्रीमान् था। मित्र (सूरज) के समान उसकी प्रभा थी। मित्रों के द्वारा वह वृद्धिंगत था। उत्तम गुणवालों में श्रेष्ठ था। उसकी प्रिया का नाम सौमिनी था। उनके नयन सुन्दरी नाम एक कन्या थी। वह मृगाक्षी थी, उसका मानस बहुत ही निर्मल था। वह बड़ी सुन्दरी थी, गुणों की खान थी। राजा की तरह सेठ ने इसकी भी निमित्तज्ञानी के वचन से युधिष्ठिर को देनी कर रक्खी थी ॥१०४-११२॥


सापि तद्दहनं श्रुत्वा खिन्ना ताभिः समं स्थिता।
धर्मध्यानरताः सर्वा बभूवुर्व्रततत्पराः ॥११३॥

राजा श्रेष्ठी सभार्यौ तौ पुरुषान्तरवेदिनौ।
तास्तं दातुं समुद्युक्तौ क्षितौ दुःखभरैः स्थितौ ॥११४॥

अर्थ (श्लोक 113 से 114): अतः वह भी पाण्डवों के जलने की बात सुनकर खेदखिन्न हुई और गुणप्रभा आदि राजपुत्रियों के साथ रहने लगी। इसके बाद ये ग्यारह की ग्यारह ही कन्यायें धर्मध्यान में लीन होकर व्रत-उपवास वगैरह करने लगीं और राजा, सेठ तथा उन दोनों की भार्यायें ये चारों अपनी कन्याओं के ब्याह देने की चिंता में मग्न होकर दुख से अपना समय बिताने लगे। ये मधुरभाषिणी कन्यायें


सर्वपर्वसु ताः प्रीता उपवासं सुदुष्करम्। कुर्वन्त्योऽस्थुः स्थिरा भावैः स्वभावमधुरा गिरा ॥११५॥

एकदा ताश्चतुर्दश्यां प्रोषधं द्व्यष्टयामकम्। गृहीत्वा श्रीजिनागारे वनस्थे विदधुः स्थितिम् ॥११६॥

तत्रैव ता अहोरात्रं धर्मध्यानपरायणाः। व्युत्सर्गविधिसंशुद्धा निन्युः संनिश्चयान्विताः ॥११७॥

जिनचक्रिनरेन्द्राणां ताः कथाः कथनोद्यताः। निशां नीत्वा प्रगे सर्वाश्चक्रुःसामायिकीं क्रियाम् ॥११८॥

अर्थ (श्लोक 113 से 118): सभी पर्व दिनों में स्थिरचित्त से दुष्कर उपवास करती थीं। इसी प्रतिज्ञा के अनुसार इन्होंने एक दिन चतुर्दशी को सोलह प्रहर का उपवास किया और वे एक वन के जिनमंदिर में-जहाँ किसी तरह का कोई उपद्रव न था-गईं। वहाँ उन्होंने धर्म-ध्यान पूर्वक कायोत्सर्ग धर कर रात और दिन को बिताया तथा अपनी आत्मा को शुद्ध किया। उस दिन जिन भगवान् चक्रवर्ती तथा अन्य महापुरुषों की कथाओं और उनके पवित्र जीवन-चरित्रों के श्रवण-पूर्वक रात बिताकर सबेरे उन्होंने सामायिक आदि क्रियाएँ कीं ॥११३-११८॥


ततः प्रोवाच सश्रीका राजपुत्री गुणप्रभा। अत्रैव पारणां शुद्धाः करिष्यामो वयं लघु ॥११९॥

तत्र चेन्मुनिदानेन पारणा सफला भवेत्। तदानीं सफलं जन्म जायतेऽस्माकमुन्नतम् ॥१२०॥

दत्त्वा च मुनये दानं ग्रहीष्यामो वरं तपः। तत्पार्श्वे शुद्धचेतस्का भावयन्तीति भावनाः ॥१२१॥

अहो संसारवैचित्र्यं विद्यते परमं महत्। सुधियामपि जायेत ममत्वं तत्र मोहतः ॥१२२॥

पुनः स्त्रीत्वं भवेन्निन्द्यं भवे दुष्कर्मयोगतः। जातमात्रा तु पितॄणां पुत्री दुःखाय कल्पते ॥१२३॥

अर्थ (श्लोक 119 से 123): इस समय उन सबसे श्रीमती गुणप्रभा राजपुत्री ने कहा कि हम लोग आज यहीं पारणा करेंगी और यदि आज मुनिदान से हमारा पारणा सफल हो गया तो समझो कि जन्म ही सफल हो गया तथा एक बात यह कि मुनि को दान देकर उनके पास से हम उत्तम तप ग्रहण करेंगी। इसके बाद वह शुद्धमना इस प्रकार भावना भाने लगी कि संसार बड़ा भारी विचित्र है, इसमें मोह के वश होकर बुद्धिमान् लोग भी ममत्व करने लग जाते हैं-इसकी विचित्रता से अपने को भूल जाते हैं। फिर भी यहाँ यह स्त्रीपना तो और भी निंद्य है, यह पाप के उदय से प्राप्त होता है ॥११९-१२३॥


वर्धमाना पितुर्दत्ते वरान्वेषणसंभवाम्। चिन्तां विवाहिता सापि पजितां शर्महारिणीम् ॥१२४॥

कदाचिच्छेद्वरो दुष्टो व्यसनी वा क्रियातिगः। मृषावाग्विनयातीतो दुरोदररतः सदा ॥१२५॥

सरोगो विभवातीतः परनारीषु लम्पटः। अन्यायी क्रोधसंबद्धो धर्मातीतोऽतिदुर्मतिः ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 124 से 126): देखो, कन्या के उत्पन्न होते ही तो माता-पिता संकट में पड़ जाते हैं। वे उसके जन्म की खबर पाते ही निसासें डालने लगते हैं और पुत्र की आशा छोड़कर निराशा के समुद्र में गोते लगाने लगते हैं। इसके सिवाय जब वह सयानी होती है तब उन्हें उसके विवाह की चिन्ता में जलना पड़ता है एवं किसी तरह आपत्तियों को सह कर भी वे उसके विवाह से पार पड़े तो उन्हें इस बात की चिन्ता लगी रहती है कि कन्या को पति के समागम से सुख होगा या नहीं। सुख हुआ तब तो अच्छा ही है, अन्यथा कहीं पाप के उदय से वर दुष्ट, व्यसनी, झूठा, लवार, गैरसमझ, अविनयी, अन्यायी, व्यभिचारी, रोगी, दरिद्री, परस्त्री-लंपट, क्रोधी, अधर्मी और दुर्बुद्धि हुआ तब तो उस बेचारी के


ईदृशश्चेद्दुराचारः स्त्रिया दुष्कर्मपाकतः।
तस्या दुःखाय जायेत तद्दुःखं कोऽत्र वेत्त्यहो ॥१२७॥

समीचीनः कदाचित्स सपत्नी दुःखदा भवेत्।
सपत्नीतः परं दुःखं नाभून्न भविता स्त्रियः ॥१२८॥

अर्थ (श्लोक 124 से 128): दुख का पार ही नहीं रह जाता। फिर उस स्त्री के दुखों को-जिसको कि ऐसा पति मिला हो-कौन जान सकता है और माना कि वर निर्दोष भी मिल गया परन्तु कहीं सौत का समागम हो गया तब और भी अधिक दुख का पहाड़ ही उसके सिर पर आ पड़ता है क्योंकि स्त्रियों को जैसा दुख सौत का होता है वैसा दुख संसार में न तो किसको है, न हुआ और न होगा ही ॥१२४-१२८॥


तथा पत्युरमान्या वा वन्ध्या वा युवतिर्भवेत्।
प्रसूतिका कदाचिच्चेद्दुःखं स्याद्गर्भसंभवम् ॥१२९॥

गर्भभारभराक्रान्ता न क्वापि लभते सुखम्।
प्रसूतावामनस्यं कस्तद्दुःखं गदितुं क्षमः ॥१३०॥

अर्थ (श्लोक 129 से 130): इसके सिवाय यदि स्त्री-पति की प्यारी न हुई या बाँझ हुई तब भी दुख ही है और कदाचित् पति को प्यारी हुई और बाँझ भी न हुई तो गर्भवती होने पर नौ महीने गर्भ का दुख होता है। यह तो सभी जानते हैं कि गर्भवती स्त्री को गर्भ के भार के मारे सुख नहीं मिलता। इसके बाद भी जब बाल-बच्चा पैदा होता है तब स्त्री को इतना दुख होता है कि उस दारुण दुख को कोई कह ही नहीं सकता ॥१२९-१३०॥


मृते भर्तरि वैधव्यं तादृशं तदपि स्त्रियाः।
युवतीजन्मजं दुःखं गदितुं कः क्षमो भवेत् ॥१३१॥

विवाहविधिसन्त्यक्ता वयं वैधव्यमागताः।
धिक्स्त्रीत्वं भवभोगैर्नः कृतमन्यच्च श्रूयताम् ॥१३२॥

भर्तुः प्रसादतः स्त्रीणां सफलाः स्युर्मनोरथाः।
धर्मार्थकामजाः सर्वं भर्तृधीनं यतः स्त्रियाः ॥१३३॥

वृथा भर्त्रा विना जन्म स्त्रीभिर्निर्गम्यते कथम्।
अतः संयममाधाय सुखिताः स्याम चालयः ॥१३४॥

शीलसंयमसम्यक्त्वध्यानैः स्त्रीलिङ्गमाकुलम्।
हत्वा नरत्वमासाद्य मुक्तिं यास्याम इत्यलम् ॥१३५॥

अर्थ (श्लोक 131 से 135): इसके सिवाय स्त्री को भारी दारुण दुख पति के मर जाने पर विधवापने का भोगना पड़ता हैं। सच पूछो तो इस दुख के समान संसार में कोई दुख ही नहीं है परन्तु फिर भी जो स्त्रियाँ पतिव्रता होती हैं वे अपने सतीत्व का पालन कर इन कष्टों को भी सह लेती हैं। तात्पर्य यह है कि स्त्री जन्म का दुख कोई कह ही नहीं सकता परन्तु देखिए तो इन दुष्ट कर्म की लीला जो हम सब विवाह न हुए ही विधवा हो गई। अतएव वास्तव में यह स्त्री-पर्याय ही धिक्कार योग्य है और अब सांसारिक भोगों से भी हमारी मनसा पूरी हो गई है। अतः इसके द्वारा हमें कल्याण ही करना उचित है और सुनो कि स्त्री सर्वथा पति के अधीन होती है और इसलिए पति की प्रसन्नता से ही उसके धर्म, अर्थ और कामजन्य मनोरथ सिद्ध होते हैं-वह सुखी होती है। अतः पति के बिना स्त्री का जन्म व्यर्थ है और उसका निर्वाह भी नहीं हो सकता। इसलिए बहिनों, हम जब संयम का शरण लेंगी तभी हमें सुख होगा और तरह सुख मिलने का नहीं। देखो, शील, संयम और सच्चे ध्यान के बल से और तो क्या हम दारुण दुखदायी इस स्त्रीलिंग को छेद कर तथा पुरुष जन्म पाकर मुक्ति को भी पा सकेंगी ॥१३१-१३५॥


तद्वाचमपरा श्रुत्वोवाच दीक्षाप्रशंसिनी।
त्वदुक्तं सत्यमेवात्र किं चान्यच्छ्रूयतां सखि ॥१३६॥

अर्थ: गुणप्रभा के इन वचनों को सुन दीक्षा लेने को उद्यत हुई कोई दूसरी राजपुत्री बोली कि सखी,


पत्युः स्नेहसुखाशार्थं गृहवासो हि केवलम् ।
अबलानां बलं सोऽत्र तं विना का गृहं वसेत् ॥१३७॥

विधवा स्त्री सभामध्ये शोभते न कदाचन ।
अविवेकी यथा मर्त्यो वाथ लोभाकुलो यतिः ॥१३८॥

विधवानां त्रपाकार्य्यञ्जनं ताम्बूलभक्षणम् ।
श्वेतवासो विना नान्यद्भूषावच्छोभते शुभम् ॥१३९॥

मृते गतेऽथवा पत्यौ युवती संयमं श्रयेत् ।
तपसा निर्दहेद्देहं करणानि च सत्वरं ॥१४०॥

भोजनं वसनं वार्ता कौशल्यं जीवनं धनम् ।
स्वस्नेहः शोभते स्त्रीणां विना नाथं कदापि न ॥१४१॥

अर्थ (श्लोक 136 से 141): तुमने जो कुछ भी कहा है वह अक्षरशः सत्य है। उसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। यह सुन गुणप्रभा बोली कि सखी और भी सुनो। देखो, पति के स्नेह से होने वाले सुख की आशा से ही स्त्री घर-गृहस्थी में रहती है और वास्तव में अबला स्त्री के लिए पति ही बल है। फिर उस बल के न होने पर कौन घर-गृहस्थी में रह कर झंझट भोगेगी। सखी, बिना पति के विधवा स्त्री की जनसमाज में उसी तरह शोभा नहीं होती। जिस तरह कि अविवेकी मनुष्य और लोभी साधु की और भी देखो कि विधवा होने पर स्त्री की श्रृंगार करने, अच्छे खाने-पीने आदि बातें लज्जित करने वाली हैं। केवल सफेद वस्त्र के सिवाय और कोई वस्त्र, आभूषण वगैरह उसे शोभा नहीं देता। इसलिए पति के मर जाने या परदेश चले जाने पर स्त्री को उचित है कि वह संयम का शरण ले और तप के द्वारा शरीर को सुखा कर इन्द्रियाँ को जीते। मतलब यह है कि भोजन, वस्त्र, बोलचाल, जीवन, धन और घर-गृहस्थी से प्रेम ये सब बातें पति के बिना स्त्री की शोभा नहीं देतीं ॥१३६-१४१॥


एवं वृत्तेऽत्र वृत्तान्ते तासां संयमकोविदः ।
दमितारिमुनिर्ज्ञानी समायासीज्जिनालये ॥१४२॥

तास्तं योगीन्द्रमावीक्ष्य सहर्षाः कोपवर्जिताः ।
त्रिधा परीत्य सद्‍भक्त्या नेमुस्तत्पादपङ्कजम् ॥१४३॥

कन्या अकथयन्स्वामिन् योगीन्द्रं योगभास्करम् ।
कृपां कृत्वा प्रव्रज्यां नो यच्छ स्वच्छमनोमल ॥१४४॥

अर्थ (श्लोक 142 से 144): इस प्रकार वे सब राजकन्याएँ आपस में विचार कर ही रही थीं कि इतने में ही वहाँ जिनालय में संयम-कुशल और ज्ञानी दमतारि नाम एक मुनि आ गये। उन्हें देखकर वे सब बड़ी प्रसन्न हुई और उन्होंने तीन प्रदक्षिणा देकर भक्तिभाव से उनके चरण-कमलों में नमस्कार किया। इसके बाद वे बोलीं कि स्वामिन्, योगीन्द्र, योगभास्कर और मनोमल रहित स्वच्छ भगवन्! आप कृपा करके हमें दीक्षा-दान दीजिए। हम दीक्षा के लिए बहुत दिनों से उत्सुक हैं। अब आप हमारी, उत्सुकता को मिटाइए ॥१४२-१४४॥


अवदंस्ता यथा वृत्तं मुनीन्द्रं पाण्डवोद्भवम् ।
ज्वलिते भर्तरि श्रेष्ठास्माकं दीक्षा शुभावहा ॥१४५॥

कुलजानां यतः स्त्रीणामेक एव पतिर्भवेत् ।
निशम्येति वचोऽवादीद्योगीन्द्रोऽवधिलोचनः ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 145 से 146): उत्तर में योगीन्द्र ने कहा कि पुत्रियों, सुनो एक तो तुम्हारी अभी बाल्यावस्था है और दूसरे तुम अबला हो, ऐसी अवस्था में तुम सब वैराग्य क्यों धारण करना चाहती हो? इसका कोई कारण होना चाहिए। यह सुन कन्याओं ने मुनीन्द्र को पाण्डवों पर बीती हुई सारी कथा कही और कहा कि जब हमारे पति मर चुके हैं तब हमारे लिए दीक्षा लेना ही श्रेष्ठ है, शुभ है और इसी में हमारा कल्याण भी है क्योंकि कुलीन नारियों का एक ही पति होता है। कन्याओं के इन वचनों को सुनकर उन अवधिज्ञानी


एष्यन्ति ते मुहूर्त्तान्ते पाण्डवाः पञ्च पावनाः।
योक्ष्यध्वे तैः समं यूयं स्थिरा भवत सांप्रतम् ॥१४७॥

अर्थ (श्लोक 145 से 147): मुनि ने कहा कि तुम अभी ठहरो। देखो, अभी एक क्षण में ही पवित्रात्मा पाँचों पाण्डव यहीं आये जाते हैं और उनके साथ अभी तुम्हारा समागम होता है ॥१४५-१४७॥


इत्युक्ते सज्जनास्तत्र विस्मयव्याप्तचेतसः।
दध्युः कथं समायातिस्तेषां हि ज्वलितात्मनाम् ॥१४८॥

तावता पाण्डवाः पञ्च पवित्राः समुपागताः।
निःसहीति प्रकुर्व्वन्ति श्वेतवासोवहाः पराः ॥१४९॥

नुत्वा नत्वार्चयित्वा च जिनेन्द्रप्रतियातनाः।
मुनिं ववन्दिरे भूपा भक्तिसंदोहभाजनम् ॥१५०॥

शशंसुस्ता मुनीन्द्रस्य बोधिं सद्बोधभागिनः।
अहो बोधो मुनीन्द्रस्य सर्वलोकप्रकाशकः ॥१५१॥

पुनः कन्याः समावीक्ष्य युधिष्ठिरमहीपतिम्।
बिडौजःसदृशं श्रीभिर्युतं तुतुषुरद्भुतम् ॥१५२॥

अर्थ (श्लोक 148 से 152): मुनिराज के इन वचनों को सुनकर वहाँ जितने श्रावक थे वे सब बड़े अचम्भे में पड़ गये। वे सोचने लगे कि भला जले हुए पाण्डव कैसे अभी यहाँ आये जाते हैं। सब इसी सोच-विचार में उलझ रहे थे कि इतने में पवित्रात्मा पाँचों पाण्डव सफेद वस्त्र पहिने हुए निःसहि-निःसहि कहते हुए वहीं आ पहुँचे और आते ही उन्होंने मुनिराज को नमस्कार किया तथा स्तुति कर उन्होंने उनकी भक्तिभाव से पूजा की। वे भक्ति के भाजन थे और मुनियों को जिन भगवान् का प्रतिनिधि जानते थे। पाण्डवों को देखकर सब कन्यायें मुनिराज के ज्ञान की प्रशंसा करने लगीं कि देखो, इन प्रभु का ज्ञान कितना बड़ा है कि ये सारे लोक को जानते हैं-इनसे कोई बात छुपी नहीं है। धन्य है ज्ञान की महिमा, जिसके द्वारा कि हो गई, हो रही और होने वाली सभी बातें सामने आ जाती हैं। इसके बाद इन्द्र जैसे और अद्भुत श्री-युक्त युधिष्ठिर महाराज को देखकर उन सब कन्याओं को बड़ा सन्तोष हुआ ॥१४८-१५२॥


आगतान्नृपतिश्श्रुत्वा पाण्डवांश्चण्डवाहनः।
धराधीशो मतिं दधे तत्र गन्तुं समुत्सुकः ॥१५३॥

घनगर्जनसंकाशैरातोद्यैर्दीप्तदिङ्मुखैः।
घोटकैः सुघटाटोपैरायातान्मिलितुं नृपः ॥१५४॥

छत्रच्छन्नमहाव्योमा शोभमानगुणोत्करः।
तत्रैत्येष्ट्वा जिनान्युक्त्या दमंतारिं ननाम च ॥१५५॥

पुनः स क्षितिपो भक्त्या समुत्थाय नरेश्वरान्।
गाढमालिङ्ग्य लक्ष्मीशो ननाम नतमस्तकः ॥१५६॥

अर्थ (श्लोक 153 से 156): उधर चंडवाहन राजा ने ज्यों ही पवित्र पाण्डवों के आगमन को सुना त्यों ही उसे उनसे मिलने की बड़ी उत्सुकता हो उठी और उससे फिर एक मिनट भी न रहा गया। अतः वह गुणों का भण्डार वहाँ से उसी समय उनके दर्शन के लिए चल पड़ा। उसके सिर पर छत्र लग रहा था और आगे आगे मेघ की तरह गर्जन वाले बाजे बजते जाते थे तथा साथ में सुन्दर-सुन्दर बहुत से घोड़े थे। उसने वहाँ जाकर पहले मुनिराज को नमस्कार किया-उनकी वन्दना की और बाद मस्तक झुकाकर पाँचों पाण्डवों का गाढ़ आलिंगन किया-उनसे भेंट की ॥१५३-१५६॥


विपुलं कुशलं सर्वेऽन्योन्यं प्रष्टुं समुद्यताः।
साधर्मिणां हि वात्सल्यं परं स्नेहस्य कारणम् ॥१५७॥

अर्थ: इसके बाद सबने परस्पर में एक दूसरे से कुशल-वार्त्ता पूछी। ऐसा करने से आपस में प्रेम बढ़ता है, अतएव ऐसा करना ही चाहिए क्योंकि साधर्मी भाइयों के साथ वात्सल्य दिखाने से चित्त में बड़ी प्रसन्नता और स्नेह होता है-एक दूसरे के प्रति निजी भाव पैदा होता है और फिर धीरे-धीरे आत्मबल


किंवदन्तीं विधायाथ विविधां कुशलस्य च। तैः समं नृपतिर्भेजे पुरं पुत्रीसमन्वितः ॥१५८॥

भोज्यभोजनभावेन भोजयित्वा स्ववेश्मनि। तान्भूपः प्रार्थयामास विवाहार्थं युधिष्ठिरम् ॥१५९॥

अर्थ (श्लोक 157 से 159): बढ़ता जाता है। यहाँ तक कि वह शत्रु, मित्र सबको एक दृष्टि से देखने लगता है। इसके बाद राजा उनको साथ लेकर पुत्रियों सहित नगर को चला आया। वहाँ उसने भोजन आदि से उनका खूब आदर किया और उन्हें अपने एक महल में ठहरा दिया। इसके बाद उसने युधिष्ठिर से विवाह के लिए प्रार्थना की ॥१५७-१५९॥


ततो मङ्गलनादेन नदन्तमिव मण्डपम्। नृत्यन्तं च नटीन्नृत्यैर्हसन्तमिव मौक्तिकैः ॥१६०॥

वदन्तमिव मालाभिर्मन्वानमिव मञ्चकैः। अन्यान्निर्माप्य भूमीशो विवाहं विदधे वरम् ॥१६१॥

विवाहमङ्गलोद्भासिशतकुम्भीयकुम्भकाः। शोभन्ते मण्डपे रम्ये विवाहसमये तदा ॥१६२॥

युधिष्ठिरस्तु पुण्येन समाप पाणिपीडनम्। प्रतीपदर्शिनीनां वै तासां मङ्गलनिस्वनैः ॥१६३॥

ताः कन्या नृपतिं प्राप्य पार्श्वस्थाश्चातिरेजिरे। कल्पवल्ल्यो यथा कल्पपादपं कल्पितार्थदम् ॥१६४॥

अहो पुण्यद्रुमः सातं फलतीहान्यजन्मनि। ततो वृषो विधातव्यो विविधार्थो वृषार्थिभिः ॥१६५॥

अर्थ (श्लोक 160 से 165): चंडवाहन ने विवाहोत्सव के लिए एक बड़ा सुंदर मंडप बनवाया, जो मंगल-नादों से शब्द-मय और नटियों के नृत्यों से नृत्य-मय हो रहा था। उसमें जो मोतियों की झालरें लगी थीं उनसे वह हँसता हुआ सा दीखता था, लटकती हुई मालाओं से बोलता हुआ सा जान पड़ता था और तख्तों से आदर करता हुआ सा देख पड़ता था। विवाह के समय उसमें विवाह-मंगल के सूचक सोने के सुन्दर कलश सजाये गये थे, जिनसे उसकी अपूर्व ही शोभा हो गई थी। ऐसे सुन्दर मन को मोहने वाले अपूर्व मंडप में राजा चंडवाहन ने विवाहोत्सव किया। इसके बाद युधिष्ठिर ने पुण्योदय से मंगल-गीतों की मधुर ध्वनि के साथ उन ग्यारह ही कन्याओं के साथ विवाह किया-उनका पाणिग्रहण किया। उस समय युधिष्ठिर के पास में खड़ी हुई वे कन्यायें ऐसी शोभती थीं मानों वाञ्छित अर्थ को देने वाले कल्पवृक्षों के पास में खड़ी हुई कल्पलतायें ही हैं। यहाँ ग्रन्थकार कहते हैं कि जीवों को इस लोक और परलोक में जो सुख मिलता है, वह सब पुण्य-वृक्ष का ही फल है। इसलिए जो सुख चाहते हैं उन्हें सदा धर्म में लगा रहना चाहिए ॥१६०-१६५॥


इत्थं पुण्यविपाकतो नरपतिर्युद्धे स्थिरः सुस्थिरः
विख्यातस्तु युधिष्ठिरो वरवधूलाभेन संलम्भितः।
देशेऽशेषपुरे वने प्रविपुले संपूजितो भूमिपैः
वामाभिर्वरवाञ्छितार्थफलदो रेजे यथा देवराट् ॥१६६॥

अर्थ: देखो, यह सब पुण्य का ही फल है, जिससे कि युधिष्ठिर सारे संसार में युद्ध में पीछे पाँव नहीं देने वाले प्रसिद्ध हुए। उन्हें श्रेष्ठ बन्धुओं का लाभ हुआ। वे देश, विदेश, भयानक वन-जंगलों में जहाँ कहीं गये वहीं राजाओं महाराजाओं ने उनका आदर किया, स्त्रियों ने उनकी पूजा की और उन्हें अपना पति बनाया। वह युधिष्ठिर वाञ्छित फल को देने वाले इन्द्र के जैसे सुशोभित हुए और भी देखो कि


क्वास्ते हस्तिपुरं सुहस्तिनिनदैः संनन्दितं सर्वदा
क्वास्ते कौशिकपत्तनं क्व वनितालाभः सतां संमतः।
कौशाम्बी च पुरी क्व विन्ध्यतनया त्रिःशृङ्गसत्पत्तनम्
क्वास्त्येकादशकामिनीसुपतिता क्वैतत्फलं पुण्यजम् ॥१६७॥

अर्थ (श्लोक 166 से 167): कहाँ तो हाथियों के नादों से शब्दमय होने वाला हस्तिनापुर है-और कहाँ कौशाम्बीपुरी जहाँ से युधिष्ठिर को कन्या का लाभ हुआ, कहाँ कौशाम्बीपुरी जहाँ से उन्हें बसन्तसेना मिली और कहाँ त्रिशृंगपुर जहाँ से उन्होंने ग्यारह सुंदरियाँ लाभ कीं। यह सब क्या है, इस प्रश्न का उत्तर यही है कि पुण्य का फल ॥१६६-१६७॥ इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचंद्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में पाण्डवों का परदेश गमन का और युधिष्ठिर को कन्यालाभ का वर्णन करने वाला तेरहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१३॥

चतुर्दशं पर्व

पुष्पदन्तं सुकुन्देन्दुपुष्पदन्तं जिनेश्वरम्।
पुष्पदन्ताभमानौमि पुष्पदन्तातपङ्कजम् ॥१॥

अर्थ: उन पुष्पदन्त भगवान् को प्रणाम है, जिनके दाँत कुन्द के पुष्प-तुल्य हैं, कान्तिशाली हैं, जिनके शरीर का वर्ण भी कुन्द के पुष्प के जैसा निर्मल है और जो संसार के प्राणियों को निर्मल-कर्ममल रहित करते हैं। वे मुझे निर्मलता प्रदान करें ॥१॥


ततश्चेलुर्महाचित्ताश्चञ्चला मलवर्जिताः।
पश्यन्तः परमां शोभां वीथीनां व्यथयातिगाः ॥२॥

क्रमेण ते महारण्यं शरण्यं सुशरीरिणाम्।
विकटाटोपसंछन्नं पाण्डवाश्च प्रपेदिरे ॥३॥

पिपासापीडितो भूपो मार्गजातश्रमेण च।
सूरतापपरिश्रान्तः समभूत्स युधिष्ठिरः ॥४॥

अहो भीम पदं दातुं न शक्नोमि तृषातुरः।
स्थातव्यमत्र सर्वैश्च समुच्चार्येति संस्थितः ॥५॥

तदा तद्दुःखमक्ष्णा न क्षमो द्रष्टुं विकर्तनः।
प्रतीचीं दिशमातस्थौ कः पश्येन्महदापदम् ॥६॥

तदा तिमिरवृन्देन व्याप्तः सर्वदिशां चयः।
जलाक्तकज्जलाभेन मधुव्रतसमात्मना ॥७॥

तदा ब्रूते स्म भूपालः पिपासापरिपीडितः।
रे भीम नीरानीय मत्तृषां विनिवारय ॥८॥

तृषासक्ता न संसक्ताः शरीरपरिरक्षणे।
सरणीं सर्तुमुद्युक्ता न भवन्ति कदाचन ॥९॥

इत्युक्त्वा धर्मजस्तस्थौ स्थिरायां स्थिरमानसः।
तादृशं तं समावीक्ष्य भीमोऽभूद्भयविह्वलः ॥१०॥

सलिलं स समानेतुं तत्र संस्थाप्य सोदरम्।
इयायान्यामरण्यानीं करकाक्रान्तसत्करः ॥११॥

अर्थ (श्लोक 2 से 11): इसके बाद गंभीर पाण्डव आनन्द-चैन से त्रिश्रृंगपुर के गली-बाजारों वगैरह की सुंदर शोभा को देखते हुए वहाँ से चले और एक महान् अरण्य में पहुँचे, जो उत्तम प्राणियों का शरण और वृक्षावलि से प्रच्छन्न था। वहाँ मार्ग की थकावट और सूरज की गर्मी से युधिष्ठिर को प्यास की पीड़ा सताने लगी। उन्होंने पीड़ित होकर भीम से कहा कि प्यारे भीम, मुझे बहुत प्यास लग रही है और उसके कारण अब मैं आगे एक कदम भी नहीं जा सकता हूँ। इसलिए तुम सब कुछ देर तक यहीं ठहर जाओ। यह कह कर युधिष्ठिर पृथ्वी पर बैठ गये। उनके इस समय के प्यास के दुख को सूरज भी अपनी आँखों से देख न सका, सो इसलिए मानो वह पच्छिम की ओर अस्ताचल पर जाकर छिप गया। बात भी यही है कि दुर्द्धर आपत्ति किसी से देखी नहीं जाती। सूरज के अस्त होते ही भौरों के समान बिल्कुल काले अंधेरे के समूह ने सभी दिशाओं पर अपना अधिकार जमा लिया। इस समय प्यास से अत्यन्त दुखी होकर युधिष्ठिर ने पुनः भीम से कहा कि भाई भीम, तुम जल्दी जाओ और कही से ठंडा जल लाकर मेरी प्यास को शान्त करो। तुम्हें यह नहीं मालूम कि प्यासा पुरुष न तो मार्ग ही तय कर सकता है और न अपने शरीर की ही रक्षा कर सकता है। इतना कह कर कष्ट से युधिष्ठिर वहीं भूमि पर लेट गये। उनकी ऐसी अवस्था देखकर भीम बड़ा भयात्तुर हुआ और वह उसी समय बर्तन ले, जल लाने के लिए दूसरे वन में गया ॥२-११॥


जलकल्लोलमालाढ्यं विकसत्सुकुशेशयम्।
क्वचिद्धंससमूहेन हसन्तं कोकनिस्वनैः ॥१२॥

अर्थ: दैवयोग से वहाँ पहुँचते ही उसे एक सुन्दर तालाब दीख पड़ा। उसे देखकर उसके हृदय का


वदन्तं विस्फुराकारनानामुक्ताफलान्वितम्। आह्वयन्तं तृषा क्षुण्णान्रान्कल्लोलसत्करैः ॥१३॥

तत्र पद्माकरं वीक्ष्य भीमोऽभूद्भीतिवर्जितः। कमलाक्रान्तसद्वक्त्रं करकं कमलैर्भृतम् ॥१४॥

कृत्वादाय त्वरां तत्र पावनिः पवनो यथा। यावदायाति तावच्च न्यग्रोधतलसद्भुवि ॥१५॥

सुप्तः पिपासया ज्येष्ठः पीडितः स युधिष्ठिरः। तं सुप्तं मारुतिर्वीक्ष्य विषसाद हृदा तदा ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 12 से 16): भाव कम हुआ। तालाब हंसो के द्वारा हँसता हुआ और चकवे चकवी के शब्दों द्वारा बोलता हुआ जान पड़ता था। उसमें तरंगें लहरा रही थीं और सुन्दर कमल खिल रहे थे। वह लम्बा-चौड़ा भी खूब था। उसके किनारों पर सघन वृक्षावलि उसकी अपूर्व ही शोभा बढ़ा रही थी। भाँति-भाँति के वृक्षों के फल उसमें उतरा रहे थे। वह अपनी अतीव चंचल लहरों से ऐसा जाना जाता था मानों तरंग-रूपी हाथों के इशारे से प्यास बुझाने के लिए प्यासे पुरुषों को ही बुला रहा है। भीम ने उसमें से जल भर लिया और कमल से बर्तन का मुँह ढक वह पवन की तरह तेजी से वापस गया परन्तु वह जल्दी न जा सका। युधिष्ठिर इसके पहले से ही प्यास से बड़े पीड़ित होकर एक बरगद के पेड़ के नीचे सो गये थे। उनको सोया देखकर भीम के हृदय में बड़ा विषाद हुआ ॥१२-१६॥


अहो संसारवैचित्र्यं विषमं सर्वदेहिनाम्। दृष्टमात्रप्रियं सद्यः कुड्यालिखितचित्रवत् ॥१७॥

संसारनाटके नाट्यं नटन्ति सुनटा इव। नराः कर्मविपाकेन प्रेरिताः पावना अपि ॥१८॥

यः कौरवनृपेशानः पाण्डवानां महीपतिः। सोऽयं संस्तरमाधाय प्रसुप्तः किं विधीयते ॥१९॥

न वक्ति परमादत्ते नाट्यं किं न नेक्षते। वयं कर्तव्यतामूढा विस्मरामः स्मयावहाः ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 17 से 20): वह सोचने लगा कि इस संसार की विचित्रता बड़ी विषम है। वह जीवों को भीत में लिखे हुए चित्र की तरह केवल देखने में प्यारी लगती है परन्तु वास्तव में उसमें कुछ भी तथ्य नहीं है। देखो, इस संसार-रूप नाटक में कर्म के उदय की प्रेरणा से पवित्रात्मा पुरुष भी सुघर नट की तरह स्वांग बना-बना कर नाचते हैं और दुखों का भार सिर पर ढोते हैं। अधिक क्या कहा जावे यहीं देख लो कि जो कौरवों का स्वामी है और पाण्डव जिसको अपना राजा मानते हैं, वही आज यहाँ जमीन का विस्तर लगाकर सो रहा है और जिसे अपने तन वदन की भी सुध तक नहीं है। वह न बोलता है, न कुछ लेता देता है और न कुछ खाता-पीता ही है और तो क्या वह किसी की ओर दृष्टिपात तक नहीं करता है। इस समय मुझे कोई उपाय नहीं सूझ पड़ता कि मेरा इस समय कर्तव्य क्या है। वास्तव में मैं इस समय कर्तव्य-विमूढ़ सा हो रहा हूँ ॥१७-२०॥


चिन्तयन्निति यावत्स समास्ते विपुलोदरः। तावत्कश्चित्खगस्तत्र कन्यामादाय चागमत् ॥२१॥

स वीक्ष्य पक्वबिम्बोष्ठीं चन्द्रवक्त्रां सुलोचनाम्। मालूरपीनवक्षोजां हृदि तामित्यतर्कयत् ॥२२॥

अहो इयं सुलक्ष्मीः किं किं वा मन्दोदरी परा। किं वा सीता शची किं वा किं वा पद्माथ रोहिणी ॥२३॥

अर्थ (श्लोक 21 से 23): भीम इस प्रकार विचार कर रहा था कि इतने में उसके पास अपनी कन्या को साथ लिए एक विद्याधर वहीं पहुँचा। उस पके हुए बिंबा-फल के समान ओठों वाली, चन्द्र-वदनी, सुलोचना और कठिन तथा गोल कुचों वाली कन्या को देखकर भीम मन ही मन विचार ने लगा कि यह लक्ष्मी है


तावदाह खगाधीशो नत्वा तत्पादपङ्कजम्। देवेमां धारय त्वं हि कन्यापाणिप्रपीडनैः ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 21 से 24): या मंदोदरी, सीता है या शची, एवं पद्मा है या रोहिणी। यह कितनी सुंदरी है इतने में उसके चरण-कमलों में प्रणाम कर वह विद्याधर राजा बोला कि देव, आप विधि-पूर्वक विवाह कर इस कन्या को ग्रहण कीजिए ॥२१-२४॥


कस्त्वं कस्मात्समायासीः का कन्या कस्य चात्मजा। कथं ददासि मां ब्रूहि भीमोऽभाषीदिति स्फुटम् ॥२५॥

सोऽवोचन्मारुते वृत्तमस्याः कर्णय सातदम्। संध्याकारपुरं चात्र संध्याजलदभासुरम् ॥२६॥

त्रिसंध्यासाधने सक्ताः सद्धियो यत्र चासते। हिडिम्बवंशसंभूतो वैरिवारणसद्धरिः ॥२७॥

सिंहघोषो नृपस्तत्र शोभते सिंहघोषवत्। तत्प्रिया हरिणीनेत्रा लक्ष्मणा लक्षणैर्युता ॥२८॥

या वक्ति परमां वाणीं यया कामोऽपि जीवति। तत्सुता च हिडिम्बाख्या या रतिं सुविडम्बयेत् ॥२९॥

कदाचिद्धृततारुण्यां दीप्तसंभिन्नतामसाम्। लावण्यसरसीं तारां गतिनिर्जितदन्तिनीम् ॥३०॥

वाससंस्थापितात्यन्तमदनां स्वशरीरके। कामाडम्बरदण्डेन सदा तां च विडम्बिताम् ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 25 से 31): यह सुनकर भीम ने उससे पूछा कि तुम कौन हो ? कहाँ से आये हो ? यह कन्या कौन है और इसके माता-पिता कौन हैं ? एवं तुम यह कन्या मुझे क्यों-देते हे ? कृपा कर आप मेरे इन प्रश्नों का उत्तर-दीजिए। फिर विचार करके मैं आपकी बात का उत्तर दूँगा। इस पर विद्याधर बोला हे महाभाग ! सुनिए, मैं इस कन्या के चरित को कहता हूँ, जो कि बहुत उत्तम और सुखकर है। राजन्! यहाँ एक संध्याकार नाम का पुर है। वह सायंकाल के मेघों की रंग-बिरंगी छटा से युक्त है। वहाँ पर तीनों संध्याओं में आत्म-साधन करने वाले सिद्ध योगीजनो का निवास है। वहाँ का राजा सिंहघोष है। वह हिडंव-वंशी है और वैरी-रूपी हाथियों के लिए सिंह है। उसकी रानी का नाम है लक्ष्मणा। वह भी उत्तम लक्षणों वाली और मृगाक्षी है। वह इतनी मधुर और प्यारी बोलने वाली है कि जिसकी बोली सुनकर कामदेव भी जीवित हो जाता है। उसी की यह रति को भी जीतने वाली हिडंवा नाम कन्या है। यह रूप-लावण्य की सरसी है, शरीर की कान्ति से अँधेरे को दूर करती है, मंदगति से हथिनी की चाल को जीतती है। यह यौवन अवस्था को प्राप्त है, कामदेव का निवास-स्थान है और इसी कारण सदाकाल कामदेव की विडम्बना को अपने सुन्दर शरीर द्वारा भोग रही है ॥२५-३१॥


हिडिम्बां भूषणैर्भूष्यां क्रीडन्तीं कन्दुकेन च। सखीभिः खेचरो वीक्ष्याचिन्तयच्चेति चेतसि ॥३२॥

को वरो भविता ह्यस्याः समरूपः समक्रियः। समशक्तिः समाचारः समशीलः समप्रियः ॥३३॥

इत्यातर्क्य समाहूय दैवज्ञं भाविवेदिनम्। को वरो भवितेत्यस्याः समप्राक्षीत्खगाधिपः ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 32 से 34): सब प्रकार शोभा-सम्पन्न यह कन्या एक दिन सुंदर वस्त्राभूषण पहिने अपनी सखी-सहेलियों के साथ गेंद खेल रही थी। इसको खेलती देखकर सिंहघोष ने मन ही मन विचार किया कि अब यह युवती हो गई है, अतः किसी योग्य वर के साथ इसका अति शीघ्र ही ब्याह कर देना चाहिए। वह वर इसी के समान रूपशाली, शक्तिशाली, सुंदर आचार-विचार वाला, अच्छे स्वभाव का और प्रीतिपात्र होना चाहिए। यह सोच कर उसने भविष्य के ज्ञाता निमित्तज्ञानी से पूछा कि हिडंवा का वर


समावेद्य निमित्तेन स चाभाषीष्ट भूमिपम्। यः पिशाचवटस्याधः स्थित्वा जागर्ति निश्चितम् ॥३५॥

स वरो भविताप्यस्याः प्रचण्डभुजविक्रमः। पुनर्निशाचरं चौरं यो जेष्यति वटस्थितम् ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 32 से 36): कौन होगा? उसने विचार कर उत्तर दिया कि जो महान् पुरुष पिशाचवट के नीचे ठहर कर निश्चिन्त हुआ जागता रहेगा वही पुरुष इसका वर होगा अथवा जो वटवृक्ष में रहने वाले पिशाच को अपनी भुजाओं के विक्रम से जीतेगा वह इसका वर होगा ॥३२-३६॥


सुभटः सुघटो वैरिकटको विटपस्थितः। स भर्ता भविता नूनं हिडिम्बायाः सुडम्बरः ॥३७॥

ततः प्रभृति तेनाहं प्रेक्षणे रक्षितोऽत्र च। निद्रामुक्तं समावीक्ष्य त्वामिमामानयं त्वरा ॥३८॥

त्वं स्वामिन्संधराधीश धारयोद्धृत्य धार्मिक। धरां धृतिं धियं सिद्धिं यथा धत्से तथा त्विमाम् ॥३९॥

मा विलम्बय बुद्धीश हिडिम्बां हिण्डनोद्यताम्। शर्मोपयम्य भुङ्क्ष्व त्वं सुशिक्षाविविधवेदकः ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 37 से 40): इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। निमित्तज्ञानी के इन वचनों पर भरोसा करके सिंहघोष राजा ने मुझे तभी से यहाँ रख छोड़ा है। अतः आपको यहाँ जागते हुए देखकर मैं इसे यहीं ले आया हूँ। स्वामिन्! जिस तरह आप धरा, धृति, बुद्धि, सिद्धि आदि को ग्रहण किये हुए हैं उसी तरह इसको भी ग्रहण कीजिए। हे बुद्धिमान् धर्मात्मा और हित-अहित के जानकार विद्वान्, आप अब देर न कर जल्दी इसे स्वीकार कर, स्वर्गीय सुखों का अनुभव कीजिए ॥३७-४०॥


हिडिम्बापि त्रपां हित्वा बम्भूणीति स्म तं तदा। आडम्बरेण वेगेन हिडिम्बां मां वृणु त्वकम् ॥४१॥

मा विचारय चित्ते त्वं विचारोऽन्योऽत्र वर्तते। वटे सविटपे नाथ पिशाचो वावसीति च ॥४२॥

किंच कश्चित्खगो गच्छन्खे क्षिप्ताखिलविद्यकः। विद्यां साधयितुं तस्थौ विकटे वटकोटरे ॥४३॥

मथ्नाति मानवान्मूढो मानी स नियमस्थितः। मथिष्यति तथा मध्यं ममापि विक्रमोत्कटः ॥४४॥

तावकं भणितं श्रुत्वा पिशाचोऽचिन्त्यविक्रमः। कोपं यास्यति कोपात्मा त्वं तूष्णीं भव जीवन ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 41 से 45): हिडंवा ने भी संकोच छोड़कर कहा कि स्वामिन्! आप मेरा पाणिग्रहण करने में विलम्ब न कीजिए और न दिल में कुछ संदेह कीजिए। यह शीघ्रता इसलिए की जाती है कि इस विशाल वटवृक्ष में एक पिशाच रहता है। वह बड़ा दुष्ट है। दूसरे एक विद्याधर एक दिन आकाश में जा रहा था सो इसके नीचे आते ही न जाने कैसे उसकी सारी विद्याएँ नष्ट हो गई। अतः वह भी विद्या साधने के लिए यहीं रहता है। वह बड़ा मानी और मूढ़बुद्धि है। वह मनुष्यों को कष्ट दिया करता है। वह मुझे भी कष्ट देने लगेगा और हे विक्रमशाली वीर, आपके वचनों को सुनकर अचिंत्य विक्रम वाला वह पिशाच क्रोधित भी होगा क्योंकि वह बड़ा भारी क्रोधी है-उसे क्रोध आते देर नहीं लगती। इसलिए जीवनाधार, अब आप कुछ न कह कर मुझे स्वीकार कीजिए ॥४१-४५॥


इत्याकर्ण्यावगण्योक्तं तस्या जगर्ज गर्जनैः। स्फोटयन् स श्रुती तस्य संस्फूर्जथुरिवोन्नतः ॥४६॥

यमराज इवोन्मादमदिष्णुर्मदमेदुरः। भीमो बभाण भीमात्मा पिशाचाकर्षणं वचः ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 46 से 47): हिडंवा के इन वचनों को सुनकर भीम ने वज्र के शब्द जैसी बड़ी भारी गर्जना की, जो कि उस पिशाच के कानों को फाड़ देने वाली थी। मदोन्मत्त यमराज की भाँति मानी भीमात्मा भीम


एह्येहि चात्र संत्रस्त बलं दर्शय दोर्भवम्।
भावत्कं येन दृप्तेन त्वया संत्रासिता नराः ॥४८॥

इत्याकर्ण्य महाघोषं ह्लादिनीघोषसंनिभम्।
दधाव पावनिं भीमं निशाचौरो निशाचरः ॥४९॥

कुर्वन्किलकिलारावं कालास्यः कालदर्शनः।
पिशाचः पावनिं योद्धुमुत्तस्थे क्रोधनिष्ठुरः ॥५०॥

अर्थ (श्लोक 46 से 50): पिशाच को बुलाने के लिए बोला कि हे पिशाचराज ! यहाँ आकर अपनी भुजाओं के पराक्रम को दिखाइए, जिसके अभिमान में आ तुम लोगों को कष्ट दिया करते हो। भीम के वज्र जैसे महान् निर्घोष को सुनकर यम सदृश और काले मुँह का वह भयानक निशाचर पिशाच भीम के पास आया और किलकारियाँ मारता हुआ क्रोध से भीम के साथ लड़ने को तैयार हुआ ॥४६-५०॥


भीमोऽभाणीत्पिशाचेश संगरे संगरोद्यत।
सज्जो भव विलम्बेन त्वया संत्रासिता नराः ॥५१॥

इत्युक्त्वा तौ समालग्नौ योद्धुं संक्रुद्धमानसौ।
धरन्तौ च महाधाष्टर्यं शब्दसंभिन्नपर्वतौ ॥५२॥

जघ्नतुर्घनघातेन बाहुजेन परस्परम्।
वज्रमुष्टिप्रपातेन चूर्णयन्तौ शिलामिव ॥५३॥

चरच्चरणघातेन मारयन्ता मदोद्धतौ।
क्षेपिष्ठौ क्षिप्रमावीक्ष्य क्षिपन्तौ सुक्षितौ क्षणात् ॥५४॥

युयुधाते सुयोद्धारौ भौमौ भीमनिशाचरौ।
तावता खचरो योद्धुमुत्तस्थे च हिडिम्बया ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 51 से 55): उसको देखते ही भीम बोला कि पिशाचेश, अब देर न करो और जल्दी से द्वंद्व युद्ध के लिए तैयार हो। रे पशुघातक, तू अपने गर्व को दूर कर दे, नहीं तो अभी तेरे गर्व को खर्व किये देता हूँ। इसके बाद वे दोनों खूब क्रोध में भरे हुए और अपने शब्दों से पर्वतों को भी भेद डालने वाले शब्दों को करते हुए एक दूसरे से लड़ने लगे। वे वज्र के प्रहार से पर्वत की तरह एक दूसरे को जबरदस्त मुष्टि के प्रहार से गतविक्रम करने लगे एवं वे मद से उद्धत हुए पाँव के प्रहार से पृथ्बी पर एक दूसरे को गिराने लगे। इस तरह उन दोनों में खूब युद्ध हुआ। उन दोनों का युद्ध तो समाप्त ही नहीं हो पाया था कि इस बीच में वह विद्याधर भी, जो कि विद्या साधने के लिए वटवृक्ष में रहता था, हिडंवा के पास आकर नाना भूषणों से मंडित हिडंवा को पीड़ा देने लगा ॥५१-५५॥


विडम्बयितुमारेभे हिडिम्बां तां स मण्डिताम्।
आह खेचरि कोऽन्यस्त्वां मय्यहो परिणेष्यति ॥५६॥

तद्धोर्धारणधीरत्वं यावद्धत्ते खगेश्वरः।
तावज्जघान तं भीमो मुष्ट्या दक्षिणदोर्भुवा ॥५७॥

निशाचरः पुनः क्रोधात्पृष्टे तेन हतस्तदा।
अस्रपो निस्त्रपः पाप्मा पतितोऽपि समुत्थितः ॥५८॥

क्रव्यादं तं समुत्सार्य खेचरो भीमसन्मुखम्।
युयुधे युद्धसंबद्धो विधुरं कर्तुमुद्यतः ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 56 से 59): वह उससे बोला कि आश्चर्य है हिडंवा, मेरे यहाँ होते हुए कोई दूसरा ही तुझे ब्याहे। यह कह उस खेचर ने ज्यों ही हिडंवा को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाये त्यों ही भीम ने उसे अपने दाहिने हाथ के घूंसे से दूर हटा दिया और उधर पिशाच की पीठ में एक जोर की लात मार कर उसे भी नीचे गिरा दिया परन्तु वह निर्लज्ज पापी पुनः उठ खड़ा हुआ और लगा लड़ने। इतने में दौड़ कर वह विद्याधर भी आ गया, जिसको कि भीम ने घूंसे से दूर हटा दिया था और पिशाच को हटा कर स्वयं भीम से खूब ही मुस्तैदी के साथ लड़ने लगा। इधर इन दोनों का युद्ध हो रहा था। उधर क्रोध से लाल हुए उसे पिशाच को भी कब चैन पड़ने वाली थी, अतः वह भी भीम के ऊपर झपट रहा था। भीम उसका


क्रव्याद्रक्रममाक्रम्य पाद्घातेन पातितः ।
क्रव्यादो भीमसेनेन पृष्ठौ संचूर्णितः क्षणात् ॥६०॥

खेचरोऽपि क्षणार्धेन चूर्णितस्तेन भूभुजा ।
दुःखीभूतो बलातीतः कृतोऽभूत्परवेपथुः ॥६१॥

ततः प्रणम्य भीमेशं संक्षमाप्य खगेश्वरः ।
सिद्धविद्योऽगमद्गेहं गृहीत्वा तद्गुणान्वरान् ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 56 से 62): भी प्रतिकार करता जाता था। उसे गिरा कर भीम ने पहले के जैसा ही उसे जमीन पर गिर पड़ने पर न छोड़ दिया किन्तु उसकी पीठ के ऊपर अपना पाँव पूरी तौर से जमा रक्खा एवं क्षणभर में उसने उस विद्याधर का भी मान-मद चूर डाला, जिससे वह निर्बल बड़ा दुखी हुआ। उसका शरीर काँपने लगा। इसके बाद उसने भीम को प्रणाम कर उससे अपने अपराध की क्षमा कराई और उससे कितने ही गुणों को ग्रहण करके वह विद्या को सिद्ध कर अपने घर चला गया ॥५६-६२॥


समुत्थितेन ज्येष्ठेन हिडिम्बाऽम्बरेण च ।
आपादिता सुभीमेन सहपाणिप्रपीड़नम् ॥६३॥

तया सह सुखं भेजे पावनिर्विपुलं वरम् ।
सर्वे ते तत्र संतस्थुर्दीर्घध्वस्त्रानघातिगाः ॥६४॥

हिडिम्बा तेन भुञ्जाना भोगानाभं दधौ वरम् ।
पूर्णे काले सुतं लेभे ज्ञास्यमानपराक्रमम् ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 63 से 65): इतने में युधिष्ठिर जाग उठे और उन्होंने भीमसेन के द्वारा हिडंबा का पाणिग्रहण करवा दिया। इसके बाद युधिष्ठिर आदि पाण्डव बहुत दिनों तक वहीं रहे। भीम ने हिडंबा के साथ खूब ही सुख भोगा। भीम के साथ भोग भोगती हुई हिडंबा गर्भवती हो गई और गर्भ के दिन पूरे हो जाने पर उसने जगत् प्रसिद्ध पराक्रम वाले पुत्र-रत्न को जन्म दिया। पुत्र-जन्म से सबको बड़ा आनन्द हुआ। उसका नाम घुंटुक रखा गया। घुंटुक सब लक्षणों से लक्षित था, अतः उसकी बहुत जल्दी संसार में प्रसिद्धि हो गई ॥६३-६५॥


अयोजयत्सुतं भीमः प्रवरं घुंटुकाख्यया ।
लक्षणैर्व्यञ्जनैः पूर्णं स सुतः प्रथितो भुवि ॥६६॥

ततस्ते निर्गतास्तूर्णं नृपाः सत्वरमानसाः ।
भीमाख्यं विपिनं प्रापुः परमश्वपदाकुलम् ॥६७॥

यत्रास्ते दुर्धरो दुष्टो विपत्कारी सुजन्मिनाम् ।
भीमासुर इति ख्यातो भुजदण्डबली महान् ॥६८॥

कुर्वन्कलकलारावं विरावघनगर्जितः ।
निर्जगाम निजस्थानात्स तान्वीक्ष्य समागतान् ॥६९॥

जगाद तांस्तदा देवः किमर्थं यूयमागताः ।
आस्माकीनं वनं वेगादपूतं कर्तुमिच्छवः ॥७०॥

न समर्थो नरः कोऽस्ति य आयातो वनं मम ।
भो मनुष्याः कथं पादरजसा मलिनीकृतम् ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 66 से 71): इसके बाद पाण्डव वहाँ से चले और भीम नाम के एक भयानक जंगल में आये, जो सिंह आदि हिंसक जन्तुओं से परिपूर्ण था। यहाँ एक भीमासुर नाम देव था। वह बहुत ही प्रसिद्ध था, दुष्ट था, दुर्धर था, जीवों को दुख देने वाला था तथा उसके भुजदण्डों में पूर्ण बल था। वह इन्हें वन में आया देखकर मेघ की तरह गर्ज कर अपने स्थान से निकला और इनके पास आकर कहने लगा। कि तुम लोग यहाँ किस लिए आये। क्या तुम लोग मेरे इस पवित्र वन को अपवित्र बना देने की इच्छा से यहाँ आये हो। नहीं तो तुम्हीं बताओ कि तुम्हारे यहाँ आने का दूसरा और कारण ही क्या है? मैं जानता हूँ कि ऐसी सामर्थ्य किसी मनुष्य में नहीं है जो मेरे इस पवित्र वन में आवे और अपने पाँवों की धूल से इसे अपवित्र करे। फिर तुम लोगों ने यहाँ आकर इसे क्यों अपवित्र किया ? ॥६६-७१॥


भीमो भीमासुरं वीक्ष्य तदाचख्यौ विचक्षणः ।
कथं गर्जसि वर्षाभूवद्वृषो वा खलो यथा ॥७२॥

वयं पूताः सदाचारा मनुष्यत्वात्सुचक्रिवत् ।
मनुष्यत्वं सदापूतं तीर्थकृच्चक्रिविष्णुवत् ॥७३॥

यद्यस्ति विपुला शक्तिस्तद्देहि देहि संगरम्।
दर्शयाम्यसुरत्वस्य फलं प्रविपुलं किल ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 72 से 74): उस भीमासुर को ऐसी बेढब बातें करते हुए देखकर विचक्षण भीम ने कहा कि तू व्यर्थ ही मेंढक की तरह या गाल फुलाने वाले दुष्ट पुरुष की तरह क्यों गर्जता है और खेदखिन्न होता है। तू हमें अपवित्र बताकर आप पवित्र बनना चाहता है, यह तेरा झूठा अभिमान है। हम अपवित्र नहीं हैं किन्तु बड़े पवित्र हैं। हम सदाचारी हैं, जैसे कि चक्रवर्ती वगैरह होते हैं। बात यह है कि मनुष्य पर्याय सदा ही पवित्र है क्योंकि तीर्थंकर, नारायण वगैरह उत्तम-उत्तम पुरुष सब इसी में उत्पन्न होते हैं और इसे पवित्र बनाते हैं। फिर तू क्या कह रहा है, जरा हित-अहित को भी विचार और सुन, यदि तुझमें कुछ ताकत हो, तुझे अपने असुरपने का अभिमान हो तो आ हमारे साथ युद्ध कर। हम अभी ही तुझे तेरे असुरपने का फल चखाये देते हैं ॥७२-७४॥


इत्युक्त्वा बाहुयुगलप्रधनं कर्तुमुद्यतौ।
भीमभीमासुरौ तौ च मल्लाविव महोद्धतौ ॥७५॥

युयुधातेऽङ्घ्रिघातेन कम्पयन्तौ वसुंधराम्।
त्रासयन्तौ मृगेन्द्रादीन्निर्घोषरणे तर्कौ ॥७६॥

दुष्टमुष्टिप्रघातेन चूर्णितोऽसुरसत्तमः।
भीमेन निर्मदीचक्रे सुदन्तीव मृगारिणा ॥७७॥

प्रणम्य चरणौ तस्यासुरोऽगाद्दासतां गतः।
तेऽपि तूर्णं वनात्तस्मान्निर्गता गमनोत्सुकाः ॥७८॥

अर्थ (श्लोक 75 से 78): बाद वे दोनों भीम और भीमासुर अपने-अपने बाहु युगल को ठोक-ठोक कर मदोद्धत मल्लों की तरह युद्ध करने को तैयार हो गये। इन दोनों के पाँव के कठोर आघात से पृथिवी काँपती थी। इनके वज्र जैसे भयंकर शब्द को सुनकर सिंह वगैरह वनजन्तु भी अपने प्राणों को लिये इधर-उधर भाग रहे थे और दुखी हो रहे थे। इन दोनों का बड़ी देर तक घनघोर युद्ध हुआ परन्तु आखिर में अपनी मुष्टि के प्रहार से भीम ने भीमासुर को निर्मद कर दिया, जैसे सिंह हाथी का मद उतार कर उसे निर्मद कर देता है। इसके बाद भीमासुर ने भीम के चरणों में प्रणाम किया और उसकी दासता को मंजूर कर वह अपने स्थान को चला गया। इधर पाण्डव भी अति शीघ्र उस वन से चल दिये। ये आगे जाने को बहुत ही उत्सुक हो रहे थे ॥७५-७८॥


ततस्ते क्रमशः प्रापुः पुरं श्रुतपुरं परम्।
तत्र चैत्यालये चित्राः प्रतिमाः पूजिताश्च तैः ॥७९॥

क्षणमास्थाय ते तत्र निशि वासाय सत्वरम्।
वणिग्गेहं समाजग्मुः शयनं कर्तुमिच्छवः ॥८०॥

तत्कुट्यां कुटिलायां ते विकटाः संकटापहाः।
तस्थुः कथां प्रकुर्वाणाश्चैत्यचैत्यालयोद्भवम् ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 79 से 81): पाण्डव वहाँ से चलकर धीरे-धीरे श्रुतपुर नाम के एक नगर में आये और यहाँ उन्होंने एक जिनालय में जा भगवान् की प्रतिमाओं का पूजन किया और भक्तिभाव से उनकी स्तुति की। वहाँ कुछ देर ठहर कर वे रात में रहने के लिए एक वणिक् के घर पर आये वे बहुत थके हुए थे, इसलिए शयन करना चाहते थे। वे उसकी कुटी में ठहर गये। संकट को हरने वाले विकट पराक्रमी, पाण्डव बैठे हुए वहाँ के विचित्र जिनालयों की बावत कुछ चर्चा कर रहे थे कि इतने में संध्या होते ही, उस घर वाले


तावत्संध्यामुखे वैश्यवनिता विललाप च।
दुःखिता दैन्यतो दीनं विलपन्ती महाशुचा ॥८२॥

तदा कुन्ती कृपाक्रान्ता तामाश्वास्य गतान्तिकम्।
अप्राक्षीत्खेदसंखिन्नां बाष्पाकुलविलोचनाम् ॥८३॥

कथं रोदिषि रे बाढं गाढं शोकसमाकुला।
अबीभणद्वणिग्भार्या श्रूयतामत्र कारणम् ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 79 से 84): वैश्य की भार्या महान् शोक से पीड़ित होकर अत्यन्त दीनता के साथ विलाप करने लगी। तब दयालु कुन्ती ने उसके पास जाकर उसे आश्वासन दिया-धीरज बँधाया और आँसुओं से परिपूर्ण नेत्रों वाली खेदखिन्न उस वैश्यभार्या से प्रेम के साथ पूछा कि तुम इतना भारी शोक क्यों कर रही हो ? वैश्यभार्या ने कहा कि सुनिए, मैं अपने दुखपूर्ण रोने का कारण बताती हूँ ॥७९-८४॥


अत्र श्रुतपुरे श्रीमान्बको नाम महीपतिः।
बकवद्वृषहीनात्मा लोकपालनकोविदः ॥८५॥

पललासक्तचित्तेन मतिर्दधे पलेऽनिशम्।
सूपकारः सदा दत्ते तिरश्चां तस्य मांसकम् ॥८६॥

हन्ति हन्त हतात्मा स तिरश्चां समजं तदा।
संस्कृत्य पललं तस्मै दत्ते दीनो दयातिगः ॥८७॥

एकदा पशुमांसस्यालाभतः पाककारकः।
तदानीं मृत्तिमापन्नं बालं गर्तस्थमानयत् ॥८८॥

तदामिषं च संस्कृत्य संपच्य पचनोत्सुकः।
सूपकारः सुभूपायार्पयत्खादितुमञ्जसा ॥८९॥

भूपोऽपि तरसं तूर्णमदित्वा सरसं मुदा।
सहर्षः सूपकारं तं न्ययुङ्क्त रसनाहतः ॥९०॥

पाककार शुभं पक्वं तरसं तरसा कुतः।
आनीतं स्वाददं रम्यं न दृष्टं चेह ब्रूहि भोः ॥९१॥

अभयं याचयित्वासौ बभाण भयभीतधीः।
नरक्रव्यमिदं राजन्दत्तं तुभ्यं विपच्य च ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 85 से 92): देवी, इसी श्रुतपुर में श्रीमान् बक नाम राजा था। वह बगुले की तरह ही धर्म-हीन था परन्तु प्रजा के ऊपर शासन करने में अच्छा प्रवीण था। उसे कारण-वश मांस खाने की चाट पड़ गई और वह इतनी जबरदस्त कि वह हमेशा मांस के संबंध में ही अपनी सारी बुद्धि खर्च किया करता था। उसका रसोइया उसे सदा पशु का मांस पका-पका कर देता था और वही नीच निर्दय उसके लिए पशुओं का घात करता था। लेकिन एक दिन कहीं से भी जब उसे पशु का मांस न मिला तब वह दुष्ट मांस की खोज में नगर से बाहर निकला और मसान भूमि से किसी गड्ढे में से एक मरे हुए बच्चे को खोदकर ले आया एवं उस पापी ने उस बच्चे को मसाला आदि डालकर बड़ी चतुराई से पकाया और उसका मांस बक राजा को खिला दिया। राजा को वह मांस बहुत ही अच्छा स्वादु मालूम पड़ा। अतः उस मांस लोलुपी ने बड़े भारी आग्रह के साथ रसोइये से पूछा कि पाककार! तुम ऐसा अच्छा सुस्वादु मांस कहाँ से लाये। मैंने तो कभी ऐसा उत्तम मांस खाया ही नहीं। यह सुन रसोइया अभयदान माँग कर डरता-डरता बोला कि प्रभो! माफ कीजिए, यह मांस मनुष्य का है। आज कहीं से भी जब मुझे पशु का मांस न मिल सका तब मैंने इसे ही चतुराई से पकाकर आपको खिलाया है ॥८५-९२॥


ब्रूते स्म भूपतिर्भव्यम् क्रव्यं संस्कृतिसंस्कृतम्।
मार्त्यं मह्यं महीयाश देयं तृप्तिकरं सदा ॥९३॥

सूपकारस्ततो वीथ्यामित्वा डिम्भान्सुखेलितान्।
मेलयित्वा ददौ स्वाद्यं खाद्यं तेभ्यः समोदकम् ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 93 से 94): यह सुनकर राजा बोला कि प्रिय! यह मांस मुझे बहुत ही अच्छा मालूम हुआ है और इससे मुझे तृप्ति हुई है। इसलिए अब से तुम मुझे मनुष्य का ही मांस खिलाया करो। राजा की इतनी


गच्छत्सु तेषु स सूपकारः पाश्चात्यबालकम्। गृहीत्वा मारयित्वा च ददौ तस्मै च तत्पलम् ॥९५॥

प्रतिवासरमेवं स कुर्वाणः कौतुकैर्जनैः। दृष्टः पृष्टो नृपेणैतत्कारितं चेत्यवीवदत् ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 93 से 96): सम्मति पाकर वह रसोइया और भी निडर हो गया और अब वह हमेशा मनुष्य के मांस की खोज में गली-कूचों में जाकर नगर के बच्चों को मिठाई आदि बाँटने लगा। मिठाई लेकर सब बच्चों के चले जाने पर जो बच्चा पीछे रह जाता उसे पकड़कर वह उसका गला घोंट देता और उसका मांस राजा को खिला देता। ऐसा दुष्कृत्य वह रोज-रोज करने लगा ॥९३-९६॥


ततः संमन्त्र्य सर्वैस्तैर्निष्कासितस्ततो बकः। स वने मारयत्याशु स्थित्वा लोकाननेकशः ॥९७॥

ततो विमृश्य तत्रस्थैर्नरैरिति निबन्धनम्। चक्रेऽस्मै पुरुषो देय एकैकं प्रतिवासरम् ॥९८॥

एवं निबन्धने जाते गेहे गेहे दिने दिने। एकैकः पुरुषं दत्ते स्वदिनेऽस्मै जनोऽखिलः ॥९९॥

द्वादशाब्दा गता एवमद्य मत्पुत्रवासरः। समागतोऽस्ति तेनाहं संरोदिमि सुदुःखतः ॥१००॥

अद्यैव स्यन्दने स्वाद्यं निवेश्य मत्सुतेन च। मुक्त्वा महिषसंयुक्तं दास्यते सकलैर्जनैः ॥१०१॥

ममैकस्तनयस्तन्वि किं करिष्यामि तद्गतौ। किं मे न स्फुटति स्वान्तं न जाने केन हेतुना ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 97 से 102): उधर धीरे-धीरे जब नगर के बच्चे प्रति दिन कम होने लगे तब सारे नगर में खलबली पड़ गई और लोगों ने छुप-छुप कर बच्चों के घातक को देखना-खोजना आरम्भ कर दिया। इसके थोड़े ही दिनों में वह रसोइया पकड़ा गया। लोगों के पूछने पर उसने साफ-साफ कह दिया कि मेरा तनिक-सा भी इस दुष्कृत्य में अपराध नहीं है किन्तु मुझसे राजा ने जैसा करवाया वैसा ही मैंने किया। इस पर सब लोगों की सम्मति से राजा बक राजगद्दी पर से उतार दिया गया। इसके बाद बक वन में रह कर मनुष्यों को मार कर खाने लगा। धीरे-धीरे जब उसने नगर के बहुत से मनुष्यों को मार खाया तब नगर के लोगों ने मिलकर विचार कर यह निश्चय किया कि इसके लिए बारी-बारी से हर रोज एक मनुष्य खाने को देना चाहिए। बस, इसी नियम के अनुसार अपनी-अपनी बारी पर सब लोगों ने उसे घर-घर से एक-एक मनुष्य प्रति दिन खाने को दिया और धीरे-धीरे आज बारह वर्ष ऐसे ही बीत गये। पापयोग से आज मेरे प्यारे बच्चे की बारी है और इसी से दुखी होकर मैं रो रही हूँ। देवी, मेरे रोने का दूसरा और कोई निमित्त नहीं है। नगर के लोग आज ही एक गाड़ी में मिठाई आदि भरकर और उसके बीच में मेरे प्यारे पुत्र को बैठाकर उस अधर्मी को भेंट में देंगे तथा साथ में एक भैंसा भी देंगे। माता, मेरे यह एक ही तो प्यारा आँखों का तारा सर्वस्व पुत्र है और यही आज काल के गाल में पहुँचाया जा रहा है। इसके बिना हाय अब मैं क्या करूंगी और कैसे अपना जीवन बिताऊँगी। पुत्र के वियोग का चित्र मेरी आँखों के सामने खिच रहा है और वह मेरी छाती चीरे डालता है-हृदय में वज्र के जैसी चोट कर रहा है। बताइए अब मैं कैसे और किसके भरोसे धीरज धरूँ। मुझे तो कोई उपाय ही नहीं सूझ पड़ता ॥९७-१०२॥


तदा कुन्ती कृपाक्रान्ता शान्तयित्वा वणिग्वधूम्। उवाच चतुरालापा चिन्तन्ती तत्सुखोदयम् ॥१०३॥

अर्थ: यह सुनकर कुन्ती का हृदय दया से भीग गया। वह मिष्टभाषिणी उसके लिए सुख का उपाय


वणिग्वधु न भेतव्यं दिवसे समुपस्थिते।
सूनोरद्य करिष्याम्युपायं त्वत्पुत्ररक्षणे ॥१०४॥

दास्यामि मत्सुतं भूतबल्यर्थं रूपभासुरम्।
मन्दिरे नन्दनस्तेऽद्यानन्दानन्दतु निश्चितम् ॥१०५॥

इत्युक्त्वा सा गता कुन्ती यत्रास्ते पावनिः सुतः।
समुत्थाय स तां वीक्ष्य ननाम तत्पदाम्बुजम् ॥१०६॥

क्षणं स्थित्वा स्थिरा साऽप्यगदीद्गद्गदया गिरा।
बकवृत्तं च निःशेषं निःशेषस्वान्तहारिणी ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 103 से 107): सोचती हुई उसे शान्ति देकर बोली कि वणिग्वधू, तुम डरो मत। सबेरा होने दो। तुम्हारे पुत्र की बारी आने पर मैं उसकी रक्षा का उपाय करूँगी। सुनो, मैं उस भूत की बलि के लिए अपना अतीव रूप-शाली पुत्र भेज दूँगी। तुम्हारा पुत्र आनंद-चैन से अपने मंदिर ही में रहेगा। तुम्हें और उसे कोई चिंता न करनी चाहिए। उस वैश्य-भार्या को इस तरह समझा कर कुन्ती वहाँ गई जहाँ कि भीम बैठा हुआ था। उसे आती देखकर भीम उठ खड़ा हुआ और उसने उसके चरण-कमलों में प्रणाम किया। इसके बाद कुछ देर बैठ कर सबके मन को अपनी ओर झुकाने के लिए कुन्ती ने भीम को उस दुष्ट बक राजा का सारा हाल कह सुनाया ॥१०३-१०७॥


पावने शृणु शान्तः सन्त्रस्या एकोऽस्ति सत्सुतः।
यातुधानाय सल्लोकैर्दास्यते बलयेऽद्य सः ॥१०८॥

दुःखिनीयं सदादुःखा सुतवित्तविवर्जिता।
हते सुते वराकी च किं करिष्यति सर्वदा ॥१०९॥

अद्य रात्रौ स्थिता यूयमस्या वेश्मनि विस्मिताः।
प्राघुर्ण्यमनया नीता विनीता वसनोदकैः ॥११०॥

परोपकारिणो यूयं परोपकृतिसिद्धये।
अस्यां जीवन्सुतो गेहे यथा तिष्ठेत्तथा कुरु ॥१११॥

मनुष्यराक्षसश्चायं लोकानत्ति निरन्तरम्।
निर्दयो वारणीयस्तु त्वया कम्रकृपात्मना ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 108 से 112): वह बोली कि भीम जरा शान्तचित्त से मेरी बात पर ध्यान दो। इस बेचारी वैश्यपत्नी के एक ही तो पुत्र है और उसी को लोग आज नरभक्षी बक राक्षस के लिए बलि देंगे। पुत्र के बिना यह बेचारी जन्म-भर के लिए दुःखिनी हो जायेगी। इसे अपना जीवन भी बोझ-मय हो जायेगा। देखो, आज रात में तुम लोग इसके घर बड़े आराम के साथ ठहरे हो। इसके सिवाय इसने तुम्हारा खूब अतिथि-सत्कार किया है, वस्त्र, जल आदि द्वारा तुम्हारी पाहुनगत की है। अस्तु, जबकि तुम लोग परोपकारी हो और तुम्हारा यही सच्चा व्रत है तब तुम्हें इन बातों की तो परवाह नहीं है कि कोई तुम्हारी भलाई करें या न करे। तब तुम परोपकार दृष्टि से ही ऐसा काम करो जिससे कि इसका प्यारा पुत्र जीता रह जाये-इसकी आँखों के सामने बना रहे और बेटा, भीम, आगे के लिए कोई ऐसा उपाय कर दो जिससे यह मनुष्य जो कि हमेशा मनुष्यों को खाया करता है और महान् निर्दय है, नरभक्षण से रुक जाय। आगे ऐसा दुष्कृत्य न करे, जिससे लोगों में बड़ी भारी खलबली मच रही है ॥१०८-११२॥


कुन्त्युक्तं पावनिः श्रुत्वा जगौ कार्यकदम्बकृत्।
अम्बैतत्किं त्वया प्रोक्तं यतस्त्वत्सेवकोऽस्म्यहम् ॥११३॥

त्वद्वचःपालनायाशु यातुधानबलिकृते।
तद्वाससं विनाद्याहं संयास्यामि च सत्वरम् ॥११४॥

अर्थ (श्लोक 113 से 114): कुन्ती के वचनों को सुनकर कर्मवीर भीम ने कहा कि माता, भला आप यह क्या कहती हो, मैं तो तुम्हारा आज्ञाकारी हूँ। तुम्हारी आज्ञा-पालने के लिए आज ही उस मनुष्य राक्षस के पास जाने को तैयार हूँ। इस प्रकार अति प्रवीण और न्याय के जानकार माता-पुत्र इस प्रकार परोपकार की बातें


इति मातृसुतौ तत्र तन्वानौ जल्पमुत्तमम्।
आसाते किंवदन्तीज्ञौ यावत्सुनयकोविदौ ॥११५॥

तावदाकारणं तस्याः सुतस्य समुपस्थितम्।
एह्येहीति प्रकुर्वाणैः संकृतं तलरक्षकैः ॥११६॥

भो वणिग्वर वेगेन तद्बल्यर्थसुसिद्धये।
शकटारोहणं कृत्वा त्वमागच्छ समुद्यतः ॥११७॥

विलम्बेन बलेनापि न सेत्स्यति हितं तव।
किं क्लिश्नासि क्षणस्थित्यै स्वात्मानं त्वं त्वरां कुरु ॥११८॥

अर्थ (श्लोक 113 से 118): कर ही रहे कि इतने में उस वैश्य-पुत्र को ले जाने के लिए कोतवाल ने आकर उससे कहा कि वैश्यवर, उस मनुष्य-राक्षस की बलि के लिए गाड़ी में सवार होकर अति शीघ्र मेरे साथ चलो, देर न करो और जरा देर के जीवन के लिए देर करने से भी क्या होगा ॥११३-११८॥


इत्युक्तं पावनिः श्रुत्वा प्रोवाच तलरक्षकान्।
यात यात समेष्यामि तस्मै दास्यामि मद्बलिम् ॥११९॥

श्रुत्वा तद्वचनं सर्वे तलरक्षास्त्वरान्विताः।
समवर्तिर्भुजिष्याभा यावज्जग्मुः सहर्षिताः ॥१२०॥

तावता भानुमान् प्राच्यामुदितो वेदितुं यथा।
तच्चरित्रं कृपाक्रान्त आयाति वीक्षितुं हि तत् ॥१२१॥

अर्थ (श्लोक 119 से 121): कोतवाल की बात सुनकर उससे भीम ने कहा कि आप जाइए, मैं आकर उस नर-पिशाच को अपनी बलि दे दूँगा। भीम के वचनों को सुनकर यम के दूत जैसा कोतवाल हर्षित होता हुआ चला गया। इसी समय पूर्व दिशा में सूरज का उदय हो आया। जान पड़ता था कि मानों उसके दुश्चरित्र को देखने के लिए ही आया है और है भी सच कि दयालु पुरुष लोगों के दुश्चरित्र को देखकर-जहाँ तक बन सकता है-उसे सुधारने की कोशिश करते हैं ॥११९-१२१॥


ततः सज्जीकृतं तेन शकटं विकटं परम्।
कटाहमात्रनैवेद्यैः पूर्णं सन्तूर्णतां गतम् ॥१२२॥

पावनी रथमारुह्य निर्भयो भीतिदारुणः।
चचाल चञ्चलश्चित्रं दाहको वायुमित्रवत् ॥१२३॥

बकाख्यो दानवस्तावद्दृष्ट्वा तं विपुलोदरम्।
आयान्तं संमुखं क्षिप्रमयासीत्समवर्तिवत् ॥१२४॥

भीमस्तं राक्षसं वीक्ष्य कलयन्तं ककुप्चयम्।
क्रुद्धं कलकलारावं कुर्वाणं सोऽगदीदिति ॥१२५॥

आगच्छागच्छ दैत्येन्द्र ददाम्यद्य महाबलिम्।
आलोक्य भुजदण्डस्य बलं प्रविपुलं तव ॥१२६॥

एतावत्कालपर्यन्तं हता हन्त त्वया नराः।
वराका दन्तसंलग्नतृणा नश्यन्त एव च ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 122 से 127): इसके बाद एक गाड़ी सजाई गई और उसमें कढ़ाई भर भोजन रक्खा गया। उसके ऊपर भीम बड़ी निर्भयता-पूर्वक सवार होकर चला। वह ऐसा जान पड़ता था मानों उस नर-पिशाच को जलाने के लिए आग ही जा रही है। वह थोड़ी ही देर में उस यम के जैसे पापी बक के पास पहुँच गया। उसे सामने आया देखकर वह दुष्ट उसके ऊपर झपटा और क्रोध से गर्जना कर उसने सभी दिशाओं को शब्द-मय बना दिया। उसे इस तरह क्रोधित देखकर भीम ने कहा कि दैत्येन्द्र, आओ मैं आज तुम्हारे भुजदण्डों का पराक्रम देखकर ही तुम्हें अपनी बलि दूँगा, वैसे नहीं। खेद है कि इतने काल तक तुमने इन गरीब लोगों को व्यर्थ ही सताया। सच है कि जो दीनता दिखाते है, दाँतों में तिनकों को दबा कर रहते हैं वे संसार में मारे जाते है। तात्पर्य यह कि गरीबों पर ही सब का वश चलता है, बलवानों पर नहीं क्योंकि बली का सामना करने के लिए कुछ ताकत की जरूरत होती है ॥१२२-१२७॥


ततस्तौ करमास्फाल्य लग्नौ क्रोधोद्धुरौ नरौ।
दारयन्तौ हृदाकाशं स्फोटयन्तौ भुजान्तरम् ॥१२८॥

अर्थ: इसके बाद क्रोध से उद्धत हुए वे दोनों ही खम ठोक कर भिड़ गये और आकाश तथा पृथ्वी को


मस्तकैर्मस्तकैर्मत्तौ प्रहरन्तौ परस्परम्। पद्भ्यां पद्भ्यां महाघातं ददानौ सद्ययातिगौ ॥१२९॥

कूर्परैः कूर्परैः कोपात्स्फोटयन्तौ शिरस्तदा। एवं युद्धे प्रवृत्तौ तौ समवर्त्तिसुताविव ॥१३०॥

अर्थ (श्लोक 128 से 130): उन्होंने गुंजा दिया। वे कभी मस्तक के द्वारा और कभी पाँवों के द्वारा एक दूसरे पर प्रहार करते थे तथा हाथों की कुहनियों से एक दूसरे का सिर फोड़ते थे। इस समय वे दोनों ही दया से कोसों दूर थे-कोई भी किसी पर तीव्र प्रहार करने में कसर न रखता था। दोनों ही निर्दय-भाव से एक दूसरे पर टूटते थे। यम के पुत्र जैसे उन दोनों में बड़ा भारी भीषण युद्ध हुआ ॥१२८-१३०॥


भीमस्तं तृणवन्मत्वा भुजदण्डेन मूर्धनि। जघान घस्मरं दुष्टं कृतघ्नं कोपकम्पितम् ॥१३१॥

पुनः कोपेन तत्पृष्ठौ दत्त्वा पादं दयातिगः। पापिनं पातयामास तं भीमो भुवि निर्दयम् ॥१३२॥

गृहीत्वा चरणौ तस्याभ्रामयद्वसुधातले। नभोभागे भयतक्तो स आस्फोटयितुं यथा ॥१३३॥

ततो बद्ध्वा भयक्रान्तं समक्षं सर्वजन्मिनाम्। सेवकं सेवकीकृत्य पादलग्नं मुमोच सः ॥१३४॥

ज्ञात्वा तत्संगरं शीघ्रमायाता नगरीनराः। वीक्षन्ते स्म तयोर्युद्धं क्रोधसंबद्धभागिनोः ॥१३५॥

बकं च निर्मदीभूतं विमुखीभूतमानसम्। नरघातात्समालोक्य नरा हर्षमुपागताः ॥१३६॥

अर्थ (श्लोक 131 से 136): आखिर निर्भय भीम ने उस पापी, नरभक्षक, दुष्ट और क्रोध से काँप रहे नर-पिशाच को तृण के जैसा निःसत्व कर उसके सिर में अपने भुज-दण्ड का एक ऐसा भीषण प्रहार किया कि वह बिल्कुल ही हतप्रभ हो गया। इसके बाद ही वह फिर न उठ खड़ा हो इसके लिए क्रोध में आकर बली भीम ने उसकी पीठ में एक ऐसी जोर की लात मारी कि जिससे वह अधम जमीन पर लौट गया। भीम ने उसका तब भी पिण्ड न छोड़ा और वह उसके दोनों पाँव पकड़, उसे आकाश में चारों ओर घुमाने लगा। जान पड़ता था कि वह उसे जमीन पर पछाड़ना ही चाहता है। तब वह नर-पिशाच बड़ा डरा और भीम के हा-हा खाने लगा। यह देख भीम ने उसे सब लोगों के सामने जो कि उन दोनों के युद्ध को सुनकर वहाँ अति शीघ्र आ गये थे और खड़े-खड़े क्रोध से उद्धत हुए उन दोनों का युद्ध देखते थे, अपना सेवक बना कर छोड़ दिया और उससे आगे के लिए मनुष्य-घात न करने की प्रतिज्ञा करवा ली। तात्पर्य यह कि भीम ने उसका सारा मद उतार कर उसे सीधा साधा मनुष्य बना कर छोड़ दिया। उसको इस तरह निर्मद हुआ देखकर दर्शक लोगों को बड़ी खुशी हुई और वास्तव में खुशी होने की बात ही थी ॥१३१-१३६॥


जना जयारवं चक्रुर्भाणन्तो भक्तिनिर्भराः। तत्प्रशंसनमाभेजुस्ततो जीवनमानिनः ॥१३७॥

त्वं कोऽपि महतां मान्यो जगदानन्ददायकः। यशसा धवलीकुर्वञ्जगत्त्वं जय सज्जन ॥१३८॥

अर्थ (श्लोक 137 से 138): उस खुशी के मारे वे लोग भीम का जय-जयकार करने लगे तथा भक्ति से स्वाभिमानी भीम की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने लगे कि आप अवश्य ही बड़े-बड़े पुरुषों द्वारा मान्य हैं, संसार को आनन्दित करने वाले हैं और संसार को अपने निर्मल यश से पवित्र करते हैं। अतः हे सज्जन आपकी जय हो। देखिए हम लोगों को यहाँ जीना भी मुश्किल पड़ रहा था परन्तु महाभाग, आपके प्रसाद से अब हमें कोई भी खटका नहीं रहा। अतः अब हम बेफिक्र होकर अपने जीवन को आनंद-चैन से बिता


अतः प्रभृति जीवामो वयं लोका निराकुलाः।
त्वत्प्रसादाद्यथा मेघात्तृणानि सुमहामते ॥१३९॥

इति स्तुत्वा ददुर्दक्षा धनकोटिं सुधान्यकम्।
तस्मै श्रीभीमसेनाय भक्ताः किं न प्रकुर्वते ॥१४०॥

अर्थ (श्लोक 137 से 140): सकेंगे। तात्पर्य यह है कि आज से हम सब अपनी नींद सोयेंगे और अपनी ही नींद उठेंगे। हमें अब कुछ चिन्ता नहीं हैं। कौन नहीं जानता कि जब मेघों की कृपा होती है तब तृण वगैरह सब खूब हरे भरे रहते हैं। वे जरा भी नहीं मुरझाते हैं। इस प्रकार उन दक्षों ने भीम की खूब स्तुति की और भेंट में उसे अनन्त धन-सम्पदा दी और है भी यही बात कि भक्त लोग जिसके ऊपर मुग्ध हो जाते हैं उसके लिए वे फिर कोई बात उठा नहीं रखते-जो कुछ सम्पत्ति उनके पास होती है वह सब देने को वे तैयार हो जाते हैं ॥१३७-१४०॥


तेन वित्तेन ते भक्ता जिनचैत्यालयं मुदा।
अकारयन्पुरे तत्र पाण्डवाः परमोदयाः ॥१४१॥

घनाघनस्तदा तत्र वर्षन् धारा धराधरान्।
धरां च छादयामास पयःपूरैः सुखप्रदैः ॥१४२॥

उष्णोतापं निराकर्तुं प्रोद्गतो हि घनाघनः।
स्ववैरिणं निराकर्तुं को नोदेति महान्नरः ॥१४३॥

पन्थानं च समासाद्य जलं जलधरोऽमुचत्।
सर्वलोकान्सुखीकर्तुमायातः इव भूतले ॥१४४॥

वर्षाकालं समावीक्ष्य पाण्डवास्तत्र संस्थिताः।
धर्मध्यानं प्रकुर्वन्त आचतुर्मासकं मुदा ॥१४५॥

क्षणे क्षणे क्षणं क्षिप्रं कुर्वन्तो मेघकालजम्।
स्वकारिते जिनेशस्य चैत्यवेश्मनि संस्थिताः ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 141 से 146): इसके बाद जिनभक्त परमोदयशाली पाण्डवों ने वह सब सम्पत्ति जो कि उन्हें लोगों ने भेंट में दी थी, श्रुतपुर में ही एक विशाल जिनालय बनवाने में लगा दी। इसी बीच में वर्षा का आरम्भ हो गया और मेघों ने धारासार जलवर्षा कर नदी, पर्वत और पृथ्वी को जल-मय कर दिया। ऐसा भान होता था मानों सूरज के ताप को दूर करने के लिए ही मेघों ने वह धारासार वर्षा की है। अपने-अपने वैरी को नष्ट करने के लिए सभी महान् पुरुष तैयार होकर प्रयत्न करते हैं। इस समय इतनी वर्षा हुई कि जल के मारे मार्ग भी नहीं देख पड़ता था और पानी ही पानी दीखता था। जान पड़ता था मानों लोगों को सुखी करने के लिए पृथ्वी पर मेघ ही आ गये है। वर्षा ऋतु को आ गई जान कर पाण्डव वहीं ठहर गये और उन्होंने धर्म-ध्यान पूर्वक बरसात के चार महीने वहीं बिताये। वहाँ वे वर्षा ऋतु के योग्य महोत्सवों को करते हुए अपने निज के बनवाये जिनालय में रहते थे ॥१४१-१४६॥


प्रावृट्कालं समाप्याशु ततस्ते पाण्डुनन्दनाः।
कम्पयन्तो धरां पादैश्चेलुः कुन्त्या समन्विताः ॥१४७॥

क्रमेण पावनीं प्रापुः ख्यातां चम्पापुरीं नृपाः।
कर्णो यत्र महीनाथो राजते राजसिंहवत् ॥१४८॥

कुम्भकारगृहे तत्र शुम्भत्कुम्भसुशोभिते।
चक्रचक्रसमाक्रान्ते तस्थुस्ते पाण्डुनन्दनाः ॥१४९॥

अर्थ (श्लोक 147 से 149): जब चौमासा पूरा हो गया तब वे वहाँ से चले और पृथ्वी को लाँघते हुए कुछ समय में कुन्ती-सहित उस पवित्र और प्रसिद्ध चंपापुरी में आये जहाँ कि कर्ण राजा था। वहाँ आकर वे सुन्दर-सुन्दर घड़ों और चक्रों से सुशोभित एक कुंभकार के घर ठहरे। वहाँ विनोद में आकर भीम स्थास, कोश, कुशूल वगैरह कैसे बनते हैं यह देखने के लिए कुंभार का चाक फिराने लगा एवं


विनोदनोदितो भीमो भ्रामयंश्चक्रमुत्तमम् । तत्र द्रष्टुं मनः क्षिप्रं चक्रे स्थासादिकां क्रियाम् ॥१५०॥

आस्फोटयत्स्फुटारम्भो राभस्येन स पावनिः। उदञ्चनमहाकुम्भस्थालीकरकसद्घटीः ॥१५१॥

तत्प्रस्फोटनजं स्पष्टं स्फोटं प्रस्पष्टमानसा। कुन्ती श्रुत्वा प्रकोपेन भीमं भीत्या न्यवारयत् ॥१५२॥

भीम भीम त्वयाकृत्यं किं कृतं चपलात्मना। प्रयासि यत्र यत्र त्वं तत्रानर्थं करोषि वै ॥१५३॥

चञ्चलौ चोद्धतौ दोषौ सदोषौ दूषणावहौ। तव नित्यं प्रदुष्टस्य शिष्टाचारातिगस्य च ॥१५४॥

उपालम्भं समाश्रित्य जनन्या मौनमाश्रितः। निर्जगाम ततो भीमः सुसीमोल्लङ्घनोद्यतः ॥१५५॥

अर्थ (श्लोक 147 से 155): हँसी-विनोद में ही उसने दण्ड को हाथ में ले उस कुम्भार के ढक्कन, मटके, कुण्डे आदि बहुत से बर्तन फोड़ डाले। उनके फूटने की आवाज सुनकर निर्मलमना कुन्ती ने कुछ कोप और भय दिखा कर भीम से कहा कि भीम, तुम बड़े चंचल हो। तुमने यह क्या किया। तुम जहाँ जाते हो वहीं अनर्थ करते हो। तुम बड़े दुष्ट हो। तुम्हारे पास शिष्टाचार की तो तू भी नहीं है। तुम्हारे हाथों में भी चंचलता का बड़ा दोष है। भाई, तुम तो अपराध के सिवाय दूसरा काम करना जानते ही नहीं। माता के ऐसे उलाहने को सुनकर भीम चुप सा हो गया और माता की मर्यादा के भय से वह उसी समय वहाँ से चल दिया ॥१४७-१५५॥


भक्ष्यकारापणं प्राप पूपोत्करविराजितम्। पूतात्मा पावनिस्तत्र भोक्तुकामोऽतिकोविदः ॥१५६॥

देहि कान्दविकात्रं मे हिरण्येन हतात्मना। भ्रातरोऽत्र बुभुक्षाभिर्भयतः सन्ति सुदुःखिनः ॥१५७॥

तुष्टः कान्दविको यावदन्नं दातुं समुद्यतः। हिरण्यदानतः कोत्र न तुष्यति महीतले ॥१५८॥

तावद्बुभुक्षितं भीममस्थापयत्स्थिरासने। भक्ष्यकारः सुभक्ताढ्यो भोजनाय सभाजनम् ॥१५९॥

भीमो बुभुक्षितः सर्वं भुक्तवान्मोदकादिकम् । अन्नमाकण्ठपर्यन्तं तत्र किञ्चिन्न चोद्धृतम् ॥१६०॥

भ्रात्रर्थं देहि मे भक्तमिति निर्धाटितो वणिक् । अवशिष्टं न विद्येत किं देयमिति भीतिभाक् ॥१६१॥

क्षणार्धेन प्रदास्यामीति च कान्दविकस्तदा। प्रणम्य तत्पदं भक्त्यातोषयत्पावनिं परम् ॥१६२॥

अर्थ (श्लोक 156 से 162): इसके बाद भोजन करने की इच्छा से वह पवित्रात्मा प्रवीण भीम हलवाई की दुकान पर पहुँचा। वहाँ उसने एक हलवाई से कहा कि भाई, यह चमकती हुई सोने की मोहर लेकर हमें भोजन के लिए मिठाई दे दो। देर मत करो क्योंकि हमारे भाई भूख से दुखी हो रहे हैं। हलवाई उस मोहर को लेकर खूब संतुष्ट हुआ। सो ठीक ही है कि सोने को पाकर कौन सन्तुष्ट नहीं होता। इसके बाद हलवाई ने भीम को भोजन करने के लिए एक मजबूत आसन पर बैठाया और भक्ति-भाव से उसके सामने भोजन का थाल परोस दिया। भीम बहुत ही भूखा था सो उसने धीरे-धीरे कंठ तक-वहाँ जितनी सामग्री मिली उसे खूब खाया, जरा भी कोई चीज उसने बाकी न छोड़ी। भीम ने खा-पी कर संतुष्ट हो हलवाई से कहा कि अब भाइयों के लिए भोजन दो। यह देख वह चकराया और डरता-डरता बोला कि अब आप ही कहिए कि मैं क्या दूँ, कुछ बाकी तो बचा ही नहीं है। हाँ, कहें तो क्षणभर में मैं तैयार करवाये देता हूँ। यह कह कर उसने भक्तिभाव से भीम के चरणों में नमस्कार कर उसे सन्तुष्ट किया। यह सुन भीम थोड़ी देर के लिए वहीं ठहर गया ॥१५६-१६२॥


तावताऽङ्कुशमुल्लङ्घ्य कर्णदन्तावलो वरः। मदोन्मत्तो महाकायो भङ्क्त्वात्वालानं विनिर्ययौ ॥१६३॥

पातयन्नापणान्रम्यगृहान्वृक्षानुरःस्थितान्। उच्छलयञ्छलाच्छित्वा दन्ताभ्यां द्विरदो बली ॥१६४॥

नगरं व्याकुलीकृत्य कुर्वन्नपि सुवेपथुम्। श्रुतो भीमेन सत्कर्णे स आजग्मे तदन्तिकम् ॥१६५॥

रक्ष रक्षेति कुर्वाणा जनाश्च श्रीवृकोदरम्। प्रोचुः शरणमापन्ना भयकम्पितविग्रहाः ॥१६६॥

भवता बलिना विप्र रक्ष्यैयं विपुला प्रजा। यतस्त्वं बलिनां मान्यो नाम्नासि विपुलोदरः ॥१६७॥

ततः सोऽपि समुत्तस्थे गजं जेतुं मदोद्धुरम्। वज्रघातनिभेनाशु मुष्टिघातेन ताडयन् ॥१६८॥

पद्भ्यां संचूर्णयन्पादाञ्छुण्डादण्डं विखण्डयन्। दन्तावुन्मूलयन्भीमो निर्मदं च चकार तम् ॥१६९॥

तदा कश्चिन्नृपं गत्वा न्यवेदयदिति स्फुटम्। देवैकेन सुविप्रेण प्रचण्डेन गजो हतः ॥१७०॥

यो रणे शत्रुभिः शक्यो गजः साधयितुं न हि। सोऽनेन क्षणतो नीतो निर्मदत्वं महाबलात् ॥१७१॥

स त्वया देव निग्राह्यो विग्रहेण विना छलात्। ब्रुवन्तमिति कर्णस्तं निवार्य सुखं स्थितः ॥१७२॥

अर्थ (श्लोक 163 से 172): इतने ही में कर्ण का एक महाकाय हाथी मद से उन्मत्त होने के कारण निरंकुश हो साँकल तोड़ कर निकल भागा और जो-जो बाजार के मनोहर मकान, वृक्ष वगैरह उसके सामने आये उन्हें उसने उखाड़ कर फेंक दिये। धीरे-धीरे उसके उत्पात की खबर भीम के कानों में पड़ी और वह उसके पास पहुँचा। लोग उसे देखते ही कहने लगे कि हम सब आपकी शरण में हैं, हमें इससे बड़ा भय हो रहा है। देखिए इसी के कारण हम सब काँप रहे हैं। अतः अब आप हमारी रक्षा कीजिए, हमें इस संकट से बचाइए। महाराज, आप बड़े बली हैं। अतः आपको प्रजा की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि आपको बड़े-बड़े बली भी मानते हैं और आपका नाम भी विपुलोदर है। ऐसे भयानक समय में बलवानों की ही हिम्मत पड़ सकती है। उन लोगों के ऐसे दीनता भरे वचनों को सुनकर भीम उस मदोद्धत हाथी को जीतने के लिए तैयार हुआ। उसने वज्र के जैसे अपने मुष्टिप्रहार, पैरों के प्रहार और भुजदण्डों के प्रहार से उसे क्षणभर में निःसत्व कर उसके दाँत को उखाड़कर मद-रहित कर दिया। यह देख एक मनुष्य ने जाकर भीम की यह सारी लीला कर्ण को कही। उसने कहा कि देव, एक प्रचंड ब्राह्मण ने आपके हाथी को एक क्षण में ही वश में कर लिया है। महाराज! बड़े अचम्भे की बात है कि जिस हाथी को युद्ध में कोई भी नहीं जीत सकता था उसी हाथी को उस बली ने एक क्षण में ही निर्मद कर दिया है। देव, वह बड़ा बलवान् है, शायद कोई उपद्रव खड़ा कर दे। अतएव आप युद्ध के बिना ही छल से उसका निग्रह कर डालिए। उसके वचनों को सुनकर कर्ण ने उसे समझा कर टाल दिया और आप अपने महल में चला गया ॥१६३-१७२॥


तत्र ते जयमापन्ना नीत्वा कालं च कंचन। निर्गताः पाण्डवाः प्रापुर्वैदेशिकपुरं वराम् ॥१७३॥

नृपो वृषध्वजो यत्र वृषध्वजो विराजते। दिशावली प्रिया तस्य दिशाव्याप्तमहायशाः ॥१७४॥

अर्थ (श्लोक 173 से 174): इसके बाद विजयी पाण्डव कुछ दिन तो वहाँ और रहे, बाद वहाँ से चलकर वे वैदेशिकपुर में आये। यहाँ का राजा वृषध्वज था। वह धर्मात्मा था। उसकी रानी का नाम दिशावली था। उसका यश सब दिशाओं में फैला हुआ था। वृषध्वज और दिशावली के एक पुत्री थी। वह बड़ी शुद्ध हृदय


दिशानन्दा महाशुद्धा तयोरासीत्सुता वरा।
जघनस्तनभारेण गच्छन्ती लीलया च या ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 173 से 175): की धारक थी। उसका नाम दिशानंदा था। वह अपने जघन और स्तनों के भार से मंद-मंद चलती हुई हथिनी की गति को जीतती थी और अपने चन्द्रमा समान मुख से वह सारे घर के अंधेरे को दूर करती थी ॥१७३-१७५॥


तत्र तान्पाण्डवान्मुक्त्वा संगतान् श्रमसंगतान्।
शेषान्बुभुक्षितान्भीमः पुरं भिक्षार्थमाययौ ॥१७६॥

विप्रवेषधरो धीमान्भीमो भव्यगुणाम्बुधिः।
भिक्षार्थं भूपसद्माग्रे ययौ बलकुलाकुलः ॥१७७॥

तदा गवाक्षसंरूढा दिशानन्दा शुभानना।
तं निरीक्ष्य निजे चित्तेऽचिन्तयच्चेति निर्भरम् ॥१७८॥

किमयं मन्मथो मानी नररूपं समाश्रितः।
भिक्षाच्छलात्समायातो नान्यश्चेदृग्विधो भवेत् ॥१७९॥

मेषोन्मेषविनिर्मुक्तां तदासक्तां नृपस्तदा।
ज्ञात्वा तां दातुमुद्युक्तः समाकारयति स्म तम् ॥१८०॥

अप्राक्षीद्भूपतिर्विप्र किमर्थमागतोऽसि भोः।
भिक्षार्थं चेद्गृहाण त्वं कन्याभिक्षां ममाग्रहात् ॥१८१॥

इत्युक्त्वा तां महारूपां नानाभरणभूषिताम्।
तस्याग्रे धृतवान्भूपो दिशानन्दां सुनन्दिनीम् ॥१८२॥

भीमोऽभाणीत्तदा राजन्नाहं वेद्मि च वेत्ति वै।
मज्ज्येष्ठसोदरः क्वास्ते स भूप इत्यबीभणत् ॥१८३॥

पुरोपान्ते स्थितश्चेति भीमवाक्यान्महीपतिः।
ज्ञात्वाभ्यर्णं चचालाशु तस्य भीमेन संयुतः ॥१८४॥

अर्थ (श्लोक 176 से 184): वहाँ पहुँच कर भूखे और थके हुए पाण्डवों को किसी विश्राम की जगह छोड़कर उत्तम गुणों का सागर और बलशाली भीम अकेला ही भिक्षा के लिए नगर में गया और ब्राह्मण का वेष बना वह राजा के महल के आगे पहुँचा। उस समय झरोखे में बैठी हुई शुभानना दिशानन्दा ने उसे देखकर मन ही मन सोचा कि कहीं यह मनुष्य रूपधारी मानी कामदेव ही तो-भीख माँगने के छल से यहाँ नहीं आया है। क्योंकि ऐसा सुन्दर रूपशाली दूसरा कोई और तो हो ही नहीं सकता। भीम को देखते ही वह उसके रूप पर निछावर हो गई और एकटक दृष्टि से उसी की ओर देखने लगी। उसकी यह दशा राजा को भी मालूम पड़ गई कि इस सुन्दर युवा पर पूर्ण मोहित होकर दिशानन्दा ने अपना सर्वस्व भी इसे अर्पण कर दिया है। यह देख उसने भीम को बुलाया और उससे पूछा कि विप्र, तुम यहाँ किसलिए आये हो। यदि सचमुच ही भीख माँगने के लिए आये हो तो लो मेरी इस राजकुमारी को भीख के रूप में ग्रहण करो। यह कह कर राजा ने महान् रूपशाली, भाँति-भाँति के गहनों से विभूषित और लोगों को आनंद देने वाली दिशानन्दा को लाकर भीम के आगे खड़ाकर दिया। यह देख भीम बोला कि राजन्, इस सम्बन्ध में मैं कुछ भी नहीं कह सकता। मेरे बड़े भाई जो कुछ करेंगे वही मुझे प्रमाण होगा। इस पर राजा ने पूछा कि वे कहाँ हैं। भीम ने बतलाया कि वे नगर के बाहर प्रदेश में ठहरे हुए हैं। तब राजा भीम के साथ-साथ जहाँ पाण्डव ठहरे हुए थे-वहाँ गया ॥१७६-१८४॥


युधिष्ठिरसमीपं च गत्वा नत्वा समाहितः।
पप्रच्छ कुशलं स्नेहादन्योन्यं स्नेहसंगतः ॥१८५॥

अर्थ: वहाँ युधिष्ठिर के पास पहुँच कर उसने उन्हें नमस्कार किया तथा स्नेह के साथ उनसे कुशल-समाचार पूछा। इसके बाद बड़े स्नेह से राजा ने उनसे नगर में चलने के लिए प्रार्थना की और पाण्डव भी राजा के स्नेह-वश नगर में चले आये। वहाँ राजा ने भोजन आदि से उनकी खूब भक्ति की-


अभ्यर्थ्य ते पुरं नीता राज्ञा भोजनभक्तितः । आवर्जितः समज्याशु सुखं तस्थुः पुरे वरे ॥१८६॥

भीमेन सह कन्याया विवाहार्थं युधिष्ठिरः। अभ्यर्थितो नृपेन्द्रेण तथेति प्रतिपन्नवान् ॥१८७॥

ततस्तयोः शुभे लग्ने विवाहमकरोन्नृपः। पुण्याद्भिक्षामगतेनैव लब्धा तेन सुकन्यका ॥१८८॥

अर्थ (श्लोक 185 से 188): उनका उचित आदर किया। इसके बाद राजा ने भीम के साथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिए युधिष्ठिर से प्रार्थना की। युधिष्ठिर ने उसके लिए अपनी स्वीकारता दे दी। तब शुभ लग्न में राजा ने उन दोनों का बड़े ठाट-बाट के साथ विवाह कर दिया। देखो, पुण्य की महिमा कि भीम आया तो था भिक्षा के लिए और प्राप्त हुआ उसे कन्या रत्न। राजा की भक्ति से पाण्डव बड़े सन्तुष्ट हुए ॥१८५-१८८॥


राज्ञा भक्तिभरेणाशु प्रीणितास्तोषमागताः। कियद्दिनानि ते स्थित्वा निर्जग्मुस्तत्र पाण्डवाः ॥१८९॥

ततः सोमोद्भवां रम्यां सरितं पाण्डुनन्दनाः। उत्तीर्य खेदनिर्मुक्ताः प्रापुर्विन्ध्याचलं वरम् ॥१९०॥

दूरस्तत्समुत्तुङ्गशृङ्गसङ्गी जिनगृहम्। अष्टापदे यथा स्वर्णं नानाशोभासमन्वितम् ॥१९१॥

दृष्ट्वा ते गन्तुमुद्युक्तास्तत्र श्रान्ता अपि स्वयंम्। आरुरुहुर्महोत्तुङ्गं शृङ्गं विन्ध्याभिधाचलम् ॥१९२॥

तत्र हर्षप्रकर्षेण प्रकृष्टाः पाण्डुनन्दनाः। चैत्यालयं महाशालशुम्भच्छोभाविराजितम् ॥१९३॥

स्वर्णसोपानपङ्क्त्याढ्यं नानावर्णविराजितम्। दत्ताररमहाद्वारं शुम्भस्तम्भसुशोभितम् ॥१९४॥

समालोक्य समुद्विग्ना अभवन्भयवर्जिताः। तत्प्रवेष्टुमशक्तास्ते क्षणं खेदेन संस्थिताः ॥१९५॥

ततो भीमः समुत्थाय द्वारोद्घाटनसद्धिया। द्वारे दत्त्वा करं वेगात्कपाटमुदघाटयत् ॥१९६॥

अर्थ (श्लोक 189 से 196): इसके बाद पांडव कुछ दिनों तक और ठहरकर वहाँ से चल दिये और बिना श्रम के वे मनोहर नर्मदा नदी को पार कर विंध्याचल पर्वत के पास आये। वहाँ दूर से ही उनकी दृष्टि विंध्याचल के उन्नत शिखर पर बने हुए जिनालय पर पड़ी, जो नाना प्रकार की शोभा से शोभित और कैलास पर बने हुए सोने के मंदिर सरीखा देख पड़ता था। उस समय यद्यपि वे थके हुए थे, पर भक्ति के आवेश में आकर विंध्याचल के अतीव ऊँचे शिखर पर चढ़ने को तैयार हुए और थोड़े ही समय में वहाँ पहुँच गये। वहाँ पहुँच कर उन सत्पुरुषों ने उस चैत्यालय की विचित्रता को देखकर बड़ा हर्ष प्रकट किया। उस जिनालय के चारों ओर एक सुन्दर कोट था, जिससे उसकी अपूर्व ही शोभा थी। उसमें जाने-आने के लिए सोने की मनोहर सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। उसमें भाँति-भाँति के चित्र बने हुए थे। उसके दरवाजों के किवाड़ बड़े सुन्दर थे। उसमें चित्र विचित्र खंभे लग रहे थे। ऐसे विशाल जिनभवन को देखकर उन्हें पहले तो बड़ा हर्ष हुआ परन्तु जब वे किसी तरह उसके भीतर न जा सके तब दुख से कुछ उद्विग्न हुए। इसके बाद द्वार के किवाड़ खोलने की इच्छा से भीम ने उठ कर ज्यों ही किवाड़ को हाथ लगाया त्यों ही किवाड़ खुल गये ॥१८९-१९६॥


मध्येगृहं प्रविष्टास्ते कुर्वन्तो जयनिःस्वनम्। स्वर्णरूप्यमयान्बिम्बान्ददृशुः श्रीजिनेशिनः ॥१९७॥

अर्थ: तब पाण्डव जय-जय ध्वनि करते हुए उस जिनालय के भीतर गये और वहाँ उन्होंने भव्य प्रतिमाओं के दर्शन किये। इसके बाद उन्होंने फलों और पुष्पों से उनकी पूजा की-उनके आग


पूजयित्वा फलैः पुष्पैर्नर्घ्यैरर्घ्यदानतः। जिनांस्ते तुष्टुवुस्तुष्टा विशिष्टेष्टगुणोत्करैः ॥१९८॥

अद्यैव सफलं जन्म गतिरद्यैव सार्थका। अद्यैव सफले नेत्रे जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥१९९॥

अद्य त्वच्चिन्तनासक्तं स्वान्तं सुश्रान्तिवारकम्। सफलं विपुलं जातं जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥२००॥

अद्यैव सफलाः पादा अद्यैव सफलाः कराः। अद्यैव सफला भावा जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥२०१॥

अद्य जाता वयं धन्या अद्य मान्या मनोहराः। अद्य निःश्रेयसं प्राप्ता जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥२०२॥

अर्थ (श्लोक 197 से 202): भक्तिभाव से अर्घ चढ़ाया और शान्त-चित्त से उनके गुणों का गान कर खूब स्तुति की कि हे जिनेन्द्र, आपके दर्शन करने से आज हमारा जन्म सफल हो गया-हमें मनुष्य पर्याय का फल मिल गया। हमारे नेत्र भी सफल हो गये। हे प्रभो! आपके गुणों का चिंतन करने से आज हमारा हृदय सफल हुआ, एवं हमारी सब थकावट दूर हो गई। भगवन्! आपकी यात्रा से आज हमारे हाथ-पाँव भी सफल हो गये तथा परिणाम भी सफलीभूत हुए। अधिक क्या कहें हम आज कृतार्थ हो गये, मनोहर और मान्य हो गये-मानों हम आज ही मोक्ष को प्राप्त कर चुके ॥१९७-२०२॥


ते स्तुत्वेति जिनान्नत्वा बहिरित्वा क्षणं स्थिताः। यावत्तावत्समायासीद्यक्षः श्रीमणिभद्रकः ॥२०३॥

नत्वावोचत्तदा यक्षो यूयं धन्या नरोत्तमाः। विवेकिनः सदा श्रेष्ठा विशिष्टा गुणसंपदा ॥२०४॥

जिनचैत्यालयद्वारसमुद्घाटनेनतो मया। यूयं पुण्यतमा ज्ञातास्तथा योगीन्द्रवाक्यतः ॥२०५॥

इत्युदीर्य महाधैर्यधारिणे शौर्यशालिने। गदां भीमाय दत्ते स्म यक्षः शत्रुक्षयंकराम् ॥२०६॥

यन्नामतो रणाद्यान्ति शत्रवः संगरोद्यताः। भयं याति यतो नृणां गद्वृन्दं यथौषधात् ॥२०७॥

रत्नवृष्टिं ततश्चक्रे वस्त्राभरणसन्मणीन्। यक्षो दत्ते स्म पञ्चभ्यस्तेभ्यो भक्तिप्रणोदितः ॥२०८॥

अनवद्यां महाविद्यां दस्युदर्पापहां गदाम्। समादाय दरोन्मुक्तास्तस्थुस्ते तत्र पाण्डवाः ॥२०९॥

अर्थ (श्लोक 203 से 209): इस प्रकार जिनदेव की स्तुति कर तथा उन्हें नमस्कार कर वे जिनालय से बाहर निकले। वे बाहर आकर वहाँ बैठे ही थे। कि इतने में वहाँ श्री मणिभद्र नाम का यक्ष आया और उनको नमस्कार कर बोला कि नरोत्तम, आप बड़े विवेकी हैं, श्रेष्ठ हैं और गुण-सम्पदा से युक्त हैं। अतः मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। हे मान्य पुरुष, आपने इस जिनालय के किवाड़ खोले हैं, मैंने इसी से जान लिया है कि आप बड़े पुण्यात्मा जीव हैं और ऐसा ही एक योगिराज ने कहा था। इतना कह कर उस यक्ष ने महान् धीरजधारी, शूरवीर भीम को शत्रु विघातनी नाम एक गदा दी, जिसके नाम को सुनते ही भीषण युद्ध के लिए उद्यत शत्रु भी रणांगण छोड़कर भाग जाते हैं, जैसे कि दवाई से मनुष्यों के रोग भाग जाते हैं। इसके बाद उस यक्ष ने रत्नों की बरसा कर भक्ति से प्रेरित हो उन पाँचों ही पाण्डवों को वस्त्र, आभूषण और मणि-मुक्ता वगैरह भेंट में दिये एवं उसने उन्हें निर्दोष विद्या भी दी। उस निर्दोष विद्या और शत्रुघातकी गदा को पाकर पाण्डव निर्भय होकर ठहरे ॥२०३-२०९॥


जयति जितविपक्षः संगरे शुद्धपक्षो नरपतिगणवन्द्यः सर्वहर्षोऽनवद्यः।
सुगतियुवतिलाभैर्लब्धलीलाविलीलाविशोभैर्युत इह वरभीमः सर्वसौख्याभिससीमः ॥२१०॥

अर्थ: वह भीम योद्धा जय को प्राप्त हो, जो भाँति-भाँति की लीला से युक्त गजगामिनी ललनाओं


यो निर्भर्त्स्य निशाचरं वरगतिं विद्याधरं च भृशम्
नानायुद्धशतैः खगेशतनयां लब्ध्वा हिडिम्बां प्रियाम्।
छित्त्वा दन्तिमदं वृषध्वजसुतामाप्त्वा गदाख्यायुधम्
लेभे श्रीविपुलोदरो जिनगृहद्वारं समुद्घाटयन् ॥२११॥

अर्थ (श्लोक 210 से 211): को पाकर सांसारिक सुख की सीमा पर पहुँच गया, जो रण में शत्रुओं पर विजय को लाभ कर चुका, जिसकी राज-गणों ने वन्दना स्तुति की और जो शुद्ध पक्ष वाला, सबको हर्ष देने वाला और निर्दोष था एवं जिसने सैकड़ों युद्ध करके निशाचर और विद्याधर को भय चकित कर-गर्व रहित कर हिडंबा नाम की विद्याधर-कन्या को पाया, हाथी का मद उतारा, दिशानन्दा को ब्याहा और जिनालय के द्वार के किवाड़ों को खोल कर गदा को प्राप्त किया वह विपलोदर भीम सदा जय को पावे ॥२१०-२११॥

पञ्चदशं पर्व

शीतलं शीललीलाढ्यं शीतलं ललिताङ्गकम् ।
लसल्लक्ष्मीविशालं च स्तुवे श्रीवृक्षलाञ्छनम् ॥१॥

अर्थ: शीतलनाथ भगवान् की मैं स्तुति करता हूँ जो पूर्ण शील के स्वामी हैं, जिनका अतीव मनोहर शरीर है, जो जीवों को शान्ति-दाता हैं, उत्कृष्ट लक्ष्मी के स्थान हैं और जो श्रीवृक्ष के लक्षण से युक्त हैं ॥१॥


अथ धर्मात्मजो राजा यक्षं पक्षीकृतं जगौ ।
हेतुना केन भीमाय त्वया दत्तं गदायुधम् ॥२॥

तदावोचत्सुपक्षाढ्यो यक्षो रक्षितशासनः ।
शृणु भूप वदाम्येतत्कारणं दत्तसंभवम् ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): इसके बाद युधिष्ठिर ने उस यक्ष से पूछा कि यक्षराज, तुमने भीम के लिए जो गदा दी है उसके देने का क्या कारण है। इसके उत्तर में उस उत्तम पक्ष वाले और शासन-कुशल यक्ष ने कहा कि राजन्! सुनिए, मैं गदा देने का कारण बताता हूँ ॥२-३॥


मध्येभारतमुत्तुङ्गो विजयार्धो महाचलः ।
पूर्वापराब्धिसंस्पर्शी मानदण्ड इवापरः ॥४॥

पञ्चविंशतिरुत्तुङ्गः पञ्चाशद्विस्तृतो यकः ।
सपादषड्गतो मूले योजनानां महागिरिः ॥५॥

यश्च श्रेणिद्वयं धत्ते दक्षिणोत्तरभेदगम् ।
तत्र दक्षिणसच्छ्रेणौ नगरं रथ्नूपुरम् ॥६॥

अर्थ (श्लोक 4 से 6): इस भरत क्षेत्र के बीच में एक अति ऊँचा विजयार्द्ध नाम पहाड़ है। वह पूर्व और पच्छिम की ओर को लम्बा है और दोनों ओर के कोनों से लवण समुद्र को छूता है। अतः वह ऐसा जान पड़ता है मानो भरत क्षेत्र को नापने के लिए मान-दंड ही है। वह पच्चीस योजना ऊँचा है, पचास योजन का उसका विस्तार है और सवा छह योजन की उसकी जड़ है। उसकी दो श्रेणियाँ हैं। एक दक्षिण श्रेणी और दूसरी उत्तर श्रेणी। दक्षिण श्रेणी में रथ्नूपुर नाम एक नगर हैं ॥४-६॥


तत्पतिः पातितानेकविपक्षो मेघवाहनः ।
तत्प्रिया प्रीतिदा प्रीतिमती नाम्नाऽभवद्वरा ॥७॥

घनवाहनसंसेव्यस्तत्सुतो घनवाहनः ।
विद्यासाधनसंसक्तो विक्रमाक्रान्तशात्रवः ॥८॥

राज्यविस्तीर्णतां वाञ्छन्विपक्षांक्षेप्तुमुद्यतः ।
गदासिद्धिकरीविद्यासिद्धयै विन्ध्याचले गतः ॥९॥

तत्र साधयतो विद्यां चिरं तस्याभवद्गदा ।
सिद्धा सुविद्यया सिद्धा प्रसिद्धा च जगतत्रये ॥१०॥

चतुर्णिकायदेवौघा गच्छन्तो व्योम्नि तत्क्षणे ।
दृष्ट्वा विद्याधरेशेन विद्याविभववासिना ॥११॥

अर्थ (श्लोक 7 से 11): उसका स्वामी मेघवाहन था। उसने रण में बहुत से बैरियों पर विजय पाई थी। उसकी प्रिया का नाम प्रीतिमती था। वह राजा को बहुत प्यारी थी और वह भी राजा पर पूर्ण प्रेम रखती थी। इन दोनों के एक पुत्र था। उसका नाम था घनवाहन। घनवाहन के बहुत से अच्छे-अच्छे वाहन थे। वह विद्या साधने में दत्तचित्त था। उसने अपने पराक्रम से बहुत से शत्रुओं को तो वश में कर लिया था और अपने राज्य को बढ़ाने की इच्छा से बाकी शत्रुओं को जीतने को वह तैयार था। इसलिए वह गदा देने वाली विद्या साधने के लिए विंध्याचल पर्वत पर गया था। वहाँ उसने बहुत दिनों तक विद्या साधी। उसके फल से उत्तम विद्या-साधन से सिद्ध होने वाली और तीन लोक में प्रसिद्ध यह गदा उसे प्राप्त हुई। इसी समय आकाश मार्ग से देव जा रहे थे। उनको जाते हुए देखकर विद्या के वैभव से युक्त उस विद्याधरों


इमे कुत्र सुरा यान्ति गगने केन हेतुना। इति पृष्टः सुरः कश्चित्तेनोवाच महामनाः ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 7 से 12): के राजा ने कहा कि ये देव कहाँ जा रहे हैं और किस लिए जा रहे हैं। इस पर एक देव ने कहा कि सुनिए, मैं आपको सब हाल कहता हूँ? ॥७-१२॥


श्रुणु खेचर विन्ध्याद्रौ केवलज्ञानसंभवः। क्षमाधरयतीन्द्रस्यात्राभूद्भुवनभासकः ॥१३॥

वयं तं वन्दितुं यामो लिप्सवो बोधसंपदम्। चिकीर्षवः सुकल्याणं धर्मामृतपिपासवः ॥१४॥

तच्छ्रुत्वा खेचरः सोऽपि प्रगत्य तत्क्रमाम्बुजम्। वन्दित्वा धर्मपीयूषं पपौ पापपराङ्मुखः ॥१५॥

निर्विण्णो भवभोगेषु जिघृक्षुः संयमं परम्। स प्रार्थयन्मुनिं दीक्षां क्षमाक्षिप्तक्षमः क्षमी ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 13 से 16): विंध्याचल पर्वत पर क्षमाधर नाम योगीराज को तीन लोक को प्रकाशित करने वाला केवल ज्ञान लाभ हुआ है। इसलिए ज्ञान-सम्पत्ति को चाहने वाले हम सब धर्मामृत पीने की इच्छा से प्रभु का ज्ञानकल्याणक करने के लिए वहाँ जा रहे हैं। यह सुनकर वह विद्याधर भी वहाँ गया और पाप से पराङ्मुख हो उसने मुनि के चरण-कमलों में प्रणाम करके धर्मामृत का पान किया और संसार से विरक्त होकर संयम लेने की इच्छा से उस क्षमा के भण्डार और शान्त परिणामी विद्याधर ने दीक्षा के लिए मुनिराज से प्रार्थना की ॥१३-१६॥


गदाविद्या तदागत्य तमुवाच विचक्षणम्। अस्मत्साधनसंक्लेशं त्वं चकर्थ कृतार्थवित् ॥१७॥

सुसिद्धायाः फलं तस्या गृहाणागमकोविद। अन्यथा क्लेशसंपत्तिर्विहिता च कथं त्वया ॥१८॥

प्रौढा दृढा गदाविद्या संगरे जयकारिणी। कीर्तिलक्ष्मीप्रदा दिव्या नानाभोगप्रसाधिनी ॥१९॥

कथं संसाधिता सिद्धा चेत्कथं कथमप्यहो। त्वं तत्फलं गृहाणाशु गम्भीरो भव सर्वथा ॥२०॥

यत्प्रभावात्सुपर्वाणो भवन्ति भृत्यसंनिभाः। अन्येषां का कथा नृणां विरक्तस्तेन मा भवः ॥२१॥

अर्थ (श्लोक 17 से 21): यह देख उस गदा विद्या को बड़ी चिन्ता हुई और वह आकर उस विचक्षण से कहने लगी कि हे कृत अर्थ को जानने वाले विद्वान्, आपने मेरे साधने में इतना भारी कष्ट सहा तब कहीं मैं सिद्ध हुई और अब आप मेरा कुछ भी फल प्राप्त न कर दीक्षा ले रहे हैं, यह क्या बात है। यदि आपकी ऐसी ही मनसा थी तो फिर मेरे साधने के लिए आपने व्यर्थ ही इतना क्लेश उठाया। यह प्रौढ़ और दृढ़ गदा युद्ध में जय दिलाती है, संसार में कीर्ति फैलाती है और भाँति-भाँति के दिव्य भोगों को देती है। अतएव जब आपने इसे साधा है और यह सिद्ध हो गई है तब इसका आप अवश्य ही फल प्राप्त कीजिए और गंभीरता से काम लीजिए। भला जिसके प्रभाव से देव भी आकर नौकरी बजाते हैं और मनुष्य सदा ही सेवा में हाजिर रहते हैं ऐसी उत्तम विद्या से आप उदास होते हैं, यह कहाँ तक उचित है। अतः आप इससे किसी तरह भी उदास मत हूजिए ॥१७-२१॥


अवादीत्स गदाविद्यां श्रुत्वेति प्रवरं वचः। एतल्लब्धं फलं त्वत्तो विद्ये यन्मुनिसंगमः ॥२२॥

अर्थ: विद्या के इन वचनों को सुनकर उसने उत्तम वचनों में कहा कि विद्यादेवि, तुमसे मैंने यही भारी फल पा लिया है जो मुझे तुम्हारे प्रभाव से ऐसे महा मुनिराज का समागम मिल गया। तुम्हीं कहो कि यदि मैं विद्या न साधता तो इनका समागम प्राप्त कर सकता। अतः मैं जो तुमसे मुनि


असाधयिष्यं नो विद्यां चेदलप्सि कथं मुनिम्। अतस्त्वत्तः फलं प्राप्तं लब्धो यन्मुनिरुत्तमः ॥२३॥

अर्थ (श्लोक 22 से 23): समागम रूप फल पा चुका-यही मेरे लिए बहुत है ॥२२-२३॥


तं निश्चलं परिज्ञाय विद्या प्रोवाच सद्गिरा। मां प्रसाध्य नरेन्द्राय मा त्याक्षीस्त्वं विचक्षण ॥२४॥

अहं स्वस्थानमुत्सृज्य त्वां प्राप्ता पुण्यतस्तव। मां तित्यक्षस्यहं जातोभयभ्रष्टा करोमि किम् ॥२५॥

कश्चिद्राज्यं परित्यज्य दीक्षित्वा च ततश्च्युतः। यद्वत्तद्वदहं जातोभयभ्रष्टा महामते ॥२६॥

स तस्याः कृपणं वाक्यमाकर्ण्य कृतिनं मुनिम्। माणिभद्रोऽहमित्याख्यद्विनयी नयपेशलः ॥२७॥

भविष्यति पतिः कोऽस्या विद्याया वद सत्वरम्। सोऽवचद्यक्ष भीमोऽस्या भविता पतिरुत्तमः ॥२८॥

स कः कथं पुनर्ज्ञेय इति पृष्टो मया मुनिः। जगाद जगदानन्दं विदधानः प्रमोदवाक् ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 24 से 29): इस उत्तर से उसको निश्चल जानकर विद्या ने मधुर वाणी द्वारा फिर भी कहा कि नरेन्द्र, तुम बड़े विचक्षण पुरुष हो, सब कुछ जानते हो। देखो, मैं फिर भी कहती हूँ कि तुम मुझे साध कर मत छोड़ो। मैं तुम्हारे पुण्य-प्रताप से ही अपना स्थान छोड़ तुम्हारे पास आई हूँ और तुम मुझे छोड़ना चाहते हो। तब आप ही कहें कि मैं दोनों ओर से भ्रष्ट होकर अब क्या करूँ। इस वक्त मेरी वैसी ही गति हो रही है जैसी कि राज्य छोड़कर दीक्षा ले पुनः दीक्षा से भी भ्रष्ट हो जाने वाले पुरुष की होती है। वह न इधर का रहता है और उधर का। यही हाल मेरा भी है जो मैं न इधर की रही न उधर की-मेरा कोई ठिकाना ही नहीं रहा। राजन्! उस विद्या के ऐसे दीन वचनों को सुनकर मैंने उन कृती मुनिराज से पूछा कि प्रभो! अब इस विद्या का कौन नीतिवान् विनयी पुरुष पति होगा। मुनिराज ने उत्तर दिया कि यक्ष, इसका स्वामी अब महापुरुष भीम होगा। यह सुनकर मैंने फिर मुनिराज से पूछा कि भीम कौन है? और वह कैसे जाना जायेगा? इसके उत्तर में संसार को आनन्द देने वाले वे मुनिराज प्रमोद के साथ यों कहने लगे ॥२४-२९॥


अत्रैव भरते हस्तिनागङ्गे गुणोत्करः। प्रचण्डो भविता पाण्डुस्तत्सुतो भीमनामभाक् ॥३०॥

स सत्रं भ्रातृभिर्भीमः समेष्यत्यत्र वन्दनाम्। त्रैलोक्यसुन्दरे चैत्ये कर्तुं भावपरायणः ॥३१॥

कपाटपिहितं द्वारं यः समुद्घाटयिष्यति। गदापतिः स एवात्र भविष्यति न संशयः ॥३२॥

विद्याधरस्तथा चाहं श्रुत्वैवं खगनायकः। शिक्षां दत्त्वा सुविद्यायाः प्राव्राजीन्मुनिसंनिधौ ॥३३॥

ततः प्रभृति तद्रक्षां कुर्वन्वो वीक्षितुं नृपान्। स्थितोऽद्यापि तथा वीक्ष्य तुष्टोऽस्मै च गदामदाम् ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 30 से 34): इसी भरत क्षेत्र में एक हस्तिनापुर नाम नगर है। वहाँ का राजा पाण्डु था। वह गुणों का समुद्र था। भीमसेन उसी का पुत्र है और वह शुद्ध परिणामी तीन लोक में सुन्दर इस चैत्यालय की वन्दना के लिए अपने भाइयों सहित अति शीघ्र ही यहाँ आवेगा। स्पष्ट बात यह है कि जो कोई यहाँ आकर इस जिनालय के किवाड़ों को खोलेगा वही इस गदा का स्वामी होगा। यह सुनकर वह विद्याधर राजा तो विद्या को समझा कर मुनि के पास दीक्षित हो गया और मैं तभी से इसकी रक्षा करता हुआ और आप लोगों की प्रतीक्षा करता हुआ यहीं ठहरा हुआ हूँ। आज आप लोगों को आया देखकर मुझे बड़ा भारी संतोष हुआ और मुनि के कहे अनुसार मैंने भीम को यह गदा दी। इसके बाद उस यक्ष ने वस्त्र,


इत्युक्त्वा पूजयित्वा तान्वस्त्राद्यैर्वरभूषणैः।
यक्षोऽगान्निजमावासं स्मरंस्तेषां गुणावलिम् ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 30 से 35): आभूषण आदि के द्वारा उनकी पूजा-भक्ति की और अन्त में उनके गुणों को याद करता हुआ वह अपने स्थान को चला गया ॥३०-३५॥


ततस्ते दक्षिणान्देशान्विहृत्य हस्तिनं पुरम्।
गन्तुं समुद्यताश्चासन्भुञ्जन्तो धर्मजं फलम् ॥३६॥

क्रमान्मार्गवशात्प्रापुर्माकन्दीं नगरीं नृपाः।
स्वःपुरीमिव देवौघा बुधसीमन्तिनीश्रिताम् ॥३७॥

विशालेन सुशालेन संस्कृता भाति भूतले।
भालेन भामिनी यद्वद्या सद्गूर्णसमाश्रिता ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 36 से 38): इस प्रकार पाण्डव दक्षिण के देशों में विहार करते और धर्म के फल को भोगते हुए हस्तिनापुर जाने को तैयार हुए। वहाँ से चल कर वे धीरे-धीरे मार्ग में पड़ने वाली माकन्दी नाम नगरी में आये। वह देवताओं जैसे सत्पुरुषों का और देवांगनाओं जैसी ललनाओं का निवास था, अतः स्वर्गपुरी-सी जान पड़ती थी। उसके चारों ओर एक सुन्दर विशाल कोट था। जैसे स्त्रियाँ माँग में उत्तम लाल वर्ण का सिंदूर भर कर शोभा पाती हैं वैसे ही उसमें भी उत्तम वर्ण के लोग भर रहे थे, अतः वह भी अतीव शोभा पाती थी। तात्पर्य यह कि वह सुंदर सजावट से ऐसी जानी जाती थी मानों स्वर्गपुरी ही नीचे उतर कर यहाँ आ गई है ॥३६-३८॥


तत्र ते पाण्डवा गत्वा द्विजवेषधराः पराः।
कुलालसदनं प्राप्य तस्थुः प्रच्छन्नतां गताः ॥३९॥

पश्यन्तः पावनां पूर्णां बुधैस्तां लोकपालकैः।
पाण्डवास्तोषमासेदुरमराः स्वःपुरीमिव ॥४०॥

तत्रास्ति भूपतिर्भव्यो द्रुपदो द्रुपदस्थिरः।
सवीर्यो धैर्यसंपन्नो न जय्यो जितशत्रवः ॥४१॥

प्रिया भोगवती तस्य नाम्ना भोगवती सदा।
भजन्ती परमान्भोगान्भूषणानि बभार या ॥४२॥

अर्थ (श्लोक 39 से 42): वहाँ पहुँच कर वे ब्राह्मण वेष-धारी पाण्डव एक कुँभार के घर गये और वहाँ ठहर गये। इसके बाद वे पवित्र और लोकों को पालने वाले पंडितों से परिपूर्ण उस पुरी को देखने के लिए निकले। उसकी शोभा देखकर वे बड़े संतुष्ट हुए, जैसे कि स्वर्गपुरी को देखकर अमर-गण संतुष्ट होते हैं। वहाँ का राजा द्रुपद था। वह वृक्ष की जड़ जैसा स्थिर था, वीर्यशाली था, धीरज-धारी था और शत्रुओं को जीतने वाला था। वह स्वयं किसी से नहीं जीता जाता था। उसकी प्रिया का नाम भोगवती था। वह वास्तव में भोगवती ही थी-भोगों की खान थी। भाँति-भाँति के मनोहर भोगों को भोगती थी। वह आभूषणों से खूब सजी हुई थी ॥३९-४२॥


धृष्टद्युम्नादयः पुत्रास्तयोः सुद्युम्नदीपिताः।
स्ववीर्याक्रान्तदिक्चक्राः शक्रा इव मनोहराः ॥४३॥

द्रौपदी च परा पुत्री तयोरासीत्सुलक्षणा।
सुरूपेण गुणैश्चापि या जिगाय शचीं पराम् ॥४४॥

गत्या मरालसत्पत्नीं नखैस्ताराः सुपङ्कजम्।
अङ्घ्रिणा कदलीस्तम्भं जङ्घया जघनेन च ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 43 से 45): द्रुपद के कई पुत्र थे। वे सुवर्ण के समान कान्ति वाले थे। उन्होंने अपने पराक्रम से सब दिशाओं पर अधिकार जमा लिया था। वे इन्द्र की तरह मनोहर थे। उनके नाम धृष्टद्युम्न आदि थे। इनके सिवा उसके एक पुत्री भी थी। उसका नाम द्रौपदी था। वह उत्तम लक्षणों वाली थी और अपने सुन्दर रूप तथा गुणों से इन्द्राणी को भी जीतती थी। अपनी चाल से वह हंसी को और नखों से


कामक्रीडागृहं स्वर्णनितम्बेन शिलां पराम्।
सावतां सरसीं नाभिमण्डलेन च वक्षसा ॥४६॥

कनकाद्रितटं स्वर्णकुम्भौ नागकलङ्कितौ।
स्तनाभ्यां हारपूर्णाभ्यां बाहुना कल्पशाखिकाम् ॥४७॥

वक्त्रेणेन्दुं स्वरेणैव पिककान्तां च चक्षुषा।
मृगाङ्गनां सुवंशं च नासया विधिपत्रकम् ॥४८॥

ललाटेन धम्मिल्लेन भुजंगं या जिगाय वै।
कलाकुशलसंलीना तन्वङ्गी कठिनस्तनी ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 43 से 49): तारा-गण को जीतती थी। चरणों से कमल की और जाँघों से केले के स्तंभों को जीतती थी। जघनों से कामक्रीड़ा के घर को और नितम्बों से सोने की शिला को जीतती थी। नाभि-मण्डल से भँवरों वाले सरोवर की और वक्षस्थल से कैलास के तट को जीतती थी। जिन पर हार लटक रहा था ऐसे कुचों के द्वारा वह सांपों से वेष्टित कुंभों को जीतती थी। हाथों के द्वारा कल्पवृक्ष की शाखाओं को, मुख से चाँद को और स्वर से कोकिला को जीतती थी। आँखों से मृगी को, नाक से बाँस की सुंदर बाँसुरी को और ललाट से अष्टमी के चंद्रमा को जीतती थी। अपने सुंदर केशपास से वह भुजंग को जीतती थी। वह कला-कौशल में पूर्ण कुशल थी। उसका कटिभाग कृश था और स्तन गोल और कठिन थे ॥४३-४९॥


द्रुपदो वीक्ष्य तां पुत्रीं यौवनोन्नतिशालिनीम्।
आहूय मन्त्रिणः प्राह विवाहार्थं विशांपतिः ॥५०॥

सचिवाः स्वस्वयोग्येन बोधेनोचुः परं वचः।
अनेकशो वरान् दक्षान्दर्शयन्तो नृपात्मजान् ॥५१॥

कांस्कान्वीक्ष्य नृपेन्द्रोऽथ याच्ञाभङ्गभयादिति।
आह स्वयंवरः ख्यातमण्डपः क्रियतां लघु ॥५२॥

दूतानाहूय वेगेन सलेखान्प्राहिणोन्नृपः।
कर्णदुर्योधनादीनामानयनार्थमञ्जसा ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 50 से 53): एक दिन द्रुपद ने देखा कि पुत्री अब युवती हो गई है, अतः इसका जल्दी विवाह कर देना चाहिए। यह सोचकर उसने अपने मंत्रियों को बुलाया और उनसे इस सम्बन्ध में सलाह ली। उन्होंने भी अपनी-अपनी योग्यता और बुद्धि के अनुसार सलाह दी और बहुत से राजाओं के नाम कहे और कहा कि, इनमें से राजन्! आप जिसे पसन्द करें, उसी के साथ द्रौपदी का ब्याह कर दें। मंत्रियों की इस सम्मति के अनुसार राजा ने भी किसी किसी कुमार की ओर दृष्टि दौड़ाई पर फिर याचना भंग होने के भय से उसने यही निश्चित किया कि स्वयंवर की तैयारी करके अति शीघ्र एक सुन्दर स्वयंवर-मण्डप बनवाया जाये। स्वयंवर के बिना ठीक नहीं होगा। किसी से वर की याचना की गई और उसने मंजूर न की तो उल्टा दुख ही होगा। इसके बाद राजा ने दूतों को बुलाया और उन्हें निमंत्रण पत्र देकर कर्ण और दुर्योधन आदि राजाओं के पास भेज दिया ॥५०-५३॥


सुरेन्द्रवर्धनः खेटः खगाद्रौ सुखसाधनः।
नैमित्तिकं समप्राक्षीत्कन्याया वरमुत्तमम् ॥५४॥

स समालोक्य चोवाच शृणु राजन् समासतः।
माकन्द्यां यो बली ज्यायां गाण्डीववरकार्मुकम् ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 54 से 55): खगाचल पर्वत पर एक विद्याधर राजा रहता था। उसका नाम सुरेन्द्रवर्धन था। उसे सब साधन प्राप्त थे। उसके एक कन्या थी। एक समय उसने एक नैमित्तिक से पूछा कि मेरी कन्या का वर कौन होगा। नैमित्तिक ने कहा कि राजन्! माकंदी पुरी में आकर जो बलवान् पुरुष गांडीव धनुष चढ़ावेगा


रोहयिष्यति ते पुत्र्या द्रौपद्याश्च जनिष्यति। वरः कोऽपि बली श्रीमान्पुण्यवान्परमोदयः ॥५६॥

इत्याकर्ण्य खगश्चायं गाण्डीवं वरकन्यकाम्। समादाय समागच्छन्माकन्द्यां कुन्दसद्यशाः ॥५७॥

अभ्येत्य द्रुपदं तत्र प्रवृत्तिं कन्यकोद्भवाम्। प्रजल्प्य जल्पवित्तस्मै ददौ गाण्डीवकार्मुकम् ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 54 से 58): वही पुण्यशाली, श्रीमान् और परमोदयशाली तुम्हारी कन्या और द्रौपदी का वर होगा। यह सुनकर कुंद के समान यश वाला वह विद्याधर गांडीव धनुष और अपनी कन्या को लेकर माकन्दी पुरी में आया और वहाँ द्रुपद राजा के पास जाकर उससे उसने कन्या के सम्बन्ध की सारी बात कह दी और साथ ही उस स्पष्टवक्ता ने द्रुपद को वह धनुष भी दे दिया ॥५४-५८॥


ततस्तु द्रुपदो भूपो मण्डपन्यासमुत्तमम्। कुम्भकोद्भूतसत्तम्भं शातकुम्भसुतोरणम् ॥५९॥

वितानतानसंछन्नं मुक्तालम्बूपशोभितम्। नानाचित्रितसद्धेमभित्तिकापरिवेष्टितम् ॥६०॥

पताकापटसंछन्नगगनं नगरोपमम्। विशाखाढ्यं समुत्तुङ्गमध्यवेदिमत्तल्लिकम् ॥६१॥

हट्टद्घाटकसंघट्टघटितं स्तम्भमञ्चकम्। अकारयज्जनाभोगभोगयदं शुभाकृतिकम् ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 59 से 62): इसके बाद द्रुपद ने अति शीघ्र एक सुन्दर मंडप तैयार करवाया। उसमें सोने के खंभे लगे हुए थे और सोने का ही तोरण बाँधा गया था। उस पर मुक्ताफलों से विभूषित चंदोवे तने हुए थे। भाँति-भाँति के चित्रों से सुशोभित सोने की उसकी भीतें थीं। उस पर इतनी पताकायें फहरा रही थीं कि उनसे सारा गगन-मण्डल ढक गया था। वह नगर के जैसा दीख पड़ता था। उसमें बहुत-सी गलियाँ बनी हुई थीं। उसके ठीक बीच में एक ऊँची वेदिका बनाई गई थी। दीप्तिशाली सोने के पायों के उसमें बहुत से तख्त पड़े हुए थे। वह बहुत ही सुन्दर आकार का था और भाँति-भाँति की भोग-सम्पत्ति का दाता था ॥५९-६२॥


तावता भूमिपाः सर्वे कर्णदुर्योधनादयः। यादवा मगधाधीशा जालन्धराश्च कौशलाः ॥६३॥

अभ्येत्य मण्डपे तस्थुर्महारूपसुशोभिनः। द्विजवेषधरास्तत्र पाण्डवाः पञ्च संस्थिताः ॥६४॥

तावद्द्रुपदविद्येशावित्थत्कारयतां वराम्। घोषणां घोषनिर्भिन्नघनघोषां सुपोषणाम् ॥६५॥

गाण्डीवकार्मुकं ज्यायामारोप्य यो विधास्यति। राधानासास्थमुक्ताया वेधं च स वरोऽनयोः ॥६६॥

इति कन्याप्रतिज्ञायाः शुश्रुवुर्घोषणां घनाम्। अभ्येत्य चापमावेष्ट्य द्रोणकर्णादयस्तथा ॥६७॥

चापं द्रष्टुमपि स्पष्टं न क्षमास्ते महीभुजः। स्पर्शनाकर्षणे तेषां कुतस्त्या शक्तिरिष्यते ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 63 से 68): स्वयंवर के समय कर्ण, दुर्योधन आदि यादव, मगधाधीश, जालंधर और कौशल आदि के सब राजा आये और वे महान् रूप-सौन्दर्यशाली मण्डप में आकर विराजे। ब्राह्मण-वेष में पाँचों पांडव भी यहीं माकन्दी पुरी में ठहरे हुए थे। इसी समय द्रुपद और सुरेन्द्रवर्द्धन विद्याधर ने मेघ के शब्द को भी जीतने वाली घोषणा करवाई कि जो कोई गांडीव धनुष चढ़ाकर राधावेध करेगा वही पुण्यवान् इन दोनों कन्याओं का वर होगा। कन्याओं की यह प्रतिज्ञा-घोषणा सुनकर कर्ण आदि सब राजा आकर उस धनुष को देखने लगे। वह इतना कान्तिशाली था कि उसके तेज को वे लोग सह न सके। उसे फिर छूने और चढ़ाने के लिए तो उनमें शक्ति ही कहाँ थी ॥६३-६८॥


तावता द्रौपदी कन्या नानाभूषणभूषिता। दुकूलपरिधानेन छादयन्ती निजां तनूम् ॥६९॥

श्लक्ष्णकञ्चुकसंछन्नस्तनकुम्भभराश्रिताम्। रणन्नूपुरनादेन जयन्ती कामभामिनीम् ॥७०॥

लसन्नासापुटाग्रस्थस्वर्णमुक्ताफलान्विता। उपमण्डपसद्गेहमागता तान्दिदृक्षया ॥७१॥

तावन्नृपाः सुमञ्चस्था वीक्षन्ते स्म सुकन्यकाम्। लसल्लावण्यलीलाढ्यां वेष्टितां स्वसखीजनैः ॥७२॥

धात्रीहस्तसुविन्यस्तमणिमालां मलापहाम्। कटाक्षक्षेपमात्रेण क्षिपन्तीं भूरिभूमिपान् ॥७३॥

ते तां वीक्ष्य समुत्क्षिप्तमदना आहुरुद्धियः। सुरूपा सुभगाकारा नास्त्यन्या चेदृशी क्वचित् ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 69 से 74): इसी समय अनेक प्रकार के गहनों से विभूषित और रेशमी ओढ़नी से अपने शरीर को ढके हुई द्रौपदी मंडप में आये हुए राजाओं को देखने की इच्छा से वहाँ आई। वह बारीक कंचुकी से प्रच्छन्न कुचकुंभों के भार से युक्त थी और अपने नूपुरों के रण-झण शब्द से रति को भी जीतती थी। उसकी नासा के अग्रभाग में मुक्ताफलों से, जड़ी हुई सोने की सुंदर नथ सुशोभित थी। तात्पर्य यह कि इस वक्त वह अपूर्व ही शोभायुक्त थी और इन्द्राणी के जैसी देख पड़ती थी। वह रूपलावण्य की खान थी। उसके सब ओर उसकी सखियाँ थीं। धाय के हाथ में उसने मणियों की माला दे रक्खी थी। वह निर्मल थी और अपने कटाक्षपात द्वारा उन राजाओं के मन को मोहित करती थी। ऐसी मनमोहिनी मूर्ति वाली द्रौपदी को उन राजाओं ने ज्यों ही देखा कि उनकी कामाग्नि धधक उठी। वे मन ही मन बोले कि ऐसी सुन्दरी रूप-सौन्दर्य की सीमा दूसरी स्त्री तो हमने आज तक नहीं देखी। इसका रूप-सौन्दर्य संसार भर से बढ़ा चढ़ा है ॥६९-७४॥


कश्चिन्मित्रेण वै सत्रं चित्रालापं सुनर्मणा। कुर्वाणः कन्यकां कम्प्रां कटाक्षेण स्म वीक्षते ॥७५॥

नागवल्लीदलं लात्वा कश्चिच्चच्छेद् भूपतिः। ईषत्स्मितेन रागाढ्यान्दशनान्दर्शयन्स्फुटम् ॥७६॥

पादाङ्गुष्ठेन सौवर्णं लिखति स्म वरासनम्। कश्चित्सव्याङ्घ्रिमादाय वामोरूपरि संदधे ॥७७॥

विधत्ते जृम्भणं कश्चित्कश्चिद्धत्ते स्म शेखरम्। मूर्ध्नि कश्चिन्निजं चाङ्गमङ्गदेन न्यपीडयत् ॥७८॥

कश्चिच्च पाणिना श्मश्रु चालयामास सर्वतः। कश्चित्त्वमुद्रिकोद्भासिकरान्संदर्शयत्यहो ॥७९॥

एवं स्थितेषु भूपेषु स्वनो वीणामृदङ्गजः। वंशजश्च विशेषेणाविरासीत्पटहादिजः ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 75 से 80): इस समय वहाँ जितने राजा थे सबकी विचित्र ही चेष्टा हो रही थी। कोई अपने मित्र के साथ बातें करता हुआ द्रौपदी पर मंद कटाक्ष फेंक रहा था। कोई मंद मुस्कान से अपने पान के रंग से लाल हुए दाँतों को दिखाता हुआ दाँतों के नीचे पान दबाकर उसे बड़े जोर से चबा रहा था। कोई पाँव के अँगूठे के द्वारा सिंहासन पर लिख सा रहा था। कोई दाहिने पाँव को बायें पाँव पर रक्खे हुए था। कोई जँभाई ले रहा था। कोई सिर पर मुकुट रख रहा था। कोई अपने हाथों के कड़ों को इधर-उधर घुमा रहा था, जिससे उसकी भुजायें ऐंठती सी थीं। कोई हाथ से मूंछों को मरोड़ता था। कोई अँगूठियों की कान्ति से प्रकाशित हाथों को ऊँचे उठा-उठाकर दिखाता था। इस प्रकार विचित्र चेष्टायें करते हुए वे लोग वहाँ बैठे हुए थे। उसी समय वीणा, मृदंग, बाँसुरी, नगाड़े आदि की आवाज हुई, जिससे सब दिशायें गूँज उठीं ॥७५-८०॥


सुलोचना ततो धात्री स्वर्णयष्टिकरा सुवाक्।
दर्शयामास भूपालान् द्रौपद्यै मञ्चकस्थितान् ॥८१॥

अधीशोऽयमयोध्यायाः सूर्यवंशशिरोमणिः।
सुरसेनः सुनासीर इव भाति बुधेश्वरः ॥८२॥

वाराणसीपतिश्चायं विपक्षक्षपणोद्यतः।
अयं चम्पापुरीनाथः कर्णः स्वर्णसमानरुक् ॥८३॥

अयं दुर्योधनो धीमान् हस्तिनागनरेश्वरः।
दुःशासनोऽयं तद्भ्राता दुर्मर्षणमहीपतिः ॥८४॥

इमे यादवभूपाला इमे मगधमण्डनाः।
इमे जालन्धराधीशा इमे बाल्हीकभूभुजः ॥८५॥

एतेषु सत्सु भूपेषु न जाने को महीपतिः।
धनुरादाय बाणेन न जाने किं करिष्यति ॥८६॥

अर्थ (श्लोक 81 से 86): इसके बाद उस मिष्टभाषिणी सुलोचना धाय ने जो कि वरमाला हाथ में लिये हुए थी, वहाँ बैठे हुए राजाओं का द्रौपदी को परिचय कराया। वह बोली बेटी, देखो ये अयोध्या के राजा हैं। ये सूर्यवंश के शिरोमणि हैं। इन्द्र के जैसी विभूति के धारक हैं। पण्डित लोग इनका आश्रय लेते हैं। इनका नाम सुरसेन है। ये शत्रुपक्ष के विघातक बनारस के राजा हैं। ये सुवर्ण की सी कान्ति वाले चंपापुरी के राजा कर्ण हैं। ये हस्तिनापुर के राजा दुर्योधन हैं। बड़े बुद्धिमान् हैं और यह इन्हीं का भाई दुश्शासन है। यह शत्रुओं का नाश करने वाला दुर्मर्षण राजा है। देखो, ये यादववंशीय राजा हैं। ये मगध देश के अधिपति हैं। ये जलंधर देश के राजा हैं। ये वाल्हीक देश के राजा हैं। पुत्री, मैं नहीं कह सकती कि इन राजाओं में से कौन धनुष को उठाकर बाण के द्वारा राधावेध करेगा ॥८१-८६॥


ज्वलदग्निमहाज्वालाजालसज्जटिलो धनुः।
सुरनागफणास्फीतफूत्कारमुखराननः ॥८७॥

ज्वालयन्धर्तुमायातान्भात्यधीशान्धनुर्धरान्।
तत्र तज्जवालया ध्वस्ताः पिधायागुः स्वलोचने ॥८८॥

अन्ये तस्थुः स्थिता दूरात् संवीक्ष्य विषमोरगान्।
भयतः कम्पमानाङ्गाः संमीलितविलोचनाः ॥८९॥

अन्ये ज्वालाहताः पेतुर्धरायां धरणीधराः।
मुमूर्च्छुरपरे स्वच्छज्वालातापप्रपीडिताः ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 87 से 90): बहुत से राजे लोग तो उस धनुष को उठाने के लिए इसलिए असमर्थ हुए कि वह जलती हुई आग की महान् ज्वाला से व्याप्त था, नागों के फणों की फुंकारों से वह शब्द-मय हो रहा था। अतः जो उसे उठाने के लिए उसके पास जाते उन्हें वह अपनी प्रचंड ज्वाला के द्वारा भस्म किये डालता था, जिससे वे अपनी आँखें बन्द कर-करके उससे दूर भागते थे। कोई राजा उन भयंकर जहरीले साँपों को देखकर दूर ही से डर के मारे काँपते थे और उनको न देख सकने के कारण अपने नेत्रों को ढंक लेते थे। कोई हिम्मत बाँधकर उसके पास तक जाते भी थे तो उसकी विषम ज्वाला से पीड़ित होकर वे जमीन पर गिर पड़ते थे और उनमें बहुतों को मूर्छा तक आ जाती थी ॥८७-९०॥


अन्यालं परे प्रोचुर्यास्यामो मन्दिरं मुदा।
दास्यामो दुर्धरं दानं दीनानाथदरिद्रिषु ॥९१॥

जगुः केचित्स्वयोषाभिः क्रीडिष्यामः स्वमन्दिरे।
रूपसंपूर्णया चालमनया प्राणयातनात् ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 91 से 92): कोई बेचारे कहते थे कि हमें द्रौपदी नहीं चाहिए किन्तु हम सकुशल अपने घर पहुँच जायें तो बड़ी खुशी मनायें और आनंदपूर्वक दीन, अनाथ और दरिद्रों को दान दें। कोई कहते थे कि हम तो अपने घर जाकर अपनी स्त्रियों के साथ ही क्रीड़ा, मनोविनोद करेंगे, हमें ऐसी सुन्दरी द्रौपदी नहीं चाहिए, जिसके पीछे प्राणों के ही लाले पड़ जायें और जिन राजाओं के कामिनियाँ न थीं वे कहते


ब्रुवन्ति स्म परे भूपा अलं कामसुखेच्छया।
नेष्यामः समयं कंचिद् ब्रह्मचर्येण चारुणा ॥९३॥

रूपेणेयं नरान् हन्ति कांश्चिद्रागविषार्चिषा।
मारवेगेन कांश्चिच्च हंहो कन्या महाविषा ॥९४॥

तदा दुर्योधनोऽवोचद्दधानो मानसे मदम्।
मत्तः कोऽन्यः समर्थोऽस्ति राधावेधविधायकः ॥९५॥

राधानासासुमुक्तायाः करिष्यामि सुवेधनम्।
इत्युक्त्वा स समुत्तस्थे रक्तनेत्रो वराननः ॥९६॥

गाण्डीवकार्मुकोत्पन्नज्ज्वलज्वालाकरालितः।
सोऽपि स्थातुमशक्तात्मा पतितस्तु पलायितः ॥९७॥

अर्थ (श्लोक 91 से 97): थे हमें ऐसे प्राण के घातक विषय-सुख की चाह नहीं है। इससे तो हम घर जाकर कुछ समय ब्रह्मचर्य से रहें यही परम उत्तम है। देखिए एक तो यह अपने रूप से ही लोगों के प्राण लिये लेती है और उस पर साँप के विष की तीव्र ज्वाला जैसे काम के वेग से मारे डालती है। यह कन्या नहीं है किन्तु कहना चाहिए कि महान् विष ही है। यह देखकर मद के आवेश में आ दुर्योधन बोला कि मेरे सिवा इस राधावेध के लिए दूसरा और कौन समर्थ हो सकता है। इस राधा के मोती को तो मैं ही वेधूँगा। इतना कहकर वह नेत्रों को लाल करके उठा और धनुष के पास पहुँचा परन्तु उस धनुष से उत्पन्न हुई ज्वाला से पीड़ित होकर वह भी उसके पास ठहर न सका और असमर्थ होकर भूमि पर गिर पड़ा और बड़ी कठिनता से उठकर अपनी जगह पर आकर बैठा ॥९१-९७॥


एवं कर्णादयो भूपास्तज्वालां सोढुमक्षमाः।
मुमुचुर्मानमुद्रां ते तदा स्वस्थानमास्थिताः ॥९८॥

युधिष्ठिरस्तदावादीत्स्वानुजन्मानमर्जुनम्।
धनुःसंधानमाधातुमेतेषां कोऽपि न क्षमः ॥९९॥

अत उत्तिष्ठ संधेहि धनुःसंधानमुद्धरम्।
गाण्डीवजीवनं त्वां हि विना कोऽत्र करिष्यति ॥१००॥

इत्युक्ते पार्थिवः पार्थः कृतसिद्धनमस्क्रियः।
अग्रजं प्रणिपत्याशु समुत्तस्थे विशुद्धधीः ॥१०१॥

द्विजवेषधरं पार्थं रूपनिर्जितमन्मथम्।
द्रौपदी वीक्ष्य दूरस्था हता कामस्य सायकैः ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 98 से 102): इसी प्रकार कर्ण आदि और-और राजा भी उसकी ज्वाला को न सह सकने के कारण मान को छोड़कर अपने-अपने स्थान पर चुपचाप आ बैठे। जब कोई भी उस धनुष को न चढ़ा सका तब युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाई अर्जुन से उसके चढ़ाने के लिए कहा। वे बोले कि जान पड़ता है इन राजाओं में से कोई भी यह धनुष नहीं चढ़ा सकता है। इसके लिए ये सब असमर्थ हैं, अतः तुम उठो और इस धनुष की चढ़ाओ। तुम्हारे सिवा इस धनुष को और कौन ऐसा है जो सिद्ध करेगा। युधिष्ठिर के वचनों की सुनकर सिद्धों को और अपने बड़े भाई युधिष्ठिर को प्रणाम कर विशुद्ध-बुद्धि अर्जुन उठ खड़ा हुआ। उस समय उस द्विजवेषधारी और कामदेव से भी अतिशय रूपशाली को दूर से ही देखकर द्रौपदी उसके रूप पर मोहित हो काम के बाणों द्वारा बेधी जाने लगी ॥९८-१०२॥


सर्वानुल्लङ्घ्य भूपालान्स स्थितो धनुषः पुरः।
तदा शरासनं शांतं जातं ज्वालातिगं शुभम् ॥१०३॥

अहो पुण्यवतां प्रायः प्रयोगाच्छान्तता भवेत्।
शूराणामपि सांनिध्यात्तेषां किं कथ्यते बुधैः ॥१०४॥

अर्थ (श्लोक 103 से 104): इसके बाद अर्जुन सब राजाओं को लाँघकर धनुष के आगे जाकर खड़ा हो गया। उसके वहाँ पहुँचते ही पुण्य से वह सब ज्वाला उसी समय बिल्कुल शान्त हो गई और सब साँप अन्तर्हित हो गये। पुण्यात्मा पुरुषों के सम्बंध से बहुधा सब शान्त हो जाते हैं और वे यदि शूरवीर हों तब तो


स गाण्डीवं सुकोदण्डं करे कृत्वा धनुर्धरः ।
मौर्व्यामारोप्य पूतात्मा स्फालयामास तद्गुणम् ॥१०५॥

तदास्फालनशब्देन बाधिर्यं भूमिपाः श्रुतौ ।
दधुर्घोटकसंघाता अचलंस्त इतस्ततः ॥१०६॥

गजाश्च दिग्गजश्चान्ये गर्जन्तो ध्वनिकर्णनात् ।
जगर्जुः प्रतिशब्देन समुत्क्षिप्तकरास्तदा ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 103 से 107): कहना ही क्या है। धनुर्धर अर्जुन ने उस गांडीव धनुष को उसी क्षण हाथ में उठा लिया और चढ़ाकर उस पवित्र आत्मा ने उसकी डोरी का शब्द किया, जिसे सुनकर वहाँ बैठे हुए सब राजा बहिरे हो गये और घोड़े भड़क कर इधर-उधर भागने और हींसने लगे। हाथी चिंघाड़ने लगे तथा दिग्गज अपनी प्रतिध्वनि के द्वारा शब्द करते हुए ऐसे जान पड़ने लगे मानो सूंड उठा कर गर्ज ही रहे हैं ॥१०३-१०७॥


तदास्फालनशब्दं च श्रुत्वा द्रोणो रुरोद च ।
इत्ययं सोऽर्जुनः किं वा मृतोऽपि समुपस्थितः ॥१०८॥

ततः पार्थः पृथुर्बाणं गुणे संरोप्य विक्रमी ।
संभ्रमच्चावधीद्राधानासामौक्तिकमुन्नतम् ॥१०९॥

समौक्तिकं तदा भूमौ पतितं वीक्ष्य सायकम् ।
जहर्षुः पार्थिवाः सर्वे तद्गुणग्रहणोत्सुकाः ॥११०॥

यादवा मागधा भूपास्तं शशंसुर्द्विजोत्तमम् ।
द्रुपदः सात्मजश्चित्ते सोत्कण्ठोऽभूत्स्वमानसे ॥१११॥

ततो द्रुपदराजेन्द्रसुता पार्थस्य कन्धरे ।
सुलोचनाकराल्लात्वाऽक्षिपन्मालां मनोहराम् ॥११२॥

तदा दैववशान्माला वायुना चलिता चला ।
पञ्चानामपि पर्यङ्के विकीर्णा पार्श्ववर्तिनाम् ॥११३॥

लोकोक्तिर्निर्गता मौढ्यादियं कर्मविपाकतः ।
पञ्चानया वृता मर्त्या दुर्जनाश्चेत्यघोषयन् ॥११४॥

अर्थ (श्लोक 108 से 114): उस विशाल शब्द को सुनकर द्रोणाचार्य चकित होकर बोल उठे कि क्या यहाँ मरा हुआ अर्जुन आ गया है। इसके बाद उस महान् विक्रमी पार्थ ने धनुषबाण चढ़ाया और घूमते हुए राधा की नाक के मोती को बात ही बात में ही वेध दिया। उस समय मोती के साथ बाण को पृथ्वी पर गिरा हुआ देखकर वहाँ बैठे हुए सभी राजाओं को बड़ा भारी हर्ष हुआ और वे उसके गुणों को ग्रहण करने के लिए उत्कंठित हो उठे। इस द्विज-वेष-धारी पार्थ की यादव, मागध आदि राजाओं ने बड़ी प्रशंसा की और द्रुपद राजा तथा उसके पुत्र भी मन ही मन बहुत आनंदित हुए। इसके बाद ही द्रौपदी ने अपनी धाय के हाथ में से ‘वरमाला’ लेकर अर्जुन के गले में पहिना दी परन्तु दैववशात् वह माला वायु के अति वेग से टूट गई, जिससे वहीं पास में बैठे हुए चार पाण्डवों की गोद में भी उसके मोती जा पड़े। अतः लोगों की मूर्खता से यह दन्तकथा चल पड़ी कि इसने पाँचों ही पाण्डवों को वरा है। उन दुर्जनों ने- जहाँ तक उनसे बन सका-इसकी संसार में खूब घोषणा कर दी ॥१०८-११४॥


सार्जुनस्य समीपस्था साक्षाल्लक्ष्मीरिवोर्जिता ।
पाकशासनपार्श्वस्था शचीव शुशुभे तराम् ॥११५॥

अर्जुनाज्ञां समासाद्योपकुन्ति द्रौपदी स्थिता ।
मेघावलिं संगता विद्युदिव रेजे मनोहरा ॥११६॥

तावद्दुर्योधनो दुष्टो मलीमसमुखो नृपान् ।
जगौ सर्वेषु भूपेषु कोऽधिकारोऽत्र ब्राह्मणे ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 115 से 117): इस समय द्रौपदी अर्जुन के पास में खड़ी हुई ऐसी शोभती थी मानों साक्षात् लक्ष्मी ही है। अर्जुन की आज्ञा को पाकर द्रौपदी कुन्ती के पास जाकर बैठ गई। इस समय वह मनमोहनी ऐसी जानी जाती थी मानों मेघमाला से युक्त बिजली ही है। ये सब बातें दुर्योधन से न सही गई, अतः वह दुर्मुख राजा


धार्तराष्ट्रैश्च संमन्त्र्य प्रेषितो द्रुपदं प्रति।
दूतश्चन्द्राख्यया ख्यातः सुशिक्षितः सुलक्षणः ॥११८॥

वचोहरो विनीतात्मा वीक्ष्येत्थं द्रुपदं जगौ।
मन्मुखेन वदन्त्येते नृपा इति समुद्धताः ॥११९॥

द्रोणे दुर्योधने कर्णे यादवे मगधेश्वरे।
स्थितेष्वेतेषु भूपेषु कन्ययाकारि दुर्णयः ॥१२०॥

अर्थ (श्लोक 115 से 120): लोगों को भड़काने लगा कि आप लोग ही कहिए कि इतने राजाओं के यहाँ होते हुए एक दीन ब्राह्मण को भला इस बात का अधिकार ही क्या था कि राजाओं की सभा में राधावेध करे। इसके बाद उसने और सब कौरवों से सलाह करके द्रुपद राजा के पास चन्द्र नाम के एक सुशिक्षित दूत को भेजा। उसने द्रुपद के पास जाकर नम्रता के साथ कहा कि महाराज ये सब तेजस्वी राजे मेरे द्वारा कहते हैं कि द्रोण, दुर्योधन, कर्ण, यादव, मागध इत्यादि सभी राजाओं के होते हुए कन्या ने जो एक दीन ब्राह्मण को वरा है यह बड़ा भारी अन्याय किया है ॥११५-१२०॥


अयमज्ञातदेशीयो वाडवो वडवो यथा।
अतृप्तस्तु कथं याति कन्यां लात्वा नृपे स्थिते ॥१२१॥

अस्मै वाथ वितृप्ताय काञ्चनं रत्नमुत्तमम्।
दत्त्वैनमृजुभावेन विसर्जय सुसज्जितः ॥१२२॥

नृपयोग्यामिमां कन्यां यच्छ भूपाय भूमिप।
अथवा संगरे सज्जः सद्यो भव नृपैः समम् ॥१२३॥

द्रुपदः कोपतोऽवादीन्न युक्तमिति भाषणम्।
नृपाणां न्याययुक्तानां स्वयंवरविदां सदा ॥१२४॥

अयमेष वरः साध्व्या अस्या भूमिसुरो महान्।
स्वयंवरविधौ लब्धो नान्यथा क्रियते मया ॥१२५॥

तुमुले तूलसादृश्ये कोऽधिकारो नृपेशिनाम्।
यतः स्वयंवरे लब्धे नीचो वान्यः पतिः स्त्रियाः ॥१२६॥

संगरे संगरो योग्यो न तेषां तत्र चेन्मतिः।
दास्यामि संगरातिथ्यं वितथोत्पथपातिनाम् ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 121 से 127): आप ही सोचिए कि जो परदेशी है, जिसके देश का कुछ पता नहीं है और जो एक लोभी ब्राह्मण है जैसे कि और-और ब्राह्मण होते हैं तब वह इतने राजाओं के रहते हुए यहाँ से कन्या-रत्न को कैसे ले जा सकता है। अतः आप इस लोभी ब्राह्मण को कुछ रत्न वगैरह भेंट में देकर सीधी-साधी बातों से टाल दीजिए और राजा के योग्य इस कन्या को किसी राजा के हवाले कीजिए। यदि यह बात आपके काबू की न हो तो आप इन राजाओं के साथ युद्ध करने को तैयार होइए। चंद्र दूत के मुँह से राजाओं के अभिप्रायों को सुनकर क्रोध में आ द्रुपद ने उत्तर में कहा कि न्याय के जानकार और स्वयंवर विधि को जानने वाले राजाओं को अपने मुँह से ऐसे वचनों का निकालना ही अधर्म हैं। इस सम्बन्ध में और विशेष कहने की आवश्यकता नहीं। साध्वी द्रौपदी ने स्वयंवर विधि से जिसको वरा है वही यह भूसुर (ब्राह्मण) इसका वर है। मैं इसमें कुछ भी फेर-फार नहीं कर सकता। इसमें युद्ध करने का इन राजाओं को अधिकार ही क्या है क्योंकि चाहे नीच हो या ऊँच स्त्री का वही वर होता है जिसे वह अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वरती है। इसलिए युद्ध की प्रतिज्ञा करना इनका ठीक नहीं है। हाँ, यदि वे न मानें और उन्हें युद्ध करने ही में मजा है तो मैं भी इन व्यर्थ ही बुरे मार्ग पर जाने वालों को युद्ध के लिए निमंत्रण देता हूँ ॥१२१-१२७॥


इत्याकर्ण्य क्षणाद्दूतश्चर्चरीति स्म भूपतीन्।
विज्ञप्तिं भूपसंदिष्टां परावृत्य परार्थवित् ॥१२८॥

अर्थ: यह सुन दूत लौट कर दुर्योधन आदि के पास आया और उसने द्रुपद के संदेश को ज्यों का


दुर्योधनादयो भूपाः क्रुद्धा रणसमुद्धताः। अदापयन् रणातिथ्यसूचकं दुन्दुभिं भृशम् ॥१२९॥

अर्थ (श्लोक 128 से 129): त्यों उन्हें सुना दिया। यह देख दुर्योधन आदि बड़े क्रुद्ध हुए और रण के लिए तैयार हो गये। उन्होंने उसी वक्त रण के आमंत्रण को सूचित करने वाली रण भेरी बजवा दी। जिसे सुनकर युद्ध के सब साधन से युक्त होकर राजा लोग निकल पड़े ॥१२८-१२९॥


श्रुत्वा भेरीस्वनं भूपा निर्ययुः साधनावृताः। दन्तावलबलोपेता वाहवाहनसंस्थिताः ॥१३०॥

रथस्थितिं भजन्तश्च केचित्कोदण्डपाणयः। खड्गखेटककुन्ताढ्याः पत्तयश्च मदोद्धताः ॥१३१॥

केचिदूचुस्तदा क्रुद्ध्वा गृह्यतां गृह्यतां त्वरा। कन्या निर्घाट्यतां धृष्टो वाडवो यो मदोद्धुरः ॥१३२॥

मार्यतां द्रुपदो मानी समापाद्यापदां पदम्। इति शत्रुस्वरं श्रुत्वा चकम्पे द्रुपदात्मजा ॥१३३॥

प्रविष्टा शरणं तस्य नरस्य स्वे दिला सती। तादृक्षां तां समावीक्ष्याचख्यौ पवननन्दनः ॥१३४॥

मा बिभीहि भव स्वस्था पश्य मे भुजयोर्बलम्। करोमि क्षणतो दूरं वैरिणः पर्वतं गतान् ॥१३५॥

अर्थ (श्लोक 130 से 135): वे हाथियों की विशाल सेना से युक्त और अपने-अपने वाहनों पर सवार थे। उनके साथ में जो योद्धा-गण थे उनमें कई रथों पर सवार थे, कोई अन्य-अन्य वाहनों पर थे तथा कोई पैदल थे। वे भाँति-भाँति के हथियार लिये हुए थे। कोई दंड लिये था, कोई ढाल तलवार बाँधे था और कोई भाला लिये थे। वे सभी मद से उद्धत हुए मन-मानी बातें करते जाते थे। कोई क्रोध में आकर कहते थे कि जल्दी से कन्या को पकड़ लो और इन दुष्ट तथा मतवाले ब्राह्मणों को यहाँ से मार भगा दो। यह सुनकर कोई मानी कहते थे कि ऐसा क्यों ? पहले मानी द्रुपद को ही पकड़ कर न मार डालो, जिसके कारण से यह सब झगड़ा खड़ा हुआ हैं। इस प्रकार शत्रुओं के शब्दों की सुनकर द्रौपदी काँप उठी। उसे पसीना आ गया। वह अर्जुन की शरण आ गई। उसको इस तरह घबड़ाई हुई देखकर भीम ने कहा कि तुम डरो मत। प्रसन्न होकर मेरी भुजाओं के पराक्रम को देखो। मैं अभी इन बैरियों को मार कर भगाये देता हूँ। मेरे मारे ये अभी एक क्षणभर भी यहाँ नहीं ठहर सकेंगे और पर्वत की गुफाओं की जाकर शरण लेंगे ॥१३०-१३५॥


तदा कलकलो जज्ञे बलयोरुभयोरपि। कोदण्डचण्डबाणेन क्षुभ्यतो रणसंस्थयोः ॥१३६॥

समग्रं परसैन्यं तु संप्राप्तं शमनोपमम्। द्रुपदाद्याः समावीक्ष्याभूवन्संनद्धमानसाः ॥१३७॥

द्रुपदं प्रार्थयामास युधिष्ठिरद्विजोत्तमः। सास्त्रशस्त्रसमूहेन देहि पञ्चरथान्युतान् ॥१३८॥

श्रुत्वैते धृष्टद्युम्नाद्याश्चिन्तयन्ति स्वमानसे। अहो एते महामर्त्या याचन्ते यतो रथान् ॥१३९॥

अर्थ (श्लोक 136 से 139): इसके बाद रणांगण में आई हुई उभय पक्ष की सेनाओं में प्रचण्ड बाणों के छोड़ने का शब्द होने लगा और बड़ा भारी क्षोभ मच गया। यह देखकर कि यम के तुल्य शत्रु पक्ष की सारी की सारी सेना चढ़ करके युद्ध स्थल में आ पहुँची है, द्रुपद आदि भी युद्ध के लिए तैयार हो गये। इसी समय द्विजोत्तम युधिष्ठिर ने द्रुपद से प्रार्थना की कि आप हमें अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित पाँच रथ दीजिए। यह जानकर धृष्टद्युम्न आदि द्रुपद के पुत्रों ने मन ही मन सोचा कि ये लोग जो अस्त्र-शस्त्रों से सजे हुए रथ चाहते हैं इससे जान पड़ता है कि ये कोई महान् पुरुष हैं। इसके बाद धृष्टद्युम्न पाँचाली


धृष्टद्युम्नेन पाञ्चाली स्वरथे स्थापिता तदा। युधिष्ठिरो रथस्थोऽभाद्यथा सौधर्मदेवराट् ॥१४०॥

अर्जुनोऽपि सगाण्डीवः श्वेतवाजिरथे स्थितः। संनद्धो बलसंधानः शुशुभे स उपेन्द्रवत् ॥१४१॥

द्रुपदो विपदां दातुं वैरिणां संपदाकुलः। स्वर्णवर्मसुसंपन्नो रेजे मुकुटमण्डितः ॥१४२॥

अर्थ (श्लोक 136 से 142): (द्रौपदी) को अपने रथ में बैठाकर उसकी रक्षा करने लगा। इधर युधिष्ठिर रथ पर आरूढ़ हो सौधर्म इन्द्र के जैसे शोभने लगे और गांडीव धनुष लेकर अर्जुन सफेद घोड़ों के रथ पर सवार हो प्रतीन्द्र जैसा शोभने लगा। वह धनुष पर बाण चढ़ाये हुए था। इसी प्रकार द्रुपद भी सोने के कवच को पहिन कर वैरियों को कष्ट देने के लिए तैयार हुआ अपने वैभव और मुकुट से अपूर्व ही शोभा पाता था ॥१३६-१४२॥


तावता दुर्धरं सैन्यं परकीयं समागतम्। वीक्ष्य भीमः समुन्मूल्य महीरुहं दधाव वै ॥१४३॥

परेतराडिव क्रुद्धो जघानाग्रे स्थितान्नृपान्। हयान् हेषारवापन्नान्स गजानार्जनोद्यतान् ॥१४४॥

रथान्संचूर्य चक्रौघै रहितान्विदधे स च। तत्र कोऽपि नरो नासीद्यो भीमेन हतो न हि ॥१४५॥

स्वयं गर्जति गम्भीरगिरा भीमो गजेन्द्रवत्। परांस्तर्जयति निष्कम्पो भूपान्कौणपवत् कृती ॥१४६॥

एवं रणाङ्गणे रम्ये रेमे भीमो मृगेन्द्रवत्। दलयन्निखिलं सैन्यं तृणलूश्च यथा तृणम् ॥१४७॥

मध्यस्थवर्तिनो भूपास्तदा दृष्ट्वा च पावनिम्। रममाणं शशंसुस्ते जयकारप्रदायिनः ॥१४८॥

अर्थ (श्लोक 143 से 148): इतने ही में शत्रु की दुर्द्धर सेना को चढ़ आई देखकर भीम एक वृक्ष को जड़ से उखाड़ उसके ऊपर दौड़ पड़ा और यम के समान क्रुद्ध हो उसने अपने आगे आने वाले राजाओं को, हींसते हुए घोड़ों को, गर्जते हुए हाथियों को मारा और रथों को चूर करके उन्हें चक्र-रहित कर दिया। बात यह है कि वहाँ ऐसा कोई भी नहीं बचा जो भीम के द्वारा अधमरा न कर दिया गया हो। इस समय भीम अपनी गंभीर वाणी के द्वारा गजेन्द्र के जैसा गर्जता था और यम के तुल्य निर्भय होकर शत्रुओं को दंड देता था। इस तरह सम्पूर्ण सेना को मारता पीटता हुआ भीम रमणीय रणांगण में सिंह के जैसा शोभता था और घास काटने वाला, जैसे घास को काटता जाता है उसी तरह वह भी शत्रुदल का संहार करता जाता था। भीम के ऐसे अपूर्व पराक्रम को देखकर वहाँ जो मध्यस्थ राजा थे वे उसकी जय-जय ध्वनि के साथ तारीफ करते थे ॥१४३-१४८॥


भीमेन भज्यमानं तद्वीक्ष्य दुर्योधनो नृपः। उत्तस्थे तूर्यनादेन त्रासयन्निखिलान्रिपून् ॥१४९॥

कर्णोऽपि स्वगणैः सार्धं दुद्रोके च धनंजयम्। क्षिपन्विशिखसंघातान्विघ्नानिव सुसज्जितान् ॥१५०॥

बाणपूरैः प्रपूर्याशु पुष्कलं पुष्कलोदयः। कर्णो धनंजयेनामा युयुधे योद्धृसंगतः ॥१५१॥

अर्थ (श्लोक 149 से 151): इस तरह भीम के द्वारा अपनी सेना को नष्ट हुई देखकर तूर्यनाद से सारे शत्रुओं को त्रास देता हुआ दुर्योधन उठा। उधर से सेना लेकर कर्ण भी धनंजय पर छूट पड़ा और उस वीर ने विघ्न समूह के जैसे बाणों को सब ओर छोड़कर सारे आकाश को बाणों से पूर दिया। इस प्रकार अपने योद्धाओं को लेकर उसने अर्जुन के साथ खूब भीषण युद्ध किया। उधर से पार्थ भी कर्ण के छोड़े हुए बाणों को बड़ी शीघ्रता के साथ छेदता जाता था क्योंकि वह लक्ष्यवेध करने में बड़ा भारी कुशल था। अतः जैसे वायु मेघों को उड़ा देता है वैसे ही वह कर्ण के बाणों को वारण करता था। उसके ऐसे अपूर्व धनुष-


कर्णमुक्तान्शरान्पार्थः क्षणोति स्म क्षणान्तरे। स दक्षो लक्ष्यसंवेधे मातरिश्वा यथा घनान् ॥१५२॥

धानुष्कं वीक्ष्य दुर्लक्ष्यं कर्णोऽभूत्तस्य विस्मितः। ईदृक्षं भूतले दृष्टं धानुष्कं क्वापि नो मया ॥१५३॥

कर्णोऽभाणीद्द्विजेश त्वं धनुर्विद्याविशारदः। चारु चारुगुणं चर्यं धानुष्कं दर्शितं त्वया ॥१५४॥

अर्थ (श्लोक 149 से 154): बाण-कौशल को देखकर कर्ण को बड़ा भारी अचम्भा हुआ। वह मन ही मन सोचने लगा कि मैंने पृथ्वी पर आज तक ऐसा धनुष-बाण चलाने वाला कोई पुरुष नहीं देखा। कर्ण अपने हृदय के भावों को न रोक सका। वह बोल उठा कि द्विजेश, तुम धनुष-विद्या के बड़े अच्छे पंडित हो। तुमने आज धनुष-विद्या के कौशल को दिखाने में कमाल ही कर डाला। हम तुम्हारी इस कुशलता की प्रशंसा ही नहीं कर सकते। यह तुम्हारी कुशलता संसार भर द्वारा स्तुत्य है ॥१४९-१५४॥


पुनर्विहस्य चापेषोऽगदीद्गद्गदनिस्वनः। दधानो धन्वसंधानं पिधाय तं शरोत्करैः ॥१५५॥

भो द्विजेश त्वया कुत्र धनुर्विद्या महोन्नता। लब्धा लब्धिसमा रम्या चिच्चमत्कारकारिणी ॥१५६॥

नाकात्पाकात्स्वपुण्यस्य पतितः किं द्विजोत्तम। अस्माभिर्न श्रुतः कोऽपि धनुर्वेदी त्वया समः ॥१५७॥

त्वं किं शक्र उताऽर्को वा वीतहोत्रो भवान्किमु। अर्जुनः किं रणौद्धत्यं दधानो वा मृतोत्थितः ॥१५८॥

अर्थ (श्लोक 155 से 158): इसके बाद कर्ण ने बाणों से अर्जुन को पूरते हुए हँसते-हँसते कहा कि द्विजेश, भला तुमने यह महोन्नत विद्या कहाँ पर सीखी है जो तुम्हारे आत्मा के जैसे विलक्षण चमत्कार को दिखाती है और मन को मोहित करती है। तुम्हारी यह विद्या लब्धि के तुल्य है। हे द्विजोत्तम! क्या तुम पुण्य के उदय से स्वर्ग से तो यहाँ नहीं आये हो क्योंकि मैंने तुम्हारे जैसा धनुष-विद्या का पंडित और कहीं नहीं देखा। तुम इन्द्र हो या सूरज, अथवा अग्नि हो या रण में उद्धतपने को दिखाने वाले मरे हुए अर्जुन ही हो यहाँ जी कर आ गये हो ॥१५५-१५८॥


वीरोऽवादीत्प्रहसन् राजन धरादेवोऽहमत्र च। पार्थस्य सारथीभूय स्थितो धानुष्कतां गतः ॥१५९॥

कर्णो बभाण भो विप्र पूर्वं मुञ्च शरोत्करान्। लभस्वाद्य ससामर्थ्यान्मामकीनान् शरान्वरान् ॥१६०॥

इत्युक्त्वा तौ रणे लग्नौ कर्णाकृष्टशरासनौ। हृदयं दारयन्तौ च यथा सिंहकिशोरकौ ॥१६१॥

ध्वजं स ध्वंसयामास कार्णं पार्थः समर्थवाक्। छत्रं संछन्नसप्ताश्वं कवच वचनं यथा ॥१६२॥

अर्थ (श्लोक 159 से 162): सच कहो तुम हो कौन? कर्ण के इन प्रश्नों को सुनकर हँसता हुआ अर्जुन बोला कि राजन्! मैं ब्राह्मण ही हूँ, लेकिन पार्थ का सारथी रह कर मैंने यह धनुषविद्या पाई है और इसके बल यहाँ ठहर सका हूँ। इस पर कर्ण ने कहा कि अच्छी बात है विप्र, पहले तुम अपने उत्तम से उत्तम बाणों को चला लो और फिर बाद अपनी सामर्थ्य से मेरे महान् शरों को सहो। इतनी बातचीत के बाद वे दोनों सिंह की तरह पराक्रमी योद्धा कान तक धनुषों को खींच-खींच कर युद्ध करने लगे और एक दूसरे के हृदय को विदारने लगे। अन्त में पार्थ ने कर्ण के वचनों की तरह उसकी ध्वजा, सूरज की गर्मी को दूर करने वाले छत्र और कवच को छेद डाला ॥१५९-१६२॥


द्रुपदो विपदां दातुमुत्तस्ते सर्वविद्विषाम्। छादयन्कौरवीं सेनां विशिखैः सुखहारिभिः ॥१६३॥

अर्थ: उधर सारे शत्रुओं को आपदा के पंजे में फँसाने के लिए द्रुपद ने कौरवों की सारी सेना को


धृष्टद्युम्नादयो वीरा हन्तुकामाः स्ववैरिणः।
उत्तस्थिरे स्थिरस्थैर्याः कुर्वन्तो रणखेलनम् ॥१६४॥

दुर्योधनं पुरस्कृत्य भीमसेनो रथस्थितः।
युयुधे वैरिणो वेगात्संछिन्दन्कवचं वरम् ॥१६५॥

पाण्डवीयैः शरैर्विद्धो न को नाभून्महाहवे।
मर्त्यो मतङ्गजो मत्तो घोटको वा समुत्कटः ॥१६६॥

भज्यमानं बलं वीक्ष्य निजं गाङ्गेयभूपतिः।
जहार रणशौण्डीर्यं शुण्डानां रणवेदिनाम् ॥१६७॥

अर्थ (श्लोक 163 से 167): बाणों की बरसा करके पूर दिया। इसी तरह बैरियों को नष्ट करने के लिए धृष्टद्युम्न आदि धीर वीर स्थिरता के साथ रण-स्थल में युद्ध करने लगे एवं रथ पर सवार होकर भीमसेन ने दुर्योधन का सामना किया और बात ही बात में उसका वखतर छेद डाला। इस महा समर में ऐसा कोई भी मनुष्य, मत्त हाथी और महान् उत्कट घोड़ा न बचा जो कि पाण्डवों के बाणों से न वेधा गया हो। अपनी सेना के इस तरह नष्ट होती हुई देखकर भीष्म पितामह समर के लिए तैयार हुए और उन्होंने युद्ध-कुशल शरों की रण-कुशलता को अपनी कुशलता से भुला दिया ॥१६३-१६७॥


पितामहं समालोक्य रणस्थं रणकोविदः।
आगच्छन्तं महाबाणै रुणद्धि स्म धनंजयः ॥१६८॥

पार्थः पञ्चास्यवल्लग्नो गाङ्गेयं च महागजम्।
कुर्वाणो व्यर्थतां तस्य बाणानां बाणकोविदः ॥१६९॥

तावद् द्रोणोऽगदीद्वाक्यं दुर्योधनमहीपतिम्।
रेणुभिः पश्य खं छन्नं तुरंगमखुरोत्थितैः ॥१७०॥

इमं पश्य नरं कंचिद्रणकेलिक्रियाकरम्
अर्जुनं विद्धि नेदृक्ष्यान्यत्र चापविदग्धता ॥१७१॥

मृषा विद्धि विदग्धास्ते पाण्डवा जतुवेश्मनि।
दग्धा इति यतः प्राप्ता जीवन्तः संयुगेऽप्यमी ॥१७२॥

अर्थ (श्लोक 168 से 172): उनको इस तरह युद्धस्थल में उतरे हुए देखकर युद्ध-कुशल अर्जुन ने अपने शरों द्वारा उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया और वह पार्थ केसरी पितामह के बाणों को अपने रण-कौशल से निष्फल करने लगा। इतने में द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा कि राजन्! देखो, घोड़ों की टापों से उठी हुई धूल से आकाश कैसा ढक गया है और रण में अद्भुत क्रीड़ा करने वाला यह पराक्रमी कैसी रण-कुशलता दिखा रहा है। राजन्! जान पड़ता है यह अर्जुन ही है क्योंकि अर्जुन के सिवा और किसी में इतनी धनुष-कुशलता आ कहाँ से सकती है। यह बिल्कुल ही झूठ है कि विद्वान् पाण्डव लाख के महल में जल गये क्योंकि वे जले नहीं किन्तु जीते जागते ही वहाँ से निकल गये और वे ही ये युद्ध में आ गये हैं ॥१६८-१७२॥


श्रुत्वा दुर्योधनो भूपो विकम्प्याकम्पमानसः।
मूर्धानं समुवाचेति हसित्वा विस्मिताशयः ॥१७३॥

द्रोण विद्रावणं वाक्यं किमुक्तं भवताप्यहो।
जतुगेहे मया दग्धा कुतस्ते पुनरागताः ॥१७४॥

अर्जुनोऽपि तथा तत्र दग्धः कथमिहागतः।
धनंजयाभिधानं त्वं न मुञ्चसि तथाप्यहो ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 173 से 175): यह सुनकर दुर्योधन का चित्त बड़ा व्याकुल हुआ और मस्तक घूम गया। वह चकित हो हँसता-हँसता बोला कि वाह गुरुराज! आप भी अच्छी बातें कहते हैं। भला, जब पाण्डव लाख के महल में ही जल चुके तब फिर वे यहाँ कहाँ से आ गये। उनके साथ ही अर्जुन भी वहीं जल चुका था फिर वह कहाँ से आया। गुरुवर! आश्चर्य है कि इतना होते हुए भी आप धनंजय के नाम की रटंत को नहीं छोड़ते हैं। मैंने तो संसार में आपके मोह का महत्त्व एक निराला ही देखा जो आप मरे हुए अर्जुन को निर्द्वन्द्व


महीयो मोहमाहात्म्यं भवतां भुवि वीक्षितम्। यतः स्मरसि निर्द्वन्द्वं मृतार्जुनयुधिष्ठिरौ ॥१७६॥

अर्थ (श्लोक 173 से 176): हुए याद करते रहते हैं ॥१७३-१७६॥


द्रोणः श्रुत्वा करे कृत्वा धनुषं शरसंयुतम्। धनंजयमुवाचेदं सज्जो भव त्वमाहवे ॥१७७॥

द्रोणं प्राप्तं समावीक्ष्य पार्थो व्यर्थीकृताहितः। वीरोऽथ तुमुले चित्तेऽचिन्तयच्चेति विग्रहे ॥१७८॥

एष श्रीमान्समभ्यर्च्यो गुरुर्गुणगणाग्रणीः। यस्य प्रसादतो लब्धा धनुर्विद्या मयामला ॥१७९॥

यस्य प्रसादतो लब्धः संयुगे सुजयो महान्। तेन सार्धं कथं युद्धे युद्ध्यते महता मया ॥१८०॥

गुरूूंश्च गणनातीतगुणान्सद्धितकारिणः। ये विस्मरन्ति ते पापाः क्व यास्यन्ति न वेद्म्यहम् ॥१८१॥

अर्थ (श्लोक 177 से 181): दुर्योधन की यह मर्म भेदी वाणी सुनकर द्रोणाचार्य ने हाथ में धनुष-बाण लेकर अर्जुन से ललकार कर कहा कि वीरवर, युद्ध के लिए तैयार हो। अपने परम गुरु द्रोणाचार्य को सामने देखकर धनंजय ने चित्त में विचारा कि यह तो मेरे पूज्य गुरु हैं, गुणों के समुद्र हैं। इन्हीं के प्रसाद से मैंने इस युद्ध में विजय पाई है। फिर मैं इतना विचारशील होकर इनके साथ कैसे युद्ध करूँ। मैं नहीं जानता कि वे पापी कहाँ जायेंगे, कौन-सी दुर्गति में पड़ेंगे जो असंख्य गुणों के भण्डार और हितैषी गुरुओं को भूल जाते हैं ॥१७७-१८१॥


चिन्तयित्वेति चित्ते स न लक्ष्यः सप्तपादकम्। उत्सृज्य नमनं चक्रे द्रोणस्य श्रीधनंजयः ॥१८२॥

पुनः स प्रेषयामास मार्गणं गुणतो गुणी। सलेखं यत्तदङ्के सोऽपतत्पार्थेन प्रेषितः ॥१८३॥

सलेखं विशिखं वीक्ष्य लात्वा द्रोणोऽप्यवाचयत्। लेखं लेखार्थसंजातहर्षोत्कर्षितमानसः ॥१८४॥

द्रोणं स्वगुरुमानम्य भक्त्या नम्रमहाशिराः। कुन्तीसुतोऽर्जुनश्चाहं भवच्छिष्यो गुणाम्बुधेः ॥१८५॥

चर्करीमि सुविज्ञप्तिं श्रूयतां सावधानतः। निष्कारणं मया क्षिप्ता योद्धारः सकला रणे ॥१८६॥

निष्कारणं वयं दग्धुमारब्धाः कौरवैः खलैः। कथं कथमपि स्वामिंस्तस्माद्गेहाद्विनिर्गताः ॥१८७॥

देशान्भ्रान्त्वा पुनः प्राप्ता माकन्दीं सातकन्दलीम्। अत्रपुण्यप्रभावेन वयं प्राप्तास्त्वदङ्घ्रिकौ ॥१८८॥

अर्थ (श्लोक 182 से 188): यह विचार कर धनंजय ने सात पैंड़ आगे जाकर द्रोण के चरणों में नमस्कार किया और द्रोण के पास लिखे हुए पत्र के साथ एक बाण छोड़ा। बाण जाकर द्रोण के पास गिरा। उसे देखकर द्रोण ने उठा लिया और उसमें बँधे हुए पत्र को बाँचा। पत्र पढ़कर हर्ष के उत्कर्ष से द्रोण का मन खिल उठा। उस पत्र में लिखा था कि “परम गुरु द्रोणाचार्य के चरणों में मेरा मस्तक नम्र है। मैं कुन्ती का पुत्र और आपका गुणसागर शिष्य हूँ। गुरो! मेरा नाम अर्जुन है। मैं आपसे एक प्रार्थना करता हूँ। उसे आप सुनिए। वह यह कि मैंने बिना कारण ही जो इस रण में इतने योद्धाओं को मारा है इसका मुझे बड़ा दुख है। गुरो! दुष्ट कौरवों ने हम लोगों की बिना कारण ही जला देने का उपक्रम आरम्भ किया था परन्तु पुण्य-योग से किसी तरह हम उस महल से निकल आये। वहाँ से नाना देशों में घूमते हुए सुख के सदन-रूप इस माकंदीपुरी में आये ॥१८२-१८८॥


अपसृत्य क्षणं तिष्ठाधुनान्तेवासिनस्तव। भुजयोबलमीक्षस्व सार्थकोऽहं भवामि यत् ॥१८९॥

अर्थ: पुण्य से आज यहाँ हमें आपके चरणों के दर्शन हुए, इसका हमें बड़ा आनन्द है। अन्त में


दुर्योधनादिभूपानां पाण्डवज्वालनोद्भवम्।
दर्शयामि फलं द्रोणस्तमवाचयदित्यलम् ॥१९०॥

अर्थ (श्लोक 189 से 190): आपसे मेरा यही नम्र निवेदन है कि आप थोड़ी देर ठहर जाइए और चुपचाप अपने इस विद्यार्थी की भुजाओं के बल को देखिए ताकि मैं भी सार्थक हो जाऊँ। दुर्योधन आदि ने जो पाण्डवों की जलाकर मारना चाहा था, इन्हें भी इनकी करतूत का फल चखा दूँ” ॥१८९-१९०॥


ततोऽश्रुजलसम्पूर्णनेत्रो द्रोणो बभाण च।
कर्णदुर्योधनादिनामग्रे पत्रोद्भवं खलु ॥१९१॥

कर्णोऽवोचद्विना पार्थं सामर्थ्यं कस्य संभवेत्।
ईदृशं यो रणे छेत्तुं क्षमः शत्रून् शरैः परैः ॥१९२॥

एको भीमो रणं सर्वं संहर्तुं च सदा क्षमः।
युधिष्ठिरादयश्चान्ये समर्थाः सर्ववस्तुषु ॥१९३॥

इति वृत्तान्तसर्वस्वं निशम्य कौरवाग्रणीः।
इतिकर्तव्यतामूढो विलक्षोऽभूदिह क्षणम् ॥१९४॥

पाण्डवानां समभ्यर्णं द्रोणस्तावदगाद्भृशम्।
ते तं वीक्ष्य समालिङ्ग्य नतास्तत्पादपङ्कजम् ॥१९५॥

वृत्तान्तं पूर्वजं सर्वं ते तं वाचीकथन्मुदा।
द्रोणो निवारयामास युद्धं बन्धुसमाश्रितः ॥१९६॥

अबीभणत्पुनर्द्रोणो यूयं शृणुत मद्बचः।
कौरवाणामयं दोषो न ग्राह्यो हितवेदिभिः ॥१९७॥

रोषो विशेषतः पुत्रा न कर्तव्यो हितेच्छुभिः।
भवतां पुण्यमाहात्म्यं भुवने कोऽत्र वर्णयेत् ॥१९८॥

हुताशनज्वलद्गेहान्निर्गतास्तन्महाद्भुतम्।
देशे देशे गता यूयं कन्याद्यैः पूजिताश्चिरम् ॥१९९॥

एवं वार्तां प्रकुर्वाणा यावत्सन्ति महीभुजः।
तावद्गाङ्गेयसत्कर्णकौरवाश्च समाययु ॥२००॥

अन्योन्यं मिलिताः सर्वे नम्राश्च ते यथायथम्।
अगर्वाः कौरवास्तस्थुरधोवक्त्रा मदच्युताः ॥२०१॥

अर्थ (श्लोक 191 से 201): उस पत्र को पढ़कर द्रोणाचार्य की आँखों में पानी भर आया। उन्होंने जाकर कर्ण और दुर्योधन आदि से पत्र का सारा हाल कहा। पत्र को सुनकर कर्ण ने कहा कि सच है कि अर्जुन के बिना और किसमें ऐसी सामर्थ्य थी जो इस तरह रण में बाणों के द्वारा शत्रुओं के सिरों को छेदता ? इसी तरह एक भीम ही सारे रण का संहार करने के लिए सदा समर्थ है तथा युधिष्ठिर आदि पाण्डव भी इसके लिए खूब समर्थ हैं। यह सब हाल सुनकर कौरवाग्रणी दुर्योधन क्षणभर के लिए इति-कर्तव्यविमूढ़ हो चकित सा रह गया। इतने में ही द्रोण पाण्डवों के पास पहुँचे। पाण्डवों ने उनके दर्शन कर, उनका आलिंगन कर उनके चरण कमलों में नमस्कार किया और अपने पर बीता हुआ सारा हाल कह सुनाया। अन्त में भाई-भाइयों में होने वाले इस महान् युद्ध को द्रोणाचार्य ने रोक दिया। इसके बाद उन्होंने पाण्डवों से कहा कि तुम लोग मेरी एक बात सुनो। वह यह कि तुम लोगों को कौरवों के इस दोष पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि तुम जानते हो कि हित किसमें है। पुत्रो! तुम लोगों को अब रोष करना उचित नहीं। कारण रोष करने से कुछ हित साधन नहीं होता। तुम लोगों के पुण्य के माहात्म्य को कौन कह सकता है कि जिसके प्रभाव से जलते हुए महल में से भी तुम जीते जागते निकल आये और जहाँ-जहाँ गये वहीं-वहीं कन्या आदि सम्पदा के द्वारा पूजे गये। पाण्डव इस तरह द्रोणाचार्य के साथ वार्तालाप कर ही रहे थे कि इतने में भीष्म पितामह, कर्ण आदि कौरव राजा भी वहीं आ पहुँचे और वे सब प्रीति के साथ आपस में नम्रता-पूर्वक यथायोग्य रीति से मिले-भेंटे तथा गर्व-रहित हुए कौरव नीचा मुँह करके चुपचाप बैठ गये और वे बड़े लज्जित हुए ॥१९१-२०१॥


गाङ्गेयद्रोणकर्णाद्यैः पाण्डवाः कौरवाः क्षमाम्।
अन्योन्यं कारितास्तूर्णं सतां योगः शुभाप्तये ॥२०२॥

दुर्योधनो धराधीशः पुनराह नरेश्वराः।
ज्वलनो न मया दत्तस्तत्र साक्षी जिनेश्वरः ॥२०३॥

पाण्डवानां गृहे येन दत्तो हि हुतभुक् खरः।
स एव नरकं घोरं यातु जन्तुप्रपीडकः ॥२०४॥

समीचीनमिदं जातं युष्माकं यः समागमः।
अस्माकं पुण्ययुक्तानामपवादनिवारकः ॥२०५॥

यज्जन्मान्तरजं कर्म तन्निषेद्धुं हि न क्षमः।
कश्चिद्येन सुकीर्तिश्चापकीर्तिर्जायते नृणाम् ॥२०६॥

इति दौष्ट्यं समाच्छाद्य छद्मना मुखमिष्टताम्।
अभजत्कौरवो दुष्टो दौष्ट्यं केन हि हीयते ॥२०७॥

इति सर्वनरेन्द्राणां चित्तेषु तोषमुल्बणम्।
अकुर्वन्कौरवास्तूर्णं सर्वतोषप्रदायिनः ॥२०८॥

अर्थ (श्लोक 202 से 208): इसके बाद कर्ण, द्रोण, भीष्म (गांगेय) आदि ने कौरवों की और पाण्डवों की परस्पर में क्षमा करवाई-उनके हृदय का मैल दूर करवाया। यह ठीक ही है कि सज्जनों का समागम शुभ कृत्यों के लिए ही होता हैं। अन्त में दुर्योधन ने कहा कि लाख के महल में मैंने आग नहीं लगाई और इस विषय में मैं श्रीजिनेन्द्र की साक्षी देता हूँ। मैं तो यही कहता हूँ कि जिस दुष्ट ने महल में आग लगाई हो वह जन्तु-पीड़क पुरुष घोरातिघोर नरक में पड़े परन्तु यह बड़ा अच्छा हुआ जो आप लोगों का समागम फिर हो गया और इससे हम लोगों का अपवाद दूर गया। नहीं तो लोग हमें ही कलंक लगा रहे थे कि इन्होंने पाण्डवों को जला दिया है। यह सच है कि पहले जन्म में किये हुए कर्म को कोई रोक नहीं सकता चाहे फिर उससे जीवों की कीर्ति हो या अपयश। इस तरह बहाना करके कौरवों ने अपना दोष छिपाकर मुख पर मीठापन दिखाया। सच है दुष्टों की दुष्टता घट नहीं सकती। इस प्रकार कौरवों ने सब राजाओं के दिलों में जैसे बना सन्तोष करा दिया ॥२०२-२०८॥


कुम्भकारगृहं प्राप्ताः कुन्तीं नेमुर्नराधिपाः।
भक्तिनम्रा विशेषेण कुलवैपुल्यपालिनीम् ॥२०९॥

धार्तराष्ट्राः पुनः कुन्तीं जननीं नतमस्तकाः।
नत्वा सन्तोषमुत्पाद्य पुरस्तस्थुः स्थिराशयाः ॥२१०॥

चलन्नेत्रा तदावोचत्कुन्ती दुर्योधनं प्रति।
धृतराष्ट्रमहावंशे त्वया दत्ता मषिः कथम् ॥२११॥

त्वया त्ववसितं किं भो दुर्योधनमहीपते।
स्ववंशज्वालनं वंशक्षयकारणमुक्तटम् ॥२१२॥

ये निर्धूय स्वयं वंशं वाञ्छन्ति परमं सुखम्।
त एव निधनं यान्ति वह्नितो वेणवो यथा ॥२१३॥

राज्यार्थश्चार्थिभिः साध्योऽभ्यर्थितः कृच्छ्रदो भवेत्।
अन्यथानर्थसंपातो दुःखाय परिकल्पते ॥२१४॥

अर्थ (श्लोक 209 से 214): इसके बाद कुँभार के घर जाकर भक्ति-भाव से नम्र राज-गण ने कुल की मर्यादा पालने वाली कुन्ती को बड़े विनय से नमस्कार किया। इसी प्रकार दुर्योधन आदि भी कुंती को मस्तक झुका नमस्कार कर और उसे सन्तोषत कर स्थिर-चित्त से उसके आगे बैठ गये। तब कुन्ती ने दुर्योधन से कहा कि भाई! धृतराष्ट्र के इस महान् वंश में तुमने न जाने क्यों कालिमा लगाई। दुर्योधन! तुमने यह क्या किया जो अपने वंश को भी जलाने का यत्न कर वंश के नाश ही की चेष्टा की। देखो! जो अपने कुटुम्ब का नाशकर उत्तम सुख चाहते हैं वे वैसे ही कुमौत मरते हैं जैसे कि आग से हरे बाँस जलकर खाक हो जाते हैं। यह राज्य भी तो तभी तक सुख देता है जब तक कि दिल में इसकी चाह रहे। जब दिल से इसकी चाह निकल जाती है तब यही उसे संताप, दुख देने वाला हो जाता है और बड़े-बड़े अनर्थ


तृणाग्रबिन्दुवद्राज्यं नश्वरं किं तदर्थिभिः।
वंश्यान्हत्वा समिष्येत तत्तेषां जीवितं हि धिक् ॥२१५॥

धार्तराष्ट्रा इदं श्रुत्वाधोवक्त्राः कृष्णतां गताः।
शशंसुस्तद्गुणांस्तूर्णमपकीर्तिं समागताः ॥२१६॥

अर्थ (श्लोक 209 से 216): का कारण हो जाता है क्योंकि यह राज्य वास्तव में तृण के अग्र भाग में लगी हुई ओस की बूँद के समान ही नष्ट होने वाला है। फिर न जाने इसको चाहने वाले क्यों अपने वंश के लोगों को भी मार कर इसे चाहते हैं। ऐसे स्वार्थियों के जीवित को धिक्कार है-एक बार नहीं, सौ बार नहीं किन्तु असंख्य बार अनंत बार धिक्कार है। यह सुनकर दुर्योधन आदि का मुँह काला पड़ गया और लज्जा के मारे वे नीचा मस्तक करके रह गये ॥२०९-२१६॥


द्रुपदोऽपि ततः शीघ्रं विवाहार्थं समुद्यतः।
सुन्दरे मन्दिरे भूपान्याण्डवान्समवासयत् ॥२१७॥

ततस्तूर्यनिनादेन जयकोलाहलैः समम्।
विवाहमण्डपं प्राप पार्थः सद्रथसंस्थितः ॥२१८॥

सुमुहूर्ते शुभे लग्नेऽधिवेदि स च मण्डपे।
पाणिग्रहणमाभेजे द्रौपद्याः खचरीसमम् ॥२१९॥

अर्थ (श्लोक 217 से 219): इसके बाद जब द्रुपद को यह जान पड़ा कि ये ब्राह्मण वेषधारी पाण्डव हैं तब उसे बड़ी खुशी हुई और वह अतिशीघ्र द्रौपदी का विवाह करने को तैयार हो गया। उसने पाण्डवों को एक सुन्दर महल में ठहराया। इसके बाद रथ में सवार होकर बाजों के शब्द और जय कोलाहल के साथ अर्जुन विवाह-मण्डप में आया और उसने मण्डप की वेदी के ऊपर शुभ मुहूर्त और शुभ लग्न में उस विद्याधर की पुत्री सहित द्रौपदी का पाणिग्रहण किया ॥२१७-२१९॥


दध्वनुः सुन्दरध्वानाः पटहाः प्रकटास्तदा।
नेदुर्दुन्दुभयो नित्यं ननृतुर्नर्तकीगणाः ॥२२०॥

सम्मानिता महीशाना महीशेन महात्मना।
द्रुपदेन सुवस्त्राद्यैर्भूषणैर्वरवस्तुभिः ॥२२१॥

तद्विवाहं समावीक्ष्य भीष्मकर्णादिभूमिपाः।
स्वं स्वं मन्दिरमासेदुः सुन्दरं युवतीजनैः ॥२२२॥

चतुरङ्गबलोपेताः पाण्डवाः कौरवास्तदा।
हस्तिनागपुरं चेलुश्चञ्चलाश्चतुरङ्गाश्च ते ॥२२३॥

अर्थ (श्लोक 220 से 223): इस समय नगाड़ों के सुन्दर शब्द हुए, दुंदुभियों की गर्जना हुई और नटियों के मनोरम नृत्य हुए। कान्तिशाली द्रुपद राजा ने इस समय आगन्तुक राजाओं का दिव्य वस्त्राभूषण और उत्तम-उत्तम वस्तुओं द्वारा खूब आदर सत्कार किया। इसके बाद भीष्म, कर्ण आदि अर्जुन के विवाहोत्सव को देखकर युवतिजनों के साथ अपने-अपने सुन्दर महलों में चले गये और चतुरंग सेना सहित चतुर पाण्डव तथा कौरव हस्तिनापुर चले आये ॥२२०-२२३॥


उत्तोरणं महाकुम्भशोभाभ्राजिष्णुमन्दिरम्।
विविशुः सर्वशोभाढ्यं पुरं ते पाण्डुनन्दनाः ॥२२४॥

या संशुद्धा विबुधशुभधीः शीलसंपत्समेता दीप्यद्रूपा वरगुणनरं सेवते पञ्च नैव।
तत्संसक्ता भवति हि सती कथ्यते चेत्कथं सा साध्वीनां वै प्रथममुदिता द्रौपदी वंशभूषा ॥२२५॥

अर्थ (श्लोक 224 से 225): वहाँ पाण्डवों ने बड़े ठाट-बाट के साथ नगर में प्रवेश किया। इस समय हस्तिनापुर में घर-घर तोरण बाँधे गये थे और द्वार-द्वार पर सुन्दर शोभाशाली कलश रक्खे गये थे। तात्पर्य यह कि इस वक्त हस्तिनापुर में खूब ही शोभा की गई थी। सती द्रौपदी पवित्र थी, बड़ी विदुषी थी, शील-सम्पति से युक्त थी, रूपसौन्दर्य की सीमा थी। वह उत्तम गुणों के आकर एक अर्जुन को ही भजती थी, अन्य पाण्डवों की नहीं क्योंकि यदि वह और-और पाण्डवों पर भी आसक्त-चित्त होती तो सती कैसे कही जाती तथा उस वंश-भूषण का नाम सारी सतियों में पहले क्यों लिया जाता ॥२२४-२२५॥


कश्चिल्लोको वदति समदो द्रौपदी दिव्यमाप्य भर्त्रा पञ्चाप्यनुमतिगता सेवते यान्सुशीला।
एकासक्ता विपुलमतयः पाण्डवास्ते कथं स्यु-र्दरिद्राणां भवति वनिता भिन्नभिन्ना सदैव ॥२२६॥

पञ्चासक्ता कथमपि भवेद् द्रौपदी चेत्सतीत्वं तस्याः स्यात्किं विमलमतयश्चेति चित्ते विचार्य।
तां संशुद्धां सुधृतिधिषणाः साध्वीमेतां वदन्ति एवं तस्या निजमतरतास्ते क्व यास्यन्ति पापाः ॥२२७॥

अर्थ (श्लोक 226 से 227): इस सम्बन्ध में कोई मत्त पुरुष कहते हैं कि द्रौपदी दिव्य रूप-सम्पत्ति को पाकर कामासक्त हो गई थी, अतएव उसने पाँचों पाण्डवों की अपना हृदय दिया परन्तु यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जिन पाँचों को वह भजती थी वे तो बड़े सुशील और निर्मल-बुद्धि थे। फिर वे कैसे एक पत्नी पर आसक्त चित्त हुए। वे तो स्वयं श्रीमान् थे, उनके लिए कोई कमी नहीं थी। जब दीन, दरिद्र लोगों के भी जुदी-जुदी स्त्रियाँ होती हैं तब ऐसे समझदार पाँचों के बीच एक ही स्त्री हो यह आश्चर्य है। हम पूछते हैं कि यदि मान भी लिया जाये कि द्रौपदी पाँचों पर आसक्त थी तो क्या फिर कोई उसे सती कहने के लिए तैयार हो सकता है। नहीं, हरगिज नहीं। बुद्धिमानों को इस पर विचार करके उसे शुद्ध और गंभीर-बुद्धि साध्वी ही कहना चाहिए। जो अपने मत के अन्ध श्रद्धालु ऐसी सती को दोष देते हैं भगवान् जाने वे पापी कौन-सी दुर्गति में पड़ेंगे ॥२२६-२२७॥


यः शीलं श्रुतिसातदं शिवकरं सत्सेव्यमाशंसितम् सद्भिः संगसुधारसैकरसिकं संसारसारं सदा।
सत्कुर्वीत समाश्रयत्यसमकं सोऽशोकशङ्काशमम् संवित्तिं च सुवृत्तमेव सकलं संसक्तसंगापहम् ॥२२८॥

अर्थ: जो जीव ज्ञान और सुख को देने वाले, मोक्ष के मार्ग, उत्तम पुरुषों द्वारा प्रशंसा और सेवा किये गये, अमृत का स्थान और सारे संसार में सार वस्तु शील-धर्म का आदर करता है वह कभी शोक का पात्र नहीं होता और उसे कभी क्रोध आदि कषायें भी नहीं सता सकतीं। उसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का लाभ होता है, जिससे कि उसका सारा मोह, अज्ञान और विषय-राग नष्ट हो जाता है ॥२२८॥


इति श्रीपाण्डवपुराणे भारतनाम्नि भट्टारकश्रीशुभचन्द्रप्रणीते ब्रह्म० श्रीपालसाहाय्यसापेक्षे
पार्थद्रौपदीविवाहपाण्डवहस्तिनापुरसमागमवर्णनं नाम पञ्चदशं पर्व ॥२२९॥

षोडशं पर्व

श्रेयोजिनं सदा श्रेयःश्रेयांसं श्रेयसे श्रये। संश्रियं श्रितलोकानां श्रेयःकर्तारमुन्नतम् ॥१॥

अर्थ: मैं उन श्री श्रेयांस भगवान् का आश्रय लेता हूँ जो कल्याणमय है, जिन्होंने घाति कर्मों को आत्मा से जुदा कर दिया है अतएव जिन्हें जिन कहते हैं, जो बाह्य और अभ्यन्तर लक्ष्मी से युक्त हैं, आश्रितों को श्रेय के दाता हैं और उन्नत हैं। वे प्रभु मुझे भी कल्याण-मार्ग पर लगावें ॥१॥


पाण्डवाः कौरवास्तत्र राज्यार्धार्थं विभज्य च। वसुंधरां हयांस्तुङ्गान्र्दन्तिनो मदमेदुरान् ॥२॥

रथान्सार्थांस्तथा योध्दॄँल्लक्ष्मीकोशं परं समम्। अर्धार्धं भुञ्जते सर्वेऽन्योन्यं प्रीतिमुपागता ॥३॥

अथेन्द्रपथमावास्य स्थानीयं तत्र सुस्थिरः। युधिष्ठिरः स्थिरं तस्थौ स्थगिताशेषशात्रवः ॥४॥

तत्रैवावास्य विपुलं पुरं श्रीविपुलोदरः। नाम्ना तिलपथं पथ्यं संतस्थे पृथुमानसः ॥५॥

पार्थः सुनपथे व्यर्थीकुर्वन्वैरिनरेश्वरान्। पालयन्परमां पृथ्वीं तत्र तस्थौ स्थिराशयः ॥६॥

नकुलः सफलं कुर्वन् कुलं जलपथस्थितः। वणिक्पथपुरे प्रीत्या सहदेवः स्थितिं व्यधात् ॥७॥

अर्थ (श्लोक 2 से 7): इसके बाद पाण्डव और कौरव सारे राज्य को आधा-आधा बाँटकर एक दूसरे के साथ स्नेह रखते हुए राज्य भोगने लगे। इसी तरह पाण्डव भी अपने हिस्से के पाँच भागकर और पाँच मुख्य स्थान नियत कर जुदा-जुदा रहने लगे। उनमें से शत्रु-विजयी, स्थिर-चित्त युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ (देहली) में रहते थे। गंभीराशय भीमसेन वहीं देहली के पास ही तिलपथपुर में रहते थे। नीति-निपुण और विचारशील अर्जुन शत्रुओं को व्यर्थ कर नीति से पृथ्वी को पालते हुए सुनपत में रहते थे। नकुल अपने कुल को सफल करते हुए जलपथ में निवास करते थे और प्रीतिभाजन सहदेव वणिकपथपुर में रहते थे ॥२-७॥


एवं स्वस्वनियोगेन पाण्डवाः परमोदयाः। भुञ्जते परमां लक्ष्मीं सदा सातसस्मैषिणः ॥८॥

युधिष्ठिरेण भीमेन याश्च पूर्वं पुरे पुरे। परिणीताः समानीता राजपुल्यस्तदाखिलाः ॥९॥

कौशाम्ब्याश्च समानीय विन्ध्यसेनसुतां पराम्। तया युधिष्ठिरः प्राप परमं पाणिपीडनम् ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 8 से 10): तात्पर्य यह कि वे महाभाग इस तरह जुदा-जुदा रह कर अपने-अपने हक के अनुसार आनंद-चैन से उत्तम लक्ष्मी को भोगते थे। जब सब समुचित प्रबन्ध हो चुका तब युधिष्ठिर और भीम ने जो देश-देश में राज-पुत्रियाँ ब्याही थीं, उन सब को वे वहीं ले आये। साथ ही वे कौशाम्बी पुरी से विन्ध्यसेन राजा की पुत्री बसन्तसेना को भी लिवा ले आये और युधिष्ठिर ने उसके साथ ब्याह कर लिया ॥८-१०॥


भीमादयो भुवं पान्तो युधिष्ठिरनियोगतः। भजन्तः परमं सातं तस्थुः सेवकवत्सला ॥११॥

धनैर्धान्यैर्हिरण्यैश्च न हि तेषां प्रयोजनम्। परं साधनसंवृद्ध्यै प्रयोजनमभूत्तदा ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 11 से 12): भीमसेन आदि युधिष्ठिर की आज्ञा के अनुसार पृथ्वी को पालते हुए सदा उत्तम सुख भोगते थे और उनकी सेवा के लिए तैयार रहते थे। इन्हें धन-धान्य और सोने-चाँदी आदि जंगम विभूति से कुछ अधिक प्रयोजन न था किन्तु ये सदा ही अपनी सेना की बढ़ती में दत्त-चित रहते थे। तात्पर्य


दन्तावलतुरङ्गाणां वर्धनं विदधुर्भुवम्।
कौन्तेयाः कृतितां प्राप्ता विकसन्मुखपङ्कजाः ॥१३॥

गाङ्गेयमिव गाङ्गेयं गुरुं गर्वपरिच्युताः।
सावधानतया नित्यं सेवन्ते पाण्डुनन्दनाः ॥१४॥

अर्थ (श्लोक 11 से 14): यह कि इनका अपनी सेना को बढ़ाने में खूब यत्न था। इनके हृदय बिल्कुल साफ थे और यही कारण है कि इनके चेहरे सदा ही कमल से खिले रहते थे, ये अपने मन की स्वच्छता से सब कामों में सफल होते थे। इन लोगों को राज्य का बिल्कुल गर्व न था। ये सरल भाव से सदा ही गंगा के जल के जैसे स्वच्छ भीष्म पितामह की भक्ति भाव से सेवा-उपासना करते थे और इसलिए पितामह भी इन पर पूरा स्नेह रखते थे ॥११-१४॥


तेषामैक्यं विलोक्याशु कौरवो वचनं जगौ।
पितामह किमारब्धं त्वया दुर्णयचेतसा ॥१५॥

पाण्डवं कौरवीयं च समभागेन भुज्यताम्।
राज्यं पाण्डवपक्षत्वं कथं हि क्रियते त्वया ॥१६॥

क्रोधसंमिश्रितं वाक्यं तस्याकर्ण्य पितामहः।
उवाच कौरवाधीश शृणु तत्रास्ति कारणम् ॥१७॥

इमे सत्पुरुषाः शूराः सन्ति सद्गुणभाजनम्।
न्यायनिश्चयवेत्तारः सद्धर्मामृतपायिनः ॥१८॥

न शोचन्ते गतं वस्तु भविष्यच्चिन्तयन्ति न।
वर्तमानेषु वर्तन्ते ततस्ते मम वल्लभाः ॥१९॥

अर्थ (श्लोक 15 से 19): पाण्डवों के साथ पितामह की ऐसी प्रीति देखकर एक समय कौरवों ने उनसे कहा कि कलुषित-चित्त पितामह, तुमने यह क्या करना शुरू किया है। भला सोचिए तो जब आप पाण्डवों और कौरवों की राज-सम्पत्ति को बराबरी से भोगते हो तब फिर इस प्रकार पाण्डव की ओर ही आप का झुकाव क्यों है? इसका कारण क्या है? दुर्योधन आदि के ऐसे क्रोध भरे शब्दों को सुनकर पितामह ने कहा कि कौरवाधीश, सुनिए, इसका भी कारण है और वह यह कि ये सत्पुरुष हैं, शूरवीर हैं, अच्छे गुणों के पात्र हैं, नीति-न्याय के पण्डित हैं और सच्चे धर्म-रूप अमृत के पीने वाले हैं। इसके सिवा इनमें बड़ा भारी गुण यह है कि ये बीती हुई और आने वाली बातों की व्यर्थ चिन्ता नहीं करते। ये वर्तमान में उपस्थित विषय पर ही पूरा-पूरा विचार करते हैं। बस, इसी से ये मुझे अतीव प्यारे हैं ॥१५-१९॥


विष्टरश्रवसा तेन सव्यसाची सुमोहतः।
एकदाकारितस्तूर्णमूर्जयन्ते महागिरौ ॥२०॥

सुवंशं सुमहापादं तिलकाढ्यं महोन्नतम्।
अनेकप्राणिसंकीर्णं ददर्श तं नरं यथा ॥२१॥

कृष्णस्तत्र समायासीद्रौ रैवतके वरे।
अर्जुनोऽपि तथा तत्र रन्तुं संसक्तमानसः ॥२२॥

समालिङ्ग्य पुनस्तत्र नरनारायणौ मुदा।
ऊर्जयन्ते महाचित्तौ चिरं चिक्रीडतुर्वरौ ॥२३॥

अर्थ (श्लोक 20 से 23): एक समय कृष्ण ने प्रेम के वश हो अर्जुन को क्रीड़ा के लिए गिरनार पर्वत पर बुलाया। विशाल गिरनार पर्वत मनुष्य की तुलना करता था। मनुष्य के वंश होता है उसमें वंश-बाँस थे। मनुष्य के पाँव होते हैं उसके किनारे की भूमि ही पाँव थे। मनुष्य तिलक लगाते हैं उसमें भी तिलक वृक्ष थे। वह बड़ा भारी उन्नत था और उसमें नाना जाति के जीव-जन्तु रहते थे। कुछ समय में उधर से तो कृष्ण गिरनार पहुँचे और इधर से क्रीड़ा में दत्तचित अर्जुन भी वहाँ पहुँच गया। उन दोनों ने प्रेम के साथ एक दूसरे का आलिंगन किया और वे महामना आनंद-चैन से गिरनार पर क्रीड़ा करने लगे ॥२०-२३॥


वनक्रीडां प्रकुर्वाणौ शक्रप्रतिशक्रसन्निभौ।
रेमाते रागसंरक्तौ नरनारायणौ सदा ॥२४॥

कदाचिद्बनखेलाभिः कदाचिज्जलमज्जनैः।
कदाचिच्चन्दनोद्भूतनिर्य्यासैः कुङ्कुमाश्रितैः ॥२५॥

ऊर्जयन्ते समारोहेरवरोहैः कदाचन।
रम्भाभनर्तकीनृत्यैर्नानागीतैस्तदुद्भवैः ॥२६॥

कदाचित्कन्दुकक्रीडां कुर्वाणौ तौ नरोत्तमौ।
रेमाते स्नेहसंबद्धौ चिरं तत्र महागिरौ ॥२७॥

अर्थ (श्लोक 24 से 27): क्रीड़ा करते हुए वे दोनों स्नेही ऐसे जान पड़ते थे मानो इन्द्र और प्रतीन्द्र ही क्रीड़ा करते हैं। उनकी क्रीड़ा विलक्षण ही थी। वे कभी वन में दौड़ते फिरते थे, कभी पानी में डूबते निकलते थे, कभी एक दूसरे पर वे केसर मिले हुए चंदन की पिचकारी भरकर छोड़ते थे, कभी दौड़ते-दौड़ते गिरनार पर चढ़ जाते और पीछे पाँव लौट आते थे, कभी देवांगनाओं के जैसी नृत्यकारणियों के नृत्यों और गीतों द्वारा मनोविनोद करते थे और कभी गेंद खेलते थे। तात्पर्य यह है कि इस तरह से उन दोनों ने स्नेह के साथ गिरनार पर खूब क्रीड़ा-विनोद किया और दिल को बहलाया ॥२४-२७॥


विष्णुना सह संप्राप ततो द्वारावतीं पुरीम्।
पुरन्दरसुतः श्रीमान् पुरन्दर इवोन्नतः ॥२८॥

अर्जुनो विष्णुना साकं रममाणश्चिरं स्थितः।
घोटकैर्दन्तिसंदोहैर्नरेन्द्रैः क्रीडनोद्यतैः ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 28 से 29): इसके बाद कृष्ण के साथ-साथ अर्जुन भी द्वारिका में आया। वह उसमें प्रवेश करता हुआ अतुल विभूति के धारक इन्द्र के जैसा शोभता था। अर्जुन मनोविनोद पूर्वक काल बिताता हुआ कृष्ण के साथ द्वारिका में बहुत दिनों तक रहा। उसके साथ अन्य राजा भी सुख-पूर्वक अपने समय को बिताते हुए वहीं रहे। इन राजाओं के साथ पूरी-पूरी राजविभूति थी। हाथी घोड़ों आदि की पूरी-पूरी सेना थी ॥२८-२९॥


अथैकदा पृथुः पार्थो गच्छन्तीं स्वच्छमानसाम्।
सुभद्रां भद्रभावाढ्यां संवीक्ष्येति व्यचिन्तयत् ॥३०॥

केयं सुरूपशोभाढ्या साक्षाच्चक्रवधूरिव।
नदनूपुरनादेन जयन्तीव दिगङ्गनाः ॥३१॥

कटाक्षक्षेपमात्रेण जीवयन्ती मनोभुवम्।
यं ददाह पुरा योगी ध्यानकृपीटयोनिना ॥३२॥

किमियं रतिरेवाहो पद्मा पद्मावती किमु।
रोहिणी सूर्यकान्ता वा सीता वा किन्नरी पुनः ॥३३॥

लभ्यते चेदियं रम्या मया मृगविलोचना।
वक्त्रेन्दुजिततामस्का तदाहं स्यात्सुखी महान् ॥३४॥

विनानया नरत्वं हि निष्फलं निश्चितं मया।
अतः केनाप्युपायेन करोमीमां रववल्लभाम् ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 30 से 35): एक समय महत्त्वशाली अर्जुन ने स्वच्छमना और भद्र विचारों वाली सुभद्रा को जाते हुए देखकर सोचा कि रूप-सौन्दर्य से इन्द्राणी को भी जीतने वाली यह सुन्दरी कौन है। यह अपने रण-झण शब्द करते हुए नूपुरों के शब्द से देवांगनाओं को जीतती है और कटाक्ष-निक्षेप से उस काम को भी जीवित कर देती है जिसे पहले ध्यानरूपी अग्नि के द्वारा योगीजन जला चुके हैं। नहीं जान पड़ता यह रूप-सौन्दर्य की सीमा कौन है। रति है या लक्ष्मी, पद्मावती है या रोहिणी, या सूरज की प्रिया है। जो हो यदि यह मृगनयनी और मुख-चन्द्र से अँधेरे को दूर करने वाली अनिंद्य सुन्दरी मुझे मिले-मेरी प्रिया बने तब ही मैं अपना सौभाग्य समझूँगा और तब ही मुझे सुख होगा। इसके बिना मेरा जन्म ही व्यर्थ है। अतः किसी न किसी उपाय से मैं इसे अपनी प्राण-बल्लभा बनाऊँगा ॥३०-३५॥


इत्यातर्क्य स पप्रच्छ पार्थो दामोदरं मुदा।
कस्येयं तनुजा साक्षाल्लक्ष्मीरिव सुलक्षणा ॥३६॥

हरिराह विहस्याशु किं न वेत्सि धनंजय।
सुभद्रा नामतः कम्रा स्वसा मे रूपशालिनी ॥३७॥

पार्थः प्राह हसित्वाथ ममेयं मातुलात्मजा।
परिणेतुं मया योग्या मत्तमातङ्गगामिनी ॥३८॥

अभाणीद्भास्वरो भोगिमर्दनश्च धनंजय।
दत्तेयं च मया तुभ्यं गृहीत्वा गम्यतां त्वया ॥३९॥

इत्याकर्ण्य सुकौन्तेयस्तदाशासक्तमानसः।
क्षणं तस्थौ पुनस्तस्यास्यपद्मं संविलोकयन् ॥४०॥

तस्याकूतं परिज्ञाय मुरजिन्मृदुमानसः।
स्वस्यन्दनमदात्तस्मै वायुवेगाश्ववेगिनम् ॥४१॥

सुभद्रां सन्मुखीकृत्य नानोपायैर्धनंजयः।
तदासक्तां विधायाश्वारोपयत्स्यन्दनं निजम् ॥४२॥

सरथः पाण्डवस्तूर्णं कन्यां तां कनकप्रभाम्।
वायुवेगाश्ववेगेन चचाल वायुवेगवत् ॥४३॥

सुभद्राहरणं श्रुत्वा तदा यादवपुङ्गवाः।
क्रुद्धाः संनाहसंबद्धा दधावुर्धन्विनो ध्रुवम् ॥४४॥

कवचेन पिधायाङ्गं दधावुः परिघान्विताः।
केचित्कुन्तकराः केचिद्दीप्त्यत्कृपाणपाणयः ॥४५॥

केचिद्रवरथारूढाः केचित्संसक्तशक्तयः।
केचिदुत्तुङ्गतुरगतरङ्गितनभस्तलाः ॥४६॥

केचिदूचुर्भटाः किं भो वाजिना वारणेन च।
कृपाणैर्नर किं यूयं समुद्घाटितविग्रहाः ॥४७॥

यादवानां सुतां हृत्वा स क्व यास्यति दुर्जनः।
अर्जुनश्चार्जुनीभूय परेऽवादिक्षुरित्यतः ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 36 से 48): मन ही मन यह सोचकर उस मनस्वी ने कृष्ण से पूछा कि महाराज, साक्षात् लक्ष्मी जैसी और उत्तम लक्षणों वाली यह किस महाभाग की पुत्री है। उत्तर में कृष्ण ने कुछ मुसकरा कर कहा कि धनंजय, क्या तुम इसे सचमुच ही नहीं जानते। यह अतीव रूप-सौन्दर्यशालिनी मेरी सुभद्रा नाम बहिन है। यह सुन पार्थ ने हँसकर उत्तर दिया कि तब तो यह गजगामिनी मेरे मामा की पुत्री है और मेरे सम्बन्ध के योग्य है। इस पर कृष्ण ने कहा कि अच्छी बात है धनंजय, तुम्हारी इस राय से मैं खुश हूँ और इसके साथ तुम्हारा संबंध स्थिर करता हूँ। तुम इसे स्वीकार करो। यह सुन अर्जुन कृष्ण के मुख-कमल की ओर देखने लगा। तब कृष्ण ने अर्जुन का अभिप्राय जानकर उसके लिए वायु के वेग जैसे शीघ्रगामी घोड़े वाला एक सुन्दर रथ मँगवा दिया, जिसे पाकर अर्जुन प्रसन्न हुआ। इसके बाद वह सुभद्रा को परस्पर प्रेमालाप द्वारा अपने पर मोहित कर, रथ में बैठा, वायु के वेग से भी जल्दी चलने वाले घोड़ों के द्वारा, वायु के वेग की तरह अति शीघ्र ही वहाँ से चल दिया। उधर जब यादवों ने सुभद्रा के हरे जाने की बात सुनी तब वे बड़े क्रुद्ध हुए और कवच वगैरह पहन-पहनकर, धनुष-बाण ले उसी वक्त दौड़ पड़े। कोई कवच पहिन कर हाथ में मुदगर लेकर दोड़े, कोई भाला और चमकती हुई तलवार लेकर भागे, कोई रथों में सवार होकर और कोई पैदल ही शक्ति हाथ में लेकर चले, कोई आकाश-तल में तरंगों की तरह उछलने कूदने वाले घोड़ों पर सवार होकर चले और कोई यह कहते हुए चले कि घोड़े आदि सवारियों की जरूरत ही क्या हैं, आखिर काम तो तलवारों से ही पड़ेगा। अतः वे कवच वगैरह बिना पहिने ही हाथ में तलवार लिये हुए भागे। कुछ वीरगण अर्जुन की इस धोखेबाजी पर बड़े क्रोधित होकर कहने लगे कि यादवों की कन्या को हर ले जाकर यह दुर्जन अर्जुन छिप करके जायेगा ही कहाँ? हम लोगों के मारे पानी में डूबने पर भी तो नहीं बचेगा ॥३६-४८॥


समुद्र इव गम्भीरश्चतुरङ्गसुवीचिभृत्। समुद्रविजयो भूपः प्रतस्थे बान्धवैः सह ॥४९॥

बलभद्रो बलैः पूर्णो हयहेषारवोन्नतैः। अयासीच्च रणातिथ्यं समर्थः कर्तुमुद्यतः ॥५०॥

हरिर्हरिरिवोत्तस्थे शार्ङ्गं धनुषमावहन्। मन्दं मन्दं बलोपेतः कुर्वन्पञ्चाननारवम् ॥५१॥

अन्येऽपि भूमिपा भूरिभूतयो भुवनोत्तमाः। बभ्रमुर्भूतलं भीतिमुक्ता भास्वन्त उद्भटाः ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 49 से 52): इस प्रकार समुद्र के जैसा गंभीर और चतुरंग सेना-रूप तरंगों से तरंगित समुद्रविजय अपने बन्धु-वर्ग की साथ लेकर चला और घोड़े के हींसने के शब्द से उन्नत सेना-सहित बलदेव भी चला। इनके साथ ही पराक्रमी नारायण धनुष-बाण लेकर, पाँचजन्य शंख का मंद-मंद शब्द करता हुआ कुछ सेना को साथ ले सिंह की तरह बढ़ा। इसी प्रकार भूरि विभूति वाले, लोकोत्तम, तेजस्वी और निर्भीक राजा भी इनके साथ रवाना हुए ॥४९-५२॥


इतस्ततो हरिर्गत्वा व्यावृत्यागाद्बलैः समम्। स्वां पुरीं तत्र चाहूय बलादीन्भूपतीञ्जगौ ॥५३॥

विस्तरेण किमत्राहो कार्यं पार्थाय दीयताम्। कन्या हरणदोषेण दुष्टा सल्लक्षणान्विता ॥५४॥

पुनरस्मै प्रदातुं हि भागिनेयाय भासुरा। योग्येयमिति संचर्च्य देया तस्मै स्वहस्ततः ॥५५॥

वृथा कलिर्न कर्त्तव्योऽनेनेति शाम्बरं वचः। आकर्ण्य सज्जनः सर्वस्तथेति प्रतिपन्नवान् ॥५६॥

ततः सन्मन्त्रिणो मार्गसन्मार्गणसमुद्यताः। तदानयनसंसिद्ध्यै प्रेषिता हरिणा तदा ॥५७॥

ते गत्वा तत्र संनत्य नरं विनयसंयुताः। कार्यसिद्धौ वचो दत्त्वा निन्युर्द्वारावतीं पुरीम् ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 53 से 58): इसके बाद, नारायण इधर-उधर कुछ घूमकर सेना-सहित द्वारिका वापस आ गया और बलदेव आदि को बुलाकर उसने कहा कि दादा, बात यह है कि अब ज्यादा झगड़ा बढ़ाने से कुछ लाभ नहीं। अतः अच्छा यही है कि सुलक्षणा होने पर भी हरे जाने के दोष से दूषित हुई बहिन सुभद्रा पार्थ को ही दे दीजिए और अर्जुन अपना भनेज ही है तब उसके लिए यह सर्वथा योग्य है। अतएव सोचकर उसे अर्जुन के लिए अपने हाथ से ही देना योग्य है क्योंकि अर्जुन के साथ झगड़ा करना अब व्यर्थ ही है। कृष्ण के ऐसे माया भरे शब्दों को सुनकर उन लोगों ने अर्जुन के लिए सुभद्रा देना स्वीकार कर लिया। इसके बाद कृष्ण ने अपने चतुर मंत्रियों की बुलाया और उन्हें सुभद्रा को ले आने के लिए सुनपत भेज दिया। उन्होंने वहाँ जाकर अतीव विनय के साथ अर्जुन को प्रणाम किया और अर्जुन को वचन देकर सुभद्रा के साथ वे द्वारिका वापस आ गये ॥५३-५८॥


तत्रैत्य परमोत्साहादातोद्यवरनादतः। नट्नटीनटोत्साहानानावित्तप्रदानतः ॥५९॥

मण्डपे सुमुहूर्तेऽथ सुभद्रां परिणीतवान्। पार्थः परमया प्रीत्या रन्तुकामस्तथानिशम् ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 59 से 60): इसके बाद वहाँ ब्याह की सब तैयारी की गई और एक सुन्दर विवाह मंडप निर्माण किया गया। उसमें परम उत्साह के साथ शुभ मुहूर्त, शुभ लग्न में परम प्रीति के साथ अर्जुन ने सुभद्रा का पाणिग्रहण किया। अर्जुन उसके लिए बड़ा उत्सुक हो रहा था। विवाह के समय अनेक प्रकार के बाजों के शब्द से दिशायें शब्द-मय हो रही थीं। नट-नटियों के मनोहारी नृत्य हो रहे थे। दीन-हीन गरीब अनाथों को खूब दान-मान, धन-दौलत से तृप्त किया जा रहा था। इस विवाहोत्सव में यादवों


तद्विवाहक्षणे क्षिप्रं चत्वारश्चतुरा नराः।
पाण्डवास्तद्विवाहाय हूता यादवराजभिः ॥६१॥

ततो लक्ष्मीमतिं प्राप ज्येष्ठः शेषवतीं पराम्।
भीमोऽथ नकुलो रम्यां विजयां चानुजो रतिम् ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 59 से 62): के बुलाये हुए सब पाण्डव भी आकर सम्मिलित हुए थे। इस प्रकार अपनी प्यारी सुभद्रा को पाकर अर्जुन सुख के साथ समय बिताने लगा। इधर भीमसेन ने लक्ष्मीमती और शेषवती का पाणिग्रहण और किया तथा नकुल ने विजया का और सहदेव ने जो सबसे छोटा था, सुरति का पाणिग्रहण किया ॥५९-६२॥


एवं सर्वेषु भूपेषु यथास्थानं गतेषु च।
कृष्णः पार्थेन संप्राप रन्तुं चोपवनं परम् ॥६३॥

तत्र तौ सफलौ रम्ये रेमाते माधवार्जुनौ।
जलकल्लोलमालाभिश्छादयन्तौ परस्परम् ॥६४॥

तावता गच्छता तत्र ब्राह्मणेन धनंजयः।
अवाचि चारुणा वाक्यं परं संतोषदायिना ॥६५॥

भो पार्थ भोजनं देहि मां प्रीणय सुवस्तुभिः।
अहं दावानलो राजंस्त्वं श्रीकौरवनन्दनः ॥६६॥

अर्थ (श्लोक 63 से 66): इस प्रकार विवाहोत्सव के समाप्त हो जाने पर सब राजा जब अपनी-अपनी राजधानी में चले गये तब एक दिन पार्थ के साथ कृष्ण उपवन में क्रीड़ा करने को गया और वहाँ उन दोनों ने सफल-मनोरथ होने के कारण अतीव प्रसन्नता के साथ जल-कल्लोलों से खूब क्रीड़ा की। वे जल-क्रीड़ा में निमग्न हो रहे थे कि इतने में उधर से जाते हुए और अपने मीठे वचनों से सबको सन्तुष्ट करने वाले एक ब्राह्मण ने अर्जुन से कहा कि पार्थ, मुझे भोजन और उत्तम-उत्तम वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट करो ॥६३-६६॥


खण्डयस्व वनं मेऽद्यानुचरैश्चरितार्थिभिः।
श्रुत्वा तद्वचनं पार्थो बभाषीति स्म भासुरः ॥६७॥

रथो नास्ति ममाद्यापि धनुर्धर्ता न कश्चन।
सर्वकार्यकरा दिव्यशरा वर्तन्त एव न ॥६८॥

तच्छ्रुत्वा स द्विजस्तस्मै कपिलाञ्छनलाञ्छितम्।
द्विड्भिर्योद्धुमशक्यं च समदाद्रथमुत्तमम् ॥६९॥

पुनर्विहस्य देवोऽस्मै द्विजवेषधरोऽप्यदात्।
वह्निवारिभुजंगाख्यातार्क्ष्यमेघमरुच्छरान् ॥७०॥

गोविन्दाय पुनः सोदाद्गदां तार्क्ष्यध्वजं रथम्।
अन्यानि बहुरत्नानि नानाकार्यकराणि च ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 67 से 71): राजन्! मैं दावानल हूँ और आप कौरवों के वीर पुत्र हैं। मैं चाहता हूँ कि आप अपने समर्थ सेवकों को साथ लेकर मेरे इस वन को जलाकर नष्ट कर दीजिए। उसके इन वचनों की सुनकर उत्तर में तेजस्वी पार्थ ने कहा कि आज न तो मेरे पास रथ है और न कोई धनुर्धर ही है और मेरे सब कार्यों के साधक दिव्य शर भी मेरे पास नहीं हैं। यह सुनकर उस द्विज ने अर्जुन को एक ऐसा रथ दिया जो वानर के लक्षण से युक्त था और शत्रु जिसको जीत नहीं सकते थे। इसके बाद फिर उस द्विज-वेषधारी देव ने मुसकरा कर अर्जुन को वह्नि, वारि, भुजंग, ताक्ष्य, मेघ और वायु आदि बाण दिये। नारायण को उसने गदा और गरुड़ की ध्वजा से चिह्नित एक रथ दिया और नाना कार्य करने वाले बहुत से रत्न नारायण की भेंट किये ॥६७-७१॥


लब्ध्वा पार्थ इमान्बाणांस्तत्र दावानलाभिधम्।
मुमोच बाणमादाय वनज्वालनहेतवे ॥७२॥

अर्थ: इस समय इन बाणों को पाकर पार्थ ने उस वन को जलाने के लिए एक बाण छोड़ा, जिससे भयभीत हुए वनेचर जन्तुओं को जलाता हुआ दावानल धीरे-धीरे सारे वन को घेर कर सब ओर से


देवोऽवोचत्पुनर्यच्च यच्च तुभ्यं हि रोचते।
तज्ज्यालय सुरेन्द्रो वा यमो न रक्षितुं क्षमः ॥७३॥

तावद्दावानलो लग्नो वनं दग्धुं समग्रतः।
वनेचरगणं सर्वं ज्वालयंस्त्रस्तमानसम् ॥७४॥

अग्निज्वाला गता व्योम्नि ज्वालयन्ती च पक्षिणः।
फणिनः करिणः सर्वान्मृगेन्द्रान्मृगशावकान् ॥७५॥

ज्वालयामास स सर्वाञ्छाखिनस्तृणसंहतीः।
बुभुक्षितो यमः क्रुद्धः किं नात्ति सुरमानवान् ॥७६॥

अर्थ (श्लोक 72 से 76): वन को जलाने लगा। पक्षी, साँप, हाथी, सिंह और मृगों आदि को जलाती हुई वह आग की ज्वाला आकाश में बहुत ऊँचे तक जाने लगी। उसने थोड़ी ही देर में सारे वृक्ष और तृण-समूह को जलाकर खाक में मिला दिया। सच है जब भूखा यम क्रोध करता है तब देव-दानव और मनुष्य आदि किसी को भी वह नहीं छोड़ता। इसके बाद अर्जुन को एक बाण देते हुए उस द्विज ने कहा कि इस बाण के प्रभाव से जिस वस्तु को आप चाहें जला सकते हैं और निश्चय रखें कि जिसको आप जला देंगे उसको फिर न तो सुरेन्द्र बचा सकता है और न यम ही ॥७२-७६॥


सर्वेषां ज्वालनं वीक्ष्य तक्षको नागनिर्जरः।
क्रुद्धो देवगणांस्तूर्णं स्माकारयति तत्क्षणम् ॥७७॥

देवौघाः क्रोधमापन्ना दधावुरिति वादिनः।
तिष्ठ तिष्ठ महामर्त्य क्व यास्यस्मत्सुकोपतः ॥७८॥

ततस्तैर्निखिलं व्योम मेघमालाकुलं कृतम्।
जगर्ज घनसंघातः कज्जलाभो महाध्वनिः ॥७९॥

गर्जन्तं तं तदा वीक्ष्य समर्थः स कपिध्वजः।
जनार्दनं जगादेति विद्युद्दन्तं च दर्शयन् ॥८०॥

पश्य पश्य मुरारे त्वं बाणतः सुरसंततिम्।
भनज्यहं च भक्ष्यामि यशोराशिं यतः स्वयम् ॥८१॥

दावानलमहाबाण यथेष्टं तिष्ठ निष्ठुर।
शीघ्रेण सुरसंघातं घातयामि सुधस्मरम् ॥८२॥

इत्युक्त्वा स करे कृत्वा गाण्डीवं पाण्डुनन्दनः।
ज्यायामारोप्य संचक्रे टंकारबधिरं जगत् ॥८३॥

तट्टंकाररवं श्रुत्वा यमहंकारसंनिभम्।
तत्क्षणं सुरसंघाता भेजुर्यद्विशतं भयम् ॥८४॥

किरीटिन्कपटं कृत्वा वनं दग्ध्वा सुराग्रतः।
क्व यास्यसि सुपर्णाग्रे बलवान्पन्नगो यथा ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 77 से 85): इस प्रकार सारे वन के समस्त जीव-जन्तुओं को जलते हुए देखकर एक तक्षक नाम नाग को बड़ा भारी क्रोध आया और उसने सब देवताओं को निमंत्रित किया। उसने क्रोध में आकर सब देवता यह कहते हुए दौड़े आये कि महानुभाव पार्थ! ठहरिए। अब तुम हमारे क्रोध से बचकर जाओगे कहाँ? हम तुम्हें कहीं छोड़ने के नहीं। यह कहकर उन देवों ने सारे गगन-मण्डल को मेघों से भर दिया। काजल के जैसे काले वे मेघ महान् ध्वनि करते हुए गर्जने लगे। उनको गर्जते हुए देखकर अर्जुन ने बिजलियों को दिखाते हुए कृष्ण से कहा कि देखिए मैं इस मेघमाला को एक ही बाण से अभी उड़ाये देता हूँ। मैं सुरों की इस मेघविद्या को एक ही बाण के द्वारा अभी छेदे डालता हूँ। इसके बाद वह दावानल से बोला कि हे दावानल! तुम यथेष्ट रीति से विहार करो। तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। तुम्हारे साथ द्वेष करने वाले या तुम्हारी भक्षक इस मेघमाला को तो मैं अभी नष्ट किये देता हूँ। इतना कहकर अर्जुन ने गांडीव धनुष हाथ में उठाया और उसे चढ़ाकर उसने उसकी टंकार की, जिसको सुनकर सारा जगत् बहरा हो गया और धनुष की यम के हुँकार जैसी ध्वनि को सुनकर अर्जुन को डराने के लिए देवगण बोले कि अर्जुन! कपट से वन को जलाकर तुम हम जैसे विक्रमशाली देवों से बचकर कहाँ रहोगे। गरुड़ के आगे बलवान् साँप की भी क्या चल सकती है? ॥७७-८५॥


अथोग्रधारया देवा ववृषुः क्षुब्धमानसाः।
छादयन्तो धरां सर्वां तदिच्छां छेत्तुमिच्छवः ॥८६॥

तदा स शरसंघातैर्विरच्य वरमण्डपम्।
वृष्टिं कर्तुं न दत्ते स्म जज्वल ज्वलनोऽधिकम् ॥८७॥

द्विगुणस्त्रिगुणस्तूर्णं स ववर्ष चतुर्गुणम्।
मेघौघो विघ्नसंद्घातं चिकीर्षुश्च दवानले ॥८८॥

अर्थ (श्लोक 86 से 88): इसके बाद देवों ने क्षुब्ध होकर धारासार जल की बरसा की और थोड़ी ही देर में सारी पृथ्वी को जलमय कर दिया। उन्हें अर्जुन की वन को जला डालने की इच्छा को नष्ट करना था। यह देख अर्जुन ने शर-समूह के द्वारा एक उत्तम मण्डप रचा और पानी की एक बूँद भी दावानल पर नहीं पड़ने दी, जिससे दावानल न बुझ कर बढ़ता ही गया। अन्त में देवताओं ने और अधिक बरसा की पर उससे भी वह दावानल शान्त नहीं हुआ ॥८६-८८॥


तावता केशवः क्रुद्धो वायुबाणं करे पुनः।
कृत्वा मुमोच शीघ्रेण त्रासयन्तं घनाघनान् ॥८९॥

धनंजयस्य बाणेन तदा नेशुः सुरासुराः।
यथा तार्क्ष्यसुपक्षेण सफूत्काराः फणीश्वराः ॥९०॥

तदा सुराः समभ्येत्य मघवानं महेश्वरम्।
अचीकथन्स्ववृत्तान्तं तत्पराभूतमानसाः ॥९१॥

देव खण्डवनं दग्धं तरुखण्डसमाश्रितम्।
भवत्क्रीडाकृते योग्यं पार्थेन विफलीकृतम् ॥९२॥

वयं निर्घाटितास्तूर्णं हठेन कुण्ठमानसाः।
निर्लोठिताः समायाता भवत्पार्श्वे भयाकुलाः ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 89 से 93): इसी समय क्रोध में आकर कृष्ण ने वायु बाण छोड़ा, जिससे उन मेघों को बड़ा त्रास हुआ और साथ ही अर्जुन ने बाण चलाये, जिससे बात की बात में सब मेघ नष्ट हो गये, जैसे कि गरुड़ के मारे पूर्ण बलशाली फणेश्वर भी भाग जाते हैं। तब अर्जुन से इस प्रकार तिरस्कृत होकर देवगण महान् ऐश्वर्यशाली इन्द्र के पास गये और इन्द्र से उन्होंने अपना सारा हाल कहकर कहा कि देव, आपके क्रीड़ा करने के योग्य, सुंदर वृक्षावली से सुशोभित खांडव वन को अर्जुन ने जलाकर खाक कर दिया है। हम लोगों ने उसके बचाने का बहुत कुछ उपाय किया परन्तु उस मानी ने हमें वहाँ से मार भगाया और हमारा बड़ा तिरस्कार किया, जिससे भयातुर होकर हम सब आप की शरण में आये हैं ॥८९-९३॥


मघवा तत्समाकर्ण्य क्रुद्धः संनद्धमानसः।
ऐरावतं गजं सज्जीचकार स रणोद्यतम् ॥९४॥

सुरानाज्ञापयामास रणभेरीसमागतान्।
वज्रपाणिः करे वज्रं कृत्वा गन्तुमनास्तदा ॥९५॥

तदा व्योमरवो जज्ञे सुरेशेति च संवदन्।
नाकं हित्वा क्व गम्येत सुरसंघातसंयुतम् ॥९६॥

तत्र तं विघ्नसंद्घातं विधातुं न क्षमो भवेत्।
यत्र वंशे स विख्यातो बभूव भुवनेश्वरः ॥९७॥

नेमिर्नारायणश्चापि पाण्डवोऽपि महान्पुमान्।
जडत्वं त्वं परित्यज्य स्वस्थो भव निजे पदे ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 94 से 98): यह सुनकर इन्द्र को बड़ा क्रोध आया। वह उद्विग्न हुआ। इसके बाद वह ऐरावत हाथी को सजाकर रण के लिए तैयार हुआ उसकी रणभेरी को सुनकर आये हुए देवगण को उसने चलने के लिए आदेश दिया और वह स्वयं भी हाथ में वज्र लेकर चला परन्तु इस समय अकस्मात् यह आकाशवाणी हुई कि “सुरेश! स्वर्ग को छोड़कर देवताओं के साथ कहाँ जाते हो। तुम अर्जुन के लिए कुछ भी विघ्न उपस्थित नहीं कर सकते क्योंकि वह उसी-पवित्र वंश का है, जिस वंश में प्रसिद्ध और तीन लोक के स्वामी नेमिप्रभु, कृष्ण नारायण और पाण्डव जैसे महान् पुरुष पैदा हुए


निशम्येति स्थिरं तस्थौ सुरराट् सुरशंसितः। अर्जुनोऽपि विसर्ज्याशु विघ्नं विपिनसंभवम् ॥९९॥

हस्तिनागपुरं प्रेम्णा समियाय समुत्सुकः। केशवः स्वपुरं प्राप प्रमोदभरभूषितः ॥१००॥

सुभद्रया परान्भोगान्भुञ्जानो वानरध्वजः। अभिमन्युसुतं लेभे लसल्लक्षणलक्षितम् ॥१०१॥

अर्थ (श्लोक 94 से 101): हैं। इसलिए तुम अपना हठ छोड़कर आनन्द से अपने स्थान पर ही रहो।‘’ यह सुनकर सुरेन्द्र अपने स्थान पर ही रह गया। उधर अर्जुन भी सब विघ्नों को दूर करके प्रेम के साथ हस्तिनापुर चला आया एवं उत्कण्ठित कृष्ण भी प्रमोद के साथ अपनी नगरी में आ गये। अपनी राजधानी में पहुँच कर अर्जुन सुभद्रा के साथ रमता हुआ दिव्य भोगों को भोगने लगा। इसके कुछ काल बाद उसके सुभद्रा के गर्भ से पुत्र रत्न का जन्म हुआ। वह सब उत्तम लक्षणों से युक्त था। उसका नाम अभिमन्यु था ॥९४-१०१॥


एकदा धार्तराष्ट्रेण दुर्योधनमहीभुजा। कौन्तेयाः कपटेनैवाकारिताः खलबुद्धिना ॥१०२॥

बहुस्नेहाविलं वाक्यं गान्धारेयो जगौ तदा। युधिष्ठिरं स्थिरं बुद्ध्या भीमाद्यैः समलंकृतम् ॥१०३॥

कुरु क्रीडां सुकौन्तेय नानाक्षेपणक्षमाम्। धर्मपुत्रेण स द्यूतमारेभे कौरवाग्रणीः ॥१०४॥

द्वावक्षौ दोलयन्तस्ते कौरवाः शतसंख्यया। धर्मपुत्रेण धैर्येण रेमिरे छद्मसँगता ॥१०५॥

कौरवाणां शतं पुत्रा द्वावक्षौ पातयन्त्यलम्। आज्ञाकाराविवात्यन्तं दासेरौ सुष्ठु शिक्षितौ ॥१०६॥

भीमहुंकारनादेन पततुस्तावितस्ततः। न स्थिरं तस्थतुर्भीताविव भीमस्य नादतः ॥१०७॥

व्याजेन वेश्मतो वायुपुत्रं ते निरकासयन्। पुनर्धूतं समारब्धं छलेन च्छलवेदिभिः ॥१०८॥

धर्मपुत्रस्तु धर्मात्मा छद्मना तेन निर्जितः। हारितं धर्मपुत्रेण सर्वस्वं स्वविरोधकम् ॥१०९॥

केयूरकुण्डलस्फारहारहाटककङ्कणम्। धनं धान्यं सुरत्नानि मुकुटं तेन हारितम् ॥११०॥

पुनर्देशो विशेषेण शेषस्तेनैव हारितः। तुरंगमाश्च मातङ्गा रथाः खलु पदातयः ॥१११॥

अमत्राणि पवित्राणि सर्वः कोशः सुखावहः। हारयित्वेति संरब्धं द्यूतं धर्मात्मजेन च ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 102 से 112): एक समय दुष्टबुद्धि दुर्योधन ने कपट से पाण्डवों को बुलाया और स्नेह-वचनों द्वारा धीर-बुद्धि युधिष्ठिर से कहा कि कौन्तेय, आइए हम आप दिल बहलाने के लिए अक्षक्रीड़ा करें-जुआ खेलें। यह कहकर कौरवाग्रणी दुर्योधन ने युधिष्ठिर के साथ जुआ खेलना शुरू किया। कपट से कौरव जो पाँसे फेंकते थे वे उनके अनुकूल ही पड़ते थे। देखकर ऐसा जान पड़ता था मानों अच्छी तरह से सिखाये गये दोनों पाँसे कौरवों के आज्ञाधारी सेवक ही है और वे जो कभी भीम के हुँकार के मारे इधर-उधर जाकर पड़ते थे उससे ऐसा जान पड़ता था मानों भीम के नाद के डर के मारे वे स्थिर ही नहीं होने पाते किन्तु इधर-उधर जाकर उल्टे पड़ जाते हैं। यह देख कौरवों ने किसी बहाने से भीम को महल से बाहर भेज दिया और उन छलियों ने अब पूरे कपट से द्यूत-क्रीड़ा आरम्भ की और थोड़े ही समय में छली दुर्योधन ने छल से धर्मात्मा युधिष्ठिर को जीत लिया। युधिष्ठिर अपना सर्वस्व हार गये। उन्होंने बाजूबंद, कुण्डल, विशाल हार, सोने के कंकण, धन-धान्य, रत्न-मुकुट आदि और समस्त देश, घोड़े, हाथी, रथ, योद्धा वगैरह सब धन-सम्पत्ति जुआ में हार दी ॥१०२-११२॥


योषितः सकलाः सर्वे भ्रातरस्तु विशेषतः ।
पणीकृत्य स्वखेलार्थं दर्शितास्तेन भूभुजा ॥११३॥

तावता पावनिः प्राप्तो हुंकारमुखराननः ।
हारितं निखिलं पश्यन् धृतं शेषं व्यलोकयत् ॥११४॥

राजन्युधिष्ठिर भ्रातर्भीमोऽभाणीद्भयावहः ।
किमिदं किमिदं द्यूतं त्वयारब्धं सुहानिकृत् ॥११५॥

अर्थ (श्लोक 113 से 115): यहाँ तक कि सुख को देने वाली तमाम वस्तुएँ हारकर भी युधिष्ठिर ने द्यूतक्रीड़ा बंद न की। अन्त में वे अपनी रानियों और प्यारे भाइयों को भी दाव पर रखने को तैयार हो गये। इतने में ही हुंकार करता हुआ भीम वहाँ आ पहुँचा और सारी सम्पत्ति को हारी हुई तथा बाकी को दाव पर रक्खी हुई देखकर उसने भयभीत हो युधिष्ठिर से कहा कि पूज्य भाईसाहब ! यह क्या है? तुमने सारी हानि करने वाला यह जुआ काहे को शुरू किया ॥११३-११५॥


द्यूतेन याति निःशेषं यशो लोकापवादतः ।
भवेद्भवे तु निःशेषा द्रव्यहानिः पदे पदे ॥११६॥

सर्वानर्थकरं द्यूतमिहलोकविनाशकम् ।
क्षणात्क्षिपति निःशेषं परलोकं सुदेहिनाम् ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 116 से 117): क्या आपको नहीं मालूम है कि इस जुआ से सारा यश नष्ट हो जाता है और सारे संसार में बदनामी होती है। इससे पद-पद पर हानि भोगनी पड़ती है। महाराज, यह द्यूत सभी अनर्थों का मूल है और इस लोक का बिगाड़ने वाला तो है ही परन्तु एक क्षण भर में जीवों के परलोक को भी बिगाड़ देता है ॥११६-११७॥


व्यसनानामिदं चाद्यं द्यूतं दुर्धरदुःखदम् ।
अदीपि दीपितज्ञानैर्मुनिभिः स्थितिवेदिभिः ॥११८॥

द्यूतकाराः सदा हेयाः सदा मद्यपवद्भुवि ।
विद्धि द्यूतसमं पापं न भूतं न भविष्यति ॥११९॥

इति वाक्येन संक्षुब्धो द्वादशाब्दावधिं महीम् ।
हारयित्वा स कौन्तेयो द्यूतं वारयति स्म च ॥१२०॥

अर्थ (श्लोक 118 से 120): यह सब व्यसनों में प्रधान है, दुर्द्धर दुखों का दाता है। विद्वान् मुनिजनों ने इसी लिए इसे भी मदिरा की तरह बिल्कुल ही हेय बताया है। उन्होंने तो यहाँ तक कहा है कि इसके समान संसार में न तो कोई पाप है, न हुआ और न होगा। भीम के ऐसे उत्तम वचनों को सुनकर युधिष्ठिर क्षुब्ध हो उठे और जुआ खेलना उन्होंने बंद भी कर दिया परन्तु इसके पहले ही वे बारह वर्ष के लिए सारी पृथ्वी को पण पर रखकर हार चुके थे ॥११८-१२०॥


धर्मपुत्रो गृहं प्राप भीमाद्यैर्म्लानमानसः ।
वचोहरं तदा क्षिप्रं प्राहिणोत्स युधिष्ठिरम् ॥१२१॥

दूतो गत्वा प्रणम्यात्र विज्ञप्तिं चर्करीति च ।
धर्मपुत्र जगावेवं मन्मुखेन सुयोधनः ॥१२२॥

द्वादशाब्दावधिर्यावत्तावदत्रैव संस्थितिः ।
न कर्तव्या महीनाथ यतो न स्यात्सुखासिका ॥१२३॥

वने वासो विधातव्यो भवद्भिः सुखकाङ्क्षिभिः ।
द्वादशाब्दं न जानाति यावत्त्वन्नाम कोऽप्यलम् ॥१२४॥

अर्थ (श्लोक 121 से 124): इसके बाद व्यथित मन हो युधिष्ठिर भीम आदि के साथ घर की ओर चले आये। उनके घर पहुँचते ही दुर्योधन ने एक दूत को उनके पास भेजा। दूत ने आकर युधिष्ठिर को प्रणाम किया और कहा कि हे महीनाथ ! मेरे मुख से दुर्योधन महाराज कहते हैं कि बारह वर्ष के लिए आप यहाँ से चले जायें क्योंकि यहाँ रहने में आपका हित नहीं है। आप अपना भला चाहते हैं तो आप को बारह साल तक वन में रहना चाहिए और सो भी इस तरह कि जिसमें इतने दिनों तक कोई आप लोगे का नाम


स्थातव्यं तत्र तावच्च भवद्भिः सातसिद्धये । नेतव्यं पाण्डवैः क्वापि गुप्तैर्वर्षं त्रयोदशम् ॥१२५॥

अर्थ (श्लोक 121 से 125): भी न सुन सके। कहने का मतलब यह है कि आपको इसमें सुख है कि आप वनवास स्वीकार करें। आप लोग आज ही रात यहाँ से चले जायें, नहीं तो आप लोगों को संताप भोगना पड़ेगा। इसके अनंतर तेरहवाँ वर्ष आप गुप्तरीति से व्यतीत करें, दूत इतना निवेदन करके चला गया॥१२१-१२५॥


अद्यापि रजनीं रम्या न स्थेयात्र स्थिराशयाः । अन्यथानर्थसंपातो भविता भवतामिह ॥१२६॥

वचोहरो निवेद्येति निर्गत्य सदनं गतः । तावद्दुःशासनो दुष्टो द्रौपदीसदनं ययौ ॥१२७॥

स तां कुन्तलपाशेन गृहीत्वा निरजीगमत् । गृहात्साक्षान्महालक्ष्मीमिव पद्मानिवासिनीम् ॥१२८॥

गाङ्गेय इति संवीक्ष्य प्रोवाच गुरुकौरवान् । भो भो युक्तमिदं नैव भवतां भवभागिनाम् ॥१२९॥

इत्थं कृतेऽखिले लोकेऽपकीर्तिः कीर्तिता भवेत् । यशस्यं जायते लोके तथा कुरुत कौरवाः ॥१३०॥

इदं भ्रातृकलत्रं हि पवित्रं पतितां गतम् । खलीकारे कृते तस्य महती स्यादधोगतिः ॥१३१॥

अर्थ (श्लोक 126 से 131): इधर दुष्ट दुःशासन द्रौपदी के महल में आकर, द्रौपदी की चोटी पकड़ उसे महल से बाहर खींच लाया। उस समय ऐसा जान पड़ता था मानों उसने कमल-वन में रहने वाली महान् लक्ष्मी को ही कमल-वन से निकाल लिया है। यह हाल देख भीष्म पितामह ने कौरवों से कहा कि यह आप लोग अच्छा नहीं करते। इससे सारे संसार में तुम्हारी अपकीर्ति होगी। काम वह करो, जिससे संसार भर में तुम्हारा यश विस्तृत हो। देखो, यह तुम्हारे भाई की स्त्री है, पवित्र है, जिसको तुमने घर से निकाल कर बाहर कर दिया है। विश्वास रक्खो कि जो कोई अपनी भौजाई का तिरस्कार करता है उसे दुर्गति के दुःसह अनन्त दुख झेलने पड़ते हैं ॥१२६-१३१॥


तावता द्रौपदी क्षुण्णा रुदन्ती बाष्पलोचना । इयाय पाण्डवाभ्यर्णं दुःखिता दुर्दशां गता ॥१३२॥

बभाण भवतां यादृग्वर्तते सा पराभवः । ततोऽधिको ममाप्यासीन्मद्वेण्याकर्षणक्षणे ॥१३३॥

यदग्रे मम शीर्षस्य वेणी नोद्धरति स्फुटम् । अन्यत्किं विपुलं वस्तु तेषामग्रे यमाग्रवत् ॥१३४॥

हा शिखण्डधर प्राज्ञ पार्थपूर्वज पूर्वतः । इमं पराभवं कोऽत्र त्वां विना विनिवारयेत् ॥१३५॥

अर्थ (श्लोक 132 से 135): अपनी इस दुर्दशा से दुखी हो आँसू बहाती और रोती हुई द्रौपदी ने पाण्डवों के पास आकर कहा कि देखिए जितना आप लोगों का तिरस्कार हुआ है उससे भी अधिक-चोटी पकड़कर खींची जाने के कारण-मेरा हुआ है। हाय! जिसके आगे मेरा सिर कभी खुला नहीं रहा उसी ने मेरा सिर खोलकर चोटी खींची। बतलाइए अब मेरा बचा ही क्या? यम के जैसे दुष्ट दुःशासन के आगे मैं कर ही क्या सकती थी। उसने मेरी सब इज्जत ले ली। द्रौपदी ने भीम को सम्बोधित करके कहा कि हा भीम, यह मैं जान चुकी कि मेरे इस अपमान का बदला तुम्हारे बिना कोई नहीं ले सकता ॥१३२-१३५॥


पराभवभवं वाक्यं पाञ्चाल्या विपुलोदरः । श्रुत्वावादीन्महाक्रोधो घुर्घुरस्वरघूर्णितः ॥१३६॥

अर्थ: किसी में ऐसी सामर्थ्य नहीं जो इस पराभव की दूर करे। द्रौपदी के ऐसे तिरस्कार भरे वाक्यों को सुनकर क्रोध में आकर भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि स्वामिन्! मैं आज शत्रुओं के कुल को जड़ मूल से उखाड़े फेंके देता हूँ। द्रौपदी के इस तिरस्कार को न सह सकने के कारण, पार्थ भी उठा। यह


स्वामिन्नद्य प्रकुर्वेऽहं क्षयं वैरिकुलस्य वै।
पुनः पार्थः समुत्तस्थे द्रौपद्याश्च पराभवात् ॥१३७॥

तदा युधिष्ठिरोऽवोचन्महानाज्ञां न लङ्घयेत्।
क्षुब्धोऽपि मारुतौघेन मर्यादां किं सरित्पतिः ॥१३८॥

अर्थ (श्लोक 136 से 138): देखकर युधिष्ठिर ने कहा कि यह हम लोगों के लिए उचित नहीं है। जिस तरह वायु के वेग से क्षोभित होने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता उसी तरह ही महान् पुरुष भी किसी भी अवस्था में अपनी मर्यादा को नहीं लाँघते ॥१३६-१३८॥


इति यौधिष्ठिरं वाक्यमाकर्ण्य पाण्डुनन्दनाः।
गन्तुकामाः समुत्तस्थुर्मदान्ध्यपरिवर्जिताः ॥१३९॥

अर्थ: युधिष्ठिर ने इस तरह समझाकर वचन-रूपी अंकुश से भीम-रूपी मदोन्मत्त हाथी को अनर्थ करने से रोका और अर्जुन की क्रोध-वह्नि को भी उसने वचनरूपी शीतल जल से शान्त कर दिया। वह उन्हें समझाने लगे कि भाइयों! अभी कुछ समय धीरज रक्खो। बाद जब मैं समर्थ हो जाऊँगा तब शत्रु-कुल का अवश्य ही नाश करूँगा-इसमें तनिक-सा भी सन्देह नहीं परन्तु यह निश्चित है कि चाहे जो हो, अपने वचन नहीं हारूँगा। मेरे अद्भुत पराक्रमी वीर भाइयों! अब यहाँ रहने की मति छोड़कर शीघ्र चल दो और वन में जाकर डेरा डालो। अब से हमें वन ही अपनी राजधानी बनानी होगी ॥१३९॥


विदुरस्य गृहे कुन्तीं रुदन्तीं विधुरात्मिकाम्।
मातरं मोहयुक्तास्ते विमुच्य निर्गतास्ततः ॥१४०॥

पराभवपराभूता मुच्यमाना न द्रौपदी।
तत्र तिष्ठति तैः सार्धं निर्जगाम सती शुभा ॥१४१॥

त्यक्तमाना निजे चित्ते चिन्तयन्तः सुभावनाम्।
ते चाचलति कौन्तेया मार्गे मन्दगतिप्रियाः ॥१४२॥

वने चोपवने ते च वसन्ति स्म कदाचन।
शिलायां शिखरिशृङ्गे मृगेन्द्रा इव निर्भयाः ॥१४३॥

सरिज्जलं पिबन्ति स्मादन्ति वृक्षफलानि च।
नानावल्कलवासांसि दधते ते नरोत्तमाः ॥१४४॥

अर्थ (श्लोक 140 से 144): युधिष्ठिर के इन वचनों को सुनकर भीम, अर्जुन आदि चारों भाई मान छोड़कर वन चलने के लिए उठ खड़े हुए और अपने वियोग से अतीव दुःखित अतएव रोती हुई जननी कुन्ती को विदुर के घर ही छोड़ गये। उन्होंने अपमान से दुखी हुई द्रौपदी को भी वहीं छोड़ना चाहा, पर वह रूप-सौन्दर्य की सीमा वहाँ नहीं ठहरी। वह उनके साथ ही वन को चली। धर्मात्मा पाण्डव मन ही मन भावनाओं पर विचार करते हुए द्रौपदी की गति के अनुसार मंद-मंद चले जाते थे। वे वन, उपवन, शिला और पहाड़ की चोटी पर सिंह की तरह निर्भय होकर वास करते थे। वे मार्ग में जो फले हुए वृक्ष मिलते थे उनके फलों को खाते, रास्ते में पड़ने वाली नदियों का पानी पीते और वल्कलों के वस्त्र पहनते थे ॥१४०-१४४॥


ततस्ते क्लेशतः प्रापुरुत्तीर्य बहुभूधरान्।
कालिञ्जरवनं वीरा विविधद्रुमराजितम् ॥१४५॥

पत्रोपशोभितः स्पष्टः शाखासङ्घटनाश्रितः।
प्रौढप्ररोहविकटो वटस्तैस्तत्र वीक्षितः ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 145 से 146): इसके बाद वे मार्ग के कष्टों की सहते हुए पहाड़ों आदि विषम स्थलों को लाँघकर भाँति-भाँति के वृक्षों से सुशोभित कालिंजर नाम के वन में पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक ऐसा बरगद का पेड़ देखा, जो पत्तों और डालियों से खूब छायादार था। उसे देखकर भूख-प्यास से थके हुए पाण्डव उसके नीचे


छायासंछन्नभूभागे तस्याधस्ते स्थितिं व्यधुः। क्षुत्पिपासातपश्रान्ता वारयन्तः श्रमं परम् ॥१४७॥

व्यसनभुजगगर्तं धर्मनामप्रवर्तं नरकगमनमार्गं सर्वदोषस्य सर्गम् ।
परिभवतरुमूलं चापदासन्धुकूलं निहतसुभगबुद्धि द्यूतमेतद्विरुद्धि ॥१४८॥

अर्थ (श्लोक 145 से 148): घनी छायावाली भूमि में आराम करने के लिए ठहर गये। जुआ नरक का रास्ता है, दुख-रूपी साँप का बिल है, धर्म का विध्वंसक है, सब दोषों का स्थान है, पराभव को देता है, आपत्ति का समुद्र है और हित-अहित के विवेक को भुला देने वाला है। इसलिए सुख के चाहने वालों को उससे सदा दूर ही रहना चाहिए ॥१४५-१४८॥


द्यूतं दुर्गतिदायकं भृशमृषावादस्य संपादकम्
सर्वेषु व्यसनेषु चाद्यमुदितं लौल्यव्यवस्थापकम्।
मांसाशापरिवर्धकं च मदिरापानप्रपापेशनलम्
चौर्याखेटकलञ्जिकान्वयनितासंसक्तिदं त्यज्यताम् ॥१४९॥

अर्थ: और भी देखो कि यह द्यूतकर्म दुर्गति को देने वाला है, झूठ तथा पाप का खजाना है। मांस-मदिरा की रुचि को बढ़ाता है, अतएव शिकार में प्रवृत्ति कराता है, वेश्या और परस्त्री की चाह को बढ़ाता है और चोरी की शिक्षा देता है। इसकी संगति से जीवों की लोलुपता बढ़ जाती है। मतलब यह कि यह सभी व्यसनों में प्रवृत्ति कराता है और इसी कारण से आचार्यों ने इसे सारे व्यसनों में प्रधान बताया है, अतः उत्तम पुरुष को इसका नाम भी नहीं लेना चाहिए।


द्यूतात्पाण्डवनन्दना नरवरा मुक्त्वा वरं नीवृतम्
तिष्ठन्तो वटकानाने परिहृत्याहारादिसाताः स्वयम्।
व्याघ्रव्यालभयाकुले निरुपमाः सीदन्ति सन्तः स्म च
धिग्द्यूतस्य विचेष्टितं हि महतां दुःखस्य संपादकम् ॥१५०॥

अर्थ: देखो, यह सब इसी जुआ का ही प्रभाव है कि जिसके निमित्त से उपमा रहित प्रवीण पाण्डव भी अपने देश से भ्रष्ट होकर व्याघ्र, साँप वगैरह के निवास स्थान वन में रहे और सो भी आहार आदि के बिना दारुण दुखों को सहते हुए ॥१५०॥ अतः महान्-महान् पुरुषों को भी दारुण दुखों में डालने वाले इस दुष्ट कर्म की चेष्टा को धिक्कार है और यह सब अनर्थों का मूल छोड़ने योग्य है। इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचन्द्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में पाण्डवों की द्यूतक्रीड़ा और वन में निवास के लिये जाने का वर्णन करने वाला सोलहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१६॥

सप्तदशं पर्व (भाग 1/2)

वासुपूज्यं नरैः पूज्यं वसुपूज्यसुतं स्तुवे।
वासवैः सेवितं शस्तं वसुपूजाप्रदं मुदा ॥१॥

अर्थ: उन वासुपूज्य तीर्थेश्वर को प्रणाम है जो वसुपूज्य के पुत्र हैं, इन्द्र, नरेन्द्र आदि जिन की पूजा-स्तुति करते हैं और जिनके प्रसाद से जीव स्वयं भी पूज्य बन जाते हैं। वे प्रभु मुझे संसार-समुद्र से पार करें ॥१॥


अथ तत्र समायासीद्यतिसंघो विशुद्धधीः।
कृतेर्यापथसंशुद्धिर्निःसंगः शीललक्षितः ॥२॥

यतिसंघं च ते वीक्ष्य गत्वा नत्वा पुरःस्थिताः।
आनन्दोन्नतचेतस्का धर्मभावसमुद्यताः ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): इसके बाद जहाँ पाण्डव ठहरे हुए थे, वहाँ एक मुनियों का संघ आ गया। वह सब गुण-सम्पन्न था, निर्मल-बुद्धि का धारक था, ईर्यापथ शुद्धि का पालक था, परिग्रह-रहित और शील से विभूषित था। उसको देखकर पाण्डव बहुत हर्षित हुए और वे धर्मात्मा उसी वक्त मुनियों की वन्दना के लिए गये तथा उन्हें विनीत भाव से प्रणाम कर उनके आगे बैठ गये ॥२-३॥


युधिष्ठिरः पुनश्चित्ते चिन्तयामास कोविदः।
वने निवसता पापात्किं कर्तव्यं मयाधुना ॥४॥

फलभुक्त्या च नीयन्ते घस्त्रा दुर्विधिसंगताः।
विना वित्तेन दीयन्ते किं दानानि मुनीशिने ॥५॥

अद्याहो जीवितं मे धिङ् निर्द्रव्यस्य शवस्य वा।
जीवितान्मरणं श्रेष्ठं विना दानेन देहिनाम् ॥६॥

अर्थ (श्लोक 4 से 6): इसके बाद विचार-चतुर युधिष्ठिर ने मन ही मन विचार किया कि मेरे पाप का बड़ा उदय है और उसी का प्रेरा हुआ मैं वन में बस रहा हूँ। इस समय मैं अपने कर्तव्य को कैसे निर्वाह सकता हूँ, जबकि मैं स्वयं यहाँ फलों पर निर्भर रहकर ज्यों त्यों अपने कुदिनों को बिता रहा हूँ। मेरे पास कुछ धन भी नहीं है। तब ऐसी हालत में इन महात्मा मुनिजनों को दान कैसे दूँ और जन्म सफल करूँ। मुर्दे जैसे मुझ गरीब का यह जीवन धिक्कार का पात्र है। मुनिदान के बिना दिये जीते रहने से तो कहीं मरना ही अच्छा है ॥४-६॥


चिन्तयन्तमिमं भूपं ज्ञात्वावादीन्महामुनिः।
नाशमात्रं विधातव्यं त्वया स्थितिसुवेदिना ॥७॥

त्वं महान्विनयी भव्यो वात्सल्यभरभूषणः।
यदावयोरभूद्योगो विद्धि तद्वृषवैभवम् ॥८॥

अर्थ (श्लोक 7 से 8): युधिष्ठिर इसी चिन्ता में उलझ रहे थे। उन्हें इस प्रकार चिंतित देखकर संघनायक महामुनि ने उनसे कहा कि युधिष्ठिर, जबकि तुम संसार की हालत को जानते समझते हो तब तुम्हें इस सम्बन्ध में तनिक-सा भी विषाद और खेद नहीं करना चाहिए। विनय के आगार और वात्सल्य के भण्डार भव्य, तुम देखो कि हमारा तुम्हारा जो समागम हो गया है यह भी एक भारी धर्म का वैभव है, इसे तुम कुछ थोड़ा न समझो और एक बात यह है कि यहाँ से आगे तुम्हें और भी बड़े-बड़े कष्ट होंगे परन्तु तुम उससे विचलित न होकर उन्हें शान्ति से सह लेना ॥७-८॥


अत्रानर्थस्तु कालेन भविता तव निश्चितः।
न विषादो विधेयोऽत्र तद्धि वैदुष्यजं फलम् ॥९॥


इत्युक्त्वा योगिनां संघस्ततो निर्गत्य सद्गिरिम्।
सिंहशार्दूलहस्त्याढ्यं समियाय महोन्नतम् ॥१०॥

अर्थ: इसके बाद वह मुनियों का संघ तो सिंह, शार्दूल आदि के निवास-स्थान और महान् उन्नत


पाण्डवानांमधीशोऽत्र चिरं तस्थौ स्थिराशयः। नयन्कालं स धर्मेण न्यायमार्गविशारदः ॥११॥

अर्थ (श्लोक 9 से 11): सद्गिरि नाम पहाड़ पर चला गया और न्याय के ज्ञाता तथा गंभीराशय पाण्डव धर्म द्वारा अपना समय बिताते हुए बहुत दिनों तक वहीं रहे ॥९-११॥


एकदा च करे कृत्वा गाण्डीवं वानरध्वजः। इन्द्रक्रीडां प्रकर्तुं स समियाय मनोहरः ॥१२॥

ददर्शार्थ दरातीतो गच्छन्मार्गे महाभये। मनोहराभिधं रम्यं महीध्रं जिष्णुनन्दनः ॥१३॥

आरुरोह धराधीशं धरां द्रष्टुमनाः स तम्। महोपलं द्रुमव्रातविषमं विषयी कृती ॥१४॥

तत्रारुह्य पुनः प्राह पार्थ एव विचक्षणः। कोऽप्यस्ति पर्वते देवो नरो विद्याधरोऽथवा ॥१५॥

यद्यस्ति मां स वा वक्तु यतो मे वाञ्छितं भवेत्। कार्यं सर्वेष्टसिद्धिश्च पुरुषस्येष्टसाधनी ॥१६॥

आविरासीत्तदा व्योम्नि वाणी सर्वत्र विस्तृता। सावधानमनाः पार्थ शृणु मद्बचनं परम् ॥१७॥

अर्थ (श्लोक 12 से 17): एक समय रूप-सौन्दर्यशाली अर्जुन, हाथ में गांडीव धनुष ले इन्द्र-क्रीड़ा के लिए निकला। उस समय उस निर्भय ने किसी भयंकर रास्ते में जाते हुए एक मनोहर नाम के मनोहर पहाड़ को देखा। देखने की इच्छा से वह उस पर चढ़ गया। वहाँ से उसने बड़े-बड़े विशाल पत्थरों और वृक्षों से विषम पृथ्वी तल को देखा। इसके बाद वह जोर से चिल्लाकर बोला कि इस पहाड़ पर कोई देव, विद्याधर या मनुष्य है? यदि हो तो वह मेरे सामने आवे और मुझे कोई ऐसा उपाय बतावे जिससे मेरा अभीष्ट सिद्ध हो और अन्य जनों के सब मनोरथों को साधने वाले पदार्थों की सिद्धि हो। इसके उत्तर में आकाश में फैलती हुई आकाशवाणी हुई कि पार्थ! मेरी बात एकाग्र चित्त से सुनो ॥१२-१७॥


वैताढ्योऽत्र महीध्रोऽस्ति श्रेणीद्वयविराजितः। तत्र याहि यतस्तूर्ण जयश्रीस्तव सेत्स्यति ॥१८॥

शतं शिष्या भविष्यन्ति तव सर्वार्थसाधकाः। पञ्च वर्षाणि तत्रैव त्वया स्थातव्यमञ्जसा ॥१९॥

पुनः स्वबान्धवैर्योगो भविता तव पाण्डव। इत्याकर्ण्य प्रहृष्टात्मा यावत्तिष्ठति तत्र सः ॥२०॥

तावद्वनेचरः कश्चिद्भ्रमरच्छविरुन्नतः। शुष्कौष्ठवदनो वाग्मी दन्तुरः कोलकेशकः ॥२१॥

प्रचण्डाखण्डकोदण्डधर्ता विशिखपाणिकः। भ्रूभङ्गारुणनेत्राढ्यः प्रादुरासीद्भयंकरः ॥२२॥

अर्थ (श्लोक 18 से 22): इसी भरत क्षेत्र में वैताढ्य नाम एक पहाड़ है। उसकी दो श्रेणियाँ हैं। एक उत्तर श्रेणी और दूसरी दक्षिण श्रेणी। आप वहाँ जाइए। वहाँ अतिशीघ्र ही आपको जयलक्ष्मी अपनावेगी और आपके सौ ऐसे शिष्य होंगे जो आपके सभी मनोरथ को साधेंगे परन्तु वहाँ आपको पाँच साल तक रहना चाहिए। निश्चय रखिए कि इसके बाद नियम से आपका आपके बान्धवों के साथ समागम होगा। इस आकाशवाणी को सुनकर अर्जुन को बढ़ी खुशी हुई। वह बैठा ही था कि इतने में वहाँ एक भील आ गया। उसका शरीर भौंरे जैसा काला और लम्बा था। उसका मुँह और ओंठ सूखे हुए थे। वह वातुल था, दन्तुर था, काले केशों वाला था। वह एक हाथ में प्रचंड अखण्ड धनुष और दूसरे हाथ में बाण लिये था और उसे चढ़ाने के कारण उसके नेत्र रक्त जैसे लाल हो रहे थे ॥१८-२२॥


तदावादीन्नरो देहि मह्यं हंहो धनुर्धर। मम योग्यमिदं शस्त्रं भारं वहसि मा वृथा ॥२३॥

अर्थ: सारांश यह है कि वह बड़ा भयंकर मूर्ति था। उसको देखकर अर्जुन ने कहा कि वनेचर, यह


अथवा शोभते चेदं सत्करे महतामिह। विफलं त्वं स्वमात्मानं कदर्थयसि किं नर ॥२४॥

क्रुद्धेन तेन श्रुत्वेदं विरुद्धेन निजं धनुः। आस्फालितं स्वहस्तेन खे गर्जन्मेघवत्सदा ॥२५॥

बाणमारोपयामास गुणे स सुवनेचरः। कंपयन्कंप्रशीलानि वनेचरमनांसि च ॥२६॥

अर्थ (श्लोक 23 से 26): धनुष मेरे योग्य है, इसलिए इसे तुम मुझे दे दो। तुम व्यर्थ का भार क्यों लिये फिरते हो। ऐसा उत्तम धनुष महान् पुरुषों के ही हाथ में शोभा देता हैं। तुम व्यर्थ ही अपने आपको कष्ट में काहे के लिए डाल रहे हो, अर्जुन की इन बातों से तो उसे बड़ा क्रोध आया और वह उसके विरुद्ध खड़ा हो गया। उसने आकाश में मेघ की तरह गर्जने वाले धनुष का टंकार किया और उस पर बाण चढ़ाया। इस समय उसके धनुष की आवाज सुनकर सारे वनेचरों के दिल दहल गये ॥२३-२६॥


धनंजयः किरातश्च तदा तौ सन्मुखं स्थितौ। रणाय रणशौण्डीरौ प्रहरन्तौ परस्परम् ॥२७॥

बाणैर्बाणैस्तयोर्वृत्तं युद्धं तूर्णप्रणोदितैः। आकर्णं ज्यां समाकृष्य विमुक्तैः परमोदयैः ॥२८॥

बाणैर्विरचितो भाति ताभ्यां मुक्तैर्महांस्तयोः। मध्ये जनाश्रयः स्थातुमिव संभिन्नचेतसा ॥२९॥

धनंजयेन क्रुद्धेन ये ये बाणा विसर्जिताः। ते ते निष्फलतां नीताः किरातेन महात्मना ॥३०॥

कीशकेतुर्विलोक्याशु किरातं दुर्जयं रणे। धनुर्हित्वा दधावासौ विधातुं बाहुविग्रहम् ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 27 से 31): इसके बाद धनंजय और वह भील दोनों ही युद्ध के लिए आमने-सामने खड़े हुए। उन शूरवीरों में परस्पर में खूब ही तीव्र प्रहारों द्वारा युद्ध छिड़ा। कर्ण पर्यन्त डोरी को खींच-खींचकर छोड़े गये तीक्ष्ण बाणों के द्वारा उनमें खूब युद्ध हुआ। दोनों ओर से इतने बाण छोड़े गये कि उनके द्वारा उन दोनों के बीच में एक मंडप-सा बन गया। वह ऐसा शोभने लगा मानों भग्नहृदय पुरुषों के लिए आश्रय ही खड़ा किया गया है। इस समय क्रोध के आवेश में आकर उस भील पर अर्जुन ने जो-जो बाण छोड़े उस भील ने उन सबको ही व्यर्थ कर दिया। उसे दुर्जय देखकर अर्जुन ने धनुष-बाण तो छोड़ दिया और वह बाहु-युद्ध करने के लिए उस पर झपटा ॥२७-३१॥


बाहुदण्डैः प्रचण्डौ तौ वलन्तौ रणकोविदौ। मल्लाविव विरेजाते लिङ्गितौ स्नेहतो यथा ॥३२॥

अजय्यं तं परिज्ञाय पार्थो व्यर्थीकृताशयः। चकार चरणद्वन्द्वं करे तस्य महाद्युतिः ॥३३॥

स विभ्राम्य शिरः पार्श्वे यावदास्फालयत्यलम्। महीतले किरातं तं परितः प्राणपेशलम् ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 32 से 34): तब रण-कुशल और तेजस्वी वे दोनों बाहुदण्डों के द्वारा परस्पर में भिड़ते हुए ऐसे जान पड़े मानों दो मल्ल स्नेह में आकर एक दूसरे का आलिंगन ही करते हैं परन्तु इस बाहुयुद्ध में भी जब पार्थ उस पर विजय न पा सका तब वह उसे सर्वथा अजेय समझकर कुछ हतोत्साह-सा हुआ। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद उसने बड़े साहस के साथ चट से उस किरात के दोनों पाँव पकड़कर उसे मस्तक की ओर से चारों ओर खूब घुमा डाला। तब विचारे भील पर बड़ी विपत्ति आई और कुछ समय में ही उसके प्राण शिथिल हो गये ॥३२-३४॥


तावता प्रकटीभूतो विकटोऽपि महाभटः। दिव्यरूपधरो धीमान् बभूव वरभूषणः ॥३५॥

अर्थ: इसके बाद अर्जुन उसे पृथ्वी पर पछाड़ना ही चाहता था कि वह विकट महाभट प्रकट होकर


विनयेन ततः पार्थं ननाम नतमस्तकम्। स उवाच नराधीश प्रसन्नोऽस्मि तवोपरि ॥३६॥

त्वं याचस्व वरं दिव्यं तवेष्टं पाण्डुनन्दन। श्रुत्वा जजल्प पार्थेशः परमार्थविशारदः ॥३७॥

सारथित्वं भज त्वं भो मम स्यन्दनवाहने। तथेति प्रतिपन्नं हि खेचरेण मुदा तदा ॥३८॥

संतुष्टो मनसा पार्थो बंभणीति स्म तं प्रति। कस्त्वं कस्मात्समायातो युद्धवान्केन हेतुना ॥३९॥

आचख्यौ खेचरः क्षिप्रं श्रुत्वा तद्वचनं वरम्। युद्धस्य कारणं कीशकेतो चाकर्णयाधुना ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 35 से 40): भूषणों से विभूषित एक दिव्य रूप में देख पड़ा। उसने पृथ्वी तक मस्तक झुका कर विनय के साथ अर्जुन को नमस्कार किया और कहा कि नराधीश! मैं तुम्हारे ऊपर अतीव प्रसन्न हूँ। अतः तुम चाहो जो दिव्य वर माँगो। मैं इस समय तुम्हें सब कुछ देने को तैयार हूँ। उसकी बातें सुनकर परमार्थ के ज्ञाता अर्जुन ने उत्तर दिया कि अच्छा मैं यही चाहता हूँ कि तुम मेरे सारथी बनो। इसके उत्तर में अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उस विद्याधर ने कहा कि तुम जो कहते हो मुझे वह स्वीकार है। उसके ऐसे प्रतिज्ञा-बद्ध शब्दों को सुनकर पार्थ को बड़ा संतोष हुआ और उसने प्रेम भरे शब्दों में उससे पूछा कि भाई! तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? और तुमने यह युद्ध किस मतलब से किया था? उत्तर में विद्याधर ने कहा कि प्रभो! सुनिए, मैं युद्ध का कारण तुम्हें बताता हूँ ॥३५-४०॥


अस्त्यत्र भारते भव्यो विजयार्धो धराधरः। यः शृङ्गैर्गगनं मातुमुत्थितोऽतिमहोन्नतः ॥४१॥

तद्दक्षिणमहाश्रेणौ रथ्नूपुरस्तुरम्। वरं विशालशालेन तर्जयद्यत्सुरहालयम् ॥४२॥

नभिवंशसमुद्भूतो भूपतिस्तत्र भासुरः। विद्याविधिविशुद्धात्मा खगो विद्युत्प्रभो बभौ ॥४३॥

सुतस्तस्य स्फुरद्वीर्यो बभूवेन्द्रसमाह्वयः। विद्युन्माली परः पुत्रः शत्रुसंततिशातनः ॥४४॥

विद्युत्प्रभो विरक्तस्तु शक्रे राज्यश्रियं परे। न्यस्यादीक्षत वीक्ष्य स्वं यौवराज्यं सुते प्रभुः ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 41 से 45): इसी भरत-क्षेत्र में एक विजयार्द्ध नाम मनोहर पहाड़ है। वह इतना ऊँचा है कि उसके शिखर आकाश को छूते हैं। जान पड़ता है कि वह पृथ्वी और आकाश के बीच को नापने के लिए ही इतना ऊँचा उठा हुआ है। उसकी दक्षिण श्रेणी में एक रथ्नूपुर नाम उत्तम नगर है, जो कि अपने विशाल कोट से स्वर्ग के विमानों की भी तर्जना करता है। वहाँ का राजा विद्युत्प्रभ था। वह नमि के वंश का था। वह कान्तिशाली और विद्याओं के विधान से विशुद्ध आत्मा का धारक था। वह विद्याधर था। उसके पुत्र का नाम इन्द्र है। वह स्फूर्तिवान् और बड़ा शक्तिशाली है। इसके सिवा उसका एक पुत्र और भी हैं। उसका नाम विद्युन्माली है। वह शत्रु-सन्तति का बड़ा भयानक शत्रु है। एक दिन क्षण में नष्ट होने वाले बादलों को देखकर विद्युत्प्रभ संसार-देह-भोगों से विरक्त हो गया, अतएव इन्द्र को राज-पाट और विद्युन्माली को युवराज-पद देकर वह स्वयं निःशल्य हो, दीक्षित हो गया ॥४१-४५॥


जग्राह दारान्पौराणां भूषाणान्यधनानि च। अपारयुवराट्पीडां पूरी सा इत्यपाद्रवत् ॥४६॥

अर्थ: इसके बाद युवराज विद्युन्माली ने प्रजा पर बड़ा अन्याय करना आरम्भ किया। वह कभी नगर के लोगों की स्त्रियों को पकड़ लेता, कभी उनका धन हरण कर लेता और कभी उन्हें और-और संकट देता। सारांश यह कि वह सब तरह प्रजा को दुख देता था। आखिर परिणाम यह हुआ कि


कृत्वैकान्ते कनीयांसं रसापतिरशिक्षयत्।
समजायत वैराय तस्मिञ्शिक्षापि दुर्मदे ॥४७॥

मुक्त्वाथ स पुरीं कोपाद्बहिः स्थित्वा च लुण्टति।
खरदूषणवंशीयैः सह स्वर्णपुरे स्थितः ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 46 से 48): उसके मारे सारे नगर में उपद्रव ही उपद्रव मच गया। यह देख उसे एक दिन इन्द्र ने एकान्त में बुलाकर कुछ उचित सीख दी परन्तु उसका विद्युन्माली पर विपरीत ही प्रभाव पड़ा, जिससे वह इन्द्र से भी विमुख हो गया और मद से मत्त हो उससे वैर रखने लगा। इसके बाद वह क्रोध में आ नगरी छोड़कर ही चला गया और बाहर रह कर लोगों को लूटने-खसोटने लगा। वहाँ से कुछ दिनों में वह खरदूषण के वंश के लोगों के साथ स्वर्णपुर में जाकर वहीं रहने लगा ॥४६-४८॥


संतापितः सपत्नौघैः स सुखं लभते न हि।
अहर्निशं निशानाथो राहुणेव विरोधितः ॥४९॥

अर्थ: इस प्रकार जब इन्द्र को शत्रु की ओर से अत्यधिक संताप पहुँचा तब उसे राहु के द्वारा ग्रसे गये चंद्रमा की भाँति क्षणभर के लिए भी सुख पाना कठिन हो गया। वह हमेशा ही चिन्ता से व्यग्र रहने लगा और यही कारण है कि भय के मारे वह अब नगरी के फाटक बन्द करवाये रहता है और गुप्त रीति से अपने दिन बिताता है ॥४९॥


पुरीं स पिहितद्वारां विधाय विधिवत्स्थितः।
तत्सेवको विशालाक्षसुतोऽहं चन्द्रशेखरः ॥५०॥

दुश्चिन्तं तं परिज्ञाय मया नैमित्तिकोऽन्यदा।
नत्वा पृष्टो विनीतेन कदास्य वैरसंक्षयः ॥५१॥

स बभाण निमित्तज्ञो मनोहरगिरौ शृणु।
यस्त्वां जेष्यति पार्थः स तद्रिपूंश्च हनिष्यति ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 50 से 52): महाराज! मैं उसी इन्द्र के सेवक का एक पुत्र हूँ, जिसका नाम विशालाक्ष है और मेरा नाम चन्द्रशेखर है। अतः पिता के स्वामी को इस तरह चिन्ता से संतत और शोकाकुल देखकर मुझसे नहीं रहा गया और इसी कारण मैंने एक निमित्तज्ञानी को प्रणाम कर विनय के साथ पूछा कि विभो! इन्द्र के शत्रुदल का नाश कैसे और कब होगा? उत्तर में उन निमित्तज्ञानी ने कहा कि जो मनोहर गिरि पर तुझे जीतेगा वही पार्थ धनुर्धर इन्द्र के शत्रुओं का भी संहार करेगा ॥५०-५२॥


तच्छ्रूत्वाहं ततस्तस्थौ प्रच्छन्नोऽत्र महागिरौ।
स्वामिंस्त्वं वृषपाकेन मिलितोऽसि महामते ॥५३॥

एह्येहि च त्वया साकं गम्यते तत्र सांप्रतम्।
इत्युक्त्वा तौ स्थितौ व्योमयाने प्रोद्गतसद्ध्वजे ॥५४॥

चचाल चञ्चलं व्योमयानं मानसमन्वितम्।
ताभ्यामुपरि संस्थाभ्यां रणघण्टारवाकुलम् ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 53 से 55): बस, प्रभो! उस नैमित्तिक के वचनों पर विश्वास करके ही मैं गुप्त वेश में इस गिरि पर रहता हूँ। स्वामिन्! पुण्ययोग से आज मुझे आप जैसे महामति पुरुषों के दर्शन भी मिल गये हैं, जिसके लिए कि मैं बहुत दिनों से लालायित था। अब अन्त में आपसे मेरा यही नम्र निवेदन है कि आप मेरे साथ चलिए और अपना कर्तव्य कीजिए। इसके बाद वे दोनों फहराती हुई ध्वजाओं वाले एक व्योमयान में बैठ कर वहाँ से चल दिये। जिस विमान पर वे सवार थे वह बड़ी तेजी से चलता था और रण-घण्टा के शब्द से शब्दमय किया जा रहा था ॥५३-५५॥


ततस्तौ संस्थितौ याने विजयार्धमहागिरौ।
याताविन्द्रनृपः श्रुत्वा समायासीच्च सन्मुखम् ॥५६॥

अर्थ: वे थोड़ी ही देर में विजयार्द्ध महागिरि पर पहुँच गये। उनके आने का हाल सुनकर इन्द्र सन्मुख


तावता वैरिणस्तस्य श्रुत्वा तस्यागमं ध्रुवम्। चेलुर्विमानसंरूढा व्याप्तव्योमदिगन्तराः ॥५७॥

इन्द्रेण व्योमयानस्थः पार्थः प्रत्यर्थिनः प्रति। इयाय रणतूर्येण नावि नाविकवत्सह ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 56 से 58): आकर उनसे बड़े स्नेह के साथ मिला। उधर इन्द्र के शत्रुओं को ज्यों ही पार्थ के आने की खबर लगी त्यों ही वे विमानों पर सवार हो होकर आये और उन्होंने सब दिशाओं को घेर लिया। यह देखकर अर्जुन खेवटिया की भाँति इन्द्र के साथ विमान में बैठ शत्रुओं के सामने गया और उसने रण-घोषणा कर दी ॥५६-५८॥


ततस्ते रणशौण्डीराश्चण्डकोदण्डमण्डिताः। आरेभिरे रणं कर्तुं पार्थेन सुधनुष्मता ॥५९॥

सामान्यशस्त्रतो जेतुमशक्याः सव्यसाचिना। ज्ञात्वेति वैरिणो हन्तुमारब्धा दिव्यशस्त्रतः ॥६०॥

नागपाशेन ते बद्धाः केचित्केचिच्च वह्निना। ज्वालिताश्चार्धचन्द्रेण छिन्नास्तेनारयः परे ॥६१॥

इन्द्रं निर्वैरिणं कृत्वा ययौ तेन धनंजयः। आतोद्यनादवृन्देन नगरं रथनूपुरम् ॥६२॥

गृहे गृहे स्म गायन्त्यङ्गना मङ्गलनिस्वनम्। धनंजयजयं वैरिपक्षक्षयसमुद्भवम् ॥६३॥

पाण्डवानां वरो वंशो गीयते मागधैर्मुदा। अर्च्यतेऽर्चनया पार्थः खेटैः क्षपितदुर्जनैः ॥६४॥

अर्थ (श्लोक 59 से 64): जिसको सुनकर प्रचंड धनुषधारी रण-कुशल शत्रु पार्थ धनुर्धर के साथ युद्ध के लिए तैयार हुए और उन्होंने उसके साथ युद्ध छेड़ दिया। वह युद्ध इतना भीषण था कि जिससे पार्थ को भी यह पता चल गया कि शत्रु सामान्य शस्त्र से नहीं जीते जा सकेंगे किन्तु दिव्य शस्त्र से पराजित होंगे। अतः उसने दिव्यास्त्र के द्वारा कितने ही शत्रुओं को नागपाश से बाँध लिया, बहुतों को जलाकर भस्म कर दिया और बहुतों को अर्द्धचन्द्र बाण द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया। अन्त में वह इन्द्र को शत्रु-रहित करके नगाड़ों की आवाज के साथ-साथ रथनूपुर चला आया। इस समय रथनूपूर की स्त्रियों ने घर-घर में मंगल गीत गाये और धनंजय की जय के समाचार दिगंनाओं के कानों तक पहुँचाये। गाथकों ने पाण्डवों के वंश की तारीफ की और उसका यश वर्णन किया तथा मद-रहित हुए सब विद्याधरों ने भक्तिभाव से पार्थ की पूजा-प्रशंसा की ॥५९-६४॥


अग्रेकृत्य खगान् क्षिप्रं श्रेणीयुग्मं विलोकितुम्। गत्वा वीक्ष्य स आयातो नगरं रथनूपुरम् ॥६५॥

अर्थ: इसके बाद अर्जुन बहुत से विद्याधरों को साथ लेकर विजयार्द्ध की दोनों श्रेणियों को देखने के लिए गया और थोड़े ही समय में उन्हें देखकर वह वापस रथनूपुर में आ गया ॥६५॥


एवं च पञ्च वर्षाणि विद्याधरमहाग्रहात्। स्थित्वा मित्रैः सुगन्धर्वताराद्यैर्निर्ययौ ततः ॥६६॥

चित्राङ्गप्रमुखैः शिष्यैर्धनुर्विद्यासुशिक्षकैः। शतसंख्यैः समं चेले पार्थेन पृथुकीर्तिना ॥६७॥

तत्रागत्य नृपान्भ्रातृन्समुत्तीर्य विमानतः। वीक्ष्य संमिलितो भक्त्या ननाम स यथायथम् ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 66 से 68): इसके बाद उसने विद्याधरों के आग्रह से गंधर्व आदि मित्रों के साथ वहाँ पाँच साल बिताये और बाद वह वहाँ से मित्रों सहित चला आया। उस यशस्वी के साथ ही धनुषविद्या सीखने वाले चित्रांगद आदि उसके सौ शिष्य भी चले आये। वह वहाँ आया जहाँ उसके भाई युधिष्ठिर आदि ठहरे हुए थे। उन्हें देखकर वह विमान से उतरा और उसने उन्हें भक्तिभाव से यथायोग्य नमस्कार किया ॥६६-६८॥


वियोगार्त्ताश्चिरं चित्ते सुखं भेजुस्तदाप्तितः।
पाण्डवा मिलिते स्वीये कस्य सौख्यं न जायते ॥६९॥

पुनः पार्थः स पाञ्चालीं प्राप्य प्रणयपूरिताम्।
प्रपेदे परमं सातं पुण्यपूर्णः प्रतापवान् ॥७०॥

चित्राङ्गप्रमुखाः शिष्याश्चापविद्याविशारदाः।
गरीयांसो वरीयांसः सेवन्ते स्म धनंजयम् ॥७१॥

मानयन्तो महामान्या युधिष्ठिरमहीपतेः।
जज्ञिरे परमामाज्ञां सुज्ञा विज्ञानगाश्च ते ॥७२॥

अर्थ (श्लोक 69 से 72): जब से अर्जुन चला गया तब से उसके वियोग से पाण्डव बड़े दुखी हो रहे थे। अतः उसके समागम से उन्हें भी बड़ा हर्ष हुआ। कौन ऐसा पुरुष है जिसे अपने बन्धु के समागम से सुख न हो। इसके बाद पुण्यात्मा पार्थ जाकर प्रणयवती द्रौपदी से मिला। उससे मिलकर उस प्रतापी को बहुत शान्ति मिली। इस समय धनुष-विद्या-कुशल चित्रांगद आदि सत्पुरुष विद्याधर भक्ति से सदा धनंजय की सेवा में उपस्थित रहते थे तथा महामान्य और विज्ञानी युधिष्ठिर की आज्ञा को भी शिरोधार्य करते थे ॥६९-७२॥


दुर्योधनेन ते ज्ञाता एकदा पाण्डवा नृपाः।
सहायवनसंप्राप्ताः सन्न्यायपथचारिणः ॥७३॥

संनद्धः क्रोधसंबद्धो दुर्योधनमहीपतिः।
स्वबलैर्बलसंपन्नो ययौ तान् हन्तुमुद्यतः ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 73 से 74): उधर एक दिन दुर्योधन को खबर लगी कि न्याय-मार्गगामी पाण्डव सहाय वन में आ गये हैं। यह सुन उसे बड़ा क्रोध आया और वह बहुत-सी सेना को साथ लेकर उनको मार डालने के लिए निकला ॥७३-७४॥


एतस्मिन्नन्तरेऽप्यायान्नारदर्षिर्दिवंगमी।
चित्राङ्गमभ्यगात्तूर्णं कथयितुं तदागमम् ॥७५॥

चित्राङ्गद किमर्थं त्वं वने भयसमाकुले।
वैरिवर्गसमाक्रान्ते तिष्ठसीति बभाण सः ॥७६॥

भो गन्धर्व सुताराख्य किमर्थं खगनायक।
सेव्यन्ते पाण्डवाः स्पष्टं त्वयापि वनवासिनः ॥७७॥

चित्राङ्गदो बभाणेति नारदर्षे शृणु मद्द्वचः।
अस्माकं गुरुरेवायं गरीयान् श्रीधनंजयः ॥७८॥

येनेन्द्रः स्थापितो राज्ये निवार्यारिकदम्बकम्।
स्वाम्यस्माकमयं पार्थो वयं तत्सेवकाः सदा ॥७९॥

नारदर्षिर्भाषते तावच्छ्रुत्वा तद्वचनं वरम्।
दुर्योधनो रिपुः प्राप्त इदानीमत्र दुर्जयः ॥८०॥

यद्येतस्य सुशिष्यत्वमवेदिष्यमहं तव।
धार्तराष्ट्रांक्षणाद्धैनाहनिष्यं सकलान् रिपून् ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 75 से 81): इसी समय इस बात की खबर देने के लिए ऋषितुल्य संयमी नारद चित्रांगद के पास आये। वे उससे बोले कि चित्रांगद ! तुम वैरियों से भरे हुए और भयावने इस जंगल में किस लिए रहते हो। उन्होंने गंधर्व आदि को भी सम्बोधित करके कहा कि कुछ समझ में नहीं आता कि तुम लोग इन वनवासी पाण्डवों की सेवा में ऐसे क्यों लीन हो रहे हो। यह सुनकर चित्रांगद ने कहा कि प्रभो ! महापुरुष धनंजय हमारा गुरु है। इस महाभाग ने वैरियों को वारण करके इन्द्र को राज-गद्दी पर बैठाया है, अतः यह हमारा स्वामी है और हम सब सदा के लिए इसके सेवक हैं। यह सुन नारद ने कहा कि देखो, अभी यहाँ दुर्जय दुर्योधन आ रहा है। इसलिए हम तुम्हारा सच्चा शिष्यपना तभी समझेंगे जबकि तुम लोग एक क्षण में ही उसे साथियों सहित मार भगाओगे और यम का घर दिखा दोगे। नहीं तो तुम्हारा यह गाल-फुलाना किसी भी काम का नहीं कि हम अर्जुन के बड़े सेवक हैं।


आजन्म ब्रह्मचारित्वं विद्यते मयि निश्चितम्। सदा धर्मरतश्चाहं नारीनामपराङ्मुखः ॥८२॥

यो गाङ्गेयो गरिष्ठात्मा पितामहो महामतिः। तद्वाक्यं न प्रकुर्वन्ति कौरवाः कलिकारिणः ॥८३॥

अर्थ (श्लोक 75 से 83): क्या तुम लोग मुझे जानते हो, यदि नहीं जानते तो सुनो, मैं आजन्म ब्रह्मचारी-स्त्री के नाम से भी विमुख-और धर्मकर्म में लीन रहने वाला नारद हूँ। देखो, भीष्म पितामह महान् बुद्धिशाली और बड़े पराक्रमी हैं ॥७५-८३॥


यो द्रोणो विदुरश्च स्तः पितृव्यौ परमोदयौ। तद्वाक्यविरता वैरं वहन्तः सन्ति कौरवाः ॥८४॥

इदानीं संगरं कर्तुं संप्राप्ते कौरवेश्वरे। सज्जा भवत भो भक्ता रणातिथ्यप्रदायिनः ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 84 से 85): परन्तु ये कलहकारी कौरव उनकी भी सीख नहीं मानते और न ये अपने परम गुरु द्रोणाचार्य और चाचा विदुर की बात सुनते हैं। ये उन्मार्ग-गामी, जो जी में आता है वही वैर-विरोध का काम कर बैठते हैं। ये न्याय-शून्य अपनी मन-मानी कर यहाँ युद्ध के लिए आ रहे हैं। इसलिए भक्ति वत्सल और रण को आतिथ्य देने वाले आप लोग भी युद्ध के लिए तैयार हो जाइए ॥८४-८५॥


तन्निशम्य तदा क्रुद्धो वैरिकदम्बकदावः। चित्राङ्गो गर्वसंपन्नो रणं कर्तुं समुद्यतः ॥८६॥

तावद्दुर्योधनं सैन्यं संनद्धं बन्धुबन्धुरम्। चतुरङ्गं रणं कर्तुं समायासीत्सहोदरैः ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 86 से 87): नारद के इन उत्तेजक वचनों को सुनकर चित्रांगद क्रोध से लाल हो उठा और वैरी-रूपी-जंगल के लिए दावानल के जैसे उस वीर योद्धा ने उसी समय गर्व के साथ रण के लिए तैयारी कर दी। इसी समय उधर से दुर्योधन की चतुरंग सेना भी सज कर युद्ध के लिए। इसमें दुर्योधन के सब भाई थे और वे जी-जान से युद्ध का प्रयत्न करते थे ॥८६-८७॥


तदा क्रोधाग्निसंतप्तश्चित्राङ्गश्चित्रचित्तभृत्। गन्धर्वेण दधावाशु धवलं दधता यशः ॥८८॥

संक्षुब्धः सैन्यजलधिश्चित्राङ्गागस्तिना तदा। शोषितोऽशेषमात्रोऽपि विचित्रेण महात्मना ॥८९॥

अर्थ (श्लोक 88 से 89): दुर्योधन की सेना को देखकर चित्रांगद क्रोध से संतप्त हो उठा और उसके मन में नाना प्रकार की तरंगें उठने लगीं। वह स्वच्छ यशशाली गंधर्व के साथ ही शत्रु पर टूट पड़ा। यह देख दुर्योधन के सेना-समुद्र में बड़ा क्षोभ मच गया। देखते-देखते ही उस विचित्र योद्धा ने जैसे अगस्त ऋषि ने समुद्र को सुखा दिया था वैसे ही उस-सारे सेना-समुद्र को सुखा दिया ॥८८-८९॥


शल्यश्चाथ विशाल्यश्च सबलो दुष्टमानसः। दुःशासनादयोऽप्यन्ये समुत्तस्थू रणोत्सुकाः ॥९०॥

चित्राङ्गशरसंघातैश्छिन्ना बाणास्तदीरिताः। जेघ्नीयन्ते घनैर्घातैस्तेऽन्योन्यं रणलालसाः ॥९१॥

प्रहरन्तो महाबाणैर्गदाभिः कुन्तकोटिभिः। तीक्ष्णधाराधरैः खड्गैर्योयुध्यन्ते भटा रणे ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 90 से 92): अपने पक्ष की सेना को इस तरह नाश होती हुई देखकर बलशाली दुष्टचित्त शल्य, विशल्य और दुःशासन आदि योद्धा युद्ध के लिए उठे। उन्होंने खूब जोर से बाण चलाना शुरू किया परन्तु उधर चित्रांगद उनके छोड़े हुए बाणों को अपने शर-कौशल से छिन्न-भिन्न करता जाता था। इस तरह रण की लालसा रखने वाले दोनों ओर के वीरों में परस्पर खूब बाणों की मारा-मार हुई, जिसमें हजारों को तो प्राणों से हाथ धो बैठना पड़ा। इस युद्ध में योद्धागण महान् तीक्ष्ण बाणों, गदाओं, भालों और


मुशलैर्मारिता मत्ता मनो मानं विमुच्य च।
म्रियन्ते तद्रणे किं न यदनिष्टमजायत ॥९३॥

हलैर्विदारिता हृद्ये हृदये च पतन्त्यहो।
भटाः संघट्टसंपन्ना भूगर्भा इव संभ्रमात् ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 90 से 94): तीक्ष्ण तलवारों के द्वारा एक दूसरे से घोर युद्ध कर रहे थे। इस रण में मुशलों की मार से कितने ही युद्ध-कुशल प्राणों को खोकर धराशायी हो गये थे। सच तो यह है कि ऐसा कोई भी अनिष्ट नहीं जो कि उस युद्ध में न हुआ हो ॥९०-९४॥


धार्तराष्ट्रैर्महाबाणैर्विद्धं वीक्ष्य निजं बलम्।
विव्याध तारगन्धर्वो मोहनेन शरेण तान् ॥९५॥

मोहितं तेन बाणेन सकलं विपुलं बलम्।
अयशोभाजनं भूत्वैकको दुर्योधनः स्थितः ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 95 से 96): कितने ही युद्ध-वीरों के हृदय हलों से चिर गये थे। अतः वे पृथ्वी पर पड़े हुए ऐसे जान पड़ते थे मानों मूर्च्छा के कारण पृथ्वी पर सोये हुए ही हैं। इस समय जब गंधर्व ने देखा कि कौरवों के तीक्ष्ण बाणों के द्वारा मेरी सेना वेधी जा रही है तब उसने मोहन-बाण छोड़कर सब कौरवों को मूर्च्छित कर दिया उनमें केवल अपयश का पात्र एक दुर्योधन ही होश में रहा ॥९५-९६॥


मानमुक्तो महाशूरो दुर्योधनमहीपतिः।
आहवे विह्वलस्तेनाहूतश्चित्राङ्गवैरिणा ॥९७॥

चित्राङ्गः कौरवोऽन्योन्यं प्रहरन्तौ वरेषुभिः।
वीक्ष्यमाणौ सुरौघेण शंसितौ तौ पुनः पुनः ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 97 से 98): इस प्रकार अपनी सारी सेना को मूर्च्छित देखकर दुर्योधन बड़ा घबड़ाया। वह तब अपनी मर्यादा भूल कर विह्वल-सा हुआ रण-स्थल में इधर-उधर घूमने-फिरने लगा। यह देख चित्रांगद ने उसे ललकारा। फिर क्या था, उन दोनों का तीक्ष्ण बाणों के द्वारा परस्पर में भीषण युद्ध होने लगा, जिसे देखकर देवों ने उन दोनों की भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥९७-९८॥


युध्यमानं स्थिरं युध्दे चित्राङ्गं वीक्ष्य चार्जुनः।
शशंसान्यमहाशिष्यानादिदेश युयुत्सया ॥९९॥

लब्धलक्ष्यस्तु गन्धर्वो लब्ध्वावसरमुत्तमम्।
चिच्छेद तद्ध्वजं धीमान्यन्त्रिणा शीघ्रगामिना ॥१००॥

गन्धर्वोऽपातयत्तूर्णं गन्धर्वौ तद्रथस्थितौ।
दोर्योधनं रथं बाणैर्बभञ्ज भुजविक्रमी ॥१०१॥

अर्थ (श्लोक 99 से 101): इस तरह चित्रांगद को युद्ध में धीरता से डटा देखकर अर्जुन ने उसकी खूब तारीफ की। उसने अपने और-और शिष्यों की भी युद्ध के लिए आदेश किया। इससे लक्ष्य बाँधने में प्रवीण गंधर्व को अच्छा मौका मिला। उसने उसी वक्त अपने शीघ्रगामी बाणों के द्वारा बात ही बात में दुर्योधन की ध्वजा को छेद दिया और बड़ी बहादुरी के साथ बाण-प्रहार जारी रक्खा। अन्त में उसने थोड़े ही समय में उसके रथ के घोड़ों को बेधकर अपने अपूर्व पराक्रम से रथ को भी बे-काम कर दिया ॥९९-१०१॥


जगाद पार्थधनुष्को गन्धर्वः कौरवं प्रति।
क्व यासि सांप्रतं दुष्ट खलीकृत्य जगत्खल ॥१०२॥

दौर्जन्येन नरान्हन्तुं प्रवृत्तः पापपण्डितः।
पश्येदानीं फलं तस्य प्राप्तं पाप गतायुध ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 102 से 103): इसके बाद वह धनुर्धर गंधर्व दुर्योधन से बोला कि दुष्ट, तू अब भाग कर कहाँ जायेगा? हे खल! तूने अपनी खलता से सारे संसार को खल बना डाला है। पर अब तुझे देखता हूँ कि तू कैसा बहादुर है। अब मेरे मारे तू कहीं भी नहीं बचेगा। पाप-पण्डित, तूने अपनी दुर्जनता से अनेक प्राणियों का व्यर्थ ही वध किया है। देख, यह तुझे तेरे उसी पाप का फल मिला है और उसी के कारण


इत्युक्त्वा नागपाशेन पपाश पशुवन्नृपम्।
तस्मिन्बद्धे भटा भक्ता भेजुः काष्ठां भयावहाम् ॥१०४॥

अर्थ (श्लोक 102 से 104): से तू हथियार-रहित बिल्कुल ही दीन बन गया है। इसके बाद उसने दुर्योधन को पशु की तरह नागपाश से बाँध लिया। यह देख डर के मारे उसके और-और वीर-गण दिशारूपी स्त्रियों की शरण में भाग गये। फिर उनका कुछ पता न चला ॥१०२-१०४॥


गन्धर्वस्य यशो भूमौ बभ्राम विधुनिर्मलम्।
दुर्योधनसुबन्धोत्थं न्यायात्कस्य जयो न हि ॥१०५॥

तावता पत्तयः सर्वे सादिनश्च विषादिनः।
नियन्तारो गजस्थाश्च कौरवाः शुचमाययुः ॥१०६॥

पापेन प्राप्तदुर्भाना दुर्योधनजनाः क्षणात्।
मोहिता मोहबाणेन मुमूर्च्छुश्छद्मकारिणः ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 105 से 107): इधर दुर्योधन को बाँध लेने से चन्द्रमा के जैसा निर्मल गंधर्व का यश भी संसार में फैल गया। लोग मुक्तकण्ठ से उसके गुण गाने लगे कि तू धन्य है जिसने कि दुर्योधन जैसे वीर शिरोमणि को भी बाँध लिया। सच है न्याय से किसकी जीत नहीं होती अर्थात् नीति से सभी की विजय होती है। उधर दुर्योधन के पकड़े जाने पर सब योद्धा, सवार, महावत और हाथियों पर चढ़े हुए कौरव शोकसागर में डूब गये। यह सब ही पाप का फल है जो उसके योद्धाओं का इतना भारी अपमान हुआ ॥१०५-१०७॥


तदा भानुमती प्राप तत्प्रिया प्रियवादिनी।
प्रियबन्धनजां श्रुत्वा किंवदन्तीं रुदत्यलम् ॥१०८॥

शोकसंतापसंतप्ता नेत्राश्रुजलधारया।
सिञ्चन्ती कुं रुदन्ती च भूपतीन्सावदद्गिरा ॥१०९॥

अन्योन्यवदनेक्षां च कुर्वन्तः किं नृपाः स्थिताः।
मन्नाथे बन्धनं नीते भवतां का सुखासिका ॥११०॥

मोचयध्वं ममाधीशं कौरवाणामधीश्वरम्।
अन्यथा भवतां कुत्र स्थास्नुत्वं कीर्तिकृन्तिनाम् ॥१११॥

अर्थ (श्लोक 108 से 111): उधर दुर्योधन की स्त्री भानुमती ने ज्यों ही उसके पकड़े जाने की खबर सुनी त्यों ही वह रोती हुई वहाँ आई। वह शोक-संताप में बिल्कुल ही डूब रही थी और आँसुओं की अविरल धारा से पृथ्वीतल को सींच रही थी। वह चित्रांगद आदि के पास आकर रोती हुई उनसे बोली कि हे वीरगण! आप लोग एक दूसरे के मुँह की ओर ताकते हुए क्या बैठे हैं। बताइए कि आप लोगों ने जो मेरे स्वामी को बाँध लिया है इससे आपको क्या सुख और लाभ होगा। अतएव अच्छा हो यदि कौरवों के अधीश्वर मेरे पतिदेव को आप छोड़ दें, अन्यथा आप लोगों की बड़ी अपकीर्ति होगी और ऐसी हालत में आप लोग कैसे शान्ति लाभ करेंगे और कौन आप लोगों को अच्छा कहेगा ॥१०८-१११॥


बिलापमुखरां वीक्ष्य रुदन्तीं तां पितामहः।
प्राह भानुमतीं भीतां दददाश्वासनमिति ॥११२॥

किं क्रन्दसि कृपापात्रे किं रोदिषि जने जने।
मोचयितुं समिच्छा चेत्पतिं तन्मे वचः कुरु ॥११३॥

याहि याहि स्नुषे धर्मपुत्रस्य शरणं ध्रुवम्।
यतो बन्धविमुक्तिः स्यात्तव पत्युर्दुरात्मनः ॥११४॥

अर्थ (श्लोक 112 से 114): भानुमती को इस तरह विलाप करती हुई देखकर भीष्म पितामह ने उसे आश्वासन दिया और कहा कि कृपापात्रे, तू क्यों इतनी घबरा रही है और क्यों हर एक के पास जा-जाकर रोती है। देख, यदि तुझे अपने पति को छुड़ाना ही है तो तू मेरा कहना मान और युधिष्ठिर की शरण में जा। वे तेरे दुरात्मा पति की बंधन से तुरंत छुटकारा दे देंगे। यद्यपि युधिष्ठिर के साथ तेरे पति दुर्योधन ने बड़ा भारी अन्याय किया है परन्तु फिर भी वह धर्म-बुद्धि है, अतः अपराधी कौरव राजाओं को वह अवश्य


कृतेऽपि दुर्णये तेन धर्मपुत्रस्तु धर्मधीः।
क्षमः क्षाम्यति भूपालान्कौरवान्कृतदूषणान् ॥११५॥

स धीरो विधुरान्धर्तुं धरण्यां धरणीधरान्।
समर्थो न जहात्याशु निजं शीलं कदाचन ॥११६॥

अर्थ (श्लोक 112 से 116): क्षमा कर देगा। वह धीर सब राज को आपत्ति से छुटकारा दिलाने के लिए समर्थ है। वह अपने दयालु स्वभाव को कभी नहीं छोड़ता, अतः मुझे आशा तथा विश्वास है कि वह अवश्य ही दुर्योधन को छोड़ देगा ॥११२-११६॥


श्रुत्वा तद्वचनं भानुमती तीव्राशया ततः।
गता सबान्धवो यत्र समास्ते धर्मनन्दनः ॥११७॥

देहि देहि दयाधीश भर्तृभिक्षां सुखावहाम्।
मह्यं क्षान्त्वापराधानां शतं शीतल सन्मुख ॥११८॥

तावता पार्थशिष्येण विबन्ध्य कौरवं नृपम्।
रथे संरोप्य संचेले स्वपुरं स्वः पुरोपमम् ॥११९॥

नीयमानं नृपं श्रुत्वावादीत्स विपुलोदरः।
भव्यं भव्यमिदं जातं यद्धतः कौरवाग्रणीः ॥१२०॥

वधो विधीयते यस्तु स्वहस्तेन मया त्वया।
स एव स्वयमाप्तोऽस्ति परहस्तेन किं शुचा ॥१२१॥

हसन्तं पावनिं ज्येष्ठो वर्जयित्वा वचो जगौ।
उत्तमानामयं भावो न याति विक्रियां क्वचित् ॥१२२॥

दुर्जनैः खिद्यमानोऽपि महान्नो याति विक्रियाम्।
राहुणा छाद्यमानोऽपि चन्द्रो नोज्ज्वलतां त्यजेत् ॥१२३॥

अर्थ (श्लोक 117 से 123): पितामह की बात मानकर भानुमती वहीं गई जहाँ अपने बन्धुवर्ग के साथ युधिष्ठिर बैठे हुए थे। वहाँ पहुँच कर वह बोली कि दयाधीश, शान्त-चित्त और विवेकी राजन्! आप हम लोगों के सब अपराधों को भूल जाइए और सब सुखों की देने वाली मुझे पति की भीख दया करके दीजिए। उधर गंधर्व विद्याधर दुर्योधन को बाँधकर और रथ में बैठाकर इन्द्रपुरी के जैसी अपनी नगरी को ले गया। इस समाचार को सुन भीम बोला कि दुर्योधन पकड़ा गया यह अच्छा ही हुआ। इसमें शोक करने की बात ही क्या है। जिसका वध मुझे या तुम्हें करना था वह दूसरे के द्वारा हो गया। यह तो खुशी की बात हुई। इस तरह हँसते हुए भीम को युधिष्ठिर ने रोका और कहा कि भाई, उत्तम पुरुषों का ऐसा स्वभाव होता है जो किसी हालत में भी विकृत नहीं होता किन्तु सदा एक-सा रहता है। देखो, जिस तरह राहु के द्वारा ग्रसे जाने पर भी चंद्रमा अपनी उज्ज्वलता को नहीं छोड़ता उसी तरह महान् पुरुष भी दुर्जनों के द्वारा कष्ट दिये जाने पर भी विकार भाव को नहीं प्राप्त होते ॥११७-१२३॥


पार्थं बभाण संप्राप्तो धर्मपुत्रस्तवाधुना।
विद्यतेऽवसरो नूनं तन्मोचनकृते कृतिन् ॥१२४॥

पाण्डवानां जगत्यत्रापकीर्तिर्जायते न हि।
यावत्तावद्विमोच्योऽयं कुरूणामधिपस्त्वया ॥१२५॥

यावन्न म्रियते तावत्स विमोच्य त्वमानय।
मृतेऽस्मिन्पाण्डवानां हि न सौरूप्यं कदाचन ॥१२६॥

इत्युक्तः स दधावाशु सरथः शक्रनन्दनः।
मुच्यतां मुच्यतां नेयो न गेहेऽयमिति ब्रुवन् ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 124 से 127): इसके बाद धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने पार्थ से कहा कि भाई, इसी समय दुर्योधन को छोड़ देने का यत्न करो, जिससे संसार में पाण्डवों की ऐसी अपकीर्ति न उड़ने पावे कि उन्होंने अपने कुटुम्बी के साथ ही ऐसा खोटा व्यवहार किया। तुम शीघ्र जाओ और वह मर न जाये इसके पहले ही छुड़ा कर उसे यहाँ ले आओ। उसके मर जाने से पाण्डवों की भारी अपकीर्ति होगी। युधिष्ठिर के वचन शिरोधार्य कर अर्जुन उसी वक्त रथ पर सवार होकर दौड़ा गया और गंधर्व के पास पहुँच कर उससे


गन्धर्वस्तद्वचः श्रुत्वा स्थितोऽवसरमात्मनः।
वीक्ष्यावोचत्प्रकुर्वाणः स्ववीर्यं प्रकटं परम् ॥१२८॥

भवतामस्ति चेच्छक्तिरयं संत्याज्यतां लघु।
धनुर्वेदमहाविद्यां दर्शयित्वा निजां पराम् ॥१२९॥

अर्थ (श्लोक 124 से 129): उसने कहा कि दुर्योधन को यहीं और अभी छोड़ दो, इसे न ले जाओ। यह सुनकर गंधर्व ने अपने वीर्य को प्रकट करते हुए अर्जुन से कहा कि हम इसे नहीं छोड़ेंगे। यदि तुममें ताकत हो तो अपनी अपूर्व धनुष-विद्या के बल पर छुड़ा लो ॥१२४-१२९॥


तावत्सस्यन्दनोऽधावत्सुतारस्तरदस्त्वरा।
गन्धर्वपक्षमालक्ष्य विपक्षीभूतमानसः ॥१३०॥

शिष्येण सह पार्थेशो युयुधे क्रुद्धमानसः।
बाणावल्याथ निःशेषं नभं संछादयंस्त्वरा ॥१३१॥

खचरः शरसंघातैश्छादयंच्च धनंजयम्।
पश्यामि ते धनुर्वेदं हसन्निति महामनाः ॥१३२॥

उत्तस्थे सुरथस्थोऽपि खगश्चित्ररथो रथम्।
वाहयञ्शक्रपुत्रं च संक्रीडितुमिवोन्नतम् ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 130 से 133): यह देख अर्जुन का एक शिष्य उससे विमुख हो, रथ में सवार होकर उसकी ओर दौड़ा। तब क्रोध में आकर पार्थ ने शिष्य के साथ खूब युद्ध किया और देखते-देखते बाणों की पंक्ति से सारे आकाश-मण्डल को ढँक दिया। यह देख शत्रु विद्याधर ने यह कहकर कि आपके धनुर्वेद को देखता हूँ, हँसते-हँसते अपने बाणों से धनंजय को ही प्रच्छन्न कर दिया। इसके बाद चित्रांगद भी रथ में सवार होकर युद्ध के लिए उठा और अपने रथ को लेकर अर्जुन की ओर आया। उसे देख यह जान पड़ता था मानों वह अर्जुन के साथ महती क्रीड़ा करने को ही आ रहा है ॥१३०-१३३॥


यान्याञ्शरांश्च चित्राङ्गो मुञ्चते सव्यसाचिनम्।
व्यर्थीकरोति पार्थस्तांस्तान्मेघानिव मारुतः ॥१३४॥

दिव्यास्त्रेण समारब्धं पुनर्युद्धं सुदारुणम्।
ताभ्यां चापसमुद्भाभ्यां क्रुद्धाभ्यां भीरुभीतिदम् ॥१३५॥

चित्राङ्गमुक्तदावाग्निं चिच्छेद जलदेन सः।
चिच्छेद जलदं चित्रो वायुना सर्वहारिणा ॥१३६॥

आबाधयत्तदा वायुं वाडवेन धनंजयः।
तन्मुक्तं नागपाशं च गरुडेन जघान सः ॥१३७॥

तेन मुक्ताञ्शरानेवं व्यर्थीचक्रे धनंजयः।
जयलक्ष्मीमवापाशु साधुकारं जनौघतः ॥१३८॥

तच्छिष्यैः सकलैः पार्थो गुरुभक्त्या नतस्तुतः।
दुर्योधनोऽपि पार्थेन प्रीणितो बहुभाषणैः ॥१३९॥

अर्थ (श्लोक 134 से 139): इस समय चित्रांगद ने अर्जुन के ऊपर जो-जो बाण चलाये उन्हें अर्जुन ने मेघों को नष्ट करने वाले वायु की भाँति बिल्कुल नष्ट कर दिया। तब वे क्रोध से लाल होकर दोनों ही धनुर्धर दिव्य हथियारों के द्वारा भीषण युद्ध करने लगे, जिसको देखकर डरपोकों को अपने प्राणों की ही आ पड़ती थी। यह देख चित्रांगद ने दावानल बाण छोड़ा जिसको कि पार्थ ने जलद बाण से वारण कर दिया। बाद चित्रांगद ने वायुबाण के द्वारा जब पार्थ के जलद को छेद दिया तब धनंजय ने वाडव-बाण से उसके सर्वहारी वायुबाण को नष्ट कर दिया। तब चित्रांगद ने नागपाश बाण को छोड़ा, जिसे कि धन्वजय ने गरुड़ बाण से वारण कर दिया। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार अपने शर-कौशल से धनंजय ने चित्रांगद के छोड़े हुए सभी बाणों को जब निवार दिया तब जयलक्ष्मी स्वयं ही उसके हाथ में आ गई और लोग उसे साधुवाद देने लगे। यह देख पार्थ के शिष्यों ने उसकी भक्ति से खूब पूजा-स्तुति


शरसोपानमालाश्च विधाय विविधैर्बुधः। दुर्योधनं गिरेः शृङ्गात्समुत्तारयति स्म सः ॥१४०॥

आनीय नृपतेः पार्श्वे कौरवं शक्रनन्दनः। मुमोच बन्धनात्खिन्नं बन्धात्खेदो हि जायते ॥१४१॥

अर्थ (श्लोक 134 से 141): की। इसके बाद पार्थ ने दुर्योधन की विश्वास दिलाकर प्रसन्न किया और बाणों की सीढ़ी रचकर दुर्योधन को पहाड़ के शिखर से उतारा। इसके बाद उसे युधिष्ठिर के पास लाकर उसने बंधन रहित कर दिया। सच है कि बंधन से सभी को खेद होता है ॥१३४-१४१॥


युधिष्ठिरं स संनुत्य नत्वा क्षान्त्वा स्थितो जगौ। विपाशीकृत्य संपृष्टः कुशलं धर्मजेन च ॥१४२॥

नाथ बन्धनजं नाभूद्दुःखं मम यथा तथा। मोचितोऽनेन चेत्युक्तिर्नर्मशर्मप्रदायिनी ॥१४३॥

मानभङ्गभवाद् दुःखात्रापरं शर्म हानिदम्। इति संप्रेषितस्तेन प्राप भूपः पुरं परम् ॥१४४॥

अर्थ (श्लोक 142 से 144): इस उदारता के बदले दुर्योधन ने युधिष्ठिर की बहुत-बहुत स्तुति की और उन्हें प्रणाम किया। युधिष्ठिर ने भी उससे कुशल पूछा, जिसके उत्तर में दुर्योधन ने कहा कि नाथ, मुझे बंधन का उतना दुख नहीं हुआ जितना कि छूटने पर हुआ है। यह छुटकारा मुझे बहुत ही खटकता है क्योंकि इससे मुझे नीचा देखना पड़ा है और पड़ेगा भी। महाराज मानभंग के दुख के बराबर प्राणियों के सुख का घातक दूसरा नहीं है। यही एक संसार में भारी दुख है, जिसके मारे जीव जीते जी ही मरे के जैसे हो जाते है ॥१४२-१४४॥


गतो निजपुरं दुःखी चिन्तयामास मानसे। हा हा मे मानुषं जन्म गतं निष्फलतां क्षणात् ॥१४५॥

क्वाहं च कौरवाधीशः क्व मे चित्तसमुन्नतिः। तत्सर्वं दलितं तेन रणे मोचयता मम ॥१४६॥

रणे बद्ध्वा पुनर्मुक्तः पार्थेनाहं सुदुःखितः। तद्दुःखं केन वार्येत मम प्राणापहारकम् ॥१४७॥

यः कोऽपि मारयत्याशु पाण्डवांश्चण्डशासनान्। स पराभवशल्यं मे समुद्धरति दुर्धरम् ॥१४८॥

तस्मै ददामि राज्यार्धं तद्धन्त्रे हतमानसः। कोऽप्यस्ति भवने मर्त्यो मम दुःखनिवारकः ॥१४९॥

अर्थ (श्लोक 145 से 149): इसके बाद युधिष्ठिर ने उसे उसके नगर को भेज दिया। यद्यपि वह सकुशल अपनी राजधानी में पहुँच गया पर उसके हृदय में मानभंग की शल्य भाले की नोंक जैसी चुभ रही थी। अतः उसने मन ही मन सोचा कि हाय, मेरा यह मनुष्य जन्म क्षण में ही व्यर्थ हो गया। कहाँ तो मैं कौरवों का स्वामी और कहाँ मेरे उन्नत विचार परन्तु यह सब बातें उसने मुझे रण में छोड़कर पद-दलित कर दीं। मेरा सब कुछ महत्त्व धूल में मिला दिया गया। मुझे जितना रण में पकड़े जाने का दुख नहीं उतना अर्जुन के द्वारा छुड़ाये जाने का दुख है। नहीं मालूम प्राणों को हरने वाले मेरे इस दारुण दुख को कौन निवारण करेगा। मुझे विश्वास है कि जो कोई महापुरुष इन तेजस्वी पाण्डवों को यमालय भेजेगा वही महाभाग मेरी इस पराभव-रूपी शल्य को भी मिटा सकेगा। उसने पुकार कर कहा कि क्या संसार में कोई ऐसा पुरुष है जो मेरे इस दुख को दूर करे। मैं उसे अपना आधा राज्य दूँगा ॥१४५-१४९॥


इति श्रुत्वा जगौ धीमान्कनकध्वजभूपतिः। सप्तमे वासरे तान् वै हनिष्यामि सुपाण्डवान् ॥१५०॥

अर्थ: यह सुन बुद्धिशाली कनकध्वज राजा ने कहा कि महाराज! मैं विश्वास दिलाकर कहता हूँ कि मैं आज से सातवें दिन अवश्य ही पाण्डवों का काम तमाम कर दूँगा। यदि न करूँ तो प्रतिज्ञा


न हन्मि चेद्ददाम्याशु स्वात्मानं पावके भृशम्। इत्युक्त्वा निर्गतो दुर्धीर्वन ऋष्याश्रमे गतः ॥१५१॥

कृत्यां विद्यां स्थितस्तत्र संसाधयितुमुद्यतः। मन्त्रहोमविधानज्ञः कनकध्वज इत्वरः ॥१५२॥

तावद् ब्रह्मसुतो ज्ञात्वा गत्वा पाण्डवसंनिधिम्। जगाद मधुरालापैः पाण्डवानां सुखाप्तये ॥१५३॥

सप्तमे वासरे राजन् कृत्याविद्याप्रभावतः। हनिष्यति हतात्मायं भवतः कनकध्वजः ॥१५४॥

अर्थ (श्लोक 150 से 154): करता हूँ कि मैं अपने आपको अग्नि देव को भेंट कर दूँगा। इसके बाद वह दुर्बुद्धि वहाँ से निकला और वन में ऋषियों का जहाँ एक आश्रम था वहाँ पहुँचा। वहाँ वह उद्धत कृत्या विद्या को साधने लगा और होम-मंत्र-आदि विधि करने लगा। जब इस बात की खबर नारदजी को हुई तब वे उसी समय पाण्डवों के पास आये और उनके हित की वांछा से मधुर शब्दों में बोले कि आज से सातवें दिन कृत्या विद्या के प्रभाव से दुरात्मा कनकध्वज तुम लोगों को मारना चाहता है और इसी लिए वह कृत्या विद्या को वन में साध रहा है ॥१५०-१५४॥


इति श्रुत्वा सुधर्मात्मा धर्मपुत्रः पवित्रधीः। नासाग्रदृङ्निरीहः सन् निःसंगो निश्चलः स्थितः ॥१५५॥

शुभध्यानरतः शुद्धो दुःसंसारपराङ्मुखः। समाहितमनास्तस्थौ निमीलितनिजेक्षणः ॥१५६॥

अर्थ (श्लोक 155 से 156): नारद के वचनों को सुनकर पवित्र-बुद्धि धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अपनी सारी इच्छाओं को एकदम रोक दिया और वह मेरुवत् निश्चल होकर धर्म-ध्यान करने लगे। उन्होंने परिग्रह से ममता छोड़कर नाक के अग्रभाग पर दृष्टि जमाई। वह संसार से एकदम विमुख-उदासीन-हो गये और अपने मन पर उन्होंने पूरा-पूरा अधिकार जमा लिया। वह आत्म-स्वरूप की चिन्तना में ऐसे उलझे कि सब तरफ से मन को मोड़कर आत्मा में ही लीन हो गये ॥१५५-१५६॥


प्राणीप्सितसुशर्माणि जायन्ते धर्मतो ध्रुवम्। भो भ्रातरः कुरुध्वं हि धर्ममेकं सुसिद्धये ॥१५७॥

अस्माकं परलोकाय यो वृषः सकलैः स्तुतः। सुरासुरैः सदा भूयाद्विघ्नसंघातघातकः ॥१५८॥

धर्मः सोऽप्यत्र संसिद्धयै सहायो मे भविष्यति। धर्मतो नापरं विद्धि सातहेतुं सनातनम् ॥१५९॥

आपदा धर्मतः पुंसां संपदायै भवेल्लघु। ग्रीष्मे सूर्यकरा यद्वत्सुवृक्षाणां फलर्द्धये ॥१६०॥

अर्थ (श्लोक 157 से 160): उन्होंने अपने भाइयों से कहा कि भ्रातृगण, धर्म ही एक ऐसी वस्तु है जिसके प्रभाव से प्राणियों के सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। अतः आप लोग भी अपने मनोरथों की सिद्धि के लिए एक धर्म का ही अद्वितीय शरण ग्रहण करें। देखिए जिस धर्म को परलोक के लिए सुर-असुर आदि सब सेवन करते हैं, करते थे और सदा काल करते रहेंगे वह धर्म विश्वास रखो कि अवश्य ही तुम्हारे विघ्नों को दूर करेगा और तुम्हें सब सुख देगा। मेरा तो यही विश्वास है कि धर्म के सिवा जीवों को और कोई भी ऐसा नहीं जो सुखी करे या सुख दे। इस धर्म के प्रभाव से आपत्ति भी पुरुषों के लिए सम्पत्ति-रूप हो जाती है और सुख देती है। कौन नहीं जानता कि ग्रीष्म के सूरज की किरणें भी वृक्षों में फल-फूल रूप ऋद्धि पैदा करती है ॥१५७-१६०॥


इति धर्मं स्तुवन्धर्मपुत्रोऽयमवतिष्ठते। तावदासनकम्पेन धर्मदेवः प्रबुद्धधीः ॥१६१॥

अर्थ: इस प्रकार युधिष्ठिर धर्म की प्रशंसा कर रहे थे कि इसी समय अपने आसन के कंपित होने


तदुपद्रवमाज्ञाय सहसा स समाययौ।
अवामि पाण्डवं वंशं क्षीयमाणं वदन्निति ॥१६२॥

स सुरः प्रकटीभूय जजल्प गूढमानसः।
अस्मत्स्थाने स्थिता यूयं कथं सुस्थिरमानसाः ॥१६३॥

अस्मन्माहात्म्यमाज्ञातं भवद्भिः किं पुरा न हि।
क्षीयन्तेऽस्मत्प्रकोपेन क्षणार्धेन क्षितौ जनाः ॥१६४॥

इत्याभाष्य विशुद्धात्मा जहार द्रौपदीं सतीम्।
धावन्ति स्म तदा क्रुद्धाः कौन्तेयाः कृन्तितुं सुरम् ॥१६५॥

तावन्मद्रीसुतौ तूर्णं दधावतुर्महाक्रुधौ।
जल्पन्ताविति वेगेन सुपर्वाणं वरत्विषम् ॥१६६॥

क्व यासि रे महावीर हृत्वेमां सुन्दरीं वराम्।
मार्यमाणं स्वमात्मानं किं न जानासि सत्वरम् ॥१६७॥

अर्थ (श्लोक 161 से 167): से एक अवधि-ज्ञानी देव को पाण्डवों के इस उपद्रव की खबर लगी। वह उसी समय वहाँ आया और बोला कि मैं नष्ट होते हुए पाण्डवों के कुल की रक्षा करूँगा, उन्हें तिलमात्र भी दुख न होने दूँगा। इसके बाद वह प्रकट होकर पाण्डवों से बोला कि तुम लोग ऐसे बेफिक्र होकर मेरे स्थान में क्यों ठहरे हो। क्या तुम लोग मेरे महात्म्य को नहीं जानते और न पहले क्या कभी तुमने उसे सुना ही है। देखो, मेरा महात्म्य ऐसा है कि मेरे कोप के मारे कोई मनुष्य पृथ्वी पर एक क्षण भी नहीं टिक सकता। इसके बाद उस विशुद्धात्मा ने द्रौपदी सती को हर लिया। उसके द्वारा द्रौपदी को हरी गई देखकर पाण्डवों को बड़ा भारी क्रोध आया और वे उसे मारने को उसके पीछे भागे। उनके साथ ही नकुल और सहदेव क्रोधित हो उसके पीछे वेग से यह कहते हुए दौड़े कि दुष्ट तू द्रौपदी सती को हरकर कहाँ जायेगा। अब तू अपने आपको मरा हुआ ही समझ। काहे को इधर-उधर भागता फिरता है ॥१६१-१६७॥


यत्र यत्र सुरो याति पाञ्चाल्या सह पावनः।
तत्र तत्राटतुस्तूर्णं मद्रीपुत्रौ मनोहरौ ॥१६८॥

पिपासापीडितौ तावज्जातौ तौ निर्जले वने।
जग्मतुः क्वापि पानीयं पातुं पीवरसद्भुजौ ॥१६९॥

निर्मिनोति स्म तावत्स जलकल्लोलसंकुलम्।
कमलाकरसंकीर्णं पद्माकरं वृषः सुरः ॥१७०॥

नकुलः सहदेवश्च देवखातं पिपासितौ।
पातुं पावनपानीयं पवित्रौ वीक्ष्य तावितौ ॥१७१॥

अप आपीय पूतौ तौ पतितौ जलयोगातः।
न वित्तः स्म च मूर्च्छायौ कौचिद्विषजलं यथा ॥१७२॥

तदा पार्थो जगादैवं क्व गतौ भ्रातरौ मम।
शीघ्रेण दीर्घकालेन नायातौ किं महाद्भुतम् ॥१७३॥

अर्थ (श्लोक 168 से 173): निश्चय समझ कि हम तुझे अब जीवित न छोड़ेंगे। इसके बाद पांचाली सहित वह जहाँ-जहाँ भागता गया नकुल और सहदेव भी वहीं-वहीं उसके पीछे-पीछे भागे गये। भागते-भागते वे दोनों भाई एक निर्जन वन में आ गये। उन्हें प्यास की बड़ी पीड़ा हो रही थी। वे जल की खोज में उस वन में इधर-उधर घूमने लगे। इतने में एक ओर उस देव का निर्माण किया हुआ तालाब उन्हें दिखाई पड़ा जो जल की कल्लोलों से व्याप्त था, कमलों से भरपूर था। उसको देखकर वे पवित्र आत्मा दोनों भाई पानी पीने के लिए उस पर गये और उसका पानी पीने के साथ ही वे जमीन पर गिरकर मूर्च्छित हो गये, जैसे कि विषैले जल को पीकर मनुष्य सुध-बुध-रहित हो जाते हैं। बड़ी देर तक उन्हें वापस लौटे न देखकर अर्जुन दुखित हो बोला, हाय! मेरे प्यारे भाई कहाँ चले गये? उन्हें अति शीघ्र ही लौट आना चाहिए था सो इतना काल बीत गया तब भी वे वापस नहीं आये, न जाने कहाँ चले गये ॥१६८-१७३॥


केनचित्कथिते तावत्तत्स्वरूपे धनंजयः । नत्वा युधिष्ठिरं तूर्णं निर्गतस्तौ विलोकितुम् ॥१७४॥

तेन कासारतीरे तौ कनिष्ठौ गतजीवितौ । इव वीक्ष्य विषण्णेन रुरुदे करुणस्वरम् ॥१७५॥

अहो किं पतितौ भूमौ सूर्याचन्द्रमसौ च खात् । भुजौ वा धर्मपुत्रस्य पतितौ किं महाहवे ॥१७६॥

किमुत्तरं प्रदास्याम्यनयोर्भ्रात्रे सुखात्मने । विलप्येति चिरं चित्ते दधार धीरतामसौ ॥१७७॥

पुनर्धनंजयः क्रुद्धो धृत्वा गाण्डीवसद्धनुः । करे बभाण भीमेन स्वरेण क्षोभयन्दिशः ॥१७८॥

भ्रातरौ येन केनापि हतौ हन्त हतात्मना । मम तं प्रेषयिष्यामि सत्वरं यममन्दिरे ॥१७९॥

अर्थ (श्लोक 174 से 179): इतने में एक मनुष्य ने आकर उनकी जो हालत हुई थी, वह सारी की सारी अर्जुन से कह सुनाई। सुनकर धनंजय फिर एक क्षण भर भी न ठहरा और वह युधिष्ठिर को प्रणाम कर अतिशीघ्र ही उन्हें देखने के लिए निकला। थोड़ी देर में वह उसी तालाब पर पहुँचा जहाँ दोनों मूर्च्छित पड़े हुए थे। उन्हें उस तालाब के किनारे मरे हुए की भाँति बेहोश पड़े देखकर उसे बड़ा भारी विषाद हुआ। वह शोकसागर में डूब गया। उसका मुँह मलिन हो कर मुरझा गया। उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली और आखिर उसका धीरज छूट गया। वह अतीव कातर हो विलाप करने लगा कि हाय! ये कौन हैं? क्या आकाश से पृथ्वी पर सूरज और चाँद ही तो नहीं आ पड़े हैं, या महायुद्ध के समय युधिष्ठिर की दोनों भुजायें भग्न होकर तो नहीं गिरी हैं। देखो, ये कैसी हालत में पड़े हुए हैं। इन्हें देखकर तो मेरा हृदय ही फटा जाता है, वह बिल्कुल धीरज ही नहीं धरता। हाय! मैं यहाँ से जाकर इनके सम्बन्ध में बड़े भाई को क्या उत्तर दूँगा। इस प्रकार अर्जुन ने बड़ा विलाप किया। जब उसका हृदय कुछ शांत हुआ तब क्रोध में आ उसने अपने भयावने स्वर से सारी दिशाओं को क्षोभित करते हुए कहा कि जिस किसी दुष्टात्मा ने मेरे इन परम प्यारे भाइयों को मारा है मैं उस दुष्ट को अभी ही यम-मन्दिर का अतिथि बनाये देता हूँ ॥१७४-१७९॥


बभाण भीतिमुक्तात्मा साक्षाद्धर्म इवोन्नतः । धर्मः प्रच्छन्नरूपेण पार्थं प्रत्यर्थिनं यथा ॥१८०॥

तव भ्रातृयुगं योग्यं युगपद्विनिपातितम् । मया चेच्छक्तिमांस्त्वं हि कुरु तर्हि ममोदितम् ॥१८१॥

मत्कासारे क्रुधं त्यक्त्वा पिपासां हन्तुमुल्बणाम् । पयः पिब पवित्रात्मन्यद्यस्ति बलवान्भवान् ॥१८२॥

अर्थ (श्लोक 180 से 182): अर्जुन की इस विभीषिका को सुनते ही साक्षात् धर्म-रूप और निर्भय उस देव ने, जैसे कोई शत्रु से कहता है वैसे ही छिपे-छिपे, अर्जुन से कहा कि वीर पार्थ, तुम्हारे इन दोनों योग्य भाइयों को, सच कहता हूँ कि मैंने ही मारा है और तुमसे भी कहता हूँ यदि तुम में कुछ ताकत हो तो तुम भी मेरा एक कहना कर देखो। तुम थोड़ी देर के लिए अपने क्रोध को तो छोड़ दो और अपनी प्यास बुझाने के लिए मेरे इस तालाब का थोड़ा-सा पानी पी देखो ॥१८०-१८२॥


इत्युक्ते क्रुद्धचित्तेन पपे तस्य सरोजलम् । भ्रमद्देहः पपातासौ विषेनेव जलेन च ॥१८३॥

अर्थ: देव की ऐसी आश्चर्य-पूर्ण बात सुनकर क्रोध में भूल अर्जुन ने भी उस तालाब का पानी पी लिया और इसके थोड़े ही समय में वह भी उस विषैले जल से बेसुध हो चक्कर खाकर जमीन पर


यावत्प्रत्येति पार्थो न भीमं प्रोवाच धर्मतृक् । पार्थः किं न समायातो विलम्बयति केन वा ॥१८४॥

त्वं याहि ब्रूहि तं लात्वा समेहि हितकारक।
इत्युक्ते पावनिः प्रीतामवनिं विदधद्गतः ॥१८५॥

पदप्रहारघातेन काश्यपीं कंपयन्वराम्।
पद्माकरं प्रपेदेऽसौ परमो विपुलोदरः ॥१८६॥

गतस्तत्र ददर्शासौ पतितांस्त्रीन्सुबान्धवान्।
हाकारमुखरः क्षीणो विलक्षः क्षीणमानसः ॥१८७॥

अर्थ (श्लोक 183 से 187): गिर पड़ा। उधर जब बहुत काल तक पार्थ भी वापस न लौटा तब खेदित होकर युधिष्ठिर ने भीम से कहा कि भाई, मालूम नहीं पड़ता कि अर्जुन को भी इतना विलम्ब क्यों लगा। तुम जल्दी जाकर वह जहाँ हो उसे खोजो। युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर जगत् को प्रसन्न करने वाला भीम उसी वक्त वहाँ से चलकर अपने पाद-प्रहार से जमीन को कंपित करता हुआ वहीं जा पहुँचा जहाँ वे तीनों ही बे-सुध पड़े थे ॥१८३-१८७॥


विललापेति हा दैव किमनिष्टमनुष्ठितम्।
अद्यैव पतिता लोकास्त्रयो वा बान्धवा मम ॥१८८॥

बान्धवांस्त्रीन्विमुच्याहं क्व व्रजामि स्थितिं भजे।
क्व केन वचनं वच्मि क्व पश्यामि सहोदरान् ॥१८९॥

पावनिर्विलपन्नेवमपतन्मूर्च्छया भुवि।
कृच्छ्रेण च्छिन्नशाखीव मुक्तशोभो गतक्रियः ॥१९०॥

वायविर्वायुना जातस्तत्रत्येन पयःकणैः।
गतमूर्च्छः समुत्थाय पश्यति स्म दिशो दश ॥१९१॥

उवाच पावनिश्चेति हता मे येन बान्धवाः।
समीक्षे चेत्स्वहस्तेन हत्वा दास्यामि दिग्बलिम् ॥१९२॥

ततो गगनमार्गस्थो वृषोऽवादीद्वचो वरम्।
यः कोऽपि बलवाञ्लोके प्रविश्य सरसं सरः ॥१९३॥

अर्थ (श्लोक 188 से 193): भीम उनकी मृतक जैसी दशा देखकर बड़ा दुखी हुआ और विलाप करने लगा। उनकी वह दुख-मय अवस्था न सह सकने के कारण उसका दिल टूट-सा गया। वह दैव को उलाहना देने लगा कि राक्षस! तूने यह क्या अनिष्ट उपस्थित कर दिया है। आज यह जान पड़ता है मानों मेरे भाई ही नहीं मरे किन्तु समस्त लोक ही नष्ट हो गया दुष्ट, अब तू ही बता कि इन्हें छोड़कर हम कहाँ जायें, कहाँ रहें, किससे बातें करें और कहीं अब इन प्यारे सहोदरों को देखें इस प्रकार विलाप करता हुआ महाभट भीम दुख के मारे मूर्च्छित होकर पृथिवी की गोद में लेट गया, जैसे कि काट दिया गया पेड़ क्रिया-विहीन होकर जमीन पर गिर पड़ता है। इसके बाद जब वह ठंडी हवा के स्पर्श से कुछ सचेत हुआ तब उठकर चकित की भाँति सब दिशाओं की ओर देखने लगा और बोला कि जिस दुष्ट ने मेरे इन परम प्यारे भाइयों के प्राण लिये है उसको यदि मैं देख पाता तो कभी न छोड़ता। अपने हाथों के वज्र जैसे प्रहार से उसे गतप्राण कर दिशाओं की बलि चढ़ा देता। भीम के गर्व-युक्त वचनों को सुनकर आकाश में ठहरा हुआ वह देव बोला कि सुनिए, आप चाहे अपने मुँह मियाँमिट्ठू भले ही बनें, पर मैं तो उसी को निरंकुश शक्ति वाला मानूँगा जो निर्भय हुआ मेरे इस तालाब में जाकर पानी पियेगा ॥१८८-१९३॥


पयः पिबति तस्यैव शक्तिं वेद्मि निरङ्कुशाम्।
इत्युक्ते पावनिस्तत्र प्रविश्य स्नातवाञ्जले ॥१९४॥

पपौ परमपानीय पावनिस्तस्य निर्भयः।
निर्गतो यावदास्ते स समुत्कृष्टमहाबलः ॥१९५॥

अर्थ (श्लोक 194 से 195): देव के कहने के साथ ही भीम तालाब पर गया और उसने निर्भय हो स्नान कर उसका पानी पिया। इसके बाद ज्यों ही वह महा बली बाहर आकर बैठा कि उसे भी उसी वक्त मूर्च्छा आ गई और


तावद्विषेण संछिन्नो मुमूर्च्छ धरणीमितः। न विदन्विदितात्मापि स्वेष्टानिष्टानि किंचन ॥१९६॥

अर्थ (श्लोक 194 से 196): वह एकदम बेहोश हो गया। आखिर अन्य भाइयों की भाँति उसे भी पृथ्वी की गोद में लेट जाना पड़ा। सच है कि बड़े-बड़े महात्मा भी अपने ऊपर आने वाले अनिष्टों को नहीं जान पाते हैं ॥१९४-१९६॥


तावद्युधिष्ठिरो धीमान्विषण्णो निजचेतसि। अचिन्तयच्चिरं चित्ते नायाता मम बान्धवाः ॥१९७॥

स उत्थाय स्थितस्तत्र वनषण्डं विलोकयन्। ददर्श पतितान्भ्रातृनितस्ततः सुमूर्च्छितान् ॥१९८॥

दुःखेन खिन्नचेताः स मूर्च्छया पतितो भुवि। कथं कथमपि प्राप्तचेतनो विललाप च ॥१९९॥

भो भ्रातरः पिबन्तोऽम्भो मूर्च्छिताः किमु निश्चितम्। वज्रस्तम्भे कथं लग्नो घूणो निर्घृणघुर्घुरः ॥२००॥

विलासमेष्यति क्रुद्धः पूर्णराज्यस्य कौरवः। अद्य पाण्डववंशस्य स्वयं जातः क्षयः क्षणात् ॥२०१॥

बद्धोऽपि कौरवः क्रुद्धैः स्वयोधैर्युधि बन्धुरैः। मया मारयितुं नैव दत्तो दैववशेन च ॥२०२॥

तथापि बान्धवा मेऽद्य हता दैवेन दुर्दृशा। दैवस्याथो अद्यैवत्वकरणे मम शक्तता ॥२०३॥

मारयन्तो महामत्ताः कौरवान्मम सेवकाः। रक्षिता मयका धात्रेदृग्विधं विहितं भुवि ॥२०४॥

अर्थ (श्लोक 197 से 204): उधर जब समय बहुत बीत गया और भीम भी पीछा न लौटा तब युधिष्ठिर को बड़ी चिन्ता ने घेरा। उनका मुँह फीका पड़ गया। वह मन ही मन सोचने लगे कि इतना समय बीत गया और अब तक भी बन्धु-गण पीछे नहीं आये। मालूम नहीं क्या हुआ। जाकर देखूँ कि क्यों नहीं आये। इसके बाद वह उठे और वन को देखते हुए वहीं पहुँचे। वहाँ उन सबको मूर्च्छित देखकर उन्हें भी मूर्च्छा आ गई। इसके बाद जब वे सुध में आये तब विलाप करने लगे कि बन्धु-गण, जान पड़ता है आप लोग इस तालाब के पानी से मूर्च्छित हो गये हैं। खेद है कि सड़ी चीजों में लग जाने वाला घुन इन वज्र जैसे खंभों में कैसे लग गया। हाय! आज यहाँ पाण्डव-कुल का सर्वनाश हो गया। अब दुष्ट और क्रोध के भण्डार दुर्योधन की खूब बन पड़ेगी। वह सारे राज्य का अधीश्वर बन कर मन की मुराद पूरी कर लेगा। उस दुष्ट के अन्याय को रोकने वाला अब कोई नहीं रह गया है। जब उस दुष्ट को क्रुद्ध हुए योद्धाओं ने युद्ध में बाँध लिया था तब देव के हाथ से मैंने ही उसे छुड़ाया था, उसे मारने नहीं दिया था परन्तु हाय! उसी दैव ने अब मेरे ही प्यारे भाइयों को मार डाला है। मुझमें उस दुष्ट दैव को भी हतप्रभ करने की शक्ति है और उसी का यह फल था जो मैंने उस वक्त उन मत्तों के हाथ से कौरवों को मौत से बचा लिया था परन्तु फिर भी दुष्ट दैव को भय न लगा और उसने मेरे ही साथ ऐसा व्यवहार किया ॥१९७-२०४॥


पापठीति स्म भूपीठे कोदण्डेन हता मया। बान्धवाश्चण्डकोदण्डा धर्मदेवस्तु इत्यलम् ॥२०५॥

धर्मपुत्र समर्थोऽस्यवगाह्य यदि मत्सरः। पयः पिब स्वशक्त्या किं वृथा गर्जसि भेकवत् ॥२०६॥

अर्थ (श्लोक 205 से 206): दैव के प्रति यह उलाहना सुन वह देव बोला कि धर्मराज, तुम्हारे इन प्रचण्ड धनुषधारी बान्धवों को मैंने ही अपने प्रभाव से इस अवस्था को पहुँचाया है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। तुम भी मेरी एक बात सुनो। वह यह कि यदि तुम भी कुछ शक्ति रखते हो तो इस तालाब का पानी पिओ। अन्यथा अपनी शक्ति का व्यर्थ अभिमान क्यों करते हो। क्यों मेंढक के जैसे गरजते हो। तुम्हारी इस


इत्याकर्ण्य प्रबुद्धात्मा धर्मपुत्रः समर्थधीः ।
सरः प्रविश्य पानीयं पपौ पूतमनाः स्वयं ॥२०७॥

तत्क्षणं स पपाताशु भुक्तहालाहलो यथा ।
धिग्वेष्टितं विधेर्येन तेषामीदृग्विधं कृतम् ॥२०८॥

अर्थ (श्लोक 205 से 208): टर-टर से कुछ काम न चलेगा। कुछ करके दिखाना पड़ेगा। देव की ऐसी अचम्भे में डालने वाली बात सुनकर प्रबुद्ध, पवित्रमना और धर्म-बुद्धि युधिष्ठिर चट से तालाब में घुसे और उन्होंने निडर हो उसका पानी पी लिया। इसके थोड़ी ही देर बाद वह भी अन्य भाइयों की तरह विष पीने वाले पुरुष की तरह, उसी वक्त धराशायी हो गये। हाय! धिक्कार हैं उस दैव की दुष्ट चेष्टा को जिसने कि ऐसे धर्म-बुद्धि और धर्म के अवतारों की भी ऐसी शोचनीय हालत कर दी ॥२०५-२०८॥


कनकध्वजभूपस्य जपमन्त्रविधानतः ।
सप्तमेऽह्नि कथंचिच्च कृत्या सिद्धिमगात्तदा ॥२०९॥

सागतादेशमिच्छन्ती साधकच्छन्दवर्तिनी ।
ययाचे परमादेशं कनकध्वजभूपतिम् ॥२१०॥

अतुला विपुला शक्तिर्भवत्याश्चेत्त्वरा भृशम् ।
अटित्वा झटिति प्रीते जहि तान्यञ्च पाण्डवान् ॥२११॥

लब्धादेशा क्रुधा तत्र सा चचाल सुपाण्डवाः ।
पतिता आसते यत्र मूर्च्छां प्राप्ता मृता इव ॥२१२॥

तावता शबरीभूय धर्मदेवः शुचाकुलः ।
आयासीत्पाण्डवाभ्यर्णं पाण्डवान्भाष्यनमृतान् ॥२१३॥

इतस्ततः परावृत्य गतजीवाञ्शवाकृतीन् ।
ज्ञात्वा कृत्यापि प्रोवाच शबरं शाम्बरीमयम् ॥२१४॥

कनकध्वजभूपेन प्रेषितो हन्तुकाम्यया ।
अहं पाण्डवभूपालान्कुरुजाङ्गलनायकान् ॥२१५॥

इमे मया मृता दृष्टा दैवतो वद सत्वरम् ।
किं कर्तव्यं किरातेश समाकर्ण्यैति सोऽवदत् ॥२१६॥

हताशयं जहि त्वं तं गत्वा सत्वरमञ्जसा ।
श्रुत्वा सा निर्गता हन्तुं तं खलं विफलोदयम् ॥२१७॥

पतित्वा तस्य शिरसि सा जघानाघविज्जितम् ।
कनकध्वजभूपालमद्रिं वाशनिरूर्जितम् ॥२१८॥

कृत्य स्वकृत्यमाकृत्य जगाम स्थानमात्मनः ।
धर्मोऽथ निखिलं वृत्तं निश्चिकायासुरीभवम् ॥२१९॥

अर्थ (श्लोक 209 से 219): उधर कनकध्वज के मंत्र-विधान से सातवें दिन उसे कृत्या विद्या सिद्ध हो गई और उसके पास आकर उससे आज्ञा माँगने लगी। कनकध्वज ने कहा कि यदि तुम्हारी शक्ति अतुल और विपुल है तो तुम अति शीघ्र जाकर पाण्डवों का सर्व-नाश कर दो। उसके इस आदेश को पाकर क्रोध से लाल हो वह चली गई और वहाँ पहुँची जहाँ कि पाण्डव मूर्च्छित हो मरे से पड़े थे। इसी समय धर्मदेव शोकातुर भील का रूप बना कर वहीं आया और उन्हें इधर-उधर लौट-लौटकर देखने लगा। तब उन्हें निश्चय से मरा हुआ जानकर उससे वह विद्या बोली कि मुझे पाण्डवों को मारने के लिए कनकध्वज राजा ने भेजा था परन्तु मैंने यहाँ आकर कुरुजांगल देश के इन स्वामियों को अपने आप ही मरा पाया। भीलराज, कहो अब मैं क्या करूँ? विद्या के इन वचनों को सुनकर भील ने कहा कि वह दुष्ट इतना नीच है तो तुम जाकर उस हताशय कनकध्वज को ही यमालय भेजो। भील की यह सलाह उसे ठीक जँच गई। वह उसी वक्त उस विफल मनोरथ को मारने के लिए वहाँ पहुँची और उस पापी के सिर पर पड़कर उसने उसका सर्वनाश कर दिया, जैसे अति कठोर वज्र-प्रहार पर्वत का चकनाचूर कर देता है। इस प्रकार अपने कृत्य को पूरा करके वह कृत्या अपने स्थान को चली गई ॥२०९-२१९॥


सिञ्चयित्वाखिलान्भूपान्धर्मश्चामृतबिन्दुना।
सुसुप्तानिव वेगेन समुत्थापयति स्म सः ॥२२०॥

तदा धर्मसुतोऽप्राक्षीत्किरातं को भवानिति।
उपकारकरोऽस्माकं शुभकर्म यथा नृणाम् ॥२२१॥

भिल्लः श्रुत्वा वचोऽवादीद् भो धर्मात्मज धर्मधीः।
आराधितस्त्वया धर्मो विशुद्धो विबुधोत्तमः ॥२२२॥

तत्प्रभावादहं बुद्ध्वावधिबोधाद्विधोत्तम।
सौधर्माधिपतेः प्रीत उपसर्गो महात्मनाम् ॥२२३॥

अर्थ (श्लोक 220 से 223): इसके बाद उसने उन पाण्डवों को अमृत की बूँदों के द्वारा सींचा और सोने से उठ बैठने की भाँति उन्हें पूरा-पूरा सचेत कर दिया। उस वक्त युधिष्ठिर ने उससे पूछा कि शुभ कर्म के जैसे हमारे उपकारी तुम कौन हो। देव ने कहा कि धर्मात्मा धर्मराज, मैं सौधर्म इन्द्र का प्रीतिपात्र एक देव हूँ। तुमने जो अभी विशुद्ध धर्म की आराधना की थी उसके प्रभाव से अवधिज्ञान द्वारा तुम्हारे भावी उपसर्ग को जानकर उसे दूर करने के लिए मैं आया हूँ ॥२२०-२२३॥


पाण्डवानां समागत्य कृत्यां किल्बिषसंनिभाम्।
अवारयं पुनः सेत्वा व्यधक्षत्कनकध्वजम् ॥२२४॥

इति वृत्तान्तमावेद्य धर्मः पार्थाय द्रौपदीम्।
दत्त्वा स्वसदनं यातो नत्वा तत्पादपङ्कजम् ॥२२५॥

अर्थ (श्लोक 224 से 225): मैंने यहाँ आकर वज्र पाप के जैसी कृत्या विद्या को वारण किया जो कि तुम्हारा सर्वनाश करने के लिए कनकध्वज की भेजी हुई यहाँ आई थी। मैंने सब बातें जानकर उसे ऐसी सम्मति दी कि जिससे उसने जाकर कनकध्वज को ही भस्म कर दिया। यह सब वृतान्त कहकर, पार्थ को द्रौपदी सौंपकर और उनके चरण-कमलों को नमस्कार कर वह धर्मदेव अपने स्थान को चला गया ॥२२४-२२५॥


कौन्तेयाः क्रमतः प्रापुः पुरं मेघदलाभिधम्।
सिंहाख्यस्तत्रभूः ख्यातः काञ्चनाभास्य कामिनी ॥२२६॥

तयोः सौरूप्यसंपन्ना सुता कनकमेखला।
शचीव सुचिरं चित्ते जाता प्रीतिं वितन्वती ॥२२७॥

भीमो भोजनसिद्धयर्थं पुरं प्राप्तः समाप्तवान्।
राज्ञा दत्तां परां कन्यां ज्येष्ठभ्रातृनियोगतः ॥२२८॥

अर्थ (श्लोक 226 से 228): इसके बाद वहाँ से चल कर पाण्डव मेघदलपुर में आये। यहाँ का स्वामी सिंह राजा बहुत प्रसिद्ध था। उसकी रानी का नाम कांचनाभा था। वह वास्तव में कंचन के जैसी आभा वाली थी और सच पूछो तो इसी कारण से ही कांचनाभा उसका नाम पड़ा था। सिंह और कांचनाभा के एक पुत्री थी, जो रूप सौन्दर्य-सम्पन्न थी। उसका नाम कनकमेखला था। वह इन्द्र की इन्द्राणी जैसी थी। सब को वह बड़ी प्यारी थी। बड़े भाई की आज्ञा से राजा की दी हुई उस राज-कन्या का भीम ने पाणिग्रहण किया ॥२२६-२२८॥


तत्र स्थित्वा कियत्कालं देशं कौशलसंज्ञकम्।
विलोक्य निर्गताः प्रापुः क्रमाद्रामगिरिं गिरिम् ॥२२९॥

पाण्डवाः क्रमतो भेजुर्भ्रमन्तो भूतलं शुभम्।
विराटविषये रम्यं विराटनगरं वरम् ॥२३०॥

तत्र तैर्विहितो मन्त्रः स्वतन्त्रैश्चित्रमानसैः।
द्वादशाब्दावधिः पूर्णो जातोऽस्माकं महौजसाम् ॥२३१॥

एतावत्कालपर्यन्तं वनेचरवनेचराः।
इव तस्थिम सन्मानधर्मशर्मविवर्जिताः ॥२३२॥

अर्थ (श्लोक 229 से 232): इसके बाद पाण्डव बहुत दिनों तक वहीं रहे और उन्होंने कोशल देश को खूब देखा। बाद वहाँ से भी चल कर धीरे-धीरे वे रामगिरि पहाड़ पर आये। यहाँ से घूमते हुए वे सुन्दर विराट नगर में पहुँचे। वहाँ आकर उन्होंने विचार किया कि हमारे पूरे बारह वर्ष तो वन में वनेचरों की तरह बीत गये। अब एक वर्ष और है जो अधिक मास का है। अतः एक साल भेष बदल, छिपे रहकर यहीं

सप्तदशं पर्व (भाग 2/2)

वर्षैकं केवलं क्ष्माः प्रच्छन्नाः स्वच्छमानसाः।
तिष्ठामो दर्शयन्तोऽत्र स्वकौशल्यं जनोत्करान् ॥२३३॥

ज्येष्ठो जगौ भवाम्यत्र पुरोधा धर्मदेशकः ।
भीमोऽभाणीद् भवाम्याशु बल्लवो भोजनकृते ॥२३४॥

पार्थः प्रार्थयते स्पष्टमहं नाटकनायकः।
भूत्वा सुनर्तकीर्नित्यं नर्तयामि सुनर्तिताः ॥२३५॥

देहे च शाटकं धृत्वा निचोलं हृदयस्थले।
बृहन्नडाभिधो भूत्वा तिष्ठामि शीलसंयुतः ॥२३६॥

नकुलः कलयामास वचो वाजिसुरक्षणे।
तिष्ठामि स्थिरचेतस्कः सहदेवस्तदा जगौ ॥२३७॥

रक्षामि गोधनं धन्यं धनधान्यविवर्धकम्।
द्रौपदी प्राह सन्मालाकारिणी च भवाम्यहम् ॥२३८॥

अर्थ (श्लोक 229 से 238): बिताना चाहिए। इस निश्चय के अनुसार युधिष्ठिर ने कहा कि मैं धर्मोपदेश करने वाला पुरोहित बनूँगा। भीम ने कहा कि मैं भोजन पकाने वाला रसोइया बनूँगा। अर्जुन ने कहा कि मैं नाटक की नायिका बनूँगा, उत्तम नृत्य करना सिखाऊँगा और साड़ी तथा चोली पहिन कर रहूँगा। अपना नाम मैं रखूँगा बृहंनला। नकुल ने कहा कि मैं घोड़ों की रक्षा पर रहूँगा और धीर-चित्त सहदेव ने कहा कि मैं धन-धान्य को बढ़ाने वाले गोधन की रक्षा करूँगा एवं द्रौपदी ने भी कहा कि मैं उत्तम माला गूँथने वाली मालिन बनूँगी ॥२२९-२३८॥


इमां सुरचनां चित्ते विरचय्य सुपाण्डवाः।
स्वस्ववेषान्परित्यज्य यथोक्ताचारचारिणः ॥२३९॥

सर्वे कार्पटिका भूताः काषायवसनावहाः।
महीशमन्दिरं जग्मुर्मनोनयननन्दनम् ॥२४०॥

विराटभूपतिस्तत्र निहताशेषशात्रवः।
बभूव भूरिभूमीशमौलिसन्मणिपूजितः ॥२४१॥

तमभ्येत्य स्थितास्तत्र कौन्तेयास्तेन मानिताः।
कुर्वन्तः कुशलाः स्वं स्वं नियोगं निर्मलाशयाः ॥२४२॥

विज्ञानिनः स्वविज्ञानं दर्शयन्तः सुदर्शनाः।
सुघटाय विराटाय धर्ममार्गरताय च ॥२४३॥

मासा द्वादश तेषां हि गताः सत्कार्यकारिणाम्।
भूपप्रियां च पाञ्चाली स्तुवन्त्यस्थात्सुदर्शनाम् ॥२४४॥

अर्थ (श्लोक 239 से 244): इस प्रकार सब बातें ध्यान में रखकर उन्होंने अपना-अपना वेष बदला और मैले कपड़े पहनकर कपट-वेष से वे राजमन्दिर गये। राजमन्दिर देखने में बड़ा सुंदर और आनंद देने वाला था। वहाँ का राजा विराट था। उसने शत्रु-समूह का दमन कर बहुत से राजाओं को नमा दिया था-वह बहुत से राजाओं द्वारा पूजा जाता था। पाण्डव उसके पास गये। उसने भी उनका यथायोग्य आदर किया और बाद उनकी इच्छा जानकर उन्हें उनके योग्य कामों पर नियुक्त कर दिया। वे भी उस चतुर और न्याय-मार्ग-गामी राजा को अपने-अपने कामों से खुश करते हुए कुशलता से काल बिताने लगे। इस प्रकार वहाँ उनके बारह महीने बीत गये। उधर पांचाली ने भी विराट की रानी सुदर्शना को खुशकर अपना समय सुख से पूरा किया ॥२३९-२४४॥


चूलिकायामथो पुर्यां चूलिकोऽभून्महीपतिः।
विकचाख्या प्रिया तस्य विकसन्नेत्रपङ्कजा ॥२४५॥

कीचकाद्याः सुतास्तस्य शतं जाता गुणोन्नताः।
कदाचित्कीचकोऽप्यागाद्विराटे स्वसृसंनिधिम् ॥२४६॥

अर्थ (श्लोक 245 से 246): चूलिका नामक पुरी के राजा का नाम चूलिक था और उसकी प्रिया का नाम विकचा था। उसके नेत्र खिले हुए कमल के जैसे मनोहर थे। चूलिक और विकचा के कीचक आदि सौ पुत्र थे। वे सब गुणी थे और विराट के साले थे। अतः इसी बीच में एक समय कीचक अपनी बहिन के पास


ददर्श द्रौपदीं तत्र नृपशालककीचकः।
पुलोमजामिवोत्तुङ्गां साक्षाल्लक्ष्मीमिवापराम् ॥२४७॥

भोजने शयने याने ततः प्रभृति कीचकः।
विरक्तोऽभूत्तदालापदर्शने दत्तचित्तकः ॥२४८॥

यत्र यत्र पदं दत्ते पाञ्चाली तत्र तत्र सः।
अटन्सुचाटुकारांश्च प्रयुङ्क्ते तां स्मरार्दितः ॥२४९॥

अर्थ (श्लोक 245 से 249): विराट देश में आया और वहाँ उसने रूप-सौन्दर्य की खान द्रौपदी की देखा। वह उसे इन्द्र की इन्द्राणी जैसी या लक्ष्मी के जैसी दिख पड़ी। उसे देखते ही वह उस पर जी-जान से निछावर हो गया। उसे अब खाना-पीना, सोना-उठना आदि कुछ भी नहीं सुहाने लगा। वह सब कामों से उदासीन हो गया। उसको दिन रात एक मात्र द्रौपदी की रट लगी रहने लगी। वह हमेशा द्रौपदी के ही मीठे आलाप को सुनना चाहता था, उसी के अनोखे रूप को देखना चाहता था। उसी का स्पर्श करना चाहता था और उसी के मुँह की सुगन्ध सूँघना चाहता था। सच तो यह है कि द्रौपदी के सिवाय उसे और कुछ सुहाता ही न था। जहाँ द्रौपदी जाती वह वहाँ उसके पीछे-पीछे जाता और काम से अन्धा होकर उसके साथ चाटुकारपने की बातें बनाने का यत्न करता ॥२४५-२४९॥


स्फुरिताधरया पार्थपत्नया निर्भर्त्सितः स हि।
न युक्तमिति वादिन्या कटुकाक्षरभाषणैः ॥२५०॥

भाषमाणं पुनश्चेत्थं लम्पटं कीचकं प्रति।
सावादीत्कृतकोपेन निष्ठुराक्षरभाषिणी ॥२५१॥

महापराक्रमाक्रान्ता गन्धर्वाः सन्ति पञ्च मे।
ते ज्ञास्यन्ति च चेदेवं त्वां नेष्यन्ति यमालयम् ॥२५२॥

अर्थ (श्लोक 250 से 252): उसका यह हाल देखकर एक बार पार्थ-पत्नी ने उसे खूब डाँटा और उससे अतीव कटुक शब्दों में कहा कि कीचक, यह बात तुम्हें बिल्कुल शोभा नहीं देती। देखो सोचो-समझो और कुछ विवेक से काम लो तो तुम्हें जान पड़ेगा कि यह व्यवहार अनुचित है, नीच है, निंद्य है एवं नीचों के जैसा है परन्तु वह इतने पर भी अपने खुशामदी चाटुकार वाक्यों से बाज न आया। तब द्रौपदी को बड़ा क्रोध आया और उसने अतिशय कठोर शब्दों में यों कहना आरम्भ किया कि कीचक, पर-स्त्री-लम्पट कीचक, तू मुझे अकेली मत समझ, मैं अकेली नहीं हूँ किन्तु मेरे साथ अद्भुत पराक्रम वाले पाँच गंधर्व और हैं और देख कहीं उन्होंने तेरे इस क्षुद्र बर्ताव को जान लिया तो सन्देह नहीं कि वे तुझे क्षणभर में यमालय का अतिथि बना देंगे ॥२५०-२५२॥


तच्छ्रुत्वा विकसद्वक्त्रोऽवादीत्तां द्रौपदि शृणु।
त्वां भोक्ष्यामि समाक्रम्यानेकदन्तिबलोऽप्यहम् ॥२५३॥

प्रसादं कुरु सीदन्तं मां समासीद सुन्दरि।
जीवन्तं जीवनोपायैर्भोगैर्मां रक्ष रक्षिके ॥२५४॥

अर्थ (श्लोक 253 से 254): इस पर कीचक ने मुसकरा कर कहा कि द्रौपदी, प्यारी द्रौपदी, सुनो, जिन पाँच गन्धर्वों का तुम्हें अभिमान हैं वे मेरा कुछ भी नहीं कर सकते। मेरे पास अनेकानेक हाथी-घोड़ों आदि की सेना है, मेरे पास इतनी शक्ति है कि मैं चाहूँ तो जबरदस्ती लेकर तुम्हें भोग सकूँ। पर नहीं, मैं ऐसा करना ठीक नहीं समझता, अपनी प्यारी को कष्ट देना नहीं चाहता। सुन्दरी, अब विलम्ब मत करो। देखो मैं बड़ा दुखी हो रहा हूँ, अतः कृपा करके मेरे इस दुख का इलाज करो, प्रसन्न हो। प्यारी, अब मैं तुम्हारे साथ रमने के सिवाय अपने जीने का और कोई उपाय नहीं पाता हूँ। अतः जैसे उचित समझो, मेरी रक्षा करो। उसकी इस नीचता का वह शीलवती कुछ उत्तर न देकर चली गई। इधर कीचक भी


अवगण्यैव तं साध्वी गता सा शीलसंयुता ।
कीचकोऽपि मृतावस्थामाप मारशराहतः ॥२५५॥

अर्थ (श्लोक 253 से 255): काम के शरों की मार से मुर्दे जैसा होकर पड़ा रहा ॥२५३-२५५॥


विजने वेश्मनि प्राप्यैकदा तां कीचकः खलः ।
करे धृत्वा जगावैवं मां धारय शुभैः सुखैः ॥२५६॥

कथं कथमपि स्फीता तस्मादुल्लङ्घ्य तं गता ।
रुदन्ती द्रौपदी प्राप ज्येष्ठं शिष्ठं युधिष्ठिरम् ॥२५७॥

प्राह सा तं कृतं कर्म कीचकेन दुरात्मना ।
रक्षितं च मया शीलं तव देव प्रभावतः ॥२५८॥

अर्थ (श्लोक 256 से 258): इसके बाद एक समय किसी एक शून्य मकान में उस दुष्ट ने द्रौपदी का हाथ पकड़ लिया और उससे बोला के देवी, बस, अब तुम मुझे सुखी करो, मैं मरा जा रहा हूँ। यह देख द्रौपदी भारी आपत्ति में फँस गई। उसके ऊपर मानों वज्रपात हुआ परन्तु फिर भी हिम्मत बाँधकर उस वीर नारी ने उस दुष्ट के हाथ से उस समय भी छुटकारा पा लिया। इसके बाद वह रोती हुई युधिष्ठिर के पास आई। वहाँ आकर उसने उस दुष्ट के सारे दुष्कृत्य को युधिष्ठिर से कहा और वह बोली कि हे देव! ऐसी विषम अवस्था में भी जो मैंने आपके प्रभाव से अपने शीलरत्न को बचा पाया यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है ॥२५६-२५८॥


धर्मात्मजो जगादैवं संक्रुद्धो बद्धभ्रूकुटिः ।
यत्र भूपो दुराचारी दुश्चरित्राः प्रजा न किम् ॥२५९॥

उक्तं च-
राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः ।
राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः ॥२६०॥

अर्थ (श्लोक 259 से 260): द्रौपदी की इन बातों को सुनते ही युधिष्ठिर की क्रोध से भौहें चढ़ गई और उन्होंने कहा कि हाय! जहाँ राजा भी इतना दुराचारी है वहाँ की प्रजा के दुराचार का तो फिर ठिकाना ही क्या है? विद्वानों ने ठीक कहा है कि- जैसा राजा होता है वैसी ही प्रजा होती है। राजा धर्मात्मा हो तो प्रजा भी धर्मात्मा होती है और राजा पापी हो तो प्रजा भी पापी होती है। तात्पर्य यह कि जैसा राजा होगा वैसी ही प्रजा भी होगी क्योंकि प्रजा राजा की नकल करती है ॥२५९-२६०॥


रुदन्तीं तां पुना राजा निवार्योवाच सद्गदः ।
सुशीला भव निःशल्या सुशीले शीलसंपदा ॥२६१॥

सीता सुरैः सदा पूज्या जाता मन्दोदरी तथा ।
शीलान्मदनमञ्जूषा जुष्टा योग्यगुणैरभूत् ॥२६२॥

शीलेन शोभना नार्यः शीलेन सुगुणाः सदा ।
शीलेन संपदः सर्वाः शीलतो नापरं शुभम् ॥२६३॥

अर्थ (श्लोक 261 से 263): इसके बाद उन्होंने घबराई हुई द्रौपदी की साहस बँधाया और कहा कि सुशीले! तुम बड़ी वीर नारी हो जो तुमने स्वयं शील की रक्षा की। तुम अब कुछ भी चिन्ता-भय न करो। क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि शील-सम्पत्ति के बल से ही सीता की देवताओं ने पूजा की थी और मन्दोदरी, मदनमंजूषा आदि की भी इसी के द्वारा इतनी प्रतिष्ठा हुई। तुम सच करके मानो कि संसार में स्त्रियों की शोभा शील से ही होती है। यह शील ऐसी कला है कि इसके होते हुए जीवों में और-और गुण स्वयं आ जाते हैं। इसी से जीवों को सब सम्पत्ति मिलती है। सच पूछो तो संसार में शील के सिवा कोई उत्तम पदार्थ नहीं है, न हुआ और न होगा ॥२६१-२६३॥


पाकशासनिरुत्तस्थे केसरीव क्रुधा तदा।
ज्येष्ठेन वारितस्तावद् घस्रान्दश विलम्बय ॥२६४॥

रणं मा कुरु पार्थेश यत्तत्किंचिद्भविष्यति।
दशघस्रात्पुनस्तावन्निशा जाता दिनात्ययात् ॥२६५॥

विपुलोदरपार्श्वे सा गत्वा नेत्राश्रुपूरिता।
वक्त्रमाच्छाद्य मन्दाक्षखिन्नाचख्याविदं वचः ॥२६६॥

जीवद्भिर्मे भवद्भिः किं कीचको नीचमानसः।
आपादयति संपाद्यां दुःखावस्थामिमां यदि ॥२६७॥

अर्थ (श्लोक 264 से 267): इस समय अर्जुन भी वहीं द्रौपदी की दुख भरी बातों को सुन रहा था। उसकी ऐसी अवस्था को न सह सकने के कारण उसे बड़ा क्रोध आया और वह सिंह की तरह गर्ज कर उठ खड़ा हुआ परन्तु उसे युधिष्ठिर ने यह कहकर रोक लिया कि अभी कुछ दिन ठहरो, बाद जो जी में आवे, करना। धीरे-धीरे सूरज अस्त हुआ और रात का आगमन हुआ। इस समय द्रौपदी नेत्रों में आँसू भरे हुए युधिष्ठिर के पास से भीम के पास गई और लज्जा से खेद-खिन्न हो बोली कि आप जैसे महाबली के रहते यह नीच कीचक दुष्ट मेरी ऐसी बुरी हालत करे, इससे अधिक और क्या लज्जा की बात हो सकती है ॥२६४-२६७॥


भीमोऽभाणीत्तदा श्रुत्वा गजशुण्डामहाभुजः।
भण भ्रातृप्रिये दुःखं तेन किं कृतमुत्कटम् ॥२६८॥

पराभूय च तं येन प्रापयिष्यामि पञ्चताम्।
न स्थास्यामि नृपेणैव वारितोऽपि कदाचन ॥२६९॥

पाञ्चाली प्राह भीमेश त्वयि जीवति को नरः।
करोति मम वै दुःखं पञ्चाननसमप्रभे ॥२७०॥

अनेन कीचकेनाहं हन्त हस्ते धृता मम।
परा भीतिर्भवेद्भव्य द्राव्यमेतन्ममासुखम् ॥२७१॥

पराभवो ममेत्येवं भवतीश्वर दुःखकृत्।
तत्करस्पर्शतोऽद्यात्रैजतेऽङ्गं मे विलोकय ॥२७२॥

अर्थ (श्लोक 268 से 272): यह सुनते ही हाथी की सूँड जैसी मजबूत भुजा वाले उस वीर ने कहा कि भ्रातृजाये, कहो, उस दुष्ट ने तुम्हें क्या दुख दिये हैं। उस दुष्ट का तिरस्कार करके मैं उसे अभी यमालय भेज सकता हूँ। बोलो क्या कहती हो। तुम्हारा तिरस्कार मैं नहीं सह सकता। इस पर पांचाली ने कहा कि महाभाग सिंह जैसे पराक्रमी आपके रहते मुझे दुख तो दे ही कौन सकता है परन्तु मुझे अपने इस अपमान का बड़ा ही दुख है कि दुष्ट कीचक ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझसे अपनी नीच वासना प्रकट की। आप मेरे इसी अपमान का बदला लीजिए। प्रभो! मुझे बड़ा दुख हो रहा है। देखिए उसके करस्पर्श से मेरा शरीर अब तक भी थर-थर काँप रहा है ॥२६८-२७२॥


तन्निशम्य मरुत्पुत्रो बभाण भयवर्जितः।
दावानल इव क्रुद्धस्तं हन्तुं विहितोद्यमः ॥२७३॥

वने कुरुष्व संकेतं श्वो निशायां सुसुन्दरी।
यत्र नो जायते केषां प्रवेशो वेषधारिणि ॥२७४॥

अर्थ (श्लोक 273 से 274): यह सुनते ही भीम दावानल की भाँति क्रोध से लाल हो उठा और कीचक को मार डालने के लिए तैयार होकर उसने कहा कि सती, इसके लिए एक उपाय करो। वह यह कि तुम जाकर उससे दूसरे दिन रात में वन में आने के लिए संकेत कर आओ, पर इस बात का ख्याल रखना कि वह जगह ऐसी हो जहाँ कि मनुष्यों का संचार न हो ॥२७३-२७४॥


पुनः सा द्रौपदी प्रातर्गता कीचकसंनिधिम्।
कपटाल्लम्पटं प्राह स्मरसंभिन्नमानसम् ॥२७५॥

अर्थ: इसके बाद द्रौपदी भीम के कहे अनुसार कीचक के पास गई और उसने काम से पीड़ित हुए उस


भवतो रोचते यत्र संकेतं कुरु तत्र हि। सोऽवदन्नाट्यशालायां सायमागच्छ मानिनि ॥२७६॥

त्वदिष्टमिष्टमिष्टेन पूरयिष्यामि मालिनि। इत्युक्त्वा मारुतिं गत्वा व्याजहार तदुद्भवम् ॥२७७॥

अर्थ (श्लोक 275 से 277): कपटी से कहा कि मैं आपको चाहती हूँ। अतएव जो जगह आपको रुचे आप वहीं आ जाने के लिए मुझे संकेत बताइए। मैं वहीं आ जाऊँगी। द्रौपदी के इन वचनों को सुनकर अतीव प्रसन्न कीचक ने कहा कि मानिनी, तुम शाम के समय नाट्यशाला में आना। वहाँ मैं तुम्हारी सब इच्छा की पूर्ति कर, सकूँगा। इसके बाद द्रौपदी भीम के पास आई और उसने भीम से उस दुष्ट की कही हुई सारी बातें कह दी ॥२७५-२७७॥


श्रुत्वा भीमः प्रहृष्टात्मा सायं सीमन्तिनीसमम्। रूपं निरूपयामास स्फुरत्सौभाग्यसंकुलम् ॥२७८॥

दधौ स नूपुरं पादे सुकट्यां कटिमेखलाम्। करयोः कङ्कणं रम्यं हारं वक्षसि लक्षितम् ॥२७९॥

कर्णयोः कुण्डले रम्ये भाले तिलकमद्भुतम्। अञ्जनं नेत्रयोर्मूर्ध्नि चूडामणिं स्फुरत्प्रभम् ॥२८०॥

फुल्लिकापुष्पनागैश्चालङ्कृताकृतिधारिणी। सीमन्तिनीव भूत्वासौ कुर्वती विभ्रमं परम् ॥२८१॥

रतिर्वा किं शची वाहो लक्ष्मीर्वा किं भुवं गता। कुर्वती विभ्रमं चागात्सा संकेतनिकेतनम् ॥२८२॥

अर्थ (श्लोक 278 से 282): द्रौपदी की बातों को सुनकर हर्ष के साथ, शाम के समय सौभाग्य और स्फूर्तिशाली भीम ने पैरों में नूपुर पहिने, कमर में करधौनी, हाथों में सुन्दर कंकण और हृदय में हार पहना। कानों में कुण्डल पहिने और मस्तक में तिलक लगाया। नेत्रों में कज्जल लगाया और सिर पर दीप्तिशाली चूड़ामणि गूंथा। इस प्रकार दिव्य वस्त्राभूषण आदि के द्वारा उसने अपने आपको खूब ही अलंकृत किया। वह बिल्कुल ही सीमन्तिनी-सौभाग्यवती-स्त्री के जैसा ही बन गया। उसको देखकर ऐसा भ्रम होता था कि वह रति है या इन्द्राणी अथवा पृथ्वी पर अवतरित हुई लक्ष्मी ही है ॥२७८-२८२॥


तत्र गत्वा क्षणं भीमो यावत्तिष्ठति निर्भयः। तावदायात्स्मराक्रान्तः कीचकस्तद्गताशयः ॥२८३॥

तमोविभागतः सोऽयं मुखरागरसोत्कटः। इयं द्रुपदसंजाता कृत्वेत्यासीत्तदुन्मुखः ॥२८४॥

तामिमां मन्यमानः स तत्करग्रहणं व्यधात्। यावत्तत्करकार्कश्यं तावल्लग्नं विवेद् च ॥२८५॥

कीचकोऽचिन्तयच्चित्ते सैषा नेति च निश्चितम्। अन्यः कोऽपि समायातो धूर्तो धृष्टमनाः स्वयम् ॥२८६॥

नैमित्तिकवचश्चेति मरणं विपुलोदरात्। कीचकस्य ममेदानीं जातं सत्यं तदीक्ष्यते ॥२८७॥

अर्थ (श्लोक 283 से 287): इस प्रकार लोगों को भ्रम पैदा करता हुआ भीम झपाटे के साथ संकेत-स्थान पर पहुँचा। निर्भय भीम वहाँ क्षण भर बैठा ही था कि उधर से द्रौपदी पर निछावर हुआ काम से जर्जरित हृदय दुष्ट कीचक भी वहीं आ गया। उसके हृदय में राग की उत्कटता और गाढ़ अंधेरा इतना व्याप्त हो रहा था कि उसके मारे उसे उस समय कुछ भी भान न हुआ। उसने उसे सचमुच ही द्रौपदी समझा। अतः वह उसकी ओर आगे बढ़ा और उसने उसका हाथ पकड़ा। इसके बाद ही वह हाथ की कठोरता का अनुभव कर बड़े सोच-विचार में पड़ गया। उसे जान पड़ा कि वह द्रौपदी नहीं है किन्तु कुछ छल है और कोई दुष्ट धूर्त ही इस द्रौपदी के वेष में आया है। देखूँ, आगे क्या होता है? एक बात और याद पड़ती है कि एक समय नैमित्तिक ने कहा था कि कीचक की मृत्यु महाबली भीम


ध्यात्वेति तेन तद्धस्तात्स्वहस्तो मोचितो हठात्।
कीचकेनाशु मौनेन ध्यायता मरणं ततः ॥२८८॥

अर्थ (श्लोक 283 से 288): के हाथ से होगी। जान पड़ता है कि उसका कहना बिल्कुल ही सच्चा है। यह सोच करके उसने अपना हाथ उसके हाथ से छुड़ाने का यत्न किया, पर वह उसे नहीं छुड़ा सका ॥२८३-२८८॥


ततस्तौ प्रवरौ लग्नौ रणं कर्तुं कृपातिगौ।
हस्तपादप्रहारेण प्रहरन्तौ परस्परम् ॥२८९॥

संदष्टोष्ठपुटौ स्पृष्टौ रुधिरारुणलोचनौ।
प्रस्वेदोदकदीप्ताङ्गौ दरदौ देहिनां सदा ॥२९०॥

भीमेन वज्रघाताभकरघातेन वक्षसि।
जघ्ने हुंकारनादेन कीचकः पतितो भुवि ॥२९१॥

ततस्तडत्तडत्संधिबन्धास्थिः स्थगितो हृदि।
पादाभ्यां भीमसेनेन कीचकः कण्ठरुद्धवाक् ॥२९२॥

पादौ दत्त्वा तदा तस्य हृदये पावनिर्जगौ।
रे दुष्टानिष्टसंक्लिष्ट पररामेष्टिसंरत ॥२९३॥

फलं प्रविपुलं पश्य पररामारतेर्द्रुतम्।
इत्युक्त्वा भीमसेनस्तं पिपेषोरसि निष्ठुरम् ॥२९४॥

अर्थ (श्लोक 289 से 294): फिर क्या था, वे दोनों हाथ-पैरों के प्रहारों के द्वारा निर्दयता-पूर्वक परस्पर में युद्ध करने लगे। क्रोध के मारे उनकी आँखें लाल हो गई। वे अपने-अपने ओंठ और दाँत पीसने लगे। पसीने की बूँदों से उनका शरीर चमकने लगा। इस समय उन दोनों का इतना भयंकर युद्ध हुआ कि उसे देखकर डरपोक-कायरों-के प्राण पखेरू ही उड़े जाने लगे। अन्त में भीम ने हुंकार नाद करके कीचक की छाती में एक वज्र के आघात जैसा हाथ का ऐसा प्रहार किया कि वह धड़ाम से पृथ्वी पर गिर गया और उसके शरीर की सब हड्डियाँ चटक गईं। इसके सिवा भीम ने उसकी छाती में एक ऐसी लात और लगाई कि जिससे उसकी साँस रुक गई और फिर उसे एक शब्द बोलना भी कठिन हो गया। उसका कंठ रुक गया। उसकी छाती पर पाँव देकर भीम ने उससे कहा कि दुष्ट, अनिष्टकारी, संक्लिष्ट-चित्त, परस्त्रीरत नीच, देख यह सच परस्त्री-लंपटता का ही दोष है ॥२८९-२९४॥


पररामारतस्त्वं हि क्व यासि व्यसनोद्यतः।
इत्युक्त्वा पादघातेन मारितः स मृतः क्षणात् ॥२९५॥

अर्थ: इसके बाद भीम ने उसे बड़ी निष्ठुरता से पीसकर कहा कि तू अब कहाँ जायेगा। मैं तुझे कभी जीता न छोड़ूँगा। इतने पर भी भीम को सन्तोष न हुआ सो उसने उस दुष्ट की छाती में एक ऐसी जोर की लात जमाई कि जिससे उसका एक क्षणभर में ही काम तमाम हो गया, वह मर गया।


द्रौपद्या ज्ञापितं तत्र गन्धर्वैः कीचको हतः।
इति श्रुत्वा विराटेशो भयभीतः क्षणं स्थितः ॥२९६॥

अर्थ (श्लोक 295 से 296): इसके बाद द्रौपदी ने राज-मंदिर में जाकर समाचार दिया कि आज गन्धर्वों ने कीचक को मार डाला है। जिसे सुनकर विराट बड़ा भयभीत हुआ ॥२९५-२९६॥


तत्सेवकास्तदा श्रुत्वा दधावुर्धूलिधूसराः।
आययुर्नर्तनागारे सांकेतिकजनाकुले ॥२९७॥

तत्रालोकि विलक्षैस्तैः कीचको विगतासुकः।
असृक्संघातसंकीर्णो दैवेनेव हतो हठात् ॥२९८॥

ते तं मृतं समालोक्य कीचकं विकटा भटाः।
गन्धर्वेण हतं चित्ते निश्चिक्युर्व्रीडया वृताः ॥२९९॥

अर्थ (श्लोक 297 से 299): यह समाचार ज्यों ही कीचक के सेवकों के कानों पड़ा त्यों ही वे दौड़े हुए उस नृत्यशाला में आये। उस समय वह हजारों जनों से व्याप्त हो रही थी। उन्होंने वहाँ आकर कीचक को मरा हुआ पाया। वह वहाँ मृत्यु की गोद में अचेत पड़ा था। जान पड़ता था मानों उसे दैव ने ही मार डाला है। उन्हें


गन्धर्वेण शवं सत्रं ज्वालनीयं च पावके।
प्रच्छन्नं को न जानाति यथावत्क्रियते लघु ॥३००॥

प्रभातसमये जाते ज्ञास्यन्ति निखिला जनाः।
वृत्तमेतत्प्रवृत्तं हि सहेलं हास्यकारणम् ॥३०१॥

तमिस्त्रायां विमिश्रायां तमसा त्वरयान्वितैः।
कल्प्यतां कीचको वह्नौ गन्धर्वेण समं ध्रुवम् ॥३०२॥

इत्युक्त्वा ते गता यत्र पाञ्चाली परमोदया।
समास्ते तत्र तां धृत्वा हस्ते ते निरकासयन् ॥३०३॥

पाञ्चाली निर्गता हा धिग्वदन्ती परिमुञ्चती।
अश्रुधारां सुगन्धर्व हाहेति मुखरानना ॥३०४॥

अर्थ (श्लोक 297 से 304): जब यह जान पड़ा कि इसे गंधर्व ने मारा है तब वे महाभट बड़े लज्जित हुए और उन्होंने परस्पर सलाह कर यह निश्चय किया कि चुपचाप इसी समय गंधर्व सहित इसे दग्ध कर देना चाहिए। सबेरा होने पर यदि यह समाचार लोगों में फैल गया तो बड़ी भारी हँसी होगी। इसके बाद वे वहाँ पहुँचे जहाँ कि सौभाग्यवती पांचाली थी। उन्होंने जबरदस्ती उसका हाथ पकड़कर उसे बाहर निकाला। द्रौपदी भय से चिल्लाती, आँसू बहाती तथा गंधर्व को पुकारती हुई निकली ॥२९७-३०४॥


पाञ्चालीवचनं श्रुत्वा विभज्य वरणं वरम्।
मुक्तकेशः समुन्मूल्य महीरुहमखण्डतम् ॥३०५॥

करे कृत्वा दधावासौ वायुवद्व्यायविस्तदा।
कुर्वाणो जनतारेकां सद्यो विस्मयकारिणीम् ॥३०६॥

अहो किं राक्षसः साक्षात्क्षिप्रमेति क्षयंकरः।
सकलं विपुलं कुर्वन्कालोऽयं किं किलागतः ॥३०७॥

तदा दर्शनमात्रेण तस्य ते नृपसेवकाः।
मुक्त्वा तन्मृतकं नेशुश्चकिता वा भयार्दिताः ॥३०८॥

कुर्वन्कलकलारावं कृतान्त इव भीषणः।
तेषां पृष्ठे दधावासौ मतङ्गज इवोद्धतः ॥३०९॥

भग्नो भटगणः पश्चान्न पश्यति न तिष्ठति।
मृतेर्भयादहो भीतः को भजेत्थास्नुतामहो ॥३१०॥

अर्थ (श्लोक 305 से 310): द्रौपदी का यह हाहाकार शब्द जो कि करुणाजनक था, भीम के कानों में जाकर पड़ा। उसे सुनते ही भीम को इतना क्रोध आया कि वह उसी वक्त कोट की दीवाल लाँघकर, बाल बिखेरे हुए, एक वृक्ष को उखाड़ हाथ में लेकर वायु के वेग की भाँति अति शीघ्र दौड़ा। उसे देखकर लोगों को ऐसा भ्रम होता था कि क्या यह राक्षस है जो कि देखते-देखते ही सब नष्ट किये देता है या सबको एकदम ग्रस लेने के लिए जबरदस्त काल ही आ पहुँचा है। इस समय ज्यों ही इसे कीचक के भटों ने इस हालत में देखा त्यों ही वे सब उस मुर्दे को वहीं छोड़कर भय से चकित हुए अपने प्राणों को लेकर- जिसे जिधर जगह मिली-भागे परन्तु किलकारियाँ मारते हुए यम के जैसे भीम ने तब भी उनका पीछा न छोड़ा-वह उनके पीछे भागा ही गया, जैसे कोई मतवाला हाथी लोगों के पीछे पड़ जाता है और फिर उनका पीछा नहीं छोड़ता। इस वक्त उन भटों का यह हाल था कि वे बेचारे भग्न हुए न तो पीछे को मुड़कर देखते थे और न कहीं ठहरते ही थे और है भी यही बात कि मृत्यु से डरा हुआ कोई भी ऐसा नहीं जो फिर स्थिर रह सके ॥३०५-३१०॥


पुनः पावनिना लात्वा पाञ्चाली पावनीकृता।
कारयित्वा च सुस्नानं शुद्धा च विदधे ध्रुवम् ॥३११॥


प्रविष्टा पत्तनं प्रातः पाञ्चाली प्रेक्षिता जनैः।
प्रलयश्रीरिव श्रीर्वा जनानन्दपदायिनी ॥३१२॥

अर्थ: इसके बाद बल से उद्धत हुए कीचक के सौ भाइयों ने जब कहीं भी कीचक को न पाया तब उन्होंने सब से पूछताछ की और किसी तरह द्रौपदी के द्वारा उसे मरा हुआ जानकर द्रौपदी को ही


कीचकभ्रातरस्तेऽथ शतसंख्या बलोद्धताः।
स्वबान्धवमपश्यन्तः संपृच्छन्ति स्म सर्वतः ॥३१३॥

सैरन्ध्रीतो मृतं ज्ञात्वा कथंचित्सोदरं तर्कैः।
सैरन्धीं दग्धुमुद्युक्ताश्चितां कृत्वा हठाच्छठाः ॥३१४॥

भीमेनैकेन संज्ञाय चितौ क्षिप्ता गताः क्षणात्।
समदा दुर्दशां प्राप्ता भस्मसात्कण्टका यथा ॥३१५॥

अर्थ (श्लोक 311 से 315): जलाकर खाक कर देना चाहा और इसके लिए उन्होंने चिता भी रच डाली। यह सब बातें महाबली भीम के कानों में पहुँची। उसका परिणाम यह हुआ कि उसने उसी वक्त जाकर उन सौ के सौ ही भाइयों को उस चिता पर बलात् डालकर जला डाला, जैसे कि कोई एक काँटे को उठाकर आग पर फेंक जला देता है। इस प्रकार द्रौपदी की रक्षा कर भीम ने स्नान वगैरह से उसे पवित्र किया ॥३११-३१५॥


त्रपापरा भटाः प्रातः सकलङ्का गृहं गताः।
भीमो नरपतिं नत्वा बंभणीति स्म सद्गदः ॥३१६॥

कीचकेन कृतं वृत्तं ह्यो रात्रौ द्रौपदीसमम्।
भीमेन गदितं श्रुत्वा धर्मपुत्रोऽवदद्रुचः ॥३१७॥

अर्थ (श्लोक 316 से 317): सबेरा हुआ। पांचाली को नगर में प्रवेश करते हुए सभी नागरिकों ने देखा। वह किसी को प्रलयश्री सी और किसी को आनंद देने वाली लक्ष्मी सी देख पड़ी। उधर कीचक के सब भट अपने माथे में कलंक का टीका लगाकर लज्जित हो अपने स्थान को चले गये। इसके बाद भीम ने युधिष्ठिर के पास जाकर उनसे द्रौपदी के साथ गई रात में किये हुए कीचक के सारे वृत्त को कह सुनाया, जिसको सुनकर युधिष्ठिर ने कहा कि हम लोगों को यहाँ तेरह दिन और चुपचाप रहना चाहिए और कोई बखेड़ा खड़ा न करना चाहिए। इस प्रकार अपने बड़े भाई के मना करने पर वे धर्ममना सब भाई बिल्कुल मौन हो रहे ॥३१६-३१७॥


त्रयोदश दिनान्यत्र स्थेयं प्रच्छन्नतो बुधाः।
भ्रात्रेति वारितास्तस्थुर्भीमाद्या धर्ममानसाः ॥३१८॥

तस्मिन्नवसरे प्रेष्याः प्रेषिताः प्रेक्षितुं नृपान्।
दुर्योधनमहीशेन प्राप्ताः कीर्तिकलङ्किना ॥३१९॥

भृत्यास्ते वीक्षितुं याता महीध्रे च महीतले।
अटव्यां सलिले दुर्गे लोकयन्ति स्म नो क्वचित् ॥३२०॥

समीक्ष्य निर्वृतास्तेऽपि नत्वा कौरवभूपतिम्।
न दृष्टाः क्वापि कौन्तेया जीवन्तो न श्रुतौ श्रुताः ॥३२१॥

न क्वापि लक्षिता भूमौ प्राप्तास्ते च परासुताम्।
इति विज्ञाप्य संप्रापुर्वेश्म वित्तं च कौरवात् ॥३२२॥

अर्थ (श्लोक 318 से 322): इसी बीच में दुर्योधन ने अपयश पाये हुए अपने सेवकों को पाण्डवों की खोज में भेजा। उन्होंने पहाड़, पृथ्वी, वन, जल, दुर्ग आदि सभी स्थान देख डाले, पर उन्हें कहीं भी पाण्डवों का पता न लगा। आखिर वे सब जगह देखभाल कर वापस आ गये और दुर्योधन को नमस्कार कर उससे बोले कि महाराज! हमने न तो कहीं पाण्डवों को देखा, न किसी के मुख से कहीं जीता सुना और न कहीं उन्हें हमने मरे हुए पड़े पाया। इस प्रकार दुर्योधन को सन्तुष्ट कर और धन-मान पाकर वे अपने-अपने घर चले गये ॥३१८-३२२॥


अगदीद्गुरुगाङ्गेयः कौरवाः शृणुताद्भुतम्।
प्रचण्डाः पाण्डवाः पञ्च न म्रियन्तेऽल्पमृत्युतः ॥३२३॥

अर्थ: यह देख भीष्म पितामह ने कौरवों से कहा कि राजन्! मेरी एक बात सुनिए। वह यह है कि प्रचंड पाण्डव बिना मौत तो मारे नहीं जा सकते, चाहे जो भी तुम उपाय करो। कारण कि वे बड़े भारी पराक्रमी हैं, मेरु जैसे अचल हैं, दीप्ति के धारक तेजस्वी हैं, मोक्ष-गामी हैं, सर्वश्रेष्ठ महापुरुष


महापराक्रमाक्रान्ता निश्चलाः पञ्चमेरुवत् । पञ्च ते परमाश्चान्त्यदेहा दीप्तिधरा ध्रुवम् ॥३२४॥

ममाग्रे मुनिना प्रोक्तं राज्यभागी युधिष्ठिरः । भविता तपसा सिद्धिं याताः शत्रुंजये गिरौ ॥३२५॥

ते सन्ति संततं सन्तो जीवन्तो विसृता गुणैः । सर्वत्र सुगुणैः पूज्याः पूज्यपूजनतत्पराः ॥३२६॥

अर्थ (श्लोक 323 से 326): हैं। एक मुनीश्वर ने मेरे सामने ही कहा था कि युधिष्ठिर राज्यभोगी बनेगा और पीछे तप तप कर शत्रुंजय पहाड़ पर से मोक्ष जायेगा। मुझे विश्वास है कि वे अपने गुणों द्वारा पूज्य और पूज्यों की पूजा में तत्पर रहने वाले गुणों के भण्डार अब तक जीते हैं, मरे नहीं हैं ॥३२३-३२६॥


यत्रैते परमोदयाः परभुवि प्राप्ताः प्रतिष्ठां पराम् संनिष्ठाः सुगरिष्ठशिष्टमहिताः सच्छेष्टया वेष्टिताः ।
प्रेष्ठाः स्वेष्टजनस्य कष्टरहिताः प्रस्पष्टमिष्टाक्षराः
श्रेष्ठाः सन्तु समस्तविघ्नविमुखा वः श्रेयसे पाण्डवाः ॥३२७॥

अर्थ: वे पाण्डव तुम्हारा कल्याण करें, जिन्होंने सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओं को नष्टकर स्थान-स्थान पर प्रतिष्ठा पाई, जो बड़े-बड़े शिष्ट पुरुषों द्वारा पूजित हुए, जिनकी सभी चेष्टायें परोपकार के लिए ही हुईं, जो उत्तम पुरुषों के अग्रगण्य हुए, जिनको कोई भी कष्ट नहीं दे सका और जो स्पष्ट मिष्ट भाषी हुए ॥३२७॥


पाञ्चाली परमा सुपावनयशाः सच्छीललीलावहा
लावण्यामृतवापिका वरगुणा गाम्भीर्यधैर्यावृता ।
सच्छीलेन च कीचकः कृतमहापापः समापाशु च
पञ्चत्वं परहास्यतां च जयतात्तच्छीलवृन्दं सदा ॥३२८॥

अर्थ: उस पांचाली द्रौपदी के शीलधर्म की जय हो, जो परम पवित्र और मिष्ट-भाषिणी हुई, शील की प्रवर्तक हुई, लावण्यामृत की बावड़ी हुई, उत्तम गुण, गंभीरता और धीरज की खान हुई और जिसके शील के प्रभाव से महापापी कीचक काल के गाल में गया और लोक हास्य का पात्र बना ॥३२८॥


इति श्रीपाण्डवपुराणे भारतेनाम्नि भट्टारकश्रीशुभचन्द्रप्रणीते ब्रह्म० श्रीपाल
साहाय्यसापेक्षे पाण्डवानां कृत्योपद्रवविनाशनविराटगमनद्रौपदी-
शीलरक्षणकीचकवधवर्णनं नाम सप्तदशं पर्व ॥३२९॥

अष्टादशं पर्व

विमलं विमलालापं विमलं विमलप्रभम्। विमलैः सेव्यपादाब्जं मलहान्यै स्तुवे जिनम् ॥१॥

अर्थ: उन विमल प्रभु की मैं स्तुति करता हूँ जिनकी ध्वनि निर्मल है, जो मल रहित विमल हैं, जिनके शरीर की प्रभा विमल है और पवित्र पुरुष भी जिनके चरण-कमलों की पूजा-भक्ति करते हैं। वे जिन मेरे कर्म-कलंक को हरें और मुझे निर्मल करें ॥१॥


पितामहः प्रपञ्चेनाथावादीद्द्रोणमुत्तमम्। चतुर्थे पञ्चमेवाह्नि समायास्यन्ति पाण्डवाः ॥२॥

पाण्डवाः प्रकटीभूत्वा संघटिष्यन्ति ते स्फुटम्। दुर्घटं कार्यमेवाहं जानामीति सुनिश्चितम् ॥३॥

तदाजालंधरो जाल्मो जगाद जननिष्ठुरः। विराटे भेटनं स्पष्टं भविता विकटे परे ॥४॥

कीचकः परचक्राणां भयदः प्रकटो भटः। दुर्जयो विग्रहे योद्धा कौरवीयसुपक्षभृत् ॥५॥

गन्धर्वेण सगर्वेण हतः स श्रूयते लघु। असहायो विराटोऽपीदानीं संजातवानिह ॥६॥

अर्थ (श्लोक 2 से 6): इसके बाद भीष्म पितामह ने प्रपंच के साथ द्रोणाचार्य से कहा कि आज से चौथे-पाँचवें दिन पाण्डव अवश्य ही आ जायेंगे और भरोसा है कि वे महाभट प्रकट होकर दुर्घट कामों को कर दिखावेंगे। इस समय निष्ठुर और अविचारी जालंधर राजा बोला कि मैं शीघ्र ही विराट देश को प्रयाण करता हूँ। सुना जाता है कि सारे संसार में प्रसिद्ध महाभट, परचक्र को भयभीत करने वाला, रण में दुर्जय और कौरवों का पक्षपाती कीचक किसी गंधर्व के द्वारा मारा गया है और इसी कारण इस समय विराट देश का राजा भी निःसहाय हो रहा है ॥२-६॥


विपुलं गोकुलं तस्य विख्यातमखिले जने। अटित्वा तत्र वै तूर्णं हर्तव्यं च मयाधुना ॥७॥

रणशूरान्मम पृष्ठे संगतान्विकटान्भटान्। हत्वा समानयिष्यामि गोकुलं तस्य चाखिलम् ॥८॥

पाण्डवाः प्रकटास्तत्र समेष्यन्ति युयुत्सवः। हनिष्यामि महाद्रोहान्गुप्तदेहांश्च तांस्त्वरा ॥९॥

अर्थ (श्लोक 7 से 9): उसके यहाँ संसार भर में विख्यात भारी गो-समूह है, अतः इस अवसर पर मैं वहाँ जाकर उसका गो-धन हरूँगा। कारण कि फिर कभी ऐसा अवसर मिलना दुःसाध्य है एवं गायों को हर कर लाते वक्त जो रण-शूर विकट भट मेरा पीछा करेंगे उनको मारकर मैं अखिल गो-समूह को यहाँ ले आऊँगा। सन्देह नहीं कि उस वक्त वहाँ युद्ध की अभिलाषा से प्रकट होकर पाण्डव भी युद्ध-भूमि में उतरें। अतः उन गुप्त-वेष-धारी महा द्रोहियों को भी मैं यमालय का अतिथि बना सकूँगा ॥७-९॥


आकर्ण्येति सुगान्धार्यास्तं प्रशस्य सुतः परम्। जालंधरं नृपं हर्तुं प्रेषयामास गोकुलम् ॥१०॥

स चचाल तरत्तुङ्गरङ्गै रिङ्खणोद्धतैः। सज्जैर्गजैश्चलत्केतुसंघातैः सुरथैः सह ॥११॥

तत्रेत्वा नृपतिर्जालंधरः क्रोधसमुद्धतः। जहार गोकुलं सर्वं गोरक्षै रक्षितं सदा ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 10 से 12): जालंधर के इन वचनों से दुर्योधन का हृदय फूल गया और उसने उसकी बड़ी प्रशंसा की। परिणाम यह निकला कि उसने प्रसन्नता के साथ जालंधर को विराट के गोकुल को हरने के लिए भेज दिया। वह अपने साथ में चंचल, ऊँचे और हिनहिनाते हुए घोड़े, सजे हुए हाथी और फहराती हुई ध्वजाओं वाले रथ आदि की बहुत-सी सेना लेकर रवाना हुआ। वह क्रोध से उद्धत हुआ वहाँ पहुँचा


तदा तद्रक्षकाः सर्वे पूत्कुर्वाणा भयावहाः।
नष्ट्वा चक्रुश्च पूत्कारं विराटाग्रे विशेषतः ॥१३॥

देव जालंधरो धेनुवृन्दं संहृत्य यात्यहो।
चतुरङ्गेन सैन्येन सागरो वारिणा यथा ॥१४॥

निशम्य भूपतिः क्रुद्धो विराटनगरेश्वरः।
दापयामास सद्भेरीं युद्धोद्धत्यविधायिनीम् ॥१५॥

अर्थ (श्लोक 10 से 15): और पहुँचकर उसने ग्वालों से सुरक्षित विराट के सारे गोकुल को हर लिया। तब भयभीत होकर रोते चिल्लाते हुए ग्वालों ने भागकर विराट नरेश के सामने पुकार की। वे कहने लगे कि देव, दुख है कि जालंधर राजा ने सारा गोकुल हर लिया है और जल से युक्त समुद्र की तरह चतुरंग सेना से युक्त हो वह उसको ले करके अपने देश को जा रहा है। ग्वालों की इस दुख भरी पुकार को सुनते ही विराट् नरेश्वर को बड़ा क्रोध आया। उसने उसी समय युद्ध की उद्धतता को फैलाने वाली रण-भेरी बजवा दी-युद्ध की घोषणा कर दी ॥१०-१५॥


श्रुत्वा शूराः समुत्तस्थुर्युद्धसंनाहसंगिनः।
कुर्वन्तो बधिरं व्योम ध्वनिना धन्ववर्तिना ॥१६॥

घोटका घण्टिकाटोपाः स्वर्णपर्याणभूषिताः।
तरङ्गा इव संचेलुः संग्रामाब्धेः ससादिनः ॥१७॥

सकुथाः सत्यथास्तत्र जगर्जूर्गजराजयः।
रथ्यायां संस्थिता रम्या रथाः संरुद्धसत्पथाः ॥१८॥

एवं विराटभूमीशश्चतुरङ्गबलान्वितः।
पुररक्षां विधायाशु निर्जगाम रथस्थितः ॥१९॥

अर्थ (श्लोक 16 से 19): जिसको सुनकर योद्धा कवच आदि अस्त्र-शस्त्र से सजकर उठ खड़े हुए और उन्होंने धनुषों की ध्वनियों के द्वारा आकाश को बहरा कर दिया। इस वक्त युद्ध-स्थल के लिए सोने के पलानों से विभूषित, युद्ध-समुद्र की तरंगों की तरह, चंचल और खूब सजे हुए घोड़े चले। उन सब पर सवार सुशोभित थे। सुन्दर चाल वाले हाथी गर्जते हुए निकले और गलियों के मार्ग को रोककर चलने को तैयार खड़े हुए रमणीय रथ सुशोभित हुए। इस प्रकार चतुरंग सेना सहित पुर की रक्षा का उचित प्रबन्ध करके रथ में सवार हो विराट नरेश नगर से बाहर निकला ॥१६-१९॥


प्रच्छन्नाः पाण्डवाः पश्चाच्चेलुश्चञ्चलमानसाः।
सरथा धावमानास्ते धराधरा इवोन्नताः ॥२०॥

संग्रामातोद्यवृन्द्वानि दध्वनुर्ध्वनिमिश्रिताः।
धनुषां व्योम्नि संबद्धा मेघध्वाना इवोद्धताः ॥२१॥

रोमाञ्चिता महाशूराः समालोक्य तयो रणम्।
भीरूणां विकटं नृणां संकटं प्रकटं तदा ॥२२॥

शरेण रणशौण्डीरा धनुः संधाय धन्विनः।
मुमुचुर्हृदयं वेध्यं विधाय विद्विषां शरान् ॥२३॥

खण्डिताः खड्गघातेन परे पेतुर्महाहवे।
तयोश्च वल्गतोर्यद्वत्पर्वताः पविपातात् ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 20 से 24): उसके पीछे पर्वत के जैसे उन्नत गुप्त वेषधारी पाण्डव-रथ में सवार हो चले। उधर धनुषों के शब्द से मिला हुआ रण-भेरियों का शब्द हुआ। विराट और जालंधर के इस वक्त के भीषण युद्ध को देखकर भीरुओं के प्राण संकट में पड़ गये और महाभटों के रोमांच हो आये। दोनों ओर के रण-शौंडीर योद्धा धनुषों को कर्ण पर्यन्त खींचकर अविरल बाणों की बरसा से शत्रुओं के हृदयों को बड़ी निर्दयता से वेधते थे। वज्र प्रहार से खंडित होने वाले पर्वत की तरह तलवारों के प्रहार से खंडित होकर योद्धागण पृथ्वी पर पड़ते थे। सारांश यह है कि उन दोनों में रात-रात तक बड़ा भीषण युद्ध हुआ। इस समय के उनके युद्ध को देखकर ऐसा कोई भी जीवधारी नहीं रहा, जिसे कि भय न मालूम पड़ा हो। अन्त


महाहवस्तयोर्जातः सर्वलोकभयप्रदः।
निशीथिन्यां हिमांशोश्चोद्गमे वीरसमुद्गमे ॥२५॥

जालंधरो धरन्योद्धृन्दधाव धनुषा क्षिपन्।
विशिखाञ्शाखया मुक्तान्कुर्वन्वृक्षान्व्यथा करी ॥२६॥

अर्थ (श्लोक 20 से 26): में अपने धनुष के द्वारा बाणों पर बाण छोड़ता हुआ और योद्धाओं की धर-पकड़ करता हुआ जालंधर राजा विराट की ओर दौड़ा। वह योद्धाओं के हाथ-पाँवों को काटता हुआ ऐसा जान पड़ता था मानों वृक्षों को डालियों से रहित ही करता जा रहा है ॥२०-२६॥


विराटं विकटं धीरमाहूय शरजालकैः।
जालंधरोऽथ विव्याध ससारथिं समुद्धतम् ॥२७॥

व्याजेनासौ परां दत्त्वा झम्पां तद्रथमूर्धनि।
बबन्ध बन्धनैर्वीरं विराटं संकटं गतम् ॥२८॥

गृहीत्वा तं नृपं चागात्स्वरथे व्यथयान्वितम्।
जालंधरो यथा तार्क्ष्यो भुजगं व्योम्नि भीषणम् ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 27 से 29): आखिर विराट तक पहुँच कर उसने उसे ऐसा ललकारा कि उसके होश-हवाश बिगड़ गये। बाद क्षणभर में ही अपने तीक्ष्ण बाणों के द्वारा विराट को सारथी सहित वेध दिया और कूदकर वह उसके रथ में पहुँच गया। इसके बाद उसने संकट में पड़े हुए वीर विराट को बाँधकर विवश कर दिया और अपने रथ में बैठाकर वह वहाँ से चलता बना, जैसे कि भयंकर साँप को लेकर गरुड़ आकाश में चला जाता है ॥२७-२९॥


जीवग्राहं गृहीतं तं विराटं धर्मनन्दनः।
उवाचाकर्ण्य संकीर्णं शौर्येण विपुलोदरम् ॥३०॥

रथं वाहय वेगेन तन्मोचय महाहवे।
सकलं गोकुलं कुल्यबलं पश्यामि तेऽधुना ॥३१॥

विराटं संकटाकीर्णं बद्धं भूयिष्ठबन्धनैः।
विमोच्य पूरय त्वं मे मनोरथं महारथिन् ॥३२॥

भ्रातृवाक्यं समाकर्ण्य नत्वा तं विपुलोदरः।
समुत्क्षिप्य महावृक्षं विवेश विषमाहवे ॥३३॥

कुर्वन्कलकलारावं वैवस्वत इवोन्नतः।
मतङ्गज इवात्यर्थं दधाव विपुलोदरः ॥३४॥

गाण्डीवजीवनः पार्थो नकुलो विपुलाशयः।
सहदेवो ययुस्तत्र निर्मर्यादाब्धयो यथा ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 30 से 35): उधर यह बात जब युधिष्ठिर ने सुनी कि दुष्ट जालंधर ने विराट को पकड़ लिया है तब उसने शूरवीरता के स्थान भीम से कहा कि भीम, रथ को जल्दी ले जाकर इस महारण में पकड़े गये विराट नरेश को बन्धन से मुक्त करो और जालंधर से अखिल गोकुल को छीन लाकर तुम मुझे अपना बल दिखाओ। तुम्हारे बल की परीक्षा का यही समय है। हे महारथी! तुम जाकर संकट में फँसे हुए और दृढ़ बन्धनों से बँधे हुए विराट नरेश को बन्धन मुक्त कर-आपत्ति से छुड़ाकर-मेरे मनोरथ को पूरा करो। अपने भाई के ऐसे वाक्यों को सुनकर विपुलोदर उसी वक्त तैयार हो गया और युधिष्ठिर को प्रणाम कर एक वृक्ष को जड़ से उखाड़ वह उस महायुद्ध में घुस पड़ा। घोर शब्द करते हुए उसने इधर-उधर खूब दौड़ लगाई। उस समय वह अपने घोर शब्द से यम के जैसा और उखाड़े हुए वृक्ष से मतवाले हाथी के जैसा जान पड़ता था एवं युधिष्ठिर की प्रेरणा से गांडीव धनुर्धारी पार्थ, विपुलाशय नकुल और सहदेव भी मर्यादा रहित समुद्र की तरह उमड़कर युद्ध के लिए उद्यत हुए ॥३०-३५॥


भीमो भीमाकृतिस्तावन्मर्दयन्सिन्धुरान्रथान्।
एकादशशतं भङ्क्त्वा रथानां स स्थितो रथी ॥३६॥

अर्थ: इस समय भीमाकृति भीम ने ग्यारह सौ रथों को चूर डाला, पार्थ ने अपने शर-कौशल से साढ़े


पञ्चाशता स युक्तानि शतानि नव वाजिनाम्।
जघान घनघातेन परिघातेन भूयसा ॥३७॥

नकुलो निःकुलीकुर्वन्वैरिणो युयुधे रणे।
सहदेवः सह प्रौढैर्विपक्षैः कृतवारणम् ॥३८॥

तदा जालंधरः प्राप्तो धनुर्धृत्वा च पावनिम्।
चिच्छेदाजिह्मगैर्धीरो नभो वा मेघसंचयैः ॥३९॥

भीमोऽपि शरपातेन तत्सारथिमपातयत्।
उत्सल्य रथं तस्यारुरोह रणरङ्गवित् ॥४०॥

पुनर्बबन्ध धैर्येण जालंधरमहीपतिम्।
विराटं मोचयामास भीमो भीतिविवर्जितः ॥४१॥

भग्नं शत्रुबलं तावन्ननाश निहतं शरैः।
भीमो विराटमामोच्य गोधनं च नृपं ततः ॥४२॥

अर्थ (श्लोक 36 से 42): नौ सौ घोड़ों को बेकाम कर दिया, नकुल ने अपने आरम्भ किये घन-घात के द्वारा बैरियों के कई कुलों को नष्टकर दिया और सहदेव ने भी दुर्जेय शत्रुओं के साथ बड़ी भारी शूरता से युद्ध किया। जिससे कि जालंधर के सैन्य-समुद्र में बड़ा भारी क्षोभ मच गया। कहीं भी शान्ति की जगह न रह गई। यह देख जालंधर जलकर आग हो गया और धनुष-बाण लेकर भीम के ऊपर टूट पड़ा एवं उस धीरज धारी ने भीम को बाणों की अविरल बरसा से एकदम ढक दिया, जैसे मेघ आकाश को ढक देते हैं। उधर से भीम ने भी अपने बाणों की बरसा शुरू की और बात की बात में ही उसने जालंधर के सारथी को मार गिराया। बाद रण-रंग का ज्ञाता भीम उछलकर उसके रथ पर जा झपटा और साहस के साथ उसने जालंधर महीपति की बाँधकर विराट की बंधन-मुक्त कर दिया। यह देख शरों की मार से जर्जरित हुई जालंधर की सारी सेना अपने प्राण लेकर भाग गई। इस प्रकार विराट तथा गोधन को स्वतंत्र कर भीम ने आकर युधिष्ठिर के चरणों में प्रणाम किया। युधिष्ठिर ने भी भीम की पीठ थप-थपा कर बड़ा सन्तोष प्रकट किया ॥३६-४२॥


तावद्दुर्योधनः श्रुत्वा किंवदन्तीमिमां जनात्।
क्रुद्धो योद्धुं सुसंबद्धो निर्जगाम सुसाधनः ॥४३॥

विराटनगरं प्राप्य दुर्योधनमहायोधः।
उत्तरस्यां प्रतोल्यां हि संस्थितः संगरेच्छया ॥४४॥

संचरत्संचरच्चारु जहार वरगोकुलम्।
तदोत्तरपुरं क्षुब्धं समभूद्भयविह्वलम् ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 43 से 45): उधर जालंधर के पकड़े जाने का समाचार ज्यों ही दुर्योधन के कानों तक पहुँचा त्यों ही क्रोध में आ, युद्ध के लिए उद्यत हो वह सेना-सहित विराट देश को चल पड़ा और विराट नगर के पास आकर उस महायोद्धा ने उत्तर दिशा की ओर वाले नगर के फाटक पर पड़ाव डाल दिया और वहाँ पर जो विराट का श्रेष्ठ गोकुल चरता फिरता था उस पर उसने अपना अधिकार जमा लिया। यह देख उत्तर की ओर का पुर क्षोभ-मय हो गया ॥४३-४५॥


चिन्तयन्ति स्म ते चित्ते चिन्ताशनिसमाहताः।
किं कुर्मः क्व प्रगच्छाम इति शोकसमाकुलाः ॥४६॥

साहाय्येन विना सर्वं वैरिणा गोकुलं हृतम्।
बभाषे द्रौपदी तावल्लोकान्लोलसुलोचना ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 46 से 47): वहाँ सब जगह भय ने अपना अड्डा जमा लिया। वहाँ के सब लोग भय के मारे विह्वल से हो गये और चिन्ता-रूपी वज्र पात की ताड़ना से शोकाकुल होकर वे मन ही मन सोचने लगे कि हम इस वक्त क्या करें, कहाँ जायें एवं इस समय हमारी रक्षा कैसे हो। आखिर निराश होकर वे कहने लगे कि क्या करें हमारा कोई भी सहायक नहीं है। इसी का यह परिणाम है कि वैरी ने हमारा सारा


अयं बृहन्नटो वीरो जानाति रणसत्क्रियाम्।
पार्थस्य सारथिर्भूत्वावाहयद्बहुशो रथान् ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 46 से 48): का सारा ही गोकुल छीन लिया है। यदि हमारा कोई सहायक होता तो ऐसा दृश्य कभी भी हमारे देखने में न आता। यह देखकर द्रौपदी ने अर्जुन की ओर अंगुली उठाकर उन लोगों से कहा कि देखो यह बड़े वीर हैं और रण-कला के ज्ञाता विद्वान् हैं। इन्होंने कई बार पार्थ का सारथीपन किया है। तुम इनकी शरण लो। यह तुम्हारी रक्षा करेंगे ॥४६-४८॥


श्रुत्वा विराटपुत्रेण ददे तस्मै महारथः।
गजवाजिरथैश्चागात्पुरतो राजनन्दनः ॥४९॥

पुरो बहिः स्थितः पुत्रो वीक्ष्यासंख्यबलं रिपोः।
संख्योन्मुखं क्षणार्धेन भयं भेजे भ्रमन्मतिः ॥५०॥

रणेनानेन दुष्टेन पूयतां पूर्यतां मम।
शत्रुसैन्यं ससांनाहं प्रबलं बहुघोटकम् ॥५१॥

शक्नोम्यत्र नहि स्थातुमाहवे प्राणहारिणि।
इत्युक्त्वा नोत्तरं दत्त्वा ननाश नृपनन्दनः ॥५२॥

तदा बृहन्नटो व्यक्तं प्रोवाच नृपनन्दनम्।
अहो हो भज्यते युद्धे कथं वै त्यकवा प्रभो ॥५३॥

विदधासि कुलं लज्जाकुलं राज्ञो महामते।
अर्जुनः सारथिः प्राप्तः पुण्यात्तेऽत्राहमुत्कटः ॥५४॥

तत्तस्त्वं कातरो वीर मा भूया दरदारक।
मया सह रणे शत्रूञ्जहि हन्त रणोद्धतान् ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 49 से 55): द्रौपदी के वचनों को सुनकर विराट के पुत्र ने उस नटवर को एक महारथ दिया और आप स्वयं भी हाथी, घोड़े, रथों की सेना सहित नगर से बाहर निकला और बाहर आकर उसने ज्यों ही दुर्योधन की असंख्य सेना पर दृष्टि डाली त्यों ही उस चंचल बुद्धि के देवता कूच कर गये और वह एक क्षणभर में ही वहाँ से भाग-निकलने का मार्ग देखने लगा। वह अर्जुन से बोला कि मैं तो इस रण से बिल्कुल ही सन्तुष्ट हो गया, मुझे अब युद्ध की इच्छा नहीं है। शत्रु की सेना बड़ी प्रबल है। देखो, यह घोड़ों की सेना कितनी भारी और विकट है। मैं तो इस प्राणहारी युद्ध में एक क्षण भी नहीं टिक सकता हूँ। इतना कहकर वह राजपुत्र चुप हो गया और किसी बात का उत्तर न देकर वह वहाँ से एक दम भाग खड़ा हुआ। उसे इस प्रकार भागते देख अर्जुन ने उससे स्पष्ट शब्दों में यों कहा कि आप युद्ध में बैरियों को पीठ देते हैं और अपने कुल की लजाते हैं। तुम्हारे पुण्य-प्रताप से अर्जुन जैसे वीर का सारथी मैं तुम्हें मिल गया फिर भी तुम कातर होते हो। यह तुम जैसे क्षत्रियों को उचित नहीं। युवराज ! डरो मत और मेरे साथ रण में इन उद्धत शत्रुओं की उद्धतता का इलाज करो ॥४९-५५॥


एवं समुच्यमानेऽपि स मुमोच समुच्चयम्।
आहवस्य रथं तूर्णं स्म निवर्तयति स्वयम् ॥५६॥

तावद्वृहन्नटो वाणीं प्रोवाच शृणु नन्दन।
सोऽहं पार्थः प्रसिद्धात्मा मा संशीतिं भजस्व भोः ॥५७॥

स्थिरीभव भयातीतो भूत्वा सज्जो विसर्ज्य।
शराञ्छत्रुसमूहस्य शिरश्छेत्तुं समुत्कटान् ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 56 से 58): अर्जुन ने उसे इस प्रकार यद्यपि बड़ा साहस दिलाया परन्तु उसने न माना और युद्ध-स्थल छोड़ भागने के लिए स्वयं अपना रथ वापस फेर लिया। यह देख अर्जुन ने फिर कहा कि युवराज कायरों की भाँति डरकर भागो मत। मेरी बात सुनो। मैं वही प्रसिद्ध अर्जुन हूँ जिसका नाम सुनकर शत्रु काँप उठते हैं। इसमें तनिक भी सन्देह मत करो। अब स्थिर होइए और भय को हृदय से निकाल कर शत्रु-समूह का शिर छेदने के लिए अपने समुत्कर शरों को छोड़ना शुरू कीजिए ॥५६-५८॥


दुर्योधनबलं बाणैर्विभज्य भयविद्रुतम्। विधास्यामि क्षणार्धेन पश्य मे प्रबलं बलम् ॥५९॥

अनेन वचसा यावद्विश्वे विश्वासवर्जिताः। न विश्वसन्ति पार्थं चेमं चेतसि भयाविलाः ॥६०॥

तावच्छक्रात्मजो युद्धे रथं तूर्णमवाहयत्। उत्तरं सारथिं कृत्वा वाजिवाहनतत्परम् ॥६१॥

रथं वाहय वेगेन त्वमुत्तर रणाङ्गणे। अहं हन्मि शरैः शत्रून्यथा नश्यन्ति तेऽखिलाः ॥६२॥

कृत्वा शत्रुजयं क्षत्तः समुपार्ज्य यशश्चयम्। यास्यामो जयसंपन्नाःस्वपुरं पुण्यसंपदा ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 59 से 63): थोड़ी देर के लिए भला मेरा बल ही तो देखो कि मैं क्षण भर में ही दुर्योधन की सेना को कैसी भयभीत और तितर बितर किये देता हूँ। अर्जुन के इन वचनों को सुनकर भी अविश्वासी और भयभीत लोगों ने विश्वास नहीं किया कि यह ‘वही अर्जुन है।’ वे इसी विचार में उलझ रहे थे कि पार्थ ने घोड़ों को चलाने में तत्पर हुए विराट-पुत्र को अपना सारथी बना कर अति शीघ्रता से रथ को शत्रु की ओर दौड़ाते हुए कहा कि युवराज ! तुम रणांगण में शीघ्रता से रथ चलाओ और मैं शरों के तीक्ष्ण प्रहार से अभी शत्रुओं को धराशायी किये देता हूँ। मैं शत्रुओं का नाशकर, यश सम्पादन कर, जय-सम्पन्न हो, पुण्य सम्पत्ति लेकर ही अपने पुर को जाऊँगा ॥५९-६३॥


इत्युक्त्वा तिष्ठ तिष्ठेति स्थिर वैरिगणो ध्रुवम्। वदन्नेवं चचालासौ स्यन्दनस्थो धनंजयः ॥६४॥

निरुत्तरं प्रकुर्वाणो विपक्षं स महोत्तरः। सारथिः स्वरथं यावत्संवाहयति वेगतः ॥६५॥

ज्वलनो निर्जरस्तावत्प्रसन्नः पार्थसाहसात्। नन्दिघोषाभिधं तस्मै समर्थं रथमाददे ॥६६॥

देवताधिष्ठितं पार्थो रथमारुह्य संयुगे। शत्रून्हन्तुं चचालासौ कृत्वोत्तरं सुसारथिम् ॥६७॥

तं तादृशं समावीक्ष्य द्रोणाचार्यस्तु विस्मितः। उवाच कौरवान्क्रूरान्कृतकोदण्डमण्डलान् ॥६८॥

संगरे संगरं मुक्त्वा यूयमद्यापि निश्चितम्। विधत्त संधिमुन्निद्रा यद्युष्माकं सुखं भवेत् ॥६९॥

केऽत्र पार्थशरान्सोढुं समर्थाः सन्ति भूभुजः। दावाग्नौ दीपिते दारुचयास्तिष्ठन्ति किं पुनः ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 64 से 70): इसके बाद अर्जुन बैरियों से यह कहता हुआ कि ठहरिए, स्थिर होइए, रथ में बैठकर शत्रु की ओर चला। इधर शत्रु-समूह को निरुत्तर करता हुआ महत्त्वशाली उत्तरकुमार भी बड़े वेग से रथ को चलाये लिये जा रहा था। पार्थ के साहस से खुश होकर ज्वलन नामक देव ने पार्थ को नंदिघोष नामक एक समर्थशाली रथ भेंट किया। अर्जुन भी देवताधिष्ठित उस रथ पर सवार हो, उत्तर को सारथी बना शत्रु-समूह का नाश करने के लिए युद्ध-स्थल में आगे बढ़ा। उसको इस प्रकार निर्भयता से आगे बढ़ता देखकर द्रोणाचार्य अचम्भे में पड़ गये और वह क्रूर स्वभाव वाले उन धनुर्धर कौरवों से बोले कि कौरवों, अब भी कुछ नहीं गया, युद्ध की प्रतिज्ञा को छोड़कर आप लोग सन्धि कर लीजिए, जिसमें कि आपको सुख हो। नहीं तो आप लोग ही बताइए कि इसमें कौन राजे ऐसे समर्थ हैं जो कि पार्थ के तीक्ष्ण बाणों को सह सकेंगे। क्या कहीं दावानल के जलते हुए कोई काठ बिना जला रह सकता है ॥६४-७०॥


कपटप्रकटा हित्वा कपटं गोकुलं पुनः। संगरं प्रीतिमुत्पाद्य यूयं यात निजे गृहे ॥७१॥

अर्थ: मेरी तो यही सम्मति है कि अब आप लोगों का कपट खुल गया है, अतः आप लोग कपट,


आगता गृहतो यूयं दुर्निमित्तशतानि वै।
यदाभवंस्ततस्तूर्णं निवर्तयत निश्चितम् ॥७२॥

इत्याकर्ण्य महाक्रोधाद्रुधिरारुणलोचनः।
दुर्योधनो जगादैवं योद्धुं योद्धृन्विलोकयन् ॥७३॥

द्रोण विद्रावणं वाक्यं किं वक्षि नयवर्जितम्।
वैरिणां शंसने कोऽत्रावसरस्ते रणाङ्गणे ॥७४॥

क्रुद्धे मयि च कः पार्थः कस्त्वं दुर्बलमानसः।
क्षत्रियाणां न जानासि मार्गं सर्गसमुत्कटम् ॥७५॥

अर्थ (श्लोक 71 से 75): गो-धन और युद्ध की प्रतिज्ञा को तो छोड़कर और परस्पर में प्रीति करके अपने घर को चलिए। क्या आप लोगों को ख्याल नहीं है कि घर से निकलते समय सैकड़ों खोटे अपशकुन हुए थे, जिनसे सभी अकुशल ही अकुशल झलकता था। अतः युद्ध न छेड़कर यही उचित समझ पड़ता है कि आप लोग सन्धि करके घर चलें। द्रोण के इन वाक्यों को सुनकर दुर्योधन की आँखें क्रोध से लाल रक्त के जैसी हो गईं। वह अपने भटों को बढ़ते हुए देखकर द्रोण से बोला कि नय-नीति-विहीन द्रोण, तुम ऐसे विद्रोह के वचन कहते हो! भला यह बैरियों की तारीफ का अवसर है। जान पड़ता है कि तुम अभी तक क्षत्रियों के स्वाभाविक मार्ग से परिचित नहीं हो। यदि यही बात हो तो सुनो, मेरे क्रोध के सामने पार्थ क्या वस्तु है और तुम सरीखे निर्बल मन वाले कायर, भला कर ही क्या सकते हैं ॥७१-७५॥


कर्णोऽवोचद्रथस्थोऽपि भो गाङ्गेय गुरो शृणु।
केनाहं निर्जितो दृष्टो रणे च त्वयका बली ॥७६॥

उत्तरेण समं पार्थं प्रथमानमहोदयम्।
दारयामि तथा तिष्ठेद्यथाणुर्नास्य भूतले ॥७७॥

रुष्टः क्लिष्टमनास्तावज्जल्पति स्म पितामहः।
क्व दृष्टः संगरः कर्ण भूमौ शत्रुभयंकरः ॥७८॥

आहवे नैव शक्योऽयं निवारयितुमर्जुनः।
रुष्टो दत्ते धरासुप्तिं भवतामपि नान्यथा ॥७९॥

अर्थ (श्लोक 76 से 79): उधर रथ, पर सवार हुए कर्ण ने भीष्म पितामह से कहा कि गुरुराज ! क्या तुमने मुझ सरीखे बली को भी रण में किसी के द्वारा जीता गया देखा है। अब जरा मेरे पराक्रम को भी देखो कि मैं देखते-देखते, महाभाग अर्जुन को उत्तर-सहित कैसा छिन्न भिन्न किये देता हूँ, जिसमें कि पृथ्वी पर उसका नाम-निशान भी न रहे। कर्ण के इन वचनों को सुनकर पितामह को बड़ा रोष आया और उन्हें बड़ा क्लेश हुआ। वे वाले कि कर्ण, पहले तुम यही बताओ कि पृथ्वी पर तुमने ऐसा भयंकर युद्ध कहीं देखा भी है? सच करके मानों कि युद्ध में अर्जुन का बाल भी बाँका कर सकने वाला संसार में कोई पुरुष नहीं है। यदि वह रोष में आ जायेगा तो सन्देह नहीं कि तुम सबको एक क्षण में ही पृथ्वी पर सुला देगा ॥७६-७९॥


शल्यो बल्यांस्तदा ब्रूते स्मास्माकं कलहः किल।
कारितस्त्वयका तात त्रपासंभिन्नचेतसाम् ॥८०॥

तावत्सुसाधनं योद्धुममर्यादं सुसाधितम्।
दधाव शुद्धिसंपन्नं गजवाजिरथाकुलम् ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 80 से 81): इसी बीच में कूद करके शल्य बोल उठा कि तात, सच तो यह है कि यह जो हम सरीखे लज्जाशील पुरुषों में परस्पर युद्ध छिड़ा है यह सब आप ही की करामात है और कोई भी इसमें कारण नहीं है। द्रोणाचार्य ने देखा कि दुर्योधन ने उनकी बात नहीं मानी। तब वे तथा भीष्म पितामह उसकी सुशिक्षित हाथी, घोड़े, रथों वाली सेना सहित, उमड़ करके पार्थ से भिड़ने के लिए आगे को बढ़े। उधर से पार्थ ने अतिशीघ्र ही गांगेय के पास दो बाण ऐसे छोड़े कि जिन पर उसका नाम लिखा


तदा पार्थः शरौ शीघ्रं स्वनामाक्षरसंगतौ।
प्रेषयामास गाङ्गेयं तौ शरौ तत्र संगतौ ॥८२॥

साक्षरं वीक्ष्य बाणैकं लात्वेत्यवाचयद् गुरुम्।
धनंजयश्च विज्ञप्तिं विदधाति पितामह ॥८३॥

त्वत्पादपङ्कजं नत्वा सेवेऽहं सज्जमानसः।
त्रयोदशाद्य वर्षाणि यातानि परिपूर्णताम् ॥८४॥

इदानीं शत्रुसंघातं हत्वा भुञ्जामि भूत लम्।
विशिखाक्षरमाला च दर्शिता गुरुणा तदा ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 80 से 85): हुआ था। बाण जाकर गांगेय के पास पड़े। गांगेय ने देखकर उन्हें बाँचा। उनमें लिखा था कि, “धनंजय, पितामह से प्रार्थना करता है कि मैं नत होकर आपके चरण-कमलों में मस्तक झुकता हूँ। मैं हमेशा ही आपकी सेवा के लिए तैयार रहता हूँ। हर्ष है कि आज तेरह वर्ष पूरे हो गये और भाग्य से हमें फिर आपके चरणों की सेवा का अवसर मिला। अब आगे मैं शत्रु-समूह का विनाशकर अपनी वीरता से, पृथ्वी को भोगूँगा।” पितामह ने उस बाण को कौरवों को दिखाया। देखकर वे क्षोभित हो उठे और उन्हें बड़ा भय हुआ ॥८०-८५॥


क्षुब्धा वीक्ष्य भयत्रस्ता अभवन्कौरवा नृपाः।
वाहयित्वा रथं पार्थो लक्षीकृत्य विपक्षकम् ॥८६॥

उवाचेदं क्व यासि त्वं दुर्योधन महाधम।
वैवस्वतपथं द्रष्टुं त्वां प्रेषयामि सत्वरम् ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 86 से 87): इसके बाद लक्ष्यवेधी पार्थ ने शत्रु-दल को अपना लक्ष्य-बनाया और उसके अनुसार शत्रु की ओर उसने अपना रथ भी चलाया। बाद वह दुर्योधन से बोला कि अधम दुर्योधन ! तू अब मेरे मारे कहाँ जायेगा? मैं तुझे अब यमालय का अतिथि बिना बनाये-कभी न छोड़ूँगा ॥८६-८७॥


स तद्रथं समावीक्ष्याकस्मात्कश्मलतां गतः।
कातरत्वं जगामाशु कम्पमानः प्रमुक्तधीः ॥८८॥

चातुरङ्गबलं तावदायासीत्कौरवं क्षणात्।
विशिखासंख्यपातेन वैराटं जर्जरं व्यधात् ॥८९॥

धनंजय इवोद्भूतः स धनंजयपाण्डवः।
सुबाणज्वालयारण्यं ज्वालयामास कौरवम् ॥९०॥

स गाण्डीवकरोऽवोचद्यद्यस्ति भवतामिह।
भटः कोऽप्यवतात्तर्हि दुर्योधनं ममाग्रतः ॥९१॥

अर्थ (श्लोक 88 से 91): इसके साथ ही सहसा पार्थ के रथ को अपनी ओर आता देखकर मूर्ख और दुष्टचित्त दुर्योधन काँप उठा और बड़ा भयभीत हुआ। इसी बीच में पार्थ के सामने कौरवों की सेना आ डटी और उसने अपने संख्यातीत बाणों के द्वारा विराट-पुत्र को जर्जरित कर दिया। यह देख धनंजय आग की तरह जल उठा और उसने एक ऐसा बाण छोड़ा जिसकी ज्वाला से कौरवों की सारी सेना दावानल से जलने वाले वन की भाँति जलने लगी। इसके बाद ही धनंजय ने गांडीव धनुष उठाकर कौरवों की सेना को ललकार कर कहा कि यदि तुम में कोई भट कुछ भी सामर्थ्य रखता हो तो वह आये और मेरे आगे से दुर्योधन को जीता बचा ले जाये ॥८८-९१॥


क्रुद्धः कर्णस्तदोत्तस्थे वीतहोत्र इव ज्वलन्।
अर्जुनं प्रति वेगेन धावमानो महामनाः ॥९२॥

कर्णार्जुनौ तदा लग्नौ छादयन्तौ महाशरैः।
दलन्तौ धरणीं पादैर्हसन्तौ हास्यवाक्यतः ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 92 से 93): पार्थ के इन वचनों से कर्ण क्रोध से आग की तरह जल उठा और युद्ध के लिए तैयार होकर अर्जुन पर टूट पड़ा। फिर क्या था, वे दोनों ही वीर आपस में भिड़ गये और अपने पाँवों के प्रहार से पृथ्वी को कम्पित करते हुए तथा हँसी भरे वाक्यों के द्वारा एक दूसरे की हँसी उड़ाते हुए एक


परस्परं महाबाणैश्छिन्दन्तौ छिदुराञ्शरान्।
शीघ्रं जेघ्नीयमानौ तौ विघ्नौघैरिव चासिभिः ॥९४॥

हेषारवं प्रकुर्वाणौ हयाविव महोद्धतौ।
चूर्णयन्तौ चरन्तौ तौ दलन्तौ दन्तिनाविव ॥९५॥

हिंसन्तौ सिंहवद्वीरौ पूरयन्तौ च पुष्करम्।
विशिखैः संख्यया मुक्तैर्दुरुक्तैश्च परस्परम् ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 92 से 96): दूसरे को अपने-अपने महान् तीक्ष्ण बाणों द्वारा आच्छादित करने लगे। वे परस्पर में कभी तो महान् प्रखर बाणों की बरसा से एक दूसरे के छोड़े हुए शरों को छेदते और कभी विघ्नों समूह जैसे खड्गों के द्वारा एक दूसरे का हनन करते। वे लड़ते हुए जो शब्द करते थे उससे ऐसा जान पड़ता था मानों घोड़े ही हींसते हैं। वे अपनी मारकाट से पृथ्वी को चकचूर करते हुए हाथी के जैसे जाने जाते थे। वे सिंह की भाँति ही जीवों को मार रहे थे। अब और बढ़ाकर कहने की आवश्यकता नहीं। उन्होंने अपने संख्यातीत बाणों के द्वारा सारे के सारे गगन-मण्डल को ही पूर दिया था ॥९२-९६॥


पार्थेन पूरितं व्योम विशिखैर्जलदैरिव।
शात्रवीयं बलं भङ्गं निन्ये तूलं च वायुना ॥९७॥

कर्णचापगुणं पार्थश्चिच्छेद सुधनुर्वहन्।
स सारथिं रथं तस्य चूर्णयामास चञ्चलम् ॥९८॥

द्वादशात्मजसुतस्तस्थौ स्थिरायां रथवर्जितः।
तावच्छत्रुंजयो जेतुं शत्रून्संप्राप संगरे ॥९९॥

दुर्योधनानुजः सोऽयं छादयञ्छत्रुसंहतीः।
शरैः सैन्यं समापूर्णां कुर्वाणो हि मृगारिवत् ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 97 से 100): इसके बाद भी पार्थ ने बाणों की बरसा जारी रक्खी और मेघों की तरह बाणों से आकाश को बिल्कुल ही ढँक दिया। अर्जुन की वीरता देख शत्रु-दल युद्ध-स्थल को छोड़कर ऐसा भागा जैसे वायु के मारे मेघ भागते हैं। इसके बाद धनुषधारी अर्जुन ने अपने शर-कौशल से कर्ण के धनुष की डोरी को काट डाला और बात की बात में ही उसके रथ को भी सारथी-सहित नष्ट कर दिया। कर्ण तब रथ रहित हो गया। इसके बाद शत्रुओं को जीतने की इच्छा से दुर्योधन का छोटा भाई शत्रुंजय, शत्रु-दल को बाण प्रहार से प्रच्छन्न करता हुआ सिंह के जैसा गर्ज कर पार्थ पर झपटा ॥९७-१००॥


अभ्यागतमागतं वीक्ष्य तं जगाद धनंजयः।
याहि याहि रणाद् बाल किं तिष्ठसि ममाग्रतः ॥१०१॥

मृगारिचरणाघातं सहते हरिणः किमु।
तार्क्ष्यपक्षस्य निक्षेपं क्षमते किं महोरगः ॥१०२॥

न मुञ्चामि शरं बाल तवोपरि विशक्तिक।
तदा तेन विक्रुद्धेन विमुक्ताः पञ्चमार्गणाः ॥१०३॥

ते पार्थहृदये लग्ना भग्ना इव क्षणं स्थिताः।
पार्थेन दशबाणेन स हतो गतवान्क्षितिम् ॥१०४॥

कर्णानुजस्तदा प्राप विकर्णाख्योऽपकर्णयन्।
मार्गण्यार्थसंमुक्तान्रौद्रसंगरकारकः ॥१०५॥

अर्थ (श्लोक 101 से 105): उसको युद्ध-स्थल में उतरा देख करके उससे अर्जुन ने कहा कि बालक, जाओ, रण से वापस लौट जाओ। तुम व्यर्थ ही अपने प्राण क्यों गँवाते हो? क्या कहीं बेचारा हिरण भी सिंह के पाँव के आघात को सह सकता है? या महान् सर्प भी गरुड़ के पक्ष के प्रहार को सह सकता हैं? तुम अभी बालक हो, शक्ति-विहीन हो, असमर्थ हो, इसलिए तुम पर बाण छोड़ने को मैं तैयार नहीं। अर्जुन की इस गर्वोक्ति से उसे बड़ा क्रोध आया। उसने अर्जुन के ऊपर अत्यन्त तेजी के साथ एकदम पाँच बाण चलाये जो पार्थ की छाती से टकराकर वे-काम हो गिर पड़े। यह देख पार्थ ने उस पर दस बाण चलाये, जिनसे उसके प्राण पखेरू उड़ गये और वह धराशायी हो गया। शत्रुंजय को मरा देख अर्जुन


अर्जुनः सारथिं हत्वा रथं तस्य बभञ्ज च।
शरजालेन तं शीघ्रं छादयन्विफलीकृतम् ॥१०६॥

अर्थ (श्लोक 101 से 106): के बाणों को काटता हुआ भयानक युद्ध करने वाला कर्ण का छोटा भाई विकर्ण अर्जुन पर दौड़ पड़ा। फल यह हुआ कि अर्जुन ने सारथी को मारकर उसका भी रथ नष्टकर डाला और जब वह असमर्थ हो गया तब अर्जुन ने उसे भी बाणों से पूर दिया ॥१०१-१०६॥


बीभत्साख्यो रणं प्राप कुरुसैन्यं विमर्दयन्।
दधानो धन्वसंधानं कालरूप इवोन्नतः ॥१०७॥

तत्क्षणे विशिखेनासौ चकर्त वैरिमस्तकम्।
विकर्णः क्रन्दनासक्तो जगाम यममन्दिरम् ॥१०८॥

दधाव कौरवं सैन्यं वीक्ष्य विकर्णपातनम्।
तदा तत्पृतनां पार्थो रुरोध रणसंगतः ॥१०९॥

निरुध्य निखिलं सैन्यं भानुपुत्रः पवित्रवाक्।
पार्थमाकारयामास चमूसंचूर्णनोद्धुरम् ॥११०॥

अर्थ (श्लोक 107 से 110): इसी बीच में धनुष चढ़ाये हुए यम के जैसा एक वीभत्स नाम योद्धा कौरवों की सेना को तितर-वितर करता हुआ युद्ध-स्थल में उतरा और उसने देखते-देखते अपने एक ही बाण के द्वारा विकर्ण का मस्तक धड़ से जुदा कर दिया। तब एकदम विकर्ण का चिल्लाना बन्द हुआ और वह यम-मन्दिर को प्रयाण कर गया। विकर्ण को धराशायी होता देखकर कौरवों की सारी सेना उसी वक्त पार्थ पर टूट पड़ी परन्तु वह पार्थ का बाल भी बाँका न कर सकी। पार्थ ने उसे उसी समय बढ़ने से रोक दिया। यह देख उधर से कर्ण ने सेना को भागने से रोका और उसे नष्ट करने को उद्यत हुए पार्थ को ललकारा ॥१०७-११०॥


सव्यसाची शुचा मुक्तो मुमोच तं हि मार्गणान्।
कर्णोऽपि विफलीचक्रे ताञ्शरान्संगरावहान् ॥१११॥

त्रिभिर्बाणैस्तदा कर्णो विव्याध च धनंजयम्।
त्रिभिश्च सारथिं केतुं त्रिभिस्त्रिभिश्च सद्रथम् ॥११२॥

क्रुद्धो धनंजयस्तावत्कर्णं विव्याध मार्गणैः।
निपपात महीपृष्ठे कर्णो मूर्च्छामुपागतः ॥११३॥

अर्थ (श्लोक 111 से 113): फिर क्या था, अर्जुन भी कर्ण पर बाणों की बरसा करने लगा और कर्ण उसके बाणों को व्यर्थ करने की चेष्टा करने लगा। अन्त में कर्ण ने एक साथ चलाये हुए तीन बाणों के द्वारा धनंजय को, उसके सारथी को, रथ को और उसकी ध्वजा को वेध दिया। यह देख धनंजय को बड़ा क्रोध आया और उसने थोड़ी ही देर में अपने बाणों की मार से कर्ण को धराशायी कर दिया, जिससे उसे मूर्च्छा आ गई। वह वेहोश हो गया ॥१११-११३॥


कर्णमुत्सारयामास रथे कृत्वाथ कौरवः।
तावद् दुःशासनः प्राप्तो दुस्साध्यो युधि क्रुद्धधीः ॥११४॥

सहस्व मार्गणान्मेऽद्य धन्वन्निति धनंजयम्।
जघान शरघातेन दुःशासनो हि सद्हृदि ॥११५॥

तदा धनंजयः क्रुद्धः पञ्चविंशतिमार्गणैः।
जघान युवराजं तं कृतं मृतमिवोन्नतम् ॥११६॥

अर्थ (श्लोक 114 से 116): उसी वक्त कौरवों ने कर्ण को रथ में बैठाकर युद्धस्थल से बाहर किया और वे उसका उपचार करने लगे। इधर क्रोध से अन्धा हुआ दुःसाध्य दुःशासन युद्ध-स्थल में कूद पड़ा और उसने यह कहकर अर्जुन के हृदय में एक बाण मारा कि यदि ताकत हो तो तू मेरे बाणों को सह देख। उसके बाण के लगते ही धनंजय को भी बड़ा क्रोध आया और उसने उसके ऊपर एकदम पच्चीस बाण चलाये, जिनसे उसे एक क्षण में ही अधमरा-सा हो जाना पड़ा। इसके बाद और-और राजा भी जो पार्थ के


अन्ये ये रणमायान्ति ददाति तान्दिशो बलिम्। पार्थः समर्थसिद्धार्थः कृतार्थः परिपन्थिहृत् ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 114 से 117): आगे आये, उन्हें भी उसने मार गिराया और दिगीशों को उनकी बलि चढ़ा दी। अन्त में इस प्रकार सब शत्रुओं पर विजय पाकर अर्जुन बड़ा कृतार्थ हुआ और उस शत्रु-समूह के विध्वंसक के सारे मनोरथ सिद्ध हुए ॥११४-११७॥


गाङ्गेयस्तु समायातो योद्धुं पार्थं प्रति त्वरा। तं त्रिःप्रदक्षिणीकृत्य पार्थोऽवोचत्पितामहम् ॥११८॥

त्रयोदश सुवर्षाणि गमितानि मयाधुना। भ्रमता तव पादाब्जं प्राप्तं पुण्यवशादिह ॥११९॥

धनुस्त्वं धर धीरत्वं भज भव्य पितामह। अस्माकमथ युष्माकं यथा राज्यं भवेदिह ॥१२०॥

गाङ्गेयस्तु तदा ज्यायां धनुरास्फालयन्ददौ। अष्टावष्टौ शराञ्शीघ्रं मुमोच मदमेदुरः ॥१२१॥

सुनासीरसुतस्तूर्णं चिच्छेद रथसारथी। गाङ्गेयस्य तदा क्रुद्धो गाङ्गेयो गर्विताशयः ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 118 से 122): इसके बाद अति शीघ्रता से पार्थ के साथ युद्ध करने के लिए पितामह युद्धस्थल में उतरे और उन्होंने पार्थ को भीषण ध्वनि के द्वारा ललकारा। तब पार्थ ने तीन प्रदक्षिणा दे, नमस्कार कर उनसे नम्र शब्दों में कहा कि पूज्यपाद, वन में घूमते हुए हम लोग तेरह साल बिताकर बड़े पुण्ययोग से फिर भी आपके चरणों में आये हैं। अतः प्रभो! अब आप धनुष को रख दीजिए और धीरज की शरण लीजिए, जिससे आपके सेवकों का राज्य हो जाय परन्तु पितामह गांगेय ने अर्जुन की बात पर कुछ भी ध्यान न दिया और रोष में आकर अर्जुन के ऊपर उन्होंने एक साथ सोलह बाण छोड़ दिये ॥११८-१२२॥


युयुधाते महायोधौ मार्गणैस्तौ महाहवे। असाध्यौ खलु मन्वानौ सामान्यास्त्रैः स्वयं स्थितौ ॥१२३॥

उच्चाटनं महाबाणं सैन्योच्चाटविधायकम्। मुमोच मोहनं बाणं मोहयन्तं बलं गुरुः ॥१२४॥

तथा च स्तम्भनं बाणं स्तम्भयन्तं चमूं पराम्। चक्रे स विफलान्सर्वान्बाणान्यार्थः परोदयः ॥१२५॥

अर्थ (श्लोक 123 से 125): तब उधर से अर्जुन ने भी बाण-प्रहार शुरू किया और गांगेय के रथ को सारथी-सहित वेध दिया। यह देख मदमाते गांगेय के क्रोध का कुछ ठिकाना न रहा। फिर दोनों में बाणों की तीव्र मार के द्वारा महान् भीषण युद्ध होने लगा। युद्ध करते-करते जब वे सामान्य बाणों के द्वारा एक दूसरे पर विजय न पा सके तब उन्होंने विशेष बाणों का प्रहार जारी किया। पहले ही पितामह ने शत्रु की सेना का मोहन, उच्चाटन और स्तंभन करने वाले मोहन, उच्चाटन और स्तंभन नाम बाणों को छोड़ा और उन सबको महाभाग पार्थ ने अपने कौशल से व्यर्थ कर दिया ॥१२३-१२५॥


सस्मार मानसे पार्थो वीतहोत्रसुपर्वणः। चचाल ज्वालयन्सोऽपि भूमिभूरुहसज्जनान् ॥१२६॥

गाङ्गेयस्तच्छरं मत्वा चिच्छेद निजविद्यया। अन्तरिक्षे क्षणं देवा ईक्षन्ते स्म तयो रणम् ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 126 से 127): इसके बाद पार्थ ने मन ही मन अधिदेव की याद किया। अर्जुन के याद करते ही वह देव पृथ्वी, वन और सेना को भस्म करता हुआ आया और सर्वत्र अपना प्रभाव जमाने लगा। गांगेय ने उसे पार्थ का बाण समझ कर अपनी विद्या के बल से छेद दिया। इस वक्त देवगण आकाश में ठहरे हुए उन दोनों का भीषण युद्ध देख रहे थे और उनके कला-कौशल की तारीफ कर रहे थे। बल से उद्धत हुए अर्जुन ने गांगेय के उस बाण को भी छेद दिया जो कि उसने अर्जुन के अग्निबाण को छेदने


भीमानुजस्तु चिच्छेद गुरुबाणं बलोद्धतः। तयोर्मध्ये न कोऽप्यत्र पराजयत एव हि ॥१२८॥

अर्थ (श्लोक 126 से 128): के लिए छोड़ा था। लेकिन अब तक उन दोनों में से कोई भी हारा और जीता न था ॥१२६-१२८॥


यावद्धनंजयेनाशु धनुश्छिन्नं गुरोरपि। अन्तरे च तयोस्तावद् द्रोणाचार्यः समाययौ ॥१२९॥

अङ्कुशेन विनिर्मुक्तोऽनेकपो वा समुत्थितः। द्रोणो विद्रावयञ्शत्रूंस्तावत्पार्थेन संनतः ॥१३०॥

अर्थ (श्लोक 129 से 130): इसके बाद अर्जुन ने अपने एक प्रबल बाण के द्वारा पितामह का बाण छेदा ही था कि इसी बीच में उन दोनों के मध्य में द्रोणाचार्य आ गये। शत्रु को कष्ट देने वाले वे निरंकुश हाथी की भाँति खड़े थे। अर्जुन ने उनके चरणों में झुककर बड़े भक्तिभाव से प्रणाम किया और उनसे वह बोला कि आप मेरे गुण-गरिष्ठ गुरु हैं, फिर हे नीति-नय के परम विद्वान् आप ही कहिए कि मैं आप ही का शिष्य होकर आपके साथ कैसे युद्ध करूँ ॥१२९-१३०॥


बभाषे भीषणः पार्थस्त्वं गुरुर्मे महागुणः। कथं योयुध्यते साकं त्वया सन्नयशालिना ॥१३१॥

त्वं भो याहि निजं स्थानं जेष्येऽहं रिपुव्रजान्। अगदीद्द्रोण इत्युक्ते पार्थ सज्जो भवाधुना ॥१३२॥

प्रहारं देहि देहि त्वं दोषो नास्त्यत्र कश्चन। पार्थोऽभाणीद्भयातुरः प्रथमं मुंच मार्गणान् ॥१३३॥

पश्चात्सेवा करिष्यामि हरिष्यामि महाबलम्। तदा तौ गुरुशिष्यौ हि रणं कर्तुं समुद्यतौ ॥१३४॥

अर्थ (श्लोक 131 से 134): अतः गुरुवर्य! आप अपने स्थान को जाइए। मैं आज बैरियों को यम मन्दिर का अतिथि बनाऊँगा। यह सुन द्रोण ने कहा कि पार्थ, तुम जल्दी तैयार हो और बराबर बे रोक टोक मेरे ऊपर प्रहार करो। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। द्रोणाचार्य के इन वचनों से डरकर पार्थ ने उनसे कहा कि गुरुवर्य! तब पहले आप ही बाण छोड़ें, पीछे से यथाशक्ति मैं भी आपकी सेवा करूँगा और आपके बल को देखूँगा। इसके बाद अभिमान में भूलकर वे दोनों गुरु-शिष्य आपस में युद्ध करने को उद्यत हुए ॥१३१-१३४॥


वीक्ष्यमाणौ सुरौघेणान्तरीक्षे क्षिप्रमुद्धतौ। गुरुर्विंशतिबाणैश्च च्छादयामास पुष्करम् ॥१३५॥

पार्थस्तानखण्डयामासार्धपथेऽथ समुद्धतः। पुनर्लक्षशरान्द्रोणो मुमोच मघवात्मजं ॥१३६॥

सोऽपि द्विलक्षबाणैश्च ताञ्जघान महाशरान्। वीक्षितो जयलक्ष्म्या च सव्यसाची शुभंकरः ॥१३७॥

तावदुत्सारितो द्रोणो रणात्तन्नन्दनो महान्। अश्वत्थामा समापाशु संगरं रणकोविदः ॥१३८॥

अर्थ (श्लोक 135 से 138): इस समय के इन दोनों के भीषण युद्ध को आकाश में से-देवगण और नीचे से दोनों पक्ष की सेना के लोग देखते थे और देखकर बड़े अचम्भे में पड़ रहे थे। इसके बाद द्रोण ने एक साथ बीस बाणों को छोड़कर सारे आकाश को ढँक दिया। उधर से उद्धत पार्थ ने उन आते हुए बाणों को आधे मार्ग में ही छेद डाला। तब क्रोध में आ द्रोण ने अर्जुन के ऊपर एकदम लाख-बाण छोड़े जिनकी कि उसने दो लाख बाणों से निवार दिया। यह देख जय-लक्ष्मी अर्जुन जैसे शुभंकर भव्य मूर्ति पर निछावर हो गई। इस प्रकार अर्जुन ने अपने प्रखर बाणों की मार से द्रोणाचार्य को युद्ध स्थल से हटा दिया ॥१३५-१३८॥


तौ केशरिकिशोराभौ बद्धामर्षौ मदोद्धतौ। युयुधाते महायोधौ द्रोणपुत्रार्जुनौ रणे ॥१३९॥

अर्थ: इसी बीच में युद्ध की प्रतिज्ञा करता हुआ उधर से द्रोण का पुत्र अश्वत्थामा युद्धस्थल में आ


अश्वत्थाम्नो हयौ तावद्रथस्थो हतवान्बलात्। बीभत्सुस्तौ तथा भूमौ पतितौ गतजीवितौ ॥१४०॥

अश्वत्थामा महाबाणैर्गाण्डीवगुणमच्छिनत्। अन्यां ज्यां च समारोप्यार्जुनो धनुषि तत्क्षणम् ॥१४१॥

जघान द्रोणपुत्रस्य हृदयं हृदयंगमः। सव्यसाची शरैः शीघ्रं धनुषा प्रेरितैः स्फुटम् ॥१४२॥

अश्वत्थामा महीपीठे मुमूर्च्छ पतितो द्रुतम्। अर्जुनं समुवाचेदं तावदुत्तरसारथिः ॥१४३॥

वाहयामि रथं नाथ दुर्योधननृपं प्रति। संधानं कुरु धनुष्काहिताञ्जहि महात्वरान् ॥१४४॥

पार्थः प्रोवाच दुर्जेयान्विपक्षान्सम्मुखांस्तदा। कुर्वन्विविधवाक्यैश्च मर्म नर्मविधायिभिः ॥१४५॥

तैः समं विषमं व्योम छादयद्भिर्महाशरैः। युयुधे युद्धशौण्डीरो धनंजयमहीपतिः ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 139 से 146): उतरा। फिर क्या था, अर्जुन और वह दोनों महायोद्धा परस्पर भीषण सिंह के बच्चों की भाँति भीषण युद्ध करने लगे। इतने ही में वीभत्स ने अश्वत्थामा के रथ के दोनों घोड़ों के छेद दिया, जिससे वे प्राणरहित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। इधर अश्वत्थामा ने भी अपने महाबाणों के द्वारा अर्जुन के गांडीव-धनुष की डोरी को छेद दिया परन्तु अर्जुन ने धनुष पर, उसी वक्त दूसरी डोरी चढ़ाकर अश्वत्थामा के हृदय में कई ऐसे बाण मारे कि जिनसे वह अतिशीघ्र बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। इसके बाद उत्तर सारथी ने अर्जुन से कहा कि नाथ, अब मैं दुर्योधन की ओर को रथ फेरता हूँ, अतः हे धनुर्धर, आप धनुष पर शर संधान कर अतिशीघ्र ही इन शत्रुओं का काम तमाम कर दीजिए। इस पर अर्जुन ने दुर्जेय शत्रुओं को अपनी ओर आकर्षित कर मर्म को नर्म करने वाले वचनों द्वारा समझाया और साथ ही उस शौंडीर ने अपने विषम-बाणों के द्वारा आकाश को पूर दिया ॥१३९-१४६॥


तावत्क्रममुल्लङ्घ्य राजबिन्दुः समाययौ। पार्थं च वेष्टयन्सैन्यैर्गजवृन्दैर्मृगेन्द्रवत् ॥१४७॥

एकेन तेन पार्थेन समर्थेन धनुष्मता। चिच्छेद वाहिनी तस्य मेघमालेव वायुना ॥१४८॥

गजारथाश्वध्वजान्सर्वान्लक्ष्यीकृत्य सुलक्ष्यवित्। निहत्य पातयामास धरायां स धनंजयः ॥१४९॥

अर्थ (श्लोक 147 से 149): यह देख राजबिन्दु पार्थ पर झपटा और उसने अपनी सेना के द्वारा उसे चारों ओर से घेर लिया। उस समय ऐसा जान पड़ता था मानों हाथियों ने सिंह को घेर लिया है। अर्जुन सिंह जैसा था और राजबिन्दु के सैनिक-गण हाथियों जैसे। लेकिन वह सेना अर्जुन का कुछ भी न कर सकी और है भी ऐसा ही कि क्या कहीं हाथी बहुत से मिल कर भी एक सिंह का कुछ कर सकते हैं। राजबिन्दु की सारी सेना की अकेले अर्जुन ने ही तितर-बितर कर दिया, जैसे कि थोड़ी-सी वायु भी बड़े-बड़े मेघों की तितर-बितर कर देती है। इसके बाद उस महाबली ने लक्ष्य बाँधकर राजबिन्दु के हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजाओं को छेदकर सबको धराशायी कर दिया ॥१४७-१४९॥


कांस्कान्हन्मि नृपानत्र हिंसया पातकं यतः। ध्यात्वेति सुरराट्सूनुर्मोहनास्त्रं मुमोच च ॥१५०॥

अर्थ: यह सब मार काट देख अर्जुन बड़ा विपन्न हुआ और उसने अन्त में सोचा कि इस युद्ध में मैं किस-किस राजा को मारूँ किस-किसके प्राण लूँ। हिंसा करने से तो बड़ा पाप होता है, अतः किसी को भी मारना उचित नहीं। यह सब सोच-विचार कर हिंसा दूर करने के लिए धनंजय ने मोहन-बाण छोड़ा और उन्हें ऐसा वे-सुध कर दिया मानों उन्होंने धतूरे का फल ही खा लिया है। वे उसके नशे


सङ्घाटकफलेनेव तेन सर्वे विमोहिताः।
पेतुः पृथ्वीतले तूर्णं निर्जीवा इव भूमिपाः ॥१५१॥

तेषां छत्रध्वजादीनि गजवाजिमहारथान्।
आदायाभूतदा तुष्टोऽर्जुनो निर्जितशात्रवः ॥१५२॥

अर्थ (श्लोक 150 से 152): से बेसुध हो गये, सबके सब राजा मुर्दे के जैसे पृथ्वी पर गिर पड़े। इस प्रकार शत्रुओं पर विजय पाकर और उनके छत्र-ध्वजा, हाथी-घोड़े, रथ-महारथ वगैरह पाकर अर्जुन बड़ा सन्तुष्ट हुआ ॥१५०-१५२॥


विराटो वरवादित्रैर्नाट्यैः सद्‌भटकोटिभिः।
तत्क्षणे कारयामास क्षणं श्रीपार्थभूपतेः ॥१५३॥

तावता धर्मपुत्रोऽपि मोचयामास गोकुलम्।
प्रहृष्टः शिष्टसंसेव्यः समभून्निर्भयो महान् ॥१५४॥

कथं कथमपि प्राप्ताश्चेतनां कौरवा नृपाः।
प्रपेदिरे त्रपापूर्णाः पुरं प्रमोदवर्जिताः ॥१५५॥

अर्थ (श्लोक 152 से 155): इसके बाद विराट ने उसी वक्त नौवते झड़वाईं और असंख्य वीरों के साथ पार्थ का बड़ा भारी आदर और अपूर्व उत्सव किया। इसी समय हर्षित-चित और शिष्टों द्वारा सेवित निर्भय युधिष्ठिर ने उधर से गो-कुल को भी छुड़ा लिया। इसके बाद किसी तरह जब कौरव होश में आये तब वे बड़े लज्जित और निर्मद हो दीन की भाँति अपने पुर को चले गये ॥१५२-१५५॥


विराटो विकटो मत्वा तानिमान्यञ्च पाण्डवान्।
नत्वा करपुटं कृत्वा मूर्ध्नि विज्ञप्तिमातनोत् ॥१५६॥

एतावत्समयं देव न ज्ञातो भगवान्भवान्।
मया धर्मात्मजस्त्वं हि तदागः क्षम्यतां मम ॥१५७॥

अतस्त्वमेव स्वाम्यत्र किंकरोऽहं तव प्रभो।
अत्रैव क्रियतां राज्यं प्राज्यं सद्बान्धवैः सह ॥१५८॥

विवेश पत्तनं सार्धं कौन्तेयैः स महोत्सवैः।
विनयी विनयं कुर्वंस्तेषां प्रार्थयत स्थितिम् ॥१५९॥

अर्थ (श्लोक 156 से 159): इधर जब विराट को यह निश्चय हो गया कि ये पाँचों ही वास्तव में पाण्डव हैं तब हाथ जोड़, नमस्कार कर उसने युधिष्ठिर से कहा कि देव, इतने समय तक मैंने आपको जाना नहीं था कि आप ही धर्मपुत्र हैं। अतः आप मेरे अपराधों को क्षमा करें। प्रभो, अब से इस राज्य के आप ही स्वामी हैं और मैं किंकर आपका हूँ। अतः आप बन्धुवर्ग सहित यहीं राज्य कीजिए। इसके बाद विराट गोकुल की बाड़े में बन्द करवा कर आप स्वयं पाण्डवों-सहित बड़े भारी उत्सव के साथ नगर में आया ॥१५६-१५९॥


इत्युक्त्वा विनयं कृत्वा गोष्ठेऽसौ गोकुलं न्यधात्।
स पुनः प्रार्थयामास पार्थमुद्वाहसिद्धये ॥१६०॥

धनंजय सुता धन्या ममास्ति भोगभाजनम्।
जरासंधसुतैः पूर्वं प्रार्थितानेकशोऽपि सा ॥१६१॥

सुदती न मया दत्ता सुरूपा भूप भोगदा।
तेभ्योऽतो भज तत्पाणिपीडनं पार्थ पार्थिव ॥१६२॥

पार्थोऽवोचद्विराटेड् योऽभिमन्युर्मम नन्दनः।
सुभद्रायास्त्वजे तस्मै देहि दीप्तिधरां सुताम् ॥१६३॥

अर्थ (श्लोक 160 से 163): विराट ने युधिष्ठिर आदि से बड़े विनय-पूर्वक रहने के लिए प्रार्थना की और पार्थ से इच्छा प्रकट की कि वह उसकी पुत्री के साथ विवाह करे। वह बोला कि धनंजय, मेरी भोग-योग्य और सब तरह से कृतार्थ एक पुत्री है। वह रूप-सौन्दर्य की सीमा है। पहले जरासंध के पुत्र ने मुझसे उसके लिए बहुत बार प्रार्थना की थी परन्तु मैंने उसे नहीं दी। इसलिए हे पार्थ! आप उसका पाणिग्रहण कीजिए। इस पर पार्थ ने कहा कि महाराज! सुभद्रा के गर्भ से उत्पन्न हुआ अभिमन्यु नाम मेरा एक पुत्र है। आप अपनी सुंदरी कन्या को उसे दीजिए। अर्जुन के इस कहने को स्वीकार कर विराट ने विवाह-मंगलों के द्वारा बड़े भारी ठाट-बाट के साथ अभिमन्यु के साथ अपनी कन्या का


तत्क्षणं स क्षणं कृत्वा विवाहवरमङ्गलैः। विराटः सुघटाटोपैर्ददौ तामभिमन्यवे ॥१६४॥

अर्थ (श्लोक 160 से 164): विवाह कर दिया ॥१६०-१६४॥


तदा कुन्ती समायाता ज्ञात्वा तेषां सुवैभवम्। किंवदन्ती तदा याता द्वारवत्यां महापुरि ॥१६५॥

ततो हलधरो धीमान्विकुण्ठो विष्टरश्रवाः। प्रद्युम्नो भानुमुख्याश्च प्राप्तास्तत्र महीभुजः ॥१६६॥

धृष्टार्जुनः सुसज्जः सन्नूर्जस्वी स समाययौ। अखण्डाङ्गः शिखण्डी च भूपोऽपि परमोदयः ॥१६७॥

एवमन्ये महानन्दाः सेन्दिरा रूपसुन्दराः। तत्रापुर्भुमिपास्तूर्ण मनोरथशताकुलाः ॥१६८॥

विवाहानन्तरं तत्र कियतो वासरात्नृपाः। स्थित्वा सन्मानिताः सर्वे वस्त्राद्यैः स्वपुरं ययुः ॥१६९॥

हरिर्हलधरेणामा अक्षौहिणीबलान्वितः। पाण्डवैः सह सत्प्रीत्या चचाल चञ्चलैस्त्वरा ॥१७०॥

यादवाः स्वपुरे याताः कुन्त्या सह च पाण्डवैः। तत्र तस्थुः स्थिरं स्थैर्यादन्योन्यप्रीतिमानसाः ॥१७१॥

अर्थ (श्लोक 165 से 171): इसके बाद पाण्डवों का यह सब हाल जब द्वारिका में पहुँचा तब वहाँ से बलभद्र, नारायण, प्रद्युम्न, भानु आदि विराट नगर में आये। तेजस्वी धृष्टार्जुन और अखण्ड सत्ताशाली महाभाग शिखण्डी भी आया। इसी भाँति रूप-सौन्दर्य से सुशोभित, आनंद के भरे, सैकड़ों मनोरथों को चित्त में रखकर और-और राजा भी आये। विवाह के बाद भी पाण्डव और राजा लोग कितने ही दिन वहाँ और रहे। इसके बाद वस्त्राभूषण आदि के द्वारा सम्मानित हो वे अपनी-अपनी राजधानी को चले गये। सबको विदा कर नारायण और बलभद्र आदि राजा लोग तीन अक्षौहिनी सेना लेकर प्रीति के साथ, पाण्डवों सहित वहाँ से रवाना हो द्वारिका में आ गये और वहाँ वे परस्पर बड़ी प्रीति से रहते हुए अपना समय बिताने लगे ॥१६५-१७१॥


अक्षौहिणीप्रमाणं किं वद गौतम सोऽवदत्। खं सप्ताष्टैकयुग्माङ्गा २१८७० दन्तिनो यत्र संमताः ॥१७२॥

तथा रथाश्च तावन्तः २१८७० खैकषट्पञ्चषड्गयाः ६५६१०।
पत्तयः शून्यपञ्चत्रिनवशून्यैकसंमताः १०९३५० ॥१७३॥

अर्थ (श्लोक 172 से 173): इसी समय श्रेणिक ने गौतम भगवान् से पूछा कि भगवन्! अक्षौहिणी का प्रमाण कितना होता है? गौतम ने उत्तर दिया कि २१८७० हाथी, इतने ही रथ, ६५६१० घोड़े, १०९३५० पयादे योद्धा इन सबको मिला एक अक्षौहिणी होती है ॥१७२-१७३॥


तत्रैकदा जगादैवं दिवसपतितनूद्भवः। देवकीनन्दनं नीत्या संनिर्जितबृहस्पतिः ॥१७४॥

यस्याप्यपयशो लोके वरीवर्ति वरातिगम्। अवगण्यं वचोऽतीतं गणनातीतमञ्जसा ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 174 से 175): दुर्योधन का अपयश जगत में उत्तमता का उल्लंघन कर रहा है, वह तिरस्कार करने लायक शब्दों से अवर्णनीय और निश्चय से गणना के अगोचर है। कौरवो के अपराध कहने के लिये जगत में कौन समर्थ है ? ॥१७४-१७५॥


तद्वक्तुं कौरवाणां हि कः क्षमो जगतीतले। वयं जतुगृहे क्षिप्ता ज्वालिता तैश्च छद्मना ॥१७६॥

अर्थ: द्वारिकापुरी में रहते हुए अर्जुन ने एक दिन नीति से बृहस्पति को भी जीतने वाले कृष्ण से कहा कि कौरवों ने छल से हमें लाख के महल में रक्खा और बाद उन शठों ने उसमें आग लगा दी।


गृहीत्वा द्रौपदीकेशान्गृहान्निष्कासिताः शठैः।
मुरारिस्तद्वचः श्रुत्वा रसनां दशनान्तरे ॥१७७॥

स्थापयित्वा जगादैवं निःप्रमादो महामनाः।
दुर्योधनकृतिं पार्थ प्रेक्ष्य कृत्सत्क्षतिम् ॥१७८॥

निर्वन्धुत्वं च दुष्टस्याकुलीनत्वं नयच्युतिम्।
इत्युक्त्वा मन्त्रयित्वा च पाण्डवैर्विष्टरश्रवाः ॥१७९॥

कार्यं विचार्य वेगेन प्राहिणोच्च वचोहरम्।
क्रमेणाक्रम्य भूपीठं स जगाम सुहस्तिनम् ॥१८०॥

गत्वा नत्वा नृपं नीत्या बभाण कौरवेश्वरम्।
द्वारकातः समायातो दूतोऽहं विधिवेदकः ॥१८१॥

अर्थ (श्लोक 176 से 181): पुण्य से हम लोग उस समय बाल-बाल बच गये। इसके सिवा उन, दुष्टों ने एक बड़ा भारी अपराध यह किया है कि द्रौपदी की चोटी पकड़कर उसे बलात् घर बाहर किया और उसका घोर अपमान किया। अर्जुन के वचनों को सुनकर महामना नारायण दाँतों तले जीभ दबा कर बोले पार्थ! दुर्योधन ने यह सचमुच ही बड़ा अन्याय और बहुत ही क्षुद्रता की है। यह दुष्ट न तो बन्धुवर्ग को चाहता है और न इसमें कुछ कुलीनता ही है। इसी कारण संसार में इसका इतना अपयश फैल रहा है, जिसकी कोई सीमा नहीं। कौरवों के दुराचारों को पृथ्वी पर ऐसा कोई नहीं जो सह सके। पाण्डवों के साथ इस विषय पर खूब विचार कर नारायण ने अपना कर्तव्य निश्चित किया और फिर दुर्योधन के पास एक दूत भेजा। दूत थोड़े ही समय में हस्तिनापुर पहुँचकर उसने दुर्योधन को नमस्कार किया और नीति के साथ वह बोला कि महाराज, मैं द्वारिका से आया हूँ। मैं एक निपुण दूत हूँ ॥१७६-१८१॥


राजन्नत्र महीपीठे न जेयाः पाण्डवा रणे।
वृथा किं क्रियते वंशच्छेदः स्वस्य महीपते ॥१८२॥

पाण्डवानां तु साहाय्यं करोति मधुमर्दनः।
विराटो विकटो भूमौ द्रुपदः सरथः सदा ॥१८३॥

प्रलम्बघ्नः सदा येषां विघ्नौघपरिघातकः।
दशार्हाश्चार्हणां प्राप्ताः प्रद्युम्नाद्याः सुपक्षिणः ॥१८४॥

तैः समं समरे स्थातुं किं भवान्क्षणमर्हति।
मानं विमुच्य भीतात्मन्शुद्धसंधिं विधेहि भोः ॥१८५॥

अर्धार्धभूर्विभज्याशु द्वाभ्यां भोज्या सुभाग्यतः।
दूतोक्तमेवमाकर्ण्य विदुरं कौरवोऽवदत् ॥१८६॥

ताताद्य किं प्रकर्तव्यं मया राज्यं प्रभज्यते।
पूर्णं तूर्णं कथं ब्रूहि प्रोवाच विदुरस्तदा ॥१८७॥

धर्मेण लभते सौख्यं धर्माद्राज्यं निराकुलम्।
धर्माच्च सुधरा धीमन् धर्माद्वैरिगणात्ययः ॥१८८॥

पुरुषस्य विशुद्धिस्तु धर्मः साधर्मिकैर्मतः।
मनोवचनकायानामकौटिल्यं विशुद्धता ॥१८९॥

अर्थ (श्लोक 182 से 189): राजन्! पृथ्वी पर ऐसा कोई नहीं जो पाण्डवों को जीत सके। फिर व्यर्थ ही आप अपने कुल का उच्छेद क्यों करते हैं। देखिए नारायण, संसार भर में विकट विराट, द्रुपद, सब विघ्नों को दूर करने वाला प्रलंबघ्न, सब प्रकार योग्य दशार्ह-गण तथा प्रद्युम्न आदि सब राजा पाण्डवों की पक्ष में हैं, उनकी सहायता के लिए तत्पर हैं। फिर युद्ध में उनके सामने आप एक क्षण भी कैसे ठहर सकते है। इसलिए राजन्, अब आप मान छोड़कर उनके साथ कपट रहित सन्धि कर लीजिए और आपस में आधी-आधी पृथ्वी को बाँटकर दोनों महाभाग अपने-अपने हिस्से का उपभोग कीजिए और सच पूछो तो इसमें आपकी भलाई है। दूत के इन वचनों की सुनकर दुर्योधन ने विदुर से कहा कि तात, बताइए, इस समय क्या किया जाये। वह कौन-सा उपाय है जिससे हम पूरे राज्य को भोग सकें। यह सुन विदुर ने कहा कि भाई, जीवों को सुख धर्म से मिलता है और राज्य भी निरंकुश इसी


क्रोधलोभसुगर्वाणां त्यागो हि वृष उच्यते। अतस्तांस्त्वं परित्यज्य कुरु धर्मे महामतिम् ॥१९०॥

यदि वाञ्छसि स्वच्छत्वं स्वेच्छया वत्स पाण्डवान्। आकार्य विनयेनाशु देहि देशार्धमुत्तरम् ॥१९१॥

अर्थ (श्लोक 182 से 191): से होता है। वह धर्म और कोई बाहरी चीज नहीं किन्तु आत्मा की विशुद्धि है एवं आत्म-विशुद्धि मन-वचन-काय की सरलता को कहते हैं अथवा क्रोध, लोभ और गर्व के त्याग को धर्म कहते हैं। इसलिए तुम क्रोध आदि छोड़कर अपनी बुद्धि को धर्म में लगाओ। यदि तुम निर्मल यश चाहते हो तो वत्स! अपने आप ही पाण्डवों की बुलाकर विनय के साथ उन्हें आधा राज्य बाँट दो ॥१८२-१९१॥


श्रुत्वा दुर्योधनः क्रुद्धः समवादीद् हृदा दधत्। आमर्षं हर्षनिर्मुक्तो विदुरं विदुरं सदा ॥१९२॥

अहं ते भक्तिनिर्भिन्नस्त्वं वाञ्छसि च गौरवम्। पाण्डवानां परं राज्यं ममराज्यं विशेषतः ॥१९३॥

अर्थ (श्लोक 192 से 193): यह सुन दुर्योधन को बड़ा क्रोध आया। उसका हृदय गर्व से भर आया, चेहरा लाल हो उठा। वह विदुर से बोला कि मैं हमेशा से आपकी इतनी भक्ति करता आ रहा हूँ कि जिसका कोई ठिकाना नहीं परन्तु आप इतने कठोर है जो पाण्डवों का ही गौरव और राज्य चाहते हैं और हमें उससे वंचित रखना चाहते हैं ॥१९२-१९३॥


इत्युक्त्वा दुष्टवाक्येन दूतो निर्घाट्य संसदः। तेन निःसारितः प्राप पुरीं द्वारावतीं पराम् ॥१९४॥

नत्वा नृपांश्च कौन्तेयान्यादवांश्च वचोहरः। यथावत्सर्ववृत्तान्तं न्यवेदयत्स कार्यवित् ॥१९५॥

राजन्न कुर्वते संधिं कौरवाः कृतकिल्बिषाः। न तुष्टास्ते च तिष्ठन्ति भवतामुपरि स्फुटम् ॥१९६॥

तच्छ्रुत्वा संजगौ वाक्यं पाण्डुपुत्रः पवित्रवाक्। अस्माभी रक्षिता नीतिरयशोऽपि निवारितम् ॥१९७॥

तदर्थं प्रेषितो दूतो येनानीतिर्न जायते। इत्युक्त्वा पाण्डवा यातुं यादवैस्तान्समूद्ययुः ॥१९८॥

अर्थ (श्लोक 194 से 198): इसके बाद उसने अपमान भरे वचन कहकर दूत को भी सभा से निकाल दिया। अपमान के साथ द्वारिका आकर उस कुशल दूत ने पाण्डवों और यादवों को प्रणाम कर उनसे दुर्योधन का सब हाल कह सुनाया। वह बोला कि राजन्, कौरव बड़े दुष्ट और पापी हैं। उनका स्वभाव बिल्कुल ही क्षुद्र है। वे संधि करना नहीं चाहते और न वे आप लोगों से सन्तुष्ट ही हैं। यह सुन मिष्टभाषी युधिष्ठिर ने कहा कि जो हो, हम तो नीति का पालन कर अपयश से बरी हो गये और अनीति न हो इसलिए हमने तुम्हें भी भेजा। इसके बाद ही पाण्डव यादवों सहित कौरवों पर चढ़ाई करने की तैयारी में लग गये ॥१९४-१९८॥


तावदन्यकथासंगः श्रूयतां सावधानतः। ज्ञायते येन सद्दिष्णुप्रतिविष्णोः सुखासुखम् ॥१९९॥

भ्रान्त्वा भूवलयं विराटनगरे नानाभटैः संकटे गत्वा वेषधराः सुपाण्डुतनया जित्वा रणे दुर्जयान्।
कौरव्यान्किल गोकुलं जनकुलानन्दप्रदं संख्यके रक्षन्ति स्म सपत्नतो वरवृषात्प्रापुर्विराटे जयम् ॥२००॥

अर्थ (श्लोक 199 से 200): इस अध्याय में यह बात कही गई कि पाण्डव सारी पृथ्वी पर घूमकर गुप्त वेष में नाना भटों से परिपूर्ण विराट नगर में आये। वहाँ उन्होंने दुर्जेय कौरवों को युद्ध में पराजित किया और जन-समूह को आनंद देने वाले गो-कुल की उनसे रक्षाकर पुण्य-योग से वे जयी हुए॥१९९-२००॥


धर्माद्वैरीजनस्य भेदनमहो धर्माच्छुभं सत्प्रभम्
धर्माद्वन्धुसमागमः सुमहिमालाभः सुधर्मात्सुखम्।
धर्मात्कोमलकप्रकायसुकला धर्मात्सुताः संमताः
धर्माच्छ्रीः क्रियतां सदा बुधजना ज्ञात्वेति धर्मः श्रियै ॥२०१॥

अर्थ: और ठीक ही है कि धर्म से ही वैरी नष्ट होते हैं, बन्धुओं का समागम होता है, सुन्दर शरीर मिलता है, मन की मुग्ध करने वाली सुंदर स्त्रियाँ और सुख मिलता है, कोमल शरीर और कला-विज्ञान प्राप्त होते हैं, पुत्र-पौत्र आदि सम्पत्ति प्राप्त होती है और बढ़ाकर कहाँ तक कहें जीवों की मोक्ष लक्ष्मी से भेंट भी यही धर्म कराता है। इसलिए समझदार लोगों को सदा धर्म का सेवन करते रहना चाहिए ॥२०१॥


इति श्रीपाण्डवपुराणे भारतनाम्नि शुभचन्द्रप्रणीते ब्रह्म० श्रीपालसाहाय्यसापेक्षे
पाण्डवानां विराटनगरे कौरवभङ्गप्रापणगोकुलविमोचनाभिमन्यु-
विवाहद्वारावतीप्रवेशवर्णनं नामाष्टादशं पर्व ॥२०२॥

एकोनविंशं पर्व (भाग 1/2)

अनन्तानन्तसंसारसागरोत्तारसेतुकम्।
अनन्तं नौम्यनन्तत्वं गुणानां यत्र वर्तते ॥१॥

अर्थ: उन अनंतनाथ भगवान् को प्रणाम है जो अनंत संसार-समुद्र से पार उतरने के लिए सेतु हैं और जो अनंत गुणों के भण्डार हैं। वे मुझे भी अनन्त चतुष्टय का दान दें ॥१॥


अथ दायादसंदोहक्रियाशङ्काविरक्तधीः।
संसारासुखसंभारभङ्गुरो विदुरोऽभवत् ॥२॥

स वैराग्यभराक्रान्तस्वान्तवृत्तिरचिन्तयत्।
धिक् संपदः प्रभुत्वं धिक् धिक् च वैषयिकं सुखम् ॥३॥

यत्कृते पितरं पुत्रः पिता पुत्रमपि क्वचित्।
सुहृच्च सुहृदं बन्धुर्बान्धवं च जिघांसति ॥४॥

एतांश्च कर्मचाण्डालसंश्लेषमलिनान्कुरून्।
न खलु द्रष्टुमीशिष्ये म्रियमाणारणाङ्गणे ॥५॥

एवमालोच्य विज्ञानी विदुरः कौरवान्नृपान्।
प्रकथ्य विपिनं गत्वानंसीद्विपुलमानसम् ॥६॥

विश्वकीर्तिं नतः श्रुत्वा वृषं संयमिनो वृषम्।
जग्राहोपधिनिर्मुक्तः संचरन्परमं तपः ॥७॥

अर्थ (श्लोक 2 से 7): इसके बाद विदुर ने विरक्त हो सांसारिक सुख को क्षणभंगुर समझा। वैराग्य में लीन हो वे सोचने लगे कि इस सम्पत्ति, प्रभुता और विषयजन्य सुख को धिक्कार है जिसके लिए पिता-पुत्र को, पुत्र-पिता को, मित्र-मित्र को और बन्धु-बन्धु को भी मार डालता है। ये कौरव अधर्मरूपी चांडाल के सम्बन्ध से मलिन हो रहे हैं। अतः ये अवश्य ही युद्ध में अपने प्राण देंगे और इसी लिए अब मैं इन दुष्टों का मुँह देखना नहीं चाहता। इस प्रकार विचार करके विज्ञानी विदुर कौरव राजाओं से कहकर वन को चले गये। वहाँ जाकर उन्होंने विपुलमना विश्वकीर्ति मुनि को प्रणाम कर उनसे धर्म का उपदेश सुना तथा मुनिधर्म की दीक्षा ले ली। बाद परिग्रह रहित दिगम्बर मुनि हो परम तप, तपते हुए वे विहार करने लगे ॥२-७॥


अथैकदा जनः कश्चिद्द्विपश्चिद्राजमन्दिरम्।
पुरं प्राप्य सुरत्नौघैः प्राभृतीकृत्य भूमिपम् ॥८॥

नतः पृष्टो नरेन्द्रण कस्मादायातवानिति।
स जगौ द्वारिकातोऽहं प्राप्तोऽत्र त्वद्दिदृक्षया ॥९॥

तत्र कोऽस्ति महीपालो जरासंधेन भूभुजा।
पृष्टोऽवोचत्स वैकुण्ठो नेमिना तत्र भूपतिः ॥१०॥

तत्रस्थान्यादवाञ्श्रुत्वा जरासंधो महाक्रुधा।
चचालाकालकल्पान्तचलितात्मबलाम्बुधिः ॥११॥

अर्थ (श्लोक 8 से 11): एक दिन एक पुरुष राज-मन्दिर पुर में आया और उसने जरासंध को रत्न-समूह भेंट कर प्रणाम किया। जरासंध ने उससे पूछा कि तुम कहाँ से आये हो। उत्तर में वह बोला कि राजन्, मैं आपके दर्शनों की इच्छा से द्वारिका से यहाँ आया हूँ। जरासंध ने पुनः पूछा कि वहाँ का राजा कौन है। उस आगन्तुक ने कहा कि नेमि प्रभु के साथ-साथ कृष्ण नारायण वहाँ का राज्य करते हैं। वहाँ यादवों का निवास सुनकर जरासंध के क्रोध का पारा एकदम चढ़ गया। वह असमय में क्षुभित होने वाले प्रलय काल की भाँति अपनी सेना द्वारा समुद्र को क्षोभित करता हुआ द्वारिका को चल पड़ा ॥८-११॥


निर्हेतुसमरप्रीतो माधवं नारदोऽब्रवीत्।
जरासंधमहाक्षोभं वैरिविध्वंसकारकम् ॥१२॥

अर्थ: उधर बिना कारण ही इस युद्ध को छिड़ता देखकर नारद को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने वैरियों का विध्वंस करने वाले जरासंध के महान् क्षोभ का हाल आकर कृष्ण से कहा। तब कृष्ण नेमिप्रभु


मुरारिरपि नेमीशमभ्येत्य पुरतः स्थितः। अप्राक्षीत्क्षिप्रात्मीयं जयं शत्रुक्षयोद्भवम् ॥१३॥

नेमिर्नम्रामराधीशो विष्णुमोमित्यभाषत। स्मिताद्यैः स्वजयं ज्ञात्वा योद्धुं विष्णुः समुद्ययौ ॥१४॥

बलनारायणौ राजा समुद्रविजयो जयी। वसुदेवोऽप्यनावृष्टिर्धर्मपुत्रश्च भीमकः ॥१५॥

अर्जुनो रौक्मिणेयश्च धृष्टद्युम्नस्तु सत्यकः। जयो भूरिश्रवा भूपौ सहदेवश्च सारणः ॥१६॥

हिरण्यगर्भ इत्याख्यः शम्बोऽक्षोभ्यो विदूरथः। भोजः सिंधुपतिर्वज्रो द्रुपदः पौण्ड्रभूपतिः ॥१७॥

नागदो नकुलो वृष्टिः कपिलः क्षेमधूर्तकः। महानेमिः पद्मरथोऽक्रूरो निषधदुर्मुखौ ॥१८॥

उन्मुखः कृतवर्मा च विराटश्चारुकृष्णकः। विजयो यवनो भानुः शिखण्डी सोमदत्तकः ॥१९॥

बाह्लीकप्रमुखाश्चेलुर्यादवानां महानृपाः। युद्धे संबद्धकक्षास्ते विपक्षक्षयकारकाः ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 12 से 20): के पास आये और उन्होंने शत्रु के क्षय से होने वाली अपनी विजय के बाबत उनसे पूछा। उत्तर में इन्द्रों द्वारा सेवित प्रभु कुछ न कहकर कुछ मुसकाये गये। प्रभु के इस मंदस्मित से अपनी विजय निश्चय कर कृष्ण युद्ध के लिए तैयार हुए। उनके साथ ही यादवों के अन्य बहुत से राजा शत्रु का ध्वंस करने के लिए बद्ध परिकर होकर युद्ध-स्थल में उतरने को चल पड़े। वह राजे बलदेव, नारायण, जयशील, समुद्र-विजय, वसुदेव, अनावृष्टि, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, प्रद्युम्न, धृष्टद्युम्न, सत्यक, जय, भूरिश्रव, भूप, सहदेव, सारण, हिरण्यगर्भ, शंव, अक्षोभ्य, विद्रभरथ, भोज, सिंधुपति, वज्र, द्रुपद, पौंड्रभूपति, नारद, नकुल, वृष्टि, कपिल, क्षेमधूर्तक, महानेमि, पद्मरथ, अक्रूर, निषध, दुर्मुख, उन्मुख, कृतवर्मा, विराट, चारु, कृष्णक, विजय, यवन, भानु, शिखण्डी, सोमदत्तक और वाह्लीक आदि थे ॥१२-२०॥


दुर्योधनं समाप्राप्य जरासंधवचोहरः। नत्वा प्रोवाच वागीशो यथादिष्टं सुचक्रिणा ॥२१॥

येनास्तो दुर्धरः कंसो बुधश्चक्रिसुतापतिः। चाणूरश्चूर्णितो येन मुष्टिघातेन सद्बली ॥२२॥

गोवर्धनं धराधीशं समृद्धेऽहिमर्द्दकः। गोपालः स क्षितौ ख्यातमहावक्षाः सुरक्षकः ॥२३॥

ये यादवा रणे नष्टाः प्रविष्टा हुतभुक्चये। श्रूयन्ते तत्र जीवन्तः सुस्थिता जलधौ परे ॥२४॥

प्राभृतीकृत्य रत्नानि वैश्येनैकेन चक्रभृत्। यादवानां महाराज्यप्रभावश्च निवेदितः ॥२५॥

जरासंधः समाकर्ण्य यादवान्पाण्डवांस्थितान्। द्वारावत्यां महाक्रोधात्प्राहिणोत्प्रणिधीन्नृपान् ॥२६॥

अर्थ (श्लोक 21 से 26): उधर जरासंध का भेजा हुआ दूत दुर्योधन के पास गया और उसने दुर्योधन को प्रणाम कर उससे जरासंध के उद्देश्य को कह सुनाया। उसने कहा कि जिस बली ने दुर्द्धर विद्वान् और जरासंध के दामाद कंस का ध्वंस किया, जिसने अपने मुष्टि-प्रहार से चाणूर को चूर डाला और गोवर्द्धन नाम पहाड़ को उठा लिया वह साँपों का मर्दन करने वाला, प्रजा का सुरक्षक और महान् वक्षःस्थल वाला गोपालकृष्ण-संसार भर में विख्यात है। उसे सब जानते हैं और जो यादव युद्ध में भागकर आग में जल गये थे, सुना जाता है कि वे सब जीते हैं और पश्चिम की ओर वाले समुद्र में रहते हैं। यह सब हाल बहुत से रत्न वगैरह भेंट देकर वहीं से आये हुए एक वैश्य ने जरासंध चक्रवर्ती से कहा है। उसने कहा है कि द्वारिका में यादवों का बड़ा भारी राज्य है और वहाँ उनका पूरा-पूरा वैभव है। उसके मुँह से यादवों और पाण्डवों को द्वारिका में रहते हुए सुनकर जरासंध को बड़ा क्रोध आया ॥२१-२६॥ उसने नृपों के पास दूत भेजकर सब राजाओं को बुलाया। उनके निमंत्रण से सभी राजा सज


आकारिता नृपाः सर्वे प्रधानपुरुषोत्तमाः। संवत्सरेण चैकेन मिलितास्तत्र तेऽखिलाः ॥२७॥

दुर्योधन धराधीश प्रेषितोऽहं तवान्तिकम्। चक्रिणा कारणायैव गन्तुं कुरु मतिं विभो ॥२८॥

वाहिनीं विविधां वीरविशिष्टामिष्टचेष्टिताम्। सज्जीकृत्य समागच्छ स्वच्छे वत्स ममान्तिकम् ॥२९॥

इति लब्धमहादेशो रोमाञ्चितशरीरकः। कौरवोऽपूजयद्दूतं वसनैर्भूषणैर्धनैः ॥३०॥

अचिन्तयच्चिरं चित्ते यदिष्टं मनसि स्थितम्। तदेव चक्रिणानीतमिदानीमिति कौरवः ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 27 से 31): करके वहाँ इकट्ठे हो गये हैं। अतः हे दुर्योधन महाराज, आपको बुलाने के लिए भी चक्रवर्ती ने मुझे आपके पास भेजा है। इसलिए विभो, आप चलने की तैयारी कीजिए। स्वामिन्! चक्रवर्ती ने यह संदेशा भेजा है कि यशस्वी वत्स, वीरों से युक्त, इष्ट को साधने वाली अपनी सब सेना लेकर अति शीघ्र ही आइए। दूत के हाथ जरासंध के इस संदेश को पाकर आनन्द के मारे दुर्योधन के रोमाञ्च हो आये। खुशी में आकर उसने वस्त्राभूषण और धन देकर दूत का खूब आदर किया। वह मन ही मन सोचने लगा कि जिस बात को मैं पहले से ही चाहता था, उसी को चक्रवर्ती कर रहे हैं यह बहुत ही अच्छा हुआ ॥२७-३१॥


योद्धा दुर्योधनो धीमारणभेरीमदापयत्। सभ्यान्सभापतीन्क्षुब्धान्कुर्वन्तीं रणलालसान् ॥३२॥

मत्ता मतङ्गजाश्चेलुः कुथाच्छादितविग्रहाः। रथाः सारथिभिः शीघ्रं श्वेतवाजिविराजिताः ॥३३॥

चञ्चलास्तुरगाश्चेलुश्चलच्चामरर्चिताः। पूर्णाः पदातयश्चापि वरायुधसमुत्करैः ॥३४॥

चतुरङ्गबलेनामा समियाय स कौरवः। छादयन्नखिलं व्योम रेणुभिः सुखरोत्थितैः ॥३५॥

जरासंधं समापासौ वाहिन्या कौरवाग्रणीः। सुरापगाप्रवाहो वा सागरं सर्वतोऽधिकम् ॥३६॥

ततो मागधभूपेन मानितो बहुमानतः। कर्णेन कौरवः साकं भानुना किरणौघवत् ॥३७॥

अर्थ (श्लोक 32 से 37): इसके बाद वीर दुर्योधन ने उसी समय रणभेरी बजवाई। जिसे सुनकर रण की लालसा रखनेवाले वीर योद्धा बड़े प्रसन्न हुए। वे सब सेना को सजाकर चले। उनके साथ झूलों से प्रच्छन्न मतवाले हाथी चले। सारथियों के द्वारा तेजी से चलाये गये शीघ्रगामी घोड़ों वाले रथ चले। चलते हिलते हुए किसवार वाले चंचल घोड़े चले। हाथों में भाँति-भाँति के हथियार लिये हुए पयादे चले। इस प्रकार चतुरंग सेना सहित घोड़ों की टापों से उड़ती हुई धूल से आकाश की ढँकता हुआ दुर्योधन राज-मन्दिर पुर की ओर चला और जैसे गंगा का प्रवाह समुद्र में जाकर मिलता है वैसे ही वह कौरवाग्रणी वाहिनी-सेना सहित चक्रवर्ती जरासंध की सेना में आकर मिल गया। जरासंध ने उसका कर्ण-सहित बड़ा आदर किया जैसा के लोग सूरज के साथ किरणों को आदर करते हैं ॥३२-३७॥


पुनः संप्रेषयामास चक्री दूतं सुयादवान्। स दूतस्तत्र विज्ञप्तिमकरोदेत्य सत्वरम् ॥३८॥

आज्ञापयति चक्रीशो भवतो यादवान्प्रति। त्यक्त्वा देशं भवन्तोऽत्र कथं तस्थुर्महार्णवे ॥३९॥

अर्थ (श्लोक 38 से 39): इसके बाद चक्रवर्ती ने यादवों के पास द्वारिका को दूत भेजा। दूत ने जाकर वहाँ यादवों को यह सूचना दी कि आप सब यादवों पर चक्रवर्ती जरासंध यह आज्ञा करते हैं कि अपने देश को छोड़कर आप लोग इस समुद्र में क्यों रहते हैं? बुद्धिमान् समुद्रविजय और वसुदेव मुझे बहुत ही


समुद्रविजयो धीमान् वसुदेवोऽपि मत्प्रियः।
वञ्चयित्वा निजात्मानं कथं प्रच्छन्नतां गतौ ॥४०॥

यूयं सेवध्वमत्राहो विगर्वाः सर्वतश्च्युताः।
चक्रीशचरणद्वन्द्वं सर्वसातप्रदायकम् ॥४१॥

श्रुत्वा बली बलः क्रुद्धो जगादेति वचोहरम्।
कोऽन्यश्चक्री हरिं मुक्त्वा सेवको यस्य सागरः ॥४२॥

अर्थ (श्लोक 38 से 42): प्रिय हैं। फिर ये अपने आपको ठगकर यहाँ क्यों आ छिपे। इनके लिए ऐसी छिपने की बात ही क्या थी। अस्तु, अब भी कुछ गया नहीं है। वे अपने गर्व को छोड़कर सब सुख के देने वाले मेरे चरणों की सेवा करें। दूत के मुँह से जरासंध की इस आज्ञा को सुनकर बलशाली बलभद्र ने अभिमान के साथ में यों कहना आरम्भ किया कि दूत, जाओ और अपने महाराज से कह दो कि कृष्ण को छोड़ करके और दूसरा चक्रवर्ती नहीं जिसके चरणों की सागर (समुद्रविजय) सेवा करे ॥३८-४२॥


तच्छ्रुत्वा निजगादेति दूतो विस्फुरिताधरः।
यद्भयेन भवन्तोऽत्र प्रविष्टाः सागरान्तरे ॥४३॥

तत्पादसेवने कोऽत्र दोषः स कथ्यतां मम।
समागच्छति क्रुद्धोऽत्र धीरः श्रीमगधेश्वरः ॥४४॥

एकादशप्रमाख्याताक्षौहिणीभिः क्षितीश्वरः।
भवद्गर्वापहारं स करिष्यति हरन्मदम् ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 43 से 45): बलभद्र के इन वचनों को सुनकर ओठ डँसता हुआ दूत बोला कि मुझे यह तो बताइए कि जिसके भय से आप यहाँ समुद्र के बीच में आ छिपे है उसके चरणों की सेवा में दोष ही क्या है। अस्तु, आपकी जैसी इच्छा परन्तु आपके इस गर्व को कृष्ण नहीं सह सकता और वह क्रोध से तप्त होकर अभी यहीं आता है। उसके साथ में ग्यारह अक्षौहिणी सेना है। वह आपके गर्व को खर्व करेगा, आपको पद-च्युत करेगा ॥४३-४५॥


पाण्डवः प्रकटोऽवोचच्छ्रुत्वा तद्वचनं खरम्।
निस्सार्यतामयं दूतो जल्पाकश्च यदृच्छया ॥४६॥

वचोहरो वचः श्रुत्वा तस्य क्रुद्धो विनिर्गतः।
आचख्याविति चक्रेशं यादवानां महोन्नतिम् ॥४७॥

देव ते मन्वते त्वां न पीतमद्या इवोन्मत्ताः।
सद्यस्त्वत्सेवनामुक्ता वियुक्ताः शुभकर्मणा ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 46 से 48): दूत के ऐसे कठोर वचनों की सुनकर भीम को बड़ा क्रोध आया। वह प्रकट होकर बोला कि स्वतंत्रता से बकने वाले इस दूत को यहाँ से अभी निकाल दो। यह सुनकर दूत क्रोध के मारे उसी समय वहाँ से चल दिया और जरासंध के पास जाकर उसने उससे यादवों की गुजरी हुई सारी कहानी कह सुनाई। वह बोला कि देव, वे लोग मदिरा के नशे की भाँति मतवाले हो रहे हैं और को कुछ भी नहीं समझते हैं। महाराज, वे पुण्यहीन पापी हैं और इसलिए आपकी सेवा नहीं करना चाहते ॥४६-४८॥


श्रुत्वा वाक्यं धराधीशः क्रुद्धो निर्याणसंमुखः।
दुन्दुभिं दापयामास कुर्वन्तं बधिरा दिशः ॥४९॥

खेचराः खेचरन्तश्च वव्रिरे विपुलौदयाः।
विमानस्था नरेन्द्रं तं भास्वन्तमिव भानवः ॥५०॥

अर्थ (श्लोक 49 से 50): दूत के वचनों को सुनकर जरासंध को अत्यंत क्रोध आया और युद्ध के लिए उद्यत हो उसने सब दिशाओं को बहरा कर देने वाली रणभेरी बजवा दी, युद्ध की घोषणा कर दी। उसकी घोषणा को सुनकर आकाश मार्ग से जाते हुए बहुत से विद्याधरों ने आकर अपने विमानों से जरासंध को चारों ओर से घेर लिया ॥४९-५०॥ इस वक्त वह ऐसा शोभता था जैसा कि किरणों से घिरा हुआ सूरज शोभता है एवं कुमुद


नरेन्द्राश्चन्द्रसंकाशाः कुमुदोल्लासकारिणः। सदा ग्रहसमुत्तुङ्गा व्योमेव नृपमन्दिरम् ॥५१॥

आजग्मुस्तेजसा व्याप्तदिङ्मुखास्ते नरेश्वराः। सुगम्भीरामृतोल्लासाः सत्पथस्यावगाहनः ॥५२॥

द्रोणेन भीष्मभूपेन कर्णेन नृपरुक्मिणा। अश्वत्थाम्ना सुशल्येन जयद्रथमहीभुजा ॥५३॥

कृपेण वृषसेनेन चित्रेण कृष्णवर्मणा। रुधिरेणेन्द्रसेनेन हेमप्रभेण भूभुजा ॥५४॥

दुर्योधनधरेशेन दुःशासनमहीभुजा। दुर्मर्षणेन दुर्धर्षेण कलिङ्गभूभुजा ॥५५॥

एवमन्यैर्महीपालैः कुरुक्षेत्रमगान्नृपः। कम्पयन्वसुधां सर्वां पादभारेण निर्भरम् ॥५६॥

अर्थ (श्लोक 51 से 56): (कुमुदपुष्प और पक्ष में पृथ्वी) को विकसित करने वाले चन्द्रमा के जैसे बहुत से भूमिगोचरी राजा आये। वे राजनीति के अच्छे ज्ञाता और उसी के अनुसार चलने वाले थे। गंभीराशय और सब प्रकार सुख-सम्पन्न थे। उनका सुयश सभी दिशाओं में व्याप्त था। अतएव जैसे तारागण के द्वारा आकाश की शोभा होती है वैसे ही उनके द्वारा राज-मन्दिर की शोभा हो रही थी। इनके सिवा और भी बहुत से वीर राजे उसके साथ हुए। वे द्रोण, भीष्म, कर्ण, रुक्मी, शल्य, अश्वत्थामा, जयद्रथ, कृप, अर्जुन, चित्र, कृष्णकर्म, रुधिर, इन्द्रसेन, हेमप्रभ, भूभुज, दुर्योधन, दुःशासन, दुर्मर्षण, कलिंग आदि थे। इत्यादि अनेक राजाओं महाराजाओं के साथ अपने भार से सारी पृथ्वी को कँपाता हुआ जरासंध राजा कुरु-क्षेत्र के युद्ध-स्थल में जो उतरा ॥५१-५६॥


तदाकर्ण्य नृपाः केचित्पूजयन्ति स्म देवताः। अहिंसादिव्रतान्यन्ये जगृहुर्गुरुसंनिधौ ॥५७॥

मुञ्चताशु तनुत्राणं गृह्णीतासिलतां शिताम्। आरोपयन्तु चापौघान् संनह्यन्तां च सद्गजाः ॥५८॥

विधीयन्तां सुगन्धर्वा बद्धपर्याणपावनाः। भुञ्जतां भोगवस्तूनि युज्यन्तां वाजिभी रथाः ॥५९॥

एवं केचिज्जगुर्भूपा भृत्यान्स्वस्वाधिकारिणः। शस्त्रौद्यग्रहणोद्युक्तान्कुर्वन्तो वित्तदायिनः ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 57 से 60): उसके वहाँ आने के समाचार सुनकर जीवन से निराश हो बहुत से लोगों ने जाकर प्रभु की पूजा की और गुरु के निकट जाकर अहिंसा आदि व्रत ले वे विरक्त हो गये एवं बहुतों ने शस्त्र-ग्रहण के लिए उद्यत अपने अधीन सेवकों को धन आदि देकर उनसे कहा कि भृत्य-गण, अब शरीर-रक्षा की परवाह मत करो किन्तु हाथों में चमकती हुई तलवारें लो, धनुषों को चढ़ाओ, हाथियों को सजाओ, घोड़ों पर पलान वगैरह रखो और रथों में घोड़ों को जोतो ॥५७-६०॥


केशवस्य तदा दूतः कर्णाभ्यर्णं समाप्य च। नत्वा तं भक्तितोऽवोचद्विज्ञाप्यं श्रूयतामिति ॥६१॥

यद्युक्तं तद्विधातव्यं कर्ण संकर्ण्यतां क्वचित्। भविता केशवश्चक्री नान्यथा जिनभाषितम् ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 61 से 62): इसके बाद कृष्ण का दूत कर्ण के पास आया और उसे भक्तिभाव से नमस्कार कर बोला कि राजन्! नारायण का आपके लिए यह संदेश है कि राजन्! वही कीजिए जो आपको योग्य जान पड़े परन्तु मेरा तुमसे इतना ही कहना है कि कृष्ण थोड़े ही समय में नियम से चक्रवर्ती राजा बनेंगे। इसमें कुछ सन्देह नहीं क्योंकि जिन भगवान् का ऐसा ही कहना है और उनका कहा झूठ नहीं होता। अतः हे नृप! तुम कुरुजांगल देश का राज्य ग्रहण करो और झगड़े में न फँसो। तुम पाण्डु के पुत्र हो और


कुरुजाङ्गलराज्यं त्वं गृहाण सकलं नृप।
पाण्डोः पुत्र पवित्रात्मन् कुन्त्यां च भवदुद्भवः ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 61 से 63): कुन्ती से तुम्हारा जन्म हुआ है ॥६१-६३॥


भ्रातरः पाण्डवाः पञ्च तत्रागच्छ ततस्त्वकम्।
निशम्येति जगौ कर्णो दूताकर्ण्य मद्वचः ॥६४॥

अधुना गमनं नैव युक्तं मे न्यायवेदिनः।
न मुञ्चन्ति नृपा न्यायं रणे च समुपस्थिते ॥६५॥

रणे याते न मुञ्चन्ति मर्त्या भूपं सुसेवितम्।
मुञ्चन्ति चेत्कदाचिच्चान्यायोऽयं नरनिन्दितः ॥६६॥

निवृत्ते संगरे नूनं राज्यं दास्यामि कौरवम्।
पाण्डवेभ्यः प्रचण्डेभ्य इति त्वं याहि संगरात् ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 64 से 67): इस कारण पाँचों पाण्डव तुम्हारे भाई हैं। यह सुन कर्ण ने उत्तर में कहा कि दूत, मेरी बात सुनो। न्याय के कारण मुझे इस वक्त यहाँ से वहाँ जाना योग्य नहीं है। नीति यही है कि युद्ध छिड़ जाने पर राजा लोग न्याय को नहीं छोड़ते और इसी तरह सुसेवित भूप को युद्ध-समय में भृत्य-गण भी नहीं छोड़ते और जो ऐसा करते हैं समझो कि वह अन्याय करते हैं। लोग उनकी निंदा करते हैं। हाँ, इतना मैं अवश्य करूँगा कि युद्ध बन्द हो जाने पर बलवान् पाण्डवों को कौरवों से राज्य नियम से दिला दूँगा। इसमें तुम तनिक भी सन्देह मत करो ॥६४-६७॥


इत्युक्तो निर्गतो दूतो जरासंधं सकौरवम्।
गत्वा नत्वा स विज्ञप्तिं चर्करीति स्म चक्रिणम् ॥६८॥

संधिं कुरु जरासंध यादवैः समहोदयैः।
अन्यथाकर्णय त्वं हि जिनोक्तं सत्यसंयुतम् ॥६९॥

केशवादभविता तेऽत्र पञ्चता परमाहवे।
गाङ्गेयस्य गुरोर्ज्ञेयं खण्डनं तु शिखण्डिनः ॥७०॥

धृष्टार्जुनेन धृष्टेन द्रोणस्य मरणं मतम्।
युधिष्ठिरेण शल्यस्य भीमाद् दुर्योधनस्य च ॥७१॥

जयद्रथस्य पार्थेशादभिमन्युकुमारतः।
कुरुपुत्रान्मृतान्र्विद्धि विधिचेष्टा नृपेदृशी ॥७२॥

इति यद्गदितं सद्यो मया निश्चिनु निश्चितम्।
सत्यं न चान्यथाभावं भजते मगधाधिप ॥७३॥

इत्युक्त्वा निर्गतस्तस्माद् ध्रुवं द्वारावतीं पुरीम्।
गत्वा नत्वा हृषीकेशमवोचत वचोहरः ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 68 से 74): यह कहकर उसने दूत से चले जाने के लिए कहा। दूत भी वहाँ से चलकर कौरवों-सहित बैठे हुए जरासंध के पास पहुँचा। वहाँ उसने जरासंध को नमस्कार कर यह कहा कि राजन् जरासंध! आप महाभाग यादवों के साथ सन्धि कर लीजिए। नहीं तो जिनदेव की यह सच्ची वाणी सुनिए कि “इस महायुद्ध में कृष्ण के हाथ से आपकी मृत्यु होगी। पितामह की मृत्यु शिखण्डी के हाथ से होगी और धृष्टार्जुन के हाथ से द्रोणाचार्य की मृत्यु होगी। इसके सिवा शल्य का युधिष्ठिर के हाथ से और दुर्योधन का भीम के हाथ से मरण होगा और इसी प्रकार जयद्रथ का अर्जुन के हाथ से और कुरु-पुत्रों का अभिमन्यु कुमार के हाथ से वध होगा। इसमें तुम तनिक भी सन्देह न करो क्योंकि भवितव्य ही ऐसा है।” यह कहकर दूत अति शीघ्र द्वारिका पहुँचा। वहाँ उसने कृष्ण को प्रणाम कर कहा कि देव, जरासंध की सुदारुण सेना कुरु-क्षेत्र में पहुँच चुकी है और कर्ण किसी तरह भी यहाँ आना स्वीकार नहीं करता। वह युद्ध-स्थल में उपस्थित है ॥६८-७४॥


देव तद्वाहिनी प्राप्ता कुरुक्षेत्रं सुदारुणम्।
कर्णो नायाति वैकुण्ठ संकटे समुपस्थितः ॥७५॥

अर्थ: देव, अब आपको भी कुरु-क्षेत्र में पहुँच कर इस महायुद्ध में शत्रु-योद्धाओं के साथ-घोर


त्वया देव प्रगन्तव्यं कुरुक्षेत्रे विचित्रिते। शत्रुभिस्तत्र योद्धव्यं त्वया योधैर्महारणे ॥७६॥

निशम्येति तदा विष्णू रणातोद्यप्रणोदितः। पाञ्चजन्यप्रणादेन ययौ धुन्वन्नभोऽङ्गणम् ॥७७॥

स्थलीकुर्वञ्जलं रम्यं जलीकुर्वन्स्थलं बलम्। चचाल चालयन्कुल्यानचलानचलाससम् ॥७८॥

रणोत्थरेणुना व्याप्तं पुष्करं सूरहारिणः। चतुरङ्गबलेनापि भूतलं विपुलं खलु ॥७९॥

आतोद्यवृन्दनादेन दिशां वृन्दं विजृम्भितम्। दिग्गजाः सज्जिताः सर्वेऽभूवन्सगर्जंबृंहितैः ॥८०॥

अगण्या ध्वजिनी धौर्या यादवीया महोदया। कुरुक्षेत्रबहिर्भागे स्थापिता यदुनायकैः ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 75 से 81): युद्ध करना होगा। इसके बाद ही रणभेरी दिलवाकर अपने पाँचजन्य शंख के नाद से आकाश को कँपाता हुआ कृष्ण कुरुक्षेत्र को चले और जल को थल और थल को जल करती हुई उसकी सेनायें चलीं। जान पड़ता था मानों पृथ्वी के साथ-साथ नहरें ही बहती हुई चली जा रही हैं। इस समय सेना के द्वारा उड़ी हुई धूल से सारा आकाश ढँक गया। सूरज कहीं दिखाई ही न देता था। कृष्ण की अनंत चतुरंग सेना से सारा भूतल भर गया। बाजों की आवाज से दिशायें शब्द-मय हो गई। सजे हुए दिग्गज चिंघाड़ने लगे। इस प्रकार अपनी सेना को ले जाकर यादवों ने उसे कुरु-क्षेत्र के बाहरी भाग में ठहराया ॥७५-८१॥


तदा मागधसत्सैन्ये दुर्निमित्तानि निश्चितम्। अजायन्त जयाभावसूचकानि पुनः पुनः ॥८२॥

रवेर्ग्रहणमाभेजे व्योम्नि विश्वभयावहम्। वारिदैर्वारिधाराभिर्व्यानशे तस्य वाहिनी ॥८३॥

ध्वाङ्क्षा ध्वजेषु पूर्वाह्ने रटन्ति रविसम्मुखाः। गृध्राः क्रुद्धाः स्थिता दृष्टाश्छत्राद्युपरि दुर्धराः ॥८४॥

दुर्निमित्तानि संवीक्ष्य विचक्षणं क्षणावहम्। मन्त्रिणं प्राह दुर्बोध्यो दुर्योधनमहीपतिः ॥८५॥

उन्मील्यन्ते महामन्त्रिन्दुर्नमित्तानि भूरिशः। सोऽवोचत्कुरुक्षेत्राख्यमिदं किं न श्रुतं त्वया ॥८६॥

सर्वं गिलिष्यति क्षेत्रं तिमिंगिल इवोन्नतम्। पुनः स कौरवोऽभाणीन्मन्त्रिन्ब्र्याहि ममेप्सितम् ॥८७॥

विपक्षवाहिनी मन्त्रिन्कियन्मात्राभिमन्त्रयते। योद्धारो युद्धसंनद्धाः कियन्तः सन्ति सन्नराः ॥८८॥

अर्थ (श्लोक 82 से 88): इस वक्त जरासंध चक्री की सेना की हार के सूचक बार-बार बहुत से अपशकुन हुए और इसी समय संसार को भय उत्पन्न करने वाला आकाश में सूर्यग्रहण पड़ा। मेघ ने जल बरसा कर उसकी सारी सेना को जल से पूर्ण कर दिया। सेना की ध्वजाओं पर सूरज की ओर मुँह कर बैठे हुए कौए बोले। छत्रों के ऊपर क्रोध से भरे हुए दुर्द्धर गीध पक्षी बैठे देख पड़े। इन अपशकुनों को देखकर दुर्बोध्य दुर्योधन ने अपने सुचतुर मंत्री को बुलाकर पूछा कि मंत्री महोदय, ये खोटे निमित्त क्यों देख पड़ रहे हैं। इस पर मंत्री ने कहा कि देखो, यह वह भयानक कुरुक्षेत्र है जो मछली की तरह सबको निगल जायेगा। अच्छी बात है, कहकर दुर्योधन ने फिर पूछा कि मंत्री महाशय, मतलब की बात बताइए कि शत्रु की सेना कितनी है और युद्ध के लिए उद्यत योद्धा कितने हैं ॥८२-८८॥


स जगौ शृणु राजेन्द्र ये नृपा बलसंकुलाः। दाक्षिणात्याः क्षितीशाश्च तेऽभूवन्विष्णुसेवकाः ॥८९॥

अर्थ: मंत्री ने कहा कि राजेन्द्र, बलशाली दक्षिण के जितने राजा हैं वे सब नारायण के सेवक हो चुके हैं। रण में नष्ट होने वाले बहुत से राजाओं से तो क्या हो सकता है, पर उनमें एक ही अर्जुन


अथवा बहुभिः साध्यं नृपैः किं रणनाशिभिः।
धनंजयेन चैकेन पूर्यतां पूर्यतामिति ॥९०॥

चूर्यन्ते येन पार्थेन सन्नरा रणचञ्चवः।
न शक्नुवन्ति तं विष्णुं वारयितुं सुरा नराः ॥९१॥

बलः प्रविपुलो चान्यान्मुशलेन हलेन च।
दच्यूदराणि दीप्रेण दारयत्येव दुर्धरः ॥९२॥

प्रज्ञप्तिप्रमुखा विद्याः समर्थाः शत्रुशातने।
सिद्धा यस्य स्मरः केन वार्यते स रणाङ्गणे ॥९३॥

पावनिः पावनो भूमौ पातयन्योऽरिसंहतिम्।
तं निवारयितुं शक्यः कोऽस्ति सद्गदयाङ्कितम् ॥९४॥

एवमन्ये महीपालास्तद्बले बलशालिनः।
खेचराः संचरन्त्यत्र संख्यातीता महाहवे ॥९५॥

स सप्ताक्षौहिणीयुक्तो विष्णुरास्ते निरस्तद्विट्।
निशम्येति स चक्रेशमगदीत्कौरवाग्रणीः ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 89 से 96): ऐसा है जो सबसे समझ लेगा। उसने पहले भी रण में झूठ ही वीरता की डींग हाँकने वाले बहुत से वीरों को चूर डाला था। सच तो यह है कि विष्णु को कोई देवता या मनुष्य युद्ध में जीत नहीं सकता। आप जानते हैं हरि के पक्ष में बलभद्र है, जो मूशल और हलों की मार से बैरियों के उदर फाड़ डालता है-उसके सामने कोई भी नहीं उठ सकता, वह बड़ा दुर्धर है और उस प्रद्युम्न को रणांगन में कौन निवार सकता है जिसे कि शत्रु का विध्वंस करने वाली प्रज्ञप्ति आदि विद्याएँ सिद्ध हैं तथा उस पवित्र भीम को अपनी छाती पर से कौन हटा सकता है जो शत्रु-समूह को बात ही बात में ही धराशायी कर देता है। इस प्रकार के हरि की सेना में और भी बलशाली विद्याधर राजा हैं जो असंख्य हैं और महायुद्ध में इधर से उधर घूमते हुए दिखाई दे रहे हैं। राजन्, शत्रुघातक विष्णु के पास सात अक्षौहिणी सेना है ॥८९-९६॥


श्रुत्वेति च जरासंधो मदान्धः क्रूरमानसः।
जगाद गरुडात्किं हि फणी फूत्कुरुते कियत् ॥९७॥

भासते किं तमोभारो विभाकरसुभानुतः।
पुरस्तान्मम भूपालास्तथा तिष्ठन्ति किं पुनः ॥९८॥

भणित्वेति त्रिखण्डेशः खण्डयन्खण्डिताशयान्।
अखण्डचण्डकोदण्डप्रचण्डो रणमाययौ ॥९९॥

अर्थ (श्लोक 97 से 99): दुर्योधन ने सब हाल जरासंध से कहा परन्तु तब भी वह कुछ न चेता और क्रोध में भर कर उस मदांध ने कहा कि ओह, गरुड़ के सामने साँप कितना फण फटकारेगा। क्या सूरज की किरणों के आगे अँधेरा कहीं ठहर सकता है? वैसे ही ये राजा-गण मेरे सामने भी कैसे ठहर सकेंगे। यह कहकर तीन खण्ड का स्वामी प्रचंड आत्मा जरासंध कायरों का खण्डन करता हुआ अखण्ड और प्रचंड धनुष को हाथ में ले रण-स्थल की ओर रवाना हुआ ॥९७-९९॥


आतोद्यैश्च दिशां नाथान्नर्तयन्तो नभोऽङ्गणम्।
सुच्छत्रैश्छादयन्तस्ते नृपा योद्धुं समुद्ययुः ॥१००॥

अपृथ्वीयत द्योभागः सैन्योत्थरेणुसंचयैः।
अराहूयत सूर्योऽपि स्थगितश्छत्रसद्ध्वजैः ॥१०१॥

रेणुना तमसेवाशु तदा व्याप्तं रणाङ्गणम्।
तूर्यनादच्छलात्सैन्यानीत्युवाच महाहवः ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 100 से 102): फिर क्या था, बाजों के शब्दों के द्वारा दिशाओं को पूरते हुए और छत्रों के द्वारा आकाश को ढँकते हुए राजा लोग भी युद्ध के लिए उद्यत हो चले। इस वक्त सेना के द्वारा उड़ी हुई धूल के द्वारा आकाश व्याप्त हो गया, छत्र और ध्वजाओं के मारे सूरज का प्रकाश रुक गया और रात-सी जान पड़ने लगी। धूल के मारे सारा रणांगण अंधकारमय बन गया। इस समय के बाजों के नाद से ऐसा जान पड़ता था मानों शब्द के बहाने से महायुद्ध सैनिकों से यही कहता है कि सैनिकों, तुम लोग


यात यात रणात्सैन्या भवतां तूर्णमारकात्।
इत्येवं वारिता योधा युद्धार्थं धृतिमाययुः ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 100 से 103): युद्ध-स्थल छोड़ कर जल्दी चले जाओ, नहीं तो तुम पर बड़ी भारी विपत्ति आने वाली है ॥१००-१०३॥


जरासंधः स्वसैन्येऽस्मिंश्चक्रव्यूहमकारयत्।
तार्क्ष्यध्वजः स्वसेनायां तार्क्ष्यव्यूहमरीरचत् ॥१०४॥

घोरान्धकारिते सैन्ये तयो रेणुभिरुत्थितैः।
कोकयुग्मानि सूर्यास्तशङ्कया नीडमाश्रयन् ॥१०५॥

ध्वाङ्क्षारयो निशां मत्वा पूत्कुर्वाणा भटस्वरान्।
उत्तस्थुरनुकुर्वन्त इव घस्रेऽपि संगरम् ॥१०६॥

निष्कास्यासीन्स्वयं स्यन्ति सुभटाः सुभटारणे।
कुन्ताग्रेण च कृन्तन्ति मूर्ध्नो वल्लीगणानिव ॥१०७॥

गर्जन्तो गर्जघातेन घ्नन्ति केचिद् घनानिव।
वायवोऽत्र विपक्षाणां हृदयानि मदावहाः ॥१०८॥

छित्त्वा कुम्भस्थलान्याशु कुम्भिनां ककुभः पराः।
कुङ्कुमेनेव कुर्वन्ति रक्तास्तद्रक्तधारया ॥१०९॥

अर्थ (श्लोक 104 से 109): इसके बाद जरासंध ने अपनी सेना में चक्र-व्यूह रचा और कृष्ण ने अपनी सेना में तार्क्ष्य-व्यूह को रचा। उस समय उभय पक्ष की सेनाओं में इतनी धूल उड़ी कि सब जगह घोर अन्धकार छा गया। जिससे सूरज के अस्त की शंका से कौए घोंसलों में घुस गये और उल्लू पक्षी रात समझ कर अपने घू-घू शब्द के द्वारा भटों के स्वरों की नकल करते हुए दिन में ही उड़ने लगे। थोड़ी देर में दोनों सेनाओं का घोर युद्ध शुरू हो गया। इस रण में सुभट-गण तलवारें निकाल-निकाल कर सुभटों को मारते थे और भालों की तीक्ष्ण नोकों से फल की तरह शत्रुओं के सिर छेदते थे। कोई मतवाले जोर की गर्जना करते हुए अपनी गर्जना के आघात से ही शत्रुओं के हृदयों को भेदते थे, जैसे वायु मेघों को भेदता है। कोई हाथियों के कुम्भों को विदार कर उनके रक्त की धारा से केसर की भाँति दिशाओं को लाल करते थे ॥१०४-१०९॥


तदा चक्रिबलेनाशु संभग्नं वैष्णवं बलम्।
यथा जलप्रवाहेण ज्वलनो ज्वालान्यरान् ॥११०॥

तदा शम्बुकुमारोऽपि धीरयन्धारयन्निजान्।
भटान्यरान्विभज्याशु रणं कर्तुं समुद्यतः ॥१११॥

क्षेमविद्धः सुसंनद्धः खेचरः शम्बभूभुजा।
युध्यमानो रथत्यक्तः कृतो भूमौ पलायितः ॥११२॥

तावदन्यः समुत्तस्थे खगो विद्याविशारदः।
योद्धुं शम्बेन निस्त्रिंशैर्वारितोऽपि पलायितः ॥११३॥

अर्थ (श्लोक 110 से 113): इस वक्त जरासंध की सेना ने विष्णु की सेना को कुछ ठंडा कर दिया, जैसे जलप्रवाह जलती हुई आग को ठंडा कर देता है। यह देख अपनी सेना के योद्धाओं की धीरज देता हुआ शंबुकुमार युद्ध के लिए उद्यत हुआ और उसने शत्रु-दल के योद्धाओं को वीरता से इधर-उधर भगा दिया। तब शंबुकुमार के साथ युद्ध करने को क्षेमविद्ध नाम एक विद्याधर उठा। शंबु ने उसे बात की बात में ही रथ-विहीन कर दिया। अपनी दुर्दशा देख वह उसी वक्त भाग गया। इसके बाद शंबु के साथ युद्ध करने को एक दूसरा विद्याधर उठा और वह तलवारों द्वारा युद्ध करने लगा परन्तु शंबु ने उसे भी वारण कर भगा दिया ॥११०-११३॥


कालसंवरभूमीशस्तदायाद्धतकङ्कट।
विपक्षान्विमुखान्संख्ये कुर्वन्कौतुकसंगतः ॥११४॥

अर्थ: इसके बाद युद्ध में शत्रुओं को पछाड़ देने वाला कालसंवर राजा बड़े साहस के साथ युद्ध में आया। यह देख सूरज की भाँति दीप्तिशाली प्रद्युम्न शंबु को युद्ध करने से रोककर स्वयं मेघ जैसे


तदा शम्बं निवार्याशु प्रद्युम्नो द्युम्नदीधितिः।
मेघौघ इव संवर्षन्नाययौ शरधारया ॥११५॥

बभाण खचरं मारः पितृतुल्यो भवानिह।
योद्धुं युक्तं त्वया साकं नातस्तेन निवर्त्यताम् ॥११६॥

नावाच्यं मार सोऽवोचत्स्वामिकार्यसुकारिणः।
सेवकाः सन्ति तेन त्वं संधानं धन्वनः कुरु ॥११७॥

तदा मारो विमोच्याशु प्रज्ञप्तिं कालसंवरम्।
विबन्ध्य स्वरथे चक्रे युध्यमानः परैर्भटैः ॥११८॥

अर्थ (श्लोक 114 से 118): जल वर्षते हैं वैसे ही शर-धारा को छोड़ता हुआ उसके सामने आया। उसने कालसंवर से कहा कि प्रभो, आप मेरे पिता तुल्य हैं, इसलिए आपके साथ युद्ध करना मुझे उचित नहीं है, अतः आप लौट जाइए। उत्तर में उसने कहा कि प्रद्युम्न यह न कहो, मैं क्षत्रिय हूँ, वापस नहीं लौट सकता क्योंकि वे ही सच्चे सेवक कहाते हैं जो जी-जान से स्वामी के कार्य में काम आते हैं। इस लिए वीर, तुम कुछ ख्याल न करके धनुष संधान करो। अन्त में लाचार हो प्रद्युम्न ने प्रज्ञप्ति विद्या को छोड़कर उसी समय कालसंवर को बाँध लिया और शत्रु-दल के योद्धाओं के साथ युद्ध करते हुए उसे अपने रथ में बैठा लिया ॥११४-११८॥


शल्यखेटस्तदायासीत्प्रद्युम्नं योद्धुमुद्यतम्।
मारः शरसमूहेन तस्य चिच्छेद स्यन्दनम् ॥११९॥

खेटोऽन्यरथमारुह्य तेन चक्रे महारणम्।
शिशुपालानुजः प्राप्तः कर्तुं मारणसंगरम् ॥१२०॥

मारो हतस्तु बाणेन यथा तेन विमूर्च्छितः।
रथं बभञ्ज कामस्य स शरैः शत्रुभेदकैः ॥१२१॥

अर्थ (श्लोक 119 से 121): यह देख शल्य विद्याधर प्रद्युम्न के साथ युद्ध करने को उद्यत होकर आया। प्रद्युम्न ने उसे आते ही अपने तीक्ष्ण बाणों के द्वारा उसके रथ को छेद डाला। तब वह दूसरे रथ पर सवार होकर उसके साथ घोर संग्राम करने लगा। इसी बीच में प्रद्युम्न के साथ युद्ध करने के लिए शिशुपाल राजा का छोटा भाई तैयार हुआ और उसने प्रद्युम्न पर एक ऐसा बाण छोड़ा जिससे वह मूर्छित होकर वे-सुध हो गया। फिर क्या था, अवसर पाकर उसने शत्रु का ध्वंस करने वाले बाणों के द्वारा प्रद्युम्न का रथ भी तोड़ ताड़ डाला ॥११९-१२१॥


सारथिर्भयसंत्रस्तस्तदा तस्थौ समुत्थितः।
कामः स्वसारथिं स्वस्थो जगाद गुरुसद्गुणः ॥१२२॥

इत्थं कृते रणे क्षत्तो लज्यते सुरसंसदि।
मर्त्येषु खेचरेशेषु लज्यते पाण्डवेष्वपि ॥१२३॥

दशार्हेषु विशेषेण लज्यते बलकृष्णयोः।
अनेनाशुचिदेहेन किं साध्यं दुःखकारिणा ॥१२४॥

सरसाहारतः पुष्टे शरीरे को गुणो भवेत्।
इत्युक्त्वान्यरथे स्थित्वा मन्मथः संस्थितो रणे ॥१२५॥

अर्थ (श्लोक 122 से 125): यह देख प्रद्युम्न का सारथी बड़ा डरा और उसने भागना चाहा परन्तु इसी समय प्रद्युम्न ने होश में आकर सारथी से कहा कि यह क्या करते हो? युद्ध-स्थल से भागने का विचार भी किया तो देवताओं, मनुष्य, विद्याधर, पाण्डव, समुद्रविजय आदि यादवों और खास कर कृष्ण, बलभद्र के आगे बड़ा लज्जित होना पड़ेगा-सिर उठाना मुश्किल पड़ जायेगा। फिर इस दुखदायी और अशुचि शरीर से बन ही क्या पड़ेगा और रसीले आहार से पोषे गये इससे लाभ ही क्या होगा। यह कहकर शीघ्र ही प्रद्युम्न दूसरे रथ पर सवार हो युद्ध के लिए उठ खड़ा हुआ। फिर क्या था, वे दोनों ही युद्ध-कुशल योद्धा युद्ध करने लगे। उनको युद्ध करते देखकर कृष्ण के मन में भी कुछ क्षोभ पैदा हो उठा और


पुनस्तौ संगरे लग्नौ योद्धुं संग्रामकोविदौ। वीक्ष्य क्षिप्तमना विष्णुरन्तरेऽस्थात्तयोरपि ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 122 से 126): वह उन दोनों के बीच में आ गया ॥१२२-१२६॥


तदा शल्यः समायासीत्खगः श्रीमद्गधेशिनः। ब्रुवन्निति हनिष्यामि शरैः शत्रून्समुद्धतान् ॥१२७॥

तदा खगेन संछन्नं निखिलं व्योम निश्चलम्। केनापि खलु नो दृष्टा रथसारथिकेशवाः ॥१२८॥

शरपञ्जरमध्यस्था इव जीवितसंशयाः। नरैर्दृष्टाः क्षणे तस्मिन्कश्चिदायान्नरः परः ॥१२९॥

अर्थ (श्लोक 127 से 129): तब जरासंध की पक्ष का शल्य नाम विद्याधर यह कहता हुआ युद्ध-स्थल में उतरा कि मैं इन उद्धत शत्रुओं को अपने बाण-प्रहार से अभी धराशायी किये देता हूँ। ये अब जीवित नहीं रह सकते। इसके बाद उसने थोड़ी ही देर में अपने बाणों से सारा आकाश ढँक दिया और इसी कारण उस वक्त किसी को भी न नारायण देख पड़ता था और न उसका रथ तथा सारथी ही देख पड़ते थे। देख पड़ता था तो सिर्फ शरों के बीच में कृष्ण फँसा हुआ सा देख पड़ता था, उसके जीवित में भी लोगों को संशय होता था और यही उसके सारथी की भी हालत थी ॥१२७-१२९॥


पथकल्पनया क्लृप्तो रुधिरारुणसत्तनुः। कम्पमानो नरोऽवोचत्केशवं कलितं नृपैः ॥१३०॥

मुरारे किं वृथा युद्धं कुरुषे पाण्डवा हताः। दशार्हाश्चक्रिनाथेन बलभद्रो हतो रणे ॥१३१॥

अन्येऽपि रणशौण्डीरा जरासंधेन ते हताः। द्वारावती गृहीता च वैरिणा तव निश्चितम् ॥१३२॥

द्वारावतीपुरीस्थोऽपि सत्सिन्धुविजयो महान्। रणातिथ्येऽरिभिस्तूर्णं प्रेषितो यममन्दिरम् ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 130 से 133): इसी बीच में वहाँ एक मनुष्य आया जो मायामय था, रुधिर से जिसका शरीर लाल हो रहा था और जो थर-थर काँप रहा था। उसने आकर बहुत से राजाओं से घिरे हुए कृष्ण से कहा कि कृष्ण, तुम व्यर्थ ही क्यों युद्ध करते हो। उधर जरासंध ने पाण्डव, यादव और बलभद्र का काम तमाम कर दिया है। इतना ही नहीं किन्तु उसने और-और रणशौंडीरों को भी काल के गाल में पहुँचा दिया है, तुम्हारी द्वारिका पुरी पर भी अधिकार जमा लिया है और द्वारिका में सुखासन समुद्रविजय को भी रण का आतिथ्य देकर यमालय का अतिथि बना दिया है ॥१३०-१३३॥


वृथा किं म्रियसे नाथ रणाद्याहि सुखेच्छया। मायानरवचः श्रुत्वा क्रुद्धः प्रोवाच माधवः ॥१३४॥

मयि जीवति को हन्तुं क्षमो रे दुष्ट यादवान्। इति तद्वचसा मायानरो नष्टः प्रबुद्धधीः ॥१३५॥

स कोदण्डं करे कृत्वा केशवो वैरिणोऽचलत्। तावन्निशाचरो भूत्वा कश्चिदायाद् भयप्रदः ॥१३६॥

किं युध्यसे त्वमत्राहो वसुदेवो नभोऽङ्गणे। पतितस्तं विना खेटाश्चेलुः संगरभूमिषु ॥१३७॥

अर्थ (श्लोक 134 से 137): फिर नाथ, आप भी यहाँ व्यर्थ अपने प्राण क्यों गँवाते हैं! अतः यदि आप को सुखी होने की वाञ्छा हो तो आप रण-स्थल छोड़ कर चले जाइए। उस मायामय पुरुष के इस प्रकार के वाक्यों की सुन कर कृष्ण को बड़ा क्रोध आया। वह बोला कि दुष्ट, मेरे जीते रहते हुए ऐसी शक्ति किस पुरुष में है जो यादवों को यमालय का अतिथि बनाये। कृष्ण के ऐसे विकट वचनों को सुन कर वह दुष्ट बुद्धि-माया-मय पुरुष उसी समय वहाँ से भाग गया और कृष्ण हाथ में धनुष उठाकर शत्रुओं की ओर चला। रास्ते में कृष्ण को एक निशाचर मिला, जिसे देखकर बड़ा भय लगता था। वह कृष्ण से बोला कि कृष्ण, तुम तो यहाँ युद्ध करते हो और उधर वसुदेव युद्ध में मारा गया है। उसके बिना


इत्युक्त्वा वृक्षविशिखमक्षिपत्स जनार्दनम्। विष्णुना शिखिबाणेन भिद्यते स्म द्रुमाशुगः ॥१३८॥

अर्थ (श्लोक 134 से 138): सारे विद्याधर युद्धस्थल से चले जाने को तैयार हो रहे हैं। यह कहकर छल से उसने कृष्ण पर वृक्ष बाण छोड़ा, जिसको विष्णु ने अग्नि-बाण के द्वारा उसी वक्त जला दिया ॥१३४-१३८॥


खेचरेण क्षणात्क्षिप्तः क्ष्माभृद्बाणो दृषत्प्रदः। हरिणाशनिबाणेन स रुद्धः प्रपलायितः ॥१३९॥

तदा नरैः सुरैः सर्वैः शंसितो विष्टरश्रवाः। पुनः सोऽपि हरिं नत्वा बभाण भुवि संभ्रमन् ॥१४०॥

द्वितीयोऽयं नरेन्द्रात्र खगो यावच्छिनत्ति न। ध्वजं छत्रं रथं वापि तावत्त्वं याहि संगरात् ॥१४१॥

निष्कारणं कथं कृष्ण करिष्यसि महार णम्। जरासंधशिरः शीघ्रं लुनीहि निजचक्रतः ॥१४२॥

यशोऽर्जय जगत्यत्र वृथा किं लोकमारणैः। निशम्येति जगादैवं माधवः क्रुद्धमानसः ॥१४३॥

वराको निर्जितो यावन्मया नायं महारणे। जीयते किं जरासंधस्तावत्किं भुज्यते मही ॥१४४॥

इत्युक्त्वा हरिणा खेटः शल्येन नन्दकासिना। द्विधाकृत्य हतो भूमौ पपात प्राणवर्जितः ॥१४५॥

लक्षितं जयलक्ष्म्या तं पुष्पवृष्टिं ववर्ष च। सुरसंघः स्वविघ्नौघघातकं मधुसूदनम् ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 139 से 146): इसके बाद उस विद्याधर ने पत्थरों को गिराने वाला क्ष्माभृत् बाण छोड़ा और हरि ने उसे वज्रबाण से वारण कर दिया। आखिर कृष्ण के सामने वह विद्याधर न ठहर सका और भाग गया। यह देख उस वक्त नर, सुर आदि सबने कृष्ण की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। इसी समय उस विद्याधर ने आकर जो पहले निशाचर के रूप में था, कृष्ण को प्रणाम करके कहा कि नरेन्द्र, जब तक मैं इस विद्याधर के साथ युद्ध करता हूँ तब तक आप उधर जाकर अपने चक्र के द्वारा जरासंध का सिर छेद डालिए और संसार में अपना यश विस्तृत कीजिए। व्यर्थ ही औरों को मारने से क्या होगा। यह सुन कर क्रोध में आ कृष्ण ने कहा कि इस महायुद्ध में जब तक मैं इसे न जीत लूँगा तब तक कैसे तो जरासंध जीता जायेगा और कैसे पृथ्वी भोगी जा सकेगी। यह कहकर हरि ने शल्य के साथ-साथ उस विद्याधर को भी दो टूक करके प्राण रहित कर दिया, जिससे कि वह उसी समय धराशायी हो गया। इसके साथ ही मधुसूदन के हाथ में जय-लक्ष्मी आ गई और उसके सब विघ्न नष्ट हो गये। इस समय उसके ऊपर देवताओं ने पुष्पों की बरसा की ॥१३९-१४६॥


हरिणाथ बलः प्रोक्तश्चक्रव्यूहस्तु दुर्धरः। भिद्यते समुपायेन केन संचिन्त्यतां लघु ॥१४७॥

विष्णुस्ततस्त्रिभिः शूरैर्गत्वा संगरसंगी। चक्रव्यूहं बभञ्जाशु दम्भोलिः पर्वतं यथा ॥१४८॥

जरासंधस्तदा क्रुद्धो भटान्दुर्योधनादिकान्। त्रीन्ररान्प्रेषयामास शत्रुसंघातहानये ॥१४९॥

पार्थो दुर्योधनेनामा रथेनेमिर्महाहवे। विरूप्येन च सेनान्या युयुधे धर्मनन्दनः ॥१५०॥

अर्थ (श्लोक 147 से 150): इसके बाद चक्रव्यूह भेदने के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ कृष्ण ने तीन शूरवीरों को अपने साथ में लिये और जाकर थोड़े ही समय में जरासंध का चक्रव्यूह भेद दिया, जैसे वज्र पहाड़ को भेद डालता है। यह देख जरासंध को बड़ा क्रोध आया। उसने शत्रु का नाश करने के लिए दुर्योधन आदि तीन योद्धाओं को भेजा। तब दुर्योधन के साथ पार्थ, विरूप्य के साथ रथेनेमि और हिरण्यनाभ के साथ युधिष्ठिर उधर से भी महायुद्ध करने को उद्यत हुए। ये सब युद्ध-प्रवीण योद्धा हुंकार शब्द करते हुए परस्पर में युद्ध


परस्परं तदा लग्ना भटा हुंकारकारिणः।
चूर्णयन्तो गजानश्वान्रथान्युयुधिरे चिरम् ॥१५१॥

शूरास्तदा सुसंबद्धाः कातराश्च पलायिताः।
नारदाद्याः सुरौघेण जहर्षुर्नटनोद्यताः ॥१५२॥

अर्थ (श्लोक 147 से 152): करने लगे। उन्होंने बहुत देर तक युद्ध किया और बहुत से घोड़े, हाथी और रथों को चूर डाला। उनके उस वक्त के युद्ध को देखकर शूरवीर तो युद्ध को तैयार हुए और कायर भागने के लिए मार्ग शोधने लगे ॥१४७-१५२॥


दुर्योधनो जगौ पार्थं त्वं वह्नौ भस्मितो मया।
वृथा वहसि किं गर्वं निर्लज्जः किं नु सज्जितः ॥१५३॥

धनुरास्फालयामास पार्थः श्रुत्वा स्फुरद्गुणम्।
गर्जन् प्रलयकालस्य मेघौघ इव विघ्नहृत् ॥१५४॥

आच्छाद्य शरसंघातैः कौरवं स धनंजयः।
चिच्छेद तद्धनुर्मध्ये जालंधरः समाययौ ॥१५५॥

अर्थ (श्लोक 153 से 155): यह देख नृत्योद्यत नारद आदि देवगण बड़े हर्षित हुए। इस वक्त दुर्योधन ने अर्जुन से कहा कि पार्थ, उस वक्त तो आग में जलने से भाग्य से तुम बच गये। अब व्यर्थ फिर अहंकार क्यों कर रहे हो। तुम्हें कुछ लज्जा नहीं आती जो सजे हुए मेरे सामने खड़े हो। यह सुन कर धनुष हाथ में ले, प्रलय काल के मेघों की भाँति गर्जते हुए उस विघ्न-समूह को हरने वाले वीर अर्जुन ने धनुष का भयावना शब्द किया और फिर बात की बात में उसने शरों से दुर्योधन को पूर दिया तथा उसका धनुष भी छेद डाला परन्तु इतने में ही उनके बीच में जालंधर राजा आ गया और उसने पार्थ के साथ अत्यन्त घोर, दुर्धर संग्राम किया ॥१५३-१५५॥


विषमः समरस्तेन चक्रे पार्थेन दुर्धरः।
तदा पार्थमुवाचेति कुमारो रूप्यसंज्ञकः ॥१५६॥

सुलक्षणान्यायपक्षं कुरुषे किं वृथा यतः।
परकन्याहरो विष्णुः परद्रव्याभिलाषुकः ॥१५७॥

तच्छ्रुत्वा शक्रसूनुस्तु बभाषे भीषणाकृतिः।
दर्शयामीह सज्जस्त्वं न्यायान्यायं भवाधुना ॥१५८॥

इत्युक्त्वा शरसंघातैश्चूर्णितः खचरः क्षणात्।
धनंजयेन रूप्याख्यो विघ्नौघ इव श्रेयसा ॥१५९॥

युधिष्ठिरः स्थिरो युद्धे श्वेतवाजी जवोन्नतः।
रथनेमी रथारूढो रेजुरेते जयोद्धुराः ॥१६०॥

चक्रव्यूहं निकृत्याशु त्रयस्ते यशसावृताः।
यादवीयं बलं प्रापुः प्रीणिताखिलसज्जनाः ॥१६१॥

अर्थ (श्लोक 156 से 161): इसके बाद रूप्यकुमार युद्ध-स्थल में उतरा और उसने पार्थ से कहा कि सुलक्षण, आप अन्याय पक्ष काहे को लेते हैं। देखो, यह विष्णु पर-कन्या का हरने वाला बड़ा अन्यायी है। यह सुन पार्थ ने भयंकर चेहरा बनाकर उससे कहा कि कुमार, अब तैयार हो, मैं तुम्हें न्याय और अन्याय सब यहीं बताये देता हूँ। यह कहकर धनंजय ने एक क्षण में ही विघ्न-रूप रूप्य नाम विद्याधर को अपने शरों की भीषण मार से छेद डाला। इस समय स्थिरता से युद्ध में उठा हुआ युधिष्ठिर उन्नतिशील अर्जुन और रथारूढ़ रथनेमि ये तीनों ही जय के लिए उद्यत हुए युद्ध-स्थल में अपूर्व ही शोभा पाते थे। इसके बाद वे शीघ्र ही जरासंध के चक्रव्यूह को भेदकर, यशस्वी बनकर सज्जनों को प्रसन्न करते हुए यादवों के सैन्य में आ गये ॥१५६-१६१॥


हिरण्यनाभसेनान्यं सच्छूरं रुधिरात्मजम्।
जरासंधस्य सद्युद्धे स जघान युधिष्ठिरः ॥१६२॥

अर्थ: इसके बाद युधिष्ठिर ने पुनः युद्ध-आरम्भ किया और युद्ध में लहूलुहान हुए जरासंध के


ब्रध्नोऽपि तद्वधं वीक्ष्य संखिन्नः पश्चिमार्णवम्। इव स्नातुं जगामाशु शान्तये श्रमशालिनाम् ॥१६३॥

त्रियामायां यमैर्यै च गृहीता विकटा भटाः। तेषां यथायथं कृत्वा संस्थिता नृपनन्दनाः ॥१६४॥

अर्थ (श्लोक 162 से 164): हिरण्य नाम बड़े भारी वीर योद्धा को अनेक वीरों के साथ यमपुर भेज दिया। उसका वध देखकर सूरज को भी बड़ा खेद हुआ और इसलिए वह शोक-जनित श्रम दूर करने को पच्छिम समुद्र में स्नान करने की मनसा से अति शीघ्र ही पच्छिम की ओर को चला गया। तब रात हुई जानकर मरे हुए भटों की यथायोग्य व्यवस्था करके राजे लोग भी अपने-अपने डेरों पर आ गये ॥१६२-१६४॥


जरासंधो बभाणेदं मन्त्रिणो मन्त्रकोविदान्। सेनापतिपदे कोऽपि स्थापनीयः परः प्रभुः ॥१६५॥

इत्याकर्ण्य तदा सर्वैर्मेचकः स्थापितो मुदा। तत्पदे कौरवस्तावत्प्राहिणोच्च वचोहरम् ॥१६६॥

स गत्वा पाण्डवान्नत्वा विज्ञप्तिमकरोदिति। अद्य यावन्मया नानादुःखानि विहितानि वः ॥१६७॥

स्मृत्वा तानि कथं युद्धे नागम्यते त्वरान्वितैः। जीवतोऽतो न मुञ्चामि युष्माञ्शंसितशासनान् ॥१६८॥

निशम्येति जगुः पाण्डुपुत्राः प्रत्युत्तरक्षमाः। यातुं यमपुरं तूर्णमुद्यतोऽस्ति भवत्प्रभुः ॥१६९॥

प्रेषयामि जरासंधसार्थं युष्मान्यमालयम्। स श्रुत्वेति त्वरा गत्वा धार्तराष्ट्रान्यवेदयत् ॥१७०॥

अर्थ (श्लोक 165 से 170): इसके बाद जरासंध ने अपने मंत्र-कुशल मंत्रियों से कहा कि सेनापति के पद पर अब की बार और कोई ऐसा समर्थ पुरुष नियत करना चाहिए जो शत्रुओं पर दबाव डाल सके। यह सुन मंत्रियों ने सम्मति करके बड़े हर्ष के साथ सैनिक पद पर मेचक को स्थापित किया। इसी समय उधर दुर्योधन ने पाण्डवों के पास दूत भेज कर उनसे यह कहलवाया कि आज तक मैंने तुम लोगों को जो-जो दुख दिये हैं उन्हें याद करके तुम लोग स्वयं ही अतिशीघ्र युद्ध के लिए क्यों नहीं आते ? सच कहता हूँ कि मैं अब तुम लोगों को जीता न छोड़ूँगा, चाहे लोग तुम्हारी और तुम्हारे शासन की कितनी ही तारीफ क्यों न करें। यह सुन कर समर्थ पाण्डवों ने दूत से कहा कि जाकर अपने स्वामी से कह दो कि यम-पुर जाने के लिए अब वह तैयार हो जाये। हम जरासंध के साथ-साथ उसे भी यमालय का अतिथि बनावेंगे। यह सुनकर दूत ने अति शीघ्र जाकर धार्तराष्ट्रों से वह सब हाल निवेदन किया ॥१६५-१७०॥


तत्सर्वं वीक्षितुं ब्रध्न इत्यागादुदयाचलम्। प्राह्णतूर्याणि संनेदुर्भटानामुद्यमाय च ॥१७१॥

रथस्थः पार्थ इत्याख्यत्सारथे सरथान्नृपान्। ब्रूहि ब्रूते स्म सोऽश्वादिकेतुकीर्तनपूर्वकम् ॥१७२॥

एष तालध्वजो गङ्गासुतः श्यामतुरंगमः। शोणसप्तिरयं द्रोणो बली बार्णनिकेतनः ॥१७३॥

अर्थ (श्लोक 171 से 173): उसी समय मानों वह सब देखने के लिए ही सूरज उदयाचल पर उदित हुआ। तब भटों को उत्साहित करने के लिए प्रातःकालीन मंगल बाजे बजे। सब योद्धा युद्ध के लिए तैयार हो युद्ध-स्थल में पहुँचे। उन्हें देख रथ में बैठे हुए पार्थ ने अपने सारथी से कहा कि मुझे बताओ कि रथों में कौन-कौन राजे हैं। सारथी उनके घोड़ों और ध्वजाओं को बतलाता हुआ बोला कि राजन्, देखिए ताल की ध्वजा वाले रथ में बैठे हुए पितामह है। उनके रथ में काले घोड़े जुते हुए हैं। यह लाल घोड़ों वाला द्रोण का रथ है और उस बली की कलश की ध्वजा है। नाग की ध्वजा वाला और नीले घोड़ों


सैष दुर्योधनो धन्वी नीलाश्वो नागकेतनः। दुःशासनोऽयमानायकेतुः पीततुरङ्गमः ॥१७४॥

द्रोणसूनुः कियाहाश्वोऽश्वत्थामायं हरिध्वजः। शल्यः सीताध्वजः सोऽयमश्वैर्बन्धूकबन्धुरैः ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 171 से 175): वाला धनुर्धर दुर्योधन है। पीले घोड़ों वाला वह रथ दुःशासन का है, जिसमें कि जाल की ध्वजा लगी हुई है। वह सफेद घोड़ों वाला अश्वत्थामा का रथ है। उस पर वानर की ध्वजा फहराती है। वह लाल घोड़ों वाला रथ जिस पर कि सीता की ध्वजा है, शल्य का है ॥१७१-१७५॥


कोलकेतुरयं भाति लोहिताश्वो जयद्रथः। एवं ज्ञात्वान्यभूपालानुत्तस्थे योद्धुमर्जुनः ॥१७६॥

तदा गजघटालग्ना भटाः सुघटनावहाः। संजाघटन्ति संग्रामं स्वामिकार्यपरायणाः ॥१७७॥

गाङ्गेयः सुगुणं चापे धृत्वा दधाव धीरधीः। अभिमन्युमभिप्रेत्याभिमानरसमुद्वहन् ॥१७८॥

गाङ्गेयस्य सुबाणेन स चिच्छेद महाध्वजम्। प्रथमं कौरवाणां हि सुमहत्त्वमिवोन्नतम् ॥१७९॥

दशबाणैस्तु गाङ्गेयः कुमारध्वजमाच्छिनत्। सौभद्रः सारथिं वाहौ गाङ्गेयस्याच्छिनद्ध्वजम् ॥१८०॥

वदन्ति स्म तदा वाणीं विदोऽयमभिमन्युकः। साक्षात्पार्थ इवोत्तस्थे सुस्थिरः प्रथितो भुवि ॥१८१॥

अनेनैकेन बाणेन वैरिवृन्दं निराकृतम्। निरङ्कुशेन नागेन यथा सर्वस्वहारिणा ॥१८२॥

अर्थ (श्लोक 176 से 182): कोल की ध्वजा वाला और लाल घोड़ों वाला वह रथ जयद्रथ का है। इस प्रकार सब राजाओं का परिचय प्राप्त कर अर्जुन युद्ध के लिए उठा। उस समय हाथियों की घटाओं के साथ स्वामी के कार्य में तत्पर योद्धा रण-साज सज कर युद्ध-स्थल में आये। उधर अभिमान से भरे हुए पितामह वहाँ आये। आते ही वह धीर-बुद्धि अपने धनुष पर डोरी चढ़ा कर अभिमन्यु के ऊपर टूटे। अभिमन्यु ने एक क्षण में ही अपने बाणों द्वारा उनकी ध्वजा को छेद दिया। उसे देख यह जान पड़ता था, मानों उसने पहले पहल कौरवों के उन्नत महत्त्व को ही छेद दिया है। बाद इसके गांगेय ने भी अपने बाणों द्वारा अभिमन्यु की ध्वजा को छेद डाला। तब अभिमन्यु ने उनके सारथी को बाण से बेधकर पितामह के हाथों और ध्वजा को भी बेध दिया। यह देख विद्वानों ने उसकी बड़ी तारीफ की कि अभिमन्यु साक्षात् पार्थ ही है। यह बड़ा धीरज-धारी है और इसकी स्थिरता संसार-प्रसिद्ध है। इस एक ही बालक ने सैकड़ों बैरियों को नष्ट किया है, जैसे निरंकुश हुआ एक ही हाथी सब नष्ट कर डालता है ॥१७६-१८२॥


पार्थसारथिना शल्य उत्तरेण रणान्तरे। समाहूतो रणार्थं हि कुन्तासिधन्वधारकः ॥१८३॥

शल्येन तेन क्रुद्धेन जघ्ने चोत्तरसारथिः। प्रचण्डो भुजदण्डो वा पार्थस्य पृथुविग्रहः ॥१८४॥

वैराटभूपतेः सूनुः श्वेतनामा दधाव च। शल्यस्य ध्वजछत्रास्त्रवृन्दं संपातयन्भुवि ॥१८५॥

अर्थ (श्लोक 183 से 185): इतने ही में पार्थ के सारथी उत्तर कुमार ने दूसरे रण-स्थल में रण के लिए भाला, तलवार और धनुष लिये हुए शल्य को ललकारा। यह देख शल्य को बड़ा क्रोध आया। उसने उसे एक बाण ही में मार गिराया। उस वक्त उसे युद्ध भूमि में गिरा हुआ देखकर यह जान पड़ता था कि मानों पार्थ का प्रचंड भुजदण्ड ही गिर पड़ा है। अपने बड़े भाई की यह दशा देखकर विराट का दूसरा पुत्र श्वेतकुमार दौड़ा आया और उसने उसी वक्त शल्य के ध्वजा-छत्र और अस्त्र वगैरह छेदकर उन्हें पृथ्वी पर गिरा


एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो गाङ्गेयः संचचाल च।
श्वेतेन संनिरुद्धः स धावमानो यदृच्छया ॥१८६॥


छादयामास गाङ्गेयं शरैर्वैराटनन्दनः।
अदृश्यतां परं नीतो मेघौघ इव भास्करम् ॥१८७॥


तदा दुर्योधनः प्राप्तो मार्यतां मार्यतामयम्।
वदन्पार्थेन संरुद्धो वारिणेव धनंजयः ॥१८८॥


धनंजयः करे कृत्वा गाण्डीवं दशविंशतिं।
चत्वारिंशच्च सद्बाणान्विससर्ज स कौरवम् ॥१८९॥


तावन्योन्यं रणे लग्नौ पार्थदुर्योधनौ नृपौ।
कृपाणकुन्तघातेन प्रहरन्तौ महोद्धतौ ॥१९०॥


वैराटनन्दनस्तावद्युद्ध्यमानो महायुधि।
पितामहस्य चिच्छेद चापं छत्रं ध्वजं तथा ॥१९१॥


उरःस्थले जघानासौ गाङ्गेयं करवालतः।
तदा हाहारवो जज्ञे कौरवाणां बलेऽखिले ॥१९२॥


तदा दिव्यस्वरो जज्ञे गगने च सुधाशिनाम्।
कातरो भव माद्यात्र गाङ्गेय भज धीरताम् ॥१९३॥


हन्तव्या आहवे वीरास्त्वया चतुरचेतसा।
निशम्येति पुनः सोऽभूत्सावधानः स्थिरायुधः ॥१९४॥


लक्षबाणान्स संधाय मुक्त्वा श्वेतमपातयत्।
पतितः सोऽपि संस्मृत्य जिनांश्चित्ते दिवं गतः ॥१९५॥


तदा निशीथिनी जज्ञे योद्धॄणां कृपयेव वै।
वारयन्ती रणं नॄणां प्रहाराञ्शोधयन्त्यपि ॥१९६॥


स्वशिविरं यथास्थानं तदा जग्मतुरुन्नते।
वैराटोऽथ वधं श्रुत्वारोदीत्पुत्रस्य चेत्यलम् ॥१९७॥

अर्थ: दिये। इसी समय क्रोध से जलते हुए पितामह दौड़े। उन्हें श्वेत ने बहुत रोका। पर जब वह न रुके तब उसने उन्हें शरों की वर्षा से बिल्कुल ही ढँक दिया। यहाँ तक कि वह देख ही न पड़ने लगे, जैसे मेघों के द्वारा ढँक जाने पर सूरज नहीं देख पड़ता है। यह देख इस को मारो, छोड़ो मत, यह कहता हुआ दुर्योधन दौड़ा आया परन्तु जैसे आग को जल बुझा देता है वैसे ही पार्थ ने उसे जहाँ का तहाँ रोक दिया, आगे न बढ़ने दिया और गांडीव धनुष हाथ में लेकर उसने दुर्योधन पर एक साथ सैकड़ों बाण छोड़े परन्तु उससे दुर्योधन को कुछ हानि न हुई। तब वे दोनों ही वीर भाला, तलवार आदि के द्वारा प्रहार करते हुए मदमत्त होकर परस्पर में भीषण युद्ध करने लगे ॥१८३-१९०॥


पुत्र हा संगरे नापि केन त्वं परिरक्षितः।
हा धर्मपुत्र धर्मात्मंस्त्वया किमु न रक्षितः ॥१९८॥

भीममूर्ते महाभीम धनंजय धनंजय।
भवद्भिर्दृश्यमानोऽयं कथं नीतोऽथ वैरिणा ॥१९९॥

अर्थ (श्लोक 196 से 199): भी मेरे प्यारे पुत्र की रक्षा न की। हे भीममूर्ति भीम तथा शत्रु-समूह के लिए अग्नि जैसे हे धनंजय! आपके देखते हुए मेरे पुत्र को वैरी ने कैसे मार डाला? ॥१९६-१९९॥


तावद्युधिष्ठिरो धीमानभिधत्ते स्म दारुणम्।
घस्रे सप्तदशे शल्यं मारयिष्यामि निश्चितम् ॥२००॥

न हन्मि यदि तत्रेमं ज्वलिष्यामि तदानले।
झम्पां दत्त्वा जनैः प्रेक्ष्यमाणो मानविवर्जितः ॥२०१॥

शिखण्डी खण्डितारातिर्जगौ वै नवमे दिने।
पितामहं हनिष्यामि संगरे संगरो मम ॥२०२॥

अन्यथाहं च होष्यामि हुताशे स्वं पुनर्जगौ।
धृष्टद्युम्नो हनिष्यामि सेनान्यं संगरोद्यतम् ॥२०३॥

अर्थ (श्लोक 200 से 203): विराट की वह दशा देख, क्रोध में आकर बुद्धिमान् युधिष्ठिर ने दृढ़ प्रतिज्ञा की कि मैं आज से सत्रहवें दिन तक शल्य को अवश्य ही मार डालूँगा। यदि न मार सका तो अपने मान को छोड़कर आप लोगों के देखते हुए ही आग में कूद पडूँगा और अपने को भस्म कर दूँगा। बैरियों का विध्वंस करने वाले शिखण्डी ने यह प्रतिज्ञा की कि मैं आज से नौवें दिन पितामह को अवश्य ही धराशायी कर दूँगा। यदि नहीं करूँ तो मैं भी अपने आप को आग में होम दूँगा। इसी तरह धृष्टद्युम्न ने यह कहा कि मैं युद्ध के लिए उद्यत हिरण्यनाभ सेनापति को अवश्य ही यमलोक दिखाऊँगा ॥२००-२०३॥


तावता च हरन्नैशमुदियाय दिवाकरः।
तमः संवीक्षितुं वृत्तं जनानामिव जन्यके ॥२०४॥

सैन्ययोस्तु सुयोद्धारो युद्धमारेभिरे तदा।
परस्परं शरीराणि खण्डयन्तो महायुधैः ॥२०५॥

गजा गजै रथास्तूर्ण रथेः सद्धाजिनो हयैः।
पत्तियः पत्तिभिः सार्धं संक्रुद्धा योद्धुमुद्धताः ॥२०६॥

धनंजयो दधावाशु क्षणे तस्मिन्सुलक्षणान्।
सुभटान्मत्तमातङ्गान्केसरीव जयं गतः ॥२०७॥

संख्ये संख्यातिगैर्बाणैरवृणोत्तं पितामहः।
आगच्छन्तं प्ररुन्धानो यथा कूलं सरिज्जलम् ॥२०८॥

सुरापगासुतेनापि बाणैश्छन्नं नभः स्थलम्।
पार्थेनैकेन तत्सर्वं निन्ये निष्फलतां क्षणात् ॥२०९॥

शुण्डालानां महाशुण्डा घोटकानां महोन्नतान्।
चरणान्रथचक्राणि पार्थश्चिच्छेद सच्छरैः ॥२१०॥

अर्थ (श्लोक 204 से 210): इसी समय अँधेरे की दूर करके योद्धा लोगों का हाल देखने के लिए ही मानो सूरज का उदय हुआ। फिर क्या था, दोनों ओर के वीरों ने फिर भयंकर युद्ध आरम्भ किया और वे महायुद्ध करके एक दूसरे के शरीरों को छेदने लगे एवं क्रोध में भर कर हाथी-हाथियों के साथ, रथ-रथों के साथ, घोड़े-घोड़ों के साथ, पयादे-पयादों के साथ युद्ध करने को उद्यत हुए। इसी समय धनंजय वीर सुभटों के ऊपर टूट पड़ा और उनको क्षणभर में ही तितर-बितर कर डाला, जैसे सिंह मदोन्मत्त हाथियों की तितर-वितरकर देता है। धनंजय की विजय हुई। यह देख पितामह ने असंख्य बाणों के द्वारा अर्जुन को पूरकर आगे बढ़ने से रोक दिया, जैसे जल को नदी के किनारे रोक देते हैं। इस प्रकार अनंत बाणबरसा कर गांगेय ने सारे आकाश को ही बाणों से भर दिया। यह देख पार्थ ने उन सब बाणों को अपने एक बाण के द्वारा ही निष्फल कर दिया और अपने बाणों की अविरल वर्षा से उसने हाथियों की सूंडों, घोड़ों के ऊँचे पाँवों को और रथों के पहियों की एकदम छेद डाला। इसके सिवा


स शूराणां च वर्माणि मर्माणीव सुनर्मणा।
पार्थश्चिच्छेद दिव्येन गाण्डीवेन जयार्थिना ॥२११॥

अर्थ (श्लोक 204 से 211): उस जय के अर्थी ने मर्म की भाँति शूरों के कवच भी अपने दिव्य गांडीव धनुष के द्वारा छेद दिये ॥२०४-२११॥


दुर्योधनो जगौ क्रोधाद् गङ्गापुत्रं विनिन्दयन्।
तात तात किमारब्धं रणं पराजयप्रदम् ॥२१२॥

तथा कुरु यथा पार्थः स्थातुं शक्नोति नो रणे।
अरौ प्राप्ते रणे तात को निश्चिन्तो भवेद् भटः ॥२१३॥

श्रुत्वेति जाह्नवीपुत्रः पार्थेन योद्धुमुद्यतः।
तदा नरो जजल्पेदं शृणु शीघ्रं पितामह ॥२१४॥

आयोधनमिदं सर्वं शून्यं भूयात्तथापि च।
त्वां नेष्यामि यमागारं प्राघुर्णीकृत्य तस्य वै ॥२१५॥

अर्थ (श्लोक 212 से 215): यह देखकर पितामह की निंदा करता हुआ दुर्योधन बोला कि तात, तुमने यह पराजयकारी युद्ध क्यों शुरू कर रक्खा है। इस तरह युद्ध करिए जिससे अर्जुन युद्ध में ठहर ही न सके। भला, वैरी के आगे आ उपस्थित होने पर कौन ऐसा सुभट होगा जो आप की भाँति निश्चिंत हुआ बैठा रहेगा। दुर्योधन की यह मर्मभेदी वाणी सुनकर गांगेय पार्थ के साथ युद्ध के लिए फिर बड़ी वीरता से उद्यत हुए। यह देख अर्जुन ने उनसे कहा कि पितामह, आप का मेरे साथ युद्ध करना व्यर्थ है। मैं अभी आप को यमालय भेजकर इस युद्ध को समाप्त किये देता हूँ ॥२१२-२१५॥


इत्युक्त्वा तौ समालग्नौ रणं कर्तुं कृपोज्झितौ।
तदा द्रोणः समायासीद् धृष्टद्युम्नं महाहवे ॥२१६॥

द्रोणेन च क्षुरप्रेण जह्रेऽस्य स्यन्दनध्वजः।
धृष्टार्जुनः पुनस्तस्य जहार छत्रसद्ध्वजान् ॥२१७॥

शक्तिबाणं मुमोचाशु द्रोणो विद्रावितापरः।
धृष्टार्जुनः क्षणार्धेन तं चिच्छेद सुतीक्ष्णधीः ॥२१८॥

अर्थ (श्लोक 216 से 218): इसके बाद ही वे दोनों सुभट बड़ी क्रूरता से युद्ध करने लगे। इसी बीच में द्रोण आकर धृष्टद्युम्न पर झपटे और उन्होंने महायुद्ध कर थोड़ी देर में ही धृष्टद्युम्न के रथ की ध्वजा हर ली। यह देख धृष्टार्जुन ने द्रोण के छत्र, ध्वजा आदि को हर लिया। तब शत्रु को दुख देने वाले द्रोण ने धृष्टार्जुन पर शक्तिबाण छोड़ा, जिसके कि उस वीर धृष्टार्जुन ने आधे क्षण में ही छेद दिया॥२१६-२१८॥


धृष्टार्जुनेन निर्मुक्ता लोहयष्टिः प्रहृष्टिहृत्।
छिन्नान्तरे च तातेन रणे ज्ञातेन सज्जनैः ॥२१९॥

द्रोणस्तां वञ्चयित्वाशु गृहीत्वा वसुनन्दकम्।
करे च दक्षिणे खड्गं चचाल प्रधनोद्यतः ॥२२०॥

अर्थ (श्लोक 219 से 220): यह देख धृष्टार्जुन ने पितामह के ऊपर गदा चलाई और पितामह ने उसे बीच में से ही वारण कर दिया। इसके बाद गदा वारण कर बाँये हाथ में ढाल और दाहिने हाथ में तलवार लेकर युद्ध के लिए तैयार हो द्रोण आये ॥२१९-२२०॥


एतस्मिन्नन्तरे भीमो गदाहस्तो जघान तम्।
कलिङ्गतनयं न्यायनिपुणं च मदोद्धतम् ॥२२१॥

कौरवांस्त्रासयन्काष्ठाः कष्टं खलु समागतान्।
कुर्वन् रेमे रणे शत्रून्दलयन्स बलोद्धतः ॥२२२॥

गदाघातेन संचूर्ण्य रथान्सप्तशतप्रमान्।
वैरिभिः पूरयामास भीमो भूमिवलीनिव ॥२२३॥

अर्थ (श्लोक 221 से 223): उधर हाथ में गदा लेकर भीम दौड़ा और उसने महोन्नत कलिंग-पुत्र को मार गिराया एवं बल से उद्धत होकर वह कौरवों को त्रास देता, दिशाओं को कष्ट-मय बनाता और रण में शत्रुओं को दलता क्रीड़ा करने लगा। उसने अपनी गदा के आघात से बैरियों के साथ-साथ सात सौ रथों को भी चूर


सहस्त्रैकं गजानां च चूर्णयित्वा रणोद्धतः। जयलक्ष्मीं समापाशु गदया पावनिः परः ॥२२४॥

अर्थ (श्लोक 221 से 224): डाला और उनसे पृथ्वी के बिलों को पूर दिया। इस प्रकार रणोद्धत बलवान् भीम ने अपनी गदा के बल से एक हजार हाथियों को दूर करके जय-लक्ष्मी को प्राप्त किया ॥२२१-२२४॥


एतस्मिन्नन्तरे धृष्टार्जुनस्यासिं समुज्ज्वलम्। द्रोणश्चिच्छेद छेदज्ञः कुठार इव शाखिनम् ॥२२५॥

अभिमन्युकुमारेण छिन्नो द्रोणस्य सद्रथः। दुर्योधनसुतश्चायाल्लक्ष्मणाख्यः सुलक्षणः ॥२२६॥

स चिच्छेद सुभद्रायास्तनुजस्य शरासनम्। अन्यं चापं समादायावारयत्स परान् रिपून् ॥२२७॥

सर्वैः संवेष्टितः पार्थपुत्रः प्रौढमना महान्। पञ्चास्यविक्रमः सिंहो यथा मत्तमहागजैः ॥२२८॥

पार्थो गाण्डीवचापेन वेष्टयित्वा रिपून्स्थितान्। स्वपुत्रं वारयामास वायुर्वा घनसंचयान् ॥२२९॥

युध्यमानेषु योधेष्वेवं चायान्नवमो दिनः। तदा शिखण्डिना युद्धे समाहूतः पितामहः ॥२३०॥

अर्थ (श्लोक 225 से 230): इसी बीच में छेदन-कला-निपुण वीर द्रोणाचार्य ने धृष्टार्जुन की उज्ज्वल तलवार को छेद दिया, जैसे कुठार वृक्ष को छेद देता है। उधर अभिमन्यु ने द्रोण का रथ छिन्न-भिन्न कर दिया। इतने में दुर्योधन का पुत्र सुलक्षण लक्ष्मण आ धमका और उसने अभिमन्यु के धनुष को तोड़ डाला। तब अभिमन्यु दूसरा धनुष लेकर शत्रुओं को हटाने लगा। उसे इस प्रकार असह्य देख एक साथ हजारों ही शत्रुओं ने आकर उस प्रौढ़मना और महावीर अभिमन्यु को सब ओर से घेर लिया। उस समय ऐसा भान होता था मानों मतवाले बहुत से हाथियों ने महान् पराक्रमी सिंह को ही धर लिया है। तब हाथ में गांडीव धनुष उठा पार्थ आया और उसने सब शत्रुओं को बात ही बात में ही तितर-बितरकर अपने वीर पुत्र को स्वतंत्र कर दिया, जैसे वायु मेघों को तितर-वितर करके सूरज को स्वतंत्र कर देता है। इस प्रकार योद्धाओं का युद्ध होते-होते जब नौवाँ दिन आया तब शिखण्डी ने युद्ध के लिए गांगेय को ललकारा ॥२२५-२३०॥


तदाभाणीन्महापार्थः प्रचण्डं च शिखण्डिनम्। गृहाण मे परं बाणं वैरिविध्वंसनक्षमम् ॥२३१॥

येन बाणेन संदग्धं मया खण्डवनं पुरा। तेनाग्राहि तदा बाणः स चण्डेन शिखण्डिना ॥२३२॥

वैवस्वत इवोत्तस्थे शिखण्डी खण्डयन् रिपून्। तदा परस्परं लग्नौ श्रीगाङ्गेयशिखण्डिनौ ॥२३३॥

एकेनापि तयोर्मध्ये जीयते न परस्परम्। युध्यमानौ च तौ देवैः सिंहाविव सुशंसितौ ॥२३४॥

अर्थ (श्लोक 231 से 234): उस समय पार्थ ने शिखण्डी से कहा कि बैरियों का ध्वंस करने के लिए सर्वथा समर्थ मेरा यह बाण लो और तुम इसके द्वारा बैरियों का ध्वंस करो। देखो, इसी बाण के द्वारा मैंने पहले खण्ड वन को दग्ध किया था, अतः तुम इस की शक्ति में कुछ सन्देह न करो। यह सुन कर वीर शिखण्डी ने उस बाण को ले लिया और बैरियों का ध्वंस करता हुआ वह यम की तरह युद्ध के लिए उठ खड़ा हुआ। गांगेय और शिखण्डी दोनों ही वीर आपस में भीषण युद्ध करने लगे। उन्हें युद्ध करते हुए बहुत समय बीत गया पर उनमें से किसी ने भी किसी को जीत न पाया। इस वक्त इन दोनों को सिंह की तरह भिड़ते हुए देखकर देवताओं ने इनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥२३१-२३४॥


निर्भर्त्सितः शिखण्डी तु धृष्टद्युम्नेन धीमता। भो शिखण्डिन्मया दृष्ट आहवो विहितस्त्वया ॥२३५॥

अर्थ: यह देख बुद्धिमान् धृष्टद्युम्न ने शिखण्डी से कहा कि शिखंडिन् तुमने युद्ध तो बहुत किया,


अद्यापि गुरुगाङ्गेयो रणे गर्जति मेघवत् । अद्यापि स्यन्दनं तस्य पताका च विजृम्भते ॥२३६॥

पार्थः पूरयतेऽद्यापि पृष्टिं पिष्टमहारिपुः । वैराटस्तव साहाय्यं विदधाति महारणे ॥२३७॥

अर्थ (श्लोक 235 से 237): पर अब तक भी गांगेय रण में मेघ की तरह गाज रहे हैं, उनका रथ भी वैसा ही अखण्ड है एवं पताका भी वैसी ही उड़ रही है। फिर तुम्हारे इस युद्ध से लाभ ही क्या हुआ। अतः अपने पराक्रम की बराबर काम में लाकर शत्रु का शीघ्र नाश करो। तुम निःसहाय नहीं हो, तुम्हारी पीठ पर शत्रुओं को पीस डालने वाला पार्थ है और विराट भी इस महाररण में तुम्हारी सहाय कर रहा है ॥२३५-२३७॥


निशम्येति शिखण्डी तु तर्जयन्धन्विदुर्धरम् । गाङ्गेयमाजुहावेति धनुःसंधानमावहन् ॥२३८॥

तावद् द्रुपदपुत्रेण बाणैः सहस्त्रसंख्यकैः । छाद्यते स्म सुगाङ्गेयो मेघैर्वा व्योममण्डलम् ॥२३९॥

कौरवीयं बलं तावन्मुञ्चति स्म शिखण्डिनि । शरांस्ते तस्य लग्नन्ति न भीता इव संगरे ॥२४०॥

धृष्टद्युम्नविनिर्मुक्ताः शरा वज्रमुखास्तदा । वज्राणीव सुलग्नन्ति नगे विपक्षवक्षसि ॥२४१॥

ये गाङ्गेयविनिर्मुक्ताः पुष्पायन्ते शिखण्डिनः । शरा लग्नाः सुखाय स्युः पुण्यात्सर्वं सुखाय वै ॥२४२॥

अर्थ (श्लोक 238 से 242): यह सुन शिखण्डी को खूब जोश आया। उसने धनुष चढ़ा और एक साथ असंख्य बाणों को छोड़ कर धनुर्धर दुर्द्धर पितामह को बाण से पूर दिया, जैसे मेघ आकाश को पूर देते हैं। यह देख कौरवों की सेना ने भी शिखण्डी पर खूब बाणों की बरसा की परन्तु उसके बाण उसे न लगे, मानों वे उससे डरते थे। इसी समय वज्र जैसे कठोर मुँह वाले बाणों को धृष्टद्युम्न भी छोड़ रहा था जो शत्रुओं के वक्ष-स्थलरूप पर्वत में वज्र की तरह विषम घाव करते थे। उधर से गांगेय के छोड़े हुए बाण आकर शिखण्डी के हृदय में फूल के जैसे लगते थे जिनसे कि उसे उल्टा सुख होता था और है भी ठीक ही कि पुण्य के उदय से कष्ट भी सुख रूप हो जाता है ॥२३८-२४२॥


यं यं चापं समादत्ते गाङ्गेयो गुणसंगतम् । तं तं छिनत्ति बाणेन धृष्टद्युम्नः समुद्धतः ॥२४३॥

पुण्यक्षये च क्षीयन्ते समक्षं सर्वजन्मिनः । धनानीव महायूंषि पुत्रमित्रसुखानि च ॥२४४॥

अर्थ (श्लोक 243 से 244): पितामह इस समय जो-जो धनुष हाथ में लेते थे उसे समुद्धत धृष्टद्युम्न बाण के द्वारा छेदता जाता था। सच है कि पुण्य क्षीण होने पर सब कुछ देखते-देखते ही विला जाता है। चाहे धन हो, चाहे आयु हो, चाहे पुत्र-मित्र-कलत्र आदि हो, एवं चाहे सुख हो॥२४३-२४४॥


द्रौपदस्तु सुबाणेन गाङ्गेयकवचं हठात् । बिभेद वनयूथं वा प्रावृण्मेघः सुधारया ॥२४५॥

पातयामास भूपीठे सारथिं च रथध्वजम् । गाङ्गेयस्य हयौ हर्षाच्छ्रैः श्रीद्रुपदात्मजः ॥२४६॥

पितामहः सुनिष्कम्यो रथातीतो दधाव च । कृपाणं स्वकरे कृत्वा कृन्तितुं द्रुपदात्मजम् ॥२४७॥

अर्थ (श्लोक 245 से 247): इसी समय शिखण्डी ने अपने बाणों के द्वारा गांगेय का कवच भेद डाला, जैसे बरसा काल के मेघ की धारा वनों को भेद डालती है। उसने थोड़ी ही देर में उसके सारथी और रथ की ध्वजा को पृथ्वी पर गिरा दिया तथा रथ के दोनों घोड़ों को बाणों की मार से जर्जरित कर दिया। यह देख पितामह अकंप होकर-रथ बिना ही-हाथ में तलवार ले शिखण्डी को छेद डालने के लिए दौड़े। शिखण्डी ने अपने प्रखर बाणों के द्वारा उनकी तलवार को भी बेकाम कर दिया और उस हतात्मा ने उनके


कृपाणो द्रौपदेनैव तस्य च्छिन्नो महाशरैः । हृदयं च क्षुरप्रेण हतं हन्त हतात्मना ॥२४८॥

अर्थ (श्लोक 245 से 248): हृदय को भी वेध दिया ॥२४५-२४८॥


पितामहः पपाताशु पृथिव्यां पावनस्तदा । गतं जीवितमालोक्य स संन्यासं समग्रहीत् ॥२४९॥

स दधे परमं धैर्यं धर्मध्यानपरायणः । सुपरीक्ष्यामनुप्रेक्षां ररक्ष निजचेतसि ॥२५०॥

अर्थ (श्लोक 249 से 250): इसके साथ ही वह पावन वीर धड़ाम से पृथ्वी पर गिर पड़े और अपने प्राणों को निकलते देख उन्होंने संन्यास ले लिया। इस प्रकार धर्म में लीन होकर उन्होंने परम धैर्य का सहारा लिया। उन्होंने अपने हृदय में सु-परीक्षित बारह भावनाओं को धारण किया ॥२४९-२५०॥

एकोनविंशं पर्व (भाग 2/2)

तदा सर्वे नृपास्त्यक्त्वा रणं तत्पार्श्वमाययुः । पाण्डवास्तत्पदं नत्वा रुरुदुर्दुःखसंगताः ॥२५१॥

आजन्म ब्रह्मचर्यं च पालितं व्रतमुत्तमम् । त्वया गुणगणेशेन तदेत्याहुः सुपाण्डवाः ॥२५२॥

युधिष्ठिरस्तदावोचद्भो व्रतिन् सुव्रतोत्तम । अस्माकं किं न चायाता मृतिः किं ते समागता ॥२५३॥

स बाणजर्जरोऽवोचत्कौरवान्पाण्डवान्प्रति । दद्ध्वं भव्यजीवानाभयं भव्यसत्तमाः ॥२५४॥

अन्योन्यं च कुरुध्वं भो मैत्र्यं मुक्त्वा च शत्रुताम् । अहो एवं गता घस्त्रा भवतां न च निश्चितम् ॥२५५॥

ये केऽत्र मृतिमापन्नास्ते गता गर्हितां गतिम् । इदानीं क्रियतां धर्मो दशलक्षणलक्षितः ॥२५६॥

अर्थ (श्लोक 251 से 256): पितामह की यह हालत देखकर सब राजे युद्ध छोड़ कर उनके पास आ गये। पाण्डवों को उनकी दशा से बड़ा दुख हुआ। वे उनके चरणों में प्रणाम कर आँसू बहाते हुए बोले-हे गुणी, आपने जन्म भर वह ब्रह्मचर्य पाला है जो सब व्रतों में उत्तम है और जिसका पालना बड़ा कठोर है। इस व्रत के बराबर कठिन दूसरा कोई व्रत नहीं है। उस समय दुख से जर्जरित होकर युधिष्ठिर ने कहा कि हे सुव्रतिन्, हे उन्नत हृदय वीर, यह मौत हम लोगों को क्यों नहीं आई आपके इस दुख को हम नहीं सह सकते। तब बाणों से जर्जरित भीष्म पितामह ने कौरवों और पाण्डवों से कहा कि हे भव्यो, अन्त में मेरा आप लोगों से यही कहना है कि अब परस्पर की शत्रुता छोड़ कर आप लोग मैत्री कर लें और इन बेचारों को अभयदान दें। कहते दुख होता है कि ये नौ दिन यों ही चले गये, किसी के हाथ कुछ नहीं लगा। हाँ, इतना जरूर हुआ कि युद्ध में जो लोग मरे हैं वे विचारे निंद्य गति में गये होंगे। अस्तु, जो हो गया सो तो हो गया। अब आप लोग दस लक्षण धर्म की धारण करें ॥२५१-२५६॥


एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तौ चारणौ चरणोज्ज्वलौ । गुणचुञ्चू चरन्तौ च सुतपोऽत्र नभोऽङ्गणात् ॥२५७॥

मुनीन्द्रौ हंसपरमहंसौ संशुद्धमानसौ । गाङ्गेयसंनिधिं गत्वा प्रोचतुः परमोदयौ ॥२५८॥

गाङ्गेय त्वं महावीरो वीराणामग्रणीः पुनः । त्वां विनान्यो महाधीरो विद्यते न महीतले ॥२५९॥

अर्थ (श्लोक 257 से 259): इसी समय आकाश-मार्ग से वहाँ दो चारण मुनीश्वर आ गये। उनके नाम हंस और परमहंस थे। वे शुद्ध मन वाले थे, गुणों के भण्डार थे, उत्तम-उत्तम तपों को तपने वाले थे और उनके चरण-कमल आकाश में चलने के कारण अतीव उज्ज्वल थे धूसरित न थे। वे महाभाग पितामह के पास जाकर बोले कि हे महा पुरुष, तुम बड़े वीर हो, वीरों के शिरोमणि हो। इस पृथ्वी पर तुम्हारे जैसा दूसरा कोई वीर और धीर नहीं है। यह सुनकर अगणित गुणों के पुंज और गंभीराशय पितामह उन


तन्निशम्य मुनीन्द्रौ तौ नत्वा प्रोवाच सद्गिरा।
गाङ्गेयो गणनातीतगुणो गम्भीरमानसः ॥२६०॥

भगवन्भवकान्तारे भ्रमता परमो वृषः।
मया लब्धोऽधुना नैव करवाण्यहमत्र किम् ॥२६१॥

शरच्छिन्नः प्रविष्टोऽहं शरणं तव संसृतौ।
लप्स्ये फलं सुखादीनां त्वत्प्रसादान्महामुने ॥२६२॥

अर्थ (श्लोक 257 से 262): दोनों मुनियों को प्रणाम कर अपनी मधुर वाणी के द्वारा बोले कि प्रभो, इस संसार-रूप वन में भटकते हुए मैंने अब तक यह परम धर्म नहीं पाया। अब बताइए कि मैं क्या करूँ? महामुने, मैं अब आपकी शरण हूँ। मुझे आशा है कि मैं आपके प्रसाद से संसार पार कर सकूंगा ॥२५७-२६२॥


हंसोऽवोचत्सुगाङ्गेय नम सिद्धान्सनातनान्।
आराधय समाराध्यमाराधनचतुष्टयम् ॥२६३॥

दर्शनाराधनां विद्धि तत्त्वश्रद्धानलक्षणाम्।
आराध्यते सुसम्यक्त्वं यत्र निश्चयतश्च ताम् ॥२६४॥

भावनां यत्र विज्ञानं जिनोक्तानां सुनिश्चितम्।
सा ज्ञानाराधना प्रोक्ता निश्चयेन चिदात्मनः ॥२६५॥

चर्यते चरणं यत्र निवृत्तिः पापकर्मणः।
पुनः प्रवृत्तिश्चिद्रूपे चारित्राराधना मता ॥२६६॥

यत्तपस्तप्यते द्वेधा श्रीयते संयमो द्विधा।
तपआराधना प्रोक्ता निश्चयव्यवहारगा ॥२६७॥

आराधनाविधिं प्रोच्य गतौ चारणसन्मुनी।
दधावाराधनां धीमान्गाङ्गेयो गुणसंगतः ॥२६८॥

अर्थ (श्लोक 263 से 268): यह सुन मुनिराज ने कहा कि हे भव्य, तुम सनातन सिद्धों को नमस्कार कर चार आराधनाओं का आराधन करो। तत्त्वार्थ-श्रद्धान को दर्शन-आराधना कहते हैं और इस में सम्यक्त्व की आराधना की जाती है। आत्मा के निश्चित ज्ञान को ज्ञान आराधना कहते हैं और इसमें जिनदेव की कही हुई भावनाओं के ज्ञान की आराधना होती है। चैतन्य-स्वरूप में प्रवृत्ति करने को चारित्र-आराधना कहते हैं और इसमें कर्मों की निवृत्ति और आत्मा में प्रवृत्ति की आराधना की जाती है और जो दो प्रकार का तप तपा जाता है, दो तरह का संयम लिया जाता है उसे तप-आराधना कहते हैं। इन सब आराधनाओं में निश्चय और व्यवहार का सम्बन्ध लगा हुआ है। इस प्रकार आराधनाओं की विधि बता कर वे महामुनि तो चले गये और इधर गुणी, बुद्धिमान् पितामह ने आराधनाओं को धारण आराधना शुरू किया ॥२६३-२६८॥


सल्लेखनां विधत्ते स्म चतुर्धाहारदेहयोः।
दर्शने चरणे ज्ञाने दत्वा चित्तमनारतम् ॥२६९॥

क्षमाप्य सकलाञ्जीवाञ्क्षान्त्वा सत्क्षमया युतः।
जपन्पञ्चनमस्कारान्स तत्याज तनुं तराम् ॥२७०॥

स पञ्चममहानाके सुरोऽभूद्ब्रह्मनामनि।
यत्र ब्रह्मोद्भवं सौख्यं भुञ्जते भविनः सदा ॥२७१॥

अर्थ (श्लोक 269 से 271): इसके बाद उन्होंने चार प्रकार आहार और शरीर से ममता छोड़ कर तथा दर्शन-ज्ञान-चरित्र में लीन हो सल्लेखना ग्रहण की और सब जीवों से क्षमा कराकर तथा सबको क्षमा करके पंच नमस्कार मंत्र को जपते-जपते उन्होंने अपनी जीवन-लीला समाप्त की। वह जाकर ब्रह्म नाम पाँचवें स्वर्ग में देव हुए, जहाँ कि भव्यजीव सदा आत्मा से उत्पन्न हुए सुखों को भोगते हैं ॥२६९-२७१॥


कौरवाः पाण्डवास्तत्र रुदन्ति स्म महाशुचा।
जगतां शून्यतां नित्यं मन्यमाना महौजसः ॥२७२॥

अर्थ: इसके बाद जगत् की शून्यता को नित्य मानते हुए तेजस्वी कौरव और पाण्डव शोक-सन्तत होकर खूब रोये एवं और लोगों ने भी शोक से वह रात बिताई। बाद सबेरा हुआ। सूरज का उदय


एवं प्राप्तां निशां निन्युः शोकेन सकला नराः। शोकं वक्तुमिवायासीत्तस्य प्रातर्दिवाकरः ॥२७३॥

अर्थ (श्लोक 272 से 273): हुआ। ऐसा जान पड़ा कि मानों सूरज पितामह का शोक मनाने के लिए ही आया है ॥२७२-२७३॥


इत्थं संसारचक्रे नरनिकरधरे यान्ति जीवा घनौघाः
यद्वद्यातीह लक्ष्मीस्तडिदिव चपला चञ्चलं जीवितव्यम्।
संध्यारागप्रभासं स्वजनसुतसुखादीनि भङ्गोपमानि
मत्वैवं शुद्धधर्मे विदधतु सुमतिं श्रद्दधाना भवन्तः ॥२७४॥

अर्थ: अनंत मनुष्यों को धारण करने वाले इस संसार-चक्र में जीव, मेघ-समूह की भाँति बिखर जाते हैं, लक्ष्मी बिजली की तरह चपल है, जीवन संध्या के राग की प्रभा के समान चंचल है और स्वजन-सुत-सुख आदि जल की कल्लोलों की भाँति विनश्वर हैं। इस प्रकार सब बातों को जान कर सच्चे श्रद्धालु लोगों को चाहिए कि वे शुद्ध-धर्म में बुद्धि लगावें ॥२७४॥


गाङ्गेयो ब्रह्मचारी शुभमतिसुगतिः संगरे संगरं यः
कृत्वा धर्मस्य यातो वरसुरसदनं पञ्चमं प्रीणयन्स्वम्।
हित्वा पात्वा च पापं शुभनयसुमतिं धर्मतः सोऽपि जीयात्
धर्मात्मा धर्मपुत्रो वरनयधिषणाधिष्ठितो धर्मचेताः ॥२७५॥

अर्थ: जो शुभमति महान् ब्रह्मचारी पितामह युद्ध में धर्म की प्रतिज्ञा कर और अपने आत्मा को शान्त रखकर पाँचवें ब्रह्मस्वर्ग को प्राप्त हुए उनकी जय हो और उन धर्मात्मा, धर्म के ज्ञाता, नय-कुशल युधिष्ठिर की भी जय हो जो धर्म के बल से शुभ नय-ज्ञान को प्राप्त हुए और जिन्होंने पाप से अपने आत्मा को सुरक्षित रखा ॥२७५॥

विंशं पर्व (भाग 1/2)

धर्मं धर्ममयं सर्वं कुर्वाणं धर्मशालिनम्। धर्मराजहरं धर्म्यं वन्दे सद्धर्मदेशकम् ॥१॥

अर्थ: उन धर्मनाथ प्रभु को नमस्कार है जो धर्म के उपदेशक हैं, धर्मयुक्त और धर्मशाली हैं, जो अन्य जीवों को भी धर्मात्मा बनाते हैं और धर्मराज (यम) को हरने वाले हैं। वे मुझे भी धर्म-बुद्धि दें ॥१॥


अथ प्रातः समुत्थाय भटा भेजूरणाङ्गणम्। प्रलयानलसंक्षुभ्यत्सागरा इव निर्घृणाः ॥२॥

पादभारेण भञ्जन्तो भुजङ्गानभुवि संस्थितान्। क्षोभयन्तः ककुब्नाथानभटा योद्धुं समुद्यताः ॥३॥

पार्थस्तु प्रथयामास प्रधनं निधनोद्यतः। भटघोटकसंघट्टान्खण्डयंश्च मतङ्गजान् ॥४॥

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तोऽभिमन्युः सुभटो महान्। विश्वसेनेन संयुद्धं सह कर्तुं समुद्ययौ ॥५॥

पातयामास विश्वस्य सारथिं पार्थनन्दनः। स्वहस्ते धन्वसंधानं कुर्वन्ध्वनिरभूत्करान् ॥६॥

अर्थ (श्लोक 2 से 6): सबेरा हुआ। भट-गण उठें और निर्दय हो प्रलयकाल की वायु से क्षोभ को प्राप्त हुए सागर की भाँति क्षुब्ध होकर रणांगण में पहुँचे। वे पृथिवी में रहने वाले साँपों को पद-दलित करते और दिशा-नाथों को क्षुब्ध करते युद्ध के लिए उद्यत हुए। उधर से पार्थ ने मृत्यु का आलिंगन करने को हाथ बढ़ाये हुए भटों, घोड़ों और मतवाले हाथियों को तितर-बितर करके उस युद्ध का और भी विस्तार कर दिया। इसी समय महान् सुभट अभिमन्यु युद्धस्थल में आया और विश्वसेन के साथ युद्ध करने को उद्यत हुआ एवं हाथ में धनुष लेकर शत्रुओं को कंपित करने वाले उस पार्थ-नन्दन ने थोड़ी देर में ही विश्वसेन के सारथी को धराशायी कर दिया ॥२-६॥


शल्यपुत्रः समायासीच्छल्यीभूतश्च वैरिणाम्। अभिमन्युसमं योद्धुं वाहयन्स्वरथं रथी ॥७॥

तावन्योन्यं समालग्नौ छादयन्तौ परैः शरैः। अभिमन्युशरैर्ध्वस्तः शल्यपुत्रो मृतिं ततः ॥८॥

लक्ष्मणो लक्षणैर्युक्तो लक्षयीकृत्य सुपार्थजम्। छादयामास बाणौघैर्घनघातविधायिभिः ॥९॥

लक्ष्मणं स जघानाशु बाणैः कोदण्डनिर्गतैः। यमप्राघुर्णकं कृत्वाभिमन्युस्तं रणे स्थितः ॥१०॥

चतुर्दशसहस्राणि कुमाराणां सुचारिणाम्। अभिमन्युर्जघानेवमाशुगैरसुहारिभिः ॥११॥

रणकेलिं प्रकुर्वाणो गजानिव महाद्विषः। केशरीव हरन्भेजे सौभद्रो भद्रसंगतः ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 7 से 12): इतने में बैरियों के हृदय में शल्य-सा चुभने वाला और अपने रथ को अपने आप ही चलाता हुआ शल्य-पुत्र अभिमन्यु के साथ युद्ध करने के लिए आया। वे दोनों अपने-अपने बाणों को बरसा से परस्पर में एक दूसरे को पूरने लगे। आखिर अभिमन्यु के शरों के द्वारा शल्य-पुत्र ध्वस्त हो काल के गाल में चला गया। यह देख सुलक्षण लक्ष्मण ने लक्ष्य बाँधकर पार्थ-पुत्र को वज्र के जैसे तीव्र प्रहार करने वाले बाणों के द्वारा खूब पूर दिया। अभिमन्यु ने भी तब बाणों को चलाना शुरू किया और लक्ष्मण को यम का अतिथि बना दिया। उसने रण में स्थिर बने रह कर अपने प्राणाहारी बाणों के द्वारा चौदह हजार और-और कुमारों को भी मार गिराया। इस समय वह भद्र रण-क्रीड़ा करता हुआ और महान्-महान् शत्रुओं को पृथ्वी की गोद में लिटाता हुआ ऐसा शोभता था मानों हाथियों को तितर-बितर कर उनके मस्तकों को विदार रहा पराक्रमी सिंह ही है ॥७-१२॥


तदा दुर्योधनः क्रुद्धो मानसे म्लानितामितः।
प्रेक्षते स्म महाशूरांन्वचोभिर्भावितात्मनः ॥१३॥

विचित्रांश्चञ्चलांश्चेल्लुर्गजवाजिरथस्थिताः।
भ्रूभङ्गभीषणा भूपा भाषयन्तः सुभाषणम् ॥१४॥

द्रोणो विद्रावञ्छत्रून्सुल्लिङ्गैर्लिङ्गिताङ्गकः।
कलिङ्गः कर्णभूपालोऽप्येवं चेलुर्नृपा रणे ॥१५॥

अर्थ (श्लोक 13 से 15): यह देख दुर्योधन को बड़ा क्रोध आया। उसका मन अत्यन्त क्षुब्ध हुआ। उसने मधुर मायाभरे शब्दों द्वारा उत्साह देते हुए अपने महान् शरों की ओर बड़ी आशा से देखा। उसके इस स्नेह से कृतज्ञ हो वीरगण विचित्र और चंचल हाथी, घोड़ों तथा रथों पर सवार हो-हो कर युद्ध-स्थल को चले। वे कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए चले जाते थे। उनके चेहरे भयंकर हो रहे थे। उनके साथ ही सुलक्षणों से लक्षित द्रोण भी शत्रु-दल को भयभीत करता हुआ चला। कलिंग और कर्ण भी युद्ध-स्थल में पहुँचे। दोनों ओर की सेना की मुठभेड़ हुई ॥१३-१५॥


कलिङ्गकुम्भिनं तावच्चकार विगतासुकम्।
सौभद्रः कर्णभूपस्य जहार गर्वसंततिम् ॥१६॥

द्रोणं स जर्जरीचक्रे जरयेवास्त्रमालया।
यत्र यत्र रणं चक्रेऽभिमन्युस्तत्र संजयी ॥१७॥

न कोऽप्यभूत्तदा शूरोऽभिमन्युरणसंमुखः।
जायते मत्तमातङ्गः किं सिंहाभिमुखः क्वचित् ॥१८॥

अभिमन्युशरेणाशु वाजिनो गजराजयः।
स्यन्दनाः पत्तयस्तत्र न छिन्ना नाभवन्निति ॥१९॥

अर्थ (श्लोक 16 से 19): अभिमन्यु ने थोड़ी ही देर में कलिंग के हाथी को मार गिराया और कर्ण के गर्व को खर्व कर दिया एवं उसने द्रोण को भी जरा की तरह अपने शस्त्र-प्रहार से बात ही बात में जर्जरित कर दिया। बात यह है कि अभिमन्यु ने जहाँ-जहाँ युद्ध किया वहाँ-वहाँ सब जगह ही उसने विजय पाई। उस समय ऐसा कोई वीर न था जो युद्ध में उसका सामना करता और यह सच है कि मत वाला होने पर भी हाथी सिंह का सामना नहीं कर सकता। उस समय रण-स्थल में घोड़े, हाथी, रथ पियादे वगैरह कोई भी ऐसे न बचे जो अभिमन्यु के बाण के लक्ष्य न हुए हों, उसके बाण द्वारा न वेधे गये हों ॥१६-१९॥


स्वसैन्यमक्षयं कुर्वन्कुमारोऽक्षयसंज्ञकः।
दशबाणैर्जघानेनमभिमन्युं महाहवे ॥२०॥

मूर्च्छितश्छिन्नचेतस्कः स पपात महीतले।
उन्मूर्च्छितः समुत्तस्थे पुनः पार्थस्य नन्दनः ॥२१॥

अश्वत्थामा तदा धाम दधदाप च सद्धनुः।
विमुखः क्षणतस्तेन शरैश्चक्रेऽभिमन्युना ॥२२॥

कर्णोऽप्राक्षीद् गुरुं द्रोणं लक्ष्मणप्रमुखा रणे।
कुमारा मरणं नीताः पार्थजेन सहस्रशः ॥२३॥

न हन्तुं कोऽपि शक्नोत्यभिमन्युं मन्युमानसम्।
कदाचिन्नियते पार्थो नायं कालेऽपि संयुगे ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 20 से 24): यह देख अपनी सेना की रक्षा करते हुए वीर अक्षयकुमार ने दस बाणों को छोड़ कर अभिमन्यु को घायल कर दिया। तब वह सुध-बुध रहित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। बाद थोड़ी देर में जब उसकी मूर्च्छा दूर हुई, तब वह फिर उठ खड़ा हुआ और धनुष लिये दौड़ कर आते हुए तेजस्वी अश्वत्थामा को उसने अपने बाणों की मार से एक क्षण में ही विमुख कर दिया। यह देख, कर्ण ने द्रोणाचार्य से पूछा कि गुरुवर्य, अभिमन्यु ने लक्ष्मण को आदि लेकर हजारों कुमारों को यमलोक पहुँचा दिया, परन्तु उसे कोई भी नहीं मार सका। तब बताइए कि वह भी इस काल जैसे कराल युद्ध में मरेगा या नहीं। सुन कर द्रोण ने कहा कि कर्ण, भला तुम्हीं कहो कि जिस रणशौन्डीर ने अकेले


श्रुत्वा द्रोणो बभाणेदं हन्यते यो न भूभुजा।
एकेन रणशौण्डेन स केन वद हन्यते ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 20 से 25): ही इतने बड़े राजाओं को पछाड़ दिया है उसे कौन मार सकता है? ॥२०-२५॥


कृत्वा कलकलं सैन्यं संमेल्य मिलितान्नृपान्।
हन्यतां हन्यतां चायं छिद्यतामस्य सद्धनुः ॥२६॥

इति द्रोणवचः श्रुत्वा कृत्वा कोलाहलं नृपाः।
न्यायक्रमं विमुच्याशु तेन योद्धुं समुद्ययुः ॥२७॥

एकेन तेन ते सर्वे आहवे निर्जिताः क्षणात्।
पुनरुद्यम्य ते सर्वे सोत्कण्ठा योद्धुमुद्यताः ॥२८॥

कुमारस्य रथाश्छिन्नाः सपताकाः परैर्नृपैः।
लष्टिदण्डं समादाय कुमारस्तानचूरयत् ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 26 से 29): इसके बाद रणनाद करते हुए द्रोण ने क्रोधित हो राजा लोगों से कहा कि मारो-मारो, इसे मार डालो और इस का धनुष छीन कर तोड़ डालो। देखो, वह भागने न पावे। द्रोण की वीर वाणी सुन कर राजा लोग जोश के साथ उठे और न्याय-अन्याय कुछ न गिन कर रणनाद करते हुए वे एक साथ उस पर छूट पड़े परन्तु उस बली ने अकेले ही उन सबसे युद्ध कर क्षणभर में ही उन्हें पराजित कर दिया। लेकिन थोड़ी ही देर में पुनः उद्यत हो वे सब बड़े जोश के साथ फिर युद्ध के लिए आ डटे और उन्होंने कुमार का पताका सहित रथ छिन्न-भिन्न कर डाला। यह देख अभिमन्यु ने वज्रदण्ड हाथ में लेकर बात की बात में उन सबको चूर डाला ॥२६-२९॥


स जयार्द्रकुमारस्तु कुमारं तं महाशरैः।
अताडयत्तथा भूमौ स पपातातिदुःखितः ॥३०॥

स स्थिरः संस्थितो भूमौ तदा हाहारवोऽजनि।
देवैः कृतो नृपैः प्रोक्तमन्यायोऽयं नृपैः कृतः ॥३१॥

कर्णेनोक्तं कुमार त्वं पयः पिब सुशीतलम्।
सुमना अभिमन्युस्तु निर्मलं वचनं जगौ ॥३२॥

न पिबामि पयो नूनं वरिष्येऽनशनं नृप।
करिष्यामि तनुत्यागं स्मृत्वाहं परमेष्ठिनः ॥३३॥

इत्युक्ते निर्जने नीतोऽभिमन्युर्मन्युवर्जितः।
द्रोणादिभिः स्थितः सोऽपि चैतन्यं चिन्तयन्निजम् ॥३४॥

कषायकाययोः कृत्वा सल्लेखनां जिनान्स्मरन्।
क्षान्त्वा सर्वजनांस्तूर्णं मुमोच मलिनां तनुम् ॥३५॥

स स्वर्गे संगतो देहं समीहापरिवर्जितः।
विक्रियावधिसंयुक्तं दिव्यं वरगुणोत्करम् ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 30 से 36): इसी समय जयार्द्र ने अभिमन्यु को अपने महा शरों के द्वारा बेध दिया परन्तु तब भी वह धीरज के साथ उसके सामने स्थिर हो डटा रहा। अन्त में वह पीड़ित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। इस समय देवों के हाहाकार शब्द से पृथ्वी भर गई। न्यायी राजाओं ने कहा कि अभिमन्यु के साथ यह बड़ा भारी अन्याय हुआ है जो एक साथ इतने वीरगण एक बालक पर टूट पड़े। उसे पीड़ित देख कर्ण ने कहा कि कुमार, पानी पिओ। इस से तुम्हें कुछ शान्ति होगी। सुमना अभिमन्यु ने उत्तर में निर्मल वचनों द्वारा कहा कि नृप, मैं अब जल न पीकर उपवास करूँगा और परमेष्ठी का स्मरण करते हुए प्राणों का त्याग करूँगा। यह सुन कर द्रोण आदि क्षमाशील अभिमन्यु को निर्जन स्थान में ले गये। वह वहाँ आत्मस्वरूप का चिंतन करता हुआ स्थिर रहा और काय तथा कषाय को क्षीण करके जिनदेव का स्मरण करते हुए तथा सबको क्षमा कर और सब से क्षमा कराते हुए उस वीरात्मा ने इस अशुचि शरीर का त्याग किया और निदान-रहित हो स्वर्ग में विक्रिया-युक्त दिव्य गुणों के भण्डार दिव्य शरीर को पाया ॥३०-३६॥


ज्ञात्वाथ कौरवा भूपा दुर्योधनपुरस्सराः।
कुमारमरणं हृष्टाः प्राप्ता वादित्रनिस्वनान् ॥३७॥

निशीथिन्यथ निःशेषं रणं वारयितुं द्रुतम्।
आजगाम प्रकुर्वाणोत्सवं च कोरवे बले ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 37 से 38): उधर दुर्योधन आदि कौरवों ने जब अभिमन्यु के मरण का समाचार सुना तब वे बड़े हर्षित हुए और उन्होंने खूब खुशी मनाई। इसी समय सूर्य अस्ताचल पर पहुँचा। रात हुई। जान पड़ा कि मानों वह युद्ध को वारण करने और कौरवों की सेना को नया उत्साह देने के लिए ही आई है ॥३७-३८॥


तदा जनार्दने सैन्ये रुरुदुर्निखिला नृपाः।
विलापमुखराश्चाश्रुधारासंधौतसन्मुखाः ॥३९॥

तस्य मृत्युं निशम्याशु मुमूर्च्छ धर्मनन्दनः।
पपात पृथिवीपीठे कुलशैल इवोन्नतः ॥४०॥

कथं कथमपि प्राप्य चेतनां धर्मनन्दनः।
रुरोद करुणाक्रान्तस्वरं संभाषयन्निति ॥४१॥

हा पार्थपुत्र कोन्योऽत्र त्वत्समः संगरोधुरः।
एकोऽनेकस्रहस्त्राणि हन्तुं शक्तो नरेशिनाम् ॥४२॥

स द्वादशसहस्राणि जालंधरमहेशिनाम्।
हत्वा हन्त जयं प्राप्तो हतस्त्वं केन पापिना ॥४३॥

अर्थ (श्लोक 39 से 43): अभिमन्यु की मृत्यु से कृष्ण की सेना में बड़ा शोक फैल गया। विलाप करते और आँसुओं की धारा बहाते राजा-गण बड़े दुखी हुए। अभिमन्यु की मृत्यु से युधिष्ठिर मूर्च्छित हो उन्नत कुलाचल की भाँति पृथ्वी गिर पर पड़े। इसके बाद जब वह होश में आये तब दुख-पूर्ण स्वर से यह कहते हुए रोने लगे कि हा पुत्र, तुम्हारे सिवाय और कौन ऐसा संग्राम करने वाला है जो अकेला ही हजारों शत्रुओं को इस वीरता के साथ मौत का घर दिखा सके। तुमने जालंधर राजा की बारह हजार सेना को नष्ट करके विजय पाई थी। हाय! न जाने किस पापी ने तुम जैसे शूर को भी धराशायी कर दिया ॥३९-४३॥


तावत्पार्थः समायासीद्धर्मपुत्रसमीपताम्।
प्रगुणः शोकसंतप्तः श्रुत्वाथ करुणस्वरम् ॥४४॥

पार्थः प्रोवाच भो भ्रातः समायाताः समुन्नताः।
कुमाराः किं न पश्यामि स्वसुतं सुतरां शुभम् ॥४५॥

किं वैरिणा हतः पुत्रश्चक्रव्यूहेऽथ किं मृतः।
तदा युधिष्ठिरोऽवोचच्छृणु शक्रसुत ध्रुवम् ॥४६॥

क्षात्रं मुक्त्वा नरौघेण हतस्ते बालनन्दनः।
तन्निशम्य मुमूर्च्छाशु पार्थः पृथ्वीमुपागतः ॥४७॥

पुनरून्मूर्च्छितः पार्थो रुरोदेति शुचं सरन्।
त्वया विनात्र भो पुत्र धरां धर्तुं च कः क्षमः ॥४८॥

राज्यं भर्ता कुलं त्राता को हनिष्यति वैरिणः।
तावदायान्नृपस्तत्र मुकुन्दो मुरमर्दनः ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 44 से 49): युधिष्ठिर को इस प्रकार विलाप करते देख शोक से सन्तत हुआ अर्जुन आया और बोला कि भाई और-और सब कुमार तो युद्धभूमि से आ गये, परन्तु अभिमन्यु अब तक नहीं देख पड़ा, यह क्यों? क्या चक्रव्यूह में उसे शत्रुओं ने मार डाला है या वह स्वयं मर गया है? युधिष्ठिर ने बड़े दुख के साथ कहा कि अर्जुन, वह हाल सुन कर ही तुम क्या करोगे? कैसे धैर्य धरोगे? कहते हुए छाती फटती है कि क्षत्रिय धर्म को छोड़कर नीच राजाओं ने एक साथ मिल कर अन्याय से अभिमन्यु को मार डाला है। सुनते ही पार्थ को मूर्च्छा आ गई और वह पृथ्वी पर धड़ाम से गिर पड़ा। इसके बाद उसे जब चेतना हुई तब वह भी शोकपूर्ण हो बड़ा विलाप करने लगा कि पुत्र, तुम्हारे बिना पृथ्वी का पालन करने के लिए कौन समर्थ है। तुम्हारे बिना कौन तो राज्य भोगेगा, कौन कुल की रक्षा करेगा तथा कौन बैरियों को जीतेगा ॥४४-४९॥


नो पार्थ केवलं तेऽद्य सुतो यातो ममापि च। विधवत्वं परं सैन्यं नीतं तेन गतेन वै ॥५०॥

ममातिवल्लभो भव्यो दुर्लभत्वं गतोऽधुना। शोकेनालं नरेन्द्रात्र शत्रुशर्मविधायिना ॥५१॥

विद्यतेऽवसरो नात्र शोकस्य शृणु वैरिणः। संयुगे जहि धीरत्वं धर धर्मविशारद ॥५२॥

जहि पुत्रस्य हन्तारं तत्फलं च प्रदर्शय। अभिमन्युमृतिं श्रुत्वा सुभद्रा भूतलं गता ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 50 से 53): इसी समय वहाँ कृष्ण आ गये और बोले कि पार्थ, आज केवल तुम्हारा पुत्र ही नहीं गया, किन्तु वह मेरी सेना को एक विधवा स्त्री की भाँति कर गया है। वह मुझे बड़ा प्यारा था। आज वह मुझे दुर्लभ हो गया है। अतः भाई, इस वक्त शोक न करो क्योंकि अभी शोक करने का मौका नहीं है। यदि इस वक्त तुम शोक करोगे तो इससे शत्रु बड़े खुश होंगे और उनका साहस बहुत बढ़ जायेगा। इस लिए हे धर्म-विशारद, तुम धीरज धरो और युद्ध में शत्रुओं का ध्वंस करो। बात यह है कि अभिमन्यु के मारने वाले को उसके अपराध का फल चखा देना इस समय तुम्हारा पहला कर्तव्य है ॥५०-५३॥


प्राप्ता मूर्च्छां समुच्छिन्नवल्लीव गतचेतना। उन्मूर्च्छिता रुरोदाशु हा पुत्रेति प्रजल्पिनी ॥५४॥

सुसहायपरित्यक्तः सुतो मेऽद्य मृतिं गतः। कथं सुप्तः सुत त्वं हा दुस्तरे शरसंस्तरे ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 54 से 55): उधर अभिमन्यु की मृत्यु सुन कर सुभद्रा भी मूर्च्छित हो ऐसे गिरी जैसे जड़ से उखाड़ दी गई बेल चेतना रहित हो गिर पड़ती है। इसके बाद जब वह कुछ होश में आई तब हा हा पुत्र कहती हुई विलाप करने लगी। हा पुत्र, तुम सहाय के बिना मृत्यु के ग्रास बन गये। यदि कोई तुम्हारी सहाय पर होता तो तुम्हारी ऐसी हालत कभी न होती। हा पुत्र, तुम इस दुस्तर शरों के बिछौने पर कैसे सो गये? क्या किसी ने तुम्हारी रक्षा नहीं की? ॥५४-५५॥


हा युधिष्ठिर भूमीश त्वया किं रक्षितो न सः। कुलत्रातात्र भवतां भविता भुवने सुतः ॥५६॥

हा भीम भूपते भव्य त्वया किं स न पालितः। हा धनंजय धन्यात्मन्युधि धीर न रक्षितः ॥५७॥

हा जनार्दन मे भ्रातर्जन्ये जनभयंकरे। न रक्षितः सुतः किं भो मम प्राणसमो महान् ॥५८॥

केनापि न धृतो बालो बलवान्विपुलो गुणैः। सर्वस्मिन्नगरे लोका दुःखितास्तद्वियोगतः ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 56 से 59): हा प्रभो, युधिष्ठिर! आपने भी मेरे पुत्र की रक्षा नहीं की। अब आपके महल में ऐसा कुलदीपक पुत्र फिर कौन अवतार लेगा। हा भीम, आपने अभिमन्यु को क्यों नहीं बचाया। हे प्राणप्यारे! धीर धनंजय, तुम्हें तो अपने प्यारे पुत्र की रक्षा करनी थी। हा प्यारे भाई कृष्ण, इस महान् भयंकर युद्ध में आपने भी प्राणों से अधिक प्यारे मेरे पुत्र की परवाह न की। हा, गुणों के भण्डार बली पुत्र की किसी ने भी रक्षा न की। देखो, आज अभिमन्यु के वियोग से सारे नगर के लोग दुखी हो रहे हैं ॥५६-५९॥


बान्धवो मे धराधीशो माधवो विधुरातिगः। ज्येष्ठो युधिष्ठिरो ज्येष्ठः श्रेष्ठो भीमो ममोत्तमः ॥६०॥

अर्थ: हाय! मेरे कृष्ण के जैसा सुखी, पृथ्वी-पालक भाई है, युधिष्ठिर, भीम जैसे उत्तम पुरुष जेठ हैं


पतिः पार्थस्तु भूपीठे पाता पावनमानसः।
तथापि क्रन्दनं प्राप्ता दुःखिताहं विमर्दिता ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 60 से 61): तथा पावनमना और पृथ्वी की रक्षा करने वाले वीर अर्जुन स्वामी हैं फिर भी मुझे आज रोना पड़ा और मैं इस तरह निराधार हो गई। इतने बड़े-बड़े वीरों के रहते हुए भी मुझे पुत्र-वियोग का विशाल और अतिशय गहरा समुद्र तैरना पड़ा ॥६०-६१॥


तदा दीर्घं समुच्छ्वस्य पार्थः प्रोवाच भो प्रिये।
शृणु मे वचनं पथ्यं तथ्यं सर्वमतिप्रदम् ॥६२॥

संजयार्द्रकुमारस्य मूर्धानं नो लुनामि चेत्।
प्रविशामि तदा वह्नौ न सहे सुतदुर्मृतिम् ॥६३॥

रुदित्वालं गृहीत्वा त्वं जलं क्षालय चाननम्।
हरिर्बभाण भगिनि शोकं संहर सत्वरं ॥६४॥

संसारश्चञ्चलश्चित्रं चञ्चूर्यन्ते जना भृशम्।
सुखैर्दुःखैः सदा क्षिप्ता भ्रमन्तो यत्र दुःखिताः ॥६५॥

संसारेऽत्र गताः पूर्वं पुरुषाः पावनाः परे।
इतस्ततः पतन्तश्च समर्थाः स्वं न रक्षितुम् ॥६६॥

अरघट्टीययन्त्रसदृशे संसरज्जनः।
संसारे न स्थिरः कोऽपि भवितव्यतया वृतः ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 62 से 67): इस समय दीर्घ निस्साँसें खींचते हुए पार्थ ने सुभद्रा से कहा कि प्रिये, सुनो-मेरे पुत्र का वध करके जिस दुष्ट ने मेरी यह दुर्दशा की है मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि उस जयार्द्र का सिर यदि मैं धड़ से जुदा न कर दूँगा तो अग्नि-प्रवेश करूँगा क्योंकि मुझसे अपने प्रिय पुत्र की यह दुर्गति सही नहीं जाती है। प्यारी, अब तुम न रोओ किन्तु धीरज की शरण लो और पानी लेकर मुँह धो डालो। इसके बाद कृष्ण ने धैर्य देते हुए सुभद्रा से कहा कि बहिन, तुम शोक मत करो, शोक करने से अब कुछ हाथ लगने का नहीं क्योंकि जो कुछ होना था वह तो हो चुका। अब उसके लिए शोक करने से लाभ ही क्या है? और देखो, यह संसार चंचल है, विचित्र है तथा इसका यह हमेशा का नियम है कि इस में जीवों को कभी सुख मिलता है तो कभी दुख भी भोगना पड़ता है। इसमें सदा सुखी कोई नहीं रहते और न कोई सदा स्थिर ही रहते हैं किन्तु इसी सुख-दुख-रूप हालत में विलीन हो जाया करते हैं। बात यह है कि संसार में जीव हमेशा ही जन्म-मरण के चक्कर लगाया करते हैं और दुख भोगते हैं। बहिन, इस संसार में पहले भी तो अपने पूर्व-पुरुष स्वयं अपनी ही रक्षा न कर सकने के कारण काल का शिकार बन गये हैं, यह क्या तुम नहीं जानती और अपनी ही नहीं किन्तु सारे संसार की ही यही हालत है। कारण कि संसार रहट की घड़ियों के समान उलट पलट होते रहने वाला है और यही कारण है कि यहाँ कोई भी थिर नहीं है, सभी अस्थिर दिखते हैं-सभी कर्मों के चक्कर में पड़े हुए हैं। कर्म जैसा उन्हें नचाते हैं वैसे ही वे नाचते हैं। कृष्ण ने इस प्रकार अपनी बहिन को बहुत कुछ समझाया और उसे धीरज दिया ॥६२-६७॥


इति संबोधिता बुद्ध्या माधवेन स्वसा निजा।
तावत्केनापि संप्रोक्तं जयार्द्रस्य हितार्थिना ॥६८॥

पार्थेन विहिता भद्र प्रतिज्ञा मरणकृते।
तब त्वं यासि शक्रस्य शरणं तर्हि न स्थितिः ॥६९॥

अर्थ (श्लोक 68 से 69): उधर जयार्द्र के किसी हितैषी ने उसे जाकर यह समाचार दिया कि भद्र, पार्थ ने आपको मार डालने का दृढ़ संकल्प किया है। इसलिए आप उसकी शरण में जाइए, नहीं तो परिणाम बहुत ही बुरा होगा-आप अपनी स्थिति कायम न रख सकेंगे। आश्चर्य है कि आप मृत्यु के आँखों के आगे


निश्चिन्तः किं स्थितस्त्वं हि मरणे समुपस्थिते।
निशम्येति चिरं चित्ते जयार्द्रोऽचिन्तयत्तराम् ॥७०॥

वैवस्वतः इव क्रुद्धोऽवश्यं वृद्धश्रवःसुतः।
लविष्यति निजं शीर्षं प्रभाते पटुमानसः ॥७१॥

गत्वा दुर्योधनाभ्यर्णं जयार्द्रो वचनं जगौ।
भीतोऽहं विपिनं गत्वा ग्रहीष्यामि तपोऽनघम् ॥७२॥

यत्रार्जुनभयं नैव श्रोष्यामि श्रवसोः सदा।
यः क्रुद्धो धनुषं धृत्वा युद्धे तिष्ठेत्कदाचन ॥७३॥

तदा सुरासुरा नैव स्थातुं तत्संमुखं क्षमाः।
द्रोणः श्रुत्वा बभाणेति सुमते शृणु मद्वचः ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 68 से 74): घूमते रहते भी बेफिक्र बैठे है। यह सुनकर जयार्द्र चिन्ताओं से घिर गया और बहुत देर तक सोच विचार करता रहा। यह सोचकर उसका हृदय हिल उठा कि प्रभात होते ही यम की भाँति क्रोधित हो वीर अर्जुन मेरे मस्तक को धड़ से जुदा कर देगा। कुछ स्थिर न कर सकने के कारण वह दुर्योधन के पास गया और उससे कहने लगा कि मैं बड़ा भयभीत हो रहा हूँ। मुझ पर बड़ा संकट आने वाला है, अतः अब तो वन में जाकर निर्दोष तप धारण करूँगा, जहाँ कि फिर अर्जुन का भय कभी कानों तक में भी सुनाई नहीं पड़ेगा। धनंजय ऐसा बली है कि जब वह धनुष-बाण लेकर युद्ध में रहता है तब सुर-असुर कोई भी उसका सामना करने के लिए समर्थ नहीं होते ॥६८-७४॥


न कोऽप्यस्ति जगत्यां हि नरोऽहो अजरामरः।
शोभते क्षत्रियाणां नाभ्यागमाद् भञ्जनं भुवि ॥७५॥

कृतशक्तेस्तु नुः शीर्षं याति चेद्यातु किं भयम्।
जयतो जयलक्ष्मीश्च जनानां जायते लघु ॥७६॥

अद्यास्तमनवेलायां सव्यसाची मरिष्यति।
हनिष्यति नरस्त्वां कस्ततो भव सुनिश्चितः ॥७७॥

निशम्येति स्थितः स्थैर्याज्जयार्द्रो जयवाञ्छया।
रजन्या निर्गमे जाते धनंजयश्चरेण हि ॥७८॥

अर्थ (श्लोक 75 से 78): यह सुन द्रोण ने कहा कि सुमति, मेरे वचन सुनो। देखो, इस संसार में कोई भी पुरुष अजर अमर नहीं हैं। एक दिन सभी को जरा के मुँह में होकर काल के गाल में जाना है। तब फिर क्षत्रियों का युद्ध-स्थल को पीठ दिखाना संसार में शोभा नहीं देता। अतः यदि शक्तिशाली पुरुष का मस्तक चला जाये तो भले ही चला जाये। इसमें भय ही काहे का है और यदि जीत हो गई तो थोड़ी ही देर में उन वीरों के हाथ में जय-लक्ष्मी आ जाती है। अतएव मरने से तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिए और एक बात यह भी है कि आज सूर्यास्त के समय में ही अर्जुन यमलोक को प्रयाण कर जायेगा क्योंकि उसकी प्रतिज्ञा ही ऐसी है। फिर बताओ तुम्हें मारेगा ही कौन? तुम निश्चिन्त होकर रहो, डरो मत। यह सुनकर जयार्द्र जय की वाञ्छा से थिर हो गया और उसने सारी चिन्ताएँ छोड़ दीं ॥७५-७८॥


कश्चित्पृष्टः कथं लक्ष्यो जयार्द्रस्य रथो रणे।
सोऽवोचत्पृथुभूपालैर्व्यूहो हि विहितो महान् ॥७९॥

विषमे यत्र वै वेष्टुं कोऽपि शक्नोति नो सुरः।
तं निशम्य नरः प्राह यदि रक्षन्ति तं सुराः ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 79 से 80): रात बीत चुकी। सबेरा हुआ। धनंजय का जासूस युद्ध की खबर लाने को रवाना हुआ। उसे एक आदमी मिला। उससे उसने पूछा कि रण में जयार्द्र का रथ कैसे जाना जायेगा-उसकी विशेष पहचान क्या है। उस आदमी ने उत्तर में कहा कि कौरव राजाओं ने बड़ा विषम चक्रव्यूह रचा है। उसके भीतर उन्होंने जयार्द्र को रखा है, अतः वह दिखाई तक नहीं पड़ता, उसके पहचानने की तो


तथापि मारयिष्यामि जयार्द्रं जयवाञ्छया।
इत्युक्त्वा स्थण्डिले तस्थौ कृत्वा दर्भासनं महत् ॥८१॥

स्थितस्तत्र स धैर्येण दध्यौ शासनदेवताम्।
आराधितो मया धर्मो जिनदेवः सुसेवितः ॥८२॥

गुरुश्च यदि प्राकट्यं भज शासनदेवते।
इति ध्यायञ्जिनं चित्ते स्थितोऽसौ स्थिरमानसः ॥८३॥

समायासीत्तदा पार्थं वरशासनदेवता।
जजल्पेति हरिं पार्थं सा सुरी सुखकारिणी ॥८४॥

नरनारायणौ यत्र श्रीनेमिश्च महामनाः।
तत्राहं प्रेष्यकारित्वं भजामि भवतामिह ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 79 से 85): वात ही जुदी है। बात यह है कि वह इतना सुरक्षित है कि उसे मनुष्य की तो बात ही क्या है देवता भी नहीं देख सकते। यह समाचार सुनकर अर्जुन ने कहा कि जयार्द्र की चाहे देव ही क्यों न रक्षा करें परन्तु मैं उसे आज बिना मारे छोड़ने का नहीं। यह कहकर वह एक यक्ष के चबूतरे पर कुशासन डाल कर स्थिरता से बैठ गया और धीरज के साथ शासन-देवता की आराधना करने लगा। वह थिर चित्त मन ही मन शासन देवताओं से सम्बोधन करके बोला कि यदि मैंने जिनदेव, जिनधर्म और गुरु की सच्चे दिल से आराधना की है तो हे शासनदेवता! तुम प्रकट होकर मेरी सहाय करो। यह जिनदेव का ध्यान कर ही रहा था कि उसी समय वहाँ शासन देवी आई और वह कृष्ण तथा पार्थ से बोली कि प्रभो, कृष्ण, पार्थ और-महामना नेमिप्रभु जैसे महात्मा जहाँ कहीं भी होंगे मैं सदा उनकी सेवा करूँगी ॥७९-८५॥


युवां च यच्छतं तूर्णं ममादेशं मनोगतम्।
अवोचतां तदा तौ तां श्रेष्ठं वैरिवधोद्भवम् ॥८६॥

तच्छ्रुत्वाह सुरी शीघ्रमागच्छतं मया समम्।
युवां सेत्स्यन्ति कार्याणि भवतोर्विपुलानि च ॥८७॥

तया सार्धं जगामाशु पार्थस्तेन सुमनसः।
यत्र सौख्यकरी रम्या कुबेरस्नानवापिका ॥८८॥

हेमपद्मसमाकीर्णा हंससारससद्रवा।
मणिसोपानसंरुद्धा चलत्कल्लोलमालिका ॥८९॥

अर्थ (श्लोक 86 से 89): आप मुझे जो भी चाहे आज्ञा कीजिए। यह सुन कर उन्होंने उससे वैरी के सम्बन्ध का सारा हाल कहा। जिसे सुन कर शासनदेवी बोली कि आप शीघ्र मेरे साथ चलिए। आपके सब कार्य सिद्ध होंगे। देवी के कहने पर पार्थ और कृष्ण उसके साथ गये। वे कुबेर के स्नान की बावड़ी पर पहुँचे। बावड़ी सुख की खान थी, सुंदर थी, सुवर्ण जैसे कमलों से पूर्ण थी और हंस-सारस आदि की क्रीड़ा का स्थान थी। मणियों की उसकी सीढ़ियाँ थीं और जल की कल्लोलों से वह व्याप्त थी ॥८६-८९॥


देवी बभाण पार्थेशमेतस्य विपुले जले।
वसतः फणिनौ भीमौ फणाफूत्कारकारिणौ ॥९०॥

भित्वा भयं नरेन्द्राद्य वापिकां प्रविश त्वरा।
गृहाण नागयुगलं संशल्यमिव विद्विषः ॥९१॥

निशम्य निपुणः पार्थः प्रविश्य वरवापिकाम्।
जग्राह भुजगद्वन्द्वं सर्वद्वन्द्वनिवारकम् ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 90 से 92): वहाँ पहुँचकर देवी ने पार्थ से कहा के पार्थ, इस बावड़ी के गहरे जल में विशाल फण वाले भयंकर दो साँप रहते हैं। उनका तुम बिल्कुल भय न कर बावड़ी में प्रवेश कर उन्हें पकड़ लो। वे दोनों नाग तुम्हारे शत्रु को शल्य की तरह चुभेंगे और उनके लिए काल का काम देगें। यह सुन निपुण पार्थ उसी दम बावड़ी में घुस गया और उसने विघ्नों को हरने वाले उस नाग-युगल को पकड़ लिया ॥९०-९२॥


एको यातु शरत्वं ते द्वितीयस्तु शरासनं। नरनारायणौ तुष्टौ तच्छ्रुत्वा सशरासनौ ॥९३॥

छित्त्वा जयार्द्रमूर्धानं तत्तातस्तपसि स्थितः। वने प्रविपुले ध्यानी विद्यायाः साधनेच्छया ॥९४॥

तदञ्जलौ क्षिप क्षिप्रं तस्मिन्क्षिप्ते स पञ्चताम्। यास्यत्येव भवच्छत्रुरन्योपायं च मा कृथाः ॥९५॥

तन्निशम्य नरस्तुष्टो लात्वा धन्वशरौ परौ। आयातो विष्णुना सत्रं सैन्ये लोकसुखावहः ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 93 से 96): यह देख देवी ने उनसे कहा कि इन दोनों नागों में से एक तो शर का काम देगा और दूसरा धनुष का। यह सुनकर धनुषधारी अर्जुन और कृष्ण को बड़ा संतोष हुआ। इसके बाद देवी ने पार्थ से कहा कि पार्थ, इनके द्वारा वैरी को जीत, जयार्द्र के मस्तक को काट कर प्रसन्न होओ परन्तु सुनो जयार्द्र का पिता वन में विद्या के साधने की इच्छा से तप कर रहा है। अतएव जयार्द्र को मारकर ही तुम न रह जाना किन्तु जयार्द्र के मस्तक को काटकर तुम उसके पिता के पास वन में जाना और उसके हाथों में वह सिर रख देना। तुम ज्यों ही उसके हाथों में जयार्द्र का मस्तक रखोगे त्यों ही वह भी काल-कवलित हो जायेगा और इस तरह तुम शत्रु-रहित हो जाओगे। बस, शत्रु के सम्बन्ध में इसके सिवा और कोई उपाय करने की जरूरत नहीं है, यही उपाय बस है। देवों के इन वचनों से पार्थ को बहुत सन्तोष हुआ और वह धनुष-बाण लेकर कृष्ण के साथ-साथ अपनी सेना में चला आया ॥९३-९६॥


उज्जगामार्यमा तावज्जनान्दर्शयितुं रणम्। उत्थिताः सुभटा योद्धुं सबला बलयोर्द्वयोः ॥९७॥

जयार्द्र धीरयन्द्रोणोऽभाणीद्वत्स सुस्वच्छताम्। व्रज तूष्णीं भजंस्तिष्ठ करिष्ये तव रक्षणम् ॥९८॥

चतुर्दशसहस्त्राणां गजानामन्तरे तदा। द्रोणेन स्थापयित्वा स रक्षितो वररक्षणैः ॥९९॥

तुरङ्गाणां च लक्षेण संवेष्ट्याऽस्थापयत्तम्। रथैः षष्टिसहस्त्रैश्च ततो बाह्ये व्यवेष्टयत् ॥१००॥

लक्षैर्विंशतिसंख्यैश्च पदिकैस्तस्य रक्षणम्। विधायोवाच सद्द्रोणः समुद्र इव धीरधीः ॥१०१॥

जयार्द्ररक्षणं यूयं कुरुध्वं भो महानृपाः। अहं रणमुखे क्षिप्रं क्षेप्स्यामि विपक्षकान् ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 97 से 102): सबेरा हुआ। मानों लोगों को युद्ध का दृश्य दिखाने के लिए ही सूरज निकला है। उभय पक्ष के सबल योद्धा युद्ध के लिए उठे। इस समय जयार्द्र को धीरज देकर द्रोण ने कहा कि वत्स, चिन्ता को छोड़ो, अपने दिल को स्वच्छ रक्खो और आनंद से रहो। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। इसके बाद द्रोणाचार्य ने जयार्द्र की रक्षा के लिए चौदह हजार हाथियों के घेरे के बीच में उसे रक्खा और उन हाथियों के चारों ओर तीन घेरे और डाले। जिनमें पहला घेरा लाख घोड़ों का था, दूसरा साठ हजार रथों का और तीसरा बीस लाख प्यादों का था। इस तरह से जयार्द्र की रक्षा का ठीक-ठीक प्रबन्ध कर चुकने पर समुद्र की भाँति धीर-बुद्धि द्रोण ने अपने पक्ष के राजा लोगों से कहा कि आप लोग तो जयार्द्र की रक्षा करें और मैं उधर रण में शत्रुओं का नाश करने के लिए जाता हूँ। मैं निश्चय से उनका ध्वंस करूँगा ॥९७-१०२॥


तदा युधिष्ठिरोऽवोचद्धरिं हरिमिवोद्धतम्। किं कार्यं च करिष्यामो वयं नष्टधियः स्थिताः ॥१०३॥

अर्थ: इसी समय सिंह की भाँति पराक्रमी कृष्ण से युधिष्ठिर ने कहा कि हम लोग बिल्कुल ही कर्तव्य-हीन हैं। इस प्रकार बैठे-बैठे हम कर क्या सकते हैं? जान पड़ता है हमारे वश की बात नहीं


चिरं त्वं संस्थितोऽटव्यां वृथा पार्थ प्रतिज्ञया।
जल्पाको जल्पति स्वैरं निर्वाहो भुवि दुर्लभः ॥१०४॥

अर्थ (श्लोक 103 से 104): है। यही कारण है कि पार्थ की प्रतिज्ञा का निर्वाह करने के लिए इतने समय तक वन में रहना भी व्यर्थ ही हुआ। सचमुच हम लोग अकिंचित्कर ही हैं। लोग हर एक बात आसानी से कह तो देते हैं परन्तु फिर उसका निर्वाह करना उन्हें भारी दुर्लभ पड़ जाता है ॥१०३-१०४॥


श्रुत्वेति केशवोऽवोचच्छङ्कां मा कुरु पाण्डव।
सेत्स्यत्यद्याखिलं कार्यं भवतां मङ्गलैःसह ॥१०५॥

भोक्ष्यसे त्वं परं देशमेककः कुरुजाङ्गलम्।
तत्क्षणे प्रणतः पार्थोऽवोचत्तं धर्मनन्दनम् ॥१०६॥

आदेशं देहि मे दोष्णोर्दर्शयामि बलं तव।
तदादिष्टो विशिष्टात्मा धर्मजेन धनंजयः ॥१०७॥

रथारूढश्चचालामा रथस्थेन स विष्णुना।
भयंकराणि तूर्याणि दध्वनुर्युद्धसंगमे ॥१०८॥

अर्थ (श्लोक 105 से 108): यह सुन कर केशव ने कहा कि महाराज, आप कोई शंका न करें। आपके सब कार्य निर्विघ्न सिद्ध होंगे और आप ही कुरुजांगल देश का राज्य करोगे। इसी समय पार्थ ने प्रणाम कर युधिष्ठिर से कहा कि देव, आज्ञा कीजिए जो मैं आपको अपनी भुजाओं का पराक्रम दिखाऊँ। यह सुन महामना युधिष्ठिर ने धनंजय को बड़ी प्रसन्नता से युद्ध-प्रयाण की आज्ञा दी। युधिष्ठिर की आज्ञा पाते ही अर्जुन रथ पर सवार होकर कृष्ण के साथ-साथ चला। युद्ध के सूचक भयंकर बाजे बजे ॥१०५-१०८॥


गजाः सज्जाः सुह्रेषाढ्याः हयाः सुभटकोटयः।
समाट् रथसंदोहाः कुर्वन्तः सत्कलारवम् ॥१०९॥

छिन्दन्तो मस्तकान्वैरिव्रजानां रुधिरारुणाम्।
कुर्वन्तस्तु धरां धीरा योयुध्यन्ते स्म संयुधि ॥११०॥

पातितैस्तु रथैर्भग्नैः पन्थाः पार्थेन सव्यथैः।
गर्जद्भिस्तु गजैश्छिन्नहस्तैः संरुरुधेऽयनम् ॥१११॥

कबन्धानि च नृत्यन्ति तच्छीर्षै रञ्जिता धरा।
अन्त्रैः संवेष्टिता मर्त्यास्तदाभूवन्महारणे ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 109 से 112): रण नाद करते हुए सैनिक, चिंघाड़ते हुए हाथी, हींसते हुए घोड़े, विजय के गीत गाते हुए करोड़ों पयादे और रथ-समूह चले। युद्ध-स्थल में पहुँच कर वे धीर सुभट वैरियों के मस्तकों को छेदते हुए तथा पृथ्वी को खून से तर करते हुए उमड़-उमड़कर घमासान युद्ध करने लगे। वीर पार्थ ने शत्रु के रथों को तोड़ गिराया। चिंघाड़ते हुए हाथियों के सुण्डादण्डों को छिन्न कर उन्हें भी धराशायी कर दिया, जिनसे मार्ग-बिल्कुल रुँध गया। कहीं से निकलने को जगह न रही। बात ही बात में योद्धाओं के धड़ नाचने लगे। लहूलुहान मस्तकों से पृथ्वी तर ही गई ॥१०९-११२॥


भटासृजां प्रवाहेन तरन्तो मानवास्तदा।
भेजुः स्थितिं न कुत्रापि स्वगाधजलधाविव ॥११३॥

तत्क्षणे भज्यमानं स्वं द्रोणो वीक्ष्य महाबलम्।
ददानो धीरणां सर्वान्प्रोवाच चतुरं वचः ॥११४॥

मा भज्यन्तां भटा भीता लज्यते येन स्वं बलम्।
यत्राहं भवतां भीतिः कुतस्त्या भवत स्थिराः ॥११५॥

अर्थ (श्लोक 113 से 115): इस महार ण में ऐसा कोई सुभट न रहा जो कि खून से न रँगा गया हो। यहाँ तक कि वहाँ रक्त का बड़ा भारी प्रवाह वह निकला, जिस में तैरने के लिए असमर्थ होकर योद्धा कहीं ठहर न सके, जैसे अगाध समुद्र में न तैर सकने के कारण लोग कहीं ठहर नहीं सकते। इसी समय अपनी सेना को मार के मारे भागती हुई देखकर द्रोण ने उसे धीरज देते हुए कहा कि वीर भट-गण, आप लोग , न भागें, न भय करें। ऐसा करने से हम लोगों को बड़ा लज्जित होना पड़ेगा और जहाँ मैं हूँ वहाँ आप लोगों


गुरुवाक्येन ते तस्थुः स्थिराश्च सुभटाः स्फुटम् । नरनारायणौ तावन्नत्वा गुरुमवोचताम् ॥११६॥

मद्वचः कुरु भो तात निवर्तय रणाङ्गणात् । स्फेटयावः परं सैन्यं लङ्घयावो गुरुं कथम् ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 113 से 117): को भय ही क्या है । आप लोग स्थिर हो निर्भय होइए । द्रोण के वचनों को सुन सब सुभटगण भागते हुए ठहर गये । इसी बीच में अर्जुन और कृष्ण ने आकर द्रोण को प्रणाम कर कहा कि प्रभो ! आप से हमारी प्रार्थना है कि इस युद्ध में योग न देकर आप रण-स्थल से वापस चले जाइए । आपके होते हुए हम अपने पूज्य गुरु को लाँघकर शत्रु-सेना का विध्वंस कैसे करें ॥११३-११७॥


निशम्येति जगौ द्रोणो नोत्सरामि रणादहम् । यो मया रक्षितो मर्त्यः सोऽमरत्वं गतो भुवि ॥११८॥

इत्युक्ते क्रोधसंरुद्धः संक्रन्दनसुतस्त्वरा। रथारूढश्चचालाशु धनुःसंधानमादधत् ॥११९॥

अर्थ (श्लोक 118 से 119): यह सुन उत्तर में द्रोण ने कहा मैं रण-स्थल से वापस कैसे जा सकता हूँ । मुझे तो तुम लोगों के साथ युद्ध करना होगा । एक बात और है जो तुम्हारे ध्यान देने योग्य है और वह यह है कि मैंने आज तक जिसकी भी रक्षा की है संसार में वही पुरुष अमर हो गया है और जिसे मारा है वह सदा के लिए सो गया है । अतएव इस पर विचार कर ही तुम्हें युद्ध में बढ़ना चाहिए । यह सुन कर पार्थ का हृदय क्रोध से भर आया । वह फिर उसी समय रथ में सवार हो, धनुष संधान कर युद्ध के लिए चल पड़ा ॥११८-११९॥


तदा समाहता नादास्तूर्याणां भटभीतिदाः । नवबाणैर्हतो द्रोणः पार्थेन बलशालिना ॥१२०॥

द्रोणेन तत्क्षणात्तेऽपि संरुद्धा निजबाणैः । द्विगुणद्विगुणान्बाणान्विससर्ज पुनर्नरः ॥१२१॥

यावल्लक्षप्रमा जाताः पार्थेन प्रेषिताः शराः । द्रोणश्चिच्छेद तान्नूनं स्वशरै रणसंमुखैः ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 120 से 122): उसी समय भटों को भय देने वाले भयंकर बाजे-बजे । रण आरंभ हुआ । बलशाली पार्थ ने पहले ही द्रोण को नौ बाण मारे, जिनको कि द्रोण ने उसी समय अपने बाणों से छेद दिया । इसके बाद पार्थ ने फिर दूने-दूने बाण छोड़े और जब तक वे पूरे एक लाख की संख्या तक पहुँच न गये तब तक वह बराबर बाण छोड़ता ही चला गया । द्रोण ने रण के सन्मुख हो अपने बाणों द्वारा उन्हें भी निवार दिया । यह देख द्रोण ने पार्थ से कहा कि तुम विलम्ब क्यों कर रहे हो । क्या बैरियों के सुभटों के साथ तुम्हें गुरु-शिष्य कैसा युद्ध करना युक्त है? सुन कर अर्जुन हाथ में तलवार ले शत्रु की सेना में मार्ग करता हुआ चला ॥१२०-१२२॥


तदावोचद्धरिः पार्थ विलम्बयसि किं नर । गुरुशिष्यरणं किं भो युक्तं वै रणसंविदाम् ॥१२३॥


श्रुत्वा नरः करे कृत्वा कृपाणं कारयन्सृतिम् । गच्छंश्च गुरुणा प्रोचे पृष्ठलग्नेन सत्वरम् ॥१२४॥


तिष्ठ तिष्ठ क्व यासि त्वं नरेति जल्पितं गुरुम् । हसित्वा पाण्डवोऽवोचन्मा कार्षीस्त्वं रणं गुरो ॥१२५॥

अर्थ: यह देख द्रोण ने उससे कहा कि अर्जुन, ठहरो, तुम कहाँ जा रहे हो । यह सुन पार्थ ने हँसते हुए कहा कि गुरुवर्य ! आप युद्ध न कीजिए । आपको यह युक्त नहीं है । कारण हम सब आप ही के पुत्र हैं । आपके लिए तो जैसे ही अश्वत्थामा और जैसे ही हम सब और विष्णु हैं । फिर आपको हमारे साथ युद्ध करना युक्त है क्या? गुरुवर्य ! पिता-पुत्रों का दुखद युद्ध शोभा नहीं देता । व्यर्थ ही


सुतास्ते पाण्डवा विष्णुरश्वत्थामाविशेषतः । न भेदो विद्यते तात तैर्युद्धं किं समुच्यताम् ॥१२६॥

जनकात्मजयोर्युद्धं शोभते किं दुरावहम् । मार्यते केवलं वैरी रणेऽतस्त्वं निवर्तय ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 123 से 127): इसमें योद्धाओं का संहार होता है। इसलिए प्रभो! आप युद्ध के संकल्प से लौट जाइए-युद्ध न कीजिए ॥१२३-१२७॥


निवृत्तो लज्जितो द्रोणः पार्थो हन्ति परान्रणान् । एको मतङ्गजान्सिंहो यथा विक्रमसंक्रमः ॥१२८॥

गर्जन्गाण्डीवनादेन प्रलयाब्धिरिवापरः । बिभेद कौरवं सैन्यं पार्थः संत्रासयन्परान् ॥१२९॥

अर्थ (श्लोक 128 से 129): पाण्डवों की इस प्रार्थना से द्रोण लौट गये और अब अकेला अर्जुन ही अपने पराक्रम से बैरियों का ध्वंस करने लगा, जैसे अकेला सिंह अपने पराक्रम के बल से मतवाले हाथियों का ध्वंस करता है। इसके बाद, गांडीव धनुष की भीषण टंकार से प्रलय काल के समुद्र की तुलना करने वाले पार्थ ने दुख देने वाले कौरवों की सारी सेना को ही भेद डाला ॥१२८-१२९॥


केचिदूचुस्तदा भूपाः पार्थो द्रोणेन प्रेषितः । प्रविष्टोऽनर्थसंघातं करिष्यति न चान्यथा ॥१३०॥

श्रुत्वा शतायुधः क्रोधाद्रुरोध हरिशक्रजौ । ताभ्यां तस्य रथाश्छिन्ना वाजिनो गजराजवत् ॥१३१॥

तदा शतायुधश्चित्ते ध्यायति स्मेति निश्चलः । सामान्यास्त्रेण दुःसाध्यौ प्रसिद्धौ वैरिणाविमौ ॥१३२॥

शतायुधस्तदा चित्ते सस्मार परमां गदाम् । सा स्मृता तत्करे चायाद्दासीवायोधने परे ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 130 से 133): इस समय पार्थ को अपनी ओर बढ़ते हुए देखकर राजे लोग कहने लगे कि द्रोण ने ही जान-बूझ कर यहाँ पार्थ को भेजा है। यह सेना में प्रविष्ट होकर बड़ा अनर्थ करेगा। इसे द्रोण का सहारा न होता तो यह कभी इधर नहीं बढ़ सकता। यह सुन कर शतायुध को बड़ा क्रोध आया और उसने उसी वक्त कृष्ण और अर्जुन को आगे बढ़ने से रोक दिया। तब उन दोनों ने भी क्रोध में आकर शतायुध के रथ, घोड़े और हाथी वगैरह सब छिन्न-भिन्न कर डाले। इसके बाद शतायुध ने मन ही मन गदा का स्मरण किया। स्मरण करते ही वह दासी की भाँति उसके हाथ में आ गई ॥१३०-१३३॥


पार्थ बभाण वैकुण्ठस्तव कार्यं न चेक्ष्यते । सिद्धितां गतमप्यर्थं संदिग्धं च प्रवर्तते ॥१३४॥

हन्यहं पार्थ विज्ञानाद्वैरिणं निश्चलो भव । वैरिणं पुनराह स्म माधवः स शतायुधम् ॥१३५॥

गदां मुञ्च रणेनालं विलम्बं कुरुषे च किम् । निशम्य शत्रुणा चित्ते चिन्तितं चलचेतसा ॥१३६॥

नरनारायणौ चेमौ कलिहेतू निराकृतौ । गदया सुखहेतू च स्यातां दुर्योधनस्य वै ॥१३७॥

चिन्तयित्वा गदा तेन मुक्ता विष्णोरुरःस्थले । सा गता पुष्पदामत्वं तन्वती च सुगन्धताम् ॥१३८॥

अर्थ (श्लोक 134 से 138): यह देख कृष्ण ने पार्थ से कहा कि पार्थ, अब तुम्हारा कार्य सिद्ध होता नहीं दीखता परन्तु खैर, तुम कोई चिन्ता न करो। मैं अपने बुद्धि-बल से ही वैरी का नाशकर दूँगा। इसके बाद कृष्ण ने शतायुध से ललकार कर कहा कि तुम अपनी गदा मुझ पर प्रहार करो, विलम्ब मत करो-और शस्त्रों से युद्ध करने की आवश्यकता नहीं। यह सुन चंचल-चित्त शत्रु ने मन ही मन सोचा कि अर्जुन और कृष्ण ही इस युद्ध के मूल कारण है, अतः यदि मैं गदा के प्रहार से इन दोनों को ही काल का ग्रास बना दूँ तो दुर्योधन अवश्य ही आनन्दित होगा और वह मेरा अच्छा मान करेगा। यह सोच कर उसने पहले ही कृष्ण के वक्षस्थल में गदा का प्रहार किया। कृष्ण के महान् पुण्य से वह गदा सुगन्ध से परिपूर्ण


अर्चित्वा हरिं गत्वा पतिता वैरिस्तके। शतायुधं जघानाशु गदा गर्वापहारिणी ॥१३९॥

तदा समुत्थितं सैन्यं कौरवाणां युयुत्सया। ताभ्यां शरैः समुच्छिन्नं विच्छिन्नसमवायिभिः ॥१४०॥

अर्थ (श्लोक 134 से 140): पुष्पों की माला के रूप में परिणत हो गई और उसके हृदय की शोभा बढ़ाने लगी। इसके बाद वह कृष्ण की पूजा करके वापस जाकर वैरी के मस्तक पर पड़ी और उसने उसी समय शतायुध का सब गर्व उतार दिया, उसे यमलोक, पहुँचा दिया। यह देख कौरवों की सारी सेना युद्ध की इच्छा से उठ खड़ी हुई। उसे कृष्ण और अर्जुन ने शरों की प्रबल मार से क्षणभर में ही तितर-बितर कर दिया ॥१३४-१४०॥


सोऽवादीत्पार्थ तृषिता न चलन्ति तुरङ्गमाः। अस्मिन्वर्त्मनि पादाभ्यामावाभ्यां गम्यतां लघु ॥१४१॥

पदातीभूय कर्तव्यः संगरः शत्रुहानये। धनंजयो जगादेति समाकर्ण्य माधव ॥१४२॥

मम खण्डवने दत्तो देवैर्दिव्यशरो महान्। आनयामि प्रभावेण तस्य गङ्गाजलं महत् ॥१४३॥

भणित्वैवं विसर्ज्यासावाशुगं च समानयत्। गङ्गाजलं क्षणात्तत्र महाकल्लोलसंकुलम् ॥१४४॥

स्नापितास्तुरंगास्तत्र प्रमोदं प्रापिता जलैः। तदा नभसि देवौघा जजल्पुः स्वल्पशब्दतः ॥१४५॥

पातालात्सलिलं येन समानीतं महीतले। तेन सत्रं समारब्धं तुमुलं मानवा जडाः ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 141 से 146): इसके बाद कृष्ण ने पार्थ से कहा कि पार्थ, हम लोगों के घोड़े बहुत प्यासे हैं, अतः अब वे मार्ग को तय नहीं कर सकते। ऐसी हालत में हमें पैदल ही शत्रु का विनाश करने के लिए सिपाही के रूप में युद्ध करना चाहिए। सुन कर धनंजय ने कहा कि प्रभो! खण्डवन में एक देवता ने मुझे महत्त्वशाली दिव्य बाण दिया था। उसके प्रभाव से मैं अभी ही गंगा के जल का प्रवाह यहीं प्रकट किये देता हूँ। यह कहकर उसने वह बाण छोड़ा और एक क्षण में ही अनन्त कल्लोलों से व्याप्त गंगा का प्रवाह वहाँ जारी हो गया। उसमें उन्होंने अपने घोड़ों को नहलाया और पानी पिलाया, जिससे वे फिर तरो-ताजा हो गये। यह देख आकाश में से देवताओं ने कहा कि जो महापुरुष पाताल से पृथ्वी पर जल ले आया, फिर वे लोग कितने जड़ हैं जिन्होंने उसी के साथ युद्ध ठाना है। ये लोग इसके साथ कभी विजय नहीं पा सकते ॥१४१-१४६॥


हरिर्योद्धुं समुत्तस्थे पार्थोऽपि रथसंस्थितः। मुमोच लक्षविशिखान्संख्ये क्षेप्तुं विपक्षकान् ॥१४७॥

तैः शरैर्निखिला विद्धा गजवाजिपदातयः। रथास्तदाखिला नष्टा अनिष्टाः कौरवे बले ॥१४८॥

तदा दुर्योधनः प्राप्तोऽप्राक्षीद् भो भज्यते कथम्। भवद्भिः संजयन्तस्तु बभाण शृणु भूपते ॥१४९॥

पार्थेन निखिलं सैन्यं भवत्सैन्यं च विष्णुना। दुर्मर्षणबलं सर्वं निरस्तं प्रपलायितम् ॥१५०॥

अर्थ (श्लोक 147 से 150): इसके बाद ही कृष्ण युद्ध के लिए उठा और साथ ही रथ में सवार हो पार्थ भी चला। कृष्ण ने शत्रुओं का विनाश करने के लिए एक साथ लाख बाण छोड़े। जिनके द्वारा कौरवों की सेना के हाथी, घोड़े, पयादे वगैरह सब बेध दिये गये। रथ नष्ट हो गये और सेना भाग छूटी। यह देख दुर्योधन ने सेना के लोगों से कहा कि तुम लोग क्यों भाग रहे हो ? भागने का कारण ही क्या है। क्या तुम में यही शूरता है। यह सुन संजयन्त बोला कि राजन्, क्या आपने कृष्ण और अर्जुन की वीरता नहीं


दुःशासनस्तु नायातो द्रोणस्त्यक्तो गुरुत्वतः। ताभ्यां च कृतवर्माणो हताः संगरसँगिनः ॥१५१॥

शिशुदक्षिणमुख्याश्च हतास्ताभ्यां नृपाः शरैः। ध्वस्तः शतायुधो युद्धे वृन्दविन्दौ नृपौ हतौ ॥१५२॥

पातालाच्च समानीता गङ्गा पार्थेन पावनी। ताविदानीं न जानेऽहं किं करिष्यत उद्धुरौ ॥१५३॥

अर्थ (श्लोक 147 से 153): देखी जो ऐसा कह रहे हैं। उन लोगों ने सेना को बेध डाला, दुर्मर्षण की सेना को परास्त करके भगा दिया, दुःशासन डर के मारे उनके सामने ही नहीं आया, द्रोण को उन्होंने गुरु जानकर छोड़ दिया, युद्ध-तल्लीन कृतवर्मा को मार गिराया, शिशु, दक्षिण, मुख आदि राजाओं को बाणों से बेध दिया, शतायुध, वृन्द तथा विन्द के प्राणों को हर लिया, पाताल से वे परम पावन गंगा को यहाँ ले आये- फिर भी आप कहते हैं कि क्यों भागते हो? राजन्! वे बड़े वीर हैं। उनकी वीरता का कोई अन्दाजा नहीं लगा सकता है ॥१४७-१५३॥


क्रुद्धो दुर्योधनोऽवादीन्निन्दयन्द्रोणसद्गुरुम्। द्रोण किं भवतारब्धं वैरिणो हि प्रवेशनम् ॥१५४॥

त्वया च मानिताः सर्वे वैरिणो विषमाहवे। पक्षं त्वं पाण्डवानां हि धत्से ते बुद्धिरीदृशी ॥१५५॥

तदा गुरुर्बभाषेति विषादान्वितमानसः। पार्थबाणेन विद्धोऽहं तेन यामि न तुल्यताम् ॥१५६॥

अयं युवा च वृद्धोऽहं तेन योद्धुं कथं क्षमः। यौवनश्रीसमाक्रान्तस्त्वं तेन कुरु संगरम् ॥१५७॥

अर्थ (श्लोक 154 से 157): यह सुन कर दुर्योधन का क्रोध उबल उठा और वह द्रोण की निंदा करता हुआ बोला कि द्रोण, तुमने यह क्या किया जो शत्रु को रास्ता देकर इस महायुद्ध में वैरी के द्वारा सबका अपमान कराया। तुम्हें पाण्डवों का पक्ष करते संकोच नहीं होता। यही क्या तुम्हारी बुद्धि की बलिहारी है। दुर्योधन की मर्मवाणी सुन खेदखिन्न हुए द्रोण ने कहा कि देखो, मैं पार्थ के बाण से वेधा गया हूँ, मैं उसकी बराबरी नहीं कर सका और न कर ही सकता हूँ। यह तुम ही सोचो कि कहाँ तो वह जवान और कहाँ मैं वृद्ध। फिर उसके साथ युद्ध करने को मैं कैसे समर्थ हो सकता हूँ। बात यह है कि इस वक्त तुम यौवन-श्री करके युक्त हो, अतएव तुम्हें ही इसके साथ युद्ध करना चाहिए ॥१५४-१५७॥


श्रुत्वेति चापमादाय कौरवो योद्धुमुद्यतः। पार्थं यमपथं तूर्णं दास्यामीति मुदा वदन् ॥१५८॥

दुर्योधनेन्द्रपुत्रौ च युद्धं कर्तुं समुद्यतौ। रणलक्ष्म्या लक्षिताङ्गौ वीरवर्गसमाश्रितौ ॥१५९॥

दुर्योधनेन संछिन्नाः पार्थस्य विशिखाः खलु। जहास कौरवः किं भो गाण्डीवेन तवाधुना ॥१६०॥

हसित्वाथ हरिः प्राह श्रान्तः किं तिष्ठसेऽधुना। पार्थः प्रोवाच वैकुण्ठ गहनं मे न किंचन ॥१६१॥

अर्थ (श्लोक 158 से 161): यह सुन कर दुर्योधन बोला कि अच्छी बात है आप देखते रहिए कि मैं, पार्थ को क्षणभर में यमपुर का पथिक बनाये देता हूँ। इसके साथ ही वह हाथ में धनुष उठा पार्थ के साथ युद्ध के लिए उद्यत हुआ। उधर से पार्थ भी उससे युद्ध के लिए तैयार होकर आया। उन दोनों के साथ और भी बहुत वीर-गण थे। उन दोनों का शरीर रणश्री से भूषित हो रहा था। युद्ध करते हुए दुर्योधन ने पार्थ के बाणों को छेद दिया और अभिमान में आकर वह पार्थ की यह कहकर हँसी उड़ाने लगा कि तुम्हारा गांडीव धनुष अब तक काम नहीं आया। यह देख नारायण ने हँस कर अर्जुन से कहा कि पार्थ, तुम थक तो नहीं गये हो। पार्थ ने कहा कि नहीं, मैं तो सिर्फ वैरियों को मार कर कुछ शान्ति के लिए बैठ गया


अरीन्हत्वा प्रपन्नोऽहं खेदं तेन स्थिरं स्थितः ।
निराकरोमि सच्छत्रून् मम पश्य पराक्रमम् ॥१६२॥

जित्वाथ कौरव तूर्णं ग्रहीष्यामि वरं यशः ।
भणित्वैवं पृथुः पार्थः शरैर्विव्याध कौरवम् ॥१६३॥

अर्थ (श्लोक 158 से 163): हूँ। मैं अभी इन सब शत्रुओं को धराशायी किये देता हूँ। आप तो मेरे अपूर्व पराक्रम को देखते जाइए। विश्वास रखिए कि मैं कौरवों को जीत कर चन्द्र जैसे स्वच्छ, उत्तम यश को संचित करूँगा। यह कह जोश में आ पार्थ ने शरों की प्रबल मार से दुर्योधन को वेध डाला ॥१५८-१६३॥


निजसैन्येन संभग्नः कौरवः कुरवश्चितः ।
तावद्दध्मौ हृषीकेशः शङ्खं वै पाञ्चजन्यकम् ॥१६४॥

तन्निनादं निशम्याशु जयार्द्रः कुपितः क्षणात् ।
अश्वत्थामा विनिस्थामा बभूव भयभीतधीः ॥१६५॥

समुद्धतं कुरोः सैन्यं पार्थेनैकेन संहृतं ।
कृष्णास्याग्रे पुनः सैन्यं किमुद्धरति तस्य वै ॥१६६॥

अतिरौद्रं रणं जातं रुण्डमुण्डान्विता धरा ।
तदासीच्छ्वासनिर्मुक्ताः कुणपाः पत्रवत् स्थिताः ॥१६७॥

अर्थ (श्लोक 164 से 167): उसके द्वारा अपनी सेना को छिन्न-भिन्न देख कौरव हाहाकार कर उठे। इसी समय कृष्ण ने अपने पाँचजन्य शंख को फूँका। उसके शब्द को सुन कर जयार्द्र को बड़ा क्रोध हो आया। वह भयभीत हो प्रभा-विहीन हो गया। उधर कौरवों की उद्धत हुई सेना को अकेले पार्थ ने ही तितर-बितर कर भगा दिया। फिर वह कृष्ण के आगे भी मस्तक न उठा सकी। इस समय इतना भयंकर युद्ध हुआ कि सारी पृथ्वी रुंड-मुंड-मय हो गई। सारी युद्धभूमि में श्वास-उच्छ्वास रहित मुर्दे ही मुर्दे देख पड़ने लगे ॥१६४-१६७॥


पार्थः क्रुद्धस्तदा वीक्ष्य जयार्द्रं जयवर्जितम् ।
उवाच मर्मसंभेदि वाक्यैः संभेदयंस्त्वरां ॥१६८॥

रे जयार्द्र त्वया युद्धेऽभिमन्युस्तु विदारितः ।
त्वत्पराक्रममालां मां वीरविद्यां च दर्शय ॥१६९॥

संरक्ष्य कौरवान्सर्वांस्त्वं दृष्टश्चिरकालतः ।
चेच्छक्तिरस्ति ते नूनं सज्जो भव रणाङ्गणे ॥१७०॥

इति वाक्येन पार्थैंशस्तोषयन्सकलान्सुरान् ।
चिच्छेद बाणसंघातैस्तच्चापध्वजवाजिनः ॥१७१॥

बिभेद तस्य संनाहं तदावोचज्जनार्दनः ।
पार्थस्तं याति नो यावद्दिवानाथः समुच्छ्रितः ॥१७२॥

अर्थ (श्लोक 168 से 172): इसके बाद पार्थ ने ज्यों ही जयार्द्र को देखा त्यों ही उसे बड़ा भारी क्रोध आया और उसने मर्मभेदी वचनों द्वारा उसके हृदय को भेदते हुए कहा कि नीच, तूने ही न युद्ध में अभिमन्यु का अन्याय से वध किया है! अब मेरे सामने आ और मुझे अपना पराक्रम और अपनी वीर विद्या बता। नीच, मैंने तुझे बड़ी देर में देख पाया। अब भी तुझमें शक्ति हो तो तैयार हो रणांगण में आकर मेरे साथ युद्ध कर और इन कौरवों को बचा। पार्थ के वचनों को सुनकर देवताओं को बड़ा सन्तोष हुआ। वे उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। इसी समय धनंजय ने अपने बाणों द्वारा जयार्द्र के धनुष, घोड़े और ध्वजा वगैरह को छेद दिया और उधर से कृष्ण ने उसके कवच को भेद कर अर्जुन से कहा कि पार्थ, सूरज अस्त होने के पहले-पहले ही तुम अपने तीव्र बाणों के द्वारा इसके मस्तक को धड़ से जुदाकर दो तभी तुम्हारी वीरता है ॥१६८-१७२॥


तावज्जयार्द्रमूर्धानं लुनीहि लावकैः शरैः ।
जललब्धमहानागबाणं पार्थस्तदाग्रहीत् ॥१७३॥

अर्थ: यह सुन पार्थ ने उस नागबाण को हाथ में लिया, जिसे कि शासनदेवता ने साँप के रूप में


यः शासनमहादेव्या सर्परूपेण संददे। तेन बाणेन पार्थोऽसौ लुलाव तस्य मस्तकम् ॥१७४॥

तच्छीर्षं च समादाय व्योम्नि संप्रेष्य तत्क्षणे। तपस्स्थस्य वने क्षिप्तं जनकस्य कराञ्जलौ ॥१७५॥

यथा सरसि संछिन्नं हंसैः शतदलं तदा। वीक्ष्य तज्जनकस्तूर्णं पपात पृथिवीतले ॥१७६॥

अर्थ (श्लोक 173 से 176): अर्जुन को दिया था। इसके बाद अर्जुन ने देखते-देखते ही उस बाण से जयार्द्र का मस्तक धड़ से जुदा कर दिया और उस मस्तक को लेकर वह आकाश मार्ग से वहाँ गया जहाँ उसका पिता तप कर रहा था। जाकर उसने सिर को उसके हाथों में रख दिया। इसके साथ ही जिस तरह तालाब में लगा हुआ कमल काट देने पर गिर जाता है उसी तरह उस मस्तक को देखते ही उसका पिता भी गत-चैतन्य होकर पृथ्वी पर लोट गया ॥१७३-१७६॥


जयार्द्रं च हते पाण्डुसैन्ये जयरवोऽभवत्। पार्थस्य जयसंलब्धा कीर्तिर्बभ्राम भूतले ॥१७७॥

हाहारवस्तदा जज्ञे कौरवीयेऽखिले बले। दुर्योधनेन विज्ञाय रुरुदे बाष्पमोचिना ॥१७८॥

अर्थ (श्लोक 177 से 178): उधर जयार्द्र के मारे जाते ही पाण्डवों की सेना में जय-जयकार शब्द होने लगा और जय से प्राप्त हुई पार्थ की कीर्ति सारे भूतल पर विस्तृत हो गई। उधर कौरवों की सेना में हाहाकार मच गया। जयार्द्र की मृत्यु से दुर्योधन की आँखों से आँसुओं की धारा वह निकली। वह रो उठा और विलाप करने लगा कि जयार्द्र, तुम्हारे बिना आज मेरी सारी सेना शून्य हो गई ॥१७७-१७८॥


अद्यैव सकलं सैन्यं शून्यं जातं त्वया विना। कौरवं धीरयंस्तावदश्वत्थामा जगौ ध्रुवम् ॥१७९॥

हनिष्यामि रणे पार्थं दुःखं किं क्रियते नृपाः। इत्युक्त्वा धनुषं धृत्वा दधाव गुरुनन्दनः ॥१८०॥

पार्थेन सह स क्रुद्धश्चक्रे युद्धं महाशरैः। अश्वत्थामा च चिच्छेद पार्थचापगुणं गुणी ॥१८१॥

अन्यं कोदण्डमादाय पार्थो विस्फुरिताननः। चुकोप मत्तदन्तिभ्यो मृगेन्द्र इव भीषणः ॥१८२॥

षड्भिः शरैस्तदा पार्थोऽपातयत्तस्य सारथिम्। अश्वत्थामा गतो भूमौ हतो मूर्च्छामुपागतः ॥१८३॥

गुरुपुत्रं परिज्ञाय मुक्तः पार्थेन सोऽञ्जसा। हता अन्ये नृपास्तेन हरिणेव मतङ्गजाः ॥१८४॥

तावच्च रजनी जाता तयोः सैन्यं निवर्तितम्। ईर्ष्यावशेन क्रुद्धेन कौरवेण गुरुर्जने ॥१८५॥

अर्थ (श्लोक 179 से 185): इसी समय दुर्योधन को धीरज बँधाते हुए अश्वत्थामा ने कहा कि राजन्! तुम दुख क्यों करते हैं। मैं तुम्हारे दुख के कारण को अभी दूर किये देता हूँ। यह कहकर हाथ में धनुष ले वह पार्थ के ऊपर टूट पड़ा और क्रोध में आ उसके साथ तीव्र बाणों के प्रहार द्वारा युद्ध करने लगा। थोड़े ही समय में गुणी अश्वत्थामा ने पार्थ के धनुष की डोरी छेद दी। यह देख पार्थ का चेहरा प्रफुल्लित हो उठा। वह साथ ही धनुष लेकर अश्वत्थामा को दबाने लगा, जैसे सिंह मत्त गजेन्द्र की दबा देता है एवं थोड़ी ही देर में पार्थ ने छह बाणों के द्वारा उसके सारथी को पृथ्वी पर गिरा उसे भी धराशायी कर दिया, जिससे वह बे-सुध हो गया, उसे कुछ चेतना न रह गई। पार्थ ने उसे गुरु-पुत्र समझकर छोड़ दिया। उससे कुछ भी न कहा और न उसे कैद ही किया। इसी प्रकार अर्जुन ने और भी बहुत से राजाओं को पृथ्वी पर लिटा दिया, जैसे सिंह मतवाले हाथियों को जमीन पर लिटा देता है। युद्ध करते-करते रात हो गई और सब सेनायें अपने-अपने डेरों पर चली आई ॥१७९-१८५॥


भो तात ब्रूहि सत्यं त्वं मार्गं न यद्यदास्यथाः ।
अहनिष्यत्कथं पार्थो गजवाजिभटोत्तमान् ॥१८६॥

क्रुद्धो द्रोणस्तदावोचन्मत्वा मां ब्राह्मणं गुरुम् ।
मुक्तोऽहं तेन युध्यध्वं यूयं क्षत्रियपुङ्गवाः ॥१८७॥

भवद्भिस्तु कथं मुक्तः पार्थः संगरसंगतः ।
न पश्यथ कृतं दोषं स्वयं यूयं दुराग्रहात् ॥१८८॥

शक्रसूनोर्मया दृष्टं बलं पूर्वमनेकशः ।
यद्रोचते भवद्भिस्तत्क्रियतामधुना भृशम् ॥१८९॥

अर्थ (श्लोक 186 से 189): अपनी यह दुर्दशा देख क्रोध-वश हुए दुर्योधन ने द्रोण से कहा कि यह सब तुम्हारा ही किया हुआ है। यदि तुम पार्थ को मार्ग न देते तो वह हाथी, घोड़े और वीर योद्धाओं को कभी नहीं मार सकता था। दुर्योधन के इन मर्मभेदी वचनों को सुनकर क्रुद्ध हुए द्रोण ने कहा कि राजन्! आपका यह ख्याल ठीक नहीं किन्तु उसने मुझे ब्राह्मण और गुरु समझ के ही छोड़ा है। हाँ, तुम क्षत्रिय-पुंगव हो, अतः उसके साथ युद्ध करो। अच्छा मैं तुमसे ही पूछता हूँ कि तुमने युद्ध करते हुए पार्थ को क्यों छोड़ दिया। बात यह है दुराग्रह के कारण तुम अपने दोष को नहीं देखते और व्यर्थ ही दूसरे को दोष देते हो। मैंने पार्थ के बल को कई बार देख निर्णय किया है कि मैं उसकी बराबरी नहीं कर सकता। अब तुम्हें जो रुचे वह करके तुम अपने दिल का भाव पूरा कर लो ॥१८६-१८९॥


तन्निशम्य जगादैवं कौरवेशः क्षमस्व भोः ।
मम तातापराधं त्वं महांश्च महतां गुरुः ॥१९०॥

त्वया मया प्रहर्तव्या रजन्यां वैरिणां व्रजाः ।
कर्णस्याग्रेऽप्ययं मन्त्रः कथितस्तैः समुद्धतैः ॥१९१॥

अर्थ (श्लोक 190 से 191): यह सुन दुर्योधन बड़ा घबराया। वह तब बहुत नम्र होकर बोला-प्रभो! आप महान् हैं, महापुरुषों के भी गुरु हैं, अतः मेरे अपराधों पर आप ध्यान न देकर ऐसा उपाय कीजिए जिससे आज रात में ही शत्रु नष्ट हो जायें। उन्मत्त दुर्योधन ने यह मंत्र कर्ण के कानों तक भी पहुँचा दिया॥१९०॥


यामिन्यां निर्गतं सैन्यं कौरवाणां कृपातिगम् ।
तदा कलकलो जज्ञे सुभटानां रणार्थिनाम् ॥१९२॥

विविशुः कौरवा वेगाद्राजिवारणभीकराः ।
पाण्डवीये बले सुप्ते ध्वान्ते ध्वाङ्क्षारयो यथा ॥१९३॥

कौरवाणां नृपैश्छिन्ना पाण्डवानामनीकिनी ।
नानाबाणगणैस्तूणादुद्धतैर्धन्वसुधृतैः ॥१९४॥

कौरवाग्रे क्षणं स्थातुं न क्षमास्तु क्षमाभृतः ।
पाण्डवानां भृशं भग्ना बभ्रमुस्त इतस्ततः ॥१९५॥

पृषत्कैर्दशभिर्विद्धः पावनिः पावनोऽपि तैः ।
त्रिभिस्त्रिभिस्तथा विद्धौ मद्रीपुत्रौ मदोद्धतौ ॥१९६॥

दशभिस्तु तथा विद्धो घुंटुको विशिखैर्नृपैः ।
पञ्चभिस्तु तथा भिन्न आशुगैः शक्रनन्दनः ॥१९७॥

अर्थ (श्लोक 192 से 197): इस निश्चय के बाद कौरवों की निर्दय सेना रातों रात ही रण-स्थल को चली। धीरे-धीरे वह रण-स्थल के पास पहुँची और उसने पाण्डवों की सोती हुई सेना में प्रवेश किया, जैसे अँधेरे में कोकिलाएँ कौओं में प्रवेश करती हैं। इसके बाद कौरवों ने एकदम बाणों की बरसा कर पाण्डवों की सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया, जिससे पाण्डवों के पक्ष के राजा, उनके सामने क्षणभर भी नहीं ठहर सके और इधर-उधर भागने लगे। यह देख कौरवों ने एक साथ दस बाणों द्वारा भीम को और तीन बाणों द्वारा उद्धत हुए नकुल और, सहदेव को वेध दिया। साथ ही उन्होंने दस बाणों से भीम के पुत्र बटुक को, पाँच बाणों से अर्जुन को और छह बाणों के द्वारा शिखण्डी को वेध दिया एवं सात बाणों से धृष्टद्युम्न को और पाँच बाणों से प्रसिद्ध शासक कृष्ण को वेध दिया। इसी समय क्रुद्ध


शिखण्डी षट्शरैर्विद्धो धृष्टद्युम्नस्तु सप्तभिः।
वैकुण्ठः पञ्चभिर्बाणै रुद्धः संसिद्धशासनः ॥१९८॥

तावद्युधिष्ठिरः क्रुद्धो युद्धं कर्तुं समुद्यतः।
दुर्योधनं शरैश्छित्त्वापातयन्मूर्च्छितं भुवि ॥१९९॥

अर्थ (श्लोक 191 से 199): होकर युधिष्ठिर युद्ध के लिए उठा और उसने अपने बाणों की प्रबल मार से दुर्योधन को बड़ी बुरी तरह वेध डाला, जिससे वह बे-होश होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और उसे प्राणों के लाले पड़ गये ॥१९१-१९९॥


द्रोणस्तस्थौ रणं कर्तुं संमुखो न पराङ्मुखः।
प्रविष्टः पाण्डवे सैन्ये व्योम्नि भास्वानिवोन्नतः ॥२००॥

प्रभाते पाण्डवं सैन्यं द्रोणेनोत्सारितं क्षणात्।
पार्थो बबन्ध तं द्रोणं ब्रह्मास्त्रेण सुशस्त्रवित् ॥२०१॥

गुरुं कृत्वा प्रपूज्यासौ मुक्तः पार्थेन धीमता।
द्रोणस्तु लज्जितस्तस्थौ रणान्निवृत्य निर्व्रणः ॥२०२॥

अर्थ (श्लोक 200 से 202): यह देख द्रोण युद्ध के लिए युधिष्ठिर के सामने आये और उन्होंने पाण्डवों की सेना में प्रवेश किया। इस वक्त वह ऐसे जान पड़े मानों आकाश में उन्नत सूरज ही उदित हुआ है। इसी समय सबेरा हो आया। पाण्डवों की सेना को द्रोण ने एक क्षण में ही पीछे हटा दिया। यह देख वीर पार्थ ने अपने शस्त्र-कौशल से ब्रह्मास्त्र छोड़ा और बात ही बात में द्रोण को वेध कर विवश दिया। इसके बाद ही उसने द्रोणाचार्य की छोड़ दिया और उनकी पूजा कर अपना अपराध क्षमा कराया। द्रोण तब कुछ लज्जित से हुए और अब वे युद्ध से उदासीन हो, युद्ध छोड़कर चुप बैठ गये ॥२००-२०२॥


पार्थस्तु सारथिं सार्थं जगौ वाहय सद्रथम्।
कर्णो दुर्योधनश्चास्तेऽश्वत्थामा यत्र तत्र वै ॥२०३॥

तदा दुर्योधनः कर्णमुवाच तस्य सद्रथम्।
गृहीत्वा स्वकरे कर्ण नष्टं नो विपुलं बलम् ॥२०४॥

तदा भानुसुतोऽवोचन्मा विषादं व्रजाधुना।
प्रथमं मारयिष्यामि पार्थं पश्चात्परान्नृपान् ॥२०५॥

तदा कर्णार्जुनौ लग्नौ योद्धुं संक्रुद्धमानसौ।
युधिष्ठिरेण संलग्ना योद्धुं सर्वेऽपि कौरवाः ॥२०६॥

अर्थ (श्लोक 203 से 206): इसके बाद पार्थ ने अपने चतुर सारथी से कहा कि अब रथ कर्ण, दुर्योधन और अश्वत्थामा की ओर बढ़ाओ। अर्जुन का यह पराक्रम देख दुर्योधन ने भयभीत हो और कर्ण के रथ को अपने हाथ से रोककर उससे कहा कि कर्ण, हमारी सब सेना नष्ट हो चुकी, अब क्या किया जाये। सुनकर कर्ण ने कहा कि इसकी तुम कुछ चिन्ता न करो। मैं पहले पार्थ को मारकर ही दूसरे शत्रु राजाओं की खबर लूँगा। इसके बाद क्रोध से उन्मत्त होकर कर्ण ने अर्जुन के साथ युद्ध छेड़ दिया और उधर से सब कौरव युधिष्ठिर के साथ भिड़ गये ॥२०३-२०६॥


रुन्धन्तं प्रधने योधाः शरैर्गगनमण्डलम्।
चक्रिरे बधिराः काष्ठाः कष्टानिष्टमुपागताः ॥२०७॥

कर्णस्य स्यन्दनो भग्नः पार्थेन पृथुचेतसा।
सगुणश्च धनुश्छिन्नः सरद्भिविशिखैः खलु ॥२०८॥

द्रोणः स्यन्दनमारुह्य धृष्टार्जुनं समाह्वयत्।
धृष्टद्युम्नः करिष्यामि मृतिं तेऽहं गुरुं जगौ ॥२०९॥

अर्थ (श्लोक 207 से 209): घोर युद्ध हुआ। योद्धाओं की बाण-बरसा से सारा आकाश-मण्डल ढँक गया। उनके रणनाद से दिशाएँ बहरी हो गई। यह देख-पार्थ ने बाणों की प्रबल मार से कर्ण के रथ को छिन्न-भिन्न कर दिया और मय डोरी के उसके धनुष को तोड़ डाला। उधर रथ में सवार हो द्रोण ने धृष्टार्जुन को लड़ने के लिये ललकारा। यह देख धृष्टद्युम्न ने द्रोण से कहा कि जरा ठहरिए, मैं अभी ही आपको यमपुर की


इत्युदीर्य शरैश्छिन्नो धृष्टद्युम्नेन सद्गुरुः । आगच्छन्तः शराश्छिन्ना गुरुणा गुरुणा गुणैः ॥२१०॥

ध्वजो रथस्तथा छिन्नो धृष्टद्युम्नस्य तेन वै । विंशतिं च सहस्राणि क्षत्रियाणां जघान सः ॥२११॥

अर्थ (श्लोक 207 से 211): सैर कराता हूँ। यह कहकर उसने द्रोण पर बाण-प्रहार शुरू कर दिया। द्रोण ने अपने शर कौशल से उसके बाणों को बीच में ही छेद दिया-उसने उन्हें अपने पास तक भी न आने दिया एवं उस गुण-गरिष्ठ द्रोण ने उसके रथ-ध्वजा वगैरह को भी नष्टकर बीस हजार क्षत्रियों को यमपुर का पथिक बना दिया ॥२०७-२११॥


गजानां वाजिनां संख्यां हतानां वेत्ति कः पुमान् । लक्षैकं सुभटास्तेन पातिताः पतिता भुवि ॥२१२॥

एका चाक्षौहिणी ध्वस्ता गुरुणा तावदुत्थितः । व्योम्नि स्वरः सुराणां हि द्रोणं संवारयन्निति ॥२१३॥

अतिमात्रं कियन्मात्रं कुरुषे किल्बिषं भृशम् । नृपैः सह विरोधस्तु त्वया किं भो विधीयते ॥२१४॥

आगच्छ स्वच्छतां लात्वा ब्रह्मेन्द्रो भव भव्य भोः ।
भीमोऽभाणीत्तदा विप्र किं करिष्यसि किल्बिषम् ॥२१५॥

पाण्डवेभ्यः कुरून्दत्त्वा सुखितो भव सद्गुरो । श्रुत्वैवं ब्राह्मणोऽवादीत्तेभ्यो दास्यामि तद्धराम् ॥२१६॥

जीवितं कौरवेभ्यश्च दत्त्वा स्यां सुसुखी सदा । प्रतिज्ञेयं मया सुज्ञ विहिता निजमानसे ॥२१७॥

गुरुधृष्टार्जुनौ तावद्युद्धं कर्तुं समुद्यतौ । अश्वत्थाम्ना समाहूतो घटुको भीमनन्दनः ॥२१८॥

बाणेन पतितो भूमौ मम्ने मन्दमतिः स च । पाण्डवास्तन्मृतिं ज्ञात्वा रुरुदुःखदारिताः ॥२१९॥

तदा हरिरुवाचेदं शृणुध्वं पाण्डुनन्दनाः । शोकस्यावसरो नैव क्षत्रियाणां रणे पुनः ॥२२०॥

पाण्डवाः शोचमानास्तु यावत्तिष्ठन्ति संगरे । तावत्कौरवसैन्यं हि युद्धं कर्तुं समुत्थितम् ॥२२१॥

अर्थ (श्लोक 212 से 221): उस समय द्रोण ने कोई एक लाख सुभटों को धराशायी किया और हाथी, घोड़े तो इतने मारे कि उनकी कोई गिनती ही नहीं। तात्पर्य यह है कि उन्होंने सारी एक अक्षौहिणी सेना को नष्टकर जीवन से निराश कर दिया। इतने में द्रोण को इस महा हिंसा करने से रोकती हुई आकाश में देववाणी हुई कि “द्रोण, तुम इतना भारी पाप काहे के लिए करते हो और क्यों इन राजाओं के साथ विरोध मानते हो। तुम्हें इन झगड़ों में न पड़ना चाहिए किन्तु हृदय को पवित्र कर तुम स्वर्ग के अतिथि ब्रह्मेन्द्र बनो।” यह सुन भीम बोला-हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! सचमुच तुम्हें पाप करना उचित नहीं है। इससे कुछ लाभ नहीं। अतः गुरुवर्य, पाण्डवों की कुरुजांगल देश का राज्य देकर आप सुख से रहो। यह सुन द्रोण ने कहा कि यह नहीं हो सकता। मैं कौरवों का राज्य कौरवों को ही दूँगा। मैंने प्रतिज्ञा की है कि मैं अपना जीवन कौरवों को देकर ही सुखी होऊँगा। इसके बाद द्रोण और धृष्टार्जुन फिर युद्ध के लिए उद्यत हुए। उधर अश्वत्थाम ने भीम के पुत्र घटुक को ललकारा। घटुक के सामने आते ही क्षणभर में अश्वत्थामा ने उसे धराशायी कर दिया। उसकी मृत्यु से पाण्डवों की बड़ा दुख हुआ। वे विलाप करने लगे। यह देख कृष्ण ने उनसे कहा कि क्षत्रिय वीर रण-स्थल में शोक नहीं करते। यह शोक का अवसर नहीं है। उधर पाण्डवों को शोक-संतप्त देखकर कौरवों की सेना युद्ध के लिए फिर उठ खड़ी हुई ॥२१२-२२१॥


आश्वत्थामा तदाहूतो भीमेन भयकारिणा।
ऊचे त्वं गुरुपुत्रत्वान्मया मुक्तः सुजीवितः ॥२२२॥

अधुना त्वां न मोक्ष्यामि जीवन्तं जीवनप्रिय।
इत्युक्त्वा गदया तं च जघान पवनात्मजः ॥२२३॥

अश्वत्थामा मुमूर्च्छशु पतितो मालवेशिनः।
अश्वत्थामा करीन्द्रस्तु हत्वा तैः पातितो भुवि ॥२२४॥

अर्थ (श्लोक 222 से 224): यह देख भयंकर भीम ने अश्वत्थामा को ललकारा और कहा कि गुरु-पुत्र होने से पहले मैंने तुझे जीता छोड़ दिया था परन्तु अब मैं तुझे जीता कभी छोड़ने का नहीं। यह कहकर भीम ने उस पर गदा का एक ऐसा प्रहार किया कि जिससे वह मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। इसके बाद भीम ने उसके हाथी को भी धराशायी कर दिया ॥२२२-२२४॥


तदा पाण्डवसैन्येन नत्वोचेऽथ युधिष्ठिरः।
भो देवेश रहस्यं त्वमवधारय सांप्रतम् ॥२२५॥

द्रोणेन विषमं युद्धं विहितं जर्जरीकृतम्।
भवत्सैन्यं च वज्रेण गिरिर्वा वायुना घनः ॥२२६॥

अस्मद्दले न कोऽप्यस्ति समर्थस्तन्निवारणे।
उपाय एक एवास्ति कृपां कृत्वाथ तं कुरु ॥२२७॥

अश्वत्थामा हतो दन्ती तत्स्थाने च वदाधुना।
अश्वत्थामा हतो द्रौणिरित्युक्ते स्यात्पराङ्मुखः ॥२२८॥

धर्मात्मजस्तदावोचदसत्यं ब्रूयते कथम्।
असत्यतो भवेन्नूनं किल्बिषं कर्मकारणम् ॥२२९॥

कथं कथमपि प्रायस्तैरङ्गीकारितो हठात्।
धर्मात्मजस्तदावोचदश्वत्थामा हतो रणे ॥२३०॥

तदाकर्ण्य रणे द्रोणो धन्वामुञ्चच्छुचा करात्।
सिञ्चन् क्ष्मामश्रुपातेन रुरोद हृदि दुःखितः ॥२३१॥

अर्थ (श्लोक 225 से 231): इसी समय पाण्डवों की सेना ने जाकर युधिष्ठिर को नमस्कार किया और उनसे कहा कि देवों के देव, पूर्ण विचार कर अपने कर्तव्य का शीघ्र निश्चय कीजिए क्योंकि द्रोण ने घोर युद्ध करके आपकी सेना को बिल्कुल ही जर्जरित कर डाला है, जैसे कि वज्र पहाड़ को और वायु मेघों की जर्जरित कर देता है। महाराज, हमारी सेना में ऐसा कोई भी समर्थ वीर नहीं जो उन्हें रोक सके। इसके लिए एक उपाय है। वह यह कि द्रोण को पुत्र पर बड़ा प्रेम है। अतः आप यह कह दें कि अश्वत्थामा मारा गया है, तो काम बन जाय। पुत्र-वध सुनकर द्रोण अवश्य ही युद्ध से विमुख हो जायेगा। सुनकर युधिष्ठिर ने कहा कि तुम लोग झूठ क्यों बोलते हो, तुम नहीं जानते कि झूठ बोलने में बड़ा दोष है, जिससे कि अशुभ कर्मों का बँध होता है और उससे दुख प्राप्त होता है परन्तु अन्त में उनके आग्रह से लाचार हो युधिष्ठिर ने उक्त बात को स्वीकार किया और जाकर कहा कि युद्ध में अश्वत्थामा मारा गया है। पुत्र-वध सुनकर द्रोण को इतना भारी शोक हुआ कि उनके हाथ से धनुष छूट पड़ा और वह आँसुओं की धारा से पृथ्वी को सींचते हुए रो उठे। उनका धैर्य छूट गया ॥२२५-२३१॥


तदा तेन पुनः प्रोक्तं कुञ्जरो न नरो हतः।
श्रुत्वेति संस्थितः स्थैर्याच्छेककम्पितकायिकः ॥२३२॥

धृष्टार्जुनोऽसिना तावल्लुलाव तस्य मस्तकम्।
कौरवाः पाण्डवास्तावद्रुरुदुस्तत्क्षणे क्षिताः ॥२३३॥

अर्थ (श्लोक 232 से 233): यह देख युधिष्ठिर ने थोड़ी देर बाद कहा कि मनुष्य नहीं किन्तु हाथी मारा गया है। यह सुनकर द्रोण का शोक कुछ शान्त हुआ। उन्हें कुछ धीरज बँधा। वे चेत हुए कि उधर से धृष्टार्जुन ने तलवार से उनकी मस्तक धड़ से जुदा कर दिया। महावीर द्रोण धराशायी हो परलोक को प्रयाण कर गये। यह देख कौरवों और पाण्डवों को बड़ा दुख हुआ। वे विलाप करने लगे और दुख के आवेग

विंशं पर्व (भाग 2/2)

छत्रच्छाया गता चाद्य त्वयि तात गते सति ।
द्रोणास्माकं क्षितौ जातापकीर्तिः कृतिकृन्तिका ॥२३४॥

दुर्योधनेन यः संगोविहितस्तत्फलं लघु ।
संप्राप्तं गुरुणावोचत्क्रुद्धः पार्थस्तदा क्षणे ॥२३५॥

भो युधिष्ठिर नो भृत्यो धृष्टार्जुनो न श्यालकः ।
तव तेन हतो द्रोणः कथं सर्वगुरुः शुभः ॥२३६॥

तदा धृष्टार्जुनः प्राहास्माकं दोषो न जातु चित् ।
युध्यमानैस्तु युध्यन्ते सुभटैः सुभटा रणे ॥२३७॥

तन्निशम्य नरः शान्तस्वान्तो जातो विषादवान् ।
पुनस्तु साधनं धाष्टर्याद्युद्धं कर्तुं समुद्यतम् ॥२३८॥

अर्थ (श्लोक 232 से 238): से कहने लगे कि हे परम वीर गुरु! तुम्हारे चले जाने से आज हमारी छत्र-छाया ही चली गई है। इससे संसार में हमारी जो अपकीर्ति हुई वह हमारी सब कीर्ति पर पानी फेरने वाली है अथवा हे गुरुवर्य! यह सब दुर्योधन जैसे पुरुष की संगति का परिणाम है। द्रोण की मृत्यु से दुखी होकर पार्थ ने क्रोध के साथ युधिष्ठिर से कहा-धृष्टार्जुन हमारा कोई नहीं होता। फिर इसने हमारे गुरु द्रोण का क्यों वध किया। यह सुन धृष्टार्जुन बोला कि पार्थ! इसमें मेरा कुछ दोष नहीं है किन्तु बात यह है कि युद्ध-स्थल में जब घमासान युद्ध होता है तब सुभट सुभटों पर प्रहार करते ही हैं, फिर उसमें चाहे जिसका नाश क्यों न हो । बतलाइए ऐसी हालत में मेरा क्या अपराध है? यह सुन अर्जुन शान्त तो हो गया, पर उसके हृदय में विषाद बहुत हुआ ॥२३२-२३८॥


दधाव ध्वनिना व्योम छादयन्ध्वंसयन्क्षितिम् ।
तावद्धर्मसुतो बाणैः शल्यशीर्षं लुलाव च ॥२३९॥

विराटाग्रे कृतं येन स्वपराक्रमवर्णनम् ।
दिव्यास्त्रेण पुनः पार्थोऽवधीद्राजसहस्रकम् ॥२४०॥

निशायां दिवसे शूरा योयुद्ध्यन्ते स्म निद्रया ।
घूर्णमाना लुठन्तीतस्ततो भूमौ पतन्ति च ॥२४१॥

एवं प्रतिदिनं युद्धं तयोर्जातं भयावहम् ।
घस्राः सप्तदशैवात्र जाता युधि समुत्कटाः ॥२४२॥

अर्थ (श्लोक 239 से 242): इसके बाद फिर कौरवों की सेना युद्ध के लिए उठ खड़ी हुई और उसने अपने रणनाद से सारे आकाश को पूर दिया तथा पृथ्वी को पद-दलित कर डाला। इसी बीच में उधर युधिष्ठिर ने शल्य के मस्तक को धड़ से जुदाकर दिया, जिसने कि विराट के आगे अपने पराक्रम की अद्भुतता का वर्णन कर अपना अभिमान प्रकट किया था एवं पार्थ ने भी इस वक्त दिव्य-अस्त्र के प्रहार से हजारों राजाओं को धराशायी कर दिया था। इस समय के युद्ध में योद्धा रात-दिन युद्ध करते। जब नींद आती तब चाहे जहाँ भूमि में लुढ़क रहते। तात्पर्य यह कि इस युद्ध में योद्धा लोगों को मार-काट के सिवा और कुछ काम ही न था। इस प्रकार कौरवों और पाण्डवों में प्रतिदिन भयावना युद्ध होता रहा और इस तरह युद्ध होते-होते सत्रह दिन बीत गये ॥२३९-२४२॥


अष्टादशे दिने प्रातस्तयोर्जातो महाहवः ।
चतुरङ्गबलं तत्र मेलयित्वा महारणे ॥२४३॥

रचितो मकरव्यूहो मेरुवद्गलगर्जनैः ।
गजा गर्जन्ति यत्रोच्चैः खड्गौघाः प्रज्वलन्ति च ॥२४४॥

कौरवाः पाण्डवाश्चेलुः कुरुक्षेत्रे क्षयंकरे ।
योद्धुं समुद्यता योधा घातयन्तः परस्परम् ॥२४५॥

अर्थ (श्लोक 243 से 245): इसके बाद अठारहवें दिन प्रातःकाल ही कौरव और पाण्डवों की चतुरंग सेना युद्ध-स्थल में पहुँची और उन दोनों में घोर युद्ध हुआ। दोनों सेनाओं में मकर व्यूह की रचना हुई। उनमें मेरु जैसे उद्यत हाथी चिंघाड़ रहे थे, घोड़े हींस रहे थे और सुभटों की तलवारें चमक रही थीं। इसी समय कौरव-पाण्डव कुरुक्षेत्र के क्षयंकर और भयंकर युद्ध-स्थल में आये और युद्ध के लिए उद्यत योद्धा


वाहनास्त्रमहामीने कौरवाब्धावसज्जले।
पावनी रथपोतेन विवेश हननोद्यतः ॥२४६॥

कर्णार्जुनौ तदा लग्नौ रणे योद्धुं मदोद्धुरौ।
रविपुत्रधनुश्छिन्नं पार्थेन विशिखैः खरैः ॥२४७॥

कर्णेन तस्य च्छत्रं तु छिन्नं छिदुरसच्छरैः।
परस्परं तुरंगौ तौ छेदयन्तौ च रेजतुः ॥२४८॥

कर्णेन लक्ष्यबाणेन छिन्नं पार्थशरासनम्।
अन्यं चापं समादाय पार्थः प्रोवाच भानुजम् ॥२४९॥

त्वं कुन्तीनन्दनः कर्णोऽस्मद्भ्राता भुवि विश्रुतः।
सहस्व घनघातं मे तिष्ठ तिष्ठ स्थिरं रणे ॥२५०॥

वञ्चयित्वा बहून्वारान्मुक्तस्त्वं रणाङ्गणे।
सज्जो भवाथवा याहि रणं मुक्त्वा निजे गृहे ॥२५१॥

अर्थ (श्लोक 243 से 251): परस्पर में मार-काट करने लगे। इस वक्त कौरवों की सेना समुद्र-सी देख पड़ती थी, क्योंकि उसमें वाहन और हथियार वगैरह मीन-मच्छ की जगह थे और खून जल की जगह था। यह देख भीम उसे नष्ट करने के लिए रथ-रूपी नौका पर सवार होकर उसमें घुस पड़ा और उसे छिन्न-भिन्न करने लगा एवं एक ओर मतवाले हुए कर्ण और अर्जुन युद्ध करने लगे और थोड़ी ही देर में अर्जुन ने अपने बाणों के तीव्र प्रहार से कर्ण का धनुष छेद डाला। उधर से कर्ण ने भी छेदने में कुशल अपने शरों से पार्थ का छत्र छेद दिया। तब वे परस्पर में एक दूसरे के घोड़ों को छेदने लगे। इसी समय कर्ण ने लाख-बाण छोड़कर पार्थ का दूसरा धनुष भी छेद दिया। तब पार्थ ने तीसरा धनुष लिया और वह कर्ण से बोला कि कर्ण, तुम कुन्ती के पुत्र और मेरे भाई हो, यह बात सारा संसार जानता है इसलिए अब तुम भाई-भाई के युद्ध में धीरज के साथ मेरे घन के जैसे आघातों को सहो। देखो कहीं पीठ दिखा कर भाग न जाना। मैंने पहले रण में तुम्हें पकड़ कर कई बार छोड़ दिया परन्तु अब मैं छोड़ने का नहीं। तुम या तो अति शीघ्र युद्ध के लिए तैयार हो अथवा रण-स्थल छोड़कर अपने घर का रास्ता लो, यहाँ एक क्षण भी न ठहरो। इसी में तुम्हारी भलाई है ॥२४३-२५१॥


तन्निशम्य जजलप्याशु पूषपुत्रः परोदयः।
किं त्वं जल्पसि रे पार्थाविनीतो जडतां गतः ॥२५२॥

भनज्म्यहं तवाग्रे किं मया ध्वस्ता नृपा रणे।
पूर्वं प्रहरणं लात्वा देहि मा दुर्वचो वद ॥२५३॥

अत्रान्तरे जगौ विष्णुर्विश्वसेनस्तवात्मजः।
प्रधने पतितः कर्ण तथाभूतप्राणमुक्तधीः ॥२५४॥

तन्निशम्य नृपः कर्णो धिक्कारमुखराननः।
शुशोच सुचिरं चित्ते दुश्चिन्तश्चिन्तयान्वितः ॥२५५॥

जेघ्नीयन्तेऽत्र राज्यार्थं भ्रातरो भ्रातृभिः सदा।
तदा दुर्योधनोऽवोचच्छोचन्तं भानुनन्दनम् ॥२५६॥

अर्थ (श्लोक 252 से 256): यह सुन वीर कर्ण ने कहा कि रे जड़ात्मा और अविनयी पार्थ! तू व्यर्थ ही बकता है। देख मैं तुझे अभी धराशायी किये देता हूँ और यह तो तू भी जानता है कि तेरे आगे ही पहले मैंने अनेकानेक राजाओं की धराशायी किया है। इसलिए अब तू व्यर्थ ही अपने मुँह अपनी बड़ाई न कर और न व्यर्थ ही खोटे वचन बोल किन्तु मेरे प्रहारों को सह। इसी बीच में कृष्ण ने आकर कर्ण से कहा, तुम्हारा पुत्र विश्वसेन धराशायी हो काल का अतिथि बन चुका है। यह सुनकर कर्ण शोक के मारे विह्वल-सा होकर बड़ी विषम चिन्ता में पड़ गया। वह सोचने लगा कि हाय! यह कैसा अनर्थ है जो एक तुच्छ राज्य के लिए भाई-भाई को भी मार डालते हैं। इस प्रकार कर्ण को शोकाकुल देख उससे दुर्योधन ने कहा कि वीरवर! यह शोक का अवसर नहीं है। इसलिए तुम शोक को छोड़ दो और


शोकस्यावसरो नात्र कर्ण संहन्यतां नरः।
हतेन येन जायेत जयश्रीः कौरवेशिनाम् ॥२५७॥

तन्निशम्य रणे लग्नौ क्रुद्धौ कर्णार्जुनौ तदा।
अन्तरेण विनिर्मुक्तांक्षिपन्तौ विशिखान्खलु ॥२५८॥

जगाद केशवः पार्थं विपक्षान्जहि सायकैः।
तदा पार्थः प्रक्रुद्धात्मा विससर्ज पराञ्शरान् ॥२५९॥

कर्णस्य करतस्तेन छिन्ने शरशरासने।
कर्णेनापि तथा छिन्नं धनंजयशरासनम् ॥२६०॥

पार्थो दिव्यास्त्रमादाय जगाद मधुरं वचः।
दिव्यास्त्र दिव्यदेह त्वं शृणु बाणशरासन ॥२६१॥

यद्यस्ति त्वयि सत्यत्वं यद्यहं कुलरक्षकः।
धर्मजे यदि धर्मोऽस्ति जहीमं तर्हि वैरिणम् ॥२६२॥

इत्युक्त्वा स च दिव्यास्त्रं विसर्ज्याखण्डयत्क्षणात्।
कर्णशीर्षं तदा भूमौ कबन्धं बन्धुरं गतम् ॥२६३॥

अर्थ (श्लोक 252 से 263): अर्जुन का वध करो। इसी से कौरवों के हाथ में जय-लक्ष्मी आयेगी। सुनकर कर्ण उठ खड़ा हुआ और अर्जुन के साथ युद्ध करने लगा। इस वक्त उन दोनों ने ऐसी अविरल बाणों की बरसा की कि जिससे सारा गगन-मण्डल छा गया। इसी समय कृष्ण ने पार्थ से कहा कि पार्थ, शीघ्रता से बाण चलाओ और शत्रुओं को मार गिराओ। कृष्ण की उत्तेजना में अर्जुन को बड़ा जोश आया और तब वह अति शीघ्रता से बाण छोड़ने लगा। फल यह हुआ कि उसने थोड़े ही समय में कर्ण के धनुष-बाण को छेद दिया। तब उधर से कर्ण ने भी अपना जोर चलाया और धनंजय के धनुष को वे-काम कर दिया। बाद पार्थ दिव्य-अस्त्र हाथ में लेकर और दिव्यास्त्र के रक्षक देवों से बोला कि हे दिव्य-अस्त्र और दिव्य देह के धारक शरासन, तुम सब सुनो कि यदि तुममें कुछ सत्य है, हम सच्चे कुल-रक्षक हैं और युधिष्ठिर में कुछ धर्म है तो तुम इस वैरी का विध्वंस कर दो। यह कहकर उसने अपने दिव्य-अस्त्र को छोड़ा और क्षणभर में ही कर्ण के मस्तक को धड़ से जुदाकर दिया। देखते-देखते वीर कर्ण धराशायी हो गया ॥२५२-२६३॥


चम्पाधिपे गते भूमौ विलापं विदधुर्नृपाः।
अहो अद्यैव मार्तण्डः प्रचण्डः पतितोऽभ्रतः ॥२६४॥

त्वां विना को रणे तिष्ठेत्पार्थं प्रति सुसन्मुखम्।
तावता च रणे याता नृपा दुःशासनादयः ॥२६५॥

भीमेनैकेन ते नीता एकोनशतकौरवाः।
मृत्युगेहं यथा वृक्षा उत्थितेन सुवह्निना ॥२६६॥

जगुर्नृपास्तदा क्रुद्धाः पञ्चास्यः स्म रणे तथा।
यथा हन्ति गजान्भीमः कौरवान् गौरवं गतान् ॥२६७॥

दुर्योधनं तदा कश्चिद्वान्धवानां सुपञ्चताम्।
जगाद भीमसंनीतां दुःखपुञ्जसमां भृशम् ॥२६८॥

अर्थ (श्लोक 264 से 268): इस प्रकार चंपा नगरी के वीर राजा कर्ण को धराशायी होता देखकर कौरव रोने-विलाप करने लगे कि आज आकाश से सूरज ही पृथ्वी पर पड़ गया है और सदा के लिये अँधेरा कर गया है। हा कर्ण, तुम्हारे बिना अब रण में अर्जुन का सामना और कौन करेगा। हममें ऐसा शक्तिशाली कोई नहीं जो उस वीर का सामना करे और उसे नीचा दिखावे। इसी समय उधर दुःशासन आदि राजा युद्ध-स्थल में आ उपस्थित हुए। उन्हें अकेले भीम ने ही यम के घर पहुँचा दिया जैसे कि बहुत से वृक्षों को एक आग का कण खाक में मिला देता है-जला डालता है। यह देख नृप-गण कहने लगे कि देखो, जिस तरह जंगल में क्रुद्ध हुआ एक ही सिंह बहुत से गजों को धराशायी करता जाता है उसी तरह भीम भी इन कौरवों को धराशायी करता जा रहा है। इसे धन्य है। इसी समय किसी ने दुर्योधन


मस्तके वज्रवल्लग्नं श्रुतौ तद्वचनं तदा। भूपतेर्भयभीतस्य दुःखेन खिन्नचेतसः ॥२६९॥

भ्रातरः पतिता यत्र गतस्तत्र स कौरवः। तं सारथिरुवाचेदं पश्य भ्रातृन्मृतान्भटान् ॥२७०॥

अर्थ (श्लोक 264 से 270): के पास जाकर उससे उसके बान्धवों की मृत्यु का हाल कहा, जिन्हें कि भीम ने मारा था, जिनकी मृत्यु दुर्योधन को अत्यन्त दुख देने वाली थी। उनका हाल सुनकर उस पुरुष के वचन दुर्योधन के कानों में ऐसे लगे जैसा कि मस्तक पर वज्र गिर पड़ता है। उससे वह बड़ा भयभीत हुआ। उसका चित्त व्याकुल हो उठा। इसके बाद वह वहाँ गया जहाँ कि उसके भाई मरे हुए पड़े थे। उन्हें देख सारथी ने उससे कहा कि राजन्! उद्धत शूरवीर होने पर भी देखिए ये कैसे मरे पड़े हैं? ॥२६४-२७०॥


तदा दुर्योधनोऽपश्यद्भ्रातृन्मृत्युं गतान्वरान्। ग्रहभूतपिशाचानां पिशितैस्तृप्तिकारिणः ॥२७१॥

रणस्यावसरो नास्ति हित्वा प्रधनमुद्धुरम्। दुर्योधन गृहं गच्छेत्यवदत्सारथिस्तदा ॥२७२॥

तन्निशम्य नृपश्चित्ते क्रोधोद्धत्यं दधे ध्रुवम्। प्ररुध्य सारथिः प्राह पुनर्धूप वचः शृणु ॥२७३॥

तित्यक्षसि च नाद्यापि दुराग्रहमहाग्रहम्। अर्धराज्यं त्वया दत्तं पाण्डवानां न हि प्रभो ॥२७४॥

अर्थ (श्लोक 271 से 274): दुर्योधन ने भी उन्हें देखा। देखो, जो ऐसे विकराल थे कि ग्रह-भूत-पिशाच आदि के मांस से तृप्त होते थे वे ही आज मृत्यु के ग्रास होकर पृथ्वी पर लेटे हुए हैं। यह दशा देख सारथी ने दुर्योधन से कहा कि महाराज! इस समय अब युद्ध का मौका नहीं है आप युद्ध की इच्छा छोड़कर घर लौट चलिए। यह सुनकर दुर्योधन को बड़ा क्रोध आया और वह आपे से बाहर हो गया। यह देख सारथी ने रोष में आकर कहा कि महाराज, प्रभो, आपने न पाण्डवों को पहले उनके हिस्से का आधा राज्य दिया और न अब भी अपना दुराग्रह छोड़ते हैं ॥२७१-२७४॥


शतबन्धुविनाशस्तु समानीतस्त्वया रणे। गजवाजिविनाशस्य प्रमाणं ज्ञायते न हि ॥२७५॥

स्वबुद्ध्या स्थीयतां नाथ यथा न स्यादुपद्रवः। दुर्योधनस्तदावोचत्त्वं किं वक्षि ममाग्रतः ॥२७६॥

निहत्य पाण्डवान्सर्वान्मरिष्येऽहं न चान्यथा। इत्युक्त्वा पाण्डुसैन्येन प्रचण्डो योद्धुमागमत् ॥२७७॥

द्वयोः सैन्यं दधावाशु महाहुंकारसंकुलम्। लाहि लाहि वदच्छ्रौण्डानुत्खातखड्गधारिणः ॥२७८॥

मद्राधिपं तदा प्राप्तः पाण्डुभूपो महोन्नतः। भीमो दुर्योधनं यातो महाहवपरायणम् ॥२७९॥

अर्थ (श्लोक 275 से 279): इसी का यह फल है कि इस युद्ध में आपके सौ भाइयों का सर्वनाश हो गया और अन्यसेना का तो इतना संहार हुआ कि उसका तो कुछ पता ही नहीं है। अतः नाथ, अब आप स्थिर होकर रहें तो अच्छा है, जिससे कुछ और उपद्रव खड़ा न हो। सुनकर दुर्योधन ने उससे कहा कि कायर! तू यह क्या कहता है। देख, मैं तभी मरूँगा जब पाण्डवों की सत्ता भी संसार से उठा दूँगा और तरह मैं कदापि मरने का नहीं। यह कहकर वह प्रचंड पाण्डवों की सेना के साथ फिर युद्ध करने को चला। दोनों ओर की सेनायें महान् अहंकार से भरी हुई दौड़ीं। तलवारें हाथ में लिये हुए उनके शूरवीर योद्धा “मारो-मारो कहते हुए परस्पर में भिड़ गये। वे एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। उस समय एक योद्धा दूसरे से कहता था कि वीरो! या तो अपना शरीर हमें सौंप दो या युद्ध की लालसा का शमन करो और तरह तुम्हारी भलाई न होगी। इसी समय युधिष्ठिर मद्राधिप के साथ और भीम महान् युद्ध करने वाले दुर्योधन के साथ भिड़ पड़ा ॥२७५-२७९॥


कर्णपुत्रास्त्रयः प्राप्ता नकुलं विपुले रणे।
मद्रीसुतेन खड्गेन भटा अष्टौ निपातिताः ॥२८०॥

चम्पाधिपसुतैः सार्धं युयुधे नकुलो बली।
दुर्योधनस्तदा भीमांशचापं विच्छेद मारुतेः ॥२८१॥

शक्तिं लात्वावधीद् भीमो वक्षो दुर्योधनस्य वै।
कौरवस्तु तदा मूर्च्छामित उन्मूर्च्छतः क्षणात् ॥२८२॥

संक्रुद्धः कौरवो भीमं जलस्थलनभश्चरैः।
बाणैश्चच्छाद कवचं क्षुरप्रैस्तस्य चाभिनत् ॥२८३॥

अर्थ (श्लोक 280 से 283): उधर कर्ण के तीन पुत्र नकुल के साथ युद्ध करने लगे। वीर नकुल ने थोड़े ही समय में अपनी तलवार को आठ योद्धाओं का खून पिलाकर उन्हें धराशायी कर दिया। उसने कर्ण के पुत्रों के साथ भी डट के युद्ध किया। इसी समय बुद्धिमान् दुर्योधन ने भीम के धनुष को छेद डाला। तब भीम ने हाथ में शक्ति ली और दुर्योधन के वक्षस्थल में एक ऐसा प्रहार किया कि वह मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। इसके बाद वह थोड़ी देर में जब होश में आया तब उसे बड़ा भारी क्रोध आया और वह एक दम भीम पर टूट पड़ा। फल यह हुआ कि उसने जलचर, नभचर और थलचर बाणों के द्वारा भीम को बिल्कुल ही पूर दिया और उसका कवच छेद डाला ॥२८०-२८३॥


भीमः क्रुद्धो गदां लात्वा सहस्राणि च विंशतिम्।
भटानामवधीदष्टौ सहस्त्राणि रथात्मनाम् ॥२८४॥

यत्र यत्र परं याति भीमस्तत्र न तिष्ठति।
नृपः कोऽपि भयत्रस्तः संत्रस्तसुमनोरथः ॥२८५॥

यं यं पश्यति भीमेशः स स गच्छति पञ्चताम्।
धर्मात्मजस्तदावोचद्दुर्योधननृपं प्रति ॥२८६॥

अर्थ (श्लोक 284 से 286): अपना यह हाल देख भीम के क्रोध का कुछ पार न रहा और गदा हाथ में लेकर उसने कोई बीस हजार योद्धाओं को यमपुर भेज दिया और आठ हजार रथ को चूर डाला तथा असंख्य हाथी-घोड़ों को प्राण-रहित कर दिया। सच तो यह है कि भीम जहाँ-जहाँ जाता था वहाँ-वहाँ उसके डर के मारे कोई भी राजा न ठहरता था-सब अपने-अपने मनोरथ व्यर्थ समझकर भागते थे अथवा यों कहिए कि भीम जिस किसी के ऊपर अपनी दृष्टि डालता था वही यमलोक का शरण लेता था ॥२८४-२८६॥


त्व भृत्यत्वं समासाद्य सुखं तिष्ठ यदृच्छया।
गृहाण मत्तमातङ्गान्रथानद्यापि वाजिनः ॥२८७॥

अद्याप्याज्ञां प्रतीच्छ त्वं मदीयां सदयो भव।
छत्री सिंहासनारूढो राजाद्यापि भवोन्नतः ॥२८८॥

अद्यापि जहि दुष्टत्वं भज मैत्र्यं मया सह।
निशम्येति जजल्पासौ धार्तराष्ट्रः सुगर्वभृत् ॥२८९॥

आवयोर्जन्मतो जातं वैरं नो याति निश्चितम्।
एकोऽहं मारयिष्यामि विपुलान्पाण्डवान्रणे ॥२९०॥

अर्थ (श्लोक 287 से 290): इसी समय रणोद्धत दुर्योधन से युधिष्ठिर ने कहा कि तुम मेरी अधीनता स्वीकार कर जी चाहे वहीं सुख से रहो और रथ, हाथी, घोड़े आदि जो कुछ सम्पत्ति चाहिए वह मुझसे लो। तात्पर्य यह कि मेरी भृत्यता मान लेने पर तुम्हें किसी भी तरह की तकलीफ न होगी। तुम जो चाहोगे वही तुम्हारी चाह पूरी होगी। देखो, आज सारे दिन इस बात की मैं प्रतीक्षा करूँगा कि तुम मेरी आज्ञा स्वीकार कर दयालु होओ, जिससे व्यर्थ ही इन हजारों योद्धाओं की बलि न चढ़े। तुम सच्चे क्षत्रिय बन कर आज भी सिंहासन पर आरूढ़ हो उन्नत राजा बन सकते हो। ऐसा करने से तुम अपने कर्तव्य का पालन कर सकोगे। संसार में तुम्हारी कीर्ति होगी। मेरा यही कहना है कि अब भी तुम अपनी


न भुञ्जे महीं भोक्तुं न दास्ये पाण्डवेशिनाम्।
उक्तेनालं त्वमद्यापि सज्जो भव रणाङ्गणे ॥२९१॥

इत्युक्त्वा सोऽसिना भूपं जघान क्रोधकम्पितः।
धर्मात्मजः परं खड्गं यावत्संधरति ध्रुवम् ॥२९२॥

तावत्तत्र समायासीदन्तरे पावनिर्मुदा।
समस्तारिबलं छेतुं भ्रूभङ्गैर्भीषणः स्थितः ॥२९३॥

आकारयन्कुरूणां हि सैन्यं प्रबलसंयुतम्।
तिष्ठ तिष्ठेति संजल्पन्भीमस्तस्थौ रणाङ्गणे ॥२९४॥

अर्थ (श्लोक 287 से 294): दुष्टता छोड़कर मेरे साथ मैत्री भाव स्वीकार करो। सुनकर दुर्योधन अभिमान के साथ बोला कि तुम्हारे साथ मेरा तो जन्म से ही वैर है, वह आज कैसे मिट सकता है। मैं तुम्हारी अधीनता स्वीकार करूँ, यह असंभव है, किन्तु याद रखिए मैं अकेला ही सारे संसार से तुम लोगों की सत्ता उठा दूँगा- तुममें से एक को भी मैं जीता न छोड़ूँगा और एक बात है कि मैं यदि पृथ्वी को नहीं भोग सकूँगा तो तुम्हें भी नहीं भोगने दूँगा। सच तो यह है कि तुम सज कर रण-स्थल में उतरो और मेरे साथ युद्ध करो। तुम्हारा मेरा फैसला युद्ध में ही होगा। यह कहकर क्रोध के मारे काँपते हुए दुर्योधन ने युधिष्ठिर के ऊपर तलवार का एक वार किया। युधिष्ठिर ने उसे अपनी तलवार पर रोक लिया। इसी बीच में वहाँ, अपनी भृकुटी मात्र से वैरी के सेना को कंपित कर देने वाला भीम आ गया और कौरवों की प्रबल सेना को ललकारता हुआ कि ठहरो-ठहरो भागो मत, रण-स्थल में डट गया ॥२८७-२९४॥


भीमो गदां समादाय तडिज्झङ्कारसंनिभाम्।
यमजिह्वोपमां नागकन्यां वा विदधे रणम् ॥२९५॥

दुर्योधनस्य शीर्षे सा भीममुक्ता पपात च।
कण्ठप्राणो महीपीठे पतितः कौरवस्तदा ॥२९६॥

बंभणीति स्म मन्दं स कोऽप्यस्ति कौरवे बले।
जीवन्पाण्डववृन्दस्य क्षयं नेतुं क्षमः क्षितौ ॥२९७॥

तदा बभाण कश्चिच्च गुरुपुत्रः पवित्रवाक्।
समर्थस्तान्क्षयं नेतुं विषमो वैरिणोऽस्ति वा ॥२९८॥

अश्वत्थामा समाकर्ण्य तद्वधं क्रुद्धमानसः।
न्यवेदयज्जरासंधं बन्धुरं चेति निष्ठुरम् ॥२९९॥

प्रभो दशसहस्त्रेण नृपेण कौरवः क्षितौ।
पतितस्तन्निशम्याशु चक्री शोकाकुलोऽभवत् ॥३००॥

सेनापत्यादिसैन्येनादिश गुरुनन्दनम्।
जरासंधस्तु युद्धाय प्रचण्डः पाण्डवान्प्रति ॥३०१॥

अर्थ (श्लोक 295 से 301): वह गदा हाथ में लेकर युद्ध करने लगा। उस समय वह गदा उसके हाथों में ऐसी जान पड़ी मानों बिजली ही है या यम की जीभ है अथवा नागकन्या ही है। इसके बाद भीम ने क्रोधित हो जो गदा-प्रहार किया वह जाकर दुर्योधन के मस्तक पर गिरा। उसने दुर्योधन को कंठ-गत प्राण कर दिया। वह जमीन पर धड़ाम से गिरा। अपने जीवन का कोई उपाय न देख उसने धीमे से कहा कि क्या अब भी कौरवों की सेना में कोई ऐसा वीर जीता बचा है जो पाण्डवों का सर्वनाश कर सके। यह सुन किसी पास खड़े हुए भृत्य ने कहा कि हाँ, है और वह पवित्र गुरु-पुत्र अश्वत्थामा है। वह पाण्डवों का विध्वंस कर सकता है। उसे वैरी दबा नहीं सकते। वह उनके लिए दुर्जय है। उधर ज्यों ही अश्वत्थामा ने दुर्योधन के वध का हाल सुना त्यों ही वह क्रुद्ध होकर जरासंध के पास गया और बोला कि प्रभो! दस हजार राजाओं के साथ ही आज दुर्योधन भी धराशायी हो गया है। यह सुन जरासंध को बड़ा शोक हुआ। वह व्याकुल हो उठा। इसके बाद ही उसने अपने सेनापति आदि के साथ ही प्रचंड अश्वत्थामा को पाण्डवों के साथ युद्ध करने के लिये आदेश किया ॥२९५-३०१॥


गुरुपुत्रः समागत्य दुर्योधनसमीपताम्। रुदन् बभाण भो तात सर्वं शून्यं त्वया विना ॥३०२॥

अस्माभिर्ब्राह्मणैस्ताताभोजि राज्यं समुज्ज्वलम्। त्वत्प्रसादादिदानीं किं नाथ ब्रूहि करिष्यते ॥३०३॥

तावता चक्रिणा शीर्षे बबन्ध मधुभूपतेः। चर्मपट्टः पुनः सोऽपि प्रेषितः सह सद्बलैः ॥३०४॥

अधुना पाण्डवानां हि विनाशो नेष्यते मया। संलोष्ये कृष्णशीर्षं हि भणित्वेति चचाल सः ॥३०५॥

अर्थ (श्लोक 302 से 305): अश्वत्थामा वहाँ से दुर्योधन के पास आया और उसकी यह दशा देख शोक से बोला कि हे वीरवर, आपके बिना आज यहाँ सब शून्य देख पड़ता है, कुछ भी अच्छा नहीं लगता। राजन्! अब तक तुम्हारे ही प्रसाद से हम ब्राह्मण लोग इस उज्ज्वल राज्य को भोगते थे। परन्तु अब तुम्हारे बिना हम क्या करेंगे। इतने ही में जरासंध ने मधु राजा के सिर पर भी वीरपट्टक बाँधकर उसे बहुत सेना देकर पाण्डवों से युद्ध करने के लिये भेज दिया। वह अपने दिल में यह ठानकर चला कि मैं अभी जाकर पाण्डवों का विनाश किये डालता हूँ और साथ ही कृष्ण का मस्तक भी धड़ से जुदा किये देता हूँ। इस बात को क्रोध में आकर उसने बड़-बड़ाते हुए कह भी डाला ॥३०२-३०५॥


दुर्योधनस्तदावोचन्मया बद्धस्तवाधुना। पट्टस्त्वं याहि संग्रामेऽश्वत्थामञ्जहि वैरिणः ॥३०६॥

अश्वत्थामा स्वसैन्येन गत्वा पाण्डवसैन्यकम्। वेष्टयामास सर्वत्र चतुर्दिक्षु भयप्रदम् ॥३०७॥

तदा सस्मार सद्विद्यां माहेश्वरीं गुरोः सुतः। शूलहस्ता दधावासौ चन्द्रभाला समायिका ॥३०८॥

तन्माहात्म्यान्ननाशाशु विष्णुपाण्डवयोर्बलम्। गुरुपुत्रश्चरन्सैन्ये चूरयामास तद्बलम् ॥३०९॥

गजा रथादिवाहानां महीपा दलिता रणे। तेन पाञ्चालभूपस्य शिरश्छिन्नं समुत्कटम् ॥३१०॥

अर्थ (श्लोक 306 से 310): अश्वत्थामा को देखकर मृत्यु-मुखगत दुर्योधन ने उससे कहा कि वीर अश्वत्थामा, लो मैं तुम्हारे मस्तक पर वीरपदक बाँधता हूँ। तुम अभी जाओ और शत्रु के साथ युद्ध कर उसे यमालय को भेजो। इसके बाद अश्वत्थामा अपनी सेना को साथ लेकर चला और जाकर ही उसने सब ओर से पाण्डवों की भयंकर सेना को घेर लिया। उसने इस समय माहेश्वरी विद्या को याद किया। वह त्रिशूल को हाथ में लिये उसी वक्त दौड़ी आई। उसके मस्तक में चंद्र का चिह्न था। वह उससे बड़ी सुशोभित हो रही थी। उसके प्रभाव को विष्णु और पाण्डवों की सेना न सह सकी और वह भाग छूटी और जो कुछ थोड़ी बहुत रही थी उसे अश्वत्थामा ने चूर डाला। उसने हाथी, घोड़े, रथ और राजा वगैरह सब को पद-दलित कर पांचाल के राजा का मस्तक छेद दिया ॥३०६-३१०॥


जयश्रियं समाप्यासौ गुरुपुत्रः शिरस्तदा। तस्य दुर्योधनस्याग्रे दधौ धृतिकरं परम् ॥३११॥

तन्निरीक्ष्य तदावोचत्कौरवः पाण्डवान्भुवि। हन्तुं क्षमोऽस्ति कोऽप्यत्र निरस्ता यैर्नराः सुराः ॥३१२॥

द्रोणकर्णौ रणे ध्वस्तौ यैस्तु पावनिना हतः। अहमेकेन चान्येषां हतानां तत्र का कथा ॥३१३॥

अर्थ (श्लोक 311 से 313): इस प्रकार, वह जय-लक्ष्मी से भूषित हो पांचाल के राजा का सिर लेकर दुर्योधन के पास गया और उसे उसने उसके आगे रख दिया। दुर्योधन को वह मस्तक देखकर कुछ संतोष हुआ। वह बोला कि संसार में क्या कोई ऐसा शक्तिशाली भी हैं जो पाण्डवों की विध्वंस करे, जिन्होंने कि सुर-असुर और नर सबको ही परास्त कर द्रोण और कर्ण को काल के घर पहुँचा दिया है और


पञ्चापि पाण्डवाः सन्ति जीवन्तस्तत्र किं परैः।
हतैः पाञ्चालभूपाद्यैर्वृथानर्थपरायणैः ॥३१४॥

हरिणा पाण्डवैस्तूर्णं बलेनाश्रावि मस्तकम्।
सेनान्या सह संछिन्नं तस्य द्रोणसुतेन च ॥३१५॥

अर्थ (श्लोक 311 से 315): जिनमें से अकेले भीम ने ही हजारों राजाओं महाराजाओं को यमलोक को पहुँचा कर मुझे भी इस हालत में ला दिया है। सच तो यह है कि जब पाँचों ही पाण्डव जीते हैं तब इन तुच्छ पांचाल आदि राजाओं को मारना तो किसी भी काम का नहीं, व्यर्थ ही है। इन निरीह राजाओं के मारने से क्या लाभ होगा। मारना तो चाहिए उन पाण्डवों को जिन्होंने कि जगत् भर को ही जेर कर रक्खा है ॥३११-३१५॥


तच्छ्रुत्वा दुःखिताः सर्वे रुरुदुः पाण्डवादयः।
कृष्णोऽवोचन्न कर्तव्यः शोकः स्मो जीविता वयम् ॥३१६॥

तदा क्रुद्धो जरासंधः प्रलयाब्धिरिवाययौ।
तदा सुरैर्हरिः प्रोचे मा विलम्बय केशव ॥३१७॥

जहि मागधभूपालं भविता ते महोदयः।
श्रुत्वेत्याकारितश्चक्री विष्णुना भाविचक्रिणा ॥३१८॥

अर्थ (श्लोक 316 से 318): उधर हरि, पाण्डव और बलभद्र आदि के कानों में जब यह बात पहुँची कि अश्वत्थामा ने सेनानी सहित पांचाल के राजा का मस्तक छेद डाला तब उन्हें बड़ा दुख हुआ। यह देख कृष्ण ने कहा कि इस वक्त शोक न कीजिए, यह शोक का मौका नहीं है। एक पांचाल पति मारा गया तो क्या हुआ, हम सब तो अभी जीते हैं। उधर कौरवों की दुर्दशा सुनकर जरासंध क्रोध से प्रलय-काल के समुद्र की भाँति उमड़ा हुआ वहाँ आया। यह देख देवताओं ने कृष्ण से कहा कि केशव, समय आ गया है, अब आप विलम्ब न कर मगधाधिपति जरासंध का शीघ्र काम तमाम कीजिए। यही आपके महोदय का समय है। सुनकर भविष्य चक्रवर्ती कृष्ण ने उसी समय जरासंध को ललकारा ॥३१६-३१८॥


दृष्ट्वा यदुचमूं सोऽथ दूतं पप्रच्छ सोमकम्।
ख्याहि सर्वान्नृपाञ्श्रुत्वा सोऽवोचच्छिह्नपूर्वकम् ॥३१९॥

समुद्रविजयः स्वर्णवर्णाश्वोऽयं हरिध्वजः।
अयं तु शुकवर्णाश्वो रथनेमिर्वृषध्वजः ॥३२०॥

सेनाग्रे श्वेतवाहोऽयं वैकुण्ठस्तार्क्ष्यकेतनः।
रामोऽयं नीलवर्णाश्वोऽस्यावामे तालकेतनः ॥३२१॥

नीलाश्वेन रथेनैष पाण्डुसूनुर्युधिष्ठिरः।
भीमोऽयं भाति भीतिघ्नो विचित्ररथसंस्थितः ॥३२२॥

अर्थ (श्लोक 319 से 322): फिर क्या था, यादवों की सेना तैयार होकर चली, जिसे देखकर जरासंध ने सोमक नाम दूत से कहा कि तुम मुझे इन सब राजाओं का परिचय दो। दूत भिन्न-भिन्न सब राजाओं के चिह्न बताता हुआ उसे उनका परिचय देने लगा। वह बोला कि देखिए, महाराज, वह समुद्रविजय का रथ है, जिसमें सोने जैसे वर्ण वाले घोड़े जुते हुए हैं और सिंह की ध्वजा है। वह रथनेमि का रथ है, जिसमें हरे रंग के घोड़े जुते हैं और बैल की ध्वजा है। सेना के आगे वह कृष्ण का रथ है, जिसमें सफेद घोड़े जुते हैं और गरुड़ की ध्वजा हैं। यह दाहिनी ओर राम का रथ है, जिसमें नीले वर्ण के घोड़े हैं और ताल की ध्वजा है। यह नीले घोड़ों वाला युधिष्ठिर का रथ है और वह विचित्र रथ भीम का है। महाराज, भीम भीति को दूर करने वाला अद्भुत वीर योद्धा है ॥३१९-३२२॥


शक्रसूनुरयं श्वेततुरङ्गः कपिकेतनः।
उग्रसेनः पुनरयं शुकतुण्डनिभैर्हयैः ॥३२३॥

अर्थ: वह सफेद घोड़ों और वानर की ध्वजा वाला अर्जुन है। वह उग्रसेन है, जिसके रथ को लाल वर्ण के घोड़े खींच रहे हैं। वह पीले घोड़ों वाला और हिरण की ध्वजा वाला जरत्कुमार है। शिशुभार


जरासूनुरयं स्वर्णतुरगो मृगकेतनः । मेरुः कपिलरक्ताश्वः शिशुमारध्वजस्त्वयम् ॥३२४॥

काम्बोजैर्वाजिभिश्चायं सिंहलः सूक्ष्मरोमशः । पद्माभैर्वाजिभिश्चैष नृपः पद्मरथः पुरः ॥३२५॥

अर्थ (श्लोक 323 से 325): की ध्वजा वाला और लाल-पीले घोड़ों वाला वह मेरु का रथ है। वह सूक्ष्मराम का रथ है, जिसमें कि कांबोज के घोड़े - जुते हैं और सिंह की ध्वजा है। कमल जैसे लाल रंग के घोड़ों वाला यह रथ पद्मरथ का है। यह पंचपुंड्र देश के घोड़ों वाला और कुंभ की ध्वजा वाला रथ विदूरथ का है। कपोत जैसे रंग के जिसमें घोड़े जुते हैं तथा पद्म की जिसकी ध्वजा है वह रथ शरण का है और यह अनावृष्टि नाम सेनापति का रथ है जिसमें कि हाथी की ध्वजा है और काले घोड़े जुते हुए हैं ॥३२३-३२५॥


कृष्णाश्वोऽयमनावृष्टिर्गजकेतुश्चभूपतिः । एवं श्रुत्वा क्रुधाक्रान्तो युयुधे मागधश्चिरम् ॥३२६॥

तदा तौ मार्गणाञ्ज्यायां टंकारारावपूरिते । चापे संरोप्य मुञ्चन्तौ सिंहाविव विरेजतुः ॥३२७॥

विष्णुना वह्निबाणेन ज्वालितं मागधं बलम् । चक्रिणा वारिबाणेन शान्तिं नीतं निजं बलम् ॥३२८॥

पुनश्चक्री मुमोचाशु नागपाशं महाशुगम् । तार्क्ष्यबाणेन चिच्छेद केशवस्तं समुद्धतम् ॥३२९॥

विससर्ज जरासंधो विद्यां च बहुरूपिणीम् । स्तंभिनीं चक्रिणीं शूलां मोहयन्तीं हरेर्बलम् ॥३३०॥

ताः सर्वा विष्णुना वेगान्महामन्त्रेण नाशिताः । बहुरूपिणीं गतां वीक्ष्य चक्री जातो विषण्णधीः ॥३३१॥

अर्थ (श्लोक 326 से 331): पाण्डवों की इस प्रकार विशाल सेना का हाल सुन जरासंध को बड़ा क्रोध आया। इसके साथ ही वह कृष्ण के साथ भिड़ गया। वे धनुष के टंकार से दिशाओं को शब्दमय करते, धनुषों की डोरियों पर बाणों की चढ़ाते ऐसे शोभते थे मानों दो पराक्रमी सिंह ही आपस में भिड़ रहे हैं। इसी समय कृष्ण ने एक अग्नि बाण छोड़ा। उससे जरासंध की सारी सेना में आग लग उठी। चक्री ने जल-बाण छोड़कर कृष्ण के अग्निबाण को वारण किया और सेना में शान्ति की। इसके बाद जरासंध ने नागपाश चलाया, जिसे कृष्ण ने गरुड़ बाण से वारण किया। तब जरासंध ने बहुरूपिणी, स्तंभिनी, चक्रिणी, शूला आदि बहुत-सी विद्याओं को भेजकर कृष्ण की सारी सेना की अचेत कर दिया। कृष्ण ने उन सबको भी महामंत्र के बल से भगा दिया। यह देख जरासंध की बहुरूपिणी विद्या भी चली गई। इससे जरासंध बड़ा खेद-खिन्न हुआ। उसके विषाद का कुछ पार न रहा ॥३२६-३३१॥


सुस्मृतं मागधश्चक्रमर्काभं च स्फुरत्प्रभम् । चर्चयित्वागतं हस्ते मुमोच मधुसूदनम् ॥३३२॥

स्फुरन्नभसि तच्चक्रं त्रासयद् यादवं बलम् । विवेशार्क इव व्योम्नि तत्सेनायां महाकरैः ॥३३३॥

तदा सर्वे नृपा नष्टाः स्थिरं तस्थौ जनार्दनः । हलिना पाण्डवैः सार्धं निर्भयो भीषण्यनरान् ॥३३४॥

अर्थ (श्लोक 332 से 334): इसके बाद जरासंध ने चक्ररत्न को याद किया। वह उसी समय उसके हाथों में आ गया। उसकी सूरज जैसी प्रभा थी। उसकी किरणें चारों ओर फैल रही थी। पहले जरासंध ने उसकी पूजा की और बाद उसे कृष्ण पर चलाया। वह अपनी किरणों से यादवों की सारी सेना को त्रसित करता हुआ सेना के भीतर घुसा, जैसे अपनी किरणों से सुशोभित सूरज आकाश में प्रवेश करता है। इस समय उसके तेज के मारे वहाँ कोई भी नहीं ठहर सका-सब भाग खड़े हुए। केवल शत्रुओं को भय उत्पन्न करने वाले निर्भय कृष्ण, बलदेव तथा पाण्डव ही रहे। जरासंध का चलाया हुआ चक्र कृष्ण


त्रिः परीत्य हरिं चक्रं स्थितं तद्दक्षिणे करे।
तदा जयारवो जातो यादवीये बलेऽखिले ॥३३५॥

अर्थ (श्लोक 332 से 335): के पास आकर और कृष्ण की तीन प्रदक्षिणा देकर उसके दाहिने हाथ में आ गया। उसे कृष्ण के हाथों में आते ही यादवों की सेना में जयध्वनि हुई ॥३३२-३३५॥


माधवो मधुरैर्वाक्यैर्मगधेशमुवाच च।
नम मे चरणद्वन्द्वं धरामद्यापि धारय ॥३३६॥

मदाज्ञां पालय त्वं हि पूर्ववत्सुखितो भव।
तन्निशम्य जरासंधः क्रुद्धोऽवोचद्विषण्णधी ॥३३७॥

त्वं गोपालो महीशेन मया नंम्यसे कथम्।
चक्रगर्वेण गर्वी त्वं मा भूयाः कुम्भकारवत् ॥३३८॥

त्वं च याहि ममाभ्यर्णान्मद्भुजाभ्यां म्रियस्व मा।
समुद्रविजयो भूपः सेवको मम सर्वदा ॥३३९॥

त्वत्पिता वसुदेवो मे पदातिः पुरतः स्थितः।
त्वं गोपतनयो गोपः पापाद्यासि क्षयं खलु ॥३४०॥

तन्निशम्य तदा क्रुद्धः कृष्णश्चक्रं व्यचिक्षिपत्।
तेन च्छित्त्वा जरासंधशीर्षं भूमौ निपातितम् ॥३४१॥

अर्थ (श्लोक 336 से 341): इस वक्त कृष्ण ने मधुर मीठे वचनों में जरासंध से कहा कि जरासंध! अब भी समय है, मेरे चरणों में मस्तक नमा कर राज्यभोग करो। देखो, अभी कुछ बिगड़ा नहीं है, चेतो, इसमें तुम्हारी भलाई है। मेरी आज्ञा शिरोधार्य कर तुम पहले की तरह ही सुख से राज्य भोगो। कृष्ण की यह मर्मवाणी सुनकर जरासंध को बहुत क्रोध आया और वह विषाद करता हुआ बोला कि ओह! भूल गया कि तू एक ग्वाल है और मैं राजा हूँ। मैं तुझे नमस्कार करूँ। यह कभी नहीं हो सकता। तू चक्र का कुछ गर्व न कर। चक्र तो कुम्हार के पास भी होता है। सच तो यह है कि तू यहाँ से शीघ्र ही भाग जा, व्यर्थ ही मेरी भुजाओं का बलि न बन। क्या तुझे याद नहीं है कि समुद्रविजय सदा से मेरा सेवक रहा है और तेरा पिता वसुदेव पहले मेरे यहाँ पयादा था। तू तो एक दीन ग्वाल का पुत्र है, फिर रे खल, जान पड़ता है तेरे पाप का ही उदय आ पहुँचा है जो तू जान-बूझकर मृत्यु के मुख में प्राप्त होना चाहता है। सुनकर कृष्ण के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उसने उसी समय जरासंध पर चक्र चलाया। चक्र ने उसका मस्तक धड़ से जुदा करके पृथ्वी पर गिरा दिया ॥३३६-३४१॥


परावृत्य पुनश्चक्रं विष्णुहस्तं उपस्थितम्।
तदा जयारवश्चक्रे सुरैर्भूपैश्च यादवैः ॥३४२॥

पुष्पवृष्टिं प्रकुर्वाणाः सुराः प्राहुस्त्रिखण्डप।
नवमस्त्वं समुत्पन्नो धरां धत्स्व स्वपुण्यतः ॥३४३॥

अर्थ (श्लोक 342 से 343): इसके बाद चक्र लौटकर वापस कृष्ण के हाथ में आ गया। यह देख देवताओं, राजाओं और यादवों ने बड़े प्रसन्न होकर कृष्ण का जय-जयकार किया। उस जयध्वनि से सब दिशायें गूँज उठीं। कृष्ण पर फूलों की बरसा करते हुए देवताओं ने कहा कि कृष्ण, तुम तीन खण्ड के स्वामी नौवें नारायण हो। अतः अपने पुण्य से पाई हुई इस पृथ्वी का अब तुम भरण-पोषण करो, इसका शासन करो ॥३४२-३४३॥


केशवो रणभूमिं तां शोधयन्पतितं नृपम्।
जरासंधं निरीक्ष्याशु विषसाद सपाण्डवः ॥३४४॥

निश्वसन्तं निरीक्ष्याशु दुर्योधनमुवाच सः।
स्मर धर्मं दयायुक्तं विस्मर द्वेषभावनाम् ॥३४५॥

अर्थ (श्लोक 344 से 345): इस विजय के बाद कृष्ण रण-भूमि में पहुँचे। जब उनकी दृष्टि मरे पड़े जरासंध पर पड़ी तब उन्हें बड़ा विषाद हुआ। इसी तरह जरासंध को देखकर पाण्डव भी बड़े दुखी हुए। कृष्ण ने वहीं एक


येन ते जायते जीवः सुखी जन्मनि जन्मनि। तदा क्रुद्धो जगादैवं दुर्योधनो गतत्रपः ॥३४६॥

अजीविष्यमहं नूनमकरिष्यं भवत्क्षयम्। निशम्येति तदा नूनं निश्चिक्युस्तमधर्मिणम् ॥३४७॥

गान्धारेयोऽधमो धर्महीनोऽथ निश्वसन्क्षणात्। दुर्लेश्यो दुर्गतिं मृत्वा प्रपेदे पापपाकतः ॥३४८॥

अर्थ (श्लोक 344 से 348): जगह निस्सांसें छोड़ते हुए दुर्योधन को देखा। देखकर वे साम्यभाव से बोले कि भाई, अब तुम दया-मय धर्म को याद करो और द्वेष की भावना को बिल्कुल ही भूल जाओ। देखो, जीवों को जो जन्म-जन्म में सुख मिलता है वह सब इस धर्म का ही प्रभाव है। इसलिए अब तुम अपने आत्मा को और-और झंझटों से निकालकर इसी की ओर झुकाओ। इसमें तुम्हारी भलाई हैं। सुनकर निर्लज्ज दुर्योधन को उस दशा में भी बड़ा क्रोध आया और वह बोला कि तुम घबराओ मत, मैं निश्चय से जीऊँगा और तुम्हारा सर्वनाश करूँगा। तुम मुझे क्या सीख देते हो, मैं कभी तुम्हें छोड़ने वाला नहीं। तुम चाहे कैसी ही बातें क्यों न बनाओ। उसके ऐसे उत्तर के सुनकर कृष्ण ने समझ लिया के यह बड़ा अधर्मी है-इसे धर्म की बात कभी नहीं सुहायेगी। इसके बाद निस्सांसें छोड़ता हुआ वह धर्म-हीन अधर्मी दुर्योधन थोड़ी ही देर में अशुभ लेश्या से मरा और मर कर पाप के उदय से दुर्गति में गया, जो बड़ा भारी दुख का स्थान है ॥३४४-३४८॥


पुनस्तु पतितं सैन्यं द्रोणं कर्णं निरीक्ष्य च। रुरुदुः पाण्डवाः सर्वे शुचा विष्णुबलादयः ॥३४९॥

दहनं च तदा तेषां जरासंधादिभूबुजाम्। चन्दनागुरुभिः शीघ्रं चक्रुः केशवपाण्डवाः ॥३५०॥

अत्रान्तरे महामात्या जरासंधतनूद्भवम्। सहदेवं नये निष्णां कृष्णास्याङ्के निचिक्षिपूः ॥३५१॥

माधवस्तं विधत्ते स्म मगधेषु पुनर्नृपम्। प्रणिपातावसानो हि कोपो विपुलचेतसाम् ॥३५२॥

अर्थ (श्लोक 349 से 352): इसके बाद सेना, द्रोण तथा कर्ण को मृत्यु के मुख में पड़े देखकर पाण्डव, कृष्ण, बलदेव आदि बड़े शोकाकुल हुए और उन्होंने उसी वक्त जरासंध आदि सब राजा की चन्दन, अगुरु आदि से दग्ध-क्रिया की। इसी समय जरासंध के मंत्रियों ने सहदेव नाम उसके पुत्र को लाकर उसे कृष्ण की गोद में रख दिया और कृष्ण ने भी उसे अपने पिता की गादी पर बैठाकर मगध देश का राजा बना दिया। सच है कि गंभीर पुरुषों का क्रोध तभी तक रहता है जब तक कि शत्रु नम्र नहीं होता है। शत्रु के नम्र हो जाने पर तो वे और भी नम्र हो जाते हैं और वैर-विरोध को एकदम जलांजलि दे डालते हैं ॥३४९-३५२॥


त्रिखण्डभरताधीशो भूत्वा स हलिना सह। विवेश द्वारिकां रम्यां वाद्यवृन्दैः समुत्सवैः ॥३५३॥

पाण्डवाः स्वपुरं प्रापुर्हस्तिनागपुरं परम्। धर्मकर्म प्रकुर्वाणाः शर्मसिद्धिमुपागताः ॥३५४॥

अर्थ (श्लोक 353 से 354): इसके बाद तीन खण्ड के स्वामी होकर कृष्ण ने बलभद्र सहित भाँति-भाँति के उत्सवों और बाजों के साथ रमणीक द्वारिका में प्रवेश किया। इधर पाण्डव भी अपनी राजधानी हस्तिनापुर में आ गये। वहाँ वे धर्म-युक्त कर्मों को करते हुए रहने लगे। उन्हें सब सुख प्राप्त हुए-किसी भी बात की उनके लिए कमी न रही। जो वैरियों के समूह का नाशकर सब मनुष्यों से सेवित हुए-इन्द्र-तुल्य हुए, जो कल्याण-समुद्र के पूर और संसार के भय को हरने वाले धर्म के धारक हुए, पुण्य-योग से


क्षिप्तवा ये वैरिचक्रं नरनिकरनताः शक्रतुल्याः स्मरन्तः
धर्मं शर्माब्धिपूरं विषमभवहरं पाण्डवाः पुण्यतो वै।
राज्यं प्राज्यं समाप्ता गजपुरनगरे सर्वसंतानसौख्यम्
भुञ्जन्तो भव्यवर्गे रिपुभयमथनास्ते जयन्तु क्षितीशाः ॥३५५॥

अर्थ (श्लोक 353 से 355): जो उत्तम राज्य को प्राप्त कर हस्तिनापुर में अपूर्व संतान सुख के भोक्ता हुए और अनेक भव्य पुरुषों ने जिन से सुख पाया उन शत्रु के भय को दूर करने वाले पाण्डवों की जय हो ॥३५३-३५५॥


धर्मात्मा धर्मपुत्रो रिपुभयहरणो भीमसेनः सुसेनः
ख्यातः क्षोण्यां सुपार्थः पृथुगुणसुकथः प्रार्थितो बन्दिवृन्दैः।
मद्रीपुत्रौ पवित्रौ नकुलवरसहाद्यन्तदेवौ सुदेवौ
पञ्चैते पाण्डुपुत्राश्चिरमसमगुणाः पालयन्ति स्म पृथ्वीम् ॥३५६॥

अर्थ: धर्मात्मा युधिष्ठिर शत्रुओं के भय को हरने वाले हुए हैं, भीमसेन सेना में बड़े प्रसिद्ध वीर हुए हैं, पार्थ अपने पृथु गुणों से बंदीजनों द्वारा प्रार्थित हुए हैं, इसी प्रकार मद्री के पुत्र पवित्र नकुल और सहदेव, वीरता में प्रख्यात हुए हैं ये असाधारण गुणों के भण्डार पाँचों ही पाण्डव चिरकाल तक पृथ्वी का पालन करें ॥३५६॥ इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचन्द्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में पाण्डव-कौरवों का युद्ध और जरासंध के वध का वर्णन करने वाला बीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२०॥

एकविंशं पर्व

मल्लिं शल्यहरं कर्ममल्लजेतारमुन्नतम्। मल्लिकामोदसद्देहं वन्दे सत्कुलपालिनम् ॥१॥

अर्थ: उन मल्लिनाथ प्रभु को नमस्कार है जो शल्य को हरने वाले और कर्म-मल्ल को जीतने वाले हैं। माल्लिका के फूल के जैसा सुगंध देने वाला जिनका उत्तम शरीर है तथा जो उन्नत और सत्पुरुषों के पालक हैं ॥१॥


अथैकदा नराधीशो युधिष्ठिरमहीपतिः। भीमादिभ्रातृसंपूज्यस्तस्थौ सिंहासने मुदा ॥२॥

चामरैर्वीज्यमानः स नानानृपतिसेवितः। छत्रसंछन्नतिग्मांशु रराजात्र युधिष्ठिरः ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): एक दिन भीम आदि द्वारा पूजित युधिष्ठिर हर्ष के साथ सिंहासन पर विराजे थे। उनके ऊपर चँवर ढोरे जा रहे थे और उनकी सेवा में बहुत से नृपति उपस्थित थे। उनके ऊपर जो छत्र लग रहा था उसके द्वारा सूरज की किरणों के रुक जाने से उनकी और भी अधिक शोभा हो गई थी ॥२-३॥


कदाचिन्नारदः प्राप दिवस्तेषां च संसदम्। अभ्युत्थानादिभिः पूज्यः पाण्डवैः परमोदयैः ॥४॥

विधाय विविधां वाग्मी किंवदन्तीं विधेः सुतः। पाण्डवैः सह संप्राप तन्निशान्तं सुमनसः ॥५॥

ददर्श द्रौपदीसद्म निश्छद्मा द्युमन्दीपितम्। गवाक्षपक्षसंपन्नं नारदो नरवन्दितः ॥६॥

तत्रासनसमारूढा प्रौढशृङ्गारसंगिनी। किरीटतटसंनद्धमूर्धा सा द्रौपदी स्थिता ॥७॥

विशाले तिलकं भाले दधाना हृदये वरम्। हारं सारं च नाद्राक्षीन्नारदं सा गृहागतम् ॥८॥

अर्थ (श्लोक 4 से 8): इसी समय उनकी सभा में स्वर्ग से नारद आये। महाभाग पाण्डव उन्हें देखते ही उठ खड़े हुए और उनका उन्होंने उचित आदर किया। नारद ने पाण्डवों को इधर-उधर की विविध दन्तकथाएँ सुनाईं। इसके बाद वह सुमना पाण्डवों के साथ-साथ उनके अन्तःपुर में गये। वहाँ मनुष्य द्वारा वन्दित उन महापुरुष ने दीप्तिपूर्ण झरोखों, छज्जों वाले और मन को मुग्ध करने वाले द्रौपदी के सुंदर महल को देखा। इस समय द्रौपदी वहाँ खूब ही बढ़िया श्रृंगार किये, मस्तक पर मुकुट दिये सिंहासन पर विराजी थी। वह अपने विशाल भाल में तिलक दिये थी और हृदय में सर्वोत्तम सारभूत हार पहिने थी। उसने इस समय घर आये हुए नारद को न देख पाया और दर्पण में पड़े हुए नारद के चेहरे की देखकर भी वह न तो उठ खड़ी हुई और न उनको उसने नमस्कार ही किया। इस अपमान से नारद बड़े ही क्रुद्ध हुए और वह मस्तक धुनते तथा मन ही मन रोष करते वहाँ से उसी क्षण चले आये ॥४-८॥


मुकुरे मुखमक्ष्णैव नारदस्येक्षमाणया। अभ्युत्थानादिकं कर्म न कृतं च तया नतिः ॥९॥


अपमानादिदोषेण संक्रुद्धोऽगाद्द्विधेः सुतः। तस्माद् गृहाच्छिरो धुन्वंश्चिन्वन्नरोषं स्वमानसे ॥१०॥


बभ्राम नभसि भ्रान्तः पूत्कारमुखराननः। न क्वापि रतिमालेभे गतोऽसौ गगनार्णवम् ॥११॥

जगाम विजनं देशं सहसा च समुन्नतम्। अवादिते च नृत्यामि नारदोऽहं सदा मुदा ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 11 से 12): वह बड़बड़ाते हुए आकाश में घूमने लगे परन्तु जब उन्हें कहीं सन्तोष न मिला तब वह आकाश में दूर तक चल कर एक विशाल एकान्त में पहुँचे। वहाँ पहुँचकर वह सोचने लगे कि मैं वही न नारद हूँ जो सदा ही हर्ष का भरा बिना बाजों के ही नाचा करता हूँ, लेकिन जब कारण मिल जाता है तब


वादिते किं पुनर्वच्मि चतुरः कलहप्रियः। क्वापमानः कृतो मेऽद्यानया दुःखितोऽप्यहम् ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 9 से 13): तो मेरे आनन्द का पार ही नहीं रहता। इस द्रौपदी ने मेरा अपमान कर मुझे व्यर्थ ही कितना दुखी किया है ॥९-१३॥


दूषणं च करोम्यत्रैतस्याः सा शुद्धिमाप्य च। प्रियेण संगमासाद्य तादृशी स्यान्निरङ्कुशा ॥१४॥

परेण हारयामीमां तदेषा दुःखिनी भवेत्। तस्या हतौ च मे पापं भविता तन्न युज्यते ॥१५॥

परस्त्रीलम्पटं कंचित्पश्यंश्चोपायसंयुतः। प्रमृग्य लंपटं किंचित्तेनेमां हारयाम्यहम् ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 14 से 16): अब तो मैं जब इसका बदला ले लूँगा मुझे तभी सन्तोष होगा, मेरे इस अपमान का तभी प्रायश्चित होगा। इसके सिवा मुझे किसी तरह भी सन्तोष होने का नहीं। यह अपने स्वामी आदि प्रिय पाण्डवों का समागम पाकर ही इतनी निरंकुश हो रही है। इसे दूसरे द्वारा हरवा देकर प्रिय-वियोग में डालूँ तभी यह दुःखिनी होगी। मैं इसे मारकर भी अपना बदला ले सकता हूँ परन्तु यह घोर पाप है। इसलिए ऐसा करना मुझे उचित नहीं है। अतः यही ठीक है कि किसी लंपटी पुरुष को खोजकर इसे उसके द्वारा हरवा ही दूँ ॥१४-१६॥


हरिणा बलदेवेन वन्दितोऽहं परैर्नृपैः। सर्वेषां गुरुरेवाहं सर्वस्त्रीणां विशेषतः ॥१७॥

पश्यतास्याः सुधृष्टत्वं दुष्टत्वं च सुकष्टकृत्। अवगण्य स्थितेयं मामासने दर्पसर्पिणी ॥१८॥

यः शृङ्गाररसोऽप्यस्या वल्लभो वल्लभादपि। स शृङ्गाररसो यात्यस्या यथाहां तथा यते ॥१९॥

तदा मनोरथाः सर्वे सेत्स्यन्ति मम निश्चितम्। उत्सारयामि सौभाग्यमहमस्या यदा ननु ॥२०॥

अपमानभवं दुःखं तदा यास्यति मे हृदः। यदास्या हरणं दुःखं नयनाभ्यां नभोगतः ॥२१॥

चिन्तयित्वेति कोपेन स चचाल ऋषिर्नभः। परस्त्रीलंपटं कंचित्पश्यंश्चोपायसंयुतः ॥२२॥

बभ्राम निखिलां क्षोणीं क्षिप्रं क्षीणमना ऋषिः। तादृक्षं लोकते यावन्नृपं नाभूत्तदा सुखी ॥२३॥

चिन्तयन्सोऽन्यनारीषु रतं नरपमुन्नतम्। जगाम धातकीखण्डं नानाखण्डसमुन्नतम् ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 17 से 24): नारायण, बलभद्र तथा और-और सब राजे महाराजे तो मेरी वन्दना करें, मैं सबका गुरु और विशेष कर स्त्री-जाति का गुरु, उस मेरे साथ इसकी यह कष्टदायी धृष्टता तथा दुष्टता जो गर्व के आवेश में इसने मुझे कुछ भी न गिना और आप मजे के साथ आसन पर बैठी रही। बात तो यह है कि मैं भी अब कोई ऐसा ही प्रयत्न करूँ कि जिसके द्वारा जो शृंगार-रस इसे इतना प्रिय है वह सब इसका छूट जाय। यह निश्चय है कि जब मैं इसके सौभाग्य को दूर कर दूँगा-मेरे मनोरथ भी तभी पूर्ण होंगे। मुझे जो अपमान का दुख है वह मेरे हृदय से तभी निकलेगा जबकि मैं आकाश में होकर इसके हरे जाने को आँखों देखूँगा। मन ही मन यह सब सोचकर कोप के भरे और उपाय की ताक में लगे नारद ऋषि किसी परस्त्री-रत राजा को देखते हुए आकाश मार्ग होकर चले। खिन्नचित्त हुए नारद ने बहुत जल्दी सारी ही पृथिवी घूम डाली। उन्हें कोई परस्त्रीरत राजा न देख पड़ा। वह बड़े दुखी हुए। सब जगह घूम फिर आये और जब जम्बूद्वीप भर में भी उन्हें कोई ऐसा राजा नजर न आया तब वह परस्त्रीगामी राजा की खोज में धातकीखण्ड द्वीप में गये ॥१७-२४॥


योजनानां चतुर्लक्षैर्विस्तृतं सुश्रुतं श्रुतौ।
मन्दरः सुन्दरः पूर्वस्तत्रास्ति सुमनोहरः ॥२५॥

चतुर्भिरधिकाशीतिसहस्रैर्योजनैर्महान्।
समुत्तुङ्गश्चतुर्भिश्च वनैर्भाति भूधरः ॥२६॥

तस्य दक्षिणदिग्भागे भारतं भुवि विश्रुतम्।
षट्खण्डमण्डितं भाति भाभारभूपभूषितम् ॥२७॥

मध्येक्षेत्रं पुरी सारामरकङ्का सुखाकरा।
भूपीठं भूषयन्ती च सुभगा भवनोत्तमा ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 25 से 28): यह द्वीप विविध खण्डों द्वारा समुन्नत है। चार लाख योजन का इसका विस्तार है। इसकी पूर्व दिशा में एक मंदर नाम पहाड़ है जो बहुत अधिक मनोहर है, चौरासी हजार योजन ऊँचा है और जिस पर चार विशाल वन हैं। उन वनों से उसकी और भी अधिक शोभा है। इसकी दाहिनी बाजू में जगत् विख्यात, अत्यन्त शोभा-सम्पन्न और छह खण्डों द्वारा मंडित भरत नाम क्षेत्र है। इस क्षेत्र के बीचों-बीच अमरकंका नाम की एक पुरी है जो कि भूमण्डल की शोभा है, सुहावनी है, संसार भर में उत्तम है, सार है और सुख की खान हैं ॥२५-२८॥


तां पाति परमः प्रीतः पद्मनाभमहीपतिः।
पद्मनाभ इवोत्तुङ्ग इन्दिरामन्दिरं सदा ॥२९॥

दोर्दण्डखण्डितारातिमण्डलो महिपैः स्तुतः।
अवद्योद्धुरविद्याभिः सुविद्यः परमोदयः ॥३०॥

विपुलामलसद्वक्षाः क्षितिरक्षाविचक्षणः।
अलक्ष्यस्तु विपक्षाक्षै रूपनिर्जितमन्मथः ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 29 से 31): इसका रक्षक हैं पद्मनाभ नामक महीपति। यह राजा इस नगरी का बड़ी प्रीति के साथ पालना करता है, जिस तरह कि उन्नत पद्मनाभ-कृष्ण सदा काल ही लक्ष्मी के मन्दिर (महल) की रक्षा-पालना करता है, उसे आश्रय दिये रहता है। इसने अपने बाहुदंडों द्वारा वैरियों को दण्डित किया था, अतः सब राजे इसकी स्तुति करते हैं। यह सब पाप-विद्याओं का ज्ञाता विद्वान् था। विशाल और निर्मल इसका वक्षस्थल था। पृथ्वी की रक्षा करने में यह बड़ा चतुर था। यह कभी भी शत्रु का लक्ष्य न होता था और रूप के द्वारा यह कामदेव को जीतता था ॥२९-३०॥


अथ ब्रह्मसुतः पट्टे तस्या रूपमलेखयत्।
रूपनिर्जितसर्वस्त्रीसमूहं मोहकारकम् ॥३२॥

नारदो भूमिपालाय तद्रूपं पट्टसंगतम्।
दर्शयामास संदीप्तं दीप्तिनिर्जितभास्करम् ॥३३॥

क्षितीशो वीक्ष्य पट्टस्थां योषां तां कनकोज्ज्वलाम्।
हारिहारसुवक्षोजामचिन्तयदति स्फुटम् ॥३४॥

केयं शुचिः शची स्वर्गात्समायाताब्जसद्मतः।
पद्माथ रोहिणी प्राप्ता सूर्यपत्नी भुवं गता ॥३५॥

किन्नरी खचरी वाऽहो कामपत्नी गुणात्मिका।
इत्यातर्क्य विकल्पेनेयं किं मोहनवल्लिका ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 32 से 36): उधर नारद ने यह किया कि एक चित्रपट्ट पर अपनी सुन्दरता के द्वारा सारे स्त्री समूह को जीतने वाला और बड़े अचम्भे में डालने वाला द्रौपदी का सुंदर चित्र खींचा और ले जाकर अपनी दीप्ति से सूरज को जीतने वाले उस चित्र को उसने पद्मनाभ राजा को भेंट किया। उस चित्र में सोने की जैसी उज्ज्वल और सुंदर हार द्वारा शोभित कुचों वाली द्रौपदी को देखकर वह मन ही मन विचार करने लगा कि यह कौन है? स्वर्ग से आई हुई शची है या अपना महल छोड़कर लक्ष्मी ही आ गई है। यह रोहिणी है या सूरज की पत्नी ही पृथ्वी पर आ पहुँची है, अथवा किन्नरी या खेचरी तो नहीं हैं, एवं गुणशालिनी यह काम की पत्नी रति तो नहीं हैं। यह कौन है-किसका यह चित्र है। यों नाना विकल्प


चिन्तयन्निति भूमीशो मुमूर्च्छ मोहसंगतः। तदा हाहारवैर्युक्ता नृपास्तत्र समागताः ॥३७॥

अर्थ (श्लोक 31 से 37): कर उसने बहुत विचार किया, पर वह उसके विषय में कुछ भी निश्चय नहीं कर सका कि यह मोहनवल्ली कौन है, इस तरह का विचार करता-करता ही वह मोह-वश होकर मूर्च्छित हो गया। उसकी यह दशा देख महल के सब लोग हाहाकार करते हुए वहाँ दौड़े आये ॥३१-३७॥


कथं कथमपि प्राप्तश्चेतनां चिन्तनोद्धुरः। विधातृपुत्रमानम्याप्राक्षीत्पृथ्वीश्वरस्तदा ॥३८॥

केयं पट्टगता तात वर्णिनीवरवर्णिनी। सविभ्रमा महारूपा विभ्रमभ्रूभ्रमानना ॥३९॥

यथोक्तं भण भव्येश मम निश्चयकारणम्। तदागदीद्विधेः सूनुः समाकर्णय भूपते ॥४०॥

शुश्रूषा तव चेदस्ति पट्टरूपस्य पार्थिव। वदामि तर्हि ते चित्तं सुस्थितं च यतो भवेत् ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 38 से 41): उन्होंने तुरंत शीतोपचार आदि उपाय किये तब चिंता से पीड़ित पद्मनाभ कुछ होश में आया। होश में आते ही नारद को देख उसने उन्हें प्रणाम कर पूछा कि-प्रभो! यह उत्तम स्त्री कौन है कि जिस महान् रूप वाली, सुविभ्रमा और विभ्रम-पूर्ण भ्रूयुक्त आनन वाली का यह चित्र है। भव्येश! सब बातें ठीक-ठीक कहिए, ताकि मुझे पूरा-पूरा निश्चय हो जाय। उत्तर में नारद ने कहा कि राजन्! यदि आपको इस अपूर्व सुंदरी के विषय में जिसका कि यह चित्र है, जानने की इच्छा हो तो जरा ध्यान देकर सुनिए। मैं उसका सब वृत्तान्त कहता हूँ। निश्चय है कि उसको सुनने से आपका चित्त स्थिर हो जायेगा ॥३८-४१॥


मध्येद्वीपं महान्द्वीपो जम्बूनामा मनोहरः। वृत्तेन निर्जितश्चन्द्रस्तथा योगी च येन वै ॥४२॥

तन्मध्ये मन्दरो दीप्तः सुदर्शनसमाह्वयः। लक्षयोजनतुङ्गाङ्गो भाति भूतिलकोपमः ॥४३॥

तदवाच्यां वरं क्षेत्रं भारतं भुवनोत्तमम्। चापाकारं कलाकीर्णं भाति षट्खण्डशोभितम् ॥४४॥

कुरुजाङ्गलनामास्ति नीवृत्तत्र मनोहरः। कुरुभूमिसमो भोगैर्भ्राजिष्णुर्भूरिभूपतिः ॥४५॥

हस्तिनागपुरं तत्र हस्तिनां बृंहितैर्वरम्। सुरापगापरिक्लृप्तपरिखं खलु विद्यते ॥४६॥

युधिष्ठिराभिधस्तत्र भूपो भूरिभयापहः। समृद्धो धरणीं धर्तुं विद्यते कौरवाग्रणीः ॥४७॥

पार्थः सार्थकनामाभूत्तद्भ्राता भुवि विश्रुतः। तत्पत्नी द्रौपदी पट्टे लिखितेयं सुरूपिणी ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 42 से 48): सब द्वीपों के ठीक बीच में एक जम्बूद्वीप नामक द्वीप है जो कि बड़ा ही मनोहर और महान् है और जिसने कि अपने वृत्त (गोलाकार) द्वारा चंद्रमा और योगियों को भी जीत लिया है। (योगियों के पक्ष में वृत्त का अर्थ चारित्र समझना चाहिए।) इसके बीच में दीप्त सुदर्शन नाम मंदर (पहाड़) हैं जो लाख योजन का ऊँचा है और पृथ्वी का तिलक जैसा है। इसके दक्षिण ओर चढ़े हुए धनुष के आकार का कलाओं से पूर्ण, छह खण्डों में विभक्त और संसार भर में उत्तम भरत नाम क्षेत्र है। इसमें एक कुरुजांगल नाम देश है जो कि बहुत सुंदर है, कुरुभूमि तुल्य देशों से परिपूर्ण है, अपनी बढ़ी-चढ़ी विभूति द्वारा सुशोभित है। इस देश में हाथियों के समूह द्वारा सर्वोत्तम हस्तिनापुर नाम नगर है। जिसकी खाई सदा ही गंगा के जल द्वारा भरी रहती है। हस्तिनापुर के राजा युधिष्ठिर हैं। वह कौरवग्रणी हैं और पृथ्वी को धारण करने के लिए पूर्ण समृद्ध हैं। संसार-प्रसिद्ध सार्थक नामधारी पार्थ उनका एक भाई है। उसकी पत्नी का नाम है द्रौपदी। बस, इस चित्र में लिखा हुआ यह उसी सुरूपिणी का रूप है ॥४२-४८॥


रामासुखसमीहा चेत्तवैनां कुरु हृद्गताम्।
विनानया प्रभो विद्धि जीवितं तेऽप्यजीवितम् ॥४९॥

तद्रूपं च वरे पट्टे विद्युत्कीर्णा सुकर्णभृत्।
तुभ्यं यद्रोचते भूप तत्कुरुष्व न चान्यथा ॥५०॥

इत्युक्त्वास्मिन्गते व्योम्नि तद्रूपाहतमानसः।
तत्कामिनीं स्मरंश्चित्ते क्षणं दुःखी नृपोऽभवत् ॥५१॥

वनमित्वा तदा भूपो मन्त्राराधनतत्परः।
संगमाख्यं सुरं शीघ्रं साधयामास संगदम् ॥५२॥

साधितः संगमः प्राप्तो नृपं प्रणयसंगतम्।
प्राह देहि ममादेशं त्वदिष्टं हृष्टिकारकम् ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 49 से 53): सच कहता हूँ कि यदि आपको संसार का सार सुख भोगने की इच्छा हो तो आप इस स्त्रीरत्न को हस्तगत कीजिए। राजन्! इसके बिना पाये आप अपने जीवन को व्यर्थ ही समझिए। अब आपको जो रुचे वही कीजिए। इतना कहकर नारद तो आकाशमार्ग द्वारा चले गये और इधर-उधर राजा द्रौपदी के रूप द्वारा चित्त के हरे जाने के कारण उसको याद करता हुआ बड़ा भारी दुखी हुआ। यहाँ तक कि उसे उसके मिले बिना चैन ही नहीं पड़ने लगा। अन्त में उसके प्राप्ति का कोई उपाय न देख वह वन में गया और वहाँ मंत्र की आराधना में चित्त देकर उसने बहुत जल्दी एक गदाधारी संगम नाम सुर को साध लिया। संगम ने आकर, प्रणाम कर कहा कि देव, मुझे अपनी उस इष्ट-सिद्धि की आज्ञा दीजिए जिसके द्वारा आपका चित्त प्रफुल्ल हो, आप खुश हों ॥४९-५३॥


तदाभाणीन्नृपस्तुष्टो निर्जराय मानिनीम्।
द्रौपदीं रूपसंपन्नां संप्राप्तपरमोदयाम् ॥५४॥

तन्निशम्य सुरः शीघ्रं सानुरागश्च कार्यकृत्।
चचाल चलचित्तात्मा संचरन्नागनाङ्गणम् ॥५५॥

द्विलक्षयोजनव्यापिसागरं सत्वरं सुरः।
जगामोल्लङ्घ्य निर्विघ्नो हस्तिनागपुरं परम् ॥५६॥

निशायां सदनं तस्याः प्रविश्य संगमः सुरः।
साक्षाल्लक्ष्मीमिव क्षिप्रं सुप्तां जह्रेऽर्जुनाङ्गनाम् ॥५७॥

हृत्वा सुरः समानीय द्रौपदीं स्वापसंयुताम्।
तदङ्गोद्यानसद्गेहे मुमोच मतिमोहिताम् ॥५८॥

निद्रावशादजानन्तीं हेयाहेयं कथंचन।
सशय्या तत्र सा सुप्ता प्रातःपर्यन्तमास्थिता ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 54 से 59): तब राजा ने सन्तुष्ट होकर उससे कहा कि, देव, परमोदयशाली, अनुपम रूप-सम्पन्न और मानिनी द्रौपदी की लाकर मुझसे मिला दो। बस, मेरी यही कामना है और इसलिए ही मैंने तुम्हें कष्ट दिया है। राजा के वचन सुनकर अनुराग का भरा कार्य-कुशल वह देव आकाश-मार्ग द्वारा बहुत जल्दी दो लाख योजन वाले समुद्र को बात ही बात में ही लाँघकर, बिना किसी रोकटोक के हस्तिनापुर पहुँच गया। वहाँ वह रात में द्रौपदी के महल में गया और उसने सोई हुई साक्षात् लक्ष्मी जैसी द्रौपदी की हर लाकर, सोई हुई अवस्था में ही, पद्मनाभ के उद्यान के एक सुंदर महल में छोड़ दिया। नींद के वश हुई द्रौपदी को इस समय हेय-उपादेय का कुछ भी भान न था-वह वहाँ शय्या पर पड़ी हुई प्रातःकाल तक बराबर सोती ही रही ॥५४-५९॥


पद्मनाभः सुरेणापि विज्ञापितस्तदागमः।
प्रबुद्धः पटुधीः प्राप तस्या अभ्यर्णमादरात् ॥६०॥

निद्राक्रान्तां स आलोक्य कौमुदीं कनकोज्ज्वलाम्।
पीनस्तनीं सुजघनां जहर्षेन्दुसमाननाम् ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 60 से 61): इसके बाद ही उसके हर ले आने की बात की सूचना देव ने पद्मनाभ को दी। वह सहसा जागकर और अपने को संभाल कर बड़ी सावधानी के साथ आदर का भरा द्रौपदी के पास आया। वह उस सोने जैसी उज्ज्वल, स्थूल और कठिन कुचों वाली और सुन्दर जाँघों द्वारा सुशोभित


बभाण भूपतिर्भक्तो भद्रे तु रजनी गता। प्रभातसमयो जातः प्रबुद्धा भव भामिनि ॥६२॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वेगेनालोकय त्वं सुलोचने। वद वाणीं विशेषेण विश्वविज्ञानपारगे ॥६३॥

इत्थमुत्थापिता वाक्यैर्मधुरैः सुसुधोपमैः। त्रस्तैणनयना बाला पश्यति स्म दिशो दश ॥६४॥

कोऽयं देशस्तु को वक्ति एष कः पुरतः स्थितः। किमुद्यानमिदं गेहे वेति चिन्तां तु सा गता ॥६५॥

अयं तु निश्चितं स्वप्नो न भ्रान्तिर्विद्यते मम। इति स्ववक्त्र माच्छाद्य सुप्ता सा मोलितेक्षणा ॥६६॥

भूपस्तन्मानसं ज्ञात्वा जगाद मदनाहतः। कमलाक्षि निरीक्षस्व नायं स्वप्नः प्रहर्षिणि ॥६७॥

नेयं निद्रेति सा मत्वा प्रेक्षमाणा दिशो दश। ददर्श किङ्किणीयुक्तं व्योमयानं मनोहरम् ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 60 से 68): चन्द्रवदनी द्रौपदी की नींद से भरी हुई छवि की देखकर बड़ा खुश हुआ। वह प्रेम के आवेश में आकर बोला कि भद्रे! रात्रि चली गई और सबेरा हो गया। अतः भामिनि, अब नींद को छोड़ो और उठो। सुलोचने, कला-कौशल में पार को प्राप्त हुई देवि, अपनी सुंदर वाणी बोलो। पद्मनाभ ने इस प्रकार अमृत-तुल्य सुमधुर वाक्यों द्वारा जब उसे जगाया तब आँखें खोलते ही वह भयभीत मृगी की भाँति व्याकुल नेत्रों द्वारा सब दिशाओं में देखने लगी। वह बड़ी चिन्ता में पड़ गई कि यह देश कौन है, यह मुझसे कौन बातचीत कर रहा है, यह जो सामने खड़ा है कौन है, यह उद्यान किसका है और यह महल किसका है। जान पड़ता है यह सब स्वप्न है, साक्षात् में ऐसा दृश्य कहाँ से आ सकता है। यह सोचकर, वह आँखें मींच और मुँह ढँक कर फिर सो रही। उसकी यह हालत देख कामपीड़ित राजा उसके मन की बात जानकर बोला कि कमलनयनी देवि! देखिए यह स्वप्न नहीं है। प्रहर्षिणि, जिसे कि तुम स्वप्न समझ रही हो वह सब सच्चा दृश्य है। उसके वचन सुनकर द्रौपदी को जान पड़ा कि वह स्वप्न नहीं देख रही हैं। उसने चारों दिशाओं में दृष्टि डाली तो उसे छोटी-छोटी घंटियों से युक्त एक सुंदर शोभायमान विमान दिखाई दिया ॥६०-६८॥


परस्त्रीलम्पटो लोभी कपटी विकटः पटुः। पद्मनाभो जजल्पेति भामिनि शृणु मद्वचः ॥६९॥

द्वीपोऽयं धातकीखण्डश्चतुलक्षसुयोजनैः। विस्तीर्णो वेष्टितो विष्वाक्कालोदकपयोधिना ॥७०॥

विद्धीमां देवकङ्काख्यां पुरीं ख्यातां वरां शुभैः। स्वर्णिर्गृहैः समृद्धीप्तां मणिमुक्ताफलाञ्चिताम् ॥७१॥

तत्पतिः पद्मनाभाख्यो वैरिवारविनाशकः। अहं पराक्रमाक्रान्तदिक्छक्रः शक्रसंनिभः ॥७२॥

भो भामिनि भवत्यर्थे भयत्रस्तेन चेतसा। मया कष्टेन वेगेन सुरः संसाधितो हठात् ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 69 से 73): इसके बाद परस्त्री-लंपट, लोभी, कपटी और पटु पद्मनाभ द्रौपदी से बोला कि भामिनि, जिस देश में इस समय तुम हो वह धातकीखण्ड नाम द्वीप है। इसका चार लाख योजन का विस्तार है और यह सब तरफ से कालोदधि समुद्र द्वारा घिरा हुआ है और यह सोने की कान्ति युक्त गृहों द्वारा सुदीप्त, मणि-मुक्ताफलों द्वारा भरीपुरी प्रसिद्ध अमरकंका नाम नगरी है। इसका स्वामी मैं पद्मनाभ राजा हूँ, जिसने कि अपने पराक्रम से सब दिशाओं को वश कर लिया है और शत्रुओं को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया है तथा जो इन्द्र के तुल्य है। भामिनि, तुम्हारे लिए मैंने बड़ा कष्ट उठाकर हठ-पूर्वक एक देवता को साधा और उसके द्वारा तुम्हें बुला मँगाया। तुम्हारे बिना मुझे खाना-पीना कुछ


त्वां विना भोजनं भव्यं भव्ये मे रोचते न हि। विरहेण तवात्यर्थं मृतावस्थामितोऽस्म्यहम् ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 69 से 74): भी अच्छा नहीं लगता था। देखो तुम्हारे विरह में मैं मरे के जैसा हो गया हूँ ॥६९-७४॥


सुरेण तेन वेगेन त्वमानाय्य सुखं स्थितः। प्रसन्ना भव भो भीरु भज भोगान्मया समम् ॥७५॥

देशं कोशं पुरं रत्नं चामरातपवारणे। तुरंगं दन्तिनं हर्म्यं गृहाण त्वं तवेप्सितम् ॥७६॥

विरहाग्निं परं लग्नं विध्वापय विचक्षणे। भोगोदकेन वेगेन मम मर्मणि दाहकम् ॥७७॥

सानुकूलां परां दृष्टिं कुरु मन्मथसंगरे। विषादं भज मा भव्ये मया सत्रं सुखं भज ॥७८॥

वल्लभा भव भूभर्तुर्भव्यभावमुपागता। मम मानसजं दुःखं हरन्ती सुखदायिके ॥७९॥

अर्थ (श्लोक 75 से 79): उस देवता ने बड़ी कृपा की जो कि वह तुम्हें ले आया। भीरु, अब तुम भय मत करो किन्तु प्रसन्न होकर मेरे साथ भोग विलास करो और देश, खजाना, पुर, रत्न, हाथी-घोड़े, महल वगैरह जो कुछ तुम्हें अच्छा जान पड़े उसे ग्रहण कर अपना मन बहलाओ-आनंद करो। सुंदरि, मेरे हृदय में जो विरह की आग जल रही है उसे बुझाओ-शान्त करो। विरह की आग द्वारा जलते हुए मेरे मर्म-स्थल पर भोगरूपी जल सींचो। हे कामदेव की प्रतिमा रूपी देवी, तुम विषाद छोड़कर मेरी तरफ सीधी दृष्टि डालो और भव्ये, मेरे साथ सुख-भोग भोगो। हे सुख देने वाली महादेवी, तुम मेरे मन की व्यथा को दूर करने वाली राज-रानी बनो और भव्य भाव-सीधे-सीधे स्वभाव का परिचय दो ॥७५-७९॥


निशम्येति शुचाक्रान्ता कम्पिताङ्गी स्फुटद्दृढा। रुरोद सेति दुःखार्ता बाष्पव्याप्तिमदानना ॥८०॥

हा युधिष्ठिर हा ज्येष्ठ हा विशिष्टं सुधर्मधीः। हा पावने पवित्रोऽसि वीराणामग्रणीर्वरः ॥८१॥

हा पार्थ नाथ समरे समर्थो दस्युशासनः। दुःखकाले समाक्रान्ते को मां रक्षति दुःखिनीम् ॥८२॥

अर्थ (श्लोक 80 से 82): पद्मनाभ के ऐसे वचनों की सुनकर शोक में निमग्न हुई वह सती थर-थर काँपने लगी और जब वह अपने हृदय के वेग को न रोक सकी तब एकदम रो पड़ी। उसकी आँखों से आँसू बह चले। गरज यह कि वह पद्मनाभ की चापलूसी की बातों से बड़ी खिन्न हुई। वह युधिष्ठिर आदि को याद कर विलाप करने लगी कि हा पूज्य युधिष्ठिर, तुम धर्म-बुद्धि के धारक हो, हा भीम, तुम बड़े वीर और पवित्र कहे जाते हो तथा हा रण में सामर्थ्य दिखाने वाले और शत्रुओं को वश करने वाले स्वामी अर्जुन, देखते नहीं कि मुझ पर यह कैसा दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। बतलाओ यहाँ मेरी कौन रक्षा करेगा ॥८०-८२॥


विना भवद्भिरित्यर्थं किं सुखं मम सांप्रतम्। किंवदन्तीमिमां तत्र को नेष्यति मम प्रियः ॥८३॥

सुरेणाहं हडिं नीता प्रसुप्ता भुवि विश्रुता। इत्याक्रन्दं प्रकुर्वाणा संतस्थे द्रुपदात्मजा ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 83 से 84): तुम ऐसे अचेत-सावधान-रहे जो तुझे मेरे हरे जाने की भी खबर न हुई। यही तुम्हारी वीरता है। बतलाओ अब मेरी क्या गति होगी? परन्तु इसमें तुम्हारा भी क्या दोष है? तुम्हें मेरे हरे जाने की खबर ही नहीं है और जब तक तुमको मेरी खबर न मिले तब तक भला तुम प्रयत्न ही क्या कर सकते हैं। हा, देवता ने मुझे सोई अवस्था में हर लिया और लाकर यहाँ छोड़ दिया। उसने मेरे साथ बड़ा अनुचित काम किया है-उसे ऐसा करना उचित नहीं था। इस तरह विलाप करती द्रौपदी तो रंज


स बभाण महायुक्त्या सुश्रोणि शृणु सांप्रतम्।
शोकं हित्वा रमस्वाशु मया सार्धं सुखाप्तये ॥८५॥

त्यक्त्वा धनंजयस्याशां दत्त्वा तस्मै जलाञ्जलिम्।
विषादं च विमुच्याशु भोगे रक्ता भव प्रिये ॥८६॥

अर्थ (श्लोक 83 से 86): कर रही थी और पद्मनाभ अपनी बात सोच रहा था। बाद वह द्रौपदी से बोला कि सुश्रोणि, तुम शोक काहे को करती हो। यहाँ तुम्हें कष्ट ही किस बात का है। तुम शोक छोड़कर आनन्द से रहो और सुख की प्राप्ति के लिए मेरे साथ रमण करो। मेरे साथ रमने से तुम्हें अपूर्व सुख होगा। प्रिये! धनंजय की आशा छोड़ो और विषाद त्याग कर भोगों का आनन्द लो ॥८३-८६॥


तदा निशम्य पाञ्चाली शीलभङ्गोद्धुरं वचः।
अचिन्तयन्निजे चित्ते चिन्तासंचयसंगता ॥८७॥

शीलरत्नमहो नृणां भूषणं शीलमुत्तमम्।
शीलाद्दासत्वमायान्ति सुरासुरनरेश्वराः ॥८८॥

शीलात्सुमुज्ज्वलः कायः शीलेन विपुलं कुलम्।
शीलेन जायते नाकः शीलं चक्रिपदप्रदम् ॥८९॥

शीलेन शोभते सद्यः सर्वसीमन्तिनीगणः।
शीलेन विपुलो वह्निः सीतावाच्च जलायते ॥९०॥

सुलोचना यतो याता शीलतः सुरनिम्नगाम्।
समुत्तीर्य तथान्यासां शीलात्तीरं स्थलायते ॥९१॥

शीलतो जलधिर्नृणां क्षणतो गोष्पदायते।
श्रीपालकामिनीवद्वै शीलं सर्वसुखाकरम् ॥९२॥

शीलयुक्तो मृतः प्राणी स सुखी स्याद् भवे भवे।
न जहामि वरं शीलं मृत्यावहमुपस्थिते ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 87 से 93): पद्मनाभ के शील की भंग करने वाले इन वचनों को सुनकर द्रौपदी ने सोचा कि मनुष्यों का सच्चा गहना शील-रूपी रत्न ही है। यही एक ऐसा मंत्र है कि जिसकी वजह से सुर-असुर और नरेश्वर भी उसके दास बन जाते हैं। शील से ही उज्ज्वल, सुंदर शरीर मिलता है-उच्च कुल में जन्म होता है, स्वर्ग की प्राप्ति होती है और उसी से चक्रवर्ती का पद मिलता है। शील के द्वारा ही स्त्री जाति की शोभा होती है और उसी के प्रभाव से जलती हुई आग भी पानी हो जाती है, जैसी कि सीता के लिए हुई थी। शील के प्रभाव से जिस तरह सुलोचना के लिए गंगा जैसी नदी भी थल हो गई, उसी तरह और भी जो जो स्त्री-जन शील का परिपालन करेंगी उनके लिए भी जल थल हो जायेगा। अधिक कहाँ तक कहा जाये यह शील ऐसा है कि इसका पालन करने से जीवों को सब सुख प्राप्त होते हैं- उनके लिए बड़ा भारी समुद्र भी क्षणभर में गाय के खुर तुल्य छोटा-सा गढ़ा हो जाता है। इस सम्बन्ध में श्रीपाल की स्त्री मैनासुंदरी स्मरणीय उदाहरण है। शीलव्रत का पालन करने में प्राण भी चले जायें तो भव-भव में सुख प्राप्त होता है। अतः प्राण जायें तो भी मैं किसी तरह शील को नहीं छोड़ूँगी। उसे प्राणों के बदले में रखूँगी ॥८७-९३॥


समुच्छ्वास्य विकल्प्येति जजल्प द्रुपदात्मजा।
शृणु त्वं प्रकटाः पञ्च पाण्डवा भ्रातरो भृशम् ॥९४॥

प्रचण्डाखण्डकोदण्डा जिताखण्डलमण्डलाः।
कम्पन्ते यत्प्रभावेन निर्जराः सज्जमानसाः ॥९५॥

अर्थ (श्लोक 94 से 95): यह सब सोचकर वह साहस के साथ पद्मनाभ से बोली-तुम नहीं जानते कि किससे ऐसी बेहूदी बातें कह रहे हो। जानते ही संसार प्रसिद्ध पाँच पाण्डव मेरे रक्षक हैं, वे अखण्ड धनुर्धर हैं, इन्द्रों के भी विजेता हैं। उनके प्रभाव से दृढ़-चित्त देवता भी थर-थर काँपते हैं। उनके रहते किसी शत्रु की ताकत नहीं जो उन्हें युद्ध में विचरते जरा भी रोक सके वा उनके आत्मीय को कष्ट दे सके।


संचरन्तो रणे नूनमनिवार्या विपक्षकैः।
ये घ्नन्ति घनघातेन वैरिणो विगतालसाः ॥९६॥

पुनर्यद्‌भ्रातरौ कृष्णबलौ त्रिखण्डनायकौ।
सुरासुरनरैः पूज्यौ तौ स्तो भारतभूषणौ ॥९७॥

कीचकेन समीहा मे कृता शीलविलुप्तये।
हतः स भ्रातृभिः सत्रं शतसंख्यैः सुपाण्डवैः ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 94 से 98): सच कहती हूँ कि वे ऐसे वीर हैं कि अपने सघन आघातों द्वारा बैरियों को बात ही बात में नष्टकर डालते हैं। इतने पर भी तीन खण्ड के स्वामी, सुर-असुरों द्वारा पूजित और भारत के भूषण कृष्ण-बलदेव जैसे जिसके भाई हैं उसी द्रौपदी के न साथ तुम्हारा यह बर्ताव है। तुम्हारी तरह ही एक बार कीचक ने मेरे शील को बिगाड़ने की चेष्टा की थी। फिर मालूम है कि उसे उसके सौ भाइयों के साथ प्रचण्ड पाण्डवों ने एकदम मार डाला था ॥९४-९८॥


पुनस्त्वं मोहतो मानिन्मा मुह्यातात्मवानसे।
नागीव विषवल्लीव वृथानीता त्वयाप्यहम् ॥९९॥

मासमेकं ममाशां त्वं मुक्त्वा तिष्ठ स्थिरं नृप।
एतावत्कालपर्यन्तं यद्भाव्यं तद्भविष्यति ॥१००॥

कथं कथमपि प्रायस्ते नायास्यन्ति पाण्डवाः।
मासमध्ये ततस्तुभ्यं रोचते यच्च तत्कुरु ॥१०१॥

इत्युक्ते भूपतिस्तस्थौ चिन्तयन्निति चेतसि।
रत्नाकरं समुत्तीर्य ते क्वायास्यन्ति पाण्डवाः ॥१०२॥

ततः सा निरलङ्कारा पानाहारविवर्जिनी।
शिरोवेणीं प्रबन्ध्यासौ तस्थौ चित्रगतेव वै ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 99 से 103): हे मानी राजा, तुमने जो कुछ किया सो तो किया, पर अब अपनी पाप-वासना त्याग दो। देखो, तुमने एक नागिन को या यों कहो कि विष की बेल को अपने घर में बुलाया है। इसका परिणाम बहुत बुरा होगा। तुम मेरी आशा छोड़कर सुख से रहो। इतने पर भी तुम्हें मेरे कहने का विश्वास न हो तो एक महीना ठहरो। तब तक बहुत करके पाण्डव भी यहाँ आ जायेंगे। तब तुम्हें अच्छा जान पड़े सो करना। द्रौपदी के वचन सुनकर पद्मनाभ ने मन ही मन यह सोचा कि यह कहती तो है, पर इतने विशाल रत्नाकर को पार कर यहाँ पाण्डव आ ही कैसे सकते हैं? इसके बाद राजा चुप रहा और द्रौपदी आहार-पानी, वेषभूषा आदि सब छोड़ चित्र में लिखी हुई काठ की पुतली की भाँति हो रही ॥९९-१०३॥


तदा गजपुरे प्रातः प्रचण्डैः पाण्डुनन्दनैः।
निरीक्षितापि नो दृष्टा पाञ्चाली परमोदया ॥१०४॥

अर्थ: उधर हस्तिनापुर में सबेरा हुआ। तब पाण्डवों को जान पड़ा के सर्वोत्तमा द्रौपदी महल में नहीं है-वह शत्रु द्वारा हरी गई। उसे बहुत देखा-भाला, पर कहीं उसका पता न पाया-उन्होंने उसकी भरसक खोज की, पर उसे कहीं भी न देखा ॥१०४॥


तस्या शुद्धिर्न कुत्रापि लब्धा संशोधिता ध्रुवम्।
पुनः पुनर्नरधीशैर्न दृष्टालोकिताप्यलम् ॥१०५॥

तदा द्वारावतीपुर्यां केनापि कथितं हि तत्।
चक्रिणे प्रणतिं कृत्वा द्रौपदीहरणं पुनः ॥१०६॥

क्षणं दुःखाकुलस्तस्थौ केशवो विषमो रणे।
पुनः क्रुद्धः स युद्धस्य दापयामास दुन्दुभिम् ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 105 से 107): इसी समय एक अपरिचित जनने द्वारावती जाकर कृष्ण को प्रणाम कर उनसे द्रौपदी के हरे जाने का सारा हाल कहा। जिसे सुनकर रण-विषम कृष्ण को बहुत दुख हुआ। उसका परिणाम यह निकला कि उन्होंने क्रोध में आकर युद्ध की घोषणा कर दी ॥१०५-१०७॥


तदा घोटकसंघाता गजा गर्जनतत्पराः । रथाश्चीत्काररावाढ्याश्चेलुश्चञ्चलचक्रिणः ॥१०८॥

उत्खातखड्गसन्नद्धाः कुन्तकादण्डपाणयः। पदातयस्ततस्तूर्णं प्रपेदिरे नृपाङ्गणम् ॥१०९॥

चतुरङ्गबलेनासौ यावद्यातुं समुद्ययौ। तावता नारदो यातोऽमरकङ्कापुरीं प्रति ॥११०॥

तत्र सा तेन संदृष्टा बाष्पौघप्लुतसन्मुखा। तप्तजांबूनदाभासा मुक्तकेशी कृशोदरी ॥१११॥

कपोलन्यस्तसद्धस्ता प्रतिमेव क्रियातिगा। रतिर्वा कामनिर्मुक्ता शची वाशक्रवर्जिता ॥११२॥

श्रियं निर्जित्य रूपेण स्थिता किंवा स्थिरासना। इति संचिन्त्य दुश्चिन्तो नारदश्चेत्यचिन्तयत् ॥११३॥

अर्थ (श्लोक 108 से 113): कृष्ण की आज्ञा पाते ही उनके हींसते हुए घोड़े, गर्जते हुए हाथी और चीत्कार करते हुए रथ चले। पयादे नंगी तलवारें, भाला, धनुष वगैरह हाथ में लिये हुए राज-आँगन में आये। इधर जब तक कृष्ण चतुरंग सेना ले चलने को तैयार हुए तब तक उधर नारद अमरकंकापुरी पहुँचे। वहाँ उन्होंने तपे सोने के जैसी प्रभावती कृशोदरी द्रौपदी को बाल बिखरे और आँसुओं से मुँह भीगे हुए देखा। वह मारे रंज के अपने हाथ पर कपोल रखे बैठी थी। ऐसी हालत में उसे देखकर यह जान पड़ता था मानों हलन-चलन आदि क्रिया रहित प्रतिमा ही है अथवा काम से बिछुड़ी हुई रति या इन्द्र से बिछुड़ी हुई इन्द्राणी ही है और वह अपने अनुपम रूप रूपी तलवार द्वारा लक्ष्मी को जीतकर ही यहाँ स्थिर हो गई है। द्रौपदी की ऐसी हालत देखकर कलहप्रिय नारद मन ही मन सोचने लगे कि हाय, मान के वश होकर मुझ पापी ने इस सती को व्यर्थ कष्ट में डाला। यह मैंने अच्छा नहीं किया ॥१०८-११३॥


सतीं संकटं नीता मया मानेन पापिना। ततः स केशवं प्राप्यावादीद्रणसमुद्यतम् ॥११४॥

विकटं कटकं विष्णो किमर्थं मेलितं त्वया। द्रौपदी धातकीखण्डे कङ्कयां सा तु विद्यते ॥११५॥

पद्मनाभो नृपस्तत्र वैरिवंशविनाशकः। आराध्य निर्जरं जह्रे तां सीतां वा दशाननः ॥११६॥

यत्र यातुं न शक्नोति नरः कोऽपि महाबली। अतोऽत्र तिष्ठ निर्द्वन्द्वमिदं कार्यं सुदुष्करम् ॥११७॥

तन्निशम्य स्वभूस्तत्र प्रभुः संमुच्य तद्बलम्। रथेनैकेन संप्राप नगरं हास्तिनं पुरम् ॥११८॥

संमुखं पाण्डवा विष्णुं गत्वा नत्वा न्यवेदयन्। द्रौपदीहतिवृत्तान्तं विश्वलोकभयप्रदम् ॥११९॥

अर्थ (श्लोक 114 से 119): इसके बाद वह रण के लिए उद्यत हुए कृष्ण के पास पहुँचे और उनसे बोले कि नारायण, तुमने यह विशाल सेना किस लिए एकत्र की है। द्रौपदी के लिए हो तो वह तो धातकीखण्डद्वीप की अमरकंकापुरी में मौजूद है। पूछो कि वह वहाँ कैसे पहुँची तो इसका उत्तर यह है कि जिस तरह रावण ने सीता को हरा था उसी तरह बैरियों के वंशभर का नाश करने वाले पद्मनाभ राजा ने एक देवता की आराधना कर उसे हरा है-उसे देवता के द्वारा वहाँ बुला मँगाया है। चाहे कैसा ही बलवान् मनुष्य क्यों न हो वहाँ जाने की किसी की भी शक्ति नहीं। अतः आप बेफिक्र होकर बैठिए। कारण वहाँ से द्रौपदी को लाना बहुत ही दुर्घट है-कठिन है। यह सुनकर कृष्ण ने सारी सेना को तो वहीं छोड़ा और आप अकेला ही रथ पर सवार होकर हस्तिनापुर गये। वहाँ पाण्डवों ने कृष्ण को द्रौपदी के हरे जाने का सारा हाल सुनाया, जिसे सुनकर बड़ा भय मालूम पड़ता था ॥११४-११९॥


ते तत्र मन्त्रणं कृत्वा मत्वा दुर्लङ्घ्यमर्णवम्। लवणाम्बुधिसत्तीरं प्रापुः पापपराङ्मुखाः ॥१२०॥

अर्थ: इसके बाद उन सबने मिलकर विचार किया और यह निश्चय किया कि लवण-समुद्र का


तत्र त्रिकोपवासेनासाद्यस्वस्तिकं सुरम् ।
लवणाम्बुधिसन्त्रार्थं प्रतस्थे विष्टरश्रवाः ॥१२१॥

ततस्ते स्यन्दनैः षड्भिर्देवदत्तैः सुवेगिभिः ।
पयश्चारिभिराभेजुः पुरीं कङ्काभिधां क्षणात् ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 120 से 122): लाँघना बहुत कठिन है, अतः इसके लिए कोई दूसरा ही उपाय करना चाहिए। यह विचार-विचार कर वे निष्पाप लवण समुद्र के तीर पर गये और वहाँ शक्तिशाली कृष्ण ने तीन उपवास के बाद उस समुद्र के स्वामी स्वस्तिक नाम देव को साधा। उसने इन्हें जल पर चलने वाले शीघ्रगामी छह रथ दिये। जिन पर सवार होकर ये छहों के छहों ही बात ही बात में अमरकंकापुरी पहुँच गये ॥१२०-१२२॥


हरिणा सह सिंहा वा जगर्जुः पञ्च पाण्डवाः ।
सज्जं शार्ङ्गं व्यधाद्विष्णुष्टङ्कारारावसंकुलम् ॥१२३॥

भीमेन भ्रामिता तूर्णं गदा विद्युल्लता यथा।
नकुलेन तदाग्राहि कुन्तो द्विद्कृन्तनोद्यतः ॥१२४॥

पाणौ कृतः कृपाणस्तु सहदेवेन दीप्तिमान् ।
सज्जिता सत्वरं शक्तिर्धर्मपुत्रेण जित्वरी ॥१२५॥

तदा धनंजयः प्राह नत्वा धर्मसुतं क्षणात् ।
वारयिष्याम्यर्रिं यूयं सर्वे तिष्ठत निश्चलम् ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 123 से 126): वहाँ जाकर विष्णु और पाण्डवों ने सिंहनाद किया। कृष्ण ने सार्ङ्ग-धनुष चढ़ाकर भीषण टंकार किया। भीम ने बिजली के जैसी गदा को वेग के साथ घुमाया। नकुल ने शत्रु को भेदने वाला भाला हाथ में लिया और सहदेव ने दीप्तिशाली तलवार हाथ में ली एवं धर्म पुत्र-युधिष्ठिर ने जीतने वाली शक्ति को धारण किया। अपने सब भाइयों को युद्ध के लिए उद्यत देखकर युधिष्ठिर को प्रणाम कर पार्थ ने कहा कि आप सब तो विश्राम कीजिए-मैं अकेला ही क्षणभर में शत्रु को वारण कर दूँगा। आपको कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है ॥१२३-१२६॥


इत्युक्त्वा पूरयित्वा स शङ्खं कोदण्डपाणिकः।
दधाव देवदत्ताह्वं पार्थः सद्रथसंस्थितः ॥१२७॥

हरिणा पूरितः पाञ्चजन्यो जयभयंकरः ।
तन्निशम्य पुराद्राजा निर्जगाम बलोद्धतः ॥१२८॥

रणतूर्येण तूर्णं स कुर्वंश्च बधिरा दिशः।
रेणुनाच्छादयन्व्योम युयुधे भूपतिर्बली ॥१२९॥

पार्थेन जर्जरीचक्रे पद्मनाभो महाशरैः ।
रणं हित्वा गतः पुर्यां दत्त्वा स विशिखां स्थितः ॥१३०॥

वैकुण्ठः कठिनं पादप्रहारैस्तां न्यपातयत्।
विविशुः पत्तनं सर्वे त्रासयन्तोऽखिलाञ्जनान् ॥१३१॥

भीमस्तु पातयामास गदया मन्दिराणि च।
आददाविन्दिराः सर्वाः सुन्दरो मन्दरस्थिरः ॥१३२॥

नष्टो जनस्तदा सर्वो भूपोऽपि प्रपलायितः ।
ब्रुवाणस्त्राहि त्राहीति द्रौपदीं शरणं ययौ ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 127 से 133): यह कह पार्थ ने देवदत्त नाम शंख को फूँकते हुए एक उत्तम रथ में सवार हो, धनुष सँभाल शत्रु पर धावा मारा। कृष्ण ने लोगों को भय देने वाला पाँचजन्य शंख बजाया। उसकी सुनकर बल से उद्धत पद्मनाभ पुर से बाहर निकला और उस बली ने रण के बाजों के शब्द द्वारा सब दिशाओं को बधिर करते हुए तथा धूल द्वारा आकाश को ढकते हुए वेग के साथ पार्थ से खूब युद्ध किया। पार्थ ने अपने महान् तीखे शरों द्वारा उसे जर्जरित कर दिया, जिससे वह रण को पीठ देकर भागा और फाटक बंद कर पुरी में छिप रहा। कृष्ण ने जाकर पाँवों के कठिन प्रहारों द्वारा फाटक को तोड़ डाला। वे सब नगरी के भीतर गये और वहाँ उन्होंने सब लोगों को भयभीत कर दिया। भीम ने अपनी गदा के द्वारा बहुत से मंदिर महल गिरा दिये और उनकी सब लक्ष्मी लूट ली। यह देख लोग भागे। उनके साथ ही राजा भी भगा। वह भाग कर त्राहि-त्राहि कहता द्रौपदी के शरण पहुँचा और बोला कि


द्रौपदीहरणात्पापं कृतं यद्धि मया फलम्।
लब्धं तदत्र भूमीशे इत्यवोचद्गिरं पराम् ॥१३४॥

द्रौपद्यथावदद्वाक्यं शृणु रे मूढमानस।
पुरा प्रोक्तं त्वदग्रेऽत्र समेष्यन्त्याशु पाण्डवाः ॥१३५॥

दुर्योधनादयो योधा युद्धे यैर्निर्जिताः क्षणात्।
तेषामग्रे भवद्वार्ता केति पूर्वं मयोदितम् ॥१३६॥

तावता तत्र ते प्रापुर्दन्तिनो वा निरङ्कुशाः।
भूपस्तान्वीक्ष्य नम्रोऽभूद्रक्ष रक्षेति संवदन् ॥१३७॥

तस्याः स शरणं प्राप्तो भूपोऽभाणीद्भयातुरः।
त्वमखण्डा महाशीला सुशीलासि समप्रिया ॥१३८॥

त्वं दापयाभयं दानमेतैर्मे जीवनप्रदम्।
सा तदादापयत्तस्याभयं दानं च तैर्नृपैः ॥१३९॥

ततः प्रणम्य कृष्णाङ्घ्री पाण्डवान्विनयोद्यतः।
यथायथं चकारासौ विनयं भोजनादिभिः ॥१४०॥

ते तदा द्रौपदीं लात्वा स्नात्वार्हत्पदपङ्कजम्।
प्रपूज्य कारयामास द्रौपद्याः पारणां पराम् ॥१४१॥

अर्थ (श्लोक 127 से 141): देवी, मैंने तुम्हें हर कर जो पाप किया उसी का यह फल मुझे मिल रहा है। मेरी तुम रक्षा करो। द्रौपदी बोली कि मूढ़, मैंने तो तुझसे पहले ही कहा था कि पाण्डव बहुत जल्दी आवेंगे और तुझे नष्ट कर देंगे भला जिन्होंने दुर्योधन आदि की क्षणभर में जीत लिया उनके आगे तेरी तो बात ही क्या है। राजा द्रौपदी को खुशामद कर ही रहा था कि उसी समय वहाँ हाथी जैसे निरंकुश पाण्डव पहुँच गये। उन्हें देखते ही रक्ष-रक्ष कहता हुआ पद्मनाभ एकदम नम्र हो गया। वह द्रौपदी की ओर देखता हुआ भय से आतुर हो बोला कि देवी, तुम अखण्ड शील पालने वाली सच्ची सुशीला हो। तुम मुझे अभयदान दो, जिसके द्वारा कि इनसे मेरे प्राण बचें। यह सुन द्रौपदी ने उसे अभयदान दिया उसके हृदय से पाण्डवों की तरफ का भय निकाल दिया। इसके बाद विनय के साथ कृष्ण और पाण्डवों को नमस्कार कर उसने उनका भोजन आदि से बड़ा सत्कार किया। इस समय पाण्डवों ने द्रौपदी के साथ स्नान कर और अर्हन्त देव के चरण कमलों की पूजा कर उसको पारणा कराया ॥१२७-१४१॥


इति शुभपरिपाकाच्छौभचन्द्रे जिनेन्द्रे वरकृतनतिभावा भव्यभावाः सुभव्याः।
द्रुपदनृपतिजातां ते समादाय प्रापुर्जननिकरसमिद्धं सद्यशो लोकचारि ॥१४२॥

यस्माद्धर्मान्नृपतिमहितं पद्मनाभं विजित्यं प्राप्ताः पूजां परतरमहाधातकीखण्डजाताम्।
लब्ध्वा पार्थप्रमदवनितां द्रौपदीं पाण्डवास्ते प्रापुः सातां जिनवरवृषप्रभावं तद्विद्धि ॥१४३॥

अर्थ (श्लोक 142 से 143): शुभचन्द्र जिनेन्द्र को उत्तम भक्ति से नमस्कार कर भव्य-भाव को प्राप्त हुए सुभव्य पाण्डवों ने द्रौपदी को प्राप्तकर जो सर्वोत्तम लोक-व्यापी उज्ज्वल यश प्राप्त किया वह सब पुण्य का ही प्रभाव है। देखो, वह सब जिनदेव के बताये धर्म का ही प्रभाव है जो कि राजाओं द्वारा पूजित पद्मनाभ राजा को जीतकर पाण्डवों ने दूर देश धातकीखण्डद्वीप में प्रतिष्ठा पाई और पार्थ-पत्नी द्रौपदी को प्राप्त किया। यह जानकर हे भव्य-गण! सदा धर्म का सेवन करो ॥१४२-१४३॥ इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचन्द्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में द्रौपदी-हरण, विष्णु और पाण्डवों का धातकीखण्ड में गमन और द्रौपदी की प्राप्ति इन विषयों का वर्णन करने वाला इक्कीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२१॥

एकविंशं पर्व

मल्लिं शल्यहरं कर्ममल्लजेतारमुन्नतम्। मल्लिकामोदसद्देहं वन्दे सत्कुलपालिनम् ॥१॥

अर्थ: उन मल्लिनाथ प्रभु को नमस्कार है जो शल्य को हरने वाले और कर्म-मल्ल को जीतने वाले हैं। माल्लिका के फूल के जैसा सुगंध देने वाला जिनका उत्तम शरीर है तथा जो उन्नत और सत्पुरुषों के पालक हैं ॥१॥


अथैकदा नराधीशो युधिष्ठिरमहीपतिः। भीमादिभ्रातृसंपूज्यस्तस्थौ सिंहासने मुदा ॥२॥

चामरैर्वीज्यमानः स नानानृपतिसेवितः। छत्रसंछन्नतिग्मांशु रराजात्र युधिष्ठिरः ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): एक दिन भीम आदि द्वारा पूजित युधिष्ठिर हर्ष के साथ सिंहासन पर विराजे थे। उनके ऊपर चँवर ढोरे जा रहे थे और उनकी सेवा में बहुत से नृपति उपस्थित थे। उनके ऊपर जो छत्र लग रहा था उसके द्वारा सूरज की किरणों के रुक जाने से उनकी और भी अधिक शोभा हो गई थी ॥२-३॥


कदाचिन्नारदः प्राप दिवस्तेषां च संसदम्। अभ्युत्थानादिभिः पूज्यः पाण्डवैः परमोदयैः ॥४॥

विधाय विविधां वाग्मी किंवदन्तीं विधेः सुतः। पाण्डवैः सह संप्राप तन्निशान्तं सुमनसः ॥५॥

ददर्श द्रौपदीसद्म निश्छद्मा द्युमन्दीपितम्। गवाक्षपक्षसंपन्नं नारदो नरवन्दितः ॥६॥

तत्रासनसमारूढा प्रौढशृङ्गारसंगिनी। किरीटतटसंनद्धमूर्धा सा द्रौपदी स्थिता ॥७॥

विशाले तिलकं भाले दधाना हृदये वरम्। हारं सारं च नाद्राक्षीन्नारदं सा गृहागतम् ॥८॥

अर्थ (श्लोक 4 से 8): इसी समय उनकी सभा में स्वर्ग से नारद आये। महाभाग पाण्डव उन्हें देखते ही उठ खड़े हुए और उनका उन्होंने उचित आदर किया। नारद ने पाण्डवों को इधर-उधर की विविध दन्तकथाएँ सुनाईं। इसके बाद वह सुमना पाण्डवों के साथ-साथ उनके अन्तःपुर में गये। वहाँ मनुष्य द्वारा वन्दित उन महापुरुष ने दीप्तिपूर्ण झरोखों, छज्जों वाले और मन को मुग्ध करने वाले द्रौपदी के सुंदर महल को देखा। इस समय द्रौपदी वहाँ खूब ही बढ़िया श्रृंगार किये, मस्तक पर मुकुट दिये सिंहासन पर विराजी थी। वह अपने विशाल भाल में तिलक दिये थी और हृदय में सर्वोत्तम सारभूत हार पहिने थी। उसने इस समय घर आये हुए नारद को न देख पाया और दर्पण में पड़े हुए नारद के चेहरे की देखकर भी वह न तो उठ खड़ी हुई और न उनको उसने नमस्कार ही किया। इस अपमान से नारद बड़े ही क्रुद्ध हुए और वह मस्तक धुनते तथा मन ही मन रोष करते वहाँ से उसी क्षण चले आये ॥४-८॥


मुकुरे मुखमक्ष्णैव नारदस्येक्षमाणया। अभ्युत्थानादिकं कर्म न कृतं च तया नतिः ॥९॥


अपमानादिदोषेण संक्रुद्धोऽगाद्द्विधेः सुतः। तस्माद् गृहाच्छिरो धुन्वंश्चिन्वन्नरोषं स्वमानसे ॥१०॥


बभ्राम नभसि भ्रान्तः पूत्कारमुखराननः। न क्वापि रतिमालेभे गतोऽसौ गगनार्णवम् ॥११॥

जगाम विजनं देशं सहसा च समुन्नतम्। अवादिते च नृत्यामि नारदोऽहं सदा मुदा ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 11 से 12): वह बड़बड़ाते हुए आकाश में घूमने लगे परन्तु जब उन्हें कहीं सन्तोष न मिला तब वह आकाश में दूर तक चल कर एक विशाल एकान्त में पहुँचे। वहाँ पहुँचकर वह सोचने लगे कि मैं वही न नारद हूँ जो सदा ही हर्ष का भरा बिना बाजों के ही नाचा करता हूँ, लेकिन जब कारण मिल जाता है तब


वादिते किं पुनर्वच्मि चतुरः कलहप्रियः। क्वापमानः कृतो मेऽद्यानया दुःखितोऽप्यहम् ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 9 से 13): तो मेरे आनन्द का पार ही नहीं रहता। इस द्रौपदी ने मेरा अपमान कर मुझे व्यर्थ ही कितना दुखी किया है ॥९-१३॥


दूषणं च करोम्यत्रैतस्याः सा शुद्धिमाप्य च। प्रियेण संगमासाद्य तादृशी स्यान्निरङ्कुशा ॥१४॥

परेण हारयामीमां तदेषा दुःखिनी भवेत्। तस्या हतौ च मे पापं भविता तन्न युज्यते ॥१५॥

परस्त्रीलम्पटं कंचित्पश्यंश्चोपायसंयुतः। प्रमृग्य लंपटं किंचित्तेनेमां हारयाम्यहम् ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 14 से 16): अब तो मैं जब इसका बदला ले लूँगा मुझे तभी सन्तोष होगा, मेरे इस अपमान का तभी प्रायश्चित होगा। इसके सिवा मुझे किसी तरह भी सन्तोष होने का नहीं। यह अपने स्वामी आदि प्रिय पाण्डवों का समागम पाकर ही इतनी निरंकुश हो रही है। इसे दूसरे द्वारा हरवा देकर प्रिय-वियोग में डालूँ तभी यह दुःखिनी होगी। मैं इसे मारकर भी अपना बदला ले सकता हूँ परन्तु यह घोर पाप है। इसलिए ऐसा करना मुझे उचित नहीं है। अतः यही ठीक है कि किसी लंपटी पुरुष को खोजकर इसे उसके द्वारा हरवा ही दूँ ॥१४-१६॥


हरिणा बलदेवेन वन्दितोऽहं परैर्नृपैः। सर्वेषां गुरुरेवाहं सर्वस्त्रीणां विशेषतः ॥१७॥

पश्यतास्याः सुधृष्टत्वं दुष्टत्वं च सुकष्टकृत्। अवगण्य स्थितेयं मामासने दर्पसर्पिणी ॥१८॥

यः शृङ्गाररसोऽप्यस्या वल्लभो वल्लभादपि। स शृङ्गाररसो यात्यस्या यथाहां तथा यते ॥१९॥

तदा मनोरथाः सर्वे सेत्स्यन्ति मम निश्चितम्। उत्सारयामि सौभाग्यमहमस्या यदा ननु ॥२०॥

अपमानभवं दुःखं तदा यास्यति मे हृदः। यदास्या हरणं दुःखं नयनाभ्यां नभोगतः ॥२१॥

चिन्तयित्वेति कोपेन स चचाल ऋषिर्नभः। परस्त्रीलंपटं कंचित्पश्यंश्चोपायसंयुतः ॥२२॥

बभ्राम निखिलां क्षोणीं क्षिप्रं क्षीणमना ऋषिः। तादृक्षं लोकते यावन्नृपं नाभूत्तदा सुखी ॥२३॥

चिन्तयन्सोऽन्यनारीषु रतं नरपमुन्नतम्। जगाम धातकीखण्डं नानाखण्डसमुन्नतम् ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 17 से 24): नारायण, बलभद्र तथा और-और सब राजे महाराजे तो मेरी वन्दना करें, मैं सबका गुरु और विशेष कर स्त्री-जाति का गुरु, उस मेरे साथ इसकी यह कष्टदायी धृष्टता तथा दुष्टता जो गर्व के आवेश में इसने मुझे कुछ भी न गिना और आप मजे के साथ आसन पर बैठी रही। बात तो यह है कि मैं भी अब कोई ऐसा ही प्रयत्न करूँ कि जिसके द्वारा जो शृंगार-रस इसे इतना प्रिय है वह सब इसका छूट जाय। यह निश्चय है कि जब मैं इसके सौभाग्य को दूर कर दूँगा-मेरे मनोरथ भी तभी पूर्ण होंगे। मुझे जो अपमान का दुख है वह मेरे हृदय से तभी निकलेगा जबकि मैं आकाश में होकर इसके हरे जाने को आँखों देखूँगा। मन ही मन यह सब सोचकर कोप के भरे और उपाय की ताक में लगे नारद ऋषि किसी परस्त्री-रत राजा को देखते हुए आकाश मार्ग होकर चले। खिन्नचित्त हुए नारद ने बहुत जल्दी सारी ही पृथिवी घूम डाली। उन्हें कोई परस्त्रीरत राजा न देख पड़ा। वह बड़े दुखी हुए। सब जगह घूम फिर आये और जब जम्बूद्वीप भर में भी उन्हें कोई ऐसा राजा नजर न आया तब वह परस्त्रीगामी राजा की खोज में धातकीखण्ड द्वीप में गये ॥१७-२४॥


योजनानां चतुर्लक्षैर्विस्तृतं सुश्रुतं श्रुतौ।
मन्दरः सुन्दरः पूर्वस्तत्रास्ति सुमनोहरः ॥२५॥

चतुर्भिरधिकाशीतिसहस्रैर्योजनैर्महान्।
समुत्तुङ्गश्चतुर्भिश्च वनैर्भाति भूधरः ॥२६॥

तस्य दक्षिणदिग्भागे भारतं भुवि विश्रुतम्।
षट्खण्डमण्डितं भाति भाभारभूपभूषितम् ॥२७॥

मध्येक्षेत्रं पुरी सारामरकङ्का सुखाकरा।
भूपीठं भूषयन्ती च सुभगा भवनोत्तमा ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 25 से 28): यह द्वीप विविध खण्डों द्वारा समुन्नत है। चार लाख योजन का इसका विस्तार है। इसकी पूर्व दिशा में एक मंदर नाम पहाड़ है जो बहुत अधिक मनोहर है, चौरासी हजार योजन ऊँचा है और जिस पर चार विशाल वन हैं। उन वनों से उसकी और भी अधिक शोभा है। इसकी दाहिनी बाजू में जगत् विख्यात, अत्यन्त शोभा-सम्पन्न और छह खण्डों द्वारा मंडित भरत नाम क्षेत्र है। इस क्षेत्र के बीचों-बीच अमरकंका नाम की एक पुरी है जो कि भूमण्डल की शोभा है, सुहावनी है, संसार भर में उत्तम है, सार है और सुख की खान हैं ॥२५-२८॥


तां पाति परमः प्रीतः पद्मनाभमहीपतिः।
पद्मनाभ इवोत्तुङ्ग इन्दिरामन्दिरं सदा ॥२९॥

दोर्दण्डखण्डितारातिमण्डलो महिपैः स्तुतः।
अवद्योद्धुरविद्याभिः सुविद्यः परमोदयः ॥३०॥

विपुलामलसद्वक्षाः क्षितिरक्षाविचक्षणः।
अलक्ष्यस्तु विपक्षाक्षै रूपनिर्जितमन्मथः ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 29 से 31): इसका रक्षक हैं पद्मनाभ नामक महीपति। यह राजा इस नगरी का बड़ी प्रीति के साथ पालना करता है, जिस तरह कि उन्नत पद्मनाभ-कृष्ण सदा काल ही लक्ष्मी के मन्दिर (महल) की रक्षा-पालना करता है, उसे आश्रय दिये रहता है। इसने अपने बाहुदंडों द्वारा वैरियों को दण्डित किया था, अतः सब राजे इसकी स्तुति करते हैं। यह सब पाप-विद्याओं का ज्ञाता विद्वान् था। विशाल और निर्मल इसका वक्षस्थल था। पृथ्वी की रक्षा करने में यह बड़ा चतुर था। यह कभी भी शत्रु का लक्ष्य न होता था और रूप के द्वारा यह कामदेव को जीतता था ॥२९-३०॥


अथ ब्रह्मसुतः पट्टे तस्या रूपमलेखयत्।
रूपनिर्जितसर्वस्त्रीसमूहं मोहकारकम् ॥३२॥

नारदो भूमिपालाय तद्रूपं पट्टसंगतम्।
दर्शयामास संदीप्तं दीप्तिनिर्जितभास्करम् ॥३३॥

क्षितीशो वीक्ष्य पट्टस्थां योषां तां कनकोज्ज्वलाम्।
हारिहारसुवक्षोजामचिन्तयदति स्फुटम् ॥३४॥

केयं शुचिः शची स्वर्गात्समायाताब्जसद्मतः।
पद्माथ रोहिणी प्राप्ता सूर्यपत्नी भुवं गता ॥३५॥

किन्नरी खचरी वाऽहो कामपत्नी गुणात्मिका।
इत्यातर्क्य विकल्पेनेयं किं मोहनवल्लिका ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 32 से 36): उधर नारद ने यह किया कि एक चित्रपट्ट पर अपनी सुन्दरता के द्वारा सारे स्त्री समूह को जीतने वाला और बड़े अचम्भे में डालने वाला द्रौपदी का सुंदर चित्र खींचा और ले जाकर अपनी दीप्ति से सूरज को जीतने वाले उस चित्र को उसने पद्मनाभ राजा को भेंट किया। उस चित्र में सोने की जैसी उज्ज्वल और सुंदर हार द्वारा शोभित कुचों वाली द्रौपदी को देखकर वह मन ही मन विचार करने लगा कि यह कौन है? स्वर्ग से आई हुई शची है या अपना महल छोड़कर लक्ष्मी ही आ गई है। यह रोहिणी है या सूरज की पत्नी ही पृथ्वी पर आ पहुँची है, अथवा किन्नरी या खेचरी तो नहीं हैं, एवं गुणशालिनी यह काम की पत्नी रति तो नहीं हैं। यह कौन है-किसका यह चित्र है। यों नाना विकल्प


चिन्तयन्निति भूमीशो मुमूर्च्छ मोहसंगतः। तदा हाहारवैर्युक्ता नृपास्तत्र समागताः ॥३७॥

अर्थ (श्लोक 31 से 37): कर उसने बहुत विचार किया, पर वह उसके विषय में कुछ भी निश्चय नहीं कर सका कि यह मोहनवल्ली कौन है, इस तरह का विचार करता-करता ही वह मोह-वश होकर मूर्च्छित हो गया। उसकी यह दशा देख महल के सब लोग हाहाकार करते हुए वहाँ दौड़े आये ॥३१-३७॥


कथं कथमपि प्राप्तश्चेतनां चिन्तनोद्धुरः। विधातृपुत्रमानम्याप्राक्षीत्पृथ्वीश्वरस्तदा ॥३८॥

केयं पट्टगता तात वर्णिनीवरवर्णिनी। सविभ्रमा महारूपा विभ्रमभ्रूभ्रमानना ॥३९॥

यथोक्तं भण भव्येश मम निश्चयकारणम्। तदागदीद्विधेः सूनुः समाकर्णय भूपते ॥४०॥

शुश्रूषा तव चेदस्ति पट्टरूपस्य पार्थिव। वदामि तर्हि ते चित्तं सुस्थितं च यतो भवेत् ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 38 से 41): उन्होंने तुरंत शीतोपचार आदि उपाय किये तब चिंता से पीड़ित पद्मनाभ कुछ होश में आया। होश में आते ही नारद को देख उसने उन्हें प्रणाम कर पूछा कि-प्रभो! यह उत्तम स्त्री कौन है कि जिस महान् रूप वाली, सुविभ्रमा और विभ्रम-पूर्ण भ्रूयुक्त आनन वाली का यह चित्र है। भव्येश! सब बातें ठीक-ठीक कहिए, ताकि मुझे पूरा-पूरा निश्चय हो जाय। उत्तर में नारद ने कहा कि राजन्! यदि आपको इस अपूर्व सुंदरी के विषय में जिसका कि यह चित्र है, जानने की इच्छा हो तो जरा ध्यान देकर सुनिए। मैं उसका सब वृत्तान्त कहता हूँ। निश्चय है कि उसको सुनने से आपका चित्त स्थिर हो जायेगा ॥३८-४१॥


मध्येद्वीपं महान्द्वीपो जम्बूनामा मनोहरः। वृत्तेन निर्जितश्चन्द्रस्तथा योगी च येन वै ॥४२॥

तन्मध्ये मन्दरो दीप्तः सुदर्शनसमाह्वयः। लक्षयोजनतुङ्गाङ्गो भाति भूतिलकोपमः ॥४३॥

तदवाच्यां वरं क्षेत्रं भारतं भुवनोत्तमम्। चापाकारं कलाकीर्णं भाति षट्खण्डशोभितम् ॥४४॥

कुरुजाङ्गलनामास्ति नीवृत्तत्र मनोहरः। कुरुभूमिसमो भोगैर्भ्राजिष्णुर्भूरिभूपतिः ॥४५॥

हस्तिनागपुरं तत्र हस्तिनां बृंहितैर्वरम्। सुरापगापरिक्लृप्तपरिखं खलु विद्यते ॥४६॥

युधिष्ठिराभिधस्तत्र भूपो भूरिभयापहः। समृद्धो धरणीं धर्तुं विद्यते कौरवाग्रणीः ॥४७॥

पार्थः सार्थकनामाभूत्तद्भ्राता भुवि विश्रुतः। तत्पत्नी द्रौपदी पट्टे लिखितेयं सुरूपिणी ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 42 से 48): सब द्वीपों के ठीक बीच में एक जम्बूद्वीप नामक द्वीप है जो कि बड़ा ही मनोहर और महान् है और जिसने कि अपने वृत्त (गोलाकार) द्वारा चंद्रमा और योगियों को भी जीत लिया है। (योगियों के पक्ष में वृत्त का अर्थ चारित्र समझना चाहिए।) इसके बीच में दीप्त सुदर्शन नाम मंदर (पहाड़) हैं जो लाख योजन का ऊँचा है और पृथ्वी का तिलक जैसा है। इसके दक्षिण ओर चढ़े हुए धनुष के आकार का कलाओं से पूर्ण, छह खण्डों में विभक्त और संसार भर में उत्तम भरत नाम क्षेत्र है। इसमें एक कुरुजांगल नाम देश है जो कि बहुत सुंदर है, कुरुभूमि तुल्य देशों से परिपूर्ण है, अपनी बढ़ी-चढ़ी विभूति द्वारा सुशोभित है। इस देश में हाथियों के समूह द्वारा सर्वोत्तम हस्तिनापुर नाम नगर है। जिसकी खाई सदा ही गंगा के जल द्वारा भरी रहती है। हस्तिनापुर के राजा युधिष्ठिर हैं। वह कौरवग्रणी हैं और पृथ्वी को धारण करने के लिए पूर्ण समृद्ध हैं। संसार-प्रसिद्ध सार्थक नामधारी पार्थ उनका एक भाई है। उसकी पत्नी का नाम है द्रौपदी। बस, इस चित्र में लिखा हुआ यह उसी सुरूपिणी का रूप है ॥४२-४८॥


रामासुखसमीहा चेत्तवैनां कुरु हृद्गताम्।
विनानया प्रभो विद्धि जीवितं तेऽप्यजीवितम् ॥४९॥

तद्रूपं च वरे पट्टे विद्युत्कीर्णा सुकर्णभृत्।
तुभ्यं यद्रोचते भूप तत्कुरुष्व न चान्यथा ॥५०॥

इत्युक्त्वास्मिन्गते व्योम्नि तद्रूपाहतमानसः।
तत्कामिनीं स्मरंश्चित्ते क्षणं दुःखी नृपोऽभवत् ॥५१॥

वनमित्वा तदा भूपो मन्त्राराधनतत्परः।
संगमाख्यं सुरं शीघ्रं साधयामास संगदम् ॥५२॥

साधितः संगमः प्राप्तो नृपं प्रणयसंगतम्।
प्राह देहि ममादेशं त्वदिष्टं हृष्टिकारकम् ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 49 से 53): सच कहता हूँ कि यदि आपको संसार का सार सुख भोगने की इच्छा हो तो आप इस स्त्रीरत्न को हस्तगत कीजिए। राजन्! इसके बिना पाये आप अपने जीवन को व्यर्थ ही समझिए। अब आपको जो रुचे वही कीजिए। इतना कहकर नारद तो आकाशमार्ग द्वारा चले गये और इधर-उधर राजा द्रौपदी के रूप द्वारा चित्त के हरे जाने के कारण उसको याद करता हुआ बड़ा भारी दुखी हुआ। यहाँ तक कि उसे उसके मिले बिना चैन ही नहीं पड़ने लगा। अन्त में उसके प्राप्ति का कोई उपाय न देख वह वन में गया और वहाँ मंत्र की आराधना में चित्त देकर उसने बहुत जल्दी एक गदाधारी संगम नाम सुर को साध लिया। संगम ने आकर, प्रणाम कर कहा कि देव, मुझे अपनी उस इष्ट-सिद्धि की आज्ञा दीजिए जिसके द्वारा आपका चित्त प्रफुल्ल हो, आप खुश हों ॥४९-५३॥


तदाभाणीन्नृपस्तुष्टो निर्जराय मानिनीम्।
द्रौपदीं रूपसंपन्नां संप्राप्तपरमोदयाम् ॥५४॥

तन्निशम्य सुरः शीघ्रं सानुरागश्च कार्यकृत्।
चचाल चलचित्तात्मा संचरन्नागनाङ्गणम् ॥५५॥

द्विलक्षयोजनव्यापिसागरं सत्वरं सुरः।
जगामोल्लङ्घ्य निर्विघ्नो हस्तिनागपुरं परम् ॥५६॥

निशायां सदनं तस्याः प्रविश्य संगमः सुरः।
साक्षाल्लक्ष्मीमिव क्षिप्रं सुप्तां जह्रेऽर्जुनाङ्गनाम् ॥५७॥

हृत्वा सुरः समानीय द्रौपदीं स्वापसंयुताम्।
तदङ्गोद्यानसद्गेहे मुमोच मतिमोहिताम् ॥५८॥

निद्रावशादजानन्तीं हेयाहेयं कथंचन।
सशय्या तत्र सा सुप्ता प्रातःपर्यन्तमास्थिता ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 54 से 59): तब राजा ने सन्तुष्ट होकर उससे कहा कि, देव, परमोदयशाली, अनुपम रूप-सम्पन्न और मानिनी द्रौपदी की लाकर मुझसे मिला दो। बस, मेरी यही कामना है और इसलिए ही मैंने तुम्हें कष्ट दिया है। राजा के वचन सुनकर अनुराग का भरा कार्य-कुशल वह देव आकाश-मार्ग द्वारा बहुत जल्दी दो लाख योजन वाले समुद्र को बात ही बात में ही लाँघकर, बिना किसी रोकटोक के हस्तिनापुर पहुँच गया। वहाँ वह रात में द्रौपदी के महल में गया और उसने सोई हुई साक्षात् लक्ष्मी जैसी द्रौपदी की हर लाकर, सोई हुई अवस्था में ही, पद्मनाभ के उद्यान के एक सुंदर महल में छोड़ दिया। नींद के वश हुई द्रौपदी को इस समय हेय-उपादेय का कुछ भी भान न था-वह वहाँ शय्या पर पड़ी हुई प्रातःकाल तक बराबर सोती ही रही ॥५४-५९॥


पद्मनाभः सुरेणापि विज्ञापितस्तदागमः।
प्रबुद्धः पटुधीः प्राप तस्या अभ्यर्णमादरात् ॥६०॥

निद्राक्रान्तां स आलोक्य कौमुदीं कनकोज्ज्वलाम्।
पीनस्तनीं सुजघनां जहर्षेन्दुसमाननाम् ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 60 से 61): इसके बाद ही उसके हर ले आने की बात की सूचना देव ने पद्मनाभ को दी। वह सहसा जागकर और अपने को संभाल कर बड़ी सावधानी के साथ आदर का भरा द्रौपदी के पास आया। वह उस सोने जैसी उज्ज्वल, स्थूल और कठिन कुचों वाली और सुन्दर जाँघों द्वारा सुशोभित


बभाण भूपतिर्भक्तो भद्रे तु रजनी गता। प्रभातसमयो जातः प्रबुद्धा भव भामिनि ॥६२॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वेगेनालोकय त्वं सुलोचने। वद वाणीं विशेषेण विश्वविज्ञानपारगे ॥६३॥

इत्थमुत्थापिता वाक्यैर्मधुरैः सुसुधोपमैः। त्रस्तैणनयना बाला पश्यति स्म दिशो दश ॥६४॥

कोऽयं देशस्तु को वक्ति एष कः पुरतः स्थितः। किमुद्यानमिदं गेहे वेति चिन्तां तु सा गता ॥६५॥

अयं तु निश्चितं स्वप्नो न भ्रान्तिर्विद्यते मम। इति स्ववक्त्र माच्छाद्य सुप्ता सा मोलितेक्षणा ॥६६॥

भूपस्तन्मानसं ज्ञात्वा जगाद मदनाहतः। कमलाक्षि निरीक्षस्व नायं स्वप्नः प्रहर्षिणि ॥६७॥

नेयं निद्रेति सा मत्वा प्रेक्षमाणा दिशो दश। ददर्श किङ्किणीयुक्तं व्योमयानं मनोहरम् ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 60 से 68): चन्द्रवदनी द्रौपदी की नींद से भरी हुई छवि की देखकर बड़ा खुश हुआ। वह प्रेम के आवेश में आकर बोला कि भद्रे! रात्रि चली गई और सबेरा हो गया। अतः भामिनि, अब नींद को छोड़ो और उठो। सुलोचने, कला-कौशल में पार को प्राप्त हुई देवि, अपनी सुंदर वाणी बोलो। पद्मनाभ ने इस प्रकार अमृत-तुल्य सुमधुर वाक्यों द्वारा जब उसे जगाया तब आँखें खोलते ही वह भयभीत मृगी की भाँति व्याकुल नेत्रों द्वारा सब दिशाओं में देखने लगी। वह बड़ी चिन्ता में पड़ गई कि यह देश कौन है, यह मुझसे कौन बातचीत कर रहा है, यह जो सामने खड़ा है कौन है, यह उद्यान किसका है और यह महल किसका है। जान पड़ता है यह सब स्वप्न है, साक्षात् में ऐसा दृश्य कहाँ से आ सकता है। यह सोचकर, वह आँखें मींच और मुँह ढँक कर फिर सो रही। उसकी यह हालत देख कामपीड़ित राजा उसके मन की बात जानकर बोला कि कमलनयनी देवि! देखिए यह स्वप्न नहीं है। प्रहर्षिणि, जिसे कि तुम स्वप्न समझ रही हो वह सब सच्चा दृश्य है। उसके वचन सुनकर द्रौपदी को जान पड़ा कि वह स्वप्न नहीं देख रही हैं। उसने चारों दिशाओं में दृष्टि डाली तो उसे छोटी-छोटी घंटियों से युक्त एक सुंदर शोभायमान विमान दिखाई दिया ॥६०-६८॥


परस्त्रीलम्पटो लोभी कपटी विकटः पटुः। पद्मनाभो जजल्पेति भामिनि शृणु मद्वचः ॥६९॥

द्वीपोऽयं धातकीखण्डश्चतुलक्षसुयोजनैः। विस्तीर्णो वेष्टितो विष्वाक्कालोदकपयोधिना ॥७०॥

विद्धीमां देवकङ्काख्यां पुरीं ख्यातां वरां शुभैः। स्वर्णिर्गृहैः समृद्धीप्तां मणिमुक्ताफलाञ्चिताम् ॥७१॥

तत्पतिः पद्मनाभाख्यो वैरिवारविनाशकः। अहं पराक्रमाक्रान्तदिक्छक्रः शक्रसंनिभः ॥७२॥

भो भामिनि भवत्यर्थे भयत्रस्तेन चेतसा। मया कष्टेन वेगेन सुरः संसाधितो हठात् ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 69 से 73): इसके बाद परस्त्री-लंपट, लोभी, कपटी और पटु पद्मनाभ द्रौपदी से बोला कि भामिनि, जिस देश में इस समय तुम हो वह धातकीखण्ड नाम द्वीप है। इसका चार लाख योजन का विस्तार है और यह सब तरफ से कालोदधि समुद्र द्वारा घिरा हुआ है और यह सोने की कान्ति युक्त गृहों द्वारा सुदीप्त, मणि-मुक्ताफलों द्वारा भरीपुरी प्रसिद्ध अमरकंका नाम नगरी है। इसका स्वामी मैं पद्मनाभ राजा हूँ, जिसने कि अपने पराक्रम से सब दिशाओं को वश कर लिया है और शत्रुओं को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया है तथा जो इन्द्र के तुल्य है। भामिनि, तुम्हारे लिए मैंने बड़ा कष्ट उठाकर हठ-पूर्वक एक देवता को साधा और उसके द्वारा तुम्हें बुला मँगाया। तुम्हारे बिना मुझे खाना-पीना कुछ


त्वां विना भोजनं भव्यं भव्ये मे रोचते न हि। विरहेण तवात्यर्थं मृतावस्थामितोऽस्म्यहम् ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 69 से 74): भी अच्छा नहीं लगता था। देखो तुम्हारे विरह में मैं मरे के जैसा हो गया हूँ ॥६९-७४॥


सुरेण तेन वेगेन त्वमानाय्य सुखं स्थितः। प्रसन्ना भव भो भीरु भज भोगान्मया समम् ॥७५॥

देशं कोशं पुरं रत्नं चामरातपवारणे। तुरंगं दन्तिनं हर्म्यं गृहाण त्वं तवेप्सितम् ॥७६॥

विरहाग्निं परं लग्नं विध्वापय विचक्षणे। भोगोदकेन वेगेन मम मर्मणि दाहकम् ॥७७॥

सानुकूलां परां दृष्टिं कुरु मन्मथसंगरे। विषादं भज मा भव्ये मया सत्रं सुखं भज ॥७८॥

वल्लभा भव भूभर्तुर्भव्यभावमुपागता। मम मानसजं दुःखं हरन्ती सुखदायिके ॥७९॥

अर्थ (श्लोक 75 से 79): उस देवता ने बड़ी कृपा की जो कि वह तुम्हें ले आया। भीरु, अब तुम भय मत करो किन्तु प्रसन्न होकर मेरे साथ भोग विलास करो और देश, खजाना, पुर, रत्न, हाथी-घोड़े, महल वगैरह जो कुछ तुम्हें अच्छा जान पड़े उसे ग्रहण कर अपना मन बहलाओ-आनंद करो। सुंदरि, मेरे हृदय में जो विरह की आग जल रही है उसे बुझाओ-शान्त करो। विरह की आग द्वारा जलते हुए मेरे मर्म-स्थल पर भोगरूपी जल सींचो। हे कामदेव की प्रतिमा रूपी देवी, तुम विषाद छोड़कर मेरी तरफ सीधी दृष्टि डालो और भव्ये, मेरे साथ सुख-भोग भोगो। हे सुख देने वाली महादेवी, तुम मेरे मन की व्यथा को दूर करने वाली राज-रानी बनो और भव्य भाव-सीधे-सीधे स्वभाव का परिचय दो ॥७५-७९॥


निशम्येति शुचाक्रान्ता कम्पिताङ्गी स्फुटद्दृढा। रुरोद सेति दुःखार्ता बाष्पव्याप्तिमदानना ॥८०॥

हा युधिष्ठिर हा ज्येष्ठ हा विशिष्टं सुधर्मधीः। हा पावने पवित्रोऽसि वीराणामग्रणीर्वरः ॥८१॥

हा पार्थ नाथ समरे समर्थो दस्युशासनः। दुःखकाले समाक्रान्ते को मां रक्षति दुःखिनीम् ॥८२॥

अर्थ (श्लोक 80 से 82): पद्मनाभ के ऐसे वचनों की सुनकर शोक में निमग्न हुई वह सती थर-थर काँपने लगी और जब वह अपने हृदय के वेग को न रोक सकी तब एकदम रो पड़ी। उसकी आँखों से आँसू बह चले। गरज यह कि वह पद्मनाभ की चापलूसी की बातों से बड़ी खिन्न हुई। वह युधिष्ठिर आदि को याद कर विलाप करने लगी कि हा पूज्य युधिष्ठिर, तुम धर्म-बुद्धि के धारक हो, हा भीम, तुम बड़े वीर और पवित्र कहे जाते हो तथा हा रण में सामर्थ्य दिखाने वाले और शत्रुओं को वश करने वाले स्वामी अर्जुन, देखते नहीं कि मुझ पर यह कैसा दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। बतलाओ यहाँ मेरी कौन रक्षा करेगा ॥८०-८२॥


विना भवद्भिरित्यर्थं किं सुखं मम सांप्रतम्। किंवदन्तीमिमां तत्र को नेष्यति मम प्रियः ॥८३॥

सुरेणाहं हडिं नीता प्रसुप्ता भुवि विश्रुता। इत्याक्रन्दं प्रकुर्वाणा संतस्थे द्रुपदात्मजा ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 83 से 84): तुम ऐसे अचेत-सावधान-रहे जो तुझे मेरे हरे जाने की भी खबर न हुई। यही तुम्हारी वीरता है। बतलाओ अब मेरी क्या गति होगी? परन्तु इसमें तुम्हारा भी क्या दोष है? तुम्हें मेरे हरे जाने की खबर ही नहीं है और जब तक तुमको मेरी खबर न मिले तब तक भला तुम प्रयत्न ही क्या कर सकते हैं। हा, देवता ने मुझे सोई अवस्था में हर लिया और लाकर यहाँ छोड़ दिया। उसने मेरे साथ बड़ा अनुचित काम किया है-उसे ऐसा करना उचित नहीं था। इस तरह विलाप करती द्रौपदी तो रंज


स बभाण महायुक्त्या सुश्रोणि शृणु सांप्रतम्।
शोकं हित्वा रमस्वाशु मया सार्धं सुखाप्तये ॥८५॥

त्यक्त्वा धनंजयस्याशां दत्त्वा तस्मै जलाञ्जलिम्।
विषादं च विमुच्याशु भोगे रक्ता भव प्रिये ॥८६॥

अर्थ (श्लोक 83 से 86): कर रही थी और पद्मनाभ अपनी बात सोच रहा था। बाद वह द्रौपदी से बोला कि सुश्रोणि, तुम शोक काहे को करती हो। यहाँ तुम्हें कष्ट ही किस बात का है। तुम शोक छोड़कर आनन्द से रहो और सुख की प्राप्ति के लिए मेरे साथ रमण करो। मेरे साथ रमने से तुम्हें अपूर्व सुख होगा। प्रिये! धनंजय की आशा छोड़ो और विषाद त्याग कर भोगों का आनन्द लो ॥८३-८६॥


तदा निशम्य पाञ्चाली शीलभङ्गोद्धुरं वचः।
अचिन्तयन्निजे चित्ते चिन्तासंचयसंगता ॥८७॥

शीलरत्नमहो नृणां भूषणं शीलमुत्तमम्।
शीलाद्दासत्वमायान्ति सुरासुरनरेश्वराः ॥८८॥

शीलात्सुमुज्ज्वलः कायः शीलेन विपुलं कुलम्।
शीलेन जायते नाकः शीलं चक्रिपदप्रदम् ॥८९॥

शीलेन शोभते सद्यः सर्वसीमन्तिनीगणः।
शीलेन विपुलो वह्निः सीतावाच्च जलायते ॥९०॥

सुलोचना यतो याता शीलतः सुरनिम्नगाम्।
समुत्तीर्य तथान्यासां शीलात्तीरं स्थलायते ॥९१॥

शीलतो जलधिर्नृणां क्षणतो गोष्पदायते।
श्रीपालकामिनीवद्वै शीलं सर्वसुखाकरम् ॥९२॥

शीलयुक्तो मृतः प्राणी स सुखी स्याद् भवे भवे।
न जहामि वरं शीलं मृत्यावहमुपस्थिते ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 87 से 93): पद्मनाभ के शील की भंग करने वाले इन वचनों को सुनकर द्रौपदी ने सोचा कि मनुष्यों का सच्चा गहना शील-रूपी रत्न ही है। यही एक ऐसा मंत्र है कि जिसकी वजह से सुर-असुर और नरेश्वर भी उसके दास बन जाते हैं। शील से ही उज्ज्वल, सुंदर शरीर मिलता है-उच्च कुल में जन्म होता है, स्वर्ग की प्राप्ति होती है और उसी से चक्रवर्ती का पद मिलता है। शील के द्वारा ही स्त्री जाति की शोभा होती है और उसी के प्रभाव से जलती हुई आग भी पानी हो जाती है, जैसी कि सीता के लिए हुई थी। शील के प्रभाव से जिस तरह सुलोचना के लिए गंगा जैसी नदी भी थल हो गई, उसी तरह और भी जो जो स्त्री-जन शील का परिपालन करेंगी उनके लिए भी जल थल हो जायेगा। अधिक कहाँ तक कहा जाये यह शील ऐसा है कि इसका पालन करने से जीवों को सब सुख प्राप्त होते हैं- उनके लिए बड़ा भारी समुद्र भी क्षणभर में गाय के खुर तुल्य छोटा-सा गढ़ा हो जाता है। इस सम्बन्ध में श्रीपाल की स्त्री मैनासुंदरी स्मरणीय उदाहरण है। शीलव्रत का पालन करने में प्राण भी चले जायें तो भव-भव में सुख प्राप्त होता है। अतः प्राण जायें तो भी मैं किसी तरह शील को नहीं छोड़ूँगी। उसे प्राणों के बदले में रखूँगी ॥८७-९३॥


समुच्छ्वास्य विकल्प्येति जजल्प द्रुपदात्मजा।
शृणु त्वं प्रकटाः पञ्च पाण्डवा भ्रातरो भृशम् ॥९४॥

प्रचण्डाखण्डकोदण्डा जिताखण्डलमण्डलाः।
कम्पन्ते यत्प्रभावेन निर्जराः सज्जमानसाः ॥९५॥

अर्थ (श्लोक 94 से 95): यह सब सोचकर वह साहस के साथ पद्मनाभ से बोली-तुम नहीं जानते कि किससे ऐसी बेहूदी बातें कह रहे हो। जानते ही संसार प्रसिद्ध पाँच पाण्डव मेरे रक्षक हैं, वे अखण्ड धनुर्धर हैं, इन्द्रों के भी विजेता हैं। उनके प्रभाव से दृढ़-चित्त देवता भी थर-थर काँपते हैं। उनके रहते किसी शत्रु की ताकत नहीं जो उन्हें युद्ध में विचरते जरा भी रोक सके वा उनके आत्मीय को कष्ट दे सके।


संचरन्तो रणे नूनमनिवार्या विपक्षकैः।
ये घ्नन्ति घनघातेन वैरिणो विगतालसाः ॥९६॥

पुनर्यद्‌भ्रातरौ कृष्णबलौ त्रिखण्डनायकौ।
सुरासुरनरैः पूज्यौ तौ स्तो भारतभूषणौ ॥९७॥

कीचकेन समीहा मे कृता शीलविलुप्तये।
हतः स भ्रातृभिः सत्रं शतसंख्यैः सुपाण्डवैः ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 94 से 98): सच कहती हूँ कि वे ऐसे वीर हैं कि अपने सघन आघातों द्वारा बैरियों को बात ही बात में नष्टकर डालते हैं। इतने पर भी तीन खण्ड के स्वामी, सुर-असुरों द्वारा पूजित और भारत के भूषण कृष्ण-बलदेव जैसे जिसके भाई हैं उसी द्रौपदी के न साथ तुम्हारा यह बर्ताव है। तुम्हारी तरह ही एक बार कीचक ने मेरे शील को बिगाड़ने की चेष्टा की थी। फिर मालूम है कि उसे उसके सौ भाइयों के साथ प्रचण्ड पाण्डवों ने एकदम मार डाला था ॥९४-९८॥


पुनस्त्वं मोहतो मानिन्मा मुह्यातात्मवानसे।
नागीव विषवल्लीव वृथानीता त्वयाप्यहम् ॥९९॥

मासमेकं ममाशां त्वं मुक्त्वा तिष्ठ स्थिरं नृप।
एतावत्कालपर्यन्तं यद्भाव्यं तद्भविष्यति ॥१००॥

कथं कथमपि प्रायस्ते नायास्यन्ति पाण्डवाः।
मासमध्ये ततस्तुभ्यं रोचते यच्च तत्कुरु ॥१०१॥

इत्युक्ते भूपतिस्तस्थौ चिन्तयन्निति चेतसि।
रत्नाकरं समुत्तीर्य ते क्वायास्यन्ति पाण्डवाः ॥१०२॥

ततः सा निरलङ्कारा पानाहारविवर्जिनी।
शिरोवेणीं प्रबन्ध्यासौ तस्थौ चित्रगतेव वै ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 99 से 103): हे मानी राजा, तुमने जो कुछ किया सो तो किया, पर अब अपनी पाप-वासना त्याग दो। देखो, तुमने एक नागिन को या यों कहो कि विष की बेल को अपने घर में बुलाया है। इसका परिणाम बहुत बुरा होगा। तुम मेरी आशा छोड़कर सुख से रहो। इतने पर भी तुम्हें मेरे कहने का विश्वास न हो तो एक महीना ठहरो। तब तक बहुत करके पाण्डव भी यहाँ आ जायेंगे। तब तुम्हें अच्छा जान पड़े सो करना। द्रौपदी के वचन सुनकर पद्मनाभ ने मन ही मन यह सोचा कि यह कहती तो है, पर इतने विशाल रत्नाकर को पार कर यहाँ पाण्डव आ ही कैसे सकते हैं? इसके बाद राजा चुप रहा और द्रौपदी आहार-पानी, वेषभूषा आदि सब छोड़ चित्र में लिखी हुई काठ की पुतली की भाँति हो रही ॥९९-१०३॥


तदा गजपुरे प्रातः प्रचण्डैः पाण्डुनन्दनैः।
निरीक्षितापि नो दृष्टा पाञ्चाली परमोदया ॥१०४॥

अर्थ: उधर हस्तिनापुर में सबेरा हुआ। तब पाण्डवों को जान पड़ा के सर्वोत्तमा द्रौपदी महल में नहीं है-वह शत्रु द्वारा हरी गई। उसे बहुत देखा-भाला, पर कहीं उसका पता न पाया-उन्होंने उसकी भरसक खोज की, पर उसे कहीं भी न देखा ॥१०४॥


तस्या शुद्धिर्न कुत्रापि लब्धा संशोधिता ध्रुवम्।
पुनः पुनर्नरधीशैर्न दृष्टालोकिताप्यलम् ॥१०५॥

तदा द्वारावतीपुर्यां केनापि कथितं हि तत्।
चक्रिणे प्रणतिं कृत्वा द्रौपदीहरणं पुनः ॥१०६॥

क्षणं दुःखाकुलस्तस्थौ केशवो विषमो रणे।
पुनः क्रुद्धः स युद्धस्य दापयामास दुन्दुभिम् ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 105 से 107): इसी समय एक अपरिचित जनने द्वारावती जाकर कृष्ण को प्रणाम कर उनसे द्रौपदी के हरे जाने का सारा हाल कहा। जिसे सुनकर रण-विषम कृष्ण को बहुत दुख हुआ। उसका परिणाम यह निकला कि उन्होंने क्रोध में आकर युद्ध की घोषणा कर दी ॥१०५-१०७॥


तदा घोटकसंघाता गजा गर्जनतत्पराः । रथाश्चीत्काररावाढ्याश्चेलुश्चञ्चलचक्रिणः ॥१०८॥

उत्खातखड्गसन्नद्धाः कुन्तकादण्डपाणयः। पदातयस्ततस्तूर्णं प्रपेदिरे नृपाङ्गणम् ॥१०९॥

चतुरङ्गबलेनासौ यावद्यातुं समुद्ययौ। तावता नारदो यातोऽमरकङ्कापुरीं प्रति ॥११०॥

तत्र सा तेन संदृष्टा बाष्पौघप्लुतसन्मुखा। तप्तजांबूनदाभासा मुक्तकेशी कृशोदरी ॥१११॥

कपोलन्यस्तसद्धस्ता प्रतिमेव क्रियातिगा। रतिर्वा कामनिर्मुक्ता शची वाशक्रवर्जिता ॥११२॥

श्रियं निर्जित्य रूपेण स्थिता किंवा स्थिरासना। इति संचिन्त्य दुश्चिन्तो नारदश्चेत्यचिन्तयत् ॥११३॥

अर्थ (श्लोक 108 से 113): कृष्ण की आज्ञा पाते ही उनके हींसते हुए घोड़े, गर्जते हुए हाथी और चीत्कार करते हुए रथ चले। पयादे नंगी तलवारें, भाला, धनुष वगैरह हाथ में लिये हुए राज-आँगन में आये। इधर जब तक कृष्ण चतुरंग सेना ले चलने को तैयार हुए तब तक उधर नारद अमरकंकापुरी पहुँचे। वहाँ उन्होंने तपे सोने के जैसी प्रभावती कृशोदरी द्रौपदी को बाल बिखरे और आँसुओं से मुँह भीगे हुए देखा। वह मारे रंज के अपने हाथ पर कपोल रखे बैठी थी। ऐसी हालत में उसे देखकर यह जान पड़ता था मानों हलन-चलन आदि क्रिया रहित प्रतिमा ही है अथवा काम से बिछुड़ी हुई रति या इन्द्र से बिछुड़ी हुई इन्द्राणी ही है और वह अपने अनुपम रूप रूपी तलवार द्वारा लक्ष्मी को जीतकर ही यहाँ स्थिर हो गई है। द्रौपदी की ऐसी हालत देखकर कलहप्रिय नारद मन ही मन सोचने लगे कि हाय, मान के वश होकर मुझ पापी ने इस सती को व्यर्थ कष्ट में डाला। यह मैंने अच्छा नहीं किया ॥१०८-११३॥


सतीं संकटं नीता मया मानेन पापिना। ततः स केशवं प्राप्यावादीद्रणसमुद्यतम् ॥११४॥

विकटं कटकं विष्णो किमर्थं मेलितं त्वया। द्रौपदी धातकीखण्डे कङ्कयां सा तु विद्यते ॥११५॥

पद्मनाभो नृपस्तत्र वैरिवंशविनाशकः। आराध्य निर्जरं जह्रे तां सीतां वा दशाननः ॥११६॥

यत्र यातुं न शक्नोति नरः कोऽपि महाबली। अतोऽत्र तिष्ठ निर्द्वन्द्वमिदं कार्यं सुदुष्करम् ॥११७॥

तन्निशम्य स्वभूस्तत्र प्रभुः संमुच्य तद्बलम्। रथेनैकेन संप्राप नगरं हास्तिनं पुरम् ॥११८॥

संमुखं पाण्डवा विष्णुं गत्वा नत्वा न्यवेदयन्। द्रौपदीहतिवृत्तान्तं विश्वलोकभयप्रदम् ॥११९॥

अर्थ (श्लोक 114 से 119): इसके बाद वह रण के लिए उद्यत हुए कृष्ण के पास पहुँचे और उनसे बोले कि नारायण, तुमने यह विशाल सेना किस लिए एकत्र की है। द्रौपदी के लिए हो तो वह तो धातकीखण्डद्वीप की अमरकंकापुरी में मौजूद है। पूछो कि वह वहाँ कैसे पहुँची तो इसका उत्तर यह है कि जिस तरह रावण ने सीता को हरा था उसी तरह बैरियों के वंशभर का नाश करने वाले पद्मनाभ राजा ने एक देवता की आराधना कर उसे हरा है-उसे देवता के द्वारा वहाँ बुला मँगाया है। चाहे कैसा ही बलवान् मनुष्य क्यों न हो वहाँ जाने की किसी की भी शक्ति नहीं। अतः आप बेफिक्र होकर बैठिए। कारण वहाँ से द्रौपदी को लाना बहुत ही दुर्घट है-कठिन है। यह सुनकर कृष्ण ने सारी सेना को तो वहीं छोड़ा और आप अकेला ही रथ पर सवार होकर हस्तिनापुर गये। वहाँ पाण्डवों ने कृष्ण को द्रौपदी के हरे जाने का सारा हाल सुनाया, जिसे सुनकर बड़ा भय मालूम पड़ता था ॥११४-११९॥


ते तत्र मन्त्रणं कृत्वा मत्वा दुर्लङ्घ्यमर्णवम्। लवणाम्बुधिसत्तीरं प्रापुः पापपराङ्मुखाः ॥१२०॥

अर्थ: इसके बाद उन सबने मिलकर विचार किया और यह निश्चय किया कि लवण-समुद्र का


तत्र त्रिकोपवासेनासाद्यस्वस्तिकं सुरम् ।
लवणाम्बुधिसन्त्रार्थं प्रतस्थे विष्टरश्रवाः ॥१२१॥

ततस्ते स्यन्दनैः षड्भिर्देवदत्तैः सुवेगिभिः ।
पयश्चारिभिराभेजुः पुरीं कङ्काभिधां क्षणात् ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 120 से 122): लाँघना बहुत कठिन है, अतः इसके लिए कोई दूसरा ही उपाय करना चाहिए। यह विचार-विचार कर वे निष्पाप लवण समुद्र के तीर पर गये और वहाँ शक्तिशाली कृष्ण ने तीन उपवास के बाद उस समुद्र के स्वामी स्वस्तिक नाम देव को साधा। उसने इन्हें जल पर चलने वाले शीघ्रगामी छह रथ दिये। जिन पर सवार होकर ये छहों के छहों ही बात ही बात में अमरकंकापुरी पहुँच गये ॥१२०-१२२॥


हरिणा सह सिंहा वा जगर्जुः पञ्च पाण्डवाः ।
सज्जं शार्ङ्गं व्यधाद्विष्णुष्टङ्कारारावसंकुलम् ॥१२३॥

भीमेन भ्रामिता तूर्णं गदा विद्युल्लता यथा।
नकुलेन तदाग्राहि कुन्तो द्विद्कृन्तनोद्यतः ॥१२४॥

पाणौ कृतः कृपाणस्तु सहदेवेन दीप्तिमान् ।
सज्जिता सत्वरं शक्तिर्धर्मपुत्रेण जित्वरी ॥१२५॥

तदा धनंजयः प्राह नत्वा धर्मसुतं क्षणात् ।
वारयिष्याम्यर्रिं यूयं सर्वे तिष्ठत निश्चलम् ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 123 से 126): वहाँ जाकर विष्णु और पाण्डवों ने सिंहनाद किया। कृष्ण ने सार्ङ्ग-धनुष चढ़ाकर भीषण टंकार किया। भीम ने बिजली के जैसी गदा को वेग के साथ घुमाया। नकुल ने शत्रु को भेदने वाला भाला हाथ में लिया और सहदेव ने दीप्तिशाली तलवार हाथ में ली एवं धर्म पुत्र-युधिष्ठिर ने जीतने वाली शक्ति को धारण किया। अपने सब भाइयों को युद्ध के लिए उद्यत देखकर युधिष्ठिर को प्रणाम कर पार्थ ने कहा कि आप सब तो विश्राम कीजिए-मैं अकेला ही क्षणभर में शत्रु को वारण कर दूँगा। आपको कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है ॥१२३-१२६॥


इत्युक्त्वा पूरयित्वा स शङ्खं कोदण्डपाणिकः।
दधाव देवदत्ताह्वं पार्थः सद्रथसंस्थितः ॥१२७॥

हरिणा पूरितः पाञ्चजन्यो जयभयंकरः ।
तन्निशम्य पुराद्राजा निर्जगाम बलोद्धतः ॥१२८॥

रणतूर्येण तूर्णं स कुर्वंश्च बधिरा दिशः।
रेणुनाच्छादयन्व्योम युयुधे भूपतिर्बली ॥१२९॥

पार्थेन जर्जरीचक्रे पद्मनाभो महाशरैः ।
रणं हित्वा गतः पुर्यां दत्त्वा स विशिखां स्थितः ॥१३०॥

वैकुण्ठः कठिनं पादप्रहारैस्तां न्यपातयत्।
विविशुः पत्तनं सर्वे त्रासयन्तोऽखिलाञ्जनान् ॥१३१॥

भीमस्तु पातयामास गदया मन्दिराणि च।
आददाविन्दिराः सर्वाः सुन्दरो मन्दरस्थिरः ॥१३२॥

नष्टो जनस्तदा सर्वो भूपोऽपि प्रपलायितः ।
ब्रुवाणस्त्राहि त्राहीति द्रौपदीं शरणं ययौ ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 127 से 133): यह कह पार्थ ने देवदत्त नाम शंख को फूँकते हुए एक उत्तम रथ में सवार हो, धनुष सँभाल शत्रु पर धावा मारा। कृष्ण ने लोगों को भय देने वाला पाँचजन्य शंख बजाया। उसकी सुनकर बल से उद्धत पद्मनाभ पुर से बाहर निकला और उस बली ने रण के बाजों के शब्द द्वारा सब दिशाओं को बधिर करते हुए तथा धूल द्वारा आकाश को ढकते हुए वेग के साथ पार्थ से खूब युद्ध किया। पार्थ ने अपने महान् तीखे शरों द्वारा उसे जर्जरित कर दिया, जिससे वह रण को पीठ देकर भागा और फाटक बंद कर पुरी में छिप रहा। कृष्ण ने जाकर पाँवों के कठिन प्रहारों द्वारा फाटक को तोड़ डाला। वे सब नगरी के भीतर गये और वहाँ उन्होंने सब लोगों को भयभीत कर दिया। भीम ने अपनी गदा के द्वारा बहुत से मंदिर महल गिरा दिये और उनकी सब लक्ष्मी लूट ली। यह देख लोग भागे। उनके साथ ही राजा भी भगा। वह भाग कर त्राहि-त्राहि कहता द्रौपदी के शरण पहुँचा और बोला कि


द्रौपदीहरणात्पापं कृतं यद्धि मया फलम्।
लब्धं तदत्र भूमीशे इत्यवोचद्गिरं पराम् ॥१३४॥

द्रौपद्यथावदद्वाक्यं शृणु रे मूढमानस।
पुरा प्रोक्तं त्वदग्रेऽत्र समेष्यन्त्याशु पाण्डवाः ॥१३५॥

दुर्योधनादयो योधा युद्धे यैर्निर्जिताः क्षणात्।
तेषामग्रे भवद्वार्ता केति पूर्वं मयोदितम् ॥१३६॥

तावता तत्र ते प्रापुर्दन्तिनो वा निरङ्कुशाः।
भूपस्तान्वीक्ष्य नम्रोऽभूद्रक्ष रक्षेति संवदन् ॥१३७॥

तस्याः स शरणं प्राप्तो भूपोऽभाणीद्भयातुरः।
त्वमखण्डा महाशीला सुशीलासि समप्रिया ॥१३८॥

त्वं दापयाभयं दानमेतैर्मे जीवनप्रदम्।
सा तदादापयत्तस्याभयं दानं च तैर्नृपैः ॥१३९॥

ततः प्रणम्य कृष्णाङ्घ्री पाण्डवान्विनयोद्यतः।
यथायथं चकारासौ विनयं भोजनादिभिः ॥१४०॥

ते तदा द्रौपदीं लात्वा स्नात्वार्हत्पदपङ्कजम्।
प्रपूज्य कारयामास द्रौपद्याः पारणां पराम् ॥१४१॥

अर्थ (श्लोक 127 से 141): देवी, मैंने तुम्हें हर कर जो पाप किया उसी का यह फल मुझे मिल रहा है। मेरी तुम रक्षा करो। द्रौपदी बोली कि मूढ़, मैंने तो तुझसे पहले ही कहा था कि पाण्डव बहुत जल्दी आवेंगे और तुझे नष्ट कर देंगे भला जिन्होंने दुर्योधन आदि की क्षणभर में जीत लिया उनके आगे तेरी तो बात ही क्या है। राजा द्रौपदी को खुशामद कर ही रहा था कि उसी समय वहाँ हाथी जैसे निरंकुश पाण्डव पहुँच गये। उन्हें देखते ही रक्ष-रक्ष कहता हुआ पद्मनाभ एकदम नम्र हो गया। वह द्रौपदी की ओर देखता हुआ भय से आतुर हो बोला कि देवी, तुम अखण्ड शील पालने वाली सच्ची सुशीला हो। तुम मुझे अभयदान दो, जिसके द्वारा कि इनसे मेरे प्राण बचें। यह सुन द्रौपदी ने उसे अभयदान दिया उसके हृदय से पाण्डवों की तरफ का भय निकाल दिया। इसके बाद विनय के साथ कृष्ण और पाण्डवों को नमस्कार कर उसने उनका भोजन आदि से बड़ा सत्कार किया। इस समय पाण्डवों ने द्रौपदी के साथ स्नान कर और अर्हन्त देव के चरण कमलों की पूजा कर उसको पारणा कराया ॥१२७-१४१॥


इति शुभपरिपाकाच्छौभचन्द्रे जिनेन्द्रे वरकृतनतिभावा भव्यभावाः सुभव्याः।
द्रुपदनृपतिजातां ते समादाय प्रापुर्जननिकरसमिद्धं सद्यशो लोकचारि ॥१४२॥

यस्माद्धर्मान्नृपतिमहितं पद्मनाभं विजित्यं प्राप्ताः पूजां परतरमहाधातकीखण्डजाताम्।
लब्ध्वा पार्थप्रमदवनितां द्रौपदीं पाण्डवास्ते प्रापुः सातां जिनवरवृषप्रभावं तद्विद्धि ॥१४३॥

अर्थ (श्लोक 142 से 143): शुभचन्द्र जिनेन्द्र को उत्तम भक्ति से नमस्कार कर भव्य-भाव को प्राप्त हुए सुभव्य पाण्डवों ने द्रौपदी को प्राप्तकर जो सर्वोत्तम लोक-व्यापी उज्ज्वल यश प्राप्त किया वह सब पुण्य का ही प्रभाव है। देखो, वह सब जिनदेव के बताये धर्म का ही प्रभाव है जो कि राजाओं द्वारा पूजित पद्मनाभ राजा को जीतकर पाण्डवों ने दूर देश धातकीखण्डद्वीप में प्रतिष्ठा पाई और पार्थ-पत्नी द्रौपदी को प्राप्त किया। यह जानकर हे भव्य-गण! सदा धर्म का सेवन करो ॥१४२-१४३॥ इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचन्द्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में द्रौपदी-हरण, विष्णु और पाण्डवों का धातकीखण्ड में गमन और द्रौपदी की प्राप्ति इन विषयों का वर्णन करने वाला इक्कीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२१॥

द्वाविंशं पर्व

मुनिसुव्रतसंज्ञं तं मुनिसुव्रतमुत्तमम्। मुनिसुव्रतदं वन्दे मुनिसुव्रतं यतो भवेत् ॥१॥

अर्थ: मैं उन उत्तम मुनि, सुव्रत धारण करने वाले और मुनियों को सुव्रत-उत्तम व्रत-देने वाले मुनिसुव्रत जिनको नमस्कार करता हूँ जिनके आश्रय से मनुष्य मुनिसुव्रत का धारी हो जाता है ॥१॥


अथ ते पाण्डवा विष्णुपादौ नत्वा मुदा जगुः। तव प्रभावतो लब्धा द्रौपदी वैरिणा हृता ॥२॥

ततस्ते रथमारुह्य तामादाय मनोहराम्। प्रतस्थिरे नृपाः पूर्णमनोरथशताकुलाः ॥३॥

पूरितः पाञ्चजन्यस्तु पीताम्बरमहीभुजा। महानादं प्रकुर्वाणः पयोधरसमध्वनिः ॥४॥

तदा तद्भरतावासिचम्पापूःपरमेश्वरः। त्रिखण्डमण्डलाधीशः कपिलाख्यः सुचक्रभृत् ॥५॥

कम्पयन्तं धरां सर्वां तच्छङ्खनिनादं नृपः। अश्रौषीद्विपुलं नन्तुं जिनं प्राप्तो महामनाः ॥६॥

जिनस्य समवस्थानस्थितेनार्थं सुचक्रिणा। शङ्खशब्दं समालोक्य पप्रच्छे मुनिसुव्रतम् ॥७॥

कस्य शङ्खरवोऽयं भो इति पृष्टेऽगदीज्जिनः। जम्बूद्वीपस्य भरते भाति द्वारावती पुरी ॥८॥

त्रिखण्डभरताधीशस्तत्र कृष्णो हि भूपतिः। पार्थप्रियार्थमायातः शङ्खस्तेनात्र पूरितः ॥९॥

अर्थ (श्लोक 2 से 9): पाण्डवों ने कृष्ण के चरणों में प्रणाम कर कहा-इन शब्दों में हर्ष प्रकट किया कि हमने जो वैरी के द्वारा हरी गई द्रौपदी को प्राप्त किया, यह सब आप ही का प्रभाव है। इसके बाद मनोरथ सफल होने से प्रसन्न-चित्त पाण्डव सुंदरी द्रौपदी को लेकर, रथ पर सवार हो वहाँ से चले। चलते समय कृष्ण ने महान् नाद करने वाले और समुद्र जैसी गंभीर ध्वनि वाले अपने पाँचजन्य शंख को पूरा। जिसके पृथ्वी को कँपाने वाले शब्द को सुनकर धातकीखण्ड की चंपापुरी का स्वामी त्रिखण्डमण्डल-पति महामना कपिल नारायण जो कि जिन देव की वन्दना को आया था, चौंक पड़ा और उस अर्द्धचक्री ने वहीं समवसरण में स्थित मुनिसुव्रत स्वामी से प्रश्न किया कि प्रभो, यह शंखध्वनि किसकी है-या किसने की है। उत्तर में भगवान् बोले कि जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में द्वारावती नाम की पुरी सुशोभित है। वहाँ का राजा तीन खण्ड का प्रभु कृष्ण नारायण है। वह पार्थप्रिया द्रौपदी के लिए यहाँ आया है और उसी ने यह शंखध्वनि की है ॥२-९॥


तं द्रष्टुं गन्तुमिच्छुः सोऽवाचीत्थं धर्मचक्रिणा। चक्री च चक्रिणं नैव नेक्षते च हरिं हरिः ॥१०॥

तीर्थंकरो न तीर्थेशं बलभद्रो बलं च न। गतस्य चिह्नमात्रेण तस्य स्यात्तव दर्शनम् ॥११॥

तथापि कपिलस्तूर्णं ययौ तं द्रष्टुमिच्छया। अन्योन्यं ध्वजमात्रं तौ तदा ददृशतुः स्फुटम् ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 10 से 12): इसके बाद कपिल चक्री को कृष्ण से मिलने या उसे देखने का इच्छुक देखकर भगवान् ने कहा कि नारायण, देखो, यह नियम है कि चक्री-चक्री को, नारायण-नारायण को, तीर्थंकर-तीर्थंकर को और बलभद्र-बलभद्र को देख नहीं सकते और न ये आपस में मिल-जुल ही सकते हैं। लेकिन यदि तुम चाहो तो जाते हुए उनकी ध्वजा का अवश्य ही दर्शन कर सकते हो ॥१०-१२॥


ध्मातौ शङ्खौ च ताभ्यां तौ तयोः शुश्रुवतुः स्वरान्। केशवं जलधौ यातं मत्वा निर्वृत्य स गतः ॥१३॥

अर्थ: भगवान् के द्वारा यह सुनकर भी कपिल के हृदय में कृष्ण को देखने की इच्छा दूर न हुई और


चम्पामागत्य चक्री स निर्भर्त्स्य पारदारिकम्।
पद्मनाभं सुखेनास्थात्त्रिखण्डभरतेश्वरः ॥१४॥

अर्थ (श्लोक 13 से 14): वह उसको देखने की इच्छा से गया भी परन्तु जिन देव के कहे अनुसार उन दोनों को परस्पर में एक दूसरे की ध्वजा का ही दर्शन हो सका। दोनों ने अपने-अपने शंख फूंके। उनका शब्द भी दोनों ने ही सुना। इसके बाद कृष्ण को समुद्र में प्रवेश कर गया जानकर कपिल पीछा लौट आया और चंपा में आकर उसने परस्त्री-लंपट पद्मनाभ की पूरी-पूरी भर्त्सना की। बाद इसके वह तीन खण्ड का पति वहाँ सुख से रहने लगा ॥३-१४॥


अमी च पूर्ववत्तीर्त्वा जलधिं तत्तटे स्थिताः।
जनार्दनो जगादैवं यूयं व्रजत पाण्डवाः ॥१५॥

विसृज्य स्वस्तिकं यावदायामि यमुना तटम्।
उत्तीर्य तां तरीं मह्यं प्रेषयध्वं पुनर्नृपाः ॥१६॥

ततस्ते यमुनां प्राप्य द्रौपद्या सह पाण्डवाः।
उत्तीर्य तां स्थितास्तीरे दक्षिणे लक्ष्यलक्षणाः ॥१७॥

धूर्तत्वेनाशु भीमेन नीतोत्पाट्य तरीस्तटम्।
कृष्णबाहुबलं द्रष्टुं कालिन्द्युत्तरणक्षणे ॥१८॥

तावता केशवः प्राप्तो विसर्ज्य वरनिर्जरम्।
सरिज्जलमगाधं स वीक्ष्य ब्रूते स्म पाण्डवान् ॥१९॥

कथं तीर्णा सरिच्छीघ्रं भवद्भिः कथ्यतां मम।
तन्निशम्य तदावोचन्पाण्डवाश्छद्मतः खलु ॥२०॥

अस्माभिर्भुजदण्डेन तीर्णेयं च तरङ्गिणी।
तन्निशम्याच्युतो दोर्भ्यामुत्ततार सरिज्जलम् ॥२१॥

अर्थ (श्लोक 15 से 21): उधर वे सब पहले की भाँति ही समुद्र को पार कर उसके इस तट पर आ गये। वहाँ आकर कृष्ण ने पाण्डवों से कहा कि आप चलिए और जब तक मैं स्वस्तिक देव को विसर्जन करके आता हूँ तब तक यमुना को पार कर मेरे लिए नौका पीछे भेजिए। कृष्ण की आज्ञा पाकर पाण्डव द्रौपदी-सहित यमुना पार कर उसके दाहिने किनारे जा बैठे। वहाँ यमुना को पार करते समय कृष्ण का बाहुबल देखने की इच्छा से भीम ने यह धूर्तता की कि नौका को उठाकर एक किनारे रख दिया। इसी समय देवता को विदा करके कृष्ण आ गये और यमुना के जल को अथाह देखकर उन्होंने पाण्डवों से कहा कि आप लोगों ने इतनी जल्दी यमुना कैसे पार कर ली। सुनकर पाण्डवों ने यह छल भरा उत्तर दिया कि हमने जो यमुना को पार किया है वह बाहुदण्डों द्वारा पार किया है। यह सुन कृष्ण ने उसी क्षण कूदकर हाथों से ही यमुना पार करना शुरू किया और वे बहुत जल्दी उसके पार पहुँच गये ॥१५-२१॥


तीरं गत्वा नृपान्वीक्ष्य हर्षितास्यो जहर्ष सः।
जहसुः पाण्डवा वीक्ष्य कृष्णं हडहडस्वनाः ॥२२॥

हसतः पाण्डवान्वीक्ष्य प्रोवाच चक्रनायकः।
भवद्भिर्हसितं किं भो कथ्यतां कथ्यतां मम ॥२३॥

ते जगुर्यमुनातीरं वयं तर्याथ तेरिम।
त्वद्बाहुबलवीक्षायै प्रच्छन्ना सा कृता ततः ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 22 से 24): वहाँ जाकर कृष्ण ने पाण्डवों को देखकर बड़ा हर्ष प्रकट किया। इस समय कृष्ण को देखकर पाण्डव खूब ही खिलखिला कर हँस पड़े। उन्हें हँसते देखकर कृष्ण ने पूछा कि आप लोग इतना क्यों हँस रहे हैं। मुझे इसका भेद बताइए। सुनकर पाण्डवों ने कहा कि हम सब तो यमुना को नौका के द्वारा ही पार कर यहाँ आये-लेकिन तुम्हारा बाहुबल देखने की इच्छा से हमने वह नौका छुपा दी थी। महाराज, आपने हमारे साथ जैसा अघटित कार्य किया वैसा कोई नहीं कर सकता। अतः हम कहे बिना नहीं रह सकते कि आप वैरी रूपी हाथियों के कुंभ-स्थलों को विदारने के लिए हरि-हरि


नरेन्द्राघटितं कार्यमस्माभिर्घटितं स्फुटम्। प्रत्यर्थिकुम्भिकुम्भानां भञ्जने त्वं हरिर्हरिः ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 22 से 25): (सिंह)-हो, यह बिल्कुल ठीक है ॥२२-२५॥


श्रुत्वेति क्रोधभारेण बभाषे कम्पिताधरः। माधवः पाण्डवा यूयं सदा कलहकारिणः ॥२६॥

स्वजनस्नेहनिर्मुक्ता मायायुक्ताः सदा खलाः। किं सरित्तरणेऽस्माकं माहात्म्यं वीक्षितं ननु ॥२७॥

गोवर्धनसमुद्धारे कालिन्दीनागमर्दने। चाणूरचूर्णने चित्रं कंसदस्युविघातने ॥२८॥

अपराजितनिर्नाशे गौतमामरसंस्तवे। रुक्मिणीहरणे तूर्णं शिशुपालवधोद्यमे ॥२९॥

जरासंधवधेऽस्माकं चक्ररत्नसमागमे। त्रिखण्डपरमैश्वर्ये भवद्भिर्नेक्षितं बलम् ॥३०॥

अर्थ (श्लोक 26 से 30): पाण्डवों की ऐसी छलभरी बातें सुनकर कृष्ण ने दिखाऊ क्रोध से होंठ डसते हुए कहा कि सचमुच तुम लोग बड़े छली हो, स्वजन के स्नेह-रहित और माया के पुतले हो और सदा ही दुष्टता किया करते हो। अच्छा, बताओ कि नदी को तैरते समय तुमने हमारा कौन-सा माहात्म्य देखा, जिसे कि तुमने गोवर्धन उठाने के समय, कालिन्दी नाग के मर्दन के समय, चाणूर मल्ल को चकनाचूर करते वक्त, कंस-घात के समय, अपराजित के नाश के वक्त, गौतम अमर के संस्तव के समय, रुक्मिणी हरण के समय, शिशुपाल-वध के समय, जरासंध के वध के समय, चक्ररत्न की प्राप्ति के समय और तीन खण्ड के परम ऐश्वर्य के समय नहीं देख पाया था ॥२६-३०॥


सरिज्जलसमुत्तारे किं माहात्म्यं बलेक्षणे। अद्यापि जडता याति युष्माकं न खलात्मनाम् ॥३१॥

दूरं यान्तु भवन्तोऽत्र योजनानां शतान्तरे। अपाच्यां मथुरायां च चिरं तिष्ठन्तु पाण्डवाः ॥३२॥

अर्थ (श्लोक 31 से 32): नदी तैरते समय किसी का बल देखने में कौन-सा महत्त्व है-यह तो बहुत ही छोटा काम है। बात यह है कि तुम लोग दुष्टात्मा हो, अतः तुम्हारी जड़ता नहीं जाती। अब तुम लोग यहाँ से सौ योजन दूर जाकर चिरकाल तक दक्षिण मथुरा में रहो। यहाँ तुम्हारा कुछ काम नहीं है ॥३१-३२॥


इत्युक्ते दुःखचेतस्का जग्मुर्गजपुरं नृपाः। अभिमन्युसुतं तत्र सुभद्रापौत्रमुत्तमम् ॥३३॥

विराटनृपसंजातोत्तरादेवीसमुद्भवम्। हरिः परीक्षितं राज्ये स्थापयामास सुस्थिरम् ॥३४॥

द्वारावतीं ययौ विष्णुर्दक्षिणां मथुरां गताः। पाण्डवा मातृकान्ताद्यैः पुत्रैः सह समुद्धताः ॥३५॥

अथ द्वारावतीपुर्यां नेमीशो हरिसंसदि। संप्राप्तो बलमाहात्म्यवर्णने वर्ण्यतां गतः ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 33 से 36): कृष्ण के इन वचनों से पाण्डवों को बड़ा दुःख हुआ। वहाँ से वे हस्तिनापुर चले गये। कृष्ण ने तब वहाँ का राज्य सुभद्रा के पौत्र, विराट राजा की पुत्री उत्तरा देवी से पैदा हुए अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को दिया। इसके बाद कृष्ण द्वारावती चले आये और उद्धत पाण्डव मातृकान्त आदि पुत्रों सहित दक्षिण मथुरा चले गये। द्वारावती में एक दिन नेमिनाथ भगवान् और कृष्ण राजसभा में विराज रहे थे। बल के महत्त्व पर चर्चा छिड़ी कि दोनों में कौन अधिक बलवान् है। उस समय वहाँ नेमिनाथ स्वामी का बल लोगों ने कृष्ण से कम बताया। यह देख नेमि प्रभु ने अपना बल बतलाने के लिए कृष्ण को अपनी उँगली सीधी कर देने के लिए कहा। कृष्ण उँगली पकड़ कर उसे सीधी करने लगे, पर वे कर नहीं सके। प्रभु ने विनोद में उन्हें ऊपर उठा लिया। कृष्ण एक दम लटक गये


स कनिष्ठिकया कृष्णं दोलयामास तीर्थराट् ।
विरक्तः केशवो जज्ञे श्रीनेमे राज्यलोभतः ॥३७॥

अर्थ (श्लोक 33 से 37): और नेमिनाथ उन्हें झुलाने लगे। इससे कृष्ण ने अपना अपमान समझा और इसका फल यह हुआ कि अब कृष्ण नेमिनाथ स्वामी की तरफ से राज-काज से उदास हो गये ॥३३-३७॥


कदाचिज्जलखेलायां क्रीडन्वस्त्रस्य पीलने ।
जाम्बूवत्यभिमानेन मानितो न जिनेश्वरः ॥३८॥

शस्त्रशालां समासाद्य नागशय्यां समाश्रितः ।
शार्ङ्गं ज्यायां स आरोप्यापूरयत्कम्बु नासया ॥३९॥

तदागत्य हृषीकेशो नत्वा तत्पादपङ्कजम् ।
शशंस परमैर्वाक्यैस्तं विवाहस्य सूचकैः ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 38 से 40): इसके बाद एक दिन जलक्रीड़ा के समय नेमिनाथ प्रभु ने कृष्ण की रानी जाम्बूवति से अपना कपड़ा निचोड़ देने के लिए कहा। उस समय अभिमान में आकर उसने नेमि जिनेश्वर की बात पर कुछ ध्यान न दिया। वहाँ से नेमि प्रभु कृष्ण की शस्त्रशाला में गये। वहाँ जाकर प्रभु नागशय्या पर लेट गये। फिर उन्होंने सार्ङ्ग नाम धनुष चढ़ाया और नाक के द्वारा पाँचजन्य शंख को पूरा। शंख के शब्द को सुनते ही वहाँ कृष्ण आये और उन्होंने नेमि प्रभु के चरण-कमलों को नमस्कार कर उनके बल की बड़ी तारीफ की। मौका देखकर उन्होंने प्रभु से ब्याह के लिए भी प्रार्थना की ॥३८-४०॥


उग्रसेननरेन्द्रस्य जयावत्याश्च देहजाम् ।
राजीमतीं ययाचे स नेमिपाणिग्रहेच्छया ॥४१॥

राज्यलोभेन वैकुण्ठो मेलयित्वा बहून्पशून् ।
वाटके बन्धयामास नेमिवैराग्यसिद्धये ॥४२॥

विवाहार्थं जिनो गच्छन्वीक्ष्य बद्धान्बहून्पशून् ।
पृष्ट्वा तद्रक्षकान्प्राप वैराग्यं रागदूरगः ॥४३॥

अनुप्रेक्षां जिनो ध्यात्वा लौकान्तिकसुरैः स्तुतः ।
शिबिकां देवकुर्वाख्यां समारुह्य वनं ययौ ॥४४॥

अर्थ (श्लोक 41 से 44): इसके बाद कृष्ण ने नेमिनाथ के लिए उग्रसेन से जयावती रानी के गर्भ से पैदा हुई राजमती नाम पुत्री की याचना की। राज्य के लोभ से कृष्ण ने यह प्रपंच रचा कि नेमिनाथ प्रभु किसी तरह विरक्त हो जायें। बारात आने के दिन कृष्ण ने मार्ग में जगह-जगह बहुत से पशु बँधवा दिये। विवाह के अर्थ जाते समय उन बँधे हुए पशुओं को देखकर नेमिनाथ प्रभु ने उनके रखवालों से पूछा कि ये पशु काहे के लिए घेरे गये है। उन्होंने उत्तर दिया कि बारात में जो मांसभक्षी लोग आये हैं उनके अर्थ ये वध किये जायेंगे। बस यह सुनते ही नेमिनाथ विरक्त हो गये। राग से उनका आत्मा बहुत-अधिक दूर हट गया। वे बारह भावनाओं का विचार करने लगे। फिर क्या था, नियोगवश तत्काल ही लौकान्तिक देव आये और उन्होंने प्रभु के वैराग्य की बड़ी भारी प्रशंसा की ॥४१-४४॥


सहस्राम्रवणे स्थित्वा षष्ठ्यां च श्रावणे सिते ।
पक्षे सहस्रभूपालैः स दीक्षां प्रत्यपद्यत ॥४५॥

चतुर्थज्ञानधारी स बभूवासन्नकेवली ।
षष्ठोपवासतो यातः पुरीं द्वारावतीं पराम् ॥४६॥

कनकाभो नृपो वीक्ष्यागच्छन्तं पारणाकृते ।
जग्राह युक्तितो नेमिमुच्चदेशे स्थिरीकृतम् ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 45 से 47): इसके बाद देवकुरु नाम की पालकी पर सवार होकर भगवान् वन को चले गये और वहाँ सहस्राम्रवृक्ष के नीचे बैठकर सावन सुदी छट के दिन हजार राजाओं के साथ-साथ प्रभु ने दीक्षा ग्रहण की। थोड़े ही समय के बाद भगवान् को मनःपर्ययज्ञान हो गया। इसके बाद आसन्न-केवली नेमिप्रभु दो उपवास के बाद पारणा के लिए द्वारावती आये। उन्हें पारणा के लिए आया देखकर


पादप्रक्षालनं कृत्वा पूजनं च नतिं मुनेः।
त्रिशुद्ध्या चान्नशुद्ध्यान्नं ददे तस्मै नरेश्वरः ॥४८॥

श्रद्धादिगुणसंपन्नः पञ्चाश्चर्याणि चाप सः।
कोटी द्वादश रत्नानां सार्धा सुरकरच्युता ॥४९॥

वृष्टिः सौमनसी जाता ववौ वायुः सुशीतलः।
सुरसंताडितोऽभाणीत् दुन्दुभिस्तन्नृपालये ॥५०॥

जिनोऽथ निघसं कृत्वा वनं गत्वा स्थिरं स्थितः।
दधौ ध्यानं निजे चित्ते चिद्रूपस्य परात्मनः ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 45 से 51): कनकाभ नाम राजा ने भक्ति-पूर्वक पड़गाहा, ऊँचे आसन पर बैठाकर उनके पाँव धोकर उनकी पूजा की और मन-वचन-काय की शुद्धि के साथ उन्हें नमस्कार किया। इसके बाद नरेश्वर ने अन्न-शुद्धि पूर्वक उन्हें आहार-दान दिया। तब श्रद्धा आदि गुणों के भण्डार कनकाभ के यहाँ पाँच आश्चर्यमयी बातें हुई। देवताओं ने साढ़े बारह करोड़ रत्न बरसाये, फूल बिखेरे, शीतल सुगन्धित पवन चलाई, सुगन्धित जल बरसाया और दुन्दुभि बाजे बजाये। इसके बाद आहार करके प्रभु वन को चले गये और वहाँ स्थिर होकर चिद्रूप परमात्मा का ध्यान करने लगे ॥४५-५१॥


छद्मस्थसमये याते षट्पञ्चाशद्दिनप्रमे।
गिरौ रैवतके तस्थौ जिनः षष्ठोपवासभृत् ॥५२॥

महाव्रतधरो धीरः सुगुप्तिसमलंकृतः।
समित्याहितसच्चित्तः परीषहसहो बभौ ॥५३॥

धर्मध्यानबलाद्योगी गलत्यायुरयलतः।
दृष्टिछन्नप्रकृतीः सप्त जघान सुघनो जिनः ॥५४॥

समातपचतुर्जातित्रिनिद्राः स्थावराभिधम्।
सूक्ष्मं श्वभ्रतिरश्चोश्च युग्मे उद्योतकर्म च ॥५५॥

कषायाष्टकषण्ढत्वस्त्रीत्वहास्यादिषट् नृता।
क्रोधं मानं च मायां च लोभं संज्वलनाभिधम् ॥५६॥

निद्रां प्रचलां दृग्ध्यावरण्यान्यन्तरायकम्।
हत्वा जिनेश्वरः प्राप केवलज्ञानमद्भुतम् ॥५७॥

वरे ह्याश्वयुजे मासि शुक्लपक्षादिमे दिने।
केवलज्ञानपूजायां समागुश्च नराः सुराः ॥५८॥

वरदत्तादयोऽभूवन्नेकादश गणाधिपाः।
तस्याच्युतादिभूपालैः पूजितोऽभाज्जिनेश्वरः ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 52 से 59): इस प्रकार ध्यान करते प्रभु को छप्पन दिन छद्मस्थ अवस्था में बीते। यहाँ से प्रभु रैवतक गिरि पर जाकर ध्यान करने लगे। वहाँ षष्ठोपवास धारण कर महाव्रत के धारी, गुप्तियों द्वारा अलंकृत तथा समितियों के पालक प्रभु परीषहों के तेज से बड़े सुशोभित हुए। उन योगी जिनने धर्मध्यान के बल आयुकर्म के बिना तीन कर्म को गला दिया और फिर दर्शनमोहनीय कर्म की तीन और चारित्रमोहनीय कर्म की चार अनन्तानुबन्धी कषाय इस प्रकार सात प्रकृतियों को, जो कि आत्मा के सम्यक्त्व गुण को घातती हैं, आत्मा से नष्ट कर दिया। इसके बाद शुक्लध्यान के बल से उन्होंने घातिया कर्मों की शेष ४० चालीस तथा नामकर्म की तेरह-नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, दो इंद्रिय, ते इन्द्रिय, चौ इन्द्रिय एकेन्द्रिय, आतप, उद्योत, साधारण, सूक्ष्म और स्थावर-प्रकृतियों का नाश किया, जिससे प्रभु की आत्मा में अद्भुत केवलज्ञान-ज्योति प्रकट हो गई। तब कुँवार सुदी पड़वा के दिन उनके केवलज्ञान की पूजा के लिए मनुष्य, सुर-असुर सभी आये। भगवान् के वरदत्त आदि ग्यारह गणधर हुए और तब कृष्ण आदि राजाओं द्वारा पूजित प्रभु की अपूर्व ही शोभा हुई ॥५२-५९॥


धनदेन ततश्चक्रे समवस्थानमुत्तमम्।
जिनस्य विजितारातेर्विजिताखिलपाप्मनः ॥६०॥

अर्थ: इसके बाद वैरियों और पापों पर विजय पाने वाले उन भगवान् के लिए धनद ने आकर


शालो वेदी ततो वेदी शालो वेदी च शालकः।
वेदी शालश्च वेदी च क्रमतो यत्र शोभते ॥६१॥

प्रासादाः परिखा वल्ल्यः प्रोद्यानानि सुकेतवः।
सुरवृक्षा गृहा यत्र गणाः पीठानि भान्ति च ॥६२॥

मानस्तम्भाः सुनाट्यानां शालाः स्तूपा महोन्नताः।
मार्गा धूपघटा भान्ति ध्वजा यत्र सरांस्यपि ॥६३॥

मध्येसभां जिनो भाति स्पष्टाष्टप्रातिहार्यभृत्।
चतुस्त्रिंशन्महाश्चर्यातिशयैः समलंकृतः ॥६४॥

निर्ग्रन्थाः कल्परामाश्चार्यिका भवनभौकसाम्।
वामा भवनभौमोडुकल्पामर्त्यगजादयः ॥६५॥

एतैर्द्वादशभिः सभ्यैः शोभितश्चतुराननः।
व्याजहार परं धर्मं वरदत्तं गणाधिपम् ॥६६॥

अर्थ (श्लोक 60 से 66): समवसरण की रचना की। उसकी अद्भुत शोभा थी। समवसरण प्रासादों, परिखाओं, लताओं, उद्यानों, कल्पवृक्षों, गृहों, पीठों आदि से बड़ा शोभित था। मानस्तंभ, नाट्यशालाएँ, उन्नत स्तूप, मार्ग, धूपघट, ध्वजाएँ और तालाब आदि उसकी अपूर्व शोभा बढ़ा रहे थे। सभा के ठीक बीच में आठ प्रातिहार्यों और महान् चौंतीस अतिशयों द्वारा अलंकृत भगवान् सुशोभित थे। समवसरण में बारह सभाएँ थी, जिनके सभ्य क्रम से इस प्रकार थे-निर्ग्रन्थ मुनि-गण, कल्पवासी देवों की स्त्रियाँ, अर्यिकाएँ, ज्योतिषी देवों की स्त्रियाँ, व्यन्तर देवों की स्त्रियाँ, भवनवासी देवों की स्त्रियाँ, भवनवासी देव, व्यन्तरदेव, ज्योतिषी देव, कल्पवासी देव, मनुष्य, गौ आदि पशु। इन बारह प्रकार के सभ्यों द्वारा शोभित चतुरानन (चतुर्मुख) प्रभु ने वरदत्त गणधर के लिए उत्तम धर्म का उपदेश किया ॥६०-६६॥


जीवाजीवास्त्रवा बन्धः संवरो निर्जरा तथा।
मोक्षश्चेति सुतत्त्वानि सप्त प्रोक्तानि नेमिना ॥६७॥

षड्द्रव्यसंग्रहं चाख्यान्नेमिः पञ्चास्तिकायकम्।
अधोमध्योर्ध्वभेदेन स्थितिं लोकस्य विश्रुताम् ॥६८॥

सप्तनारकसंस्थानमायुरुत्सेधपूर्वकम्।
द्वीपसागरभेदांश्च नाकलोकसुकल्पनाम् ॥६९॥

चतस्रस्तु गतीः प्राहैन्द्रियाणि पञ्च षट्पुनः।
कायान्यञ्चदश स्वामी योगान्वेदत्रयं तथा ॥७०॥

पञ्चवर्गांन्कषायांश्च ज्ञानान्यष्टौ च संयमान्।
सप्तसंख्यांश्च चत्वारि दर्शनानि सुदर्शनः ॥७१॥

षड्लेश्या भव्यभेदौ च षट्सम्यक्त्वानि भेदतः।
संज्ञाहारकभेदांश्च चतुर्दश सुसंख्यया ॥७२॥

गुणस्थानानि जीवानां समासांस्तावतः पुनः।
षट् पर्याप्तीर्दश प्राणान्संज्ञांश्च वेदसंमियाः ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 67 से 73): भगवान् बोले कि जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये जिनमत के सात तत्त्व-पदार्थ-हैं। इसके बाद प्रभु ने छह द्रव्य और पाँच अस्तिकायों का उल्लेख कर उनके समुदाय रूप लोक का कथन किया और उसकी उर्ध्व, अधः, मध्य-रूप से तीन तरह की स्थिति बताई। उन्होंने लोक का हाल बताते हुए काय का उत्सेध, सात नरकों के संस्थान, स्वर्गलोक की कल्पना तथा द्वीप-सागरों के भेद कहे। इसके बाद भगवान् ने चार गति, पाँच इन्द्रिय, छह काय, पन्द्रह योग, तीन वेद, पच्चीस कषाय, आठ मद, सात संयम, चार दर्शन, छह लेश्या, भव्य-अभव्य, छह सम्यक्त्व, संज्ञा और आहार के भेद यों चौदह मार्गणाओं का कथन किया और चौदह गुणस्थान, चौदह जीवसमास, छह पर्याप्तियाँ, दस प्राण, चार संज्ञाएँ और बारह उपयोग इनका दिग्दर्शन कराया ॥६७-७३॥


उपयोगान्द्विषड्भेदाञ्जीवजातीः कुलानि च।
यतिधर्मस्वरूपं च श्रावकाध्ययनं तथा ॥७४॥

अर्थ: एवं प्रभु ने जीव-जातियों, कुलों, यतिधर्म और श्रावक धर्म के अध्ययन का भी क्रम बताया।


एवं श्रुत्वा शुभं श्रेयः केचित्सम्यक्त्वमाददुः।
मिथ्यात्वमलमुत्सृज्य सर्वसंसारकारणम् ॥७५॥

केचिदेकादश स्थानान्केचिच्च श्रावकव्रतान्।
जगृहुः संयमं चान्ये महाव्रतपुरःसरम् ॥७६॥

एवं स श्रेयसो वृष्टिं कुर्वन्निवृति निवृति।
विजहार जिनो नेमिर्भव्यान्संबोधयन्नरान् ॥७७॥

विहृत्य निखिलान्देशान् पुनः प्राप जिनेश्वरः।
ऊर्जयन्ताभिधं शैलमूर्जस्वी चार्जवान्वितः ॥७८॥

जिनं तत्रागतं वीक्ष्य यादवाः सोद्यमा मुदा।
वन्दनार्थं समाजग्मुर्बलदेवपुरः सराः ॥७९॥

स्तुत्वा नत्वा जिनं स्थित्वा श्रुत्वा धर्मं सुमानसाः।
सीरपाणिः पुनः प्राह जिनं नत्वाच्युतान्वितः ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 74 से 80): गरज यह कि भगवान् ने क्रम से सभी पदार्थ समझाये। भगवान् के द्वारा इस तरह शुभ धर्म को सुनकर कितने ही ने ग्यारह प्रतिमारूप श्रावक धर्म को ग्रहण किया और कितनों ने महाव्रत-पूर्वक संयम का आश्रय लिया। इस तरह धर्म वृष्टि कर भव्यों को संबोध देते हुए नेमिनाथ प्रभु ने देश-विदेश में विहार किया। इसके बाद तेजस्वी और आर्जव धर्मधारी भगवान् सब देशों में विहार कर ऊर्जयंत पहाड़ पर आये। प्रभु को वहाँ आया जानकर उद्यमी यादव-गण बलदेव को आगे कर उनकी वन्दना के लिए हर्ष के साथ आये। वे भव्य भगवान् की स्तुति कर, उनको नमस्कार कर अपने योग्य स्थान में बैठ गये और एक-चित्त होकर उन्होंने धर्म-श्रवण किया ॥७४-८०॥


भगवन्वासुदेवस्य प्राज्यं राज्यं महोदयम्।
वर्तिष्यते कियत्कालं द्वारावत्याः पुनः स्थितिः ॥८१॥

जिनः प्राह पुनर्भद्र विनश्येन्मद्यहेतुतः।
नृप द्वादशवर्षान्ते द्वीपायननिमित्ततः ॥८२॥

विष्णोर्जरत्कुमारेण भवेद् गत्यन्तरे गतिः।
सद्यः संयममासाद्य दूरं द्वीपायनोऽप्यगात् ॥८३॥

तथा जरत्कुमारश्च कौशाम्बीवनमाश्रयत्।
ततः पुनर्जगामाशु जिनो देशान्तरं खलु ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 81 से 84): इसके बाद जिन भगवान् को नमस्कार कर कृष्ण के साथ-साथ बलदेव ने प्रभु से पूछा कि भगवान्! कृष्ण का यह विशाल राज्य का ऐश्वर्य कब तक रहेगा और द्वारावती की स्थिति कितनी है। भगवान् ने उत्तर दिया कि नृप, द्वारावती पुरी आज से बारह वर्ष बाद मदिरा के हेतु से द्वीपायन मुनि द्वारा नष्ट होगी और कृष्ण की जरत्कुमार के द्वारा लगभग तभी मौत होगी। भगवान् की यह वाणी सुनकर और संयम लेकर द्वीपायन दूर देश चले गये और जरत्कुमार जाकर कौशाम्बी के वन में रहने लगा। इसके बाद भगवान् भी फिर वहाँ से अन्य देश को विहार कर गये ॥८१-८४॥


तावत्काले गते चायान्मुनिर्द्धीपायनः क्रुधा।
ददाह द्वारिकां सर्वां नान्यथा जिनभाषितम् ॥८५॥

बलकृष्णौ ततो यातौ कौशाम्बीगहनान्तरम्।
पिपासापीडितो विष्णुर्जज्ञे तत्र बलच्युतः ॥८६॥

मृतो जरत्कुमारस्य बाणेन क्षणतः क्षयी।
बलो जलं समादायागतोऽपश्यन्मृतं हरिम् ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 85 से 87): इसके बाद जब समय पूरा हुआ तब द्वीपायन वापस आ गये और अपनी दुर्दशा करने वाले यादवों पर क्रोध करके उन्होंने सारी द्वारिका को भस्म में मिला दिया। सच है कि जिनभाषित बात मिथ्या नहीं होती। इस तरह जब द्वारिका भस्म हो गई तब कृष्ण और बलदेव जाकर कौशाम्बी के गहन वन में पहुँचे। वहाँ कृष्ण को प्यास की बड़ी बाधा हुई। बलदेव उनके लिए पानी लेने गये और कृष्ण अकेले ही वहीं रहे। इसी बीच में दैवयोग से वहाँ जरत्कुमार आ गया और कृष्ण उसके बाणों


उवाह तद्वपू रामः षण्मासान्प्रीतितो भृशम्।
सिद्धार्थबोधितोऽप्याशु न विवेद मृतिं हरेः ॥८८॥

अर्थ (श्लोक 85 से 88): का निशाना बन परलोक यात्रा कर गये। जब बलदेव पानी लेकर लौटे तो उन्होंने कृष्ण को गत-प्राण पाया। बलभद्र और नारायण में पूर्व भव की बहुत ही गाढ़ी प्रीति होती है, अतः प्रीति के वश हुए बलदेव कृष्ण के मृत-शरीर को छह महीना तक छाती से लगाये लिये फिरे। सिद्धार्थ देव ने उन्हें बहुत कुछ समझाया, पर वे कृष्ण के शरीर को किसी तरह भी मृत शरीर मानने को तैयार नहीं हुए और उसे लिये-लिये ही फिरते रहे ॥८५-८८॥


ततो जरत्कुमारोऽसौ गत्वा पाण्डवसन्निधिम्।
आचख्यौ स्वकृतं मृत्युं केशवस्य सुकेशिनः ॥८९॥

श्रुत्वा तन्मरणं पाण्डुनन्दना रुरुदुर्भृशम्।
विस्मयं परमं प्राप्ता साध्वी कुन्ती रुरोद च ॥९०॥

जारसेयं पुरस्कृत्य बान्धवैः सह पाण्डवाः।
स्वकलत्रैः सुमित्रैस्तैर्गता बलदिदृक्षया ॥९१॥

कियद्भिर्वासरैः प्रापुर्वनस्थं च हलायुधम्।
तमासाद्य नृपाः सर्वे रुरुदुर्दुःखिताशयाः ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 89 से 92): इसके बाद जरत्कुमार पाण्डवों के पास गया और उसने अपने द्वारा हुई कृष्ण की मृत्यु का हाल उनसे कहा। कृष्ण का मरण सुनकर वे बड़े दुःखी हुए। साध्वी कुन्ती ने भी बड़ा विलाप किया। इसके बाद बलदेव को देखने की इच्छा से जरत्कुमार को आगे कर सब पाण्डव बन्धु, मित्र, कलत्र आदि सहित वन में चले। कितने ही दिनों तक चलकर वे जब वनविहारी बलदेव के पास पहुँचे तब उन्हें दुख की दशा में देखकर उन सबके हृदय दहल गये और दुखी होकर उन्होंने बड़ा विलाप किया ॥८९-९२॥


हली तान्वीक्ष्य सुस्निग्धः स्नेहनिर्भरमानसान्।
आलिलिङ्ग समुत्थाय कुन्तीनमनपूर्वकम् ॥९३॥

तदा तत्र क्षणं स्थित्वा जगदुस्ते सुपाण्डवाः।
हलायुध महाशोकं मुञ्च विष्णुसमुद्भवम् ॥९४॥

ज्ञात्वा संसारवैचित्र्यं सावधानमना भव।
दामोदरस्य देहस्य संस्कारः क्रियतां लघु ॥९५॥

रामो बभाण मोहात्मा स्वमित्रपुत्रबान्धवैः।
दह्नेतां पितरौ तूर्णं युष्माभिश्च श्मशानके ॥९६॥

अतिचक्रमुरुन्निद्राः पाण्डवा हलिना समम्।
प्रावृट्कालं ददानास्ते प्रतिबोधं सुबन्धुरम् ॥९७॥

अर्थ (श्लोक 93 से 97): इस समय उन्हें देखकर बलदेव को कुछ चेत हुआ और उठकर उन्होंने कुन्ती को नमस्कार कर सबसे भेंट की। इसके बाद वहाँ कुछ देर बैठकर पाण्डवों ने कहा कि बलदेव, आप विष्णु के महा शोक को अब छोड़ दीजिए और संसार की विचित्र दशा को जानकर कृष्ण के मृत शरीर का जल्दी ही संस्कार कीजिए। यह सुनकर मोह के वश हुए बलदेव ने कहा कि जाइए, ऐसी बातें न कीजिए। तुम ही न अपने मित्र, पुत्र, बन्धु-बान्धवों सहित अपने माता-पिता को श्मशान भूमि में ले जाकर चिता में झोंक दो। मुझे न समझाओ। मुझे सीख देने की जरूरत नहीं है। इसके बाद प्रबोध देते हुए पाण्डवों ने बलदेव के साथ सारा चौमासा बिना नींद लिये ही बिता दिया ॥९३-९७॥


सिद्धार्थबोधितः प्राह हली संस्कारसिद्धये।
वरं यूयं समायाता मम हर्षप्रदायिनः ॥९८॥

अर्थ: एक दिन उसी सिद्धार्थ नाम देव ने मृत-देह का संस्कार करने के लिए बलदेव को फिर भी समझाया। तब प्रबोध को प्राप्त होकर बलदेव बोले कि तुम बहुत अच्छे आये। तुम्हारे आने से मुझे


तुङ्गीगिरौ ददाहासौ कृष्णदेहं सपाण्डवः। पिहितास्रवमासाद्य प्रपेदे संयमं बलः ॥९९॥

अर्थ (श्लोक 98 से 99): बड़ा हर्ष हुआ। इसके बाद बलदेव ने पाण्डवों के साथ-साथ तुंगीगिरि पर जाकर कृष्ण के देह की दग्ध क्रिया की और बाद पिहितास्रव मुनि के पास जाकर उन्होंने संयम ले लिया ॥९८-९९॥


मुक्त्वा राज्यं सुनेमिर्वरवृषसुरथे नेमिवन्नम्रनाना-
नाकीन्द्रः कामहर्ताऽसमशममहितो रम्यराजीमतीं यः।
हित्वा दीक्षां प्रपेदे दरदमनमितः सिद्धकैवल्यबोधो
धृत्वा धर्मे धरित्रीं गिरिवरशिखरे संस्थितो भातु भव्यः॥१००॥

अर्थ: जिन उत्तम धर्म-रथ को धुरा की धारण करने वाले नेमि प्रभु ने राज्य को तथा सुंदरी राजीमती को त्याग कर दीक्षा धारण की, जो इन्द्रों द्वारा पूजित, काम को हरने वाले, अतुल समभाव युक्त और भय को दूर करने वाले हुए तथा जिन्होंने कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया वे प्रभु अंत में संसार को धर्मामृत का पान करा कर गिरनार पर्वत के शिखर पर विराजमान हुए और वहाँ से उन्होंने मोक्ष लाभ किया ॥१००॥


यो नेमिर्निर्णिखिलैर्नरेशानिकरैः संसेवितो यं नता
देवेन्द्रा वरनेमिना कृतमिदं तस्मै नमो नेमये।
नेमेः कम्रगुणा भवन्ति चरणे नेमेः परं शासनम्
नेमौ विश्वसितं मनो मम महानेमे वृषो दीयताम् ॥१०१॥

अर्थ: जो नेमिप्रभु अखिल नरेशों द्वारा संसेवित हैं, जिनको देवों के इन्द्र भी आकर पूजते और मानते हैं और जिन्होंने धर्मतीर्थ को प्रवर्तित किया है उन नेमिनाथ भगवान् के लिए मेरा बार-बार नमस्कार है। नेमिनाथ भगवान् में बड़े मोहक गुण हैं और उनका शासन सर्वोत्तम है। यही कारण है जो मेरा हृदय उन पर अटल विश्वास रखता है। वे महान् नेमि प्रभु मुझे धर्म-दान दें ॥१०१॥

त्रयोविंशं पर्व

नेमिं नौमि नतानेकनरामरमुनीश्वरम्। निर्जिताक्षं विपक्षांतं सद्धर्मामृतदायकम् ॥१॥

अर्थ: उन नमि जिन को नमस्कार है जो सच्चे धर्म-रूपी अमृत के दाता हैं, जिनकी विविध नर, सुर और मुनीश्वर वन्दना करते हैं तथा जो जितेन्द्रिय और विपक्ष रहित हैं ॥१॥


जारसेयं पुरस्कृत्य पाण्डवा द्वारिकां पुरीम्। समीयुः सह कुन्त्याद्यैः करुणाक्रान्तचेतसः ॥२॥

संवास्य तत्पुरीं पस्त्यैः प्रशस्तैः परमोदयैः। तत्र राज्ये जरापुत्रमस्थापयंश्च पाण्डवाः ॥३॥

पुरातनं स्मरन्तस्तु गोविन्दबलदेवयोः। प्राज्यं राज्यं बभूवुस्ते शोकशङ्कासमाकुलाः ॥४॥

अहो या निर्मिता देवैः पुरी भस्मत्वमागता। अदृश्यतामिता व्योमपुरीव नेत्रनन्दना ॥५॥

दशार्हाः परपूजार्हाः क्व गताः संगतोत्सवाः। अहो तौ क्वाटितौ रम्यावच्युताच्युतपूर्वजौ ॥६॥

रुक्मिण्यादिसुनारीणां निवासा नाकिनन्दनाः। क्व समीयुः सुतास्तासां हर्षोत्कर्षसमुन्नताः ॥७॥

अहो स्वजनसांगत्यं क्षणिकं ह्लादिनीसमम्। जीवितं च नृणां हस्ततलप्राप्तपयःप्रभम् ॥८॥

अङ्गना सङ्गरङ्गेण रक्ताक्तकरङ्गवत्। विरक्तत्वं प्रयात्याशु का मतिस्तत्र निश्चला ॥९॥

आत्मीया ये पराः पुत्राः पवित्रा आत्मनो न ते। केवलं कर्मकर्तारः संकल्पितसुखोपमाः ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 2 से 10): इसके बाद करुणा के भरे पाण्डव जारसेय को साथ लिये द्वारिका आये। उन्होंने परमोदय शाली तथा प्रशस्त गृहों द्वारा उस पुरी को फिर से बसाया और वहाँ की राजगद्दी पर जरा-पुत्र को बैठाया। इस समय वे कृष्ण-बलदेव के पुरातन प्राज्य राज्य का स्मरण करते हुए बड़े ही शोकाकुल हुए। बोले कि आश्चर्य है जो देवताओं के द्वारा रची हुई भी यह पुरी भस्म हो गई-आँखों को आनन्द देने वाली गननपुरी की भाँति आँखों की ओट हो गई-अदृश्य हो गई। बड़ा दुख होता है कि जिनके यहाँ नित नये उत्सवों की भीड़ रहा करती थी और जो सर्वोत्तम पूजा के योग्य थे वे दशार्ह कहाँ गये। वे कृष्ण-बलदेव कहाँ हैं जिनका कि पराक्रम देखते ही बनता था। हा! रुक्मिणी आदि स्त्रियों के वे निवास-महल तो एक भी दृष्टि नहीं पड़ते, जिनको देखकर देवगण भी लज्जित होते थे। उनके वे पुत्र-गण कहाँ है जो कि सदाकाल ही हर्ष के उत्कर्ष द्वारा उन्नत रहते थे। सच बात तो यह है कि यह स्वजन-समागम बिजली की भाँति क्षण-नश्वर है और मनुष्यों का जीवन चुल्लु के पानी-तुल्य है। यही कारण है कि जो पुरुष स्त्रियों के राग से रँगे हुए है वे भी संसार की यह दशा देख माहुर की भाँति बहुत जल्दी विरक्त हो जाते हैं। जिस तरह माहुर का रंग बहुत जल्दी छूट जाता है उसी तरह उनका राग भी थोड़े ही समय में ढीला पड़ जाता है। सच है कि ऐसे पदार्थों में अचल-बुद्धि करेगा ही कौन। इसी प्रकार पुत्र-पौत्र आदि जो पवित्र पदार्थ हैं वे भी वास्तव में अपने नहीं है, अपने-अपने कर्मों के कर्ता-भोक्ता हैं-अपने को सिर्फ संकल्प मात्र से सुखदायी भास पड़ने लगते हैं-वास्तव में सुख तो आत्मा में है ॥२-१०॥


ग्रहा इव गृहाः पुंसां विकाराकरकारिणः। परप्रेमकरा आपत्संगदाः संपदापहाः ॥११॥

अर्थ: इसी तरह महल-मकान भी मनुष्यों के लिए विकार में डालने वाले ग्रह हैं, पर पदार्थों में प्रेम कराने वाले हैं, इसलिए आपत्ति रूपी रोग में फँसाने वाले और सम्पदा को हरने वाले हैं। गरज यह


वसूनि जलदस्येव मण्डलानि सुनिश्चितम् । चञ्चलानि परप्रेमकराणि स्युः क्षणे क्षणे ॥१२॥

विशरारूणि सर्वत्र शरीराणि शरीरिणाम्। अनेहसा विनश्यन्ति चलानि शुष्कपर्णवत् ॥१३॥

आत्मनोऽपि महादेहो नानास्नेहप्रवर्धितः। कालेन विपरीतत्वं याति दुर्जनवत्सदा ॥१४॥

अहो इदं शरीरं तु वराहारैः सुपोषितम्। क्षणेन विपरीतत्वं याति शत्रुकदम्बवत् ॥१५॥

सप्तधातुमये काये व्यपाये पापपूरिते। पूतिगन्धे मनुष्याणां का मतिश्च स्थिराशया ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 11 से 16): कि वे पर में प्रेम कराकर निज सम्पदा को भुला कर आपदा में फँसाते हैं। धन-दौलत मेघ-मण्डल की भाँति चंचल और क्षण-क्षण में आत्मा को लुभाने वाली है। यह प्राणियों के शरीर भी विनाशशील हैं, चंचल है, सूखे पत्तों की भाँति काल का निमित्त पाकर नष्ट हो जाते है। हमारा यह शरीर भी जिसको कि हम विविध भाँति के तेल-फुलेल लगा कर बढ़ाते है, काल का निमित्त पाकर विपरीतता धारण कर लेता है-काँपने लगता है और काम देने में आनाकानी करने लगता है। बात यह है कि इसका स्वभाव दुर्जन पुरुष के जैसा है। दुर्जन पुरुष को चाहे जैसा ही क्यों न रक्खो वह निमित्त पाकर विपरीत हो ही जायेगा। यह कितने दुख की बात है कि उत्तम-उत्तम आहारों द्वारा पुष्ट किया गया भी यह शरीर शत्रु-समूह की भाँति एक क्षण में ही विमुख हो जाता है, जरा भी लिहाज नहीं करता है। जबकि यह शरीर सात धातुमय है, नाश-युक्त है, पाप का पिटारा है, दुर्गन्धि युक्त है तब फिर न जाने इसमें मनुष्यों की थिर बुद्धि कैसे होती है ॥११-१६॥


अहो अनङ्गरङ्गेण रञ्जिता रागिणश्चिरम्। रमन्ते रम्यरामासु सातं तत्र कियन्मतम् ॥१७॥

यदङ्गे बहुधा रोगा बहुकोटीप्रमाः खलु। वसन्ति तत्र किं सातं बिले दर्वीकरा यथा ॥१८॥

भोगास्तु भङ्गुराः पुंसां सुखदाः सेवनक्षणे। अन्ते तु नीरसास्तत्र मूढाः किं मन्वते सुखम् ॥१९॥

विषयामिषदोषेण विषमेणासुहारिणा। विषेणेव नराः प्रीतिं कथयन्ति क्षयोन्मुखाः ॥२०॥

विषयेण हता जीवा दुर्गतिं यान्ति दुःखदाम्। पुनस्तमेव सेवन्ते महती मूढता नृणाम् ॥२१॥

इन्द्रियैर्निर्जिता जीवा द्रवन्तो द्रव्यमोहतः। विलीयन्ते क्षणार्धेन तस्करैर्निद्रयाथवा ॥२२॥

अर्थ (श्लोक 17 से 22): आश्चर्य है कि काम के रंग से रंगे हुए कामी पुरुष सुंदरी कामिनियों के साथ चिरकाल तक रमा करते हैं, न जाने उन्हें सुख क्या होता है। भला जिनके शरीरों में करोड़ों रोगों का निवास हैं और जो साँप के बिल जैसे है उनमें उन्हें क्या सुख हो सकता है। यह दूसरी बात है कि वे मोहान्ध हुए उनके साथ रमने में सुख की कल्पना कर-सुख मानें। पर वास्तव में सुख का लेश भी स्त्रियों के साथ रमने में प्रतीत नहीं होता। इसी प्रकार ये भोग भी क्षणभंगुर हैं। ये पुरुषों का केवल भोगने के समय ही सुखदायी प्रतीत होते है। अन्त में इनमें कुछ भी स्वाद नहीं प्रतीत होता-नीरस जान पड़ते हैं। फिर कहा नहीं जाता कि उनमें मनुष्य सुख मानते हैं तो कैसे मानते है। समझ नहीं पड़ता कि जब विषय-रूपी आमिष प्राणहारी विष-तुल्य हैं तब क्षय के उन्मुख हुए मनुष्य उसके साथ क्यों प्रीति करते हैं? मनुष्यों की यह बड़ी भारी मूर्खता है जो विषयों के द्वारा ठगे गये जीव दुखदायी दुर्गति को जाते हैं, यह जानते बूझते हुए भी वे फिर विषयों का सेवन करते हैं और दुर्गति को जाते हैं। बात यह है कि संसार में


विषयाः क्षणिकत्वं हि वदन्तः सर्वशर्मणाम् ।
सत्यापयन्ति शीघ्रेण सौगतीयं मतं सताम् ॥२३॥

इन्द्रियाणि शरीराणि वसूनि विपुलानि च ।
मित्राणि कुत्र दृष्टानि सुस्थिराणि स्थिराशयैः ॥२४॥

भोगिवच्चञ्चला भोगा भयदा भव्यदेहिनाम् ।
सेव्यमानाः प्रवर्धन्तेऽग्निना कण्डूभरा इव ॥२५॥

भोगैः संभज्यमाना हि वर्धन्ते विषया ननु ।
न यान्ति शान्तितां क्वापि ज्वलना दारुतो यथा ॥२६॥

बम्भ्रम्यन्ते भवे जीवाः सुचिरं पञ्चरूपके ।
प्रपञ्चिते प्रपञ्चेन पच्यमाना महासुखैः ॥२७॥

अनादिवासनोद्भूतमिथ्यात्वमतिमोज्ञतः ।
विरमन्ति वृषाज्जीवा अविदन्तो हिताहितम् ॥२८॥

द्वादशाविरतीर्जीवाः कुर्वन्तो भवसंभवाः ।
विपदां यान्ति वेगेन विषयामिषलोलुपाः ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 17 से 29): जितने भी पदार्थ हैं वे सब क्षण-स्थायी हैं। यदि चित को स्थिर करके देखा जाये तो इन्द्रियों, शरीर, धन-दौलत, राज-पाट, मित्र-बान्धव कहीं भी कोई स्थिर नजर नहीं आता। ये भोग भोगी (साँप) के जैसे चंचल और भव्य प्राणियों को भय देने वाले हैं। सेवन करने से इनकी लालसा अधिकाधिक बढ़ती है जैसे कि आग के निमित्त से खुजली। भोगों के द्वारा भजे गये विषय और-और अधिक बढ़ते हैं, कभी भी उनकी शान्ति नहीं होती, जैसे काठ के मिलते हुए आग शान्त नहीं होती। यही कारण है जो बड़े-बड़े दुखों के द्वारा पचता हुआ यह जीव खूब लम्बे-चौड़े पंच परावर्तन-रूप संसार में चक्कर काटा करता है और अनादि वासना से जाग्रत हुई मिथ्यात्व-बुद्धि के मोह के मारे, हित-अहित की पहिचान न होने से धर्म की तरफ इसकी रुचि ही नहीं होती उसे यह अपनाता ही नहीं किन्तु उसकी तरफ से बहुत उदास रहता है-उसे घृणा की दृष्टि से देखता है। फल यह होता है बारह प्रकार की अविरति में रत-चित्त होकर यह विषय रूपी आमिष का भक्षण करता है और संसार की घोर विपदा में जा पड़ता है ॥१७-२९॥


कर्षन्ति सद्गुणान्सर्वान् जीवानां बुद्धिशालिनाम् ।
कषायास्ते मतास्तज्ज्ञैस्त्याज्या मोक्षसुखाप्तये ॥३०॥

युज्यन्ते कर्मभिः सत्रं जीवा यैस्ते मता बुधैः ।
योगाः शुभाशुभा हेयाः श्रेण्यसंख्येयमातृकाः ॥३१॥

मद्यवत्संप्रमाद्यन्ति यतो जीवा मदोद्धताः ।
ते प्रमादाः सदा त्याज्या यतः संसारसंभवः ॥३२॥

अर्थ (श्लोक 30 से 32): बुद्धिशाली जीवों के सद्गुणों को जो कषें-बिगाड़े-बुद्धिमान् लोगों ने उन्हें कषाय कहा है। कषाय मोक्ष सुख की प्राप्ति में अटकाव डालती है, अतः जिन्हें मोक्ष सुख की लालसा है उन्हें चाहिए कि वे कषायों को छोड़ें। जिनके द्वारा जीवों का कर्मों के साथ योग होता है बुद्धिमानों ने उन्हें योग कहा है। वे स्थूलपने शुभ तथा अशुभ इस प्रकार दो भेद रूप हैं परन्तु बारीकी के साथ देखा जाये तो वे श्रेणी के असंख्यात भाग मात्र हैं। मद से उद्धत हुए जीव जिनके द्वारा मदिरा की भाँति प्रमादी हो जाते हैं उन्हें प्रमाद कहते हैं। प्रमाद भी त्यागने-योग्य हैं क्योंकि इनसे संसार बढ़ता है ॥३०-३२॥


कौन्तेयाः सततं चित्ते चिन्तयित्वेति निर्ययुः ।
ततस्तु पल्लवं प्रापुर्नीवृतं जिनसंश्रितम् ॥३३॥

सुरासुरैः सदा सेव्यं तत्र नेमिजिनेश्वरम् ।
लोकत्रयसुसेव्यत्वाच्छत्रत्रयसुशोभितम् ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 33 से 34): पाण्डव बहुत-काल मन ही मन यों संसार की दशा को विचार कर बाद वहाँ से निकले और पल्लव नाम देश में आये, जहाँ कि जिन भगवान् विराजमान थे। वहाँ उन्होंने सुर-असुरों द्वारा सेवित


शोकशङ्कापहारित्वादशोकानोकहाङ्कितम्। चतुःषष्टिचलच्चारुचामरैः परिवीजितम् ॥३५॥

जगत्त्रयसुशीर्षस्थमिव सिंहासनमाश्रितम्। सामोददिव्यदेहत्वात्पुष्पवृष्ट्योपशोभितम् ॥३६॥

कर्मारिजयतो जातदिव्यदुन्दुभिदीपितम्। अष्टादशमहाभाषाभाषणैकमहाध्वनिम् ॥३७॥

अर्थ (श्लोक 33 से 37): और तीन लोक के स्वामी नेमि प्रभु की वन्दना की। नेमिप्रभु छत्रत्रय द्वारा शोभित थे, शोक हरने वाले अशोक वृक्ष द्वारा अंकित थे। उनके ऊपर सुंदर चौंसठ चँवर ढोरे जा रहे थे। वे सिंहासन पर विराजे हुए ऐसे जाने जाते थे जैसे कि तीन लोक के शिखर पर ही विराजे हों। उनकी देह स्वयं ही सुगंधपूर्ण और दिव्य थी, अतः पुष्पों की बरसा से उसकी और अधिक शोभा हो गई थी। भगवान् ने कर्म-वैरियों का नाश कर दिया था, जिसकी घोषणा के लिए जो दिव्य दुन्दुभियाँ बजती थीं उनसे उनकी और भी शोभा बढ़ गई थी। वे अठारह महा भाषा-रूप एक महाध्वनि में उपदेश करते थे ॥३३-३७॥


सूर्यकोटिसमुद्भासिभास्वद्भामण्डलामलम्। वीक्ष्य ते पाण्डवा भक्त्या पूजयन्ति स्म पूजनैः ॥३८॥

स्तोतुमारेभिरे देवं पाण्डवाः पावनाः पराः। नावायसे नृणां नाथ संसाराब्धौ त्वमेव हि ॥३९॥

त्वमेव जगतां नाथस्त्वमेव परमोदयः। त्वमेव जगतां त्राता त्वमेव परमेश्वरः ॥४०॥

त्वमेव हितकृन्नॄणां त्वमेव भवतारकः। त्वमेव केवलोद्भासी त्वमेव परमो गुरुः ॥४१॥

त्वत्प्रसादाज्जना यान्ति जवंजवाब्धिपारताम्। तव प्रसादतो जीवो लभते पदमव्ययम् ॥४२॥

त्वमव्ययो विभुर्भास्वान्भर्ता भवभयापहः। भगवान्भव्यजीवेशः प्रभग्नभयसंकटः ॥४३॥

कैवल्यविपुलं देवं सर्वज्ञं चिद्गुणाश्रयम्। मुनीन्द्रमामनन्ति त्वां गणेशं गणनायकम् ॥४४॥

त्वया बाल्येऽपि नाकारि प्राज्ये राज्ये विराजिते। गजवाजिमहालक्ष्म्या राजीमत्या महामतिः ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 38 से 45): करोड़ सूर्यों की प्रभा से भी कहीं अधिक भासमान प्रभा वाला उनका निर्मल भामण्डल था। ऐसे प्रभु को देखकर पाण्डवों ने भक्ति के साथ, विविध सामग्री द्वारा उनकी पूजा की-सेवा की। इसके बाद वे पवित्र पाण्डव उनकी यों स्तुति करने लगे कि नाथ, इस संसाररूप समुद्र में मनुष्यों के लिए यदि कोई नौका है तो तुम्हीं हो। तुम्हीं संसार के स्वामी और परमोदयशाली हो। तुम्हीं जगत् के रक्षक और परमेश्वर हो। तुम्हीं हितैषी और भव से पार करने वाले हो। तुम्हीं केवलज्ञान द्वारा भासमान और परम गुरु हो। यही कारण है कि जीव तुम्हारे प्रसाद से ही संसार-समुद्र को पार करते हैं और तुम्हारे प्रसाद से ही अविनाशी मोक्ष पद को पाते हैं। हे भगवन्! तुम अव्यय हो, विभु हो, दीप्तिशाली हो, भर्ता हो, भव-भय के हर्ता हो, भव्यजीवों के ईश हो, भय-संकटों को भय करने वाले हो। यही कारण है जो गणनायक तुम्हें कैवल्य, विपुल, देव, सर्वज्ञ, चिद्गुणाश्रय, मुनीन्द्र और गणेश कहते हैं। प्रभो! धन्य है आपको जो आपने एक विपुल राज्य के होते हुए भी बाल्यकाल में भी गज, घोड़े आदि लक्ष्मी और राजीमती को स्वीकार न किया ॥३८-४५॥


कन्दर्पदर्पसर्पस्य हन्तौ त्वं गरुडायसे। सर्वलोकहिताख्यानाद्वृत्तकृद्वृत्तदायकः ॥४६॥

अर्थ: इसलिए कहते हैं कि आप कंदर्प-दर्प-सर्प को मारने के लिए गरुड़ के जैसे हो। प्रभो! आप


धिषणाधिष्ठितत्वेन त्वमेव धिषणायसे। अतो नमो जिनेन्द्राय नमस्तुभ्यं चिदात्मने ॥४७॥

नमस्ते बोधसाम्राज्यराज्याय विजितद्विषे। अनन्तशर्मणे नित्यमाबालब्रह्मचारिणे ॥४८॥

केवलज्ञानरूपाय नमस्तुभ्यं महात्मने। नमस्तुभ्यं शिवाढ्याय केवलं केवलात्मने ॥४९॥

नमोऽनन्तसुबोधाय विशुद्धाय बुधाय ते। त्वया राजीमती त्यक्ता बाल्ये बालार्कसंनिभा ॥५०॥

पूर्णचन्द्रानना तन्वी रतिरूपा गुणाकरा। निर्दोषा रससंपूर्णा लक्षलक्षणलक्षिता ॥५१॥

कस्ते देव गुणान्वक्तुं समर्थोऽत्र जगत्त्रये। इति स्तुत्वा स्थिताः सभ्याः सभायां भास्वरा नृपाः ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 46 से 52): लोक को हित का उपदेश करते हो, अतः सबके हितैषी हो। भगवन्! आप अनन्त बुद्धिशाली है, अतः आपके काम भी बुद्धि से पूर्ण होते हैं। अतः हे चिदात्मा-मय जिनेन्द्र, हम तुम्हारे लिए नमस्कार करते हैं-बार-बार तुम्हारे चरणों में धोक देते हैं। हे केवलज्ञानरूप महात्मा! तुम्हारे लिए नमस्कार है। केवल आत्मा और शिव के भण्डार, तुम्हें नमस्कार है। शत्रुओं के विजेता और ज्ञानसाम्राज्य के राजा, तुम्हें हमारी वन्दना है। बाल ब्रह्मचारी, अनंत सुख के खजाने अनंतज्ञान के धनी, विशुद्ध आत्मा आपको नमस्कार है। नाथ, सूरज के जैसी प्रभा वाली, तन्वी, चन्द्रवदनी, रति जैसी रूपशालिनी, गुणों की खान, निर्दोष जिस राजीमती को आपने बाल्यावस्था से छोड़ दिया वैसी सुंदरी युवती को कौन छोड़ सकता है-काम-जय की हद हो गई। प्रभो! तीन लोक में ऐसा कौन है जो आपके सब गुणों की गाथा को गा सके। इस प्रकार स्तुति कर दीप्तिशाली पाण्डव सभा में बैठ गये ॥४६-५२॥


व्याजहार जिनो धर्मं पाण्डवान् शृणुताधुना। यूयं यत्नेन जीवानां सातसाधनमुद्धरम् ॥५३॥

धर्मो जीवदया भूपैकभेदो विशदात्मकः। सा षड्जीवनिकायानां रक्षणं परमा मता ॥५४॥

द्विधाभ्यधायि धर्मो भो यतिश्रावकगोचरः। पञ्चाचारं च चरतां यतिधर्मः प्रजायते ॥५५॥

दर्शनं निर्मलं यत्र दर्शनाचार उच्यते। ज्ञानं पापठ्यते शुद्धं ज्ञानाचारः स कथ्यते ॥५६॥

चारित्रं चर्यते यत्र त्रयोदशविधं परम्। चारित्राचार उक्तः स चारुचारित्रचेतसाम् ॥५७॥

यत्तपस्तप्यते सद्भिः षोढा बाह्यं तथान्तरम्। तपआचार उक्तः स विचारचतुरैर्नरैः ॥५८॥

यद्वीर्यं प्रकटीकृत्य चर्यते चरणं महत्। वीर्याचारः प्रणीतः स जिनेन्द्रेण सुनेमिना ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 53 से 59): इसके बाद भगवान् ने उनके लिए धर्म का उपदेश करना शुरू किया। भगवान् बोले कि पाण्डवों, अब तुम हर-प्रयत्न के साथ एकाग्रचित्त होकर उस धर्म का उपदेश सुनो कि जो सुख का मुख्य साधन है। राज-गण, धर्म जीवदया को कहते हैं। वह विशद धर्म एक भेदरूप ही है। दया-सर्वोत्तम दया-छह काय के जीवों की रक्षा को कहते हैं। इस धर्म के इस प्रकार दो भेद हैं, एक यतिधर्म और दूसरा श्रावकधर्म। इनमें यतिधर्म उसे कहते हैं जिसमें कि पाँच प्रकार के आचार का पालन किया जाता है। निर्मल सम्यग्दर्शन के पालने को दर्शनाचार कहते हैं। जिसके द्वारा ज्ञान विशुद्ध होता है उसे ज्ञानाचार कहते हैं। तेरह प्रकार के चारित्र को ठीक-ठीक पालने का नाम चारित्राचार है। विचार-शील मनुष्यों ने बाह्य और अभ्यन्तर के भेद से बारह प्रकार के तप तपते को तपआचार माना है और जो वीर्य को प्रकट करके उत्तम आचरण करना है उसे वीर्याचार कहते हैं।


त्रिधात्मकः पुनः प्रोक्तो धर्मः श्रीजिननायकैः। दर्शनज्ञानचारित्रभेदेन भवभेदिना ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 53 से 60): पाण्डवों को नेमि जिनने इस तरह धर्म का उपदेश किया। बाद वे भव-भेदी नेमि भगवान् बोले कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के भेद से धर्म तीन प्रकार का भी है ॥५३-६०॥


शङ्कादिदोषनिर्मुक्तमष्टाङ्गपरिपूरितम्। तत्र सम्यक्त्वमाख्यातं तत्त्वश्रद्धानलक्षणम् ॥६१॥

संज्ञानं निर्मलं रम्यं जिनोक्तश्रुतसंश्रितम्। शब्दार्थादिप्रभेदेन पूरितं गदितं बुधैः ॥६२॥

त्रयोदशविधं विद्धि चारित्रं चरणोद्यतैः। प्रोक्तं पुरातनैः पुंसां सर्वकर्मनिकृन्तनम् ॥६३॥

अथवा दशधा धर्मो मतः क्षान्त्यादिलक्षणः। आद्यः क्षान्त्याह्वयस्तत्र मार्दवो मानमोचनम् ॥६४॥

आर्जवं शाम्बरीत्यागः शौचं लोभविवर्जनम्। सत्यं तु सत्यवादित्वं संयमो जीवरक्षणम् ॥६५॥

तपस्तु तापनं देहे त्यागो वित्तविवर्जनम्। निर्ममत्वं शरीरादावाकिंचन्यं मतं जिनैः ॥६६॥

चरणं ब्रह्मणि स्वस्मिन्ब्रह्मचर्यं स्वभावजम्। सर्वसीमन्तिनीसंगत्यागो वा तन्मतं जिनैः ॥६७॥

अथवा परमो धर्मः स चिदात्मनि या स्थितिः। मोहोद्भूतविकल्पौघवर्जिता निर्मलात्मिका ॥६८॥

चिद्रूपः केवलः शान्तः शुद्धः सर्वार्थवेदकः। उपयोगमयोऽहं चेति स्मृतिर्धर्म उच्यते ॥६९॥

मनसा वचसा तन्वा योऽचिन्त्यश्चेतनात्मकः। स्वानुभूत्या परं गम्यो ध्यायतेऽत्र निरञ्जनः ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 61 से 70): शंका आदि आठ दोष रहित तथा आठ अंग सहित जो पदार्थों का श्रद्धान करना है उसे सम्यग्दर्शन कहते हैं। जिनदेव ने तत्त्वों के सच्चे, निर्मल ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहा है। वह शब्द और अर्थ के भेद से दो तरह का है। कर्मों को दूर करने वाले चारित्र के तेरह भेद हैं और कर्मों को दूर करने वाले आचरण को चारित्र कहते हैं अथवा क्षमा आदि के भेद से धर्म दस प्रकार का भी है। क्रोध के जीतने को क्षमा कहते हैं। मान नहीं करने का नाम मार्दव है। मायाचार के त्याग को आर्जव कहते हैं। लोभ नहीं करने का नाम शौच है। सच बोलने को सत्य और जीवों की रक्षा को संयम कहते हैं। देह के तपाने को तप और धन के छोड़ने को त्याग कहते हैं। शरीर आदि से ममत्व नहीं करने का नाम आकिंचन्य और आत्मा में लीन होने का नाम ब्रह्मचर्य है अथवा सब स्त्री मात्र का त्याग करना ब्रह्मचर्य है अथवा मोह से उत्पन्न हुए विकल्प-जालों के बिना निर्मलता के साथ आत्म-स्वरूप में लवलीन होने को धर्म कहते हैं। गरज यह कि जो ऊपर धर्म के भेद-प्रभेद बताये गये हैं वे व्यवहारनय की दृष्टि से कहे गये हैं। नीचे जो आत्मस्वरूप में लीन होना धर्म बताया गया है वह निश्चयनय की दृष्टि से कहा गया है और वास्तव में चिद्रूप, केवलज्ञानस्वरूप, शान्त, शुद्ध और सर्वार्थवेदक तथा उपयोगमय आत्मा ही सच्चा धर्म है और यही कारण है जो मन-वचन द्वारा मैं चैतन्य-स्वरूप और उपयोग-मय हूँ, इस तरह के दृढ़ विचार को धर्म कहा गया है ॥६१-७०॥


संसारसागरान्मुक्तौ यः समुद्धृत्य देहिनम्। धत्ते धर्मः स आख्यातः परमो विपुलोदयैः ॥७१॥

अर्थ: धर्म शब्द का अर्थ है कि जो संसार-सागर से निकाल कर जीवों को मुक्ति में पहुँचा दे और ज्ञान द्वारा आत्मा की जो विशुद्धि होती है वही सच्चा धर्म है और वही एक ऐसा कारण है जो कि जीवों को संसार के बंधन से छुड़ा सकता है। तात्पर्य यह है कि आत्मा की बिल्कुल ही शुद्ध अवस्था


धर्मः पुंसो विशुद्धिः स्यात्सुदृग्बोधमयात्मनः। शुद्धस्य परमस्यापि केवलस्य चिदात्मनः ॥७२॥

अर्थ (श्लोक 71 से 72): को धर्म कहते हैं और सिवा इसके जो भेद-प्रभेद रूप धर्म है वह इसी निश्चय का साधन है। गरज यह कि व्यवहार धर्म द्वारा ही निश्चय धर्म प्राप्त होता है ॥७१-७२॥


इति धर्मस्य सर्वस्वं श्रुत्वापृच्छन्भवान्तरान्। आत्मीयानात्मनः शुद्ध्यै कौन्तेयाः कपटोज्झिताः ॥७३॥

अस्माभिः किं कृतं श्रेयो वयं येन महाबलाः। जाताः स्नेहयुताः सर्वेऽन्योन्यं निर्मलमानसाः ॥७४॥

पाञ्चाली केन पुण्येन जातेयमीदृशी शुभा। केनाघेन बभूवासौ पञ्चपुरुषदोषिणी ॥७५॥

बभाण भगवाञ्छ्रुत्वा भव्यानुद्धर्तुमुद्यतः। जम्बूषशोभिते द्वीपे सस्यं बाभाति भारतम् ॥७६॥

तत्राङ्गीव महानङ्गैरङ्गदेशः सुलक्षणैः। दुर्लक्ष्यस्तु विपक्षेण क्षोण्यां ख्यातिं गतोऽक्षयी ॥७७॥

अर्थ (श्लोक 73 से 77): इस तरह धर्म का पूर्ण स्वरूप सुनकर कुन्ती-पुत्र पाण्डवों ने सीधे-साधे वचनों द्वारा आत्म-शुद्धि के अभिप्राय को लेकर प्रभु से अपने भवान्तरों को पूछा। वे बोले कि भगवन्, हमने कौन-सा ऐसा पुण्य किया कि जिसके प्रभाव से हम लोग परस्पर स्नेह के भरे महाबली और निर्मल-चित्त हुए और पांचाली ने वह कौन-सा पुण्य पैदा किया था जिससे कि वह ऐसी अद्भुत सुन्दरी हुई और फिर उससे ऐसा कौन-सा पाप बन गया कि जिससे उसे पाँच पुरुषों का दोष लगा अर्थात् वह पंच भर्तारी कही गई। उत्तर में भव्य पुरुषों के उद्धार के लिए तत्पर भगवान् बोले कि जम्बूवृक्ष द्वारा शोभित जम्बूद्वीप में भरत नाम क्षेत्र है। उसमें सब प्रकार से सुशोभित अंग देश है, जो कि ऐसा जाना जाता है जैसे कि शुभ लक्षण-पूर्ण अंगों वाला महान् अंगी ही हो। इस देश में कहीं भी शत्रु का नामनिशान नहीं था। यही कारण है जो कि इसकी ख्याति सारी पृथिवी पर थी ॥७३-७७॥


तत्र चम्पापुरी पुण्या पान्ती पावनमानवान्। प्राकारपरिखावेष्ट्या विशिष्टा भाति भूतले ॥७८॥

तत्र कौरववंशीयो मेघवाहनभूपतिः। सोमदेवाभिधस्तत्र वाडवो विपुलै गुणैः ॥७९॥

श्यामाङ्गी सोमिला तस्य तयोरासन्सुतास्त्रयः। प्रथमः सोमदत्तोऽन्यः सौमिलः सोमभूतिवाक् ॥८०॥

सोमिलायाः शुभो भ्राताग्निभूतिस्तस्य भामिनी। अग्निला च तयोस्तिस्रः पुत्र्यः सोमशुभाननाः ॥८१॥

धनश्रीश्चैव मित्रश्रीर्नागश्रीः श्रीरिवापरा। तास्तिस्रः सोमदत्ताद्यैः प्राप्ताः पाणिग्रहं क्रमात् ॥८२॥

अर्थ (श्लोक 78 से 82): इसमें एक चंपा नाम की नगरी है जो कि प्राकार, परिखा द्वारा बेढ़ी हुई होने से भूतल पर बहुत अधिक शोभाशाली है। वह बहुत अधिक पवित्र है, अतः ऐसी जानी जाती है जैसे पवित्र मनुष्यों को वह और भी पवित्र बनाती हो। उसके राजा का नाम मेघवाहन था। वह कौरववंशी था। मेघवाहन के समय इस नगरी में एक बड़ा भारी गुणी ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम था सोमदेव। सोमदेव की स्त्री का नाम सोमिला था और यह बहुत ही काले रंग की थी। सोमदेव के तीन पुत्र हुए, जिनके नाम थे सोमदत्त, सौमिल और सोमभूति। सोमिला के भाई का नाम अग्निभूति था और उसकी स्त्री थी अग्निला। अग्निभूति के अग्निला के गर्भ से चंद्रमा तुल्य सुंदर मुख वाली तीन पुत्रियाँ हुईं, जिनके नाम थे धनश्री, मित्रश्री और नागश्री। नागश्री तो इनमें सचमुच दूसरी श्री जैसी ही थी। इन तीनों का क्रम से सोमदत्त आदि के साथ पाणिग्रहण (विवाह) हो गया ॥७८-८२॥


सोमदेवः कदाचित्तु विरक्तो भवभोगतः प्राव्राजीद्गुरुसांनिध्ये मिथ्यामार्गविमुक्तधीः ॥८३॥

त्रयस्ते भ्रातरो भक्ता भव्या भव्यगुणैर्युताः । श्रावकाध्ययनं धीरा ध्यायन्ति स्म सुधर्मिणः ॥८४॥

सोमिला मलनिर्मुक्ता सम्यक्त्वव्रतधारिणी । दधाना परमं धर्मं सिद्धान्तश्रवणोद्यता ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 83 से 85): एक दिन की बात है कि निमित्त पाकर सोमदेव संसार-देह-भोगों से विरक्त हो गया और जाकर उसने मिथ्या मार्ग को हटाने वाली गुरु के निकट जिनदीक्षा धारण कर ली । उधर भव्य गुणों के भण्डार, भक्त, भव्य और धर्मात्मा सोमदत्त आदि तीनों भाई भी धीरता के साथ श्रावक धर्म का अध्ययन करने लगे और सम्यक्त्व व्रत धारण करने वाली निर्मल-चित्त सोमिला भी परम धर्म को धारण कर सिद्धान्त सुनने के लिए उद्यत हो गई ॥८३-८५॥


सा वधूभ्यः सदादेशं ददाविति महाशया । अहिंसा सत्यमस्तेयं कार्यं ब्रह्मव्रतं बुधैः ॥८६॥

खण्डनी पेषणी चुल्ली जलगालनसद्विधिः । विधेयः पात्रदानादि देयं वध्वो विशेषतः ॥८७॥

द्वे वध्वौ तद्वचस्तूर्णं तदा श्रद्दधतुर्मुदा । नागश्रीर्विमुखा तस्मान्मिथ्यात्वमलदोषतः ॥८८॥

सा धर्मविकला दुष्टा कोपना कलहप्रिया । पापकर्मरता कामकलङ्ककलिता सदा ॥८९॥

अर्थ (श्लोक 86 से 89): वह उत्तम भावों वाली अपनी पुत्र-वधुओं को सदाकाल यही आदेश देती रहा करती थी कि बुद्धिमानों ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य और ब्रह्मचर्य को व्रत कहा है । तुम्हारा धर्म है कि तुम सब इनका पालन करो । इसके साथ तुम्हें यह भी उचित है कि तुम इन व्रतों की रक्षा के लिए खाँडना, पीसना, चौका-चूल्हा, पानी छानना आदि विधि बड़ी सावधानी के साथ करो और यथोचित तथा पूरी शुद्धि के साथ पात्र-दानादि धर्मों को निभाहो । सोमिला के इन वचनों की सुनकर दो बहुओं ने तो धर्म का बहुत जल्दी और बड़े हर्ष के साथ श्रद्धान कर लिया, लेकिन नागश्री को उसकी ये बातें न रुचीं और उसने उससे विमुख होकर मिथ्यात्व की ही अभिलाषा की । वह बड़ी दुष्टा थी, उसे धर्म-कर्म सुहाता ही न था । वह क्रोध की खान और कलह-प्रिया थी । सदा ही पाप कर्मों में रत रहती थी ॥८६-८९॥


नागश्रियं श्रियोपेतामुपदेशमुपादिशत् । धर्मस्य सोमिला साध्वी तत्प्रबोधप्रसिद्धये ॥९०॥

चिरण्टि कुटिलत्वं हि समुत्पाट्य सुपाटवम् । धर्मं धत्स्व च मिथ्यात्वं मुञ्च मान्ये विषाद्वत् ॥९१॥

मिथ्यात्वमोहिता जीवा न हि श्रद्दधते वृषम् । यथा पित्तज्वराक्रान्ताः पयः सच्छर्कराश्रितम् ॥९२॥

शुद्धो धर्म उपादिष्टः पापिने नैव रोचते । द्वादशात्मासमुद्दीप्तौ यथा घूकाय सूज्ज्वलः ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 90 से 93): यह सब होते हुए भी सोमिला ने उससे फिर भी कहा-उसकी भलाई के लिए उसे उपदेश दिया कि बेटी, मिथ्यात्व सेवन करते-करते तो बहुत काल बीत गया, अब तो धर्म की तरफ ध्यान दे और विषाद को पैदा करने वाले मिथ्यात्व को छोड़, जिससे तेरे आत्मा का भला हो-तेरा संसार-जाल कटे । देख, संसार की यह दशा है कि जो जीव मिथ्यात्व के नशे से मोहित हैं वे धर्म पर श्रद्धा ही नहीं लाते, जैसे कि पित्त-ज्वर वाले जीव को मीठा दूध भी रुचिकर नहीं होता । जो जीव पापी हैं या पापाचरण में मग्न रहते हैं उन्हें चाहे जितना ही धर्म का उपदेश क्यों न दिया जाये कभी भी रुचिकर न होगा । जैसे कि चाहे जितना ही प्रयत्न क्यों न किया जाये पर उल्लू का बच्चा चमकते


मिथ्यात्वान्मोहिता मत्ताः संसारे संसरन्त्यहो।
लभन्ते न रतिं क्वापि मृगा वा मृगतृष्णाया ॥९४॥

मिथ्यात्वं च सदा त्याज्यं देहिभिर्हितसिद्धये।
दोषसर्वाकराकीर्णं गेहोत्सृष्टं यथा मलम् ॥९५॥

इति धर्मोपदेशस्तु न तस्या मानसे स्थितिम्।
व्यधाद्यथाब्जिनीपत्रे पयोबिन्दुः समुज्ज्वलः ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 90 से 96): हुए सूरज को कभी अच्छा कहेगा ही नहीं। बात यह है कि मिथ्यात्व के मद से मत्त हुए मोही जीव सदाकाल संसार में चक्कर काटा करते हैं-उन्हें कहीं भी सुख का लेश नहीं मिलता, जैसे कि मृग मृगतृष्णा के वश दौड़ा करता है पर वह जल कहीं भी नहीं पाता। इसलिए जो प्राणी अपना हित चाहते हैं उन्हें चाहिए कि वे मिथ्यात्व को बहुत-जल्दी छोड़ दें, जैसे कि लोग घर के मैले-कुचैले मल की निकालकर फेंक देते हैं। सोमिला ने इस तरह नागश्री को बहुत कुछ धर्म का उपदेश सुनाया, पर उसके मन में एक भी बात न ठहरी, जैसे कि कमलिनी के पत्ते पर पानी की बूँदें नहीं ठहरतीं ॥९०-९६॥


अन्यदा प्रवरो योगी नाम्ना धर्मरुचिर्महान्।
सोमदत्तगृहं प्राप भिक्षायै प्रवरेक्षणः ॥९७॥

सोमदत्तो विलोक्याशु तं मुनिं स्वगृहागतम्।
प्रतिजग्राह तं नत्वोच्चदेशस्थं व्यधाद् गुरुम् ॥९८॥

पादौ प्रक्षाल्य नीरेण गुरोः स वाडवोऽप्यटन्।
कार्यायादात्सुदानस्य शिक्षां नागश्रियै मुदा ॥९९॥

वधूः सिद्धान्नसंस्कारं देह्यस्मै दीप्तदेहिने।
मुनये समुपार्ज्याशु सुकृतं नवधाश्रितम् ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 97 से 100): इसके बाद एक दिन का जिक्र है कि धर्मरुचि नाम प्रवर-दृष्टि एक बड़े भारी योगी भिक्षा के लिए सोमदत्त के घर आये। देखकर सोमदत्त ने उन्हें पड़गाहा और नमस्कार कर ऊँचे आसन पर बैठाया। इसके बाद उसने प्रासुक जल द्वारा उनके पाँव धोये और वह नागश्री को दान की विधि बता कार्य-वश कहीं बाहर चला गया। इधर नागश्री ने जब दान देने में कुछ गड़बड़ी की तब उसकी सास सोमिला ने उससे कहा कि बहू, दीप्त देह के धारक इन मुनि को तुम उत्तम रीति से तैयार किया आहार दो और नवधा भक्ति-जन्य पुण्य का उपार्जन करो ॥९७-१००॥


मिथ्यात्वमद्यमोहेन मदोन्मत्ता क्रोधाकुला।
अचिन्तयन्निजे चित्ते सा दुश्चिन्ताशताकुला ॥१०१॥

अहो कोऽयं मुनिर्नग्नः किं दानमन्ननाशकम्।
किं देयं को विधिः सर्वकार्यकृन्तनसाधकः ॥१०२॥

नग्ने दानात्फलं किं स्यादिति कोपेन कम्पिनी।
व्यचिक्षिपद्विषं धान्ये सा नागी गरलं यथा ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 101 से 103): सास के ये वचन सुनकर मिथ्यात्व-रूपी मदिरा के मोह से मदोन्मत्त हुई नागश्री बड़ी बिगड़ी और मन ही मन इस प्रकार बुरे विचार करने लगी कि यह नग्न मुनि कौन है? अन्न का नाश करने वाला दान क्या पदार्थ है? दान देने से होता क्या है? और इस नंगे को दान देने से फल ही क्या होगा? इस प्रकार बुरे विचार कर क्रोध से वह थरथर काँपने लगी। उसे वह सब बड़ा बुरा लगा। उसने तब भोजन में विष मिला दिया, जैसे नागिन ने जहर ही उगला हो ॥१०१-१०३॥


ऋजुबुद्ध्या न जानाति श्वश्रूस्तद्विषमिश्रणम्।
केवलं पात्रदानेन सा तदा पुण्यमार्जयत् ॥१०४॥

अर्थ: उसकी सास बड़ी सरल-चित्त थी, अतः उसने न जान पाया कि इस आहार में विष मिला हुआ है। सो उस बेचारी ने मुनि को वही आहार दे पात्र-दान के प्रभाव से पुण्य उपार्जन किया। उधर भोजन करते मुनि के शरीर में क्षण भर में ही व्याधि बढ़ गई, जैसे कि वर्षाकाल में लताएँ बढ़ जाती


विषेण विषमो व्याधिर्ववृधे विधिवत्क्षणात्।
मुनिदेहे च वर्षायां वल्लीवृन्दं निरङ्कुशम् ॥१०५॥

ज्ञात्वा योगी विषं देहे धर्मध्यानं दधौ हृदि।
सावधानं सुसंन्यस्य चचार परमं तपः ॥१०६॥

आराधनाः समाराध्य विशुद्धधिषणावृतः।
हित्वा प्राणान्सुसर्वार्थसिद्धिं साधयति स्म च ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 104 से 107): है। यह देख योगी भी जान गये कि उन्हें विष दिया गया है। तब बड़ी शान्ति के साथ धर्म में लीन हो, सावधानी पूर्वक संन्यास लेकर उन्होंने परम तप तपना आरंभ किया और विशुद्ध-बुद्धि के साथ आराधनाओं की आराधना कर प्राणों को छोड़ा। वह सर्वार्थसिद्धि गये ॥१०४-१०७॥


सोमदत्तादयो ज्ञात्वा दोषं नागश्रिया कृतम्।
विरक्ता भवभोगेषु बभूवुर्भव्यसत्तमाः ॥१०८॥

वरुणस्य गुरोः पार्श्वे गत्वा नत्वा मुनीश्वरम्।
जगृहुः परमं वृत्तं विप्राः सद्वृत्तिसंश्रिताः ॥१०९॥

द्वे ब्राह्मण्यौ परे प्रीते दृष्ट्वा नागश्रियाः कृतिम्।
गुणवत्यार्यिकाभ्यर्णे प्राव्राजिष्टां विरज्‍य च ॥११०॥

अर्थ (श्लोक 108 से 110): इधर नागश्री की इस करतूत का पता जब सोमदत्त आदि को लगा-तब उन भव्योत्तत्तमों का चित्त बड़ा उदास हुआ और वे संसार-देह-भोगों से विरक्त हो गये। इसके बाद उत्तम आचरणों के धारक सोमदत्त आदि ने वरुण नाम गुरु के पास जाकर, उन्हें नमस्कार कर उनसे जिनदीक्षा ले ली। इसी प्रकार नागश्री की कृति को जानकर परस्पर में परम प्रीति रखने वाली धनश्री और मित्रश्री भी विरक्त हो गईं और उन्होंने गुणवती आर्यिका के पास जाकर दीक्षा ले ली ॥१०८-११०॥


धर्मध्यानरताः पञ्च विशुद्धाचारचारिणः।
बाह्यामाभ्यन्तरं तत्र तपन्ति स्म परं तपः ॥१११॥

अन्ते संन्यासमादाय दयादमशमोन्नताः।
हित्वा प्राणांस्त्रयस्तूर्णमारणाच्युतयोगताः ॥११२॥

ब्राह्मण्‍यावपि संशुद्धे चरन्त्यौ चरणं चिरम्।
शुद्धसाटीश्रिते रम्ये रोजतू रञ्जितात्मके ॥११३॥

सद्दर्शनबलाच्छित्त्वा स्त्रीलिङ्गं संगवर्जिते।
संन्यस्य जग्मतुस्ते द्वे आरणाच्युतयोर्द्वयोः ॥११४॥

सामानिकाः सुरास्तत्र सातं सर्वोत्तमं सदा।
संभजन्तश्चिरं तस्थुः पञ्चैते परमोदयाः ॥११५॥

अर्थ (श्लोक 111 से 115): उक्त तीनों ही ने धर्मध्यान में लीन होकर पाँच आचारों का पालन किया और बाह्य तथा अभ्यन्तर तपों को तपा तथा अन्त समय संन्यास धारण कर, शम-दम में उद्यत हो, प्राणों को छोड़कर वे आरण और अच्युत स्वर्ग में गये। इसी प्रकार धनश्री और मित्रश्री भी शुद्धि के साथ उत्तम आचरण करती हुई शीलरक्षा के हेतु सिर्फ एक सफेद साड़ी पहने हुए बड़ी ही सुशोभित हुई और अंत में परिग्रह से विमुख हो, संन्यास ले, सम्यग्दर्शन के बल से स्त्रीलिंग छेदकर, आरण-अच्युत स्वर्ग में गईं। आरण और अच्युत नाम के स्वर्गों में उक्त पाँचों ही जीव सामानिक जाति के देव हुए और वे परमोदयशाली वहाँ सर्वोत्तम सुख भोगते हुए चिरकाल तक रहे ॥१११-११५॥


उपपादशिलाप्राप्तदिव्यदेहाः स्फुरत्प्रभाः।
अवधिज्ञानविज्ञातपूर्ववृत्तान्तवेदिनः ॥११६॥

नर्तकीनटनालोका विशोकाः शङ्कयातिगाः।
नम्रामरमहाव्यूहा नानानीकविराजिताः ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 116 से 117): वहाँ उन्होंने उपपाद शिला पर दिव्य शरीर पाया और सूरज के तुल्य उनकी प्रभा हुई। वे अवधिज्ञान द्वारा अपना पहले का वृत्तान्त जानते थे, विविध नृत्य कला पारंगत थे, शोक रहित और शंका आदि से विहीन थे, देवताओं के द्वारा नमस्कृत थे और नाना तरह की सेना से विराजित थे।


शुद्धाम्भःस्नानसंसक्ता जिनपूजापवित्रिताः।
द्वाविंशतिसहस्राब्दमानसाहारहारिणः ॥११८॥

अर्थ (श्लोक 116 से 118): वे शुद्ध जल में स्नान करते थे और जिन-पूजा द्वारा पवित्र थे। वे बाईस हजार वर्ष बीत जाने पर मानसिक आहार लेते थे ॥११६-११८॥


द्वाविंशतिसुपक्षान्ते परमोच्छ्वासश्वासिनः।
विशन्तः परमं सातं द्वाविंशत्यब्धिजीविनः ॥११९॥

इति जिनवरधर्माद् ध्वस्तमोहान्धकाराः अमरनिकरसेव्या लोकनाथस्य भूतिम्।
त्रिभुवनजिनयात्राः संभजन्तो व्रजन्तो विमलतरसुदेवीसेवितास्ते जयन्तु ॥१२०॥

अर्थ (श्लोक 119 से 120): बारह पक्ष चले जाने पर श्वासोच्छ्वास लेते थे। उनकी बाईस सागर की आयु थी और उन्हें बड़ा ही सुख था। जिनदेव के बताये धर्म के निमित्त से उनका मोहरूपी अँधेरा दूर हो गया था। उनकी हजारों देव पूजा करते थे। वे तीन लोक में स्थित जिन भगवान् की यात्रा करते थे और हजारों सुंदर देवांगनाएँ उनकी सेवा में उपस्थित रहती थीं। वे जयवन्त हों ॥११९-१२०॥


मुक्त्वा मानुषसंभवं वरसुखं संसारसारं सदा
कृत्वा घोरतरं तपो द्विदशगं हित्त्वोपधीन्धीधनाः।
याता येऽच्युतनाम्नि देवनिलये ते पुण्यतः पावनाः
ज्ञात्वैवं विबुधा भजन्तु सुवृषं सिद्धिप्रदं श्रेयसे ॥१२१॥

अर्थ: जो बुद्धि धन के धनी संसार में मनुष्य-जन्म-जन्य सारभूत उत्तम सुखों को भोग, चौदह प्रकार के परिग्रह से मोह छोड़, बारह प्रकार के घोरतर तप को तप कर अच्युत-आरण नाम के देवस्थान को गये वह सब धर्म का ही पवित्र प्रभाव है। ऐसा जानकर बुद्धिमानों का कर्तव्य है कि वे अपनी भलाई के लिए सिद्ध-पद के दाता धर्म का सेवन करें। सच बात एक ही है कि संसार में धर्मध्यान करना ही सार है जो यह विभूति दिखाई देती है वह सब असार है-क्षणभंगुर है ॥१२१॥

चतुर्विंश पर्व

नंनमीमि महारिष्टनेमिं नम्रनरामरम्।
द्विधा धर्मरथे नेमिं न्यायनिश्चयकारकम् ॥१॥

अर्थ: उन अरिष्ट नेमिनाथ को नमस्कार है जो दो प्रकार के धर्म-रथ की धुरा हैं, जिनको नर-सुर-असुर सभी नमस्कार करते हैं, एवं जो न्यायकारी हैं ॥१॥


नागश्रीरथ पापेन प्रकटा लोकनिन्दिता।
यष्टिमुष्ट्यादिभिर्हत्वा प्रापिता पीडनं परम् ॥२॥

मुण्डाप्य मस्तकं वेगादारोप्याकर्णरासभे।
भ्रामयित्वा पुरे साघालोकैर्निष्कासिता पुरात् ॥३॥

काष्ठलोष्टहता भ्रष्टा नष्टा कुष्ठेन कुष्ठिनी।
भूत्वारिष्टेन पञ्चत्वं प्राप सा नरकोन्मुखा ॥४॥

अरिष्टां पञ्चमीं पृथ्वीं प्राप पापेन वाडवी।
छेदनं भेदनं शूलारोपणं ताडनं गता ॥५॥

भुञ्जती पापतो दुःखमायुः सप्तदशार्णवम्।
निर्गता सा ततः श्वभ्रं भुक्त्वा दुर्धीरनेकधा ॥६॥

स्वयंप्रभाभिधे द्वीपे सोऽभूद्दृग्विषपन्नगः।
हिंस्रकः स चलज्जिह्वः कोपारुणितलोचनः ॥७॥

कृष्णलेश्योऽतिकृष्णाङ्गः फणाफूत्कारभीषणः।
स्फुरत्पुच्छः कषायाढ्यो मूर्तः क्रोध इवोद्धुरः ॥८॥

अर्थ (श्लोक 2 से 8): इसके बाद नागश्री का मुनि को जहर देने रूप पाप सब पर प्रकट हो गया। लोग उसकी निन्दा करने लगे और उसे पीड़ा देने लगे। इतना ही नहीं किन्तु उन्होंने उसका मस्तक मुँडवाकर उसे गधे पर चढ़ाया और सारे नगर में फिरा कर नगर के बाहर निकाल दिया। लोगों ने पत्थरों से मारा-बड़ा दुख दिया। अन्त में वह कोढ़ के दुःख से मरी और पाप के वश पाँचवें नरक में पहुँची। वहाँ उसने छेदन, भेदन, शूलारोपण, ताड़न आदि विविध दुःखों को भोगा और बड़े कष्टों से वहाँ सत्रह सागर की आयु को बिताया। बाद आयु पूरी होने पर जब वह दुर्बुद्धि वहाँ से निकली तब स्वयंप्रभ नाम द्वीप में दृष्टि-विष जाति का सर्प हुई। उसकी चंचल जीभ थी। क्रोध से नेत्र लाल थे। वह बड़ा हिंसक था और कृष्ण लेश्या का धारक अतिशय कृष्ण था। फण की फूत्कार से वह बहुत भयावह था। उसकी पूंछ बहुत चंचल थी और वह कषाय के मारे एकदम विवश हो रहा था। जान पड़ता था मानों वह मूर्ति धारण कर क्रोध ही आया हो ॥२-८॥


मृत्वा द्वितीयां पृथ्वीं स जगामाघविपाकतः।
त्रिसागरोपमायुष्को दुःखपूरपरिप्लुतः ॥९॥

बभ्राम निर्गतस्तस्मात्त्रसस्थावरयोनिषु।
किञ्चिन्न्यूनद्विकोदन्वत्पर्यन्तं निर्गतस्ततः ॥१०॥

चम्पापुर्यां समाजज्ञे मातङ्गी मन्दमानसा।
अन्यदोदुम्बराण्यत्तुमासदद्विपिनं च सा ॥११॥

समाधिगुप्तयोगीन्द्रं दृष्ट्वा तत्र शनैः शनैः।
इयाय तस्य साभ्यर्णमिच्छन्ती स्वस्य शं स्वयम् ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 9 से 12): वह यहाँ से आयु पूरी कर मरा और पाप के फल से दूसरे नरक में पहुँचा। वहाँ उसने तीन सागर की आयु-प्रमाण दुख के पूर में खूब ही गोते मारे एवं वहाँ से निकलकर वह कुछ कम दो सागर तक त्रस तथा स्थावर योनि में फिरा और उसने अगणित जन्म-मरण किये, जिनके दुख का कुछ ठिकाना ही नहीं। इसके बाद वह पापी जाकर चंपापुरी में चांडालिन हुआ। दैव-संयोग से एक दिन वहाँ वह उदुम्बर फल आदि खाने के लिए जंगल में गई थी कि सहसा उसे समाधिगुप्त नाम योगीन्द्र दीख पड़े। उन्हें देखकर सुख की इच्छा से वह धीरे-धीरे उनके पास गई ॥९-१२॥


न प्साति वक्ति नो किंचित्स्थिरं स्थानस्थितोऽप्ययम्।
किं चिकीर्षति भो एवं भवान्पृष्टे जगौ मुनिः ॥१३॥

बंभ्रम्यते भवे भव्ये भविनो भयसंकुलाः।
पापच्यन्ते पुनः पापात्पतिता दुर्गतौ नराः ॥१४॥

अर्थ (श्लोक 13 से 14): वे मौन धारण किये स्थिर बैठे थे। वे किसी से कुछ कहते बोलते न थे। वे ध्यान में निमग्न थे। उनको इस तरह ध्यान में बैठे देखकर उस चांडालिन ने पूछा कि महाराज, आप यह क्या करते हैं? उसके मुँह इस तरह का प्रश्न सुनकर उनका ध्यान भंग हुआ। वह उससे शान्ति के साथ बोले कि भव्ये, भय द्वारा आकुल हुए ये प्राणी संसार में चक्कर लगाते हैं और पाप के वश होकर दुर्गति में जाते हैं। इतने पर भी जो बड़ी कठिनाई से हाथ आने वाले मनुष्य-जन्म को पाकर धर्म नहीं करते वे अधम पुरुष पुनः पुनः दुर्गति में पड़ते है और विविध दुख भोगते हैं ॥१३-१४॥


मनुष्यत्वं च दुःप्रापं प्राप्य तत्राधमा नराः।
चेक्रीयन्ते न ये धर्मं ते जंगमति दुर्गतिम् ॥१५॥

वर्जयेन्मद्यमांसानि मधुजन्तुफलानि च।
वर्जयेद् व्यसनं कर्म यः स धर्मप्रियो मतः ॥१६॥

रजनीभोजनत्यागोऽनन्तकायविवर्जनम्।
अगालितजलत्यागो नानास्थानकहापनम् ॥१७॥

नवनीतप्रवृत्तिश्च छिन्नधान्यनिवर्तनम्।
द्वयहोषितस्य तक्रस्य निवृत्तिः क्रियतामिति ॥१८॥

कुसुमात्तिपरित्यागः पञ्चपुष्पाहृते द्रुतम्।
क्षैरेयफलसंन्यासस्त्रसजन्तुवादिरक्षणम् ॥१९॥

अर्थ (श्लोक 15 से 19): इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह मद्य, मांस, मधु और पंच उदुम्बर फलों को छोड़ दे एवं प्राणियों की हिंसा भी न करे। जो मनुष्य ऐसा करता है-वही संसार में धर्म-प्रिय होता है। इसके सिवा रात्रि-भोजन और अनंतकाय का त्याग करे, कभी बिना छना पानी न पीवे और न बहु बीज वाले पदार्थ खावे। मक्खन और द्विदल को छोड़ दे। इसी प्रकार दो दिन के रक्खे हुए मठा वगैरह को भी न खावे, फूलों का खाना छोड़ दे और जिन फलों में से दूध निकलता है उन्हें काम में न लावे ॥१५-१९॥


असत्यचौर्यविरतिः सुशीलस्य च रक्षणम्।
उपधीनां विधानं चावधेर्धीरसुधर्मदम् ॥२०॥

जिनोपदिष्टसन्मार्गश्रद्धा ध्यानं च सन्मतेः।
स्मृतिश्च पञ्चमन्त्राणां स्वातन्त्र्यं स्वात्मनः पुनः ॥२१॥

एतत्सर्वं विधेयं हि विधिना साधुना त्वया।
तदाकर्णनमात्रेणातिमात्रं मन्त्रमग्रहीत् ॥२२॥

पवित्राणुव्रतं योग्यं मद्यमांसादिवर्जनम्।
गृहीत्वा सा मृतिं प्राप मनुष्यत्वमवाप च ॥२३॥

अर्थ (श्लोक 20 से 23): कभी झूठ न बोले और न चोरी करे। हमेशा शील को पाले और परिग्रह की मर्यादा करे। पर बात यह है कि जो श्रद्धा-पूर्वक इन त्यागों में बुद्धि को निर्मल रखेगा फल उसी को मिलेगा और जो केवल बाहरी दिखावा के लिए त्यागी बनेगी वह उल्टा फल पावेगा-दुख भोगेगा। इसके सिवा जिनदेव के बताये मार्ग का श्रद्धान रखना, सद्बुद्धि के साथ ध्यान करना और पंच मंत्र का जाप जपना-यही आत्मा की स्वतन्त्रता है और यही सच्चा धर्म है। इसको पालना और इसकी भावना करना मनुष्य का पूरा-पूरा कर्तव्य है। जो सर्वोत्तम मनुष्य-जन्म को पाकर ऐसे धर्म का पालन नहीं करता उस अधर्मी के लिए दुर्गति-रूपी खाड़ा खुदा हुआ तैयार है ही। इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। यों धर्म का उपदेश देकर उन मुनिनाथ ने कहा कि, ऊपर जो कुछ भी कहा गया है यह सब तुम्हें विधि-पूर्वक पालन करना चाहिए। मुनिनाथ का यह पवित्र उपदेश सुनकर उस चांडालिन ने उसी क्षण पंच मंत्र को


चम्पायां धनवान्धन्यः सुबन्धुर्वर्तते वणिक् ।
वदान्यो राजमान्यश्च स्वजनैः सेवितः सदा ॥२४॥

धनदेवी प्रिया तस्य कुशला कुलपालिका ।
सा सुताभूत्तयोस्तन्वी दुर्गन्धाख्या विगन्धिका ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 20 से 25): स्वीकार किया और यथायोग्य पवित्र व्रतों को लेकर मद्य-मांस आदि का त्याग किया। इसके बाद वह धर्म का पालन करती हुई जब मरी तब जाकर मनुष्य भव को प्राप्त हुई। चंपा नगरी में एक सुबन्धु नाम का धन्यात्मा और बहुत धनी वैश्य था। इसे राज-सम्मान प्राप्त था और सभी स्वजन इसकी सेवा करते थे। इसकी स्त्री का नाम धनदेवी था। वह बड़ी चतुर और कुल को पालने वाली कुलपालिका थी। उस चांडालिन ने आकर इसी के यहाँ जन्म लिया-वह इसके यहाँ पुत्री हुई। उसके शरीर से बड़ी दुर्गन्ध आती थी, इसलिए उसका नाम भी दुर्गन्धा पड़ गया था ॥२०-२५॥


तत्रापरो वणिग्धन्यो धनदेवो धनच्युतः ।
भार्यास्याशोकदत्ताख्या पुत्रद्वयखनिस्ततः ॥२६॥

जिनदेवसुतः पूर्वो जिनदत्तस्तयोः परः ।
विद्याभ्यासं प्रकुर्वाणौ यौवनं भेजतुश्च तौ ॥२७॥

सुबन्धुना तदा प्रार्थि धनदेवोऽतिमानतः ।
दुर्गन्धाया विवाहार्थं जिनदेवेन धर्मिणा ॥२८॥

राजमान्यस्य तस्येत्थं वचः श्रुत्वा स संस्थितः ।
मौनं धृत्वेति चैवं चेद् भविता कोऽत्र वारयेत् ॥२९॥

सुबन्धुना पुनः सोऽपि प्रार्थ्यमानः प्रपन्नवान् ।
तथेति धनदाक्षिण्याद्दाक्षिण्यं किं करोति न ॥३०॥

अर्थ (श्लोक 26 से 30): इसी पुरी में एक दूसरा और भी वैश्य था। जिसका नाम धनदेव था और जो बिल्कुल ही दरिद्र था। उसकी स्त्री का नाम अशोकदत्ता था। इसके गर्भ से दो पुत्र हुए। एक जिनदेव और दूसरा जिनदत्त। ये दोनों विद्याभ्यास करते हुए थोड़े दिनों में यौवन दशा को प्राप्त हुए। एक दिन का जिक्र है कि सुबन्धु ने आकर धनदेव से बहुत मान-पूर्वक प्रार्थना की कि आप धर्मात्मा जिनदेव के साथ दुर्गन्धा के विवाह को स्वीकारता दीजिए। राज-मान्य सुबन्धु की बात सुनकर धनदेव चुप रहा और उसने सोचा कि यदि ऐसा ही भवितव्य है तो उसे कौन रोक सकता है। इसके बाद सुबन्धु ने जब दोबारा प्रार्थना की तब धनदेव ने तथेति कहकर उसे अपनी स्वीकारता दे दी। सच है कि धन की चतुराई के आगे मनुष्य की चतुराई जरा भी काम नहीं देती ॥२६-३०॥


जिनदेवोऽपि तच्छ्रुत्वा दध्यौ हृदि ममेदृशी ।
यदि जाया भवेन्नूनं दुःकर्मफलभागिनः ॥३१॥

तद्दुर्गन्धाङ्गसंगेन यौवनं निष्फलं मम ।
तदा स्यात्कर्मपाकेनाजाकण्ठस्तनवल्लघु ॥३२॥

दुर्गन्धायाः पिता श्रीमान्मान्यो राज्ञां सुमन्त्रवित् ।
तस्यान्यथा वचः कर्तुं न क्षमो जनको मम ॥३३॥

दुर्गन्धा दुर्भगा दुष्टा दुःखिता दीनमानसा ।
यदि मे भविता जाया तदा भोगैरलं मम ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 31 से 34): यह बात जब जिनदेव ने सुनी तब वह बड़ा संकट में पड़ा। वह मन ही मन सोचने लगा कि यदि मेरी ऐसी जाया हुई तो यह खोटे कर्म का फल ही समझना चाहिए। यदि सचमुच ही मेरे साथ दुर्गंधा का विवाह हो गया तो मेरा यौवन विफल ही हुआ। जैसे बकरी के गले के स्तन निस्सार होते हैं वैसे ही मेरा यौवन भी निस्सार है। बड़ी भारी संकट की यह बात है कि दुर्गंधा का पिता एक बड़ा भारी श्रीमान् और राज-मान्य मंत्रवित् पुरुष है, इस कारण मेरे पिता उसके वचन को किसी तरह भी नहीं टाल सकते। यदि दुर्गंधा जैसी दुष्टा, अभागिनी, दुःखिनी और दीन-चित्त स्त्री मेरी जाया हुई


कुसंगात्संगतो नॄणां जीवितान्मरणं वरम्। व्याधिसंगो यथा सर्वोऽनयासंगस्तु दुःखदः ॥३५॥

निद्राक्षुधापरित्यक्तश्चिन्तयित्वेति निर्गतः। पितरावप्रकथ्यासौ गृहाद्यातो वनं घनम् ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 31 से 36): तब तो में फिर भोगों को भोग ही चुका। ऐसे बुरे सम्बन्ध से तो मनुष्य के लिए मर जाना ही अच्छा है। जिस तरह रोग के सम्बन्ध से जीवों को दुख होता है उसी तरह बुरे सम्बन्ध से भी पीड़ा पहुँचती है। इस समय न तो उसकी आँखों में नींद थी और न उसे खाने पीने की ही सुध थी। सिर्फ वह इसी एक चिन्ता में लीन था ॥३१-३६॥


समाधिगुप्तनामानं मुनिं नत्वा पुरः स्थितः। पप्रच्छ तत्र धर्मार्थं जिनदेवो विदांवरः ॥३७॥

जगाद वचनं योगी सावधानमनाः शृणु। धर्मः सम्यक्त्वसंशुद्धो वृषः सेव्यः शिवार्थिभिः ॥३८॥

षड्जीवरक्षणं धर्मः सत्यं धर्मोऽभिधीयते। परस्वपरदारादित्यागो धर्मो विशुद्धितः ॥३९॥

वृषेण प्राप्यते वस्तु यत्सारं सातकारणम्। ज्ञात्वेति मानसे धर्मं धत्स्व धीमन्सुधाकरम् ॥४०॥

श्रुत्वेति जातवैराग्यो जिनदेवो दधौ व्रतम्। संसारसागरं तर्तुं पोतप्रख्यं भवापहम् ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 37 से 41): इसके बाद वह अपने छुटकारे का कोई उपाय न देख माता-पिता से बिना कहे ही घर से निकल वन को चला गया। वहाँ वह समाधिगुप्त नामक मुनि को नमस्कार कर उनके आगे बैठ गया। मुनि से उसने धर्मोपदेश सुनने की जिज्ञासा प्रकट की। उत्तर में योगी बोले कि जिनदेव, जरा सावधान चित्त होकर सुनो, मैं तुम्हारे लिए धर्म का स्वरूप कहता हूँ। सम्यक्त्व-सहित ज्ञान-चरित्र को धारण करना ही धर्म है और मोक्ष के अर्थी पुरुषों को उचित है कि वे इसे धारण करें। छह काय के जीवों की रक्षा करना, सच बोलना, परधन और पराई स्त्री का त्याग करना भी धर्म है। पर ध्यान रहे कि यह त्याग जब परिणामों की विशुद्धि के साथ किया जायेगा तभी धर्म का रूप पावेगा। नहीं तो वह धर्म नहीं किन्तु ढकोसला कहा जायेगा। देखो, यह धर्म का ही फल है जो जीवों को सारभूत सुख का कारण अच्छा संयोग मिलता है और मनचाही वस्तुएँ प्राप्त हे जाती हैं। ऐसा जानकर हे धीमान् जिनदेव, तुम धर्म-रूपी अमृत को हृदय में धारण करो। मुनिनाथ के द्वारा धर्म का स्वरूप सुनकर जिनदेव को वैराग्य हो गया और उसने व्रत धारण कर लिये उन व्रतों का आश्रय लिया जो कि संसार-सागर से पार होने के लिए नौका के जैसे हैं-संसार से पार पहुँचाने वाले हैं ॥३७-४१॥


सुबन्धुनाग्रहाद्धत्ता दुर्गन्धा नामतो गुणात्। विवाहविधिना तस्मै जिनदत्ताय सत्वरम् ॥४२॥

जिनदत्तो नवोढां तां गाढालिङ्गनवाञ्छया। निनाय वेश्म चात्मीयं तौ शय्यायां स्थितो पुनः ॥४३॥

तदा देहोत्थदौर्गन्ध्यं तस्याः स सोढुमक्षमः। प्रातः पलायितः क्वापि संपृच्छ्य पितरौ पुनः ॥४४॥

अर्थ (श्लोक 42 से 44): इसके बाद सुबन्धु ने बड़े हठ-पूर्वक, नाम और गुण दोनों से ही दुर्गंधा जैसी अपनी लड़की का विवाह जिनदत्त के साथ कर दिया। जिनदत्त उस नवोढ़ा के गाढ़ आलिंगन की इच्छा से उसे अपने घर लिवा गया और वहाँ वह उसके साथ एक शय्या पर बैठा। पर उसके शरीर से निकलने वाली दुर्गन्ध को न सकने के कारण वह भी माता-पिता से कुछ बहाना बना सबेरा होते ही घर से निकल भागा ॥४२-४४॥


दुर्गन्धा दुःखिता चित्ते निनिन्द स्वं वियोगिनी। हा हा विधे मया पापं किमकारि कृपोज्झितम् ॥४५॥

जननी तं गतं मत्वा तां निनाय निजे गृहे। वत्से धर्मे मतिं धत्स्वेत्युपदेशप्रदायिका ॥४६॥

तद्देहदुष्टगन्धेन बन्धूनां दुःखिताभवत्। ततस्तैः सा पृथग्धाम्नि रक्षिता दुःखिता सदा ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 45 से 47): उसके चले जाने पर दुर्गन्धा बड़ी दुखी हुई और अपनी निन्दा करती हुई विलाप करने लगी कि हाय! मैंने ऐसे कौन से पाप किये जिनसे इस समय मेरे ऊपर यह दुख आकर पड़ा। इसके बाद जिनदत्त के चले जाने की खबर जब दुर्गन्धा की माता को मिली तब उसने दुर्गन्धा की अपने घर बुला लिया और उसे यह सीख दी कि बेटी, अब तू धर्म में अपनी बुद्धि लगा। तेरा कल्याण होगा। देख पाप का कैसा बुरा फल है। इसके बाद दुर्गंधा माता के पास ही रहने लगी परन्तु दुर्गंध से उसके स्नेहियों को दुख होने लगा तब उन्होंने उसे हमेशा के लिए ही एक जुदे मकान में रख दिया। इससे वह बड़ी दुखी हुई ॥४५-४७॥


अन्यदा क्षान्तिकाक्षूणा सुव्रतैः सुव्रता गृहम्। तत्पितुः प्राप दुर्गन्धा तत्र गत्वा च तां नता ॥४८॥

तत्रार्यिकां प्रतिगृह्याहारं दत्ते स्म सोज्ज्वलम्। आर्यिका तं च जग्राह जुगुप्सोज्झितमानसा ॥४९॥

समभावेन सा लात्वाहारं तत्र क्षणं स्थिता। क्षान्तिकाभ्यां समक्षाभ्यां सक्षमाभ्यां च क्षान्तिका ॥५०॥

सा ते संवीक्ष्य पप्रच्छ के इमे यौवनोन्नते। क्षान्तिके दीक्षिते केन हेतुना वद चार्यिके ॥५१॥

सावोचत्प्रथमे नाके विमला सुप्रभाभिधे। सौधर्मेशस्य चाभूतां प्राग्भवे योषिताविमे ॥५२॥

पत्या सहान्यदा देव्यौ द्वीपे नन्दीश्वराभिधे। जग्मतुः सोत्सवे देवान्संपूजयितुमुद्यते ॥५३॥

नत्वा जिनेन्द्रमूर्तीनां पादपद्मान्प्रमोदिते। देव्यौ दिव्याम्बुगन्धाद्यैः पूजयामासतुः परे ॥५४॥

गीतनृत्यादिकं कृत्वा प्रतिज्ञां प्रतिचक्रतुः। प्राप्य मर्त्यभवं नूनं करिष्यावस्तपोऽप्यतः ॥५५॥

अयोध्याधिपतेरत्र श्रीषेणस्य ततश्च्युते। श्रीकान्तावल्लभायां ते बभूवतुरिमे सुते ॥५६॥

हरिषेणाथ श्रीषेणा क्षितौ ख्यातिं गते इमे। यौवनालंकृते रम्यरूपे मदनसुन्दरे ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 48 से 57): इसके बाद एक दिन का जिक्र है कि अक्षुण्ण व्रतों को पालने वाली एक आर्यिका उसके पिता के घर आई। दुर्गन्धा ने जाकर उसे नमस्कार किया और पड़गाहन कर विधिपूर्वक उज्ज्वल आहार दिया। अपनी साथ की दो आर्यिका के साथ ग्लानि-रहित और निर्मल मन वाली उस आर्यिका ने आहार लेकर क्षणभर समता भाव के साथ -वहाँ विश्राम किया। तब दुर्गन्धा ने उससे पूछा कि आर्ये, ये दो युवती आर्यिकाएँ कौन हैं? और इनके दीक्षित होने में क्या कारण है? उत्तर में आर्यिका बोली कि ये दोनों पहले स्वर्ग में सौधर्म-इन्द्र की विमला और सुप्रभा नाम की देवियाँ थीं। एक समय ये दोनों पूजा के लिए उद्यत होकर अपने देव के साथ नन्दीश्वर द्वीप गई और वहाँ इन्होंने हर्ष के साथ जिनेन्द्र भगवान् के चरण-कमलों की पूजा की। इसके साथ ही इन्होंने गीत, नृत्य आदि उत्सव कर यह प्रतिज्ञा की कि हम मनुष्य भव में नियम से तप करेंगे। इसके बाद आयु को पूरी होने पर वहाँ से चयकर आईं और आकर यहाँ अयोध्या के श्रीषेण राजा की श्रीकान्त नाम रानी के गर्भ से पुत्रियाँ हुई। इनका नाम हरिषेणा और श्रीषेणा है। कुछ काल में ये युवती हुईं ॥४८-५७॥


सयौवने इमे वीक्ष्य स्वयंवरविधिं नृपः। चकल्पे कल्पनातीतमहोत्सवशतावृत्ः ॥५८॥

मण्डपे मण्डिता भूपा मण्डनैर्मङ्गलावृताः। समाहूताः समायातास्तस्थुर्देशान्तरात्तदा ॥५९॥

कमलाभिधया वेत्रधारिण्या ते समागते। मण्डपे वीक्ष्य भूपालाञ्जातिस्मृतिमवापतुः ॥६०॥

स्मृत्वा ते प्राग्भवं पित्रोः कथयित्वा निजान्भवान्। निवर्त्य सर्वभूपालाञ्जग्मतुस्ते वनं घनम् ॥६१॥

ज्ञानसागरनामानं मुनिं नत्वा सुसंयमम्। ययाचाते यतः स्त्रीणां स्त्रीत्वं नैव प्रजायते ॥६२॥

प्राव्राजिष्टां ततस्ते द्वे संचरन्त्याविहागते। इति तद्वचनं श्रुत्वा व्यरंसीत्सुकुमारिका ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 58 से 63): मदनाधिष्ठत इनका रम्य रूप बहुत ही सुन्दर दिखाई पड़ने लगा। तब कल्पनातीत सैकड़ों उत्सवों के साथ राजा ने इनके स्वयंवर की तैयारी की। उस समय बुलाये हुए देश विदेशों से बड़े-बड़े विद्वान् और मंगलरूप गहनों से मंडित राजगण आये और मंडप में इकट्ठे हुए। इस समय अपनी कमला नाम की वेत्रधारिणी दासी के साथ ये मंडप में आईं और वहाँ बैठे हुए राजाओं को देखकर इन्हें जाति-स्मरण हो आया। ये तब अपने पहले भव के पिताओं को याद कर, अपने गुजरे हुए भवों का हाल कहकर और सब भूपों को वापस विदा कर वन को चली आईं। वहाँ उत्तम संयमी ज्ञानसागर मुनि को नमस्कार कर उनसे इन्होंने यह प्रार्थना की कि जिसमें फिर इन्हें स्त्री पर्याय न धारण करना पड़े। इसके बाद इन दोनों ने उन मुनि से दीक्षा ली और विहार करती-करती ये यहाँ आई हैं ॥५८-६३॥


अहो इमे महाभाग्ये महारूपे सुकोमले। राजपुत्र्यौ च संत्यज्य भोगान् धत्तः स्म संयमम् ॥६४॥

दुर्गन्धाहं सदादुःखा दुर्देहा सुकुमारिका। विषयेच्छां न मुञ्चामि तृष्णाहो मे गरीयसी ॥६५॥

इत्युक्त्वाङ्घ्री नता तस्याः प्रार्थयन्ती सुसंयमम्। प्रबोध्य जनकादीन्सा जग्राह परमं तपः ॥६६॥

तपस्तीव्रं तपन्ती सा सहमाना परीषहान्। विजहार महीं भव्या तया क्षान्तिकया समम् ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 64 से 67): उस आर्यिका के ऐसे वचन सुनकर दुर्गन्धा भी विरक्त होकर मन ही मन बोली कि धन्य है इनके जो ये बड़भागिनी राज-पुत्रियाँ इतनी सुंदर और सुकोमल होकर भी भोगों को छोड़कर दीक्षित हुई और मैं ऐसी बुरी-देह वाली जिसके पास दुर्गन्ध के मारे कोई खड़ा तक भी नहीं होता-सदा दुःखिनी रहती हुई भी विषयों की वाञ्छा रखूँ तो कहना पड़ेगा कि मेरा बड़ा भारी दुर्भाग्य है-मुझ-सदृश अभागिनी कोई नहीं है। यह कहकर लज्जा से नत-मस्तक हुई उसने संयम के लिए उस आर्यिका से प्रार्थना की और अपने माता-पिता को समझा-बुझाकर तप धारणकर लिया-वह तपस्विनी हो गई। इसके बाद तीव्र तप-तपते और परीषहों को सहते हुए उसने भव्य शान्ति का (आर्यिका) के साथ पृथ्वी-तल पर विहार किया ॥६४-६७॥


एकदैक्षत वेश्यां च वसन्ताद्यन्तसेनाकाम्। सा सुन्दरां वनं प्राप्तामावृतां पञ्चभिर्विटैः ॥६८॥

तां तादृशीं समालोक्य भूयादीदृग्विधं मम। निदानमकरोद् बाला दुर्गन्धा बन्धुरेति च ॥६९॥

अर्थ (श्लोक 68 से 69): एक दिन की बात है कि अपने पाँच विट पुरुषों को साथ लिये बसन्तसेना नाम की एक सुन्दरी वेश्या वन में पहुँची। उसे देखकर इस दुःखिनी ने निदान किया कि मैं भी ऐसी ही होऊँ। इसके बाद ही जब उसे ख्याल हुआ तो वह बड़ी पछताने लगी कि धिक्कार है मुझे जो मैंने सुख को जलांजलि


निवृत्ताचिन्तयद्धिङ् मे मनोवृत्तिं सुखातिगाम्। मिथ्यास्तु दुःकृतं मेऽद्य संचितं दुष्टचेतसा ॥७०॥

कृत्वैवं परमं घोरं तपः संन्यस्य सा क्रमात्। मुक्त्वा प्राणानगता स्वर्गेऽच्युते च्युतशरीरिका ॥७१॥

सोमभूतिचरस्याभूत्सुरस्य वरवल्लभा। देवी तु पञ्चपञ्चाशत्पल्यायुःस्थितिसंगिनी ॥७२॥

सा सुरी ते सुराः सर्वे संचरन्तः सुखेच्छया। चिरं तत्र स्थिता भेजुः प्रवीचारं च मानसम् ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 68 से 73): देने वाली बात को हृदय में स्थान देकर दुष्ट चित्त द्वारा मिथ्या पाप का उपार्जन किया। इसके बाद वह घोर तप तपकर और अन्त में संन्यास लेकर, प्राणों को छोड़ अच्युत नाम स्वर्ग में गई और वहाँ जो पहले सोमभूति नाम देव था उसकी देवी हुई। वहाँ उसकी पचपन पल्य की आयु हुई। उसने देवों के साथ वहाँ मन-चाहे सुखों को भोगते हुए और मानस प्रवीचार का सेवन करते हुए बहुत समय बिताया ॥६८-७३॥


अथ हास्तिपुरेशस्य श्रीपाण्डोः पृथिवीपतेः। कुन्त्यां मद्र्यां च ते तस्माच्च्युताः सत्पुत्रतामिताः ॥७४॥

सोमदत्तो दरातीतो यः सोऽभूस्त्वं युधिष्ठिरः। सोमिलो योऽभवद् भ्राता सोऽभूद् भीमो भयातिगः ॥७५॥

सोमभूतिरभूद् भव्योऽर्जुनो जितविपक्षकः। त्रिजगत्प्रथिता यूयं भ्रातरस्त्रय उन्नताः ॥७६॥

यो धनश्रीचरः सोऽभून्मद्रीजो नकुलो महान्। यो मित्रश्रीचरः सोयं सहदेवस्तवानुजः ॥७७॥

सुकुमारीचरा यासीत्सुता काम्पिल्यभूपतेः। सुता दृढरथायाश्च द्रौपदी द्रुपदस्य सा ॥७८॥

अर्थ (श्लोक 74 से 78): इसके बाद वे देव वहाँ से चये और हस्तिनापुर के राजा पाण्डु की कुन्ती और मद्री दोनों रानियों के गर्भ से उत्तम पुत्र हुए। देखो जो पहले सोमदत्त था वह तो तुम निर्भय युधिष्ठिर हुए हो। सोमिल नाम तुम्हारा जो भाई था वह यह भीम हुआ है और शत्रु को जीतने वाला यह अर्जुन सोमभूति का जीव है। तुम लोग तीन जगत् में प्रसिद्ध हो और अपने ही बल द्वारा उन्नत हुए हो। इसी तरह जो धनश्री का जीव था वह मद्री का पुत्र महान् नकुल और मित्रश्री का जीव तुम्हारा छोटा भाई सहदेव हुआ है एवं जो पहले सुकुमारिका (दुर्गन्धा) थी वह काम्पिल्यपुरी के पति द्रुपद राजा और दृढ़रथा रानी की द्रौपदी नाम की पुत्री हुई ॥७४-७८॥


अनया च कृतं श्रेयः पूर्वजन्मनि निर्मलम्। समित्या च तथा गुप्त्या व्रतैश्च वरभावतः ॥७९॥

तत्प्रभावादलं जाता जातरूपसमद्युतिः। भोगोपभोगभूयिष्ठा द्रौपदीयमभूद्भुवि ॥८०॥

दृष्ट्वा वसन्तसेनाख्यां पण्यपत्नीं सुरूपिणीम्। यदर्जितं त्वया पापं पूर्वजन्मनि दुष्करम् ॥८१॥

तत्प्रभावादियं जातापकीर्तिर्दुस्तरा भुवि। द्रौपद्याः पञ्चभर्तृत्वसंभवा लोकहास्यदा ॥८२॥

मनसा वपुषा वाचाऽर्जितं यत्कर्म जन्तुना। तत्फलत्येव तादृक्षमुप्तं बीजं यथा भुवि ॥८३॥

अर्थ (श्लोक 79 से 83): इसने पहले भव में समिति, गुप्ति, व्रत और उत्तम भावना आदि द्वारा जो पुण्य पैदा किया था उसके प्रभाव से तो यह उत्तम रूप और कान्ति वाली हुई और भोग-उपभोग की इसे पूर्ण सामग्री प्राप्त हुई और बसन्तसेना नामी वेश्या को देखकर जो निदान किया था यह उसका प्रभाव है जो सारे संसार में इसकी यह अपकीर्ति हुई कि द्रौपदी के पाँच पति हैं-वह पंचभर्तारी है। बात यह है कि जीव मन, वचन और काय द्वारा जिस तरह के कर्म करता है उसे वैसा ही उनका फल भी भोगना पड़ता है, जैसे


अतो दुष्कर्म संकृत्य कर्तव्यः कृतिना वृषः। यत्प्रभावाद् भवत्येव सातं संसारसंभवम् ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 79 से 84): कि खेत में जैसा बीज बोया जाता है वैसा ही फल होता है। ऐसा जानकर जो सुकृती पुरुष हैं उन्हें चाहिए कि वे पाप से दूर रहें और धर्म का सेवन करें, जिसके प्रभाव से संसार में सब सुख प्राप्त होता है ॥७९-८४॥


यदचारि पुरानेन चारित्रं परपोज्ज्वलम्। तस्माद्युधिष्ठिरस्यास्य यशोऽभूत्सत्यसंभवम् ॥८५॥

अन्वभावि च भीमेन वैयावृत्यं पुराभवे। तत्प्रभावदयं जज्ञे बलिष्ठो वैरिदुर्जयः ॥८६॥

पार्थेन प्रथितं पूर्वं यच्चारित्रं पवित्रकम्। तत्प्रभावदयं जातो धानुष्को धन्ववेदवित् ॥८७॥

नागश्रीस्नेहतः स्निग्धोऽभूद् द्रौपद्यां धनंजयः। अतिस्नेहस्तु जन्तूनां जायते पूर्वसंभवः ॥८८॥

ब्राह्मण्यौ यत्पुरा कृत्वा कर्मनिर्बर्हणक्षमम्। तपश्च चेरतुश्चित्रं चरित्रं दृक्समुज्ज्वलम् ॥८९॥

तत्प्रभावादिमौ जातौ भ्रातरौ भवतामिह। प्रसिद्धौ शुद्धनकुलसहदेवौ मनोहरौ ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 85 से 90): पहले भव में युधिष्ठिर ने जो उज्ज्वल चारित्र धारण किया था यह उसी का फल है जो इस भव में उनकी सत्य-जन्य कीर्ति हुई एवं भीम ने पहले भव में जो वैयावृत्य किया था उसका यह फल है कि यह वैरियों द्वारा दुर्जय अत्यन्त बली हुआ। पार्थ ने जो पवित्र चारित्र को धारण किया था उसका यह फल मिला कि यह धनुष-कला का अच्छा ज्ञाता धनुर्धर हुआ। नागश्री के ऊपर इसका तब अति स्नेह था। यही कारण है कि द्रौपदी पर इसका अब भी बहुत स्नेह है क्योंकि प्राणियों का अत्यन्त स्नेह पूर्व भव के निमित्त से ही होता है। इसी प्रकार धनश्री और मित्रश्री नाम की दो ब्राह्मण स्त्रियों ने जो कर्मों को नाश करने के लिए सम्यक्त्व-सहित उज्ज्वल तपरूपी विचित्र चारित्र धारण किया था यह उसी का प्रभाव है जो वे दोनों यहाँ आपके अति प्यारे और प्रसिद्ध नकुल और सहदेव भाई हुई हैं। इस प्रकार नेमिनाथ भगवान् के द्वारा अपने भव्य भवों को सुनकर पाण्डव बड़े शान्त हुए। उनके चित्त में जो उद्वेग था वह अब एक दम जाता रहा ॥८५-९०॥


इति पूर्वभवान्भव्या भाविताञ्जिननेमिना। निशम्य पाण्डवाश्चण्डा बभूवुः शान्तमानसाः ॥९१॥

इति शुभपरिभावास्त्यक्तसंसारदावाः अधिगतजिनरावा मुक्तवैकारहावाः॥
वरपरिणतिपावाः कर्मकेदारलावाः जिनपतिकृतहावाः सन्तु सिद्ध्यै सुधावाः ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 91 से 92): जो इस तरह के शुभ भावों वाले हैं, संसार वन के लिए दावानल हैं, जिनवाणी के रसिक हैं, विकार भावों से रहित हैं, अत्यन्त पवित्र और कर्म-वन के लिए वह्नि हैं और जिन्होंने जिन यतियों के आचरण किये हैं वे सुधी तुम्हें सिद्धि दें ॥९१-९२॥


कृत्वा ये सुचिरं तपो द्विजभवे लात्वा शिवं शोभनम्
हित्वा दुष्कृतसंचयं वरदिवि प्राप्तामरत्वं शुभम्।
भुक्त्वा तत्र सुसातमत्कटरसं प्राप्ता नरत्वं नृपाः
हत्वा वैरिगणं जयन्ति भुवने ते पाण्डवाः पञ्च वै ॥९३॥

अर्थ: चिर काल घोर तप-तप कर जिन्होंने ब्राह्मण के भव में बहुत पुण्य संचय किया, खोटे कर्मों


दुर्योध्यान्युधि कौरवान्यरबलान्दुर्योधनादीन्नृपान्
सान्त्वा संगरशालिनः सुरसमाः सद्यः श्रितास्ते हरिम्।
तत्साहाय्यमुपाश्रिता वरसरिद्ग्राहं सुतर्तुं क्षमाः
ये संतीर्य महाम्बुधिं बुधनुताः प्रापुः परां द्रौपदीम् ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 93 से 94): का नाश कर उत्तम देव पद पाया, बाद वहाँ के सर्वोत्तम सुखों को भोग वहाँ से यहाँ आ राज-पद प्राप्त किया-मनुष्यों के मुकुट हुए, युद्ध में दुर्योधन आदि राजाओं को जो कि बड़े ही समरशाली थे, पराजित किया, हरि की सहाय पाकर जो महा समुद्र पार करने के लिए समर्थ हुए तथा महा समुद्र को पार कर द्रौपदी को लाये वे वैरियों पर विजय पाने वाले अमर जैसे पाँच पाण्डव जयवन्त रहें ॥९३-९४॥

पञ्चविंशतितमं पर्व

शुभचन्द्राश्रितं पार्श्वं श्रीपालं पालिताङ्गिनम्।
नंनमीमि सुपार्श्वस्थभव्यवर्गं सुपार्श्वगम् ॥१॥

अर्थ: उन पार्श्वनाथ प्रभु को प्रणाम है जो शुभचन्द्र के आश्रय स्थान हैं, श्रीपाल हैं, प्राणियों के पालक हैं और जिनके सुहावने पार्श्वभागों में भव्यवर्ग सदा ही बैठे रहते हैं ॥१॥


अथ ते पाण्डवा नत्वा नेमिं नम्रनरामरम्।
विज्ञप्तिं चक्रिरे कृत्वा पाणिपद्मान्स्वमूर्धनि ॥२॥

ज्वलद्दुःखमहादाहे देहव्यूहमहीरुहे।
करालकालगहने संशुष्यद्विषणाजले ॥३॥

नानादुर्णयदुर्मार्गदुर्गमे भयदे नृणाम्।
अनेकक्रूरदुःकर्मपाकसत्वे चरज्जने ॥४॥

दुष्टभावबिले भीमे संसारविपिने जनाः।
बंभ्रम्यते भयत्रस्ता विना त्वच्छरणं विभो ॥५॥

अर्थ (श्लोक 2 से 5): इसके बाद सुर-असुर और नर-पूजित नेमिनाथ प्रभु को नमस्कार कर, हाथ जोड़ मस्तक पर लगा पाण्डव बोले कि प्रभो, जिसमें दुख की ज्वाला शरीर रूपी वृक्षों को भस्म कर रही है, कराल काल द्वारा जो बड़ा गहन है, नाना दुर्जय दुखरूपी खोटे मार्गों से दुर्गम और मनुष्यों के लिए बड़ा भयानक है, अनेक क्रूर कर्म जिनके उदय में आ रहे हैं ऐसे प्राणियों का जो स्थान है तथा जो खोटे भावों रूपी बिलों द्वारा भरा-पुरा और भीषण है ऐसे संसार में जो भय-त्रस्त प्राणी जन्म-मरण के चक्कर लगा रहे हैं वे सब एक आपके शरण बिना ही दुखी हो रहे हैं। यदि उन्हें आपका शरण मिल जाता तो वे कभी के पार हो गये होते ॥२-५॥


नानाजन्मजलौघेन लङ्घिताशासमूहके।
क्लेशोर्मिजालसंकीर्णे नानादुःकर्मवाडवे ॥६॥

प्रोद्भूताद्भुतदुर्भावविसारिविसरान्तरे।
भवाम्बुधौ जनानां त्वं नावायसे च तारणे ॥७॥

अर्थ (श्लोक 6 से 7): जो कि विविध जन्म-रूपी जल से सब दिशाओं को लाँघता है, क्लेश की लहरों से परिपूर्ण है, दुष्कर्म-रूपी जिसमें विविध बड़वानल हैं और खोटे भावरूपी भँवर उठा करते हैं ऐसे संसार समुद्र से प्राणियों को तारने के लिए आप अद्वितीय नौका हैं ॥६-७॥


भवान्धकूपतो दत्त्वा धर्महस्तावलम्बनम्।
अस्मानुद्धर धर्मेश पतितान्पापकर्मतः ॥८॥

दक्ष क्षिप्रेण सद्दीक्षां देह्यस्मभ्यं शुभावह।
त्वत्प्रसादेन देवेश वयं लिप्सामहे शिवम् ॥९॥

दत्त्वा संसारकान्तारे वृषाख्यसामवायिकम्।
अस्मान्प्रापय वै क्षिप्रं मोक्षक्षेत्रं त्वमद्य भोः ॥१०॥

इति संप्रार्थ्य भूमीशा जिनं दीक्षासमुद्यताः।
ददुः पुत्राय सद्राज्यं प्राज्यं भूरिनरैः स्तुतम् ॥११॥

अर्थ (श्लोक 8 से 11): हे धर्मेश ! पाप कर्मों ने हमें संसार-रूपी अंधकूप में गिरा रखा है, अतः कृपा कर आप धर्म-रूपी हाथ का सहारा देकर हमारा उद्धार कीजिए। प्रभो, हम संसार-रूपी जंगल में पड़े हुए हैं, सो आप हमें धर्म की सवारी देकर बहुत जल्दी मोक्ष-क्षेत्र में पहुँचा दीजिए। आज ही हमारा बेड़ा पार कर दीजिए। हे दक्ष ! आपके प्रसाद से अब हम बहुत जल्दी शिव प्राप्त करना चाहते हैं। अतः आप हमें वह दीक्षा दीजिए जो कि हमारा कल्याण कर दे। इस तरह प्रभु से प्रार्थना कर पाण्डव दीक्षा के लिए


बाह्यान्दशविधाञ्शीघ्रं ग्रहानिव हतात्मनः।
क्षेत्रवास्तुहिरण्यादींस्तत्यजुस्ते परिग्रहान् ॥१२॥

मिथ्यात्ववेदरागांश्च षड्ढास्यादीन्सुपाण्डवाः।
कषायानत्यजंश्चित्ताच्चतुरोऽभ्यन्तरोपधीन् ॥१३॥

जिनाज्ञया समुन्मूल्य चञ्चूर्यान्कचसंचयान् । त्रयोदशविधं वृत्तं जगृहुः पाण्डुनन्दनाः ॥१४॥

अर्थ (श्लोक 8 से 14): उद्यत हो गये। इसके बाद उन्होंने मनुष्यों द्वारा स्तुत्य प्राज्य राज्य पुत्रों को सौंपा और क्षेत्र, वास्तु आदि बाह्य तथा मिथ्यात्व आदि अंतरंग परिग्रह का त्याग कर, केशलोंच कर, तेरह प्रकार चरित्र धारण कर जिनदीक्षा धारण की ॥८-१४॥


राजीमत्यार्यिकाभ्यर्णे कुन्ती हित्वा सुकुन्तलान् । सुभद्रा च द्रौपद्या संयमं परमग्रहीत् ॥१५॥

अन्ये भूपास्तथा वध्वो भूरिशोऽन्याः सुसंयमम् । जगृहुर्भावतो भव्या भवभीता भयापहाः ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 15 से 16): इनके साथ ही कुन्ती, सुभद्रा और द्रौपदी ने राजीमती आर्यिका के पास जाकर, केशों का लोंचकर संयम धारण किया। इनके अतिरिक्त उस समय संसार से भयभीत होकर और भी बहुत से राजा तथा बन्धु-गण शुभ परिणामों के साथ दीक्षित हुए।


युधिष्ठिरो गरिष्ठोऽथ विशिष्टोऽनिष्टवर्जितः । निष्ठुरं मोहमल्लं हि जिगाय जगतां गुरुः ॥१७॥

भवारिसंगमे भीमः पापभीतो भयच्युतः । बिभेद पूर्ववद् भव्यो भावुको भव्यसंपदाम् ॥१८॥

अर्थ (श्लोक 17 से 18): इसके बाद जगत् गुरु गरिष्ठ युधिष्ठिर ने बिना किसी कष्ट के निष्ठुर मोह-मल्ल को जीता। भव्य सम्पदा के भावुक, पाप से डरने वाले लेकिन निर्भय तथा संसार वैरी के लिए भय देने वाले भीम ने भी मोह पर विजय पाई ॥१५-१८॥


धनंजयो दधौ चित्ते मुक्तिवधूं सुबन्धुराम् । आराध्यराधनां धीमान्धृत्या सह समुद्धुरः ॥१९॥

माद्रेयौ निद्रया मुक्तौ द्रव्यपर्यायवेदकौ । द्रव्योपाधिपरित्यक्तौ चेरतुश्चरणं चिरम् ॥२०॥

महाव्रतानि पञ्चैव तथा समितयः पराः । पञ्चेन्द्रियनिरोधाश्च परमावश्यकानि षट् ॥२१॥

लोचोऽचेलत्वमस्नानं तथा भूशयनं महत् । अदन्तधावनं चैव स्थितिभुक्त्येकभक्तके ॥२२॥

अमीमूलगुणान्मूलान्सन्मीयुः शमनोन्मुखाः । महामत्या महान्तस्ते मुनयः पञ्च पाण्डवाः ॥२३॥

नानोत्तरगुणान्भव्या भावयन्तः सुधर्मिणः । दधुर्ध्यानं सुधर्माख्यं सुधीरास्ते तपोधनाः ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 19 से 24): समुद्धर धनंजय ने चित्त में मुक्तिरूपी वधू को स्थान दिया और धृति के साथ आराधनाओं को आराधा एवं मद्री के पुत्रों ने भी द्रव्य, पर्याय आदि का अनुभव कर, परिग्रह से विमुक्त हो, नासादृष्टि ध्यान लगा उत्तम तप किया। इस तरह कर्मों के शमन के लिए उद्यत हुए पाँचों ही पाण्डवों ने दृढ़ता से पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रियों को वश करना, छह आवश्यक पालना, केशलोंच करना, नग्न रहना, स्नान नहीं करना, भूमि में सोना, दाँत नहीं धोना और एक बार दिन में खड़े आहार लेना इन मूलगुणों का पालन किया। इसके बाद उत्तर गुणों की भावना करते हुए उन धीर धर्मात्मा तपोधनों ने धर्मध्यान किया ॥१९-२४॥


तिसृभिर्गुप्तिभिर्गुप्ता गुप्तात्मानः सुगौरवाः । गुणाग्रण्यः समाम्नायन्ति द्वादशाङ्गं मुनीश्वराः ॥२५॥

स्ववीर्यं प्रकटीकृत्य विकटाः संकटोज्झिताः । विशंकं निकटे तस्य नेमेश्चेरुः परं तपः ॥२६॥

अर्थ (श्लोक 25 से 26): गुप्तियों द्वारा आत्मा को रक्षित रखते हुए गौरव के साथ द्वादशांग का मनन किया। इस प्रकार अपने वीर्य को प्रकट कर उन गुणाग्रणी पाण्डवों ने निःशंक होकर नेमिनाथ प्रभु के पास कठिन तप


षष्ठाष्टमादिभेदेन क्षपणां क्षपणोद्यताः।
कर्मणां चक्रिरे नित्यमनाश्नन्तो नरोत्तमाः ॥२७॥

द्वात्रिंशत्कवला नृणामाहारो गदितो जिनैः।
तन्न्यूनतावमोदर्य दधुस्ते देहदाहकाः ॥२८॥

वर्त्मैकवेश्मवीथ्यादिप्रतिज्ञा याशनेच्छया।
सुवृत्तिपरिसंख्यानं कुर्वन्तो भोजनं व्यधुः ॥२९॥

निर्विकृत्या रसत्यागकाञ्जिकान्नेन पारणाम्।
कुर्वाणाश्च रसत्यागं तपस्तेपुर्मुनीश्वराः ॥३०॥

शून्यागारे गुहायां च वने पितृवने तथा।
निःकुटे कोटरे भूध्रे निर्जने जन्तुवर्जिते ॥३१॥

भयदे भयसंत्यक्ताः सिंहा इव समुद्धराः।
कुर्वाणाः संस्थितिं भेजुर्विविक्तशयनासनाः ॥३२॥

चत्वरादिषु देशेषु ममत्वं वपुषः परम्।
हित्वा ते संदधुर्भव्याः कायक्लेशाभिधं तपः ॥३३॥

बाह्यं तपश्चरन्तस्ते षड्विधं भववर्जिताः।
विविधं विविधोपायैस्तस्थुस्ते पर्वतादिषु ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 25 से 34): किया और कर्मों के नाश के लिए उद्यत होकर उन नरोत्तमों ने कर्मों की खूब निर्जरा की। उन्होंने छह-छह सात-सात उपवास किए और पारण के दिन केवल बत्तीस ग्रास मात्र आहार लेकर अवमौदर्य किया। मार्ग, घर, गली आदि की प्रतिज्ञा द्वारा वृत्तिपरिसंख्यान कर भोजन की इच्छा को रोका। पारणा करते हुए रसपरित्याग किया। शून्यागार, गुहा, वन, पितृवन (मशानभूमि), वृक्षों के कोटर, पहाड़ और निर्जन स्थान जैसे भयावने स्थानों में सिंह की भाँति निर्भय होकर शय्या-आसन लगाया। शरीर से ममता भाव छोड़कर चौराहे आदि जगह में काय-क्लेश किया। इस प्रकार छह बाह्य तपों का आचरण करते हुए और निर्विघ्न विविध तप करते हुए पाण्डव पर्वत आदि स्थानों में ठहरे ॥२५-३४॥


आलोचनादिभेदेन प्रायश्चित्तं व्यधुर्मुदा।
दशधा छिद्रशुद्ध्यर्थं व्रतशुद्ध्यर्थमाशु ते ॥३५॥

चतुर्धा विनयं तेनुर्दर्शनज्ञानगोचरम्।
मुनयः पाण्डवाः प्रीताश्चारित्रं चौपचारिकम् ॥३६॥

आचार्यादिप्रभेदेन वैयावृत्त्यं विशुद्धिकृत्।
दशधा ते चरन्ति स्म चारित्राचरणोद्यताः ॥३७॥

वाचनापृच्छनाम्नायानुप्रेक्षाधर्मदेशनाः।
इति तैः पञ्चधा दध्रे स्वाध्यायो ध्यानसिद्धये ॥३८॥

कायादिममतात्यागो व्युत्सर्गस्तु सुनिश्चलः।
दध्रे तैर्निर्जने देशे कायात्मभेददर्शिभिः ॥३९॥

धर्मध्यानं चतुर्धा ते दधुः संसिद्धशासनाः।
आज्ञापायविपाकाख्यसंस्थानविचयाख्यया ॥४०॥

शुक्लं शुक्लाभिधं वीराः पृथक्त्वेन वितर्कणाम्।
वीचारेण प्रकुर्वन्तो दधुर्ध्यानं बुधोत्तमाः ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 35 से 41): वहाँ आत्मा की और व्रत की शुद्धि के लिए वे आलोचना आदि के भेद से दस-दस प्रकार प्रायश्चित्त करते, ज्ञान-दर्शन-चारित्र और उपचार के भेद से चार प्रकार का विनय पालते, चरित्राचरण के लिए उद्यत हो आचार्य आदि के भेद से दस प्रकार विशुद्धि करने वाला वैयावृत्य पालते, ध्यान की सिद्धि के लिए वाचना, पृच्छना, आम्नाय, अनुप्रेक्षा और धर्मोपदेश एवं पाँच प्रकार का स्वाध्याय करते, कषाय और आत्मा का भेद समझ कर निर्जन, स्थान में शरीर से ममता छोड़ने रूप व्युत्सर्ग करते और आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय नाम चार प्रकार धर्मध्यान साधन करते। इस प्रकार तप करते हुए उन धीरवीरों ने शुक्ल नाम के पहले शुक्लध्यान को साधा। इस तरह छह प्रकार के भीतरी तपों को तप कर उन कर्मशूरों ने कर्मों को अत्यन्त कमजोर कर दिया, जिस तरह


एवमाभ्यन्तरं द्वेधा दधतः षड्विधं तपः। कर्माणि शिथिलीचक्रुर्गरुडाश्च यथोरगान् ॥४२॥

तपसस्तु प्रभावेन प्रभवन्ति न हृद्ग्यथाः। तेषां समृद्धयो भेजुः सामीप्यं विविधा अपि ॥४३॥

अर्थ (श्लोक 35 से 43): कि गरुड़ साँपों को कमजोर कर डालता है। देखो, तप का ऐसा प्रभाव है कि उसकी वजह से हृदय में किसी तरह की भी व्याधि स्थान नहीं पाती। बस वही कारण हुआ जो तप तपते हुए पाण्डवों के पास विविध-समृद्धि उपस्थित हो गई। तप के प्रभाव से ही वे खूब ऋद्धिशाली हुए। गरज यह कि पाण्डवों ने चाहिए जैसा बारह प्रकार के तप को तपा, जिसके प्रभाव से उन्हें विविध ऋद्धियाँ प्राप्त हुईं ॥३५-४३॥


मैत्र्यं सर्वेषु सत्त्वेषु दधाना धर्मधारिणः। गुणाधिकेषु जीवेषु प्रमोदं ते दधुर्ध्रुवम् ॥४४॥

क्लिष्टजीवेषु कारुण्यं कुर्वन्तः कृपयाङ्गिताः। माध्यस्थ्यं विपरीतेषु चक्रिरे ते मुनीश्वराः ॥४५॥

भावयन्तो निजात्मानं शुद्धं बुद्धं निरञ्जनम्। एताभिर्भावनाभिस्ते स्थिरं तस्थुः स्थिराशयाः ॥४६॥

रत्नत्रयमयं ज्योतिरजायत महोज्ज्वलम्। तेषां मोहद्रुमो येन समूलं नाशमाप्नुयात् ॥४७॥

तिर्यङ्‌मर्त्यामरप्रासुकृतांस्ते विपुलाशयाः। उपसर्गान्सहन्ते स्म शुद्धचिन्मयतां गताः ॥४८॥

क्षुत्पिपासासुशीतोष्णदंशादींश्च परीषहान्। द्वाविंशति सहन्ते स्म मुनयोऽमलमानसाः ॥४९॥

अप्रमत्ता महाधीराश्चरन्ति चरणं परम्। ब्रह्मचर्यपराः पूता निर्भयाः कुम्भिनो यथा ॥५०॥

विशुद्धबुद्धिचेतस्काः सुसंयमसमावृताः। क्षीणमोहाः प्रमादघ्ना ध्यानध्वस्ताघसंचयाः ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 44 से 51): वे बड़े धर्मात्मा थे। यही कारण है कि वे सभी प्राणियों से मैत्रीभाव, अधिक गुण वालों से प्रमोदभाव, दुखी, दरिद्री जीवों से करुणाभाव और विपरीत चलने वालों से मध्यस्थ भाव रखते थे। हमेशा अपने शुद्ध-बुद्ध-निरंजन आत्मा की भावना करते और बारह भावनाओं द्वारा उसे स्थिर रखते थे। आत्मा को आत्मा में लीन रखते थे। इससे उनकी आत्मा में रत्नत्रय का स्वच्छ प्रकाश हो कर मोहरूपी अँधेरा जड़ मूल से नष्ट हो गया। उन्होंने शुद्ध चिन्मय आत्मा में लीन होकर बड़ी धीरता के साथ तिर्यंच, मनुष्य और देवों के किये घोर उपसर्गों को सहा और निर्मल चित्त द्वारा भूख-प्यास आदि परीषहों को जीता। वे ब्रह्मचारी थे, धीर थे, अप्रमादी थे, चारित्र के पालने वाले थे और पवित्र तथा हाथी के जैसे निर्भय थे। वे विशुद्ध-चित्त संयम को धारण कर मोह और प्रमाद को क्षीण कर चुके थे और ध्यान द्वारा रहे-सहे पाप-समूह को और क्षीण करना चाहते थे ॥४४-५१॥


विरहन्तः समासेदुः सौराष्ट्रे ते च नीवृति। शत्रुंजयगिरौ शीघ्रं कदाचिद् ध्यानसिद्धये ॥५२॥

तस्योत्तुङ्गसुशृङ्गेषु तस्थुस्ते ध्यानसिद्धये। कायोत्सर्गविधौ धीराः स्मरन्तः परमं पदम्॥५३॥

आतापनादियोगेन तपस्यन्तः परं तपः। घोरोपसर्गसहने समर्थाः सिद्धिसाधकाः ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 52 से 54): इसके बाद विहार करते-करते वे सौराष्ट्र देश में पहुँचे। एक समय की बात है कि वहाँ उन्होंने शत्रुंजय गिरि के शिखर पर ध्यान दिया। वे पंच परम पद का स्मरण करते हुए धीरता के साथ शत्रुंजय गिरि पर कायोत्सर्ग ध्यान से स्थित हुए और थोड़े ही काल में आतापन आदि योग द्वारा सिद्धि के साधक घोर से भी घोर उपसर्ग सहने के लिए समर्थ हो गये। उन तपोधनों ने वहाँ स्थित होकर


अनक्षरं परं शुद्धं चिन्मात्रं देहदूरगम्।
ध्यायन्तस्ते परात्मानं तत्र तस्थुस्तपोधनाः ॥५५॥

निर्ममत्वपदप्राप्ता निर्मला मानसे सदा।
यावत्तिष्ठन्ति योगीन्द्रास्तत्र ते पाण्डुनन्दनाः ॥५६॥

तावदायाद्गिरौ तत्र क्रूरः कुर्य्यधरः शठः।
खलः कौरवनाथस्य भागिनेयो गुणातिगः ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 52 से 57): अक्षय, परम शुद्ध, चिन्मात्र और शरीर से भिन्न परमात्मा का ध्यान किया। इस प्रकार योगी पाण्डव निर्मल चित्त के साथ निर्ममत्व भाव धारण कर वहाँ स्थित थे। इसी समय अचानक वहाँ दुर्योधन का भानजा क्रूरचित्त कुर्मुरधर जो कि बड़ा दुष्ट और वज्र शठ था, आ गया ॥५२-५७॥


निरीक्ष्य पाण्डवान् धर्मध्यानस्थान् दुष्टमानसः।
निहन्तुमुद्यतस्तावच्चिन्तयन्निति मानसे ॥५८॥

मदीयान्मातुलान्हत्वा मदमत्ताः सुपाण्डवाः।
इदानीं ते क्व यास्यन्ति मया दृष्टाः सुदैवतः ॥५९॥

अधुना प्रतिवैरस्य संदानेऽवसरो मम।
योगारूढा इमे किंचिन्न करिष्यन्ति संगरम् ॥६०॥

ततः पराभवं कृत्वा हन्मीमान्मानशालिनः।
वाचंयमान्यमाधारान्बलिनोऽपि बलच्युतान् ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 58 से 61): वह दुष्ट उन्हें धर्मध्यान में स्थित देखकर मार डालने के लिए तैयार हुआ। वह मन ही मन सोचने लगा कि मेरे मामा को मारकर ये मदमत्त पाण्डव यहाँ आ छिपे हैं। अब तो मैंने इन्हें देख लिया। अब ये कहाँ जायेंगे। इस समय बदला लेने के लिए मुझे पूरा अवसर आ मिला है। कारण कि ये ध्यान में आरूढ़ हो रहे है, अतः युद्ध जरा भी नहीं करेंगे। इसलिए मैं इन वचंयम (मौनधारी) और यम अर्थात् जन्म भर के लिए प्रतिज्ञाबद्ध तथा बली होकर भी निर्बल मानियों को पूरे तिरस्कार के साथ ही क्यों न मारूँ- मुझे अवश्य ही ऐसा करना चाहिए ॥५८-६१॥


आयसाभरणान्याशु पराकाराणि षोडश।
प्रज्वलन्ति ज्वलद्वह्निवर्णान्यसावकारयत् ॥६२॥

लोहजं मुकुटं मूर्ध्नि ज्वलज्ज्वालामयं दधौ।
कर्णेषु कुण्डलान्यशु तेषां हारान् गलेषु च ॥६३॥

करेषु कटकान्क्रुद्ध आयसान्वह्निदीपितान्।
कटीतटेषु संदीप्तकटिसूत्राण्यसूत्रयत् ॥६४॥

पादभूषाः सुपादेषु करशाखासु मुद्रिकाः।
आरोपयद्विकल्पाढ्यो विकलो वृषतो भृशम् ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 62 से 65): इसके बाद उसने लोहे के सोलह आभूषण बनवाये और उन्हें जलती हुई आग में खूब तपाकर अग्नि के जैसा ही लाल करवाया। इसके बाद उसने जलती हुई ज्वाला जैसे लोह के मुकुट को उनके मस्तक पर रक्खा, कानों में कुण्डल पहनाये, गले में हार डाले, हाथों में कड़े और कमर में करधौनियाँ पहनाईं। पाँवों में लंगर और अँगुलियों में मुदरियाँ पहनाईं। उस धर्महीन, अधर्मी ने इस तरह उन्हें दुख देने के लिए तपे हुए लाल, लोहे के गहने पहनाये और पूरा-पूरा दुख दिया ॥६२-६५॥


तदङ्गसंगतो भूषावह्निः संप्रज्वलन्वपुः।
ददाह दाहयोगेन दारुणीव पराणि च ॥६६॥

आयसाभरणाश्लेषान्निर्जगाम धनंजयात्।
धूमोऽन्धकारकृद्देहेर्दारुयोगाद्यथा स्फुटम् ॥६७॥

ज्वलन्ति ते तदा वीक्ष्य वपूंषि वरपाण्डवाः।
विध्यापनकृते दध्युस्तस्य ध्यानजलं हृदि ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 66 से 68): उन मुनियों के शरीर में ज्यों ही वे भूषण पहनाये गये कि उसी क्षण उनका शरीर जलने लगा, जैसे कि आग के योग से काठ जलता है। उनके जलते हुए शरीर से सब दिशाओं को व्याप्त करने वाला वैसा ही घोर धुँआ निकला, जैसा लकड़ी के जलने से अग्नि में से धुँआ निकलता है। इस समय अपने शरीरों को जलता देखकर उन श्रेष्ठ पाण्डवों ने दाह की शान्ति के लिए हृदय में


जिनसिद्धसुसाध्विद्वत्सद्धर्मवरमङ्गलम्।
चतुर्लोकोत्तमांश्चित्ते दधुस्तच्चरणानि च॥६९॥

अर्थ (श्लोक 66 से 69): ध्यानरूपी जल को स्थान दिया॥६६-६९॥


ज्वलते ज्वलनो देहाञ्ज्वालयन् विपुलात्मकः।
नात्मनः सत्कुटीर्दग्ध्वा नभस्तत्समाश्रितम्॥७०॥

मूर्तास्तु पावका मूर्त्ताञ्ज्वालयन्त्यङ्गसंचयान्।
न चात्मनो यथास्माकं सदृशाः सदृशान्यराः॥७१॥

शुद्धः सिद्धः प्रबुद्धश्च निराकारो निरञ्जनः।
उपयोगमयो ह्यात्मा ज्ञाता द्रष्टा निरत्ययः॥७२॥

त्रिधा कर्मविनिर्मुक्तो देहमात्रस्तु देहतः।
भिन्नोऽनन्तसुबोधादिचतुष्टयसमुज्ज्वलः॥७३॥

इति ते स्वात्मनो रूपं स्मरन्तः शुद्धमानसाः।
ईक्षांचक्रुरनुप्रेक्षा विपक्षक्षयहेतवे॥७४॥

अर्थ (श्लोक 70 से 74): जिन, सिद्ध, सर्व साधु और सच्चे धर्म का उन्होंने आश्रय लिया वे उत्तम मंगल और शरण-रूप हैं। अब आत्मा को नहीं किन्तु शरीर को जलाती हुई आग ने एक विपुल रूप धारण किया और जिस तरह वह एक कुटी को जलाती हुई गगन-तल में फैलती है उसी तरह गगन-तल में फैल गई। वे सोचने लगे कि अग्नि मूर्त है, अतएव यह मूर्त शरीर को ही जला सकती है-हमारे अमूर्त आत्माओं को तो यह छू भी नहीं सकती क्योंकि सदृश पर ही सदृश का वश चलता है। यह आत्मा शुद्ध-बुद्ध और सिद्ध हैं, निराकार और निरंजन है, उपयोग-मय और ज्ञाता-दृष्टा तथा निरत्यय है। यह तीन प्रकार के कर्मों से जुदा है। देह के बराबर है परन्तु देह से भिन्न हैं। अनंतज्ञान आदि अनंत चतुष्टय द्वारा समुज्ज्वल है। इस तरह आत्मस्वरूप का विचार करते-करते वे विपक्ष के क्षय के लिए अनुप्रेक्षाओं का चिंतन करने लगे ॥७०-७४॥


क्षणमात्रस्थिरं लोके जीवितव्यं नृणां सदा।
अभ्रवद्विभ्रमस्तत्र स्थायित्वेन कथं भवेत्॥७५॥

शरीरं चञ्चलं वृक्षच्छायावद्यौवनं मतम्।
जलबुद्बुदवद्विद्धि वित्तं जलदोपमम्॥७६॥

विषया यदि नश्यन्ति चक्रिणामपि का कथा।
अन्येषां तु स्वयं त्याज्या विद्वद्भिः शिवसिद्धये॥७७॥

नश्वरेण शरीरेण साध्यमत्राविनश्वरम्।
पदं प्रतिमया साध्यश्चन्द्रो वा चन्द्रिकालयः॥७८॥

न किंचिच्छाश्वतं लोके विद्यते निजजन्मिनाम्।
विहायेन्द्रधनुस्तुल्यं दृष्टमात्रप्रियं परम्॥७९॥

अर्थ (श्लोक 75 से 79): शुद्ध मन से यों विचार करने लगे कि संसार में जीवों का जीवन क्षण-स्थायी है-मेघ की भाँति नष्ट होने वाला है। फिर इसमें स्थिरता का भान तो हो ही कैसे सकता है। शरीर चंचल है, यौवन वृक्ष की छाया-तुल्य है या जल के बबूलों जैसा है तथा चित्त मेघ-तुल्य है। विषय, पदार्थ वगैरह जबकि चक्रवर्तियों के यहाँ भी स्थिर नहीं रहते तब औरों के पास स्थिर रहने की तो कथा ही क्या है। अतः विद्वानों की चाहिए कि वे मोक्ष की सिद्धि के लिए विषयों को स्वयं ही छोड़ दें और इस विनश्वर शरीर द्वारा अविनश्वर पद को साधने में कुछ भी उठा न रखें-इसमें उनकी बुद्धिमानी है। सच पूछो तो इस लोक में अपने आत्मा के सिवा और कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है। सब इन्द्र धनुष की भाँति केवल देखने मात्र के लिए प्रिय है, वास्तव में संसार में कोई प्रिय वस्तु नहीं। यदि कोई प्रिय वस्तु है तो वह एक आत्मा ही है। जबकि संसार में भरत चक्री आदि के जैसे महापुरुषों का जीवन भी स्थिर नहीं देखा गया तब फिर हे आत्मन्! तू व्यर्थ ही क्यों दुख करता है, अपने जन्म को सफल क्यों


किं कस्य जीवितं दृष्टं भरतादेश्च चक्रिणः। किं ताम्यसि तदर्थं किं सफलं वा क्षणं नय ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 75 से 80): नहीं करता। तुझे तो यह चाहिए कि तू अपने एक क्षण को भी व्यर्थ न जाने दे ॥७५-८०॥ इति अनित्यानुप्रेक्षा।


अनित्यानुप्रेक्षा॥


निःशरण्ये वने सिंहैराक्रान्तो मृगशावकः। न रक्ष्यते यथा जन्तुराक्रान्तो यमकिङ्करैः ॥८१॥

सायुधैः सुभटैर्वीरैर्भ्रातृभिर्वारिदन्तिभिः। संवृतं यमराड्जन्तुं गृह्णात्याखुमिवाखुभुक् ॥८२॥

आत्मनः शरणं नैव मन्त्रयन्त्रादयोऽखिलाः। सत्येव किं तु पुण्ये हि तैः स्थिताश्च न के भुवि ॥८३॥

पक्षिणो नष्टयानस्य पयोधाइव चायुषः। शरणं सत्यपाये न स्वास्थ्यं तस्मिन्सति ध्रुवम् ॥८४॥

समर्थोऽपि सुरेन्द्रो न निजदेवीपरिक्षये। क्षमो हि रक्षितुं सोऽन्यान्कथं रक्षति कालतः ॥८५॥

विनैकं शुद्धचिद्रूपं कालागम्यमनश्वरम्। शरणं देहिनां नैव किंचिन्मोहितचेतसां ॥८६॥

अर्थ (श्लोक 81 से 86): जिस तरह कि अशरण वन में सिंहों द्वारा घेर लिये गये मृग के बच्चे को कोई भी बचाने वाला नहीं होता उसी तरह जब इस जीव को यम के नौकर घेर लेते हैं तब इसे कोई भी बचा नहीं सकता। यह यमराज ऐसा बली है कि जीव को चाहे शस्त्रधारी सुभट, भाई-बन्धु और हाथी घोड़े वगैरह क्यों न घेरे रहें पर वह कभी छोड़ने का नहीं, जैसे बिल्ली चूहे को नहीं छोड़ती-लपक कर झट से पकड़ लेती है। अतः कहना चाहिए कि मंत्र, यंत्र आदिक आत्मा के लिए कोई भी शरण नहीं है। एक मात्र शरण है अपना किया हुआ पुण्य। जिस तरह समुद्र के बीच जाकर जिस पक्षी ने नौका का सहारा छोड़ दिया उसके लिए कोई भी शरण नहीं होता उसी तरह आयु कर्म के पूर्ण हो जाने पर इस प्राणी के लिए कोई शरण नहीं होता। जबकि सुरेन्द्र भी अपनी देवियों की काल की चाल से रक्षा करने को समर्थ नहीं होता तब दूसरा कौन है जो उससे हे आत्मन्! तेरी रक्षा कर सके। तात्पर्य यह कि चिद्रूप, काल द्वारा अगम्य, अविनश्वर और शुद्ध आत्मा के बिना मोहित-चित्त प्राणियों के लिए और कोई भी शरण नहीं शरण है-एक आत्मा ही शरण है ॥८१-८६॥ इति अशरणानुप्रेक्षा।


अशरणानुप्रेक्षा॥


संसारः पञ्चधा प्रोक्तो द्रव्यं क्षेत्रं तथा परः। कालो भवस्तथा प्रोक्तः पञ्चमो भावसंज्ञकः ॥८७॥

परावृत्तानि जीवेन कृतानि पञ्च संसृतौ। अनन्तानि च तेषां त्वेकस्य कालोऽप्यनेकशः ॥८८॥

किं रज्यसि वृथा जन्तो संसृतौ शुभलाभतः। स्थिरीभव स्वचिद्रूपेऽन्यथा चेत्संसृतिभ्रमः ॥८९॥

अर्थ (श्लोक 87 से 89): आचार्यों ने संसार के पाँच भेद बताये हैं। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और भव। इस पाँच प्रकार के संसार में इस जीव ने ऐसे अनंत चक्कर लगाये हैं जिनका एक-एक का काल भी अनंत है और एक-एक का अनेक बार नम्बर आया है। फिर हे प्राणी, तू शुभ की आशा कर संसार में व्यर्थ ही काहे को अनुरक्त होता हैं, अपने चिद्रूप आत्मा में ही लीन क्यों नहीं होता। देख, ऐसा करने से तुझे संसार में चक्कर लगाने के सिवा और कुछ भी लाभ न होगा ॥८७-८९॥ इति संसारानुप्रेक्षा।


संसारानुप्रेक्षा।


जनने मरणे लाभे सुखे दुःखे हितेऽहिते। एकोऽसि संसृतौ जन्तो भ्रमन्भिन्नास्तु बान्धवाः ॥९०॥

कर्ता त्वं कर्मणामेको भोक्ता त्वं कर्मणः फलम्। अङ्गं मोक्ता च किं मुक्तौ यतसे नात्मसंस्थितौ ॥९१॥

एकस्मिन्नेव चिद्रूपे रूपातीते निरञ्जने। स्वाधीने कर्मभिन्ने च सातरूपे स्थिरीभव ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 90 से 92): हे आत्मन्! संसार में चक्कर लगाता हुआ तू जन्म-मरण, लाभ, अलाभ, सुख-दुख और हित-अहित में अकेला ही है-कोई भी तेरा साथी नहीं है। जो बन्धु-बान्धव के रूप में तुझे नजर आते हैं वे सब स्वार्थ के सगे हैं। वे तुझसे भिन्न हैं। तू ही एक कर्मों का कर्ता है और तू ही अकेला उनका भोक्ता है। यह शरीर भी तेरा साथी नहीं, फिर तू इसे छोड़कर मुक्ति के लिए यत्न क्यों नहीं करता। एक चिद्रूप, रूपातीत, निरंजन, स्वाधीन और कर्म से भिन्न सुखरूप आत्मा में लीन हो ॥९०-९२॥ इति एकत्वानुप्रेक्षा।


एकत्वानुप्रेक्षा।


कर्म भिन्नं क्रिया भिन्ना भिन्नो देहस्तथा परे। विषया इन्द्रियाद्यार्था मात्राद्याः स्वकीयाः किमु ॥९३॥

अहं देहात्मकोऽस्मीति मतिं चेतसि मा कृथाः। निचोलसदृशो देहोऽसिसमस्त्वं च मध्यगः ॥९४॥

सर्वतो भिन्न एवासि सद्दृक्संवित्तिवृत्तमान्। कर्मातीतः शिवाकारस्त्वमाकारपरिच्युतः ॥९५॥

अर्थ (श्लोक 93 से 95): देख, कर्म भिन्न है, क्रिया भिन्न है और देह भी तुझसे भिन्न है, फिर तू ऐसा क्यों मानता है कि ये इन्द्रियों के विषय आदि पदार्थ मेरे हैं-मुझसे अभिन्न हैं, मैं देहरूप हूँ। तू अपने चित्त में ऐसा ख्याल भूलकर भी मत ला। सच तो यह है कि यह तेरा शरीर साँप की काँचुलि के जैसा है। जिस तरह काँचुलि साँप के चारों ओर लिपटी रहती है उसी तरह यह तेरे चारों ओर लिपटा हुआ है। तू देह से बिल्कुल ही भिन्न है, ज्ञानी है, चारित्रधारी है, दर्शन-सम्पन्न है या यों कहिए कि रत्नत्रय का पिटारा है, कर्मातीत हैं, शिवाकार है और आकार रहित है ॥९३-९५॥ इति अन्यत्वानुप्रेक्षा।


अन्यत्वानुप्रेक्षा।


मांसास्थ्यसृङ्मये देहे शकृत्प्रस्रावपूरिते। मेदश्चर्मकचावासे चेतः किं तत्र रज्यसे ॥९६॥

यद्योगाच्चन्दनादीनां मेध्यानामप्यमेध्यता। शुक्रशोणितसंभूते तत्र का रतिरुत्तमा ॥९७॥

सर्वाशुचिविनिर्मुक्तं सर्वदेहपरिच्युतम्। ज्ञानरूपं निराकारं चिद्रूपं भज सर्वदा ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 96 से 98): हे आत्मन्! यह शरीर मास, हड्डी, लोहू वगैरह का बना हुआ है, विष्टा का खजाना है, मेद, चर्म और केशों का घर है। इसमें तू चित्त को अनुरक्त क्यों करता है-इसे क्यों अपनाता है। देख तो सही कि इसके सम्बन्ध मात्र से ही एक से एक बढ़कर पवित्र वस्तुएँ भी क्षण भर में अपवित्र हो जाती है। फिर कौन-सा ऐसा कारण है कि जिसको देखकर तू शुक्र-शोणित के पिटारे इस शरीर से मोह करता है। तेरा कर्तव्य तो यह है कि तू सब अशुचियों से रहित, सब शरीरों से भिन्न, ज्ञानरूप, निराकार और चिद्रूप आत्मा को ही सदा भजे ॥९६-९८॥ इति अशुचित्वानुप्रेक्षा।


अशुचित्वानुप्रेक्षा।


अब्धौ सच्छिद्रनावीव भवेद्वार्यागमस्तथा।
कर्मास्रवो भवाब्धौ स्यान्मिथ्यात्वादेश्च देहिनाम् ॥९९॥

पञ्चमिथ्यात्वतो जन्तोर्द्वादशाविरतेर्भवेत्।
पञ्चवर्गकषायाच्चास्रवस्त्रिपञ्चयोगतः ॥१००॥

आस्रवाद् भ्राम्यति प्राणी संसृतावब्धिकाष्ठवत्।
अतः सर्वास्रवत्यक्तं चिद्रूपं शाश्वतं भज ॥१०१॥

अर्थ (श्लोक 99 से 101): जिस तरह समुद्र में पड़ी हुई सच्छिद्र नौका में छिद्र द्वारा जल आता है उसी तरह संसार-समुद्र में पड़े हुए प्राणियों के भी मिथ्यात्व आदि के निमित्त से कर्मों का आस्रव होता है। पाँच मिथ्यात्व, बारह अविरति, पच्चीस कषाएँ और पन्द्रह योग ये आस्रव के भेद हैं। आस्रव के निमित्त से जीव संसार-समुद्र में काठ की तरह तैरा करता है। इसलिए तुझे चाहिए कि तू आस्रवों को छोड़कर एक चिद्रूप-शाश्वत आत्मा को भजे ॥९९-१०१॥ इति आस्रवानुप्रेक्षा।


आस्रवानुप्रेक्षा।


आस्रवाणां निरोधस्तु संवरो धर्मगुप्तिभिः।
अनुप्रेक्षातपोध्यानेः समित्या क्रियते बुधैः ॥१०२॥

संवरे सति नो जन्तुः संसाराब्धौ निमज्जति।
स्वेष्टं पदं प्रयात्येव निश्छिद्रा नौरिवार्णवे ॥१०३॥

अस्मिन्नक्लेशगम्ये त्वमात्माधीने सदा मतिः।
श्रेयोमार्गे व्यधा बाह्ये मतिभ्रमणतः किमु ॥१०४॥

अर्थ (श्लोक 102 से 104): आस्रव के रोक देने को संवर कहते हैं और वह संवर समिति, गुप्ति, अनुप्रेक्षा, तप और ध्यान के द्वारा होता है। देखो, कर्मों का संवर हो जाने पर फिर आत्मा संसार-समुद्र में नहीं डूबता किन्तु अपने इष्ट पद पर पहुँच जाता है। अतः हे आत्मन्! तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम सदा काल अक्लेश-गम्य और आत्माधीन मोक्षमार्ग में बुद्धि दो-व्यर्थ ही बाह्य आडम्बर में भूल कर मत भटको ॥१०२-१०४॥ इति संवरानुप्रेक्षा।


संवरानुप्रेक्षा।


रत्नत्रयेण संबद्धकर्मणां निर्जरा भवेत्।
अग्निर्दाह्यं किमाध्मातो निःशेषं नाऽवशेषयेत् ॥१०५॥

सविपाकाविपाकेन निर्जरा द्विविधा भवेत्।
आद्या साधारणा जन्तोरन्या साध्या व्रतादिभिः ॥१०६॥

अनास्रवात्क्षयादात्मन्केवल्याय च कर्मणाम्।
आस्रवे निर्गतेऽशेषे धाराबन्धे पयः कुतः ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 105 से 107): रत्नत्रय के निमित्त से पहले के बँधे हुए कर्मों की निर्जरा होती है। जिस तरह चेतन की गई आग द्वारा दाह्य वस्तु निःशेष जल जाती है वैसे ही निर्जरा द्वारा पहले के बँधे हुए सब कर्म नष्ट हो जाते हैं। निर्जरा के दो भेद हैं। एक सविपाक और दूसरी अविपाक। इनमें पहली तो सर्व साधारण के होती है और दूसरी व्रतधारी मुनियों के होती है और यही वास्तव में काम की है। हे आत्मन्, संवर हो जाने पर जो कर्मों की निर्जरा होती है उससे तुम्हारे केवली होने में जरा भी देर नहीं रह जाती। क्योंकि जिस नाव में पानी आने का रास्ता बन्द कर दिया गया और पहले का पानी उलीच दिया गया उसमें फिर न तो पानी आ सकता है और न पानी रह सकता है ॥१०५-१०७॥ इति निर्जरानुप्रेक्षा।


निर्जरानुप्रेक्षा।


प्रसारिताङ्घ्रिनिक्षिप्तकटिहस्तनरोपमः। आद्यन्तरहितो लोकोऽकृत्रिमः कैर्न निर्मितः ॥१०८॥

पूर्ववद्भ्राम्यसि प्राणिन् सत्यज्ञाने पुनः पुनः। न हि कार्यक्षयो नूनं जृम्भमाणे च कारणे ॥१०९॥

लोकवैचित्र्यमावीक्ष्याधोमध्योर्ध्वविभेदगम्। स्वसंवेदनसिद्धयर्थं शान्तो भव सुखी यतः ॥११०॥

अर्थ (श्लोक 108 से 110): कटि पर हाथ रखकर, पाँव फैला कर खड़े हुए पुरुष के जैसे आकार का यह लोक आद्यन्त रहित अकृत्रिम है-इसे किसी ने बनाया नहीं है। इसमें प्राणी अज्ञान के वश होकर बार-बार चक्कर लगाया करते हैं क्योंकि निश्चित बात है कि कारण समर्थ रहते हुए कभी कार्य का क्षय नहीं हो सकता। ऊर्ध्व, मध्य और अधः के भेद से हुई लोक की विचित्रता को देखकर स्वसंवेदन की सिद्धि के लिए हे आत्मन्! तुम शान्त हो ताकि तुम्हें सुख मिले ॥१०८-११०॥ इति लोकानुप्रेक्षा।


लोकानुप्रेक्षा॥


भव्यत्वं च मनुष्यत्वं सुभूजन्मकुलस्थितिः। क्रमात्ते दुर्लभं चात्मन् समवायस्तु दुर्लभः ॥१११॥

समवायोऽपि ते व्यर्थो न चेद्धर्मे मतिः परा। किं केदाराधिगुण्येन कणिशोद्गमता न चेत् ॥११२॥

पुनस्तु दुर्लभो धर्मः श्राद्धानां योगिनां पुनः। लब्धे योगीन्द्रधर्मेऽपि दुर्लभं स्वात्मबोधनम् ॥११३॥

स्वात्मबोधिः कदाचिच्चेल्लब्धा योगीन्द्रगोचरा। चिन्तनीया भृशं नष्टा वित्तमर्पणवत्सदा ॥११४॥

नात्मलाभात्परं ज्ञानं नात्मलाभात्परं सुखम्। नात्मलाभात्परं ध्यानं नात्मलाभात्परं पदम् ॥११५॥

लब्ध्वात्मबोधनं धीमान्मतिं नान्यत्र संभजेत्। प्राप्य चिन्तामणिं काचे को रतिं कुरुते पुमान् ॥११६॥

अर्थ (श्लोक 111 से 116): हे आत्मन्! पहले तो भव्यपना ही दुर्लभ है और भव्य होकर भी मनुष्य जन्म, उत्तम क्षेत्र और उत्तम कुल पाना उत्तरोत्तर दुर्लभ है। कदाचित् उत्तम कुल भी मिल गया तो सत्संगति का पाना बहुत दुर्लभ बात है। मान लीजिए कि कभी सत्संग भी मिल गया और धर्मबुद्धि न हुई तो उसका पाना भी व्यर्थ हो गया। जैसे कि धान्य अधिकता से उगा और उसमें यदि बाल न निकली तो वह उसका अधिकता से उगना कौन काम आया एवं कभी धर्म भी हाथ आ गया तो फिर मुनिधर्म पाना दुर्लभ ही है और उसके मिल जाने पर भी आत्मबोध होना कोई हँसी-खेल नहीं किन्तु अत्यन्त दुर्लभ है। यदि सौभाग्य से कदाचित् स्वात्मबोध हो गया जो कि योगीन्द्रों को ही होता है, तो उसका फिर सदा ही चिन्तन रहता हैं, वह फिर नहीं छूटता। जैसे कि किसी का धन चोरी चला जाता है या और किसी तरह खो जाता है तो उसे उसके प्राप्त करने की सदा ही चिन्ता रहती है। गरज यह कि योगीन्द्रों के होने वाला स्वात्म-बोध हुआ कि वह फिर आत्मा से जुदा नहीं होता। इसलिए कहा जाता है कि आत्मलाभ के सिवा न कोई ज्ञान है, न सुख है, न ध्यान है और न कोई परम पद ही है, जो कुछ भी है वह एक आत्मबोध ही है, अतः बुद्धिमानों को चाहिए कि आत्मबोध को पाकर फिर बुद्धि को न डुलावें क्योंकि जिसके हाथ चिन्तामणि रत्न आ गया वह काँच के लिए बुद्धि करे यह ठीक नहीं ॥१११-११६॥ इति बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा।


बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा॥


जिनधर्मः सदा सेव्यो यत्प्रभावाच्च देवता। भविता श्वापि विश्वेषां नाथः स्याद्धर्मतो नरः ॥११७॥

धर्मस्तु दशधा प्रोक्तो दुर्लभो योगिगोचरः। त्रयोदशसुवृत्ताख्यः स्याद्धर्मो मुक्तिदायकः ॥११८॥

संसाराशर्मतो यस्तु समुद्धृत्य शिवे पदे। नरं धत्ते सुधाधाम्नि स धर्मः परमो मतः ॥११९॥

मोहोद्भूतविकल्पेन त्यक्ता वागङ्गचेष्टितैः। शुद्धचिद्रूपसद्बुद्धिर्गीयते धर्मसंज्ञया ॥१२०॥

धर्मः पुंसो विशुद्धिः स्यात्स मुक्तिपददायकः। शुद्धिं विना न जीवानां हेयोपादेयवेत्तृता ॥१२१॥

स्वात्मध्यानं परं धर्मः स्वात्मध्यानं परं तपः। स्वात्मध्यानं परं ज्ञानं स्वात्मध्यानं परं सुखम् ॥१२२॥

स्वात्मज्ञानं न लभ्येत स्वात्मरूपं न दृश्यते। अतः सर्वं परित्यज्यात्मन्स्वरूपे स्थिरीभव ॥१२३॥

अर्थ (श्लोक 117 से 123): उस जिनधर्म का सदा सेवन करना उचित है जिसके प्रभाव से मनुष्य उत्तम-उत्तम पद को पाकर सर्वोत्तम सुखों को भोगता है। वह दुर्लभ धर्म दस तरह का है। योगीजन इस धर्म को तेरह प्रकार के चरित्र के रूप में पालते हैं और मुक्तिपद पाते हैं। देखो, उत्तम धर्म वही है जो कि जीव को दुख की अवस्था से निकाल कर शिवरूप सुधा-धाम में पहुँचा दे। मोह से उत्पन्न हुए विकल्पों को छोड़कर शुद्ध चिद्रूप में लीन होना भी धर्म है और आत्मा की विशुद्धि को भी धर्म कहते हैं। यही धर्म आत्मा को मुक्ति देने वाला है। याद रखने की बात है कि जब तक आत्मा की शुद्धि नहीं होती तब तक जीवों को हेय-उपादेय का ज्ञान भी नहीं होता एवं आत्मा का ध्यान ही उत्तम धर्म है और वही उत्तम तप है। इसके बिना आत्मा को हेय-उपादेय का ज्ञान हो ही नहीं सकता ॥११७-१२३॥ इति धर्मानुप्रेक्षा।


धर्मानुप्रेक्षा॥


इत्यनुप्रेक्षया तेषामक्षोभ्याभूद्विरक्तता। समर्थे कारणे नूनं सतां शीलं व्यवस्थितम् ॥१२४॥

अमन्यन्त तृणायैते शरीरादिपरिग्रहान्। पीयूषे हि करस्थेऽहो के भजन्ते विषं बुधाः ॥१२५॥

निरुध्येति मनोयोगं शुद्धयोगं समाश्रिताः। श्रेणिमारुरुहुस्तूर्णं क्षपकां पाण्डवास्त्रयः ॥१२६॥

शुद्धध्यानं समाध्यास्य प्रबुद्धाः शुद्धचेतसि। ते ध्यायन्ति निजात्मानं निर्विकल्पेन चेतसा ॥१२७॥

अधःकरणमाराध्य स्वापूर्वकरणस्थिताः। आयुर्मुक्तास्तदा ते चानिवृत्तिकरणं श्रिताः ॥१२८॥

समातपादिदुःकर्मत्रयोदशविनाशकाः। अष्टाविंशतिदृग्वृत्तमोहाशतनसद्भटाः ॥१२९॥

पञ्चध्यावरणध्वंसे नवदृग्वृतिवारणे। पञ्चविघ्नौघघातार्थं तेऽभूवंश्च समुद्यताः ॥१३०॥

त्रिषष्टिप्रकृतेरेवमप्रमत्तादितः क्षयम्। व्यधुः क्षीणकषायान्ते प्रथमाः पाण्डवास्त्रयः ॥१३१॥

अर्थ (श्लोक 124 से 131): इस प्रकार अनुप्रेक्षाओं का चिंतन करने से उनकी विरक्तता बिल्कुल ही अचल हो गई। सच है कि समर्थ कारण मिलने पर सत्पुरुषों का शील-स्वभाव-स्थिर हो जाता है। उन्होंने शरीर आदि परिग्रह को तृण के बराबर भी न समझा। बुद्धिमान् जन अमृत हाथ लग जाने पर विष की कभी पसंद नहीं करते। इस तरह मनोयोग को रोक कर, शुद्ध योग का आश्रय ले तीन पाण्डवों ने तो बहुत जल्दी क्षपकश्रेणी पर आरोहण किया और प्रबुद्ध होकर शुद्ध ध्यान के बल निर्विकल्प चित्त से आत्मा का ध्यान किया। वे अधःकरण का आराधन कर अपूर्व करण पर चढ़े और बाद अनिवृत्तिकरण पर पहुँचे एवं परिणामों को शुद्ध करते हुए उन्होंने अप्रमत्तगुणस्थान से लेकर क्षीणकषाय तक तिरेसठ


केवलज्ञानमुत्पाद्य घातिकर्मनिबर्हणात्। अन्तकृत्केवलज्ञानभाजिनः शिवमुद्ययुः ॥१३२॥

युधिष्ठिरमहाभीमपार्थाः पृथ्वीं वराष्टमीं। मुक्त्वा भेजुः शिवस्थानं तनुवाते शिवाश्रिते ॥१३३॥

सम्यक्त्वाद्याष्टसुस्पष्टगुणा मोहविवर्जिताः। अनन्तानन्तशर्माणोऽभूवंस्ते सिद्धिसंगताः ॥१३४॥

अर्थ (श्लोक 124 से 134): कर्मप्रकृतियों का नाश किया और केवलज्ञान उपार्जन कर तथा पश्चात् अघातिकर्मों को भी नाशकर तीन पाण्डव अन्तकृत् केवली होकर मोक्ष गये-युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन शिवधाम पहुँचे। वे सिद्धगति लाभ कर सम्यक्त्व आदि आठ गुण तथा अनंत सुख के भोक्ता हुए ॥१२४-१३४॥


पञ्चसंसारनिर्मुक्ता बुभुक्षाक्षयसंगताः। पिपासापीडनोन्मुक्ता भयनिद्राविदूरगाः ॥१३५॥

अनन्तानन्तकालं ये मोक्ष्यन्ते चाक्षयं सुखम्। ते सिद्धा नः शिवं दद्युः पूर्णसर्वमनोरथाः ॥१३६॥

तत्कैवल्यसुनिर्वाणे युगपन्निखिलामराः। ज्ञात्वागत्य व्यधुस्तेषां कल्याणद्वयसूत्सवम् ॥१३७॥

अर्थ (श्लोक 135 से 137): अब उन्हें न तो पाँच प्रकार के संसार की बाधा रही और न क्षुधा आदि अठारह दोषों का कोई जंजाल रहा-वे निर्दोष और अनन्त सुख के भोक्ता हुए। जिनके सब मनोरथ पूर्ण हो गये हैं और जो अनंतानंतकाल अभय-मोक्ष के सुख को भोगेंगे वे सिद्ध पाण्डव हमें भी सिद्ध पद दें। इस प्रकार उन तीनों पाण्डवों को केवलज्ञान और निर्वाणकल्याणक दोनों एक साथ हुए जानकर तत्क्षण देवगण आये और उन्होंने उनके ज्ञान और निर्वाण कल्याण का महोत्सव मनाया ॥१३५-१३७॥


मद्रीजावथ मुक्ताघौ किंचित्कालुष्यसंगतौ। प्रापतुश्चोपसर्गेण मृत्युं तौ स्वर्गसन्मुखौ ॥१३८॥

सर्वार्थसिद्धिमासाद्य त्रयस्त्रिंशन्महार्णवान्। स्वास्यतस्तत्र तौ देवावहमिन्द्रपदं श्रितौ ॥१३९॥

ततश्च्युत्वा समागत्य नृलोके नरतां गतौ। सेत्स्यतस्तपसा तौ द्वौ परात्मध्यानधारिणौ ॥१४०॥

राजीमती तथा कुन्ती सुभद्रा द्रौपदी पुनः। सम्यक्त्वेन समं वृत्तं वव्रे ता वृषोद्यताः ॥१४१॥

चिरं प्रपाल्य चारित्रं शुद्धसम्यक्त्वसंयुताः। जघ्नुस्त्रैणमयं घोरं ता विघ्नौघविघातिकाः ॥१४२॥

स्वायुरन्ते च संन्यस्य स्वाराधनचतुष्टयम्। मुक्तासवः समाराध्य जग्मुस्ताः षोडशं दिवम् ॥१४३॥

सुरत्वसंश्रिताः सर्वाः पुंवेदोदयभाजिनः। सामानिकसुरा भूत्वा तत्रत्यं भुञ्जते सुखम् ॥१४४॥

द्वाविंशत्यब्धिपर्यन्तं सातं संसेव्य स्वर्भवम्। प्राणातीताः सुपर्वाणः संयास्यन्ति परासुताम् ॥१४५॥

ते नृलोके नृतामेत्य तपस्तप्त्वा सुदुस्तरम्। ध्यानयोगेन सेत्स्यन्ति कृत्वा कर्मक्षयं नराः ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 138 से 146): उधर पाप-रहित नकुल और सहदेव चित्त में कुछ अस्थिरता हो जाने के कारण स्वर्ग के सन्मुख हुए। उपसर्ग सहते हुए मरे और जाकर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुए। वहाँ वे तैंतीस सागर तक सुख-भोग भोगेंगे। बाद वहाँ से चयकर मनुष्य-लोक में मनुष्य होंगे और फिर आत्म-साधन कर तप द्वारा सिद्ध होंगे-शिवधाम जावेंगे। इसी प्रकार राजीमती, कुन्ती, सुभद्रा और द्रौपदी ने भी धर्म-साधन के लिए तत्पर होकर सम्यक्त्व के साथ-साथ व्रत धारण किये और चिरकाल तक शुद्ध भावों के साथ उनका पालन किया। वे आयु के अन्त चार आराधनाओं को आराधते हुए संन्यास धारण कर सोलह स्वर्ग गईं और स्त्रीलिंग छेदकर वहाँ उन्होंने देवपद पाया-वे सब सामानिक देव हुईं। इसके बाद बाईस सागर तक वहाँ के सुख भोगकर जब वे वहाँ से, च्युत होंगी तब मनुष्य-लोक में आ, नर-जन्म धारण कर तप करेंगी और ध्यान के योग से कर्म-क्षय कर शिवधाम जावेंगी ॥१३८-१४६॥


अथ नेमीश्वरो धीमान्विविधान्विषयान्वरान्। विहृत्य सुरसंसेव्यमागाद्रैवतकाचलम् ॥१४७॥

मासमात्रावशेषायुः संहृत्य स ध्वनद्ध्वनिम्। योगं च निष्क्रियस्तस्थौ पर्यङ्कासनसंगतः ॥१४८॥

गुणस्थानं समासाद्यान्तिमं श्रीनेमितीर्थकृत्। पञ्चाशीतिप्रकृतीनां क्षयं निन्ये जिनाधिपः ॥१४९॥

शुक्ले शुचौ च सप्तम्यां षट्त्रिंशदधिकैः सह। प्राप पञ्चशतैर्मुक्तिं योगिभिर्नेमिनायकः ॥१५०॥

सुरासुराः समायाताः सिद्धिसंगममहोत्सवे। कृत्वा निर्वाणकल्याणं ययुस्तद्गुणवाञ्छकाः ॥१५१॥

अर्थ (श्लोक 147 से 151): इसके बाद ज्ञानी नेमिप्रभु भी विविध देशों में विहार करते रैवतक पहाड़ पर आये। अब उनकी आयु सिर्फ एक महीने की रह गई थी। वहाँ उन्होंने वचनयोग रोककर योगनिरोध किया और पर्यंकासन लगा निष्क्रिय स्थित हुए। इसके बाद वे अन्त के गुणस्थान में शेष रहीं पचासी प्रकृतियों का नाश कर शुक्लपक्ष की सप्तमी के दिन पाँच सौ छत्तीस योगियों के साथ मुक्तिधाम पधारे। उनके निर्वाण-महोत्सव के लिए सब सुर-असुर आये और प्रभु के गुणों को चाहते हुए निर्वाण-कल्याणक कर अपने-अपने स्थान चले गये ॥१४७-१५१॥


भिल्लो विन्ध्यनगे वणिग्वरगुणश्चेभ्यादिकेतुः सुरः
चिन्तायातिकखेगणेम्महेन्द्रसुमनो भूषोऽपरादिर्जितः।
सोऽव्यादच्युतनायको नरपतिः स्वादिप्रतिष्ठोऽप्यह-
मिन्द्रो यश्च जयन्तके नरनुतो नेमीश्वरो वः प्रभुः ॥१५२॥

अर्थ: जो क्रम से विंध्याचल पर भील हुए, उत्तम गुणों के धारक वणिक् हुए, इभकेतु देव हुए, चिंतागति विद्याधर राजा हुए, सुमना महेन्द्र हुए, पराजित राजा हुए, अच्युतेन्द्र हुए, सुप्रतिष्ठ राजा हुए और अन्त में जयंत विमान में अहमिन्द्र होकर यहाँ नेमिप्रभु हुए-वे नेमिप्रभु हम सबकी रक्षा करें ॥१५२॥


येऽभूवन्परमोदया द्विजवरा विद्वज्जनैः संस्तुताः तप्त्वा तीव्रतपो विशुद्धमनसा नाकेऽच्युते निर्जराः।
संजाता वृषपुत्रभीमसुरराट्पुत्राश्च मद्रीसुतौ याता मोक्षपदं त्रयश्च दिविजौ जातौ श्रिये सन्तु ते ॥१५३॥

अर्थ: वे पाण्डव लक्ष्मी दें, जो पहले परमोदयशाली ब्राह्मण हो, तीव्र तप कर अच्युत स्वर्ग में देव हुए और वहाँ से चयकर यहाँ युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव हुए तथा पीछे तप कर तीन मोक्ष गये और अन्त के दो मद्री-सुत स्वर्गधाम गये ॥१५३॥


नेमिः शं वो दिशतु दुरितं दीर्णभावं विधाय दीप्यद्देवो दलितदवथुर्दर्पदावाग्निकन्दः
मन्दस्कन्दो द्रुततरदमो दिव्यचक्षुर्दृढीयः कीर्तिर्दाता दममयमहादेहदीप्तिः प्रदर्शी ॥१५४॥

अर्थ: जो दीप्तिशाली देव हैं, पाप-दर्प-रूपी दाव के लिए अग्नि के कंद हैं, भय को दूर करने वाले हैं, दिव्य चक्षु और दिव्य वीर्यशाली हैं, कीर्ति के दाता हैं, शम-दम से युक्त है, महान् दीप्तिशाली देह के धारक हैं और सर्वदर्शी हैं वे दुरित को दारुण करने वाले प्रभु हमें शिव दें ॥१५४॥


कवेदं चरित्रं क्व मम प्रबोधः श्रीगौतमाद्यैः कथितं विशालम्।
आच्छादनैश्छादितसर्वभागो ज्ञानस्य सोऽहं प्रयते तथापि ॥१५५॥

अर्थ: कहाँ तो श्रीगौतम आदि द्वारा कहा गया पाण्डवों का विशाल चरित और कहाँ मेरा अल्प ज्ञान जो पूर्णपने कर्मरूपी आवरण से ढँका हुआ है। यद्यपि मेरे ज्ञान की इस विशाल चरित के साथ कुछ भी तुलना नहीं हो सकती तो भी मैंने इसके रचने का जो प्रयत्न किया है यह मेरी धृष्टता ही है ॥१५५॥


बालोऽन्तरीक्षगणनं न करोति किं वा भेकोऽपि सिन्धुपयसां गणनां न वा किम्।
रङ्कः स्ववीर्यनिचयं विवृणोति किं न सोऽहं तथा वरकथां कथयामि कांचिन् ॥१५६॥

अर्थ: मैंने जो इस उत्तम कथा के कहने का साहस किया है वह वैसा ही है जैसा बालक तारागण के गिनने की कोशिश करते हैं, मेंढक समुद्र के जल की थाह ले ने का यत्न करता है और भीरु पुरुष अपने पराक्रम को दिखाने का साहस करता है ॥१५६॥


संप्रार्थयामि नितरां वरसाधुसिंहान् सच्छास्त्रदूषणहरान्यरतोषदातॄन्।
किं प्रार्थयामि नितरामसतः प्रयत्नाच्छास्त्रस्य दूषणकरान्यरदोषदातॄन् ॥१५७॥

अर्थ: मैं ऐसे साधुओं की हृदय से चाह करता हूँ जो उत्तम शास्त्र के दूषण हरने वाले और परतोष देने वाले हैं, मुझे उन असाधुओं की जरूरत नहीं जो प्रयत्न द्वारा रचे गये शास्त्र में भी दोष बताते हैं और पर को दूषण देते हैं ॥१५७॥


ये साधवः क्षितितले परकार्यरक्ता दोषालयेऽपि विकृतिं न भजन्ति सर्गात्।
नक्षत्रवंशविभवेऽपि किरन्ति तोषं शुभ्रांशवो निजकरैः परितर्पयन्ति ॥१५८॥

ये दुष्टतामससमूहगता विमार्गे शुभ्रांशुमार्गगहने कृतनित्यचित्ताः।
पङ्कावलिप्तनिजदेहभरा भृशं वै तेऽसाधवोऽन्धतमसं प्रकिरन्ति लोके ॥१५९॥

अर्थ (श्लोक 158 से 159): भूतल पर जो परकार्य करने में अनुरक्त साधु-पुरुष हैं उनका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे दोष देखकर भी किसी पर विकार भाव नहीं दिखाते किन्तु चंद्रमा की भाँति ही निज करों (किरणों और हाथों) द्वारा नक्षत्र-वंश-विभव होते हुए भी औरों को परितोष देते है और जो तामस स्वभाव से पूर्ण हैं वे निरन्तर उत्तम मार्ग को बिगाड़ने में ही दत्तचित्त रहते हैं, कुमार्ग पर चलकर अपने आपको भी कीचड़ में लथोड़ते हैं और लोक में अज्ञानांधकार का प्रसार करते हैं ॥१५८-१५९॥


सन्तोऽसन्तो ये भुवि जाताः स्थाने स्थाने तत्खलु कृत्यम्।
नो चेत्तेषां कः परिवेत्ता काचाभावे रत्नमिवात्र ॥१६०॥

अर्थ: देखिए संसार में अच्छे बुरे जो-जो पुरुष हुए यदि जगह-जगह उनके अच्छे और बुरे कृत्य न भरे-पड़े होते तो फिर लोगों को अच्छे बुरे की पहचान ही कैसे होती, जैसे काँच के अभाव में रत्न की पहचान नहीं हो सकती ॥१६०॥


किं प्रार्थयामि भुवि तान्वरसाधुवर्गाञ्जल्पन्ति ये परगुणानगुणान्न दैवात्।
दोषेऽपि ये न ददते हितकारिदण्डं ते तुष्टभावनिवहा भुवने विभान्ति ॥१६१॥

अर्थ: मैं उन साधुओं की क्या प्रार्थना करूँ जो पर गुणों को ही सदा कहते और सुनते है, पराये दोषों को कभी न कहते और सुनते और न भूलें हो जाने पर वे हितकारी दंड ही देते हैं। वे तोष-भाव के निधान साधु संसार की शोभा बढ़ावें ॥१६१॥


निष्कास्य दोषकणिकां भुवि दर्शयन्ति प्रादाय दोषमखिलं परिजल्पयन्ति।
अन्यस्य दोषकथने च सदा विनिद्रा ये प्रार्थयामि खलु तानसतः प्रबुद्धान् ॥१६२॥

अर्थ: मैं उन दुष्टों की प्रशंसा करता हूँ जो पराये दोष कहने के लिए सदा ही टकटकी बाँधे रहते है और जहाँ दोष का लेश मात्र भी पाया कि उसे सारे संसार में गाते फिरते हैं और कहते हैं कि अमुक की कृति सारी ही इसी तरह-तरह दोषों से भारी हुई है।


कृत्वा पवित्रं परमं पुराणं तेषां च नो राज्यसुखं लिलिप्सुः।
अहं परं मुक्तिपदं प्रयाचे त्वद्भक्तितः सर्वमिदं फलि स्यात् ॥१६३॥

अर्थ: पाण्डवों के इस पवित्र ही नहीं किन्तु परम पवित्र पुराण को बनाकर मैं न तो राज-सुख चाहता हूँ और न और ही कोई वस्तु चाहता हूँ किन्तु मुक्ति-पद की याचना करता हूँ। भक्ति से सब मनचाहा फल होता ही है ॥१६२-१६३॥


यदत्र सल्लक्षणयुक्तिहीनं छन्दःस्वलंकारविरुद्धमेव।
शोध्यं बुधैस्तत्खलु शुद्धभावाः परोपकाराय बुधा यतन्ते ॥१६४॥

अर्थ: यदि इस पुराण में कहीं व्याकरण, युति, छंद, अलंकार, काव्य आदिक विरुद्ध बात कही गई हो तो उसे बुद्धिमान् जन शुद्ध कर लें क्योंकि शुद्ध भावों के धारक बुधजन जो कुछ भी प्रयास करते है वह परोपकार के लिए ही करते हैं ॥१६४॥


छन्दांस्यलङ्कारगणान्न वेद्मि काव्यानि शास्त्राणि पराण्यहं च।
जैनेन्द्रकालापकदेवनाथसच्छाकटादीनि च लक्षणानि ॥१६५॥

त्रैलोक्यसारादिसुलोकग्रन्थान्सद्गोमटादीन्वरजीवहेतून् ।
सत्तर्कशास्त्राष्टसहस्रवीशान् नो वेद्म्यहं मोहवशीकृतान्तः ॥१६६॥

अर्थ (श्लोक 165 से 166): मैंने न छंदशास्त्र देखा है और न अलंकार तथा गणों को सीखा है, न मैं काव्य आदि जानता हूँ और न मुझे जैनेन्द्र आदि किसी व्याकरण का ही ज्ञान हैं, इसी प्रकार त्रिलोकसार आदि लोक-ग्रन्थ और गोम्मटसार आदि जीव-ग्रन्थ भी मैंने नहीं देखे हैं और न अष्टसहस्री आदि तर्कशास्त्र ही पढ़े हैं। इसका कारण यह है कि मेरा अन्तःकरण मोह से विवश है ॥१६५-१६६॥


तादृग्विधोऽहं प्रगुणैर्जिनेशं स्तुवंश्च सद्भिः सकलैः परैश्च।
क्षाम्यः सदा कोपगणं विहाय बाल्ये जने को हि हितं न कुर्यात् ॥१६७॥

अर्थ: मेरी यह दशा होने पर भी मैं जिनदेव का पूर्ण भक्त हूँ, उनकी उत्तमोत्तम गुणों द्वारा स्तुति करता हूँ। इस कारण सत्पुरुषों तथा अन्य साधारण जन को चाहिए कि वे क्रोध वगैरह छोड़कर सदा ही मुझ पर क्षमाभाव रखें। जो बालक होता है, अबोध होता है, उसका कौन हित नहीं करता ॥१६७॥


(कविप्रशस्तिः)


श्रीमूलसङ्घेऽजनि पद्मनन्दी तत्पट्टधारी सकलादिकीर्तिः।
कीर्तिः कृता येन च मर्त्यलोके शास्त्रार्थकर्त्री सकलापि चित्रा ॥१६८॥

अर्थ: श्रीमूलसंघ में पद्मनन्दी आचार्य हुए। उनके पट्ट पर सकलकीर्ति हुए, जिन्होंने मर्त्यलोक में


भुवनकीर्तिरभूद्भुवनाद्भुतैर्भावनभासनचारुमतिः स्तुतः।
वरतपश्चरणोद्यतमानसो भवभयाहिखगेट् क्षितिवत्क्षमी ॥१६९॥

चिद्रूपवेत्ता चतुरश्चिरन्तनश्चिद्भूषणश्चर्चितपादपङ्कजः।
सूरिश्च चन्द्रादिचयैश्चिनोतु वै चारित्रशुद्धिं खलु नः प्रसिद्धाम् ॥१७०॥

अर्थ (श्लोक 168 से 170): शास्त्रार्थकत्री कला प्रकट की। उनके बाद भुवनाधिपों द्वारा स्तुत्य, उत्तम तप तपने के लिए उद्यतमना, भव-भयरूपी साँप के लिए गरुड़ और पृथिवी की भाँति क्षमा के धारक भुवनकीर्ति हुए। उनके बाद चिद्रूप के वेत्ता, चतुर, चिद्भूषण और पूजित पाद-पद्म के धारी चन्द्रसूरि हुए-वे हमारे चारित्र की शुद्धि करें ॥१६८-१७०॥


विजयकीर्तियतिर्मुदितात्मको जितततान्यमतः सुगतैः स्तुतः।
अवतु जैनमतं सुमतो मतो नृपतिभिर्भवतो भवतो विभुः ॥१७१॥

पट्टे तस्य गुणाम्बुधिर्व्रतधरो धीमानगारीश्वरः
श्रीमत्श्रीशुभचन्द्र एष विदितो वादीभसिंहो महान्।
तेनेदं चरितं विचारसुकरं चाकारि चञ्चद्रुचा
पाण्डोः श्रीशुभसिद्धिसातजनकं सिद्ध्यै सुतानां मुदा ॥१७२॥

अर्थ (श्लोक 171 से 172): उनके बाद सत्पुरुषों द्वारा सेवित, राजाओं द्वारा मान्य, सुमति के धारी और मुदित-आत्मा विजयकीर्ति हुए। वे विभु हमारी संसार से रक्षा करें। उनके पट्ट पर गुण-समुद्र, व्रती, गुण-गरिष्ठ, सर्वोत्तम श्रीमान् वादीभसिंह शुभचन्द्र हुए, जिन्होंने उत्तम रुचि के धारक पाण्डु पुत्रों की सिद्धि को लेकर यह विचार-सुकर और शुभ, सिद्धि तथा सुख देने वाला चरित रचा। इन्हीं शुभचन्द्र यतीन्द्र चन्द्र ने नीचे लिखे ग्रन्थ और भी रचे हैं ॥१७१-१७२॥


[कविविरचितग्रन्थानां नामावलिः]


चन्द्रनाथचरितं चरितार्थं पद्मनाभचरितं शुभचन्द्रम्।
मन्मथस्य महिमानमतन्द्रो जीवकस्य चरितं च चकार ॥१७३॥

चन्दनायाः कथा येन दृब्धा नान्दीश्वरी तथा।
आशाधरकृताचार्या वृत्तिः सवृत्तशालिनी ॥१७४॥

त्रिंशच्चतुर्विंशतिपूजनं च सद्‌वृद्धिसिद्धार्चनमाव्यधत्त।
सारस्वतीयार्चनमत्र शुद्धं चिन्तामणीयार्चनमुच्चरिष्णुः ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 173 से 175): चन्द्रप्रभचरित, पद्मनाभचरित, मन्मथमहिमा, जीवन्धरचरित, चन्दनकथा, नंदीश्वरकथा, आशाधरकृत अनगार धर्मामृत की आचारवृत्ति टीका, तीसचौबीसी पूजा, सिद्धपूजा, सरस्वतीपूजा, पार्श्वनाथकाव्य की पंजिका ॥१७३-१७५॥


श्रीकर्मदाहविधिबन्धुरसिद्धसेवां नाना गुणौघगणनाथसमर्चनं च।
श्रीपार्श्वनाथवरकाव्यसुपञ्जिकां च यः संचकार शुभचन्द्रयतीन्द्रचन्द्रः ॥१७६॥

अर्थ: इनके सिवा इन्होंने कितने उद्यापन भी रचे हैं और संशय-वदन-विदारण, अपशब्दखण्डन,


उद्यापनमदीपिष्ट पल्योपमविधेश्च यः। चारित्रशुद्धितपसश्चतुस्त्रिंशदात्मनः ॥१७७॥

संशयवदनविदारणमपशब्दसुखण्डनं परं तर्कम्। सत्तत्त्वनिर्णयं वरस्वरूपसम्बोधिनों वृत्तिम् ॥१७८॥

अध्यात्मपद्यवृत्तिं सर्वार्थपूर्वसर्वतोभद्रम्। योऽकृत सद्याकरणं चिन्तामणिनामधेयं च ॥१७९॥

कृता येनाङ्गप्रज्ञप्तिः सर्वाङ्गार्थप्ररूपिका। स्तोत्राणि च पवित्राणि षड्वादाः श्रीजिनेशिनाम् ॥१८०॥

अर्थ (श्लोक 176 से 180): सत्तत्त्वनिर्णय, स्वरूपसंबोधिनीवृत्ति, अध्यात्मपद्यवृत्ति, सर्वार्थपूर्व, सर्वतोभद्र और चिंतामणि नाम व्याकरण आदि ग्रन्थ भी इनकी कृति हैं एवं सर्वांगार्थ प्ररूपिका अंगप्रज्ञप्ति तथा जिनदेव के कितने पवित्र स्तोत्र भी इन्होंने रचे हैं ॥१७६-१८०॥


तेन श्रीशुभचन्द्रदेवविदुषा सत्पाण्डवानां परम्
दीप्त्यद्वंशविभूषणं शुभभरभ्राजिष्णुशोभाकरम्।
शुद्धभारतनाम निर्मलगुणं सच्छब्दचिन्तामणिम्
पुष्यत्पुण्यपुराणमत्र सुकरं चाकारि प्रीत्या महत् ॥१८१॥

अर्थ: इन्हीं शुभचन्द्र देव ने प्रीति के वश हो यह पाण्डवों का परम पवित्र महान् पुराण बनाया है। यह दीप्तिशाली वंशों का भूषण है, शुभ का स्थान है, शोभा-पूर्ण है, इसमें बहुत से निर्मल गुण हैं, उत्तम छन्द-रूपी चिंतामणियों द्वारा यह गूँथा गया है और सरल है। इसका दूसरा नाम ‘जैन महाभारत’ भी है ॥१८१॥


शिष्यस्तस्य समृद्धबुद्धिविशदो यस्तर्कवेदी वरो
वैराग्यादिविशुद्धिवृन्दजनकः श्रीपालवर्णी महान्।
संशोध्याखिलपुस्तकं वरगुणं सत्पाण्डवानामिदम्
तेनालेखि पुराणमर्थनिकरं पूर्वं वरे पुस्तके ॥१८२॥

अर्थ: इन्हीं शुभचन्द्रदेव का समृद्धिशाली बुद्धिविशद, तर्कशास्त्र का पंडित, वैराग्य आदि विशुद्धियों का जनक श्रीपाल नाम का एक ब्रह्मचारी शिष्य था। उसने पाण्डवों के इस पूरे चरित को सोधा और पहले पहल इस अर्थपूर्ण पुराण को उत्तम पुस्तक पर लिखा ॥१८२॥


श्रीपालवर्णिना येनाकारि शास्त्रार्थसंग्रहे।
साहाय्यं स चिरं जीयाद्वरविद्याविभूषणः ॥१८३॥

अर्थ: इस शास्त्र के अर्थ-संग्रह में श्रीपाल ब्रह्मचारी ने मुझे बहुत सहायता दी, अतः वह श्रेष्ठ विद्याभूषण चिरंजीवी रहे ॥१८३॥


ये शृण्वन्ति पठन्ति पाण्डवगुणं संलेखयन्त्यादरात्
लक्ष्मीराज्यनराधिपत्यसुरतां चक्रित्वशक्रेशिताम्।
भुक्त्वा भोगमिदं पुराणमखिलं संबोभुवत्युन्नताः
मुक्तौ ते भवभीमनिम्नजलधिं सन्तीर्य सातं गताः ॥१८४॥

अर्थ: जो पाण्डवों के इस पवित्र पुराण को आदर के साथ लिखते-पढ़ते और सुनते हैं-वे लक्ष्मी, राज्य, नराधिपत्व, देवाधिपत्व आदि उत्तम पदों के भोगों को भोग कर उन्नत होते हैं और क्रम से संसार-समुद्र को पारकर अविनाशी सुख के भोक्ता होते हैं ॥१८४॥


अर्हन्तो ये जिनेन्द्रा वरवचनचयैः प्रीणयन्तः सुभव्यान्
सिद्धाः सिद्धिं समृद्धिं ददत इह शिवं साधवः सिद्धिशुद्धाः।
दृक्सद्बोधं सुवृत्तं जिनवरवचनं तीर्थराट्प्रोक्तधर्म-
स्तत्सच्चैत्यानि रम्या जिनवरनिलयाः सन्तु नस्ते सुसिद्धयै ॥१८५॥

अर्थ: उत्तम वचनों द्वारा भव्यों के प्रसन्न करने वाले अर्हन्त, सिद्धि-समृद्ध सिद्ध, शिवदाता सिद्धि-शुद्ध साधु, रत्नत्रयरूपी जिनोक्त धर्म, जिनदेव की रम्य प्रतिमाएँ और जिनालय ये सब सिद्धि दें ॥१८५॥


यावच्चन्द्रार्कताराः सुरपतिसदनं तोयधिः शुद्धधर्मो
यावद्भूगर्भदेवाः सुरनिलयगिरिर्देवगङ्गादिनद्यः।
यावत्सत्कल्पवृक्षास्त्रिभुवनमहिता भारते वै जगत्याम्
तावत्स्थेयात्पुराणं शुभशतजनकं भारतं पाण्डवानाम् ॥१८६॥

अर्थ: जब तक चाँद-सूरज, तारा, सुरपतिसदन, समुद्र, शुद्ध धर्म है, जब तक धरणेंद्र, सुर-निलय-गिरि और देवगंगा है और जब तक त्रिभुवन-महित कल्पवृक्ष हैं तब तक इस भारतभूमि पर शुभ देने वाला यह पाण्डवों का भारत नाम पुराण भी रहे ॥१८६॥


श्रीमद्विक्रमभूपतेर्द्विकहृतस्पष्टाष्टसंख्ये शते
रम्येष्टाधिकवत्सरे सुखकरे भाद्रे द्वितीया तिथौ॥
श्रीमद्वागवरनीवृतीदमतुलं श्रीशाकवाटे पुरे
श्रीमत्श्रीपुरुधाम्नि वै विरचितं स्थेयात्पुराणं चिरम् ॥१८७॥

अर्थ: इस पुराण के रचे जाने का समय विक्रम संवत् १६०८ भादों सुदी दूज है। यह बागड़ प्रान्त के सागवाड़ा नगर-स्थित श्री आदिनाथ भगवान् के मंदिर में रचा गया। यह चिरकाल तक रहे ॥१८७॥


तदहं शास्त्रं प्रवक्ष्यामि पुराणं पाण्डवोद्भवम्।
सहस्रषट् भवेन्नूनं शुभचन्द्राय कथ्यते॥


इति श्रीपाण्डवपुराणे भारतनाम्नि भट्टारक श्रीशुभचन्द्रप्रणीते ब्रह्म० श्रीपालसाहाय्यसापेक्षे पाण्डवोपसर्गसहनकेवलोत्पत्तिमुक्तिसर्वार्थसिद्धि-गमनवर्णनं नाम पञ्चविंशतितमं पर्व ॥१८८॥