पंचास्तिकाय गाथा एवं अर्थ (आचार्य कुन्दकुन्द) | Panchastikay Gatha Evam Arth (Acharya Kundkund)

पंचास्तिकाय गाथा एवं अर्थ

आचार्य कुन्दकुन्द

पंचास्तिकाय के मूल गाथा 1 से 173, हर गाथा के नीचे उसका अर्थ, भाग इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ। अर्थ संलग्न ग्रंथ “पंचास्तिकाय परिशीलन” में हर गाथा के बाद छपे हिन्दी अर्थ से ज्यों का त्यों लिया है; विवेचन नहीं लिया, वह पीडीएफ में है। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल गाथा (छपाई की टिप्पणियों सहित): पंचास्तिकाय मूल गाथा (आचार्य कुन्दकुन्द) | Panchastikay Mool Gatha (Acharya Kundkund)

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षड्द्रव्य पंचास्तिकाय (गाथा 1 से 26)

इंदसदवंदियाणं तिहुवणहिदमधुरविसदवक्काणं ।
अंतातीदगुणाणं णमो जिणाणं जिदभवाणं ॥1॥ ॥1॥

अर्थ: जो सौ इन्द्रों से वन्दित हैं; जिनकी वाणी तीन लोक को हितकर, मधुर एवं विशद है, निर्मल है, स्पष्ट है; जिनमें अनन्त गुण वर्तते हैं और जिन्होंने भव पर विजय प्राप्त की है; उन जिनवर को नमस्कार हो।


समणमुहुग्गदमट्ठं चदुग्गदिणिवारणं सणिव्वाणं ।
एसो पणमिय सिरसा समयमिणं सुणह वोच्छामि ॥2॥ ॥2॥

अर्थ: चतुर्गति का निवारण कराने वाले और निर्वाण की प्राप्ति कराने वाले महाश्रमण अर्थात् तीर्थंकरों के मुख से निकले हुये वचनों अर्थात् जिनवाणी को नमस्कार करके इस शास्त्र अर्थात् पंचास्तिकाय संग्रह का कथन करता हूँ। उसे तुम ध्यान से सुनो!


समवाओ पंचण्हं समउ त्ति जिणुत्तमेहिं पण्णत्तं ।
सो चेव हवदि लोओ तत्तो अमिओ अलोओ खं ॥3॥ ॥3॥

अर्थ: पाँच अस्तिकाय के समभावपूर्वक अर्थात् राग-द्वेषरूप विकृति से रहित शाब्दिक निरूपण को अथवा पंचास्तिकाय के सम्यक्बोध को अथवा पाँचों द्रव्यों के समूह को जिनवरों ने ‘समय’ कहा है। इन पाँच अस्तिकाय के समूह जितना ही लोक है; उससे आगे अमाप अलोक है।


जीवा पोग्गलकाया धम्माधम्मा तहेव आगासं ।
अत्थित्तम्हि य णियदा अणण्णमइया अणुमहंता ॥4॥ ॥4॥

अर्थ: जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म तथा आकाश अस्तित्व में नियत, अस्तित्व से अनन्यमय और अणु महान् हैं।


जेसिं अत्थि सहाओ गुणेहिं सह पज्जएहिं विविहेहिं ।
ते होंति अत्थिकाया णिप्पण्णं जेहिं तेल्लोक्कं ॥5॥ ॥5॥

अर्थ: जिन्हें विविध गुणों और पर्यायों के साथ अपनत्व है, वे अस्तिकाय हैं। इन पंचास्तिकायों से ही तीन लोक निष्पन्न हैं।


ते चेव अत्थिकाया तेक्कालियभावपरिणदा णिच्चा ।
गच्छंति दवियभावं परियट्टणलिंगसंजुत्ता ॥6॥ ॥6॥

अर्थ: जो तीन काल के भावों रूप परिणमित होते हैं तथा नित्य हैं, वे पंच अस्तिकाय कालद्रव्य सहित छहों द्रव्य हैं।


अण्णोण्णं पविसंता देंता ओगासमण्णमण्णस्स ।
मेलंता वि य णिच्चं संग सभावं ण विजहंति ॥7॥ ॥7॥

अर्थ: यद्यपि वे द्रव्य एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं, परस्पर एक-दूसरे को अवकाश देते हैं, परस्पर मिलते हैं; तथापि सदा अपने-अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते हैं।


सत्ता सव्वपयत्था सविस्सरूवा अणंतपज्जाया ।
भंगुप्पादधुवत्ता सप्पडिवक्खा हवदि एक्का ॥8॥ ॥8॥

अर्थ: सत्ता, उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मक, एक, सर्वपदार्थस्थित, सविश्वरूप, अनन्तपर्यायमय और सप्रतिपक्ष है।


दवियदि गच्छदि ताइं ताइं सब्भावपज्जयाइं जं ।
दवियं तं भण्णंते अणण्णभूदं तु सत्तादो ॥9॥ ॥9॥

अर्थ: उन-उन सद्भाव पर्यायों रूप जो द्रवित होता है, प्राप्त होता है, उसे द्रव्य कहते हैं, जो कि सत्ता से अनन्य हैं।


दव्वं सल्लक्खणियं उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं ।
गुणपज्जयासयं वा जं तं भण्णंति सव्वण्हू ॥10॥ ॥10॥

अर्थ: जो सत् लक्षण वाला है, जो उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य संयुक्त है और जो गुण-पर्यायों का आश्रयभूत है, उसे सर्वज्ञदेव द्रव्य कहते हैं।


उत्पत्ती व विसाणो दव्वस्स य णत्थि अत्थि सब्भावो ।
विगमुप्पदधुवत्तं करेंति तस्सेव पज्जाया ॥11॥ ॥11॥

अर्थ: द्रव्य का कभी उत्पाद या विनाश नहीं होता ह्र सदा सद्भाव ही रहता है। हाँ, उसकी पर्यायें विनाश, उत्पाद और ध्रुवता धारण करती हैं।


पज्जयविजुदं दव्वं दव्वविजुत्ता य पज्जया णत्थि ।
दोण्हं अणण्णभूदं भावं समणा परूवेंति ॥12॥ ॥12॥

अर्थ: पर्यायों रहित द्रव्य और द्रव्य रहित पर्यायें नहीं होतीं। दोनों अनन्य हैं, अभिन्न हैं।


दव्वेण विणा ण गुणा गुणेहिं दव्वं विणा ण संभवदि ।
अव्वदिरित्तो भावो दव्वगुणाणं हवदि तम्हा ॥13॥ ॥13॥

अर्थ: द्रव्य के बिना गुण नहीं होते तथा गुणों के बिना द्रव्य भी नहीं होते; इसलिए द्रव्य और गुणों में अभिन्नपना है, अभेदपना है।


सिय अत्थि णत्थि उहयं अव्वत्तव्वं पुणो य तत्तिदयं ।
दव्वं खु सत्तभंगं आदेसवसेण संभवदि ॥14॥ ॥14॥

अर्थ: वस्तुत: द्रव्य-कथन की अपेक्षा से स्यात् अस्तिरूप, स्यात् नास्तिरूप, स्यात् अस्ति-नास्ति (उभय) रूप है। तीनों धर्म एकसाथ कथन में न आने से वही वस्तु अवक्तव्य है। इसप्रकार वस्तु के चार भंग हुए। अवक्तव्य के साथ अस्ति, नास्ति तथा अस्ति-नास्ति लगाने से तीन भंग और हो जाते हैं। जो इसप्रकार हैं ह्न स्यात् अस्ति अवक्तव्य, स्यात् नास्ति अवक्तव्य तथा स्यात् अस्ति-नास्ति अवक्तव्य। इसप्रकार वस्तु का कथन सात भंगरूप होता है।


भावस्स णत्थि णासो णत्थि अभावस्स चेव उप्पादो ।
गुणपज्जएसु भावा उप्पादवए पकुव्वंति ॥15॥ ॥15॥

अर्थ: भाव का कभी नाश नहीं होता तथा असत् का कभी उत्पाद नहीं होता। सत् द्रव्य अपने-अपने गुण-पर्यायों से उत्पाद-व्यय करते हैं।


भावा जीवादीया जीवगुणा चेदणा य उवओगो ।
सुरणरणारयतिरिया जीवस्स य पज्जया बहुगा ॥16॥ ॥16॥

अर्थ: जीवादि छह द्रव्य भाव हैं, पदार्थ हैं तथा जीव चेतनामय है, अर्थात् ज्ञान-दर्शन उपयोगमय है और जीव की पर्यायें देव-मनुष्य-नारक-तिर्यंचरूप अनेक पर्यायें हैं।


मणुसत्तणेण णट्ठो देही देवो हवेदि इदरो वा ।
उभयत्थ जीवभावो ण णस्सदि ण जायदे अण्णो ॥17॥ ॥17॥

अर्थ: मनुष्य पर्याय से मरण कर जीव देव अथवा अन्य पर्यायरूप से उत्पन्न होता है। उन दोनों पर्यायों में जीव भाव नष्ट नहीं होता और नवीन जीव उत्पन्न नहीं होता।


सो चेव जादि मरणं, जादि ण णट्ठो ण चेव उप्पण्णो ।
उप्पण्णो य विणट्ठो, देवो मणुसो त्ति पज्जाओ ॥18॥ ॥18॥

अर्थ: यद्यपि वही जीवद्रव्य पर्यायरूप से जन्म लेता है और मरता है, तथापि वह द्रव्य द्रव्यरूप से न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है। पर्याय बदलने पर भी जीव नहीं बदलता। निष्कलंक शुद्ध पर्यायें एवं मलिन पर्यायें भी स्वयं से ही होती हैं; कर्मोदय रूप परद्रव्य तो निमित्तमात्र है।


एवं सदो विणासो असदो जीवस्स णत्थि उप्पादो ।
तावदिओ जीवाणं देवो मणुसोत्ति गदिणामो ॥19॥ ॥19॥

अर्थ: इस गाथा में जो यह कहा गया है कि जीव को सत् का विनाश और असत् का उत्पाद नहीं है ह्न वह ध्रुवता की अपेक्षा कहा है तथा देव जन्मता है और मनुष्य मरता है ह्न ऐसा जो कहा, वह पर्याय की अपेक्षा कहा है और उस समय निमित्तरूप मनुष्य गति नामकर्म भी उतने ही काल का होता है।


णाणावरणादीया भावा जीवेण सुट्ठु अणुबद्धा ।
तेसिमभावं किच्चा अभूदपुव्वो हवदि सिद्धो ॥20॥ ॥20॥

अर्थ: ज्ञानावरणादि भाव जीव के साथ भलीभांति अनुबद्ध हैं, उनका अभाव करके जीव सिद्ध होता है।


एवं भावमभावं भावाभावं अभावभावं च ।
गुणपज्जएहिं सहिदो संसरमाणो कुणदि जीवो ॥21॥ ॥21॥

अर्थ: यह जीव गुण पर्यायों सहित संसरण करता हुआ भावरूप, अभावरूप, भावाभावरूप और अभाव-भावरूप परिणमन करता है।


जीवा पुग्गलकाया आयासं अत्थिकाइया सेसा ।
अमया अत्थित्तमया कारणभूदा हि लोगस्स ॥22॥ ॥22॥

अर्थ: जीव, पुद्गलकाय, आकाश और शेष दो (धर्म एवं अधर्मद्रव्य) अस्तिकाय हैं, अकृत हैं, अस्तित्वमय हैं और वास्तव में लोक के कारणभूत हैं।


सब्भावभावाणं जीवाणं तह य पोग्गलाणं च ।
परियट्टणसंभूदो कालो णियमेण पण्णत्तो ॥23॥ ॥23॥

अर्थ: सत्ता स्वभाववाले जीवों और पुद्गलों के परिवर्तन से सिद्ध होनेवाले कालद्रव्य का सर्वज्ञों द्वारा नियम से उपदेश दिया गया है।


ववगदपणवण्णरसो ववगददोगंधअट्ठफासो य ।
अगुरुलहुगो अमुत्तो वट्टणलक्खो य कालो त्ति ॥24॥ ॥24॥

अर्थ: कालद्रव्य पाँच वर्ण और पाँच रस तथा दो गंध एवं आठ स्पर्श से रहित है तथा अगुरुलघु, अमूर्त और वर्तना लक्षणवाला है।


समओ णिमिसो कट्ठा कला य णाली तदो दिवारत्ती ।
मासोदुअयणसंवच्छरो त्ति कालो परायत्तो ॥25॥ ॥25॥

अर्थ: समय, निमिष, काष्ठा, कला, घड़ी, अहोरात्र, मास, ऋतु, अयन और वर्ष आदि हैं, वे पराश्रित होने से व्यवहार हैं।


णत्थि चिरं वा खिप्पंमत्तारहिदं तु सा वि खलु मत्ता ।
पोग्गलदव्वेण विणा तम्हा कालो पडुच्चभवो ॥26॥ ॥26॥

अर्थ: ‘चिर’ अथवा ‘क्षिप्र’ ऐसा ज्ञान काल के माप बिना नहीं होता और माप पुद्गल के आलम्बन बिना संभव नहीं है, अतः व्यवहारकाल पर के आश्रय से होता है ह्व ऐसा उपचार से कहा जाता है।

जीव द्रव्यास्तिकाय (गाथा 27 से 73)

जीवो त्ति हवदि चेदा उवओगविसेसिदो पहू कत्ता ।
भोत्ता व देहमेत्तो ण हि मुत्तो कम्मसंजुत्तो ॥27॥ ॥27॥

अर्थ: आत्मा जीव है, चेतयिता है, उपयोग लक्षित है, प्रभु है, कर्त्ता है, भोक्ता है, देह प्रमाण है, अमूर्त है और कर्म संयुक्त है।


कम्ममलविप्पमुक्को उड्ढं लोगस्स अन्तमधिगंता ।
सो सव्वणाणदरिसी लहदि सुहमणिंदियमणंतं ॥28॥ ॥28॥

अर्थ: कर्ममल से मुक्त आत्मा लोक के अन्त को प्राप्त करके सर्वज्ञ-सर्वदर्शी होकर अनन्त अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करता है।


जादो सयं स चेदा सव्वण्हू सव्वलोगदरिसी य ।
पावदि इंदियरहिदं अव्वाबाहं सगममुत्तं ॥29॥ ॥29॥

अर्थ: वह चेतयिता स्वयं सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होता हुआ स्वकीय अमूर्त अव्याबाध अनंतसुख को प्राप्त करता है।


पाणेहिं चदुहिं जीवदि जीविस्सदि जो हु जीविदो पुव्वं ।
सो जीवो पाणा पुण बलमिंदियमाउ उस्सासो ॥30॥ ॥30॥

अर्थ: ‘‘जो मूलतः चार प्राणों से जीता है, जियेगा और पूर्वकाल में जीता था, वह जीव है। मूलतः प्राण चार हैं ह्न इन्द्रिय, बल, आयु और श्वासोच्छ्वास। एकेन्द्रिय जीव की एक इन्द्रिय, आयु एवं कायबल व श्वासोच्छ्वास ह्न इसप्रकार जो चार प्राणों से जियें वे एक इन्द्रिय जीव हैं। दो इन्द्रिय जीवों के रसना इन्द्रिय बढ़ जाती है, इसी तरह असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक एक-एक इन्द्रिय बढ़ती जाती है तथा संज्ञी पंचेन्द्रिय के मन बढ़ जाता है। इसप्रकार संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के दस प्राण होते हैं।’’


अगुरुलहुगा अणंता तेहिं अणंतेहिं परिणदा सव्वे ।
देसेहिं असंखादा सिय लोगं सव्वमावण्णा ॥31॥ ॥31॥

अर्थ: सर्व जीव अपने-अपने अनन्त अगुरुलघुक गुणांशों के रूप से परिणमित हैं। प्रत्येक जीव के वे अगुरुलघुक गुणांश असंख्यात प्रदेशवाले हैं। वे कथंचित् समस्त लोक में व्याप्त होते हैं और कथंचित् स्वदेह प्रमाण ही रहते हैं।


केचित्तु अणावण्णा मिच्छादंसणकसायजोगजुदा ।
विजुदा य तेहिं बहुगा सिद्धा संसारिणो जीवा ॥32॥ ॥32॥

अर्थ: अनेक (अनन्त) जीव मिथ्यादर्शन, कषाय एवं योग सहित संसारी हैं और अनेक (अनन्त) जीव मिथ्यादर्शन कषाय योग रहित सिद्ध हैं।


जह पउमराय रयणं खित्तं खीरे पभासयदि खीरं ।
तह देही देहत्थो सदेहमेत्तं पभासयदि ॥33॥ ॥33॥

अर्थ: जिसप्रकार दूध में डाला गया पद्मराग रत्न अपनी प्रभा से अभेदरूप एकमेकरूप व्याप्त होता हुआ प्रतीत होता है, उसीप्रकार जीव देह में रहता हुआ स्वदेह प्रमाण प्रकाशित होता है।


सव्वत्थ अत्थि जीवो ण य एक्को एक्ककाय एक्कट्ठी ।
अज्झवसाणविसिट्ठो चिट्ठदि मलिणो रजमलेहिं ॥34॥ ॥34॥

अर्थ: यद्यपि आत्मा देह के साथ दूध-पानी की भाँति एक-मेक होकर रहता है; तथापि एकरूप कभी नहीं होता। अपने विभावस्वभाव के कारण अध्यवसान विशिष्ट वर्तता हुआ कर्मरूप रज से मलिन होने से संसार में भ्रमण करता है।


जेसिं जीवसहावो णत्थि अभावो य सव्वहा तस्स ।
ते होंति भिण्णदेहा सिद्धा वचिगोयरमदीदा ॥35॥ ॥35॥

अर्थ: सिद्धजीवों के दसों अचेतन द्रव्य प्राणों का अभाव हो जाने से उनके द्रव्यप्राण नहीं हैं तथा ज्ञान-दर्शनरूप चेतन प्राण होने से जीवत्व का सर्वथा अभाव नहीं है। वे सिद्ध भगवान् देहरहित वचन अगोचर अनंत महिमावंत हैं।


ण कुदोचि वि उप्पण्णो तम्हा कज्जं ण तेण सो सिद्धो ।
उप्पादेदि ण किंचि वि कारणमवि तेण ण स होदि ॥36॥ ॥36॥

अर्थ: वे सिद्ध भगवान् किसी अन्यकारण से उत्पन्न नहीं होते; इसलिए किसी के कार्य नहीं हैं और किसी अन्य कार्य को उत्पन्न नहीं करते; इसलिए किसी अन्य के कारण भी नहीं हैं।


सस्सदमध उच्छेदं भव्वमभव्वं च सुण्णमिदरं च ।
विण्णाणमविण्णाणं ण वि जुज्जदि असदि सब्भावे ॥37॥ ॥37॥

अर्थ: यदि मोक्ष में जीव का सद्भाव न हो तो जीव की ध्रुवता व अध्रुवता ही घटित नहीं होगी तथा विज्ञान व अविज्ञान आदि कुछ भी व्यवस्था नहीं बन सकेगी तथा भव्य-अभव्यपने का व्यवहार भी संभव नहीं होगा; इसलिए यह सिद्ध है कि मोक्ष में जीव का सद्भाव है।


कम्माणं फलमेक्को एक्को कज्जं तु णाणमध एक्को ।
चेदयदि जीवरासी चेदगभावेण तिविहेण ॥38॥ ॥38॥

अर्थ: एक जीव राशि विविध चेतक भावों द्वारा कर्मों के फल को वेदती है। दूसरी प्रकार की जीव राशि कार्य (कर्म) को वेदती है तथा तीसरी प्रकार की जीवराशि ज्ञान को चेतती है, वेदती है।


सव्वे खलु कम्मफलं थावरकाया तसा हि कज्जजुदं ।
पाणित्तमदिक्कंता णाणं विदंति ते जीवा ॥39॥ ॥39॥

अर्थ: सर्व स्थावर जीव समूह वास्तव में कर्मफल को वेदते हैं। त्रस वास्तव में कार्य सहित कर्मफल को वेदते हैं और जो प्राणों का अतिक्रम कर गये, वे केवलज्ञानी ज्ञान को ही वेदते हैं।


उवओगो खलु दुविहो णाणेण य दंसणेण संजुत्तो ।
जीवस्स सव्वकालं अणण्णभूदं वियाणीहि ॥40॥ ॥40॥

अर्थ: जीव ज्ञान और दर्शन इन दो उपयोग सहित होते हैं। ये दोनों उपयोग सभी जीवों के अनन्य रूप से सदैव रहते हैं।


आभिणिसुदोधिमणकेवलाणि णाणाणि पंचभेयाणि ।
कुमदिसुदविभंगाणि य तिण्णि वि णाणेहिं संजुत्ते ॥41॥ ॥41॥

अर्थ: मति-श्रुत-अवधि-मन:पर्यय और केवलज्ञान ह्व इसप्रकार ज्ञान के पाँच भेद हैं; और कुमति-कुश्रुत तथा कुअवधिज्ञान ह्व मिथ्याज्ञान भी पाँच ज्ञान के साथ संयुक्त हैं। सब मिलाकर ज्ञानोपयोग के आठ भेद हैं।


दंसणमवि चक्खुजुदं अचक्खुजुदमवि य ओहिणा सहियं ।
अणिधणमणंतविसयं केवलियं चावि पण्णत्तं ॥42॥ ॥42॥

अर्थ: दर्शन भी चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन के भेद से चार प्रकार का है।


ण वियप्पदि णाणादो णाणी णाणाणि होंति णेगाणि ।
तम्हा दु विस्सरूवं भणियं दवियं त्ति णाणीहि ॥43॥ ॥43॥

अर्थ: यद्यपि ज्ञान और ज्ञानी में कोई भेद नहीं हैं, दोनों अभेद हैं; क्योंकि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से गुण-गुणी एक हैं, तथापि ज्ञान के अनेकभेद भी हैं, इसी कारण तो आचार्यों ने जीव द्रव्य को भी अनेक रूप कहा है।


जदि हवदि दव्वमण्णं गुणदो य गुणा य दव्वदो अण्णे ।
दव्वाणंतियमधवा दव्वाभावं पकुव्वंति ॥44॥ ॥44॥

अर्थ: “यदि द्रव्य गुणों से अन्य (भिन्न) हो और गुण द्रव्य से अन्य (भिन्न) हों तो या तो द्रव्य की अनन्तता का प्रसंग प्राप्त होगा या फिर द्रव्य के अभाव का प्रसंग प्राप्त होगा, जो संभव नहीं है।


अविभत्त मणण्णत्वं दव्व गुणाणं विभत्तमण्णतं ।
णेछन्ति णिच्छयण्हू तव्विवरीदं हि वा तेसिं ॥45॥ ॥45॥

अर्थ: द्रव्य और गुणों के अविभक्त रूप अनन्यपना है। निश्चयनय से विभक्तरूप से न तो अन्यपना है और न अनन्यता ही है।


ववदेसा संढाणा, संखा विषया य होंति ते बहुगा ।
ते तेसिमणण्णत्ते, अण्णत्ते चावि विज्जंते ॥46॥ ॥46॥

अर्थ: ‘जो द्रव्य के व्यपदेश अर्थात् कथन तथा संस्थान, संख्याएँ और विषय अनेक हैं। वे व्यपदेश आदि द्रव्य एवं गुणों के अन्यपने में तथा अनन्यपने में भी होते हैं।’


णाणं धनं च कुव्वदि धणिणं जह णाणिणं च दुविधेहिं ।
भण्णति तह पुधत्तं एयत्तं चावि तच्चण्हू ॥47॥ ॥47॥

अर्थ: ''जिसप्रकार धन व ज्ञान से पुरुष धनी व ज्ञानी कहे जाते हैं, उसीप्रकार एक भिन्न पदार्थ के साथ और दूसरे अभिन्न पदार्थ के साथ ह्न ऐसा दो प्रकार से व्यपदेश है। ऐसा तत्वज्ञजन कहते हैं।


णाणी णाणं च सदा अत्थंतरिदा दु अण्णमण्णस्स ।
दोण्डं अचेदणत्वं पसजदि सम्मं जिणावमदम् ॥48॥ ॥48॥

अर्थ: यदि ज्ञानी आत्मा और ज्ञान सदैव परस्पर अर्थान्तरभूत (भिन्न पदार्थभूत) हों तो दोनों को अर्थात् आत्मा और ज्ञान-दोनों को अचेतनपने का प्रसंग प्राप्त होगा; क्योंकि ज्ञान बिना ज्ञानी कैसा? तथा ज्ञानी के बिना ज्ञान किसके आश्रय रहेगा?


णहि सो समवाया दो अत्यंतरिदो दु णाणदो णाणी ।
अण्णाणीति य वयणं एगत्त पसाधणं होदि ॥49॥ ॥49॥

अर्थ: ज्ञान से अर्थान्तरभूत आत्मा अर्थात् ज्ञान से भिन्न आत्मा ज्ञान के समवाय से ज्ञानी बनता है। ऐसा जो नैयायिकों की मान्यता है, वह यथार्थ नहीं है।


समवत्ती समवाओ अपुधब्भूदो य अजुद सिद्धो य ।
तम्हा दव्व गुणा णं, अजुदा सिद्धि ति णिद्दिट्ठा ॥50॥ ॥50॥

अर्थ: समवाय शब्द का अर्थ समवर्तीपना है, समवर्तीपना ही समवाय है, वही अपृथक्पना और अयुतसिद्धपना है। इसलिए द्रव्य और गुणों की अयुद्धसिद्धि कही है। जैसा कि आत्मा और उसके गुणों में होता है, उनका यह संबंध अनादि-अनन्त तादात्म्य मय सहवृत्ति होने से अयुतसिद्धि है, अन्यमत द्वारा मान्य प्रथक् पदार्थों के समवाय संबंधी यथार्थ नहीं है। जैनमत के अनुसार तादात्म्य सम्बन्ध एक ही द्रव्य के गुणों में होता है, इसी का दूसरा नाम अयुत सिद्ध समवाय सम्बन्ध है।

जैनदर्शन के अनुसार द्रव्य व गुणों के कभी भी प्रथक्पना नहीं होता। इसलिए द्रव्य व गुणों में अयुत सिद्धि है, युतसिद्ध सम्बन्ध नहीं है।


वण्णरसगंधफासा परमाणुपरूविदा विसेसेहिं ।
दव्वादो य अणण्णा अण्णत्तपगासगा होंति ॥51॥ ॥51॥

अर्थ: परमाणु में प्ररूपित किए जाने वाले वर्ण-रस-गंध-स्पर्श द्रव्य से अनन्य वर्तते हुए विशेषों द्वारा अन्यत्व को प्रकाशित करते हैं, परन्तु वे वर्ण आदि स्वभाव से अन्यरूप नहीं है तथा जीव में निबद्ध दर्शन-ज्ञान अनन्यवर्तते हुए कथन द्वारा प्रथक्त्व को दर्शाते हैं, स्वभाव से पृथक् नहीं है ।


दंसणणाणाणि तहा जीवणिबद्धाणि णण्णभूदाणि ।
ववदेसदो पुधत्तं कुव्वंति हि णो सभावादो ॥52॥ ॥52॥

अर्थ: परमाणु में प्ररूपित किए जाने वाले वर्ण-रस-गंध-स्पर्श द्रव्य से अनन्य वर्तते हुए विशेषों द्वारा अन्यत्व को प्रकाशित करते हैं, परन्तु वे वर्ण आदि स्वभाव से अन्यरूप नहीं है तथा जीव में निबद्ध दर्शन-ज्ञान अनन्यवर्तते हुए कथन द्वारा प्रथक्त्व को दर्शाते हैं, स्वभाव से पृथक् नहीं है।


जीवा अणाइणिहणा संता णंता य जीवभावादो ।
सब्भावदो अणंता, पंचग्गुणप्पधाणा य ॥53॥ ॥53॥

अर्थ: जीव पारिणामिकभाव से अनादि-अनन्त है, उदय, उपशम एवं क्षयोपशम भावों की अपेक्षा सादि-सान्त है तथा क्षायिक भाव की अपेक्षा सादि-अनन्त है एवं जीव भाव से भी अनादि-अनन्त है।


एवं सदो विणासो असदो जीवस्स हवदि उप्पादो ।
इदि जिणवरेहिं भणिदं अण्णोण्णविरुद्धमविरुद्धं ॥54॥ ॥54॥

अर्थ: इसप्रकार जीव के सत् का विनाश और असत् का उत्पाद होता है ह्न ऐसा जिनवरों ने कहा है। जो कि अन्योन्य विरुद्ध होकर भी अविरुद्ध है।


णेरइयतिरियमणुया देवा इदि णामसंजुदा पयडी ।
कुव्वंति सदो णासं असदो भावस्स उप्पादं ॥55॥ ॥55॥

अर्थ: उक्त गाथा में जीव के उत्पाद-व्यय की कारणभूत कर्म उपाधि को दिखाया है। नारक, तिर्यंच, मनुष्य और देव नामों वाली नामकर्म की प्रकृतियों में कहा गया है कि पर्यायार्थिकनय से नारक, तिर्यंच, मनुष्य व देव नामक नामकर्म की प्रकृतियाँ सत्भाव का नाश और असत्भाव का उत्पाद करती हैं।


उदयेण उवसमेण य खएण दुहिं मिस्सिदेहिं परिणामें ।
जुत्ता ते जीवगुणा बहुसु य अत्थेसु वित्थिण्णा ॥56॥ ॥56॥

अर्थ: उक्त गाथा में कहते हैं कि हृ उदय से युक्त उपशम से युक्त, क्षय से युक्त, क्षयोपशम भावों से युक्त और परिणाम अर्थात् पारिणामिक भावों से युक्त जीव के पाँच भाव हैं और उन्हें अनेक प्रकार से विस्तृत किया जाता है, अर्थात् भेद करके देखें ये सभी ५३ प्रकार के प्रभेदों में हैं।


कम्मं वेदयमाणो जीवो भावं करेदि जारिसयं ।
सो तस्स तेण कत्ता हवदि त्ति य सासणे पढिदं ॥57॥ ॥57॥

अर्थ: कर्म को वेदता हुआ जीव जैसे भावों को करता है, वह उन भावों का उस प्रकार से कर्त्ता है ह्न ऐसा जिन शासन में कहा है।


कम्मेण बिणा उदयं जीवस्स ण विज्जदे उवसमं वा ।
खइयं खओवसमियं तम्हा भावं तु कम्मकदं ॥58॥ ॥58॥

अर्थ: कर्म बिना जीव को उदय, उपशम, क्षायिक और क्षायोपशमिक भाव नहीं होते। इसलिए ये चारों ही भाव कर्मकृत हैं।


भावो जदि कम्म कदो, अत्ता कम्मस्स होदि किध कत्ता ।
ण कुणदि अत्ता किंचि वि, मुत्ता अण्णं सगं भावं ॥59॥ ॥59॥

अर्थ: यदि जीव के भावकर्म द्रव्यकर्मकृत हों तो आत्मा भी द्रव्यकर्म का कर्त्ता ठहरे, जो संभव नहीं है; क्योंकि आत्मा तो अपने भाव को छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं करता।


भावो कम्मणिमित्तो कम्मं पुण भावकारणं हवदि ।
ण दु तेसिं खलु कत्ता ण विणा भूदा दु कत्तारं ॥60॥ ॥60॥

अर्थ: जीवों के भावों का निमित्त द्रव्य कर्म हैं और द्रव्य कर्मों का निमित्त जीव के भाव हैं; परन्तु वास्तव में वे एक दूसरे के कर्त्ता नहीं हैं। तथा कर्त्ता के बिना कर्म होते हों ह्न ऐसा भी नहीं है। अर्थात् कर्त्ता के बिना कर्म होते भी नहीं हैं।


कुव्वं सगं सहावं अत्ता कत्ता सगस्स भावस्स ।
ण हि पोग्गलकम्माणं इदि जिणवयणं मुणेदव्वं ॥61॥ ॥61॥

अर्थ: अपने स्वभाव को करता हुआ आत्मा वास्तव में अपने भाव का कर्त्ता है, पुद्गल कर्मों का कर्त्ता नहीं।


कम्मं पि सगं कुव्वदि सेण सहावेण सम्ममप्पाणं ।
जीवो वि य तारिसओ कम्मसहावेण भावेण ॥62॥ ॥62॥

अर्थ: ‘कर्म अपने स्वभाव से अपने को करते हैं और जीव भी कर्म स्वभाव भाव से अपने को करता है।


कम्मं कम्मं कुव्वदि जदि सो अप्पा करेदि अप्पाणं ।
किध तस्स फलं भुंजदि अप्पा कम्मं च देदि फलं ॥63॥ ॥63॥

अर्थ: यदि कर्म कर्म को करे और आत्मा आत्मा को करे तो कर्म आत्मा को फल क्यों देगा तथा आत्मा उसका फल क्यों भोगेगा?


ओगाढगाढणिचिदो पोग्गलकाएहिं सव्वदो लोगो ।
सुहमेहिं बादरेहिं य णंताणंतेहिं विविधेहिं ॥64॥ ॥64॥

अर्थ: तीनों लोक सर्वत्र विविध प्रकार के अनन्तान्त सूक्ष्म और बादर पुद्गलकाय से अवगाहित होकर भरा हुआ है।


अत्ता कुणदि सभावं तत्थ गदा पोग्गला सभावेहिं ।
गच्छंति कम्मभावं अण्णण्णोगाहमवगाढा ॥65॥ ॥65॥

अर्थ: आत्मा जब अपने मोहराग-द्वेषरूप भावों को करता है, तब वहाँ रहनेवाले पुद्गल कर्म अपने भावों से जीव में विशिष्ट प्रकार से अन्योन्य अवगाहरूप से प्रविष्ट हुए कर्मभाव को प्राप्त होते हैं।


जह पोग्गलदव्वाणं बहुप्पयारेहिं खंधणिव्वत्ती ।
अकदा परेहिं दिट्ठा तह कम्माणं वियाणाहि ॥66॥ ॥66॥

अर्थ: जिसप्रकार पुद्गल द्रव्यों की अनेक प्रकार की स्कंधरचना पर के किए बिना ही होती दिखाई देती है, उसीप्रकार कर्मों की बहु प्रकार की संरचना पर से अकृत ही होती है।


जीवा पोग्गलकाया अण्णण्णोगाढगहणपडिबद्धा ।
काले विजुज्जमाणा सुहदुक्खं देंति भुञ्जन्ति ॥67॥ ॥67॥

अर्थ: जीव और पुद्गलकाय परस्पर अवगाह्य से एक-दूसरे से बद्ध हैं, काल से पृथक् होने पर कर्म सुख-दुःख देते हैं एवं जीव भोगते हैं।


तम्हा कम्मं कत्ता भावेण हि संजुदोध जीवस्स ।
भोत्ता हु हवदि जीवो चेदगभावेण कम्मफलं ॥68॥ ॥68॥

अर्थ: जीव के भाव से युक्त द्रव्यकर्म निश्चय से अपने भावों के कर्त्ता हैं और व्यवहार से वे द्रव्यकर्म जीवभाव के कर्त्ता हैं; परन्तु चेतनभाव के कारण कर्मफल का भोक्ता तो मात्र जीव है।


एवं कत्ता भोत्ता होज्जं अप्पा सगेहिं कम्मेहिं ।
हिंडदि पारमपारं संसारं मोहसंछण्णो ॥69॥ ॥69॥

अर्थ: इसप्रकार आत्मा अपने कर्मों का कर्त्ता-भोक्ता होता हुआ मोहाच्छादित होकर अनंत संसार में परिभ्रमण करता है।


उवसंतखीणमोहो मग्गं जिणभासिदेण समुवगदो ।
णाणाणुमग्गचारी णिव्वाणपुरं वजदि धीरो ॥70॥ ॥70॥

अर्थ: जिस पुरुष ने जिन वचनों द्वारा मोक्षमार्ग को प्राप्त करके तथा दर्शनमोह के उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम को प्राप्त करके सम्यग्ज्ञान प्रगट किया है, वह पुरुष शीघ्र निर्वाण को प्राप्त करता है।


एक्को चेव महप्पा सो दुवियप्पो तिलक्खणो होदि ।
चदुचंकमणो भणिदो पंचग्गगुणप्पधाणो य ॥71॥ ॥71॥

अर्थ: मूलतः तो वह महान् आत्मा एक ही है, किन्तु भेद, लक्षण, गति आदि की अपेक्षा अनेक भेदवाला कहा गया है। जैसे ह्व पाँच मुख्य गुणों से पाँच भेदवाला भी कहा है। इसीप्रकार अनुश्रेणी गमन अपेक्षा छह भेदवाला, सात भंगों की अपेक्षा सात भेदवाला, ज्ञानावरणादि आठ कर्मों अथवा सम्यक्त्वादि आठ गुणों के आश्रयरूप आठ भेदवाला, नौ अर्थरूप और दसस्थानगत भेदवाला कहा गया है।‘’


छक्कापक्कमजुत्तो उवउत्तो सत्तभंगसब्भावो ।
अट्ठासओ णवट्ठो जीवो दसट्ठाणगो भणिदो ॥72॥ ॥72॥

अर्थ: मूलतः तो वह महान् आत्मा एक ही है, किन्तु भेद, लक्षण, गति आदि की अपेक्षा अनेक भेदवाला कहा गया है। जैसे ह्व पाँच मुख्य गुणों से पाँच भेदवाला भी कहा है। इसीप्रकार अनुश्रेणी गमन अपेक्षा छह भेदवाला, सात भंगों की अपेक्षा सात भेदवाला, ज्ञानावरणादि आठ कर्मों अथवा सम्यक्त्वादि आठ गुणों के आश्रयरूप आठ भेदवाला, नौ अर्थरूप और दसस्थानगत भेदवाला कहा गया है।‘’


पयडिट्ठिदिअणुभागप्पदेसबंधेहिं सव्वदो मुक्को ।
उड्ढं गच्छदि सेसा विदिसावज्जं गदिं जंति ॥73॥ ॥73॥

अर्थ: प्रकृति, स्थिति, अनुभाग एवं प्रदेश बंध से सर्वतः मुक्तजीव ऊर्ध्वगमन करता है। शेष संसारी जीव मरणांत में चारों विदिशाओं को छोड़कर पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण तथा ऊर्द्ध एवं अधो ह्न इन छह दिशाओं में गमन करते हैं। तथा मुक्त जीवों के स्वाभाविक रूप से ऊर्द्ध गमन होता है।

पुद्गल द्रव्यास्तिकाय (गाथा 74 से 82)

खंधा य खंधदेसा खंधपदेसा य होंति परमाणू ।
इदि ते चदुव्वियप्पा पोग्गलकाया मुणेदव्वा ॥74॥ ॥74॥

अर्थ: पुद्गल काय के चार भेद हैं ह्व १. स्कन्ध २. स्कन्धदेश ३. स्कन्ध प्रदेश और ४. परमाणु।


खंधं सयलसमत्थं तस्स दु अद्धं भणंति देसो त्ति ।
अद्धद्धं च पदेसो परमाणू चेव अविभागी ॥75॥ ॥75॥

अर्थ: समस्त पुद्गल पिण्डात्मक वस्तु स्कन्ध है, उसके आधे को देश कहते हैं। आधे से भी आधे को प्रदेश कहते हैं एवं वस्तु के अविभागी अंश को परमाणु कहते हैं।


बादरसुहुमगदाणं खंधाणं पोग्गलो त्ति ववहारो ।
ते होंति छप्पयारा तेलोक्कं जेहिं णिप्पण्णं ॥76॥ ॥76॥

अर्थ: बादर और सूक्ष्मरूप से परिणत स्कन्धों को पुद्गल कहने का व्यवहार है। वे छह प्रकार के हैं, जिनसे तीन लोक निष्पन्न है।


सव्वेसिं खंधाणं जो अंतो तं वियाण परमाणू ।
सो सस्सदो असद्दो एक्को अविभागी मुत्तिभवो ॥77॥ ॥77॥

अर्थ: सर्व स्कन्धों का जो अन्तिम भाग है, सबसे छोटा अविभागी अंश है, उसे परमाणु कहते हैं। वह अविभागी, एक, शाश्वत तथा मूर्तरूप से उत्पन्न होनेवाला है और अशब्द है।


आदेसमेत्तमुत्तो धादुचदुक्कस्स कारणं जो दु ।
सो णेओ परमाणु परिणामगुणो सयमसद्दो ॥78॥ ॥78॥

अर्थ: जो आदेश मात्र से अर्थात् कथन मात्र से मूर्त हैं तथा जो पृथ्वी आदि चार धातुओं का कारण है, वह परमाणु है, जो कि परिणाम गुणवाला है और स्वयं अशब्द है।


सद्दो खंधप्पभवो, खंधो परमाणुसंगसंघादो ।
पुट्ठेसु तेसु जायदि सद्दो उप्पादिगो णियदो ॥79॥ ॥79॥

अर्थ: शब्द स्कन्धजन्य है, स्कन्ध परमाणुदल का संघात है अर्थात् स्कंध परमाणु से मिलकर बना है और उन स्कन्धों के स्पर्शित होने-टकराने से शब्द उत्पन्न होते हैं। इसप्रकार वे नियतरूप से उत्पाद्य हैं।


णिच्चो णाणवगासो ण सावगासो पदेसदो भेदा ।
खंधाणं पि य कत्ता पविहत्ता कालसंखाणं ॥80॥ ॥80॥

अर्थ: परमाणु एक प्रदेशवाला है, नित्य है, अनवकाश नहीं है, सावकाश भी नहीं है। स्कन्धों का भेदन करनेवाला है और काल तथा संख्या को विभाजित करनेवाला है अर्थात् काल का विभाजन करता है और संख्या का माप करता है।


एयरसवण्णगंधं दोफासं सद्दकारणमसद्दं ।
खंधंतरिदं दव्वं परमाणुं तं वियाणाहि ॥81॥ ॥81॥

अर्थ: वह परमाणु एक रसवाला, एक वर्ण वाला, एक गंध वाला तथा दो स्पर्शवाला है; शब्द का कारण है, अशब्द है और स्कन्ध के भीतर है तथा परिपूर्ण स्वतंत्र द्रव्य है।


उवभोज्जमिंदिएहिं य इंदियकाया मणो य कम्माणि ।
जं हवदि मुत्तमण्णं तं सव्वं पोग्गलं जाणे ॥82॥ ॥82॥

अर्थ: जो विषय इन्द्रियों द्वारा उपभोग्य हैं एवं शरीर, मन के जो कर्म हैं और अन्य जो कुछ भी मूर्त हैं, उन सबको पुद्गल जानो।

धर्म द्रव्यास्तिकाय व अधर्म द्रव्यास्तिकाय (गाथा 83 से 89)

धम्मत्थिकायमरसं अवण्णगंधं असद्दमफ्फासं ।
लोगागाढं पुट्ठं पिहुलमसंखादियपदेसं ॥83॥ ॥83॥

अर्थ: धर्मास्तिकाय अस्पर्श, अरस, अवर्ण, अगंध और अशब्द है। लोक व्यापक है, अखण्ड, विशाल और असंख्य प्रदेशी हैं।


अगुरुलघुगेहिं सया तेहिं अणंतेहिं परिणदं णिच्चं ।
गदिकिरियाजुत्ताणं कारणभूद सयमकज्जं ॥84॥ ॥84॥

अर्थ: धर्मास्तिकाय द्रव्य अनन्त अगुरुलघु (अंश) रूप सदैव परिणमित होता है, नित्य है, गतिक्रिया युक्त और निमित्तरूप है तथा स्वयं अकार्य है।


उदयं जह मच्छाणं गमणाणुग्गहकरं हवदि लोए ।
तह जीवपोग्गलाणं धम्मं दव्वं वियाणाहि ॥85॥ ॥85॥

अर्थ: जिसप्रकार लोक में पानी मछलियों को गगन में अनुग्रह करता है, अर्थात् निमित्त होता है, उसीप्रकार धर्मद्रव्य जीव एवं पुद्गलों को गमन में निमित्त होता है - ऐसा जानो।


जह हवदि धम्मदव्वं तह तं जाणेह दव्वमधमक्खं ।
ठिदिकिरियाजुत्ताणं कारणभूदं तु पुढवीव ॥86॥ ॥86॥

अर्थ: जिसप्रकार धर्मद्रव्य है, उसीप्रकार अधर्म द्रव्य भी जानो; परन्तु जो द्रव्य गमनपूर्वक स्वयं ठहरते हुए जीवों व पुद्गलों को पृथ्वी की भाँति ठहरने में निमित्त होता है वह अधर्म द्रव्य है।


जादो अलोगलोगो जेसिं सब्भावदो य गमणठिदी ।
दो वि य मया विभत्ता अविभत्ता लोयमेत्ता य ॥87॥ ॥87॥

अर्थ: जीव-पुद्गल की गति स्थिति तथा लोक-अलोक का विभाग ह्न उक्त दोनों द्रव्यों के सद्भाव से ही होता है और वे दोनों द्रव्य विभक्त-अविभक्त तथा लोक प्रमाण कहे गये हैं।


ण य गच्छदि धम्मत्थी गमणं ण करेदि अण्णदवियस्स ।
हवदि गदिस्स य पसरो जीवाणं पोग्गलाणं च ॥88॥ ॥88॥

अर्थ: धर्मास्तिकाय गमन नहीं करता और अन्य द्रव्य को भी गमन नहीं कराता; वह तो स्वयं गमन करते हुए जीवों तथा पुद्गलों के गमन में मात्र उदासीन निमित्त होता है।


विज्जदि जेसिं गमणं ठाण पुण तेसिमेव संभवदि ।
ते सगपरिणामेहिं दु गमणं ठाणं च कुव्वंति ॥89॥ ॥89॥

अर्थ: जिनकी द्रव्यों की गति होती है, उन्हीं की फिर स्थिति होती है तथा वे सभी जीव व पुद्गल अपने परिणामों से गति व स्थिति करते हैं।

आकाश द्रव्यास्तिकाय (गाथा 90 से 96)

सव्वेसिं जीवाणं सेसाणं तह य पोग्गलाणं च ।
जं देदि विवरमखिलं तं लोगे हवदि आगासं ॥90॥ ॥90॥

अर्थ: लोक में जीवों को और पुद्गलों को तथा शेष समस्त द्रव्यों को जो सम्पूर्ण अवकाश देता हैं, वह आकाश द्रव्य है।


जीवा पोग्गलकाया धम्माधम्मा य लोगदो णण्णा ।
तत्ते अणण्णमण्णं आयासं अन्तवदिरित्तं ॥91॥ ॥91॥

अर्थ: जीव, पुद्गलकाय, धर्म, अधर्म तथा काल लोक से अनन्य हैं तथा अन्तरहित आकाश लोक से अनन्य भी तथा अन्य भी है।


आगासं अवगासं गमणट्ठिदिकारणेहिं देदि जदि ।
उड्ढंगदिप्पधाणा सिद्धा चिट्ठन्ति किध तत्थ ॥92॥ ॥92॥

अर्थ: यदि आकाश अवकास का हेतु भी हो एवं गति-स्थिति का हेतु भी हो तो ऊर्द्धगति करनेवाले सिद्ध लोकाकाश के अन्त में क्यों स्थिर हों? उत्तर में कहा है कि - जिनवरों ने सिद्धों को लोकाग्र में स्थिति कहा है। इसलिए सिद्धों की गति अलोकाकाश में नहीं होती।


जम्हा उवरिट्ठाणं सिद्धाणं जिणवरेहिं पण्णत्तं ।
तम्हा गमणट्ठाणं आयासे जाण णत्थि त्ति ॥93॥ ॥93॥

अर्थ: जिससे जिनवरों ने सिद्धों की लोक के ऊपर स्थिति कही है, इसलिए गति-स्थिति आकाश में नहीं होती ह्न ऐसा जानो।


जदि हवदि गमणहेदू आगासं ठाणकारणं तेसिं ।
पसजदि अलोगहाणी, लोगस्स य अन्तपरिवुड्ढी ॥94॥ ॥94॥

अर्थ: यदि आकाश जीव-पुद्गलों को गमन में हेतु हों और स्थिति में हेतु हो तो अलोक की हानि का और लोक अन्त की वृद्धि का प्रसंग प्राप्त होगा।


तम्हा धम्माधम्मा गमणट्ठिदिकारणाणि णागासं ।
इदि जिणवरेहिं भणिदं लोगसहावं सुणंताणं ॥95॥ ॥95॥

अर्थ: (इस संस्करण में अर्थ नहीं छपा)


धम्माधम्मागासा अपुधब्भूदा समाणपरिमाणा ।
पुधगुवलद्धिविसेसा करेंति एगत्तमण्णत्तं ॥96॥ ॥96॥

अर्थ: धर्म, अधर्म और आकाश समान परिणाम वाले अपृथक्भूत होने से तथा पृथक् उपलब्ध होने से एकत्व तथा अन्यत्व को करते हैं।

चूलिका (गाथा 97 से 99)

आगासकालजीवा धम्माधम्मा य मुत्तिपरिहीणा ।
मुत्तं पुग्गलदव्वं जीवो खलु चेदणो तेसु ॥97॥ ॥97॥

अर्थ: आकाश, काल, जीव, धर्म व अधर्म अमूर्त हैं, पुद्गल मूर्त्त हैं, उनमें जीव चेतन है।


जीवा पोग्गलकाया सह सक्किरिया हवंति ण य सेसा ।
पोग्गलकरणा जीवा खंधा खलु कालकरणा दु ॥98॥ ॥98॥

अर्थ: बाह्य साधन सहित जीव और पुद्गल सक्रिय हैं। शेष द्रव्य सक्रिय नहीं है, निष्क्रिय हैं। जीव का बाह्य करण (साधन) कर्म-नोकर्मरूप पुद्गल तथा पुद्गल की सक्रियता में काल साधन (करण) है।


जे खलु इंदियगेज्झा विसया जीवेहिं होंति ते मुत्ता ।
सेसं हवदि अमुत्तं चित्तं उभयं समादियदि ॥99॥ ॥99॥

अर्थ: जो पदार्थ जीवों के इन्द्रिय ग्राह्य विषय हैं, वे मूर्त हैं और शेष पदार्थ समूह अमूर्त हैं। चित्त उन दोनों को ग्रहण करता है, जानता है।

काल द्रव्य (गाथा 100 से 102)

कालो परिणामभवो परिणामो दव्वकालसंभूदो ।
दोण्हं एस सहावो कालो खणभंगुरो णियदो ॥100॥ ॥100॥

अर्थ: व्यवहार काल का माप जीव पुद्गलों के परिणाम से होता है। परिणाम द्रव्यकाल से उत्पन्न होता है। यह दोनों का स्वभाव है। काल क्षणभंगुर तथा नित्य है।


कालो त्ति य ववदेसो सब्भावपरूवगो हवदि णिच्चो ।
उप्पण्णप्पद्धंसी अवरो दीहंतरट्ठाई ॥101॥ ॥101॥

अर्थ: ‘काल’ ऐसा व्यपदेश (कथन) सद्भाव का प्ररूपक है, इसलिए निश्चयकाल नित्य है। दूसरा व्यवहार काल उत्पन्न-ध्वंसी है। वह व्यवहारकाल क्षणिक होने पर भी प्रवाह की अपेक्षा दीर्घस्थिति का भी कहा जाता है।


एदे कालागासा धम्माधम्मा य पोग्गला जीवा ।
लब्भंति दव्वसण्णं कालस्स दु णत्थि कायत्तं ॥102॥ ॥102॥

अर्थ: यह काल, आकाश, धर्म-अधर्म पुद्गल और जीव सब द्रव्य संज्ञा को प्राप्त करते हैं, किन्तु काल द्रव्य को कायपना नहीं है।

उपसंहार (गाथा 103 से 104)

एवं पवयणसारं पंचत्थियसंगहं वियाणित्ता ।
जो मुयदि रागदोसे सो गाहदि दुक्खपरिमोक्खं ॥103॥ ॥103॥

अर्थ: इसप्रकार प्रवचन के सारभूत पंचास्तिकाय संग्रह को जानकर जो राग-द्वेष को छोड़ता है, वह दुःख से परिमुक्त होता है।


मुणिऊण एतदट्ठं तदगमणुज्जदो णिहदमोहो ।
पसमिय रागद्दोसो हवदि हद परापरो जीवो ॥104॥ ॥104॥

अर्थ: जीव इस शास्त्र के अर्थभूत शुद्ध आत्मा को जानकर उसके अनुसरण का उद्यम करता हुआ हतमोह होकर अर्थात् दर्शन मोह का क्षय करके तथा राग-द्वेष को प्रशमित करके उत्तर और पूर्व बन्ध का नाश करता है।

नवपदार्थ एवं मोक्षमार्ग प्रपंच (गाथा 105 से 108)

अभिवंदिऊण सिरसा अपुणब्भवकारणं महावीरं ।
तेसिं पयत्थभंगं मग्गं मोक्खस्स वोच्छामि ॥105॥ ॥105॥

अर्थ: जो अपुनर्भव के कारण हैं अर्थात् जिनके उपदेश को सुनकर भेदविज्ञान द्वारा मोक्ष प्राप्त होता है उन महावीर स्वामी को शिर नवाकर वन्दन करके उनके द्वारा कहे गये काल सहित पंचास्तिकाय का कथन करके अब नवपदार्थों का भेदरूप मोक्ष का मार्ग कहूँगा।


सम्मत्तणाणजुत्तं चारित्तं रागदोसपरिहीणं ।
मोक्खस्स हवदि मग्गो भव्वाणं लद्धबुद्धीणं ॥106॥ ॥106॥

अर्थ: सम्यक्त्व और ज्ञान से सहित एवं राग-द्वेष रहित चारित्रवंत भव्य जीवों को मोक्ष का मार्ग होता है।


सम्मत्तं सद्दहणं भावाणं तेसिमधिगमो णाणं ।
चारित्तं समभावो विसएसु विरूढमग्गाणं ॥107॥ ॥107॥

अर्थ: भावों का अर्थात् नव-पदार्थों का श्रद्धान ही सम्यक्त्व है, उनका अवबोध सम्यग्ज्ञान है तथा सम्यग्दर्शन ज्ञान पूर्वक विषयों के प्रति वर्तता हुआ समभाव ही चारित्र है।


जीवाजीवा भावा पुण्णं पावं च आसवं तेसिं ।
संवरणं णिज्जरणं बंधो मोक्खो य ते अट्ठा ॥108॥ ॥108॥

अर्थ: जीव-अजीव, पुण्य-पाप तथा आस्रव-संवर-निर्जरा-बंध और मोक्ष ह्व ये नौ पदार्थ हैं।

जीव पदार्थ (गाथा 109 से 123)

जीवा संसारत्था णिव्वादा चेदणप्पगा दुविहा ।
उवओगलक्खणा वि य देहादेहप्पवीचारा ॥109॥ ॥109॥

अर्थ: जीव दो प्रकार के हैं। संसारी और सिद्ध। वे चेतनात्मक और उपयोग लक्षणवाले हैं। संसारी जीव देह में वर्तनेवाले (देह सहित) तथा सिद्ध जीव देह रहित हैं।


पुढवी य उदगमगणी वाउ वणप्फदि जीवसंसिदा काया ।
देंति खलु मोहबहुलं फासं बहुगा वि ते तेसिं ॥110॥ ॥110॥

अर्थ: पृथ्वीकाय, अपकाय, अग्निकाय, वायुकाय और वनस्पतिकाय ह्न ये कायें जीव सहित हैं। अवान्तर गतियों की अपेक्षा से उनकी भारी संख्या होने पर भी वे सभी उनमें रहनेवाले जीवों को वास्तव में अत्यन्त मोह से संयुक्त स्पर्श देती हैं अर्थात् स्पर्शज्ञान में निमित्त होती हैं।


ति त्थावरतणुजोगा अणिलाणलकाइया य तेसु तसा ।
मणपरिणामविरहिदा जीवा एइंदिया णेया ॥111॥ ॥111॥

अर्थ: उन पाँचों स्थावर कायों में तीन (पृथ्वीकायिक अप्कायिक और वनस्पतिकायिक) जीव स्थानशील होने के कारण स्थावर संयोग वाले हैं तथा अग्निकायिक और वायुकायिक जीवों की चलन क्रिया देखकर व्यवहार से इन्हें त्रस कहा गया है। निश्चय से तो ये भी स्थावर, नामकर्म की आधीनता के कारण स्थावर ही हैं। ये पाँचों मन रहित एकेन्द्रिय जीव हैं।


एदे जीवणिकाया पंचविधा पुढ़विकायियादीया ।
मणपरिणामविरहिदा जीवा एइंदिया णेया ॥112॥ ॥112॥

अर्थ: इन पृथ्वीकाय आदि पाँच प्रकार के जीवनिकायों को मन परिणाम रहित एकेन्द्रिय जीव कहा है।


अंडेसु पवड्ढंता गब्भत्था माणुसा य मुच्छगया ।
जारसिया तारिसया जीवा एगेंदिया णेया ॥113॥ ॥113॥

अर्थ: इस गाथा में अण्डस्थ गर्भस्थ एवं ज्ञान शून्य अचेत मनुष्य का दृष्टान्त देकर एकेन्द्रिय जीवों का स्वरूप समझाया है।


संबुक्कमादुवाहा संखा सिप्पी अपादगा य किमी ।
जाणंति रसं फासं जे ते बेइंदिया जीवा ॥114॥ ॥114॥

अर्थ: शंबूक, मातृवाह, शंख, सीप और पदरहित कृमि आदि जो रस व स्पर्श को जानते हैं, वे दो इन्द्रिय जीव हैं।


जूगागुं भीमक्कणपिपीलिया विच्छुयादिया कीडा ।
जाणंति रसं फासं गंधं तेइंदिया जीवा ॥115॥ ॥115॥

अर्थ: जूँ, चींटीं, मकड़ी, लीख, खटमल, बिच्छु आदि जो जंतु स्पर्श, रस, गंध को जानते हैं, वे तीन इन्द्रिय जीव हैं।


उद्दंसमसयमक्खियमधुकरिभमरा पयंगमादीया ।
रूवं रसं च गंधं फासं पुण ते विजाणंति ॥116॥ ॥116॥

अर्थ: डांस, मच्छर, मक्खी, मधुमक्खी, भंवरा और पतंगे आदि जो जीव रूप, रस, गंध और स्पर्श को जानते हैं, वे चतुरिइन्द्रिय जीव हैं।


सुरणरणारयतिरिया वण्णरसफ्फासगंधसद्दण्हू ।
जलचरथलचरखचरा बलिया पंचेंदिया जीवा ॥117॥ ॥117॥

अर्थ: वर्ण, रस, स्पर्श, गंध और शब्द को जाननेवाले देव मनुष्य तिर्यंच और नारक जो जलचर, थलचर और नभचर होते हैं, वे पंचेन्द्रिय जीव हैं।


देवा चउण्णिकाया मणुया पुण कम्मभोगभूमीया ।
तिरिया बहुप्पयारा णेरइया पुढविभेयगदा ॥118॥ ॥118॥

अर्थ: देवों के चार निकाय हैं, मनुष्य कर्मभूमिज एवं भोगभूमिज - ऐसे दो प्रकार के हैं। तिर्यंच अनेक प्रकार के हैं और नारकी के भेद उनकी पृथ्वियों के अनुसार हैं।


खीणे पुव्वणिबद्धे गदिणामे आउसे य ते वि खलु ।
पाउण्णंति य अण्णं गदिमाउस्सं सलेस्सवसा ॥119॥ ॥119॥

अर्थ: पूर्वबद्ध गतिनामकर्म और आयुकर्म क्षीण होने से वे जीव अपनी लेश्यावश वास्तव में अन्य गति और आयुष्य प्राप्त करते हैं।


एदे जीवणिकाया देहप्पविचारमस्सिदा भणिदा ।
देहविहूणा सिद्धा भव्वा संसारिणो अभव्वा य ॥120॥ ॥120॥

अर्थ: इस गाथा में कहा है कि ह्न ये समस्त संसारी जीव देह सहित हैं। सिद्ध भगवान् देह रहित हैं। संसारी जीव जीवों की अपेक्षा एक जैसे होने पर भी वे भव्य व अभव्य के भेद से दो प्रकार के हैं।


ण हि इंदियाणि जीवा काया पुण छप्पयार पण्णत्ता ।
जं हवदि तेसु णाणं जीवो त्ति य तं परूवेंति ॥121॥ ॥121॥

अर्थ: व्यवहार से कहे जाने वाले एकेन्द्रियादि तथा पृथ्वीकायादि जीवों में इन्द्रियाँ जीव नहीं हैं और पांच स्थावरकाय और एक त्रसकाय ये छहप्रकार की शास्त्रोक्त कायें भी जीव नहीं है। उनमें जो ज्ञान है, वह जीव है। ज्ञानी ऐसी प्ररूपणा करते हैं।


जाणदि पस्सदि सव्वं इच्छदि सुक्खं बिभेदि दुक्खादो ।
कुव्वदि हिदमहिदं वा भुजंदि जीवो फलं तेसिं ॥122॥ ॥122॥

अर्थ: जीव जानता-देखता है, सुख चाहता है एवं दुःख से डरता है। हित-अहित को जानता है और उनके फल को भोगता है।


एवमभिगम्म जीवं अण्णेहिं वि पज्जएहिं बहुगेहिं ।
अभिगच्छदु अज्जीवं णणंतरिदेहिं लिंगेहिं ॥123॥ ॥123॥

अर्थ: पूर्वोक्त प्रकार से अन्य भी बहुत सी पर्यायों द्वारा जीव को जानकर अब ज्ञान से अन्य जड़ लिंगों द्वारा अजीव को जानो।

अजीव पदार्थ (गाथा 124 से 130)

आगासकालपोग्गलधम्माधम्मेसु णत्थि जीवगुणा ।
तेसिं अचेदणत्तं भणिदं जीवस्स चेदणदा ॥124॥ ॥124॥

अर्थ: धर्म, अधर्म, आकाश, काल व पुद्गलद्रव्यों में जीव के गुण नहीं हैं; क्योंकि उनमें अचेतनपना है तथा जीवों में चेतना है।


सुहदुक्खजाणणा वा हिदपरियम्मं च अहिदभीरुत्तं ।
जस्स ण विज्जदि णिच्चं तं समणा बेंति अज्जीवं ॥125॥ ॥125॥

अर्थ: जिन द्रव्यों में सुख-दुःख का ज्ञान नहीं होता, हित का उद्यम और अहित का भय नहीं होता, उसे अजीव कहते हैं।


संठाणा संघादा वण्णरसफ्फासगंधसद्दा य ।
पोग्गलदव्वप्पभवा होंति गुणा पज्जया य बहू ॥126॥ ॥126॥

अर्थ: संस्थान, संघात, वर्ण-रस-स्पर्श-गंध और शब्द ह्न ऐसे जो गुण और पर्यायें हैं, वे पुद्गल द्रव्य से निष्पन्न हैं।


अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसद्दं ।
जाण अलिंग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं ॥127॥ ॥127॥

अर्थ: जो अरस, अरूप, अगंध अव्यक्त हैं; अनिर्दिष्ट-संस्थान तथा चेतना गुण से संयुक्त है और इन्द्रियों द्वारा अगाह्य हैं, उन्हें जीव जानो।


जो खलु संसारत्थो जीवो तत्तो दु होदि परिणामो ।
परिणामादो कम्मं कम्मादो होदि गदिसु गदी ॥128॥ ॥128॥

अर्थ: जो संसार में स्थित जीव हैं, उनसे रागादि स्निग्ध परिणाम होता है, उन परिणामों से कर्म और कर्म से गतियों में गमन होता है।


गदिमधिगदस्स देहो देहादो इंदियाणि जायंते ।
तेहिं दु बिसयग्गहणं तत्तो रागो व दोसो वा ॥129॥ ॥129॥

अर्थ: ‘गति’ वालों को देह होती है, देह से इन्द्रियाँ होती हैं, इन्द्रियों से विषयग्रहण और विषयग्रहण से राग अथवा द्वेष होता है।


जायदि जीवस्सेवं भावो संसारचक्कवालम्मि ।
इदि जिणवरेहिं भणिदो अणादिणिधणो सणिधणो ॥130॥ ॥130॥

अर्थ: संसार चक्र में जीव को ऐसे भाव अनादि-अनन्त अथवा अनादि-सांत रूप से चक्र की भाँति पुनः पुन होते रहते हैं।

पुण्य-पाप पदार्थ (गाथा 131 से 134)

मोहो रागो दोसो चित्तपसादो य जस्स भावम्मि ।
विज्जदि तस्स सुहो वा असुहो वा होदि परिणामो ॥131॥ ॥131॥

अर्थ: जिसके भाव में मोह-राग-द्वेष अथवा चित्त प्रसन्नता है, उसे शुभ या अशुभ परिणाम हैं।


सुहपरिणामों पुण्णं असुहो पावं ति हवदि जीवस्स ।
दोण्हं पोग्गलमेत्तो भावो कम्मत्तणं पत्तो ॥132॥ ॥132॥

अर्थ: जीव के शुभ परिणाम पुण्य हैं और अशुभ परिणाम पाप हैं; उन दोनों के द्वारा पुद्गल कर्मपने को प्राप्त होते हैं। अर्थात् जीव के पुण्य-पाप के निमित्त से पुद्गल साता-असाता वेदनीयादि रूप होते हैं, वे पुद्गल परिणाम व्यवहार से जीव के कर्म कहे जाते हैं।


जम्हा कम्मस्स फलं विसयं फासेहिं भुंजदे णियदं ।
जीवेण सुहं दुक्खं तम्हा कम्माणि मुत्ताणि ॥133॥ ॥133॥

अर्थ: कर्म के फल में प्राप्त इन्द्रिय विषय मूर्त हैं; क्योंकि वे जीव के द्वारा इन्द्रियों के माध्यम से सुख-दुःख रूप से भोगे जाते हैं।


मुत्तो फासदि मुत्तं मुत्तो मुत्तेण बंधमणुहवदि ।
जीवो मुत्तिविरहिदो गाहदि ते तेहिं उग्गहदि ॥134॥ ॥134॥

अर्थ: मूर्त मूर्त को स्पर्श करता है, मूर्त मूर्त के साथ बन्ध को प्राप्त होता है; किन्तु मूर्तत्व रहित जीव मूर्त कर्मों को अवगाह देता है और मूर्तकर्म मूर्तरहित जीव को अवगाह देता है। तात्पर्य यह है कि जीव कर्मों को तथा कर्म जीवों को परस्पर अवगाह देते हैं।

आस्रव पदार्थ (गाथा 135 से 140)

रागो जस्स पसत्थो अणुकंपासंसिदो य परिणामो ।
चित्तम्हि णत्थि कलुसं पुण्णं जीवस्स आसवदि ॥135॥ ॥135॥

अर्थ: जिस जीव को प्रशस्त राग है, अनुकंपा युक्त परिणाम हैं और चित्त में कलुषता का अभाव है, उस जीव को पुण्य का आस्रव होता है।


अरहंतसिद्धसाहूसु भत्ती धम्मम्मि जा य खलु चेट्ठा ।
अणुगमणं पि गुरूणं पसत्थरागो त्ति वुच्चंति ॥136॥ ॥136॥

अर्थ: अरहंत, सिद्ध, साधुओं के प्रति भक्ति, धर्म में यथार्थ चेष्टा और गुरुओं का अनुगमन प्रशस्त राग कहलाता है।


तिसिदं व भुक्खिदं वा दुहिदं दट्ठुण जो दु दुहिदमणो ।
पडिवज्जदि तं किवया तस्सेसा होदि अणुकंपा ॥137॥ ॥137॥

अर्थ: तृषातुर, क्षुधातुर दुःखी को देखकर जो जीव मन में दुःख पाता है, करुणा से द्रवित होता है, उसका वह भाव ह्व अनुकम्पा है।


कोधो व जदा माणो माया लोभो व चित्तमासेज्ज ।
जीवस्स कुणदि खोहं कलुसो त्ति य तं बुधा बेंति ॥138॥ ॥138॥

अर्थ: जो क्रोध, मान, माया तथा लोभ चित्त का आश्रय पाकर जीव को क्षोभ उत्पन्न करते हैं, उस क्षोभ को ज्ञानी ‘कलुषता’ कहते हैं।


चरिया पमादबहुला कालुस्सं लोलदा य विसएसु ।
परपरिदावपवादो पावस्स य आसवं कुणदि ॥139॥ ॥139॥

अर्थ: बहु प्रमाद वाली चर्या, कलुषता, विषयों में लोलुपता, पर को परिताप देना तथा पर से अपवाद बोलने ह्व पाप का आस्रव होता है।


सण्णाओ य तिलेस्सा इंदियवसदा य अट्टरुद्दाणि ।
णाणं च दुप्पउत्तं मोहो पावप्पदा होंति ॥140॥ ॥140॥

अर्थ: चार संज्ञायें, तीन लेश्यायें, पाँचों इन्द्रियों के विषय, आर्त-रौद्रध्यान रूप अशुभभावों में लगा हुआ ज्ञान और मोह ह्न ये सब भाव पापप्रद हैं।

संवर पदार्थ (गाथा 141 से 143)

इंदियकसायसण्णा णिग्गहिदा जेहिं सुट्ठु मग्गम्हि ।
जावत्तावत्तेसिं पिहिदं पावासवच्छिद्दं ॥141॥ ॥141॥

अर्थ: जो व्यक्ति भलीभाँति मोक्षमार्ग में रहकर इन्द्रियों, कषायों और आहार, भय, मैथुन, परिग्रह संज्ञाओं का जितना निग्रह करते हैं, उनको उतना ही पापास्रव का छिद्र बंद होता है।


जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व सव्वदव्वेसु ।
णासवदि सुहं असुहं समसुहदुक्खस्स भिक्खुस्स ॥142॥ ॥142॥

अर्थ: जिसे सर्वद्रव्यों के प्रति राग-द्वेष एवं मोह नहीं है, उस भिक्षु को निर्विकार चैतन्यपने के कारण सम सुख-दुःख हैं, उसे शुभ व अशुभ कर्म का आस्रव नहीं होता।


जस्स जदा खलु पुण्णं जोगे पावं च णत्थि विरदस्स ।
संवरणं तस्स तदा सुहासुहकदस्स कम्मस्स ॥143॥ ॥143॥

अर्थ: जिस मुनि को विरत रहते हुए जब योग में पुण्य और पाप नहीं होते, तब उसे शुभाशुभ भावकृत कर्मों का संवर होता है।

निर्जरा पदार्थ (गाथा 144 से 146)

संवरजोगेहिं जुदो तवेहिं जो चिट्ठदे बहुविहेहिं ।
कम्माणं णिज्जरणं बहुगाणं कुणदि सो णियदं ॥144॥ ॥144॥

अर्थ: जो जीव संवर और योग से युक्त होता है, वह बहुविधतपों सहित वर्तता है, अतः वह नियम से अनेक कर्मों की निर्जरा करता है।


जो संवरेण जुत्तो अप्पट्ठपसाधगो हि अप्पाणं ।
मुणिऊण झादि णियदं णाणं सो संधुणोदि कम्मरयं ॥145॥ ॥145॥

अर्थ: संवर से युक्त जो जीव वास्तव में आत्मार्थ का अर्थात् स्व प्रयोजन का प्रकृष्ट-साधक वर्तता हुआ आत्मा को जानकर अर्थात् आत्मा का अनुभव करके ज्ञान को निश्चल रूप से ध्याता है, वह कर्मरज को खिरा देता है।


जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व जोगपरिकम्मो ।
तस्स सुहासुहडहणो झाणमओ जायदे अगणी ॥146॥ ॥146॥

अर्थ: जिसे मोह और राग-द्वेष नहीं हैं तथा योगों का सेवन नहीं है अर्थात् मन-वचन-काय के प्रति उपेक्षा है, उसे शुभाशुभ को जलानेवाली ध्यानमय अग्नि प्रगट होती है।

बंध पदार्थ (गाथा 147 से 149)

जं सुहमसुहमुदिण्णं भावं रत्तो करेदि जदि अप्पा ।
सो तेण हवदि बद्धो पोग्गलकम्मेण विविहेण ॥147॥ ॥147॥

अर्थ: यदि आत्मा रक्त (विकारी) वर्तता हुआ उदित शुभाशुभ भावों को करता है तो वह आत्मा उन भावों उन भावों के निमित्त से विविध पुद्गल कर्मों से बद्ध होता है।


जोगणिमित्तं गहणं जोगो मणवयणकायसंभूदो ।
भावणिमित्तो बंधो भावो रदिरागदोसमोहजुदो ॥148॥ ॥148॥

अर्थ: कर्मग्रहण का निमित्त योग है। योग मन-वचन-काय जनित हैं। बंध का निमित्त भाव है; भाव राग-द्वेष-मोह से युक्त आत्म परिणाम है।


हेदू चदुव्वियप्पो अट्ठवियप्पस्स कारणं भणिदं ।
तेसिं पि य रागादी तेसिमभावे ण बज्झंति ॥149॥ ॥149॥

अर्थ: द्रव्य मिथ्यात्व आदि चार प्रकार के हेतु जो आठ प्रकार के कर्मों के कारण कहे गये हैं; उनमें भी जीव के रागादि भाव कारण हैं; उन रागादि भावों के अभाव में जीव नहीं बंधते।

मोक्ष पदार्थ (गाथा 150 से 151)

हेदुमभावे णियमा जायदि णाणिस्स आसवणिरोधो ।
आस्रवभावेण विणा जायदि कम्मस्स दु णिरोधो ॥150॥ ॥150॥

अर्थ: मोह, राग-द्वेषरूप हेतुओं का अभाव होने से ज्ञानी को नियम से आस्रव का निरोध होता है और आस्रव भाव के अभाव में कर्म का निरोध होता है तथा कर्मों का अभाव होने से वह सर्वज्ञ-सर्वदर्शी होता हुआ इन्द्रियरहित, अव्याबाध अनन्त सुख को प्राप्त करता है।


कम्मस्साभावेण य सव्वण्हू सव्वलोगदरिसी य ।
पावदि इंदियरहिदं अव्वाबाहं सुहमणंतं ॥151॥ ॥151॥

अर्थ: मोह, राग-द्वेषरूप हेतुओं का अभाव होने से ज्ञानी को नियम से आस्रव का निरोध होता है और आस्रव भाव के अभाव में कर्म का निरोध होता है तथा कर्मों का अभाव होने से वह सर्वज्ञ-सर्वदर्शी होता हुआ इन्द्रियरहित, अव्याबाध अनन्त सुख को प्राप्त करता है।

ध्यान सामान्य (गाथा 152 से 153)

दंसणणाणसमग्गं झाणं णो अण्णदव्वसंजुत्तं ।
जायदि णिज्जरहेदू सभावसहिदस्स साधुस्स ॥152॥ ॥152॥

अर्थ: स्वभाव सहित साधु को अर्थात् स्वभाव परिणत केवली भगवान् को दर्शन ज्ञान से परिपूर्ण और अन्य द्रव्य से असंयुक्त ध्यान निर्जरा का हेतु होता है।


जो संवरेण जुत्तो णिज्जरमाणोध सव्वकम्माणि ।
ववगदवेदाउस्सो मुयदि भवं तेण सो मोक्खो ॥153॥ ॥153॥

अर्थ: जो संवर से युक्त है, ऐसा केवलज्ञानी जीव सर्व कर्मों की निर्जरा करता हुआ वेदनीय कर्म और आयुकर्म रहित होकर केवलज्ञानी सर्व कर्म पुद्गलों को एवं भव को छोड़ता है, वह उसका द्रव्य मोक्ष है।

मोक्षमार्ग प्रपंच चूलिका (गाथा 154 से 173)

जीवसहावं णाणं अप्पडिहददंसणं अणण्णमयं ।
चरियं च तेसु णियदं अत्थित्तमणिंदियं भणियं ॥154॥ ॥154॥

अर्थ: जीव का स्वभाव अप्रतिहतदर्शन ज्ञानमय है, जोकि जीव से अनन्यमय है। उन ज्ञान-दर्शन में नियत अस्तित्वमय है और जो अनिंदित है, उसे चारित्र कहा है।


जीवो सहावणियदो अणियदगुणपज्जओध परसमओ ।
जदि कुणदि सगं समयं पब्भस्सदि कम्मबंधादो ॥155॥ ॥155॥

अर्थ: जीव द्रव्य स्वभाव से नियत (एकरूप) होने पर भी यदि अनियत (अनेकरूप) गुणपर्यायवाला हो तो ‘परसमय’ है। यदि वह नियत गुणपर्याय से परिणत होकर स्वयं को स्वसमय रूप करता है तो कर्मबन्ध से छूटता है।


जो परदव्वम्हि सुहं असुहं रागेण कुणदि जदि भावं ।
सो सगचरित्तभट्ठो परचरियचरो हवदि जीवो ॥156॥ ॥156॥

अर्थ: जो जीव राग से पर द्रव्य में शुभ या अशुभ भाव में प्रवर्तन करते हैं, वे जीव स्वचारित्र से भ्रष्ट होकर पर चारित्र का आचरण करने वाले हैं।


आसवदि जेण पुण्णं पावं वा अप्पणोध भावेण ।
सो तेण परचरित्तो हवदि त्ति जिणा परूवेंति ॥157॥ ॥157॥

अर्थ: जिस भाव से आत्मा को पुण्य-पाप आस्रवित होते हैं, उस भाव द्वारा वह जीव पर चारित्र है ह्न ऐसा जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है।


जो सव्वसंगमुक्को णण्णमणो अप्पणं सहावेण ।
जाणदि पस्सदि णियदं सो सगचरियं चरदि जीवो ॥158॥ ॥158॥

अर्थ: जो सर्व संग से मुक्त और अनन्य मनवाला वर्तता हुआ अपने आत्मा को ज्ञान-दर्शन रूप स्वभाव द्वारा नियतरूप से (स्थिरतापूर्वक) जानता-देखता है, वह जीव स्वचारित्र आचरता है।


चरियं चरदि सगं सो जो परदव्वप्पभावरहिदप्पा ।
दंसणणाणवियप्पं अवियप्पं चरदि अप्पादो ॥159॥ ॥159॥

अर्थ: जो पर द्रव्यात्मक भावों से अर्थात् परद्रव्य रूप भावों से रहित स्वरूप में वर्तता हुआ अपने दर्शन-ज्ञान रूप आत्मा में अभेद रूप आचरण करता है, वह स्व-चारित्र आचरता है।


धम्मादीसद्दहणं सम्मत्तं णाणमंगपुव्वगदं ।
चेट्ठा तवम्हि चरिया ववहारो मोक्खमग्गो त्ति ॥160॥ ॥160॥

अर्थ: धर्मास्तिकायादि का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है, अंगपूर्व सम्बन्धी ज्ञान सम्यग्ज्ञान एवं तप में चेष्टा सम्यक्चारित्र है। यह व्यवहार मोक्षमार्ग है।


णिच्छयणएण भणिदो तिहि तेहिं समाहिदो हु जो अप्पा ।
ण कुणदि किंचि वि अण्णं ण मुयदि सो मोक्खमग्गो त्ति ॥161॥ ॥161॥

अर्थ: जो आत्मा सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ह्न इन तीनों में एकाग्र (अभेद) होता हुआ अन्य कुछ भी करता नहीं तथा छोड़ता भी नहीं है, वह निश्चयनय से मोक्षमार्ग कहा गया है।


जो चरदि णादि पेच्छदि अप्पाणं अप्पणा अणण्णमयं ।
सो चारित्तं णाणं दंसणमिदि णिच्छिदो होदि ॥162॥ ॥162॥

अर्थ: जो जीव अनन्यमय आत्मा को आत्मा से आचरता है, जानता है, देखता है; वह आत्मा ही चारित्र है, ज्ञान है, दर्शन है ह्न ऐसा यहाँ समझाया है।


जेण विजाणदि सव्वं पेच्छदि सो तेण सोक्खमणुहवदि ।
इदि तं जाणदि भविओ अभवियसत्तो ण सद्दहदि ॥163॥ ॥163॥

अर्थ: जिससे आत्मा मुक्त होने पर सबको जानता है और देखता है। उससे वह निराकुल सुख का अनुभव करता है ह्र ऐसा भव्य जीव जानते हैं। अभव्य जीव ऐसे निराकुल सुख तथा मोक्ष की श्रद्धा नहीं करता।


दंसणणाणचरित्ताणि मोक्खमग्गो त्ति सेविदव्वाणि ।
साधूहि इदं भणिदं तेहिं दु बंधो व मोक्खो वा ॥164॥ ॥164॥

अर्थ: दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्षमार्ग हैं। इसलिए वे सेवन योग्य हैं; परन्तु उनसे बंध भी होता है और मोक्ष भी होता है।


अण्णाणादो णाणी जदि मण्णदि सुद्धसंपओगादो ।
हवदि त्ति दुक्खमोक्खं परसमयरदो हवदि जीवो ॥165॥ ॥165॥

अर्थ: सुद्ध संप्रयोग से अर्थात् शुभ भक्तिभाव से दुःख से मुक्ति होती है ह्न कोई यदि अज्ञान से ऐसा माने अर्थात् शुभभाव की ओर झुके तो वह ज्ञानी भी पर समयरत है ह्न ऐसा माना जाता है।


अरहंतसिद्धचेदियपवयणगणणाणभत्तिसंपण्णो ।
बंधदि पुण्णं बहुसो ण हु सो कम्मक्खयं कुणदि ॥166॥ ॥166॥

अर्थ: अरहंत, सिद्ध, चैत्य (अरहंत की प्रतिमा) प्रवचन (शास्त्र) मुनिगण और ज्ञान के प्रति भक्ति सम्पन्न जीव बहुत पुण्य बांधता है, परन्तु वस्तुतः वह कर्मक्षय नहीं करता।


जस्स हिदएणुमेत्तं वा परदव्वम्हि विज्जदे रागो ।
सो ण विजाणदि समयं सगस्स सव्वागमधरो वि ॥167॥ ॥167॥

अर्थ: जिसे परद्रव्य के प्रति अणुमात्र भी, लेशमात्र भी राग हृदय में विद्यमान है, वह भले ही सर्व आगम का पाठी हो, तथापि स्वकीय समय को नहीं जानता, आत्मा का अनुभव नहीं करता।


धरिदुं जस्स ण सक्कं चित्तुब्भामं विणा दु अप्पाणं ।
रोधो तस्स ण विज्जदि सुहासुहकदस्स कम्मस्स ॥168॥ ॥168॥

अर्थ: जो राग के सद्भाव के कारण अपने चित्त को स्थिर नहीं रख सकता, उसके शुभाशुभ कर्मों का निरोध नहीं है।


तम्हा णिव्वुदिकामो णिस्संगो णिम्ममो य हविय पुणो ।
सिद्धेस कुणदि भत्तिं णिव्वाणं तेण पप्पोदि ॥169॥ ॥169॥

अर्थ: मोक्षार्थी जीव निःसंग और निर्मम होकर सिद्धों की भक्ति करता है अर्थात् शुद्धात्म द्रव्य में स्थिरता रूप पारमार्थिक सिद्ध भक्ति करता है, इसलिए वह निर्वाण को प्राप्त करता है।


सपयत्थं तित्थयरं अभिगदबुद्धिस्स सुत्तरोइस्स ।
दूरतरं णिव्वाणं संजमतवसंपउत्तस्स ॥170॥ ॥170॥

अर्थ: संयमतप संयुक्त होने पर भी नवपदार्थों तथा तीर्थंकरों के प्रति भक्तिभाव रूप बुद्धि का झुकाव होने पर भी तथा सर्वज्ञकथित जिनसूत्रों के प्रति भी जिसे रुचि है, उन ज्ञानी जीवों को शुद्धता मिश्रित शुभभाव की मुख्यता होने के कारण निर्वाण दूरतर है।


अरहंतसिद्धचेदियपवयणभत्तो परेण णियमेण ।
जो कुणदि तवोकम्मं सो सुरलोगं समादियदि ॥171॥ ॥171॥

अर्थ: जो जीव अरहंत, सिद्ध, चैत्य और जिनप्रवचन के प्रति भक्तियुक्त वर्तता हुआ परमसंयम सहित तप कर्म करता है वह स्वर्ग को प्राप्त करता है।


तम्हा णिव्वुदिकामो रागं सव्वत्थ कुणदु मा किंचि ।
सो तेण वीदरागो भविओ भवसायरं तरदि ॥172॥ ॥172॥

अर्थ: हे मोक्षाभिलासी! तुम सर्वत्र ही किंचित् भी राग मत करो; क्योंकि पूर्वोक्त कथनानुसार किंचित् राग भी दुःखद है, संसार का कारण है तथा शुभाशुभ राग में हेयबुद्धि से भव्यजीव वीतराग होकर भवसागर से तर जाते हैं।


मग्गप्पभावणट्ठं पवयणभत्तिप्पचोदिदेण मया ।
भणियं पवयणसारं पंचत्थियसंगह सुत्तं ॥173॥ ॥173॥

अर्थ: प्रवचन की भक्ति से प्रेरित होकर मैंने मोक्षमार्ग की प्रभावना हेतु प्रवचन के सारभूत पंचास्तिकाय संग्रह सूत्र कहा है।