नाटक-समयसार (कविवर पं. बनारसीदास जी) | शब्दार्थ एवं विशेषार्थ सहित | Natak Samaysar with Shabdarth and Visheshartha

अनुक्रमणिका


मंगलाचरण तथा उत्थानिका

‘नाटक-समयसार’ जी की ‘जिज्ञासु-जन-रंजनी-टीका’ का मंगलाचरण (‘नाटक-समयसार’ जी के नव-प्रकाश्य-संस्करण की टीका में निबद्ध आदि-मंगल)

समयसार-नाटक-ग्रंथ समय का सार है।
आत्मतत्त्व का गहन-रहस्य अपार है।।
संसारी से सिद्ध-पर्यंत की जो साधना।
इसमें उसका मर्म बताया अपरम्पार है।। 1।।

कुन्दकुन्दाचार्य का ग्रंथराज ‘समयसार’ था।
‘आत्मख्याति’ के कलश मनु मंगलाचार था।।
पांडे राजमल्ल ने रची वृत्ति-‘बालबोधिनी’।
इन सबसे ही बना ‘नाटक-समयसार’ था।। 2।।

मूल-ग्रंथ अरु टीका का मर्म समाहित है।
अध्यात्म की चिद्-अमृतधार प्रवाहित है।।

निश्चय अरु व्यवहारमयी-तत्त्वज्ञान की, चिन्मय-कल्पतरु-सुमन-गंध सुवासित

है।। 3।।

नाटक यहाँ संसार का प्रतिपल चल रहा।
मोह और मिथ्यात्व ही निरन्तर पल रहा।।

इसके अविरल-क्रम के सतत-विनाश को,

समयसार का नाटक यह कविवर ने रचा।। 4।।

नमूँ सिद्ध-परमात्मा अरु निज-शुद्धात्म को।
अप्रतिबुद्घ-जीव लहें आत्म-स्वभाव को।।

यही भावना सतत अन्तर्निहित इस ग्रन्थ में,

मैं भी पाऊँ नित्य-निरंजन शुद्ध-स्वभाव को।। 5।।

।। अथ श्रीनाटक-समयसाराख्य-ग्रन्थः आरभ्यते।।

ग्रंथकार का मंगलाचरण

(मनहर-छंद)

करम-भरम जग तिमिर-हरन खग, उरग-लखन-पग सिवमग-दरसी।
निरखत नयन भविक जल बरखत, हरखत अमित भविकजन-सरसी।।
मदन-कदन-जित परम धरम-हित, सुमिरत भगति भगति सब डरसी।
सजल-जलद-तन मुकुट सपत-फन, कमठ-दलन-जिन नमत बनरसी।। 1।।

शब्दार्थ :- करम-भरम जग-तिमिर-हरन खग= कर्मभ्रम-रूपी संसार के अंधकार को हरण करने के लिये सूर्य के समान हो, उरग-लखन-पग= उरग (साँप) लक्षण है जिनके पैर में, सिवमग-दरसी= मोक्षमार्ग को दरसानेवाले हैं, निरखत नयन भविक जल बरखत= आपको देखकर भव्य-जीवों के नेत्रों से जल बरसता है। मदन-कदन-जित= कामदेव को युद्ध में जीत लिया है, परम-धरम-हित= उत्कृष्ट-धर्म के हितकारी हैं, सुमिरत भगति भगति सब डरसी= स्मरण करने से भव्यजीवों के सभीप्रकार के डर भाग जाते हैं, सजल-जलद-तन= जिनका शरीर जल से भरे हुये बादलों के समान श्यामलवर्णी है, मुकुट सपत-फन= जिनके सिर पर सात-फण का मुकुट है, कमठ-दलन= कमठ के मद को दलन करनेवाले, जिन नमत बनरसि= ऐसे ‘जिनेन्द्र-देव’ को बनारसीदास नमस्कार करते हैं। विशेषार्थ :- कविवर बनारसीदास जी कहते हैं जिसप्रकार सूर्य के निकलने से सारे संसार का अंधकार एक क्षण में दूर हो जाता है, ठीक उसीप्रकार हे भगवन्! आप उस सूर्य के समान हो जिसके पास आने पर कर्मभ्रमरूपी अंधकार क्षण में दूर हो जाता है। अभिप्राय यही है कि भावपूर्वक आपके दर्शन करने मात्र से ही कर्मों का क्षय हो जाता है। कविवर कहते हैं मैं उनकी वंदना कर रहा हूँ, जिनके पैर में उरग यानि सर्प का चिह्न बना हैं, अर्थात् मंगलाचरण में कवि ने ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ को नमन किया है। कैसे हैं पार्श्वनाथ? ‘सिवमग-दरसी’ अर्थात् ‘मोक्षमार्ग को दर्शानेवाले’ हैं। हे भगवन्! आपको देखते ही भव्यजीवों के नेत्रों से आनंद के अश्रु बहने लगते हैं। जिसप्रकार सूर्य को देखकर सरोवर में कमल खिलने लगते हैं, ठीक उसीप्रकार आपको देखते ही हर्ष के कारण भव्यजीवों के ह्रदयरूपी कमल खिल जाते हैं। जिसप्रकार युद्ध में राजा को पराजित करके जीत हासिल होती है, ठीक उसीप्रकार हे भगवन्! सारे संसार का राजा कामदेव, जिसने सबको अपने वश में कर रखा है, आपने उसे भी जीत लिया है। आप जगत् के सभीजीवों के लिये धर्म का उपदेश देने से ‘परम-हितकारी’ हो। आपके स्मरण करने मात्र से ही भव्यजीवों के सभी डर दूर हो जाते हैं। जिसप्रकार जल से भरे बादल गर्मी से संतप्त-जीवों को शीतलता प्रदान करते हैं, ठीक उसीप्रकार आपका शरीर विषयभोग की अग्नि से संतप्त जगत् के जीवों के लिये जल से भरे बादलों के समान शीतलता प्रदान करने वाला है, अर्थात् आपके पास आने पर सहज ही शांति की अनुभूति होती है। आपके सिर पर सप्त-फणों का सुंदर-मुकुट शोभायमान हो रहा है। आप ‘कमठ’ के मद को दलन यानि नष्ट करने वाले हो- ऐसे जिनेन्द्रदेव ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ को बनारसीदास विनयपूर्वक नमन करते हैं।

(छप्पय-छंद)

सकल-करम-खल-दलन, कमठ-सठ-पवन कनक-नग।
धवल परम-पद-रमन, जगत्-जन-अमल-कमल-खग।।
परमत-जलधर-पवन, सजल-घन-सम-तन समकर।
पर-अघ-रजहर जलद, सकल-जन-नत भव-भय-हर।।
जम-दलन नरकपद-क्षयकरन, अगम अतट भवजल-तरन।
वर-सबल-मदन-वन-हरदहन, जय जय जय अभयकरन।। 2।।

शब्दार्थ :- सकल-करम-खल-दलन= समस्त कर्मरूपी-शत्रु को नष्ट करनेवाले हो, कमठ-सठ-पवन कनक-नग= मूर्ख-कमठ के द्वारा चलाई गई आँधी में भी आप स्वर्ण-पर्वत अर्थात् सुमेरु पर्वत के समान अडिग, धवल परम-पद-रमन= निर्मल/पवित्र सर्वोत्कृष्ट-पद (आत्मा) में रमण करने वाले हो, जगत्-जन-अमल4 कमल-खग= जगत् के जीवोंरूपी कमलों को खिलाने के लिये सूर्य के समान हो, परमत-जलधर-पवन= अन्यमतरूपी मेघों को उड़ाने के लिये हवा के समान हो, सजल-घन-सम-तन= जिनका शरीर जल से भरे बादलों के समान श्यामल-वर्ण का है, समकर= समता को प्रदान करनेवाले, पर-अघ-रजहर-जलद= परलक्ष्यी विकाररूपी धूलि को धोने के लिए मेघ के समान, सकल-जन-नत= जगत् के समस्त जीव जिन्हें नमन करते हैं, भव-भय-हर= संसार के भय को हरनेवाले हो, जम-दलन= मृत्यु के भय को नष्ट करनेवाले हो, नरक-पदछयकरन= नरकगति का क्षय करनेवाले हो, अगम= जिन्हें पूरीतरह समझ सकना कठिन है, अतट= जिनके गुणों का पार पाना अशक्य है अर्थात् अपार गुणसमूह के धनी, भव-जल-तरन= संसार-समुद्र से पार करनेवाले, वर सबल मदनवन हर-दहन= विशाल और सबल/सघन कामदेवरूपी वन को जलाने के लिये रुद्र की अग्नि के समान हो, जय जय परम अभयकरन= जीवों को श्रेष्ठ अभयदान करनेवाले आपकी बारम्बार जय हो। विशेषार्थ :- ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ की स्तुति करते हुये कविवर कहते हैं कि हे भगवन्! आपने शत्रु- समान समस्त-कर्मों को नष्ट कर दिया है, अर्थात् आप ज्ञानावरणादि-आठों-कर्मों से रहित ‘निष्कर्म’ हो, कमठ के उपसर्गोंरूपी आँधी के बीच में भी आप सुमेरू-पर्वत के समान अडिग रहे, अर्थात् कमठ द्वारा किये गये घोर-उपसर्गों में भी आपका चित्त तनिक भी विचलित नहीं हुआ, और हम अज्ञानी-जीव जरासी प्रतिकूलता आते ही डगमगा जाते हैं, यह जानते हुये भी कि ‘जो होना है सो निश्चित है’। हे भगवन्! आप तो सदाकाल अपने परम-स्वच्छ आत्मस्वरूप में ही रमण करते हो, लेकिन आपकी निर्मलता का प्रभाव ऐसा है कि आपके दरबार में आने पर जगत् के जीव सहज ही विकारोंरूपी मल से रहित/अमल हो जाते हैं। जिसप्रकार सूर्य के उदय होने पर कमल स्वयं खिल जाता है, ठीक उसीप्रकार हे भगवन्! आप भव्यजीवों के मनरूपी कमल को खिलाने के लिये सूर्य के समान हो, अर्थात् आपके समक्ष आने पर जगत् के जीवों को स्वयं ही आनंद की अनुभूति होती है। ‘परमत’ यानि अन्यमतरूपी सघन-बादलों को उड़ाने के लिये आप वायु के प्रचण्ड-वेग के समान हो अर्थात् जिसप्रकार आकाश में छाये घनघोर-बादलों को भी हवा अपने वेग से उड़ा ले जाती है, ठीक उसीप्रकार कुगुरु-कुदेव-कुधर्म और उनके प्रशंसकों की मिथ्या-मान्यताओं का खंडन करने के लिये अाप प्रचण्ड-पवन के वेग के समान हो। जिसप्रकार जल से भरे बादल श्यामल और शीतलता प्रदान करनेवाले होते है, ठीक उसी प्रकार आपकी श्यामल-काया निर्मल-जल से भरे बादलों के समान शीतलता और समता प्रदान करनेवाली है। परलक्षी-पापभावों रूपी ‘रज’ या धूल को धोने के लिये आप जलधर-मेघ के समान हो, अर्थात् जिसप्रकार कितनी भी अधिक रज या धूल क्यों न हो जल से साफ हो जाती है, ठीक उसीप्रकार पापभावों की गंदगी कितनी भी अधिक क्यों न हो आपकी भक्तिरूपी-जल से क्षणभर में ही सारे पाप धुल जाते हैं। आप संसारी-जीवों के भयंकर जन्म-मरणरूपी दुःखों को हरनेवाले हो, इसीलिये तीनों-लोकों के समस्त-जीव आपको बारम्बार नमन करते हैं। आपने ‘जम’ यानि मृत्यु को जीत लिया है, अर्थात् आप जन्म-मरण से रहित अविनाशी हो। हे भगवन्! भावपूर्वक आपकी भक्ति करनेवाले जीवों को कभी नरक गति की प्राप्ति नहीं होती है। आपकी महिमा ‘अगम’ है, अर्थात् आपकी महिमा का गुणगान करने में जब गणधरदेव भी समर्थ नहीं है, तो मैं अल्पबुद्धि आपकी महिमा का गुणगान कैसे कर सकता हूँ? ‘अतट’ यानि आपके गुणोंरूपी समुद्र काे पार पाना अशक्य है, जैसे समुद्र के जल को पार करना अशक्य है, ठीक उसीप्रकार भगवन् आपके अनंत गुणों का वर्णन करना अशक्य है। आप ‘भव-जल’ अर्थात् संसाररूपी समुद्र को पार करने के लिये जहाज के समान हो। जिसप्रकार जहाज में बैठकर हम समुद्र के उस पार जाने में समर्थ होते हैं, ठीक उसीप्रकार आपके स्मरण/भक्ति/गुणगानरूपी जहाज से हम जगत् के जीव संसार-सागर के उस पार यानि मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। हे भगवन्! आप जगत् में सर्वश्रेष्ठ हो, बलवान हो। कहा जाता है कि शंकर जी की तीसरी आँख ने कामदेव को भस्म कर दिया था; ठीक उसीप्रकार आप जगत् के जीवों को वश में करने वाले कामदेव को भस्म करने के लिये शंकर जी की तीसरी आँख के समान हो। हे जगत् के सर्वश्रेष्ठ रक्षक भगवान् पार्श्वनाथ! आपकी सदैव जय हो। (यह कर्त्तावादी-कथन नहीं है, बल्कि उस युग में जैन-मनीषी भी जिनेन्द्र-भक्ति में बहुमानपूर्वक ऐसे विशेषण जिनेन्द्रदेव की सर्वोत्कृष्टता बताने के लिये प्रयोग करते थे। उसी के अनुरूप यह युगप्रभावी-प्रयोग है।)

(सवैया इकतीसा)

जिन्हि के वचन उर-धारत जुगल-नाग, भए धरनिंद-पदुमावति पलक में।
जाकी नाम-महिमा सौं कुधातु कनक धरैं, पारस-पखान नामी भयौ है खलक में।।
जिन्ह के जनमपुरी-नाम के प्रभाव हम, अपनौ-स्वरूप लख्यौ भानु सौं भलक में।।
तेई प्रभु-पारस महारस के दाता अब, दीजै मोहि साता दृगलीला की ललक में।। 3।।

शब्दार्थ :- जिन्हिं के वचन उर-धारत जुगल-नाग= जिन भगवान् पार्श्वनाथ के वचन/उपदेश हृदय में धारण करके नाग-नागिनी का जोड़ा, भए धरनिंद-पदुमावति पलक में= पलक झपकते ही यानि बहुत कम समय में धरणेन्द्र-पद्मावती हो गए, जाकी नाम-महिमा सौं कुधातु कनक धरैं= जिनके नाम-स्मरण से लोहा सोना हो जाता है, पारस-पखान नामी भयौ है खलक में= पारस-पत्थर प्रसिद्ध हुआ है जगत् में, जिन्ह की जनमपुरीनाम के प्रभाव हम= जिनकी जन्मनगरी के नाम के प्रभाव से हमने, अपनौ-स्वरूप लख्यौ भानुसौं भलक में= अपने आत्मस्वरूप का अनुभव किया सूर्य की चमक में, (अर्थात् जैसे सूर्य के प्रकाश में कोई जीव खोयी वस्तु को पहिचान लेता है, उसीप्रकार मैंने आपकी जन्मनगरी का नाम पाकर विस्मृत निज-निधि को पाया है), तेई प्रभु पारस महारस के दाता अब= वे प्रभु पार्श्वनाथ भगवान् अतीन्द्रिय-आनंद को देनेवाले अब, दीजै मोहि साता दृगलीला की ललक में= मुझे शांति प्रदान करें पलक झपकते ही अर्थात् क्षणभर में। विशेषार्थ :- भगवान् पार्श्वनाथ की स्तुति करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जिन ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ के संबोधन को जलते हुये नाग-नागिनी के जोड़े ने भी जब अपने हृदय में धारण किया, तो अल्प-समय में ही उस जोड़े ने धरणेन्द्र-पद्मावती के रूप में देव-पर्याय प्राप्त कर ली थी। भगवान् पार्श्वनाथ के प्रति बहुमान व्यक्त करते हुये कविवर कहते हैं कि इनके नाम की ही महिमा है कि लोहे को सोने में बदलने वाला पारस-पत्थर भी आज जगत् में प्रसिद्ध है, अर्थात् भगवान् के गुणों का स्मरण करने से संसार के जीव कितने भी पापों से लिप्त क्यों न हों, कंचन के समान पवित्र होकर मोक्ष

के मार्ग पर अग्रसर हो जाते है।
मेरा नाम ‘बनारसी’ भी ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ की जन्म-नगरी ‘बनारस’ के नाम पर ही रखा गया था।

जिसप्रकार सूर्य के प्रकाश में जगत् के पदार्थ प्रकाशित होते हैं, ठीक उसीप्रकार भगवन्! आपकी प्रतिमा को देखकर मुझे अपना स्वरूप अनुभव में आता है। अतीन्द्रिय-आनंद को प्रदान करनेवाले हे पार्श्वनाथ भगवान्! मुझे पलक झपकते ही अर्थात् शीध्रतिशीघ्र शांति प्रदान करें। यद्यपि भगवान् अपने भक्तों को कभी कुछ नहीं देते,- ऐसा जानते हुये भी बनारसीदास जी भगवान् से अपनी सुख-शांति की कामना करते हैं, ये वास्तव में भक्ति का अतिरेक मात्र है। लेकिन हाँ, भगवान् की प्रतिमा का ऐसा अतिशय अवश्य है कि उनके दरबार में आने पर संसार के दु:खों से आकुलित दु:खी-जीवों को सहज ही शांति का अनुभव होता है, और स्वयं ही सातिशय-पुण्य का बंध

होता है, जो आगे भी आकुलता से छुटकारा दिलाने में निमित्त बनता है।
''तुम भक्तों को कुछ नहीं देत, अपने समान बस बना लेत।
यह मैंने तेरी सुनी आन, जो लेवे तुमको बस पिछान।

वह पाता है कैवल्य-ज्ञान, होता परिपूर्ण कला-निधान।।‘’ -(जिन-स्तुति)

(अडिल्ल-छंद)

'अविनाशी अविकार परमरस-धाम है, समाधान सरवंग सहज-अभिराम है।
सुद्ध-बुद्ध-अविरुद्ध अनादि-अनंत हैं, जगत्-शिरोमनि सिद्ध सदा जयवंत हैं।। 4।।

शब्दार्थ :- अविनाशी-अविकार परमरस-धाम है= विनाशरहित/ शाश्वत, विकाररहित, अतीन्द्रिय-आनंद की खान, समाधान-सरवंग सहज-अभिराम है= समाधानस्वरूप अर्थात् निःशंकरूप, सर्वांग, सहज, बहुत रमणीय, सुद्ध-बुद्ध-अविरुद्ध अनादि अनंत है= पवित्र, ज्ञानमय, विरोध- रहित, जिसकी आदि न हो, जिसका अंत न हो, जगत्-शिरोमनि सिद्ध सदा जयवंत हैं= लोक के, सिरताज, सिद्ध भगवान् हमेशा जयवंत रहें। विशेषार्थ :- ‘सिद्ध-परमेष्ठी’ का गुणगान करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं, हे सिद्ध भगवन्! आप शाश्वत अर्थात् जन्म-मरण से रहित सदाकाल रहनेवाले हो, मोह-राग-द्वेष आदि विकारीभावों से रहित अविकारी हो, और परमआनंद-रस की खान हो अर्थात् सदाकाल अतीन्द्रिय-सुख का वेदन करते हो, आप सर्वसमाधान-स्वरूप हो, सर्वांग सहज और सुंदर हो। आप परम-पवित्र, परमज्ञानी हो, आपकी न आदि है और अंत है,- ऐसे आप अनादि-अनंत हो। आपसे श्रेष्ठ संसार में कोई और नहीं,- ऐसे तीनों लोकों के सरताज सिद्ध भगवान् सदा जयवंत रहें।

(सवैया इकतीसा)

ग्यान को उजागर, सहज-सुखसागर, सुगुन-रत्नागर, विराग-रस भरयौ है।
सरन की रीति हरै, मरन कौ न भै करे, करनसौं पीठि दे, चरन अनुसरयौ है।।
धरम को मंडन, भरम को विहंडन है, परम नरम ह्वै कै, करम सौ लरयौ है।
ऐसौ मुनिराज भुव-लोक में विराजमान, निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है।। 5।।

शब्दार्थ :- ग्यानकौ उजागर सहज-सुखसागर= ज्ञान के प्रकाशक, सहज-सुख के समुद्र हैं, सुगुन-रत्नागर विराग रस भरयौ है= सुगुणों की खान, वैराग्य-रस से भरे हुये हैं, सरन की रीति हरै= शरण की रीति को हरनेवाले, मरण कौ न भै करै= मरण के भय से रहित हैं, करनसौं पीठि दे= इन्द्रिय-विषयों से पीठ दिखाते है यानि विरक्त हैं, चरन अनुसरयौ है= चारित्र का अनुसरण यानि पालन करते हैं, धरम को मंडन= धर्म को सुशोभित करनेवाले हैं, भरम को विहंडन= भ्रम का खंडन करनेवाले हैं, परम-नरम ह्वै कै करमसौं लरयौ है= अतिनम्र होकर कर्मों से लड़ते हैं, ऐसो मुनिराज भुवलोक में विराजमान= ऐसे मुनिराज, तीनों लोक में विराजमान हैं, उन्हें निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है= उन्हें देखकर बनारसीदास ने नमन किया है। विशेषार्थ :- साधु-परमेष्ठी की स्तुति करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जो ज्ञान के प्रकाशक हैं अर्थात् जगत् के संतप्त-जीवों को ज्ञानामृत का पान करानेवाले हैं, जो सहज आत्मिक-सुख के सागर है, अर्थात् जो अपने समतारूपी-वचनों से जगत् के जीवों को शांति प्रदान करते हैं। जो गुणोंरूपी मणियों की खान है अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी मणियों की खान है। पंचेन्द्रिय के विषयों से विरक्त होने से वैराग्यरस से सराबोर हैं। दिगम्बरत्व धारण करने से जो किसी के अाश्रित नहीं है, इसलिये उनको मरण का भी भय नहीं है, जंगलों में निवास करते हैं, संसार-शरीर और भोगों से विरक्त होकर सम्यक् रूप से चारित्र का पालन करते हैं। जिनसे धर्म महिमा-मंडित होता है या जो धर्म की शान हैं, जो देहादिक समस्त पर-पदार्थों को अपना मानने रूप भ्रम का खंडन करनेवाले हैं। जो कर्मों को द्वेषपूर्वक क्षय नहीं करते हैं, बल्कि वे तो स्वरूप में लीन रहने का अभ्यास करते हैं, तो कर्मादिक सहज और स्वयं क्षय हो जाते हैं। ऐसे जितने भी भावलिंगी दिगम्बर-मुनिराज तीनों लोकों में विराजमान है, बनारसीदास उन सभी को परखकर विनय से भावसहित वंदन करते हैं।

(सवैया छन्द, भगण)

भेदविज्ञान जग्यौ जिन्हके घट, सीतल-चित्त भयौ जिमि चंदन।
केलि करैं सिवमारग में, जगमाँहि जिनेसुर के लघुनंदन।।
सत्य-सरूप सदा जिन्हकैं, प्रगट्यौ अवदात मिथ्यात-निकंदन।
सांत-दशा तिन्हकी पहिचानि, करैं करजोरि बनारसि वंदन।। 6।।

शब्दार्थ :- भेदविज्ञान जग्यौ जिन्हकैं घट= स्व और पर का भेदविज्ञान जिनके हृदय में प्रगट हुआ है, सीतलचित्त भयौ जिमि चंदन= जिनका मन चंदन की तरह शीतल हुआ है, केलि करैं सिवमारग में= मोक्षमार्ग में क्रीड़ा/आनंद करते हैं, जगमाँहि जिनेसुर के लघुनंदन= संसार में रहकर भी जिनेन्द्रदेव के छोटे पुत्र, सत्य, सरूप सदा जिन्हकैं= जिनके सदा वस्तु का यथार्थ-स्वरूप प्रगट/ज्ञात हुआ है, प्रगट्यौ अवदात मिथ्यात-निकंदन= जो मिथ्यात्व को नष्ट करनेवाला है, सांतदशा तिन्हकी पहिचानि= उनकी शांत-स्थिति को पहिचानकर, करैं करजोरि बनारसि वंदन= हाथ जोड़कर बनारसीदास जी नमस्कार करते हैं। विशेषार्थ :- पंचपरेष्ठी-भगवंतों की वंदना करने के बाद सम्यग्दृष्टि-जीव की महिमा का वर्णन करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जिस जीव के हृदय में ‘स्व’ और ‘पर’ का ‘भेदविज्ञान’ प्रकट हुआ है अर्थात् जिसे अपने आत्मस्वरूप का सच्चा श्रद्धान है, उसका चित्त/मन चंदन के समान शीतल हो गया है अर्थात् अब मोह-राग-द्वेष आदि विकारीभावों और कषायों की अग्नि उसे प्रभावित नहीं करती। इसे हम इसप्रकार भी कह सकते हैं कि जिसप्रकार चंदन के वृक्ष पर प्रतिसमय काले विषधर-नाग लिपटे रहते हैं; लेकिन फिर भी चंदन की शीतलता व सुगंधि पर कोई फर्क नहीं पड़ता, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव बाहर में भले ही विषधर के समान पंचेन्द्रिय के विषयों से घिरे दिखाई दें, फिर भी सुखस्वरूप भगवान् आत्मा का वेदन उनके चित्त में चंदन की सुगंधि के समान प्रतिसमय व्याप्त रहता है। वास्तव में सम्यग्दृष्टि तो अपने आत्मिक-आनंद की मस्ती में ही केलि करते हैं अर्थात् आनंदमग्न रहते हैं और मोक्षमार्ग पर अग्रसर भी। इसीलिये उन्हें ‘जिनेन्द्रदेव का लघुनदं न’ अर्थात् छोटा-पुत्र कहा जाता है, जिसप्रकार छोटा-पुत्र हमेशा अपने पिता का लाड़ला ही होता है, उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव भी अविरत-अवस्था में भी जिनेन्द्रदेव के प्रिय ही हैं, उनके अनुगामी ही हैं। जैसे छोटा-पुत्र पिता के मार्ग का ही अनुसरण करता है,और पिता के जैसा ही बनना चाहता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव भी जिनेन्द्रदेव के मार्ग का अनुसरण करता हुआ जिनेन्द्र देव के समान ही अल्पकाल में मोक्ष को प्राप्त करता है। एक बात विशेषरूप से ध्यान देने योग्य कि बिना-परखे बनारसीदास जी ने न साधु को वंदन किया (निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है) और न ही सम्यग्दृष्टि को (सांतदशा तिनकी पहिचानि…)- इस बात की गहराई की झलक हमें उनके जीवन में घटित-घटनाओं में भी देखने को मिलती है। उन्होंने जिनाम्नाय में निर्दिष्ट सभी पूज्यपदों को उनकी गुणवत्ता पहिचानकर ही नमस्कार किया है, इसे परखे बिना उन्होंनें कभी किसी को भी नमस्कार नहीं किया, फिर चाहे वह किसी भी पद पर आरूढ़ क्यों न हो। कवि के द्वारा रचित इन पंक्तियों से हमें शिक्षा मिलती है कि बिना परखे किसी भी मुनि-वेषधारी को या धर्मात्मा को कभी नमस्कार नहीं करना चाहिए।

(सवैया इकतीसा)

स्वारथ के साँचे, परमारथ के साँचे चित्त, साँचे-साँचे बैन कहें, साँचे जैनमती हैं।
काहू के विरुद्ध नाहिं, परजाय-बुद्धि नाहिं, आतम-गवेषी, न गृहस्थ हैं न जती है।।
सिद्धि-रिद्धि-वृद्धि दीसै घट मेैं प्रगट सदा, अंतर की लच्छिसौं अजाची लच्छपती है।
दास भगवंत के उदास रहैं जगत् सौं, सुखिया सदैव ऐसे जीव समकिती हैं।। 7।।

शब्दार्थ :- स्वारथ के साँच=े स्व+अरथ = स्व यानि आत्मा अर्थ यानि प्रयोजन के सच्चे, परमारथ के साँचे चित्त= परम-अर्थ यानि मोक्ष के लिये भी जिनका सच्चा-पुरुषार्थ है, साँचे-साँचे बैन कहे= सत्य-वचन बोलनेवाले, साँचे जैनमती हैं= जैनमत या जिनधर्म के सच्चे-श्रद्धानी हैं, काहू के विरुद्ध नाहिं= किसी से भी विरोध नहीं है, परजाय-बुद्धि नाहिं= स्वयं को पर्यायरूप से देखने की बुद्धि का अभाव है, आतम-गवेषी= आत्मस्वरूप की खोज करनेवाले हैं, न गृहस्थ न जती हैं= न तो गृहस्थ हैं और न साधु हैं, सिद्धि= आत्मस्वरूप की सिद्धि, रिद्धि= आत्मशक्ति की ऋद्धि, वृद्धि दीसै= निरन्तर स्वरूप के प्रति सावधानी की वृध्दि दिखाई देती हैं, घट में प्रगट सदा= सदैव अंतरंग में, अंतर की लच्छिसौं= जो आत्मानुभूतिरूपी अंतरंग-लक्ष्मी से संपन्न हैं, अजाची= किसी से याचना या आकांक्षा नहीं करते हैं, लच्छपती= लक्ष्मीपति होते हुये भी, भगवंत के दास= जिनेन्द्रदेव के भक्त रहकर, उदास रहैं जगतसौं= संसार से विरक्त रहते हैं सुखिया सदैव= जो हमेशा सुखी/संतुष्ट रहते हैं, ऐसे जीव समकिती हैं= ऐसे जीव सम्यग्दृष्टि होते हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में ‘सम्यग्दृष्टि-जीव’ के स्वरूप का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि वे सम्यग्दृष्टि-जीव अपने आत्मस्वरूप के सच्चे-ज्ञानी हैं, और मोक्षमार्ग की ओर जिनका चित्त उन्मुख है, जो सत्य-वचन बोलते हैं, और जिन-आज्ञा को मानने से सच्चे-जैनी है। जिनका किसी से कोई विरोध या आपसी-मतभेद नहीं है, जो स्वयं को भी और जगत् के अन्य जीवों को भी पर्याय-दृष्टि से नहीं देखते, जिनका चित्त निरन्तर आत्मस्वरूप की खोज में ही लगा रहता है, जो विषय-भोगों से विरक्त होने से न तो पूरीतरह से गृहस्थों के समान संसार-मग्न हैं, और स्थूलरूप से व्रत अंगीकार न करने से पूरीतरह से व्रती भी नहीं हैं। जिन्हें अपने आत्मस्वरूप की सिद्धि या अनुभूति हो चुकी है, आत्मशक्ति से परिचित होने से निरन्तर ऋद्धियों की वृद्धि अंतरंग में प्रत्यक्ष दिखाई देती है। आत्मवैभवरूपी लक्ष्मी से संपन्न होने के

कारण सच में लक्ष्मी के पति हैं, जगत् की लक्ष्मी की अब कोई वांक्षा नहीं है।
ये जिनेन्द्रदेव के सच्चे-सेवक हैं, इसलिये सांसारिक विषय-भोगों से सदा विरक्त रहते हैं।

आत्मिक-आनंद में मग्न रहने से सुखिया हैं, ऐसे गुणों को धारण करनेवाले जीव ही सम्यग्दृष्टि होते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जाकै घट प्रगट विवेक गणधरकौसौ, हिरदै हरखि महामोहकौं हरतु हैं।
साचौ सुख मानै निज-महिमा अडोल जानै, आपुही मैं आपनौ सुभाउ ले धरतु है।।
जैसे जल-कर्दम कतक फल भिन्न करै, तैसे जीव-अजीव विलछनु करतु है।
आतम-सकति साधैं ग्यान कौ उदौ आराधै, सोई समकिती भवसागर तरतु है।। 8।।

शब्दार्थ :- जाकै घट प्रगट विवेक गणधरकौसौ= जिसके हृदय में गणधर के समान विवेक प्रकट हुआ है, हिरदै हरखि महामोहकौं हरतु है= हृदय हर्षित यानि प्रसन्न रहता है, सबसे बड़ा मोह अर्थात् मिथ्यात्व को हरण अर्थात् नष्ट करता है, साचौ सुख मानै= (उसे ही) सच्चा-सुख मानता है, निज-महिमा अडोल जानै= अपनी महिमा को अविचल जानता है, आपुही मैं आपनौ सुभाउ ले धरतु है अपने आप में ही अपना स्वभाव अनुभव करता है, जैसे जल-कर्दम कतकफल भिन्न करै= जिसप्रकार जल में मिली कीचड़ को निर्मली/ फिटकरी अलग-अलग कर देती है, तैसें जीव-अजीव विलछनु करतु है= ठीक उसीप्रकार आत्मा-अनात्मा का भेदविज्ञान करता है, आतम सकति साधै ग्यान को उदौ आराधै= आत्म-शक्ति को साधता है, ज्ञान के उघाड़ को सार्थक करता है, सोई समकिती भवसागर तरतु है= वही सम्यग्दृष्टि-जीव संसार-सागर से पार उतरता है। विशेषार्थ :- सम्यग्दृष्टि-जीव की परिणति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जिसके हृदय में गणधर के समान स्व-पर-भेदविज्ञान की कला जागृत हुई है, जिससे महा-भयंकर मिथ्यात्व का अभाव हो गया है और आत्मस्वरूप की सच्ची-प्रतीति/अनुभूति होने से उसका हृदय हर्षित है, यानि अब उसे जो आत्मिक-सुख की अनुभूति हो रही है,उसी को वह सच्चा-सुख मानता है। सम्यग्दृष्टि-जीव को आत्मस्वरूप का अविचल-श्रद्धान होता है अर्थात् संसार का कोई भी प्रलोभन अब उसके श्रद्धान को हिला नहीं सकता। अब तो वह प्रतिसमय स्वयं को स्वयं में ही अनुभव करता है। प्रतिसमय यही भावना भाता है - ‘‘स्वयं स्वयं में तृप्त रहूँ मैं, रमूँ नहीं संसार में।’’ जिसप्रकार गंदे पानी में कतकफल यानि निर्मली या फिटकरी डालने पर गंदगी और स्वच्छ-पानी अलग अलग हो जाते हैं, ठीक उसीप्रकार प्रज्ञा-रूपी कतकफल का प्रयोग करने पर अनादिकाल की देहादिक समस्त पर-पदार्थों को अपना माननेरूप मिथ्यात्व की गंदगी और निजात्मारूपी स्वच्छ-जल भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। सम्यग्दर्शन होने पर ज्ञान भी स्वतः सम्यक् हो जाता है, जिससे सम्यग्ज्ञान के प्रकाश में सम्यग्दृष्टिजीव निरन्तर अपनी आत्मा की ही आराधना करता है, अर्थात् अपनी आत्मिक-शक्ति को बढ़ाने के लिये सतत जागरुक रहता है। कविवर बनारसीदास जी कहते हैं ऐसे सम्यग्दृष्टि-जीव ही संसाररूपी-समुद्र को पार करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

धरम न जानत, बखानत भरमरूप, ठौर-ठौर ठानत, लराई पच्छपात की।
भूल्यौ अभिमान में, न पाउ धरै धरनी में, हिरदै में करनी, बिचारे उतपात की।।
फिरै डांवाडोल-सौ, करम के कलोलनि में, ह्वै रही अवस्था, सु बघेलू कैसे पात की।
जाकी छाती ताती कारी कुटिल कुवाती भारी, ऐसौ ब्रह्मघाती, है मिथ्याती महापातकी।। 9।।

शब्दार्थ :- धरम न जानत= वस्तुस्वरूप को नहीं जानता, बखानत भरमरूप= भ्रामक-बातें बतलाता है, ठौर-ठौर ठानत लराई पच्छपात की= जगह-जगह एक पक्ष को लेकर यानि एकांती होकर लड़ाई करता है, भूल्यौ अभिमान में न पाउ धरै धरनी पर= घमंड में चूर होकर धरती पर पाँव नहीं रखता है, हिरदै में करनी बिचारै उतपात की= हृदय में उपद्रव/खुरापात की करतूतें सोचता है, फिरैं डांवाडोल सौ= डांवाडोल/अस्थिरचित्त होकर भटकता है, कर्म के कलोलनि में= कर्म के उदयरूपी लहरों में, ह्वै रही अवस्था सु बघेलू कैसे पात की= बवंडर के पत्ते की तरह इसकी स्थिति हो रही है, जाकी छाती ताती कारी कुटिल-कुबाती भारी= जिसका हृदय संतप्त, काला, वक्र, बुरी-बातों के बोझ से वजनदार है, ऐसौ ब्रह्मघाती मिथ्याती महापातकी= ऐसा ‘ब्रह्म’ अर्थात् आत्मस्वरूप का घात/तिरस्कार करनेवाला मिथ्यादृष्टि महापापी है। विशेषार्थ :- मिथ्यादृष्टि-जीव की प्रवृत्ति का वर्णन करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि मिथ्यादृष्टि-जीव धरम के अर्थात् वस्तु के वास्तविक-स्वरूप को तो जानता नहीं, और अपनी मनमर्जी से भ्रमरूप यानि कपोल-कल्पित धर्म का स्वरूप बखान करता है। धर्म के नाम पर अपने मिथ्या-विकल्पों और एकांती-पक्ष को सत्य साबित करने के लिये हर किसी से लड़ाई करने को भी प्रतिसमय तैयार रहता है। अपने मिथ्याज्ञान के अभिमान में इतना डूबा रहता है कि उसके पैर जमीन पर ही नहीं टिकते, हमेशा आसमान में उड़ने को तैयार रहता है अर्थात् हमेशा अभिमान से भरा रहता है। इतने से भी उसे तसल्ली नहीं होती, तो दिन-रात इसका चित्त नये-नये उपद्रवों को सोचने में ही चलायमान रहता है। जैसे समुद्र में तूफान आने पर लहरें इतनी तेज हो जाती है कि पानी पर चलनेवाली नाव भी डगमगाने लगती है, ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव के जीवन में कर्म का तीव्र-उदयरूपी तूफान आने पर प्रतिकूलतारूपी लहरें इतनी तेज हो जाती है कि इसकी जीवनरूपी नैया डगमगाने लगती है। जिससे इसकी दशा बघेलू यानि चक्रवाती-तूफान के बवंडर में फँसे पत्ते के जैसी हो जाती है, जो बेबस होकर उड़ता ही जाता है। जैसे चक्रवाती-तूफान में फँसी नाव आखिरकार डूब ही जाती है, ठीक उसीप्रकार मिथ्यात्व के भँवर में फँसी नाव आखिरकार भवसागर में डूब ही जाती है। जिसकी ‘छाती ताती’ है अर्थात् जिसका हृदय क्रोधकषाय के कारण संतप्त रहता है, ‘कारी’ अर्थात् लोभकषाय के कारण मलिन रहता है, ‘कुटिल’ अर्थात् मायाकषाय से कुटिल रहता है, और ‘कुवाती’ अर्थात् बुरे विचारों के बोझ तले मानकषाय के कारण पत्थर की तरह भारी रहता है। चारों कषायों की तीव्रता होने से वह मिथ्यादृष्टि-जीव प्रतिसमय अपने आत्मस्वरूप का ही घात करता है, और आगम के अनुसार- आत्मघाती महापापी नरकगामी अर्थात् आत्मघात करनेवाला महापापी मिथ्यादृष्टि-जीव नरकगामी होता है। (मध्ययुग में ब्रह्महत्या अर्थात् ब्राह्मण को मार डालना अक्षम्य-अपराध माना जाता था। उसी को लक्ष्य में रखकर कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि उसी प्रकार ब्रह्म-स्वरूप आत्मा का विस्मरण करना भी अक्षम्य-अपराध है। अन्य अपराधों की माफी कदाचित् संभव हो जाये, किन्तु इस अपराध को किसी भी हालत में, किसी भी अदालत में माफ नहीं किया जा सकता है।)

(दोहा)

बंदौ सिव अवगाहना, अरु बंदौं सिवपंथ।
जसु प्रसाद भाषा करौं, नाटक नामक ग्रंथ।। 10।।

शब्दार्थ :- बंदौं सिव-अवगाहना= सिद्ध-भगवान् को नमस्कार करता हूँ, अरु बंदौं सिवपंथ= और मोक्षमार्ग को नमस्कार करता हूँ जसु प्रसाद भाषा करौं नाटक नामक ग्रंथ= (क्योंकि) जिनकी कृपा से ‘नाटक’ नामक इस ग्रंथ की भाषाबद्ध-रचना कर रहा हूँ। विशेषार्थ :- ग्रंथ-रचना की प्रतिज्ञा करते हुये कविवर कहते हैं कि मैं सिद्ध-परमेष्ठी को और मोक्षमार्ग अर्थात् रत्नत्रय को नमस्कार करता हूँ; क्योंकि जिनके प्रसाद से या जिनकी कृपा से मैं प्रचलित- जनभाषा में ‘नाटक-समयसार’ नाम के इस ग्रंथ की रचना कर रहा हूँ। उत्थानिका

(सवैया मत्तगयन्द)

चेतनरूप अनूप अमूरति, सिद्ध-समान सदा पद मेरौ।
मोह-महातम आतम-अंग, कियौ पर-संग महातम घेरौ।।
ग्यानकला उपजी अब मोहि, कहौं गुन नाटक आगमकेरौ।
जासु प्रसाद सधै सिव-मारग, वैगि मिटै भव-वास-बसेरौ।। 11।।

शब्दार्थ :- चेतनरूप अनूप अमूरति= चैतन्यरूप आत्मा, अनुपम, अमूर्तिक है, सिद्ध-समान सदा पद मेरौ= मेरा पद या स्वरूप हमेशा सिद्ध-परमेष्ठी के समान, मोह-महातम आतम-अंग= मोहरूपी भयंकर-अंधकार आत्मा में, कियौ पर-संग महातम घेरौ= पर का संग करने से इस घोर-अंधकार ने घेर लिया है, ग्यानकला उपजी अब मोहि= अब मुझे विशेष-ज्ञानरूपी कला उत्पन्न हुई है, कहौं गुन नाटक आगमकेरौ= आगमसम्बन्धी/आगम-तुल्य ‘नाटक’ ग्रंथ को कहता हूँ, जासु प्रसाद सधै सिवमारग= जिसके कारण मोक्ष का मार्ग सधेगा या प्राप्त होगा, वैगि मिटै भववास बसैरो= शीघ्र ही मिट जायेगा भवभ्रमण का निवास। विशेषार्थ :- ग्रंथ-रचना का कारण और फल बताते हुये कविवर कहते हैं कि मैं चेतन-स्वरूप भगवान् आत्मा अनुपम अर्थात् जगत् में जिसकी कोई उपमा नहीं है, ‘अमूर्तिक’ अर्थात् जिसका इन्द्रिय- गोचर रूप नहीं है, सिद्ध-परमेष्ठी के समान पूर्ण-शुद्ध हूँ; लेकिन अनादिकाल से ‘पर’ यानि आठ कर्मों के साथ रहने से मोहरूपी भयंकर-अंधकार के कारण अंधा बना हुआ था अर्थात् मोह के कारण मैंने सिद्ध-समान शुद्ध-आत्मा का कभी अनुभव नहीं किया। लेकिन आज तीव्र-पुण्य का उदय है कि मुझे विशेष-ज्ञानरूपी-ज्योति प्रगट हुई है, जिससे आज मैं आगम के आलोक में महान्-ग्रंथ ‘नाटक समयसार’ की रचना कर रहा हूँ। जिसकी रचना से मोक्ष का मार्ग भी सधेगा और शीघ्रतिशीघ्र संसार-अटवी में निवास भी खतम हो जायेगा अर्थात् जन्म-मरण के दुःख से छूटकर अजर-अमर अविनाशी सिद्ध-पद की प्राप्ति होगी।

(छंद मनहर)

जैसे कोऊ मूरख महा-समुद्र तिरवें कौं, भुजानिसौं उद्यत भयौ है तजि नावरौ।
जैसे गिरि ऊपर विरख-फल तोरिवेकौं, बाबनु पुरुष कोऊ उमगै उतावरौ।।
जैसे जलकुंड में निरखि शशि-प्रतिबिम्ब, ताके गहिबै कौं कर नीचौ करै टाबरौ।
तैसें मैं अलपबुद्धि नाटक आरंभ कीनौ, गुनी मोहि हसैंगें कहैंगें कोऊ बाबरौ।। 12।।

शब्दार्थ :- जैसें कोऊ मूरख महासमुद्र तिरवेंकौं= जिसप्रकार कोई अज्ञानी-जीव विशाल-समुद्र पार करने के लिये, भुजानिसौं उद्यत भयौ है तजि नावरौ= नाव को छोड़कर अपनी बाँहों से (पार करने को) उद्यत/ प्रयत्नशील हुआ है, जैंसे गिरि ऊपर विरखफल तोरिवैंकौं= जिसप्रकार पहाड़ के ऊपर वृक्ष पर लगे फलों को तोड़ने के लिये, बाबनु पुरुष कोऊ उमगै उतावरौ,= कोई बौना अर्थात् बहुत छोटा-पुरुष उतावला होकर जल्दी से (हाथ बढ़ाता है), जैंसें जलकुंडमैं निरखि शशि-प्रतिबिम्ब= जिसप्रकार पानी से भरे कुंड में चंद्रमा का प्रतिबिम्ब या रूप देखकर, ताके गहिबैकौं कर नीचो करै टाबरौ= उसको पकड़ने के लिये छोटा-बच्चा हाथ नीचे करता है, तैसें मैं अलपबुद्धि नाटक आरंभ कीनौ= उसीप्रकार मुझ अल्पबुद्धि बनारसीदास ने ‘नाटक समयसार’ शुरू किया है, गुनी मोहि हसैंगें कहैंगे कोऊ बाबरौ= गुणवान् यानि विद्वान् मेरे ऊपर हँसेंगे और कहेंगे कि यह तो कोई बाबरा या पागल है। विशेषार्थ :- श्रेष्ठ-ग्रंथ की रचना करने में अपने को अशक्य बताते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार कोई मूर्ख-व्यक्ति नाव को छोड़कर अपने बाँहों के बल पर विशाल और अथाह-समुद्र को पार करने की चेष्टा करता है (वो ये समझ ही नहीं पाता कि जिस-समुद्र का कोई ओर-छोर ही नहीं है, मैं उसे अपनी बाँहों से कैसे पार कर सकता हूँ?) जिसप्रकार कोई बौना-व्यक्ति पर्वत पर वृक्ष पर लगे फलों को देखकर उन्हें तोड़ने के लिये खुशी के कारण जल्दबाजी में अपना हाथ बढ़ाने की चेष्टा करता है, (अर्थात् खुशी के कारण वह यह बात भूल ही जाता है पहले पर्वत विशाल, फिर पेड़ भी इतना ऊँचा, मैं इस पर लगे फलों को कैसे तोड़ सकता हूँ?) जिसप्रकार कोई छोटा-बच्चा पानी से भरे कुंड में चंद्रमा का प्रतिबिम्ब देखकर उसे पकड़ने के लिये अपना हाथ नीचे करता है, (वह सोचता ही नहीं है कि चंद्रमा तो ऊपर है, पानी में तो उसका प्रतिबिम्ब है, मैं इसे कैसे पकड़ सकता हूँ?) ठीक उसीप्रकार मैं अल्पबुद्धि यानि बनारसीदास इतने विशाल, अथाह, गूढ़, मार्मिक, अध्यात्मिक-ग्रंथ ‘समयसार’, जिसकी महिमा अकथनीय है, ऐसे ग्रंथ पर नाटक लिखने का दुस्साहस कर रहा हूँ, मेरे इस कृत्य को देखकर गुणवान् या विद्वान् लोग मेरे ऊपर हँसेंगे और कहेंगे

कि यह तो कोई बाबरा या पागल-व्यक्ति है, जिसने ऐसी चेष्टा की।
वास्तव में देखा जाये, तो इस छंद में गर्भित-भाव कवि की विनम्रता के परिचायक हैं।

(सवैया इकतीसा)

जैंसे काहू रतनसौं बींध्यौ है रतन कोऊ, तामैं सूत रेसम की डोरी पोई गई है।
तैंसे बुध-टीकाकार नाटक सुगम कीनौ, तापरि अलपबुद्धि सूधी परिनई है।।
जैसे काहू देस के, पुरुष जैसी भाषा कहैं, तैंसी तिनिहूँ के, बालकनि सीख लई है।
तैंसे ज्यौं गरंथ कौ, अरथ कह्यौ गुरु त्योंहि, हमारीमति कहिवे, कौं सावधान भई है।। 13।।

शब्दार्थ :- जैंसे काहू रतनसौं बींध्यौ है रतन कोऊ= जिसप्रकार किसी रत्न से बींधा गया है कोई रत्न, तामैं सूत रेसम की डोरी पोई गई है= उसमें सूती या रेशम का धागा पिरोया गया हो, तैंसे बुध-टीकाकार नाटक सुगम कीनौ= उसीप्रकार ज्ञानीजन जिन्होंने समयसार जी की टीका लिखी यानि आचार्य अमृतचन्द्रकृत ‘आत्मख्याति’ टीका और पांडे राजमल्लकृत ‘समयसार-कलश-टीका’ लिखकर इस ग्रन्थ को बहुत सरल कर दिया है, तापरि अलपबुद्धि सूधी परिनई है= उसपर मेरी कम-बुद्धि आसानी से चल सकी है, जैसे काहू देस के पुरुष जैसी भाषा कहैं= जिसप्रकार किसी स्थान के लोग जैसी भाषा बोलते हैं, तैंसी तिनिहूँ के बालकनि सीख लई है= वैसी ही उनके बच्चे भी सीख लेते हैं, तैंसे ज्यों गरंथ कौ अरथ कह्यौ गुरु त्योंहि= उसीप्रकार गुरु ने जैसा कहा उनके अनुसार इस ग्रंथ का भाव, हमारी मति कहिवे कौं सावधान भई है= कहने के लिये हमारी बुद्धि सावधान हुई है। विशेषार्थ :- जिसप्रकार हीरे की कणी से किसी रत्न में छेद कर दिया हो, बस उसमें सूत या रेशम की डोरी डालने का काम रह गया हो, उसीप्रकार समयसार के टीकाकार आचार्य अमृतचंद्र ने ‘समयसार जी’ पर टीका लिखकर एवं पांडे राजमल्ल जी ने समयसार के कलशों पर टीका लिखकर मेरा काम बहुत आसान कर दिया है, मुझे तो बस मात्र डोरी डालनी है, अर्थात् उन टीकाओं के अभिप्राय को छंदोबद्ध करना है। कहने का तात्पर्य यही है कि जो कठिन काम था रत्न में छेद करना अर्थात् टीका लिखना, वह तो पहले ही टीकाकार कर चुके हैं, अब तो डोरी डालने जैसा बहुत सरल-सा काम मुझे करना है। जिसप्रकार जिस देश में जैसी भाषा बोली जाती है, उस देश के बच्चे भी अपने आप ही वैसी ही भाषा सीख लेते हैं, उसीप्रकार गुरु-परम्परा से जो ज्ञान चला आ रहा है, मैंने भी वैसा ही सीख लिया है, अर्थात् मैंने कुछ नया काम नहीं किया है, और जो मैंने गुरु-परम्परा से सीखा था, उसी को बताने के लिये मेरी बुद्धि तत्पर हुई है।

(सवैया इकतीसा)

कबहू सुमति ह्वै कुमति को विनाश करै, कबहू विमल-जोति अंतर जगति है।
कबहू दया ह्वै चित्त करत दयालरूप, कबहू सुलालसा ह्वै लोचन लगति है’'।।
कबहू आरती ह्वै कै प्रभु सन्मुख आवै, कबहू सुभारती ह्वै बाहर बगति है।
धरै दसा जैसी तब करै रीति तैसी ऐसी, हिरदै हमारे भगवंत की भगति है।। 14।।

शब्दार्थ :- कबहू सुमति ह्वै= कभी सद्बुद्धि होकर, कुमति को विनास करै= कुबुद्धि को नष्ट करती है, कबहू विमल-जोति अंतर जगति है= कभी निर्मल-ज्ञानज्योति अंतरंग में जागृत होती है, कबहू दया ह्वै चित्त करत दयालरूप= कभी दया का भाव मन को दयालुतारूप करता है, कबहू सुलालसा ह्वै लोचन लगति है= कभी आपकी भक्ति की इच्छा नेत्रों को अच्छी लगती है, कबहू आरती ह्वै कै प्रभु सन्मुख आवै= कभी आरतीरूप होकर प्रभु के नजदीक आती है, कबहू सुभारती ह्वै बाहर बगति है= कभी सुन्दर स्तोत्र-पाठ के रूप में बाहर में भी प्रकट होती है, धरै दसा जैसी तब करै रीति तैसी ऐसी= जैसी स्थिति तब वैसा ही व्यवहार अर्थात् परिणमन होता है, हिरदै हमारै भगवंत की भगति है= हृदय में मेरे यानि बनारसीदास जी के जिनेन्द्र भगवान् की भक्ति है। विशेषार्थ :- कविवर कहते हैं मुझे जो ज्ञान-ज्योति मिली है, वह भगवान् की भक्ति का ही फल है, जिसकी वजह से कभी तो सद्बुद्धि अनादि से पड़ी कुबुद्धि का विनाश करती है, तो कभी निर्मलज्ञानज्योति बनकर अंतरंग में जागृत होती है; कभी अंतर में दया का भाव जगता है, तो बाहर में भी जीवदया और करुणा के परिणाम वर्तते हैं, कभी नेत्रों को आपको देखने की तीव्र-इच्छा होती है अर्थात् बस आपको ही निहारता रहूँ- ऐसा अंतरंग में भाव उमड़ता है। कभी तो अंतर्मन में उमड़े भाव आरती अर्थात् पूजन के रूप में प्रभु के सन्मुख आते है, कभी प्रभु की महिमा का गुणगान करते हुये सुन्दर-स्तोत्र के रूप में बाहर आते हैं, कवि कहते हैं जब जैसी स्थिति होती है, तब वैसा ही व्यवहार होता है, जिनेन्द्र-भगवान् की ऐसी सुदं र-भक्ति मेरे हृदय में प्रतिसमय उमड़ती है।

(सवैया इकतीसा)

मोख चलिबै को सोन करमकौ करै बौन, जाके रस-भौन बुध लौन ज्यों घुलत है।
गुन को गरंथ निरगुन कौ सुगम-पंथ, जाकौ जस कहत सुरेश अकुलत हैं।।
याही के जु पच्छी ते उड़त ग्यान-गगन में, याही के विपच्छी जग-जाल में रुलत हैं।
हाटकसौ विमल विराटकसौ विसतार, नाटक सुनत हिये फाटक खुलत हैं।। 15।।

शब्दार्थ :- मोख चलिबै को सोन= मोक्षमार्ग पर चलने के लिये सीढ़ी, करम कौ करै बौन= कर्म का वमन करती है, जाके रस भौन बुध लौन ज्यों घुलत हैं= जिसके रसरूपी जल में ज्ञानीजन नमक की तरह घुल जाते हैं, गुन को गरंथ= गुणों का ग्रंथ, निरगुन कौ सुगम-पंथ= निर्गुणों का सरल-रास्ता, जाकौ जस कहत सुरेश अकुलत हैं= जिसकी महिमा का गुणगान करने में सुरों के ईश (इन्द्र) भी व्याकुल रहते हैं अर्थात् समर्थ नहीं हैं, याही के जु पच्छी ते उड़त ग्यानगगन में= जो इसके पक्षधर हैं, वे ज्ञानरूपी आकाश में उड़ते हैं, याही के विपच्छी जग-जाल में रुलत हैं= इसके विरोधी संसाररूपी वन में दुःखी होते हैं, हाटक सौं विमल= स्वर्ण के समान निर्मल, विराटक सो विसतार= विष्णुकुमार-मुनि के विराटरूप की तरह विस्तृत, नाटक सुनत हिये फाटक खुलत हैं= इस नाटक को सुनते ही हृदय के दरवाजे खुल जाते हैं। विशेषार्थ :- प्रस्तुत-छंद में ‘समयसार’ जी की महिमा का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि ‘समयसार’ जी ग्रंथ मोक्षमार्ग पर चलनेवाले जीवों के लिये सोने की सीढ़ी के समान है, अर्थात् इस ग्रंथ का आद्योपांत-अध्ययन, मनन-चिंतन एवं अनुभवन करनेवाला जीव निश्चित ही मोक्ष प्राप्त करता है। साथ ही इस ग्रंथ का भावपूर्वक स्वाध्याय करनेवाले जीव के कषाय का वमन होता है, अर्थात् कषायरूपी गंदगी निकल जाती है, और परिणाम निर्मल होते हैं। यह ग्रंथ इतना मधुर है कि इसके रसास्वादन में ज्ञानीजन इसप्रकार तन्मय हो जाते हैं, जिसप्रकार पानी में नमक घुलकर एकमेक-सा हो जाता है। 'यह ग्थ रं आत्मिक-गुणों का भंडार है, अर्थात् इस ग्रंथ में आत्मा के अनंत-गुणों का वर्णन किया गया है। और निर्गुण (गुणभेद के विकल्प से मुक्त) होने के लिये सबसे सरल रास्ता है अर्थात् मुक्ति का सरलपंथ इसमें वर्णित है। कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘‘इस ग्रंथ की महिमा अगम है, इसका वर्णन करने में, मैं तो क्या सुरों के ईश अर्थात् इन्द्र भी संकोच करते हैं अर्थात् वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं।’’ ‘समयसार जी’ की महिमा का गुणगान करते हुये कवि कहते हैं कि जो ‘समयसार’ जी के पक्षधर है वे ज्ञानरूपी आकाश में पक्षियों के समान उड़ान भरते हैं, अर्थात् जिसप्रकार पक्षी अपने पंखों के सहारे खुले गगन में विचरण करते हैं, ठीक उसी प्रकार जो ‘समयसार’ जी ग्रंथ के मर्म को समझते हैं वे आत्मस्वरूप के अनंत-गुणों में केलि करते हैं। और जो ‘समयसार’ जी के विरोधी हैं, वे संसार-अटवी में रुलते हैं, अर्थात् जो आत्मस्वरूप के विरोधी हैं या जो बाहरी-क्रियाकाण्ड से ही मोक्ष होना मानते हैं, वे संसाररूपी वन में अनंतकाल तक भ्रमण करते हुये दुःखी होते हैं। जैसे बियावान-जंगल का कोई ओरछोर नहीं होता, वैसे ही आत्मस्वरूप के विरोधी-जीवों के संसार-परिभ्रमण का कोई अंत नहीं होता। स्वरूप के आराधकों के लिये ये ग्रंथ स्वर्ण की तरह निर्मल है और विष्णुकुमार मुनि जी के विराटरूप की तरह विस्तृत भी। (जब सातसौ मुनियों की रक्षा करने के निमित्त विष्णु कुमार मुनि ने विक्रिया-ऋद्धि का प्रयोग करके विराट-रूप बनाकर बलि को हराया था)। यदि ‘समयसार’ जी ग्रंथ का भाव-भासनपूर्वक स्वाध्याय किया जाये, तो हृदय के फाटक खुल जाते हैं, अर्थात् अनादि की मिथ्याकुटेव/बुरी आदत क्षणभर में दूर हो जाती है।

(दोहा)

कहौं सुद्ध निहचै-कथा, कहौं सुद्ध-विवहार।
मुकतिपंथ-कारन कहौं, अनुभौ को अधिकार।। 16।।

शब्दार्थ :- कहौं सुद्ध-निहचै-कथा= शुद्ध-निश्चयनय की बात कहता हूँ, कहौं सुद्ध-विवहार= शुद्ध- व्यवहारनय की बात कहता हूँ, मुकतिपंथ-कारन= मोक्षमार्ग के कारणभूत, अनुभौ को अधिकार= अनुभव का अध्याय या वर्णन। विशेषार्थ :- मैं अब शुद्ध-निश्चयनय से, शुद्ध-व्यवहारनय से मोक्षमार्ग के कारणभूत अनुभव की चर्चा करता हूँ, अर्थात् आत्मानुभूति के बिना मोक्षमार्ग की शुरूआत भी नहीं होती- यह बात वे स्पष्टरूप से घोषित कर रहे हैं। निश्चय-मोक्षमार्ग तो आत्मानुभूति के बिना होता ही नहीं है, व्यवहार-मोक्षमार्ग भी आत्मानुभूति के बिना नहीं होता है- यह उनका दोटूक-अभिप्राय है।

(दोहा)

वस्तु विचारत ध्यावतैं, मन पावे विश्राम।
रस-स्वादत सुख ऊपजै, अनुभव याकौ नाम।। 17।।

शब्दार्थ :- वस्तु विचारत ध्यावतैं= वस्तु-स्वरूप का चिंतन व ध्यान करने से, मन पावे विश्राम= मन को विश्रांति मिलती है अर्थात् चंचलता मिट जाती है, रस स्वादत सुख ऊपजै= आत्मिक-रस का पान करने से जो सुख उत्पन्न होता है, अनुभव याकौ नाम= इसी का नाम अनुभव है। विशेषार्थ :- वस्तु-स्वरूप का विचार करने से अर्थात् आत्म-स्वरूप का चिंतन करने से, उसी का ध्यान करने से मन विश्रांति को प्राप्त होता है अर्थात् उसकी संकल्प-विकल्परूप चंचलता मिट जाती है जिससे साम्यभाव प्रकट होता है। और जब ऐसा करते हैं, तो आत्मिक-रस का स्वाद अर्थात् आत्मानुभूति होने पर जो अतीन्द्रिय-आनंद या सुख का वेदन होता है, उसी का नाम ‘अनुभव’ है।

(दोहा)

अनुभव चिंतामणि-रतन, अनुभव है रसकूप।
अनुभव मारग मोख कौ, अनुभव मोखसरूप।। 18।।

शब्दार्थ :- अनुभव चिंतामणि-रतन= अनुभूति चिंतामणि-रत्न है, अनुभव है रसकूप= अनुभूति रस के कुँयें के (समान) है, अनुभव मारग-मोख कौ= अनुभूति ही मोक्ष का मार्ग है, अनुभव मोख-सरूप= अनुभूति मोक्षरूप ही है। विशेषार्थ :- आत्मानुभूति चिंतामणि-रत्न के समान है, अर्थात् जिसप्रकार चिंतामणि-रत्न से हम जो चाहते हैं, वह प्राप्त हो जाता है, उसीप्रकार हम सभी सुखी होना चाहते हैं, तो सच्चे सुख की प्राप्ति आत्मानुभूतिरूपी चिंतामणि-रत्न से ही होती है। आत्मानुभूति ही समतारस का कुँआ है, अर्थात् जैसे कुँये के पास जाने पर जल की प्राप्ति होती है, ठीक उसीप्रकार आत्मानुभूति होने पर चित्त को शांति अवश्य मिलती है। आत्मानुभूति ही मोक्ष का मार्ग है, अर्थात् आत्मानुभूति ही मोक्षमार्ग अर्थात् रत्नत्रय है। अात्मानुभूति मोक्षस्वरूप ही है, अर्थात् ऐसा लगता है कि मोक्ष कुछ और नहीं बल्कि अखंड-आत्मानुभूति ही मोक्ष है।

(सवैया मनहर)

अनुभौ के रस को रसायन कहत जग, अनुभौ-अभ्यास यहु तीरथ की ठौर है।
अनुभौ की रसा कहावै सोई पोरसा सु, अनुभौ अधोरसा सौं ऊरध की दौर है।।
अनुभौ की केलि यहै कामधेनु चित्रावेलि, अनुभौ को स्वाद पंच-अमृतकौ कौर है।
अनुभौ करम तोरै परमसौं प्रीति जोरै, अनुभौ-समान न धरम कोऊ और है।। 19।।

शब्दार्थ :- अनुभौ के रस को रसायन कहत जग= आत्मानुभूति के रस को संसार ‘रसायन’ (जीवनदायिनी औषधि) कहता है, अनुभौ-अभ्यास यहु तीरथ की ठौर है= आत्मानुभूति का अभ्यास यही तीर्थस्थान है, अनुभौ की जो रसा कहावै पोरसा सु= आत्मानुभूति की जो पृथ्वी है, वही उपजाऊ-भूमि कहलाती है, अनुभौ अधोरसा-सौं ऊरध की दौर है= आत्मानुभूति अधोलोक की पृथ्वी से ऊर्ध्वलोक की दौ़ड़ है, अनुभौ की केलि यहै कामधेनुचित्रावेलि= आत्मानुभूति का यह अानंद ‘कामधेनु’ और ‘चित्रावेलि’ के समान है, अनुभौ को स्वाद पंच-अमृत कौर है= अनुभूति का स्वाद पंचामृत-भोजन के निवाले/ग्रास के समान है, अनुभौ करम तोरै= आत्मानुभूति कर्मों के बंध को तोड़नेवाली है, परमसौं प्रीति जौरे= परमपद अर्थात् मोक्ष से लगन लगाने/ जोड़नेवाली है, अनुभौ समान न धरम कोऊ और है= आत्मानुभूति के समान कोई और धर्म नहीं है। विशेषार्थ :- आत्मानुभूति की विशेष-महिमा का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं आत्मानुभूति के रस को समस्त ज्ञानीजन ‘रसायन’ कहते हैं, अर्थात् आत्मानुभूति एक ऐसा रस है, जो भवरोग के नाश के लिये औषधि के समान है। आत्मानुभूति का अभ्यास ही पवित्र-तीर्थस्थान है, अर्थात् आत्मानुभूति होने के बाद मुक्ति पाने के लिये किसी भी तीर्थस्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं है। आत्मानुभूति के साधक जहाँ विराजमान होते हैं, वही स्थान ‘तीर्थ’ बन जाता है। आत्मानुभूति उस उपजाऊ भूमि के समान है, जहाँ पर हरप्रकार की खेती की जा सकती है अर्थात् सभीप्रकार की शंकाओं का समाधान हो जाता है। आत्मानुभूति ही अधोलोक से ऊर्ध्वलोक की दौड़ है, अर्थात् आत्मानुभूति जीव को अधोलोक से निकालकर ऊर्ध्वलोक के शिखर ‘मोक्ष’ में ले जानेवाली है। जो आत्मानुभूति के आनंद में केलि करता है, अर्थात् आत्मा के आनंद का रसास्वादन करता है, उसके लिये ये ‘कामधेनु’ और ‘चित्रावेलि’ के समान है। जिसप्रकार घी, तेल, दूध, दही, मीठा- इन पाँच रसों से बना भोजन अति-पोषक एवं स्वादिष्ट होने से ‘पंचामृत’ कहलाता है, ठीक उसीप्रकार आत्मानुभूति का स्वाद पंचामृत-भोजन के निवाले के समान ‘अमृतत्व की प्राप्ति का नियामक’ है। एकमात्र आत्मानुभव ही ऐसा हथौड़ा है, जो कर्मों के बंधन को तोड़ सकता है और परमपद अर्थात् मोक्षमहल में प्रवेश करवा सकता है। अात्मानुभव के समान दूसरा कोई धर्म इस संसार में नहीं है।

(दोहा)

चेतनवंत अनंत-गुन, परजै-सकति अनंत।
अलख अखंडित सर्वगत, जीवदरब-विरतंत।। 20।।

शब्दार्थ :- चेतनवंत अनंतगुन= चैतन्य-स्वरूप अनंत-गुणों का धनी, परजै-सकति अनंत= पर्याय की शक्ति अनंत है, अलख अखंडित सर्वगत= जो दिखाई न दे, जो अखंडित हो, सर्व में व्याप्त, जीव दरब विरतंत= (एेसा) जीव द्रव्य का वृत्तांत/स्वरूप है। विशेषार्थ :- जीवद्रव्य का स्वरूप वर्णित करते हुये कविवर कहते हैं कि जीवद्रव्य चैतन्य-स्वरूप है, अर्थात् जिसमें स्व-पर-प्रकाशक चेतना-शक्ति विद्यमान है, जो अनंत-गुणों का स्वामी है, उसमें अनंतपर्याय प्रकट करने की शक्ति है, जो ‘अलख’ है, अर्थात् लख यानि देखना और अलख यानि जो दिखाई न दे अर्थात् अरूपी है, जो ‘अखंडित’ है, अर्थात् जो कभी खंडरूप नहीं होता, त्रिकाल एक जैसा, जो ‘सर्वगत’ है, अर्थात् जो सर्व में व्याप्त है- ऐसा जीवद्रव्य का स्वरूप है।

(दोहा)

फरस-वरन-रस-गंध मय, नरद-पास संठान।
अनुरूपी पुदगल-दरब, नभ-प्रदेश-परवान।। 21।।

शब्दार्थ :- फरस-वरन-रस-गंधमय= स्पर्श-वर्ण-रस-गंध से सहित, नरद-पास संठान - चौपड़ के पाँसे के आकारवाला, अनुरूपी पुदगल-दरब= उसके समान रूपवाला पुदगलद्रव्य, नभ-प्रदेश-परवान= आकाश के प्रदेश के प्रमाण या बराबर। विशेषार्थ :- पुद््गल-द्रव्य का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि जो स्पर्श (छूने योग्य), वर्ण (रंग), रस (स्वाद), गंध (महक) आदि गुणों से सहित है, चौपड़ के पाँसे के समान जिसका आकार है, वह पुदगलद्रव्य है। जो आकाश के प्रदेश के अनुरूप कहा गया है, अर्थात् उत्कृष्ट-परिमाण लोकाकाश के अनुरूप एवं सूक्ष्मतम शुद्ध-परमाणु आकाशद्रव्य के एक प्रदेश के बराबर आकार का माना गया है।

(दोहा)

जैसे सलिल-समूह में, करैं मीन गति-कर्म।
तैसें पुद््गल-जीव को, चलन-सहाई धर्म।। 22।।

शब्दार्थ :- जैंसे सलिल-समूहमें= जिसप्रकार पानी के समूह में अर्थात् सरोवर आदि में, करैं मीन गतिकर्म= मछली चलने का कार्य करती है, तैंसे पुद््गल-जीव को= उसीप्रकार पुद््गल और जीव को, चलन सहाई धर्म= चलने में सहायक ‘धर्मद्रव्य’ होता है। विशेषार्थ :- ‘धर्मद्रव्य’ का स्वरूप बताते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जिसप्रकार स्वयं गमन करती हुई मछली को गमन करने में सरोवर आदि का पानी सहायक होता है, ठीक उसीप्रकार स्वयं चलते हुये पुद््गलों और जीवों को चलने में ‘धर्मद्रव्य’ सहायक होता है। सरोवर का पानी मछली को जबरन नहीं चलाता है, जब मछली स्वयं चलना चाहे, तब पानी उसकी सहायता करता है। यदि पानी मछली को चलाता, तो मछली कभी ठहरती ही नहीं, चलती ही रहती, ठीक उसीप्रकार धर्मद्रव्य जीवों और पुद््गलों को जबरन नहीं चलाता है, जब जीव और पुद््गल स्वयं गमन करना चाहें, तब धर्मद्रव्य चलने में उनकी सहायता करता है।

(दोहा)

ज्यौं पंथी ग्रीषम-समै, बैठे छाया-माँहि।
त्यौं अधर्म की भूमि में, जड़-चेतन ठहराँहिं।। 23।।

शब्दार्थ :- ज्यौं पंथी ग्रीषम-समै बैठे छायामाँहि= जिसप्रकार राहगीर गर्मी के समय में छाया में बैठता है, त्यौं अधर्म की भूमि में= उसीप्रकार अधर्म- द्रव्य की भूमि/स्थिति में, जड़ चेतन ठहराँहि=ं पुद््गलद्रव्य और जीवद्रव्य ठहरते हैं। विशेषार्थ :- ‘अधर्मद्रव्य’ का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार गर्मी से संतप्त-मनुष्य वृक्ष की छाया देखकर उसके नीचे बैठकर विश्राम करता है, ठीक उसीप्रकार जब भी जीव और पुद््गल स्वयं गतिपूर्वक ठहरना चाहते हैं, तब ‘अधर्मद्रव्य’ उन्हें ठहरने में सहायक होता है। जैसे वृक्ष की छाया पथिक को बुलाकर ठहरने के लिये नहीं कहती; बल्कि पथिक स्वयं ठहरने की इच्छा करता है, तब वह छाया निमित्त बनती है । ठीक उसीप्रकार ‘अधर्मद्रव्य’ जीवों और पुद््गलों को ठहरने के लिये प्रेरित नहीं करता; बल्कि जीव और पुद््गल जब स्वयं ठहरना चाहते हैं, तब ‘अधर्मद्रव्य’ सहायक होता है।

(दोहा)

संतत जाके उदरमैं, सकल पदारथवास।
जो भाजन सब जगतकौं, सोई दरब अकास।। 24।।

शब्दार्थ :- संतत जाके उदर मैं= संतति/बच्चे की तरह जिसके पेट में, सकल पदारथवास= समस्त पदार्थ निवास करते हैं, जो भाजन सब जगत्कौं= जो संपूर्ण-जगत् का भाजन/पात्र है, सोई= वही आकाशद्रव्य है। विशेषार्थ :- ‘आकाशद्रव्य’ का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार माँ के उदर में बच्चे का निवास होता है, ठीक उसीप्रकार जगत् के समस्त पदार्थों का निवास जिसमें होता है, जो जगत् के समस्त द्रव्यों के लिये पात्र/बर्तन के समान आधारभूत है, अर्थात् जिसप्रकार बर्तन किसी भी वस्तु के लिये आधार होता है, ठीक उसीप्रकार जगत् के समस्त द्रव्यों का जो आधार है, वही ‘आकाशद्रव्य’ है।

(दोहा)

जो नवकरि जीरन करै, सकल वस्तुथिति ठानि।
परावर्त वर्तन धरै, काल-दरब सो जानि।। 25।।

शब्दार्थ :- जो नवकरि जीरन करै= जो नवीन को जीर्ण करे, सकल वस्तुथिति ठानि= समस्त वस्तुस्थिति ठानकर, परावर्त वर्तन धरे= पाँचों परावर्तनों में परिवर्तन/ परिणमन कराये, काल दरब सो जानि= उसे कालद्रव्य जानो। विशेषार्थ :- काल-द्रव्य का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि जो जगत् के समस्त पदार्थों को नवीन से जीर्ण अर्थात् पुराना करे अर्थात् नवीन-पर्याय की उत्पत्ति और पूर्व-पर्याय के विनाश का कारण बने, ऐसा वर्तना-लक्षण वाला ‘काल-द्रव्य’ है।

(दोहा)

समता-रमता-उरधता, ग्यायकता-सुखभास।
वेदकता-चैतन्यता, ये सब जीव-विलास।। 26।।

शब्दार्थ :- समता-रमता-उधरता= साम्यभाव, रमण करना, ऊर्ध्वगमन-स्वभाव, ग्याकता सुखभाष= ज्ञायक-स्वभाव, सुख का अनुभव करना, वेदकता चैतन्यता= वेदन करना, चैतन्यरूप परिणमन, ये सब जीवविलास= ये सब जीव के कार्य हैं। विशेषार्थ :- जीव की परिणतियों का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि साम्यभाव अर्थात् राग-द्वेष से रहित वीतराग-स्वरूप में रमण करना, ऊर्ध्वगमन करना अर्थात् ऊपर की ओर गमन करना जीव का स्वभाव है, ज्ञाता-दृष्टारूप रहना, सहज आत्मिक-सुख का प्रतिसमय वेदन करना, चेतनरूप अर्थात् स्व-पर प्रकाशीपना- ये सब जीव के विलास हैं अर्थात् ये जीव के सहज-कार्य हैं।

(दोहा)

तनता मनता वचनता, जड़ता जड़-सम्मेल।
लघुता गुरुता गमनता, ये अजीव के खेल।। 27।।

शब्दार्थ :- तनता मनता वचनता= शरीररूप परिणमन, मनरूप परिणमन, वचनरूप परिणमन, जड़ता जड़सम्मेल= अचेतनपना, अन्य जड़-पदार्थों में मिलन का भाव, लघुता गुरुता गमनता= छोटा या हल्कापना, बड़ा या भारीपना, गमन करना, ये अजीव के खेल= ये सब अजीव का परिणमन हैं। विशेषार्थ :- ‘अजीव-द्रव्य’ की परिणति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि शरीर, मन, वचन, अचेतनपना अर्थात् सुख-दुःख का वेदन न होना, जड़ का जड़ में ही मिल जाना, हल्का या छोटा होना, भारी या बड़ा होना, गमन करने अर्थात् क्षेत्र से क्षेत्रान्तर होना- ये सब अजीव-द्रव्यों की परिणतियाँ हैं, अर्थात् संसार का ये सारा खेल जीव का नहीं ‘अजीव-द्रव्य’ का है। उपर्युक्त दोनों दोहों में कविवर बनारसीदास जी ने जीव-द्रव्य और अजीव-द्रव्य के स्वरूप और कार्यों का सरल और सुंदर-वर्णन करके दोनों द्रव्यों की भिन्नता का सुंदर-चित्रण किया है। इनका इसीरूप में ज्यों का त्यों श्रद्धान, ज्ञान और तदनुरूप आचरण करना ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र है। लेकिन हम अज्ञानी-जीवों को इन दोनों-द्रव्यों का मिलाजुला श्रद्धान, ज्ञान और तदनुरूप आचरण होने से ही हम प्रतिसमय दुःखी हैं। अर्थात् सारा दुःख दृष्टि के मिथ्यारूप होने का है, और जिस दिन दृष्टि सम्यक् हुई, उसी क्षण हम सुखी।

(दोहा)

जो विशुद्धभावनि बंधै, अरु ऊरधमुख होइ।
जो सुखदायक जगत् में, पुन्य-पदारथ सोइ।। 28।।

शब्दार्थ :- जो विशुद्धभावनि बंध=ै संकलेश-रहित शुद्ध अर्थात् शुभभावों से बँधता है, अरु ऊरधमुख होइ= और ऊर्ध्वमुखी होता है, जो सुखदायक जगत् में= सुख देनेवाला संसार में, पुन्य-पदारथ सोइ= वही पुण्य नामक पदार्थ है। विशेषार्थ :- पुण्य का स्वरूप और फल का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जो विशुद्धभावों से अर्थात् संक्लेश-रहित शुभ-भावों से बंधे और जो ऊर्ध्वमुखी अर्थात् ऊपर की ओर गमन करे या जिसके फल में स्वर्ग आदि की प्राप्ति हो, जो सांसारिक-सुख को देनेवाला हो, वही पदार्थ ‘पुण्य’ है।

(दोहा)

संक्लेश-भावनि बँधै, सहज अधोमुख होइ।
दुःखदायक संसार में, पाप-पदारथ सोइ।। 29।।

शब्दार्थ :- संक्लेश-भावनि बँध=ै संक्लेश-परिणामों से बँधता है, सहज-अधोमुख होइ= सहज अधोगति (नरक, तिर्यंच का कारण) होता है, दुःखदायक संसार में= दुःख देनेवाला संसार में, पाप-पदारथ सोइ= वही ‘पाप’ नामक पदार्थ है। विशेषार्थ :- पाप के स्वरूप एवं उसके फल का वर्णन करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जो संक्लेश-परिणामों से अर्थात् तीव्र-कषाय से बंधता है, और जिसके फल में अधोगति अर्थात् नरक और तिर्यंच-गतियों की प्राप्ति होती है, जो संसार में भी निरन्तर दुःख देनेवाला है, वह पदार्थ जगत् में दुःखरूप है। उपर्युक्त दोनों दोहों में कवि ने पुण्य और पाप का सुंदर-वर्णन किया है। पुण्य भाव- जो परिणाम आपको सन्मार्ग पर ले जाये। पाप भाव- जो परिणाम आपका पतन कराये। कवि ने यहाँ ‘‘पुण्य-बंध भी विशुद्ध-भावों से होता है’’- कहकर स्पष्ट किया कि पुण्य-फल की वांक्षा रखते हुये यदि पुण्य-क्रियायें की जायें,- तो ऐसे अशुद्ध-भावों से तो पुण्य भी नहीं बंधता। अर्थात् सांसारिक-सुख की इच्छा रूप निदानभाव रखते हुये यदि भगवान् की पूजा-अर्चना, व्रत-तप, दयादानादिक के भाव किये, तो उनसे पुण्य-बंध भी नहीं होगा। क्या कभी किसान भूसा पाने के लिये खेती करता है? लेकिन यदि वही किसान गेहूँ की खेती करता है, तो भूसा तो उसे सहज प्राप्त होता है; ठीक उसीप्रकार यदि साधक बिना किसी स्वार्थ के आत्महित के लक्ष्य से जिनेन्द्र की पूजा-अर्चना, व्रत-तप, दया-दानादिक के भाव करता है, तो अशुभकर्मों की आंशिक-निर्जरा के साथ-साथ पुण्य उसे सहज प्राप्त होता ही है।

(दोहा)

जोई करम-उद्योत धरि, होइ क्रिया-रसरत्त।
करषै नूतन-करम कौं, सोई आस्रव-तत्त।। 30।।

शब्दार्थ :- जोई करम उद्योत धरि= जब कर्म उदय में आता है, होइ क्रिया रसरत्त= तब कार्य या प्रवृत्ति राग-सहित होती है, करषै नूतनकरम कौं= जिससे नवीन कर्मों का आस्रव होता है, सोई आस्रव-तत्त= वही ‘आस्रव-तत्त्व’ है। विशेषार्थ :- आस्रव-तत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जब कर्म का उदय आता है, तब उस उदयजनित-परिणाम में मन, वचन और काया से रागरूप जुड़ने की जो प्रवृत्ति होती है, वह नवीनकर्मों को अपनी ओर खींचती है, जिसे आस्रव-तत्त्व कहते हैं। ‘आस्रव’ अर्थात् कर्मों का आना। संपूर्ण-लोक में कर्मरूपी पुद््गल-वर्गणायें ठसाठस भरी हुई हैं, जब पूर्वबद्ध-कर्म का उदय आता है, तो हम अज्ञानी-जीव उससे प्रभावित होकर अाकुलित होते हैं, कभी रागरूप तो कभी द्वेषरूप। वास्तव में देखा जाये, तो यही आकुलता हमारे लिये नवीन-कर्मों के आस्रव का कारण बनती है, वरना कर्म तो निर्जरित होने के लिये ही उदय में आया है, यदि हम उस समय साम्यभाव रखें, तो नवीन-कर्म का आस्रव नहीं होगा। यही ‘ज्ञानी’ और ‘अज्ञानी’ की परिणति में फर्क़ है, ज्ञानी जीव उदयजनित-परिणाम में आकुलित न होकर साम्यभाव रखते हैं, जिससे पुराना-कर्म भी निर्जरित हो जाता है और नवीन-कर्म का आस्रव भी नहीं होता। जबकि अज्ञानी-जीव कर्मोदय में मूर्च्छित होकर नवीन-कर्मबंध करता रहता है।

(दोहा)

जो उपयोग स्वरूप धरि, वरतै जोग-विरत्त।
रौकें आवत-करम कौं, सो है संवर-तत्त।। 31।।

शब्दार्थ :- जो उपयोगस्वरूप धरि= जब उपयोग स्वरूप में स्थिर होकर, वरतै जोग विरत्त= योग की चंचलता से विरक्तिरूप प्रवर्तन करता है, रौकें आवत करमकौं = तब वह आनेवाले कर्मों को रोकता है, सो है संवर-तत्त= वही संवर-तत्त्व है। विशेषार्थ :- संवर-तत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जब उपयोग स्वरूप में स्थिर होता है, तब सहज ही मन, वचन और काया का व्यापार रुक जाता है अर्थात् योगों से विरक्तिरूप प्रवृत्ति होती है, जिससे आनेवाला नवीन-कर्म रुक जाता है, वही संवर-तत्त्व है। कहने का तात्पर्य यही है कि यदि हमें नवीन-कर्मों को आने से रोकना है, तो इसका एकमात्रसाधन स्वरूप में स्थिरता ही है। इसी से मन-वचन-काया का व्यापार रुकता है, और नवीन-कर्मों का आना भी। इसलिये यदि हमें भी सुखी होना है, तो आत्मानुभूति का पुरुषार्थ करना चाहिये, शुभाशुभविकल्पों का नहीं।

(दोहा)

जो पूरब-सत्ता करम, करि थिति-पूरन आउ।
खिरबै को उद्यत भयौ, सो निर्जरा लखाउ।। 32।।

शब्दार्थ :- जो पूरब-सत्ता करम= पहले से सत्ता में मौजूद हैं, एेसे कर्म, करि थिति पूरन आउ= स्थिति पूरी करके उदय में आते हैं, वह खिरबै को उद्यत भयौ= इसप्रकार जो कर्म निर्जरित होने को तैयार हुआ है, सो निर्जरा लखाउ= उसे ही निर्जरा देखो/जानो। विशेषार्थ :- निर्जरा-तत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जो कर्म पहले से सत्ता में मौजूद हैं, और अपनी आयु की स्थिति पूरी करके खिरने को तैयार हैं, उसे ‘निर्जरा-तत्त्व’ कहते हैं। ‘निर्जरा’ अर्थात् कर्म-वर्गणाओं का अात्म-प्रदेशों से अलग होना। यूँ तो देखा जाये, तो कर्मों की निर्जरा तो प्रतिसमय स्वयं हो रही है, लेकिन मोक्षमार्ग में इस निर्जरा की कोई कीमत नहीं है, क्योंकि ये ‘सविपाक’ अर्थात् कर्मफल-सहित निर्जरा हो रही है। जब साधक आत्मस्वरूप में स्थिर होता है, तब वही निर्जरा कर्म-फल से रहित होती है, जिसे ‘अविपाक-निर्जरा’ कहते हैं, जो मोक्षमार्ग में सहकारी होती है, इसलिये यही वास्तविक-निर्जरा है।

(दोहा)

जो नव-करम पुरानसौं, मिले गाँठ दिढ़ होइ।
सकति बढ़ावै वंश की, बंध-पदारथ सोइ।। 33।।

शब्दार्थ :- जो नवकरम पुरानसौं= जब नवीन-कर्म पुराने-कर्मों सेे, मिले गाँठ दिढ़ होइ= मिलते हैं, तो और मजबूती से दृढ़ हो जाते हैं, सकति गाँठ दिढ़ होइ= वंश-परम्परा की शक्ति को बढ़ाते हैं, बंध-पदारथ सोइ= वही ‘बंध-पदार्थ’ है। विशेषार्थ :- बंध-तत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जब नवीन-कर्म पुराने-कर्मों से मिलते हैं, तो कर्मशक्ति और मजबूत हो जाती है, जो कर्मों की वंश-परम्परा को बढ़ाता है, वही ‘बंध-पदार्थ’ है। कवि ने इन दो-पंक्तियों में बंध-तत्त्व का बहुत ही सटीक-वर्णन किया है। जब नवीन-कर्म पुरानेकर्म से मिलते हैं, अर्थात् पूर्व-कर्म तो उदय में निर्जरित होने के लिये ही आया है, उससे नवीन-कर्मबंध तभी होता है, जब हमारा उपयोग उस उदयजनित-कर्म से जुड़ता है, यदि हम उस उदयजनित-कर्म से न जुड़ें, तो नवीन-कर्मों का बंध अर्थात् कर्मों की वंश-परम्परा में वृद्धि नहीं होगी, और पुराना-कर्म तो अपनी स्थिति पूरी कर चुका है, सो वह तो खिरेगा ही। इस विवक्षा से सिद्ध होता है कि यदि हम कर्म के उदय में समता-भाव रखें, तो वर्तमान में होने वाली आकुलता और नवीन-कर्मबंध- दोनों से बच जायेगें, और सच्चे-सुख का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

(दोहा)

थिति-पूरन करि जो करम, खिरै बंधपद-हानि।
हंस-अंस उज्ज्वल करै, मोक्षतत्त्व सो भानि।। 34।।

शब्दार्थ :- थिति-पूरन करि जो करम= स्थितिबंध पूरा करके जो कर्म, खिरै बंधपद-हानि= बंधदशा को नष्ट करके खिरता हैं, हंस-अंस उज्ज्वल करै= आत्मा की पर्याय को निर्मल करता है, मोक्षतत्त्व सो भानि= उसे मोक्षतत्त्व जानो। विशेषार्थ :- मोक्षतत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जो कर्म अपनी स्थिति पूर्ण करके खिरने से पहले बंधदशा को भी नष्ट कर लेता है, और हंस यानि आत्मा के गुणों को निर्मल करता है, उसे मोक्षतत्त्व जानो। ‘मोक्ष’ अर्थात् संपूर्ण-कर्मों का आत्मप्रदेशों से अलग हो जाना। जो कर्म-क्षय होने से पहले बंधदशा को भी नष्ट करता है अर्थात् जिन कर्मों का उदय आकर निर्जरा तो हो जाये, किन्तु पुनः बंध न हो, वही मोक्ष-अवस्था है।

(दोहा)

भाव पदारथ समय धन, तत्त्व वित्त वसु दर्व।
द्रविन अरथ इत्यादि बहु, वस्तु नाम ये सर्व।। 35।।

शब्दार्थ :- भाव पदारथ समय धन= भाव, पदार्थ, समय, धन, तत्त्व वित्त वसु दर्व= तत्त्व, वित्त, वसु, दर्व, द्रविन अरथ आदि बहुत से= द्रविन अर्थ आदि बहुत से, वस्तु नाम ये सर्व= ये सभी वस्तु के नाम हैं। विशेषार्थ :- ‘वस्तु’ के पर्यायवाची-शब्दों का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि भाव, पदार्थ, समय, धन, तत्त्व, वित्त, वसु, दरव, द्रविन, अर्थ- ये सब ‘वस्तु’ के पर्यायवाची नाम हैं।

(सवैया इकतीसा)

परम-पुरुष परमेसुर परम-ज्योति, परब्रह्म पूरन परम-परधान है।
अनादि-अनंत अविगत अविनाशी अज, निरदुंद सुकत मुकुंद अमलान है।।
निराबाध निगम निरंजन निरविकार, निराकार संसार-सिरोमनि सुजान है।
सरब-दरसी सरवज्ञ सिद्ध स्वामी सिव, धनी नाथ ईस जगदीस भगवान् है।। 36।।

शब्दार्थ :- परम-पुरुष परमेसुर परम-ज्योति= प्रधान-पुरुष, परमेश्वर, परम-ज्योति, परब्रह्म पूरन परम परधान= परब्रह्म, पूर्ण, परम (श्रेष्ठ), प्रधान, अनादि-अनंत अविगत अविनाशी अज= अनादि-अनंत, अमर, विनाश-रहित, अजन्मा, निरदुंद सुकत मुकुंद अमलान है= निर्द्वन्द (द्वन्द-रहित), सुकृत अर्थात् पवित्रकार्यरूप, कमल के समान निर्मल हैं, निराबाध निगम निरंजन निरविकार= बाधा से रहित, ज्ञानस्रोत, कालिमा/ दोषरहित, विकार से रहित, निराकार संसार-सिरोमनि सुजान है= आकार-रहित, संसार के शिरोमणि, सुज्ञानी हैं, सरब-दरसी सर्वज्ञ सिद्ध स्वामी सिव= सर्वदर्शी, सर्वज्ञ, सिद्ध, नाथ, शिव, धनी नाथ ईस जगदीस भगवान् है= (सर्वगुण) सम्पन्न, जिसकी आदि या शुरूआत न हो, ईश्वर, जगत् के ईश, भगवान् हैं। विशेषार्थ :- शुद्ध-जीव के नामों का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि शुद्ध-जीव ‘प्रधानपुरुष’ अर्थात् परमपुरुष, ‘परमेश्वर’, ‘परमज्योति’, ‘परमब्रह्म’, ‘पूर्ण’, ‘परमप्रधान’, आदि से रहित ‘अनादि’, अंत से रहित ‘अनंत’, ‘अविगत’ अर्थात् अमर, कभी विनष्ट नहीं होने से ‘अविनाशी’, ‘अज’ अर्थात् अजन्मा, समस्त-द्वन्द से रहित ‘निर्द्वन्द’, पवित्र कार्यरूप अर्थात् ‘सुकृत’ और ‘मुकुंद-अम्लान’ अर्थात् कमल के समान निर्मल है। शुद्ध-जीव के बाधारहित अर्थात् ‘निराबाध’, ज्ञान के स्रोत ‘निगम’, कालिमा-रहित ‘निरंजन’, विकारों से रहित’ निर्विकार’, देह के आकार से रहित ‘निराकार’, संसार के शिरोमणि अर्थात् ‘सिरताज’, ‘सुज्ञानी’ अर्थात् सुजान, सर्वलोक को देखनेवाले ‘सर्वदर्शी’, समस्त लोक को जाननेवाले ‘सर्वज्ञ’, अनंतगुणों की सिद्धि करनेवाले ‘सिद्ध’, स्वयं के अधिपति अर्थात् ‘स्वामी’, मुक्त आत्मा अर्थात् ‘शिव’, सर्वगुण-संपन्न अर्थात् ‘धनी’, आदि-अंत से रहित त्रिकाल एकसमान अर्थात् ‘नाथ’, जगत् के स्वामी अर्थात् ‘जगदीश’, तथा ’ ऐश्वर्य’, ‘वीर्य’, ‘स्मृति’,’ यश’, ‘ज्ञान’ और ‘सौम्यता’ आदि गुणों के धारी अर्थात् ‘भगवान्’ इत्यादि नाम हैं।

(सवैया इकतीसा)

चिदानन्द चेतन अलख जीव समैसार, बुद्धरूप अबुद्ध असुद्ध-उपजोगी है।
चिद्रूप स्वयंभू चिनमूरति धरमवंत, प्रानवंत प्रानी जंतु भूत भवभोगी है।।
गुनधारी कलाधारी भेषधारी विद्याधारी, अंगधारी संगधारी जोगधारी जोगी है।
चिन्मय अखंड हंस अक्षर आतमराम, करम कौ करतार परम-विजोगी है।। 37।।

शब्दार्थ :- चिदानन्द चेतन अलख जीव समैसार= चिदानन्दरूपी, चेतन, इंद्रियों से अगोचर, जीव, समयसार, बुद्धरूप अबुद्ध असुद्ध-उपजोगी है= ज्ञानी, अज्ञानी, अशुद्ध-उपयोग-स्वरूपी है, चिद्रूप स्वयंभू चिनमूरति धरमवंत= चिद्रूप, स्वयंभ,ू चैतन्य की मूर्ति, धर्मात्मा, प्रानवंत प्रानी जंतु भूत भवभोगी है= दस प्राण-सहित प्राणी, जंत,ु भूत, संसार का भोग करनेवाला है, गुनधारी कलाधारी भेषधारी विद्याधारी= गुणों को धारण करनेवाला, कलाओं में निपुण, नानारूप रखनेवाला, विद्याओं में निपुण, अंगधारी संगधारी जोगधारी जोगी है= अंगोपांग सहित, संयोगीभाव सहित, योग को धारण करनेवाला, योगी, चिन्मय अखंड हंस अक्षर आतमराम= चैतन्यमय, खंडरहित, आत्मा, अविनाशी, आत्माराम, करम कौ करतार परम विजोगी= कर्म को करनेवाला, श्रेष्ठ-त्यागी। विशेषार्थ :- जीवद्रव्य के नामों का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जीवद्रव्य के ‘चिदानन्द’ अर्थात् चैतन्य के आनंद का रसास्वादन करनेवाला, ‘चेतन’ अर्थात् जड़ता से रहित ‘अलख’ अर्थात् इन्द्रियों से अगोचर, ‘जीव’ अर्थात् सुख-दुःख का वेदन करनेवाला, ‘समयसार’ अर्थात् शुद्धात्मा, बुद्धरूप अर्थात् ज्ञानी, अबुद्धरूप अर्थात् अज्ञानी, अशुद्ध-उपयोग-स्वरूपी अर्थात् मोह-राग-द्वेषरूपी विकार-सहित है, जो चिद्रूप अर्थात् चैतन्य-स्वरूप, स्वयंभू, चैतन्य की मूर्ति, धर्म को धारण करनेवाला धर्मात्मा, दसप्राणों से सहित प्राणवंत, प्राणी, जंतु, भूत, भवभोगी अर्थात् संसार या कर्मफल का भोग करनेवाला है। वह जीव अनंतगुणों को धारण करनेवाला, कलाओं में निपुण, विभिन्न-रूपों को धारण करनेवाला, विद्याओं का पारगामी, अंगोपांग से सहित, संयोगी-भावों से सहित, मन, वचन, काय तीनों योगों को धारण करनेवाला, योगी यानि तपस्वी है। जो चैतन्यरूप, खंडरहित अखंड, आत्मा, अविनाशी, कर्म का बंध करनेवाला और परम-वियोगी अर्थात् श्रेष्ठ त्यागी है।

(दोहा)

खं विहाय अंबर गगन, अंतरिक्ष जगधाम।
व्योम वियत नभ मेघपथ ये आकाश के नाम।। 38।।

शब्दार्थ :- खं= आकाश, विहाय= वह स्थान जहाँ पक्षी उड़ते हैं, अंबर= अम्बर, गगन= गगन, अंतरिक्ष= जहाँ तारामंडल विद्यमान हो, जगधाम= लोक जिसमें रहता हो, व्योम= व्योम, वियत= आकाश, नभ= नभ, मेघपथ= मेघों के गमन का मार्ग। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आकाश-द्रव्य के विविध-नामों का उल्लेख किया है। खं, विहाय, अंबर, गगन, अंतरिक्ष, जगधाम, व्योम, वियत, नभ, मेघपथ- ये सभी ‘आकाश-द्रव्य’ के विविध नामान्तर हैं।

(दोहा)

जम कृतांत अंतक त्रिदस, आवर्ती मृतथान।
प्रानहरन आदित-तनय, काल नाम परवान।। 39।।

शब्दार्थ :- जम= यमराज, कृतांत= जो जीवन का अंत करता हो, अंतक= आयुकर्म का अंत करानेवाला, त्रिदश= भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों दशाओं रूप, आवर्ती= जन्म-मरणरूप परिभ्रमण करानेवाला, मृतथान= मरण का स्थान, प्रानहरन= प्राण-हरण करनेवाला, आदिततनय= आदित्य/सूर्य का पुत्र। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘काल-द्रव्य’ के विविध-नामों का उल्लेख किया हैं। जम, कृतांत, अंतक, त्रिदस, आवर्ती, मृतथान, प्रानहरन, आदित-तनय - ये सभी ‘काल-द्रव्य’ के विविध नामान्तर हैं। इनमें मात्र जैन-परम्परागत प्रयोग ही किये गये हों- ऐसा नहीं है, बल्कि लोक में प्रचलित-नामों व मान्यताओं का भी समावेश इनमें है- यह बात ध्यान रखना अनिवार्य है।

(दोहा)

पुन्य सुकृत ऊरधवदन, अकररोग शुभकर्म।
सुखदायक संसारफल, भाग बहिर्मुख धर्म।। 40।।

शब्दार्थ :- पुण्य= पुण्य, सुकृत= अच्छा कार्य, ऊरधवदन= ऊपर मुँह रखनेवाला, अकररोग= मानकषाय के परिणामस्वरूप होनेवाली अकड़ने रूप रोग, शुभकर्म= अच्छे कार्य, सुखदायक= सुख देने वाला, संसारफल= जिसके होने पर संसार को सफल माना जाता है, भाग= भाग्य, बहिर्मुख= जो जीव को बहिर्मुखी बनानेवाला है, धर्म= जिसे व्यवहार-धर्म कहा जाता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘पुण्य’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। पुण्य, सुकृत, ऊरधवदन, अकररोग, शुभकर्म, सुखदायक संसारफल, भाग, बहिर्मुख, धर्म - ये सब ‘पुण्य’ के विविध नामान्तर हैं।

(दोहा)

पाप अधोमुख एन-अघ, कंपरोग दुःखधाम।
कलिल-कलुस किल्विष दुरित, असुभ-करम के नाम।। 41।।

शब्दार्थ :- पाप= पाप, अधोमुख= नीचे की ओर मुख अर्थात् नरकादि नीचगतियों में ले जानेवाला, एन-अघ= घोर पाप, कंपरोग= जिसके उदय से भयभीत होकर जीव काँपता है ऐसा कंपन-रोग, दुःख-धाम= दुःखों का घर, कलिल-कलुस= कलिकाल का मैल, किल्विष= शत्रु, दुरित= दुर्भाव। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘पाप’ के विविध-नामों का उल्लेख किया है। पाप, अधोमुख, एन- अघ, कंपरोग, दुःखधाम, कलिल-कलुस, किल्विष, दुरित- ये सब ‘अशुभकर्म’ या ‘पाप’ के विविध नामांतर हैं।

(दोहा)

सिद्धक्षेत्र त्रिभुवनमुकुट, शिवपथ अविचलथान।
मोख मुकति वैकुंठ सिव, पंचमगति निरवान।। 42।।

शब्दार्थ :- सिद्धक्षेत्र= मुक्त-जीव जहाँ रहते हैं, त्रिभुवनमुकुट= जो तीनों लोकों का मुकुट है, शिवपथ= जो मुक्ति का मार्ग है, अविचलथान= ऐसा स्थान जहाँ जाने के बाद अनंतकाल तक स्थिर रहते हैं, पुनः संसार में जन्म-मरण नहीं होगा, मोख= मोक्षस्वरूप, मुकति= मुक्ति, वैकुंठ= वयः यानि आयुकर्म जहाँ कुंठित हो जाये अर्थात् जन्म-मरण से रहित अवस्था- अन्य दर्शन जिसे ‘वैंकुंठ’ कहते हैं, सिव= शिव/मोक्ष, पंचमगति= चारों गतियों से पूर्णतः भिन्न, इसीलिये मोक्ष को पंचमगति भी कहते हैं, निरवान= निर्वाण अर्थात् जन्म-मरण आदि दोषों से रहित अवस्था। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने मोक्ष के विविध नामों का उल्लेख किया है। सिद्धक्षेत्र, त्रिभुवनमुकुट, शिवपथ, अविचलथान, मोख, मुकति, वैकुंठ, सिव, पंचमगति, निरवान- इत्यादि ‘मोक्ष’ के विविध नामांतर हैं।

(दोहा)

प्रज्ञा धिसना सेमुसी, धी मेधा मति बुद्धि।
सुरति मनीषा चेतना, आशय अंस विशुद्धि।। 43।।

शब्दार्थ :- प्रज्ञा= तीक्ष्ण धार, धिसना= वाक्-शक्ति, सेमुसी= बुद्धि/समझ , धी= ज्ञान, मेधा= प्रतिभा, मति= बुद्धि, सुरति= सद्बुद्धि, मनीषा= अक्ल, चेतना= ज्ञान, आशय= संस्कार, अंस= विवेक , विसुद्धि= विशेष ज्ञान विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘बुद्धि’ के विविध-नामों का उल्लेख किया है। प्रज्ञा, धिसना, सेमुसी, धी, मेधा, मति, बुद्धि, सुरति, मनीषा, चेतना, आशय, अंस, विशुद्धि- इत्यादि ‘बुद्धि’ के विविध-नामान्तर है।

(दोहा)

निपुन विचच्छन विबुध बुध, विद्याधर विद्वान्।
पटु प्रवीन पंडित चतुर, सुधी सुजन मतिमान।। 44।।

कलावंत कोविद कुसल, सुमन दच्छ धीमंत।
ज्ञाता सज्जन ब्रह्मविद, तज्ञ गुनीजन संत।। 45।।

शब्दार्थ :- निपुण= चतुर, विचच्छन= विलक्षण, विबुध-बुध= विविध-शास्त्रों का ज्ञाता, विद्याधर= विद्याओं के धारी, विद्वान्= विशेष-ज्ञानी, पटु= चतुर, प्रवीन= बुद्धिमान्, पंड़ित= पंड़ित, चतुर= चतुर, सुधी= सुधारक, सुजन= सुजान, मतिमान= बुद्धिमान् कलावंत= कलाओं के धनी, कोविद= पंडित या वेदज्ञ, कुसल= चतुर, सुमन= विवेकी या विचारवान, दच्छ= निपुण, धीमंत= विद्वान्, ज्ञाता= जानकार, सज्जन= सज्जन, ब्रह्मविद्= ब्रह्म विद्या के जानकार, तज्ञ= विशेष ज्ञानी, गुनीजन= गुणवान्, संत= निस्पृही। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘विचक्षण-पुरुष’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। निपुन, विचच्छन, विबुध-बुध, विद्याधर, विद्वान्, पटु प्रवीन, पंडित, चतुर, सुधी, सुजन, मतिमान, कलावंत, कोविद, कुसल, सुमन, दच्छ, धीमंत, ज्ञाता, सज्जन, ब्रह्मविद, तज्ञ, गुनीजन, संत- इत्यादि ‘विचक्षणपुरुष’ के विविध नामान्तर हैं।

(दोहा)

मुनि महंत तापस तपी, भिच्छुक चारितधाम।
जती तपोधन संयमी व्रती, साधु ऋषि नाम।। 46।।

शब्दार्थ :- मुनि, महंत= महिमायुक्त, तापस=तपस्वी, तपी= तप करनेवाले, भिच्छुक= भिच्छा लेनेवाले, चारितधाम= चारित्र को धारण करनेवाले, जती= यती, तपोधन= तपस्वी, संयमी= इन्द्रियों को वश में करनेवाले, व्रती= व्रतादिक धारण करनेवाले,साधु ऋषि= साधु और ऋषि। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘मुनि’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। मुनि, महंत, तापस, तपी, भिच्छुक, चारितधाम, जती, तपोधन, संयमी व्रती, साधु, ऋषि- इत्यादि ‘मुनिराज’ के विविध-नामान्तर है।

(दोहा)

दरस विलोकनि देखनौ, अवलोकनि दृगचाल।
लखन दृष्टि निरखनि जुवनि, चितवनि चाहनि भाल।। 47।।

शब्दार्थ :- दरस= दर्शन, विलोकनि= विशेषरूप से देखना, देखनौ= देखना, अवलोकनि, अवलोकन करना, दृगचाल= नेत्रों को घुमाकर देखना, लखन= लखना/देखना, दृष्टि= देखना, निरखनि= निरखना/ निहारना, जुवनि= जोवना, चितवन= चितैना/देखना, चाहनि= देखने की इच्छा, भाल= देखना-भालना। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘दर्शन’ के विविध-नामों का उल्लेख किया है। दरस, विलोकनि, देखनौ, अवलोकनि, दृगचाल, लखन, दृष्टि, निरखनि, जुवनि, चितवनि, चाहनि, भाल- इत्यादि ‘दर्शन’ के विविध-नामांतर हैं।

(दोहा)

ज्ञान बोध अवगम मनन, जगतभान जगजान।
संजम चारित आचरन, चरन वृत्ति थिरवान।। 48।।

शब्दार्थ :- ग्यान= ज्ञान, बोध= ज्ञान, अवगम= विशेष ज्ञान, मनन= चिंतन, जगतभान= जगत् को प्रकाशित करना, जगजान= जगत् को जानना। संजम= संयम/इन्द्रियों और मन को वश में करना, चारित= चारित्र, आचरन= आचरण, चरन= चरण अर्थात् चरणानुयोग के अनुरूप आचरण करना, वृत्ति= चर्या, थिरवान= स्थिरता धारण करना। विशेषार्थ :-इस छंद में कवि ने’ ज्ञान’ और’ चारित्र’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। ज्ञान, बोध, अवगम, मनन, जगतभान, जगजान- ये ‘ज्ञान’ के विविध नाम हैं, और संजम, चारित, आचरन, चरन, वृत्ति, थिरवान- ये ‘चारित्र’ के विविध नाम हैं।

(दोहा)

सम्यक् सत्य अमोघ सत्, निसंदेह निरधार।
ठीक जथारथ उचित तथ, मिथ्या आदि अकार।। 49।।

शब्दार्थ :- सम्यक्= यथार्थ, सत्य, अमोघ= अकाट्य, सत्= सत्य, निसंदहे = संदहे -रहित, निरधार= निर्णयात्मक, न कि ढुलमुल-रूप, ठीक= सही, जथारथ= यथार्थ, उचित=ठीक, तथ= तथ्यात्मक। विशेषार्थ :-इस छंद में कवि ने सत्य के विविध नामों का उल्लेख किया है। सम्यक्, सत्य, अमोघ, सत्, निसंदेह, निरधार, ठीक, जथारथ, उचित, तथ- ये ‘सत्य’ के विविध नाम हैं। इनमें शुरू में ‘अकार’ अर्थात् ‘अ’ जोड़ने से ‘मिथ्या’ अर्थात् ‘झूठ’ के नाम बनते हैं।

(दोहा)

अजयारथ मिथ्या मृषा, वृथा असत्त अलीक।
मुधा मोघ निःफल वितथ’ अनुचित असत अठीक।। 50।।

शब्दार्थ :- अजयारथ= अयथार्थ, मिथ्या= झूठ, मृषा= झूठ, वृथा= व्यर्थ की बकवास, असत्त= असत्य, अलीक= झूठ, मुधा= मिथ्या, मोघ= जो अकाट्य न हो, निःफल= निष्फल, वितथ= अयथार्थ, अनुचित= उचित नहीं, असत्= सत्य के विपरीत, अठीक= ठीक नहीं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘झूठ’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। अजयारथ, मिथ्या, मृषा, वृथा, असत्त, अलीक, मुधा, मोघ, निःफल, वितथ, अनुचित, असत, अठीक- ये ‘झूठ’ के विविधनामान्तर हैं।

(सवैया इकतीसा)

जीव निरजीव करता-करम पुन्न-पाप, आस्रव संवर निरजरा बंध मोष है।
सरव-विसुद्धि स्यादवाद साध्य-साधक, दुवादश दुवार धरै समैसार कोष है।।
दरवानुयोग दरवानुजोग दूरि करै, निगमकौ नाटक परमरस-पोष है।
सो परमागम बनारसी बखानै जामै, ग्यानकौ निदान सुद्ध चारित की चोष है।। 51।।

शब्दार्थ :- जीव निरजीव करता-करम पुन्न-पाप= जीव, अजीव, कर्ता-कर्म, पुण्य-पाप, अास्रव संवर निरजरा बंध मोष है= आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्ष, सरव-विसुद्धि स्यादवाद साध्य-साधक= सर्वविशुद्धि, स्याद्वाद, साध्य-साधक, दुवादश दुवार धरै समैसार कोष हैं= समयसार कोश में बारह (12) द्वार/ अधिकार हैं, दरवानुयोग दरवानुजोग दूरि करै= द्रव्यानुयोग, द्रव्यों के अनुयोग यानि संबंध से दूर करके, निगम कौ नाटक परमरस-पोष है= आत्मा का नाटक परमशांति का पोषक है, सो परमागम बनारसी बखानै= उस श्रेष्ठ-आगम का बनारसीदास बखान करते हैं या कहते हैं, जामै ग्यानकौ निदान सुद्ध-चारित की चोष है= इसमें ज्ञान का कारण शुद्ध-चारित्र की प्राप्ति होती है। विशेषार्थ :- ‘समयसार जी’ की ‘आत्मख्याति-टीका’ के बारह-अधिकारों का उल्लेख करते हुये कविवर कहते हैं कि समयसार जी ग्रंथ के खजाने में ‘जीव-अधिकार’, ‘अजीव-अधिकार’, ‘कर्ता-कर्म अधिकार’, ‘पुण्य-पाप अधिकार’, ‘आस्रव-अधिकार’, संवर-अधिकार, ‘निर्जरा-अधिकार’, ‘बंध-अधिकार’, ‘मोक्षअधिकार’, ‘सर्वविशुद्धि-अधिकार’,‘स्यादवाद-अधिकार’, ‘साध्य-साधक अधिकार’- ये बारह-द्वार है, इन दरवाजों से गुजरने पर अर्थात् आत्मसात् करने पर मोक्षरूपी महल का दरवाजा खुलता है। ‘समयसार जी’ की महिमा का गुणगान करते हुये कविवर कहते हैं कि यह ‘समयसार जी’ ग्रंथ ‘द्रव्यानुयोग’ का सर्वश्रेष्ठ-ग्रंथ है। और आत्मा को द्रव्यों के अनुयोग से अर्थात् पर-द्रव्यों के संयोग से भिन्न करके स्वानुभूति अर्थात् मोक्ष के मार्ग पर चलने की कला सिखाता है। यह आत्मा का नाटक अर्थात् समय का सार परमशांत-रस का पोषक है, अर्थात् ‘समयसार जी’ को पढ़कर आत्मचिंतन-मनन करने से अद्भुत-शांति की प्राप्ति होती है। इसके चिंतन-मनन से सम्यग्ज्ञान का उदय और सम्यक्चारित्र की प्राप्ति होती है, इसीलिये ‘पंडित बनारसीदास जी’ कहते हैं कि ‘‘मैं इसका पद्य-शैली में बखान अर्थात् वर्णन करता हूँ।’’

जीव द्वार (१)

(प्रथम अधिकार)

(दोहा)

शोभित निज-अनुभूति-जुत, चिदानन्द भगवान्।
सार-पदारथ आत्मा, सकल-पदारथ जान।। 1।।

शब्दार्थ :- शोभित निज-अनुभूति जुत= निज-आत्मानुभूति सहित सुशोभित हैं, चिदानन्द भगवान्= चैतन्य-स्वरूप भगवान्, सार-पदारथ आत्मा सकल-पदारथ जान= समस्त पदार्थों में सार या प्रयोजनभूतपदार्थ भगवान् आत्मा जानो। विशेषार्थ :- ‘चिदानन्द भगवान्’ की स्तुति करते हुये कविवर कहते हैं कि निज/आत्मा की अनुभूतिरूपी आनंद से सुशोभित, समस्त पदार्थों में सारभूत, और समस्त पदार्थों को जाननेवाला है,- एेसा चिदानन्द भगवान् आत्मा है।

(सवैया तेईसा)

जो अपनी दुति आप विराजत, है परधान-पदारथ नामी।
चेतन-अंक सदा निकलंक, महा-सुखसागर कौ विसरामी।।
जीव-अजीव जिते जग में, तिनकौ गुन-ज्ञायक अंतरजामी।
सो सिवरूप बसै सिव-थानक, ताहि विलोकि नमैं सिवगामी।। 2।।

शब्दार्थ :- जो अपनी द्युति आप विराजत= जो अपनी द्युति/ ज्योति से स्वयं प्रकाशित है, है परधान-पदारथ नामी= प्रधान/सर्वश्रेष्ठ प्रसिद्ध-पदार्थ है, चेतन-अंक सदा निकलंक= चेतन आत्मा हमेशा कलंकरहित अर्थात् निर्विकार, महा-सुखसागर कौ विसरामी= अपार-सुखरूपी समुद्र में विश्राम करता हैं, जीव-अजीव जिते जग में= जीव-अजीव जगत् में जितने हैं, तिनकौ गुन-ज्ञायक अंतरजामी= उन सभी के गुणों को जाननेवाले अंतर्यामी, सो सिवरूप बसै सिवथानक= वह मोक्षस्वरूप मोक्षस्थली अर्थात् सिद्धालय में रहते हैं, ताहि विलोकि नमैं सिवगामी= उनको देखकर (ये) मोक्षगामी-जीव नमन करता है। विशेषार्थ :- ‘सिद्ध भगवान्’ की स्तुति करते हुये कविवर कहते हैं कि जो अपने अनंत-गुणों की ज्योति से स्वयं प्रकाशित हैं, जगत् के समस्त-पदार्थों में प्रधान और प्रसिद्ध है, जो समस्त-विकारों से रहित मात्र चैतन्य-चमत्कार-स्वरूप हैं, और निरन्तर अपने अनंत-सुखरूपी महासागर में केलि करते हैं अर्थात् अतीन्द्रिय-आनंद का रसास्वादन करते हैं। जगत् में जितने भी चेतन-अचेतन पदार्थ हैं, उन सभी को उनके गुण और पर्यायों सहित जानते हैं, अर्थात् भगवान् के ज्ञान में जगत् के समस्त चराचर-पदार्थ झलकते हैं, इसीलिये उनका ‘अंतर्यामी’ नाम सार्थक है। वे सिद्ध-भगवान् स्वयं भी मोक्षस्वरूप हैं, और मोक्षस्थली अर्थात् सिद्धालय में विराजमान हैं। कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि ऐसे सिद्ध भगवान् को शिवगामी अर्थात् मुक्ति के मार्ग पर

चलनेवाला (बनारसीदास) बारम्बार नमन करता है।
नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते। चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावान्तरच्छिदे ।। 1।।

(सवैया तेईसा)

जोग धरैं रहैं जोगसौं भिन्न, अनंत-गुनातम केवलज्ञानी।
तासु ह्रदै-द्रहसौं निकसी, सरिता-सम ह्वै श्रुत-सिन्धु समानी।।
यातैं अनंत-नयातम-लच्छन, सत्य-स्वरूप सिधंत बखानी।
बुद्ध लखै न लखै दुरबुद्ध, सदा जगमाँहि जगै जिनवानी।। 3।।

शब्दार्थ :- जोग धरैं रहैं जोग सौं भिन्न= योगसहित होने पर भी योग से भिन्न रहते हैं, अनंत-गुनातम केवलज्ञानी= अनंत-गुणों के धारी केवली भगवान्, तासु ह्रदै-द्रहसौं निकसी= उनके हृदयरूपी सरोवर से निकली, सरिता-सम ह्वै श्रुत-सिन्धु समानी= नदी के समान होकर शास्त्ररूपी समुद्र में समा गई, यातैं अनंतनयातम-लच्छन= इसीलिए अनंत-नयात्मक लक्षण, सत्य-स्वरूप-सिधंत बखानी= सत्य-स्वरूप शास्त्रों में कहा है, बुद्ध लखै न लखै दुरबुद्ध= ज्ञानी-जीव लखते/समझते हैं, दुर्बुद्धि अर्थात् अज्ञानी जीव नहीं लखते/समझते हैं, सदा जगमाँहि जगै जिनवानी= जिनेन्द्रदेव की वाणी हमेशा जगत् में जागृत/प्रसारित रहे। विशेषार्थ :- जिनवाणी माँ की स्तुति और महिमा का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि अनंत-गुणों के धारी केवलज्ञानी तीर्थंकर-परमात्मा मन-वचन और काय- तीनों योगों से सहित होने पर भी, योगों से रहित प्रवर्तन करते हैं। उनके हृदयरूपी सरोवर से दिव्यध्वनि प्रस्फुटित हुई, जिसप्रकार नदी बहती हुई आखिर में समुद्र में जाकर मिल जाती है, ठीक उसीप्रकार तीर्थंकर-परमात्मा की दिव्यध्वनि द्वादशांगवाणीरूपी समुद्र में समा गई अर्थात् प्रवेश कर गई। तीर्थंकर-परमात्मा की वाणी होने से यह अनंत-नयात्मक है, और वस्तु के सत्य-स्वरूप का दिग्दर्शन करानेवाली है- ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। इसका रसास्वादन मात्र ज्ञानी-जीव ही करते हैं, मूढ़मति दुर्बुद्धि अज्ञानी-जीव जो नयज्ञान से शून्य हैं, वे इसके मर्म को नहीं समझते। कविवर भावना भाते हैं कि ऐसी जिनवाणी माँ तीनों लोकों में सदा जयवंत रहे।

(छप्पय-छंद)

हौं निश्चय तिहुँकाल सुद्ध-चेतनमय-मूरति, पर-परनति-संजोग भई जड़ता विस्फूरित। मोह-कर्म पर-हेतु पाइ चेतन पर-रच्चइ,

ज्यौं धतूर-रसपान करत नर बहुविध नच्चइ।।
अब समयसार वरनन करत, परम-सुद्धता होहु मुझ।
अनयास बनारसिदास कहि, मिटहु सहज भ्रमकी अरुझ।। 4।।

शब्दार्थ :- हौं तिहुँकाल सुद्ध-चेतनमय-मूरति= मैं त्रिकाल-शुद्ध ज्ञान-दर्शन चेतना-स्वरूप हूँ, पर-परनति संजोग भई जड़ता विस्फूरित= पर-परिणति के संयोग से जड़ता विस्फुरित/प्रगट हुई, मोह-कर्म पर-हेतु पाइ चेतन पर-रच्चइ= मोहनीय-कर्मरूपी परपदार्थ का निमित्त पाकर चेतन ‘पर’ से राग करता है, ज्यों धतूर-रसपान करत नर बहुविधि नच्चइ= जिसप्रकार धतूरे का रस पीकर व्यक्ति विविध-प्रकार से नाचता है, अब समयसारवरनन करत= अब ‘समयसार’ का वर्णन करने से, परम-सुद्धता होहु मुझ= मुझे परम-शुद्धता होवे, अनयास अनन्तधर्मणस्तत्त्वं पश्यन्ती प्रत्यगात्मनः। अनेकान्तमयी मूर्तिर्नित्यमेव प्रकाशताम् ।। 2।।

परपरिणति-हेतोर्मोहनाम्नोऽनुभावा-दविरतमनुभाव्य-व्याप्ति-कल्माषितायाः।
मम परविशुद्धिः शुद्धचिन्मात्रमूर्ते-र्भवतु समयसार-व्याख्यैवानुभूतेः।। 3।।

बनारसिदास कहि= बनारसीदास कहते हैं कि बिना किसी विशेष-प्रयास के, सहज मिटहु भ्रम की अरुझ= अब सहज ही भ्रम की उलझन मिट गई है। विशेषार्थ :- सामान्य-जीव के स्वरूप और परिणति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि निश्चय से तो मैं (जीव) त्रिकाल-शुद्ध ज्ञान-दर्शन-स्वभावी चैतन्यमूर्ति हूँ, परन्तु पर-परिणति अर्थात् निजआत्मस्वरूप से भिन्न पर-पदार्थों में इष्ट-अनिष्टपने की कल्पना करने से मेरी परिणति जड़रूप हो गई है, अर्थात् अज्ञानतारूप परिणमन कर रही है। जैसे कोई धतूरे का रस पीकर ‘‘मैं कौन हूँ’’- यह तो भूल जाता है और विविधप्रकार अर्थात् नानाप्रकार के रूप रखकर नाचता है, ठीक उसीप्रकार यह जीव अपने स्वरूप को भूलकर मोह-कर्म के निमित्त से प्राप्त-पर्याय में तन्मय होकर अपने को मनुष्य, तिर्यंच, नारकी और देव मानकर नानाप्रकार के रूप रखकर चार गति चौरासी-लाख योनियों में नाचता रहता है अर्थात् परिभ्रमण करता हुआ दुःखी होता है। प्रतिसमय बाहर में ‘समयसार जी’ ग्रंथ का और अंतरंग में ‘समयसार-स्वरूप आत्मा’ का चिंतनमनन करने से मेरे अंदर भी परम-शुद्धता प्रकट हो गई है, अर्थात् मिथ्यात्व की कालिमा अब अपना अस्तित्व खो चुकी है। इसीलिये कविवर कहते हैं कि अनायास ही यानि विभिन्न-ग्रंथों को पढ़े बिना ही मेरी मिथ्यात्वपरक सभी उलझनें अपने आप ही सुलझ गई है, अर्थात् सभी भ्रान्तियाँ दूर हो गई हैं।

(सवैया इकतीसा)

निहचैमैं रूप-एक, विवहार में अनेक हैं, यही नै-विरोध में जगत् भरमायो है।
जग के विवाद नासिबै को जिन-आगम है, जामैं ‘स्याद्वाद’ नाम लच्छन सुहायौ है।।
दरसनमोह जाको गयौ है सहजरूप, आगम-प्रमान ताके हृदय में आयौ है।
अनैसौं अखंडित अनूतन अनंत-तेज, ऐसो पद-पूरन तुरंत तिनि पायौ है।। 5।।

शब्दार्थ :- निहचैमैं रूप-एक, विवहार में अनेक हैं= निश्चय से पदार्थ एकरूप है और व्यवहार से अनेकरूप हैं, यही नै-विरोध में जगत् भरमायो है= इसी नय-विरोध में संसार भ्रमित है, जग के विवाद नासिबै को जिन-आगम है= संसार के झगड़ा खतम करने को जिनेन्द्र-प्रणीत वचन हैं, जामें ‘स्याद्वाद’ नाम लच्छन सुहायौ है= इसमें ‘स्याद्वाद’ नाम का लक्षण/चिह्न बहुत अच्छा है, दरशनमोह जाकौ गयौ है सहजरूप= दर्शनमोहनीय जिसका क्षय हो जाने से सहजता से, आगम-प्रमान ताके हृदय में आयौ है= आगम के प्रमाण से उसके अंतरंग में प्रविष्ट हुआ है, अनैसौं अखंडित अनूतन अनंत तेज= अनय से खंडित नहीं हो सकनेवाला, नया नहीं अर्थात् अनादि-अनंत, तेजसहित, ऐसो-पद पूरन तुरंत तिनि पायौ है= ऐसा पद पूर्णरूप से शीघ्र ही उन्होंने प्राप्त किया है। विशेषार्थ :- शास्त्र की महिमा का गुणगान करते हुये कविवर कहते हैं कि निश्चय से तो पदार्थ ‘एकरूप’ ही हैं, परन्तु व्यवहार से पदार्थ ‘अनेकरूप’ कहा गया है। जैसे निश्चयनय से आत्मा पूर्णशुद्ध ज्ञान-दर्शनमयी चेतनस्वरूप है, परन्तु व्यवहारनय से आत्मा के अशुद्ध, रागी-द्वेषी आदि अनेकरूप दिखाई देते हैं। नयों के इसी चक्रजाल में सारा जगत् भ्रमित हो जाता है, अर्थात् उसे वस्तु का सत्य-स्वरूप ख्याल में नहीं आता है। कविवर कहते हैं कि जगत् के इसी विवाद को अर्थात् नयों के चक्रजाल को खत्म करने के लिये जिनागम अर्थात् जिनेन्द्र की वाणी स्याद्वाद-लक्षण से युक्त सूर्य के समान है, क्योंकि

उभयनय-विरोधध्वंसिनि स्यात्पदाङ्के, जिनवचसि रमन्ते ये स्वयं वान्तमोहाः।
सपदि समयसारं ते परं ज्योतिरुच्चै-रनवमनयपक्षाक्षुण्णमीक्षन्त एव।। 4।।

इसके प्रकाश में सारी भ्रांतियाँ दूर हो जाती है, जिससे वस्तु का यथार्थरूप नजर आने लगता है। कहने का अभिप्राय यही है कि परस्पर विरोधी अनंत-धर्मात्मक वस्तु-स्वरूप को एकमात्र ‘स्याद्वाद’ के द्वारा ही समझा व सिद्ध किया जा सकता है। जिसके आत्मस्वरूप की अनुभूतिपूर्वक दर्शनमोहनीय-कर्म विनाश को प्राप्त हो गया है, अर्थात् सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो चुकी है, आगम का रहस्य भी उसी के हृदय में प्रवेश करता है अर्थात् उसी की समझ में अाता है। कहने का अभिप्राय यही है कि आत्मानुभूति के बिना आगमज्ञान कितना भी हो, उसकी कीमत ‘शून्य’ के बराबर ही होती है। ऐसे जीव को यानि सम्यग्दृष्टि-जीव को अनादि-अनंत, अखंडित तेजवान् आत्मस्वरूप की प्राप्ति शीघ्रतिशीघ्र होती है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति सहज और अवश्य होती है।

(सवैया इकतीसा)

ज्यौं नर कोउ गिरै गिरिसौं तिहि, सोइ हितू जो गहै दिढ़बाही।
त्यौं बुध को विवहार भलौ, तबलौं जबलौं सिव-प्रापति नाहीं।।
यद्यपि यौं परवान तथापि, सधै परमारथ चेतनमाँहीं।
जीव अव्यापक है परसौं, विवहारसौं तौ पर की परछाहीं।। 6।।

शब्दार्थ :- ज्यौं नर कोउ गिरै गिरिसौं तिहि= जैसे कोई पुरुष पहाड़ से गिरे, सोइ हितू जो गहै दिढ़बाही= उसे (जो बीच में ही अपनी) भुजाओं के बल से पकड़ ले, वही हितैषी है, त्यौं बुध को विवहार भलौ है= उसीप्रकार ज्ञानी को व्यवहार अच्छा है, तबलौं जबलौं सिव-प्रापति नाहीं= तबतक, जबतक मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, यद्यपि यौं परवान तथापि= यद्यपि ये प्रमाण/सत्य है, फिर भी, सधैं परमारथ चेतनमाँहीं= चेतनस्वरूप निश्चय से ही सधता/दृढ़ होता है, जीव अव्यापक है परसौं= आत्मा पर से अव्याप्त है, विवहारसौं तौं पर की परछाँही= व्यवहार से तो पर की ही परछाईं मात्र है। विशेषार्थ :- एक बहुत ही सटीक-उदाहरण के माध्यम से ‘निश्चयनय की श्रेष्ठता’ सिद्ध करते हुये कवि कहते हैं कि जैसे कोई पुरुष पहाड़ से फिसले या गिरे, तो जमीन पर पहुच ँ ने से पहले कोई अन्य-पुरुष उसे अपनी भुजाओं का सहारा दे दे, तो वह व्यक्ति नीचे गिरने से बच जाता है, और पुनः ऊपर चढ़ने का प्रयास करता है। ठीक उसीप्रकार यदि कोई साधक अपने स्वरूप से च्युत होता है, या कहें कि उपयोग स्वरूप में स्थिर न रह पाये, तब उसके लिये व्रत-तप-स्वाध्यायरूप व्यवहार उस आश्रय के समान है, जहाँ कुछ देर रुककर पुनः स्वरूप में स्थिर होने का पुरुषार्थ करता है। इस दृष्टि से वह व्रत-तप आदि के भाव भी ज्ञानी के लिये भले हैं, अर्थात् करने योग्य हैं। और वह साधक जबतक स्वरूप में पूर्णरूप से स्थिरता यानि मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, तबतक कर सकता है, लेकिन प्रयास स्वरूप में स्थिरता का ही रहता है। -यह कहकर कवि ने एक तथ्य और स्पष्ट किया कि व्यवहार भी हमेशा निश्चय के साथ ही होता है। अकेला व्यवहार तो शुभभाव है, जिससे कर्म बंधते हैं, कर्मों की निर्जरा नहीं होती। कहने का अभिप्राय यही है कि जो स्वरूप की साधना से च्युत हुये हैं,उनके ही व्रत-तपादिक व्यवहाररूप धर्म होता है, और कार्यकारी भी है, लेकिन जो अभी स्वरूप के नजदीक भी नहीं पहुँचे, उनके लिये तो ये व्रतादिक के भाव

मात्र शुभभाव हैं, व्यवहार-धर्म भी नहीं।
व्यवहरणनयः स्याद्् यद्यपि प्राक्पदव्या-मिह निहितपदानां हन्त हस्तावलम्बः।
तदपि परममर्थं चिच्चमत्कारमात्रं, पर-विरहितमन्तः पश्यतां नैष किञ्चित्।। 5।।

यद्यपि ज्ञानी के जीवन में व्यवहार होता है, फिर भी कविवर कहते हैं कि ये कथन भी परम-सत्य है कि निश्चयनय ही जीव के स्वरूप का यथार्थ-प्रतिपादन करता है, व्यवहारनय नहीं। जीव तो पर में अव्यापक अर्थात् पूर्ण-भिन्न है। व्यवहार पर की परछाँई ही हैं अर्थात् व्यवहारनय जीव को पराधीन ही कहता है। वास्तव में देखा जाये, तो निश्चय ही वस्तु के यथार्थ-स्वरूप का प्रतिपादक है, यद्यपि सम्यग्दृष्टि/ ज्ञानी जीव को मोक्ष प्राप्त करने तक व्यवहार का अवलंबन रहता है, लेकिन फिर भी ज्ञानी-जीव को यह श्रद्धान हमेशा रहता है कि व्यवहार कर्मबंध का कारण होने से मोक्षमार्ग में प्रयोजनभूत नहीं है, इसलिये उसकी व्यवहार में प्रवृत्ति हमेशा उदासीन ही रहती है।

(सवैया इकतीसा)

शुद्धनय निहचै अकेलौ आपु चिदानन्द, अपनैं ही गुन-परजाय को गहतु है।
पूरन-विग्यानघन सो है विवहार-माँही, नव-तत्त्वरूपी पंच-दर्व में रहतु है।।
पंच-दर्व नव-तत्त्व न्यारे जीव न्यारौ लखै, सम्यकदरस यहै और न गहतु है।
सम्यकदरस जोई आतम-सरूप सोई, मेरे घट प्रगटो बनारसी कहतु है।। 7।।

शब्दार्थ :- शुद्धनय निहचै अकेलौ आपु चिदानन्द= शुद्ध-निश्चयनय से अकेला आत्मा चैतन्य-स्वरूप आनंद का पिण्ड है, अपनैं ही गुन परजाय को गहतु है= अपने ही गुण-पर्यायों को ग्रहण करता है, पूरन-विग्यानघन सो है विवहार-माँही= वह ज्ञान का घनपिण्ड होते हुये भी व्यवहार-नय से, नव-तत्त्वरूपी पंच-दर्व में रहतु है= नवतत्त्वों और पाँच द्रव्यों में रहता है, पंच-दर्व नव-तत्त्व न्यारे जीव न्यारौ लखै= जो पाँच द्रव्यों, नौ तत्त्वों से निजात्मा को भिन्न दख े ता है, सम्यकदरस यहै और न गहतु है= यही सम्यग्दर्शन है, वह सम्यग्दर्शन आत्मा के अलावा और कुछ ग्रहण नहीं करता है, सम्यकदरस जोई आतम-सरूप सोई= जो सम्यग्दर्शन है, वही आतम-स्वरूप है, मेरे घट प्रगटो बनारसी कहतु है= बनारसीदास जी कहते हैं कि वही मेरे अंतरंग में प्रगट हुआ है। विशेषार्थ :- सम्यग्दर्शन का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि शुद्ध निश्चय-नय से आत्मा चैतन्य-स्वरूप अनंत-आनंद का घनपिण्ड है, और स्वयं ही अर्थात् बिना किसी की अपेक्षा से अपने ही गुण और पर्यायों में परिणमन करता है। परन्तु व्यवहार-नय से परिपूर्ण ज्ञानस्वरूप नव-तत्त्वों और पाँचद्रव्यों के बीच रहते हुये भी इन सबसे न्यारा है। क्योंकि एक जीव-द्रव्य को छोड़कर अन्य पाँच-द्रव्यों में न तो ‘ज्ञान-गुण’ है और न ही ‘सुख’ नाम का गुण है। पाँच-द्रव्य और नव-तत्त्वों से जीव-तत्त्व को पूर्ण भिन्न देखना/अनुभव करना ही ‘सम्यग्दर्शन’ है, अर्थात् मैं परिपूर्ण-ज्ञानस्वरूप आत्मतत्व अन्य सभी द्रव्यों और तत्त्वों के बीच रहता हुआ भी ‘‘मैं इन सबसे पूर्ण-भिन्न शुद्ध-तत्त्व हूँ, अन्य किंचित् मात्र भी मेरा नहीं है’’- ऐसी अनुभूति/प्रतीति ही ‘सम्यग्दर्शन’ है। और सम्यग्दर्शन ही आत्मा का सच्चा और वास्तविक-स्वरूप है। कविवर कहते हैं कि ऐसा अात्मस्वरूप अर्थात् आत्मानुभूति मुझे भी प्रगट हो ऐसी भावना करता हूँ। इस छंद में कवि ने सम्यग्दर्शन की प्राप्ति का एक बहुत सुंदर-क्रम प्रस्तुत किया। सबसे पहले पाँचद्रव्यों से जीव को न्यारा कहा अर्थात् भिन्न बताया- ऐसा कहकर समस्त चराचर-पदार्थों, विशेषकर शरीरादि पुद््गल-द्रव्य से जीव को भिन्न कहा। उसके बाद नव-तत्त्वों (जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष और पुण्य-पापरूप पर्यायों) से भी भिन्न कहा अर्थात् समस्त संयोगी-भावों से पूर्णएकत्वे नियतस्य शुद्धनयतो व्याप्तुर्यदस्यात्मनः, पूर्णज्ञान-घनस्य दर्शनमिह द्रव्यान्तरेभ्यः पृथक्। सम्यग्दर्शनमेतदवे नियमादात्मा च तावानयम्, तन्कमु ्त्वा नवतत्त्वसन्ततिमिमामात्मायमेकोऽस्तु नः ।। 6।। भिन्न ''मैं शुद्ध टंकोत्कीर्ण चेतन-तत्त्व हूँ ‘’- जीव को जब ऐसा अनुभवन होता है- तब उसे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती हैं, वही आत्मा का वास्तविक-स्वरूप है। जिसे अपने अंतरंग में प्रकट होने की सूचना कवि ने इन पंक्तियों में व्यक्त की है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसे तृण-काठ-बाँस-आरने इत्यादि और, ईंधन-अनेकविध पावक में दहिये।
आकृति-विलोकित कहावै आग नानारूप, दीसै एक दाहक-सुभाव जब गहिये।।
तैंसे नवतत्त्व में भयो है बहुभेषी-जीव, सुद्धरूप मिश्रित असुद्धरूप कहियेे।
जाही छिना चेतना-सकति कौं विचार कीजै, ताही छिन अलख-अभेदरूप लहिये।। 8।।

शब्दार्थ :- जैंसे तृण-काठ-बाँस-आरने इत्यादि= जिसप्रकार तिनका, काठ (मजबूत लकड़ी का टुकड़ा), पोली/खोखली लकड़ी/बाँस, जंगली-सूखी लकड़ी आदि, और ईंधन अनेकविधि= और भी अनेकप्रकार का ईंधन, पावक में दहिये= अग्नि में जलायें, आकृति विलोकित कहावै आग नानारूप= बाह्यरूप देखकर कही जाती है अग्नि अनेकप्रकार की (परन्तु) दीसै एक दाहक सुभाव जब गहिये= किन्तु एक ही प्रकार की जलाने के स्वभाव का ग्रहण करती दिखाई देती है, तैंसे नवतत्त्व में भयोै है बहुभेषी-जीव= उसीप्रकार नौ तत्त्वों में बहुतप्रकार के भेष रखनेवाला जीव, सुद्धरूप मिश्रित असुद्धरूप कहिये= शुद्धस्वरूप, मिला हुआ, अशुद्धरूप कहा जाता है, जाही छिना चेतना-सकतिकौं विचार कीजै= जिस क्षण चेतनारूप-शक्ति का विचार करता है, ताही छिन अलख-अभेदरूप लहिये= उसी क्षण अदृष्टरूप, भेदरहित ग्रहण करना चाहिये। विशेषार्थ :- जीव की स्थिति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार तिनका, काठ, बाँस, जंगल और अन्यप्रकार की ईंधन-सामग्री को जब हम जलाते हैं, तो उसकी अग्नि में विविधता दिखाई देती है, (जैसे तिनके की आग जरा जली और बुझ गई, काठ की अग्नि धीरे-धीरे और बहुत देर तक जलती है, बाँस की अग्नि बहुत शीघ्रता से जलती है और जंगल की आग तो पूरी तरह से विनाश का कारण होती है) इसप्रकार अग्नि के विविध-रूपों को देखकर हम अग्नि को नानाप्रकार की कहते हैं, जैसे ये उपले की आग है, ये कोयले की आग है, ये जंगल की आग है इत्यादि। लेकिन जब हम अग्नि के दाहक-स्वभाव की ओर देखते हैं, तो उसके नानारूपों में कोई फर्क दिखाई नहीं देता, क्योंकि आखिरकार अग्नि के सभी रूप दाहक-स्वभाव अर्थात् जलाने रूप में ही परिणमन कर रहे हैं। उसीप्रकार नवतत्त्वों (जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पाप) के बीच जीव भी अग्नि की तरह नानाप्रकार के भेषरूप में दिखाई देता है, यानि कभी रागी, कभी द्वेषी, कभी ज्ञानी तो कभी अज्ञानी अर्थात् कभी शुद्ध-जीव, कभी अशुद्ध-जीव और कभी शुद्ध-अशुद्ध के मिश्रितरूप में दिखाई देता है। लेकिन जिस-क्षण हम जीव के चैतन्य-स्वरूप का विचार करते हैं, तो उसी-क्षण अग्नि के दाहक-स्वभाव की तरह जीव भी अगोचर अर्थात् रूपातीत, भेदरहित अखण्ड दिखाई देता है, अर्थात् पर्यायरूप से विविधता होते हुये भी द्रव्य-स्वभाव से जीव त्रिकाल-शुद्ध एकमात्र चेतन-स्वरूप ही दृष्टिगोचर होता है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसे बनवारी में कुधात के मिलाप हेम, नाना-भाँति भयौ पै तथापि एक-नाम है।
कसिकैं कसौटी लोकु निरखै सराफ ताहि, बान के प्रवान करि लेतु, देतु दाम है।।

अतः शुद्धनयायत्तं प्रत्यग्ज्योतिश्चकास्ति तत्। नवतत्त्वगतत्वेऽपि यदेकत्वं न मुञ्चति ।। 7।।

तैंसे ही अनादि पुदगलसौं संजोगी-जीव, नवतत्त्वरूप मैं अरूपी महाधाम है।
दीसै उनमानसौं उदोतवान ठौर-ठौर’, दूसरौ न और एक आत्मा ही राम है।। 9।।

शब्दार्थ :- जैंसे बनवारीमैं कुधात के मिलाप हेम= जिसप्रकार सोना पिघलानेवाला पात्र/घरिया में सोने से भिन्न-धातु के मिलाने पर स्वर्ण/सोना, नानाभाँति भयौ पै तथापि एक नाम है= विविधरूपों में हुआ है फिर भी एक ‘स्वर्ण’ नाम ही पाता है, कसिकैं कसौटी लीकु निरखै सराफ ताहि= कसौटी पर कसकर, उस रेखा देखकर सुनार/सोना की पहचान रखनेवाला, बान के प्रवान करि लेतु-देतु दाम है= (जानकर इसमें) कितने प्रतिशत सोना है- यह प्रमाण करके उसकी कीमत लेता-देता है, तैंसे ही अनादि पुदगलसौं संजोगी-जीव= उसीप्रकार अनादिकाल से पुद््गल के साथ संयुक्त आत्मा, नवतत्त्वरूप मैं अरूपी महाधाम है= नव-तत्त्वों के रूपों में रूपरहित महाधामरूप दिखाई देता है, उनमानसौं उदोतवान ठौर-ठौर= मूल्यांकन से चमकता हुआ जगह-जगह/ विभिन्न-पर्यायों में, दूसरौ न और एक आत्मा ही राम है= दूसरा कोई और नहीं एक आत्मा ही राम है। विशेषार्थ :- जीव की स्थिति को बताने के लिये स्वर्ण का दृष्टांत देते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार सोना तपानेवाला सुनार ‘घरिया’ में डालकर सोने में कुधातु अर्थात् सोने से भिन्न धातु चाँदी या ताँबा मिलाकर जब अग्नि में तपाता है, तब सोना विविधरूपों में दिखाई देता है अर्थात् सोने के तरह-तरह के आभूषण बनकर तैयार होते हैं। और उन आभूषणों को सुनार कसौटी पर कसकर या रेखा खींचकर ये पहचान लेता है कि इसमें कितना सोना है और कितनी कुधातु मिली हुई है, और फिर उसी के हिसाब से वह लेन-देन या क्रय-विक्रय करता है। ठीक उसीप्रकार यह दीप्तिमान, अरूपी, चेतनस्वरूप भगवान् आत्मा अनादिकाल से कर्मरूपी पुद््गल-परमाणुुओं के साथ उसके विभिन्नरूपों में ही रहता आया है, लेकिन फिर भी इसकी चेतयितारूपशक्ति हर स्थिति में विद्यमान रहती है, और ज्ञानी-जीव के मूल्यांकन के प्रमाण से प्रतिसमय एकमात्र आत्मा ही जानने में आता है, अन्य कुछ भी नहीं। अनादिकाल से आत्मा आठ-कर्मों के साथ ही है। और कर्मों के उदयरूप नानाप्रकार के भावरूप परिणमन करता हुआ दिखाई देता है, कभी शरीरादि पर-पदार्थों में अहंबुद्धि करता हुआ जड़रूप, तो कभी अशुभभाव करता हुआ पापरूप, तो कभी शुभभाव करता पुण्यरूप, तो कभी आस्रव और बंधरूप, और कभी इन सबसे भिन्न आस्रव-बंध का अभाव करता हुआ संवर-निर्जरारूप प्रवर्तता हुआ दिखाई देता है, परन्तु फिर भी इन सभी संयोगों और अवस्थाओं में रहता हुआ भी आत्मा त्रिकाल-कालिमारहित शुद्धस्वर्ण की भाँति निर्विकार और उद्योतवान् रहता है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसे रवि-मंडल के उदै महि-मंडल में, आतप अटल तम-पटल विलातु है।
तैंसे परमातमा कौ अनभौ रहत जौंलौ, तौलों कहूँ दुविधा न कहूँ पच्छपातु है।।
नय कौ न लेस परवान कौ न परवेस, निच्छेप के वंस कौ विधुंस होतु जातु है।
जे-जे वस्तु साधक हैं तेऊ तहाँ बाधक हैं, बाकी राग-दोषकी दसाकी कौन बातु है।। 10।।

चिरमिति नवतत्त्वच्छन्नÂमुÂन्नीयमानं, कनकमिव निमग्नं वर्णमालाकलापे।
अध सतत-विविक्तं दृश्यतामेकरूपं, प्रतिपदमिदमात्म-ज्योतिरुद्योतमानम् ।। 8।।

उदयति न नयश्रीरस्तमेति प्रमाणं, क्वचिदपि च न विद्मो याति निक्षेपचक्रम्।।
किमपरमभिदध्मो धाम्नि सर्वंकषेंऽस्मि-Âन्ननुभवमुपयाते भाति न द्वैतमेव ।। 9।।

शब्दार्थ :- जैंसे रवि-मंडल के उदै महि-मंडल में= जिसप्रकार सूर्य के उदय होने पर पृथ्वी पर (पड़नेवाली), आतप अटल तमपटल विलातु है= धूप से नहीं टलनेवाला घोर-अंधकार भी भाग जाता है, तैंसे परमातमा कौ अनभौ रहत जौंलौं= उसीप्रकार जबतक परम-आत्मा/शुद्धात्मा का अनुभव रहता है, तौलौं कहूँ दुविधा न कहूँ पच्छपातु है= तबतक न तो कोई दुविधा है और न ही कोई पक्षपात, नयकौं न लेस परवान कौ न परवेस= न तो नयों का लेश और न प्रमाण का प्रवेश, निच्छेप के वंसकौ विधुंस होतु जातु है= निच्छेप का समूह का विध्वंस/ विनाश होता जाता है, जे-जे वस्तु साधक हैं, तेऊ तहाँ बाधक है= (संसार मार्ग में)जो-जो वस्तुयें (पहलीभूमिका में) सहायक थीं, वे सब वहाँ (आत्मानुभूति में) बाधक सिद्ध होतीं हैं, बाकी राग-दोस की दसा की कौन बातु है= शेष राग-द्वेष की स्थिति की बात ही क्या करें (वे तो संभव ही नहीं हैं)? विशेषार्थ :- सूर्य के माध्यम से अनुभव की स्थिति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार सूर्य के उदय होने पर पृथ्वीमंडल पर सर्वत्र सूर्य का प्रकाश छा जाने से घोर-अंधकार क्षणभर में गायब हो जाता है, और सब कुछ साफ-साफ नजर आने लगता है, ठीक उसीप्रकार जबतक परम-आत्मा अर्थात् शुद्धात्मा की अनुभूति होती है, तबतक न तो नयों की कोई दुविधा रहती है, और न ही विकल्पों का कोई पक्षपात, एकमात्र आत्मा के आनंद की अनुभूति होती है। अर्थात् जब आत्मा का अनुभव होता है, तब वहाँ नयों का लेशमात्र भी विकल्प नहीं होता, प्रमाण का तो प्रवेश भी नहीं होता और निक्षेपों का तो वंश ही नष्ट हो जाता है। अर्थात् कहने का तात्पर्य यही है कि वस्तुस्वरूप को समझने के लिये जिस शास्त्रज्ञान की महती उपयोगियता रहती है, वही शास्त्रज्ञान आत्मानुभूति के समय सबसे अधिक बाधक होता है। जो नय वस्तु के गुणों को सिद्ध करने में सहायक होता है, वही अनुभव के समय बाधक होता है। प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाण से असिद्ध-वस्तु या अनदेखी वस्तु भी सिद्ध होती है; लेकिन वही विकल्प आत्मानुभूति में बाधक होते हैं, कहा जाता है न कि ‘‘प्रत्यक्षे किं प्रमाणम्’’ अर्थात् प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। उसीप्रकार जब आत्मवस्तु की सिद्धि हो ही चुकी, तो अब प्रमाण की क्या आवश्यकता? इसीप्रकार निक्षेपों से वस्तु की स्थिति समझ में आती है, और अनुभव के समय तो जब वस्तु ही अनुभव में आ रही है, तो निक्षेपों की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती। उदाहरण के लिये जैसे यदि हमने पहले कभी रसगुल्ला नहीं खाया हो, और अब खाने की तीव्र इच्छा हो, तो सबसे पहले हम उसके स्वरूप को जानने का प्रयास करते हैं, उसके रंग-रूप, आकार-प्रकार को जानने का प्रयास करते हैं, परन्तु जिस क्षण हमें रसगुल्ले की प्राप्ति होती है, क्या उस क्षण हम उसके स्वरूप और रंग-रूप के बारे में विचार करते हैं? कि रसगुल्ले के स्वाद का आनंद लेते हैं? ठीक उसीप्रकार जब साधक को आत्मानुभूति होती है, तब उस आनंद की अनुभूति में ये समस्त साधक-तत्त्व सबसे अधिक बाधक सिद्ध होते हैं। कवि कहते हैं जब साधक भी बाधक हैं, तो राग-द्वेष आदि की तो बात ही क्या कहें? क्योंकि ये तो प्रत्यक्ष ही बाधक हैं। यहाँ एक बात विशेषरूप से ध्यान देने योग्य है कि ये सही है कि अनुभूति के समय ये तीनों बाधक है, पर अात्मस्वरूप के निर्णय के लिये यही सबसे अधिक सहायक भी है। क्योंकि इनके बिना आत्मस्वरूप का निर्णय करना संभव नहीं है। जैसे रोटी बनाने के लिये चकला, बेलन, तवा आदि सभी साधन आवश्यक हैं, भले ही रोटी बनने के बाद ये सब अप्रयोजनभूत होते हैं ; पर इनकी सहायता के बिना भी रोटीरूप-कार्य की सिद्धि नहीं होती। ठीक उसीप्रकार आत्मस्वरूप की सिद्धि के लिये ये सभी साधक होते हुये भी आत्मानुभूति के समय बाधक हैं, क्योंकि नय-प्रमाण- निक्षेप आदि साधक है और आत्मानुभूति साध्य है।

(अडिल्ल छंद)

आदि-अंत पूरन-सुभाव-संयुक्त है। पर-सरूप पर-जोग-कल्पना-मुक्त है।।
सदा एकरस प्रगट कही है जैन में। सुद्ध-नयातम वस्तु विराजै बैन में।। 11।।

शब्दार्थ :- आदि-अंत पूरन-सुभाव-संयुक्त= आदि और अंत से रहित पूर्ण-स्वभाव से युक्त, पर-सरूप पर-जोग-कल्पना-मुक्त= पर-द्रव्यों के स्वरूप और संयोग की कल्पना से भी रहित, सदा एकरस प्रगट कही है जैन में= हमेशा एकमात्र चैतन्यरस संयुक्त है, ऐसा जिनागम में कहा है, सुद्ध-नयातमवस्तु विराजै बैन में= शुद्ध-नय के अनुसार वस्तु सुशोभित होती है वचनों में (जिनेन्द्र देव के वचनों में)। विशेषार्थ :- शुद्ध-नय की अपेक्षा से जीव का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि शुद्ध-नय की अपेक्षा जीव/आत्मा आदि से लेकर अंत तक अर्थात् निगोद से लेकर सिद्ध-अवस्था तक परिपूर्ण ज्ञानदर्शन चेतना-लक्षणवाला है। पर-पदार्थों के संयोग एवं स्वरूप की कल्पना से भी सर्वथा-भिन्न है, क्योंकि आत्मा चेतन है और परपदार्थ अचेतन हैं, पर-पदार्थों के बीच रहते हुये भी आज तक इस जीव ने पर-पदार्थों को छुआ भी नहीं है- ऐसा जिनवाणी कहती है- ‘‘मैं चेतन और तू जड़ है, बेमेल हमारो मेल है’’। कविवर कहते हैं जीव का त्रिकाल एकमात्र जाननहार चेतन-स्वभाव ही प्रगट है, शुद्ध-नय की अपेक्षा से जीव का ऐसा ही स्वरूप जिनेन्द्रदेव की वाणी में प्रगट हुआ है अर्थात् जिनागम में वर्णित है।

(कवित्त)

सद््गुरु कहैं भव्य-जीवनिसौं, तोरहु तुरत मोह की जेल।
समकित-रूप गहो अपनौ गुन, करहु सुद्ध-अनुभवकौ खेल।।
पुदगल-पिण्ड भाव-रागादिक, इनसौं नाहीं हमारौ मेल।
ए जड़-प्रगट गुपत तुम चेतन, जैंसे भिन्न तोय अरु तेल।। 12।।

शब्दार्थ :- सद््गरुु कहैं भव्यजीवनिसौं= सद््गरुु भव्यजीवों से कहते हैं, तोरहु तुरत मोह की जेल= तुरतं / अतिशीघ्र मोह के बंधन को तोड़ दो, समकितरूप गहौ अपनौ गुन= सम्यक्त्व-स्वरूप अपने गुणों को ग्रहण करो, करहु सुद्ध-अनुभवकौ खेल= शुद्ध-आत्मा की अनुभति ू करो, पुदगल-पिण्ड भाव-रागादिक= पुद््गल के पिण्डरूप मोह-राग-द्वेषादि समस्त भाव, इनसौं नाहीं तुम्हारौ मेल= इनसे तुम्हारा मेल नहीं है, ए जड़-प्रगट गुपत तुम चेतन= ये तो प्रकट जड़ हैं, तुम चेतनस्वरूप अदृश्य हो, जैंसे भिन्न तोय अरु तेल= जिसप्रकार जल और तेल भिन्न-भिन्न हैं। विशेषार्थ :- जीव के लिये हितकारी-उपदेश देते हुये कविवर कहते हैं कि ‘‘हे भव्यजीवो! सद््गुरु कहते हैं कि तुम तुरंत मोह की जेल को तोड़ दो अर्थात् मोह के इन बंधनों को जिनसे तुमने संसार, शरीर और भोगों को अपना मान रखा है, उसे शीघ्रतिशीघ्र तोड़ दो, और अपने गुणों को ग्रहण करो अर्थात् अपने आत्मस्वरूप को पहचानो। तुम अनंत-गुणों के धनी हो, क्यों पर से ममत्व का अपराध करके मोह की जेल में बंद हो? हे आत्मन्! सम्यक्त्व-स्वरूप अपनी शुद्धात्मा का अनुभव करो और आनंद की मस्ती में मगन हो जाओ।’’

आत्मस्वभावं परभाव-भिन्नमापू र्णम ाद्यन्त-विमु क्तमेकम्।
विलीन-सङ्कल्प-विकल्पजालं प्रकाशयन् शुद्धनयोऽभ्युदेति।। 10।।

न हि विदधति बद्धस्पृष्ट-भावादयोऽमी, स्फुटमुपरि तरन्तोऽप्येत्य यत्र प्रतिष्ठाम्।
अनुभवतु तमेव द्योतमानं समन्तात्ज, जगदपगतमोहीभूय सम्यक्स्वभावम्।। 11।।

रागादि-भावों का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि ये रागादि-भाव पुद््गल का पिण्ड है, जड़ है, इनसे आत्मा का कोई मेल नहीं है। हे जीवराज! ये तो जड़ हैं कभी दृश्य और कभी अदृश्य होते हैं, लेकिन तुम तो सदाकाल चैतन्य ज्ञानस्वरूप ही रहते हो। ठीक उसीप्रकार जिसप्रकार जल और तेल को हम कितना भी मिलाने की कोशिश करें, तो भी वे कभी नहीं मिलते, सदाकाल पूर्ण-भिन्न ही रहते हैं। ठीक उसीप्रकार जड़/पुद््गल और चेतन अनादिकाल से एकसाथ रहते हुये भी आज तक जड़ का एक भी परमाणु चेतनरूप और चेतन का एक भी प्रदेश जड़रूप नहीं हुआ और न कभी होगा, एकसाथ रहने के बाबजूद भी इन दोनों में त्रिकाल-अत्यंताभाव कायम रहता है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ बुधिवंत नर निरखै शरीर-घर, भेदग्यान-दृष्टिसौं विचारै वस्तु-वासतौ।
अतीत-अनागत-वरतमान मोहरस, भीग्यौ चिदानन्द लखै बंध में विलासतो।।
बंध को विदारि महा-मोह कौ सुभाउ डारि, आत्मा को ध्यान करै देखै परगासतौ।
करम-कलंक-पंक-रहित प्रगटरूप, अचल-अबाधित विलोकै देव-सासतौ।। 13।।

शब्दार्थ :- कोउ बुधिवंत-नर निरखै शरीर-घर= कोई बुद्धिमान्-मनुष्य शरीररूपी घर को देखे, भेदग्यानदृष्टिसौं विचारे वस्तु-वासतौ= भेदविज्ञान की दृष्टि से वस्तु के वास्तविक-स्वरूप का विचार करता है, अतीत-अनागत-वरतमान= भूतकाल, भविष्यकाल, वर्तमानकाल, मोहरस भीग्यौ= मोह के रस से भीगा हुआ, चिदानन्द लखै बंध में विलासतौ= चैतन्य का अानंद देखते हुए भी बंध में विलास करता है, बंध को विदारि महामोह को सुभाउ डारि= बंध को विदीर्ण कर, महाभयंकर-मोह का स्वभाव छोड़कर, आत्मा को ध्यान करै देखै परगासतौ= आत्मा का ध्यान करता है, प्रकाशमान देखता है, करम-कलंक-पंक-रहित प्रगटरूप= कर्मकलंक-रूपी कीचड़ से रहित प्रत्यक्ष-स्वरूप, विलोकै देव-सासतौ= शाश्वत-आत्मदेव देखता है। विशेषार्थ :- सम्यग्दर्शन की प्राप्ति का सुंदर-उपाय बताते हुये कविवर कहते हैं कि जब कोई ज्ञानी- जीव शरीररूपी-घर में विराजमान आत्मवस्तु को भेदविज्ञान की दृष्टि से देखता है, तो उसे पहले तो भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमानकाल यानि तीनों ही कालों में मोह-राग-द्वेषरूपी रस में भीगा हुआ और कर्मबंधन में विलास करता हुआ चिदानन्द अर्थात् आत्मा दृष्टिगोचर होता है। तब वह ज्ञानी-जीव कर्मबंधन को छोड़कर, महा-भयंकर मोह को नष्ट करके एकमात्र ज्ञान के प्रकाश में अात्मा का ध्यान करता है अर्थात् आत्मानुभूति का पुरुषार्थ करता है, तो उसे कर्म-कलंकरूपी कीचड़ से रहित ‘अचल’, कर्मों की बाधा से रहित ‘अबाधित’, जन्म-मरण से रहित ‘शाश्वत-आत्मदेव’ दिखाई देता है। इस छंद में कवि ने पर्यायदृष्टि से कथन प्रारम्भ करते हुये द्रव्यदृष्टि से स्वरूप तक पहुँचने की सुन्दर-प्रेरणा दी है। अनादिकाल से कर्मों के साथ होने से वर्तमान में जीव मोह के बंधनों में जकड़ा हुआ है, जब जीव आत्मानुभूति का पुरुषार्थ करता है, तब पहले तो उसे अपना स्वरूप कर्मबंधन और मोहरागादि-भावों से जकड़ा हुआ ही दिखाई देता है, यदि ऐसा न हो, तो वह कर्मबंधन से छूटने का पुरुषार्थ ही क्यों करेगा? उदाहरण के लिये जैसे यदि हमें छिलका-रहित दाल चाहिये, तो पहले तो हमें दाल छिलका-सहित भूतं भान्तमभूतमेव रभसा निर्भिद्य बन्धं सुधी-र्यद्यन्तः किल कोऽप्यहो कलयति व्याहत्य मोहं हठात्। आत्मात्मानुभवैकगम्यमहिमा व्यक्तोऽयमास्ते ध्रुवम्, नित्यं कर्मकलङ्क-पङ्क-विकलो देवः स्वयं शाश्वतः ।। 12।। ही नजर आयेगी, लेकिन फिर हम पुरुषार्थ करेगें, तो दाल और छिलका अलग-अलग हो जायेगें, तब हम दाल को ग्रहण करके छिलके को हटा देगें। ठीक उसीप्रकार आत्मानुभूति के समय साधक-जीव को पहले तो मोहरस से भीगा हुआ आत्मा ही दिखाई देता है। फिर भेदविज्ञान या प्रज्ञारूपी छैनी से मोह के बंधनों को तोड़कर जब आत्मस्वरूप पर दृष्टि केन्द्रित होती है, तो कर्मकलंक और विकारी-भावोंरूपी कीचड़ से रहित अचल-अनुपम शाश्वत भगवान् आत्मा दिखाई देता है, तभी सच्ची-प्रतीति और अनुभूति होती है।

(सवैया तेईसा)

सुद्ध-नयातम आतम की, अनुभूति विज्ञान-विभूति है सोई।
वस्तु विचारत एक-पदारथ, नाम के भेद कहावत दोई।।
यौं सरवंग सदा लखि आपुहि, आतम-ध्यान करै जब कोई।
मेटि असुद्ध-विभावदसा तब, सुद्ध-सरूप की प्रापति होई।। 14।।

शब्दार्थ :- सुद्धनयातम आतम की अनुभूति= शुद्ध-नय के अनुसार आत्मा की अनुभूति, विज्ञान-विभूति सोई= वही ज्ञान की विभूति/वैभव है, वस्तु-विचारत एक-पदारथ= वस्तुस्वरूप की दृष्टि से पदार्थ एक ही है, नाम के भेद कहावत दोई= नाम के लिये दो भेद कहे जाते हैं, यौं सरवंग सदा लखि आपुहि= इसप्रकार सर्वांग से हमेशा अपने-आप को देखकर, आत्म-ध्यान करै जब कोई= जब कोई आत्मस्वरूप का ध्यान करता है, मेटि असुद्ध विभावदसा तब= तब अशुद्ध वैभाविक-स्थिति नष्ट होकर, सुद्ध-सरूप की प्रापति होई= शुद्ध-स्वरूप की प्राप्ति होती है। विशेषार्थ :- आत्म-वस्तु और गुण अभेद हैं- यह सिद्ध करते हुये कविवर कहते हैं कि शुद्ध-नय की अपेक्षा से आत्मस्वरूप की अनुभूति ज्ञान की अनुभूति ही हैं, वस्तुस्वरूप की दृष्टि से दोनों एक ही हैं, उनमें कोई भेद नहीं है, ये भेद सिर्फ नाम के लिये है। आत्मा अनंत-गुणों का अभेद पिण्ड है। आत्मानुभूति कहो या ज्ञानानुभूति कहो दोनों एक ही है, उनमें कोई भेद नहीं है। जो स्वयं को इसप्रकार अर्थात् गुण और गुणी को अभेद देखकर, जानकर और मानकर, उसी ज्ञान से जब अपने आत्मस्वरूप का ध्यान करता है, तो विभाव-भावों की स्थिति अर्थात् अशुद्ध-स्थिति मिट जाती है, और सच्चे शुद्ध-आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। - इन पंक्तियों में कवि ने स्पष्ट किया कि आत्मा और आत्मा के गुण दोनों अलग-अलग वस्तु नहीं है, दोनों में तादात्म्य-संबंध है, अर्थात् गुण और गुणी नाम भले ही दो हैं, पर दोनों अभेद ही हैं। जैसे अग्नि की उष्णता, जल की शीतलता, चीनी की मिठास, नमक के खारेपन को हम भिन्न करना चाहें, तो भी नहीं कर सकते; क्योंकि इनमें तादात्म्य-संबंध होने से वे अभेद है, उन्हें भिन्न नहीं किया जा सकता, ठीक उसीप्रकार आत्मा ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य आदि अनंत-गुणों का पिण्ड है। कहने में भले ही ऐसा आये कि ‘‘ज्ञान आत्मा का गुण है या सुख आत्मा का गुण है’’; परन्तु वास्तव में ये भिन्न-वस्तु नहीं है, अभेद है; इसलिये ज्ञानानुभूति भी आत्मानुभूति है और सुखानुभूति भी आत्मानुभूति ही हैं। और जब साधक अपने को इसरूप अनुभव करता है, तब उसे समस्त विभावों से रहित शुद्ध-आत्मतत्त्व की

अनुभूति होती है।
आत्मानुभूतिरिति शुद्धनयात्मिका या, ज्ञानानुभूतिरियमेव किलेति बुद्ध््वा।
आत्मानमात्मनि निवेश्य सुनिष्प्रकम्प-मेकोऽस्ति नित्यमवबोधघनः समन्तात्।। 13।।

(सवैया इकतीसा)

अपनैंही गुन-परजायसौं प्रवाहरूप, परनयौ तिहुँकाल अपनै अधारसौं।
अन्तर-बाहर प्रकाशवान एकरस, खिन्नता न गहै भिन्न रहै भौ-विकारसौं।।
चेतना के रस सरवंग भरि रह्यौ जीव, जैसे लोन-कांकर भरयौ है रस-खारसौं।
पूरन-सरूप अति-उज्जवल विग्यानघन, मोंकौ होहु प्रगट विसेस-निरवारसौं।। 15।।

शब्दार्थ :- अपनैंही गुन-परजायसौं प्रवाहरूप= अपने ही गुण-पर्यायों से धाराप्रवाहरूप, परिनयौ तिहुँकाल अपने अधारसौं= तीनों-काल स्वयं के ही आधार से परिणमन करता है, अन्तर-बाहर परकाशवान एकरस= अंतरंग-बहिरंग प्रकाशवान एकरूप, खिन्नता न गहै भिन्न रहै भौं-विकारसौं= समानरूप से भव/संसार के विकारों से भिन्न रहता है, चेतना के रस सरवंग भरि रह्यौ जीव= चैतन्यता के रस से सर्वांग भरा हुआ जीव, जैंसें लोन-कांकर भरयौ है रस-खारसौं= जैसे नमक की डली भरी हुुई है खारेपन से, पूरन-सरूप अति-उज्जवल विग्यानघन= पूर्ण-स्वरूप अत्यंत-उज्जवल, ज्ञान का घनपिण्ड, मोकौं होहु प्रगट विसेस-निरवारसौं= (मोहादि के) विशेष-निवारण से मुझे भी प्रगट हो। विशेषार्थ :- ज्ञानी-जीव के चिंतन का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि आत्मा त्रिकाल अपने ही गुण-पर्यायों में धाराप्रवाहरूप से अर्थात् जैसे सामान्यरूप से नदी का जल अपनी एक अखंड-धारा में बहता रहता है, उसीप्रकार आत्मा भी अपने ज्ञानादि-गुणों में बिना किसी अवलंबन के अपने ही आधार से सहज-प्रवाहित होता रहता है। अंतरंग और बहिरंग दोनों ही रूपों में एक समान अर्थात् कम ज्यादा नहीं समानरूप से प्रकाशित रहता है। भव-विकार अर्थात् मोहादि समस्त विकार, सांसारिक उतार-चढ़ाव या अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं से आत्मा के सहज-परिणमन पर कोई अन्तर नहीं पड़ता। कहने का तात्पर्य यही है कि निगोद से लेकर सिद्ध-अवस्था तक आत्मा का चैतन्य-प्रकाश त्रिकाल एकसमान विद्यमान रहता है। यद्यपि ज्ञानावरणादि-कर्मों का आवरण आत्मा के ज्ञानादि-गुणों के परिणमन पर आवरण तो डालता है, लेकिन इन कर्मों ने आजतक आत्मा के ज्ञानादि-गुणों को और सहज-प्रकाशमान चैतन्य-स्वरूप को कभी प्रभावित/विकृत नहीं किया है। यदि ऐसा हो जाता, तो वह ज्ञानादि-गुण शुद्धरूप में कैसे अनुभव में आते? इससे सिद्ध होता है कि भव-विकार से आत्मस्वरूप त्रिकाल अछूता ही रहता है। एक उदाहरण के माध्यम से आत्मा के जीवत्व स्वरूप का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि यह आत्मा चेतना के रस से उसी तरह सर्वांग अर्थात् लबालब भरा हुआ है, जैसे नमक की डली के संपूर्णभागों में खारापन समाहित है। उस डली को किसी भी कोने से, कितने ही छोटे से हिस्से को चखें, खारेपन का ही स्वाद आयेगा। ठीक उसीप्रकार आत्मा किसी भी पर्याय में रहे, उसका चैतन्य-स्वरूप ज्यों का त्यों विद्यमान रहता है। कवि कहते हैं कि ऐसा परिपूर्ण-स्वरूप, विकारों से रहित अत्यंत-उज्जवल, ज्ञान का घनपिण्ड आत्मस्वरूप मोहादि के निवारण-पूर्वक मुझे भी प्रगट हो। जिसप्रकार मिश्री में मिठास सर्वत्र और लबालब भरी रहती है, किसी भी कोने से उसे चखें, एकमात्र मिठास का ही रस आता है, ठीक उसीप्रकार आत्मा के अनंत-गुणों में से किसी भी गुण का आस्वादन करें, एकमात्र चैतन्य का ही रस आता है। उस अनुपम-रस के रसास्वादन की अनुभूति मुझे भी

अतिशीघ्र हो ऐसी उत्कृष्ट-भावना कवि ने यहाँ व्यक्त की है।
अखण्डितमनाकुलं ज्वलदनन्तमन्तर्बहि-र्महः परममस्तु नः सहजमुद्विलासं सदा।
चिदुच्छलन-निर्भरं सकल-कालमालम्बते, यदेकरसमुल्लसल्लवण-खिल्य-लीलायितम् ।। 14।।

(कवित्त)

जहँ ध्रुव-धर्म कर्मक्षय-लच्छन, सिद्धि-समाधि साधि पद सोई।
सुद्धपयोग जोग-महिमंडित, साधक ताहि कहै सब कोई।।
यौं परतच्छ-परोच्छरूपसौं, साधक साधि अवस्था दोई।
दुहु कौ एक ग्यान संचय करि, सैवे सिववंछक थिर होई।। 16।।

शब्दार्थ :- जहँ ध्रुव-धर्म कर्मक्षय-लच्छन= जहाँ अविनाशी-धर्म, जिसका लक्षण कर्म-क्षय है, सिद्धि समाधि साधिपद सोई= सिद्धिसाधिका-समाधि की प्राप्ति, वही साध्य-पद है, सुद्धपयोग जोग-महिमंडित= शुद्धोपयोगमयी योगरूपी भूमि से अलंकृत, साधक ताहि कहै सब कोई= सब कोई उसे साधक/साधना करनेवाला कहते हैं, यौं परतच्छ-परोच्छ-रूपसौं= इसप्रकार प्रत्यक्ष और परोक्षरूप से, साधक साधि अवस्था दोई= साधना करनेवाला दोनों ही अवस्थाओं को साधकर, दुहु कौ एक ग्यान संचय करि= दोनों का एकसाथ ज्ञान अर्जित करके, सेवै सिववंछक थिर होई= उसका सेवन कर मोक्ष की दृढ़-इच्छावाला होता है। विशेषार्थ :- साध्य और साधक का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि सर्व-कर्मों से रहित, शाश्वत अविनाशी सिद्ध-पद ही साध्य है, और उस साध्य को प्राप्त करनेवाले, तथा जो मन, वचन, काय तीनों योगों से शुद्ध-उपयोग को धारण करनेवाले हैं, उन सभी को ‘साधक’ कहते हैं। कहा जाता है ‘‘जैसा साध्य हो, वैसा ही साधक होना चाहिये, तभी साध्य की सिद्धि संभव है।’’ जैसे सिद्ध-पद जीव की पूर्ण-निर्मल शुद्ध-दशा है, वही साध्य है, अतः उस सिद्ध-पद की सिद्धि करनेवाला उपयोग भी पूर्ण-शुद्ध होना चाहिये। इसीलिये शुद्धोपयोग, और उसको धारण करनेवाले को ही साधक कहा, अर्थात् शुद्धात्मा की साधना के लिये उपयोग का शुद्ध होना भी अति-आवश्यक है, यानि विकारों की गंदगी के रहते हुये सिद्ध-पद की साधना कदापि संभव नहीं है। इसप्रकार साध्य और साधक- दोनों ही अवस्थायें जीव की ही है। इनमें प्रत्यक्ष और परोक्ष का भेद है, मोक्ष का इच्छुक सम्यग्दृष्टि-जीव इन दोनों ही अवस्थाओं का ज्ञानकर चित्त की स्थिरतापूर्वक इनको ग्रहण करता है, वही सच्चा-साधक हैं। हे आत्मन्! मोक्ष के इच्छुक प्रत्येक जीव के लिये एकमात्र-साध्य ‘सिद्ध-पद’ ही हैं। क्योंकि वही अचल, अविनाशी, शाश्वत सुखप्रदायक है। अरिहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु ये सभी शुद्धोपयोग के धारी होने से ‘सच्चे-साधक’ हैं। बस इनमें ‘प्रत्यक्ष’ (अरिहंत और सिद्ध) और ‘परोक्ष’ (आचार्य उपाध्याय साधु) का भेद हैं।

(कवित्त)

दरसन-ग्यान-चरन-त्रिगुनातम, समलरूप कहिये विवहार।
निहचै-दृष्टि एकरस-चेतन, भेदरहित अविचल-अविकार।।
सम्यक्-दसा प्रमान उभै-नय, निर्मल-समल एक ही बार।
यौं समकाल जीव की परिनति, कहैं जिनेंद गहैं गनधार।। 17।।

शब्दार्थ :- दरसन-ग्यान-चरन त्रिगुनातम= सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यकचारित्र तीनों गुणरूप, समलरूप कहिये विवहार= व्यवहार से मल/दोष-सहित कहते हैं, निहचै-दृष्टि एकरस चेतन= निश्चयनय से आत्मा

एष ज्ञानघनो नित्यमात्मा सिद्धिमभीप्सुभिः। साध्य-साधकभावेन द्विधैकः समुपास्यताम् ।। 15।।

दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रित्वादेकत्वतः स्वयम्। मेचकोऽमेचकश्चापि सममात्मा प्रमाणतः ।। 16।।

एकरूप, भेदरहित अविचल अविकार= अभेद, हल-चल से रहित स्थिर, विकारों से रहित है, सम्यकदसा प्रमान उभै-नय= सम्यग्दर्शन की स्थिति प्रमाण और दोनों नय, निर्मल-समल एक ही बार= निर्मल/भूतार्थ, समल/अभूतार्थ एक ही साथ, यौं समकाल जीव की परिनति= इसप्रकार एक ही समय में जीव की परिणति, कहैं जिनेंद गहै गनधार= जिनेन्द्रदेव कहते हैं और गणधर ग्रहण करते हैं। विशेषार्थ :- निश्चय और व्यवहार-नय से जीव की परिणति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि व्यवहार-नय से आत्मा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र तीन-गुणरूप है, लेकिन व्यवहारनय को असत्यार्थ अभूतार्थ कहते हैं। जबकि निश्चयनय जोकि सत्यार्थ है, उसके अनुसार जीव एक रूप, ज्ञान-दर्शन लक्षणवाला भेदरहित अभेद, हल-चल रहित अविचल, विकारों से रहित पूर्ण-शुद्ध है। कवि ने इस छंद में निश्चय और व्यवहार-नयों की सुंदर-विवक्षा सिद्ध की है, कहा जाता है कि ‘सम्यग्दर्शन’ आत्मा के ‘श्रद्धा-गुण’ की पर्याय है, ‘सम्यग्ज्ञान’ आत्मा के ‘ज्ञान-गुण’ की पर्याय है, और ‘सम्यक्चारित्र’ आत्मा के ‘चारित्र-गुण’ की पर्याय है, ‘बल’ आत्मा के ‘वीर्य-गुण’ की पर्याय है, लेकिन कवि कहते हैं कि ऐसा भेदरूप-कथन भी वास्तव में व्यवहार ही हैं, निश्चय से तो आत्मा अनंत-गुणों का एक अभेद-पिण्ड है, जिसमें न कोई भेद है, न कोई विकार, पूर्ण-शुद्ध निर्विकार चेतन-तत्त्व है। इसीलिये भेदरूप-कथन करने से ही व्यवहार-नय को ‘अभूतार्थ’ कहा गया है, और अभेदरूप-कथन करने से निश्चय-नय को ‘भूतार्थ’ कहा गया है। सम्यग्दर्शन के समय सम्यग्दृष्टि-जीव को ये दोनों-नय ‘भूतार्थ’ और ‘अभूतार्थ’ एक ही काल में एक साथ वर्तते हैं। जीव की ऐसी ही निर्मल और समल-परिणति जिनेन्द्रदेव ने कही है, और गणधर भगवान् ने भी इसीरूप में ग्रहण और विवेचित किया है।

(दोहा)

एकरूप आतम-दरब, ग्यान-चरन-दृग तीन।
भेदभाव-परिनामसौं, विवहारै सु मलीन।। 18।।

शब्दार्थ :- एकरूप आतम-दरब= आत्मद्रव्य एकरूप है, ग्यान-चरन-दृग तीन= ज्ञान, चरण, दर्शन तीन, भेदभाव परिनामसौं= परिणामों से भेदरूप, विवहारै सु मलीन= व्यवहार में मलिन है। विशेषार्थ :- व्यवहारनय से जीव का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि आत्म-द्रव्य तो एक ही हैं, उसे ज्ञान, चारित्र और दर्शन- इन तीन रूप कहना ही व्यवहार है, जो द्रव्य-दृष्टि से सदोष या असत्यार्थकथन है।

(दोहा)

जदपि समल विवहारसौं, पर्यय-सकति अनेक।
तदपि नियत-नय देखिये, सुद्ध निरंजन एक।। 19।।

शब्दार्थ :- जदपि समल विवहारसौं= यद्यपि व्यवहारनय से मल/दोष-सहित है, पर्यय-सकति अनेक= पर्याय-शक्ति बहुत, तदपि नियत-नय देखिये= फिर भी निश्चयनय से देखें, तो आत्मा, सुद्ध निरंजन एक= शुद्ध

निरंजन/कालिमारहित एक/अभेद-अखंड है।
दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रिभिः परिणतत्वतः, एकोऽपि त्रिस्वभावत्वाद्वयवहारेण मेचकः।। 17।।

परमार्थेन तु व्यक्त-ज्ञातृत्व-ज्योतिषैककः। सर्वभावान्तर-ध्वंसि-स्वभावत्वादमेचकः।। 18।।

विशेषार्थ :- निश्चय-नय की मुख्यता से कथन करते हुये कविवर कहते हैं कि यद्यपि व्यवहार-नय से आत्मा अनंत-गुणों और उनके परिणमन की अनंत-शक्तिवाला है, लेकिन फिर भी निश्चय-नय से आत्मा गुणभेद-रहित, शुद्ध, अंजन अर्थात् विकारी-भावों की कालिमा से रहित निरंजन एक अखंडतत्त्व है।

(दोहा)

एक देखिये जानिये, रम रहिये इक ठौर।
समल-विमल न विचारिये, यहै सिद्धि नहिं और।। 20।।

शब्दार्थ :- एक देखिये जानिये= एक आत्मा को ही देखो, जानो, रम रहिये इक ठौर= उस एक में ही रम जाओ, समल-विमल न विचारिये= मल/दोषसहित या मल/दोषरहित का विचार मत करो, यहै सिद्धि नहिं और= यही सिद्धि है, कहीं और कुछ नहीं। विशेषार्थ :- शुद्ध-निश्चय-नय से आत्मा का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि आत्मा एक ही है, इसलिये एकमात्र आत्मस्वरूप को ही देखो, जानो और उसी में रमण करो अर्थात् लीन हो जाओ। ‘समल’ अर्थात् विकारों से सहित या ‘विमल’ अर्थात् विकारों से रहित है, -ऐसा विचार न करते हुये मात्र आत्मानुभूति का पुरुषार्थ करो; क्योंकि यही एकमात्र करने योग्य कार्य है। इसी में सर्वप्रकार से कल्याण संभव है। सुखी होने का इसके अलावा अन्य कोई उपाय नहीं है। उपर्युक्त छंदों में कवि ने एकमात्र आत्मा का ही सच्चा-स्वरूप वर्णित किया है, और उसी को देखने, जानने और रमने की सुंदर-प्रेरणा दी है। क्योंकि आत्मस्वरूप का विकल्परहित सच्चा श्रद्धान, ज्ञान और रमणता ही मोक्षमार्ग है, और वही एकमात्र कल्याण का मार्ग है।

(सवैया इकतीसा)

जाकै पद सोहत सुलच्छन अनंत-ग्यान, विमल-विकासवंत-ज्योति लहलही है।
यद्यपि त्रिविधरूप विवहार में तथापि, एकता न तजै यौं नियत-अंग कही है।।
सो है जीव कैसी हूँ जुगति के सदीव ताके, ध्यान करिबै कौं मेरी मनसा उनही है।
जाते अविचल-रिद्धि होत और भाँति सिद्ध, नाहीं नाहीं नाहीं यामैं धोखो नाहींसही है।। 21।।

शब्दार्थ :- जाकै पद सोहत सुलच्छन अनंत-ग्यान= जिसका, स्वरूप सुलक्षण अनंत-ज्ञान से शोभित है, विमल-विकासवंत-ज्योति लहलही है= निर्मल, विकासरूप/प्रकाश स्वरूप ज्योति जगमगा रही है, यद्यपि त्रिविधरूप विवहार में= फिर भी व्यवहार में तीनरूप हैं, तथापि एकता न तजै यौं नियत-अंग कही है= फिर भी एकता नहीं छोडता- ऐसा निश्चय-नय से कहा गया है, सो है जीव कैसी हूँ जुगति के सदीव ताके= ऐसा आत्मा किसी भी प्रकार से, किसी भी युक्ति से हमेशा उसका, ध्यान करिबैंकौं मेरी मनसा उनही है= ध्यान करने को मेरा मन हुआ है, जाते अविचल रिद्धि होत= इसके अडिग/एकटक ध्यान से ऋद्धि प्राप्त होती है, और भाँति सिद्धि नाहीं नाही, नाही= और किसी भी प्रकार लक्ष्य की प्राप्ति नहीं है, नहीं है, नहीं है, यामैं धोखो नाहीं सही

है= इसमें धोखा नहीं है, बिल्कुल सही है।
आत्मनश्चिन्तयैवालं मेचकामेचकत्वयोः। दर्शनज्ञानचारित्रैः साध्यसिद्धिर्न चान्यथा ।। 19।।

कथमपि समुपात्तत्रित्वमप्येकतायाः अपतितमिदमात्म-ज्योतिरुद््गच्छदच्छम्।
सततमनुभवामोऽनन्तचैतन्यd¨fÁ³fa। न खलु न खलु यस्मादन्यथा साध्यसिद्धिः।। 20।।

विशेषार्थ :- आत्मा के ज्ञान-गुण की श्रेष्ठता सिद्ध करते हुये कविवर कहते हैं कि जो अनंतज्ञानरूपी शुभ-लक्षण से सुशोभित है, जिसके निर्मल-ज्ञान की ज्योति प्रतिसमय प्रकाशवान् है, यद्यपि व्यवहारनय से वह ज्ञान, दर्शन, चारित्र तीनरूप से विद्यमान है, लेकिन फिर भी निश्चय-नय से तीनों-गुणों की एकता कभी भी भंग नहीं होती। आत्मा अनंत-लक्षणों या गुणों से विभूषित होने पर भी कवि ने ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ क्यों कहा? क्योंकि एकमात्र ज्ञान ही है, जो स्व और पर दोनों को, प्रकाशित करता है, त्रिकाल-ज्ञान से ही आत्मा जानने में आता है। जीव किसी भी गति में गमन करे उसे जाननेवाला एकमात्र ज्ञान ही है, इसीलिये कवि ने आत्मा को अनंत-ज्ञान से सुशोभित कहा। कविवर आत्मानुभूति की श्रेष्ठता का वर्णन करते हुये आगे कहते हैं कि मेरी बस एक ही इच्छा है कि ऐसी ज्ञानस्वरूप आत्मा की अनुभूति किसी भी प्रकार, किसी भी युक्ति से मुझे हो जाये, मेरा चित्त सदैव एकमात्र आत्मा का ध्यान करने के लिये लालायित है; क्योंकि इसी के यानि आत्मा के ध्यान से ही समस्त ऋद्धियों अर्थात् सुखों की प्राप्ति संभव है, अन्य किसी भी प्रकार से सुख की प्राप्ति संभव नहीं है! नहीं है! नहीं है!! यही सत्य है। इसमें कोई संदेह या भ्रम नहीं है।

(सवैया तेईसा)

कै अपनो पद आप संभारत, कै गुरु के मुख की सुनि बानी।
भेदविग्यान जग्यौ जिन्हिकै, प्रगटी सुविवेक-कला-रसधानी।।
भाव अनंत भये प्रतिबिंबित, जीवन-मोख-दसा ठहरानी।
तैं नर दर्पन-ज्यौं अविकार, रहैं थिररूप सदा सुखदानी।। 22।।

शब्दार्थ :- कै अपनो पद आप संभारत= या तो अपना स्वरूप अपने आप संभालते हैं, कै गुरु के मुख की सुनि बानी= या गुरु के मुख से वाणी सुनकर, भेदविग्यान जग्यौ जिन्हिकै= स्व-पर का ज्ञान जिनके जागृत हुआ है, प्रगटी सुविवेक-कला-रसधानी= सुंदर विवेकपूर्ण-निर्णय की शक्ति प्रगट हुई है, भाव अनंत भये प्रतिबिंबित= अनंत-परिणाम झलकने लगे, जीवन-मोख दसा ठहरानी= जीवन-मुक्त स्थिति प्राप्त हुई, ते नर दर्पन-ज्यौं अविकार= वे जीव दर्पण की तरह अविकारी, रहैं थिररूप= स्थिर रूप रहते हैं, सदा सुखदानी= हमेशा सुखदायक-दशा। विशेषार्थ :- ज्ञानी-जीव की स्थिति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि या तो वे स्वयं अपने आत्मस्वरूप का चिंतन करते हैं, या गुरु के मुख से जिनेन्द्र की वाणी सुनकर अपने परिणामों को स्थिर करते हैं। उनके हृदय में भेदविज्ञान करने की कला प्रगट हुई है, जिससे स्व-पर के निर्णय की अद्भुत-कला जागृत हुई है, अर्थात् अब उन्हें आत्मस्वरूप का निर्णय/ आत्मानुभूति हो चुकी है। ऐसे ज्ञानी-जीवों को अनंत-भाव प्रतिबिंबित होने पर भी उन जीवों की स्थिति जीवन-मुक्त (वेदांत-दर्शन में जो जीव शरीर से तो सहित हैं, किंतु दुष्कर्मों से मुक्त हो चुके हैं, उन्हें ‘जीवन-मुक्त’ कहा गया है) के समान ही है। वे ज्ञानी-जीव स्वभाव में स्थिरता के विपरीत-परिस्थितियों के होने पर भी दर्पण के समान निर्विकार रहते हैं। और अपने स्वरूप में स्थिर रहकर अनंत-सुख में केलि या रमण करते हैं। उपर्युक्त-पंक्तियों में कवि ने ज्ञानी जीव की परिणति को दर्पण के माध्यम से अभिव्यक्त किया

कथमपि हि लभन्ते भेदविज्ञानमूला-मचलितमनुभूतिं ये स्वतो वान्यतो वा।
प्रतिफलन-निमग्नाऽनन्त-भाव-स्वभावै-र्मकुरवदविकारा संततं स्युस्त एव।। 21।।

है। जिसप्रकार दर्पण के सामने कैसा भी पदार्थ झलके, अच्छा-बुरा, गंदा-साफ, दर्पण की निर्मलता पर कोई फर्क नहीं पड़ता, ठीक उसीप्रकार जिन जीवों को प्रतिसमय स्वरूप की महिमा और उसके अतीन्द्रिय आनंद का रसास्वादन होता है, संयोगजन्य अनेकों विकार रहते हुये भी उनका ज्ञान हमेशा दर्पणवत् अविकारी ही रहता है, और वे निरन्तर अपने स्वरूप की मस्ती में ही केलि करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

याही वर्तमान-समै भव्यनि कौ मिटौ मोह, लग्यौ है अनादि कौ पग्यौ है कर्ममल-सौं।
उदै करै भेदज्ञान महारुचि कौ निधान, उरकौ उजारौ भारौ न्यारौ दुंद-दल-सौं।।
जातैं थिर रहै अनुभौ विलास गहै फिरि, कबहूँ अपनपौ न कहै पुदगल-सौं।
यहै करतूति यौं जुदाई करै जगत्-सौं, पावक ज्यौं भिन्न करै कंचन उपलसौं।। 23।।

शब्दार्थ :- याही वर्तमान-समै= इसी वर्तमान समय में, भव्यनि कौ मिटौ मोह= भव्य-जीवों का मोह मिट गया, लग्यौ है अनादि कौ= (जो) अनादिकाल से लगा हुआ था, पग्यौ है कर्ममल-सौं= कर्मरूपी मल/गंदगी से रचा-पचा है, उदै करै भेदज्ञान= भेदविज्ञान का उदय होने से, महारुचि कौ निधान= दृढ़-श्रद्धानरूपी रुचि का खजाना, उरकौ उजारौ भारौ= हृदय का बहुत उजाला, न्यारौ दुंद-दल-सौं= संशय और द्वंद/दुविधा के समूह से भिन्न, जातैं थिर रहै= जिससे स्वरूप में स्थिर रहे, अनुभौ-विलास गहै= अनुभूति का आनंद ग्रहण करते हैं, फिरि कबहूँ अपनपौ न कहै पुदगल-सौं= फिर कभी पुद््गल को अपना नहीं कहते, यहै करतूति यौं जुदाई करैं जगत् सौं= इसप्रकार यही प्रक्रिया जगत् से भिन्न करती है, पावक ज्यौं भिन्न करै कंचन उपलसौं= जिसप्रकार अग्नि सोने को स्वर्ण-पाषाण से भिन्न करती है। विशेषार्थ :- भेदज्ञान की महिमा बताते हुये कविवर कहते हैं कि अनादिकाल से जीव के साथ अष्टकर्मरूपी-मल लगा हुआ है, अर्थात् कर्म और जीव का संयोग-संबंध अनादिकाल से है, और जीव भी अनादि से ही इन कर्मों के साथ रचा-पचा है, अर्थात् इनको ही जीव ने अपना मान रखा है, कविवर कहते हैं कि वह मोहादिरूप कर्ममल इसी वर्तमान समय में अर्थात् इसी मनुष्यभव में मिट जाये। और उनके हृदय में भेदविज्ञानरूपी सूर्य का उदय हो, जिसके प्रकाश से संशयरूपी अंधकार का समूल विनाश हो, आत्मस्वरूप का दृढ़ श्रद्धान हो और आत्मज्ञान का प्रकाश हो। भेदज्ञान की प्रक्रिया को एक सुंदर-उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करते हुये कविवर कहते हैं कि एकबार भेदज्ञानपूर्वक स्वरूप का निर्णय होने पर जीव स्वरूप में स्थिर रहने का पुरुषार्थ करता है, और अात्मिक-आनंद का स्वाद लेता है, फिर वह कभी पुद््गल यानि शरीरादि समस्त-परपदार्थों को अपना नहीं मानता। भेदज्ञान की यह प्रक्रिया जीव को संसार से ठीक वैसे ही भिन्न कर देती है, जैसे अग्नि कालिमा-सहित स्वर्ण-पाषाण में से स्वर्ण और कालिमा को भिन्न-भिन्न कर देती है।

(सवैया इकतीसा)

बनारसी कहैं भैया भव्य! सुनौ मेरी सीख, कैंहूं भाँति कैसैहूंकै ऐसो काजु कीजिये।
एकहू मुहूरत मिथ्यातकौ विधुंस होइ, ग्यानकौं जगाइ अंस-हंस खोजि लीजिये।।
त्यजतु जगदिदानीं मोहमाजन्म-लीढम्, रसयतु रसिकानां रोचनं ज्ञानमुद्यत्।
इह कथमपि नात्माऽनात्मना साकेमेकः, किल कलयति काले क्वापि तादात्म्य-वृत्तिम् ।। 22।।

अयि कथमपि मृत्वा तत्त्वकौतूहली सन्-ननुभव भवमूर्तेः पार्श्ववतीं मुहूर्त्तम्।
पृथगथ विलसंतं स्वं समालोक्य येन, त्यजसि झगिति मूत्यार् साकमेकत्वमोहम् ।। 23।।

वाही कौ विचार वाको ध्यान यहै कौतूहल, यौंही भरि जनम परम-रस पीजिये।
तजि भव-वासकौ विलास सविकाररूप, अंतकरि मोहकौ अनंतकाल जीजिए।। 24।।

शब्दार्थ :- बनारसी कहैं भैया भव्य सुनौ मेरी सीख= बनारसीदास जी कहते हैं भाई भव्यजीव! मेरी बात सुनो! कैंहूं भाँति कैसैहूंकै एकहू मुहूरत ऐसो काज कीजिये= किसी भी प्रकार से कैसे भी करके एक मुहूर्त के लिये ही सही ऐसा कार्य करो कि, मिथ्यातकौ विधुंस होइ= मिथ्यात्व का विनाश हो जाये और, ग्यानकौ जगाइ अंस-हंस खोज लीजिए= ज्ञान को जागृतकर आत्मा का अंश/आत्मानुभूति ढूँढ लीजिए, वाही कौ विचार= उसी का चिंतन, वाको ध्यान= उसी का ध्यान, यहै कौतूहल= ऐसा अद्भुत-कार्य, यौंही भरि जनम परम-रस पीजिये= इसप्रकार जीवनभर परम-रस/आत्मिक-आनंद का पान करो, तजि भव-वासकौ विलास सविकाररूप= संसार में निवास के विलास के विकारी रूप को छोड़कर, अंतकरि मोह कौ= मोह का अंत करके, अनंतकाल जीजिये= अनंतकाल तक जीवित रहो। विशेषार्थ :- साधर्मी-वात्सल्य की सुंदर-अभिव्यक्ति करते हुये कविवर कहते हैं कि ‘‘भाई भव्य! मेरी बात सुनो, तुम किसी भी तरह, कैसे भी करके एक मुहुर्त अर्थात् पौने अड़तालीस मिनिट के लिये बस एक काम कर लो कि इस मिथ्यात्व-बैरी का विनाश हो जाये, और आत्मज्ञान का अंश प्रकट हो जिससे आत्मस्वरूप की खोज/अनुभूति हो जाये।’’ उस आत्मिक-खोज का फल बताते हुये कविवर कहते हैं कि फिर एकमात्र उसी का यानि आत्मस्वरूप का चिंतन और उसी का ध्यान करना, ऐसा अद्भुत-कार्य करने पर हे आत्मन्! तुम्हें जीवनभर उसके आनंद का रसास्वादन होता रहेगा। और तुम संसार का निवास छोड़कर अर्थात् जन्म-मरण का चक्र और मोह-राग-द्वेषादि समस्त विकारी-भावों को भी छोड़कर अर्थात् इनका भी नाशकर अनंतकाल तक आत्मिक-आनंद का रसास्वादन करते हुये शाश्वत, अविनाशी सिद्ध-पद को प्राप्त कर लोगे। कवि के द्वारा लिखित इन पंक्तियों में कवि के हृदय की सरलता और सरसता की सुंदर झलक दिखाई दे रही है। जैसे लौकिक में भी जब हमें कुछ हितकारी-जानकारी प्राप्त होती है, तो उसे हम अपने परिजनों और मित्रों के बीच अवश्य साझा करते हैं, फिर यहाँ तो कवि को भव-बंधन के भयंकर दुःखों से छूटने का और अतीन्द्रिय-आनंद की खोज का मार्ग मिला, तो फिर ये बात संसार के घोर-दुःखों से पीड़ित, और आत्म-सुख के रसिक-जीवों को भी क्यों न बतायी जाये? कवि की ऐसी हार्दिक-उत्सुकता इन पंक्तियों में परिलक्षित हो रही है। हे आत्मन्! तुम कैसे भी, कुछ भी करके बस एक मुहूर्त के लिये पुरुषार्थ करके मिथ्यात्व का विनाश कर दो। लेकिन कवि ने ऐसा क्यों कहा? क्योंकि पहली-बात, जब तक मिथ्यात्व का विनाश नहीं होगा मोक्षमार्ग की शुरूआत भी नहीं होगी, और दूसरी-बात, यदि वास्तव में उपयोग अंतर्मुर्हुत के लिये स्वरूप में ठहर गया, तो अनंतकाल तक मात्र सुख ही सुख का वेदन होगा। और जन्म-मरण के भयावह-दुःखों से सदा के लिये छुटकारा मिल जायेगा।

(सवैया इकतीसा)

जाके देह-द्युतिसौं दसों दिसा पवित्र भई, जाके तेज-आगैं सब तेजवंत रुके हैं।
जाकौ रूप-निरखि थकित महारूपवंत, जाकी वपु-वाससौं सुवास और लुके हैं।।
जाकी दिव्यधुनि सुनि श्रवण कौं सुख होत, जाके तन-लच्छन अनेक आइ ढुके हैं।
तेई जिनराज जाके कहे विवहार-गुन, निहचै-निरखि सुद्ध-चेतनसौं चुके हैं।। 25।।

शब्दार्थ :- जाके देह-द्युतिसौं= जिसके शरीर की चमक/कांति से, दसों दिसा पवित्र भई हैं= दशों दिशायें पवित्र हो गई है, जाके तेज आगैं सब तेजवंत रुके हैं= जिसके तेज/आभा के सामने सभी आभावान्-पदार्थ फीके पड़ जाते हैं, जाको रूप-निरखि थकित महारूपवंत= जिसके रूप/सौन्दर्य को देखकर महान्-सौन्दर्य के धारी भी शिथिल या उत्साह-विहीन पड़ जाते हैं, जाकी वपु-वाससौं सुवास और लुके हैं= जिस शरीर की गंध से सभी सुगंधित-पदार्थ लज्जित होकर छिप जाते हैं, जाकी दिव्यधुनि सुनि= जिसकी दिव्यध्वनि को सुनकर, श्रवण कौं सुख होत= कानों को को सुख होता है, जाके तन-लच्छन अनेक आइ ढुके हैं= जिसके शरीर में अनेक शुभ-लक्षण स्वयं आकर विराजमान हैं, तेई जिनराज= वे जिनेन्द्र देव, जाके कहे विवहार-गुण= जिनके व्यवहार से अनेक गुण कहे गये हैं, निहचै निरखि= निश्चय से देखें, सुद्ध-चेतनसौं चुके हैं= (ये सभी गुण) शुद्ध-आत्मा से भिन्न हैं। विशेषार्थ :- समवसरण में साक्षात् विराजमान तीर्थंकर-परमात्मा के बाह्य-स्वरूप की स्तुति करते हुये कविवर कहते हैं कि जिनके परम-औदारिक शरीर की चमक से अर्थात् निर्मलता से दशों-दिशायें पवित्र हो गई हैं, क्योंकि तीर्थंकर-परमात्मा का शरीर जन्म से ही धवल-रुधिर और मल-मूत्र-पसीना आदि से रहित पूर्ण-निर्मल होता है। जिनके तेज या आभा के सामने समस्त आभावान्-पदार्थ फीके पड़ जाते हैं, उनके शरीर के तेज से स्वत: ही ‘भामंडल’ की रचना होती है, जिसमें भव्यजीवों को अपने सात भव दिखाई देते हैं। उनका शरीर ‘समचतुरस्र-संस्थान’ रूप होने से अतिसुंदर होता है, जिसके सामने जगत् के सभी सुंदर-पदार्थ थक जाते हैं अर्थात् सौन्दर्य-विहीन हो जाते हैं, जिनके शरीर की सुगंध को देखकर समस्त सुगंधित-पदार्थ स्वयं ही छिप जाते हैं। जिनकी दिव्यध्वनि को सुनकर कानों को या सुननेवालों को वचनातीत-सुख की प्राप्ति होती है, क्योंकि वहाँ उपस्थित सभी जीवों को अपनी-अपनी भाषा में समझ आती है, यदि जीव भावपूर्वक सुनें तो अनंतकाल के लिए सुखी हो जाता है। जगत् में जितने भी शुभ-लक्षण विद्यमान हैं, वे सभी उनके औदारिक-शरीर के सामने स्वयं ही आकर झुक जाते हैं, अर्थात् भगवान् का शरीर समस्त शुभ-लक्षणों से संपन्न होता है। लेकिन हे आत्मन्! ये सभी गुण तो जिनेन्द्र-परमात्मा के व्यवहार से कहे गये हैं, क्योंकि ये तो इस जड़ पौद्गलिक-शरीर की विशेषतायें हैं, जो आत्मस्वरूप में स्थिरता होने से स्वत: ही उत्पन्न होती है। निश्चय से देखा जाये तो तीर्थंकर-परमात्मा पूर्ण-शुद्ध अनंत-गुणों की खान है, जो इन जड़-शरीर के या व्यवहार-गुणों से सर्वथा-भिन्न हैं।

(सवैया इकतीसा)

जामैं बालपनौ तरुनापौ वृद्धपनौ नाहिं, आयु-परजंत महारूप महाबल है।
बिना ही जतन जाके तन मैं अनेक गुन, अतिसै-विराजमान काया निर्मल है।।
जैसे बिनु-पवन समुद्र अविचलरूप, तैंसे जाकौ मन अरु आसन अचल है।
ऐसौ जिनराज जयवंत होउ जगत् में, जाकी सुभगति महा-सुकृत को फल है।। 26।।

कान्त्यैव स्नपयन्ति ये दशदिशो धाम्ना निरुन्धन्ति ये, धामोद्दाम-महस्विनां जन-मनो मुष्णन्ति रूपेण च। दिव्येन ध्वनिना सुखं श्रवणयोः साक्षात्क्षरन्तोऽमृतम्, वन्द्यास्तेऽष्टसहसर्-लक्षणधरास्तीर्थेश्वराः सूरय: ।। 24।। नित्यमविकार-सुस्थित-सर्वांगमपूर्व-सहज-लावण्यम्। अक्षोभमिव समुद्रं जिनेन्द्ररूपं परं जयति ।। 25।। शब्दार्थ :- जामैं बालपनौ तरुनापौ वृद्धपनौ नाहिं= जिसमें बाल्यावस्था, तरुणावस्था, वृद्धावस्था नहीं है, आयु-परजंत महारूप महाबल है= आयुपर्यंत सर्वांग-सुंदर, अनंतबल के धनी, बिना ही जतन जाके तनमैं अनेक गुन= बिना किसी प्रयत्न के जिसके शरीर में अनेक-गुण हैं, अतिसै-विराजमान काया निर्मल= अतिशय सहित विराजमान हैं, शरीर भी मलरहित है, जैंसे बिनु-पवन समुद्र अविचलरूप= जिसप्रकार हवा के वेग से समुद्र चलायमान नहीं होता, तैंसे जाकौं मन अरु आसन अचल है= उसीप्रकार जिनका मन और मुद्रा स्थिर है, ऐसौ जिनराज जयवंत होउ जगत् में= ऐसे जिनेन्द्रदेव संसार में जयवंत होवें, जाकी सुभगति= जिनकी श्रेष्ठभक्ति करना, महा-सुकृत को फल है= महान् पुण्य का फल है। विशेषार्थ :- इस छंद के माध्यम से कवि ने तीर्थंकर-परमात्मा की सुंदर, महाबलशाली, निर्मल-काया का बहुत ही सुंदर-वर्णन किया। जो बाल-युवा-वृद्धपने से रहित जन्म से लेकर मोक्ष प्राप्त करने तक सदाकाल एक जैसी ही रहती है। हम संसारी-प्राणी अपनी काया को सुंदर बनाने के लिये क्या-क्या जतन करते हैं, फिर भी हम उसे सुंदर नहीं बना पाते। जब कि तीर्थंकर-परमात्मा ‘अंतरंग में उपयोग की निर्मलता’ और बाहर में उसकी आनुषंगिक पुण्य-प्रकृतियाँ स्वयं अपना अतिशय-वैभव प्रकट करती है। अायु-पर्यंत अर्थात् जन्म से लेकर मोक्ष प्राप्त करने तक महारूपवान और महान् बल के धारी होते हैं। बिना किसी बाहरी-प्रयत्न के, केवल महान् पुण्य के उदय से उनके शरीर में अनंत अतिशयात्मक-गुण विद्यमान होते हैं, उनकी काया परम-पवित्र होती है। जगत् में पवन/हवा के वेग को बलशाली माना गया है; क्योंकि वह अपने वेग से मनुष्य, मकान, वृक्ष आदि बहुत सी सामग्री को उड़ाकर ले जाने की सामर्थ्य रखती है; परन्तु जिसप्रकार हवा का तीव्रवेग अविचल-समुद्र को चलायमान नहीं कर सकता, ठीक उसीप्रकार ये पुण्य-प्रकृतियों के उदय की अनुकूलताजन्य-सुसंयोग तीर्थंकर-परमात्मा के चित्त और आसन को चलायमान नहीं कर सकते हैं। कविवर कहते हैं कि ऐसे तीर्थंकर-परमात्मा संसार में सदा जयवंत होवें। ऐसे परमात्मा की पूजा-भक्ति का सुअवसर मिलना अतितीव्र-पुण्य का फल है। यद्यपि हम सभी इतने तीव्र-पुण्य के धनी तो नहीं हैं कि हमें यहाँ पंचमकाल में साक्षात् तीर्थंकर-परमात्मा का समागम मिलता, लेकिन फिर भी हम सौभाग्यशाली है कि तीर्थंकर-परमात्मा की वाणी आज आचार्यों और ज्ञानियों के माध्यम से हमें प्राप्त है, हम चाहें तो आज भी अपने कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। इसीलिये तो ज्ञानियों ने कहा है - यदि अवसर चूका तो, भव-भव पछतायेगा। फिर काल अनंत अरे! दुःख का घन छायेगा।।

(दोहा)

जिनपद नाहीं शरीरकौ, जिनपद चेतन-माँहि।
जिन-वर्नन कछु और है, यह जिन-वर्नन नाहिं।। 27।।

शब्दार्थ :- जिनपद नाहीं शरीर कौ= जिन-पद शरीर का नाम नहीं है, जिनपद चेतनमाँहि= जिनेन्द्र का पद तो चैतन्य-स्वरूप आत्मा है, जिनवर्नन कछु और है= जिनेन्द्र का वर्णन कुछ और है, यह जिनवर्नन नाहिं= यह (देह का वर्णन) जिनेन्द्र का वर्णन नहीं है। विशेषार्थ :- जिनेन्द्र-परमात्मा के वास्तविक-स्वरूप का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि हे आत्मन्! वास्तव में ‘जिनेन्द्र परमात्मा’ यह इस शरीर का नाम नहीं है, जिसका वर्णन मैंने उपर्युक्तपंक्तियों में किया। ‘जिनेन्द्र परमात्मा’ नाम तो उस चेतन-आत्मा का है जो कर्म-मल से रहित परमशुद्ध, अनंत-गुणों का धारी है। तीर्थंकर-परमात्मा के बाहरी-वैभव का जो वर्णन मैं ने किया वास्तव में देखा जाये, तो ये जिनेन्द्र का वर्णन है ही नहीं, जिनेन्द्रदेव का वर्णन तो इससे पूर्ण-भिन्न है।‘’ ऐसा क्यों? जिन/जिनेन्द्र/जितेन्द्रिय ये सभी शब्द पर्यायवाची हैं। जिनका अर्थ है- जिसने इन्द्रियों को जीता, सो जिन है। बाहरी-वैभव से जिनेन्द्र की पहचान नहीं है, क्योंकि ये बाहरी-वैभव तो पुण्य-प्रकृति का खेल है, जो मोक्ष-प्राप्ति में बाधक है; इसीलिये इसे छोड़कर ही तीर्थंकर-परमात्मा सिद्ध-परमात्मा बनते हैं। और उस अविनाशी, शाश्वत सिद्ध-पद के सामने इस तुच्छ जड़-वैभव का कोई मूल्य नहीं है।

(सवैया इकतीसा)

ऊँचे-ऊँचे गढ़ के कंगूरे यौं विराजत हैं, मानौं नभलोक-गीलवे कौं दाँत दीयौ है।
सोहै चहूँओर उपवन की सघनताई, घेरा करि मानौ भूमिलोक घेरि लीयौ है।।
गहिरी गंभीर-खाई ताकी उपमा बनाई, नीचौ करि आनन पताल-जल पीयौ है।
ऐसो है नगर यामैं नृप को न अंग कोऊ, यौंही चिदानन्दसौं सरीर भिन्न कीयौ है।। 28।।

शब्दार्थ :- ऊँचे-ऊँचे गढ़ के कंगूरे यौं विराजत हैं= उन्नत/विशाल महल के कंगूरे इसप्रकार शोभायमान हैं, मानों नभलोक गीलवें कौं दांत दीयौ है= मानो आकाशलोक को लीलवे/अपने अंदर समेटने को दाँतों की रचना की हो, सौंहें चहुंओर उपवन की सघनताई= चारों ओर बगीचे की सघनता ऐसे सुशोभित हो रही है कि, मानौ भूमिलोक घेरि लीयौ है= मानो उसने सम्पूर्ण पृथ्वीलोक को घेर लिया हो, गहिरी गंभीर-खाई= गहरी विकट-खाई, ताकी उपमा बनाई= जो ऐसी लगती है, नीचौ करि आनन पताल-जल पीयौ है= कि मानो मुँह नीचा करके पाताल का जल पी लिया हो, ऐसौ है नगर यामैं नृप को न अंग कोऊ= ऐसा नगर है, जिसमें राजा या उसके कोई अनुचर नहीं हैं, यौंही चिदानन्दसौं सरीर भिन्न कीयौ है= उसीप्रकार चेतन-आत्मा से शरीर अलग किया/अनुभवा है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि जिसप्रकार नगर का वर्णन राजा का वर्णन नहीं, ठीक उसीप्रकार शरीर के सौंदर्य का वर्णन तीर्थंकर-परमात्मा का वर्णन होने पर भी वास्तव में उनका वर्णन नहीं है, क्योंकि तीर्थंकरत्वपने की पूज्यता शरीर से नहीं आत्मिक-गुणों से है। कवि ने कल्पना की है कि जैसे किसी नगर में बहुत सुंदर-सुंदर महल बने हो, जिसकी मुंडेरों पर सफेद-पत्थरों को तराशकर ऊँचे-ऊँचे सुंदर कंगूरे बनाये गये हों। उनकी विशालता देखकर ऐसा लगता है कि मानो सारे आकाश को लीलने को दाँत गढ़े गये हों अर्थात् सारे आकाश को अपने अंदर ही समेटने को तैयार हों। नगर के चारों और सुंदर-सुंदर घने पेड़-पौधे के बगीचे बने हुये हैं, जिन्हें देखकर एेसा लगता है मानो उपवनों की सुंदर-आकृति ने मिलकर पृथ्वीलोक को चारों ओर से घेर लिया है। उस नगर में गहरी और विकट खाई बनी हों, जिन्हें देखकर एेसा लगता है मानो उस खाई रूपी मुँह को नीचा करके वह नगर पाताललोक का जल पी रहा हो। लेकिन जिसप्रकार नगर की सुंदरता का वर्णन करने पर राजा का वर्णन नहीं होता, जबकि वह नगर उस राजा का ही है, उसी की पहचान है, कहा भी जाता है कि ये अमुक-राजा का नगर है, लेकिन फिर भी वह वर्णन उस राजा का नहीं है। ठीक उसीप्रकार ये समस्त वैभव तीर्थंकर का ही है, तीर्थंकर की ही पहचान है, लेकिन फिर भी तीर्थंकर का स्वरूप इससे पूर्णत: भिन्न है, ठीक उसीप्रकार जैसे शरीर और आत्मा भिन्न-भिन्न हैं। तीर्थंकर के शरीर प्राकार-कवलितांबरमुपवन-राजी-निगीर्ण-भूमितलं। पिबतीव हि नगरमिदं परिखा-वलयेन पातालम् ।। 26।। का वर्णन पुण्य- प्रकृतियों का वर्णन है, जबकि तीर्थंकर का वर्णन पुण्य-पाप से सर्वथा-रहित चेतनस्वरूप भगवान् आत्मा का वर्णन है।

(सवैया इकतीसा)

जामैं लोकालोक के सुभाव-प्रतिभासे सब, जगी ग्यान-सकति-विमल जैसी आरसी।
दर्सन उद्योत लीयौ, अंतराय अंत कीयौ, गयौ महा-मोह, भयौ परम-महारसी।।
सन्यासी सहज-जोगी जोगसौं उदासी जामैं, प्रकृति-पचासी लग रही जरि छार-सी।
सोहै घट-मंदिरमें चेतन प्रगट-रूप, ऐसौ जिनराज ताहि बंदत बनारसी।। 29।।

शब्दार्थ :- जामैं लोकालोक के सुभाव-प्रतिभासे सब= जिसमें समस्त लोकालोक का स्वाभाविक-प्रतिभास होता है, जगी ज्ञान-सकति-विमल जैसी आरसी= दर्पण जैसी निर्मल-ज्ञान-शक्ति जागृत हुई है, दर्सन उद्योत लीयौ, अंतराय अंत कीयौ= अनंत-दर्शन प्रकट किया, अंतराय-कर्म को नष्ट किया, गयौ महामोह, भयौ परम महारसी= विकट मोहनीय-कर्म नष्ट हुआ और परम-रस के धनी हुये, सन्यासी सहज-जोगी= जो सन्यासी हैं और सहज-योग के धारक योगी हैं, जोगसौं उदासी= (मन-वचन-काय की चंचलता रूप) योगों से उदासीन हैं, जामैं प्रकृति पचासी= जिसमें पच्चासी (85) कर्मप्रकृतियाँ, लगि रहीं जरी छार-सी= जली हुई रस्सी की राख के जैसी लग रही हैं, सोहै घट-मंदिर में चेतन प्रगटरूप= देहरूपी मंदिर में चेतन-स्वरूप भगवान् आत्मा प्रकट रूप में शोभायमान है, ऐसो जिनराज ताहि बंदत बनारसि= ऐसे जिनेन्द्रदेव को बनारसीदास वंदन करते हैं। विशेषार्थ :- जिनेन्द्र-परमात्मा के घातिया-कर्मों के क्षय और अनंत-चतुष्टय प्रकट होने की सुंदर- विवेचना करते हुये कविवर कहते हैं कि जिनको सहज अपने स्वरूप की स्थिरतापूर्वक कर्मों का अभाव होने से निर्मल-केवलज्ञान प्रकट हुआ है। यह केवलज्ञान दर्पण के समान निर्मल है, जिसप्रकार दर्पण में पदार्थ अच्छा हो या बुरा, ज्यों का त्यों झलकता है, ठीक उसीप्रकार भगवान् के ज्ञान में तीनों-लोक तीनोंकाल के समस्त द्रव्य-गुण और पर्याय युगपत् हाथ पर रखे आँवले की तरह यथावत् स्पष्ट झलकते हैं। ज्ञानावरणी का क्षय होने से ‘केवलज्ञान/अनंतज्ञान’ और दर्शनावरणी का क्षय होने से ‘केवलदर्शन/ अनंतदर्शन’ प्रकट हुआ है और अंतराय-कर्म का पूर्ण-क्षय होने से ‘अनंतवीर्य’ प्रकट हुआ है। महामोह अर्थात् कर्मों का राजा मोहनीय-कर्म का क्षय होने से जिनेन्द्र-परमात्मा परम-आनंद-रस अर्थात् ‘अनंतसुख’ के धनी है। इसप्रकार केवली-परमात्मा को चारों घातिया-कर्मों का क्षय हो जाने से ‘अनंतचतुष्टय’ प्रकट हुये हैं। यही तीर्थंकर-परमात्मा/ जिनेन्द्रदेव का वास्तविक-स्वरूप है। संसार में रहते हुये भी सन्यासी अर्थात् संसार से पूर्ण-विरक्त रहते हैं, संसार की कोई भी क्रियाप्रतिक्रिया उन्हें बाधित नहीं करती। मन-वचन-काय तीनों योगों के होने के बावजूद भी योगों से उदासीन अर्थात् विरक्त ही रहते हैं। घातिया-कर्मों का तो क्षय हो चुका है, परन्तु अघातिया-कर्मों की 85 प्रकृतियों का सद्भाव रहता है, लेकिन उनकी उपस्थिति ठीक वैसे ही है, जैसे जली हुई रस्सी की राख हो। जलने के बाद भी उसमें वो एेंठ या बल तो दिखाई देते हैं, किंतु अब उन बलों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता, यानि उसमें अब रस्सी जैसी सामर्थ्य नहीं रहती; ठीक उसीप्रकार तीर्थंकर-परमात्मा के शरीर व अघातियाकर्मों का सद्भाव तो होता है, पर उनका अस्तित्व जली-जेवरी की तरह बलहीन ही होता है, अर्थात् उनकी उपस्थिति प्रभाव-विहीन ही रहती है। उनका उपयोग तो एकमात्र देहरूपी-मंदिर में विराजमान चेतनदेव में ही लीन रहता है, ऐसे तीर्थंकर-परमात्मा को बनारसीदास मन,वचन,काया से वंदन करते हैं। यद्यपि आगम में केवलज्ञान की तुलना दर्पण से की गई है। लेकिन दर्पण का उदाहरण सिर्फ, केवलज्ञान की निर्मलता को ही सिद्ध करता है, स्व-पर-प्रकाशीपने को नहीं। जब कि केवली का ज्ञान निर्मलता के साथ-साथ स्व-पर-प्रकाशक भी हैं। दर्पण केवल अपने सामने आनेवाले पदार्थ को प्रकाशित करता है, अन्य को नहीं; जबकि केवलज्ञान में संपूर्ण-लोकालोक झलकता है। वास्तव में देखा जाये; तो यह है तीर्थंकर/केवली का स्वरूप। ऐसे वीतरागी-सर्वज्ञ-परमात्मा को बनारसीदास जी सादर वंदन करते हैं।

(कवित्त)

तन-चेतन विवहार एक से, निहचै भिन्न-भिन्न हैं दोइ।
तनकी थुति विवहार-जीवथुति, नियतदृष्टि मिथ्याथुति सोइ।।
जिन सो जीव, जीव सो जिनवर, तन-जिन एक न मानै कोइ।
ता कारन तन की संस्तुति सौं, जिनवर की संस्तुति नहिं होइ।। 30।।

शब्दार्थ :- तन-चेतन विवहार एक से= शरीर और आत्मा व्यवहार से एक है, निहचै भिन्न-भिन्न हैं दोइ= निश्चय से दोनों भिन्न-भिन्न हैं, तनकी थुति विवहार-जीवथुति= शरीर की स्तुति व्यवहार से जीव की स्तुति है, नियतदृष्टि मिथ्या-थुति सोइ= निश्चय या वस्तुस्वभाव की दृष्टि से वही स्तुति झूठी है, जिन सो जीव= जिनेन्द्र ही जीवरूप, जीव सो जिनवर= जीव ही जिनेन्द्र है, तन-जिन एक न मानै कोइ= शरीर और जिनेन्द्र को कोई एक नहीं मानता, ता कारन तन की संस्तुतिसौं= इसी कारण शरीर की संस्तुति से, जिनवर की संस्तुति नाहिं होइ= जिनेन्द्र की स्तुति नहीं होती है। विशेषार्थ :- व्यवहार की मुख्यता से जिनेन्द्र-परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि व्यवहार-नय से जिनेन्द्र की आत्मा और शरीर भले ही एक मानकर स्तुति की गयीं हैं, पर निश्चय-नय से देह और आत्मा- दोनों का स्वरूप भिन्न-भिन्न हैं। इसीलिये जिनेन्द्र-परमात्मा के शरीर की स्तुति को व्यवहारनय से तो जीव की स्तुति कहा जाता है, लेकिन जब हम वस्तु के स्वरूप का विचार करते हैं अथवा द्रव्यदृष्टि से कथन करते हैं, तब वही स्तुति मिथ्या सिद्ध होती है; क्योंकि वह वास्तव में जीव की स्तुति है ही नहीं। क्योंकि शरीर और बाह्य-वैभव का मिलना तो पुण्य के आधीन है, और ये पुण्यजनित-वैभव न तो जीव के साथ त्रिकाल रहता है और न ही मोक्ष-प्राप्ति में सहकारी है। जबकि आत्मिक-गुणों के प्रकट होने में जीव का अपना पुरुषार्थ है, और ये गुण सदाकाल जीव के साथ ही रहते हैं, इसीलिये वास्तव में वही ‘जिन’ का सच्चा-स्वरूप है। निश्चय-नय की मुख्यता से जो जिनेन्द्र-परमात्मा हैं, वही जीव है, और जो उनका जीव या आत्मा है, वही जिनेन्द्र-परमात्मा है। अर्थात् जिनेन्द्र-परमात्मा कहें या उनकी आत्मा कहें एक ही बात है, उनमें कोई भेद नहीं है, और जो जिनेन्द्र-परमात्मा का शरीर है, उसे ज्ञानियों ने जिनेन्द्र नहीं माना है। इसलिये जिनेन्द्रपरमात्मा के शरीर की स्तुति कितनी भी अच्छे से क्यों न की जाये, वह जिनेन्द्र-परमात्मा का स्तवन नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि जिनेन्द्र और जिनेन्द्र की आत्मा-ऐसी दो वस्तु नहीं है, अर्थात् उनमें कोई भेद नहीं है। पर्याय में भी परमशुद्ध-चेतनस्वरूप भगवान् आत्मा ही ‘जिन’ या ‘जिनेन्द्र’ हैं। ‘देवागम स्तोत्र’ में ‘आचार्य समन्तभद्र’ भी यही बात कहते हैं कि ‘‘हे भगवन्! आप आकाश में विराजते हो, छत्र-चमर-भामण्डल व समवसरणादि विभूतियों से विभूषित हो, सौ-सौ इन्द्र आपको एकत्वं व्यवहारतो न तु पुनः कायात्मनोर्निश्चया-न्नुः स्तोत्रं व्यवहारतोऽस्ति वपुष: स्तुत्या न तत्तत्त्वतः। स्तोत्रं नििश्चतो भवति चित्स्तुत्येव सैवं भवे-Âन्नातस्तीर्थंकरस्तवोत्तर-बलादेकत्वमात्माङ्गयोः।। 27।। नमस्कार करते हैं- इसलिये आप पूज्य नहीं हो! बल्कि आप अनंतज्ञानादि गुणों से सुशोभित परम वीतरागी हो, इसलिये आप पूज्य हो।’’ वही भाव बनारसीदास जी ने यहाँ व्यक्त किया है कि बाह्य-वैभव या शरीर की स्तुति जिनेन्द्र की स्तुति नहीं है। बल्कि जिस आत्मा ने अपने अनंत-गुणों को प्रकट किया, वास्तव में वह आत्मा ही परमात्मा है, और उसी की स्तुति ही जिनेन्द्र की स्तुति है।

(सवैया तेईसा)

ज्यों चिरकाल-गड़ी वसुधा-माँहि, भूरि-महानिधि अंतर-गूझी।
कोउ उखारि धरै महि-ऊपर, जे दृगवंत तिन्हें सब सूझी।।
त्यों यह आतम की अनुभूति, पड़ी जड़भाउ अनादि अरूझी।
नै-जुगतागम-साधि कही गुरु, लच्छन-वेदि विचच्छन-बूझी।। 31।।

शब्दार्थ :- ज्यों चिरकाल-गड़ी वसुधा-माँहि= जैसे बहुत समय से पृथ्वी में गहरे गड़ी हुई, भूरि-महानिधि अंतर-गूझी= अंतरंग में छिपी हुई अपार निधि/खजाना, कोउ उखारि धरै महि-ऊपर= कोई उखाड़कर/खोदकर निकालकर पृथ्वी के ऊपर रख दे तो, जे दृगवंत तिन्हें सब सूझी= जो आँखवाले/बुद्धिमान् हैं, उन सबको दिखाई देने लगती है, त्यों यह आतम की अनुभूति= वैसे ही यह आत्मा की अनुभूति, पड़ी जड़भाउ अनादि अरूझी= अनादिकाल से जड़भावों में उलझी हुई है, नै-जुगतागम-साधि कही गुरु= नय, युक्ति और आगम से सिद्ध करके गुरु/आचार्यों ने कही है, लच्छन-वेदि विचच्छन-बूझी= लक्षणों को जानकर ज्ञानी-जीवों ने बतायी या कही है। विशेषार्थ :- धरती में गुप्त-लक्ष्मी के उदाहरण के माध्यम से आचार्यों के द्वारा प्रतिपादित आत्मनिधि का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जैसे कोई पुरुष बहुत समय से जमीन में गढ़ा हुआ धन पुरुषार्थपूर्वक जमीन से बाहर निकालकर रख दे, तो वह छिपी हुई लक्ष्मी भी नेत्रधारियों को दिखने लगती है। नेत्रधारियों को दिखाई देने लगती है- एेसा कवि ने क्यों कहा? क्योंकि जमीन से निकलने पर भी वह लक्ष्मी एक अंधे-व्यक्ति को दिखाई नहीं देती, ठीक उसीप्रकार आचार्यों ने हम अज्ञानी-जीवों पर अत्यंत-करुणा करके हमारी निधि, अक्षय-सुख का खजाना न जाने कितने तर्क और युक्तियों से सिद्ध कर हमें दिखाया। आत्मानुभूति का मार्ग इतना सरल कर दिया कि हम जब चाहे उस आनंद की अनुभूति का रसास्वादन कर सकते हैं। लेकिन हमारी स्थिति तो उस अंधे व्यक्ति के समान है, जिसके सामने खजाना पड़ा है और वह उसे देख नहीं पा रहा है। ठीक उसीप्रकार यह आत्मसंपदा, जो अनादिकाल से अज्ञानता के कारण देहादि जड़-पदार्थों के नीचे दबी हुई थी/ छिपी हुई थी, जिसे लक्षणों के ज्ञाता अर्थात् आगम के वेत्ता आचार्यों और ज्ञानियों ने नय, युक्ति और आगम के आलोक में समझायी है।

(सवैया इकतीसा)

जैसे कोऊ जन गयौ धोबी के सदन तिन, पहिरयो परायौ-वस्त्र मेरौ मानि रह्यौ है।
धनी देखि कह्यौ ‘‘भैया! यह तो हमारौ-वस्त्र’’, चीन्हैं पहिचानत ही त्यागभाव लह्यौ है।।
इति परिचित-तत्त्वैरात्म-कायैकतायां, नयविभजन-युक्त्याऽत्यन्तमुच्छादितायाम्।
अवतरति न बोधो बोधमेवाद्य कस्य, स्वरस-रभसकृष्टः प्रस्फुटन्नेक एव।। 28।।

अवतरति न यावद््व‍‍‍‍‍ृत्तिमत्यन्तवेगा-दनवमपरभाव-त्याग-दृष्टान्त-दृष्टि:।
झटिति सकलभावैरन्यदीयैिर्वमुक्ता स्वयमियमनुभूतिस्तावदाविर्बभूव।। 29।।

तैसें ही अनादि पुदगलसौं संजोगी-जीव, संग के ममत्वसौं विभाव तामैं बह्यौ है।
भेदज्ञान भयौ अब आपा-पर जान्यौ तब, न्यारौ परभाव से स्वभाव निज गह्यौ है।। 32।।

शब्दार्थ :- जैंसे कोऊ जन गयौ धोबी के सदन= जैसे कोई व्यक्ति धोबी के घर गया, तिन पहिरयो परायौ वस्त्र मेरौ मानि रह्यौ है= उसने दूसरे का कपड़ा पहन रखा था और उसे अपना मान रहा था, धनी देखि कह्यौ ‘‘भैया! यह तो हमारौ वस्त्र’’= कपड़े के असली मालिक ने देखकर कहा ‘‘भाई! यह वस्त्र तो मेरा है’’, वस्त्रचीन्हैं पहिचानत ही त्यागभाव लह्यौ है= वस्त्र के लक्षण देखकर, पहिचानते ही त्यागभाव अंगीकार किया, तैंसे ही अनादि पुद््गलसौं संजोगी-जीव= उसीप्रकार अनादिकाल से पुद््गल के साथ संयोग होने से, जीव संग के ममत्वसौं विभाव तामैं बह्यौ है= जीव इसके प्रति ममत्वभाव से स्वभाव के विपरीत उसमें बह रहा है, भेदज्ञान भयौ अब आपा-पर जान्यौ तब= अब भेदज्ञान होने पर, जब स्व और पर को जाना उसी समय, न्यारौ परभाव स्वभाव निज गह्यौ है= परभावों से भिन्न अपना स्वभाव ग्रहण किया। विशेषार्थ :- धोबी के माध्यम से भेदज्ञान की प्राप्ति का सुंदर-वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जैसे कोई व्यक्ति धोबी के घर गया, और अपने वस्त्रों के बदले में दूसरे के वस्त्र ले आया। फिर उन्हें अपने वस्त्र मानकर पहनने लगा, लेकिन एक दिन उस कपड़े का असली मालिक मिला और उसने वस्त्र को देखते ही पहचान लिया, और कहने लगा कि ‘‘भाई! यह वस्त्र तो मेरा है’’, फिर जैसे ही उसकी नज़र वस्त्र पर पड़ी, लक्षण आदि से वह पहचान गया कि ‘हाँ, वास्तव में ये मेरा वस्त्र नहीं है’। यद्यपि अभी भी वह व्यक्ति उस वस्त्र को पहने हुये है, लेकिन जानकारी होने के बाद उसके भावों में उस वस्त्र का त्याग प्रतिसमय वर्त रहा है, अर्थात् वस्त्र पहिचानते ही ‘यह वस्त्र मेरा नहीं है’- ऐसा त्यागभाव वर्त रहा है। उसीप्रकार अनादिकाल से जीव और शरीरादि पुद््गल-पदार्थों का एकसाथ संयोग होने से जीव इन संयोगों में ममत्व करता आया है, अर्थात् इनको अपना मानता आया है, जिससे अपने ज्ञाता-दृष्टास्वभाव के विपरीत मोह-राग-द्वेषादि भावों रूप परिणमन कर रहा है। लेकिन जब आगम के अभ्यास से, ज्ञानियों के वचनों को सुनकर अनादिकाल से पड़ी ममत्वबुद्धि पर जिस क्षण प्रज्ञारूपी छैनी से वार होता है और स्व-पर का भेदविज्ञान होता है, उसी क्षण स्व का ग्रहण और पर का त्याग हो जाता है। फिर चाहे वह जीव इस शरीर और संयोगों के बीच कितने ही समय तक रहे, परन्तु उसके परिणाम जल से भिन्न कमल की तरह निर्मल ही रहते हैं। देहादिक की क्रिया होने पर भी परिणाम कीचड़ में पड़े स्वर्ण की शुद्धता की तरह निर्मल रहते हैं, अर्थात् देहादिक-संयोगों और आत्मा के बीच भेदज्ञान प्रतिसमय वर्तता है, यही सम्यग्दर्शन का स्वरूप और महिमा है।

(अडिल्ल छंद)

कहैं विचच्छन-पुरुष सदा मैं एक हूँ। अपने-रससौं भर्यौ आपनी टेक हौं।।
मोहकर्म मम नाहिं, नाहिं भ्रमकूप है। सुद्ध-चेतना-सिंधु हमारौ रूप है।। 33।।

शब्दार्थ :- कहैं विचच्छन-पुरुष सदा मैं एक हू=ँ विचक्षण-पुरुष हमेशा कहते हैं ‘मैं एक हूँ’, अपने रससौं भर्यौ आपनी टेक हौं= अपने ही रस से भरा हुआ अपने ही आश्रय से हूँ, मोहकर्म मम नाहिं नाहिं भ्रमकूप है= मोहादि कर्म मेरे में नहीं है, ना ही भ्रमरूपी कुँआ है, सुद्ध-चेतना-सिंधु हमारौ रूप है= निर्मल-चैतन्यरस से भरा

हुआ समुद्र (की तरह अपार व अगाध) ही हमारा रूप है।
सर्वत: स्वरस-निर्भरभावं चेतये स्वयमहं स्वमिहैकम्।
नास्ति नास्ति मम कश्चन मोहः शुद्धचिद्घन-महोनिधिरस्मि।। 30।।

विशेषार्थ :- आत्मा का सच्चा-स्वरूप वर्णित करते हुये कविवर कहते हैं कि विचक्षण-पुरुषों अर्थात् ज्ञानियों का कहना है कि ‘‘मैं त्रिकाल एक ज्ञान स्वभावी आत्मा हूँ, मैं अपने ही चैतन्यरस से लबालब भरा हुआ हूँ, और अपने ही आधार से रहता हूँ।’’ मोह-राग-द्वेषादि कर्म मेरे आत्मस्वरूप में नहीं है, ये पंचेन्द्रिय के विषय-भोग ‘भ्रम के कुँये’ के समान है। हे आत्मन्! तुम कहाँ भ्रम के कुँये में डुबकी लगा रहे हो, इन विषय-भोगों में सुख की कल्पना मृगतृष्णा के समान भ्रामक है। हे चेतन! क्यों मोह-राग-द्वेषादि भावों को अपना स्वरूप मानकर दुःखी होते हो, यह तेरा स्वरूप नहीं है। जैसे कुँये का पानी बहुत गहरा होता है, एकबार पानी लेने नीचे उतरे तो बाहर आने का कोई रास्ता नहीं मिलता; ठीक उसीप्रकार ये विषयभोग भी भ्रम का कुँआ है, जिसमें व्यक्ति डूबता चला जाता है। सुख की चाह में जैसे ही हमने अपना ज्ञायक-स्वभाव छोड़ा और इन मोहादि-भावों को अपना माना, तो फिर इनमें डूबते ही चले गये, जिसका फल कि अनादिकाल से संसार में आज तक डूबे ही हुये हैं, और चाहकर भी बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। इसीलिये ज्ञानीजन कहते हैं, ‘‘हे आत्मन्! ये तेरा स्वरूप नहीं है, तू तो चैतन्य के रस से भरा हुआ अथाह सागर है। जैसे सागर में जल अथाह है, ठीक उसीप्रकार भगवान् आत्मा अनंत-सुख का निधान है, जो अनंतकाल तक ऐसे ही रहनेवाला है। उसे किसी के सहारे की अपेक्षा नहीं है, वह तो अपने ही आधार से अपने ही स्वचतुष्टय में पूर्ण है और सदाकाल एेसे ही रहेगा। मोहादि-कर्मों ने तेरे स्वरूप को न कभी स्पर्श किया है, और न कभी स्पर्श कर सकते हैं, तू स्वयं ही भ्रम से इन्हें अपना मानता आया है। एकबार इस भ्रम के कुँये से बाहर तो निकल, अनंत-गुणों से लबालब समुद्र तेरे सामने है- यही तेरा वास्तविक स्वरूप है।’’

(सवैया इकतीसा)

तत्त्वकी प्रतीतिसौं लख्यौ है निज-परगुन, दृग-ज्ञान-चरन त्रिविध परिनयौ है।
विसद-विवेक आयौ आछौ विसराम पायौ, आपुही में आपनौ सहारो सोधि लयौ है।।
कहत बनारसि गहत पुरुषारथ कौं, सहज सुभावसौं विभाव मिटि गयौ है।
पन्ना के पकाये जैसे कंचन विमल होत, तैंसे सुद्ध-चेतन प्रकासरूप भयौ है।। 34।।

शब्दार्थ :- तत्त्वकी प्रतीतिसौं लख्यौ है निज-परगुन= सात-तत्त्व की सम्यक्-श्रद्धान होने से स्व और पर की पहिचान हुई, दृग-ज्ञान-चरन त्रिविध परिनयौ है= दर्शन, ज्ञान, चारित्र तीनरूप परिणमन हुआ, विसद-विवेक आयौ= निर्मल विवेक/भेदविज्ञान प्रकट हुआ, आछौ विसराम पायौ= अच्छा/उत्तम-विश्राम प्राप्त किया, आपुही मैं आपनौ सहारौ सोधि लयौ है= अपने में ही अपना सहारा खोज लिया है, कहत बनारसि गहत पुरुषारथ कौं= बनारसीदास जी कहते हैं, मैंने पुरुषार्थ को ग्रहण किया, सहज सुभासौं= सहज ही स्वभाव से, विभाव मिटि गयौ है= विभाव नष्ट हो गया है, पन्ना के पकाये= स्वर्णपत्र को पकाने पर, जैंसे कंचन विमल होत= जैंसे सोना शुद्ध होता है, तैंसें सुद्ध-चेतन प्रकासरूप भयौ है= वैसे ही शुद्धात्मा प्रकाशरूप/अनुभवगोचर हुआ है। विशेषार्थ :- सम्यग्दर्शन होने पर जीव की स्थिति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जीवादि सातों-तत्वों का सम्यक्-श्रद्धान होने से निज और पर अर्थात् स्व-पर का भेदविज्ञान-पूर्वक निर्णय हो गया, जिससे दर्शन-ज्ञान और चारित्र-तीनों गुण सम्यक्-रूप से परिणमित हो गये हैं। अब ज्ञान निर्मल होने से स्वयं ही अपने स्वरूप में पूर्ण-विश्राम मिल गया है, अब मुझे कहीं जाने की जरूरत नहीं है; क्योंकि

इति सति सह सर्वैरन्यभावैर्विवेके, स्वयमयमुपयोगो विभ्रदात्मानमेकम्।
प्रकटित-परमाथै-र्दर्शन-ज्ञान-वृत्तैः, कृत-परिणतिरात्माराम एव प्रवृत्तः।। 31।।

मैंने अपना सहारा स्वयं में ही खोज लिया है।

दर्शन-ज्ञान-चारित्र प्रत्येक जीव के स्वाभाविक-गुण हैं’, और त्रिकाल जीव के साथ ही रहते हैं। बस अंतर इतना है कि मिथ्यादृष्टि-जीव के इन्हीं गुणों का मिथ्यारूप परिणमन हो रहा है और सम्यग्दृष्टिजीव के इन्हीं गुणों का सम्यक् रूप परिणमन हो रहा है। जब भेदविज्ञानपूर्वक सात-तत्त्व का सम्यक् श्रद्धान होता है, तब स्व का ग्रहण और पर का त्याग होने से दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीनों गुण सम्यक् रूप से परिणमन करते हैं। जब निज-स्वभाव का ग्रहण होता है, अर्थात् जब उपयोग स्वरूप में ठहरता है, तब मोहादि विकारीभाव तो स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं, उनको नष्ट करने का पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता; क्योंकि विकारी-भावों की उत्पत्ति का कारण ही स्वरूप में अस्थिरता है। यानि हम बस एकबार स्वरूप की महिमा और अनुभति ू का पुरुषार्थ कर ले, बाकी सारे कार्य तो स्वयं होंगे, करने नहीं पड़ेंग।े जिसप्रकार खदान से निकले हुये कालिमा-सहित स्वर्णपत्र को रसायन आदि के सहयोग से तेज अग्नि में तपाने पर कालिमा तो जलकर भस्म हो जाती है और शुद्ध-सोना निखरकर सामने आ जाता है, ठीक उसीप्रकार ‘‘स्वरूपे प्रतपनः तपः’’ अर्थात् स्वरूप में स्थिरता ही तप है- आचार्यों की इस युक्ति के अनुसार तपरूपी अग्नि के ताप से जब उपयोग स्वरूप में ठहरता है, तो कर्मों की कालिमा स्वतः नष्ट हो जाती है और चैतन्य-स्वरूप आत्मा अपने अनंत-गुणों-सहित प्रकाशित होता है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसें कोऊ पातुर बनाय वस्त्र-आभरन, आवति अखारे निसि आडौ-पट करकैं।
दुहूँ ओर दीवटि संवारि पट दूरि कीजै, सकल-सभा के लोग देखैं दृष्टि धरिकैं।।
तैंसे ग्यान-सागर मिथ्याति-ग्रंथि भेदि करि, उमग्यौ प्रगट रह्यौ तिहूँ लोक भरि कैं।
ऐसौ उपदेस सुनि चाहिये जगत्-जीव, सुद्धता संभारै जग-जालसौं निसरिकैं।। 35।।

शब्दार्थ :- जैंसे कोऊ पातुर बनाय वस्त्र आभरन= जैंसे कोई अभिनेत्री (नर्तकी/नायिका) वस्त्र और आभूषण से सजकर, आवति अखारे निसि आडौ पट करकैं= नाट्यस्थल/रंगमंच पर रात में परदा आड़ा करके आती है, दुहूँ ओर दीवटि संवारि पट दूरि कीजै= दोनों ओर से दीपकों के प्रकाश को संभालकर परदा दूर करती है, सकल सभा के लोग= सभा के समस्त लोग, देखैं दृष्टि धरिकैं= गौर से/आँखे खोल-खोलकर देखते हैं, तैंसे ग्यान-सागर मिथ्याति-ग्रंथि भेदिकर= उसीप्रकार मिथ्यात्व की ग्रंथि को खोलने पर ज्ञान का सागर, उमग्यौ प्रगट रह्यौ तिहूँ लोक भरि के= उछलता हुआ प्रकट हुआ है, जिसमें तीनों लोक समाये हुये हैं, ऐसौ उपदेस सुनि चाहिये जगत् जीव= ऐसा उपदेश जगत् के जीवों को सुनना चाहिये, सुद्धता गंभीरा= शुद्ध, गंभीर, जग जालसौं निसरिकैं= संसार के झंझटों से निकलकर। विशेषार्थ :- भेदविज्ञान की विशेषता का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जैसे नाटक की पात्रा अर्थात् कोई नायिका सुंदर-वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर जब रंगमंच पर परदे के पीछे आकर खड़ी हो जाती है, तो किसी को दिखाई नहीं देती। लेकिन जब दोनों ओर प्रकाश की व्यवस्था को अच्छे से देखकर जैसे ही परदे को हटाती हैं, तो सारी-सभा के लोग एकदम गौर से देखने लगते हैं। ठीक उसीप्रकार ज्ञान का सागर अर्थात् अनंतज्ञान का धनी चैतन्य-स्वरूप भगवान् आत्मा जो मिथ्यात्व के परदे से ढँका हुआ था,

मज्जन्तु निर्भरममी सममेव लोका, आलोकमुच्छलति शान्तरसे समस्ताः।
आप्लाव्य विभ्रम-तिरस्करिणीं भरेण, प्रोन्मग्न एष भगवानवबोधसिन्धुः।। 32।।

वह मिथ्यात्व की गाँठ को भेदकर अर्थात् मिथ्यात्व के परदे के हटते ही अपने वास्तविक-स्वरूप में प्रगट हो जाता है। जो कुछ समय बाद तीनों-लोकों को भी प्रकाशित करेगा, अर्थात् केवलज्ञान प्रकट करेगा। अनादिकाल से चेतन-स्वरूप भगवान् आत्मा मिथ्यात्व के आवरण से ढँका हुआ है, लेकिन जब ग्रंथिभेद होता है अर्थात् प्रथमोपशम-सम्यग्दर्शन होता है, तो अखंड-मिथ्यात्व की गाँठ खुल जाती है और दर्शनमोहनीय कर्म- मिथ्यात्व, सम्यकमिथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति के रूप में खंडित हो जाता है। इसे ही आगम में ग्रंथिभेद कहते है, और ज्ञायक भगवान् आत्मा प्रकशित हो जाता है। इसलिये हे जीवराज! यदि सुखी होना है, तो पहले मिथ्यात्वरूपी परदे को हटाने का सम्यक् पुरुषार्थ कर। अंतिम पंक्तियों में असीमकरूणा के साथ जगत् के जीवों को प्रेरणा देते हुये कहते हैं कि ‘‘हे जगत् के जीवों! तुम्हें भी जिनवाणी का ऐसा अमृतमयी-उपदेश अवश्य सुनना चाहिये, और अपने परिणामों को संभालते हुये संसार के झंझटों से निकलकर आत्मस्वरूप का आश्रय लेने का पुरुषार्थ करना चाहिये।’’ आत्मकथ्य के रूप में कविवर के उद्गार इतर-निगोद में विभाव ताके बहुरूप, तामैं हू सुभाव ताकौ एक-अंस आवै है। वहै-अंस तेजपुंज बादर-अगनि जैंसें, एकतैं अनेक-रस रसना बढ़ावै है।। 1।। आगैं जोर बढ्यौ घ्राण-चक्षु-श्रोत नरदेह, देह-देही भिन्न दीखै भिन्नता ही भावै है। ‘बानारसीदास’ निज-ज्ञान को प्रकाश भयो, शुद्धता में वास कियै सिद्ध-पद पावै है।। 2।। उदै भयो भानु कोऊ पंथी उठ्यौ पंथ-काज, कहै नैन तेज थोरो दीप कर चहिये। कोऊ कोटीध्वज नृप-छत्र-छाँह पुरतज, ताहि हौंस भई जाय ग्राम-वास रहिये।। 3।। मंगल-प्रचंड तज काहू ऐसी इच्छा भई, एक खर निज-असवारी-काज चाहिए। ‘बानारसीदास’ जिनवचन-प्रकास सुन, और बैन सुन्यो चाहै तासों ऐसी कहिये।। 4।।

अजीव द्वार (२)

(द्वितीय-अधिकार)

(दोहा)

जीव-तत्त्व-अधिकार यह, कह्यौ प्रगट समुझाय।
अब अधिकार-अजीव कौ, सुनहु चतुर-चित लाय।। 1।।

शब्दार्थ :- जीव-तत्त्व-अधिकार यह= यह जीवतत्त्व नामका अधिकार, कह्यौ प्रगट समुझाय= समझाते हुये कहा, अब अधिकार-अजीव कौ= अब अजीब नाम का अधिकार, सुनहु चतुर-चित लाय= मन लगाकर सुनो। विशेषार्थ :- ‘अजीव-अधिकार’ का वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हुये कविवर कहते हैं कि इससे पूर्व ‘जीवतत्त्व-अधिकार’ का सांगोपांग-वर्णन किया, अब ‘अजीवतत्त्व-अधिकार’ का वर्णन करता हूँ। हे चतुर-चित्तवाले जीवो! इसे ध्यान से सुनो।

(सवैया इकतीसा)

परम-प्रतीति उपजाय गनधर-की-सी, अंतर अनादि की विभावता विदारी है।
भेदग्यान-दृष्टिसौं विवेक की सकति साधि, चेतन-अचेतन की दसा निरवारी है।।
करम कौ नास करि अनुभौ-अभ्यास धरि, हिए मैं हरखि निज-उद्धता सँभारी है।
अंतराय नास भयौ सुद्ध-परकास थयौ, ग्यानकौ विलास ताकौ वंदना हमारी है।। 2।।

शब्दार्थ :- परम-प्रतीति उपजाय गनधर-की सी= गणधरदेव जैसा दृढ़-श्रद्धान उत्पन्न हुआ है, अंतर अनादि की विभावता विदारी है= अंतरंग से अनादि से चले आ रहे विभाव-भाव नष्ट हो गए हैं, भेदग्यानदृष्टिसौं विवेक की सकति साधि= भेदविज्ञान की कला से विवेक की शक्ति को साधकर, चेतन-अचेतन की दसा निरवारी है= जीव और जड़/पुद््गल की स्थिति को भिन्न-भिन्न किया है, करमकौ नास करि= कर्मों को नष्ट करके, अनुभौ अभ्यास धरि= आत्मानुभूति का अभ्यास करके, हिएमैं हरखि निज-उद्धता संभारी है= हृदय में हर्षित होकर अपनी उद्धतता को संभाला/‍नियंत्रित किया है, अंतराय नास भयौ= अंतराय-कर्म नष्ट हो गया, सुद्ध-परकास थयौ= शुद्ध-स्वरूप का प्रकाश हुआ है, ग्यानकौ विलास= ज्ञान का विलास/अनंतता, ताकौ वंदना हमारी है= उनको हमारा नमस्कार है। विशेषार्थ :- पूर्ण-ज्ञान की वंदना और स्वयं के अनंतज्ञान प्रकट होने की सुंदर-भावना व्यक्त करते हुये कविवर कहते हैं कि मेरे हृदय में गणधर देव जैसा दृढ़-श्रद्धान उत्पन्न होने से अनादिकाल से चली आ रही विभाव-परिणति अर्थात् मिथ्यात्व का नाश हो गया है। अंतरंग में भेदविज्ञान की अनमोल-कला के जागृत होने से विवेकपूर्वक-ज्ञान की शक्ति से आत्मा और जड़-पदार्थों की भिन्नता का निर्णय हो गया है। अब तो हृदय में प्रतिसमय स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ दृढ़ हो- ऐसी भावना है। भेदविज्ञानपूर्वक तत्त्व का निर्णय होने से कर्मों को नष्ट कर दिया है, आत्मानुभूति का अभ्यास करते हुये प्रसन्नतापूर्वक अपने हृदय में आत्मस्वरूप की उत्कृष्टता को स्वीकार किया है। आत्मस्वरूप का ग्रहण होने से अनुभूति में बाधक अंतराय-कर्म का स्वतः ही नाश हो गया है और शुद्ध-आत्मतत्व का जीवाजीव-विवेक-पुष्कलदृशा प्रत्यावयत्पार्षदान्-आसंसार-निबद्ध-बंधनविधि-ध्वंसाद् विशुद्धं स्फुटत्। आत्माराममनन्तधाम महसाध्यक्षेण नित्योदितं, धीरोदात्तमनाकुलं विलसति ज्ञानं मनोह्लादयत्।। 1।। प्रकाश हुआ, जिससे पूर्ण-ज्ञान जैसा अानंद प्रगट हुआ है- ऐसे पूर्ण-ज्ञान में जो निरन्तर केलि करते हैं, उन ‘केवली-परमात्मा’ को हमारा बारम्बार नमस्कार हो।

(सवैया इकतीसा)

भैया! जगवासी तू उदासी ह्वैकैं जगतसौं, एक छह-महीना उपदेश मेरौ मानु रे।
और संकल्प-विकल्प के विकार तजि, बैंठिकैं एकांत मन एक-ठौर आनु रे।।
तेरौ घट-सर तामैं तूही है कमल ताकौ, तूही मधुकर ह्वै सुवास पहिचानु रे।
प्रापति न ह्वैहै कछु ऐसौ तू विचारतु है, सही ह्वैहै प्रापति सरूप यौंही जानु रे।। 3।।

शब्दार्थ := भैया जगवासी तू उदासी ह्वैकैं जगतसौं= हे संसार में रमने वाले जीवराज! तुम जगत् से उदासीन होकर, एक छह महीना उपदेश मेरौ मानु रे= मात्र छह महीने के लिये मेरी सीख मान लो, और संकल्प-विकल्प के विकार तजि= और संकल्प-विकल्पों के विकारों को छोड़कर, बैठिकैं एकांत मन एक-ठौर आनु रे= एकांत में बैठकर मन को एकाग्र करो, तेरौ घट-सर= तेरा हृदय ही तालाब है, तामैं तूही है कमल ताकौ= तुम ही उसमें खिलनेवाले कमल हो, तूही मधुकर ह्वै= तुम ही भौंरा होकर, सुवास पहिचानु रे= सुगंध पहिचान ले, प्रापति न ह्वैहै कछु= कुछ भी प्राप्ति नहीं होगी, ऐसौ तू विचारतु है= ऐसा तुम विचार करते हो, (जबकि) सही ह्वैहै प्रापति= वास्तव में प्राप्ति होगी, सरूप यौंही जानु रे= ऐसा वस्तु का स्वरूप है= यह तुम जान लो। विशेषार्थ :- भव्यों को आत्मानुभव की शिक्षा देते हुये कविवर कहते हैं कि हे संसार में रमनेवाले जीवराज! तू संसार से विरक्त होकर मात्र छह-महीने के लिये मेरी बात मान ले अर्थात् जिनागम के उपदेश को हृदय से स्वीकार कर ले, और संसार, शरीर और संयोगों के समस्त संकल्प-विकल्पों को त्यागकर एकांत-स्थान पर एकाग्रचित्त होकर आत्मस्वरूप में लीन होने का प्रयास कर। एकांत-स्थान पर बैठकर चिंतन करना कि तेरा हृदय/आत्मा ही सरोवर है, तू ही उसमें खिलनेवाला कमल है, और तू ही उस कमल के फूल का रस पीनेवाला भौंरा है, एकबार अपने चैतन्य के रस का रसपान तो कर। कभी ऐसा विचार मत करना कि इससे क्या मिलेगा? हे आत्मन्! तू एक बार एेसा कर तो सही, वस्तु का स्वरूप ही ऐसा है कि तुझे नियम से आत्मा के आनंद का रसपान होगा। क्योंकि आत्मा स्वयं ही सिद्धि-स्वरूप है, अतः समर्पित होकर तो देख, सिद्धि न होने का प्रश्न ही नहीं है। आत्मसिद्धि का यही एकमात्र उपाय है, अन्य कोई नहीं। उपर्युक्त-पंक्तियाँ कवि के सरस-हृदय की परिचाियका है। संसार के सभी जीव सच्चे-सुख को प्राप्त करें ऐसी पवित्र-भावना कवि ने यहाँ व्यक्त की है। कितनी अद्भुत-बात है कि मात्र छह-महीने यदि हम ज्ञानियों के अनुसार अपने स्वरूप की साधना-हेतु प्रवर्तन करें, तो स्वरूप की सिद्धि हुये बिना नहीं रहेगी। परन्तु संसार, शरीर और संयोगों के समस्त संकल्प-विकल्पों को त्यागकर ही यह कार्य संभव है। हे आत्मन्! विचार तो करो, निर्विकल्प-आत्मा की अनुभूति आत्मिक-विकल्पों के साथ संभव नहीं, तो सांसारिक-विकल्पों के रहते कैसे संभव होगी? भाई! एक बार स्वीकार तो कर कि ‘‘तू ही सरोवर है, तू ही कमल है, और तू ही रसपान करनेवाला भौंरा अर्थात् मैं ही ज्ञाता, मैं ही ज्ञान और मैं ही ज्ञेयरूप हूँ। यदि तुम ऐसा करने में सफल होते हो, तो निश्चितरूप से तुम्हें आत्मिक-आनंद की अनुभूति होगी ही होगी। क्योंकि सच्चे-सुख की प्राप्ति का यही एकमात्र उपाय है।’’

विरम किमपरेणाकार्य-कोलाहलेन, स्वयमपि निभृतः सन् पश्य षण्मासमेकम्।
हृदय-सरसि पंुसः पुद््गलाद्भिन्नधाम्नो, ननु किमनुपलब्धिर्भाति किं चोपलब्धिः।। 2।।

(दोहा)

चेतनवंत अनंत-गुन, सहित सु आतमराम।
याते अनमिल और सब, पुदगल के परिनाम।। 4।।

शब्दार्थ :- चेतनवंत अनंत गुन= चेतनता से भरपूर अनंत-गुणों, सहित सु आतमराम= से सहित आत्मा है, याते अनमिल और सब= इससे बेमेल/भिन्न शेष सभी, पुदगल के परिनाम= पुद््गल के परिणाम हैं। विशेषार्थ :- चेतन-स्वरूप भगवान् आत्मा और जड़-स्वरूप पुद््गल का लक्षण बताते हुये कविवर कहते हैं कि आत्मा चैतन्य-रस से भरपूर, अनंतगुणों से सहित हैं, और इससे भिन्न शेष सभी पुद््गल के परिणाम या परिणति है। चेतनरूप भगवान् आत्मा यानि मैं कैसा हूँ? मैं चैतन्य-स्वरूप भगवान् आत्मा अनंत-दर्शन, अनंत-ज्ञान, अनंत-वीर्य, अनंत-सुख का धनी परिपूर्ण-शुद्ध चेतन-तत्त्व हूँ, ध्रुव (शाश्वत), अचल (स्थिर), अनुपम (ऐसा तत्त्व, जिसकी जगत् में कोई उपमा ही नहीं), अखण्ड (जिसका कोई खण्ड न कर सके), निर्विकार (विकारों से रहित), निर्द्वन्द (द्वन्द से रहित), निराकुल (आकुलता से रहित), निराधार (किसी के आधार की अपेक्षा नहीं अपने ही आधार), निर्मम (ममता से रहित), निर्मल (रागादि-मल से रहित), निराकार (दृष्टि का विषय ऐसे आकार से रहित, मात्र ज्ञानाकार), प्रचण्ड (मोहरूपी शत्रु को दमित करने में समर्थ), अशरीरी (औदारिक आदि पाँचों-शरीरों से रहित), अरूपी (रूप से रहित), अविनाशी/अक्षय (जो कभी नष्ट नहीं हो सकता), अकर्ता (जड़-कर्मों का कर्ता नहीं), अविचल (कोई चलायमान नहीं कर सकता), निष्कलंक (कलंकरहित), निरपेक्ष (अपेक्षा-रहित), निर्विकल्प (विकल्पों से रहित), अतीन्द्रिय (इन्द्रियों से रहित), निरालम्बी (आलम्बन से रहित), निष्क्रिय (जड़-क्रिया से रहित), निष्कर्म (आठों कर्मो से रहित), निर्बन्ध (बंध से रहित), असंयुक्त/असंयोगी (संयोगों से रहित), परिपूर्ण (स्वयं में पूर्ण), स्वाधीन (परकृत-बाधाओं से रहित स्वाधीन), निस्पृह (स्पृह से रहित), परम तृप्त, ज्ञानानुभूति से युक्त, अनंत-शक्तियों से संपन्न एक अद्भुत-तत्त्व हूँ। अधिक क्या कहूँ ऐसा समझो- ‘‘सर्वत्र सुंदर लोक में शुद्धात्मा हमारा है’’। इसके अलावा स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द, प्रकाश, आतप (सूर्य का ताप), उद्योत (चन्द्रमा की शीतलता), तम (अंधकार), छाया, शरीर, भाषा, मन, श्वासोच्छ्वास, इन्द्रियाँ, क्रोध, मान, माया, लोभ, कषाय, राग, द्वेष आदि सभी परिणाम पौद्गलिक हैं।

(कवित्त)

जब चेतन सँभारि निज-पौरुष, निरखै निज-दृगसौं निज-मर्म।
तब सुखरूप विमल अविनासिक, जानै जगत्-सिरोमनि धर्म।।
अनुभौ करै सुद्ध-चेतन कौ, रमै स्वभाव वमै सब-कर्म।
इहि-विधि सधै मुकतिकौ मारग, अरु समीप आवै सिव-सर्म।। 5।।

शब्दार्थ :- जब चेतन संभारि निज-पौरुष= जब आत्मा अपने आत्मिक-बल को सँभालकर, निरखै निज दृगसौं निज मर्म= अपने ज्ञानमयी-नेत्रों से अपना रूप निहारता है, तब सुखरूप विमल अविनासिक= तब चिच्छक्ति-व्याप्त-सर्वस्वसारो जीव इयानयम्, अतोऽतिरिक्ता: सर्वेऽपि भावाः पौद््गलिका अमी।। 3।।

सकलमपि विहायाह्नाय चिच्छक्तिरिक्तम्, स्फुटतरमवगाहृा स्वं च चिच्छक्तिमात्रम्।
इममुपरि चरन्तं चारु विश्वस्य साक्षात्, कलयतु परमात्मात्मानमात्मन्यनन्तम्।। 4।।

सुखस्वरूप, विकारों से रहित निर्मल, अविनाशी, जानै जगत्-सिरोमनि धर्म= लोक के शिरोमणि धर्म को जानता है, अनुभौ करै सुद्ध-चेतन कौ= शुद्ध-चेतनरूप भगवान् आत्मा का अनुभव करता हैं, रमै स्वभाव= स्वभाव में रमता हैं, वमै सब कर्म= कर्म का वमन अर्थात् विनाश करता हैं, इह विधि सधै मुकतिकौ मारग= इसप्रकार मोक्ष का मार्ग सधता है, अरु समीप आवै सिव सर्म= और तब मोक्षरूपी सुख समीप आता है। विशेषार्थ :- आत्मज्ञान का फल बताते हुये कविवर कहते हैं ‘‘जब जीव अपने आत्मिक-पुरुषार्थ से अपने चेतन-स्वरूप भगवान् आत्मा को अपने ज्ञानमयी-नेत्रों से निरखता है, तब उसे अपने वास्तविकशुद्ध-स्वरूप की अनुभूति होती है’’- यह कहकर कवि ने स्पष्ट कर दिया कि आत्मानुभूति में शास्त्रज्ञान तो निमित्त-मात्र है, वास्तव में स्वयं का ज्ञान ही कार्यकारी है, अर्थात् जबतक जीव स्वयं से पुरुषार्थ नहीं करेगा तबतक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी। किन्तु जब साधक इसप्रकार पुरुषार्थ करते हुये आत्मानुभूतिपूर्वक स्वरूप में स्थिरता करता है, तब वह समस्त-कर्मों का वमन अर्थात् विनाश करता है। और मोह-राग-द्वेषादि भावों की मलिनता से रहित निर्मल, जन्म-जरा-मरण से रहित अविनाशी, शाश्वत-परमपद को प्राप्त करता है। इसप्रकार से साधना करने पर ही मोक्षमार्ग सिद्ध होता है, और सच्चा निराकुल आत्मिक-सुख प्राप्त होता है।

(दोहा)

वरनादिक-रागादि यह, रूप हमारौ नाहिं।
एक ब्रह्म नहिं दूसरौ, दीसै अनुभव-माँहिं।। 6।।

शब्दार्थ :- वरनादिक-रागादि= वर्ण आदि पौद्गलिक-विकार और राग-द्वेष आदि आत्मिक-विकार, यह रूप हमारौ नाहिं= ये सब मेरा रूप नहीं हैं, एक ब्रह्म नहिं दूसरौ= एकमात्र आत्मा ही मैं हूँ, अन्य कुछ भी मैं नहीं हूँ, दीसै अनुभव-माँहि=ं ऐसा अनुभव के समय दिखाई देता है। विशेषार्थ :- आत्मा और पुद््गल में भिन्नता बताते हुये कविवर कहते हैं कि वर्णादि अर्थात् स्पर्श, रस, गंध, वर्ण तथा शरीर आदि जड़-पदार्थ आदि पौद्गलिक-परिणाम और रागादि अर्थात् मोह-रागद्वेषादि विकारी-भाव- यह मेरा अर्थात् चेतन आत्मा का स्वरूप नहीं है। आत्मानुभूति के समय एकमात्र चिद्ब्रह्म-स्वरूप भगवान् आत्मा ही अनुभवगोचर होता है, अन्य कुछ भी दिखाई नहीं देता।

(दोहा)

खांडो कहिये कनककौ, कनक-म्यान संयोग।
न्यारौ निरखत म्यानसौं, लोह कहैं सब लोग।। 7।।

शब्दार्थ :- खांडो कहिये कनक कौ= तलवार को भी सोने की कहते हैं, कनक-म्यान संयोग= सोने की म्यान के संयोग से, न्यारौ निरखत म्यानसौं= म्यान से भिन्न देखने पर, लोह कहैं सब लोग= सभी लोग (उसे) लोहा कहते हैं। विशेषार्थ :- देह और जीव की भिन्नता को एक दृष्टांत के माध्यम से स्पष्ट करते हुये कविवर कहते हैं कि लोहे की तलवार भी जब सोने की म्यान में रखी जाती है, तब वह तलवार लोहे की होने पर भी सोने का ही नाम पाती है। लेकिन जैसे ही तलवार को म्यान से अलग करते हैं, लोग उसे ‘लोहे की’ ही कहते है। वर्णाद्या वा राग-मोहादयो वा, भिन्ना भावाः सर्व एवास्य पुंसः। तेनैवान्तस्तत्त्वतः पश्यतोऽमी, नो दृष्टाः स्युदृष्टमेकं परं स्यात् ।। 5।। निर्वर्त्यते येन यदत्र किंचित्तदेव तस्यान्न कथं च नान्यत्। रुक्मेण निर्वृत्तमिहासिकोशं पश्यन्ति रुक्मं न कथंचनासिम् ।। 6।। जीव और देह भी तलवार और म्यान की तरह एकक्षेत्रावगाह-रूप रहते हैं। जबतक संसारीजीव को भेदविज्ञान नहीं वर्तता, तबतक वह इस नश्वर-देह को भी चेतन ही मानता है; लेकिन जैसे ही भेदविज्ञान के द्वारा जीव को आत्मा और शरीर भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, उसी क्षण यह देह नश्वर और अशुचि लगने लगती है, और चेतन आत्मा परम-पवित्र अविनाशी तत्त्व भासित होता है। तब इस नश्वरदेह से आत्मबुद्धि स्वत: ही छूट जाती है, और एकमात्र निज-स्वभाव से अपनत्व वर्तता है।

(दोहा)

वरनादिक पुदगल-दसा, धरै जीव बहुरूप।
वस्तु विचारत करमसौं, भिन्न एक-चिद्रूप।। 8।।

शब्दार्थ :- वरनादिक पुदगल-दसा= वर्ण आदि पुद््गल की पर्यायें हैं, धरै जीव बहुरूप= जीव इनके संयोग में नाना-रूपों को धारण करता है, वस्तु विचारत करमसौं= वस्तु-स्वरूप का क्रमशः विचार करने पर (ज्ञात होता है) भिन्न एक चिद्रूप= भगवान् आत्मा इनसे भिन्न एक चेतन-स्वरूप है। विशेषार्थ :- जीव और पुद््गल की भिन्नता का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि स्पर्श, रस, गंध और वर्णरूप पुद््गल के नानारूपों को जीव आज तक धारण करता आया है, लेकिन जब वस्तु के स्वरूप का विचार करते हैं, तो सिद्ध होता है कि ये सब तो कर्म के उदय से प्राप्त नाना-स्वाँग है, आत्मा तो इन सभी से भिन्न एक चैतन्यमूर्ति है। कहने का अभिप्राय यह है कि अनादिकाल से आठों-कर्मों का संयोग होने से जीव अर्थात् मैं नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव पर्याय को धारण करते हुये चार-गति चौरासी-लाख योनियों में परिभ्रमण करता हुआ दुःखी हो रहा हूँ, लेकिन आज जब आगम का अभ्यास किया, तो वस्तु का वास्तविक-स्वरूप ख्याल में आया कि ये सब पर्यायें तो पुद््गलमय हैं, विनाशीक हैं, कर्मों के उदय और क्षयोपशम के आधीन हैं, इनमें एकत्व-ममत्व करके ही तो मैं आज तक दुःखी होता आया हूँ। जबकि मैं तो इन सबसे भिन्न परम-शुद्ध, निर्विकार, अनंत-सुख की खान, चैतन्यमूर्ति भगवान् आत्मा हूँ।

(दोहा)

ज्यौं घट कहिये घीव कौ, घट कौ रूप न घीव।
त्यौं वरनादिक नामसौं, जड़़ता लहै न जीव।। 9।।

शब्दार्थ :- ज्यौं घट कहिये घीवकौ= जिसप्रकार घड़े को (घी का संयोग होने पर) घी का घड़ा कहते हैं, घटकौ रूप न घीव= परन्तु घड़ा घी रूप नहीं होता, त्यौं वरनादिक नामसौं= उसीप्रकार वर्णादिक-नामों से, जड़ता लहै न जीव= जीव अचेनता प्राप्त नहीं करता। विशेषार्थ :- जिसप्रकार मिट्टी का घड़ा घी का संयोग होने पर घी का घड़ा नाम पाता है, लेकिन इससे घड़ा घी रूप और घी घड़ेरूप नहीं हो जाता, ठीक उसीप्रकार यह चेतन-आत्मा अनादिकाल से शरीर का संबंध होने पर भी, तथा नाना-गतियों में नाना-प्रकार के रूप रखने पर भी कभी ये आत्मा शरीररूप और शरीर आत्मारूप नहीं हुआ अर्थात् चेतन कभी जड़रूप/अचेतनरूप और अचेतन कभी चेतनरूप नहीं हुआ, तो फिर मैं क्यों भ्रमित हो रहा हूँ? वर्णादि-सामग्र्यमिदं विदन्तु निर्माणमेकस्य हि पुद््गलस्य। ततोऽस्त्विदं पुद््गल एव नात्मा यतः स विज्ञानघनस्ततोऽन्यः ।। 7।। घृतकुम्भाभिधानेऽपि कुम्भो घृतमयो न चेत्। जीवो वर्णादिमज्जीव जल्पनेऽपि न तन्मयः ।। 8।।

(दोहा)

निराबाध चेतन अलख, जानै सहज स्वकीव।
अचल अनादि-अनंत नित, प्रगट जगतमैं जीव।। 10।।

शब्दार्थ :- निराबाध चेतन अलख= (जीव) बाधारहित, चेतन, इन्द्रिय-अगोचर, जानै सहज स्वकीव= सहज स्वयं अपने को ही जानता है, अचल अनादि-अनंत नित= स्थिर, जिसकी कोई आदि न हो, जिसका कोई अंत न हो, नित्य, प्रगट जगत् मैं जीव= जगत् के जीवों को प्रतिसमय प्रकट है। विशेषार्थ :- आत्मा के वास्तविक-स्वरूप का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं ‘‘जीव निराबाध, चेतन, अलख, सहज, ज्ञाता-दृष्टा स्वभावी, अचल, अनादि-अनंत, नित्य, जगत् के जीवों में प्रत्यक्ष प्रकट है’’। ‘निराबाध’ यानि आत्मा बाधा-रहित है अर्थात् साता-असाता वेदनीय के उदय-क्षयोपशम से उत्पन्न होनेवाली बाधाओं से रहित है, क्योंकि साता-असाता के उदय-क्षयोपशम का फल शरीर और बाह्य-संयोगों में परिलक्षित होता है, चेतन-आत्मा पर नहीं, वह तो इन सबसे त्रिकाल-भिन्न ही रहता है। ‘चेतन’ अर्थात् त्रिकाल चेतयितारूप से विद्यमान है, किसी भी पर्याय में एकसमय के लिये भी कभी जड़रूप नहीं हुआ, और न कभी हो सकता है। ‘अलख’ अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा दिखाई नहीं देता, क्योंकि इन्द्रियाँ तो रूपी-पदार्थ को ही जानती है, अरूपी को नहीं, जबकि अात्मा अरूपी और अतीन्द्रियतत्त्व है, इसीलिए कभी इन्द्रियों के द्वारा जानने में आ ही नहीं सकता। ‘सहज’ स्वकीय अर्थात् प्रतिसमय सहज स्वयं ही स्वयं को जानता है यानि ज्ञान, ज्ञान को ही जानता है, ज्ञेयों को नहीं। ‘अचल’ अर्थात् अपने ज्ञान स्वभाव में ही स्थिर रहता है, चाहे किसी भी गति या किसी भी पर्याय में रहे स्वभाव से ज्ञानस्वरूप ही रहता है। ‘अनादि’ अर्थात् आदि से रहित, ‘अनंत’ अर्थात् अंत से रहित/ जन्म-मरण से रहित है। ‘नित्य’ अर्थात् कभी विनाश को प्राप्त नहीं होगा, जिसका विनाश होता है, वह पर्याय मैं नहीं हूँ। मैं तो अजर-अमर शाश्वत अविनाशी तत्त्व हूँ, जो जगत् के समस्त जीवों में प्रत्यक्ष प्रमाणित है।

(सवैया इकतीसा)

रूप-रसवंत मूरतीक एक पुदगल, रूप बिनु औरु यौं अजीव दर्व दुधा है।
चारि हैं अमूरतीक-जीव भी अमूरतीक, याहीतैं अमूरतीक-वस्तु-ध्यान मुधा है।।
औरसौं न कबहूँ प्रगट आप आपुहीसौं, ऐसौ थिर चेतन-सुभाऊ सुद्ध सुधा है।
चेतनकौ अनुभौ अराधैं जग तेई जीव, जिन्हकौं अखंड-रस चाखिवै की छुधा है।। 11।।

शब्दार्थ :- रूप-रसवंत मूरतीक एक पुदगल= रूप-रस आदि गुणोंवाला, मूर्तिक एक पुद््गल-द्रव्य है, रूप- बिनु औरु यौं अजीव दर्व= रूप के बिना और भी अजीव-द्रव्य, दुधा हैं= (जो) दो प्रकार के हैं, चारि हैं अमूरतीक= चार अमूर्तिकद्रव्य अजीव हैं, जीव भी अमूरतीक= जीव भी अमूर्तिक है, याहीतैं अमूरतीक वस्तु= इसीलिए अमूर्तिक वस्तु (का) ध्यान मुधा है= ध्यान व्यर्थ है, औरसौं न कबहूँ प्रगट= (जीवद्रव्य) किसी और से कभी प्रगट नहीं होता, आप आपुहीसौं= आप स्वयं अपने आप ही प्रकट है, ऐसौ थिर चेतन-सुभाऊ सुद्ध मुदा है= चेतन का ऐसा स्थिर-स्वभाव शुद्ध-अमृतस्वरूप है, चेतनकौ अनुभौ अराधैं= आत्म-अनुभव की आराधना, अनाद्यनन्तमचलं स्वयंवेद्यमिदं स्फुटम्। जीवः स्वयं तु चैतन्यमुच्चैश्चकचकायते।। 9।। वर्णाद्यैः सहितस्तथा विरहितो द्वेधास्त्यजीवो यत:, नामूर्त्तत्वमपास्य पश्यति जगज्जीवस्य तत्त्वं ततः। इत्यालोच्य विवच े कैः समुचितं नाव्याप्त्यतिव्यापि वा, व्यक्तं व्यञ्जित-जीवतत्त्वमचलं चैतन्यमालम्ब्यताम् ।। 10।। जग तेई जीव= जगत् में वे ही जीव करते हैं, जिन्हकौं अखंड-रस चाखिबै की छुधा है= जिनको प्रतिसमय आत्मिक-आनंद के रसास्वादन करने की भूख/ललक/तीव्र-इच्छा है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने दो तथ्यों का स्पष्टीकरण किया। पहला लोक में छह-द्रव्य है, जिनमें से एक पुद््गलद्रव्य ‘रूपी’ और ‘मूर्तिक’ है, और शेष धर्म, अधर्म, आकाश और काल-द्रव्य ‘अरूपी’ और ‘अमूर्तिक’ हैं। जीव-द्रव्य भी ‘अरूपी’ और ‘अमूर्तिक’ है। इसप्रकार छह में से पाँच-द्रव्य ‘अमूर्तिक’ हैं, सो यदि अमूर्तिक-पदार्थ का ध्यान करते हो, तो व्यर्थ है; क्योंकि भले ही जीव-द्रव्य अमूर्तिक है, पर शेष चार-द्रव्य भी तो अमूर्तिक हैं; और इन अमूर्तिक-द्रव्यों का स्वभाव और लक्षण भिन्न होने से अमूर्तिक जीव-द्रव्य से इनका कोई संबंध नहीं है, इसलिये केवल अमूर्तिक-पदार्थ का ध्यान करने से आत्मा की सिद्धि कभी नहीं होगी। दूसरा आत्मस्वरूप की सिद्धि जगत् में उन्हीं जीवों को होती है, जिन्हें अपने अखण्ड-चैतन्यस्वरूप का अमृतपान करने की तीव्रतम-ललक होती है। इसलिये ऐसे जीवों को आत्मस्वरूप की सिद्धि करने के लिये आत्मा के अमूर्तिक-स्वरूप का नहीं, बल्कि ज्ञान-स्वभावी, सहज, स्वयं-सिद्ध, परिपूर्ण, चैतन्यमूर्ति, सुखस्वरूप अतीन्द्रिय-तत्त्व का ध्यान करना चाहिये।

(सवैया तेईसा)

चेतन-जीव अजीव-अचेतन, लच्छन-भेद उभै-पद न्यारे।
सम्यक्दृष्टि-उदोत विचच्छन, भिन्न लखैं लखिकैं निरधारे।।
जे जगमाँहि अनादि-अखंडित, मोह-महामद के मतवारे।
ते जड़-चेतन एक कहैं, तिन्हकी फिरि टेक टरै नहिं टारे।। 12।।

शब्दार्थ :- चेतन-जीव= जीव चेतन है, अजीव-अचेतन= अजीव अचेतन है, लच्छन-भेद उभै-पद न्यारे= लक्षणभेद से दोनों ही पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं, सम्यक्दृष्टि-उदोत-विचच्छन= सम्यक्/सच्ची दृष्टिवान् विचक्षण/ ज्ञानी पुरुष, भिन्न लखैं= (दोनों को) भिन्न-भिन्न देखते है, लखिकैं निरधारे= (और) देखकर सम्यक्-निर्णय करते हैं, जे जगमाँहि अनादि अखंडित= जो अनादिकाल से अखंडरूप से संसार में ही मगन हैं, मोह-महामद के मतवारे= मोहरूपी तीव्रतम-मदिरा के नशे में चकचूर हैं, ते जड़-चेतन एक कहैं= वे (जीव) जड़ और चेतन को एक ही मानते हैं, तिन्हकी फिरि टेक टरै नहिं टारे= उनकी यह कुटेव/गंदी-आदत टालने पर भी नहीं टलती। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ज्ञानी/मोक्षार्थी और संसारी-जीव की परिणति का वर्णन किया है। संसार में दोप्रकार के जीव है, एक तो वे जीव जो अनादिकाल से आज तक संसार और मोह-माया के बंधनों में ही जकड़े हुये हैं, और दूसरे वे जीव जो इन बंधनों को तोड़कर सम्यक्-मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं। पहली-प्रकृति के यानि संसार में रमनेवाले जीव मोह के कारण आज तक शरीर और आत्मा को एक या शरीर को ही आत्मा मानते आ रहे हैं- उनकी ये अनादि की एेसी कुटेव या गंदी-आदत है, जो कितना भी समझाने का पुरुषार्थ करो फिर भी नहीं छूटती। जबकि दूसरी-प्रकृति के जीव, जो मोह के बंधनों को तोड़कर आत्मस्वरूप के सच्चे श्रद्धानी हैं, वे जीव शरीर और आत्मा के लक्षणों के आधार पर इनके स्वरूप का सम्यक्-निर्णय करते हैं, और स्वरूप

में स्थिरता का निरन्तर पुरुषार्थ करते हैं।
जीवादजीवमिति लक्षणतो विभिन्नं, ज्ञानी जनोऽनुभवति स्वयमुल्लसन्तम्।
अज्ञानिनो निरवधि-प्रविजृम्भितोऽयं, मोहस्तु तत्कथमहो बत नानटीति।। 11।।

(सवैया तेईसा)

या घट में भ्रमरूप अनादि, विसाल महा-अविवेक अखारौ।
तामहिं और स्वरूप न दीसत, पुग्गल नृत्य करै अति-भारौ।।
फेरत भेख दिखावत कौतुक, सौंजि लियै वरनादि पसारौ।
मोहसौं भिन्न जुदौ जड़सौं, चिनमूरति नाटक-देखनहारौ।। 13।।

शब्दार्थ :- या घट में भ्रमरूप अनादि= इस हृदय में अनादिकाल से मिथ्यात्वरूपी भ्रम, विसाल महा- अविवेक अखारौ= अज्ञानता रूपी विस्तृत-नाट्यशाला है, तामहि और स्वरूप न दीसत= जिसमें (पुद््गल के द्वारा दिखाये जानेवाले रूपी के अलावा) कोई और रूप नहीं दिखता, पुग्गल नृत्य करै अतिभारौ= पुद््गल (अपने परिवार के साथ) बहुत-भारी नृत्य कर रहा है, फेरत भेख दिखावत कौतुक= भेष बदल-बदलकर आश्चर्यजनक (क्रियायें करता है), सौंजि लिये वरनादि पसारौ= साथ में वर्णादि का विस्तार (भी), मोहसौं भिन्न जुदो जड़सौं= मोहादि से भिन्न, जड़ता से न्यारा, चिनमूरति नाटक देखनहारो= चैतन्यमूर्ति भगवान् आत्मा (इस) नाटक को (मात्र) देखनेवाला है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने रंगमंच के माध्यम से संसारी-जीव के कृत्यों का सुंदर-चित्रण किया है। यह संसार एक रंगमंच है, जहाँ जीव और पुद््गल दोनों पात्र साथ-साथ रंगमंच पर आते हैं। फिर रंगमंच पर पुद््गल-द्रव्य स्पर्श, रस, गंध और वर्ण आदि अपने परिवार के साथ नानाप्रकार के स्वाँग रखकर अर्थात् चार-गति चौरासी-लाख योनियों में नाना-प्रकार की पर्यायों में जन्म लेकर अनादिकाल से भ्रमरूप कौतुक दिखा रहा है। विडम्बना यह है कि इस मायाजाल को देखते-देखते मोह के बंधनों से भरे इन प्रपंचों में जीव ऐसा उलझता है कि उसे फिर इनके अलावा कुछ और दिखाई ही नहीं देता। वह इस भ्रम को ही सत्य मानकर प्राप्त पर्याय में ही तन्मय हो जाता है, और दुःखी होता है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी आत्मा तो इन मोह के बंधनों और जड़ता से सदाकाल न्यारा ही रहा, कभी इन रूप हुआ ही नहीं। और अपने ज्ञाता-दृष्टा-स्वभावरूप रहकर इस भ्रमरूप नाटक को मात्र आज तक देखता ही रहा है, कभी इसका कर्त्ता नहीं बना। अंतिम-पंक्तियों में कवि सम्यग्दृष्टि-जीव को लक्ष्य में रखकर अपनी बात कहते हैं कि पुद््गल का यह भ्रमरूप-नाटक सम्यग्दृष्टि-जीव के साथ भी चलता है, पर वह अपने ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव को कायम रखकर मात्र इस नाटक को देखता रहता है, अर्थात् हर्ष-विषादरूप, इष्ट-अनिष्ट-बुद्धि या राग-द्वेषरूप नहीं होता। जबकि मिथ्यादृष्टि-जीव अपने को उसी रूप अनुभव करने लगता है। इसीलिये मिथ्यादृष्टिजीव प्रतिसमय अनंत-दु:खी, और सम्यग्दृष्टि-जीव प्रतिसमय अनंत-सुख की ओर अग्रसर रहता है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसे करवत एक काठ-बीच खंड करै, जैंसे राजहंस निरवारै दूध-जलकौं।
तैंसैं भेदग्यान निज भेदक-सकति-सेती, भिन्न-भिन्न करै चिदानंद-पुदगलकौं।।
अस्मिÂन्ननादिनि महत्यविवेकनाट्ये, वर्णादिमाÂन्नटति पुद््गल एव नान्य:।
रागादि-पुद््गल-विकार-विरुद्ध-शुद्ध-चैतन्य-धातुमय-मूर्तिरयं च जीवः।। 12।।

इत्थं ज्ञान-क्रकच-कलनात्पाटनं नाटयित्वा, जीवाजीवौ स्फुट-विघटनं नैव यावत्प्रयातः।

विश्वं व्याप्य प्रसभ-विकसद् व्यक्त-चिन्मात्र-शक्त्या, ज्ञातद्रृ व्यं स्वयमतिरसात्तावदुच्शचै ्चकाशे।। 13।।

अवधिकौं धावै मनपर्यैकी अवस्था पावे, उमगिकैंं आवै परमावधि के थलकौं।
याही-भाँति पूरन-सरूप कौ उदोत करै, करै प्रतिबिंबित पदारथ-सकलकौं।। 14।।

शब्दार्थ :- जैंसे करवत एक-काठ बीच खंड करै= जिसप्रकार आरा-मशीन/लकड़ी काटने की मशीन एक लकड़ी के टुकड़े को बीच में से भेदकर दो टुकड़े कर देती है, जैसें राजहंस निरवारै दूध-जलकौं= जिसप्रकार राजहंस पक्षी दूध और पानी को अलग-अलग कर देता है, तैंसें भेदग्यान निज भेदक-सकतिसेती= उसीप्रकार (सम्यग्दृष्टि-जीव) भेदविज्ञानरूप अपनी भेदक-शक्ति से, भिन्न-भिन्न करै चिदानंद-पुदगलकौं= आत्मा और पुद््गल को भिन्न-भिन्न कर देता है, अवधिकौं धावै= (फिर) अवधिज्ञान को प्राप्त करने का पुरुषार्थ करता है, मनपर्यैकी अवस्था पावे= मनःपर्ययज्ञान की अवस्था को प्राप्त करता है, उमगिकैं आवे परमावधि के थलकौं= हर्षपूर्वक परमावधि-ज्ञान की भूमि को आता है, याही-भाँति पूरन-सरूप को उदोत करै= इसीप्रकार (स्वरूप में स्थिरता के द्वारा) पूर्ण-स्वरूप को प्रकट करता है, करैं प्रतिबिंबित पदारथ-सकल कौ= (और) ज्ञान में झलकनेवाले समस्त-पदार्थों को प्रकाशित करता है। विशेषार्थ :- भेदविज्ञान होने के बाद की स्थिति का वर्णन करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जिसप्रकार आरा-मशीन लकड़ी के टुकड़े को बीच में से काटकर अलग-अलग कर देती है, जैसे राजहंस-पक्षी अपनी स्वयं की भेदक-शक्ति से दूध और पानी अलग-अलग कर देता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव भेदविज्ञान होने पर अपनी उस भेदक-शक्ति अर्थात् प्रज्ञा-छैनी से जीव और पुद््गल को भिन्न-भिन्न कर देता है। वह ज्ञानी-जीव क्रम से अवधिज्ञान में भी परमावधिज्ञान को प्राप्त करने का पुरुषार्थ करता है। और परमावधिज्ञान प्राप्त करके मनःपर्ययज्ञान की अवस्था को प्राप्त करता है। फिर अति-हर्षपूर्वक आत्मस्वरूप में निरन्तर स्थिरता-पूर्वक अनंतगुणी-विशुद्धि करता हुआ पूर्ण-स्वरूप का प्रकाश अर्थात् केवलज्ञान को प्रकट करता है, जिसके प्रकाश में जगत् के समस्त पदार्थ स्वयं प्रतिबिंबित होते हैं। अनादिकाल से एकक्षेत्रावगाहरूप से रहते हुये और मिथ्यात्व के घोर-बंधनों में जकड़े हुये संसारीजीव को एक साधक-जीव अपनी श्रुतज्ञानरूपी प्रज्ञा-छैनी से देह और आत्मा को भिन्न-भिन्न जानकर आत्मस्वरूप को ग्रहण करता है। फिर निरन्तर आत्मसाधना करते हुये वह जीव अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान को भी प्राप्त करता है, और स्वरूप में स्थिरता का तीव्र-पुरुषार्थ करते हुये पूर्ण-स्वाधीन होकर केवलज्ञान प्रकट करता है। केवलज्ञान यानि वह परिपूर्ण और निर्मल-ज्ञान, जिसमें तीन लोक के समस्त द्रव्य, गुण, और तीनों काल की समस्त पर्यायें युगपत् प्रकाशित होती हैं, जिसका कभी क्षय नहीं होता। अवधिज्ञान के तीन भेद हैं -

1- देशावधि- जो अविरति-सम्यग्दृष्टि जीव को होता है।
2- परमावधि- असंख्यात-लोकप्रमाण संयमी-मनुष्य को होनेवाला ज्ञान परमावधि होता है।
3- सर्वावधि- जो परमावधि से भी अधिक जानता है, वह सर्वावधि होता है।

सामान्य-अवधिज्ञान तो चारों गतियों के जीवों को हो सकता है, किन्तु देशावधि-ज्ञान सम्यग्दृष्टिमनुष्यों और तिर्यंचों को होता है। तथा परमावधि और सर्वावधिज्ञान-मोक्षगामी-मनुष्यों को होता है। इसीलिये कवि ने परमावधि ज्ञान की प्राप्ति को श्रेष्ठ कहा, जिससे परमावधि ज्ञान की प्राप्ति के बाद शीघ्रतिशीघ्र केवलज्ञान की प्राप्ति हो।

कर्त्ता-कर्म द्वार (३)

(तृतीय-अधिकार)

(दोहा)

यह अजीव-अधिकार कौ, प्रगट बखानौ मर्म।
अब सुनु जीव-अजीव के, करता-किरिया-कर्म।। 1।।

शब्दार्थ :- यह अजीव-अधिकार कौ= अजीव अिधकार के, प्रगट बखानौ मर्म= रहस्य का वर्णन किया, अब सुनु जीव-अजीव के= अब सुनो जीव और अजीव के, करता-किरिया-कर्म= कत्तार् क्रिया और कर्म। विशेषार्थ :- इससे पूर्व ‘अजीव-अधिकार’ में अजीव-तत्त्व का सुंदर-वर्णन किया, अब जीव और अजीव के कत्तार्, क्रिया और कर्म के मर्म को सुनो।

(सवैया इकतीसा)

प्रथम अग्यानी-जीव कहै ‘‘मैं सदीव एक, दूसरौ न और मैं ही करता करमकौ’’।
अंतर-विवेक आयौ आपा-पर-भेद पायौ, भयौ बोध, गयौ मिटि भारत-भरमकौ।।
भासे छहौं-दरब के गुन-परजाय सब, नासे दु:ख, लख्यौ मुख पूरन-परमकौ।
करमकौ करतार मान्यौ पुदगल-पिण्ड, आप करतार भयौ आतम-धरमकौ।। 2।।

शब्दार्थ :- प्रथम अग्यानी-जीव कहै मैं सदीव एक= प्रथम तो मिथ्यादृष्टि-जीव कहता है ''हमेशा मैं अकेला ही, दूसरौ न और मैं ही करता करमकौ= कर्म का कत्तार् हूँ ‘‘दूसरा कोई नहीं है’’, अंतर-विवेक आयौ आपापर-भेद पायौ= (फिर) अंतरंग में ज्ञान का उदय हुआ और स्व-पर का भेद जागृत हुआ, भयौ बोध, गयौ मिटि भारत भरमकौ= सम्यग्ज्ञान हुआ और भ्रम का युद्ध मिट गया/समाप्त हो गया, भासै छहों-दरब के गुन-परजाय सब= छहों-द्रव्य अपने समस्त गुण-पर्यायों के साथ भासित होने लगे, नासे दु:ख= दु:ख नष्ट हो गया, लख्यौ मुख पूरन-परमकौं= परिपूर्ण एवं सर्वश्रेष्ठ भगवान् आत्मा को देखा, करमकौ करतार मान्यौ पुदगल-पिण्ड= कर्मों का कत्तार् पुदगल-पिंड को माना, आप करतार भयौ आतम-धरमकौ= आप स्वयं आत्म-स्वभाव का कर्त्ता हुआ। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘मिथ्यादृष्टि’ और ‘सम्यग्दृष्टि’ दोनों जीवों की परिणति का सुदं र- चित्रण किया है। पहले अर्थात् अनादिकाल से जीव निज-स्वरूप से विमुख और कर्म का संयोग होने के कारण अज्ञानतावश स्वयं को ही कर्म का कत्तार् मानता आया है। लेकिन जब उस जीव ने आगम का अभ्यास किया, तब अंतर्मन में विवेक जागृत हुआ और स्व-पर यानि आत्मा और देहादिक की भिन्नता का सच्चा-श्रद्धान और निर्णय हुआ। तब अनादिकाल से चली आ रही भ्रम की दीवार एकक्षण में धराशायी हो गई, अर्थात् मिथ्यात्व नष्ट हो गया और सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हुई। हे आत्मन्! सम्यग्दर्शन प्राप्त होने के बाद भी संसार का परिणमन तो यथावत् चलता रहता है, बस जीव की परिणति बदल जाती है। पहले वह जीव जिन-कार्यों का कर्ता स्वयं को मानकर दु:खी हो रहा था, अब उसे वस्तुस्वरूप का यथार्थ-ज्ञान होने से उसे छहों-द्रव्य, उनके गुण और उनकी पर्यायें स्पष्ट

और सहज स्वयं अपने-अपने द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव में परिणमित होती हुई दिखाई देने लगती हैं।
एकः कर्त्ता चिदहमिह मे कर्म कोपादयोऽमी, इत्यज्ञानां शमयदभितः कर्त्तृकर्म-प्रवृत्तिम्।

ज्ञानज्योतिः स्फुरति परमाेदात्तमत्यन्तधीरं, साक्षात्कुर्वन्निरुपधि-पृथग्द्रव्य-निर्भासि विश्वम्।। 1।। जिससे पर में ममत्व-बुद्धि, एकत्व-बुद्धि, कत‍र्ृत्व-बुद्धि, भोक्तृत्व-बुद्धिरूप जो दु:ख था, वह सम्यग्ज्ञान के आलोक में मिट गया, और सच्चा आत्मस्वरूप प्रतिभासित होने लगा। अब वही जीव सम्यग्ज्ञान के आलोक में पुद््गल-कर्मों का कत्तार् पुद््गल को मानने लगा और आत्मस्वभाव का कर्त्ता स्वयं को मानने लगा, अर्थात् उसने सहज और स्वयं-परिणमित वस्तु-व्यवस्था को स्वीकार कर लिया। वास्तव में यही ‘सम्यग्दृष्टि-जीव’ का सच्चा-स्वरूप और पहिचान है।

(सवैया इकतीसा)

जाही-समै जीव देहबुद्धिकौ विकार तजै, वेदत स्वरूप-निज भेदत-भरमकौ।
महा-परचंड मति-मंडन अखंड-रस, अनुभौ-अभ्यासि परगासत-परमकौ।।
ताही-समै घटमैं न रहे विपरीत-भाव, जैंसे तम-नासै भानु प्रगटि धरमकौ।
ऐसी दसा आवै जब, साधक कहावै तब, करता ह्वै कैसे करै पुग्गल-करमकौं।। 3।।

शब्दार्थ :- जाही-समै जीव देहबुद्धिकौ विकार तजै= जिससमय संसारी-जीव देह में अपनत्व-बुद्धि के अशुद्ध-परिणाम को छोड़ता है, वेदत स्वरूप-निज= और अपने आत्मस्वरूप का वेदन करता है, भेदतभरमकौ= तब मिथ्यात्वरूपी भ्रम को नष्ट करता है, महा-परचंड मति-मंडन अखंड-रस= महा-प्रचंड, ज्ञान की शोभारूप, अखंड-आत्मिकरस (का वेदन करता है), अनुभौ-अभ्यासि= (और) आत्म-अनुभव के ऐसे अभ्यासपूर्वक, परगासत परमकौं= आत्मस्वरूप को प्रकाशित करता है, ताही-समै घटमैं न रहे विपरीतभाव= उससमय हृदय में मिथ्यात्वभाव नहीं रहता है, जैसे तम-नासै भानु प्रगटि धरमकौं= जैसे सूर्य के उदित होने पर स्वभावतः ही अंधकार विनाश को प्राप्त होता है, ऐसी दसा आवै जब साधक कहावै तब= जब ऐसी स्थिति होती है, तब वह जीव मोक्षार्थी कहलाता है, करता ह्वै कैसे करै पुग्गल-करमकौं= (तब) वह कर्ता होकर पुद््गल-कर्मों को कैसे कर सकता है? विशेषार्थ :- सम्यग्दृष्टि-जीव की परिणति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं। जिस-क्षण जीव आत्मस्वरूप का सच्चा-श्रद्धान करता है, उसीसमय मिथ्यात्व अर्थात् देह के प्रति आत्मबुद्धि का त्याग हो जाता है, और उसे अखंड-आत्मिकरस का रसास्वादन होने लगता है। फिर वह जीव महा-प्रचंड, ज्ञानस्वरूप अखंड आत्मिक अनुभव के निरंतर अभ्यास से आत्मस्वरूप को प्रकाशित करता है। जिसप्रकार सूर्य का उदय होने पर अंधकार तत्क्षण विनाश को प्राप्त होता है, उसीप्रकार आत्मानुभूतिरूपी-सूर्य का उदय होने पर मिथ्यात्वरूपी-अंधकार भी स्वयं ही विनाश को प्राप्त होता है। कहने का अभिप्राय यही है कि हमें मिथ्यात्वरूपी-अंधकार को भगाने का पुरुषार्थ नहीं करना है, बल्कि ‘‘मैं आत्मा हूँ’’- ऐसे दृढ़-श्रद्धान का पुरुषार्थ करना है। जब ऐसी दृढ़ता का अभ्यास निरन्तर होने लगता है, तब वह जीव सच्चा-साधक या मोक्षमार्गी कहलाता है। फिर वह स्वप्न में भी स्वयं को पुद््गलकर्मों का कर्त्ता नहीं मानता है।

(सवैया इकतीसा)

जगमैं अनादिकौ अग्यानी कहै मेरौ कर्म, करता मैं याकौ किरियाकौ प्रतिपाखी है।
अंतर सुमति भासी जगसौं भयौ उदासी, ममता मिटाइ परजाइ-बुद्धि नाखी है।।
पर-परिणतिमुज्झत् खंडयद्-भेदवादा-निदमुदितमखण्डं ज्ञानमुच्चण्डमुच्चैः।
ननु कथमवकाशः कर्त्तृ-कर्म-प्रवृत्ते-रिह भवति कथं वा पौद्गलः कर्मबन्धः।। 2।।

इत्येवं विरच्य संप्रति परद्रव्यान्निवृत्तिं परां, स्वं विज्ञानघन-स्वभावमभयादास्तिध्नुवानः परम्। अज्ञानोत्थिकर्तृ कर्म-कलनात् क्लेशान्नििÂवृत्त: स्वयं, ज्ञानीभूत इतश्चकास्ति जगतः साक्षी पुराण: पुमान् ।। 3।।

निरभै-सुभाव लीनो अनुभौ के रस भीनौ, कीनौ विवहारदृष्टि निहचैमैं राखी है।
भरम की डोरी तोरी धरम को भयौ धोरी, परमसौं प्रीति जोरी करमकौ साखी है।। 4।।

शब्दार्थ :- जगमैं अनादिकौ अग्यानी कहै मेरौ कर्म= संसार में अनादिकाल से अज्ञानी-जीव कहता है ‘ये मेरा कर्म है’, करता मैं याकौ= 'मैं ही इसका कत्तार् हूँ ', किरियाकौ प्रतिपाखी है= (हमेशा) क्रिया का ही पक्षधर रहा, अंतर सुमति भासी= (जब) अंतरंग में सद्बुद्धि जागृत हुई, जगसौं भयौ उदासी= (तब) संसार से विरक्त हुआ, ममता मिटाई परजाइ-बुद्धि नाखी है= (देहादिक संयोगों में) ममत्वपने का त्यागकर, पर्याय-बुद्धि को नष्ट किया, निरभै सुभाव लीनौ= निर्भय-स्वभाव का ग्रहण किया, अनुभौ के रस भीनौ= आत्मानुभूति के रस में मगन हुआ, कीनौ विवहारदृष्टि निहचैमैं राखी है= व्यवहारधर्म करते हुये भी दृष्टि निश्चय पर ही रखी, भरम की डोरी तोरी= भ्रम की डोरी तोड़कर, धरम को भयौ धोरी= धर्म का स्वामी हुआ, परमसौं प्रीति जोरी= परम-स्वभाव से प्रीति जोड़ी, करमकौ साखी है= कर्मों का साक्षी है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मिथ्यात्व की अवस्था से लेकर सम्यक्त्व-प्राप्ति का सुंदर-चित्रण किया है। अज्ञानी-जीव अनादिकाल से स्वयं को जड़-कर्मों का कत्तार् मानता आया है, अर्थात् ये मेरा कर्म है और मैं इसका कत्तार्, इसप्रकार वह हमेशा क्रिया का ही पक्षधर रहा है। (अनादि की छोड़ें, आज भी जब हम प्रतिदिन जिनवाणी में सुनते हैं कि आत्मा मात्र ज्ञाता-दृष्टा है, परद्रव्य का कत्तार् और भोक्ता नहीं है; तब भी हम स्वयं को परद्रव्य और कर्मों का कत्तार् ही मानते हैं, एक-क्षण के लिए भी पर में कत्तर्ृत्वबुद्धि नहीं छूटती है।) लेकिन आगम के अभ्यास से जब अंतरंग में बुद्धि का सम्यक् रूप से परिणमन हुआ अर्थात् सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हुई, तब संसार से सहज ही विरक्ति का भाव उत्पन्न हुआ। परपदार्थों और देहादिक संयोगों से ममत्वपना छूट गया, और पर्याय-बुद्धि/पर्यायदृष्टि नष्ट हो गई। पर्याय-दृष्टि से तात्पर्य है कि द्रव्य-दृष्टि से सर्व-जीव समान होने पर भी पर्याय-बुद्धि से जीवों में विविधता दिखाई देती है अर्थात् मनुष्य,तिर्यंच,देव,नारकी, दु:खी-सुखी, छोटा-बड़ा, पापी-पुण्यात्मा, संयोगों और देहादिक से जीव मात्र को देखना ‘पर्याय-बुद्धि’ है। और सम्यग्दृष्टि-जीव की पर्याय-बुद्धि नष्ट हो जाने से उसे सर्वजीव समान और भगवान् आत्मा ही प्रतीत होते हैं, इसीलिये वह हमेशा सुखी है, जबकि मिथ्यादृष्टि-जीव, प्रत्येक जीव को पर्याय-दृष्टि से देखता है, सो प्रतिसमय दु:खी रहता है। सम्यग्दृष्टि-जीव सर्वप्रकार से निर्भय होकर स्वभाव का अाश्रय लेता है, और अात्म-अनुभव के रस में मगन हो जाता है। यद्यपि व्यवहार में सब क्रियायें यथावत् होने पर भी दृष्टि निरन्तर निश्चय अर्थात् स्वभाव पर ही रहती है। अनादिकाल से चले आ रहे परद्रव्य में कर्तृत्वपने के भ्रम को तोड़कर सत्य-धर्म का स्वामी हो जाता है, अर्थात् अब वह स्वयं को जड़-कर्मों से सर्वथा भिन्न सिर्फ अपने स्वाभाविकगुणों के परिणमन का ही कत्तार् मानता है। इसीलिये आचार्यों ने सर्वत्र यही कहा कि सर्वप्रथम सम्यग्दर्शन-प्राप्ति का पुरुषार्थ करो, क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना कत्तर्ृत्वबुद्धि नहीं छूटती। और सम्यग्दर्शन होने पर यह मिथ्या-बुद्धि एक क्षण भी टिकती नहीं। यद्यपि सम्यग्दृष्टि-जीव व्यवहार में पूर्ववत् ही परिणमन करता है, परन्तु दृष्टि हमेशा स्वभाव पर ही रहती है, अर्थात् अंतरंग में यह श्रद्धान बराबर रहता है कि ये सब कर्माधीन-परिणमन चल रहा है, मैं तो इन क्रियाओं का मात्र ज्ञाता हूँ, और आत्मिक-आनंद के वेदन का पुरुषार्थ प्रतिसमय चलता रहता है।

(सवैया इकतीसा)

जैसो जो दरब ताके तैसो गुन-परजाय, ताहीसौं मिलत पै मिलै न-काहु आनसौं।
जीव-वस्तु चेतन करम-जड़ जातिभेद, अमिल-मिलाप ज्यौं नितंब जुरै कानसौं।।
ऐसौ सुविवेक जाकै हिरदै प्रगट भयौ, ताकौ भ्रम गयौ ज्यौं तिमिर भागे भानसौं।
सोई जीव करमकौ करता सौ दीसै पै, अकरता कह्यौ है सुद्धताके परमानसौं।। 5।।

शब्दार्थ :- जैसो जो दरब ताके तैसो गुन-परजाय= जैसा जो द्रव्य है, उसके गुण और पर्याय भी वैसे ही होते हैं, ताहीसौ मिलत पै मिलै न-काहु आनसौ= वे केवल उसी से मिलते हैं, अन्य किसी से नहीं मिलते, जीव-वस्तु चेतन= जीव-पदार्थ चेतन है, कर्म-जड़ जातिभेद= जड़-कर्मों की जाति ही भिन्न है (अचेतन है), अमिल-मिलाप= बेमेल-मिलाप, ज्यौं नितंब जुरै कानसौं= जैसे नितंब का मेल कान से, ऐसौ सुविवेक जाकै हिरदै प्रगट भयौ= ऐसा विवेक/सद्बुद्धि जिसके हृदय में प्रगट हुआ है, ताकौ भ्रम गयौ ज्यौं तिमिर भागे भानुसौं= उसका भ्रम उसीप्रकार दूर हो जाता है, जैसे सूर्य के प्रकाश से अंधकार दूर हो जाता है, सोई जीव करमकौ करता सो दीसै पै= उसीप्रकार जीव कर्म का कत्तार् दिखाई देता है परन्तु, अकरता कह्यौ है सुद्धता के परमानसौं= शुद्धता के प्रमाण से उसे ‘अकत्तार्’ ही कहा गया है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने जीव और पुद््गल की जातिगत-भिन्नता का वर्णन किया है। इस लोक में छह-द्रव्य हैं, और छहों-द्रव्यों के गुण और उनका परिणमन अर्थात् पर्यायें भिन्न-भिन्न हैं। न कोई किसी के गुण-पर्याय से मेल खाता है, और न ही कोई किसी को सहयोग या बाधा पहुँचाता है। सभी द्रव्य त्रिकाल अपने-अपने स्वभाव के अनुरूप स्वतंत्र-परिणमन करते हैं। आज तक किसी भी द्रव्य ने अपना स्वभाव नहीं छोड़ा है, एकमात्र जीव-द्रव्य ही अपने स्वभाव को छोड़कर पर की ओर दौड़ लगाता है, और फिर स्वयं ही दु:खी होता है। चेतन और जड़ की तो जाति ही भिन्न-भिन्न है, इनका मेल कैसे हो सकता है? जैसे नितंब और कान का कभी मेल नहीं हो सकता है, उसीप्रकार जड़ और चेतन/आत्मा और शरीर का भी कोई मेल नहीं है। जिनका न केवल स्वभाव (एक का ज्ञाता-दृष्टा और दूसरे का स्पर्श-रसादिवाला) भिन्न है, बल्कि जाति (एक चेतन, दूसरा जड़/अचेतन) भी भिन्न है, यानि गुण-पर्याय से पूर्णतः भिन्न है, फिर उनका मेल कैसे संभव है?? जिस जीव के हृदय में भेदविज्ञान के द्वारा सम्यक्त्वरूपी सुविवेक प्रकट होता है, उसके हृदय से मिथ्यात्वरूपी-भ्रम ऐसे भागता है, जैसे सूर्य के उदय होने पर अंधकार भागता है। यद्यपि उसके बाद भी जीव बाहर में पूर्ववत् कर्म के कर्ता के रूप में दिखाई तो देता है, लेकिन अंतरंग-परिणामों में शुद्धता अर्थात् अकत्तर्ृत्व का भाव वर्तने से ज्ञानियों नेे उस जीव को कर्मों का ‘अकत्तार्’ ही कहा है। कर्मों की लीला कर्मों में, ज्ञानी की लीला ज्ञायक में।

(छप्पय)

जीव ग्यानगुन सहित, आपगुन-परगुन-ज्ञायक।
आपा परगुन लखै, नांहि पुग्गल इहि लायक।।

व्याप्य-व्यापकता तदात्मनि भवेन्नैवातदात्मन्यपि, व्याप्य-व्यापक-भाव-सम्भवमृते का कर्तृ-कर्मस्थितिः। इत्युद्दाम-विवेक-घस्मरमहो भारेण भिन्दन्स्तमो, ज्ञानीभूय तदा स एष लसितः कर्तृत्वशून्यः पुमान्।। 4।।

जीवदरब चिद्रूप सहज, पुग्गल अचेत जड़।
जीव अमूरति मूरतीक, पुग्गल अंतर बड़।।
जब लग न होइ अनुभौ प्रगट, तब लग मिथ्यामति लसै।
करतार जीव जड़-करमकौ, सुबुधि विकास यहु भ्रम नसै।। 6।।

शब्दार्थ :- जीव ग्यानगुन-सहित= आत्मा ज्ञान-गुण से सहित है, आपगुन-परगुन ज्ञायक= स्व और पर के गुणों को जाननेवाला है, आपा परगुन लखै= अपने और पर के गुणों को देख सके, नांहि पुग्गल इहि लायक= पुदगल-द्रव्य इस लायक ही नहीं है, जीवदरब चिद्रूप सहज= जीव-द्रव्य सहज चेतन-स्वरूप है, पुग्गल अचेत जड़= पुदगल-द्रव्य अचेतन है जड़ है, जीव अमूरति= आत्मा अमूर्तिक है, मूरतीक पुग्गल= पुदगल मूर्तिक है, अंतर बड़= (दोनों में) बड़ा अंतर है, जब लग न होइ अनुभौ प्रगट= जबतक (आत्म)अनुभव प्रगट नहीं होता, तब लग मिथ्यामति लसै= तबतक बुद्धि मिथ्यारूप ही रहती है, करतार जीव जड़-करमकौ= आत्मा जड़-कर्मों का कर्त्ता है, सुबुधि विकास यहु भ्रम नसै= सद्बुद्धि (सम्यक्त्व) के प्रगट होने पर ही यह भ्रम दूर होता है। विशेषार्थ :- जीव और पुद्ग् ल के स्वाभाविक-गुणों का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जीव यानि आत्मा ज्ञान-गुण से सहित हैं, इसीलिए वह स्वयं अपने और पर के गुणों को भी जानने की सामर्थ्य रखता है। लेकिन दूसरी ओर पुदगल-द्रव्य, जो स्वयं अपने और दूसरों के गुणों को जान सके, वह इस लायक ही नहीं है अर्थात् पुद्ग् ल में ज्ञान गुण न होने से उसकी स्व और पर को जानने की सामर्थ्य ही नहीं है। जीवद्रव्य तो चेतनस्वरूप है, इसलिये वह सहज ही स्वपर-प्रकाशक-शक्ति का धनी है, जबकि पुद््गल अचेतन, है जड़ है; इसलिये उसमें किसी को भी जानने की शक्ति नहीं है। इसके अलावा जीवद्रव्य अमूर्तिक है और पुदगल-द्रव्य मूर्तिक है, सो इन दोनों द्रव्यों में बहुत बड़ा अंतर है। जबतक जीव को आत्मानुभूति नहीं होती, तबतक मिथ्यामति अर्थात् बुद्धि का विपरीत-परिणमन चलता रहता है, और जीव जड़-कर्मों का कर्त्ता भी बना रहता है, तथा मिथ्यात्वरूपी भ्रम भी नष्ट नहीं होता। हम अज्ञानी-जीवों को सबसे बड़ा भ्रम यही है कि आँख देखती है और कान सुनते हैं आदि…। अर्थात् ज्ञेयों से ज्ञान होता है- ऐसी हमारी मान्यता है। जबकि कविवर कहते हैं कि पुदगल तो इस लायक ही नहीं है, क्योंकि जो स्वयं को नहीं जान सकता, वह हमें कैसे ज्ञान करा सकता है? हे आत्मन्। विचार तो करो एक जड़-वस्तु चेतन-आत्मा को कैसे प्रकाशित कर सकती है?? भाई! मेरा तो स्वभाव ही ज्ञानमयी है, लोक में समाहित छह-द्रव्यों में से एक मात्र जीव-द्रव्य ही ऐसा है, जो स्वयं को भी प्रकाशित करता है, और संपूर्ण लोकालोक को भी प्रकाशित करता है, शेष सभी-द्रव्य तो अचेतन हैं, जड़ हैं, उनमें ज्ञान नहीं है। प्रश्न उठता है कि तो फिर ये भ्रम बना ही क्यों?? तब कविवर कहते हैं कि जबतक तेरी बुद्धि मिथ्यारूप अर्थात् विपरीत परिणमन करती रहेगी, तबतक ये भ्रम यूँ ही बना रहेगा,अर्थात् जबतक तू पर में ही अनुरक्त रहेगा, पर को ही सर्वस्व मानता रहेगा, तबतक ये भ्रम बना ही रहेगा, लेकिन जिस दिन तेरी बुद्धि सम्यक् रूप से परिणमन करने लगेगी अर्थात् स्वयं में ही अनुरक्त होगी, स्वयं को ही सर्वस्व स्वीकार करेगी, यह भ्रम तत्क्षण विनष्ट हो जायेगा। ज्ञानी जानÂन्नपीमां स्व-परपरिणतिं पुद््गलश्चाप्यजानन्, व्याप्तृ-व्याप्यत्वमन्तः कलयितुमसहौ नित्यमत्यन्त-भेदात्। अज्ञानात्कर्तृ-कर्म-भ्रममतिरनयोर्भाति तावन्न यावद्, विज्ञानार्चिश्चकास्ति क्रकचवदयं भेदमुत्पाद्य सद्यः।। 5।। ‘‘मैं ही मेरा कर्त्ता-धर्ता, पर में मेरा कुछ काम नहीं। जिस क्षण ये निर्णय होगा, उस क्षण तू स्वयं सुखी होगा।।’’

(दोहा)

करता परिनामी-दरव, करमरूप परिनाम।
किरिया परजय की फिरिन, वस्तु एक त्रय-नाम।। 7।।

शब्दार्थ :- करता परिनामी-दरव= कर्त्ता स्वयं परिणामी-द्रव्य है, करमरूप परिनाम= कर्मरूप परिणाम भी उसीका, किरिया परजय की फिरिन= क्रियारूप परिणमन भी उसी का, वस्तु एक त्रय-नाम= एक ही वस्तु के तीन नाम हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने कर्त्ता, क्रिया और कर्म-तीनों को अभेद बताया है। पहले उदाहरण के माध्यम से समझते हैं- जैसे सोने के आभूषण- इसमें सोना ही कर्त्ता है, सोना ही कर्म है, और सोना ही क्रिया है। कैसे? आभूषणरूपी-कार्य में आभूषण को उत्पन्न करनेवाला स्वयं सोना ही है, इसलिए सोना ही कर्त्ता है। इसीप्रकार सोना ही स्वयं आभूषणरूप परिणमित हुआ है, सो सोना ही कर्म है। और स्वर्ण-पिण्ड के रूप में भी सोना ही था और आभूषणरूप कार्य में भी सोना ही है, सो सोना ही क्रिया है। सुनार को आभूषण का कर्त्ता, आभूषण को उसका कर्म और पिण्डरूप स्वर्ण का आभूषण रूप होने को क्रिया कहना- ये तो भेदरूप या व्यवहार का कथन है। इसीप्रकार द्रव्य भी अपने परिणामों का कर्त्ता स्वयं ही है; क्योंकि वे परिणाम द्रव्य के ही हैं, और परिणाम द्रव्य से अभिन्न होने के कारण द्रव्य ही कर्म है, और द्रव्य स्वयं ही परिणाम की अवस्थारूप परिणमित होता है, सो अवस्था से अवस्थान्तर होने से द्रव्य ही क्रिया है। जैसे आत्मा ज्ञानस्वरूप है (कर्त्ता) और जानना उसका कार्य (कर्म) है, और जो जाननरूप-कार्य (क्रिया) हुआ उसमें भी ज्ञान ने ज्ञान को ही जाना अर्थात् स्वयं ही जाननक्रिया-रूप परिणमित हुआ। कहने का अभिप्राय यही है कि निश्चय से आत्मा ही कर्त्ता है, आत्मा ही कर्म है, और आत्मा ही क्रिया है, यानि एक ही वस्तु के कर्त्ता, कर्म और क्रिया तीन नाम है।

(दोहा)

करता करम क्रिया करे, क्रिया करम करतार।
नाम-भेद बहुविधि भयौ, वस्तु एक निरधार।। 8।।

शब्दार्थ :- करता करम क्रिया करै= कर्त्ता ही कर्म और क्रिया करता है, क्रिया करम करतार= क्रिया भी कर्म और कर्त्ता की है, नामभेद बहुविधि भयौ= नाम के भेद से बहुतप्रकार का है, वस्तु एक निरधार= (वास्तव में) वस्तु एक ही है। विशेषार्थ :- कर्त्ता, कर्म और क्रिया का एकत्व बताते हुये कविवर कहते हैं कि कर्त्ता ही कर्म और क्रिया को करनेवाला है, और क्रियारूप परिणमन भी कर्म और कर्त्ता का ही है। नाम के भेद से वस्तु को तीनरूप में कहा गया है, वास्तव में देखा जाये तो वस्तु का स्वरूप तीनों का एक अभेदरूप ही हैं, भेदरूप नहीं। यही यः परिणमति स कर्त्ता, यः परिणामो भवेत्तु तत्कर्म। या परिणतिः क्रिया सा, त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया।। 6।। एकः परिणमति सदा परिणामो जायते सदैकस्य। एकस्य परिणतिः स्यादनेकमप्येकमेव यतः ।। 7।। निश्चय और सम्यक्-दृष्टि है। ‘आचार्य अमृतचंद्र’ के अनुसार- ‘‘यः परिणमति स कर्त्ता, यत्परिणामं भवेत्तु तत्कर्म। या परिणतिः क्रिया सा, त्रयमेव भिन्नं न वस्तुतया।।’’ -(समयसार जी, कलश नं 51) अर्थात् जो परिणमित होता है, वह कर्त्ता है, जो परिणाम है, वही कर्म है, और जो परिणति है, सो क्रिया है, यह तीनों वस्तुरूप से भिन्न नहीं है।

(दोहा)

एक करम की करतव्यता, करै न करता दोइ।
दुधा दरब-सत्ता सधी, एक-भाव क्यौं होइ।। 9।।

शब्दार्थ :- एक करम करतव्यता= एक कर्म के कर्त्तापने के, करै न करता दोइ= दो द्रव्य कर्त्ता नहीं हो सकते हैं, दुधा दरब-सत्ता सधी= दोनों-द्रव्य की सत्ता भिन्न-भिन्न सिद्ध है, एक भाव क्यौं होइ= (फिर) उन दोनों का भाव(कार्य) एक कैसे हो सकता है? विशेषार्थ :- एक कर्म का एक ही कर्त्ता होता है, इसकी सिद्धि करते हुये कविवर कहते हैं कि एक कर्म का कर्त्ता और क्रिया एक ही होता है, कभी एक कार्य के दो कर्त्ता नहीं होते। दोनों द्रव्यों अर्थात् जीव और पुद््गल की सत्ता ही भिन्न-भिन्न है, तो उनका भाव/कार्य एक कैसे हो सकता है? कहने का अभिप्राय यही है कि जीव और पुद््गल दो भिन्न द्रव्य अनादिकाल से साथ होते हुये भी दोनों द्रव्यों की सत्ता, स्वभाव, लक्षण, गुण, परिणमन सब कुछ भिन्न-भिन्न हैं। दोनों ही द्रव्य अपनेअपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव में स्वतंत्ररूप से परिणमन करते हैं, यानि जब कुछ भिन्न-भिन्न है, तो इनका भाव/कार्य या परिणमन एक कैसे हो सकता है? क्योंकि आत्मा का स्वभाव चेतनस्वरूप है, और पुद््गल का स्वभाव अचेतन है, जड़ है, यानि एक चेतन-पदार्थ और एक अचेतन-पदार्थ- दोनों एक कार्य के कर्त्ता कैसे हो सकते हैं? अर्थात् कभी नहीं हो सकते, इन दोनों के कार्यों में पूर्णरूप से भिन्नता है। ‘समयसार कलश जी’ में भी आचार्य भगवन् यही कहते हैं- ‘‘नोभौ परिणमतः खलु, परिणामो नोभयो प्रजायेत। उभयोर्न परिणतिः, स्याद्यदनेकमनेकमेव सदा।।’’ -(समयसार जी, कलश नं 53) अर्थात् दो-द्रव्य एक होकर परिणमित नहीं होते, दो-द्रव्यों का एक परिणाम नहीं होता, दो-द्रव्यों की एक परिणति नहीं होती, क्योंकि द्रव्य अनेक हैं, सो उनके परिणमन भी अनेक ही हैं, सब मिलकर एक नहीं हो जाते। अभिप्राय यह है कि दो भिन्न-वस्तुयें सर्वथा-भिन्न ही रहती हैं, दोनों कभी एकरूप परिणमित नहीं होती, न ही उनकी क्रिया कभी एक होती है। लोक की वस्तु-व्यवस्था ही ऐसी है, यदि हम ऐसा नहीं मानेगें, तो सभी द्रव्यों की स्वतंत्रता का ही लोप हो जायेगा। जीव अपने परिणामों का भी कर्त्ता बने और पुद््गल के परिणामों का भी कर्त्ता बने, ऐसा संभव ही नहीं है, फिर भी जो अज्ञानभाव से ऐसा मानते है, आचार्य देव ने उन्हें ‘द्विक्रियावादी-मिथ्यादृष्टि’ कहा है, क्योंकि वस्तुस्वरूप में एकद्रव्य दूसरे-द्रव्य का

कर्त्ता हो- यह तीन काल में कभी संभव ही नहीं है।
नोभौ परिणमतः खलु परिणामो नोभयोः प्रजायेत। उभयोर्न परिणतिः स्याद्यदनेकमनेकमेव सदा ।। 8।।

(सवैया इकतीसा)

एक-परिनाम के न करता दरब-दोइ, दोइ-परिनाम एक-दरब न धरतु हैं।
एक-करतूति दोइ-दर्व कबहूँ न करै, दोइ-करतूति एक-दरब न करतु है।।
जीव-पुद््गल एक-खेत-अवगाही दोउ, अपने-अपने रूप कोउ न टरतु है।
जड़-परनामनिकौं को करता है पुदगल, चिदानंद-चेतन सुभाउ आचरतु है।। 10।।

शब्दार्थ :- एक-परिनाम के न करता दरब-दोइ= एक-परिणाम के कर्त्ता दो-द्रव्य नहीं होते, दोइ-परिनाम एक-दरब न धरतु है= दो-परिणाम एक-द्रव्य धारण नहीं करता, एक-करतूति दोइ-दर्व कबहूँ न करै= एकपरिणाम को दो-द्रव्य कभी नहीं करते, दोइ-करतूति एक-दरब न करतु है= दो-परिणाम एक-द्रव्य नहीं करता है, जीव-पुदगल दोउ एक खेत-अवगाही= जीव और पुद््गल दोनों एकक्षेत्रावगाही हैं, अपने-अपने रूप कोउ न टरतु है= अपने-अपने स्वरूप को कोई भी नहीं छोड़ता है, जड़-परनामनिकौं करता है पुदगल= जड़-परिणामों का कर्त्ता पुद््गल-द्रव्य है, चिदानंद चेतन सुभाउ आचरतु है= चेतन-आत्मा तो अपने स्वभावरूप आचरण करता है। विशेषार्थ :- कर्त्ता, कर्म और क्रिया का विशेष वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं सभी-द्रव्य और उनके कार्य एक दूसरे से पूर्णतः भिन्न है। किसी एक कार्य के दो कर्त्ता कभी नहीं होते। जैसे मिट्टी से घड़ा बना, इसमें घड़े रूपी कार्य का कर्त्ता कुम्हार को कहना व्यवहार है, निमित्तरूप कथन है; क्योंकि यदि घड़े का कर्त्ता कुम्हार होता तो कुम्हार को घड़े रूप परिणमित होना चाहिये था, जबकि ऐसा नहीं होता। मिट्टी ही स्वयं घड़े रूप परिणमित होती है, इसलिये मिट्टी ही उसकी ‘कर्त्ता’ है। और घड़ा मिट्टी रूप है मिट्टी ही उसमें अभिन्न है,सो वही उसका ‘कर्म’ है, और मिट्टी के पिण्ड से घड़े बनने रूप प्रक्रिया में मिट्टी ही सहभागी है, सो वही ‘क्रिया’ है। इसप्रकार कर्त्ता, कर्म और क्रिया तीनों मिट्टी पर ही घटित हुये, जो एक स्वतंत्र पुद््गल-द्रव्य है। कुम्हार जोकि एक भिन्न जीव-द्रव्य था, उस पर तो केवल निमित्त का आरोप आया, कर्त्तापने का नहीं। जीव और पुद््गल की भिन्नता बताते हुये कविवर कहते हैं कि जीव और पुद््गल दोनों एक क्षेत्रावगाही हैं अर्थात् अनादिकाल से साथ-साथ हैं, लेकिन किसी ने भी आज तक अपना स्वभाव नहीं छोड़ा है अर्थात् आज तक न जीव पुद््गलरूप और न ही पुद््गल जीवरूप हुआ है। साथ-साथ परिणमन करते हुये भी दोनों में पूर्ण-भिन्नता है, जड़-कार्यों का कर्त्ता पुद््गल-द्रव्य है और चैतन्य-स्वरूप भगवान् आत्मा तो हमेशा अपने जानन-स्वभावरूप ही आचरण करता है, इसलिए अपने चैतन्य-भावों का ही कर्त्ता है। उसी उदाहरण पर पुन: विचार करते हैं, जैसे मिट्टी और कुम्हार एक क्षेत्रावगाही हैं, फिर भी मिट्टीरूपी पुद््गल-द्रव्य ने घड़े बननेरूप अपना कार्य किया, और कुम्हाररूपी जीव-द्रव्य ने मिट्टी से घड़े बननेरूप प्रक्रिया को अपने स्वभाव के अनुरूप मात्र जाना, अर्थात् दोनों द्रव्यों ने अपना-अपना स्वतंत्र-कार्य किया। इसीप्रकार आत्मा भी अनादिकाल से अपने स्वभाव के अनुसार मात्र जाननरूप-क्रिया का ही कर्त्ता है, ज्ञान और आत्मा अभिन्न हैं, इसप्रकार जीव-द्रव्य भी और अन्य-द्रव्य भी स्वतंत्ररूप से ही परिणमन कर रहे है। कोई द्रव्य किसी अन्य-द्रव्य का कार्य कभी नहीं करता। लोक में ऐसी ही स्वतंत्र वस्तु-व्यवस्था है। नैकस्य हि कर्तारौ द्वौ स्तो द्वे कर्मणी न चैकस्य। नैकस्य च क्रिये द्वे एकमनेकं यतो न स्यात् ।। 9।।

(सवैया इकतीसा)

महाधीठ दुख कौ वसीठ परदर्वरूप, अंधकूप काहूपै निवान्यौ नहि गयौ है।
ऐसौ मिथ्याभाव लग्यौ जीवकौं अनादिहीकौ, याहि अहंबुद्धि लिये नानाभाँति भयौ है।।
काहू समै काहू कौ मिथ्यात-अंधकार-भेदि, ममता-उछेद सुद्धभाव-परिनयौ है।
तिनही विवेक धारि बंधकौ विलास डारि, आतम-सकति से जगत् जीत लयौ है।। 11।।

शब्दार्थ :- महाधीठ दुःख कौ वसीठ परदर्वरूप= महाढीठ, दुःख का दूत, परद्रव्यरूप, अंधकूप काहूपै निवान्यौ नहि गयौ है= अंधा-कुँआ, किसी के भी द्वारा हटाया नहीं जा सका है, ऐसौ मिथ्याभाव लग्यौ जीवकौं अनादिहीकौ= ऐसा मिथ्यात्व-भाव जीव के अनादिकाल से ही लगा हुआ है, याहि अहंबुद्धि लिये नानाभाँति भयौ है= इसी में अहंपने करके नानारूप हुआ है, काहू-समै काहूकौ मिथ्यात-अंधकार भेदि= किसी समय कोई जीव मिथ्यात्वरूपी अंधकार को भेदकर/नष्टकर, ममता-उछेद सुद्ध-भाव परिनयौ है= ममत्व का त्यागकर, शुद्ध-भावरूप परिणमित होता है, तिनही विवेक धारि बंधकौ विलास डारि= वही जीव विवेक धारणकर बंध के साम्राज्य को नष्ट करके, आतम-सकति से जगत् जीत लयौ है= आत्मशक्ति से जगत् को जीत लेता है। विशेषार्थ :- इन-पंक्तियों में कवि ने सटीक-शब्दों में ‘मिथ्यात्व का स्वरूप’ वर्णित किया है। कैसा है मिथ्यात्व? ‘महाढीठ है’- यानि जो किसी की भी नहीं सुनता, जैसे जगत् में भी कोई बच्चा जब किसी की नहीं सुनता, तो लोग उसे ‘महाढीठ’ कहते हैं, वही लोकभाषा का शब्द कवि ने यहाँ मिथ्यात्व के लिये प्रयोग किया है। सत्य भी है हम मिथ्यादृष्टि-जीवों को समझाने के लिये गणधरदेव ने इतने विशाल जिनागम की रचना की, हम प्रतिदिन सुनते भी हैं, पर इसी मिथ्यात्व के प्रभाव में आकर मानते बिल्कुल भी नहीं है, तो हम भी ‘महाढीठ’ ही हैं। जो ‘दुःख का वसीठ’ यानि अग्रदूत है अर्थात् जिसके रहने पर जीव को दुःख के सिवाय और कुछ नहीं मिलता। ‘परद्रव्यरूप है’ अर्थात् ये मिथ्यात्वपना मेरा स्वभाव नहीं है, परद्रव्य के लक्ष्य से उत्पन्न होता है, इसलिए परद्रव्यरूप है। ‘अंधकूप है’ अर्थात् अंधे-कुँयें के समान है, ऐसा अंधा-कुँआ जिसमें गिरने पर बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नजर न आये, उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव भी चार-गति चौरासीलाख योनिरूप अंधे-कुँये में ही भटकता रहता है, कभी बाहर ही नहीं निकल पाता। ‘निवान्यौ’ अर्थात् जो किसी और के द्वारा हटाया नहीं जा सकता अर्थात् मिथ्यात्व या विपरीत-मान्यता को जीव स्वयं ही दूर कर सकता है, किसी और के पुरुषार्थ से अपना भला कभी नहीं होगा। ऐसा मिथ्यात्व-भाव जीव के साथ अनादिकाल से लगा हुआ है, और इसी में अहंबुद्धि करके अर्थात् इसी मिथ्यात्व-बैरी को अपना सर्वस्व मानकर यह जीव नानाप्रकार के रूप रखता है अर्थात् चारों-गतियों में नाना-भेष धारणकर जन्म-मरण करता हुआ निरन्तर दुःखी होता है। किसी समय, कोई-जीव मिथ्यात्वरूपी अंधकार को नष्ट करके, ममत्व का त्याग करके, शुद्धभावरूप परिणमित होता है; तब वह विवेक को धारणकर अर्थात् भेदविज्ञान-पूर्वक संसार-बंध के कारणों को हटाकर, आत्मशक्ति के बल पर सारे संसार को जीत लेता है अर्थात् मोह के बंधनों को तोड़कर मोक्षमार्ग पर अग्रसर होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब जीव अपने चैतन्य-स्वभाव का आश्रय लेता है, उसी क्षण ये महाढीठ मिथ्यात्व का विनाश अर्थात् दर्शनमोहनीय का क्षय, उपशम या आसंसारत एव धावति परं कुर्वेऽहमित्युच्चकै-र्दुर्वारं ननु मोहिनामिह महाहङ्काररूपं तमः। तद््भूतार्थ-परिग्रहेण विलयं यद्येकवारं व्रजेत्, तत्किं ज्ञानघनस्य बन्धनमहो भूयो भवेदात्मनः।। 10।। क्षयोपशम हो जाता है। फिर संसार, शरीर और भोगों से ममत्वभाव त्यागकर स्वरूप में ज्यों-ज्यों स्थिर होता है, त्यों-त्यों बंध का साम्राज्य यानि बंध के कारणों- मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग का अभाव करता हुआ अपनी आत्मिक-शक्ति से संसार का अभाव करके मुक्ति को प्राप्त करता है।

(सवैया इकतीसा)

सुद्धभाव-चेतन असुद्धभाव-चेतन, दुहूंकौ करतार जीव और नहिं मानिये।
कर्मपिंडकौ विलास वर्न-रस-गंध-फास, करता दुहूंकौ पुदगल परवानिये।।
तातैं वरनादि-गुन ग्यानावरनादि-कर्म, नाना-परकार पुदगलरूप जानिये।
समल-विमल-परिनाम जे-जे चेतन के, ते-ते सब अलख-पुरुष यौं बखानिये।। 12।।

शब्दार्थ :- सुद्धभाव-चेतन= शुद्ध-भाव भी आत्मा के, असुद्धभाव-चेतन= अशुद्ध-भाव भी आत्मा के हैं, दुहूंकौ करतार जीव और नहिं मानिये= दोनों का कर्त्ता जीव है, और किसी को मत मानो, कर्मपिंडकौ विलास= कर्मों के पिण्ड का साम्राज्य, वर्न-रस-गंध-फास= वर्ण, रस, गंध और स्पर्श है, करता दुहूंकौ पुदगल परवानिये= दोनों का कर्त्ता पुद््गल है- ऐसा निर्णय करना चाहिये, तातैं नाना-परकार वरनादि-गुन= इसीलिए नानाप्रकार के वर्ण आदि गुण और, ग्यानावरनादि-कर्म= ज्ञानावरणी आदि कर्मों को, पुदगलरूप जानिये= पुद््गलरूप जानना चाहिये, समल-विमल-परिनाम= मल-सहित/अशुद्ध, मल-रहित/शुद्ध परिणाम, जे-जे चेतन के= जो-जो आत्मा के हैं, ते-ते सब अलख-पुरुष यौं बखानिये= वे-वे सब इन्द्रिय-अगोचर-पुरुष अर्थात् आत्मा के हैं- ऐसा कहा गया है। विशेषार्थ :- कविवर कहते हैं कर्म के अनुसार ही कर्त्ता होता है। इस अपेक्षा से शुद्ध-भाव भी आत्मा के हैं, और अशुद्ध-भाव भी आत्मा के ही हैं, यानि दोनों ही भावों का कर्त्ता जीव है, अन्य कोई नहीं है। इसीप्रकार ज्ञानानरणादि कर्मों का पिण्ड और पुद््गल का साम्राज्य स्पर्श-रस-गंध और वर्ण आदि का कर्त्ता पुद््गल-द्रव्य को ही मानना चाहिये। कहने का अभिप्राय यह है कि जितने भी शुद्ध-भाव अर्थात् केवलज्ञान, केवलदर्शन, सुख, वीर्य आदि हैं; उन भावों का कर्त्ता भी आत्मा है, और जितने अशुद्ध-भाव अर्थात् मोह, राग, द्वेषादि-भाव हैं; उनका कर्त्ता भी आत्मा ही है, अन्य कोई नहीं। क्योंकि समस्त शुद्ध-भाव जीव के दर्शन और चारित्र-गुणों की स्वाभाविक-पर्याय हैं, और मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भाव जीव के दर्शन और चारित्र-गुणों की विकारी-पर्यायें हैं, लेकिन इनका कर्त्ता जीव ही है। इसीप्रकार ज्ञानावरणी आदि आठों कर्मरूप पुद््गल-परमाणुओं का और उसके स्पर्श-रस-गंध और वर्ण आदि समस्त-गुणों का कर्त्ता पुद््गल-द्रव्य को ही मानना चाहिये। उदाहरण के लिए गुलाब के पेड़ पर उगनेवाले फूल और काँटे, जैसे गुलाब का फूल पेड़ का अपना फूल है, उसीप्रकार काँटे भी तो गुलाब के पेड़ के ही हैं, क्या हम उन काँटों को किसी अन्य पेड़ का मानते हैं? नहीं। ठीक उसीप्रकार जैसे जाननरूप परिणमन आत्मा का अपना परिणमन है, उसीप्रकार मोह-रागद्वेषादि के भाव भी गुलाब के पेड़ में उगनेवाले काँटों की तरह आत्मा के गुणों का विकारी-परिणमन हैं। जैसे हम गुलाब को ग्रहण करके काँटों को वहीं छोड़ देते हैं, ठीक उसीप्रकार सुखी होने के लिये जीव विकाररूपी काँटों को छोड़कर ज्ञानस्वभाव का अाश्रय लेता है। और ज्ञानस्वभाव का ग्रहण होने पर

विकारों की उत्पत्ति स्वतः ही समाप्त हो जाती है।
आत्मभावान्करोत्यात्मा परभावान्सदा परः। आत्मैव हृाात्मनो भावाः परस्य पर एव ते ।। 11।।

(सवैया इकतीसा)

जैंसे गजराज नाज-घास के गरास करि, भच्छत सुभाय नहिं भिन्न-रस लीयौ है।
जैंसें मतवारौ नहिं जानै सिखरनि-स्वाद, जुंग में मगन कहै गऊ-दूध पीयौ है।।
तैंसे मिथ्यादृष्टि-जीव ग्यानरूप है सदीव, पग्यौ पाप-पुन्नसौं सहज सुन्न-हीयौ है।

चेतन-अचेतन दुहक ूँ ौ मिश्र-पिंड लखि, एकमेक-मानै-न-विवेक-कछु-कीयौ है।। 13।। शब्दार्थ :- जैंसे गजराज नाज-घास के गरास करि= जिसप्रकार हाथी अनाज और घास के ग्रास/निवाला करके, भच्छत सुभाय नहि भिन्न रस लीयौ है= (मिलाकर) भक्षण करता है, दोनों का भिन्न स्वाद नहीं लेता, जैसें मतवारौ नहिं जानै सिखरनि-स्वाद= जिसप्रकार मतवाला-पुरुष श्रीखंड का स्वाद नहीं जानता, जुंग में मगन कहै ‘‘गऊ दूध पीयौ है’’= धुन में मगन होकर कहता है कि ‘‘गाय का दूध पिया है’’, तैंसे मिथ्यादृष्टि-जीव ग्यानरूप है सदीव= उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव भी हमेशा ज्ञानरूप ही है, पग्यौ पाप-पुन्नसौं= (लेकिन) पाप और पुण्य के रस में भीगा होने से, सहज सुन्न-हीयौ है= सहज ही विवेकरहित होता है, चेतन-अचेतन= आत्मा और समस्त बाह्य-पदार्थ, दुहूँकौं मिश्र-पिंड लखि= दोनों का मिश्रितरूप देखकर, एकमेव मानै= एकमेक मानता है, न विवेक कछु कीयौ है= कोई विवेक नहीं करता। विशेषार्थ :- मिथ्यादृष्टि-जीव की प्रवृत्ति का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि पर में ममत्व-बुद्धि होने के कारण यह जीव भेदविज्ञान के मर्म को नहीं समझता। जैसे हाथी अनाज और घास का मिला हुआ ग्रास मुँह में रखता है, तब उसकी दृष्टि सिर्फ खाने पर होने से अनाज और घास दोनों का स्वाद एकदम भिन्न होने पर भी उसे उनका भिन्न-स्वाद भासित नहीं होता। जैसे कोई मदिरा के नशे में मतवाला हो और उसे दही और चीनी के मिश्रण से बना पदार्थ श्रीखंड खिलाया जाये, तो उसे उसका सही स्वाद भासित नहीं होता; बल्कि उसे ऐसा लगता है कि मैंने गाय का दूध पिया है। ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव को भी जड़ और चेतन की परिणति भिन्न-भिन्न होते हुये भी एकरूप ही भासित होती है, जबकि वह भी अनंत-वैभव का धनी ज्ञान-स्वभावी आत्मा है; उसको भी मात्र अपने ज्ञान का ही वेदन होता है, लेकिन कर्मोदय के परिणामों, पाप-पुण्यरूप क्रियाओं, विषयभोगों और परपदार्थों के आकर्षण में वह इतना मगन होता है, कि उसे उन्हीं का ही रस आता है। एक क्षण के लिये भी न तो ज्ञानस्वरूप की महिमा आती है और न ही जड़ और चेतन की भिन्नता ख्याल में आती है, इसीलिए वह स्वयं को कर्म का कर्त्ता और कर्मफल का भोक्ता मानता है।

(सवैया इकतीसा)

जैसे महाधूप की तपतिमैं तिसायौ-मृग, भरमसौं मिथ्याजल-पीवनकौ धायौ है।
जैसे अंधकार-माहिं जेवरी निरखि नर, भरमसौं डरपि सरप मानि आयौ है।।
अपनैं सुभाव जैंसे सागर सुथिर सदा, पवन-संजोगसौं उछरि अकुलायौ है।
तैंसे जीव जड़सौं अव्यापक सहजरूप, भरमसौं करमकौ करता कहायौ है।। 14।।

शब्दार्थ :- जैसे महाधूप की तपतिमैं तिसायौ-मृग= जिसप्रकार भयंकर-धूप की गर्मी में प्यासा-हिरण,

अज्ञानतस्तु सतृणाभ्यवहारकारी, ज्ञानं स्वयं किल भवÂन्नपि रज्यते यः।
पीत्वा दधीक्षु-मधुराम्ल-रसातिगृद्धया, गां दोग्धि दुग्धमिव नूनमसौ रसालम्।। 12।।

अज्ञानान्मृगतृष्णिकां जलधिया धावन्ति पातुं मृगा, अज्ञानात्तमसि द्रवन्ति भुजगाध्यासेन रज्जौ जनाः। अज्ञानाच्च विकल्प-चक्र-करणाद्-वातोत्तरंगाब्धिवत्, शुद्धज्ञानमया अपि स्वयममी कÂर्त्रोभवन्त्याकुलाः।। 13।। भरमसौं मिथ्याजल-पीवनकौं आयौ है= भ्रम से जल नहीं होने पर मृगतृष्णा को जल समझकर पीने के लिये आता है, जैसे अंधकार-माँहि जेवरी निरखि नर= जिसप्रकार अंधेरे में रस्सी देखकर व्यक्ति, भरमसौं डरपि सरप मानि आयौ है= भ्रम से उसे सर्प मानकर डर कर आता है, अपने सुभाव जैंसे सागर सुथिर सदा= अपने स्वभाव के अनुसार जैसे समुद्र हमेशा शांत रहता है, पवन-संजोगसौं उछरि अकुलायौ है= हवा के संयोग से उछलकर आकुलित होता है, तैंसे जीव जड़सौं अव्यापक सहजरूप= उसीप्रकार जीव जड़ में व्याप्त हुये बिना भी सहजरूप से, भरमसौं करमकौ करता कहायौ है= भ्रम से कर्म का कर्त्ता कहलाता है। विशेषार्थ :- इन पंक्तियों में कवि ने मिथ्यादृष्टि-जीव की तुलना कई उदाहरणों के माध्यम से की है। पहली तुलना मृगजल अर्थात् प्यास से व्याकुल होकर मृगतृष्णा में जल मानने वाले हिरण से की। जैसे महाभयंकर-गर्मी में प्यासा-हिरण भ्रम से ‘मृगजल’ पीने के लिये आतुर रहता है। ‘मृगजल’ अर्थात् जब तेज-गर्मी में सूर्य की चमक बालू पर पड़ती है, तो बालू भी पानी की तरह प्रतीत होती है और प्यास से अाकुलित हिरण उस चमक को पानी समझकर उसके पीछे दौड़ता है, लेकिन जब वहाँ पहुच ँ ता है, तब वहाँ उसे पानी नहीं मिलता; पुनः जब वह नजर उठाता है, तो फिर कुछ दूरी पर सूर्य की धूप की चमक से पानी का भ्रम होता है, और वह फिर दौड़ता है- इसप्रकार वह दौड़ता ही रहता है, पर पानी नहीं मिलता। ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव पंचन्द्रि े य के विषयों में सुख की मिथ्या/झूठी कल्पना करके नये-नये विषयों को बदलता रहता है और सुख की चाह में भ्रमित होता रहता है पर सुख नहीं मिलता। दूसरे-उदाहरण के माध्यम से कवि कहते हैं कि जैसे कोई व्यक्ति अंधेरे में रस्सी को ही साँप समझकर डरने लगे, तो यह तो उसका भ्रम ही हैं, वास्तव में तो वह रस्सी है, ठीक उसीप्रकार यदि मिथ्यादृष्टि-जीव शरीर और संयोगों को ही अपना हितैषी मानकर उनके वियोग के डर से दु:खी होवे, तो यह तो उसका भ्रम ही है, क्योंकि संयोगों का वियोग तो निश्चित है। इसीप्रकार सामान्यरूप से देखा जाये, तो समुद्र अपने स्वभाव से तो हमेशा शांत ही रहता है, पर हवा के झोंकों से लहरें उठती है,और उसका शांत-स्वभाव क्षुब्ध दिखाई देता है, ठीक उसीप्रकार आत्मा स्वभाव से त्रिकाल-शुद्ध और पूर्ण-भिन्न ही रहता है, जितनी भी मलिनता है सब पर्याय में ही है, स्वभाव तो आज तक मलिन हुआ ही नहीं। स्वभाव तो आज भी ज्ञाता-दृष्टा ही है और कल भी ज्ञाता-दृष्टा ही रहेगा। जिसने आज तक अणुमात्र भी पर को स्पर्श नहीं किया, वह कर्त्ता कैसे बन सकता है? फिर भी जीव पुद््गल के हर परिणमन का कर्त्ता स्वयं को ही मानता है, और फिर स्वयं ही दु:खी होता है यह जीव का भ्रम ही है, अन्य कुछ नहीं।

(सवैया इकतीसा)

जैंसें राजहंस के बदन के सपरसत, देखिये प्रगट न्यारौ-छीर न्यारौ-नीर है। तैंसे समकिती की सुदष्टि

ृ में सहजरूप, न्यारौ-जीव न्यारौ-कर्म न्यारौ ही सरीर है।।
जब सुद्ध-चेतनकौ अनुभौ-अभ्यासै तब, भासै आप अचल न दूजौ और सीर है।
पूरब-करम-उदै आइकै दिखाई देइ, करता न होय तिन्हकौ तमासगीर है।। 15।।

शब्दार्थ :- जैंसे राजहंस के बदन के सपरसत= जैसे राजहंस-पक्षी के बदन/शरीर यानि मुख के स्पर्श से, देखिये प्रगट न्यारौ-छीर न्यारौ-नीर है= दूध अलग पानी अलग प्रगट दिखाई देता है, तैसें समकिती की सुदृष्टि

ज्ञानाद् विवेचकतया तु परात्मनोर्यो, जानाति हंस इव वाःपयसोर्विशेषं।
चैतन्यधातुमचलं स सदाधिरूढो, जानीत एव हि करोति न dIY®¨f³ffपि ।। 14।।

में सहजरूप= उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव की सम्यक्-दृष्टि में सहज ही, न्यारौ-जीव न्यारौ-कर्म न्यारौ ही सरीर है= जीव अलग, कर्म अलग, शरीर भी अलग है, जब सुद्ध-चेतनको अनुभौ-अभ्यासै तब= जब चेतनस्वरूप शुद्धात्मा के अनुभव का अभ्यास करता है, तब भासै आप अचल= तब अपना स्वरूप अचल भासित होता है, न दूजौ और सीर है= तब दूसरा कोई और साथी नहीं दिखता, पूरब-करम-उदै आइकै दिखाई देइ= पूर्व-कर्म का उदय आकर दिखाई देता है, करता न होय= (परन्तु उसका) कर्त्ता नहीं होता, तिन्हकौ तमासगीर है= उसका भी तमाशबीन/दर्शक ही रहता है। विशेषार्थ :- भेदविज्ञानी-जीव कर्म का कर्त्ता क्यों नहीं होता, मात्र ज्ञाता ही क्यों रहता है?- इसका सुंदर-वर्णन कवि ने इस छंद में किया है। जैसे मिले हुये दूध और पानी को लोक में कोई अलग नहीं कर सकता, लेकिन राजहंस-पक्षी के पास ऐसी क्षमता है कि उसके मुख का स्पर्श होते ही दोनों पदार्थ अलग-अलग हो जाते है, ठीक उसीप्रकार शरीर, कर्म और आत्मा भी नीर-क्षीर की तरह दिखते तो एकक्षेत्रावगाही हैं, लेकिन फिर भी एकमात्र ज्ञानी-जीवों को ही भिन्न-भिन्न दिखाई देते हैं; क्योंकि इसके लिये भेदविज्ञानरूपी पैनी-नज़र का होना अति-आवश्यक है, जो सिर्फ ज्ञानी-जीवों के पास ही होती है। ज्ञानी-जीवों को जब अपने आत्मस्वरूप के अनुभव का अभ्यास होता है, तब उन्हें संसार में एकमात्र अपना आत्मा ही अनुमप-सुखमय भासित होता है, उसके जैसा संसार में अन्य कोई नहीं दिखता, जिससे पर से भिन्न अपने आत्मस्वरूप का श्रद्धान और दृढ़ हो जाता है। मोक्ष होने से पहले सभी जीवों के साथ कर्म का सद्भाव होता ही है, और उन कर्मों का उदय भी वर्तता है, लेकिन जहाँ मोही-जीव उदय में आये हुये कर्मों और कर्मफलों का मोह और अहंबुद्धि के कारण कर्त्ता और भोक्ता बन जाता है, वहीं ज्ञानी-जीव उदय में आये हुये उन कर्मों और कर्मफलों का मात्र तमाशगीर/दर्शक रहता है, यानि उस अनुकूल-प्रतिकूल परिणमन का मात्र ज्ञाता-दृष्टा रहता है, उसमें हस्तक्षेप नहीं करता अर्थात् अपने उपयोग को उससे नहीं जोड़ता और सहज-साम्यभाव धारण करता है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसें उसनोदक में उदक-सुभाव सीरौ, आग की उसनता फरस-ग्यान लखियै।
जैंसे स्वाद व्यंजन में दीसत विविधरूप, लौन को सुवाद खारौ जीभ-ग्यान चखियै।।
तैंसे घट-पिंड में विभावता अग्यानरूप, ग्यानरूप-जीव भेद-ग्यानसौं परखियै।
भरमसौं करम कौ करता है चिदानंद, दरब-विचार करता-भाव नखियै।। 16।।

शब्दार्थ :- जैसे उसनोदक में उदक-सुभाव सीरौ= जैसे उष्ण-उदक या गरम-जल की अवस्था में भी पानी का स्वभाव ठंडा ही है, आग की उसनता फरस-ग्यान लखियै= (फिर भी) वह उष्णता अग्नि की है- यह स्पर्श-ज्ञान जान लेता है, जैंसे स्वाद व्यंजन में दीसत विविधरूप= जैसे भोजन में स्वाद विविधरूपों में दिखाई देता है, लौन को सुवाद जीभ ग्यान चखियै= नमक का स्वाद (खारा है), जीभ/रसना-इन्द्रिय चख लेती है, तैंसे घट-पिंडमैं विभावता अग्यानरूप= उसीप्रकार घटपिण्ड/शरीर में विभाव-भाव अज्ञानतारूप, ग्यानरूप-जीव भेदग्यानसौं परखियै= ज्ञानरूप-आत्मा को भेदविज्ञान के द्वारा पहिचानना चाहिये, भरमसौं करमसौं करता है चिदानंद= चैतन्य-स्वरूप भगवान् आत्मा भ्रम से अपने को करम का कर्त्ता मानता है, दरब-विचार करताभाव नखियै= द्रव्यदृष्टि से विचार करने पर परकर्तृत्व का भाव नहीं दिखाई देता है। ज्ञानादेव ज्वलन-पयसोरौष्ण्य-शैत्य-व्यवस्था, ज्ञानादेवोल्लसति लवण-स्वाद-भेद-व्युदासः। ज्ञानादेव स्वरस-विकसन्निÂत्य-चैतन्यधातोः, क्रोधादेश्च प्रभवति भिदा भिन्दती कर्तृभावम्।। 15।। विशेषार्थ :- जीव और पुद््गल की पहचान कैसे होती है?- इसका वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार पानी का स्वभाव शीतल होते हुये भी गरम-पानी को स्पर्श करके अग्नि-जनित उष्णता को पहचान लिया जाता है। जैसे पकी हुई सब्जी में वैसे तो विविध मसालों का स्वाद रहता है, लेकिन फिर भी जीभ पर रखते ही नमक के खारेपन का स्वाद अन्य-मसालों के बीच भी अलग पहचान लिया जाता है। ठीक उसीप्रकार घट-पिंड यानि आत्मा में अज्ञानतारूप विभावभाव और ज्ञानरूप स्वभाव-भाव को ज्ञानी-जीव भेदविज्ञान के द्वारा परख या जान लेते हैं। अज्ञानदशा में आत्मा को कर्मों का कर्त्ता मानना जीव का केवल भ्रम है, द्रव्यदृष्टि से या स्वभाव की अपेक्षा आत्मा को कर्मों का कर्त्ता नहीं है। कहने का अभिप्राय यही है कि विभावरूप-परिणमन आत्मा का स्वभाव नहीं है, पर-संयोग की स्थिति में अज्ञानता से उत्पन्न होनेवाला विकार है, जैसे अग्नि का संयोग हटते ही जल पुनः अपने शीतलस्वभावरूप परिणमन करता है, उसीप्रकार पर-संयोग यानि पर से दृष्टि हटते ही आत्मा अपने जाननस्वभावरूप परिणमन करता है। हे आत्मन्! जगत् का परिणमन पूर्ण-स्वतंत्र है, मिथ्यादृष्टि-जीव उस परिणमन का कर्त्ता स्वयं को मानता है, यही उसका अज्ञान है, भ्रम है, विभाव है, और ज्ञानी-जीव उस परिणमन का मात्र ज्ञाता रहता है- यही स्वभाव है, सम्यग्ज्ञान है।

(दोहा)

ग्यानभाव-ज्ञानी करै, अग्यानी-अज्ञान।
दर्वकर्म पुदगल करै, यह निहचै परवान।। 17।।

शब्दार्थ :- ग्यानभाव-ज्ञानी करै= ज्ञानभाव ज्ञानी करता है, अग्यानी-अग्यान= अज्ञानी अज्ञान-भाव करता है, दर्वकर्म-पुदगल करै= द्रव्यकर्म का कर्त्ता पुद््गल है, यह निहचै परवान= यही निश्चय से मानना चाहिये। विशेषार्थ :- पदार्थ अपने स्वभाव का ही कर्त्ता होता है। आत्मा चेतनस्वरूप है, सो अपने चैतन्य-भावों का ही कर्त्ता है, कर्मरूप अचेतन पुद्ग् ल-परमाणुओं का कर्त्ता आत्मा तीन-काल में भी न हुआ है, और न हो सकता है। आत्मा के परिणाम दो-प्रकार के होते हैं- शुद्ध और अशुद्ध। जिस समय आत्मा अपने जाननस्वभावरूप परिणमन करता है, वह शुद्धचेतना-रूप है, उसका कर्त्ता ‘ज्ञानभाव’ है। लेकिन जिस समय आत्मा मोह-राग-द्वेषादि विकारीभाव-रूप परिणमन करता है, वह अशुद्ध-चेतनारूप है, उससमय उसका कर्त्ता ‘अज्ञानभाव’ है। लेकिन द्रव्य-कर्मरूप अचेतन पुद््गल-परमाणुओं का कर्त्ता पुदगल-द्रव्य ही है, क्योंकि चेतन आत्मा का अचेतन-कर्मों के साथ व्यापक-व्याप्य संबंध नहीं है; तो उनका कर्त्ता आत्मा कैसे हो सकता है? निश्चय से यही सत्य और प्रामाणिक है।

(दोहा)

ग्यान-सरूपी आत्मा, करै ग्यान नहिं और।
दरब-करम चेतन करै, यह विवहारी-दौर।। 18।।

शब्दार्थ :- ग्यान-सरूपी आत्मा= ज्ञान-स्वरूपी आत्मा, करै ग्यान नहि और= ज्ञान ही करता है और कुछ अज्ञानं ज्ञानमप्येवं कुर्वÂन्नात्मानमञ्जसा। स्यात्कर्त्तात्मात्म-भावस्य परभावस्य न क्वचित् ।। 16।। आत्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानादन्यत्करोति किम्। परभावस्य कर्त्तात्मा मोहोऽयं व्यवहारिणाम् ।। 17।। नहीं, दरब-करम चेतन करै= द्रव्य-कर्म आत्मा करता है, यह विवहारी-दौर= यह व्यवहार का कथन है। विशेषार्थ :- ज्ञान-भाव का कर्त्ता केवल जीव है, अन्य कोई नहीं- इस कथन को स्पष्ट करते हुये कविवर कहते हैं कि ‘‘आत्मा ज्ञानस्वरूप है और ज्ञानरूप ही परिणमन करता है, ज्ञानरूप अर्थात् जाननेरूप कार्य के अलावा आत्मा और कुछ नहीं करता’’। जैसे चीनी सर्वांग में केवल मिठास से भरपूर है, सो केवल मिठासरूप ही परिणमन करती है। नमक सर्वांग में केवल खारेपन से भरपूर है, सो खारेरूप ही परिणमन करता है। ठीक उसीप्रकार आत्मा सर्वांग में ज्ञान से भरपूर है, सो केवल जाननरूप ही परिणमन करता है। आत्मा को कर्मरूप पुद््गल-परमाणुओं का कर्त्ता कहना- ये मोही-जीवों का अज्ञान है, व्यवहारकथन है। और आगम में ‘व्यवहार’ को ‘असत्यार्थ’ कहा गया है; क्योंकि ‘व्यवहार’ उसी का नाम है, जो संयोगों से कथन करता है, जो वस्तु के सत्य-स्वरूप का प्रतिपादन नहीं करता है।

(सवैया तेईसा)

पुग्गलकर्म करै नहिं जीव, कही तुम मैं समुझी नहिं तैसी।
कौन करै यह रूप कहौ अब, को करता करनी कहु कैसी।।

आपु ही आप मिलै-बिछुरै जड़, क्यों करि मो मन संशय ऐसी? सिष्य-संदेह-निवारन-कारन, बात कहैं गुरु है कछु ऐसी।। 19।। शब्दार्थ :- पुग्गलकर्म करै नहि जीव= पुद््गल-कर्म जीव नहीं करता, कही तुम मैं समुझी नहिं तैसी= तुमने एेसा कहा, पर वैसा मुझे समझ में नहीं आया, कौन करै यह रूप कहौ अब= फिर कौन करता है यह सब परिणमन? को करता करनी कहु कैसी= कौन कर्ता है? यह किसकी करनी है? बताओ, आपुही आप मिलै बिछुरै जड़= पुद््गल अपने आप मिलता और बिछुड़ता है, क्यों करि मो मन संशय ऐसी= (कैसे?) क्यों मेरे मन में ऐसा संशय है? सिष्य संदेह निवारन कारन= शिष्य का भ्रम दूर करने के लिये, बात कहैं गुरु है कछु ऐसी= गुरु कुछ ऐसी बात कहते हैं। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने कहा कि ‘‘आत्मा अपने परिणामों का, और पुद्ग् ल अपने परिणामों का कर्ता है’’- यह बात शिष्य की समझ में नहीं आई। अतः इस छंद में कवि ने शिष्य की उसी शंका का वर्णन किया है। वह पूछता है ज्ञानावरणादि जड़-कर्मों को जीव नहीं करता- ऐसा आपने कहा तो, पर मेरी समझ में नहीं आया। क्योंकि यदि जीव ये सब नहीं करता, तो फिर कौन करता है? ये किसकी क्रिया हैं?‘’ शिष्य आगे कहता है कि ये जड़-कर्म अपने आप मिलते हैं और अपने आप बिछुड़ते हैं, पर कैसे? ये बात मेरी समझ में नहीं आई, इसमें मुझे संदेह है। तब शिष्य की शंका का निवारण करने के लिये गुरुजी सत्य को कुछ ऐसे कहते हैं। वास्तव में देखा जाये तो यह शंका किसी एक जीव की नहीं, हर मिथ्यादृष्टि-जीव की है। क्योंकि प्रत्येक द्रव्य का परिणमन स्वतंत्र है, कोई किसी का कर्ता नहीं- यह बात मिथ्यादृष्टि-जीव के गले नहीं उतरती, क्योंकि उसे तो प्रतिसमय कर्तृत्वबुद्धि का ही बोझ सवार है। उसे तो यही लगता है कि ‘‘हर कार्य का कर्त्ता मैं ही हूँ, मेरे बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिलता।’’ लेकिन माँ जिनवाणी कहती है ''भाई! जगत् का ये परिणमन पूर्ण-स्वतंत्र और स्वयं होता है, कोई

जीवः करोति यदि पुद््गलकर्म नैव, कस्तहिर् तत्कुरुत इत्यभिशङ्कयैव।
एतहिर् तीव्ररयमोह-निवर्हणाय सङ्कीर्त्यते शृणुत पुद््गल-कर्म-कर्तृ।। 18।।

किसी का कर्त्ता नहीं है।‘’ शिष्य की शंका को दूर करने के लिये इस सत्य का निरूपण कविवर अगले छंद में करेंगें।

(दोहा)

पुदगल परिनामी-दरब, सदा परिनवै सोइ।
यातैं पुदगल-करम कौं, पुदगल करता होइ।। 20।।

जीव चेतना-संजुगत, सदा-पूरण सब ठौर।
तातैं चेतन-भाव को, करता जीव न और।। 21।।

शब्दार्थ :- पुदगल परिनामी-दरब= पुद््गल परिणामी-द्रव्य है, सदा परिनवै सोइ= सदा वैसा ही परिणमन करता है, यातैं पुदगल-करमकौं= इसलिये पुद््गल-कर्मों का, पुदगल करता होइ= पुद््गल ही कर्त्ता होता है।। 20।। जीव चेतना-संजुगत= जीव और चेतना-संयुक्त है, सदा पूरण सब ठौर= हरतरह से हमेशा पूर्ण है, तातैं चेतन-भाव को= इसलिए चेतन-भाव का, करता जीव न और= कर्त्ता जीव है, अन्य कोई नहीं है।। 21।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त दोनो-छंदों में कविवर शिष्य की शंका का समाधान करते हुये कहते हैं कि जगत् का प्रत्येक-द्रव्य परिणमनशील है, पुद््गल-द्रव्य भी परिणामी-द्रव्य हैं अर्थात् अनादिकाल से परिणमनरूप ही है, पूरण-गलन तो पुद््गल का स्वभाव है, सो स्वयं ही पुद््गल-परमाणु मिलते हैं, और बिछुड़ते रहते हैं, ज्ञानावरणादि आठ-कर्मों रूप भी पुद््गल-द्रव्य स्वयं ही परिणमता है, इसलिये स्वयं ही उसका कर्त्ता होता है। इसीप्रकार जीव-द्रव्य भी अनादिकाल से परिणमनशील है, इसका स्वभाव चेतनारूप है; सो ये अपने स्वभाव के अनुरूप ही जाननरूप परिणमन करता है, अर्थात् ज्ञाता-दृष्टा-स्वभावी होने से प्रत्येक परिणमन का मात्र ज्ञाता ही रहता है, अपने चैतन्य-भावों के अलावा पुद््गल के परिणमन का भी ज्ञाता ही रहता है, कभी कर्त्ता नहीं बनता, बन भी नहीं सकता; क्योंकि जीव और पुद््गल दो भिन्न-द्रव्य हैं और दोनों में अत्यंताभाव है, सो दोनों ही द्रव्य अपने-अपने स्वभावरूप सहज-परिणमन करते हैं। उन दोनों के भिन्न-भिन्न परिणमन को एक-दूसरे का ‘कर्त्ता’ कहनेवाला या दोनों को मिलाकर एक माननेवाला जीव अज्ञानी-मिथ्यादृष्टि है, और उन दोनों के परिणमन को भिन्न-भिन्न सहज स्वीकार करनेवाला और अपने स्वभाव-अनुसार ज्ञाता-दृष्टारूप प्रवर्तन करनेवाला जीव सम्यग्दृष्टि है, ज्ञानी है, मोक्षमार्ग का पथिक है।

(अडिल्ल-छंद)

ग्यानवंतकौं भोग निरजरा-हेतु हैं। अज्ञानीकौ भोग बंध-फल देतु है।।
यह अचरज की बात हिये नहीं आवही। पूछै कोऊ सिष्य गुरू समझावही।। 22।।

शब्दार्थ :- ग्यानवंतकौं भोग निरजरा-हेतु हैं= ज्ञानी-जीवों को भोग (शुभ-अशुभ-कर्मों का फल), कर्मों की निर्जरा का कारण है, अज्ञानीकौ भोग बंध-फल देतु हैं= अज्ञानी-जीवों को वही भोग कर्मबंधनरूप फल देते हैं, यह अचरज की बात हिये नहीं आवही= यह आश्चर्य की बात हृदय में नहीं बैठी, पूछै कोऊ सिष्य गुरू समझावही= कोई शिष्य ऐसा पूछता है, गुरु उसे समझाते हैं। स्थितेत्यविघ्न ा खलु पुद््गलस्य, स्वभावभूता परिणामशक्तिः। तस्यां स्थितायां स करोति भावं, यमात्मनस्तस्य स एव कर्त्ता।। 19।। स्थितेति जीवस्य निरन्तराया, स्वभावभूता परिणामशक्ति:। तस्यां स्थितायां स करोति भावं, यं स्वस्य तस्यैव भवेत्स कर्त्ता।। 20।। ज्ञानमय एव भावः कुतो भवेद् ज्ञानिनो न पुनरन्यः। अज्ञानमयः सर्वः कुतोऽयमज्ञानिनो नान्यः ।। 21।। विशेषार्थ :- शिष्य के प्रश्न का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि कोई शिष्य ऐसा पूछता है कि ‘‘ज्ञानियों के लिये भोग भी कर्मों की निर्जरा का कारण है, और अज्ञानी के लिये वही भोग कर्मों के बंध का कारण है, ये आश्चर्यजनक बात मेरे हृदय में नहीं बैठी अर्थात् समझ में नहीं आई।’’ तब गुरु शिष्य को समझाते हुये कहते हैं-

(सवैया इकतीसा)

दया-दान-पूजादिक विषय-कषायादिक, दोऊ-कर्मबंध पै दुहूकौ एक-खेतु है।
ग्यानी-मूढ़ करम करत दीसैं एकसै पै, परिनामभेद न्यारौ-न्यारौ फल देतु हैं।।
ग्यानवंत करनी करै पै उदासीनरूप, ममता न धरैं तातैं निर्जराकौ हेतु है।
वहै करतूति मूढ़ करै पै मगनरूप, अंध भयौ ममतासौं बंध-फल लेतु है।। 23।।

शब्दार्थ :- दया-दान-पूजादिक= दया, दान, पूजा आदि शुभ-भाव, विषय-कषायादिक= विषय- कषायादिरूप पाप-भाव, दोऊ कर्मबंध= दोनों ही कर्म-बंधन के कारण हैं, पै दुहूकौ एक-खेतु है= परन्तु दोनों का क्षेत्र एक ही है, ग्यानी-मूढ़ करम करत दीसैं एकसै पै= ज्ञानी और अज्ञानी दोनों कार्य करते हुये एक जैसे ही दिखाई देते हैं, परन्तु परिनामभेद न्यारौ-न्यारौ फल देतु है= परिणामों की भिन्नता अलग-अलग फल देती है, ग्यानवंत करनी करै पै उदासीनरूप= ज्ञानी-जीव क्रिया करते हैं, परन्तु उदासीनभाव से, ममता न धरैं तातैं निर्जराकौ हेतु है = ममता नहीं रखते, इसलिये (वे ही भोग) कर्मों की निर्जरा का कारण है, वहै करतूति मूढ़ करै पै मगनरूप= वही क्रिया अज्ञानी-जीव करता है, परन्तु मग्न होकर, अंध भयौ ममतासौं बंध-फल लेतु है= ममत्वभाव के कारण अंधा होकर कर्मबंधनरूपी फल को प्राप्त करता है। विशेषार्थ :- शिष्य की शंका का समाधान करते हुये कविवर कहते हैं कि दया, दान, पूजा आदि के शुभ/पुण्य-भाव और पंचेन्द्रिय के विषयभोग में आसक्तिरूप एवं कषायादि के अशुभ/पाप-भाव-दोनों ही कर्मबंधन के कारण हैं; क्योंकि दोनों का उत्पत्ति-स्थान एक रागभाव ही है। ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही बाहर में एक जैसी ही क्रिया करते हुये दिखाई देते हैं; परन्तु परिणामों में भिन्नता होने से दोनों को फल अलग-अलग मिलता है। क्योंकि ज्ञानी-पुरुष क्रिया करते हैं, पर उदासीन होकर अर्थात् सहज और अनासक्त-भाव से। उस क्रिया के प्रति मोहरहित मात्र जाननहार होने से ज्ञानियों के लिये वही क्रिया कर्मों की निर्जरा का कारण बनती है। जबकि अज्ञानी-जीव जब वही क्रिया करता है, तो अासक्ति-भाव से उसी में मगन होकर या कहें मोह में अंधा होकर करता है, सो वही क्रिया उसे कर्मबंधनरूप फल देती है। सम्यग्दृष्टि-जीव भोग करता हुआ भी अबंधक है और मिथ्यादृष्टि-जीव भोग करे या न करें, फिर भी अंतरंग में भोगों के प्रति इष्टबुद्धि और लालसा के कारण निरन्तर बंधनरूप ही है। कैसे? हे आत्मन्! भोग-सामग्री ना तो बंध का कारण है और ना ही निर्जरा का। वह तो पुद््गल का स्वतंत्र-परिणमन है। बंध का कारण तो मोह-भाव, परद्रव्य में आसक्ति-भाव, एकत्वपना, ममत्वपना है। और निर्जरा का कारण मोहरहित होकर परद्रव्य में अनासक्ति, भिन्नत्वपना और निर्ममत्वपना है। ये अनासक्ति का भाव ज्ञानियों में होता है और अज्ञानी में नहीं। इसीलिये ज्ञानी भोगसामग्री भोगते हुए यहाँ तक कि संसार की क्रियायें करते हुए भी अपेक्षाकृत ‘निर्बंधक’ रहते हैं, और अज्ञानी-जीव भोगज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ता, सवेर् भावा भवन्ति हि। सर्वेऽप्यज्ञान-निर्वृत्ता, भवन्त्य ज्ञानिनस्तु ते ।। 22।। सामग्री भोगते हुए या संसार की क्रियायें करते हुए ना भी दिखे, तो भी प्रतिसमय बंध ही बंध; क्योंकि बंध का कारणभूत आसक्ति-भाव मौजूद है, तो बंधरूप कार्य तो होगा ही। कर्मबंधन का मूल-कारण भोग-सामग्री नहीं, मोह-भाव है; जो अज्ञानी के मौजूद है और ज्ञानी के नहीं। वहीं दूसरी ओर वीतरागता की अपेक्षा विचार करें, तो बंध का कारण ‘कषायभाव’ और निर्जरा का कारण ‘अकषायभाव’। इस अपेक्षा ये कथन पूर्ण-सत्य है कि ज्ञानियों के भी जितने अंश में अकषायभाव या वीतरागता है, उतनी निर्बन्धता, और जितने अंश में कषायभाव है, उतने अंश में बंध ही है। परन्तु मिथ्यादृष्टि-जीव की अपेक्षा ये बंध बहुत कम भी है, और फिर प्रतिसमय आत्मानुभूति की ओर अग्रसर होने से निर्जरित भी होता रहता है; क्योंकि सम्यग्दृष्टि-जीव प्रतिसमय अपने को इन सबसे भिन्न अनुभव करता है, ये विचार उसे प्रतिसमय चलता है कि- ''ये जो कुछ भी हो रहा है वह सब कर्म का परिणमन है, मैं तो इन सबसे भिन्न जाननहार-तत्त्व हूँ, सो ये सब मुझे मात्र जानने में आ रहे हैं, लेकिन ना तो मैं कभी इन रूप हुआ हूँ और ना होता हूँ, मैं तो त्रिकाल-शुद्ध-चैतन्य हूँ ‘’- ऐसा भेदज्ञान प्रतिसमय वर्तता है, और कर्म की क्रियारूप परिणमन करते हुये भी वे निर्बन्ध रहते हैं। इसीलिए कहने में यही आता है कि ‘‘सम्यग्दृष्टि के भोग भी निर्जरा के हेतु हैं’’।

(छप्पय)

ज्यों माटी में कलस होन की सकति रहे ध्रुव।
दंड-चक्र चीवर-कुलाल, बाहिज-निमित्त हुव।।
त्यों पुदगल-परवांनु-पुंज वरगना-भेष धरि।
ग्यानावरनादिक रूप, विचरंत विविध परि।।
बाहिज-निमित्त बहिरात्मा, गहि संसै अग्यानमति।
जगमाँहि अहंकृत-भावसौं, करमरूप ह्वै परिनमति।। 24।।

शब्दार्थ :- ज्यों माटी में कलस होन की सकति रहै ध्रुव= जिसप्रकार मिट्टी में कलशरूप होने की शक्ति अक्षयरूप से रहती है, दंड-चक्र चीवर-कुलाल बाहिज-निमित्त हुव= दंड, चाक, धागा, कुम्हार बाह्यनिमित्त होते हैं, त्यों पुदगल-परवांनु-पुंज वरगना भेष धरि= उसीप्रकार पुद््गल-स्कन्ध वर्गणाओं के रूप में, ग्यानावरनादिक रूप विचरंत विविध परि= ज्ञानावरणी आदि विविधरूपों में भ्रमण कर रहे हैं, बाहिज-निमित्त बहिरात्मा गहि संसै अग्यानमति= बहिरंग-निमित्त को बहिरात्मा/मिथ्यादृष्टि अज्ञानी-जीव (आत्मस्वरूप में) संशय के कारण ग्रहण करता है, जगमाँहि अहंकृत-भावसौं करमरूप ह्वै परिनमति= (और) अहंकार-भाव से, संसार में कर्मरूप होकर परिणमित होता है। विशेषार्थ :- पुद््गल-वर्गणायें कर्मरूप कैसे परिणमित होती हैं?- इस कथन को स्पष्ट करते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार मिट्टी में कलश/घड़ेरूप परिणमित होने की शक्ति प्रतिसमय विद्यमान रहती है। दंड, चाक, धागा और कुम्हार तो बहिरंग-निमित्त हैं, ठीक उसीप्रकार पुद््गल-कार्माण वर्गणाओं में ज्ञानावरणादि आठों-कर्म के विविधरूपों में परिणमित होने की शक्ति सदाकाल विद्यमान रहती है, अर्थात् वे इसी रूप में लोक में ठसाठस भरी हुुई हैं। उन वर्गणाओं को मिट्टी की तरह बहिरात्मा/मिथ्यादृष्टि अज्ञानी-जीव का आत्मतत्त्व के प्रति अज्ञानमय-भावानामज्ञानी व्याप्य भूमिकाम्। द्रव्यकर्म-निमित्तानां भावानामेति हेतुताम् ।। 23।। संशय, देह के प्रति ममत्वबुद्धि, अहंकार से भरपूर कत्तर्ृत्वबुद्धि रूप बाहरी निमित्त मिलने पर लोक में भरी पुद््गल-वर्गणायें कर्मरूप में परिणमित होकर आत्मा के साथ सम्बद्ध हो जाती है। संपूर्ण लोक में ठसाठस भरी पुद््गल-वर्गणायें वैसे तो जड़ हैं, भिन्न-द्रव्य हैं, जीव का कुछ नहीं बिगाड़तीं हैं, लेकिन जब जीव अपने स्वरूप को भूलकर पर की ओर आकर्षित होता है, तब मोहराग-द्वेषादि विकारी-भावों की उत्पत्ति होती है, जिन्हें हम ‘भावकर्म’ कहते हैं। और इन्हीं भावकर्म का निमित्त पाकर लोक में भरी पुद््गल-कार्माण वर्गणायें तुरंत कर्मरूप में परिणमित होकर जीव के साथ एकक्षेत्रावगाह-रूप से सम्बद्ध हो जाती है, जिन्हें हम ‘द्रव्यकर्म’ कहते हैं। जीव के साथ कर्मों के जुड़ने के 148 रूप हैं अर्थात् आठ-कर्मों की 148 कर्म प्रकृतियाँ हैं, जो भिन्न-भिन्नरूप से उदय में आकर फल देती हैं। जीव उदय में आये हुये इन अनुकूल-प्रतिकूल प्रसंगों के साथ ज्योंही मोहासक्त होकर जुड़ता है, पुनः नवीन-कर्म वर्गणायें आकर जीव के साथ चिपक जाती है, और फिर उदय में आकर फल देती हैं, ऐसा यह क्रम अनादिकाल से इसीप्रकार चला आ रहा है। वस्तु का सच्चा-स्वरूप समझने पर जब जीव इन अनुकूल-प्रतिकूल-प्रसंगों से जुड़ने के बजाय, सहज-ज्ञाता रहकर अपने आत्मस्वरूप की साधना का अभ्यास करता है, तब ये कर्म-बंधन स्वतः ही ढीला पड़ता है, और तब सच्चे-सुख का या मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

(सवैया तेईसा)

जे न करैं नयपच्छ-विवाद, धरैं न विखाद अलीख न भाखैं।
जे उदवेग तजैं घट-अंतर, सीतल-भाव निरन्तर राखैं।।
जे न गुनी-गुन-भेद विचारत, आकुलता मन की सब नाखैं।
ते जग में धरि आतम-ध्यान, अखंडित ग्यान-सुधारस-चाखैं।। 25।।

शब्दार्थ :- जे न करैं नयपच्छ-विवाद= जो नयवाद का झगड़ा नहीं करते, धरैं न विखाद= जो किसी भी प्रकार का खेद नहीं करते, अलीख न भाखैं= जो कभी झूठ नहीं बोलते, जे उदवेग तजैं= जो चिंता/व्यग्रता छोड़ते है, घट-अंतर सीतलभाव निरन्तर राखैं= हृदय में/अंतरंग में निरन्तर शांतभाव रखते हैं, जे न गुनी-गुन-भेद विचारत= जो गुण-गुणी का भेद नहीं विचारते, आकुलता मन की सब नाखैं= मन की सब अाकुलताओं को छोड़ते हैं, ते जग में धरि आतमध्यान= वे जगत् में आत्मध्यान को धारण करते हैं, अखंडित ग्यान-सुधारस चाखैं= (और) निरन्तर ज्ञानरूपी-अमृत का रसास्वादन लेते हैं। विशेषार्थ :- इन पंक्तियों में कवि ने उन जीवों की महिमा का गुणगान किया है, जो निर्विकल्प होकर मात्र आत्मिक-आनंद का रसास्वादन करते हैं; क्योंकि विकल्प कैसा भी हो राग का हो या विराग का- आकुलता का ही जनक है। और आकुलता दुःख रूप ही है, इससे विपरीत निराकुलता ही सच्चा-सुख है। इसीलिये कविवर कहते हैं कि जो नयों के विकल्प तक से मुक्त है अर्थात् जबतक ये विकल्प रहेगा कि ‘शुद्धनय से आत्मा ऐसा है, अशुद्धनय से ऐसा’, तबतक यह जीव विकल्पों में ही भ्रमण करता रहेगा और आत्मिक-आनंद से अनभिज्ञ रहेगा। जबतक जीव विषाद/खेद, झूठ, चिंता आदि विकल्पों से ग्रसित रहेगा, तबतक दुःखी रहेगा। जिस क्षण उसके चित्त में सहजता, समता का भाव वर्तेगा, उसी क्षण

य एव मुक्त्वा नयपक्षपातं, स्वरूपगुप्ता निवसन्ति नित्यम्।
विकल्पजाल-च्युत-शान्तचित्तास्त एव साक्षादमृतं पिबन्ति ।। 24।।

उसे आत्मिक-सुख का वेदन होगा।

जबतक जीव को गुण-गुणी में भेद दिखेगा अर्थात् आत्मा में ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य आदि अनंतगुण हैं, यह ज्ञान-गुण का कार्य है, यह दर्शन-गुण का, यह श्रद्धा-गुण का- ऐसा गुण-भेद का विकल्प रहेगा, तब तक अभेद-आत्मा की अनुभूति नहीं होगी। आत्मस्वरूप को समझने के लिये कई विकल्प हो सकते हैं, लेकिन आत्मानुभूति निर्विकल्प ही होती है। इसलिये कवि कहते हैं कि जो जीव हरप्रकार की आकुलता से रहित होते हैं, उन्हीं को ज्ञानामृत का रसास्वादन होता है।

(सवैया इकतीसा)

विवहार-दृष्टिसौं विलोकत बंध्यौ-सौ दीसै, निहचै निहारत न बांध्यौ यह किनहीं।
एक-पच्छ बंध्यौ एक-पच्छसौं अबंध सदा, दोऊ पच्छ अपनैं अनादि धरे इनिहीं।।
कोऊ कहै समल, विमलरूप कोऊ कहै, चिदानंद तैसौई बखान्यौ जैसौ जिनिहीं।
बंध्यौ मानै, खुल्यौ मानै, दोऊ नैकौ-भेद जानै, सोई ग्यानवंत जीवतत्त्व पायौ तिनिहीं।। 26।।

शब्दार्थ :- विवहार-दृष्टिसौं विलोकत बंध्यौसौं दीसै= व्यवहार-नय से देखने पर (आत्मा) बँधा-सा दिखाई दते ा है, निहचै निहारत न बांध्यौ यह किनिही= निश्चय-नय से देखें, तो यह किसी से बँधा हुआ नहीं है, एक-पच्छ बंध्यो एक-पच्छसौं अबंध सदा= एक-पक्ष से बँधा और एक-पक्ष से अबंध हमेशा, दोऊ पच्छ अपनैं अनादि धरे इनिहीं= दोनों ही पक्ष अनादि से आत्मा ने धारण किये हैं, कोऊ कहै समल विमलरूप कोऊ कहै= कोई कहता है आत्मा मल-सहित है, कोई कहता है मल-रहित है, चिदानंद तैसौई बखान्यौ जैसौ जिनिहीं= (और फिर) आत्मस्वरूप का वैसा ही बखान किया गया, जैसा जिसने जाना, बंध्यौ मानै खुल्यौ मानै= बंधा माने, खुला माने, दोऊ नैकौ भेद जानै= जो दोनों-नयों के भेद को जानता है, सोई ग्यानवंत जीव= वही ज्ञानी-जीव है, तत्त्व पायौ तिनिहीं= वही उसके अभिप्राय को प्राप्त करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘निश्चय-नय’ और ‘व्यवहार-नय’ का सुंदर-चित्रण किया हैं। वस्तु अनंत-धर्मात्मक है, और उन सभी धर्मों का बिना किसी विरोध के कथन करने की पद्धति का नाम ‘नय’ है। यहाँ ‘निश्चय-नय’ और ‘व्यवहार-नय’ या कहें ‘द्रव्य-दृष्टि’ और ‘पर्याय-दृष्टि’ से आत्मा के स्वरूप को दर्शाया है। अनादिकाल से जीव कर्मों के साथ है, और अपने को इन कर्मों से बँधा हुआ ही मानता आया है, ‘व्यवहार-नय’ या पर्याय-दृष्टि से ये कथन सही भी है; लेकिन ‘निश्चय-नय’ से या द्रव्य-दृष्टि से विचार करें, तो आत्मा कभी कर्मों से बँधा ही नहीं, पूर्ण-स्वतंत्र एक भिन्न-द्रव्य है। वास्तविकता यही है कि अनादिकाल से मुक्त और बंध ऐसे ही दोनों रूपों को जीव धारण किये हुये है। उपर्युक्त-कथन सत्य होते हुये भी भ्रम यहाँ खड़ा होता है कि कोई जीव को ‘समल’ यानि कर्ममल से सहित मानता है, और कोई जीव को कर्ममल से रहित यानि ‘विमल’ मानता है। और उसी रूप में आत्मस्वरूप का कथन करता है। जब कि वास्तविकता ये है कि जो जीव के मुक्त और बंध दोनों रूपों को स्वीकार करता है, दोनों के वास्तविक-स्वरूप और अभिप्राय को समझता है, वही सम्यग्ज्ञानी है, उसे ही आत्मस्वरूप की सम्यक् प्रतीति होती है। क्योंकि यदि हम किसी एक नय या दृष्टि से वस्तु को स्वीकार करेंगें, तो विरोध खड़ा

एकस्य बद्धो न तथा परस्य, चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युत-पक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। 25।।

होगा। जैसे यदि हम जीव को केवल कर्मों से सहित ही मानेंगें, तो फिर मोक्ष का अस्तित्व ही नहीं ठहरेगा। और यदि केवल कर्मों से रहित ही मानेगें, तो फिर मोक्ष के पुरुषार्थ की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी, और जीव स्वच्छंदी हो जायेगा। और ये दोनों ही स्थितियाँ आगम के अनुकूल नहीं है। इसीलिये कवि ने कहा जो आत्मा के ‘बंध’ और ‘मुक्त’- दोनों ही रूपों को स्वीकार करता है, दोनों के सम्यक् अभिप्राय और स्वरूप को समझता है, वही सम्यग्ज्ञानी है, अर्थात् स्वयं को अंतरंग में कर्म-सहित मानकर, बाह्य में कर्म-रहित होने का सम्यक् पुरुषार्थ करके मुक्ति रमा को वरनेवाले जीव ही लोकोत्तम अर्थात् सर्वश्रेष्ठ हैं।

(सवैया इकतीसा)

प्रथम नियत-नय दूजी विवहार-नय, दुहूँ को फलावत अनंत-भेद फले हैं।
ज्यों-ज्यों नय फले त्यों-त्यों मन-कल्लोल फलैं, चंचल-सुभाव लोकालोकलौं उछले है।।
ऐसी नयकक्ष ताकौ पक्ष तजि ग्यानी-जीव, समरसी भये एकतासौं नहिं टले हैं।
महामोह-नाशि सुद्ध-अनुभौ अभ्यासि निज-बल-परगासि सुखरासि-माँहि रले हैं।। 27।।

शब्दार्थ :- प्रथम नियतनय दूजी विवहारनय= पहला निश्चय-नय दूसरा व्यवहार-नय, दुहूँ को फलावत अनंत-भेद फले है= दोनों का विस्तार करने पर अनंत-भेद फलते हैं/होते हैं, ज्यों-ज्यों नय फले त्यों-त्यों मन-कल्लोल फलैं= जैसे-जैसे नयभद बढ़ते हैं वैसे-वैसे मनरूपी चंचल-लहरें बढ़ती हैं, चंचल-सुभाव लोकालोकलौं उछले है= चंचल-स्वभाव लोकालोक तक उछलता है, ऐसी नयकक्ष ताकौं-पक्ष तजि ग्यानी जीव= ऐसी नयकक्ष/नय-भूमिका का पक्ष छोड़कर ज्ञानी-जीव, समरसी भये एकतासौं नहिं टले हैं= समरसी/ पक्षातीत होकर (स्वरूप से) एकता को नहीं छोड़ते हैं, महामोह नाशि सुद्ध-अनुभौ अभ्यासि= महामोह को नष्ट करके शुद्ध-अनुभव के अभ्यास से, निज-बल परगासि सुखरासि-माँहिं रले हैं= आत्मिक-बल प्रकट करके सुख का खजाना प्राप्त करते हैं। विशेषार्थ :- इन-पंक्तियों में कवि ने नयों के माध्यम से आत्मस्वरूप को समझने और नयातीत अतीन्द्रिय-आनंद की महिमा का गुणगान किया है। मुख्यरूप से नयों के दो भेद है- ‘निश्चय-नय’ और ‘व्यवहार-नय’। पर इनका विस्तार करने पर इनके अनंत-भेद होते हैं, जैसे अशुद्ध-निश्चयनय, शुद्धनिश्चयनय, परमशुद्ध-निश्चयनय, द्रव्यार्थिक-नय, पर्यायार्थिक-नय, नैगमादि सात-नय, क्रियानय आदि अनेक नय- इत्यादि। आत्मस्वरूप को समझने के लिये इन नयों की महती-उपयोगिता है। नयों को समझे बिना आगम के सिद्धांतों में और आचार्यों के कथन में विरोधाभास खड़ा होता है, क्योंकि कहीं आचार्यदेव कहते हैं कि ‘‘आत्मा मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भावों का कर्ता है’’, और कहीं कहते हैं ‘‘विकारों को तो आत्मा ने आज तक छुआ ही नहीं’’; कहीं कथन आता है ‘‘जीव बहुत दुःखी है’’, और कहीं कथन आता हैं कि ‘‘दुःख तो आत्मा का स्वभाव ही नहीं है’’। यदि नयों का परिपक्व-ज्ञान नहीं है अर्थात् ये समझ नहीं है कि आचार्यों ने किस अपेक्षा से कौन-सा कथन किया है? तब जीव भ्रमित होता है, और नयों का सम्यक् ज्ञान होने पर भ्रम का अस्तित्व भी नजर नहीं आता। ज्यों-ज्यों नयों के माध्यम से ज्ञानी-जीव को आत्मा का वास्तविक-स्वरूप समझ में आता है, स्वेच्छा-समुच्छलदनल्प-विकल्पजाला-मेवं व्यतीत्य महतीं नयपक्ष-कक्षाम्। अन्तर्बहिस्समरसैक-रसस्वभावं, स्वं भावमेकमुपयात्यनुभूतिमात्रम्।। 45।। त्यों-त्यों मनरूपी-लहरें उछलने लगती है। उन्हें संपूर्ण लोकालोकाश में एक आत्मा ही सर्वश्रेष्ठ भाषित होता है। नयों के माध्यम से आत्मस्वरूप को समझने के बाद जो ज्ञानी-जीव इन नयों के पक्ष को छोड़कर अर्थात् समस्त-विकल्पों को छोड़कर मात्र समताभाव को धारण करते हैं, उन्हीं जीवों को आत्मानुभूति होती है। वे ही जीव सर्वप्रथम महाबलशाली-मोह का नाश करते है, क्योंकि मोह ही समस्त-कर्मों का राजा है। जबतक दर्शनमोहनीय का क्षय, उपशम या क्षयोपशम नहीं होता, तब तक आत्मिक-सुख का वेदन भी नहीं होता। दर्शनमोहनीय का क्षय या उपशम होते ही साधक-जीव निरन्तर शुद्ध आत्मिक-अनुभूति के अभ्यास से आत्मिक-बल को प्रगट करता है, और फिर सच्चे-सुख का वेदन करते हुये आत्मस्वरूप में लीन हो जाता है।

(सवैया इकतीसा)

जैसे काहू बाजीगर चौहटे बजाइ ढोल, नानारूप धरिकैं भगल-विद्या ठानी है।
तैंसे मैं अनादिकौं मिथ्यातकी तरंगनिसौं, भरम में धाइ बहु काय-निज मानी है।।
अब ग्यानकला-जागी भरम की दृष्टि भागी, अपनी-पराई सब सौंज पहिचानी है।
जाकै उदै होत परवांन ऐसो भांति भई, निहचै हमारी जोति सोई हम जानी है।। 28।।

शब्दार्थ :- जैसे काहू बाजीगर चौहटे बजाइ ढोल= जैसे कोई जादुई खेल दिखानेवाला चौराहे पर ढोल बजाकर, नानारूप धरिकैं= अनेकप्रकार के स्वाँग रखकर, भगल-विद्या ठानी है = बहुरूपिये की कला धारण की या अपनायी हो, तैंसे मैं अनादिकौं= उसीप्रकार मैंने अनादिकाल से, मिथ्यातकी तरंगनिसौं = मिथ्यात्व की तरंगों से, भरम में बहु धाइ= भ्रम में बहुत भटककर, काय निज मानी है= प्राप्त-काया को अपना माना है, अब ग्यानकला जागी = अब सम्यग्ज्ञानरूपी कला जागृत हुई, भरम की दृष्टि भागी= भ्रमकी दृष्टि भाग गई, अपनी पराई सब सौंज= अपनी और पर की सब साझेदारी या मिलावट को, पहिचानी है= पहिचान लिया, जाकै उदै होत= जिसके उदय होने पर, परवांन ऐसो भांति भई= इसतरह निर्णय हुआ है, निहचै हमारी जोति= निश्चय से हमारा जो स्वरूप है, सोई हम जानी है= वही हमने जान लिया है। विशेषार्थ :- प्रस्तुत-छंद में मिथ्यात्व के उदय में जीव की क्या दशा होती है?- इसका वर्णन करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘‘जैसे कोई बाजीगर या जादुई तमाशा दिखानेवाला चौराहे पर ढोल बजाकर सबको इकट्ठा करके तरह-तरह के स्वांग या भेष रखकर अपनी ठगविद्या से अच्छे भले आदमी को भी भ्रमित कर देता है। उसीप्रकार इस जीव ने भी अनादिकाल से मोह/मिथ्यात्व की तरंगों में मस्त होकर नानाप्रकार के स्वांग धारण किये, और आज तक हर स्वांग को अपना मानता आया है।’’ अर्थात् मोह के कारण भ्रम से हर शरीर या प्राप्त पर्याय को ही अपना मानता रहा, या उसी को अपना स्वरूप मानकर इष्ट-अनिष्ट-बुद्धिपूर्वक राग-द्वेष करके अनंत-दुःख उठाता रहा। कविवर कहते हैं अब आगम के अभ्यास से सम्यग्ज्ञान की वह कला जागृत हुई है, जिससे इस नश्वर-देह में होनेवाली आत्मबुद्धि का भ्रम अब दूर हो गया, जिससे मुझे अपने और पराये की सच्ची पहचान हो गई है। जैसे रात्रि के घोर-अंधकार में जो वस्तु दिखाई नहीं देती, वह सूर्य के उदय होने पर उसके प्रकाश में स्पष्ट और साफ नजर आने लगती है, ठीक उसीप्रकार मिथ्यात्व के घोर-अंधकार में

इन्द्रजालमिदमेवमुच्छलत्पुष्कलोच्चल-विकल्प-वीचिभिः।
यस्य विस्फुरणमेव तत्क्षणं, कृत्स्नमस्यति तदस्मि चिन्महः।। 46।।

मुझे जिस आत्मस्वरूप की पहचान नहीं हो रही थी, अब सम्यग्ज्ञानरूपी-सूर्य के उदय होने पर उसकी सच्ची-पहचान हो गई है। अब मेरी स्थिति यह है कि निश्चय से वास्तव में जो मेरा अपना था, अब मैंने उसे पहचान लिया है।

(सवैया इकतीसा)

जैसे महारतन की ज्योति में लहर उठै, जल की तरंग जैसे लीन होय जल में।
तैंसे सुद्ध-आतम-दरब परजाय करि, उपजै-बिनसै-थिर रहै निज-थल में।।
ऐसै अविकलपी-अजलपी अानंदरूपी, अनादि-अनंत गहि लीजै एकपल में।
ताकौ अनुभव कीजै परम-पीयूष पीजै, बंध कौ विलास डारि दीजै पुदगल में।। 29।।

शब्दार्थ :- जैंसे महारतन की ज्योतिमैं लहर उठै= जिसप्रकार महान्-रत्न की आभा में चमक की लहर उठती है, जल की तरंग जैसे लीन होय जल में= जल में उठनेवाली लहरें जैसे जल में समा जाती है, तैंसे सुद्धआतम-दरब परजाय करि= उसीप्रकार शुद्धात्म-द्रव्य की पर्याय, उपजै बिनसै थिर रहै निज-थल मैं= उपजती है, विनष्ट होती है, स्थिर रहती है अपने स्वरूप में, ऐसै अविकलपी अजलपी अानंदरूपी= ऐसे विकल्परहित, जल्परहित, आनंदरूप, अनादि-अनंत गहि लीजै एक पल में= अनादि-अनंत तत्त्व को एकपल में ग्रहण कर लो, ताको अनुभव कीजै परम-पीयूष पीजै= उसका अनुभव करो, परम-अमृत का पान करो, बंध कौ विलास डारि दीजै पुदगल में= बंध का साम्राज्य पुद््गल पर छोड़ दो। विशेषार्थ :- ‘ज्ञान स्वयं अपने को ही जानता है’- इस सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कविवर कहते हैं जैसे एक उत्तम-रत्न की चमक स्वयं रत्न से ही निकलती है, और रत्न में ही समा जाती है; जैसे समुद्र में उठनेवाली लहरें समुद्र से ही उठती हैं, और समुद्र में ही विलीन हो जाती है; ठीक उसीप्रकार शुद्धात्म-द्रव्य की जाननरूप अनंत-पर्यायें अपने ज्ञान-गुण से ही उत्पन्न होती है, और ज्ञान में ही विलीन हो जाती है, और आत्मा त्रिकाल अपने स्वरूप में ही स्थिर या लीन रहता है। ऐसे विकल्प-रहित अर्थात् निर्विकल्प, जल्प-रहित अर्थात् कषाय-जनित दुःख से रहित, परिपूर्ण आनंदस्वरूपी, अनादि-अनंत अर्थात् शाश्वत परमात्मा को एकपल में ग्रहण कर लो। कहने का अभिप्राय यह है कि अब विकल्पों में समय बर्बाद मत करो, मैं अनादि-अनंत, जन्म-मरण से रहित, त्रिकाली, शाश्वत, अविनाशी, अनंत-सुख की खान, ध्रुवतत्त्व हूँ- शीघ्रतिशीघ्र ऐसा श्रद्धान करो, उसी का अनुभव करो, और उसी के आनंद-अमृत का पान करो। कर्मों के उदय, फल, बंध आदि का विचार मत करो, क्योंकि ये तो पुद््गल की लीला है, उसी पर छोड़ दो। कविवर कहते हैं- हे आत्मन्! पुरुषार्थ तो कर, कर्मों की दशा स्वयं बदल जायेगी, क्योंकि वैसे भी ये जड़ का परिणमन है, तेरा नहीं।

(सवैया इकतीसा)

दरब की नय, परजायनय दोऊ, श्रुतग्यानरूप, श्रुतग्यान तो परोख है।
सुद्ध-परमातम कौ अनुभौ प्रगट तातैं, अनुभौ विराजमान अनुभौ अदोख है।।
अनुभौ-प्रवांन भगवान् पुरुष-प्रमान, ग्यान औ’ विग्यानघन महासुख-पोख है।
परम-पवित्र यौं अनंत-नाम अनुभौ के, अनुभौ बिना न कहूँ और ठौर मोख है।। 30।।

चित्स्वभाव-भर-भावित-भावा-भाव-भाव-परमार्थतयै क म्।
बन्ध-पद्धतिमपास्य समस्तां चेतये समयसारमपारम्।। 47।।

शब्दार्थ :- दरब की नय, परजायनय दोऊ= द्रव्यार्थिक-नय, पर्यायार्थिक-नय दोनों, श्रुतग्यानरूप= श्रुतज्ञानरूप हैं, श्रुतग्यान तो परोख है= श्रुतज्ञान तो परोक्ष है, सुद्ध-परमातम कौ अनुभौ प्रगट= जबकि शुद्धपरम-आत्मतत्त्व का अनुभव प्रत्यक्ष है, तातैं= इसलिये, अनुभौ विराजमान अनुभौ अदोख है= अनुभव साक्षात् है, अात्मानुभव अदोष/निर्दोष है, अनुभौ-प्रवांन भगवान् पुरुष-प्रमान= अनुभव-प्रमाण, भगवान्, पुरुष-प्रमाण, ग्यान औ विग्यानघन= ज्ञान और विज्ञानघन, महासुख-पोख है= परमसुख का पोषक है, परम-पवित्र यौं अनंत नाम अनुभौके= परम-पवित्र- इसप्रकार अनुभव के अनंत-नाम हैं, अनुभौ बिना न कहूँ और ठौर मोख है= अनुभव के बिना कोई और स्थान मोक्ष का नहीं है। विशेषार्थ :- आत्मानुभव की महिमा का गुणगान करते हुये कविवर कहते हैं कि द्रव्यार्थिक-नय और पर्यायार्थिक-नय- ये दोनों ही श्रुतज्ञान के अंश हैं, और श्रुतज्ञान परोक्ष-प्रमाणरूप है, जबकि शुद्ध परमआत्मतत्त्व का अनुभव प्रत्यक्ष होता है, इसीलिये अनुभव सर्वश्रेष्ठ है, अनुभव अदोष/निर्दोष है। आत्मानुभूति को ‘प्रत्यक्ष-प्रमाण’ कहा गया है, जबकि नय श्रुतज्ञान के अंश हैं, जो परोक्षप्रमाणरूप है। कहने का अभिप्राय यही है कि आत्मानुभूति की महिमा का मैं कितना भी गुणगान करूँ, वह कथनमात्र ही होगा; क्योंकि आत्मानुभूति तो वचनातीत है, निर्दोष है। सामान्यतः जिनेन्द्र भगवान् के एक हजार आठ नामों का महिमापूर्ण-वर्णन ‘जिन-सहस्रनाम’ में आता है। यहाँ कविवर पं. बनारसीदास जी आत्मानुभूतिरूप-परिणाम की अचिन्त्य-महिमा बताते हुये कहते हैं कि अनुभव के भी प्रमाण, भगवान्, प्रमाण-पुरुष, ज्ञान और विज्ञानघन, महान् /सच्चे-सुख का पोषक, परम-पवित्र- ऐसे अनंत-नाम बताये हैं। अनुभव के अलावा अन्य किसी स्थान का नाम मोक्ष नहीं है, ऐसा कहकर कवि ने अनुभव की जिनेन्द्र-परमात्मा से भी अनन्तगुनी-महिमा प्रकट की है। कवि ने स्वयं लिखा है - ‘‘अनुभव चिंतामणि-रत्न, अनुभव है रसकूप। अनुभव मारग-मोक्ष को, अनुभव मोक्षस्वरूप।।’’

(सवैया इकतीसा)

जैसे एक-जल नानारूप-दरबानुजोग, भयौ बहु-भाँति पहिचान्यौ न परतु है।
फिरि काल पाइ दरबानुजोग दूरि होत, अपनै सहज नीचे मारग ढरतु है।।
तैंसे यह चेतन-पदारथ विभाव तासौं, गति-जोनि-भेस-भव-भांवरि भरतु है।
सम्यक्-सुभाइ पाइ अनुभौ के पंथ धाइ, बंध की जुगति-भानि मुकति करतु है।। 31।।

शब्दार्थ :- जैंसे एक-जल नानारूप-दरबानुजोग= जिसप्रकार एक ही स्वच्छ-जल विभिन्न-प्रकार के द्रव्यों अर्थात् वस्तुओं के संयोग से, भयौ बहु भाँति= बहुतप्रकार का हो जाता है, पहिचान्यौ न परतु है= यहाँ तक कि उसे पहिचानना भी मुश्किल होता है, फिरि काल पाइ दरबानुजोग दूरि होत= फिर समय पाकर अन्य-वस्तुओं का संयोग दूर होते ही, अपनै सहज नीचे-मारग ढरतु है= सहज अपने स्वभाव के अनुसार नीचे की ओर अर्थात् स्वाभाविक निर्मलता की ओर ढलता है, तैंसे यह चेतन-पदारथ विभाव तासौं= उसीप्रकार यह आत्मारूपीपदार्थ विभाव के संयोग से, गति-जोनि-भेस-भव-भांवरि भरतु है= गति, योनि, भेष धारणकर संसार-चक्र आक्रामÂन्नविकल्पभावमचलं पक्षैर्नयानां विना, सारो यः समयस्य भाति निभृतैरास्वाद्यमानः स्वयम्। विज्ञानक ै रसः स एष भगवान्पुण्यः पुराणः पुमान्, ज्ञानं दर्शनमप्ययं किमथवा यत् dIY®¨f³fैकोऽप्ययम्।। 48।। दूरं भूरि-विकल्प-जाल-गहने भ्राम्यन्निजौघाच्चयुतो, दूरादेव विवेक-निम्न-गमनान्नीतो निजौघं बलात्। विज्ञानैक-रसस्तदेकरसिनामात्मानमात्माहरन्, आत्मन्येव सदा गतानुगततामायात्ययं तोयवत्।। 49।। भरता है, सम्यक्-सुभाइ पाइ अनुभौ के पंथ धाइ= सम्यक् स्वभाव को पाकर अनुभव के मार्ग पर चलकर, बंध की जुगति भानि मुकति करतु है= बंध की युक्ति को पहिचानकर मुक्ति को प्राप्त करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मिथ्यात्व और सम्यक्त्व के सद्भाव में होनेवाली जीव की दशा का सटीक-वर्णन किया है। जैसे स्वच्छ-पानी वैसे तो पारदर्शी होता है। पर अन्य-पदार्थों, जैसे- गेरू, चूना, हल्दी, रंग आदि के संयोग से उन्हीं के रंग-रूप दिखने लगता है, यहाँ तक कि उसका असलीरूप पहचानना ही मुश्किल हो जाता है। लेकिन फिर समय पाकर जब ये संयोग दूर होते हैं, तो वापस अपने स्वच्छस्वभाव की ओर लौटता है। उसीप्रकार यह जीव भी स्वयं स्वभाव से निर्मल होने पर भी मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भावों का संयोग होने पर गति, योनि, तरह-तरह के भेष धारणकर संसार में चक्कर लगाता रहता है। फिर अवसर पाकर या सुयोग मिलने पर सम्यग्ज्ञान को प्राप्त कर आत्म-अनुभव के मार्ग पर चलता है, तो शीघ्र ही बंध की युक्ति को नष्ट करके मुक्ति को प्राप्त करता है। एक अन्य-उदाहरण के माध्यम से इस सिद्धांत को समझते हैं, जिसप्रकार किसी बगीचे में फव्वारा/ फाउण्टेन लगा है, उसमें नीचे पानी को इकट्ठा करके प्रेशर से पानी को ऊपर की ओर फेंकते हैं, तब पानी स्वच्छ दिखाई देता है, लेकिन जब उसके चारों ओर हरी, लाल, पीली, नीली लाइट लगा देते हैं, तब जिस रंग की लाइट होती है पानी भी उसी रंग का दिखाई देने लगता है। यद्यपि पानी उससमय भी पूर्ण-निर्मल हैं; पर रंगीन-प्रकाश के संयोग से उसीरूप दिखाई देता है। परन्तु जैसे ही वह संयोग हटता है, पानी पुनः अपने निर्मलरूप में प्रकट हो जाता है। ठीक उसीप्रकार ज्ञायक भगवान् आत्मा स्वभाव से पूर्ण-निर्मल है, लेकिन जब पर-सन्मुख या पर की ओर आकर्षित होता है, तब मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भावों रूप परिणमित होता है। यद्यपि जैसे लाइट ने जल में प्रवेश नहीं किया, और पानी उस समय भी निर्मल ही है; ठीक उसीप्रकार विकारी-भावों ने भी कभी आत्मा में प्रवेश नहीं किया, और विकाररूप परिणमित होते समय भी आत्मा स्वभाव से निर्मल ही रहता है। लेकिन जिस-प्रकार हरी पीली लाइट के संयोग से पानी विविध रंगों रूप हो जाता है ठीक उसीप्रकार इन विकारी-भावों का संयोग होने से, और उस रूप परिणमित होने से जीव चार गति, चौरासी लाख योनियों में नानाप्रकार के भेष धारणकर भव-भांवरि अर्थात् संसार-चक्ररूपी भँवर में फँसकर पुरुषार्थ-विहीन हो जाता है। जैसे लाइट का संयोग हटने पर पानी अपने सहज स्वभाव को प्राप्त करता है, ठीक उसीप्रकार सत्यधर्म का सद्भाव होने पर यह जीव पुनः अपने ज्ञाता-दृष्टा-स्वभाव को प्रकट करता है, और आत्मानुभूति को प्राप्त करता है। ज्यों-ज्यों अनुभव के मार्ग पर आगे बढ़ता है, त्यों-त्यों बंध की युक्ति अर्थात् प्रकृति, प्रदेश, स्थिति और अनुभाग की चौकड़ी को नष्ट करता हुआ मुक्तिरमा को वरण करता है।

(दोहा)

निसि-दिन मिथ्याभाव-बहु, धरै मिथ्याती-जीव।
तातैं भावित-करमकौ, करता कह्यौ सदीव।। 32।।

शब्दार्थ :- निसि-दिन मिथ्याभाव-बहु धरै मिथ्याती-जीव= मिथ्यादृष्टि-जीव रात-दिन देह में आत्मबुद्धिरूप बहुत मिथ्या-भाव करता है, तातैं भावित-करम कौ करता कह्यौ सदीव= इसलिये वह भाव-कर्मों का सदाकालकर्त्ता कहा जाता है। विकल्पकः परं कर्त्ता विकल्पः कर्म केवलं। न जातु कर्तृकर्मत्वं सविकल्पस्य नश्यति।। 50।। विशेषार्थ :- मिथ्यादृष्टि-जीव ‘भावकर्म का कर्त्ता’ क्यों कहा जाता है? इस कथन को स्पष्ट करते हुये कविवर कहते हैं कि जीव अनादिकाल से देह और कर्मों के साथ है, और प्राप्त-देह में आत्मबुद्धि करने से मिथ्यादृष्टि नाम पाता है। जब दृष्टि ही मिथ्या है, तो परिणमन सम्यक् कैसे हो सकता है? अर्थात् अनादि से जीव मिथ्यात्व के कारण मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भावरूप ही परिणमन करता आया है, इसीलिये जीव को इन विकारी-भावों का कर्त्ता कहा जाता है।

(चौपाई)

करै करम सोइ करतारा, जो जानै सो जाननहारा।
जो करता निहं जानै सोई, जानै सो करता निह होई।। 33।।

शब्दार्थ :- करै करम सोइ करतारा= जो कर्म करता है, वही कर्त्ता होता है, जो जानै सो जाननहारा= जो जानता वह ज्ञाता होता है, जो करता नहिं जानै सोई= जो कर्त्ता नहीं होता, वही ज्ञाता होता है, जानै सो कर्ता नहि होई= जो जानता है, वह कर्त्ता नहीं होता। विशेषार्थ :- जीव ज्ञाता और कर्त्ता दोनों एक साथ नहीं हो सकता, क्योंकि जीव का स्वभाव मात्र जानना-देखना है, कर्त्ता बनना जीव का स्वभाव नहीं है। पुद््गल का स्वभाव कार्यरूप परिणमित होना है, जानना पुद््गल का स्वभाव नहीं है। अर्थात् जानना और करना दो भिन्न द्रव्यों का स्वतंत्र-परिणमन है, और दो-द्रव्यों के बीच अत्यंताभाव होने से एक-द्रव्य दूसरे-द्रव्य का कार्य कभी नहीं करता। इसीलिये कवि ने कहा जो ज्ञाता है सो कर्त्ता नहीं, और जो कर्त्ता है सो ज्ञाता नहीं हो सकता।

(साेरठा)

ग्यान मिथ्यात न एक, नहिं रागादिक ग्यान-मांहि।
ग्यान करम-अतिरेक, ग्याता सो करता नहीं।। 34।।

शब्दार्थ :- ग्यान-मिथ्यात न एक= ज्ञान और मिथ्यात्व एक नहीं है, नहिं रागादिक ग्यान-मांहि= ना ही राग-द्वेषादि-भाव ज्ञान में होते हैं, ग्यान करम-अतिरेक= ज्ञान और कर्म भिन्न-भिन्न हैं, ग्याता सो करता नांहि= जो ज्ञाता है, वह कर्त्ता नहीं होता। विशेषार्थ :- ज्ञान और रागादि-भावों की भिन्नता का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि ज्ञान और मिथ्यात्व दोनों भिन्न-भिन्न है; क्योंकि ज्ञान आत्मा का त्रिकाली स्वाभाविक-गुण है, जबकि मिथ्यात्व आत्मा का वैभाविक क्षणिक-परिणमन है, दोनों एक कैसे हो सकते हैं? इसलिये कहा जाता है कि रागादि-भाव ज्ञान में नहीं होते, क्योंकि ये तो पर के संयोग से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं; आत्मा का स्वाभाविक-परिणमन नहीं है। ज्ञान का स्वभाव स्व-पर-प्रकाशी होने से ज्ञान इन रागादि-भावों को सिर्फ जानता है, करता नहीं है। इन दोनों में परस्पर स्वाभाविक-भिन्नता होने के कारण ही कवि ने कहा ‘‘जो ज्ञाता है, वह कर्त्ता नहीं हो सकता है, और जो कर्त्ता है, वह ज्ञाता नहीं हो सकता।’’

(छप्पय)

करम-पिंड अरु रागभाव, मिलि एक हौंहि नहिं।
दोऊ भिन्न-सरूप, बसहिं दोऊ न जीवमाँहिं।।

यः करोति स करोति केवलं, यस्तु वेत्ति स तु वेत्ति केवलम्। यः करोति न हि वेत्ति स क्वचित्, यस्तु वेत्ति न करोति स क्वचित् ।। 51।। ज्ञप्तिः करोतौ न हि भासतेऽन्त:, ज्ञप्तौ करोतिश्च न भास्तेऽन्तः। ज्ञप्तिः करोतिश्च ततो विभिन्ने, ज्ञाता न कर्तेति ततः स्थितं च ।। 52।।

करमपिंड पुग्गल, विभाव रागादि मूढ़ भ्रम।
अलख-एक, पुग्गल-अनंत, किमि धरहि प्रकृति-सम।।
निज-निज-विलासजुत जगतमाँहिं, जथा सहज-परिनमहिं तिम।
करतार-जीव जड़-करम कौ, मोह-विकल-जन कहहिं इम।। 35।।

शब्दार्थ :- करमपिंड अरु रागभाव= ज्ञानावरणादि-कर्मों का समूह और रागादि-भाव, मिलि एक हौंहि नहिं= मिलकर एक नहीं होते हैं, दोऊ भिन्न-सरूप= दोनों का स्वरूप भिन्न है, बसहिं दोऊ न जीवमाँहि= दोनों ही जीव में नहीं रहते हैं, अलख-एक= अलक्ष्यी आत्मा एक है, पुग्गल-अनंत= पुद््गल अनंत हैं, किमि धरहि प्रकृतिसम= कैसे एकसमान-स्वभाव धारण कर सकते हैं? निज-निज विलासजुत जगतमाँहि=ं जगत् में (सभी द्रव्य) अपने-अपने स्वभाव में, जथा सहज-परिनमहिं तिम= जैसा स्वभाव है, उसी के अनुसार परिणमन करते हैं, करतार-जीव जड़-करम कौ= जीव जड़-कर्मों का कर्त्ता है, मोह-विकल-जन कहहि इम= ऐसा मोहवश व्याकुल होकर संसारी-प्राणी कहते हैं। विशेषार्थ :- ‘द्रव्यकर्म’ और ‘भावकर्म’ में भिन्नता का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि करम-पिंड अर्थात् ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म, और रागभाव अर्थात् मोह-राग-द्वेषादि भावकर्म- ये दोनों ही मिलकर कभी एक नहीं होते; क्योंकि दोनों का स्वरूप ही भिन्न है, और दोनों ही जीव में नहीं होते। कर्मों का पिण्ड तो पुद््गल है, और रागादि-भावकर्म अज्ञानी-जीव का भ्रम है। आत्मा एक और पुद््गल-कर्म अनंत- दोनों की प्रकृति एक कैसे हो सकती है? जगत् में छहों-द्रव्य अपने-अपने विलासयुक्त यानि स्वभाव के अनुरूप ही सहज-परिणमन करते हैं, फिर भी जीव को जड़कर्मों का कर्ता कहना या मानना- ये संसारी मोही-जीवों की विकलता अर्थात् मोह से ग्रसित परिणाम है। द्रव्यकर्म और भावकर्म दोनों ही आत्मा से भिन्न हैं, कैसे? आत्मा ज्ञानादि अनंत-गुणों का पिण्ड है, जीव का स्वभाव मात्र जानना और देखना है। और ज्ञान का स्वभाव स्व-पर प्रकाशी होने से पर-पदार्थ ज्ञान में झलकते हैं, यह तो हुई सहज-प्रक्रिया। फिर जीव की भूल क्या है? जीव स्वयं के स्वभाव को भूलकर पर की इस झलकन को ही अपना स्वरूप मान लेता है, और उनमें इष्ट-अनिष्टपने की कल्पना करता है, जिससे मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भावों की उत्पत्ति होती है, जिन्हे हम ‘भावकर्म’ कहते हैं। इन भावकर्मों का निमित्त पाकर लोक में भरी कार्माण-वर्गणायें तत्क्षण जीव के साथ आकर चिपक जाती है, जिन्हें हम ‘द्रव्यकर्म’ कहते हैं। ये ‘द्रव्यकर्म’ तो कार्माण-वर्गणायें हैं, जो भिन्न-द्रव्य होने से जीव से पूर्णतः भिन्न हैं। और ‘भावकर्म’ भी आत्मा का स्वभाव नहीं होने से ये भी आत्मा से पूर्णतः भिन्न ही हैं। क्योंकि ये ‘भावकर्म’ पर के संयोग और जीव की भूल से उत्पन्न होनेवाले ‘औपाधिक-भाव’ हैं। यदि जीव अन्य-द्रव्यों की तरह अपने स्वभावरूप-परिणमन करे, तो इन विकारी-भावों का तो अस्तित्व ही नहीं ठहरता। इसीलिये कवि ने कहा कि ये दोनों ही कर्म आत्मा से भिन्न हैं। आत्मा एक और कर्म-वर्गणायें अनंत, दोनों का स्वभाव भिन्न, दोनों का परिणमन भिन्न है, फिर ये दोनों एक कैसे हो सकते हैं? कर्त्ता कर्मणि नास्ति नास्ति नियतं कर्मापि तत्कर्त्तरि। द्वन्दं विप्रतिषिध्यते यदि तदा का कर्तृ-कर्म-स्थितिः। ज्ञाता ज्ञातरि कर्म कर्मणि सदा व्यक्तेति वस्तुस्थिति-र्नेपथ्ये बत नानटीति रभसा मोहस्तथाप्येष किम्।। 53।। छह-द्रव्यों के समूह को ‘लोक’ कहते हैं। और इस लोक में सभी द्रव्य अपनी-अपनी मर्यादा में स्वतंत्र परिणमन करते हैं। न कोई किसी के आधीन है और न कोई किसी का कार्य करता है। इन सभी द्रव्यों में एकमात्र जीवद्रव्य ही अपनी मर्यादा को लाँघता है, स्वयं ही अपने को जड़कर्मों का कर्त्ता मानता है, और फिर उन कर्मों के अपने अनुसार परिणमन न करने पर स्वयं ही दुःखी होता है, इस सबका एकमात्र-कारण संसारी-जीव का मोह और अज्ञानभाव ही है, अन्य कोई कारण नहीं।

(छप्पय)

जीव मिथ्यात न करै, भाव नहिं धरै भरम-मल।
ग्यान ग्यानरस-रमै, होइ करमादिक-पुदगल।
असंख्यात-परदेस सकति, जगमगै प्रकट-अति।
चिदविलास गंभीर-धीर, थिर रहै विमलमति।।
जब लगि प्रबोध घटमाँहि उदित, तब लगि अनय न पेखिये।
जिमि धरम-राज वरतंत पुर, जहं-तहं नीति परेखिये।। 36।।

शब्दार्थ :- जो मिथ्यात न करै= जो मिथ्यात्वभाव नहीं करता, भाव नहिं धरै भरम-मल= भ्रमरूपी मलिन- भावों को भी नहीं धरता, ग्यान ग्यानरस-रमै= ज्ञान, ज्ञानरस में ही लीन, होइ करमादिक पुदगल= कर्मादिक पुद््गल होते हैं, असंख्यात-परदेस सकति= असंख्यात-प्रदेशी शक्ति, जगमगै प्रकट अति= जगमगाती हुई प्रकट होती है, चिदविलास गंभीर धीर= चैतन्य में ही मगन, गंभीर, धीर, थिर रहै विमलमति= निर्मल-बुद्धि स्थिर रहती है, जब लगि प्रबोध घटमाहिं उदित= जबतक सम्यग्ज्ञान हृदय में प्रकाशित रहता है, तब लगि अनय न पेखिये= तब तक अन्य कुछ भी दिखाई नहीं देता, जिमि धरम-राज-वरतंत पुर= जैसे (जब) धर्म का राज नगर में वर्तता है, जहं-तहं नीति परेखिये= तब हरतरफ नीति ही दिखाई देती है। विशेषार्थ :- आत्मानुभव की महिमा और इस अधिकार का निष्कर्ष बताते हुये कविवर कहते हैं कि जीव मिथ्यात्वभाव को नहीं करता, और भ्रमरूपी मलिन अर्थात् रागादि-भावों को भी धारण नहीं करता, हमेशा ज्ञानरस में ही लीन रहता है। ज्ञानावरणादि-द्रव्यकर्म तो पुद््गल की ही रचना है, सो पुद््गल है ही, लेकिन मोह-राग-द्वेषादि भावकर्म भी पुद््गल के संयोग से उत्पन्न होने के कारण पुद््गल ही हैं, मेरा यानि चेतन-आत्मा का स्वभाव नहीं है। जब जीव ऐसा चिंतनकर ज्ञानावरणादि-आठों द्रव्यकर्म और मोहराग-द्वेषादि भावकर्म इन दोनों से ही पूर्ण-भिन्न निज-स्वभाव पर दृष्टि केन्द्रित करता है, तब आत्मा के असंख्यात-प्रदेशों में एक निर्मल चैतन्य-आत्मज्योति प्रगट होती है, जिसे ‘सम्यग्ज्ञान’ कहते हैं। जिसके प्रकाश से पर में कर्तृत्व-बुद्धिरूपी अज्ञान-अंधकार हमेशा के लिये दूर हो जाता है। जबतक इस निर्मल-ज्योति का प्रकाश अर्थात् ‘सम्यग्ज्ञान’ वर्तता है, तबतक अनय अर्थात् नीतिविरुद्ध कुछ नहीं होता। सर्वत्र न्याय, नीति, सदाचार-सहित धर्म का राज ही प्रवर्तित रहता है, अर्थात् प्रत्येक द्रव्य की स्वतंत्र कार्य-व्यवस्था का सहज-प्रवर्तन वर्तता है। कर्त्ता कर्त्ता भवति न यथा, कर्म कर्मापि नैव। ज्ञानं ज्ञानं भवति च यथा, पुद््गलः पुद््गलोऽपि। ज्ञानज्योतिर्ज्वलितमचलं व्यक्तमन्तस्तथोच्चै-श्चिच्छक्तीनां निकर-भरतोऽत्यन्त-गम्भीरमेतत्।। 54।।

पुण्य-पाप-एकत्व द्वार (४)

(चतुर्थ-अधिकार)

(दाेहा)

करता-किरिया-करमकौ, प्रगट बखान्यौ मूल।
अब वरनौं अधिकार यह, पाप-पुन्न समतूल।। 1।।

शब्दार्थ :- करता-किरिया-करमकौ= कर्त्ता, क्रिया, कर्म का, प्रगट बखान्यौ मूल= मूल से स्पष्ट-वर्णन किया, अब वरनौं अधिकार यह= अब इस अधिकार का वर्णन करता हूँ, पाप-पुन्न समतूल= (जिसमें) पाप और पुण्य दोनों की समानता वर्णित हैं। विशेषार्थ :- पिछले अधिकार में कर्ता-कर्म और क्रिया का मूलभूतरूप से स्पष्ट-वर्णन किया, अब कविवर प्रतिज्ञा करते हैं कि ‘‘मैं इस अधिकार में पाप और पुण्य की समानता का वर्णन करता हूँ।’’

(कवित्त मात्रिक)

जाके उदै होत घट-अंतर, बिनसै मोह-महातम-रोक।
सुभ अरु अशुभ-करम की दुविधा, मिटै सहज दीसै इक थोक।।
जाकी कला होत संपूरन, प्रतिभासै सब लोक-अलोक।
सो प्रबोध-ससि निरखि बनारसि, सीस नवाइ देत पग धोक।। 2।।

शब्दार्थ :- जाकै उदै होत घट-अंतर= जिसके उदय होने पर हृदय में, बिनसै मोह-महातम-रोक= मोहरूपी भयंकर-अंधकार नष्ट हो जाता है, सुभ अरु अशुभ-करम की दुविधा= शुभ और अशुभ-कर्मों की भिन्नता का भेद, मिटै सहज दीसै इक-थोक= मिट जाता है, (दोनों) सहज ही एकसमान दिखाई देते हैं, जाकी कला होत संपूरन= जिसकी कला संपूर्ण होने पर, प्रतिभासै सब लोक-अलोक= लोक और अलोक के समस्त-पदार्थ झलकते हैं, सो प्रबोध-ससि निरखि बनारसि= उस केवलज्ञानरूपी चंद्रमा को देखकर बनारसी, सीस नवाइ देत पग-धोक= सिर झुकाकर चरणों में वंदना करता है। विशेषार्थ :- मंगलाचरण-स्वरूप अपनी भावना व्यक्त करते हुए कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार सूर्य के उदय होने पर रात्रि का काला गहन-अंधकार भी क्षणभर में विनाश को प्राप्त होता है, ठीक उसीप्रकार रत्नत्रयरूपी सूर्य के उदित होने पर अनादि का मोहरूपी गहन-अंधकार भी तत्क्षण ही विनाश को प्राप्त होता है। उसके सम्यक्-प्रकाश में शुभ और अशुभ-कर्म का भेद या उनमें भिन्नपने की बुद्धि सहज ही समाप्त हो जाती है, और दोनों ही परिणाम एकसमान भासित होते हैं। रत्नत्रय की साधना पूर्ण होने पर अर्थात् केवलज्ञान प्रकट होने पर ज्ञान की निर्मलता में लोक और अलोक के समस्त द्रव्य, गुण एवं उनकी समस्त पर्यायें युगपत् सहज-प्रतिभासित होती हैं। जैसे चंद्रमा के आने पर जगत् के समस्त जीवों को दिनभर की तपन से छुटकारा मिल जाता है, और शीतलता की प्राप्ति होती है; ठीक उसीप्रकार भगवान् को केवलज्ञान की प्राप्ति होने पर जगत् के संतप्त-जीवों को भगवान् की छवि का अवलोकन करने मात्र से ही अद्भुत-शांति या शीतलता का अनुभव होता है। दिव्यध्वनिरूपी

तदथ कर्म शुभाशुभ-भेदतो द्वितयतां गतमैक्यमुपानयन्।
ग्लपित्-निर्भर-मोहरजा अयं स्वयमुदेत्यवबोध-सुधाप्लवः।। 1।।

अमृत का पान करने पर तो दुःख का सदा के लिये अभाव ही हो जाता है। कवि कहते हैं कि ऐसी अनुपम शीतल-छवि को निरखते हुये मैं बनारसीदास उनके चरणों में सिर झुकाकर सविनय-वंदन करता हूँ।

(सवैया इकतीसा)

जैंसे काहू चांडाली जुगल-पुत्र जनें तिनि, एक दीयौ बांभन कै एक घर राख्यौ है।
बांभन कहायौ तिनि मद्य-मांस त्याग कीनौ, चंडाल कहायौ तिनि मद्य-मांस चाख्यौ है।।
तैसें एक वेदनी-करमके जुगल-पुत्र, एक पाप एक पुन्न नाम-भिन्न भाख्यौ है।
दुहूँ माँहि दौर-धूप दोऊ कर्मबंधरूप, यातैं ग्यानवंत नहिं कोउ अभिलाख्यौ है।। 3।।

शब्दार्थ :- जैंसे काहू चांडाली= किसी चांडालिनी ने जुगल-पुत्र जनें तिनि= जुडवाँ पुत्रों को जन्म दिया, उनमें से, एक दीयौ बांभन कै= एक ब्राह्मण को दे दिया, एक घर राख्यौ है= एक अपने घर में रख लिया, बांभन कहायौ= जो ब्राह्मण कहलाया, तिनि मद्य-मांस त्याग कीनों= उसने शराब, मांस आदि का त्याग किया, चांडाल कहायौ= जो चांडाल कहलाया, तिनि मद्य-मांस चा़ख्यौ है= उसने शराब, मांस आदि का सेवन किया, तैसें एक वेदनी-करम के जुगल-पुत्र= वैसे ही एक वेदनीय-कर्म के जुडवाँ-पुत्र, एक पाप एक पुन्न= एक ‘पुण्य’ और एक ‘पाप’, नाम-भिन्न भाख्यौ है= ऐसे अलग-अलग नाम कहे गये हैं, दुहूँ मांहि दौर धूप दोऊ= दोनों में दौड़ धूप, कर्मबंधरूप= (दोनों) कर्मबंधनरूप, यातैं ग्यानवंत नहिं कोउ अभिलाख्यौ है= इसीलिये ज्ञानीजन किसी की भी अभिलाषा नहीं करते। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पुण्य और पाप की समानता को एक सरल-उदाहरण के माध्यम से वर्णित किया है। जैसे एक चांडालनी के यहाँ दो जुडवाँ-पुत्रों ने जन्म लिया, उनमें से एक पुत्र उस चांडालनी ने ब्राह्मण को दे दिया और दूसरे पुत्र को उसने अपने पास रखा। ब्राह्मण के घर पलनेवाले पुत्र ने सहज ही परिवार में शराब, मांस आदि का सेवन न होने से त्यागरूप प्रवर्तन किया, और दूसरे ने परिवार में शराब, मांस आदि का सेवन होने से भक्ष्यसेवनरूप प्रवर्तन किया; लेकिन मूल में तो वह दोनों ‘चांडालनी के ही पुत्र’ कहलायेगें। बाहरी-प्रवर्तन से उनका कुल-स्वरूप तो नहीं बदलेगा। ठीक उसीप्रकार पुण्य हो या पाप- दोनों ही ‘वेदनीय-कर्म’ की ही संतान हैं। जिस तरह धर्मविमुखपरिणाम, हिंसादि-पाप, व्यसन आदिरूप प्रवर्तन से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी; वैसे ही मात्र पूजा-पाठ, दया-दानादिक, व्रत-संयम आदि शुभभावरूप प्रवर्तन करने से भी जीव को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी; क्योंकि वे हैं तो दोनों कर्म ही, और कर्मों के रहते हुये जीव को मोक्ष की प्राप्ति कभी नहीं होगी। भाई! पुण्य-पाप दोनों मूल में वेदनीय-कर्म की संतान होने से दोनों में दौड़-धूप बराबर है, अर्थात् जितनी आकुलता जीव को पाप के उदय और उसके फल को भोगने में होती है, उतनी ही आकुलता पुण्य के उदय और उसके फल को भोगने में भी होती है,- यदि ऐसा न होता, तो वर्तमान में सभी पुण्यवान् जीव सुखी होते। हमारे तीर्थकर-परमात्मा अथाह-पुण्य को धूलि-सम छोड़कर क्यों जाते?? हे आत्मन्! पुण्य और पाप दोनों ही आकुलता के जनक है, दोनों में ही निराकुलता नहीं है। जबकि आगम के अनुसार सच्चा-सुख तो निराकुलता में ही है। इसके अलावा दोनों ही पुन: कर्मबंधनरूप हैं, अर्थात इनसे कर्मों का बंधन ही होता है, कर्मों से मुक्ति नहीं मिलती। दोनों का फल संसार-परिभ्रमण ही है, अर्थात् दोनों से ही जीव को चार-गति एको दूरात्त्यजति मदिरां ब्राह्मणत्वाभिमाना-दन्यः शूद्रः स्वयमहमिति स्नाति नित्यं तयैव। द्वावप्येतौ युगपदुदरान्निर्गतौ शूद्रिकायाः, शूद्रौ साक्षादपि च चरतो जातिभेद-भ्रमेण।। 2।। पुण्य पाप एकत्व-द्वार चौरासी-लाख योनियों में भटकने और दु:ख के अलावा कुछ नहीं मिलता, - कहने का अभिप्राय यही है कि हम चाहे पुण्यरूपी लक्ज़री-कोच में सफर कर रहे हों या पापरूपी जनरल-कोच में- मंजिल दोनों की एक ही है संसार-परिभ्रमण। कविवर कहते हैं कि ‘‘इसीलिए ज्ञानी-जीव पुण्य या पाप दोनों में से किसी की भी वांछा नहीं करते हैं, बल्कि समस्त-कर्मों से रहित त्रिकाल अपने आत्मस्वरूप की अनुभूति का पुरुषार्थ करते हैं।’’

(चौपाई)

कोऊ सिष्य कहै गुरु-पांही, पाप-पुन्न दोऊ सम नाहीं।
कारन-रस-सुभाव-फल न्यारे, एक अनिष्ट लगैं इक प्यारे।। 4।।

शब्दार्थ :- कोऊ सिष्य कहै गुरु-पांही= कोई शिष्य गुरु के पास आकर कहता है, पाप-पुन्न दोऊ सम नांही= पाप और पुण्य दोनों समान नहीं है, कारन-रस-सुभाव-फल न्यारे= कारण, रस, स्वभाव और फल भिन्न-भिन्न हैं, (इसीलिये) एक अनिष्ट लगैं= एक बुरा लगता है, इक प्यारे= एक अच्छा (लगता है)। विशेषार्थ :- पुण्य-पाप की समानता के संबंध में शिष्य की शंका को वर्णित करते हुये कविवर कहते हैं कि कोई शिष्य गुरु के पास जाकर कहता है कि ''गुरुजी! पाप और पुण्य दोनों समान नहीं हैं, क्योंकि दोनों के कारण, रस, स्वभाव और फल भिन्न-भिन्न है; इनमें से एक अनिष्ट यानि बुरा लगता है, पर दूसरा इष्ट यानि अच्छा लगता है। वास्तव में देखा जाये, तो ये शंका केवल शिष्य की ही नहीं, कवि ने हम सभी के मनोभावों की भी सटीक-प्रस्तुति की है। भले ही हम सभी अच्छे स्वाध्यायी हैं, परन्तु फिर भी पुण्य के प्रति आकर्षण को नहीं छोड़ पाते हैं। वह हमारे अंतर्मन में अपनी जगह हमेशा बनाये रहता है। बुरा जानकर पाप को तो सभी छोड़ना चाहते, पर पुण्य का आकर्षण हमें अपनी ओर खींचता है, कहीं न कहीं हमें पुण्य में मिठास नजर आती है। तभी तो शिष्य कहता है कि गुरुजी! पाप और पुण्य में देखो कितनी भिन्नता है- पाप-बंध का कारण- संक्लेश-परिणाम, पुण्य-बंध का कारण- विशुद्ध-परिणाम, पाप का रस- असाता का उदय होने से कड़वा, पुण्य का रस- साता का उदय होने से मीठा, पाप का स्वभाव- कषाय की तीव्रतारूप प्रवर्तन, पुण्य का स्वभाव- कषाय की मंदतारूप प्रवर्तन, पाप का फल- नरकादि कुगतियों में गमन, पुण्य का फल- देवादि सुगतियों में गमन इसीलिए शिष्य कहता है कि गुरुवर! मेरी शंका निराधार नहीं है; क्योंकि उपर्युक्त इतनी सारी भिन्नता होने पर हम पुण्य और पाप दोनों को समान कैसे कह सकते हैं??

(सवैया इकतीसा)

संकलेस-परिनामनिसौं पाप-बंध होइ, विसुद्ध-सौं पुन्न-बंध ‘हेतु-भेद’ मानियै।
पाप के उदै ‘असाता’ ताकौ है कटुक-स्वाद, पुन्न-उदै ‘साता’-मिष्ट 'रस-भेद ’ जानिये।।
पाप संक्लेसरूप पुन्न है विसुद्धरूप, दुहँू को ‘सुभाव-भिन्न भेद’ यों बखानिये।
पापसौं कुगति होय पुन्नसौं सुगति होय, ऐसो ‘फलभेद’ परतच्छि परमानियै।। 5।।

शब्दार्थ :- संक्लेस-परिनामनिसौं पाप-बंध होइ= संक्लेश-परिणामों से पाप का बंध होता है, विसुद्ध-सौं पुन्न-बंध= विशुद्ध-परिणामों से पुण्यबंध (होता है- ऐसा), हेतु-भेद मानियै= यह कारणभेद मानना चाहिये, हेतु-स्वभावानुभवाश्रयाणां, सदाप्यभेदाÂन्न हि कर्मभेदः। तद््बन्ध-मार्गाश्रितमेकमिष्टं, स्वयं समस्तं खलु बन्धहेतुः।। 3।। पापकै उदै असाता= पाप के उदय में असाता/प्रतिकूलता, ताकौ है कटुक-स्वाद= जिसका स्वाद कड़वा होता है, पुन्न-उदै साता मिष्ट= पुण्य के उदय में साता/अनुकूलता जिसका स्वाद मीठा लगता है, रस-भेद जानियै= ऐसा रस-भेद जानना चाहिये, पाप संक्लेसरूप= पाप संक्लेशरूप है, पुन्न है विसुद्धरूप= पुण्य विशुद्धरूप है, दुहूं कौ सुभाव भिन्न= दोनों का स्वभाव भिन्न है, भेद यौं बखानियै= एेसा स्वभावभेद कहा गया है, पापसौं कुगति होइ= पाप से कुगति होती है, पुन्नसौं सुगति होइ= पुण्य के उदय में सुगति, ऐसौ फलभेद= ऐसा फलभेद, परतच्छि परमानियै= प्रत्यक्षत: प्रमाणित करना चाहिये। विशेषार्थ :- इस-छंद में शिष्य ने अपनी शंका को न केवल तर्क से बल्कि आगम-सम्मत सटीक-तर्कों से सिद्ध किया है। पहली ‘कारण-भिन्नता’- सबसे पहले पाप और पुण्य में कारण भेद सिद्ध किया कि संक्लेश- परिणामों से पाप का बंध और विशुद्ध-परिणामों से पुण्य का बंध होता है। आगम के अनुसार संक्लेशपरिणाम अर्थात् पाँच-पाप, सप्त-व्यसन, अभक्ष्य-भक्षण, अन्याय, अनीति और धर्म की विमुखतारूप आदि अशुभ-परिणामों से जीव को पाप का बंध होता है। जबकि इसके विपरीत व्रत, नियम, संयम, अभक्ष्य-भक्षण का त्याग, अन्याय, अनीति- अनाचार का त्याग, पूजा-पाठ दया-दानादिक के भावों से पुण्य का बंध होता है। अब यदि कारण से विचार करें, तो शिष्य का तर्क पूर्णत: सही प्रतीत होता है। दूसरी ‘रस/स्वाद-भिन्नता’- पाप के उदय में असाता होती है और उसका स्वाद कड़वा होता है, और पुण्य के उदय में साता होती है, जिसका स्वाद मधुर प्रतीत होता है। आगम में भी हम यही सुनते हैं कि हे आत्मन्! आज जीवन में जो तुझे असाता अर्थात् रोगादि की वेदना, धन-वैभव की हीनता, पारिवारिक-प्रतिकूलतायें मिलीं हैं, वे तेरे ही द्वारा पूर्व में कमाये हुये पाप के उदय से मिली हैं। ये कड़वेबीज तूने खुद ही बोये थे, तो आज इन फलों का स्वाद तुझे कड़वा क्यों लगता है? क्योंकि जैसा बीज वैसा ही फल, फिर आज तू दुःखी क्यों होता है? और दूसरी ओर जो साता के उदयजन्य संयोग अर्थात् निरोगी-काया, धन-वैभव की प्रचुरता, पारिवारिक- अनुकूलतायें मिली हैं, जिनका स्वाद तुझे बहुत मधुर और मोहक लगता है; वे सब किसी परद्रव्य की देन नहीं हैं, बल्कि ये पुण्य के परिणाम अर्थात् मीठे बीज भी तूने खुद ही बोये थे, जिनके मोहक-स्वाद में तू वर्तमान में इतरा रहा है। देखा जाये, तो स्वाद की दृष्टि से भी पुण्य-पाप में भिन्नता सही साबित होती है। तीसरी स्वभाव की भिन्नता- पाप के उदय में कषाय की तीव्रतारूप प्रवर्तन होता है और पुण्य के उदय में कषाय की मंदतारूप प्रवर्तन होता है। हम विचार करें, तो स्वभाव की ऐसी भिन्नता तो हमें प्रत्यक्ष दिखाई देती है। जिन जीवों के पाप का उदय होता है, वर्तमान में भी उनके परिणाम प्रतिसमय संक्लेशरूप ही रहते हैं, जैसे बात-बात पर क्रोध आना, अभिमान के चलते किसी की विनय न करना, मन-वचन-काय में कुटिलता होना, और लोभ के कारण कभी दया-दानादिक के भाव नहीं होना, इन्द्रिय-विषयों को भोगने की अति-तीव्र-लालसा होना, धर्म-कार्यों में अनुत्साह या बोझिलप्रवृति होना इत्यादि। वहीं दूसरी ओर जिन जीवों के पुण्य का उदय होता है, वर्तमान में भी उनके परिणाम मंदकषायरूप ही रहते हैं, जैसे क्रोध, मान, माया, लोभ आदि चारों कषायों की हीनता होना, पाँचों-इन्द्रिय के विषयों को भोगने की तीव्र-लालसा का अभाव होना, दया-दानादिक, पूजा-पाठ, व्रत-नियम, तथा धर्मप्रभावना के कार्यों में तन-मन-धन से उत्साह वर्तना इत्यादि। देखा जाये, तो आगम के अनुसार ये पुण्य पाप एकत्व-द्वार तर्क भी सत्य प्रतीत होता है। चौथी फल की भिन्नता- पाप के उदय में कुगतियों में गमन और पुण्य के उदय में सुगति-गमन होता है। आगम के अनुसार नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव- ये चार गतियाँ मानी गई है, और इनमें से नरक और तिर्यंचादि को ‘कुगति’ और मनुष्य और देवगति को ‘सुगति’ माना गया है। जो जीव जैसा परिणाम करता है, उसके फल में वैसी ही गति का बंध करता है। आचार्यों का कथन है कि पाप के फल में नरकादि कुगतियों में गमन होता है और पुण्य के फल में स्वर्गादि सुगतियों में गमन होता है। इस आधार से शिष्य का ये कथन भी सत्य प्रतीत होता है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर शिष्य कहता है कि ‘‘गुरुजी! कारण, रस, स्वभाव और फल की दृष्टि से उपर्युक्त इतनी भिन्नता होने पर पुण्य और पाप को समान कैसे माना जाये’’??

(सवैया इकतीसा)

पाप-बंध पुन्न-बंध दुहूँ मैं मुकति नांहिं, कटुक-मधुर-स्वाद पुग्गल कौ पेखिए।
संक्लेस-विसुद्ध सहज दोऊ कर्मचाल, कुगति-सुगति जगजाल में विसेखिए।।
कारनादि-भेद तोहि सूझत मिथ्यात-मांहि, ऐसौ द्वैत-भाव ग्यान-दृष्टि में न लेखिए।
दोऊ महा-अंधकूप दोऊ कर्मबंधरूप, दुहूँ को विनास मोख-मारग मैं देखिए।। 6।।

शब्दार्थ :- पाप-बंध पुन्न-बंध दुहूँ मैं मुकति नांहि=ं पापबंध और पुण्यबंध दोनों में मुक्ति नहीं है, कटुक- मधुर स्वाद पुग्गल कौ पेखिए= कड़वा और मीठा स्वाद पुद््गल का समझना चाहिये, संक्लेस-विसुद्ध सहज दोऊ कर्मचाल= संक्लेश और विशुद्ध दोनों स्वाभाविकरूप से कर्म की चाल है, कुगति-सुगति जगजाल में विसेखिए= कुगति और सुगति संसार ही हैं- ऐसा समझना चाहिये, कारनादि-भेद तोहि सूझत मिथ्यातमांहि= कारण आदि भेद तुझे मिथ्यात्व के कारण दिखाई देते हैं, ऐसौ द्वैत-भाव ग्यान-दृष्टि में न लेखिए= ऐसा द्वैत-भाव ज्ञानदृष्टि में नहीं होता है, दोऊ महाअंधकूप= दोनों ही अंधे-कुँये में डालनेवाले हैं, दोऊ कर्मबंधरूप= दोनों कर्मबंधनरूप हैं, दुहूँ को विनास= दोनों का विनाश, मोख-मारग देखिए= मोक्षमार्ग में दिखाई देता है। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में शिष्य ने पाप और पुण्य की भिन्नता सिद्ध करने की पूरी कोशिश की, परन्तु शिष्य के सभी तर्कों का सटीक-जबाब देते हुये कविवर कहते हैं कि यद्यपि पाप-बंध और पुण्य-बंध दोनों के स्वरूप में भिन्नता है; पर हैं तो दोनों में बंधन ही, मुक्ति तो दोनों से ही नहीं है। और बंधन कभी भी किसी के लिए सुख का कारण नहीं हो सकता, तभी तो कहते हैं- ‘‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’’, और मैं तो परम-स्वाधीन-तत्त्व हूँ, बंधन का तो मेरे स्वरूप में अस्तित्व ही नहीं है, फिर मैं बंधन में सुखी कैसे रह सकता हूँ? और जो तुमने पाप के स्वाद को कड़वा और पुण्य के स्वाद को मधुर कहा, तो भाई ये कड़वापन और मधुरता तो पुद््गल की पर्याय है, आत्मा की नहीं, आत्मा तो त्रिकाल अरस-स्वभावी है। संक्लेश और विशुद्ध दोनों ही परिणाम कर्म के निमित्त से यानि कर्मों के उदय या क्षयोपशम से होने वाले भाव हैं; आत्मा के स्वभावरूप परिणाम नहीं हैं, क्योंकि आत्मा का परिणाम तो पूर्ण-शुद्ध होता है, संक्लेशरूप या विशुद्धरूप नहीं होता है। इसीप्रकार कुगति-गमन और सुगति-गमन संसार के ही दो भिन्न-स्थल है, अर्थात कुगति हो या सुगति- है तो संसार ही न; मोक्ष तो नहीं है। भाई! गति कोई भी हो, दुःखरूप ही है, यदि कोई भी गति सुखरूप होती, तो सिद्ध-भगवान् चारों-गतियों से भिन्न पंचमगति में क्यों निवास करते? अर्थात् सिद्ध-गति का तो अस्तित्व ही नहीं होना चाहिये था। हे आत्मन्! पाप और पुण्य में कारण, रस, स्वभाव और फलरूप जो भिन्नता तुझे दिख रही है; वह मिथ्यात्व अर्थात् उल्टी-मान्यता के कारण दिख रही है। तेरी आँखो पर मोह का चश्मा जो लगा हुआ है, जिससे तुझे जीव और पुद््गल का मिला-जुला परिणमन दिखाई दे रहा। ऐसा जीव और पुद््गल का द्वैतभाव यानि मिला-जुला परिणमन ज्ञान की नजर से नहीं दिखता अर्थात् ज्ञानियों को जीव और पुद््गल का मिला-जुला नहीं, स्वतंत्र-परिणमन सहज ही परिलक्षित होता है। पाप और पुण्य दोनों ही महाअंधकूप है, अर्थात् जैसे कुँयें में घने अंधकार के अलावा और कुछ नहीं होता, और एक बार कुँये में गिरने पर बाहर निकलने का कोई रास्ता आसानी से नजर नहीं आता; ठीक उसीप्रकार पाप की तरह पुण्य भी गहन अंधकार-स्वरूप ही है। क्योंकि एक बार यदि जीव पुण्य में ही संतुष्ट हो गया, तो आत्महित के सारे रास्ते स्वत: ही बंद हो जाते हैं। पाप और पुण्य दोनों ही कर्मबंधनरूप हैं, अर्थात् ये दोनों ही स्वभाव के विस्मरण और पर के लक्ष्य से उत्पन्न होने हैं, इनसे पुन: कर्म का बंधन होता है, जिससे संसार का परिभ्रमण यथावत् चलता रहता है। कविवर कहते हैं कि मोक्षमार्ग में इन दोनों का ही विनाश देखा जाता है, अर्थात् जो जीव मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हैं, या जिन जीवों ने मोक्ष की प्राप्ति की है, उनने कर्मों का क्षय करके ही मोक्ष प्राप्त किया है, पाप हो या पुण्य, शुभ हों या अशुभ- कर्मों के रहते हुये न तो कोई जीव आज तक मोक्ष गया है और न कभी जायेगा।

(सवैया इकतीसा)

सील-तप-संजम-विरति-दान-पूजादिक, अथवा असंजम-कषाय-विषैभोग है।
कोऊ सुभरूप कोऊ अशुभ- स्वरूप मूल, वस्तु के विचारत दुविध-कर्मरोग हैं।।
ऐसी बंध-पद्धति बखानी वीतरागदेव, आतम-धरममैं करम त्याग-जोग है।
भौ-जल-तरैया राग-दोष कौ हरैया महा-, मोख को करैया एक सुद्ध-उपयोग है।। 7।।

शब्दार्थ :- सील-तप-संजम-विरति-दान-पूजादिक= शील/ब्रह्मचर्य, तप, संयम, व्रत, दान, पूजा आदि के भाव, अथवा= या, असंजम-कषाय-विषैभोग है= असंयम, कषायभाव और विषयभोग के भाव, कोऊ सुभरूप= कोई शुभरूप है, कोऊ अशुभ स्वरूप मूल= कोई मूलतः अशुभरूप है वस्तु के विचारत= वस्तुस्वरूप का विचार करने पर, दुविध-कर्मरोग है= दोनों ही कर्मों के रोग हैं, ऐसी बंध-पद्धति बखानी वीतरागदेव= ऐसी बंध की पद्धति जिनेन्द्रदवे ने कही है, आतम-धरम में करम त्याग-जोग हैं= आत्मधर्म में दोनों ही कर्म त्यागने-योग्य हैं, भौ-जलतरैया= संसाररूपी सागर से तारनेवाला, राग-द्वेष को हरैया= राग-द्वेष को हरनेवाला, महा-मोख कौ करैया= महा-मोक्ष को करने वाला, एक सुद्ध-उपयोग है= एकमात्र शुद्ध-उपयोग ही है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कविवर व्यवहार की दृष्टि से पिछले विषय को और अधिक खुलासा करते हुए कहते हैं कि ‘शील’ यानि ब्रह्मचर्य का भाव, ‘तप’ यानि इच्छाओं को रोकने का परिणाम, ‘संयम’ यानि छहों-काय के जीवों की रक्षा का भाव, और पाँचों-इन्द्रियों के विषयों से विरक्ति का भाव, ‘व्रत’ यानि पाँचों-पापों के त्यागरूप परिणाम, चारों-प्रकार के दान का भाव, जिनेन्द्रदेव की पूजा-वंदना आदि का भाव, अथवा इसके विपरीत असंयम यानि जीवदया का भाव नहीं होना, पाँचों-इन्द्रियों के विषयों में अासक्तिरूप प्रवर्तन, क्रोध, मान, माया लोभरूप कषाय की तीव्रता का परिणाम, विषय-भोग (कुशीलजन्य) की तीव्रकर्म सर्वमपि सर्वविदो यद्-बन्ध-साधनमुशन्त्यविशेषात्। तेन सर्वमपि तत्प्रतिषिद्धं, ज्ञानमेव विहितं शिवहेतुः।। 4।। पुण्य पाप एकत्व-द्वार लालसारूप परिणाम- इनमें से कोई परिणाम तो कषाय की मंदतारूप होने से शुभ या पुण्यरूप है, और कोई कषाय की तीव्रतारूप होने से अशुभ या पापरूप है; परन्तु हैं तो दोनों कषाय के ही रूप। जब हम वस्तु के मूल-स्वरूप का विचार करते हैं, तो ये दोनों ही कर्म-कृत रोग हैं। क्योंकि हर जीव अपनी आयु से जीता है और आयुकर्म क्षय होने पर स्वत: ही मरण को प्राप्त होता है, तब जीवों को मारने का या बचाने का परिणाम मेरा कैसे हुआ?? मैं तो दोनों ही परिस्थितियों का मात्र ज्ञाता ही रहा, यही मेरा अपना परिणाम है। इसीप्रकार व्रत, तप, शील, संयम आदि का परिणाम कषाय की मंदता का परिणाम है, और तदनुरूप होनेवाली क्रिया शरीर की है, मेरी नहीं। केवल इनको जाननेवाला परिणाम मेरा है,जो पूर्ण-शुद्ध है। जब वस्तुस्वरूप की स्वतंत्रता का ऐसा चिंतन चलता है, तब ये सब कषायजनित-परिणाम प्रत्यक्ष ‘पर’ भासित होते हैं, और जीव को कर्म का बंध नहीं होता, जबकि इसके विपरीत चाहे परिणाम शुभ का हो या अशुभ का, बंध तो प्रतिसमय होता ही है। कवि कहते हैं कि ये बंध का स्वरूप मैंने नहीं कहा, तीर्थकर-परमात्मा की वाणी में ऐसा ही ध्वनित हुआ है, कि आत्मधर्म यानि आत्मिक-सुख की प्राप्ति में शुभ हो या अशुभ दोनों ही कर्म त्याग करने योग्य ही हैं, अर्थात् कर्मों के रहते हुये जीव कभी सुखी नहीं हो सकता है। यदि हमें संसार-समुद्र से पार होना है, कर्मों के जनक राग-द्वेषरूपी शत्रुओं को जीतना है, और अनंत-सुख की प्रकटतारूप मोक्ष या सिद्ध-पद को प्राप्त करना है, तो समस्त कर्मों से रहित एकमात्र शुद्ध-उपयोग अर्थात् वीतरागता ही कार्यकारी है।

(सवैया इकतीसा)

सिष्य कहे ''स्वामी! तुम करनी असुभ-सुभ, कीनी है निषेध मेरे संसै मन-माँहिं है।
मोख के सधैया ज्ञाता देसविरती-मुनीस, तिनकी अवस्था तो निरावलंब नाहीं है’'।।
कहै गुरु ''करम कौ नास अनुभौ-अभ्यास, ऐसौ अवलंब उनही कौ उन पांही है।
निरुपाधि आतम-समाधि सोइ सिवरूप, और दौर-धूप पुदगल-परछांही है’'।। 8।।

शब्दार्थ :- सिष्य कहै स्वामी! तुम करनी असुभ-सुभ= शिष्य कहता है गुरुजी! आपने तो अशुभ और शुभ दोनों क्रियाओं का, कीनी है निषेध मेरे संसै मन-माँहि है= निषेध किया है, इससे मेरे मन में यह संशय है, कि मोख के सधैया ज्ञाता= मोक्ष के साधक-ज्ञानी, देसविरती-मुनीस= देशव्रती और मुनिराज, तिनकी अवस्था तो= उनकी स्थिति तो, निरावलंब नाहीं है= अवलंबन-रहित नहीं है, कहै गुरु करम कौ नास अनुभौ अभ्यास= गुरू कहते हैं, कर्म का विनाश, अनुभव का अभ्यास, ऐसौ अवलंब उनही कौ उन पांही है= ऐसा अवलंबन वे स्वयं अपने लिये ही करते हैं निरुपाधि आतम-समाधि सोइ सिवरूप= उपाधिरहित जो आत्मसमाधि, वही मोक्षस्वरूप है, और दौरधूप तो पुदगल-परछांही है= अन्य दौड़-धूप तो पुद््गल की परछाईं है। विशेषार्थ :- पिछले छंद में कवि ने शुभ और अशुभ दोनों ही परिणाम और क्रियाओं को मोक्षमार्ग में त्यागने-योग्य कहा था। ये कथन शिष्य के गले नहीं उतरा और वह गुरुजी से कहता है कि ‘‘आपने जो शुभ-अशुभ-क्रिया का निषेध किया, उसके बारे में मुझे संदेह है; क्योंकि जितने भी मोक्ष के साधक ज्ञानी-पुरुष या पथिक हैं, फिर चाहे वे अणुव्रती-श्रावक हों या महाव्रती-मुनिराज हों, वे सभी शील, व्रत, तप, संयम आदि क्रियायें करते हुये दिखाई देते हैं, तो हम कैसे मानें कि मोक्ष की साधना इनके आलंबन निषिद्धे सर्वस्मिन् सुकृत-दुरिते कर्मणि किल, प्रवृत्ते नैष्कर्म्ये न खलु मुनय: सन्त्यशरणा:। तदा ज्ञाने ज्ञानं प्रतिचरितमेषां हि शरणम्, स्वयं विन्दन्त्येते परमममृतं तत्र निरता:।। 5।। के बिना भी हो सकती है’’? गुरुजी शिष्य की शंका का समाधान करते हुये कहते हैं कि ‘‘हाँ! ये बात सही है कि ज्ञानी-पुरुष के जीवन में ये क्रियायें देखी जाती हैं, परन्तु वे इन क्रियाओं को कर्मों की निर्जरा का कारण नहीं मानते। कर्मों की निर्जरा का कारण तो एकमात्र आत्मानुभूति ही है। जब उपयोग स्वरूप में नहीं ठहरता, तब बाहर में कषाय की मंदता होने से ये व्रतादिक के भाव सहज आते हैं, वे इन-भावों को करते नहीं हैं; सहज होते हैं, परन्तु उनको बंध का कारण ही मानते हैं, और वापस स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ करते हैं। हे आत्मन्! ये व्रतादिक के भाव मोक्षमार्ग की मंजिल नहीं पड़ाव हैं, जो भूमिकानुसार सहज होते हैं।’’ कर्म के निमित्त से होने के कारण राग-द्वेष-मोहादि-भावों को ‘औपाधिक-भाव’ कहा जाता है, इसलिए कवि कहते हैं कि उपाधि-रहित अर्थात् राग-द्वेष-मोहादि भावों से रहित यानि शुभ और अशुभ किसी भी प्रकार के विकल्प से रहित निर्विकल्प-आत्मानुभूति ही मोक्ष-स्वरूप है, शेष सारी दौड़-धूप तो पुद््गल की परछाईं हैं। अर्थात् वीतरागता के अतिरिक्त जितने भी परिणाम हैं, वे परलक्ष्यी, कर्मकृत और कषाय की मंदता के फलस्वरूप होने से जड़ हैं, और तदनुरूप जितनी क्रिया है वह भी शरीर की होने से पुद््गल की ही है। कहने का अभिप्राय यही है कि विकल्प चाहे कैसा भी हो शुभ या अशुभ, कर्मबंध का ही कारण है, एकमात्र निर्विकल्प-आत्मानुभूति ही कर्मों की निर्जरा का कारण है, यही सत्य है और यही मोक्षमार्ग है।

(सवैया तईसा)

मोख-सरूप सदा चिनमूरति, बंधमई-करतूति कही है।
जावत-काल बसै जहाँ चेतन, तावत सो रस-रीति गही है।।
आतम कौ अनुभौ जबलौं, तबलौं सिवरूप-दसा निबही है।
अंध भयौ करनी जब ठानत, बंध-विथा तब फैल रही है।। 9।।

शब्दार्थ :- मोख-सरूप सदा चिनमूरति= चैतन्य-आत्मा हमेशा मोक्ष-स्वरूप है, बंधमई करतूति कही है= क्रियायें बंधमयी कही गई है, जावतकाल बसै जहाँ चेतन= जितने समय तक चेतन जहाँ बसता है, तावत सो रस-रीति गही है= तबतक वह उसरूप प्रतीति को ग्रहण करता है, आतम कौ अनुभौ जबलौं= जबतक आत्मा का अनुभव, तबलौं सिवरूप-दसा निबही है= तबतक मुक्तरूप-दशा रहती है, अंध भयौ करनी जब ठानत= ज्योंही स्वरूप से विमुख होकर कर्त्ताबुद्धि करता है, बंध-विथा तब फैल रही है= उसीसे बंध की व्यथा का विस्तार होने लगता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने शिष्य की शंका का सटीक-समाधान किया है कि ‘‘हे आत्मन्! मुक्ति का स्वरूप तो हमेशा से एक ही है और एक ही रहेगा- चैतन्यस्वरूप में स्थिरता, वीतरागता। इसके अलावा जितनी भी क्रियायें है, वे चाहे शुभ हों या अशुभ, एकमात्र बंध की ही कारण हैं। इसलिये भाई! ज्ञानी-जीव का भी जितनी देर उपयोग जहाँ टिकता है, फल भी उसी के अनुसार मिलता है।’’ कहने का अभिप्राय यही है कि मुक्ति के साधक का उपयोग जितनी देर अपने आत्मस्वरूप में स्थिर रहता है, उतनी देर मुक्त या अबंध-दशा ही रहती है, यानि कर्मों का बंधन नहीं होता है, और जैसे ही उपयोग स्वरूप से हटता है, फिर चाहे क्रिया कैसी भी हो शुभ या अशुभ, ज्ञानी-जीव को भी कर्म का बंध यदेतज् ज्ञानात्मा ध्रुवमचलमाभाति भवनम्, शिवस्यायं हेतु: स्वयमपि यतस्तच्छिव इित। अतोऽन्यद् बन्धस्य स्वयमपि यतो बन्ध इति तत्, ततो ज्ञानात्मत्वं भवनमनुभूतिर्हि विहितम।। 6।। पुण्य पाप एकत्व-द्वार होता ही है। हाँ लेकिन उस बंध की स्थिति जली-जेवरी अर्थात् जली हुई रस्सी के समान बलहीन होती है, जो शीघ्र ही निर्जरित भी होता जाता है। विशेष बात-यहाँ कवि ने स्वरूप से विस्मृत साधक को ‘अंधे’ की उपमा दी है। जैसे ही साधक का उपयोग अपने ज्ञाता-दृष्टा-स्वभाव से बाहर आता है, वह अंधे के समान हो जाता है, जैसे अंधा-व्यक्ति दिखाई न देने के कारण ठोकरें खाता है, वैसे ही स्वभाव से बाहर आने पर साधक कर्मकृत-क्रिया में उलझता है, और बंधन को भी प्राप्त होता है।

(सोरठा)

अंतर-दृष्टि लखाउ, निज-सरूप कौ आचरन।
ए परमातम-भाउ, सिव-कारन येई सदा।। 10।।

शब्दार्थ :- अंतर-दृष्टि लखाउ= स्वयं को अंतर्दृष्टि से देखना, निज-सरूप कौ आचरन= अपने स्वरूप में रमना, ए परमातम-भाउ= यही परमात्मा का स्वभाव है, सिव-कारन येई सदा= यही सदा से मोक्ष का कारण है। विशेषार्थ :- मोक्ष-प्राप्ति का ‘अस्ति’ से कथन करते हुए अर्थात् मोक्ष-प्राप्ति का उपाय बताते हुए कविवर कहते हैं कि यदि हम संसार के दुःखों से छूटना चाहते हैं, और सच में मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं, तो इसका केवल एक ही उपाय है कि स्वयं को देखो, स्वयं को जानो और स्वयं में ही रम जाओ। वास्तव में यही परमात्मा का स्वभाव है, और यही सदा से मोक्ष का उपाय भी है। कवि ने यहाँ ‘परमात्मा’ शब्द में ‘श्लेष-अलंकार’ का प्रयोग किया है, पहला अर्थ परमात्मा यानि परम-आत्मा अर्थात् सर्वश्रेष्ठ-आत्मा और दूसरा अर्थ परमात्मा यानि केवलज्ञानी-परमात्मा और दोनों का स्वभाव एक ही है। कहने का अभिप्राय यही है कि मोक्ष का एकमात्र-उपाय स्वरूप में रमना है। और इस संसार में मेरे लिये मेरी आत्मा ही सर्वश्रेष्ठ है, अन्य कोई नहीं, इसलिये स्व-स्वरूप की आराधना ही एकमात्र मुक्ति का सच्चा-उपाय है।

(सोरठा)

करम सुभासुभ दोइ, पुदगल-पिंड विभाव-मल।
इनसौं मुकति न होइ, नहिं केवल-पद पाइए।। 11।।

शब्दार्थ :- करम सुभासुभ दोइ= शुभ और अशुभ-कर्म दोनों ही, पुदगल-पिंड विभाव-मल= पुद््गल के पिण्ड हैं, विभावरूपी मल हैं, इनसौं मुकति न होइ= इनसे मुक्ति नहीं होगी, नहिं केवल-पद पाइए= (और) न ही केवलज्ञान की प्राप्ति होगी। विशेषार्थ :- मोक्ष-प्राप्ति का नास्ति से कथन अर्थात् किससे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी, उसका वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि शुभ और अशुभ दोनों ही कर्म पुद््गल के पिण्ड हैं। कैसे? ज्ञानावरणादिद्रव्यकर्म तो पुद््गल के परमाणु हैं ही, परन्तु इनके निमित्त से होने वाले ये शुभ-अशुभ भाव भी पुद््गल या पर के लक्ष्य से उत्पन्न होने के कारण पुद््गल के ही हैं। और जड़ व चेतन दो भिन्न-द्रव्य हैं और दोनों में अत्यन्ताभाव होने से ये जड़कर्म चेतन-आत्मा के लिये मुक्ति के साधक कैसे हो सकते हैं? वृत्तं ज्ञाान स्वभावेन ज्ञानस्य भवनं सदा। एकद्रव्य-स्वभावत्वान्मोक्षहेतुस्तदेव तत्।। 7।। वृत्तं कर्मस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं न हि। द्रव्यान्तर-स्वभावत्वान्मोक्षहेतुर्न कर्म तत्।। 8।। दूसरा-कारण दोनों ही कर्म आत्मा का स्वभाव नहीं, विभाव हैं, कैसे? क्योंकि स्वभाव त्रिकाली होता है, कभी क्षय को प्राप्त नहीं होता। यदि ये शुभ-अशुभ भाव आत्मा का स्वभाव होते तो, सिद्धअवस्था में इनका क्षय नहीं होता। इसलिये सिद्ध होता है कि ये दोनों ही कर्म ‘स्वभाव’ नहीं ‘विभाव’ है। और जो मेरा नहीं वो मेरे लिये सुख का कारण कैसे हो सकता है? तीसरा-कारण ये शुभ-अशुभ भाव-मल हैं, कैसे? लोक में भी जबतक दो वस्तुयें भिन्न-भिन्न अपने स्वभाव में रहती हैं, निर्मल रहती हैं, लेकिन जैसे ही वह मिलती हैं, अपनी स्वाभाविक-निर्मलता को खो देती हैं, ठीक उसीप्रकार जबतक पुद््गल और चेतन दोनों भिन्न रहते हैं, तबतक मलिनता नहीं होती; लेकिन जैसे ही दोनों मिलते हैं, मलिनतारूप, संयोगरूप शुभ-अशुभ भावों की उत्पत्ति होती है, इसीलिये आगम में भी और यहाँ कवि ने भी इन संयोगी-भावों को ‘मल’ की उपमा दी है। और इन मलिन-भावों से निर्मल चैतन्य-स्वरूप की आराधना कैसे संभव हो सकती है? इसीलिए कविवर कहते हैं कि इन शुभ-अशुभ भावों से न तो मोक्ष की प्राप्ति संभव है, और न ही केवलज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। मोक्ष का उपाय तो एकमात्र स्व-स्वरूप की आराधना और लीनता ही है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ सिष्य कहै ‘‘स्वामी! असुभक्रिया असुद्ध, सुभक्रिया सुद्ध तुम ऐसी क्यों न वरनी’’?

गुरु कहैं ''जबलौं क्रिया के परिनाम रहै, तबलौं चपल-उपयोग जोग धरनी।।
थिरता न आवैं तोलौं सुद्ध-अनुभौ न होइ, यातैं दोऊ-क्रिया मोख-पंथ की कतरनी।
बंध की करैया दोऊ, दुहू में न भली कोऊ, बाधक विचारि मैं निसिद्ध कीनी करनी’'।। 12।।

शब्दार्थ :- कोऊ सिष्य कहै स्वामी= कोई शिष्य कहता है ‘‘गुरुजी! असुभक्रिया असुद्ध= अशुभ-क्रिया अशुद्ध, सुभक्रिया सुद्ध= शुभ-क्रिया शुद्ध है, तुम एेसी क्यों न वरनी= तुमने/आपने ऐसा वर्णन क्यों नहीं किया’’, गुरु कहैं जबलौं क्रिया के परिनाम रहैं= गुरुजी कहते हैं ‘‘जबतक क्रिया के परिणाम रहते हैं, तबलौं चपलउपयोग जोग धरनी= तबतक उपयोग की चंचलता योग की कारण बनी रहती है, थिरता न आवैं तोलौं= (उपयोग की) स्थिरता नहीं आती तबतक, सुद्ध-अनुभौ न होइ= (जबतक) शुद्ध-अनुभूति नहीं होती, यातैं दोऊ-क्रिया= इसलिये दोनों क्रिया, मोख-पंथ की कतरनी= मोक्षमार्ग में कैंची के समान घातक हैं, बंध की करैया दोऊ= दोनों बंध को करनेवाली हैं, दुहू में न भली कोऊ= दोनों में कोई अच्छी नहीं है, बाधक विचारि मैं निसिद्ध कीनी करनी= (दोनों को मोक्षमार्ग में) बाधक जानकर मैंने इन दोनों क्रियाओं का निषेध किया है’’। विशेषार्थ :- पुन: शिष्य कहता है कि गुरुजी! अशुभभाव/पाप तो बुरा था, पर भगवान् की पूजा, भक्ति, व्रत, तप आदि शुभभाव तो अच्छे थे, इनका निषेध क्यों किया? आपने अशुभ को ‘अशुद्ध’ और शुभ को ‘शुद्ध’- ऐसा वर्णन क्यों नहीं किया? समाधान- गुरु जी कहते हैं कि ‘‘भाई जबतक क्रिया के परिणाम रहते हैं, तब तक उपयोग की चंचलता बनी रहती है, एकाग्रता नहीं रहती।’’ हे आत्मन्! जबतक तुझे कुछ भी करने का भाव रहेगा, तबतक उपयोग की चंचलता बनी रहेगी। उदाहरण के लिए जैसे हमारा नियम हो कि हमें प्रतिदिन षडावश्यकों का पालन करना है, तो जबतक हमारा ये नियम पूरा नहीं हो जाता, तबतक हमें आकुलता बनी रहती है। और जिस दिन ये नियम बिना किसी बाधा के समय से पूरा हो जाता हैं, उस दिन हमें एक संतुष्टि का अहसास होता है। अंतर में एक खुशी की अनुभूति होती है कि आज मेरा नियम पूरा हो गया, मोक्षहेतु-तिरोधानाद्,बन्धत्वात्स्वयमेव च। मोक्षहेतु-तिरोधायि, भावत्वात्तन्निषिध्यते ।। 9।। पुण्य पाप एकत्व-द्वार तो क्या वास्तव में वह नियम मेरे करने से पूरा हुआ? नहीं, यदि ऐसा होता, तो प्रतिदिन मेरे हिसाब से पूरा होना चाहिए था, पर ऐसा होता नहीं है। क्यों? क्योंकि वास्तविकता तो यह है कि सारी क्रिया तो जड़ की थी, और जड़ में ही स्वतंत्ररूप से परिणमित भी हो रही थी। मैं चेतन-आत्मा तो इन क्रियाओं का मात्र ज्ञाता था, यदि मुझे द्रव्य की ऐसी स्वतंत्रता का भान होता, तो न तो मुझे उन कार्यों को करने की आकुलता होती और न ही उन कार्यों को न कर पाने का दुःख होता। इससे सिद्ध होता है कि क्रिया भले ही शुभ हो, पर है तो वह आकुलता की जनक ही, और आकुलता में सुख कभी संभव ही नहीं है। पं. दौलतराम जी छहढाला में कहते हैं- ‘‘आकुलता शिवमाँहि न तातैं, शिवमग लाग्यौ चहिये।’’ इसीलिए कविवर आगे कहते हैं कि जब तक मन-वचन-काय में एकाग्रता नहीं होती, उपयोग में भी स्थिरता नहीं आती, और जबतक उपयोग स्वरूप में एकाग्र नहीं होता; तबतक शुद्धात्मा की अनुभूति नहीं होती। जैसे कैंची चाहे सोने की हो या लोहे की उसका काम काटना ही है, ठीक उसीप्रकार क्रिया चाहे शुभ हो या अशुभ, उपयोग की एकाग्रता भंग करने के कारण ‘मोक्षमार्ग की कतरनी’ अर्थात् बाधक ही है। साथ ही दोनों ही क्रियायें बंधनस्वरूप भी हैं, चाहे उनसे पाप का बंध हो या पुण्य का बंध, होता तो बंध ही है। दोनों में से कोई भी क्रिया भली या अच्छी नहीं है; क्योंकि जो क्रिया जीव को बंधन में निमित्त है, दुःख व आकुलता की जनक है, वह क्रिया अच्छी कैसे हो सकती हैं? इसप्रकार दोनों ही क्रिया मोक्षमार्ग में बाधक होने के कारण ही मैंने क्रिया का निषेध किया है। हे आत्मन्! कुछ करने का नाम ‘धर्म’ नहीं है; बल्कि कुछ न करने, मात्र अपने स्वभाव के अनुरूप जाननरूप-प्रवर्तन का नाम ही ‘धर्म’ है, और यही मोक्ष का उपाय है।

(सवैया इकतीसा)

मुकति के साधक कौं बाधक करम सब, आत्मा अनादि कौ करम-माँहि लुक्यौ है।
एते पर कहै जो कि ‘‘पाप बुरौ पुन्न भलौ’’, सोई महामूढ मोखमारग-सौं चुक्यौ है।।
सम्यक्-सुभाव लिये हिये मैं प्रगट्यौ ग्यान, ऊरध उमंगि चल्यौ काहूपै न रुक्यौ है।
आरसी-सौ उज्जल बनारसी कहत आपु, कारन-सरूप ह्वैकै कारजकौ ढुक्यौ है।। 13।।

शब्दार्थ :- मुकति के साधक कौं बाधक करम सब= मोक्ष के पथिक को सभी करम बाधक हैं, आत्मा अनादि कौ करम-माँहि लुक्यौ है= आत्मा अनादिकाल से कर्मों के बीच ही छिपा हुआ है, एते पर कहै जो कि ‘‘पाप बुरौ पुन्न भलौ’’= इतने पर भी जो ये कहे कि ‘‘पाप बुरा है पुण्य भला है’’, सोई महामूढ मोखमारग-सौं चुक्यौ है= वही महामूर्ख मोक्षमार्ग से च्युत है, सम्यक् सुभाव लिये हियेमैं प्रगट्यौ ग्यान= आत्मानुभूतिरूप सम्यग्दर्शन होने पर हृदय में सम्यग्ज्ञान प्रगट होता है, ऊरध उमंगि चल्यौ काहूपै न रुक्यौ है= उत्साहपूर्वक ऊपर की ओर बढ़ता है, किसी से भी नहीं रुकता है, आरसी-सौ उज्जल बनारसी कहत= (सम्यग्ज्ञान) दर्पण के समान उज्ज्वल होता है, बनारसीदास कहते हैं, आपु कारनसरूप ह्वैकै कारज कौं ढुक्यौ है= स्वयं कारणस्वरूप होकर कार्यरूप परिणमित होता है। विशेषार्थ :- शिष्य की शंका का और अधिक स्पष्टीकरण करते हुए कविवर कहते हैं कि मुक्ति के साधक अर्थात् मोक्षमार्ग के पथिक के लिये सभी कर्म बाधक ही हैं, फिर चाहे वे शुभ हों या अशुभ। संन्यस्तव्यमिदं समस्तमपि तत्कर्मेव मोक्षार्थिना, संन्यस्ते सति तत्र का किल कथा पुण्यस्य पापस्य वा। सम्यक्त्वादि-निजस्वभाव भवनान्मोक्षस्य हते र्भु वन्-नैष्कम्यर्-प्रतिबद्धमुद्धतरसं ज्ञानं स्वयं धावति।। 10।। यह जीव अनादिकाल से कर्मों के बीच ही छिपा हुआ है, अर्थात् अनादिकाल से यह जीव आठ-कर्मों के साथ ही हैं, परन्तु न तो जीव आज तक सुखी हुआ और न ही बंधन से मुक्त हुआ। यदि कर्म करते हुये जीव सुखी और मुक्त होता, तो आज संसार में कोई भी जीव दुःखी नहीं होता, सभी सुखी होते, पर ऐसा दिखाई नहीं देता। इतने पर भी यदि कोई ये कहे कि ‘‘पाप बुरा है और पुण्य भला है’’, तो उससे बड़ा मूर्ख इस दुनिया में कोई और नहीं; क्योंकि पुण्य हो या पाप, हैं तो दोनों कर्म ही न? जो जीव पुण्य/शुभभावों को भला मानकर पुण्य में ही संतुष्ट हो गया, वह जीव कभी सच्चे-सुख या मोक्षमार्ग पर चलने का पुरुषार्थ ही नहीं करेगा, क्योंकि ‘आवश्यकता ही तो आविष्कार की जननी होती है’, अर्थात् जिसको सच्चे-सुख की चाहत ही नहीं, वह सुखी होने का पुरुषार्थ क्यों करेगा? इसलिए कवि ने ऐसे जीव को ‘महामूर्ख’ की उपमा दी है, क्योंकि वह जीव मोक्षमार्ग से चूका हुआ है, यानि कोसों दूर है। जिस जीव को आत्मस्वरूप की सम्यक्-अनुभूति होती है, उसी के हृदय में सम्यग्ज्ञान प्रगट होता है। ऐसा जीव हृदय में उमंग धारणकर अर्थात् अति-उत्साह से मोक्ष के मार्ग की ओर निरन्तर अग्रसर होता है, फिर वह किसी के रोकने से नहीं रुकता। बनारसीदास जी कहते हैं कि सम्यग्ज्ञान दर्पण के समान निर्मल होता है, उसकी निर्मलता में स्वयं आत्मा कारण-स्वरूप होकर कार्य-रूप परिणमित होता है अर्थात् जीव स्वयं अपने स्वरूप में स्थिरतापूर्वक केवलज्ञान प्राप्त करते हुये सिद्धपद को प्राप्त करता है, कहने का अभिप्राय कि कारणपरमात्मा ही स्वयं कार्य-परमात्मा के रूप में विराजमान होता है।

(सवैया इकतीसा)

जौंलौं अष्टकर्म कौ विनास नांही सरवथा, तौलौं अंतरातमा धारा दोइ बरनी।
एक ग्यानधारा एक सुभासुभ-कर्मधारा, दुहूँ की प्रकृति न्यारी-न्यारी धरनी।।
इतनौ विसेस जु कर्मधारा बंधरूप, पराधीन-सकति विविध-बंध करनी।
ग्यानधारा मोखरूप मोख की करनहार, दोख की हरनहार भौ-समुद्र-तरनी।। 14।।

शब्दार्थ :- जौंलौं अष्टकर्म कौं विनास नांही सरवथा= जबतक आठों-कर्मों का पूरीतरह से क्षय नहीं होता, तौंलौं अंतरातमा धारा दोइ बरनी= तबतक अंतरात्मा में दोनों धारायें वर्तती है, एक ग्यानधारा= एक ज्ञानधारा, एक सुभासुभ-कर्मधारा= एक शुभ और अशुभ-कर्मधारा, दुहूँ की प्रकृति न्यारी-न्यारी धरनी= दोनों की प्रकृति भी अलग-अलग है, सत्ता भी अलग-अलग, इतनौ विसेस जु कर्मधारा बंधरूप= इतना विशेष है, जो कर्मधारा है, वह बंधनरूप है, पराधीन-सकति विविध-बंध करनी= आत्मशक्ति को पराधीन करनेवाली है, और अनेकप्रकार के कर्मबंध करनेवाली है, ग्यानधारा मोखरूप मोख की करनहार= ज्ञानधारा मोक्षस्वरूप है, और मोक्ष को प्रकट करनेवाली है, दोख की हरनहार भौ-समुद्र-तरनी= दोष/दुःख को हरनेवाली है, भव-समुद्र से पार करानेवाली है। विशेषार्थ :- उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने ‘‘क्षीर-नीरवत्’’ अर्थात् दूध का दूध और पानी का पानी जैसा सटीक-विवेचन किया है। शिष्य की जिज्ञासा थी कि ज्ञानियों को कर्मबंध होता है या नहीं, वास्तव में देखा जाये तो ज्ञानियों के जीवन में शुभ-भावों की प्रकटता देखकर ये सवाल हम संसारी-जीवों के यावत्पाकमुपैति कर्मविरतिर्ज्ञानस्य सम्यङ् न सा, कर्म-ज्ञान-समुच्चयोऽपि विहितस्तावÂन्न काचित्क्षतिः। किन्त्वत्रापि समुल्लसत्यवशतो यत्कर्मबन्धाय तन्, मोक्षाय स्थितमेकमेव परमं ज्ञानं विमुक्तं स्वतः।। 11।। पुण्य पाप एकत्व-द्वार मन में भी रहता है, और हमारे इस सवाल का सटीक-समाधान करते हुये कविवर कहते हैं कि ‘‘जबतक आत्मा के साथ एकक्षेत्रावगाह-स्थित ज्ञानावरणादि आठों-कर्म समूलरूप से या पूरीतरह से क्षय नहीं हो जाते, तबतक अंतरात्मा या सम्यग्दृष्टि-जीव के अंतरंग में दोनोंप्रकार की धारायें वर्तती है, एक ज्ञानधारा यानि आत्मानुभूति/आत्मस्वरूप में स्थिरता से स्वभावरूप-प्रवर्तन, और दूसरी कर्मधारा अर्थात् स्वरूप में अस्थिरता से शुभ-अशुभ-विभावरूप-प्रवर्तन।’’ लेकिन दोनों ही धाराओं की प्रकृति/स्वभाव, और सत्ता/स्थिति भिन्न-भिन्न होती है। इन दोनों की विशेषता यह है कि जो कर्मधारा है वह बंधरूप है, अर्थात् जितनी देर साधक जीव स्वरूप से बाहर शुभअशुभ भावों में प्रवर्तन करता है, उतनी देर उसको भी कर्म का बंध होता है, उतनी देर आत्मशक्ति पराधीन यानि कर्मों के आधीन होती है, और तत्समय के भावों की योग्यतानुसार अनेकप्रकार का बंध भी होता है। जबकि दूसरी ओर जो ज्ञानधारा है, वह स्वयं मोक्ष-स्वरूप है, और मोक्ष को ही प्रकट करनेवाली है, समस्त-दोषों को दूर करनेवाली है, और अथाह-अपार भवसमुद्र से पार करानेवाली है। कहने का अभिप्राय यही है कि ज्ञानियों को भी जितने अंश वीतरागता या स्वरूप में स्थिरता, उतनी निर्बंधता, और जितनी स्वरूप में अस्थिरता, उतना बंध भी होता है। इस प्रकरण में पाँचों-पाण्डवों का उदाहरण एकदम सटीक है। कैसे? पाँचों-पाण्डव स्वरूप की साधना में लीन थे, जब दुर्योधन के कहने पर उनको तप्त-लोहे के आभूषण पहनाये गये, तब युधिष्ठिर,भीम और अर्जुन तो ‘ज्ञानधारा’ में प्रवर्तित रहे, और फलस्वरूप तत्काल मुक्ति को प्राप्त हुये, जबकि नकुल और सहदेव शुभभावरूप-‘कर्मधारा’ में प्रवर्तित हुये और फलस्वरूप तेंतीस-सागर के लिये सर्वार्थसिद्धि रूप देवगति की सांसारिक-अवस्था मिली यानि कर्मधारा के एक परिणाम के फल ने मुक्ति को सागरों पर्यन्त दूर कर दिया। हे आत्मन्! कर्मधारा चाहे शुभ ही क्यों न हो, बंधन का ही कारण है, मुक्ति का नहीं, जबकि ज्ञानधारा यानि वीतरागता प्रतिसमय मोक्ष का कारण ही नहीं, मोक्षस्वरूप भी है।

(सवैया इकतीसा)

समुझैं न ग्यान, कहैं ‘‘करम कियेेसौं मोख’’, ऐसे जीव विकल मिथ्यात की गहलमैं।
ग्यान-पच्छ गहैं कहैं आतमा अबंध सदा, बरतैं सुछंद तेऊ बूढ़े हैं चहल में।।
जथा-जोग करम-करैं पै ममता न धरैं, रहैं सावधान ग्यान-ध्यान की टहलमैं।
तेई भवसागर के ऊपर ह्वै तरैं जीव, जिन्हिकौं निवास स्यादवाद-महल में।। 15।।

शब्दार्थ :- समुझैं न ग्यान कहैं ‘‘करम कियेसौं मोख’’= जो ज्ञान को तो समझते नहीं और कहते हैं कि कर्म करने से ही मोक्ष हो जायेगा, ऐसे जीव विकल मिथ्यात की गहल में= ऐसे जीव मिथ्यात्व के पागलपन में व्याकुल हैं, ग्यान-पच्छ गहैं= ज्ञान-पक्ष को ग्रहण करें, कहैं ‘‘आतमा अबंध सदा’’= कहते हैं कि ‘‘आत्मा हमेशा अबंध ही है’’ (ऐसा मानकर), बरतैं सुछंद तेऊ बूढ़े हैं चहलमैं= स्वच्छंद-प्रवर्तन करते हैं, वे भी संसार की कीचड़ में ही डूबे हैं, जथाजोग-करम करैं= यथायोग्य/भूमिकानुसार-कर्म/कार्य करते हैं, पै ममता न धरैं= परन्तु ममता नहीं रखते, रहैं सावधान= सावधान रहते हैं, ग्यान-ध्यान की टहलमैं= ज्ञान और थ्यान की सेवा में, तेई भवसागर के= वे ही संसार समुद्र से, ऊपर ह्वै तरैं जीव= ऊपर हैं और तिरने में समर्थ हैं, जिन्हिंकौं निवास स्यादवादमहलमैं= जिनका/उन्हीं का निवास/ठिकाना स्याद्वादरूपी महल में है। मग्ना: कर्मनयावलम्बनपरा ज्ञानं न जानन्ति ये, मग्ना ज्ञाननयैषिणोऽपि सततं स्वच्छन्दमन्दोद्यमाः। विश्वस्योपरि ते तरन्ति सततं ज्ञानं भवन्तः स्वयम्, ये कुर्वन्ति न कर्म जातु न वशं यान्ति प्रमादस्य च।। 12।। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ज्ञानी और अज्ञानी की विचारधारा का सटीक-विवेचन किया है। पहले संसारी-जीव की मन:स्थिति का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं ‘‘संसार में नानाप्रकार के जीव हैं, उन-जीवों की परिणति भी भिन्न-भिन्न है। बहुत से जीव ऐसे हैं जो मात्र कर्मकांड में ही उलझे हुये हैं, उनको ज्ञान-पक्ष अर्थात् स्वरूप का तो भान नहीं है, और जप-तप, पूजा-पाठ, दया-दानादिक यहाँ तक कि दिगम्बर-भेष धारण करके मंद-कषाय के परिणाम से ही मोक्ष की प्राप्ति मानते हैं’’। कवि कहते हैं कि’’ ऐसे जीव घोर-मिथ्यादृष्टि हैं, पागल के समान हैं’'। जैसे पागल-व्यक्ति को ‘‘मैं कौन हूँ?’’- इसकी तो खबर है नहीं, और लोग जैसा कहते हैं, वह वैसा ही करने लगता है, या देखादेखी कुछ भी करता है। इसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव की स्थिति भी पागल के समान ही है, उसे भी ‘‘मैं कौन हूँ’’? इसकी तो खबर नहीं है, जैसे संयोग मिलते हैं, वह जीव वैसा ही प्रवर्तन करने लगता है। दूसरी-धारा में वे जीव हैं, जो मात्र ज्ञान-पक्ष को ही पकड़कर बैठे हैं, जो आत्मा को सांख्यमत की तरह अबंध-स्वरूप ही मानते हैं, यानि वे जीव जो व्रत, तप, नियम, संयम तो दूर सामान्य-सदाचार का भी पालन नहीं करते; क्योंकि वे ये मानते हैं कि आत्मा को तो बंध कभी होता ही नहीं, ये तो जड़ की क्रिया है, अपनी योग्यतानुसार जड़ में हो रही है, मैं इसको करनेवाला नहीं हूँ, इसलिये कुछ भी करो कैसे भी करो, कोई बंध या फल नहीं मिलता। यहाँ तक कि आगम और अध्यात्म के अच्छे अभ्यासी भी हैं, परन्तु निश्चयाभासी, स्वच्छंदी होकर मनमाना-प्रवर्तन करते हैं, कविवर कहते हैं ऐसे जीव भी संसार की चहल यानि कीचड़ में ही डूबे हुए हैं। तीसरी-धारा में वे जीव हैं, जो यथायोग्य-भूमिकानुसार क्रिया करते हैं, अर्थात् यथायोग्य भूमिकानुसार स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ होने से बाहर में व्रतादिक की क्रिया जिनके सहज पलती है, पालनी नहीं पड़ती। यहाँ तक कि मुनिराज को यदि ये विकल्प भी आ जाये कि ''मैं महाव्रतों का पालन करता हू’ँ ', तो शरीर की यानि जड़ की क्रिया का स्वामी बनने से उनका गुणस्थान गिर जायेगा, इसलिए ज्ञानी-जीव ममता धारण नहीं करते अर्थात् कर्म की क्रिया से सहज भेदज्ञान करते हुये स्वयं को शुद्ध चैतन्य-स्वरूप अनुभव करते हैं। जो निरन्तर ज्ञान यानि भेदज्ञान, और ध्यान यानि स्वरूप में स्थिरता में सावधान रहते हैं, हे आत्मन्! वे ही जीव इस संसाररूपी समुद्र को पार करने में समर्थ हैं, और उन्हीं जीवों का निवास स्याद्वादरूपी महल में होता है, अर्थात् वे ही जीव मुक्तिरमा को वरण करके चैतन्य-महल में निवास करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जैंसैं मतवारौ कोऊ कहै और करै और, तैंसे मूढ़-प्रानी विपरीतता धरतु है।
असुभ-करम बंध-कारन बखानै मानै, मुकति के हेतु सुभ-रीति आचरतु है।।
अंतर-सुदृष्टि भई मूढ़ता बिसर गई, ग्यानकौ उदोत भ्रम-तिमिर हरतु है।
करनीसौं भिन्न रहै आतम-सुरूप गहै, अनुभौ अरंभि रस-कौतुक करतु है।। 16।।

शब्दार्थ :- जैंसैं मतवारौ कोऊ= जैसे कोई मतवाला-व्यक्ति, कहै और करै और= कहता कुछ और है, और करता कुछ और है, तैंसैं मूढ़-प्रानी= वैसे ही अज्ञानी-प्राणी, विपरीतता धरतु है= विपरीतता को धारण करता है, असुभ-करम= अशुभ-कर्मों को, बंध-कारन बखानै मानै= बंध का कारण कहता और मानता है, मुकति के हेतु सुभ-रीति आचरतु है= (लेकिन) मुक्ति को प्राप्त करने के लिए, सुभ-रीति आचरतु है= शुभाचरण

भेदोन्मादं भ्रमरस-भराÂन्नाटयत्पीतमोहं, मूलोन्मूलं सकलमपि तत्कर्म कृत्वा बलेन।
हेलोन्मीलत्परमकलया सार्द्धमारब्धकेलि, ज्ञानज्योतिः कवलिततमः प्रोज्जजृम्भे भरेण।। 13।।

पुण्य पाप एकत्व-द्वार को बुद्धिपूर्वक करता है, अंतर-सुदृष्टि भई= अंतरंग में दृष्टि सम्यक् होने से, मूढ़ता बिखर गई= मूर्खता बिखर गई/नष्ट हो गई है, ग्यानकौ उदोत भ्रम-तिमिर हरतु है= ज्ञान का प्रकाश भ्रमरूपी-अंधकार विनाश करता है, करनीसौं भिन्न रहै आतम-सरूप गहै= कर्तृत्वभाव से भिन्न रहता है, आत्मस्वरूप को ग्रहण करता है, अनुभौ अरंभि= अनुभव को आरंभकर, रस-कौतुक करतु है= आत्मरस में आनंद करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने अज्ञानी और ज्ञानी-पुरुषों की क्रिया का वर्णन किया है। कवि ने अज्ञानी-जीव की तुलना मतवाले/शराबी-व्यक्ति से की है। जैसे किसी मदिरा पीनेवाले व्यक्ति के मदिरा पीने के बाद उसकी कथनी और करनी में अंतर आता है, उसे कुछ होश नहीं रहता कि वह क्या कह रहा है, और क्या कर रहा है? ठीक उसीप्रकार अज्ञानी-मिथ्यादृष्टि जीव ने भी अनादिकाल से मोहरूपी मदिरा पी रखी है, जिससे इसे वस्तु-स्वरूप का यथार्थ श्रद्धान न होकर विपरीत श्रद्धान ही रहता है। ऐसा जीव अशुभ-भावों या पाप को तो बंध का कारण मानता है; पर शुभ-भावों को या पुण्य को मुक्ति का कारण मानकर उत्साह से बुद्धि-पूर्वक तदनुरूप-आचरण भी करता है। लेकिन जब होनहार अच्छी हो तब तत्त्वाभ्यास का सुयोग भी मिलता है। जब अज्ञानी-जीव को वस्तु का सही-स्वरूप समझ में आता है, तब अंतरंग में आत्मस्वरूप का सच्चा-श्रद्धान होने पर विपरीतदृष्टि भी सम्यक् हो जाती है। जैसे सूर्य का प्रकाश होने पर अंधकार को भगाने के लिये पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता, बल्कि वह स्वयं भाग जाता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञान का प्रकाश या दृष्टि सम्यक् होने पर सारी मूढ़ता या अज्ञानता स्वयं ही बिखर जाती है अर्थात् दूर हो जाती है, फिर मूढ़ता को भगाने का पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता है। फिर उस ज्ञान के ‘सम्यक्’-प्रकाश में जीव कर्तृत्व-बुद्धि से रहित अपने आत्मस्वरूप को ग्रहण करता है, और आत्मानुभूति करते हुये आत्मिक-आनंद का रसास्वादन करता है। निष्कर्षरूप में हम कह सकते हैं '‘पाप की अपेक्षा भले ही पुण्य को अच्छा कहा जाता हो, पर मोक्ष और मोक्षमार्ग की अपेक्षा पुण्य-पाप दोनों समान ही है। दोनों ही बंध के कारण हैं, दोनों ही मोक्षमार्ग में बाधक हैं। हे आत्मन्! पाप यदि कड़वा जहर है, तो पुण्य मीठा जहर। लेकिन जहर तो जिंदगी का घातक ही है, रक्षक तो नहीं। अग्नि चाहे शीशम की हो या चंदन की, दोनों का काम जलाना ही है।’'इसी बात को ‘आचार्य योगीन्द्रदेव’ इसप्रकार कहते हैं- ''जह लोहम्मियं णियडं, बुह तह सुण्णम्मियं जाणि। जे सुहु-असुह परिच्चयहिँ, ते वि हवंति हु णाणि।। -(योगसार जी, दोहा नं 72) अर्थात् हे पंडित! जैसे लोहे की साँकल को तू साँकल समझता है, उसीप्रकार सोने की साँकल को भी तू साँकल अर्थात् बंधन ही समझ। जो शुभ और अशुभ दोनों ही भावों का परित्याग करते हैं, निश्चय से वे ही ज्ञानी होते हैं। हे आत्मन्! तीर्थंकर-प्रकृति पुण्य-प्रकृतियों में सबसे उत्कृष्ट पुण्य-प्रकृति है, लेकिन ये भी मोक्षमार्ग में बाधक ही हैं, क्योंकि जबतक तीर्थंकर-प्रकृति का उदय चल रहा है, तबतक तीर्थंकर-परमात्मा भी मोक्ष नहीं जा सकते, उनके लिये वह पुण्य-प्रकृति भी एक बेड़ी के समान है। इसलिये निष्कर्ष यही है कि हम सभी जीव पाप-क्रियाओं से तो पुरुषार्थपूरक ्व विरक्त होवें, लेकिन पुण्य भी भव-भ्रमण का ही कारण है इसलिये हेय है, छोड़ने योग्य ही है,- ऐसा विवेक रखते हुये इन दोंनों से भिन्न आत्मानुभति ू के मार्ग पर अग्रसर हों यही ‘नाटक समयसार’ जी के इस अधिकार का अमृत-संदश े है।

आस्रव द्वार (५)

(पंचम-अधिकार)

(दोहा)

पाप-पुन्न की एकता, वरनी अगम-अनूप।
अब आस्रव-अधिकार कछु, कहौं अध्यातमरूप।। 1।।

शब्दार्थ :- पाप-पुन्न की एकता= पाप और पुण्य की समानता का, वरनी अगम-अनूप= गहन, उपमारहित वर्णन किया, अब आस्रव-अधिकार= अब आस्रव-अधिकार के, कछु कहौं अध्यातम-रूप= आध्यात्मिकरूप के बारे में कुछ कहता हूँ। विशेषार्थ :- पिछले-अधिकार में पाप-पुण्य की समानता का गहन और अनुपम-वर्णन करने के बाद कविवर बनारसीदास जी कहते हैं ‘‘अब आस्रव-अधिकार का कुछ आध्यात्मिकरूप से वर्णन करता हूँ।’’

(सवैया इकतीसा)

जेते जगवासी-जीव थावर-जंगमरूप, तेते निज-बस करि राखे बल-तोरिकैं।
महाअभिमानी ऐसौ आस्रव अगाध-जोधा, रोपि रन-थंभ ठाड़ौ भयौ मूछ-मोरिकैं।।
आयौ तिहि-थानक अचानक परम-धाम, ग्यान-नाम सुभट सवायौ-बल फोरिकैं।
आस्रव-पछारयौ रन-थंभ तोरि डारयौ ताहि, निरखि बनारसी नमत कर-जोरिकैं।। 2।।

शब्दार्थ :- जेते जगवासी-जीव थावर-जंगमरूप= जगत् के जितने भी स्थावर और दो-इन्द्रिय आदि त्रस- जीव हैं, तेते निज-बस करि राखै बल-तोरिकैं= उन सभी को बलहीन करके अपने वश में कर रखा है, महा-अभिमानी ऐसौ आस्रव अगाध-जोधा= महा-घमंडी ऐसा आस्रव नामक शूरवीर-योधा, रोपि रन-थंभ ठाड़ौ भयौ मूछ मोरिकैं= युद्ध का खंभा रोपकर मूछें मरोड़कर खड़ा हुआ है, आयौ तिहि-थानक अचानक परमधाम= अचानक उस स्थान पर आया परमशक्ति-सम्पन्न, ग्यान-नाम सुभट सवायौ-बल फोरिकैं= ज्ञान नाम का महान् योद्धा आस्रव से अधिक बलशाली होकर, आस्रव पछारयौ= आस्रव को पराजित कर, रन-थंभ तोरि डारयौ= युद्ध का खंभा तोड़ दिया है, ताहि निरखि बनारसी नमत कर-जोरिकैं= उसे देखकर बनारसी हाथ जोड़कर वंदन करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आस्रव की हार और सम्यग्ज्ञान की जीत का वर्णन बहुत सुंदरता से चित्रित किया है। युद्ध-स्थल पर संसार के मोह-जाल में फँसे समस्त त्रस और स्थावर-जीव तथा आस्रवरूपी-योद्धा मौजूद है, और इस अनंत-बलशाली आस्रवरूपी-योद्धा ने सभी जीवों को बलहीन करके अपने वश में कर रखा है। अभिमान से सराबोर इस आस्रवरूपी-योद्धा ने युद्ध-स्थल पर मूँछों पर ताव देकर रन-थंभ यानि युद्ध का झंडा गाढ़कर अपनी जीत का शंखनाद किया है। लेकिन तभी अचानक वहाँ आस्रवरूपी-योद्धा से सवाया यानि अधिक बलशाली ज्ञानरूपी सुभट-राजा प्रवेश करता है। उसने अास्रवरूपी-योद्धा को परास्त किया और रन-थंभ उखाड़कर फेंक

दिया। ऐसे ज्ञान यानि ‘सम्यग्ज्ञान’ को बनारसीदास हाथ जोड़कर सविनय-वंदन करता है।
अथ महामद-निर्भर-मन्थरं समर-रङ्ग-परागतमास्रवं।
अयमुदार-गभीर-महोदयो जयति दुर्जय-बोध-धनुर्धरः।। 1।।

कहने का अभिप्राय यही ‘‘है कि हे आत्मन्! आस्रव कितना भी बलशाली क्यों न हो, वर्तमान में भी यदि हमारा ज्ञानरूपी विवेक जागृत हो, तो हम आस्रव को तत्क्षण ही परास्त कर सकते हैं।’’ आस्रव यानि पूर्वबद्ध कर्मों का उदय में आकर जीव को विकारित करना। जिसकी उदयाधीन-व्यवस्था को पलटना हमारे वश में नहीं है, पर यदि इनके उदय के समय हमारा ज्ञान या भेदज्ञानरूपी विवेक जागृत है, अर्थात् ‘‘मैं इन भावों से भिन्न शुद्ध-चेतन-तत्त्व हूँ’’- एेसा चिंतन प्रतिक्षण चलता है, तो ये आस्रव वर्तमान में भी हमें पराजित नहीं कर सकेगा और भविष्य के लिये पुन: कर्मबंधन से भी हमें मुक्ति मिलेगी- भेदज्ञान ही महामंत्र है, मोह तिमिर-क्षयकारा।

(सवैया तेईसा)

दर्वित-आस्रव सो कहिए जहँ, पुग्गल-जीवप्रदेस-गरासै।
भावित-आस्रव सो कहिए जहं, राग-विरोध-विमोह विकासै।।
सम्यक्-पद्धति सो कहिए जहँ, दर्वित-भावित-आस्रव नासै।
ग्यान-कला प्रगटै तिहि थानक, अंतर-बाहिर और न भासै।। 3।।

शब्दार्थ :- दर्वित-आस्रव सो कहिए= द्रव्यास्रव उसे कहते हैं, जहँ पुग्गल जीवप्रदेस गरासै= जहाँ पुद््गल जीव के प्रदेश को घेर लेता है, भावित-आस्रव सो कहिए= भावास्रव उसे कहते हैं, जहँ राग-विरोध-विमोह विकासै= जहाँ राग, विरोध, विमोह का विकास हो, सम्यक्-पद्धति सो कहिए= सच्ची-प्रक्रिया वही कही जाती है, जहं दर्वित-भावित-आस्रव नासै= जहाँ द्रव्यास्रव, भावास्रव दोनों का विनाश होता है, ग्यानकला प्रगटै तिहि थानक= उसी जीव के ज्ञानकला प्रगट होती है, अंतर-बाहिर और न भासै= (जिसे) अंतरंग और बहिरंग में ज्ञान के अलावा कुछ और भासित नहीं होता है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘द्रव्यास्रव’ और ‘भावास्रव’ के स्वरूप का वर्णन किया है। आस्रव अर्थात् कर्मों का आना। कैसे? अपने ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव को भूलकर, मन-वचन-काय के निमित्त से जो पर में इष्ट-अनिष्ट बुद्धि होती है, उससे जो शुभ-अशुभ प्रवृत्ति होती है, वो ‘भाव-आस्रव’ है। अर्थात् मोह-राग-द्वेषादि भावों की उत्पत्ति ‘भावास्रव’ है, और उसके निमित्त से लोक में ठसाठस भरी हुई पुद््गल-वर्गणायें आकर्षित होकर जीव के प्रदेशों के साथ बंधतीं हैं, वह ‘द्रव्यास्रव’ है। जैसे घर का दरवाजा खोलने पर हवा के साथ धूल-मिट्टी के कण भी अंदर आते हैं; ठीक उसीप्रकार जब-जब उपयोग जाननहार-स्वभाव को छोड़कर पर-सन्मुख होता है, तब-तब मोह-राग-द्वेषादि भावों की उत्पत्ति होती है; यही ‘भावास्रव’ है। और इसके निमित्त से कर्म-परमाणुओं का जीव के सन्मुख आना ‘द्रव्यास्रव’ है। सम्यक्-पद्धति अर्थात् सच्ची-रीति तो यह है कि आत्मा में तो न द्रव्यास्रव होता है, न भावास्रव, अर्थात् दोनों का ही अस्तित्व आत्मा में नहीं है, आत्मा तो मात्र जाननहार-स्वभावी ही है। जिसको ये ज्ञान-कला प्रगट होती है, उसे अंतर-बाहर ज्ञान के अलावा कुछ और दिखाई नहीं देता, यानि वह मात्र जाननहार-रूप ही प्रवर्तन करता है।

(चौपाई)

जो दरवास्रव-रूप न होई, जहँ भावास्रव-भाव न होई।
जाकी दसा ग्यानमय लहिए, सो ग्यातार निरास्रव कहिए।। 4।।

भावो राग-द्वेष-मोहैर्विना यो स्याद् ज्ञाननिर्वृत्त एव। रुन्धन् सर्वान् द्रव्यकर्मास्रवौघान् एषोऽभावः सर्वभावास्रवाणाम् ।। 2।। शब्दार्थ :- जो दरवास्रव-रूप न होई= जो द्रव्यास्रव-रूप नहीं होता, जहं भावास्रव भाव न होई= जहाँ भावास्रवरूप भाव भी नहीं होते, जाकी दसा ग्यानमय लहिए= जिसकी स्थिति ज्ञानमय ही रहती है, सो ग्यातार निरास्रव कहिए= वह ज्ञानी आस्रव-रहित कहलाता है। विशेषार्थ :- ज्ञानी-जीव निरास्रवी कैसे रहते हैं? इसका वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि ज्ञानीजीव के द्रव्यास्रव और भावास्रव- दोनों ही नहीं होते; क्योंकि उनका उपयोग अपने ज्ञायक-स्वभाव पर रहता है। अर्थात् वे अपने को मात्र जाननहार ही अनुभव करते हैं। ज्ञानीजन विचार करते हैं कि ‘‘मैं इन कर्मों से पृथक् शुद्ध चेतन-तत्त्व हूँ, ज्ञाता-दृष्टा स्वभाववाला हूँ; ये शुभ-अशुभ परिणाम मेरे नहीं है; इनसे मेरा कुछ हित-अहित नहीं हो सकता’’- इसप्रकार विचार करने पर बाहर में कर्म का आस्रव भले ही हो; पर ज्ञानी-जीव दुःखी नहीं होते, इस अपेक्षा से ज्ञानी-जीवों को ‘निरास्रवी’ कहा गया है।

(सवैया इकतीसा)

जेते मनगोचर प्रगट-बुद्धि-पूरवक, तिह परिनामन की ममता हरतु है।
मनसौं अगोचर अबुद्धि-पूरवक-भाव, तिनके विनासिवे कौं उद्यम धरतु है।।
याही भाँति पर-परिनति कौ पतन करै, मोख को जतन करै भौ-जल तरतु है।
ऐसे ग्यानवंत ते निरास्रव कहावैं सदा, जिन्हिकौ सुजस सुविचच्छन करतु है।। 5।।

शब्दार्थ :- जेते मनगोचर प्रगट-बुद्धि-पूरवक= जितने मन के द्वारा बुद्धिपूर्वक जानने योग्य हैं, तिह परिनामन की ममता हरतु है= उन परिणामों की ममता को हरता है, मनसौं अगोचर अबुद्धि-पूरवक-भाव= मन के द्वारा नहीं जानने योग्य अबुद्धि-पूर्वक होने वाले भाव, तिनके विनासिवे कौं उद्यम धरतु है= उनके नष्ट करने का पुरुषार्थ करता है, याही भांति पर-परिनति कौ पतन करै= इसप्रकार पर की परिणति को नष्ट करते हैं, मोख को जतन करै भौ-जल तरतु है= मोक्ष का उपाय करते है, संसार सागर से तिरते हैं, ऐसे ग्यानवंत ते निरास्रव कहावै सदा= ऐसे ज्ञानीजन हमेशा निरास्रवी कहलाते हैं, जिन्हिकौ सुजस सुविचच्छन करतु हैं= उन्हीं का सुयश/ गुणगान समस्त विद्वज्जन करते हैं। विशेषार्थ :- ज्ञानीजन कर्मास्रव से कैसे बचते हैं?- इसका मार्मिक-वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं मनगोचर यानि जिनको इन्द्रियों और मन से जाना जा सके, प्रगट यानि जो इन्द्रिय-विषय प्रत्यक्ष द्रष्टव्य हैं, बुद्धिपूर्वक यानि जानबूझकर की जानेवाली सांसारिक-क्रियायें और परिणाम- इनसे ममत्व-बुद्धि या अपनेपन का त्याग करते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जिन इन्द्रिय-विषयों, दृश्यों, परिस्थतियों के निकट जाने पर अपने परिणाम मलिन हों, विकारित हों, उनसे सदैव अपने को दूर रखते हैं और जिन संयोगों की निकटता से परिणाम आकुलित हों, उनके प्रति ममत्व नहीं रखते। मन से जैसे भूतकाल में भोगे गये भोगों को स्मरण करके वर्तमान में विकार उत्पन्न होना, या भविष्य में क्या होगा ऐसा सोचकर वर्तमान में आकुलित होना- ऐसे परिणाम उत्पन्न ही न हों, इसका पुरुषार्थ करना अर्थात् अपने उपयोग को अधिक से अधिक स्वाध्याय और आत्मचिंतन में व्यस्त रखना,

जिससे उपयोग पर-सन्मुख ही न हो।
भावास्रवाभावमयं प्रपन्नो द्रव्यास्रवेभ्यः स्वत एवं भिन्नÂः।
ज्ञानी सदा ज्ञानमयैकभावो निरास्रवो ज्ञायक एक एव।। 3।।

सन्नस्यन्निजबुद्धिपूर्वमनिशं रागं समग्रं स्वयम्, वारंवारमबुद्धिपूर्वमनिशं तं जेतुं स्वशक्तिं स्पृशन्। उच्छिन्दन् परवृत्तिमेव सकलां ज्ञानस्य पूर्णो भव-न्नात्मा नित्य-निरास्रवो भवति हि ज्ञानी यदा स्यात्तदा ।। 4।। इसप्रकार ज्ञानीजन पर-परिणति अर्थात् पर के लक्ष्य से होने वाले परिणाम या कहें उपयोग परसन्मुख होने पर जो मोह-राग-द्वेषादि विकार उत्पन्न होते हैं, उसके पतन का या विनाश का उपाय करते हैं। और भौ-जल अर्थात् संसाररूपी-समुद्र को पार करने अर्थात् मोक्षमार्ग पर चलने का सम्यक्-पुरुषार्थ करते हैं, और अपने स्वरूप में अधिकाधिक-स्थिरता का प्रयास करते हैं, जिससे शीघ्रतिशीघ्र इस जन्ममरण की व्याधि से छुटकारा मिले। ऐसे ज्ञानीजीव कर्मास्रव का सद्भाव होते हुये भी निरास्रवी या आस्रव-रहित कहे जाते हैं, क्योंकि कर्म का आस्रव उनके परिणामें को मलिन और आकुलित नहीं करता। ऐसे ज्ञानियों का सुजस या गुणगान विद्वतजन् हर्ष और बहुमानपूर्वक करते हैं। वास्तव में देखा जाये, तो जो कर्मास्रव से बचने की प्रक्रिया ज्ञानियों के लिए वर्णित की है, यदि हम संसारी मिथ्यादृष्टि-जीव भी इन विषय-कषाय के प्रसंगों से, पापवर्धक-क्रियाओं से, उन परिस्थितियों से जिनसे मेरे परिणाम मलिन, विकृत हों, पुन: तीव्र कर्म-बंधन में निमित्त हो; उनसे स्वयं को बचाने का पुरुषार्थ करें, तब निश्चित ही हम वर्तमान में कर्मों के तीव्र आस्रव से होनेवाली आकुलता से और पुन: होनेवाले कर्म-बंधन से कुछ सीमा तक बच सकते हैं। इसीप्रकार यदि देह और देहादिक-संयोगों से निरन्तर तत्त्वाभ्यास-पूर्वक भेदज्ञान चले, तो कर्मास्रव-जनित आकुलता में साम्यभाव रखने के पुरुषार्थ को भी संबल प्राप्त होता है।

(सवैया तेईसा)

ज्यों जग में विचरै मतिमंद, सुछंद सदा वरतै बुध तैसो।
चंचल-चित्त असंजित-वैन, सरीर-सनेह जथावत् जैसो।।
भोग-संजोग परिग्रह-संग्रह, मोह-विलास करै जहँ ऐसो।
पूछत सिष्य आचारजसौं यह, सम्यकवंत निरास्रव कैसो।। 6।।

शब्दार्थ :- ज्यों जग में विचरेै मतिमंद= जिसप्रकार बुद्धिहीन/ मिथ्यादृष्टि-जीव जगत् में विचरण करता है, सुछंद सदा वरतै बुध तैसो= उसीप्रकार ज्ञानी सम्यग्दृष्टि-जीव भी जगत् में स्वच्छंद/स्वाधीन होकर विचरण करता है, चंचल-चित्त असंजित-वैन= चित्त की चंचलता, असंयत-वचन, सरीर-सनेह जथावत् जैसो= शरीर से स्नेह सब एक जैसा, भोग-संजोग परिग्रह-संग्रह= भोग और संयोग, परिग्रह-संग्रह की वृत्ति, मोह-विलास करै जहँ ऐसौ= मोह का विकास, सब एक जैसा ही करता है, पूछत सिष्य आचारजसौं= शिष्य आचार्य/गुरुजी से पूछता है, यह सम्यकवंत निरास्रव कैसो= (फिर) यह सम्यग्दृष्टि-जीव निरास्रव कैसे? विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने ‘सम्यग्दृष्टि जीव को निरास्रवी कहा’- यह बात शिष्य के गले नहीं उतरी, तब शिष्य ने गुरु के समक्ष जो भावना व्यक्त की, उसका वर्णन कवि ने इस छंद में किया है। शिष्य कहता है कि ‘‘गुरुजी! मिथ्यादृष्टि-जीव और सम्यग्दृष्टि-जीव में बाहर में तो सब कुछ तो समान है, जैसे एक मिथ्यादृष्टि-जीव जगत् में विचरण करता है, यानि अपनी स्वेच्छा से खाता-पीता, पहनता-ओढ़ता है, सम्यग्दृष्टि-जीव भी उसीप्रकार जगत् में विचरण करता है। जैसी चित्त की चंचलता, बोलचाल, शरीर के प्रति स्नेह या शरीर को सजाने-संवारने की प्रवृत्ति, कहने का अभिप्राय कि मनवचन-काय की जैसी प्रवृत्ति जगत् में मिथ्यादृष्टि-जीव की दिखाई देती है, लगभग वैसी ही प्रवृत्ति सम्यग्दृष्टि-जीव की भी रहती है। सर्वस्यामेव जीवन्त्यां द्रव्य-प्रत्यय-संततौ। कुतो निरास्रवो ज्ञानी नित्यमेवेति चेन्मतिः ।। 5।। एक मिथ्यादृष्टि-जीव जैसे इन्द्रिय-विषयों को भोगते हुये दिखाई देता है, ठीक उसीप्रकार सम्यदृष्टि-जीव भी भोगों में प्रवृत्त दिखाई देता है। माता-पिता, स्त्री, पुत्र, मित्रादिक के जैसे संयोग मिथ्यादृष्टि-जीव के दिखाई देते हैं, वैसे ही संयोग सम्यदृष्टि-जीव के भी दिखाई देते हैं। सोना-चाँदी, धन-धान्य, नौकर-चाकर आदि परिग्रह जोड़ने की प्रवृत्ति जैसी मिथ्यादृष्टि-जीव में देखी जाती है, वैसी ही संग्रह-वृत्ति सम्यग्दृष्टि-जीव में भी देखी जाती है। मोह का विकास यानि अपने से जुड़े संयोगों से जैसी मोह-बुद्धि मिथ्यादृष्टि-जीव में दिखती है, वैसी ही सम्यग्दृष्टि-जीव में भी दिखती है। अर्थात् अपने परिवार का भरण-पोषण, व्यापार-धंधा जैसा एक मिथ्यादृष्टि-जीव करता है, वैसा ही एक सम्यग्दृष्टिजीव भी करता है। जब सब कुछ समान है, तो फिर मिथ्यादृष्टि-जीव ‘आस्रव-सहित’ और सम्यग्दृष्टिजीव ‘निरास्रवी’ या ‘आस्रव-रहित’ ऐसा कैसे कहा गया है?’’

(सवैया इकतीसा)

पूरब-अवस्था जे करम-बंध कीने अब, तेई उदै आइ नाना-भाँति रस देत हैं।
केई सुभ-साता केई असुभ-असातारूप, दुहूँसौं न राग न विरोध सम-चेत है।।
जथाजोग-क्रिया करैं, फल की न इच्छा धरैं, जीवन-मुकति कौ विरद गहि लेत है।
यातैं ग्यानवंतकौं न अास्रव कहत कोऊ, मुद्धतासौं न्यारे भए, सुद्धता-समेत हैं।। 7।।

शब्दार्थ :- पूरब-अवस्था जे करम-बंध कीने= पूर्व-पर्याय में जो कर्मबंध किये थे, अब तेई उदै आइ नाना- भाँति रस देत है= अब वही कर्म उदय में आकर विभिन्नप्रकार से फल देते हैं, केई सुभ-साता केई असुभअसातारूप= कोई शुभकर्म सातारूप कोई अशुभकर्म असातारूप, दुहूँसौं न राग न विरोध समचेत है= दोनों से ही न राग न द्वेष, समताभाव रखते हैं, जथाजोग-क्रिया करैं फल की न इच्छा धरैं= यथायोग्य-कार्य करते हैं फल की इच्छा नहीं रखते, जीवन-मुकति कौ विरद गहि लेत है= जीवन-मुक्त का पद प्राप्त करते हैं, यातैं ग्यानवंतकौं न अास्रव कहत कोऊ= इसीलिये ज्ञानी-जीव को कोई अास्रवी नहीं कहता, मुद्धतासौं न्यारे भए सुद्धता समेत हैं= मिथ्यात्व से भिन्न होकर शुद्धता से सहित हुये हैं। विशेषार्थ :- अनादिकाल से जीव ज्ञानावरणादि-आठ कर्मों के साथ है, निजस्वरूप से अनभिज्ञ होने के कारण प्रतिसमय पर-सन्मुख ही रहा, और पर में अपनत्व होने से निरन्तर पर में इष्ट-अनिष्ट बुद्धि भी कायम रही। फलस्वरूप मोह-राग-द्वेषादि भावों की उत्पति होती रही, जिसके फलस्वरूप ज्ञानावरणादि-आठ कर्मरूप कार्माण-वर्गणायें आकर जीव के साथ सम्बद्ध होती रही, फिर ये द्रव्यकर्म उदय में आये, और फिर इष्ट-अनिष्ट बुद्धि, फिर रागादि-भावकर्म और फिर पुन:द्रव्यकर्म। कर्म-बंधन की यह परम्परा अनादिकाल ऐसे ही चलती चली आ रही है। इस छंद में इसी क्रम का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि पूर्व-अवस्था में या भवों में जीव ने जो कर्म बाँधे थे, वे ही अब उदय में आकर विभिन्नप्रकार से फल देते हैं। ज्ञानावरणादि आठ-कर्मों की 148 प्रकृतियों में से कुछ शुभरूप होती है, सो उनके उदय में कषाय की मंदता वर्तती है, सातारूप फल मिलता है, और जीव को निरोगी-काया और बाहरी-जीवन में उस संबंधी अनुकूलतायें प्राप्त होती है। कुछ प्रकृतियाँ अशुभरूप होती हैं, सो उनके उदय में कषाय की तीव्रता वर्तती है, अतः असातारूप संयोगों

(रोगी-शरीर और बाहरी-जीवन में भी प्रतिकूलताओं) की प्राप्ति होती है।
विजहति न हि सत्तां प्रत्ययाः पूर्वबद्धाः, समयमनुसरन्तो यद्यपि द्रव्यरूपाः।
तदपि सकल-राग-द्वेष-मोह-व्युदासा-दवतरति न जातु ज्ञानिनः कर्मबन्धः।। 6।।

यहाँ तक की सारी व्यवस्था तो जीव को कर्म के उदयानुसार प्राप्त होती है, चाहे वह मिथ्यादृष्टि-जीव हो या सम्यग्दृष्टि-जीव हो, इसमें फेरबदल करने की सामर्थ्य किसी में भी नहीं है। दोनों में अन्तर अब शुरू होता है, जहाँ मिथ्यादृष्टि-जीव कर्म के उदय में प्राप्त इन संयोगों में इष्ट-अनिष्ट कल्पना, और राग-द्वेष के भाव करके वर्तमान में भी आकुलित या दु:खी होता है और भविष्य के लिये भी नवीन-कर्म का बंध करता है। वहीं सम्यग्दृष्टि-जीव कर्म के उदय में प्राप्त इन संयोगों में न तो इष्ट-अनिष्ट कल्पना करता है, न ही राग-द्षवे के भाव करके आकुलित होता है, बल्कि वह तो दोनों ही परिस्थितियों को कर्मोदय-जन्य और स्वयं से पूर्णत: भिन्न मानकर समता-भाव रखता है, इसलिये वर्तमान में भी सुख की अनुभति ू करता है। यद्यपि बाहरी-आचरण और क्रिया में दोनों में समानता दिखाई देती है, फिर भी दोनों के श्रद्धान में भिन्नता वर्तती है। जहाँ मिथ्यादृष्टि-जीव हर कार्य के बदले फल की इच्छा रखता है, वहीं सम्यग्दृष्टिजीव निर्वांछक या वांक्षारहित होता है। संसार, शरीर,भोगों के प्रति निर्ममत्व-बुद्धि रखने से वर्तमानपर्याय में भी जीवन-मुक्त अर्थात् अर्हन्त-भगवान् जैसा यश प्राप्त करता है। इसीलिए ज्ञानी-जीव या सम्यग्दृष्टि-जीव को कर्म-आस्रव का सद्भाव होते हुये भी ‘निरास्रवी’ कहा जाता है, क्योंकि वह मुद्धता से न्यारा अर्थात् मिथ्यात्व का अभाव होने से सम्यक्त्व से सहित होता है। निष्कर्षरूप में हम कह सकते हैं कि आत्मा के अनंत-गुणों में से तीन प्रमुख-गुण- श्रद्धा, ज्ञान और चारित्र हैं, जिनका सहज-परिणमन प्रतिसमय चल रहा है। जब श्रद्धागुण का परिणमन पर के लक्ष्यपूर्वक चलता है, तो मिथ्यात्व नाम पाता है, और जब उसी श्रद्धागुण का परिणमन स्व के लक्ष्य से चलता है, तो ‘सम्यक्त्व’ नाम पाता है। हाँ, ये सही है कि श्रद्धान सम्यक् होते ही ज्ञानगुण का परिणमन भी तत्क्षण ही सम्यक् हो जाता है। परन्तु चारित्रगुण के पूर्णरूप से सम्यक्-परिणमन में समय लगता है; जैसे-जैसे स्वरूप में स्थिरता बढ़ती है, चारित्रगुण में भी विशुद्धता बढ़ती जाती है। इसीलिए मिथ्यादृष्टि-जीव और सम्यग्दृष्टि-जीव के श्रद्धान में भिन्नता वर्तने पर भी बाह्य-प्रवृति समान दिखाई देती है। जैसे रामचंद्र जी तद्भव-मोक्षगामी थे, फिर भी बाहर में सामान्य संसारी-जीव की तरह राज-पाठ, शादी-ब्याह, वनवास, युद्ध आदि कार्य करते हुये दिखाई दे रहे थे। लेकिन ये सब कार्य करते समय अंतरंग में श्रद्धागुण का सम्यक् परिणमन भी चल रहा था, जिससे प्रतिसमय संसार की हरक्रिया से भेदज्ञान भी वर्त रहा था और निरास्रवीपना भी।

(दोहा)

जो हित-भाव सो राग है, अनहित-भाव विरोध।
भ्रामिक-भाव विमोह है, निरमल-भाव सुबोध।। 8।।

शब्दार्थ :- जो हितभाव सो राग है= जो हित/भलाई का परिणाम है, वह राग है, अनहित-भाव विरोध= (और जो) बैर/अहित का भाव वह द्वेष, भ्रामिक-भाव विमोह है= भ्रम का परिणाम मोह है, निरमल-भाव सुबोध= शुद्ध-भाव सच्चा-ज्ञान है। विशेषार्थ :- राग, द्वेष,मोह का पारिभाषिक-स्वरूप बताते हुए कविवर कहते हैं कि जब किसी भी वस्तु या व्यक्ति को देखकर मन में इष्टबुद्धि उत्पन्न हो, अर्थात् वह वस्तु मुझे अच्छी लगे, उस व्यक्ति के प्रति दया या उसकी भलाई का परिणाम उत्पन्न हो, वह ‘राग’ है। जब किसी वस्तु या व्यक्ति को देखकर उसके प्रति अनिष्टबुद्धि हो अर्थात् वह मुझे अच्छी न लगे, उस व्यक्ति के प्रति मेरे मन में बैर, विरोध या उसका अहित करने का भाव आये, वह ‘द्वेष’ है। और जब किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अहंबुद्धि का भाव हो, अर्थात् ये वस्तु मेरी है, मैं इसका स्वामी हूँ, यहाँ तक कि उस व्यक्ति या वस्तु के खोने पर मुझे दु:ख या आकुलता हो, वह ‘मोह’ का परिणाम है। यद्यपि राग और मोह दोनों एक जैसे प्रतीत होते हैं, परन्तु दोनों के स्वरूप में बहुत-अंतर है। जैसे पड़ोसी के बच्चे के प्रति जो लगाव है, वह राग है, और अपने बच्चे के प्रति जो लगाव है, वह मोह है। कैसे? जैसे पड़ोसी के बच्चे को कुछ हो जाये, तो हमें अच्छा तो नहीं लगता है; पर फिर भी दु:ख या आकुलता नहीं होती है। और वहीं अपने बच्चे को कुछ हो जाये, तो आकुलता ही आकुलता, एक मिनिट भी चैन नहीं आती- ये मोह का परिणाम है।

(दोहा)

राग-विरोध-विमोह मल, एई आस्रवमूल।
एई करम बढ़ाइकैं, करैं धरम की भूल।। 9।।

शब्दार्थ :- राग-विरोध-विमोह मल= राग, द्वेष, मोहरूपी मल, एई आस्रवमूल= ये ही आस्रव के मूल हैं, एई करम बढ़ाइकैं= ये ही कर्म बढ़ाकर, करैं धरम की भूल= धर्म को भुलानेवाले हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में आस्रव का मूलकारण बताते हुये कविवर कहते हैं कि राग, द्वेष, मोह ये तीनों ही मल/विकार आस्रव के मूलकारण हैं। यहाँ कवि ने मोह, राग, द्वेष तीनों को मल कहा। क्या ये सच में मल के समान लगते हैं?? विचार कीजिये कि द्वेष को तो हम एकबार बुरा/मल कहते भी हैं, पर राग? राग तो हमें कहीं से भी मल नजर नहीं आता। इसे तो हम बहुत अच्छा मानते हैं, जबकि देखा जाये, तो राग-परिणाम द्वेष से कहीं ज्यादा खतरनाक है। इतिहास देखें, तो रामायण, महाभारत आदि के जितने भी युद्ध हुय,े वहाँ कहीं न कहीं मूल में राग ही विद्यमान था, फिर चाहे वह सीता के प्रति हो या द्रौपदी के प्रति। आज हम जितना भी अभक्ष्य-भक्षण, अन्याय, अनीति, पापाचार आदि करते हैं, स्वाद की लोलुपता, और पैसे के प्रति रागवश ही करते हैं, द्षवे वश नहीं। और मोह तो हमारे लिये दूर-दूर तक मल की परिधि में भी नहीं आता, उसे तो हमारा अंतर्मन ‘मल’ मानने को तैयार ही नहीं है। धर्म को भुलाने वाले और कर्म की वंश-परम्परा को बढानेवाले सभी मूलकारण तो हमें अच्छे लगते हैं। फिर जब ये वंश-परम्परा अपना फल देती है, तो हम दु:खी क्यों होते हैं? जब ये बीज हमने खुद ही बोये हैं, तो फल खाने में हमें ऐतराज क्यों होता है?

(दोहा)

जहाँ न रागादिक-दसा, सो सम्यक्-परिनाम।
यातैं सम्यकवंत कौ, कह्यो निरास्रव नाम।। 10।।

शब्दार्थ :- जहाँ न रागादिक-दसा= जहाँ रागादि-भाव नहीं है, सो सम्यक् परिनाम= वहीं परिणाम सम्यक् है, यातैं सम्यकवंत कौ= इसीलिए सम्यग्दृष्टि-जीव को, कह्यो निरास्रव नाम= निरास्रवी कहा गया है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने सम्यक्-परिणामों की महिमा का वर्णन किया है। जहाँ मोह-राग-द्वेष भावों की गंदगी नहीं होती, वही परिणाम सम्यक् या निर्मल है। अभिप्राय यह है कि जब जीव मात्र अपने जानन-स्वभावरूप परिणमन करता है, तब वह आत्मा का मल-रहित, निर्मल-परिणाम है। और जिन जीवों के निरन्तर ऐसा स्वाभाविक परिणमन चल रहा है, वही जीव सम्यग्दृष्टि है, और निरास्रवी है। भले ही उस जीव को कर्म का आस्रव चल रहा हो, परन्तु वह कर्मास्रव उसके ज्ञान-स्वभाव पर हावी नहीं होता,

राग-द्वेष-विमोहनां ज्ञानिनो यदसंभवः। तत एव न बन्धोऽस्य ते हि बन्धस्य कारणम् ।। 7।।

इसलिए वह जीव आस्रव का सद्भाव होते हुये भी ‘निरास्रवी’ नाम पाता है।

(सवैया इकतीसा)

जे केई निकट-भव्यरासी जगवासी-जीव, मिथ्यामति-भेदि ग्यान-भाव-परिनए हैं।
जिन्हिकी सुदृष्टि में न राग-द्वेष-मोह कहूं, विमल-विलोकनि में तीनों जीति लए हैं।।
तजि-परमाद घट-सोधि जे निरोधि-जोग, सुद्ध-उपयोग की दसा में मिलि गए हैं।
तेई बंधपद्धति-विदारि परसंग-डारि, आपमें मगन ह्वै कै आपरूप भए हैं।। 11।।

शब्दार्थ :- जे केई निकट-भव्यरासी जगवासी-जीव= जो कोई आसन्न-भव्य संसारी-जीव हैं, मिथ्यामत- भेदि ग्यानभाव-परिनए हैं= मिथ्यात्व को भेदकर/छोड़कर, ज्ञानभावरूप परिणमित हुये हैं, जिन्हिकी सुदृष्टि में राग-द्वेष-मोह कहू=ं जिनकी सम्यक्-दृष्टि में कहीं भी राग, द्वेष, मोह नहीं है, विमल-विलोकनि में तीनों जीति लए हैं= निर्मल-दृष्टि में उक्त तीनों को जीत लिया है, तजि-परमाद घट-सोधि जे निरोधि-जोग= प्रमाद को छोड़कर, चित्त को निर्मलकर जो योगनिरोध कर, सुद्ध-उपयोग की दसा में मिलि गए है= शुद्ध-उपयोग की दशारूप परिणमित हो गये हैं, तेई बंधपद्धति विदारि परसंग डारि= वे ही बंध की पद्धति को नष्ट करके, पर-संबंध को छोड़कर, आपमें मगन ह्वैकै आपरूप भए हैं= अपने में मगन होकर आत्मरूप हुए हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने उन आसन्न-भव्यजीवों की परिणति का वर्णन किया है, जो अपने स्वरूप को पहचानकर मोक्षमार्ग पर अग्रसर हैं। इस संसार में अनंत-जीवराशि है, उसमें से छह-महीने आठ-समय में 608 जीव ही मोक्ष जाते हैं। जिन जीवों में मोक्ष जाने की पात्रता है, उनको ‘भव्यजीव’ कहते हैं, लेकिन उनमें से भी जो अल्पकाल में ही मोक्ष जानेवाले हैं, उन्हें ‘आसन्न-भव्य’ कहते हैं। उन्हीं आसन्न-भव्यजीवों का वर्णन कवि ने इन पंक्तियों में किया है। ऐसे जीव जो भले ही संसार में हों, पर जिन्होंने अनादि से चले आ रहे मिथ्यात्वरूपी गहन-अंधकार को नष्ट कर दिया है, जो अब मात्र अपने ज्ञान-स्वभाव रूप ही परिणमन करते हैं, जिनकी निर्मल-दृष्टि में मोह, राग, द्वेष का अस्तित्व भी नहीं है, वे जीव आसन्न-भव्य अर्थात् शीघ्र ही मोक्ष जानेवाले हैं, क्योंकि उन जीवों ने आत्मस्वरूप के सम्यक्श्रद्धान से तीनों विकारों को जीत लिया है। ऐसे आसन्न-भव्य-जीव प्रमाद को छोड़कर यानि सर्व सांसारिक-क्रियाओं में अरुचिपूरक ्व , विकारों का अभाव होने से निर्मल-चित्त से, योग-निरोधकर, अपने उपयोग को अपने स्वरूप में स्थिर करते हैं। इसके फलस्वरूप अनादि से चली आ रही कर्म-बंधन की इस प्रक्रिया को तोड़कर, पर-संबध ं या पर के लक्ष्य को भी छोड़कर, एकमात्र अपने स्वरूप में मगन होकर अपने पूर्ण-लक्ष्य या सिद्ध-पद को प्राप्त करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जेते जीव पंडित-खयोपशमी-उपसमी, तिन्हकी अवस्था ज्यों लुहार की संडासी है।
खिन आग-मांहि खिन पानी-मांहि तैंसे एऊ, खिन में मिथ्यात खिन ग्यानकला भासी है।।
जौंलौं ग्यान रहै तौलौं सिथिल चरन-मोह, जैंसे कीले-नाग की सकति-गति नासी है।
आवत मिथ्यात तब नाना-रूप बंध करै, ज्यों उकीले-नाग की सकति परगासी है।। 12।।

अध्यास्य शुद्धनयमुद्धत-बोधचिह्न-मैकाग्रमेव कलयन्ति सदैव ये ते।
रागादि-मुक्तमनसः सततं भवन्तः, पश्यन्ति बन्धविधुरं समयस्य सारम्।। 8।।

प्रच्युत्य शुद्धनयतः पुनरेव ये तु, रागादि-योगमुपयान्ति विमुक्तबोधाः।
ते कर्मबन्धमिह विभ्रति पूर्वबद्ध-द्रव्यास्रवैः कृत-विचित्र-विकल्प-जालम् ।। 9।।

शब्दार्थ :- जेते-जीव पंडित खयोपशमी-उपसमी= जितने जीव पंडित/सम्यग्दृष्टि, क्षयोपशमी, उपशमी, तिन्हकी अवस्था ज्यौं लुहार की संडासी है= (उनके परिणामों की) स्थिति लुहार की संडासी के समान (अस्थिर) है, खिन आग-मांहि खिन पानी-मांहि= क्षण में अग्नि में, क्षण में पानी में, तैंसे एऊ खिन में मिथ्यात= वैसे ही ये भी क्षण में मिथ्यात्व, खिन ग्यानकला भासी है= क्षण में ज्ञानभाव भासित होता है, जौंलौं ग्यान रहै तौलौं सिथिल चरन-मोह= जब तक ज्ञान रहता है, तबतक चारित्रमोह शिथिल रहता है, जैंसे कीले नाग की सकतिगति नासी है= जैसे नाग को कीलित करने पर उसकी गमनशक्ति नष्ट हो जाती है, आवत मिथ्यात, तब नानारूप बंध करै= जब मिथ्यात्व का उदय होता है, तब विभिन्नप्रकार का बंध करता है, ज्यों उकीले-नाग की सकति परगासी है= जैसे नाग के उत्कीलित/मंत्रबद्धता दूर करने पर उसकी गमनशक्ति प्रगट हो जाती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उपशम और क्षयोपशम-सम्यग्दृष्टि-जीवों के परिणामों की अस्थिरता का एक सरल-उदाहरण के माध्यम से सुदं र-वर्णन किया है। जैसे लुहार जब लोहे से कुछ भी सामान बनाता है, तो लोहे को अपने अनुसार ढालने के लिये उसे ठंडा और गर्म दोनोंप्रकार का ताव देता है, इसलिये उस लोहे को पकड़ने के लिये उपयोग में आनेवाली लुहार की संडासी क्षण में पानी में और क्षण में अग्नि में रहती है। ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीवों में जो उपशम-सम्यग्दृष्टि और क्षयोपशम-सम्यग्दृष्टि-जीव हैं, उनके परिणाम भी इसीतरह क्षण-क्षण में बदलते रहते हैं, कभी मिथ्यात्व के, तो कभी सम्यक्त्व के। उपशम-सम्यक्त्व का उत्कृष्टकाल एवं जघन्यकाल अंतर्मुहुर्त है, और क्षयोपशम-सम्यक्त्व का उत्कृष्टकाल 66 सागर तक, और जघन्यकाल अंतर्मुहुर्त है। उपशम-सम्यक्त्व में दर्शन-मोहनीय की सातों प्रकृतियाँ (अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ और मिथ्यात्व, सम्यङ्मिथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति) का उपशम यानि शांत रहती है, सो उतने समय तक जीव के परिणाम निर्मल रहते हैं, लेकिन काल पूरा होते ही फिर मलिन हो जाते हैं। परन्तु क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि-जीव के सात में से छह प्रकृतियों का तो उदयाभावी-क्षय हो जाता है, परन्तु एक सम्यक्प्रकृति उदय में रहती है, जिस कारण से चल, मल, अगाढ़-दोष लगने से परिणामों में पूर्ण-निर्मलता नहीं रहती। आगे चारित्र-मोहनीय के उदय और अनुदय में होनेवाले जीव के परिणामों की स्थिति का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि जैसे जहरीला और फुफकारनेवाला नाग भी जब सपेरे के द्वारा मंत्रकीलित कर दिया जाता है, तो कुछ समय के लिये उसकी सारी शक्ति क्षीण हो जाती है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव का उपयोग जितनी देर निज-स्वरूप में ठहरता है, उतनी देर मोहनीयकर्म की दशा कीलित-नाग की तरह शिथिल हो जाती है, अर्थात् उस समय सत्ता में मौजूद होने के बावजूद भी मोहनीयकर्म का बंध नहीं होता। लेकिन जैसे ही सम्यग्दृष्टि-जीव का उपयोग स्वरूप से च्युत होता है, चारित्र-मोहनीय वापस अपना पूरा रंग दिखाती है, ठीक वैसे ही जैसे कीलित-नाग को जब सपेरा उकीलित करता है, तो फिर वही नाग अपनी पूरी-शक्ति के साथ सक्रिय हो जाता है। कविवर-रचित उपर्युक्त-पंक्तियों में हमने देखा कि स्वरूप में स्थिरता होने पर ये प्रबल-प्रकृति भी शिथिल हो जाती है।

(दोहा)

यह निचोर या ग्रंथ कौ, यहै परमरस-पोख।
तजै सुद्ध-नय बंध है, गहै सुद्ध-नय मोख।। 13।।

इदमेवात्र तात्पर्यं हेयः शुद्धनयो न हि। नास्ति बन्धस्तदत्यागात्तत्त्यागाद््बन्ध एव हि।। 10।। शब्दार्थ :- यह निचोर या ग्रंथ कौ= यही इस ग्रंथ का निष्कर्ष है, यहै परमरस-पोख= यही परमरस की पोषक-बात है कि, तजै सुद्ध-नय बंध है= शुद्ध-नय (के विषयभूत शुद्धात्म तत्त्व को) छोड़ना ही बंध है, गहै सुद्धनय मोख= शुद्धनय (के विषयभूत शुद्धात्म तत्त्व) को ग्रहण करना मोक्ष है। विशेषार्थ :- इस अधिकार के निष्कर्षरूप में कविवर कहते हैं कि जब भी जीव शुद्धनय के विषयभूत शुद्धात्म-तत्त्व को छोड़ता है, तो बंध को प्राप्त होता है। और जब शुद्धनय के विषयभूत शुद्धात्म-तत्त्व को ग्रहण करता है, तो मोक्ष को प्राप्त होता है। और यही एकमात्र ऐसा मार्ग है, जहाँ जीव परमरस का पोषण अर्थात् अनंत आत्मिक-सुख को प्राप्त करता है।

(सवैया इकतीसा)

करम के चक्र में फिरत जगवासी-जीव, ह्वै रह्यौ बहिरमुख व्यापत-विषमता।
अंतर सुमति आई, विमल बड़ाई पाई, पुदगल सौं प्रीति टूटी, छूटी माया-ममता।।
सुद्ध-नै निवास कीनौ, अनुभौ-अभ्यास लीनौ, भ्रमभाव छांड़ि दीनौ, भीनौ चित्त-समता।
अनादि-अनंत अविकलप-अचल ऐसौ, पद-अवलंबि अवलोकै राम-रमता।। 14।।

शब्दार्थ :- करम के चक्र में फिरत जगवासी-जीव= संसारी-जीव करम के चक्र या फेरे में फिर रहे हैं, ह्वै रह्यौ बहिरमुख व्यापत विषमता= (जिससे) बहिर्मुख हो रहे है, सर्वत्र दु:ख ही दु:ख व्याप्त है, अंतर सुमति आई, विमल बड़ाई पाई= (जब) अंतरंग में सुमति आई, तो उत्कृष्ट-निर्मलता की प्राप्ति हुई, पुदगलसौं प्रीति टूटी, छूटी माया ममता= जड़ पुद््गल से स्नेह खत्म हो गया, और मोह-माया छूट गई, सुद्धनै निवास कीनौ अनुभौ अभ्यास लीनौ= शुद्धनय/आत्मस्वरूप में निवास किया, आत्मानुभव का अभ्यास किया, भ्रमभाव छांड़ि दीनौ= भ्रमबुद्धि यानि पर में अहंबुद्धि छूट गई, भीनौ चित्त समता= चित्त समतारस से भीग गया, अनादि-अनंत अविकलप-अचल ऐसौ= जिसकी कोई आदि न हो, जिसका कभी अंत न हो, विकल्परहित, स्थिर ऐसे पद का, अवलंबि अवलोके राम-रमता= आलम्बन करके, अवलोकन करके आत्मस्वरूप में मगन हुआ। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने बहिरात्मा से अंतरात्मा बनने की यात्रा का सुंदर-वर्णन किया है। वर्तमान में जीव पूर्वबद्ध-कर्मों के उदय और फिर वर्तमान में पुन: मोह, राग, द्वेष के भाव करके फिर नवीन-कर्म का बंधन- ऐसे कर्म-बंधन के अटूट-चक्र में फँसा हुआ है। उसका उपयोग प्रतिसमय बहिर्मुख यानि देह और देह से संबंधित-संयोगों और विषयभोग में रमा हुआ है, जिससे अनेकानेकविषमताओं और दु:खों से घिरा हुआ है। किसी तीव्र-पुण्य के उदय से सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का समागम मिला, जिनवाणी सुनने का सुयोग मिला तो अंतरंग में सद्बुद्धि आई, परिणामों में निर्मलता आई है; जिससे पुद््गल से अर्थात् बाहर में पुण्य-पाप के उदय में प्राप्त जड़-पदार्थों से राग टूटा, संयोगों के प्रति जो ममत्व-बुद्धि थी, वह भी छूट गई। शुद्धनय के विषयभूत निज-शुद्धात्म-स्वरूप की महिमा आई, तो सहज ही अनुभव का अभ्यास हुआ, जब उपयोग ने अपने स्वरूप का लक्ष्य किया, तो पर और पर्याय के स्वामित्वपने की भ्रमबुद्धि छूट गई, और अंतरंग समतारस से सराबोर हो गया। मैं अनादि-अनंत, हरप्रकार के विकल्प धीरोदार-महिम्न्यनादिनिधने बोधे निबध्नन्धृतिम्, त्याज्य: शुद्धनयो न जातु कृतिभिः सर्वंकषः कर्मणाम्। तत्रस्थाः स्वमरीचि-चक्रमचिरात्संहृत्य निर्यद््बहिः पूर्णज्ञान-घनौघमेकमचलं पश्यन्ति शान्तं महः।। 11।। से रहित निर्विकल्प, अविचल परमात्मा हूँ- ऐसा अवलोकन होने पर एक क्षण भी बिलम्ब न कर जीव अपने आत्मस्वरूप में रमने का अभ्यास करने लगा।

(सवैया इकतीसा)

जाके परगासमैं न दीसैं राग-द्वेष-मोह, आस्रव मिटत, नहि बंधकौ तरस है।
तिहूँकाल जामैं प्रतिबिंबित अनंतरूप, आपहूं अनंत-सत्ता नंततैं सरस हैं।।
भाव-श्रुतग्यान-परवान जो विचारि वस्तु, अनुभौ करै न जहाँ वानीकौ परस है।
अतुल-अखंड-अविचल-अविनासी धाम, चिदानंद नाम ऐसौ सम्यक्-दरस है।। 15।।

शब्दार्थ :- जाके परगासमैं न दीसैं राग-द्वेष-मोह= जिसके होते ही राग, द्वेष, मोह दिखाई नहीं देते, आस्रव मिटत, नहिं बंधकौ तरस है= आस्रव मिट जाता है, बंध का त्रास/दुःख भी नहीं रहता, तिहूँकाल जामैं प्रतिबिंबित अनंतरूप= तीनों काल जिसमें अनंतरूप प्रतिबिंबित होते हैं, आपहूं अनंत-सत्ता नंततैं सरस हैं= आप स्वयं अनंत-सत्तात्मक अनंतानंत-सहित है, भाव-श्रुतग्यान-परवान जो विचारि वस्तु= भाव-श्रुतज्ञानप्रमाण वस्तु-स्वरूप का विचार करके, अनुभौ करै न जहाँ वानीकौ परस है= जो वचनातीत है, ऐसे अनुभव को प्राप्त करता है, अतुल-अखंड-अविचल-अविनासी धाम= जिसकी तुलना नहीं है, खंडरहित, स्थिर, विनाशरहित स्वरूप, चिदानंद नाम ऐसौ सम्यक्-दरस है= ऐसे चिदानंद का नाम ‘सम्यग्दर्शन’ है। विशेषार्थ :- जब जीव का उपयोग स्व-सन्मुख होता है, तब उपयोग पर-सन्मुख न होने से उसमें मोह- राग-द्वेष का तो अस्तित्व ही नहीं रहता। भावास्रव के मिटने से द्रव्यास्रव स्वयं ही मिट जाता है; क्योंकि द्रव्यास्रव का निमित्त-कारण तो भावास्रव है। और जब आस्रव नहीं, तो बंध का तो सवाल ही नहीं; क्योंकि बंध हमेशा आस्रवपूर्वक ही होता है। अनुभव के काल में जीव को ऐसी अनुभूति होती है। कि जिस ज्ञान में तीन-लोक और तीन-काल के समस्त पदार्थ अपनी अनंत-पर्यायों-सहित प्रतिबिंबित होते हैं, ऐसी अनंतगुणी-शक्ति का स्वामी मैं भगवान् आत्मा हूँ। भाव-श्रुतज्ञान-प्रमाण आत्मवस्तु के स्वरूप का विचार किया जाये, तो आत्मा केवल अनुभवगम्य है, जैसे हम किसी भोज्य-पदार्थ को खाने के बाद उससे मिलनेवाली-संतुष्टि को वचनों से व्यक्त नहीं कर सकते। ठीक उसीप्रकार अात्मा के अनंत-गुणों को और अनुभव के काल में होने वाली आनंद की अनुभूति जोकि मात्र अनुभवगम्य है, वाणी उस अनुभूति को स्पर्श भी नहीं कर सकती अर्थात् शब्दों में गुणगान नहीं किया जा सकता। दूसरा-कारण शब्द तो भाषा-वर्गणा यानि पुद््गल की पर्याय है, और जड़-भाषा से चेतन-आत्मा का गुणगान तीन-काल में भी संभव नहीं है। तीनों-लोकों में जिसके समान कोई दूसरा-पदार्थ नहीं है ऐसा ‘अतुलनीय’, जो आज तक न खंडखंड हुआ है और न कभी होगा ऐसा ‘अखंड’, जिसे कोई चलायमान नहीं कर सकता- ऐसा ‘अविचल’, जिसका कभी न विनाश हुआ है और न होगा ऐसा ‘अविनाशी’, प्रतिसमय चैतन्य-लक्षण-स्वभावी, आनंद का घनपिण्ड ‘मैं आत्मा हूँ’- ऐसा अनुभव ही ‘सम्यग्दर्शन’ है। रागादीनां झगिति विगमात् सर्वतोऽप्यास्रवाणां, नित्योद्योतं किमपि परमं वस्तु सम्पश्यतोऽन्तः। स्फार-स्फारैः स्वरस-विसरैः प्लावयत्सर्वभावा-नालोकान्तादचलमतुलं ज्ञानमुन्मग्नमेतत्।। 12।।

संवर द्वार (६)

(षष्ठ-अधिकार)

(दोहा)

आस्रव कौ अधिकार यह, कह्यो जथावत जेम।
अब संवर-वरनन करौं, सुनहु भविक धर प्रेम।। 1।।

शब्दार्थ :- आस्रवकौ अधिकार यह= आस्रव का अधिकार यह, कह्यो जथावत जेम= यथावत् वर्णन किया, अब संवर वरनन करौं= अब संवर का वर्णन करूँगा, सुनहु भविक धर प्रेम= भव्यजनो! प्रीतिपूर्वक सुनो। विशेषार्थ :- कविवर कहते हैं कि मैंने ‘आस्रव-अधिकार’ का यथावत्-वर्णन किया, अब मैं ‘संवरअधिकार’ का वर्णन करूँगा, सभी भव्यजीव प्रीतिपूर्वक सुनो।

(सवैया इकतीसा)

आतमकौ अहित अध्यात्म-रहित ऐसौ, आस्रव-महातम अखंड-अंडवत् है।
ताकौ विसतार गिलिबे कौ परगट भयौ, ब्रहमंड कौ विकासी ब्रहमंडवत् है।।
जामैं सब रूप जो सबमैं सबरूपसौ पे, सबनिसौं अलिप्त आकास-खंडवत् है।
सोहै ग्यानभान-सुद्ध संवरकौ भेष धरै, ताकी रुचि-रेखकौं हमारी दंडवत् है।। 2।।

शब्दार्थ :- आतमकौ अहित अध्यात्म-रहित= आत्मा के लिए अहितकारी, अध्यात्म से रहित, ऐसौ आस्रव- महातम अखंड-अंडवत् है= घोर-अंधकारमय, अंडे के समान अखंड, ऐसा आस्रव, ताकौ विसतार गिलिबे कौ परगट भयौ= उसके विस्तार को नष्ट करने के लिये प्रगट हुआ है, ब्रहमंड कौ विकासी ब्रहमंडवत् है= ब्रह्मांड को प्रकाशित करनवे ाले सूर्य के समान, जामैं सब रूप जो सबमैं सबरूपसौ= जिसमें सभी प्रकाशित होते हैं, जो सब रूप/व्याप्त जैसा है, पे सबनिसौं अलिप्त आकास-खंडवत् है= फिर भी आकाश के प्रदेश के समान सबसे अलिप्त है, सोहै ग्यानभान-सुद्ध संवरकौ भेष धरै= शुद्ध-ज्ञानरूपी सूर्य, संवर का भेष धारण किये हुए सुशोभित है, ताकी रुचि-रेखकौं हमारी दंडवत् है= उसकी आभा को हमारा साष्टांग-प्रणाम है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने सम्यग्ज्ञानरूपी-संवर को महिमा-मंडित करते हुए प्रणाम किया है। आस्रव अर्थात् मोह-राग-द्वेषरूपी विकारी-भाव आत्मा के ज्ञान-स्वभाव का घात करने से प्रतिसमय ‘अहितकारी’ हैं, ‘अध्यात्म से रहित’ हैं अर्थात् इन विकारों के रहते हुये आत्मस्वरूप कभी प्रगट नहीं हो सकता, ‘महातम’ अर्थात् ये आस्रव-भाव घोर-अंधकार के समान है, ‘अंडवत्’ अर्थात् जैसे अंडे का आकार अखंड होता है चारों ओर से एक जैसा, उसका कोई ओर-छोर नहीं होता; ठीक उसीप्रकार इन आस्रव-भावों ने जीव को चारों से घेर रखा है, यहाँ तक कि इस अंधकार से बाहर निकलने का कोई रास्ता जीव को दिखाई नहीं देता। इतने विशाल आस्रव को गीलवे/लीलवे अर्थात् नष्ट करने के लिए सम्यग्ज्ञानरूपी-सूर्य प्रगट हुआ है, जो पूरे ब्रह्मांड या तीनों लोकों को प्रकाशित करता हुआ स्वयं सूर्य के समान है, जैसे सूर्य के आने पर जगत् का घोर-अंधकार भी क्षणभर में गायब हो जाता है, ठीक उसीप्रकार संवररूपी सूर्य के आने पर आसंसार-विरोधि-सवंरजयैकान्तावलिप्तास्रव-न्यक्कारात्प्रतिलब्ध-नित्य-विजयं सम्पादयत्संवरम्। व्यावृत्तं पररूपतो नियमितं सम्यक्स्वरूपे स्फुर-ज्ज्योतिश्चिन्मयमुज्ज्वलं निजरस-प्राग्भारमुज्जृम्भते।। 1।। आस्रवरूपी घनघोर-अंधकार भी क्षणभर में विलय को प्राप्त होता है। सूर्य स्वयं तो प्रकाशित होता ही है, उसके प्रकाश में जगत् की हर वस्तु भी प्रकाशित होती है। लेकिन सूर्य किसी भी वस्तु को कभी स्पर्श नहीं करता, ठीक उसीप्रकार संवर अर्थात् सम्यग्ज्ञान प्रकट होने पर उसके प्रकाश में जगत् के समस्त ज्ञेय प्रकाशित होने पर भी ज्ञान आकाश के प्रदेश के समान अखंड और व्यापक रहता है, कभी ज्ञेयरूप नहीं होता। ऐसा सम्यग्ज्ञानरूपी सूर्य संवर का भेष धारणकर शोभायमान है, बनारसीदास जी कहते हैं कि ऐसे सम्यग्ज्ञानरूपी सूर्य की आभा अर्थात् संवर को मैं प्रणाम करता हूँ।

(सवैया तेईसा)

सुद्ध-सुछंद-अभेद-अबाधित, भेद-विग्यान सुतीछन-आरा।
अंतरभेद सुभाव-विभाऊ, करै जड़-चेतनरूप दुफारा।।
सो जिन्हके उरमैं उपज्यौ, न रुचै तिन्हकौ परसंग-सहारा।
आतमको अनुभौ करि ते, हरखैं-परखैं परमातम-धारा।। 3।।

शब्दार्थ :- सुद्ध-सुछंद-अभेद-अबाधित= विकाररहित शुद्ध, स्वाधीन/स्वतंत्र, भेदरहित, बाधारहित, भेद- विग्यान सुतीछन आरा= भेदविज्ञानरूपी अत्यधिक-पैनी धारवाली आरी/करोंत, अंतरभेद सुभाव विभाऊ= के अंतरंग में भदे न/े प्रवेश करने पर स्वभाव और विभाव (भिन्नता को प्राप्त होते हैं), करै जड़-चेतनरूप दुफारा= जड़ और चते न दो टुकड़े अर्थात् भेदविज्ञान हो जाता है, सो जिन्हके उरमैं उपज्यौ= वह जिनके हृदय में उपजता है, न रुचै तिन्हकौ परसंग-सहारा= उन्हें पर का साथ अर्थात् संसार में कुछ भी नहीं रुचता, आतमको अनुभौ करि ते= आत्मा का अनुभव करके, हरखैं परखैं परमातम-धारा= अतिप्रसन्न होते हैं, परमात्मा के स्वरूप को पहचान लेते हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने भेदविज्ञान का महत्त्व और फल का वर्णन किया है। भेदविज्ञान= ‘भेद’+‘वि’+‘ज्ञान’ अर्थात् भेद का या भिन्नपने का विशेष-ज्ञान। दो वस्तुयें जो आपस में भिन्न होते हुये भी हमें एकरूप दिखाई दे रही है, उनको भिन्न-भिन्न देखना ही भेदविज्ञान है। क्योंकि जो पहले से भिन्न हो, उसी को भिन्न किया जा सकता है; जो पहले से भिन्न न हो, उसको भिन्न करना असंभव है। जैसे बादाम के ऊपर छिलका- यद्यपि बादाम के साथ ही पैदा होता है, पर हमेशा साथ रहते हुये भी भिन्न ही रहता है, इसीलिये हम उसे बाद में भिन्न-भिन्न भी कर लेते हैं। पर क्या बादाम गिरी को बादाम से भिन्न कर सकते हैं? कभी नहीं। इससे सिद्ध होता है कि जो पहले से ही भिन्न है, उन्हीं में भेदज्ञान करना है, जैसे शरीर और आत्मा। इसीप्रकार जड़ और चेतन या कहें शरीर और आत्मा अनादिकाल से साथ रहते हुये भी पूर्णत: भिन्न हैं। मैं आत्मा समस्त-विकारों से रहित पूर्ण ‘शुद्ध’, सहज-ज्ञान स्वभावरूप-परिणमन करने के लिये किसी भी रूप में पर की कोई अपेक्षा नहीं होने से पूर्ण-स्वतंत्र, ‘अभेद’ यानि आज तक किसी पर वस्तु ने मेरे ज्ञान-स्वरूप में प्रवेश नहीं किया, नय-प्रमाण आदि सभीप्रकार की बाधा से रहित ‘अबाधित’, ऐसी भेदविज्ञानरूपी अत्यंत पैनी-करोंत जब अंतरंग में प्रवेश करती है; तो ज्ञान-स्वभाव और मोह, राग, द्वेषादि विभाव, देहादि जड़ और चेतनरूप-आत्मा का भिन्नपना स्पष्ट-प्रतिभासित हो जाता है; जैसे आरा-मशीन में कितनी भी मोटी-लकड़ी प्रवेश करे एकक्षण में उसके दो टुकड़े हो जाते हैं। चैद्रूप्यं जडरूपतां च दधतोः कृत्वा विभागं द्वयो-रन्तर्दारुणदारणेन परितो ज्ञानस्य रागस्य च। भेदज्ञानमुदेति निर्मलमिदं मोदध्वमध्यासिताः शुद्धज्ञान-घनौघमेकमधुना सन्तो द्वितीयच्युताः।। 2।। भेदविज्ञान का फल बताते हुए कविवर कहते हैं कि जिसके हृदय में ऐसा भेदज्ञान प्रगट होता है, उसे संसार की सभी मनमोहक-वस्तुओं से अरुचि हो जाती है, सभी संयोग अशरण प्रतीत होते हैं, अर्थात फिर भले ही वह जीव जगत् के इन संयोगों के बीच में रहे पर इनसे एकत्व-बुद्धि नहीं रहती। अब उसे आत्मानुभूति में सच्चा-आनंद वर्तता है, आत्मा परमात्मा के स्वरूप को पहचानकर उसी मार्ग का अनुसरण करता है।

(सवैया तेईसा)

जो कबहूँ यह जीव-पदारथ, औसर पाइ मिथ्यात मिटावै।
सम्यक्-धार-प्रवाह बहै गुन, ज्ञान-उदै मुख-ऊरध धावै।।
तो अभि-अंतर दर्वित-भावित, कर्म-कलेस प्रवेस न पावै।
आतम-साधि अध्यातम के पथ, पूरन ह्वै परब्रह्म कहावै।। 4।।

शब्दार्थ :- जो कबहूँ यह जीव-पदारथ= जब कभी यह जीव नाम का पदार्थ, औसर पाइ मिथ्यात मिटावै= अवसर पाकर (काललब्धि पकने पर) मिथ्यात्व को मिटा देता है, सम्यक्-धार प्रवाह बहै= सम्यक्त्व की धारा के प्रवाह में बहता हुआ, गुन ज्ञान-उदै मुख ऊरध धावै= सम्यग्ज्ञान को प्राप्त कर, ऊर्ध्वमुखी होता है, तो अभिअंतर दर्वित-भावित कर्म-कलेस= तब अंतरंग में द्रव्यकर्म और भावकर्मरूपी क्लेश, प्रवेस न पावै= प्रवेश नहीं करते, आतम-साधि अध्यातम के पथ= आत्मा की साधना करते हुए अध्यात्म के पथ पर चलकर, पूरन ह्वै परब्रह्म कहावै= पूर्णता को प्राप्त करके परमात्मा कहलाते हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘सम्यग्दर्शन’ और ‘सम्यग्ज्ञान’ की महिमा का वर्णन किया है। अनादिकाल से जीव चार-गति चौरासी-लाख योनियों में परिभ्रमण करता आ रहा है, कदाचित् अवसर प्राप्त होने पर अर्थात् अति-तीव्र-पुण्य के उदय से कभी इस जीव को सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का समागम मिले, जिनवाणी सुनने का सुयोग मिले और आत्मा की बात सुनने में उत्साह वर्ते, साथ ही दर्शनावरणी-कर्म का अनुदय हो, और स्व-पर में भेदज्ञान वर्ते, तो अनादि का मिथ्यात्व एक क्षण में दूर होता है। एकबार सम्यक्त्व की प्राप्ति होने पर जीव को जो आनंद की अनुभूति होती है, उसकी धारा में जीव सहज ही बहने लगता है अर्थात् सहज ही स्वरूप में स्थिरता की ओर उन्मुख होने लगता है, सम्यग्ज्ञान का उदय होने से जीव ऊर्ध्वमुखी होता है अर्थात् जीव के परिणाम निरन्तर उत्तरोत्तर-विशुद्धि को प्राप्त होते हैं। परिणामों में निरन्तर विशुद्धि होने से ज्ञानावरणादि-द्रव्यकर्म और मोह-राग-द्वेष आदि भावकर्म का क्लेश या दु:ख प्रवेश नहीं करता अर्थात् ये जड़कर्म जीव को आकुलित नहीं करते। शनै:-शनै: जीवस्वरूप में स्थिरतापूर्वक अध्यात्म-मार्ग पर चलकर अर्थात् मुनिपना अंगीकार करके आत्मसाधना करता हुआ पूर्णता को प्राप्त होता है, ज्ञान की पूर्णता अर्थात् केवलज्ञान प्राप्त करने पर वही जीव ‘परमात्मा’ कहलाता है।

(सवैया तेईसा)

भेदि मिथ्यात सु बेदि-महारस, भेदविज्ञान- कला जिन्ह पाई।
जो अपनी महिमा अवधारत, त्याग करैं उर सौंज पराई।।
यदि कथमपि धारावाहिना बोधनने -ध्वरु मुपलभमानः शुद्धमात्मानमास्ते।
तदयमुदयदात्मा-राममात्मानमात्मा-परपरिणति-रोधाच्छुद्धमेवाभ्युपैति।। 3।।

उद्धत रीति फुरी जिन्हके घट, होत निरंतर जोति सवाई।
ते मतिमान सुवर्न-समान, लगै तिन्हकौं न सुभासुभ-काई।। 5।।

शब्दार्थ :- भेदि मिथ्यात सु बेदि महारस= मिथ्यात्व को भेदकर, महारस/आत्मिक-रस का वेदन करते हैं, भेद-विज्ञान-कला जिन्ह पाई= भेदविज्ञानरूपी कला जिन्होंने प्राप्त की, जो अपनी महिमा अवधारत= जो अपनी महिमा को स्वयं धारण करते हैं, त्याग करैं उर सौंज पराई= (वे जीव) मन से पर-वस्तुओं के अपनत्व का त्याग करते हैं, उद्धत-रीति फुरी जिन्हके घट= (ज्ञान ज्योति) ऊपर की ओर चढ़ती हुई रीति जिनके हृदय में स्फुरित/प्रगट हुई है, होत निरंतर जोति-सवाई= वह ज्योति निरन्तर बढ़ती रहती है, ते मतिमान सुवर्न-समान= वे बुद्धिमान्-जीव स्वर्ण के समान हैं, लगै तिन्हकौं न सुभासुभ-काई= उनको शुभ-अशुभ-भावोंरूपी काई स्पर्श नहीं करती है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने भेदविज्ञान और सम्यग्दृष्टि-जीव की महिमा वर्णित की है। सच तो यही है कि जिनको ‘स्व’ और ‘पर’ में भेदज्ञान की कला आती है, वे ही जीव आत्मिक-आनंद की अनुभूति का रसास्वादन करते हैं। इतना ही नहीं वे जीव वर्तमान में भी इस विपरीत-देश, काल, वातावरण में भी सुखी रहते हैं, आकुलता-रहित रहते हैं। जिन जीवों ने मिथ्यात्व को भेदकर अपने स्वरूप की महिमा को पहचाना हैं, वे ही जीव ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य आदि अनंत-गुणों की प्रगटता को अवधारण करते हैं। देह और देह से संबंधित समस्त संयोगों से उन्हें सहज ही विरक्ति होती है। जो सम्यग्ज्ञानरूपी-ज्योति उनके हृदय में स्फुरित हुई है, वे उसे अंतरंग में स्वरूप में स्थिरता को धारण करते हुये सवाई करते हैं, यानि उत्तरोत्तर बढ़ाते हैं। कविवर कहते हैं कि ऐसे मतिमान-जीव या बुधिवंत-जीव स्वर्ण के समान होते हैं, जैसे लोहे को कुछ समय के लिये पानी में छोड़ने पर उसमें जंग या काई लग जाती है। जबकि सोना पानी तो दूर कीचड़ में गिरने पर भी खरा ही रहता है, गंदगी उसे कभी स्पर्श भी नहीं करती; ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव कहीं भी, किसी भी परिस्थिति में रहे, कर्मोंदय की घोर अनुकूलताओं-प्रतिकूलताओं के बाबजूद भी स्वर्ण के समान खरा रहता है, शुभ-अशुभ भावों की काई उसे कभी स्पर्श भी नहीं करती, अर्थात् वह स्वयं को जाननहार ही अनुभव करता है।

(अडिल्ल)

भेदग्यान संवर-निदान निरदोष है। संवरसौं निर्जरा अनुक्रम-मोष है।।
भेदग्यान सिवमूल जगतमहिं मानिये। जदपि हेय है, तदपि उपादेय जानिये।। 6।।

शब्दार्थ :- भेदग्यान संवर-निदान निरदोष है= भेदज्ञान संवर का कारण, निर्दोष है, संवरसौं निर्जरा अनुक्रम-मोष है= संवर से निर्जरा, और क्रम से मोक्ष है, भेदग्यान सिवमूल जगतमहि मानिये= जगत् में एकमात्र भेदज्ञान ही मोक्ष की जड़ है, जदपि हेय है तदपि उपादेय जानिये= यद्यपि छोड़ने योग्य है, फिर भी ग्रहण करने योग्य जानना चाहिये । विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने भेदविज्ञान हेय होते हुये भी बहुत ही सुंदरता से इसकी उपादेयता को

निज-महिम-रतानां भेदविज्ञान-शक्त्या,भवति नियतमेषां शुद्ध-तत्त्वोपलम्भः।
अचलितमखिलान्यद्रव्य-दूरेस्थितानां, भवति सति च तस्मिÂन्नक्षयः कर्ममोक्षः।। 4।।

सम्पद्यते संवर एष साक्षाच्छुद्धात्म-तत्त्वस्य किलोपलम्भात्। स भेदविज्ञानता एव तस्मात्तद््भेदविज्ञानमतीव भाव्यम् ।। 5।। सिद्ध किया है। अनादि का मोही अज्ञानी-जीव जो देहादिक जड़-पदार्थों में ही रचा-पचा हो, जिसे आत्मा और शरीर की भिन्नता का ज्ञान ही न हो, उसके लिये सीधे मुक्ति की बातें करना हास्यास्पद ही होगी। लेकिन यदि उसे क्रम से देह और देहादिक-संयोगों की असारता, क्षणभंगुरता का ज्ञान कराया जाये और मैं स्वयं जगत् में इन सबसे पूर्ण-भिन्न सर्वश्रेष्ठ अलौकिक-तत्त्व हूँ, इसकी महिमा से परिचित कराया जाये, तो निश्चित ही वह जीव मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होगा,- यही तो भेदज्ञान है। इसी से जीव को आत्मानुभूति होगी, यही तो संवर है। जब संवर होगा, तभी कर्मों का क्षय या निर्जरा होगी, और जब धीरेधीरे समस्त कर्मों का क्षय हो जायेगा, तभी तो मुक्ति होगी। इससे सिद्ध होता है सर्वप्रथम करने योग्य कार्य तो भेदविज्ञान या तत्त्वनिर्णय ही है, अर्थात् यही तो मोक्षरूपी वृक्ष की जड़ है, कहने का अभिप्राय यही है कि यदि जड़ ही नहीं होगी, तो वृक्ष कैसे खड़ा होगा? यही संदेश तो कवि ने यहाँ दिया है कि भेदविज्ञान ही संवर का कारण है, संवर, निर्जरा का और निर्जरा मोक्ष की कारण है। इसीलिये कवि ने ‘भेदविज्ञान’ को ‘मोक्ष की जड़’ कहा है। लेकिन ये भी उतना ही सत्य है, कि वृक्ष को उगाते समय किसान जितना ध्यान जड़ का रखता है, एक बार फसल आने के बाद वही जड़ उसके लिये महत्त्व नहीं रखती, ठीक उसीप्रकार मोक्षमार्ग पर चलने के लिये जो भेदविज्ञान परमावश्यक है, वही मोक्ष की पूर्णता में बाधक बन जाता है। क्योंकि यदि जीव भेदविज्ञानरूपी विकल्पों में ही उलझा रहेगा, तो स्वरूप में स्थिरता कब करेगा? इसीलिए भेदविज्ञान को मोक्षमार्ग की अपेक्षा ‘उपादेय’ होते हुये भी मुक्ति की अपेक्षा ‘हेय’ कहा गया है।

(दोहा)

भेदग्यान तबलौं भलौ, जबलौं मुकति न होइ।
परम-जोति परगट जहाँ, तहाँ न विकलप कोइ।। 7।।

शब्दार्थ :- भेदग्यान तबलौं भलौ= भदे ज्ञान तबतक अच्छा है, जबलौं मुकति न होइ= जबतक मुक्ति न हो, परम-जोति परगट जहाँ= उत्कृष्ट ज्ञान-ज्योति जहाँ प्रगट होती है, तहाँ न विकलप कोइ= वहाँ कोई विकल्प नहीं होत।े विशेषार्थ :- जहाँ पिछले छंद में कवि ने भेदविज्ञान की उपयोगिता/उपादेयिता सिद्ध की थी वहीं इस छंद में भेदविज्ञान की हेयता सिद्ध की है। जैसे किसी व्यक्ति ने जीवन में कभी आम का फल-खाना तो दूर देखा भी न हो। पर सुना बहुत हो कि आम फलों का राजा होता है। बहुत मीठा और स्वादिष्ट होता है निश्चित ही उसके मन में खाने की इच्छा जरूर होगी, परन्तु जब आम देखा ही नहीं तो जिज्ञासा/ विकल्प भी बहुत होंगे, कैसा रंग-रूप, आकार-प्रकार आदि, परन्तु ये वही उपयोगी-विकल्प होंगें, जो उस व्यक्ति को आम तक पहुँचायेगें। लेकिन इतने परिश्रम के बाद जब आम खाने को मिलेगा, तो वह व्यक्ति उसका स्वाद लेगा या उन विकल्पों में भटकेगा? अर्थात् जिन विकल्पों ने उसे आम की प्राप्ति करायी, अब वही विकल्प उस आम की स्वादानुभूति में बाधक है, ठीक उसीप्रकार शरीर और आत्मा की भिन्नता को सिद्ध करनेवाले भेदविज्ञान के जिन विकल्पों ने पर से भिन्न स्व की अनुभूति और सिद्धि करायी, अब वही विकल्प स्वरूप की स्थिरता में बाधक है। क्योंकि यदि साधक का उपयोग विकल्पों में ही भटकता रहेगा, तो स्वरूप में स्थिरता न होने से कर्मों की निर्जरा भी नहीं होगी, और कर्मों की निर्जरा नहीं तो मुक्ति भी नहीं होगी। इसीलिए कवि ने कहा कि परमज्योति प्रगट होने पर कोई भावयेद् भेदविज्ञानमिदमच्छिÂन्नधारया। तावद्यावत्पराच्च्युत्वा ज्ञानं ज्ञाने प्रतिष्ठते।। 6।। विकल्प नहीं रहता अर्थात् ‘आत्मानुभूति निर्विकल्प ही होती है।’

(चौपाई)

भेदग्यान-संवर जिन्ह पायौ, सो चेतन सिवरूप कहायौ।
भेदग्यान जिन्हके घट-नाहीं, ते जड़-जीव बंधें घट-मांही।। 8।।

शब्दार्थ :- भेदग्यान-संवर जिन्ह पायौ= भेदविज्ञान के द्वारा जिन्होंने संवर/आत्मानुभूति को प्राप्त किया, सो चेतन सिवरूप कहायौ= वह जीव शिवरूप/मोक्षमार्गी कहलाता है, भेदग्यान जिन्हके घट नाहीं= जिनके हृदय में भेदविज्ञान नहीं है, ते जड़-जीव बंधें घट-मांही= वे जड़/अज्ञानी-जीव शरीर के बंधन को प्राप्त होते हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने स्व और पर के भेदविज्ञान के फलस्वरूप उत्पन्न आत्मानुभति ू रूप-संवर की महत्ता को वर्णित किया है। कहने का अभिप्राय यही है कि जिन जीवों के हृदय में भेदविज्ञान की ज्योति जल रही है, वास्तव में वही जीव मोक्ष का अधिकारी है। और इसके विपरीत जिसके हृदय में भेदविज्ञान की ज्योति नहीं जल रही है या कहें जिन्हें पर की ही महिमा आती है, वे जीव चेतन होते हुये भी जड़ के ही समान है। जैसे कोई व्यक्ति अपने घर की ओर तो देखे नहीं और दूसरे के घर की व्यवस्था बनाने में दिन-रात एक कर दे, तो दुनिया उसे मूर्ख कहती है। ठीक उसीप्रकार जब जीव अपने अनंत-गुणों की ओर तो निहारे नहीं, और देहादिक नश्वर जड़-संयोगों में रमते हुए अपना अमूल्य-समय व्यर्थ गँवाये, तो कविवर कहते हैं कि वह जीव चेतन होते हुये भी जड़ के समान ही है। लोक में कहावत है ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ अर्थात् जो जैसा करता है, उसको वैसा ही फल मिलता है, तदनुसार देहादिक जड़-पदार्थों की संभाल करनेवाला जीव भी घट यानि देहादिक से ही बँधा रहता है, अर्थात् ‘ऐसे जीव को देह से भिन्न भगवान् आत्मा की अनुभति ू नहीं होती’।

(दोहा)

भेदग्यान साबू भयौ, समरस निरमल-नीर।
धोबी अंतर-आतमा, धोवै निजगुण-चीर।। 9।।

शब्दार्थ :- भेदग्यान साबू भयौ= भेदविज्ञान को साबुन बनाकर, समरस निरमल-नीर= समतारूपी स्वच्छ- जल से, धोबी अंतर-आतमा= जो अंतरात्मा/ सम्यग्दृष्टि-जीवरूपी धोबी, धोवै निजगुण-चीर= अपने गुणोंरूपी वस्त्र को धोता है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने धोबी के उदाहरण के माध्यम से सम्यग्दृष्टि-जीव की परिणति का सुन्दर-चित्रण किया है। जैसे कोई धोबी गंदे-वस्त्रों को साबुन लगाकर निर्मलजल से साफ करता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव भेदविज्ञानरूपी साबुन लगाकर और साम्यभावरूपी निर्मल-जल में खंगालकर कषाय-जनित विकारों की गंदगीरूपी मैल को धोकर साफ करता है, और अपने अनंत-गुणों की विशुद्धि को प्रगट करता है।

(सवैया इकतीसा)

जैसे रज-सोधा रज सोधिकैं दरब काढैं, पावक कनक-काढ़ि दाहत उपलकौं।
पंक के गरभ में ज्यों डारिये कतक-फल, नीर करै उज्जल नितारि डारै मलकौं।।
भेदविज्ञानतः सिद्धाः ये किल केचन। अस्यैवाभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन।। 7।।

दधिकौ मथैया मथि काढ़ै जैसे माखनकौं, राजहंस जैंसे दूध पीवैं त्यागि जलकौं।
तैंसैं ग्यानवंत भेदग्यान की सकति साधि, वेदै निज-संपति उछेदै पर-दलकौं।। 10।।

शब्दार्थ :- जैसे रजसोधा रज सोधिकैं दरब काढैं= जैसे रज सोधनेवाला रज सोधकर कीमती-वस्तु निकाल लेता है, पावक कनक-काढ़ि दाहत उपलकौं= (सुनार) स्वर्ण-पत्थर को अग्नि में तपाकर सोना निकाल लेता है, पंक के गरभ में ज्यों डारिये कतकफल= कीचड़-मिश्रित जल में जैसे फिटकरी को डालने पर, नीर करै उज्जल नितारि डारै मलकौं= वह मल/गंदगी को निथारकर जल को स्वच्छ कर देता है, दधिकौ मथैया मथि काढ़ै जैसे माखनकौं= दही को मथनेवाला दही को मथकर जैसे मक्खन को निकाल लेता है, राजहंस जैंसे दूध पीवै त्यागि जलकौ= राजहंस-पक्षी जैसे जल को छोड़कर दूध पी लेता है, तैंसैं ग्यानवंत भेदग्यान-सकति साधि= उसीप्रकार ज्ञानी-जीव भेदविज्ञान की शक्ति को साधकर, वेदै निज-संपति उछेदै पर-दलकौ= अपनी संपदा का वेदन/अनुभव करता है और पर द्रव्य का समूह को त्याग करता है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने भेदविज्ञान की प्रक्रिया और उसके फलस्वरूप ज्ञानी-जीवों को मिलनेवाली उपलब्धि का कई उदाहरणों के माध्यम से बहुत सुंदर-स्पष्टीकरण किया है। जैसे रज/धूल के कणों को सोधकर रजशोधक अपनी मेहनत से उसमें छिपी अपनी प्रयोजनभूत कीमती-सामग्री को निकाल लेता है। जैसे स्वर्णकार खदान से प्राप्त स्वर्णपत्थर को अग्नि में तपाकर अपनी बुध्दिमत्ता से उसमें छिपे स्वर्ण को निकाल लेता है। जैसे कितना भी गंदा जल हो या कीचड़ हो, उसमें यदि फिटकरी को डाल दिया जाये तो कीचड़ और पानी तुरंत अलग-अलग हो जाते हैं, अर्थात् कतकफल (फिटकरी) डालने से पानी ऊपर आ जाता है और सारी कीचड़ नीचे बैठ जाती है। जैसे दही को मथनेवाला दही को ऐसे बिलोता है कि दही में छिपा हुआ मक्खन भी ऊपर आ जाता है और छाछ अलग हो जाती हैं। ऊपरी तौर पर देखने पर दूध में पानी कहीं दिखाई नहीं देता, लेकिन फिर भी राजहंस-पक्षी उस दूध में से दूध के कणों को पी लेता है और पानी को छोड़ देता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव अनादि से मिले देह और आत्मा को भेदविज्ञान की अनुपम-कला से देहादिक परद्रव्यों के बीच रहकर भी, देहादिक परद्रव्यों से भिन्न अपने अनंत-गुणात्मक-स्वरूप का वेदन कर लेते हैं। उपर्युक्त सभी उदाहरणों में एक विशेष-बात है कि चाहे रजकण हों, स्वर्णपत्थर हो, कीचड़ हो, दही हो या दूध हो- सभी अपने सहज मिश्रितरूप में ही हैं, यहाँ तक कि उनमें प्रयोजनभूत-सामग्री प्रत्यक्ष दिखाई भी नहीं दे रही, लेकिन फिर भी उस विधा का पारखी अपनी कला-चातुर्य से उसमें से अपनी प्रयोजनभूत-सामग्री को प्राप्त कर लेता है। ठीक उसीप्रकार शरीर और आत्मा अनादि से साथ हैं, और उनमें से एक दृश्य और दूसरा अदृश्य होने पर भी ज्ञानी-जीव भेदविज्ञान की अनुपम-कला से मूर्तिक के बीच रहते हुये अमूर्तिक-आत्मा के अनंत-गुणों के रसास्वादन का वेदन प्रतिसमय करते हैं- यह है भेदविज्ञान कीअनूठी-कला, और भेदविज्ञान के फलस्वरूप प्राप्त उपलब्धि।

(छप्पय)

प्रगटि भेद-विग्यान, आपगुन-परगुन जानै।
पर-परनति परित्याग, सुद्ध-अनुभौ-थिति ठानै।।
भेदज्ञानोच्छलन-कलनाच्छुद्ध-तत्त्वोपलम्भा-द्राग-ग्राम-प्रलयकरणात्कर्म्मणां संवरेण।
विभ्रत्तोषं परमममलालोकमम्लानमेकं, ज्ञानं ज्ञाने नियतमुदितं शाश्वतोद्योतमेतत्।। 8।।

करि अनुभौ-अभ्यास, सहज संवर-परगासै।
आस्रव-द्वार-निरोधि, करमघन-तिमिर विनासै।।
छय करि विभाव, समभाव भजि, निरविकलप निज-पद गहै।
निर्मल-विसुद्धि सासुत-सुथिर, परम-अतींद्रिय- सुख लहै।। 11।।

शब्दार्थ :- प्रगटि भेद-विग्यान= भेदविज्ञान प्रगट होने पर आपगुन परगुन जानै= स्व-गुण और पर-गुणों को जानता है, पर-परनति परित्याग= पर-परिणति का त्यागकर, सुद्ध-अनुभौ-थिति ठानै= शुद्ध अनुभव/ स्वरूप में स्थिरता करता है, करि अनुभौ-अभ्यास सहज संवर-परगासै= आत्म-अनुभव का अभ्यास होने से सहज संवर प्रगट करता है, आस्रव-द्वार निरोधि करमघन-तिमिर विनासै= आस्रव द्वार के रुकने से घनघोर कर्मरूपी अंधकार विनाश को प्राप्त होता है, छय करि विभाव= विभावों को नष्ट करके, समभाव भजि= समता-भाव को धारण करके, निरविकलप निज-पद गहै= विकल्प रहित निज-आत्मपद को ग्रहण करता है, निर्मल विसुद्धि सासुत सुथिर परम-अतींद्रिय-सुख लहै= स्वच्छ, विशुद्ध, शाश्वत, सुस्थिर, इन्द्रियों से रहित सुख को प्राप्त करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उस स्थिति का वर्णन किया है, जब भेदविज्ञान की प्रक्रिया निरन्तर चलती है, और प्रतिसमय भेदविज्ञान चलने पर जीव को कैसी अनुभूति होती है। भेदविज्ञान का अर्थ ही यही है कि दो भिन्न-चीजों की भिन्नता का ज्ञान करना, सो जब ‘स्व’ अर्थात् आत्मा और ‘पर’ अर्थात् देहादिक समस्त-पदार्थों में भिन्नता का अनुभव होता है, तो स्व के अर्थात् अपने अनंत आत्मिक-गुण और देहादिक पर-द्रव्य के समस्त गुणों में सहज स्पष्ट भिन्नता प्रतिभासित होती है। जब जीव को स्वयं अपने अनंत-गुणों की महिमा आती है, तो पर-परिणति यानि मोह, राग, द्वेष आदि विकारी-भावों का सहज ही त्याग हो जाता है, और उपयोग स्वरूप को लक्ष्य करता है। जब अनुभूति का यह अभ्यास निरन्तर चलता है, तब जो विशुद्धि प्रगट होती है, उसे संवर कहते हैं। और संवर/आत्मानुभूति होने पर उपयोग स्वरूप में स्थिर होने से आस्रव का स्वयं निरोध हो जाता है, और कर्मघन अर्थात् अनंतसंसार का अनुबंध करनेवाली अनंतानुबंधी का घोर-अंधकार भी विनाश को प्राप्त होता है। इसप्रकार समस्त-विभावों का क्षय करके, स्वरूप में स्थिरतारूप समता-भाव को भजकर या धारण करके निर्विकल्प-स्वात्मपद को प्राप्त करता है। और विकारों से रहित निर्मल, विशुद्धि अर्थात् स्वाभाविक-परिणमनरूप विशुद्धि प्राप्त कर, अनादि-अनंत शाश्वत, त्रिकाल रहनेवाला, इन्द्रियों से रहित परम-अतीन्द्रिय आत्मिक-सुख को प्राप्त करता है। अज्ञानी-जीव की परिणति

ज्यों मतिहीन विवेक-बिना नर, साजि मतङ्गज ईंधन ढोवै।
कंचन-भाजन धूल भरै शठ, मूढ़ सुधारससौं पग धोवै।।
बाहित काग-उड़ावन-कारण, डार महामणि मूरख रौवै।
त्यौं यह दुर्लभ-देह ‘बनारसि’, पाय अजान अकारथ खोवै।।

निर्जरा द्वार (७) | भाग १/२

(सप्तम-अधिकार)

(दोहा)

वरनी संवर की दसा, जथा-जुगति-परवांन।
मुकति-वितरनी निर्जरा, सुनहु भविक धरि कान।। 1।।

शब्दार्थ :- वरनी संवर की दसा= संवर की दशा का वर्णन किया, जथा-जुगति-परवांन= युक्ति-प्रमाण के अनुसार, मुकति-वितरनी निर्जरा= (अब) मुक्ति को देनेवाली निर्जरा, सुनहु भविक धरि कान= हे भव्यजीव! कान रखकर/ध्यान से सुनो। विशेषार्थ :- निर्जरा-अधिकार के वर्णन की प्रतिज्ञा करते हुये कविवर कहते हैं कि संवर का जैसा स्वरूप आगम में वर्णित है, मैंने वैसा ही वर्णन किया। अब आगे मुक्ति को देनेवाली निर्जरा का वर्णन करूँगा, सो सभी भव्यजीव कान लगाकर अर्थात् ध्यान से सुनो।

(चौपाई)

जो संवरपद-आनंदै, सो पूरवकृत-कर्म निकंदै।
जो अफंद ह्वै बहुरि न फंदै, सो निरजरा बनारसि बंदै।। 2।।

शब्दार्थ :- जो संवरपद आनंद=ै जो संवर का आनंद लेता है, सो पूरवकृत-कर्म निकंद=ै सो पूर्व में किये हुए कर्मों की निर्जरा करता है, जो अफंद ह्वै बहुरि न फंद=ै जो फंद/बंधन से रहित होकर दुबारा नहीं बंधते, सो निरजरा बनारसि बंद=ै उस निर्जरा (अविपाक-निर्जरा) को बनारसी वंदन करता है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने निर्जरा का महत्त्व अर्थात् उस स्थिति का वर्णन किया है, जब जीव आत्मानुभूतिरूप संवर की प्राप्ति कर, उसका निरन्तर-अभ्यास करता है, जिससे उस समय भी नवीन कर्मों का बंध तो रुकता ही है, पहले बँधे कर्मों की भी निर्जरा होती है। और जैसे-जैसे कर्मों की निर्जरा होती जाती है, जीव उतना ही निर्बन्ध होता जाता है। यद्यपि सकाम निर्जरा तो हम सभी जीवों को भी प्रतिसमय हो रही है, पर वह निर्जरा पुन: कर्मबंधन में निमित्त होने से कार्यकारी नहीं है। जबकि यह निर्जरा ऐसी होती है, कि एकबार निर्जरित होने पर जीव दुबारा कर्मों के बंधन में नहीं बँधता, यानि मुक्ति की ओर ही अग्रसर होता है। बनारसीदास जी कहते हैं कि ऐसी निर्जरा को मेैं सविनय-वंदन करता हूँ।

(दोहा)

महिमा सम्यग्ज्ञान की, अरु विरागबल जोइ।
क्रिया-करत फल-भुंजतै, करम-बंध नहिं होइ।। 3।।

शब्दार्थ :- महिमा सम्यग्ज्ञान की= सम्यग्ज्ञान की महिमा, अरु विरागबल जोइ= और वैराग्य का बल दोनों, क्रिया-करत फल-भुज ं तै= क्रिया करते हुए, फल भोगते हुये भी, करम-बंध नहिं होइ= कर्म का बंधन नहीं होता। रागाद्यास्रवरोधतो निजधुरां धृत्वा परः संवरः, कर्मागामि समस्तमेव भरतो दूरान्निरुन्धन् स्थितः। प्राग्बद्धं तु तदेव दग्धमधुना व्याजृम्भते निर्जरा, ज्ञानज्योतिरपावृतं न हि यतो रागादिभिर्मूर्च्छति।। 1।। °fªÄffनस्यैव सामर्थ्यं विरागस्यैव वा किल। यत्कोऽपि कर्मभिः कर्म भुञ्जानोऽपि न बध्यते।। 2।। विशेषार्थ :- इन पंक्तियों में कवि ने सम्यग्ज्ञान की महिमा और फल वर्णित किया है। कितनी अचिंत्यमहिमा है ज्ञान और वैराग्य की? एकबार ज्ञान और वैराग्य सम्यक् होने पर जीव चाहे शुभ-अशुभ कैसी भी क्रिया करे, उन क्रियाओं का फल भोगता हुआ भी दिखाई दे, तब भी उसे कर्म का बंधन नहीं होता, जब कि अज्ञान-अवस्था में वह कर्म का बंध प्रतिसमय होता है। तभी तो ‘‘दौलतराम जी’’ ‘छहढाला’ में कहते हैं - ‘‘सो सब महिमा ज्ञान-तनी मुनिनाथ कहे हैं’’।

(सवैया इकतीसा)

जैंसें भूप कौतुक-सरूप करै नीच-कर्म, कौतुकी कहावै तासौं कौन कहै रंक है।
जैंसें विभचारिनी विचारै विभचार वाकौ, जारहीसौं प्रेम भरतारसौं चित-बंक है।।
जैंसें धाइ बालक चुँघाइ करै लालि-पालि, जानै ताहि औरकौ जदपि वाकै अंक है।
तैंसैं ग्यानवंत नाना-भाँति करतूति ठानै, किरियाकौं भिन्न मानै यातैं निकलंक है।। 4।।

शब्दार्थ :- जैंसें भूप कौतुक-सरूप करै नीच कर्म= जैसे राजा कौतूहली-वृत्ति-स्वरूप तुच्छ-कर्म करता है, कौतुकी कहावै तासौं कौन कहै रंक है= (फिर भी) वह खेल ही कहलाता है, उसे देखकर कौन उसे रंक/ गरीब कह सकता है, जैंसें विभचारिनी विचारै विभचार= जैसे व्यभचारिणी व्यभिचार विचार करती है, वाकौ जारहीसौं प्रेम, भरतारसौं चित बंक है= उसका प्रेम अपने यार से ही रहता है, पति से प्रेम नहीं करती, जैंसें धाइ बालक चुँघाइ करै लालि-पालि= जैसे धाय बालक को दूध पिलाये लालन-पालन करे, जानै ताहि औरकौ जदपि वाकै अंक है= तब भी वह उसे किसी और का ही मानती है, भले ही वह उसकी गोद में है, तैंसैं ग्यानवंत नाना-भाँति करतूति ठानै= वैसे ही ज्ञानवान् सम्यग्दृष्टि-जीव विभिन्न-प्रकार के कार्य करते हैं, किरियाकौं भिन्न मानै यातैं निकलंक है= लेकिन उन क्रियाओ से स्वंय को भिन्न मानते है, इसलिये कलंक-रहित/निर्दोष है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने कई उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि सम्यग्दृष्टि-जीव भी, अज्ञानी मिथ्यादृष्टि-जीव की भाँति ही संसार की सभी सामान्य-क्रियायें करता है; फिर भी सम्यग्दृष्टिजीव ‘निकलंक’ और अज्ञानी मिथ्यादृष्टि-जीव ‘कलंक-सहित’ माना गया है। जैसे कोई राजा किसी को आश्चर्यचकित करने के लिए या किसी अन्य कारणवश यदि कोई निम्न-कार्य भी करे, तो भी उसे कोई निम्न-जाति का नहीं कहता; बल्कि निम्न-कार्य करते हुये भी सब उसे राजा ही मानते हैं। ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव चाहे पंचेन्द्रियों के विषय-भोगों में रत दिखे, चाहे व्यापार, युद्ध आदि करता हुआ दिखाई दे; तब भी वह जीव स्वयं को इन भोगों और क्रियाओं से भिन्न ही अनुभव करता है, -यही अन्तर है ज्ञानी और अज्ञानी की दृष्टि में। जैसे कोई व्यभिचारिणी/चरित्रहीन-नारी भले ही पति के साथ रहती हो, फिर भी वह पति से प्यार नहीं करती, बल्कि प्रतिसमय पति से विमुख ही रहती है, जबकि अपने प्रेमी के साथ न रहने पर भी प्रतिसमय उसी का ध्यान करती है, उसी से प्यार करती है। ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव भले ही देह और संयोगों के बीच रहे, पर फिर भी उसका चित्त यानि उपयोग स्व की ओर उन्मुख और पर से विमुख ही रहता है। जैसे कोई धाय अर्थात् बच्चे को पालनेवाली, किसी बच्चे का पालन-पोषण करें, उसे गोद में बिठाये, यहाँ तक कि उसे दूध भी पिलाये फिर भी वह उस बच्चे को किसी और का ही बच्चा मानती है। अपने बच्चे की तरह पालन करती हुई भी स्वप्न में भी कभी उसको अपना बच्चा नहीं मानती है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव प्रतिसमय देह के साथ रहता है, देह की सारी क्रियायें भी करता है; लेकिन फिर भी उस धाय की तरह स्वप्न में कभी देह को अपना नहीं मानता। कहने का अभिप्राय यही है कि सम्यग्दृष्टि-जीव कर्म के उदय में नानाप्रकार के स्वांग रखता है, शुभ-अशुभ विविधप्रकार की क्रियायें भी करता दिखता है, शरीर और शरीर से संबंधित सभी कार्य करता है; लेकिन चित्त में प्रतिसमय इन क्रियाओं के प्रति हेय भाव ही वर्तता है। ‘‘मैं इन क्रियाओं को करते हुये भी इन क्रियाओं का मात्र ज्ञाता ही हूँ, कर्ता नहीं’’- ऐसी कर्तृत्व-बुद्धि का अभाव होने से उसे ‘निकलंक’ यानि कालिमा-रहित कहा जाता है, और वहीं अज्ञानी-जीव को पर में कर्तृत्व-बुद्धि वर्तने से ‘कलंकी’ कहा जाता है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसें निसि-वासर कमल रहै पंकही मैं, पंकज कहावै पै न वाकै ढिंग पंक है।
जैंसें मंत्रवादी विषधरसौं गहावै गात, मंत्र की सकति वाकै बिना विष-डंक है।।
जैंसें जीभ गहै चिकनाई रहै रूखे-अंग, पानी में कनक जैसैं काईसौं अटंक है।
तैंसैं ग्यानवंत नानाभाँति-करतूति ठानै, किरियाकौ भिन्न मानै यातें निकलंक है।। 5।।

शब्दार्थ :- जैंसें निसि-वासर कमल रहै पंकही में= जैसे रात-दिन कमल का फूल कीचड़ में रहता है, पंकज कहावै पै न वाकै ढिंग पंक है= पंकज भी कहलाता है, फिर भी उसके पास/स्वरूप में कीचड़ नहीं है, जैंसें मंत्रवादी विषधरसौं गहावै गात= जैसे मंत्रवादी अपने शरीर को विषधर अर्थात् नाग से डसवाता है, मंत्र की सकति वाकै बिना विष डंक है= लेकिन मंत्र की शक्ति के कारण उस पर विष का असर नहीं होता, जैसें जीभ गहै चिकनाई रहै रूखे-अंग= जैसे जीभ चिकनाई ग्रहण करके भी रूखी ही रहती है, पानी में कनक जैसैं काईसौं अटंक है= पानी में सोना जैसे काई से बेदाग रहता है, तैंसैं ग्यानवंत नानाभांति-करतूति ठानै= उसीप्रकार ज्ञानीजीव विभिन्नप्रकार की क्रियायें करते हैं, किरियाकौ भिन्न मानै यातें निकलंक है= परन्तु उन क्रियाओं से स्वयं को भिन्न मानते हैं, इसीलिए निकलंक है। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने सम्यग्दृष्टि-जीव को कर्म की क्रिया करते हुये भी निर्बंध सिद्ध किया था, उसी कथन को पुन: कुछ और उदाहरणों के माध्यम से इस छंद में स्पष्ट किया है। जैसे कमल का फूल, जो कीचड़ में ही खिलता है, दिन-रात कीचड़ में ही रहता है, नाम भी उसका ‘पंकज’ है, फिर भी उसके किसी कोने में भी कीचड़ का अस्तित्व नहीं होता, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टिजीव भी दिन-रात देह के साथ ही रहता है, संसारीजन उसे देह के नाम से ही संबोधित करते हैं, परन्तु फिर भी उसकी दृष्टि में देह में एकत्वबुद्धि का कोई अस्तित्व नहीं होता, देह में रहते हुये भी वह देह से भिन्न ही रहता है। जैसे कोई ‘सर्पवशीकरण-मंत्र-विद्या’ (गारुडी-विद्या) का जानकर हो, उसे कोई भयंकर-विषधर नाग काट भी ले; तो भी उन मंत्रों के कारण उसे उस नाग के विष का असर नहीं होता। ‘आगम के अनुसार कर्म का उदय किसी भी जीव को किसी भी समय आ सकता है’, सम्यग्दृष्टि-जीव के जीवन में भी पापोदय-जनित कितनी भी प्रतिकूलतायें आ जायें, वह उनसे कभी विचलित नहीं होता; क्योंकि उसके पास भी एक ‘वशीकरण-मंत्र’ है- कि ‘‘मैं तो इन कर्मोदय-जनित प्रतिकूलताओं से भिन्न मात्र जाननहार-तत्त्व हूँ’’- ऐसा अनुभवन होने से कर्मोदय-जनित विष का उस पर कोई असर नहीं होता। जैसे जीभ कितने भी चिकने-पदार्थों का भक्षण करे, पर फिर भी वह हमेशा रूखी ही रहती है, उसपर चिकनाई का कोई असर नहीं होता, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव के जीवन में भी पुण्योदयजनित कितनी भी अनुकूलतायें क्यों न आ जायें, वह कभी हर्षित होकर अभिमानी नहीं होता, उस समय भी वह स्वयं को इन सबसे भिन्न जाननहार ही अनुभव करता है। जैसे सोना कितनी भी देर तक पानी में रहे, पर काई उसे कभी स्पर्श भी नहीं करती है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव कितना भी भोगों के बीच में रहे, भोक्तृत्व-बुद्धिरूपी काई उसे कभी स्पर्श भी नहीं करती; क्योंकि उसकी दृष्टि तो प्रतिसमय अभोक्तृत्व-स्वभावी आत्मा पर ही रहती है। कहने का अभिप्राय यही है कि सम्यग्दृष्टि-जीव कर्मोदय-जनित नानाप्रकार की क्रियायें करते हैं, लेकिन उन क्रियाओं से स्वयं को प्रतिसमय भिन्न ही अनुभव करते हैं। पर में कर्तृत्व, देह में एकत्व, संयोगों में ममत्व, भोगों में भोक्तृत्व-बुद्धिरूपी कलंक का अभाव होने से वे ‘निकलंक’ है।

(दोहा)

पूर्व-उदै सनबंध, विषै भोगवै समकिती।
करै न नूतन-बन्ध, महिमा ज्ञान-विरागकी।। 6।।

शब्दार्थ :- पूर्व उदै सनबंध= पूर्व कर्म के उदय से, विषै भोगवै समकिती= सम्यग्दृष्टि-जीव विषयों का भोग करता है, करै न नूतन-बन्ध= नवीन-बंध नहीं करता, महिमा ज्ञान-विरागकी= यह ज्ञान और वैराग्य की महिमा है। विशेषार्थ :- इस छंद में ज्ञान और वैराग्य की महिमा के प्रभाव का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि पूर्व-कर्म के उदय के संबंध से वर्तमान में सम्यग्दृष्टि-जीव पंचेन्द्रिय के विषयों को भोगता हुआ दिखाई देता है, परन्तु फिर भी उसे नवीन-कर्म का बंध नहीं होता; क्योंकि उसके अंतरंग में अपने स्वभाव के प्रति ‘मैं तो मात्र जाननहार हूँ’, और पंचेन्द्रिय के विषय भोगों के प्रति अंतरंग में वैराग्य अर्थात् अनासक्ति का भाव वर्तता है।

(सवैया तेईसा)

सम्यकवंत सदा उर-अंतर, ज्ञान-विराग उभै-गुन धारे।
जासु प्रभाव लखै निज-लच्छन, जीव-अजीव-दसा निरवारै।।
आतम कौ अनुभव करि ह्वै थिर, आप तिरै अर औरनि तारै।
साधि सुदर्व लहै सिव-सर्म, सु कर्म-उपाधि-विथा वमि-डारै।। 7।।

शब्दार्थ :- सम्यकवंत सदा उर-अंतर= सम्यग्दृष्टि-जीव अपने अंतरंग में हमेशा, ज्ञान-विराग उभै गुन धारे= ज्ञान और वैराग्य दोनों गुण धारण करते हैं, जासु प्रभाव लखै निज-लच्छन= जिसके प्रभाव से अपने गुणों को देखते हैं, जीव-अजीव दसा निरवारै= जीव और अजीव की स्थिति का निवारण करते हैं, आतम कौ अनुभव करि ह्वै थिर= आत्मा का अनुभव करके स्थिर होते हैं, आप तिरै अर औरनि तारै= स्वयं तिरते हैं, औरों को भी तारते हैं, साधि सुदर्व लहै सिव सर्म= स्वद्रव्य को साधते हैं, और मोक्ष-सुख को प्राप्त करते हैं, सु कर्म उपाधि विथा वमि डारै= और कर्म की उपाधिरूप व्यथा को वमन/दूर करते हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ज्ञान और वैराग्य को सर्वश्रेष्ठ ही नहीं, मोक्ष का कारण भी कहा है। सम्यग्दृष्टि-जीव अंतरंग में इन दोनों गुणों को धारण करता है, अंतरंग में क्यों? क्योंकि जो जीव अंदर से

विरक्त होता है, उसकी चर्या में विरक्ति सहज दिखाई देती है।
नाश्नुते विषयसेवनेऽपि यत्स्वं फलं विषयसेवनस्य ना।
ज्ञानवैभव-विरागता-बलात्सेवकोऽपि तदसावसेवकः।। 3।।

सम्यग्दृष्टेर्भवति नियतं ज्ञान-वैराग्य-शक्ति:, स्वं वस्तुत्वं कलयितुमयं स्वान्यरूपाप्तिमुक्त्या। यस्माज्ज्ज्ञात्वा व्यतिकरमिदं तत्त्वतः स्वं परं च, स्वस्मिÂन्नास्ते विरमति परात्सर्वतो रागयोगात्।। 4।। संसार में प्रत्येक वस्तु परिणमनशील और स्वतंत्र है, कोई किसी के आधीन नहीं है। संयोगों का मिलना-बिछुड़ना पुण्य-पाप के आधीन है। देहादिक समस्त-पदार्थ अजीव हैं, जड़ हैं, क्षणभंगुर/ विनाशीक है, और मैं अनंत-गुणों का धारी, अजर, अमर, अविनाशी जीव-तत्त्व हूँ। जब जीव को अपने ज्ञान-गुण से जगत् की स्वचालित वस्तु-व्यवस्था का यथार्थ और सम्यक्-निर्णय होता है, तो सहज ही अंतरंग से वैराग्य प्रगट होता है। सम्यग्दृष्टि-जीव का ये सम्यक्-श्रद्धान ही उसे मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है। जब जीव को आत्मस्वरूप का सम्यक्-निर्णय होता है, स्वरूप की महिमा और अनंत-गुणों से परिचय होता है, तो स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ भी सहज चलता है। जीव का यही सम्यक्-पुरुषार्थ न केवल स्वयं को संसाररूपी-समुद्र को पार करने में सहायक होता है; बल्कि औरों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनता है। स्व-द्रव्य को साधते हुये अर्थात् अपने उपयोग को स्व-स्वरूप में केन्द्रित करते हुये और कर्मोदय-जनित उपाधि अर्थात् मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों का वमन करते हुए जीव अल्पसमय में मोक्ष-सुख को प्राप्त करता है।

(सवैया तेईसा)

जो नर सम्यकवंत कहावत, सम्यग्ज्ञान-कला नहि जागी।
आतम-अंग अबंध विचारत, धारत-संग कह हम त्यागी।।
भेष धरैं मुनिराज-पटंतर, अंतर मोह-महानल दागी।
सुन्न-हिये करतूति करै पर, सो सठ-जीव न होय विरागी।। 8।।

शब्दार्थ :- जो नर सम्यकवंत कहावत= जो व्यक्ति स्वयं को सम्यग्दृष्टि कहते हैं, सम्यग्ज्ञान-कला नहि जागी= (परन्तु जिनके) सम्यग्ज्ञान-कला जागृत नहीं हुई, आतम-अंग अबंध विचारत= आत्मा को बंधनमुक्त मानते हैं, धारत-संग कहैं हम त्यागी= परिग्रह धारण करके भी स्वयं को ‘त्यागी’ कहते हैं, भेष धरैं मुनिराजपटंतर= मुनिराज के समान भेष धारण करते हैं, अंतर मोह-महानल दागी= अंतरंग में मोहरूपी भयंकर-अग्नि धधक रही है, सुन्न-हिये करतूति करै पर= शून्य-हृदय से क्रियायें करता है, परन्तु सो सठ जीव न होय विरागी= वह जीव मूर्ख है, कभी विरागी नहीं हो सकता है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि सम्यग्ज्ञान के बिना चारित्र की कोई कीमत नहीं हैं, अर्थात् समस्त-क्रियायें व्यर्थ हैं। कहने का अभिप्राय यही है कि जो व्रत, तप, ध्यान आदि क्रियायें कर्मों की निर्जरा का कारण है, सम्यग्ज्ञान के अभाव में वही क्रियायें कर्मबंधन की कारण हैं। सम्यग्ज्ञान के अभाव में यदि कोई व्यक्ति स्वयं को सम्यग्दृष्टि मानकर चारित्र को अंगीकार करता है, स्वयं को बंधनमुक्त अर्थात् मोक्षमार्गी मानता है, परिग्रह को धारण करते हुये भी स्वयं को त्यागी कहता है, वह जीव विरागी नहीं मूर्ख है। क्योंकि ऐसी विपरीतता जिनधर्म में संभव नहीं है। संसार में नानाप्रकार के जीव हैं, कुछ जीव ऐसे हैं, जिन्हें आत्मस्वरूप का श्रद्धान और ज्ञान तो है नहीं, और भावावेश में या देखादेखी बाहर में मुनिवेष अंगीकार करते हैं, और मुनिचर्या का पालन भी करते है, कविवर कहते हैं कि वह मुनिपना व्यर्थ है; क्योंकि एेसे जीवों को मिथ्यात्व का सद्भाव होने से अंतरंग में मोहरूपी-अग्नि प्रतिसमय धधकती रहती है। ऐसे जीव शून्य-हृदय से या भावरहित सम्यग्द्दष्टिः स्वयमयमहं जातु बन्धो न मे स्या-दित्युत्तानोत्पुलकवदना रागिणोऽप्याचरन्तु। आलम्बन्तां समितिपरतां ते यतोऽद्यापि पापा, आत्मानात्मावगम-विरहात् सन्ति सम्यक्त्व-रिक्ता: ।। 5।। मुनियों का बाहरी-आचरण भी पालते हैं, लेकिन जैसे अंकरहित-शून्य की कोई कीमत नहीं है, उसीप्रकार भावरहित-क्रिया या कहें सम्यक्त्व के बिना व्यवहार-चारित्र की भी कोई कीमत नहीं हैं। हे आत्मन्! आगम के अनुसार सम्यक् रूप से चारित्र का पालन तो सम्यग्दृष्टि-जीव को ही होता हैं। बिना सम्यग्दर्शन के व्रत, तप, शील, संयामादि व्यवहार-चारित्र कार्यकारी नहीं है। ‘आचार्य योगीन्द्र देव’ ‘योगसार जी’ में कहते हैं- वय-तव-संजम-मूलगुणु, मूढहँ मोक्खु ण वुत्तु। जावु ण जाणइ इक्कु परु सुद्धउ-भाव पवित्तु।। -(योगसार जी गाथा नं 29) अर्थात् जब तक एक परमशुद्ध श्रेष्ठतम (आत्मा) का ज्ञान नहीं होता, तब तक मूढ़-लोगों के जो व्रत-तप-संयम और मूलगुण आदि हैं, उन्हें मोक्ष का कारण नहीं कहा जा सकता है। वहीं अगली-गाथा में आचार्य भगवन् कहते हैं कि यदि जीव व्रत, तप, संयम, शील के साथ निर्मल-आत्मा को भी पहिचानता है, तो वह शीघ्र ही शिव-सुख को प्राप्त करता है- जइ णिम्मलु अप्पा मुणइ वय-संजम-संजुत्तु। तो लहु पावइ सिद्धि-सुहु इउ जिणणाहहँ उत्तु।। -(योगसार जी गाथा नं 30) कहने का अभिप्राय यही है कि आत्मानुभूति के बिना व्यवहार-चारित्र ठीक उसीप्रकार है, जैसे बिना बीज डाले फसल के उगने का इंतजार करना। जैसे कोई किसान खेत में बीज तो ना डाले और बाकी सब काम समय पर और अवश्य करे; जैसे खूब हल चलाये, खाद-पानी भी डाले, कीड़ों से भी सुरक्षित रखे, यानि हरप्रकार का पुरुषार्थ करे, और फसल आने का इंतजार भी करे, लेकिन क्या फसल आयेगी? नहीं, क्यों? अरे भाई! जब बीज ही नहीं डाला, तो फसल कैसे उगेगी? ठीक उसीप्रकार जब तक निश्चय-चारित्र का बीज यानि सम्यग्दर्शन नहीं होगा, तब तक व्यवहार में भी सम्यक्-चारित्ररूपी फसल नहीं लहलहायेगी, और ना ही मोक्षरूपी फल लगेगें।

(सवैया तेईसा)

ग्रन्थ रचै, चरचै सुभ-पंथ, लखै जगमैं विवहार सुपत्ता।
साधि-संतोष अराधि-निरंजन, देह सुसीख, न लेइ अदत्ता।।
नंग-धरंग फिरै तजि-संग, छकै सरवंग मुधारस-मत्ता।
ए करतूति करै, सठ पै, समुझै न अनातम-आतम-सत्ता।। 9।।

शब्दार्थ :- ग्रन्थ रचै, चरचै सुभ-पंथ= ग्रंथों की रचना करें, शुभ-मार्ग की चर्चा करें, लखै जगमैं विवहार सुपत्ता= संसार में सुपात्र को देखकर व्यवहार करें, साधि-संतोष अराधि-निरंजन= संतोष धारणकर रागद्वेषरूपी-अंजन से रहित की आराधना करें, देह सुसीख न लेइ अदत्ता= अच्छी सीख/उपदेश दें, बिना दिये कुछ भी ग्रहण न करें, नंग-धरंग फिरै तजि-संग= परिग्रह छोड़कर नग्न-अवस्था में विचरण करें, छकै सरवंग मुधारस-मत्ता= सर्वांग में छककर मूढ़ता के रस में धुत्त हों, ए करतूति करै सठ पै= (ऐसे जीव कितनी भी) क्रियायें करें, पर वे मूर्ख हैं, समुझै न अनातम-आतम सत्ता= आत्मा और अनात्मा के स्वरूप को नहीं समझते। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने अंतरंग में आत्मस्वरूप के सम्यक्-श्रद्धान से रहित, और बाहर में मुनिवेष धारण करनेवाले द्रव्यलिंगी-मुनि के स्वरूप का वर्णन किया है। जबतक जीव को स्व-पर का भेदविज्ञान नहीं है, तब तक उसकी मुनिधर्म-संबंधी समस्त-क्रियायें निष्फल/व्यर्थ हैं। फिर चाहे वह मुनिवेषधारी-जीव सुन्दर-शास्त्र-रचना करे, चर्चा करे, बहिरंग-मुनिधर्म का निरतिचार-पालन करे, लोक में भी सुसंगत-जीवों के साथ ही व्यवहार करें, आचरण में संतोषीप्रवृत्ति हो अर्थात् अन्याय, अनीति, अनाचार से कोई वास्ता न हो, ‘अंजनरहित’ यानि निर्दोष अर्थात् जन्म-मरण आदि समस्त-दोषों से रहित अरिहंत, सिद्ध-परमात्मा की आराधना करे। कहने का अभिप्राय है कि वीतरागी सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का उपासक हो, अच्छी शिक्षा दें, बिना दिया कुछ भी ग्रहण न करे अर्थात् चोरी आदि समस्त पापों से रहित हो, संपूर्ण-परिग्रह का त्यागकर नग्न रहते हों, फिर भी वह मुनिपना निरर्थक है। हे अात्मन्! आगम में आत्मज्ञान के अभाव में होनेवाले अर्थात् अज्ञानतापूरक ्व किये जानेवाले इस तपश्चरण को ‘बालतप’ और ‘मूढ़ता’ की संज्ञा दी गई है, और द्रव्यलिंगी-मुनि इन मूढ़ताओं के रस में ही अानंदित है, अर्थात् देह-आश्रित होनेवाली इन जड़-क्रियाओं में ही संतषु ्ट हैं, वह इन भावरहित-क्रियाओं से ही अपने को मोक्षमार्गी मानता है। कविवर कहते हैं कि मोक्षमार्ग की दृष्टि से ऐसे जीव की सभी क्रियायें निरथ ्र क हैं, क्योंकि जबतक जीव को आत्मा और अनात्मा की भिन्नता का ज्ञान नहीं है, अर्थात् मैं त्रिकालशुद्ध चेतन-आत्मा हू,ँ और अनात्मा अर्थात् जिसमें चेतनता का अस्तित्व ही नहीं है, ऐसे मोह, राग, द्वेषादि समस्त विकारी-भाव और देहादिक समस्त संयोगी जड़-पदार्थों से पूर्णतः भिन्न हू।ँ ''मैं तो मात्र जाननहार तत्त्व हू,ँ इन जड़-क्रियाओं का कर्ता मैं नहीं हू’ँ '- जबतक जीव को ऐसा श्रद्धान नहीं है, तबतक वह जीव मुनिधर्म के अनुरूप कितनी भी क्रियायें करे, तो भी वह शठ है अर्थात् मूर्ख है, विरागी नहीं है।

(सवैया तेईसा)

ध्यान धरै, करै इंद्रिय-निग्रह, विग्रहसौं न गनै निज-नत्ता।
त्यागि विभूति, विभूति मढ़ै तन, जोग गहै, भवभोग-विरत्ता।।
मौन रहै, लहै मंदकषाय, सहै वध-बंधन, होइ न तत्ता।
ए करतूति करै सठ पै, समुझै न अनातम-आतम सत्ता।। 10।।

शब्दार्थ :- ध्यान धरै करै इंद्रिय-निग्रह= स्थूलरूप से ध्यान करें, इंद्रियों को वश में भी करे, विग्रहसौं न गनै निज-नत्ता= अपने शरीर से नाता नहीं रखते, त्यागि विभूति, विभूति मढ़ै= बाह्य-वैभव को त्यागकर, भभूति लगायें, तन-जोग गहै भवभोग-विरत्ता= काय-योग ग्रहण करे, संसार और विषयभोगों से विरक्त हों, मौन रहै लहै मंदकषाय= चुप रहें, मंद-कषाय को प्राप्त हों, सहै बध-बंधन होइ न तत्ता= वध-बंधन सहन करें, फिर भी दुःखी न हों, ए करतूति करै सठ पै= इतनी क्रियायें करने पर भी मूर्ख, समुझै न अनातम-आतम-सत्ता= अनात्मा और आत्मा के स्वरूप को नहीं समझता। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने पुन: स्पष्ट किया कि भेदविज्ञान अर्थात् चेतन और अचेतन के भेद को जाने बिना समस्त-आचरण मिथ्या है। जगत् में ऐसे अनेकाें जीव हैं, जो मुक्ति पाने के लिए मुनिवेष धारणकर अनेकानेक-क्रियायें करते हैं, कईप्रकार के कठिन से कठिन आसन लगाकर ध्यान करते हैं। पाँचों-इन्द्रियों को अपने वश में करते हैं, जैसे जमीन पर सोना, सर्दी-गर्मी-बरसात सहन करना, दिन में एक बार आहार करना, उसमें भी कई-कई दिनों तक निर्जल-उपवास भी करना, वनों और गुफाओं में रहना इत्यादि क्रियायें करते हैं। शरीर से कोई नाता नहीं रखते अर्थात् शरीर से रंचमात्र भी स्नेह नहीं रखते, जगत् के समस्त वैभव, मान-सम्मान, धनादि का त्याग करते हैं, बहुत से भेषधारी अपने तन पर भभूति लगाकर घोर-साधना करते हैं, तरह-तरह के प्राणायाम, योगा आदि भी करते हैं, संसार और भोगों से पूरी तरह विरक्त रहते हैं, सुनसान बियावान-जंगलों में शरीर को नानाप्रकार के कष्ट देकर साधना करते हैं, कई दिनों तक मौन रहते हैं, कषाय में भी इतनी मंदता होती है कि उनके शरीर को काटकर नमक भी भर दें, तो आँख का कोना भी लाल न हो, वध-बंधन आदि अनेक दु:ख, कितने भी उपसर्ग-परीषह आयें, सब सहन करते हुये रंचमात्र भी दु:खी नहीं होते। आश्चर्य कि बात है कि वह जीव इतनी सब क्रियायें करता है, किसलिये? एकमात्र सुखी होने के लिये, मुक्ति पाने के लिए; फिर भी न तो वह सुखी होता है और न ही मुक्त; क्योंकि वह आत्मा और अनात्मा या स्व और पर की भिन्नता को नहीं समझता।

(चौपाई)

जो बिनु-ग्यान क्रिया अवगाहै, जो बिनु-क्रिया मोखपद चाहै।।
जो बिनु-मोख कहे मैं सुखिया, सो अजान मूढनि में मुखिया।। 11।।

शब्दार्थ :- जो बिनु-ग्यान क्रिया अवगाहै= जो बिना ज्ञान के क्रिया/चारित्र को ग्रहण करे, जो बिनु-क्रिया मोखपद चाहै= जो बिना क्रिया/चारित्र के मोक्ष प्राप्त करना चाहे, जो बिनु मोख कहे मैं सुखिया= जो बिना मोक्ष प्राप्त किये ही कहे कि ‘‘मैं सुखी हूँ’’, सो अजान मूढनि में मुखिया= वह अज्ञानी-जीव, मूर्खों का मुखिया है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने उन सभी जीवों की चर्चा की है, जो मोक्ष की प्राप्ति के लिए स्व-पर में भेदविज्ञान को छोड़कर बाकी सब कुछ करना चाहते हैं। संसार में नानाप्रकार के जीव है, कुछ जीव एेसे हैं जो बिना ज्ञान अर्थात् सम्यग्ज्ञान प्राप्त किये बिना मात्र चारित्र के बल पर ही मोक्ष पाना चाहते हैं, इसलिये वे चारित्र का तो यथायोग्य-पालन करते हैं, परन्तु आत्मश्रद्धान बिल्कुल नहीं करते हैं। कविवर कहते हैं कि वे जीव मूर्ख हैं, क्योंकि स्वयं को जाने बिना ज्ञान कभी सम्यक् नहीं होता और जब ज्ञान सम्यक् नहीं, तो क्रिया सम्यक् कैसे होगी? जबतक हमें यह नहीं पता होगा कि मैं कौन हूँ? मेरा क्या स्वभाव है? मुझे सुखी होना है, तो मेरे लिये प्रयोजनभूत क्या है? उसके लिए मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? तबतक हम जो भी क्रिया करेगें, वह सम्यक् नहीं होगी। इसीलिए पहले सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति और फिर क्रिया या चारित्र के पालन का उपदेश आगम में दिया गया है। संसार में कुछ जीव ऐसे हैं, जो बिना क्रिया या चारित्र पालन किये ही मोक्ष पाना चाहते हैं, अर्थात् ऐसे जीव शास्त्र-स्वाध्याय तो खूब करते हैं, दिन-रात आत्मा की ही बात करते हैं, लेकिन चारित्रपरक समस्त क्रियाओं को कर्मकांड मानते हैं। इसलिये विवेकशून्य होकर अभक्ष्य-भक्षण, अन्यायअनीतिपूर्वक आचरण भी करते हैं, अर्थात् विचारों में, शब्दों में तो आत्मा, पर आचरण में तदनुरूप कुछ भी नहीं। क्योंकि वे तो ये मानते हैं कि ‘‘आत्मा तो न कुछ खाता है, और न ही कुछ करता है, ये भोजन और परिणमन-संबंधी क्रिया तो जड़ में हो रही है, मैं इस भोजन या परिणमन-संबंधी क्रिया का कर्ता नहीं हूँ, मैं तो अकर्ता-स्वभावी आत्मा हूँ।’’ कविवर कहते हैं ‘‘वे जीव भी मूर्ख ही हैं।’’ संसार में कुछ जीव ऐसे भी हैं, जो ये मानते हैं कि ‘‘मैं तो मुक्त ही हूँ, आत्मा कभी कर्मों से बँधा ही नहीं, सो मुझे मोक्ष-प्राप्ति की आवश्यकता ही नहीं है, मैं तो वर्तमान में भी पूर्ण-सुखी हूँ,’’- ऐसे जीव भी मूर्ख ही हैं। कवि तो यहाँ तक कहते हैं कि ये जीव अज्ञानी और मूर्ख ही नहीं है, ‘मूर्खों के भी मुखिया’ अर्थात् महामूर्ख हैं। सम्यग्ज्ञान अर्थात् जीवादि-पदार्थ जिस रूप में है, उनको ज्यों का त्यों जानना। और सम्यक्चारित्र अर्थात् सम्यक्-आचरण, जिन क्रियाओं से कर्मों का ग्रहण हो, उनके त्याग का नाम सम्यक्-चारित्र है। कई बार ऐसा कहने में आता है कि सम्यग्दर्शन हो गया, तो मोक्ष तो हो ही जायेगा। - इस भ्रांति को दूर करने में यह कथन बहुत कारगर साबित होता है कि अकेला सम्यग्दर्शन ही मोक्ष मार्ग नहीं है, सम्यकज्ञान, सम्यकचारित्र भी साथ होना चाहिये। हालॉकि ये बात सही है कि सम्यग्दर्शन होने से आपकी गाड़ी सही रास्ते पर तो आ गई है, पर अगर गाड़ी वहीं खड़ी रही, तो मंजिल पर कैसे पहुँचेगी? इसलिये तीनों का होना बहुत जरूरी है। सम्यग्ज्ञान तो सम्यग्दर्शन के साथ ही हो जाता है, पर सम्यक्चारित्र के लिये पुरुषार्थ जरूरी है। हाँ, यह बात भी सत्य है कि ये पुरुषार्थ सहज होता है। जब श्रद्धा, ज्ञान सम्यक् होते हैं, तो जीव स्वरूप में लीन होने का पुरुषार्थ करता है; तब बाहर में कषाय की मंदता से व्रतादिक और 28 मूलगुणों के पालन के भाव सहज आते ही हैं, करने नहीं पड़ते, फिर भी ये व्यवहार-कथन ही है। निश्चय से तो अपने अात्मस्वरूप का सच्चा-श्रद्धान, सच्चा-ज्ञान, और उसमें लीनता ही सच्चा मोक्ष-मार्ग है।

(सवैया इकतीसा)

जगवासी-जीवनसौं गुरु उपदेस कहैं, तुमैं इहां सोवत अनंतकाल बीते हैं।
जागौ ह्वै, सचेत-चित्त समता-समेत सुनौ, केवलि-वचन जामैं अक्ष-रस जीते हैं।।
आवौ मेरे निकट, बताऊँ मैं तुम्हारे गुन, परम-सुरस भरे करमसौं रीते हैं।
ऐसे बैन कहैं गुरु, तौऊ तैं न धरे उर, मित्त कैसे पुत्त किधौं चित्र कैसे चीते हैं।। 12।।

शब्दार्थ :- जगवासी-जीवनसौं गुरु उपदेस कहैं= संसार के जीवों से गुरु उपदेश-स्वरूप कहते हैं, तुमैं इहां सोवत अनंतकाल बीते हैं= तुम्हें यहाँ सोते हुए अनंतकाल बीत गया है, जागौ ह्वै सचेत-चित्त समता-समेत सुनौ= जागृत होकर, ध्यानपूर्वक समताभाव से सुनो, केवलि-वचन जामैं अक्ष-रस जीते हैं= केवली के वचन, जिन्होंने इन्द्रियों के रस अर्थात् विषयों के आकर्षण को जीता है, आवौ मेरे निकट आओ बताऊं मैं तुम्हारे गुन= आओ, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे गुण/हित बताता हूँ, परम-सुरस भरे करमसौं रीते हैं= परमानंद-रस से भरे हुये हैं, कर्म से खाली हैं, ऐसे बैन कहै गुरु तौऊ तैं न धरे उर= गुरु ऐसे वचन कहते हैं, फिर भी तुम हृदय में धारण नहीं करते, मित्त कैसे पुत्त किधौं चित्र कैसे चीते हैं= क्या तुम मिट्टी के पुतले हो या तस्वीर में बने चित्र/ आकृति हो। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने हम अज्ञानी-जीवों पर की गई आचार्यों की करुणा का बहुत ही सुंदर और मधुर-शब्दों में वर्णन किया है। हे जगत् के जीवो! तुम्हें यहाँ सोते हुए अनंतकाल बीत गया अर्थात् अनादिकाल से आज तक यह जीव मोह की मदिरा पीकर गहरी-निद्रा में सोया हुआ है। एेसा क्यों कहा आचार्यों ने? क्योंकि अनादि से आज तक हमने सबको जाना, परन्तु एकमात्र अपने स्वरूप को नहीं पहचाना, और मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों में ही लिप्त रहे, इसीलिये आचार्य भगवन् कहते हैं कि ‘‘हे चेतन! अब तो जागो! सचेत होकर, सावधान होकर, शांत-चित्त से यानि समताभाव धारण करके मेरी बात सुनो। हे आत्मन्! ये मेरे नहीं, केवली के वचन हैं, जिन्होंने अक्षरस अर्थात् पंचेन्द्रिय कि विषयों को जीता है। और जब तुम इन वचनों को सुनोगे, तो आज तक जिन पंचेन्द्रिय के विषयों ने तुम्हें अपने आधीन कर रखा था, तुम भी उन विषयों पर विजय प्राप्त कर सकोगे’’। ''हे मोह की चिर-निद्रा में सुप्त-जीवो! तुम मेरे पास तो आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे अनंत-गुणों से परिचित करवाऊँगा, तुम अानंद-रस से परिपूर्ण शुद्ध चेतन-तत्त्व हो, और कर्म से रीते हो अर्थात् जहाँ

आसंसारात्प्रतिपदममी रागिणो नित्यमत्ताः, सुप्ता यस्मिन्नपदमपदं तद्विबुध्यध्वमन्धाः।
एतैतेत: पदमिदमिदं यत्र चैतन्यधातुः, शुद्धः शुद्धः स्वरस-भरतः स्थायि-भावत्वमेति।। 6।।

मोह-राग-द्वेष, पुण्य-पाप आदि विकारी-भावों का तो अस्तित्व भी नहीं है।‘’ कैसी बिडम्बना है कि आचार्य भगवन् इतने मधुर-शब्दों में हमें हमारे ही हित की बात कह रहे हैं, फिर भी हम उन वचनों को अपने हृदय में धारण नहीं करते। तब गुरुजी कहते हैं कि-‘’ ऐसा लगता है कि या तो तुम मिट्टी के पुतले हो या फिर तस्वीर में बने चित्र के समान हो; क्योंकि जैसे मिट्टी के पुतले से या तस्वीर में बने चित्र से कुछ भी कहो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है; ठीक उसीप्रकार हम इतने स्नेह और वात्सल्य से तुम्हें तुम्हारी ही निधि बतला रहे हैं, और तुम हो कि मानना तो दूर, सुनना भी नहीं चाहते हो? कैसी विचित्र-महिमा है मोह-ग्रसित हम अज्ञानी-जीवों की।

(दोहा)

एते पर बहुरौं सुगुरु, बोलें वचन-रसाल।
सैन-दसा जागृत-दसा, कहै दुहूँ की चाल।। 13।।

शब्दार्थ :- एते पर बहुरौं सुगुरु= इतनी बात होने पर पुनः सुगुरु, बोलें वचन-रसाल= मीठे-वचनों में बोले, सैन-दसा जागृत-दसा= शयनदशा और जागृतदशा, कहै दुहूँ की चाल= दोनों की स्थिति को कहता हूँ । विशेषार्थ :- इस छंद में गुरु की प्रतिज्ञा का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि इतने पर भी दयालुगुरु बहुत ही मीठे-शब्दों में जीव की ‘शयनदशा’ (अज्ञानभाव) और ‘जागृतदशा’ (ज्ञानभाव) का वर्णन करते हैं। कहने का अभिप्राय यही है कि हम अज्ञानी-जीव तो ढीठ है, बेसुध है, सुनने को तैयार भी नहीं है, पर फिर भी आचार्यो की, गुरुओं की करुणा तो देखो कि वे हमें हमारे हित के लिये, हमें हमारी मन:स्थिति का परिचय करवाने की प्रतिज्ञा कर रहे हैं।

(सवैया इकतीसा)

काया-चित्रसारी में करम-परजंक भारी, माया की संवारी सेज चादरि-कलपना।
सैन करै चेतन अचेतनता-नींद लिये, मोह की मरोर यहै लोचन कौ ढपना।।
उदै-बल जोर यहै स्वासकौ सबद-घोर, विषै-सुख-कारज की दौर यहै सपना।
ऐसी मूढ़-दसामैं मगन रहै तिहू-ँ काल, धावै भ्रमजाल में न पावैं रूप अपना।। 14।।

शब्दार्थ :- काया-चित्रसारी में करम-परजंक भारी= शरीररूपी शयनागार में कर्मरूपी भारी-पलंग, माया की संवारी सेज चादरि कलपना= छल-कपट से सजी सुन्दर सेज/बिस्तर पर कल्पना की चादर (ओढ़कर), सैन करै चेतन अचेतनता नींद लिये= जीव सो रहा है, जड़ की तरह गहरी-नींद में, मोह की मरोर यहै लोचन कौ ढपना= मोह की तीव्रता से आँखें बंद हैं, उदै-बल जोर यहै स्वासकौ सबद घोर= कर्मोदय का जोर, श्वास का बहुत शोर, विषै-सुख-कारज की दौर यहै सपना= विषय-सुख को पाने के लिए की दौड़ रहा है, यह सपना (देख रहा है), ऐसी मूढ़दसा में मगन रहै तिहुँ-काल= ऐसी अज्ञानदशा में तीनों काल मगन रहता है, धावै भ्रमजाल में न पावैं रूप अपना= भ्रमरूपी जाल में दौड़ता है, लेकिन अपने स्वरूप को प्राप्त नहीं करता। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने अनादि से मोह की निद्रा में सुप्त हम अज्ञानी-जीवों की वास्तविक- स्थिति का बहुत ही सुंदर-चित्रण किया है। जैसे लोक में संसारी-प्राणी अपने आलीशान-महल में सुंदरपलंग पर बेसुध होकर सोता है। वह मात्र सोता ही नहीं नये-नये सपने भी बुनता है, और उन सपनों के पूरा होने के लिये योजनायें भी बनाता है; लेकिन सपने देखते-देखते कब सुबह हो जाती है, और सारे सपने चकनाचूर हो जाते हैं- इसे पता ही नहीं चलता। ठीक वैसा ही चित्रण कवि ने इस छंद में किया है। कविवर कहते हैं शरीर रूपी शयनागार में कर्मरूपी भारी पलंग है, शयनागार यानि विश्राम स्थल जो हमें एक निश्चित अवधि के लिये ही मिला है, समय पूरा होते ही खाली करना पड़ेगा, ‘भारी’ इसलिए क्योंकि अनंत संसार का अनुबध ं करनेवाली अनंतानुबध ं ी जो मौजूद है, छल कपट के प्रपंचों से बुनी पर बाहर से सजी-संवरी सेज सजी हुई है, जिस पर कल्पनाओं की चादर रखी है, सच भी यही है जीव की मन:स्थिति भी ऐसी ही है वास्तविकता में कुछ हो न हो पर कल्पनाओं की उड़ान हमेशा ऊँची ही रहती है, उस पलंग पर जीव-राजा अचेतन होकर अर्थात् स्वयं के चेतनस्वरूप को भूलकर अचेतन की तरह लेटा हुआ है, जैसे ठंडी हवा लगते ही पलकें अपने आप झुकने लगती है, ठीक उसीप्रकार मोह के तीव्र झकोरों से पलकें स्वत: ही बंद होने लगी है। जैसे गहरी नींद में होने पर घुरकने या खर्राटों की तेज आवाज आती है, ठीक उसीप्रकार इधर कर्मोदय का जोर और उधर साँसों की तेज आवाज होने पर भी ये जीव-राजा चैन से सोया है, सोया ही नहीं सपने देखने में भी मस्त है, सुख की चाह में पंचेन्द्रिय के विषय-भोंगों को जुटाने और उनको भोगने की चाहत में मगन- ऐसी मूढता या अज्ञानतापूर्ण स्थिति में ये जीव तीनों काल अर्थात् प्रतिसमय दौड़ता रहता है, इस भ्रम में कि अब सुख मिलेगा, अब सुख मिलेगा, और अपने वास्तविक स्वरूप से अनजान रहते हुये इस बीच कब आयु पूरी हो जाती है, इसे पता ही नहीं चलता, और फिर वही चक्र नया शरीर, नये सपने, इसी तरह अनंतकाल बीतता चला गया।

(सवैया इकतीसा)

चित्रसारी न्यारी, परजंक न्यारौ, सेज न्यारी, चादरि भी न्यारी, इहां झूठी मेरी थपना।
अतीत-अवस्था सैन निद्रावाहि कोउ पै, न विद्यमान पलक न यामैं अब छपना।।
स्वास औ सुपन दोऊ निद्रा की अलंग बूझै, सूझै सब अंग लखि आतम दरपना।
त्यागी भयौ चेतन, अचेतनता भाव त्यागि, भालै दृष्टि खोलिकैं संभालै रूप अपना।। 15।।

शब्दार्थ :- चित्रसारी न्यारी परजंक न्यारौ सेज न्यारी= (मुझसे)शयनागार भिन्न, पलंग भिन्न, सेज भिन्न, चादरि भी न्यारी इहां झूठी मेरी थपना= चादर भी भिन्न है, यहाँ मेरी स्थापना/अस्तित्व भी झूठा है, अतीतअवस्था सैन निद्रावाहि कोउ= अतीतकाल की सोने की अवस्था में सोनेवाला भी कोई और था, पै न विद्यमान पलंक न यामैं अब छपना= अब वर्तमान में न वह पलंग है न उसमें मेरा अस्तित्व है, स्वास औ सुपन दोऊ निद्रा की अलंग बूझै= श्वास और स्वप्न दोनों नींद के संयोग से थे, सूझै सब अंग लखि आतम-दरपना= अब आत्म-दर्पण में अपने गुण साफ दिखाई दे रहे हैं, त्यागी भयौ चेतन अचेतनता-भाव त्यागि= अब चेतन अचेतनता-भाव त्यागकर त्यागी हुआ है, भालै दृष्टि खोलिकैं संभालै रूप अपना= और अच्छे से आँख खोलकर अपने आत्मस्वरूप को संभालता है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने उस स्थिति का वर्णन किया है, जब निरन्तर भेदविज्ञान करते हुये सम्यक्- श्रद्धानरूप आत्मानुभति ू होने से जीव का ज्ञान भी सम्यक् हो गया है। सम्यग्ज्ञान से पूर्व सभी वस्तुओं में जो ममत्वपना भासित हो रहा था, अब वे सभी वस्तुयें स्वयं से भिन्न दिखाई दे रही हैं। शरीररूपी शयनागार, कर्मरूपी पलंग, मायाजनित सेज, और कल्पना की चादर, -इनमें अब उसे अपना अंश भी नजर नहीं आता, अर्थात् देह से, मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों, कषायों से, सांसारिक समस्त-क्रियाओं से भेदज्ञान वर्त रहा है। यद्यपि अभी सब चीजें यथावत् जैसी थीं, जहाँ थीं, वैसी ही हैं, कुछ भी नहीं बदला है; बस दृष्टि बदल गई, पहले जहाँ मोह की धारा चल रही थी, अब वहाँ ज्ञान की धारा बह रही है। मोही-जीव की अतीत में जो सुप्त-अवस्था थी, ज्ञान प्रकट होने पर जीव को अनुभव होता है कि वह अवस्था मेरी नहीं थी, वो सोनेवाला कोई और था, अब तो मुझे वर्तमान का एक-पल भी उस मोहनिद्रा-रूप नहीं बिताना है। ये श्वास और स्वप्न दोनों ही नींद से संबंध रखते हैं; क्योंकि लौकिक में भी जब जीव सोता है, तभी स्वप्न और श्वास की आवाज (खर्राटे) आती है। उसीप्रकार कर्मोदय का जोर और श्वास के चलने का संबंध भी मोह से हैं, वर्ना जीव तो समस्त-कर्मों से त्रिकाल भिन्न, अजर-अमर-अविनाशी-तत्त्व है। सम्यग्ज्ञान होने से आत्मारूपी-दर्पण में अब जीव को अपने समस्त-गुण प्रत्यक्ष और स्पष्ट-प्रतिभासित हो रहे हैं, इसलिये चेतन-आत्मा स्वरूप के विस्मरणरूपी अचेतनत्वरूप-भाव को त्यागकर भलीभाँति अपने ज्ञानरूपी नेत्रों को खोलकर स्वरूप को संभालता है अर्थात् स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ करता है।

(दोहा)

इह-विधि जे जागे पुरुष, ते शिवरूप सदीव।
जे सोवहिं संसार में, ते जगवासी-जीव।। 16।।

शब्दार्थ :- इह-विधि जे जागे पुरुष= इसप्रकार जो जागृत-पुरुष हैं, ते शिवरूप सदीव= वे हमेशा मोक्षस्वरूप ही हैं, जे सोवहि संसार में= जो संसार में सोते है ते जगवासी-जीव= वे संसारी-जीव हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने पिछले दोनों छंदों में वर्णित ‘जीव की शयन और जागृत-अवस्थाओं’ का फल बताया है। जो जीव ऊपर-वर्णित भेदविज्ञान और आत्मानुभति ू करते हुये प्रतिसमय सचेत रहते हैं, वे संसार में रहते हुये भी मोक्षस्वरूप ही हैं क्योंकि उन जीवों को मोक्ष-प्राप्ति का पुरुषार्थ शुरू हो गया है, और अल्पकाल में ही मोक्ष प्राप्त करेगें। लेकिन जो जीव मोह की निद्रा में अचेत हैं अथवा संसार में ही मगन हैं; जिन्हें अपने स्वरूप की अनुभति ू तो दूर उसके बारें में कुछ पता तक नहीं है, वे जीव कहीं भी रहें, संसारी ही हैं, और मुक्ति की मंजिल उनसे कोसों दूर हैं।

(दोहा)

जो पद भौपद-भय हरै, सो पद सेऊ अनूप।
जिहि पद-परसत और पद, लगै आपदारूप।। 17।।

शब्दार्थ :- जो पद भौपद-भय हरै= जो पद संसार के पदों का भय दूर करे, सो पद सेऊ अनूप= वह उपमारहित-पद शीघ्र स्वीकार करो, जिहि पद-परसत और पद लगै आपदारूप= (क्योंकि) इस पद को स्पर्श करने पर अन्य सभी पद कष्टरूप लगते हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कविवर पुन: संसारी-जीव को प्रेरणा देते हुये कहते हैं कि ''हे आत्मन्! अनादिकाल से तुम संसार में ही हो, और दुःखी भी, आज तक जितने भी पद या सम्मान तुमने प्राप्त किये, उनमें से किसी भी पद को प्राप्त करने के बाद न तो तुम सुखी हुये और न ही जन्म-मरण की वेदना से तुम्हें छुटकारा मिला। इसलिये हे भाई! अब तुम उस पद को प्राप्त करने का पुरुषार्थ करो, जिससे तुम्हें जन्ममरण के इस चक्र से शीघ्रतिशीघ्र छुटकारा मिले। वह पद उपमारहित है अर्थात् जगत् में उसकी तुलना में कोई पद नहीं है अथवा उसकी तुलना संसार की किसी भी वस्तु से नहीं की जा सकती है। कहने का

अभिप्राय यही है कि उसकी तुलना में जगत् में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो तुझे सुखी कर सके।
एकमेव हि तत्स्वाद्यं, विपदामपदं पदम्। अपदान्येव भासन्ते, पदान्यन्यानि यत्पुरः।। 7।।

जिस पद को स्पर्श करने पर जगत् में विद्यमान सभी पद कष्टदायक लगने लगते हैं, उस अनुपम सुखद-पद को प्राप्त करने के बाद जगत् का प्रत्येक पदार्थ निस्सार लगने लगें, कष्टरूप लगने लगे; तुम उस पद को अंगीकार करो। आखिर कौन-सा पद है वह, जिसकी आचार्यों ने इतनी महिमा वर्णित की है? वह है निजात्म-स्वरूप की अनुभूति और रमणता का पद। जिसके आगे संसार के सभी पद ‘अपद’ के समान है।

(सवैया इकतीसा)

जब जीव सोवै, तब समुझै सुपन सत्य, वही झूठ लागै, तब जागै नींद खोइकै।
जागै कहै ‘‘यह मेरौ तन, मेरी सौंज’’, ताहू झूठ मानत, मरन-तिथि जोइकै।।
जानै निज-मरम, मरन तब सूझै झूठ, बूझै जब और अवतार-रूप होइकै।
वाहू अवतार की दसा में फिरि यहै पेच, याही भाँति झूठौ जग देख्यौ हम टोइकै।। 18।।

शब्दार्थ :- जब जीव सोवै, तब समुझै सुपन सत्य= जब जीव सोता है, तब समझता है, कि सपने सच होते हैं, वही झूठ लागै तब जागै नींद खोइकै= वही झूठ लगता है, जब नींद से जागता है, जागै कहै यह मेरौ तन मेरी सौंज= जागकर कहता है, ‘‘यह मेरा शरीर मेरी वस्तु है’’, ताहू झूठ मानत मरन-तिथि जोइकै= उसको तब झूठ मानता है, जब मरण की तिथि जान लेता है, जानै निज-मरम मरन तब सूझै झूठ= जब निजस्वरूप का मर्म जानते हैं, तब मरण झूठ दिखाई देता है, बूझै जब और अवताररूप होइकै= यह बात उसे तब समझ में आती है, जब वह अन्य-पर्याय में जन्म लते ा है, वाहू अवतार की दसा में फिरि यहै पेच= उस अवतार/जन्मकी दशा में फिर वही चक्र, याही भाँति झूठौ जग देख्यौ हम टोइकै= इसीप्रकार हमने सारा जग खोजकर देखा कि सब झूठा है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने जीव की उस स्थिति का वर्णन किया है, जब जीव को संसार प्रत्यक्ष- मिथ्या भासित होता है, फिर भी वह मानने को तैयार नहीं होता। जैसे कोई गहरी-नींद में स्वप्न देखे, तो उस समय वह उस स्वप्न को भी सच मान लेता है, लेकिन नींद खुलते ही सब कुछ झूठ लगने लगता है; ठीक उसीप्रकार संसार में मोह रूप शयन-अवस्था में जीव को शरीर, कुटुम्ब, परिवार, धन-वैभव आदि सब कुछ अपना लगता है; लेकिन जैसे ही मरण का ख्याल आता है, या कहें कोई मरण का प्रसंग सामने देखता है, तब एक क्षण में ही सब झूठ लगने लगता है। लेकिन कुछ समय बाद फिर सब भूल जाता है, और फिर वही अपनापन शुरू हो जाता है। पुण्य के उदय से कदाचित् कभी जिनवाणी सुनने का सुयोग बने और अपने स्वरूप का मर्म जाने तो, फिर सब झूठ लगने लगता है। संसार की स्थिित विचित्र है; कोई न कोई अवतार या चमत्कार के प्रसंग बनते ही रहते हैं, उन प्रसंगों को देखकर फिर वही पेच/प्रपंच अर्थात् एकत्व ममत्व बुद्धि शुरू, फिर सब झूठ, फिर सब सच, यही चक्र चलता रहता है। इसप्रकार हमने सारा संसार खोज लिया कहीं भी कुछ सत्य नहीं दिखा, सब झूठ ही दिखा। वास्तव में देखा जाये, तो हम संसारी मोहीजनों की सच्चाई भी तो यही है कि जिन संयोगों और पदार्थों के बीच हम रहते हैं, क्या एक क्षण के लिये भी वे हमें झूठ लगते हैं? नहीं। मोह-निद्रित-अवस्था में देखा हुआ हर स्वप्न हमें सत्य ही लगता है। लेकिन जैसे ही कोई प्रतिकूलता आ जाये, किसी संयोग का वियोग हो जाये, या अपने ही देह छूटने का प्रसंग बन जाये, तो सब एक पल में ही झूठ, निस्सार लगने लगता है। लेकिन कुछ समय बीतते ही फिर वही राग शुरू हो जाता है। इसीप्रकार जिनवाणी सुनते समय, स्वाध्याय करते समय कुछ क्षण के लिये स्वरूप की महिमा आती है, जगत् असार भासित होता है, लेकिन दूसरे ही पल फिर वही पर में तन्मयता, अपनापन, कैसी विचित्र महिमा है मोह की, सारी सच्चाई आँखों के सामने प्रत्यक्ष दिखती है, फिर भी हम नहीं चेतते।

(सवैया इकतीसा)

पंडित विवेक लहि एकता की टेक गहि, दुंदज-अवस्था की अनेकता हरतु है।
मति-श्रुत-अवधि इत्यादि विकलप मेटि, निरविकलप-ग्यान मनमैं धरतु है।।
इंद्रियजनित-सुख-दुःखसौं विमुख ह्वैकै, परम के रूप ह्वै करम निर्जरतु है।
सहज-समाधि साधि त्यागी पर की उपाधि, आतम-आराधि परमातम करतु है।। 19।।

शब्दार्थ :- पंडित विवेक लहि एकता की टेक गहि= सम्यग्दृष्टि-जीव विवेक प्राप्तकर एकत्व की धुन लगाकर, दुंदज-अवस्था की अनेकता हरतु है= द्वंद्व अर्थात् विकल्परूप-अवस्था की अनेकता को छोड़ देता है, मति-श्रुत-अवधि इत्यादि विकलप मेटि= मति-श्रुत-अवधि इत्यादि विकल्पों को मेटकर, निरविकलप-ग्यान मनमैं धरतु है= विकल्परहित-ज्ञान मन में धारण करता है, इंद्रियजनित सुख-दुःखसौं विमुख ह्वैकै= इन्द्रियजनित सुख-दुःख से विमुख होकर, परम के रूप ह्वै करम-निर्जरतु है= आत्मस्वरूप में स्थिर होकर कर्मों की निर्जरा करता है, सहज-समाधि साधि त्यागी पर की उपाधि= पर की उपाधि त्यागकर, सहज समाधिभाव प्राप्त कर, आतम-आराधि परमातम करतु है= आत्मा की आराधना करते हुए परमात्मपद प्राप्त करता है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने जीव की उस स्थिति का वर्णन किया है, जब जीव भेदविज्ञान- पूर्वक सम्यक्-श्रद्धान-सहित सम्यग्ज्ञान प्राप्त करता है। वह पंडित अर्थात् सम्यग्दृष्टि-जीव विवेकपूर्वक सम्यग्ज्ञान के द्वारा एकमात्र आत्मा को ग्रहणकर द्वंदज अर्थात् समस्त सांसारिक-द्वंद्वों/ विकल्पों की अनेकता को त्याग देता है। क्योंकि शुद्धात्मा एक, अखंड और विकल्पों से रहित तत्त्व है; जबकि संसार में विकल्पों का कोई अंत नहीं, एक कार्य के लिये भी अनेक-अनेक विकल्प। लेकिन जो शुद्धात्मा को ग्रहण करते हैं, अर्थात् अपने उपयोग को एक निजस्वरूप में ही केन्द्रित करते हैं, वे नाना-विकल्पों से सहज ही छूट जाते हैं। फिर वह जीव मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान आदि के विकल्पों को भी मिटाकर एकमात्र विकल्प-रहित यानि निर्विकल्प-आत्मज्ञान को ही लक्ष्य बनाता है। जिस जीव का लक्ष्य आत्मज्ञान हो, अनंतसुख का वेदन हो, उसे भला इंद्रिय-जनित क्षणिक-सुख और दुःख से प्रीति कैसे हो सकती है? सहज ही इनसे विमुख होकर स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ करता है, जिससे अनंतसुख के वेदन में बाधक-कर्मों की निर्जरा होती है। तब जीव को सहज ही समाधि का भाव आता है और पर की उपाधि या पर के लक्ष्य से होनेवाले मोह-राग-द्वेष आदि औपाधिक-भावों का त्याग करके, एकमात्र आत्मा की आराधना-पूर्वक, परमसुखी परमात्म-पद को प्राप्त करता है।

(सवैया इकतीसा)

जाके उर-अंतर निरन्तर अनंत-दर्व-भाव, भासि रहै पै सुभाव न टरतु है।
निर्मलसौं निर्मल सुजीवन प्रगट जाके, घट में अघट-रस कौतुक करतु है।।

एक-ज्ञायकभाव-निर्भर-महास्वादं समासादयन्, स्वादं द्वन्द्वमयं विधातुमसहं स्वां वस्तुवृत्तिं विदन्। आत्मात्मानुभवानुभाव-विवशो भ्रश्यद्-विशेषोदयं, सामान्यं कलयन् किलैष सकलं ज्ञानं नयत्येकताम्।। 8।।

जागै मति-श्रुति-औधि-मनपर्यै-केवल सु, पंचधा तरंगनि उमंगि उछरतु है।
सो है ज्ञान-उदधि उदार महिमा अपार, निराधार एक में अनेकता धरतु है।। 20।।

शब्दार्थ :- जाके उर-अंतर निरन्तर अनंत-दर्व-भाव भासि रहै= जिसके अंतरंग में प्रतिसमय अनंत- द्रव्य और उनके परिणाम भासित हो रहे हैं, पै सुभाव न टरतु है= फिर भी स्वभाव को नहीं छोड़ता है, निर्मलसौं निर्मल सु जीवन प्रगट जाके= निर्मल से निर्मल सुंदर-जीवन जिसके प्रगट है, घट में अघट-रस कौतुक करतु है= अंतरंग में अघट-रस केलि करता है, जागै मति-श्रुति-औधि-मनपर्यै-केवल सु= मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय, केवलज्ञान स्वरूप, सु पंचधा तरंगनि उमंगि उछरतु है= पाँचप्रकार की ज्ञान-तरंगें वेगपूर्वक उछलतीं हैं, सो है ज्ञान- उदधि उदार महिमा-अपार= वह ज्ञानरूपी समुद्र उदार है, जिसकी महिमा अपार है, निराधार एक में अनेकतानेकता धरतु है= निराधार है, एक होते हुये भी अनेकता को धारण करता है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ज्ञान और समुद्र का बहुत ही सुंदरता से तुलनात्मक एवं सटीक-चित्रण प्रस्तुत किया है। जिसप्रकार समुद्र के तल में अनंत बहुमूल्य-रत्न विद्यमान रहते हैं, ठीक उसीप्रकार ज्ञानरूपी-समुद्र में भी अनंत-द्रव्य, उनके अनंत-गुण, और उनकी अनंत-पर्यायें विद्यमान रहती हैं या प्रतिबिंबित होती हैं। लेकिन जैसे समुद्र कभी रत्नरूप नहीं होता, ठीक उसीप्रकार ज्ञान भी कभी ज्ञेयरूप नहीं होता, अर्थात् ज्ञान अपना स्वाभाविक-प्रवर्तन कभी नहीं छोड़ता। जैसे समुद्र का जल निर्मल रहता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञान भी मोह-राग-द्वेष आदि विकारीभावों के संसर्ग में रहते हुए भी कभी मलिन नहीं होता, इन देहादिक-संयोगों और विकारों के बीच रहकर भी सहजरूप में प्रकाशित रहता हैं। जैसे समुद्र स्वयं में परिपूर्ण है, ठीक उसीप्रकार ज्ञान भी सर्वप्रकार की अपेक्षाओं से रहित स्वयं में परिपूर्ण है। जिसप्रकार समुद्र में प्रतिसमय अनेक-लहरें उठती हैं, लेकिन वह फिर भी अप्रभावित रहता है। ठीक उसीप्रकार ज्ञानरूपी समुद्र में भी मति, श्रुति, अवधि, मन:पर्यय, केवलज्ञान आदि रूप अनेक लहरें उठती है, लेकिन फिर भी ज्ञान तद्रूप न होकर अप्रभावित ही रहता है। जैसे समुद्र का हृदय अत्यंत-उदार या विशाल होता है, यानि कितनी ही नदियों का जल हो, उसमें समा जाता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञानरूपी समुद्र में भी अनंत-जाननरूप-पर्यायें भी सहज समा जाती है। जैसे समुद्र अथाह-अपार होते हुये भी निराधार यानि आधार-रहित या कहें स्वयं अपने ही आधार रहता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञान भी अनंत होते हुए भी निराधार या स्वयं के आधार से ही रहता है। जैसे समुद्र एक होते हुये भी लहरों की विविधतारूप अनेकता को लिये हुये हैं, ठीक उसीप्रकार ज्ञान भी ज्ञायक-स्वभाव की अपेक्षा एक होते हुये भी ज्ञेयों को जानने की अपेक्षा विविधतारूप अनेकता को लिये हुये है। इसप्रकार कवि ने ज्ञान की बहुत ही सुंदर-महिमा वर्णित की है। हे आत्मन्! ऐसे अनंतज्ञान का निधान, जाननरूप अनंत-पर्यायों का धनी, फिर भी त्रिकाल-शुद्ध ऐसा भगवान् आत्मा मैं ही हूँ। बस एकबार प्रतीति तो कर, ये सारा आत्मिक-वैभव प्रत्यक्ष-प्रतिभासित होगा।

(सवैया इकतीसा)

केई क्रूर-कष्ट सहैं तपसौं शरीर दहैं, धूम्रपान करैं अधोमुख ह्वैकै झूले हैं।
केई महाव्रत गहैं क्रिया में मगन रहैं, वहैं मुनिभार पै पयार-केसे पूले हैं।।

अच्छाच्छाः स्वयमुच्छलन्ति यदिमाः संवेदन-व्यक्तयो, निष्पीताखिल-भाव-मण्डल-रस-प्राग्भार-मत्ता इव। यस्याभिÂन्नरसः स एष भगवानेकोऽप्यनेकीभवन्, वल्गत्युत्कलिकाभिरद्भुत-निधिश्चैतन्य-रत्नाकरः।। 9।।

इत्यादिक जीवन कौं सर्वथा मुकति नांहि, फिरैं जगमांहि ज्यौं बयारि के वघूले हैं।
जिन्हके हियेमैं ग्यान तिन्हीकौं निरवान, करम के करतार भरम में भूले हैं।। 21।।

शब्दार्थ :- केई क्रूर कष्ट सहैं= कई क्रूर/मूर्ख कष्ट सहते हैं, तपसौं शरीर दहैं= तप से शरीर को दहाते हैं, धूम्रपान करैं= (चिलम आदि से) धूम्रपान करके नशाकारक-वस्तुओं का सेवन करते हैं, अधोमुख ह्वैकै झूले हैं= नीचे मुख करके उल्टे लटकते हैं, केई महाव्रत गहैं= कई महाव्रत ग्रहण करते हैं, क्रिया में मगन रहैं= बाह्य-क्रिया में ही रचे-पचे रहते हैं, वहैं मुनिभार= मुनिपद का भार वहन करते हैं, पै पयार-केसे पूले हैं= फिर भी पुआल के पूले की तरह हैं (देखने के ही बड़े हैं, पर निःसार हैं), इत्यादिक जीवन कौं सर्वथा मुकति नांहि= इत्यादि-प्रकार के जीवों को कदापि मुक्ति संभव नहीं है, फिरैं जगमांहि ज्यौं बयारि के वघूले हैं= वे जग में ऐसे भटकते हैं, जैसे हवा के बबंडर हों, जिन्हके हिये मैं ग्यान तिन्हीकौं कौं निरवान= जिनके हृदय में ज्ञान उन्हीं को निर्वाण होता है, करम के करतार भरम में भूले हैं= (अन्य सभी) कर्मों के कर्त्ता बनकर भ्रम में भूले हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने कोरे बाह्य-क्रियाकाण्ड की हेयता और ज्ञान की उपादेयता को सिद्ध किया है। संसार में नानाप्रकार के जीव है, सभी दुःखी हैं, और दुःख दूर करने का अर्थात् दु़ःखों से मुक्ति का उपाय भी प्रतिसमय करते हैं, लेकिन उनमें से किन जीवों को मुक्ति की प्राप्ति होगी और किन जीवों को नहीं- इसका सुंदर-वर्णन कवि ने उपर्युक्त पंक्तियों में किया है। कुछ जीव तो ऐसे हैं, जो ऐसी तपस्या करते हैं, जिससे शरीर को अनेकप्रकार से कष्ट हों, और शरीर कृश हो, जैसे शरीर पर कोड़े मारना, एक पैर से खड़े रहना, पंचाग्नि-तप तपना इत्यादि, कुछ जीव संसार के दुःखों से त्रस्त होकर, उस दुःख को भुलाने के लिये चरस, गांजा, अफीम, शराब आदि नशाकारकवस्तुओं का उपयोग करते हैं। कुछ जीव ओंधे-मुख अर्थात् उल्टे लटककर दुःखों से छूटना चाहते हैं, क्योंकि इन सभी जीवों ने शरीर को ही आत्मा माना है, और शरीराश्रित-क्रियाओं को ही दुःखों से मुक्ति का उपाय। यहाँ तक तो कवि ने उन जीवों की चर्चा की, जिन्हें जिनधर्म और जिनागम की शरण नहीं मिली है, जो मुक्ति के वास्तविक-स्वरूप को ही नहीं जानते। लेकिन जो जीव जिनधर्मानुयायी भी हैं, मुक्ति के स्वरूप को भी जानते हैं, और जिनाम्नाय में वर्णित मुनिधर्म-रूप महाव्रतों आदि को भी धारण करते हैं, और उसके अनुरूप बाह्य-चर्या को पालने का रुचिपूर्वक पुरुषार्थ भी करते हैं, पर आत्मज्ञान से जिनका कोई लेना-देना नहीं है। कविवर कहते हैं कि ‘‘ऐसे जीव मुनिपद के भार को ठीक वैसे ही वहन करते हैं, जैसे ‘पयार के पूले’ अर्थात् अनाज के कण के बिना खाली घास को संभालकर रखना’’, अर्थात् जैसे कोई किसान अनाज की परवाह तो करे नहीं और कचरे के समान घास को बड़े जतन से सहेजकर रखे, ठीक उसीप्रकार जो आत्मज्ञान और श्रद्धान को तो समझे नहीं और देह की क्रिया को बड़े जतन से पाले- ऐसे मुनिव्रत-धारक जीवों को कवि ने ‘पयार के पूले’ की संज्ञा दी है। कविवर कहते हैं कि इत्यादिरूप से प्रवर्तन करनेवाले नानाप्रकार के जीवों को कभी भी किसी भी कीमत पर मुक्ति की प्राप्ति नहीं होगी। ऐसे जीव जगत् में ठीक उसीप्रकार भटकेंगें, जैसे ‘बयार के बघूले’ अर्थात् हवा के बबंडर, जिसप्रकार हवा के बबंडर का कोई ठिकाना नहीं होता है, वे तो बस हवा के साथ उड़ते ही रहते हैं, ठीक उसीप्रकार आत्मज्ञान-रहित जीवों का कोई ठिकाना नहीं है, वे कर्मोदय के वेग में क्लिश्यन्तां स्वयमेव दुष्करतरैर्मोक्षोन्मुखैः कर्मभिः, क्लिश्यन्तां च परे महाव्रत-तपोभारेण भग्नािश्चरम्। साक्षान्मोक्ष इदं निरामयपदं संवेद्यमानं स्वयं, ज्ञानं ज्ञानगुणं विना कथमपि प्राप्तुं क्षमन्ते न हि।। 10।। अनंतकाल तक यूँ ही परिभ्रमण करते रहेंगें। हाँ लेकिन जिन जीवों को आत्मश्रद्धान और आत्मज्ञान है, वे निश्चित ही एक न एक दिन मुक्ति को प्राप्त करेगें। परन्तु जो जीव कर्म के कर्ता बनकर अर्थात् मात्र क्रियाकाण्ड के भरोसे मुक्ति को पाना चाहते हैं, वे ‘भरम में भूले हैं’ अर्थात् ये उनका भ्रम ही है कि हमें मुक्ति प्राप्त होगी, वास्तविकता रंचमात्र भी नहीं है।

(दोहा)

लीन भयौ विवहार में, उकति न उपजै कोइ।
दीन भयौ प्रभुपद जपै, मुकति कहाँ सौं होइ?।। 22।।

शब्दार्थ :- लीन भयौ विवहार में= व्यवहार में ही मगन हुआ, उकति न उपजै कोइ= (दु:ख दूर करने का) कोई उपाय नहीं करता, दीन भयौ प्रभु-पद जपै= दीन होकर भगवान् के चरणों को ही जपता है, मुकति कहाँ सौं होइ= उसे मुक्ति कैसे हो सकती है? विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन जीवों का वर्णन किया है जो व्यवहार में ही लीन हैं अर्थात् जो व्रत, तप, पूजा-पाठ, सामायिक-जाप तो सब करते हैं; पर जिनके हृदय में स्व और पर में भेदविज्ञान नहीं वर्तता, यानि जो मिथ्यात्व से ग्रसित हैं, बस भगवान् के चरणों की पूजा-वंदना करके ही मुक्ति पाना चाहते हैं; कविवर उनसे कहते हैं कि ‘‘मुक्ति का मुख्य-कारण तो भेदविज्ञान और आत्मश्रद्धान है, सो जब तक ये नहीं, तब तक मुक्ति कैसे संभव है?’’

(दोहा)

प्रभु सुमरौ पूजा पढो, करो विविध-विवहार।
मोख-सरूपी आत्मा, ग्यान-गम्य निरधार।। 23।।

शब्दार्थ :- प्रभु सुमरौ पूजा पढो= भगवान् का सुमिरन करो, पूजा करो, पाठ या स्तुति पढ़ो, करो विविधविवहार= विभिन्न-प्रकार का व्यवहार करो, मोख-सरूपी आत्मा= मोक्षस्वरूपी आत्मा, ग्यान-गम्य निरधार= ज्ञानगम्य है- ऐसा निर्णय करो। विशेषार्थ :- ‘आत्म-वस्तु अनुभवगोचर है’- इस कथन को सिद्ध करते हुए कविवर कहते हैं कि कोरे व्यवहार-चारित्र का कोई फल नहीं है। कोई व्यक्ति भगवान् का अधिकाधिक-स्मरण करे अर्थात् सामायिक, जाप, ध्यान आदि क्रिया करे, नित्य या प्रतिदिन नियम से भगवान् की पूजा-अर्चना करे, स्तुति-पाठ आदि भी खूब रुचिपूर्वक पढ़े, अन्य व्यवहार-चारित्र अर्थात् अणुव्रत, महाव्रत आदि का भी पालन करे; फिर भी उससे सिवाय पुण्यबंध के और कुछ नहीं होगा। क्योंकि जिसके श्रद्धान से मुक्ति संभव है, वह आत्मवस्तु तो अनुभवगोचर है, वाणी से उसका कथन संभव नहीं है। जैसे कोई रसगुल्ले के स्वरूप का अच्छे से बखान करे, पर क्या बखान करने मात्र से उसे रसगुल्ले का स्वाद आ सकता है? कभी नहीं। अर्थात् जबतक वह स्वयं रसगुल्ले को नहीं खायेगा, तबतक उसे उसके स्वाद की अनुभूति नहीं होगी, ठीक उसीप्रकार जीव को मुक्ति तबतक संभव नहीं होगी, जबतक वह स्वयं मोक्षस्वरूपी-आत्मा का रसास्वादन नहीं करेगा; क्योंकि आत्मिक-सुख की अनुभूति, अनुभव का विषय है, कथन का नहीं।

(सवैया तेईसा)

काज-बिना न करै जिय उद्यम, लाज-बिना रन- माँहि न जूझै।
डील-बिना न सधै परमातम, सील-बिना सतसौं न अरूझै।।
नेम-बिना न लहै निहचै पद, प्रेम-बिना रस- रीति न बूझै।
ध्यान-बिना न थंभै मन की गति, ग्यान-बिना सिवपंथ न सूझै।। 24।।

शब्दार्थ :- काज-बिना न करै जिय उद्यम= बिना प्रयोजन के जीव पुरुषार्थ नहीं करता, लाज-बिना रनमाँहि न जूझ=ै स्वाभिमान के बिना युद्ध नहीं लड़ता, डील-बिना न सधै परमातम= नर-देह के बिना परमात्म-पद नहीं सधता है, सील-बिना सतसौं न अरूझै= शील के बिना सत्य की प्राप्ति नहीं होती है, नेम-बिना न लहै निहचै-पद= नियम के बिना निश्चयपद/मोक्षपद प्राप्त नहीं होता, प्रेम-बिना रस-रीति न बूझ=ै प्रेम के बिना रसरीति समझ में नहीं आती, ध्यान-बिना न थंभै मन की गति= ध्यान के बिना मन की गति नहीं थमती, ग्यानबिना सिवपंथ न सूझ=ै ज्ञान के बिना मोक्षमार्ग नहीं दिखता। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने बहुत ही सरल-उदाहरणों के माध्यम से सिद्ध किया है कि ‘ज्ञान के बिना मोक्ष तो दूर मोक्षमार्ग भी समझ में नहीं आता’। जैसे लोक में देखा जाता है कि कोई भी व्यक्ति बिना प्रयोजन या लाभ के उद्देश्य के बिना व्यापार नहीं करता है, वास्तव में देखा जाये तो व्यापार ही नहीं, हम बिना प्रयोजन कोई भी कार्य नहीं करते हैं। जैसे जबतक राजा के स्वाभिमान को चोट नहीं पहुँचती, तबतक वह युद्ध करने को तैयार नहीं होता; जैसे शरीर के बिना परमात्म-पद की प्राप्ति नहीं होती है, अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति केवल पुरुष-पर्याय से ही संभव है अन्य-पर्याय से नहीं; जैसे शील के बिना सत्य नहीं मिलता अर्थात् जबतक जीवन में सदाचार, विवेक, स्वभाव की सरलता, सहजता नहीं होगी; तबतक न तो सत्य से भेंट होती है और न ही सत्य जीवन में टिकता है। जैसे नियम या संयम-पालन के बिना मोक्ष का पुरुषार्थ नहीं होता अर्थात् जबतक हम अपने को नियमों में आबद्ध नहीं करते, तबतक हम इन्द्रियविजय या इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं। जैसे प्रेम के बिना रस-रीति समझ में नहीं आती अर्थात् लौकिक शृंगार आदि रस व रीतियाँ समझ में नहीं आतीं, जैसे ध्यान के बिना मन की गति को रोकना असंभव है, अर्थात् उपयोग को एकमात्र प्रयोजनभूतआत्मतत्त्व पर केन्द्रित करो, मन की गति चंचलता स्वत: ही थम जाती है। ठीक उसीप्रकार जबतक आत्मज्ञान या सम्यग्ज्ञान नहीं है, तबतक मोक्ष तो दूर मोक्षमार्ग की शुरूआत भी नहीं होती, और तबतक मोक्षमार्ग की दृष्टि से चारित्र के नाम पर की जाने वाली हर क्रिया अंकरहित-शून्य के समान निस्सार है।

(सवैया तेईसा)

ग्यान-उदै जिन्हके घट-अंतर, जोति जगी मति होत न मैली।
बाहिज-दिष्टि मिटी जिन्हके हिय, आतमध्यान-कला विधि फैली।।
जे जड़-चेतन भिन्न लखैं, सुविवेक लियैं परखैं गुन-थैली।
ते जगमैं परमारथ-जानि, गहैं रुचि मानि अध्यातम-सैली।। 25।।

शब्दार्थ :- ग्यान-उदै जिन्हके घट अंतर= जिनके हृदय में ज्ञान का उदय होने से, जोति जगी मति होत न मैली= सम्यग्ज्ञान की ज्योति जली है, उनकी बुद्धि मैली नहीं होती है, बाहिज-दिष्टि मिटी जिन्हके हिय= जिनके हृदय से बाह्य-दृष्टि (देहादिक के प्रति एकत्व बुद्धि) मिट गई है, आतमध्यान-कला विधि फैली= आत्मध्यान की कला फैली/जागृत हुई है, जे जड़-चेतन भिन्न लखैं= जो जड़ और चेतन को भिन्न देखते हैं, सुविवेक लियैं परखैं गुन-थैली= सुविवेक से गुणों की थैली को परखते हैं, ते जगमैं परमारथ जानि= वे जगत् में आत्मतत्व को प्रयोजनभूत जानकर, गहैं रुचि मानि अध्यातमसैली= रुचिपूर्वक आत्मानुभव को ग्रहण करते हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने जीव की उस स्थिति का वर्णन किया है, जब निरन्तर तत्वाभ्यास- पूर्वक स्व और पर में भिन्नता वर्तती है, और आत्मश्रद्धान-पूर्वक ज्ञान भी सम्यक्तता को प्राप्त होता है। कविवर कहते हैं कि जिनके हृदय में सम्यग्ज्ञानरूपी-सूर्य का उदय हुआ है, उनकी बुद्धि कभी मैली नहीं होती है। जैसे लौकिक में भी जब सूर्य का उदय होता है, तो अंधकार स्वत: ही भाग जाता है, और जबतक सूर्य का प्रकाश रहता है, तबतक वापस भी नहीं आता है; ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानरूपी सूर्य के प्रकाश के रहते हुये मैली-मति/परिणतिरूप ‘मिथ्यात्व’ वापस नहीं आता। जिनके हृदय से बाह्य-दृष्टि यानि देहादिक के प्रति एकत्व, ममत्वबुद्धि जब हट जाती है,तब आत्मध्यान की कला जागृत होती है, अर्थात् स्वयं की अनुभूति का पुरुषार्थ प्रबल होता है। ऐसे जीव जड़ और चेतन या आत्मा और समस्त-परपदार्थों को भिन्न-भिन्न देखते हैं, और फिर अपने सद्बुद्धि-विवेक से गुणों की थैली/पूँजी को परख लेते हैं। जैसे लोक में काँच और हीरा सामने हो और पारखी-व्यक्ति की नजर जब हीरे को पहचान लेती है तब उसे कहना नहीं पड़ता कि हीरे को ग्रहण करे और काँच को छोड़ दे, ठीेक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानी-जीव जब आत्मगुणों की थैली को परख लेते हैं, तब एक मात्र यही प्रयोजनभूत है ऐसा जानकर, मानकर रुचिपूर्वक स्वरूप के अनुभव और स्थिरता का पुरुषार्थ करते हैं।

(दोहा)

बहुविधि-क्रिया-कलेससौं, सिवपद लहै न कोइ।
ग्यानकला-परकाशसौं, सहज-मोखपद होइ।। 26।।

शब्दार्थ :- बहुविधि-क्रिया कलेससौं= बहुतप्रकार की क्रियाओं के क्लेश से, सिवपद लहै न कोइ = कोई मोक्षपद प्राप्त नहीं करता, ग्यानकला-परकाशसौं= ज्ञान-कला के प्रकाश से, सहज मोखपद होइ= सहज ही मोक्षपद प्राप्त होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने दोटूक-शब्दों में पुन: वही बात प्रेरणा-स्वरूप कही कि ‘‘हे आत्मन्! केवल बाह्य-क्रियाओं यानि पूजा-पाठ, व्रत, तप, सामायिक, ध्यान, अणुव्रत यहाँ तक कि महाव्रत आदि के पालन से भी आज तक न तो किसी जीव को मोक्ष की प्राप्ति हुई है, और न हो सकती है, और न कभी होगी।’’ विचार करने योग्य-बात है कि कवि ने इन बाह्य-क्रियाओं का क्लेश कहा है। क्यों? क्या व्रतादिक का पालन करना क्लेश है? जबकि अधिकांश-जीव तो इन्हें शुभभाव ही नहीं, धर्म भी मानते हैं। हाँ, मिथ्यादृष्टि-जीव के लिये इन क्रियाओं का पालन क्लेश ही है, क्योंकि अंतरंग में आत्मश्रद्धान न होने से, और बाहर में अनंतानुबंधी का उदय होने से ये क्रियायें सहज नहीं पलती हैं; बल्कि उसे प्रयत्नपूर्वक पालनी पड़ती हैं। और जो कार्य प्रयत्नपूर्वक या जबरदस्ती किये जाते हैं, उनमें परिणामों का आकुलित होना स्वाभाविक है, इस अपेक्षा से कवि ने इन क्रियाओं को ‘क्लेश’ की संज्ञा दी। जबकि पंचम-गुणस्थानवर्ती व्रती-श्रावक को अंतरंग में आत्मानुभूति के साथ-साथ ‘अनंतानुबंधी’ और ‘अप्रत्यख्यानावरणी’ दो कषाय-चौकड़ी का अभाव होने से ये व्रतादिक के परिणाम और बाहर में तत्संबंधी-क्रिया सहज पलती हैं, पालनी नहीं पड़ती। इसलिए वहाँ आकुलता न होने से इन्हीं व्रतादिक को क्लेश नहीं, धर्म और कर्मों की निर्जरा का कारण माना जाता है। लेकिन मिथ्यात्व की अवस्था में भी यदि जीव इन बाह्य-क्रियाओं को करते हुये स्वयं को इन क्रियाओं से भिन्न अनुभव करे या स्वयं को इन क्रियाओं का कर्ता न मानते हुये, अपने को सिर्फ एक जाननहार-तत्त्व के रूप में अनुभव करे, अर्थात् ज्ञानकलारूप प्रवर्तन करे तो उसके प्रकाश में सहज ही मोक्षमार्ग प्रकाशित ही नहीं प्रशस्त भी होता है।

(दोहा)

ग्यानकला घट-घट बसै, जोग-जुगति के पार।
निज-निज कला उदोतकरि, मुकत होइ संसार।। 27।।

शब्दार्थ :- ग्यानकला घट-घट बसै= ज्ञानकला सभी के हृदय में विद्यमान है, जोग-जुगति के पार= योग, युक्ति से परे, निज-निज कला-उदोत करि= अपनी-अपनी कला को प्रकाशित कर, मुकत होइ संसार= संसार से मुक्त होओ। विशेषार्थ :- उपर्युक्त छंद में कवि ने हमें हमारी ही अनंत-शक्तियों का परिचय कराया है। हे आत्मन्! तू कहाँ दर-दर भटक रहा है, कहाँ ज्ञेयों में ज्ञान को खोज रहा है, अनंतज्ञान का निधान तू स्वयं है, एकबार विचार तो कर। सभी जीवों में स्वभाव से भगवान् बनने की सामर्थ्य विद्यमान है, मन, वचन, काया के नियंत्रणरूप योग और तार्किकबुद्धिरूप युक्तियों से भिन्न तूँ अनंतज्ञानादि-गुणों का धारी परमशुद्धचेतन-तत्त्व है। इसलिये हे भव्यजीव! तुम अपनी-अपनी शक्तियों को प्रगट करो अर्थात् एकबार दृढ़ता से देहादिक समस्त-परपदार्थों से सर्वथा-भिन्न मैं शुद्धात्मा हूँ- ऐसा श्रद्धान तो करो। पर्याय की पामरता स्वयं दूर होकर प्रभुता प्रकट होगी और संसार से मुक्ति भी होगी।

(कुंडलिया-छंद)

अनुभव-चिंतामनि-रतन, जाके हिय परगास।
सो पुनीत-सिवपद लहै, दहै चतुरगति-वास।।
दहै चतुरगति-वास, आस धरि क्रिया न मंडै।

नूतन-बंध-निरोधि, पुब्बकृत

बिहंडै।।
ताके न गनु विकार न गनु बहुभार न गनु भव।
जाके हिरदै-माँहि, रतन-चिंतामनि अनुभव।। 28।।

शब्दार्थ :- अनुभव-चिंतामनि-रतन जाके हिय परगास= चिंतामणि-रत्न के समान आत्मानुभव जिसके हृदय में प्रकाशित है, सो पुनीत-सिवपद लहै दहै चतुरगति-वास= वह पवित्र(जीव)मोक्षपद को प्राप्त करता है, चारों गतियों में निवास को दहन करता है, दहै चतुरगति-वास आस-धरि क्रिया न मंडै= चतुर्गति निवास दहन करने के साथ-साथ वह जीव फल की इच्छारूप-निदानपूर्वक किसी भी क्रिया को नहीं करता, नूतन-बंध निरोधि पुब्बकृत बिहंड=ै नवीन बंध को रोककर, पूर्व में किये हुये कर्मों को भी निर्जरित करता है, ताके न गनु विकार न

पदमिदं ननु कर्म-दुरासदं, सहज-बोध-कला-सुलभं किल।
तत इदं निजबोध-कलाबलात्, कलयितुं यततां सततं जगत्।। 11।।

अचिन्त्यशक्ति: स्वयमेव देवश्चिन्मात्र-चिन्तामणिरेष यस्मात्। सर्वार्थंसिद्धात्मतया विधत्ते, ज्ञानी किमन्यस्य परिग्रहेण ।। 12।। गनु बहुभार न गनु भव= उस जीव के न विकार होते हैं, न बहुत भार/परिग्रह, और न ही भव, जाके हिरदै-माँहि रतन-चिंतामनि अनुभव= जिसके हृदय में अनुभवरूपी चिंतामणि-रत्न होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘अनुभव’ की अपूर्व महिमा वर्णित की है। स्व-पर के भेदविज्ञान- पूर्वक वस्तु-स्वरूप का विचार करने से अर्थात् आत्म-स्वरूप का चिंतन करने से, उसी का ध्यान करने से मन विश्रांति को प्राप्त होता है, अर्थात् उसकी संकल्प-विकल्परूप चंचलता मिट जाती है, जिससे साम्यभाव प्रकट होता है। और उस समय आत्मिक-रस का आस्वाद अर्थात् आत्मानुभूति होने पर जो अतीन्द्रिय-आनंद या सुख का वेदन होता है, उसी का नाम ‘अनुभव’ है। ऐसे ‘आत्मानुभव’ को कवि ने ‘चिंतामणि-रत्न’ कहा है। जैसे लौकिक में भी जिसके घर में चिंतामणि-रत्न का प्रकाश या सद्भाव हो उसके घर में दरिद्रतारूपी-अंधकार प्रवेश नहीं करता है। ठीक उसीप्रकार जिसके हृदय में आत्मानुभूतिरूपी चिंतामणि-रत्न का प्रकाश होता है, उसके हृदय में मिथ्यात्वरूपी-दरिद्रता का प्रवेश नहीं होता। वह जीव परम-पवित्र-मोक्षपद को शीघ्र प्राप्त करता है, और चारों गतियों के दुःखों से छूट जाता है। जो जीव चतुर्गति के निवास का दहन करता है, वह इच्छा-सहित-क्रिया को धारण नहीं करता अर्थात् सांसारिक-सुख की इच्छा तो करता ही नहीं, अन्य किसी अभिलाषा से भी किसी भी प्रकार के अणुव्रत-महाव्रतादि के पालनरूप क्रिया नहीं करता। जिससे नवीन-कर्मों का बंध तो रुकता ही है, पूर्व में बँधे कर्मों की निर्जरा भी सहज होती है। अब उस आत्मानुभवी-जीव के न तो राग-द्वेष आदि विकारों की तीव्रतारूप परिणमन होता है, और न ही परिग्रह का बहुत भार रहता है, और न ही उसके बहुत भव शेष रहते हैं अर्थात् वह जीव अल्पकाल में ही मोक्ष को प्राप्त करता है, जिसके हृदय में आत्मानुभूतिरूपी चिंतामणि-रत्न का प्रकाश या कहें वास रहता है।

(सवैया इकतीसा)

जिन्हके हिये में सत्य-सूरज उदोत भयौ, फैली मति-किरन मिथ्यात-तम नष्ट है।
जिन्हकी सुदिष्टि में न परचै-विषमतासौं, समतासौं प्रीति ममतासौं लष्ट-पुष्ट हैं।।
जिन्हके कटाक्ष में सहज मोखपंथ सधै, मन को निरोध जाके तनकौ न कष्ट है।
तिन्हके करम की कलोलें यह है समाधि, डोलै यह जोगासन बोलै यह मष्ट है।। 29।।

शब्दार्थ :- जिन्हके हिये में सत्य-सूरज उदोत भयौ= जिनके हृदय में सत्य का सूर्य उदित हुआ है, फैली मति-किरन मिथ्यात-तम नष्ट है= सम्यक्-बुद्धिरूपी किरणों के फैलने से मिथ्यात्वरूपी-अंधकार नष्ट हो गया है, जिन्हकी सुदिष्टि में न परचै विषमतासौं= जिनकी सुदृष्टि में राग-द्वेषरूपी विकारों से परिचय नहीं है, समतासौं प्रीति ममतासौं लष्ट-पुष्ट हैं= साम्यभाव से प्रीति और ममता से विरोधभाव है, जिन्हके कटाक्ष में सहज मोखपंथ सधै= जिनकी चितवन मात्र से सहज ही मोक्षपंथ सधता है, मन को निरोध जाके तनकौ न कष्ट= मन पर नियंत्रण है, शरीर का कष्ट भी नहीं है, तिन्हके करम की कलोलें यह है समाधि= उनको कर्म की लहरें समाधिरूप हैं, डोलै यह जोगासन बोलै यह मष्ट है= मन-वचन-कायरूपी योग का आसन/आधार चलायमान हो जाता है, बोलना भी मौनव्रतरूप कहा जाता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यग्दर्शन की विशेष-महिमा वर्णित करते हुये बड़ी ही सरसता से स्पष्ट किया कि सम्यग्दृष्टि-जीव विषय-भोगादि कोई भी क्रिया करें, फिर भी उसके कर्मों की निर्जरा ही होती है। जिनके हृदय में सम्यग्दर्शनरूपी-सूर्य का उदय हुआ है, उसकी ज्ञानरूपी-किरणों से मिथ्यात्वरूपीअंधकार हमेशा के लिये पलायन कर गया है। ठीक उसीप्रकार, जैसे सूर्य की किरणें ज्यों-ज्यों पृथ्वी की ओर बढ़ती है, त्यों-त्यों रात्रि का काला गहन-अंधकार स्वत: ही पलायन कर जाता है। सम्यग्दृष्टि-जीव की दृष्टि सम्यक् होने से जगत् की विषमताओं यानि रागादि-विकार-जनित परिस्थितियों से परिचय नहीं होता अर्थात् तदनुरूप विपरीत-प्रवर्तन नहीं होता। सर्वत्र साम्यभाव वर्तता है और ममता से विरोध वर्तता है, अर्थात् दर्शनमोहनीय का उपशम, क्षय या क्षयोपशम होने से मोहरूपप्रवर्तन नहीं होता। जिनकी चितवन से भी मोक्षमार्ग सधता है, अर्थात् जैसे जिनेन्द्रदेव की प्रतिमा बिना कुछ कहे भी प्रतिसमय वीतरागता का ही उपदेश देती है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव की प्रत्येक क्रिया से भी मोक्षमार्ग ही प्रशस्त होता है। पाँचों इन्द्रियों और मन पर सहज-नियंत्रण होने से न तो शरीर को कष्ट होता है और न ही परिणामों में तनिक भी मलिनता आती है। इसीलिये कर्म के उदय से आनेवाली अनुकूलता-प्रतिकूलतायें भी समाधि का साधन बनती है, अर्थात् जहाँ संसारी-जीव इनसे घबराकर विपरीत-प्रवर्तन करता है, वहीं सम्यग्दृष्टि-जीव इनके माध्यम से संसार की क्षणभंगुरता का विचार करते हुए स्वभावरूप प्रवर्तन करते हैं। यहाँ तक कि बोलते हुये भी वह मौनव्रती है। अभिप्राय यही है कि नानाविध-प्रवृत्तियाँ करते हुए भी उसके कर्मों की निर्जरा ही होती है।

(सवैया इकतीसा)

आतमसुभाउ-परभाउ की न सुधि ताकों, जाकौ मन मगन परिग्रह में रह्यौ है।
ऐसौ अविवेक को निधान परिग्रह-राग, ताकौ त्याग इहांलौं समुच्चैरूप कह्यो है।।
अब निज-पर-भ्रम दूरि करिवै कै काज, बहुरौं सुगुरु उपदेस को उमह्यौ है।
परिग्रह-त्याग परिग्रह कौ विशेष-अंग, कहिवै कौ उद्दिम-उदार लहलह्यौ है।। 30।।

शब्दार्थ :- आतम-सुभाउ परभाउ की न सुधि ताकों= आत्म-स्वभाव और पर-भाव की जिसको खबर नहीं है, जाकौ मन मगन परिग्रह में रह्यौ है= जिसका मन परिग्रह में लीन है, ऐसौ अविवेक को निधान परिग्रह-राग= ऐसे अविवेक /अज्ञान का कारण परिग्रह का राग है, ताकौ त्याग इहांलौं समुच्चैरूप कह्यो है= (इसलिये) उसका (परिग्रह का) त्याग यहाँ तक समुच्चयरूप से कहा है, अब निज-पर भ्रम दूरि करिवै कै काज= अब स्व और पर में (रागरूप) भ्रम दूर करने के लिए, बहुरौं सुगुरु उपदेस को उमह्यौ है= ज्ञानी-सुगुरु उपदेश देने को तत्पर हुये हैं, परिग्रह-त्याग परिग्रह कौ विशेष-अंग= परिग्रह के त्याग का और परिग्रह के विशेष-अंगों को कहिवै कौ उद्दिम-उदार लहलह्यौ है= उत्साहपूर्वक उदारमन से कहने को प्रवृत्त हुए हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कविवर आगे की विषयवस्तु का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि अब मैं परिग्रह के सामान्य-त्याग और परिग्रह के अंगों अर्थात् परिग्रह के विशेष-त्याग का वर्णन करूँगा। हम संसारी-जीवों को जो आत्मस्वभाव यानि ''मैं ज्ञाता-दृष्टा त्रिकाल-शुद्ध चेतन-आत्मा जन्ममरण से रहित अविनाशी-तत्त्व हूँ, और परभाव यानि मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भाव मेरा स्वभाव

इत्थं परिग्रहमपास्य समस्तमेव, सामान्यतः स्व-परयोरविवेक-हेतुम्।
अज्ञानमुज्झितुमना अधुना विशेषाद्, भूयस्तमेव परिहर्त्तुमयं प्रवृत्त:।। 13।।

नहीं है, ये तो पर के लक्ष्य से होनेवाले परिणाम हैं’‘- एेसी खबर नहीं है, उसका प्रमुख-कारण परिग्रह में लीनता है; क्योंकि हमने अपना स्वरूप और सुख-दुःख का कारण परिग्रह को ही माना है, सो प्रतिसमय उसी की संभाल में मगन रहते हैं, अपनी वास्तविक-सुधि लेने का हमारे पास समय ही नहीं है। कविवर कहते हैं कि इस सारी अज्ञानता का एकमात्र-कारण परिग्रह के प्रति जीव का राग-भाव है, इसलिए यहाँ तक तो परिग्रह के समुच्चयरूप से त्याग की बात कही। कविवर आगे कहते हैं कि ‘‘निज और पर में जो अज्ञानतारूप-भ्रम है, जो स्वाभाविक-सुखानुभूति में सर्वाधिक-बाधक है, उसे दूर करने के लिए परिग्रह के विशेष-त्याग का उत्साहपूर्वक और उदारमन से वर्णन करूँगा।’’ पहले ‘परिग्रह’ शब्द का अर्थ देखते हैं- ‘परि’+‘ग्रहण’ = ‘परिग्रह’। अर्थात् मन-वचन-काय से परवस्तु के ग्रहण का परिणाम ही ‘परिग्रह’ है। तो प्रश्न उठता है ‘पर’ यानि क्या? मैं शुद्धात्मा हू,ँ और मेरे अलावा सब ‘पर’ हैं। यहाँ तक कि रागादिभाव भी परलक्षी-भाव होने से ‘पर’ ही हैं, उनको ग्रहण करना या उन्हें अपना मानना भी ‘परिग्रह’ है। ‘आचार्य उमास्वामी के अनुसार- ‘मूर्च्छा परिग्रहः’ अर्थात् मोहकर्म के उदय से परपदार्थों में जो अासक्ति अर्थात् ममत्व का भाव है, उसे ‘मूर्च्छा’ कहते हैं, वही ‘परिग्रह’ है। ‘राजवार्तिक’ के अनुसार -’ ममेदं वस्तु अहं स्वामीत्यात्मात्मीयाभिमानः संकल्पः परिग्रह इत्युच्यते।’ अर्थात् ''यह मेरा है, मैं इसका स्वामी हू’ँ '- इसप्रकार का ममत्व-परिणाम ही ‘परिग्रह’ है।

(दोहा)

त्याग-जोग परवस्तु सब, यह सामान्य-विचार।
विविध-वस्तु नाना-विरति, यह विशेष- विस्तार।। 31।।

शब्दार्थ :- त्याग-जोग परवस्तु सब= समस्त पर-वस्तुयें त्यागने योग्य हैं, यह सामान्य-विचार= यह सामान्य-उपदेश है, विविध-वस्तु नाना-विरति= विविध-प्रकार की वस्तुओं के प्रति नाना-प्रकार से विरक्ति का भाव, यह विशेष-विस्तार= यह विशेष-त्याग का विस्तार है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सामान्य और विशेषरूप से परिग्रह के त्याग का स्वरूप समझाया है। आगम में अंतरंग और बहिरंग के भेद से परिग्रह के 24 भेद हैं। जो इसप्रकार हैं- अंतरंग-परिग्रह- मिथ्यात्व, राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जगुप्सा, वेद (स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद) ये 14 प्रकार का अंतरंग-परिग्रह है। बहिरंग-परिग्रह- क्षेत्र, वास्तु (कोठी, मकान आदि), सोना, चाँदी, धन, धान्य, दास, दासी, वस्त्र और बर्तन- ये दस प्रकार का बहिरंग-परिग्रह है। यह समस्त प्रकार का परिग्रह त्यागने योग्य है- ये सामान्य-उपदेश हैं। और इनका विरक्तिपूरक ्व त्याग करना ये विशेष-उपदेश है। यहाँ कवि ने ‘विशेष’ शब्द का प्रयोग- 'विरक्तिपूरक ्व ’ के अर्थ में किया है। कहने का अभिप्राय यही है कि बिना अंतरंग- विरक्ति के किसी भी वस्तु को छोड़ देना ‘त्याग’ नहीं है। किसी के कहने पर, देखादेखी, परिस्थितिवश अर्थात् जैसे हमें ज्ञात हो कि ये वस्तु हमें प्राप्त नहीं होगी, तो हम उसका त्याग कर देते हैं। बीमारी के चलते डाॅ. ने किसी वस्तु को खाने के लिये मना किया, तो हमने मजबूरी में उसका त्याग कर दिया। लोक में ऐसे कई प्रसंग आते हैं, जब हम दूसरों की इच्छा से त्यागवृत्ति को अपनाते हैं, यद्यपि हम उस वस्तु का उपयोग नहीं करते, पर अंतरंग से विरक्ति का भाव न होने से अथवा आसक्ति न घटने से वह त्याग, ‘त्याग’ संज्ञा प्राप्त नहीं करता अर्थात् त्याग करते हुये भी वह निष्फल है। साथ ही मिथ्यात्व का त्याग, अविरति का त्याग, कषाय का त्याग, विकथाओं का त्याग, प्रमाद का त्याग भी विशेष-त्याग है।

(चौपाई)

पूरब-करम-उदै रस भुंजै, ग्यान-मगन ममता न प्रयुंजै।
उरमैं उदासीनता लहिये, यौं बुध परिग्रहवंत न कहिये।। 32।।

शब्दार्थ :- पूरब-करम उदै-रस भुंज=ै पूर्वकृत-कर्म के उदय के रस/फल में विविध-प्रकार के फल को भोगते हैं, ग्यान-मगन ममता न प्रयुंज=ै ज्ञान में मग्न रहते हैं, उनमें ममता नहीं करते, उरमैं उदासीनता लहिये= हृदय में विरक्ति का भाव धारण करते हैं, यौं बुध परिग्रहवंत न कहिये= इसप्रकार ज्ञानीजन ‘परिग्रही’ नहीं कहलाते। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने बहुत ही सरलता से स्पष्ट किया है कि परिग्रह के होते हुये भी सम्यग्दृष्टिजीव ‘परिग्रहवंत’ या कहें ‘परिग्रही’ नहीं है। सम्यग्दर्शन यानि आत्मा का सच्चा-श्रद्धान होना। सम्यग्दृष्टि-जीव की बाह्य-स्थिति अभी पूर्ववत् ही है। मात्र दृष्टि अर्थात् श्रद्धान ही बदला है, इसलिये पूर्वबद्ध-कर्म तो उदय में आते हैं, और उनके अनुसार बाह्य सुख-दुःख की सामग्री भी उनको प्राप्त होती है। लेकिन जहाँ अज्ञानी-जीव मोह के उदय से उस सामग्री को तन्मय होकर भोगता हैं, वहीं ज्ञानी-जीव मोहग्रस्त नहीं होने से उन विषयों में तन्मय नहीं होते; बल्कि वे तो अपने ज्ञाता-स्वभाव में मगन रहते हैं, और बाहर में कर्मोदय-जनित क्रिया सहजप्रवर्तित होती रहती है। हृदय में पर-पदार्थों, प्राप्त भोग-सामग्री, संयोगों आदि के प्रति उदासीनता अथवा विरक्ति का भाव होने से परिग्रह होते हुए भी उन्हें ‘निष्परिग्रही’ कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यही है कि परिग्रह का कारण ‘पर में आसक्ति का भाव’, और निष्परिग्रही होने का प्रमुख-कारण ‘पर में अनासक्ति का भाव’ है।

(सवैया इकतीसा)

जे-जे मनवांछित विलास-भोग जगत् में, ते-ते विनासीक सब राखे न रहत हैं।
और जे-जे भोग-अभिलाष चित्त-परिनाम, तेऊ विनासीक धारारूप ह्वै बहत हैं।।
एकता न दुहू-माँहि तातैं वांछा फुरै नांहि, ऐसे भ्रम-कारज को मूरख चहत हैं।
सतत रहैं सचेत, परसौं न करैं हेत, यातैं ग्यानवंतकौं अवंछक कहत हैं।। 33।।

शब्दार्थ :- जे-जे मनवांछित विलास-भोग जगत् में= जो-जो मनचाही विलासितापूर्ण भोग-सामग्री संसार में है, ते-ते विनासीक सब राखे न रहत हैं= वह सब नष्ट होनेवाली हैं, चाहने पर भी टिकती नहीं हैं, और जे-जे भोग-अभिलाष चित्त-परिनाम= और जो-जो भोगों की इच्छारूप मन के भाव हैं, तेऊ विनासीक धारारूप ह्वै बहत हैं= वे भी नष्ट होनेवाले हैं, परन्तु फिर भी धाराप्रवाह रूप से बहते/होते रहते हैं, एकता न

पूर्वबद्ध-निजकर्म-विपाकात्, ज्ञानिनो यदि भवत्युपभोगः।
तद््भवत्वथ च रागवियोगात्, नूनमेति न परिग्रहभावम्।। 14।।

निर्जरा द्वार (७) | भाग २/२

वे द्य-वे दक-विभाव-चलत्वाद, वे द्य ते न खलु कां क्षि तमेव।
तेन कांक्षति न dIY®¨f³f विद्वान्, सर्वतोऽप्यति-विरक्तिमुपैति।। 15।।

दुहू-माँहि तातैं वांछा फुरै नांहि= दोनों (भोग-सामग्री और भोग-संबंधी इच्छा) के बीच एकता नहीं है, इसलिए (ज्ञानियों को) इच्छा उत्पन्न ही नहीं होती, ऐसे भ्रमकारज को मूरख चहत है= ऐसे भ्रमपूर्ण-कार्य (दोनों में एकता करना) को मूर्ख-लोग ही चाहते हैं, सतत रहैं सचेत परसौं न करैं हेत= (ज्ञानी) हमेशा सावधान रहते हैं, परद्रव्यों से अनुराग नहीं करते, यातैं ग्यानवंतकौं अवंछक कहत हैं= इसलिए ज्ञानियों को ‘इच्छा-रहित’ कहा जाता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जगत् की समस्त भोग-सामग्री, और उस भोग-सामग्री को भोगने- संबंधी समस्त-परिणामों की नश्वरता का और ज्ञानी-जीव की ‘निर्वांछकता’ का बहुत ही सुंदर-वर्णन किया है। संसार में जितनी भी भोग-सामग्री है, सब विनाशीक है, क्षणभंगुर है; कभी मिलती है कभी छूट जाती है, इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं है; क्योंकि पुद््गल का पर्यायगत स्वभाव ही ऐसा है। हम कितना भी पुरुषार्थ करें पुण्य-पाप के उदय से प्राप्त भोग-सामग्री को सहेजकर नहीं रख सकते, हम अपने ही जीवनकाल में कितने ही परिवर्तन देखते हैं, कोई राजा से रंक बनता है, तो कोई रंक से राजा। भाई! भोग-सामग्री तो ‘पर’ है, लेकिन मोह के कारण उसको भोगने के जो परिणाम मेरे है, जो धारा-प्रवाह उत्पन्न होते ही रहते हैं; वे भी विनाशीक हैं, क्षणभर में बदल जाते हैं। जब भी हमें इच्छा हो और भोग-सामग्री प्राप्त हो जाये- ऐसा तो तीनकाल में भी संभव नहीं है। जबतक हम उस उत्पन्न-इच्छा को पूरा करने का पुरुषार्थ करते हैं तबतक वहाँ अनेक नई-इच्छाओं का जन्म हो चुका होता है, यानि न तो कभी इच्छा पूरी होती है, और न कभी वे परिणाम स्थायी रहते हैं। भोग-सामग्री और भोग-संबंधी-इच्छा- इन दोनों में एकता या कहें सुमेल न होने से, अर्थात् इनका वास्तविक-स्वरूप ज्ञात होने से ज्ञानी-जीवों को इच्छा उत्पन्न ही नहीं होती है। भोगों की वांक्षासंबंधी- भ्रमपूर्ण या मूर्खतापूर्ण-परिणाम अज्ञानी मिथ्यादृष्टि-जीव को ही होते हैं; क्योंकि उसे ही इस भोग-सामग्री में सुख-प्राप्ति का भ्रम होता है। ज्ञानियों को एेसा भ्रम तीन-काल में नहीं होता; क्योंकि इस क्षणभंगुर, विनाशीक भोग-सामग्री से त्रिकाल एकसमान रहनेवाला अविनाशी-सुख प्राप्त नहीं होगा- इस तथ्य से ज्ञानीजीव भली-भाँति परिचित हैं। क्यों न हों, जिसने सच्चे आत्मिक-सुख का स्वाद चख लिया हो, भला उसे इस छलावे मेें आनंद कैसे आ सकता है?? इसीलिए ज्ञानी-जीव प्रतिसमय सावधान और सचेत रहते हैं, पर-द्रव्यों से अथवा इस विनाशीक भोग-सामग्री से किंचिंत् भी अनुराग नहीं रखते। जब अनुराग ही नहीं, तो इच्छा भी नहीं। इसीलिये ज्ञानीजीव को ‘अवांछक’ अर्थात् ‘इच्छा-रहित’ कहा जाता है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसे फिटकड़ी लौद हरड़े की पुट बिना, स्वेत-वस्त्र डारिये मजीठ-रंग नीर में।
भीग्यौ रहै चिरकाल सर्वथा न होइ लाल, भेदै नहिं अंतर-सुफेदी रहै चीर मैं।।
तैंसे समकितवंत राग-द्वेष-मोह बिनु, रहै निशि-वासर परिग्रह की भीर में।
पूरब-करम हरै, नूतन न बंध करै, जाचै न जगत्-सुख राचै न शरीर में।। 34।।

शब्दार्थ :- जैंसे फिटकड़ी-लौद हरड़े की पुट बिना= जैसे फिटकरी-लोंद और हरड के प्रयोग बिना, स्वेतवस्त्र डारिये मजीठ-रंग नीर में= लाल-रंग के पानी में सफेद कपड़ा डालने पर, भीग्यौ रहै चिरकाल= बहुत

ज्ञानिनो न हि परिग्रहभावं कर्म-राग-रसरिक्त-तयैति।
रङ्ग-युक्तिरकषायित-वस्त्रे स्वीकृतैव हि बहिर्लुठतीह।। 16।।

समय तक भीगने पर भी, सर्वथा न होइ लाल= किंचिंत् भी लाल नहीं होता, भेदै नहिं अंतर-सुफेदी रहै चीरमैं= अंतरंग को नहीं भेदता, वस्त्र में सफेदी ही रहती है, तैंसे समकितवंत राग-द्वेष-मोह बिनु= ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव राग-द्वेष-मोह के बिना, रहै निशि-वासर परिग्रह की भीर में= परिग्रह की भीड़ में रात-दिन रहे,(फिर भी) पूरब-करम हरै नूतन न बंध करै= पूर्व-कर्मों की निर्जरा करता है, और नवीन-बंध नहीं करता है, जाचै न जगत्-सुख राचै न शरीर में= संसार का सुख नहीं चाहता, शरीर में भी नहीं राचता/मग्नता नहीं करता। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने बहु-प्रचलित सरल-उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया है कि सम्यग्दृष्टि-जीव परिग्रह के मध्य रहता हुआ भी ‘निष्परिग्रही’ कैसे रहता है? जैसे कपड़ा रंगनेवाला जब कपड़ा रंगता है, तो वह पानी में लाल-रंग के अलावा फिटकरी, लोंद और हरड़ का भी प्रयोग करता है। इनका प्रयोग किये बिना कपड़ा कितनी भी देर तक क्यों न भिगोया जाये, वह रंगता नहीं है, उसमें सफेदी विद्यमान रहती है। ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव राग-द्वेष-मोह इन तीनों से रहित होने के कारण परिग्रह के बीच रहकर भी ‘परिग्रही’ नहीं कहलाता। कहने का अभिप्राय यही है कि जैसे फिटकरी, लोंद और हरड़ के डालने पर लाल-रंग चढ़ता है, यानि सफेद कपड़े को भी अपने रंग में रंगकर लाल कर देता है; ठीक उसीप्रकार राग-द्वेष और मोह इन तीनों के कारण ही आत्मा से पूर्ण-भिन्न होते हुये भी परिग्रह अपना रंग दिखाता है, अर्थात् जीव ‘परिग्रही’ कहलाता है। वर्ना पर-वस्तु तो पूर्णत: भिन्न-द्रव्य है, और जब दोनों-द्रव्यों के बीच अत्यंताभाव है, तो दोनों-द्रव्य कितने ही काल साथ रहे कोई फर्क नहीं पड़ता। ‘परिग्रही’ कहलाने का मूल-कारण पर-वस्तु नहीं, पर-वस्तु में अपनापन है, मोह-राग-द्वेष का परिणाम है। और पर-वस्तु में अपनेपन का ये परिणाम सम्यग्दृष्टि-जीव में नहीं है, सो वह परिग्रह के बीच रहकर भी निष्परिग्रही है, और मिथ्यादृष्टि-जीव में ये तीनों परिणाम जड़ से विद्यमान हैं, सो वह परिग्रह के बीच रहे या न रहे वह ‘परिग्रही’ ही कहलाता है। परवस्तु में अपनेपन के परिणाम से जहाँ मिथ्यादृष्टि-जीव पूर्व-कर्मों को भोगकर दुःखी होता है, और नवीन-कर्मों का भी बंध करता है; वहीं सम्यग्दृष्टि-जीव परिग्रह के इस मिथ्या-परिणाम के न होने से न तो पूर्वकर्मों के फलस्वरूप दु:ख भोगता है, बल्कि उनकी भी निर्जरा करता है, और नवीन-कर्मों का बंध भी नहीं करता है। देहादिक और जगत् के भ्रमरूप-मिथ्यासुख के वास्तविक-स्वरूप से परिचित होने के कारण न तो लौकिक-सुख की वांछा करता और न ही शरीर में रमता है अर्थात् देहादिक से मोह-बुद्धि नहीं करता। इसलिए सम्यग्दृष्टि-जीव संसार में रहकर भी ‘निष्परिग्रही’ और ‘सुखी’ है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसे काहू देसकौ बसैया बलवंत-नर, जंगल में जाइ मधु-छत्ताकौं गहतु है।
वाकौं लपटाँहि चहुँओर मधु-मच्छिका पै, कंबल की ओटसौं अडंकित रहतु है।।
तैंसें समकिती सिवसत्ताकौ स्वरूप साधै, उदै की उपाधिकौं समाधिसी कहतु हैं।
पहिरै सहजकौ-सनाह मन में उछाह, ठानै सुख-राह उदवेग न लहतु हैं।। 35।।

शब्दार्थ :- जैंसे काहू देसकौ-बसैया बलवंत-नर= जैसे किसी देश में रहने वाला बलवान् पुरुष, जंगल में जाइ मधु-छत्ताकौं गहतु है= जंगल में जाकर मधुमक्खी के छत्ते को ग्रहण करता है, वाकौं लपटाँहि चहुँओर मधु-मच्छिका पै= मधुमक्खियाँ उसके चारों ओर लिपट जातीं हैं, पै कंबल की ओटसौं अडंकित रहतु है= परन्तु कंबल की आड़ में रहने से वह डंकरहित रहता है, तैंसें समकिती सिवसत्ताकौ स्वरूप साधै= उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव (जब) मोक्ष की सत्ता का स्वरूप साधते हैं, तब उदै की उपाधिकौं समाधिसी कहतु हैं= उदय की उपाधि को समाधि के समान कहते हैं, पहिरै सहजकौ-सनाह मन में उछाह= मन में उत्साह भरकर सहजस्वरूप का बख्तर/कवच पहने रहते हैं, ठानै सुख-राह उदवेग न लहतु हैं= सुख की राह पर चलते हैं, परन्तु आकुलता को प्राप्त नहीं होते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पुनः एक नये उदाहरण के माध्यम से सिद्धांत को घटाया है। मधुमक्खी के छत्ते को तोड़नेवाले पुरुष जब जंगल में जाकर मधुमक्खी के छत्ते को तोड़ते हैं, तो छत्ते की अधिकांश मक्खियाँ उस पुरुष के चारों ओर लिपट जाती हैं। लेकिन वह पुरुष बदन पर कंबल लपेटकर ही छत्ते को तोड़ने जाता है, इसलिए मधुमक्खियों के डंक से प्रभावित नहीं होता अर्थात् उसके चारों ओर मधुमक्खियों के लिपटे होने पर भी उनका डंक उसे नहीं लगता; क्योंकि वे मधुमक्खियाँ कंबल पर चिपटकर डंक मारती रहतीं हैं, और वह डंक उस कंबल तक ही सीमित रह जाता है, उसके शरीर में नहीं चुभता है। ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव भी जब परिग्रह के मध्य रहते हैं, तब वह अपने जाननहारस्वभाव का कंबल पहने रहते हैं; जिससे मोह-राग-द्वेष आदि विकाररूप अंतरंग-परिग्रह और देहादिक संयोगोंरूप बहिरंग-परिग्रहरूपी मधुमक्खियों के डंक से प्रभावित नहीं होते हैं, अर्थात् अनुकूलताप्रतिकूलताओं का कितना भी उदयजनित-संयोग बनें, परन्तु फिर भी तदनुरूप विकाररूप परिणमित होकर ‘परिग्रही’ नहीं होते, अर्थात् अपने ज्ञाता-स्वभावरूप रहकर ‘निष्परिग्रही’ ही रहते हैं। बल्कि कर्मोदय-जनित अनुकूलता-प्रतिकूलतारूप इन औपाधिक-भावों को भी समाधि के समान मानते हैं, क्योंकि इससे परिणामों में दृढ़ता आती है, और स्वरूप की साधना और प्रबल होने से कर्मों का बंध नहीं, बल्कि निर्जरा ही होती है। इसलिए मन में अपूर्व-उत्साह धारण करते हुये, आत्मस्वभाव का कवच पहनकर सुख की राह ठानते हैं अर्थात् मोक्षमार्ग पर ही अग्रसर होते हैं, रंचमात्र भी आकुलित नहीं होते हैं।

(दोहा)

ग्यानी ग्यान-मगन रहै, रागादिक-मल खोइ।
चित-उदास करनी करै, करम-बंध नहिं होइ।। 36।।

शब्दार्थ :- ग्यानी ग्यान-मगन रहै= ज्ञानी-जीव ज्ञान में मग्न/लीन रहते हैं, रागादिक-मल खोइ= राग-द्वेष आदि दोषों को हटाकर, चित-उदास करनी करै= उदासीन/अनासक्त-मनसे क्रियायें करते हैं,(इसकारण उनको) करम-बंध नहिं होइ= कर्मों का बंध नहीं होता है । विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि जिन क्रियाओं को करते हुये अज्ञानी-जीव प्रतिसमय बंध करता है, उन्हीं क्रियाओं को करते हुये ज्ञानी-जीव प्रतिसमय निर्बंध रहते हैं, ऐसा क्यों? ज्ञानी-जीव प्रतिसमय अपने स्वभावरूप अर्थात् जाननहाररूप ही प्रवर्तन करते हैं, जिससे परपदार्थों में, और उदयजनित-भावों में इष्ट-अनिष्ट-बुद्धि न होने से मोह-राग-द्वेष के परिणाम उत्पन्न ही नहीं होते, जिससे कर्म का बंध नहीं होता। साथ ही उदास-चित्त अर्थात् विरक्त-मन से क्रिया करने से भी कर्म का बंध नहीं होता है। यहाँ ‘उदास-मन’ से तात्पर्य है मोह-रहित सहज-प्रवर्तन करना, जब उपयोग मात्र जाननरूप प्रवर्तन करता है, तो मोह-राग-द्वेष की उत्पत्ति ही नहीं होती; क्योंकि कर्मबंध का मूल

कारण यही विकारी-भाव हैं।
ज्ञानवान् स्वरसतोऽपि यतः स्यात्, सर्वराग-रस-वर्जनशीलः।
लिप्यते सकल-कर्मभिरेषः, कर्म-मध्य-पतितोऽपि ततो न।। 17।।

(दोहा)

मोह-महातम-मल हरै, धरै सु म ति-परकास।
मुकति-पंथ परगट करै, दीपक-ज्ञान-विलास।। 37।।

शब्दार्थ :- मोह-महातम-मल हरै=मोहरूपी गहन-अंधकार के दोष को दूर करते हैं, धरै सुमति परकास= सुबुद्धिरूपी-प्रकाश को धारण करते हैं, मुकति-पंथ परगट करै=मुक्ति- पंथ/मोक्षमार्ग प्रकाशित करते हैं, दीपकज्ञान-विलास=ज्ञानरूपी-दीपक के विलास अर्थात् प्रज्वलन से। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया कि ज्ञानी-जीव मोक्षमार्ग का प्रकाश कैसे करते हैं? जैसे दीपक के प्रकाश से गहन-अंधकार में भी हमें रास्ता दिखाई देने लगता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानरूपीदीपक के सुबुद्धिरूपी-प्रकाश से अनादि का मोहरूपी गहन-अंधकार भी तत्क्षण विलय को प्राप्त होता है, जिससे भव्यजीवों के लिए मोक्ष का मार्ग प्रकट होता है। दीपक भले ही छोटा हो, परन्तु फिर भी उसका प्रकाश रास्ता देखने में सहायक है; ठीक उसीप्रकार ज्ञान भले ही अल्प हो, पर यदि सम्यक् है, तो मोक्ष का मार्ग अवश्य प्रकाशित करता है। इसके विपरीत, क्षयोपशम-ज्ञान भले ही बहुत हो, पर सम्यक् न हो, तो वह तीन-काल में भी मोक्ष का मार्ग प्रकाशित नहीं कर सकताहै।

(सवैया इकतीसा)

जामैं धूम को न लेस, वातकौ न परवेस, करम-पतंगनिकौं नास करै पल में।
दसाकौ न भोग, न सनेहकौ संजोग जामें, मोह-अंधकारकौ वियोग जाके थलमैं।।
जामैं न तताई नहिं राग-रकताई रंच, लहलहै समता-समाधि-जोग जलमैं।
ऐसी ग्यान-दीप की सिखा जागी अभंगरूप, निराधार फुरी पै दुरी है पुद्ग् लमैं।। 38।।

शब्दार्थ :- जामैं धूम को न लेस वातकौ न परवेस= जिसमें रंचमात्र भी धुँआ नहीं है, और हवा का भी प्रवेश नहीं है, करम-पतंगनिकौं नास करै पल में= कर्मरूपी पतंगों को जो क्षण में नष्ट करता है, दसा को न भोग न सनेह कौ संजोग= जिसमें बाती का भी प्रयोग नहीं है, न जिसमें सनेह यानि चिकनाई का प्रयोग है, मोहअंधकारकौ वियोग जाके थलमैं= इसके अस्तित्व में मोहरूपी अंधकार का मूल में ही वियोग है, जामैं न तताई नहिं राग-रकताई रंच= जिसमें गरमाहट भी नहीं है, और न ही रागरूपी रक्तिमा/लालिमा है, लहलहै समतासमाधि-जोग जलमैं= जिसकी ज्वाला/ज्योति में समता, समाधि और योग लहलहाते हैं, ऐसी ग्यानदीप की सिखा जागी अभंगरूप= ऐसी ज्ञानरूपी दीपक की ज्योति अखंडरूप से जागृत हुई है, निराधार फुरी पै दुरी है पुद््गलमैं= (जो) बिना किसी आधार के स्फुरायमान है, परन्तु पुद््गल में छिपी हुई है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने बहुत ही सरसता से सम्यग्ज्ञान और दीपक में साम्य और विरोध दोनों को वर्णित किया है। यहाँ ‘सम्यग्ज्ञान’ को ‘दीपक’ माना है, और उन दोनों में साम्य बैठाते हुये दोनों में भिन्नता भी सिद्ध की है। जैसे लोक में जो दीपक जलता है, उसमें से धुँआ निकलता है; लेकिन ज्ञानरूपी-दीपक विकार की कालिमारूपी धुँयें से रहित है। लौकिक-दीपक में हवा का प्रवेश होते ही बुझ जाता है, लेकिन ज्ञानरूपीदीपक में कर्म के झकोरेरूपी-हवा का प्रवेश ही नहीं होता, तो बुझने का तो सवाल ही नहीं। जैसे लौकिकदीपक की लौ से पतंगे आदि तत्क्षण ही जलकर नष्ट हो जाते हैं, ठीक उसीप्रकार ज्ञानरूपी-दीपक के जलने पर कर्मोंरूपी कीट-पतंगे स्वयं ही जलकर नष्ट हो जाते हैं। जैसे लौकिक-दीपक बिना बाती और तेल के नहीं जलता है, लेकिन ज्ञानरूपी-दीपक को जलने के लिये न तो ज्ञेयरूपी-बाती की आवश्यकता होती है और न ही रागरूपी-संयोगों की चिकनाई की आवश्यकता है। जैसे लौकिक में भी दीपक के प्रकाश में अंधकार का वियोग या कहें कोई अस्तित्व ही नहीं होता, अर्थात् प्रकाश होते ही अंधकार स्वयं ही भाग जाता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानरूपी दीपक के जलने पर मोहरूपी अंधकार का कोई अस्तित्व ही नहीं रहता। लौकिक-दीपक जलने पर गरमाहट महसूस होती है, जबकि ज्ञानरूपी-दीपक के जलने पर दुःख की गरमाहट नहीं, बल्कि सुखरूपी-शीतलता का अनुभव होता है। लौकिक-दीपक की लौ में लालिमा रहती है, जबकि ज्ञानरूपी-दीपक में राग या कषायरूपी-लालिमा दिखाई नहीं देती। जैसे दीपक की ज्योति के प्रकाश में जगत् के पदार्थ स्वत: प्रकाशित होते हैं, ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञान के प्रकाश में साम्यभाव, स्वरूप में स्थिरतारूप-समाधि, और मन-वचन-काय की स्थिरतारूपयोग लहलहाते हैं अर्थात् पल्लवित और पुष्पित होते हैं, वृद्धि को प्राप्त होते हैं- ऐसी अखंड, अनुपमज्ञानरूपी ज्योति स्फुरायमान हुई है, लेकिन पुद्ग् ल में छिपी हुई है अर्थात् प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर न होकर देहरूपी-देवालय में विराजमान है।

(सवैया इकतीसा)

जैसो जो दरब, तामैं तैसोई सुभाउ सधै, कोऊ दरब काहूकौ सुभाऊ न गहतु है।
जैंसे संख उज्जल, विविध-वर्न माटी भखै, माटीसौ न दीसत नित-उज्जल रहतु है।।
तैंसें ग्यानवंत नाना-भोग परिगह-जोग, करत विलास, न अग्यानता लहतु है।
ग्यान-कला दूनी होइ, दुदं -दसा सूनी होइ, ऊनी होइ भौ-स्थिति बनारसी कहतु है।। 39।।

शब्दार्थ :- जैसो जो दरब, तामैं तैसोई सुभाउ सधै= जैसा जो पदार्थ होता है, उसका वैसा ही स्वभाव सिद्ध/ फलित होता है, कोऊ दरब काहूकौ सुभाऊ न गहतु है= कोई भी पदार्थ किसी का भी स्वभाव ग्रहण नहीं करता, जैंसे संख उज्जल विविध-वर्न-माटी भखै= जैसे शंख उजला (होकर भी)विविध-रंगों की मिट्टी का भक्षण करता है, माटीसौ न दीसत नित उज्जल रहतु है= (लेकिन फिर भी) मिट्टी जैसा दिखाई नहीं देता है, हमेशा उजला ही रहता है, तैंसें ग्यानवंत नाना-भोग परिगह-जोग= उसीप्रकार ज्ञानी-जीव विविध-प्रकार के भोग, परिग्रह के संयोग में, करत विलास, न अग्यानता लहतु है= विलास करते हुए भी अज्ञानता को प्राप्त नहीं होता है, ग्यानकला दूनी होइ= ज्ञान-कला दुगनी होती जाती है, दुदं -दसा सूनी होइ= द्वंद्व/ भ्रम की दशा शून्य हो जाती है, ऊनी होइ भौ-स्थिति बनारसी कहतु है= संसार की स्थिति कम हो जाती है- ऐसा बनारसीदास जी कहते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उस स्थिति का वर्णन किया है, जब सम्यग्दृष्टि-जीव परिग्रह को भोगते हुये, संयोगों के बीच रहते हुए भी परिग्रह के रंग में नहीं रंगता है। लोक में भी हम देखते हैं कि जिस पदार्थ का जो स्वभाव होता है, वह कभी नहीं बदलता है। जैसे चीनी का स्वभाव मीठापन, नीबू का स्वभाव खट्टापन, और नमक का स्वभाव खारापन; अब इन तीनों को कितना भी मिलाया जाये, फिर भी तीनों ही अपना स्वभाव नहीं छोड़ते हैं; क्योंकि जब हम चखते हैं, तब हमें तीनों का स्वाद अलग-अलग ही आता है। यादृक् तादृगिहास्ति तस्य वशतो यस्य स्वभावो हि यः, कर्त्तंु नैष कदाचनापि हि परैरन्यादृशः शक्यते। अज्ञानं न कदाचनापि हि भवेज्ज्ज्ञानं भवेत्सन्ततम् ज्ञानिन्, भुंक्ष्व परापराध-जनितो नास्तीह बन्धस्तव।। 18।। इसीप्रकार न ही कोई पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ के स्वभाव को ग्रहण करता है, न उस रूप होता है, फिर चाहे वे कितने ही काल तक साथ में क्यों न रहें या भोग करें। जैसे शंख स्वभाव से सफेद होता है, दिन-रात अनेक-रंगों की मिट्टी का भक्षण करने पर भी वह आज तक मटमैला नहीं हुआ, उजला ही रहा। जैसे शरीर और आत्मा अनादिकाल से साथ हैं, फिर भी दोनों पूर्णत: भिन्न हैं, न ही आज तक दोनों ने अपना स्वभाव बदला है और न ही रूप, अर्थात् न तो आज तक चेतन-आत्मा जड़रूप हुआ, और न ही जड़ चेतनरूप। उसीप्रकार ज्ञानी अर्थात् सम्यग्दृष्टि-जीव नानाप्रकार के भोग भोगने पर भी, और अनेकों संयोगों के बीच रहने पर भी कभी अज्ञानता को प्राप्त नहीं होता अर्थात् स्वप्न में भी परिग्रह के प्रति ममत्व का भाव उत्पन्न नहीं होता। बल्कि विपरीत-परिस्थितियों में ज्ञानकला अर्थात् भेदविज्ञान की कला और अधिक प्रबल होती है, और मोहरूपी भ्रम की स्थिति शून्य हो जाती है, जिससे कर्मों की प्रतिसमय निर्जरा होने से भौ-स्थिति अर्थात् संसार की स्थिति घटती जाती है- ऐसा बनारसीदास जी कहते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जौलौं ज्ञान को उदोत तौलौं नहिं बंध होत, बरतै मिथ्यात तब नाना-बंध होहि है।
ऐसौ भेद सुनिकै लग्यौ तू विषै-भोगनिसौं, जोगनिसौं उद्दम की रीतितैं बिछोहि है।।
सुनु भैया संत तू कहै मैं समकितवंत, यहु तौ एकंत भगवंत कौ दिरोहि है।
विषैंसौं विमुख होहि अनुभौ-दसा अरोहि, मोख-सुख टोहि, तोहि ऐसी मति सोहि है।। 40।।

शब्दार्थ :- जौलौं ज्ञान को उदोत= जबतक ज्ञान का प्रकाश रहता है, तौलौं नहिं बंध होत= तबतक बंध नहीं होता, बरतै मिथ्यात तब नाना-बंध होहि है= जब मिथ्यात्व वर्तता है, तब विविधप्रकार का बंध होता है, ऐसौ भेद सुनिकै लग्यौ तू विषै-भोगनिसौं= तू ऐसा कथन सुनकर भी विषय-भोगों में लगा हुआ है, जोगनिसौं उद्दम की रीतितैं बिछोहि है= प्रयत्नपूर्वक पुरुषार्थ करने की रीति को छोड़ दिया है, सुनु भैया संत! तू कहै मैं समकितवंत= सुनो भैया संत! तुम कहते हो कि ‘‘मैं सम्यग्दृष्टि हूँ’’ यहु तौ एकंत भगवंत कौ दिरोहि है= यही एकांत तो जिनेन्द्रदेव का द्रोही है, विषैंसौं विमुख होहि, अनुभौ-दसा अरोहि= विषय-भोगों से विरक्त होकर अनुभव की दशा को ग्रहण करके, मोख-सुख टोहि तोहि ऐसी मति सोहि है= मोक्ष-सुख को देखो, तुझे ऐसी बुद्धि शोभती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन जीवों का वर्णन किया है, जो अपने आपको ‘सम्यग्दृष्टि’ भी कहते हैं, और विषय-भोगों में प्रवृत्त भी रहते हैं। आगम के अनुसार ‘‘जबतक ज्ञान का प्रकाश हो, तबतक बंध नहीं होता, और जबतक मिथ्यात्व वर्तता है, तबतक बंध होता है’’- जिनवाणी का ये कथन सुनकर कोई जीव यह मान ले कि ‘मैं तो ज्ञातादृष्टा भगवान् आत्मा हूँ, मैं तो कुछ करता ही नहीं, यह सब तो जड़ का परिणमन है, सो कुछ भी करो, कुछ भी खाओ-पिओ, कोई फर्क नहीं पड़ता’- यह सोचकर विषय-भोगों में प्रवृत्त हो और सामान्य नियमसंयम की प्रवृत्ति को भी जानबूझकर छोड़ दे, और कहे कि ‘‘मैं तो सम्यग्दृष्टि हूँ।’’- उसके प्रति कविवर कहते हैं ‘‘तुम्हारा यह एकांत या एक-पक्ष को स्वीकार करना भी मिथ्यात्व ही है, जो आत्मा एवं जिनेन्द्रदेव का द्रोही या विरोधी है, अर्थात् इससे भी आत्मा का अहित ही होगा।’’ ज्ञानिन् कर्म न जातु कर्तुमुचितं dIYd®¨fत्तथाप्युच्यते, भुंक्षे हन्त जातु मे यदि परं दुर्भुक्त एवासि भोः। बन्धः स्यादुपभोगतो यदि न तत्किं कामचारोऽस्ति ते, ज्ञानं सन्वस बन्धमेष्यपरथा स्वस्यापराधाद् ध्रुवम्।। 19।। क्योंकि जिसे आत्मस्वरूप का सच्चा-श्रद्धान होता है, उसकी विषय-भोगों में प्रवृत्ति हो ही नहीं सकती, जिसने सच्चा-आत्मसुख का स्वाद चख लिया हो, उसे इन क्षणिक और भ्रामिक-भोगों में आनंद कैसे आ सकता है? उसे इनसे विरक्ति नियम से वर्तती ही है। जबतक ऐसा न हो तबतक समझना वह जीव मिथ्यात्व की अवस्था में ही है। क्योंकि स्वंय बनारसीदास ही आगे कहते है - ‘‘ज्ञानी मगन विषयसुख-मांहीं, यह विपरीति संभवै नाहीं।’’ सम्यक्-दशा तो वह है, जब पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों से विरक्ति हो,अर्थात् इनके त्यागरूप प्रवर्तन भी हो, और आत्मस्वभाव का ग्रहण हो अर्थात् आत्मस्वरूप का दृढ़ और सम्यक्-श्रद्धान भी हो, और मोक्ष-सुख या पूर्ण-सुखी होने का लक्ष्य हो- ऐसी सुमति ही जीव को शोभा देती है।

(चौपाई)

ग्यानकला जिनके घट जागी, ते जगमाँहि सहज-वैरागी।
ग्यानी मगन विषै-सुखमाँही, यह विपरीति संभवै नांही।। 41।।

शब्दार्थ :- ग्यानकला जिनके घट जागी= सम्यग्ज्ञान की कला, जिनके हृदय में जागृत है, ते जगमांहि सहज वैरागी= वे संसार में सहज-वैरागी रहते हैं, ग्यानी मगन विषै-सुखमांही= ज्ञानी-जीव विषयों के सुख में मगन रहें, यह विपरीति संभवै नांही= यह उल्टी-चाल संभव नहीं है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया कि ज्ञानी-जीव विषयों में मग्न कैसे हो सकता है? क्योंकि जिसके चित्त में ज्ञानकला जागृत होती है, अर्थात् जब भेदविज्ञान-पूर्वक जड़ से भिन्न निज-स्वभाव की महिमा आती है, और अनुभूति के आनंद का जो रस आता है उसकी तुलना जगत् के किसी भी रस से संभव ही नहीं है। तो फिर ज्ञानी-जीव को इन क्षणिक, जड़, पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों में रस कैसे आ सकता है? और जब रस ही नहीं आता, तो मगनता कैसे हो सकती है? अर्थात् ऐसी विपरीतता तीन-काल में भी संभव नहीं है। यदि जीव स्वयं को सम्यग्दृष्टि कहे, और पंचेन्द्रिय के विषयों में रमता हुआ दिखे, तो समझना कि वह जीव ज्ञानी नहीं, अज्ञानी-मिथ्यादृष्टि ही है। जैसे चंदन के वृक्ष पर जहरीले-साँप रहते हैं, परन्तु दिन-रात साथ रहने पर भी साँप का जहर चंदन के अंदर प्रवेश नहीं करता। ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव कर्मोदय-जनित प्रसंगों में, परन्तु आगम के अनुकूल विषय-भोगों में प्रवर्तन करते हुये कदाचित् दिखे भी, परन्तु फिर भी भोगों में मगनता तो कदापि संभव ही नहीं है।

(दोहा)

ग्यान-सकति वैराग्य-बल, सिव-साधैं समकाल।
ज्यौं लोचन न्यारे रहैं, निरखैं दोउ नाल।। 42।।

शब्दार्थ :- ग्यान-सकति वैराग्य-बल सिव-साधैं समकाल= ज्ञान-शक्ति और वैराग्य-बल दोनों एक साथ/एक समय में ही मोक्षमार्ग को साधते हैं, ज्यौं लोचन न्यारे रहैं निरखैं दोउ नाल= जैसे दोनों नेत्र अलगअलग रहते हैं, परन्तु देखते दोनों एक साथ ही हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने बहुत ही सरल-उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया कि मोक्षमार्ग में ज्ञान और वैराग्य दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू की तरह होते हैं, ज्ञान के बिना वैराग्य की और वैराग्य के बिना ज्ञान की कोई कीमत नहीं। क्योंकि ज्ञान के बिना वैराग्य आकुलता-रहित सहजता से पालना असंभव है, और बिना वैराग्य के ज्ञान मोक्षरूपी मंजिल तक पहुँचाने में असमर्थ होता है। इसलिए मोक्षमार्ग में ज्ञान और वैराग्य दोनों भिन्न होते हुये भी एकसाथ ही कार्य करते हैं। जिसप्रकार दोनों ही नेत्र भिन्न-भिन्न होते हुए भी देखने का काम एक साथ ही करते हैं, ठीक उसीप्रकार ‘सम्यग्ज्ञान’ जीव के ज्ञान-गुण की पर्याय है, और ‘वैराग्य’ जीव के चारित्र-गुण की पर्याय हैं, दोनों में भिन्नता होते हुए भी मोक्षमार्गरूपी कार्य दोनों एकसाथ ही करते हैं।

(चौपाई)

मूढ ‘करम को करता’ होवै, फल-अभिलाष धरै फल-जोवै।
ग्यानी क्रिया करै फल-सूनी, लगै न लेप निर्जरा-दूनी।। 43।।

शब्दार्थ :- मूढ करम को करता होवै= मूर्ख-जीव कर्म का कर्ता बनता है, फल-अभिलाष धरै फल जोवै= (पहले भी) फल की इच्छा रखता है, (और बाद में भी) फल चाहता है, ग्यानी क्रिया करै फल-सूनी= ज्ञानी फल की वांक्षा से रहित होकर कर्म करता है, लगै न लेप निर्जरा दूनी= बंध भी नहीं होता, और निर्जरा भी दुगनी होती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ज्ञानी क्रिया करते हुए निर्बंध और अज्ञानी को बंध- इस सत्य का स्पष्टीकरण किया है। पहले विचार करते हैं कि अज्ञानी कर्म से बंधता क्यों है? पहली-गल्ती- अज्ञानीजीव स्वयं को उस क्रिया का कर्ता मानता है। दूसरी-गल्ती- वह पहले से फल की वांक्षा रखकर ही कार्य शुरू करता है। और तीसरी-गल्ती- बाद में फल मिला कि नहीं? - येे भी विचार करता है। फल अच्छा मिला तो हर्ष/खुश होता है, और बुरा मिले तो विषाद/दुःखी होता है, जिससे वह हर क्रिया के फल में कर्मबंधन को प्राप्त होता है। सीधा-सा न्याय है, जो फल की चाह करता है, उसको फल भोगना पड़ता है, जो फल की चाह नहीं रखता उसे भोगना भी नहीं पड़ता। जैसे सम्यग्दृष्टि-जीव न तो स्वयं को किसी भी क्रिया का कर्ता मानता है, न ही किसी भी क्रिया के बदले फल की वांक्षा करता है, और न ही क्रिया के फल में हर्ष और विषाद करके सुखी और दुःखी होता है, इसीलिए वह उस क्रिया के फलस्वरूप कर्मबंधन को भी प्राप्त नहीं होता है। बल्कि हर क्रिया विरक्ति या उदासीनता-पूर्वक करने से और सहज रहने से बंधन के बजाय उसके उत्तरोत्तर निर्जरा होती है।

(दोहा)

बंधै करमसौं मूढ़ ज्यौं, पाट-कीट तन-पेम।
खुलै करमसौं समकिती, गोरखधंधा-जेम।। 44।।

शब्दार्थ :- बंधै करमसौं मूढ़= अज्ञानी-जीव कर्म से बँधता है, ज्यौं पाट-कीट तन पेम= जैसे रेशम का कीड़ा जो अपनी लार को अपने तन पर ही लपेटता है, खुलै करमसौं समकिती= सम्यग्दृष्टि कर्मबंधन से खुलता/छूटता है, गोरखधंधा जेम= जैसे गोरखधंधा। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि जीव अपने बंधन के धागे स्वयं ही बुनता है, और मुक्ति का पुरुषार्थ भी स्वयं ही करता है। जैसे रेशम का कीड़ा स्वयं अपनी लार को अपने शरीर पर लपेटता जाता है, और अंत में स्वयं उसमें कैद होकर मरण को प्राप्त होता है, ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टिकर्तारं स्वफलेन यत्किल बलात्कर्मैव नो योजयेत्, कुर्वाणः फल-लिप्सुरेव हि फलं प्राप्नोति यत्कर्मणः। ज्ञानं संस्तदपास्त-राग-रचनो नो बध्यते कर्मणा, कुर्वाणोऽपि हि कर्म तत्फल-परित्यागैक-शीलो मुनिः।। 20।। जीव स्वयं अपने स्वरूप को भूलकर, अपने ही परिणामों से अपने लिये ही कर्मों की गठरी तैयार करता है, और उसका फल भी स्वयं ही भोगता है। वहीं सम्यग्दृष्टि-जीव प्रतिसमय अपने ज्ञाता-दृष्टा-स्वभावरूप प्रवर्तन करता है, सो अपने ही परिणामों के बल पर अपने लिये स्वयं ही कर्मबंधन से छूटने का या मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। ठीक उसीप्रकार जैसे गोरखधंधा नाम का कीड़ा स्वयं ही अपनी युक्तियों से अपने बुने जाल से बाहर निकलता है।

(सवैया तेईसा)

जे निज पूरब-कर्म उदै, सुख-भुंजत भोग उदास रहेगें।
जे दुःख में न विलाप करैं, निरबैर हियैं तन-ताप सहैगें।।
है जिन्हकै दिढ़-आतमज्ञान, क्रिया करिकैं फल कौं न चहैंगें।
ते सुविचच्छन-ग्यायक हैं, तिनकौ ‘करता’ हम तौ न कहैंगें।। 45।।

शब्दार्थ :- जे निज पूरब-कर्म उदै= जो अपने पूर्वकर्म के उदय से, सुख-भुंजत भोग उदास रहेग=ें प्राप्त भोग-सामग्री में उदासीन रहकर सुख भोगतें हैं, जे दुःख में न विलाप करैं= जो दुःख में दुःखी नहीं होते, निरबैर हियैं तन-ताप सहैग=ें बैर-रहित हृदय से शरीर के कष्टों को सहन करते हैं, है जिन्हकै दिढ़ आतमज्ञान= जिनके दृढ़ आत्मज्ञान है, क्रिया करिकैं फल कौं न चहैंग=ें वे क्रिया करके फल की इच्छा नहीं करते, ते सुविचच्छनग्यायक हैं= वे विद्वान्-पुरुष सम्यग्दृष्टि हैं, तिनकौ करता हम तौ न कहैंग=ें उनको ‘कर्ता’ हम तो नहीं कहेगें। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि ज्ञानी-जीव कर्म के उदय में अनुकूल-प्रतिकूल सामग्री प्राप्त होने पर भी कर्म के कर्त्ता क्यों नहीं बनते? पूर्व-कर्म के उदय में जिसप्रकार अज्ञानी-जीव को भोग-सामग्री प्राप्त होती है, उसीप्रकार पूर्वकर्म के उदय में ज्ञानी-जीव को भी भोग-सामग्री प्राप्त होती है। लेकिन अज्ञानी-जीव उस भोग-सामग्री को आसक्ति ही नहीं, अधिकतर तो अति-आसक्तिपूर्वक भोगता है, वहीं ज्ञानी-जीव उस भोग-सामग्री को उदासीन या कहें विरक्त-भाव से भोगते हैं। यदि कोई सामग्री या संयोग दुःख में भी निमित्त होती है, तब भी वे दुःखी नहीं होते, न ही किसी के प्रति द्वेष और बैर का भाव रखते हैं; बल्कि अपने ही पूर्वकर्म का उदय जानकर साम्यभाव रखते हैं। इतना ही नहीं ऐसे जीवों को निज आत्मस्वरूप का भी दृढ़ श्रद्धान होता है, कितनी भी प्रतिकूलता आ जाये इनका श्रद्धान डगमगाता नहीं है। जो किसी भी क्रिया के फल में सांसारिक-सुख की ही नहीं मोक्ष-सुख की भी वांक्षा नहीं करते, वे ही विद्वान् जीव वास्तव में ‘सम्यग्दृष्टि’ हैं। कविवर कहते हैं कि उनको हम कर्म का कर्त्ता कैसे कह सकते हैं? अर्थात् वे ज्ञानी-जीव कर्म के कर्त्ता नहीं होते।

(सवैया इकतीसा)

जिन्हकी सुदृष्टि में अनिष्ट-इष्ट दोऊ सम, जिन्हकौ अचार सु विचार सुभ-ध्यान है।
स्वारथकौं त्यागि जे लगे हैं परमारथकौ, जिन्हकै बनिजमें न नफा है न ज्यान है।।
जिन्हकी समुझि में सरीर ऐसौ मानियत, धानकौसौ छीलक कृपानकौसौ म्यान है।
पारखी-पदारथ के साखी-भ्रम-भारथ के, तेईं साधु तिनहीकौ जथारथ-ग्यान है।। 46।।

त्यक्तं येन फलं स कर्म कुरुते नेति प्रतीमो वयं, किन्त्वस्यापि कुतोऽपि कििञ्चदपि तत्कर्मावशेनापतेत्। तस्मिÂन्नापतिते त्वकम्प-परमज्ञान-स्वभावे स्थितो, ज्ञानी किं कुरुतेऽथ किं न कुरुते कर्मेति जानाति कः।। 21।। सम्यग्दृष्टय एव साहसमिदं कर्तुं क्षमन्ते परं, यद््वज्रेऽपि पतत्यमी भयचलत्-त्रैलोक्यमुक्ताध्वनिः। सर्वामेव निसर्ग-निर्भयतया शङ्कां विहाय स्वयं, जानन्तः स्वमवध्य-बोध-वपुषं बोधाच्च्यवन्ते न हि।। 22।। शब्दार्थ :- जिन्हकी सुदृष्टि में अनिष्ट-इष्ट दोऊ सम= जिनकी सम्यक्-दृष्टि में अप्रिय और प्रिय-दोनों समान हैं, जिन्हकौ अचार सु विचार सुभ-ध्यान है= जिनका आचरण और विचार शुभध्यानरूप है, स्वारथकौं त्यागि जे लगे हैं परमारथकौ= (सांसारिक) स्वार्थवृत्ति को त्यागकर जो परमारथ या मोक्षमार्ग में लगे हैं, जिन्हकै बनिजमें न नफा है न ज्यान है= जिनके व्यापार/कार्य में न फायदा है, न नुकसान है, जिन्हकी समुझि में सरीर ऐसौ मानियत= जिनकी सोच में शरीर को ऐसा मानते हैं, धानकौसौ छीलक= धान के छिलके के समान, कृपानकौसौ म्यान है= म्यान में रखी तलवार के समान, पारखी पदारथ के साखी भ्रम-भारथ के= पदार्थों के जानकार हैं, भ्रमरूपी युद्ध के साक्षी हैं, तेई साधु तिनहीकौ जथारथ ग्यान है= वे ही साधु हैं, और उन्हीं को यथार्थ-ज्ञान है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि संसार और संयोगों के बीच में रहते हुये ज्ञानी की चिंतनधारा कैसी रहती है? संसार में नानाप्रकार के पदार्थ और संयोग हैं, जो जीव को अपने-अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त होते हैं, उनमें से कुछ हमें बहुत अच्छे लगते हैं और कुछ खराब। जो इष्ट या अच्छे लगते हैं, हम उनसे ‘राग’ करते हैं, और जो हमें अनिष्ट या बुरे लगते हैं, उनसे हम ‘द्वेष’ करते हैं। जबकि ज्ञानी-जीव के लिए दोनों समान होते हैं, जिससे उन्हें राग-द्वेष विकारी-भावों की उत्पत्ति ही नहीं होती। उनका समस्त-आचरण और विचार केवल निज-आत्मध्यान के लिये ही होता है। जैसे यदि वे भोजन भी ग्रहण करते हैं, तो सिर्फ उतना ही, जिससे उनकी साधना निर्विघ्न हो, चिंतन भी चलता है, तो इसका कि कब और कैसे मैं स्वरूप में स्थिर होऊँ‍? जो जगत् की भ्रमपूर्ण और संसार में परिभ्रमण करानेवाली सांसारिक-स्वार्थवृत्ति को छोड़कर एकमात्र आत्मध्यान के मार्ग पर ही अग्रसर होते हैं। जिनके वचन व्यापार में न तो सांसारिक-लाभ की चर्चा होती है और न नुकसान की, एकमात्र धर्म की ही चर्चा में अनुरक्त रहते हैं। जिनके चिंतन में देह और आत्मा के बीच निरन्तर भेदज्ञान वर्तता है। जैसे चावल धान के अंदर पैदा होने पर भी उससे भिन्न ही रहता है, यदि ऐसा न होता तो धान कूटनेवाला चावल और धान को अलग नहीं कर सकता था। जैसे तलवार म्यान के अंदर रहने पर भी सदैव भिन्न रहती है, ठीक उसीप्रकार देहरूपी-म्यान में आत्मारूपी-तलवार सदाकाल-भिन्न रहती है। जो भ्रमरूप-संसार में चलनेवाली विकारों की लड़ाई के साक्षी अर्थात् ज्ञातामात्र हैं। अभिप्राय यह है कि सत्य से सुपरिचित होने से उनकी दृष्टि में भ्रमरूप-संसार का कोई स्थान नहीं है- ऐसे निर्मल-जीव ही वास्तव में सच्चे-साधु हैं,और उन्हीं का ज्ञान यथार्थ या कहें निर्दोष है।

(सवैया इकतीसा)

जम-कौसौ भ्राता दुःखदाता है असाता-कर्म, ताकै उदै मूरख न साहस गहतु है।
सुरग-निवासी भूमि-वासी औ पाताल-वासी, सबही कौ तन-मन कंपितु रहतु है।।
उरकौ उजारौ न्यारौ देखिये सपत-भैसौं, डोलत निसंक भयौ आनंद लहतु है।
सहज-सुवीर जाकौ सासतौ-सरीर एेसौ, ग्यानी-जीव आरज-आचारज कहतु है।। 47।।

शब्दार्थ :- जमकौसौ भ्राता दुःखदाता है असाताकर्म= असाता-वेदनीयकर्म यमराज के भाई के समान दुःख देनेवाला है, ताकै उदै मूरख न साहस गहतु है= इसके उदय में मूर्ख/ मिथ्यादृष्टि-जीव साहस ग्रहण नहीं करता है, सुरग-निवासी भूमि-वासी औ पाताल-वासी= स्वर्ग में रहनेवाले, भूमि पर रहनेवाले, और पाताल में रहनेवाले, सबहीकौ तन-मन कंपितु रहतु है= सभी का शरीर और मन कंपित रहता है, उरकौ उजारौ न्यारौ देखिये सपतभैसौं= उजले हृदयवाले अर्थात् सम्यग्दृष्टि-जीव, (स्वयं को) सात-भयों से भिन्न देखते हैं, डोलत निसंक भयौ आनंद लहतु है= निशंकित होकर आनंद प्राप्त करते हैं, सहज-सुवीर जाकौ सासतौ-सरीर= आत्मबल के धनी जिसका ज्ञान-शरीर शाश्वत है, एेसौ ग्यानी-जीव आरज-आचारज कहतु है= ऐसा ज्ञानी-जीव का आचरण पवित्र/अनुकरणीय कहलाता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि ज्ञानी निर्भय और अज्ञानी भयभीत क्यों रहता है? अनादिकाल से जीव आठ-कर्मों के साथ है, यद्यपि मोहनीय-कर्म बलवान है और एकमात्र वही दुःख का कारण है; परन्तु संसारी-जीव उसको दुःख का कारण कभी नहीं मानता, उसे समस्त दुःख का कारण असाता-वेदनीयकर्म ही लगता है, क्योंकि जिस सांसारिक क्षणिक-सुख में जीव मग्न है, इस कर्म का उदय जीव के उस क्षणिक सुख में बाधक बनता है; इसीलिये कवि ने असाताकर्म को ‘यमराज का भाई’ कहा। जैसे यमराज के सामने जीव अपना धैर्य खो देता है, ठीक उसीप्रकार असाता-वेदनीय कर्म के उदय में भी जीव अपना धैर्य, साहस सब खो देता है। यहाँ तक कि कुगुरु-कुदेवादि को भी पूजने के लिये तैयार हो जाता है, और फिर भी महादुःखी होता है। असाता-वेदनीयकर्म का उदय केवल हम मनुष्यों को ही नहीं, स्वर्ग में रहनेवाले देवों, भूमि पर रहनेवाले तिर्यंच और व्यंतर आदि तथा पाताल यानि अधोलोक में रहनेवाले भवनवासी, नारकी आदि सभी जीवों को कंपित कर देता है अर्थात् सभी जीव इससे भयभीत और दुःखी रहते हैं। जब कि वहीं दूसरी ओर जिनके हृदय में ज्ञान का प्रकाश है अर्थात् सम्यग्दृष्टि ज्ञानी-जीव इस कर्म के उदय में तनिक भी भयभीत और दुःखी नहीं होते हैं; क्योंकि वह इस कर्म के उदय में मिलनेवाले संयोगों और संयोगी-भावों से स्वयं को प्रतिक्षण भिन्न अनुभव करते हैं। सातोंप्रकार के भय सम्यग्दृष्टि-जीव को नहीं होते, वे हमेशा निर्भय और सुखी रहते हैं, क्योंकि वे आत्मबल के धनी होते हैं, वे इस नश्वर-देह को नहीं, बल्कि ज्ञान को अपना शरीर मानते हैं, जो शाश्वत है, कभी मरण को प्राप्त नहीं होता। इस प्रकार सम्यग्दृष्टि-ज्ञानी जीव परम-पवित्र ऐसे उत्तम-आचरण के धनी होते हैं।

(दोहा)

इहभव-भय परलोक-भय मरन-वेदना-जात।
अनरच्छा-अनगुप्त-भय अकस्मात-भय सात।। 48।।

शब्दार्थ :- इहभव-भय = इसलोक का भय, परलोक-भय= परलोक का भय, मरन-वेदना-जात= मरण का भय, वेदनाजनित भय, अनरच्छा= अनरक्षा-भय, अनगुप्त-भय= अगुप्ति भय, अकस्मात-भय= अकस्मात् भय, सात= ये सात भय होते हैं। विशेषार्थ :- सप्त-भयों के नामों का वर्णन करते हुए कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि इसलोक का भय, परलोक का भय, मरण का भय, वेदनाजनित-भय, अनरक्षा-भय, अगुप्ति-भय और अकस्मात्भय- ये सातप्रकार के भय होते हैं।

(सवैया इकतीसा)

दसधा-परिग्रह-वियोग-चिंता इह-भव, दुर्गति-गमन-भय परलोक मानिये।
प्राननिकौ-हरन मरन-भै कहावै सोइ, रोगादिक-कष्ट यह वेदना बखानिये।।
रच्छक हमारौ कोऊ नांही अनरच्छा-भय, चोर-भै विचार अनगुप्त मन आनिये।
अनचिंत्यौ अबही अचानक कहाधौं होइ, ऐसौ भय-अकस्मात् जगतमैं जानिये।। 49।।

शब्दार्थ :- दसधा-परिग्रह-वियोग-चिंता इह-भव= दसप्रकार का परिग्रह अलग हो जाने की चिंता ‘इहलोकभय’ है, दुर्गति-गमन भय-परलोक मानिये= दुर्गति में जाने का भय ‘परलोक-भय’ मानो, प्राननिकौ हरन मरनभै कहावै सोइ= प्राणों का वियोग होना वह ‘मरण-भय’ कहलाता है, रोगादिक-कष्ट यह वेदना बखानिये= रोगादिक के चलते कष्ट का होना यह ‘वेदना-भय’ कहा जाता है, रच्छक हमारौ कोऊ नांही अनरच्छा-भय= हमारी रक्षा करने वाला कोई नहीं है ये ‘अनरक्षा-भय’ है, चोर-भै विचार अनगुप्त मन आनियै= चोर दुश्मन आदि के आने पर कैसे बचेगें मन में ऐसा विचार आना ‘अगुप्ति-भय’ है, अनचिंत्यौ अबही अचानक कहाधौं होइ= जो पहले सोची न हो, ऐसी अचानक विपत्ति का आना, ऐसौ भय-अकस्मात् जगतमैं जानिये= ऐसा ‘अकस्मात्भय’ लोक में जानना चाहिए। विशेषार्थ :- इस-छंद में सप्तभयों के स्वरूप का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि दसप्रकार के बाह्य-परिग्रह के अलग होने का भय ‘इहलोक-भय’ है। नरक-निगोद-निर्यंचादि दुर्गतियों में गमन का भय ‘परलोक-भय’ है। दसप्रकार के प्राणों का हरण या छूटना ‘मरण-भय’ कहलाता है। शरीर में होनेवाले रोगादिक के होने पर कष्ट का होना ‘वेदना-भय’ है। मेरी रक्षा करनेवाला कोई नहीं है एेसा मानना ‘अनरक्षा-भय’ है। चोर-दुश्मन आदि के आने पर स्वयं को कैसे बचायेंगें, ऐसा सोचना ‘अगुप्तिभय’ है। जिसके बारे में पहले सोचा भी न हो और अचानक ऐसा कुछ भी होना ‘अकस्मात्-भय’ है,- ऐसा लोक में माना जाता है। इनका विशेष-विवेचन इसप्रकार है- 1. इहलोक-भय- अनादिकाल से संसारी-जीव को कर्म का संयोग होने से अंतरंग-परिग्रह के साथ साथ सोना-चाँदी, क्षेत्र-वास्तु, धन-धान्य, बर्तन-भांडे, दास-दासी आदि बाह्य परिग्रह की भी प्राप्ति होती है, जिसे हर मिथ्यादृष्टि-जीव अपनी जान से भी ज्यादा संभालकर रखता है कि, कहीं यह परिग्रह मुझसे छूट न जाये, ये भय उसे जीवन-पर्यंत बना ही रहता है। जब कि हम अच्छे से जानते हैं कि ये सब हमें यहीं छोड़कर जाना है, परलोक में इसे साथ ले जाने की व्यवस्था नहीं है, तो फिर भयभीत क्यों? 2. परलोक-भय- मरण के बाद मेरा जन्म किस गति में होगा?- यह आशंका हर संसारी मिथ्यादृष्टि- जीव को रहती है, जब कि इस देह का वियोग होने पर अगले भव में कहाँ जन्म लेना है, यह सब पूर्वनिश्चित है; तब भी हम भयभीत रहते है। 3. मरण-भय- मरण का भय तो प्रत्येक संसारी मिथ्यादृष्टि-जीव को प्रतिसमय रहता है, चाहे वो संज्ञी हो या असंज्ञी। तिर्यंच-गति का असंज्ञी-जीव भी अपने प्राणों को बचाने की पूरी कोशिश करता है। और हम मनुष्यों की तो बात ही अलग है, हम अच्छे से जानते हैं कि जीव का मरण आयु-कर्म के आधीन है, जिसे एक पल भी कोई घटा-बढा नहीं सकता, फिर भी हम भयभीत रहते हैं। जबकि वास्तविकता तो यह है कि मरण का समय, मरण का स्थान आदि सब पूर्व-निश्चित है, जिसे टालने में हम तो क्या जिनेन्द्र भी समर्थ नहीं है, फिर हम प्रतिसमय मरण से भयभीत क्यों रहते हैं? 4. वेदना-भय- रोगादि से होनेवाली वेदना का भय होना ‘वेदना-भय’ है। जिनवाणी माँ कहती है कि ‘‘हे आत्मन्! शरीर तो रोगों का पिटारा है, और आत्मा तो कभी रोगी हुआ ही नहीं’’। भगवान् की वाणी में आया ‘‘मैं तो शरीर आदि से भिन्न भगवान् आत्मा हूँ, तो जब रोग मुझे हुआ ही नहीं, तो वेदना कैसी? मेरे में और इन सभी पदार्थों में तो अत्यंताभाव है।’’ - यह सब सुनकर भी हम निरन्तर भयभीत रहते हैं। 5. अनरक्षा-भय- पिता, पुत्र, पति आदि संयोगों के बिछुड़ जाने पर अब मेरी रक्षा कौन करेगा? ऐसा भय करना ‘अनरक्षा-भय’ है। वास्तव में देखा जाये, तो क्या ये संयोग हमारी रक्षा कर सकते हैं? हम प्रत्यक्ष-अनुभव करते हैं कि जब मरण-समय नजदीक हो, सारे संबंधी भी पास खड़े हों, डॉ. भी साथ हो; पर क्या उस समय कोई हमारी रक्षा करने में समर्थ होता है? नहीं। क्या संयोगों के बिछुड़ जाने पर, कोई रक्षक न होने से किसी की जिंदगी रुक जाती है? नहीं। तो फिर भय कैसा? 6. अगुप्ति-भय- रुपया पैसा जमीन जायदाद आदि के खोने का भय ‘अगुप्ति-भय’ है। हम यह भूल ही जाते हैं कि जो होना है सो निश्चित है। यदि पाप का उदय आयेगा तो इस लक्ष्मी का भी वियोग होना निश्चित है; और पुण्य का उदय है तो इसे कोई छीन नहीं सकता, तो फिर हम क्यों व्यर्थ ही भयभीत रहते हैं? हम प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं कि जब डकैती पड़ती है तो हमारे सामने होते हुए भी यह लक्ष्मी हमसे छिन जाती है, हम उसे रोक नहीं पाते फिर भी हम भयभीत रहते हैं, क्यों? 7. अकस्मात्-भय- संसारी-जीवों की ये प्रवृत्ति है कि अचानक कुछ न हो जाये ऐसी आशंका उन्हें हर समय बनी रहती है। घर से व्यक्ति निकले और वापस समय पर घर न आये, तो फिर मन में न जाने कितनी आशंकायें जन्म लेती है। क्यों? क्योंकि हम भूल जाते हैं कि हर कार्य अपने समय पर ही होता है, अकस्मात् कुछ नहीं होता। यदि कोई दुर्घटना भी घटी है, तो उसका भी समय पूर्व-निश्चित था, वह भी तेरे उदय के आधीन ही घटी है। हे आत्मन्! तो फिर भय कैसा?

(छप्पय)

नख-सिख-मित परवान, ग्यान-अवगाह निरक्खत।
आतम-अंग अभंग संग, पर-धन इम अक्खत।।
छिनभंगुर संसार-विभव, परिवार भार-जसु।
जहाँ उतपति तहाँ प्रलय, जासु संजोग-विरह तसु।।
परिगह-प्रपंच परगट परखि, इहभव-भय उपजै न चित्त।
ग्यानी निसंक-निकलंक निज- ग्यानरूप निरखंत नित।। 50।।

शब्दार्थ :- नख-सिख-मित परवान= सिर की चोटी से लेकर पैर के नाखून तक परिमित, ग्यान-अवगाह निरक्खत= ज्ञान की अवगाहनारूप देखते हैं, आतम-अंग अभंग= आत्मा के स्वरूप को भंगरहित, संग परधन इम अक्खत= संयोग/परिग्रह को पराये धन के समान जानते/कहते हैं, छिनभंगुर संसार-विभव= संसार का वैभव क्षणभंगुर है, परिवार भार-जसु= परिवार आदि संयोगों को भार के समान (मानते हैं), जहाँ उतपति, तहाँ प्रलय= जहाँ उत्पत्ति है, वहाँ विनाश भी है, जासु संजोग विरह तसु= जिसका संयोग उसका वियोग (भी है - ऐसा मानते हैं), परिगह-प्रपंच परगट परखि इहभव-भय उपजै न चित्त= परिग्रह को प्रत्यक्ष प्रपंच/ जंजाल देखकर इहलोकभय चित्त में उत्पन्न नहीं होता, ग्यानी निसंक निकलंक निज-ग्यानरूप निरखंत नित= ज्ञानी जीव अपने

स्वरूप को प्रतिदिन शंकारहित विकाररहित मात्र ज्ञानरूप देखते हैं।
लोकः शाश्वत एक एष सकल-व्यक्तो विविक्तात्मन-श्चिल्लोकं स्वयमेव केवलमयं यं लोकयत्येककः।

लोकोऽयं न तवापरस्तदपरस्तस्यास्ति तद्भीः कुतो, निःशङ्कः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विन्दति।। 23।। विशेषार्थ :- ज्ञानी-जीव अर्थात् सम्यग्दृष्टि-जीव को पूर्वकथित सातों भय क्यों नहीं होते हैं? इसका स्पष्टीकरण आगे के छंदों में क्रम से किया जा रहा है। पहला इहलोक भय बाह्य-परिग्रह के छूटने का भय ‘इहलोक-भय’ है। अज्ञानी मिथ्यादृष्टि-जीव को यह भय प्रतिसमय रहता है, क्योंकि उसे परिग्रह में ममत्वबुद्धि है, साथ ही पैर के नाखून से सिर तक सर्वांग-देह के साथ एकत्वबुद्धि होने से स्वयं को देहरूप ही अनुभव करता है; जबकि ज्ञानी-जीव स्वयं को देह और संयोगों से भिन्न देखते हैं। जिस परिवार और कुटुम्बीजनों के साथ अज्ञानी-जीव को आनंद आता है, ज्ञानी-जीव उसे भार या बोझ समझते हैं, उनकी दृष्टि में संसार का समस्त वैभव क्षणभंगुर है। जिसकी उत्पत्ति हुई है, उसका विनाश अवश्य होगा, संयोगों का वियोग निश्चित है,- ऐसा दृढ-श्रद्धान ज्ञानी-जीव को प्रतिसमय वर्तता है। कवि कहते हैं कि ज्ञानी-जीव जब परिवार, कुटुम्ब, धन-वैभव आदि जड़-पदार्थों का ऐसा नश्वर-स्वरूप प्रत्यक्ष देखते हैं, तो इनके छूटने का भय उन्हें उत्पन्न ही नहीं होता। इसीलिए ज्ञानी-जीव स्वयं को इन जड़-पदार्थों से पूर्णत: भिन्न किसी भी प्रकार की शंका से रहित निःशंक, समस्त विकारों से रहित निःकलंक, एकमात्र ज्ञान-स्वरूप ही अनुभव करते हैं; और प्रतिसमय निर्भय रहते हैं।

(छप्पय)

ग्यानचक्र मम-लोक, जासु अवलोक मोख-सुख।
इतर-लोक मम नाहिं, नाहिं जिसमाँहि दोख-दुख।।
पु न्न -सु ग तिदातार,पाप-दु र गति-पद-दायक।
दोऊ खंडित खानि, मैं अखंडित सिवनायक।।
इहविधि विचार परलोक-भय, नहिं व्यापत वरतै सुखित।
ग्यानी निसंक-निकलंक निज-, ग्यानरूप निरखंत नित।। 51।।

शब्दार्थ :- ग्यानचक्र मम-लोक जासु अवलोक मोख-सुख= ज्ञान-स्वरूपी अात्मा मेरा लोक है, जिसे देखने से मोक्ष-सुख होता है, इतर-लोक मम नांहि, नांहि जिसमाँहि दोख-दुख= अन्य कोई लोक मेरे नहीं है, ना ही वह मेरा है, जिसमें दोष-दुःख है, पुन्न सुगतिदातार, दुरगति पद-दायक= पुण्य सुगति को देनवे ाला है, और पाप दुर्गति को दने वे ाला है, दोऊ खंडित खानि मैं अखंडित सिवनायक= दोनों खंडित यानि नाशवान् हैं, (जबकि) मैं अविनाशी, मोक्ष का नायक हू,ँ इहविधि विचार परलोक-भय नहि व्यापत= इसप्रकार विचार करने से परलोक का भय मन में व्याप्त नहीं होता है, वरतै सुखित ग्यानी निसंक-निकलंक निज-ग्यानरूप= (बल्कि वे तो) सुखरूप वर्तते हैं, ज्ञानी-जीव अपने स्वरूप को प्रतिसमय शंकारहित, विकाररहित मात्र-ज्ञानरूप देखते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘परलोक का भय’ ज्ञानी-जीव को क्यों नहीं होता?- इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया है। जहाँ अज्ञानी-जीव स्वयं को छोड़कर समस्त-लोक को अपना मानता है, और फलस्वरूप दुःखी होता है। वहीं ज्ञानी-जीव मानते हैं कि समस्त लोक में एकमात्र मेरी ज्ञानस्वरूपी-आत्मा ही मेरा लोक है; क्योंकि उसके अवलोकन-मात्र या श्रद्धान से ही मुझे मोक्षसुख या सच्चे-सुख की प्राप्ति होती है, फलस्वरूप प्रतिसमय-सुखी रहते हैं। जिनमें पापाचार आदि दोष और चारों गतियों में परिभ्रमणरूप दुःख हैं, वे अन्यलोक मेरे नहीं हैं। यद्यपि पुण्य मनुष्यगति और देवगतिरूप सुगति को प्राप्त कराने में निमित्त हैं, और पाप नरकगति, तिर्यंचगति और निगोदरूप दुर्गति को प्राप्त कराने में निमित्त हैं; परन्तु हैं तो दोनों (पुण्य और पाप) संसाररूप ही, दोनों ही नाशवान् हैं, संसार में परिभ्रमण करानेवाले हैं, दुःखरूप हैं; जबकि मैं तो अनंतसुख का घनपिण्ड, कभी नष्ट न होनेवाला अविनाशी ध्रुव-तत्त्व हूँ, और मोक्षरूपी-महल का राजा हूँ- ऐसा विचार करते हैं। जहाँ अज्ञानी-जीव को यह भय रहता है कि मैं अगले-भव में कहाँ किस गति में जाऊँगा? वहीं ज्ञानी-जीव विचार करते हैं कि ‘‘मैं कहीं भी रहूँ, किसी भी गति में जाऊँ, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता; क्योंकि मैं तो हमेशा अपने स्व-चतुष्टय में ही निवास करता हूँ।’’- इसप्रकार विचार करने से ज्ञानी-जीव को ‘परलोक का भय’ उत्पन्न ही नहीं होता, इसलिए वह हमेशा सुखी रहते हैं, और प्रतिसमय अपने को समस्त शंकाओं से रहित ‘निशंक’, समस्त-विकारों से रहित ‘निकलंक’, एकमात्र ‘ज्ञानरूप’ ही अनुभव करते हैं, और ‘निर्भय’ रहते हैं।

(छप्पय)

फरस-जीभ-नासिका, नैन अरु श्रवन-अच्छ इति।
मन-वच-तन बल-तीन, स्वास-उस्वास आउ-थिति।।
ये दस-प्रान विनास, ताहि जग ‘मरन’ कहिज्जइ।
ग्यान-प्रान-संजुगत, जीव तिहुँ-काल न छिज्जइ।।
यह चिंत करत नहिं मरन-भय, नय-प्रवांन जिनवर-कथित।
ग्यानी निसंक-निकलंक निज-, ग्यानरूप निरखंत नित।। 52।।

शब्दार्थ :- फरस-जीभ-नासिका-नैन अरु श्रवन-अच्छ इति= स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र- ये पाँच इन्द्रिय (प्राण), मन-वच-तन बल-तीन स्वास-उस्वास आउ-थिति= मन, वचन, काया- तीन बल (प्राण), श्वासोच्छ्वास (प्राण), आयु (प्राण), ये दस-प्रान-विनास ताहि जग ‘मरन’ कहिज्जइ= इन दस प्राणों के विनाश को संसार में ‘मरण’ कहा जाता है, ग्यान-प्रान-संजुगत जीव तिहुँ-काल न छिज्जइ= ज्ञान-प्राण से सहित जीव तीनों काल में कभी नष्ट नहीं होता, यह चिंत करत नहि मरन-भय= यह चिंतन करने से मरण का भय नहीं होता, नय-प्रवांन जिनवरकथित= जिनेन्द्र-परमात्मा द्वारा कहे गये नय के अनुसार, ग्यानी निसंकनिकलंक निज- ग्यानरूप निरखंत नित= ज्ञानी जीव अपने स्वरूप को प्रतिसमय शंकारहित, विकाररहित, मात्र ज्ञानरूप देखते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि ज्ञानी-जीव को ‘मरणभय’ क्यों नहीं होता? लोक में पाँच-इन्द्रियाँ, तीन-बल, श्वासोच्छ्वास और आयु की स्थिति-ये दस-प्राण माने गये हैं, और इन दस-प्राणों के विनाश को ही ‘मरण’ कहा जाता है। पर विचार कीजिये कि ये दसों-प्राण तो शरीर के अंतर्गत हैं, जैसे पाँचों इन्द्रियाँ और तीनों बल तो शरीर का हिस्सा हैं ही, श्वास की क्रिया भी शरीर करता है, और आयु भी शरीर के संयोग से ही कही जाती है, जिसे ‘पुद््गल-द्रव्य’ कहते हैं। जबकि मैं तो जीव-द्रव्य हूँ, जो कि अजर-अमर है, इन दस-प्राणों का न तो जीव में कोई अस्तित्व है और न ही कोई संबंध, फिर इनके मरण होने पर जीव का मरण कैसे हुआ? तो फिर प्रश्न उठता है कि अज्ञानी-जीव को मरण का भय क्यों होता है? और लोक में ऐसा कथन क्यों किया जाता है? अज्ञानी-जीव को मरण का भय इसलिये होता है कि वह शरीर को अपना स्वरूप प्राणोच्छेदमुदाहरन्ति मरणं प्राणा: किलास्यात्मनो, ज्ञानं तत्स्वयमेव शाश्वततया नोच्छिद्यते जातुचित्। तस्यातो मरणं न dIY®¨fन भवेत्तद््भी: कुतो ज्ञानिनो, नि:शङ्क: सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विन्दति।। 24।। या शरीर को ही आत्मा मानता है, और इसके बिछुड़ने को अपना मरण, इसीलिए भयभीत भी होता है और दुःखी भी। जब कि ज्ञानी-जीव न केवल शरीर और आत्मा को भिन्न-भिन्न मानते हैं, बल्कि स्वयं को शरीर से पूर्णत: भिन्न मात्र ज्ञानस्वरूप आत्मा ही अनुभव करते हैं, ऐसे ज्ञान प्राण से सहित जीव का कभी मरण या विनाश नहीं होता इसीलिए न तो वह कभी भयभीत होते हैं और न दुःखी। लोक में दस-प्राणों के वियोग को ‘मरण’ व्यवहार की मुख्यता से कहा जाता है। निश्चयनय से तो सभी जानते हैं कि आत्मा मरती ही नहीं, केवल पर्याय बदलती है। केवली-भगवान् द्वारा कथित नयप्रमाण की साक्षीपूर्वक उक्त-कथन का चिंतन करने से ज्ञानी-जीव को मरण का भय ही उत्पन्न नहीं होता। इसीलिए ज्ञानी-जीव स्वयं को मात्र ज्ञानस्वरूप अनुभवते हुये शंकारहित ‘निःशंक’, विकाररहित ‘निकलंक’ और भयरहित ‘निर्भय’ रहते हैं।

(छप्पय)

वेदनवारौ जीव, जाहि वेदत सोउ जिय।
यह वेदना अभंग, सु तौ मम अंग नांहि विय।।
करम-वेदना दुविध, एक-सुखमय दुतीय-दुख।
दोऊ मोह-विकार, पुग्गलाकार बहिरमुख।।
जब यह विवेक मनमहिं धरत, तब न वेदनाभय विदित।
ग्यानी निसंक-निकलंक निज-, ग्यानरूप निरखंत नित।। 53।।

शब्दार्थ :- वेदनवारौ जीव जाहि वेदत सोउ जिय= वेदन करनेवाला आत्मा जिसका वेदन करता है, उस जीव को, यह वेदना अभंग सु तौ मम अंग नांहि विय= ‘यह वेदन अखंड रहता है, कि यह वेदना तो मेरे अंग (ज्ञान) में व्याप्त नहीं होती’ (ऐसा मानता है), करम-वेदना दुविध एक सुखमय दुतीय दुख= कर्म-वेदना दोप्रकार की है, एक सुखरूप, दूसरी दुःखरूप, दोऊ मोह-विकार पुग्गलाकार बहिरमुख= दोनों मोह का विकाररूप हैं, पुद््गल का आकाररूप हैं और परलक्ष्यी हैं, जब यह विवेक मनमाहिं धरत= जब ऐसा विवेक मन में धारण करते हैं, तब न वेदनाभय विदित= तब वेदनाभय का अनुभव नहीं होता, ग्यानी निसंक-निकलंक निज-ग्यानरूप निरखंत नित= ज्ञानी जीव अपने स्वरूप को प्रतिसमय शंकारहित, विकाररहित, ज्ञानरूप देखते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि सप्तभयों में से ‘वेदनाभय’ ज्ञानी को क्यों नहीं होता? ‘वेदन’ यानि ‘अनुभति ू करना’ या ‘आस्वादन करना’। और यह वेदन करना प्रत्येक जीव की जीवनशैली का अभिन्न-अंग है, अन्तर इतना है कि जहाँ ज्ञानी-जीव प्रतिसमय अपने ‘ज्ञान-स्वभाव’ का वेदन करते हैं, वहीं अज्ञानी-जीव प्रतिसमय अपने ‘मोह-जनित विकार’ का वेदन करता है। यह मोह-जनित-विकार दोप्रकार का होता है- एक ‘सातारूप’ होने से सुखाभास और दूसरा ‘असातारूप’ होने से दुःखरूप। ये दोनों ही विकार पुद््गलरूप और बहिर्मुखी हैं; क्योंकि इनका संबंध भी आत्मा से पूर्णत: भिन्न बाह्य जड़-पदार्थों से है, और इनका फल भी चाहे वह अच्छा हो या बुरा, देहरूप जड़ या पुद््गल को ही प्राप्त होता है। जैसे यदि मनपसंद भोग-सामग्री मिले, तो उसका भोग भी ये शरीर

ही करता है, और यदि रोगजनित-वेदना हो, तो उसका असर या प्रतिफल भी शरीर को ही मिलता है।
आत्मा ने तो आज तक न किसी सामग्री का भोग किया, और न ही कभी रोगादिरूप परिणमित हुआ।
एषैकैव हि वेदना यदचलं ज्ञानं स्वयं वेद्यते, निर्भेदोदित-वेद्य-वेदक-बलादेकं सदाऽनाकुलैः।

नैवान्यागत-वेदनैव हि भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो, निःशङ्कः सततं स्वयं स सहजं ज्ञान सदा विन्दति।। 25।। यहाँ प्रश्न उठता है कि जब सारा प्रतिफल पुद््गलरूप-देह को ही प्राप्त होता है, तो फिर वेदना का भय जीव को क्यों होता है? क्योंकि अज्ञानी-जीव मोह के कारण जब इस जड़-देह को ही अपना मानता है, तो उसको मिलने वाले प्रतिफल साता-असाता को भी अपना ही मानता है। यद्यपि दोनों ही मोह-जनित, परिश्रम-साध्य और विकाररूप होने से कष्टप्रद ही हैं; परन्तु साता का उदय कष्टसाध्य होने पर भी इसे इष्ट होने से उसके वेदन में तो इसे बहुत-आनंद आता है, और असाता का वेदन अनिष्ट होने से वेदना के भय से भयभीत रहता है। जब कि ज्ञानी-जीव विचार करते हैं कि जब देह ही अपनी नहीं, तो देह को मिलनेवाला प्रतिफल मेरा कैसे हो सकता है? इसीलिए देह में होनेवाले प्रतिफल का वेदन न करके वे उस-समय भी अपने ज्ञान-स्वभाव का ही वेदन करते हैं, अर्थात् देह में होनेवाले परिणमन के भी वे ‘भोक्ता’ नहीं, मात्र ‘ज्ञाता’ ही रहते हैं,- ऐसा विवेक प्रतिसमय चित्त में रहने से ज्ञानियों को वेदना का भय उत्पन्न ही नहीं होता। इसीलिए ज्ञानी-जीव प्रतिसमय किसी भी प्रकार की शंका से रहित ‘निःशंक’, समस्त विकारों से रहित ‘निष्कलंक’, जड़-वेदन के भय से रहित ‘निर्भय’ और स्वयं को एकमात्र ‘ज्ञानरूप’ ही अनुभव करते हैं।

(छप्पय)

जो स्व-वस्तु सत्ता-सरूप, जगमाँहि त्रिकालगत।
तासु विनास न होइ सहज, निहचै-प्रवांन मत।।
सो मम आतम-दरब सरवथा, नहिं सहाय धर।
तिहि-कारन रच्छक न होइ, भच्छक न कोइ पर।।
जब इहि-प्रकार निरधार किय, तब अनरच्छा-भय नसित।
ग्यानी निसंक-निकलंक निज- ग्यानरूप निरखंत नित।। 54।।

शब्दार्थ :- जो स्व-वस्तु सत्ता-सरूप जगमाँहि त्रिकालगत= जो आत्मवस्तु सत्स्वरूप जगत् में त्रिकाल विद्यमान है, तासु विनास न होइ सहज निहचै प्रवांन मत= उसका कभी भी विनाश नहीं होता- यह सहज बात निश्चय से प्रमाणित है, सो मम आतम-दरब सरवथा नहिं सहाय धर= सो मेरा आत्मद्रव्य कभी सहायता की अपेक्षा नहीं रखता, तिहि-कारन रच्छक न होइ भच्छक न कोइ पर= इसकारण न कोई दूसरा रक्षक होता है और न कोई भक्षक, जब इहि-प्रकार निरधार किय तब अनरच्छा-भय नसित= जब इसप्रकार निर्णय होता है, तब अनरक्षा का भय नष्ट हो जाता है, ग्यानी निसंक-निकलंक निज-ग्यानरूप निरखंत नित= ज्ञानी जीव अपने स्वरूप को प्रतिसमय शंकारहित, विकाररहित और मात्र ज्ञानरूप देखते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि ‘अनरक्षा-भय’ ज्ञानियों को क्यों नहीं होता? पहले विचार करते हैं कि कोई ‘मेरी रक्षा करे’- ऐसा भाव किसे और क्यों आता है? पहली बात रक्षा का विकल्प उसे होगा, जिसे अपने मरण का भय हो। और इस विकल्प का कारण यह कि उसने स्वयं के अविनाशी-स्वरूप को तो जाना नहीं, और प्राप्त-संयोगों को ही अपना रक्षक माना है, तभी तो उनके बिछुड़ने और खोने का भय उसे प्रतिसमय रहता है। और ऐसे विकल्प संसार में एकमात्र अज्ञानी-जीव को ही होते हैं, क्योंकि उसी ने देह और प्राप्त-संयोगों में ममत्व-बुद्धि करके उन्हीं को अपना रक्षक या कहें यत्सÂन्नाशमपु ति ै तत्र नियतं व्यक्तेति वस्तुस्थिति-ज्ञानं सत्स्वयमेव तत्किल ततस्त्रातं किमस्यापरैः। अस्यात्राणमतो न किंचन भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो, निःशङ्कः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विन्दति।। 26।। सर्वस्व मान रखा है, और उससे विपरीत-संयोगों को अपना भक्षक माना है। इसीलिए जैसे ही संयोगों के वियोग का अवसर आता है, ये अपने आपको असहाय और अनरक्षित महसूस करता है, और दु:खी होता है। जबकि ज्ञानी-जीव की प्रवृत्ति इसके विपरीत होती है। पहली बात तो वे स्वयं को देह और संयोगों से पूर्ण-भिन्न शुद्धात्मा मानते हैं, और केवली भगवान् की वाणी से प्रमाणित होता है कि आत्मद्रव्य शाश्वत हैं, उसका कभी क्षय नहीं होता है। तब ज्ञानी-जीव विचार करते हैं, कि फिर मेरा क्षय कैसे हो सकता है? इसलिये स्वयं के विनाश का भय उत्पन्न ही नहीं होता। दूसरी-बात, अज्ञानी-जीव संयोगों से रक्षा की अपेक्षा रखता है और जब वे नहीं होते, तो अनरक्षा का भय होता है। जबकि ज्ञानी-जीव विचार करते हैं, मैं तो अपने स्व-चतुष्टय से परिपूर्ण हूँ; और जगत् में अपने आधार से हूँ, मुझे किसी के सहयोग या सहायता, और रक्षा की अपेक्षा नहीं, इसलिये न मेरा कोई रक्षक है, और न कोई भक्षक, तो ‘अनरक्षा का भय’ कैसे होगा? इसप्रकार स्वचिंतन से अपने स्वरक्षितस्वरूप का यथार्थ-निर्णय होने से स्वप्न में भी ज्ञानी-जीव को अनरक्षा का भय उत्पन्न नहीं होता। इसीलिए ज्ञानी-जीव सर्व-शंकाओं से रहित ‘निःशंक’, सर्व-विकारों से रहित ‘निष्कलंक’, और अनरक्षाभय से रहित ‘निर्भय’ रहते हैं, और स्वयं को प्रतिसमय एकमात्र ‘ज्ञानस्वरूप’ ही अनुभव करते हैं।

(छप्पय)

परमरूप परतच्छ, जासु लच्छन चिन्मंडित।
पर-प्रवेस तहाँ नाहिं, माँहि महि अगम-अखंडित।।
सो मम-रूप अनूप, अकृत-अनमित-अटूट धन।
ताहि चोर किम गहै, ठौर नहिं लहै और जन।।
चितवंत एम धरि ध्यान जब, तब ‘अगुप्त-भय’ उपसमित।
ग्यानी निसंक-निकलंक निज- ग्यानरूप निरखंत नित।। 55।।

शब्दार्थ :- परमरूप परतच्छ जासु लच्छन चिन्मंडित= सर्वश्रेष्ठ आत्मवस्तु (परमात्मा के समान) प्रत्यक्ष है, जिसका लक्षण चेतना से मंडित अर्थात् चैतन्य-स्वरूप, पर- प्रवेस तहाँ नाहिं माँहिं महि अगम अखंडित= परवस्तु का प्रवेश उसमें नहीं है, पृथ्वी-मंडल पर जिसका पार पाना/जान सकना असंभव है, सो ममरूप अनूप अकृत अनमित अटूट धन= इसलिये मेरा रूप अनुपम किसी के द्वारा नहीं किया गया अर्थात् स्वयंसिद्ध है असीमित/अपार, क्षयरहित धन, ताहि चोर किम गहै ठौर नहिं लहे और जन= उसे चोर कैसे ग्रहण कर सकता है, जब अन्य लोग भी उसका ठिकाने का पता नहीं लगा सकते हैं, चितवंत एम धरि ध्यान जब, तब अगुप्तभय उपसमित= जब चित्त में ऐसा चिंतन करते हैं, तब अगुप्ति-भय शांत हो जाता है, ग्यानी निसंक-निकलंक निज-ग्यानरूप निरखंत नित= ज्ञानी-जीव अपने स्वरूप को प्रतिसमय सर्व-शंकाओं से रहित, विकारों से रहित मात्र ज्ञानरूप निरखते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में सप्तभयों में से ज्ञानियों को ‘अगुप्ति-भय’ क्यों नहीं होता‍?- इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया है। वास्तव में देखा जाये, तो लोक में भी चोरी उसीकी होती है, जो वस्तु स्वयं से भिन्न होती है, जैेसे रुपया पैसा जवाहरात आदि। लेकिन जो वस्तु आत्मसात् होती है, उसकी चोरी तो लोक में भी नहीं होती। स्वं रूपं किल वस्तुनोऽस्ति परमा गुप्तिः स्वरूपे न यत्, शक्तः कोऽपि परः प्रवेष्टुमकृतं ज्ञानं स्वरूपं च नुः। अस्यागुप्तिरतो न काचन भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो, निःशङ्कः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विन्दति।। 27।। जैसे- विद्या, कला, प्रतिभा आदि। लेकिन मोहासक्त अज्ञानी-जीव तो फिर भी हरसमय भयभीत रहता है, और भय भी किसका जो वस्तु जड़ है,अपने से पूर्णत: भिन्न है, परभव में जिसे साथ ले जाना असंभव है, आयु पूर्ण होते ही सब यहीं छोड़कर जाना है। लेकिन मोह की महिमा देखो, यह सब जानते हुये भी हम प्रतिसमय भयभीत हैं। इन जड़-वस्तुओं के मोह में इतने आसक्त हैं कि कभी विचार भी नहीं आता कि मैं कौन हूँ? किसके लिये रात-दिन चिंतित हूँ? इस नश्वर जड़-वैभव के लिये। जिनवाणी कहती हैं, ‘‘हे आत्मन्! तू तो जगत् का सर्वश्रेष्ठ-पदार्थ है, चैतन्य-स्वरूप अनंतगुणों का धारी है, तेरे अंदर पर वस्तु का रंचमात्र भी प्रवेश नहीं है। जो ‘अगम’ है अर्थात् इन्द्रियों और बाह्यसाधनों से जिसको जानना असंभव है। ये जड़-पदार्थ तो खंड- खंड हो जाते हैं, पर तूँ तो ‘अखंड-तत्त्व’ है, जिसे कोई खंड-खंड नहीं कर सकता। जगत् में तेरे समान कोई और नहीं है ऐसा ‘अनुपम-तत्त्व’ है, तेरा स्वरूप स्वयंसिद्ध है, तेरी महिमा अपार है। जगत् में जिसको धन कहा जाता है, वह तो देखते-देखते क्षय को प्राप्त हो जाता है, जबकि तू तो ऐसा धन है, जिसका आज तक क्षय ही नहीं हुआ। ऐसे ‘अपूर्वधन’ की चोरी कौन-सा चोर कर सकता है? चोरी तो दूर कोई अन्य-व्यक्ति उसको छू भी नहीं सकता।’’ जब ज्ञानी-जीव को इसप्रकार का चिंतन चलता है, तो ‘अगुप्ति का भय’ उन्हें उत्पन्न ही नहीं होता। इसीलिए ज्ञानी-जीव प्रतिसमय सर्व-शंकाओं से रहित नि:शंक, सर्व-विकारों से रहित निष्कलंक, और ‘अगुप्ति-भय’ से रहित ‘निर्भय’ रहते हैं, और स्वयं को इन सबसे भिन्न मात्र ‘ज्ञानस्वरूप’ ही अनुभव करते हैं।

(छप्पय)

सुद्ध-बुद्ध-अविरुद्ध, सहज-सुसमृद्ध सिद्ध-सम।
अलख अनादि-अनंत, अतुल-अविचल-सरूप मम।
चिदविलास-परगास, वीत-विकलप सुखथानक।
जहाँ दुविधा नहिं कोइ, होइ तहाँ कछु न अचानक।।
जब यह विचार उपजंत तब, ‘अकस्मात-भय’ नहि उदित।
ग्यानी निसंक-निकलंक निज-, ग्यानरूप निरखंत नित।। 56।।

शब्दार्थ :- सुद्ध-बुद्ध-अविरुद्ध सहज-सुसमृद्ध सिद्ध-सम= कर्म-कलंक से रहित, अनंतज्ञान का धनी, राग-द्वेष के विरोध से रहित, सहज, समृद्धशाली, सिद्ध के समान, अलख अनादि-अनंत अतुल-अविचलसरूप मम= अरूपी, आदि-अंत से रहित, उपमा-रहित, स्थिर मेरा स्वरूप, चिदविलास परगास वीत विकलप सुखथानक= चैतन्य के रस से सराबोर, विकल्प से रहित निर्विकल्प, सुख का स्थान, जहाँ दुविधा नहिं कोइ होइ तहाँ कछु न अचानक= जहाँ कोई दुविधा नहीं होती और वहाँ अचानक कुछ नहीं होता, जब यह विचार उपजंत तब अकस्मात् भय नहि उदित= जब इसप्रकार का चिंतन उत्पन्न होता है, तब ‘अकस्मात्-भय’ उत्पन्न ही नहीं होता, ग्यानी निसंक-निकलंक निज-ग्यानरूप निरखंत नित= ज्ञानी जीव अपने स्वरूप को प्रतिसमय शंकारहित, विकार-रहित मात्र ज्ञानरूप देखते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि सप्तभयों में से ‘अकस्मात्-भय’ ज्ञानियों के क्यों नहीं होता? अकस्मात् यानि अचानक कुछ होना। यह भय अज्ञानी-जीव को प्रतिसमय रहता है कि अचानक एकं ज्ञानमनाद्यनन्तमचलं सिद्धं किलैतत्स्वतो, यावत्तावदिदं सदैव हि भवेन्नाञ द्वितीयोदयः। तÂान्नाकस्मिकमत्र dIY®¨fन भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो, निःशङ्कः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विन्दति ।। 28।। कुछ अनहोनी न हो जाये। ‘अनहोनी यानि वह क्रिया, जो इसके विचारों के अनुकूल न हो’। जबकि आगम के अनुसार अनहोनी कभी होती ही नहीं, जो कुछ भी होता है, होने योग्य ही होता है, और अपने निर्धारितसमय पर ही होता है। पर मोहासक्त-जीव वस्तु-व्यवस्था के इस स्वतंत्र-परिणमन को मानने को तैयार ही नहीं, इसलिए प्रतिसमय भयभीत रहता है। जबकि ज्ञानी-जीव इस स्वतंत्र-परिणमन को न केवल जानते हैं, वरन् स्वीकार भी करते हैं। और साथ ही विचार करते हैं कि मैं स्वभाव से समस्त कर्म-कालिमा से रहित पूर्ण-शुद्ध हूँ, अनंतज्ञान का धारी हूँ, परस्पर-विरुद्ध भावों से रहित अविरुद्ध, सहज और सिद्धों के समान महान् वैभवशाली-तत्त्व हूँ। मेरा स्वरूप इन्द्रियगोचर न होने से अलख/अरूपी, आदि और अंत से रहित अविनश्वर है। जगत् में मेरे समान दूसरा कोई नहीं है; इसलिये अतुलनीय हूँ। अपने स्वभाव से कभी चलायमान नहीं होता हूँ; इसलिए अविचल हूँ। मेरा आत्मस्वरूप सदाकाल चैतन्य के प्रकाश से प्रकाशित रहता है, वहाँ किसी भी प्रकार का कोई विकल्प है ही नहीं, बस, एकमात्र सुख का खजाना हूँ। कहने का अभिप्राय यही है कि जब सब कुछ पूर्व-निश्चित, स्वतंत्र और स्वयंसिद्ध है, अर्थात् जब कोई दुविधा ही नहीं, तो अचानक कुछ कैसे हो सकता है? या जो भी होता है, सब पूर्व-निश्चित ही होता है, तो भय कैसा? जब इसप्रकार का चिंतन ज्ञानी-जीव को चलता है, तो ‘अकस्मात्-भय’ ज्ञानियों को उत्पन्न ही नहीं होता। इसीलिए ज्ञानी-जीव सर्व-शंकाओं से रहित ‘नि:शंक’, समस्त-विकारों से रहित ‘निष्कलंक’, और सप्त-भयों से रहित ‘निर्भय’ रहते हैं, और अपने को एकमात्र ‘ज्ञानस्वरूप’ ही अनुभव करते हैं।

(छप्पय)

जो पर-गुन त्यागंत, सुद्ध निज-गुन गहंत ध्रुव।
विमल-ग्यान-अंकुर, जासु घटमहिं प्रकास हुव।।
जो पूरबकृत-कर्म, निरजरा-धार बहावत।
जो नव-बंध निरोध, मोख-मारग-मुख धावत।।
नि:संकतादि जस अष्ट-गुन, अष्टकर्म-अरि संहरत।
सो पुरुष-विचच्छन तासु पद, बानारसि वंदन करत।। 57।।

शब्दार्थ :- जो परगुन त्यागंत सुद्ध निज-गुन गहंत ध्रुव= जो पर-गुण त्यागते हैं, नित्य-शुद्ध अपने गुणों को ग्रहण करते हैं, विमल-ग्यान-अंकरु जासु घटमहिं प्रकास हुव= निर्मल-ज्ञानरूपी अंकुर जिसके हृदय में प्रकाशित हुआ है, जो पूरबकृत-कर्म निरजरा-धार बहावत= जो पूर्वबद्ध-कर्मों को निर्जरा की धार में बहाते हैं, जो नव-बंध निरोध मोख-मारग मुख धावत= जो नवीन कर्मबंध को रोकते हैं, और मोक्षमार्ग की ओर उन्मुख हैं, नि:संकतादि जस अष्ट-गुन अष्ट-कर्म-अरि संहरत= जिसके निशंकतादि अष्ट-गुण (प्रगट हैं, और) अष्ट-कर्मरूपी शत्रु का संहार/नष्ट करते हैं, सो पुरुष-विचच्छन तासु पद बनारसि वंदन करत= वे पुरुष सम्यग्ज्ञानी हैं, उनके चरणों में, बनारसीदास नमस्कार करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन जीवों की महिमा वर्णित की है, जो मोक्षमार्ग के सन्मुख हैं, जिन्होंने पर-गुणों अर्थात् देहादिक समस्त परपदार्थों, और संयोगों से एकत्व, ममत्वबुद्धि का त्याग किया है, और अपने निज-स्वरूप के नित्य या अक्षय-गुणों को ग्रहण किया है, जिनके हृदय में सम्यग्ज्ञानरूपी अंकुर टङ्कोत्कीर्ण-स्वरस-निचित-ज्ञान-सर्वस्वभाजः, सम्यग्दृष्टेर्यदिह सकलं घ्ननन्ति लक्ष्माणि कर्म। तत्तस्यास्मिन्पुनरपि मनाक्कर्म्मणो नास्ति बन्धः, पूर्वोपात्तं तदनुभवतो नििश्चतं निर्जरैव।। 29।। प्रस्फुटित हुआ है, जिन्हें अपने आत्मस्वरूप का सच्चा-श्रद्धान और ज्ञान है। जो आत्मस्वरूप में स्थिरतापूर्वक पूर्वबद्ध-कर्मों को निर्जरा की धार में बहाते हैं, अर्थात् जैसे पानी का प्रबलवेग अपने साथ सब कु़छ बहाकर ले जाता है, उसीप्रकार ज्ञानी-जीव ज्यों-ज्यों स्वरूप में स्थिर होते हैं, त्यों-त्यों पूर्वसंचित-कर्मों की निर्जरा होती जाती है। साथ ही नवीन-कर्मों का बंध भी रुक जाता है, और ज्ञानी-जीव मोक्षमार्ग पर दौड़ने लगते हैं अर्थात् मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। कविवर कहते हैं ज्ञानी-जीव स्वरूप में स्थिरता के पुरुषार्थ-पूर्वक निशंकतादि आठ-गुणों का सहज पालन करते हुये ज्ञानावरणादि-आठकर्मों का संहार करते हैं अर्थात् नष्ट करते हैं। वास्तव में वे ही जीव सच्चे-ज्ञानी अर्थात् सम्यग्ज्ञानी हैं, इसीलिए बनारसीदास उनके चरणों में वंदन/नमस्कार करते हैं।

(सोरठा)

प्रथम निसंसै जानि, दुतिय अवंछित परिनमन।
तृतिय-अंग अगिलानि, निर्मल-दिष्टि चतुर्थ-गुन।। 58।।

पंच अकथ-परदोष, थिरीकरन छट्टम सहज।
सत्तम वच्छल-पोष, अष्टम-अंग प्रभावना।। 59।।

शब्दार्थ :- प्रथम निसंसै जानि= पहला संशय नहीं होना(निःशंकित) जानो, दुतिय अवंछित परिनमन= दूसरा परिणमन की वांक्षा (निःकांक्षित) का न होना, तृतिय अंग अगिलानि= तीसरा-अंग ग्लानि का भाव न होना (निर्विचिकित्सा), निर्मल-दिष्टि चतुर्थ-गुन= चौथा-गुण निर्मल-दृष्टि (अमूढदृष्टि) होना, पंच अकथ परदोष= पाँचवा दूसरे के दोषों को न कहना (उपगूहन), थिरीकरन छट्टम सहज= स्थितिकरण छटवाँ सहज, सत्तम वच्छल-पोष= सातवाँ वात्सल्य-भाव का होना, अष्टम-अंग प्रभावना= आठवाँ-अंग प्रभावना। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यग्दर्शन के आठ-अंगों के नामों का वर्णन किया है। पहला-अंग जिनवचनों में शंका नहीं करना अर्थात् ‘निःशंकित-अंग’, दूसरा धर्मकार्य के बदले में मनवांछित-परिणमन की इच्छा नहीं करना अर्थात् ‘निःकांक्षित-अंग’, तीसरा मुनिराज के मलिन-शरीर को देखकर ग्लानि का भाव नहीं होना अर्थात् ‘निर्विचिकत्सा-अंग’, चौथा निर्मल-दृष्टि यानि देव, गुरु और धर्म-संबंधी समस्त-मूढ़ताओं का त्यागकर दृष्टि का निर्मल होना अर्थात् ‘अमूढ़दृष्टि-अंग’। पाँचवाँ दूसरों के दोषों को नहीँ कहना या उजागर नहीं करना अर्थात् ‘उपगूहन-अंग’, छठवाँ धर्म से डिगते हुये को पुन: धर्म में स्थिर करना अर्थात् ‘स्थितिकरण-अंग’। सातवाँ साधर्मियों के प्रति वात्सल्य का या स्नेह का भाव रखना अर्थात्’ वात्सल्य-अंग’ और आठवाँ जिनधर्म की प्रभावना करना अर्थात् ‘प्रभावना-अंग’- ये सम्यग्दर्शन के आठ अंग हैं। ये आठों-अंग सम्यग्दृष्टि-जीव के जीवन में नियम से होते हैं, हम यह भी कह सकते हैं कि ये सम्यग्दर्शन को मापने का थर्मामीटर हैं, बाहरी-पहचान हैं, अर्थात् जिस जीव को सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है, उसके जीवन में ये आठ-अंग अवश्य होते हैं। जिसप्रकार शरीर के अंग होते हैं, और वे कभी शरीर से अलग नहीं होते, ठीक उसीप्रकार निःशंकित आदि आठों-अंग कभी सम्यग्दर्शन से भिन्न नहीं होते हैं। इन आठों-अंगों का विशेष- वर्णन कविवर अगले छंद में कर रहे हैं।

(सवैया इकतीसा)

धर्म मैं न संसै सुभकर्म-फल की न इच्छा, असुभ कौ देखि न गिलानि आनै चित्तमैं।
साँची-दिष्टि राखै काहू प्रानीकौ न दोष भाखै, चंचलता-भानि थिति-ठानै बोध-वित मैं।।
प्यार निजरूपसौं उछाह की तरंग उठै, एई आठौ अंग जब जागै समकित मैं।
ताहि समकित कौं धरै सो समकितवंत, वहै मोख पावै जौ न आवै फिर इतमैं।। 60।।

शब्दार्थ :- धर्ममैं न संस=ै धर्म में संशय नहीं करना, सुभकर्म-फल की न इच्छा= शुभ-कर्म के फल की इच्छा नहीं करना, असुभ कौ देखि न गिलानि आनै= अशुभ को देखकर ग्लानि का नहीं आना, चित्त मैं सांची दिष्टि राखै= चित्त में सच्ची दृष्टि रखना, काहू प्रानीकौ न दोष भाखै= किसी भी प्राणी के दोषों को प्रकट नहीं करना, चंचलता-भानि थिति-ठानैबोध-वित में= चंचलता हटाकर रत्नत्रय में स्थिरता करना, प्यार निज रूपसौं= अपने आत्मस्वरूप से अनुराग रखना, उछाह की तरंग उठै= (आत्म-उन्नति और धर्म-प्रभावना के लिए) उत्साह की लहर उठना, एई आठौ अंग जब जागै समकित मैं= जब ये आठों-अंग सम्यग्दृष्टि-जीव के जाग्रत होते हैं, ताहि समकितकौं सो धरैं सो समकितवंत= उस सम्यग्दर्शन को जो जीव धारण करते हैं, वही सम्यग्दृष्टि है, वहै मोख पावै जौ न आवै फिर इत मैं= वही मोक्ष प्राप्त करते हैं, और वे फिर इस संसार में नहीं आते। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यग्दर्शन के आठों-अंगों के स्वरूप का वर्णन किया है। जिस जीव को अपने आत्मस्वरूप का सम्यक्-श्रद्धान होता है उस जीव को ये अाठ-अंग अवश्य प्रकट होते हैं। इनका विशेष-वर्णन इसप्रकार है- 1. निःशंकित-अंग- जिनेन्द्र परमात्मा के वचनों में कभी भी शंका नहीं करना, जैसे- संसार, शरीर और भोगों का जैसा स्वरूप जिनागम में वर्णित है, वैसा ही मानना, अन्यथा कदापि नहीं मानना, मैं आत्मा अनंत-गुणों का धनी, शाश्वत, अविनाशी-तत्त्व हूँ, इत्यादि- इस विषय में स्वप्न में भी शंका नहीं करना ‘निःशंकित-अंग’ है। 2. निःकांक्षित-अंग- शुभकार्य या धर्मकार्य के बदले पुण्य या भोगों की वांछा नहीं करना। जैसे- मेरे घर में शांति हो जाये, ऐसी इच्छा से शांतिपाठ करवाना, घर में धन-संपदा पुत्रादि की प्राप्ति की वांछा से विधान आदि करना या करवाना, या मुझे स्वर्गादिक की प्राप्ति हो- ऐसी भावना से व्रत-संयम नियम आदि करना ‘कांक्षा-दोष’ है, और ऐसी भावना न रखना- ‘निःकांक्षित-अंग’ है। 3. निर्विचिकित्सा-अंग- मुनिराज के मलिन-शरीर को देखकर ग्लानि का भाव नहीं आना निर्विचिकित्सा अंग है। वास्तव में देखा जाये तो संसार के किसी भी पदार्थ को कभी भी घृणा की नजर से नहीं देखना चाहिए। क्योंकि ये उस वस्तु का स्वरूप है, उसे अच्छी या बुरी कहना मेरा भ्रम है। और सम्यग्दृष्टि-जीव को यह भ्रम कभी नहीं होता। 4. अमूढ़दृष्टि-अंग- देव-मूढ़ता, गुरू-मूढ़ता, धर्म-मूढ़ता तीनों मूढ़ताओं का त्यागकर दृष्टि को निर्मल करना। जैस- े रागी देवी-देवताओं की पूजा करना, कराना, और प्रशंसा करना ‘देव-मूढ़ता’ है, इसीप्रकार होली-दीवाली आदि त्यौहारों पर होलिका या लक्ष्मी, गणेश आदि को देव मानकर उनको पूजना ‘देव-मूढ़ता’ है। कुलदेवी को पूजना, शादी-ब्याह के प्रसंगों पर बहुत सारे देवी-देवताओं को पूजना भी ‘देव-मूढ़ता’ है। वीतरागी निर्ग्रंथ-भावलिंगी दिगम्बर-मुनिराज के अलावा किसी भी वेषधारी को गुरु मानना ‘गुरु-मूढ़ता’ है। गौ-दान, कन्या-दान, मकर-संक्रांति आदि दसप्रकार के कुदान को स्वयं देना या देनेवाले की अनुमोदना करना धर्म मूढ़ता है। गंगा-स्नान, कुँआ-बाबड़ी आदि खुदवाना, सूर्यग्रहणचंद्रग्रहण आदि मानना, तुलसी पूजना, करवाचौथ मनाना, सूर्य को अर्घ देना, देहली पूजना अर्थात् धर्म के नाम पर कुछ भी अंधविश्वास-पूर्वक पूजना ‘धर्ममूढ़ता’ है। कहने का अभिप्राय यही है कि सभी मूढताओं का कृत-कारित-अनुमोदना से त्याग करना और एकमात्र वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु का दृढ़-श्रद्धान करना ही ‘अमूढ़दृष्टि-अंग’ है। 5. उपगूहन-अंग- हमेशा अपने गुणों को और दूसरे के दोषों को छिपाना, तथा अपने दोषों को और दूसरे के गुणों को उजागर करना ‘उपगूहन-अंग’ है। 6. स्थितिकरण-अंग- धर्म-मार्ग से डिगते हुये मुनिराज और श्रावकों को पुनः धर्ममार्ग में दृढ़ या स्थिर करना, क्योंकि कर्म का उदय कभी भी, किसी भी जीव को आ सकता है। फिर चाहे वह रोगादि के रूप में आये, प्रबल-कषाय के उदय के रूप में आये या मिथ्या-उपदेश से या मंत्र-तंत्र-चमत्कार आदि के कारण भी कभी-कभी जीव श्रद्धान और आचरण दोनों से ही चलायमान हो सकता है; तब उसे पुनः धर्म में स्थिर करना श्रावक और मुनि दोनों का ही कर्तव्य बनता है, और यही ‘स्थितिकरण-अंग’ है। 7. वात्सल्य-अंग- अपने आत्मस्वरूप के प्रति अति-अनुराग रखना, साथ ही साधर्मी के प्रति गौ-वच्छवत् निःस्वार्थ-स्नेह रखना, अर्थात जैसे गाय अपने बच्चे से जब तक वह समर्थ नहीं होता, तब तक एक मिनिट के लिये भी दूर नहीं करती, लेकिन जैसे ही वह समर्थ होता है फिर उसकी तरफ पलटकर भी नहीं देखती, ठीक उसीप्रकार धर्म एवं धर्मात्माओं के प्रति निःस्वार्थभाव से विनय, स्नेह और भाईचारे का व्यवहार रखना, ‘वात्सल्य-अंग’ है। 8. प्रभावना-अंग- आत्मस्वरूप की उन्नति या कहें स्वरूप में स्थिरता के लिए प्रतिसमय उत्साहित रहना। साथ ही वीतरागी देव-गुरु-धर्म की जैसे बने वैसे प्रभावना करना ‘प्रभावना-अंग’ है। ‘आचार्य समन्तभद्र’ कहते हैं कि ‘‘संसारी जीवों के हृदय में जो अज्ञानतारूपी-अंधकार फैला हुआ है, उसे वस्तुस्वरूप का सच्चा-प्रतिपादन करके दूर करना, और साथ ही जिनशासन का महत्त्व बताना, सो ‘प्रभावना-अंग’ है।’’ वास्तव में देखा जाये, तो जिनशासन की प्रभावना का अधिकार तो सम्यग्दृष्टि-जीव को ही है। क्योंकि वही वस्तुस्वरूप का सच्चा प्रतिपादन कर सकता है। ‘राजवार्तिक जी’ में आचार्य अकलंक देव कहते हैं- ‘‘सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रय के प्रभाव से आत्मा को प्रकाशित करना ‘प्रभावना’ है।’’ कहने का अभिप्राय यही है कि अज्ञानरूपी-अंधकार का विनाश जिसप्रकार बने उसप्रकार दूर करना सो ‘प्रभावना-अंग’ है। फिर चाहे वह प्रभावना पूजा-विधानादि के रूप में की जाये, दया-दानादि के रूप में की जाये या स्वाध्याय-तत्त्वचर्चा आदि के रूप में की जाये। लेकिन ‘प्रभावना-अंग’ का सबसे उत्तम-साधन स्वाध्याय और तत्त्वचर्चा ही है, क्योंकि यदि जीव को एकबार सच्ची-जानकारी प्राप्त हो जाये, तो अज्ञानतारूपी-अंधकार स्वयं ही दूर होता है। जैसे सूर्य के निकलने पर अंधकार को भगाने का पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता, बल्कि वह स्वयं ही चला जाता है, ठीक उसीप्रकार आगम के आलोक में यदि वस्तुस्वरूप का सही ज्ञान हो, तो अज्ञानता स्वयं दूर होती है। इसप्रकार ये आठों अंग सम्यग्दृष्टि-जीव को तो नियम से होते ही हैं, हम सभी जीवों को भी यथायोग्य इन आठों-अंगों को अपने जीवन में अवश्य धारण करके सम्यग्दर्शन का अभ्यास करना चाहिए।

(सवैया इकतीसा)

पूर्व-बंध नासै सो तो संगीत-कला प्रकासै, नव-बंध रुंधि ताल-तोरत उछरिकै।
निसंकित आदि अष्ट-अंग संग सखा जोरि, समता-अलापचारी करै सुर भरिकै।।

रुन्धन् बन्धं नवमिति निजैः सङ्गतोऽष्टाभिरङ्गै:, प्राग्बद्धं तु क्षयमुपनयन् निर्जरोज्जृम्भणेन। सम्यग्दृष्टिः स्वयमतिरसादादि-मध्यान्त-मुक्तं, ज्ञानं भूत्वा नटति गगनाभोगरङ्गं विगाह्य।। 30।।

निरजरा-नाद गाजै ध्यान-मिरदंग बाजै, छक्यौ महानंद में समाधि रीझ करिकै।
सत्ता-रंगभूमि में मुकत भयौ तिहूँकाल, नाचै सुद्धदिष्टि-नट ग्यान- स्वांग धरिकै।। 61।।

शब्दार्थ :- पूर्व-बंध नासै सो तो संगीत-कला प्रकासै= पूर्वबद्ध-कर्मों का निर्जरा वह तो संगीत-कला के प्रकाश के समान है, नवबंध रुंधि ताल तोरत उछरिकै= नवीन-कर्मों का बंध उछलकर ताल टूटने के समान है, निसंकित आदि अष्ट-अंग संग-सखा जोरि= निःशंकतादि आठ-अंग उसके सखी/सहचरी हैं, समताअलापचारी करै सुर-भरिकै= स्वर भरकर समता का अालाप करती है, निरजरा-नाद गाजै= निर्जरा का मंगलनाद हो रहा है, ध्यान-मिरदंग बाजै= ध्यानरूपी मृदंग बज रहा है, छक्यौ महानंद में समाधि रीझ करिकै= समाधि में आकृष्ट होकर महा-आनंद में तृप्त है, सत्ता-रंगभूमि में मुकत भयौ तिहूंकाल= सत्तारूपी-रंगभूमि में तीनों काल के लिए मुक्त हो गया है, नाचै सुद्धदिष्टि-नट ग्यान-स्वांग धरिकै= ज्ञानरूपी स्वांग को धारण करके सम्यग्दृष्टिरूपी-नट नाच रहा है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने सम्यग्दृष्टि-जीव की प्रवृत्ति को एक ‘संगीतक’ का रूप देकर प्रस्तुत किया है। जिसप्रकार रंगमंच पर एक गायक अपने सुर-ताल के साथ अपने गायन की मस्ती में डूबकर सुंदर-प्रस्तुति देता है, ठीक उसीप्रकार अपने अनंतगुणों की सत्तारूपी रंगमंच पर शुद्ध- स्वभावरूप परिणमित हुआ सम्यग्दृष्टिरूपी-नट सम्यग्ज्ञानरूपी-स्वांग को धारणकर या प्राप्तकर, पूर्वबद्धकर्मों को नष्टकर संगीत-कला को यानि स्वयं को प्रकाशित करता है, और नवीन-कर्मबंधरूपी ताल को छोड़ता जाता है, अर्थात् ज्ञानावरणादि-आठकर्मों का पुद््गल- पिण्ड, जो जीव के प्रदेशों से एकक्षेत्रावगाह-रूप है, उसे छोड़ता हुआ, निःशंकित आदि आठ-अंगरूप सखा/सहचारी के साथ, (क्योंकि ये आठों अंग सम्यक्त्व के सहायक-गुण है) स्वरूप की एकाग्रतारूपी स्वर भरकर ‘समता’ का आलाप करता है। जिससे आत्मध्यान-रूपी ‘मृदंग’ पर निर्जरारूपी ‘ध्वनि’ गुंजायमान होती है, और समाधिपूर्वक अर्थात् मन-वचन-काय की एकतापूर्वक आत्मिक-स्वरूप के आनंद की मस्ती का छककर स्वाद लेता है। फलस्वरूप इन अष्टकर्मों की सत्ता का समूल विनाश करते हुए इनसे तीनों काल के लिए मुक्त हो जाता है अर्थात् शाश्वत-मोक्ष की प्राप्ति करता है। कविवर के जीवन की अंतिम-रचना

ज्ञान-कुतक्का हाथ, मारि अरि-मोहना।
प्रकटे रूप-सरूप अनन्त जु सोहना।।
जा परजय कौ अन्त सत्य करि मानना।
चले ‘बनारसिदास’ फेरि नहिं आवना।।

बंध द्वार (८) | भाग १/२

(अष्टम-अधिकार)

(दोहा)

कही निरजरा की कथा, सिवपथ-साधनहार।
अब कछु बंध-प्रबंध कौ, कहूँ अलप-विस्तार।। 1।।

शब्दार्थ :- कही निरजरा की कथा= निर्जरा का स्वरूप कहा, सिवपथ-साधनहार= जो मोक्षमार्ग की साधक है, अब कछु बंध-प्रबंध कौ= अब कुछ बंध के प्रबंध को, कहूँ अलप-विस्तार= कुछ विस्तार से कहता हूँ। विशेषार्थ :- इस-छंद में पूर्व ‘निर्जरा-द्वार’ की पूर्णता और ‘बंध-द्वार’ को प्रारंभ करने की प्रतिज्ञा करते हुए कविवर कहते हैं कि पिछले अधिकार में मैंने मोक्षमार्ग की साधिका निर्जरा का वर्णन किया। साधिका क्यों? क्योंकि कर्मों की निर्जरा अथवा क्षय किये बिना मोक्षमार्ग का प्रारंभ ही नहीं होता। कविवर कहते हैं कि अब आगे मैं कर्मों के बंध का स्वरूप और उसके भेद-प्रभेद का कुछ विस्तार से वर्णन करूँगा।

(सवैया इकतीसा)

मोह-महामद पाई जिनि संसारी विकल कीने, याहीतैं अजानुबाहु-विरद बिहतु है।
ऐसौ बंध-वीर विकराल महाजाल-सम, ग्यान मंद करै चंद राहु ज्यौं गहतु है।।
ताकौ-बल भंजिवे कौं घट मैं प्रगट भयौ, उद्धत उदार जाकौ उद्दिम महतु है।
सो है समकित-सूर आनंद-अंकुर ताहि, निरखि बनारसी ‘‘नमो-नमो’’ कहतु है।। 2।।

शब्दार्थ :- मोह-महामद पाई जिनि संसारी विकल कीने= मोहरूपी-मदिरा पिलाकर जिसने संसारी-जीवों को दुःखी किया है, याहीतैं आजानुबाहु-विरद बिहतु है= इसीलिए ‘घुटनों तक लंबी भुजाओंवाला’ - इस रूप मे बहुत-प्रसिद्धि है, ऐसौ बंध-वीर विकराल महाजाल-सम= ऐसा बंध नाम का सुभट (जो) भयंकर-महाजाल के समान है, ग्यान मंद करै चंद राहु ज्यौं गहतु है= ज्ञान को (उसीतरह) क्षीण करता है, जैसे राहु चंद्रमा को ग्रसता है, ताकौ-बल भंजिवे कौ घट मैं प्रगट भयौ= उसके बल को नष्ट करने के लिए हृदय में प्रकट हुआ है, उद्धत उदार जाकौ उद्दिम महतु हैं= बलवान्, महान् जो तीव्र-पुरुषार्थी है, सो है समकित-सूर= वह है सम्यग्दर्शनरूपी शूरवीर, आनंद-अंकुर= आनंदरूपी अंकुर, ताहि निरखि बनारसी ‘‘नमो-नमो’’ कहतु है= उसे देखकर बनारसीदास बारम्बार नमस्कार करता हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यक्त्व की महिमा वर्णित करते हुए सम्यक्त्वरूपी-शूरवीर को नमस्कार किया है। अनादिकाल से संसार के समस्त अज्ञानी-जीवों को जिसने मोहरूपी-मदिरा पिलाकर, अपने वश में करके, अति-दुःखी किया है, अर्थात् पर में ममत्वबुद्धि के कारण जीव अपने स्वरूप से अनजान रहता है, जिससे कर्मबंध, फिर कर्मोदय,पुन: एकत्व-ममत्व बुद्धि और फिर कर्मबंध, जिससे जीव दुःखी- कर्मबंध और दुःख का ये सिलसिला अनादिकाल से इसीप्रकार चला आ रहा है। ये बंधरूपी-सुभट, जिसका नाम संसार में प्रसिद्ध है, जिसकी अजानबाहु अर्थात् घुटनों तक लंबी रागोद्गार-महारसेन सकलं कृत्वा प्रमत्तं जगत्, क्रीडन्तं रसभाव-निर्भर-महानाट्येन बन्धं धुनत्। आनन्दामृत-नित्य-भोजि सहजावस्थां स्फुटÂन्नाटयद्, धीरोदारमनाकुलं निरुपधि-ज्ञानं समुन्मज्जति।। 1।। विशाल-भुजायें हैं, जिनमें जीव पूरी तरह से जकड़ा हुआ है, जिसका रूप महाजाल के समान विकराल अर्थात् महा-भयंकर है। जैसे बेड़ियों में जकड़ा जीव चाहते हुये भी आसानी से नहीं छूट पाता, ठीक उसीप्रकार कर्मबंधन से जकड़ा हुआ जीव चाहते हुये भी आसानी से नहीं छूट पाता। जिसप्रकार राहू के ग्रसने पर चंद्रमा का प्रकाश धीमा हो जाता है, ठीक उसीप्रकार कर्मबंधन की जकड़न के कारण ज्ञान-गुण भी शक्तिहीन हो जाता है। लेकिन इस कर्मबंधरूपी राहू का बल नष्ट करने के लिए अब हृदय में सम्यग्ज्ञानरूपी-शूरवीर प्रकट हुआ है। अर्थात् जैसे युद्ध में महायोद्धा के आने पर बलवान शत्रु का भी विनाश होता है, ठीक उसीप्रकार हृदय में सम्यग्ज्ञानरूपी शूरवीर/योद्धा के प्रकट होने पर कर्मबंध रूपी राहू/शत्रु भी तत्क्षण ही विनाश को प्राप्त होता है। सम्यक्त्वरूपी-शूरवीर जो बलवान, महान् और तीव्र-पुरुषार्थी है, जिसके उदय होने पर आनंदरूपी-अंकुर अर्थात् आत्मिक-आनंद की अनुभूति होती है, बनारसीदास जी कहते हैं मैं उस सम्यक्त्वरूपी-योद्धा को बारम्बार नमन करता हूँ।

(सवैया इकतीसा)

जहाँ परमातम-कला कौ परकास तहाँ, धरम-धरा में सत्य-सूरज की धूप है।
जहाँ सुभ-असुभ-करमकौ गढ़ास तहाँ, मोह के बिलासमैं महा-अंधेर-कूप है।।
फैली फिरै घटा-सी छटा-सी घन-घटा-बीचि, चेतन की चेतना दुहूँधा गुपचूप है।
बुद्धिसौं न गही जाइ बैनसौं न कही जाइ, पानी की तरंग जैंसे पानी में गुडूप है।। 3।।

शब्दार्थ :- जहाँ परमातम-कला कौ परकास= जहाँ परमात्म-कला यानि ज्ञान-ज्योति का प्रकाश है, तहाँ धर्म-धरा में सत्य-सूरज की धूप है= वहाँ धर्मरूपी पृथ्वी पर सत्यरूपी सूरज की धूप है, जहाँ सुभ-असुभ करमकौ गढ़ास= जहाँ शुभ-अशुभ-कर्मों की सघनता है, तहाँ मोह के बिलासमैं महा-अंधेर-कूप है= वहाँ मोह की विलासितारूप महाभयंकर अंधा-कुँआ है, फैली फिरै घटा-सी छटा-सी घन-घटा बीचि= बादलों की घटा में बिजली की छटा-सी फैली हुई है, चेतन की चेतना दुहूँधा गुपचूप है= आत्मा की दोनोंप्रकार की चेतना छिपी हुई है, बुद्धिसौं न गही जाइ= बुद्धि से ग्रहण नहीं की जा सकती, बैनसौं न कही जाइ= वचनों से नहीं कही नहीं जा सकती, पानी की तरंग जैंसे पानी में गुडूप है= जैसे पानी की तरंग पानी में ही विलीन हो जाती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘कर्म-चेतना’ और ‘ज्ञान-चेतना’ का सुंदर-वर्णन किया है? जहाँ-जहाँ आत्मा की ज्ञान-ज्योति विद्यमान है अर्थात् जहाँ-जहाँ जाननपना है, वहाँ धर्मरूपीधरती पर सत्यरूपी-सूर्य का उजाला है, अर्थात् वहाँ सर्वत्र आत्मधर्म और सत्य के उजाले में वस्तु के स्वरूप का यथार्थ-ज्ञान होता है; ठीक उसीप्रकार जैसे सूर्य के उजाले में हर वस्तु साफ- साफ दिखाई देती है। और जहाँ व्रत, संयम, दया-दानादिक शुभ-भाव और पाप-कषायादिक अशुभ-भावों की सघनता है अर्थात् जीव मात्र इन्हीं भावों में व्यस्त है, वहाँ मोह की विलासिता यानि मगनता के कारण महा-भयंकर अंधेरा-कुँआ है, जिसमें वस्तु का यथार्थ-स्वरूप भासित नहीं होता, ठीक उसीप्रकार जैसे अंधेरे कुँये में प्रवेश करने पर कुछ दिखाई नहीं देता। उपर्युक्त दोनों ही स्थितियों में जीव की चेतना या कहें चेतनत्व-गुण शरीररूपी-बादलों के बीच चमकती हुई बिजली के समान फैला हुआ है। जैसे आसमान में घिरे बादलों की सुंदर-छवि के बीज बिजली चमकती है, ठीक उसीप्रकार इन शरीररूपी घने-बादलों के बीच बिजली की सुंदर-छवि के समान चेतना-गुण विद्यमान है। यह चेतना-गुण अरूपी होने से न तो बुद्धि विकल्पों के द्वारा ग्रहण किया जा सकता है, और न ही वचनों के द्वारा उसका वर्णन किया जा सकता है। वह तो जल की तरंग/लहर के समान है, जैसे जल की तरंग जल से उठकर जल में ही विलीन हो जाती है, उसीप्रकार चेतना-गुण की पर्याय आत्मा में व्यक्त होकर आत्मा में ही विलीन हो जाती है।

(सवैया इकतीसा)

कर्मजाल-वर्गणासौं जग में न बंधै जीव, बंधै न कदापि मन-वच-काय-जोगसौं।
चेतन-अचेतनकी हिंसासौं न बंधै जीव, बंधै न अलख पंच-विषैं-विष-रोगसौं।।
कर्मसौं-अबंध सिद्ध, जोगसौं अबंध-जिन, हिंसासौं अबंध-साधु, ग्याता विषैं-भोगसौं।
इत्यादिक वस्तु के मिलापसौं न बंधै जीव, बंधै एक रागादि असुद्ध-उपयोगसौं।। 4।।

शब्दार्थ :- कर्मजाल-वर्गणासौं जग में न बंधै जीव= कर्मरूप पुद््गल-परमाणुओं के समूह से संसार में जीव नहीं बंधता है, बंधै न कदापि मन-वच-काय-जोगसौं= न ही मन-वचन-काय तीनों योगों से कभी बंधता है, चेतन-अचेतनकी हिंसासौं न बंधै जीव= चेतन और अचेतन की हिंसा से भी जीव नहीं बंधता है, बंधै न अलख पंच-विषैं-विष-रोगसौं= आत्मा पंचेन्द्रिय के विषयोंरूपी विष के रोग से नहीं बंधता है, कर्मसौं अबंध सिद्ध, जोगसौं अबंध-जिन= कर्म से अबंध सिद्ध-भगवान्, योग से अबंध अरिहंत-भगवान्, हिंसासौं अबंध साधु= हिंसा से अबंध साधु, ग्याता विषैं-भोगसौं= ज्ञानी विषय-भोगों से अबंध, इत्यादिक वस्तु के मिलापसौं न बंधै जीव= इत्यादि वस्तु के मिलने से जीव नहीं बंधता है, बंधै एक रागादि असुद्ध- उपयोगसौं= जीव बंधता है तो एकमात्र रागादिरूप अशुद्ध-उपयोग से। विशेषार्थ :- इस-छंद में कविवर कहते हैं कि संसार में जीव कर्मरूपी पुद््गल वर्गणाओं से बंधन को प्राप्त नहीं होता है, और न हीं कभी मन वचन और काय इन तीनों योगों से बंधता है। जीव-अजीव की हिंसा से भी जीव नहीं बंधता है, और न ही आत्मा पंचेन्द्रिय-के विषयों रूपी-विष के रोग से बंधन को प्राप्त होता है। फिर संसार में जीव के बंधन का मुख्य-कारण क्या है? आचार्य उमास्वामी ने ‘तत्त्वार्थसूत्र’ में मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग को बंध का कारण कहा है। उन्हीं बंध के कारणों को यहाँ कविवर बनारसीदास जी ने कार्माण-वर्गणायें, योग, हिंसा और भोग के नाम से वर्णित किया है। अधिकांश संसारी मिथ्यादृष्टि-जीव कर्म को बंध या दुःख का कारण मानते हैं, कि ‘‘इन कर्मों की बजह से मैं बँधा हुआ हूँ’’, लेकिन कविवर कहते हैं कि सिद्धालय में ये कर्मरूपी पुद््गल-वर्गाणायें मौजूद होने पर भी रागादि-भाव न होने से सिद्ध-भगवान् कभी बंधन को प्राप्त नहीं होते हैं। दूसरा मन-वचन और काया इन तीनों योगों की चंचलता को बंध का कारण माना गया है, लेकिन तेरहवें गुणस्थान में अरिहंत भगवान् के इन तीनों योगों की उपस्थिति मौजूद होने पर भी रागादिभाव न होने से वे कभी बंधन को प्राप्त नहीं होते हैं। तीसरा जीवों की हिंसा को बंध का कारण माना गया है, लेकिन आचार्य उपाध्याय और साधुओं से महाव्रती होेने पर भी अबुद्धि-पूर्वक या अनजाने में जीवों की हिंसा होती है; परन्तु फिर भी यत्नाचार प्रवृत्ति और रागादि भावों के न होने से वे मुनिराज बंधन को प्राप्त नहीं होते हैं। चौथा पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों को संसार में विष और रोगों की संज्ञा दी गई है, अर्थात् इनकों विष

न कर्मबहुलं जगÂन्न चलनात्मकं कर्म्म वा, न नैक-करणानि वा न चिदचिद्वधो बन्धकृत्।
यदैक्यमुपयोगभूः समुपयाति रागादिभिः, स एव किल केवलं भवति बन्धहेतुर्नृणाम्।। 2।।

या जहर के समान माना गया है। इनको भोगने पर तो जीव बंधता ही है, परन्तु कवि कहते हैं कि आत्मा को जाननेवाले सम्यग्दृष्टि-जीव रुचि और तल्लीनता न होने से पंचेन्द्रिय के विषयों को भोगते हुये भी बंधन को प्राप्त नहीं होते हैं; बल्कि सम्यग्दृष्टि-जीव के लिये भोग भी निर्जरा के हेतु माने गये हैं। तो फिर बंधन का कारण क्या है? तब कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि एकमात्र मोह-रागद्वेषादि भावरूप अशुद्ध- उपयोग ही जीव को बंध का कारण है, अन्य और कोई नहीं। जहाँ मिथ्यादृष्टिजीव कर्मों से एकत्वपना, योगों से ममत्वपना या अपनत्वपना, हिंसा में बुद्धिपूर्वक-प्रवर्तन, और भोगों में तल्लीनता के कारण उपयोग मलिन होने से बंधन को प्राप्त होते है। वहीं इन सबकी विपरीतता होने से अर्थात् मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावरूप उपयोग में मलिनता न होने से सर्वज्ञ-परमात्मा, साधु और सम्यग्दृष्टि-ज्ञानी जीव बंधन को प्राप्त नहीं होते हैं। इससे सिद्ध होता है कि बंध का मुख्य-कारण एकमात्र अशुद्ध उपयोग अर्थात् मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भाव ही हैं।

(सवैया इकतीसा)

कर्मजाल-वर्गणाकौ वास लोकाकास-माँहि, मन-वच-कायकौ निवास गति-आउमैं।
चेतन-अचेतन की हिंसा बसै पुग्गलमैं, विषै-भोग वरतै उदै कै उरझाऊ में।।
रागादि सुद्धता-असुद्धता है अलख की, यहै उपादान-हेतु बंध के बढाउ में।
याहीतैं विचच्छन अबंध कह्यौ तिहूँकाल, राग-दोष-मोह नाहीं सम्यक्-सुभाउमैं।। 5।।

शब्दार्थ :- कर्मजाल-वर्गणाकौ वास लोकाकास-माँहि= कर्मरूप-पुदगल-वर्गणाओं का निवास लोकाकाश में है, मन-वच-कायकौ निवास गति-आउमैं= मन, वचन, काय का निवास गति और आयुकर्म में है, चेतनअचेतन की हिंसा बसै पुग्गलमैं= चेतन-अचेतन की हिंसा पुद््गल में बसती है, विषै-भोग वरतै उदै कै उरझाऊ में= विषय-भोग में प्रवर्तन उदय के अनुसार, रागादि सुद्धता-असुद्धता है अलख की= राग-द्वेष आदि भावों की शुद्धता और अशुद्धता है आत्मा की, यहै उपादान-हेतु बंध के बढाउ मैं= यही उपादान-कारण है बंध के बढ़ने में, याहीतैं विचच्छन अबंध कह्यौ तिहूँकाल= इसीलिए ज्ञानी-जीव को तीनों काल बंधन-रहित कहा गया है, रागदोष-मोह नाहीं सम्यक्-सुभाउ मैं= (क्योकि) सम्यक्-स्वभाव में राग-द्वेष-मोह भाव नहीं है । विशेषार्थ :- जहाँ पिछले-छंद में कवि ने स्पष्ट किया था कि कार्माण-वर्गणायें, योग, हिंसा और भोग ‘बंध के कारण’ नहीं है, वहीं इस छंद में स्पष्ट करते हैं कि ‘ये सब बंध के कारण क्यों नहीं है’? कर्म-रूप परिणमित होनेवाली कार्माण-वर्गणाओं का निवास-स्थान संपूर्ण-लोकाकाश है अर्थात् ये वर्गणायें न केवल पुद््गल के परमाणुरूप है, बल्कि ये रहती भी संपूर्ण-लोकाकाश में हैं। आत्मस्वभाव में तो इनका अस्तित्व ही नहीं है। इसीप्रकार मन-वचन और काय- इन तीनों योगों का संबंध भी गति और आयु-कर्म से है अर्थात् जब जीव जिस गति और आयु में जाता है, वहाँ उसे ये मनवचन-काय रूप पुद््गल-परमाणु के संयोग नवीन प्राप्त होते हैं, और आयु पूरी होने पर ये संयोग स्वत: ही छूट जाते हैं, अर्थात् ये भी आत्म-स्वभाव का अंश नहीं है। चेतन और अचेतन की हिंसा का संबंध भी पुद््गल से है, क्योंकि हिंसा-संबंधी कार्य होने पर देखा जाये, तो आत्मा तो कभी मरती नहीं, मात्र पुद््गल-परमाणुओं के स्वरूप या पर्याय में ही बदलाव आता है, अर्थात् इनका अस्तित्व भी मेरे आत्मस्वभाव में नहीं है। इसीप्रकार पाँचों-इन्द्रियों के विषय-भोगों का लोकः कर्म ततोऽस्तु सोऽस्तु च परिस्पन्दात्मकं कर्मं तत्, तान्यस्मिन्करणानि सन्तु चिदचिद्-व्यापादनं चास्तु तत्। रागादीनुपयोग-भूमिमनयन् ज्ञानं भवेत् केवलं, बन्ध नैव कुतोऽप्युपैत्ययमहो सम्यग्दृगात्मा ध्रुवम्।। 3।। संबंध भी पुण्य-पाप के उदयानुसार है, अर्थात् इनका प्राप्त होना या न होना भी अपने हाथ में नहीं है, कर्मों के आधीन है। कहने का तात्पर्य यही है कि मिथ्यादृष्टि-जीव जिनको बंध का कारण मानता है, उन सबका संबंध तो पुद््गल से है, आत्मा से नहीं। आत्मा और कर्मरूप पुदगल-परमाणु दो भिन्न और स्वतंत्र-द्रव्य हैं, इन दोनों द्रव्यों में अत्यंताभाव है, सो एक-द्रव्य दूसरे-द्रव्य के लिये बंध का कारण कैसे हो सकता है? तो फिर बंध का कारण कौन है? तब कविवर कहते हैं कि बंध का कारण एकमात्र मोह-रागद्वेषादि विकारी-भाव से होनेवाली उपयोग की मलिनता ही है, और सम्यक्त्व-स्वभाव में ये मोह-रागद्वेष के भाव नहीं होते, इसीलिये ज्ञानी-जीवों को तीनों-काल या प्रतिसमय ‘बंधन-रहित’ या ‘निर्बंध’ ही कहा गया है।

(सवैया इकतीसा)

कर्मजाल-जोग हिंसा-भोगसौं न बंधै पै, तथापि ग्याता ‘उद्दिमी’ बखान्यौ जिनबैन में।
ग्यान-दिष्टि देत विषै-भौगनिसौ हेत दोउ, क्रिया एक-खेत यौंतौ बनै नांहि जैन में।।
उदै-बल उद्दिम गहै, पै फल कौ न चहै, निरदै-दसा न होइ हिरदै के नैन में।
आलस-निरुद्दिमकी भूमिका मिथ्यात-माँहि, जहाँ न संभारै जीव मोह-नींद सैन मैं।। 6।।

शब्दार्थ :- कर्मजाल-जोग हिंसा-भोगसौं न बंध=ै कर्मों का समूह, योग, हिंसा और, भोग से नहीं बंधता है, पै तथापि ग्याता उद्दिमी बखान्यौ जिनबैन में= परन्तु फिर भी ज्ञानी को जिनवचनों में पुरुषार्थी कहा गया है, ग्यानदिष्टि देत विषै-भौगनिसौ हेत= ज्ञानदृष्टि हो और विषय भोगों से प्रेम भी हो, दोउ क्रिया एकखेत यौं तौ बनै नांहि जैन में= दोनों कार्य एकक्षेत्र या एकसाथ हों ऐसा तो संभव ही नहीं है जैन/जिनवचनों में, उदै बल उद्दिम गहै पै फल कौ न चहै= उदय के अनुसार पुरुषार्थ करता है, परन्तु फल की इच्छा नहीं करता, निरदै दसा न होइ हिरदै के नैन में= निर्दय यानि दयारहित-अवस्था नहीं होती हृदय की आँखों में, आलस निरुद्दिमकी भूमिका मिथ्यात-माँहि= आलस और पुरुषार्थ- रहित अवस्था मिथ्यात्व के उदय में होती है, जहां न संभारै जीव मोह-नींद सैन मैं= जहाँ जीव स्वयं को नहीं संभालता मोहरूपी निद्रा में सोता रहता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि सम्यक्त्व और मिथ्यात्व या सम्यग्ज्ञान-दृष्टि और भोगों से अनुराग दोनों क्रिया एकसाथ संभव नहीं है। ये सत्य है कि कार्माण-वर्गणायें, मन-वचन-काय तीनों-योग, जीव-हिंसा और विषय-भोगों से बंध नहीं होता; परन्तु फिर भी ज्ञानी-जीव निरन्तर पुरुषार्थी रहता है- ऐसा जिनवचनों में कहा गया है। क्यों? क्योंकि जिसे एकबार आत्मिक-आनंदरूप सच्चे-सुख का स्वाद आ जाता है, वह पूर्ण-सुख की प्राप्ति का पुरुषार्थ अवश्य करता ही है,- ऐसा ही जिनेन्द्र-परमात्मा की वाणी में कहा गया है। सम्यग्ज्ञान-दृष्टि भी प्रवर्ते और पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों से अनुराग भी प्रवर्ते- ऐसी दो विपरीत क्रियायें एक साथ हों,- ऐसा जैन में नहीं बनता अर्थात् जिनवचनों में ऐसा उपदेश ही नहीं है। कहने का अभिप्राय यही है कि जैसे दिन और रात, सुख और दुःख, अमृत और जहर-इत्यादि दो विपरीत-स्थितियाँ एकसाथ नहीं होतीं, ठीक उसीप्रकार दृष्टि सम्यक् हो और भोगों में आसक्ति हो- ऐसी विपरीत-स्थिति

एक साथ संभव ही नहीं है।
तथापि न निरर्गलं चरितुमिष्यते ज्ञानिनां, तदायतनमेव सा किल निरर्गला व्यापृतिः।
अकाम-कृत्कर्म तन्मतमकारणं ज्ञानिनां, द्वयं न हि विरुध्यते किमु करोति जानाति च ।। 4।।

यद्यपि सम्यग्दृष्टि-जीव कर्मों के उदय के अनुसार पुरुषार्थ करता है अर्थात् प्रवर्तन करता हुआ दिखाई देता है, परन्तु फल की इच्छा नहीं करता, अर्थात् अंतरंग-भावों से स्वयं को उस क्रिया का कर्त्ता नहीं, मात्र ज्ञाता ही मानता है। न आगामी किसी भी प्रकार के फल की वांक्षा करता है और न ही प्राप्तफल में हर्ष या विषादरूप-भाव करके आकुलित होता है। सम्यग्दृष्टि-जीव के हृदय में निर्दयता और हिंसा का नहीं, जीवमात्र के प्रति दया का भाव रहता है, इसलिए भोगों के प्रति आसक्ति होती ही नहीं। आलस या कहें प्रमाद और पुरुषार्थ-हीनता का भाव तो मिथ्यात्व की भूमिका में आता है, जिससे जीव प्रतिसमय स्वरूप से विस्मृत रहता है और मोह की नींद में चैन से सोता है अर्थात् प्रतिसमय स्व से विमुख और पर के सन्मुख रहता है। पर में आसक्त रहना- यही तो मिथ्यादृष्टि-जीव की पहचान है।

(दोहा)

जब जाकौ जैसो उदै, तब सोहै तिहि थान।
सकति मरोरै जीव की, उदै महा बलवान।। 7।।

शब्दार्थ :- जब जाकौ जैसो उदै= जब जिसका जैसा उदय, तब सोहै तिहि थान= तब उस स्थान पर वैसा ही प्रवर्तन होता है, सकति मरोरै जीव की= जीव की शक्ति को बलहीन कर देता है, उदै महाबलवान= कर्म का उदय बड़ा बलशाली होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कर्मोदय की प्रबलता का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि जब जिस जीव का जैसा कर्म का उदय होता है, तब वह वैसा ही प्रवर्तन करता है, क्योंकि कर्म का उदय इतना बलवान् होता है कि वह जीव को बलहीन करके अपने अनुसार प्रवर्तन करवाता है। (इसका विशेष-स्पष्टीकरण कविवर अगले छंद में करेंगे।)

(सवैया इकतीसा)

जैसे गजराज परयौ कर्दम कै कुंड-बीच, उद्दिम अहूटै पै न छूटै दुःख-दंदसौं।
जैसे लोह-कंटक की कोरसौं उरझ्यौ-मीन, ऐंचत असाता लहै साता लहै संदसौं।।
जैंसे महाताप सिर-वाहिसौं गरास्यौ नर, तकै निज-काज उठि सकै न सुछंदसौं।
तैंसें ग्यानवंत सब जानै न बसाइ कछू, बंध्यौ फिरै पूरब-करम फल-फंदसौं।। 8।।

शब्दार्थ :- जैसे गजराज परयौ कर्दम कै कुंडबीच= जैसे हाथी कीचड़ के गड्ढे में पड़ा/फसा हो, उद्दिम अहूटै पै न छूटै दुःख-दंद सौं= (तब वह) पुरुषार्थ करने पर भी नहीं छूटता दुःख-द्वन्द से, जैसे लोह-कंटक की कोरसौं उरझ्यौ मीन= जैसे लोहे के काँटे की नोंक से उलझी हुई मछली, ऐंचत असाता लहै साता लहै संदसौं= खींचने से कष्ट पाती है और छूटने पर साता का अनुभव करती है, जैंसे महाताप सिर-वाहिसौं गरास्यौ नर तकै= जैसे तज े बुखार सिर-शूल/दर्द से पीड़ित मनुष्य तकता रहता है, निज-काज उठि सकै न सुछंदसौं= अपने आप अपनी स्वच्छंदता से उठ नहीं सकता है, तैंसें ग्यानवंत सब जानै न बसाइ कछू= वैसे ही ज्ञानी-जीव सब जानते हैं, पर वश में कुछ नहीं सो विवश होकर, बंध्यौ फिरै पूरब-करम-फल फंदसौं= पूर्वकर्म के फल में बंधन से बंधे रहते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने कर्म की प्रबलता को उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया है। यद्यपि उस प्रबलता में सम्यग्दर्शन होने पर दर्शनमोहनीय तो क्षय या उपशम को प्राप्त हो जाती है, परन्तु चारित्रमोहनीय का पूर्ण-क्षय तो स्वरूप की पूर्ण-स्थिरता होने पर ही होता है। तबतक जिस जीव ने जैसा कर्म बाँधा है, वैसा ही उदय में आता है। और जब चारित्र-मोहनीय का प्रबल उदय आता है, तब सम्यग्दृष्टिजीव भी न चाहते हुये भी उस रूप परिणमित होता है। जैसे हाथी यद्यपि बहुत बलवान् है, लेकिन यदि वह कीचड़ के गड्डे में गिर जाये, तो बहुत-पुरुषार्थ करने पर भी वह हाथी अपने आपको उस गड्डे से बाहर निकालने में असमर्थ होता है। मछली पकड़नेवाले मछली पकड़ने के लिये लोहे के काँटे में आटे की गोली लगाकर पानी में डालते हैं, पहले तो मछली चंचलता के कारण आसानी से पकड़ में नहीं आती; परन्तु यदि एक बार मछली उस काँटे में फँस जाये, तो फिर अथक-पुरुषार्थ करने पर भी वह उससे छूट नहीं पाती। जैसे बहुत-तेज बुखार और सिर में तीव्र-शूल या दर्द होने पर बलवान से बलवान् मनुष्य भी शरीर शिथिल हो जाने से छोटे-से काम के लिए भी अपने को पराधीन अनुभव करता है, अर्थात् वह अपने आप कुछ नहीं कर पाता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव की दृष्टि यद्यपि सम्यक् है, अंतरंग से वह स्वयं को किसी भी क्रिया का कर्ता भी नहीं मानता और न ही विपरीत-परिणमन होने पर आकुलित होता है; लेकिन फिर भी प्रतिकूलता आने पर उस रूप कार्य करता हुआ दिखाई देता है- ऐसे कई उदाहरण आगम में देखने को मिलते हैं। जैसे रामचंद्र जी तद्भव-मोक्षगामी थे, लेकिन फिर भी कर्मोदय की प्रबलता देखो! सीता का हरण होने पर रावण से युद्ध करते हैं। लक्ष्मण का वियोग होने पर उनकी लाश को कंधे पर लेकर घूमते हैं। जैसे माघनन्दि-मुनिराज नग्न-दिगम्बर भावलिंगी-मुनि होने पर भी कर्म के उदय की प्रबलता में कुम्हार की लड़की के साथ सम्बन्ध करने को विवश हुये थे। कहने का अभिप्राय यही है कि दृष्टि सम्यक् होने पर भी प्रबल-कर्म का उदय जीव की निर्णयक्षमता को कुछ समय के लिये बलहीन कर देता है, और सम्यग्दृष्टि-जीव भी उसरूप कार्य करता हुआ दिखाई देता है। लेकिन यह बलहीनता कुछ समय के लिये ही रहती है, जैसे ही कर्म का उदय-समय पूरा होता है, जीव पुन: अपने स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ करता है।

(चाैपाई)

जे जिय मोह-नींद में सौवै, ते आलसी निरुद्दिम होवै।
द्रिष्टि खोलि जे जगे प्रवीना, ते आलस तजि उद्दिम कीना।। 9।।

शब्दार्थ :- जे जिय मोह-नींद में सौवै= जो जीव मोह की नींद में सोते हैं, ते आलसी निरुद्दिम होवै= वे आलसी, पुरुषार्थहीन होते हैं, द्रिष्टि खोलि जे जगे प्रवीना= जो दृष्टि खोलकर जागृत हैं, वे चतुर हैं, ते आलस तजि उद्दिम कीना= वे आलस छोड़कर पुरुषार्थ करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में पुरुषार्थी कौन और पुरुषार्थ-हीन कौन?- इसका वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि जो जीव मोह की निद्रा में सोते हैं, वे जीव मोक्षमार्ग में प्रमादी और पुरुषार्थहीन होते हैं, और जो जीव ज्ञान-दृष्टि खोलकर जाग‍ृत रहते हैं, वे बुद्धिमान्-पुरुष आलस छोड़कर मोक्षमार्ग में निरन्तर पुरुषार्थी रहते हैं। कहने का अभिप्राय यही है कि जब तक मिथ्यात्व की अवस्था रहती है, तब तक जीव मोक्ष के लिए पुरुषार्थ नहीं करता; क्योंकि जिसे स्वरूप की खबर ही नहीं, वह पुरुषार्थी कैसे होगा? और जिस जीव को स्वरूप की खबर है, अर्थात् सम्यग्दर्शन है, उसे स्वरूप की स्थिरता का पुरुषार्थ न चले- ऐसी विपरीतता संभव ही नहीं है।

(सवैया इकतीसा)

काच बाँधै सिरसौं सुमनि बाँधे पाइनिसौं, जानै न गँवार कैसी मनि कैसौ काँच है।
यौंही मूढ़ झूठमें मगन झूठ हीकौं दोरै, झूठी-बात मानै, पै न जानै कहा साँच है।।
मनिकौं परखि जानै जौहरी जगत्-माँहि, साँच की समुझि ग्यान-लोचन की जाँच है।
जहाँ को जु वासी, सो तौ तहाँ को मरम जानै, जाकौ जैसौ स्वांग ताकौ ताही रूप नाच है।। 10।।

शब्दार्थ :- काच बाँधै सिरसौं सुमनि बाँधे पाइनिसौं= काँच बाँधते हैं सिर से, सुमणि बाँधते हैं पैर से, जानै न गँवार कैसी मनि कैसौ काँच= जानते ही नहीं गँवार हैं कि कौनसी मणि है, कौनसा काँच है? योहीं मूढ़ झूठमें मगन झूठ कौं ही दौरे= इसीप्रकार मूर्ख भी झूठ में मगन रहता हैं, झूठ के लिए ही दौड़ता है, झूठी बात मानै पै न जानै कहा साच है= झूठी बात ही मानते हैं, परन्तु यह नहीं जानते हैं कि सच क्या है? मनिकौं परखि जानै जौहरी जगत् माँहि= जगत् में मणि की परख जौहरी ही जानता है, साँच की समुझि ग्यान-लोचन की जाँच है= सच की समझ जगत् में ज्ञानरूपी नेत्रों का काम है, जहाँ को जु वासी सो तौ तहाँ को मरम जानै= जहाँ का जो रहनेवाला है, वह वहाँ के मर्म को जानता है, जाकौ जैसौ स्वांग ताकौ ताही रूप नाच है= जिसका जैसा स्वांग उसका उसीरूप नृत्य है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मिथ्यादृष्टि-जीव की अनादि से चली आ रही प्रवृत्ति को बहुत ही सरलता से वर्णित किया है। जैसे कोई विवेकहीन-पुरुष काँच को सिर पर और सुमणि अर्थात् हीरे जैसे कीमती-रत्न को पैर में धारण करता है; क्योंकि वह काँच और हीरा दोनों की ही कीमत को नहीं पहिचानता। ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव सत् और असत् के स्वरूप को नहीं जानता, इसलिए असत् को सत् मानकर सारा पुरुषार्थ असत् को प्राप्त करने में लगाता है। इतना ही नहीं, असत् को प्राप्त करने में इतना पुरुषार्थी होता है कि सत् को जानना भी नहीं चाहता। जैसे जगत् में हीरे की परख केवल जौहरी को ही होती है, ठीक उसीप्रकार सत् और असत् की परख भी केवल ज्ञान-नेत्रों से ही होती है; क्योंकि जो जिस कला का पारखी होता है, वही उसके पूरे मर्म या भेद को जानता है। इसीप्रकार जो जैसा स्वांग धारण करता है, वह उसीरूप प्रवर्तन भी करता है, जैसे आम-आदमी भी जब नट-नटी का स्वांग धारण करता है, तब वह उसी अनुरूप क्रिया भी करता है। ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव संसार में मिथ्या-स्वांग धारण करता है, सो मिथ्यात्वरूप प्रवर्तन करता है। और सम्यग्दृष्टि-जीव अपने सम्यक्-स्वरूप का अवलोकन करता है, सो उसी अनुरूप सम्यक्त्वरूपप्रवर्तन करता है।

(दोहा)

बंध बढावै अंध ह्वै, ते आलसी-अजान।
मुकति-हेतु करनी करै, ते नर उद्दिमवान।। 11।।

शब्दार्थ :- बंध बढावै अंध ह्वै= जो विवेकहीन होकर बंध को बढाते हैं ते आलसी-अजान= वे आलसी अज्ञानी हैं, मुकति-हेतु करनी करै= जो मुक्ति के लिये पुरुषार्थ करते हैं, ते नर उद्दिमवान= वे मनुष्य पुरुषार्थी हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में जैसी करनी वैसा फल- इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए कविवर कहते हैं कि जो जीव विवेकहीन होकर प्रमाद व अज्ञानता के कारण बंध की परम्परा को बढ़ाता है, वह मिथ्यात्वी होकर संसार में परिभ्रमण करता है। और जो मनुष्य पुरुषार्थी होकर मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, वे ही जीव सच्चे-पुरुषार्थी और सम्यक्त्वी हैं।

(सवैया इकतीसा)

जब लग जीव सुद्ध-वस्तुकौं विचार ध्यावै, तब लग भोगसौं उदासी सरवंग है।
भोग में मगन तब ग्यान की जगन नाँहि, भोग-अभिलाष की दसा मिथ्यात-अंग है।।
तातैं विषैभोगमैं मगन सो मिथ्याती-जीव, भोगसौं उदास सो समकिती अभंग है।
ऐसी जानि भोगसौं उदास ह्वै मुकति साधै, यहै मन-चंग तौ कठौती-माँहि गंग है।। 12।।

शब्दार्थ :- जब लग जीव सुद्धवस्तुकौं विचार ध्यावै= जबतक जीव शुद्ध-वस्तु/आत्मा का चिंतनपूर्वक ध्यान करता है, तब लग भोग सौं उदासी सरवंग है= तबतक भोगों से उदासी सर्वांग में है, भोग में मगन तब ग्यान की जगन नांहि= जब भोगों में मगन है, तब ज्ञान की जाग‍ृति नहीं है, भोग-अभिलाष की दसा मिथ्यातअंग है= भोग-अभिलाषा की स्थिति मिथ्यात्व का ही अंग है, तातैं विषैभोगमैं मगन सो मिथ्याती-जीव= इसलिए विषय-भोगों में तल्लीन वह जीव मिथ्यादृष्टि है, भोगसौं उदास सो समकिती अभंग है= जो भोगों से उदास वह सम्यग्दृष्टि अभंग है, ऐसी जानि भोगसौं उदास ह्वै मुकति साधै= एेसा जानकर भोगों से उदास होकर मोक्षमार्ग साधता है, यहै मन चंग तौ कठौती-माँहि गंग है= यदि मन चंगा है, तो कठौती में गंगा है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मिथ्यात्व और सम्यक्त्वरूप-परिणति का स्वरूप बताते हुये सम्यक्त्व की महिमा का प्रतिपादन किया है। जबतक जीव अपने शुद्ध-स्वरूप का विचार करता है, तबतक उसे भोगों के प्रति उदासीनता रहती है, वही दशा सम्यक् है। इसके विपरीत जबतक जीव पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों के प्रति आसक्त है, तबतक ज्ञानरूप प्रवर्तन न होने से अज्ञानतारूप-स्थिति है, जो मिथ्यात्व की दशा है, क्योंकि भोगों की इच्छा और आसक्ति अज्ञानता का ही रूप है। इसलिये विषयभोगों में तल्लीन जीव मिथ्यादृष्टि हैं, और जो भोगों से उदास है, वह जीव सम्यग्द‍ृष्टि है। हे आत्मन्! ऐसा जानकर भोगों से विरक्त होकर मुक्ति की साधना करो अर्थात् मोक्षमार्ग पर अग्रसर होओ, क्योंकि यदि मन चंगा अर्थात् अच्छा या पवित्र है, तो कठौती (लकड़ी की छोटी कटोरी के आकार का बर्तन) में भी गंगा है। जगत् में कहावत है गंगास्नान से पापों से निवृत्ति मिलती है, उसी कहावत के माध्यम से कवि ने यहाँ सिद्धांत को प्रस्तुत किया है। यद्यपि जिनशासन के हिसाब से ऐसा कुछ नहीं है कि गंगास्नान से पाप धुल जायेगें, लेकिन लोक में उससमय बहुप्रचलित कहावत होने से कवि ने यहाँ मात्र सिद्धांत को समझाने के लिये प्रयुक्त किया है। कहने का अभिप्राय यही है कि यदि हमारा मन पवित्र है, तो कठौती के बहुत थोड़े से पानी से नहाने पर भी गंगास्नान का फल यानि पापों से छुटकारा मिल सकता है, और यदि मन मिथ्यात्व, विषय-कषाय, पाप आदि से मलिन है, तो गंगा के अथाह जल से स्नान करने पर भी गंगा स्नान का फल अर्थात् दुःखों से छुटकारा नहीं मिल सकता। दूसरा दृष्टिकोण- यदि दृष्टि सम्यक् हो, परन्तु ज्ञान भले ही कठौती के जल के समान अति-अल्प हो, फिर भी वह जीव मोक्षमार्गी है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। लेकिन यदि दृष्टि मिथ्या है, तब ज्ञान गंगाजल के समान अथाह होने पर भी जीव मोक्षमार्गी नहीं है अर्थात् मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता।

जानाति यः स न करोति करोति यस्तु, जानात्ययं न खलु तत्किल कर्मरागः।
रागं त्वबोधमयमध्वसायमाहु-र्मिथ्यादृशः स नियतं स च बन्धहेतुः।। 5।।

(दोहा)

धरम-अरथ अरु काम-सिव, पुरुषारथ-चतुरगं ।
कुधी कलपना गहि रहै, सुधी गहै सरवंग।। 13।।

शब्दार्थ :- धरम-अरथ अरु काम-सिव= धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, पुरुषारथ चतुरंग= चारप्रकार के पुरुषार्थ हैं, कुधी कलपना गहि रहै= मूर्ख-व्यक्ति कल्पना के अनुसार ग्रहण करता है, सुधी गहै सरवंग= बुद्धिमान/विवेकी सर्वांग ग्रहण करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में चार-प्रकार के पुरुषार्थों का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- ये चारप्रकार के पुरुषार्थ हैं। मूर्ख/अज्ञानी-जीव इनका स्वरूप अपनी कल्पना के अनुसार या अपनी इच्छाओं के अनुसार ग्रहण करता है; जबकि बुद्धिमान/ज्ञानी-जीव सर्वांग अर्थात् आगमसम्मत-रीति से सभी को ग्रहण करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

कुलकौ-अाचार ताहि मूरख धरम कहै, पंडित धरम कहै वस्तु के सुभाउ कौं।
खेहकौं-खजानौ ताहि अग्यानी अरथ कहै, ग्यानी कहै अरथ दरब-दरसाउकौ।।
दंपतिकौ-भोग ताहि दुरबुद्धी काम कहै, सुधी काम कहै अभिलाष चित-चाउ कौं।
इंद्रलोक-थानकौं अजानलोग कहैं मोख, सुधी मोख कहै एक बंध के अभाउ कौं।। 14।।

शब्दार्थ :- कुलकौ अाचार ताहि मूरख धरम कहै= कुल-परम्परागत आचरण को मूर्ख ‘धर्म’ कहता है, पंडित धरम कहै वस्तु के सुभाउ कौं= पंड़ित ‘धर्म’ कहते हैं वस्तु के स्वभाव को, खेहकौं खजानौ ताहि अग्यानी अरथ कहै= मिट्टी का खजाना उसे अज्ञानी-जीव अर्थ/धन कहते हैं, ग्यानी कहै अरथ दरब-दरसाउकौ= ज्ञानी ‘अर्थ’ कहते हैं द्रव्य के अवलोकन को, दंपतिकौ भोग ताहि दुरबुद्धी काम कहै= पति-पत्नी के भोग को मूर्ख पुरुष ‘काम’ कहता है, सुधी काम कहै अभिलाष चित-चाउ कौं= विवेकी-जीव ‘काम’ कहते हैं चित् स्वरूप की अभिलाषा को, इंद्रलोक थानकौं अजान लोग कहैं मोख= इन्द्रों के निवास-स्थान को अज्ञानी-जीव ‘मोक्ष’ कहता है, सुधी मोख कहै एक बंध के अभाउ कौं= विवेकी-जीव ‘मोक्ष’ कहते हैं एकमात्र बंधन के अभाव को। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थ के विषय में ज्ञानी और अज्ञानी की विचारधारा का सुंदर वर्णन किया है। जगत् में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- ये चार पुरुषार्थ यानि करने योग्य कार्य माने गये हैं। लेकिन अज्ञानी-जीव इनका स्वरूप आगम के अनुसार न मानकर अपनी कल्पना या कहें इच्छानुसार मानता है, जबकि ज्ञानी-जीव इनका सम्यक्-स्वरूप ही अंगीकार करते हैं। पहला पुरुषार्थ ‘धर्म’- आगम के अनुसार ‘वस्तु के स्वभाव को धर्म’ कहते हैं, जैसे नीबू का स्वभाव खट्टापन, चीनी का स्वभाव मीठापन, वैसे ही आत्मा का धर्म या स्वभाव जानना-देखना। लेकिन अज्ञानी-जीव के लिए तो कुछ करने का नाम धर्म है, सो वह पूजा-पाठ, व्रत-संयम, चौका की शुद्धि, नित्य-स्नानपूर्वक कोई भी काम करना, शुद्ध-वस्त्रों में खाना पकाना और खाना- ऐसी अनेक आचारपरक-क्रियाओं के करने मात्र को धर्म मानता है। यद्यपि यहाँ इन क्रियाओं के निषेध की चर्चा नहीं है, बल्कि इन क्रियाओं को धर्म मानने का निषेध है; क्योंकि ये तो जड़ का परिणमन है, धर्म नहीं, विवेकी या ज्ञानी-जीव तो अपने स्वभावरूप-प्रवर्तन को ही धर्म मानते हैं। दूसरा पुरुषार्थ ‘अर्थ’- ‘जीवन की उपलब्धि’ अर्थात् अपने आत्मद्रव्य का अवलोकन करना ही वास्तव में इस जीवन की सर्वोत्तम-उपलब्धि है, इसीलिये ज्ञानी-जीव इसी को सच्चा ‘अर्थ’ मानकर निरन्तर इसी का पुरुषार्थ करते है। जबकि अज्ञानी-जीव सोना-चाँदी, धन-दौलतरूप मिट्टी के खजाने को ‘अर्थ’ मानता है, सो उसी का पुरुषार्थ करता है। तीसरा पुरुषार्थ ‘काम’- ज्ञानी-जीव आत्मस्वरूप में आसक्ति को ‘काम’ कहते हैं, इसीलिये निरन्तर आत्मानुरागपूर्वक प्रवर्तन करते हैं। वहीं अज्ञानी-जीव पति-पत्नी के वासनापरक-भोगासक्ति को ‘काम’ कहता हैं, सो उसीरूप प्रवर्तन करता है। चौथा पुरुषार्थ ‘मोक्ष’- मोक्ष यानि हरप्रकार के बंधन से मुक्ति। लेकिन अज्ञानी-जीव इंद्रलोक अर्थात् बैकुंठ या कहें स्वर्ग की प्राप्ति को ही मुक्ति मानता है, जबकि ज्ञानी-जीव एकमात्र कर्मों के बंधन से छूटने को ही मुक्ति मानते हैं, क्योंकि बैकुंठ या स्वर्ग तो चार-गतिरूप संसार यानि बंधन-स्वरूप ही है, मोक्ष नहीं। इसीलिए अज्ञानी-जीव बाल-तपरूप क्रिया करके स्वर्ग की प्राप्ति का पुरुषार्थ करता है, और ज्ञानी-जीव समस्त कर्मबंधन से रहित मुक्ति या वीतरागता की प्राप्ति के लिए स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

धरम कौ साधन जु वस्तुकौ-सुभाउ साधै, अरथ कौ साधन विलेछ दर्व-षट मैं।
यहै काम-साधन जु संग्रहै निरासपद, सहज-सरूप मोख सुद्धता प्रगटमैं।।
अंतर की द्रिष्टिसौं निरंतर विलोकै बुध, धरम-अरथ-काम-मोख निज-घटमैं।
साधन-आराधन की सौंज रहै जाके संग, भूल्यौ फिरै मूरख मिथ्यात की अटलमैं।। 15।।

शब्दार्थ :- धरम कौ साधन जु वस्तुकौ सुभाउ साधै= धर्म प्राप्ति का मुख्य साधन तो वस्तु के स्वभाव को साधना है, अरथ कौ साधन विलेछ दर्व-षट मैं= अर्थ का साधन छहों द्रव्यों के स्वरूप को भिन्न-भिन्न ग्रहण करना है, यहै काम-साधन जु संग्रहै निरासपद= काम-साधन यह है, जो निस्पृहता को बढ़ाता है, सहज-सरूप मोख सुद्धता प्रगटमैं= (और) मोक्ष सहज-स्वरूप की शुद्धता को पर्याय में प्रगट करना, अंतर की द्रिष्टि सौं निरंतर विलोकै बुध= (इन चारों पुरुषार्थों को) ज्ञानी-जीव अंतरंग-दृष्टि से प्रतिसमय अवलोकन करते हैं, धरम अरथ काम मोख निज घट मैं= धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ अंतरंग में हैं, साधन-आराधन की सौंज रहे जाके संग= साधन और आराधन दोनों जिसके साथ हैं, भूल्यौ फिरै मूरख मिथ्यात की अटलमैं= (फिर भी) मूर्ख-मिथ्यात्व के भ्रम में भूला रहता है विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि वास्तव में चारों पुरुषार्थ आत्मा में ही होते हैं। पुरुषार्थ यानि करने योग्य कार्य, इस दृष्टि से मैं आत्मा हूँ, और पर से मेरा किंचिंत् भी संबंध नहीं है, तो मेरे करने योग्य कार्य अर्थात् पुरुषार्थ मेरे ऊपर ही घटित होगें, न तो ये परद्रव्य पर घटित होंगें, और न ही परद्रव्य के संयोग से, क्योंकि दोनों द्रव्यों में अत्यंताभाव है। इसीलिए ज्ञानी-जीव चारों-पुरुषार्थों को स्वयं पर ही सिद्ध करते हैं, ‘धर्म’ पुरुषार्थ के साधन के लिये वस्तु के स्वभाव को साधते हैं, अर्थात् आत्मवस्तु के स्वभावरूप-प्रवर्तन करते हैं। ‘अर्थ’ पुरुषार्थ के साधन के लिये ज्ञानी-जीव, जीव, पुद््गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन छहों-द्रव्यों को भिन्न-भिन्न उनके स्वभावरूप ही ग्रहण करते हैं। ‘काम’ पुरुषार्थ को साधने के लिये पर से निष्पृहता और आत्मस्वरूप से स्पृहतारूप प्रवर्तन करते हैं। ‘मोक्ष’ पुरुषार्थ को साधने के लिये सहज-स्वरूप की आराधना करते हुए पर्याय में पूर्ण-वीतरागता प्रकट करने रूप प्रवर्तन करते हैं। इसप्रकार ज्ञानी-जीव या कहें सम्यग्दृष्टि-जीव धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों को अपनी अंतरंग-दृष्टि से निजस्वरूप में ही अवलोकन करते हैं, जबकि अज्ञानी-जीव या कहें मिथ्यादृष्टिजीव साधन और आराधन दोनों की सामग्री स्वयं के पास होने पर भी चारों-पुरुषार्थों को न केवल पर में खोजता है, अपितु पर से ही उनकी सिद्धि भी करना चाहता है, यही तो मिथ्यात्व है, जिसके कारण मूर्ख अज्ञानी-जीव प्रतिसमय भ्रमित होता रहता है।

(सवैया इकतीसा)

तिहूँ-लोकमाँहि तिहूँकाल सब जीवनि कों, पूरब-करम उदै आइ रस देतु हैं।
कोउ दीरघाऊ धरै कोउ अलपाउ मरै, कोउ दुखी कोउ सुखी कोउ समचेतु है।।
याही में जिवायौ याही मारौ याही सुखी करौ, याही दुखी करौ ऐसौ मूढ मान लेतु है।

याही अहंबद्धि ु से न विनसै भरम-भूल, यहै मिथ्या-धरम करम-बंध हेतु है।। 16।। शब्दार्थ :- तिहूँ-लोकमाँहि तिहूँकाल सब जीवनि कों= तीनों लोकों में तीनों काल में समस्त जीवों को, पूरब-करम उदै आइ रस देतु हैं= पूर्वकर्म उदय में आकर रस/फल देते हैं, कोउ दीरघाऊ धरै= कोई लंबी-आयु धारण करता है, कोउ अलपाउ मरै= कोई कम-आयु में ही मरण को प्राप्त होता है, कोउ दुखी कोउ सुखी कोउ समचेतु है= कोई दुःखी, कोई सुखी, कोई सामान्य रहता है, याही मैं जिवायौ याही मारौ= इसे मैं ने जिलाया, इसे मारा, याही सुखी करौ याही दुखी करौ= इसे सुखी किया, इसे दुःखी किया, ऐसौ मूढ मान लेत है= ऐसा मूर्ख अज्ञानी-जीव मानता है, याही अहंबुद्धि से न विनसै भरम-भूल= इसी अहंभाव के कारण ये भ्रम-बुद्धि विनष्ट नहीं होती, यहै मिथ्या-धरम करम-बंध हेतु है= यही मिथ्या-बुद्धि कर्मबंध का कारण है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जगत् की स्वचालित वस्तु-व्यवस्था और मिथ्यादृष्टि-जीव की परिणति का बहुत ही सरलता से चित्रण किया है। अनादिकाल से जीव और आठ-कर्मों का घनिष्ट-संबंध है अर्थात् मिथ्यादृष्टि-जीव हमेशा आठ-कर्मों के साथ ही जन्म लेता है। साथ ही ये भी सुनिश्चित है कि तीनों-लोकों यानि ऊर्ध्व, मध्य और अधोलोक, तीनों-कालों यानि भूतकाल, वर्तमानकाल, और भविष्यकाल में पूर्वोपार्जित अर्थात् जीव के द्वारा पूर्व में बाँधे गये कर्म ही वर्तमान में उदय में आकर फल देते हैं। जिससे किसी जीव को बहुत लम्बी-आयु मिलती है, कोई जीव बहुत कम-आयु में ही मरण को प्राप्त होता है। पूर्व-कर्म के उदय में किसी जीव को अनुकूल-सामग्री मिलती है, सो संसार की दृष्टि से वह जीव अपने को सुखी मानता है, और किसी जीव को प्रतिकूल-सामग्री मिलती है, सो वह जीव अपने को दुःखी मानता है। और कितने ही जीव ऐसे हैं, जिन्हें न अति-अनुकूलता मिलती है और न अति-प्रतिकूलता, सो वे जीव सामान्य रहते हैं न बहुत-सुखी और न बहुत-दुःखी। यद्यपि जीव को सांसारिक सुख-दुःख में निमित्त समस्त-सामग्री, संयोग और आयु अर्थात् जन्ममरण की स्थिति पूर्व-कर्म के उदय से सहज प्राप्त होती है, जिसे घटाने-बढाने या नष्ट करने में सामान्य संसारी-जीव तो क्या, जिनेन्द्र भी समर्थ नहीं है। लेकिन फिर भी अज्ञानी-मिथ्यादृष्टि संसारी-जीव को ये भ्रम हमेशा रहता है कि ''मैंने उसको जिलाया या जीवन दिया, मैंने उसको मार दिया, मैंने उसको सुखी

सर्व सदैव नियत भवति स्वकीय-कर्मोदयान्मरण-जीवित-दुःख-सौख्यम्।
अज्ञानमेतदिह यत्तु परः परस्य, कुर्यात्पुमान् मरण-जीवित-दुःख-सौख्यम्।। 6।।

किया और मैंने उसको दुःखी किया अर्थात् संसार में जो भी परिवर्तन हो रहा है, उसका कर्त्ता मैं ही हूँ, मेरी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता-इत्यादि।‘’ इसी ‘अहंबुद्धि’ या ‘मैं ही जगत् का कर्ता हूँ’- के कारण इसका अज्ञानरूपी-अंधकार अथवा मिथ्या-भ्रम कभी दूर ही नहीं होता। जैसे अंधकार के रहते जीव को कुछ दिखाई नहीं देता ठीक उसीप्रकार भ्रम और अज्ञानरूपी-अंधकार में न तो इसे स्वयं का स्वरूप भासित होता है, और न ही संसार, शरीर और भोगों की वास्तविकता ख्याल में आती है। फलस्वरूप निरन्तर नवीन-कर्मों का बंध होता रहता है। कहने का अभिप्राय यही है कि जीव की ये मिथ्या या भ्रम-बुद्धि ही कर्म-बंध का मूल-कारण है।

(सवैया इकतीसा)

जहाँलौं जगत् के निवासी जीव जगत् में, सबै असहाइ कोऊ काहूकौ न धनी है।
जैसी-जैसी पूरब-करम-सत्ता बांधी जिन, तैसी उदै में अवस्था आइ बनी है।।
एते परि जो कोउ कहै कि मैं जिवाऊँ मारूँ, इत्यादि अनेक-विकलप बात-घनी है।
सो तौ अहंबुद्धिसौं विकल भयौ तिहूँ-काल, डोलै निज आतम-सकति तिन हनी है।। 17।।

शब्दार्थ :- जहाँलौ जगत् के निवासी जीव जगत् में= जहाँ तक संसार में रहनेवाले जीव हैं, (वे) संसार में, सबै असहाइ कोऊ काहूकौ न धनी है= सभी असहाय/निराधार हैं, कोई किसी का स्वामी नहीं है, जैसी जैसी पूरबकरम-सत्ता बांधी जिन= जिसने जैसा-जैसा पूर्व कर्म का स्थिति-अनुभाग आदि बाँधा है, तैसी उदै में अवस्था आइ बनी है= वैसी ही अवस्था उदय-अनुसार बनती है, एते परि जो कोउ कहै कि मैं जिवाऊँ मारूँ= इतने पर भी जो कोई ये कहता है कि ''मैं जिलाता हू,ँ मैं मारता हू’ँ ', इत्यादि अनेक विकलप बात घनी है= इत्यादि बहुत सारे विकल्प करता हैं, सो तौ अहंबद्धि ु सौं विकल भयौ तिहू-ँ काल= वह ऐसी अहंबद्ु धि से ही तीनों-काल व्याकुल होता है, डोलै निज आतम-सकति तिन हनी है= संसार में भ्रमता है, और अपनी आत्मशक्ति का घात करता रहता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पुन: मिथ्यादृष्टि-जीव को ही संकेतित किया है। छह-द्रव्यों के समूह से निर्मित इस विश्व में सभी द्रव्य अपने-अपने आधार से हैं, न तो कोई किसी का सहायक है, न रक्षक और न विरोधी। इसीप्रकार निगोद से लेकर पंचेन्द्रिय तक संसार के समस्त प्राणी असहाय हैं अर्थात् अपने-अपने आधार से हैं, और स्वतंत्र हैं। न तो कोई किसी का रक्षक और न कोई किसी का भक्षक, न कोई किसी का स्वामी है और न कोई किसी का चाकर, अर्थात् न कोई किसी को कुछ देता है, न लेता है । सच तो ये है कि जिस जीव ने जैसे परिणाम किये, उस जीव ने उसी अनुरूप कर्मों की सत्ता बाँधी है, अर्थात् जीव के परिणामों के अनुसार ही कर्मों की प्रकृति, प्रदेश, स्थिति और अनुभागरूप बंध होता है, और वही कर्म अपने-अपने समय पर उदय में आकर फल देते हैं; जिनके परिणामस्वरूप वैसी ही क्षणिक-सुख या दु:खरूप-अवस्था जीव को प्राप्त होती है। इतनी स्वतंत्र और स्वचालित वस्तु-व्यवस्था के होने पर भी यदि कोई जीव ये कहे कि मैंने उसको जीवन दिया, मैंने उसका भरण-पोषण किया, मैं सहायक, मैं रक्षक, मैं विरोधी- ऐसे अनेकप्रकार के विकल्प करे, तो यह उस जीव का भ्रम-मात्र ही है, सत्य नहीं। वास्तव में देखा जाये, तो पर में कर्तृत्वपने, एकत्वपने, ममत्वपने आदि के अनगिनत-विकल्प

अज्ञानमेतदधिगम्य परात्परस्य, पश्यन्ति ये मरण-जीवित-दुःख-सौख्यम्।
कर्माण्यहंकृति-रसेन चिकीर्षवस्ते, मिथ्यादृशो नियतमात्महनो भवन्ति।। 7।।

का नाम ही ‘अहंबुद्धि’ है, और इसी अहंबुद्धि से जीव निरन्तर-व्याकुल होता रहता है; क्योंकि जगत् की वस्तु व्यवस्था तो पूर्ण-स्वतंत्र और स्वचालित होने से जीव उसमें किसी भी प्रकार की फेरबदल कर ही नहीं सकता। लेकिन अज्ञानी-जीव फेरबदल करने का प्रयास अवश्य करता है, इसीलिए प्रतिसमय मात्र आकुलित होता है। और इसी आकुलता के फल में अनादि से आज तक चार-गति चौरासी-लाख योनियों में परिभ्रमण करता हुआ न केवल दुःखी होता आ रहा है, बल्कि अपनी अनंत-आत्मशक्ति की भी उपेक्षा करता आ रहा है।

(सवैया इकतीसा)

उत्तम-पुरुष की दसा ज्यों किसमिस-दाख, बाहिज-अभिंतर विरागी मृद-ु अंग है।
मध्यम-पुरुष नारियर-कीसी भाँति लिये, बाहिज-कठिन होय कोमल-तरंग है।।
अधम-पुरुष बदरीफल-समान जाकैं, बाहर से दीखैं नरमाई दिल-संग है।
अधम सें अधम-पुरुष पूंगीफल-सम, अंतरंग-बाहिर कठोर सरवंग है।। 18।।

शब्दार्थ :- उत्तम-पुरुष की दसा ज्यों किसमिस-दाख= श्रेष्ठ-पुरुष की स्थिति किसमिस/दाख के समान, बाहिज-अभिंतर विरागी मृद-ु अंग है= बाहर और अंदर से बैरागी, कोमल/मधुर-अंग है, मध्यम-पुरुष नारियरकीसी भाँति= मध्यम-पुरुष नारियल के समान, लिये बाहिज-कठिन होय कोमल-तरंग है= बाहर से कठोरता लिये अंतरंग में कोमल होता है, अधम-पुरुष बदरीफल-समान= जघन्य-पुरुष बेर के समान, जाकैं बाहर से दीखैं नरमाई दिल-संग है= जिसके बाहर से कोमलता दिखती है, दिल पत्थर की तरह कठोर है, अधम सें अधम-पुरुष पूगं ीफल-सम= जघन्य से भी जघन्य-पुरुष सुपारी के समान, अंतरंग-बाहिर कठोर सरवंग है= अंतरंग और बाहर से एकसमान कठोर होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने बहुत ही सुन्दरता से चार-दृष्टान्तों के माध्यम से संसारी-जीव के स्वभाव का वर्णन किया है। अपने इस कथन को स्पष्ट करने के लिए कवि ने जगत् में प्रचलित-वस्तुओं को उदाहरण-स्वरूप प्रस्तुत किया है। इस संसार में नानाप्रकार के जीव हैं, और कर्मोदय भिन्न होने से मोही-जीवों की प्रवृत्ति भी भिन्नभिन्न होती है, उनके आचार-विचार, व्यवहार, प्रवर्तन सभी में भिन्नता होती है। फलस्वरूप कर्म का बंधन भी सभी का भिन्न-भिन्न ही होता है। जब बंध का कारण भिन्न-भिन्न है, तो उदय की अवस्था भी भिन्न-भिन्न ही होती है। कवि ने संसारी-जीवों के उनके परिणामों के आधार पर चार-भेद किये हैं- उत्तम-पुरुष, मध्यम-पुरुष, जघन्य-पुरुष और अतिजघन्य-पुरुष। सर्वप्रथम उत्तम-पुरुष का स्वभाव किसमिस/द्राक्षा के समान होता है, जैसे किसमिस अंदर और बाहर दोनों ही तरफ से मुलायम होती है, उसीप्रकार उत्तम-पुरुष का स्वभाव अंतरंग और बहिरंग दोनों से अत्यंत-कोमल होता है, इन जीवों के कषाय की मंदता होने से न मन में छल होता है, और न बाहरी आचरण छल-सहित होता है, इसीलिए ऐसे उत्तम-पुरुष ‘देव-गति’ या ‘श्रेष्ठ-मनुष्य-गति’ के पात्र हैं। दूसरे नंबर पर मध्यम-पुरुष आते हैं, जिनका स्वभाव नारियल के समान होता है, अर्थात् जैसे नारियल बाहर से कठोर और अंदर से मुलायम होता है। ठीक उसीप्रकार मध्यम-पुरुष का स्वभाव भी बाहर से भले ही नारियल जैसा कठोर दिखे या कषाय की तीव्रता दिखे, पर अतरंग से कषाय में मंदता वर्तती है, ऐसे मध्यम-पुरुष ‘मनुष्य-गति’ के पात्र हैं। तीसरे नंबर पर जघन्य-पुरुष आते हैं, जिनका स्वभाव बदरीफल या बेर के समान होता है, जैसे बेर-फल ऊपर से मुलायम परन्तु अंदर कठोर होता है, ठीक उसीप्रकार जघन्य-पुरुष ऊपर से भले ही

नरम-स्वभाव का दिखे, लेकिन अंतरंग से उसके परिणाम छल-कपट और मायाचारी-सहित ही होते हैं।
ऐसे जघन्य-पुरुष ‘तिर्यंच-गति’ के पात्र हैं।

चौथे नंबर पर वे पुरुष आते हैं जो अति-अधम अर्थात् बिल्कुल ही निकृष्ट हैं। इन जीवों का स्वभाव सुपारी के समान होता है, जैसे सुपारी अंदर से भी कठोर और बाहर से भी कठोर ही होती है, ठीक उसीप्रकार निकृष्ट-जीवों के परिणाम भी अंतरंग और बहिरंग दोनों अोर से समानरूप से कठोर होते हैं। इन जीवों के कषाय की तीव्रता होने से न केवल विचारों में मलिनता, छल-कपट होता हैं, बल्कि आचरण भी उतना ही निकृष्ट होता है, ऐसे जीव ‘नरक-गति’ के पात्र हैं। अंतत: जिन जीवों के परिणामों में न राग होता है न द्वेष; बल्कि सहज आत्मस्वभाव रूप परिणमन होता है, वे ही ‘पंचमगति’ अर्थात् ‘मोक्ष’ के पात्र होते हैं।

(सवैया इकतीसा)

कीचसौ-कनक जाकै नीचसौ-नरेस-पद, मीचसी-मिताई गरुवाई जाकै गारसी।
जहर-सी जोग-जाति कहर-सी करामाति, हहर-सी हौस पुदगल-छवि छार-सी।।
जाल-सौ जग-विलास भाल-सौ भुवन-वास, काल-सौ कुटुंब-काज लोक-लाज लार-सी।
सीठ-सौ सुजसु जानै बीठ-सौ बखत मानै, एेसी जाकी रीति, ताहि वंदत बनारसी।। 19।।

शब्दार्थ :- कीच-सौ कनक जाकै नीच-सौ नरेस-पद= जिसको सोना कीचड़ के समान, राजा का पद नीच के समान अर्थात् अत्यंत-तुच्छ, मीच-सी मिताई गरुवाई जाकै गार-सी= मित्रता मृत्यु के समान, बड़प्पन/ प्रसन्नता जिसके गाली के समान, जहर-सी जोग जाति कहर-सी करामाति= दैहिक-योग की क्रियायें जहर के समान, मंत्रादि से होनेवाली क्रियायें वज्रपात के समान, हहर-सी हौस पुदगल-छवि छार-सी= इच्छा या महत्त्वाकांक्षा अनर्थ के समान पुद््गल की/तन की सुंदरता राख के समान, जाल-सौ जग-विलास भाल-सौ भुवन-वास= संसार का वैभव जाल के समान, भवनों का निवास भाले की नोंक के समान, काल-सौ कुटुंबकाज लोक-लाज लार-सी= कुटुंबादि के कार्य काल के समान, लोक-लाज लार के समान, सीठ-सौ सुजसु जानै बीठ-सौ वखत मानै= सुयश को नाक के मैल के समान जानता है, भाग्योदय को बिष्ठा के समान मानता है, एेसी जाकी रीति ताहि वंदत बनारसी= ऐसी जिनकी रीति या परम्परा है, उनको बनारसी वंदन करता है । विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘उत्तम-पुरुष’ की विचारधारा का बहुत ही सुंदर और मार्मिक-वर्णन किया है। उत्तम-पुरुष यानि श्रेष्ठ-पुरुष या कहें सम्यग्दृष्टि-जीव, जो निरन्तर मोक्षमार्ग में अग्रसर है। संसार, शरीर और भोगों के प्रति उनका चिंतन या कहें विरक्ति का भाव कैसा रहता है, उसका मार्मिकवर्णन कवि ने यहाँ किया है। जिस सोना-चाँदी हीरे-जवाहरात को मिथ्यादृष्टि-जीव बहुमूल्य मानकर सहेजकर रखता है, उत्तम-पुरुष उसे ‘कीचड़’ के समान अस्पृश्य मानते हैं। जिस राजसी-पद को श्रेष्ठ-पद मानकर मिथ्यादृष्टि-जीव उसे पाने के लिये हरसंभव-प्रयास करता है, उसे उत्तम-पुरुष सबसे ‘निकृष्ट-पद’ मानते हैं। जहाँ जगत् के अज्ञानी-जीव मित्र को सहोदर की तरह ‘मान’ देते हैं, वहीं उत्तम-पुरुष मित्र को ‘यमराज’ और मित्रता को ‘मृत्यु’ के समान मानते हैं। जहाँ अज्ञानी-जीव को अपनी प्रशंसा सुनने में अतिआनंद आता है, वहीं उत्तम-पुरुष को ये प्रशंसा के वचन गाली के समान अप्रिय प्रतीत होते हैं। जोग-जाति यानि दैहिय यौगिक क्रियायें अज्ञानी-जीव को अमृत के समान प्रिय लगती हैं, जबकि उत्तम-पुरुष को ये क्रियायें ‘जहर’ के समान लगती हैं। जैसे जहर का आंशिक-सेवन भी मरण का ही कारण है, वैसे ही सांसारिक कार्यों में आंशिक-प्रवृत्ति भी चार-गति में भटकाव का ही कारण है। मंत्र-तंत्रादि के द्वारा जगत् में मिलनेवाली उपलब्धियों को अज्ञानी-जीव अपनी उपलब्धि मानकर खुश होते हैं, वही उत्तमपुरुष इन उपलब्धियों को वज्रपात के समान आपत्तिजनक जानकर उन्हें दु:ख का कारण मानते हैं। जहाँ अज्ञानी-जीव महत्वाकांक्षी होने में स्वयं को अच्छा और उन इच्छाओं को पूरा करने योग्य मानते है, वहीं उत्तम-पुरुष इच्छाओं को अनर्थ-योग्य अर्थात् नहीं करने योग्य कार्य और अपशकुन के समान मानते हैं। जिस तन की सुंदरता पर अज्ञानी-जीव प्रतिसमय रीझता है, उसे पाने के लिये न जाने क्या-क्या प्रयत्न करता है, उस तन की सुंदरता को श्रेष्ठ-पुरुष जले हुये कोयलों की राख के समान त्याग करने योग्य मानते हैं। जिन भौतिक-संसाधनों, भोग-विलास के पीछे दुनिया पागल है, उसे उत्तम-पुरुष ‘जी का जंजाल’ मानते हैं; क्योंकि जैसे मकड़ी अपना जाला स्वयं ही बनाती है और फिर उसमें फँसकर खुद ही मरण को प्राप्त होती है; ठीक उसीप्रकार इस भोग-विलासिता की सामग्री को जीव स्वयं ही जोड़ता है और फिर उसमें फँसकर स्वयं ही नीच-गति का पात्र बनता है। सुंदर-भवनों को बनाना और उसमें अति-अनुरागपूर्वक रहना अज्ञानी-जीवोंं को अतिप्रिय लगता है, वहीं इन भवनों में रहना उत्तम-पुरुष को भाले की नोंक पर रहने के समान कष्टप्रद लगता है। जैसे भाले की नोंक पर स्थिर रहना महा-दुःखदायी है, उसीप्रकार उत्तम-पुरुष के लिये इन ‘जड़-भवनों’ में रहना महा-दुःखदायी लगता है। जिस परिवार और कुटुंबी-जनों को अज्ञानी-जीव अपना सहारा मानता है, और उसकी साज-संभाल में अपना सारा जीवन बर्बाद करता है, उन्हीं कुटुंबी-जनों को उत्तम-पुरुष ‘काल’ के समान मानते हैं; क्योंकि इनका मोह ही तो ‘भाव-मरण’ कराकर संसार में परिभ्रमण कराता है। जिन लोक-लाज, दुनिया के रीति-रिवाजों को ओढ़कर अज्ञानी-जीव फूला नहीं समाता है; उन्हें उत्तमपुरुष मुँह से निकली हुई ‘लार’ के समान त्यागने-योग्य मानते हैं। ‘सुयश’ यानि यश की प्राप्ति हो ऐसे कार्यों को करने की चाह अज्ञानी-जीव को प्रतिसमय रहती है, जबकि उत्तम-पुरुष उसे नाक से निकले हुये मैल के समान तुरंत फेंकने-योग्य मानते हैं। जिस ‘भाग्योदय’ की आशा अज्ञानी-जीव को एक क्षण भी विस्मृत नहीं होती, उत्तम-पुरुष उसे विष्टा के समान मानते हैं। जैसे विष्टा को कोई भी व्यक्ति छूने योग्य तो दूर, याद भी नहीं करना चाहता, वैसे ही उत्तम-पुरुष भाग्योदय को ही नहीं, इस संबंधी विकल्प को भी छोड़ना चाहते हैं। कविवर कहते हैं कि जिन पुरुषों की संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति-पूर्ण ऐसी विचारधारा होती है, उनको मैं बनारसीदास सविनय-वंदन करता हूँ।

(सवैया इकतीसा)

जैसें कोउ सुभट-सुभाइ ठग-मूर खाइ, चेरा भयौ ठगनी के घेरा में रहतु है।
ठगौरी उतरि गई तबै ताहि सुधि भई, परयौ परवस नाना-संकट सहतु है।।
तैसे ही अनादिकौ मिथ्याती-जीव जगत् में, डोलै आठों-जाम विसराम न गहतु है।
ग्यानकला भासी, भयौ अंतर उदासी पै, तथापि उदै व्याधिसौं समाधि न लहतु है।। 20।।

शब्दार्थ :- जैसें कोउ सुभट-सुभाइ ठग-मूर खाइ= जैसे कोई स्वभाव से बलवान योद्धा ‘ठगमूर’ नामक जड़ी खाकर, चेरा भयौ ठगनी के घेरा में रहतु है= ठगनी का दास होकर उसके चंगुल में रहता है, ठगौरी उतरि गई तबै ताहि सुधि भई= जड़ी का नशा उतर जाता है, तब उसे होश आता है, परयौ परवस नाना संकट सहतु है= दूसरे के आधीन विभिन्न-प्रकार के कष्ट सहन करता है, तैसे ही अनादिकौ मिथ्याती-जीव जगत् मैं= वैसे ही, अनादिकाल से मिथ्यादृष्टि-जीव संसार में, डोलै आठों जाम विसराम न गहतु है= आठों-पहर परिभ्रमण करता है, चैन नहीं पाता है, ग्यानकला भासी भयौ अंतर-उदासी= सम्यग्ज्ञान-कला भासित होने पर अंतरंग से उदास होता है, पै तथापि उदै व्याधिसौं समाधि न लहतु है= परन्तु फिर भी उदय की प्रबलता से स्थिरता या शांति को प्राप्त नहीं होता। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘मध्यम-पुरुष’ की स्थिति का एक उदाहरण के माध्यम से बहुत ही सुंदर-चित्रण किया है। जैसे कोई योद्धा, जो स्वभाव से बलवान् है, पर यदि वह ‘ठगमूर’ नामक जड़ी (एक ऐसी जड़ीबूटी जिसका भक्षण करने पर उसके नशे में व्यक्ति अपनी सुध-बुध खो देता है) का भक्षण कर ले, तो वह उसके नशे में अपना स्वभाविक-बल भी भूल जाता है, और ठगनी के वशीभूत होकर उसके आधीन प्रवर्तन करने लगता है अर्थात् उसका दास बन जाता है। लेकिन जैसे ही उसकी ठगौरी या नशा उतरता है, उसकी याददाश्त, बल आदि स्मरण तो हो जाता है, परन्तु उसके चंगुल फँसा होने के कारण तुरंत छूट नहीं पाता, और विवश होकर नानाप्रकार के कष्टों को सहन करता रहता है। ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टिजीव अनादिकाल से मोहरूपी ‘ठगमूर जड़ी’ का भक्षण करता आ रहा है, उसके नशे में अपने अनंतचतुष्टयरूपी अतीव-बल को भूलकर मोह के वशीभूत हो जाता है, और फिर आठों-याम यानि प्रतिक्षण उसके आधीन रहकर उसके अनुसार ही प्रवर्तन करता रहता है। लेकिन जब मोहरूपी ठगमूर-जड़ी का नशा उतरता है, अर्थात् आत्मानुभूति होती है, तब विरक्ति का भाव तो रहता है; परन्तु संसार शरीर और संयोगों के चंगुल में फँसा होने के कारण तुरंत उनसे छूट नहीं पाता है। इसलिये विविधप्रकार के कष्टों को सहन करता हुआ परिभ्रमण करता रहता है, चैन नहीं पाता है। यद्यपि उसके हृदय में अब भेदविज्ञान की सम्यक्-कला जागृत है, सो संसार, शरीर और भोगों के प्रति उदासीन तो रहता है, परन्तु पूर्वोपार्जित-कर्मों की प्रबलता इतनी अधिक होती है कि चित्त स्थिरता को प्राप्त नहीं होता अर्थात् न चाहते हुए भी उस रूप प्रवर्तन करता रहता है।

(सवैया इकतीसा)

जैसें रंक-पुरुषकैं भायैं कानी-कौड़ी धन, उलुवा के भायैं जैसें संझा ही विहान है।
कुकरु के भायैं ज्यौं पिडोर जिरवानी मठा, सूकरु कैं भायैं ज्यों पुरीष पकवान हैं।।
बायसके भायैं जैंसें नींब की निंबोरी दाख, बालक कैं भायैं दंतकथा ज्यौं पुरान है।
हिंसक के भायैं जैंसे हिंसा में धरम तैंसे, मूरख के भायैं सुभबंध निरवान है।। 21।।

शब्दार्थ :- जैसें रंकपुरुषकैं भायैं कानी-कौड़ी धन= जैसे गरीब-व्यक्ति को कानी-कौड़ी भी धन लगता है, उलुवा के भायैं जैसें संझा ही विहान है= उल्लू को जैसे शाम भी प्रभात के समान प्रिय है, कुकरु के भायैं ज्यौं पिडोर जिरवानी मठा= कुत्ते को जैसे वमन/उल्टी भी जीरे से छुँकी-छाछ के समान प्रिय है, सूकरु कैं भायैं ज्यों पुरीष पकवान है= सुअर को जैसे विष्टा भी पकवान के समान लगती है, बायसके भायैं जैंसें नींब की निंबोरी दाख= कौऐ को नीम की निबोली किशमिश जैसी लगती है, बालककैं भायैं दंतकथा ज्यौं पुरान है= बालक को कल्पित-कथायें भी पुराण जैसी लगतीं हैं, हिंसक के भायैं जैंसे हिंसा में धरम= हिंसा करनेवाले को जैसे हिंसा में धर्म लगता है, तैंस=े उसीप्रकार, मूरख के भायैं सुभबंध निरवान है= मूरख को शुभबंध/पुण्यकर्म ही निर्वाण/ मोक्षरूप लगता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जगत् में प्रचलित-उदाहरणों के माध्यम से ‘अधम/जघन्य-पुरुष’ के स्वभाव का वर्णन किया है। ‘अधम-जीव’ अर्थात् वे जीव जो देह में ही अनुरक्त हैं, संसार के दु:खों से पीड़ित हैं और इन दुःखों से छूटना भी चाहते हैं, पर सच्चे-सुख से अनभिज्ञ होने के कारण सुख/मुक्ति का कारण शुभ-भाव अर्थात् पूजा-पाठ, दया-दान व्रतादिक को ही मानते है। जैसे गरीब-पुरुष, जिसके पास धन के नाम पर कुछ भी न हो, तो उसे फूटी-कौड़ी भी धन के समान प्रिय होती है, क्योंकि वास्तविक-धन से तो उसका परिचय ही नहीं है। जैसे उल्लू के लिये शाम का धुधल ँ का भी सुबह के समान प्रिय होता है, क्योंकि वह दिन के उजाले से तो परिचित ही नहीं है। वह तो रात को ही दिन समझता है; क्योंकि उसे तो रात को ही दिखाई देता है। जैसे कुत्ता वमन/उल्टी को ही छाछ के समान प्रिय मानकर स्वाद लेकर चाँटता है। जैसे सुअर पकवान के वास्तविक-स्वरूप से तो अपरिचित है, उसने पकवान खाना तो दूर कभी देखे ही नहीं, इसीलिए उसके लिये विष्टा ही पकवान के समान प्रिय होती है। जैसे कौआ किशमिश की मिठास से परिचित नहीं है, सो नीम की निबोली को ही किशमिश के समान समझता है और उसी में आनंदित होता है। जैसे बच्चों ने कभी पुराण तो पढ़े नहीं, बस सुना है कि पुराणों में बहुत सुंदर-कथायें होती है, इसलिए गप्पा समान कल्पित किस्से-कहानियाँ भी उनको पुराण के समान ही प्रिय होती हैं अर्थात् वे उन्हें ही पुराण के समान समझते हैं। जैसे हिंसक-व्यक्ति भी धर्म के वास्तविक-स्वरूप से अपरिचित होने के कारण पशुबलि आदिरूप हिंसा करके उसमें ही धर्म मानता है। ठीक उसीप्रकार मूर्ख/अधम या जघन्य-पुरुष मुक्ति के सत्य-स्वरूप को तो जानता नहीं है; क्योंकि जो स्वयं को नहीं जानता, वह स्वानुभव से होनेवाली मुक्ति को कैसे जानेगा? वह तो शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है, सो शरीर से होने वाली शुभ-क्रियायें/पुण्यभावरूप पूजा-पाठ, दया-दान, व्रत-नियम आदि को ही ‘धर्म’ मानता है और उन्हीं को मोक्ष-प्राप्ति का साधन मानता है।

(सवैया इकतीसा)

कुंजर कौं देखि जैंसें रोस करि भूँसै स्वान, रोस करै निर्धन विलोकि धनवंत कौं।
रैन के जगैय्याकौं विलोकि चोर रोस करै, मिथ्यामति रोस करै सुनत सिद्धंतकौं।।
हंसकौं विलोकि जैसैं काग मन रोस करै, अभिमानी रोसकरै देखत महंतकौं।
सुकविकौं देखि ज्यौं कुकवि मन रोस करै, त्यौं ही दुरजन रोस करै देखि संतकौं।। 22।।

शब्दार्थ :- कुंजर कौं देखि जैंसें रोसकरि भूँसै स्वान= हाथी को देखकर जैंसे कुत्ता गुस्से में भौंकता है, रोस करै निर्धन विलोकि धनवंत कौं= जैसे निर्धन-व्यक्ति धनवान को देखकर ईर्ष्या करता है, रैन के जगैय्याकौं विलोकि चोर रोष करै= जैसे रात में जागनेवालों को देखकर चोर गुस्सा करता है, मिथ्यामति रोस करै सुनत सिद्धंतकौं= (वैसे ही) मिथ्यादृष्टि-जीव सिद्धांत/आत्महित के उपदेश को सुनकर चिढ़ता है, हंसकौं विलोकि जैसैं काग मन रोस करै= हंस को देखकर जैसे कौआ मन ही मन ईर्ष्या करता है, अभिमानी रोसकरै देखत महंतकौं= जैसे घमंडी-व्यक्ति महापुरुष को देखकर चिढ़ता है, सुकविकौं देखि ज्यौं कुकवि मन रोस करै= जैसे बुद्धिमान्-कवि को देखकर दुर्बुद्धि-कवि मन में क्रोध करता है, त्यौं ही दुरजन रोस करै देखि संतकौं= उसीप्रकार दुर्जन-व्यक्ति संत या सत्पुरुष को देखकर गुस्सा करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘अधमाधम’ यानि अतिजघन्य-जीवों के स्वभाव का वर्णन किया है। अधमाधम-पुरुष का व्यवहार ऐसा होता है, जैसे हाथी को देखकर कुत्ता गुस्से से भौंकता है, धनवान-व्यक्ति को देखकर धनहीन निर्बल-व्यक्ति दु:खी होता है, जैसे रात में जागनेवाले-पुरुषों को देखकर चोर को गुस्सा आता है, वैसे ही मिथ्यादृष्टि-जीव पहले तो शास्त्र सुनना ही नहीं चाहता, लेकिन यदि कभी किसी कारणवश सुनने को मिल जाये तो उसे क्रोध आता है, सुनानेवाले से बहस करता है, झगड़ा करता है, परन्तु तत्त्व की बात सुनने को तैयार नहीं होता, क्योंकि ‘विनाशकाले विपरीत-बुद्धि’ अर्थात् जिसकी होनहार ही खोटी है, उसे आत्मा की बात रुचिकर कैसे लग सकती है? तभी तो कहा गया है-

मिथ्यादृष्टि-जीव को, आतमहित न सुहाय।
कै ऊँघै कै लड़ मरै, कै उठि घर कों जाय।।

जैसे हंस के उजले-रंग व लोक में उसके सम्मान को देखकर कौआ मन ही मन बहुत दुःखी होता है। जैसे महापुरुषों को देखकर अभिमानी को गुस्सा आता है, क्योंकि उसके सामने उसका सारा दिखावा फीका पड़ जाता है। जैसे किसी सभा में बुद्धिमान्-कवि बैठा हो, तो उसको देखकर कुकवि/ बुद्धिहीनकवि अपनी हैसियत को जानकर दु:खी होता है। ठीक उसीप्रकार संत या गुणीजनों को देखकर दुर्जनव्यक्ति गुस्सा करता है, क्योंकि उसे उनकी बात रुचिकर नहीं लगती है। कहने का अभिप्राय यही है कि मूढमति अधमाधम-जीव को न केवल आत्महित, बल्कि कोई शिक्षाप्रद-बात भी अच्छी नहीं लगती। वे इस अमूल्य मनुष्य-भव को रत्नों से काग उड़ाने की तरह बर्बाद करते हैं, अर्थात् रत्नसमान बहुमूल्य इस मनुष्य-पर्याय को पाप, कषाय, व्यसन आदि में व्यर्थ गँवाते हैं, ऐसे जीव न केवल निंद्य-गति के पात्र होते हैं, वरन् उन्हें ये मनुष्य-पर्याय, उत्तमकुल पुन: मिलना अतिदुर्लभ होता है।

(सवैया इकतीसा)

सरलकौं सठ कहैं वकताकौं धीठ कहैं, विनै करै तासों कहै धनकौ अधीन है।
छमी कौ निबल कहै दमी कौ अदत्ति कहै, मधुर-वचन बोले तासौं कहे दीन है।।
धरमीकौं दंभी निसप्रेहीकौं गुमानी कहै, तिसना घटावै तासौं कहै भागहीन है।
जहाँ साधुगनु देखै तिन्हकौं लगावै दोष, ऐसौ कछु दुर्जन कौ हिरदौ मलीन है।। 23।।

शब्दार्थ :- सरलकौं सठ कहैं= सरल व्यक्ति को ‘मूर्ख’ कहता है, वकता कौं धीठ कहैं= वक्ता/बोलनेवाले को ‘बेशर्म’ कहता है, विनै करै तासों कहै= (जो) विनय करता है उससे कहता है, धनकौ अधीन है= धन का गुलाम है, छमी कौ निबल कहै= क्षमावान् को कमजोर कहता है, दमी कौं अदत्ति कहै= संयमी को कंजूस कहता है, मधुर-वचन बोले तासौं कहै दीन है= जो मधुर-वचन बोलता है, उसे दीन/दरिद्री कहता है, धरमी कौ दंभी= धर्मात्मा को अभिमानी, निसप्रेहीकौं गुमानी कहै= निःस्पृही/लोभरहित को घमंडी कहता है, तिसना घटावै तासौं कहै भागहीन है= जो आसक्ति घटाये, उसको भाग्यहीन कहता है, जहाँ साधुगुन देखै, तिन्हकौं लगावै दोष= जहाँ साधुओं को देखता है उन्हें दोष लगाता है, ऐसौ कछु दुर्जन कौ हिरदौ मलीन है= इसप्रकार कुछ दुर्जनव्यक्तियों का हृदय मलिन रहता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पुन: अधमाधम-जीवों की मनोदशा का सटीक-वर्णन किया है। ऐसे जीव न केवल सत्य से दूर रहते हैं; बल्कि सत्य को लांछित भी करते हैं, दुष्टता की पराकाष्ठा का परिचय देते हैं। आगम में छल-कपट से रहित, स्वभाव की सरलता को ‘धर्म’ कहा गया है; जबकि जो जीव सरल-स्वभावी होते हैं, उन्हें ‘अधमाधम-जीव’ ‘शठ’ या ‘मूर्ख’ कहता है। वक्ता अर्थात् सत्य बोलनेवाले को ‘धीठ’ या वाचाल/बेशर्म कहता है। ‘विनयवान्’ को ‘स्वार्थी’ कहता है, अर्थात् इस व्यक्ति को धन का लालच होगा, इसलिए ये पूज्य या महापुरुषों की विनय कर रहा है। ‘क्षमा-स्वभावी’ को आगम जहाँ धर्म कहता है, वहीं ‘अधमाधम-पुरुष’ उसे’ निर्बल’ या कमजोर कहता है। ‘दमी’ यानि इन्द्रियों का दमन/वश में करनेवाले ‘त्यागी-संयमी-पुरुष’ को ‘कंजूस’ कहता है, अर्थात् ‘‘इसके घर में खाने को नहीं होगा, या ये खाने पर खर्च नहीं करना चाहता इसलिए इसने त्याग किया है’’- ऐसा आरोप लगाता है। मीठे-वचन बोलना या ‘हित-मित-प्रिय’ वचन बोलने को आगम में ‘धर्म’ कहा गया है, वहाँ ‘अधमाधम-पुरुष’ ऐसे वचन बोलने वाले को ‘गरीब’ या ‘चापलूसी करनेवाला’ कहता है। पूजा-पाठ, दया-दान आदि शुभभाव करनेवाले ‘धर्मात्मा-जीवों’ को ‘दुरभिमानी’, ‘भेषधारी’ कहता है। ‘निःस्पृही-वृत्ति’, इच्छारहित ‘सादा-जीवन उच्च-विचार’ रखनेवाले जीवों को ‘घमंडी’ कहता है।’ तृष्णा को घटानेवाले’, परिग्रह को मर्यादित करनेवाले जीवों को ‘भाग्यहीन’ या ‘पुण्यहीन’ कहता है, ‘‘धन-वैभव आदि तो इसके भाग्य में ही नहीं है’’- ऐसा कहता है। जहाँ दिगम्बर, गुणी और सच्चे-साधु देखता है, वहाँ उनसे गुण-ग्रहण करने के बजाय उनमें दोष लगाता है; उनकी’ निर्दोष-चर्या’ को दोष लगाकर कलंकित करता है- इसप्रकार से दुर्जन का हृदय प्रतिसमय मलिन ही रहता है, कहने का तात्पर्य है कि जगत् में जितनी अच्छे संयोग और वस्तुयें हैं, उनको कलंकित करना ही ‘अधमाधम-जीवों’ का स्वभाव और प्रवृत्ति होती है।

(चौपाई)

मैं करता मैं कीन्ही कैसी, अब यौं करौ कहौ जो ऐसी।
ए विपरीतभाव है जामैं, सो बरतै मिथ्यात-दसामैं।। 24।।

शब्दार्थ :- मैं करता मैं कीन्ही कैसी= मैं कर्त्ता हूँ, यह मेरा कर्म है, अब यौं करौ कहौ जो ऐसी= अब ऐसे करो, ऐसा जो कहता है, ए विपरीतभाव है जामैं= ये उल्टी-मान्यता/भाव जिसमें हैं, सो बरतै मिथ्यात-दसामैं= वह जीव मिथ्यात्व की दशा में विद्यमान है। विशेषार्थ :- इस छंदों में कवि ने मिथ्यादृष्टि-जीव की मन:स्थिति का वर्णन किया है। इस संसार में नानाप्रकार के जीव हैं, उनमें से अधिकांश जीव ऐसा कहते हैं कि ‘मैं जगत् के कार्यों का कर्त्ता हूँ। यदि मैं न करूँ, तो ये कार्य होंगे ही नहीं, मेरे बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता’- इत्यादि अनेकप्रकार के विकल्प करते हैं, अर्थात् पर में कर्तृत्वबुद्धि का और अहंबुद्धि का भरपूर जोर चलाते हैं, और बहुत खुश होते हैं। ‘यह मैंने ऐसा कर दिया, अब क्या होगा’ अर्थात् यदि अपने मन के मुताबिक कार्य न हो, तो ‘‘ये मैंने क्या कर दिया?’’ कहकर बहुत पछताते हैं, दुःखी होते हैं। और उस कार्य को अपने अनुकूल करने के लिये हरसंभव और असंभव-प्रयास करते हैं और आकुलित होते हैं। ‘‘तुम ऐसा करो, तुम वैसा करो, तुम वही करो, जैसा मैंने कहा है’’- अर्थात् हर व्यक्ति और पदार्थ को अपने हिसाब से परिणमाना चाहते हैं, और जो उसके अनुरूप-परिणमन करते हैं, उनसे राग, और जो प्रतिकूल-परिणमन करते हैं, उनसे द्वेष करते हैं, और आकुलित होते हैं। कविवर कहते हैं कि ये सब भाव विपरीतभाव हैं, क्योंकि ‘तूँ तो चेतन-आत्मा है और तेरा कार्य तो जानना-देखना है; ये सारा परिणमन तो जड़ का है और जड़ में ही हो रहा है; तू तो इस परिणमन का मात्र मिथ्यादृष्टेः स एवास्य बन्धहेतुर्विपर्ययात्। य एवाध्यवसायोऽयमज्ञानात्माऽस्य दृश्यते ।। 8।। ज्ञाता-दृष्टा है’- ऐसा मानना सम्यक्-श्रद्धान है, लेकिन ‘तू तो उसे जड़ का नहीं, बल्कि अपना परिणमन मानकर सुखी-दु:खी होता है’- यही उल्टी-मान्यता तो मिथ्यात्व है। अतत्त्व-श्रद्धान या विपरीत-श्रद्धान को ही ‘मिथ्यात्व’ या ‘मिथ्यादर्शन’ कहते हैं।

(दोहा)

अहंबुद्धि मिथ्यातदसा, धरै सो मिथ्यावंत।
विकल भयौ संसार में, करै विलाप अनंत।। 25।।

शब्दार्थ :- अहंबुद्धि मिथ्यातदसा= परपदार्थों में अहंबुद्धिरूप मिथ्यात्व-दशा, धरै सो मिथ्यावंत= जो धारण करता है, वह मिथ्यादृष्टि है, विकल भयौ संसार में= (वह) संसार में व्याकुल होता है, करै विलाप अनंत= और अत्यधिक-दु:खी होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में मिथ्यात्व का फलवर्णित करते हुए कविवर कहते हैं परपदार्थों में अहंबुद्धि अर्थात् अहंकार, ममकार, कतर्ृत्वपना, भोक्तृत्वपने का जो भाव है वही मिथ्यात्व है। और जो इसे धारण करता है वह जीव मिथ्यादृष्टि है। ऐसा जीव-संसार में अनंत प्रकार से रुदन करता हुआ व्याकुल होता है और चार गति चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करता हुआ दु:खी होता है।

(सवैया इकतीसा)

रवि के उदोत-अस्त होत दिन-दिन प्रति, अंजुलिकै पीवन ज्यों जीवन घटतु है।
कालकै ग्रसत छिन-छिन होत छीन-तन, आरे के चलत मानौ काठ-सौ कटतु है।।
एते पर मूरख न खोजै परमारथ कौ, स्वारथकै हेतु भ्रम-भारत ठटतु है।
लगौ फिरै लोगनिसौं, पग्यौ परै जोगनिसौं, विषैरस-भोगनिसौं नेकु न हटतु है।। 26।।

शब्दार्थ :- रवि के उदोत-अस्त होत दिन-दिन प्रति= सूर्य के उदित होने और छिपने से प्रतिदिन, अंजुलिकै पीवन ज्यों जीवन घटतु है= अंजुलि के पानी के जैसे जीवन घटता है, कालकै ग्रसत छिन-छिन होत छीन तन= मृत्यु के सन्मुख होने पर क्षण-क्षण शरीर क्षीण होता है, आरे के चलत मानौ काठ-सौ कटतु है= आरे/ आरी के चलने से मानों लकड़ी की तरह कटता है, एते पर मूरख न खोजै परमारथ कौ= इतने पर भी मिथ्यादृष्टि परमार्थ/मोक्षमार्ग को नहीं खोजता, स्वारथकै हेतु भ्रम-भारत ठटतु है= स्वार्थ के कारण भ्रमरूपी-भार को उठाता है, लगौ फिरै लोगनिसौं, पग्यौ परै जोगनिसौं= लोगों से प्रीति करता है, मन-वचन-काय तीनों-योगों में लीन है, विषैरस-भौगनिसौं नेकु न हटतु है= पंचेन्द्रिय के विषयों-भोगों के रस से जरा भी विरक्त नहीं होता। विशेषार्थ :- इस-छंद में कविवर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ये बहुमूल्य मनुष्य-आयु पल- पल बीती जा रही है; फिर भी ये जीव नहीं चेतता है, सब कुछ जानते हुए भी पंचेन्द्रिय के विषयों में तल्लीन है, जरा भी विचार नहीं करता है। जैसे प्रतिदिन सूर्य का उदित होना, फिर देखते-देखते अस्त हो जाना; कब दिन पूरा हो जाता है पता ही नहीं चलता। इसीप्रकार दिन, महीने और साल, इस बीच कब आयु पूरी हो जाती है? हम सोच भी नहीं पाते। भाई! ये आयु के क्षण अंजुलि में जल की तरह है, जैसे कितना भी हाथों को भींचकर अंजुलि बनाई जाये, फिर भी पानी बूँद-बूँद करके कब निकल जाता है? पता ही नहीं चलता, अर्थात् जैसे हम अंजुलि

के जल को नहीं रोक सकते, वैसे ही आयु के क्षणों को भी हम एकसमय के लिये भी रोक नहीं सकते।
अनेनाध्यवसायेन निष्फलेन विमोहितः। तत्किञ््चनापि नैवास्ति नात्मात्मानं करोति यत् ।। 9।।

हम अज्ञानी-प्राणी मोहवश इस शरीर की कितनी फिक्र करते हैं, इसको स्वस्थ और सुंदर बने रहने के लिए क्या-क्या यत्न करते हैं, परन्तु ज्यों-ज्यों जरा/बुढ़ापा के नजदीक आते हैं, त्यों-त्यों ये नश्वरकाया स्वयं ही क्षीण होने लगती है। और ये सब हम प्रतिदिन प्रत्यक्ष देखते हैं, आश्चर्य है हम फिर भी नहीं चेतते। जैसे आरा-मशीन के चलने पर उसके सामने कितनी भी मोटी लकड़ी क्यों न हो? कट ही जाती है; उसीप्रकार आयु भले ही अधिक मिले, पर यदि समय पर न चेते, तो कब बीत जायेगी पता नहीं चलेगा। कविवर कहते हैं कि इतने पर भी ये मूढ़, अज्ञानी-जीव परमार्थ यानि मोक्षमार्ग को नहीं खोजता है। मोक्षमार्ग तो दूर, आत्महित की बात सुनने के लिये भी इसके पास समय नहीं है। प्रतिसमय स्वार्थ के सगे-संबंधी और कुटुम्बीजनों के क्षणिक-सुख के लिए भ्रमरूपी-भार (यानि मैं इनको सुखी कर सकता हूँ) को ढोता रहता है। पर-संयोगों और पर-वस्तुओं से कभी राग तो कभी द्वेष करता है। मन, वचन और कायारूप तीनों योगों की प्रवृत्ति में तल्लीन है, कष्ट पाकर भी उसमें आनंदित होता है। सुख की चाहत में क्षणभर के लिये भी पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों को नहीं छोड़ता है अर्थात् कभी तो स्वयं विषयों को पकड़ता है और कभी विषयों का आकर्षण इसे अपनी ओर खींचता है, और इसी खींचातानी में कब आयु पूरी हो जाती है? पता नहीं चलता। इन्हीं भावों को व्यक्त करती हुई एक भजन की कुछ पंक्तियाँ-

''चेतो चेतन निज में आओ, अंतरात्मा बुला रही है।
मोह-राग अरु द्वेष को छोड़ो, निज-स्वभाव से नाता जोड़ो।।
‘ब्रह्मानंद’ जल्दी तुम चेतो, मृत्यु पंखा डुला रही है।

चेतो चेतन निज में आओ, अंतरात्मा बुला रही है।।‘’

(सवैया इकतीसा)

जैंसे मृग-मत्त वृषभादित्य की तपन-माँहि, तृषावंत मृषाजल-कारन अटतु है।
तैंसैं भववासी मायाहीसौं हित मानि-मानि, ठानि-ठानि भ्रम श्रम-नाटक नटतु है।।
आगेकौं धुकत धाइ, पीछे बकरा चवाइ, जैंसैं नैनहीन-नर जेवरी बटतु है।
तैंसैं मूढ़-चेतन सुकृत-करतूति करै, रोवत-हसत फल-खोवतु खटतु है।। 27।।

शब्दार्थ :- जैंसे मृग-मत्त वृषभादित्य की तपन माँहि= जैसे हिरन उन्मत्त होकर दोपहरी के प्रचंड सूर्य की ताप में, तृषावंत मृषाजल कारन अटतु है= प्यास से आकुलित मिथ्या/झूठे जल के कारण भटकता है, तैंसैं भववासी मायाही सौं हित मानि मानि= उसीप्रकार संसार में रहने/रमनेवाला छल-कपटरूप माया से ही बारम्बार भला मानकर, ठानि-ठानि भ्रम श्रम-नाटक नटतु है= जगह-जगह भ्रमजनित-पुरुषार्थ करने का दिखावा करता हैं, आगे कौं धुकत धाइ पीछे बकरा चवाइ= आगे-आगे बनाता जाता है, पीछे बकरा चबाता जाता है, जैंसैं नैनहीन-नर जेवरी बटतु है= जैसे अंधा व्यक्ति रस्सी बटता/भाँजता जाता है, तैंसैं मूढ़-चेतन सुकृत करतूति करै= उसीप्रकार अज्ञानी-जीव स्थूल-पुण्यरूप कार्य करता है, रोवत-हसत फल-खोवत खटतु है= रोने और हँसनेरूप फल को भोगता हुआ (नरभव को) खोता रहता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने अज्ञानी-जीव की मूढ़ता को एक सटीक-उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया है। दोपहर के समय जब सूरज अासमान पर चढता है, तब उसकी चमक से रेत दूर से देखने पर पानी की तरह चमकती है। ये तो सहज वस्तु-स्थिति है, लेकिन बहुत तेज-प्यास से आकुलित-हिरण उसे सच में पानी समझकर उसके पीछे दौड़ लगाता है; लेकिन जब वह उसके नजदीक पहुँचता है, तब वही चमक आगे दिखने लगती है, फिर आगे की ओर दौड़ता है, लेकिन पानी नहीं मिलता और तड़प-तड़पकर जान दे देता है। ठीक वही स्थिति संसार में रमनेवाले इस मूढ़-चेतन की है, जो सुख की खोज में पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों के प्रति इतना आसक्त है कि दिन-रात प्यासे हिरण की तरह दौड़ लगाता है, सुख न मिलने पर विषयों को बदलता रहता है और इसी दौड़-धूप में न तो अपनी खबर लेता है, और न पंच-परमेष्ठी की विनय करता है; इस बीच कब आयु पूरी हो जाती है, इसे पता नहीं चलता। संसारी जीव देह और देह से जुड़े संयोगों में और छल-कपटरूप मायाचारी से ही अपना हित मानता है, सो पूरे जीवन इन्हीं की सेवा में लगा रहता है। जैसे रंगमंच पर नाटक के पात्र वेष बदलबदलकर अपने अभिनय से जनता को आकर्षित करते हैं, ठीक उसीप्रकार ये जीव संसाररूपी रंगमंच पर चार-गति चौरासी-लाख योनियों में प्राप्त-पर्याय को ही अपना रूप मानकर वैसे ही क्रियाकलाप करता हुआ परिभ्रमण पूरा करता है। अज्ञानी-जीव का सारा परिश्रम किसप्रकार व्यर्थ होता है?- इसका वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि जैसे कोई नेत्रहीन-पुरुष रस्सी को बँटता है या भाँजता है, तो दिखाई न देने से जैसे-जैसे वह आगे की ओर बटता जाता है पीछे बकरा चबाता जाता है, इसप्रकार उसका सारा परिश्रम बेकार चला जाता है, और रस्सी नहीं बन पाती है, ठीक उसीप्रकार अज्ञानी-जीव ज्ञानरूपी नेत्रों से स्वयं को न देखते हुये जितने भी सुकृत अथवा शुभभाव करता है, वे सब व्यर्थ होते हैं। इसप्रकार उसका सारा जीवन व्यर्थ परिश्रम, हर्ष और विषादरूपी फलों को भोगने में ही बीत जाता है।

(सवैया इकतीसा)

लियैं द्रिढ़-पेंच फिरै लोटन-कबूतरसौ, उलटौ अनादिकौ न कहूँ सुलटतु है।
जाकौ फल दुःख ताहि सातासौं कहत सुख, सहत-लपेटी असिधारा-सी चटतु है।।
ऐसे मूढ़जन निज-संपदा न लखै क्यौंही, यौंहिं मेरी-मेरी निसि-वासर रटतु है।
याही ममतासौं परमारथ विनसि जाइ, कांजीकौ परस पाइ दूध ज्यौं फटतु है।। 28।।

शब्दार्थ :- लियैं द्रिढ़-पेंच फिरै लोटन-कबूतरसौ= लोटन-कबूतर की तरह मजबूत पेंच लिये फिरता है, उलटौ अनादिकौ न कहूं सुलटतु है= अनादि से उल्टा ही है, कभी सुलटता ही नहीं है, जाकौ फल दु:ख ताहि सातासौं कहत सुख= जिसका फल दुःख है, उस साता को सुखरूप मानता है, सहत-लपेटी असिधारासी चटतु है= मानो वह शहद में लिपटी हुई तलवार की धार को चाटता है, ऐसे मूढ़जन निज-संपदा न लखै क्यौंही= ऐसे मूर्ख-व्यक्ति अपनी संपत्ति को कभी नहीं देखते, यौंहिं मेरी-मेरी निसिवासर रटतु है= दिन-रात ‘ये मेरी-ये मेरी’ रटता है, याही ममतासौं परमारथ विनसि जाइ= इसी ममत्व से मोक्षमार्ग नष्ट हो जाता है, कांजीकौ परस पाइ दूध ज्यौं फटतु है= जैसे काँजी के खट्टेपन का स्पर्श पाकर दूध फट जाता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने अज्ञानी-जीव सच्चे देव, शास्त्र, गुरु का संयोग पाकर भी आज तक क्यों नहीं सुलटा?- इस तथ्य को सटीक-उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया है। पतंगबाजी में पतंग उड़ाने के लिये जिस धागे का प्रयोग किया जाता है, उसे ‘पेंच’ या ‘मंजा’ कहते हैं। पतंग उड़ाते वक्त यदि उस मंजे में कबूतर फँस जाये, तो वह जितना उससे निकलने की कोशिश करता है, उतना ही उसमें उलझता जाता है; पर उसके बंधन से मुक्त नहीं हो पाता और मरण को प्राप्त हो जाता है। ठीक उसीप्रकार अनादिकाल से मिथ्यादृष्टि जीव कर्म-बंधन के मजबूत-पेंच में उलझा हुआ है; सम्यक्-मार्ग का अनुसरण न करने से जितना उस कर्म-बंधन के पेंच से निकलने की कोशिश करता है, उतना ही अधिक उलझता जाता है, और कब मरण को प्राप्त हो जाता है? पता नहीं चलता। जिन पंचेन्द्रिय के विषयों के सेवन का फल दुःख है, उनसे क्षणभर के लिये मिलनेवाली साता को सच्चा-सुख मानता है। जबकि वह सुख तो है ही नहीं, और साता भी ऐसी है, जैसे कोई शहद से लिपटी हुई तलवार को चाटता है, अर्थात् जैसे शहद लिपटी हुई तलवार को कोई मुँह से चाटे, तो पहले तो शहद का स्वाद आने से उसे मिठास का वेदन होता है; परन्तु वह पूरी तरह से उस मिठास का स्वाद ले, उससे पहले ही जीभ के दो टुकड़े हो जाते हैं, और घोर कष्ट होता है। ठीक उसीप्रकार जिन पंचेन्द्रिय के विषयों के प्रति जीव आकृष्ट होता है, उनका भोग करके अानंदित होना चाहता है; परन्तु पूरा आनंद लेने से पहले ही दुःख का वेदन होने लगता है। अभिप्राय यह है कि किसी भी विषय के सेवन से यदि सच में सुख मिल रहा है, तो लगातार उसी विषय को सेवन करते रहना चाहिए; परन्तु सेवन करने के बाद अल्प-समय में ही वह विषय अरुचिकर लगने लगता है, फिर हम नये विषय का सेवन करते हैं, फिर वही अरुचि होती है। और अंत में इस विषय सेवन का फल नरक-निगोदादि के रूप में प्राप्त होने से तलवार से जीभ कटने जैसा महादुःखदायी है। इसप्रकार मूढ़/अज्ञानी-जीव अपने अनंत आत्मिक-गुणों की अक्षुण्ण-संपत्ति को तो देखता नहीं, और पर-पदार्थों और संयोगों के लिए रात-दिन मेरी-मेरी की रट लगाये रहता है। इस ममत्वपने से मोक्षमार्ग ठीक उसीप्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे कांजी के स्पर्श से दूध फट जाता है, अर्थात् जिसप्रकार कांजी की खटास की एक बूदँ के स्पर्श से दूध तुरतं फट जाता है, ठीक उसीप्रकार पर-पदार्थों के प्रति रंचमात्र ममत्व भी मोक्षमार्ग को नष्ट कर देता है, अर्थात् मोह का किंचित्-परिणाम भी जीव के लिये मुक्ति में बाधक है।

(सवैया इकतीसा)

रूप की न झाँक हीयैं करमकौ डांक पियै, ग्यान दबि रह्यौ मिरगांक जैसैं घन में।
लोचन की ढांकसौ न मानै सदगुरू हांक, डोलै मूढ़ रांकसौ निसांक तिहूं पन मैं।।

टांक एक मांस की डली-सी तामैं तीन फाँक, तीनकौसौ आंक लिखि राख्यौ काहू तन में, तासौं कहै नांक ताके राखिवैकौ करै कांक, लांकसौं खड़ग बांधि बांक धरै मनमैं।। 29।। शब्दार्थ :- रूप की न झाँक हीयैं करमकौ डांक पियै= रूप की तो खबर नहीं है, कर्म का ढक्कन लगा है, ग्यान दबि रह्यौ मिरगांक जैसैं घन में= ज्ञान दब/छिप रहा है, जैसे चंद्रमा बादलों में, लोचन की ढांकसौ न मानै सद्गुरु-हांक= ज्ञान-नेत्र ढँके होने से सद्गुरु की सीख भी नहीं मानता, डोलै मूढ़ रांकसौ निसांक तिहूं पन में= अज्ञानी-जीव तीनों-काल दरिद्र की तरह निःशंक होकर डोलता रहता है, एक टांक मांस की डली-सी तामैं तीन फाँक= एक छटाँकभर की माँस की डली उसके तीन खंड हैं, तीन-कौसौ आंक लिखि राख्यौ काहू तन में= जैसे किसी ने तीन का अंक लिख दिया हो, तासौं कहै नांक= उसे ये नाक कहता है, ताके राखिवैकौ करै कांक= उसे रखने के लिए झगड़ा करता है, लांकसौं खडग बांधि बांक धरै मनमैं= कमर से तलवार बाँधकर मन में वक्रता धारण करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने अज्ञानी-जीव की अहंकारपूर्ण-मनोवृत्ति का उदाहरण के माध्यम से मार्मिक-वर्णन किया है। अनादिकाल से जीव के ऊपर कर्म का ढक्कन लगा हुआ है अर्थात् जीव और कर्म का अनादि से संयोग है, जैसे किसी पतीले में कोई वस्तु रखकर उसे ढक्कन से ढँक दें, तो हमें उसके अंदर रखी हुई वस्तु दिखाई नहीं देती है; ठीक उसीप्रकार अनादि से जीव के ऊपर आठ-कर्मों का ढक्कन लगा होने से इसे अपना वास्तविक-रूप दिखाई नहीं देता, अर्थात् अनंत-गुणों का स्वामी होने पर भी उनका वेदन इसे नहीं होता। जैसे बादलों के आ जाने से चंद्रमा छिप जाता है अर्थात् दिखाई नहीं देता, ठीक उसीप्रकार अनंतज्ञानरूपी-चंद्रमा ज्ञानावरणी-कर्मरूपी बादलों के बीच छिपा होने से प्रकटरूप में प्रवर्तन नहीं करता। यही कारण है कि ज्ञान-दर्शनरूपी नेत्र बंद होने से सदगुरु की सीख भी नहीं मानता अर्थात् सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का समागम मिलने पर भी, तनिक भी विचार नहीं करता, आचरण में नहीं लाता। और रंक की तरह निःशंक होकर डोलता रहता है अर्थात् जैसे गरीब-व्यक्ति के पास पूँजी के नाम पर फूटी-कौड़ी भी नहीं होती, सो उसे कुछ खोने का डर भी नहीं होता; इसलिए निःशंक होकर डोलता रहता है, ठीक उसीप्रकार अज्ञानी मिथ्यादृष्टि-जीव को भी किसी दुर्दशा का भय न होने से निःशंक होकर कर्मोदय-जनित सामग्री को भोगने में मगन रहता है। कविवर आगे कहते हैं कि इस देह में छटाँकभर की (बहुत छोटी-सी) एक माँस की डली लगी है, जिसके तीन भाग हैं। देखने में एेसा लगता है कि जैसे किसी ने तीन का अंक ही लिख रखा हो, जिसे हम ‘नाक’ (घ्राणेन्द्रिय) कहते हैं। यहाँ कवि ने इस ‘नाक’ को ‘मान-सम्मान’ के रूप में प्रयुक्त किया है। अक्सर हम अपनी झूठी-शान रखने के लिये अन्याय-अनीति और अनाचाररूप वे सब कार्य भी करते हैं, जो हमें नहीं करना चाहिए। जिसके लिये हम अक्सर कहते हैं, ‘‘क्या करें नाक का सवाल है।’’ यहाँ तक कि हम अपनी ‘नाक या इज्जत’ बचाने के लिये झगड़ा करते हैं अर्थात् सच-झूठ की परवाह किये बिना शब्द-अपशब्द कुछ भी बोलते हैं, कमर से तलवार बाँधते हैं अर्थात् अकड़ते भी हैं और लड़ने-मरने को भी तैयार रहते हैं। मन में वक्रता रखते हैं अर्थात् मन-वचन और काया तीनों का विपरीत-परिणमन इतनी सहजता से चलता है कि सत्य की ओर तो दृष्टि भी नहीं जाती। और ये सब विपरीतता किसके लिए? - इस नाक के लिये, जो इस जड़-देह का अंग है, और देखा जाये, तो उसका प्रवर्तन भी जड़ में ही है, और मैं व्यर्थ में ही मेरी इज्जत, मेरा मान, मेरा अपमान, मानकर पाप की गठरी तैयार कर रहा हूँ।

(सवैया इकतीसा)

जैसें कोउ कूकर-छुदित सूके-हाड़ चाबै, हाड़नि की कोर चहुँओर चुभैं मुखमैं।
गाल-तालु-रसना-मसूढ़नि कौ मांस फाटै, चाटै निज-रुधिर मगन स्वाद-मुख मैं।।
तैंसें मूढ़ विषयी-पुरुष रति-रीति ठानै, तामैं चित्त-सानै हित मानै खेद-दुखमैं।
देखै परतच्छ बल-हानि मल-मूत खानि, गहै न गिलानि पगि रहै राग-रुखमैं।। 30।।

बंध द्वार (८) | भाग २/२

शब्दार्थ :- जैसें कोउ कूकर-छुदित सूके-हाड़ चाबै= जैसे कोई भूखा-कुत्ता सूखी-हड्डियों को चबाता है, हाड़नि की कोर चहुँओर चुभैं मुखमैं= हड्डियों की नोंकें (नुकीले भाग) चारों ओर मुँह में चुभती हैं, गाल-तालु रसना-मसूढ़नि कौ मांस फाटै= गाल, तालू, जीभ, मसूड़ों का माँस फट जाता है, चाटै निज-रुधिर मगन स्वाद मुख मैं= मुख में निकलते हुए अपने ही खून को स्वादमग्न होकर चाटता है, तैंसें मूढ़ विषयी-पुरुष रति-रीति ठानै= वैसे ही विषयों में अनुरक्त-पुरुष भोगों में अासक्त होता है, तामैं चित्त-सानै हित मानै खेद-दुखमैं= उसी में मन/उपयोग को लगाता है, उसी खेद और दुःख में हित मानता है, देखै परतच्छ बल-हानि= ताकत को क्षीण होते हुए प्रत्यक्ष देखता है, मल-मूत खानि= मल-मूत्र की खान है, गहै न गिलानि पगि रहै राग-रुखमैं= ऐसा जानते हुये भी इसे घृणा भी नहीं आती और रागभाव में मग्न रहता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने हम अज्ञानी-जीवों की वास्तविक-स्थिति का बहुत ही मार्मिक-वर्णन किया है। सब कुछ जानते, सुनते, सुनाते हुए भी हमारी विषयासक्ति एक पल के लिये भी छूटना तो दूर कम भी नहीं होती। क्या सच में हमारी स्थिति उस कुत्ते के समान नहीं है? कुत्ता एक मांसाहारी-पशु है, इसलिये रुधिर-मांस आदि उसका सहज भोजन है। अत: जैसे भूख से आकुलित किसी कुत्ते को कोई सूखी-हड्डी मिल जाये, तो वह उसको चबाने लगता है; लेकिन हड्डी के किनारे सख्त व नुकीले होने से उसका पूरा मुहँ , तालू, जीभ आदि सब छिल जाते हैं, उनसे खून बहने लगता है, उसी खून का स्वाद जब कुत्ते को आता है, तो वह समझता है कि ये खून का स्वाद उस हड्डी के टुकड़े में से आ रहा है, सो वह बहुत आनंदित होता है। उसके स्वाद में इतना मगन हो जाता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि ये खून का स्वाद हड्डी में से नहीं, स्वयं उसके मुख से निकलनेवाले खून से आ रहा है। ठीक वही स्थिति हम अज्ञानी-जीवों की है, जो ऐसा मानते हैं कि सुख का स्वाद इन पंचेन्द्रिय के विषयों में से आ रहा है, सो उनको भोगने में इतने मगन हो जाते हैं कि हम ये भी भूल जाते हैं कि सुख तो मेरा स्वभाव है, इन जड़-विषयों का नहीं, तो इनमें से सुख आयेगा कैसे? कैसी बिडम्बना है कि भोग के काल में भी जीव अपने ज्ञान का ही वेदन करता है, पर मानता यही है कि ये स्वाद इन विषयों में से आ रहा है, इसलिये उनके भोगने में ही सारा पुरुषार्थ, बुद्धि, समय और ये अमूल्य मनुष्य-भव व्यर्थ गँवा देता है। आगे की पंक्ति में कवि ने पंचेन्द्रिय के विषयों और स्त्री और पुरुष के रति-संबंधों की विवेचना की है। मोहासक्त-जीव निरन्तर इन विषयों के सेवन में ही अपने उपयोग को लगाता है, इन विषयों को जुटाने में भले ही कितना भी कष्ट क्यों न हो, पर फिर भी उसमें अपना हित ही मानता है। वासनापरककामासक्ति में इसे प्रत्यक्ष अपने बल की हानि होते हुये भी दिखाई देती है, परन्तु फिर भी उसमें आनंदित होता है। देहासक्ति की ये प्रवृत्ति साक्षात् मल-मूत्र की खान अर्थात् अत्यंत घिनावनी-प्रवृत्ति होने पर भी इसे घृणा नहीं आती, बल्कि आनंदित होता है, बुद्धिपूर्वक इन भोगों व देह के प्रति रागरूप प्रवर्तन करता है, एक क्षण के लिये भी विरक्ति का भाव नहीं आता। हे आत्मन्! ये कैसी प्रबलता है विषयासक्ति की।

(अडिल्ल)

सदा करमसौं भिन्न, सहज चेतन कह्यौ। मोह-विकलता मानि, मिथ्याती ह्वै रह्यौ।।
करै विकल्प-अनंत, अहंमति धारिकै। सो मुनि जो थिर होइ, ममत्त- निवारिकै।। 31।।

शब्दार्थ :- सदा करमसौं भिन्न सहज चेतन कह्यौ= चेतन आत्मा सहज ही समस्त कर्मों से भिन्न कहा गया है, मोह-विकलता मानि मिथ्याती ह्वै रह्यौ= मोहजनित-परिणामों के कारण मिथ्यात्वी हो रहा है, करै विकल्प अनंत अहंमति धारिकैं= अहंबुद्धि धारण करके अनंत-विकल्प करता है, सो मुनि जो थिर होइ ममत्त निवारिकै= जो ममत्वपना त्यागकर (स्वरूप में) स्थिर रहता है, वही (सच्चा) मुनि है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने वास्तव में आत्मा का स्वरूप कैसा है? और वर्तमान में कैसा प्रवर्तन कर रहा है? और साधक क्या करते हैं, जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है?- इन सब प्रश्नों का सटीकसमाधान किया है। सर्वप्रथम आत्मा कैसा है? आत्मा स्वभाव से त्रिकाल समस्त-कर्मों से रहित पूर्ण-शुद्ध-तत्त्व है, ‘चेतना’ का धनी होने से इसका ‘चेतन’ नाम सार्थक है। आत्मा पर कर्मों का आवरण ठीक वैसे ही है, जैसे

विश्वाद्वि विभक्तोऽपि हि यत्प्रभावादात्मानमात्मा विदधाति विश्वम्।
मोहैक-कन्दोऽध्यवसाय एष, नास्तीह येषां यतयस्त एव।। 10।।

चंदन के वृक्ष पर साँपों का लिपटना। चंदन के अंदर विद्यमान सुगंधि की तरह आत्मा में कर्मों का अस्तित्व नहीं है। इसीलिये कर्मों को आत्मा से जुदा किया जा सकता है, ठीक उसीप्रकार जैसे साँप को चंदन के वृक्ष से जुदा किया जा सकता है। लेकिन आत्मिक-गुण चंदन के सर्वांग में व्याप्त सुगंधि की तरह है, जो कभी आत्मा से अलग नहीं होते; ठीक उसीप्रकार जैसे चंदन की सुगंधि चंदन से कभी भी, किसी भी स्थिति में अलग नहीं होती। दूसरी बात, वर्तमान में आत्मा कैसा प्रवर्तन कर रहा है? आठ-कर्मो में से राजा के समान सबसे बलशाली मोहनीयकर्म, जिसके कारण परपदार्थों में अहंबुद्धि/ममत्वपना और इष्ट-अनिष्ट की कल्पना करते हुये यह जीव अनंत-विकल्प करता है और मोह-जनित इन विकल्पों के कारण मिथ्यात्वी या मिथ्यादृष्टि नाम पाता है। जो वस्तु इससे न केवल स्वभाव से भिन्न है, बल्कि पर्याय में भी सर्वथा-भिन्न है, उसको भी ये मूढ-जीव अपनी मानकर व्याकुल होता है, दुःखी होता है। जिन रागादि-विकारों से यह जीव आकुलित होता है, वे भी पर के लक्ष्य से उत्पन्न होने के कारण ‘पर’ ही हैं, परन्तु उन्हें भी यह जीव अपना ही मानता है- यह मोह की पराकाष्ठा ही तो है, जो इसे अपने स्वरूप की, अनंत-गुणों की प्रतीति और अनुभूति नहीं होने देती। तीसरा-पक्ष, साधक-जीव ऐसा क्या करते हैं, कि उनको अतिशीघ्र मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है? इस प्रश्न के समाधान में कवि ने नास्ति से कथन करते हुए कहा है कि जो जीव मोह का त्याग करते हैं अर्थात् स्वरूप में स्थिर होते हैं, वे ही सच्चे-मुनि या साधक या कहें मोक्षमार्ग के पथिक हैं; वे ही अतिशीघ्र अपने लक्ष्य अर्थात् संसार से मुक्ति को प्राप्त करते हैं। यही कथन जब हम ‘अस्ति’ से करते हैं, तो ज्ञात होता है कि साधक-जीव केवल स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ करते हैं, अर्थात् ‘‘मैं आत्मा हूँ, और मेरा स्वभाव जानना देखना है, तदनुरूप परिणमन करना ही स्वरूप में स्थिरता है।’’ जब साधक-जीव ऐसा करते हैं, तो उपयोग की आत्मस्वरूप में एकाग्रता होने से परपदार्थों के प्रति ममत्व का सहज-त्याग हो जाता है। और जैसे-जैसे ये स्थिरता बढ़ती जाती है, मोक्ष की प्राप्ति भी उतनी ही सहज और सुगम हो जाती है।

(सवैया इकतीसा)

असंख्यात-लोक-परवांन जे मिथ्यात-भाव, तेई विवहार-भाव केवली-उकत हैं।
जिन्हकौ मिथ्यात गयौ सम्यक्-दरस भयौ, ते नियत-लीन विवहारसौं मुकत है।।
निरविकलप निरुपाधि आतम-समाधि, साधि जे सुगुन मोख-पंथ कों ढुकत हैं।
तेई जीव परमदसा में थिररूप ह्वैंकैं, धरम में धुके न करमसौं रुकत हैं।। 32।।

शब्दार्थ :- असंख्यात-लोक-परवांन जे मिथ्यात-भाव= असंख्यात लोकप्रमाण जो मिथ्यात्व के परिणाम हैं, तेई विवहार-भाव केवली-उकत हैं= वे ही व्यवहारभाव हैं- ऐसा केवली के द्वारा कहा गया है, जिन्हकौ मिथ्यात गयौ सम्यकदरस भयौ= जिनका मिथ्यात्व चला गया है,(और) सम्यग्दर्शन हो गया है, ते नियत-लीन विवहारसौं मुकत है= वे निश्चय में लीन हैं, व्यवहार से मुक्त/छूटे हुए हैं, निरविकलप निरुपाधि आतमसमाधि= विकल्प-रहित, उपाधि-रहित, आत्मस्वरूप में स्थिरतारूप समाधि को, साधि जे सुगुन मोखपंथ कौं सर्वत्राध्यवसानमेवमखिलं त्याज्यं यदुक्तं जिनै-स्तन्मन्ये व्यवहार एव निखिलोऽप्यन्याश्रयस्त्याजितः। सम्यङ् निश्चयमेकमेव तदमी निष्कम्पमाक्रम्य किं, शुद्ध-ज्ञानघने महिम्नि न निजे बध्नन्ति सन्तो धृतिम्।। 11।। ढुकत हैं= साधकर जो जीव सम्यक् मोक्षमार्ग को ग्रहण करते हैं, तेई जीव परमदसा में थिररूप ह्वैंकैं= वे ही जीव श्रेष्ठदशा में स्थिर होकर, धरम में धुके न करमसौं रुकत हैं= धर्म को साधते हैं, कर्मों के रोके नहीं रुकते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मिथ्यात्व के प्रकार और मिथ्यात्व के नष्ट होने पर सम्यक्त्व के स्वरूप और फल का सुंदर-विवेचन किया है। अनादिकाल से जीव मिथ्यात्व के साथ ही जन्म लेता आया है। यद्यपि मिथ्यात्व तो अभेद है, परन्तु व्यवहार या भेद की दृष्टि से देखा जाये, तो इसके भेद असंख्यात-लोकप्रमाण हैं, और मिथ्यात्व के ये भेद केवली के द्वारा कथित हैं। जिन जीवों का ये मिथ्यात्व-भाव नष्ट हो जाता है, उनको सम्यग्दर्शन प्रकट होता है। अर्थात् जब देहादिक समस्त-परपदार्थों से ममत्वपना छूट जाता है, और आत्मस्वरूप की सच्ची- प्रतीति होती है, उसे ‘मिथ्यात्व का नष्ट होना और सम्यक्त्व का प्रकट होना’ कहते हैं। सम्यग्दर्शन की प्राप्ति अर्थात् मोक्षमार्ग का सच्चा-पथिक। ऐसे पथिक-जीव विकल्परहित अर्थात् पर-संबंधी समस्त विकल्पों का त्यागकर, मोह-राग-द्वेषादि समस्त औपाधिक-भावों का भी त्यागकर आत्म-समाधि करते हैं अर्थात् आत्मस्वरूप को साधते हैं या कहें स्वरूप की आराधना करते हैं, वे ही जीव सही-अर्थों में मोक्षमार्ग पर अग्रसर होते हैं। मोक्षमार्ग के ऐसे सम्यक्-पथिक जब स्वरूप की आराधना करतेे हुए ध्यान की उत्कृष्ट-दशा को प्राप्त होते हैं, अर्थात् पूर्णरूप से स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ करते हैं; तो वे अतिशीघ्र धर्म अर्थात् निर्वाण को प्राप्त करते हैं। और सिद्धों की समश्रेणी में विराजमान होते हैं, फिर कर्मों का तीव्र से तीव्रउदय भी उनको रोक नहीं पाता। कहने का अभिप्राय यही है कि जब साधक-जीव स्वरूप में स्थिरता का तीव्र-पुरुषार्थ करते हैं, तो कर्मोंदय की तीव्र-प्रबलता या कहें प्रतिकूलता भी उन्हें रोक नहीं पाती।

(कवित्त)

जे-जे मोह-कर्म की परनति, बंध-निदान कही तुम सब्ब।
संतत-भिन्न सुद्ध-चेतनसौं, तिन्हकौ मूल-हेतु कहु अब्ब।।
कै यह सहज जीवकौ कौतुक, कै निमित्त है पुद््गल-दब्ब।
सीस नवाइ शिष्य इम पूछत, कहै सुगुरु उत्तर सुन भब्ब।। 33।।

शब्दार्थ :- जे-जे मोह कर्म की परनति= जो-जो मोहकर्म की परिणति/भाव हैं, बंध निदान कही तुम सब्ब= उन सबकाे आपने कर्मबंध का कारण कहा, संतत-भिन्न सुद्ध-चेतनसौं= (वह तो) शुद्धात्मा से सदाकाल ही भिन्न हैं, तिन्हकौ मूल-हेतु कहु अब्ब= अब उनका अर्थात् बंध का मूल-कारण कहो, कै यह सहज जीवकौ कौतुक= क्या यह जीव का सहज खेल है, कै निमित्त है पुद््गल-दब्ब= या इसमें पुद््गल-द्रव्य निमित्त है, सीस नवाइ शिष्य इम पूछत= सिर झुकाकर शिष्य यह पूछता है, कहै सुगुरु उत्तर सुन भब्ब= गुरु जी कहते हैं, हे भव्य! तुम इसका उत्तर सुनो। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने शिष्य की शंका को वर्णित किया है। वास्तव में देखा जाये, तो ये शंका न केवल शिष्य की है, बल्कि हम सभी की है, जिसका समाधान कविवर आगामी-छंदों में करेगें। शिष्य ने बहुत ही सटीक-सा प्रश्न किया है कि ''अभी तक जितने भी मोहजनित-परिणाम थे, रागादयो बन्ध-निदानमुक्तास्ते शुद्ध-चिन्मात्रमहोऽतिरिक्ता:, आत्मा परो वा किमु तन्निमित्तमिति प्रणुÂन्नाः पुनरेवमाहुः।। 12।। उन सभी को आपने बंध का कारण कहा, और साथ में ये भी कहा कि ये सब परिणाम चेतन-आत्मा से सदाकाल भिन्न हैं; जड़ हैं, अचेतन हैं। अभिप्राय यह है कि एक चेतन और दूसरा अचेतन, यानि दो भिन्नद्रव्य, तो फिर ये आपस में बंधे कैसे? अर्थात् बंध का मूल-कारण क्या है? शिष्य कहता है ‘‘क्या यह जीव का आश्चर्य-चकित करनेवाला खेल है? या फिर इसमें पुद््गलद्रव्य निमित्त है या पुद््गल-द्रव्य की मिलीभगत है। वास्तव में सच क्या है? मैं विनयपूर्वक सिर झुकाकर आपसे अपनी इस शंका का समाधान चाहता हूँ।’’ तब गुरु जी ने कहा ‘‘यदि ऐसा है तो, हे भव्य! तुम सुनो।’’

(सवैया इकतीसा)

जैसे नाना-बरन पुरी बनाइ दीजै हेठ, उज्जल विमल मनि सूरज-करांति है।
उज्जलता भासै जब वस्तु कौ विचार कीजै, पुरी की झलकसौं वरन भाँति-भाँति है।।
तैंसे जीव-दरब कौं पुग्गल-निमित्तरूप, ताकी ममतासौं मोह-मदिरा की मांति है।
भेदग्यान-दृष्टिसौं सुभाव साधि लीजै तहाँ, साँची शुद्ध-चेतना अवाची सुख-सांति है।। 34।।

शब्दार्थ :- जैसे नाना-बरन पुरी बनाइ दीजै हेठ= जैसे विभिन्न-रंगों की पुड़िया/पुट/डांक/रंगीन-वस्तु बनायी जाये, उज्जल-मनि विमल सूरज-करांति है= उज्जवल-मणि, मल/गंदगी-रहित सूर्य की चमक के सामने, उज्जलता भासै जब वस्तु कौ विचार कीजै= जब वस्तु के मूलस्वरूप का विचार करते हैं, तो उज्ज्वलता दिखाई देती है, पुरी की झलकसौं वरन भाँति-भाँति है= (लेकिन) पुट/डांट के रंग की झलक से विभिन्न-रंगों रूप (दिखाई देती) है, तैंसे जीव दरब कौं पुग्गल-निमित्तरूप= वैसे ही जीवद्रव्य को पुद््गल निमित्तरूप है, ताकी ममतासौं मोह-मदिरा की मांति है= उसकी ममता से मोहरूपी शराब की उन्मत्तता है, भेदग्यान-दृष्टिसौं सुभाव साधि लीजै= भेदविज्ञान की दृष्टि से स्वभाव को ग्रहण करो, तहाँ साँची शुद्धचेतना अवाची सुखसांति है= वहाँ वचन से अगोचर सुख-शांतिमय सच्ची-शुद्धचेतना है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने शिष्य की शंका समाधान स्वरूप स्पष्ट किया है कि जीव की वास्तविक स्थिति क्या है, और जीव भ्रमित क्यों हैं ? इस तथ्य को बहुत ही सरल उदाहरण के माध्यम से सिद्ध किया है। स्फटिक-मणि रंग-रहित पारदर्शी, धवल, उज्जवल एक पत्थर होता है। जिसका अपना कोई रंग नहीं होता, लेकिन यदि उसके पीछे या नीचे किसी भी रंग की कोई वस्तु रखें, तो वह मणि स्वयं पूरी तरह रंगरहित होते हुये भी सर्वांग उसी रंग की दिखाई देने लगती है। यद्यपि उस समय भी वह मणि उज्जवल, धवल ही है, किसी भी रंग ने उसमें प्रवेश नहीं किया है, परन्तु फिर भी वह उसरूप दिखाई देती है। ठीक उसीप्रकार चेतन-पदार्थ-आत्मा स्वभाव से त्रिकाल पूर्ण-शुद्ध, ज्ञान-स्वभावी, और स्वपर-प्रकाशी है। लेकिन अनादिकाल से पुद्गल-द्रव्य के निमित्त से अर्थात् आठ-कर्मों, और नोकर्मोंरूप रंगीन-डाट का संयोग होने से मोहरूपी शराब की उन्मतत्ता दिखाई देती है, अर्थात् स्वरूप से पूर्ण-शुद्ध होते हुये भी आत्मा कर्मों के उन रंगों-रूप दिखाई देता है। जैसे रंगों ने कभी स्फटिक के अंदर प्रवेश नहीं किया, ठीक उसीप्रकार कर्मों ने भी आज तक आत्मा के शुद्ध-स्वरूप में प्रवेश नहीं किया है। इसीलिए

न जातु रागादि-निमित्तभाव-मात्मात्मात्मनो याति यथार्ककान्तः।
तस्मििÂन्नमित्तं परसङ्ग एव वस्तु-स्वभावोऽयमुदेति तावत्।। 13।।

कविवर कहते हैं कि भेदविज्ञान की दृष्टि से स्वभाव को ग्रहण करो, क्योंकि वहीं वचनातीत सुख-शांतिस्वरूप शुद्ध-चेतना का निवास है। लोक में भी हम देखते हैं कि जो व्यक्ति स्फटिक के वास्तविकरूप को जानते हैं, वे तुरतं समझ जाते हैं कि यह रंग स्फटिक का नहीं, संयोगी-पदार्थ का है; ठीक उसीप्रकार जिनकी दृष्टि भेदविज्ञान से पैनी है अर्थात् जिनके पास भेदविज्ञान की कला है, कर्मरूपी रंगों की डाट के बावजूद भी वे स्फटिक-समान आत्मा के शुद्ध-स्वरूप को ग्रहण कर लेते हैं, और मधुर, आत्मिक, वचनातीत-आनंद का रसास्वादन करते हैं। अज्ञानी और ज्ञानी की दृष्टि में यही अंतर होता है, अज्ञानी-जीव हमेशा मोह के चश्मे से वस्तुस्वरूप को देखता है, और ज्ञानी-जीव उसी वस्तु-स्वरूप को भेदविज्ञान की पैनी-नजर से देखते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जैसे महि-मंडल मैं नदी कौ प्रवाह एक, ताहीमैं अनेक-भाँति नीर की ढरनि है।
पाथर कौ जोर तहाँ धार की मरोर होति, कांकर की खांनि तहाँ झाग की झरनि है।।
पौंन कौ झकोर तहाँ चंचल-तरंग ऊठै, भूमिकी निचांनि तहाँ भौंरकी परनि है।
तैंसैं एक आतमा अनंत-रस पुदगल, दुहूँके संजोग मैं विभाव की भरनि है।। 35।।

शब्दार्थ :- जैसे महिमंडल मैं नदी कौ प्रवाह एक= जैसे पृथ्वीतल पर नदी का बहाव एक है, ताहीमैं अनेक भांति नीर की ढरनि है= लेकिन उसमें भी पानी की ढाल अनेकप्रकार की है, पाथर कौ जोर तहाँ धार की मरोर होति= जहाँ पत्थर से टकराता है, वहाँ पानी की धार मुड़ जाती है, कांकर की खांनि तहाँ झाग की झरनि है= कंकड़ की बहुलता हो, वहाँ पानी में झाग बन जाता है, पौंन कौ झकोर तहां चंचल-तरंग ऊठै = जहाँ हवा का झौंका हो, वहाँ चंचल-तरंगें उठती हैं, भूमिकी निचांनि तहाँ भौंरकी परनि है= जहाँ पृथ्वी की निचाई यानि गहराई हो वहाँ पानी में भँवर पड़ती है, तैंसैं एक आतमा अनंत-रस पुदगल= वैसे ही एक आत्मा और अनंत-प्रकार के पुद््गल का रस, दुहूंके संजोग मैं विभाव की भरनि है= दोनों के मिलने पर विभावरूप परिणति होती है। विशेषार्थ :- जब सभी आत्मायें समान है, तो फिर जीव की अवस्था और परिणामों में विविधता क्यों दिखाई देती है?- जल के उदाहरण से इस कथन का स्पष्टीकरण कवि ने इस-छंद में किया है। पिछले-छंद में कवि ने स्फटिक के उदाहरण से सिद्ध किया था कि चेतन-आत्मा स्वभाव से तो पूर्ण-शुद्ध, सिद्धसमान है, परन्तु कर्मों की डांक के कारण मलिनतारूप दिखाई देता है। तब प्रश्न उठता है कि यदि ऐसा है, तो स्फटिक के समान सर्व-जीवों की परिणति भी एकसमान होनी चाहिए थी, पर ऐसा तो नहीं होता क्यों? इस-छंद में इसी शंका का समाधान कवि ने बहुत ही सरलता से किया है। सामान्यत: तो नदी में पानी का बहाव एकसमान रहता है, परन्तु फिर भी हमें उसके विविधरूप दिखाई देते हैं। जैसे नदी में बहता हुआ पानी जब किसी पत्थर या चट्टान से टकराता है, तो उसकी धारा सहज मुड़ जाती है अथवा बिना किसी पुरुषार्थ के अपना रास्ता सहज बदल लेती है। जब वही पानी की धारा कंकड़ों या छोटेछोटे टुकड़ों के ऊपर बहती है, तो उसमें झाग बनने लगता है। जल की उसी धारा में जब तेज-हवाओं के झोंकों का संयोग होता है, तब उसमें चंचल-लहरें उठने लगती हैं; जिसे हम समुद्र में उठनेवाली लहरों के रूप में देख सकते हैं। जल की वही धारा जब ढलान या खाई में गिरती है, तब उसमें गोल-गोल भँवरें उठने लगती है, अर्थात् जल की एक ही धारा बाहरी-संयोग मिलने पर विविधरूपों में परिवर्तित होती हुई दिखाई देती है। ठीक उसीप्रकार जब शुद्ध-आत्मा और बाहर में पुद््गल-परमाणुओं के अनंत-प्रकार के रस का संयोग होता है, तो वह अपने स्वभाव के विपरीत विभावरूप, विविध-अवस्थाओं में परिणमित होती हुई दिखाई देती है। जैसे बाहर में क्रोध, मान, माया, लोभ किसी भी कषाय के उदय का रस या प्रसंग बनने पर मिथ्यादृष्टि-जीव तत्संबंधी-कषायरूप परिणमित होता हुआ दिखाई देता है। यद्यपि किसी भी कषाय ने आज तक आत्मस्वभाव को स्पर्श नहीं किया है, फिर भी जैसे डांक के संयोग से स्फटिक, वैसे ही कर्म के संयोग से आत्मा उस रूप परिणमित होती हुई दिखाई देती है। जैसे जल की धारा समान और शांत होते हुए भी बाहरी संयोग से विभिन्न-अवस्थाओं व रूपों में देखने को मिलती है, उसीप्रकार सभी आत्मायें स्वभाव से समान होते हुये भी अपने-अपने परिणाम, कर्मोदय और कर्मफल के कारण विविध-अवस्थाओं में दिखाई देती है।

(दोहा)

चेतन-लच्छन आतमा, जड़-लच्छन तन-जाल।
तन की ममता त्यागिकै, लीजै चेतन-चाल।। 36।।

शब्दार्थ :- चेतन-लच्छन आतमा= आत्मा का लक्षण चेतनता, जड़-लच्छन तन-जाल= शरीरादि का लक्षण जड़ता है, तन की ममता त्यागिकै= शरीर की ममता त्यागकर, लीजै चेतन-चाल= आत्मा को ग्रहण करो। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मा और शरीर का लक्षण बताते हुए दोनों की पृथक्ता/भिन्नता सिद्ध कर स्वभाव को ग्रहण करने की प्रेरणा दी है। आत्मा का लक्षण चेतनपना है अर्थात् जानने-देखने की शक्ति जिसमें विद्यमान है, एकमात्र वही चेतन-पदार्थ आत्मा है, इसके अलावा समस्त तन-जाल यानि देह और देह से जुड़े समस्त-पदार्थों में चेतनपना न होने से जड़ हैं, अचेतन हैं, तेरे स्वरूप से पूर्णत: भिन्न हैं। इसलिए हे आत्मन्! तन और तनसंबंधित समस्त-पदार्थों में ममत्व या अपनत्व-भाव को त्यागो, क्योंकि दुःख का कारण भी एकमात्र पर से अपनत्व-भाव ही है। और निज-आत्मा को ग्रहण करो अर्थात् जो तुम्हारा अपना है उसे ग्रहण करो, क्योंकि सुख का कारण या कहें सुखस्वरूप तुम स्वयं ही हो।

(सवैया तेईसा)

जो जग की करनी सब ठानत, जो जग जानत-जोवत जोई।
देह-प्रवांन पै देहसौं दूसरौ, देह-अचेतन चेतन सोई।।
देह धरै प्रभु देहसौं भिन्न, रहै परछन्न लखै नहिं कोई।
लच्छन-वेदि विचच्छन बूझत, अच्छनसौं परतच्छ न होई।। 37।।

शब्दार्थ :- जो जग की करनी सब ठानत= जो संसार की समस्त क्रियायें करता है, जो जग जानत-जोवत जोई= जो जगत् को जानता-देखता है, देह-प्रवांन पै देहसौं दूसरौ= जो देहप्रमाण/बराबर है, परन्तु देह नहीं है, देह-अचेतन चेतन सोई= देह अचेतन है, और वह चेतन है, देह धरै प्रभु देहसौं भिन्न रहै= भगवान् आत्मा देह इति वस्तु-स्वभावं स्वं, ज्ञानी जानाति तेन सः। रागादीÂन्नात्मनः कुर्याÂन्नातो भवति कारकः ।। 14।। इति वस्तुस्वभावं स्वं नाज्ञानी वेत्ति तेन सः। रागादीनात्मनः कुर्यादतो भवति कारकः ।। 15।। धारण करता है, परन्तु देह से भिन्न रहता है, परछन्न लखै नहिं कोई= (देह से) ढँका हुआ है, किसी को दिखाई नहीं देता, लच्छन वेदि विचच्छन बूझत= लक्षण जानकर ज्ञानी-जीव जानते/पहचानते हैं, अच्छनसौं परतच्छ न होई= इन्द्रियों से प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि आत्मा देह में रहते हुये भी ‘देहातीत’ है। यद्यपि ज्ञान इन्द्रिय-द्वारों से प्रवर्तन करता है; फिर भी इन्द्रियों से जानने में नहीं आता, यही तो महिमा है स्व-परप्रकाशी ज्ञान की। अनादिकाल से जीव और पुद््गल दोनों साथ है, और एक दूसरे से भिन्न होते हुये भी एकदूसरे के पूरक हैं। दोनों में निमित्त-नैमित्तिक-संबंध होने के कारण जीव संसार की सभी क्रियायें करता हुआ दिखाई देता है। जबकि वास्तविकता यही है कि दोनों द्रव्य स्वतंत्ररूप से अपना-अपना कार्य कर रहे हैं। समस्त जगत् को जानने-देखने वाला भी एकमात्र जीव ही है, क्योंकि शेष सभी-द्रव्य तो जड़ हैं, अचेतन हैं। यद्यपि आत्मा देहप्रमाण रहता है, अर्थात् देह के परिमाण में रहता है, पर देह नहीं है। हालांकि जिस देह में भी जाता है, उसी अनुरूप इसका आकार हो जाता है, फिर भी देह से तलवार और म्यान की तरह पूर्णत: भिन्न ही रहता है, क्योंकि देह तो जड़ है और आत्मा चेतन है। अनादिकाल से इतने नजदीक रहने पर भी आज तक न तो आत्मा का कोई प्रदेश देहरूप हुआ और न ही देह का एक भी परमाणु जीवरूप हुआ। इसका सबसे बड़ा सबूत मरण के समय दृष्टिगोचर होता है, जब आत्मा इस जड़-देह को यहीं छोड़कर दूसरी पर्याय के लिये गमन कर जाती है। और आश्चर्य की बात है कि ये सब हम प्रत्यक्ष अपनी आँखों से प्रतिदिन देखते हैं, परन्तु फिर भी इस देह से आसक्ति रंचमात्र भी कम नहीं होती, कैसी महिमा है मोह की। इसी प्रकार यह जीवात्मा भी इस देह में रहता है, और देह से ढँका होने के कारण प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता, ठीक उसीप्रकार जैसे सोने से बने आभूषण में चाँदी या ताँबा मौजूद होने के बाबजूद भी हमें दिखाई नहीं देता। जब सुनार सोने से आभूषण बनाता है तो वह उसमें चाँदी या ताँबा मिलाता है, जो कितने परसेंट मिलाया है इसकी जानकारी केवल उस सुनार को होती है, हमें तो सिर्फ सोना ही दिखाई देता है। लेकिन जब हम वही आभूषण किसी अन्य पारखी सुनार के पास बेचने के लिये जाते हैं, तो यद्यपि सोना और चांदी /ताँबा उस आभूषण के सर्वांग में व्याप्त है, लेकिन फिर भी वह उसकी चमक और बाहरी रंग रूप को देखकर तुरंत पहचान लेता है कि इसमें सोना कितने परसेंट है और अन्य धातु कितनी। और वह उसी हिसाब से बिल बना देता है, कभी भ्रमित नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार आत्मा के प्रदेश देह के सर्वांग में व्याप्त है, और प्रत्यक्ष दिखाई न देने पर भी ज्ञानी-जीव कभी भ्रमित नहीं होते और ज्ञान, दर्शन, सुख आदि लक्षणों के माध्यम से पहचान लेते हैं, और उसका रसास्वादन करते हैं। यद्यपि छद्मस्थ-अवस्था में हमारा ज्ञान इन्द्रियों के माध्यम से ही प्रवर्तन करता प्रतीत होता है, परन्तु फिर भी वह आत्मवस्तु कभी भी इन्द्रियों से दृष्टिगोचर नहीं होती। और हम अज्ञानी-जीव उस आत्मवस्तु को न केवल इन्द्रियों से पाना चाहते हैं, बल्कि इन्द्रियों को ही आत्मा मानकर संतुष्ट हो जाते हैं, इसीलिये सुख की कल्पना भी हम उसी से करते हैं, जबकि ज्ञानी-जीव की प्रवृत्ति इससे हमेशा विपरीत ही रहती है।

(सवैया तेईसा)

देह अचेतन प्रेत-दरी रज-रेत-भरी मल-खेत की क्यारी।
ब्याधिकी पोट अराधि की ओट, उपाधि की जोट समाधिसौं न्यारी।।
रे जिय! देह करै सुख-हानि, इते पर तो तोहि लागत प्यारी।
देह तौ तोहि तजेगी निदान पै, तूही तजै किन देह की यारी।। 38।।

शब्दार्थ :- देह अचेतन प्रेत-दरी रज-रेत-भरी= शरीर जड़ है, मुर्दाखाना/मोर्चुरी है, रज और वीर्य से बनी है, मल-खेत की क्यारी= मल-मूत्र से भरी खेत की क्यारी के समान, ब्याधिकी पोट= रोगों की गठरी, अराधि की ओट= आराध्य को ढँकनेवाली, उपाधि की जोट= उपाधियों का समूह, समाधिसौं न्यारी= समाधि से भिन्न है, रे जिय! देह करै सुख हानि= हे जीवराज! शरीर तो सुख को नष्ट करनेवाला है, इते पर तौ तोहि लागत प्यारी= इतने पर भी तुझे प्रिय लगती है, देह तौ तोहि तजेगी निदान पै= किसी न किसी कारण से देह तो तुझे एक दिन छोडेगी ही, तूही तजै किन देह की यारी= (उससे पहिले) तू ही देह की दोस्ती/अपनापन को क्यों नहीं छोड़ देता? विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने इस नश्वर, घिनावनी, मल की थैली देह का बहुत ही मार्मिक-वर्णन किया है। यदि कवि के द्वारा वर्णित देह का ऐसा स्वरूप चित्त में उतर जाये, तो इस देह से आसक्ति खत्म हुये बिना न रहे। पिछले-छंद में कवि ने देह को सिर्फ ‘अचेतन’ कहा था, पर इस छंद में तो कवि ने देह को ‘मुर्दाखाना’ कहा अर्थात् वह जगह जहाँ सिर्फ मृत-शरीरों को रखा जाता है। सत्य भी यही है कि इस देह में रहनेवाले लाखों-जीव प्रतिदिन इसी देह में मरण को प्राप्त होते हैं, जिन्हें हम वैज्ञानिकों की भाषा में ‘जर्म्स’ कहते हैं। इस देह का निर्माण भी अत्यंत घृणित-पदार्थ माता-पिता के रज और वीर्य के संयोग से होता है, अर्थात् जिसका निर्माण ही घृणित चीजों से हुआ है वह अच्छी कैसे हो सकती है? जैसे खेत की क्यारियों में मिट्टी और खाद अर्थात् विष्टारूप-गंदगी के अलावा कुछ नहीं होता, ठीक उसीप्रकार यह देह भी केवल मलमूत्र की क्यारी है। जैसे खेत की उस गंदगी में ही बीज पनपता है, ठीक उसीप्रकार मल-मूत्र की इस थैली में जीवरूपी बीज पनपता है। यह शरीर रोगों की पोटली या कहें घर है, आगम में कथन आता है कि उँगली की एक पोर में 96 रोगों का निवास है, तो विचार करें संपूर्ण शरीर में कितने रोग होंगें? कहना क्या इन रोगों को तो हम प्रतिदिन अनुभव करते हैं, यहाँ तक कि जगत् में ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जो कि देह-जनित रोग से पीड़ित न हो। आराधि की ओट- जिसकी आराधना की जाती है अर्थात भगवान् आत्मा, जिसे इस मल की थैली ने ढँक रखा है, जो कि प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता। यह देह उपाधियों/कष्टों का समूह या मकड़जाल है। जितने भी दुःख-दर्द, रिश्ते-नाते, सगे-संबंधी, मान-सन्मान, वैभव-प्रतिष्ठा आदि हैं; वे सब दुःखरूप औपाधिकभाव मोह, राग, द्वेष का ही तो प्रत्यक्षरूप हैं, जिनमें ये जीवात्मा दुःखी होते हुये भी सदा मोहित रहता है। ये देहासक्ति ही तो जीव को समाधि यानि आत्मस्वरूप की स्थिरता से न केवल दूर रखती है, बल्कि आत्मस्वरूप का परिचय भी नहीं होने देती। कविवर कहते हैं ‘‘हे जीवराज! ये देहासक्ति सच्चे आत्मिक-सुख को नष्ट करनेवाली है, क्योंकि जबतक उपयोग में देह के प्रति आकर्षण रहेगा, तबतक सच्चे सुख का स्वाद भी तुझे नहीं आयेगा।’’ आश्चर्य है कि इतने पर भी ये देह तुझे सबसे ज्यादा प्रिय लगती है, तू रात-दिन इसी की सेवा में लगा रहता है, अन्याय, अनीति, अभक्ष्य-भक्षण, सप्तव्यसन, पाप, कषाय न जाने क्या-क्या नहीं करता इस देह को हृष्ट-पुष्ट और सुरक्षित रखने के लिये। भाई! कितना भी प्रयत्न कर ले, समय आने पर किसी न किसी कारण से ये देह तो एक न एक दिन तुझे छोड़ ही देगी।‘’ हे आत्मन्! देह तुझे छोड़े उससे पहले समय रहते ही क्यों न तू ही इस देहासक्ति को छोड़ दे अर्थात् इस देह से ममत्व-बुद्धि को छोड़ दे।‘’

(दोहा)

सुन प्रानी! सदगुरु कहै, देह खेह की खांनि।
धरै सहज दुख-दोषकौं, करै मोख की हांनि।। 39।।

शब्दार्थ :- सुन प्रानी! सदगुरु कहै देह खेह की खानि= सदगुरु कहते हैं हे जीव! सुनो, देह खेह की खांनि= शरीर राख/मिट्टी की खान है, धरै सहज दुख-दोषकौं= ये स्वभाव से ही दुःख और दोषमय है, करै मोख की हांनि= मोक्ष में बाधक है। विशेषार्थ :- इस-छंद में गुरु ने पुन: कहा हे आत्मन्! ये देह ‘राख या मिट्टी की खदान’ है। अर्थात् जैसे कोयले की खदान में केवल कोयला, और पत्थर की खदान में केवल पत्थर मिलता है, ठीक उसीप्रकार इस देहरूपी खदान में मिट्टी के अलावा कुछ नहीं है। जगत् में हर वस्तु का अपना स्वभाव होता है, जैसे नीबू का खटास, चीनी का मिठास, ठीक उसीप्रकार इस देह का स्वभाव भी दुःख और दोषमय ही है, तब इससे सुख की कल्पना करना उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे सूर्य से शीतलता की कामना करना व्यर्थ है। इसीलिए यह मोक्षमार्ग में भी बाधक है, क्योंकि मोक्ष सुखरूप है और ये दुःखरूप।

(सवैया इकतीसा)

रेत-कीसी गढ़ी किंधौं मढ़ी है मसान-कीसी, अंदर-अंधेरी जैसी कंदरा है सैल की।
ऊपर की चमक-दमक पट-भूषन की, धोखै लागै भली जैसी कली है कनेल की।।
औगुन की औंडी महाभौंडी मोह की कनौडी, माया की मसूरति है मूरत है मैल की।
ऐसी देह याही के सनेह याकी संगतिसौं, ह्वै रही हमारी मति कोल्हू-कैसे बैल की।। 40।।

शब्दार्थ :- रेत-कीसी गढ़ी किंधौं मढ़ी है मसान-कीसी= रेत का गढ़ या किला, श्मसान में बने मंदिर/मढ़िया के जैसी है, अंदर अंधेरी जैसी कंदरा है सेल की= अंदर अंधेरा है, जैसे पत्थर की गुफा हो, ऊपर की चमकदमक पट-भूषन की= बाहरी चमक-दमक वस्त्र-आभूषणों की है, धोकै लागै भली जैसी कली की कनेल की= धोने पर अच्छी लगती है, जैसे कनेर की कली हो, औगुन की औंडी महाभौंडी मोह की कनौडी= औगुण से भरी, महा-भद्दी, मोह की कानी आँख, माया की मसूरति मूरत है मैल की= माया पर आधारित है, मैल की मूर्ति है, ऐसी देह याहीके सनेह याकी संगतिसौं= ऐसा शरीर, इसी के प्रेम, इसी की संगति से, ह्वै रही हमारी मति कोल्हू-केसे बैल की= हमारी बुद्धि हो रही है कोल्हू के बैल जैसी। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने देह की बनावट का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है। हे आत्मन्! ये देह रेत के गढ़ यानि छोटे-से किले के समान है, अर्थात् जैसे रेत का किला कभी भी ढह सकता है, ठीक उसीप्रकार देहरूपी किला भी कभी भी ढह सकता है। ये देह श्मशानघाट में बनी मढ़िया या मंदिर के समान है; ऐसा मंदिर जहाँ कोई भी एक क्षण के लिए भी जाना नहीं चाहता। जैसे पर्वतों पर बनी गुफा में प्रतिसमय अंधरे ा ही रहता है, ठीक उसीप्रकार देह के अंदर भी घनघोर-अंधरे ा रहता है। लेकिन फिर भी मोह-ग्रसित अज्ञानी-जीव को देह बहुत सुन्दर लगती है। तब कविवर कहते हैं कि ये बाहरी चमक-दमक तो वस्त्राभूषण की है। ये देह बाहरी मलिनता को धोने पर ऐसी भली लगती है, जैसे कनेर का फूल हो, जैसे कनेर का फूल बाहर से अच्छा दिखने पर भी कभी शुभ-कार्यों पूजा आदि में प्रयुक्त नहीं होता, उसे अशुभ ही माना जाता है, ठीक उसीप्रकार बाहर से यह देह कितनी भी सुदं र क्यों न हो, पर पूज्य नहीं हो सकती। कविवर कहते हैं ये देह मात्र अवगुणों से भरी हुई है, यानि इसके अंदर एक भी सुगंधित-पदार्थ नहीं है, यहाँ तक कि जगत् के सुगंधित- पदार्थ भी इसके स्पर्श से दुर्गंधित हो जाते है, ये अत्यधिक बदसूरत है, कानी-आँख के समान अशुभ है, अर्थात् जैसे कानी आँख/रोशनी रहित आँख की कोई कीमत नहीं होती, ठीक उसीप्रकार ये देह भी कुछ काम की नहीं है। माया यानि छल-कपट आदि से बनी मैल की मूर्ति है, अर्थात् स्पर्श करने लायक भी नहीं है। ऐसी इस देह के प्रति प्रेम, आसक्ति और संगति से अर्थात् इसके साथ रहकर मेरी बुद्धि भी कोल्हू के बैल के जैसी हो गई है। जैसे कोल्हू का बैल एक निश्चित दायरे में ही घूमता रहता है, ठीक उसीप्रकार मेरी बुद्धि भी केवल देह व इसके संबंधियों के चारों ओर ही घूमती रहती है, यानि देह के अलावा वह कुछ और सोचना भी नहीं चाहती।

(सवैया इकतीसा)

ठौर-ठौर रकत के कुंड केसनि के झुंड, हाड़निसौं भरी जैसैं थरी है चुरैल की।
नैकु-से धका-के लगै एेसै फटि जाय मानौ, कागदकी-पूरी किधौं चादरि है चैल की।।
सूचै भ्रम-वांनि ठानि मूढ़निसौं पहचांनि, करै सुख-हानि अरु खांनि बदफैल की।
ऐसी देह याही के सनेह याकी संगतिसौं, ह्वै रही हमरी मति कोल्हू केसे बैल की।। 41।।

शब्दार्थ :- ठौर-ठौर रकत के कुंड केसनि के झुंड= जगह जगह खून के कुंड, बालों के झुंड, हाड़निसौं भरी जैंसैं थरी है चुरैल की= हड्डियों से भरी हुई है, जैसे चुड़ैल का अड्डा हो, नैकुसे धकाके लगै एेसै फटि जाय= जरा-सा धक्का लगते ही ऐसे फट जाती है, मानौ कागदकी पूरी किधौं चादरि है चैल की= मानों कागज की पुड़िया हो, या कपड़े की पुरानी चादर हो, सूचै भ्रम-वांनि ठानि मूढ़निसौ पहचांनि= भ्रमपूर्ण-वचनों को सूचित करती है और मूढ़-जीवों से पहिचान करके करै सुख हानि अरु खांनि बदफैल की= अपने सुख की हानि करती है,और बुराइयों की खान है, ऐसी देह याही के सनेह याकी संगतिसौं= ऐसे इस शरीर के साथ स्नेह करके इसकी संगति से, ह्वै रही हमरी मति कोल्हू केसे बैल की= हमारी बुद्धि कोल्हू के बैल जैसी जड़ हो रही है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पुन: देह की सुंदरता पर कटाक्ष करते हुए जीवों को सचेत किया है, कि जिस देह की बाहरी-सुंदरता पर ये जीव रीझा है, वास्तव में उसकी क्या स्थिति है। हम अज्ञानी-जीवों की देह से आसक्ति टूटे- इसका हरसंभव प्रयास कवि ने इस छंद में किया है। कविवर कहते हैं कि इस देह में जगह-जगह रक्त के कुंड बने हुए हैं, अर्थात् सारे शरीर में खून की नलियाँ विद्यमान है, कहीं साफ खून की तो कहीं गंदे खून की; लेकिन हैं तो खून की ही, इसके अलावा कुछ नहीं है। बालों के झुंड बने है अर्थात् सारे शरीर पर रोम के रूप में, और अन्य अंगों (सिर आदि) पर गुच्छों के रूप में बाल हैं, कहीं ज्यादा तो कहीं कम। हड्डियों की ढेर होने से वास्तव में ये देह चुड़ैल के घर से कम नहीं है, क्योंकि वहाँ भी ये सब चीजें ही होती हैं। कितना आश्चर्य होता है जब ये अज्ञानी जीव इस नाजुक-काया के बल पर इतराता है, जबकि वास्तविकता तो ये है कि जरा-सा धक्का लगे, तो यह ऐसे फट जाती है, जैसे कागज की पुड़िया हो, या कपड़े की जीर्ण/पुरानी चादर हो, जो कि जरा सी खींचने पर ही फट जाती है। ठीक उसी प्रकार जरा सा गिरते ही इस देह के अंदर का भयावह रूप सामने अा जाता है। कहने काे तो इस छोटी सी मनुष्य देह मे 206 हड्डियाँ होती हैं, परन्तु जरा-सा गिरने से चकनाचूर हो जाती है। शरीर की नश्वरता का ऐसा कड़वा-सच जानकर-पहचानकर, प्रत्यक्ष अनुभव करने पर भी अज्ञानी-जीव हमेशा भ्रमित रहता है, और उसकी क्षणिक-सुंदरता का ही दीवाना बना रहता है। जबकि कोयले की खदान की तरह ये देह भी बुराइयों की खान है, क्योंकि देहरूपी इस खान में बुराई की हर जड़ मौजूद है। और अज्ञानी-जीव निरन्तर बुराइयों की खान इस देह में आसक्त होकर अपने आत्मिक-सुख की हानि करता रहता है। कविवर कहते हैं कि ऐसी इस देह के प्रति प्रेम, आसक्ति और संगति से अर्थात् इसके साथ रहकर मेरी बुद्धि भी कोल्हू के बैल के जैसी हो गई है। जैसे कोल्हू का बैल एक निश्चित दायरे में ही घूमता रहता है, ठीक उसीप्रकार मेरी बुद्धि भी केवल देह व इसके संबंधियों के चारों ओर ही घूमती रहती है, यानि देह के अलावा वह कुछ और सोचना भी नहीं चाहती।

(सवैया इकतीसा)

पाटी बाँधी लोचनिसौं सकुचै दबोचनिसौं, कोचनिके सोचसौं न बेदै खेद तनकौ।
धायबो ही धंधा अरु कंधामांहि लग्यौ जोत, बार-बार आर सहै कायर है मनकौ।।
भूख सहै प्यास सहै दुर्जन को त्रास सहै, थिरता न गहै न उसास लहै छनकौ।
पराधीन घूमै जैसौ कोल्हूकौ कमेरौ बैल, तैसौई स्वभाव या जगतवासी जनकौ।। 42।।

शब्दार्थ :- पाटी बाँधी लोचनिसौं सकुचै दबोचनिसौं= आँखों पर पट्टी बँधी है, सिकुड़ा और दबा हुआ-सा रहता है, कोचनिके सोचसौं न बेदै खेद तनकौ= चाबुकों की मार की सोच से/डर से शरीर के दु:ख का वेदन नहीं करता, धायबो ही धंधा अरु कंधामांहि लग्यौ जोत= चलना ही जिसका काम है, कंधे पर जोत लगी है, बार-बार आर सहै कायर है मनकौ= बार-बार चोट सहता है, मन से साहसहीन है, भूख सहै प्यास सहै दुर्जन को त्रास सहै= भूख-प्यास सहन करता है, दुर्जन के द्वारा दिये दुःखों को सहन करता है, थिरता न गहै न उसास लहै छनकौ= चैन नहीं लेता, न ही एक क्षण को भी विश्राम करता है, पराधीन घूमै जैसौ कोल्हूकौ कमेरौ बैल= दूसरे के आधीन होकर घूमता है, जैसे कोल्हू का कमाउ/मेहनती-बैल हो, तैसौई स्वभाव या जगतवासी जनकौ= वैसा ही स्वभाव ये संसार में रहनेवाले जीवों का है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने संसारी-जीव की तुलना कोल्हू के बैल से करते हुए हमें हमारी वास्तविक-स्थिति से परिचित कराया है। जैसी दयनीय-हालत कोल्हू के बैल की होती है, उससे भी दयनीय-स्थिति आज हमारी है, और फिर भी हम खुश हैं, अपने को सुखी कहते हैं, यह मोह की ही तो महिमा है। कोल्हू के बैल की आँख पर पट्टी बँधी होती है, ताकि उसे बाहर का कुछ भी न दिखाई दे, जिससे वह इधर-उधर देखकर अपना ध्यान न बटाये। ठीक उसीप्रकार हम अज्ञानी-जीवों की आँख पर भी ‘अज्ञानता’ की पट्टी बंधी हुई है, सो हमें भी हित-अहित कुछ दिखाई नहीं देता। बैल इधर-उधर न भागे और काम अच्छे से होता रहे, सो उसे एक छोटी-रस्सी से एक निश्चित-दायरे में बाँध दिया जाता है, ठीक उसीप्रकार हम अज्ञानी-जीव भी अपने परिवारीजनों से बंधे हुए हैं, एक निश्चित-दायरे से बाहर न हम जाते हैं और न ही बाहर जाने की सोचते हैं, सुबह से शाम तक वही दिनचर्या। उस बैल को नियंत्रित रखने के लिये उसे चाबुक से डराया जाता है, मार के डर से वह अपने शरीर में होनेवाले कष्ट की भी परवाह नहीं करता, ठीक उसीप्रकार घर-परिवार, स्त्री आदि के कटु-वचन चाबुक का ही काम करते हैं, शरीर को कितना भी कष्ट हो, उसकी परवाह किये बिना भी ये जी-हजूरी में लगा रहता है। जैसे बैल का एकमात्र काम निश्चित दायरे में निरन्तर चलते रहना है, ठीक उसीप्रकार यह जीव पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों की सामग्री जुटाने के लिये निरन्तर दौड़ता रहता है। जैसे बैल के कंधे पर जोत लगा होता है, जिससे वह कहीं भाग नहीं सकता; ठीक उसीप्रकार इस जीव के कंधों पर भी गृहस्थीसंबंधी जिम्मेदारी का जोत लगा हुआ है, जिसे छोड़कर ये कभी भाग नहीं सकता, और न ही भागना चाहता है। यद्यपि बैल अपना काम निरन्तर करता रहता है, फिर भी उसका मालिक उसकी पीठ पर निरन्तर चोट करता रहता है; ठीक उसीप्रकार ये जीव पहले ही अपनी जिम्मेदारी समझकर निरन्तर जुता रहता है, लेकिन फिर भी कर्मोदय की चोट से हर समय आहत रहता है। मन से हताश अथवा विषयों में मगन होने के कारण कभी प्रतिकार के बारे में सोचता भी नहीं। जैसे बैल भूख-प्यास सहन करता है, क्योंकि उसका मालिक उसे भरपेट दाना-पानी नहीं देता, कि कहीं ये आलसी होकर काम में लापरवाही न करे; ठीक उसीप्रकार ये संसारी-जीव परिग्रह के संग्रह के लिये या कहें पैसा कमाने और जोड़ने के लिये दिन-रात भूखा-प्यासा रहता है; यहाँ तक कि अच्छाखासा कमाने पर भी, उसका ठीक से भोग भी नहीं कर पाता। जैसे बैल निर्दयी-मालिक के द्वारा दिया गया दु:ख सहन करता है, ठीक उसीप्रकार ये जीव पैसा कमाने के चक्कर में राजा, मालिक, सेठ, साहूकार या आज की भाषा में कहें बाॅस के अत्याचारों को सहन करता है। जैसे बैल एक क्षण के लिये भी विश्राम नहीं करता, ठीक उसीप्रकार ये जीव 24 घंटे परिश्रम करता है, एक क्षण के लिये भी चैन नहीं लेता। जैसे कोल्हू का बैल कमाऊ/मेहनती होने पर भी पराधीन है, अपनी स्वेच्छा से कुछ भी नहीं कर सकता, ठीक उसीप्रकार ये संसारी-जीव भी आठ-कर्मों के आधीन है, कर्म का जैसा उदय आता है हितअहित, सुख-दु:ख की परवाह किये बिना ही ये उसी रूप प्रवर्तन करने लगता है। जैसे कोल्हू का बैल निरन्तर चक्कर लगाता रहता है ठीक उसीप्रकार यह जीव भी अनादिकाल से उस कोल्हू के बैल की तरह ही चार-गति चौरासी-लाख योनियों में भटक रहा है, एक क्षण के लिये भी सुखी नहीं हुआ है।

(सवैया इकतीसा)

जगतमैं डोलैं जगवासी नररूप धरैं, प्रेत-केसे दीप किंधौं रेत-केसे थूहे हैं।
दीसैं पट-भूषन आडंबरसौं नीके फिरि, फीके छिनमांझ सांझ-अंबर ज्यों सूहे हैं।।
मोह के अनल दगे माया की मनीसौं पगे, डाभ की अनीसौं लगे ओस केसे फूहे हैं।
धरम की बूझ नांहि उरझे भरम-माँहि, नाचि-नाचि मरि जाँहि मरी-केसे चूहे हैं।। 43।।

शब्दार्थ :- जगतमैं डोलैं जगवासी नररूप धरैं= संसारी-प्राणी मनुष्यरूप धारणकर संसार में भ्रमण करते रहते हैं, प्रेत-केसे दीप किंधौं रेत-केसे थूहे हैं= जैसे श्मशान-घाट पर जलनेवाले दिया अथवा रेत का टीला (नाशवान), दीसैं पट-भूषन आडंबरसौं नीके= वस्त्राभूषण और बाह्य-आडंबर से अच्छे दिखाई देते हैं, फिरि फीके छिनमांझ सांझ-अंबर ज्यों सूहे हैं= लेकिन क्षण में ही मलिन, शाम के आसमान के जैसे चमक-विहीन हो जाते हैं, मोह के अनल दगे मायाकी मनीसौं पगे= मोह की अग्नि में जलते हैं, मणि की तरह माया की ममता में डूबे हुए हैं, डाभ की अनीसौं लगे ओस केसे फूहे हैं= घास पर पड़ी ओस की बूँद के समान क्षणभंगुर है, धरम की बूझ नांहि, उरझे भरममाँहि= धर्म की समझ नहीं है, भ्रम में ही उलझे हुए हैं, नाचि-नाचि मरि जाँहि मरीकेसे चूहे हैं= नाच-नाचकर मरते हैं, जैसे प्लेग के चूहे हों। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मनुष्य-पर्याय की स्थिति और क्षणभंगुरता का बहुत ही मार्मिकचित्रण किया है। चारों गतियों के जीवों में से मनुष्य अपने आप को सर्वश्रेष्ठ मानता है, और इतराता है, लेकिन सच्चाई तो ये है कि मनुष्य-देह की वास्तविक-स्थिति भी श्मशान-घाट के दीपक और रेत के टीले के समान क्षणिक है। जैसे श्मशानघाट पर जलनेवाला दिया कितनी देर तक जलेगा?- ये कोई नहीं कह सकता, क्योंकि वहाँ तेज-हवा और कोई आड़ न होने से दीपक कभी भी बुझ जाता है। जैसे रेगिस्तानी-क्षेत्र में तेज-हवा के निमित्त से रेत के टीले बन जाते हैं, लेकिन वही हवा जब दूसरी ओर से चलती है, तो वे टीले बिखर जाते हैं। ठीक वही स्थिति इस मनुष्य-देह की है, ये कब नष्ट हो जाये- कुछ नहीं कहा जा सकता। सुंदर-सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनने से जो देह तुझे सुंदर लगती है, वे सुंदर-वस्त्राभूषण भी इस देह के संयोग से कुछ ही क्षणों में संध्या के आकाश की तरह फीके पड़ जाते हैं। अर्थात् जैसे दिन में सूर्य की रोशनी से जो आसमान स्वच्छ और चमकता हुआ दिखाई देता है, वही आकाश सांझ के समय जब दिन और रात के मिलन का समय होता है, तब चमक-विहीन फीका-सा पड़ जाता है। ठीक उसी प्रकार इस देह के संयोग में आनेवाली हर वस्तु कुछ ही समय में मलिनता को प्राप्त होती है। हे आत्मन्! ये मनुष्य निन्तर मोह की अग्नि में जल रहा है, क्योंकि इस मनुष्य-पर्याय में मोह बढ़ानेवाले रुपया-पैसा, मान-प्रतिष्ठा, पत्नी-पुत्र आदि सगे-संबंधी अर्थात् चेतन और अचेतन दोनों ही प्रकार के सर्वाधिक-पदार्थ मौजूद हैं, और ये जीव प्रतिसमय इनके मोह में फँसकर अत्यधिक-दुःखी है। मणि की तरह माया की ममता में डूबा हुआ है, अर्थात् जैसे सुनार गहने बनाते समय मणि को चारों ओर से जकड़ देता है, जिससे वह उसमें से निकल न पाये; ठीक उसीप्रकार ये मनुष्य भी प्रतिसमय मनवचन-काय की अस्थिरता यानि छल-कपटरूप मायाचारी में पूरी तरह से जकड़ा हुआ है, एक क्षण के लिये भी उससे बाहर नहीं निकलता है। जैसे हरी-घास पर पड़नेवाली ओस की बूँद मोती के समान देखने में बहुत सुंदर लगती है, लेकिन अगले ही क्षण सूर्य की किरण पड़ते ही वह विलय को प्राप्त होती है, ठीक उसीप्रकार ये मनुष्य-देह ओस की बूँद के समान देखने में भले ही सुंदर लगे, लेकिन कषाय की गर्मकिरण का संयोग पाते ही इसकी सुंदरता अगले ही क्षण विलय को प्राप्त होती है। मन/बुद्धि या कहें क्षयोपशम की प्राप्ति होने पर भी आत्मानुभूतिरूप-धर्म तो दूर व्यवहार-धर्म के स्वरूप को भी नहीं समझता, देहादिक पर-पदार्थों के प्रति ममत्वरूपी भ्रम में ही उलझा रहता है। और इसी भ्रम में नाच-नाचकर ठीक उसीप्रकार मरण को प्राप्त होता है, जैसे प्लेग की बीमारी से ग्रसित चूहा, अर्थात् जब चूहे को प्लेग की बीमारी होती है, तब वह अपने बिल आदि से निकलकर जमीन पर गिरता है और चक्कर खा-खाकर मरण को प्राप्त होता है; ठीक उसीप्रकार यह मोह-ग्रसित अज्ञानी-जीव चार गति चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाता हुआ निरन्तर जन्म-मरण को प्राप्त होता है।

(सवैया इकतीसा)

जासौं तू कहत यह संपदा हमारी सो तौ, साधनि अडारी ऐसैं जैसे नाक सिनकी।
ताहि तू कहत याहि पुन्नजोग पाई सो तौ, नरक की साई है बढ़ाई डेढ़ दिन की।।
घेरा-माँहि परयौ तू विचारै सुख आँखनिकौ, माखनि के चूटत मिठाई जैसै भिनकी।
एते परि होहि न उदासी जगवासी जीव, जगमैं असाता है, न साता एकछिन की।। 44।।

शब्दार्थ :- जासौं तू कहत यह संपदा हमारी= (जिस संपदा को) तू कहता है ये हमारी संपत्ति है, सो तौ साधनि अडारी ऐसैं= वह तो साधुजन ऐसे छोड़ देते हैं, जैसे नाक सिनकी= जैसे नाक छिनक दी हो, ताहि तू कहत याहि पुन्नजोग पाई= जिसे तू कहता है यह पुण्ययोग से प्राप्त की, सो तौ नरक की साई है= वह तो नरक का बयाना है, बढ़ाई डेढ़ दिन की= डेढ़ दिन का/क्षणिक बडप्पन है, घेरा-माँहि परयौ तू विचारै सुख आँखनिकौ= (संपत्ति के) घेरे में पड़ा तू सोचता हे कि आँखों का सुख है, माखनि के चूटत मिठाई जैसै भिनकी= मक्खियों के नोचने से मिठाई जैसे भिनक रही हो, एते परि होहि न उदासी= इतने पर भी उदासी नहीं होती, जगवासी जीव जग मैं असाता है= हे जगत् में रहनेवाले जीव! संसार में दु:ख ही है, न साता एक छिन की= एक क्षण के लिए भी सुख नहीं है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने धन-संपत्ति से मोह रखनेवाले अज्ञानी-जीव को इस जड़-संपत्ति की वास्तविक-स्थिति से परिचय कराते हुए उससे विरक्ति का उपदेश दिया है। कविवर कहते हैं कि जिस धन-संपत्ति को तू अपना कहता है, दिन-रात तू जिसकी साज-संभाल करता है, और सुरक्षा के चक्कर में जिसकी चौकीदारी करता है; उसे साधुजन/ज्ञानी-पुरुष ठीक उसीप्रकार त्याग देते हैं, जैसे हम नाक छिनकते हैं। वास्तव में देखा जाये, तो हम उस गंदगी को हम मात्र फेंकते ही नहीं है, बल्कि उसकी ओर पलटकर भी नहीं देखते हैं। इसीप्रकार ज्ञानी-पुरुष भी इस धन-संपदा को गंदगी मानकर इसकी तरफ पलटकर भी नहीं देखते हैं। जिस संपदा के प्राप्त होने पर तू खुश होता है,और कहता है ये तो मुझे पुण्य के उदय से मिली है, ज्ञानी-पुरुष कहते हैं कि ‘‘ये तो डेढ़ दिन का बड़प्पन है अर्थात् बहुत ही अल्प-समय की मेहमान है अर्थात् पुण्य क्षीण होते ही विलय को प्राप्त हो जायेगी।’’ और नरक की साई/बयाना है, अर्थात् जैसे हम ये मानते हैं कि बयाना देकर हमने संपत्ति को अपने आधीन कर लिया, ठीक उसीप्रकार इस धन-संपदा में आसक्ति करके हमने भी नरक निगोद में अपनी बुकिंग कर ली है। क्योंकि जितनी ज्यादा धन-संपत्ति में आसक्ति होती है, उतना ही पापरूप प्रवर्तन भी अधिक होता है, और नरक-निगोद के दरवाजे उतने ही ज्यादा खुल जाते हैं। वे जीव विरले ही होते हैं, जो धन-संपत्ति पाकर पुण्य-कार्यों में प्रवर्तन करते हैं, या अनासक्ति का भाव रखते हैं। ‘आचार्य उमास्वामी जी’ ने भी ‘तत्वार्थसूत्र’ में ‘अधिक-आरंभ और अधिक-परिग्रह को नरकायु का आस्रव’ माना है। कैसी बिडम्बना है ये धन-संपत्ति का बना रहना तुझे आँखों का सुख लगता है अर्थात् बहुत अच्छा लगता है, जिसकी वजह से तू परिवारीजनों से भी घिरा रहता है, कविवर कहते हैं यह तो ठीक उसीप्रकार है, जैसे मिठाई के ऊपर मक्खियाँ न केवल भिनभिनाती हैं, बल्कि उसे चोंटती भी रहती हैं। संसार में भी सब स्वार्थ के सगे हैं, जबतक धन-संपत्ति है तबतक सब चोंटते रहते हैं अर्थात् पास रहते हैं और इसके जाते ही सब दूर हो जाते हैं। भाई! इतने पर भी तुझे संसार से विरक्ति नहीं आती, यहाँ तक कि इस संपत्ति की प्राप्ति में सुख और इसके वियोग में तुझे दु:ख लगता है, तो तेरे अभाग्य की महिमा कौन कहे। हे आत्मन्! इस संसार में, इस जड़-संपत्ति में एक क्षण के लिये भी साता या चैन नहीं है, चारों ओर दु:ख ही दु:ख है। इसलिये भाई इस जड़-संपत्ति का मोह त्यागो, और अपने अनंतगुणोंरूपी चैतन्य-संपदा की ओर निहारो।

(दोहा)

ए जगवासी! यह जगत्, इन्हसौं तोहि न काज।
तेरे घट में जग बसै, तामै तेरौ राज।। 45।।

शब्दार्थ :- ए जगवासी यह जगत्= हे जगत् में रहनेवाले-जीव! यह जगत्, इन्हसौं तोहि न काज= इससे तुझे कोई प्रयोजन नहीं है, तेरै घट में जग बसै= जगत् तो तेरे अन्तरंग में बसा है, तामै तेरौ राज= उसमें तेरा ही राज है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मोही-जीव को संसार से विरक्ति का उपदेश दिया है। हे आत्मन्! इस संसार में तेरा कुछ भी नहीं है; जो कुछ है, वह तेरे भावों का ही खेल है, और न ही संसार में रहनेवालों से तेरा कोई संबंध है; क्योंकि इस संसार में तूने अकेले ही जन्म लिया था और मरण-समय भी तू अकेला ही जायेगा। ये सारे संयोग और पदार्थ तो बस इसी पर्याय में या कहें केवल वर्तमान में प्राप्त इस देह के ही सगे हैं, देह छूटते ही सब यहीं छूट जायेंगे। तेरा जगत् तो तेरे ज्ञान-घट में है, जिस पर तेरा एकछत्र-राज्य है। जो तेरा साथ तू किसी भी पर्याय में रहे, किसी भी स्थिति में रहे, एक समय के लिये भी नहीं छोड़ता। इसलिए भाई! बाह्य-संसार से मुख मोड़कर अपने अनंत-गुणों की ओर निहारो।

(सवैया इकतीसा)

याही नरपिंडमैं विराजै त्रिभुवन-थिति, याहीमैं त्रिविध-परिनामरूप सृष्टि है।
याहीमैं करम की उपाधि दु:ख-दावानल, याही में समाधि-सुख-वारिद की वृष्टि है।।
याहीमैं करतार करतूति हीमैं विभूति, यामैं भोग याहीमैं वियोग यामैं घृष्टि है।
याहीमैं बिलास सब गर्भित गुपतरूप, ताहीकौं प्रगट जाके अंतर सुदृष्टि है।। 46।।

शब्दार्थ :- याही नरपिंडमैं विराजै त्रिभुवन-थिति= इसी मनुष्य-देह में तीनों लोक विराजते हैं, याहीमैं त्रिविध-परिनामरूप सृष्टि है= इसी में तीनोंप्रकार के परिणामों की उत्पत्ति होती है, याहीमैं करम की उपाधि दु:ख दावानल= इसी में कर्मजनित-औपाधिकभाव, दुःखरूपी-दावाग्नि, याही में समाधि-सुख-वारिद की वृष्टि है= इसी में समाधि-सुखरूप बादलों की बरसात है, याहीमैं करतार करतूति ही मैं विभूति= इसी में करनेवाला यानि कर्ता, इसी में करतूत यानि कर्म, इसी में संपदा, यामैं भोग याहीमैं वियोग यामैं घृष्टि है= इसी में भोग, इसी में वियोग, इसी में घर्षण है, याहीमैं बिलास सब गर्भित गुपतरूप= इसी में सारे विलास गुप्तरूप से समाहित हैं, ताहीकौं प्रगट जाके अंतर सुदृष्टि है= उसी को प्रकट हैं, जिसकी अंतरोन्मुखी-सुदृष्टि है। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने कहा था कि ‘‘इस बाह्य-जगत् में तेरा कुछ भी नहीं है’’, उसी की सिद्धि इस छंद में की है, कि जो कुछ है वह सब तेरे स्वयं के पास ही है, पर में तेरा कुछ भी नहीं है, यहाँ तक कि न तो पर का कुछ भी तेरे पास है और न ही तेरा कुछ भी पर के आधीन है। जिस जगत् यानि तीनों लोकों को तू अपना मानता है वह तेरी इस नर-देह में ही है। कमर से नीचे का भाग अधोलोक, कमर का हिस्सा मध्यलोक, और कमर के ऊपर का हिस्सा ऊर्ध्वलोक है। शुभ, अशुभ और शुद्ध तीनोंप्रकार के परिणामों की उत्पत्ति भी यहीं होती है। अपने आत्मस्वभावरूपपरिणमन ही शुद्ध-परिणाम है, और अपने स्वभाव के विपरीत पंचपरमेष्ठी के स्मरण और अनुसरणरूप (उनके बताये मार्ग पर चलना) परिणमन शुभ-परिणाम, और अपने स्वभाव के विपरीत पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों में आसक्तिरूप-परिणमन अशुद्ध-परिणाम है। इसी में कर्मों के उदयजनित औपाधिक-भावों की दुःखरूपी-दावाग्नि जल रही है अर्थात् मोहराग-द्वेष आदि विकारी-भावों और पूर्वोपार्जित-कर्मों के उदयरूप फल भी इसी में ही प्राप्त होते है, और दुःखों से छूटने का उपाय अर्थात् समाधि भी इसी में है या कहें कि दावाग्नि को बुझाने के लिये आत्मध्यानरूपी-मेघवृष्टि भी इसी में हो रही है। इसी देह में कार्य करनेवाला कर्ता अर्थात् आत्मा है, और इसी में उसकी क्रिया भी है, इसी देह में आत्मज्ञान-रूपी संपदा भी है। इसी देह में कर्म का भोग अर्थात् फल मिलता है, और कर्म का वियोग/ छूटते भी इसी से हैं, इसी में अच्छे और बुरे कर्मों का घर्षण अर्थात् उत्कर्षण और अपकर्षण है। इसी देह में विलासिता की सारी सामग्री गुप्तरूप से गर्भित हैं; परन्तु वह उसी को प्रगट होती हैं जिसकी दृष्टि अंतरोन्मुखी अर्थात् अपने स्वभाव पर केन्द्रित होती है। अभिप्राय यह है कि जो सम्यग्दृष्टि होता है, उसे ही सच्चे-सुख की अनुभूति होती है।

(सवैया तेईसा)

रे रुचिवंत पचारि कहै गुरु, तू अपना पद बूझत नांही।
खोजु हिये निज-चेतन-लच्छन, है निजमैं निज गूझत नांही।।
सुद्ध-सुछंद सदा अति-उज्जवल, माया के फंद अरूझत नांही।
तेरौ सरूप न दुंदकी दोहीमैं, तोहीमैं है तोहि सूझत नांही।। 47।।

शब्दार्थ :- रे रुचिवंत पचारि कहै गुरु= गुरुजी बुलाकर कहते हैं, हे आत्मा की रुचि रखनेवाले! तू अपना पद बूझत नांहि= तू अपना स्वरूप पहिचानता नहीं है, खोजु हिये निज चेतन-लच्छन है= अपने हृदय में खोजो, चेतना-लक्षण है, निजमैं निज गूझत नांहि= निज में ही है, निज से कभी ओझल नहीं होता है, सुद्ध सुछंद सदा अति-उज्जवल= शुद्ध, स्वाधीन हमेशा अत्यधिक-निर्मल, माया के फंद अरूझत नांही= विकारों के फंदों का प्रवेश नहीं है, तेरौ सरूप न दुंदकी दोहीमैं= तेरे स्वरूप में न द्वंद्व/भ्रम है, (न) दुविधा है, तोहीमैं है तोहि सूझत नांही= तेरे अंदर ही है तुझे दिखाई नहीं देता। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने गुरु-शिष्य के संवाद के रूप में रुचिवान-जीव को आत्मज्ञान की प्रेरणा दी है। प्रश्न उठता है कि रुचिवान्-जीव को ही उपदेश क्यों? क्योंकि जिसे स्वयं को जानने की रुचि होगी, उसी को ये उपदेश कार्यकारी और सार्थक होगा। अरुचिवान्-जीव के लिये तो सम्यक्-उपदेश भी कषाय का ही निमित्त बनता है। गुरु शिष्य को बुलाकर कहते हैं कि हे ‘‘रुचिवंत/भव्यजीव! सुनो, तू अपने स्वरूप को पहिचानता नहीं है, तू स्वयं के अस्तित्व को स्वयं में ही खोज। चेतना यानि जो जानता-देखता है, जो सुख-दु:ख का वेदन करता है, वह तेरा ही लक्षण है, ज्ञानादि अनंत-गुणों का धनी तू स्वयं ही है, क्योंकि जीव के अलावा ये लक्षण अन्य किसी भी द्रव्य में नहीं पाया जाता है। और ये चेतन-लक्षण कभी स्वयं से ओझल नहीं होता है अर्थात् एकसमय के लिये भी ये जीव अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता है। प्रतिसमय जो जाननेरूपक्रिया हो रही है, उस जाननक्रिया का स्वामी तू स्वयं ही है, अन्य कोई नहीं।’’ हे आत्मन्! तू स्वभाव से सदाकाल विकारों की मलिनता से रहित पूर्ण-शुद्ध-तत्त्व है, किसी भी प्रकार की पराधीनता से रहित स्वाधीन-तत्त्व है। विकारों ने तेरे स्वरूप में कभी प्रवेश ही नहीं किया इसलिये तू अतिनिर्मल है; माया यानि मन-वचन-काय के विपरीतता रूप छल-प्रपंच आदि भावों का तो तेरे स्वरूप में प्रवेश भी नहीं है। तेरे आत्मस्वरूप में किसी भी प्रकार का कोई भ्रम नहीं है, दर्पण की तरह बिल्कुल स्वच्छ और पारदर्शी है। किसी भी प्रकार की विकल्पात्मक-दुविधा भी नहीं है, स्वभाव-भावरूप सब कुछ तेरे अंदर ही विद्यमान है, फिर भी तुझे दिखाई नहीं देता; क्योंकि तेरी आँखों पर मोह की पट्टी जो बंधी है, जिसके कारण अनंत-गुणों का धनी होते हुए भी तुझे उनकी प्रतीति और अनुभति ू नहीं हो रही है।

(सवैया तेईसा)

केई उदास रहैं प्रभु-कारन, केई कहैं उठि जांहि कहींकै।
केई प्रनाम करैं गढ़-मूरति, केई पहार चढ़ैं चढ़ि-छीकैं।।
केई कहैं असमान के ऊपरि, केई कहैं प्रभु हेठि-जमीकैं।
मेरो धनी नहि दूर-दिसन्तर, मोहीमैं ही मोहि सूझत नीकै।। 48।।

शब्दार्थ :- केई उदास रहैं प्रभु-कारन= कोई विरक्त रहते हैं प्रभु के कारण, केई कहैं उठि जांहि कहींकै= कोई कहते हैं उठकर कहीं दूर चले जायें, केई प्रनाम करैं गढ़ मूरति= कोई प्रणाम करते हैं मूर्ति बनाकर, केई पहार चढ़ैं चढ़ि छीकैं= कोई छींकें (डोली) पर चढ़कर पहाड़ चढ़ते हैं, केई कहैं असमान के ऊपरि= कोई कहते है (प्रभु) आसमान के ऊपर, केई कहैं प्रभु हेठि जमीकैं= कोई कहते हैं प्रभु जमीन के नीचे हैं, मेरो धनी नहिं दूर दिसन्तर= मेरा स्वामी दूर-देशान्तर/अन्य-क्षेत्र में नहीं है, मोहीमैं ही मोहि सूझत नीकै= मेरे अंदर ही है मुझे अच्छे से दिखाई देता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जीव की उस स्थिति का वर्णन किया है, जब जीव दु:खों से व्याकुल होकर सच्चे-सुख की चाहत में भगवान् की शरण में आता है, और ये मानता है कि ‘‘भगवान् मुझे सुखी कर देगें’’, इतना ही नहीं इस झूठी-आशा में यह जीव न जाने कितने प्रयास करता है, और सुख न मिलने पर बहुत-आकुलित होता है, जबकि ज्ञानीजीव उस सुख को अपने अंतरंग में ही अनुभव करते हैं। संसार में नानाप्रकार के जीव हैं, और सभी भगवान् को पाना चाहते हैं, पर वास्तव में सच्चा देव/ भगवान् कौन है- इसकी पहचान न होने से भटकते ही रहते हैं। कई जीव तो प्रभु को पाने के लिये संसार से विरक्त हो जाते हैं, साधु/बाबा आदि का वेश धारणकर उदासीन-जीवन बिताते हैं, और कई जीव अपने निवास-क्षेत्र को छोड़कर कहीं दूर जंगलों में जाकर रहने लगते हैं, और कईतरह की कठिन से कठिन-तपस्या करते हुए जीवन बिताते हैं। कई जीव पत्थर, मिट्टी, या लकड़ी आदि की मूर्ति बनाकर उसमें प्रभु की कल्पना कर बड़ी ही भक्ति-भाव से पूजा-अर्चना, नमन-वंदन आदि करते हैं, तो कई जीव छींके यानि डोली में बैठकर या सामर्थ्य के अनुसार पैदल पहाड़-पर्वत आदि चढ़ते हैं, अर्थात् तीर्थयात्रा आदि करते हैं, सिर्फ इस इच्छा से कि भगवान् हमें सुखी कर देगें। कई जीव मानते हैं कि भगवान् (ब्रह्मा, शिव आदि) तो आसमान के ऊपर हैं, और कुछ मानते हैं कि सिद्धशिला पर विराजमान हैं, तो कई ये मानते हैं कि भगवान् तो जमीन के नीचे विराजमान हैं। लेकिन ज्ञानी-जीव कहते हैं कि मेरा भगवान् तो कहीं दूर देश में नहीं, मृग की नाभि में बसी कस्तूरी की तरह मेरे घट में ही विराजमान है, अर्थात् जैसे कस्तूरी को मृग दुनिया के किसी भी कोने में ढूँढ़े उसे नहीं मिलेगी; क्योंकि वह तो उसकी अपनी नाभि में है। इसीप्रकार सुख का निधान भगवान् आत्मा भी अन्यत्र कहीं नहीं, इसी देह-देवालय में विराजमान है। और मुझे प्रतिसमय बहुत अच्छे से जानने में भी आ रहा है। हे आत्मन्! जिस सुख की तलाश में, तू भगवान् को खोज रहा हूँ, वह सुख तुझे केवल तेरे देह देवालय में विराजमान भगवान् आत्मा के आश्रय से ही अर्थात् निज-आत्मा की प्रतीति अनुभूति और लीनता से ही प्राप्त हो सकता है, अन्यत्र किसी भी चेतन या अचेतन-पदार्थ के आश्रय से उस सुख की प्राप्ति तीन-काल में भी संभव नहीं है। तब एक प्रश्न उठता है कि क्या देह-देवालय में विराजमान देव यानि भगवान् आत्मा मात्र ज्ञानियों को ही जानने में आता है, अज्ञानी अर्थात् मुझे जानने में नहीं आता? तब आगम से उत्तर मिलता है कि जगत् के प्रत्येक जीव को केवल ज्ञान-स्वरूप भगवान् आत्मा ही जानने में आता है, और कुछ नहीं आता है। लेकिन जहाँ ज्ञानियों को आगम के इस कथन पर न केवल विश्वास है, बल्कि स्वीकृति भी है, और तदनुरूप-आचरण भी है, वहीं अज्ञानी-जीव को इस अकाट्य-सत्य पर न विश्वास है, न स्वीकृति है और आचरण तो पूर्णत: विपरीत है, इसीलिए ज्ञानी-जीव सुखी है और अज्ञानी-जीव महादु:खी रहता है।

(दोहा)

कहैं सुगुरु ''जो समकिती, परम उदासी होइ।
सुथिर-चित्त अनुभौ करै, प्रभु-पद परसै सोइ’'।। 49।।

शब्दार्थ :- कहैं सुगुरु जो समकिती= सच्चे-गुरु कहते हैं ''जो सम्यक्-दृष्टि जीव है, परम उदासी होइ= अति-विरक्त होता है, सुथिर-चित्त अनुभौ करै= स्थिर-चित्त होकर अनुभव करता है, प्रभुपद परसै सोइ= वही प्रभु के पद/पैर को स्पर्श करता है। ‘’ विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मानुभूति की प्रक्रिया का वर्णन किया है। गुरु जी कहते हैं कि जो समकिती अर्थात् जिस जीव की बुद्धि सम्यक् होती है, श्रद्धान सम्यक् होता है, वह जीव संसार से अति-विरक्त होकर अर्थात् पाँचों-इन्द्रियों के समस्त विषय-भोगों से मन, वचन और काया से, व कृत, कारित व अनुमोदना से समस्त अशुभ-भावों का त्याग करके, स्थिर-चित्त होता है अर्थात् समस्त शुभ और शुद्ध-विकल्पों से भी रहित निर्विकल्प होकर स्वयं को मात्र ज्ञानस्वरूप अनुभव करता है; तभी वह प्रभु के पद अर्थात् देह-देवालय में विराजमान आत्मप्रभु को स्पर्श करता है अर्थात् आत्मानुभूति करता है।

(सवैया इकतीसा)

छिनमैं प्रवीन छिनहीमैं मायासौं मलीन, छिनकमैं दीन छिनमाँहि जैसौ सक्र है।
लियैं दौर-धूप छिन-छिनमैं अनंतरूप, कोलाहल ठानत मथान-कौसौ तक्र है।।
नटकौसौ थार किधौं हार है रहटकौसौ, धार-कौसौ भौंर कि कुंभार-कौसौ चक्र है।
ऐसौ मन-भ्रामक सुथिरु आजु कैसै होई, ओरहीकौ चंचल अनादि-हीकौ वक्र है।। 50।।

शब्दार्थ :- छिनमैं प्रवीन छिनहीमैं मायासौं मलीन= क्षण में चतुर/बुद्धिमान्, क्षण में ही छल से मलिन, छिनकमैं दीन छिनमांहि जैसौ सक्र है= क्षण में ही दया का पात्र, क्षण में ही जैसे इन्द्र है, लियैं दौरधूप छिन-छिनमैं अनंतरूप= दौड़-धूप में व्यस्त क्षण-क्षण में विविधरूप धारण करता है, कोलाहल ठानत मथानकौसौ तक्र है= शोर मचाता है, जैसे छाछ को मथने पर शोर होता है, नट-कौसौ थार किधौं हार है रहट-कौसौ= नट के थाल के समान अथवा रहट के हार के समान, धार-कौसौ भौंर= जल की धारा में पड़नेवाले भँवर के समान, कि कुंभार-कौसौ चक्र है= या कुम्हार के चाक के समान ऐसौ मन भ्रामक सुथिरु आजु कैसै होई= ऐसा भ्रामक-मन आज स्थिर कैसे हो, ओरहीकौ चंचल अनादिहीकौ वक्र है= जो शुरू से ही चंचल, अनादि से ही टेढ़ा है। विशेषार्थ :- कवि ने पिछले छंद में कहा कि ‘‘जब जीव मन को हर तरह से शांत और स्थिर करता है, तभी आत्मानुभूति होती है।’’ तब शिष्य विचार करता है कि इस चंचल-मन को स्थिर कैसे किया जाये? क्योंकि स्थिर तो दूर ये चंचल-मन तो एक विषय पर भी पूरी तरह से नहीं ठहरता अर्थात् प्रतिक्षण विषय को ही बदलता रहता है, मन की उसी चंचलता का वर्णन कवि ने इस छंद में किया है। कविवर कहते हैं कि ये चंचल-मन क्षण में ही चतुराई बुद्धिमत्ता अथवा विचारों की उज्ज्वलता का परिचय देता है, लेकिन दूसरे ही क्षण वह मोह-राग-द्वेष रूप छल आदि विकारी-भावों की उत्पत्ति होने से मलिनता को प्राप्त होता है। क्षण में ही भिखारी की तरह दीन-हीन सा हो जाता है अर्थात् पाँचों इन्द्रियों का गुलाम या कहें विषयों का मोहताज हो जाता है, वहीं दूसरी ओर इन्द्रियों का राजा यानि इन्द्र के समान हो जाता है। इन्द्रिय-विषयों को जुटाने के लिए क्षण में इधर दौड़ता है, क्षण में उधर दौड़ता है अर्थात् दिन-रात उसी में व्यस्त रहता है, एक क्षण भी चैन नहीं पाता। यहाँ तक कि उन विषयों को पाने की लालसा में कभी मजदूर तो कभी मालिक जैसे विविधरूप भी धारण करता है। दिन-रात ऐसे शोर मचाता है, जैसे दही या छाछ को बिलोने पर उसमें से गुड-गुड़ की आवाज आती है, उसीप्रकार ये मन भी नित-नये विकल्पों में रमने की इच्छा करता हुआ शोर मचाता है। कवि ने मन की चंचलता को कई सटीक-उपमायें देकर सिद्ध किया है, जैसे नट का थाल हमेशा घूमता ही रहता है, रहट की माला या घेरा चलता ही रहता है और किसान उसी में अपना काम करता रहता है। जल की धारा में जब भँवर उठती है, तो पानी भी घूमने लगता है। जैसे कुम्हार जब मिट्टी से बर्तन बनाता है, तब कुम्हार का चाक भी घूमता ही रहता है, ठीक उसीप्रकार ये चंचल-मन भी एक क्षण के लिये शांत नहीं होता; अपितु घूमता ही रहता है। शिष्य विचार करता है ऐसा भ्रामक-मन अर्थात् इतना ज्यादा भटकनेवाला चंचल-मन शांत और स्थिरता को कैसे प्राप्त हो? वैसे भी मन की ये चंचलता कुछ समय से नहीं है, बल्कि अनादिकाल से ही ये तो इतना चंचल और वक्र अर्थात् टेढ़ा है कि हमेशा विपरीत ही परिणमन करता है।

(सवैया इकतीसा)

धायौ सदाकाल पै न पायौ कहूँ साँचौ-सुख, रूपसौं-विमुख दुःखकूप-वास बसा है।
धरमकौ धाती अधरमकौ संघाती महा-, कुरापाती जाकी संनिपात-कीसी दसा है।।
मायाकौं झपटि गहै कायसौं लपटि रहै, भूल्यौ भ्रम-भीर मैं बहीर-कौसौ ससा है।
ऐसौ मन-चंचल पताकासौ अंचल सु, ग्यानके जगेसौं निवारण-पथ धसा है।। 51।।

शब्दार्थ :- धायौ सदाकाल पै न पायौ कहूं सांचौ-सुख= हमेशा दौड़ता रहा, फिर भी सच्चा-सुख कहीं नहीं मिलता, रूपसौं विमुख दुःख-कूपवास बसा है= अपने स्वरूप से विमुख होकर दुःखरूपी कुँये में पड़ा है, धरमकौ घाती अधरमकौ संघाती= धर्म को नष्ट करनेवाला, अधर्म का संगाती/साथी, महा-कुरापाती जाकी संनिपात-कीसी दसा है= अत्यधिक-खुराफाती जिसकी स्थिति सन्निपात के रोगी जैसी है, मायाकौं झपटि गहै= रूपया-पैसा को झपटकर ग्रहण करता है, कायसौं लपटि रहै= शरीर से अनुराग रखता है, भूल्यौ भ्रम-भीर मैं= भ्रम की भीड़ में भूला/भटका हुआ है, बहीर-कौसौ ससा है= जैसे बहेलिया के चंगुल में फँसा खरगोश, ऐसौ मन चंचल= मन ऐसा चंचल है, पताकासौ अंचल= जैसे झंडे का कपड़ा, सुग्यानके जगेसौं = सम्यग्ज्ञान के, जगने से/उत्पन्न होने से, निरवाण-पथ धसा है= मोक्षमार्ग में प्रवेश करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उस स्थिति का वर्णन किया है, जो मन की चंचलता के फलस्वरूप उत्पन्न होती है। ये जीव सुबह से शाम तक सुख-प्राप्ति के लिये हरतरह के संभव और असंभव-कार्य करता है; लेकिन फिर भी आज तक इसे सुख तो दूर सच्चे-सुख की झलक तक भी नहीं मिली। मिलती भी कैसे? क्योंकि इसका सारा पुरुषार्थ तो विपरीत-दिशा में चल रहा है। सुख का निधान तो ये स्वयं है, लेकिन स्वयं से तो ये प्रतिसमय विमुख ही रहता है, और पर के सन्मुख अति-प्रीति से रहता है। इसके प्रतिफल-स्वरूप निरन्तर दुःख के कुँये में ही पड़ा रहता है। जैसे कुँये में पानी अत्यधिक-गहराई में होता है, वैसे ही ये जीव भी दुःख के गर्त में गहराई तक डूबा रहता है। स्वरूप से विमुख होने से प्रतिसमय धर्म का विरोधी रहता है, अर्थात् जो चर्चा या रास्ते आत्मसन्मुख होने में सहायक हो, उन सबका तो विरोध करता है, और पर-सन्मुख होने से अधर्म का संगी/ साथी बनता है, अर्थात् पंचेन्द्रिय के विषय-भोग, जो स्वरूप के विरोधी हैं, उनमें अति-रुचिपूर्वक प्रवर्तन करता है। महा-खुरापाती है अर्थात् हमेशा उपद्रव के बारे में ही सोचता है, समतारूप-परिणाम तो इसे सुहाते ही नहीं है। इसकी हालत सन्निपात के रोगी जैसी है अर्थात् जैसे सन्निपात का रोगी एक-क्षण के लिये भी स्थिर नहीं होता, निरन्तर काँपता ही रहता है; ठीक उसीप्रकार ये मन भी निरन्तर भटकता ही रहता है, एक-क्षण के लिए भी स्थिर नहीं होता। माया अर्थात् रुपया-पैसा, धन-संपत्ति को झपटकर ग्रहण करता है अर्थात् अन्याय, अनीति, झूठ और छल आदि जिस भी रास्ते से माया आये, वह हर रास्ता बिना बिचारे अपनाता है। प्रतिसमय देह की सुरक्षा, साज-सँवार में ही लगा रहता है, एक-क्षण के लिये भी देह से ममत्व नहीं छूटता। देह के प्रति अपनत्व के भ्रम में स्वयं को भूलकर ऐसा भ्रमता है; जैसे बहेलिये के चंगुल में फसने के बाद खरगोश छटपटाता रहता है। कविवर कहते हैं कि मन का स्वभाव इतना चंचल होता है, जैसे पताका या ध्वजा फहराने के बाद उसका कपड़ा एक समय के लिए भी स्थिर नहीं रहता है, बल्कि हिलता ही रहता है। उसीप्रकार ये मन भी भ्रमता ही रहता है। लेकिन इस चंचल-मन पर भी सम्यग्ज्ञान के द्वारा अंकुश लगाया जा सकता है, अर्थात् जब दृष्टि स्वसन्मुख होती है, तो यही मन चंचलता छोड़कर स्थिर होकर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होता है।

(दोहा)

जो मन विषै-कषायमैं, वरतै चंचल सोइ।
जो मन ध्यान-विचारसौं, रुकै सु अविचल होइ।। 52।।

तातैं विषै-कषायसौं, फेरि सु मन को बांनि।
सुद्धातम अनुभौ-विषैं, कीजै अविचल आनि।। 53।।

शब्दार्थ :- जो मन विषै-कषायमैं वरतै चंचल सोइ= जो मन विषय-भोगों और कषायों में प्रवर्तन करता है, वह चंचल होता है, जो मन ध्यान-विचारसौं रुकै सु अविचल होइ= जो मन आत्मध्यान एवं चिन्तन- मनन में रुकता है, वही अविचल/स्थिर होता है, तातैं विषै-कषायसौं फेरि सु मन को बांनि= इसलिए विषय-भोगों और कषाय से मन को फेरकर, सुद्धातम अनुभौ-विषैं कीजै अविचल आनि= शुद्धात्मा के अनुभव के विषय में स्थिर करो। विशेषार्थ :- इन दोनों छंदों में कवि ने पूर्वकथित चंचल-मन कब और कैसे स्थिर होता है? इसका बहुत ही मार्मिक और सटीक-वर्णन किया है। मानव-मन की सबसे बड़ी दुविधा यही है कि इस अतिचंचल-मन को वश में कैसे करें? वास्तव में देखा जाये, तो मन की चंचलता का प्रमुख-कारण पंचेन्द्रिय के विषयों के प्रति आकर्षण और कषाय-भावों की उत्पत्ति ही है। कैसे? जब हम अपने स्वरूप को भूलकर मोहवश इन पंचेन्द्रिय के विषयों के प्रति आकर्षित होते हैं, तो इष्ट-अनिष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है, जिसके फलस्वरूप क्रोध, मान, माया, और लोभादि कषाय-भावों में प्रवर्तन होता है। और फिर शुरू होता है उन विषयों में फेरबदल करने के पुरुषार्थ का सिलसिला, अर्थात् जो विषय हमें अच्छे और अनुकूल लगते हैं, हम उन्हें प्राप्त करने का बेजोड़-पुरुषार्थ करते हैं। और जो विषय हमें बुरे और प्रतिकूल लगते हैं, फिर हम उन्हें हटाने के लिए भी अथक-पुरुषार्थ करते हैं। देखा जाये, तो यही मन की चंचलता है, क्योंकि न तो पंचेन्द्रिय के विषयों की कोई सीमा है और न ही हमारी इच्छाओं की। इसीलिए प्रयास भी अनादिकाल से अनवरत चले आ रहे हैं; परन्तु सफलता न आज तक मिली है और न ही कभी मिलेगी; क्योंकि परद्रव्य में स्वद्रव्य/जीव का पुरुषार्थ चले ऐसी तो वस्तु220 व्यवस्था ही नहीं है। इसीलिए कविवर कहते हैं कि जब तक मन विषय-कषाय में वर्तता है, तब तक वह चंचल ही रहता है। इसीलिए यदि मन की चंचलता को रोकना है, तो जिन कारणों से वह चंचलता को प्राप्त होता है, उन कारणों को खत्म करने का पुरुषार्थ करो। जो उपयोग विषय-भोगों और कषायों में प्रवर्तन से चंचलता का नाम पाता है, उसे आत्मचिंतन, ध्यान और आत्मानुभूति में लगाओ, तो ये चंचल-मन स्वयं ही स्थिर हो जायेगा। कहने का अभिप्राय यही है कि जबतक मन पर-सन्मुख रहेगा, तबतक चंचल ही रहेगा और ज्योंही ये मन आत्म-सन्मुख होगा, त्योंही शांत और स्थिर हो जायेगा। इसीलिए कविवर कहते हैं कि इस चंचल-मन को पुरुषार्थ-पूर्वक विषय-भोगों और कषायों से हटाकर शुद्धात्मा के चिंतन, मनन, ध्यान और अनुभूति में लगाओ और स्थिर करो।

(सवैया इकतीसा)

अलख-अमूरति-अरूपी-अविनासी-अज, निराधार-निगम-निरंजन-निरंध है।
नानारूप भेस धरै भेसकौ न लेस धरै, चेतन-प्रदेस धरै चेतन को खंध है।।
मोह धरै मोहीसौं विराजै तोमैं तोहीसौं, न तोहीसौं न मोहीसौं न रागी निरबंध है।
ऐसौ चिदानंद याही घटमैं निकट तेरे, ताहि तू विचारु मन और सब धंध है।। 54।।

शब्दार्थ :- अलख-अमूरति-अरूपी-अविनासी अज= इन्द्रियों से रहित, आकार-रहित, रूप-रहित, विनाश-रहित, अजन्मा/जन्म-रहित, निराधार-निगम-निरंजन-निरंध है= (पर) आधार-रहित/स्वयं के आधार से, ज्ञानी, अंजन/कालिमा-रहित, खंड-रहित है, नानारूप भेस धरै भेसकौ न लेस धरै= विविधप्रकार के भेष धारण करता है, परन्तु रंचमात्र भी (उस) भेषरूप नहीं होता, चेतन-प्रदेस धरै चेतन को खंध है= चैतन्य-प्रदेशों को धारण करता है, चैतन्य का पिण्ड है, मोह धरै मोहीसौं विराजै तोमैं तोहीसौं= मोही से मोह करता है, शरीर में ही विराजता है, न तोहीसौं न मोहीसौं न रागी निरबंध है= न तेरे से, न मेरे से, न मोही से, न रागी से, बंधरहित है, ऐसौ चिदानंद याही घटमैं निकट तेरे= ऐसा चैतन्य-स्वरूप तेरे इसी शरीर में है, निकट तेरे ताहि तू विचारु मन= तेरे नजदीक, हे मन तू उसका ही विचार कर, और सब धंध है= और बाकी सब द्वंद/जंजाल है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने अनादिकाल से आत्मा स्वभाव से कैसा है? इसका सुन्दर और सटीक- वर्णन किया है। आत्मा ‘अलख’ यानि इन्द्रियों से रहित ‘अतीन्द्रिय-तत्त्व’ है, इसीलिए कभी इन्द्रियों के द्वारा जानने में नहीं आता, ‘अमूर्तिक’ यानि पुद््गल की तरह उसका कोई आकार नहीं है अर्थात् ‘निराकार’ है। ‘अरूपी’ यानि रूपरहित अर्थात् चक्षु से देखा जा सके- ऐसा कोई वर्ण/रूप नहीं है। ‘अविनासी’ अर्थात् आज तक आत्मा का न कभी मरण हुआ है और न हो सकता है; क्योंकि वह भी अन्य द्रव्यों की तरह ‘शाश्वत’ द्रव्य है, ‘अज’ यानि ‘अजन्मा’ है अर्थात् आत्मा का कभी जन्म नहीं होता, वह जन्म-मरण से रहित त्रिकाल शाश्वत-तत्त्व है। ‘निराधार’ अर्थात् किसी अन्य द्रव्य के आधार से नहीं, स्वयं अपने ही आधार से है, ‘निगम’ अर्थात् ज्ञान का घनपिण्ड है, ‘निरंजन’ अर्थात् मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों की कालिमा से रहित’ निर्मल-तत्त्व’ है, ‘निरंध’ अर्थात् खंडरहित एक ‘अखंड-तत्त्व’ है। यद्यपि आत्मा निराकार, अरूपी होते हुये भी विभिन्नप्रकार के भेष धारण करता है। चार गति, चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ अनेक-पर्यायों को धारण करता है, उनमें एकमेक होकर रहता है; लेकिन फिर भी आज तक आत्मा ने उस पर्याय के एक भी प्रदेश को धारण करना तो दूर, स्पर्श भी नहीं किया। चैतन्य का पिण्ड होने से हमेशा अपने चैतन्य-प्रदेशों को धारण करते हुये चैतन्यरूप ही रहा। यद्यपि यह जिस पर्याय में भी जाता है, वहाँ उस रूप ही तन्मय हो जाता है, शरीरादि पर-पदार्थों से मोह करता हुआ दिखाई देता है, राग-द्वेष-मोह के परिणामों से लिप्त दिखाई देता है; लेकिन फिर भी स्वभाव से हमेशा राग-रहित वीतरागी और कर्मबंध से रहित निर्बंध ही रहता है। क्योंकि जो भी विकार या बंधनरूप-अवस्था है, वह न तो जीव के स्वभाव में है और न ही पुद््गल के स्वभाव में, अपितु जीव और पुद््गल इन दोनों के संयोग से उत्पन्न पर्यायरूप है। हे आत्मन्! ऐसा वीतरागी, निर्बंध, आनंद का घनपिण्ड अजर-अमर अविनाशी-तत्त्व कहीं दूर नहीं; बल्कि तेरे नजदीक इस घट में ही विराजमान है, तूँ मात्र उसी का चिंतन-मनन और विचार कर; क्योंकि शेष चेतन या अचेतन सभी पदार्थ तो जंजाल यानि मोह-जाल के समान है। जिसमें एकबार फँसे, तो छूटना बहुत मुश्किल है।

(सवैया इकतीसा)

प्रथम सुदृष्टि में शरीर-रूप कीजै भिन्न, तामैं और सूच्छम-सरीर भिन्न मानिये। अष्टकर्म-भाव की उपाधि सोऊ कीजै भिन्न, ताहूमैं सुबद्धि

ु कौ विलास भिन्न जानिये।।
तामैं प्रभु-चेतन विराजत अखंडरूप, वहै श्रुतग्यान के प्रवांन उर-आनिये।
वाही कौ विचार करि, वाहीमैं मगन हूजै, वाकौ पद साधिवेकौ ऐसी विधि ठानिये।। 55।।

शब्दार्थ :- प्रथम सुदृष्टि में शरीररूप कीजै भिन्न= पहले सम्यक्-दृष्टि से शरीर यानि स्थूल-शरीर से (स्वयं को) भिन्न करो, तामैं और सूच्छम-सरीर भिन्न मानिये= उसमें और सूक्ष्म-शरीरों को भी भिन्न मानो, अष्टकर्म भाव की उपाधि सोऊ कीजै भिन्न= आठों-कर्मों के उपाधिरूप-भाव उनको भी भिन्न करो, ताहूमैं सुबुद्धिकौ विलास भिन्न जानिये= उसमें भी भेदविज्ञान से भी स्वयं को भिन्न जानो, तामैं प्रभु-चेतन विराजत अखंडरूप= उसमें भगवान् आत्मा अखंडरूप से विराजमान है, वहै श्रुतग्यान के प्रवांन उर आनिये= उसे श्रुतज्ञान से प्रमाणित करके अंतरंग में धारण करो, वाही कौ विचार करि वाहीमैं मगन हूजै= उसी का विचार करो, उसी में लीन होओ, वाकौ पद साधिवेकौ ऐसी विधि ठानिये= उसका/उस पद को प्राप्त करने के लिए यह विधि अपनानी चाहिए। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने भेदविज्ञान की कला का बहुत ही सुंदर-विवेचन किया है, क्योंकि हम सभी जीव सुखी होना चाहते हैं, और आगम के अनुसार सच्चे-सुख को प्राप्त करने का सर्वप्रथम-उपाय यही है कि स्व-पर में अथवा देह और आत्मा में भिन्नता भासित हो। कैसे? आगम में शरीर के पाँच भेद माने गये हैं- औदारिक, वैक्रियक, आहारक, तैजस और कार्मण। इनमें से प्रथम तीन-शरीरों को स्थूल माना गया है, क्योंकि ये इन्द्रियों से दिखाई देते हैं। और अंतिम दोनों शरीरों को सूक्ष्म-शरीर माना गया है, क्योंकि वे इन्द्रियों से दिखाई नहीं देते, इनमें से औदारिक के साथ तैजस और कार्माण- ये तीन शरीर मनुष्यों और तिर्यंचों को और वैक्रियक के साथ तैजस और कार्मणशरीर देव और नारकी को प्राप्त होता है। और आहारक-शरीर विशेषरूप से ऋद्धिधारी-मुनिराजों के औदारिक, तैजस और कार्माण के साथ प्राप्त होता है। अब सर्वप्रथम सम्यक्-दृष्टि से स्थूल-शरीर यानि औदारिक, वैक्रियक और आहारक (जो जिसको प्राप्त है) से स्वयं को भिन्न जानो, यानि मैं इस प्राप्त देह से सर्वथा-भिन्न चेतन भगवान्-आत्मा हूँ,- ऐसा दृढ़-निश्चय करो। फिर दूसरे नंबर पर सूक्ष्म-शरीर तैजस, कार्माण जो सभी के होता है, उससे भी स्वयं को भिन्न मानो, अर्थात् पुद््गल के पिण्ड-स्वरूप आठों कर्मों से रहित निष्कर्म और देहादिक के तेज से पूर्णत: रहित अनंत आत्मिक-तेज का धारी चैतन्य-रत्नाकर हूँ। फिर आठों-कर्मों के उपाधिजनित-भावों अर्थात् इनके निमित्त से होनेवाले मोह-राग-द्वेष आदि औपाधिक-भावों से भी स्वयं को भिन्न करो, भले ही ये भाव मेरी ही भूल से उत्पन्न होते हैं; परन्तु ये गुलाब के साथ उगनेवाले काँटों के समान सदैव त्याज्य हैं; क्योंकि ये मेरा स्वभाव नहीं है, संयोगी और विकारी-भाव हैं। और फिर उस सुबुद्धि के विलास अर्थात् क्षयोपशम-ज्ञान के वे विकल्प, जिनसे हम अभी तक स्वयं को पर से भिन्न अनुभव कर रहे थे, उन विकल्पों को भी स्वयं से भिन्न जानो और मानो, क्योंकि किसी भी प्रकार का विकल्प हो, वह अात्मानुभूति में बाधक ही है। । हे आत्मन्! प्राप्त देह-देवालय में चेतन-पदार्थ भगवान्-आत्मा अखंडरूप से विराजमान है, उसे श्रुतज्ञान, नय, निक्षेप आदि से प्रमाणित करके अर्थात् निर्णय करके हृदय में धारण करो। और फिर उसी स्वात्मा का चिंतन करो, मनन करो, ध्यान करो और उसी में लीन हो जाओ। यदि सच में तुम सुखी होना चाहते हो, अर्थात् मोक्ष-स्वरूप आत्मपद प्राप्त करना चाहते हो, तो भेदविज्ञान की यह विधि अपनानी ही चाहिए।

(चौपाई)

इहविधि वस्तु-व्यवस्था जानै, रागादिक निज-रूप न मानै।
तातैं ग्यानवंत जगमाँही, करम-बंध को करता नाहीं।। 56।।

शब्दार्थ :- इहविधि वस्तु-व्यवस्था जानै= इसप्रकार वस्तु-व्यवस्था को जानते हैं, रागादिक निज-रूप न मानै= राग-द्वेष आदि विकारों को अपना स्वरूप नहीं मानते, तातैं ग्यानवंत जगमांही= इसीलिए ज्ञानी-जीव जगत् में, करम-बंध को करता नाहीं= कर्म-बंधन के कर्त्ता नहीं बनते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने बहुत ही संक्षेप में स्पष्ट किया कि स्वतंत्र वस्तु-व्यवस्था में प्रवर्तन करते हुए भी ज्ञानी-जीव निर्बंध क्यों रहते हैं? यहाँ वस्तु-व्यवस्था से तात्पर्य है- छह-द्रव्यों के समूह इस विश्व में सभी द्रव्य पूर्ण-स्वतंत्र हैं, स्वभाव से भी सभी पूर्णत: भिन्न-भिन्न हैं, कोई किसी के आधीन नहीं है; इसीलिए सभी अपने-अपने स्वभाव के अनुसार सहज और स्वतंत्र-परिणमन भी करते हैं- यही जगत् की स्वतंत्र और स्व-संचालित वस्तु-व्यवस्था है। ज्ञानी-जीव इसी सहज, स्व-संचालित वस्तु-व्यवस्था को स्वीकार करते हैं और तदनुरूप ही आचरण करते हैं, इसीलिये निर्बंध रहते हैं, कर्मबंधन का दण्ड उनको प्राप्त नहीं होता है। वहीं अज्ञानीजीव इस स्वतंत्रता को न मानकर सभी द्रव्यों को आपस मिलाकर अपनी मन-मर्जी से कार्य करने का अपराध करता है, फलस्वरूप कर्मबंधनरूप दण्ड को प्राप्त होता है। इसीप्रकार मोह, राग, द्वेष आदि विकारी-भाव भी तेरा स्वभाव-भाव नहीं हैं, पर के संयोग से होनेवाले विकार हैं; उन्हें भी स्वयं से भिन्न मानो, जैसा कि ज्ञानी-जीव मानते हैं और निर्बंध रहते हैं; क्योंकि दु:ख और कर्मबंध का कारण एकमात्र मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भाव ही हैं, अन्य कुछ भी नहीं।

(सवैया इकतीसा)

'ग्यानी भेदज्ञानसौं विलेछि पुदगल-कर्म, आतमीक-धर्मसौं निरालौं करि मानतौ।
ताकौ मूल-कारन असुद्ध-रागभाव ताके, नासिबैकौ सुद्ध-अनुभौ-अभ्यास ठानतौ।।
याही अनुक्रम पररूप-सनबंध त्यागि, आपमाँहि अपनौ-सुभाव गहि आनतौ।
साधि-सिवचाल निरबंध होत तिहूँ-काल, केवल-विलोक पाइ लोकालोक जानतौ।। 57।।

शब्दार्थ :- ग्यानी भेदज्ञानसौं विलेछि पुदगल-कर्म= ज्ञानी-जीव भेदज्ञान से पुद््गल-कर्म को भिन्न करके, आतमीक-धर्मसौं निरालौं करि मानतौ= आत्मस्वभाव को निराला/भिन्न मानते हैं, ताकौ मूल-कारन असुद्धरागभाव= उसका मूल-कारण अशुद्ध रागादि-भाव, ताके नासिबैकौ= उनको नष्ट करने के लिए, सुद्ध-अनुभौअभ्यास ठानतौ= शुद्ध-अनुभव का अभ्यास करते हैं, याही अनुक्रम पररूप-सनबंध त्यागि= इसी प्रक्रिया से पर-पदार्थों से संबंध त्यागकर आपमांहि अपनौ-सुभाव गहि आनतौ= स्वयं में अन्य को हटाकर अपना स्वभाव ग्रहण करते हैं, साधि-सिवचाल निरबंध होत तिहूं काल= मोक्षमार्ग को साधते हुए तीनों-काल बंधन-रहित होते हैं, केवल-विलोक पाइ लोकालोक जानतौ= केवलज्ञान प्राप्त कर लोक और अलोक को जानते हैं। विशेषार्थ :- सहज, स्व-संचालित वस्तु-व्यवस्था और भेदविज्ञान की सम्यक्-प्रक्रिया का वर्णन करते हुये इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि ज्ञानी-जीव कैसे इस क्रिया को अपनाते है? और उनको इस क्रिया का क्या प्रतिफल मिलता है? भेदज्ञान की सम्यक्-प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए ज्ञानी-जीव सर्वप्रथम पुद््गल-कर्म या ज्ञानावरणादि पुद््गल-परमाणुओं का पिण्ड जो आत्मा के प्रदेशों के साथ एकक्षेत्रावगाह-रूप से विद्यमान है, जिसे हम द्रव्य-कर्म कहते हैं; उनको आत्मीक-धर्म अर्थात् आत्म-स्वभाव से पूर्णत: भिन्न मानते हैं। और इन द्रव्य-कर्मों के मूलभूत-कारण अशुद्ध-भाव अर्थात् मोह, राग, द्वेषादि विकारी-भावरूप भावकर्म को नष्ट करने के लिये शुद्ध-स्वभावी आत्मा के अनुभव का अभ्यास करते हैं। यहाँ कवि ने परिणामों के दो भेद किये हैं- शुद्ध और अशुद्ध, क्योंकि यहाँ लक्ष्य आत्मानुभूति का है, और आत्मानुभूति की दृष्टि से शुभ और अशुभ दोनों ही परिणाम बाधक होने से अशुद्ध है। इसी अनुक्रम से कवि का तात्पर्य पूर्वोक्त 54 नं छंद में वर्णित भेदविज्ञान की क्रिया से है। उस प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए ज्ञानी-जीव देहादिक पर-पदार्थों से संबंध अर्थात् ममत्व-बुद्धि त्यागकर, कर्म-बंध के कारण अर्थात् मोह, राग, द्वेष आदि विकारी-भावों को समूल-नष्ट करते हुए अपने आत्मस्वभाव को ग्रहणकर स्वरूप में पूर्णरूप से लीनता का पुरुषार्थ करते हैं। इसप्रकार मोक्षमार्ग को साधते हुये हमेशा के लिए घातिया-कर्मों से रहित होकर केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, और लोकालोक को जानते हैं, अर्थात् ज्ञान की पूर्ण-निर्मलता होने से लोकालोक सहज जानने में आता है।

(सवैया इकतीसा)

जैसें कोऊ मनुष्य अजान महाबलवान, खोदि मूल-वृच्छकौं उखारै गहि बाहूसौं।
तैंसें मतिमान दर्वकर्म-भावकर्म त्यागि, ह्वै रहै अतीत मति ग्यानकी दशाहूसौं।।
याही क्रिया अनुसार मिटै मोह-अंधकार, जगै जोति-केवल प्रधान सविताहूसौं।
चुकै न सकतीसौं, लुकै न पुद््गलमाँहि, धुकै मोख-थलकौं, रुकै न फिर काहूसौं।। 58।।

इतालोच्य विवेच्य तत्किल परद्रव्यं समग्रं बलात्, तन्मूलां बहुभाव-सन्ततिमिमामुद्धर्तुकामः समम्। आत्मानं समुपैति निर्भरवहत्पूर्णैकसंविद्युतम्, येनोन्मूलित-बन्ध एष भगवानात्मामनि स्फूर्जति।। 16।। रागादीनामुदयमदयं दारयत्कारणानां, कार्यं बन्धं विविधमधुना सद्य एव प्रणुद्य। ज्ञानज्योतिः क्षपित-तिमिरं साधु सÂन्नद्धमेतत्, तद्वद्यद्वत्प्रसरमपरः कोऽपि नास्यावृणोति।। 17।। शब्दार्थ :- जैसें कोऊ मनुष्य अजान महाबलवान= जैसे कोई मनुष्य, अज्ञानी व महाबलशाली, खोदि मूल-वृच्छकौं उखारै गहि बाहूसौं= वृक्ष की जड़ को खोदकर बाँहों से पकड़कर उखाड़ता है, तैंसें मतिमान दर्वकर्म-भावकर्म त्यागि= वैसे बुद्धिमान् द्रव्यकर्म, भावकर्म को त्यागकर, ह्वै रहै अतीत मतिग्यानकी दशाहूसौं= मतिज्ञान की दशा से अतीत हो रहे हैं, याही क्रिया-अनुसार= इसी प्रक्रिया से, मिटै मोहअंधकार= मोह का अंधकार मिटता है, जगै जोति-केवल= केवलज्ञान-ज्योति जागृत होती है, प्रधान सविताहूसौं= सूर्य से भी श्रेष्ठ, चुकै न सकतीसौं= किसी भी शक्ति से चूकता नहीं है, लुकै न पुद््गलमाँहि= पुद््गल से छिपता नहीं है, धुकै मोख-थलकौं= मोक्ष-स्थल पर गमन करता है, रुकै न फिर काहूसौं= फिर किसी के रोके नहीं रुकता। विशेषार्थ :- बंध-द्वार की पूर्णता, और कर्मबंधन से छूटने का सर्वश्रेष्ठ उपाय भेदज्ञान की सामर्थ्य और फल का सटीक-वर्णन कवि ने उपर्युक्त-छंद में किया है। दु:ख का मूलकारण मोह, राग, द्वेष आदि भावकर्म और उसके निमित्त से बँधनेवाले ज्ञानावरणादि आठों द्रव्यकर्म हैं। और इन कर्मों से छूटने का एकमात्र-उपाय भेदविज्ञान ही है, जिसका बहुत ही सुन्दरवर्णन कवि ने पिछले छंदों में किया। अब इस-छंद में विश्वास दिलाया कि जीव यदि भेदविज्ञान के बल से कर्मों का क्षय करता है, तो वह अनंतकाल के लिए सुखी हो सकता है, भेदज्ञान की ऐसी सामर्थ्य या फल है। जैसे कोई अज्ञानी हो, परन्तु शारीरिक-दृष्टि से महाबलशाली हो, वह विशाल-वृक्ष को जड़सहित खोदकर अपने बाहुबल से उखाड़कर फेंक देता है; ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव क्षयोपशम की दृष्टि से भले ही अल्पज्ञानी हो पर भेदज्ञान के महानबल से द्रव्यकर्म और भावकर्म को नष्टकर रीते यानि कर्मों के भार से मुक्त होते हैं। कहने का अभिप्राय यही है कि शास्त्रज्ञान भले ही अल्प हो, पर स्वयं का अर्थात् निजात्मा का श्रद्धान-ज्ञान सम्यक् हो, तो वह जीव भेदज्ञान के बल से ही समस्त कर्मों का क्षय कर सकता है। स्व-पर के भेदविज्ञान की इसी प्रक्रिया से मोहरूपी-अंधकार नष्ट हो जाता है अर्थात् गहनअंधकारवत् मोहनीय-कर्म का पूर्ण-क्षय हो जाता है। और सूर्य के प्रकाश से भी श्रेष्ठ-ज्योति का पुंज केवलज्ञान प्रगट होता है। यद्यपि सूर्य के प्रकाश और केवलज्ञान के प्रकाश में जातिगत-समानता नहीं है; क्योंकि सूर्य का प्रकाश पुद््गल का परिणमन है और केवलज्ञान जीव के ज्ञान-गुण का परिणमन है, अर्थात् एक अचेतन और दूसरा चेतन, परन्तु जगत् में सूर्य के प्रकाश को ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है,सो कवि ने यहाँ सूर्य के प्रकाश की तुलना केवलज्ञान से की है, लेकिन यह मात्र उदाहरण से सिद्धांत का प्रतिपादन है। केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद फिर वह प्रगट-ज्ञानशक्ति कभी चूकती नहीं है अर्थात् समाप्त नहीं होती, केवलज्ञान सादि-अनंतकाल तक प्रगट रहता है। उसके बाद वह ज्ञानशक्ति द्रव्यकर्म और भावकर्मरूपी किसी भी आवरण से छिपती या ढँकती भी नहीं है, सदाकाल प्रकाशित रहती है और वह जीव सीधा मोक्षमहल की ओर गमन करता है, किसी के रोकने पर भी नहीं रुकता अर्थात् मोक्ष प्राप्त करता है।

मोक्ष द्वार (९) | भाग १/२

(नवम-अधिकार)

(दोहा)

बंध-द्वार पूरौ भयौ, जो दुःख-दोष निदान।
अब वरनौं संक्षेपसौं, मोख-द्वार सुखथान।। 1।।

शब्दार्थ :- बंध-द्वार पूरौ भयौ= बंध-द्वार पूरा हुआ, जो दुख-दोष निदान= जो दुःख और दोष का कारणभूत है। अब वरनौं संक्षेपसौं= अब संक्षेप में वर्णन करता हूँ, मोख-द्वार सुखथान= सुख के स्थान मोक्ष-द्वार का। विशेषार्थ :- इसके पहले बंध-द्वार में कवि ने दुःख के मूल-कारण कर्म-बंधन के स्वरूप का तथा कर्मों से छूटने का विस्तार से बहुत ही सुंदर-वर्णन किया। अब आगे के अधिकार में सुख का कारणभूत मोक्षपदार्थ का सुंदर-वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हैं; क्योंकि कर्मबंधन से छूटने के बाद ही जीव अविनाशी, त्रिकाल, शाश्वत मोक्ष-सुख को प्राप्त करता है।

(सवैया इकतीसा)

भेदग्यान-आरासौं दुफारा करै ग्यानी-जीव, आतम-करम-धारा भिन्न-भिन्न चरचै।
अनुभौ-अभ्यास लहै परम-धरम गहै, करम-भरमकौ खजानो खोलि चरचै।।
यौंही मोख-मुख धावै केवल निकट आवै, पूरन-समाधि लहै परमकौ परचै।
भयौ निरदौर याहि करनौ न कछु और, ऐसौ विश्वनाथ ताहि बनारसी अरचै।। 2।।

शब्दार्थ :- भेदग्यान-आरासौं दुफारा करै ग्यानी-जीव= ज्ञानी-जीव भेदज्ञानरूपी करोंत से दो टुकड़े करते हैं, आतम-करम-धारा भिन्न-भिन्न चरचै= आतम-धारा और करम-धारा दोनों को अलग-अलग जानते हैं, अनुभौ-अभ्यास लहै परम-धरम गहै= अनुभव का अभ्यास प्राप्त करते हैं, सर्वश्रेष्ठ-धर्म को ग्रहण करते हैं, करम-भरमकौ खजानो खोलि खरचै= कर्म (द्रव्यकर्म) और भावकर्म का खजाना खोलकर खर्च/निर्जरा करते हैं, यौंही मोख-मुख धावै केवल निकट आवै= इसीप्रकार मोक्ष के सन्मुख दौड़ते हैं, केवलज्ञान पास आता है, पूरन-समाधि लहै परमकौ परचै= पूर्ण-समाधि को प्राप्त करते हैं, फिर परमात्म-पद को प्राप्त करते हैं, भयौ निरदौर याहि करनौ न कछु और= (स्वरूप में) स्थिर होते हैं, जैसे कुछ और करना शेष नहीं रहा, ऐसौ विश्वनाथ ताहि बनारसी अरचै= ऐसे विश्वनाथ अर्थात् तीनों-लोकों के स्वामी, उनको बनारसीदास अर्चन/ वंदन करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन जीवों को वंदन किया है, जो भेदविज्ञान के बल पर आत्मा और कर्मों को भिन्न करते हैं। जैसे करोंत (आरा मशीन) के सामने कितनी भी मोटी-लकड़ी रखी जाये, वह उसके दुफारा यानि उसे फाड़कर दो टुकड़े कर देती है; ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव भेदज्ञानरूपी करोंत से आत्मधारा और कर्मधारा दोनों को भिन्न कर देते हैं अर्थात् स्व और पर या आत्मा को कर्मादि-विकार से भिन्न-भिन्न अनुभव करते हैं। स्व और पर में भिन्नता भासित होने पर स्व अर्थात् आत्मानुभवरूप

द्विधाकृत्य प्रज्ञा-क्रकच-दलनाद्-बन्धपुरुषौ, नयनमोक्षं साक्षात्पुरुषमुपलम्भैक-नियतम्।
इदानीमुन्मज्जत्सहज-परमानन्द-सरसं, परं पूर्णं ज्ञानं कृत-सकलकृत्यं विजयते।। 1।।

स्वरूप में स्थिरता का अभ्यास करते हैं, और परमधर्म या रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को प्राप्त करते हैं। और ज्ञानावरणादि-द्रव्यकर्म और मोह-राग-द्वेष आदि भावकर्म काे खजाना खोलकर खर्च करते हैं अर्थात् कर्मों का तीव्रता से क्षय करते हैं। ज्यों-ज्यों कर्मों का क्षय होता जाता है, त्यों-त्यों जीव मोक्ष के सन्मुख दौड़ता है, तब केवलज्ञान निकट आने लगता है, और साधक-जीव पूर्ण-समाधि अर्थात् स्वरूप में पूर्ण-स्थिरता करते हुये परमपद अर्थात् परमात्मपद को प्राप्त कर लेता है। संसार का परिभ्रमण समाप्त होने से कुछ भी करना शेष नहीं रहता, इसलिए कृतकृत्य होता है। ‘निरदौर’ अर्थात् अनंतकाल के लिये स्थिरता को प्राप्त होते हैं; क्योंकि अब पुन: जन्म-मरण का अभाव होने से अनंतकाल तक सिद्धालय में विराजमान रहेगें। ऐसे विश्व के नाथ यानि ऊर्ध्व, मध्य और अधो तीनों-लोकों के स्वामी त्रिलोकपूज्य वीतरागी परमात्मा तीर्थंकर देव को मैं बनारसीदास वंदन या अर्चन करता हूँ।

(सवैया इकतीसा)

काहू एक जैनी सावधान ह्वै परम-पैनी, ऐसी बुद्धि-छैनी घटमाँहि डार दीनी है।
पैठी नोकरम भेदि दरव-करम छेदि, सुभाउ-विभाउताकी संधि सोधि लीनी है।।
तहाँ मध्यपाती होय लखी तिन धारा दोय, एक मुधामई एक सुधारस भीनी है।
मुधासौं विरचि सुधा-सिंधुमैं मगन भई, ऐती सब क्रिया एक-समै-बीचि कीनी है।। 3।।

शब्दार्थ :- काहू एक जैनी सावधान ह्वै परम-पैनी= कोई एक जैनी ने सावधान होकर अत्यधिक-पैनी, ऐसी बुद्धि-छैनी घटमाँहि डार दीनी है= ऐसी बुद्धिरूपी/प्रज्ञारूपी छैनी अपने हृदय/अंतरंग में डाल दी है, पैठी नोकरम भेदि दरव-करम छेदि= नोकर्म को भेदकर, द्रव्य-कर्म को छेदकर (अंतरंग में) घुसी है, सुभाउ-विभाउताकी संधि सोधि लीनी है= स्वभाव और विभाव के भेद को पहचान लिया, तहाँ मध्यपाती होय लखी तिन धारा दोय= वहाँ मध्यस्थ होकर उसने दो धारा देखी, एक मुधामई सुधारस भीनी है= अज्ञानमयी, एक अमृतरस में भीगी हुई, मुधासौं विरचि सुधासिंधुमैं मगन भई= अज्ञान को छोड़कर, अमृत-समुद्र में लीन हुआ, ऐती सब क्रिया एक समै बीचि कीनी है= इतनी सब क्रिया एक समय में ही की गयीं हैं। विशेषार्थ :- एक सम्यग्ज्ञानी-जीव कैसे नोकर्म, द्रव्यकर्म और भावकर्म से भिन्न निजात्मा का साक्षात्कार करता है?- इसका बहुत ही सुंदर और सटीक-चित्रण कवि ने इस छंद में किया है। साथ ही यह मूक-संदेश भी दिया कि हम भी जब चाहें, तब इस प्रक्रिया को अपनाकर स्वानुभूति कर सकते हैं। जैसे एक लुहार लोहे की बहुत पैनी-छैनी को लकड़ी की संथि पर रखकर जैसे ही चोट करता है, उस लकड़ी के दो टुकड़े हो जाते हैं, वैसे ही एक जैनी स्व-पर का भेदविज्ञान करता है। यहाँ प्रश्न उठता है कि कवि ने ‘जैनी’ यह संबोधन क्यों किया? क्योंकि जो जीव मोक्षमार्ग के दिग्दर्शक जिनेन्द्रदेव का अनुयायी है, वही सच्चा-जैन है, और वही उनका अनुयायी होने से उपर्युक्त मुक्ति के मार्ग का अनुसरण करता है। उपर्युक्त विवेचित ऐसा कोई जैनी सावधान होकर अर्थात् विवेकपूर्वक अति-पैनी बुद्धि अर्थात् प्रज्ञारूपी-छैनी को अंतस्/अंतरंग में डालता है, जैसे ही वह प्रज्ञा-छैनी अंतस् में प्रवेश करती है, तो सर्वप्रथम नोकर्म को भेदती है। नोकर्म अर्थात् सबसे पहले देहादिक बाह्य-पदार्थों से ममत्वबुद्धि छूटती प्रज्ञाछेत्री शितेयं कथमपि निपुणैः पातिता सावधानैः, सूक्ष्मेऽन्तःसन्धिबन्धे निपतति रभसादात्म-कर्मोभयस्य। आत्मानं मग्नमन्तःस्थिर-विशद-लसद्धाम्नि चैतन्यपूर,े बन्धं चाज्ञानभावे नियमितमभितः कुर्वती भिन्नÂभिन्नौ।। 2।। है, पश्चात् ज्ञानावरणादि-द्रव्यकर्म को छेदकर अर्थात् कर्मों का वह आवरण जो अनादिकाल से चेतनआत्मा को ढँके हुये हैं, ऐसी पौद््गलिक कार्माण-वर्गणाओं से स्वयं को भिन्न अनुभव करता है। पश्चात् मोह, राग, द्वेष आदि विकारी-भावरूप विभाव-परिणति और ज्ञान-दर्शन चेतनतारूप स्वभाव-परिणति की संधि से साक्षात्कार होता है, और स्वभाव और विभावरूप दो धारायें दिखती है। जिनमें से एक धारा अज्ञान की, जो अनादिकाल से जीव को मोहित या भ्रमित किये हुये है, और दूसरी धारा ज्ञानामृतरूपी अमृत-सिंधु की, जो अतीन्द्रिय-सुख का वेदन कराती है। तब वह जीव अज्ञानधारा को छोड़कर ज्ञानमयी-धारा को ग्रहणकर स्वरूप के रसास्वादन में मगन हो जाता है। कविवर कहते हैं कि इस सारी प्रक्रिया में जीव को मात्र एक-समय ही लगता है और उस एक-समय में वह जीव लकड़ी के दो टुकड़ों की तरह जड़ और चेतन की भिन्नता की दृष्टि को प्राप्त होता है अर्थात् अज्ञान की निर्वृित्त एवं अनुभूति/ज्ञान की प्राप्ति में कालभेद नहीं है।

(दोहा)

जैसे छैनी-लोह की, करै एकसौं दोइ।
जड़-चेतन की भिन्नता, त्यों सुबुद्धिसौं होइ।। 4।।

शब्दार्थ :- जैसे छैनी लोह की= जैसे लोहे की छैनी, करै एकसौं दोइ= एक जैसे दो टुकड़े करती है, जड़चेतन की भिन्नता त्यों= उसीप्रकार जड़ और चेतन का पृथक्करण, सुबुद्धिसौं होइ= सम्यग्ज्ञान से होता है। विशेषार्थ :- इस छंद में सुबुद्धि/सम्यग्ज्ञान की महिमा को वर्णित किया गया है। जैसे एक लोहे की छैनी लकड़ी के दो समान टुकड़े कर देती है, ठीक उसी प्रकार सुबुद्धिरूपी पैनी-छैनी से जीव जड़ और चेतन को भिन्न करता है, अर्थात् देह से भिन्न आत्मा का अनुभव करता है।

(घनाक्षरी)

धरति धरम-फल, हरति करम-मल, मन-वच-तन-बल करति समरपन।
भखति-असन सित चखति रसन-रित, लखति-अमित वित करि चित-दरपन।।
कहति मरम-धुर, दहति भरम-पुर, गहति परम-गुर उर-उपसरपन।
रहति जगति-हित, लहति भगति-रति, चहति अगति-गति यह मति-परपन।। 5।।

शब्दार्थ :- धरति धरम-फल= धर्म-फल को धारण करती है, हरति करम-मल= कर्मों की गंदगी का हरण करती है, मन-वच-तन-बल करति समरपन= मन, वचन, काया तीनों बलों का समर्पण करती है, भखतिअसन सित चखति रसन-रित= रसना-इन्द्रिय से स्वाद लिये बिना एकबार भोजन करती है, लखति अमित वित-करि चित-दरपन= अनंत-संपत्ति को चित्तरूपी-दर्पण में देखती है, कहति मरम-धुर= मर्म की बात कहती है, दहति भरम-पुर= भ्रम के नगर का विनाश करती है, गहति परम-गुर उर-उपसरपन= परमगुरु (की देशना) ग्रहण करती है, चित्त में (उस देशना के प्रतिपाद्य से) निकटता लाती है, रहति जगति-हित लहति भगति-रति= जगत् की हितकारी रहती है, भक्ति में अनुराग रखती है, चहति अगति-गति यह मति-परपन= अगति अर्थात् गतिरहित पंचमगति (मुक्ति) को चाहती है,- यह उस बुद्धि/प्रज्ञा का प्रताप है। विशेषार्थ :- जहाँ कवि ने पिछले-छंद में ‘सुबुद्धि’ को एक तीक्ष्ण-छैनी कहा था, और स्पष्ट किया था कि इस छैनी से जीव और पुद््गल को भिन्न-भिन्न किया जाता है, वहीं इस छंद में उस सुबुद्धि का और क्या प्रताप है? उसको बहुत ही सरल-शब्दों में स्पष्ट किया है। ‘सुबुद्धि’ अर्थात् सम्यग्ज्ञान धर्म-फल को धारण करता है अर्थात् सुबुद्धि से ही आत्मधर्म का ग्रहण होता है, जिससे कर्मरूपी-मल का हरण होता है अर्थात् समस्त-कर्मों का क्षय होता है। जबतक जीव को सुबुद्धि की प्राप्ति नहीं होती, तबतक तीनों बलों की चंचलता बनी रहती है, जैसे ही सुबुद्धि की प्राप्ति होती है, वैसे ही जीव मन, वचन और काया तीनों को मोक्षमार्ग में समर्पित करता है, या कहें कि तीनों की एकाग्रता सुबुद्धि से ही संभव है। सुबुद्धि/सम्यग्ज्ञान होने पर जीव रसना-इन्द्रिय का उपयोग किये बिना ही निरन्तर-ज्ञानामृत का स्वादिष्ट-भोजन करता है; क्योंकि रसना-इन्द्रिय तो जड़-पदार्थों के स्वाद को ग्रहण करती है, चैतन्य के रस का स्वाद-ग्रहण करने की सामर्थ्य रसना-इन्द्रिय में नहीं है। साथ ही सुबुद्धि अपने चैतन्य-गुणों की अनंत-संपत्ति को अपने चित्तरूपी-दर्पण में देखती है अर्थात् अपने सम्यग्ज्ञान से निजात्मा के अनंत-गुणों का वेदन करते है। सम्यग्ज्ञान होने पर जीव को केवल स्वात्मा की ही चर्चा सुहाती है, इसलिए वह जीव स्वयं के लिये भी और भव्यजीवों के लिये भी आत्महित की ही चर्चा करते हैं। जैसे अग्नि की एक चिंगारी भी सब कुछ जलाकर राख कर देती है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञान/ सुबुद्धिरूपी-चिंगारी के द्वारा मिथ्यात्वरूपी-भ्रम के संपूर्ण-नगर का दहन हो जाता है। भ्रम दूर होने से वह जीव गुरु की देशना को ग्रहणकर हृदय में धारण करता है और चित्त को स्थिर करता है। वह सुबुद्धि सदैव जगत् के जीवों के हित की बात करने से जगत् के लिये हितकारी रहती है। निरन्तर बाह्य में पंच-प्रभु की भक्ति एवं अंतरंग में चैतन्य-प्रभु की भक्ति में अनुराग रखती है। तथा अगति अर्थात् चारों गतियों से परे सिद्धगति/मोक्षपुरी की चाह रखती हैं इसलिये ज्ञानी जीव निरन्तर मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं- ये सुबुद्धि का ही प्रताप या विलास है।

(सवैया इकतीसा)

राणाकौसौ बाना-लीनै आपा-साधै थाना चीनै, दाना-अंगी नाना-रंगी खाना-जंगी जोधा है।
मायाबेली जेती तेती रेतैमैं धारेती सेती, फंदाहीकौ कंदा खोदै खेतीकौसौ लोधा है।।
बाधा-सेती हांता लोरै राधा-सेती ताँता जोरै, बाँदी-सेती नाता तोरै चाँदी-कौसौ सोधा है।
जानै जाही ताही नीकै मानै राही पाही पीकै, ठानै बातैं डाही ऐसौ धारावाही-बोधा है।। 6।।

शब्दार्थ :- राणा-कौसौ बाना लीनै= राणा के जैसा वेश धारण किया, आपा-साधै थाना-चीनै= अपने को साधता है, अपने स्थान/देश/स्वरूप को पहिचानता है, दाना-अंगी नाना-रंगी= प्रतापी, विविध-रंगों से सहित, खाना-जंगी जोधा है= भयंकर-युद्ध का योद्धा है, माया-बेली जेती तेती= मायारूपी जितना लोहा है, उतना, रेतैमैं धारेती सेती = रेती से घिसने में, फंदा हीकौ कंदा खोदै= फंदेरूप कांस की जड़ को खोदने में, खेती-कौसौ लोधा है= खेती करनेवाले किसान के समान है, बाधा-सेती हांता लोरै= दुःख /क्लेश आदि से अलग करता है, राधा-सेती ताँता जोरै= राधिकारूपी सुमति से प्रेम करता है, बाँदी-सेती नाता तोरै= कुमतिरूपी दासी से संबंध तोड़ता है, चाँदी-कौसौ सोधा है= चाँदी को सोधनेवाले के समान, जानै जाही ताही नीकै मानै= जिसे जानता है, उसे अच्छा मानता है, राही पाही पीकै= प्यासा-राहगीर पानी पीकर, ठानै बातैं डाही= होशियारी की बातें करता है, ऐसौ धारावाही-बोधा है= ऐसा ही अनवरत-ज्ञानी है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने बहुत ही सुंदरता से सम्यग्ज्ञानी-जीव और एक राजा में साम्य वर्णित किया है। सम्यग्ज्ञानी-जीव ने राणा अर्थात् युद्धवीर-राजा का वेश धारण किया है, जैसे राजा अपने राज्य और लोगों की सुरक्षा के लिये प्रतिसमय अपने परिणामों की संभाल करता है कि कहीं कुछ गलत न हो जाये, ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानी-जीव यद्यपि स्वात्मा का श्रद्धान तो अडिग है; लेकिन फिर भी चारित्र-संबंधी-विकारों की मलिनता कहीं उपयोग को मलिन न कर दे, सो निरन्तर अपने परिणामों की संभाल करते हैं। जैसे राजा अपने राज्य के हर-क्षेत्र व पदार्थ को भलीभाँति पहचानता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानी-जीव अपनी आत्मसत्तारूप-भूमि को भलीभाँति पहचानते हैं। युद्धवीर-राजा अपनी चतुरंगिणी-सेना, अंगरक्षकों को संभालने में पूरीतरह सजग रहता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानीजीव भी प्रशम, संवेग, अनुकंपा, आस्तिक्य आदि गुणोंरूपी सेना और अंगरक्षकों की संभाल में हमेशा सजग रहते हैं ; क्योंकि ये चारों सम्यक्त्व की सुरक्षा के घेरे माने गये हैं। जैसे राजा अपनी प्रजा को परिपक्व या कहें आत्मनिर्भर करने के लिये अनेक-रंगों को या रूपों को धारण करके उनकी परीक्षा लेता है; ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानी-जीव अपने चारित्र को दृढ़ करने के लिए तप, समिति, गुप्ति, परीषहजय, धर्म, अनुप्रेक्षा इत्यादि अनेक-रंगों को धारणकर स्वयं की परीक्षा लेते हैं। कर्मरूपी-शत्रुओं को हराने के लिये सम्यग्ज्ञानी-जीव महाशूरवीर-राजा के समान बलशाली है। जिसप्रकार लोहे को घिसने के लिये रेती का प्रयोग किया जाता है, ठीक उसीप्रकार मायारूपी लोहे को रेतने यानि खत्म करने के लिये सम्यग्ज्ञानी-जीव रेती के समान है। जिसप्रकार किसान फसल को सुरक्षित रखने के लिए कांस की जड़ों को उखाड़कर फेंक देता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानी-जीव अपने आत्मस्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए कर्मरूपी कटीले-फंदों को उखाड़कर फेंक देते हैं। सम्यग्ज्ञान दुःख/क्लेशरूप कर्मजनित-बाधाओं से बचानेवाला है अर्थात् सम्यग्ज्ञानी-जीव कभी दुःखी नहीं होते। सुमतिरूपी-राधिका अर्थात् स्वभाव के अनुरूप सत्कार्यों से प्रीति करते हैं, और कुमतिरूपी-दासी से संबंध तोड़ देते हैं, अर्थात् स्वभाव से विपरीत मिथ्याभावों रूपी कार्यों में प्रवर्तन नहीं करते। सम्यग्ज्ञानी-जीव रजत-सोधा (चाँदी को साफ करनेवाले) के समान है, अर्थात् जैसे चाँदी सोधनेवाला धूल-मिट्टी आदि समस्त गंदगी को अलगकर चाँदी को सोधता/साफ करता है; ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानी-जीव पर-भावोंरूप धूल-मिट्टी को अलगकर निज-स्वरूप को सोधते हैं। और फिर जिस सत्य से परिचित होते हैं, उसे न केवल जानते हैं, वरन् मानते भी हैं, ठीक उसीप्रकार जैसे प्यासा-राहगीर पानी पीने पर तृप्त होकर बातें करता है। जैसे उड़द की दाल को लेते समय ही हम ये मान लेते हैं कि इसका छिलका ‘हेय’ और अंदर का बीज ‘उपादेय’ है, उसीप्रकार ज्ञानी-जीव मानते हैं कि शरीरादि पर-पदार्थ हेय हैं, और भगवान् आत्मा उपादेय है, अर्थात् हेय-ज्ञेय-उपादेय के ज्ञान से तृप्त होकर वैसा ही प्रतिपादन भी करते हैं। ऐसी उत्तम-बातों के आराधक सम्यग्ज्ञानी होते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जिन्हकै दरब-मिति साधन छखंड-थिति, बिनसै विभाव-अरि-पंकति-पतन है।
जिन्हकै भगतिको विधान एई नौ-निधान, त्रिगुन के भेद मानौ चौदह-रतन हैं।।
जिन्हकौ सुबुद्धिरानी चूरै महा-मोह-वज्र, पूरै मंगलीक जे-जे मोख के जतन हैं।
जिन्हकै प्रमान-अंग सोहै चमू-चतुरंग, तेई चक्रवर्ती-तनु धरैं पै अतन हैं।। 7।।

शब्दार्थ :- जिन्हकै दरब-मिति साधन छखंड-थिति= जो छह-द्रव्य साधते हैं (जैसे चक्रवर्ती) छह-खंड की स्थिति (को साधते हैं), बिनसै विभाव-अरि-पंकति पतन है= (जैसे चक्रवर्ती) शत्रु के समूह का विनाश करता है, वैसे ही ये विभाव-भाव नष्ट करते हैं, जिन्हकै भगतिको विधान एई नौ-निधान= जिनके नवधा-भक्ति का विधान है, जैसे (चक्रवर्ती की) नौ निधियाँ, त्रिगुन के भेद मानौ चौदह रतन हैं= तीन गुण (रत्नत्रय) के भेद, जैसे (चक्रवर्ती के) चौदह रत्न हों, जिन्हकौ सुबुद्धिरानी चूरै महामोह-वज्र= जिनको सुबुद्धि-रानी महामोहरूपी वज्र/हीरे को चूरकर, पूरै मंगलीक जे-जे मोख के जतन हैं= मांगलीक/चौक पूरती हैं, जो-जो मोक्ष के उपाय हैं (वे सभी करती है), जिन्हकै प्रमान-अंग सोहै चमू-चतुरंग= जिनके प्रमाण आदि अंग वैसे ही शोभायमान हैं, जैसे चक्रवर्ती की चतुरंगिणी-सेना सोहती है, तेई चक्रवर्ती तनु धरैं पै अतन= वैसे ही ये चक्रवर्ती शरीर धारण करते हैं, पर अशरीरी हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ज्ञानी-जीव को सच्चा-चक्रवर्ती सिद्ध किया है। चक्रवर्ती की जो संपदा या वैभव होता है, ठीक वैसा ही वैभव ज्ञानी-जीव को भी होता है। चक्रवर्ती का सर्वप्रथम-वैभव कि वे छह-खंड को साधते हैं या जीतते है, वैसे ही ज्ञानी-जीव छहों-द्रव्यों को साधते हैं अर्थात् छहों-द्रव्यों के स्वरूप को जानकर अपने निज-स्वरूप को साधते हैं। जैसे चक्रवर्ती मात्र शत्रु का नहीं, बल्कि शत्रुओं के कुल का भी विनाश करते हैं, ठीक उसीप्रकार ज्ञानीजीव स्वभाव से विपरीत हर विभाव-परिणति का समूल-विनाश करते हैं। जिसप्रकार चक्रवर्ती को नव-निधियाँ प्रकट होती हैं, ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव श्रवण, कीर्तन आदि नवधा-भक्ति को धारण करते हैं। जैसे चक्रवर्ती को सात-सजीव/सचेतन और सात-अजीव/अचेतन- ऐसे चौदह रत्नों की प्राप्ति होती है, ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव को तीन गुण यानि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के भेद अर्थात् सम्यग्दर्शन के औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक ये तीन भेद, सम्यग्ज्ञान के मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पाँच भेद, और सम्यकचारित्र के सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय, यथाख्यात और संयमासंयम- ये छह-भेद, इसप्रकार रत्नत्रय के कुल चौदह-रत्न प्राप्त होते हैं। जब चक्रवर्ती दिग्विजय के लिये जाते हैं, तब उसकी पटरानी अपनी चुटकी से वज्र-रत्नों को चूरकर उससे मांगलिक-चौक पूरती है, ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव जब मोक्ष-गमन का पुरुषार्थ करते हैं, तब सुबुद्धिरूपी पटरानी महा-मोहरूपी वज्र को चूरकर चौकरूपी-शगुन करती है, अर्थात् मोह वज्र के समान कठोर है, और उसको चूरे बिना अर्थात् नष्ट किये बिना मोक्ष का शगुन यानि शुरूआत भी नहीं होती। जैसे चक्रवर्ती के हाथी, घोड़े, रथ और पैदल- इन चार समूहों से सुसज्जित चतुरंगिणी-सेना सोहती है, ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव के प्रत्यक्ष और परोक्ष-प्रमाण, नय-निक्षेप आदि शोभायमान होते हैं। यद्यपि दोनों ही चक्रवर्ती हैं, परन्तु एक ‘तन-चक्रवर्ती’ है और दूसरे ‘अतन-चक्रवर्ती’ हैं, अर्थात् देह में रहते हुए भी देह से भिन्न निजात्मा के चिंतन मनन और लीनता में रत रहते है, जिससे आत्मवैभव प्रगट होता है, इसीलिये ये धर्म के सच्चे और ‘अतन-चक्रवर्ती’ हैं।

(दोहा)

श्रवन-कीरतन-चिंतवन,dgसेवन-वंदन-ध्यान।
लघुता-समता-एकता, नौधा-भक्ति प्रवान।। 8।।

शब्दार्थ :- श्रवन= सुनना, कीरतन= गुणगान करना, चिंतवन= विचार करना, सेवन= ग्रहण/आचरण करना, वंदन= वंदन/आदर करना, ध्यान= एकाग्रतापूर्वक स्मरण करना, लघुता= विनम्रता, समता= समभाव, एकता= एकत्व करना, नौधा-भक्ति प्रवान= ये नवधा-भक्ति जाननी चाहिये। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पिछले-छंद में कथित नवधा-भक्ति का उल्लेख किया है। ये नवधा-भक्ति ज्ञानियों के जीवन में अवश्य होती है। सबसे पहले ‘श्रवण’ अर्थात् अपने आत्महित की बातों को सुनना, दूसरी ‘कीर्तन’ अर्थात् स्वहितकारी-गुणों का व्याख्यान या गुणगान करना, तीसरी ‘चिंतवन’ अर्थात् आत्महितकारी-गुणों का विचार करना, चौथी ‘सेवन’ अर्थात् जीवन में अपनाना, पाँचवी ‘वंदन’ अर्थात् गुण और गुणियों की वंदना करना, छठवीं ‘ध्यान’ अर्थात् मन, वचन, काय की एकाग्रतापूर्वक आत्मध्यान करना, सातवी ‘लघुता’ अर्थात् मन-वचन-काय से विनय करना गर्व नहीं करना, आठवीं ‘समता’ अर्थात् जीवमात्र के प्रति समभाव रखना, और नौवी ‘एकता’ अर्थात् देहादिक से भिन्न एक आत्मतत्व को ही अपना मानना या कहें एकत्व करना- ये ‘नवधा-भक्ति’ ज्ञानी-जीव हमेशा करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ अनुभवी-जीव कहै मेरे अनुभौ में, लक्षन-विभेद भिन्न करमकौ जाल है।
जानै आपा आपुकौं जु आपु-करि आपु-विषैं, उतपति-नास-ध्रुव-धारा असराल है।।
सारे विकलप मोंसौं न्यारे सरवथा मेरौ, निहचै-सुभाव यह विवहार-चाल है।
मैं तो सुद्ध-चेतन अनंत-चिनमुद्राधारी, प्रभुता हमारी एकरूप तिहूँकाल है।। 9।।

शब्दार्थ :- कोऊ अनुभवी-जीव कहै मेरे अनुभौ में= कोई आत्मानुभवी-जीव कहता है कि ''मेरे अनुभव में, लक्षन-विभेद भिन्न करमकौ जाल है= लक्षणभेद से भी कर्म का जाल आत्मा से पूर्णत: भिन्न है, जानै आपा आपुकौं जु आपु-करि आपुविषैं= वे अपने आपको, अपने ही द्वारा, अपने में ही जानते हैं, उतपति-नासध्रुव-धारा असराल है= उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य की धारा निरन्तर बहती है, सारे विकलप मोंसौं न्यारे सरवथा= समस्त विकल्प मेरे से पूर्णतः भिन्न हैं, मेरौ निहचै- सुभाव यह विवहार-चाल है= मेरा निश्चयरूप स्वभाव है, और यह व्यवहार का कथन है, मैं तो सुद्ध-चेतन= मैं पूर्ण-शुद्ध चेतन-आत्मा हूँ, अनंत- चिनमुद्राधारी= अनंत-चैतन्यमुद्रा को धारण करनेवाला हूँ, प्रभुता हमारी एकरूप तिहूंकाल है= हमारा वैभव तीनों काल एक समान है। ‘’ विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मस्वरूप की महिमा और ज्ञानी-जीव के चिंतन को प्रस्तुत किया है। आत्मानुभूति के समय साधक को समस्त-कर्मों से, विकल्पों से रहित, पूर्ण शुद्ध-आत्मा ही अनुभव में आता है। कर्मों का जाल न केवल आत्मा से पृथक् है; बल्कि लक्षण-भेद आदि से भी सर्वथा-भिन्न है। क्योंकि कार्माण-वर्गणा पुद््गलरूप होने से जड़ हैं; स्पर्श, रस, गंध, वर्ण से युक्त हैं; जबकि आत्मा चेतन, अरूपी, ज्ञान-दर्शन आदि अनंत-गुणों से युक्त है। ज्ञानी-जीव प्रतिसमय बिना किसी की अपेक्षा या सहायता के स्वयं अपने आप को, अपने द्वारा, अपने में ही जानते हैं। वे जानते हैं कि पर्यायों का उत्पाद और व्ययरूप समस्त विकल्प मेरे आत्मस्वरूप से सर्वथा-भिन्न हैं। उन विकल्पों को मेरा कहना- यह व्यवहार-कथन है। निश्चय से तो मैं त्रिकाल विकारों से पूर्ण-रहित शुद्ध-चैतन्य सुख, वीर्य आदि अनंत-गुणों का धारी परिपूर्ण भगवान् आत्मा हूँ, और मेरा ये वैभव, प्रभुता, स्वामित्व सदाकाल एक-जैसा ही रहता है, किसी भी पर्याय में, किसी भी परिस्थिति में घटता बढ़ता नहीं है; क्योंकि मैं क्षय और उत्पाद से रहित ध्रौव्य-तत्त्व हूँ। भित्त्वा सर्वमपि स्वलक्षण-बलाद्भेत्तुं हि यच्छक्यते, चिन्मुद्राङ्कित-निर्विभाग-महिमा शुद्धश्चिदेवास्म्यहम्। भिद्यन्ते यदि कारकाणि यदि वा धर्मा गुणा वा यदि, भिद्यन्तां न भिदास्ति काचन विभौ भावे विशुद्धे चिित।। 3।।

(सवैया इकतीसा)

निराकार-चेतना कहावै दरसन-गुन, साकार-चेतना सुद्ध-ज्ञान-गुनसार है।
चेतना अद्वैत दोऊ चेतन-दरब-माँहि, सामान-विशेष-सत्ताहीकौ विसतार है।।
कोऊ कहै चेतना-चिह्न नांही आतमा मैं, चेतना के नास होत त्रिविध-विकार है।
लक्षनकौ नास सत्ता-नास मूल-वस्तु-नास, तातैं जीव-दरबकौ चेतना आधार है।। 10।।

शब्दार्थ :- निराकार-चेतना कहावै दरसन-गुन= दर्शन-गुण निराकार/सामान्य-चेतनारूप कहलाता है, साकार-चेतना सुद्ध-ज्ञान-गुनसार है= साकार/विशेष-चेतना शुद्ध-ज्ञान-गुण का सार है, चेतना अद्वैत दोऊ चेतन-दरब-माँहि= चेतना एक है, दोनों चेतन-द्रव्यों के बीच, सामान-विशेष सत्ताहीकौ विसतार= सामान्य और विशेष-सत्ता का ही विस्तार है, कोऊ कहै चेतना-चिह्न नांही आतमा मैं= कोई कहै आत्मा में चेतना का कोई चिह्न नहीं है, चेतना के नास होत त्रिविध-विकार है= चेतना के नष्ट होने पर ये तीन दोष उत्पन्न होते हैं= लक्षनकौ नास सत्ता-नास मूल-वस्तु-नास= लक्षण का विनाश, सत्ता का नाश, मूल-वस्तु का विनाश, तातै जीव दरबकौ चेतना आधार है= इसलिए जीवद्रव्य के लिये चेतना ही आधार है।‘’ विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने चेतना का स्वरूप और भेद बताते हुये ये भी स्पष्ट किया कि चेतना तो अभेद ही है। कवि ने यहाँ चेतना के दो भेद कहे- दर्शन-चेतना और ज्ञान-चेतना। सर्वप्रथम आकार-रहित चेतना या सामान्य-प्रतिभास को दर्शन-गुण या दर्शन-चेतना कहते हैं, और आकार-सहित चेतना या विशेष-प्रतिभास को ज्ञान-गुण या ज्ञान-चेतना कहते हैं। यद्यपि दर्शन और ज्ञान दो भेद होते हुये भी चेतना दोनों में एक ही है, एक ही द्रव्य में रहती हैं। सामान्य-प्रतिभास और विशेष-प्रतिभास उस चेतनसत्ता का ही विस्तार है। यहाँ कवि ने अन्यमत का उल्लेख करते हुए कहा है कि यदि कोई ये कहे कि ये चेतना-लक्षण आत्मा का नहीं है; क्योंकि वैशेषिक आदि अन्य-मत-वाले आत्मा में चैतन्य-गुण को नहीं मानते हैं। वैशेषिक-मत मूलतः गुण और गुणी की भिन्न-वस्तु के रूप में कल्पना करता है। तब जिनेन्द्र-प्रज्ञप्त जैन-दर्शन यह कहता हैं कि यदि मूलतः आत्मवस्तु से चेतनागुण को भिन्न मानोगे, अर्थात् चैतन्य को आत्मा का स्वरूप नहीं मानोगे, तो तीन दोष उत्पन्न होते हैं- पहला ‘लक्षण का विनाश’ अर्थात् द्रव्य के आधार बिना चेतनत्व की स्थिति ही संभव नहीं होने से उसका विनाश हो जायेगा। दूसरा लक्षण ‘चैतन्य का नाश’ होने से ‘द्रव्यरूप-सत्ता का विनाश’ का प्रसंग, क्योंकि चैतन्य के बिना जीव का स्वरूप ही नहीं रहेगा, तो उसकी सत्ता कैसे सिद्ध हो सकेगी? तीसरा जीवद्रव्यरूप-सत्ता का विनाश होने से मूलवस्तु का ही विनाश हो जायेगा, अर्थात् जीवद्रव्य का अस्तित्व ही चेतना पर आधारित है, अर्थात् चेतना नहीं तो जीव भी नहीं है, दूसरे शब्दों में कहें कि आत्मवस्तु को समझने के लिए चेतनत्व ही मूल है।

(दोहा)

चेतन-लक्षण आतमा, आतम-सत्ता-माँहि।
सत्ता-परिमित वस्तु है, भेद तिहूँमैं नांहि।। 11।।

अद्वैतापि हि चेतना जगति चेद् दृग्ज्ञप्तिरूपं त्यजेत्, तत्सामान्य-विशेष-रूप-विरहात्साऽस्तित्वमेव त्यजेत्। तत्त्यागे जडता चितोऽपि भवति व्याप्यो विना व्यापका-दात्मा चान्तमुपैति तेन नियतं दृग्ज्ञप्ति-रूपास्तु चित्।। 4।। शब्दार्थ :- चेतन-लक्षण आतमा= आत्मा चेतना-लक्षणवाला है, आतम-सत्ता माँहि= आत्म-सत्ता में है, सत्ता-परिमित वस्तु है= सत्ता-प्रमाण वस्तु है, भेद तिहूँमैं नांहि= तीनों में कोई भेद नहीं है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने लक्षण, सत्ता और वस्तु तीनों अभेदपने को वर्णित किया है। चेतनत्व लक्षण आत्मा का है, और आत्म-सत्ता भी उसी में है, और सत्ता-प्रमाण ही वस्तु है, इसप्रकार तीनों में कोई भेद नहीं है, अर्थात् तीनों अभेद हैं। चेतना का स्वरूप - स्वसंवेदनगम्य अंतरंग-चैतन्य-प्रकाशस्वरूप भाव-विशेष को ‘चेतना’ कहते हैं। जो जीव का लक्षण है। चेतना को जीव का लक्षण बताते हुए आचार्य पूज्यपाद देव सर्वार्थसिद्धि में कहते हैं - ‘‘चेतनालक्षणो जीवः’’ अर्थात् चेतना जीव का लक्षण है। (1/4/14/3) ‘द्रव्यसंग्रह’ में ‘आचार्य नेमिचंद्र जी’ कहते हैं- ‘‘णिच्छयणयदो दु चेदणा जस्स’’ अर्थात् निश्चयनय से जिसके चेतना है, वही जीव है। (द्र.सं. गाथा नं.-3) ‘राजवार्तिक जी’ में ‘आचार्य अकलंकदेव’ कहते हैं - ‘‘जीवस्वभावश्चेतना…यत्संन्निधा-नादात्मा ज्ञाता दृष्टा कर्त्ता भोक्ता च भवति तल्लक्षणो जीवः’’- ( रा.वा.1/4/14/26/11) अर्थात् जिस शक्ति के सान्निध्य में आत्मा ज्ञाता-दृष्टा अथवा कर्त्ता-भोक्ता होता है , वह चेतना है, और वही जीव का स्वभाव होने से जीव का लक्षण है। ‘नयचक्रवृत्ति’ में तो ‘अनुभव’ को चेतना कहा- ‘‘अणुहवभावो चेयणमं’’ अर्थात् अनुभवरूप भाव का नाम चेतना है। (नयचक्रवृति-64) कहने का तात्पर्य यही है कि चेतना ही वह लक्षण है; जिससे जीव का अस्तित्व सिद्ध होता है, और कवि ने भी यही सिद्ध किया है।

(सवैया तेईसा)

ज्यौं कलधौत सुनार की संगति, ‘भूषण’ नाम कहै सब कोई।
कंचनता न मिटी तिहि-हेतु, वहै फिरि औटिकै कंचन होई।।
त्यौं यह जीव अजीव-संजोग, भयौ बहुरूप भयौ नहिं दोई।
चेतनता न गई कबहूँ, तिहि-कारन ‘ब्रह्म’ कहावत सोई।। 12।।

शब्दार्थ :- ज्यौं कलधौत सुनार की संगति= जैसे सोने को सुनार की संगति से, भूषण नाम कहै सब कोई= सभी आभूषण कहते हैं, कंचनता न मिटी तिहि हेत=ु लेकिन इस से उसका स्वर्णपना नहीं मिटता, वहै फिरि औटिकै कंचन होई= वही फिर गलाने पर/गर्म करने पर सोना बन जाता है, त्यौं यह जीव अजीव-संजोग भयौ= उसीप्रकार यह जीव अजीव का संयोग होने पर, बहुरूप भयौ नहि दोई= विभिन्न-रूपवाला होता है, परन्तु, चेतनता न गई कबहूँ= इसका चेतनत्व कभी नहीं जाता/नष्ट नहीं होता है, तिहि-कारन ‘ब्रह्म’ कहावत सोई= इसीकारण वह ‘ब्रह्म’ कहलाता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मतत्त्व की नित्यता का वर्णन करते हुये स्पष्ट किया है कि आत्मा कहीं भी किसी भी रूप में रहे पर अपने चेतनत्व-गुण को कभी नहीं छोड़ता। जैसे सोना स्वभाव से एकरूप और पूर्णशुद्ध अपने स्वर्णत्वपने के साथ रहता है। लेकिन जब वही सोना सुनार की संगति पाता है अर्थात् सुनार के द्वारा गढ़ा जाता है, तब वह विभिन्नरूप होकर विभिन्नआभूषणों के नाम पाता है; लेकिन फिर भी हर-रूप में उसका स्वर्णपना कायम रहता है, अर्थात् अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ता। क्योंकि जब सुनार उस आभूषण को गलाता है, तो वह फिर अपने उसी शुद्धरूप को प्राप्त करता है। ठीक उसीप्रकार जीवात्मा स्वभाव से पूर्ण-शुद्ध और एकरूप होने पर भी जब अजीव या कहें कर्मों के संयोग में आता है, तो नरक, तिर्यंच, देव और मनुष्यगति आदि में विविधरूपों को धारण करता है, लेकिन उन रूपों को धारण करते हुये भी वह न तो कभी उनरूप होता है और न ही अपने चेतनत्व-स्वभाव को एकसमय के लिए भी छोड़ता है, इसीकारण आत्मा को ‘ब्रह्म’ कहा जाता है।

(सवैया तेईसा)

देखु सखी! यह ब्रह्म विराजित, याकी दसा सब याही को सोहै।
एकमैं एक अनेक अनेकमैं, दुंद लियै दुविधामँह दो है।।
आपु संभारि लखै अपनौ पद, आपु विसारिकैं आपुहि मोहै।
व्यापकरूप यहै घट-अंतर, ग्यानमैं कौन अग्यानमैं को है।। 13।।

शब्दार्थ :- देखु सखी यह ब्रह्म विराजित= देखो सखी! यह ब्रह्म शोभायमान है, याकी दसा सब याही को सोहै= इसकी दशा सब इसी को सोहती है, एकमैं एक अनेक अनेकमैं= एक में एक अनेक में अनेक, दुंद लियैं दुविधामह दो है= भ्रमपूर्ण दोप्रकार की दुविधा लिए हुये है, आपु संभारि लखै अपनौ पद= अपने को संभालकर अपने आपको देखता है, आपु विसारिकैं आपुहि मोहै= (कभी) अपने को भूलकर स्वयं ही मोहित होता है, व्यापकरूप यहै घट-अंतर= (परन्तु) यह व्यापकरूप निज-घट में है, ग्यानमैं कौन अग्यानमैं को है= (तब) ज्ञान में कौन है, अज्ञान में कौन है? विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने जीव को ‘ब्रह्म’ नाम से संबोधित किया था, वहीं इस छंद में ब्रह्म के स्वरूप और अवस्था का वर्णन सखी-वार्तालाप के माध्यम से किया है। सुबुद्धिरूपी सखी दूसरी सखी से कहती हैं कि ‘‘देखो सखी! यह ब्रह्म-स्वरूप आत्मा विराजमान है, इसकी सारी अवस्थायें अर्थात् परिणति इसी को सोहती (शोभित होतीं) हैं। जैसी विचित्रता या परिणति इस ब्रह्म की है, वैसी किसी अन्य-द्रव्य की नहीं है। यह एकरूप भी रहता है और अनेकरूप भी अर्थात् जब आत्मसत्ता में देखते हैं, तो सर्वांग एकरूप ही दिखाई देता है, और जब परसत्ता में देखते हैं, तो विविधरूपों में दिखाई देता है। ज्ञान-दशा में देखो, तो ज्ञानरूप और अज्ञान-दशा में अज्ञानरूप परिणत होता दिखाई देता है, इसका स्वरूप ऐसी भ्रम-जनित दुविधा लिये हुये है।’’ कभी तो यह ब्रह्मस्वरूप आत्मा सावधान होकर अपने परिणामों की संभाल करता है और परमपद को प्राप्त करता है, और वहीं दूसरी ओर प्रमादवश मोहजाल में फँसकर स्वयं को ही भूल जाता है और पर में मोहित हो जाता है। लेकिन फिर भी ये ब्रह्म निज-घट में ही व्याप्त रहता है, अर्थात् अपने स्वभाव को कभी नहीं छोड़ता है, चाहे वह ज्ञान की दशा हो या अज्ञान की, अर्थात् दोनों ही स्थितियों में वह ब्रह्म अपने संपूर्ण-वैभव के साथ विराजमान रहता है।

(सवैया तेईसा)

ज्यौं नट एक धरै बहु-भेख, कला प्रगटै बहु-कौतुक देखै।
आपु लखै अपनी करतूति, वहै नट भिन्न-विलोकत भेखै।।
त्यौं घट में नट चेतन-राव, विभाउ-दसा धरि रूप विसेखै।
खोलि-सुदृष्टि लखैं अपनों पद, दुंद-विचारि दसा नहिं लेखै।। 14।।

शब्दार्थ :- ज्यौं नट एक धरै बहु-भेख= जैसे एक नट बहुत से भेष धारणकर, कला प्रगटै बहु कौतुक देख=ै कलायें प्रगट करता है, बहुत लोग उसे कौतुक समझकर देखते हैं, आपु लखै अपनी करतूति= (जब) अपनी कला खुद देखता है, वहै नट भिन्न-विलोकत भेखै= (तब) वही नट उस कृत्रिम-वेश को स्वयं से भिन्न देखता है, त्यौं घट में नट चेतन-राव= उसीप्रकार इस शरीर में नटरूपी चेतन-राजा, विभाउ-दसा धरि रूप-विसेख=ै विभाव-दशा को धारण कर अनेकरूपों को प्राप्त होता है, खोलि-सुदृष्टि लखैं अपनों पद= लेकिन दृष्टि सम्यक् होने पर अपने स्वरूप को देखता है, दुंद-विचारि दसा नहिं लेख=ै दुविधा को समझकर फिर उस अवस्थारूप स्वयं को नहीं देखता। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यग्दर्शन होने पर जीव का प्रवर्तन कैसा होता है?- उस स्थिति का नट के माध्यम से सुंदर-चित्रण किया है। जैसे एक नट (अपने शरीर पर विभिन्न-वेश धारणकर कलाबाजियाँ दिखानेवाला व्यक्ति) जब कलाबाजियाँ दिखाता है, तो अनेक वेश धारण करता है, लोग उसे न केवल आश्चर्य से देखते हैं; बल्कि उसके कृत्रिम-वेश को देखकर उसे उसरूप ही मानकर भ्रमित हो जाते हैं। लेकिन वहीं दूसरी ओर जो ये कलाबाजियाँ दिखा रहा है, वह नट जब अपने को उन वेशों में देखता है, तब एक पल के लिये भी स्वयं को उस वेशरूप अनुभव नहीं करता; बल्कि स्वयं को उन वेशों से भिन्न ही अनुभवता है। उसीप्रकार इस देह में विराजमान नटरूपी चेतन-राजा परद्रव्य के निमित्त से या पर के लक्ष्य से, कर्म के उदय से मोह-राग-द्वेषरूप अनेक विभावरूप होकर अनेक अवस्थाओं को प्राप्त होता है, कभी क्रोधी, कभी मानी, कभी पापरूप और कभी पुण्यरूप इत्यादि, अर्थात् उन विविधरूपों को देखकर मिथ्यादृष्टि-जीव नट का खेल देखनेवाले दर्शकों की तरह भ्रमित हो जाता है। लेकिन जब दृष्टि सम्यक् होती है, अर्थात् जीव को सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है, तब कर्म के उदय से यद्यपि बाहर में स्थिति पूर्ववत् होने पर भी वह जीव नट की तरह स्वयं को उन विकारों से भिन्न ही अनुभव करता है; एक समय के लिए भी अपने को उसरूप अनुभव नहीं करता।

(अडिल्ल)

जाके चेतन-भाव, चिदानंद सोइ है। और भाव जो धरै, सो औरौ कोइ है।।
जो चिनमंडित-भाउ, उपादे जाननैं। त्याग-जोग परभाव, पराये माननैं।। 15।।

शब्दार्थ :- जाके चेतन-भाव चिदानंद सोइ है= जिसके चैतन्य-भाव है, वही चिदात्मा है, और भाव जो धरै सो औरौ कोइ है= जो अन्यभाव रखता है, वह चेतन नहीं कोई और ही है, जो चिनमंडित-भाउ उपादे जाननैं= जो चैतन्य-भाव है, सो उपादेय जानना, त्याग-जोग परभाव पराये माननैं= पर-भाव पराये मानकर त्यागने योग्य मानना। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने बहुत ही संक्षेप में स्पष्ट कर दिया कि हमें क्या उपादेय अर्थात् ग्रहण करना है और क्या हेय अर्थात् त्यागना है? जिसके चैतन्यभाव है, वही चिदात्मा है। जो चैतन्यरूप अर्थात् अपने ज्ञान-दर्शनरूप परिणमन कर रहा है, वास्तव में वही चेतनस्वरूप-आत्मा है। और जो परभाव अर्थात् मोह-राग-द्वेष आदि भावों

एकश्चितश्चिन्मय एव भावो, भावाः परे ये किल ते परेषाम्।
ग्राह्यस्ततश्चिन्मय एव भावो, भावाः परे सर्वत एव हेयाः।। 5।।

को धारण करता है या स्वयं को उन परभावरूप मानता है, वह आत्मा ही, नहीं अनात्मा है। इसलिए भाई! चैतन्यस्वरूप-आत्मा ही उपादेय है, परभाव तो हेय ही है; क्योंकि परभाव तो पर के लक्ष्य से होने अर्थात् स्व के लक्ष्य से नहीं होने से पराये हैं, और जो अपना नहीं उसे ग्रहण क्यों करें, इसीलिए हेय अर्थात् छोड़ने योग्य ही है।

(सवैया इकतीसा)

जिन्हकैं सुमति जागी भोगसौं भये विरागी, परसंग-त्यागी जे पुरुष त्रिभुवनमैं।
रागादिक-भावनिसौं जिनिकी रहनि न्यारी, कबहूँ मगन ह्वै न रहैं धाम-धनमैं।।
जे सदैव आपको विचारैं सरवांग-सुद्ध, जिन्हकैं विकलता न व्यापैं कहूँ मनमैं।
तेई मोख-मारग के साधक कहावैं जीव, भावैं रहौ मंदिरमैं भावैं रहौ वनमैं।। 16।।

शब्दार्थ :- जिन्हकैं सुमति जागी भोगसौं भये विरागी= जिनके सम्यक्-बुद्धि जागृत हुई है, वे भोगों से विरक्त होते हैं, परसंग-त्यागी जे पुरुष त्रिभुवनमैं= पर-पदार्थों की संगति को त्याग दिया है, वे पुरुष तीनों लोक में, रागादिक-भावनिसौं जिनिकी रहनि न्यारी= राग-द्वेष आदि भावों से जो भिन्न रहते हैं, कबहूँ मगन ह्वै न रहैं धाम-धनमैं= कभी मगन होकर नहीं रहते घर-संपत्ति में, जे सदैव आपको विचारैं सरवांग-सुद्ध= जो हमेशा स्वयं को सर्वांग-शुद्ध विचारते हैं, जिन्हकैं विकलता न व्यापैं कहूँ मनमैं= जिनको कभी भी मन में आकुलता नहीं व्यापती, तेई मोख-मारग के साधक कहावैं= वे ही मोक्षमार्ग के साधक कहलाते हैं, जीव भावैं रहौ मंदिरमैं भावैं रहौ वनमैं= फिर वे जीव चाहे मंदिर/घर में रहें, चाहे वन में रहे। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मोक्षमार्ग पर चलनेवाले उन ज्ञानी-जीवों का वर्णन किया है, जो निरन्तर स्वरूप की साधना में रत हैं। अधिकांश जीवों का मानना है कि जो घर-परिवार, संपत्ति आदि को त्यागकर मुनि-दीक्षा धारणकर संसार की बाधाओं से दूर वन में रहते हैं, वही सच्चे-साधक हैं। लेकिन कवि का मानना है कि जिन जीवों का चित्त वास्तव में संसार से विरक्त है, वे ही सच्चे ज्ञानी-ध्यानी हैं। जिनकी बुद्धि-सम्यक् है, जो पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों से पूरी तरह विरक्त हैं, जो तीनों-लोकों के परसंग-त्यागी हैं अर्थात् जिन्हें न नरक का भय है, न स्वर्ग के वैभव की वांक्षा है, और न अनुकूलताप्रतिकूलता की परवाह है, अर्थात् पूरी तरह से विरक्त हैं। जिनकी परिणति मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों से भिन्न ही रहती है, जो घर-परिवार, धनसंपत्ति में मगन होकर नहीं रहते हैं, जो स्वयं को प्रतिसमय सर्वांग-शुद्ध ही अनुभव करते हैं। जिनके मन में रंचमात्र भी आकुलता उत्पन्न नहीं होती, वे ही जीव वास्तव में मोक्षमार्ग के साधक कहलाते हैं अर्थात् मोक्षमार्ग को साधते हैं। फिर चाहे वे जीव घर में रहे या वन-जंगल आदि में रहे, स्वरूप की आराधना में ही रत रहते हैं। इस संदर्भ में आगम-प्रसिद्ध ‘भरत जी’ का उदाहरण सभी को विदित है- ‘‘भरत जी घर में ही वैरागी।’’

(सवैया तेईसा)

चेतन-मंडित अंग-अखंडित, सुद्ध पवित्र-पदारथ मेरौ।
राग-विरोध-विमोह-दसा, समुझै भ्रम-नाटक पुद््गल-केरौ।।

सिद्धान्तोऽयमुदात्त-चित्त-चरितैर्मोक्षार्थिभिः सेव्यतां, शुद्धं चिन्मयमेकमेव परमं ज्योतिः सदैवास्म्यहम्। एते ये तु समुल्लसन्ति विविधा भावाः पृथग्लक्षणा-स्तेऽहं नास्मि यतोऽत्र ते मम परद्रव्यं समग्रा अपि।। 6।।

भोग संयोग-वियोग-बिथा, अवलोकि कहै यह कर्मज घेरौ।
है जिन्हकौ अनुभौ इह-भाँति, सदा तिनकौं परमारथ नेरौ।। 17।।

शब्दार्थ :- चेतन-मंडित अंग-अखंडित= चेतना से शोभायमान अखंड-अभेद-स्वरूपी, सुद्ध पवित्र- पदारथ मेरौ= शुद्ध, पवित्र-पदार्थ मैं हूँ, राग-विरोध-विमोह दसा= राग-द्वेष-मोह की स्थिति, समुझै भ्रमनाटक पुदगल-केरौ= पुद््गल के द्वारा रचाया भ्रमपूर्ण-नाटक हैं, भोग संयोग-वियोग बिथा= विषय-भोग के संयोग-वियोग का दुःख, अवलोकि कहैं यह कर्मज घेरौ है= देखकर कहते हैं, यह कर्मजनित है, जिन्हकौ अनुभौ इह-भांति सदा= जिनका अनुभव हमेशा ऐसा रहता है, तिनकौं परमारथ नेरौ= उनके लिये मोक्ष हमेशा समीप है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन जीवों की परिणति का चित्रण किया है, जो मोक्ष के मार्ग पर निरन्तर पुरुषार्थरत हैं। मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर ज्ञानी-जीव निरन्तर यही विचार करते हैं, कि मैं चैतन्य-गुण से सुशोभित भगवान् आत्मा अपने में परिपूर्ण, अखंड, अभेद, रागादि-विकारों से रहित पूर्ण-शुद्ध, बाह्य और आंतरिक-मल से रहित निर्मल-तत्त्व हूँ। ये मोह-राग-द्वेष आदि विकारी भावों की स्थिति तो पुद््गल के द्वारा रचित भ्रमजनित-नाटक है, जिसे मिथ्यादृष्टि-जीव सत्य मानकर भ्रमित हो जाता है, जबकि मोक्षमार्गी इसे परदे पर खेले जाने वाले नाटक की तरह कर्मों का खेल मानते है, और भ्रमित नहीं होते। पंचेन्द्रिय के विषय-भोग, जिन्हें अज्ञानी-जीव अमृत-तुल्य मानकर उनके पीछे दौड़ता ही रहता है, इष्ट-वस्तु या संयोगों के मिलने पर अज्ञानी-जीव फूला नहीं समाता, और उनका वियोग होने पर पागलवत् हो जाता है, इसीप्रकार अनिष्ट-पदार्थ और संयोगों के मिलने पर उनको हटाने के लिए दिनरात एक कर देता है। लेकिन मोक्षमार्गी ज्ञानी-जीव इन्हें देखकर सहज रहते हैं, और कहते हैं कि ‘‘ये तो कर्मोदय-जनित खेल है, पुण्य-पाप की माया है, इसमें मेरा कुछ भी नहीं है तो फिर कैसा हर्ष और कैसा विषाद’’। जिन जीवों का ऐसा श्रद्धान प्रतिसमय रहता है, आचार्य भगवन् कहते हैं कि उनकी मंजिल दूर नहीं अर्थात् उनका मोक्षमार्ग अत्यंत-नजदीक है, वे जीव शीघ्रतिशीघ्र मोक्षमहल में विराजमान होंगें।

(दोहा)

जो पुमान परधन हरै, सो अपराधी-अग्य।
जो अपनौ धन व्यौहरै, सो धनपति सरवग्य।। 18।।

शब्दार्थ :- जो पुमान परधन हरै= जो मनुष्य दूसरे के धन को चुराये, सो अपराधी-अग्य= वह चोर है, मूर्ख है, जो अपनौ धन व्यौहरै= जो अपना धन वर्ते यानि उपयोग करे, सो धनपति-सरवग्य= सो धन का स्वामी है, सर्वज्ञ/समझदार हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मिथ्यादृष्टि-जीव को ‘चोर’ (अज्ञानी) और सम्यग्दृष्टि-जीव को ‘साहूकार’ (ज्ञानी) के रूप में परिभाषित किया है। लोक में भी हम देखते हैं कि जो परायी-संपत्ति का हरण करता है उसे चोर, डाकू, मूर्ख और अज्ञानी कहा जाता है, गुनहगार मानकर सजा भी दी जाती है। मिथ्यादृष्टि-जीव भी तो स्वयं एक परिपूर्ण-द्रव्य होते हुये भी, परद्रव्य (अर्थात् देहादिक समस्त पदार्थ भिन्न-द्रव्य होने से पर हैं) को अपना मानता है, उसे परद्रव्य-ग्रहं कुर्वन् बध्यतैवापराधवान्। बध्येतानपराधो न स्वद्रव्ये संवृतो यतिः ।। 7।। अपनी वस्तु समझकर प्रीति करता है, प्राप्त होने पर हर्ष और खो जाने पर विषाद करता है, यहाँ तक कि स्वप्न में भी उसे नहीं भूलता है- परवस्तु के प्रति ये अपनापन चोरी ही तो है, जिसकी सजा हमें चार-गति चौरासी-लाख योनियों में परिभ्रमण के रूप में अवश्य मिलती है, लेकिन फिर भी हम ये जघन्य-अपराध चोरी करना नहीं छोड़ते। वहीं दूसरी ओर लोक में जो अपनी संपत्ति का सदुपयोग करता है, उसे साहूकार, बुद्धिमान् कहा जाता है। सम्यग्दृष्टि-जीव भी तो साहूकार ही है, क्योंकि वह स्वयं की संपत्ति यानि आत्मिक-वैभव से ही प्रीति करता है, मिलने पर हर्षित होता है, कहीं खो न जाये, सो सदैव चौकन्ना रहता है, स्वप्न में भी उसे नहीं भूलता- यह साहूकारी (समझदारी) ही तो है। और इसके सुफल में उसे चार-गतियों के दुःखों से निवृत्ति और धनपति अर्थात् मोक्षलक्ष्मी का स्वामी होता है।

(दोहा)

पर की संगति जौ रचै, बंध बढावै सोइ।
जो निज-सत्तामैं मगन, सहज-मुक्त सो होइ।। 19।।

शब्दार्थ :- पर की संगति जौ रचै= जो पर की संगति में मग्न रहता है, बंध बढावै सोइ= वह बंध को बढ़ाता है, जो निज-सत्तामैं मगन= जो अपनी सत्ता में मगन रहता है, सहज-मुक्त सो होइ= वह सहज ही मुक्त होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पर-संगति और स्व-संगति के फल में क्या अंतर है, इसका सीमित- शब्दों में सुंदर-वर्णन किया है। जो पर की संगति अर्थात् परवस्तु व संयोग, चाहे वे चेतन हों या अचेतन, उनमें जितना अधिक रुचता है, अर्थात् जितनी प्रीति करता है, उनमें लीन होता है, वह मिथ्यादृष्टि है, इसके फल में वह संसार की उतनी ही अधिक बंध-परम्परा को बढ़ाता है, साथ ही अति-दुःख भी पाता है। वहीं दूसरी ओर जो अपनी-सत्ता में मग्न होता है अर्थात् अधिक से अधिक अपने आत्मस्वरूप में लीनता का पुरुषार्थ करता है, पर-वस्तु और संयोगों से विरक्त रहता है, वह उतनी ही शीघ्रता और सहजता से मोक्ष-सुख को प्राप्त करता है।

(दोहा)

उपजै-विनसै-थिर रहै, यह तो वस्तु बखान।
जो मरजादा-वस्तु की, सो सत्ता-परवांन।। 20।।

शब्दार्थ :- उपजै-विनसै-थिर रहै= उत्पत्ति/उत्पाद, व्यय/विनाश, स्थिर रहे/ध्रौव्य, यह तो वस्तु बखान= यह वस्तु का स्वरूप कहा गया है, वस्तु की जो मरजादा= वस्तु की जो मर्यादा है, सो सत्ता-परवांन= वह सत्ताप्रमाण है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि जो ‘उत्पाद’ अर्थात् जिसमें नवीन-पर्याय की उत्पत्ति होती है, और ‘व्यय’ अर्थात् पूर्व-पर्याय का विनाश होता है, लेकिन फिर भी वह वस्तु ‘ध्रौव्य-रूप’ अर्थात् स्थिर रहती है, वही द्रव्य है। और उस द्रव्य की जो मर्यादा है अर्थात् उसका जो स्व-चतुष्टय है, वह उसकी

सत्ता जानना।
अनवरतमनन्तैर्बध्यते सापराधः, स्पृशति निरपराधो बन्धनं नैव जातु।
नियतमयमशुद्धं स्वं भजन्सापराधो, भवति निरपराधः साधु शुद्धात्मसेवी।। 8।।

(सवैया इकतीसा)

लोकालोक-मान एक-सत्ता है आकाश-दर्व, धर्म-दर्व एक सत्ता लोक-परमिति है।
लोक-परवान एक-सत्ता है अधर्म-दर्व, काल के अनू-असंख सत्ता-अगनिति है।।
पुद््गल सुद्ध-परवानु की अनंत-सत्ता, जीवकी अनंत-सत्ता न्यारी-न्यारी छिति है।
कोऊ सत्ता काहूसौं न मिलि एकमेक होइ, सबै असहाय यौं अनादिहीकी थिति है।। 21।।

शब्दार्थ :- आकाश-दर्व एक-सत्ता लोकालोक-मान= आकाश-द्रव्य की एक-सत्ता लोकालोक-प्रमाण है, धर्म-दर्व एक-सत्ता लोक-परमिति है= धर्म-द्रव्य की एक-सत्ता लोक-प्रमाण है, अधर्म-दर्व एक-सत्ता लोक-परवान है= अधर्म-द्रव्य की भी एक-सत्ता लोक-प्रमाण है, काल के अनू-असंख सत्ता-अगनिति है= कालाणु-असंख्यात हैं, और उनकी सत्ता भी असंख्यात है, सुद्ध पुदगल-परवानु की अनंत-सत्ता= शुद्ध पुद््गलपरमाणु की अनंत-सत्ता है, जीव की अनंत-सत्ता छिति न्यारी-न्यारी है= जीव की सत्ता-अनंत, सभी की स्थिति जुदी-जुदी है, कोऊ सत्ता काहूसौं न मिलि एकमेक होइ= किसी द्रव्य की सत्ता किसी से न मिलती है, न एकमेक होती है, सबै असहाय यौं थिति अनादिही की है= सभी बिना सहारे के हैं, ऐसी स्थिति अनादिकाल से है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने छहों द्रव्यों की सत्ता, संख्या और स्थिति का वर्णन किया है। आकाशद्रव्य, धर्म-द्रव्य, अधर्म-द्रव्य तीनों संख्या में एक-एक हैं, कालाणु लोक-प्रमाण असंख्यात हैं, जीवद्रव्य अनंत हैं, और शुद्ध पुद््गल-परमाणु जीव-द्रव्य से अनंतगुणे अधिक अर्थात् अनंतानंत है। इसीप्रकार सत्ता की दृष्टि से आकाश-द्रव्य की सत्ता लोकालोक-प्रमाण, धर्म-द्रव्य और अधर्म-द्रव्य की लोकप्रमाण, कालाणु लोक-प्रमाण असंख्यात, जीव और अजीव की सत्ता अनंत है। लेकिन फिर भी आज तक कोई भी द्रव्य न तो किसी से मिला है, न एकमेक हुआ है, न किसी के सहारे या आधार से है, सभी द्रव्य स्वतंत्र अपने-अपने आधार से है, यहाँ तक कि हर द्रव्य के गुण और पर्याय भी भिन्न-भिन्न हैं और अपनी-अपनी मर्यादा में ही परिणमित होते है, कोई किसी के आधीन नहीं। और ये वस्तुव्यवस्था आज से नहीं, अनादिकाल से इसीप्रकार व्यवस्थित चली आ रही है,- यही जैनदर्शन का प्राण है।

(सवैया इकतीसा)

एई छहौं-दर्व इनहीकौ है जगत्-जाल, तामैं पाँच-जड़ एक-चेतन सुजान है।
काहूकी अनंत-सत्ता काहूसौं न मिलै कोइ, एक-एक सत्ता मैं अनंत-गुनगान है।।
एक-एक सत्ता में अनंत-परजाइ फिरै, एक मैं अनेक इहि-भाँति परवान है।
यहै स्यादवाद यहै संतनि की मरजाद, यहै सुख-पोख यह मोख कौ निदान है।। 22।।

शब्दार्थ :- एई छहौं-दर्व इनहीकौ है जगतजाल= ये छह-द्रव्य हैं, इनसे ही जगत् का प्रपंच बना है, तामैं पाँच-जड़ एक-चेतन सुजान है= जिसमें पाँच-द्रव्य जड़, और एक चेतन ज्ञानमय है, काहूकी अनंत-सत्ता कोइ काहूसौं न मिल= प्रत्येक-द्रव्य की अनंतसत्ता, कोई किसी से नहीं मिलती है, एक-एक सत्ता मैं अनंत-गुनगान है= एक-एक सत्ता में अनंत-गुणों का समूह है, एक-एक सत्ता में अनंत-परजाइ फिरै= एक-एक सत्ता में अनंतअनंत पर्यायें हैं, एकमैं अनेक इहि-भाँति परवान है= एक में अनेक इसीप्रकार प्रमाणित है, यहै स्यादवाद यहै संतनि की मरजाद= यही स्याद्वाद है, यही साधु-संतों की मर्यादा अर्थात् कथन है, यहै सुख-पोख यह मोख कौ निदान है= यही सुख को पुष्ट करता है, यही मोक्ष का कारण है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने विश्व के स्वरूप का वर्णन किया है। जीव, पुद््गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल- इन छह-द्रव्यों के समूह को ‘विश्व’ कहते हैं। इन छह-द्रव्यों में एक जीव-द्रव्य ‘चेतन’ और शेष पुद््गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल द्रव्य ‘अचेतन/जड़’ हैं। प्रत्येक द्रव्य में अनंतगुण और उनकी अनंत-पर्यायें हैं, और सब स्वतंत्ररूप से परिणमन करते हैं। आज तक किसी द्रव्य की सत्ता किसी अन्य-द्रव्य से नहीं मिली, यहाँ तक कि उनके गुण और पर्यायें भी एकदूसरे से नहीं मिलते, सभी भिन्न और स्वतंत्र-परिणमन करते हैं। न कोई द्रव्य किसी के आधीन है और न ही किसी द्रव्य को अपने स्वभावरूप-परिणमन करने के लिये किसी अन्य-द्रव्य की अपेक्षा है। एक में अनेक अर्थात् एक आकाश-द्रव्य में ही सभी द्रव्यों का निवास है, पर फिर भी पूर्ण-स्वतंत्रता है, आकाश की भी पराधीनता या किसीतरह का हस्तक्षेप उनमें नहीं है। प्रत्येक द्रव्य-गुण-पर्याय का स्वतंत्र-परिणमन- यही तो ‘जैन-दर्शन’ है, यही तो ‘स्याद्वाद’ है, यही जिनेन्द्र की वाणी का सार है, आचार्यों का कथन है, सुख का आधार है और मुक्ति का सोपान है। क्या सच में स्वतंत्र वस्तु-व्यवस्था को स्वीकार करना ही सुख और मोक्ष का आधार है? हाँ यह कथन शत-प्रतिशत सही है। क्योंकि दुःख और बंधन का कारण एकमात्र पर में अपनत्व और कर्ता-बुद्धि ही तो है। अनादि से हम एकत्व, ममत्व, कर्तृत्व और भोक्तृत्वपना एकमात्र पर-वस्तु, पर-संयोगों में ही तो करते आये हैं, और चारों गतियों में दुःख उठाते आये हैं। यदि ये एकत्व, ममत्व, कर्तृत्व-भोक्तृत्वपना निजात्मा में किया होता, तो हम भी आज सिद्ध-भगवंतों के साथ सिद्धशिला पर विराजमान होते। यदि हम सच में सुखी होना चाहते हैं, तो आज नहीं तो कल, हमें इस स्वतंत्र वस्तु-व्यवस्था को स्वीकार करना ही होगा।

(सवैया इकतीसा)

साधी दधि-मंथ मैं अराधी रस-पंथनिमैं, जहाँ-तहाँ ग्रंथनिमैं सत्ताहीकौ सोर है।
ग्यान-भान सत्तामैं सुधा-निधान सत्ताहीमैं, सत्ता की दुरनि-सांझ सत्ता मुख-भोर है।।
सत्ता को सरूप मोख सत्ता-भूल यहै दोष, सत्ता के उलंघे धूमधाम चहुँ-ओर है।
सत्ता की समाधिमैं विराजि रहै सोई साहू, सत्तातैं निकसि और-गहै सोई चोर है।। 23।।

शब्दार्थ :- साधी दधि-मंथ मैं= दही को मथने में साधी जाती है, अराधी रस-पंथनिमैं= रस के उपाय में (औषधि) आराधी जाती है, जहां-तहां ग्रंथनिमैं= जहाँ-तहाँ ग्रंथों में, सत्ताहीकौ सोर है= सत्ता की ही चर्चा है, ग्यान-भान सत्तामैं= ज्ञान का सूर्य सत्ता में है, सुधा-निधान सत्ताहीमैं= अमृत का खजाना सत्ता में है, सत्ता की दुरनि सांझ= सत्ता को छिपाना शाम के समान, सत्ता-मुख भोर है= सत्ता का मुख अर्थात् कथन सुबह के समान है, सत्ता को सरूप मोख= सत्ता का स्वरूप पहचानना ही मोक्ष, सत्ता-भूल यहै दोष= सत्ता को भूलना ही दोष है, सत्ता के उलंघ=े सत्ता का उलंघन या स्वीकार न करना, धूमधाम चहुँ-ओर है= चारों गतियों में भटकना है, सत्ता की समाधिमैं विराजि रहै सोई साहू= जो अपनी सत्ता में विराजमान है, वही साहूकार है, सत्तातैं निकसि और गहै सोई चोर है= अपनी सत्ता से निकलकर किसी अन्य-सत्ता का ग्रहण करे, वही चोर है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘सत्ता’ का महत्त्व वर्णित करते हुये ‘आत्मसत्ता’ की महिमा का वर्णन किया है। ‘सत्ता’ अर्थात् ‘वस्तु का अस्तित्व’ या कहें ‘उपस्थिति’, यदि सत्ता नहीं, तो वस्तु का अस्तित्व भी नहीं है। यद्यपि छह-द्रव्यों में से केवल पुद््गल-द्रव्य की सत्ता ही इंद्रियों के निमित्त से संसारी-जीवों को परिलक्षित होती है, अन्य पाँच-द्रव्यों को तो अनुमान-ज्ञान से ही प्रमाणित किया जाता है; ठीक उसीप्रकार जैसे दही बिलोते समय घी यद्यपि दिखाई नहीं देता, लेकिन फिर भी उसकी सत्ता या मौजूदगी को स्वीकार किया जाता है, तभी तो दही को बिलोते हैं। जैसे जड़ी-बूटी के रस के उपाय में औषधि आँखों से स्पष्ट दिखाई नहीं देते हुये भी उसका अस्तित्व स्वीकार होता है, तभी तो उससे औषधि बनाने की प्रक्रिया की जाती है। ठीक उसीप्रकार आत्मवस्तु आँखों से दिखाई न देने पर भी उसकी सत्ता स्वीकार्य है। शास्त्रों में भी हरजगह द्रव्य की सत्ता अर्थात् आत्मसत्ता का ही कथन किया जाता है। ज्ञानरूपी सूर्य का उदय भी आत्मसत्ता में ही है, अर्थात् ज्ञान का घनपिण्ड केवल आत्मा ही है। अमृत का निधान अर्थात् सुख का खजाना भी आत्मसत्ता में ही है, अन्यत्र कहीं नहीं। आत्मसत्ता को छिपाना अर्थात् स्वीकार न करना अंधकार के समान है। जैसे अंधकार में कुछ दिखाई नहीं देता, ठीक उसीप्रकार आत्मज्ञान के बिना सर्वत्र अंधकार ही है। और आत्मसत्ता को स्वीकार करना अर्थात् आत्मज्ञान होना उगे हुये सूरज के समान है, अर्थात् सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश है। आत्मसत्ता को स्वीकार कर उसी में लीन होना ही तो मोक्ष है, और उसको भूलना ही सबसे बड़ा दोष है, क्योंकि समस्त दुःखों का एकमात्र कारण भी यही है। आत्मसत्ता की सीमा को लाँघना, अर्थात् अपने स्व-चतुष्टय से बाहर प्रवर्तन करना ही चार गति चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करना है। जो जीव अात्मसत्ता में विराजमान है अर्थात् अपने स्वरूप की ओर उन्मुख है अथवा अपनी स्वभाव सीमा में सीमित हैं, वे ही जीव साहूकार अर्थात् भले हैं। और जो जीव अपनी सत्ता को भूलकर परद्रव्य की सत्ता को ग्रहण करते हैं अर्थात् पर में अपनापन, प्रवर्तन करते हैं, वे जीव चोर हैं, निंदनीय हैं।

(सवैया इकतीसा)

जामैं लोकवेद नांहि, थापना-उछेद नांहि, पाप-पुन्न-खेद नांहि, क्रिया नांहि करनी।
जामैं राग-दोष नांहि, जामैं बंध-मोख नांहि, जामैं प्रभु-दास न अकास नांहि धरनी।।
जामैं कुल-रीत नांहि, जामैं हारि-जीत नांहि, जामैं गुरु-सीष नांहि, वीष नांहि भरनी।
आश्रम-बरन नांहि, काहू की सरन नांहि, ऐसी सुद्ध-सत्ता की, समाधि-भूमि बरनी।। 24।।

मोक्ष द्वार (९) | भाग २/२

शब्दार्थ :- जामैं लोकवेद नांहि= जिसमें लौकिक-रीति नहीं है, थापना-उछेद नांहि= लौकिक-बातों की स्थापना और खंडन नहीं है, पाप-पुन्न खेद नांहि= पाप-पुण्य का दुःख नहीं है, क्रिया नांहि करनी= क्रिया भी नहीं करनी, जामैं राग-दोष नांहि= जिसमें राग-द्वेष नहीं है, जामैं बंध-मोख नांहि= जिसमें बंध-मोक्ष भी नहीं है, जामैं, प्रभु-दास न= जिसमें स्वामी और नौकर का भेद नहीं है, अकास नांहि धरनी= न आकाश है न धरती है, जामैं कुल-रीत नांहि= जिसमें कुलाचार नहीं है, जामैं हारि-जीत नांहि= जिसमें हार-जीत नहीं है, जामैं गुरुसीष नांहि= जिसमें गुरु और शिष्य का भेद नहीं है, वीष नांहि भरनी= कोई मंजिल/लक्ष्य-पूर्ति नहीं है, आश्रमबरन नांहि= वर्णाश्रम-भेद नहीं है, काहू की सरन नांहि= किसी की शरण लेना नहीं है, समाधि-भूमि की ऐसी सुद्ध-सत्ता बरनी= समाधि-भूमि की ऐसी शुद्ध-सत्ता वर्णित है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उस स्थिति का चित्रण किया है, जब साधक को स्व-आत्मसत्ता की अनुभूति होती है, उस समय कोई विकल्प नहीं होता; क्योंकि जबतक विकल्प रहता है, तबतक रसास्वादन नहीं होता। कवि ने उन सब सांसारिक-गतिविधियों का उल्लेख किया है, जिन्हें हम मिथ्यादृष्टि-जीव बहुत रुचिपूर्वक करते हैं, जबकि इन सब गतिविधियों का तो हमारी सत्ता में अस्तित्व भी नहीं है, फिर करने अतो हताः प्रमादिनो गताः सुखासीनतां, प्रलीनं चापलमुन्मूलितमालम्बनम्। आत्मन्येवालानितं च चित्तमा-संपूर्ण-विज्ञान-घनोपलब्धेः।।9।। का तो औचित्य ही कहाँ? जिन लौकिक-रीतियों को हम पूरी लगन से निभाते हैं, उन लौकिक क्रियाकलापों का तो आत्मसत्ता में अस्तित्व ही नहीं, न तो उसमें विधि है, न स्थापना है, और न खंडन है। जिन पाप-भाव और क्रियाओं को करते हुये हम भयभीत रहते हैं, और जिन पुण्य-भाव और क्रियाओं को करने के लिये अथक-पुरुषार्थ करते हैं; कवि कहते हैं, ‘‘उस आत्मसत्ता में न तो पाप है न पुण्य है, ये दोनों भाव और क्रियायें तो दुःखरूप है, और मेरी आत्मसत्ता में दुःख का अस्तित्व ही नहीं, मैं अनंत-सुख का धनी हूँ। आत्मसत्ता में न तो किसी भी क्रिया को करने का उपदेश है, और न ही किसी क्रिया को करने की मनाही है; क्योंकि आत्मसत्ता तो इस कर्तृत्वबुद्धि से रहित केवल ज्ञाता-दृष्टा और अकर्ता-स्वभावी है।’’ जिसमें राग-द्वेष नहीं है अर्थात् जब पर का लक्ष्य, इष्ट-अनिष्ट-बुद्धि ही नहीं, तो रागादि-विकारों की उत्पत्ति कैसे होगी? और जब रागादि की उत्पत्ति नहीं, तो बंध-मोक्ष का तो अस्तित्व ही नहीं ठहरता। वहीं दूसरी ओर कर्मों की अपेक्षा से कहें, तो जिस कर्म-बंध से हम डरते हैं और मोक्ष पाने की चाहत रखते हैं, आत्मसत्ता में बंध और मोक्ष दोनों ही नहीं है; क्योंकि ये दोनों ही स्थितियाँ कर्म-सापेक्ष हैं अर्थात् कर्म का योग हो तो बंध और कर्म का अभाव हो तो मोक्ष। और आत्मसत्ता में तो कर्म का अस्तित्व ही नहीं। जिसमें न कोई स्वामी है, न दास है; क्योंकि मैं स्वयं ही स्वयं का स्वामी हूँ, अन्य विकल्पों और संयोगों का अभाव होने से दासपने का तो सवाल ही नहीं। न कोई आकाश है न धरती है, अर्थात् मेरी आत्मसत्ता को किसी के आधार की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि मैं स्वयं ही स्वयं का आधार हूँ। जिसमें कुलाचार नहीं है; क्योंकि कुल तो देह का होता है, उच्च हो या नीच-कुल, आत्मा का तो कोई कुल ही नहीं; जब कुल नहीं, तो कुलाचार भी नहीं। जहाँ हार-जीत भी नहीं है; क्योंकि हार-जीत का प्रसंग तो तब आता है, जहाँ परिपूर्णता न हो; पर आत्मसत्ता की दृष्टि से तो सभी जीव समान हैं, तो हार-जीत का प्रश्न ही नहीं। जिसमें गुरु-शिष्य का भेद भी नहीं है, क्योंकि आत्मा ही आत्मा का गुरु होता है, शिष्य-वाला कोई संबंध ही नहीं। कोई शुल्क (फीस) भी नहीं भरना है अर्थात् कोई चाहत या लक्ष्य ही नहीं तो दौड़-भाग भी नहीं। जहाँ कोई वर्णाश्रम नहीं है अर्थात् जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का कोई भेद नहीं है। न किसी की शरण की आवश्यकता है; क्योंकि शरण उसे दी या ली जाती है, जो कमजोर हो। मैं तो अनंतबल का धनी हूँ, इसलिए मेरी सत्ता में शरण का अभाव है। ऐसी समस्तविकल्पों एवं ऊहापोह से रहित पूर्ण-शुद्ध आत्मसत्ता अनुभव की भूमि पर पाई जाती है, अर्थात् अनुभूति निर्विकल्प होती है।

(दोहा)

जाकै घट समता नहीं, ममता-मगन सदीव।
रमता-राम न जानई, सो अपराधी-जीव।। 25।।

अपराधी-मिथ्यामती, निरदै हिरदै-अंध।
परकौं मानै आत्मा, करै करमकौ बंध।। 26।।

झूठी-करनी आचरै, झूठे-सुख की आस।
झूठी-भगति हिए धरै, झूठे प्रभुकौ दास।। 27।।

शब्दार्थ :- जाकै घट समता नहीं= जिसके हृदय में समताभाव नहीं है, ममता-मगन सदीव= सदैव ममता में ही मगन रहता है, रमता-राम न जानई= रमने का प्रयास करते हुएभी आतमराम को नहीं जानता; सो अपराधीजीव= वह अपराधी-जीव है।। 25।। अपराधी-मिथ्यामती= अपराधी-जीव मिथ्याबुद्धि-वाला है, निरदै हिरदै-अंध= निर्दयी, हृदय का अंधा है, परकौं मानै आत्मा= पर को आत्मा मानता है, करै करमकौ बंध= कर्म का बंध करता है।। 26।। झूठी-करनी आचरै झूठे-सुख की आस= झूठे-सुख की उम्मीद में झूठे-कार्य करता है, झूठी-भगति हिए धरै झूठे प्रभुकौ दास= हृदय में ईश्वर की झूठी-भक्ति धारण करता है, ईश्वर का झूठा-सेवक है।। 27।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त तीनों-छंदों में कवि ने अपराधी-जीव कौन है, कैसा प्रवर्तन करता है?- इसका संक्षिप्त और सटीक-वर्णन किया है। सर्वप्रथम सच्चा-अपराधी कौन है? इस प्रश्न के उत्तर में कविवर कहते हैं कि जिसके हृदय में साम्य-भाव नहीं है अर्थात् अनुकूल-प्रतिकूल संयोगों में, प्रसंगों में, कर्मोदय-जनित परिस्थितियों में जबतक समता-भाव नहीं वर्तता, तबतक वह जीव अपराधी है। साथ ही जो रमता-राम अर्थात् रमण करने का प्रयास करते हुए भी जो रमणीय आत्मस्वरूप को तो जानता नहीं, और पर की ममता में ही मगन रहता है अर्थात् देह में, पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों में, देहजनित-संयोगों में ममत्व-बुद्धि करता है, अर्थात् उनको ही अपना सर्वस्व मानता है; वह जीव अपराधी है। ऐसा अपराधी-जीव अर्थात् पर में आसक्त-जीव मिथ्यादृष्टि है। जब जीव आत्मस्वरूप से विमुख होता है, तो रागादि-भावों की उत्पत्ति होती है, और आत्मस्वरूप का घात होता है, जिसे आगम में भावहिंसा कहा गया है, और इसी हिंसक-परिणाम की अपेक्षा कवि ने अपराधी-जीव को ‘निर्दयी’ कहा है। हृदय से ‘अंधा’ कहा है, जैसे अंधे व्यक्ति को कुछ दिखाई नहीं देता, ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव को भी कोई विवेक न होने से उसे कवि ने अंधे की उपमा दी है। ऐसा अपराधी-जीव प्रतिसमय पर को ही आत्मा या अपना मानता है और निरन्तर कर्मों का बंध करता है। जिस जीव का श्रद्धान ही विपरीत है, तो उसका आचरण सम्यक् कैसे हो सकता है? अर्थात् आत्मश्रद्धान, आत्मज्ञान न होने से उसके द्वारा की जानेवाली व्रतादिकरूप समस्त-क्रियायें भी मिथ्या ही नाम पाती है। और जब क्रिया ही मिथ्या है, तो मोक्ष-सुख की आशा भी झूठी ही है। वह मिथ्यादृष्टि-जीव न तो अपने स्वरूप को जानता है, और न ही भगवान् के स्वरूप को जानता है; इसीलिए उसके द्वारा की जानेवाली प्रभु-भक्ति व दासत्व भी झूठा है। साथ ही कहीं न कहीं उसमें पुण्य की चाहत भी छिपी होती है, सो उसका हर प्रवर्तन ‘मिथ्या’ ही नाम पाता है। कहने का अभिप्राय यही है कि जैसे उल्टे घड़े पर रखे जानेवाले सभी घड़े उल्टे ही रखे जाते हैं, उसीप्रकार जिसका श्रद्धान मिथ्या होता है, उसका ज्ञान और आचरण भी मिथ्या ही होता है, और जिसका श्रद्धान सम्यक् होता है, उसका ज्ञान और आचरण भी सम्यक् होता है।

(सवैया इकतीसा)

माटी भूमि-सैलकी सो संपदा बखानै निज, कर्ममैं अमृत जानै ग्यानमैं जहर है।
अपनौ न रूप गहै औरहीसौं आपौ कहै, साता तो समाधि जाकै असाता कहर है।।
कोपकौ कृपान लिए मान-मद पान किए, माया की मरौर हियै लोभ की लहर है।
याही भाँति चेतन, अचेतनकी संगतिसौं, साँचसौं विमुख भयौ झूठमैं बहर है।। 28।।

शब्दार्थ :- माटी भूमि सैलकी= मिट्टी जो जमीन की हो या पर्वत की, सो संपदा बखानै निज= उसे अपनी संपत्ति कहता है, कर्ममैं अमृत जानै= क्रिया/कर्मकांड को अमृत जानता है, ग्यानमैं जहर है= ज्ञान को जहर मानता है, अपनौ न रूप गहै= अपना स्वभाव ग्रहण नहीं करता, औरहीसौं आपौ कहै= अन्य को ही अपना कहता है, जाकै साता तो समाधि= जिसके अनुकूलता ही समाधि/अानंद, असाता कहर है= प्रतिकूलता आफत/परेशानी है, कोपकौ कृपान लिए= क्रोध की तलवार लिए, मान-मदपान किए= मान की शराब पिये, माया की मरौर= माया की वक्रता, हियै लोभ की लहर है= हृदय में लोभ का ज्वार है, याही भाँति चेतन-अचेतनकी संगतिसौं= इसी प्रकार चेतन-आत्मा अचेतन की संगति से, साँचसौं विमुख भयौ= सत्य से पराङ्मुख है, झूठमैं बहर है= झूठ में फँसा हुआ है। विशेषार्थ :- अनादिकाल से चेतन आत्मा पर अर्थात् कर्म और कर्मफल रूप- देहादिक-संयोगों के साथ होने से किसप्रकार भ्रमित होता आया है?- इसका सटीक-वर्णन कवि ने इस-छंद में किया है। स्वभाव से चेतन और अनंत-आत्मिक गुणोंरूपी-रत्नों का स्वामी होने पर भी उसे तो देखता नहीं, और खेत-पहाड़, स्वर्ण-पाषाण आदि अचल-सम्पत्तियों को अपनी संपत्ति मानता है। कर्मकांड अर्थात् व्रत, पूजा, तप, दानादिक शुभ-क्रियाओं को अमृत के समान हितकारी मानता है; सो कितनी भी आकुलता हो पर उन क्रियाओं को करने का अथक-प्रयास करता है। और यदि कोई यह कहे कि ‘‘तुम तो ज्ञाता-दृष्टा हो, तुम इन क्रियाओं के कर्ता नहीं मात्र ज्ञाता हो; आकुलतापूर्वक होने वाली इन क्रियाओं का तुम्हें कोई फल नहीं मिलेगा’’- तो ऐसी ज्ञान की बातें इसे विष के समान कड़वी प्रतीत होती है। अपने दिव्यरूप को तो यह अपराधी-जीव निहारता नहीं है, और एकमात्र स्वात्मा को छोड़कर अन्य को अर्थात् देहादिक को ही आत्मा मानता है, और देह से संबंध रखनेवाली हर परवस्तु और संयोगों को अपना मानता है। इसीलिए साता-वेदनीय के उदय में देह को प्राप्त होनेवाली अनुकूलताओं को समाधि अर्थात् सबसे-बड़ी हितकारी-उपलब्धि मानता है, और असाता-वेदनीय के उदय में देह को प्राप्त होनेवाली प्रतिकूलतायें इसे कहर/वज्रपात जैसी अर्थात् जैसे किसी ने इस पर बिजली ही गिरा दी हो और सब कुछ विनष्ट हो गया हो- ऐसी प्रतीत होती है। स्वरूप से विमुख होने और पर की ओर उन्मुख होने से मोह-राग-द्वेष और क्रोधादि-कषायों की उत्पत्ति होती है, जिन्हें आगम में ‘भावकर्म’ कहते हैं, और इन्हीं भावकर्मों का निमित्त पाकर द्रव्यकर्मों का बंध होता है। अनादिकाल से कर्मबंध की ये परम्परा अनवरत चली आ रही है। जब भी कोई परिस्थिति प्रतिकूल होती है, तो इसके हाथ में क्रोध की तलवार आ जाती है। जैसे तलवार से कभी किसी का भला नहीं होता, उसीप्रकार क्रोध से भी जीव का कभी भला नहीं हुआ; बल्कि हमेशा बुरा ही होता है। इसीप्रकार पुण्य के उदय में जब जीव को अनुकूलतायें मिलती है, तो मान की मदिरा पीकर होश गँवा देता है। जैसे मदिरा पीने के बाद व्यक्ति को कुछ होश नहीं रहता, ठीक उसीप्रकार मान की मदिरा पीने के बाद जीव भी विवेकशून्य और निर्दयी हो जाता है। जगत् के प्रपंचों में इतना उलझता है कि मन-वचन-काय तीनों में वक्रता आ जाती है, अर्थात् तीनों ही एक दूसरे के विपरीत प्रवर्तन करते हैं। जैसे समुद्र में लहरों का उछाल प्रतिसमय बना ही रहता है, उसीप्रकार अपराधी-जीव के हृदय में लोभ की लहरें उठती ही रहती है, एक-क्षण के लिये भी लोभ की लहर शांत नहीं होती है, हो भी कैसे? क्योंकि लोभ ही तो इन समस्त क्रुद्ध-परिणामों की जड़ है, इसीलिए लोभ को ‘पाप का बाप’ कहा जाता है। कविवर कहते हैं इसीकारण ये चेतन-आत्मा इन पर-पदार्थों की संगति अर्थात् साथ रहने से आज तक सत्य अर्थात् आत्मस्वरूप से विमुख है, और झूठ अर्थात् पर-पदार्थों में रचा-बसा है।

(सवैया इकतीसा)

तीन-काल अतीत-अनागत-वरतमान, जगमैं अखंडित-प्रवाहकौ डहर है।
तासौं कहै यह मेरौ-दिन यह मेरी-राति, यह मेरी-घरी यह मेरौ ही पहर है।।
खेहकौ खजानौ जोरै तासौं कहै मेरौ-गेह, जहाँ बसै तासौं कहै मेरौ ही सहर है।
याहि भाँति चेतन, अचेतन की संगतिसौं, साँचसौं विमुख भयौ झूठमैं बहर है।। 29।।

शब्दार्थ :- तीन-काल अतीत अनागत वरतमान= तीन-काल भूतकाल, भविष्यकाल, वर्तमानकाल, जगमैं अखंडित-प्रवाहकौ डहर है= संसार में अनवरत ये कालचक्र चला आ रहा है, तासौं कहै यह मेरौ-दिन यह मेरी-राति= उससे कहता है ये मेरा-दिन है मेरी-रात है, यह मेरी-घरी यह मेरौ ही पहर है= यह मेरी-घड़ी, मेरापहर है, खेहकौ खजानौ जोरै= राख या मिट्टी के ढ़ेर को जोड़ता है, तासौं कहै मेरौ-गेह= उससे कहता है ये मेरा-घर है, जहाँ बसै तासौं कहै= जहाँ रहता है उसी को कहता है, मेरौ ही सहर है= मेरा ही शहर है, याहि भाँति चेतन, अचेतन की संगतिसौं= इसप्रकार चेतन-आत्मा, अचेतन-पदार्थों के साथ रहकर, साँचसौं विमुख भयौ झूठमैं बहर है= सत्य से विमुख और झूठ में रचा-पचा है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मिथ्यादृष्टि-जीव किसतरह पर-पदार्थों को अपना मानता है, इसका सटीक-चित्रण किया है। अनादिकाल से आज तक समय का प्रवाह अर्थात् काल का चक्र या कहें समय का पहिया अनवरत अर्थात् बिना थमे इसी प्रकार चला आ रहा है; न किसी के आने से कभी बदलता है, और न किसी के जाने से रुकता है। जो समय बीत गया, हमने उसे भूतकाल का नाम दिया और जो चल रहा है, उसे वर्तमान तथा जो समय आनेवाला है, उसे भविष्यकाल कहा। वास्तव में देखा जाये, तो यह तो वस्तु-व्यवस्था के सहज-परिणमन का सूचक मात्र है; लेकिन मिथ्यादृष्टि-जीव तो इसे भी अपना मानता है। यहाँ तक कि दिन, रात, घड़ी, घंटा, पहर को भी अपना कहता है। तभी तो प्रतिसमय उसे अपने अनुकूल अर्थात् अपनी सुविधा-अनुसार बदलने का पुरुषार्थ करता है; लेकिन कालचक्र को बदलना तो तीन काल में भी संभव नहीं है, फलस्वरूप दुःखी होता है। इसके अलावा मिट्टी के ढेर को भी अपना मानता है, अर्थात् गारा-मिट्टी से बने इस नश्वर-मकान को अपना मानता है। वैसे तो मिट्टी का एक-कण भी रखना इसे पसंद नहीं, पर उसी मिट्टी के ढ़ेर को जी-जान से सजाता-संवारता है, हर पल उसकी देखभाल करता है; यहाँ तक कि अपने से भी ज्यादा उस मिट्टी के ढेर का ख्याल रखता है। एक से तसल्ली नहीं होती, तो दो-चार जगह ढेर करता है अर्थात् कई-कई मकान बनवाता है। जिस शहर में, जिस गली-मोहल्ले में रहता है, उसी को अपना कहता है। यहाँ तक कि गहरी-नींद में भी कोई पूछे, तो तुरतं जबाब देता है ‘‘यह मेरा घर मेरा शहर है,’’ उसी को अपना पता बताता है। भाई! जिस मिट्टी के ढेर का एक क्षण का भी भरोसा नहीं; कभी भी बाढ़, भूकम्प, सुनामी आदि आकर उसका नामोनिशान भी मिटा सकती है, तू उसका ख्याल रखता है। विचार तो कर! यह मिट्टी का ढेर भी कबतक तेरा है, जबतक तू इस नरदेह-रूपी किराये के मकान में हैं। जिस दिन मकान की अवधि पूरी हुई, उस दिन ये मिट्टी का ढेर यहीं पड़ा रह जायेगा, तेरे साथ नहीं जायेगा। यह सब जानते हुये भी इससे इतना अपनापन क्यों? हे आत्मन्! तू तो ज्ञायक भगवान् आत्मा है। जिस चैतन्य-महल का तू स्वामी है, उसे न तो कोई नष्ट कर सकता है, न ही उसे कोई छीन सकता है; वह त्रिकाल तेरे साथ रहनेवाला है। यह कैसी बिडम्बना है कि फिर भी तुझे उससे प्रीति नहीं होती। कविवर कहते हैं कि इसप्रकार ये चेतन-आत्मा अचेतन-संपत्ति के साथ रहकर सत्य अर्थात् अपने स्वरूप से विमुख, और झूठ अर्थात् पर-पदार्थों में रचा-पचा रहता है।

(दोहा)

जिन्हके मिथ्यामति नहीं, ग्यान-कला घट-माँहि।
परचै आतमरामसौं, ते अपराधी नांहि।। 30।।

शब्दार्थ :- जिन्हके मिथ्यामति नहीं= जिनके मिथ्या-बुद्धि नहीं है, ग्यान-कला घट-माँहि= हृदय में भेदविज्ञान की कला प्रकट हुई है, परचै आतमरामसौं= आत्माराम से परिचय है, ते अपराधी नांहि= वे अपराधी नहीं है। विशेषार्थ :- इस-छंद में भले-पुरुष अर्थात् सम्यग्दृष्टि-जीव अपराधी क्यों नहीं है- इस का वर्णन किया है। जिन जीवों के हृदय में स्व-पर का भेद करने की कला जागृत है, और उस भेदविज्ञान के द्वारा जिन्होंने अपने आत्मस्वरूप का परिचय प्राप्त किया हैं, वे सम्यग्दृष्टि-जीव अपराधी नहीं है।

(सवैया इकतीसा)

जिन्हकै धरम-ध्यान पावक प्रगट भयौ, संसै-मोह-विभ्रम बिरख तीनों डढ़े हैं।
जिन्हकी चित्तौनि-आगै उदै-स्वान भूसि भागै, लागै न करम-रज ग्यान-गज चढ़ै है।।
जिन्हकी समुझिकी तरंग अंग-आगममैं, आगममैं निपुन अध्यातम में कढ़े हैं।
तेई परमारथी पुनीत-नर आठौं-जाम, राम-रस गाढ़ करैं यहै पाठ पढ़े हैं।। 31।।

शब्दार्थ :- जिन्हकै धरम-ध्यान पावक प्रगट भयौ= जिनके धर्मध्यान-रूपी अग्नि प्रकट हुई है, संसै-मोह- विभ्रम बिरख तीनों डढ़े हैं= (जिससे)संशय, मोह, विभ्रमरूपी तीनों-वृक्ष जल गये हैं, जिन्हकी चित्तौनि आगै= जिनकी चितवन के आगे, उदै-स्वान भूसि भागै= कर्मोदय-रूपी कुत्ते भौंककर भाग जाते हैं, लागै न करम-रज= कर्मरूपी-धूल उनको नहीं लगती है, ग्यान-गज चढ़ै है= ज्ञानरूपी-हाथी पर सवार हैं, जिन्हकी समुझिकी तरंग अंग-आगममैं= जिनकी समझ में आगम के ज्ञान की तरंग उठती है, आगममैं निपुन= आगम के ज्ञान में प्रवीण हैं, अध्यातम में कढ़े हैं= अध्यात्म-विद्या के पारगामी है, तेई परमारथी पुनीत-नर आठौं-जाम= वे ही पवित्रमोक्षार्थी-मनुष्य आठों पहर/प्रतिसमय, राम-रस गाढ़ करैं यहै पाठ पढ़े हैं= आत्मानुभव का रसपान करते हैं, यही पाठ पढ़ते हैं अर्थात् इतना ही सीखे हैं। विशेषार्थ :- जहाँ पिछले-छंदों में कवि ने ‘अपराधी-जीव’ की मनोवृत्ति का वर्णन किया था, वहीं इसछंद में सम्यग्दृष्टि-जीव के चिंतन और प्रवर्तन का वर्णन किया है। जब जीव आत्मस्वरूप का अनुभव करता है, तब चैतन्य के प्रकाश में वस्तु का स्पष्ट-स्वरूप प्रतिभासित होता है। ज्यों ही आत्मध्यान की पवित्र-अग्नि जलती है, त्यों ही संशय (जिन-वचनों में शंका) मोह (देहादिक में ममत्व का परिणाम) और विभ्रम (भ्रमित करने वाले रागादि के परिणाम) के वृक्ष जो अनादिकाल से पुष्पित और पल्लवित हो रहे थे, उस ध्यानाग्नि में जलकर नष्ट हो जाते हैं। जिनकी चितवन के आगे अर्थात् सम्यग्दृष्टि-जीव के दृढ़-श्रद्धान के आगे कर्मोदय के कुत्ते भौंकभौंककर थक-हारकर भाग जाते हैं, अर्थात् कर्म के उदयजनित अनुकूलतायें और प्रतिकूलतायें कभी भी किसी भी जीव के साथ आ सकती है, लेकिन उन परिस्थितियों में जहाँ मिथ्यादृष्टि-जीव संशय, मोह, और विभ्रम के कारण भयभीत और भ्रमित हो जाता है, वहीं सम्यग्दृष्टि-जीव का श्रद्धान अडिग रहता है, एक क्षण के लिए भी चलायमान नहीं होता; क्योंकि ये तीनों वृक्ष तो जलकर राख हो चुके हैं, इसीलिए उदय के कुत्ते भौंक-भौंक कर यानि उदय में आकर चले जाते हैं। जैसे कुत्ते के भौंकने पर सज्जन व्यक्ति कभी परवाह नहीं करते और सहज रहते हैं, ठीक उसीप्रकार उदयजन्य-परिस्थितियों में कोई प्रतिक्रिया न देकर ज्ञानी-जीव सहज, निःशंक, निर्मोही, अभ्रम यानि भ्रमरहित रहते हैं। सम्यग्दृष्टि-जीव ज्ञानरूपी हाथी पर सवार रहते हैं, जिससे अष्टकर्मों की रज उनको स्पर्श भी नहीं करती है। जैसे लोक में हाथी की सवारी को ‘राजसी-सवारी’ का दर्जा दिया जाता है, और उस पर सवारी करनेवाले तक छोटे-मोटे लोगों की पहुँच नहीं होती है; ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव भी ज्ञानरूपी हाथी पर सवारी करते हैं, अत: कर्मों की धूल उनको स्पर्श भी नहीं करती। जिन जीवों के विचारों में, चिंतन में केवल आगम की तरंगें उठती है अर्थात् केवल आचार्यों की बातों का ही मनन चलता है, जो आगमज्ञान में प्रवीण हैं जिनकी चर्चा में भी स्वरूप का ही कथन चलता है; जो अध्यात्म-विद्या यानि आत्मा के स्वरूप का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन करानेवाली विद्या के भी पारगामी अर्थात् जानकार हैं, वे ही जीव सच में परमार्थी अर्थात् मोक्षमार्गी है, पवित्र हैं। वे आठों-पहर अर्थात् हरसमय एकमात्र आत्मस्वरूप का ही रसपान करते हैं, और ये ही पाठ पढ़े हैं अर्थात् इसी के विशेषज्ञ है; वे जीव निश्चित ही मोक्षगामी हैं।

(सवैया इकतीसा)

जिन्हकी चिहुँटि चिमटा-सी गुन-चूनिबै कौ, कुकथाके सुनिबै कौं दोऊ-कान मढ़े हैं।
जिन्हकौ सरल-चित्त कोमल-वचन बोलै, सोमदृष्टि लियैं डोलैं मोम-कैसे गढ़े हैं।।
जिन्हकी सकति जगी अलख-अराधिबैकौं, परम-समाधि साधिबैकौं मन बढ़े हैं।
तेई परमारथी पुनीत-नर आठों-जाम, राम-रस गाढ़ करैं यहै पाठ पढ़े हैं।। 32।।

शब्दार्थ :- जिन्हकी चिहुँटि गुन चूनिबैकौ चिमटा सी= जिनकी बुद्धि गुण-ग्रहण करने के लिये चिमटा के समान है, कुकथाके सुनिबैकौं दोऊ कान मढ़े हैं= विकथा को सुनने के लिए दोनों कान बंद किये हुए हैं, जिन्हकौ सरल-चित्त कोमल-वचन बोलै= जिनका मन कपट-रहित है, मधुर-वचन बोलते है, सोमदृष्टि लियैं डोलैं मोमकैसे गढ़े हैं= जिनकी सौम्य या विकार-रहित दृष्टि है, जैसे मोम से बने हों, जिन्हकी सकति अलख-आराधिवै कौं जगी= जिनकी शक्ति आत्मस्वरूप की आराधना के लिये जागृत है, परम-समाधि साधिबैकौं मन बढ़े हैं= परम-समाधि या मोक्ष की साधना के लिए मन उत्साहित रहता है, तेई परमारथी पुनीत-नर आठों जाम= वे ही परमार्थी पवित्र-मनुष्य आठों पहर, राम-रस गाढ़ करैं यहै पाठ पढ़े हैं= आत्मस्वरूप का रसपान करते हैं, उसी के जानकार हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यग्दृष्टि-जीव की निश्छल-वृत्ति और मोक्ष के लिए उनके सतत- पुरुषार्थ का वर्णन किया है। सम्यग्दृष्टि-जीव की बुद्धि सद््गुणों को ग्रहण करने के लिये चिमटे के समान है। अर्थात् जैसे चिमटा/चिमटी के द्वारा हम सूक्ष्म से सूक्ष्म-वस्तु को भी पकड़ लेते हैं, यहाँ तक कि जिस वस्तु को हम हाथ से नहीं पकड़ पाते, उसे भी हम चिमटी/चिमटे से पकड़ लेते हैं; ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव आचार्यों के सूक्ष्म से सूक्ष्म अभिप्राय को भी आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। राजकथा, भोजनकथा, चोरकथा, स्त्रीकथा- इनको ‘कुकथा’ या ‘विकथा’ कहते हैं। हम मिथ्यादृष्टि-जीव जहाँ इन विकथाओं को कान लगाकर सुनते हैं, जिन्हें सुनने में हमें बहुत रस आता है; वहीं सम्यग्दृष्टि-जीव इन विकथाओं को सुनने के लिए कान से बहरे हो जाते हैं, अर्थात् विकथायें करना तो दूर सुनते भी नहीं है। जिनका चित्त सरल है अर्थात् मन, वचन और काय में वक्रता या छल नहीं है, निष्कपट है; जो मृदुभाषी हैं अर्थात् हित-मित-प्रिय वचन बोलते हैं; जिनकी दृष्टि सौम्य है अर्थात् क्रोधादि कषाय के उत्पन्न होने पर दृष्टि और चेहरा विकृत हो जाता है; लेकिन जहाँ कषाय की उत्पत्ति ही नहीं होती,वहाँ

यत्र प्रतिक्रमणमेव विषं प्रणीतम्, तत्राप्रतिक्रमणमेव सुधा कुतः स्यात्।
तत्किं प्रमाद्यति जनः प्रपतÂन्नधोऽधः, किं नोर्ध्वमूर्ध्वमधिरोहिति निष्प्रमादः।। 10।।

विकृति का सवाल ही नहीं रहता अर्थात् इतनी सौम्यता रहती है, जैसे मोम से बने हो। अर्थात् जैसे मोम अंदर से बाहर से एक जैसा रहता है, वैसे ही जिनकी परिणति अंतरंग और बहिरंग दोनों से सहज और सौम्य रहती है। एकमात्र अलख यानि इन्द्रियों से जो ग्रहण नहीं होता, ऐसे आत्मा की आराधना के लिये ही जिनकी शक्ति जागृत है, अर्थात् चिंतन-मनन, ध्यान और स्वाध्याय आदि सभी क्रियायें एकमात्र आत्माराधना के लक्ष्य से ही होती है। और निज-स्वरूप में लीनता के पुरुषार्थ के लिये जिनका मन निरन्तर-उत्साहित रहता है। वास्तव में वे ही जीव सच्चे-मोक्षार्थी है, पवित्र हैं,जो आठों पहर अर्थात् हरसमय स्वरूप का ही रसपान करते हैं, और उसी का पाठ या कथन करते हैं।

(दोहा)

राम-रसिक अर राम-रस, कहन-सुनन कौं दोई।
जब समाधि परगट भई, तब दुविधा नहिं कोइ।। 33।।

शब्दार्थ :- राम-रसिक अर राम-रस= आत्मरस का पान करनेवाला और आत्मरस, कहन-सुनन कौं दोई= कहने सुनने के लिये दो हैं, जब समाधि परगट भई= जब आत्मानुभूति प्रगट होती है, तब दुविधा नहिं कोइ= तब ये दुविधा (द्वैतभाव) नहीं रहती। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘आत्मा और आत्मानुभव दोनों अभेद हैं’- इसका स्पष्टीकरण किया है। आत्मस्वरूप का अनुभव करने से पहले आत्मा और आत्म-अनुभव दोनों भिन्न दिखते हैं; क्योंकि मैं आत्मा तो हू,ँ परन्तु अनुभति ू का आनंद तो अभी आया नहीं, इसलिये भिन्नता प्रत्यक्ष दिखती है। लेकिन अनुभति ू होने के बाद दोनों में कोई भेद नहीं है; क्योंकि उस समय आत्मा स्वयं के ही आनंद का तो अनुभव करता है। दोनों को भिन्न कहना- यह तो कथनमात्र है; वास्तव में तो समाधि प्रकट होने पर अर्थात् अनुभति ू के काल में ऐसे द्तवै -भाव की दुविधा नहीं रहती क्योंकि दोनों अभेद हैं, उनमें कोई भेद नहीं है।

(दोहा)

नंदन, वंदन, थुतिकरन, श्रवन, चिंतवन, जाप।
पढ़न, पढ़ावन, उपदिसन, बहुविधि-क्रिया-कलाप।। 34।।

शब्दार्थ :- नंदन= आनंद मानना, वंदन= नमस्कार करना, थुति करन= स्तवन करना, श्रवन= सुनना, चिंतवन= चिंतन करना, जाप= जाप्य करना, पढ़न= पढ़ना, पढ़ावन= पढ़ाना, उपदिसन= उपदेश देना, बहुविधि-क्रियाकलाप= ये बहुतप्रकार की क्रियायें हैं। विशेषार्थ :- आनंदित होना, नमस्कार करना, स्तवन करना, सुनना, चिंतन करना, ध्यान या जाप्य करना, पढ़ना, पढ़ाना- ये बहुतप्रकार की (शुभ) क्रियायें हैं।

(दोहा)

सुद्धातम-अनुभव जहाँ, सुभाचार तहाँ नांहि।
करम, करम-मारग विषैं, सिवमारग सिवमाँहि।। 35।।

शब्दार्थ :- सुद्धातम अनुभव जहाँ= जहाँ शुद्धात्मा का अनुभव होता है, सुभाचार तहाँ नांहि= वहाँ शुभाचरण नहीं होता, करम करममारग= कर्म या क्रिया करना कर्ममार्ग अथवा संसार है, सिवमारग सिवमाँहि विषैं= मोक्षमार्ग, मोक्ष में ही है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने शुद्धोपयोग में शुभाचार/शुभोपयोग का निषेध किया है। शुद्धोपयोग यानि मात्र शुद्धस्वरूप का वेदन, और शुभोपयोग अर्थात् पूजा-पाठ, व्रत-तप, दया-दानादिक रूप विकल्पात्मक-प्रवर्तन। जब शुद्धस्वरूप का अनुभव होता है, तब वहाँ ये शुभाचार नहीं होता है। क्योंकि ‘कर्म’ अर्थात् शुभाचार, ‘कर्म-मार्ग’ अर्थात् संसार-मार्ग है, और ‘सिव’ अर्थात् अात्मानुभव, ‘शिवमार्ग’ अर्थात् मोक्षमार्ग हैं। कहने का अभिप्राय यही है कि विकल्प कैसा भी हो बंध का ही कारण है अर्थात् संसार-मार्ग ही है, और निर्विकल्प-आत्मानुभव अर्थात् शुद्धस्वरूप में पूर्ण-लीनता ही मोक्षमार्ग है।

(चौपाई)

इहि-विधि वस्तु-व्यवस्था जैसी, कही जिनंद, कही मैं तैसी।।
जे प्रमाद-संजुत मुनिराजा, तिनके सुभाचारसौं काजा।। 36।।

शब्दार्थ :- इहि-विधि जैसी जिनंद कही= इसप्रकार जैसी जिनेन्द्रदेव ने कही, वस्तु-व्यवस्था मैं तैसी कही= वस्तु-व्यवस्था मैंने वैसी ही कही, जे प्रमाद-संजुत मुनिराजा= जो प्रमाद से संयुक्त मुनिराज हैं, तिनके सुभाचारसौं काजा= उनके शुभाचार से कार्य होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि वस्तु-व्यवस्था का जैसा स्वरूप केवली के ज्ञान में झलका है, और उनकी वाणी में आया है, वैसा ही स्वरूप मैंने यहाँ कहा है। छठवाँ-गुणस्थान ‘प्रमत्तविरत’ है, अर्थात् प्रमाद-सहित विरक्ति। इस गुणस्थानवर्ती जो मुनिराज होते हैं, उनके प्रमाद का सद्भाव होने से ये शुभाचार होते ही हैं। प्रमाद से यहाँ तात्पर्य ‘स्वरूप में असावधानी’ से है, अर्थात् उपयोग का स्वरूप में स्थिर न रह पाना। जब मुनिराज का उपयोग स्वरूप में स्थिर नहीं रह पाता, तो वे मुनिराज सातवें गुणस्थान (शुद्धोपयोग) से गिरकर छठवें गुणस्थान (शुभोपयोग) में आते हैं। तब मुनिचर्या में जो विकल्पात्मक-प्रवर्तन यानि जप, तप, सामायिक, शास्त्र-लेखन, आहार आदि के भाव होते हैं; वे ही शुभाचार हैं, और ये विकल्प प्रमाद अर्थात् स्वरूप की अस्थिरता से ही होते हैं।

(चौपाई)

जहाँ प्रमाद-दसा नहि व्यापै, तहाँ अवलंब आपनौ-आपै।।
ता कारन प्रमाद उतपाती, प्रगट मोख-मारग कौ घाती।। 37।।

शब्दार्थ :- जहाँ प्रमाद-दसा नहि व्यापै= जहाँ प्रमाद की स्थिति नहीं होती है, तहाँ अवलंब आपनौ-आपै= वहाँ निरन्तर स्वयं का ही अवलंबन होता है, ता कारन प्रमाद उतपाती= इसीकारण प्रमाद की उत्पत्ति, प्रगट मोख-मारग कौ घाती= प्रत्यक्ष मोक्षमार्ग का घात करनेवाली है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने प्रमाद की उत्पत्ति को मोक्षमार्ग में बाधक कहा है, क्योंकि प्रमाद अर्थात् स्वरूप में अस्थिरता, और जबतक यह रहेगी तबतक मोक्ष कैसे संभव है? क्योंकि मोक्ष तो स्वरूप में पूर्णस्थिरता का नाम है। और जब प्रमाद की स्थिति नहीं होती, तब निश्चित ही साधक को स्वरूप का अवलंबन होता है। अर्थात् एक काल में उपयोग एक को ही विषय बनाता है; या तो स्वरूप में लीनता अथवा स्वरूप से बाहर प्रवर्तन/प्रमाद। इसीलिए कवि ने प्रमाद की उत्पत्ति को मोक्षमार्ग में बाधक कहा है।

(चौपाई)

जे प्रमाद-संजुगत गुसांई, उठहिं गिरहिं गिंदुक की नांहि।
जे प्रमाद तजि उद्धत हौंहीं, तिनको मोख निकट द्रिग सौंहीं।। 38।।

घट मैं है प्रमाद जब तांईं, पराधीन प्रानी तब तांईं।
जब प्रमाद की प्रभुता नासै, तब प्रधान अनुभौ परगासै।। 39।।

शब्दार्थ :- जे प्रमाद-संजुगत गुसांई= जो प्रमाद-सहित साधु हैं, गिंदुक की नांहि उठहिं गिरहिं= गेंद की तरह उठते हैं, गिरते हैं, जे प्रमाद तजि उद्धत हौंहीं= जो प्रमाद छोड़कर पुरुषार्थी होते हैं, तिनको मोख निकट द्रिग सौंहीं= उनकी दृष्टि में मोक्ष निकट दिखता है।। 38।। जब ताईं घट में है प्रमाद= जबतक अंतरंग में प्रमाद है, तब ताईं पराधीन प्रानी= तबतक जीव पराधीन है, जब प्रमाद की प्रभुता नासै= जब प्रमाद की शक्ति नष्ट होती है, तब प्रधान अनुभौ परगासै= तब श्रेष्ठ-अनुभव प्रकट होता है।। 39।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने प्रमाद को हेय और पराधीनता का कारण माना है। आगम के अनुसार कहा जाता है कि जब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, तब तक मुनिराज छठवें और सातवें गुणस्थान में झूलते हैं। वैसे तो मुनिराज प्रतिसमय स्वरूप में स्थिरता का ही पुरुषार्थ करते हैं, पर जब उपयोग स्वरूप में नहीं टिकता तब बाहर में जप, तप, ध्यानरूप इसतरह प्रवर्तन करते हैं कि उपयोग पुन: स्वरूप में स्थिरता को प्राप्त हो। सातवें से छठवें, और फिर छठवें से सातवें में- इस प्रक्रिया को कवि ने एक सटीक-उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया है। जैसे गेंद को पुरुषार्थपूर्वक ऊपर की ओर उछाला जाता है, लेकिन जैसे ही गति भंग होती है, वह नीचे गिर जाती है, तथा पुन: उछालने का पुरुषार्थ तथा पुन: उसका वापस नीचे आना होता है। ठीक उसीप्रकार मुनिराज स्वरूप में स्थिरता अर्थात् श्रेणी-आरोहण का पुरुषार्थ करना चाहते हैं; परंतु जैसे ही उपयोग की एकाग्रता भंग होती है, वे वापस नीचे, अर्थात् छठवें गुणस्थान में गिर जाते हैं। इसप्रकार मुनिराज छठवें से सातवें में और सातवें से छठवेंगुणस्थान में झूलते हैं। इसीलिए कविवर कहते हैं कि जो जीव प्रमाद को छोड़कर स्वरूप में स्थिरता के लिये पुरुषार्थरत होते हैं, उनके लिए मोक्षमार्ग अतिनिकट और सहज होता है। इसी सत्य को अगले छंद में कवि पुन: स्पष्ट करते हैं कि जब तक प्रमाद की स्थिति रहती है, तब तक जीव पराधीन रहता है, और जैसे ही प्रमाद की शक्ति नष्ट होती है, तब श्रेष्ठ-आत्मानुभव यानि मोक्ष प्रकट होता है।

(दोहा)

ता-कारन जगपंथ इत, उत सिवमारग-जोर।
परमादी जगकौं धुकै, अपरमादि सिव-ओर।। 40।।

जे परमादी आलसी, जिन्हकैं विकलप भूरि।
होइ सिथल अनुभौविषैं, तिन्हकौ सिवपथ दूरि।। 41।।

शब्दार्थ :- ता-कारन जगपंथ इत= इसकारण इधर जगत् का पंथ है, उत सिवमारग जोर= उधर मोक्षमार्ग का प्रमादकलितः कथं भवति शुद्धभावोऽलसः, कषायभर-गौरवादलसत्ता प्रमादो यतः। अतः स्वरस-निर्भरे नियमितः स्वभावे भवन्, मुनिः परमशुद्धतां व्रजति मुच्यते चाऽचिरात्।। 11।। जोर है, परमादी जगकौं धुक=ै प्रमादी-जीव जगत् की ओर झुकता है, अपरमादि सिव-ओर= अप्रमादी-जीव मोक्ष की ओर (गतिशील होते हैं)।। 40।। जे परमादी-आलसी= जो प्रमादी और आलसी हैं, जिन्हकैं विकलप भूरि= उनको बहुत विकल्प होते हैं, होइ सिथल अनुभौविषैं= अनुभव में शिथिल होते हैं, तिन्हकौ सिवपथ दूरि= उनको मोक्षमार्ग दूर होता है।। 41।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त-दोनों छंदों में कवि ने प्रमादी और अप्रमादी-जीव की स्थिति वर्णन किया है। प्रमाद की स्थिति विकल्प और स्वरूप की अस्थिरतारूप होने से संसार का कारण है, और अप्रमाद की स्थिति निर्विकल्प और स्वरूप में लीनतारूप होने से मोक्ष का कारण है। इसीलिए प्रमादी-जीव संसार को देखता है, और अप्रमादी-जीव मोक्ष की ओर प्रयाण करता है। ऐसा क्यों होता है?- इसका वर्णन कवि ने अगले छंद में किया है। जो जीव प्रमादी और आलसी होते हैं, उन्हें बहुत विकल्प होते हैं। विकल्पों की अधिकता के कारण आत्मस्वरूप में शिथिलता आती है, जिससे मोक्ष और मोक्षमार्ग दोनों ही दूर हो जाते हैं।

(दोहा)

जे परमादी-आलसी, ते अभिमानी-जीव।
जे अविकलपी-अनुभवी, ते समरसी सदीव।। 42।।

जे अविकलपी-अनुभवी, सुद्ध-चेतना-युक्त।
ते मुनिवर लघुकालमैं, हौंहि करमसौं मुक्त।। 43।।

शब्दार्थ :- जे परमादी-आलसी= जो प्रमादी और आलसी हैं, ते अभिमानी-जीव= वे अभिमानी है, जे अविकलपी-अनुभवी= जो विकल्परहित और आत्मानुभवी हैं, ते समरसी सदीव= वे हमेशा समतारस के धनी होते हैं।। 42।। जे अविकलपी-अनुभवी= जो विकल्परहित और आत्मानुभवी हैं, सुद्धचेतना-युक्त= वे शुद्ध-चेतना से युक्त हैं, ते मुनिवर लघुकालमैं= वे मुनिराज अल्पकाल में ही, हौंहि करमसौं मुक्त= कर्मों से मुक्त होते हैं।। 43।। विशेषार्थ :- पुन: प्रमादी और अप्रमादी-जीव की मनोदशा का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जो प्रमादी और आलसी-जीव हैं, वे सदैव अभिमानी होते हैं। अभिमान से यहाँ तात्पर्य ‘स्वरूप की अविनय’ से है; क्योंकि जब मोक्षार्थी का उपयोग स्वरूप से बाहर भ्रमण करता है, तो स्वरूप की अविनय होती ही है। और जब उपयोग स्वरूप में एकाग्र होता है, तो स्वरूप की विनय होती है। इसी अपेक्षा से कवि ने प्रमादी-जीव को ‘अभिमानी’ कहा है। और जो विकल्परहित अर्थात् निर्विकल्प होते हैं, वे सदैव साम्यरस का रसास्वादन करते हैं। इसीलिए जो विकल्परहित अर्थात् निर्विकल्प और आत्मानुभवी होते हैं, वे चेतना-संयुक्त अर्थात् शुद्ध ज्ञान-दर्शन से युक्त होते हैं, और अल्पकाल में ही कर्मों के बंधन से छूटकर अजर-अमर-अविनाशी सिद्ध-पद को प्राप्त करते हैं।

(कवित्त)

जैसैं पुरुष लखै परवत चढ़ि, भूचर-पुरुष ताहि लघु लग्गै।
भूचर-पुरुष लखै ताकौं लघु, उतरि मिलैं दुहुकौ भ्रम भग्गै।।
तैंसैं अभिमानी उन्नत लग, और जीवकौं लघुपद दग्गै।
अभिमानीकौं कहैं तुच्छ सब, ग्यान जागै समता-रस जग्गै।। 44।।

शब्दार्थ :- जैसैं परवत चढ़ि पुरुष लखै= जैसे पर्वत पर चढ़कर पुरुष देखता है, ताहि भूचर-पुरुष लघु लग्गै= उसे भूमि के पुरुष छोटे लगते हैं, भूचर-पुरुष लखै ताकौं लघु= (और) भूमि के पुरुष को वह छोटा दिखता है, उतरि मिलैं दुहुकौ भ्रम भग्गै= उतरकर मिलने पर दोनों का भ्रम दूर हो जाता है, तैंसैं उन्नत लग अभिमानी= उसीप्रकार ऊँचा सिर रखनेवाला अभिमानी-पुरुष, और जीवकौं लघुपद दग्गै= अन्य जीवों को तुच्छ देखता है, अभिमानीकौं कहैं तुच्छ सब= सब अभिमानी को तुच्छ कहते हैं, ग्यान जागै समता-रस जग्गै= ज्ञान जागृत होने पर समता-रस जागृत होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में ज्ञानी-जीव को सभी जीव समान क्यों दिखते हैं, इस तथ्य का दृष्टांत के माध्यम से सुंदर स्पष्टीकरण किया है। जैसे जब कोई पुरुष पर्वत के शिखर से नीचे की ओर देखता है, तो उसे भूमिगोचर-प्राणी या भूमिपर चलनेवाले प्राणी बहुत छोटे दिखाई देते हैं, और भूमि पर चलनेवाले जीव जब पर्वत की ओर देखते हैं, तो उनको पर्वत पर रहनेवाले मनुष्य छोटे-छोटे दिखाई देते हैं। लेकिन जब वे दोनों जीव पर्वत से उतरकर अर्थात् समान धरातल पर मिलते हैं, तब एकदूसरे को तुच्छ या छोटा दिखनेवाला भ्रम सहज ही दूर हो जाता है। ठीक उसीप्रकार अभिमानी-जीव अपने आपको सबसे ऊँचा या श्रेष्ठ समझता है, और अन्यजीवों को तुच्छ या छोटा समझता है। दूसरी ओर सामान्य-प्राणी उस मानी-जीव को घमंडी और तुच्छ समझता है। लेकिन जब सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान प्रकट होता है; तब अनंतानुबंधी कषाय-चौकड़ी का अभाव होने से मानकषाय भी नष्ट हो जाती है। मानकषाय के नष्ट होने से अभी तक जिन जीवों में मानकषाय के कारण छोटे-बड़े या ऊँच-नीच का भेद दिख रहा था, अब वह भेद सहज ही दूर हो जाता है, और प्राणीमात्र के प्रति समता का भाव जागृत होता है, जिससे ज्ञानी-जीवों को सभी जीव समान भासित होते हैं।

(सवैया इकतीसा)

करम के भारी समुझैं न गुनकौ मरम, परम-अनीति अधरम-रीति गहे हैं।
हौंहि न नरम-चित्त गरम-घामहूतैं, चरमकी द्रिष्टिसौं भरम भूलि रहे हैं।।
आसन न खोलैं मुख-वचन न बोलैं, सिर नाये हू न डोलैं मानौं पाथरके चहे हैं।
देखनके हाऊ, भव-पंथ के बढ़ाऊ ऐसे, माया के खटाऊ अभिमानी-जीव कहे हैं।। 45।।

शब्दार्थ :- करम के भारी समुझैं न गुनकौ मरम= अनंत-कर्मों से बंधे हुये हैं, गुणों के मर्म को नहीं समझते हैं, परम अनीति-अधरम-रीति गहे हैं= अत्यधिक-अनीति और अधर्म के रास्ते को ग्रहण करते हैं, हौंहि न नरमचित्त= कोमल-चित्त नहीं होते हैं, गरम-घामहूत=ैं धूप से भी गरम हैं, चरमकी द्रिष्टिसौं भरम भूलि रहे हैं= चमड़े की दृष्टि होने से भ्रम में भूले हुए हैं, आसन न खोलैं= जो आसन भंग नहीं करते, मुख वचन न बोलैं= मुँह से वचन नहीं बोलते, सिर नाये हू न डोलैं= सिर झुकाने पर भी नहीं हिलते हैं, मानौं पाथरके चहे हैं= मानो पत्थर से चिने/बने हों, देखनके हाऊ= देखने में भयंकर, भव-पंथ के बढ़ाऊ ऐसे= संसार-मार्ग को बढ़ानेवाले हैं ऐसे, माया के खटाऊ= माया के टिकाऊ, अभिमानी-जीव कहे हैं= अभिमानी-जीव कहे गए हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने संसारी मिथ्यादृष्टि अभिमानी-जीवों की मनोदशा का चित्रण किया है। जिनका चित्त कषायों से कलुषित है,जिससे वे अत्यधिक कर्मों के भार से लदे हुये हैं अर्थात् कर्मों के तीव्र-बंध से बंधे हुए हैं। आठों-कर्मों ने स्वज्ञान पर ऐसा परदा डाला है कि जीव अपने ज्ञान-स्वभाव को तो पहिचानता नहीं है, और कर्मों के उदय की चाल को ही अपनी चाल समझता है। गुणों के मर्म को नहीं जानता, अर्थात् गुणों के वास्तविक-स्वरूप को तो समझता नहीं, और दोषों को ही गुण मानकर उनके अनुरूप ही आचरण करता है। जो अन्याय, अनीति, अधर्म, अनाचार अर्थात् जितने भी विपरीतमार्ग हैं, उन सभी को बड़े चाव से अपनाता है, यद्यपि कई बार समझता भी है कि ये गलत है, लेिकन फिर भी मानता नहीं है। जो कभी नरम-स्वभावी नहीं होता, अर्थात् मानकषाय से अति-तीव्रता से बंधा होने से स्वात्मा का मार्दव-स्वभाव तो कभी प्रगट ही नहीं होता। घाम या धूप से भी गर्म होता है अर्थात् हमेशा कषाय की अग्नि से तप्त रहता है, जिसकी गरमाहट धूप से कई गुना अधिक घातक होती है। चर्म यानि चमड़ा, आगम में इस नश्वर-देह को चर्ममढित कहा गया है। चर्म की दृष्टि या देह की दृष्टि से भ्रम में स्वयं को ही भूला है। दूसरे शब्दों में कहें, तो देह को ही आत्मा, और इन्द्रियों से होनेवाले ज्ञान को ही आत्मज्ञान समझकर भ्रमित है। आसन नहीं खोलता अर्थात् कोई भी आये-जाये, पूजा-प्रशंसा भी करे, तब भी अपने आसन को भंग नहीं करता है। वह किसी के स्वागत-सत्कार के लिये भी उठकर खड़ा नहीं होता, न ही वचन से कुछ भी बोलता है। यहाँ तक कि कोई सिर भी झुकाये अर्थात् साष्टांग-प्रणाम भी करे, तब भी वह अपने आसन को भंग नहीं करता। उसे देखकर एेसा लगता है कि मानों वह पत्थर से ही चिना गया हो अर्थात् पत्थर की मूर्ति हो। जो देखने में या हाव-भाव से भी भयंकर लगता है, अर्थात् जिसका मन-मैला होता है उसका बाह्य-शरीर उज्जवल कैसे हो सकता है? अपने इन दुर्विचारों के कारण वह निरन्तर संसार-मार्ग को ही बढ़ाता है, अर्थात् अति तीव्र-संसार का बंध करता है। माया के धनी अर्थात् मायाचारी में पक्के अभिमानी-जीवों का ऐसा स्वरूप कहा गया है।

(सवैया इकतीसा)

धीरके धरैया भव-नीरके तरैया भय, भीरके हरैया वर-वीर ज्यौं उमहे हैं।
मारके मरैया सुविचारके करैया सुख, ढारके ढरैया गुन-लौसौं लहलहे हैं।।
रूपके रिझैया सब नैके समझैया सब, हीके लघु-भैया सबके कुबोल सहे हैं।
बामके बमैया दुख-दामके दमैया ऐसे, रामके रमैया नर ग्यानी-जीव कहे हैं।। 46।।

शब्दार्थ :- धीरके धरैया= धैर्य को धारण करनेवाले, भव-नीरके तरैया= संसार-समुद्र को पार करनेवाले, भय-भीरके हरैया= सप्त-भयों के भय को हरनेवाले, वर-वीर ज्यौं उमहे हैं= महा-योद्धा के समान (धर्म में) उत्साहित हैं, मारके मरैया= काम (विषय-वासना) को मारनेवाले, सुविचारके करैया= आत्मस्वरूप के चिंतन में रत हैं, सुख ढारके ढरैया= सुख-शांति में ढलनेवाले, गुन लौसौं लहलहे हैं= गुणों की लौ से जगमगाते हैं, रूपके रिझैया= अपने आत्मस्वरूप पर रीझनेवाले, सब नैके समझैया= सब नयों के जानकार, सब हीके लघुभैया= सभी के छोटे भैया, सबके कुबोल सहे हैं= सभी के वचनों को सुननेवाले, बामके बमैया= वक्रता को वमन करनेवाले, दुख-दामके दमैया= दुःख/संताप का दमन करनेवाले, ऐसे रामके रमैया नर= ऐसे आतमराम में रमनेवाले पुरुष, ग्यानी-जीव कहे हैं= ज्ञानी-जीव कहलाते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ज्ञानी-जीवों की स्थिति, और उनकी मनोदशा का सुंदर-वर्णन किया है। जिनका चित्त कषायों की कलुषता से रहित है, जिन्हें निरन्तर अपने स्वभाव का संबल है, ऐसे जीवों को कितनी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ क्यों न आये, निरन्तर धैर्य धारण करते हैं। जिस संसाररूपी अथाह और गहरे-समुद्र में अज्ञानी-जीव गोते लगाता रहता है, कभी पार नहीं पाता; वहीं ज्ञानी-जीव निज-स्वभाव के अवलंबन से उस अथाह-समुद्र से भी सहज पार हो जाते हैं। इहलोक-भय, परलोक-भय, वेदनाभय, मरण-भय, अरक्षा-भय, अगुप्ति-भय, अकस्मात्-भय, इत्यादि सप्तभयों से ज्ञानी-जीव स्वयं तो रहित होते ही है। उनके निकट आने पर, उनके उपदेशों को सुनकर भयभीत अज्ञानीजीव भी कुछ समय के लिये ही सही भयरहित हो जाता है। धर्म-कार्यों में एक योद्धा के समान हमेशा उत्साहित रहते हैं, जैसे एक योद्धा अपने राज्य की रक्षा के लिए प्रतिसमय सजग रहता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव अंतरंग में स्वधर्म और बाह्य में धर्म की प्रभावना के लिये हमेशा उत्साहित रहते हैं, जबकि अज्ञानी-जीव इन कार्यों को स्वार्थवश या कहें पुण्य की वांछा से करता है। दुनिया के जीवों को जिसने अपने वश में कर रखा है, ऐसे कामदेवरूपी शत्रु को मारनेवाले अर्थात् अपने वश में करनेवाले हैं, अथवा विषयों की वासना से रहित हैं। निरन्तर सुविचार अर्थात् अच्छे विचारों में रत हैं, आत्मरस के रसिक को एकमात्र शुद्धात्मा ही उपादेय है; इसलिये उसी का चिंतन-मनन ही उनके लिये सुविचार है। सुख-शांति में ढलनेवाले अर्थात् आत्मसुख का वेदन करनेवाले हैं। जैसे दीपक की लौ से जगत् के पदार्थ जगमगाते हैं, ठीक उसीप्रकार वे सद््गण ु ों-रूपी लौ से जगमगाते हैं। जो आत्मा के अनुपम-रूप पर रीझनेवाले हैं अर्थात् जिनको आत्मरूप ही प्रिय है, जो नयों के रहस्य को जाननेवाले हैं अर्थात् जिनेन्द्र की वाणी और आचार्यों के कथन का मर्म समझनेवाले हैं। सभी के छोटे भाई के समान हैं, अर्थात् इतने क्षमावान हैं कि सभी के अच्छे और बुरे वचनों को सुनकर भी कभी अपने क्षमा-स्वभाव को नहीं छोड़ते। मन, वचन और काया तीनों योगों की वक्रता में जहाँ अज्ञानी-जीव बड़े-चाव से रचा पचा रहता है, वहीं ज्ञानी-जीव इसका वमन करते हैं अर्थात् त्याग करते हैं, और सरल या नम्र-स्वभावी होते हैं। दुःख/संताप का दमन करनेवाले हैं, स्वाभाविक रूप से जिसे अपने सुख-स्वरूपी आत्मा का अवलंबन होता है, उसके लिए दुःख-दर्द का अस्तित्व स्वत: ही समाप्त हो जाता है; क्योंकि अपने सुख-स्वरूपी आत्मा का वेदन न करने का नाम ही तो दुःख है। और ज्ञानीजीव तो प्रतिसमय अपने स्वरूप की मस्ती में मगन हैं, तो दुःख की उत्पत्ति कैसे होगी? ऐसे आतमराम में रमनेवाले, उसी में विश्राम करनेवाले पुरुषों को ही ज्ञानी-जीव कहा गया है।

(चौपाई)

जे समकिती-जीव समचेती, तिनकी कथा कहौं तुमसेती।
जहाँ प्रमाद क्रिया नहिं कोई, निरविकलप-अनुभौ पद सोई।। 47।।

परिग्रह-त्याग जोग थिर तीनों, करम-बंध नहिं होय नवीनौं।
जहाँ न राग-दोष-रस मोहै, प्रगट मोख-मारग मुख सोहै।। 48।।

शब्दार्थ :- जे समकिती-जीव समचेती= जो साम्यभाव को धारण करने वाले सम्यग्दृष्टि-जीव हैं, तिनकी त्यक्त्वाऽशुद्धि-विधायि तत्किल परद्रव्यं समग्रं स्वयं, स्वद्रव्ये रतिमेति यः स नियतं सर्वापराधच्युतः। बन्ध-ध्वंसमुपेत्य-नित्यमुदितः स्वज्योतिरच्छोच्छल-च्चैतन्यामृत-पूर-पूर्ण-महिमा शुद्धो भवन्मुच्यते।। 12।। कथा कहौं तुमसेती= उनकी कथा कहता हूँ, तुम सुनो, जहाँ प्रमाद-क्रिया नहिं कोई= जहाँ प्रमादरूप-आचरण नहीं होता, निरविकलप-अनुभौ-पद सोई= वही निर्विकल्प-अनुभव का पद है।। 47।। परिग्रह-त्याग जोग थिर तीनों= परिग्रह को त्यागकर तीनों योगों से स्थिर हैं, करम-बंध नहिं होय नवीनौं= नवीन-कर्मबंध नहीं होता, जहाँ न राग-दोष-रस मोहै= जहाँ राग-द्वेष-मोह का रस नहीं है, प्रगट मोख-मारग-मुख सोहै= वही साक्षात् मोक्षमार्ग के सन्मुख है।। 48।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने सम्यग्दृष्टि-जीव की महिमा का गुणगान किया है, साथ ही क्रम से मोक्ष-प्राप्ति का सुंदर-चित्रण किया है। जो जीव-साम्यभाव को धारण करते हैं वे सम्यग्दृष्टि कहलाते हैं। अब मैं उनकी कथा कहता हूँ, तुम सुनो! सर्वप्रथम वे जीव साम्य-भाव को धारण करते हैं, अर्थात् जीव-मात्र के प्रति समभाव, न हर्ष न विषाद, न राग न द्वेष, सहज-साम्यभाव रखते हैं। सम्यग्दृष्टि-जीव को आत्मानुभूति होती है, पर जितने समय प्रमादरूप अर्थात् शुभाचाररूप-प्रवर्तन नहीं होता, उपयोग एकमात्र स्वरूप में ही स्थिर होता है, वही वास्तव में निर्विकल्प-आत्मानुभूति है। शेष विकल्परूप-प्रवर्तन तो शुभाचार ही है। जब सम्यग्दृष्टि-जीव अंतरंग-बहिरंग समस्त-परिग्रह का त्याग करके अर्थात् मुनिव्रत अंगीकार करके, मन-वचन-कायरूप तीनों योगों की चंचलता को छोड़कर, उपयोग को स्वरूप में एकाग्र करते हैं, तब सहज ही नवीन-कर्म का बंध नहीं होता और साथ ही पूरब ्व द्ध-कर्मों की निर्जरा भी होती है। जब मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भावों का रस नहीं होता, तभी जीव निर्बंध होता है; क्योंकि मोह-राग-द्वेष ही तो कर्म-बंध के मूल-कारण है। जब बंध का कारण ही नहीं, तो कर्म-बंधनरूप-कार्य कैसे होगा? इसीलिए जब कर्मबंधन नहीं होता, तभी जीव मोक्षमार्ग के सन्मुख होता है, अर्थात् तभी मोक्षमार्ग प्रकट होता है।

(चौपाई)

पूरब-बंध-उदय नहिं व्यापै, जहाँ न भेद पुन्न अरु पापै।
दरब-भाव गुन निरमल-धारा, बोध-विधान विविध-विस्तारा।। 49।।

जिन्हकी सहज-अवस्था ऐसी, तिन्हकै हिरदै दुविधा कैसी।
जे मुनि क्षपक-श्रेणि चढ़ि जाये, ते केवलि-भगवान् कहाये।। 50।।

(दोहा)

इहि-विधि जे पूरन भये, अष्टकरम-वन दाहि।
तिन्हकी महिमा जो लखै, नमै बनारसि ताहि।। 51।।

शब्दार्थ :- पूरब-बंध-उदय नहिं व्यापै= पूर्व में बंधे हुए कर्मों के उदय में ममत्व नहीं होता, जहाँ न भेद पुन्न अरु पापै= जहाँ पुण्य और पाप में भेद नहीं है, दरब-भाव गुन निरमल-धारा= द्रव्य और भाव से गुणों की निर्मल-धारा बह रही है, बोध-विधान विविध-विस्तारा= बोध यानि रत्नत्रय का विधान विविधरूप विस्तार ले रहा है।। 49।। जिन्हकी सहज-अवस्था ऐसी= जिनके सहज ऐसी स्वतंत्र-अवस्था है, तिन्हकै हिरदै दुविधा कैसी= उनके हृदय में दुविधा कैसे हो सकती है? जे मुनि क्षपक-श्रेणि चढ़ि जाये= यदि ये मुनि क्षपक-श्रेणी चढ़े, ते केवलि-भगवान् कहाये= तो केवली-भगवान् कहलाते हैं।। 50।। इहि-विधि जे पूरन भये= इस विधि से जो पूर्ण हुये हैं, अष्टकरम-बन दाहि= अष्ट-कर्मोंरूपी वन को जलाकर, तिन्हकी महिमा जो लखै= उनकी महिमा को जो देखते/जानते हैं, नमै बनारसि ताहि= बनारसीदास उनको नमस्कार करते हैं।। 51।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त सभी छंदों में कवि ने सम्यग्दृष्टि-जीव की महिमा का गुणगान किया है। सम्यग्दृष्टि-जीव पूर्व में बंधे हुए कर्मों के उदय में आने पर मिलने वाली अनुकूलता-प्रतिकूलताओं पर किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं करते, अर्थात् मोह-राग-द्वेषरूप प्रवर्तन नहीं करते। पुण्य और पाप में भी कोई भेद नहीं वर्तता, अर्थात् दोनों समान भासित होते हैं। अंतरंग में तो आत्मिक-गुणों का रसास्वादन करते ही हैं, बाह्य में भी उन गुणों की छवि प्रत्यक्ष दिखाई देती है, जिन्हें हम सम्यक्त्व के आठअंगों के रूप में जानते हैं। जिनके सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र निरन्तर उन्नति पर हैं, अर्थात् स्वरूप में स्थिरता निरन्तर बढ़ने से विशुद्धि भी बढ़ती है। जिन जीवों की उपरोक्त-वर्णित सम्यक्त्व की ऐसी अवस्था होती है, उनके हृदय में स्वरूप के विषय में कोई दुविधा, कोई शंका कैसे उत्पन्न हो सकती है? अर्थात् कभी नहीं होती। इतना ही नहीं यदि ये मुनि क्षपक-श्रेणी आरोहण कर लें अर्थात् उनका उपयोग अंतर्मुहूर्त अपने स्वरूप में टिक जाये, तो समस्त घातिया-कर्मों का क्षय करके केवली-परमात्मा बन जायें। कविवर कहते हैं कि इस विधि से अर्थात् जैसी विधि आगम में वर्णित है, उस विधि को अपनाते हुये जो जीव आठो़ं-कर्मोंरूपी वन को अपने ध्यानरूपी अग्नि में जलाकर भस्म कर देते हैं, और अपने स्वभाव की परिपूर्णता को प्राप्त करते हैं; उन जीवों की महिमा को जो जानते, देखते या अनुभव करते हैं, उन जीवों को बनारसीदास जी सिर झुकाकर वंदन करते हैं।

(छप्पय)

भयौ सुद्ध-अंकुर, गयौ मिथ्यात-मूर नसि।
क्रम-क्रम होत उदोत,सहज जिम सुकल-पक्ष ससि।।
केवलरूप प्रकासि, भासि सुख-रासि धरम-धुव।
करि पूरन-थिति-आउ, त्यागि गत-लाभ परम हुव।।
इह विधि अनन्य-प्रभुता धरत, प्रगटि बूंदि सागर थयौ।
अविचल-अखंड-अनभय-अखय, जीव-दरब जग-मँहि जयौ।। 52।।

शब्दार्थ :- भयौ सुद्ध-अंकुर= शुद्ध अंकरु /सम्यग्दर्शन प्रकट हुआ, गयौ मिथ्यात-मूर नसि= मिथ्यात्व जड़ से नष्ट हो गया, क्रम-क्रम होत उदोत= क्रम-क्रम से बढ़ता गया, सहज जिम सुकल-पक्ष ससि= सहज शुक्ल-पक्ष के चंद्रमा की तरह, केवलरूप प्रकासि= केवलज्ञान का प्रकाश हुआ, भासि सुखरासि धरम-धुव= आत्मा का ध्वरु स्वभाव और सुख भासित हुआ, करि पूरन थिति-आउ= आयुकर्म की स्थिति पूर्ण की, त्यागि-गत लाभ परम हुव= गति का त्याग हुआ, परमात्मा-पद का लाभ हुआ, इह-विधि अनन्य-प्रभुता धरत= इसप्रकार अनुपम-प्रभुता धारणकर, प्रगटि बूदि ं सागर थयौ= बूदँ प्रकट होकर सागर हो गई, अविचल अखंड अनभय अखय= स्थिर, खंडरहित, भयरहित, शाश्वत, जीव-दरब जग-मँहि जयौ= जीवद्रव्य जगत् में जयवंत हुआ। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यग्दर्शन से लेकर मोक्ष-प्राप्ति तक की यात्रा का अर्थात् एक अज्ञानी बन्धच्छेदात्कलयदतुलं मोक्षमक्षÕय्यमेत-न्निÂत्योद्योत-स्फुटित-सहजावस्थमेकान्त-शुद्धम्। एकाकार-स्वरस-भरतोऽत्यन्त-गम्भीर-धीरं, पूर्ण-ज्ञानं ज्वलितमचले स्वस्य लीनं महिम्नि।। 13।। मिथ्यादृष्टि-जीव सम्यग्दर्शन प्राप्तकर कैसे मोक्षगामी हुआ?- इसका सुदं र और सटीक-वर्णन किया है। लोक में भी हम देखते हैं कि जबतक हम बीजारोपण न करें, तबतक फलदार-वृक्ष की उपलब्धि नहीं होती है। अर्थात् बीज के बिना वृक्ष का अस्तित्व ही नहीं, ठीक उसीप्रकार यदि मोक्षरूपी फल की प्राप्ति करना है, तो सम्यग्दर्शनरूपी बीज का होना अति-आवश्यक है। यहाँ भी कविवर यही कहते हैं कि बीज अंकुरित हुआ अर्थात् सम्यग्दर्शन प्रगट हुआ। सम्यग्दर्शन के प्रकट होने पर मिथ्यात्व का जड़ से विनाश हो जाता है; क्योंकि मिथ्यात्व और सम्यक्त्व जीव के श्रद्धा-गुण का ही विपरीत और सम्यक्परिणमन है। जब श्रद्धान सम्यक् होता है, तो विपरीतता स्वयं ही विनाश को प्राप्त होती है। सम्यग्दर्शन प्रकट होने पर जो आंशिक-शुद्धि प्रकट होती है, वही विशुिद्ध-तप के द्वारा धीरे-धीरे वृद्धि को प्राप्त होती है; ठीक उसीप्रकार, जैसे शुक्ल-पक्ष का चन्द्रमा दूज से पूर्णिमा की ओर बढ़ता है। जब निरन्तर स्वरूप की स्थिरतारूप-तप के द्वारा यही विशुद्धि पूर्णिमा के चाँद की तरह पूर्णता को प्राप्त होती है, तब केवलज्ञान प्रकट होता है, और आत्मा के नित्य-स्वभाव और अनंत-सुख की सहजअनुभति ू होती है, अर्थात् अरिहंतपना प्रगट होता है। फिर शेष अघातिया-कर्मों की स्थिति पूर्ण अर्थात् कर्म-प्रकृतियों का क्षय और आयु पूर्णकर, मनुष्य-गति को त्यागकर वह जीव परम-पद को प्राप्त होता है। इसप्रकार अनन्य-प्रभुता अर्थात् अनंत-वैभव को धारण करता है, सम्यग्दर्शन होने पर विशुद्धि की जो बूँद प्रगट हुई थी, वह अब अथाह-सागर बन गई अर्थात् सम्यग्दर्शन होने पर जो विशुद्धि बूँद के बराबर थी, अब वही सागर के जल के समान अथाह हो गई। और अविचल/स्थिर अर्थात् पुन:जन्म-मरण से रहित, अखंड अर्थात् भेदरहित, समस्त-भयों से रहित निर्भय, अक्षय अर्थात् शाश्वत पद को प्राप्तकर वह शुद्धात्मा जगत् में जयवंत हुआ।

(सवैया इकतीसा)

ग्यानावरनीकै गयैं जानियै जु है सु सब, दर्सनावरनकै गयेतैं सब देखिये।
वेदनी-करमके गयेतैं निराबाध-सुख, मोहनीके गयैं सुद्ध-चारित विसेखियै।।
आउकर्म गयैं अवगाहना अटल होइ, नामकर्म गयेतैं अमूरतीक पेखियै।
अगुरु-अलघुरूप होत गोत्रकर्म गयैं, अंतराय गयेतैं अनंत-बल लेखियै।। 53।।

शब्दार्थ :- ग्यानावरनीकै गयैं जानियै जुहै सु सब= ज्ञानावरणी के क्षय से (जगत् में) जो है, वह सब जानते हैं, दर्सनावरनकै गयैं तैं सब देखिये= दर्शनावरणी के क्षय से सब दख े ते हैं, वेदनी-करमके गयैं तैं निराबाध-सुख= वेदनीय-कर्म के क्षय से बाधारहित-सुख, मोहनीके गयैं सुद्ध-चारित विसेखियै= मोहनीय के क्षय से शुद्ध-चारित्र होता है, आउकर्म गयैं अवगाहना अटल होइ= आयुकर्म के क्षय से अवगाहना अटल अर्थात् अपरिवर्तनशील होती है, नामकर्म गयेतैं अमूरतीक पेखियै= नामकर्म के क्षय से अमूर्तिकता, अगुरुलघुरूप होत गोत्रकर्म गयैं= गोत्रकर्म के क्षय से अगुरुलघुपना, अंतराय गयेतैं अनंतबल लेखियै= अंतराय के क्षय से अनंतबल प्रगट होता है। विशेषार्थ :- यह-छंद मोक्ष-अधिकार का अंतिम-छंद है, और इसमें स्वयं मोक्ष-स्वरूप या कहें मोक्ष की प्राप्ति करनेवाले सिद्ध-भगवंतों का गुणानुवाद किया है। जीव अनादिकाल से आठ-कर्मों के साथ है, जब साधक-जीव स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ करते हैं, तो इन आठों-कर्मों का क्रम से क्षय होता है। और जब इन कर्मों का पूर्णक्षय होता है, तब सिद्ध-अवस्था प्रगट होती है। आठ-कर्मों के अभाव में जो आठ-गुण प्रगट होते हैं, उन्हीं का वर्णन कवि ने इस छंद में किया है। ज्ञानावरणी-कर्म के क्षय होने से ‘केवलज्ञान’ प्रकट होता है, और दर्शनावरणी-कर्म के क्षय होने से ‘केवलदर्शन’ प्रगट होता है, जिससे भगवान् के ज्ञान में तीनों-लोक और तीनों-कालों के समस्त पदार्थ, अपने गुण और पर्यायों-सहित, युगपत् एकसाथ जानने में आते हैं या झलकते हैं। वेदनीय-कर्म का क्षय होने से ‘बाधारहित’, ‘स्वाधीन’ अतीन्द्रिय’, सच्चे-सुख की प्राप्ति होती है। बाधा से तात्पर्य उस सुख से है, जो पराधीन है, क्षणिक है, सुख नहीं सुखाभास है, और सिद्ध-परमात्मा तो वेदनीय-कर्म से रहित होने से पूर्ण-स्वाधीन, त्रिकाल शाश्वत-सुख का वेदन करते हैं। मोहनीय के क्षय से शुद्ध-चारित्र अर्थात् आत्मस्वरूप में लीनतारूप स्वरूपाचरण-चारित्र प्रकट होता है। यद्यपि दर्शन-मोहनीय का क्षय तो पहले ही हो जाता है, परन्तु चारित्र-मोहनीय का क्षय क्रम से होता है, और पूर्ण-क्षय होने पर स्वरूप में

लीनतारूप चारित्र स्वत: प्रगट होता है।
आयु-कर्म का क्षय होने पर एक ‘निश्चित-अवगाहना’ होती है, जो अनंतकाल तक स्थिर रहती है।

नाम-कर्म का क्षय होने से ‘अमूर्तिकता’ प्रकट होती है, क्योंकि नाम-कर्म शरीर की रचना करता है, और नामकर्म का क्षय होने से चक्षु-इन्द्रियगम्य मूर्तिक-शरीर की रचना नहीं होती, इसलिए आत्मा का ‘अमूर्तिकपना’ प्रकट होता है। गोत्र-कर्म का क्षय होने से ऊँच और नीच-गोत्र का अस्तित्व ही नहीं रहता, अर्थात् न बड़ा, न छोटा, इसलिए ‘अगुरुलघुत्व’-गुण प्रकट होता है। और अंतराय-कर्म के नाश होने से ‘अनंत-बल’ प्रगट होता है। इसप्रकार अाठ-कर्मों के क्षय होने पर’ सिद्ध भगवान्’ को आठ-गुण प्रगट होते है। संसार की वास्तविकता

चेतन! तू तिहूँकाल अकेला।
नदी नाव-संजोग मिले ज्यों, त्यों कुटंब का मेला।
चेतन तू तिहूँकाल अकेला।
यह संसार असाररूप सब, ज्यों पटपेखन-खेला।
सुख-संपत्ति-शरीर जल-बुदबुद, विनसत नाहीं बेला।
चेतन! तू तिहूँकाल अकेला। 1।

मोह-मगन आतम-गुन भूलत, परि तोहि गल जेला।
‘‘मैं मैं’’ करत चहूँ-गति डोलत, बोलत जैसे छेला।
चेतन तू तिहूँकाल अकेला। 2।

कहत ‘बनारसि’ मिथ्यामत तज, होइ सुगुरू का चेला।
तास वचन परतीत आन जिय, होइ सहज सुरझेला।।
चेतन तू तिहूँकाल अकेला। 3।

सर्वविशुद्धि द्वार (१०) | भाग १/३

(दशम-अधिकार)

(दोहा)

इति श्री नाटक-ग्रंथमैं, कहौ मोख-अधिकार।
अब वरनौं संक्षेपसौं, सर्व-विसुद्धी-द्वार।। 1।।

शब्दार्थ :- इति श्री नाटक-ग्रंथमैं= इसप्रकार नाटक-समयसार नामक इस ग्रंथ में, कहौ मोख-अधिकार= मोक्ष-अधिकार का वर्णन किया। अब वरनौं संक्षेपसौं= अब संक्षेप में वर्णन करता हूँ, सर्व-विसुद्धी-द्वार= सर्वविशुद्धि-द्वार का। विशेषार्थ :- इस-छंद में कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि अभी इस ‘नाटक-समयसार’ ग्रंथ में ‘मोक्ष-अधिकार’ का वर्णन किया, अब संक्षेप में ‘सर्व-विशुद्धि-द्वार’ अर्थात् आत्मा त्रिकाल समस्तदोषों से रहित परम-पवित्र है- ऐसा वर्णन करूँगा।

(सवैया इकतीसा)

कर्मनिकौ करता है भोगनिकौ भौगता है, जाकी प्रभुतामैं ऐसौ कथन अहित है।
जामैं एक-इंद्री आदि पंचधा कथन नाँहि, सदा-निरदोष बंध-मोखसौं रहित है।।
ग्यानकौ समूह ग्यान-गम्य है सुभाव जाकौ, लोकव्यापी लोकातीत लोकमैं महित है।
सुद्ध-बंस सुद्ध-चेतनाकै रस अंस भरयौ, ऐसौ हंस परम-पुनीतता-सहित है।। 2।।

शब्दार्थ :- कर्मनिकौ करता है= कर्मों का कर्ता है, भोगनिकौ भौगता है= भोगों का भोक्ता है, जाकी प्रभुतामैं ऐसौ कथन अहित है= जिसकी गरिमा में ऐसा कथन हितकारी नहीं है, जामैं एक-इंद्री आदि पंचधा कथन नांहि= जिसमें एक-इंद्रिय से पाँच-इन्द्रिय आदि का कथन नहीं है, सदा निरदोष बंध-मोखसौं रहित है = हमेशा निर्दोष है और बंध-मोक्ष से रहित है, ग्यानकौ समूह= ज्ञान का पिण्ड है, जाकौ सुभाव ग्यान-गम्य है= जिसका स्वभाव ज्ञान से जाना जाता है, लोकव्यापी= लोकव्यापी है, लोकातीत= लोक से परे है, लोकमैं महित है= लोक में पूज्य है, सुद्ध-बंस= जाति शुद्ध है, सुद्ध-चेतनाकै रस अंस भरयौ= शुद्ध-चेतना के रस से पूरीतरह भरा हुआ है, ऐसौ हंस परम-पुनीतता-सहित है= ऐसा वह शुद्धात्मा परम-पवित्रता से युक्त है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मस्वरूप की निर्दोषता अथवा आत्मा के शुद्ध-स्वरूप का सुंदर वर्णन किया है। अनादिकाल से जीव यही मानता आया है कि '‘मैं कर्मों का कर्ता हू,ँ और कर्मफल का यानि भोगों का भोक्ता हू’ँ ‘, जबकि कविवर यहाँ कहते हैं कि ‘कर्म करना’ और ‘कर्मफल को भोगना’ तो आत्मा की सामर्थ्य से भी परे है, अर्थात् ये दोनों कार्य आत्मा करे- ऐसी तो आत्मा की सामर्थ्य ही नहीं है। भाई! करना तो दूर, ऐसा कहना भी आत्मा के हित में नहीं है; क्योंकि ‘करना’ और ‘भोगना’ आत्मा का स्वभाव ही नहीं है, और फिर भी उसे ‘कर्ता’ या’ भोक्ता’ कहा जाये, तब यह तो आत्म-स्वरूप का निरादर है, अविनय है, कलंक है। नीत्वा सम्यक् प्रलयमखिलान् कर्तृ-भोक्त्रादि-भावान्, दूरीभ्ूतः प्रतिपदमयं बन्ध-मोक्ष-प्रक्लृप्तेः। शुद्धः शुद्धः स्वरस-विसरापूर्ण-पुण्याचलार्चि-ष्टंकोत्कीर्ण-प्रकट-महिमा स्फूर्जति ज्ञान´fb®ªf:।। 1।। सभी आत्मायें समान-प्रभुता की धारी हैं, उनमें एक, दो, तीन, चार, या पाँच-इन्द्रिय-जीव का भेदरूप-कथन भी लागू नहीं पड़ता है; क्योंकि आत्मा तो इन इन्द्रियों के भेद से रहित ‘अतीन्द्रिय-तत्त्व’ है। इसीप्रकार स्वयं को कर्मों से ‘बंधा’ और ‘मुक्त’ मानना भी दोषरूप है, क्योंकि आत्मा आज तक न तो कर्मों से बंधा है, न मुक्त है; जब भी स्वरूप से बाहर प्रवर्तन करता है, तो कर्म के परमाणु स्वयं ही आकर आत्मा के प्रदेशों पर चिपक जाते हैं, और जब स्वरूप में ही प्रवर्तन करता है, तो वे कर्म-परमाणु स्वयं ही आत्मप्रदेशों से झड़ जाते हैं। आत्मस्वरूप के बाहर होनेवाली कर्म की इसी प्रक्रिया का नाम ‘बंध’ और ‘मोक्ष’ है। अनादिकाल से साथ रहते हुये भी आज तक कर्म के एक भी परमाणु ने आत्मा के स्वरूप में प्रवेश नहीं किया है, क्योंकि आत्मा स्वभाव से ही त्रिकाल बंध और मोक्ष के दोष से रहित ‘निर्दोष’ है। आत्मा ज्ञान का घनपिण्ड है, और उसका स्वभाव भी ज्ञानगोचर है अर्थात् अरूपी/अमूर्तिक होने से एकमात्र ज्ञान के द्वारा ही जानने में आता है। वैसे तो संपूर्ण-लोक में व्याप्त है, क्योंकि ज्ञान की निर्मलता में संपूर्ण-लोक झलकता है; लेकिन अपने स्व-चतुष्ट्य में ही स्थित रहने से लोकातीत भी है। छहों-द्रव्यों में अकेला यही ज्ञानवान्, जाननहार-स्वभावी, सुख और आनंद का पिण्ड होने से उपादेय-तत्त्व है, इसलिये लोक में पूज्य भी है। जिसकी जाति भी शुद्ध है अर्थात् जो स्वभाव से ही शुद्ध है, अशुद्धता ने आज तक उसके स्वरूप में प्रवेश ही नहीं किया, शुद्ध-चैतन्य के रस से लबालब भरा हुआ है- ऐसा ‘हंस’ अर्थात् ‘शुद्धात्मा’ परम-पवित्र है।

(दोहा)

जो निहचै निरमल सदा, आदि-मध्य अरु अंत।
सो चिद्रूप बनारसी, जगत्-माँहि जयवंत।। 3।।

शब्दार्थ :- जो निहचै निरमल सदा= जो निश्चय से सदा मलरहित निर्मल है, आदि-मध्य अरु अंत= आदि, मध्य और अंत में, सो चिद्रूप बनारसी= बनारसीदास जी कहते हैं कि वह चैतन्यरूप, जगत्-माँहि जयवंत= लोक में जयवंत हो। विशेषार्थ :- आत्मा त्रिकाल-निर्मल है- इसका वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि निश्चय से आत्मा भूत, भविष्य और वर्तमान- सदाकाल निर्मल ही रहता है। कहने का अभिप्राय यही है कि कीचड़ में कमल की तरह, आत्मा कर्मों के साथ रहता हुआ भी पहले भी शुद्ध था, आज भी शुद्ध है, और आगे भी शुद्ध ही रहेगा। अपने इसी शुद्ध-स्वभाव के कारण ही आत्मा जगत् में सदैव जयवंत रहता है।

(चौपाई)

जीव करम-करता नहि ऐसैं, रस-भोगता सुभाव न तैसैं।
मिथ्यामतिसौं करता होई, गए अग्यान, अकरता सोइ।। 4।।

शब्दार्थ :- जीव करम-करता नहि ऐसैं= जैसे जीव कर्मों का कर्ता नहीं है, रस-भोगता सुभाव न तैस=ैं वैसे ही कर्मफल को भोगना भी जीव का स्वभाव नहीं है, मिथ्यामतिसौं करता होई= मिथ्या-बुद्धि से जीव कर्म का कर्त्ता होता है, गए अग्यान, अकरता सोइ= अज्ञान के दूर हो जाने पर सहज ही वह अकर्त्ता होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में जीव पर-द्रव्य का कर्त्ता कब और कैसे होता है? इसका बहुत ही संक्षेप में

सटीक-वर्णन किया है।
कर्त्तृत्वं न स्वभावोऽस्य चितो वेदयितृत्ववत्। अज्ञानादेव कर्तायं तदभावादकारकः ।। 2।।

सर्व विशुद्धि-द्वार यूँ तो जीव स्वभाव से न तो परद्रव्य का कर्त्ता है, न भोक्ता है, जैसा कि पिछले-छंद में स्पष्ट किया। परन्तु ये भी सच है कि अज्ञानी-जीव संसार में इस कर्तृत्व और भोक्तृत्व-बुद्धि के कारण ही दुःखी है,- ऐसा क्यों? इसी प्रश्न का समाधान करते हुए कविवर कहते हैं कि जीव मिथ्याबुद्धि के कारण परद्रव्य का कर्त्ता होता है, जैसे ही इस मिथ्याबुद्धि का क्षय होता है, जीव पुन: अकर्ता होता है। अब प्रश्न उठता है यहाँ मिथ्याबुद्धि का अभिप्राय क्या? हे आत्मन्! सारे दुःखों की जड़ एकमात्र स्वरूप का विस्मरण और पर में ममत्वपना है- वास्तव में यही मिथ्याबुद्धि है। अर्थात् देह और देह से जुड़े समस्त पदार्थो में अपनापन जहाँ होगा, वहाँ मिथ्याबुद्धि भी नियम से होगी। और जहाँ मिथ्याबुद्धि है, वहाँ कर्तृत्व-भोक्तृत्व-बुद्धि भी नियम से होती है। लेकिन जैसे ही स्व के अवलंबन से देहादिक में अपनापन टूटता है, तत्क्षण अज्ञान का विनाश होता है, और बुद्धि भी सम्यक्-रूप से परिणमन करती है। फिर संयोग भले ही पूर्ववत् रहें पर कर्तृत्व और भोक्तृत्व-बुद्धि छूट जाती है, और जीव पुन: अपने अकर्त्ता-स्वभाव को प्राप्त करता है।

(सवैया इकतीसा)

निहचै निहारत सुभाव याहि आतमाकौ, आतमीक-धरम परम-परकासना।
अतीत-अनागत-बरतमान-काल जाकौ, केवलस्वरूप गुन लोकालोक भासना।।
सोई जीव संसार-अवस्था-माँहि करमकौ, करतासौ दीसै लीये भरम-उपासना।
यहै महा-मोहकौ पसार यहै मिथ्याचार, यहै भौ-विकार यह विवहार-वासना।। 5।।

शब्दार्थ :- निहचै निहारत सुभाव याहि आतमाकौ= निश्चय से देखो इस आत्मा का यही स्वभाव है, आतमीक-धरम परम-परकासना= निज-स्वभाव का परम-प्रकाशक है, अतीत-अनागत-बरतमानकाल= भूत, भविष्य और वर्तमानकाल, जाकौ केवल-स्वरूप गुन= जिसका केवलज्ञान-स्वरूप है और इसके फलस्वरूप, लोकालोक भासना= लोकालोक प्रतिभासित होते हैं, सोई जीव संसार-अवस्था-माँहि= वही जीव संसार अवस्था में, करमकौ करतासौ दीसै= कर्म का कर्त्ता प्रतीत होता है, लीये भरम-उपासना= भ्रमपूर्ण-उपासना को लिये हुये यहै महा-मोहकौ पसार= यह महामोह का विस्तार है, यहै मिथ्याचार= यही विपरीत-प्रवर्तन है, यहै भौ-विकार= यही भव यानि संसार/जन्म-मरण का विकार है, यह विवहार-वासना= यही व्यवहार का कथन है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मा त्रिकाल-शुद्ध अनंत-ज्ञान का धारी होने पर भी संसारअवस्था में भ्रमित और पर का कर्त्ता क्यों होता है?- इसका सटीक-वर्णन किया है। निश्चयनय की दृष्टि से देखें, तो आत्मा का स्वभाव या धर्म स्व-पर-प्रकाशक है, अर्थात् ज्ञान की निर्मलता में न केवल स्वयं के अनंतगुण, बल्कि तीन लोक और तीन काल के समस्त-पदार्थ, उनके समस्त-गुुण और उनकी भूत-भविष्य और वर्तमान अर्थात् त्रिकालवर्ती समस्त-पर्यायें भी युगपत् प्रतिभासित होती है, अर्थात् आत्मा अनंतगुणों एवं अनंतशक्ति का धनी है। लेकिन व्यवहार-नय से देखें, तो वही आत्मा संसार अर्थात् अज्ञान-अवस्था में कर्मों का कर्त्ता दिखाई देता है, अनंत-गुणों का स्वामी होते हुए भी भ्रमित होकर दूसरों की उपासना अर्थात् चाकरी करता है, यह और कुछ नहीं मोह का ही विस्तार अथवा माहात्म्य है। मोह अर्थात् परद्रव्य में अपनेपन के कारण अकर्ता जीवोऽयं स्थित इति विशुद्ध: स्वरसत:, स्फुरच्चिज्ज्योतिर्भिश्छुरित-भुवनाभोग-भवन:। तथाप्यस्यासौ स्याद्यदिह किल बन्धः प्रकृतिभिः, स खल्वज्ञानस्य स्फुरति महिमा कोऽपि गहनः ।। 3।। ही यह आत्मा पर का कर्त्ता बनता है, और फिर उसीरूप विपरीत-आचरण करता है, यही ‘मिथ्याचार’ है। यही भव-विकार है, पुन: जन्म-मरण का कारण है अर्थात् पर के ममत्व व संयोग से उत्पन्न मोह-रागद्वेष के भाव ही तो संसार है, भव-वर्धक है अर्थात् संसार को बढ़ाने का मूल-कारण है। यही व्यवहारवासना है अर्थात् व्यवहार का कथन है। वस्तु का स्वरूप जैसा है, वैसा न कहकर संयोग से अन्यथा कहना ही तो ‘व्यवहार’ है, जिसे आगम में ‘असत्यार्थ’, या ‘उपचरित-कथन’ नाम दिया गया है।

(चौपाई)

यथा जीव करता न कहावै, तथा भोगता नाम न पावै।
है भोगी मिथ्यामति-माँहि, गयैं मिथ्यात भोगता नांहीं।। 6।।

शब्दार्थ :- यथा जीव करता न कहावै= जब जीव कर्म का कर्त्ता नहीं कहलाता, तथा भोगता नाम न पावै है= तब वह भोक्ता नाम भी नहीं पाता, भोगी मिथ्यामति-माँहि= मिथ्याबुद्धि में भोगी है, गयैं मिथ्यात भोगता नांहीं= मिथ्याबुद्धि दूर हो जाने पर वह भोक्ता नहीं है। विशेषार्थ :- जीव कर्मफल का भोक्ता कब होता है?- जो जीव ये मानता है कि ‘‘मैंने कर्म किया’’, वही कर्मफल का भोक्ता भी होता है, और- जो जीव स्वयं को कत्तार् नहीं मानता वह भोक्ता नाम भी नहीं पाता, क्योंकि स्वयं को परद्रव्य का कर्त्ता मानना ही मिथ्यात्व या मिथ्याबुद्धि है। जब तक यह मिथ्याबुद्धि रहती है, तबतक जीव कर्मफल को भोगे या न भोगे, वह ‘कर्मफल का भोक्ता’ कहा जाता है, परन्तु मिथ्याबुद्धि के क्षय होते ही जीव पुन: ‘अभोक्ता’ नाम पाता है।

(सवैया इकतीसा)

जगवासी-अग्यानी त्रिकाल परजाइ-बुद्धी, सो तौ विषै-भोगनिकौ भोगता कहायौ है।
समकिती जीव जोग-भोगसौं उदासी तातैं, सहज-अभोगता गरंथनिमैं गायौ है।।
याही-भाॅंति वस्तु की व्यवस्था अवधारि बुध, परभाउ त्यागि अपनौ सुभाउ आयौ है।
निरविकलप-निरुपाधि आतम अराधि, साधि जोग-जुगति समाधिमैं समायौ है।। 7।।

शब्दार्थ :- जगवासी अग्यानी त्रिकाल परजाइ-बुद्धी= संसार में रहनेवाले अज्ञानी-जीव की हर समय पर्यायबुद्धि होने से, सो तौ विषै-भोगनिकौ भोगता कहायौ है= उसे विषय-भोगों का भोक्ता कहा जाता है, समकितीजीव जोग-भोगसौं उदासी= सम्यग्दृष्टि-जीव विषय-भोगों से उदास रहते हैं, तातैं सहज-अभोगता गरंथनिमैं ं वस्तु की व्यवस्था अवधारि गायौ है= इसलिए सहज-अभोक्ता रहते हैं,- ऐसा ग्रंथों में कहा है। याही-भाॅति बुध= इसीप्रकार वस्तु-व्यवस्था का निर्णय कर ज्ञानी-जीव, परभाउ-त्यागि= परभावों को त्यागकर, अपनौ सुभाउ आयौ है= अपने स्वरूप को ग्रहण करते हैं, निरविकलप-निरुपाधि आतम अराधि= विकल्परहित, उपाधिरहित आत्मतत्त्व की आराधना कर, साधि जोग-जुगति समाधिमैं समायौ है= योग-निग्रह का उपाय कर आत्मसमाधि में समाते हैं। विशेषार्थ :- अज्ञानी-जीव कर्मफल, विषय-भोग भोगते हुये ‘भोक्ता’ कहलाता और ज्ञानी-जीव उसी स्थिति में ‘अभोक्ता’ कहलाते हैं,- ऐसा क्यों है? प्रस्तुत-छंद में कवि ने इसी सत्य का स्पष्टीकरण किया है। भोक्तृत्वं न स्वभावोऽस्य स्मृतः कर्तृत्ववच्चितः। अज्ञानादेव भोक्ताऽयं तदभावादवेदकः ।। 4।। अज्ञानी प्रकृति-स्वभाव-निरतो नित्यं भवेद्वेदको, ज्ञानी तु प्रकृति-स्वभाव-विरतो नो जातुचिद् वेदकः। इत्येवं नियमं निरूप्य निपुणैरज्ञानिता त्यज्यतां, शुद्धैकात्ममये महस्यचलितैरासेव्यतां ज्ञानिता।। 5।। सर्व विशुद्धि-द्वार अज्ञानी मिथ्यादृष्टि-जीव अनादि से पर्याय-बुद्धि में रमता आया है, अर्थात् एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक जब जिस पर्याय में गया, उसी पर्याय को अपना स्वरूप माना, और उस पर्याय से जुड़े संयोगों और पदार्थों को भी अपना माना है। पुण्य के उदय से मिले पंचेन्द्रिय के विषयों में सुख मानकर अतिचाव से उनको भोगा, और पाप के उदय में उन पदार्थों और संयोगों के बिछुड़ने पर अपने को दु:खी माना; फलस्वरूप वह जीव ‘कर्मों का कर्त्ता’ और ‘कर्मफल का भोक्ता’ कहलाया। जबकि इसके विपरीत सम्यग्दृष्टि-जीव ने प्राप्त-पर्याय और संयोगों से भिन्न स्वयं को ज्ञायक भगवान् आत्मा स्वीकार किया, जिसके फलस्वरूप प्राप्त-संयोगों और पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों से निरन्तर उदासीनता का भाव रहा। यद्यपि सम्यग्दृष्टि-जीव भी कर्म की क्रिया करते और कर्मफल को भोगते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन उनको आसक्ति की जगह अनासक्ति या कहें विरक्ति का भाव वर्तता है; इसीलिए आगम में सम्यग्दृष्टि-जीव को ‘अकर्ता’ और ‘अभोक्ता’ कहा गया है। इसप्रकार पूर्व-वर्णित वस्तु- व्यवस्था का सम्यक्-निर्णय कर ज्ञानी-जीव परभावों को त्यागकर अर्थात् पर में अपनापन या ममत्व का त्यागकर अपने ज्ञायक-स्वभाव को ग्रहण करते हैं। और फिर समस्त शुभ, अशुभ और शुद्ध-विकल्पों को त्यागकर, आत्मस्वभाव की आराधनापूर्वक मन, वचन और काय- तीनों योगों के निग्रहपूर्वक आत्मस्वरूप में रमने या समाने का पुरुषार्थ करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

चिनमुद्रा-धारी ध्रुव-धर्म-अधिकारी, गुन-रतन-भंडारी अपहारी कर्म-रोगकौ।
प्यारौ-पंडितनकौं हुस्यारौ मोख-मारग में, न्यारौ पुद््गलसौं उज्यारौ-उपयोगकौ।।
जानै निज-पर-तत्त, रहै जगमैं विरत्त, गहै न ममत्त मन-वच-काय जोगसौं।
ता-कारन ग्यानी ग्यानावरनादि -करमकौ, करता न होइ भोगता न होइ भोगकौ।। 8।।

शब्दार्थ :- चिनमुद्रा-धारी ध्रुव-धर्म-अधिकारी= चैतन्य-मुद्रा को धारण करनेवाला, अपने नित्य-स्वभाव का स्वामी, गुन-रतन-भंडारी- गुणरूपी-रत्नों का भंडार, अपहारी कर्म-रोगकौ= कर्मरूपी-रोग को नष्ट करनेवाला, प्यारौ पंडितनकौं= ज्ञानियों का प्रिय, हुस्यारौ मोख-मारग में= मोक्षमार्ग में कुशल, न्यारौं-पुद््गलसौं= पुद््गल से भिन्न, उज्यारौ-उपयोगकौ= उपयोग यानि ज्ञान-दर्शन का प्रकाशरूप, जानै निज-पर-तत्त= निज और पर के तत्त्व का ज्ञाता, रहै जगमैं विरत्त= संसार से विरक्त रहता है, गहै न ममत्त मन-वच-काय-जोगसौं= मन, वचन, काय तीनों योगों से ममत्वरहित, ता-कारन ग्यानी= इसकारण ज्ञानी-जीव, ग्यानावरनादि करमकौ= ज्ञानावरणी आदि कर्मों का, करता न होइ= कर्त्ता नहीं होता, भोगता न होइ भोगकौ= भोगों का भोक्ता भी नहीं होता। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ज्ञानी-जीव कर्म करते हुये भी कर्म के कर्त्ता नहीं, और भोग भोगते हुए भी कर्मफल के भोक्ता क्यों नहीं है?- इसका सटीक-स्पष्टीकरण किया है। सर्वप्रथम ज्ञानी-जीव चैतन्यमुद्रा के धारी अर्थात् सम्यग्दर्शन से सुशोभित हैं, जो ध्रुव अर्थात् नित्य-स्वभाव के स्वामी हैं, जो अपने को प्रतिसमय स्वभावरूप ही अनुभव करते हैं। जैसे रत्नागार में विभिन्न-प्रकार के रत्न सुशोभित होते हैं, वैसे आत्मा भी अनंतगुणों-रूपी रत्नों का भण्डार है। कर्मरूपीरोगों को नष्ट करनेवाला है, अर्थात् जब जीव स्वयं को मात्र ज्ञातारूप अनुभव करता है, तो कर्म के

ज्ञानी करोति न न वेदयते च कर्म, जानाति केवलमयं किल तत्स्वभावम्।
जानन्परं करण-वदे नयोरभावा-, च्छुद्ध-स्वभाव-नियतः स हि मुक्त एव।। 6।।

परमाणु स्वत: ही क्षय को प्राप्त होते हैं।

जो ज्ञानियों के अतिप्रिय हैं, जो मोक्षमार्ग में निपुण हैं, अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थरत हैं। जो स्वयं को प्रतिसमय देहादिक जड़-द्रव्यों से पूर्णत: भिन्न अनुभव करते हैं। ज्ञान-दर्शनमयी उपयोग के प्रकाशक हैं। जो निज और पर के ज्ञाता हैं, अर्थात् निज को निजरूप और पर को पररूप अनुभव करते हैं। संसार से विरक्त है, मन-वचन और काया तीनों योगों से रंचमात्र भी पर-वस्तु, पर-भावों के प्रति ममत्व ग्रहण नहीं करते- ऐसे साधक अर्थात् ज्ञानी-जीव कर्म करते हुए भी ज्ञानावरणादि आठ-कर्मों के कर्त्ता, और पंचेन्द्रिय के विषय-भोग करते हुए भी भोक्ता नहीं होते।

(दोहा)

निरभिलाष करनी करै, भोग-अरुचि घट-माँहि।
तातैं साधक सिद्ध-सम, करता-भुगता नांहिं।। 9।।

शब्दार्थ :- निरभिलाष करनी करै= इच्छारहित-कार्य करते हैं, भोग-अरुचि घट-माँहि= हृदय में भोगों के प्रति अरुचि या अनासक्ति है, तातैं साधक सिद्धसम= इसीलिये साधक-जीव सिद्ध के समान, करता भुगता नांहि=ं कर्त्ता-भोक्ता नहीं है। विशेषार्थ :- इस छंद में कविवर पुन: कहते हैं कि जहाँ अज्ञानी-जीव कोई भी धर्म-कार्य बिना किसी इच्छा के नहीं करता, वहीं दूसरी ओर ज्ञानी-जीव हर कार्य बिना इच्छा या स्वार्थ के ही करते हैं, अंतरंग में पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों के प्रति निरन्तर अरुचि या कहें अनासक्ति का भाव वर्तता है, इसीलिए ज्ञानीजीव सिद्ध भगवान् के समान ज्ञाता दृष्टा रहते हैं, कर्त्ता भोक्ता नहीं होते हैं।

(कवित्त)

ज्यौं हिय-अंध विकल मिथ्यात-धर, मृषा सकल-विकलप उपजावत।
गहि एकंत-पक्ष आतमकौ, करता मानि अधोमुख धावत।।
त्यौं जिनमती दरब-चारित्री कर, कर करनी करतार कहावत।
वंछित-मुकति तथापि मूढ़मति, बिन-समकित भव-पार न पावत।। 10।।

शब्दार्थ :- ज्यौं हिय-अंध विकल मिथ्यात धर= जैसे हृदय का अंधा व्याकुल मिथ्यादृष्टि, मृषा सकलविकलप उपजावत= झूठे संकल्प-विकल्प उत्पन्न करता है, गहि एकंत-पक्ष= एकांत-पक्ष को ग्रहणकर, आतमकौ करता मानि= आत्मा को कर्त्ता मानकर, अधोमुख धावत= नीचे की ओर दौड़ लगाता है, त्यौं जिनमती दरब-चारित्री= उसीप्रकार जिनमत को माननेवाला द्रव्यचारित्र/देहाश्रित व्रतादि को धारणकर, कर-कर करनी करतार कहावत= क्रिया कर-करके कर्त्ता कहलाता है, वंछित-मुकति= मुक्ति को चाहता है, तथापि मूढमति= फिर भी मूर्ख-बुद्धि जीव, बिन समकित भव-पार न पावत= बिना सम्यग्दर्शन के संसार से पार नहीं होता। विशेषार्थ :- यद्यपि आत्मिक-सामर्थ्य की दृष्टि से अज्ञानी-जीव भी कर्म का कर्त्ता और कर्मफल का भोक्ता नहीं होता, लेकिन फिर भी, प्रतिसमय कर्त्ता और भोक्ता कहलाता है क्यों?- इस तथ्य का वर्णन कवि ने इस-छंद में किया है। ये तु कर्तारमात्मानं पश्यन्ति तमसा तताः। सामान्य-जनवत्तेषां न मोक्षोऽपि मुमुक्षताम् ।। 7।। सर्व विशुद्धि-द्वार इस छंद में कवि ने मिथ्यादृष्टि-जीव को हृदय का अंधा अर्थात् विवेक-रहित कहा; क्योंकि मिथ्यादृष्टि-जीव को सत्य का भान न होने से उसकी सभी क्रियायें विवेकरहित ही होती हैं। साथ ही मिथ्यात्व से आकुलित अर्थात् विपरीत-श्रद्धानी होने से व्यर्थ ही झूठे संकल्प-विकल्प अर्थात् परद्रव्य को अपना माननेरूप झूठे-विकल्प उत्पन्न करता है। झूठे इसलिये कहा, क्योंकि अज्ञानी-जीव के अनादि से आज तक परद्रव्य को अपना मानने पर भी परद्रव्य तो क्या, एक परमाणु भी इसका अपना नहीं हुआ। वस्तु का स्वरूप ‘अनेकांत’ मय है, अर्थात् प्रत्येक वस्तु अनेक-धर्मात्मक है। एक ही वस्तु में परस्पर-विरोधी दो धर्मों या शक्तियों का प्रकाशित होना ‘अनेकांत’ है, अर्थात् जो वस्तु किसी अपेक्षा से एकरूप है, वही अन्य अपेक्षा से अनेकरूप भी है, इसीप्रकार अपेक्षा भेद से जो वस्तु नित्य है, वही अनित्य भी है, जो सत् है, वही असत् भी है। लेकिन अज्ञानी-जीव आत्मा के एक-पक्ष को ही ग्रहण करता है, और स्वयं को पर का कर्त्ता मानकर अधोमुख या नीचे की ओर दुर्गति की ओर दौड़ लगाता है, अर्थात् कर्तृत्व बुद्धि के फलस्वरूप नरक-निगोद आदि गतियों को प्राप्त करता है। इसीप्रकार जो जीव जिनमत का अनुयायी है, देव-गुरु-धर्म का सच्चा-उपासक है, द्रव्यचारित्र अर्थात् बाह्य में नग्न-अवस्था धारण कर स्वयं को तत्संबंधी क्रियाओं का कर्त्ता मानता है, अर्थात् 'मैं मुनि हूँ, मैं 28 मूलगुणों का पालन करता हूँ, और इसके बदले में मुक्ति पाने की चाहत रखता है। उस जीव से कविवर कहते हैं कि ‘‘हे मूढमति! हे अज्ञानी! बिना सम्यग्दर्शन के कोई भी जीव संसार से पार नहीं होता। अर्थात् जबतक आत्मस्वरूप का सम्यक्-श्रद्धान नहीं है, तबतक मात्र शरीराश्रित बाह्य-चारित्र-संबंधी थोथी-क्रियाओं के फल में मोक्ष की प्राप्ति तीन काल में भी संभव नहीं है।’’

(चौपाई)

चेतन-अंक जीव लखि लीन्हा, पुद््गल-कर्म अचेतन चीन्हा।
बासी एक खेत के दोऊ, जदपि तथापि मिलैं नहिं कोऊ।। 11।।

शब्दार्थ :- चेतन-अंक जीव लखि लीन्हा= चेतन-चिह्न या लक्षण से जीव को पहिचान लिया, पुद््गल-कर्म अचेतन चीन्हा= पुद््गल-कर्म को अचेतन पहिचाना, जदपि बासी एक खेत के दोऊ= यद्यपि दोनों एक ही क्षेत्र के निवासी हैं, तथापि मिलैं नहिं कोऊ= फिर भी दोनों एकदूसरे से कभी नहीं मिलते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जीव और पुद््गल का लक्षण बताते हुये दोनों की भिन्नता को सिद्ध किया है। जीव का लक्षण चैतन्य यानि ज्ञाता-दृष्टापना है, जबकि पुद््गल-कर्मों का लक्षण अचेतनपना है, अर्थात् दोनों का लक्षण पूर्णतया भिन्न है। यद्यपि दोनों के लक्षण भिन्न हैं, परन्तु फिर भी दोनों एक ही क्षेत्र में रहने से दोनों एकक्षेत्रावगाही हैं। जहाँ आत्मा के प्रदेश है, वहीं कर्मों की सत्ता भी है; लेकिन इतना नजदीक या एकक्षेत्रावगाही होने पर भी जीव और पुद््गल एकदूसरे में कभी नहीं मिलते, और न कभी मिलेंगें।

(दोहा)

निज-निज भाव-क्रिया-सहित, व्यापक-व्यापि न कोइ।
कर्ता पुद््गल-करमकौ, जीव कहाँसौं होइ।। 12।।

शब्दार्थ :- निज-निज भाव-क्रिया- सहित= अपने अपने भाव और क्रियाओं के साथ, व्यापक-व्यापि नास्ति सर्वोऽपि सम्बन्धः परद्रव्यात्म-तत्त्वयोः। कर्त्तृ-कर्मत्व-सम्बन्धाभावे तत्कर्तृता कुतः ।। 8।। न कोइ= कोई व्यापक-व्याप्य नहीं है, कर्ता पुद््गल-करमकौ= तब कर्त्ता पुद््गलकर्म का, जीव कहाँसौं होइ= जीव कैसे हो सकता है? विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि व्याप्य-व्यापक-संबंध की दृष्टि से जीव पुद््गलकर्म का कर्त्ता कैसे हो सकता है? व्याप्य- वह पदार्थ जो व्यापक में पूरीतरह से समा जाये, व्यापक- जिसमें व्याप्य-पदार्थ समाहित हो जाये। जैसे- सोने के आभूषण, इसमें सोना व्यापक और आभूषण व्याप्य। जैसे- ज्ञान आत्मा के सर्वांग में व्याप्त है, इसलिये ज्ञान व्याप्य और आत्मा व्यापक। यहाँ जीव और कर्मरूप पुद््गल-परमाणु दो वस्तु हैं, जो कि दो स्वतंत्र भिन्न-द्रव्य हैं। एक अमूर्तिक है, तो दूसरा मूर्तिक, दोनों के लक्षण, गुण, क्रिया, स्वभाव सब कुछ भिन्न है। इनमें तो व्याप्य और व्यापकपने का तो सवाल ही नहीं उठता है। और जब व्याप्य-व्यापक नहीं तो कर्त्ता-कर्म संबंध कैसे? क्योंकि कर्त्ता-कर्म-संबंध भी एक ही द्रव्य पर घटित होता है। यहाँ तो दोनों ही द्रव्य भिन्न, और अपने-अपने स्वभावरूप स्वतंत्र-कार्य करते हैं, कोई किसी के आधीन नहीं, तो एक-द्रव्य दूसरे द्रव्य का अर्थात् जीव-द्रव्य पुद््गल-द्रव्य का कर्त्ता कैसे हो सकता है? अर्थात् कभी नहीं हो सकता है।

(सवैया इकतीसा)

जीव और पुदगल-करम रहैं एक-खेत, जदपि तथापि सत्ता न्यारी-न्यारी कही है।
लक्षन-स्वरूप-गुन-परजै-प्रकृति भेद, दुहूँमैं अनादिहीकी दुविधा ह्वै रही है।।
एते पर भिन्नता न भासै जीव-करमकी, जौंलौं मिथ्याभाव तौंलौं ओंधि-बाऊ बही है।
ग्यानकैं उदोत होत ऐसी सूधी-द्रिष्टि भई, जीव कर्म-पिंडकौ अकरतार सही है।। 13।।

शब्दार्थ :- जदपि जीव और पुदगल-करम रहैं एक-खेत= यद्यपि जीव और पुद््गल-कर्म एक ही क्षेत्र में रहते हैं, तथापि सत्ता न्यारी-न्यारी कही है= फिर भी उनकी सत्ता भिन्न-भिन्न कही गई है, लक्षन-स्वरूप-गुन-परजैप्रकृति भेद= लक्षण, स्वरूप, गुण, पर्याय, स्वभाव सभी भिन्न हैं (लेकिन फिर भी) दुहम ूँ ैं अनादिहीकी दुविधा ह्वै रही है= दोनों में अनादिकाल से ही भ्रम बना हुआ है, एते पर भिन्नता न भासै जीव-करमकी= इतने पर भी जीव और कर्म में भिन्नता भासित नहीं होती, जौंलौं मिथ्याभाव तौंलौं ओंधि बाऊ बही है= जबतक मिथ्यात्व-भाव है, तबतक हवा उल्टी ही बहती है, ग्यानकैं उदोत होत ऐसी सूधी-द्रिष्टि भई= सम्यग्ज्ञान के उदय होने पर दृष्टि ऐसी सम्यक् होती है कि, जीव कर्म-पिंडकौ अकरतार सही है= जीव कर्म-पिण्ड का अकर्ता ही सिद्ध होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जीव के अकर्तृत्व-पने को सिद्ध किया है। वास्तव में तो जीव कर्म की क्रिया का और कर्मफल का न कर्त्ता है, न भोक्ता है। जीव तो प्रतिसमय अपने स्वभाव के अनुसार उनका ज्ञाता ही है। लेकिन अज्ञानता के कारण संसार-अवस्था में मोही-जीव इस सत्य को स्वीकार नहीं करता, और दु:खी होता है, परन्तु ज्ञान का प्रकाश होने पर जीव उसी सत्य को अर्थात् अकर्तापने को स्वीकार करता है। यद्यपि अनादिकाल से जीव और कर्मरूप पुद््गल-परमाणु एक ही क्षेत्र में रहते हैं, लेकिन फिर भी दोनों ने एक दूसरे को कभी स्पर्श नहीं किया; क्योंकि इन दोनों की सत्ता ही भिन्न-भिन्न है। सिर्फ सत्ता ही नहीं, दोनों के लक्षण-स्वरूप-गुण, पर्याय-स्वभाव भी पूर्णत: भिन्न हैं। कैसे?

एकस्य वस्तुन इहान्यतरेण सार्धं सम्बन्ध एव सकलोऽपि यतो निषिद्धः।
तत्कर्तृ-कर्म-घटनास्ति न वस्तुभेदे, पश्यन्त्वकर्तृ मुनयश्च जनाश्च तत्त्वम् ।। 9।।

सर्व विशुद्धि-द्वार जीव का लक्षण ‘चेतनपना’ या कहें जानना-देखना और कर्म परमाणु का लक्षण ‘अचेतनपना’। जीव का स्वरूप ‘अमूर्तिक’ और कर्म-परमाणु ‘मूर्तिक’। जीव के गुण ‘ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य’ आदि अनंत गुण जब कि कर्म-परमाणु के गुण ‘स्पर्श, रस, गंध, वर्णादि’। जीव की पर्यायें ‘देव, नर, तिर्यंच, नारकादि’ रूप जब कि कर्म-परमाणु ‘निषेक’ और ‘स्कंध’ रूप या कहें’ ज्ञानावरणादि आठ-कर्मरूप। जीव की प्रकृति अर्थात् स्वभाव ‘जाननरूप, अखंड, शाश्वत’, जबकि कर्म-परमाणु ‘स्निग्ध-रूक्षस्वभावी’ होने से परमाणुओं का मिलना-बिछुड़ना चलता रहता है। इसप्रकार जीव और कर्म परमाणु पूरीतरह से भिन्न दो स्वतंत्र-द्रव्य हैं। जीव और कर्म-परमाणु में इतनी भिन्नता होने पर भी जीव अनादि से मोह के कारण भ्रमित है, और अज्ञानतावश पर-द्रव्य और परभावों का कर्त्ता बनकर दुःखी होता आया है। जब तक मिथ्यात्व हृदय में है, तब तक हवा उल्टी ही बहेगी अर्थात् जबतक आत्मविषयक अज्ञानता का सद्भाव है, तबतक श्रद्धान-ज्ञान और आचरण भी विपरीत ही रहेगा। लेकिन जैसे सूर्य का उदय होने पर न केवल रात का घना-अंधकार विलय को प्राप्त होता है, बल्कि जगत् के सभी पदार्थ भी सहज प्रकाशित होते हैं; ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञान-सूर्य का उदय होने पर न केवल मिथ्यात्व का काला-अंधकार विलय को प्राप्त होता है, बल्कि वस्तु का सत्य-स्वरूप भी प्रकाशित होता है। सत्य-स्वरूप का अनुभव होने पर न केवल दृष्टि सम्यक् होती है, बल्कि जीव भी स्वयं कर्म-परमाणुओं का सहज-अकर्त्ता भासित होता है।

(दोहा)

एक-वस्तु जैसी जु है, तासौ मिलै न आन।
जीव अकरता करमकौ, यह अनुभौ-परवांन।। 14।।

शब्दार्थ :- एक-वस्तु जैसी जु है= जो वस्तु जैसी है, तासौ मिलै न आन= उसमें अन्य वस्तु नहीं मिल सकती है, जीव अकरता करमकौ= जीव कर्म का अकर्त्ता है, यह अनुभौ-परवांन= यह अनुभव से प्रमाणित है। विशेषार्थ :- लोक में चेतन और अचेतन जितने भी पदार्थ हैं, सब अपने-अपने स्व-चतुष्ट्य में ही रहते हैं, कोई पदार्थ किसी अन्य-पदार्थ में न आज तक मिला है और न कभी मिलेगा। उदाहरण के लिये जैसे हम शिकंजी बनाते हैं, उसमें चीनी, नमक, और नीबू सब मिलाते हैं, सभी को अच्छे से मिलाने पर भी वह कभी नहीं मिलते; क्योंकि यदि मिल जाते तो हमें हर चीज का अलग-अलग स्वाद नहीं आता, सभी का एक मिला-जुला स्वाद आता, परन्तु ऐसा नहीं होता। विचार कीजिये जब एक ही पुद््गल-द्रव्य के दो परमाणु आपस में नहीं मिलते, अर्थात् जब जड़ ही, जड़ में नहीं मिलता, तब ये जीव और कर्म रूप पुद््गल-परमाणु तो दो भिन्न स्वतंत्र-द्रव्य हैं, एक चेतन है, तो दूसरा अचेतन, तब ये आपस में कैसे मिल सकते हैं? अर्थात् कभी नहीं मिलते, और जब मैं चेतन-आत्मा किसी अन्य-पदार्थ में मिलता ही नहीं, तो उसका कर्त्ता कैसे हो सकता हूँ? कविवर कहते हैं कि ‘‘जीव कर्मों का अकर्त्ता ही है, ये तथ्य अनुभव से प्रमाणित है, अर्थात् अनंत तीर्थंकर-परमात्माओं ने इसे अपने अनुभव से प्रमाणित किया है, और यही सत्य है।’’

(चौपाई)

जो दुरमती-विकल-अग्यानी, जिन्हि सु-रीति पर-रीति न जानी।
माया-मगन भरम के भरता, ते जिय भाव-करम के करता।। 15।।

ये तु स्वभाव-नियमं कलयन्ति नेम-मज्ञान-मग्न-महसो बत ते बराकाः।
कुर्वन्ति कर्म तत एव हि-भावकर्म-कर्ता स्वयं भवति चेतन एव नान्यः।। 10।।

शब्दार्थ :- जो दुरमती-विकल-अग्यानी= जो जीव दुर्बुद्धि, व्याकुल और अज्ञानी हैं, जिन्हि सु-रीति पररीति न जानी= जो स्व-परिणति और पर-परिणति को नहीं जानते, माया-मगन भरम के भरता= माया में मग्न, भ्रम के पोषक/स्वामी हैं, ते जिय भाव-करम के करता= वे जीव भावकर्म के कर्त्ता हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने अज्ञानी-जीव की भूल का वर्णन किया है कि कैसे वह भाव-कर्म का कर्त्ता होता है? जो जीव दुर्बुद्धि हैं, अर्थात् जिनकी बुद्धि उल्टी चलती है, जिन्हें हित-अहित का विवेक ही नहीं है; ऐसे जीव मोह के कारण व्याकुल हैं, ज्ञानस्वरूप आत्मा का भान न होने से अज्ञानी है। वे न तो स्व-परिणति अर्थात् अपने ज्ञाता-स्वभाव को जानते हैं, और न ही पर-परिणति अर्थात् पर के लक्ष्य से होने वाले मोहराग-द्वेष आदि विकारी-भावों के स्वरूप को जानते हैं। सिर्फ परद्रव्य के आकर्षण या भौतिक-चकाचौंध के कारण छल में ही मगन हैं और पर में ही सुख है- ऐसे भ्रम से भ्रमित हैं, फलस्वरूप पर में अपनापन और इष्ट-अनिष्ट बुद्धि होने से मोह, राग, द्वेष आदि विकारी भाव-कर्मों के कर्त्ता बनते हैं।

(दोहा)

जे मिथ्यामति-तिमिरसौं, लखै न जीव-अजीव।
तेई भावित-करमके, करता होंहिं सदीव।। 16।।

जे असुद्ध-परनति धरैं, करैं अहं-परवांन।
ते असुद्ध-परिनामके, करता होंहिं अजान।। 17।।

शब्दार्थ :- जे मिथ्यामति-तिमिरसौं= जो मिथ्यात्वरूपी-अंधकार के कारण, लखैं न जीव-अजीव= जीव और अजीव को नहीं पहचानते हैं, तेई भावित करमके= वे ही भाव-कर्म के, करता होंहिं सदीव= हमेशा कर्त्ता होते हैं।। 16।। जे असुद्ध-परनति धरैं= जो अशुद्ध-परिणामों को धारण करते हैं, करैं अहं-परवांन= परपदार्थों में अहंबुद्धि करते हैं, ते असुद्ध परिनामके करता होंहिं अजान= वे अज्ञानी-जीव अशुद्ध-परिणामों के कर्त्ता होते हैं।। 17।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त दोनों छंदों में कवि ने उन जीवों की विवेचना की है, जो अपनी ही भूल से भाव- कर्म के कर्त्ता बनते हैं। अनादिकाल से जीव मिथ्यात्वरूपी घोर-अंधकार में फँसा हुआ है। अंधकार इतना गहरा था कि इसे न जीव का स्वरूप दिखाई दिया, और न अजीव का। इसीलिए आज तक या तो जीव को अजीव या अजीव को जीव मानता आया है, या फिर दोनों को एक मानता है। कहने का अभिप्राय यही है कि आत्मा जीव और पर-भाव अजीव है, लेकिन जीव और अजीव के स्वरूप का सच्चा-ज्ञान न होने से इस जीव ने रागादि-भावों को ही अपना अर्थात् जीव का स्वभाव माना है, इसलिए जीव हमेशा से इन रागादिरूप भाव-कर्म का कर्त्ता बनता आया है। इसीप्रकार अगले-छंद में कविवर कहते हैं कि जो जीव स्वयं के ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव को भूलकर पर-पदार्थों में अहंबुद्धि अर्थात् अपनापन करता है, इष्ट-अनिष्ट या कहें अच्छे-बुरे की कल्पना करता है, तो मोह, राग, द्वेष आदि अशुद्ध-परिणामों की उत्पत्ति होती है, स्वभाव की शुद्धता का भान न होने से वह उन अशुद्ध-परिणामों को ही अपना स्वभाव मानकर तदनुरूप-आचरण करता है, फलस्वरूप अज्ञानता के कारण स्वयं ही इन अशुद्ध-परिणामों का कर्त्ता बनता है। सर्व विशुद्धि-द्वार

(दोहा)

शिष्य कहै ''प्रभु! तुम कह्यौ, दुविध-करमकौ रूप।
दरब-कर्म पुदगल-मई, भावकर्म-चिद्रूप’'।। 18।।

करता दरवित-करमकौ, जीव न होइ त्रिकाल।
अब यह भावित-करम तुम, कहौ कौन-की चाल।। 19।।

करता याको कौन है, कौन करै फल-भोग।
कै पुदगल कै आतमा, कै दुहूँकौ संजोग?।। 20।।

शब्दार्थ :- शिष्य कहै ''प्रभु! तुम कह्यौ= शिष्य कहता है गुरुजी! आपने ऐसा कहा कि, दुविध-करमकौ रूप= कर्म दोप्रकार का है, दरब-कर्म पुदगल-मई= द्रव्यकर्म पुद््गलमय, भावकर्म चिद्रूप= भावकर्म चिद्रूप/ चैतन्य का विकार है।। 18।। करता दरवित-करमकौ= द्रव्य-कर्म का कर्त्ता, जीव न होइ त्रिकाल= जीव तीनों काल नहीं है, अब यह भावित-करम= अब यह भाव-कर्म, तुम कहौ कौनकी चाल= आप बताओ किसकी चाल है? ।। 19।। करता याको कौन है= इस भावकर्म का कर्त्ता कौन है, कौन करै फल-भोग= इसे कौन करता है, कौन इसका फल भोगता है, कै पुदगल कै आतमा= या तो पुद््गल या आत्मा, कै दुहूंकौ संजोग= या दोनों मिलकर।। 20।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त-छंदों में कवि ने कर्म के विषय में शिष्य के हृदय की शंका को व्यक्त किया है। इससे पहले के छंदों में कवि ने कर्म के दो भेद ‘द्रव्यकर्म’ और ‘भावकर्म’ का वर्णन किया, और दोनों में ही जीव के कर्तापने का निषेध किया। तब शिष्य ये प्रश्न करता है कि ‘‘गुरुजी! आपने कर्म के दो भेद कहे, एक तो ज्ञानावरणादिक-‘द्रव्यकर्म’ और दूसरे मोह, राग, द्वेषादि ‘भावकर्म’। उनमें से द्रव्यकर्म तो पुद््गलमय है अर्थात् पुद््गल की रचना है, और भावकर्म चिद््रूप है या चैतन्य का विकार है।’’ ''ज्ञानावरणादि-द्रव्यकर्म पुद््गल की रचना होने से जीव उसका कर्त्ता न कभी था, न है, और न कभी होगा, -यह तो सही है; परन्तु मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भाव जो चैतन्य का ही विकार है, ये भाव जीव में ही होते हैं, पुद््गल में नही; तो फिर उनका कर्त्ता कौन है? कौन उन कर्मफलों को भोगता है? जीव है या पुद््गल? अथवा दोनों का युगल-रूप?

(दोहा)

क्रिया एक कर्ता-जुगल, यौं न जिनागम-माँहि।
अथवा करनी और की, और करै यौं नांहि।। 21।।

करै और फल भोगवै, और बनै नहिं एम।
जो करता सो भोगता, यहै जथावत जेम।। 22।।

शब्दार्थ :- क्रिया एक कर्ता-जुगल= कार्य एक कर्त्ता दो, यौं न जिनागम-माँहि= ऐसा जिनागम में नहीं होता है, अथवा करनी और की= अथवा करनी किसी की, और करै यौं नांहि= और करनेवाला कोई और हो- ऐसा भी नहीं होता।। 21।। करै और फल भोगवै और= कार्य कोई करे और फल कोई और भोगे, बनै नहि एम= ऐसा भी नहीं होता, जो करता सो भोगता= जो कर्त्ता है, वही भोक्ता होता है,= यहै जथावत जेम= यही यथार्थ (जिनवचन) है।। 22।। विशेषार्थ :- पिछले-छंदों में शिष्य ने शंका व्यक्त की थी कि भावकर्म का कर्त्ता जीव है, या पुद््गल है, या दोनों है? उसी शंका का समाधान करते हुए गुरुजी कहते हैं कि ‘‘न तो एक क्रिया के दो कर्त्ता होते हैं और न ही ऐसा होता है कि क्रिया कोई और करे और कर्त्ता किसी और को माना जाये। अर्थात् जो कार्य करता है, वही उस क्रिया का कर्त्ता कहा जाता है।’’ ‘‘इसीप्रकार जो क्रिया करता है, वही उस क्रिया का फल भोगने का अधिकारी होता है। ऐसा कभी नहीं होता कि कार्य कोई करे और फल किसी और को मिले।’’ - यही जिनवचनों का सार है। नीति/न्याय भी यही है कि प्रत्येक जीव को अपनी-अपनी करनी का ही फल मिलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो मैंने जो अच्छे-कर्म किये, उनका फल किसी और को मिलता, और उसके द्वारा किये जाने वाले बुरे-कर्मों का फल मुझे मिलता, क्या ये न्यायसंगत होता? नहीं। आदरणीय बाबूजी ‘युगल’ जी की लिखी पंक्तियाँ-

स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ, फल निश्चय ही वे देते।
करें आप, फल देय अन्य, तो स्वयं किये निष्फल होते।।

-(भावना-बत्तीसी का हिन्दी-पद्यानुवाद) कहने का अभिप्राय यही है कि भावकर्म भी जो करता है, वही उसका कर्त्ता होता है, और उसका फल भी वही भोगता है। वास्तव में इन भावकर्मों का कर्त्ता कौन है? इसका समाधान कविवर अागामीछंदों में करेगें।

(दोहा)

भावकरम करतव्यता, स्वयंसिद्ध नहिं होइ।
जो जग की करनी करै, जगवासी-जिय सोइ।। 23।।

जिय करता जिय भोगता, भावकरम जिय-चाल।
पुद््गल करै न भोगवै, दुविधा मिथ्याचाल।। 24।।

तातैं भावित-करमकौं, करै मिथ्याती-जीव।
सुख-दु:ख आपज-संपदा, भुंजै सहज सदीव।। 25।।

शब्दार्थ :- भावकरम करतव्यता= भावकर्मों का कर्त्तापना, स्वयंसिद्ध नहि होइ= अपने आप नहीं होता, जो जग की करनी करै= जो सांसारिक-क्रियायें करता है, जगवासी जिय सोइ= वही प्राणी संसार में निवास करता है।। 23।। जिय करता जिय भोगता= जीव कर्त्ता है, जीव ही भोक्ता है, भावकरम जिय-चाल= भावकर्म जीव की ही चाल है, पुद््गल करै न भोगवै= पुद््गल न करता है, न भोगता है, दुविधा मिथ्या-चाल= दुविधा अर्थात् दोनों को कर्त्ता मानना मिथ्या-चाल/मिथ्यात्व है।। 24।। तातैं भावित-करमकौं= इसलिये भावकर्म का, करै मिथ्याती जीव= कर्त्ता मिथ्यादृष्टि-जीव है, सुख-दु:ख आपद-संपदा= सुख-दुःख, प्रतिकूलता-अनुकूलता, भुंजै सहज सदीव= सहज ही सदैव भोगता है।। 25।। विशेषार्थ :- पिछले-छंद से चल रही शिष्य की शंका कि भावकर्म का कर्त्ता कौन है? उसका सटीककार्यत्वादकृतं न कर्म न च तज्जीव-प्रकृत्योर्द्वयो- रज्ञायाः प्रकृतेः स्वकार्य-फलभुग्भावानुषंगात्कृतिः। नैकस्याः प्रकतृ रे चित्त्व-लसनाज्जीवोऽस्य कर्ता ततो, जीवस्यैव च कर्म तच्चिदनुगं ज्ञाता न यत्पुद््गलः।। 11।। सर्व विशुद्धि-द्वार समाधान उपर्युक्त-तीन छंदों में कवि ने किया है। कविवर कहते हैं भावकर्म-रूपी कार्य स्वयंसिद्ध नहीं है अर्थात् अपने आप नहीं होता, कहने का अभिप्राय यही है कि जब भी कोई कार्य होता है, तो उसका कर्त्ता भी अवश्य होता है। यहाँ भी भावकर्मरूपी कार्य हुआ है, इसलिये उसका कर्त्ता भी है, आगम के अनुसार भावकर्म का कर्त्ता वही जीव है, जो जगत् के स्वतंत्र-परिणमन का कर्त्ता स्वयं को मानता है, अर्थात् जो ये कहता है कि ‘‘जगत् का परिणमन मेरे आधीन है, मैं ही करनेवाला हूँ, यदि मैं न करूँ, तो कोई काम नहीं होगा’’- जो जीव ऐसा मानता है, वही जीव भावकर्म का कर्त्ता होता है, ऐसा जीव मिथ्यादृष्टि है। इसीप्रकार जो जीव जगत् के कार्यों का स्वयं को कर्त्ता मानता हैै, वही जीव उन कर्मफलों को भी भोगता है। ये भावकर्म मिथ्यादृष्टि-जीव की ही विभाव-परिणति है, पुद््गल की नहीं, क्योंकि पुद््गलद्रव्य न तो किसी क्रिया का कर्त्ता होता है, न ही उसका फल भोगता है। उसको कर्त्ता-भोक्ता मानना, या दोनों को संयुक्तरूप से कर्त्ता-भोक्ता मानना मिथ्यात्व है। इसप्रकार सिद्ध होता है कि मिथ्यादृष्टि-जीव ही भावकर्म का कर्त्ता है, और वही सुख-दुःख, आपत्ति-वैभव, अनुकूलता-प्रतिकूलता को भोगता है। वहीं दूसरी ओर जो जीव जगत् के कार्यों का कर्त्ता स्वयं को नहीं मानते, मात्र ज्ञाता-दृष्टा रहते हैं, वे जीव भावकर्म के भी कर्त्ता नहीं होते, और न ही उन कर्मफलों के भोक्ता होते हैं, ऐसे जीव ही सम्यग्दृष्टि हैं।

(सवैया इकतीसा)

केई मूढ विकल एकंत-पच्छ गहैं कहैं, अातमा अकरतार पूरन-परम है।
तिन्हिसौं जु कोऊ कहै जीव करता है तासौं, फेरि कहैं करमकौ करता करम है।।
ऐसे मिथ्या-मगन मिथ्याती ब्रह्मघाती-जीव, जिन्हिकैं हिए अनादि-मोह कौ भरम है।
तिन्हिकौ मिथ्यात दूर करिबैकौं कहैं गुरु, स्यादवाद-परवांन आतम-धरम है।। 26।।

शब्दार्थ :- केई मूढ विकल एकंत-पच्छ गहैं= कितने ही अज्ञानी दुःखी-जीव एकांत-पक्ष को ग्रहण करते हैं, कहैं अातमा अकरतार पूरन-परम है= और कहते हैं आत्मा अकर्त्ता पूर्ण-परमात्मा है, तिन्हिसौं जु कोऊ कहै जीव करता है= उनसे यदि कोई जीव ये कहे कि ‘‘जीव कर्त्ता है’’, तासौं फेरि कहैं करमकौ करता करम है= उनसे वह कहते हैं ‘‘कर्म का कर्त्ता कर्म ही हैं’’, ऐसे मिथ्या-मगन मिथ्याती ब्रह्मघातीजीव= ऐसे मिथ्यात्व में मगन मिथ्यादृष्टि आत्मस्वभाव का घात करनेवाले जीव, जिन्हिकैं हिए अनादिमोह कौ भरम है= जिनके हृदय में अनादि-मिथ्यात्व का भ्रम है, तिन्हिकौ मिथ्यात दूर करिबैकौं= उनका मिथ्यात्व दूर करने के लिए, कहैं गुरु स्यादवाद-परवांन आतम-धरम है= गुरु कहते हैं आत्म-धर्म स्याद्वाद-प्रमाण है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन मिथ्यादृष्टि-जीवों की विवेचना की है, जो एकांतवादी हैं, निश्चयाभासी हैं, अर्थात् वस्तु के एक धर्म या पक्ष को ही स्वीकार करते हैं। जो यह कहते हैं कि आत्मा भावकर्म का कर्त्ता नहीं है, कर्मों का संयोग होने पर भी वह आत्मा को कर्मों से रहित परिपूर्ण भगवान् मानते हैं। कहते हैं कि कर्मों का कर्त्ता आत्मा नहीं कर्म हैं,- ऐसा मानना ही एकांतवाद है। जबकि वस्तु का स्वरूप अनेकांतात्मक है। प्रत्येक वस्तु अनेक-धर्मात्मक है, एक ही वस्तु में परस्पर विरोधी अनेक272 कर्मेव प्रवितर्क्य कर्तृहतकैः क्षिप्त्वात्मनः कर्तृतां, कर्तात्मैष कथंचिदित्यचलिता कैिश्च्च�ुतिः कोपिता। तेषामुद्धतमोह-मुद्रितधियां बोधस्य संशुद्धये, स्याद्वाद-प्रतिबन्ध-लब्धविजया वस्तुस्थितिः स्तूयते।। 12।। धर्मयुगलों या शक्तियों का प्रकाशित होना ‘अनेकांत’ है।अनेकांत के बिना वस्तु की सिद्धि नहीं हो सकती। यदि जीव को सर्वथा कर्त्ता मानेंगें, तो जीव कभी निष्कर्म और सुखी नहीं होगा। क्योंकि कर्तृत्वबुद्धि के रहते जीव कभी सुखी नहीं हो सकता। और यदि जीव को सर्वथा अकर्त्ता मानेंगें, तो अनादि से चले आ रहे कर्म के संयोग और मोहजनित-विकारों की सिद्धि कैसे होगी ? जब कि ये अकाट्य-सत्य है कि अनादिकाल से जीव आठ कर्मों के साथ है, और उनके निमित्त से परलक्ष्यी-भावों का कर्त्ता बनकर निरन्तर दुःखी होता आया है। तब हम वर्तमान में कर्म का संयोग होने पर भी आत्मा को सर्वथाअकर्त्ता कैसे कह सकते हैं ? क्योंकि भूल स्वीकार करना ही प्रायश्चित्त की निशानी है। जो जीव वस्तु के अनेकांत-स्वरूप को नहीं मानते, वे जीव भी मिथ्यादृष्टि ही हैं, स्वरूप के घातक ही हैं। जिनके हृदय में अनादि से मिथ्यात्व का भ्रम है उन जीवों का मिथ्यात्व दूर करने के लिये ही आचार्यों ने वस्तु के स्याद्वादस्वरूप का वर्णन किया है। स्याद्वाद यानि स्यात् + वाद = स्याद्वाद। ‘स्यात्’ यनि ‘कथंचित्’/किसी अपेक्षा से और ‘वाद’ यानि कथन करना। अर्थात् अनेकांतमयी- वस्तु को कथन करने की पद्धति का नाम स्याद्वाद है। किसी भी एक शब्द या वाक्य के द्वारा वस्तु का समग्र-कथन करना संभव नहीं है, प्रयोजन की मुख्यता से अन्य-धर्मों को गौण करते हुये एक धर्म का सापेक्ष-कथन करना स्याद्वाद है। वस्तु के अन्य-धर्मों का निषेध न हो जाये, इसलिये अनेकांतवादी ‘स्यात्’ यानि ‘कथंचित्’ शब्द का प्रयोग करते हैं। जैसे वस्तु कथंचित् सत् और कथंचित् असत्, कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है। जैसे द्रव्यरूप से वस्तु नित्य है और पर्यायरूप से अनित्य, उसीप्रकार आत्मा रागादि भावकर्म का द्रव्य स्वभाव की अपेक्षा सर्वथा-अकर्त्ता है, लेकिन पर्याय-अपेक्षा कर्म का संयोग होने से आत्मा इन रागादि भावों का कर्त्ता है। यही अनेकांतात्मक-वस्तु का स्याद्वादपूर्ण कथन है, और जो जीव ऐसा नहीं मानते वे भी मिथ्यात्व में मग्न मिथ्यादृष्टि-जीव ही हैं, और जो जीव अनेकांत रूप वस्तु के यथार्थ-स्वरूप को स्वीकार करते हैं, वे ही सम्यग्दृष्टि-जीव हैं।

(दोहा)

चेतन करता-भोगता, मिथ्या-मगन अजान।
नहिं करता नहिं भोगता, निहचै सम्यकवान।। 27।।

शब्दार्थ :- चेतन करता-भोगता= (जो) आत्मा कर्त्ता-भोक्ता है, मिथ्या-मगन अजान= वह मिथ्यात्व में मग्न अज्ञानी है, नहिं करता नहिं भोगता= न कर्त्ता और न ही भोक्ता, निहचै सम्यकवान= वह निश्चय से सम्यग्दृष्टि-जीव है। विशेषार्थ :- कौन-सा जीव कर्म का कर्त्ता-भोक्ता होता है? उसका वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि जो जीव मिथ्यात्व में मगन है, अज्ञानी है, वही जीव कर्म का कर्त्ता और भोक्ता है। और जो सम्यग्दृष्टि है, वह जीव निश्चय से न कर्त्ता है, न भोक्ता है। कहने का अभिप्राय यही है कि आत्मा तो स्वभाव से त्रिकाल अकर्त्ता है, अर्थात् न कर्त्ता है न भोक्ता है, मात्र ज्ञाता-दृष्टा हैं। जिनका उपयोग आत्मस्वरूप में स्थिर है, वे जीव अकर्त्ता हैं, और जो स्वरूप से बाहर देहादिक में मग्न हैं, वे अकर्त्ता-स्वभावी होने पर भी पुद््गल-कर्म के कर्त्ता कहे जाते हैं। सर्व विशुद्धि-द्वार

(सवैया इकतीसा)

जैंसें सांख्यमती कहैं अलख-अकरता है, सर्वथा प्रकार करता न होइ कबहीं।
तैंसैं जिनमती गुरुमुख एक-पक्ष सुनि, याहि भाँति मानै सौ एकंत तजौ अबहीं।।
जौंलौं दुरमती तौंलों करमकौ करता है, सुमती सदा अकरतार कह्यौ सबहीं।
जाकै घट ग्यायक-सुभाउ जग्यौ जबहीसौं, सो तौ जगजाल सौं निरालौ भयौ तबहीं।। 28।।

शब्दार्थ :- जैंसें सांख्यमती कहैं= जैसे सांख्यमती कहते हैं, अलख अकरता है= अकर्त्ता अदृश्य है, सर्वथा प्रकार करता न होइ कबहीं= सर्व-प्रकार से कभी कोई कर्त्ता नहीं होता, तैंसैं जिनमती= उसीप्रकार जिनमत का अनुयायी, गुरुमुख एकपक्ष सुनि= गुरु के मुख से एक-पक्ष सुनकर, याहि भाँति मानै= इसीप्रकार माने, सौ एकंत तजौ अबहीं= ऐसा एकांत अभी त्यागो, जौंलौं दुरमती= जबतक दुर्बुद्धि है, तौंलों करमकौ करता है= तबतक कर्म का कर्त्ता है, सुमती सदा अकरतार कह्यौ सबहीं= सुमति/सम्यग्दृष्टि को सभी ने हमेशा अकर्त्ता ही कहा है। जाकै घट ग्यायक-सुभाउ जग्यौ जबहीसौं= जिसके हृदय में जब से ज्ञायकस्वभाव जागृत है, सो तौ जगजाल सौं निरालौ भयौ तबहीं= वह जीव तभी से जगत् के जंजाल से निराला हो गया है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पुन: सांख्यमत का उदाहरण देते हुये एकांतवाद का खंडन किया है। क्योंकि जैसा अनेकांतात्मक-वस्तु का स्वरूप जैनदर्शन में वर्णित है, वैसा किसी भी अन्य-दर्शन में वर्णित नहीं है। यहाँ कवि ने सांख्यमत की चर्चा की है, सांख्यमती भी एकांत-पक्ष को स्वीकार करते हुये आत्मा को त्रिकाल कूटस्थ-नित्य अपरिणामी होने से अकर्त्ता ही मानते हैं, उनके मतानुसार आत्मा कभी किसी रूप में कर्त्ता होता ही नहीं। उसीप्रकार कोई जिनदर्शन का अनुयायी आगम से, स्वाध्याय में या किसी गुरु के मुख से वस्तु का एक-पक्ष सुनकर उसी को सत्य मानकर तदनुरूप प्रवर्तन करे, तो यह एकांतवाद ही है, वह जीव विपरीत-श्रद्धानी ही है, कविवर कहते हैं कि ऐसा एकांत तो इसी क्षण त्यागो, वर्ना अनेकांतमयीवस्तु का सत्य-स्वरूप समझ में नहीं आयेगा, और भ्रम की काली-कोठरी में जैसे अब तक दुःखी होकर समय बिताया है, वैसे ही आगे भी भ्रमित और दुःखी ही होते रहोगे। आत्मा अकर्ता-स्वभावी होते हुये भी तबतक रागादि-भावकर्म का कर्त्ता कहा जाता है, जबतक जीव में दुर्बुद्धि या अज्ञानता का वास रहता है; लेकिन सुबुद्धि अर्थात् श्रद्धान-ज्ञान सम्यक् होने पर जीव अकर्त्ता ही कहा जाता है, अर्थात् स्वयं ही अकर्त्तापने को प्रगट करता है। जिस क्षण जीव के हृदय में ज्ञायक-स्वभाव प्रकट होता है, या कहें आत्मानुभूति-पूर्वक वस्तु का सत्य-स्वरूप भासित होता है, तत्क्षण जीव जगत् के जंजाल से सर्वथा भिन्न निराला होता है अर्थात् अपने अकर्त्तृत्व-स्वभाव का आश्रय लेकर मुक्ति को प्राप्त करता है।

(दोहा)

बौध-छिनकवादी कहै, छिनभंगुर तन-माँहि।
प्रथम-समय जो जीव है, दुतिय-समय सो नांहि।। 29।।

माऽकर्तारममी स्पृशन्तु पुरुषं सांख्या इवाप्यार्हताः, कर्तारं कलयन्तु तं किल सदा भेदावबोधादधः। ऊर्ध्वं तूद्धतबोध-धाम-नियतं प्रत्यक्षमेनं स्वयम्, पश्यन्तु च्युत-कर्तृभावमचलं ज्ञातारमेकं परम्।। 13।।

तातैं मेरे मत-विषैं, करै करम जो कोइ।
सो न भोगवै सरवथा, और भोगता होइ।। 30।।

शब्दार्थ :- बौध-छिनकवादी कहै= क्षणिकवादी-बौद्ध कहते हैं कि, छिनभंगुर तन-माँहि= यह देहवासी/ आत्मा क्षणभंगुर है, प्रथम-समय जो जीव है= पहले समय में जो जीव है, दुतिय-समय सो नांहि= दूसरे समय में वही जीव नहीं है।। 29।। तातैं मेरे मत-विषैं= इसलिये मेरे मत के अनुसार, करै करम जो कोइ= जो कोई कर्म करता है, सो न भोगवै सरवथा= वह कभी नहीं भोगता है, और भोगता होइ= भोगनेवाला कोई और ही होता है।। 30।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त दोनों-छंदों में कवि ने बौद्धमत की विचारधारा का वर्णन किया है। ‘गौतम बुद्ध’ के द्वारा प्रवर्तित बौद्ध-मत की क्षणिकवादी-शाखा के अनुसार आत्मा क्षणिक है, नश्वर है। उनके मतानुसार प्रतिसमय देह के साथ-साथ आत्मा का भी विनाश हो जाता है, अर्थात् सब कुछ नया। सो पहले जो जीव था अब वह जीव नहीं है, जीव के बदल जाने से उस जीव ने जो पूर्व में कर्म किये थे, वह अब उसके कर्म नहीं रहे; जब कर्म उसके नहीं, तो वह जीव उन कर्मफलों का भोक्ता भी नहीं रहा; उन्हें तो अगले समय में कोई अन्य ही जीव भोगेगा। इसप्रकार बौद्धधर्म के अनुसार अन्य जीव अपने कर्मों का कर्त्ता है, और अन्य ही जीव उन कर्मफलों का भोक्ता है।

(दोहा)

यह एकंत-मिथ्यात-पख, दूर करन कै काज।
चिद्विलास-अविचल-कथा, भाषै श्रीजिनराज।। 31।।

बालापन काहू-पुरुष, देख्यौ पुर एक कोइ।
तरुन भए फिरिकैं लख्यौ, कहै नगर यह सोइ।। 32।।

जो दुहुपन में एक थौ, तौ तिनि सुमिरन कीय।
और पुरुषकौ अनुभव्यौ, और न जानैं जीय।। 33।।

जब यह वचन प्रगट सुन्यौ, सुन्यौ जैनमत-सुद्ध।
तब इकंतवादी-पुरुष, जैन भयौ प्रतिबुद्ध।। 34।।

शब्दार्थ :- यह एकंत-मिथ्यात-पख= इस एकांत-मिथ्यात्व के पक्ष को, दूर करन कै काज= दूर करने के लिए, चिद्विलास अविचल-कथा= चैतन्य-स्वरूप आत्मा के शाश्वत-स्वरूप की कथा, भाषै श्रीजिनराज= श्री जिनेन्द्र देव कहते हैं।। 31।। बालापन काहू पुरुष= बचपन में किसी पुरुष ने, देख्यौ पुर एक कोइ= किसी एक नगर को देखा, तरुन भए फिरिकैं लख्यौ= युवा होने पर फिर से देखा, कहै नगर यह सोइ= कहता है ‘‘ये वही नगर है’’, ।। 32।। जो दुहुपन में एक थौ= जो दोनों अवस्थाओं में एक ही था, तौ तिनि सुमिरन कीय= तभी तो उसने स्मरण किया/याद रहा, और पुरुषकौ अनुभव्यौ= अन्य पुरुष का अनुभव किया हुआ, और न जानैं जीय= अन्य जीव/

क्षणिकमिदमिहैकः कल्पयित्वात्मतत्त्वं, निजमनसि विधत्ते कर्तृ-भोक्त्रोर्विभेदम्।
अपहरति विमोहं तस्य नित्यामृतौघैः, स्वयमयमभिषिञ््चंश्चिच्चमत्कार एव।। 14।।

सर्व विशुद्धि-द्वार व्यक्ति नहीं जान सकता था।। 33।। जब यह वचन प्रगट सुन्यौ= जब यह वचन स्पष्ट सुना, सुन्यौ जैनमत-सुद्ध= शुद्ध जैनमत को सुना, तब इकंतवादी-पुरुष जैन भयौ प्रतिबुद्ध= तब उस एकांतवादी पुरुष ने जैनधर्म को अंगीकार किया।। 34।। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने बौद्ध-मत में आत्मा के संबंध में वर्णित क्षणिकवाद की विचारधारा को प्रस्तुत किया था। उसी एकांतवाद की विचारधारा का खंडन सटीक-उदाहरण के माध्यम से उपर्युक्तछंदों में किया गया है। बौद्ध- मत में वर्णित है कि देह के साथ आत्मा भी प्रतिसमय क्षणिक है, नश्वर है, आत्मा के संबंध में प्रचलित-एकांतवाद के इस मिथ्या-पक्ष को दूर करने के लिए जिनेन्द्रदेव कहते हैं कि ‘‘आत्मा नश्वर नहीं शाश्वत है, चैतन्य के विलास से परिपूर्ण है, नित्य है, आत्मा को देह के समान नश्वर या क्षणिक मानना मिथ्यात्व है।’’ -इस कथन की सिद्धि के लिये कवि ने एक सटीक-उदाहरण प्रस्तुत किया है। जैसे किसी व्यक्ति ने अपने बचपन में किसी नगर या तीर्थक्षेत्र को देखा; वही नगर या तीर्थक्षेत्र जब वह युवा होने पर पुन: देखता है, तो उसे तुरंत स्मरण होता है कि ‘‘यह तो वही नगर या तीर्थक्षेत्र है, जो मैं ने बचपन में देखा था।’’ जबकि बौद्ध-मत के अनुसार तो आत्मा प्रतिसमय क्षणिक है, नवीन-पर्याय के साथ आत्मा भी नवीन-जन्म लेती है, क्रिया करनेवाला कोई और है और भोगनेवाला कोई और है- वास्तव में यह मिथ्या-कल्पना है। यदि बौद्ध-मत का ये कथन सत्य होता, तो किसी जीव के द्वारा बचपन में देखे जानेवाले दृश्य युवा होने पर उसे कैसे याद रहते? दोनों ही अवस्थाओं में जाननेवाला जीव एक ही है, यदि दोनों जीव भिन्न होते, तो अन्य-जीव के स्मरण को अन्य जीव कैसे स्मरण रखता? स्वत: स्पष्ट है कि देह में परिवर्तन होने पर भी उसकी आत्मिक-शक्ति या स्मरण-शक्ति क्षीण नहीं हुई, वह ज्यों की त्यों बनी हुई है और आगे भी इसीतरह बनी रहेगी। इससे सिद्ध होता है कि देह क्षणिक है, परन्तु आत्मा क्षणिक या नश्वर नहीं है; वह त्रिकाल शाश्वत है। जैन-आचार्यों ने स्मृति-प्रमाण के द्वारा बौद्धों के क्षणिकवाद का निराकरण किया है। जब जिनेन्द्र-प्रणीत जैनदर्शन में वर्णित आत्मा के नित्य-स्वरूप को सुना या कहें प्रत्यक्ष देखा, तो वह ‘अप्रतिबुद्ध-जीव’ तत्क्षण ‘प्रतिबुद्ध’ अर्थात् सचेत हो गया और उसने जिनेन्द्रदेव-प्ररूपित जैनधर्म को अंगीकार किया।

(सवैया इकतीसा)

एक-परजाइ एक-समैमैं विनसि जाइ, दूजी-परजाइ दूजै-समै उपजति है।
ताकौं छल पकरिकैं बौध कहै समै-समै, नवौ-जीव उपजै पुरातन की छति है।।
तातैं मानै करमकौ करता है और जीव, भोगता है और वाकै हिए ऐसी मति है।
परजै-प्रवांनकौ सरवथा दरब जानै, ऐसे दुरबुद्धिकौं अवसि दुरगति है।। 35।।

शब्दार्थ :- एक-परजाइ एक समैमैं विनसि जाइ= एक-पर्याय एक-समय में नष्ट हो जाती हैं, दूजी-परजाइ दूजै समै उपजति है= दूसरी-पर्याय दूसरे-समय उत्पन्न होती है, ताकौ छल पकरिकैं बौध कहैं= उसका छल ग्रहणकर बौद्ध कहते हैं, समै-समै नवौ-जीव उपजै= समय-समय पर नया-जीव उत्पन्न होता है, पुरातन की छति है= और पुराना विनाश को प्राप्त होता है, तातैं मानै करमकौ करता है और जीव= इसलिये मानते हैं कि वृत्त्यंशभेदतोऽत्यन्तं वृत्तिमÂन्नाश-कल्पनात्। अन्यः करोति भुङ्क्तेऽन्य इत्येकान्तश्चकास्तु मा ।। 15।। कर्म का कर्त्ता अन्य-जीव है, भोगता है और वाकै हिए ऐसी मति है= भोगनेवाला कोई और है, उसके हृदय में ऐसी बुद्धि है, परजै-प्रवांनकौ सरवथा-दरब जानै= पर्याय-प्रमाण को ही संपूर्ण-द्रव्य जानता है, ऐसे दुरबुद्धिकौं अवसि दुरगति है= ऐसे दुर्बुद्धि-जीव की अवश्य दुर्गति होती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने बौद्ध-धर्म के अनुयायी आत्मा को क्षणिक क्यों मानते हैं?- इसका वर्णन किया है। सहज-परिणमित वस्तु-व्यवस्था के अनुसार पर्याय एकसमय की होती है, अर्थात् प्रतिसमय पूर्व-पर्याय का व्यय और नवीन-पर्याय का उत्पाद होता है, लेकिन फिर भी ध्रौव्य अर्थात् द्रव्य त्रिकाल-शाश्वत रहता है। पर्याय के साथ यदि द्रव्य का भी क्षय होता, तो सारी वस्तु-व्यवस्था ही भंग हो जाती। लेकिन बौद्धदर्शन पर्याय को तो विनाशीक मानता ही है, साथ ही पर्याय के छल से द्रव्य को भी विनाशीक मानता है। उनके अनुसार नवीन-पर्याय के साथ नवीन-जीव की भी उत्पत्ति होती है। जिससे कर्म-करनेवाला-जीव अन्य है और भोगनेवाला-जीव भी अन्य ही होता है; उनके दर्शन में ऐसी मिथ्यामान्यता प्रचलित है। ‘छल-ग्रहण’ करने से तात्पर्य यह है कि किसी भी प्रकार का पापाचार करें, भक्ष्य-अभक्ष्य, अंडा, मांस आदि कुछ भी भक्षण करें, कोई फर्क नहीं पड़ता ; क्योंकि मैं जो कर्म कर रहा हूँ, उसका फल तो मुझे भोगना ही नहीं है; क्योंकि वह जीव तो नष्ट हो जायेगा, इसलिये हम निश्चिंत हाेकर पापाचार में मगन रहें। कविवर कहते हैं ऐसे आचार-विचारवाले जीवों की अनिवार्यरूप से नीच-गति ही होती है।

(दोहा)

कहै अनातम की कथा, चहै न आतम-सुद्धि।
रहै अध्यातमसौं विमुख, दुराराधि-दुरबुद्धि।। 36।।

दुरबुद्धि-मिथ्यामती,

दुरगति-मिथ्याचाल।
गहि एकंत दुरबुद्धिसौं, मुकत न होइ त्रिकाल।। 37।।

शब्दार्थ :- कहै अनातम की कथा= आत्मा से भिन्न देहादिक की बातें कहता है, चहै न आतम-सुद्धि= आत्मशुद्धि नहीं चाहता, रहै अध्यातमसौं विमुख= अध्यात्म से विमुख रहता है, दुराराधि दुरबुद्धि= समझाने पर भी न समझनेवाला दुर्बुद्धि-जीव।। 36।। दुरबुद्धि-मिथ्यामती= दुर्बुद्धि-जीव की मति मिथ्या होती है, दुरगति-मिथ्याचाल= उसकी मिथ्या-चाल से उसे दुर्गति ही मिलती है, गहि एकंत दुरबुद्धिसौं= इसी दुर्बुद्धि से वह एकांत का ग्रहण करता है, मुकत न होइ त्रिकाल= तीन-काल में भी मुक्त नहीं होता।। 37।। विशेषार्थ :- इन दोनों छंदों में कवि ने मिथ्या-बुद्धि जीव की विचारधारा, प्रवर्तन और फल का वर्णन किया है। दुर्बुद्धि-जीव अर्थात् वह जीव जिसकी बुद्धि सदाचरण से तो कोसों दूर रहे और हित-अहित का विवेक न रखकर मात्र दुराचरण में ही प्रतिसमय प्रवर्तन करे। ऐसा जीव अनातम अर्थात् जो आत्मा से भिन्न- ऐसे देहादिक-पदार्थों की तो बहुत चर्चा करता है; परन्तु आत्मा की तो चर्चा से भी कोसों दूर रहता है। वह प्रतिसमय देह का ही गुणगान करता है, आत्मा को तो मानता ही नहीं, शरीर को ही सब कुछ मानता है; इसीलिये आत्मा की शुद्धि भी नहीं चाहता, देह की शुद्धि में ही तल्लीन रहता है। सर्व विशुद्धि-द्वार जब आत्मा को ही नहीं मानता, तो अध्यात्म को कैसे मानेगा? इसलिए अध्यात्म अर्थात् आत्मानुभूति, आत्मज्ञान से विमुख अर्थात् विरक्त रहता है। जिनवाणी माँ के लाख समझाने पर भी जिसकी समझ में नहीं आती, ऐसे ढीठ-बुद्धिवाले जीव को कवि ने ‘दुर्बुद्धि-जीव’ कहा है। कविवर आगे कहते हैं कि ऐसे विपरीत-बुद्धिवाले जीवों की मति/बुद्धि हमेशा मिथ्या ही रहती है। और उनके इसी मिथ्या-प्रवर्तन/विपरीत-आचरण के कारण इन जीवों की हमेशा नरक-निगोदादि रूप दुर्गति ही होती है। साथ ही ऐसे जीव अपनी दुर्बुद्धि से वस्तु के एकांत-पक्ष को ग्रहण करते हैं, और अपनी इसी अज्ञानता से वे जीव तीन-काल में भी मुक्त नहीं होते हैं।

(सवैया इकतीसा)

कायासौं विचारै प्रीति, मायाहीसौं हारि-जीति, लियै हठ-रीति जैंसैं हारिल की लकरी।
चंगुलके जोर जैंसैं गोह गहि रहै भूमि, त्यौंही पाइ गाड़ै पै न छाड़ै टेक पकरी।।
मोह की मरोरसौं भरमकौ न छोर पावै, धावै चहुँओर ज्यौं बढ़ावै जाल मकरी।
ऐसी दुरबुद्धि भूली झूठकै झरोखे झूली, फूली फिरै ममता-जंजीरनिसौं जकरी।। 38।।

शब्दार्थ :- कायासौं विचारै प्रीति= शरीर से ही प्रीति करता है, मायाहीसौं हारि-जीति= माया यानि धन से ही हार-जीत मानता है, लियै हठ-रीति जैंसैं हारिल की लकरी= जिद्दी इतना, जैसे हारिल लकड़ी को पकड़ता है, चंगुलके जोर जैंसैं गोह गहि रहै भूमि= ममता की पकड़ इतनी मजबूत होती है, जैसे गोह नामक प्राणी जमीन को पकड़ता है, त्यौंही पाइ गाड़ै पै न छाड़ै टेक पकरी= उसीप्रकार पंजे गड़ा देता है, पर पकड़ी हुई जगह को नहीं छोड़ता, मोह की मरोरसौं= मोह के जोर से, भरमकौ न छोर पावै= भ्रम का किनारा/अंत नहीं पाता है, धावै चहुँओर= चारों ओर दौड़ता है, ज्यौं बढ़ावै जाल मकरी= जैसे मकड़ी जाला बनाती है, ऐसी दुरबुद्धि भूली= ऐसे दुर्बुद्धि-जीव भ्रमित रहता है, झूठकै झरोखे झूली= झूठ के झरोखों में झूलता है, फूली फिरै ममता-जंजीरनिसौं जकरी= ममता की जंजीरों में जकड़ा फूला फिरता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने लोक में प्रचलित-उक्तियों के माध्यम से दुर्बुद्धि या कहें मिथ्यादृष्टि- जीव की भूलों का सटीक-वर्णन किया है। दुर्बुद्धि-जीव आत्मा को तो जानता ही नहीं और शरीर से अत्यधिक-प्रेम करता है, प्रतिसमय उसी का ख्याल रखता है। धन-वैभव, रुपया-पैसा, मान-सम्मान के घटने से अपनी हार और बढ़ने से अपनी जीत मानता है। जैसे हारिल-पक्षी अपने पंजों से बाँस की लकड़ी, को गिरने के भय से बहुत मजबूती से पकड़ता है, वैसे ही अज्ञानी-जीव हठपूर्वक अपने भ्रम को ही सही मानता है। जैसे ‘गोह’ नामक जानवर जमीन या दीवार को अपने पंजे से बहुत मजबूती से पकड़ता है, उसीप्रकार दुर्बुद्धिजीव भी कुटव े ों को बहुत मजबूती से पकड़ता है; यहाँ तक कि उन पर ही अड़ा रहता है। ‘गोह’ एक ऐसा जानवर है, जिसे चोर सदैव अपने पास रखते हैं। जब चोरों को चोरी करने के लिए ऊँची-ऊँची दीवारें फाँदनी होती हैं, तब वे गोह की कमर में रस्सी बाँधकर मकान की ओर फेंकते हैं, और उस रस्सी के सहारे चोर बड़ी आसानी से उस दीवार पर चढ़ जाते है, क्योंकि गोह जमीन या दीवार को अपने पंजे गढ़ाकर बहुत मजबूती से पकड़े रहता है। ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव अपनी कुटेवों या खोटीमान्यताओं को पकड़कर रखता है, चाहे कितना भी बुरा क्यों न हो जाए, परन्तु फिर भी उन्हें छोड़ना नहीं चाहता, अड़ा ही रहता है। मोह के जोर से भ्रम की थाह नहीं मिलती अर्थात् मोह के कारण सच्चाई सामने होने पर भी स्वीकार नहीं करता, भ्रमित ही रहता है, इसीलिये भ्रम का कभी अंत नहीं होता और निरन्तर उसी में रचा-पचा रहता है। जैसे मकड़ी अपना जाला चारों ओर गोल-गोल घूमकर स्वयं बनाती है, उसीप्रकार ये दुर्बुद्धि-जीव अपनी कुटव े ों से ही चार-गति चौरासी-लाख योनियों में परिभ्रमण करता रहता है, न मकड़ी के जाले से मकड़ी आज तक बाहर आई और न ही दुर्बुद्धि जीव अपने भ्रमजाल से एवं चारों-गतियों से कभी बाहर निकल सका। ऐसा मोह-भ्रमित दुर्बुद्धि-जीव झूठ के झूले में ही झूलता है, माया-मानादि कषायों की जंजीरों से जकड़ा होने पर भी फूला नहीं समाता। कहते हैं कि बंधन में जीव कभी सुखी नहीं होता, पर दुर्बुद्धि-जीव की विडम्बना तो देखो; यह बंधन में रहकर ही अपने को सुखी अनुभव करता है।

(सवैया इकतीसा)

बात सुनि चौंकि उठै, बातहीसौं भौंकि उठै, बातसौं नरम होइ, बातही सौं अकरी।
निंदा करै साधु की, प्रशंसा करै हिंसककी, साता मानैं प्रभुता, असाता मानै फकरी।।
मोख न सुहाइ, दोष दैखै तहाँ पैठि जाइ, कालसौं डराइ, जैसैं नाहरसौं बकरी।
ऐसी दुरबुद्धि भूली, झूठकै झरोखे झूली, फूली फिरै ममता-जंजीरनिसौं जकरी।। 39।।

शब्दार्थ :- बात सुनि चौंकि उठै= बात सुनते ही चौंकने लगता है, बातहीसौं भौंकि उठै= बात-बात पर भौंकने/बहस करने लगता है, बातसौं नरम होइ= बात सुनकर ही नरम हो जाता है, बातहीसौं अकरी= बात से ही अकड़ने लगता है, निंदा करै साधु की= साधुओं की निंदा करता है, प्रशंसा करै हिंसक की= हिंसा करनेवाले की प्रशंसा करता है, साता मानैं प्रभुता= धन-वैभव में सुख मानता है, असाता मानै फकरी= निर्धनता में दु:ख मानता है, मोख न सुहाइ= मोक्ष अच्छा नहीं लगता, दोष दैखै तहाँ पैठि जाइ= जहाँ दोष/ अवगुण देखता है, वहीं बैठ जाता है/ग्रहण कर लेता है, कालसौं डराइ= मौत से डरता है, जैसैं नाहरसौं बकरी= जैसे सिंह से बकरी डरती है, ऐसी दुरबुद्धि भूली झूठकै झरोखे झूली= ऐसा भ्रमित दुर्बुद्धि-जीव झूठ के झूले में झूलता है, फूली फिरै ममता-जंजीरनिसौं जकरी= माया-ममता की जंजीरों में जकड़ा हुआ फूला/ गौरवान्वित रहता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने अज्ञानी-मिथ्यादृष्टि-जीवों की अंतरंग-मनोवृत्ति का बहुत ही मार्मिक-वर्णन किया है। अज्ञानी मिथ्यादृष्टि-जीव अर्थात् कषाय की अति-बहुलतावाला जीव। कब किस बात पर कौन-सी कषाय भड़क जाये- कुछ नहीं कहा जा सकता। हित-अहित का विचार किये बिना कभी किसी साधारण-सी बात पर ही गर्म हो जाता है, कभी कुत्ते की तरह जोर-जोर से भौंकने/बहसबाजी करने लगता है। कभी कोई मनचाही-बात सुनने को मिले, तो एकदम नरम और मीठा-व्यवहार करता है, और कभी अनचाही-बात सुनने को मिले, तो ऐसा ऐंठ जाता है, कि फिर कहो वर्षों तक उससे बात भी न करे। जो अपने भले की बात कहते हैं- ऐसे साधुजन की तो निंदा करता है, उनके निकट तो बैठना भी नहीं चाहता, और जो स्वयं हिंसक-कार्यों में प्रवर्तन करे या करने की प्रेरणा दें, उनको अपना हितैषी मानकर उनकी तारीफ करता है, उनके इर्द-गिर्द चक्कर लगाता है। पूर्व-पुण्य के उदय से कुछ धन-वैभव, मान-सम्मान आदि मिले तो अपने को प्रभु-समान मानने लगता है, जैसे इससे बड़ा इस दुनिया में कोई सर्व विशुद्धि-द्वार और है ही नहीं। और कदाचित् पाप का उदय हो, और ये तुच्छ बाह्य-वैभव न मिले तो अपने को किसी दरिद्री से कम नहीं मानता और प्रतिसमय दु:खी होता है। मोक्ष-सुख जो निराकुलता-रूप है, शाश्वत-सुखरूप है, वह तो इसे सुहाता नहीं है, और जहाँ दुःख के कारण मिले, पापाचरण में प्रवर्तन हो, सप्तव्यसन में प्रवर्तन हो, अहितकारी संगति हो या कहें चित्त को आकुलता हो, उन सब आदतों को, प्रसंगों को तुरंत आत्मसात् करता है। ऐसे मनुष्यों को भी बड़े चाव से गले लगाता है। यद्यपि यह बात वह भलीभाँति जानता है कि जीवन-मरण तो इस प्राप्तदेह का होता है, आत्मा का मरण कभी नहीं होता, फिर भी इस देह के मरण की आशंका से ऐसे डरता है, जैसे शेर के आगे बकरी डरती है; क्योंकि इस देह में अहंबुद्धि अर्थात् ममत्वपना जो कूट-कूटकर भरा रहता है। ऐसे दुर्बुद्धि-जीव प्रतिसमय मोह और अज्ञान के कारण भ्रमित रहते हैं। क्या अच्छा क्या बुरा, क्या हेय क्या उपादेय?- विचार ही नहीं करते। झूठ के झूले में ही झूलते रहते है, क्योंकि सत्य से हमेशा अनभिज्ञ रहते है। माया-मोह के बंधनों में जकड़े अर्थात् पराधीन होने पर भी गर्व से फूले रहते हैं, अपने को उसी में सुखी भी अनुभव करते हैं।

(कवित्त)

केई कहैं जीव-क्षनभंगुर, केई कहैं करम-करतार।
केई करम-रहित नित जंपहिं, नय-अनंत नाना-परकार।।
जे एकांत गहैं ते मूरख, पंडित अनेकांत-पख धार।
जैंसैं भिन्न-भिन्न मुकताहल, गुनसौं गहत कहावै हार।। 40।।

शब्दार्थ :- केई कहैं जीव-क्षनभंगुर= कुछ कहते हैं आत्मा क्षणिक है, केई कहैं करम-करतार= कुछ कहते हैं कर्म का कर्त्ता है, केई करम-रहित नित जंपहि= कुछ कहते हैं आत्मा हमेशा कर्म-रहित है, नयअनंत नाना-परकार= अनेक-मत अनेक-प्रकार से कथन करते हैं, जे एकांत गहैं ते मूरख= जो एकांत-पक्ष ग्रहण करते हैं, वे मूर्ख हैं, पंडित अनेकांत-पख धार= जो पंडित हैं, वे अनेकांत-पक्ष को धारण करते हैं, जैंसैं भिन्न-भिन्न मुकताहल= जैसे बिखरे हुये मोती, गुन सौं गहत कहावै हार= सूत में पिरोने पर हार कहलाते है। विशेषार्थ :- वस्तु का धर्म ‘अनेकांतमय’ है, अर्थात् वस्तु में परस्पर-विरोधी अनेक-धर्म एकसाथ प्रकाशित होते हैं- ऐसे अनेकांत-स्वरूप की महिमा का वर्णन कवि ने इस-छंद में किया है। जैनदर्शन को छोड़कर लोक में प्रचलित सभी-मत वस्तु के किसी एक-पक्ष को ही स्वीकार करते हैं। जबकि जैनदर्शन वस्तु के अनेकांत-स्वरूप को स्वीकार करता है। जैसे ‘बौद्ध-मत’ वाले आत्मा को क्षणिक कहते हैं, ‘मीमांसक-मत’ वाले आत्मा को कर्म का कर्त्ता कहते हैं, ‘सांख्यमती जीव’ को कर्मरहित ही कहते हैं, इसप्रकार अनेक-मतवाले अपनी-अपनी धारणा के अनुसार वस्तु के किसी एक-पक्ष को ही ग्रहण करते हैं। कवि कहते हैं कि अनेकांतमयी-वस्तुस्वरूप के एक पक्ष को ग्रहण करनेवाले सभी अज्ञानी हैं, आत्मानं परिशुद्धमीप्सुभिरतिव्याप्तिं प्रपद्यान्धकै, कालोपाधि-बलादशुद्धिमधिकां तत्रापि मत्वा परैः। चैतन्यं क्षणिकं प्रकल्प्य पृथकैः शुद्धर्जुसूत्रे रतैः, आत्मा व्युज्झित एष हारवदहो निःसूत्रमुक्तेक्षिभिः ।। 16।। क्योंकि एक-पक्ष से किसी भी वस्तु की सिद्धि करना संभव ही नहीं है। इसीलिए जो वस्तु के अनेकांतस्वरूप को ग्रहण कर वस्तु की सिद्धि करते हैं, वे ही ज्ञानी हैं; क्योंकि वे वस्तु के सत्य-स्वरूप को स्वीकार करते हैं। जैसे बिखरे हुये मोतियों को कभी हार या माला का नाम नहीं मिलता, लेकिन वही मोती जब एक सूत में पिरो दिये जाते हैं, तो तत्क्षण हार या माला नाम पाते हैं; ठीक उसीप्रकार वस्तु के अनेक-धर्मों में से किसी एक-पक्ष से वस्तु की सिद्धि नहीं होती है; लेकिन जब माला की तरह वस्तु के सभी धर्मों को एक साथ प्रकाशित किया जाता है, तो बिना किसी विरोध के वस्तु की सहज-सिद्धि होती है।

(दोहा)

यथा सूत-संग्रह बिना, मुकत-माल नहिं होइ।
तथा स्यादवादी बिना, मोख न साधै कोइ।। 41।।

पद-सुभाव पूरब-उदै, निहचै-उद्मम-काल।
पच्छपात मिथ्यात-पथ, सरवंगी सिव-चाल।। 42।।

शब्दार्थ :- यथा सूत-संग्रह बिना= जैसे सूत में पिरोये बिना, मुकत-माल नहिं होइ= मोतियों की माला नहीं होती, तथा स्यादवादी बिना= इसीप्रकार स्याद्वाद के बिना, मोख न साधै कोइ= कोई मोक्ष की साधना नहीं कर सकता।। 41।। पद-सुभाव पूरब-उदै= वस्तु का स्वभाव, पूर्व-कर्मों का उदय, निहचै-उद्मम-काल= निश्चय, पुरुषार्थ, भवितव्य, पच्छपात मिथ्यात-पथ= किसी एक का पक्ष लेना मिथ्यात्व का रास्ता है, सरवंगी सिवचाल= सर्वांग को स्वीकार करना मोक्ष की चाल है।। 42।। विशेषार्थ :- जैन-दर्शन वस्तु के सभी-धर्मों को बिना विरोध के एक साथ कैसे स्वीकार करता है? इसके समाधान-स्वरूप पंचकरण-समवाय के माध्यम से ‘स्याद्वाद’ की महिमा का प्रतिपादन कवि ने इन दोनों छंदों में किया है। इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुये कविवर कहते हैं कि जैसे धागे में मोतियों का संग्रह किये बिना माला नहीं बनती, ठीक उसीप्रकार स्याद्वाद का प्रयोग किये बिना मुक्ति की साधना आरंभ भी नहीं होती। अिभप्राय यह है कि अनेकांत-स्वरूप वस्तु के समस्त अप्रयोजनभूत धर्मों का निषेध नहीं, मात्र गौण करके प्रयोजनभूत-तत्त्व का कथन करना- यही तो स्याद्वाद है। वस्तु के अनेक-धर्मों में से कुछ लोग ‘‘वस्तु के स्वभाव को ही स्वीकार करते हैं अर्थात् जो भी परिणमन होता है या हो रहा है, वह प्राकृतिक है अर्थात् स्वाभाविक है’’। कुछ कहते हैं ‘‘जो भी होता है पूर्वकर्म के उदय से होता है या भाग्य अनुसार होता है’’। कुछ कहते हैं ‘‘जो भी है ब्रह्मस्वरूप है न नष्ट होता है और न उत्पन्न होता है।’’ कुछ कहते हैं ‘‘पुरुषार्थ ही सब कुछ है, अर्थात् पुरुषार्थ करें, तो कुछ भी हो सकता है’’। कुछ कहते हैं ‘‘जो कुछ है सब समय के आधीन है, अर्थात् समय अच्छा, तो सब अच्छा और समय खराब, तो सब खराब।’’ जबकि जैनदर्शन वस्तु के इन सभी धर्मों को स्वीकार करता है, जिनको पाँच-समवाय के नाम से वर्णित किया गया है, जो इसप्रकार हैं, क्रमश: स्वभाव, निमित्त, नियति, पुरुषार्थ और काललब्धि। कर्तुर्वेदयितुश्च युक्तिवशतो भेदोऽस्त्वभेदोऽपि वा, कर्ता वेदयिता च मा भवतु वा वस्त्वेव सञ्चिन्त्यताम्। प्रोता सूत्र इवात्मनीह निपुणैर्भेत्तुं न शक्या क्वचि- च्चिच्चिन्तामणि-मालिकेयमभितोऽप्येका चकास्त्वेव नः।। 17।। सर्व विशुद्धि-द्वार किसी भी कार्य के होने में कोई एक नहीं पाँचों समवायों का होना अनिवार्य है, जब ये पाँचों समवाय मिलते हैं, तो कार्य सहज ही होता है। इसीलिए इन पाँचों में से किसी एक को स्वीकार करना और शेष चार का निषेध/अभाव करना यही एकांत है, मिथ्यात्व है, और सभी पक्षों को स्याद्वाद के माध्यम से सहज स्वीकार करना ही सत्य-दर्शन है, यही मोक्ष की चाल है।

(सवैया इकतीसा)

एक जीव-वस्तु के अनेक-गुन-रूप-नाम, निजजोग-सुद्ध परजोगसौं असुद्ध है।
वेदपाठी ब्रह्म कहैं, मीमांसक कर्म कहैं, सिवमती सिव कहैं, बौद्ध कहैं बुद्ध है।।
जैनी कहैं जिन, न्यायवादी करतार कहैं, छहौं-दरसन में वचन कौ विरुद्ध है।
वस्तु कौ सरूप पहिचानै सोई परवीन, वचनकै भेद, भेद मानै सोई सुद्ध है।। 43।।

शब्दार्थ :- एक जीववस्तु के अनेक गुन-रूप-नाम= एक जीव नामक पदार्थ के अनेक-गुण, अनेक- रूप, अनेक-नाम हैं, निजजोग-सुद्ध परजोगसौं-असुद्ध है= निजस्वरूप से शुद्ध है, पर के संयोग से अशुद्ध है, वेदपाठी ब्रह्म कहैं= वेदो को पढ़नेवाले ब्रह्म कहते हैं, मीमांसक कर्म कहैं= मीमांसक कर्म कहते हैं, सिवमती सिव कहैं= शैवमती शिव कहते हैं, बौद्ध कहैं बुद्ध है= बौद्धमती बुद्ध कहते हैं, जैनी कहैं जिन= जैनमती जिन कहते हैं न्यायवादी करतार कहैं= न्यायवादी कर्त्ता कहते हैं, छहौं-दरसन में वचन कौ विरुद्ध है= छहों मत में वचन की विरुध्दता है, वस्तु कौ सरूप पहिचानै सोई परवीन= जो वस्तु के स्वरूप को पहिचानते हैं, वही पंडित हैं, वचनकै भेद भेद-मानै सोई सुद्ध है= जो वचन के भेद से भेद मानते हैं, वही निपट-मूर्ख है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘जीव’ के बारे में समस्त दर्शन क्या कहते हैं? इसका समीक्षात्मक- वर्णन किया है। जगत् में षट्-दर्शन माने गए हैं- वेदांत-दर्शन, मीमांसा-दर्शन, शैव-दर्शन, बौद्ध-दर्शन, जैन-दर्शन और न्याय-दर्शन। सभी दर्शनों में जीव के विविध-गुण-रूप और नाम वर्णित हैं। यद्यपि स्वभाव से आत्मा पूर्ण-शुद्ध है, परन्तु पर के संयोग से या कहें पर की ओर लक्ष्य करने से अशुद्ध नाम पाती है। कविवर कहते हैं छहों-दर्शनों में जीव के विविध-नाम स्वीकृत हैं। जैसे वेदों को माननेवाले वेदांत-दर्शन के अनुयायी-जीव को ‘ब्रह्म’ कहते हैं, मीमांसा-दर्शन को माननेवाले मीमांसक जीव को ‘कर्म’ कहते हैं, शैव-दर्शन को माननेवाले जीव को ‘सदा-शिवरूप’ कहते हैं, और बौद्ध-धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध को माननेवाले जीव को ‘बुद्ध’ कहते हैं, जिनेन्द्र को माननेवाले या कहें जिनधर्म को माननेवाले जैनी जीव को ‘जिन या भगवान्’ कहते हैं, और न्याय-दर्शन को माननेवाले नैयायिक जीव को ‘कर्त्ता’ कहते हैं। इसप्रकार छहों-दर्शन में जीव के बारे में आपस में वचन-विरोध है। लेकिन वचन में विरोध होने पर भी जो वस्तु के यथार्थ-स्वरूप को पहिचानते और मानते हैं, वास्तव में वही जीव प्रवीण अर्थात् चतुर हैं, पंडित हैं। और जो जीव वचन में भेद होने पर वस्तु में भी भेद मानते हैं, वे जीव सुद्ध हैं अर्थात् बिल्कुल ही मूर्ख हैं। कवि ने यहाँ ‘सुद्ध’ शब्द का प्रयोग व्यंगात्मक-रूप में किया है, अर्थात् वे जीव कुछ ज्यादा ही शुद्ध हैं, अर्थात् निपट-मूर्ख हैं।

(सवैया इकतीसा)

वेदपाठी ‘ब्रह्म’ मानि निहचै-सुरूप गहै, मीमांसक ‘कर्म’ मानि उदैमैं रहत है।
बौद्धमती ‘बुद्ध’ मानि सूच्छम-सुभाव साधै, सिवमती ‘सिव’ रूप कालकौ कहत हैं।।
न्याय-ग्रंथ के पढ़ैया थापैं करताररूप, उद्दिम उदीरि उर-आनंद लहत हैं।
पांचौं-दरसनि तेतौं पोषैं एक-एक अंग, जैनी जिनपंथी सरवंगी नै गहत हैं।। 44।।

शब्दार्थ :- वेदपाठी ब्रह्म मानि निहचै सुरूप गहै= वेदांती-जीव को ब्रह्म मानकर निश्चय-स्वरूप को ही ग्रहण करते हैं, मीमांसक कर्म मानि उदैमैं रहत है= मीमांसक कर्म मानकर उदय में ही मग्न रहते हैं, बौद्धमती बुद्ध मांनि सूच्छम-सुभाव साधै= बौद्धमती बुद्ध मानकर सूक्ष्म-स्वभाव को सिद्ध करते हैं, सिवमती सिवरूप कालकौ कहत हैं= शिवमती सदाशिवरूप मानकर काल को ही जीव कहते हैं, न्याय-ग्रंथ के पढ़ैया थापैं करताररूप= न्याय-ग्रंथों को पढ़नेवाले अर्थात् नैयायिक जीव के कत्तार् रूप को सिद्ध करते हैं, उद्दिम उदीरि उर आनंद लहत हैं= और पुरुषार्थ छोड़कर हृदय में आनंद प्राप्त करते हैं, पांचौं-दरसनि तेतौं पोषैं एक-एक अंग= पाँचो दर्शनों से तो एक-एक अंग का ही पोषण होता है, जैनी जिनपंथी सरवंगी नै गहत हैं= जिनधर्म को माननेवाले जैनी जीव सभी नयों के द्वारा प्ररूपित सर्वांगरूप को ग्रहण करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि के द्वारा अन्य-दर्शन को माननेवाले एकांती और जैनदर्शन को माननेवाले स्याद्वादी कैसे होते हैं? इसका कारण-सहित समाधान किया गया है। सर्वप्रथम वैदिक ब्रहमवादी अर्थात् ‘वेदांती’, जीव को एकमात्र निश्चय-नय की दृष्टि से ही देखते हैं, इसलिये उसे ब्रह्म ही मानते हैं अर्थात् व्यवहार से कोई लेना-देना नहीं है। ‘मीमांसा-दर्शन’ के अनुयायी जीव को कर्मोदय की दृष्टि से ही देखते हैं, इसलिये केवल कर्म को ही जीव मानते हैं अर्थात् आत्मा से कोई लेना-देना नहीं। ‘बौद्धधर्म’ के अनुयायी जीव को क्षणिक मानते हैं, इसलिये आत्मा के अस्तित्व को मात्र एकसमय का ही स्वीकार करते हैं। ‘शैव-मत’ के अनुयायी, जीव को सदाशिवरूप मानते हैं। और न्याय-शास्त्र के जानकर ‘नैयायिक’ जीव को हर क्रिया का कर्त्ता मानकर हर्षित होते हैं, और उसे मात्र कर्त्ता मानते हैं। इसप्रकार पाँचों-दर्शनों से जीव के मात्र एक-एक धर्म का ही पोषण अर्थात् सिद्धि होती है, जबकि जिनशासन के अनुयायी जैनी, आत्मा/जीव के सभी धर्मों को स्वीकार करते हैं। अर्थात् जैनदर्शन आत्मा को निश्चय-नय की अपेक्षा वेदांतियों की तरह ब्रह्म भी मानता है, मीमांसकों की तरह कर्म के उदय और बंध को भी स्वीकार करता है, तभी तो कर्मों के अभाव की बात करता है। बौद्ध-मतियों की तरह वर्तमान-पर्याय का पूर्व और आगामी-पर्यायों में अभाव होने से पर्यायदृष्टि से क्षणिक भी मानता है। शैवमत की तरह शिवस्वरूप यानि मोक्षस्वरूप भी मानता है, नैयायिकों की तरह कर्म का कर्त्ता भी मानता है और कर्म का अकर्त्ता भी मानता है, कर्मसहित भी मानता है, तो कर्मरहित भी; परन्तु अन्य-दर्शनों की तरह एकांतरूप से नहीं मानता/कहता है। बल्कि ‘कथंचित्’ शब्द का प्रयोग करके जीव के सभी धर्मों को भिन्न-भिन्न अपेक्षाओं से स्वीकार करता है, अन्यमतियों की तरह जीव के शेष सभी धर्मों को नकारता नहीं, मात्र गौण करता है, यही ‘स्याद्वाद’ है। अनेकांतमयी वस्तु-स्वरूप के सभी धर्मों को स्याद्वाद की शैली में कथन करने या स्वीकार करने से जैनी ‘स्याद्वादवादी’ और मात्र किसी एक धर्म को ही ग्रहण करने से अन्यमती ‘एकांती’ कहलाते हैं। सर्व विशुद्धि-द्वार

(सवैया इकतीसा)

निहचै अभेद-अंग, उदै गुनकी तरंग, उद्दिमकी रीति लिए उद्धता-सकति है।
परजाइ रूपकौ प्रवान सूच्छम-सुभाव, काल की-सी ढाल परिनाम-चक्र गति है।।
याही भाँति आतम-दरब के अनेक-अंग, एक मानै एककौं, न मानै सो कुमति है।

टेक डारि एकमैं, अनेक खोजैं सो सुबद्धि ु , ‘‘खोजी जीवै, वादी मरै’’, साँची-कहवति है।। 45।। शब्दार्थ :- निहचै अभेद-अंग= निश्चय से आत्मा भेदरहित, उदै गुनकी तरंग= उदय में गुणों की तरंग है, उद्दिमकी रीति लिए= स्वभावरूप परिणमन होने से, उद्धता-सकति है= कर्तापने की शक्ति है, परजाइ-रूपकौ प्रवान= पर्यायरूप को प्रमाणित करता, सूच्छम-सुभाव= सूक्ष्म-स्वभाव भी सत्य है, काल की-सी ढाल= कालचक्र की तरह, परिनाम-चक्र गति है= परिणामों के समूह की गति है, याही-भांति आतम-दरब के अनेक अंग= इसीप्रकार आत्मद्रव्य के अनेक-धर्म हैं, एक मानै एककौं न मानै सो कुमति है= एक को मानें, दूसरे को न मानें, सो मिथ्याज्ञान है, टेक डारि एकमैं, अनेक खोजैं सो सुबुद्धि है= हठ या दुराग्रह छोड़कर एक आत्मद्रव्य में अनेक-धर्मों को खोजना, वही सम्यग्ज्ञान है, ‘‘खोजी जीवै वादी मरै’’ साँची-कहवति है= खोजनेवाला जीतता है, विवाद करनेवाला मरता है,- यह कथन सत्य है। विशेषार्थ :- पिछले-छंदों में कवि ने जीव-पदार्थ के बारे में अन्य-दर्शन क्या कहते हैं। और जैनदर्शन क्या कहता है- इसका वर्णन किया। यद्यपि अन्य-दर्शन जीव-पदार्थ के बारे में जो कहते हैं, जिनशासन के अनुयायी उसका समर्थन करते हैं; पर कैसे?- इसका वर्णन इस-छंद में कवि ने किया है। सर्वप्रथम वेदांत-दर्शन कहता है कि जीव अभेद है अर्थात् उसमें कोई भेद नहीं है, जैनदर्शन इस तथ्य का समर्थन करता है, और कहता है कि सभी आत्मायें स्वभाव की सामर्थ्य से समान हैं, कोई छोटीबड़ी नहीं, फिर चाहे वह किसी भी गति में हो या किसी भी पर्याय में। जीवमात्र के प्रति समभाव रखना तो जैनदर्शन का मुख्य-सिद्धांत है। मीमांसा-दर्शन के अनुसार कर्म के उदय को भी जैनदर्शन स्वीकार करता है। इसीलिए तो पुण्य-पाप के परिणाम और उनके फल की विवेचना जैनदर्शन में की गई है। ‘नैयायिक’ जीव को कर्म का कर्त्ता मानकर हर्षित होते हैं, इसे भी जैनदर्शन स्वीकार करता है; क्योंकि प्रत्येक जीव अपने स्वभाविक-गुणों ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य आदि रूप परिणमन का कर्त्ता है, और मिथ्यात्व की अवस्था में मोह-राग-द्वेष आदि विभाव-भावों का भी व्यवहार से कर्त्ता कहलाता है। ‘बौद्धधर्म’ के अनुयायी जीव को एक-समय की पर्याय के रूप में क्षणिक मानते हैं, जैन-दर्शन भी पर्याय को एकसमय की और क्षणिक ही मानता हैं। ‘शैव-मती’ जीव को काल के रूप में मानते हैं, जैनदर्शन के अनुसार भी जीव के परिणाम काल-चक्र की भाँति निरन्तर बदलते या कहें परिणमनशील रहते हैं। इसप्रकार देखा जाये, तो आत्मद्रव्य में अनेक-धर्म हैं, उनमें से किसी एक को मानना और अन्य का निषेध करना- ये तो विपरीत-बुद्धि है, कुमति है, और अन्य-दर्शन यही करते हैं कि किसी एक को मानते हैं और शेष का निषेध करते हैं। जबकि जैन-दर्शन सभी धर्मों को सहजता से बिना किसी विरोध के स्वीकार करता है। इसलिए कविवर कहते हैं हठ या दुराग्रह छोड़कर एक आत्मद्रव्य में सभी धर्मों को खोजना ही ‘सम्यक् बुद्धि’ या ‘सम्यग्ज्ञान’ है। जगत् में प्रचलित कहावत कि ‘‘जिन खोजा तिन पाइयाँ’’ या कहें ‘‘खोजी जीवे, वादी मरे’’ अर्थात् जो खोजते हैं, वे प्राप्त करते हैं और जो विवाद करते हैं, वे विनाश को प्राप्त होते हैं- पूर्णत: सत्य सिद्ध होती है।

(सवैया इकतीसा)

एकमैं अनेक हैं, अनेकहीमैं एक है सो, एक न अनेक कछु कह्यौ न परतु है।
करता-अकरता है भोगता-अभोगता है, उपजै न उपजत मूएं न मरतु है।।
बोलत-विचारत न बोलै न विचारै कछू, भेखकौ न भाजन पै भेखसौ धरतु है।
ऐसौ प्रभु चेतन, अचेतनकी संगतिसौं, उलट-पलट नटबाजी-सी करतु है।। 46।।

शब्दार्थ :- एकमैं अनेक हैं= एक में अनेक हैं, अनेकहीमैं एक है= अनेक में एक ही है, सो एक न अनेक= सो एक न अनेक, कछु कह्यौ न परतु है= कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, करता अकरता है= करते हुये भी अकर्त्ता है, भोगता अभोगता है= भोगते हुये भी अभोक्ता है, उपजै न उपजत= उत्पन्न होते हुये भी, नहीं उपजता है, मूएं न मरतु है= मरते हुये भी, नहीं मरता है, बोलत-विचारत= बोलता है विचार करता है, न बोलै न विचारै कछू= न बोलता है न विचारता है, भेखकौ न भाजन= कोई भेष का पात्र नहीं है, पै भेखसौ धरतु है= परन्तु फिर भी भेष रखता है, ऐसौ प्रभु-चेतन= ऐसा चेतन भगवान् आत्मा, अचेतनकी संगतिसौं= अचेतन-पदार्थों की संगति से, उलट-पलट नटबाजी-सी करतु है= नट की तरह उलट-पुलट कलाबाजी-सी करता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्याद्वाद की विवक्षा से जीव के अनेक-धर्मो को स्पष्ट किया है। आत्मा एक अखंड-द्रव्य है, जो निरन्तर अपने जानन-स्वभावरूप परिणमन कर रहा है, जिसे हम जीव के ज्ञान-गुण का परिणमन कहते हैं। ऐसी अनंत-पर्यायें जीव-द्रव्य में होतीं हैं, और उन अनंतपर्यायों में भी एक जीव-द्रव्य ही है, क्योंकि ऐसा जाननरूप-परिणमन किसी अन्य-द्रव्य का नहीं है। इसप्रकार जीव एक होते हुये भी पर्याय-दृष्टि से अनेक है। इसलिए एक या अनेक कुछ नहीं कहा जा सकता है,अर्थात् सर्वथा एक-रूप नहीं कह सकते, कथंचित् (अपेक्षा से) एक, और कथंचित् अनेक। व्यवहारनय से देखें, तो जीव मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों का कर्त्ता है; क्योंकि ये भाव जीव की ही भूल है, जीव की ही पर्याय में उत्पन्न होते हैं, अन्य द्रव्यों में नहीं। और निश्चयनय से देखें, तो जीव इन विकारी-भावोंं का अकर्त्ता है, क्योंकि ये विकार जीव का स्वभाव नहीं है, स्वभाव से तो वह मात्र अपने जाननरूप-कार्य का कर्त्ता है, यदि जीव को सर्वथा इन विकारों का कर्त्ता मान लिया, तो इन विकारों से छूटेंगें कैसे? इसलिए जीव कथंचित्-कर्त्ता भी है, और कथंचित्-अकर्त्ता भी। इसीप्रकार व्यवहारनय से देखें, तो जीव अपनी भूल से बाँधे गये कर्म और कर्मफलों का भोक्ता भी है; क्योंकि इन कर्मों के फल में ही तो जीव चारों गतियों में परिभ्रमण कर रहा है, और निश्चयनय से देखें, तो जीव अभोक्ता भी है; क्योंकि आज तक जीव ने पौद्गलिक-कर्मों को छुआ ही नहीं, तो भोगेगा कैसे? इसलिये जीव कथंचित भोक्ता भी है और कथंचित अभोक्ता भी। व्यवहारनय की अपेक्षा, जब जीव एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को धारण करता है, तो उसे जन्म या उत्पत्ति कहते हैं। जबकि निश्चयनय की अपेक्षा जीव तो अनादि-अनंत एक शाश्वत-द्रव्य है, तो जन्म या उत्पत्ति कैसे संभव है? इसलिए कथंचित्-जन्मा, और कथंचित्-अजन्मा। इसीप्रकार देह के छूटने को लोक में ‘मरण’ कहते हैं, इसीलिये व्यवहारनय से कहने में आता है कि ‘‘जीव का मरण हुआ’’; परन्तु निश्चयनय से देखें, तो आत्मा तो कभी मरती ही नहीं, वह तो जन्म-मरण से रहित अविनाशी-तत्त्व है; इसलिए कथंचित्-मरणधर्मा और कथंचित्-अमरणशील। इसीप्रकार व्यवहारनय से देखें, तो जीव में बोलने, विचार करने रूप जप-तप ध्यान-चिंतन आदि रूप प्रवृत्ति देखी जाती है; जबकि निश्चयनय से देखें, तो आत्मा मात्र ज्ञाता-दृष्टा है, वचन-विचाररूप सर्व विशुद्धि-द्वार व्यवहार की सामर्थ्य तो आत्मा में है ही नहीं; इसलिए कथंचित्-विचारशील और कथंचित्-अविचारशील। इसीप्रकार व्यवहारनय से चार-गति चौरासी-लाख योनियों में भ्रमण करते हुए जीव अनंत-भेष धारण करता है, परन्तु निश्चयनय से तो आत्मा अमूर्तिक है, सो किसी भी भेष को धारण करने की सामर्थ्य आत्मा में है ही नहीं। इसलिये कथंचित्-भेषी और कथंचित्-अभेषी है। इसप्रकार अनंत-गुणों का धनी चेतन-स्वरूप भगवान् आत्मा पौदगलिक-कर्मो के संयोग से नट की भाँति उलट-पुलट हो रहा है। अर्थात् जिसप्रकार नट अनेक-प्रकार के भेष धारणकर कलाबाजियाँ दिखाता है, ठीक उसीप्रकार चेतन-आत्मा इन कर्मों के संयोग और फल में चार-गति चौरासी-लाख योनियों में कभी नरक, तो कभी स्वर्ग, कभी मनुष्य, तो कभी तिर्यंच-गति में नानाप्रकार की पर्यायों को धारण करता हुआ परिभ्रमण कर रहा है।

(दोहा)

नटबाजी विकलप-दसा, नांही अनुभौ-जोग।
केवल अनुभौ-करनकौ, निरविकलप-उपजोग।। 47।।

शब्दार्थ :- नटबाजी विकलप-दसा= नटबाजी विकल्पात्मक-दशा है, नांही अनुभौ-जोग= अनुभव के योग्य नहीं है, केवल अनुभौ-करनकौ= अनुभव करने के लिए केवल, निरविकलप-उपजोग= निर्विकल्पउपयोग ही कार्यकारी है। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में वर्णित विकल्पात्मक-दशा को कवि ने नटबाजी कहा, फिर चाहे वह शुभ-विकल्प ही क्यों न हो, क्योंकि कि विकल्प के रहते वस्तु का अानंद नहीं आता। जैसे हम किसी वाटिका में भ्रमण करने जायें, और उसमें लगे सुंदर-वृक्षों को देखकर विचार करें कि ‘यह किसका वृक्ष है? कब लगाया होगा? किसने लगाया था?’- इत्यादि, तो क्या इन विकल्पों के चलते हम उस वाटिका की सुंदरता का आनंद ले पायेंगें? नहीं। ठीक उसीप्रकार आत्मानुभूति से पूर्व आत्मा के स्वरूप के विषय में किये गये समस्त-विकल्प नटबाजी/नाटक/अभिनय की तरह हैं, जो अनुभव के योग्य नहीं है। अनुभव का अानंद तो तब है, जब हम इन समस्त-विकल्पों को त्यागकर निर्विकल्प-आत्मानुभूति का आनंद लें; इसलिए निर्विकल्प-उपयोग ही अनुभव के योग्य है।

(सवैया इकतीसा)

जैसैं काहू चतुर संवारी है मुकत-माल, मालाकी क्रियामैं नानाभाँतिकौं विग्यान है।
क्रियाकौ विकलप न देखै पहिरनवारौ, मोतिन की सोभामैं, मगन सुखवान है।।
तैसैं न करै, न भुंजै, अथवा करै सो भुंजै, और करै और भुंजै, सब नय-प्रवांन है।
जदपि तथापि विकलप-विधि त्याग-जोग, निरविकलप-अनुभौ अमृतपान है।। 48।।

सर्वविशुद्धि द्वार (१०) | भाग २/३

शब्दार्थ :- जैसैं काहू चतुर संवारी है मुकतमाल= जैसे किसी होशियार व्यक्ति ने मोतियों की माला बनाई है, माला की क्रियामैं नाना-भाँतिकौं विग्यान है= माला बनाने में भिन्न-भिन्न प्रकार का विज्ञान है, क्रियाकौ विकलप न देखै पहिरनवारौ= पहननेवाला बनाने की क्रिया के बारे में विचार तक नहीं करता, मोतिन की सोभामैं मगन सुखवान है= वह तो उसकी सुन्दरता में ही मगन और संतुष्ट है, तैसैं न करै न भुंजै= उसीप्रकार न कर्त्ता, न भोक्ता, अथवा करै सो भुंज=ै अथवा जो करे, वही भोगे, और करै और भुंजै= कोई और करे, कोई और भोगे, जदपि सब नय-प्रवांन है= यद्यपि ये सब नय के कथन हैं, तथापि विकलप-विधि त्याग-जोग= फिर भी विकल्पजाल होने से त्यागने-योग्य है, निरविकलप-अनुभौ अमृतपान है= निर्विकल्प-अनुभव का अमृतपान करना ही योग्य है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने निर्विकल्प-अनुभव की श्रेष्ठता को एक उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया है। जैसे कोई माला बनाने की कला में निपुण-पुरुष बिखरे हुए मोतियों से भाँति-भाँति की सुंदर माला बनाये, यद्यपि माला बनाते समय उस संबंधी विशेष-ज्ञान की आवश्यकता होती है, तभी वह माला बनकर तैयार होती है। लेकिन उस माला को पहननेवाला उसको बनानेवाले व्यक्ति या बनाने संबंधी क्रिया के विकल्पों को नहीं देखता, वह तो मगन होकर मात्र उसकी सुंदरता का आनंद लेता है। ठीक उसीप्रकार आत्मा कर्त्ता है या अकर्ता है, भोक्ता है या अभोक्ता है, जो कर्त्ता है वही भोक्ता है, या करनेवाला कोई और था और भोगनेवाला कोई और है- इत्यादि समस्त-विकल्प नयात्मक हैं अर्थात् ये विभिन्न-नयों के कथन हैं। ये आत्मवस्तु के स्वरूप को समझने के लिये तो आवश्यक हैं; परन्तु एकबार आत्मस्वरूप समझने पर ये सभी विकल्प त्यागने-योग्य ही हैं; क्योंकि इन विकल्पों के चलते आत्मिकअनुभूति से होनेवाले आनंद का वेदन नहीं होगा। या कहें कि जब तक विकल्पों में उलझे रहेगें, तब तक आनंद या आत्मिक-सुख की अनुभूति नहीं होगी। इसीलिए कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘निर्विकल्प-अनुभव’ ही अमृतपान करने जैसा या कहें अपनाने योग्य है।

(दोहा)

दरब-करम करता अलख, यह विवहार कहाउ।
निहचै जो जैसौ दरब, तैसौ ताकौ भाउ।। 49।।

शब्दार्थ :- दरब-करम करता अलख= द्रव्यकर्म का कर्त्ता आत्मा है, यह विवहार कहाउ = यह व्यवहार-नय कहता है, निहचै जो जैसौ दरब= निश्चय-नय से जो द्रव्य जैसा है, तैसौ ताकौ भाउ= उसका वैसा ही स्वभाव है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया कि जो द्रव्य जैसा है, वैसा ही उसका स्वभाव होता है। इसलिए जीव-द्रव्य चेतन है और अपने चैतन्य-भाव का कर्त्ता है। इसीप्रकार द्रव्य-कर्म अचेतन है, पुद््गल है, और अपने स्वभाव यानि स्पर्श-रस-गंध-वर्णादिरूप कार्यों का कर्त्ता है। अर्थात् दोनों द्रव्यस्वभाव से ही पूर्णतया-भिन्न है। और आगम का कथन है कि ‘‘एक-द्रव्य दूसरे-द्रव्य का कर्त्ता नहीं होता है।’’ तब एक चेतन-द्रव्य, एक अचेतन-द्रव्य के कार्यो का कर्त्ता कैसे हो सकता है? जीव-द्रव्य को द्रव्यकर्मों का कर्त्ता कहना- यह व्यवहार-नय का कथन है, जो असत्यार्थ है। निश्चयनय और व्यवहारनय का स्वरूप- वक्ता के अभिप्राय को ‘नय’ कहते हैं। निश्चयनय और व्यवहारनय दोनों ही वस्तु-स्वरूप को कहने की शैली है। दोनों ही श्रुतज्ञान के अंश है। किसी भी वस्तु के स्वरूप का यथार्थ-कथन करनेवाला नय ‘निश्चयनय’ है। उसी वस्तु का संयोगों से, निमित्त से, या किसी को किसी में मिलाकर कथन करनेवाला नय ‘व्यवहारनय’ है। जैसे मिट्टी के घड़े को मिट्टी का कहना ‘निश्चयनय’ और उसी घड़े को घी का संयोग होने पर घी का

व्यावहारिक-दृशैव केवलं कर्तृ कर्म च विभिÂन्नमिष्यते।
निश्चयेन यदि वस्तु चिन्त्यते कर्तृ कर्म च सदैकमिष्यते ।। 18।।

सर्व विशुद्धि-द्वार घड़ा, या पानी का संयोग होने पर पानी का घड़ा कहना ‘व्यवहारनय’ है। इसीलिये निश्चयनय ‘सत्यार्थ’ है, ‘भूतार्थ’ है, क्योंकि ज्यों का त्यों कथन करता है। जबकि व्यवहारनय असत्यार्थ है; अभूतार्थ है, क्योंकि संयोगाधीन कथन करता है। इस विवक्षा से जीव को द्रव्यकर्म का कर्त्ता कहना अन्यद्रव्य के संयोगरूप-कथन है। कैसे? द्रव्यकर्म अर्थात् पुद््गल-परमाणुओं का पिण्ड, और इनके बंध का कारण मोह, राग, द्वेष आदि विकारीभाव, जोकि पहले तो जीव का स्वभाव नहीं है, इसलिये पर हैं। और दूसरी बात, इनकी उत्पत्ति परद्रव्य के लक्ष्य से होती है, अत: वह भी एक भिन्न-द्रव्य हुआ। इसप्रकार जिनकी उत्पत्ति ही परद्रव्य के लक्ष्य या संयोग से होती है, वह नियम से संयोगीभाव है, और व्यवहारनय संयोग से ही कथन करता है; इसीलिए व्यवहारनय द्रव्यकर्म का कर्त्ता जीव को कहता है। चूँकि व्यवहारनय असत्यार्थ होने से यह कथन भी असत्यार्थ है कि ‘जीव द्रव्यकर्म का कर्त्ता है।’

(सवैया इकतीसा)

ग्यानकौ सहज ज्ञेयाकार-रूप परिणवै, यद्यपि तथापि ग्यान ग्यानरूप कह्यौ है।
ज्ञेय ज्ञेयरूप यौं अनादिहीकी मरजाद, काहू-वस्तु काहू-कौ सुभाव नहिं गह्यौ है।।
एते पर कोऊ-मिथ्यामती कहै ज्ञेयाकार, प्रतिभासनसौं ग्यान असुद्ध ह्वै रह्यौ है।
याही दुरबुद्धिसौं विकल भयौ डोलत है, समुझै न धरम यौं भरम-माँहि बह्यौ है।। 50।।

शब्दार्थ :- ग्यानकौ सहज ज्ञेयाकाररूप परिणवै= ज्ञान का सहज-स्वभाव है ज्ञेयाकाररूप परिणमन करना, यद्यपि तथापि ग्यान ग्यानरूप कह्यौ है= लेकिन फिर भी ज्ञान ज्ञानरूप ही कहा गया है, ज्ञेय ज्ञेयरूप यौं अनादिहीकी मरजाद= और ज्ञेय का, ज्ञेयरूप (रहना) अनादिकाल से यही मर्यादा/रीति है, काहू-वस्तु काहूकौ सुभाव नहिं गह्यौ है= किसी वस्तु ने अन्य किसी वस्तु का स्वभाव ग्रहण नहीं किया है, एते पर कोऊ मिथ्यामती कहै= इतने पर कोई मिथ्यादृष्टि-जीव कहे, ज्ञेयाकार प्रतिभासनसौं ग्यान असुद्ध ह्वै रह्यौ है= ज्ञेयाकाररूप प्रतिभास होने से ज्ञान अशुद्ध हो रहा है, याही दुरबुद्धिसौं विकल भयौ डोलत है= इसी विपरीत-बुद्धि से व्याकुल होकर घूमता है, समुझै न धरम यौं भरम-माँहि बह्यौ है= धर्म को समझता नहीं है, इसीप्रकार भ्रम में बहता रहता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ज्ञान ज्ञेयाकार होने पर भी त्रिकाल-शुद्ध ही रहता है- इसका सटीक- वर्णन किया है। ज्ञान सहज ही ज्ञेयाकाररूप परिणमन करता है, लेकिन फिर भी ज्ञान, ज्ञानरूप ही रहता है और ज्ञेय, ज्ञेयरूप ही रहते हैं- ऐसी प्रक्रिया अनादिकाल से इसीप्रकार चली आ रही है। इस सहज-प्रक्रिया में आज तक किसी भी वस्तु ने किसी भी अन्य-वस्तु के स्वभाव को ग्रहण नहीं किया है, सभी स्वतंत्र और सहज-परिणमन करते हैं। ज्ञान अर्थात् आत्मा का जाननरूप-स्वभाव, और ज्ञेय अर्थात् जानने में आनेवाले पदार्थ या कहें ज्ञान में झलकनेवाले पदार्थ। ज्ञेयाकार से अभिप्राय ज्ञान की निर्मलता में किसी भी वस्तु का आकार ननु परिणाम एव किल कर्म विनिश्चियत:, स भवति नापरस्य परिणामिन एव भवेत्। न भवति कर्तृशून्यमिह कर्म न चैकतया, स्थितिरिह वस्तुनो भवतु कर्तृ तदेव ततः।।*

बहिर्लुठति यद्यपि स्फुटदनन्त-शक्ति: स्वयं, तथाऽप्यपर-वस्तुनो विशति नान्यवस्त्वन्तरम्।
स्वभाव-नियतं यतः सकलमेव वस्त्विष्यत,े स्वभाव-चलनाकुलः किमिह मोहितः क्लिश्यते ।। 19।।

बनना या प्रतिबिम्बित होना/ज्ञेय बनना। जैसे आँख के परदे पर बाह्य-वस्तुओं के चित्र बनना। जब भी रेटीना पर किसी वस्तु का चित्र बनता है, तब न तो वह वस्तु आँख में समाती है और न आँख उस वस्तु का स्पर्श करती है, लेकिन फिर भी देखने-जाननेरूप क्रिया होती है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान की निर्मलता में पौद्गलिक-वस्तुओं अर्थात् ज्ञेय का आकार बनता है, उस समय न तो वह वस्तु ज्ञान में समाती है, और न ज्ञान उस वस्तु को स्पर्श करता है। लेकिन फिर भी ज्ञान की निर्मलता में वह वस्तु झलकती है और जानने की क्रिया होती है, इसी को ज्ञान का ज्ञेयाकार होना कहते हैं, और अनादिकाल से ज्ञान का यह परिणमन इसीप्रकार चला आ रहा है। इतने पर भी यदि कोई मिथ्यादृष्टि-जीव यह कहे कि ज्ञान के ज्ञेयाकाररूप परिणमन होने पर ज्ञान अशुद्ध होता है, तो ये उसकी दुर्बुद्धि ही है; क्योंिक ज्ञान का स्वरूप ऐसा नहीं है कि वह अशुद्ध हो सके। लोक में प्रचलित-मतों में वैशषि े क-मत ये मानता है कि जब ज्ञान में जगत् के पदार्थ प्रतिबिंबित होते हैं, तब ज्ञान अशुद्ध हो जाता है, इसलिए जबतक ज्ञान की अशुद्धता नहीं मिटेगी, तबतक जीव मुक्त नहीं होगा। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है, ज्ञान प्रतिसमय दर्पण के समान स्वच्छ और निर्मल रहता है। जैसे दर्पण में अच्छा या बुरा, गंदा या साफ कोई भी पदार्थ झलकने पर न तो दर्पण कभी उसरूप होता है, और न ही दर्पण की निर्मलता पर कोई फर्क पड़ता है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान में कोई भी पदार्थ झलकने पर न तो ज्ञान कभी उसरूप होता है और न ही उसकी निर्मलता पर कोई फर्क पड़ता है, अर्थात् ज्ञान कभी अशुद्ध नहीं होता है। जैसे सूर्य और पृथ्वी की दूरी सर्वविदित है, यद्यपि सूर्य कभी जगत् के पदार्थों को प्रकाशित करने नहीं आता, वह तो स्वयं प्रकाशित होता है, और उसके प्रकाश में जगत् के पदार्थ सहज स्वयं प्रकाशित होते हैं, फिर चाहे वह पदार्थ मलिन हो या निर्मल, सूर्य की प्रकाशकत्व शक्ति पर उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, वह तो ज्यों की त्यों ही रहती है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान भी स्व-पर-प्रकाशी है, सो ज्ञान की निर्मलता में स्वयं का आत्मा भी प्रकाशित होता है, और जगत् के पदार्थ भी स्वयं प्रकाशित होते हैं; उससे ज्ञान की निर्मलता पर कोई फर्क नहीं पड़ता, वह तो ज्यों का त्यों निर्मल रहता है। इस विवक्षा से वैशेषिकों की यह मान्यता पूर्णतः गलत सिद्ध होती है। अपनी इसी विपरीत-मान्यता के कारण मिथ्यादृष्टि-जीव आकुलित होकर चारों गतियों में भ्रमण करता हुआ दु:खी होता है, धर्म के वास्तविक-स्वरूप को भी नहीं समझता, और अपनी दुर्बुद्धि से मिथ्यात्व के भ्रम में ही भूला रहता है।

(चौपाई)

सकल-वस्तु जगमैं असहाई, वस्तु वस्तुसौं मिले न काई।
जीव-वस्तु जानै जग जेती, सोऊ भिन्न रहै सब-सेती।। 51।।

शब्दार्थ :- सकल-वस्तु जगमैं असहाई= जगत् के समस्त-पदार्थ बिना सहारे अर्थात् स्वाधीन हैं, वस्तु वस्तुसौं मिले न काई= कोई वस्तु किसी वस्तु से कभी नहीं मिलती है। जीव-वस्तु जानै जग जेती= जगत् के जितने पदार्थ हैं, उन सभी को जीव ही जानता है, सोऊ भिन्न रहै सब-सेती= लेकिन फिर भी वह उन सभी से

भिन्न रहता है।
वस्तु चैकमिह नान्यवस्तुनो, येन तेन खलु वस्तु वस्तु तत्।
निश्चयोऽयमपरो परस्य कः, किं करोति हि बहिर्लुठÂन्नपि।। 20।।

सर्व विशुद्धि-द्वार विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने वस्तु-स्वरूप की स्वतंत्रता का सुंदर-वर्णन किया है। जगत् में जितने भी पदार्थ हैं, वे जड़ हों या चेतन, सभी अपने-अपने आधार से हैं। यद्यपि प्रत्यक्ष देखने पर अज्ञानी-जीव को ऐसा भासित होता है कि सब आपस में मिलकर एक हो गए हैं, एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं, एक-दूसरे को रहने का स्थान देते हैं। यद्यपि व्यवहार से कहने में भी यही आता है, परंतु वास्तविकता यही है कि नीर-क्षीरवत् मिलती हुई दिखाई देने पर भी आज तक कोई वस्तु किसी अन्य वस्तु से नहीं मिली है और न कभी मिलेगी, और न ही कोई किसी के आधार से है; क्योंकि प्रत्येक वस्तु अपने स्व-चतुष्ट्य में निवास करती है, न वह स्वयं किसी अन्य वस्तु की सीमा में प्रवेश करती है, और न अन्य वस्तु उसकी सीमा में प्रवेश करती है,- ऐसा अस्ति-नास्ति-धर्म प्रत्येक-वस्तु में विद्यमान है। जगत् में जितने भी द्रव्य और पदार्थ हैं, उन सबको जाननेवाला एकमात्र जीवद्रव्य ही है। हाँ, यह भी सत्य है कि ज्ञान की पूर्णता या केवलज्ञान में सम्पूर्ण-जगत् का प्रत्येक-परमाणु प्रतिभासित होता है, और अपूर्णता यानि क्षयोपशम-ज्ञान में यथासंभव। लेकिन फिर भी ज्ञान इन सभी से पूर्णत: भिन्न ही रहता है, न वह पदार्थ ज्ञान को स्पर्श करते हैं और न ज्ञान उन पदार्थों को स्पर्श करता है। लेकिन फिर भी जगत् के समस्त पदार्थ ज्ञान में प्रतिभासित होते हैं, ठीक उसीप्रकार जैसे सूर्य अपने स्थान से कहीं नहीं जाता है, लेकिन फिर भी सभी को प्रकाशित करता है। ऐसा अनंत-ज्ञान का धारी तीनों लोकों में एकमात्र मैं जीवात्मा ही हूँ, बस एक बार स्वीकार करने की देर है।

(दोहा)

कर्म-करै फल-भोगवै, जीव-अग्यानी कोइ।
यह कथनी विवहार की, वस्तु-स्वरूप न होइ।। 52।।

शब्दार्थ :- कर्म-करै फल-भोगवै जीव-अग्यानी कोइ= कोई अज्ञानी जीव कहे (जीव) कर्म करता है फल भोगता है, यह कथनी विवहार की वस्तु-स्वरूप न होइ= यह व्यवहार का कथन है, किन्तु वस्तु-स्वरूप ऐसा नहीं है। विशेषार्थ :- इस-छंद में भी कवि ने जीव की स्वतंत्रता का ही वर्णन किया है। अज्ञानी-जीव की ये मान्यता कि ‘‘मैं कर्म करता हूँ और कर्मफल को भोगता हूँ’’- दोनों ही मान्यतायें सिद्धांतत: गलत हैं। क्योंकि पहली-बात, कर्म करने के लिये भी और कर्मफल को भोगने के लिये भी अन्य-द्रव्य की आवश्यकता होगी, अर्थात् पराधीनता होगी, जबकि वस्तु-स्वरूप की दृष्टि से तो अणु-अणु पूर्ण-स्वाधीन है, और दूसरी-बात, कि जीव का स्वभाव मात्र जानना-देखना है, कर्म करने और कर्मफल को भोगने का स्वभाव ही जीव में नहीं है, और जब शक्ति ही नहीं, तो कार्य कैसे संभव है? जीव को कर्म करनेवाला और कर्म फल भोगनेवाला मानना- यह अज्ञानी-जीव की ही विपरीतविचारधारा है; क्योंकि वस्तु-स्वरूप ऐसा नहीं है। वस्तु-व्यवस्था तो ऐसी है कि सभी द्रव्य अपने-अपने स्वभाव के अनुरूप सहज-परिणमन कर रहे हैं। उस स्वतंत्र-परिणमन को देखकर मोहवश यदि अज्ञानीजीव यह मानता है कि ‘‘मैंने किया या मैं नहीं कर पाया, मैंने भोगा या मैं नहीं भोग पाया’’- तो यह तो अज्ञानी-जीव का ही भ्रम है; वस्तु-स्वरूप ऐसा नहीं है। जीव के दुःख का कारण ही पर में कर्तृत्व और

यत्तु वस्तु कुरुतेऽन्यवस्तुनः कि®¨fनापि परिणामिनः स्वयम्।
व्यावहारिक-दृशैव तन्मतं, नान्यदस्ति किमपीह निश्चयात्।। 21।।

भोक्तृत्व-बुद्धि है, अन्यथा तो जीव त्रिकाल-सुखी ही है।

(कवित्त)

ज्ञेयाकार ग्यान की परणति, पै वह ग्यान ज्ञेय नहिं होइ।
ज्ञेयरूप षट्-दरब भिन्न-पद, ग्यानरूप-आतमपद सोइ।।
जानै भेद-भाउ सु विचच्छन, गुन-लच्छन सम्यकद्रिग जोइ।
मूरख कहै ग्यानमय-आकृति, प्रगट-कलंक लखै नहिं कोइ।। 53।।

शब्दार्थ :- ज्ञेयाकार ग्यान की परणति= ज्ञेयाकार होना ज्ञान का परिणमन है, पै वह ग्यान ज्ञेय नहिं होइ= परन्तु वह ज्ञान कभी ज्ञेयरूप नहीं होता, ज्ञेयरूप षट्-दरब भिन्न-पद= ज्ञेयरूप छहों द्रव्य भिन्न-पदरूप हैं और ग्यानरूप आतमपद सोइ= जो ज्ञानरूप है, वही आत्मपद है, जानै भेदभाउ गुन-लच्छन= जो ज्ञान और ज्ञेय के भेद को गुण और लक्षण से जानता है, सो विचच्छन सम्यकद्रिग जोइ= वह विचक्षण/ज्ञानी-पुरुष सम्यग्दृष्टि होता है, मूरख कहै ग्यानमय-आकृति= मूर्ख कहते हैं ज्ञान में बननेवाला आकार, प्रगट कलंक लखै नहिं कोइ= प्रत्यक्ष कलंक/अशुद्धता है- यह कोई देखता ही नहीं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ज्ञेय और ज्ञान या कहें ज्ञेय और ज्ञायक की भिन्नता का वर्णन किया है। ज्ञेयाकार होना ज्ञान की परिणति है, अर्थात् ज्ञान का सहज परिणमन है। सम्पूर्ण-विश्व में एक जीवपदार्थ ही ज्ञायक है, ज्ञान उसका गुण है, जैसे अन्य-पदार्थ चीनी मिठासरूप, नीबू खटासरूप अर्थात् अपने गुणों के अनुरूप परिणमन करते हैं, वैसे ही ज्ञायक अपने ज्ञान-गुण के अनुरूप जानन-स्वभावरूप परिणमन करता है, और जगत् के छहों-द्रव्यों को जानता है, या कहें जानने में आते हैं। ज्ञान स्व-परप्रकाशी होने से स्वयं को भी जानता है और जगत् के समस्त चेतन और जड़-पदार्थों को भी जानता है। अर्थात् स्वयं आत्मा भी अपने ज्ञान का ज्ञेय है और जगत् के समस्त-पदार्थ भी उसके ज्ञान के ज्ञेय हैं। जब भी कोई पदार्थ ज्ञान में झलकता है, तब स्वयं ही ज्ञान का परिणमन ज्ञेयाकाररूप होता है। लेकिन फिर भी ज्ञान कभी ज्ञेयरूप नहीं होता, और न ही ज्ञेय ज्ञानरूप। छहों द्रव्य को जानते हुये भी जो सदैव भिन्न रहता है, वह ज्ञान ही तो आत्मा है। जैसे स्फटिक-मणि स्वयं में पूर्ण-निर्मल है, अब यदि उसके सामने लाल-रंग का कपड़ा आये, तो वह लाल-रंग की, नीला आये नीले-रंग की, अर्थात् जो रंग सामने आये वह उसी रंग की दिखने लगती है; लेकिन न तो उस कपड़े ने स्फटिक में प्रवेश किया है, और न ही स्फटिक ने कपड़े में। फिर भी उस रूप परिणमन हुआ। और जब उसके सामने कोई कपड़ा नहीं रहता, तब वह अपने निर्मलरूप में ज्यों की त्यों विद्यमान रही। उसीप्रकार ज्ञान, स्वभाव से पूर्ण-निर्मल है, जब भी कोई ज्ञेय प्रतिभासित हुआ, ज्ञान भी ज्ञेयाकार हुआ, वर्ना अपने निर्मलरूप में ज्यों का त्यों विद्यमान रहा। जो जीव ज्ञान और ज्ञेय की इस भिन्नता को गुण और लक्षण से जानते हैं, अर्थात् ज्ञान के स्व-परप्रकाशी सत्य-स्वरूप को पहिचानते हैं, वे ही सम्यग्दृष्टि-जीव हैं। लेकिन विवेकशून्य-वैशेषिक आदि मिथ्यादृष्टि-जीव कहते हैं कि ज्ञान में बननेवाली ज्ञेय की आकृति प्रत्यक्ष-कलंक है, अर्थात् प्रत्यक्ष दिखाई देता है कि ज्ञान अशुद्ध हो गया, पर कोई नहीं मानता। शुद्धद्रव्य-निरूपणार्पितमतेस्तत्त्वं समुत्पश्यतो, नैकद्रव्यगतं चकास्ति किमपि द्रव्यान्तरं जातुचित्। ज्ञानं ज्ञेयमवैति यत्तु तदयं शुद्ध-स्वभावोदयः, किं द्रव्यान्तर-चुम्बनाकुल-धियस्तत्त्वाच्च्यवन्ते जनाः।। 22।। सर्व विशुद्धि-द्वार

(चौपाई)

निराकार जो ब्रह्म कहावै, सो साकार नाम क्यों पावै।
ज्ञेयाकार ज्ञान तब तांई, पूरन-ब्रह्म नांहि तब तांई।। 54।।

ज्ञेयाकार ब्रह्म-मल मानै, नास-करनकौ उद्दिम ठानै।
वस्तु-सुभाव मिटै नहिं क्योंही, तातैं खेद करै सठ यौंही।। 55।।

शब्दार्थ :- निराकार जो ब्रह्म कहावै= आकार-रहित जो ब्रह्म है, सो साकार नाम क्यों पावै= वह आकार- सहित नाम कैसे प्राप्त कर सकता है, ज्ञेयाकार ज्ञान तब तांई= जबतक ज्ञान ज्ञेयाकार है, पूरन-ब्रह्म नांहि तब तांई= तबतक वह पूर्ण-ब्रह्म नहीं हो सकता।। 54।। ज्ञेयाकार ब्रह्म-मल मानै= ज्ञेयाकार को ब्रह्म/आत्मा का मल यानि अशुद्धि मानता है, नास करनकौ उद्दिम ठानै= (इसलिए) उसे नष्ट करने के लिए पुरुषार्थ करता है, वस्तु-सुभाव मिटै नहिं क्योंही= लेकिन वस्तु का स्वभाव कभी मिटता नहीं, तातैं खेद करै सठ यौंही= इसलिए मूर्ख व्यर्थ ही दुःखी होता है।। 55।। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने ज्ञान के ज्ञेयाकार होने को ज्ञान का सहज-परिणमन कहा था। लेकिन मिथ्यादृष्टि-जीव ने उसे कलंक या ज्ञान की अशुद्धता कहा। अपनी उसी बात को सही सिद्ध करने के लिए मिथ्यादृष्टि-जीव जो तर्क देता है, उसी का वर्णन कवि ने इस-छंद में किया है। वैशेषिक आदि मतों को माननेवाले ब्रह्म या ईश्वर को निराकार मानते हैं, ज्ञान के ज्ञेयाकार होने पर उनका तर्क है कि जो ब्रह्म/आत्मा निराकार है, वह साकार कैसे हो सकता है? इसलिये जबतक ज्ञान ज्ञेयाकार रहेगा, तबतक वह अशुद्ध है; और जबतक अशुद्धि है, तबतक वह पूर्ण-ब्रह्मरूप नहीं है। इतना ही नहीं ज्ञान के ज्ञेयाकार होने को ये दुर्बुद्धि-जीव ब्रह्म का मल अर्थात् अशुद्धि मानते हैं, सो उसको नष्ट करने का पुरुषार्थ करते हैं। लेकिन ये नहीं जानते कि वस्तु का स्वभाव तो कभी नष्ट ही नहीं होता, मूर्ख व्यर्थ ही दुःखी होते हैं। लौकिक में भी विचार करें, तो किसी भी वस्तु का स्वभाव कभी नहीं मिटता है। जैसे क्या हम नमक का खारापन मिटा सकते हैं? चीनी की मिठास को मिटा सकते हैं? नहीं। क्योंकि खारापन ही तो नमक की पहिचान है, मिठास ही तो चीनी का स्वरूप है; इसीप्रकार ज्ञान का स्वभाव ही है, ज्ञेयाकाररूप परिणमन करना अथवा ज्ञेयों की सिद्धि करना है; क्योंकि ज्ञान ही तो है, जो सम्पूर्ण-विश्व को जानने की सामर्थ्य रखता है, फिर हम इसे ज्ञान की मलिनता या अशुद्धता कैसे कह सकते हैं? यदि किसी वस्तु का स्वभाव ही मिटा दिया, तो उस वस्तु का अस्तित्व सिद्ध कैसे होगा, वह तो तत्क्षण विनाश को प्राप्त हो जायेगी, जो कि संभव नहीं है, स्वभाव तो त्रिकाल एक जैसा ही रहता है। मिटाना तो दूर, वह कभी बदलता भी नहीं है। इसीलिए वैशेषिक आदि मिथ्यादृष्टि-जीवों का ये तर्क स्वत: ही गलत सिद्ध होता है।

(दोहा)

मूढ मरम जानै नहीं, गहै एकंत-कुपक्ष।
स्याद्वाद सरवंगनै, मानै दक्ष प्रतक्ष।। 56।।

सुद्ध-दरब अनुभौ करै, सुद्धद्रिष्टि-घटमाँहि।
तातैं समकितवंत-नर, सहज उछेदक नांहि।। 57।।

शब्दार्थ :- मूढ़ मरम जानै नहीं= मूर्ख सत्य को तो जानते नहीं, गहै एकंत कुपक्ष= एकांतवाद के पूर्वाग्रह को ग्रहण करते है, स्याद्वाद सरवंग नै= स्यादवादी सर्वांग को जानते हैं, मानै दक्ष प्रतक्ष= इसलिये सभी धर्मों को प्रत्यक्ष मानते हैं।। 56।। सुद्ध-दरब अनुभौ करै= शुद्ध-द्रव्य का अनुभव करते हैं, सुद्धद्रिष्टि-घटमाँहि= सम्यग्दृष्टि-जीव अंतरंग में, तातैं समकितवंत नर= इसलिये सम्यग्दृष्टि-जीव, सहज उछेदक नांहि= सहज-स्वभाव का लोप नहीं करते।। 57।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने पुन: मिथ्यादृष्टि-जीव की विचारधारा का खंडन और सम्यक्- मत को तर्क-सहित प्रस्तुत किया। यद्यपि ब्रह्म/आत्मा ‘साकार’ भी है और ‘निराकार’ भी, लेकिन दोनों की अपेक्षा भिन्न-भिन्न है। परन्तु मिथ्यादृष्टि-जीव तो स्याद्वाद को मानता ही नहीं, वह तो वस्तु के एक-पक्ष को ही मानता है, जिसे कवि ने ‘कुपक्ष’ या ‘कुटेव’ नाम दिया। जैसे किसी व्यक्ति में कोई कुटेव या गंदी-आदत हो, तो लाख समझाने पर भी वह व्यक्ति अपनी उस कुटेव को नहीं छोड़ पाता; ठीक उसीप्रकार यहाँ मिथ्यादृष्टि-जीव भी एकांतवाद की अपनी कुटेव को छोड़ने की जगह और मजबूती से पकड़ता है। जबकि स्याद्वादी ब्रह्म के साकार और निराकार सभी धर्मों को सहज-स्वीकार करते हैं। कैसे? ज्ञान में ज्ञेेय का आकार बनता है, यह तो प्रत्यक्ष है; क्योंकि तभी तो ज्ञेय जानने में आते हैं, सो साकार-पक्ष को स्वीकार किया। लेकिन उन ज्ञेयों से ज्ञान में कभी कोई विकार नहीं होता, जैसे ज्ञान में कोई मलिन-पदार्थ झलके तो ज्ञान मलिन नहीं होता, और कोई स्वच्छ-पदार्थ झलके तो स्वच्छ नहीं होता, वह तो त्रिकाल एक जैसा रहता है, अर्थात् निराकार। इसप्रकार स्यादवादी बिना किसी विरोध के सभी धर्मों को साक्षात् स्वीकार करते हैं। ज्ञान के ऐसे शुद्ध-स्वरूप को ही सम्यग्दृष्टि-जीव अपने अंतरंग में अनुभव करते हैं। ज्ञान के स्वभाव का लोप किये बिना या उसको मिटाये बिना उसके सहज ज्ञेयाकारपरिणमन को भी स्वीकार करते हैं, और ज्ञेयों से अप्रभावित रहने से निराकार-रूप को भी स्वीकार करते हैं। तथा स्वभाव को मिटानेरूप कर्तृत्वबुद्धि का त्यागकर सहज-सुखी रहते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जैंसैं चंद-किरनि प्रगटि भूमि सेत करै, भूमी-सी न दीसै सदा जोति-सी रहति है।
तैंसैं ज्ञान-सकति प्रकासै हेय-उपादेय, ज्ञेयाकार दीसै पै न ज्ञेयकौं गहति है।।
सुद्ध-वस्तु सुद्ध-परजाइरूप परिनवै, सत्ता-परवांन माहें ढाहें न ढहति है।
सो तौ औररूप कबहूँ न होइ सरवथा, निहचै अनादि जिनवानी यौं कहति है।। 58।।

शब्दार्थ :- जैंसैं चंद-किरनि प्रगटि भूमि-सेत करै= जैसे चंद्रमा की किरणें प्रगट होकर भूमि को सफेद/ उजला कर देती हैं, भूमीसी न दीसै सदा जोतिसी रहति है= वे भूमि जैसी मलिन नहीं दिखतीं हैं, हमेशा ज्योतिरूप में ही रहती हैं, तैंसैं ज्ञान-सकति प्रकासै हेय-उपादेय= वैसे ही ज्ञान-शक्ति हेय और उपादेय-पदार्थों को प्रकाशित करती है, ज्ञेयाकार दीसै पै न ज्ञेयकौं गहति है= ज्ञेयाकार दिखती हैं, परन्तु ज्ञेयाकार को ग्रहण नहीं करती हैं, सुद्ध-वस्तु सुद्ध-परजाइरूप परिनवै= शुद्ध-वस्तु शुद्ध- पर्यायरूप परिणमन करती है, सत्ता-परवांन मांहे ढाहें न ढहति है= सत्ता-प्रमाण रहती है, विचलित करने से विचलित नहीं होती है; सो तौ औररूप कबहूँ न होइ सरवथा= वह कभी भी किसी भी स्थिति में अन्यरूप भी नहीं होती, निहचै अनादि जिनवानी यौं कहति है= निश्चय से अनादि से- जिनवाणी ऐसा कहती है। शुद्धद्रव्य-स्वरस-भवनात‍्किं स्वभावस्य शेष-मन्यद्रव्य भवति यदि वा तस्य किं स्यात्स्वभावः। ज्योत्स्ना-रूपं स्नपयति भुवं नैव तस्यास्ति भूमि-र्ज्ञानं ज्ञेयं कलयति सदा ज्ञेयमस्यास्ति नैव।। 23।। सर्व विशुद्धि-द्वार विशेषार्थ :- इस-छंद में ज्ञेय और ज्ञायक की भिन्नता को कवि ने एक सटीक-उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया है। लोक में हम देखते हैं कि पूर्णमासी का चाँद तो आकाश में होता है, लेकिन उसकी चाँदनी जब जमीन पर बिखरती है, तो सम्पूर्ण पृथ्वी सफेद/उजली हो जाती है; लेकिन फिर भी वह चाँदनी, एक ज्योति के रूप में उजली ही रहती है, पृथ्वी के वर्णरूप नहीं होती है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान भी जगत् के हेय और उपादेय या हितकारी और अहितकारी सभी पदार्थों को प्रकाशित करता है, यद्यपि उस समय ज्ञान ज्ञेयाकार प्रतीत होता है, परन्तु फिर भी ज्ञेयरूप परिणमन नहीं करता, मात्र उनको प्रकाशित करता है, उनसे प्रभावित नहीं होता है और न ही कभी उन पदार्थोंरूप होता है। वस्तु जैसी होती है, उसका परिणमन भी वैसा ही होता है; क्योंकि वह अपनी सत्ता-प्रमाण यानि अपने स्व-चतुष्ट्य में ही रहती है। आत्मा स्वभाव से त्रिकाल-शुद्ध है, और शुद्धरूप ही परिणमन करता है, क्योंकि वह भी अपनी सत्ता में रहकर ही परिणमन करता है, विचलित करने पर भी विचलित नहीं होता है अर्थात् किसी भी प्रकार की बाह्य-अशुद्धि का संयोग होने पर भी अशुद्धरूप नहीं होता; क्योंकि अशुद्धि कभी ज्ञान-स्वभाव में प्रवेश नहीं करती- ऐसी सामर्थ्य ज्ञान की है। इसीलिए कोई भी वस्तु कभी भी किसी भी स्थिति में अन्य वस्तुरूप नहीं होती, यही वस्तु का सत्य-स्वरूप है, और अनादिकाल से जिनवाणी भी यही कह रही है, लेकिन अज्ञानी-जीव मोह-वश जिनवाणी की बात सुनना व समझना ही नहीं चाहता है।

(सवैया तईसा)

राग-विरोध-उदै जबलौं तबलौं, यह जीव मृषा-मग धावै।
ग्यान जग्यौ जब चेतनकौ तब, कर्म-दसा पररूप कहावै।।
कर्म-विलेछि करै अनुभौ तहाँ, मोह-मिथ्यात प्रवेश न पावै।
मोह गयै उपजै सुख केवल, सिद्ध भयौ जगमाँहि न आवै।। 59।।

शब्दार्थ :- राग-विरोध-उदै जबलौं= जबतक राग-द्वेष का उदय रहता है, तबलौं यह जीव मृषा-मग धावै= तबतक यह जीव विपरीत-रास्ते पर ही दौड़ता है, ग्यान जग्यौ जब चेतनकौ= जब चेतन-आत्मा का ज्ञान जागृत होता है, तब कर्म-दसा पररूप कहावै= तब कर्मों की स्थिति को पररूप कहता/अनुभवता है, कर्म विलेछि करै अनुभौ तहाँ= कर्मों से भिन्न जब आत्मानुभव करता है, मोह-मिथ्यात प्रवेश न पावै= तब मोह और मिथ्यात्व का प्रवेश नहीं होता, मोह गयै उपजै सुख केवल= मोह के (समूल) नाश होते ही अनंतसुख और अनंतज्ञान/केवलज्ञान की उत्पत्ति होती है, सिद्ध भयौ जगमाँहि न आवै= तब (कैवल्य प्रकट होने पर) सिद्ध-पद प्रकट होता है, फिर वह जीव लौटकर संसार में नहीं आता। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने कर्म का संयोग होने पर जीव की प्रवृत्ति कैसी होती है और कर्म का नाश होने पर जीव की प्रवृत्ति कैसी होती है,- इसका सटीक-वर्णन किया है। कर्म का संयोग (अर्थात् उदय और बंध) जीव के साथ अनादिकाल से चला आ रहा है। इसलिये जबतक राग-द्वेष रूप कर्मोदय-जनित परिणाम का संयोग रहता है, तबतक जीव की बुद्धि भ्रमित रहती है, हित-अहित की परख न होने से उसकी बुद्धि हमेशा विपरीत-मार्ग का ही अनुसरण करती है। परन्तु जिस क्षण सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का समागम मिलने पर आत्मिक-ज्ञान जागृत होता है, तब आत्मराग-द्वेष-द्वयमुदयते तावदेतÂन्न यावत्, ज्ञानं ज्ञानं भवति न पुनर्बोध्यतां याति बोध्यम्। ज्ञानं ज्ञानं भवतु तदिदं न्यक्कृताज्ञानभावं, भावाभावौ भवति तिरयन् येन पूर्णस्वभावः।। 24।। स्वरूप की सही-जानकारी होने से ये कर्मोदय-जनित-दशा पररूप अर्थात् अपने से भिन्न अनुभव में आती है। जब जीव द्रव्यकर्म और भावकर्म- दोनों से अपने को भिन्न अनुभव करता है, तब फिर वहाँ मोह और मिथ्यात्व का प्रवेश नहीं होता, अर्थात् पर में एकत्व-ममत्व-बुद्धिरूप जो दर्शन-मोहनीय का प्रभाव अनादिकाल से अपनी सत्ता जमाये हुये था, वह आत्मानुभव से विनाश को प्राप्त होता है, और पुन: आत्मा में प्रवेश नहीं करता है। फिर पुरुषार्थपूर्वक धीरे-धीरे चारित्रमोहनीय और शेष तीनों घातिया-कर्मों का भी विनाश होने पर उस जीव को पूर्ण-सुख एवं केवलज्ञान प्रकट होता है। मोहनीय-कर्म अर्थात् कर्मों का राजा, जब राजा ही अपने वैभव के साथ विनाश को प्राप्त होता है, तो अघातिया-कर्म रूपी अनुचर भी स्वत: ही समयानुसार विनाश को प्राप्त होते हैं, और जीव अविनाशी सिद्ध-दशा को प्राप्त करता है। सिद्ध-अवस्था प्राप्त करने के बाद वह जीव पुन: संसार में नहीं आता है अर्थात् जन्म-मरण से रहित हो जाता है।

(छप्पय)

जीव करम-संजोग, सहज मिथ्यातरूप धर।
राग-दोष परनति-प्रभाव जानै न आप-पर।।
तम-मिथ्यात मिटि गयौ, हुवो समकित उदोत-ससि।
राग-दोष कछु वस्तु नांहि, छिन-माँहि गये नसि।।
अनुभौ-अभ्यास सुखरासि रमि, भयौ निपुन तारन-तरन।
पूरन-प्रकास निहचल निरखि, बानारसि वंदत चरण।। 60।।

शब्दार्थ :- जीव करम-संजोग मिथ्यातरूप धर= कर्म का संयोग होने पर जीव की मिथ्यात्वरूप-अवस्था होती है, राग-दोष परनति-प्रभाव जानै न आप-पर= राग-द्वेषरूप परिणमन के प्रभाव से स्व और पर को नहीं जानता, तम मिथ्यात मिटि गयौ हुवो समकित उदोत शशि= मिथ्यात्वरूपी-अंधकार मिट गया और सम्यक्त्वरूपी-चंद्रमा का उदय हुआ, राग-दोष कछु वस्तु नांहि छिन-माँहि गये नसि= राग-द्वेष कोई वस्तु नहीं है, क्षण में ही विनाश को प्राप्त होते हैं, अनुभौ-अभ्यास सुखरासि रमि= अनुभव के अभ्यासरूप सुख की राशि में लीन होकर, भयौ निपुन तारन-तरन= संसार से तारनेवाले और स्वयं तिरनेवाले पूर्ण-ज्ञाता हुए, पूरनप्रकास निहचल निरखि= ऐसे पूर्ण-परमात्मा के निश्चल-स्वरूप अवलोकन करके, बानारसि वंदत चरण= बनारसीदास उनकी चरण-वंदना करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पहले मिथ्यात्व की अवस्था, और फिर सम्यक्त्व-पूर्वक परम-पद को

प्राप्त करने तक की अवस्था का वर्णन किया है।
अनादिकाल से कर्म का संयोग होने से जीव की मिथ्यात्वरूप-अवस्था का होना स्वाभाविक है।

और मिथ्यात्वरूप-अवस्था में राग-द्वेषरूप विकार, इष्ट-अनिष्टरूप बुद्धि का होना भी सहज है। इसके परिणामस्वरूप जीव को स्व-पर का भेदज्ञान नहीं होता, यही वास्तविक-स्थिति है। लेकिन जब सुसंयोग मिलने पर आत्मिक-अनुभूतिरूप चंद्रमा का उदय होता है, तब मिथ्यात्वरूपीअंधकार स्वत: ही विनाश को प्राप्त होता है। यहाँ कवि ने प्रतीक के रूप में सूर्य की जगह चंद्रमा को राग-द्वेषाविह हि भवति ज्ञानमज्ञान-भावात्, तौ वस्तुत्व-प्रणिहित-दृशा दृश्यमानौ न किि®¨fत्। सम्यग्दृष्टिः क्षपयतु ततस्तत्त्व-दृष्टया स्फुटन्तौ, ज्ञान-ज्योतिर्ज्वलति सहजं येन पूर्णाचलार्चिः।। 25।। सर्व विशुद्धि-द्वार लिया; क्योंकि चंद्रमा को शीतलता का प्रतीक माना गया है, और आत्मानुभूति होने के बाद न केवल मिथ्यात्वरूपी-अंधकार का विनाश होता है; बल्कि संसार की तपन से संतप्त-जीव को आत्मिकसुखरूपी-शीतलता का वेदन भी होता है। जब आत्मिक-अनुभूतिरूपी शीतलता और परिणामों में साम्यभाव होता है, तब राग-द्वेष का तो अस्तित्व ही नहीं रहता; क्योंकि राग-द्वेष की उत्पत्ति की मूल-जड़ तो मिथ्यात्व है। जैसे जड़ के नष्ट होने पर वृक्ष जीवित नहीं रहता है, ठीक उसीप्रकार मिथ्यात्वरूपी जड़ के विनाश होने पर राग-द्वेषरूपी वृक्ष भी शीघ्र ही विनाश को प्राप्त होते हैं। उसके पश्चात् निरन्तर आत्मानुभूति के अभ्यासरूप-सुख में लीन होकर जीव पूर्ण-ज्ञानस्वरूप तारण-तरण परमात्म-पद को प्राप्त करते हैं। तारण यानि जो संसाररूपी समुद्र से भव्यों को तारनेवाले, और तरण यानि जो संसार-समुद्र से स्वयं तिरनेवाले हैं। ऐसे आत्मस्वरूप को बतानेवाले जिनेन्द्रपरमात्मा को बनारसीदास सादर चरण-वंदन करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ सिष्य कहै ''स्वामी! राग-दोष परिणाम, ताको मूल-प्रेरक कहहु तुम कौन है?

पुग्गल-करम-जोग किधौं इंद्रिनिकौ भोग, किधौं धन किधौं परिजन किधौं भौन है’'।।
गुरु कहैं ''छहो-दर्व अपने-अपने रूप, सबनिकौ सदा असहाई-परिनौन है।
कोऊ दरब काहूकौ न प्रेरक कदापि तातैं, राग-दोष मोह-मृषा-मदिरा-अचौन है’'।। 61।।

शब्दार्थ :- कोऊ सिष्य कहै ''स्वामी= कोई शिष्य कहता है कि ‘‘हे गुरुजी!, राग-दोष-परिणाम ताको= राग-द्वेष-परिणामों का, मूल-प्रेरक कहहु तुम कौन है= मूल-प्रेरक-तत्त्व कौन है? आप बताओ, पुग्गल-करमजोग= वह पौद्गलिक-कर्मों का संयोग है, किधौं इंद्रिनिकौ भोग= अथवा इंद्रियों के भोग है, किधौं धन किधौं परिजन किधौं भौन है= अथवा धन है अथवा परिवार के लोग हैं अथवा भवन है?’’ गुरु कहैं ‘’ छहों-दर्व= गुरुजी कहते हैं छहों-द्रव्य, अपने-अपने रूप= अपने-अपने स्वरूप में (मर्यादित रहते हैं और), सबनिकौ सदा असहाई-परिनौन है= सभी का हमेशा स्वतंत्र-परिणमन है, कोऊ दरब काहूकौ न प्रेरक कदापि= कोई भी द्रव्य कभी भी किसी भी द्रव्य का प्रेरक नहीं है, तातैं राग-दोष-मोह-मृषा-मदिरा-अचौन है= इसलिए राग-द्वेष (का मूल-कारण) मिथ्या मोहरूपी-मदिरा का आचमन करना/पीना है। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने सिद्ध किया था कि यह जीव कर्म का संयोग होने से अनादिकाल से मिथ्यादृष्टि है, और राग-द्वेष के कारण जीव स्व-पर में भेदज्ञान नहीं कर पाता है; इसलिए हमेशा दु:खी रहता है। गुरुजी की इस बात को सुनकर शिष्य के मन में जिज्ञासा होती है कि इस राग-द्वेष की उत्पत्ति का मूल-कारण क्या है? और वह गुरुजी से पूछता है, ‘‘हे स्वामी! इस राग-द्वेष की उत्पत्ति का मूल-कारण क्या है? क्या अनादि से चले आ रहे पौद्गलिक-कर्म-परमाणुओं का संयोग है? या पाँचों इन्द्रियों के विषय-भोग है? धन-वैभव, मान-सम्मान, या परिवार और कुटुम्बीजन हैं? या आलीशान-महल, मकान, जमीनजायदाद आदि हैं? आखिर क्या वास्तविक-कारण है राग-द्वेष की उत्पत्ति का? आप ही बताइये।’’ तब गुरु जी कहते हैं कि ''भाई! छहों-द्रव्य भिन्न-भिन्न अपनी-अपनी सीमा में अर्थात् अपने-अपने

राग-द्वेषोत्पादकं तत्त्व-दृष्टया नान्यद्-द्रव्यं वीक्ष्यते कि®¨fनापि।
सर्व-द्रव्योत्पत्तिरन्तश्चकास्ति व्यक्तात्यन्तं स्व-स्वभावेन यस्मात्।। 26।।

स्व-चतुष्टय में स्वयं के ही आधार से सहज, स्वतंत्र-परिणमन करते हैं, न कोई किसी का सहयोगी है, और न बाधक। तुम स्वयं जीवद्रव्य हो, और ये कर्मादि, इन्द्रियों की भोग-सामग्री, धन-वैभव, परिवारीजन, और भवनादि- ये तो सब तुमसे पूर्णत: भिन्न पुद्ग् ल-द्रव्य हैं। जब कोई द्रव्य किसी द्रव्य का कुछ नहीं करता, तब ये समस्त पौद्गलिक-सामग्री तुझ जीव द्रव्य को राग-द्वेष कैसे उत्पन्न करा सकती है’'? हे आत्मन्! राग-द्वेष की उत्पत्ति का मूल-कारण मोह/ मिथ्यात्वरूपी-मदिरा का पान करना है। अर्थात् पर-पदार्थों में एकत्व-ममत्वबुद्धिरूप मिथ्यात्व ही राग-द्वेष की उत्पत्ति का मूल-कारण है। कहने का अभिप्राय यही है कि राग-द्वेष की उत्पत्ति का कारण- ये पौद्गलिक-कर्म नहीं, बल्कि ये कर्म मेरा भला-बुरा करते हैं- ऐसी भ्रमजनित विपरीत-मान्यता है। पंचेन्द्रिय के विषय-भोग की सामग्री नहीं, उनमें सुख मानकर भोगने की अभिलाषारूप विपरीत-मान्यता है, धन-वैभवरूप जड़-सामग्री नहीं, बल्कि इनमें सुख-बुद्धिरूप विपरीत-मान्यता है। परिवारी-जन नहीं, बल्कि परिवारी-जनों के प्रति ममत्वरूप मोहबुद्धि है। घर-मकान-जमीन-जायदाद नहीं, बल्कि इनमें अपनत्व-बुद्धिरूप विपरीत-मान्यता है, अर्थात् इनमें होनेवाली इष्ट-अनिष्ट-बुद्धि राग-द्वेष की उत्पत्ति का मूल-कारण है।

(दोहा)

कोऊ मूरख यौं कहै, राग-दोष-परिनाम।
पुग्गल की जोरावरी, वरतैं आतमराम।। 62।।

ज्यों-ज्यों पुग्गल बल करै, धरि धर कर्मज-भेष।
राग-दोषकौ परिनमन, त्यों-त्यों होइ विशेष।। 63।।

शब्दार्थ :- कोऊ मूरख यौं कहै= कोई मूर्ख-जीव ऐसा कहे कि, राग-दोष परिनाम= राग-द्वेष के परिणाम, पुग्गल की जोरावरी= पुद््गल की जबरदस्ती से, वरतैं आतमराम= आत्मा में होते हैं।। 62।। ज्यों-ज्यों पुग्गल बल करै= जैसे जैसे पुद््गल जोर करता है, धरि धर कर्मज-भेष= कर्म के उदय के अनुरूप भेष रखकर, राग-दोषकौ परिनमन= राग-द्वेष का परिणमन, त्यों-त्यों होइ विशेष= वैसे-वैसे अौर अधिक होता है।। 63।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने अज्ञानी-जीव की मान्यता को बहुत ही सरलता से चित्रित किया है। अज्ञानी-जीव की सबसे प्रमुख-विशेषता है कि वह अपनी गल्ती कभी स्वीकार नहीं करता, बल्कि अपनी गल्ती का दोष हमेशा दूसरों को देता है। यहाँ कवि ने अज्ञानी-जीव की इसी आदत का वर्णन किया गया है। अज्ञानी-जीव कहता है कि राग-द्वेष के परिणाम पुद््गल की जबरदस्ती से होते हैं, अर्थात् जैसा कर्म का उदय आता है, मेरे परिणाम वैसे ही हो जाते हैं। कर्मोदय की अनुकूलता में रागरूप, और कर्मोदय की प्रतिकूलता में द्वेषरूप। उसीप्रकार कर्मोदय की तीव्रता में तीव्र-कषायरूप, और कर्मोदय की मंदता में मंद-कषायरूप। अर्थात् अज्ञानी-जीव ये मानता है कि मैं कुछ भी नहीं करता, जो कुछ भी होता है, वह इन कर्मों की वजह से ही होता है। जब दु:ख का कारण कर्मों को मानता है, तो दु:ख दूर करने का पुरुषार्थ भी प्रतिकूल-कर्मों को

यदिह भवति राग-द्वेष-दोष-प्रसूतिः, कतरदपि परेषां दूषणं नास्ति तत्र।
स्वयमयमपराधी तत्र सर्पत्यबोधो, भवतु विदितमस्तं यात्वबोधोऽस्मि बोधः।। 27।।

सर्व विशुद्धि-द्वार हटाने और अनुकूल-कर्मों को जुटाने में करता है। लेकिन भिन्न-द्रव्य होने से उसमें इसका पुरुषार्थ नहीं चलता, और पर में हस्तक्षेप करने की अपनी इस कर्तृत्व-बुद्धि के कारण ही अज्ञानी-जीव निरन्तर-दु:खी होता रहता है।

(दोहा)

इहविधि जो विपरीत-पख, गहै-सद्दहै कोइ।
सो नर राग-विरोधसौं, कबहूँ भिन्न न होइ।। 64।।

सुगुरु कहै जग में रहै, पुग्गल-संग सदीव।
सहज-सुद्ध-परिनामनिकौ, औसर लहै न जीव।। 65।।

तातैं चिदभावनि-विषैं, समरथ चेतन-राउ।
राग-विरोध मिथ्यातमैं, समकितमैं शिव-भाउ।। 66।।

शब्दार्थ :- इहविधि= इसप्रकार, जो विपरीत-पख गहै सद्दहै नर= जो जीव मिथ्या-पक्ष को ग्रहण करता है, और उसका श्रद्धान करता है, सो नर= वह मनुष्य, राग-विरोधसौं= राग-द्वेष से, कबहूँ भिन्न न होइ= कभी भिन्न/ रहित नहीं होगा।। 64।। सुगुरु कहै= सच्चे गुरु कहते हैं, जग में रहै पुग्गल-संग सदीव= (यदि) संसार में पुद््गल हमेशा साथ रहता है (तो), सहज-सुद्ध-परिनामनिकौ= सहज-शुद्ध-परिणामों की प्राप्ति का, औसर लहै न जीव= अवसर जीव को कभी प्राप्त नहीं होगा।। 65।। तातैं चिदभावनि-विषैं= इसलिये चैतन्य-भावों की उत्पत्ति में, समरथ चेतन-राउ= चेतन-राजा ही समर्थ है, राग-विरोध मिथ्यातमैं= राग-द्वेष मिथ्यात्व की दशा में (होते हैं और), समकितमैं शिव-भाउ= सम्यक्त्व की दशा में मोक्षरूप परिणाम (होते हैं)।। 66।। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में अज्ञानी-जीव ने कहा था कि राग-द्वेष के परिणाम पुद््गल-कर्मों के बल या जोर से होते हैं, अर्थात् जैसा कर्म का उदय होता है, वैसे ही मेरे परिणाम हो जाते हैं, अज्ञानी-जीव की इसी मान्यता को खंडित करने के लिये गुरुजी जो सम्यक्-उपदेश देते हैं, उसी का वर्णन कवि ने उपर्युक्त तीन-छंदों में किया है। श्रीगुरु कहते हैं कि जो जीव ऐसा मानते हैं कि- ‘‘कर्म मुझे दुःख देते हैं, कर्म मेरा भला करते हैं, मैं अच्छे-कर्म करूँगा, तो सुखी हो जाऊँगा इत्यादि’’- इस विपरीत-पक्ष को ग्रहणकर ऐसा श्रद्धान करते हैं, वे जीव वर्तमान में तो क्या, भविष्य में भी कभी राग-द्वेष या कर्म के बंधन के दु:ख से मुक्त नहीं हो सकते हैं। यदि कुछ समय के लिये मान भी लें कि पुद्ग् ल-कर्म का संयोग जीव के साथ हमेशा रहे, तो क्या परेशानी है? लेकिन भाई! यदि ऐसा हुआ तो फिर तो जीव कभी सुखी हो ही नहीं सकता; क्योंकि कर्म का संयोग, फिर इष्ट-अनिष्टबुद्धि, फिर राग-द्वेष, फिर कर्म-बंधन और फिर कर्मोदय अर्थात् यदि यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा, तो जीव सुखी कब होगा? कब उसे अपने स्वरूप की महिमा आयेगी? कब वह अपने अनंत-गुणों से परिचित होगा? कभी नहीं। सुख का खजाना तो जीव स्वयं है, इसलिये यदि जीव सच्चे सुख की अनुभति ू करना चाहता है, तो जीव को जड़-कर्मों से भेदज्ञान वर्तना ही चाहिए। यदि जीव सच में संसार के दुःखों से छूटना चाहता है, तो इसमें उसकी स्वयं की सामर्थ्य ही

रागजन्मनि निमित्ततां पर-द्रव्यमेव कलयन्ति ये तु ते।
उत्तरन्ति न हि मोहवाहिनीं, शुद्धबोध-विधुरान्ध-बुद्धयः।। 28।।

कार्यकारी है। क्योंकि अपने चैतन्य-भावों का कर्त्ता जीव स्वयं है, और स्वयं ही पुरुषार्थ करके अपने अनंत-गुणों को प्रगट कर सकता है। जबतक जीव अपने स्वरूप के ज्ञान से च्युत है और मोह-मिथ्यात्व में भ्रमित रहता है, तबतक जीव के अपने ही दर्शन-ज्ञान-चारित्रादि गुणों की परिणतियाँ ‘मिथ्या’ नाम पातीं हैं, और जिस क्षण जीव मोह-मिथ्यात्व को नष्टकर स्वरूप के सन्मुख होता है, तब जीव के वही दर्शन-ज्ञान-चारित्रादि गुण की परिणतियाँ ‘सम्यक्’ नाम पाती हैं, और मोक्षमार्ग प्रकट होता है।

(दोहा)

ज्यों दीपक रजनी-समै, चहुँ-दिसि करै उद्योत।
प्रगट घट-पट-रूप में, घट-पट-रूप न होत।। 67।।

त्यों सुज्ञान जानै सकल, ज्ञेय-वस्तु को मर्म।
ज्ञेयाकृति-परिनवै पै, तजै न आतम-धर्म।। 68।।

शब्दार्थ :- ज्यों दीपक रजनी-समै चहुँ-दिसि करै उद्योत= जैसे दीपक रात्रि के समय चारों तरफ उजाला करता है, प्रगट घट-पट-रूप में घट-पट-रूप न होत= घड़ा, वस्त्र आदि को प्रकाशित करता है, परन्तु घटपटादिरूप नहीं होता, त्यों सुज्ञान जानै सकल ज्ञेय-वस्तु को मर्म= उसीप्रकार ज्ञान समस्त वस्तुओं के स्वरूप को जानता है, ज्ञेयाकृति परिनवै पै तजै न आतम-धर्म= ज्ञेयाकाररूप परिणमन भी करता है, लेकिन फिर भी अपने आत्मिक-स्वभाव को नहीं छोड़ता है। विशेषार्थ :- कवि ने इन दोनों छंदों में एक सटीक-उदाहरण के माध्यम से ज्ञान की महिमा को वर्णित किया है। जिसप्रकार रात्रि के घने-अंधकार में एक दीपक का प्रकाश भी घट-पट अर्थात् अपने चारों ओर के पदार्थों को प्रकाशित तो करता है; परन्तु वह स्वयं कभी घट-पट रूप परिणमित नहीं होता है, उसीप्रकार ज्ञान भी मिथ्यात्व के घोर-अंधकार में भी अपने स्वभाव अनुसार अपने चारों ओर के पदार्थों को, उनके मर्म को सहज प्रकाशित करता, ज्ञेयाकाररूप परिणमन भी करता है, पर कभी उन पदार्थोंरूप नहीं होता। क्योंकि वास्तव में देखा जाये, तो दीपक तो अपने स्वभाव के अनुसार स्वयं प्रकाशित होता है, और उसके प्रकाश में जगत् के पदार्थ भी स्वयं सहज-प्रकाशित होते हैं, इसलिए दीपक का उन पदार्थोंरूप होने का सवाल ही नहीं, ठीक उसीप्रकार ज्ञान का स्वभाव भी जानना है, और उसके जानन-स्वभावरूप प्रवर्तन करने में जगत् के पदार्थ भी स्वयं सहज-प्रकाशित होते हैं, तो ज्ञान का उन पदार्थोंरूप होने का सवाल ही नहीं है। कहने का अभिप्राय यही है कि जाननरूप-प्रवर्तन करते समय न तो ज्ञान कभी अपने स्वभाव को छोड़ता है, और न कभी वह उन पदार्थों-रूप होता है।

(दोहा)

ग्यानधर्म अविचल सदा, गहै विकार न कोइ।
राग-विरोध-विमोहमय, कबहूँ भूलि न होइ।। 69।।

ऐसी महिमा ज्ञान की, निहचै है घट-माँहि।
मूरख मिथ्याद्रिष्टिसौं, सहज विलोकै नांहि।। 70।।

पूर्णैकाच्युत-शुद्ध-बोध-महिमा बोधा न बोध्यादयं, यायात्कामपि विक्रियां तत इतो दीपः प्रकाश्यादिव। तद्वस्तु-स्थिति-बोध-वन्ध्यधिषणा एते किमज्ञानिनो, राग-द्वेषमयी भवन्ति सहजां मु®¨fन्त्युदासीनताम्।। 29।। सर्व विशुद्धि-द्वार शब्दार्थ :- ग्यानधर्म अविचल सदा गहै विकार न कोइ= ज्ञान स्वभाव से सदा अचल/शुद्ध होता है, कभी किसी विकार को ग्रहण नहीं करता है, राग-विरोध-विमोहमय कबहूँ भूलि न होइ= राग-द्वेष-मोहादि से युक्त होने पर भी कभी भूल से भी (विकार-युक्त) नहीं होता है, ऐसी महिमा ज्ञान की निहचै है घटमाँहि= निश्चय से अंतरंग में ज्ञान की ऐसी महिमा है, मूरख मिथ्याद्रिष्टिसौं सहज विलोकै नांहि= मूर्ख-जीव विपरीत-श्रद्धान होने के कारण सहज ही यह देख ही नहीं पाता है। विशेषार्थ :- ज्ञान का जानन-स्वभाव अचल है अर्थात् हमेशा एकसमान रहता है; किसी भी पर्याय में, किसी भी परिस्थिति में एकसमय के लिये भी नहीं छूटता, और न ही कभी विकार-युक्त होता है। यहाँ तक कि भूल से भी कभी मोह-राग-द्वेषरूप परिणमित नहीं होता है, अर्थात् विकार ज्ञान-स्वभाव में कभी प्रवेश ही नहीं करते हैं। मेरे आत्मिकज्ञान की ऐसी अचिंत्य-महिमा है, ऐसा परिपूर्ण-शुद्ध अनंतज्ञान का धारी भगवान् आत्मा अंतरंग में विराजमान है; लेकिन मूर्ख-जीव/मिथ्या-दृष्टि जीव मोह और अज्ञानवश उसे देखता ही नहीं, अर्थात् अनुभव में आते हुये भी उसे स्वीकार नहीं करता।

(दोहा)

पर-सुभावमैं मगन ह्वै, ठानै राग-विरोध।
धरै परिग्रह-धारना, करै न आतम-शोध।। 71।।

शब्दार्थ :- पर-सुभावमैं मगन ह्वै= पर-स्वभाव में लीन होकर, ठानै राग-विरोध= राग-द्वेष करते हैं, धरै परिग्रह-धारना= परिग्रह की इच्छा रखते हैं, करै न आतम-शोध= आत्मा की खोज नहीं करते। विशेषार्थ :- अज्ञानी-जीव क्या सोचता है? क्या करता है?- इस-छंद में कवि ने इसी का वर्णन किया है। अज्ञानी-जीव ने अनादिकाल से कर्मों का संयोग होने से निज-स्वरूप को तो कभी देखा ही नहीं, पर-पदार्थों में ही रचा-पचा रहा। आज भी वह पर-पदार्थों और संयोगों को जुटाने-हटाने में व्यस्त ही नहीं, त्रस्त भी है और अभ्यस्त भी है; अर्थात् इन सबके जुटाने में दु:खी होने पर भी वह उस दुःख को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं है; बल्कि उसी में सुख मानकर संतुष्ट है। उनमें राग-द्वेष, बैर-विरोध कर नित नवीन-कर्म बाँधता रहता है। दिन-रात परिग्रह की वांक्षा अर्थात् भोगों की लालसा रखता है। कैसी विडम्बना है कि जिनके पास परिग्रह नहीं है, वे जुटाने में व्यस्त हैं, और जिनके पास है, वे उड़ाने में व्यस्त हैं। इतने व्यस्त हैं कि एक क्षण के लिये भी ये विचार नहीं आता कि ‘मैं कौन हूँ? मेरा क्या स्वरूप है? कहाँ से आया हूँ? कहाँ जाना है?’ यहाँ तक कि आचार्यों के समझाने पर भी मानने को तैयार नहीं है। यह अज्ञान की पराकाष्ठा ही तो है।

(चौपाई)

मूरख के घर दुरमति भासी, पंडित हियें सुमति परगासी।
दुरमति-कुबिजा करम कमावे, सुमति-राधिका राम रमावै।। 72।।

(दोहा)

कुबिजा कारी-कूबरी, करै जगत् में खेद।
अलख-अराधै राधिका, जानै निज-पर भेद।। 73।।

शब्दार्थ :- मूरख के घर दुरमति भासी= मूर्ख के घर में दुर्बुद्धि उत्पन्न होती है, पंडित हियें सुमति परगासी= पंडित के हृदय में सुबुद्धि प्रकाशित होती है। दुरमति-कुबिजा करम कमावे= दुर्बुद्धि कुब्जा के समान मात्र कर्म कमाती है, सुमति-राधिका राम रमावै= सुबुद्धिरूपी-राधा आतमराम में रमण कराती हैं।। 72।। कुबिजा कारी-कूबरी= कुबुद्धि काली और कूबड़ी के समान है, करै जगत् में खेद= संसार में खेद उत्पन्न कराती है, अलख-अराधै राधिका= जबकि सुबुद्धी राधिका के समान, जानै निज-पर भेद= स्व और पर के भेद को जानती है।। 73।। विशेषार्थ :- कुबुद्धि/कुमति और सुबुद्धि/सुमति का स्वामी कौन है? और उनका क्या स्वरूप है? इसका वर्णन कवि ने इन-छंदों में किया है। कविवर कहते हैं कि कुबद्धि ु /कुमति का स्वामी मूर्ख अर्थात् मिथ्यादृष्टि-जीव है, और सुबद्धि ु /सुमति का स्वामी पंडित अर्थात् सम्यग्दृष्टि-जीव है। दुर्बुद्धि कुब्जा के समान है, जो निरन्तर नवीन-कर्म का बंध कराती है, अर्थात् जैसे कुब्जा यानि चरित्रहीन दासी/नारी जो निरन्तर पर-पुरुष के साथ प्यार का नाटककर जीवों को अपने वश में करती है और पापरूप प्रवर्तन करती है। उसीप्रकार 'कुबद्धि ु ’ अर्थात् जो बुद्धि पर में रमें, वह कुब्जा के समान है, जो भोले-जीवों को विपरीत-प्रवर्तन कराके संसार में भटकाती है। जबकि सुमति/सम्यग्ज्ञान राधा शीलवंती-नारी के समान आत्मा में रमण कराती है। जैसे शीलवंतीनारी पर-पुरुष से सदा विरक्त मात्र स्व-पुरुष अर्थात् स्वविवाहित-पुरुष से ही प्यार करती है; उसीप्रकार जो बुद्धि पर से भिन्न अपने स्वरूप के सन्मुख होती है, वह शीलवंती-नारी के समान है और अपने आत्मस्वरूप में रमती है। कुमति/कुबुद्धिरूपी कुब्जा काली-कूबडी अर्थात् बदसूरत कही गयी है। जैसे कुब्जा को काला बदसूरत माना गया है, उसीप्रकार कुबुद्धि मिथ्यात्व के घोर-अंधकार में पली होने से काली और बदसूरत अर्थात् शिष्टजनों से तिरस्करणीय होती है। इसीलिए जगत् में खेद उपजाती है अर्थात् स्वयं भी दुःखी रहती है और जगत् के जीवों को भी संतप्त करती है। जबकि सुमतिरूपी राधा अपने स्वरूप की आराधना करती है, स्व-पर में भेदज्ञान करती है, जिससे स्वयं भी सुख का अनुभव करती है, और जगत् के जीवों को भी सुख-प्राप्ति में निमित्त बनती है।

(सवैया इकतीसा)

कुटिल-कुरूप-अंग लगी है पराये-संग, अपुनो प्रवांन करि आपुही बिकाई है।
गहै गति-अंधकीसी सकति कबंध-कीसी, बंध कौ बढ़ाऊ करै धंध हीमैं धाई है।।
रांड की-सी रीत लिये मांड की-सी मतवारी, सांड ज्यों सुछंद डोलै भांड की-सी जाई है।
घर कौ न जानै भेद करै पराधीन खेद, यातैं दुरबुद्धि-दासी-कुबजा कहाई है।। 74।।

शब्दार्थ :- कुटिल कुरूप-अंग लगी है पराये-संग= कपटी, बदसूरत, पर-पुरुष के साथ रहती है, अपुनो प्रवांन करि आपुही बिकाई है= अपना मोल स्वयं लगाकर स्वयं ही बिकती हैं, गहै गति अंध-कीसी= अंधों के समान स्थिति ग्रहण करती है, सकति कबंध-कीसी= शक्ति कबंध के समान है, बंध कौ बढ़ाऊ= बंध को बढ़ानेवाली है, करै धंध ही मैं धाई है= सांसारिक-कार्य/उपद्रव करने के लिये ही दौड़ती/सक्रिय रहती है, रांडकीसी रीत लिये= विधवा/चरित्रहीन-नारी की तरह चालचलन करती है, मांड-कीसी मतवारी= शराबी की तरह मतवाली, सांड-ज्यों सुछंद डोलै= साँड की तरह स्वच्छंद डोलती है, भांड-कीसी जाई है= भांड की संतान की तरह उत्पन्न हुई है, घर कौ न जानै भेद= घर का मर्म नहीं जानती, करै पराधीन खेद= पराधीन रहकर दुःखी रहती है, यातैं दुरबुद्धि= इसीलिए दुर्बुद्धि को, दासी-कुबजा कहाई है= कुब्जा-दासी कहा गया है। सर्व विशुद्धि-द्वार विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने दुर्बुद्धि या कुबुद्धि को ‘कुब्जा’ नाम दिया था, इस-छंद में कवि ने सिद्ध किया है कि दुर्बुद्धि को कुब्जा-दासी क्यों कहा? (‘कुब्जा’ कंस की दासी थी, उसका शरीर बदसूरत और स्वभाव कपटी था। श्रीकृष्ण राधा से अलग होकर एक बार उसके चंगुल में फँस गये थे। फिर बाद में राधा के प्रयास से सन्मार्ग पर आये।) कवि ने लोक में प्रचलित इस कथानक को यहाँ उदाहरण के रूप में प्रयोग किया है, और दुर्बुद्धि को कुब्जादासी के समान सिद्ध किया। जिसप्रकार कुब्जा कुटिल अर्थात् छल-कपट स्वभाववाली थी, उसीप्रकार कुबुद्धि भी छल-कपट का ही दूसरा नाम है; क्योंकि जो बुद्धि अपने निज-स्वभाव को छोड़कर पर में रमे, उससे बड़ा छली कोई और नहीं। जैसे कुब्जा कुरूप अर्थात् रूपहीन थी, ठीक उसीप्रकार कुबुद्धि भी विकृत-परिणाम होने से रूपहीन है; क्योंकि सबसे सुंदर-रूप तो निज-आत्मा का ही है। जैसे कुब्जा पर-पुरुष से स्नेह रखती है, ठीक उसीप्रकार कुबुद्धि भी स्व-आत्मा को छोड़कर पर-पदार्थों में ही रमण करती है, इसलिए व्यभिचारिणी/वेश्या के समान है। जैसे कुब्जा या चरित्रहीन-नारी अपनी कीमत स्वयं लगाकर स्वयं ही पर-पुरुष के हाथों बिक जाती है, ठीक उसीप्रकार कुबुद्धि भी स्वयं अपनी स्वेच्छा से ही पर-पदार्थों या कहें विषय-भोगों में रमती है; क्योंकि विषय-भोग तो जड़ है, वे नहीं कहते कि ‘‘हमें भोगो’’; हम स्वयं ही उनकी ओर आकर्षित होते हैं, और फिर उनमें रमते ही चले जाते हैं। कुब्जा और कुबुद्धि दोनों की दशा अंधे-व्यक्ति के समान है, जैसे अंधे-व्यक्ति को कुरूप-सुरूप, भला-बुरा कुछ दिखाई नहीं देता; ठीक उसीप्रकार कुब्जा और कुबुद्धि को भी अपना हित-अहित, भलाबुरा कुछ दिखाई नहीं देता है। अर्थात् ये विषय-भोग बाद में तो क्या, भोग के काल में भी दुःखदायी है, नीच-गति में ले जानेवाले हैं- सब जानकर भी हम उन्हीं में रमे रहते हैं। कुब्जा और कुबुद्धि - दोनों की ही शक्ति ‘कबंध’ के समान है। कबंध भी एक पौराणिक कथानक का राक्षस-पात्र था, जो बहुत बलशाली था; उसको बल के प्रतीक-रूप में कवि ने यहाँ प्रयोग किया है। जैसे कुब्जा पर-पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करने में अत्यधिक-प्रबल है, अर्थात‍् एकबार उसके जाल में फँसने के बाद वह पुरुष बाहर नहीं निकल पाता। ठीक उसीप्रकार कुबुद्धि पर-पदार्थों में अहंबुद्धि करने में अत्यधिक-बलशाली है, क्योंकि पर में आसक्त पुरुष भवों-भवों तक उसके चंगुल से बाहर नहीं निकल पाता। कुब्जा पापरूप-आचरण करने और कुबुद्धि मिथ्यामार्ग का अनुसरण करने से, दोनों ही संसार अर्थात् कर्म-बंधन को बढ़ानेवाली है। दोनों की ही प्रवृत्ति उपद्रवों अर्थात् तीव्र-कषाय की ओर ही दौड़ती है, क्योंकि मंदकषायी-जीव तो आसानी से इनकी ओर आकृष्ट नहीं होता। कुब्जा और कुबुद्धि दोनों के लिए कवि ने यहाँ लोकभाषा में प्रचलित ‘रांड’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘रांड’ यानि वह स्त्री जो पति से विरक्त और पर-पुरुष से अति-आसक्त रहती है। कुब्जा भी अपने पति की ओर कभी नहीं देखती, ठीक उसीप्रकार कुबुद्धि भी निजात्मारूपी-पति की और कभी नहीं देखती, पर सन्मुख ही रहती है, इसलिये दोनों के लिये प्रयुक्त ‘रांड’ शब्द सार्थक है। दोनों ही ‘मांड’ यानि शराब की तरह मतवाली हैं; जैसे शराब के नशे में व्यक्ति पागलवत् हो जाता है, ठीक उसीप्रकार पर-पुरुष और दौलत के नशे में कुब्जा, तथा मोहवश भोगों में अति-अासक्ति के नशे में कुबुद्धि भी शराबी की तरह भ्रमित रहती है। जैसे लोक में गाय, भैंस, कुत्ता, बिल्ली सभी जानवरों को वश में या कहें बाँधकर रखा जाता है, परन्तु साँड स्वच्छंदी होता है; उसे कोई बाँधकर नहीं रखता वो खुला घूमता है। वैसे ही कुब्जा के तो घर-परिवार आदि का ठिकाना ही नहीं होता, तो अंकुश लगने का तो सवाल ही नहीं, और कुबुद्धि के रहते अज्ञानी-जीव भी भक्ष्य-अभक्ष्य, व्रत-नियम-संयम, पूजा-पाठ आदि किसी भी प्रकार के बंधन में नहीं रहता, स्वच्छंदी की तरह ही प्रवर्तन करता है; इसलिए कवि ने दोनों को साँड की तरह ‘स्वच्छंदी’ कहा है। दोनों ही भांड (विभिन्नप्रकार के स्वाँग रखकर लोगों को लुभानेवाले) की संतान के समान निर्लज्ज यानि लज्जा-विहीन हैं। दोनों ही घर के भेद अर्थात् स्थिति से अनभिज्ञ रहती है, कुब्जा के तो घर का ही ठिकाना नहीं रहता, तो भेद कैसे जानेगी, उसीप्रकार कुबुद्धि भी आत्मा के मर्म/स्वरूप को नहीं जानती, क्योंकि जब तक कुबुद्धि का जोर रहता है, तब तक जीव स्वरूप की ओर उन्मुख भी नहीं होता। दोनों ही पराधीन और दुःखी हैं, कुब्जा पर-पुरुष के कब्जे में रहती है, और कुबुद्धि आठ-कर्मों के आधीन रहती है, सो दोनों ही निरन्तर दुःखी रहती है। कुब्जा और कुबुद्धि में उपर्युक्त वर्णित इतनी समानता होने से ही कुबुद्धि को कवि ने कुब्जा-दासी का नाम दिया है।

(सवैया इकतीसा)

रूपकी रसीली भ्रम-कुलफ की कीली सील, सुधा के समुद्र झीली, सीली सुखदाई है।
प्राची ग्यान-भान की, अजाची है निदान की, सुराची-निरवाची, ठौर साची ठकुराई है।।
धाम की खबरदारि, राम की रमनहारि, राधा रस-पंथनि के, ग्रंथनि में गाई है।
संतन की मानी निरबानी नूर की निशानी, यातैं सद््बुद्धि रानी-राधिका कहाई है।। 75।।

शब्दार्थ :- रूपकी रसीली= सरस-रूपवती, भ्रम-कुलफ की कीली सील= भ्रमरूपी-ताले को खोलने की चाबी है, सुधा के समुद्र झीली= अमृत के समुद्र में स्नान की हुई, सीली सुखदाई है= शीतल और सुख देनेवाली है, प्राची ग्यान-भान की= ज्ञानरूपी-सूर्य को उदय करने में पूर्व-दिशा के समान है, अजाची है निदान की= आगामी-काल में भोगों की याचक अर्थात् माँगनेवाली नहीं है, सुराची निरवाची= महिमा वचन-अगोचर है, ठौर साँची-ठकुराई है= अपने स्थान का सच्चा-स्वामित्वपना है, धाम की खबरदारि= घर की खबर रखनेवाली, राम की रमनहारि= राम में रमण करानेवाली, राधा रस-पंथनि के ग्रंथि में गाई है= राधा का सुयश रस-शास्त्रों में बखाना गया है, संतन की मानी= साधुओं के द्वारा आदरणीय, निरबानी नूर की निशानी= अिनर्वचनीय-सौंदर्य की प्रतीक, यातैं सद्बुद्धि रानी= इसलिए सुबुद्धिरानी को, राधिका कहाई है= राधिका कहा गया है। विशेषार्थ :- छंद नं 72-73 में कवि ने ‘सुबुद्धि’ को ‘राधिका’ नाम दिया था। लेकिन ‘सुबुद्धि’ को ‘राधिका’ क्यों कहा?- इसका स्पष्टीकरण इस-छंद में किया गया है। (राधिका यानि श्रीकृष्ण की प्रिया, जिसने जीवनभर एकमात्र श्रीकृष्ण को ही पति के रूप में स्वीकार किया, स्वप्न में भी अन्य-पुरुष की ओर नहीं देखा। ऐसी शीलवंती-नारी को कवि ने यहाँ उदाहरण के रूप में प्रयुक्त किया है।) जैसे राधिका रूप की धनी थी, उसीप्रकार सुबुद्धि जीव का स्वाभाविक-परिणमन होने से सर्वांगसुन्दर है अथवा चैतन्य के अनुपम-रूप की धनी हैं। जैसे राधिका व्यवहार में सरस थी, उसीप्रकार छलकपट से रहित होने के कारण सुबुद्धि भी सरस है। लोक में कहावत है ‘जिसके घर कुलीन-नारी का वास होता है, उसके घर पुण्य स्वत: ही फलीभूत होता है, घर में ताले लगाने की अावश्यकता ही नहीं रहती’। राधिका भी कुलीन होने से श्रीकृष्ण के लिये सर्व-संपन्नता की चाबी थी अर्थात् हरप्रकार से शुभ थी, इसीप्रकार सुबुद्धि भी अनादि के भ्रमजनित मोह-मिथ्यात्व का ताला खोलने की चाबी है, अर्थात् सुबुद्धि के आते ही मिथ्यात्व स्वत: ही भाग जाता है। सुबुद्धि और राधिका दोनों ही शील के समुद्र में सर्व विशुद्धि-द्वार स्नान की हुई है, अर्थात् राधिका एकमात्र श्रीकृष्ण के साथ, और सुबुद्धि एकमात्र अपने ज्ञायक-स्वभाव के साथ रहने से दोनों ही शील की धनी हैं। इसीलिए दोनों ही शीतलता/शांत-स्वभावी और सुख को देनेवाली हैं। जैसे पूर्व-दिशा से सूर्य का उदय होता है, जो संपूर्ण-लोक को प्रकाशित करता है; ठीक उसीप्रकार सुबुद्धि और राधिका दोनों ही ज्ञानरूपी-सूर्य का उदय करने में पूर्व-दिशा के समान है,अर्थात् सुबुद्धि के उदय होते ही सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश फैल जाता है। जैसे राधिका सर्व-समृद्धि से संपन्न होने के कारण उसे आगामी-काल में विषय-भोगों की चाह नहीं थी, ठीक उसीप्रकार सुबुद्धि के कारण ज्ञान का प्रकाश होने से पहले ही वर्तमान में भोगों की लालसा पर विराम लग जाता है, सो आगामी-काल में स्वत: ही भोगों की वांक्षा-संबंधी याचना से रहित होती है। दोनों की महानता अनिर्वचनीय है अर्थात् उनकी श्रेष्ठता का वर्णन करना संभव नहीं है। जैसे राधिका अपने घर की स्वामी है, ठीक उसीप्रकार सुबुद्धि का भी निजात्मारूपीगृह पर सच्चा-स्वामित्व है। दोनों ही कुलीन होने से अपने-अपने घर की खबर रखती है, अर्थात् सुबुद्धि निजात्मा का ही ध्यान करती है। राधिका अपने पति श्रीकृष्ण में और सुबुद्धि अपने आतमराम में रमण करती है। इसीलिए रस-शास्त्रों या शृंगारपरक-साहित्य में राधा की कुलीनता, शील, और सरस व्यवहार की महिमा वर्णित है, उसीप्रकार अध्यात्म-ग्रंथों में सुबुद्धि का प्रताप अर्थात् आत्मिक-वैभव और अनंतगुणों की महिमा वर्णित है। जैसे राधिका संतों के द्वारा आदरणीय है, उसीप्रकार सुबुद्धि ज्ञानियों के द्वारा चिंतनीय और मननीय है। दोनों ही किसी भी प्रकार के क्षोभ से रहित गंभीर हैं, दोनों ही कांतिवती हैं,

सौंदर्य की मूरत हैं।
उपर्युक्त-वर्णित इतनी समानता होने के कारण ही कवि ने ‘सुबुद्धि’ को ‘राधिका-रानी’ कहा है।

(दोहा)

वह कुबिजा, वह राधिका, दोऊ गति-मतिवानि।
वह अधिकारिन करम की, यह विवेक की खानि।। 76।।

शब्दार्थ :- वह कुबिजा, वह राधिका= एक कुब्जा है, एक राधिका है, दोऊ गति मतिवानि= दोनों में एक घुमानेवाली, दूसरी विवेकवती है, वह अधिकारिन करम की= वह कर्मबंधन के योग्य है, यह विवेक की खानि= यह (स्व-पर के) विवेक की खान है। विशेषार्थ :- पिछले-छंदों में कवि ने ‘कुबुद्धि’ और ‘सुबुद्धि’ का स्वरूप और क्रमश: कुब्जा और राधिका से समानता का विस्तार से वर्णन किया, अब इन दोनों में क्या अंतर है? और इनका क्या फल है? = इसका वर्णन कवि ने इस-छंद में किया है। ‘कुबुद्धि’ विपरीत-अभिप्रायवाली होने से कुब्जा के समान है, और ‘सुबुद्धि’ सम्यक्-अभिप्रायवाली होने से राधिका के समान है। इसीलिए कुबुद्धि का फल चार-गति चौरासी-लाख योनियों में परिभ्रमण है, जब कि सुबुद्धि बुद्धिमती और विवेकिनी है, हित-अहित, सही-गलत का सम्यक्-निर्णय करती है; इसलिए संसार-परिभ्रमण से छुटकारा दिलाती है। कुबुद्धि पर में अहंबुद्धि के कारण कर्म-बंधन की अधिकारिणी है, जब कि सुबुद्धि स्व-पर में भेदज्ञान करने और तद्रूप आचरण करने से कर्म-बंधन से छूटकर मोक्ष की अधिकारिणी है। कुबुद्धि अविवेक की और सुबुद्धि विवेक की खान है।

(दोहा)

दरब-करम पुग्गल-दसा, भाव-करम मति-वक्र।
जो सुग्यानकौ परिनमन, सो विवेक गुरु-चक्र।। 77।।

शब्दार्थ :- दरब-करम पुग्गल-दसा= द्रव्यकर्म पुद््गल की परिणति है, भाव-करम मति-वक्र= भावकर्म आत्मा का विभाव है़, जो सुग्यानकौ परिनमन= जो सुज्ञान का परिणमन है, सो विवेक गुरु-चक्र= वह विवेक या ज्ञान का बड़ा-पुंज/समूह है। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में ‘सुबुद्धि’ को ‘विवेक की खान’ कहा था, तो प्रश्न उठता है कि ये ‘विवेक’ क्या है?- इसका वर्णन कवि ने इस-छंद में किया है। हे आत्मन्! द्रव्यकर्म अर्थात् ज्ञानावरणादि आठों-कर्म तो पुद््गल की स्थिति है, अर्थात् पुद््गल के परमाणु हैं, जो कर्मरूप परिणमित हुये हैं। और मोह-राग-द्वेष आदि परिणाम हैं, वे भावकर्म हैं; वे भी आत्मा के गुणों का स्वभावरूप-परिणमन नहीं, विभावरूप-परिणमन है। और इन दोनों से सर्वथाभिन्न, मैं ज्ञान का घनपिण्ड हूँ, ऐसी स्वयं की सिद्धि करनेवाला, और इन विकारों की भी सिद्धि करनेवाला जो सुज्ञान का जाननरूप-परिणमन है, वही ‘विवेक’ है, ज्ञान का पुंज या समूह है।

(कवित्त)

जैसे नर खिलार चौपरि कौ, लाभ विचारि करै चित-चाउ।
धरै संवारि सारि बुधि-बलसौं, पासा जो कछु परै सु दाउ।।
तैंसैं जगत्-जीव स्वारथकौ, करि उद्दिम चिंतवै उपाउ।
लिख्यौ ललाट होई सोई फल, करम-चक्रकौ यही सुभाऊ।। 78।।

शब्दार्थ :- जैसे नर खिलार चौपरि कौ= जैसे कोई चौपड़ खेलनेवाला/खिलाड़ी मनुष्य, लाभ विचारि करै= लाभ/धनार्जन का विचार करके, चितचाउ धरै संवारि सारि= बड़ी लगन से/मनोयोग से गोटी को संभालकर जमाता है, बुधिबलसौं= बुद्धि के जोर से, पासा जो कछु परै सु दाउ= लेकिन दाव तो पाँसे के आधीन है, तैंसैं जगत्-जीव= वैसे ही जगत् के जीव, स्वारथकौ करि उद्दिम चिंतवै उपाय= अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए उपाय सोचते हैं, लिख्यौ ललाट होई सोई फल= भाग्य में जो लिखा है, फल वही होगा, करम-चक्रकौ यही सुभाऊ= कर्म-चक्र का यही स्वभाव है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उस समय का बहुप्रचलित खेल ’ चौपड़ ’ के माध्यम से ‘कर्म के उदय में जीव का पुरुषार्थ नहीं चलता’ इसका सुंदर-स्पष्टीकरण किया है। चौपड़ का खेल (जिसकी वजह से महाभारत का युद्ध हुआ) खेलने-वाले खिलाड़ी धन-प्राप्ति की इच्छा से बड़े चाव से बहुत सोच-समझकर गोटियाँ जमाते हैं, साथ ही खेलनेवाले खिलाड़ियों के दाव-पेंच को भी ध्यान में रखते हैं, और जीतने के लिये हरसंभव प्रयत्न करते हैं; लेकिन इतना पुरुषार्थ करने पर भी खेल का रुख तो पासे पड़ने पर ही निर्भर करता है, अर्थात् पासा फेंकने पर जिसका जो नं. आता है, उसी के आधार पर हार-जीत का निर्णय होता है। उसीप्रकार जगत् के जीव अपना स्वार्थ अर्थात् प्रयोजन साधने के लिए दिन-रात पुरुषार्थ करते हैं। प्रत्येक जीव ये चाहता है कि हर कार्य या परिणमन मेरी सुविधा के अनुसार हो; मैं जो भी चाहूँ, वह मुझे प्राप्त हो; मुझे और मेरे परिवार को कोई कष्ट न हो, मेरा हर उद्देश्य पूरा हो, इसके लिये वह हरसंभव सर्व विशुद्धि-द्वार प्रयास करता है, तरह-तरह के उपाय सोचता है; लेकिन होता वही है, जो उसके ललाट या भाग्य में लिखा होता है। भाग्य यानि क्या? ‘भाग्य’ से तात्पर्य ‘वर्तमान में स्वयं के द्वारा किये जानेवाले परिणामों का फल आगामीकाल में प्राप्त होना’- ऐसा कर्मफल-सिद्धांत यहाँ ‘भाग्य’ शब्द से लक्षित है। अर्थात् हम जैसे भाव करते हैं, फल भी उसी अनुसार प्राप्त होता है। एकबार उदय में आने के बाद हम उसमें फेरबदल नहीं कर सकते, अर्थात् उदय में आनेवाला कर्म फल देकर ही जाता है। इसीलिए ''हे आत्मन्! वर्तमान

के परिणाम को संभालो, क्योंकि आगामी-काल में यही बीजरूप-परिणाम वृक्ष बनकर फलीभूत होंगे।
जैसा बोयेंगे, वैसा ही फल हम पायेंगे; क्योंकि कर्मचक्र का यही स्वभाव है।

(कवित्त)

जैसे नर खिलार-सतरंज कौ, समुझै सब सतरंजकी घात।
चलै चाल निरखै दोऊ-दल, मौंहरा गिनै विचार मात।।
तैसैं साधु निपुन-सिवपथ मैं, लच्छन-लखै तजै-उतपात।
साधै-गुन चिंतवै-अभयपद, यह सुविवेक-चक्रकी बात।। 79।।

शब्दार्थ :- जैसे नर खिलार-सतरंज कौ= जैसे कोई शतरंज का खिलाड़ी मनुष्य, समुझै सब सतरंजकी घात= शतरंज के सभी दाँव-पेंच को समझता हो, चलै चाल निरखै दोऊ-दल= दोनों दलों पर नजर रखता हुआ चाल चलता है मौंहरा गिनै विचार मात= हाथी, घोड़ा आदि मोहरों को गिनता हुआ, मात/हराने की सोचकर। तैंसैं साधु निपुन-सिवपथ मैं= उसीप्रकार मोक्षमार्ग में निपुण साधु, लच्छन-लखै तजै-उतपात= लक्षणों को देखकर, उपद्रव/बाधक-कारणों को छोड़कर, साधै-गुण चिंतवै-अभयपद= गुणों को ग्रहणकर, भयरहित-अात्मपद का चिंतन करता है, यह सुविवेक-चक्रकी बात= यह विवेक-चक्र यानि सुज्ञान-परिणति की बात है। विशेषार्थ :- इस-छंद में शतरंज अर्थात् एक ऐसा खेल जो आज भी बहुप्रचलित है, उसके माध्यम से कवि ने विवेक-चक्र/ज्ञान-चक्र अर्थात् ज्ञानी-जीव की परिणति का सुंदरता से चित्रण किया है। ऐसा नहीं है कि कर्म का उदय ज्ञानी-जीवों को नहीं आता, उनको भी आता है; लेकिन फिर भी वे इतने सहज और शांत कैसे रहते हैं? -यह शिक्षा भी हमें इस-छंद से मिलती है। (शतरंज का खेल दो खिलाड़ियों के बीच होता है। इस खेल में पासा नहीं होता, ये दिमाग का खेल है, सामनेवाले के मोहरे हमारे सामने होते हैं, यदि हम खेल के अच्छे अनुभवी हैं, तो सामनेवाले की चाल का अंदाजा लगाना बहुत आसान होता है। फिर हम उसी हिसाब से अपनी चाल चलते हैं, और अपने राजा को बचा लेते हैं अर्थात् जीत हमारे हाथ में होती है।) जैसे कोई शतरंज का निपुण-खिलाड़ी, शतरंज के सभी दाँव-पेंच समझकर अर्थात् किस चाल से मुझे शह देना अर्थात् घेरना है, और किस चाल से मुझे मात अर्थात् हार मिल सकती है?- ऐसा विचार करके, दोनों दलों अर्थात् अपनी व सामनेवाले की चाल को ध्यान में रखकर ही अपनी चाल चलता है। बीच-बीच में मोहरों को भी गिनता रहता है अर्थात् कौन-सा मोहरा हाथी, घोड़ा, प्यादा आदि कौन कितने घर चलेगा?- यह भी ध्यान रखता है। कहने का अभिप्राय यही है कि अपनी शह बचाना और सामनेवाले को मात कैसे देनी है?- ऐसा विचार करके ही खेल खेलता है। ठीक उसीप्रकार जो मोक्षमार्ग में निपुण हैं, अर्थात् जो सम्यग्दर्शन प्राप्तकर मोक्ष की राह पर अग्रसर है, कर्मोदय का संयोग तो उन जीवों के साथ भी विद्यमान रहता है, लेकिन जैसे शतरंज का खिलाड़ी प्रतिसमय सजग रहता है, उसीप्रकार ज्ञानी-जीव भी अपने स्वरूप की साधना करते हुये हमेशा सजग रहते हैं। जैसे शतरंज का खिलाड़ी सामनेवाले की चाल की मार से स्वयं को बचाता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञानीजीव साधना में बाधक-कारणों से स्वयं को बचाते हैं। जैसे खिलाड़ी मोहरों को गिनता है, वैसे ही ज्ञानीजीव तप के द्वारा अपने गुणों को साधते हैं। जैसे खिलाड़ी को प्रतिसमय अपने राजा का ध्यान रहता है; ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव निरन्तर अपने अभयपद अर्थात् भयरहित अात्मपद का चिंतन करते हैं। जैसे शतरंज का खिलाड़ी सामनेवाले की चाल में फेरबदल नहीं कर सकता, वह तो उसकी चाल को समझकर अपनी चाल चलता है। उसीप्रकार ज्ञानी-जीव, अज्ञानी की तरह कर्म के उदय में फेरबदल नहीं करते हैं, बल्कि उस विपरीतता में भी अपने परिणामों की संभाल कैसे करें? ऐसा पुरुषार्थ करते हैं, अर्थात् स्वरूप की साधना में मग्न हो जाते हैं। और इस बीच कर्म का उदय स्वयं ही सहजता से ज्ञानी-जीव को प्रभावित किये बिना निर्जरा को प्राप्त होता है- यही विवेक-अर्थात् ज्ञानी की सहज परिणति है।

(दोहा)

सतरंज खेले राधिका, कुब्जा खेले सारि।
याकै निस-दिन जीतकौ, बाकै निस-दिन हारि।। 80।।

जाकै उर कुबिजा बसै, सोई अलख-अजान।
जाकै हृदय राधिका, सो बुध-सम्यग्ज्ञान।। 81।।

शब्दार्थ :- सतरंज खेले राधिका= राधिका शतरंज खेलती है, कुब्जा खेले सारि= कुब्जा चौपड़ खेलती है, याकै निस-दिन जीतकौ= इसका रात-दिन जीत का, बाकै निस-दिन हारि= उसकी रात-दिन हार।। 80।। जाकै उर कुबिजा बसै= जिसके हृदय में कुब्जा रहती है, सोई अलख-अजान= वह अलक्ष्यी, अज्ञानी है, जाकै हृदय राधिका= जिसके हृदय में राधिका रहती है, सो बुध सम्यग्ज्ञान= वह ज्ञानी सम्यग्ज्ञानी हैं।। 81।। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने ‘सुबुद्धि’ या ‘विवेक’ को ‘राधिका’ और ‘कुबुद्धि’ को ‘कुब्जा’ नाम दिया था। फिर राधिका की परिणति को शतरंज के माध्यम से और कुब्जा की परिणति को चौपड़ के माध्यम से स्पष्ट किया। जगत् में किसकी जीत और किसकी हार होती है?- इसका वर्णन कवि ने इसछंद में किया है। कविवर आगे कहते हैं कि राधिका/सुबुद्धि हमेशा शतरंज का खेल खेलती है, अर्थात् भाग्य/कर्म के अनुसार नहीं स्वयं के आत्मबल से स्वभावरूप परिणमन करती है और हमेशा जीतती है। जबकि कुब्जा/कुबुद्धि चौपड़ का खेल खेलती है, अर्थात् पासा या भाग्य के अनुसार प्रवर्तन करती है, इसलिये प्रतिसमय हारती है। इसीलिये जिसके हृदय में कुब्जा अर्थात् कुबद्धि ु वास करती है, उसकी बुद्धि कर्म के अनुसार चलती है, अर्थात् जैसा उदय वैसा परिणमन, वे जीव अज्ञानी हैं; जगत् में उनकी हमेशा हार होती है, दुःखी रहते हैं, संसार में भटकते हैं। जबकि जिनके हृदय में राधिका अर्थात् सुबद्धि ु का वास रहता है अर्थात् वे जीव कर्म के अनुसार नहीं, बल्कि स्वभाव के संबल से साम्यभावरूप-परिणमन करते हैं, इसलिये वे जीव सम्यग्ज्ञानी हैं; जगत् में हमेशा उनकी जीत होती है, वे प्रतिसमय सुखी रहते हैं, और संसार से मुक्त होते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जहाँ सुद्ध-ग्यान की कला उदोत दीसै तहाँ, सुद्धता-प्रवांन सुद्ध-चारितकौ अंस है।
ता कारन ग्यानी सब जानै ज्ञेय-वस्तु-मर्म, वैराग-विलास धर्म वाकौ सरवंस है।।

सर्व विशुद्धि-द्वार

राग-दोष-मोह की दसासौं भिन्न रहै यातैं, सर्वथा त्रिकाल कर्म-जाल कौं विधुंस है।
निरुपाधि आतम-समाधि मैं विराजै तातैं, कहिए प्रगट पूरन परम-हंस है।। 82।।

शब्दार्थ :- जहाँ सुद्ध-ग्यान की कला उदोत दीसै= जहाँ शुद्ध-ज्ञान की कला का प्रकाश दिखता है, तहाँ सुद्धता- प्रवांन सुद्ध-चारितकौ अंस है= वहाँ शुद्धता के प्रमाण/अनुपात में शुद्ध-चारित्र का अंश प्रकट है, ता-कारन ग्यानी ज्य ञे वस्तु-मर्म सब जानै= इसकारण ज्ञानी-जीव ज्ञेय-वस्तुओं का सर्व-मर्म जान लेते है, वैराग-विलास धर्म वाकौ सरवंस है= वैराग्य का वैभवरूप धर्म/संयम ही उनका सर्वस्व है, राग-दोष-मोह की दसासौं भिन्न रहै= राग-द्वेषमोह की परिणति से हमेशा भिन्न रहते हैं, यातैं सर्वथा त्रिकाल कर्म-जाल कौं विधुस ं है= इसलिये पूर्णरूप से हमेशा कर्मों की निर्जरा होती है, निरुपाधि आतम-समाधि मैं विराजै= उपाधि-रहित आत्म-स्वरूप में विराजमान रहते हैं, तातैं कहिए प्रगट पूरन परम-हंस है= इसलिये प्रगट पूर्ण-परमात्मा कहते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने 'ज्ञान और वैराग्य की महिमा का सटीक और सुंदर-वर्णन किया है। शुद्ध-ज्ञान अर्थात् वह ज्ञान, जो मात्र ज्ञायक को ही लक्ष्य करता है। ऐसे शुद्ध-ज्ञान की कला का प्रकाश जहाँ होता है, जहाँ स्व और पर में निरन्तर भेदज्ञान वर्तता है; वहाँ उस शुद्धता के अनुपात में शुद्धचारित्र भी विद्यमान रहता है, अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान के साथ साथ सम्यक्चारित्र भी प्रकट होता है। जिससे ज्ञानी-जीव जगत् की समस्त-वस्तुओं के मर्म को जानते हैं क्या हेय है और क्या उपादेय है? - यह भलीभाँति जानते हैं। इसलिये जो उपादेय है उसको ग्रहण करते हैं, और जो हेय है उससे विरक्त होते हैं, उनका संपूर्ण-जीवन वैराग्यमय ही होता है। मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों को कर्म-बंधन का कारण माना गया है, और ज्ञानी-जीव इन विकारों से सर्वथा-भिन्न रहते हैं, जिससे सदाकाल कर्मों का विनाश होता रहता है, अर्थात् नवीन-कर्मों का तो बंध नहीं होता, और उपयोग ज्ञायक-भगवान्-आत्मा पर केन्द्रित होने से सत्ता में विद्यमान-कर्मों की स्वत: निर्जरा होती रहती है। मोह, राग, द्वेष आदि औपाधिक-भावों से रहित आत्म-स्वरूप में स्थिर होने से उनको साक्षात् ‘पूर्ण-परमात्मा’ कहा जाता है।

(दोहा)

ग्यायक-भाव जहाँ तहाँ, सुद्ध-चरन की चाल।
तातैं ग्यान-विराग मिलि, सिव-साधै समकाल।। 83।।

शब्दार्थ :- ग्यायक-भाव जहाँ= जहाँ ज्ञायकभाव है, तहाँ सुद्ध-चरन की चाल= वहाँ शुद्ध-चारित्र रहता है‍‍, तातैं ग्यान-विराग मिलि= इसलिए ज्ञान और वैराग्य मिलकर, सिव-साधैं समकाल= एक ही समय में मोक्ष को साधते हैं। विशेषार्थ :- कविवर कहते हैं कि जहाँ ज्ञायक-भाव अर्थात् एकमात्र स्वभावरूप-प्रवर्तन विद्यमान है, वहाँ नियम से अंशतः शुद्ध-चारित्र भी विद्यमान रहता है। और ये ज्ञान और वैराग्य दोनों मिलकर एक ही समय में अर्थात् एकसाथ मोक्षमार्ग को साधते हैं। क्योंकि न तो अकेला ज्ञान मोक्ष का कारण है और राग-द्वेष-विभाव-मुक्त-महसो नित्यं स्वभाव-स्पृशः, पूर्वागामि-समस्त-कर्म-विकला भिÂन्नास्तदात्वोदयात्। दूरारूढ-चरित्र-वैभव-बलाच्चञ््चच्चिदर्चिर्मयीं, विन्दन्ति स्व-रसाभिषिक्त-भुवनां ज्ञानस्य संचेतनाम्।। 30।।

ज्ञानस्य संचेतनयैव नित्यं, प्रकाशते ज्ञानमतीव शुद्धम्।
अज्ञान-संचेतनया तु धावन्, बोधस्य शुद्धिं निरुणद्धि बन्धः।। 31।।

न अकेला चारित्र; दोनों मिलकर ही मोक्षमार्ग को साधते हैं, इसीलिए तो कहा गया है कि सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र- तीनों की एकता ही मोक्षमार्ग है। जहाँ ज्ञान सम्यक् होता है, वहाँ व्रत-जपतपरूप सभी परिणामों से कर्मों की निर्जरा होती है, और कर्मों का संपूर्ण-क्षय होने पर मोक्ष की स्वत: प्राप्ति होती है।

(दोहा)

जथा अंध के कंध पर, चढ़ै पंगु-नर कोइ।
वाके दृग वाके चरन, होंहि पथिक मिलि-दोइ।। 84।।

जहांँग्यान-किरिया मिलै, तहाँ मोख-मग सोइ।
वह जानै पदकौ मरम, वह पदमैं थिर होइ।। 85।।

शब्दार्थ :- जथा अंध के कंध पर= जैसे अंधे व्यक्ति के कंधे पर, चढ़ै पंगु नर कोइ= कोई लंगड़ा मनुष्य चढ़ा हो, वाके दृग वाके चरन= उस लंगड़े के नेत्र, और उस अंधे के पैर, होंहि पथिक मिलि दोइ= दोनों मिलकर राहगीर/राह पर चल सकते हैं।। 84।। जहाँ ग्यान-किरिया मिलै= जहाँ ज्ञान और क्रिया मिलते हैं, तहाँ मोख-मग सोइ= वहीं मोक्षमार्ग होता है, वह जानै पदकौ मरम= वह/ज्ञान आत्मपद के मर्म को जानता है, वह पदमैं थिर होइ= वह/चारित्र आत्मपद में स्थिर होता है।। 85।। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने स्पष्ट किया था कि ज्ञान और वैराग्य दोनों मिलकर ही मोक्षमार्ग को साधते हैं। अब इस-छंद में कवि ने उसी सिद्धांत को उदाहरण के माध्यम से सिद्ध किया है। जैसे एक अंधा-व्यक्ति अकेला अपने आप रास्ता पार नहीं कर सकता, उसीप्रकार एक लंगड़ाव्यक्ति भी अकेला अपने आप रास्ता पार नहीं कर सकता। लेकिन यदि वे दोनों मिल जायें, तो एकदूसरे के साथ मिलकर आसानी से रास्ता पार कर सकते हैं। अर्थात् लंगड़ा-व्यक्ति अंधे-व्यक्ति के कंधे पर बैठ जाये, तो उसके नेत्र यानि लंगड़ा-व्यक्ति रास्ता बताता जाये और उसके चरन यानि अंधा-व्यक्ति चलता जाये, तो रास्ता भी पार हो जायेगा और आसानी से भी पार होगा। ठीक उसीप्रकार, न तो अकेले ज्ञान से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है, और न अकेले क्रिया/चारित्र से। लेकिन यदि ये दोनों मिल जायें, अर्थात् ज्ञान-चारित्र परस्पर-पूरक हो जायें, तो ज्ञान मार्गदर्शन करता जाये और वैराग्य/चारित्र मोक्षमार्ग पर आगे चलता जाये; तब मोक्षमार्ग की डगर भी पार होगी और आसानी से भी पार होगी। इसीलिए कवि ने कहा कि जहाँ ज्ञान और क्रिया/चारित्र दोनों मिलते है, वहीं से मोक्षमार्ग प्रारंभ होता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा है या कहें पंगु के समान है; क्योंकि ज्ञान आत्मा के मर्म को अर्थात् वास्तविक-स्वरूप को जानता है, और चारित्र से आत्मस्वरूप में स्थिरता होती है, अर्थात् इसप्रकार दोनों के मिलने से ही मोक्षमार्ग तय होता है। और जबतक दोनों का ऐसा सुयोग न मिले, तबतक मोक्षमार्ग की पूर्णता तीन-काल में भी संभव नहीं है।

(दोहा)

सर्व विशुद्धि-द्वार

ग्यान जीव की सजगता, करम जीव की भूल।
ग्यान मोख-अंकुर है, करम जगत् कौ मूल।। 86।।

ग्यान-चेतना के जगे, प्रगटै केवलराम।
कर्म-चेतना में बसै, कर्मबंध परिनाम।। 87।।

शब्दार्थ :- ग्यान जीव की सजगता= ज्ञान जीव की जागरुकता है, करम जीव की भूल= कर्म जीव की भूल है, ग्यान मोख अंकुर है= ज्ञान मोक्ष का अंकुर/बीज है, करम जगत् कौ मूल= कर्म जगत् का मूलकारण/जड़ है।। 86।। ग्यान-चेतना के जगे= ज्ञान-चेतना के जागृत होने पर, प्रगटै केवलराम= केवलज्ञान/शुद्धात्म-स्वरूप प्रगट होता है, कर्म-चेतना में बसै= कर्म-चेतना में गर्भित है, कर्मबंध-परिनाम= कर्मबंधन-योग्य परिणाम। ।। 87।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने ‘ज्ञान-चेतना’ और ‘कर्म-चेतना’ में अंतर काे वर्णित किया है। ‘ज्ञान-चेतना’ जीव की जागरुकता है, अर्थात् स्वाभाविक- परिणमन है, जबकि ‘कर्म-चेतना’ अर्थात् पर में इष्ट-अनिष्टबुद्धि, जो जीव की भूल है। इसीलिए ज्ञान-चेतना मोक्षरूपी-वृक्ष का अंकुर अर्थात् बीज है, जो एकबार अंकुरित होने पर फलित अवश्य होगा। जबकि कर्म-चेतना जगत् में परिभ्रमण का मूल-कारण है, अर्थात् जड़ है, जबतक ये जड़ मौजूद रहेगी, तबतक संसाररूपी वृक्ष भी फलित होता रहेगा। इसलिए ज्ञान-चेतना उपादेय है, और कर्म-चेतना हेय है। ज्ञान-चेतना के जागृत होने पर जीव को केवलज्ञान की प्राप्ति होती है, जब कि कर्म-चेतना के रहने पर जीव को पुन: कर्म-बंधन के योग्य परिणामों की उत्पत्ति होती है। चेतना का स्वरूप- स्वसंवेदन-गम्य अंतरंग- प्रकाश-स्वरूप भाव-विशेष को ‘चेतना’ कहते हैं। जो जीव का लक्षण है। चेतना के 2 भेद हैं- 1. शुद्धचेतना, 2. अशुद्धचेतना शुद्ध चेतना- केवल जाननेरूप-भाव शुद्धचेतना है, अर्थात् पदार्थों को मात्र जानना, उनमें इष्टअनिष्ट की बुद्धि न करना शुद्ध-चेतना है। जो ज्ञानी वीतरागी-जीवों को ही होती हैं। इसे ज्ञान-चेतना भी कहते हैं। अशुद्ध-चेतना- जिसमें जाननक्रिया के साथ पर-पदार्थों में इष्ट-अनिष्टपना और कर्त्ता-भोक्ता का भाव होता है, वो अशुद्ध-चेतना है। पर का संयोग होने से ये अशुद्ध है। अशुद्ध-चेतना के भी 2 भेद हैं- 1. कर्म-चेतना, 2. कर्म-फलचेतना कर्म-चेतना- पर-पदार्थों में इष्ट-अनिष्ट बुद्धिपूर्वक कर्त्ताबुद्धि से अहंकार-सहित प्रवर्तना, वह ‘कर्म-चेतना’ है। अर्थात् ज्ञान से भिन्न (भावों में) ऐसा अनुभव करना कि ‘‘इसे मैं करता हूँ’’, वह ‘कर्मचेतना’ है। ‘कर्मफल-चेतना’-जब इन्द्रियजन्य सुख-दुःख में तन्मय होकर ‘‘मैं सुखी-दुःखी’’- ऐसा अनुभव करना सो कर्मफल-चेतना है। अर्थात् ज्ञान से भिन्न (भावों में) ऐसा अनुभव करना कि ‘‘इसे मैं भोगता हूँ’’, वह कर्मफल-चेतना है। शुद्धचेतना जीव का सहज-स्वभाव होने से शुद्ध है और मुक्ति का कारण है। जबकि अशुद्ध-चेतना पर-लक्ष्यी-वृत्ति होने और आठ-कर्मों के बंध की जनक होने से संसार का कारण है।

(चौपाई)

जब लग ग्यान-चेतना न्यारी, तब लग जीव विकल-संसारी।
जब घट ग्यान-चेतना जागी, तब समकिती सहज-वैरागी।। 88।।

सिद्ध-समान रूप-निज जानै, पर संजोग-भाव परमानै।
सुद्धातम-अनुभौ अभ्यासै, त्रिविध-कर्मकी ममता नासै।। 89।।

शब्दार्थ :- जब लग ग्यान-चेतना न्यारी= जबतक ज्ञान-चेतना भिन्न रहती है, तब लग जीव विकल- संसारी= तबतक जीव व्याकुल/दुःखी और संसारी रहता है, जब घट ग्यान-चेतना जागी= जब हृदय/अंतरंग में ज्ञान-चेतना जागृत होती है, तब समकिती सहज-वैरागी तब सम्यग्दृष्टि-जीव सहज-वैरागी होता है।। 88।। सिद्ध-समान रूप-निज जाने= अपना स्वरूप सिद्धों के समान जानते हैं, पर संजोग-भाव परमानै= संयोगी-भावों को पर/भिन्न मानते हैं, सुद्धातम-अनुभौ अभ्यासै= शुद्धात्मा के अनुभव का अभ्यास करते हैं, त्रिविध-कर्मकी ममता नासै= तीनोंप्रकार के कर्मों की ममता को नष्ट करते हैं।। 89।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने ‘ज्ञान-चेतना’ के प्रभाव और फल का बहुत सुन्दर-वर्णन किया है। यद्यपि ज्ञान-चेतना प्रत्येक जीव को प्रतिसमय-अनुभूत है; क्योंकि इसी से तो जीव का अस्तित्व सिद्ध होता है अर्थात् यही तो जीव की पहचान है; परन्तु जब इसके साथ परलक्ष्यी-विकार अर्थात् इष्टअनिष्टपना और कर्त्ता-भोक्ताबुद्धि जुड़ जाती है, तब यही चेतना ‘अशुद्ध’ नाम पाती है। कहने का अभिप्राय यही है कि इससे चेतना अपने शुद्धरूप को खो देती है। और जबतक चेतना अपने शुद्धरूप से भिन्न रहती है, तबतक जीव आकुलित होता है, दुःखी रहता है; चारों-गतियों में परिभ्रमण करता रहता है। लेकिन जिस क्षण अंतरंग में चेतना का शुद्ध-रूप जागृत होता है, उसी क्षण जीव सम्यग्दृष्टि हो जाता है। जब जीव सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है, अर्थात‍् अतीन्द्रिय आत्मिक-सुख, जो अमृत के समान है, उसका वेदन करता है, तब विष-मय इन पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों और जगत् से स्वत: ही विरक्त हो जाता है; क्योंकि अमृतपान करने के बाद विष कौन पीना चाहेगा? सम्यग्दृष्टि-जीव की परिणति सहज बदल जाती है, अब वह अपने को सिद्ध के समान अनुभव करता है, उसे अपने अनंत स्वाभाविक आत्मिक-गुणों का बहुमान आता है। पहले जिन मोह, राग, द्वेष आदि विकारी-भावों को अपना सबकुछ मानता था, अब वही विकारी-भाव जो पर के लक्ष्य से होते हैं, अपने से भिन्न भासित होते हैं। ज्ञान-चेतना के जागृत होने से अब निरन्तर एकमात्र शुद्धात्मा के अनुभव का ही अभ्यास चलता है, जिससे नवीन-कर्मों का बंध तो स्वत: ही रुक जाता है और पूर्व-बद्ध-कर्म भी निर्जरा को प्राप्त होते हैं, अर्थात् द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म इन तीनों की उत्पत्ति का मूल-कारण मोह/ममता नष्ट होने से ये सब भी स्वयं ही विनाश को प्राप्त होते हैं।

(दोहा)

ग्यानवंत अपनी कथा, कहैं आपसौं आप।
मैं मिथ्यात-दसाविषैं, कीने बहुविधि-पाप।। 90।।

शब्दार्थ :- ग्यानवंत अपनी कथा= ज्ञानीजन अपनी कहानी, कहैं आपसौं आप= स्वयं अपने आप से कहते हैं, मैं मिथ्यात-दसाविषैं= मैंने मिथ्यात्व की अवस्था में, कीने बहुविधि-पाप= बहुत-प्रकार के पाप किये हैं। विशेषार्थ :- ज्ञानी-जीव कैसे स्वयं अपनी आलोचना करते हैं- इसी का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि ज्ञानी-जीव स्वयं अपनी कहानी कहते हैं कि मिथ्यात्व की अवस्था में मैंने बहुत-प्रकार के पाप किये थे। कृत-कारितानुमननैस्त्रिकाल-विषयं मनो-वचन-कायैः। परिहृत्य कर्म सर्वं परमं नैष्कर्म्यमवलम्बे यदहमकार्ष यदहमचीकरं यत्कुर्वन्तमप्यन्यं समन्वज्ञासिषं, मनसा च वाचा च कायेन च तन्मिथ्या मे दुष्कृतमिति। 32।। सर्व विशुद्धि-द्वार

(सवैया इकतीसा)

हिरदै-हमारे महा-मोह की विकलताई, तातैं हम करुना न कीनी जीव-घातकी।
आप पाप कीनैं औरनिकौं उपदेस दीनैं, हुती अनुमोदना हमारे याही बात की।।
मन-वच-काया मैं मगन ह्वै कमाये कर्म, धाये भ्रमजालमैं कहाये हम पातकी।
ग्यान के उदय भए हमारी दसा ऐसी भई, जैसें भानु भासत अवस्था होत प्रातकी।। 91।।

शब्दार्थ :- हिरदै-हमारे महा-मोह की विकलताई= हमारे हृदय में महामोह-जनित व्याकुलता थी, तातैं हम करुना न कीनी जीव-घातकी= इसलिए हमने कभी जीवों के प्रति करुणाभाव नहीं किया, बल्कि उनका घात किया, आप पाप कीनैं औरनिकौं उपदेस दीनैं स्वयं भी पाप किये, और दूसरों को भी पाप का ही उपदेश दिया, हुती अनुमोदना हमारे याही बात की= अनुमोदना भी की, तो इन्हीं पापों की, मन-वच-काया मैं मगन ह्वै कमाये कर्म= मन-वचन और काया में मगन होकर कर्मबंधन किया, धाये भ्रमजालमैं कहाये हम पातकी= मोह के भ्रमजाल में दौड़ते रहे और पापी कहलाये, ग्यान के उदय भए हमारी दसा ऐसी भई= ज्ञान का उदय होने पर हमारी स्थिति ऐसी हुई, जैसें भानु भासत अवस्था होत प्रातकी= जैसी अवस्था सूर्य के उदय होने पर प्रात:काल की होती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने न केवल ज्ञानी-जीव की मिथ्यात्व-अवस्था का वर्णन किया है, बल्कि हम मिथ्यादृष्टि-जीवों की वर्तमान-अवस्था का भी सटीक-चित्रण किया है। हम भी तो इसीतरह महामोह के भ्रमजाल में फँसे हुये हैं; तभी तो अतिदुर्लभ मनुष्य-पर्याय, देव-शास्त्र-गुरु का समागम, जिनवाणी सुनने की रुचि पाकर भी अपना कल्याण नहीं कर पा रहे हैं, और न ही उस मोह के जाल से अपने को बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं; बल्कि देखा जाए, तो हम तो उसी मोहजाल में आनंदित भी हैं। मोह के कारण पाँचों इन्द्रियों की लोलुपतावश कभी भक्ष्य-अभक्ष्य, हित-अहित, प्रयोजनभूतअप्रयोजनभूत का भी विचार नहीं किया और अनंत-जीवों की हिंसा की, यहाँ तक कि धर्म-कार्यों में भी हम हिंसा से अछूते नहीं रहे, जीव-दया या करुणा का तो ख्याल भी नहीं आया। स्वयं भी मनमानेकुकृत्य करके पाप किये, और दूसरों को भी पाप-कार्यों का ही उपदेश दिया, कभी अनुमोदना भी की, तो पापकार्यों की ही की। धर्म-क्षेत्र से बाहर अर्थात् संसार की समस्त-क्रियायें, चाहे वे अच्छी हों या बुरी, ‘पाप’ की श्रेणी में ही आती है। देखा जाये, तो धर्मक्षेत्र/मंदिरजी के घंटे दो घंटे के समय को छोड़कर हम भी तो सुबह से शाम तक केवल संसार की अर्थात् पाप-क्रियायें ही करते हैं, कृत-कारित और अनुमोदना- तीनों से मात्र पाप में ही प्रवर्तन और पाप का ही बंध करते हैं। मन-वचन और काया तीनों से प्रतिसमय शुभ-अशुभ भावों का ही व्यापार करते हैं, और निरन्तर नवीन-कर्मों का बंध भी। कैसी बिडम्बना है कि हम स्वयं ही मोह के भ्रम से भटकते हैं, स्वयं ही विषयकषाय में प्रवर्तन करते हैं, स्वयं ही दुःखी भी होते हैं, और स्वयं ही ‘पापी’ कहलाते हैं, एक क्षण को भी ये अहसास नहीं होता कि हम पापी नहीं, परम-पवित्र सुख का निधान भगवान् आत्मा हैं। मिथ्यात्व के उदय में हम सभी की भी ऐसी ही अवस्था हो रही है। लेकिन ज्ञानी-जीव कहते हैं कि आज हमारे ज्ञान-सूर्य का उदय हुआ है, जैसे रात्रि के घनेअंधकार के बाद जब प्रात: सूर्य का उदय होता है, तो चारोंतरफ प्रकाश की स्वर्णिम-आभा छा जाती है, उसके प्रकाश में सब कुछ प्रत्यक्ष और स्पष्ट भासित होता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञान-चेतना के उदय होने से मेरा स्वरूप मुझे स्पष्ट-भासित हो रहा है, अब मिथ्यात्व का काला घना-अंधकार भी हमेशा के लिए विलीन हो गया है।

(सवैया इकतीसा)

ग्यान-भान भासत प्रवान ग्यानवान कहै, करुना-निधान अमलान मेरौ रूप है।
कालसौं-अतीत कर्मजालसौं-अजीत जोग-जालसौं अभीत जाकी महिमा अनूप है।।
मोह कौ विलास यह जगत् कौ वास मैं तो, जगतसौं सुन्न पाप-पुन्न अंधकूप है।
पाप किनि कियौ, कौन करै, करिहै सु कौन, क्रियाकौ विचार सुपिने की दौर-धूप है।। 92।।

सर्वविशुद्धि द्वार (१०) | भाग ३/३

शब्दार्थ :- ग्यान-भान भासत प्रवान ग्यानवान कहै= ज्ञान-सूर्य के उदित होते ही ज्ञानी कहते हैं, करुनानिधान अमलान मेरौ रूप है= करुणामय और निर्मलता मेरा-स्वरूप है, कालसौं-अतीत कर्मजालसौं-अजीत= कालचक्र से पर,े कर्मजाल भी जिसको नहीं जीत सका, जोग-जालसौं अभीत जाकी महिमा अनूप है= योगसमूह से भी भयभीत नहीं है, जिसकी महिमा अनुपम है, मोह कौ विलास यह जगत् कौ वास= जगत् का वैभव/ जंजाल मोहजनित है, मैं तो जगतसौं सुन्न= मैं तो जगत् से शून्य हू/ँ भिन्न हू,ँ पाप-पुन्न अंधकूप है= पाप और पुण्य दोनों अंधे-कुँये हैं, पाप किनि कियौ कौन करै करिहै सु कौन= पाप किसने किया, कौन कर रहा है, कौन करेगा, क्रियाकौ विचार सुपिने की दौर धूप है= ऐसा क्रिया का विचार ज्ञानियों के लिये दौड़-धूप/निरर्थक-श्रम है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ज्ञान-सूर्य का उदय होने पर ज्ञानी-जीव आत्मस्वरूप का कैसा चिंतन करते है, इसका सटीक-वर्णन किया है। ज्ञान-सूर्य का उदय होने पर ज्ञानी-जीव विचार करते हैं ‘मेरा आत्मा तो करुणा का निधान है’, अर्थात‍् मेरी दृष्टि में सभी आत्मायें समान है, सो जीवमात्र के प्रति सहज करुणा का भाव रहता है। मोहजनित-मलिनता मेरे स्वरूप में नहीं है, न वह मेरा स्वभाव है। आत्मा कालचक्र से भी परे है, अर्थात् मृत्यु के आधीन नहीं है। अज्ञानअवस्था में होनेवाले भाव कि ‘मैंने जीवों का घात किया या मैंने जीवों की रक्षा की’- ये दोनों ही परिणाम मोहजनित हैं, मेरा स्वभाव नहीं है। जहाँ अज्ञानी-जीव विचारता है कि ‘मैं कर्मों के भार से लदा हुआ हूँ, इसीलिये दुःखी हूँ’। वहीं ज्ञानी-जीव विचार करते हैं ‘कर्म तो जड़ है और मैं चेतन हूँ, अनंत-कर्मों का समूह मिलकर भी मुझे नहीं जीत सकता, न वे मुझे दुःखी कर सकते हैं, मैं इन जड़-कर्मों से पूर्णत: भिन्न निष्कर्म-तत्त्व हूँ’। जहाँ अज्ञानी-जीव विचारता है कि ‘मन, वचन और काया में मगन होकर अर्थात् इनके आधीन होकर मैं कर्म-बंधन करता हूँ’, वहीं ज्ञानी-जीव विचार करते हैं कि ‘आत्मा तो मन, वचन, काय- तीनों योगों के भय से भी रहित निर्भय-तत्त्व है, अर्थात् ये तीनों योग-समूह तो जड़ हैं, और मैं चेतन-आत्मा हूँ; फिर ये जड़ होकर चेतन को अर्थात‍् मुझे विकार-युक्त कैसे कर सकते हैं? मेरा आत्मा अनुपम है, जगत् में इसकी उपमा अर्थात‍् इसके समान कोई दूसरा नहीं’। सारा जगत् मोहजनित-भ्रम का जंजाल है, और मैं चेतन-आत्मा इस जंजाल से पूर्णत:-मुक्त हूँ, अर्थात् न मैं जन्म लेता हूँ और न ही मरण को प्राप्त होता हूँ, फिर दुःख कैसा? पाप-पुण्य या शुभअशुभभाव दोनों ही अंधे-कुँयें के समान है, अर्थात् दोनों का ही फल संसार-परिभ्रमण है। जैसे अंधेकुँये में गिरने के बाद बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता, ठीक उसीप्रकार जो पुण्य-पाप के फल में मगन है, खुश हैं, उन्हें मुक्ति का मार्ग कभी नजर नहीं आता। जहाँ अज्ञानी-जीव मोह के भ्रम में फँसकर स्वयं को पापी कहता है, वहीं ज्ञानी-जीव विचार करते हैं ‘पाप किसने किये? कौन करता है? कौन करेगा? ये क्रिया करना मेरा स्वभाव नहीं है, मैं तो ज्ञाता-दृष्टा हूँ, पाप भाव तो पर-संबंधी एकसमय का विकार था, अब मुझे अपने अकर्तृत्व-स्वभाव की अनुभूति होने से ये विकार मुझे अपने से भिन्न मोहाद्यदहमकार्षं समस्तमपि कर्म तत्प्रतिक्रम्य। आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्त्ते ।। 33।। सर्व विशुद्धि-द्वार भासित होता है।’ कर्तापने का भार ज्ञानी-जीव के लिए स्वप्न की दौड़-धूप के समान है, अर्थात् जैसे हम स्वप्न में होनी-अनहोनी कुछ भी करते/सोचते हैं, लेकिन आँख खुलने पर वह सब मिथ्या लगता है, ठीक उसीप्रकार ज्ञान-सूर्य का प्रकाश होने पर ज्ञानी जीव को सब संसार स्वप्नवत् मिथ्या प्रतीत होता है।

(दोहा)

मैं कीनौ, मैं यौं करौं, अब यह मेरौ काम।
मन-वच-काया मैं बसै, ए मिथ्या-परिनाम।। 93।।

मन-वच-काया-करमफल, करमदसा जड़-अंग।
दरबित पुग्गल-पिंडमय, भावित भरम-तरंग।। 94।।

तातैं आतम-धरमसौं, करम सुभाउ अपूठ।
कौन करावै, कौ करै? कोसल है सब झूठ।। 95।।

शब्दार्थ :- मैं कीनौ मैं यौं करौं अब= मैंने किया, अब मैं ऐसा करता हूँ, यह मेरौ काम= यह मेरा काम है, मन-वच-काया मैं= मन, वचन, काया में, बसै ए मिथ्या-परिनाम= ये मिथ्या-परिणाम बसते हैं/रहते हैं।। 93।। मन-वच-काया करमफल= मन, वचन, काया कर्मफल है, करमदसा जड़-अंग= कर्मस्थिति/परिणति जड़ की अंग है, दरबित पुग्गल-पिंडमय= द्रव्यकर्म पुद््गल के पिण्डरूप है, भावित भर-तरंग= भावकर्म भ्रम/ अज्ञान की लहर है।। 94।। तातैं आतम-धरमसौं= इसलिये आत्मधर्म से, करम सुभाउ अपूठ= कर्म का स्वभाव विपरीत है, कौन करावै कौ करै= कौन करवाता है, कौन करता है?, कोसल है सब झूठ= यह सब कौशल/दिखावा/अभिमान मिथ्या है।। 95।। विशेषार्थ :- इन तीनों-छंदों में कवि ने मिथ्यात्व की अवस्था में जीव कैसे-कैसे विकल्प करता है? इसका सटीक-वर्णन किया है। यद्यपि जगत् का परिणमन पूर्ण-स्वतंत्र है, न कोई किसी के आधीन है, और न ही कोई किसी का कर्त्ता है। सभी द्रव्य अपनी-अपनी सीमा में स्वत: परिणमित होते हैं। लेकिन फिर भी मोह से भ्रमित यह जीव ऐसा मानता है कि ‘ये कार्य मैं ने किया, अब मैं एेसा करता हूँ, ये मेरा कर्तव्य/मेरी ड्यूटी/मेरा जाॅब है’ इत्यादि। हे आत्मन्! ये सारे विकल्पात्मक परिणाम मन, वचन और काया में रहते हैं, आत्मा में नहीं अर्थात् यह कर्तृत्वपने का विकल्प मन, वचन, काया में होता हैं, जो देह का अंग होने से जड़ ही है; आत्मस्वरूप में इनका कोई अस्तित्व नहीं है। कैसी विडम्बना है कि फिर भी उन परिणामों को अपना अर्थात् जीव का मानता है, और स्वयं परिणमनशील-पदार्थ और कार्य/परिणमन का जबरन कर्त्ता बनता है, फिर स्वयं ही दुःखी होता है। यह जीव पर का कर्त्ता क्यों नहीं बन सकता? -इसका समाधान करते हुये कविवर कहते हैं कि मन, वचन, और काया की रचना ‘नामकर्म’ का फल है, कर्मोदय-जनित परिस्थिति पुण्य-पाप के फलानुसार है, और वह भी पुद््गल-रूप होने से जड़ का ही अंग है। ‘द्रव्यकर्म’ पुद््गल के परमाणु हैं, और मोह-राग-द्वेष आदि परिणाम ‘भावकर्म’ हैं, वे भी मोह और अज्ञान की लहर हैं। अर्थात् सब जड़-कर्मों की रचना या फल है, जो एक भिन्न-द्रव्य है। और जीव इन सबसे न्यारा एक चेतन-द्रव्य है। जब दोनों ही द्रव्य पूर्णतः भिन्न हैं, तो एक-दूसरे के कर्त्ता कैसे हो सकते हैं? आत्मा का धर्म या स्वभाव और कर्म का स्वभाव- दोनों एक-दूसरे के विपरीत हैं या भिन्न हैं। जब दोनों का स्वभाव ही पूर्णतः भिन्न हैं, तो फिर चेतन-आत्मा इन जड़-पदार्थों/परिणमन का कर्त्ता कैसे हो सकता हैं? इसलिये कौन करवाता है? और कौन करता है?- अज्ञानी-जीव का यह बुद्धि-चातुर्य/अभिमान मिथ्या है, अर्थात् कोरी-कल्पना मात्र है, वास्तविकता नहीं।

(दोहा)

करनी हित-हरनी सदा, मुकति-वितरनी नांहि।
गनी बंध-पद्धति विषैं, सनी महादुख-माँहि।। 96।।

शब्दार्थ :- करनी हित-हरनी सदा= कर्त्ताबुद्धि हित का हरण करनेवाली है, मुकति वितरना नांहि= मुक्ति को होने नहीं देती है, गनी बंध-पद्धति विषैं= बंध-पद्धति में गिनी जाती है, सनी महादुख-माँहि= महादुःख से सनी/लिप्त है। विशेषार्थ :-सर्वप्रथम करनी/कर्त्ताबुद्धि से तात्पर्य स्वयं को भूलकर पर के लक्ष्य से होनेवाले शुभ और अशुभ-भाव और तदनुरूप-आचरण करना। अनादिकाल से यह जीव स्वयं को तो भूला ही है, साथ ही इन क्रियात्मक-विकल्पों में ऐसा उलझा, कि अनंतबार सद्िनमित‍् मिलने पर भी आज तक इसे स्वयं की प्रतीति नहीं हुई। श्रीगुरु कहते हैं कि ‘‘हे आत्मन्! ये करनी/कर्त्ताबुद्धि आत्मा का अहित करनेवाली है, अर्थात् इसके रहते जीव का हित कभी नहीं हो सकता। क्योंकि ये कर्त्ताबुद्धि सुखस्वरूप मोक्षमार्ग को प्रकट ही नहीं होने देती, और दु:खस्वरूप संसार में ही परिभ्रमण कराती है। इसीलिए आज तक इसकी गणना बंध-पद्धति में की जाती है, अर्थात् आगम और आध्यात्मिक-ग्रंथों में इन शुभ-अशुभ भावों को, और उनके फल को आस्रव और बंध-तत्त्वों के अंतर्गत ही वर्णित किया गया है। आस्रव और बंध दोनों ही दु:खरूप हैं, इसीलिये कर्त्ता-बुद्धि भी महा-दुःखरूप है, क्योंकि इन विकल्पों के रहते जीव प्रतिसमय आकुलित ही रहता है।’’

(सवैया इकतीसा)

करनी की धरनी मैं महामोह-राजा बसै, करनी अग्यान-भाव राकिस की पुरी है।
करनी-करम-काया पुग्गल की प्रतिछाया, करनी प्रगट माया मिसरी की छुरी है।।
करनी के जाल मैं उरझि रह्यौ चिदानंद, करनी की वोट ग्यान-भान-दुति दुरी है।
आचारज कहै करनीसौं विवहारी-जीव, करनी सदैव निहचै-सुरूप बुरी है।। 97।।

शब्दार्थ :- करनी की धरनी मेैं महामोह-राजा बसै= कर्त्ताबुद्धि की धरती पर महामोह राजा का निवास है, करनी अग्यान-भाव राकिस की पुरी है= कर्त्ताबुद्धि अज्ञानभाव-रूपी राक्षस की नगरी है, करनी करम काया पुग्गल की प्रतिछाया= कर्त्ताबुद्धि, कर्म, शरीर पुद््गल का ही प्रतिरूप है, करनी प्रगट माया मिसरी की छुरी है= कर्त्ताबुद्धि साक्षात् मायारूप है और मिश्री में लपेटी छुरी अर्थात् मीठी-छुरी है, करनी के जाल मैं उरझि रह्यौ चिदानंद= कर्त्ताबुद्धि के जाल में चैतन्यस्वरूप आत्मा उलझा हुआ है, करनी की वोट ग्यान-भान-दुति दुरी है= कर्त्ताबुद्धि की ओट/आड़ ज्ञानरूपी सूर्य की चमक को छिपा देती है, आचारज कहै करनीसौं विवहारी-जीव= व्यवहारी-जीव कर्त्ताबुद्धि को ‘आचरण’ कहते हैं, करनी सदैव निहचै सुरूप बुरी है= निश्चय से तो कर्त्ताबुद्धि का स्वरूप हमेशा बुरा ही है। मोह-विलास-विजृम्भितमिदमुदयत्कर्म सकलमालोच्य। आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्त्ते।। 34।। सर्व विशुद्धि-द्वार विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने कर्त्ताबुद्धि का स्वरूप बताते हुये मोक्षमार्ग में उसका निषेध किया है। करनी/कर्त्ता-बुद्धि के स्वरूप का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि कर्त्ताबुद्धि की धरती पर महामोह-रूपी राजा का निवास है, अर्थात् इन विकल्पों का मूलकारण मोह है, जबतक मोह (पर में एकत्व-ममत्व बुद्धि) विद्यमान है, तब तक शुभ-अशुभ में प्रवृत्ति रहेगी। कर्त्ताबुद्धि का वास अज्ञानरूपीराक्षस की नगरी में है, अर्थात् जब तक जीव अज्ञानरूप प्रवर्तन करता रहेगा, या कहें ज्ञान-स्वरूप आत्मा से विमुख रहेगा, तब तक वह इस जड़ करनी /कर्त्ताबुद्धि में भरमाता रहेगा। कर्त्ताबुद्धि, कर्म, काया- ये सब पुद््गल की ही प्रतिमूर्ति है, पुद््गल का ही अंश है। जिसप्रकार मिठाई के लोलुपी-प्राणी को मिसरी में लिपटी हुई छुरी अपनी ओर आकर्षित करती है, लेकिन मुँह में रखने पर जीभ के दो टुकड़े भी करती है; ठीक उसीप्रकार भोगों में आसक्त-जीवों को करनी/कर्त्ता-बुद्धि के विविध-मायामयी शुभ और अशुभरूप अपनी ओर आकर्षित करते हैं; लेकिन इन में उलझने पर जीभ के दो टुकड़े होने की तरह ये जीव को संसाररूपी दुःखों के सागर में ढकेल देती है। इसी कर्तृत्व-बुद्धि के मोह या मिथ्याजाल में आनंद का घनपिण्ड भगवान् आत्मा अनादि से उलझा हुआ है। इस करनी की आड़ ज्ञान-सूर्य को भी छिपा देती है, ठीक उसीप्रकार जैसे बादलों की ओट में सूर्य छिप जाता है। कैसी विडम्बना है कि छहों द्रव्यों में से एकमात्र जीवद्रव्य ही ज्ञान-स्वरूप है। इतना ही नहीं उस शुभ-अशुभ-परिणाम को जाननेवाला आत्मा स्वयं को जानते हुये भी अनजान है। आचार्य भगवन् कहते हैं कि इस कर्त्ताबुद्धि के कारण ही जीव व्यवहार से इन शुभ-अशुभ-भावों का कर्त्ता कहा जाता है, वास्तव में तो जीव उस समय भी इनका मात्र ज्ञाता ही है। निश्चय से तो इस करनी का स्वरूप अनादि से बुरा ही है, क्योंकि इन विकल्पों के मोहजाल में फँसने से ही जीव आज तक आत्मिक-सुख का वेदन नहीं कर पाया।

(चौपाई)

मृषा-मोह की परनति फैली, तातें करम-चेतना मैली।
ग्यान होत हम समझी एती, जीव सदीव-भिन्न पर-सेती।। 98।।

(दोहा)

जीव अनादि-सरूप मम, करम-रहित निरुपाधि।
अविनासी असरन सदा, सुखमय सिद्ध-समाधि।। 99।।

(चौपाई)

मैं त्रिकाल करनीसौं न्यारा, चिदविलास-पद जग-उजयारा।
राग-विरोध-मोह मम नांहि, मेरौ अवलंबन मुझ-माँही।। 100।।

शब्दार्थ :- मृषा-मोह की परनति फैली= मिथ्या-मोह का उदय फैला हुआ था, तातें करम-चेतना मैली= इसकारण से कर्म-चेतना-मलिन हो रही थी, ग्यान होत हम समझी एती= ज्ञान के प्रकट होने पर हम ये समझ गये, जीव सदीव-भिन्न पर-सेती= कि जीव हमेशा पर- परिणति से भिन्न है।। 98।। जीव अनादि-सरूप मम= जीवत्व मेरा अनादि-स्वरूप है, करम-रहित निरुपाधि= जो कर्म-रहित है, प्रत्याख्याय भविष्यत्कर्म समस्तं निरस्त-सम्मोहः। आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्त्ते ।। 35।। समस्तमित्येवमपास्य कर्म, त्रैकालिकं शुद्धनयावलम्बी। विलीनमोहो रहितं विकारैिश्चन्मात्रमात्मानमथावलम्बे ।। 36।। विगलन्तु कर्मविष-तरु-फलानि मम भुक्ति मन्तरेणैव। संचेतयेऽहमचलं चैतन्यात्मानमात्मानम् ।। 37।। उपाधि-रहित है, अविनासी असरन= विनाश-रहित, शरण-रहित/स्वाधीन है, सदा-सुखमय सिद्ध-समाधि= हमेशा सुखरूप सिद्ध के समान है।। 99।। मैं त्रिकाल करनीसौं न्यारा= मैं त्रिकाल कर्ताबुद्धि से भिन्न हूँ चिदविलास-पद जग-उजयारा= मेरा स्वभाव चैतन्य में विलसित होने से जगत् को प्रकाशित करनेवाला है, राग-विरोध-मोह मम नांहि= राग-द्वेष-मोह मेरे स्वरूप में नहीं है, मेरौ अवलंबन मुझ-माँही= मेरा अस्तित्व मुझमें ही है।। 100।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त-छंदों में कवि ने ज्ञानियों की विचारधारा और आत्मा का वास्तविक-स्वरूप वर्णित किया है। सम्यक्त्व होने के बाद ज्ञानी-जीव स्वीकार करते हैं कि पहले मोह का उदयरूप जो झूठा-साम्राज्य फैला था, उसकी वजह से कर्म का आस्रव हो रहा था, और उससे मेरी चेतना मैली हो रही थी, अर्थात् प्रभावित हो रही थी। लेकिन आत्म-स्वरूप की सच्ची-प्रतीति होने से अब मैं ये समझ गया हूँ कि जीव अनादिकाल से ‘पर’ से ही नहीं, पर-परिणति’ से भी भिन्न है। आत्मस्वरूप का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि मेरा जीवत्वरूप अनादिकाल से है, और कर्मों से सदाकाल-भिन्न है, मोह-राग-द्वेष आदि औपाधिक-भावों से भी रहित निरुपाधि, जन्म-मरण के चक्र से रहित अविनाशी, पर की शरण से भी रहित अशरण, स्वाधीन, सिद्धों के समान हमेशा सुखस्वरूप ही हैं। आत्मा सदाकाल कर्तृत्व-बुद्धि से भिन्न ही है। मेरा आत्मवैभव ही संपूर्ण-जगत् को प्रकाशित करता है, क्योंकि एकमात्र जीवद्रव्य ही जगत् की प्रसिद्धि करता है, और वही जीवद्रव्य आत्म-वैभव की पूर्णता प्रकट होने पर या केवलज्ञान होने पर संपूर्ण जगत् के कण-कण को भी प्रकाशित करता है। ‘परलक्ष्यी-विकार’ मोह, राग, द्वेष आदि औपाधिक-भाव मेरे स्वरूप में नहीं है, और न ही इनकी वजह से मेरा अस्तित्व है। मेरा अस्तित्व एकमात्र मेरे ही ज्ञानादि-गुणों से सिद्ध होता है।

(सवैया तेईसा)

सम्यकवंत कहै अपने गुन, मैं नित राग-विरोधसौं रीतौ।
मैं करतूति करूँ निरवंछक, मोहि विषै-रस लागत तीतौ।।
सुद्ध-सुचेतनकौ अनुभौ करि, मैं जग मोह-महा-भट जीतौ।
मोख समीप भयौ अब मोकहुं, काल-अनंत इही-विधि बीतौ।। 101।।

शब्दार्थ :- सम्यकवंत कहै अपने गुन= सम्यग्दृष्टि-जीव स्वयं अपने गुणों का बखान करते हैं, मैं नित राग-विरोधसौं रीतौ= मैं प्रतिसमय राग-द्वेष से रहित हूँ, मैं करतूति करूँ निरवंछक= मैं इच्छा-रहित होकर कार्य करता हूँ, मोहि विषै-रस लागत तीतौ= मुझे विषयों का रस तिक्त/तीखा/अरुचिकर लगता है, सुद्ध-सुचेतनकौ अनुभौ करि= शुद्धात्मा का अनुभव करके, मैं जग मोह-महाभट जीतौ= मैंने जगत् के मोहरूपी महायोद्धा को जीत लिया है, मोख-समीप भयौ अब मोकहुं= अब मोक्ष मेरे बहुत नजदीक है, काल-अनंत इही-विधि बीतौ= अब अनंतकाल इसीप्रकार व्यतीत होनेवाला है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यक्त्व प्राप्त करने के बाद जीव की परिणति कैसी होती है, इसका सुंदर-वर्णन स्वयं सम्यग्दृष्टि-जीव के मुख से करवाया है। सम्यक्त्वी या ज्ञानी-जीव स्वयं अपने बारे में कहते हैं कि मैं प्रतिसमय राग-द्वेष से रहित रहता सर्व विशुद्धि-द्वार हूँ, अर्थात् मुझे जगत् के सभी जीव समान दिखते हैं, और समस्त अचेतन-पदार्थ जड़, सो इनमें सहज ही इष्ट-अनिष्ट-बुद्धि उत्पन्न नहीं होती, और जब कोई जीव या पदार्थ इष्ट-अनिष्ट नहीं, तो राग-द्वेष किससे करूँ? इसलिए राग-द्वेष भी नहीं होता। आत्मानुभूति होने के बाद यद्यपि मैं जगत् का प्रत्येक कार्य करता हूँ, पर इच्छा/वांक्षा-रहित, अर्थात‍् जो परिणमन स्वत: हो रहा है, न तो मैं स्वयं को उसका कर्त्ता मानता हूँ, और न ही उसके बदले में कोई इच्छा, न उससे कोई अपेक्षा रखता हूँ। वास्तव में देखा जाये, तो दुःख का कारण पर-पदार्थ नहीं हैं, बल्कि उससे जुड़ी हमारी अपेक्षा, उपेक्षा और इच्छा/वांक्षा ही है। जिसे एकबार आत्मिक-आनंद के रस का वेदन हो जाये, उसे पाँचों इन्द्रियों के विषय-भोगों में रस नहीं आता,अरुचिकर लगते हैं, रस आये भी कैसे? क्योंकि ये पदार्थ तो जड़ हैं, और इन जड़-पदार्थो में चैतन्य का रस कैसे आ सकता है? दोनों की जाति ही भिन्न है। ज्ञानीजन कहते हैं कि शुद्धात्मा की अनुभूति करके अर्थात् अपने ज्ञायक-स्वरूप को स्वीकार करके जगत् का सबसे बलशाली राजा मोह, जिसने अनादि से जगत् के जीवों को अपने वश में कर रखा था, उस मोहराजा को आज मैंने जीत लिया है। जब राजा को जीत लिया तो प्रजा तो स्वयं ही जीती हुई मानी जाती है। इसीलिए अब मेरे लिए मोक्ष अत्यंत-निकट है, मैं भावना भाता हूँ कि अब मेरा अनंतकाल बस इसीप्रकार आत्मिक-सुख का वेदन करते हुये व्यतीत हो।

(दोहा)

कहै विचच्छन ''मैं रह्यौ, सदा ज्ञान-रस-राचि। सुद्धातम-अनुभति

ू सौं, खलित न होहुँ कदाचि’'।। 102।।

पुव्व-करम विष-तरु भये, उदै भोग फल-फूल।
मैं इनको नहिं भोगता, सहज होहु निरमूल।। 103।।

शब्दार्थ :- कहै विचच्छन मैं रह्यौ= ज्ञानीजन कहते हैं ‘‘मैं रहता हूँ, सदा ज्ञान-रस राचि= हमेशा ज्ञान रस में रचा-पचा, सुद्धातम-अनुभूतिसौं= शुद्धात्मा की अनुभूति से, खलित न होहुँ कदाचि= कभी भी स्खलित नहीं होता हूँ’’।। 102।। पुव्वकरम विषतरु भये= पूर्वकृत-कर्म विषवृक्ष बन गये हैं, उदै भोग फलफूल= उदयकाल में प्राप्त भोग-सामग्री उनके फल-फूल के समान हैं, मैं इनको नहिं भोगता= मैं इनका भोग नहीं करता हूँ, सहज होहु निरमूल= सहज ही निर्मूल/समाप्त/नष्ट हो जाने वाले हैं।। 103।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने ज्ञानी-जीवों के चिंतन-मनन का उदाहरण-सहित सुदं र-वर्णन किया है। ज्ञानी-जीव स्वयं कहते हैं कि मैं हमेशा अपने ज्ञान-रस में ही रचा-पचा या कहें रमण करता हूँ, अर्थात् मैं हमेशा से ज्ञान का ही वेदन करता आया हूँ; जबकि अज्ञानी-जीव प्रतिसमय अपने रागादिभावों का ही वेदन करता आया है, इसीलिये वह दुःखी रहता है, और ज्ञानी-जीव सदा सुखी रहते हैं। ज्ञानी-जीव शुद्धात्मा की अनुभूति से कभी स्खलित नहीं होते अर्थात् पहले तो उनका उपयोग स्वरूप में ही रहता है; लेकिन यदि कदाचित् न रह पाये, तो बाहर में तदनुरूप पुरुषार्थ करते हैं; जिससे पुन: उपयोग स्वरूप में स्थिर हो। यद्यपि ज्ञानी-जीव भी मोक्ष-प्राप्ति से पूर्व संसार में ही रहते हैं, और संसार की क्रिया करते हुए दिखाई

निःशेष-कर्मफल-संन्यसनात्मनैवं, सर्व-क्रियान्तर-विहार-निवृत्तवृत्तेः।
चैतन्यलक्ष्म भजतो भृशमात्मतत्त्वं, कालावलीयमचलस्य वहत्वनन्ता ।। 38।।

भी देते हैं, लेकिन विरक्ति-पूरक ्व । कैस?े - इस तथ्य को समझाने के लिये कवि ने एक सटीक-उदाहरण दिया है। जैसे वृक्ष पर फल-फूल लगे हैं, यदि माली उनको तोड़कर उपयोग में लेना चाहे तो ले सकता है, वर्ना वे फल और फूल अपना समय पूरा होने पर स्वयं ही वृक्ष को छोड़कर जमीन पर गिरकर नष्ट हो जाते हैं। ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव पूरक ्व ृत-कर्मबंध को विषवृक्ष के समान मानते हैं और उनके उदयकाल में होनेवाले संयोगादिक को उस विषवृक्ष के फल-फूल के समान मानते हैं, अर्थात् पूरब ्व द्ध-कर्मों के उदय में मिलने वाले पंचन्द्रि े य के विषय-भोग ज्ञानी-जीवों के लिये विषवृक्ष के विषैले फूल-फल के समान हैं; इसीलिये ज्ञानी-जीव इन फल-फूल को भोगते नहीं है अर्थात् इन उदयजनित-परिणामों में मोह-रागद्षवे आदि विकारी-भावों से न जुड़कर इनके मात्र ज्ञाता रहते है। परिणाम-स्वरूप ये फल-फूल अर्थात् उदयजनित कर्म-परमाणु स्वयं ही अपना समय पूरा होने पर निर्मूल या निर्जरित हो जाते हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि हे आत्मन्! जो कर्म उदय में आया है, वह निर्जरित होने के लिए ही आया है, पर हम अज्ञानी-जीव उन उदयरूप-परिणामों की स्थिति में मोह-राग-द्वेष करते हुये उनसे जुड़ते हैं, सो वही उदयरूप कर्म नवीन-कर्मबंध का बीज हमें भेंट में देकर स्वयं तो निर्जरित हो जाता है, और हम संसार की ओर बढ़ जाते हैं। जबकि ज्ञानी-जीव उन उदयरूप कर्मों के मात्र ज्ञाता रहते हैं, सो नवीन-कर्मबंध भी नहीं होता और पुराना तो निर्जरित होता ही है। इसप्रकार कर्म की वंशावलि क्रमशः निर्मूल होती जाती है और ज्ञानी-जीव निरन्तर मुक्ति की ओर अग्रसर होते जाते हैं।

(दोहा)

जो पूरबकृत-करम-फल, रुचिसौं भुंजै नांहि।
मगन रहै आठों-पहर, सुद्धातम-पद-माँहि।। 104।।

सो बुध करमदसा-रहित, पावै मोख तुरंत।
भुंजै परम-समाधि-सुख, आगम-काल-अनंत।। 105।।

शब्दार्थ :- जो पूरबकृत करम-फल= जो पूर्व में किये कर्मों के फल को, रुचिसौं भुंजै नांहि= रुचिपूर्वक नहीं भोगता, मगन रहै आठों-पहर= व आठों पहर/ सदाकाल मगन/लीन रहता है, सुद्धातम-पद-माँहि= शुद्धात्मा में।। 104।। सो बुध करमदसा-रहित= वह ज्ञानी कर्म-अवस्था से रहित, पावै मोख तुरंत= मोक्ष-पद को तुरंत प्राप्त करता है, भुंजै परम-समाधि-सुख= परम अतीन्द्रिय-सुख को भोगता है, आगम-काल-अनंत= आगामीअनंतकाल तक।। 105।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों से विरक्ति-अर्थात‍् वैराग्यमय परिणामों की महिमा और फल कोे वर्णित किया है। जो जीव पूर्वबद्ध-कर्मों के उदय को, उनके फल में प्राप्त संयोगों, पदार्थों और परिस्थितियों को रुचिपूर्वक नहीं भोगते अर्थात् उनमें आसक्त नहीं होते; जो भी है, जैसा भी है, उसमें सहज समताभाव धारण करते हैं। अिभप्राय यह है जो जीव अज्ञानी-जीव की तरह राग का प्रसंग बनने पर रागरूप, द्वेष का प्रसंग बनने पर द्वेषरूप नहीं होते, और मोह अर्थात् देह से एकत्व-ममत्वबुद्धि, जो कि अज्ञानी-जीव की परिणति में तो चीनी में मिठास की तरह समाई हुई है, उससे जो जीव प्रतिसमय अपने को भिन्न ही अनुभव सर्व विशुद्धि-द्वार

यः पूर्वभाव-कृत-कर्म-विष-द्रुमाणां, भुङ्क्ते फलानि न खलु स्वत एव तृप्तः।
आपातकाल-रमणीयमुदर्क-रम्यं, निष्कर्म-शर्ममयमेति दशान्तरं सः।। 39।।

करते हैं, और आठों पहर शुद्धात्मा की अनुभूति में मगन रहते हैं। वे ज्ञानी-जीव अतिशीघ्र समस्त-कर्मों से रहित मोक्ष-अवस्था को प्राप्त करते हैं, और आगामी अनंतकाल तक परम-अतीन्द्रिय आत्मिक-अानंद का रसास्वादन करते हैं, अर्थात् वे जीव पुन: संसार में जन्म-मरण नहीं करते।

(छप्पय)

जो पूरबकृत-करम, विरख-विष-फल नहिं भुंजै।
जोग-जुगति कारिज-करंति, ममता न प्रयुंजै।।
राग-विरोध-निरोधि, संग-विकलप सब छंडइ।
सुद्धातम-अनुभौ अभ्यासि, सिव-नाटक मंडइ।।
जो ग्यानवंत इहि मग चलत, पूरन ह्वै केवल लहै।
सो परम-अतींद्रिय-सुख-विषैं, मगनरूप संतत रहैं।। 106।।

शब्दार्थ :- जो पूरबकृत-करम= जो पूर्वबद्ध-कर्मों के विरख-विष-फल नहिं भुंज=ै विष-वृक्ष के फलों को नहीं भोगता है, जोग-जुगति कारिज-करंति= योगपूर्वक कार्य तो करता है, ममता न प्रयुंज=ै किन्तु उसमें ममता नहीं करता, रोग-विरोध निरोधि= राग-द्वेष को त्यागकर, संग-विकलप सब छंडइ= परिग्रह के सभी विकल्पों को छोड़कर, सुद्धातम-अनुभौ अभ्यासि= शुद्धात्मा के अनुभव का अभ्यास कर, सिव-नाटक मंडइ= मोक्षनाटक का मंडन करता है, जो ग्यानवंत इहि मग चलत = जो ज्ञानी-जीव इस रास्ते पर चलते हैं, पूरन ह्वै केवल लहै= और पूर्ण होकर केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, सो परम-अतींद्रिय-सुख-विषैं= वह परम-अतीन्द्रय-सुख में, मगनरूप संतत रहैं= सदैव मगन रहते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मुक्ति के मार्ग का सुन्दर-विवेचन किया है। हम सभी जीव मोक्ष तो प्राप्त करना चाहते हैं, परन्तु मोक्ष की प्राप्ति के लिये क्या करें और क्या न करें?- यह बात हमें समझ में नहीं आती। इतना ही नहीं कईबार तो विपरीत-मार्ग का अनुसरण कर मुक्ति के समीप आने के बजाय कोसों दूर चले जाते हैं। अब कवि द्वारा निर्देशित-मार्ग का अनुसरण करते हुए हम अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करेंगें। हम सभी अनादिकाल से कर्मों के साथ हैं, और निरन्तर कर्म-फल को भोगते आ रहे हैं अर्थात् उनमें इष्ट-अनिष्टपना, राग-द्वेष, और आसक्तिरूप प्रवर्तन करते आ रहे हैं। जबकि ज्ञानी-जीव पूर्वकर्म के उदय को विषवृक्ष का विषैला-फल मानते हैं, और अनासक्ति-भाव अर्थात् न राग न द्वेष, न इष्ट न अनिष्ट, बल्कि सहज साम्य-भाव से प्रवर्तन करते हैं, कर्म के उदय और कर्मफल के कर्त्ता न बनकर, मात्र ज्ञाता रहते हैं। साथ ही मन, वचन और काया को भी वश में करते हैं, देहादिक-संयोगों में एकत्व-ममत्व नहीं करते हैं, संसार की प्रत्येक क्रिया में उदासीनभाव से प्रवर्तन करते हैं। कहने का अभिप्राय यही है कि समस्त-परिग्रह का त्याग करने से पहले संसार, शरीर और भोगों से अरुचि का होना अति-आवश्यक है, वर्ना जीव भ्रमित भी हो सकता है, या कहें विषय-भोगों के प्रति लालसा यथावत् बनी रही और मुनिव्रत अंगीकार किया, तो भ्रमित होना स्वाभाविक है। फिर क्रमश: समस्त परिग्रह को ही नहीं परिग्रह-संबध ं ी विकल्प को भी त्यागकर मुनिव्रत अंगीकार करते हैं; राग-द्वेष का निरोध अर्थात् त्यागकर, एकमात्र शुद्धात्मा की अनुभति ू का अभ्यास करते हैं। निरन्तर-अभ्यास और स्वरूप की स्थिरता से मोक्षरूपी-नाटक का मंडन करते हैं, अर्थात् श्रेणी माँडने का पुरुषार्थ करते हैं। अत्यन्तं भावयित्वा विरतिमविरतं कर्मणस्तत्फलाच्च, प्रस्पष्टं नाटयित्वा प्रलयनमखिलाज्ञान-संचेतनायाः। पूर्णं कृत्वा स्वभावं स्वरस-परिगतं ज्ञान-संचेतनां स्वां, सानन्दं नाटयन्तः प्रशम-रसमितः सर्वकालं पिबन्तु ।। 40।। अंत में कवि कहते हैं कि जो ज्ञानी-जीव उपर्युक्त वर्णित-मार्ग का अनुसरण करते हैं, और अपने परिपूर्ण-स्वभाव की पूर्णता को प्राप्त करते हैं, उनको केवलज्ञान की प्राप्ति होती है। और परम-अतीन्द्रिय अर्थात् इन्द्रिय-रहित अनंत आत्मिक-सुख का न केवल वेदन करते हैं, बल्कि अनंतकाल के लिये उसी आनंद में मग्न हो जाते हैं।

(सवैया इकतीसा)

निरभै निराकुल निगम वेद निरभेद, जाकै परगासमैं जगत् माइयतु है।
रूप-रस-गंध-फास पुदगल कौ विलास, तासौं उदवास जाकौ जस गाइयतु है।।
विग्रहसौं-विरत परिग्रहसौं-न्यारौ सदा, जामैं जोग-निग्रह चिह्न पाइयतु है।
सो है ग्यान-परवांन चेतन-निधान ताहि, अविनासी ईस जानि सीस नाइयतु है।। 107।।

शब्दार्थ :- निरभै निराकुल निगम वेद निरभेद= भय-रहित, आकुलता-रहित, उत्कृष्ट-ज्ञान-स्वरूप, भेद- रहित, जाकै परगासमैं जगत् माइयतु है= जिसके प्रकाश में संपूर्ण जगत् समाया हुआ है, रूप-रस-गंध-फास पुदगल कौ विलास= रूप, रस, गंध और स्पर्श पुद््गल का वैभव है, तासौं उदवास जाकौ जस गाइयतु है= उससे भिन्न जिसका (आत्मा का) यशोगान किया गया है, विग्रहसौं विरत परिग्रहसौं न्यारौ सदा= शरीर से भिन्न, परिग्रह से भिन्न, जोग-निग्रह जामैं चिह्न पाइयतु है= योग-निग्रह के लक्षण जिसमें पाये जाते है, सो है ग्यानपरवांन चेतन-निधान= वह ज्ञान-प्रमाण चैतन्य का निधान है, ताहि अविनासी ईस जानि सीस नाइयतु है= उसे विनाश-रहित, शाश्वत, ईश्वर जानकर शीश झुकाता हूँ। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने अविनाशी-आत्मस्वरूप, जिसकी महिमा जगत् में सर्वश्रेष्ठ है, उसका गुणगान करते हुए वंदन किया है। आत्मा कैसा है?- जो ‘निर्भय’ है अर्थात् सातों प्रकार के भयों से रहित है, क्योंकि सातोंप्रकार के भय शरीर पर लागू होते हैं, आत्मा पर नहीं। आत्मा तो इन भयों से त्रिकाल-भिन्न है। आत्मा ‘निराकुल’ है, अर्थात् आकुलता से रहित। आकुलता यानि दुःख, और दु:ख/आकुलता से आत्मा उसीप्रकार रहित है, जैसे सूर्य का प्रकाश अंधकार से। अर्थात् जैसे सूर्य के प्रकाश में अंधकार का अस्तित्व ही नहीं है, ठीक उसीप्रकार आत्मा में भी दुःख नाम का गुण ही नहीं है। ‘निगम वेद’ अर्थात् जगत् में छहों-द्रव्यों में एकमात्र उत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप-वस्तु आत्मा ही है अन्य कोई नहीं। ‘भेद रहित’ अर्थात् अखंड, स्वयं में परिपूर्ण आत्मवस्तु, जिसके प्रकाश में संपूर्ण-लोक समाहित है, अर्थात् जिसने आत्मा को जान लिया, उसने संपूर्ण-लोक को जान लिया, और जिसने आत्मा को नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना। स्पर्श, रस, गंध और वर्ण तो मूर्तिक-पुद््गल का वैभव है, सारा जगत् पुद््गल के इसी वैभव पर भरमाया है। जबकि अमूर्तिक-आत्मा का वैभव तो इससे सर्वथा भिन्न-लक्षणवाला है। देह में रहते हुए भी आत्मा सदाकाल देह से भिन्न है, बाह्य-परिग्रह तो आत्मा से भिन्न है ही, परन्तु आत्मा तो अंतरंग-परिग्रह के विकल्प से भी रहित है, योगों से भी निराला अर्थात् भिन्न है; क्योंकि मन, वचन, और काया- तीनों तो देह के अंग हैं, जड़ है़ं, और आत्मा तो इनसे भिन्न चेतन-स्वरूप लक्षणवाला है। ऐसा वह शाश्वतपरमात्मा ज्ञान-प्रमाण है, ज्ञानाकार है अर्थात् ज्ञानरूप ही जिसका अस्तित्व है। चैतन्य का निधान अर्थात‍् खजाना है, इसीलिये आत्मा को अविनाशी अर्थात् जन्म-मरण से रहित शाश्वत-भगवान् जानकर शीश

इतः पदार्थ-प्रथनावगुण्ठनाद्विना कृतेरेकमनाकुलं ज्वलत्।
समस्त-वस्तु-व्यतिरेक-नििश्चयाद्विवेचितं ज्ञानमिहावतिष्ठते ।। 41।।

सर्व विशुद्धि-द्वार झुकाता हूँ, अर्थात् सविनय-वंदन करता हूँ।

(सवैया इकतीसा)

जैसौ निरभेदरूप निहचै अतीत हुतौ, तैसौ निरभेद अब भेद कौन कहैगौ।
दीसै कर्म-रहित, सहित सुख-समाधान, पायौ निज-स्थान फिर बाहरि न बहैगौ।।
कबहूँ कदाचि अपनौ सुभाव त्यागि करि, राग-रस राचिकैं न पर-वस्तु गहैगौ।
अमलान-ग्यान विद्यमान परगट भयौ, याही-भाँति आगम-अनंतकाल रहैगौ।। 108।।

शब्दार्थ :- जैसौ निरभेदरूप निहचै अतीत हुतौ= निश्चय से जैसा भेदरहित आत्मा पहले था, तैसौ निरभेद= वैसा ही अभेदरूप अब प्रगट हो गया है, अब भेद कौन कहैगौ= अब उसे भेदरूप कौन कहेगा? दीसै कर्मरहित= कर्मरहित दिखता है, सहित सुख-समाधान= सुख-शांति सहित, पायौ निज-स्थान= निज-स्थान को प्राप्त कर लिया है, फिर बाहरि न बहैगौ= अब बाहर नहीं आयेगा, कबहूँ कदाचि= कभी भी किसी भी स्थिति में, अपनौ सुभाव त्यागि करि= अपना स्वभाव छोड़कर, राग-रस राचिकैं= राग- रस में रच-पचकर, न पर-वस्तु गहैगौ= परवस्तु का ग्रहण नहीं करेगा, अमलान-ग्यान= मलिनता रहित शुद्ध-ज्ञान, विद्यमान परगट भयौ= वर्तमान में प्रगट हुआ है, याही भाँति= इसीप्रकार, आगम-अनंतकाल रहैगौ= आगामी-अनंतकाल तक रहेगा। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मा की शाश्वत-अवस्था और वर्तमान में प्रकट शुद्ध-अवस्था, जिसे हम परमात्मा के रूप में वंदन करते हैं, उसका सटीक और सुंदर-वर्णन किया है। निश्चय से अर्थात् द्रव्य-स्वभाव से आत्मा अनादिकाल से शुद्ध और अखंड ही है; जो भी मलिनता है, वह पर्याय में है, द्रव्य-स्वभाव में नहीं। जैसे सूर्य के सामने बादलों के आ जाने पर कुछ समय के लिये सूर्य का प्रकाश आच्छादित/बाधित तो होता है, पर नष्ट नहीं होता; इसीलिए बादलों के सामने से हटते ही वह अपने स्वभावरूप सहज प्रकट होता है। ठीक उसीप्रकार अनादि से कर्मों का संयोग होने से आत्मा का स्वाभाविक-शुद्ध और अखंड-स्वरूप प्रकट नहीं हो रहा था, अब कर्मों की मलिनता हटने से वह अपने स्वाभाविक-शुद्ध और अखंडरूप में प्रकट हो गया है। अब उसे भेदरूप यानि पर्यायरूप कौन कहेगा? अर्थात् कोई नहीं। अब वह परमात्म-स्वरूप आत्मा कर्म-रहित और अनंत-सुखऔर शांतिसहित दिखाई देता है। अब उस आत्मा ने अपने निज-स्थान अर्थात् मुक्तिरूपी-महल में प्रवेश कर लिया है, अब वह कभी बाहर नहीं आयेगा अर्थात् पर-घर में प्रवेश नहीं करेगा, पुन: संसार में जन्म-मरण करता हुआ दुःखी नहीं होगा। यहाँ तक कि कभी भी किसी भी स्थिति में अपना ज्ञाता-स्वभाव छोड़कर मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों में रच-पचकर या लीन होकर पर-वस्तु अर्थात् देहादिक समस्त संयोग और परपदार्थों को ग्रहण नहीं करेगा। निरन्तर स्वरूप की स्थिरतापूर्वक जो वर्तमान में शुद्ध-ज्ञान अर्थात् केवलज्ञान प्रकट हुआ है, अब वह आगे भी इसीप्रकार अनंतकाल तक रहेगा, अर्थात् कभी भी क्षय को प्राप्त नहीं होगा।

(सवैया इकतीसा)

जबहीतैं चेतन विभावसौं उलटि आपु, समै पाइ अपनौ-सुभाउ गहि लीनौ है।
तबहीतैं जो-जो लेन-े जोग सो-सो सब लीनौ, जो-जो त्याग-जोग सो-सो सब छाँड़ि दीनौ है।।

अन्येभ्यो व्यक्तिरिक्तमात्मनियतं बिभ्रत् पृथग्वस्तुता-मादानोज्झन-शून्यमेतदमलं ज्ञानं तथावस्थितम्। मध्याद्यन्त-विभाग-मुक्त-सहज-सफार-प्रभा-भासुर:, शुद्ध-ज्ञानघनो यथास्य महिमा नित्योदितस्तिष्ठति ।। 42।। लैबे कौं न रही ठौर त्यागिवे कौं नांहि और, बाकी कहा उबरयौ जु कारजु नवीनौ है। संग-त्यागि अंग-त्यागि वचन-तरंग-त्यागि, मन-त्यागि बुद्धि-त्यागि आपा-सुद्ध कीनौ है।। 109।। शब्दार्थ :- जबहींतैं चेतन= जबसे आत्मा ने विभावसौं उलटि आपु= स्वयं ही विभाव-परिणति को छोड़कर, समै पाइ अपनौ सुभाउ गहि लीनौ= काललब्धि पाकर अपने निज-स्वभाव को ग्रहण किया है, तबहीतैं जो-जो लेने-जोग= तभी से जो-जो लेने-योग्य था, सो-सो सब लीनौ है= सो सब ग्रहण किया, जो-जो त्याग-जोग= जो जो त्यागने-योग्य था, सो-सो सब छाँड़ि दीनौ है= सो सब त्याग दिया है, लैंबे की न रही ठौर= ग्रहण करने के लिए अब कोई स्थान नहीं, त्यागिवेकौं नांहि और= त्यागने के लिये भी अब कुछ नहीं, बाकी कहा उबरयौ= बाकी क्या शेष रहा, जु कारजु नवीनौ है= जो नया करना है, अर्थात् कुछ नहीं संग-त्यागि= परिग्रह त्यागकर, अंग-त्यागि= शरीर की चंचलता त्यागकर, वचन-तरंग त्यागि= वचन की क्रिया का त्यागकर, मन त्यागि= मन के विकल्पों का त्यागकर, बुद्धि त्यागि= विचारों की चंचलता को त्यागकर, आपा सुद्ध कीनौ है= अपनी आत्मपरिणति को शुद्ध किया है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मिथ्यात्व की अवस्था को छोड़कर आत्मा के परमात्मा बनने तक की

प्रक्रिया का सुंदर-वर्णन किया है।
आत्मा त्रिकाल-शुद्ध है, लेकिन विभाव-भावों के कारण उस शुद्धता की अनुभूति नहीं हो रही।

सो जब से चेतन भगवान्-आत्मा ने सुयोग-अवसर पाकर अर्थात‍् वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु का समागम पाकर स्वयं ही अपने विवेक से उस विभाव-परिणति का अवलम्बन छोड़कर निज-स्वभाव-परिणति को ग्रहण किया है। तभी से जो-जो बातें उपादेय यानि ग्रहण करने योग्य थीं, वे सब ग्रहण की, और जो-जो वस्तु हेय यानि त्यागने योग्य थीं, वे सब त्याग दीं। अर्थात् जबसे अपने परिपूर्ण-स्वभाव में विश्राम किया, तबसे अन्य किसी भी वस्तु-ग्रहण करने के लिए अवकाश ही नहीं बचा, और न ही स्वरूप में ऐसी कोई वस्तु दिखी जिसको त्याग करना हो, और न ही अब कुछ नया करने-योग्य कार्य शेष रहा, अर्थात‍् आत्मवस्तु हरप्रकार से स्वयं में परिपूर्ण है, न कुछ कम है और न ही कुछ ज्यादा, समस्त बाह्यविकल्पों से मुक्ति मिल गई। क्योंकि विकल्पों की उत्पत्ति का स्थान तो देहादिक-संयोग है, जबकि उस आत्मा ने संग अर्थात‍् अंतरंग-बहिरंग सभीप्रकार के परिग्रह का ही त्याग कर दिया, अंग अर्थात‍् जो प्रतिसमय साथ रहती है, अब उस देह का व्यापार भी बंद हो गया अर्थात् क्षुधा, तृषा आदि 18 दोषों से रहित हो गये; इसलिए अब देह का भी कोई औचित्य शेष नहीं रहा। वचन की तरंग अर्थात् वचन का व्यापार भी अब बंद हो गया; क्योंकि अब परमात्मा अनंतकाल तक मौन रहेंगें। मन-संबंधी समस्त-विकल्पों का भी त्याग कर दिया। बुद्धि-त्याग यानि इन्द्रियाँ मौजूद होने पर भी अब इन्द्रियों से ज्ञान का व्यापार नहीं चलता, अर्थात‍् इंद्रियज्ञान-संबंधी समस्त व्यापार बंद हो गया। इसप्रकार हर-तरफ से निज-आत्मा को शुद्ध कर लिया अर्थात् अब निरन्तर एकमात्र शुद्ध-स्वभाव की ही अनुभूति होती है।

(दोहा)

सुद्ध-ज्ञानकै देह नहिं, मुद्रा-भेष न कोइ।
तातैं कारन मोखकौं, दरबलिंग नहिं होइ।। 110।।

उन्मुक्तमुन्मोच्यमशेषतस्तत्तथात्तमादेयमशेषतस्तत्। यदात्मनः संहृतसर्वशक्ते: पूर्णस्य सन्धारणमात्मनीह ।। 43।। व्यतिरिक्तं परद्रव्यादेवं ज्ञानमवस्थितम्। कथमाहारकं तत्स्याद्येन देहोऽस्य शङ्क्यते ।। 44।। सर्व विशुद्धि-द्वार

दरबलिंग न्यारौ-प्रगट, कला-वचन-विग्यान।
अष्ट-महारिधि अष्ट-सिधि, एऊ होहि न ग्यान।। 111।।

शब्दार्थ :- सुद्ध-ज्ञानकै देह नहिं= शुद्ध-ज्ञान के कोई शरीर नहीं है, मुद्रा-भेष न कोइ= न कोई आकृति या भेष है, तातैं कारन मोखकौं= इसलिये मोक्ष का कारण, दरबलिंग नहिं होइ= द्रव्यलिंग नहीं है।। 110।। दरबलिंग न्यारौ-प्रगट= द्रव्यलिंग तो स्पष्टतः भिन्न है, कला-वचन-विग्यान= कला-कौशल, वचन-चातुरी, अष्ट-महारिधि= अाठ महाऋद्धियाँ, अष्ट सिद्धि= आठ सिद्धियाँ, एऊ होहि न ग्यान= ये सब भी सम्यग्ज्ञान नहीं है।। 111।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने स्पष्ट किया है कि द्रव्यलिंग अर्थात् कोरा बाह्य-चारित्र मोक्ष का कारण नहीं है। मुक्ति का सच्चा और मूल-कारण आत्मज्ञान है, अर्थात् ज्ञानस्वरूप-आत्मा की सम्यक्-आराधना है। आत्मा अर्थात‍् ज्ञान का घनपिण्ड, जब आत्मा ही अमूर्तिक है, तो ज्ञान की देह, मुद्रा/रूप/भेष कैसे हो सकता है? अर्थात् शुद्ध-ज्ञान की न कोई देह है, और न कोई मुद्रा या भेष है, अर्थात‍् कोई भी रूप या आकार-प्रकार नहीं है; जबकि द्रव्यलिंग का तो बाह्य-चारित्ररूप दिगम्बर-मुद्रा या कहें देह की नग्नतारूप भेष है। कहने का अभिप्राय यही है कि अंतरंग-चारित्र या परिणामों की विशुद्धि के बिना कोरा बाह्यचारित्र अर्थात् द्रव्यलिंग मोक्ष का कारण नहीं है। लोक में जो कोरे बाह्य-चारित्र को भलीभाँति पालते हैं, बहुत सारी कलाओं के ज्ञाता हैं, वचनचातुरी के धनी है, कदाचित् बुद्धि-विक्रिया आदि आठ महाऋद्धियों के भी धनी हैं; आचार, श्रुत, शरीर आदि आठ सिद्धियों को भी प्राप्त हैं, वे भी अंतरंग-शुद्धि के बिना मुक्ति के सच्चे-साधक नहीं बन सकते हैं; क्योंकि ये सब बाह्य-उपलब्धियाँ शुद्धज्ञान का अंग नहीं है, इनका संबंध देह से होने के कारण ये भी मोक्ष की मूल-कारण नहीं हैं। ऋद्धि- तपश्चरण के प्रभाव से कदाचित् किन्हीं योगीजनों को कुछ चामत्कारिक-शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं, उन्हें ‘ऋद्धि’ कहते हैं। इनके आठ मुख्य-भेद और अनेकों प्रभेद हैं। बुद्धि-ऋद्धि, विक्रिया-ऋद्धि, चारण-ऋद्धि, तप-ऋद्धि, बल-ऋद्धि, औषध-ऋद्धि, रस-ऋद्धि, क्षेत्र-ऋद्धि हैं। सिद्धि-सिद्धिश्चेदुपलब्धिमात्रम् अर्थात् उपलब्धि-मात्र को सिद्धि कहते हैं। वे आठ प्रकार की हैं। आचार, श्रुत, शरीर, वचन, वाचन, बुद्धि, उपयोग और संग्रह-संलीनता। -(सि. वि. मू. 1/2/6) निष्कर्षरूप में हम कह सकते हैं कि यद्यपि ये ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ योगीजनों को तपस्या के फल में सहज प्राप्त होतीं हैं, लेकिन ये शुद्ध-ज्ञान/सम्यग्ज्ञान का अंश नहीं होने से मोक्ष की कारणरूप नहीं है। मुक्ति का एकमात्र और सम्यक्-कारण शुद्धात्म-तत्त्व की आराधना और स्थिरता ही है, द्रव्यलिंग नहीं।

(सवैया इकतीसा)

भेषमैं न ग्यान, नहिं ग्यान गुरु-वर्तन में, मंत्र-जंत्र-तंत्र में न ग्यानकी कहानी है।
ग्रंथमैं न ग्यान, नहिं ग्यान कवि-चातुरी में, बातनिमैं ग्यान, नहिं ग्यान कहा बानी है।।
तातैं भेष-गुरुता-कवित्त-ग्रंथ-मंत्र-बात, इनतैं अतीत ग्यान-चेतना-निसानी है।

ग्यानही में ग्यान, नहिं ग्यान और ठौर कहूँ, जाकै घट ग्यान, सोई ग्यान का निदानी है।। 112।।

एवं ज्ञानस्य शुद्धस्य देह एव न विद्यते।
ततो देहमयं ज्ञातुर्न लिङ्गं मोक्ष-कारणम्।। 45।।

शब्दार्थ :- भेषमैं न ग्यान= भेष में ज्ञान नहीं है, नहिं ग्यान गुरु-वर्तन मैं= गुरू बनकर घूमने में भी ज्ञान नहीं है, मंत्र-जंत्र-तंत्रमैं= मंत्र-तंत्र-जंत्र में, न ग्यानकी कहानी है= न ही ज्ञान की कोई कहानी/प्रवृत्ति है, ग्रंथमैं न ग्यान= ग्रंथ में ज्ञान नहीं है, नहिं ग्यान कवि-चातुरी में= और न ही ज्ञान कवि की चतुराई में है, बातनिमैं ग्यान नहिं= बातों में ज्ञान नहीं है, ग्यान कहा बानी है= ज्ञान वचनों में कहाँ है? तातैं भेष-गुरुता-कवित्त= इसलिए भेष, गुरुता, कवित्त, ग्रंथ-मंत्र-बात= ग्रंथ, मंत्र, बात, इनतैं अतीत ग्यान-चेतना निसानी है= इन सबसे ज्ञानचेतना का लक्षण भिन्न है, ग्यानहीमैं ग्यान= ज्ञान में ही ज्ञान है, नहिं ग्यान और-ठौर कहू= ज्ञान (उत्पत्ति) का कोई अन्य स्थान नहीं है, जाकै घट ग्यान= जिसके अंतरंग में ज्ञान है, सोई ग्यान का निदानी है= वही ज्ञान का मूल स्वामी है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि ज्ञान ज्ञेयों से नहीं होता, ज्ञान का स्थान केवल आत्मा है। लोक में बहुत से ज्ञान-परक-संसाधन प्रचलित है, जिनको देखकर अज्ञानी-जीव भ्रमित होता है कि ज्ञान इसी में से आ रहा है, और वह उनके पीछे दौड़ लगाता है। जबकि कविवर कहते हैं कि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का भेष धारण कर ले, तब भी वह ज्ञानी नहीं हो सकता है। बहुत से लोग धनादि के लालच में गुरु या महात्मा बनकर घूमते हैं, पर उनसे भी ज्ञान नहीं होता। मंत्र, तंत्र, जंत्र की कहानी में भी ज्ञान नहीं है, अर्थात् कोई कितनी भी मंत्र-सिद्धि आदि कर ले, फिर भी ज्ञान नहीं हो सकता। शास्त्रों में ज्ञान नहीं है, अधिकांश-जीव ये समझते हैं कि ये तो बहुत-शास्त्रों के ज्ञाता है, सो ये तो बहुत ज्ञानी हैं, और हम तो पढ़ेलिखे ही नहीं है, सो हम तो अज्ञानी हैं; परन्तु ऐसा नहीं है। क्योंकि ग्यारह-अंग नौ-पूर्व का पाठी द्रव्यलिंगीमुनि संसार में भटकता है, और जो पढ़ना भी नहीं जानते ऐसे तिर्यंचादि भी मोक्षमार्ग प्रशस्त कर लेते हैं। कवि की चतुराई अर्थात‍् कविता-कौशल में भी ज्ञान नहीं है, और न इसमें ज्ञान है कि कौन कितनी चतुराई और तर्क से अपनी बात को सिद्ध करने की क्षमता रखता है। और न ही जिनवचनों में ज्ञान है, अधिकांश-जीव यही मानते हैं कि यदि हमने जिनवचनों को सुनभर लिया, तो हमें ज्ञान हो जायेगा, परन्तु ऐसा नहीं है। ये सब संसाधन ज्ञान-प्राप्ति के कारण तो हो सकते हैं, पर ज्ञान नहीं हैं; क्योंकि ज्ञान तो चेतन-आत्मा का स्वभाव है, और उपर्युक्त सभी पदार्थ अचेतन हैं, जड़ हैं, भला एक जड़-पदार्थ से चैतन्य-स्वरूप ज्ञान की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? दोनों ही भिन्न-द्रव्य हैं और दोनों में अत्यंताभाव है। इसीलिए भेष, महंतता/गुरुता/पंडिताई, कवित्त या काव्य-कौशल, शास्त्र/आगम, तंत्र-मंत्र, यहाँ तक कि जिनवचनों में भी ज्ञान नहीं है। ज्ञान-चेतना तो इन सबसे भिन्न चैतन्य-लक्षणवाली है। ज्ञान की उत्पत्ति सिर्फ ज्ञान से ही होती है, अर्थात् छहों द्रव्यों में से एकमात्र आत्मा ही ज्ञानस्वरूप है, अन्य कोई नहीं। और सुखी होने के लिए या मोक्ष-प्राप्त करने में निज-आत्मस्वरूप का ज्ञान ही एक मात्र सम्यक्कारण है। जगत् में भी हम देखते हैं कि जो वस्तु जिसकी है, वही उसका स्वामी होता है। ठीक उसीप्रकार जिसके हृदय में ज्ञान की उत्पत्ति होती है, वही उसका असली-स्वामी होता है, अर्थात् मैं भगवान् आत्मा स्वयं ही अपने अनंतज्ञान का स्वामी हूँ, और स्वयं ही, स्वयं के आश्रय से ही ज्ञानी बन सकता हूँ।

(सवैया इकतीसा)

भेष धरि लोकनिकौं बंचै सो धरम-ठग, गुरु सो कहावै गुरुवाई जाहि चहिये।
मंत्र-तंत्र-साधक कहावै गुनी-जादूगर, पंडित कहावै पंडिताई जामैं लहिये।।
कवित्त की कलामैं प्रवीन सो कहावै कवि, बात कहि जानै सो पवारगीर कहिये।
एतौ सब विषै के भिखारी मायाधारी-जीव, इन्हकौं विलोकिकै दयालरूप रहिये।। 113।।

सर्व विशुद्धि-द्वार शब्दार्थ :- भेष धरि लोकनिकौं बंचै सो धरम-ठग = भेष धारणकर लोगों को ठगता है, वह धर्म का ठग है, गुरु सो कहावै गुरुवाई जाहि चहिये= गुरु वही कहलाता है, जिसमें गुरुता होती है, मंत्र-तंत्र साधक कहावै गुनी जादूगर= मंत्र-तंत्र को साधनेवाला, गुनिया/ओझा-जादूगर कहलाता है, पंडित कहावै, पंडिताई जामैं लहिये= पंिडत वही कहलाता है जिसमें पंडिताई होती है, कवित्त की कलामैं प्रवीन सो कहावै कवि= काव्य-कौशल की कला में निपुण, वह कवि कहलाता है, बात कहि जानै सो पवारगीर कहिये= जो अपनी बात कहना जानता है, उसे व्याख्याता कहते हैं, एते सब विषै के भिखारी मायाधारी-जीव= ये तो सब विषयों के भिखारी, मायाचारीजीव हैं, इन्हकौं विलोकिकै दयालरूप रहिये= इनको देखकर, दया का पात्र/बेचारे ही मानकर व्यवहार करना चाहिए। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि आत्मज्ञान के बिना सारा पांडित्य-प्रदर्शन मात्र है। जगत् में नाना-प्रकार के धर्म और उनके नाना-प्रकार के अनुयायी हैं, जो धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह करते हैं, झूठे क्रियाकांडों में उलझाते हैं, और पैसा एेंठते हैं, वास्तव में वो धर्मात्मा नहीं, धर्म के ठग हैं। लोक में भी गुरु वे कहलाते हैं, जिनमें गुरुता हो, न कि वो जिनमें गुरुता के नाम पर कोरा-अहंकार भरा हो, जिसके चलते वह अपने को सबसे बड़ा और सामनेवाले को सबसे छोटा समझते हैं। मंत्र-तंत्र, जादू-टोना आदि की सिद्धि करने वाले, जो अपने को तांत्रिक, जादूगर कहते हैं, वास्तव में तो वे सिर्फ पैसे के पुजारी होते हैं, और लोगों को भ्रमित करते हैं। पूजा-पाठ, हवन आदि करानेवाले आजकल पंडित कहलाते हैं, जिन्हें मात्र अपनी दान-दक्षिणा से मतलब होता है, धर्म-कर्म से उन्हें कोई लेना देना नहीं होता। काव्य-कौशल में निपुण अर्थात् जनता को प्रसन्न करने के लिये अच्छी-अच्छी कवितायें सुनाकर उनका दिल जीतने के पीछे कवि का एकमात्र-उद्देश्य पैसा कमाना होता है। अपनी बात को तर्कपूर्ण-ढंग से कहनेवाला व्याख्याता होता है, वह भी ये सब पैसे कमाने के लिए ही करता है। वास्तव में देखा जाये, तो उपर्युक्त वर्णित सभी जीव मायाचारी में सिद्धहस्त होते हैं, क्योंकि उनकी वाणी कुछ कहती है, और उनके मन में कुछ और ही होता है। ये पंचेन्द्रिय-विषयों के भिखारी हैं, अर्थात् विषय-सेवन के लिये अपना प्रयोजन साधते हैं। जहाँ इनका प्रयोजन पूरा हुआ, वहीं ये रास्ता बदल लेते हैं। कविवर कहते हैं ‘‘ऐसे जीवों को देखकर उन पर क्रोध नहीं करुणा आना चाहिए, ये जीव तिरस्कार के नहीं दया के पात्र हैं, क्योंकि ये सच्चाई से अनभिज्ञ हैं।’’

(दोहा)

जो दयालता-भाव सो, प्रगट ज्ञान कौ अंग।
पै तथापि अनुभौ-दसा, वरतै विगत-तरंग।। 114।।

दरसन-ग्यान-चरन-दसा, करै एक जो कोइ।
थिर ह्वै साधै मोख-मग, सुधी-अनुभवी सोइ।। 115।।

शब्दार्थ :- जो दयालता-भाव= जो दया/करुणा का भाव है, सो प्रगट ज्ञान कौ अंग= वह स्पष्ट रूप से ज्ञान का अंग है, पै तथापि अनुभौ-दसा= फिर भी अनुभव की स्थिति, वरतै विगत-तरंग= तो इन विकल्पों से रहित ही वर्तती है।। 114।। दरसन-ग्यान-चरन-दसा= दर्शन, ज्ञान, चारित्र की स्थिति, करै एक जो कोइ= जो भी एकरूप करते है, दर्शन-ज्ञान-चारित्र-त्रयात्माकतत्त्वमात्मनः। एक एव सदा सेव्यो मोक्षमार्गो मुमुक्षुणा ।। 46।। थिर ह्वै साधै मोख-मग= स्थिर होकर मोक्षमार्ग साधते हैं, सुधी-अनुभवी सोइ= वही अनुभवी-ज्ञानी है।। 115।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने सच्चे-आत्मानुभवी का लक्षण वर्णित किया है। पिछले-छंद में कवि ने सभी जीवों पर करुणा की बात कही थी, फिर चाहे वो हमारे लिये अपकारी हों या उपकारी। करुणा के भी दो रूप देखने को मिलते हैं- करुणा का रागरूप और करुणा का वीतरागरूप। अज्ञानी-जीवों के द्वारा की जाने वाली करुणा रागरूप है, क्योंकि उसमें कहीं न कहीं लौकिक या पारलौकिक-स्वार्थ छिपा रहता है। और भावलिंगी-मुनियों के द्वारा की जानेवाली करुणा वीतराग-रूप है, जो निःस्वार्थ-भाव से की गई है। ज्ञानी-जीवों के द्वारा की जानेवाली शास्त्र-रचना हम भ्रमित-जीवों पर निस्वार्थरूप से की गई करुणा का भाव ही तो है, अन्यथा वे तो अपने स्वरूप की साधना में लीन थे, उन्हें शास्त्र-रचना करने की क्या जरूरत थी? मुनि-भगवंतों के द्वारा की जानेवाली इसी करुणा को कवि ने यहाँ साक्षात् ‘ज्ञान का अंग’ माना है। लेकिन फिर भी ये करुणा है तो विकल्परूप ही, और स्वरूप की अनुभूति तो इन विकल्पों से भी परे है, अर्थात् आत्मानुभूति तो निर्विकल्प ही होती है। जो जीव इन समस्त विकल्पों से रहित दर्शन, ज्ञान, चारित्र की एकता से ही मोक्षमार्ग को साधता है, अर्थात् मोक्षमार्ग पर अग्रसर होता है, वही सच्चा-भेदविज्ञानी अनुभवी ज्ञानी-जीव है।

(सवैया इकतीसा)

जोई द्रिग-ग्यान-चरनातम मैं बैठि ठौर, भयौ निरदौर पर-वस्तु कौ न परसै।
सुद्धता विचार, ध्यावै, सुद्धता में केलि करै, सुद्धता में थिर ह्वै अमृत-धारा बरसै।।
त्यागि तन-कष्ट ह्वै सपष्ट अष्ट-करमकौ, करि थान-भ्रष्ट-नष्ट करै और करसै।
सोतौ विकलप-विजई अलप-काल-माँहि, त्यागि भौ-विधान, निरवान-पद परसै।। 116।।

शब्दार्थ :- जोई द्रिग-ग्यान-चरनातम मैं बैठि ठौर= जो दर्शन-ज्ञान-चारित्रस्वरूप आत्मा में स्थिर होकर, भयौ निरदौर= परिणामों की चंचलता से रहित होता है, पर-वस्तु कौ न परसै= पर-पदार्थों को स्पर्श नहीं करता, सुद्धता विचारै= शुद्धता का विचार करता है, ध्यावै सुद्धता में केलि करै= शुद्धता को ध्याता है, उसी में केलि करता है, सुद्धता में थिर ह्वै= शुद्धता में स्थिर होकर, अमृत-धारा बरसै= अमृतधारा को बरसाता है, त्यागि तनकष्ट= शारीरिक-कष्ट को त्यागकर, ह्वै सपष्ट अष्ट-करमकौ= आठों कर्मों की स्पष्टरूप से, करि थान-भ्रष्टनष्ट= स्थान-भ्रष्ट व नष्ट करके, करै और करसै= करता है और अधिक करेगा, सोतौ विकलप-विजई= उस विकल्प को भी जीतनेवाला, अलप-काल-माँहि= अल्पकाल में ही, त्यागि भौ-विधान= भवभ्रमण का विधान त्यागकर, निरवान-पद परसै= मोक्ष-पद को स्पर्श करता है। विशेषार्थ :- एक सच्चे आत्मानुभवी-जीव को अनुभव का क्या फल मिलता है?- इसी का वर्णन कवि ने इस-छंद में किया है। दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप परिणमन करना आत्मा का स्वभाव है; जब ये परिणमन स्व-स्वरूप/स्व के लक्ष्य से होता है, तब-सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र नाम पाता है; जब वही परिणमन परस्वरूप/पर के लक्ष्य से होता है, तब मिथ्यादर्शन-मिथ्याज्ञान-मिथ्याचारित्र नाम पाता है। यहाँ सच्चे आत्मानुभवी-जीव का प्रकरण है; अतः जब जीव दर्शन, ज्ञान, चारित्र-स्वरूप आत्मा में बैठकर अर्थात् स्थित होकर/दृढ़-श्रद्धानी होकर, पर-संबंधी समस्त विकल्पों से रहित हो जाता है। सर्व विशुद्धि-द्वार यहाँ तक कि उसके भावों में भी पर-वस्तु का स्पर्श नहीं रहता। फिर वह आत्मानुभवी-जीव शुद्ध-स्वरूप आत्मा का ही विचार करता है, उसी का ध्यान करता है, और उसी में अर्थात् शुद्धात्मा में ही केलि करता है; रसास्वादन करता है। शुद्ध-स्वरूप आत्मा में स्थिर होकर आनंदरूपी-अमृत की बरसात करवाता है, अर्थात् आनंदित होता है। शारीरिक-कष्ट का त्याग अर्थात् शरीर से ममत्व का त्यागकर, और स्पष्टरूप से आठों-कर्मों की स्थिति को और भी जीर्ण-शीर्ण कर देता है] फिर धीरे-धीरे उनकी निर्जरा और क्षय करता है। अंत में विकल्प-मात्र को भी त्यागकर अल्पकाल में ही संसार के विधि-विधान अर्थात् जन्म-मरण के दुःखों से छूटकर अविनाशी निर्वाण-पद को प्राप्त करता है।

(चौपाई)

गुन-परजै में द्रिष्टि न दीजै, निरविकलप-अनुभौ-रस पीजै।
आप समाइ आपमैं लीजै, तनुपौ मेटि अपनुपौ कीजै।। 117।।

(दोहा)

तजि-विभाउ हूजै मगन, सुद्धातम-पद-माँहि।
एक मोख-मारग यहै, और दूसरौ नांहि।। 118।।

शब्दार्थ :- गुन-परजै में द्रिष्टि न दीजै= गुण-पर्याय में उपयोग नहीं लगाओ, निरविकलप-अनुभौ-रस पीजै= निर्विकल्प-आत्मानुभव का रस पियो, आप समाइ आप मैं लीजै= अपने को अपने में समा लो, तनुपौ मेटि अपनुपौ कीजै= तन में अपनापन मेटकर, अपने में अपनापन करो।। 117।। तजि-विभाउ= विभावों को छोड़कर, हूजै मगन सुद्धातम-पद माँहि= शुद्धात्म-स्वरूप में मगन होओ, एक मोख-मारग यहै= एक यही मोक्षमार्ग है, और दूसरौ नांहि= और दूसरा नहीं है।। 118।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने भव्यजीवों को न केवल पर-संबधी बल्कि स्वात्मानुभूति-संबंधी भी सभी विकल्पों का त्यागकर एक मात्र आत्मिक-रस का वेदन करने का उपदेश दिया है; क्योंकि विकल्प कैसा भी हो, आनंद के वेदन में बाधक ही है। यह-छंद उपदेशात्मक-शैली में लिखा गया है, जो जीव आत्मस्वरूप की अनुभूति के लिये पुरुषार्थरत तो हैं, लेकिन आत्मा के गुणों अर्थात् आत्मस्वरूप में कौनसे गुण हैं, कौनसे नहीं है? क्या अस्ति है, क्या नास्ति है? पर्यायों में अर्थात् अभी तो अमुक-पर्याय में हूँ, अमुक-काल में हूँ, अभी तो मोक्ष हो ही नहीं सकता,-इत्यादि विकल्पों में उलझ जाते हैं, उन जीवों को संबोधित करते हुए कविवर कहते हैं कि इन विकल्पों से अपने उपयोग को हटाओ, अपने को मात्र ज्ञाता-दृष्टा अनुभव करो, और विकल्प-रहित आत्मिक-आनंद के रस का वेदन करो; क्योंकि जबतक विकल्पों में उलझे रहोगे, तबतक वास्तविक-आनंद की अनुभूति नहीं होगी। अब तो अपने को अपने में समा लो अर्थात् अपने उपयोग को समस्त बाह्य-विकल्पों से हटाकर एकमात्र शुद्ध-स्वरूप में ही स्थित करो, और शरीरादि पर-संयोगों और संयोगी-भावों में जो अहंबुद्धि या अपनापन है, उसका त्यागकर अपने ज्ञायक भगवान् आत्मा में अपनापन करो। यहाँ तक कि विभाव अर्थात् स्वभाव के विपरीत, स्वरूप से बाहर मोह, राग, द्वेष, व्रत, तप, नियम, संयमादि के जो भी विकल्प एको मोक्षपथो य नियतो दृग्ज्ञप्ति-वृत्त्यात्मक-स्तत्रैव स्थितिमेति यस्तमनिशं ध्यायेच्च तं चेतति। तस्मिÂन्नेव निरन्तरं विहरति द्रव्यान्तराण्यस्पृशन्, सोऽवश्यं समयस्य सारमचिरािÂन्नत्योदयं विन्दति।। 47।। है, वह सब विभाव ही है; उनको छोड़कर अपने उपयोग को शुद्धात्मा में ही स्थिर करो, क्योंकि केवल यही मुक्ति का मार्ग है, दूसरा कोई नहीं। कहने का अभिप्राय यह है कि इसके अलावा शेष सभी भेष या मार्ग संसार में ही परिभ्रमण करानेवाले हैं।

(सवैया इकतीसा)

केई मिथ्याद्रिष्टि-जीव धरैं जिनमुद्रा-भेष, क्रियामैं मगन रहैं कहैं हम जती हैं।
अतुल, अखंड, मल-रहित, सदा उदोत, ऐसे ग्यान-भावसौं विमुख मूढ़मती हैं।।
आगम संभालै, दोस टालैं, विवहार भालैं, पालैं व्रत जदपि, तथापि अविरती हैं।
आपुकौं कहावैं मोख-मारग के अधिकारी, मोखसौं सदीव-रुष्ट दुष्ट-दुरमती हैं।। 119।।

शब्दार्थ :- केई मिथ्याद्रिष्टि-जीव= कई मिथ्यादृष्टि-जीव, धरैं जिनमुद्रा-भेष= दिगम्बर-मुद्रा का वेश धारणकर, क्रियामैं मगन रहैं= बाहरी-क्रिया में मग्न रहते हैं, कहैं हम जती हैं= और स्वयं को ‘मुनि’ कहते हैं, अतुल अखंड मल-रहित = तुलना-रहित, भेद-रहित, विकार-रहित, सदा उदोत= सदा प्रकाशरूप, ऐसे ग्यानभावसौं विमुख= ऐसे ज्ञान-भाव से विमुख, मूढ़मती हैं= बुद्धिहीन/अज्ञानी हैं, आगम संभालैं= शास्त्र का अध्ययन करते हैं, दोस टालैं= बाहरी-दोषों से बचते हुये, विवहार भालैं= व्यवहार में सावधान रहते हैं, जदपि पालैं व्रत= यद्यपि व्रतादिक का पालन करते हैं, तथापि अविरती हैं= फिर भी अव्रती हैं, आपुकौं कहावै= स्वयं को कहलवाते हैं, मोख-मारग के अधिकारी= मोक्षमार्ग का अधिकारी, मोखसौं सदीव-रुष्ट= मोक्ष से सदैव रूठे हुये, दुष्ट दुरमती हैं= दुष्ट, दुर्बुद्धि-जीव हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन जीवों को संबोधित किया है, जो आत्मानुभूति को छोड़कर शरीराश्रित सभी बाह्य-क्रियायें यथायोग्य पालते हुये भी संसार में ही परिभ्रमण करते हैं। जगत‍् में नाना-प्रकार के जीव हैं, और सभी धर्म के नाम पर कुछ न कुछ अवश्य करते हैं, फिर चाहे वह गलत हो या सही। जैन-आम्नाय में बाह्य में जिनमुद्रा अर्थात् समस्त अंतरंग-बहिरंग परिग्रह से रहित वीतरागी नग्न-दिगम्बर-मुद्रा को मोक्ष का कारण माना गया है; लेकिन उस जिनमुद्रा को धारण करने से पहले निज-शुद्धात्मा का चिंतन-मनन और अनुभवन होना अति-आवश्यक है, अन्यथा जैसे बिना बीज के खेती का कोई महत्त्व नहीं होता, उसीप्रकार बिना आत्मानुभूति के अर्थात् बिना सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान के निरतिचार-चारित्र का पालन भी ‘सम्यक्’ नाम नहीं पाता है। बहुत से मिथ्यादृष्टि-जीव, अर्थात‍् वे जीव जिन्हें अभी सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं हुई है, लेकिन भावावेश में या अन्य किसी भी कारणवश ‘जिनमुद्रा’ अर्थात् ‘नग्नमुद्रा’ को धारण करते हैं, और मुनिधर्मसंबंधी बाहरी-क्रियाओं में मगन रहते हैं अर्थात् 28 मूलगुणों का निरतिचार-पालन करते हैं, और स्वयं को ‘मुनि’ कहकर या कहलवाकर अपनी पूजा-वंदना करवाते हैं। लेकिन जिसकी तुलना-योग्य जगत् में अन्य कोई पदार्थ नहीं है- ऐसा अतुलनीय, पर्यायगत भेद-रहित- अखंड, रागादि-विकारों के मल से रहित- अमल/निर्मल, किसी भी गति में, किसी भी स्थिति में अपना जीवत्व-स्वभाव नहीं छोड़ता- सदा उदोत ऐसे ज्ञान-स्वभावी आत्मा से पूर्णत: विमुख अर्थात् अनुभूति से रहित हैं, वे जीव मूर्ख हैं, बुद्धिहीन है। ये त्वेनं परिहृत्य संवृति-पथ-प्रस्थापितेनात्मना, लिङ्गे द्रव्यमये वहन्ति ममतां तत्त्वावबोध-च्युताः। नित्योद्योतमखण्डमेकमतुलालोकं स्वभावप्रभा-प्राग्भारं समयस्य सारममलं नाद्यापि पश्यन्ति ते।। 48।। सर्व विशुद्धि-द्वार यद्यपि ये जीव आगम को संभालते हैं, अर्थात् आगम का अभ्यास करते हैं, चिंतन, मनन, पठनपाठन भी करते हैं, निर्दोष-विधि से आहार-विहार आदि समस्त क्रियायें करते हैं। व्रत, नियम, संयमादिक्रियायें भी करते हैं, लेकिन फिर भी आत्मानुभव न होने से ‘अव्रती’ ही कहलाते हैं। कैसी बिडम्बना है कि ऐसे जीव स्वयं को मोक्ष का अधिकारी भी कहते हैं, जबकि वे मोक्ष का स्वरूप भी नहीं जानते। मात्र क्रियाकांडरूपी कर्तृत्वपने का बोझ सिर पर रखकर मोक्ष से कोसों दूर चले जाते हैं। इसलिए कविवर कहते हैं कि ऐसे जीव मोक्ष से सदैव रुष्ट/नाराज, दुष्ट और दुर्बुद्धि हैं।

(चौपाई)

जैसे मुगध धान पहिचानै, तुष-तंदुल कौ भेद न जानै।
तैंसैं मूढ़मती-विवहारी, लखै न बंध-मोख-गति न्यारी।। 120।।

(दोहा)

जे विवहारी मूढ़-नर, परजै-बुद्धी जीव।
तिन्हकौं बाहिज-क्रियाविषैं, है अवलंब सदीव।। 121।।

शब्दार्थ :- जैसे मुगध धान पहिचानै= जैसे कोई भोला-पुरुष धान को तो पहिचाने, तुष-तंदुलकौ भेद न जानै= लेकिन छिलके और चावल के भेद को न जाने, तैंसैं मूढ़मती-विवहारी= उसीप्रकार अज्ञानी व्यवहारीजीव, लखै न बंध-मोख-गति न्यारी= बंध और मोक्ष की भिन्नता को नहीं पहिचानता।। 120।। जे विवहारी मूढ़-नर= जो व्यवहार में लीन अज्ञानी-जीव, परजै-बुद्धी-जीव= पर्याय में अहंबुद्धि करनेवाले, तिन्हकौं बाहिज-क्रियाविषैं= उनको बाह्य-क्रियाओं में ही, है अवलंब सदीव= सदैव अवलंबन रहता है।। 121।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने अज्ञानी मिथ्यादृष्टि-जीव की मनोवृत्ति का सटीक-चित्रण किया है। जैसे कोई भोला-मनुष्य धान अर्थात् छिलका सहित चावल को तो जानता हो, लेकिन धान के अंदर के चावल और छिलके के भेद अर्थात् अंतर को न जानता हो, वह मूर्ख है, अर्थात् वह यह नहीं जानता है कि इस धान के अंदर का चावल प्रयोजनभूत है, अतः उसे उपयोग में लेना है, और छिलका अप्रयोजनभूत है, अतः उसे छोड़ना है। उसीप्रकार अज्ञानी-जीव देह को ही प्रयोजनभूत, और देहाश्रितक्रियाओं को ही उपादेय मानकर ग्रहण करना चाहे, तो वह मूर्ख है, दुर्बुद्धि है, क्योंकि जैसे धान के अंदर प्रयोजनभूत चावल विद्यमान है, ठीक उसीप्रकार इस देह-देवालय के अंदर प्रयोजनभूत ज्ञायकभगवान्-आत्मा विराजमान है। जैसे हम धान के ऊपर के छिलके को हटाकर चावल का उपयोग करते हैं, उसीप्रकार अप्रयोजनभूत-देहादिक से दृष्टि हटाकर प्रयोजनभूत-शुद्धात्मा को ग्रहण करना चाहिए। पूजा-पाठ, व्रतादिक, यहाँ तक कि 28 मूलगुणों का निरतिचार-पालन करना भी देहाश्रित-क्रिया है, जो कि एक भिन्न-द्रव्य है, और देहाश्रित समस्त-क्रियाओं का कर्त्ता अर्थात‍् पर का कर्त्ता स्वयं को मानना ही तो मिथ्यात्व है, धर्म कैसे हो सकता है? इसी झूठी-मान्यता से ही तो कर्म का बंध होता है, और

जिन परिणामों से बंध होता है, उन परिणामों से मोक्ष कैसे हो सकता है? विचार तो करो।
व्यवहार-विमूढदृष्टयः परमार्थं कलयन्ति नो जनाः।
तुष-बोध-विमुग्ध-बुद्धयः कलयन्तीह तुषं न तण्डुलम् ।। 49।।

हे आत्मन्! बंध और मोक्ष का न केवल स्वरूप भिन्न है, बल्कि दोनों की चाल भी भिन्न है। दोनों के कारण और फल भी पूर्णत: भिन्न है, फिर दोनों एकरूप कैसे हो सकते हैं? इसीलिए जो जीव व्यवहार में अर्थात् पूजा-पाठ, व्रत-संयम आदि में ही मग्न हैं, जिनको पर्याय के प्रति अहंबुद्धि, देह के प्रति ममत्वबुद्धि निरन्तर बनी रहती है; उन्हें हमेशा बाह्य-क्रियाओं का ही अवलंबन रहता है अर्थात् उन जीवों ने हमेशा देहाश्रित-क्रियाओं में ही धर्म माना है, कविवर कहते हैं कि वे जीव भी अज्ञानी हैं।

(दोहा)

कुमति बाहिज-दृष्टिसौं, बाहिज-क्रिया करंत।
मानै मोख-परंपरा, मन मैं हरष धरंत।। 122।।

सुद्धातम-अनुभौ-कथा, कहै समकिती कोइ।
सो सुनिकैं तासौं कहै, यह सिवपंथ न होइ।। 123।।

शब्दार्थ :- कुमति बाहिज दृष्टिसौं= कुबुद्धि बहिर्मुख-दृष्टि से, बाहिज-क्रिया करंत= बाह्य-क्रियायें करता है, मानै मोख-परंपरा= उसी से मोक्ष की परम्परा मानता है, मन मैं हरष धरंत= मन ही मन हर्षित होता है।। 122।। सुद्धातम-अनुभौ कथा= शुद्ध-स्वरूप के अनुभव की चर्चा, कहै समकिती कोइ= कोई सम्यग्दृष्टिजीव कहता है, सो सुनिकैं तासौं कहै= उसे सुनकर उनसे कहता है, यह सिवपंथ न होइ= यह मोक्षमार्ग नहीं है।। 123।। विशेषार्थ :- मिथ्यादृष्टि-जीव अर्थात् वह जीव, जिसकी बुद्धि हमेशा आत्महित से विपरीत ही परिणमन करती है, सत्य-मार्ग की जानकारी हो जाने पर भी उसे स्वीकार नहीं करती- ऐसे जीवों की मानसिकता और प्रवृत्ति का वर्णन कवि ने उपर्युक्त-छंदों में किया है। जिन जीवों की दृष्टि बहिर्मुख है, अर्थात् देहादिक पर-संयोगों और रागादि पर-भावों में आसक्त है, वे अपने सुख-दु:ख का कारण भी दूसरों को ही मानते हैं; इसीलिए धर्म साधने के लिये भी वे बाह्यक्रियाओं में ही अनुरक्त होते हैं या कहें रुचिपूर्वक प्रवर्तते हैं। इतना ही नहीं मुक्ति का कारण भी वे बाह्यक्रियाओं पूजा-पाठ व्रत, नियम, संयम, दिगम्बरत्व आदि को ही मानते हैं, इसलिये स्वयं तो उन क्रियाओं में सहर्ष-प्रवर्तन करते ही हैं, दूसरों को भी उसकी ही प्रेरणा देते हैं। यदि कोई सम्यक्-श्रद्धानी-जीव उन भ्रमित-जीवों को शुद्ध-स्वरूप की अनुभूति का मार्ग बताये, सत्य-धर्म की चर्चा करे; तो पहले तो वह सुनने को ही तैयार नहीं होते और कदाचित् सुन भी लें, तो मानते नहीं, बल्कि कुतर्क करते हैं। और कहते है कि ‘‘यह मुक्ति का मार्ग नहीं है, मुक्ति का मार्ग तो तपस्या करना है, जबतक 28 मूलगुणों का पालन अर्थात् देहाश्रित बाह्य-क्रियायें नहीं करेंगे, तबतक मुक्ति कैसे होगी?’’ सो उन क्रियाओं को पालने का अथक-पुरुषार्थ करते हैं।

(कवित्त)

जिन्हके देहबुद्धि घट-अंतर, मुनिमुद्रा-धरि क्रिया-प्रवांनाहि।
ते हिय-अंध बंध के करता, परम-तत्तकौ भैद न जानहिं।।
जिन्हके हिए सुमति की कनिका, बाहिज-किया भेष पर-मानहि।
ते समकिती मोख-मारग-मुख, करि प्रस्थान भवस्थिति भानहि।। 124।।

द्रव्यलिङ्ग-ममकार-मीलितैर्दृश्यते समयसार एव न।
द्रव्यलिङ्गमिह यत्किलान्यतो ज्ञानमेकमिदमेव हि स्वतः।। 50।।

सर्व विशुद्धि-द्वार शब्दार्थ :- जिन्हके देहबुद्धि घट-अंतर= जिनके अंतरंग में देह के प्रति ममत्वबुद्धि है, मुनिमुद्रा-धरि क्रिया- प्रवांनाहि= मुनिमुद्रा को धारणकर बाह्य-क्रिया को ही उपादेय मानते हैं, ते हिय-अंध बंध के करता= वे हृदय के अंधे हैं, बंध के कर्त्ता हैं, परम-तत्तकौ भैद न जानहि= आत्मतत्त्व का मर्म नहीं जानते, जिन्हके हिए सुमति की कनिका= जिनके हृदय में सम्यग्ज्ञान की किरण प्रकाशित हुई है, बाहिज-किरिया-भेष पर मानहि= बाह्य-क्रिया और भेष को ‘पर’ मानते हैं, जे समकिती मोख-मारग मुख= वे सम्यग्दृष्टि मोक्षमार्ग के सन्मुख होकर, करि प्रस्थान भवस्थिति भानहि= गमन करते हैं, और संसार की स्थिति को क्षीण करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मिथ्यादृष्टि-जीव और सम्यग्दृष्टि-जीव की विचारधारा के अंतर को स्पष्ट किया है। जिन जीवों के हृदय में देह ओर संयोगों के प्रति अपनापन विद्यमान है, वे जीव मुनिव्रत अंगीकार करने के बाद भी बाह्य- क्रियाकांड को ही श्रेष्ठ मानते हैं। अर्थात् जब देह में ममत्वबुद्धि विद्यमान है, तो देहाश्रित पलनेवाली-क्रियाओं में भी रुचि और प्रवृत्ति वर्तती है। ऐसे जीव सच्चे-मोक्षमार्ग की कल्पना भी उन्हीं बाह्य-क्रियाओं से करते हैं। कविवर कहते हैं कि वे जीव हृदय के अंधे हैं, जैसे अंधे-व्यक्ति को जमीन और खाई का अंतर समझ में नहीं आता; ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव को भी सत्यधर्म और मिथ्याधर्म का अंतर समझ में नहीं आता। यद्यपि वे जीव उन समस्त तथाकथित धर्म-संबंधी बाह्यक्रियाओं को मोक्षमार्ग समझकर करते हैं; लेकिन वे ये नहीं जानते कि इन क्रियाओं से मोक्ष नहीं, बंध की सिद्धि हो रही है। बाह्य-क्रियाओं में अनुरक्त-जीव परम-तत्त्व अर्थात‍् आत्म-तत्त्व के मर्म को ना तो स्वयं समझते हैं, और न ही किसी से समझना चाहते हैं। जबकि इसके विपरीत जिन जीवों के हृदय में सम्यग्ज्ञान की किरण प्रकाशित है अर्थात् देह और आत्मा या स्व और पर के बीच भेदविज्ञान जागृत है, वे जीव बाह्य-क्रियाओं और बाह्य-मुनिभेष को ‘पर’ मानते हैं अर्थात् हेय मानते हैं। जैसे सूर्य की एक किरण भी अंधकार को दूर कर देती है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्ज्ञान की एक किरण भी अनादि के मिथ्यात्व-अंधकार को दूर कर देती है। ऐसे स्व की आराधना में अनुरक्त सम्यग्दृष्टि-जीव ही वास्तव में मोक्षमार्ग की ओर गमन करते हैं, और अपनी भवस्थति अर्थात् अनंत-संसार को, जन्म-मरण के दुःखों को अतिशीघ्र नष्ट करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

आचारज कहैं ''जिनवचन कौ विसतार, अगम-अपार है, कहैंगें हम कितनौ ।
बहुत बोलिबेसौं न मकसूद चुप्प भली, बोलिये सुवचन प्रयोजन है जितनौ’'।।
नानारूप-जलपसौं नाना-विकलप उठैं, तातैं जैतौ-कारज कथन-भलौ तितनौ।
सिद्ध-परमातमाकौ अनुभौ-अभ्यास कीजै, यहै मोखपंथ परमारथ है इतनौ।। 125।।

शब्दार्थ :- आचारज कहैं= आचार्य कहते हैं, जिनवचन कौ विसतार अगम-अपार है= जिनवचनों का विस्तार अगम्य, अंतहीन है, कहैंगें हम कितनौ= हम कितना विस्तार करें, बहुत बोलिबेसौं न मकसूद चुप्प भली= बहुत बोलना इष्ट नहीं है, (इसलिए) मौन रहना अच्छा है, बोलिये सुवचन प्रयोजन है जितनौ= जितना प्रयोजन है, उतना ही बोलो वही सुवचन है, नानारूप-जलपसौं= नानाप्रकार की बकवास करने से, नानाअलमलमतिजल्पैर्दुर्विकल्पैरनल्पै-रयमहि परमार्थश्चिेत्यतां नित्यमेक:। स्वरस-विसर-पूर्णज्ञान-विस्फूर्ति-मात्रा-न्न खलु समयसारादुत्तरं किि®¨fदस्ति ।। 51।। विकलप उठैं= अनेकप्रकार के विकल्प उठते हैं, तातैं जैतौ-कारज= इसलिये जितना काम हो, कथन भलौ तितनौ= उतना ही कथन करना अच्छा है, सिद्ध परमातमाकौ= सिद्धसमान शुद्ध-परमात्मा के, अनुभौ-अभ्यास कीजै= अनुभव का अभ्यास करना चाहिये, यहै मोखपंथ= यही मोक्षमार्ग है, परमारथ है इतनौ= इतना ही निश्चय है या प्रयोजन है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जिनवाणी की अपार-महिमा और प्रयोजनभूत-सुवचनों की आवश्यकता और सार्थकता का सुंदर-वर्णन किया है। जिनवाणी अर्थात् समवसरण के मध्य विराजमान तीन-लोक के नाथ जिनेन्द्र-देव के सर्वांग से निःसृत ओंकारमयी-ध्वनि को ‘दिव्यध्वनि’ या ‘जिनवाणी’ कहते हैं। जो इतनी विस्तृत है कि उसका वर्णन करना असंभव है, चार-ज्ञान के धारी गणधरदेव भी उसका वर्णन करने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं, क्योंकि जिनवचनों का न तो आदि है न अंत, आचार्यदेव कहते हैं कि हम कितना कहें? अर्थात् हम कितना भी वर्णन करें, तब भी हम उसका संपूर्ण-वर्णन नहीं कर सकते। इसलिए बहुत बोलना हमें इष्ट नहीं है, चुप रहना ही श्रेष्ठ है; क्योंकि प्रयोजनभूत वचन ही ‘सुवचन’ हैं, इसलिये उतना ही बोलना चाहिए। नाना-प्रकार के जल्प/बकवास से अर्थात् अत्यधिक विस्तार-पूर्वक कथन करने से बहुत सारे व्यर्थ के विकल्प उठते हैं, और उन विकल्पों में उलझकर जीव भ्रमित हो जाता है। इसलिए कथन हमेशा उतना ही अच्छा होता है, जितने में अपनी बात या प्रयोजन पूरा होता हो। इसलिये एक मात्र सिद्ध समान निज शुद्धात्मा के अनुभव का ही अभ्यास करना चाहिये, क्योकि निश्चय से यहीं मोक्षमार्ग है।

(दोहा)

सुद्धातम-अनुभौ क्रिया, सुद्ध-ग्यान-द्रिग दौर।
मुकति-पंथ साधन यहै, वागजाल सब और।। 126।।

शब्दार्थ :- सुद्धातम-अनुभौ क्रिया= शुद्धात्मा के अनुभव की क्रिया ही, सुद्ध-ग्यान-द्रिग-दौर= सम्यग्ज्ञान, दर्शन और चारित्र है, मुकति-पंथ साधन यहै= मोक्षमार्ग का साधन यही है, वागजाल सब और= शेष सब वचनों का जाल है। विशेषार्थ :- इसीलिए एकमात्र सिद्ध-समान निज-शुद्धात्मा के अनुभव का ही अभ्यास करना चाहिए; क्योंकि निश्चय से यही मोक्षमार्ग है। अपने शुद्धस्वरूप का ऐसा दृढ़-श्रद्धान, ज्ञान और लीनता अर्थात् तदनुरूप प्रवर्तन ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र है। वास्तव में परमार्थ से/निश्चय से यही मोक्ष का कारण है, यही सत्य है; शेष सब मात्र वचनों का मायाजाल है।

(दोहा)

जगत्-चक्षु आनंदमय, ग्यान-चेतनाभास।
निरविकलप-सासुत-सुथिर, कीजै अनुभौ तास।। 127।।

अचल-अखंडित-ग्यानमय, पूरन-बीत-ममत्व।
ग्यानगम्य बाधा-रहित, सो है आतम-तत्त्व।। 128।।

सर्वविशुद्धी-द्वार यह, कह्यौ प्रगट सिवपंथ।
कुन्दकुन्द-मुनिराज-कृत, पूरन भयौ गरंथ।। 129।।

इदमेकं जगच्चक्षुरक्षयं याति पूर्णताम्। विज्ञान-घनमानन्द-मयमघ्यक्षतां नयत् ।। 52।।

इतीदमात्मनस्तत्त्वं ज्ञान-मात्रमवस्थितम्। अखण्डमेकमचलं स्वसंवेद्यमबाधितम्।। 53।।

सर्व विशुद्धि-द्वार शब्दार्थ :- जगत्-चक्षु आनंदमय= विश्व-चक्षु (विश्व के समस्त-पदार्थों को देखने के लिए नेत्र के समान) अानंद-स्वरूप, ग्यानचेतना-भास= ज्ञानचेतना से प्रकाशित, निरविकलप-सासुत-सुथिर= विकल्प-रहित, शाश्वत, सुस्थिर, कीजै अनुभौ तास= उसका अनुभव करो।। 127।। अचल-अखंडित-ग्यानमय= अविचल, खंडरहित, ज्ञान का घनपिण्ड, पूरन-बीत-ममत्व= पूर्णतः मोह-रहित, ग्यानगम्य बाधा-रहित= ज्ञानगोचर, समस्त-बाधाओं (जन्म-मरण की) से रहित, सो है आतमतत्त्व= ऐसा आत्मतत्त्व है।। 128।। सर्व-विशुद्धी-द्वार यह= यह सर्वविशुद्धि -द्वार, कह्यौ प्रगट सिवपंथ= साक्षात् मोक्षमार्ग को प्रकट करनेवाला, कुन्दकुन्द-मुनिराज कृत= आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा रचित, पूरन भयौ गरंथ= ग्रंथ पूरा हुआ।। 129।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने ‘सर्वविशुद्धि-द्वार’ नामक अधिकार के सार-स्वरूप शुद्धात्मा के स्वरूप का वर्णन और अनुभव की प्रेरणा दी है। कविवर के अनुसार पिछले-छंद में भी अाचार्य देव ने यही कहा कि अत्यधिक-विस्तार करना इष्ट नहीं है; इसलिये आत्महित के लिए जो उपयोगी है, वही कार्य करो। इस अधिकार का सार भी यही है कि आत्मतत्त्व सर्वप्रकार के मोह-रागादि मलों से रहित ‘विशुद्ध’ अर्थात् ‘पूर्ण-शुद्ध’ है; इसलिये अन्यविकल्पों में न उलझकर एकमात्र आत्मस्वरूप के अनुभव का अभ्यास करो। कैसा है वह ‘आत्मतत्त्व’? विश्व के समस्त-पदार्थ एकमात्र ज्ञान से ही प्रकाशित है, अर्थात् ज्ञान के द्वारा ही जानने में आते हैं, जगत् के पदार्थों को प्रकाशित करने के लिए आत्मा नेत्र के समान अर्थात् ‘जगत्-चक्षु’ है ‘आनंदमय’ अर्थात् आनंद से परिपूर्ण है। वह आत्मतत्त्व स्वयं ही स्वयं की ‘ज्ञानचेतना से प्रकाशित’ है, समस्त इष्ट-अनिष्ट संकल्प-विकल्पों से रहित ‘निर्विकल्प’ है, जन्म-मरण से रहित शाश्वत है, ‘सुस्थिर’ यानि किसी भी गति या पर्याय में रहे एकसमान रहता है। ‘अचल’ अर्थात् कभी विचलित नहीं होता, खंड-रहित ‘अखंड’ है, ज्ञान का ‘घन-पिण्ड’ है, ‘पर’ की किसी भी प्रकार की अपेक्षा से रहित स्वयं में ही ‘परिपूर्ण’ है, स्वभाव से मोहादि-विकारों से रहित ‘वीतरागी’ है, ज्ञान से ही जानने योग्य होने से ‘ज्ञानगोचर’ है, जन्म-मरण, क्षुधा-तृषा आदि इन्द्रिय-जन्य समस्त बाधाओं से रहित ‘निराबाध’ है। हे आत्मन्! ऐसा आत्मतत्त्व है, सो उसी का अनुभव/श्रद्धान, ज्ञान और उसी में लीनता का अभ्यास करो। ‘सर्वविशुद्धि-द्वार’ नाम का यह अधिकार वर्णित करता है कि आत्मा सर्वप्रकार के मलों से रहित परिपूर्ण-शुद्ध है, ऐसा अनुभवन ही मोक्षमार्ग है। इसलिये कवि ने इसे साक्षात् मोक्षमार्ग को प्रकट करने का अधिकार कहा। कविवर कहते हैं कि ‘आचार्य कुन्दकुन्द देव’-विरचित ये ‘समयसार’ ग्रंथ यहाँ पूर्ण हुआ।

(चौपाई)

कुन्दकुन्द-मुनिराज प्रवीना, तिन्ह यह ग्रंथ इहाँलौं कीना।
गाथा-बद्ध सुप्राकृत-वानी, गुरु-परम्परा रीति बखानी।। 130।।

भयौ गिरंथ जगत् विख्याता, सुनत महासुख पावहि ग्याता।
जे नवरस जगमाँहि बखानै, ते सब समयसार-रस सानै।। 131।।

शब्दार्थ :- कुन्दकुन्द-मुनिराज प्रवीना= विद्याओं में निपुण कुन्दकुन्द मुनिराज, तिन्ह यह ग्रंथ इहाँलौं कीना= उनने यह ग्रंथ यहाँ तक रचा, गाथा-बद्ध सुप्राकृत-वानी= गाथा-छंद में निबद्ध, श्रेष्ठ-प्राकृतभाषा में, गुरु-परम्परा-रीति बखानी= गुरु-परम्परा का निर्वहन किया।। 130।। भयौ गिरंथ जगत्-विख्याता= यह ग्रंथ लोक में प्रसिद्ध हुआ, सुनत महासुख पावहि ग्याता= सुनते ही ज्ञानीजनों को महान्-सुख की प्राप्ति होती है, जे नवरस जगमाँहि बखानै= जो नव-रस जगत् में कहे गए है, ते सब समयसार-रस सानै= वे सब समयसार-रस में गर्भित हैं।। 131।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने ‘समयसार जी’ ग्रंथ के मूल रचनाकार का उल्लेख और ग्रंथ की महिमा का सुंदर-वर्णन किया है। कविवर कहते हैं ‘‘यहाँ तक ‘समयसार जी’ की रचना लोकप्रचलित जन-भाषा ‘प्राकृत’ के साथसाथ आध्यात्मिक-रहस्य का मर्म खोलने में निपुण कलिकाल-सर्वज्ञ ‘आचार्य कुन्दकुन्द देव’ ने की। इस ‘समयसार जी’ ग्रंथ की रचना आचार्यदेव ने पूर्व से चली आ रही परम्परा का निर्वाह करते हुए उस समय की जन-प्रचलित सरल, सुगम, स्वाभाविक प्राकृत-भाषा में की।’’ आचार्यदेव-रचित यह महान् ग्रंथ लोक में अत्यधिक-प्रसिद्ध हुआ। जो जीव भावपूर्वक इस ग्रंथ को पढ़ते है, सुनते है, चिंतन-मनन करते हैं, वे महान् अतीन्द्रिय-सुख को प्राप्त करते हैं। साहित्य में नाट्यरचना के लिये शृंगार, वीर, करुण, हास्य, रौद्र, जुगुप्सा, भय, अद्भुत और शांत आदि नवरस प्रसिद्ध हैं अर्थात् इन रसों के माध्यम से काव्य-रचना की जाती है। ये सभी रस इस ‘समयसार’ के रस में गर्भित हैं।

(दोहा)

प्रगटरूप संसार मैं, नवरस-नाटक होइ।
नवरस-गर्भित ग्यानमय, विरला जानै कोई।। 132।।

शब्दार्थ :- प्रगटरूप संसार मैं= लोक में प्रत्यक्ष देखते हैं, नवरस-नाटक होइ= नाटक में नवरस होते हैं, नवरस-गर्भित ग्यानमय= लेकिन नवरस ज्ञान में गर्भित हैं, विरला जानै कोई= यह बात कोई विरला ही जानता है। विशेषार्थ :- साहित्य में नाट्य-रचना के लिये श्रृंगार, वीर, करुण, हास्य, रौद्र, जुगुप्सा, भय, अद््भुत और शांत आदि नव-रस प्रसिद्ध हैं, अर्थात् इन रसों के माध्यम से काव्य-रचना की जाती है। ये सभी रस इस ‘समयसार’ के रस में गर्भित है इसका विवेचन करते हुये कविवर कहते हैं कि संसाररूपी रंगमंच पर कर्मोदय-जन्य प्रसंगों में जीव-राजा के द्वारा अनादिकाल से जो नाटक खेला जा रहा है, उसमें ये सभी रस प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। कभी ‘क्रोधादि’-विकार होने पर ‘रौद्र’ रूप, कभी जन्म-मरण के ‘भय’ रूप, कभी अनुकूलताओं के मिलने पर ‘हर्ष’ रूप, कभी प्रतिकूलताओं के मिलने पर ‘विषाद’ रूप, कभी धर्म और धर्मायतनों की रक्षा के लिये ‘वीर’ रूप, कभी जीवों पर दया-भाव रखते हुए ‘करुणा’ रूप, कभी जिनेन्द्रभक्ति में मगन ‘शांत-रस’ रूप दिखाई देता है। इन सभी रसों में श्रेष्ठ ‘शांतरस’ को माना गया है, और यह शांतरस ज्ञान-रस में समाहित है, क्योंकि इन सभी रसों को जाननेवाला एक ज्ञान अर्थात् मैं शुद्धात्मा ही हूँ, ये कोई विरला ही अर्थात‍् ज्ञानी ही जानता है। जहाँ अज्ञानी-जीव इस नाटक में दर्शित नवरसों में उलझकर कभी हर्षित और कभी दु:खी होता है, और नवीन-कर्मों का बंध करके संसार में भटकता है; वहीं ज्ञानी-जीव इन नवरसों के ज्ञाता बनकर इनसे भिन्न आत्मिक-रस का पानकर संसार-परिभ्रमण से छूटकर मोक्ष-सुख को प्राप्त करता है।

(कवित्त)

सर्व विशुद्धि-द्वार

प्रथम सिंगार, वीर दूजौ-रस, तीजौ-रस करुना सुखदायक।
हास्य चतुर्थ, रुद्ररस-पंचम, छट्टम-रस बीभच्छ विभायक।।
सप्तम-भय, अट्ठम-रस अद्भुत, नवमो-शांत रसनिकौ नायक।
ए नव-रस एई नव-नाटक, जो जहँ मगन सोइ तिहि लायक।। 133।।

शब्दार्थ :- प्रथम सिंगार= पहला शृंगार-रस, वीर दूजौ-रस= दूसरा वीर-रस, तीजौ-रस करुना सुखदायक= तीसरा सुखदायी करुणा-रस, हास्य-चतुर्थ= चौथा हास्य-रस, रुद्र रस-पंचम= पाँचवा रौद्र-रस, छट्टम-रस बीभच्छ विभायक= छटवां वीभत्स-रस घृणाजनक, सप्तम-भय= सातवाँ भय-रस, अट्ठम-रस अद्भुत= आठवाँ अद्भुत-रस, नवमो-शांत= नवमां शांत-रस, रसनिकौ नायक= सभी रसों का नायक है, ए नव-रस= ये नौ-रस, एई नव नाटक= ये ही नौ नाटकवत्, जो जहँ मगन= जो जहाँ मगन, सोइ तिहि लायक= वह उसी के लायक है। विशेषार्थ :-नवरसों का नामोल्लेख करते हुये कविवर कहते है पहला शृंगार रस, दूसरा वीररस, तीसरा करूणा रस जो सुखदायक है; चौथा हास्य रस, पांचवां रौद्ररस, छटवां घृणाजनक वीभत्स रस, सातवां भय रस और आठवां अद‍‍्भुतरस, नवमां शांत रस है। ये नवरस साहित्य में काव्य-रचना के लिए प्रसिद्ध हैं। इनमें से शांत-रस को सभी रसों का नायक यानि राजा माना गया है। लेकिन ये भी सच है कि जिस जीव को जो रस रुचिकर लगता है, वह उस रस-संबंधित विषयों की खोज करता है और उस रस का रसास्वादन करता है।

(सवैया इकतीसा)

सोभामैं सिंगार बसै, वीर पुरुषारथमैं, कोमल हिएमैं करुना-रस बखानिये।
आनंद में हास्य, रुंड-मुंडमैं विराजै रुद्र, वीभत्स तहाँ जहाँ ग्लानि मन आनिये।।
चिंतामैं भयानक, अथाहता में अद्भुत, माया की अरुचि तामैं सांत-रस मानिये।
एई नवरस भवरूप, एई भावरूप, इनिकौ विलेछिन सुद्रिष्टि जागैं जानिये।। 134।।

शब्दार्थ :- सोभामैं सिंगार बसै= सुन्दरता में शृंगार-रस बसता है, वीर पुरुषारथमैं= वीर-रस पुरुषार्थ में, कोमल हिएमैं करुना-रस बखानिये= कोमल-हृदय में करुण-रस होता है, आनंद में हास्य= खुशी में हास्य-रस, रुंडमुड ं मैं विराजै रुद्र= रुंड-मुडं में रौद्र-रस रहता है, वीभत्स तहाँ जहाँ ग्लानि मन आनिये= वीभत्स-रस वहाँ होता है, जहाँ मन में घृणा का भाव होता है, चिंतामैं भयानक= चिंता में भयानक-रस, अथाहता में अद्भुत= आश्चर्य में अद्भुत-रस, माया की अरुचि तामैं सांत-रस मानिये= छल-कपट से विरक्ति का भाव उसमें शांत-रस होता है। एई नवरस भवरूप= ये ही नव-रस संसार/लौकिकरूप हैं, एई भावरूप= ये ही भाव/परमार्थरूप हैं। इनिकौ विलेछिन सुद्रिष्टि जागैं जानिये= इनका पृथक्करण दृष्टि के सम्यक् होने पर जागृत होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने शृंगार आदि नव-रसों के लौिकक स्वरूप का सटीक-वर्णन किया है। जिस जीव को शारीरिक-सौंदर्य में रुचि होती है, वह शृंगार-परक-संसाधनों में तृप्त होता है। जिसके हृदय में देश-भक्ति और देश के आन-बान-शान की फिक्र होती है, वह वीर-रस में संतुष्ट होता है। जिसका हृदय कोमल होता है, जिसे जीव-दया, पर-हित, दूसरे जीवों के दुःख-दर्द को दूर करने की भावना होती है, वहाँ करुण-रस होता है। जीवन में अनुकूलताओं के मिलने पर, लौकिक में हार-जीत के प्रसंगों में जीत का अहसास होने पर जो खुशी मिलती है, वहाँ हास्य-रस होता है। युद्ध आदि के प्रसंगों, जीवन में मिलनेवाली प्रतिकूलताओं में क्रोध का आना, उससे चेहरे की भाव-भंगिमा बदल जाना आदि में रौद्र-रस होता है। और घृणाजनक-प्रसंगों पर मन में ग्लानि का भाव आने पर वीभत्स-रस होता है। जन्म-मरण, वेदना, चोरी, भूत-प्रेतादि, रोगादि के होने पर जो डर लगता है, वहाँ भयानक-रस होता है। किसी भी चौंकानेवाले प्रसंग को देखकर आश्चर्यचकित होना, दंग रह जाना आदि में अद्भुतरस होता है। प्रभु-भक्ति में मग्नता, पाप, कषायादि से विरक्ति का भाव आना, वैराग्यमय-भावों के होने पर शांत-रस होता है। ये सभी रस भवरूप भी हैं, अर्थात् लौकिकरूप में भी हैं; जिनमें आसक्त होने पर पुन: संसार का बंध होता है। और यही नव-रस भावरूप या परमार्थरूप भी है, अर्थात् इन रसों का अाध्यात्मिकरूप भी हैं; जिनमें तल्लीन होने पर जीव संसार-बंधन से छुटकारा पा जाता है। लेकिन इन नव-रसों का पृथक्करण या इनसे भिन्नता और सही रसों का चुनाव दृष्टि के सम्यक् होने पर ही होता है, अर्थात् जब जीव को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है; तब वह इन नव-रसों के लौकिकरस से विरक्त होकर पारमार्थिक-रूप या अध्यात्म-रस की ओर अग्रसर होता है।

(छप्पय)

गुन-विचार ‘सिंगार’, ‘वीर’ उद्यम उदार-रुख।
‘करुना’ समरस-रीति, ‘हास’ हिरदै उछाह-सुख।।
अष्ट-करम-मल-दलन, ‘रुद्र’ वरतै तिहि थानक।
तन विलेछ ‘वीभच्छ’, दुन्द-मुखदसा ‘भयानक’।।
‘अद्भुत’ अनंत-बल-चिंतवन, ‘सांत’ सहज वैराग-धुव।
नव-रस-विलास परगास तब, जब सुबोध घट-प्रगट हुव।। 135।।

शब्दार्थ :- गुन-विचार सिंगार= गुणों का विचार ‘शृंगार’-रस, वीर उद्यम उदार-रुख= उदार-मन से पुरुषार्थ करना’ ‘वीर’-रस, करुना-समरस रीति= समस्त जीवों पर समभाव रखना ‘करुण’-रस, हास हिरदै उछाह सुख= हृदय में सुख-प्राप्ति का उत्साह ‘हास्य’-रस, अष्ट-करम-मल-दलन= अष्ट-कर्मों का विनाश करना, रुद्र वरतै तिहि थानक= उस स्थान पर ‘रौद्र’-रस होता है, तन-विलेछ वीभच्छ= शरीर की अशुचिता को देखकर ग्लानि आना ‘वीभत्स’-रस, दुन्द-मुख-दसा भयानक= जन्म-मरण की दुविधा में ग्रसित रहना ‘भयानक’-रस है, ‘अद्भुत’ अनंत-बल-चिंतवन= आत्मा के अनंत-बल का चिंतन ‘अद्भुत-रस’ है, सांत-सहज वैराग धुव= सहज-वैराग्य होना ‘शांत-रस’ है, नव-रस-विलास= नव-रसों का वैभव, परगास तब= तब प्रगट होता है, जब सुबोध घट प्रगट हुव= जब अंतरंग में सम्यग्ज्ञान प्रकट होता है। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने नवरसों का लौकिक-स्वरूप वर्णित किया था। लेकिन इन नवरसों का ज्ञानी-जीव भी रसास्वादन करते हैं, कैसे? ऐसे आध्याित्मक स्वरूप एवं पात्रता का वर्णन इस-छंद में किया है। जहाँ अज्ञानी-जीव इस नश्वर जड़-देह को बाह्य जड़-सामग्री से सजाकर खुश होते हैं, वहीं ज्ञानी-जीव अपने को अपने ही चैतन्य-स्वरूप अनंत-आत्मिक-गुणों से सजाकर ‘शृंगार-रस’ का पान करते हैं। जहाँ अज्ञानी-जीव वीर-रस के तहत देश, समाज, परिवार आदि की रक्षा करने के लिये पुरुषार्थ करते हैं; वहीं ज्ञानी-जीव विशाल/उदार-मन से मोक्ष-प्राप्ति का पुरुषार्थ कर ‘वीर-रस’ को सार्थक करते हैं। जहाँ अज्ञानी-जीव केवल स्थूलकाय, दु:खी-जीवों पर करुणा करते है, वहीं ज्ञानी-जीव निगोद से लेकर संज्ञी-पंचेन्द्रिय तक के समस्त-जीवों के प्रति समभाव रखकर ‘करुण-रस’ का रसास्वादन करते हैं। जहाँ अज्ञानी-जीव लौकिक-उपलब्धियों को प्राप्तकर हर्षित होते हैं, वहीं ज्ञानी-जीव उत्साहपूर्वक आत्मिक सच्चे-सुख की अनुभूति करके ‘हास्य-रस’ रूप आनन्द का रसपान करते हैं। जहाँ अज्ञानी-जीव रण-संग्राम आदि में विजय प्राप्त करने के लिए रौद्ररूप धारण करते है, वहीं ज्ञानी-जीव अनादिकाल से साथ चले आ रहे अष्ट-कर्मों का विनाश करने के लिये जो तीव्र/उग्र-पुरुषार्थ करते हैं; उसी को यहाँ कवि ने ‘रौद्र-रस’ के रूप में संकेतित किया है। जहाँ अज्ञानी-जीव बाह्य-पदार्थों सर्व विशुद्धि-द्वार को देखकर ग्लानि का अनुभव करते हैं, वहीं ज्ञानी-जीव, अनादि से साथ चली आ रही इस जड़ देह की नव-द्वार से बहनेवाली अशुचिता को देखते हैं; उसी को यहाँ ‘वीभत्स-रस’ के रूप में चित्रित किया है। जहाँ अज्ञानी-जीव बाह्य-जड़-पदार्थों और संयोगों के जुदा होने के डर से भयभीत रहते है, वहीं ज्ञानी-जीव भव-भ्रमण और उसे बढ़ाने वाले भोगों से भयभीत रहते हैं; अतः वही ‘भयानक रस’ है। जहाँ अज्ञानी-जीव लोक में होने वाले अजूबों पर अाश्चर्यचकित होते है, वहीं ज्ञानी-जीव अपने अनंत-गुणों के वैभव को प्रत्यक्ष देखकर; अभी तक पर में उपयोग रमाने पर आश्चर्यचकित होते हैं- यही ‘विस्मय/ अद्भुत-रस’ है। जहाँ अज्ञानी-जीव प्रभु-भक्ति में मगन, और कुछ नियम-संयम का पालनकर ‘शांतरस’ का रसास्वादन करके तृप्त हो जाते हैं, वहीं ज्ञानी-जीव अंतरंग में स्वरूप-स्थिरता और बाह्य में क्रमशः कषायों का अभाव-पूर्वक मिलनेवाली आनंद की अनुभूति का पानकर वास्तविक ‘शांत-रस’ का अनुभव करते हैं। कहने का अभिप्राय यही है कि ज्ञानी-जीव भी प्रतिसमय नव-रसों का ही रसास्वादन करते हैं, परन्तु परमार्थरूप इन नव-रसों का वैभव उसी जीव को प्रगट होता है, जिसके हृदय में सम्यग्ज्ञान प्रगट होता है।

(चौपाई)

जब सुबोध घटमैं परगासै, तब रस-विरस-विषमता नासै।
नव-रस लखै एक-रस-माँही, तातैं विरस-भाव मिटि जांहि।। 136।।

(दोहा)

सबरस-गर्भित मूल-रस, नाटक नाम गरंथ।
जाके सुनत प्रवांन जिय, समुझै पंथ-कुपंथ।। 137।।

शब्दार्थ :- जब सुबोध घट मैं परगासै= जब सम्यग्ज्ञान हृदय में प्रगट होता है, तब रस-विरस विषमता नासै= तब रस और बेरस/नीरसता की विषमता/भेेद नष्ट हो जाता है, नव-रस लखै एक-रस-माँही= नव-रस एक-रस में ही दिखते हैं, तातैं विरस-भाव मिटि जाँहि= जिससे बेरस अर्थात् रसरहित-भाव विनाश को प्राप्त होते हैं।। 136।। सबरस-गर्भित मूल-रस= सभी रस एक मूल-रस में गर्भित हैं, नाटक नाम गरंथ= नाटक नाम के ग्रंथ में, जाके सुनत प्रवांन जिय= जिसको सुनकर बुद्धिमान् जीव, समुझै पंथ-कुपंथ= सम्यक्-मार्ग और विपरीतमार्ग का अंतर समझ जाते हैं।। 137।। समुच्चय-विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने ‘रस’ और ‘बेरस’ का अंतर बताते हुए सम्यक्-रस की उपादेयता प्रस्तुत की है। ‘रस’ अर्थात् एक अनुभूति, एक तृप्ति, एक संतुष्टि; सुख का एक ऐसा वेदन, जिसके सामने सभी रस फीके या बेस्वाद लगें। सम्यग्दर्शन से पूर्व जीव को इन रसों के लौकिक-स्वरूप में ही रस/आनंद/ रुचि होती है। लेकिन सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान प्रकट होने के बाद जीव को आत्मानुभूति के समय जिस अतीन्द्रिय-आनंद के रस का वेदन होता है, तब रस और विरसता का भेद स्वत: ही खत्म हो जाता है; क्योंकि उस आत्मिक-रस के सामने ये सभी रस बेरस/नीरस/फीके और बेस्वाद लगते हैं। कारण यह है कि एक-रस इन्द्रिय-जनित है और दूसरा अतीन्द्रिय। एक-रस विकल्पात्मक है, तो दूसरा विकल्प-रहित निर्विकल्प। उस समय इन नवों-रसों के एकसाथ होने पर संभव आनंद से भी कई गुना अधिक आनंद इस नाटक के एक आत्मिक-रस में ही समाहित हो जाता है, जिससे नीरसता का विकल्प ही नहीं रह जाता है। कविवर कहते हैं कि ‘नाटक-समयसार’ ग्रंथ, में जो सभी रसों का राजा है, ऐसे ‘शांतरस’ का वर्णन किया गया है जिसमें अन्य सभी रस समाहित हैं, जिसको भावपूर्वक सुनने, चिंतन, मनन करने से बुद्धिमान्-जीव को सम्यक् और विपरीत-मार्ग का भेद समझ में आता है। और वह जीव विपरीत-मार्ग को छोड़कर सम्यक्-मार्ग का अनुसरण करता है ।

(चौपाई)

वरतै ग्रंथ जगत्-हित-काजा, प्रगटे अमृतचंद-मुनिराजा।
तब तिन्हि ग्रंथ जानि अति-नीका, रची बनाई संस्कृत-टीका।। 138।।

(दोहा)

सरब-विसुद्धी-द्वारलौं, आए करत बखान।
तब आचारज भगतिसौं, करै ग्रंथ-गुनगान।। 139।।

शब्दार्थ :- वरतै ग्रंथ जगत्-हित-काजा= (समयसार) जगत् के जीवों के लिये हितकारी-ग्रंथ विद्यमान था, तब प्रगटे अमृतचंद-मुनिराजा= अमृतचंद्र मुनिराज हुये, तब तिन्हि ग्रंथ जानि अति-नीका= तब उन्होंने इस ग्रंथ को अत्यधिक-हितकारी जानकार, रची बनाई संस्कृत-टीका= इस पर संस्कृत-टीका की रचना की।। 138।। सरब-विसुद्धी-द्वारलौं= सर्वविशुद्धि-द्वार तक, आए करत बखान= वर्णन/टीका करते आये, तब आचारज-भगतिसौं= अब (आगे) आचार्य (अमृतचंद्र) भक्तिपूर्वक, करै ग्रंथ-गुनगान= ग्रंथ का गुणगान अर्थात् महिमा को वर्णित करते हैं।। 139।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने ‘आचार्य कुन्दकुन्द’ विरचित ‘समयसार जी’ ग्रंथ का और इस पर टीका लिखनेवाले ‘आचार्य अमृतचंद्र’ का बहुत ही आदर के साथ स्मरण किया है। ‘आचार्य कुन्दकुन्द’-विरचित समयसार जी ग्रंथ, जो प्राकृतभाषा में निबद्ध है, वह ‘नाटक समयसार जी’ के ‘सर्वविशुद्धि-द्वार’ पर पूर्ण होता है। जिसकी महिमा का वर्णन अथवा गाथाओं पर कलश चढ़ाने का श्रेय ‘आचार्य अमृतचंद्र’ को जाता है, जो कि संस्कृतभाषा में निबद्ध ‘समयसार कलश’ के नाम से अध्यात्म-जगत् में अपना अप्रतिम-स्थान रखता है। कविवर कहते हैं ‘आचार्य कुन्दकुन्द’ के पश्चात् उनकी परम्परा में एक ‘आचार्य अमृतचंद्र’ हुये, जब उन्होंने इस ग्रंथ को पढ़ा, तो भाव-विभोर हो गये, स्वयं के लिए भी और जगत् के संतप्त-जीवों के लिये अत्यधिक-हितकारी जानकर संस्कृत में ‘आत्मख्याति’ नाम से मूलतः गद्य-टीका की रचना की, जिसमें टीका के बीच-बीच में भावपूर्ण-पद्यों को भी अपनी ओर से संजोकर सजाया है। जिन्हें ‘समयसारकलश’ नाम दिया गया है। नाटक-समयसार में आगे अभी तीन द्वारों का वर्णन और है, जिसमें कविवर बनारसीदास जी ने ‘आचार्य अमृतचंद्र’ द्वारा हिन्दी भाषा में गद्य-शैली में रचित ग्रंथ की महिमा को, पद्य-शैली में वर्णित किया है। यहाँ पर आचार्य कुन्दकुन्द देव के द्वारा रचित मूलाधार-ग्रंथ ‘समयसार’ जी का विषय पूर्ण हो रहा है। अत: उसका उपसंहार करते हुये कविवर बनारसीदास जी लिखते हैं- आचार्य कुन्दकुन्द देव विरचित ‘समयसार’ जी ग्रंथ जगत् के जीवों के लिये महा-हितकारी है, क्योंकि इसमें संसार के दु:खों से पीड़ित जगत् के जीवों को उनके अपने ही अनंत-वैभव से, अात्मिक अनंत-गुणों से परिचय कराया है, सच्चे-सुख का परिचय और उसकी प्राप्ति का मार्ग बताया है। सर्व विशुद्धि-द्वार

स्याद्वाद द्वार (११)

(एकादश-अधिकार)

(चौपाई)

अदभुत-ग्रंथ अध्यातम-वानी, समुझै कोउ विरला-ग्यानी।
यामैं स्यादवाद-अधिकारा, ताकौ जो कीजै विसतारा।। 1।।

तो गरंथ अति-सोभा पावै, वह मंदिर यहु कलस कहावै।
तब चित अमृत-वचन गढ़ि खोले, अमृतचंद्र-आचारज बोले।। 2।।

शब्दार्थ :- अदभुत-ग्रंथ अध्यातम-वानी= यह आध्यात्मिक-शैली का अद्भुत-ग्रंथ है, समुझै कोउ विरला- ग्यानी= जिसका मर्म कोई विशिष्ट ज्ञानी-जीव ही समझ सकता है, यामैं स्यादवाद-अधिकारा= इसमें स्याद्वादअधिकार है, ताकौ जो कीजै विसतारा= उसका जो विस्तार/स्पष्टीकरण करे तो गरंथ अति-सोभा पावै= तो ये ग्रंथ अत्यधिक-गरिमा को प्राप्त हो, वह मंदिर यहु कलस कहावै= मूल समयसार-ग्रंथ मंदिर के समान और यह आगामी-वर्णन कलश के समान उपमित किया जाये, तब चित अमृत-वचन= यह मन में विचारकर अमृतमयीवचनों की, गढ़ि खोले= रचना करके मर्म खोलनेवाले, अमृतचंद्र आचारज बोले= आचार्य अमृतचंद्र (इस स्याद्वाद-अधिकार को) कहते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘आचार्य अमृतचंद्र’ के मनोभावों की अभिव्यक्ति का वर्णन करते हुए उनकी स्वयं से की गई प्रतिज्ञा का भी वर्णन किया है। ‘आचार्य अमृतचंद्र’ ने जब समयसार जी का अध्ययन किया तो भावविभोर हो गये, और कहने लगे ‘‘यह अद्भुत-ग्रंथ है, इसमें तो आत्मस्वरूप का सजीव-चित्रण है, जिसे कोई विशेष-ज्ञानी-जीव ही समझ सकता है।’’ इसमें जो ‘स्याद्वाद’ का वर्णन है, वह तो वस्तु-स्वरूप को समझने की अद्भुत-शैली है। उसका कोई स्पष्टीकरण करे, तो वह ठीक उसीप्रकार शोभा को प्राप्त होगा; जैसे मंदिर के ऊपर कलश शोभा को प्राप्त होता है। अर्थात् कुन्दकुन्दाचार्य के भावों को खोलनेवाला यह ‘स्याद्वाद-अधिकार’ उस अतिसुन्दर ‘समयसार’-रूपी मंदिर के शिखर पर कलशारोहण करने के समान है।

(दोहा)

कुंदकुंद नाटक-विषैं, कह्यौ दरब-अधिकार।
स्यादवाद नै साधि मैं, कह्यौ अवस्था-द्वार।। 3।।

कहौं मुकति-पद की कथा, कहौं मुकति का पंथ।
जैसे घृत ‘कारज’ जहाँ, तहाँ ‘कारन’ दधि-मंथ।। 4।।

शब्दार्थ :- कुंदकुंद नाटक-विषैं= कुन्दकुन्द ने नाटक (ग्रंथ) में, कह्यौ दरब-अधिकार= नौ-पदार्थों के वर्णनरूप अधिकार कहे, स्यादवाद नै साधि मैं= अब स्याद्वाद को साधकर मैं अर्थात् अमृतचंद्र सूरि, कह्यौ अवस्था-द्वार= अवस्था-द्वार कहता हूँ।। 3।। कहौं मुकति पद की कथा= मुक्ति-पद/मोक्ष का वर्णन करूँगा, कहौं मुकति का पंथ= मुक्ति का मार्ग भी कहूँगा; जैसे घृत कारज जहाँ= जैसे जहाँ घी प्राप्तिरूप कार्य (का वर्णन करना लक्ष्य हो), तहाँ कारन दधि मंथ= वहाँ दही को मथनेरूप कारण (का वर्णन भी अनिवार्य हो जाता है)।। 4।। विशेषार्थ :- आचार्य अमृतचंद्र के भावों का मर्म खोलते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘आचार्य कुन्दकुन्द’ ने इस ‘समयसार’ ग्रंथ में ‘द्रव्य-अधिकार’ के रूप में नवपदार्थों के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया। अब ‘‘आचार्य अमृतचंद्र ने जो ‘स्याद्वाद-द्वार’ लिखा है, उसके मर्म को मैं कहूँगा। मोक्षरूपी कार्य के वर्णन के साथ मोक्षमार्गरूपी-कारण का भी वर्णन करूँगा; क्योंकि जहाँ कार्य विवेच्य होता है, वहाँ उसका कारण भी विवेचनीय होता ही है। बिना कारण का वर्णन किये कभी कार्य का विवेचन सार्थक नहीं हो सकता है। जैसे लोक में यदि किसी को घी प्राप्त करना है, तो उसे दधि-मंथनरूप कारण का ज्ञान भी करना पड़ता है। ठीक उसीप्रकार यदि जीव मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, तो उसे मोक्षमार्ग का ज्ञान व अनुसरण करना ही होगा।’’

(चौपाई)

अमृतचंद्र बोले मृदु-वानी, स्यादवाद की सुनौ कहानी।
कोऊ कहै ‘‘जीव जगमाँहि’’, कोऊ कहै ‘‘जीव है नांही’’।। 5।।

(चौपाई)

एकरूप कोऊ कहै, कोऊ अगनित-अंग।
छिनभंगुर कोऊ कहै, कोऊ कहै अभंग।। 6।।

नै-अनंत इहिविधि कही, मिलै न काहू कोइ।
जो सब नै-साधन करै, स्यादवाद है सोई।। 7।।

स्यादवाद-अधिकार अब, कहौं जैन को मूल।
जाके जानत जगत्-जन, लहैं जगत्-जल-कूल।। 8।।

शब्दार्थ :- अमृतचंद्र बोले मृदु-वानी= अमृतचंद्र आचार्य मधुर-स्वर में बोले, स्यादवाद की सुनौ कहानी= स्याद्वाद की कहानी/वर्णन सुनो, कोऊ कहै जीव जगमाँहि= कोई कहता है ‘‘जगत् में जीव है’’, तो कोऊ कहै जीव है नांही= कोई कहता है ‘‘जीव है ही नहीं’’।। 5।। एकरूप कोऊ कहै= कोई जीव को एकरूप कहते हैं, कोऊ अगनित अंग= कोई अनक े रूप, छिनभंगरु कोऊ कहै= कोई कहते हैं जीव अनित्य/नाशवान् है, कोऊ कहै अभंग= कोई कहता है जीव नित्य/अविनाशी है।। 6।। नै-अनंत इहिविधि कही= इसप्रकार अनंत-नय कहे गये हैं, मिलै न काहू कोइ= कोई किसी से नहीं मिलता, जो सब नै-साधन करै= जो सभी नयों को साधता है/ स्वीकार करता है, स्यादवाद है सोई= वही स्याद्वाद है।। 7।। स्यादवाद-अधिकार अब= अब स्याद्वाद-अधिकार, कहौं जैन को मूल= जो जैनदर्शन का मूल है, उसे कहता हूँ, जाके जानत जगत्-जन= जिसके जानने से जगत् के जीव, लहैं जगत्-जल-कूल= संसाररूपी जलधि/समुद्र का किनारा पा लेते हैं।। 8।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त-छंदों में कवि ने आचार्य भगवन् के इस अधिकार के वर्णन करने की सार्थकता बतलाते हुये स्याद्वाद की विचारधारा को वर्णित किया है। आचार्य भगवन् अपनी प्रतिज्ञा को साकार करते हुये कहते हैं, ‘‘हे भव्यजीवो! स्याद्वाद की कहानी सुनो।’’ लोक में नानाप्रकार के मत या दर्शन हैं, जीव के बारे में सभी की धारणायें भी भिन्न-भिन्न हैं। कोई कहते हैं, ‘‘जगत् में जीव का अस्तित्व है’’, और कोई कहते हैं कि’’ जगत् में जीव नाम का कोई पदार्थ ही अत्र स्याद्वाद-शुद्धयर्थं वस्तुतत्त्व-व्यवस्थितिः। उपायोपेय-भावश्च मनाग्भूयोऽपि चिन्त्यते ।। 1।। नहीं है’‘। कोई कहते है ‘‘जीव एकरूप है’’ (अद्वैतवादी जीव को एक ब्रह्मरूप मानते हैं ), तो कोई कहते हैं ‘‘जीव अनेकरूप है’’ ( नैयायिक जीव को अनेकरूप मानते हैं )। ‘‘कोई जीव को अनित्य या विनाशीक मानते हैं’’ (बौद्ध-मतानुयायी जीव को अनित्य या क्षणिक मानते हैं ), तो कोई जीव को नित्य/अविनाशी मानते हैं’’ ( सांख्यमती जीव को नित्य या शाश्वत मानते हैं) इत्यादि। इसप्रकार अनेक-नयों अर्थात् भिन्न-भिन्न कथनों का वर्णन मिलता है, सभी अपने-अपने हिसाब से जीव का स्वरूप मानते हैं, और किसी की भी विचारधारा एक दूसरे से नहीं मिलती है, परस्पर-विरुद्धता स्पष्ट भासित होती है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि जो सभी नयों को अर्थात् अपेक्षाओं को स्वीकार करता है, वही स्याद्वाद इन सबमें अवरोध स्थापित कर वस्तु-स्वरूप के मर्म को समझाता है। और जैनदर्शन सभी नयों के प्रयोग से उन सब विवक्षाओं को कैसे बिना किसी विरोध के स्वीकर करता है- यह इस अधिकार में समर्थ-ढंग से बताया गया है। आचार्य भगवन् कहते हैं कि इसीलिए मैं अब ‘स्याद्वाद’ का सच्चा-स्वरूप कहता हूँ; क्योंकि यह जैनदर्शन का मूल है। जैसे विशाल से भी विशाल वृक्ष का आधार उसकी जड़ होती है, ठीक उसीप्रकार जैनदर्शनरूपी विशाल वृक्ष की जड़ ‘स्याद्वाद’ है। जगत् के जो जीव अनेकांतमयी-वस्तु के सभी धर्मों को स्याद्वाद के माध्यम से समझकर आत्मसात् करते हैं, वे निश्चित ही भवसमुद्र से पार हो जाते हैं।

(सवैया इकतीसा)

शिष्य कहै ''स्वामी! जीव स्वाधीन कि पराधीन, जीव एक है किधौं अनेक मान लीजिए।
जीव है सदीव किधौं नांहि है जगत्-माँहि, जीव अविनश्वर कि नश्वर कहीजिये’'।।
सतगुरु कहैं ''जीव है सदीव निजाधीन, एक अविनश्वर दरव-द्रिष्टि दीजिए।
जीव पराधीन छिनभंगुर अनेकरूप, नांही जहाँ तहाँ परजै-प्रवांन कीजिये’'।। 9।।

शब्दार्थ :- शिष्य कहै स्वामी= शिष्य कहता है गुरुजी! जीव स्वाधीन कि पराधीन= जीव स्वाधीन है या पराधीन, जीव एक है किधौं अनेक मान लीजिए= जीव एक है अथवा अनेक मान लें, जीव है सदीव= जीव सदाकाल है, किधौं नांहि है जगत्-माँहि= अथवा जगत् में जीव है ही नहीं, जीव अविनश्वर कि नश्वर मान लीजिए= जीव अविनाशी है कि विनाशीक मान लें। सतगुरु कहैं= सतगुरु कहते हैं, जीव है सदीव निजाधीन= जीव हमेशा निजाधीन ही रहता है, एक अविनश्वर= एक है, अविनाशी है, दरव-द्रिष्टि दीजिए= द्रव्य-दृष्टि से देखिये, जीव पराधीन छिनभंगुर= जीव पराधीन, विनाशी, अनेकरूप नांही= अनेकरूप नहीं है, जहाँ तहांँ परजै प्रवांन कीजिये= जहाँ (कहा गया हो), वहाँ पर पर्याय के अनुसार प्रमाणित करना। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पहले शिष्य की शंका को और पश्चात् गुरु के द्वारा दिये समाधान को वर्णित किया है। सामान्य मिथ्यादृष्टि-जीव जब अपने चारों तरफ देखता है, तो उसे बहुत सारे दर्शन और उनके अनुयायी नजर आते हैं, जो अपने-अपने पक्ष से जीव की सिद्धि करते हैं। जब एक ही जीव की परस्परविरुद्ध सिद्धि होती है, तो यह शंका होना स्वाभाविक है कि आखिर सत्य क्या है? इसीलिए अपनी शंका को लेकर शिष्य गुरु के पास पहुँचता है, और गुरु से कहता है- बाहृाार्थैः परिपीत-मुज्झित-निज-प्रव्यक्ति-रिक्तीभवद्, विश्रान्तं पररूप एव परितो ज्ञानं पशोः सीदति। यत्तत्तत्तदिह स्वरूप एव इति स्याद्वादिनस्तत्पुन-र्दूरोन्मग्न-घन-स्वभाव-भरतः पूर्णं समुन्मज्जति।। 2।। ‘‘हे स्वामी! मेरी शंका का समाधान कीजिये। जीव स्वाधीन है या पराधीन? एकरूप है या अनेकरूप? जीव जगत् में सदाकाल रहता है या कभी ऐसा भी होता है कि जीव का अस्तित्व न भी हो? जीव अविनाशी है या विनाशी’’? गुरुजी शिष्य की शंका का समाधान करते हुए कहते हैं कि ‘‘प्रत्येक पदार्थ के दो पहलू हैं, एक शाश्वत-स्वभाव-अपेक्षा और दूसरा क्षणिक-परिणमन-अपेक्षा, या कहें द्रव्य-अपेक्षा और दूसरा पर्यायअपेक्षा। जब हम द्रव्य-स्वभाव की अपेक्षा देखते हैं, तो जीव त्रिकाल-निजाधीन अर्थात् स्वयं के अधीन है, अपने ही द्रव्य-क्षेत्र-काल और भावरूप स्वचतुष्टय में ही परिणमन करता है, कभी किसी के आधीन नहीं है। इसीप्रकार द्रव्य-अपेक्षा सभी आत्मायें समान हैं, एकरूप है, रंचमात्र भी अंतर नहीं है, न कभी विनाश को प्राप्त होती है, त्रिकाल शाश्वत है।’’ ‘‘लेकिन जब हम पर्याय की अपेक्षा कथन करते हैं, तो जीव पराधीन दिखाई देता है। अनादिकाल से जीव आठ-कर्मों के आधीन है, और उन कर्मों के फल अनुसार चार-गति चौरासी-लाख-योनियों में परिभ्रमण भी करता है। इतना ही नहीं सुख-स्वभावी होते हुये भी दुःखी होता है। एकरूप होते हुये भी नाना स्थूल और सूक्ष्मरूपों में दिखाई देता है। अविनाशी होते हुये भी आयुकर्म की पराधीनता के कारण आयु पूरी होने पर मरण या कहें अन्य-देह को प्राप्त होता है। स्वभाव से पूर्ण-शुद्ध होते भी पर्याय में विकारगतअशुद्धि को प्राप्त होता है।’’ कहने का अभिप्राय यही है कि जहाँ-जहाँ जीव पराधीन, विनाशी, अनेकरूप दिखे, वहाँ-वहाँ पर्याय-अपेक्षा प्रमाण जानना। और जहाँ-जहाँ जीव स्वाधीन, अविनाशी, एकरूप दिखे, वहाँ-वहाँ द्रव्य-अपेक्षा प्रमाण जानना। और जो दर्शन जीव के इन दोनों पहलुओं को निर्विरोधरूप से स्वीकार करता है, वही स्याद्वाद का पोषक होता है। लोक में वस्तु का ऐसा स्वरूप केवल जैनदर्शन ही स्वीकार करता है, अन्य कोई नहीं।

(सवैया इकतीसा)

दर्व-खेत-काल-भाव च्यारौं भेद वस्तु ही मैं, अपने चतुष्क वस्तु अस्तिरूप मानियै।
पर के चतुष्क नासति नियत-अंग, ताकौ भेद दर्व-परजाइ-मध्य जानियै।।
दरव तौ वस्तु, खेत सत्ताभूमि, काल चाल, स्वभाव सहज मूल-सकति बखानियै।
याही भाँति पर-विकलप-बुद्धि कलपना, विवहार-द्रिष्टि अंस-भेद परवांनियै।। 10।।

शब्दार्थ :- दर्व-खेत-काल-भाव च्यारौं-भेद वस्तुही मैं= द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव= ये चारों भेद वस्तु में है, अपने चतुष्क वस्तु अस्तिरूप मानियै= स्व-चतुष्टय से वस्तु अस्तिरूप है, पर के चतुष्क नासति= पर-चतुष्टय से नास्तिरूप है, नियत-अंग= यही निश्चय से वस्तु का स्वरूप है, ताकौ भेद दर्व-परजाइ मध्य जानियै= उसका भेद द्रव्य-पर्याय के बीच में घटित होता है, दरव तौ वस्तु, खेत सत्ताभूमि, काल चाल= द्रव्य-वस्तु है, क्षेत्र-क्षेत्रावगाहना (जितनी जगह में वस्तु रहती है)है, काल-परिणमन करना है, और स्वभाव सहज मूलसकति बखानियै= वस्तु के मूल-स्वभाव को ‘भाव’ कहा जाता है, याही भाँति पर-विकलप-बुद्धि कलपना= इसीप्रकार पर के विकल्प की बुद्धिपूर्वक कल्पना करना, विवहार-द्रिष्टि अंस-भेद परवांनियै= व्यवहारनय की दृष्टि से अंश-भेद प्रमाणित करना चाहिये। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने वस्तु-स्वरूप के ‘अस्ति’ और ‘नास्ति’ दोनों ही पहलुओं का वर्णन किया है। छह-द्रव्यों के समूहरूप इस विश्व में अनंतानंत-द्रव्य हैं। जिसमें जीव-द्रव्य अनंत, पुद्ग् ल-द्रव्य अनंतानंत, धर्म-अधर्म-आकाश द्रव्य एक-एक और कालाणु लोकप्रमाण-असंख्यात हैं। लेकिन प्रत्येकद्रव्य सदाकाल अपने-अपने स्व-चतुष्टय या अपने द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव में ही निवास करते हैं। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से क्या अभिप्राय है? गुणों के समूह को ‘द्रव्य’ कहते हैं, जैसे जीव, पुद््गल आदि द्रव्य हैं। एक-द्रव्य आकाश के जितने हिस्से को घेरता है, उस सत्ताभूमि को ‘क्षेत्र’ कहते हैं। पदार्थ के परिणमन को या पर्याय से पर्यायान्तर होने के अन्तर को ‘काल’ कहते हैं। और उस वस्तु के मूल-स्वभाव को ‘भाव’ कहते हैं, -ये चतुष्क अर्थात‍् ये चारों ही प्रत्येक पदार्थ में सदाकाल विद्यमान रहते हैं। इस ‘स्व-चतुष्ट्य’ से ही पदार्थ की ‘अस्तिरूप’ में सिद्धि होती है। लेकिन एक-पदार्थ के चतुष्कों का अन्य-पदार्थ के चतुष्कों में प्रवेश नहीं है, अर्थात् परद्रव्य के चतुष्कों की स्व में नास्ति भी है। निश्चय से यही वस्तु का स्वरूप है, लेकिन इनका भेद द्रव्य और पर्यायों

के बीच जाना जाता है, या घटित होता है।
एकसाथ मिले हुये दिखने पर भी कोई वस्तु कभी किसी के चतुष्क/चतुष्टय में प्रवेश नहीं करती।

अर्थात‍् एक के स्व-चतुष्टय में पर के चतुष्टय की सदाकाल नास्ति है। इसप्रकार बुद्धिपूर्वक पर के विकल्प करना व्यवहारनय (वस्तु स्वरूप का असत्यार्थ प्रतिपादक) का भेद जानना, निश्चय से तो प्रत्येक वस्तु अपने स्व-चतुष्टय में ही सीमित है।

(दोहा)

है, नांही, नांही सु है, है, है नांही, नांहि।
यह सरवंगी नय-धनी, सब मानै सब-माँहि।। 11।।

शब्दार्थ :- है= स्याद्-अस्ति, नांही= स्याद्-नास्ति, नांही सु है= स्याद् अस्ति-नास्ति, स्याद्-अवक्तव्य, है है नांही नांहि= स्याद्-अस्ति-अवक्तव्य, स्याद् नास्ति-अवक्तव्य, स्याद् अस्ति-नास्ति-अवक्तव्य, यह सरवंगी नय-धनी= यह सभी नयों का स्वामी (स्याद्वाद), सब मानै= सभी को मानता है, सब-माँहि= सभी वस्तुओं में। विशेषार्थ :- इन-छंद में कवि ने स्याद्वाद के सप्त-भंगों का वर्णन किया है। ‘‘प्रश्न के अनुसार एक वस्तु में प्रमाण से अविरुद्ध विधि-प्रतिषेधरूप धर्मों की विवेचना सप्तभंगी है।’’ -(रा. वा. 1/6/5/33/15) प्रश्नकर्त्ता के प्रश्नवश अनेकांत-स्वरूप वस्तु के प्रतिपादन के सप्त-भंग होते हैं। ये भंग सातप्रकार के हैं- स्याद् अस्ति, स्याद् नास्ति, स्याद् अस्ति-नास्ति, स्याद् अवक्तव्य, स्याद् अस्ति-अवक्तव्य, स्याद् नास्ति-अवक्तव्य, और स्याद् अस्ति-नास्ति-अवक्तव्य। वास्तव में देखा जाये, तो मूल-भंग तो तीन ही है- अस्ति, नास्ति और अवक्तव्य। शेष चार-भंग तो इन तीनों के संयोग से ही बनते हैं, इसलिए उनका इन्हीं में अंतर्भाव हो जाता है। जैसे- 1. जीव चेतन-स्वरूप ही है- ‘अस्ति’, 2. जीव अन्यरूप नहीं है- ‘नास्ति’, 3. जीव चैतन्य-स्वरूप है, अन्यरूप नहीं है- ‘अस्ति-नास्ति’, 4. जीव में अस्ति-नास्ति दोनों रूप होते हैं, परन्तु दोनों का युगपत् अर्थात् एकसाथ-कथन संभव नहीं है, अत:- ‘अवक्तव्य’; 5. जीव चैतन्य-स्वरूप है, परन्तु उसके सभी धर्मों का युगपत्-कथन संभव न होने से -‘अस्ति-अवक्तव्य’, 6. जीव जड़रूप नहीं है, परन्तु सभी धर्मों का युगपत्-कथन संभव न होने से- ‘नास्ति-अवक्तव्य’, 7. जीव चैतन्य-स्वरूप होने से अस्तिरूप है, जड़रूप नहीं होने से नास्तिरूप है, परन्तु दोनों का युगपत्-कथन संभव न होने से- ‘अस्ति-नास्ति-अवक्तव्य’। इसप्रकार पिछले-छंद के अनुसार हम कह सकते हैं कि एक-द्रव्य अपने स्व-चतुष्टय अर्थात् स्व-द्रव्य, स्व-क्षेत्र, स्व-काल, स्व-भाव की अपेक्षा तो 'अस्ति’रूप है। पर-चतुष्टय अर्थात् परद्रव्य, पर-क्षेत्र, पर-काल, और पर-भाव रूप न होने की अपेक्षा 'नास्ति’रूप है। एक ही समय में स्वचतुष्टय की अस्ति और पर-चतुष्टय की नास्ति होने से 'अस्ति-नास्ति’रूप है। जीव स्व-चतुष्टयरूप है, और पर-चतुष्टय-रूप नहीं है, परन्तु एक ही समय में सभी धर्मों का युगपत्-कथन संभव न होने से अवक्तव्य है। स्व-चतुष्टय की अस्ति होते हुये भी सभी धर्मों का एक ही समय में युगपत्कथन संभव न होने से ‘अस्ति-अवक्तव्य’ है। पर-चतुष्टय की नास्ति होते हुये भी सभी धर्मों का एक ही समय में युगपत्-कथन संभव न होने से ‘नास्ति-अवक्तव्य’ है। स्व-चतुष्टय की अस्ति और पर-चतुष्टय की नास्ति दोनों होते हुये भी एक ही समय में युगपत्-कथन न होने से ‘अस्ति-नास्तिअवक्तव्य’ है। कहने का अभिप्राय यही है कि वस्तु परस्पर-विरोधी अनंत-धर्मात्मक है। जैसे द्रव्य-अपेक्षा नित्य है, पर्याय-अपेक्षा अनित्य भी है; इसीप्रकार सत् भी है, असत् भी है; शुद्ध भी है, अशुद्ध भी है इत्यादि। और इन सभी परस्पर-विरोधी धर्मों का एकसाथ एक ही समय में कथन करना संभव नहीं है, इसलिये स्याद्वादी ‘स्यात्’ या ‘कथंचित्’ शब्द का प्रयोग करते हैं, जिससे बिना किसी विरोध के सहज ही वस्तु स्वरूप की सिद्धि होती है। इसीलिए आगम में उपर्युक्त वर्णित इन सप्तभंगी-नयों के द्वारा वस्तु-स्वरूप का कथन किया जाता है।

(सवैया इकतीसा)

ग्यान कौ कारन ज्ञेय, आतमा त्रिलोकमय, ज्ञेयसौं अनेक-ग्यान, मेल ज्ञेय-छांही है। जौंलौं ज्ञेय तौंलौं ग्यान, सर्व-दर्व में विग्यान, ज्ञेय-क्षेत्र मान ग्यान जीव-वस्तु नांही है।।

देह नसै जीव नसै, देह उपजत लसै, आतमा अचेतना है सत्ता अंस-माँही है।
जीव-छिनभंगुर अग्यायक सहजरूपी ग्यान, एेसी-ऐसी एकांत-अवस्था मूढ-पांही है।। 12।।

शब्दार्थ :- ग्यान कौ कारन ज्ञेय= ज्ञान का कारण ज्ञेय मानना, आतमा-त्रिलोकमय= आत्मा त्रिलोक- प्रमाण मानना, ज्ञेयसौं अनेक-ग्यान= (अनेक) ज्ञेय से अनेक ज्ञान मानना, मेल ज्ञेय छांही है= ज्ञान में ज्ञेय की छाया/प्रतिबिंब मानना, जौंलौं ज्ञेय तौंलौं ग्यान= जबतक ज्ञेय, तबतक ज्ञान है, सर्व-दर्व में विग्यान= सर्व-द्रव्य ज्ञानमय मानना, ज्ञेय-क्षेत्र मान ग्यान= ज्ञेय के क्षेत्रप्रमाण ज्ञान है, जीव-वस्तु नांही है= जीव स्वतंत्र-वस्तु नहीं है, देह नसै जीव नसै= देह के विनाश से जीव का विनाश होना मानना, देह उपजत लसै आतमा= देह की उत्पत्ति से आत्मा की उत्पत्ति मानना, अचेतना है= आत्मा मूलतः अचेतन है- ऐसा मानना, सत्ता अंस-माँही है= सत्ता अंश में है= ऐसा मानना, जीव छिनभंगुर= आत्मा को क्षणभंगुर मानना, अग्यायक= उसे जानन-शक्ति से रहित मानना, सहजरूपी ग्यान= सहज/बिना-प्रयास-ज्ञान की एेसी-ऐसी एकांत-अवस्था मूढ-पांही है= ऐसी-ऐसी एकांत-अवस्थाओं को प्राप्त करनेवाला/माननेवाला मूर्ख/अज्ञानी है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों या कहें मिथ्यादृष्टि-जीवों के द्वारा प्रवर्तित चौदह- मिथ्या नयों/मिथ्या-मान्यताओं की चर्चा की है। जो इनमें से किसी भी एक मिथ्या-नय/मान्यता को स्वीकार करता है, कविवर कहते हैं कि वह मूर्ख है। इनका वर्णन इसप्रकार है- 1. ज्ञेय रूप है- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘ज्ञान का कारण एकमात्र ज्ञेय हैं।’ 2. त्रिलोक-प्रमाण है- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘आत्मा तीन-लोक प्रमाण अर्थात् तीन-लोक के बराबर सर्वव्यापी है।’ 3. अनेक-ज्ञान रूप है- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘ज्ञेय अनेक होने से ज्ञान भी अनेक हैं।’ 4. ज्ञेय का प्रतिबिम्ब रूप है- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘ज्ञान में ज्ञेय की छाया/प्रतिबिम्ब होता है’। 5. ज्ञेय-काल प्रमाण है- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘जबतक ज्ञेय रहते हैं, तबतक ज्ञान रहता है, ज्ञेय के विनाश होते ही ज्ञान का भी विनाश हो जाता है’ । 6. द्रव्यमय ज्ञान रूप है- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘सभी द्रव्य ब्रह्म से अभिन्न हैं, इसलिए सभी पदार्थ ज्ञानरूप हैं’ । 7. क्षेत्रयुत ज्ञान रूप है- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘जितना ज्ञेय-क्षेत्र है, उतना ही ज्ञान हैं, उसके बाहर नहीं है’। 8. जीव की नास्ति- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘जीव नामक कोई पदार्थ है ही नहीं’, अर्थात् वे जीव की स्वतंत्र-सत्ता को ही स्वीकार नहीं करते। 9. जीव का विनाश- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘देह का विनाश होने पर जीव का भी विनाश हो जाता है’। 10. जीव का उत्पाद- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘जब-जब देह उत्पन्न होती है, तब-तब जीव भी उत्पन्न होता है’। 11. आत्मा अचेतन है- इस पक्ष को माननेवाले ‘ज्ञान को अचेतन मानते हैं, सो उनके लिये आत्मा भी अचेतन है’। 12. सत्ता का-अंश है- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘आत्मा परम-सत्ता या ब्रह्म सत्ता का अंश है’। 13. क्षणभंगुर है- इस पक्ष को माननेवाले’ जीव को एकसमय की पर्याय-मात्र मानते हैं, अर्थात् पर्याय क्षणभंगुर, सो जीव भी क्षणभंगुर है’। 14. अज्ञायक है- इस पक्ष को माननेवाले कहते हैं कि ‘जीव जानन-शक्ति से रहित है, इसलिए अज्ञायक है’। इसप्रकार कवि ने एकांतवाद के पोषक चौदह-प्रकार के मिथ्या नयों/मिथ्या-मान्यताओं का वर्णन किया। जो जीव इन नयों में से किसी एक को ग्रहणकर शेष को छोड़ देता है, वह ‘एकांती-मिथ्यादृष्टि’ है। और जो इन सब नयों के सम्यक्-पक्ष को स्वीकार करता है, वही स्याद्वाद का पोषक होता है। आगे के छंदों में कविवर क्रमश: इन सभी नयों के मिथ्या-स्वरूप का खण्डन, और सम्यक्स्वरूप का मण्डन करेंगें।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ मूढ़ कहै ''जैसैं प्रथम सवाँरी-भीति, पाछैं ताके ऊपर सुचित्र आछयौ लेखिए ।
तैंसैं मूल-कारन प्रगट घट-पट जैसौ, तैसौ तहाँ ग्यानरूप-कारज विसेखिए’'।।
ग्यानी कहै ''जैसी वस्तु तैसौ ही सुभाव ताकौ, तातैं ग्यान-ज्ञेय भिन्न-भिन्न-पद पेखिए।
कारन-कारज दोऊ एक हीमैं निहचै पै, तेरौ मत साँचौ विवहारदृष्टि देखिए’'।। 13।।

शब्दार्थ :- कोऊ मूढ़ कहै= कोई मूर्ख कहे= जैसे प्रथम सवाँरी भीति= जिसप्रकार पहले दीवाल को संवार यानि साफ करके, पाछैं ताके ऊपर= बाद में उसके ऊपर, सुचित्र आछयौ लेखिए= उत्तम-चित्र अच्छी-तरह लिखा/बनाया जाता है, तैंसैं मूल-कारन= वैसे ही मूल-कारण, प्रगट घट-पट जैसौ= साक्षात् घड़ा एवं वस्त्र आदि, तैसौ तहाँ ग्यानरूप कारज विसेखिए= वैसे ही वहाँ ज्ञानरूप कार्य-विशेष होता है। ग्यानी कहै= ज्ञानीजीव कहते हैं, जैसी वस्तु= जैसी वस्तु होती है, तैसौ ही सुभाव ताकौ= उसका वैसा ही स्वभाव होता है, तातैं ग्यान-ज्ञेय भिन्न-भिन्न-पद पेखिए= इसलिये ज्ञान और ज्ञेय को भिन्न-भिन्न देखना चाहिए, कारन-कारज= कारण और कार्य, दोऊ एकहीमैं= दोनों एक में ही, निहचै पै= निश्चय से परंतु, तेरौ मत साँचौ= तेरा मत सही है, विवहार-दृष्टि देखिए= व्यवहार-दृष्टि से देखने पर। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवाद के पोषक पहले-पक्ष, कि ‘ज्ञेय से ज्ञान होता है’- इस तथ्य का सतर्क-खंडन किया है। मीमांसक-मत के प्रवर्तक ऐसा मानते हैं कि ‘‘ज्ञेयों से ज्ञान होता है। अर्थात् ज्ञेय की निर्मलता और प्रगटता पर ही ज्ञान की निर्मलता और प्रगटता आधारित है’’। अपने इस कथन को सिद्ध करने के लिये वे अज्ञानी-जीव तर्क देते हैं कि ‘‘जैसे गंदी-दीवार पर अच्छा-चित्र नहीं बनाया जा सकता, उसके लिए पहले दीवार को साफ करें, पश्चात् चित्र बनायें, तो उत्तम-चित्र बनता है; उसीप्रकार ज्ञान के कारणभूत घट-पट आदि ज्ञेय-पदार्थ जैसे होंगें, ज्ञानरूप-कार्य भी वैसा ही होगा; क्योंकि ज्ञान की निर्मलता का कारण ज्ञेयों की प्रगटता और निर्मलता ही है।’’ एकांतवादियों के इस तर्क का खंडन करते हुए स्याद्वादी ज्ञानी-जीव कहते हैं कि पहला-सिद्धांत ‘जो पदार्थ जैसा होता है, उसका स्वभाव भी वैसा ही होता है’- इसके कहने का अभिप्राय यह है कि ज्ञान आत्मा का स्वभाव होने से चैतन्य-स्वरूप और अरूपी है, जबकि प्रकट-ज्ञेय रूपी-पदार्थ पुद्ग् ल-द्रव्य होने से जड़ हैं, मूर्तिक हैं; अत: मूल में स्वभाव से ही जो पूर्णतः भिन्न हैं ऐसे जड़ और चेतन या कहें ज्ञेय और ज्ञान- दोनों पदार्थों का स्वभाव एक कैसे हो सकता हैं? अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय दोनों पूर्णतः भिन्न-भिन्न है। दूसरा-सिद्धांत कि ‘निश्चयनय से कारण और कार्यपना एक ही द्रव्य में घटित होता है, दो भिन्न-द्रव्यों में नहीं’। जबकि ज्ञान और ज्य ञे तो दोनों भिन्न-द्रव्य हैं। इस अपेक्षा से ज्ञान का कारण ज्य ञे कैसे हो सकते है? हे आत्मन्! सत्य तो यही है कि ज्ञान हमेशा ज्ञान को ही जानता है, अथवा ज्ञान की निर्मलता में बननेवाले ज्ञेयाकाररूप को ही ज्ञान जानता है, ज्ञेय को नहीं। इसलिये ज्ञेय ज्ञान की उत्पत्ति का कारण कैसे हो सकते हैं? अर्थात् कभी नहीं। इसप्रकार एकांतवादी का यह तर्क कि ‘ज्ञेय से ज्ञान होता है’- वह व्यवहारनय से तो सही हो सकता है; क्योंकि व्यवहारनय हमेशा मिला-जुला अर्थात् दो द्रव्यों या दो पदार्थों को मिलाकर ही कथन करता है; किन्तु निश्चयनय की दृष्टि से वह कदापि सही नहीं है, क्योंकि निश्चयनय वस्तु स्वरूप का यथार्थ निरूपण करता है, मिला-जुला नहीं।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ मिथ्यामती लोकालोक-व्यापि ग्यान मानि, समुझै त्रिलोक-पिंड आतम-दरब है।
याहीतैं सुछंद भयौ डोलै मुखहू न बोलै, कहै ‘‘या जगत् मैं हमारोई परब है’’।।
तासौं ग्याता कहैं ''जीव जगत्-सौं भिन्न पै, जगतकौ विकासी तौही याहीतें गरब है।
जो वस्तु सो वस्तु पररूपसौं निराली सदा, निहचै-प्रमान स्यादवाद मैं सरब है’'।। 14।।

शब्दार्थ :- कोऊ-मिथ्यामती लोकालोक-व्यापि ग्यान मानि= कोई मिथ्या-मतवाला ज्ञान को लोकालोकविश्वं ज्ञानमिति प्रतर्क्य सकलं दृष्ट्वा स्वतत्त्वाशया, भूत्वा विश्वमयः पशु पशुरिव स्वच्छन्दमाचेष्टते। यत्तत्तत्पररूपतो न तदिति स्याद्वाददर्शी पुनर्विश्वाद् भिन्नमविश्व-विश्व-घटितं तस्य स्वतत्त्वं स्पृशेत्।। 3।। व्यापी मानकर, समुझै त्रिलोक-पिंड आतम-दरब है= समझता है आत्म-द्रव्य त्रिलोक-प्रमाण है, याहीतैं सुछंद भयौ डोलै= इसीकारण स्वच्छंदी होकर घूमता है, मुखहू न बोलै= किसी से बोलता तक नहीं है, कहै या जगत् मैं हमारोई परब है= और कहता है ‘‘इस जगत् में हमारा सिद्धांत ही सत्य है’’ तासौं ग्याता कहैं= उन अज्ञानी-जीवों से ज्ञानी-जीव कहते हैं, जीव जगत्-सौं भिन्न= जीव तो जगत् से भिन्न है, पै जगतकौ विकासी= परन्तु जगत् का प्रकाशक है, तौही याहीतें गरब है= तुझे इसी से अभिमान है, जो वस्तु सो वस्तु पररूपसौं निराली सदा= एक-वस्तु दूसरी-वस्तु से अन्यरूप है और स्वयं में निराली है, निहचै प्रमान स्यादवाद मेैं सरब है= निश्चयनय के अनुसार स्याद्वाद में सब गर्भित है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के दूसरे पक्ष कि ‘आत्मा त्रिलोक-प्रमाण है’- इसका सटीक-खंडन किया है। नैयायिक-मत के प्रवर्तक ‘ज्ञान को लोकालोक व्यापी’ मानकर आत्मा को त्रिलोक-प्रमाण मानते हैं, अर्थात् ऐसा कहते हैं कि आत्मा तीन-लोक के बराबर है। इस अपेक्षा वे अपने को सर्वव्यापी मानकर स्वच्छंदी होकर घूमते हैं, अर्थात् स्वयं को ईश्वर और दूसरों को मूर्ख समझते हैं। अभिमान में डूबे होने से किसी से सीधे मुहँ बात भी नहीं करते, और कहते हैं कि ‘‘संसार में केवल हमारा मत/विचारधारा ही सही है, अन्य सब झूठ है’’। ऐसे अज्ञानी-जीवों की मान्यता का खंडन करते हुए ज्ञानी-जीव उनसे कहते हैं कि ‘‘जीव तो जगत् से सदाकाल-भिन्न है। हाँ, उसके ज्ञान में तीनों लोक प्रकाशित होते हैं; इसीकारण तुझे अभिमान है। जैसे सूर्य के प्रकाश में जगत् के समस्त पदार्थ प्रकाशित होते हैं, परन्तु न तो वह अपने स्थान कभी च्युत होता है, और न ही ज्ञान में प्रकाशित-पदार्थों के साथ एकमेक होता है। इसीप्रकार ज्ञान स्वपर-प्रकाशी है, सो ज्ञान की निर्मलता में संपूर्ण-लोक स्वयं प्रकाशित होता है, जैसे केवली का ज्ञान। लेकिन केवली-भगवान् न तो अपने स्वरूप से कभी च्युत होते हैं, और न ही उनका ज्ञान कभी उन प्रकाशित-पदार्थों यानि ज्ञेयों के साथ एकमेक होता है, फिर भी उसमें वे पदार्थ सहज और स्वयं प्रकाशित होते हैं।’’ जगत् का प्रत्येक-पदार्थ अन्य-पदार्थों से पूर्णत: भिन्न और स्वयं में निराला है। निश्चय से देखें तो ये सब स्याद्वाद में गर्भित है। अर्थात् यदि हम अज्ञानी-जीव की धारणा को, कि ‘मेरा ही सिद्धांत सत्य है’- ऐसा सर्वथा एकांतरूप मान लें, तो ये सिद्धांत मिथ्या होगा, और यदि स्यात् यानि अपेक्षा से मानेंगे, तो विरोध खड़ा नहीं होगा।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ पसु ग्यानकी अनंत-विचित्राई देखै, ज्ञेय कै अकार नानारूप विसतरयौ है।
ताहीको विचारि कहै ग्यान की अनेक-सत्ता, गहिकै एकंत-पच्छ लोकनिसौं लरयौ है।।
ताकौ भ्रम-भंजिवैकौ ग्यानवंत कहै ''ग्यान, अगम-अगाध-निराबाध-रस भरयौ है।
ज्ञायक सुभाइ परजायसौं अनेक भयौ, जद्यपि तथापि एकतासौं नहिं टरयौ है’'।। 15।।

शब्दार्थ :- कोऊ पसु ग्यानकी अनंत-विचित्राई देख=ै कोई पशुवत् अज्ञानी-जीव ज्ञान की अनंत-विचित्रता देखकर, ज्ञेयकै अकार नानारूप विसतरयौ है= विभिन्न-ज्ञेयाकार-रूप परिणमन जानकर, ताहीको विचारि कहै= उसको विचारकर कहे कि, ग्यान की अनेक सत्ता= ज्ञान की अनेक-सत्ता है, गहिकै एकंत-पच्छ= इसी एकांत-पक्ष को ग्रहणकर, लोकनिसौं लरयौ है= लोगों से लड़ता/बहस करता है। ताकौ भ्रम-भंजिवैकौ= उसका बाहृाार्थ-ग्रहण-स्वभावभरतो विष्वग्विचित्रोल्लसद्-ज्ञेयाकार-विशीर्ण-शक्तिरभितस्त्रुट्यन्पशुर्नश्यति। एकद्रव्यतया सदा व्युदितया भेदभ्रमं ध्वंसय-न्नेकं ज्ञानमबाधितानुभवनं पश्यत्यनेकान्तवित्।। 4।। भ्रम नष्ट करने के लिए, ग्यानवंत कहै= ज्ञानी-जीव कहते हैं, ग्यान-अगम-अगाध-निराबाध-रस भरयौ है= ज्ञान, अपार, असीमित, बाधारहित, रस से भरा हुआ है, ज्ञायक-सुभाइ परजायसौं अनेक भयौ जद्यपि= ज्ञायक-स्वभाव यद्यपि पर्याय से अनेकरूप दिखता है, तथापि एकतासौं नहिं टरयौ है= फिर भी अपनी एकरूपता को नहीं छोड़ता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के तृतीय-पक्ष ‘ज्ञेय अनेक होने से ज्ञान भी अनेक हैं’- का खंडन किया है। ज्ञान स्वपर-प्रकाशी होने से संपूर्ण-लोकालोक को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है, अर्थात‍् ज्ञेयाकार-रूप परिणमन करता प्रतीत होता है। ज्ञान के इस परिणमन को देखकर अज्ञानी मिथ्यादृष्टिजीव कहता है कि ‘‘जैसे ज्ञेय अनंत है, सो ज्ञान भी अनंत है।’’ ऐसे अज्ञानी-जीव को कवि ने विवेकहीनपशु की उपमा दी है, जो कि बिना विचारे ज्ञान में नाना-ज्ञेयाकार झलकते देखकर यह मानता है कि ज्ञान भी नानाप्रकार का हो गया है। इतना ही नहीं, अपने इसी एकांत-पक्ष को ग्रहणकर वह लोगों से वादविवाद/बहस करता है। अज्ञानी-जीव के इस भ्रम को दूर करने के लिए ज्ञानी-जीव कहते हैं कि ‘‘ज्ञान तो ‘अगम’ है अर्थात् जैसे समुद्र के जल का कोई पार नहीं, ठीक उसीप्रकार ज्ञान के विस्तार का भी कोई माप नहीं है। ‘अगााध’ अर्थात् जैसे समुद्र के जल की गहराई का कोई माप नहीं है, ठीक उसीप्रकार ज्ञान की गहराई का कोई माप नहीं है। ‘निराबाध’ अर्थात् जैसे समुद्र का जल किसी से भी बाधित नहीं होता, ठीक उसीप्रकार ज्ञान भी इन्द्रियजनित-बाधा से बाधित नहीं होता है अर्थात् ज्ञान इन्द्रियों का मोहताज नहीं है। ज्ञान तो ऐसे अतीन्द्रिय-रस से भरा हुआ है, जबकि अज्ञानी-जीव ज्ञान को ज्ञेयाकाररूप तक ही सीमित मानता है, इसलिए उसका ये एकांत-पक्ष मिथ्या है।’’ हे आत्मन्! अनंतज्ञान का धनी ज्ञायक भगवान्-आत्मा यद्यपि पर्याय से अनेकरूप दिखाई देता है, लेकिन फिर भी अपनी स्वभावगत-एकरूपता को कभी नहीं छोड़ता है, अर्थात् पर्याय-दृष्टि से अनेकरूप होता हुआ भी स्वभाव-दृष्टि की अपेक्षा एकरूप ही रहता है। ठीक उसीप्रकार, जैसे फाउण्टेन की रंगबिरंगी-लाइट में पानी अनेक रंगों का दिखाई भले ही देता है, परन्तु वास्तव में पानी उसरूप नहीं होता है, वह अपने मूल रूप में ही विद्यमान रहता है, अर्थात् अनेकरूप नहीं होता, एकरूप ही रहता है। इसप्रकार यदि हम एकांतवादियों के इस पक्ष को सर्वथा-एकांत-दृष्टि से मानेगें, तो मिथ्या होगा, और स्याद्वाद के अनुसार स्वभाव-अपेक्षा एकरूप और पर्याय-अपेक्षा अनेकरूप स्वीकार करेगें, तो कोई विवाद नहीं होगा।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ कुधी कहै ''ग्यान-माँहि ज्ञेयकौ अकार, प्रतिभासि रह्यौ है कलंक ताहि धोइयै।
जब ध्यान-जलसौ पखारिकै धवल कीजै, तब निराकार सुद्ध-ग्यानमय होइयै’'।।
तासौं स्यादवादी कहै ''ग्यानकौ सुभाव यहै, ज्ञेयकौ अकार वस्तु-माँहि कहाँ खोइयै।
जैसे नानारूप-प्रतिबिंब की झलक दीखै, जद्यपि तथापि आरसी-विमल जोइयै’'।। 16।।

शब्दार्थ :- कोऊ कुधी कहै ग्यान-माँहि ज्ञेयकौ अकार= कोई दुर्बुद्धि/अज्ञानी कहता है कि ज्ञान में ज्ञेय का ज्ञेयाकार-कलङ्क-मेचकचिति प्रक्षालनं कल्पय-न्नेकाकार-चिकीर्षया स्फुटमपि ज्ञानं पशुर्नेच्छति। वैचित्र्येऽप्यविचित्रतामुपगतं ज्ञानं स्वतः क्षालितं, पर्यायैस्तदनेकतां परिमृशन्पश्यत्यनेकान्तवित्।। 5।। आकार, प्रतिभासि रह्यौ है कलंक ताहि धोइयै= प्रतिबिंबित हो रहा है वह ज्ञान का कलंक/दोष है, उसे धोओ, जब ध्यान जलसौ-पखारिकै धवल कीजै= जब ध्यानरूपी-जल से स्वच्छ कर उज्जवल करें, तब निराकार सुद्ध-ग्यानमय होइयै= तब ज्ञान निराकार शुद्ध होता है। तासौं स्यादवादी कहै= उनसे स्याद्वादी कहते हैं, ग्यानकौ सुभाव यहै= यह तो ज्ञान का स्वभाव है, ज्ञेयकौ अकार वस्तु-माँहि कहाँ खोइयै= ज्ञेय का आकार जो वस्तुरूप है, उसे कहाँ भगायें, जैसे नानारूप-प्रतिबिंब की झलक दीखै जद्यपि= यद्यपि जैसे दर्पण में अनेकप्रकार के पदार्थ झलकते हैं, तथापि आरसी विमल जोइयै= फिर भी दर्पण निर्मल ही रहता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के चतुर्थ पक्ष- ‘ज्ञान में ज्ञेय की छाया पड़ना ज्ञान का ही दोष है’- इस मान्यता का सतर्क-खंडन किया है। ज्ञान स्वभाव से स्वपर-प्रकाशी है, इसीलिए ज्ञान की निर्मलता में संपूर्ण-लोकालोक झलक रहा है। ज्ञान में ज्ञेयों की इस झलकन को देखकर अज्ञानी-जीव मानता है कि ये ज्ञान का दोष है; क्योंकि ज्ञान तो निर्मल और निराकार है, ज्ञेयों के झलकने से वह साकार और मलिन हो जाता है। इसीलिए ज्ञान की इस मलिनता को दूर करने के लिए अज्ञानी-जीव तर्क देता है कि ‘‘पहले ध्यानरूपी जल से अच्छीतरह से धोकर उसे उज्जवल करो, तब ज्ञान निराकार और शुद्ध होगा।’’ एकांतवादियों के इस तर्क का खंडन करते हुए ज्ञानी-जीव कहते हैं कि ‘‘ज्ञान कहो या आत्मा कहो, एक ही बात है, जानना ज्ञान का स्वभाव है। जैसे नीबू का स्वभाव है खट्टापन, चीनी का स्वभाव मीठापन, और जिस वस्तु का (फिर चाहे वह चेतन हो अचेतन) जो स्वभाव होता है, वह न तो कभी बदलता है, न ही कभी विनाश को प्राप्त होता है। भाई! जब पुद््गल-द्रव्य जड़ होकर भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ता, तो जीव-द्रव्य चेतन होकर अपना जानन-स्वभाव कैसे छोड़ सकता है? यदि कोई भी द्रव्य अपना स्वभाव छोड़ता है, तो उसका तो अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा।’’ ‘‘हे आत्मन्! ज्ञान में ज्य ञे ों का झलकना ज्ञान का दोष नहीं, बल्कि ज्ञान की निर्मलता का प्रतीक है। यदि ये संपर्ण ू -विश्व जानने में आ रहा है, तो ये ज्ञान की ही महिमा है। ज्य ञे ों की इस झलकन को हम कहाँ भगायें अर्थात् हम उसे ज्ञान से अलग नहीं कर सकते। जैसे दर्पण में अनेकानेक-पदार्थ झलकते हैं, ये दर्पण का निर्मल-स्वभाव है, जैसे पदार्थों के झलकने से आज तक दर्पण की निर्मलता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा; बल्कि दर्पण जितना अधिक-निर्मल होता है, पदार्थों का प्रतिबिम्ब भी उतना ही स्पष्ट होता है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान जितना अधिक-निर्मल होता है, ज्य ञे उतना ही स्पष्ट झलकते हैं; क्योंकि ये ज्ञान का स्वभाव है, दोष नहीं।’’ ‘इसप्रकार ज्ञेयों के झलकने से ज्ञान दूषित होता है’- एकांतवादियों का यह पक्ष पूर्णत: मिथ्या है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ अज्ञ कहै ''ज्ञेयाकार ग्यान-परिनाम, जौलौं विद्यमान तौंलौं ग्यान परगट है।
ज्ञेय के विनास होत ग्यानकौ विनाश होइ’', ऐसी बाके हिरदै मिथ्यात्व की अलट है।।
तासौं समकितवंत कहैं ''अनुभौ-कहानि, पर्जय-प्रवांन ग्यान नानाकार-नट है।
निरविकलप अविनस्वर दरबरूप, ग्यान ज्ञेय-वस्तुसौं अव्यापक अघट है’'।। 17।।

शब्दार्थ :- कोऊ अज्ञ कहै= कोई अज्ञानी कहे कि, ज्ञेयाकार ग्यान-परिनाम= ज्ञान का परिणमन ज्ञेयाकार होता है, जौलौं विद्यमान= जबतक ज्ञेय विद्यमान रहता है, तौंलौं ग्यान परगट है= तबतक ज्ञान प्रगट है, ज्ञेय के प्रत्यक्षालिखित-स्फुट-स्थिर-परद्रव्यास्तिता वञ्चितः, स्वद्रव्यानवलोकनेन परितः शून्यः पशुर्नश्यति। स्वद्रव्यास्तितया निरूप्य निपुणं सद्यः समुन्मज्जता, स्याद्वादी तु विशुद्ध-बोध-महसा पूर्णो भवन् जीवति ।। 6।। विनास होत= ज्ञेय के विनाश होने पर, ग्यानकौ विनाश होइ= ज्ञान का विनाश हो जाता है, ऐसी बाके हिरदै= ऐसी उसके हृदय में, मिथ्यात्व की अलट है= मिथ्यात्व का दुराग्रह है। तासौं समकितवंत कहै अनुभौ कहानि= उससे सम्यग्दृष्टि-जीव अनुभव की कहानी कहते हैं, पर्जय-प्रवांन ग्यान नानाकार-नट है= पर्याय से ज्ञान नट के समान विभिन्न-प्रकार का है, निरविकलप अविनस्वर दरबरूप= विकल्प-रहित, अविनाशी, द्रव्यरूप, ग्यान ज्ञेय वस्तुसौं= ज्ञान ज्ञेय-वस्तु में, अव्यापक अघट है= न व्याप्त होता है और न घटता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के पाँचवे-पक्ष- ‘जब तक ज्ञेय, तब तक ज्ञान’- इस विचारधारा का सतर्क-खंडन किया है। इस विचारधारा को माननेवाले अज्ञानी-जीव कहते हैं कि ‘‘ज्ञान का परिणमन ज्ञेय के अनुसार होता है; इसलिये जबतक ज्ञेय विद्यमान रहते हैं, तबतक ज्ञान भी प्रगट रहता है। और ज्ञेयों के नष्ट होते ही ज्ञान भी विनाश को प्राप्त होता है’’- ऐसा उसके हृदय में मिथ्यात्व का दुराग्रह या जोर है। एकांतवादियों के इस पक्ष का खंडन करते हुये सम्यग्दृष्टि ज्ञानी-जीव उन अज्ञानी-जीवों को अनुभव की कहानी कहते हैं अर्थात् जनप्रचलित-उदाहरण के माध्यम से समझाते हैं। जैसे नट के खेल में नट स्वभाव से एक साधारण-पुरुष होते हुये भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कईप्रकार के भेष धारणकरता है, और आम-आदमी उसके उसी रूप को सच मानकर खुश होता है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान भी अखंड होते हुए भी पर्याय से ज्ञेयाकाररूप प्रवर्तित प्रतीत होता है, और अज्ञानी-जीव ज्ञान के इस ज्ञेयरूप-प्रवर्तन को ही ज्ञान का स्वभाव मान लेता है। अथवा ज्ञान को ज्ञेयों की आधीन मानता है, जबकि ज्ञान पूर्णतः भिन्न एक स्वाधीन-द्रव्य है। द्रव्य-स्वभाव से ज्ञान तो निर्विकल्प और अविनाशी है, अर्थात् ज्ञान अपने स्वभाव की अपेक्षा समस्त-विकल्पों से रहित है, वह कौन-सा ज्ञेय झलके कौन-सा नहीं?- ऐसा कोई विकल्प ज्ञान में नहीं है, पूरीतरह ज्ञेय के विकल्प से निर्विकल्प; इसीप्रकार कोई भी ज्ञेय कबतक झलके, कबतक नहीं? अर्थात‍् ज्ञेय के आकार बदलनेरूप विनाश से रहित अविनाशी है। ज्ञान ‘अव्यापक’ और ‘अघट’ भी है, अर्थात् ज्ञान की निर्मलता में ज्ञेय झलकते तो हैं; पर ज्ञान कभी उन ज्ञेयों में व्याप्त नहीं होता अर्थात‍् कभी उनमें प्रवेश नहीं करता है। ठीक उसीप्रकार, जैसे सूर्य के प्रकाश में पदार्थ प्रकाशित तो होते हैं; परन्तु सूर्य का प्रकाश उन पदार्थों के अंदर प्रवेश नहीं करता, ज्ञान भी कभी ज्ञेयों से एकमेक नहीं होता; इसलिए ज्ञान और ज्ञेय की एकता कभी नहीं घटती, अर्थात‍् ज्ञान में ज्ञेयों का झलकना सहज और त्रिकाल होता है, क्षणिक नहीं। इसप्रकार एकांतवादियों का यह पाँचवाँ पक्ष (कि ज्ञेय हैं, तब तक ज्ञान है) भी मिथ्या सिद्ध होता है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ मंद कहै ‘‘धर्म-अधर्म-आकास-काल, पुदगल-जीव सब मेरो रूप जगमें’’।
जानै न मरम-निज मानै आपा-पर-वस्तु, बांधै द्रिढ़-करम धरम खोवै डगमैं’'।।

समकिती-जीव सुद्ध-अनुभौ-अभ्यास तातैं, परकौ-ममत्व त्याग करै पग-पगमैंं, अपने-सुभाव में मगन रहैं आठों-जाम, धारावाही-पंथक कहावै मोख-मगमें।। 18।। शब्दार्थ :- कोऊ मंद कहै= कोई मंदबुद्धि कहता है कि, धर्म-अधर्म आकास-काल-पुदगल-जीव= धर्म, सर्वद्रव्यमयं प्रपद्य पुरुषं दुर्वासना-वासितः, स्वद्रव्य-भ्रमतः पशुः किल परद्रव्येषु विश्राम्यति। स्याद्वादी तु समस्त-वस्तुषु पर-द्रव्यात्मना नास्तितां, जानन्निÂर्मल-शुद्धबोध-महिमा स्वद्रव्यमेवाश्रयेत्।। 7।। अधर्म, आकाश, काल, पुद््गल और जीव, सब मेरो रूप जगमें= जगत् में सब मेरा ही रूप है, जानै न मरमनिज= वे निजात्मा के मर्म को तो जानते नहीं है, मानै आपा-पर-वस्तु= पर-वस्तु को अपना स्वरूप मानते हैं, बांधै द्रिढ़-करम= कर्मों का दृढ़-बंध करते हैं, धरम खोवै डगमैं= और कदम-कदम पर अपने धर्म यानि स्वरूप को खोते हैं। समकिती जीव= सम्यग्दृष्टि-जीव (जिनको), सुद्ध-अनुभौ-अभ्यास= शुद्धात्मा के अनुभव का अभ्यास है, तातैं परकौ ममत्व-त्याग करै पग-पगमैं=ं जिससे कदम-कदम पर-पदार्थों से ममत्व का त्याग करते हैं, अपने सुभाव में मगन रहैं आठों जाम= प्रतिसमय अपने स्वभाव में मगन रहते हैं, धारावाही-पंथक कहावै मोख-मगमें= और मोक्षमार्ग के धारावाही/अनवरत पथिक कहलाते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के छठवें-मत कि ‘सभी द्रव्य ब्रह्म से अभिन्न हैं, इसलिए सभी ज्ञान स्वरूप हैं’- इसका सटीक-खंडन किया है। ब्रह्म-अद्वैतवादी-मत के अनुयायी मानते हैं कि ‘‘जगत् के सभी द्रव्य अर्थात् जीव, पुद््गल धर्म, अधर्म, आकाश, काल- मेरा ही स्वरूप है, अर्थात् ब्रह्म सब द्रव्यमय हैं, इसलिए सभी ज्ञानरूप हैं।’’ वे अपना निजस्वरूप तो जानते नहीं, और पर-पदार्थों को ही निज-आत्मा मानते हैं। इससे वे कदम-कदम पर कर्मों का दृढ़-बंध करते हैं और अपने स्वरूप को मलिन करते हैं। कहने का अभिप्राय यही है कि इन ब्रह्म-अद्वैत-मतावलंबियों ने तो छहों द्रव्यों की भिन्न-सत्ता और स्वतंत्रता को ही स्वीकार नहीं किया, सभी जड़-चेतन द्रव्यों को आपस में मिला दिया। केवल आत्मा को ही नहीं, पाँचों जड़-द्रव्यों को भी ब्रह्म-स्वरूप अर्थात् ज्ञानस्वरूप माना। साथ ही एक स्वात्मा के अलावा समस्त पर-द्रव्यों, पर-पदार्थों को भी निजात्मा मानते हैं। अर्थात् निरन्तर विपरीत-मान्यता, जिससे महापाप मिथ्यात्व अर्थात् अनंत-संसार का बंध करते हैं। जिन्हें अपने आत्मस्वरूप का सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान और लीनता है,- ऐसे सुधी ज्ञानी-जीव इन मिथ्यादृष्टि-जीवों को समझाते हैं, कि ‘‘हे आत्मन्! ये जगत् छह-द्रव्यों का समूह है, और प्रत्येक द्रव्य पूर्ण-स्वतंत्र और भिन्न-भिन्न-स्वभाव और सत्ता का धारी है। इनमें से एकमात्र जीव ही ज्ञान गुण का धनी है। शेष सभी द्रव्य तो जड़ हैं, अचेतन हैं, और निजात्मा से पूर्णतः भिन्न हैं। इन सभी जड़-द्रव्यों और पदार्थो को अपना मानना ही तो मिथ्यात्व है, जो अपने स्वरूप की मलिनता और अनंत-संसार के बंध का कारण है। इसीलिए ज्ञानी-जीव स्वात्मा में अनुरक्त होकर पर-पदार्थों के प्रति ममत्व का क्षण-क्षण पर त्याग करते हैं, और आठों-याम प्रतिसमय अपने स्वभाव में ही मगन रहते हैं, इसीलिए मोक्षमार्ग के धारावाही अर्थात‍् मोक्षमार्ग पर निरन्तर अग्रसर पथिक या अनवरत-मोक्षमार्गी कहलाते हैं।’’ इसप्रकार अद्वैतवादियों कि यह मान्यता कि ‘सभी द्रव्य ब्रह्ममय है, और ज्ञान-स्वरूप हैं’ सर्वथामिथ्या सिद्ध होती है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ-सठ कहै ''जेतौज्ञेयरूप-परवांन, तेतौ-ग्यान तातैं कहूँ अधिक न और है।
तिहूँकाल परक्षेत्र-व्यापी परनयौ मानै, आपा न पिछानै ऐसी मिथ्यादृग-दौर है’'।।
जैनमती-कहै ''जीव-सत्ता परवांन ग्यान, ज्ञेयसौं अव्यापक जगत्-सिरमौर है।

ग्यान की प्रभा में प्रतिबिंबित विविध-ज्ञेय, जदपि तथापि थिति न्यारी-न्यारी ठौर है’'।। 19।। भिन्न-क्षेत्र-निषण्ण-बोध्यनियत-व्यापारनिष्ठः सदा, सीदत्येव बहिः पतन्तमभितः पश्यन्पुमांसं पशुः। स्वक्षेत्रास्तितया निरुद्धर-भसः स्याद्वादवेदी पुन-स्तिष्ठत्यात्मनिखातबोध्यनियत-व्यापार-शक्तिर्भवन् ।। 8।। शब्दार्थ :- कोऊ-सठ कहै= कोई अज्ञानी कहता है, जेतौ ज्ञेयरूप-परवांन= जितना ज्ञेय का प्रमाण है, तेतौ ग्यान तातैं कहूँ अधिक न और है= उतना ही ज्ञान है, उससे न अधिक है न कम है, तिहूँकाल परक्षेत्र-व्यापी परनयौ मानै= त्रिकाल परक्षेत्र में व्याप्त और परिणत मानता है, आपा न पिछानै= स्वयं को नहीं पहचानता, ऐसी मिथ्यादृग दौर है= मिथ्यात्व का ऐसा प्रवाह है। जैनमती-कहै= जैनमत को माननेवाले कहते हैं, जीव-सत्तापरवांन ग्यान= ज्ञान जीव-सत्ता के प्रमाण है, ज्ञेयसौं अव्यापक= ज्ञेय से अव्याप्त/भिन्न है, जगत्-सिरमौर है= जगत् का शिरोमणि है, ग्यान की प्रभा में= ज्ञान के प्रकाश/निर्मलता में, प्रतिबिंबित विविध-ज्ञेय जदपि= यद्यपि ज्ञान में विविधप्रकार के ज्ञेय प्रतिबिंबित होते हैं, तथापि थिति न्यारी-न्यारी ठौर है= फिर भी उनकी स्थिति/ सत्ता जुदी-जुदी है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के सातवें-पक्ष कि ‘ज्ञान, ज्ञेय-क्षेत्र के बाहर नहीं होता’- इसका सटीक-खंडन किया है। एकांतवादियों का मानना है कि ज्ञान, ज्ञेय-क्षेत्र से बाहर नहीं होता अर्थात् जितना ज्ञेय उतना ही ज्ञान, न तो ज्ञेय से ज्यादा और न ज्ञेय से कम। इसप्रकार वे ज्ञान को त्रिकाल परक्षेत्र-व्यापी अर्थात् परक्षेत्र के अधीन, और पर में परिणत या पर में तन्मय मानते हैं। मिथ्यात्व की ऐसी दौड़/जोर है कि वे अपने ही स्वरूप को नहीं पहचानते। कहने का अभिप्राय यह है कि इस विचारधारा के जीवों ने अपरिमित, असीमित, पूर्ण-स्वाधीन ज्ञान-सत्ता को इन जड़-ज्ञेयों के अधीन मान लिया। अाश्चर्य होता है कि प्रत्येक जीव तो स्वाधीनता चाहता है, और इस मत के अनुयायियों ने तो ज्ञान को अर्थात‍् स्वयं को पूर्णत: पराधीन ही मान लिया। अनादिकालीन-मिथ्यात्व की ऐसी अंधी-दौड़ है, कि अनंतज्ञान का धनी और पूर्ण-स्वाधीन होते हुये भी स्वयं को ज्ञेय-क्षेत्र के अधीन मानता है। जिनेन्द्र-भगवान् द्वारा प्रवर्तित जैन-मत को माननेवाले सुधीजन उन अज्ञानी-जीवों से कहते हैं कि ''भाई! ज्ञान, ज्ञेय-क्षेत्र के बराबर नहीं, बल्कि आत्मसत्ता के बराबर है। कभी ज्ञेयों के साथ तन्मय नहीं होता, न कभी परक्षेत्र अर्थात् ज्ञेयक्षेत्र में व्याप्त होता है; उनके अंदर प्रवेश नहीं करता है। ज्ञान तो जगत् का शिरोमणि है; क्योंकि ज्ञान ही संपूर्ण-जगत् को प्रकाशित करता है, न कि संपूर्ण जगत् ज्ञान को प्रकाशित करता है। यद्यपि ज्ञान की निर्मलता में संपूर्ण लोकालोक के समस्त ज्ञेय पदार्थ झलकते हैं, जो कि उसका स्वभाव है; परन्तु ज्ञान त्रिकाल दर्पणवत् निर्विकार ही रहता है, क्योंकि ज्ञान और ज्ञेय दोनों की

सत्ता पूर्णतः भिन्न-भिन्न है।
इसप्रकार ‘ज्ञान को ज्ञेय-क्षेत्र के आधीन’ माननेवालों की यह कल्पना मिथ्या सिद्ध होती है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ सुन्नवादी कहै ''ज्ञेय के विनास होत, ज्ञान कौ विनास होइ कहौ कैसे जीजिये।
तातैं जीवतव्यता की थिरिता निमित्त सब, ज्ञेयाकार-परिनामनि कौ नास कीजिये’'।।
सत्यवादी कहै ''भैया! हूजे नांहि खेद-खिन्न, ज्ञेयसौं विरचि ग्यान भिन्न मानि लीजिए।
ग्यान की सकति-साधि अनुभौ-दसा अराधि, करमकौं त्यागिकै परमरस पीजिये’'।। 20।।

शब्दार्थ :- कोऊ सुन्नवादी कहै= कोई शून्यवादी/माध्यमिक-बौद्ध कहते हैं, ज्ञेय के विनास होत= ज्ञेय के स्वक्षेत्र-स्थितये पृथग्विधि-परक्षेत्र-स्थितार्थोज्झनात्, तुच्छीभूय पशुः प्रणश्यति चिदाकारान् सहार्थैर्वसन्। स्याद्वादी तु वसन् स्वधामनि परक्षेत्रे विदन्नास्तितां, त्यक्तार्थोऽपि न तुच्छतामनुभवत्याकारकर्षी परान्।। 9।। नष्ट होने से, ज्ञान कौ विनास होइ= ज्ञान का भी विनाश हो जाता है, कहौ कैसे जीजिये= कहो कैसे जियें, तातैं जीवतव्यता की थिरिता निमित्त= इसलिए जीवन की स्थिरता के निमित्त, सब ज्ञेयाकार परिनामनि कौ नास कीजिये= सब ज्ञेयाकार-परिणामों को नष्ट कीजिये। सत्यवादी कहै= सत्यवादी कहते हैं, भैया हूजे नांहि खेद खिन्न= ‘’ भाई! खेद-खिन्न मत होओ, ज्ञेयसौं विरचि= ज्ञेयों से विरक्त होकर, ग्यान भिन्न मानि लीजिए= ज्ञान को भिन्न मान लीजिये, ग्यान की सकति साधि= ज्ञान की शक्ति को साधकर, अनुभौ-दसा अराधि= अनुभव की आराधना कर, करमकौं त्यागिकै= कर्मों का त्याग करके, परमरस पीजिये= परम-अमृतरस का पान करो’'। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के आठवें-पक्ष ‘जीव-नास्ति रूप है अर्थात् जीव नामका कोई पदार्थ ही नहीं हैं’- इसका सतर्क-खंडन किया है। इस विचारधारा के जीवों ने तो आत्मसत्ता को सिरे से ही नकार दिया। उनका कहना है कि ‘‘ज्ञेय का विनाश होने पर ज्ञान का भी विनाश होता है। और ज्ञान जीव का स्वरूप है, सो जीव का भी विनाश निश्चित है, तो फिर जीवन ही कहाँ रहा? कैसे जियें? इसलिये जीवन की स्थिरता के लिये ज्ञान में समस्त ज्ञेयाकाररूप-परिणमन का अभाव मानना चाहिए।’’ इसे कहते हैं कि अपना स्वार्थ पूरा करने के लिये किसी भी पदार्थ की सत्ता जो प्रत्यक्ष मौजूद होते हुये भी उसे नकार दिया जाये। भाई! आत्मा ज्ञानमय/ज्ञान का घन-पिण्ड है, यदि हमने उसमें से जाननशक्ति को ही निकाल दिया, तो फिर उसका अस्तित्व ही नहीं बचेगा। और जानन-शक्ति केवल प्रत्यक्ष मौजूद ही नहीं है, बल्कि अपना जाननरूप-कार्य भी प्रतिसमय कर रही है। सो तुम्हारा ये तर्क सत्य कैसे हो सकता है? ऐसे जीवों को समझाते हुए सत्यवादी ज्ञानी-जीव कहते हैं कि ''भाई! खेद-खिन्न मत होओ। ज्ञेय तो ज्ञान में झलकेगें ही। ज्ञान का स्वभाव ही स्व-पर-प्रकाशी है, अत: पर ज्ञेयों के साथ साथ निज-आत्मा भी ज्ञान में झलक रहा है, इसलिये तुम पर-ज्ञेयों से विरक्त होकर निज-आत्मा को ज्ञान/उपयोग का विषय बनाओ। निज ज्ञान-शक्ति को साधकर अपनी शुद्धात्मा में उपयोग की स्थिरता का पुरुषार्थ करो। और समस्त कर्मों का क्षय करके एकमात्र स्वात्मा के आनंदामृत के अतीन्द्रिय-रस का पान करो। इसप्रकार जीव की सत्ता को ही नकारनेवाले इन शून्यवादी-जीवों की ये विचारधारा स्वत: ही मिथ्या सिद्ध होती है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ क्रूर कहै ''काया-जीव दोऊ एक-पिंड, जब देह नसेगी, तबही जीव मरैगौ।
छाया-कौसौ छल किंधौं माया-कौसौं परपंच, कायामैं समाइ फिरि काया न धरैगौ’'।।
सुधी कहैं ''देहसौं अव्यापक सदीव जीव, समै पाइ परकौ ममत्व परिहरैगौ।।
अपने सुभाई आइ, धारना धरामैं धाइ, आपमैं मगन ह्वै कै आप सुद्ध करैगौ’'।। 21।।

(दोहा)

ज्यौं तन-कंचुक-त्यागसौं, विनसै नांहि भुजंग।
त्यौं सरीरके नासतैं, अलख अखंडित-अंग।। 22।।

पूर्वालम्बित-बोध्य-नाशसमये ज्ञानस्य नाशं विदन्, सीदत्येव न कि®¨fनापि कलयन्नत्यन्ततुच्छः पशुः। अस्तित्वं निजकालतोऽस्य कलयन् स्याद्वादवेदी पुनः,पूर्णस्तिष्ठति बाह्य-वस्तुषु मुहुर्भूत्वा विनश्यत्स्वपि।। 10।। शब्दार्थ :- कोऊ क्रूर कहै= कोई क्रूर/आत्मा का निषेध करनेवाला कहता है, काया-जीव दोऊ एक-पिंड= शरीर और आत्मा दोनों एक-पिंड हैं, जब देह नसेगी= जब शरीर का विनाश होता है, तबही जीव मरैगौ= तब जीव का भी मरण होता है, छाया-कौसौ छल= छाया के समान छल, किंधौं माया-कौसौं परपंच= अथवा माया के प्रपंच के समान, काया मैं समाइ= शरीर में समाने पर, फिरि काया न धरैगौ= फिर देह धारण नहीं करेगा। सुधी कहैं= ज्ञानी-जीव कहते हैं, देहसौं अव्यापक सदीव जीव= आत्मा शरीर से सदाकाल अव्याप्त ही रहता है, समै पाइ परकौ ममत्व परिहरैगौ= समय पाकर पर-पदार्थों से ममत्व त्याग देगा, अपने सुभाई आइ= अपने स्वभाव में आकर, धारना धरामैं धाइ= उसे धारणा में धारणकर, आपमैं मगन ह्वै कै= अपने में मगन होकर, आप सुद्ध करैगौ= अपने को शुद्ध करेगा।। 21।। ज्यौं तन-कंचुक-त्यागसौं= जैसे शरीर की केंचुली के त्यागने से, विनसै नांहि भुजंग= सर्प का विनाश नहीं होता है, त्यौं सरीरके नासतैं= उसीप्रकार शरीर के नाश होने से, अलख अखंडित-अंग= अलक्षी-आत्मा का भी विनाश नहीं होता।। 22।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने एकांतवादियों के नौंवे-पक्ष- ‘देह के साथ जीव का भी विनाश होता है’- इसका सतर्क-खंडन किया है। चार्वाक-मत के अनुयायी कहते हैं कि ‘‘देह और जीव दोनों एक पिंड हैं, सो जब देह का विनाश होता है, तब जीव का भी विनाश हो जाता है। ठीक उसीप्रकार जैसे वृक्ष के विनाश होने पर उसकी छाया भी नष्ट हो जाती है। अथवा इन्द्रजाल की माया के समान कौतुक बन रहा है, सो जीवात्मा दीपक की लौ के प्रकाश के समान शरीर में ही समा जायेगा और फिर दुबारा शरीर-धारण नहीं करेगा।’’ एकांतवादियों के इस मत का खंडन करते हुए सुधी ज्ञानी-जीव कहते हैं -‘‘जीवात्मा देह में रहते हुए भी कभी देह में व्याप्त नहीं होती अर्थात् तद्रूप नहीं होती। यहाँ तक कि कभी देह को स्पर्श भी नहीं करती; क्योंकि दोनों के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, प्रदेश आदि सब भिन्न-भिन्न हैं। जैसे प्रतिसमय कीचड़ में रहकर भी कमल कभी कीचड़ को स्पर्श नहीं करता; ठीक उसीप्रकार प्रतिसमय देह में रहकर भी जीवात्मा ने कभी देह को स्पर्श नहीं किया। इसलिये देह के विनाश होने पर भी जीव का विनाश नहीं होता’’। जिसप्रकार सर्प के द्वारा अपनी केंचुली का त्याग करने पर भी सर्प का विनाश नहीं होता, ठीक उसीप्रकार देह के विनाश होने पर भी जीवात्मा अखंड और अविनाशी रहता है। बल्कि समय पाकर या काललब्धि आने पर जीवात्मा पर-पदार्थों से एकत्व-ममत्वबुद्धि का त्यागकर अपने स्वभाव का आश्रय लेकर उस पर ही उपयोग केन्द्रित करके, अपने स्व-चतुष्टय में मगन होकर अपने को शुद्ध करेगा और इस देह को छोड़कर निर्वाण प्राप्त करेगा।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ-दुरबुद्धी कहै ''पहले न हुतौ जीव, देह-उपजत अब उपज्यौ है आइकै।
जौलौं-देह तौलौं-देहधारी फिर देह नसै, रहैगौ अलख-जोति जोतिमैं समाइकै’'।।
सद्बुद्धी कहै ''जीव अनादि को देहधारी, जब ग्यानी होइगौ कबहूँ काल पाइकै।
तबहीसौं पर-तजि अपनौ सरूप-भजि, पावैगौ-परमपद करम-नसाइकै’'।। 23।।

शब्दार्थ :- कोऊ-दुरबुद्धी कहै= कोई दुर्बुद्धि-जीव कहता है, पहले न हुतौ जीव= पहले जीव नहीं था, अर्थालम्बन-काल एव कलयन् ज्ञानस्य सत्त्वं बहि-र्ज्ञेयालम्बन-लालसेन मनसा भ्राम्यन् पशुर्नश्यति। नास्तित्वं परकालतो¹ऽस्य कलयन् स्याद्वादवेदी पुन-स्तिष्ठत्यात्मनिखात-नित्य-सहज-ज्ञानैकपु®जीभवन् ।।11।। देह उपजत अब उपज्यौ है आइकै= देह का जन्म होने पर नया उत्पन्न हुआ है, जौलौं-देह तौलौं-देहधारी= जबतक शरीर रहता है, तबतक जीव भी रहता है, फिर देह नसै= फिर देह के नष्ट होने पर, रहैगौ अलख-जोति जोतिमैं समाइकै= जीवात्मा की ज्योति अलक्ष्य-ज्योति में समा जाती है। सद्बुद्धी कहै= सद््बुद्धि जीव कहते हैं, जीव अनादि को देहधारी= जीव अनादिकाल से देह को धारण किये हुए है, जब ग्यानी होइगौ= जब ज्ञानी होगा, कबहूँ काल पाइकै= कभी समय पाकर, तबहीसौं पर-तजि= तब पर को छोड़कर, अपनौ सरूप-भजि= अपने स्वरूप का ग्रहणकर, पावैगौ-परमपद= परमपद को प्राप्त करेगा, करम-नसाइकै= कर्मों का विनाश करके। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के दसवें-पक्ष कि ‘देह की उत्पत्ति होने पर जीव की उत्पत्ति होती है’- इस विचारधारा का स्पष्टीकरण करते हुये उसका खंडन किया है। देह में अति-आसक्त दुर्बुद्धि-जीव ‘चार्वाक’ कहते हैं कि ‘‘जीव तो पहले था ही नहीं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- इन पंच-तत्त्वों के मिलने पर जीव की उत्पत्ति हुई। अर्थात् जब देह का जन्म हुआ, तब जीव का भी जन्म हुआ; इसलिये जबतक देह रहेगी, तबतक जीव भी रहेगा। देह विनाशीक है, अत: देह का मरण होने पर जीव भी इन पंचतत्त्वों की ज्योति में ही विलीन हो जायेगा’’। कैसी विडम्बना है कि इस विचारधारा के जीवों ने तो आत्मा-परमात्मा की अनादि-अनंत’ ‘त्रिकाल’ शाश्वत’ ध्रुव-सत्ता को ही नकार दिया है, इतना ही नहीं ‘कर्म-सिद्धांत’ को भी स्वीकार नहीं किया; क्योंकि जब जीव का विनाश होगा, तो उसके अच्छे-बुरे कर्मों का भी विनाश हो जायेगा, अर्थात‍् अगला जन्म, पुण्य-पाप और उनके फल का भी कोई अस्तित्व नहीं रहा। परम-स्वाधीन स्व-चतुष्टय के धारी जीव की सत्ता को देह और पंच-तत्त्वों के आधीन मान लिया। देखा जाये, तो एकांतवादियों का यह मत तो प्रत्यक्ष ही प्रमाणित नहीं होता; क्योंकि कर्म, कर्मफल, पुण्य-पापरूप अनुकूलता-प्रतिकूलता और उनमें इतनी विविधता तो प्रत्यक्ष देखने को मिलती है; फिर हम कैसे मानें कि जीव की नवीन-उत्पत्ति होती है। ऐसे मिथ्यादृष्टि-जीवों से सम्यग्दृष्टि ज्ञानी-जीव कहते हैं कि ''भाई! जीव तो अनादिकाल से देह को धारण किये हुये हैं, और निजात्मा के भान बिना कर्म और कर्मफलों को भोगता भी आ रहा है। जब कभी समय पाकर ज्ञानी होगा अर्थात् सद्-निमि�ा मिलने पर जब निज-स्वरूप की पहचान और अनुभूति करेगा, तब अभी जो पर-पदार्थों और संयोगों में अासक्ति है, उसका त्यागकर अपने स्वरूप में ही रमण करेगा, और समस्त द्रव्यकर्म, भावकर्म, और नोकर्म को नष्टकर परमात्मा-पद को प्राप्त करेगा। इसप्रकार एकांतवादियों का यह मत कि ‘देह के साथ जीव की भी उत्पत्ति होती है’- मिथ्या सिद्ध होता है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ-पक्षपाती-जीव कहै ''ज्ञेयकै अकार, परिनयौ-ग्यान तातैं चेतना असत है।
ज्ञेयके नसत चेतनाकौ नास ता-कारन, आतमा अचेतन त्रिकाल मेरे मत है’'।।
पंडित कहत ''ग्यान सहज अखंडित है, ज्ञेयकौ अाकार धरै ज्ञेयसौं विरत है।
चेतनाकौ नास होत सत्ताकौ विनास होइ, यातैं ग्यान-चेतना-प्रवांन जीव-तत है’'।। 24।।

शब्दार्थ :- कोऊ पक्षपाती-जीव कहै= कई हठग्राही-जीव कहते हैं, ज्ञेयकै अकार परिनयौ ग्यान= ज्ञान ज्ञेय विश्रान्तः परभाव-भाव-कलनान्नित्यं बहिर्वस्तुषु, नश्यत्येव पशुः स्वभाव-महिमन्येकान्त-निश्चेतनः। सर्वस्मान्नियत-स्वभाव-भवन-ज्ञानाद्-विभक्तो भवन्, स्याद्वादी तु न नाशमेति सहज-स्पष्टीकृत-प्रत्ययः।। 12।। के आकाररूप परिणमित होता है, तातैं चेतना असत है= इससे चेतना असत् है, ज्ञेयके नसत= ज्ञेय के नाश होने पर, चेतनाकौ नास= चेतना का भी विनाश हो जाता है, ता-कारन आतमा अचेतन= इस कारण आत्मा अचेतन है, त्रिकाल मेरे मत है= सदाकाल मेरे मत में। पंडित कहत= पंडित कहते हैं, ग्यान सहज अखंडित है= ज्ञान सदाकाल सहज अखंडित है, ज्ञेयकौ अाकार धरै= ज्ञेय का आकार धारण करता है, ज्ञेयसौं विरत है= परन्तु ज्ञेय से विरक्त रहता है, चेतनाकौ नास होत= चेतना के नाश होने पर, सत्ताकौ विनास होइ= सत्ता का भी विनाश हो जायेगा, यातैं ग्यान चेतना-प्रवांन जीव-तत है= इसलिए ज्ञान चेतना-प्रमाण जीव-तत्त्व है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के ग्यारहवें-पक्ष ‘ज्ञान अचेतन है’- का निराकरण किया है। कोई हठग्राही या अपनी जिद पर अड़े जीव कहते हैं कि ‘‘ज्ञान तो ज्ञेय के अनुसार ही परिणमन करता है, और आकार तो असत् है (क्योंकि अगले ज्ञेय का आकार बनने पर पुराना-ज्ञेयाकार विनाश को प्राप्त होता है), इसलिये चेतना भी असत् हुई। इसप्रकार ज्ञेय के विनाश होने से चेतना भी विनाश को प्राप्त होती है, इसलिए मेरे मत में चेतना त्रिकाल-असत् है।’’ कहने का अभिप्राय यही है कि इस विचारधारा के जीवों नें चेतन-स्वरूप आत्मा की सत्ता को ही नकार दिया यानि ज्ञान को ही अचेतन कह दिया। इनका यह तर्क तो प्रत्यक्ष ही मिथ्या सिद्ध होता है; क्योंकि चेतना, जीव, ज्ञान सब मूल में एक ही है। सो यदि चेतना को ही अचेतन कहेंगें; तो फिर स्मरण-शक्ति तो होगी ही नहीं, जोकि मौजूद रहती है। दूसरा यदि चेतन को ही अचेतन कहेंगें, तो फिर चेतन किसे कहेगें? ऐसे मिथ्यादृष्टि-जीवों से पंडित या विशेष-ज्ञानी जीव कहते हैं कि ‘‘ज्ञान तो त्रिकाल अखंडित रहता है। जैसे सूर्य त्रिकाल प्रकाशित ही रहता है, उसके लिये प्रकाशित होनेवाले पदार्थ कम हों या ज्यादा हों, ऐसा कोई भेद नहीं है। उसीप्रकार ज्ञान तो त्रिकाल एक जैसा अखंडित ही है, ज्ञेयों के झलकने पर ज्ञेयाकाररूप प्रतीत जरूर होता है, पर फिर भी ज्ञेयों से विरत या भिन्न ही रहता है। जब ज्ञान ज्ञेयों से हमेशा भिन्न ही है, तो चेतना का विनाश कैसे संभव हैं’’? यदि चेतना का विनाश हो गया, तो जीव की सत्ता का ही विनाश हो जायेगा, क्योंकि जीव तो चेतना का ही पिण्ड है। इसप्रकार हम कह सकते हैं कि ‘जीव ज्ञान-चेतना प्रमाण और सत् है।’’ इसप्रकार हम कह सकते हैं, ज्ञान को अचेतन मानना जीव का भ्रम हैं, उनका ये तर्क पूर्णत: मिथ्या है। ज्ञान तो त्रिकाल-शुद्ध और चेतन था, है और रहेगा।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ महामूरख कहत ''एक पिंड-माँहि, जहाँलौं अचित-चित अंग लहलहै है।
जोगरूप-भोगरूप-नानाकार-ज्ञेयरूप, जेते-भेद करमके तेते-जीव कहै हैं’'।।
मतिमान कहै ''एक-पिंड-माँहि एक-जीव, ताहीके अनंत-भाव अंस फैलि रहै है।
पुग्गलसौं भिन्न कर्म-जोगसौं अखिन्न सदा, उपजै-विनसै-थिरता सुभाव गहै है’'।। 25।।

शब्दार्थ :- कोऊ महामूरख कहत= कोई महामूर्ख कहते हैं, एक पिंड-माँहि= एक ही पिंड/शरीर में, जहाँलौं अचित-चित अंग लहलहै है= जहाँ तक अचेतन-चेतनरूप विचार फैल रहे हैं, जोगरूप भोगरूप नानाकार ज्ञेयरूप= योगरूप, भोगरूप, नानाप्रकार के ज्ञेयरूप, जेते भेद करमके= जितने भेद कर्म के, तेते जीव कहै है= अध्यास्यात्मनि सर्वभाव-भवनं शुद्ध-स्वभाव-च्युतः, सर्वत्राप्यनिवारितो गतभयः स्वैरं पशुः क्रीडति। स्याद्वादी तु विशुद्ध एव लसति स्वस्य स्वभावं भरा-दारूढः परभाव-भाव-विरह-व्यालोक-निष्कम्पितः।। 13।। उतने ही जीव के कहे हैं। मतिमान कहै= बुद्धिमान्-जीव कहते हैं, एक-पिंड-मांहि एक-जीव= एक-पिंड में एक ही जीव, ताहीके अनंत-भाव अंस फैलि रहै है= उसी के अनंत-भाव अंशरूप में फैल रहे हैं, पुग्गलसौं भिन्न= पुद््गल से भिन्न, कर्म-जोगसौं अखिन्न= कर्म के योग से खेद-रहित/अप्रभावित, सदा उपजै-विनसै-थिरता= सदा उत्पाद-व्यय-धौव्य, सुभाव गहै है= स्वभाव से संपन्न है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के बारहवें-पक्ष कि ‘आत्मा सत्ता का अंश है’- इसका सटीक-खंडन किया है। इस विचारधारा के जीव ऐसा मानते हैं कि ‘‘एक ही पिंड/शरीर में चेतन और अचेतन- दोनों प्रकार की तरंगें उठती हैं। कभी योगरूप तो कभी भोगरूप और कभी ज्ञेयरूप, सो जिससमय योगरूप-तरंगें उठें, उससमय योगी-जीव, और जिससमय भोगरूप-तरंगें उठें, उससमय भोगी-जीव। इसप्रकार ज्ञेय-रूप क्रिया के जितने भेद हैं, उतने ही भेद जीव के हैं, अतः आत्मा सत्ता का अंश है’’। ऐसे अज्ञानी-जीवों को समझाते हुए ज्ञानी-जीव कहते हैं कि ‘‘एक पिंड/शरीर में एक ही जीव होता है, उसी के अनंतभाव अंशरूप में फैल रहे हैं। जो पुद््गल से पृथक्, कर्मयोग से रहित सदाकाल उत्पाद-व्यय-धौव्य स्वभाव से संपन्न हैं।’’ कहने का अभिप्राय यही है कि एक शरीर में आत्मा तो एक ही है, भोगरूप, योगरूप जो भी भाव है, वे सब पर्याय में है, और पर्याय द्रव्य-स्वभाव से भिन्न उत्पाद और व्यय-स्वभावी है, और आत्मा उस समय भी ध्रौव्यरूप सदाकाल विद्यमान रहता है। अर्थात् शरीर से व संयोगों से भिन्न आत्म-स्वभाव ही परिपूर्णता का स्थान है, वही आश्रय के योग्य है। ज्ञेयों के आधार पर जब-जब हम स्वरूप-निर्धारण करना चाहेंगे, तब-तब आत्म-विभ्रम की स्थिति बनेगी, अर्थात् ज्ञेयों का

ध्यान /विकल्प करना ही विकृति को जन्म देता है।
इसप्रकार एकांतवादियों का यह मत कि ‘आत्मा सत्ता का अंश है’ ये भी निराधार है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ एक-छिनवादी कहै ''एक पिंड-माँहि, एक-जीव उपजत एक विनसत है।
जाही-समै अंतर नवीन-उतपति होइ, ताही-समै प्रथम-पुरातन बसत है’'।।
सरवांगवादी कहै ''जैसै जल-वस्तु एक, सोई जल विविध-तरंगनि लसत है।
तैसै एक आतम-दरब गुन-परजैसौं, अनेक भयौ पै एकरूप दरसत है’'।। 26।।

शब्दार्थ :- कोऊ एक-छिनवादी कहै= कोई-कोई क्षणिकवादी कहते हैं, एक-पिंड माँहि एक-जीव उपजत= एक पिंड/शरीर में एक जीव उत्पन्न होता है, एक विनसत है= और एक नष्ट होता है, जाही समै अंतर नवीनउतपति होइ= जिस समय अंतरंग में नवीन-जीव की उत्पत्ति होती है, ताही समै-प्रथम पुरातन बसत है= उसके पूर्व-समय तक प्राचीन-जीव था, सरवांगवादी कहै= स्याद्वादी कहते हैं, जैसै जल-वस्तु एक= जैसे पानी एक वस्तु है, सोई जल विविध-तरंगनि लसत है= वही जल अनेक-तरंगोंरूप होता है, तैसै एक आतम-दरब= वैसै ही एक आत्म-द्रव्य, गुन-परजैसौं अनेक भयौ= गुण-पर्याय से अनेकरूप होता है, पै एकरूप दरसत है= परन्तु एकरूप दिखाई दते ा/अनुभव में आता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के तेरहवें-पक्ष कि ‘जीव क्षणभंगुर है’- इसका सतर्कखंडन किया है। प्रादुर्भाव-विराम-मुद्रित-वहªज्ञानांश-नानात्मना, निर्ज्ञानात्क्षण-भङ्ग-सङ्ग-पतितः प्रायः पशुर्नश्यति। स्याद्वादी तु चिदात्मना परिमृशंिश्चद्वस्तु नित्योदितं, टङ्कोत्कीर्ण-घनस्वभाव-महिमज्ञानं भवन् जीवति ।। 14।। क्षणिकवादी बौद्ध-अनुयायी अपनी क्षणिकवादी-मान्यता का समर्थन करते हुए कहते हैं- ‘‘एक ही शरीर में एक जीव की उत्पत्ति होती है, और एक ही विनाश को प्राप्त होता है। जिससमय नवीन-जीव की उत्पत्ति होती है, उसीसमय पूर्व-जीव प्राचीन-समय में था, अर्थात् नवीन-जीव की उत्पत्ति होने पर पूर्व-जीव विनाश को प्राप्त होता है।’’ आश्चर्य की बात है कि इस विचारधारा के जीवों ने अजर-अमर, त्रिकाली, शाश्वत-आत्मसत्ता को एकसमय की पर्यायमात्र ही मान लिया। अर्थात् पर्याय का काल एक-समय, सो जैसे अगले-समय में नवीन-पर्याय की उत्पत्ति और पूर्व-पर्याय का व्यय होता है, ठीक उसीप्रकार प्रतिसमय नवीन-जीव की उत्पत्ति और पूर्व-जीव का व्यय होता है। अर्थात‍् वर्तमान समय में पुण्य या पापरूप परिणाम करनेवाले जीव को अपने परिणाम का फल प्राप्त नहीं होगा; क्योंकि उस जीव का तो विनाश हो गया, इसलिए जीव अच्छा-बुरा कैसा भी परिणाम करे कोई हर्ष या विषाद नहीं; क्योंकि फल तो उसे भोगना ही नहीं है। यदि इन जीवों की मान्यता सही है, तो फिर पिछले-जन्म की बात तो छोड़ो, इस जन्म में भी जीव को पूर्व में अपने द्वारा किये हुये कर्म का स्मरण नहीं होना चाहिए; क्योंकि उस जीव का तो विनाश हो गया। परन्तु वास्तविकता तो यह है कि हम सभी को अपने द्वारा बिताया हुआ हर पल अच्छे से याद है, अर्थात् वही जीव आज भी मौजूद है; फिर इन क्षणिकवादियों का मत सत्य कैसे हो सकता है? दूसरी बात आज हमें जो अनुकल ू -प्रतिकूल संयोग या पदार्थ मिले हैं, वे किसके परिणामों का फल हैं? क्योंकि जिसने ये परिणाम किये थे, उस जीव का तो विनाश हो गया, अर्थात‍् संपूर्ण कर्म-सिद्धांत ही विपरीत सिद्ध होगा, जो कि प्रत्यक्ष प्रमाणित नहीं होता, इसलिये इनका ये तर्क निराधार है। क्षणिकवाद मानने पर स्मृति, प्रत्यभिज्ञान आदि सभी असंभव और मिथ्या सिद्ध हो जायेंगे, जबकि ये प्रमाणज्ञान हैं। ऐसे अज्ञानी-जीवों को सभी अंगों को अपनी-अपनी अपेक्षा से सत्य माननेवाले स्यादवादी ज्ञानी-जीव समझाते हुए कहते हैं कि ''भाई! आत्मद्रव्य तो सदाकाल एक ही है, न कभी उत्पन्न होता है, और न विनाश को प्राप्त होता है, जो भी उत्पाद और व्यय होता है, वह पर्याय में होता है द्रव्य-स्वभाव तो हमेशा ध्रौव्यरूप ही रहता है। जैसे समुद्र का पानी एक समान स्थिर रहता है; लेकिन हवा का संयोग मिलने पर उसमें हलचल होती है अर्थात् लहरें उठती है, कोई ऊँची तो कोई नीची, कोई तूफानी, तो कोई चक्रवाती। यद्यपि उन सभी अवस्थाओं में पानी के विविधरूप ही दिखाई देते हैं; लेकिन फिर भी पानी एकरूप ही है, ठीक उसीप्रकार आत्मद्रव्य सदाकाल एकसमान रहता है; परन्तु कर्म का संयोग मिलने पर उसमें हलचल होती है, और अपने गुण-पर्यायों से विविधरूपों में दिखाई देता है; परन्तु द्रव्य-स्वभाव की

अपेक्षा एकरूप ही रहता है, न जन्म लेता है और न मरण को प्राप्त होता है’'।
इसप्रकार क्षणिकवादियों की ‘जीव को क्षणिक मानने’ की विचारधारा मिथ्या सिद्ध होती है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ-बालबुद्धि ''कहै ग्यायक-सकति जौंलौं, तौलौं ग्यान-असुद्ध जगत्-मध्य जानियै।
ज्ञायक-सकति काल पाइ मिटि जाइ जब, तब अविरोध-बोध-विमल बखानियै’'।।
परम-प्रवीन कहै ''ऐसी तौ न बनै बात, जैंसैं बिन-परगास सूरज न मानियै।
तैंसैं बिन ग्यायक-सकति न कहावै ग्यान, यह तौ न परोच्छ-परतच्छ परवांनियै’'।। 27।।

टङ्कोत्कीर्ण-विशुद्धबोध-विसराकारात्म-तत्त्वाशया, वाञ््छत्युच्छलदच्छ-चित्परिणतेर्भिन्नं पशुः कि®¨fन। ज्ञानं नित्यमनित्यतापरिगमेऽप्यासादयत्युज्ज्वलं, स्याद्वादी तदनित्यतां परिमृशंश्चिद््वस्तु-वृत्तिक्रमात् ।। 15।। शब्दार्थ :- कोऊ-बालबुद्धि कहै= कोई अज्ञानी कहे, ग्यायक-सकति जौंलौं= जबतक ज्ञायक-शक्ति है, तौलौं ग्यान-असुद्ध= तबतक ज्ञान अशुद्ध है, जगत्-मध्य जानियै= संसार में ऐसा जानना, ज्ञायक-सकति काल-पाइ मिटि जाइ जब= ज्ञायक-शक्ति समय पाकर जब मिट जाती है, तब अविरोध-बोध-विमल बखानियै= तब ज्ञान निर्विरोध/ निर्विकल्प और शुद्ध हो जाता है। ‘’ परम-प्रवीन कहै= श्रेष्ठ-बुद्धिमान् जीव कहते हैं, ऐसी तौ न बनै बात= ‘’ ऐसी तो बात नहीं है, जैंसैं बिन-परगास सूरज न मानियै= जैसे बिना प्रकाश के सूरज को नहीं मानते, तैंसैं बिन ग्यायक-सकति न कहावै ज्ञान= उसीप्रकार ज्ञायक-शक्ति के बिना ज्ञान नहीं कहलाता, यह तौ न परोच्छ-परतच्छ परवांनियै= यह तो परोक्ष और प्रत्यक्ष दोनों से ही प्रमाणित नहीं है।‘’ विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने एकांतवादियों के चौदहवें-पक्ष कि ‘जीव ज्ञायक-शक्ति से रहित अज्ञायक है’- इसका सतर्क-खंडन किया है। इस विचारधारा को माननेवाले लोग कहते हैं कि ‘‘सारा दोष ज्ञायक-शक्ति का है, सो जबतक जीव में ज्ञायक-शक्ति रहेगी तबतक जीव-अशुद्ध रहेगा, और जैसे ही ज्ञायक-शक्ति का अभाव होगा, जीव पूर्ण-शुद्ध और निर्विकार हो जायेगा; अत: हमारा मानना है कि जीव में ज्ञायक-शक्ति का अभाव मानना चाहिए’’। इस विचारधारा को माननेवालों ने तो जीव की पहचान ही खत्म कर दी है। जैसे एक मनुष्य है, उसे हम कबतक अपने से लगाकर रखते हैं/कबतक हम उसे जीवित मानते? जबतक उसमें जानन-शक्ति है, उसे सुख-दुःख का वेदन हो रहा है; अन्यथा जिस-क्षण उसमें से जीवत्व-शक्ति/ज्ञायक-शक्ति का विलय होता है, हम उसे ‘मुर्दा’ कहकर तत्क्षण अपने से दूर कर देते हैं। क्यों? क्योंकि हम जानते हैं कि जबतक इसमें जीवत्व/जाननशक्ति है, तभी तक ये हमारे लिये प्रिय है; अन्यथा तो अन्य अचेतन-पदार्थों के समान जड़ है। उसीप्रकार जबतक जीव में ज्ञायक-शक्ति विद्यमान है, तभीतक उसका अस्तित्व जीवरूप में कायम है, वर्ना तो अन्य-पदार्थों के समान जड़ हो जायेगा, इस अपेक्षा इनकी ये कल्पना निराधार है। ऐसे अज्ञानी-जीवों को परम-प्रवीण अर्थात् विशिष्ट-ज्ञानी जीव कहते हैं, ‘‘जैसा तुम कह रहे हो ऐसा तो प्रत्यक्ष-अनुभव में नहीं आता।’’ लोक में भी जैसे हम बिना प्रकाश के सूरज को नहीं मानते, यहाँतक कि जिस दिन बादलों के कारण सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर नहीं पहुँच पाता, उस दिन हम यही कहते हैं कि ‘‘आज सूरज नहीं निकला’’, क्योंकि उस दिन सूर्य का वो प्रकाश वो गरमाहट हमें प्राप्त नहीं होती, जबकि सूरज तो उस समय भी उदित ही रहता है, हम फिर भी उसको नहीं मानते। और भी कई उदाहरण जैसे उष्णता के बिना अग्नि, शीतलता के बिना जल, खटास के बिना नीबू, खारेपन के बिना नमक इत्यादि को स्वीकार नहीं करते; क्योंकि इन गुणों के बिना इन पदार्थों का कोई अस्तित्व ही नहीं है, ठीक उसीप्रकार जानन-शक्ति/ज्ञायक-शक्ति के बिना ज्ञायक/जीव/आत्मा का कोई अस्तित्व ही नहीं है। ज्ञानीजन कहते हैं कि इसलिये तुम्हारा यह तर्क ‘ज्ञान के बिना ज्ञायक’ प्रत्यक्ष और परोक्ष- दोनों ही प्रमाणों से बाधित है। इसप्रकार ज्ञान बिना ज्ञायक की प्रसिद्धि करनेवाले इन जीवों का तर्क पूर्णतः मिथ्या और निराधार साबित होता है।

(दोहा)

इहविधि आतम-ग्यान-हित, स्याद्वाद-परवांन।
जाके-वचन-विचारसौं, मूरख होइ सुजान।। 28।।

इत्यज्ञान-विमूढानां ज्ञानमात्रं प्रसाधयन्। आत्मतत्त्वमनेकान्तः स्वयमेवानुभूयते ।। 16।।

स्यादवाद आतम-दसा, ता-कारन बलवान।
सिवसाधक बाधारहित, अखै-अखंडित आन।। 29।।

शब्दार्थ :- इहविधि आतम-ग्यान-हित= इसप्रकार आत्मा को जानने के लिए, स्याद्वाद-परवांन= स्याद्वाद ही प्रामािणक सर्वश्रेष्ठ है, जाके वचन-विचारसौं= इसके वचनों को विचारने से, मूरख होइ सुजान= मूर्ख भी बुद्धिमान् हो जाता है।। 28।। स्यादवाद आतम-दसा= स्याद्वाद (की विशिष्ट कथन-शैली) आत्मा की स्थिति है, ता-कारन बलवान= इसकारण ये बलवान है, सिवसाधक बाधारहित= मोक्ष की प्राप्ति करानेवाला समस्त-बाधाओं से रहित, अखै अखंडित-आन= अक्षय अखंडित मर्यादा /स्वरूपवाला है।। 29।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने इस अधिकार का सार ‘स्याद्वाद की महिमा’ को वर्णित किया है, बल्कि यह कहें कि आत्मस्वरूप को समझने का एकमात्र-साधन स्याद्वाद ही है, इसकी प्रतीति भी कराई है। इस अधिकार के लगभग सभी छंदों में कवि ने एकांतवादियों के थोथे-विचारों का प्रस्तुतीकरण और उनका आगम-सम्मत सटीक व सतर्क-खंडन भी किया। और स्पष्ट किया कि यदि हम वास्तव में न केवल आत्मस्वरूप काे, बल्कि समूची वस्तु-व्यवस्था के स्वरूप को जानना चाहते हैं, तो उसमें एकमात्र स्याद्वाद ही समर्थ है। इसके वचनों के विचार से अर्थात् स्याद्वाद के मर्म को समझने से बड़े से बड़ा मूर्ख भी बुद्धिमान् हो जाता है। स्याद््वाद‍ को आत्मस्वरूप का परिचय कराने, अात्मानुभति, और मोक्षमार्ग की प्राप्ति में सहायक होने से बलशाली और सर्वश्रेष्ठ माना गया है; क्योंकि यह अनुमान-प्रमाण की समस्त बाधाओं से रहित है, अक्षय है, और कोई भी वादी या प्रतिवादी इसके कथनों को खंडित नहीं कर सकता। अनेकांतमयी वस्तु-व्यवस्था को समझने के लिये जैन-दर्शन के समस्त सिद्धांतों में से ‘स्यादवाद्’ सर्वश्रेष्ठ है, यह जैनदर्शन का गौरव भी है और प्राण भी। हम कह सकते हैं कि एकांतवादियों के समस्त तर्कों को निर्मूल करने के लिये स्याद्वाद ‘सुदर्शन-चक्र’ के समान है। वस्तु अनंत-धर्मात्मक है, और सभी धर्मों का कथन एकसाथ करना संभव नहीं है, इसलिये स्याद्वाद के द्वारा किसी एक-धर्म को मुख्य और अन्य-धर्मों काे गौण करके कथन किया जाता है। जबकि अन्य-मतों के लोग वस्तु के एक-धर्म का ही कथन करते हैं, और शेष-धर्मों का निषेध करते है; इसलिए वे एकांतवाद के पोषक कहे जाते हैं; जबकि स्याद्वादी वस्तु के समस्त धर्मों को अपेक्षा के साथ ग्रहण करते हैं इसलिये वे अनेकांतवादी कहे जाते है। जैसे जीव नित्य भी है और अनित्य भी, दोनों ही धर्म परस्पर-विरोधी हैं। यदि हम जीव को केवल नित्य मानते हैं, तो फिर कभी देव, कभी नारकी, कभी तिर्यंच और कभी मनुष्य इत्यादि-रूपों को कैसे स्वीकारेगें? और यदि हम आत्मा के केवल अनित्यरूप को ही मानेगें, तो आत्मा के अजर-अमर शाश्वतस्वरूप, जिनेन्द्र-परमात्मा, पुण्य-पाप, कर्म-सिद्धांत इत्यादि को कैसे स्वीकारेगें? कहने का अभिप्राय यही है कि इसीलिए हमें आत्मा के परस्पर-विरोधी नित्य और अनित्य- दोनों रूपों को स्वीकार करना पड़ेगा, अर्थात् आत्मा द्रव्य-स्वभाव की अपेक्षा नित्य, और पर्याय की अपेक्षा अनित्य है। जब जिसकी मुख्यता से अर्थात् जिस अपेक्षा से कथन किया जाये, तब अन्य सभी धर्मों को गौण करके उस मुख्य-अर्थ को समझना चाहिए।- इसी का नाम तो स्याद्वाद है। एवं तत्त्व-व्यवस्थित्या स्वं व्यवस्थापयन्स्वयम्। अलंघ्यं शासनं जैनमनेकान्तो व्यवस्थितः ।। 17।। इस ‘स्याद्वाद-द्वार’ अधिकार के सार-स्वरूप हम कह सकते हैं कि एकांतवादियों की तरह वस्तु के अनंत-धर्मों का निषेध न करके मुख्य और गौण या ‘स्यात्/कथंचित्’ शब्द का प्रयोग करते हुए वस्तु के सभी धर्मों को सहजता से स्वीकार करना चाहिए, यही स्याद्वाद है, और यही मुक्ति का मार्ग भी है। कविवर बनारसीदास जी द्वारा गोस्वामी तुलसीदास जी को लिखकर दी गयी संक्षिप्त ‘अध्यात्म-रामायण’

विराजै रामायण घट-माँहिं।
मरमी होय मरम सो जाने, मूरख मानै नाहिं।
विराजै रामायण घट-माँहिं।।
आतम-राम ज्ञानगुन-लछमन, सीता-सुमति-समेत।
शुभपयोग-वानरदल-मंडित, वर-विवेक रनखेत।।
विराजै रामायण घट-माँहिं।। 1।।

ध्यान-धनुष-टंकार शोर सुनि, गई विषय-दिति भाग।
भई भस्म मिथ्यामत-लंका, उठी धारणा आग।।
विराजै रामायण घट-माँहिं।। 2।।

जरे अज्ञान-भाव-राक्षसकुल, लरे निकांचित-सूर।
जूझे राग-द्वेष-सेनापति, संसै-गढ़ चकचूर।।
विराजै रामायण घट-माँहिं।। 3।।

विलखत कुंभकरण भव-विभ्रम, पुलकित मन दरयाव।
थकित उदार-वीर महिरावण, सेतुबंध-समभाव।।
विराजै रामायण घट-माँहिं।। 4।।

मूर्च्छित मंदोदरि-दुराशा, सजग-चरन हनुमान्।
घटी चतुर्गति-परणति सेना, छूटे छपक-गुण-बान।।
विराजै रामायण घट-माँहिं।। 5।।

निरखि सकति-गुन चक्र-सुदर्शन, उदय-विभीषण दीन।
फिरै कबंध महीरावण की, प्राण-भाव शिर-हीन।।
विराजै रामायण घट-माँहि।। 6।।

इह-विधि सकल-साधु घट-अंतर, होय सहज-संग्राम।
यह विवहार-दृष्टि रामायण, केवल निश्चय-राम।।
विराजै रामायण घट-माँहिं।। 7।।

साध्य-साधक द्वार (१२) | भाग १/२

(द्वादश-अधिकार)

(दोहा)

स्यादवाद-अधिकार यह, कह्यौ अलप-विसतार।
‘अमृतचंद-मुनिवर’ कहैं, साधक-साध्य-दुवार।। 1।।

शब्दार्थ :- स्यादवाद-अधिकार यह= यह स्याद्वाद-अधिकार, कह्यौ अलप-विसतार= संक्षेप में कहा, अमृतचंद-मुनिवर= अब आचार्य अमृतचंद्र, कहैं साध्य-साधक-दुवार= साध्य-साधक द्वार कहते हैं। विशेषार्थ :- स्यादवाद-अिधकार को कुछ अल्प विस्तार के साथ पूर्ण किया है, अब आचार्य अमृतचंद साध्य-साधक-द्वार का वर्णन करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जोई जीव-वस्तु अस्ति प्रमेय अगुरुलघु, अभोगी अमूरतीक परदेसवंत है।
उतपतिरूप नासरूप अविचलरूप, रतनत्रयादि-गुनभेदसौं अनंत है।।
सोई जीव दरब-प्रमान सदा एकरूप, ऐसौ सुद्ध-निहचै सुभाउ निरतंत है।
स्यादवाद-माँहि साध्य-पद अधिकार कह्यौ, अब आगे कहिवै कौं साधक-सिद्धंत है।। 2।।

शब्दार्थ :- जोई जीव-वस्तु= वह जीव वस्तु, अस्ति-प्रमेय-अगुरुलघु-अभोगी-अमूरतीक, परदेसवंत है= अस्तित्व, प्रमेयत्व, अगुरुलघु, अभोक्तृत्व, अमूर्तिकत्व, प्रदेशवत्व वाला है, उतपतिरूप-नासरूप-अविचलरूप= उत्पादरूप, व्ययरूप, ध्रौव्यरूप, रतनत्रयादि-गुनभेदसौं अनंत है= रत्नत्रय आदि गुण-भेदों से अनंत-गुण- संपन्न है, सोई जीव= वही जीव, दरब-प्रमान सदा एकरूप - द्रव्य-अपेक्षा सदा एकरूप, ऐसौ सुद्ध-निहचै सुभाउ निरतंत है= निश्चयनय से ऐसा शुद्ध-स्वभाव वर्तता है, स्यादवाद-माँहि= स्याद्वाद-अधिकार में, साध्यपद अधिकार कह्यौ= साध्यपद का वर्णन किया, अब आगे कहिवै कौं साधक-सिद्धंत है= अब आगे साधकरूप को कहता हू।ँ विशेषार्थ :- इस-छंद में कविवर लक्ष्य की प्राप्ति में पुरुषार्थरत साधक जीवों का वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हैं। ‘साध्य’ अर्थात् वह लक्ष्य जिसे हमें प्राप्त करना है, या कहें जीव का वह शुद्ध स्वरूप जिसकी अनुभूति और लीनता ही हमारा मुख्य प्रयोजन है। वह जीव-वस्तु अस्तित्व ( जिसका कभी उत्पत्ति और विनाश नहीं होता ), प्रमेयत्व ( ज्ञान का विषय बनने योग्य ), अगुरुलघुत्व ( त्रिकाल द्रव्यपना कायम रहना, गुण और पर्यायों का यथावत रहना ), अभोक्तृत्व ( भोक्तृत्वपने से रहित ), अमूर्तिक ( जड़ आकार से रहित ), प्रदेशत्व (ज्ञानाकार से सहित) आदि गुणों से संपन्न है। उत्पत्तिरूप यानि नवीन-पर्याय का उत्पन्न होना, व्ययरूप यानि पूर्व-पर्याय का विनाश होना, फिर भी स्वभाव से ध्रौव्यरूप रहना, दर्शनज्ञान-चारित्र इन तीनों रत्नों और अनंत-गुणों से संपन्न है। ऐसा वह जीव-द्रव्य सदाकाल एकरूप रहता है, निश्चय से जीव का स्वभाव त्रिकाल-शुद्ध ही है। जो भी अशुद्धि है, वह पर्याय में है। स्याद्वाद-द्वार में पर्याय से भिन्न उसी शुद्ध-जीव की सिद्धि की, अब साध्य-साधक -द्वार

इत्याद्यनेक-निजशक्ति-सुनिर्भरोऽपि, यो ज्ञानमात्र-मयतां न जहाति भावः।
एवं क्रमाक्रम-विवर्ति-विवर्तचित्रं, तद््द्रव्य-पर्ययमयं चिदिहास्ति वस्तु ।। 1।।

उस शुद्ध-स्वरूप को प्राप्त करने के लिये जो पुरुषार्थरत हैं, उन ज्ञानी-जीवों का वर्णन करता हूँ।

(दोहा)

साध्य सुद्ध-केवल-दसा, अथवा सिद्ध-महंत।
साधक अविरत आदि बुध, छीनमोह-परजंत।। 3।।

शब्दार्थ :- साध्य सुद्ध-केवल-दसा अथवा सिद्ध-महंत= साध्यरूप दशा केवल दो अरिहंत अथवा सिद्ध- परमात्मा, साधक अविरत आदि बुध छीनमोह-परजंत= मोक्षमार्ग को साधनेवाले अविरति-सम्यग्दृष्टि से लेकर क्षीणमोह-पर्यंत सभी ज्ञानी। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्पष्ट किया कि साध्य कौन हैं? और साधक कौन है? इस संसार में ‘साध्य’ केवल दो, एक तो केवलज्ञान से सुशोभित अरिहंत-परमात्मा, और दूसरे समस्त-कर्मों से रहित पूर्ण-शुद्ध सिद्ध-परमात्मा हैं; क्योंकि ये दोनों ही अपने साध्यपद को प्राप्त कर चुके हैं। और ‘साधक’ अर्थात् वे सभी ज्ञानी-जीव जो अपने साध्यपद को प्राप्त करने के लिये पुरुषार्थरत हैं। इस विवक्षा के अनुसार चतुर्थ-गुणस्थानवर्ती ‘अविरत- सम्यग्दृष्टि’ से लेकर ‘क्षीणमोह’ नामक बारहवें-गुणस्थान तक के समस्त ज्ञानी-जीव ‘साधक’ हैं।

(सवैया इकतीसा)

जाकौ अधो-अपूरब-अनिवृति-करनकौ, भयौ लाभ भई गुरुवचन की बोहिनी। जाकै अनंतानुबध

ं ी-क्रोध-मान-माया-लोभ, अनादि-मिथ्यात मिश्र समकित-मोहिनी।।
सातौं परकिति खपां किंवा उपसमी जाके, जगी उर-माँहि समकित-कला सोहनी।
सोई मोख-साधक कहायौ ताकै सरवंग, प्रगटी सकति गुनथानक-अरोहनी।। 4।।

शब्दार्थ :- जाकौ अधो-अपूरब-अनिवृतिकरनकौ भयौ लाभ= जिसके अध:करण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण का लाभ हुआ, भई गुरुवचन की बोहिनी= गुरुवचनों का लाभ (देशना-लब्धि) मिला, जाकै अनंतानुबंधी क्रोध-मान-माया-लोभ= जिसके अनंतानुबंधी, क्रोध, मान, माया, लोभ, अनादि-मिथ्यात मिश्र समकित-मोहिनी= अनादिमिथ्यात्व, मिश्र (सम्यक्-मिथ्यात्व-प्रकृति), सम्यक्त्व मोहनी नामक दर्शनमोहनीय की, सातौं परकिति खपां किंवा उपसमी= इन सातों-प्रकृतियों के क्षय अथवा उपशमित होने से, जाके जगी उर-माँहि समकित-कला सोहनी= सम्यक्त्व की सुन्दर-कला जिसके अंतरंग में जागृत है, सोई मोख-साधक कहायौ ताकै सरवंग= वही मोक्ष का साधक कहलाता है जिसके सर्वांग में, प्रगटी सकति गुनथानक-अरोहनी= गुणस्थान चढ़ने की शक्ति प्रगट हुई है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने साधक-जीव के परिणामों की स्थिति का वर्णन किया है। सुगुरु का उपदेश-लाभ अर्थात् देशना-लब्धि प्राप्त होने पर मिथ्यादृष्टि-जीव मिथ्यात्व को छोड़कर निजआत्मस्वरूप की अनुभूति के लिए पुरुषार्थ करता है, तब जिससमय वह जीव अपने स्व-पुरुषार्थ से सम्यक्त्व के सन्मुख होता है, तो चारों लब्धियों को पार करते हुए करण-लब्धि के परिणामों में पहुँचता है। उससमय भी ये तीनों परिणाम होते हैं- 1. अधःकरण :- इस करण में उपरितन-समयवर्ती तथा अधस्तन-समयवर्ती-जीवों के परिणाम सदृश और विसदृश होते हैं। 2. अपूर्वकरण :- इस करण में जीव अ+पूर्व अर्थात् पूर्व में जिनको कभी धारण नहीं किया, ऐसे अपूर्व- परिणामों को धारण करते हैं। इस करण में भिन्नसमयवर्ती-जीवों के परिणाम सदा विसदृश ही रहते हैं, और एकसमयवर्ती जीवों के परिणाम सदृश और विसदृश दोनों होते हैं। 3. अनिवृत्तिकरण :- अ+निवृत्ति = अनिवृत्तिकरण यानि इस करण में अलग-अलग जीवों के परिणामों की विशुद्धि में परस्पर ‘निवृत्ति’ अर्थात् ‘भेद’ नहीं पाया जाता। इस करण में भिन्न-समयवर्ती जीवों के परिणाम विसदृश ही होते हैं, और एक-समयवर्ती जीवों के परिणाम सदृश ही होते हैं। इन परिणामों में अनिवृत्तिकरण-परिणामों के अंतिम-समय में जीव को मिथ्यात्व छूटकर सम्यक्त्व की प्राप्ति हो जाती है। तब अनंतानुबंधी (जो अनंत-संसार का अनुबंध कराये) की चार- अनंतानुबंधीक्रोध, अनंतानुबंधी-मान, अनंतानुबंधी-माया और अनंतानुबंधी-लोभ, और दर्शन-मोहनीय की तीन - मिथ्यात्व, सम्यक्मिथ्यात्व/मिश्र और सम्यक्प्रकृति/सम्यक्त्व-मोहनीय- इन सात प्रकृतियों का क्षय या उपशम हो जाता है। इन प्रकृतियों का क्षय या उपशम होने से उसके अंतरंग में सम्यग्दर्शन की सुदं र-कला जागृत होती है, अर्थात् श्रद्धा-गुण की निर्मल-परिणति प्रकट होती है, तब वह जीव ‘मोक्ष’ का ‘साधक’ या ‘मोक्षमार्गी’ कहलाता है। तत्पश्चात् उसके सर्वांग में अर्थात् संपर्ण ू -गुणों में गुणस्थान चढ़ने की शक्ति प्रगट होती है, क्योंकि तब साधक-जीव की साधना में सर्वाधिक-बाधक अनंतानुबध ं ी का क्षय या उपशम होने से पुरुषार्थ जोर मारता है। तत्पश्चात् अंतर में धीरे-धीरे स्वरूप की सन्मुखता/स्थिरता बढ़ती है, और बाहर में व्रतादिकपूरक ्व त्याग की भावना उत्तरोत्तर-वृद्धि को प्राप्त होती है, इसी को ‘गुणस्थान-आरोहण’ कहते हैं। सदृश और विसदृश-परिणाम :- सामान्य-अर्थ मेंं कहें तो सदृश अर्थात् समान या एकरूप रहना और विसदृश अर्थात् असमान या भिन्न-भिन्न । जैसे अग्नि किसी भी स्थिति में हो हमेशा उष्णरूप ही रहती है,- ये सदृश; लेकिन जैसे आम पेड़ पर लगता है पहले हरा और फिर बाद में वह पीला हो जाता है, यानि उसीरूप नहीं रहा, परिवर्तित हो गया- यह विसदृश। इसीप्रकार जैसे ज्ञान-गुण का परिणमन हमेशा जाननरूप ही रहता है, कहीं भी कभी भी, यह हुआ सदृश; लेकिन वही ज्ञान जब हम पर्याय अपेक्षा देखेगें, तो जो पूर्व का ज्ञानरूप परिणमन था, अब वह नहीं है, इसलिये यह विसदृश हुआ।

(दोहा)

जाके मुकति समीप भई, भव-स्थिति घट गई।
ताकी मनसा-सीप, सुगुरु-मेघ मुकता-वचन।। 5।।

शब्दार्थ :- जाके मुकति समीप भई= जिसके मुक्ति/मोक्ष नजदीक है, भव-स्थिति घट गई= संसार की स्थिति घट/कम हो गई है, ताकी मनसा-सीप= उसके मनरूपी सीप में, सुगुरु-मेघ मुकता-वचन= सदगुरुरूपी मेघ के वचन मोती के समान प्रतिफलित होते हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने उन भव्य-जीवों की परिणति का उदाहरण के माध्यम से सुन्दर और प्रेरक-वर्णन किया है, जिनकी नैया भव-समुद्र के किनारे पर खड़ी है अथवा जिनके लिये मुक्तिरमा वरने को तैयार खड़ी है। कविवर कहते हैं जिन जीवों की मुक्ति समीप है अर्थात् जिनका संसार में रहने का काल कम से कम रह गया है, उन जीवों के मनरूपी सीप में सद््गुरु का समागम मेघ के समान और उनके हितकारीसाध्य-साधक -द्वार वचन मोती के समान परिणमित होते हैं। कहा जाता है कि यदि स्वाति-नक्षत्र में वर्षा की बूँद सीप के अंदर प्रवेश कर जाये, तो वह बूँद मोती बन जाती है। कहना बहुत आसान है, लेकिन ऐसा होना बहुत मुश्किल; क्योंकि सीप का मुँह बहुत-छोटा और घुमावदार होता है, अतः वर्षा की बूँद आसानी से प्रवेश नहीं करती। लेकिन यदि प्रवेश कर जाती है, तो वह निश्चित ही बहुमूल्य-मोती बन जाती है। ठीक उसीप्रकार सद््गुरु की देशना भी पहले तो विरले ही जीवों को प्राप्त होती है, लेकिन यदि वह देशना प्राप्त हो, और अंतर में स्वाित-नक्षत्र की बूँद की तरह प्रवेश कर जाये, तो निश्चित ही वह भव्यता या सम्यग्दर्शनरूपी-मोती बनकर प्रस्फुटित होती है। हे आत्मन्! तब एेसे जीवों का संसार में रहने का काल अति-अल्प रह जाता है।

(दोहा)

ज्यौं बरषै बरषा-समै, मेघ अखंडित-धार।
त्यौं सदगुरु-वानी खिरै, जगत्-जीव-हितकार।। 6।।

शब्दार्थ :- ज्यौं बरषै बरषा-समै मेघ अखंडित-धार= जैसे बरसात के समय बादलों से अखंड-जलधारा बरसती है, त्यौं सदगुरु-वानी खिरै जगत्-जीव-हितकार= उसीप्रकार सद्गुरु का उपदेश संसार के जीवों के लिये हितकारी है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने देशना की हितकारिता को एक उदाहरण के माध्यम से वर्णित किया है। जैसे बरसात के मौसम में पानी का बरसना पेड़-पौधे, फसल, और जन-जीवन सभी के लिये हितकारी होता है; ठीक उसीप्रकार सद््गुरु की देशना भी हम संसारी-जीवों के लिये हमेशा हितकारी ही होती है। कहने का अभिप्राय यही है कि यदि हम इस दुःखरूपी भव-समुद्र से पार होना चाहते हैं, तो सद््गुरु की हितकारी-देशना को आत्मसात् करना ही होगा।

(सवैया तेईसा)

चेतनजी! तुम जागि विलोकहु, लागि रहे कहा माया के तांई।
आए कहींसौं, कहीं तुम जाहुगे, माया रमेगी जहाँ की तहाँई।।
माया तुम्हारी न जाति न पाँति, न वंस की वेलि न अंस की झाँई।
दासी कियै बिनु लातनि मारत, ऐसी अनीति न कीजै गुसांई।। 7।।

शब्दार्थ :- चेतनजी! तुम जागि विलोकहु= हे चेतन-आत्मा! तुम जागो और देखो, लागि रहे कहा माया के तांई= कहाँ माया की संभाल में लगे हो, आए कहींसौं कहीं तुम जाओगे= कहाँ से आये हो? कहाँ तुम जाओगे? माया रमेगी जहाँ की तहाँई= माया फिर जहाँ की तहाँ ही रमी रहेगी, माया तुम्हारी न जाति न पांति= माया तुम्हारी न जात की है न पात की, न वंस की वेलि न अंस की झांई= न वंश परम्परा की है, न ही तुम्हारे अंश की छाया है, दासी कियै बिनु लातनि मारत= नौकरानी बनाये बिना लातें मारती है, ऐसी अनीति न कीजै गुसांई= हे महन्त! ऐसा अन्याय मत करो। विशेषार्थ :- जहाँ पिछले-छंद में कवि ने उन जीवों का वर्णन किया था, जिनकी नैया भवसागर के पार/किनारे पर खड़ी थी। वहीं इस छंद में कवि ने उन जीवों का वर्णन किया है, जिनकी नैया भवसागर के बीचों-बीच भँवर में फँसी है, न जाने कब डूब जाये। कवि द्वारा रचित ये चार-पंक्तियाँ मोह की निद्रा में अचेत पड़े हम अज्ञानी-जीवों को न केवल जगा रही है; बल्कि मायारूपी-ठगिनी का वास्तविकरूप दिखाकर हम भोले-जीवों को मायाजाल से छुड़ाकर मोक्षमार्ग पर चलने के लिये प्रेरित भी कर रही है। हे चेतन! तुम अनादिकाल से मोह की चिर-निद्रा में सोये हुए हो, अब तो इस मोह-नींद से जागो, और देखो, कहाँ माया की संभाल में अर्थात् धन-दौलत, कुटुम्ब-कबीला आदि पर की संभाल में लगे हो और अपना बहुमूल्य मनुष्य-भव और समय बर्बाद कर रहे हो। विचार तो करो, तुम कहाँ से अर्थात् किस गति से आये हो, और न जाने किस गति में जाना है। भाई! न तो तुम इस माया को अपने साथ लेकर आये थे, और न साथ लेकर जाओगे। तुम अकेले ही आये थे और अकेले ही चले जाओगे। तुम्हारे जाने के बाद ये माया, ये संगी-साथी सब जहाँ हैं, वहीं रम जायेंगे। (आश्चर्य की बात तो ये है कि ये सब दृश्य हम अपनी आँखो के सामने प्रतिदिन देखते हैं, और फिर भी नहीं चेतते हैं! ) कविवर आगे कहते हैं कि हे आत्मन्! इस माया की कोई जात नहीं है, अर्थात् ये तो एक छलावा है, भ्रम है, जिसे अज्ञानी-जीव न केवल अपनी मानता है; बल्कि अपना स्वरूप ही मान लेता है। इस माया की कोई वंश-बेल भी नहीं है, अर्थात यह कुलीन नहीं है; कोई कितना भी जोड़-जोड़कर रखे, साथ उसी का देती है, जिसके पल्ले में पुण्य होता है; वर्ना बिजली की चमक के समान क्षणभर में विलय को प्राप्त होती है। भाई! न ही ये माया तुम्हारी प्रतिछाया है; क्योंकि तुम तो चेतन हो और यह जड़ है, इसका और तुम्हारा दूर-दूर तक कोई मेल नहीं है। यदि तुमने इस माया को अपने वश में नहीं किया और इसकी चाकरी में ही लगे रहे, तो ये एक दिन एेसी लात मारेगी कि सीधा नरक-निगोद में ही जाना पड़ेगा। इसलिए हे महंत! ऐसी अनीति/अन्याय मत होने दो। इस माया/परिग्रह में आसक्ति को छोड़कर अपने अखंड, शाश्वत आत्म-वैभव को देखो जिसके तुम त्रिकाल स्वामी हो।

(दोहा)

माया-छाया एक है, घटै-बढ़ै छिन-माँहि।
इन्हकी संगति जे लगैं, तिन्हहिं कहूँ सुख नांहि।। 8।।

शब्दार्थ :- माया-छाया एक है= माया और छाया एक-समान है, घटै-बढ़ै छिन-माँहि= क्षण में घटती और बढ़ती है, इन्हकी संगति जे लगैं= इनकी संगति जो भी करता है, तिन्हहिं कहूँ सुख नांहि= उसे कभी सुख नहीं मिलता। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने माया का स्वरूप बताया था, अब इस छंद में माया को छाया के समान परिवर्तनशील बताया है। जिसप्रकार छाया एक ही पल में बदल जाती है, कभी छोटी कभी बड़ी हो जाती है, ठीक उसीप्रकार माया का भी कोई ठिकाना नहीं है, पुण्य-पाप के उदयानुसार कभी बढ़ जाती है, तो कभी घट जाती है। जो जीव इसमें आसक्त रहता है, वह कभी चैन नहीं पाता; क्योंकि जब माया बढ़ती है, तो जीव हर्ष से आकुलित होता है, और जब माया घटती है, तो ये विषाद से आकुलित होता है, अर्थात् एक क्षण भी चैन से अर्थात‍् निराकुल नहीं रहता।

(सवैया तेईसा)

लोकनिसौं कछु नातौ न तेरौ न, तौसौं कछु इह लोककौ नातौ।
ए तौ रहै रमि स्वारथ के रस, तू परमारथ के रस-मातौ।।

साध्य-साधक -द्वार

ये तनसौं तनमैं तन से जड़, चेतन तू तिनसौं नित हांतौ।
होहु सुखी अपनौ-बल फेरिकै, तोरिकै राग-विरोध कौ तांतौ।। 9।।

शब्दार्थ :- लोकनिसौं कछु नातौ न तेरौ= कुटुम्बी-जनों से तेरा कोई नाता नहीं है, न तौसौं कछु इह लोककौ नातौ= न इस लोक का तुझसे कुछ नाता है, ए तौ रहै रमि स्वारथ के रस= ये तो सब स्वार्थ के रस में रमे हैं, तू परमारथ के रस मातौ= तुम तो परमार्थ के रस में मस्त होओ, ये तनसौं तनमैं तन से जड़= ये तो शरीर से तन्मय, तन के समान जड़ हो रहे हैं, चेतन तू तिनसौं नित हांतौ= चेतन तुम तो इनसे प्रतिसमय-भिन्न हो, होहु सुखी अपनौ-बल फेरिकै= अपना बल प्रगट करके सुखी होओ, तोरिकै राग-विरोध कौ तांतौ= राग-द्वेष का धागा/ बंधन तोड़कर। विशेषार्थ :- पिछले-छंदों में कवि ने माया अर्थात् धन-दौलत, कुटुम्बी-जनों के प्रति आसक्ति छोड़ने का उपदेश दिया था, और अब इस छंद में कुटुम्बी-जनों के प्रति आसक्ति क्यों छोड़नी?- इसका सटीक-वर्णन किया है। लोक में अज्ञानी-जीव यह मानता है कि मेरा-परिवार, मेरे-कुटुम्बीजन सब मेरे अपने हैं, सब मेरे सुख-दु:ख में मेरा साथ देगें, इनके बिना तो मेरा जीवन बेकार है। इसलिए उनके भरण-पोषण, उनकीसुरक्षा में दिन-रात एक करता है, यहाँ तक कि उनके लिये अन्याय, अनीति, अभक्ष्य की भी परवाह नहीं करता, उनके मोह में पागल बना फिरता है। मोह में गाफिल ऐसे अज्ञानी-जीवों को संबोधित करते हुए कविवर कहते हैं ‘‘हे आत्मन्! इन लौकिकजनों, परिवारीजनों से तेरा कोई नाता या संबंध नहीं है, और न ही इस लोक को तुझसे कोई प्रयोजन हैं, ये तो सब स्वारथ के सगे हैं’’, अर्थात् अपने मतलब के लिये तुझे अपना मानते हैं, जिस क्षण उनका स्वार्थ सिद्ध हो जाता है, ये तत्क्षण तुझे दूध में गिरी मक्खी की तरह निकालकर फेंक देते हैं, और यह कुछ नया नहीं है, ऐसा हम प्रतिदिन प्रत्यक्ष देखते हैं, लेकिन फिर भी कभी विचार तक नहीं करते। ‘‘भाई! तुम तो परमार्थ के मीत हो अर्थात् आत्महित या मोक्ष के पक्षधर हो; तुम्हें इन संयोगों की आवश्यकता नहीं है। तुम तो अपने आप में परिपूर्ण हो, ये संयोग इस जड़-देह से उत्पन्न हुए हैं, और इस जड़-देह में ही तन्मय रहते हैं, अर्थात् इनका संबंध केवल तेरी इस नश्वर-देह से है, देह के विनष्ट होने पर कोई तुझे याद तक नहीं करता है, इसीलिए जिसप्रकार ये देह जड़ है, उसीप्रकार ये देह के संबंधी भी जड़वत् हैं, और तुम तो चेतन हो, इस जड़ देह में रहते हुए भी त्रिकाल इससे भिन्न ही रहते हो। तुम अनंत-बल के धनी हो, अपने आत्मबल को प्रगट करो, और जिस राग-द्वेष के मजबूत-धागे ने तुम्हें इनसे जोड़कर रखा है, तुम उस बंधन को तोड़कर सुखी हो जाओ, अर्थात् राग-द्वेष के इन विकल्पों को छोड़कर अपने उपयोग को अपने में जोड़कर अपना मोक्षमार्ग प्रशस्त करो।’’

(दोहा)

जे दुरबुद्धी-जीव, ते उतंग-पदवी चहैं।
जे समरसी-सदीव, तिनकौं कछु न चाहिये।। 10।।

शब्दार्थ :- जे दुरबुद्धी-जीव= जो दुर्बुद्धि-जीव हैं, ते उतंग-पदवी चहैं= वे हमेशा उच्च-पद चाहते हैं, जे समरसी सदीव= जो हमेशा समरसी/समताभावी होते हैं, तिनकौं कछु न चाहिये= उनको कुछ नहीं चाहिए। विशेषार्थ :- अज्ञानी और ज्ञानी-जीव की चाह का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि जो दुर्बुद्धि अर्थात् अज्ञानी-जीव हैं, वे निरन्तर उच्चपदों की चाह करते हैं; जबकि जो समरसी अर्थात् समता-रस के धनी ज्ञानी-जीव हैं, वे उच्चपद की ही नहीं; संसार की किसी भी वस्तु की चाहना नहीं करते, वे तो प्रतिसमय स्वयं के आनंद में ही मग्न रहते हैं।

(सवैया इकतीसा)

हाँसी मेैं विषाद बसै, विद्या मैं विवाद बसै, काया में मरन, गुरु-वर्तन में हीनता।
सुचि मैं गिलानि बसै, प्रापति मैं हानि बसै, जैमैं हारि सुंदर-दसामैं छवि-छीनता।।
रोग बसै भोग मैं, संजोग मैं वियोग बसै, गुनमैं गरब बसै, सेवा-माँहि हीनता।
और जग-रीति जेती गर्भित असाता सेती, साता की सहेली है, अकेली उदासीनता।। 11।।

शब्दार्थ :- हाँसी मेैं विषाद बसै= हँसी में दुःख का निवास है, विद्या मैं विवाद बसै= विद्या में विवाद बसता है, काया में मरन= शरीर में मरण, गुरु वर्तन में हीनता= बड़प्पन में लघुता, सुचि मैं गिलानि बसै= पवित्रता में ग्लानि बसती है, प्रापति मैं हानि बसै= प्राप्ति/लाभ में हानि बसती है, जैमैं हारि= जीत में हार, सुंदर-दसामैं छवि छीनता= सुंदरता में बदसूरती, रोग बसै भोग मैं= भोगों में रोग बसते हैं, संजोग मैं वियोग बसै= संयोग में वियोग बसता है, गुनमैं गरब बसै= गुणों में घमंड बसता है, सेवा-माँहि हीनता= सेवा में तुच्छता, और जग-रीति जेती= और भी जगत् की जितनी भी रीति है, गर्भित असाता तैसी= उनमें सर्वत्र ही असाता छिपी रहती है, साता की सहेली है अकेली उदासीनता= साता की सहेली तो अकेली उदासीनता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पुण्य-पाप के फलानुसार होनेवाली जगत् की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए साम्यभाव को ही आकुलता या दु:खसे बचने का एकमात्र सर्वश्रेष्ठ-कारण सिद्ध किया है। अज्ञानी-जीव की प्रतिक्षण यही चाह रहती है कि धन-वैभव, मान-प्रतिष्ठा सब कुछ उत्तरोत्तरवृद्धि को प्राप्त हो, जबकि ज्ञानी-जीव एक क्षण के लिए भी इस सांसारिक-वैभव की चाह नहीं करते। आखिर ऐसा क्यों? इस धारणा का सटीक-समाधान करते हुए कविवर कहते हैं कि तुम जिन हास्य के प्रसंगों में हर्षित होते हो, उनमें भी कहीं न कहीं झगड़ा/तकरार छिपी रहती है, जो दुःख का कारण है। विचार करो, अब हर्ष कहाँ रहा? विद्या में विवाद छिपा रहता है; क्योंकि जो जितना विद्यार्जन करता है, वह उतना ही वाद-विवाद, बहस में उलझा रहता है। जिस विद्या को पाने में वह अपनी खुशी मान रहा था, अब वही विद्या उसके लिये कलह या फिर मानकषाय का कारण बन जाती है, सुकून तो दोनों ही स्थिति में नहीं रहा। काया में मरण बसा है अर्थात् जन्म के समय मिलनेवाली काया जिसको पाकर तू हर्षित होता है, समय पाकर एक दिन उसका मरण होना निश्चित है। बड़प्पन में हीनता अर्थात् थोड़ा-सा मान-सम्मान मिलने पर अज्ञानी-जीव अपने को बहुत बड़ा मानता है, लेकिन पाप का उदय आने पर जिस दिन मान-सम्मान फीका पड़ता है, उस दिन केवल हीनता का अनुभव होता है। शुचिता में ग्लानि का वास रहता है, अर्थात् जो वस्तु ऊपर से पवित्र दिख रही है, जरूरी नहीं कि वह अंदर से भी उतनी ही पवित्र हो। जैसे देह ऊपर से चिकनी, साफ-सुथरी, और अंदर से मल-मूत्र आदि का घड़ा। अज्ञानी-जीव व्यापारादि में नफा या लाभ होने पर हर्ष मानता है, लेकिन उसमें भी नुकसान छिपा रहता है; क्योंकि समय कभी एक-सा नहीं रहता है। आज पुण्य का उदय है, तो लाभ है ; कल पाप का उदय होगा, तो हानि भी होगी। इसीप्रकार जीत में हर्ष मानता है, लेकिन उसमें भी हार छिपी रहती है; क्योंकि यदि आज मेरी जीत है, तो सामनेवाले की हार है; कल सामनेवाले की जीत होगी, तो मेरी हार निश्चित है। अज्ञानी-जीव सुंदरता में हर्ष मानता है, तो वह भी हमेशा नहीं रहती, एक न एक दिन अवश्य क्षीण होती है, देह की सुन्दरता को ही देख लो, समय के साथ-साथ हम प्रत्यक्ष क्षीण होते हुये देखते हैं। साध्य-साधक -द्वार जिन पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों में हम सुख मानते हैं, रात-दिन उनके संग्रह और भोगने में व्यस्त रहते हैं। कभी विचार भी नहीं करते कि ये भोग ही तो रोगों को जन्म देते हैं। हमारे मुनिराज का जीवन देखो। प्रतिदिन पंचेन्द्रियों के विषय-भोगों से दूर रहते हैं, इसीलिए रोगों से बचे रहते हैं। और वहीं अज्ञानीजीव प्रतिसमय भोगों में मगन रहता है, इसीलिये रोगों से भी घिरा रहता है। जिन संयोगों के जुड़ने पर अज्ञानी-जीव फूला नहीं समाता, उनके बिछुड़ने पर उतना ही दु:खी होता है; वह यह भूल ही जाता है कि संयोगों का वियोग तो सुनिश्चित है, -यही प्रकृति का नियम है। गुणों में गर्व/घमंड बसा है, अर्थात् यह जीव अपने आत्मिक-गुणों को तो पहचानता नहीं है, और दैहिक-गुणों पर खुश होकर इतराता है। वह यह भूल ही जाता है कि ये दैहिक-गुण तो इन्द्रियों की पूर्णता पर निर्भर करते हैं, इन्द्रियों के क्षीण होते ही विलय को प्राप्त होते हैं, अर्थात् परायी-संपत्ति पर कैसा गर्व? सेवा में हीनता अर्थात् जिस नौकरी के मिलने पर तुम हर्षित होते हो, अपने को सुखी मानते हो, क्या वह मालिक की गुलामी नहीं है? और गुलामी या बंधन में रहकर कोई भी जीव कभी सुखी नहीं रह सकता। अधिक क्या कहें और भी जगत् की जितनी रीतियाँ अर्थात् जो भी व्यवहार या व्यवस्था है, उन सभी में कहीं न कहीं असाता ही छिपी रहती है। किसी भी अनुकूल संयोग या वस्तु को प्राप्त करने में जीव को जो आकुलता या दु:ख होता है, उसे तो यह दुःख या परेशानी मानता ही नहीं; बल्कि उस दुःख में तो इसे आनंद आता है, यही तो अज्ञानता की पराकाष्ठा है। इसीलिए ज्ञानी-जीव इन सभी आकुलताजन्य-परिस्थितियों से सदैव उदासीन अर्थात् विरक्त रहते हैं; न हर्ष न विषाद, न सुख न दु:ख; इसीलिए प्रतिसमय साता का अनुभव करते हैं; क्योंकि उदासीनता अर्थात् हर परिस्थिति में समता का भाव ही एकमात्र सुख का कारण है।

(दोहा)

जिहि उतंग चढ़ि फिर पतन, नहिं उतंग वह कूप।
जिहि सुख-अंतर भय बसै, सो सुख है दुःखरूप।। 12।।

जो विलसै सुख-संपदा, गये तहाँ दुःख होइ।
जो धरती बहु-तृनवती, जरै अगनिसौं सोइ।। 13।।

शब्दार्थ :- जिहि उतंग चढ़ि फिर पतन= जिस ऊँचाई पर चढ़कर फिर गिरते हैं, नहिं उतंग वह कूप= वह ऊँचाई/उन्नति नहीं गहरा कुँआ है, जिहि सुख-अंतर भय बसै= जिस सुख के अंदर डर बसता है, सो सुख है दुःखरूप= वह सुख नहीं साक्षात् दु:ख है।। 12।। जो विलसै सुख-संपदा= जो जीव जड़-संपत्ति को भोगकर सुख मानते हैं, गये तहाँ दुःख होइ= वे संपदा के नष्ट होने पर दु:खी होते हैं, जो धरती बहु-तृनवती= जो जमीन अधिक-तृण (सूखी-घास) वाली होती है, जरै अगनिसौं सोइ= वही अग्नि से जलती है।। 13।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने लौकिक-सुख का स्वरूप वर्णित करते हुए सच्चे-सुख को प्राप्त करने की प्रेरणा दी है। अज्ञानी-जीव हमेशा धन-दौलत, पंचेन्द्रिय के विषय-भोग, मान-सम्मान इत्यादि सांसारिकअनुकूलताओं में ही अपने को सुखी मानता है; इसीलिये उनकी उत्तरोत्तर-वृद्धि के लिये पुरुषार्थ करता है। लेकिन सच्चाई यह है कि जो जीव जितनी ऊँचाई पर है अर्थात् जितना वैभवशाली है, वह उतना ही धर्म से दूर और विषय भोगों में रमा हुआ है। और इस आसक्ति के परिणामस्वरूप वह उतना ही नीचे गिरता है, अर्थात् नरक-निगोद का पात्र बनता है। ऐसे जीवों को संबोधित करते हुए कविवर कहते हैं कि जिस ऊँचाई पर चढ़कर अर्थात् अत्यधिकवैभव प्राप्त करने के बाद फिर नीचे गिरना पड़े, तो वह वास्तव में ऊँचाई अर्थात् उन्नति नहीं अवनति है; नरक-निगोदरूपी गहरा-कुँआ है। जिसप्रकार कुयें से बाहर निकलना अत्यधिक-मुश्किल है; उसीप्रकार नरक-निगोद से निकलना भी अत्यन्त-कठिन है। इसीलिए कविवर अज्ञानी-जीव को आगाह करते हुए कहते हैं कि जिस सुख के अंतर में भय बसता है अर्थात् जिस क्षणिक सांसारिक-सुख को प्राप्त करने के बाद उसके नष्ट होने का भय हो, अथवा जिस सुख को प्राप्त करने में भी और भोगने में भी निरन्तर दु:ख का ही वेदन हो; हे आत्मन्! वह सुख नहीं, दु:ख का ही प्रतिरूप है। तभी तो ज्ञानी-जीव कहते हैं- ‘‘वह सुख सदा ही त्याज्य रे! पश्चात् जिसके दु:ख भरा।’’ अपने इस कथन को एक सटीक-उदाहरण के माध्यम से सिद्ध करते हुए कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार जिस भूमि पर सूखी तृणवाली-घास जितनी अधिक होती है, वह अग्नि का संयोग पाकर उतनी ही शीघ्रता से जल जाती है। ठीक उसीप्रकार जिस जीव की संपदा अर्थात‍् भोग-सामग्री में जितनी अधिक आसक्ति होती है, वह जीव उस संपदा के नष्ट होने पर उतना ही अधिक दुःखी होता है, और अंततोगत्वा-कुगति को प्राप्त होता है। कहने का अभिप्राय यही है कि बाह्य-वैभव, भोग-सामग्री आदि जितनी सीमित होगी और उसमें आसक्ति जितनी अल्प होगी, उतना ही जीव वर्तमान में भी आकुलित कम से कम होगा, और भविष्य में कषाय की मंदता होने से मोक्षमार्ग भी प्रशस्त होगा।

(दोहा)

सबद-माँहि सतगुरु कहै, प्रगटरूप निज-धर्म।
सुनत विचच्छन सद्दहै, मूढ़ न जानै मर्म।। 14।।

(सवैया इकतीसा)

जैसैं काहू नगर के वासी द्वै-पुरुष भूले, तामैं एक नर सुष्ट एक दुष्ट-उरकौ।
दोउ फिरैं पुर के समीप परे ऊटवमैं, काहू और पथिकसौं पूछैं पंथ पुरकौ।।
सो तौ कहै ‘‘तुमारौ नगर है तुमारे ढिंग’’, मारग दिखावै समुझावै खोज पुरकौ।
एते पर सुष्ट पहचानै पै न मानै दुष्ट, हिरदै-प्रवांन तैसे उपदेस गुरुकौ।। 15।।

शब्दार्थ :- सबद-माँहि सतगुरु कहै= शब्दों के माध्यम से सतगुरु कहते हैं, प्रगटरूप निज-धर्म= आत्मधर्म का प्रकटरूप, सुनत विचच्छन सद्दहै= उसे सुनकर बुद्धिमान् जीव श्रद्धान करते हैं, मूढ़ न जानै मर्म= किन्तु मूढ़जन उसका मर्म नहीं जान पाते हैं।। 14।। जैसैं काहू नगर के वासी द्वै पुरुष भूले= जैसे किसी नगर में रहनेवाले दो पुरुष (रास्ता) भूल गये हैं, तामैं एक नर सुष्ट= उसमें से एक मनुष्य समझदार, एक दुष्ट उरकौ= एक दुष्ट-हृदय है, दोउ फिरैं पुर के समीप परे ऊटव मैं= दोनों नगर के आसपास घूम रहे हैं, परन्तु उल्टे रास्ते पर है, काहू और पथिकसौं पूछैं पंथ पुरकौ= किसी और राहगीर से अपने नगर का रास्ता पूछ रहे हैं, सो तौ कहै तुमारौ नगर है तुमारे ढिंग= वह (राहगीर) कहता है, ‘‘तुम्हारा नगर तुम्हारे पास ही है’’, मारग दिखावै समुझावै खोज पुरकौ= मार्ग दिखाता है, लक्षण बताकर नगर का पता समझाता है, एते पर सुष्ट पहचानै= इतने पर समझदार तो पहचान लेता है, पै न मानै दुष्ट= परन्तु दुष्ट (उसकी बात) नहीं मानता है, हिरदै प्रवांन तैसे उपदेस गुरुकौ= ऐसे ही गुरु का उपदेश हृदय की दशा से प्रमाणित/सार्थक होता है।। 15।। साध्य-साधक -द्वार विशेषार्थ :- उपर्युक्त-छंदों में कवि ने सुगुरु का उपदेश सुनकर समझदार-व्यक्ति और मूर्ख-व्यक्ति की क्या प्रतिक्रियायें होती हैं?- इस तथ्य का उदाहरण के माध्यम से सटीक-वर्णन किया है। जैसे एक नगर के दो-पुरुष अपने ही नगर का रास्ता भूल गये, जिसमें एक समझदार या बुद्धिमान् है, और दूसरा मूर्ख या दुर्बुद्धि है। दोनों ही पुरुष अपने ही नगर के समीप रास्ता भूल जाने के कारण भटक रहे हैं। फिर एक अन्य राहगीर से अपने नगर का पता पूछते हैं। तब वह राहगीर उन्हें उनके नगर का सही रास्ता दिखाता हैं, लक्षण बताकर खोजना सिखाता है, तब उन दोनों में से समझदार-पुरुष तो अपने नगर को पहचान लेता है, लेकिन मूर्ख-पुरुष लाख समझाने पर भी नहीं पहचानता। ठीक उसीप्रकार अनादिकाल से हम अज्ञानी-जीव अपने चैतन्य-नगर का रास्ता भूले हुये हैं, और मिथ्यात्व के वश विपरीत-मार्ग पर भटक रहे हैं। कदाचित् अतितीव्र-पुण्य का उदय आता है, और सदगुरु/आचार्यों से भेंट होती है, और हम अपने भूले हुये नगर का पता उनसे पूछते हैं। तब सहज, सरल, शांत-स्वभावी हमारे आचार्य भगवन् हमें हमारे चैतन्य-नगर को ढूँढने के लिए उपदेश देते हैं, निजचैतन्य-स्वरूप की महिमा को प्रत्यक्ष दिखाते हैं; हमें हमारे अनंत-गुणों से परिचय कराते हैं। लेकिन हममें से जो बुद्धिमान्-पुरुष हैं, वे तो उस उपदेश को सुनकर तत्काल अनुभव से प्रमाणित करते हैं अर्थात् अपने चैतन्य-नगर को पहचानकर अात्मानुभूति से प्रमाणित करते हैं। और दुष्ट-बुद्धि अज्ञानी-जीव मोहवश उस उपदेश को सुनकर भी अनसुनी कर देते हैं, उसका मर्म भी नहीं समझते हैं, और कुतर्कों के जाल में फँसकर अपने चैतन्य-नगर से हमेशा अनजान बने रहते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जैसै काहू जंगलमैं पावसकौ समै पाइ, अपने सुभाव महामेघ बरसतु है।
आमल, कषाय, कटु, तीखन, मधुर, खार, तैसौ रस बाढ़ै जहाँ जैसौ दरखतु है।।
तैंसैं ग्यानवंत-नर ग्यानकौ बखान करै, रसकौ उमाहू है न काहू परखतु है।
वहै धुनि सुनि कोऊ गहै, कोऊ रहै सोइ, काहूकौ विखाद होइ, कोऊ हरखतु है।। 16।।

शब्दार्थ :- जैसैं काहू जंगलमैं पावसकौ समै पाइ= जैसे किसी जंगल में वर्षा-ऋतु का समय पाकर, अपने सुभाव महामेघ बरसतु है= स्वाभाविकरूप से बादलों से जल की वर्षा होती है, आमल-कषायकटु-तीखन-मधुर-खार= खट्टा, एेंठायदा/कसैला, कड़वा, तीखा/चरपरा, मीठा, खारा, तैसौ रस बाढ़ै जहाँ जैसौ दरखतु है= जहाँ जैसा वृक्ष होता है, वहाँ वैसा ही रस बनता है, तैंसैं ग्यानवंत नर ग्यानकौ बखान करै- उसीप्रकार ज्ञानी-जीव ज्ञान का वर्णन करते हैं, रसकौ उमाहू है न काहू परखतु है= अात्मरस में उत्साहित होकर, बिना किसी की परीक्षा किये वहै धुनि सुनि कोऊ गहै, कोऊ रहै सोइ= वह ध्वनि/उपदेश सुनकर, कोई ग्रहण करता है, कोई सोता रहता है, काहूकौ विखाद होइ, कोऊ हरखतु है= किसी को विषाद/रंज/दु:ख होता है, कोई हर्षित होता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पुन: एकबार गुरु के उपदेश को सुनकर जीवों के द्वारा होनेवाली प्रतिक्रिया को एक सटीक-उदाहरण के माध्यम से सिद्ध किया है। जैसे जंगल में अनेकप्रकार के फल-फूल आदि के वृक्ष लगे होते हैं। वर्षा-ऋतु के समय सहज ही बादलों से पानी बरसता है। यद्यपि पानी स्वतंत्ररूप से और सभी वृक्षों पर समानरूप से गिरता है; लेकिन फिर भी जहाँ जैसा वृक्ष होता है, पानी उसी वृक्ष के रसरूप परिणमित हो जाता है। जैसे नीबू, कैरी के वृक्ष पर पड़ने से खट्टा; आंवले, कैंथ के वृक्ष पर पड़ने से ऐंठायदा/कसैला; नीम, करेला के वृक्ष पर पड़ने से कड़वा, मिर्ची के वृक्ष पर पड़ने से तीखा; गन्ने के वृक्ष पर पड़ने से मीठा; समुद्री-जल में मिलने पर खारा हो जाता है। ठीक उसीप्रकार ज्ञानी-जीव अपने आत्मिक-रस में सराबोर होकर, अपने अनुभव को, आत्मज्ञान को बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के सहज-उपदेशरूप में वर्णित करते हैं। उपदेश देते समय ज्ञानीजीव पात्र-अपात्र की परीक्षा भी नहीं करते; बल्कि सहज साम्यभाव से निज-स्वरूप का कथन करते हैं। लेकिन वहाँ बैठे श्रोताओं में से कुछ जीव तो उस उपदेश को सुनकर तुरंत आत्मसात् कर अनुभूति से प्रमाणित भी करते हैं। कुछ आनंदित होते हैं कि आज बहुत अच्छा या मार्मिक-प्रवचन सुना, कुछ उपदेश रुचिकर न लगने से सो जाते हैं। कुछ को उपदेश सुनकर खेद वर्तता है कि इससे तो अच्छा होता है कि मैं व्यापार आदि में समय बिताता, जिससे कुछ लाभ तो होता। कुछ तर्क-कुतर्क कर बहस करते हैं। कुछ संसार से भयभीत होकर पाप-प्रवर्तन छोड़कर पुण्य-भावों में आसक्त होते हैं। कुछ अगले-भव को सुधारने के लिये ‘नियम’ ‘संयम’ प्रतिज्ञा लेकर संकल्पित होते हैं। कुछ निंदा-स्तुति में रत होते हैं कि ‘‘अमुक-विद्वान् का प्रवचन बहुत अच्छा था, अमुक विद्वान् के प्रवचन में मजा नहीं आया।’’ और कुछ इस इंतजार में रहते हैं कि ‘‘कब उपदेश पूरा हो और मैं यहाँ से जाऊँ।’’ कहने का तात्पर्य यही है कि गुरु का उपदेश सभी के लिये समानरूप से वर्णित होने पर भी वहाँ जो जीव जिस विचारधारा का होता है, गुरु का उपदेश भी उस जीव के लिये उसीरूप परिणमित होता है। अथवा जिस जीव की जैसी होनहार होती है, उपदेश सुनकर उस जीव की परिणति भी उसीरूप परिणमित होती है।

(दोहा)

गुरु-उपदेस कहा करै, दुराराध्य-संसार।
बसैं सदा जाकै उदर, जीव पंच-परकार।। 17।।

डूंघा प्रभु, चूंघा चतुर, सूंघा रुंचक-सुद्ध।
ऊंघा दुरबुद्धी-विकल, घूंघा घोर-अबुद्ध।। 18।।

शब्दार्थ :- गुरु-उपदेस कहा करै= गुरु का उपदेश क्या कर सकता है, दुराराध्य-संसार= जब संसार से पार पाना कठिन है, बसैं सदा जाकै उदर= जिस संसार के उदर में सदैव रहते हैं, जीव पंच-परकार= पाँच प्रकार के जीव।। 17।। डूंघा प्रभु= डूंघा-जीव प्रभु, चूंघा चतुर= चूंघा-जीव चतुर, सूंघा रुंचक सुद्ध= सूंघा-जीव शुद्ध रुचिवान्, ऊंघा दुरबुद्धी-विकल= ऊंघा-जीव दुर्बुद्धि और दु:खी, घूंघा घोर-अबुद्ध= घूंघा-जीव नितान्त-अज्ञानी।। 18।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने संसार में रहनेवाले जीवों को उनकी योग्यता और प्रवृत्ति के आधार पर वर्गीकृत किया है। पिछले-छंद में कवि ने स्पष्ट किया था कि गुरु के वचन एकसमान उपदेशित होने पर भी हर जीव अपनी-अपनी योग्यता से ग्रहण करता है। ऐसा क्यों? इसके समाधान-स्वरूप कविवर कहते हैं कि इसमें गुरु का उपदेश क्या करेगा? अर्थात् कुछ नहीं कर सकता क्योंकि संसार का स्वरूप ही ऐसा विचित्र है। संसार के उदर में अर्थात् संसार में पाँच प्रकार के जीव पाये जाते हैं। जो इसप्रकार हैं- 1. डूंघा-जीव- परमात्मा, 2.चूंघा-जीव- चतुर, 3. सूंघा-जीव- शुद्ध रुचिवान, 4. ऊंघा-जीव- दुर्बुद्धि और दु:खी, 5. घूंघा-जीव- महा-अज्ञानी साध्य-साधक -द्वार

(दोहा)

जाकी परम-दसा-विषैं, करम-कलंक न होइ।
डूंघा अगम-अगाधपद, वचन-अगोचर सोइ।। 19।।

शब्दार्थ :- जाकी परम-दसा विषैं= जिसकी सर्वश्रेष्ठ-स्थिति में, करम-कलंक न होइ= किसी भी कर्म का कोई कलंक शेष नहीं बचता है, डूंघा अगम अगाधपद= डूंघा जीव (सिद्ध जीव) अगम्य और अगाध-पदों/ज्ञान के धारी/ज्ञाता होते हैं, वचन-अगोचर सोइ= जिनका वर्णन वचनों से संभव नहीं है। विशेषार्थ :- जो जीव ‘परमपद’ को प्राप्त कर चुके हैं, जो कर्मों की कालिमा से रहित है, जो ‘अगम्य’ अर्थात् जिनके अनंत-गुणों का कोई अनुमान/माप नहीं है, और ‘अगाध’ अर्थात् जिनके गुणों की गंभीरता/ गहराई का अनुमान लगाना संभव नहीं है, जिनकी महिमा का वर्णन इन जड़-शब्दों से करना संभव ही नहीं है; -ऐसे अनंत-सुख का प्रतिक्षण वेदन करनेवाले ‘सिद्ध-भगवान्’ ‘डूंघा-जीव’ हैं।

(दोहा)

जो उदास ह्वै जगतसौं, गहै परम-रस-प्रेम।
सो चूंघा गुरु के वचन, चूंघै बालक जेम।। 20।।

शब्दार्थ :- जो उदास ह्वै जगतसौं= जो सदा ही जगत् से उदास रहते हैं, गहै परम-रस प्रेम= जो परमरस / आत्मरस का प्रेम/भक्ति/समर्पण को ग्रहण/आत्मसात् करते हैं, सो चूंघा= वह चूंघा-जीव है, गुरु के वचन चूंघै बालक जेम= जो गुरु के वचनों को बालक के समान माँ के दुग्धवत् चूसते हैं। विशेषार्थ :- जो जीव संसार, शरीर और भोगों से विरक्त रहते हैं, आत्मरस को प्रीतिपूर्वक-ग्रहण करते हैं अर्थात् आत्मस्वरूप की चर्चा/चिंतन-मनन में जिन्हें आनंद और उत्साह वर्तता है। जैसे बालक माँ के दूध की एक-एक बूँद को भी चूस लेने में मग्न रहता है; ठीक उसीप्रकार जो जीव समय बर्बाद किये बिना गुरु के एक-एक उपदेश का रसास्वादन निरन्तर लेते हैं अर्थात् आत्मसात् कर लेते हैं, ऐसे मोक्षगामी-जीव ‘चूंघा-जीव’ हैं।

(दोहा)

जो सुवचन रुचिसौं सुनैं, हिये दुष्टता नांहि।
परमारथ समुझै नहीं, सो सूंघा जगमाँहि।। 21।।

शब्दार्थ :- जो सुवचन रुचिसौं सुन=ैं जो आत्महितकारी-वचनों को रुचि से सुनते है, हिये दुष्टता नांहि= हृदय में दुष्टता नहीं रखते, परमारथ समुझै नहीं= फिर भी परमार्थ/आत्मस्वरूप को नहीं समझते, सो सूंघा जगमाँहि= वे संसार में रहनेवाले ‘सूंघा-जीव’ हैं। विशेषार्थ :- जो जीव ‘सुवचन’ अर्थात् आत्मा और परमात्मा की चर्चा को बहुत-रुचिपूर्वक सुनते हैं, या कहें जिन जीवों को जिनवाणी श्रवण करते समय अच्छा लगता है कि ‘‘ये मेरी ही चर्चा है, इसमें मेरा ही हित है।’’ जिनके हृदय में दुष्टता या विचारों में कटुता, मलिनता नहीं है; लेकिन ऐसे जीव परमार्थ अर्थात‍् आत्महित को नहीं जानते दूसरे शब्दों में कहें, तो जिन्हें आत्मानुभूति से कोई वास्ता नहीं है; परन्तु कषाय में मंदता है, जगत् के ऐसे जीवों को ‘सूंघा-जीव’ कहते हैं।

(दोहा)

जाकौ विकथा हित लगै, आगम-अंग अनिष्ट।
सो ऊंघा विषयी-विकल, दुष्ट-रुष्ट-पापिष्ट।। 22।।

शब्दार्थ :- जाकौ विकथा हित लगै= जिसको विकथा हितकारी लगती है, आगम-अंग अनिष्ट= द्वादशांग के वचन अहितकारी/अप्रिय लगते हैं, सो ऊंघा विषयी-विकल= वह ऊंघा-जीव विषयों का अभिलाषी, दु:खी, दुष्ट-रुष्ट-पापिष्ट= दुष्ट, क्रोधी, पापों में रत है। विशेषार्थ :- जिन जीवों को विकथा अर्थात् भोजन-कथा, राष्ट्र-कथा, चोर-कथा, स्त्री-कथा जैसी विकथायें तो अतिप्रिय लगती है, यहाँ तक कि उन्हीं में अपना हित भी भासित होता है; परन्तु आगम-अंग अर्थात् द्वादशांग जिनवाणी, जो वास्तव में हितकारी है, वह अहितकारी, अप्रिय लगती है। जिनवचनों को सुनते ही ऊँघने लगते हैं अर्थात् नींद/प्रमाद आता है। जो निरन्तर पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों के अभिलाषी हैं, दुःखी हैं, दुष्ट हैं, क्रोधी हैं अर्थात‍् जो क्रोध, मान, माया, लोभ चारों कषायों में तल्लीन हैं, जो हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील,परिग्रह आदि पाँच-पापों में रत हैं; वे दुर्बुद्धि जीव ‘ऊंघा-जीव’ हैं।

(दोहा)

जाकै वचन-श्रवन नहीं, नहिं मन सुरति-विराम।
जड़तासौं जड़वत भयौ, घूंघा ताकौ नाम।। 23।।

शब्दार्थ :- जाकै वचन-श्रवन नहीं= जिसके पास वचन सुनने की शक्ति ही नहीं है, नहिं मन सुरतिविराम= न ही मन और विचार करने की सामर्थ्य है, जड़तासौं जड़वत भयौ= जड़ता/अज्ञानता या मिथ्यात्व के प्रभाव से जड़वत् हो गया है, घूंघा ताकौ नाम= उसका नाम ‘घूंघा’ है। विशेषार्थ :- इस वर्ग में वे जीव आते हैं, जिनके पास वचनों को सुनने की सामर्थ्य ही नहीं है अर्थात् वे जीव जो कर्ण इन्द्रिय से ही रहित हैं। चार इन्द्रिय तक से समस्त जीव, इसके अलावा वे सभी जीव जिनके पास कर्ण इन्द्रिय तो है परंतु चिन्तन-मनन-विचार और निर्णय करने के लिए ना तो मन है और न ही विशेष-क्षयोपशम ज्ञान। इसके अलावा वे जीव, जो संज्ञी-पंचेन्द्रिय होकर भी विषय-भोगों में ही आसक्त हैं, जो कभी जिनवचनों को सुनना ही नहीं चाहते, व्रत-नियम-संयम आदि शुभ-कार्यों से पूर्णतः विरक्त हैं, स्वप्न में भी जिनका चित्त धर्म-कार्यों के प्रति अनुरक्त नहीं होता, जो ज्ञानावरणी-कर्म के अतितीव्र उदय से जड़-पदार्थों में अति-आसक्त होकर जड़वत् ही परिणमन कर रहे हैं, मोह में गाफिल बेचेत पड़े हैं, जिन्हें न अपनी सुध है और न पर की- ऐसे महा-अज्ञानी-जीव ‘घूंघा-जीव’ कहलाते हैं।

(चौपाई)

डूंघा-सिद्ध कहै सब कोऊ, सूंघा, ऊंघा मूरख दोऊ।
घूंघा घोर-विकल संसारी, चूंघा-जीव मोख-अधिकारी।। 24।।

शब्दार्थ :- डूंघा सिद्ध कहै सब कोऊ= डूंघा-जीवों को सभी ‘सिद्ध’ कहते हैं, सूंघा ऊंघा मूरख दोऊ= सूंघा ऊंघा दोनों जीव मूर्ख है, घूंघा घोर-विकल-संसारी= घूंघा-जीव घोर-दुःखी संसारी है, चूंघा-जीव मोखअधिकारी= चूंघा-जीव मोक्ष का पात्र है। विशेषार्थ :- पिछले-छंदों में संसार में पाये जानेवाले पाँच-प्रकार के जीवों का सामान्य-वर्णन किया, अब यहाँ उन जीवों का विशेष-वर्णन करते हैं। साध्य-साधक -द्वार कविवर कहते हैं कि सिद्ध-भगवान् डूंघा-जीव हैं- ये तो सर्वविदित है। लेकिन सूंघा और ऊंघा - दोनों ही मूर्ख हैं। कवि ने ऐसा क्यों कहा? क्योंकि सूंघा-जीव तो वे जीव है, जो आत्मा की चर्चा रुचिपूर्वक सुनकर भी आत्मानुभूति का पुरुषार्थ नहीं करते; बल्कि बाह्य-क्रियाकांड, और कषायों की मंदता को ही धर्म मानकर उन्हीं में निरत रहते हैं। इसीप्रकार ऊंघा-जीव की तो बात ही अलग है। वे ऐसे जीव हैं, जिन्हें दुर्लभ मनुष्य-पर्याय, देवगुरु-धर्म का समागम मिलने पर भी जो उनकी कीमत नहीं समझते, और पापाचार में ही जीवन पूरा करते हैं। आचार्य-भगवन् कहते हैं ‘‘उन जीवों के अभाग्य की महिमा कहने में हम असमर्थ हैं।’’ घूंघा-जीव तो दया के पात्र हैं, क्योंकि उन जीवों को तो ऐसी सामर्थ्य ही नहीं मिली कि वे अपनी महिमा को समझ सकें; इसलिए उन जीवों का दु:खी और व्याकुल होना तो स्वाभाविक है। एकमात्र चूँघा-जीव ही मोक्ष का अधिकारी है।

(दोहा)

चूंघा साधक-मोखकौ, करै दोष-दुख नास।
लहै मोख संतोषसौं, वरनौं लच्छन तास।। 25।।

कृपा-प्रसम-संवेग-दम, अस्तिभाव-वैराग्य।
ये लच्छन जाकै हियै, सप्त-व्यसनकौ त्याग।। 26।।

शब्दार्थ :- चूंघा साधक-मोखकौ= चूंघा-जीव मोक्ष का साधक है, करै दोष दुख नास= दोष और दुःखों का नाशक है, लहै मोख संतोषसौं= संतोषी-वृत्ति से मोक्ष प्राप्त करता है, वरनौं लच्छन तास= उसके लक्षण वर्णित करता हूँ ।। 25।। कृपा-प्रसम-संवेग-दम= जीव-दया, प्रशम (कषायों की मंदता), संवेग ( संसार से भयभीत), इन्द्रियों का दमन, अस्तिभाव-वैराग्य= आस्तिक्यभाव, वैराग्य, ये लच्छन जाकै हियै सप्त-व्यसनकौ त्याग= और सप्त-व्यसन का त्याग ये लक्षण/गुण जिसके हृदय में हैं (वह चूँघा अर्थात् साधक-जीव है)।। 26।। विशेषार्थ :- चूंघा-जीव ही एकमात्र मोक्ष का साधक है; क्योंकि वह जीव समस्त-दोषों और दुःखों को नष्ट करने के लिये पुरुषार्थरत है। प्राप्त-सुअवसर को, देव-गुरु-धर्म के समागम की कीमत को पहचानकर अात्मानुभूति के मार्ग पर अग्रसर है। ऐसे जीवों के कुछ विशेष-लक्षण इसप्रकार हैं- ‘कृपा’ अर्थात् जीवमात्र ( निगोदिया जीव से लेकर संज्ञी पंचन्द्रि े य तक सभी) के प्रति करुणा का भाव होना; ‘प्रशम’ अर्थात् क्रोध, मान, माया, लोभ चारों कषायों में मंदता होना, 'संवगे ’ अर्थात् संसार से भयभीत होना, ‘अास्तिक्यभाव’ अर्थात् जिन-वचनों पर अटल श्रद्धान होना; किसी भी परिस्थिति में डगमगाना नहीं; ‘वैराग्य’ अर्थात् संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति का भाव होना; और जुआ आदि सप्तव्यसन का त्यागी होना- ये सभी लक्षण जिसके हृदय में हैं, वे सभी मोक्षमार्ग के पथिक ‘चूघ ं ा-जीव’ हैं।

(चौपाई)

जूवा-आमिष-मदिरा-दारी, आखेटक-चोरी-परनारी।
एई सात-विसन दुखदाई, दुरित-मूल दुरगति के भाई।। 27।।

(दोहा)

दरवित ये सातौं-विसन, दुराचार-दु:खधाम।
भावित अंतर-कल्पना, मृषा-मोह परिनाम।। 28।।

शब्दार्थ :- दरवित ये सातौं-विसन= शरीर से सेवनरूप ये सातों व्यसन ‘द्रव्य-व्यसन’ हैं, दुराचार दु:खधाम= दुराचरणरूप और दु:ख के घर हैं, भावित-अंतर-कल्पना= अंतरंग भावों में इनकी कल्पना करना ‘भाव-व्यसन’ है, मृषा-मोह परिनाम= मिथ्यारूप मोह के परिणाम हैं।। 27।। जूवा= जुआ खेलना, आमिष= मांस-भक्षण करना, मदिरा= शराब पीना, दारी= वेश्या-सेवन, आखेटक= शिकार खेलना, चोरी= चोरी करना, परनारी= पर-स्त्री सेवन, एई सात-विसन दुखदाई= ये सातों व्यसन दुःख देनेवाले हैं, दुरित मूल= पाप की जड़ हैं, दुरगतिके भाई= दुर्गति में ले जानेवाले हैं।। 28।। विशेषार्थ :-इन दोनों छंदों में कवि ने सप्तव्यसनों का नामोल्लेख करते हुये द्रव्यव्यसन और भावव्यसन का वर्णन किया हैं। जुआ खेलना, माँस भक्षण करना, मदिरा पीना, वेश्या सेवन करना, शिकार खेलना, चोरी करना, परस्त्री सेवन करना ये सातों ही व्यसन-घोर दु:ख को देने वाले हैं। पाप की जड़ है अर्थात‍् इनके ऊपर सिर्फ पाप का वृक्ष ही पल्लवित होता है। दुर्गति अर्थात‍् नरक निगोद-तिर्यंचादि -दुर्गति में ले जाने वाले हैं। देह से इन सातो व्यसनों का भोग करना-द्रव्यव्यसन है और अन्तरंग भावों से इनकी कल्पना करना, इनको भोगने संबंधी परिणाम करना भावव्यसन है। जिसकी जड़ अन्तरंग में मौजूद-मिथ्यात्व और मोहरंजित परिणाम है। द्रव्यव्यसन को तो लाेक में भी प्रत्यक्ष-दुराचरण-दुःख रूप माना गया है। इनका विशेष वर्णन कविवर अगले छंद में करेंगे।

(सवैया इकतीसा)

अशुभमैं हारि शुभमैं जीति यहै दूत-कर्म, देह की मगनताई यहै मांस-भखिबौ।
मोह की गहलसौं अजान यहै सुरापान, कुमतिकी रीति गनिकाकौ रस चखिबौ।।
निरदै ह्वै प्रानघात करवौ यहै सिकार, परनारी-संग परबुद्धिकौ परखिबौ।
प्यारसौं पराई-सौंज गहिवे की चाह चोरी, एई सातौं-विसन विडारैं ब्रह्म लखिबौ।। 29।।

शब्दार्थ :- अशुभमैं हारि शुभमैं जीति यहै दूत कर्म= अशुभ में हार, शुभ में जीत यह ‘दूतकर्म/जुआ खेलना’ है, देह की मगनताई यहै मांस भखिबौ= शरीर में मगन रहना यह ‘मांस-भक्षण’ है, मोह की गहलसौं अजान यहै सुरापान= मोह की मूर्छा के कारण अपने से अनजान रहना यह मदिरापान है, कुमतिकी रीति गनिकाकौ रस चखिबौ= कुबुद्धि के मार्ग पर चलना ये वेश्या का रस चखना अर्थात् वेश्या-सेवन है, निरदै ह्वै प्रानघात करवौ यहै सिकार= निर्दयी होकर प्राणों का घात करना यह शिकार खेलना है, परनारी-संग परबुद्धिकौ परखिबौ= दूसरों की बुद्धि को परखने का भाव होना परस्त्री-संग है, प्यारसौं पराई सौंज गहिवे की चाह चोरी= प्यार से पराई-वस्तु के संसर्ग की चाह को ग्रहण करने की इच्छा रखना चोरी है, एई सातौं विसन विडारैं ब्रह्म् लखिबौं= ये सातों व्यसन छोड़ने पर ही आत्मा देख सकते हैं, अर्थात् आत्मानुभूति हो सकती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘सप्तव्यसन’ का द्रव्यपक्ष एवं भावपक्ष- दोनों ही दृष्टियों से बहुत ही सुंदर, सटीक अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलनेवाला विवेचन प्रस्तुत किया है। ‘व्यसन’ शब्द का शाब्दिक-अर्थ होता है ‘बुरी-आदत’। सामान्यरूप से हम कह सकते हैं कि कषाय की तीव्रता में होनेवाला वह पापरूप-परिणाम, जो धर्म और लोक दोनों ही दृष्टियों से निंदनीय हो, जिसके कारण अनंत-जीवों का घात हो, वेदना हो, संक्लेश परिणाम हों, नरकादि-कुगतियों का बंध हो, वे सभी परिणाम व्यसन के अंतर्गत आते हैं। साध्य-साधक -द्वार लोक में प्रचलित-व्यसनों में सात को प्रमुख माना है, जो इसप्रकार है - जुअा खेलना, मांसभक्षण करना, मदिरा-पान करना, वेश्या-सेवन करना, शिकार खेलना, चोरी करना, और परस्त्री-सेवन करना। वैसे तो हम सभी इन व्यसनों के स्वरूप से अच्छी तरह से परिचित हैं। और एक सच्चे-जैन होने के नाते अधिकांश-जीव इन व्यसनों के त्यागी भी होते हैं। यद्यपि इनका स्थूल, आचरणपरक-वर्णन तो चरणानुयोग के ग्रंथों में मिलता है; फिर भला ‘समयसार जी’ जैसे द्रव्यानुयोग के महान् आध्यात्मिक-ग्रंथ में आचार्यदेव ने इनका वर्णन क्यों किया है? यह सत्य है कि चरणानुयोग के ग्रंथों में इन व्यसनों का विस्तृत-वर्णन मिलता है, परन्तु वह स्थूल द्रव्य-व्यसनों का वर्णन है। लेकिन यहाँ इन व्यसनों की भावात्मक-दृष्टि से उस रूप में विवेचना की गई है, जिन रूपों को हम स्वप्न में भी व्यसन नहीं मानते है, अर्थात् इन व्यसनों के माध्यम से कविवर पं. बनारसीदास जी ने हमारे उन परिणामों की समीक्षा की है, जिनकी वजह से आज तक हम अपने स्वरूप से ही अनभिज्ञ हैं; अनंत-सुख का निधान होते हुये भी दु:खी हैं। मोह और कषाय से मिश्रित इन परिणामों के हम इतने आदी हो चुके हैं, कि हम इन्हें व्यसनरूप में मानते ही नहीं है। उन परिणामों का विशद-विवेचन क्रमशः इसप्रकार हैं- 1. जुआ खेलना- सामान्यतौर पर रुपये-पैसों को दाँव पर लगाकर चौपड़, ताश-पत्ते आदि से खेले जानेवाले खेल को हम ‘जुआ’ कहते हैं। और जो लोग इस खेल को कभी नहीं खेलते वे ये मानते हैं कि ‘‘हमारे तो जुआ-व्यसन का त्याग है।’’ क्या वास्तव में जुआ नामक व्यसन का स्वरूप इतना ही है? नहीं। जुआ-व्यसन की आध्यात्मिक-विवेचना करते हुये कविवर कहते हैं ‘‘अशुभ-कर्म/पाप के उदय में हार मानना, और शुभकर्म/पुण्य के उदय में अपनी जीत मानना, उनमें दु:खी-सुखी होना ही ‘जुआ’ नामक व्यसन है।’’ क्यों? क्योंकि मैं भगवान् आत्मा कर्म-परमाणुओं से त्रिकाल-भिन्न हूँ, यह जानकर भी अशुभ-कर्म के उदय में अपनी हार और शुभ-कर्म के उदय में अपनी जीत मानना अर्थात् जड़ में होनेवाले स्वतंत्र-परिणमन में हर्ष या विषाद करना जुआ खेलने के समान ही है, और ये परिणाम तो हम प्रतिसमय करते ही रहते हैं, क्या हमने कभी विचार किया कि ये ‘जुआ’ नामक व्यसन है या हम जुआ खेल रहे हैं? हे आत्मन्! लौकिक में भी हार-जीत की भावना से खेला गया कोई भी खेल, कोई भी कार्य, जिसके फलस्वरूप आपके परिणाम संक्लेशरूप होते हों, हर्ष-विषादरूप होते हों; वे सभी खेल और कार्य ‘जुआ’ व्यसन के अंतर्गत ही आते हैं। उदाहरण के लिए आज का सर्वाधिक प्रचलित शेयर-मार्केट, सट्टा-बाजार, जिसमें हिस्सा लेना लोग अपनी शान समझते हैं; वास्तव में देखा जाये, तो वह भी जुआ का ही प्रतिरूप है; क्योंकि उसमें भी हार-जीत की ही भावना प्रधान रहती है। अब विचार कीजिये क्या हम इस व्यसन के त्यागी हैं? 2. मांस भक्षण- सामान्यरूप से मांसल-जीवों को मारकर उनकी मृतदेह के खाने को ‘मांस-भक्षण’ कहते हैं। किंतु यदि हम सूक्ष्मता से विचार करें, तो इसमें घुना हुआ अनाज, अमर्यादित भोजन-सामग्री, या कहें, वह सामग्री जिसमें स्थूल-जीवराशि उत्पन्न हो चुकी हो, और हम उसका भक्षण करें, तो ‘मांसभक्षण व्यसन’ का दोष लगता है। लेकिन जो वास्तव में जैन-धर्म के अनुयायी हैं, वे इस व्यसन के त्यागी होते हैं। परन्तु पं. बनारसीदास जी तो यहाँ कुछ और ही कह रहे हैं, उनके अनुसार जो इस जड़-देह में मग्नता है, वही ‘मांस-भक्षण’ व्यसन है। मग्नता से तात्पर्य किसी भी वस्तु में इतने अनुरक्त हो जाना कि कुछ और याद ही न रहे, सदाकाल उसी में आत्मबुद्धि व तन्मयता का संवेदन बना रहना ही यहाँ ‘देह की मगनताई’ है। अनादिकाल से चेतन-आत्मा इस जड़-देह के साथ ही रहता आया है, और इसे केवल अपनी ही नहीं, अपना स्वरूप भी मानता आया है। इतना तो फिर भी ठीक था, लेकिन आश्चर्य की बात तो ये है कि आज देह और आत्मा की भिन्नता की जानकारी होने पर, या कहें देह से भिन्नता का उपदेश देनेवाले भी इस जड़-देह की सुंदरता, इसको सजाने-संवारने में व्यस्त हैं। यहाँ तक कि उसके लिये हिंसक सौंदर्य-प्रसाधनों का उपयोग करने में भी नहीं झिझकते। भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार किये बिना ही दिन-रात इसके भरण-पोषण के लिये चिंतित रहते हैं, इसमें होनेवाले रोगादि से भयभीत रहते हैं- ये देह की मग्नता नहीं, तो और क्या है? हे आत्मन्! जिस देह का एक परमाणु भी तेरा नहीं है, न तेरे साथ जानेवाला है, न तेरे सुख-दु:ख का साथी है, उस देह की इतनी चिंता, इसमें इतनी आसक्ति, इतनी मग्नता, कि जिसके कारण तुम अपना वास्तविक-स्वरूप ही भुला बैठे हो। बनारसीदास जी कहते हैं ‘‘भाई! यह देह की मग्नता तेरे लिये मांसभक्षण के समान ही है। अब विचार कीजिये क्या हम इस व्यसन के त्यागी हैं?’’ 3. मदिरापान- सामान्यरूप से अत्यधिक हिंसक-प्रक्रिया और पदार्थों के सड़ने से उत्पन्न हुये अनन्तत्रसजीवों के घात से बनी हुई मदिरा/शराब का पान करना ‘मदिरापान’ नामक व्यसन है। जो व्यक्ति वास्तव में किंचित्-मात्र भी जैनधर्म का श्रद्धापूर्वक अनुयायी है, वह इसे पीना तो दूर, स्पर्श करने का भी त्यागी होता है। लेकिन आज इस परिभाषा के मायने बदल चुके हैं। जो जैनी इसे स्पर्श तक नहीं करते थे, आज वे ही अपने बच्चों की शादी-पार्टी में इसे पीने और पिलाने की होड़ रखते हैं और ऐसा करके वे अपनी शान/ स्टैंडर्ड मानते हैं। क्या वे सच में जैन कहलाने के लायक हैं? और जो इस स्थूल-मदिरापान के त्यागी हैं, वे स्वयं पर गर्व करते हैं कि हम तो इस व्यसन के त्यागी हैं, लेकिन बनारसीदास जी ने तो ‘मदिरापानव्यसन’ का स्वरूप कुछ और ही कहा है। कविवर कहते हैं ‘‘भाई! मोह/ममता भी एक शराब ही है, बल्कि यह कहें कि शराब से भी ज्यादा खतरनाक है। शराब का नशा तो चार-छह घंटे में उतर जाता है, परन्तु इस मोहरूपी शराब का नशा तो आज तक उतरा ही नहीं। हम तो अनादिकाल से आज तक इस मोह की शराब को अत्यधिक-रुचिपूरक ्व पीते आये हैं, कभी एक क्षण के लिये भी नहीं लगा कि हम मदिरापान कर रहे हैं। हे आत्मन्! यह भी एक व्यसन है, जैसे शराबी शराब पीकर अपना घर-द्वार यहाँ तक कि परिवारजनों को और अपने को भी भूल जाता है, ठीक उसीप्रकार हम सब भी तो अनादिकाल से मोह के कारण अपने चैतन्य-स्वरूप को, अपने अनंत-गुणोंरूपी परिवार को भूले हुये हैं। हे आत्मन्! ये मदिरापान ही तो है, क्या हम इस व्यसन के त्यागी हैं? 4. वेश्या-सेवन- ‘वेश्या’ यानि वह नारी, जो पैसे के लिये किसी भी धर्म या जाति के पुरुष का सेवन कर सकती है। धर्म के क्षेत्र में ही नहीं, लौकिक-दृष्टि से भी वेश्या-सेवन को निंदनीय माना गया है। जैन ही नहीं, एक सभ्य-पुरुष भी वेश्या-सेवन का त्यागी होता है। हम सब भी ऐसा ही मानकर स्वयं को इस व्यसन का त्यागी मानते हैं। लेकिन बनारसीदास जी तो कहते हैं कि ‘‘हम तो प्रतिसमय वेश्या-सेवन कर रहे हैं।’’ कैसे? कवि के शब्दों में ‘‘कुबुद्धि के मार्ग पर चलना ही वेश्या-सेवन है।’’ अर्थात् सम्यक्-मार्ग को छोड़कर विपरीतमार्ग पर चलना या कहें वीतरागी देव-गुरु-धर्म के बताये सम्यक्-मार्ग को छोड़कर मिथ्यात्व, पाप, कषायों के मार्ग पर चलना, धन-वैभव के लालच में अन्याय, अनीति और अनाचार के मार्ग का अनुसरण साध्य-साधक -द्वार करना, विवेकरहित-कार्य करना, अहिंसामयी-धर्म के सत्य-स्वरूप को छोड़कर धर्म के नाम पर हिंसकमार्ग में प्रवर्तन करना, अपना घर छोड़कर पर-संयोगों में बुद्धि को भ्रमाना भी कवि के अनुसार वेश्यासेवन ही है। आत्मस्वरूप को छोड़कर, उसका विस्मरण करके पर-पदार्थों में सुखाभिलाषा से विचरनेवाली बुद्धि को आगम में ‘व्यभिचारिणी’ कहा गया है। और जो अपने कुल-गौरव, सदाचार आत्मस्वरूप का मनन-चिंतन-ध्यान छुड़ाकर परपदार्थों में रमाये, ऐसी ‘कुमति’ का संग करना तो वेश्यागमन से भी खतरनाक है। क्योंकि वेश्या तो जड़-धन/सम्पत्ति का ही हरण करके निर्धन बनाती है ; किन्तु कुमतिरूपी वेश्या तो हित-अहित का विवेक ही छीन लेती है, और जीव को भव-भवान्तरों तक के लिये संसारपरिभ्रमण के अनंत-दुःखों का कारण बनती है। अतः इस कुमति के चक्कर में फँसना तो वेश्यागमन से भी अनन्तगुना दुःखदायी है। अब विचार कीजिये क्या हम ‘वेश्या-सेवन-व्यसन’ के त्यागी हैं? 5. शिकार खेलना- सामान्यरूप से जंगल में जाकर निरीह पशु-पक्षियों का शिकार करना अथवा अपने मनोरंजन के लिये उनके प्राणों का घात करना ‘शिकार खेलना’ नामक व्यसन है। आज तो लोग इस कार्य को करने में अपनी शान समझते हैं; लेकिन क्या निरपराध, बेजुबान जानवरों को मारकर भी किसी को खुशी मिल सकती है? ऐसा विचार भी नहीं करते। आश्चर्य तो इस बात का है कि शिकार खेलने और जीवहिंसा में हर्ष मनाने के लिये तो आजकल जंगल में जाने की भी जरूरत नहीं रह गयी है। क्योंकि आज शिकार के उपकरण बदल गये हैं और शिकारियों का रूप भी बदल गया है। पहले तलवार, भाले, तीर-कमान, लाठी, पिस्तौल और बंदूक आदि शिकार के उपकरण माने जाते थे और इनसे वन्य पशु-पक्षियों का लोग अपने मनोरंजन के लिये शिकार करते थे। किन्तु आज हिट, बेगॉन, लाइजॉल आदि अनेकप्रकार के केमिकल्सवाले स्प्रेरूपीहिंसोपकरण बाजार में आधुनिक-शिकारियों के लिये आसानी से उपलब्ध हैं। लोग घरों में ही अपनी सुशील, कोमलांगी-गृहणियों को घरेलू जीव-जन्तुओं (जैसे कॉकरोच, मक्खी, मच्छर, चींटी आदि) का शिकार करने के लिये खुशी से इन्हें लाकर भी देते हैं, और आधुनिक-शिकारी (ये गृहणियाँ/ कोमलांगियाँ) घर के कोने-कोने तक में अपनी जान बचाकर छुपकर बैठनेवाले इन निरीह व क्षुद्रत्रसजीवों का निर्ममतापूर्वक-शिकार करके हर्षित होतीं हैं, कि हमने अपने घर को ‘जर्म्स-रहित’ बना दिया है। यह शिकारी-वृत्ति का अधुनातन-रूप एवं प्रक्रिया है। लेकिन हाँ एक सच्चा-जैन अवश्य इस व्यसन के प्रत्येक रूप का त्यागी होता है। इनके संक्रमण से बचने के लिये वह अग्रिमरूप से सफाई रखता है, ताकि ये जीव उत्पन्न ही नहीं हों। परन्तु आध्यात्मिक-दृष्टि से देखें, तो मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों में अनुरक्त होकर अपने जाननहार चैतन्य-स्वभाव का घात करना भी तो ‘भाव-शिकार’ है। भावनात्मक-दृष्टि से केवल स्थूलजीवों का ही नहीं सूक्ष्म से सूक्ष्म-जीवों का भी निर्दयता-पूर्वक प्राणघात करना भी शिकार करने के बराबर ही है। कई बार किसी जीव का प्राणघात भले ही न हो, पर उसके प्रति परिणामों में कठोरता/निर्दयता का होना भी ‘भाव-शिकार’ है। प्रमादवश किसी भी रूप में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति आदि एकेन्द्रिय से लेकर सभी विकलत्रय-जीवों का घात करना जैसे पंखा ए.सी. कूलर बिना प्रयोजन चल रहे हैं, तो चलने देना; (बिना प्रयोजन लाइट-बल्ब आदि के जलने से अग्निकायिक-जीवों की हिंसा होती हो तो हो) बिना प्रयोजन वनस्पति को तोड़ना, सजावट के लिए छेदन-भेदन करना, घास पर चलना, अनछने-जल का प्रयोग करना, बेवजह जल-ढोलना, अभक्ष्य-भक्षण करना इत्यादि भी तो प्रकारान्तर से शिकार ही है। कहने का अभिप्राय यही है कि जहाँ अपने निमित्त से जीवों की हिंसा या प्राण-पीड़न होता हो, वह सब ‘भाव-शिकार’ है। अब विचार कीजिये क्या हम शिकार व्यसन के त्यागी हैं? 6. परस्त्री-सेवन- सामान्यरूप से अपनी विवाहिता-स्त्री को छोड़कर किसी भी अन्य-स्त्री का पत्नी या प्रेयसी के रूप में सेवन करना; ऐसे भाव रखना; इस अभिप्राय से उससे संवाद आदि करना- ये सभी ‘परस्त्री-सेवन’ नामक व्यसन के अन्तर्गत माना जाता है। यद्यपि धर्म के क्षेत्र में ही नहीं, लोक में भी इस कार्य को कुकृत्य और निंदनीय माना जाता है। जैसे पुरुष के लिये परस्त्री-सेवन पाप है, वैसे ही स्त्री के लिये अपने विवाहित-पति को छोड़कर अन्य किसी भी पुरुष का पति/प्रेमी के रूप में सेवन करना, वैसा अभिप्राय रखना या वैसे अभिप्राय से वार्त्तालाप आदि करना ‘परपुरुष-सेवन’ नामक पापरूप व्यसन है। आगम में परस्त्री-सेवन को सबसे निंद्य-कार्य माना गया है। ‘लाटीसंहिता’ नामक ग्रंथ में एक प्रश्न आता है, जो इस संदर्भ में बहुत महत्त्वपूर्ण है- ‘‘विषय-सेवन करते समय जो क्रिया धर्मपत्नी में की जाती है, वही क्रिया एक परस्त्री के साथ की जाती है। तो क्रिया-भेद न होने से उन दोनों में भी कोई भेद नहीं होना चाहिये?’’ तब आगम से उत्तर मिलता है कि कर्मबंधन में प्रधानता परस्त्री-स्पर्श या विषय-सेवन आदि बाह्य-कारणों की नहीं; बल्कि उस समय होनेवाले जीव के परिणामों की है। और परस्त्री-सेवन में तीव्रलालसा का भाव है, अतः तीव्र-पाप का बंध है। जैसे- जल का स्वभाव पूर्ण-निर्मल है, परन्तु फिर भी चंदनादि सुगंधित- पदार्थ के संपर्क में आने पर ‘शोभनीय’ और कीचड़-गंदगी आदि के संपर्क में आने पर ‘अशोभनीय’ संज्ञा पाता है। उसीप्रकार परस्त्री और धर्मपत्नी के साथ एक जैसी क्रिया होने पर भी जीव के परिणामों में अंतर आता है, जिससे कर्म-बंधन में भी अंतर आता है। इसीलिये आगम में परस्त्रीप्रेम/परपुरूष प्रेम को’ आपत्तियों की जननी’ माना गया है। जो इसलोक में तो दुःखदायी है ही, परलोक में भी दुःखदायी है। परस्त्री/परपुरुष-सेवन नरकादि-कुगतियों में गमन का साक्षात् कारण है। इसलिये स्थूलरूप से सप्तव्यसन के त्यागी को इस व्यसन का भी अनिवार्यतः त्याग वर्तता है। लेकिन यहाँ तो कविवर कहते हैं ‘‘जो बुद्धि आत्मस्वरूप को छोड़कर पर में अर्थात् देहादिकसंयोगों एवं पर-भावों में भ्रमण करे, वह बुद्धि व्यभिचारिणी है’’ जो परस्त्री-सेवन नामक व्यसन-सेवन करनेवाली स्त्री/पुरुष के समान है। आचार्यों ने देह में आसक्ति को परस्त्री में आसक्ति के समान निंदनीय माना है। इस विवक्षा से देखा जाये, तो हम तो प्रतिसमय देह में ही आसक्त हैं, तो हम परस्त्री-सेवन के त्यागी कैसे हो सकते हैं? इतना ही नहीं कविवर तो यहाँ तक लिखते हैं कि जो ‘परनारी-संग परबुद्धि कौ परखिबौ’ अर्थात् पर में बुद्धि को भ्रमाना ही नहीं, पर में चातुरी दिखाना, दूसरे की बुद्धि को परखना भी परस्त्री-सेवन व्यसन के समान है, इसके सबसे ज्यादा दोषी तो बुद्धिजीवी-वर्ग के लोग होते हैं। वे प्रायः यही देखते हैं कि ‘‘सामने वाला कितने पानी में है?’’- यह परखने के लिये ही अनेकप्रकार की जिज्ञासा, तर्क-कुतर्क प्रस्तुत करते हैं। उस समय यदि वे एक क्षण को भी इस पंक्ति का विचार कर लें कि पं. बनारसीदास जी के कथनानुसार तो वे ‘परस्त्रीसंग’ नामक व्यसन का सेवन करनेरूप महापाप कर रहे हैं, तो अनेकप्रकार के विवादविसंवाद और झगड़ों को सहज ही टाला जा सकता है। यह बात समाज में ही नहीं, बल्कि सज्जन-व्यक्ति को अपने परिजन-पुरजन, पड़ौसी, घर-परिवार, कार्यक्षेत्र-सभी जगह लागू करनी चाहिये। क्योंकि परस्त्री/परपुरुष-सेवनरूप व्यसन को तो हर कोई अपराध मानता है; इसलिये जो कोई कदाचित् इसे करते भी है, तो चोरी-छुपे करते है, सबके सामने खुलकर नहीं करते। किन्तु परबुद्धि को परखनेरूप व्यसन साध्य-साधक -द्वार का सेवन तो लोग बड़े-गर्व से सार्वजनिकरूप से करते हैं और इसके भयंकर सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक-दुष्परिणामों को हम सभी भोगते हैं। फिर भी इस कुकृत्य के प्रति कभी किसी के मन में ग्लानि का भाव नहीं आता। इससे इसकी भयंकरता को तथा पं. बनारसीदास जी द्वारा इसे परस्त्री/परपुरुषसेवनरूपी दुर्व्यसन के रूप में प्रतिपादित करना उनकी दूरदर्शिता को दर्शाता है। अब विचार कीजिये कि क्या हम इस व्यसन के त्यागी हैं? 7. चोरी करना- सामान्यरूप से किसी की पड़ी हुई, भूली हुई, रखी हुई वस्तु को स्वयं उठाना या उठाकर किसी को दे देना या दूसरों से उठवा देना ‘चोरी’ नामक व्यसन के अंतर्गत आता है। यद्यपि चोरी का ये बहुत ही स्थूलरूप है, लेकिन फिर भी अधिकांश-जीव इस व्यसन के त्यागी नहीं होते। जैसे बिना-टिकिट यात्रा करना, बिजली की चोरी, टैक्स की चोरी, व्यापारादि में हेर-फेर करना आदि और भी ऐसे कई कार्य हैं, जिन्हें हम चोरी मानते ही नहीं हैं और निर्भय होकर उन कार्यों को करते हैं। मनोरंजन के लिये दूसरों की रखी हुई या भूली हुई वस्तु को छुपाकर रख देना कि ‘कुछ देर परेशान करके मजे लेने के बाद बता दूँगा’- ऐसी प्रवृत्तियाँ अधिकांश-लोगों के जीवन में देखीं जातीं हैं। परन्तु उनमें से किसी को भी एक-क्षण के लिये भी यह अहसास तक नहीं जगता है कि वे चोरी जैसा महापाप कर रहे हैं, और उसमें आनन्द मानकर 'हिंसानंदी-मृषानंदी-चौर्यानंदी रौद्रध्यान करके नरकायु के बंध जैसी विकट-स्थितियों को न्यौता दे रहे हैं। कविवर बनारसीदास जी तो यहाँ तक कहते हैं कि अनुराग-पूर्वक पर-पदार्थों को ग्रहण करने का भाव भी ‘भाव-चोरी’ है। बनारसीदास जी ने चोरी की ऐसी परिभाषा क्यों लिखी? क्योंकि मैं चेतनआत्मा एक भिन्न-द्रव्य, और मेरे अलावा अन्य सभी वस्तुयें पूर्णतः भिन्न पुदगल-द्रव्य हैं। अर्थात् मैं एक ‘स्व’ और बाकी सब ‘पर’, और किसी भी पर-वस्तु को पाने की चाहत ही तो चोरी है, इस अपेक्षा ये परिभाषा बिल्कुल सटीक है, क्योंकि हमने भी तो आज तक एक निजात्मा को छोड़कर समस्त पर-द्रव्यों को पाने की चाहत को ही तो अनवरत कायम रखा है। विचार कीजिये कि क्या हम वास्तव में इस व्यसन के त्यागी हैं? निष्कर्षरूप में हम कह सकते हैं कि ये सातों-व्यसन जीव को दुःख देनेवाले हैं, क्योंकि इन व्यसनों के रहते जीव का उपयोग कभी अंतर्मुख हो ही नहीं सकता। और जबतक उपयोग अंतर्मुख नहीं होगा, तबतक जीव सुखी नहीं हो सकता। इसलिए सच्चे-सुख के पिपासु प्रत्येक जीव को इन भावपरकसप्तव्यसनों का त्यागी होना ही चाहिए।

(दोहा)

विसन-भाव जामैं नहीं, पौरुष अगम-अपार।
किये प्रगट घट-सिंधुमैं, चौदह-रतन उदार।। 30।।

(सवैया इकतीसा)

लक्ष्मी-सुबुद्धि अनुभूति-कउस्तुभ-मनि, वैराग-कलपवृच्छ संख-सुवचन है।
ऐरावत-उद्दिम-प्रतीति रंभा उदै-विष, कामधेनु-निर्जरा सुधा-प्रमोदधन है।।
ध्यान-चाप प्रेमरीति-मदिरा विवेक-वैद्य, सुद्धभाव-चन्द्रमा तुरंगरूप-मन है।
चौदह-रतन ये प्रगट होंहि जहाँ तहाँ, ग्यान के उदोत घट-सिंधुकौ मथन है।। 31।।

शब्दार्थ :- विसन-भाव जामैं नहीं= जिनमें व्यसन का भाव नहीं रहता, पौरुष अगम-अपार= (जिनका) पुरुषार्थ अगम्य और अपार है, किये प्रगट घट-सिंधुम=ैं (वे) हृदयरूपी समुद्र में प्रकट करते हैं, चौदह-रतन उदार= चौदह-महारत्न।। 30।। लक्ष्मी-सुबुद्धि= सुबुद्धिरूपी लक्ष्मी, अनुभूति-कउस्तुभ मनि= अनुभूतिरूपी कौस्तुभमणि, वैरागकलपवृच्छ= वैराग्यरूपी कल्पवृक्ष, संख-सुवचन है= सुवचनरूपी शंख, ऐरावत-उद्दिम= पुरुषार्थरूपी ऐरावतहाथी, प्रतीति-रंभा= प्रतीतिरूपी रम्भा, उदै-विष= उदयरूपी विष, कामधेनु-निर्जरा= निर्जरारूपी कामधेनु, सुधा-प्रमोदधन है= प्रमोदरूपी धन के रूप में अमृत, ध्यान-चाप= ध्यानरूपी धनुष, प्रेमरीति-मदिरा= प्रेमरूपी मदिरा, विवेक-वैद्य= विवेकरूपी वैद्य, सुद्धभाव-चन्द्रमा= शुद्धभावरूपी-चंद्रमा, तुरंगरूप-मन है= मनरूपी घोड़ा, चौदह-रतन ये प्रगट होंहि जहाँ= ये चौदह-रत्न जहाँ प्रकट होते हैं, तहाँ ग्यान के उदोत= वहाँ ज्ञान के प्रकाश में, घट सिंधुकौ मथन है= हृदयरूपी समुद्र का मंथन हैं।। 31।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने उस स्थिति का वर्णन किया है, जब साधक-जीव अपने परिणामों का शोधन करता हुआ विशुद्धि के मार्ग पर अग्रसर होता है; तब हृदयरूपी समुद्र-मंथन में चौदह-महारत्न प्रकट होते हैं। हिन्दू-मान्यता के अनुसार जब देवताओं और राक्षसों में विवाद हुआ और समुद्र-मंथन किया गया, तब समुद्र में से पहले हलाहल-विष निकला; लेकिन फिर अन्त में अमृत-सहित कुल चौदह-रत्नों की प्राप्ति हुई थी। चूँकि ये कथानक उस समय अत्यधिक-लोकप्रचलित था, और प्रायः कवियों की रचना में तात्कालिक देश-काल-वातावरण की प्रधानता रहती है, यहाँ तक कि वे अपने कथन को स्पष्ट करने के लिये जन-प्रचलित उदाहरण ही देते हैं। कवि ने भी यहाँ साधक-जीव के द्वारा चल रहे करण-लब्धि के परिणामों को प्राप्त करने के पुरुषार्थ को ‘समुद्र-मंथन’ और करण-लब्धि की प्राप्ति अर्थात् आत्मानुभूति और उसके साथ प्राप्त होनेवाले वैभव को ‘चौदह-महारत्नों’ के माध्यम से चित्रित किया है। कविवर कहते हैं जब भावमय-सप्त-व्यसन का लेशमात्र भी अंश शेष नहीं रहता, तब अपने अगम्य और अपार-बल से अर्थात् स्वयं के अति-पुरुषार्थ से साधक-जीव अपने हृदय में आत्मानुभूतिसहित चौदह-महारत्नों को प्रकट करते है। जो इसप्रकार हैं- सर्वप्रथम ‘सुबद्धि ु रूपी लक्ष्मी’ (लौकिक में भी कहते है जिसके घर में लक्ष्मी का वास हो वहाँ दरिद्रता/मलिनता नहीं रहती, ठीक उसीप्रकार जिसके हृदय में सुबद्धि ु रूपी लक्ष्मी प्रकट होती है, फिर उसकी मति कुबद्धि ु अर्थात् मिथ्यात्व के मार्ग पर नहीं भटकती है ), अतिदुर्लभ और बहुमलू ्य 'कौस्तुभ-मणि के समान आत्मानुभति ू ’ का प्रकट होना, सर्व-सांसारिक दु:खों से मुक्ति और सर्व-अनुकल ू ताओं को देने वाला ‘वैराग्यरूपी कल्पवृक्ष’, शंख की सुन्दर-ध्वनि के समान ‘सत्य-वचन’, ऐरावत हाथी के समान ‘विशाल पौरुष/अतीव-बल’, सुदं री रंभा के समान ‘अविचल-श्रद्धा/प्रतीति’, विष के समान घातक ‘कर्मोदय’, सर्वसिद्धियों की जनक 'निर्जरारूपी कामधेन’ु , ‘आनंदामृत-रूपी धन’ को प्रकट करते हैं। जिसप्रकार की एकाग्रता धनुर्धर (धनुष-बाण चलनेवाले) को होती है, उसीप्रकार की ‘उपयोग की एकाग्रता’ साधक-जीव को प्रकट होती है। अविरतिभावरूपी रागभाव की मदिरा की लत को ‘विवेकरूपी वैद्य’ ठीक करता है। अर्थात् जिसप्रकार वैद्य रोग का इलाज करने के साथ-साथ परहेज पर विशेष-ध्यान देता है; ठीक उसीप्रकार साधक-जीव उपयोग की एकाग्रता भंग न हो, इसलिए सांसारिक-प्रसंगों के संपर्क से परहेज करते है। ‘शुद्ध-भावरूपी चंद्रमा’ अर्थात् जैसे चंद्रमा की चाँदनी धवल और शांतिप्रदायक होती है, वैसे ही साधक-जीव की परिणति मोह-राग-द्वेष की मलिनता से रहित धवल और शांत होती है, साध्य-साधक -द्वार ‘मनरूपी घोड़ा’ अर्थात् जैसे घोड़े को उद्दाम-पौरुष का शुभ-प्रतीक माना जाता है, उसीप्रकार साधकजीव का मन घोड़े के समान निरन्तर उद्दाम-पौरुषमय रहता है। इसप्रकार ये चौदह-महारत्न उस भाव-सप्तव्यसन-रहित जीव को प्रकट होते हैं, जिसके घट या अंतरंग में निर्मल-ज्ञान के प्रकाश में परिणामों का शोधनरूपी-मंथन चलता है। जब जीव करण-लब्धि की प्राप्ति के लिये पुरुषार्थ करता है, तब आत्मानुभति ू सहित उपर्युक्त चौदह-महारत्नों की प्राप्ति होती है।

साध्य-साधक द्वार (१२) | भाग २/२

(दोहा)

किये अवस्थामैं प्रगट, चौदह-रतन रसाल।
कछु त्यागै, कछु संग्रहै, विधि-निषेधकी चाल।। 32।।

रमा-संख-विष-धनु-सुरा, वैद्य-धेनु-हय हेय।
मनि-रंभा-गज-कलपतरु, सुधा-सोम आदेय।। 33।।

इहविधि जो परभाव-विष, वमै रमै-निजरूप।
सो साधक-सिवपंथकौ, चिद-वेदक चिद्रूप।। 34।।

शब्दार्थ :- किये अवस्थामैं प्रगट= सम्यग्दर्शन की अवस्था में प्रकट किये, चौदह-रतन रसाल= रस-पूर्ण चौदह-रत्न, कछु त्यागै कछु संग्रहै= (इनमें से) कुछ का त्याग और कुछ का ग्रहण करते हैं, विधि-निषेधकी चाल= ग्रहण-त्याग की पद्धति के अनुसार।। 32।। रमा-संख-विष-धनु-सुरा-वैद्य-धेनु-हय हेय= लक्ष्मी, शंख, विष, धनुष, मदिरा, वैद्य, कामधेनु, घोड़ा त्यागने योग्य मानते हैं। (और) मनि-रंभा-गज-कलपतरु-सुधा-सोम-आदेय= कौस्तुभ-मणि, अप्सरा (प्रतीति), ऐरावत-हाथी, कल्पवृक्ष, अमृत, चंद्रमा, ग्रहण करने योग्य हैं।। 33।। इहविधि जो परभाव-विष वमै= इसप्रकार जो परभावरूपी-ज़हर का वमन करते हैं, रमै-निजरूप= अपने निजरूप में रमण करते हैं, सो साधक सिवपंथकौ= वह मोक्षमार्ग का सच्चा-साधक है, चिद वेदक चिद्रूप= चैतन्य-स्वरूप का वेदक/अनुभूति करनेवाला चेतनस्वरूप-आत्मा है।। 34।। विशेषार्थ :- इन तीनों-छंदों में कवि ने अनुभूति के समय प्राप्त महारत्नों में से कौन-से रत्न ‘हेय’ अर्थात् छोड़ने योग्य हैं, और कौन से ‘उपादेय’ अर्थात् ग्रहण करने योग्य है- इसका सटीक-वर्णन किया है। अनुभूति-सहित चौदह महा-रत्नों में से आठ-रत्न सुबुद्धि, सुवचन, कर्मोदय, ध्यान, प्रेम, विवेक, निर्जरा और मन छोड़ने योग्य बताये हैं। लेकिन ये सभी छोड़ने योग्य क्यों कहे? सर्वप्रथम ‘सुबुद्धिरूपी लक्ष्मी’- बुद्धि चाहे सन्मार्ग पर हो या कुमार्ग पर छोड़ने योग्य ही है, क्योंकि वह विकल्परूप है और विकल्प कैसा भी हो अनुभूति में बाधक ही है। यद्यपि स्वरूप का निर्णय सुबुद्धि से ही होता है; परन्तु स्वरूप/लक्ष्य की प्राप्ति होने के बाद सुबुद्धिरूपी-साधन उसीप्रकार हेय है, जैसे छत पर पहुँचने के बाद सीढ़ी हेय है अर्थात् जैसे छत पर पहुँचने के लिये सीढ़ी बहु-उपयोगी है, परन्तु छत पर पहुँचने के बाद उसे छोड़ना ही समझदारी है। ‘शंख’ के समान मोहक-ध्वनि जैसे वचन बहुत-प्रिय होते हैं; परन्तु वचन भी एक विकल्प ही है, और निर्विकल्प-अनुभूति की प्राप्ति में सुवचनरूपी-विकल्प भी साधक-जीव के लिये हेय है। जैनदर्शन में तो मौन/वचनगुप्ति को श्रेष्ठ-साधना/तप माना गया है, इसका सबसे बड़ा-प्रमाण यही है कि तीर्थंकर-परमात्मा दीक्षा लेने के बाद आजीवन मौन रहते हैं। ‘कर्मोदयरूपी-विष’ अर्थात् कर्म के उदय-जन्य-परिणाम चाहे अनुकूल/पुण्यरूप हों या प्रतिकूल/ पापरूप, साधक-जीव के लिये विष के समान हेय ही हैं; क्योंकि साधक-जीव की भावना यही होती है कि लक्ष्य की प्राप्ति अतिशीघ्र हो, और कर्म का उदय लक्ष्य यानि मोक्ष-प्राप्ति में सदैव बाधक ही है। इसका सबसे बड़ा-प्रमाण है कि ‘तीर्थंकर-नामकर्म’ जैसी सर्वोत्कृष्ट-पुण्य-प्रकृतिरूप कर्म का उदय रहने पर तीर्थंकर-परमात्मा को भी सिद्ध-दशा की प्राप्ति नहीं हो सकती है। साधक-जीव को स्वरूप में एकाग्र होने के लिए ‘विकल्पात्मक-ध्यान’ की प्रक्रिया भी हेय है; क्योंकि उस समय उस जीव को व्यवहार-ध्यान नहीं, बल्कि स्वरूप में लीनता ही इष्ट है। वीतरागता के मार्ग पर अग्रसर साधक-जीव को ‘शुभरागरूप-मदिरा’ का अंश भी मुक्ति में बाधक होने से हेय ही हैं। जैसे मदिरा की एक बूँद भी अमृत जैसे पदार्थ को अपवित्र कर देती है, ठीक उसीप्रकार राग-भाव का अंश भी पूर्ण-वीतरागता प्रकट नहीं होने देता। जैसे पाँच-पांडवों में से नकुल और सहदेव आंशिक-राग के कारण ही तैंतीस-सागर तक मोक्ष-प्राप्ति से वंचित रहेंगे। ‘विवेकरूपी-वैद्य’ भी विकल्पात्मक होने से हेय है। निर्जरारूपी-कामधेनु अर्थात् ये भी कर्मों की निर्जरा का परिणाम होने से हेय है। (यहाँ संभवतः पं. बनारसीदास जी ‘अकाम-निर्जरा’ की ओर संकेत कर रहे हैं) मनरूपी-घोड़ा चंचल एवं अस्थिरता-जन्य होने से हेय है। -इसप्रकार उपर्युक्त आठों ही रत्न ‘हेय’ अर्थात् त्याग करने योग्य बताये गये हैं। चौदह-महारत्नों में से शेष छह-महारत्न मणि, रंभा, गज, कल्पवृक्ष, अमृत और चंद्रमा को ग्रहण करने योग्य कहा गया है। क्यों? ‘आत्मानुभूतिरूपी-मणि’ ही उपादेय है, क्योंकि यही तो मुक्ति की आधारशिला है और यही मोक्षस्वरूप भी है। स्वयं बनारसीदास जी ने कहा भी है- ‘‘अनुभव मारग मोक्ष कौ, अनुभव मोक्षसरूप।’’ ‘प्रतीतिरूपी-रंभा’ या आत्मस्वरूप का दृढ़-श्रद्धान, साधक-जीव को अनुभूति से भिन्न-काल में भी जो स्वरूप की दृढ़-प्रतीति बनी रहती है, वह बहुत-महत्त्वपूर्ण है ; क्योंकि यदि ज्ञानी-जीव को अनुभूति के काल के अतिरिक्त अन्य-समय में यह प्रतीति न रहे, तो श्रद्धान कमजोर हो जायेगा, और उस स्थिति में साधक जीव को ‘ज्ञानी’ कैसे कहा जायेगा? एेरावत-हाथी के समान ‘प्रशस्त-पौरुष/पुरुषार्थ’ के बिना कर्मरूपी विशाल-पर्वत को जड़ से उखाड़ फेंकना किसी के लिये संभव ही नहीं है; इसलिये साधकजीव के लिये पुरुषार्थ उपादेय ही है। ‘वैराग्यरूपी-कल्पवृक्ष’ अर्थात् संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति का भाव होने पर ही स्वरूप में एकाग्रता संभव है। इसीलिए सम्यग्दृष्टि-जीव के नियमतः ज्ञान के साथ-साथ वैराग्य का होना अनिवार्य कहा गया है ‘‘सम्यग्दृष्टेर्भवति नियतं ज्ञान-वैराग्य-शक्तिः।’’ ‘आनंद-अमृतरूपी धन’ अर्थात् निरन्तर आनंद का वेदन ही साधक-जीव के मोक्षमार्गी होने की निशानी है। संक्लेश-भाव रहे और सुख-स्वभावी आत्मा का वेदन/अनुभव भी हो- ये दोनों विपरीत-स्थितियाँ एकसाथ संभव ही नहीं हैं? शुद्धभावरूपी-चंद्रमा अर्थात् जैसे शुक्लपक्ष में दूज के चंद्रमा की कलायें निरन्तर बढ़ती ही जातीं हैं, उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव का गुणस्थान-क्रम से स्वरूप में स्थिरता का काल एवं तदनुरूप-परिणामों की विशुद्धि निरन्तर बढ़ती ही रहती है। तभी साधक-जीव अपने लक्ष्य को अतिशीघ्र प्राप्त कर सकता है। इसप्रकार जो साधक-जीव परभावों या मोह-राग-द्वेषरूप-विष को वमनकर अर्थात् त्यागकर निज-आत्मस्वरूप में रमण करता है, वही निज चैतन्य-स्वरूप का वेदक अर्थात् रसास्वादन करने वाला चेतन-आत्मा मोक्षमार्ग का सच्चा-साधक होता है।

(कवित्त)

ग्यान-द्रिष्टि जिन्हके घट-अंतर, निरखैं दरव-सुगुन-परजाइ।
जिन्हकें सहजरूप दिन-दिन प्रति, स्यादवाद-साधन अधिकाइ।।

साध्य-साधक -द्वार

जे केवलि-प्रनीत-मारग-मुख, चिंतै चरन राखै ठहराइ।
जे प्रवीन करि खीन-मोहमल, अविचल होहिं परमपद पाइ।। 35।।

शब्दार्थ :- ग्यान-द्रिष्टि जिन्हके घट-अंतर= जिनके अंतरंग में ज्ञान-दृष्टि है, निरखैं दरव-सुगुन-परजाइ= द्रव्य-गुण और पर्याय का अवलोकन करते हैं, जिन्हकें सहजरूप दिन-दिन प्रति= जिनके सहज ही दिनप्रतिदिन, स्यादवाद-साधन अधिकाइ= स्याद्वाद के साधन की अधिकता/बहुलता रहती है, जे केवलि-प्रनीत मारग-मुख= जो केवली-कथित मोक्षमार्ग का, चिंतै चरन राखै ठहराइ= मुख्यतया से चिंतवन करते हैं, (उसके अनुसार) स्थिरता से आचरण करते हैं, जे प्रवीन करि खीन-मोहमल= वे चतुर-जीव मोहरूपी-मल को नष्टकर, अविचल होहिं परमपद पाइ= स्वरूप में स्थिर होकर परमपद को प्राप्त करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मोक्षमार्ग के सच्चे साधक-जीवों की अवस्था का वर्णन किया है। जिन जीवों के अंतरंग में ज्ञान-दृष्टि जागी है अर्थात् स्वयं के ज्ञानोपयोग से अपने ही स्वरूप का द्रव्यपने, गुणपने और पर्यायपने अवलोकन करते हैं, और स्याद्वाद के साधन द्वारा निज-आत्मा को दिन प्रतिदिन और अधिक जानने का अभ्यास करते हैं। अभिप्राय यह है कि निजात्म-स्वरूप को वे विविध-पक्षों से ज्ञानात्मक-चिंतन-प्रक्रिया के द्वारा विचारते रहते हैं, स्वरूप से बाहर अन्यत्र कहीं उपयोग को भटकने नहीं देते। इस प्रकरण में हम ‘आचार्य कुन्दकुन्द देव’ की इस गाथा को समान्तर रूप से विचारार्थ रख सकते हैं - ‘‘जो जाणदि अरिहंतं, दव्वत्त-गुणत्त-पज्जयत्तेहिं। सो जाणदि अप्पाणं, मोहो खलु जादि तस्स लयं।।’’ (प्रवचनसार जी गाथा नं.-80) जो जीव केवली-भगवान् द्वारा बताये वीतरागतारूप धर्म-मार्ग पर दृढ़-श्रद्धान करते हैं, तदनुरूप सम्यक्-आचरण करते हैं, वे जीव अल्प-समय में ही मोहरूपी मल को नष्ट करते हैं। (यहाँ कवि ने ‘मोह’ को ‘मल’ की संज्ञा दी है, क्योंकि ये ‘पर’ के लक्ष्य से उत्पन्न होता है, इसलिए आत्मा का विभावरूपपरिणमन है, विकार है),- और स्वरूप में पूर्ण-स्थिर होकर अविनाशी सिद्ध-पद/परमपद को प्राप्त करते हैं। अभिप्राय यह है कि एकबार मोक्ष प्राप्त करने के बाद जीव पुन: संसार में जन्म-मरण नहीं करता, बल्कि अनंतकाल के लिये सिद्धालय में स्थित होता है।

(सवैया इकतीसा)

चाकसौ फिरत, जाकौ संसार निकट आयौ, पायौ जिन सम्यक्, मिथ्यात नास-करिकै।
निरदुंद मनसा सुभूमि साधि लीनी जिन, कीनी मोखकारन-अवस्था ध्यान धरिकै।।
सो ही सुद्ध अनुभौ-अभ्यासी अविनासी भयौ, गयौ ताकौ करम-भरम-रोग गरिकै।
मिथ्यामती अपनौ सरूप न पिछानै तातैं, डोलै जगजालमैं अनंत-काल भरिकै।। 36।।

शब्दार्थ :- चाकसौ फिरत जाकौ संसार निकट आयौ= चाक के समान घूमते-घूमते जिसका संसार निकट आ गया है, पायौ जिन सम्यक्, मिथ्यात नास करिकै= जिसने मिथ्यात्व को नष्ट करके सम्यक्त्व प्राप्त कर लिया है, निरदुंद मनसा-सुभूमि साधि लीनी जिन= जिसने द्वंद/दुविधा-रहित होकर चित्तरूपी भूमि को सोध लिया

नैकान्त-सङ्गत-दृशा स्वयमेव वस्तु-तत्त्व-व्यस्थितिमिति प्रविलोकयन्तः।
स्याद्वाद-शुद्धिमधिकामधिगम्य सन्तो, ज्ञानी भवन्ति जिन-नीतिमलंघयन्तः ।। 2।।

ये ज्ञानमात्र-निजभावमयीमकम्पां, भूमिं श्रयन्ति कथमप्यपनीत-मोहाः।
ते साधकत्वमधिगम्य भवन्ति सिद्धाः, मूढास्त्वमूमनुपलभ्य परिभ्रमन्ति।। 3।।

है, कीनी मोखकारन अवस्था ध्यान धरिकै= (और) ध्यानावस्था धारण करके मोक्ष के योग्य कर लिया है। सो ही सुद्ध अनुभौ-अभ्यासी अविनासी भयौ= वही शुद्धात्मा के अनुभव का अभ्यासी होकर विनाश-रहित/ अविनाशी हुआ, गयौ ताकौ करम-भरम-रोग गरिकै= जिसके कर्मों का भ्रमरूपी रोग गलकर नष्ट हो गया है, (जबकि) मिथ्यामती अपनौ सरूप न पिछानै= मिथ्यादृष्टि-जीव अपने स्वरूप को ही नहीं पहचानता, तातैं डोलै जगजालमैं अनंतकाल-भरिकै= इसलिये अनंतकाल-पर्यन्त संसार में भटकता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन जीवों की स्थिति का वर्णन किया है, जो संसार की भटकन को समाप्तकर मोक्षयात्रा के पथिक बन चुके हैं, अर्थात् जिन्होंने सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया है। और उन जीवों की स्थिति को भी वर्णित किया, जिनका संसार अभी ‘अनंत’ है अर्थात् मिथ्यात्व में ही रमे हुये हैं। उपर्युक्त दोनोंप्रकार के जीवों की स्थिति चाक या पहिये के समान है। लेकिन चाक भी दोप्रकार का होता है। एक चाक/पहिया वह जो बिना धुरी के कहीं भी कैसे भी घूमता है, कोई ओर-छोर नहीं, कोई ठहराव नहीं। और दूसरा वह, जो अपनी धुरी पर केन्द्रित रहकर घूमता है, और समय पर रुकता भी है, जैसे कुम्हार के चाक का पहिया। अनादिकाल से मिथ्यादृष्टि संसारी-जीव मिथ्यात्व के कारण चार-गति चौरासी-लाख योनियों में ठीक उसीप्रकार भटक रहा है, जैसे कोई पहिया मार्ग में भटकता है। जबकि कुम्हार का चाक/पहिया भी गोल-गोल ही घूमता है, लेकिन एक ही केन्द्र पर स्थित रहता है; उसमें भटकाव नहीं होता, वह एक जगह रुकता है। ठीक वही स्थिति उन जीवों की है, जो सम्यक्त्व-सहित हैं। यद्यपि उनकी परिणति भी परिणमनशील है, परन्तु उनका लक्ष्य एक शुद्धात्म-तत्त्व पर ही केंद्रित रहता है, अर्थात् वे कहीं भी किसी भी गति में जायें; परन्तु कुम्हार के चाक की तरह अपने शुद्धात्म-तत्त्व की कीली/धुरी पर ही केंद्रित रहते हैं, इसीलिये ऐसे जीव संसार में अधिक नहीं भटकते। ऐसे जीवों को संबोधित करते हुए कविवर कहते हैं ''अब जिनका संसार निकट है अर्थात् संसारभ्रमण का समय बहुत कम रह गया है, जिन्होंने मिथ्यात्व को नष्ट करके सम्यक्त्व को प्राप्त कर लिया है, जिन्होंने अपनी चित्तरूपी-भूमि को शोध लिया है, अर्थात् जिनका मन द्वंदरहित अर्थात् देह और आत्मासंबंधी भ्रमपूर्ण समस्त-दुविधाओं से रहित हो गया है, जिन्होंने ध्यानावस्था धारणकर अर्थात् स्वरूप में अपने उपयोग को स्थिरकर स्वयं को मोक्ष-प्राप्ति के योग्य बना लिया है, वे ही जीव शुद्धात्मा के अनुभव के अभ्यासी होकर अविनाशी-पद को प्राप्त करते है, और उनके समस्त-कर्म और भ्रमरूपी रोग गलकर नष्ट हो जाते हैं। जबकि दूसरी और जो जीव अपने आत्मस्वरूप को नहीं पहचानते, अर्थात् सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं करते, मिथ्यात्व में ही फँसे हुये हैं, वे धुरी-विहीन भटकनेवाले पहिये की तरह अनंतकालपर्यन्त इसीप्रकार चार-गति चौरासी-लाख योनियों में परिभ्रमण करते रहते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जे जीव दरबरूप तथा परजायरूप, दोऊ नै-प्रवांन वस्तु-सुद्धता गहतु है।
जे असुद्ध-भावनि के त्यागी भये सरवथा, विषैंसौं-विमुख ह्वै विरागता-बहतु हैं।।
जे-जे ग्राह्यभाव-त्यागभाव दोऊ-भावनिकौं, अनुभौ-अभ्यासविषैं एकता करतु है।
तेई ग्यान-क्रिया के आराधक सहज मोख-मारग के साधक अबाधक महतु है।। 37।।

स्याद्वाद-कौशल-सुनिश्चल-संयमाभ्यां, यो भावयत्यहरहः स्वमिहोपयुक्त:।
ज्ञानक्रिया-नय-परस्पर-तीव्रमैत्री-पात्रीकृतः श्रयति भूमिमिमां स एकः।। 4।।

साध्य-साधक -द्वार

(दोहा)

विनास अनादि-असुद्धता, होइ सुद्धता-पोख।
ता-परनति को बुध कहैं, ग्यान-क्रियासौं मोख।। 38।।

शब्दार्थ :- जे जीव दरबरूप तथा परजायरूप= जो जीव द्रव्यरूप और पर्यायरूप, दोऊ नै-प्रवांन वस्तु सुद्धता गहतु है= दोनों-नयों के अनुसार वस्तु के शुद्ध-स्वरूप को ग्रहण करते हैं, जे असुद्ध-भावनि के त्यागी भये सरवथा= जो अशुद्ध-भावों के सर्वथा-त्यागी हैं, विषैंसौं विमुख ह्वै विरागता बहतु हैं= विषयों से विमुख हैं, वैराग्य की धारा में बहते हैं, जे-जे ग्राह्यभाव-त्यागभाव दोऊ भावनिकौं= जो ग्रहणभाव और त्यागभाव दोनोंभावों में, अनुभौ-अभ्यासविषैं एकता करतु है= अात्मानुभव के अभ्यास के समय एकत्व स्थापित करते हैं, तेई ग्यान-क्रिया के आराधक सहज= वे ही ज्ञान-क्रिया के सहज-उपासक हैं, मोख-मारग के साधक अबाधक महतु है= मोक्षमार्ग के पथिक हैं, कर्मबाधा से रहित हैं, महान् हैं।। 37।। विनास अनादि-असुद्धता= अनादिकाल की अशुद्धता का विनाश, (और) होइ सुद्धता-पोख= शुद्धता की पुष्टि हो, ता-परनति को बुध कहैं= उस परिणति को ज्ञानीजन कहते हैं, ग्यान-क्रियासौं मोख= यही ज्ञानक्रिया है, इसी से मोक्ष होता है।। 38।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने आत्मानुभवी-जीव की प्रवृत्ति और आत्मानुभव का फल वर्णित किया है। अनादिकालीन मिथ्यादृष्टि-जीव जब आत्मा के स्वरूप को द्रव्यपने/द्रव्यार्थिक-नय से और पर्यायपने/ पर्यायार्थिक-नय से समझकर आत्मवस्तु के शुद्ध-स्वरूप को ग्रहण करता है, अर्थात् द्रव्यदृष्टि से विचार करता है कि मैं चेतन आत्मा, अनंत-ज्ञानादि-गुणों का पिण्ड, शाश्वत, त्रिकाली, ध्रुव, अखंड-तत्त्व हूँ। और पर्याय-दृष्टि से विचार करता है कि ये देहादिक-संयोग मेरे नहीं है, जड़ है, विनाशीक है, इनसे मेरा कुछ ही दिनों का संयोग है, समय आने पर ये जड़-पदार्थ मुझे छोड़ देंगे या मैं इन जड़-पदार्थो को छोड़ दूँगा, फिर क्यों मैं इनसे प्रीति करूँ? इसीप्रकार ये मोह-राग-द्वेष आदि भाव, जिन्हें अभी तक मैं अपना मानता आया था, ये भी मेरा स्वभाव नहीं हैं, मेरी पर्याय में पर के लक्ष्य से होनेवाला विकार है, मैं तो इन विकारों से त्रिकाल-भिन्न मात्र जाननहार-तत्त्व हूँ- ऐसा विचार, चिंतन, मननकर आत्मा के शुद्ध-स्वरूप को ग्रहण करता है। मोह, राग, द्वेष, पाप, कषाय, व्यसन इत्यादि अशुद्ध-भावों का सर्वथा-त्यागी होकर, पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों से विमुख अर्थात् इनके प्रति आसक्ति का त्याग करता हैं, और संसार, शरीर और संयोगों से पूर्णत: विरक्त, एकमात्र वीतरागता के रस में सराबोर होता हैं। अब उस जीव के अंतरंग में निजवस्तु को ग्रहण करने और परवस्तु को त्याग करने- ये दोनों ही भाव समान रूप से एक साथ सहज वर्तते हैं। यद्यपि आत्मानुभव से पूर्व अात्मवस्तु के शुद्ध-स्वरूप को ग्रहण करने और पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों और विकारी-भावों को त्याग करने का भाव वर्तता है; लेकिन अनुभव के काल में न स्व का ग्रहण और न पर का त्याग अर्थात् दोनों में एकता/समानता सहज स्वयं वर्तती है; क्योंकि दोनों ही भाव विकल्परूप है, और अनुभूति निर्विकल्प होती है। ऐसे साधक-जीव ज्ञान-क्रिया के उपासक होते हैं। ज्ञान-क्रिया से कवि का तात्पर्य है वह परिणति, जब उपयोग निज-स्वरूप में हो, तत्क्षण अनादिकाल की अशुद्धता या अज्ञानता का विनाश हो और शुद्ध-स्वरूप की पुष्टि हो अर्थात् शुद्ध-स्वरूप का वेदन हो, वही क्रिया या वीतरागता का भाव ‘ज्ञानक्रिया’ है, वही मोक्षमार्ग है- एेसे सहज, सरल-मार्ग पर चलनेवाले पथिक ही मोक्षमार्ग के सच्चे-साधक कहलाते हैं; जो कर्मकृत या कर्म के उदय और बंध-संबंधी समस्त-बाधाओं से रहित, महान् जीव हैं।

(दोहा)

जगी सुद्ध-समकित-कला, बगी मोख-मग जोइ।
वहै करम-चूरन करै, क्रम-क्रम पूरन होइ।। 39।।

जाके घट ऐसी-दसा, साधक ताकौ नाम।
जैसे जो दीपक धरै, सो उजियारौ धाम।। 40।।

शब्दार्थ :- जगी सुद्ध-समकित-कला= (जिसके अंतस् में) सम्यग्दर्शन की शुद्ध-कला जागृत हुई, बगी मोख-मग जोइ= जो मोक्षमार्ग में ज्योति की तरह जगमगाती है, वहै करम चूरन करै= वही कर्मों को नष्ट करती हुई, क्रम-क्रम पूरन होइ= क्रम-क्रम से पूर्ण होती हैग।। 39।। जाके घट ऐसी-दसा= जिसके अंतरंग में ऐसी दशा होती है, साधक ताकौ नाम= उसी का नाम साधक है, जैसे जो दीपक धरै= जैसे जो दीपक को रखता/जलाता है, सो उजियारौ धाम= उजाला भी उसी के घर में होता है।। 40।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने सम्यग्दर्शन की महिमा के साथ-साथ सम्यक्त्व से ही क्रमशः ज्ञान की पूर्णता होती है, इस तथ्य को सतर्क-स्पष्ट किया है। कविवर कहते हैं आत्मानुभवी-जीव के हृदय में जो सम्यग्दर्शन की कला जागृत होती है, वही मोक्षमार्ग को प्रकाशित करती है। ठीक उसीप्रकार जैसे दूज के चंद्रमा की कलायें ज्यों-ज्यों बढ़ती है, त्योंत्यों अंधकार का विनाश होता जाता है, और चंद्रमा का प्रकाश बढ़ता जाता है। और एक दिन चंद्रमा अपने पूर्णत्वरूप (पूर्णिमा का चाँद) को प्राप्त करता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दर्शन की कला अर्थात् परिणामों की विशुद्धि ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है; त्यों-त्यों आत्मस्वरूप को ढँकनेवाले कर्म-कृतरूपी-अंधकार का विनाश होता जाता है, और ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जाता है। इसप्रकार ज्ञान एक दिन अपने पूर्णत्व-स्वरूप या केवलज्ञान को प्राप्त करता है। कविवर कहते हैं जिस जीव के अंतरंग में उपरि-वर्णित स्थिति होती है, उसी को साधक या आत्मस्वरूप की साधना करनेवाला कहते हैं; क्योंकि जिस घर में दीपक जलाया जाता है, प्रकाश भी उसी के घर में होता है। कहने का अभिप्राय यही है कि जो जीव साधना करता है, वही साधक कहलाता है; अर्थात् सम्यग्दर्शन का दीपक जिसके अंतरंग में जलता है, केवलज्ञानरूप-प्रकाश की प्राप्ति भी उसी जीव को होती है।

(सवैया इकतीसा)

जाकै घट-अंतर मिथ्यात-अंधकार गयौ, भयौ परगास सुद्ध-समकित-भानकौ।
जाकी मोह-निद्रा घटी ममता-पलक फटी, जान्यौ जिन मरम अवाची-भगवानकौ।।
जाकौ ग्यान-तेज बग्यौ उद्दिम-उदार जग्यौ, लगौ सुख-पोख समरस-सुधा-पानकौ।
ताही सुविचच्छनकौ संसार निकट आयौ, पायौ तिन मारग-सुगम निरवानकौ।। 41।।

शब्दार्थ :- जाकै घट-अंतर मिथ्यात-अंधकार गयौ= जिसके अंतरंग से मिथ्यात्वरूपी-अंधकार दूर हो गया

चित्पिण्ड-चण्डिमविलासि-विकासहासः, शुद्धप्रकाश-भर-निर्भर-सुप्रभातः।
आनन्द-सुस्थित-सदास्खलितैकरूप-स्तस्यैव चायमुदयत्यचलार्चिरात्मा।। 5।।

साध्य-साधक -द्वार है, भयौ परगास सुद्ध-समकित भानकौ= शुद्ध सम्यग्दर्शनरूपी-सूर्य का प्रकाश हुआ है, जाकी मोह-निद्रा घटी ममता-पलक फटी= जिसकी मोह-निद्रा टूट गई है, ममतारूपी पलकें खुल गयीं हैं, जान्यौ जिन मरम अवाची-भगवानकौ= जिन्होंने वचनातीत भगवान् आत्मा का मर्म जान लिया है, जाकौ ग्यान-तेज बग्यौ उद्दिम-उदार जग्यौ= जिसका ज्ञान का तेज/सूर्य प्रकाशित हुआ है,और तीव्र-पुरुषार्थ जागृत हुआ, लगौ सुखपोख समरस-सुधा-पानकौ= जो समतारूपी-अमृतरस का पान करके सुख से पुष्ट हुआ, ताही सुविचच्छनकौ संसार निकट आयौ= उसी बुद्धिमान् पुरुष के संसार का अंत नजदीक है, पायौ तिन मारग सुगम-निरवानकौ= उन्हीं को सरल-मोक्षमार्ग की प्राप्ति होती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यग्दर्शन की महिमा को वर्णित करते हुये सम्यग्दृष्टि-जीवों को ही मोक्षमार्ग का सच्चा-पथिक बताया है। लोक में हम देखते हैं रात्रि का काला-घना-अंधकार भी सुबह सूर्य की पहली किरण के उदित होते ही विलीन हो जाता है। और ज्यों-ज्यों सूर्य अपने प्रचंडरूप में आता है, त्यों-त्यों अंधकार तो पूर्णरूप से विनाश को प्राप्त होता ही है;, साथ ही जगत् का प्रत्येक पदार्थ भी स्पष्ट-प्रतिभासित होता है। ठीक उसीप्रकार जिसके हृदय में सम्यग्दर्शनरूपी-सूर्य का उदय होता है, उसका मिथ्यात्वरूपी-अंधकार तो तत्क्षण ही विलीन होता ही है; साथ ही जगत् का प्रत्येक पदार्थ और संयोग अपने वास्तविक-स्वरूप में प्रतिभासित होता हैं, जिसे देखकर जीव को स्वत: ही अपनी भूल का भान होता है। अनादिकाल से जीव स्वयं को भूलकर देहादिक-संयोगों से एकत्वरूपी-मोह की चिरनिद्रा में सोया हुआ था, सम्यग्दर्शनरूपी सूर्य के उदित होते ही ठीक उसीप्रकार जाग जाता है, जैसे लोक में सूर्य के उदय होने पर सारे प्राणी रात्रि की गहरी नींद से जाग जाते हैं। ममता की पलकें खुल गई हैं, अर्थात् अनादि-मोह की नींद खुल गयी है, जिस मोह-ममता के कारण जीव अपने वास्तविक-स्वरूप का अनुभव होने पर भी उसे स्वीकार नहीं करता था, आज न केवल स्वीकार किया; बल्कि प्रत्यक्ष-अनुभव भी किया है। और वचनातीत-भगवान् आत्मा अर्थात् जिस आत्मस्वरूप को उसके अनंत-गुणों को वचनों से वर्णित करना असंभव है; उसके मर्म या वास्तविक-स्वरूप को जान लिया है। ऐसे सम्यग्दृष्टि-जीव, जिनकी श्रद्धा सम्यक् होने से सम्यग्ज्ञान का तेज सहज-प्रकाशित होता है। जिनके हृदय में तीव्र-पुरुषार्थ जागृत हुआ है, जिन्होंने समतारूपी अमृतरस का पान किया है, अर्थात् आत्मस्वरूप के आनंद का वेदन किया है, उन्हीं जीवों का संसार निकट है, अर्थात् संसार के दुःखों से छूटने का समय अत्यंत-निकट है। ऐसे जीवों को ही जिनेन्द्र भगवान् द्वारा कथित सहज-सरल मुक्ति के मार्ग की प्राप्ति होती है, अथवा ऐसे आत्मानुभवी-जीव ही मोक्ष-सुंदरी को वरण करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

जाकै हिरदै में स्याद्वाद-साधना करत, सुद्ध-आतमाकौ अनुभौ प्रगट भयौ है।
जाके संकलप-विकलप के विकार मिटि, सदाकाल एकीभाव-रस परिनयौ है।।
जिन बंध-विधि-परिहार मोख-अंगीकार, ऐसौ-सुविचार पच्छ सोऊ छाँड़ि दयौ है।
ताकौ ग्यान-महिमा उदोत दिन-दिन प्रति, सोही भवसागर-उलंघि पार गयौ है।। 42।।

शब्दार्थ :- जाकै हिरदै में स्याद्वाद-साधना करत= जिसके हृदय में स्याद्वाद का अभ्यास करने से, सुद्धस्याद्वाद-दीपित-लसन्महसि प्रकाशे, शुद्धस्वभाव-महिमन्युदिते मयीति। किं बन्धमोक्ष-पथ-पातिभिरन्यभावै- र्नित्योदयः परमयं स्फुरतु स्वभावः।। 6।। आतमाकौ अनुभौ प्रगट भयौ है= शुद्ध-आत्मा का अनुभव प्रगट हुआ है, जाके संकलप-विकलप के विकार मिटि= जिसके संकल्प-विकल्प के विकार नष्ट हो गए हैं, सदाकाल एकीभाव-रस परिनयौ है= हमेशा स्वरूप से एकरसपने का भाव परिणित हुआ है, जिन बंध-विधि-परिहार मोख-अंगीकार= जिसने बंध-विधि के त्याग और मोक्ष को अंगीकार, ऐसौ-सुविचार-पच्छ सोऊ छाँड़ि दयौ है= ऐसे उत्तम-विचार का पक्ष लेना भी छोड़ दिया है, ताकौ ग्यान-महिमा उदोत दिन-दिन प्रति= उसके ज्ञान की महिमा दिन-प्रतिदिन प्रकाशित हो रही है, सोही भवसागर उलंघि पार गयौ है= वही संसार-समुद्र को पारकर किनारे पर पहुँच सकता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने सम्यग्ज्ञान की महिमा को वर्णित करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि सम्यग्ज्ञानी-जीव ही भवसमुद्र से पार हो सकता है। अनादि मिथ्यादृष्टि-जीव स्याद्वाद के माध्यम से वस्तु का सम्यक्-स्वरूप समझकर स्व-पर का भेदज्ञान करते हुये शुद्ध-स्वरूप का अनुभव करता है, अर्थात् निज-स्वरूप के आनंद का रसास्वादन करता है। जब जीव को आत्मिक-आनंद का वेदन होता है, तब वह जीव उसके रस में इतना निमग्न हो जाता है कि पर-सबंधी ही नहीं स्व-संबंधी भी समस्त संकल्प-विकल्पों का अभाव हो जाता है। सदाकाल या प्रतिसमय एकमात्र ज्ञान-स्वभाव का ही रस परिणत होता है अर्थात् ‘मैं जाननहार हूँ’- ऐसा अभ्यास निरन्तर चलता है। ऐसे सम्यक्-श्रद्धानी और ज्ञानी-जीव के बंध-विधि अर्थात् कर्मों के बंधरूप-विकल्प का त्याग और मुक्ति को अंगीकार करना यानि ‘मुझे मोक्ष प्राप्त करना है’- इस विकल्प का भी त्याग सहज ही वर्तता है। जिसके ज्ञान की महिमा दिन-प्रतिदन उन्नत हो रही है अर्थात् परिणामों की निरन्तर विशुद्धि, कर्म-प्रकृतियों का क्षय, स्वरूप में स्थिरता का बढ़ना- ये सब ज्ञान की ही तो महिमा है। ऐसे ज्ञानी-जीव ही संसाररूपी-समुद्र को पारकर किनारे पर आने और मुक्ति-महल में प्रवेश करने की सामर्थ्य रखते हैं। इस-छंद में दो विशेष-शब्द प्रयुक्त हुये संकल्प और विकल्प। संकल्प अर्थात् दृढ़ता और विकल्प अर्थात् विचार। वैसे तो ये दोनों ही सामान्य से शब्द हैं, पर वास्तव में इनका अर्थ बहुत गहरा है। अभी तक इन शब्दों का प्रयोग बुरे-संदर्भ में ही प्रयुक्त होता आया है, परन्तु यदि शब्दार्थ की दृष्टि से देखें, तो ये ही वे शब्द हैं, जिनसे मिथ्यात्व का भी पोषण होता है, और सम्यक्त्व का भी। कैसे? मिथ्यात्व का पोषण- संकल्प यानि दृढ़ता, पूर्ण-स्वीकृति। वर्तमान में मेरी दृढता है कि ‘‘मैं रंजना हूँ’’- यह तो हुआ संकल्प और स्वयं को रंजना स्वीकार करते ही रंजना या शरीर से संबंधित अनगिनतपरिणामों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह है, विकल्प। ऐसा चिंतन मिथ्यादृष्टि-जीव को प्रतिसमय चलता है। इसीलिये मिथ्यादृष्टि-जीव सारे दिन इन संकल्प-विकल्पों के फल में अनंत-संसार का बंध करके अनंत-दुःखों का सृजन करता है। ऐसा नहीं है कि ये संकल्प-विकल्प केवल मिथ्यादृष्टि-जीव ही करता है। सम्यदृष्टि-जीव भी संकल्प और विकल्प करता है। लेकिन वहाँ उसकी दृष्टि सम्यक् होने से इन संकल्प-विकल्पों का स्वरूप भिन्न है। कैसे? सम्यक्त्व का पोषण- सम्यग्दृष्टि जीव का यह दृढ़-श्रद्धान है कि ‘‘मैं आत्मा हूँ’’- यह हुआ ‘संकल्प’ और ऐसा निर्णय होते ही आत्मस्वरूप का चिंतन, मनन और लीनता के पुरुषार्थरूप जो परिणाम हुये, वह है ‘विकल्प’। लेकिन दृष्टि सम्यक‍् होने से सम्यग्दृष्टि-जीव इन्हीं संकल्प-विकल्पों के फल में अनंत-संसार के घोर-दुःखों से छूटकर सच्चे-सुख की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। साध्य-साधक -द्वार और जो जीव इन संकल्प-विकल्पों से रहित निर्विकल्प-आत्मस्वरूप का वेदन करते हैं, वे जीव केवलज्ञानरूपी लक्ष्मी से सुशोभित होते हैं। आगम का अटूट-सिद्धांत है- ''आत्मा पर द्रव्य का कर्ता-हर्त्ता नहीं है। ‘’ सुनकर यकीन नहीं होता, और प्रतिसमय कर्तृत्व का बोझ सिर पर सवार रहता है। लेकिन सच तो यही है कि आत्मा इन संकल्पविकल्पों के अलावा कुछ कर ही नहीं सकता है। आज तक जितना भी कर्मों का बंधन इस जीव ने किया, और इन कर्मों से छूटने का जो पुरुषार्थ इस जीव ने किया वह सब इन संकल्प-विकल्पों का ही फल है। हे आत्मन्! अब तो इन संकल्प-विकल्पों से छूटने का सुअवसर आया है। ‘माँ जिनवाणी’ पग-पग पर सचेत करती है- ‘‘कितने भव बीत चुके, संकल्प-विकल्पों में। जिया कब तक उलझेगा, संसार-विकल्पों में।।’’ (हम सभी इन मिथ्या संकल्प-विकल्पों को छोड़कर अपने स्वरूप का निर्णयरूपी ‘संकल्प’ और स्वरूप का चिंतन-मननरूपी ‘विकल्पों’ से सुख का मार्ग प्रशस्त करते हुये निर्विकल्प-आत्मस्वरूप में लीनतारूपी पुरुषार्थ की ओर अग्रसर हों, यही भावना है।)

(सवैया इकतीसा)

अस्तिरूप-नासति अनेक-एक थिररूप-अथिर इत्यादि नानारूप जीव कहियै।
दीसै एक-नैकी प्रतिपच्छी न अपर दूजी, नैकी न दिखाइ वाद-विवादमैं रहियै।।
थिरता न होइ विकलप की तरंगनिमैं, चंचलता बढ़ै अनुभौ-दसा न लहियै।
तातैं जीव अचल-अबाधित-अखंड-एक, ऐसौ पद साधिकै समाधि-सुख गहियै।। 43।।

शब्दार्थ :- अस्तिरूप-नासति अनेक-एक थिररूप-अथिर= अस्तिरूप-नास्तिरूप, एकरूप-अनेकरूप, स्थायीरूप-अस्थायीरूप, इत्यादि नानारूप-जीव कहियै= इत्यादि विविध-प्रकार जीव के कहे गए हैं, दीसै एक-नैकी= एक-नय से एकरूप दिखे, प्रतिपच्छी न अपर दूजी= दूसरा विपरीत-पक्ष न दिखे, नैकी न दिखाइ वाद-विवादमैं रहियै= नय से न देखें, तो वाद-विवाद में रहना होता है, थिरता न होइ विकलप की तरंगनिमैं= विकल्पों के जाल में स्थिरता नहीं रहती, चंचलता बढ़ै= चंचलता/व्यग्रता बढ़ती है, अनुभौ-दसा न लहियै= अनुभव की स्थिति प्राप्त नहीं होती, तातैं जीव अचल-अबाधित-अखंड-एक= इसलिये जीव को शाश्वतबाधारहित-खंडरहित-एकरूप, ऐसौ पद साधिकै= ऐसा पद ग्रहणकर, समाधि-सुख गहियै= समाधि-सुख प्राप्त करना चाहिये। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने नयों की विवक्षा से रहित निर्विकल्प-आत्मानुभूति को ही न केवल सर्वश्रेष्ठ कहा, बल्कि प्रयोजनभूत भी कहा; क्योंकि विकल्प कैसा भी हो अानंद की अनुभूति में बाधक ही है। सामान्यत: द्रव्य-अपेक्षा जीव-पदार्थ का कोई भेद नहीं है, वह तो ज्ञानादि-अनंत-गुणों का पिण्ड, अभेद, त्रिकाल, एक, शाश्वत द्रव्य है। लेकिन पर्याय-अपेक्षा जीव के कई-रूप परिलक्षित होते हैं, और इन सभी-रूपों का एकसाथ कथन करना असंभव है। इसलिये जीव के इन सभी-रूपों का कथन करने के लिए आचार्यों ने नयों की विवक्षा से कथन किया है, ताकि अभेद-आत्मवस्तु के सभी भेदों का सहजता

चित्रात्मशक्ति-समुदायमयोऽयमात्मा, सद्यः प्रणश्यति नयेक्षण-खण्डयमानः।
तस्मादखण्डमनिराकृत-खण्डमेक-मेकान्त-शान्त-मचलं चिदहं महोऽस्मि।। 7।।

से वर्णन करना भी संभव हो, और कोई विवाद भी खड़ा न हो। नयों की दृष्टि से विचार करें, तो एक-नय जीव की अस्तिपने या जीव-पदार्थ अपने स्वचतुष्टय से विद्यमान है- एेसा कथन करता है, तो दूसरा-नय जीव के नास्तिपने या पर-चतुष्टय का जीव में प्रवेश नहीं है- इस अपेक्षा से कथन करता है। द्रव्य-अपेक्षा जीव का त्रिकाल एक ही रूप है, लेकिन पर्याय-अपेक्षा चार-गति चौरासी-लाख योनियों में भ्रमण करते हुए जीव के अनेकरूप हैं। द्रव्य-अपेक्षा जीव थिर या शाश्वत है अर्थात् जीव का कभी क्षय नहीं होता; परन्तु पर्याय-अपेक्षा जीव जन्म-मरण से सहित होने से अथिर है अर्थात् विनाश को प्राप्त होता है। द्रव्य-अपेक्षा जीव अबंध है,यहाँ तक कि आज तक कर्मों ने उसे स्पर्श भी नहीं किया, जबकि पर्याय-अपेक्षा देखा जाये; तो चारों-गतियों में जीव का परिभ्रमण कर्म-बंध और उदय का ही परिणाम है। द्रव्य-अपेक्षा जीव अनंतज्ञान का धारी है, जबकि पर्याय-अपेक्षा जीव अपने ही स्वरूप से आज तक अनजान होने के कारण महा-अज्ञानी है। इसप्रकार जीव परस्पर-विरुद्ध अनेक-शक्तियों का धारी है। इसीलिए जब एक-पक्ष से कथन किया जाता है, तब दूसरे-पक्ष को गौण करते हैं, और ऐसा करने के लिये नयों के माध्यम से कथन किया जाता है। लेकिन यदि एक-नय का कथन हो और उसके प्रतिपक्षी दूसरे-नय का कथन न हो, तो विवाद खड़ा होता है। इसलिए पदार्थ के स्वरूप को समझने के लिए नयों की विवक्षा को समझना आवश्यक है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यदि हम नयों की विवक्षा में ही उलझे रहेगें, तो अनुभूति का आनंद कभी प्राप्त नहीं होगा। क्योंकि जैसे समुद्र में उठनेवाली तरंगों/लहरों का कोई अंत नहीं है, ठीक उसीप्रकार चित्त में उठनेवाले विकल्पों का भी कोई अंत नहीं है। जितना हम विकल्पों के मायाजाल में उलझते जाते हैं, उतनी ही उपयोग की चंचलता बढ़ती जाती है, स्थिरता नहीं रहती। और जबतक उपयोग में स्थिरता नहीं आती, तबतक अनुभव की स्थिति भी नहीं बनती। जैसे पानी में हमें अपना प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, परन्तु कब? जब पानी निर्मल और शांत हो, चंचल-लहरों के चलते हमें अपना प्रतिबिंब दिखाई नहीं देता, ठीक उसीप्रकार आत्मानुभूति के काल में भी साधक को निजात्मा ही अनुभव में आता है, परन्तु कब? जब उपयोग विकारों की मलिनता से रहित निर्मल और विकल्पों की चंचलता से रहित शांत हो। इसीलिए कविवर कहते हैं कि जीव को आत्मानुभूति करने के लिये चंचलता-रहित, कर्मकृतबाधाओं से रहित, अखंड, शाश्वत, त्रिकाली, ध्रुव एकमात्र ज्ञायक-भगवान्-आत्मा को लक्ष्य में लेना चाहिए। और फिर उसी में लीनता का पुरुषार्थ कर समाधि-सुख प्राप्त करना चाहिए; क्योंकि आत्मानुभूति निर्विकल्प ही होती है, विकल्पों के रहते आत्मिक-आनंद की अनुभूति कभी नहीं होती।

(सवैया इकतीसा)

जैंसैं एक पाकौ-आंबफल, ताके चार-अंस, रस-जाली-गुठली-छीलक जब मानियै।
यौंतौं न बनै पै ऐसे बनै जैसै वहै फल, रूप-रस-गंध-फास अखंड प्रमानियै।।
तैसै एक-जीव कौ दरब-खेत-काल-भाव, अंस-भेदकरि भिन्न-भिन्न न बखानियै।
दर्वरूप-खेतरूप-कालरूप-भावरूप, चारौंरूप अलख-अखंड-सत्ता मानियै।। 44।।

शब्दार्थ :- जैंसैं एक पाकौ-आंबफल= जैसे एक पका हुआ आम का फल, ताके चार-अंस= उसके चार अंश हैं, रस-जाली-गुठली-छीलक जब मानियै= रस, जाली, गुठली और छिलका (अभिन्न हैं)= ऐसा मानते हैं, यौंतौं न बनै पै ऐसे बनै= परन्तु ऐसा नहीं है, ऐसा है, जैसै वहै फल= जैसे वही फल, रूप-रस-गंध-फास अखंड प्रमानियै= रूप, रस, गंध और स्पर्श उससे अभिन्न है- ऐसा मानना चाहिए, तैसै एक जीव कौ= उसीप्रकार एकसाध्य-साधक -द्वार जीव के, दरब-खेत-काल-भाव= द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव, अंस-भेदकरि भिन्न-भिन्न न बखानियै= अंशभदे हैं, परन्तु भिन्न-भिन्न नहीं कहे गये, दर्वरूप-खेतरूप-कालरूप-भावरूप= द्रव्यरूप, क्षेत्ररूप, कालरूप, भावरूप, चारौंरूप अलख अखंड-सत्ता मानियै= ये चारों रूप (आँखों से दिखाई नहीं देनवे ाली) आत्मा की अखंड-सत्ता मानो। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मस्वभाव की अखंडता का उदाहरण-सहित स्पष्टीकरण किया है। प्रत्येक आत्मवस्तु अपने स्वचतुष्टय या द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप से स्वतंत्ररूप में विद्यमान है। न तो उन स्वचतुष्टय को आत्मा से अलग किया जा सकता है, और न ही किसी अन्य-द्रव्य के चतुष्टय का किसी अन्य द्रव्य में प्रवेश संभव है। कहने का अभिप्राय यही है कि इन-चतुष्टयों का भेदरूप-कथन तो संभव है, परन्तु ये वस्तुतः भिन्न नहीं हैं। जैसे एक पका हुआ आमफल है, उसके चार अंश हैं- रस, जाली, गुठली और छिलका। यद्यपि ये चारों ही आम के साथ ही उत्पन्न होते हैं, उसके अंदर समाहित हैं, परन्तु फिर भी हम इन चारों को आम से अलग कर सकते हैं; क्योंकि ये आम से अभिन्न दिखते हुये भी भिन्न हैं। लेकिन आम का जो स्पर्श-रस-गंध और वर्ण नाम के गुण हैं, उसे हम किसी भी कीमत पर आम से अलग नहीं कर सकते हैं; क्योंकि ये आमरूपी पुद््गल-द्रव्य के स्व-गुण हैं। ठीक उसीप्रकार आत्म-वस्तु के स्वचतुष्टय रस, जाली, गुठली और छिलके की तरह नहीं है; जो उससे अलग किये जा सकें, बल्कि स्पर्श, रस, गंध और वर्ण की तरह अभिन्न हैं; जोकि उससे अलग नहीं किये जा सकते हैं। प्रत्येक आत्मवस्तु इन द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप स्व-चतुष्टय से सदाकाल अखंडित विद्यमान है। जैसे मैं अनंत-ज्ञानादि-गुणों का पिण्ड जीव द्रव्य, अपने स्वक्षेत्र अर्थात् अनंत निज-आत्म-प्रदेशों में विद्यमान, स्वकाल अर्थात् अनादि-अनंत शाश्वत, और स्व-भाव अर्थात् अपने जानन-स्वभावरूप से सदाकाल अखंड विद्यमान हूँ। इनसे मुझे कोई अलग नहीं कर सकता, जैसे कि क्या कोई अग्नि से उसकी उष्णता, जल से उसकी शीतलता, चीनी से उसकी मिठास, नमक से उसका खारापन अलग कर सकता है? नहीं, कभी नहीं। ठीक उसीप्रकार आत्मवस्तु से उसके गुण, उसके प्रदेश, अविनाशीपना, उसका जानन-स्वभाव कभी अलग नहीं किया जा सकता है। इसीलिये आत्मसत्ता अपने द्रव्य-क्षेत्र-कालभाव से सदैव अभिन्न है, अखंड है।

(सवैया इकतीसा)

कोऊ ग्यानवान कहै ''ग्यान तौ हमारौ रूप, ज्ञेय षट-दर्व सो हमारौ रूप नांही है।
एक-नै-प्रवांन ऐसै दूजी अब कहूँ जैसै, सरस्वती अक्खर-अरथ एक-ठाहीं है’'।।
तैंसैं ग्याता मेरौ नाम, ग्यान-चेतना विराम, ज्ञेयरूप-सकति अनंत मुझ-पांही है।
आ कारन वचन के, भेद ‘भेद’ कहै कोऊ, ग्याता-ग्यान-ज्ञेयकौ विलास सत्ता-माँही है।। 45।।

शब्दार्थ :- कोऊ ग्यानवान कहै ग्यान तौ हमारौ रूप= कोई बुद्धिमान् व्यक्ति कहेे ज्ञान तो हमारा रूप है, ज्ञेय षट्-दर्व सो हमारौ रूप नांही है= ज्ञेयरूप जो छहों-द्रव्य हैं, वह मेरा रूप नहीं है, एक-नै-प्रवांन ऐसै दूजी

योऽयं भावो ज्ञानमात्रोऽहमस्मि, ज्ञेयो ज्ञेय-ज्ञानमात्रः स नैव।
ज्ञेयो ज्ञेय-ज्ञान-कल्लोल-वल्गन्, ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञातृमद् वस्तुमात्रः।। 8।।

अब कहूँ= (कवि का कथन) यह कथन एक नय (व्यवहार नय) से है, दूसरा (निश्चय नय का) कथन इसप्रकार है, जैसै सरस्वती अक्खर-अरथ एक-ठाहीं है= जैसे शास्त्र में अक्षर और अर्थ एक ही स्थान पर रहते हैं, तैंसैं ग्याता मेरौ नाम ग्यान-चेतना विराम= वैसे ही ज्ञाता मेरा नाम है, और ज्ञानचेतना में ही मर्यादित हूँ, ज्ञेयरूपसकति-अनंत मुझ पांही है= ज्ञेयरूप अनंत-शक्ति मेरे अंदर ही विद्यमान है, आ-कारन वचन के भेद, ‘भेद’ कहै कोऊ= इसकारण से वचन के भेद को कोई भले ही भेदरूप कहे, (किन्तु) ग्याता-ग्यान-ज्ञेयकौ विलास सत्ता माँही है= ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की उपस्थिति/युगपत् विद्यमानता आत्मसत्ता में ही है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूप-परिणमन करने की सामर्थ्य एकमात्र आत्मा में ही है’- इस सत्य का उदाहरण-सहित सुंदर-स्पष्टीकरण किया है। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय से क्या अभिप्राय है? ‘ज्ञाता’ अर्थात् जाननेवाला, ‘ज्ञान’ अर्थात् जानने की सामर्थ्य, और ‘ज्ञेय’ अर्थात् जो जानने में आता है। कई ज्ञानवान् या बुद्धिमान् जीव ऐसा मानते हैं कि ‘‘ज्ञाता तो मैं हूँ, और ज्ञान या जाननरूपस्वभाव भी मेरा ही है; परन्तु जो ज्ञेयरूप छहों-द्रव्य जानने में आते हैं, ये मेरा रूप नहीं है’’। उन जीवों को संबोधित करते हुए कविवर कहते हैं कि ‘‘भाई! तेरा ये कथन व्यवहारनय से तो सही है, परन्तु निश्चयनय से आत्मवस्तु का स्वरूप इसप्रकार हैं’’- जैसे शास्त्र में शब्द और उस शब्द का अर्थ एक ही स्थान पर होते हैं, दो भिन्न स्थानों पर नहीं, जैसे ‘आ’ और ‘म’ इन दो अक्षरों से बनने वाला शब्द ‘आम’ और इस शब्द का अर्थ/वाच्यार्थ- दोनों इसी में निहित हैं। ऐसा नहीं है कि अक्षर/ शब्द तो यहाँ और वाच्यार्थ उस आम नामक पदार्थ में हो। ‘आम’ नामक पदार्थ तो भिन्न है, पर उस शब्द का अर्थ उस शब्द से भिन्न नहीं है। ठीक उसीप्रकार ‘ज्ञाता’ अर्थात् जाननेवाला आत्मा है, और ‘ज्ञान/जानना’ उसका स्वभाव है, और ‘ज्ञेय’ अर्थात् जो जानने में आता है, वह भी उसका ‘स्वयं का ज्ञान’ ही है, कहने का अभिप्राय यही है कि किसी भी पदार्थ को जानने के लिये ज्ञान कभी उस पदार्थ में प्रवेश नहीं करता; बल्कि ज्ञान हमेशा ज्ञेयाकाररूप-परिणमित अपने ज्ञान को ही जानता है। ठीक उसीप्रकार जैसे आँख किसी पदार्थ को देखती है, अर्थात् आँख में पाये जानेवाले रेटीना के परदे पर उसकी स्वयं की योग्यता से जानने में आनेवाले पदार्थ का चित्र बनता है, और आँख उस चित्राकार को ही देखती है, न कि उस पदार्थ में प्रवेश करती है। इसीलिए एक अंधा-व्यक्ति किसी भी पदार्थ को देखने में असमर्थ होता है; क्योंकि उसकी आँख में वह ज्योतिरूप सामर्थ्य नहीं होती, जिससे आँख के पर्दे पर वह चित्र बन सके। इसीलिए कवि ने कहा कि ‘ज्ञाता’ मेरा नाम है, और ‘ज्ञानचेतना’ ये मेरी चेतना का ही प्रकार है, और ज्ञेयाकाररूप-परिणमन होने की शक्ति अर्थात् जानने में आनेवाले ज्ञेयाकाररूप भी मेरे में ही हैं, अर्थात् ये तीनों रूप मेरे ही हैं, और अभेद हैं। वचनों से वर्णित करने पर भेदरूप-कथन भले ही हो, परन्तु वास्तव में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तीनों की अखंडता मुझ आत्मसत्ता में ही विद्यमान है, अन्य किसी में नहीं।

(चौपाई)

स्व-पर-प्रकासक-सकति हमारी, तातैं वचन-भेद भ्रम-भारी।
ज्ञेय-दशा दुविधा-परगासी, निजरूपा-पररूपा भासी।। 46।।

(दोहा)

निजरूपा आतम-सकति, पररूपा पर-वस्त।
जिन लखि लीनौं पेंच यह, तिन लखि लियौ समस्त।। 47।।

साध्य-साधक -द्वार शब्दार्थ :- स्व-पर-प्रकासक-सकति हमारी= हमारी (ज्ञान) शक्ति स्व और पर को प्रकाशित करनेवाली है, तातैं वचन-भेद भ्रम-भारी= इसीलिए वचन-भेद बहुत-भ्रमित करता है, ज्ञेय-दशा दुविधा-परगासी= ज्ञेय की स्थिति दो तरह की प्रतीतिगोचर है, निजरूपा पररूपा भासी= स्वज्ञेय (निजरूप से प्रकाशित होनेवाला) और परज्ञेय (पररूप से प्रकाशित होनेवाले)।। 46।। निजरूपा आतम-सकति= आत्मशक्ति स्व-रूपवाली है, पररूपा पर-वस्त= और पर-रूप जगत् के सभी पदार्थ हैं, जिन लखि लीनौं पेंच यह= जिन जीवों ने इस मर्म को पहचान लिया, तिन लखि लियौ समस्त= उन जीवों ने (मानो) सब कुछ जान लिया।। 47।। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पिछले-छंद में वर्णित-सत्य को और अधिक-स्पष्ट करते हुए सिद्ध किया कि यदि ज्ञान, ज्ञान को ही जानता है, तो ज्ञेय को जाननेरूप भ्रम की स्थिति उत्पन्न ही क्यों होती है? षट्द्रव्यमयी इस लोक में एकमात्र जीवद्रव्य अनंत-ज्ञान का धनी है। और ज्ञान का स्वभाव स्वपर-प्रकाशी है, अर्थात् ज्ञान ‘स्वज्ञेय’ निजात्मा की प्रसिद्धि तो करता ही है, साथ ही ‘परज्ञेय’ या जगत् के सभी पदार्थों की भी प्रसिद्धि करता है। लेकिन इसके लिये ज्ञान उन पदार्थों में प्रवेश नहीं करता, बल्कि ज्ञान की निर्मलता में सहज ही पदार्थ प्रकाशित होते हैं; ठीक उसीप्रकार जैसे दर्पण की निर्मलता में पदार्थ स्वयं ही झलकते हैं, दर्पण उन पदार्थों को झलकाने का प्रयास नहीं करता, वह तो अपने निर्मल-स्वभाव को कायम रखता है। उसीप्रकार ज्ञान भी पदार्थों को जानता नहीं है, वह तो अपने ज्ञान को ही जानता है; पर ज्ञान के स्व-पर-प्रकाशी-स्वभाव और निर्मलता के कारण पदार्थों का सहज-जानपना होता है। जैसे दीपक अपने स्थान पर स्वयं ज्योतिरूप-परिणमित होता है; परन्तु उसके प्रकाश में स्वयं दीपक भी और उसके संपर्क में आनेवाले सभी पदार्थ सहज, स्वयं ही प्रकाशित होते हैं, दीपक उन पदार्थों को प्रकाशित करने का भाव नहीं रखता। यह एक सहज-प्रक्रिया है; लेकिन अज्ञानी-जीव इस सत्य से अपरिचित होने के कारण भ्रमित हो जाता है और कहता है कि ‘‘ज्ञान ज्ञेयों को जानता है।’’ इतना ही नहीं, वह तो यहाँ तक भी कहता है कि ‘‘ज्ञेयों से ही ज्ञान होता है।’’ जबकि ज्ञानी-जीव को ज्ञान-स्वभाव की सत्यता से सुपरिचित होने के कारण भ्रम की गुंजाइश ही नहीं रहती। इसीलिए कवि ने कहा है कि स्वज्ञेय आत्मशक्ति है, और परज्ञेय जगत् के समस्त-पदार्थ हैं, और ज्ञान स्व-पर-प्रकाशी-स्वभावी होने के कारण दोनों को सहज-प्रकाशित करता है। जिन जीवों ने इस पेंच अर्थात् रहस्य या मर्म को जान लिया, उन ज्ञानी-जीवों ने संपूर्ण-जगत् के पदार्थों को जान लिया; और जो इस सत्य से अपरिचित रहे, वे अज्ञानी-जीव भ्रमित हो गए।

(सवैया इकतीसा)

करम-अवस्थामैं असुद्धसौं विलोकयित, करम-कलंकसौं रहित सुद्ध-अंग है।
उभै-नै प्रवांन समकाल सुद्धासुद्ध-रूप, ऐसौ परजाइधारी-जीव नाना-रंग है।।
एकही समै-मैं त्रिधारूप, पै तथापि याकी, अखंडित-चेतना-सकति सरवंग है।
यहै स्यादवाद याकौ भेद स्यादवादी जानै, मूरख न मानै जाकौ हियौ दृग-भंग है।। 48।।

क्वचिल्लसति मेचकं क्वचिन्मेचकामेचकं, क्वचित्पुनरमेचकं सहजमेव तत्त्वं मम।
तथापि न विमोहयत्यमल-मेधसां तन्मनः, परस्पर-सुसंहत-प्रकट-शक्तिचक्रं स्फुरत्।। 9।।

शब्दार्थ :- करम-अवस्थामैं असुद्धसौं विलोकयित= कर्म से संयकु ्त-अवस्था में अशुद्धनय से आत्मा अशुद्ध जैसा दिखता है, करम-कलंकसौं रहित सुद्ध-अंग है= (शुद्धनय से) कर्म के कलंक से रहित आत्मा (उसी समय) शुद्ध-स्वरूपी है, उभै-नै प्रवांन समकाल सुद्धासुद्ध-रूप= उभयनय अर्थात् दोनों-नयों से युगपत् देखें, तो एक ही काल में शुद्धाशुद्धरूप है, ऐसौ परजाइधारी-जीव नाना-रंग है= इसप्रकार पर्याय-सहित-जीव के अनेकरूप हैं, एकही समै-मैं त्रिधारूप पै तथापि याकी= एक ही समय में तीनरूप हैं, परन्तु फिर भी इसकी, अखंडितचेतना-सकति सरवंग है= अखंडित चेतना-शक्ति सर्वांग में समान है, यहै स्यादवाद याकौ भेद स्यादवादी जानै= यही स्याद्वाद है, इसका मर्म स्याद्वादी ही जानते हैं, मूरख न मानै जाकौ हियौ-दृगभंग है= जिसके हृदय में नयदृष्टि ही खंडित है, वे अज्ञानी इस बात को नहीं मानते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने स्याद्वाद की दृष्टि से विविध-अपेक्षाओं द्वारा जीव के नानारूपों का यथार्थ-चित्रण किया है। छह-द्रव्यों के समूह इस विश्व में सभी द्रव्य स्वभाव-अपेक्षा अनादि-अनंत हैं। जीव-द्रव्य भी अनादिकाल से है, और आठ-कर्मों के साथ है। लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि कर्मों के साथ रहते हुये भी पूर्ण-शुद्ध है,- इस सत्य को हमारे केवली-भगवंतों ने प्रत्यक्षतः प्रमाणित भी किया है। यहाँ कवि ने कर्मसहित-अशुद्ध, कर्मरहित-शुद्ध और एक ही काल में शुद्ध भी और अशुद्ध भी- ऐसे जीव के विविधरूपों को वर्णित किया है। व्यवहार-नय की अपेक्षा कर्मस्थ-जीव अशुद्ध है, क्योंकि अभी उसने अपने शुद्ध-स्वभाव को नहीं पहिचाना है, और जबतक ऐसी स्थिति रहती है, तबतक जीव उन कर्मों के आकर्षण में मोहित होकर तदनुरूप-आचरण करता है, और सुख-स्वभावी होते हुये भी दु:ख का वेदन करता है। इसलिए इस अपेक्षा व्यवहार-नय जीव को ‘अशुद्ध’ कहता है। जब जीव स्व-पर में भेदज्ञान करके, अपने शुद्ध-स्वभाव का आश्रय लेता है, तो जीव अपने वास्तविक शुद्ध-स्वरूप को जो अनादि से ही शुद्ध था, उसका अनुभव करता है। इसीलिये निश्चयनय अनादि से ही शुद्ध-जीव को वर्तमान में भी शुद्ध ही कहता है। और यदि इन दोनों नयों से एकसाथ विचार करें, तो जीव एक ही काल में शुद्धाशुद्ध अर्थात् वर्तमान में द्रव्य-दृष्टि/स्वभाव से शुद्ध और पर्याय-दृष्टि से अशुद्ध दिखाई देता है। इसप्रकार एक ही जीव विविधअपेक्षाओं से विविधरूपों में दृष्टिगोचर होता है। यद्यपि एक ही जीव एक ही समय में शुद्ध, अशुद्ध और शुद्धाशुद्ध तीन रूपों में दिखाई देता है, परन्तु जीव के इन तीनों रूपों में चेतनत्व-शक्ति अखंडरूप से सर्वांग में विद्यमान रहती है। इस मर्म को या वस्तु के इस सत्य-स्वरूप को स्याद्वादी ही समझ सकते हैं, हृदय के अंधे अर्थात् नय-दृष्टि से विहीन अज्ञानीजीव इस सत्य को कभी नहीं समझ सकते।

(सवैया इकतीसा)

निहचै दरवद्रिष्टि दीजै तब एक-रूप, गुन-परजाइ-भेद-भावसौं बहुत है।
असंख्य-परदेस-संजगु त सत्ता-परमान, ग्यानकी प्रभासौं लोकालोक-मानयुत है।।
परजै-तरंगनिके अंग छिनभंगुर है, चेतना-सकतिसौं अखंडित-अचुत है।
सो है जीव जगत्-विनायक जगत्-सार, जाकी मौज-महिमा अपार-अदभुत है।। 49।।

इतो गतमनेकतां दधदितः सदाप्येकता-मितः क्षणविभङ्गुरं ध्रुवमितः सदैवोदयात्।
इतः परम-विस्तृतं धृतमितः प्रदेशैर्निजै-रहो सहजमात्मनस्तदिदमद््भुतं वैभवम्।। 10।।

साध्य-साधक -द्वार शब्दार्थ :- निहचै दरवद्रिष्टि दीजै तब एकरूप= निश्चय से, द्रव्यदृष्टि से देखें तब आत्मा एकरूप ही है, किन्तु गुन-परजाइ-भेद-भावसौं बहुत हैं= गुण-पर्यायों के भेद की अपेक्षा से अनेकरूप है, असंख्य-परदेससंजुगत सत्ता-परमान= (प्रदेश अपेक्षा) असंख्य-प्रदेशों से सहित, (क्षेत्र अपेक्षा) सत्ता-प्रमाण है, ग्यानकी प्रभासौं लोकालोक-मानयुत है= ज्ञान की प्रभा (जानन-स्वभाव की सामर्थ्य) से लोकालोक-प्रमाण-सहित है, परजै-तरंगनिके अंग छिनभंगुर है= पर्याय की तरंगों/परिवर्तनों की दृष्टि से जीव क्षणभंगुर है, चेतना-सकतिसौं अखंडित-अचुत है= चेतनत्व-शक्ति से अखंडित, स्वभाव से अच्युत/अविचल है, सो है जीव जगत्-विनायक जगतसार= सो जीव जगत् में प्रथम-पूजनीय है, जगत्/लोक में सारभूत है, जाकी मौज-महिमा अपार-अदभुत है= जिसके आनन्द/सुख की महिमा अपार और अद्भुत है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने विविध-अपेक्षाओं से जीव के स्वरूप का वर्णन करते हुए आत्मतत्त्व को संपूर्ण-जगत् में एकमात्र सारभूत-तत्त्व बताकर महिमा-मंडित किया है। निश्चय या द्रव्यदृष्टि से कहें तो जीवात्मा अनंत-ज्ञानादि-गुणों का पिण्ड, अजर-अमर-शाश्वत, सर्वत्र एकरूप से विद्यमान है; लेकिन गुणों के भेद और पर्याय के भेद की अपेक्षा अनेकरूप है। अर्थात् गुणभेद और पर्यायभेद के भेद-विकल्पना (ज्ञान-दर्शनादि गुणभेद एवं अर्थ-व्यंजनादि पर्यायभेद की अपेक्षा) से अनेकरूप कहा गया है। आत्मप्रदेशों की संख्या-अपेक्षा जीव असंख्यात-प्रदेशी है, और क्षेत्र की अपेक्षा सत्ता-प्रमाण है, ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव की अपेक्षा लोकालोक-प्रमाण है, अर्थात् संपूर्ण लोक और अलोक को एकसमय में जानने की सामर्थ्य रखता है। (यद्यपि आत्मा की ज्ञान-पर्याय एकसमय में ऐसे अनंत-लोकालोकों को भी जानने की सामर्थ्य रखती है, किन्तु लोकालोक सीमित अर्थात् एक लोकाकाश में संस्थित लोक एवं अलोकाकाशरूप अलोक- इतना ही लोकालोक होने से ज्ञान को लोकालोक-परिमित कहा गया है।) पर्याय की अपेक्षा क्षणभंगुर है, ठीक उसीप्रकार जैसे समुद्र में उठनेवाली लहरें क्षण-क्षण में समुद्र में विलय को प्राप्त होती हैं; वैसे ही जीव एक पर्याय के बाद दूसरी पर्याय, दूसरी के तीसरी पर्याय- इसप्रकार अनंत-पर्यायों में परिणमित होने के कारण क्षणभंगुर/परिवर्तनशील है। इतने रूपों की विविधता होने पर भी चैतन्य-शक्ति की अपेक्षा जीव इन समस्त भेदों/खण्डों से रहित अखंडित और अपने ज्ञाता-दृष्टा-स्वभाव से अचल है, अर्थात् किसी भी पर्याय में रहे, जीव ने अपना जानन-स्वभाव आज तक कभी नहीं छोड़ा। ऐसा वह परमोत्कृष्ट-जीवात्मा संपूर्ण-जगत् का शिरोमणि है, पूजनीय है, सारभूत है; क्योंकि कषायों की ताप से संतप्त-जीवों को शीतलता प्रदान करने के लिये इस असार-संसार में एकमात्र प्रयोजनभूत-तत्त्व आत्मा ही है, अन्य कोई नहीं। जिसके आनंद/ सुख की महिमा अपरम्पार और अद्भुत है, क्योंकि जिस सुख की संसार में कोई उपमा नहीं ऐसे अनुपमअतीन्द्रिय-सुख का धनी एकमात्र मैं शुद्धात्मा हूँ।

(सवैया इकतीसा)

विभाव-सकति-परनतिसौं विकल-दीसै, सुद्ध-चेतना-विचारतैं सहज-संत है।
करम-संजोगसौं कहावै गति-जोनि-वासी, निहचै-सुरूप सदा मुकत-महंत है।।
ज्ञायक-सुभाऊ धरै लोकालोक-परगासी, सत्ता-परवांन सत्ता-परगासवंत है।
सो है जीव जानत-जहान कौतुक-महान्, जाकी कीरति-कहान अनादि-अनंत है।। 50।।

कषाय-कलिरेकतः स्खलति शान्तिरस्त्येकतो, भवोपहतिरेकतः स्पृशति मुक्तिरप्येकतः।

जगत्त्रितयमेकतः स्फुरति चिच्चकास्त्येकतः, स्वभाव-महिमात्मनो विजयतेऽद््भुतादद््भुत:।। 11।। शब्दार्थ :- विभाव-सकति-परनतिसौं विकल-दीसै= विभाव-शक्ति की परिणति से (जीव) दु:खी दिखता है, सुद्ध-चेतना-विचारतैं सहज-संत है= शुद्ध-चेतना का विचार करें, तो सहज-शांतरूप है, करम-संजोगसौं कहावै गति-जोनि-वासी= कर्म के संयोग से गतियों और योनियों का निवासी कहलाता है, निहचै-सुरूप सदा मुकतमहंत है= निश्चय-स्वरूप से सदा मुक्त-महंत अर्थात् मोक्ष का परमेश्वर है, ज्ञायक-सुभाऊ धरै लोकालोकपरगासी= ज्ञायक-स्वभाव को धारणकर लोकालोक को प्रकाशित करनेवाला है, सत्ता-परवांन सत्ता-परगासवंत है= सत्ता-प्रमाण है और सत्ता को प्रकाशित करनेवाला है सो है जीव जानत जहान कौतुक महान= ऐसा वह जीवात्मा जगत् को जानता है, यह महान्/बड़े आश्चर्य की बात है, जाकी कीरति कहान अनादि अनंत है= जिसकी कीर्ति कहाँ नहीं है अर्थात् सर्वत्र छाई हुई है, अादि-अंत से रहित है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जीवराज-शुद्धात्मा की विभिन्न-अवस्थाओं का वर्णन करते हुए

उसकी महिमा को जग से निराला सिद्ध किया है।
अनंतसुख का धनी आत्मा वर्तमान में विभावरूप-परिणमन के कारण दु:खी दिखाई देता है।

कहने का अभिप्राय है कि यदि जीव अपने ज्ञाता-दृष्टा स्वभावरूप परिणमन करे, तो जगत् का कोई भी पदार्थ उसे दु:खी नहीं कर सकता; लेकिन जीव स्वयं ही अपने स्वभाव को भूलकर पर की ओर आकर्षित होता है, और फिर स्वयं ही मोह-राग-द्वेष आदि के परिणामकर दु:खी होता है। यदि जीव उसी-क्षण अपने शुद्ध-चैतन्य स्वभाव का लक्ष्य करे, तो सहज-शांति का अनुभव करता है, क्योंकि स्वभाव से जीव त्रिकाल शांत-स्वरूपी ही है। अनादिकाल से कर्म का संयोग और तदनुरूप परिणमनकर पुन: कर्मों का बंधकर, यह जीवात्मा उसके फलस्वरूप चार-गति चौरासी-लाख योनियों में जन्म-मरण करता है- इस अपेक्षा से कहने में आता है कि जीव मनुष्य है, नारकी है, देव है या तिर्यंच है, जिस गति और योनि में जन्म लेता है, उसी गति व योनिवाला कहलाने लगता है; जबकि निश्चय से तो जीव प्रतिसमय कर्ममुक्त ही है, अर्थात् स्वभाव की दृष्टि से तो जीव सदाकाल बंध-मोक्ष से रहित परमात्मा ही है। जगत् के सभी द्रव्यों में एक जीवात्मा ही जानन-स्वभावी होने से तीनों लोकों को प्रकाशित करनेवाला है। क्षेत्र-अपेक्षा अपने आत्म-प्रदेशों की सत्ता में सीमित रहकर भी लोकालोक की महासत्ता को प्रकाशित करता है। इसलिये यह सर्वोत्कृष्ट-शुद्धात्मा महान्-आश्चर्य का विषय प्रतीत होता है। इसकी कीर्ति कहाँ नहीं फैली है? अर्थात् संपूर्ण-विश्व में व्याप्त है, और इतना ही नहीं अनादिकाल से ज्ञायक भगवान्-आत्मा की ऐसी अनुपम महिमा चली आ रही है और अनंतकाल तक ऐसे ही चलती रहेगी।

(सवैया इकतीसा)

पंच-परकार-ग्यानावरनकौ नास करि, प्रगटी प्रसिद्धि जग-माँहि जगमगी है।
ज्ञायक-प्रभामैं नाना-ज्ञेयकी अवस्था धरि, अनेक भई पै एकता के रस-पगी है।।
याहीं-भाँति रहेगी अनंतकाल-परजंत, अनंत-सकति फोरि अनंतसौं लगी है।
नरदेह-देवलमैं केवल-सरूप सुद्ध, ऐसी ग्यानज्योति की सिखा समाधि जगी है।। 51।।

शब्दार्थ :- पंच-परकार ग्यानावरनकौ नास करि= पाँच-प्रकार के ज्ञानावरणी-कर्म को नष्टकर, प्रगटी

जयति सहजतेजःपुञ्जमज्जत्-त्रिलोकी-स्खलदखिल-विकल्पोऽप्येक एव स्वरूपः।
स्वरस-विसर-पूर्णाच्छिÂन्न-तत्त्वोपलम्भः, प्रसभ-नियमितार्चिश्चिच्चमत्कार एषः।। 12।।

साध्य-साधक -द्वार प्रसिद्धि जग-मांहि जगमगी है= (जो कैवल्य-ज्योति) प्रगट हुई है, जिसकी प्रसिद्धि और चमक संपूर्ण लोक में व्याप्त है, ज्ञायक-प्रभामैं नाना-ज्ञेयकी अवस्था धरि= (वह) ज्ञायक की चमक विविधप्रकार के ज्ञेयों की अवस्थाओं को धारणकर/जानती हुई, अनेक भई पै एकता के रस पगी है= अनेकरूप होते हुए भी एकता के रस में डूबी हुई है, याहीं भाँति रहेगी अनंतकाल-परजंत= यह ज्योति इसीप्रकार अनंतकाल तक रहेगी, अनंत-सकति फोरि अनंतसौं लगी है= अनंतवीर्य को स्फुरितकर अंतरहित अक्षयपद को वरण करेगी, नरदेह-देवलमैं केवलसरूप सुद्ध= मनुष्य-देहरूपी मंदिर में केवलज्ञानरूपी शुद्ध, ऐसी ग्यानज्योति की सिखा समाधि जगी है= ऐसी ज्ञानज्योति की शिखा/लौरूपी समाधि/अविचल-अात्मानुभूति प्रकट हुई है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने केवलज्ञान-स्वरूप ज्ञायक-ज्योति की महिमा को वर्णित किया है, साथ ही स्पष्ट किया कि यह ज्ञान-ज्योति अनंतकाल तक ऐसे ही प्रज्वलित रहेगी। आगम के अनुसार ज्ञान के पाँच-भेद हैं, मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान। अनंत-ज्ञान के धारी शुद्धात्म-तत्त्व में ये पाँचों ज्ञानों की शक्ति समाहित है। लेकिन अनादिकाल से ज्ञान पर आवरण (जिसे हम ज्ञानावरणी के नाम से जानते हैं) पड़ा होने के कारण इनकी प्रगटता प्रत्यक्ष-दृष्टिगोचर नहीं होती। लेकिन जैसे कमल का फूल रात्रि में बंद हो जाता है, और सुबह जैसे-जैसे सूर्य की किरण पड़ती है, उसकी कलियाँ स्वत: ही खिलने लगती हैं; ठीक उसीप्रकार जब जीव स्व-पर का भेदज्ञान कर निज-आत्म-तत्त्व का श्रद्धान, ज्ञान और उसी में रमणता करता है; तो अनादि से पड़ा ज्ञानावरणी-कर्म का अावरण क्रमशः हटने लगता है। और जब पाँचों प्रकार का ज्ञानावरण हटता है, तो केवलज्ञानरूपी-ज्योति प्रगट होती है; जिसके प्रकाश में संपूर्ण-लोकालोक जगमगा उठता है, अर्थात् उस निर्मल-ज्ञान में तीनों लोकों की प्रसिद्धि होती है। यद्यपि वह ज्ञान-ज्योति संपूर्ण-लोक के विविध-प्रकार के ज्ञेयों की अवस्था को धारणकर अनेकरूप होती है; लेकिन फिर भी वह एकमात्र वीतरागता के रस में डूबी हुई होती है, अर्थात् ज्ञानज्योति में संपूर्ण-लोकालोक झलकने पर भी केवली अपने ज्ञायक भगवान्-आत्मा में ही लीन रहते हैं। हे आत्मन्! अब यह ज्ञान-ज्योति इसीप्रकार अनंतकाल तक प्रज्वलित रहेगी। और अनंतवीर्य को स्फुरितकर अंत-रहित अक्षयपद या सिद्ध-पद को प्राप्त करेगी। वैसे तो यह मनुष्य-देह मलिनता को प्राप्त है; परन्तु केवली भगवान् के इस मनुष्य-देहरूपी देवालय में ही केवलज्ञानरूपी शुद्ध-ज्ञान-ज्योति की लौरूप समाधि अर्थात् अविचल-आत्मानुभूति प्रकट हुई है।

(सवैया इकतीसा)

अच्छर-अरथमैं मगन रहै सदाकाल, महासुख-दैवा जैसी सेवा काम-गविकी।
अमल-अबाधित-अलख-गुन गावना है, पावना-परम सुद्ध-भावना है भविकी।।
मिथ्यात-तिमिर-अपहारा वर्धमान-धारा, जैसी उभै-जामलौं किरण दीपैं रवि की।
ऐसी है अमृतचंद-कला त्रिधारूप धरै, अनुभौ-दसा गरंथ टीका-बुद्धि कविकी।। 52।।

(दोहा)

नाम साध्य-साधक कह्यौ, द्वार-द्वादशम ठीक।
समयसार-नाटक सकल, पूरन भयौ सटीक।। 53।।

अविचलित-चिदात्मन्यात्मनात्मानमात्म-न्यनवरत-निमग्नं धारयद् ध्वस्त-मोहम्।
उदितममृतचन्द्र-ज्योतिरेतत्समन्ता-ज्ज्वलतु विमलपूर्णं निःसपत्न-स्वभावम्।। 13।।

शब्दार्थ :- अच्छर-अरथमैं मगन रहै सदाकाल= जो सदाकाल अक्षरशुद्धि और अर्थशुद्धि में मगन रहते हैं, महासुख-दैवा जैसी सेवा काम-गविकी= जिनकी सेवा कामधेनु के समान महासुख देनेवाली है, अमलअबाधित-अलख-गुन गावना है= (जिसमें) निर्मल, बाधा-रहित, आत्मा के गुणों का गान है, पावना-परम सुद्ध-भावना है भविकी= जो परम-पवित्र है, भव्यजीवों की शुद्ध-भावनारूप है, मिथ्यात-तिमिर-अपहारा वर्धमान-धारा= मिथ्यात्वरूपी-अंधकार को हरनेवाली, धाराप्रवाह-रूप से वृद्धिंगत, जैसी उभै-जामलौं किरण दीपैं रवि की= जैसे दोपहर के समय सूर्य की किरणें चमकतीं हैं, ऐसी है अमृतचंद-कला त्रिधारूप धरै= ऐसी ( ‘आचार्य अमृतचंद्र सूरि’ की) अमृतमयी ‘चंद्र-कला’ है, जो तीनप्रकार के रूप धारण किये हुये है, अनुभौदसा गरंथ-टीका बुद्धि-कविकी= अनुभव की दशारूप, ग्रंथ की टीकारूप, कवित्व की प्रतिभारूप।। 52।। नाम साध्य-साधक कह्यौ द्वार-द्वादसम ठीक= ‘साध्य-साधक’ नामक बारहवाँ-द्वार भलीभाँति कहा, समयसार-नाटक सकल पूरन भयौ सटीक= सम्पूर्ण समयसार-नाटक सटीक/टीकासहित पूरा हुआ।। 53।। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘आचार्य अमृतचंद्र देव’ की काव्य-क्षमता को बहुत ही सुंदरता से उदाहरण-सहित वर्णित किया है। अाचार्य भगवन् द्वारा रचित् सभी कृतियाँ भावप्रधान और प्रयोजनभूत हैं। जैसे कामधेनु की सेवा को सकल-सुखदायकत्व का प्रतीक माना जाता है, ठीक उसीप्रकार आचार्यदेव-रचित कृतियों की सेवा अर्थात् भावपूर्वक इनका चिंतन-मनन और अनुसरण करने पर जीव को सच्चे अतीन्द्रिय-सुख की प्राप्ति होती है। क्योंकि इनमें मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों की मलिनता से रहित निर्मल, इन्द्रियजन्य समस्त-बाधाओं से रहित निर्बाध-शुद्धात्मा के गुणों का वर्णन किया गया है, जो भव्यजीवों के लिये परम-पवित्र भाने योग्य/चिंतन करने योग्य शुद्ध-भावनारूप है। जो मिथ्यात्वरूपी घोर-अंधकार को दूर करने के लिये निरन्तर-उन्नतिशील है; ठीक उसीप्रकार जैसे सूर्य की किरण ज्यों-ज्यों उदित होती हैं, वैसे-वैसे अंधकार छँटने लगता है, और दोपहर के समय जब सूर्य का प्रकाश अपनी पूर्णता पर होता है; तब सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश होता है। ऐसी है ‘अमृतचंद्र देव’ की कला, जो तीनरूपों में परिलक्षित होती है। ‘एक-रूप’ तो उनकी आत्मानुभति ू की निर्मलदशा है, जो उनके शब्दों में भी अमृत के स्रोत की तरह प्रवाहशील है। ‘दूसरा-रूप’ समयसार जैसे सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक-ग्रन्थ की इतनी मार्मिक-टीका के रूप में हमारे सामने आया है। और ‘तीसरा-रूप’ ‘आचार्य अमृतचंद्र सूरि’ की अद्वितीय काव्य-प्रतिभा का रूप जिसे कविवर बनारसीदास जी ने विशेषरूप से उल्लिखित किया है। जिस काव्य-प्रतिभा के परिणामस्वरूप ‘समयसार जी’ की टीका में उन्होंने अमृतमय-कलशों की रचना की, जिन्हें परवर्ती ‘पांडे राजमल्ल जी’ जैसे विद्वानों ने स्वतंत्र-ग्रन्थ के रूप में बहुमानित करके उस पर बालबोधिनी-टीका लिखी; उन्हीं के आधार पर यह ‘नाटक-समयसार’ नामक ग्रन्थ लिखा जा सका। इसीलिये तीसरे रूप में उन्होंने ‘आचार्य अमृतचंद्र सूरि जी’ की काव्य-प्रतिभा को वंदन किया है, जोकि ‘नाटक-समयसार’ की जननी बनी है। अंत में कविवर कहते हैं यहाँ तक बारहवाँ ‘साध्य-साधक द्वार’ भलीभाँति विवेचित किया। इसी के साथ ‘नाटक-समयसार’ ग्रंथ विशेष-विवेचन-सहित आदर्शरूप से पूर्ण हुआ।

(दोहा)

अब कवि निज-पूरब-दसा, कहैं आपसौं-आप।
सहज-हरख मनमैं धरैं, करै न पश्चाताप।। 54।।

साध्य-साधक -द्वार

(सवैया इकतीसा)

जो मैं आपा छाँड़ि दीनौ पररूप गहि लीनौ, कीनौ न बसेरौ तहाँ, जहाँ मेरौ थल है।
भोगनिकौ भोगी ह्वै करमकौ करता भयौ, हिरदै हमारे राग-द्वेष-मोह-मल है।।
ऐसी विपरीत-चाल भई जो अतीतकाल, सो तो मेरे क्रियाकी ममता हीकौ फल है।
ग्यान-दृष्टि भासी, भयौ क्रियासौं उदासी वह, मिथ्या मोह-निद्रामैं सुपन-कोसौ छल है।। 55।।

शब्दार्थ :- अब कवि निज-पूरब-दसा कहैं आपसौं आप= अब कविवर अपनी पूर्व-दशा अपने आपसे कहते हैं, सहज-हरख मन मैं धरैं करै न पश्चाताप= किन्तु किसी भी प्रकार का पश्चात्ताप न करके अपने चित्त में सहज ही हर्ष रखते हुए।। 54।। जो मैं आपा छाँड़ि दीनौ= जब मैं ने अपने स्वरूप को छोड़ दिया था, पररूप गहि लीनौ= पररूप को ही ग्रहण किया था, कीनौ न बसेरौ तहाँ जहाँ मेरौ थल है= जहां मेरा स्थान था, वहाँ मैंने बसेरा/निवास नहीं किया, भोगनिकौ भोगी ह्वै= भोगों का भोक्ता होकर, करमकौ करता भयौ= कर्मों का कर्ता हुआ, हिरदै हमारे राग-द्वेष-मोह-मल है= हमारे हृदय में राग-द्वेष-मोह का मल/गंदगी भरी थी, ऐसी विपरीत-चाल भई जो अतीतकाल= भूतकाल में ऐसा विपरीत-प्रवर्तन किया, सो तो मेरे क्रियाकी ममता हीकौ फल है= सो ये मेरे द्वारा किये (स्वभाव-विपरीत) कार्यों और (परपदार्थों के प्रति) ममत्व का ही परिणाम है, ग्यान-दृष्टि भासी= अब मुझे ज्ञान-दृष्टि प्रकट हुई है, भयौ क्रियासौं उदासी= सो अब मैं जगत् की क्रिया से उदास हुआ हूँ, वह मिथ्या मोहनिद्रामैं= वह झूठी मोह की निद्रा में, सुपनकोसौ छल है= स्वप्न के समान छल है।। 55।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि अपने जीवन की कड़वी-सच्चाई को दृढ़ता से स्वीकार कर ज्यों का त्यों वर्णित किया है। सामान्यत: स्वयं की आलोचना करना, वह भी सभी के समक्ष करना आसान-काम नहीं है, लेकिन कविवर बनारसीदास जी ने इस संबंध में अपने साहस का परिचय निर्भीकता से दिया। वे स्वयं लिखते हैं कि पूर्वकाल में मैंने अपने आत्मस्वरूप को कभी ग्रहण नहीं किया अर्थात् सम्यक्-श्रद्धान नहीं किया, अन्य मिथ्यादृष्टि-जीवों की तरह मैंने भी देहादिक पर-पदार्थों और परसंयोगों को ही अपना माना, प्रतिसमय उनमें ही आसक्त रहा। जो निजात्मा मेरा अपना और शाश्वतठिकाना था, वहाँ तो कभी मैंने निवास किया ही नहीं अर्थात् पर-घर में ही आसरा खोजता रहा। सुख की लालसा में पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों में ही आसक्त रहा, एक-क्षण के लिये भी कभी विरक्ति का भाव नहीं आया। स्वतंत्ररूप से परिणमित वस्तु-व्यवस्था का प्रतिक्षण कर्त्ता बना, अर्थात् कर्तृत्व-बुद्धि का बोझा सिर पर लिये घूमता रहा, मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों की गंदगी से ही भरा रहा। कवि ने स्वयं स्वीकार किया कि मेरे साथ अतीतकाल यानि पूर्व में जो कुछ भी बुरा हुआ, वह सब मेरे ही द्वारा की गयीं पाप-क्रियाओं और देहादिक पर-पदार्थों में ममत्व-बुद्धि का ही परिणाम था। लेकिन आज में हर्षपूर्वक कहता हूँ कि अब मेरे हृदय में स्व और पर में भेदज्ञान करने की सम्यक्-ज्ञानकला जागृत हुई है, अब देहादिक-परपदार्थों एवं जड़ की क्रियाओं से सहज ही विरक्ति का भाव हुआ है। जैसे कोई स्वप्न में ऊँचे-ऊँचे ख्बाबों के महल बनाता है और अति-प्रसन्न होता है; लेकिन नींद खुलते ही वही व्यक्ति स्वयं को छला हुआ महसूस करता है। ठीक उसीप्रकार मिथ्यात्व की अवस्था में, मैं मोह की नींद सोता रहा और स्वप्नवत् स्वयं को छलता रहा। लेकिन अब मोह की निद्रा खुल गई है, और वस्तु का यथार्थ स्वरूप प्रत्यक्ष-दृष्टिगोचर हुआ है, सो अब छल की कोई गुज ं ाइश ही नहीं है। यस्माद् द्वैतमभूत्पुरा स्व-परयोर्भूतं यतोऽत्रान्तरं, राग-द्वेष-परिग्रहे सति यतो जातं क्रिया-कारकैः। भु®जाना च यतोऽनुभूतिरखिलं खिÂन्नं क्रियायाः फलं, तद्विज्ञान-घनौघ-मग्नमधुना कििचन्न किि®¨fत्किल।। 14।।

(दोहा)

अमृतचंद्र-मुनिराजकृत, पूरनभयौ गिरंथ।
समयसार-नाटक प्रगट, पंचम-गतिकौ पंथ।। 56।।

शब्दार्थ :- अमृतचंद्र-मुनिराजकृत पूरनभयौ गिरंथ= अमृतचंद्र मुनिराज द्वारा रचित ग्रंथ यहाँ पूर्ण हुआ, समयसार-नाटक प्रगट पंचम-गतिकौ पंथ= पंचम-गति का मार्ग प्रकट करनेवाला समयसार नाटक। विशेषार्थ :- इस छंद में कविवर बनारसी दास जी कहते हैं कि ‘आचार्य अमृतचंद्र मुिनराज’ द्वारा रचित पंचमगति अर्थात‍् सिद्ध गति को प्रकट करने वाला ‘समयसार नाटक’ नामक ग्रन्थ पूणर् हुआ। स्वशक्ति-संसूचित-वस्तुतत्त्वैर्व्याख्या कृतेयं समयस्य शब्दैः। स्वरूपगुप्तस्य न कििञ््चदस्ति कर्तव्यमेवामृतचन्द्रसूरेः ।। 15।। || इति समयसार कलशा: समाप्ता:|| गोस्वामी तुलसीदास जी के द्वारा कविवर बनारसीदास जी के आराध्य भगवान् पार्श्वनाथ की लिखित-स्तुति

पद-जलज श्री भगवान् जू के, बसत हैं उर-माँहि।
चहुँगति-विहंडन तरन-तारन, देव विघन विलाहिं।।

थकि धरनि-पति नहिं पार पावत, नर सु बपुरा कौन?

तिहि लसत करुणाजन-पयोधर भजहिं भविजन तौन।।
दुति-उदित त्रिभुवन-मध्य भूपन, जलधि ज्ञान-गंभीर।
जिहि माथ-ऊपर छत्र सोहत, दहन दोष अधीर।।
जिहि नाथ ‘पारस’ जुगल-पंकज, चित्त चरनन जास।
रिधि-सिद्धि कमला अजर-राजित, भजत ‘तुलसीदास’ ।।

यह उस समय के मनीषियों की पारस्परिक गुणग्राहिता थी, जो वैचारिक-परम्परा अपनी रखते हुये भी अपने से भिन्न-विचारधारावालों के प्रति सौहार्द एवं सहिष्णुता का परिचय देते हुये उनके आराध्यों के प्रति बहुमान दिखाते थे। जहाँ कविवर पं. बनारसीदास जी ने तुलसीदास जी के ‘रामचरितमानस’ के प्रत्युत्तर-स्वरूप ‘अध्यात्म-रामायण’ लिखकर दी, जिसमें भाव जिनाम्नाय के थे और पात्र ‘रामचरितमानस’ के थे। उसी के अनुरूप गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी बनारसीदास जी के आराध्य प्रभु पार्श्वनाथ की स्तुति इसरूप में लिखकर दी। इससे संकेतित होता है कि संभवतः गोस्वामी तुलसीदास जी कविवर बनारसीदास जी से सौहार्द-भेंट करने आगरा आये थे और वहीं उन्होंने पार्श्वनाथ प्रभु के दर्शन करते हुये यह स्तुति लिखी होगी। साध्य-साधक -द्वार

चतुर्दश गुणस्थानाधिकार (१३) | भाग १/२

(कविवर बनारसीदास जी का मौलिक-अवदान) चतुर्दश-गुणस्थानाधिकार-द्वार

(दोहा)

जिन-प्रतिमा जिन-सारिखी, नमै बनारसि ताहि।
जाकी भक्ति-प्रभावसौं, कीनौ ग्रंथ-निवाहि।। 1।।

शब्दार्थ :- जिन-प्रतिमा जिन-सारिखी= जिनेन्द्र भगवान् की प्रतिमा जिनेन्द्रदेव के समान है, नमै बनारसि ताहि= बनारसीदास उनको वंदन करते हैं, जाकी भक्ति-प्रभावसौं= जिनकी भक्ति के प्रभाव से, कीनौ ग्रंथनिवाहि= ‘नाटक समयसार’ ग्रंथ का निर्वाह हुआ। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जिनेन्द्र-देव की महिमा के साथ-साथ जिन-प्रतिमा की महिमा को भी वर्णित किया है। क्योंकि जिन-प्रतिमा भी साक्षात् समवसरण में विराजमान जिनेन्द्रदेव के समान ही होती है, इसीलिये जिन-मंदिर को ‘समवसरण’ के समान पवित्र माना गया है। ‘जिन-प्रतिमा’ या जिनेन्द्रदेव को भाव-सहित वंदन करते हुए कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि यह प्रतिदिन जिन-प्रतिमा की वंदना एवं भक्ति का ही सुफल है कि मैं निर्विघ्नरूप से इस ‘नाटक समयसार’ ग्रंथ को पूर्ण कर पाया हूँ। व्यवहार में ऐसा कथन न केवल संगत है, बल्कि लोगों को जिनदर्शन/वंदन की प्रेरणा के लिये आवश्यक भी है। कृतज्ञता-ज्ञापन है यह, जो विनीत एवं सभ्यव्यक्तियों का सदाचार माना जाता है। यह भक्त की भक्ति का सुन्दरतम-रूप है। यद्यपि कविवर ये भली-भाँति जानते हैं कि जिन-प्रतिमा तो दूर साक्षात् जिनेन्द्र-परमात्मा भी ऐसा करने में असमर्थ हैं, फिर भी भक्ति के आवेग में जीव को जिनेन्द्र-देव का बहुमान आता ही है। आगे भी इसीप्रकार जिनेन्द्रभक्ति का अतिसुंदर-रूप कवि ने वर्णित किया है।

(सवैया इकतीसा)

जाके मुख-दरससौं भगतके नैननिकौं, थिरता की बानि बढ़ै, चंचलता विनसी।
मुद्रा देखि, केवली की मुद्रा याद आवै जहाँ, जाके आगै इंद्र की विभूति दीसै तिन-सी।।
जाकौ जस-जंपत प्रकास जगै हिरदैमैं, सोइ सुद्धमति होइ हुती जु मलिन-सी।
कहत बनारसी सुमहिमा प्रगट जाकी, सोहै जिनकी छबि सुविद्यमान जिन-सी।। 2।।

शब्दार्थ :- जाके मुख-दरससौं भगतके नैननिकौं= जिनके मुख-दर्शन से भक्त के नेत्रों की, थिरता की बानि बढ़ै, चंचलता विनसी= स्थिरता बढ़ जाती है, (और) चंचलता विनष्ट होती है, मुद्रा देखि, केवली की मुद्रा याद आवै जहाँ= जिनमुद्रा को देखकर जहाँ केवली की मुद्रा याद आती है, जाके आगै इंद्र की विभूति दीसै तिन-सी= जिसके आगे इंद्र का वैभव भी तिनके के समान दिखता है, जाकौ जस-जंपत प्रकास जगै हिरदैम=ैं जिनके गुणों का वर्णन करने से हृदय में प्रकाश जागृत होता है, सोइ सुद्धमति होइ हुती जु मलिनसी= (और) जो बुद्धि मलिन थी, वह शुद्ध हो जाती है, कहत बनारसी सुमहिमा प्रगट जाकी= बनारसीदास जी कहते हैं जिनकी महिमा प्रत्यक्ष-प्रगट है, सोहै जिनकी छबि सुविद्यमान जिन-सी= जिनकी छवि साक्षात् जिनेन्द्रदेव के समान शोभायमान है। विशेषार्थ :- कविवर कहते हैं ‘‘हे आत्मन्! जिनेन्द्र-देव की प्रतिमा को देखते ही भक्त के नेत्रों की चंचलता दूर हो जाती है, और नेत्र तथा चित्त की स्थिरता बढ़ जाती है।’’ कहने का अभिप्राय यही है कि जिन-प्रतिमा का रूप इतना मनोहारी होता है कि भक्त सब सुध-बुध खोकर टकटकी लगाकर देखता ही रह जाता है। इतना ही नहीं मंदिर जी में विराजमान जिन-मुद्रा को देखकर समवसरण में विराजित साक्षात् केवली-परमात्मा की मुद्रा का स्मरण होता है। जिनके दर्शन के सामने मनुष्य का वैभव तो दूर, इन्द्र का बहुमूल्य और अपार-वैभव भी तिनके के समान तुच्छ प्रतीत होता है- यह है भक्ति की पराकाष्ठा। जिनेन्द्र-देव के गुणों का वर्णन करने से मोह का अंधकार दूर होता है, और हृदय ज्ञान के प्रकाश से जगमगा उठता है। जो बुद्धि अभी तक मलिन थी अर्थात् पर के प्रति आकर्षित थी, मोह-राग-द्वेष आदि विकारी-भावों में लिप्त थी, वही बुद्धि जिन-भक्ति से अर्थात् जिनेन्द्र देव के गुणानुवाद से निर्मल और स्वयं की ओर आकर्षित होती है। बनारसीदास जी कहते हैं कि जिन-प्रतिमा की ऐसी महिमा प्रत्यक्ष प्रगट है, जिनकी सुंदर-छवि सुविद्यमान अर्थात् समवसरण में विराजित तीर्थंकर-परमात्मा के समान शोभायमान है। जो जीव भावपूर्वक एकबार जिन-प्रतिमा के दर्शन करता है, वह स्वयं ही कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है।

(सवैया इकतीसा)

जाके उर-अंतर सुद्रिष्टि की लहर लसी, विनसी-मिथ्यात्व मोहनिद्राकी ममारखी।
सैली जिनशासन की फैली जाके घट, भयौ गरबकौ त्यागी षट-दरब कौ पारखी।।
आगमकै अच्छर परे हैं जाके श्रवनमैं, हिरदै-भंडार मैं समानी वानी-आरखी।
कहत बनारसि अलप-भवथिति जाकी, सोई जिन-प्रतिमा प्रवांनै जिन-सारिखी।। 3।।

शब्दार्थ :- जाके उर-अंतर सुद्रष्टि की लहर लसी= जिसके अंतरंग में सच्ची-दृष्टि की लहर जागृत है, विनसी मिथ्यात-मोहनिद्राकी ममारखी= मिथ्यात्व और मोह-जनित निद्रा की मूर्च्छा नष्ट हो गई, सैली-जिनशासन की फैली जाके घट= जिसके हृदय में जिनशासन की पद्धति फैली हुई है, भयाै गरबकौ त्यागी षट-दरब कौ पारखी= (वह) अभिमान का त्यागी हुआ है, और छह-द्रव्यों का पारखी/जानकार है, आगमकै अच्छर परे हैं जाके श्रवनमैं= आगम के अक्षर जिसके कान में पड़े हैं, हिरदै-भंडार मैं समानी वानी-आरखी= आचार्यों/ मुनिराजों के वचन जिनके हृदय में समा गये हैं, कहत बनारसि अलप-भवथिति जाकी= बनारसीदास जी कहते हैं ‘‘जिसकी संसार की स्थिति बहुत कम-शेष है, सोई जिन-प्रतिमा प्रवांनै जिन-सारिखी= वे ही जिन-प्रतिमा को जिनेन्द्र-देव के समान मानते हैं।’’ विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन-जीवों की प्रशंसा की जो जिन-प्रतिमा को भी साक्षात् जिनेन्द्र के समान मानकर, उनकी भक्ति में अनुरक्त होकर उनके बताये मार्ग पर चलकर, अपने कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। धन्य हैं वे जीव, जिनके हृदय में सच्ची-दृष्टि जागृत हुई है, अर्थात् जिनके हृदय में भेदज्ञान का सूर्य प्रकाशित हुआ है, जिसके प्रकाश में स्व और पर का स्वरूप प्रत्यक्ष-दृष्टिगोचर हुआ है। उस सूर्य के सम्यक्-प्रकाश में मिथ्यात्व का घना-अंधकार और मोह-निद्रा की मूर्च्छा या खुमारी ठीक उसीप्रकार विलय को प्राप्त हुई, जैसे प्रात: सूर्य के निकलने पर रात्रि का घना-अंधकार और प्रमाद/नींद दोनों ही विलय को प्राप्त होते हैं। जिनके हृदय में जिनशासन की शैली का प्रसार है, अर्थात् जो जिनेन्द्र-परमात्मा के मार्ग का अनुसरण करते हैं, जो कुल, जाति, धन, बल, रूप, ज्ञान, प्रभुता, तप/ॠद्धि आदि आठ-मदों के त्यागी हैं; जीव, पुद््गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल छहों-द्रव्य के पारखी हैं अर्थात् छहों-द्रव्यों के वास्तविक-स्वरूप से भलीभाँति परिचित हैं। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार जिनके कानों में आगम के अक्षर सुनाई देते हैं, इसका अभिप्राय यह बिल्कुल नहीं है कि प्रतिदिन परम्परा से मात्र प्रवचन या शास्त्र सुनना; बल्कि सम्यक्-अभिप्राय यह है कि आगम का, स्वाध्याय के पाँचों अंगों का (वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश) का पालन करते हुए निरन्तर स्वाध्याय अर्थात् स्वयं के परिणामों का आंकलन करना, जिनके हृदय के कोष में आचार्यों के वचन समा गये हैं, अर्थात् जो जिनवचनों को सुनकर उन वचनों का अनुसरण भी करते हैं। कविवर कहते हैं ‘‘उन जीवों की संसार की स्थिति अति-अल्प रह गई है, जिन्हें अपने स्वरूप का भान है, जो जिन-प्रतिमा को साक्षात् जिनेन्द्र-परमात्मा के समान मानते हैं, अनुभवते हैं, और मोक्षमार्ग में अग्रसर होते हैं।’’

(चौपाई)

जिन-प्रतिमा जन-दोष निकंदै, सीस-नमाइ बनारसि बंदैं।
फिरि मन-माँहि विचारै ऐसा, नाटक-गरंथ परमपद जैसा।। 4।।

परम-तत्त परचै इस-माँहि, गुनथानक की रचना नांहि।
यामैं गुनथानक-रस आवै, तो गरंथ अति-शोभा पावै।। 5।।

(दोहा)

इह विचारि संक्षेपसौं, गुनथानक-रस चोज।
वरनन करै बनारसी, कारन सिवपथ-खोज।। 6।।

शब्दार्थ :- जिन-प्रतिमा जन-दोष निकंदै= जिन-प्रतिमा लोगों के दोषों को नष्ट करती है, सीस-नमाइ बनारसि बंद=ैं बनारसीदास सिर झुकाकर वंदन करते हैं, फिरि मनमाँहि विचारै एेसा= फिर मन में ऐसा विचार करते हैं, नाटक-गरंथ परमपद जैसा= ये ‘नाटक-समयसार’ ग्रंथ परमपद के समान है।। 4।। परम-तत्त परचै इस-माँहि= इसमें परम-तत्त्व यानि शुद्धात्मा का परिचय तो है, गुनथानक की रचना नांहि= लेकिन इसमें गुणस्थानों की चर्चा नहीं है, यामैं गुनथानक-रस आवै= इसमें गुणस्थान का वर्णन भी आ जाये, तो गरंथ अति-शोभा पावै= तो यह ग्रंथ और भी अधिक शोभा/गरिमा को प्राप्त हो।। 5।। इह विचारि संक्षेपसौं गुनथानक-रस चोज= ऐसा विचारकर गुणस्थानों का सार-संक्षेप, वरनन करै बनारसी कारन सिवपथ-खोज= (जोकि) मोक्षमार्ग की खोज के कारणभूत हैं, मैं बनारसीदास उनका वर्णन करता हू।ँ । 6।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कविवर बनारसीदास जी ने आत्मा के वास्तविक-स्वरूप के प्रतिपादक इस आध्यात्मिक-ग्रंथ ‘नाटक समयसार’ की परिपूर्णता में गुणस्थान-विवेचनरूप स्पष्ट-झलकती आवश्यकता को महसूस किया और उनका स्वरूप विवेचित करने की स्वयं से प्रतिज्ञा की। पिछले-छंदों में जिन-प्रतिमा के स्वरूप और महत्त्व का विवेचन किया, उसी क्रम में कविवर आगे कहते हैं ‘‘जिन-प्रतिमा का भावों से, विनयपूर्वक दर्शन करने से जीवों के मिथ्यात्व और मोहजनित सभी दोष दूर हो जाते हैं। इसीलिये बनारसीदास जी जिन-प्रतिमा को सिर झुकाकर वंदन करते हुए मन में विचार करते हैं कि ये ‘नाटक-समयसार’ ग्रंथ परमपद के समान है, अर्थात् ‘परमपद’ में स्थित कराने में निमित्तभूत है। अभिप्राय यह है कि इस ग्रंथ का भावपूर्वक पठन-पाठन, चिंतन-मनन करने से ‘परमपद’ अर्थात् ‘सिद्ध-पद’ की प्राप्ति होती है। लेकिन इस ग्रंथ में ‘परमतत्त्व’ या निज-शुद्धात्मा का परिचय तो प्राप्त होता है; परन्तु गुणस्थान का रस नहीं है। अर्थात् परमपद को प्राप्त करने के लिए जीव जब पुरुषार्थ करता है, उस समय जीव के परिणामों में होने वाले उतार-चढ़ाव, जिन्हें आगम में ‘गुणस्थान’ के रूप में विवेचित किया गया है, उनका वर्णन इस ग्रंथ में नहीं है। यदि उन गुणस्थानों का वर्णन भी इस ग्रंथ में हो, तो यह ग्रंथ और भी अधिक प्रयोजनभूत हो सकता है,’’- ऐसा विचार करके कवि ने निर्णय लिया कि अब मैं मोक्षमार्ग को खोजने में कारणभूत गुणस्थानों का संक्षेप में वर्णन करूँगा।

(दोहा)

नियत-एक विवहारसौं, जीव चतुर्दश-भेद।
रंग-जोग बहुविधि भयौ, ज्यों पट सहज-सुफेद।। 7।।

शब्दार्थ :- नियत-एक, विवहारसौं जीव चतुर्दश-भेद= निश्चय से एक, (और) व्यवहार से जीव-पदार्थ चौदहप्रकार का है, रंग-जोग बहुविधि भयौ ज्यौं पट सहज-सुफेद= जैसे सफेद-वस्त्र रंग के संयोग से सहज ही बहुतप्रकार का होता है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने स्पष्ट किया है कि इस ग्रंथ में गुणस्थान-विवेचन की आवश्यकता क्यों हुई? निश्चय-नय से देखें, तो जीव-पदार्थ एकप्रकार का ही है, परन्तु व्यवहार-नय से विचार करें, तो जीव के चौदह-भेद हैं। जैसे स्वभाव से तो वस्त्र सफेद ही होता है, परन्तु रंगों का संयोग होने पर विविध-प्रकार का हो जाता है; ठीक उसीप्रकार ज्ञान-स्वभाव की अपेक्षा जीव-पदार्थ सर्वत्र एक ही है; परन्तु मोह और योग के निमित्त से जीव के चौदह-भेद आगम में वर्णित है, जिनका वर्णन गुणस्थानविवेचन में आता है। इसलिये अब उनका वर्णन करता हूँ।

(सवैया इकतीसा)

प्रथम-मिथ्यात, दूजौ-सासादन, तीजौ-मिश्र, चतुर्थ-अव्रत, पंचमौ-विरत-रंच है।
छट्टौ-परमत्त-नाम, सातमो-अपरमत्त, आठमो-अपूरवकरन सुखसंच है।।
नौमौ-अनिवृत्तिभाव, दसमो-सूच्छम-लोभ, एकादशमो सु उपसांतमोह-बंच है।
द्वादशमो-खीनमोह, तेरहो-सजोगी-जिन, चौदहो-अजोगी जाकी-थिति अंक-पंच है।। 8।।

शब्दार्थ :- प्रथम-मिथ्यात= पहला ‘मिथ्यात्व’, दूजौ-सासादन= दूसरा ‘सासादन’, तीजौ-मिश्र= तीसरा ‘मिश्र’, चतुर्थ-अव्रत= चौथा ‘अविरत-सम्यक्त्व’, पंचमौ-विरत रंच है= पाँचवाँ किंचिंत्-व्रत/‘देश-विरत’, छट्टौपरमत्त नाम= छठवें का नाम ‘प्रमत्तसंयत’, सातमो-अपरमत्त= सातवाँ ‘अप्रमत्तसंयत’, आठमो-अपूरवकरन सुखसंच है= आठवाँ सुख का संचयरूप ‘अपूर्वकरण’, नौमौ-अनिवृत्तिभाव= नौवाँ ‘अनिवृत्तिकरण’, दसमोसूच्छम लोभ है= दसवाँ ‘सूक्ष्म-सांपराय’ है, एकादशमो सु उपसांतमोह-बंच है= ग्यारहवाँ ‘उपशांतमोह’ का धोखा है, द्वादशमो-खीनमोह= बारहवाँ ‘क्षीणमोह’, तेरहो-सजोगीजिन= तेरहवाँ ‘सयोगी-जिन’, चौदहोअजोगी= चौदहवाँ ‘अयोगी-जिन’ है, जाकी-थिति अंक-पंच है= जिसकी स्थिति/काल पाँच ह्रस्व-अक्षरप्रमाण है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने गुणस्थान के चौदह-भेदों के नामों का उल्लेख किया है, इनका विशेष-वर्णन क्रमशः आगे करेगें। गुणस्थान से तात्पर्य- ‘मोह’ और ‘योग’ के निमित्त से होनेवाली आत्मिक-परिणामों की क्रमिक- विकासरूपी अवस्थाओं को ‘गुणस्थान’ कहते हैं। इनके 14 भेद/प्रकार हैं। वे क्रमशः इसप्रकार है- मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरति-सम्यक्त्व, किंचित-व्रत/देशविरत (यानि एकदेश व्रतों का पालन होने से इस गुणस्थान को देशविरत कहते हैं), प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, अपूरक ्व रण (सुखसंचय-रूप), चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसांपराय (संज्वलन-संबध ं ी सूक्ष्म-लोभ शेष रहता है), उपशांतमोह (इस गुणस्थान के अंतिम-समय में मोह का उदय आ जाने से साधक-जीव का गुणस्थान गिर जाता है, इसीलिए कवि ने इसे ‘मोहबंच’ यानि ‘मोह का धोखा’ कहा है), क्षीणमोह, सयोगकेवली-जिन, अयोगकेवली-जिन- ये चौदह-गुणस्थानों के नाम आगम में वर्णित हैं। चौदहवें-गुणस्थान ‘अयोगकेवली-जिन’ का समय ‘अ इ उ ऋ लृ’- इन पाँच ह्रस्व-अक्षरों के उच्चारण-काल के बराबर होता है।

(दोहा)

बरनै सब-गुनथान के, नाम-चतुर्दस सार।
अब वरनौं मिथ्यात के, भेद पंच-परकार।। 9।।

(सवैया इकतीसा)

प्रथम ‘एकांत’ नाम मिथ्यात अभिग्रहीत, दूजौ ‘विपरीत अभिनिवेसिक’ गोत है।
तीजौ ‘विनै-मिथ्यात’ अनाभिग्रह नाम जाकौ, चौथौ 'संस’ै जहाँ चित्त भौंर-कौसौ पोत है।।
पाँचमौ ‘अग्यान’ अनाभोगिक-गहलरूप, जाकै उदै चेतन अचेत-सौ होत है।
एई पाँचौं-मिथ्यात जीवकौ जगमैं भ्रमावे, इनकौ विनास समकितकौ उदोत है।। 10।।

शब्दार्थ :- बरनै सब-गुनथान के नाम चतुर्दस सार= सभी गुणस्थानों के मुख्य चौदह नाम वर्णित किये, अब वरनौं मिथ्यात के भेद पंच-परकार= अब मिथ्यात्व के पाँच-प्रकार के भेदों का वर्णन करता हूँ।। 9।। प्रथम ‘एकांत’ नाम मिथ्यात अभिग्रहीत= पहला ‘एकांत’ नाम का मिथ्यात्व का अभिग्रहण किया है, दूजौ ‘विपरीत-अभिनिवेसिक’ गोत है= दूसरा ‘विपतीत-अभिनिवेश’ नाम (का मिथ्यात्व), तीजौ ‘विनैमिथ्यात’ अनाभिग्रह नाम जाकौ= तीसरा ‘विनय-मिथ्यात्व’ है, जिसका नाम अनाभिग्रह है, चौथौ ‘संसै’ जहाँ चित्त भौंरकौसौ पोत है= चौथा ‘संशय-मिथ्यात्व’ है, जिसमें चित्त भँवर में पड़े जहाज के समान डाँवाडोल रहता है, पाँचमौ-अग्यान अनाभोगिक गहलरूप= पाँचवाँ अनाभोगिक-अचेतनता रूप ‘अज्ञान-मिथ्यात्व’ है, जाकै उदै चेतन अचेत-सौ होत है= जिसका उदय होने पर चेतन अचेत-सा हो जाता है, एई पाँचौं मिथ्यात जीवकौ जगमैं भ्रमावे= ये ही पाँचों मिथ्यात्व जीव को संसार में परिभ्रमण कराते हैं, इनकौ विनास समकितकौ उदोत है= इनका विनाश ही सम्यग्दर्शन का प्रकाश है।। 10।। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने गुणस्थानों के नामों का उल्लेख किया था, अब उसी क्रम में पहले ‘मिथ्यात्व-गुणस्थान’ के अंतर्गत मिथ्यात्व के भेदों का वर्णन इस छंद में किया है। कविवर स्वयं कहते हैं ''सभी गुणस्थानों के मुख्य चौदह-नाम वर्णित किये। अब मैं ‘मिथ्यात्व’ के पाँच-भेदों का वर्णन करता हू।ँ ‘’ पहला ‘वस्तु-स्वरूप ऐसा ही है’- ऐसे एकांत-पक्ष का अभिग्रहण करनेवाला ‘एकांत-मिथ्यात्व’ है। विपरीत-अभिनिवेश अर्थात् विपरीत-अभिप्राय को ही ग्रहण करनेवाला दूसरा ‘विपरीत-मिथ्यात्व’ है। तीसरा ‘अनाभिग्रह’ अर्थात् कोई गुण-विशेष के आधार के बिना ही सभी को समानरूप से पूज्य माननेरूप ‘विनय-मिथ्यात्व’ है। चौथा-भेद ‘संशय-मिथ्यात्व’ अर्थात् अनिर्णय की स्थिति या कहें कभी इधर तो कभी उधर, जैसे जहाज लहरों के भँवर में फंसकर डगमगाता है, ठीक उसीप्रकार ‘संशयमिथ्यात्वी’ जीव किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँचता है, उसका चित्त हमेशा डाँवाडोल ही बना रहता है। पाँचवे ‘अज्ञान-मिथ्यात्व’ में जीव की स्थिति अचेत के समान होती है, अर्थात् जैसे मूर्च्छित-अवस्था में व्यक्ति को अपने हित-अहित का कोई विवेक नहीं रहता, ठीक उसीप्रकार अज्ञान-मिथ्यात्व के उदय में जीव जड़वत् गाफिल हो जाता है। इसप्रकार ये पाँचों-प्रकार का मिथ्यात्व अर्थात् वस्तु-स्वरूप से विपरीत-मान्यतायें ही जीव को चार-गति चौरासी-लाख योनियों में परिभ्रमण कराती हैं। जबतक ये विपरीत-मान्यतायें रहती हैं, तबतक जीव को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति नहीं होती, इसलिए कवि ने कहा कि इन पाँचों-मिथ्यात्व का विनाश ही सम्यग्दर्शन का उदोत है अर्थात् सम्यग्दर्शन की प्रगटता है।

(दोहा)

जो इकंत-नय-पच्छ गहि, छकै कहावै दच्छ।
सो इकंतवादी-पुरुष, मृषावंत परतच्छ।। 11।।

शब्दार्थ :- जो इकंत-नय-पच्छ गहि छकै कहावै दच्छ= जो नय के एकांत-पक्ष को ग्रहणकर संतुष्ट है, और स्वयं को पारखी/चतुर (आगम का जानकार) कहता है, सो इकंतवादी-पुरुष मृषावंत परतच्छ= वह ‘एकांतवादी-पुरुष’, प्रत्यक्ष झूठा है। विशेषार्थ :- प्रत्येक वस्तु अनेक-धर्मात्मक है, और फिर भी वस्तु को एकांततः एकधर्मरूप ही मानना ‘एकांत-मिथ्यात्व’ है। जैसे- वस्तु द्रव्य-स्वभाव की अपेक्षा ‘नित्य’ है और पर्याय-अपेक्षा ‘अनित्य’ भी है, लेकिन फिर भी वस्तु को या तो एकांत ‘नित्य’ ही मानना या एकांत ‘अनित्य’ ही मानना अर्थात् एक ही पक्ष को मानकर संतुष्ट होना ‘एकांत-मिथ्यात्व’ है। ‘एकांत-मिथ्यात्व’ का पोषक-जीव वस्तु के एकपक्ष को ग्रहण करके स्वयं को ‘तत्त्ववेत्ता’ या आगम के जानकर कहता है, कविवर कहते हैं ‘‘ऐसे जीव साक्षात्-मिथ्यादृष्टि ही हैं।’’

(दोहा)

ग्रंथ-उकत-पथ उथपि जो, थापै कुमत-स्वकीउ।
सुजस-हेतु गुरुता गहै, सो विपरीती जीउ।। 12।।

शब्दार्थ :- ग्रंथ-उकत-पथ उथपि जो= आगम में कहे हुये मार्ग का जो खंडन करके, थापै कुमत-स्वकीउ= अपने कपोल-कल्पित मान्यता की स्थापना करते हैं, सुजस-हेतु गुरुता गहै= यश-प्राप्ति के लिए बड़प्पन को धारण करते हैं, सो विपरीती जीउ= वे ‘विपरीत-मिथ्यादृष्टि’ जीव हैं। विशेषार्थ :- जो जीव आगम में वर्णित सम्यक्-मोक्षमार्ग का खंडन करके अपनी कपोल-कल्पित मिथ्या-मान्यताओं को ‘धर्म’ या ‘मोक्ष का मार्ग’ कहता है; अपनी मान-बढ़ाई, प्रशंसा के लिए पाखंडी या धर्माराधक का भेष धारण करता है। कविवर कहते हैं ‘‘वह जीव ‘विपरीत-मिथ्यात्व’ का पोषक है।’’ कहने का अभिप्राय यही है कि आत्मतत्त्व और जगत् का जो स्वरूप है, उसको वैसा न मानकर बिल्कुल-विपरीत मानना ‘विपरीत-मिथ्यात्व’ है। जैसे हिंसा में धर्म मानना, पुण्यभावों को उपादेय कहना, आत्मज्ञान-रहित देहादिक से किये जानेवाले तप से ही मोक्ष की सिद्धि करना, स्त्रीपयार्य से मुक्ति मानना इत्यादि।

(दोहा)

देव-कुदव

े , सुगरुु -कुगरुु , ठानै समान जु कोइ।
नमैं भगतिसौं सबनिकौं, विनै-मिथ्याती सोइ।। 13।।

शब्दार्थ :- देव-कुदेव सुगुरु-कुगुरु= देव और कुदेव, सुगुरु और कुगुरु को, ठानै समान जु कोइ= जो कोई इनको समान मानता है, नमैं भगतिसौं सबनिकौं= सभी को भक्तिभाव से नमन करता है, विनै-मिथ्याती सोइ= वह ‘विनय-मिथ्यादृष्टि’ जीव है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार विशेषार्थ :- वीतरागता के पोषक सभी सुदेवों को और रागी-द्वेषी, अस्त्र-शस्त्रधारी गृहीत-मिथ्यात्व के पोषक कुदेवों को एकसमान मानना; वीतरागता के अनुयायी नग्न-दिगम्बर भावलिंगी-मुनिराजों को और अनगिनत-वेषधारी तथाकथित-साधुओं को एकसमान-पूज्य मानना; अहिंसामयी वीतरागी-धर्म और हिंसामयी-कर्मकांड को एकसमान मानना, इन सभी को समान भक्तिभाव से नमन और अनुकरण करना ‘विनय-मिथ्यात्व’ है। मिथ्यात्व की यह कैसी पराकाष्ठा है कि यह जीव देव, गुरु, धर्म की विनय तो करता है, पर उनके स्वरूप को नहीं जानता। अधिकांश व्यक्तियों के मुख से सुना होगा कि ‘भगवान् तो सब एक ही हैं।’ पर कभी विचार नहीं किया कि रागी और वीतरागी दोनों एक कैसे हो सकते हैं? भाई यह कहकर हमने कब अनादि ‘विनय-मिथ्यात्व’ का पोषण कर लिया हमें पता भी नहीं चला।

(दोहा)

जो नाना-विकलप गहै, रहै हियै-हैरान।
थिर ह्वै तत्त्व न सद्दहै, सो जिय संशयवान।। 14।।

शब्दार्थ :- जो नाना-विकलप गहै= जो विविध-प्रकार के विकल्पों को ग्रहण करते हैं, रहै हियै-हैरान= जो व्याकुल-हृदय हैं, थिर ह्वै तत्त्व न सद्दहै= स्थिर-चित्त होकर तत्त्व का श्रद्धान नहीं करते, सो जिय संशयवान= वे जीव ‘संशय-मिथ्यादृष्टि’ हैं। विशेषार्थ :- इस मिथ्यात्व का पोषक जीव नाना-प्रकार के विकल्पों में उलझा रहता है, व्याकुल-हृदय, परेशानचित्त रहता है, शांत-चित्त से कभी तत्त्व का श्रद्धान नहीं करता, तत्त्व-श्रद्धान में हमेशा संशय ही बना रहता है, जैसे- ‘धर्म का लक्षण हिंसा है या अहिंसा, राग में धर्म है या वीतरागता में, मैं आत्मा हूँ या शरीर’ अर्थात् अनिर्णय की स्थिति ही रहती है। ऐसे जीवों को कवि ने ‘संशयित-मिथ्यादृष्टि’ जीव कहा है।

(दोहा)

जाकौ तन-दुख-दहलसौं, सुरत होत नहिं रंच।
गहलरूप वरतै सदा, सो अग्यान-तिरजंच।। 15।।

शब्दार्थ :- जाकौ तन-दुख-दहलसौं= जो शारीरिक- कष्ट से अति-दु:खी हैं, सुरत होत नहिं रंच= रंचमात्र भी सुध-बुध नहीं है, गहलरूप वरतै सदा= सदा मूर्च्छितरूप ही रहता है, सो अग्यान तिरजंच= वह ‘अज्ञानीमिथायादृष्टि’ जीव तिर्यंच के समान है। विशेषार्थ :- अज्ञान अर्थात् ज्ञान ही नहीं, वस्तु-स्वरूप से सर्वथा-अनभिज्ञ। जैसे शरीर में अत्यधिक- पीड़ा होने पर उपयोग प्रतिक्षण उस पीड़ा के वेदन में ही रमा रहता है, एक-क्षण के लिये भी उस पीड़ा से बाहर नहीं आता; यहाँ तक कि मूर्छित-सा ही रहता है। ठीक उसीप्रकार अज्ञानी-मिथ्यात्वी जीव भी हित-अहित के विवेक-विचार बिना ही कुछ भी करता है, जैसे हिंसक-कार्यों में धर्म होगा भी कि नहीं? कोई विचार नहीं करता है, जैसा जिसने कहा वैसा ही मान लिया। कविवर कहते हैं ऐसे जीव मनुष्य होकर भी तिर्यंच के समान ही है, जैसे तिर्यंच को कोई विवेक नहीं होता, वह कुछ भी खाता है, कुछ भी पीता है, कुछ भी करता है; ठीक उसीप्रकार अज्ञानी-मिथ्यादृष्टि-जीव भी बिना सोचे-समझे कुछ भी करता है। इसप्रकार मिथ्यात्व-गुणस्थान के अंतर्गत कवि ने बहुत ही सरलता से जीव की अनादिकालीन पाँच-भूलें, जोकि आगम में पाँच-प्रकार के मिथ्यात्व के नाम से वर्णित है, उनका वर्णन किया। ये पाँचों ही प्रकार का मिथ्यात्व जीव के लिये महा-दु:खदायी है। जबतक इस मिथ्यात्व-बैरी का अंश भी विद्यमान रहता है, तबतक जीव को सच्चे-सुख की प्राप्ति नहीं होती।

(दोहा)

पंच-भेद मिथ्यात के, कहै जिनागम-जोइ।
सादि-अनादि सरूप अब, कहूँ अवस्था-दोइ।। 16।।

जो मिथ्या-दल उपसमै, ग्रंथि-भेदि बुध होइ।
फिर आवै मिथ्यातमैं, सादि-मिथ्याती सोइ।। 17।।

जिनि ग्रंथी भेदी नहीं, ममता-मगन सदीव।
सो अनादि-मिथ्यामती, विकल बहिर्मुख-जीव।। 18।।

शब्दार्थ :- पंच-भेद मिथ्यात के= मिथ्यात्व के पाँच-भेद, कहै जिनागम जोइ= जिनागम के अनुसार कहे हैं, सादि-अनादि सरूप अब= अब (मिथ्यात्व की) सादि और अनादिरूप, कहूँ अवस्था-दोइ= इन दो अवस्थाओं को कहता हूँ।। 16।। जो मिथ्या-दल उपसमै= जो मिथ्यात्व के अखंडितरूप/समूह का उपशम करके, ग्रंथि-भेदि बुध होइ= अखंड-मिथ्यात्व का ग्रंथि-भेद करके ज्ञानी होता है, फिर आवै मिथ्यातमैं= (और) फिर वापस मिथ्यात्व मेंं आता है, सादि-मिथ्याती सोइ= वह जीव ‘सादि-मिथ्यात्वी’ है।। 17।। जिनि ग्रंथी भेदी नहीं= जिन्होंने मिथ्यात्व का ग्रंथि-भेद कभी किया ही नहीं है, ममता-मगन सदीव= सदैव पर में ममत्वरूप-परिणामों में ही मगन हैं, सो अनादि-मिथ्यामती= वे अनादि-मिथ्यात्वी हैं, विकल बहिर्मुखजीव= वे दुःखी, परोन्मुखी-जीव हैं।। 18।। विशेषार्थ :- इन तीनों-छंदों में कवि ने मिथ्यात्व के दो-अवस्थाओंरूप भेदों का वर्णन किया है। एक तो वह जीव, जो अनादिकाल से आज तक सुलटा ही नहीं, मिथ्यात्व के परिणामों में ही रमा रहा। और दूसरा वह जीव जिसने मिथ्यात्व का ग्रंथि-भेद भी किया, और उपशम-सम्यक्त्व का स्वाद भी चखा; परन्तु उसका काल अति-अल्प होने से, और पुन: मिथ्यात्व का उदय आने से उसकी दलदल में फँस गया। विपरीत-अभिप्राय/उल्टी-मान्यता /अतत्त्व-श्रद्धान अर्थात् वस्तु का जैसा स्वरूप आगम में वर्णित है, उसे उसरूप में न मानकर अन्यथारूप मानना- ऐसी विपरीत-मान्यता को ‘मिथ्यात्व’ कहते हैं। ‘मिथ्यात्व’ के दो भेद जिनागम में बताये गये हैं- ‘अनादि-मिथ्यात्व’ और ‘सादि-मिथ्यात्व’। अनादि-मिथ्यात्व अर्थात् जिसे नवीन ग्रहण नहीं किया। मिथ्यात्व-कर्म के उदय से दूसरे के उपदेश के बिना ही अनादिकाल से आत्मस्वरूप की भ्रांतिरूप विपरीत-श्रद्धान होने से ज्ञानावरणादि-कर्म और शरीरादि-नोकर्म तथा पुण्य-पाप, रागादिरूप मलिन-भावों में जो एकत्व, ममत्व, कतृर् त्व-भोक्तृत्वबुद्धि है, सो वह ‘अनादि-मिथ्यात्व’ है। सादि-मिथ्यात्व अर्थात् नवीन-ग्रहण किया। मिथ्यात्व का ग्रंथि-भेद करके प्रथमोपशम-सम्यक्त्व प्राप्त करने के बाद उसका काल अत्यल्प होने से, पुनः मिथ्यात्व का उदय आ जाने से जो फिर से मिथ्यादृष्टि हो जाता है, वह ‘सादि-मिथ्यादृष्टि-जीव’ है। जो जीव अपूर्व आत्मिक-पुरुषार्थ के द्वारा दर्शन-मोहनीय के अखंडितरूप का उपशम करके, अर्थात् उस दर्शनमोहनीय-कर्म का ग्रंथिभेद करके उसे मिथ्यात्व, सम्यक्त्व एवं मिश्र- इन तीन प्रकृतियों के रूप में विखंडित कर देता है, और मिथ्यात्व-गुणस्थान को पहली बार पारकर सम्यक्त्व का स्वाद चखता है, अर्थात् उपशम-सम्यक्त्व को प्राप्त करता है; लेकिन पुन: मिथ्यात्व का उदय आ जाने से नीचे चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार गिरता है, उसे ‘सादि-मिथ्यात्वी’ कहते हैं। अर्थात् यहाँ से वह पुन: मिथ्यादृष्टि हो जाता है। लेकिन जिन जीवों ने अनादिकाल से आज तक मिथ्यात्व का ग्रंथि-भेद किया ही नहीं है, और देहादिक-परपदार्थों की ममता में ही मग्न रहे, वे बहिर्मुखी यानि स्वात्मा से विमुख, अज्ञानी ‘अनादि-मिथ्यात्वी’ जीव हैं। ‘अनादि-मिथ्यात्व’ के उदय में हमारी/जीव की अवस्था :- अनादि-मिथ्यादृष्टि-जीव- ‘मैं आत्मा सदाकाल ज्ञान-स्वरूप हूँ, अनंत-सुख का भंडार हूँ’, उसे तो जानता नहीं, और केवल शरीर और संयोगीपदार्थों में ही एकत्व-ममत्वबुद्धि करता है। शरीरादि की अनुकूलता और प्रतिकूलता में ही अपने को सुखी-दु:खी भी अनुभव करता है, ‘मैं निर्धन, मैं धनवान, मैं बलवान्, मैं निर्बल, मैं कुरूप, मैं सुन्दर, मेरा घर, मेरा वैभव, मेरे पुत्र, मेरी स्त्री, मैं मूर्ख, मैं चतुर हूँ’ इत्यादि- ऐसा मानता है। यह जानता ही नहीं कि यह सब देहादिक के संयोग तो कर्म के उदय के आधीन हैं, लेकिन फिर भी अज्ञानतावश इन्हें अपना मानकर दु:खी होता है, और अनंत-संसार का बंध करता है। मिथ्यादृष्टि-जीव यह नहीं जानता कि धर्म का स्वरूप क्या है? शुभ-अशुभ भावों या पुण्य-पाप का भेद/रहस्य क्या है? बस शरीराश्रित-क्रियाओं में ही ममत्वबुद्धि स्थापित कर उसमें मग्न रहता है। इसलिये एेसे जीव को शुभाशुभ-क्रियायें करते हुये भी मिथ्यादृष्टि ही कहा जाता है। इसीलिए आचार्य भगवन् कहते हैं, ‘‘हे आत्मन्! मिथ्यात्व का तो अंश भी बुरा है।’’ क्यों? क्योंकि जबतक मिथ्यात्व रहेगा, तबतक जीव कितना भी पुरुषार्थ कर ले, वह सुखी नहीं हो सकता। जिसप्रकार स्वादिष्ट-भोजन को विष की एक बूँद; पतीला-भर दूध को जरा-सा नीबू का रस विकृत व अहितकारी कर देता है; ठीक उसीप्रकार अंशमात्र भी मिथ्यात्व के रहते जीव कितना भी ध्यान, तप, सामायिक आदि करे, उसके कर्मों की निर्जरा नहीं होगी, सारी तपस्या निष्फल है। मिथ्यात्व संसाररूपी-वृक्ष की जड़ है। जबतक वृक्ष की जड़ अखंडित है, तबतक वह वृक्ष ऊपर से कितना भी काट-छाँट दिया जाये, वह नष्ट नहीं होगा। ठीक उसीप्रकार जबतक मिथ्यात्वरूपी-जड़ मौजूद है, तबतक संसाररूपी-वृक्ष फलता ही रहेगा। यदि इस वृक्ष को गिराना है, तो सबसे पहले मिथ्यात्वरूपी-जड़ को नष्ट करो; वृक्ष तो स्वयं ही गिर जायेगा। जिसप्रकार लकड़ी की नाव भले ही कितनी भी छोटी क्यों न हो, पर वह अपने आश्रित को डूबने नहीं देती, उसीप्रकार जिसकी दृष्टि सम्यक् है, उसे संसार-समुद्र को पार करने में कुछ वक्त भले ही लगे, परन्तु वह पार हो ही जायेगा। लेकिन जिसकी दृष्टि मिथ्या है, वह कितना भी पुरुषार्थ कर ले, उसकी पत्थर की नाव संसार-समुद्र में डूबेगी ही डूबेगी। इसप्रकार यह मिथ्यात्व-भाव जीव को चिरकाल तक मात्र दुःखदायी ही है।

(दोहा)

कह्यौ प्रथम-गुनथान यह, मिथ्यामत-अभिधान।
करूँ अलप-वरनन अबै, सासादन-गुनथान।। 19।।

(सवैया इकतीसा)

जैंसैं कोऊ क्षुधित-पुरुष खाइ खीर-खांड, वौन करै पीछेकौ लगार स्वाद पावै है।
तैंसैं चढ़ि चौथै पाँचए कै छट्ठे गुनथान, काहू उपसमीकौ कषाय-उदै आवै है।।
ताही-समै तहाँसौं गिरै प्रधान-दसा-त्यागी, मिथ्यात-अवस्थाकौ अधोमुख ह्वै धावै है।
बीचि एक-समै वा छह-आवली-प्रवांन रहै, सोई सासादन-गुनथानक कहावै है।। 20।।

शब्दार्थ :- कह्यौ प्रथम-गुनथान यह मिथ्यामत-अभिधान= यहाँ तक पहले ‘मिथ्यात्व’ नामक गुणस्थान का स्वरूप कहा, करूँ अलप-वरनन अबै सासादन-गुनथान= अब सासादन-गुणस्थान का संक्षेप में वर्णन करता हूँ।। 19।। जैंसैं कोऊ क्षुधित-पुरुष खाइ खीर-खांड= जैसे कोई भूखा-मनुष्य खांड/चीनी-मिश्रित खीर खाये, वौन करै पीछेकौ लगार स्वाद पावै है= और उसका वमन/उल्टी कर दे, लेकिन फिर भी बाद में उसके मुहँ में उस खीर के स्वाद का अंश रह जाता है, तैंसैं चढ़ि चौथै पाँचए कै छट्ठे गुनथान= वैसे ही चौथे, पाँचवे, छट्ठे गुणस्थान तक चढ़ने के बाद, काहू उपसमीकौ कषाय उदै आवै है= किसी उपशमी-सम्यक्त्वी को (अनंतानुबध ं ी-) कषाय का उदय आ जाये, ताही-समै तहाँसौं गिरै प्रधान-दसा त्यागी= उसीसमय वह उस गुणस्थान से गिरता है, श्रेष्ठदशा/सम्यग्दर्शन को छोड़कर, मिथ्यात-अवस्थाकौ अधोमुख ह्वै धावै है= मिथ्यात्व की ओर उल्टा अर्थात् ऊपर से नीचे की ओर दौड़ता/गिरता है, बीचि एक-समै वा छह-आवली-प्रवांन रहै= उस बीच का समय (जोकि न्यूनतम) एक-समय या (अधिकतम) छह-आवली-प्रमाण है, सोई सासादन-गुनथानक कहावै है= वही ‘सासादन-गुणस्थान’ कहलाता है।। 20।। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने गुणस्थान-विवेचन के क्रम में दूसरे ‘सासादन-गुणस्थान’ का उदाहरण-सहित वर्णन किया है। जैसे कोई भूख से आकुलित-व्यक्ति खांड-मिश्रित-खीर का भक्षण करे; लेकिन कदाचित् किसी कारणवश उसे वमन अर्थात् उल्टी हो जाये, तो उल्टी होने के बाद भी उसके मुँह में मीठी-खीर के अंश का स्वाद रह जाता है; ठीक उसीप्रकार जब कोई जीव आत्मिक-पुरुषार्थ के बल पर दर्शन-मोहनीय की कर्म-प्रकृतियों का उपशम करते हुए चौथे, पाँचवे और छट््ठे गुणस्थान तक भी पहुँच जाता है; लेकिन अचानक अनंतानुबंधी-कषाय का उदय आ जाने से वह उपशमी-सम्यग्दृष्टि-जीव उसी-समय सम्यग्दर्शनरूप श्रेष्ठ-दशा को छोड़कर मिथ्यात्व की ओर अधोमुख अर्थात् ऊपर से नीचे की ओर गिरता है। तब सम्यग्दर्शन से च्युत होने और मिथ्यात्व-दशा में पहुँचने के बीच का समय, जो कम से कम एकसमय और अधिक से अधिक छह-आवलीकाल तक होता है, उस अवस्था को ‘सासादन-गुणस्थान’ कहते हैं। यह गुणस्थान सम्यक्त्व की विराधना हो चुकने, किंतु मिथ्यात्व को प्राप्त होने से पहले की अवस्था का गुणस्थान है। सम्यग्दर्शन की विराधना को ‘आसादन’ कहते है। तथा उसके साथ जो भाव होते है, उसको ‘सासादन’ कहते है। जिस औपशमिक-सम्यग्दृष्टि जीव ने अन्तानुबन्धी-कषाय के उदयवश औपशमिक-सम्यग्दर्शन के काल मेें कम से कम एक-समय और अधिक से अधिक छह-आवली काल शेष रहने पर सम्यग्दर्शनरूपी-रत्नपर्वत के शिखर से च्युत होकर मिथ्यादर्शनरूपी-भूमि के सम्मुख होते हुए सम्यक्त्व का तो नाश कर लिया है; किन्तु अभी मिथ्यात्व-अवस्था को प्राप्त नही हुआ है; जीव की उस बीच की अवस्था को ‘सासादन-गुणस्थान’ कहते हैं। सासादन का परिणाम सम्यग्दर्शन की विराधना-पूर्वक मिथ्यात्व के नज़दीक का परिणाम है। इसलिए इस गुणस्थान से जीव नियम से मिथ्यात्व में ही प्रवेश करता है।

(दोहा)

सासादन-गुनथान यह, भयौ समापत बीय।
मिश्रनाम-गुनथान अब, वरनन करूँ तृतीय।। 21।।

चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार

(सवैया इकतीसा)

उपसमी-समकिती कै तौ सादि-मिथ्यामती, दुहुँनिकौं मिश्रित-मिथ्यात आइ गहै है।
अनंतानुबंधी-चौकरीकौ उदै नाहिं जामैं, मिथ्यात, समै-प्रकृति मिथ्यात न रहै है।।
जहाँ सद्दहन-सत्यासत्य-रूप समकाल, ग्यानभाव-मिथ्याभाव मिश्र-धारा बहै है।
याकी-थिति अंतरमुहूरत उभयरूप, ऐसौ मिश्र-गुनथान आचारज कहौ है।। 22।।

शब्दार्थ :- सासादन-गुनथान यह बीय भयौ समापत= यह ‘सासादन’ नामक दूसरा-गुणस्थान (का वर्णन) यहाँ समाप्त हुआ, मिश्रनाम-गुनथान अब वरनन करूँ तृतीय= अब तीसरे ‘मिश्र’ नामक गुणस्थान का वर्णन करता हूँ।। 21।। उपसमी-समकिती कै तौ सादि-मिथ्यामती= उपशमी-सम्यक्त्वी अथवा सादि-मिथ्यात्वी जीव, दुहनि ुँ कौं मिश्रित-मिथ्यात आइ गहै है= दोनों को ‘मिश्र-मिथ्यात्व-प्रकृति’ का उदय आ गया हो, अनंतानुबध ं ी-चौकरीकौ उदै नाहि जामैं= किन्तु जिसमें अनंतानुबधं ी-चौकड़ी का उदय न हो, मिथ्यात समै-प्रकृति मिथ्यात न रहै है= (दर्शनमोहनीय कर्म की) ‘मिथ्यात्व’ और ‘सम्यक्-प्रकृति-मिथ्यात्व’ का भी उदय न हो, जहाँ सद्दहन-सत्यासत्यरूप समकाल= जहाँ एक ही समय में सत्य-असत्यरूप श्रद्धान, ग्यानभाव-मिथ्याभाव मिश्र-धारा बहै है= ज्ञान-भाव और मिथ्यात्व-भाव की मिश्र-धारा बह रही हो, याकी-थिति अंतरमुहरू त= इसका समय अंतर्मुहर्तु , उभयरूप ऐसौ मिश्र-गुनथान आचारज कहै है= दोनों का मिलाजुलारूप ऐसा ‘मिश्र-गुणस्थान’ आचार्यदेव ने कहा है।। 22।। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि गुणस्थान-विवेचन के क्रम में तीसरे मिश्र-गुणस्थान का सुंदर-विवेचन किया है। इस गुणस्थान में जीव को न तो सर्वथा-मिथ्यादृष्टि ही कह सकते हैं, और न ही सर्वथा-सम्यग्दृष्टि; बल्कि इस गुणस्थान में दोनों का मिला-जुला-रूप होता है। कर्म-प्रकृतियों का उपशम करनेवाले औपशमिक-सम्यक्त्वी या सम्यक्त्व का स्वाद चखकर पुन: मिथ्यात्व में आनेवाले सादि-मिथ्यात्वी दोनों को जब सम्यक्-मिथ्यात्व-प्रकृति का उदय हो, और अनंतानुबंधी-क्रोध-मान-माया-लोभ में से किसी भी प्रकृति का उदय न हो, साथ ही ‘मिथ्यात्व’ और ‘सम्यक्-प्रकृति’ का भी उदय न हो, अर्थात् इन छह प्रकृतियों का अनुदय एवं एक ‘सम्यक्मिथ्यात्व-प्रकृति’ का उदय हो, तब उससमय एक ही काल में जीव को सत्य और असत्यरूप श्रद्धान होता है। साथ ही ज्ञान-भाव और मिथ्यात्व-भाव की धारा एकसाथ बहती है, दोनों के उभयरूप या मिलाजुले-स्वाद को ‘मिश्र-गुणस्थान’ के नाम से आचार्यों ने वर्णित किया है। इस गुणस्थान का काल अंतर्मुहुर्त होता है। जैसे कोई व्यक्ति दही और गुड़- दोनों को मिलाकर खाता है, तो उसे जितना स्वाद दही की खटास का आता है, उतना ही स्वाद गुड़ की मिठास का भी आता है। न तो वह व्यक्ति उस पदार्थ को खट्टा कह सकता है और न मीठा; क्योंकि उसे दोनों का बराबर-स्वाद आ रहा है। ठीक उसीप्रकार इस गुणस्थान में जीव को मिला-जुलारूप अनुभव में आता है। क्योंकि जीव के श्रद्धा-गुण की निर्मल-पर्याय का नाम ‘सम्यग्दर्शन’ है; और मलिन-पर्याय का नाम मिथ्यादर्शन है। परन्तु इस गुणस्थान में जीव के श्रद्धा-गुण की पर्याय ‘सम्यक्’ तथा ‘मिथ्या’- दोनों रूप परिणमित होती हैं, उस समय हम उसे न तो सम्यक्-रूप कह सकते हैं, न मिथ्यारूप; उस समय साधक-जीव को दोनों की बराबर-अनुभूति होती है, अर्थात् उस समय श्रद्धा-गुण का परिणमन मिश्ररूप होता है। सरल-शब्दों में कहें, तो इस तीसरे- गुणस्थान में जीव के न तो सम्यक्त्वरूप परिणाम होते हैं, और न ही मिथ्यात्वरूप परिणाम होते हैं; वरन् गुड़ और दही के समान सम्मिश्ररूप परिणाम होते हैं। इसीलिए जैसे भली-भाँति मिलाए गये दही और गुड़ के मिश्रण के स्वाद को पृथक्-पृथक् लेना संभव नहीं है; उसीप्रकार इस मिश्रभाव को भी पृथक्-पृथक् करना संभव नहीं है। अत: इस मिश्रभाव-युक्त गुणस्थान को ‘मिश्र-गुणस्थान’ कहा जाता है।

(दोहा)

मिश्र-दसा पूरन भई, कही यथामति-भाखि।
अब चतुर्थ-गुनथान-विधि, कहौं जिनागम-साखि।। 23।।

(सवैया इकतीसा)

केई-जीव समकित पाइ अर्ध-पुदगल-परावर्त-काल तांई चोखे होइ चितके।
केई एक अंतरमुहूरतमैं गंठि-भेदि, मारग-उलंघि सुख वेदै मोख वितके।।
तातैं अंतरमुहूरतसौं अर्धपुदगल-लौं, जेते-समै होहिं तेते भेद समकित के।
जाही समै जाकौं जब समकित होइ सोई, तब-हीसौं गुन गहे, दोस दहै इतके।। 24।।

(दोहा)

अध-अपूव्व-अनिवृत्ति-त्रिक, करन करै जो कोइ।
मिथ्या-गंठि-विदारि गुन, प्रगटै समकित सोइ।। 25।।

शब्दार्थ :- मिश्र-दसा पूरन भई, कही यथामति भाखि= मिश्र-दशा/गुणस्थान का वर्णन अपनी बुद्धि- अनुसार विवेचित किया, अब चतुर्थ-गुनथान-विधि कहौं जिनागम साखि= अब चौथे गुणस्थान की प्रक्रिया जिनवाणी की साक्षीपूर्वक कहता हूँ।। 23।। केई जीव समकित पाइ= कोई जीव सम्यग्दर्शन प्राप्त कर, अर्ध-पुदगल-परावर्त-काल तांई= अर्धपुद््गल-परावर्तन-काल तक, चोखे होइ चितके= निर्मल-चित्तवाले होते हैं, केई एक अंतरमुहूरतमैं गंठि भेदि= कई अंतर्मुहुर्त में ग्रंथि-भेदनकर, मारग-उलंघि सुख वेदै मोख वितके मार्ग का उल्लंघनकर मोक्ष-सुख का वेदन करते हैं, तातैं अंतरमुहूरतसौं अर्धपुदगल-लौं= इसलिये अंतर्मुहुर्त से अर्ध-पुद््गल-परावर्तन-काल तक, जेते समै होहिं, तेते भेद समकित के= जितने समय होते हैं, उतने ही भेद सम्यग्दर्शन के हैं, जाही समै जाकौं जब समकित होइ= जिस समय जब जिसको सम्यग्दर्शन होता है, सोई तबहीसौं गुन गहे= वह तभी से गुण-ग्रहण करता है, दोस दहै इतके= और संसार के दु:खों का दहन करता है।। 24।। अध-अपूव्व-अनिवृत्ति-त्रिक करन करै जो कोइ= अध:करण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण इन तीनों करणों/परिणामों जो कोई करता है, (वह), मिथ्या-गंठि विदारि, गुन प्रगटै समकित सोइ= मिथ्यात्व का ग्रंथिभेदनकर, गुणों को प्रकट करता है, वही सम्यग्दृष्टि है।। 25।। विशेषार्थ :- इन तीनों-छंदों में कवि ने गुणस्थान-विवेचन के अंतर्गत चतुर्थ ‘अविरत-सम्यक्त्व’ नामक गुणस्थान का विवेचन किया है। इससे पूर्व कवि ने स्वयं अपनी योग्यता को व्यक्त करते हुए कहा कि तीसरा ‘मिश्र-गुणस्थान’ मैंने अपने क्षयोपशम के अनुसार वर्णित किया, अब जिनवाणी की साक्षीपूर्वक चतुर्थ-गुणस्थान का वर्णन करता हूँ। कविवर कहते हैं कई-जीव सम्यग्दर्शन प्राप्तकर अर्ध-पुद्ग् ल-परावर्तन-काल-पर्यंत निर्मलचित्तवाले होते हैं। कहने का अभिप्राय यही है कि जिस जीव को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है, उस जीव का इस संसार में रहने का अधिकतम-काल अर्ध-पुद्ग् ल-परावर्तन शेष रहता है अर्थात् अनंत-संसार सिमटकर चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार मात्र इतना ही रह जाता है। और कई-जीव ऐसे हैं, जो मात्र अंतर्मुहुर्त-काल में ही मिथ्यात्व का ग्रंथि-भेदनकर, मार्ग का उल्लंघनकर, सीधे मोक्षगामियों जैसे अतीन्द्रिय-सुख का वेदन करते हैं। अर्थात् ऐसे जीव अतितीव्र-पुरुषार्थ करके अंतर्मुहुर्त में ही श्रेणी मांड़कर सीधे मोक्ष-सुख का वेदन करते हैं। कम से कम अंतर्मुहुर्त और अधिक से अधिक अर्ध-पुद्ग् ल-परावर्तन-काल में जितने समय होते हैं, उतने ही सम्यक्त्व के भेद हैं। जिससमय जिस जीव को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है, उसीसमय से वह जीव आत्मिक-गुणों को ग्रहण करता है अर्थात् स्व-सन्मुख रहता है, और संसार के दोषों का दहन या नष्ट करता है। निष्कर्षरूप में कविवर कहते हैं कि जो जीव सम्यक्त्व-प्राप्ति से पूर्व करण-लब्धि के अन्तर्गत अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणरूप तीन-करणों/परिणामों को करता है। और अनिवृत्तिकरण के अंतिम-समय में मिथ्यात्व का ग्रंथि-भेदन करके आत्मिक-गुणों को प्रगट/साक्षात्कार करता है, उसी जीव को सम्यग्दर्शन प्रगट होता है, अर्थात् वही जीव सम्यग्दृष्टि है। अविरत-सम्यक्त्व-गुणस्थान- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इस गुणस्थान में तत्त्वार्थ के सम्यक्-श्रद्धानरूप सम्यक्त्व होते हुये भी विरक्तिरूप-भाव नहीं होते, या कहें व्रतादिक के पालनरूपभाव नहीं होते; इसीलिए इसे ‘अविरत-सम्यक्त्व’ गुणस्थान कहते हैं। इस गुणस्थान में दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृति और अनंतानुबंधी कषाय-चौकड़ी का क्षय या उपशम हो जाता है। शंकादि आठ-दोष, आठ-मद, तीन-मूढ़ता, छह-अनायतन आदि 25 दोष नहीं होते। निःशंकित, निःकांक्षित आदि अष्ट-गुण प्रकट होते हैं। कषाय में मंदता आती है। संसार की क्रिया करते हुये भी स्व-पर का भेदज्ञान प्रतिसमय वर्तता है।

(दोहा)

समकित-उतपति-चिहन-गुन-भूषन दोष-विनास।
अतीचार-जुत अष्ट-विधि, वरनौं विवरन तास।। 26।।

शब्दार्थ :- समकित-उतपति-चिहन-गुन भूषन-दोष-विनास= सम्यक्त्व, उत्पत्ति, चिह्न, गुण, भूषण, दोष, विनाश, अतीचार-जुत अष्ट-विधि वरनौं विवरन तास= अतिचार-सहित आठप्रकार (सम्यक्त्व से संबंधित वर्ण्य-विषयों) का वर्णन करता हूँ। विशेषार्थ :- इस-छंद में सम्यग्दर्शन के आठ-वर्ण्य-विषयों के नामो का वर्णन किया है, अर्थात् सम्यग्दर्शन क्या है? कैसे होता है? सम्यग्दर्शन के क्या चिह्न/लक्षण या पहचान है? सम्यग्दर्शन होने पर क्या प्रगट होता है? और किसका विनाश हो जाता है? इत्यादि। इसप्रकार सम्यक्त्व, उत्पत्ति, चिह्न, गुण, भूषण, दोष, विनाश और अतिचार-सहित- ये आठ ‘सम्यग्दर्शन’ के वर्ण्य-विषय हैं।

(चौपाई)

सत्य-प्रतीति-अवस्था जाकी, दिन-दिन रीति गहै समताकी।
छिन-छिन करै सत्यकौ साकौ, समकित नाम कहावै ताकौ।। 27।।

शब्दार्थ :- सत्य-प्रतीति-अवस्था जाकी= जिसकी अवस्था सत्य-स्वरूप की प्रतीतिरूप है, दिन-दिन रीति गहै समताकी= दिन-प्रतिदिन समताभाव को ग्रहण करता है, छिन-छिन करै सत्यकौ साकौ= जो क्षण-क्षण सत्य का साक्षात्कार करता है, समकित नाम कहावै ताकौ= उसका नाम सम्यग्दर्शन है। विशेषार्थ :- पहला वर्ण्य विषय सम्यग्दर्शन क्या है? जो प्रत्येक पदार्थ के सत्य-स्वरूप को ही ग्रहण करता है, अर्थात् छहों-द्रव्यों की भिन्नता और स्वतंत्र-परिणमन को जैसा है, वैसा ही स्वीकार करता है। प्रतिदिन कर्मों की उदयाधीन-व्यवस्था में इष्ट-अनिष्टरूप प्रवर्तन न करके सहज-समताभाव धारण करता है। क्षण-क्षण पर सत्य का साक्षात्कार करता है अर्थात् आत्मिक-गुणों का रसास्वादन करता है, ऐसे आत्मस्वरूप की निर्मलता का नाम ही ‘सम्यग्दर्शन’ है।

(दोहा)

कै तौ सहज-सुभाउ कै, उपदेसै गुरु कोइ।
चहुँगति सैनी-जीउकौ, सम्यकदरसन होइ।। 28।।

शब्दार्थ :- कै तौ सहज-सुभाउ= या तो सहज-स्वभाव से (निसर्गज), कै उपदेसै गुरु कोइ= या किसी गुरु के उपदेश से (अधिगमज), चहुँगति सैनी-जीउकौ= चारों गतियों में संज्ञी-जीव को, सम्यकदरसन होइ= सम्यग्दर्शन प्रकट हो सकता है। विशेषार्थ :- दूसरा वर्ण्य विषय सम्यक्त्व की उत्पत्ति कैसे होती है? वास्तव में तो सम्यग्दर्शन की प्रगटता का एकमात्र-कारण जीव का स्वयं का पुरुषार्थ ही है; क्योंकि गुरु का उपदेश भी तभी कार्यकारी होता है, जब जीव स्वयं पुरुषार्थ करता है। और स्वयं के पुरुषार्थ से होनेवाले इस सम्यग्दर्शन को ‘निसर्गज सम्यग्दर्शन’ कहते हैं। कदाचित् ऐसा भी होता है कि बाहर में वीतरागी देव, गुरु, धर्म के उपदेश का सुयोग बना, और उसीसमय जीव ने आत्मिक-पुरुषार्थ भी किया और सम्यग्दर्शन प्राप्त किया; तब देव, गुरु, धर्म का उपदेश साक्षात्-निमित्त होने से उसे ‘अधिगमज-सम्यग्दर्शन’ कहा जाता है।

(दोहा)

आपा-परिचै निज-विषैं, उपजै नहिं संदेह।
सहज प्रपंच-रहित दशा, समकित-लच्छन एह।। 29।।

शब्दार्थ :- आपा-परिचै निज-विषैं= आत्मा का परिचय आत्मा में ही, उपजै नहिं संदेह= संदेह की उत्पत्ति नहीं होती, सहज प्रपंच-रहित दसा= छल-कपट से रहित सहज ही स्वाभाविक-स्थिति, समकित-लच्छन एह= यही सम्यग्दर्शन का लक्षण है। विशेषार्थ :- तीसरा वर्ण्य विषय चिह्न ‘सम्यग्दर्शन का लक्षण या पहचान’ क्या है?- स्वयं का परिचय/ साक्षात्कार स्वयं से ही होने से संदहे की उत्पत्ति ही नहीं होती। क्योंकि संदहे की उत्पत्ति तो वहाँ होती है, जहाँ पर की अपेक्षा या बाधा होती है। यहाँ तो पर से भिन्न आत्मा, आत्मा को ही जानता है। इसीलिये छल-कपट के प्रपंचों से रहित सहज, स्वाभाविक-ज्ञानरूप परिणमन होता है- यही सम्यग्दर्शन का वास्तविक-लक्षण है।

(दोहा)

करुना-वच्छल-सुजनता, आतम-निंदा-पाठ।
समता-भगति-विरागता-धरमराग गुन-आठ।। 30।।

शब्दार्थ :- करुना= करुणा, वच्छल= वात्सल्य, सुजनता= सज्जनता, आतम-निंदा-पाठ= अात्म-आलोचना, समता= समता, भगति= भक्ति, विरागता= उदासीनता, धरमराग= धर्मानुराग, गुन आठ= ये सम्यक्त्व के आठगुण हैं। विशेषार्थ :- चतुर्थ वर्ण्यविषय गुण के अंतर्गत कवि ने सम्यग्दर्शन के आठगुणों का वर्णन किया है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार आत्मस्वभाव की निर्मल-परिणति का नाम सम्यग्दर्शन है, जिसकी प्रगटता बाहर में इन आठ-गुणों के माध्यम से देखी जा सकती है। ‘करुणा’ यानि जीवमात्र के प्रति करुणा का भाव होना। मिथ्यादृष्टि-जीव के हृदय में पहले तो करुणा का भाव आता ही नहीं, और आता भी है, तो मात्र अति-स्थूल-जीवों के प्रति और वह भी निहित स्वार्थों के कारण, न कि वास्तविक व निःस्वार्थ-करुणाभाव से। जबकि सम्यग्दृष्टिजीव के हृदय में, आचार-विचार में, प्रवर्तन में जीवमात्र के प्रति सहज ही ‘करुणा निहित’ होती है। ‘साधर्मी-वात्सल्य’ या जीवमात्र के प्रति निःस्वार्थ-प्रेम का ‘सच्चारूप’ सम्यग्दृष्टि-जीव के व्यवहार में ही होता है। छल-कपट के प्रपंचों से रहित होने से ‘सज्जनता’ का सहजरूप देखने को मिलता है। मिथ्यादृष्टि-जीव अपनी आलोचना तो दूर, गल्ती को भी स्वीकार नहीं करता; जबकि सम्यग्दृष्टि-जीव की दृष्टि में ‘आत्मालोचन’ की ही मुख्यता होती है। कर्म के उदय में प्राप्त संयोगों और पदार्थों में इष्टअनिष्ट-बुद्धि, राग-द्वेष का परिणाम न होकर सहज ‘साम्यभाव’ वर्तता है। अंतरंग में आत्मस्वरूप का दृढ़-श्रद्धान और बाह्य में सच्चे देव-शास्र-गुरु का दृढ़-श्रद्धानरूप ‘भक्ति’ सम्यग्दर्शन का अभिन्न-गुण है। जिसे आत्म-स्वरूप की महिमा आती है, उसे जगत् का कोई भी पदार्थ रुचिकर नहीं लगता, इसलिए सहज ही पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों के प्रति ‘विरक्ति’ का भाव वर्तता है। ऐसे सम्यक्-श्रद्धानी-जीवों को आत्म-स्वभावरूप उत्तम-क्षमादि दश-धर्मों के प्रति ‘अति-अनुराग’ होता है, इसीलिए सम्यग्दृष्टि जीव इन सभी धर्मों को अपने जीवन में अवश्य धारण करते है।

(दोहा)

चित-प्रभावना-भावजुत, हेय-उपादै वानि।
धीरज-हरख-प्रवीनता, भूषन-पंच बखानि।। 31।।

शब्दार्थ :- चित-प्रभावना-भावजुत= भावसहित-प्रभावना करना, हेय-उपादै-वानि= हेय-उपादेय की पहिचान-सहित वाणी बोलना, धीरज= धैर्य धारण करना, हरख= हर्ष का भाव रखना, प्रवीनता= बुद्धिमानता, भूषन-पंच बखानि= ये पाँच सम्यक्त्व के आभूषण/अलंकरण कहे गये हैं। विशेषार्थ :- पाँचवे वर्ण्य-विषय के अंतर्गत कवि ने सम्यक्त्व के आभूषणों का वर्णन किया है। जैसे बाह्य-आभूषण देह को अलंकृत करते हैं, ठीक उसीप्रकार निम्न पाँच-अाभूषण सम्यग्दृष्टि-जीव के व्यक्तित्व को अलंकृत करते हैं। उसके चित्त में प्रतिसमय वीतरागी-धर्म की प्रभावना का भाव वर्तता है। हेय-उपादेय की सच्चीपरख होने से समस्त बाह्य हेय-पदार्थों/भावों को छोड़कर एकमात्र निज-स्वरूप को उपादेय जानकर उसी की सच्ची-प्रतीति और उसी में प्रवर्तन का पुरुषार्थ करता है। जगत् के परिणमन की स्वतंत्रता का भान होने से अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं में धैर्य धारण करता है। आत्मिक-सुख का वेदन होने से निरन्तर हर्ष और उत्साह का भाव रहता है। स्व-पर में भेदविज्ञान वर्तने से तत्त्वचिंतन में प्रवीणता- ये पाँचों-आभूषण सम्यग्दृष्टि-जीव के व्यक्तित्व को सुशोभित करते हैं।

(दोहा)

अष्ट-महामद अष्ट-मल, षट-आयतन विशेष।
तीन-मूढ़ता-संजुगत, दोष-पचीसौं एष।। 32।।

शब्दार्थ :- अष्ट-महामद= आठ-महामद, अष्ट-मल= आठ मल/विकार, षट-अनायतन= छह-अनायतन, विशेष तीन-मूढ़ता= तीन मूढ़ता, संजुगत दोष-पचीसौं एष= सब मिलाकर ये 25 दोष हैं। विशेषार्थ :- छठवें वर्ण्य-विषय के अंतर्गत कवि ने आठ-मद, आठ-मल, छह-अनायतन, और तीनमूढ़ता- ऐसे सम्यग्दर्शन के 25 दोषों का वर्णन किया है। जिनका वर्णन क्रमश: इसप्रकार है-

(दोहा)

जाति-लाभ-कुल-रूप-तप, -बल-विद्या-अधिकार।
इनकौ गरब जु कीजिये, यह मद अष्ट-प्रकार।। 33।।

शब्दार्थ :- जाति-लाभ-कुल-रूप-तप= जाति, लाभ, कुल, रूप, बाह्य-तप, बल-विद्या-अधिकार= बल, विद्या और अधिकार, इनकौ गरब जु कीजिये= इनका गर्व/घमंड करना, यह मद अष्टप्रकार= ये आठप्रकार का मद है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने आठ-मदों का संक्षिप्त-वर्णन किया है। पूर्वोपार्जित-कर्मों के अनुसार प्राप्त जाति (माँ का वंश), लाभ (धन-वैभव-संपदा-यश आदि), कुल (पिता का वंश), रूप (देह की सुंदरता), तप (देह से किये जाने वाले बाह्य-व्रतादिक), बल (देह का बल), विद्या (लौकिक-ज्ञान, क्षयोपशमज्ञान) और अधिकार (प्रभुता, ऐश्वर्य, आदि)- इन आठों पर घमंड करना ही ‘मद’ है, जो सम्यग्दृष्टि-जीव को नहीं होते। क्योंकि वे देह और आत्मा की भिन्नता को प्रत्यक्ष-अनुभव करते हैं। साथ ये भी भली-भाँति जानते हैं कि ये सब माया पुण्योदय के आधीन है, पुण्य-क्षीण होते ही क्षण में ही विलय को प्राप्त होगी, तो मान कैसा? हाँ, सम्यग्दृष्टि-जीव को भी मान होता है; परन्तु पर-संपदा पर नहीं, अपनी मार्दव-स्वभावी आत्मा पर, और अात्मिक-गुणों की अमूल्यसंपदा पर गौरव होता है।

(चौपाई)

आसंका-अस्थिरता-वांछा, ममता-द्रिष्टि दसा-दुरगंछा।
वच्छल-रहित दोष-पर-भाखै, चित प्रभावना-माँहि न राखै।। 34।।

शब्दार्थ :- आसंका= शंका करना, अस्थिरता= स्थिर नहीं रहना, वांछा= इच्छा होना, ममता-द्रिष्टि= ममत्व का परिणाम, दसा-दुरगंछा= ग्लानि का भाव होना, वच्छल-रहित= वात्सल्य-रहित होना, दोष-पर-भाखै= दूसरों के दोषों को कहना, चित प्रभावना-माँहि न राखै= प्रभावना में चित्त का न होना,- ये सम्यक्त्व के आठ मल/विकार हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने सम्यकत्व के आठ मलों का वर्णन किया है। ‘मल’ अर्थात् विकार। जिसे अपनी निर्मल-स्वभावी आत्मा की अनुभूति होती है, उसके हृदय में ये आठ-मल नहीं होते। 1. शंका- जिनेन्द्रदेव के वचनों में शंका करना, आत्मा एवं संसार-शरीर-भोगों का जैसा स्वरूप जिनागम में वर्णित है, उसमें शंका करना या वैसा न मानकर अन्यथा मानना इत्यादि- ऐसे भाव सम्यग्दर्शन को मलिन करते हैं। 2. अस्थिरता- देव-गुरु-धर्म के नाम पर होने वाले झूठे-अतिशयों/ चमत्कारों को सुनकर सच्चे-धर्म और स्वरूप से डिग जाना या स्थिर नहीं रह पाना- यह ‘अस्थिरता’ नामक सम्यग्दर्शन का मल है। 3. वांक्षा- धर्म-कार्य के बदले पुण्य या भोगों की वांछा करना, या मुझे स्वर्गादिक की प्राप्ति हो- ऐसी भावना से व्रत, संयम, तप आदि करना ‘वांक्षा’ या ‘कांक्षा’ नामक मल है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार 4. ममता-दृष्टि- पर-पदार्थों और संयोगों के प्रति ममत्व का परिणाम होने से सम्यग्दर्शन मलिन होता है। 5. ग्लानि का भाव- मुनिराज के मलिन-शरीर को देखकर ग्लानि आना, या संसार के किसी भी अशुचिपदार्थ को देखकर होने वाला घृणा का भाव भी सम्यग्दर्शन को मलिन करता है। 6. वात्सल्य-रहितता- साधर्मीजनों के प्रति द्वेष का भाव होना, या अपने किसी स्वार्थ को पूरा करने के लिए दिखावटी-लगाव रखना- ऐसा वात्सल्य-रहित छल-युक्त-परिणाम सम्यग्दर्शन को मलिन करता है। 7. पर के दोष देखना- अर्थात् दूसरे के दोषों को उजागर करना, और अपने दोषों को छिपाना- ऐसा निकृष्ट-परिणाम भी सम्यक्त्व को मलिन करता है। 8. अप्रभावना- चित्त में धर्म की प्रभावना का परिणाम न होना अर्थात् धर्म-कार्यों से हर्षित न होना और उनमें बाधा डालना सम्यग्दर्शन को मलिन करता है।

(दोहा)

कुगरुु -कुदव े -कुधर्म-धर, कुगरुु कुदव

े कुधर्म।
इनकी करै सराहना, यह षडानायतन-कर्म।। 35।।

शब्दार्थ- कुगरुु -कुदवे -कुधर्म-धर= कुगुरु-कुदेव-कुधर्म को माननेवाले या उनके अनुयायी, (और) कुगुरु कुदेव कुधर्म= कुगुरु, कुदेव कुधर्म, इनकी करै सराहना= इन छहों की प्रशंसा करना, यह षडायतन-कर्म= ये छह-अनायतन-कार्य हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘षट्-अनायतन’ का वर्णन किया है। ‘आयतन’ अर्थात् वह परिसर जहाँ रहकर जीव अपना कल्याण कर सके। और इसके विपरीत जिस परिसर से जीव कल्याण के बजाय पतन के मार्ग पर अग्रसर हो उसे ‘अनायतन’ कहते हैं। अनादिकालीन-मिथ्यात्व के पोषक 6 अनायतन आगम में वर्णित हैं- ‘कुगुरु’ (रागी, परिग्रही, मंत्र-तंत्र का प्रलोभन देनेवाले), ‘कुदेव’ ( रागी देवी-देवता), ‘कुधर्म’ (हिंसा आदि पापों और राग में धर्म मानना) को पूजना और ‘कुगुरु के उपासक’, ‘कुदेव के उपासक’, ‘कुधर्म के उपासक’- इनकी प्रशंसा करना, उनको पूजना- ये छह-अनायतन आगम में वर्णित हैं।

(दोहा)

देवमूढ़ - गुरुमूढ़ता, - धर्ममूढ़ता पोष।
आठ-आठ-षट-तीन मिलि, ए पचीस सब दोष।। 36।।

शब्दार्थ :- देवमूढ़= देवमूढ़ता, गुरुमूढ़ता= गुरुमूढ़ता, धर्ममूढ़ता पोष= धर्ममूढ़ता- इनका पोषण करना, आठ, आठ, षट, तीन मिलि= आठ, आठ, छह और तीन सब मिलाकर, ए पचीस सब दोष= सम्यग्दर्शन के ये 25 दोष हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने तीन मूढ़ताओं का वर्णन किया है। मूढ़ता अर्थात् मूर्खता- देव, गुरु,

धर्म के सम्यक्-स्वरूप का अनुसरण न करके उनके नाम पर विवेक-रहित कुछ भी करना ‘मूढ़ता’ है।
आगम में मूढ़ता के तीन भेद हैं- देव-मूढ़ता, गुरु-मूढ़ता, धर्म-मूढ़ता।

देव-मूढ़ता- वीतरागी-देव के अलावा अन्य किसी को भी देव मानकर पूजना ‘देवमूढ़ता’ है। जितने भी रागी देवी-देवता हैं, उनकी किसी भी रूप में पूजा करना, कराना और प्रशंसा करना देव-मूढ़ता है। होली पर होलिका-दहन और उपले की पूजा करना, दीवाली पर लक्ष्मी और गणेश आदि को देव मानकर पूजना, कुलदेवी को पूजना, शादी-ब्याह के प्रसंगों पर बहुत सारे देवी-देवताओं को पूजना, हल पूजना, औजार पूजना, देहली पूजना, कुँआ पूजना, तराजू-बाँट, गज आदि को पूजना, वट-मावस पर वट-वृक्ष को पूजना, करवा-चौथ पर चंद्रमा को पूजना, सूर्य को सुबह-सुबह अर्घ देना- इत्यादि ऐसे बहुत से कार्य, जिनमें अन्यमत के देवी-देवताओं की पूजा होती है वह सब ‘देवमूढ़ता’ है। गुरु-मूढ़ता- वीतरागी निर्ग्रंथ भावलिंगी दिगम्बर-मुनिराज के अलावा किसी भी वेशधारी को गुरु मानना ‘गुरु-मूढ़ता’ है। ‘गुरु-मूढ़ता’ या ‘पाखण्ड-मूढ़ता’ का लक्षण बताते हुये ‘आचार्य समन्तभद्र’ कहते हैं कि ‘सग्रन्थ’ अर्थात् जो ‘ग्रन्थ’ या परिग्रह से सहित हैं, ‘आरंभ’ अर्थात् समरंभ-समारंभ और आरंभ से सहित हैं, ‘हिंसा’ अर्थात् किसी भी प्रकार की हिंसा आदि पापों से सहित हो, ‘संसारावर्त’ अर्थात् संसाररूपी-आवर्त या भँवरों में, ‘वर्तिनाम्’ अर्थात् घूमनेवाले हैं, (जैसे भँवर के बीच में फँसी नाव स्वयं तो डूबती ही है, और जो उसके साथ हो उन्हें भी डुबो देती हैं, ठीक उसीप्रकार पाखण्डी-गुरु स्वयं तो भवसागर में डूबता ही है, और साथ में उनकी प्रशंसा करनेवाले भी डूबते हैं) ‘पाखण्डिनां पुरस्कारो’ अर्थात् ऐसे पाखण्डियों की पूजा-सत्कार करना, ‘ज्ञेयं’ अर्थात् जानने की रुचि रखना, ‘पाखण्डिमोहनम्’ अर्थात् उन पाखण्डियों पर मोहित होना ‘गुरु-मूढ़ता’ या ‘पाखण्ड-मूढ़ता’ है। एेसे पाखण्डियों को पूजना तो दूर, इनके नजदीक भी नहीं जाना चाहिये; क्योंकि जिसप्रकार कोयले की खदान में प्रवेश करने पर हाथ-पैर, कपड़े आदि काले होते ही हैं; इसीप्रकार ऐसे रागी-द्वेषी, भेषधारी, मिथ्या-चमत्कारी, जिनमत से विपरीत-श्रद्धानी गुरुओं के पास जाने पर हम अल्पज्ञानी, अज्ञानी-जीवों की परिणति भ्रमित होना स्वाभाविक है, इसलिये इनकी संगति को दूर से त्याग देना ही श्रेष्ठ है। धर्म-मूढ़ता- गंगा-स्नान, कुआ-बाबड़ी आदि पूजना, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण आदि होने पर दान-पूजा की मान्यता करना, तुलसी-पूजना, करवाचौथ मनाना, मकर संक्रांति पर दान देना अर्थात् धर्म के नाम पर विवेकरहित कुछ भी करना या पूजना ‘धर्म-मूढ़ता’ है। गौदान, कन्यादान आदि दस-प्रकार के ‘कुदान’ को स्वयं देना या देनेवाले की अनुमोदना करना धर्ममूढ़ता है। यज्ञ, होम, बलि आदि कार्यों को करना कराना या प्रशंसा करना भी धर्ममूढ़ता है। ऐसे बहुत से कार्य हैं जो दैनिक-जीवन में हम करते हैं, बिना ये सोचे कि हम इन्हें क्यों कर रहे हैं? करना चाहिये भी या नहीं? विचार ही नहीं करते बस घर के बड़े जैसा कहते हैं, हम वैसा ही करते जाते हैं। भाई! इन अनजाने में किये गये कार्यों का फल भी भोगना पड़ता है। इसलिये करने से पहले विचार अवश्य करो। कहने का अभिप्राय यही है कि रागी देवी-देवताओं या कुगुरु, कुदेव और कुधर्म को किसी भी रूप में पूजना और अनुमोदना करना मूढ़ता ही है। विडम्बना तो ये है कि आज लोग वीतरागी के उपासक बनकर भी धर्म के नाम पर जो मूढ़ता करते हैं, उसका तो कोई ठिकाना ही नहीं है। वीतरागी-धर्म अर्थात् अहिंसामयी-धर्म। फिर दीपक से आरती करना, अग्नि से हवन करना- अर्थात् हिंसा में धर्म? क्या ये मूढ़ता नहीं? विधान में लोंग चढ़ाना और फिर इन लोंगों को घर ले जाकर अपनी तिजोरी में रखना, क्यों?- क्या भगवान् को चढ़ायी गई सामग्री या निर्माल्य-द्रव्य घर ले जाना पाप नहीं? क्या ये धर्म है? कोई विवेक नहीं, बस अंधों की तरह देखादेखी करते जा रहे हैं। पद्मावती, क्षेत्रपाल, चक्रेश्वरी, यक्ष-यक्षिणी आदि को जिनशासन के रक्षक के रूप में पूजना, चोला चढाना, शृंगार आदि करना, अर्थात् राग में धर्म मानना, फिर वह निर्माल्य-सामग्री घर ले चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार जाना, क्या यह मूढ़ता नहीं है? भाई! ये सब ‘धर्म’ नहीं है, धर्म के नाम पर होनेवाला ‘अधर्म’ है। सम्यग्दृष्टि-जीव वीतरागी देव, शास्त्र, गुरु के अलावा स्वप्न में भी किसी अन्य देवी-देवताओं को पूजना तो दूर नमस्कार भी नहीं करते। देव, गुरु,धर्म के नाम पर की जानेवाली हरप्रकार की मूढ़ता के पूर्ण-त्यागी होते हैं। इसप्रकार आठ-मद, आठ-मल, छह-अनायतन और तीन-मूढ़ता- ये सब मिलाकर सम्यक्त्व के 25 दोष हैं।

(दोहा)

ग्यान-गरब मति-मंदता, निठुर-वचन-उदगार।
रुद्रभाव आलस-दसा, नास पंच-परकार।। 37।।

शब्दार्थ :- ग्यान-गरब= ज्ञान का घमंड, मति-मंदता= बुद्धि की हीनता, निठुर-वचन उदगार= निष्ठुर/ निर्दयी-वचन बोलना, रुद्र-भाव= क्रोध का भाव, आलस-दसा= प्रमाद की स्थिति, नास पंच-परकार= इन पाँच-प्रकारों से सम्यग्दर्शन का विनाश होता है। विशेषार्थ :- सातवें वर्ण्यविषय के अंतर्गत कवि ने सम्यक्त्व के विनाशक पाँच-कारणों को वर्णित किया है। यद्यपि सम्यग्दर्शन प्राप्त करने के बाद जीव निश्चित ही मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। लेकिन कदाचित् पूर्वोपार्जित पाप-कर्म के उदय से या वर्तमान में किसी प्रलोभन आदि के कारण निम्नवर्णित पाँच-कारणों से सम्यग्दर्शन का विनाश भी हो सकता है। ‘पहला’ क्षयोपशमज्ञान या ज्ञान के उघाड़ पर गर्व होना, अर्थात् बहुत क्षयोपशम होने पर ‘‘मैं ज्ञानी हूँ’’- ऐसा अहंकार होने से सम्यक्त्व विनाश को प्राप्त होता है। ‘दूसरा’ कारण-बुद्धि की मंदता होना अर्थात् जिस ज्ञान से स्व-पर में भिन्नता का अभ्यास चलता है, उसका क्षीण हो जाना। ‘तीसरा’ कषायवश निष्ठुर, निर्दयी, पर-पीड़ाकारी कड़वे-वचन बोलना। ‘चौथा’ कषाय का उदय आने पर, या बाहर में प्रतिकूलताओं के होने पर साम्यभाव छोड़कर क्रोधरूप प्रवर्तन करना। ‘पाँचवाँ’ आचार-विचार, सामायिक, ध्यान आदि में प्रमादरूप-प्रवर्तन करना- इत्यादि कारणों से सम्यग्दर्शन का विनाश होता है।

(दोहा)

लोक-हास-भय भोग-रुचि, अग्र-सोच थितिमेव।
मिथ्या-आगम की भगति, मृषादर्सनी-सेव।। 38।।

(चौपाई)

अतीचार ए पंच-परकारा, समल करहिं समकित की धारा।
दूषन-भूषन-गति अनुसरनी, दसा-आठ समकित की वरनी।। 39।।

शब्दार्थ :- लोक-हास-भय= लोक में हँसी होने का भय, भोग-रुचि= भोगों में रुचि, अग्र-सोच थितिमेव= आगामीकाल के बारे में सोचना, मिथ्या-आगम की भगति= झूठे-शास्त्रों की भक्ति करना, मृषादर्सनी-सेव= मिथ्यादृष्टि की सेवा।। 38।। अतीचार ए पंच-परकारा= ये पाँचप्रकार के अतिचार, समल करहिं= मल-सहित/सदोष कर देते हैं, समकित की धारा= सम्यग्दर्शन की निर्मलधारा को, दूषन-भूषन-गति अनुसरनी= सदोष और निर्दोष-गति को प्राप्त करानेवाली, दसा-आठ समकित की वरनी= सम्यग्दर्शन की आठ-स्थितियों का वर्णन किया।। 39।। विशेषार्थ :- आठवें वर्ण्य-विषय के अंतर्गत कवि ने सम्यक्त्व के अतीचारों का वर्णन किया है। ‘अतिचार’ अर्थात् वह परिणाम, जिससे सम्यग्दर्शन की निर्मलता खंडित हो, उसमें दोष लगे। ऐसे पाँचप्रकार के अतिचारों का वर्णन कवि ने यहाँ किया है। ‘पहला’ लोक में हास्य का पात्र बनने का भय अर्थात् ‘‘मैं त्यागी-व्रतियों की तरह प्रवर्तन करूँगा, तो लोग क्या कहेंगे?’’ ‘दूसरा’ भोगों में रुचि- यद्यपि सम्यग्दृष्टि-जीव विषय-सेवन का पूर्णतः त्यागी नहीं होता है, परन्तु किसी भी विषय के अति-आसक्ति-पूर्वक सेवन का त्यागी अवश्य होता है, और यदि भोगों में आसक्ति वर्ते, तो ये सम्यग्दर्शन का अतिचार है। ‘तीसरा’ वीतरागता के पोषक शास्त्र ही पूज्य हैं,- ऐसा जानकर भी बिना विचारे मिथ्यात्व के पोषक-शास्त्रों की विनय करना। ‘चौथा’ आगामीकाल के बारे में सोचना, जब सब कुछ पूर्व निश्चित है, हम उसे बदलने में असमर्थ हैं; तो फिर उसके बारे में सोचकर अपना समय खराब करना सम्यग्दृष्टि-जीव के लिए उचित नहीं है। ‘पाँचवाँ’ मिथ्यादृष्टि-जीवों की सेवा करने का भाव बिना किसी स्वार्थ के नहीं होता, इसीलिए ऐसा प्रवर्तन होने पर सम्यग्दर्शन में दोष लगता है। इसप्रकार ये पाँचों अतिचार सम्यक्त्व की निर्मलधारा को मलिन करते हैं, इसलिए सम्यग्दृष्टिजीव को इन अतिचारों से बचने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। कविवर कहते हैं कि इसप्रकार सदोष और निर्दोष-गति को प्राप्त करानेवाले सम्यक्त्व के आठ-वर्ण्यविषयों का विवेचन यहाँ पूर्ण हुआ।

(दोहा)

प्रकृति-सात अब मोह की, कहूँ जिनागम जोइ।
जिनकौ उदै निवारिकै, सम्यग्दरसन होइ।। 40।।

(सवैया इकतीसा)

चारितमोह की च्यारि मिथ्यात की तीन तामैं, प्रथम-प्रकृति अनंतानुबंधी-कोहिनी।
बीजी-महामान-रस-भीजी मायामयी-तीजी, चौथी-महालोभ-दसा परिग्रह-पोहनी।।
पाँचई-मिथ्यातमति छट्ठी-मिश्र-परनति, सातई-समै-प्रकृति समकित-मोहनी।
एई षट-विग-वनिता-सी एक-कुतिया-सी, सातौं-मोहप्रकृति कहावैं सत्ता-रोहनी।। 41।।

शब्दार्थ :- प्रकृति-सात अब मोह की कहूँ जिनागम जोइ= अब मोह की सात-प्रकृतियों का वर्णन जिनागम के अनुसार कहता हूँ, जिनकौ उदै निवारिकै सम्यग्दरसन होइ= जिनका उदय-निवारण करने या अनुदय होने पर सम्यग्दर्शन होता है।। 40।। चारितमोह की च्यारि= चारित्रमोह की चार, मिथ्यात की तीन तामैं= उसमें मिथ्यात्व की तीन, प्रथमप्रकृति अनंतानुबध ं ी-कोहिनी= पहली-प्रकृति अनंतानुबधं ी-क्रोध, बीजी-महा-मानरसभीजी= दूसरी महा-मान के रस में भीगी हुई अनंतानुबधं ी-मान, मायामयी-तीजी= तीसरी अनंतानुबधं ी-माया, चौथी-महालोभ-दसा परिग्रह-पोहनी= चौथी परिग्रह को पुष्ट करनेवाली अनंतानुबधं ी-महा-लोभ, पाँचई-मिथ्यातमति= पाँचवी-मिथ्याबुद्धि, छट्ठी-मिश्रपरनति= छटवीं-मिश्र-परिणति, सातई-समै-प्रकृति= सातवीं-सम्यक्-प्रकृति, समकितमोहनी= सम्यक्त्व को मोहनेवाली, एई षट-विग-वनिता-सी= इनमें से पहली छह व्याघ्रनी के समान हैं, एक कुतिया-सी= एक कुतिया के समान है, सातौं-मोहप्रकृति= मोहनीय की ये सातों-प्रकृतियाँ, कहावैं सत्ता-रोहनी= आत्मसत्ता को रोहण करने या ढँकनेवाली हैं।। 41।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने जिनागम की साक्षीपूर्वक सम्यक्त्व में बाधक मोहनीय-कर्म की सात-प्रकृतियों का उदाहरण-सहित सटीक-विवेचन किया है, क्योंकि इन प्रकृतियों का उदय-निवारण चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार या अनुदय होने पर ही सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है। मोहनीय-कर्म अर्थात् वह कर्म जिसके उदय में अपने स्वरूप की विस्मृति और मोह, राग, द्वेषादि विकारी-भावों की उत्पत्ति होती हैं। मोहनीय-कर्म का उदय जीव को आत्म-स्वरूप का यथार्थ-श्रद्धान नहीं होने देता, उसे संसार में ही मोहित करके रखता है, इसलिये इसे मोहनीय-कर्म कहते हैं। जिसप्रकार मदिरापान जीव को मोहित करता है, उससमय जीव को सही-गलत, उचित-अनुचित का विवेक नहीं रहता, वह बावला-सा हो जाता है; उसीप्रकार मोहनीय-कर्म आत्मा को मोहित कर देता है। इस कर्म के संयोग से जीव निज-स्वरूप को भूलकर पर-पदार्थों में इष्ट-अनिष्टपने की कल्पना कर व्यर्थ-दुःखी होता है। यह कर्म आत्मा के श्रद्धा और चारित्र-गुण को घातता है। मोहनीय-कर्म के दो भेद हैं-एक ‘दर्शन-मोहनीय’ और दूसरा ‘चारित्र-मोहनीय’, और इसकी कुल 28 प्रकृतियाँ होती है। उनमें से जो सात-प्रकृतियाँ सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति में बाधक हैं, उनका वर्णन कवि ने इस छंद में किया है। सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति में सात-प्रकृतियाँ बाधक हैं, उनमें चारित्र-मोहनीय की चार और ‘मिथ्यात्व’ अर्थात् ‘दर्शन-मोहनीय’ की तीन हैं। प्रथम-प्रकृति ‘अनंतानुबध ं ी-क्रोध’, दूसरी-प्रकृति ‘अनंतानुबध ं ीमान’, तीसरी-प्रकृति ‘अनंतानुबध ं ी-माया’, और चौथी-प्रकृति ‘अनंतानुबध ं ी-लोभ’ है। पाँचवी-प्रकृति ‘मिथ्यात्व’, छठवीं-प्रकृति ‘मिश्र’ अर्थात् ‘सम्यक्मिथ्यात्व’, और सातवीं-प्रकृति ‘सम्यक्-प्रकृति’ है। ‘अनंतानुबध ं ी’ अर्थात् अनंत/मिथ्यात्व के साथ जिसका अनुबध ं है, वह ‘अनंतानुबध ं ी’ कषाय है। अभिप्राय की विपरीतता के कारण इसे सम्यक्त्व का घात करनेवाली और मोह-प्रेरित राग-द्वेष उत्पन्न कराने के कारण इसे चारित्र की भी घातक माना गया है। कवि ने इन-प्रकृतियों का विशेष-स्पष्टीकरण करते हुए कहा कि पहली छह-प्रकृतियाँ तो व्याघ्रनी के समान हैं, और एक अर्थात् सातवीं कूकरी/कुतिया के समान है। जैसे व्याघ्रनी किसी का भक्षण करने के लिये सीधा-झपट्टा मारती है और उसका घात कर देती है, ठीक उसीप्रकार ये पहली छहों-प्रकृतियाँ मिथ्यात्व-पोषक होने से सम्यक्त्व का सीधा-घात करती हैं। और सातवीं-प्रकृति को कुतिया के समान कहा अर्थात् जैसे कुतिया व्याघ्रनी-जैसी घातक तो नहीं है, परन्तु भौंक-भौंककर चित्त को शांत नहीं रहने देती या कहें एकाग्रता को भंग करती है; ठीक उसीप्रकार सम्यक्-प्रकृति या सम्यक्त्व-मोहनीय-प्रकृति भी सम्यक्त्व का सीधा-घात नहीं करती; परन्तु जीव को स्वरूप में एकाग्र भी नहीं होने देती। यद्यपि इसका काल बहुत-कम है; परन्तु जितना भी है, वह सम्यक्त्व में बाधक ही है। इसप्रकार ये सातों ही प्रकृतियाँ आत्मसत्ता को रोधन करती/ढँकती है, आत्म-स्वरूप को प्रकट नहीं होने देतीं हैं।

(छप्पय)

सात-प्रकृति उपसमहि, जासु सो उपमा-मंडित।
सात-प्रकृति छयकरन-हार, छायिकी अखंडित।।
सात-माँहि कछु खपै, कछुक उपसम-करि रक्खै।
सो छय-उपसमवंत, मिश्र समकित-रस रक्खै।।
षट्-प्रकृति उपसमै वा खपै, अथवा छय-उपसम करै।
सातई-प्रकृति जाके उदय, सो वेदक-समकित धरै।। 42।।

शब्दार्थ :- सात-प्रकृति उपसमहि= सातों-प्रकृतियों का उपशम करता है, जासु सो उपसम-मंडित= जिससे वह ‘औपशमिक-सम्यग्दृष्टि’ है, सात-प्रकृति छय-करन-हार= सातों-प्रकृतियों को क्षय करनेवाला, छायिकीअखंडित= अखंडित ‘क्षायिक-सम्यग्दृष्टि’ है, सात-माँहि कछु खपै, कछुक उपसम करि रक्खै= सात में से कुछ का क्षय और कुछ का उपशम करता है, सो छय-उपसमवंत= सो ‘क्षायोपशमिक-सम्यग्दृष्टि’ है, मिश्र समकित-रस चक्खै= वह मिश्ररूप सम्यक्त्व का रसास्वादन करता है, षट-प्रकृति उपसमै वा खपै= छहप्रकृतियाँ उपशम करे, अथवा क्षय करे, अथवा छय-उपसम करै= अथवा क्षय और उपशम करे, (और) सातईप्रकृति जाके उदय= सातवीं-प्रकृति का जिसके उदय होता है, सो वेदक-समकित धरै= वह ‘वेदक-सम्यक्त्व’ का धारी होता है। विशेषार्थ- इस-छंद में कवि ने गुणस्थान-विवेचन के अंतर्गत चतुर्थ-गुणस्थान अविरत-सम्यक्त्व में सम्यक्त्व के भेदों का वर्णन किया है। पिछले-छंद में वर्णित दर्शन-मोहनीय की तीन और चारित्र-मोहनीय की चार, कुल सात-प्रकृतियों का जो उपशम करता है, अर्थात् ये प्रकृतियाँ सत्ता में तो रहती हैं, पर उदय नहीं होता, उस समय जिस जीव को निज-स्वरूप की अनुभति ू होती है, वह ‘औपशमिक-सम्यग्दृष्टि’ कहलाता है। और जो जीव इन सातों-प्रकृतियों का क्षय करके निज-स्वरूप की अनुभति ू करता है, वह ‘क्षायिक-सम्यग्दृष्टि’ कहलाता है। क्षायिक-सम्यग्दर्शन अखंड रहता है अर्थात् कभी नहीं छूटता। ‘क्षायिक-सम्यग्दृष्टि’ अल्पकाल में नियम से मोक्ष जाता है। और जो जीव इन सात-प्रकृतियों में से कुछ का क्षय और कुछ का उपशम करते है, वे ‘क्षयोपशमिक-सम्यग्दृष्टि’ कहलाते हैं। ऐसे जीवों को मिश्र अर्थात् सम्यक्त्व के साथ-साथ सम्यक्त्व को मलिन करनेवाले-रस का मिला-जुला स्वाद आता है। और जो जीव सम्यक्त्व की घातक मोह की सातप्रकृतियों में से छह-प्रकृतियों का उपशम करे या उदयाभावी-क्षय करे, या कुछ का क्षय और कुछ का उपशम करे, परन्तु सातवीं ‘सम्यक्-प्रकृति’ का जिसके उदय हो, वह ‘वेदक- सम्यक्त्व’ का धारी होता है।

(दोहा)

छय-उपसम वरतैं त्रिविध, वेदक च्यारि-प्रकार।
छायक उपसम जुगल-जुत, नौधा-समकित धार।। 43।।

शब्दार्थ :- छय-उपसम वरतैं त्रिविध= क्षायोपशमिक-सम्यक्त्व तीनप्रकार का है, वेदक च्यारि-प्रकार= वेदक-सम्यक्त्व चारप्रकार का है, छायक-उपसम जुगल= क्षायिक और उपशम दो भेद हैं, जुत नौधा-समकित धार= इनको मिलाने से सम्यक्त्व के नौ भेद होते है। विशेषार्थ :- सम्यक्त्व के भेदों का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं क्षायोपशमिक-सम्यक्त्व के तीन भेद हैं, वेदक-सम्यक्त्व के चार भेद हैं, और क्षायिक और उपशम ये दो भेद- ऐसे कुल मिलाकर सम्यक्त्व के 9 भेद हैं।

(दोहा)

च्यारि-खिपै त्रय-उपसमै, पन-छै उपसम-दोइ।
छै-षट् उपसम-एक यौं, छय-उपसम-त्रिक होइ।। 44।।

शब्दार्थ :- च्यारि-खिपै त्रय-उपसमै= चार का क्षय व तीन का उपशम हो, पन-छै उपसम-दोइ= पाँच का क्षय, दो का उपशम, छै-षट् उपसम-एक= छह का क्षय, एक का उपशम, यौं छय-उपसम-त्रिक होइ= इसप्रकार क्षायोपशमिक-सम्यक्त्व तीनप्रकार का है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार विशेषार्थ :- क्षायोपशमिक-सम्यक्त्व के तीन-भेदों का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं, ‘पहला- भेद’ जिसमें चार (अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ) का क्षय और तीन (दर्शन-मोहनीय की तीन मिथ्यात्व, सम्यक्मिथ्यात्व, सम्यक्-प्रकृति) का उपशम होता है। दूसरे भेद में पाँच (अनंतानुबंधी की चौकड़ी और मिथ्यात्व) का क्षय और दो (मिश्र मिथ्यात्व और सम्यक्-प्रकृति) का उपशम होता है। तीसरे भेद में छह (अनंतानुबंधी की चौकड़ी, मिथ्यात्व और मिश्र मिथ्यात्व) का क्षय और एक (सम्यक्प्रकृति) का उपशम होता है। इसप्रकार क्षायोपशमिक-सम्यक्त्व के तीन भेद पूर्ण हुये।

(दोहा)

जहाँ च्यारि-परकिति खिपहिं, द्वै-उपशम इक-वेद।
छय-उपसम वेदक-दसा, तासु प्रथम यह भेद।। 45।।

पंच-खिपै इक-उपसमै, इक-वेदै जिहिं ठौर।
सो छय-उपसमै वेदकी, दसा-दुतिय यह और।। 46।।

छै-षट वेदै-एक जो, छायक-वेदक सोई।
षट-उपशम इक-प्रकृति विद, उपसम-वेदक होइ।। 47।।

शब्दार्थ :- जहां च्यारि-परकिति खिपहिं= जहाँ चार-प्रकृति का क्षय, द्वै-उपशम इक-वेद= दो का उपशम और एक का उदय, छय-उपसम वेदक दसा= (सो) क्षयोपशम-वेदक-दशा है, तासु प्रथम यह भेद= उसका यह पहला-भेद है।। 45।। पंच-खिपै इक-उपसमै= पाँच का क्षय और एक का उपशम, इक-वेदै जिहि ठौर= एक का उदय रहता है जिस दशा में, सो छय-उपसमै वेदकी दसा-दुतिय यह और= वह क्षयोपशम-वेदक-सम्यक्त्व नाम का दूसरा भेद है।। 46।। छै-षट वेदै-एक जो= छह का क्षय और एक का उदय, छायक-वेदक सोई= वही क्षायिक-वेदकसम्यक्त्व है, षट-उपशम इक-प्रकृति-विद= छह का उपशम और एक का उदय है, उपसम-वेदक होइ= वह उपशम-वेदक-सम्यक्त्व है।। 47।। विशेषार्थ :- उपर्युक्त-छंदों में कवि ने ‘वेदक-सम्यक्त्व’ के चार-भेदों का संक्षेप में वर्णन किया है। वे इसप्रकार हैं - 1. प्रथम क्षयोपशम-वेदक-सम्यक्त्व- इसमें अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ की चौकड़ी का क्षय होता है, और महा-मिथ्यात्व और सम्यक् मिथ्यात्व- इन दो-प्रकृतियों का उपशम होता है, और सम्यक्प्रकृति का उदय रहता है। 2. द्विताय-क्षयोपशम-वेदक सम्यक्त्व- इसमें अनंतानुबंधी-चौकड़ी और महा-मिथ्यात्व- इन पाँचप्रकृतियों का क्षय, मिश्र का उपशम और एक सम्यक्-प्रकृति का उदय रहता है। 3. क्षायिक-वेदक-सम्यक्त्व- इसमें अनंतानुबंधी की चौकड़ी, महामिथ्यात्व और मिश्र- इन छहप्रकृतियों का क्षय और एक सम्यक्-प्रकृति का उदय रहता है। 4. उपशम-वेदक-सम्यक्त्व- इसमें अनंतानुबंधी की चौकड़ी, महा-मिथ्यात्व और मिश्र- इन छहप्रकृतियों का उपशम और एक सम्यक्-प्रकृति का उदय रहता है।

(दोहा)

उपसम-छायक की दसा, पूरब षट-पदमाँहि।
कही प्रगट अब पुनरुकति, कारन वरनी नांहि।। 48।।

छय-उपसम-वेदक-खिपक, उपसम-समकित च्यारि।
तीन-च्यारि-इक-इक मिलत, सब नव-भेद बिचारि।। 49।।

शब्दार्थ :- उपसम-छायक की दसा= उपशम और क्षायिक-सम्यक्त्वों की स्थिति, पूरब षटपद-माँहि= पिछले छप्पय-छंद (42 नं.) में, कही प्रगट= प्रगटरूप में कही है, अब पुनरुकति-कारन वरनी नांहि= यहाँ पुनरुक्ति-दोष के कारण अब दुबारा नहीं कही है।। 48।। छय-उपसम-वेदक-खिपक उपसम-समकित च्यारि= क्षयोपशम, वेदक, क्षायिक और उपशम= यह चार-प्रकार का सम्यक्त्व, तीन च्यारि इक इक= तीन(क्षयोपशम), चार(वेदक), एक(क्षायिक), एक(उपशम) के क्रम से, मिलत सब नव-भेद बिचारि= सब मिलकर नौ भेद होते हैं, ऐसा विचार करो।। 49।। विशेषार्थ :- सम्यक्त्व के शेष दो भेदों का वर्णन क्यों नहीं किया ? इसका स्पष्टीकरण करते हुए कवि कहते हैं कि क्षायिक और उपशम-सम्यक्त्वों का स्वरूप पिछले (42 नंं के छंद) में वर्णित किया, अब यहाँ पुनरुक्ति-दोष के कारण पुन: वर्णित नहीं किया। सम्यक्त्व के क्षयोपशम-सम्यक्त्व, वेदक-सम्यक्त्व, क्षायिक-सम्यक्त्व और उपशम-सम्यक्त्व- ऐसे मूल चार भेद हैं। और क्षयोपशम-सम्यक्त्व के तीन, वेदक-सम्यक्त्व के चार, क्षायिक-सम्यक्त्व एक, उपशम-सम्यक्त्व एक- ऐसे कुल मिलाकर नौ उपभेद हैं।

(दोहा)

अब निहचै-विवहार, अरु सामान्य-विशेष-विधि।
कहौं च्यारि-परकार, रचना समकित-भूमि की।। 50।।

(सवैया इकतीसा)

मिथ्यामति गंठि-भेद, जगी निरमल-जोति, जोगसौं अतीत, सो तो निहचै प्रमानियै।
वहै दुंद-दसासौं कहावे, जोग-मुद्रा धरै, मति-श्रुतग्यान-भेद, विवहार मानियै।।
चेतना-चिहन पहिचानि, आपा-पर वेदै, पौरुष अलख तातैं, सामान्य बखानियै।
करै भेदाभेदकौ, विचार विसतार-रूप, हेय-गेय-उपादेयसौं विशेष जानियै।। 51।।

शब्दार्थ :- अब निहचै-विवहार अरु सामान्य-विशेष-विधि= अब निश्चय और व्यवहार और सामान्य और विशेष-विधि, कहौं च्यारि-परकार रचना समकित-भूमिकी= सम्यक्त्व की सत्ता/आधारभूमि की रचना के चारप्रकार कहता हूँ।। 50।। मिथ्यामति गंठि-भेद जगी निरमल-जोति= मिथ्यात्व का ग्रंथिभेद होने पर निर्मल-ज्योति प्रगट होती है, जोगसौं अतीत सो तो निहचै प्रमानियै= योगों से रहित उसे निश्चय-सम्यक्त्व मानना, वहै दुंद-दसासौं कहावै जोग-मुद्रा धरै= वही सम्यक्-ज्योति विकल्परूप-अवस्था में योग एवं मुद्रा आदि धारणकर, मति-श्रुतग्यानभेद विवहार मानियै= मतिज्ञान और श्रुतज्ञान के भेदरूप व्यवहार-सम्यक्त्व मानना, चेतना-चिहन पहिचानि आपा-पर वेदै= चेतना-लक्षण पहचानकर स्व और पर को भिन्न अनुभव करे (स्व-पर-भेदविज्ञान करे), पौरुष अलख तातैं सामान्य बखानियै= अंतरंग-पुरुषार्थ के बल पर (स्व-पर की भिन्नता का वेदन करता है) इसलिये चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार उसे ‘सामान्य’ कहा गया, करै भेदाभेदकौ विचार विसतार-रूप= जो विस्तार से (गुण-गुणी के) भेद और अभेद का विचार करके हेय-गेय-उपादेयसौं विशेष जानियै= हेय, ज्ञेय उपादेयरूप (प्रवर्तन करे) उसे ‘विशेष’ जानना।। 51।। विशेषार्थ :- यहाँ कवि ने सम्यग्दर्शन का निश्चय, व्यवहार, सामान्य और विशेष- इन चार-दृष्टियों से कथन किया है। मन-वचन-काय-तीनों योगों से रहित, निर्विकल्प, निर्विकार-आत्मानुभूति ही निश्चय-सम्यग्दर्शन है, और ‘निश्चय सम्यग्दर्शन’ के साथ होनेवाली योगसहित विकल्पात्मक-अवस्था व्यवहार-सम्यग्दर्शन है। चेतना-लक्षण को पहचानकर ‘स्व’ और ‘पर’ की भिन्नतारूप अंतरंग-पुरुषार्थ को ‘सामान्य-सम्यग्दर्शन’ कहा गया है। और विस्तार से ‘गुण और गुणी के भेदाभेद’ रूप, तथा ‘हेय, ज्ञेय उपादेय का विचार’ करते हुए तदनुरूप-प्रवर्तन करने को ‘विशेष-सम्यग्दर्शन’ जानना। एक अन्य-विद्वान् ‘नाना रामचंद्र नाग’ ने ‘नाटक समयसार’ के मर्म को विवेचित करते हुए अपनी टीका में यहाँ कहे गये सम्यक्त्व के इन विभिन्नरूपों को इसप्रकार विवेचित किया है- ‘‘मोहनीय, ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी और अंतराय इन चार घातिया-कर्मों का क्षयकर, जिसके निर्मल-ज्ञानज्योति प्रगट हुई है, जो मन, वचन, काय तीनों योगों (की चंचलता) से रहित हैं, ऐसे केवलज्ञानी ‘निश्चय-सम्यक्त्व’ है। और जो दिगम्बर-दीक्षा धारणकर, आत्मध्यान भी धारण करे, और आहारादि की इच्छा भी करें, ऐसी द्वंददशा-रूप प्रवर्तन करते हैं, ऐसे मति-श्रुतज्ञान के भेद-पर्यंत ‘व्यवहार-सम्यक्त्व’ है। जो स्व-पर को पहिचाने, और कर्म के उदयरूप सुख और दुःख को वेदे हैं, और चारित्र-मोहनीय के उदय में अल्प-पुरुषार्थ (व्रतादिक) धारण करें या अविरत रहें, सो सामान्य-सम्यक्त्व है। और जो आत्मा गुणी है और ज्ञान उसका गुण है, ऐसे भेदाभेद-रूप का विस्तार से विचार करे, और हेय यानि त्यागनेयोग्य वस्तुओं का त्याग करे, और ग्रहण करने योग्य-वस्तुओं को ग्रहण करे, सो ‘विशेष-सम्यक्त्व’ है।’’ विशेष टिप्पणी- यहाँ मूलग्रंथ के एकमात्र टीकाकार-विद्वान् ने इन चारों सम्यक्त्वों के धारकों की भिन्नभिन्न भूमिकाओं की चर्चा इस प्रकार की है। पहले निश्चय-सम्यक्त्व की भूमिका में वीतरागी अरिहंतकेवली को बताया है। दूसरी ‘व्यवहार-सम्यक्त्व’ की भूमिका निर्ग्रन्थ-साधुओं/भावलिंगी-मुनिवरों की बतायी गयी है। तीसरी ‘सामान्य-सम्यक्त्व’ की भूमिका उन्होंने अणुव्रती/देशव्रती की बतायी है। और ‘विशेष-सम्यक्त्व’ की भूमिका में किसी का उल्लेख तो नहीं किया है; किन्तु प्रकरण सम्यग्दृष्टि-जीव या सम्यग्दर्शन का है, अतः उससे भिन्न कोई पात्र तो लिया नहीं जा सकता है, अतः उन्होंने यहाँ ‘अविरतिसम्यग्दृष्टि’ का ग्रहण किया है- ऐसा अभिप्राय समझकर यह कहा गया है। किन्तु इस वर्गीकरण का उन्होंने कोई आधार नहीं बताया है। मैं उन पर कोई आशंका व्यक्त नहीं कर रही हू,ँ किन्तु मेरी जिज्ञासा यह अवश्य है कि मूल-ग्रंथकार कविवर पं. बनारसीदास जी ने इन भूमिकाओं के बारे में किसी रूप में चर्चा या संकेत यहाँ इस छंद में नहीं किया है। साथ ही सम्यक्त्व के इन चारों-भेदों के स्वरूप-वर्णन करते समय भी उन्होंने ऐसा कोई संकेत नहीं किया है, जिनसे इन भूमिकाओं को लक्षित किया जा सके। वैसे भी निश्चय और व्यवहार सम्यग्दर्शनों को दो भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में कहीं वर्णित नहीं किया गया है। उसी गुणस्थान में निर्विकल्प-आत्मानुभति ू को ‘निश्चय-सम्यग्दर्शन’, तथा आत्मानुभति ू के काल के अलावा सविकल्प-अवस्था को ‘व्यवहार-सम्यग्दर्शन’ कहा जाना सुसगं त भी है। जब इन दोनों की भूमिकाओं में यह अंतर है, तो शेष ‘सामान्य’ और ‘विशेष’ नामक सम्यग्दर्शन के भेदों की भूमिकाओं की वास्तविकता भी अनुसन्धेय है। क्योंकि इसतरह के भेदों का परिचय जिनागम में प्रायः दुर्लभ है। अतः इनकी वास्तविकता जानने के लिये अपेक्षित-साक्ष्यों का व्यापक-अनुसंधान किया जाना आवश्यक है।

(दोहा)

थिति सागर-तेतीस, अंतर्मुहुरत एक वा।
अविरत-समकित-रीति, यह चतुर्थ-गुनथान इति।। 52।।

शब्दार्थ :- थिति सागर-तेतीस अंतर्मुहुरत एक वा= (उत्कृष्ट)स्थिति तैंतीस-सागर अथवा एक अंतर्मुहुर्त (जघन्य) अविरत-समकित-रीति यह चतुर्थ-गुनथान इति= यहाँ अविरत-सम्यक्त्व नामक चतुर्थ-गुणस्थान का वर्णन पूर्ण हुआ। विशेषार्थ :- चतुर्थ-गुणस्थान का विवेचन पूर्ण करते हुए कविवर कहते हैं कि इस गुणस्थान का उत्कृष्ट-काल तैंतीस-सागर और जघन्य-स्थिति/काल अंतर्मुहुर्त है।

(दोहा)

अब वरनौं इकईस-गुन, अरु बाबीस-अभक्ष।
जिनके संग्रह-त्यागसौं, सोभै श्रावक-पक्ष।। 53।।

(सवैया इकतीसा)

लज्जावंत दयावंत प्रसंत प्रतीतवंत, परदोषकौ ढकैया पर-उपगारी है।
सौमदृष्टी गुनग्राही गरिष्ट सबकौं-इष्ट, शिष्टपक्षी मिष्टवादी दीरघ-विचारी है।।
विशेषग्य रसग्य कृतग्य तग्य धरमग्य, न दीन न अभिमानी, मध्य-विवहारी है।
सहज-विनीत, पापक्रियासौं अतीत ऐसौ, श्रावक पुनीत इकवीस-गुनधारी है।। 54।।

शब्दार्थ :- अब वरनौं इकईस-गुन= अब इक्कीस-गुणों का वर्णन करता हूँ, अरु बाबीस-अभक्ष= और बाईस-अभक्ष्यों का, जिनके संग्रह-त्यागसौं= जिनके ग्रहण (गुणों को) और त्याग (अभक्ष्य को) से, सोभै श्रावक-पक्ष= श्रावक का व्यक्तित्व सुशोभित होता है।। 53।। लज्जावंत= लज्जावान्, दयावंत= दयावान्, प्रसंत= मंदकषायी, प्रतीतवंत= श्रद्धावान्, परदोषकौ ढकैया= दूसरे के दोषों को ढँकनेवाला, पर-उपगारी है= परोपकारी, सौमदृष्टी= सौम्य-दृष्टि, गुनग्राही= गुणों को ग्रहण करनेवाला, गरिष्ट= गंभीर/सहनशील, सबकौं इष्ट= सभी को प्रिय, शिष्टपक्षी= सत्य का पक्षधर, मिष्टवादी= मीठे-वचन बोलनेवाला, दीरघ-विचारी है= सोच-विचार करके निर्णय लेनेवाला, विशेषग्य= विशेषज्ञ/अनुभवी, रसग्य= शास्त्रों के मर्म को जाननेवाला, कृतग्य= दूसरों के उपकार को न भूलनेवाला, तग्य= तत्त्वज्ञानी, धरमग्य= धर्मज्ञ/धर्मात्मा, न दीन न अभिमानी= दीनता व अभिमान= दोनों नहीं करनेवाला, मध्यविवहारी है= दोनों के बीच का व्यवहार करनेवाला, सहज विनीत= सहज विनयवान्, पापक्रियासौं अतीत= पाप-क्रियाओं से रहित, ऐसौ श्रावक पुनीत इकवीस-गुनधारी है= एेसे पवित्र 21 गुणों को धारण करनेवाला श्रावक होता है।। 54।। विशेषार्थ- पंचम-गुणथानवर्ती श्रावक के 21 गुणों का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं ‘‘लज्जावान् (शील गुण का धारक), दयावान् (जीवमात्र के प्रति दया का भाव होना), मंदकषायी (कषायों की मंदतावाला), श्रद्धावान् (वीतरागी देव-शास्र-गुरू और निजात्मा का दृढ़-श्रद्धानी), दूसरों के दोषों को ढँकनेवाला चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार (उपगूहन-अंग का धारी), परोपकारी (दूसरों का उपकार करनेवाला), सौम्य-दृष्टि (समताभावी), गुणों को ग्रहण करनेवाला, गंभीर/सहनशील, सर्वप्रिय, सत्य का पक्षधर, मिष्ट-वचन बोलनेवाला, अग्रसोची (दूरदर्शी/सोच-विचारकर निर्णय लेनव े ाला), विशेष-ज्ञानी/अनुभवी, शास्त्रों के मर्म को जाननेवाला, कृतज्ञ (दूसरों के उपकार को न भूलने वाला) तत्त्वदर्शी (तत्त्वज्ञान का मर्मज्ञ), धर्मज्ञ/धर्मात्मा, न दीनता का धारक और न अभिमानी बल्कि मध्य-व्यवहारी अर्थात् समान व्यवहार करनेवाला, सहज विनयवान्, पाप-क्रियाओं से रहित- सच्चा-श्रावक ऐसे पवित्र 21 गुणों को धारण करनेवाला होता है।’’

(कवित्त)

ओरा घोरबरा निसिभोजन, बहुबीजा बैंगन संधान।
पीपर बर ऊमर कठूंबर, पाकर, जो फल होइ अजान।।
कंदमूल माटी विष आमिष, मधु माखन अरु मदिरापान।
फल अति-तुच्छ तुसार चलित-रस, जिनमत ए बाईस-अखान।। 55।।

शब्दार्थ :- ओरा= ओला/बारिश में गिरनेवाले बर्फ के गोले, घोरबरा= दहीबड़ा/द्विदल, निसिभोजन= रात्रि- भोजन, बहुबीजा= बहुत बीजवाले-पदार्थ, बैंगन= बैंगन, संधान= गला हुआ /अमर्यादित अचार-मुरब्बा आदि, पीपर= पीपल का फल, बर= बड़ का फल, ऊमर= ऊमर-फल, कठूंबर= कठूमर/कटहल-फल, पाकर= पाकरफल, जो फल होइ अजान= जो फल अनजान/अपरिचित हो, कंदमूल= कंदमूल, माटी= मिट्टी, विष= जहर, आमिष= माँस, मधु= शहद, माखन= मक्खन, अरु मदिरापान= और शराब, फल अतितुच्छ= अतिसूक्ष्मफल, तुसार= बर्फ, चलित-रस= जिनका स्वाद खराब हो जाये, जिनमत ए बाईस अखान= जिनमत में ये 22 पदार्थ अभक्ष्य (नहीं खाने योग्य) कहे गये हैं। विशेषार्थ :- बाईस अभक्ष्यों का संक्षिप्त-वर्णन करते हुए कविवर बनारसीदास जी कहते हैं ओला (आसमान से गिरनेवाले बर्फ के टुकड़े), द्विदल ( जिन दालों के दो समभाग होते हैं, या कहें दो दल होते हैं, उन्हें कच्चा दूध या गरम दूध, उससे बने दही, मठा/छाछ आदि के साथ मिलाकर खाना जैसे दहीबड़ा, छाछ की कढ़ी आदि), रात्रि-भोजन, बहुबीजा (बहुत-अधिक बीजोंवाले फल ), बैंगन, संधान (सभी प्रकार के गले हुये/अमर्यादित अचार, मुरब्बा आदि), पीपल का फल, बड़ का फल, ऊमर-फल, कठूंबर/कटहल-फल, और पाकर/अंजीर-फल (पंच-उदुम्बर-फल), अनजान-फल (जिन फलों को हम पहिचानते नहीं है), कंदमूल, मिट्टी, जहर, माँस (मृत-शरीर का भक्षण, घुना हुआ अनाज आदि), शहद-(मधुमक्खियों के लार, मल-मूत्रादि से निर्मित-मधुपदार्थ), मक्खन (नोनी, ताजा-मक्खन भी अंतर्मुहूर्त के बाद अभक्ष्य हो जाता है), शराब, अतिसूक्ष्म-फल (बहुत छोटे फल), बर्फ (अनछने या अमर्यादित-जल से बनी बर्फ), चलित-रस ( जिनका स्वाद खराब हो जाये)- ये बाईस पदार्थ जिनाम्नाय में ‘अभक्ष्य’ कहे हैं, अर्थात् श्रावकों के खाने योग्य नहीं है।

(दोहा)

अब पंचम-गुणथान की, रचना बरनौं अल्प।
जामैं एकादश-दशा, ‘प्रतिमा’ नाम विकल्प।। 56।।

(सवैया इकतीसा)

दर्सन-विसुद्धकारी, बारह-विरतधारी, सामाइकचारी, पर्व-प्रोषधविधि वहै।
सचितकौ परिहार, दिवा अपरस-नारी, आठौं जाम ब्रह्मचारी, निरारंभी ह्वै रहै।।
पाप-परिग्रह छंडै, पाप की न शिक्षा मंडै, कोऊ याकै निमित्त, करै सो न वस्तु गहै।
एेते देसव्रत के, धरैया समकिती-जीव, ग्यारह-प्रतिमा तिन्हैं भगवंतजी कहै।। 57।।

शब्दार्थ :- अब पंचम-गुणथान की रचना बरनौं अल्प= अब पंचम-गुणस्थान की रचना का संक्षिप्त-वर्णन करता हूँ, जामैं एकादस-दसा प्रतिमा नाम विकल्प= जिसमें ग्यारह-प्रकार की ‘प्रतिमा’ नाम से विकल्प/भेद होते हैं।। 56।। दर्सन-विसुद्धकारी= दर्शन में विशुद्धि उत्पन्न करनेवाली, बारह विरतधारी= बारह-व्रतों को धारण करनेवाली, सामाइकचारी= सामायिक का आचरण, पर्व-प्रोषध-विधि वहै= पर्व में प्रोषध-विधि से उपवास करना, सचितकौ परिहारी= सचित्त का त्यागी, दिवा अपरस-नारी= दिन में नारी-स्पर्श/सेवन का त्यागी, आठौंजाम ब्रह्मचारी= आठों-पहर स्त्री का त्यागी, निरारंभी ह्वै रहै= आरंभ का त्यागी होना, पाप-परिग्रह छंड=ै पाप के कारणभूत-परिग्रह का त्यागी, पाप की न शिक्षा मंडै= पाप-कार्य को करने की शिक्षा/अनुमति का त्यागी, कोऊ याकै निमित्त करै, सो न वस्तु गहै= कोई इनके निमित्त भोजनादि बनाये, उसे ग्रहण नहीं करना, एेते देसव्रत के धरैया= ऐसे देशव्रत को धारण करनेवाले, समकिती-जीव= सम्यग्दृष्टि-जीव (के लिए), ग्यारह-प्रतिमा तिन्हैं भगवंतजी कहै= इनके ग्यारह-प्रतिमायें जिनेन्द्रदेव ने कही हैं।। 57।। विशेषार्थ :- गुणस्थान विवेचन के क्रम में अब कविवर पंचमगुणस्थान की विवेचना प्रारंभ करते हैं। जिसमें ग्याारह प्रकार की प्रतिमाओं का वर्णन आगम में वर्णित है। जो इसप्रकार है- 1. दर्शन-विशुद्धि-प्रतिमा- यह प्रतिमा सम्यग्दर्शन में विशुद्धि उत्पन्न करनेवाली है, अर्थात् इसके पालने से आत्मस्वरूप में स्थिरता बढ़ती है। 2. व्रत-प्रतिमा- इस प्रतिमा को धारण करनेवाले जीव आंतरिक-विशुद्धि के साथ-साथ श्रावक के लिये निर्दिष्ट बारह-व्रतों का निरतिचार-पालन करते हैं। 3. सामायिक-प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव बाह्य में मन-वचन-काय की स्थिरतापूर्वक पंचपरमेष्ठी के स्वरूप का चिंतन, और अंतरंग में निज-स्वरूप का चिंतन करते हुए स्वरूप में स्थिरता का पुरुषार्थ करते हैं, जिसे ‘सामायिक’ कहते हैं। 4. प्रोषध-प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव अष्टमी, चतुर्दशी, अष्टाह्निका, दशलक्षण आदि पर्व के