जैन महाभारत: प्रचलित मिथक और उनका खण्डन (पाण्डवपुराण, हरिवंशपुराण और उत्तरपुराण के आधार पर) | Jain Mahabharat: Prachalit Mithak aur unka Khandan

लोक में प्रचलित महाभारत कथा की कई बातें दिगम्बर आचार्यों के ग्रन्थों में अलग रूप में मिलती हैं। पाण्डवपुराण में गौतम गणधर स्वयं राजा श्रेणिक से कहते हैं: “हे श्रेणिक, लोगों की बड़ी मूढ़ता है” (पर्व ८, श्लोक २)। नीचे हर मिथक के साथ ग्रन्थ का कथन और स्रोत दिया है।

१. मिथक: द्रौपदी के पाँच पति थे

ग्रन्थ: स्वयंवर में द्रौपदी ने केवल अर्जुन के गले में माला डाली। तेज वायु से माला टूटकर पास खड़े पाँचों पाण्डवों पर बिखर गई, तब किसी विवेकहीन चपल मनुष्य ने कह दिया कि इसने पाँचों को वरा है। द्रौपदी अर्जुन की ही पत्नी थी। युधिष्ठिर और भीम उसे बहू के समान, नकुल और सहदेव माता के समान मानते थे। गौतम स्वामी कहते हैं: पाण्डवों पर मिथ्या दोष लगाने वालों की जिह्वा के सौ खण्ड क्यों नहीं हो जाते।
स्रोत: हरिवंशपुराण सर्ग ४५/१३५ से १३७, ४५/१५० से १५५; पाण्डवपुराण पर्व १५/११२ से ११४

२. मिथक: कर्ण कुन्ती के कान से जन्मा

ग्रन्थ: यह कहना “महामूढ़ता” है। कान से किसी मनुष्य का जन्म न देखा गया न सुना गया, जैसे गाय के सींग से दूध नहीं निकलता। कुन्ती के पुत्र की बात लोग कान से कान फैलाने लगे, और चम्पापुर में रानी राधा ने कान खुजलाते समय बालक को लिया, इसलिए नाम “कर्ण” पड़ा।
स्रोत: पाण्डवपुराण पर्व ८/२ से १०

३. मिथक: कर्ण सूर्य देवता का पुत्र था

ग्रन्थ: सूर्य के सेवन से कुन्ती को पुत्र हुआ, यह कथन मिथ्या है, मनुष्य स्त्री का सूर्य से संगम कैसे सम्भव है। कर्ण को चम्पापुर के राजा भानु (भानु अर्थात् सूर्य) और रानी राधा ने पाला, इसलिए वह “सूर्यपुत्र” कहलाया, जैसे नन्द गोप के पालने से कृष्ण “गोपाल” कहलाए।
स्रोत: पाण्डवपुराण पर्व ८/११ से १२; पर्व ७/२७८ से २९५

४. मिथक: हिडिम्बा राक्षसी थी

ग्रन्थ: हिडिम्बा संध्याकारपुर के राजा सिंहघोष (हिडिम्ब वंश) और रानी लक्ष्मणा की राजकन्या थी। ज्योतिषी ने बताया था कि जो वीर वटवृक्ष के नीचे जागकर निशाचर चोर को जीतेगा, वही इसका वर होगा। भीम ने वही किया और उससे विवाह हुआ।
स्रोत: पाण्डवपुराण पर्व १४/२६ से ३७

५. मिथक: भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हुआ और वस्त्र बढ़ता गया

ग्रन्थ: पाण्डवपुराण के इस प्रसंग में दुष्ट दुःशासन द्रौपदी के घर जाकर उसे केश पकड़कर खींच ले गया। तभी भीष्म ने कौरवों को फटकारा: “यह तुम्हारे भाई की पवित्र पतिव्रता पत्नी है, इसकी विडम्बना करोगे तो बड़ी अधोगति होगी।” द्रौपदी रोती हुई पाण्डवों के पास आई। वस्त्र खींचने और वस्त्र बढ़ने का वर्णन इस प्रसंग में नहीं है।
स्रोत: पाण्डवपुराण पर्व १६/१२७ से १३७

६. मिथक: भीष्म इच्छामृत्यु के बल से शरशय्या पर प्राण रोके रहे

ग्रन्थ: बाणों से जर्जर भीष्म ने दोनों पक्षों को वैर छोड़ मैत्री और दशलक्षण धर्म का उपदेश दिया। तभी हंस और परमहंस नाम के दो चारण मुनि आकाश से आए। उनसे चार आराधना का उपदेश सुनकर भीष्म ने चारों आहार और देह की ममता छोड़ सल्लेखना ली, सब जीवों से क्षमा माँगी और पंच नमस्कार जपते हुए देह छोड़ी। वे पाँचवें ब्रह्म स्वर्ग में देव हुए।
स्रोत: पाण्डवपुराण पर्व १९/२५१ से २७१

७. मिथक: जरासंध को भीम ने मल्लयुद्ध में मारा

ग्रन्थ: जरासंध प्रतिनारायण था। युद्ध में उसने अपना चक्ररत्न श्रीकृष्ण पर चलाया, पर चक्र कृष्ण की प्रदक्षिणा कर उनके दाहिने हाथ में आ ठहरा। उसी चक्र से श्रीकृष्ण ने जरासंध का मस्तक काटा।
स्रोत: पाण्डवपुराण पर्व २०/३२९ से ३४७

८. मिथक: श्रीकृष्ण विष्णु के अवतार, स्वयं भगवान् थे

ग्रन्थ: जरासंध वध पर देवों ने कहा: “हे श्रीकृष्ण, तू तीन खण्डों का पालन करने वाला नवम नारायण उत्पन्न हुआ है।” श्रीकृष्ण बलभद्र बलराम के साथ तीन खण्ड के स्वामी (अर्धचक्री) हुए। वे त्रेसठ शलाका पुरुषों में नौवें नारायण, एक महापुरुष मनुष्य थे, किसी देवता के अवतार नहीं। इस युग के तीर्थंकर उनके चचेरे भाई भगवान् नेमिनाथ थे।
स्रोत: पाण्डवपुराण पर्व २०/३३४ से ३४७, २०/३५३; उत्तरपुराण पर्व ७०, ७१

९. मिथक: पाण्डव हिमालय में गलकर स्वर्ग गए (स्वर्गारोहण)

ग्रन्थ: पाँचों पाण्डवों ने भगवान् नेमिनाथ के समीप दीक्षा ली और विहार करते हुए शत्रुंजय पर्वत पर आतापन योग में स्थित हुए। दुर्योधन के भानजे कुर्यवर ने वैर से तपे हुए लोहे के मुकुट आदि आभूषण उनके शरीर पर रखकर उपसर्ग किया। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन क्षपक श्रेणी चढ़कर अन्तकृत् केवली हुए और मोक्ष गए। नकुल और सहदेव सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुए, अगले मनुष्य भव में मोक्ष पाएँगे।
स्रोत: उत्तरपुराण पर्व ७२/२६६ से २७०; पाण्डवपुराण पर्व २५/१२६ से १४०

१०. मिथक: द्रौपदी हिमालय यात्रा में सबसे पहले गिरकर देह छोड़ गई

ग्रन्थ: द्वारिका दहन देखकर पाण्डवों के साथ कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा और राजीमती ने भी दीक्षा ली। ये चारों आर्यिकाएँ शुद्ध सम्यक्त्व के साथ दीर्घ काल चारित्र पालकर, आयु के अन्त में संन्यास से देह छोड़ अच्युत स्वर्ग में देव हुईं।
स्रोत: पाण्डवपुराण पर्व २५/१४१ से १४३

यह तुलना किसी परम्परा की निन्दा के लिए नहीं, केवल जिनवाणी में आई बात सामने रखने के लिए है।


स्रोत ग्रन्थ: पाण्डवपुराण, आचार्य शुभचन्द्र, हिन्दी अनुवाद पं. जिनदास शास्त्री (जीवराज जैन ग्रन्थमाला, सोलापुर), PDF: पाण्डव पुराण (आचार्य शुभचन्द्र), हिन्दी अनुवाद सहित | Pandav Puran (Acharya Shubhachandra)
हरिवंशपुराण, आचार्य जिनसेन (भारतीय ज्ञानपीठ), PDF: हरिवंशपुराण (आचार्य जिनसेन, पुन्नाट संघ), हिंदी अनुवाद सहित | Harivansh Puran (Acharya Jinasena)
उत्तरपुराण, आचार्य गुणभद्र (भारतीय ज्ञानपीठ), PDF: उत्तरपुराण (आचार्य गुणभद्र) | Uttarpuran (Acharya Gunabhadra)