अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| प्रस्तावना भाग १ · भाग २ | |
| ग्रंथकार कविवर पं. बनारसीदास जी का संक्षिप्त जीवन-परिचय | |
| नाटक-समयसार का समीक्षात्मक-विश्लेषण | |
| १ | मंगलाचरण तथा उत्थानिका |
| २ | जीव द्वार (१) |
| ३ | अजीव द्वार (२) |
| ४ | कर्त्ता-कर्म द्वार (३) |
| ५ | पुण्य-पाप-एकत्व द्वार (४) |
| ६ | आस्रव द्वार (५) |
| ७ | संवर द्वार (६) |
| ८ | निर्जरा द्वार (७) भाग १ · भाग २ |
| ९ | बंध द्वार (८) भाग १ · भाग २ |
| १० | मोक्ष द्वार (९) भाग १ · भाग २ |
| ११ | सर्वविशुद्धि द्वार (१०) भाग १ · भाग २ · भाग ३ |
| १२ | स्याद्वाद द्वार (११) |
| १३ | साध्य-साधक द्वार (१२) भाग १ · भाग २ |
| १४ | चतुर्दश गुणस्थानाधिकार (१३) भाग १ · भाग २ |
| १५ | प्रशस्ति |
मंगलाचरण तथा उत्थानिका
‘नाटक-समयसार’ जी की ‘जिज्ञासु-जन-रंजनी-टीका’ का मंगलाचरण (‘नाटक-समयसार’ जी के नव-प्रकाश्य-संस्करण की टीका में निबद्ध आदि-मंगल)
समयसार-नाटक-ग्रंथ समय का सार है।
आत्मतत्त्व का गहन-रहस्य अपार है।।
संसारी से सिद्ध-पर्यंत की जो साधना।
इसमें उसका मर्म बताया अपरम्पार है।। 1।।
कुन्दकुन्दाचार्य का ग्रंथराज ‘समयसार’ था।
‘आत्मख्याति’ के कलश मनु मंगलाचार था।।
पांडे राजमल्ल ने रची वृत्ति-‘बालबोधिनी’।
इन सबसे ही बना ‘नाटक-समयसार’ था।। 2।।
मूल-ग्रंथ अरु टीका का मर्म समाहित है।
अध्यात्म की चिद्-अमृतधार प्रवाहित है।।
निश्चय अरु व्यवहारमयी-तत्त्वज्ञान की, चिन्मय-कल्पतरु-सुमन-गंध सुवासित
है।। 3।।
नाटक यहाँ संसार का प्रतिपल चल रहा।
मोह और मिथ्यात्व ही निरन्तर पल रहा।।
इसके अविरल-क्रम के सतत-विनाश को,
समयसार का नाटक यह कविवर ने रचा।। 4।।
नमूँ सिद्ध-परमात्मा अरु निज-शुद्धात्म को।
अप्रतिबुद्घ-जीव लहें आत्म-स्वभाव को।।
यही भावना सतत अन्तर्निहित इस ग्रन्थ में,
मैं भी पाऊँ नित्य-निरंजन शुद्ध-स्वभाव को।। 5।।
।। अथ श्रीनाटक-समयसाराख्य-ग्रन्थः आरभ्यते।।
ग्रंथकार का मंगलाचरण
(मनहर-छंद)
करम-भरम जग तिमिर-हरन खग, उरग-लखन-पग सिवमग-दरसी।
निरखत नयन भविक जल बरखत, हरखत अमित भविकजन-सरसी।।
मदन-कदन-जित परम धरम-हित, सुमिरत भगति भगति सब डरसी।
सजल-जलद-तन मुकुट सपत-फन, कमठ-दलन-जिन नमत बनरसी।। 1।।
शब्दार्थ :- करम-भरम जग-तिमिर-हरन खग= कर्मभ्रम-रूपी संसार के अंधकार को हरण करने के लिये सूर्य के समान हो, उरग-लखन-पग= उरग (साँप) लक्षण है जिनके पैर में, सिवमग-दरसी= मोक्षमार्ग को दरसानेवाले हैं, निरखत नयन भविक जल बरखत= आपको देखकर भव्य-जीवों के नेत्रों से जल बरसता है। मदन-कदन-जित= कामदेव को युद्ध में जीत लिया है, परम-धरम-हित= उत्कृष्ट-धर्म के हितकारी हैं, सुमिरत भगति भगति सब डरसी= स्मरण करने से भव्यजीवों के सभीप्रकार के डर भाग जाते हैं, सजल-जलद-तन= जिनका शरीर जल से भरे हुये बादलों के समान श्यामलवर्णी है, मुकुट सपत-फन= जिनके सिर पर सात-फण का मुकुट है, कमठ-दलन= कमठ के मद को दलन करनेवाले, जिन नमत बनरसि= ऐसे ‘जिनेन्द्र-देव’ को बनारसीदास नमस्कार करते हैं। विशेषार्थ :- कविवर बनारसीदास जी कहते हैं जिसप्रकार सूर्य के निकलने से सारे संसार का अंधकार एक क्षण में दूर हो जाता है, ठीक उसीप्रकार हे भगवन्! आप उस सूर्य के समान हो जिसके पास आने पर कर्मभ्रमरूपी अंधकार क्षण में दूर हो जाता है। अभिप्राय यही है कि भावपूर्वक आपके दर्शन करने मात्र से ही कर्मों का क्षय हो जाता है। कविवर कहते हैं मैं उनकी वंदना कर रहा हूँ, जिनके पैर में उरग यानि सर्प का चिह्न बना हैं, अर्थात् मंगलाचरण में कवि ने ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ को नमन किया है। कैसे हैं पार्श्वनाथ? ‘सिवमग-दरसी’ अर्थात् ‘मोक्षमार्ग को दर्शानेवाले’ हैं। हे भगवन्! आपको देखते ही भव्यजीवों के नेत्रों से आनंद के अश्रु बहने लगते हैं। जिसप्रकार सूर्य को देखकर सरोवर में कमल खिलने लगते हैं, ठीक उसीप्रकार आपको देखते ही हर्ष के कारण भव्यजीवों के ह्रदयरूपी कमल खिल जाते हैं। जिसप्रकार युद्ध में राजा को पराजित करके जीत हासिल होती है, ठीक उसीप्रकार हे भगवन्! सारे संसार का राजा कामदेव, जिसने सबको अपने वश में कर रखा है, आपने उसे भी जीत लिया है। आप जगत् के सभीजीवों के लिये धर्म का उपदेश देने से ‘परम-हितकारी’ हो। आपके स्मरण करने मात्र से ही भव्यजीवों के सभी डर दूर हो जाते हैं। जिसप्रकार जल से भरे बादल गर्मी से संतप्त-जीवों को शीतलता प्रदान करते हैं, ठीक उसीप्रकार आपका शरीर विषयभोग की अग्नि से संतप्त जगत् के जीवों के लिये जल से भरे बादलों के समान शीतलता प्रदान करने वाला है, अर्थात् आपके पास आने पर सहज ही शांति की अनुभूति होती है। आपके सिर पर सप्त-फणों का सुंदर-मुकुट शोभायमान हो रहा है। आप ‘कमठ’ के मद को दलन यानि नष्ट करने वाले हो- ऐसे जिनेन्द्रदेव ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ को बनारसीदास विनयपूर्वक नमन करते हैं।
(छप्पय-छंद)
सकल-करम-खल-दलन, कमठ-सठ-पवन कनक-नग।
धवल परम-पद-रमन, जगत्-जन-अमल-कमल-खग।।
परमत-जलधर-पवन, सजल-घन-सम-तन समकर।
पर-अघ-रजहर जलद, सकल-जन-नत भव-भय-हर।।
जम-दलन नरकपद-क्षयकरन, अगम अतट भवजल-तरन।
वर-सबल-मदन-वन-हरदहन, जय जय जय अभयकरन।। 2।।
शब्दार्थ :- सकल-करम-खल-दलन= समस्त कर्मरूपी-शत्रु को नष्ट करनेवाले हो, कमठ-सठ-पवन कनक-नग= मूर्ख-कमठ के द्वारा चलाई गई आँधी में भी आप स्वर्ण-पर्वत अर्थात् सुमेरु पर्वत के समान अडिग, धवल परम-पद-रमन= निर्मल/पवित्र सर्वोत्कृष्ट-पद (आत्मा) में रमण करने वाले हो, जगत्-जन-अमल4 कमल-खग= जगत् के जीवोंरूपी कमलों को खिलाने के लिये सूर्य के समान हो, परमत-जलधर-पवन= अन्यमतरूपी मेघों को उड़ाने के लिये हवा के समान हो, सजल-घन-सम-तन= जिनका शरीर जल से भरे बादलों के समान श्यामल-वर्ण का है, समकर= समता को प्रदान करनेवाले, पर-अघ-रजहर-जलद= परलक्ष्यी विकाररूपी धूलि को धोने के लिए मेघ के समान, सकल-जन-नत= जगत् के समस्त जीव जिन्हें नमन करते हैं, भव-भय-हर= संसार के भय को हरनेवाले हो, जम-दलन= मृत्यु के भय को नष्ट करनेवाले हो, नरक-पदछयकरन= नरकगति का क्षय करनेवाले हो, अगम= जिन्हें पूरीतरह समझ सकना कठिन है, अतट= जिनके गुणों का पार पाना अशक्य है अर्थात् अपार गुणसमूह के धनी, भव-जल-तरन= संसार-समुद्र से पार करनेवाले, वर सबल मदनवन हर-दहन= विशाल और सबल/सघन कामदेवरूपी वन को जलाने के लिये रुद्र की अग्नि के समान हो, जय जय परम अभयकरन= जीवों को श्रेष्ठ अभयदान करनेवाले आपकी बारम्बार जय हो। विशेषार्थ :- ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ की स्तुति करते हुये कविवर कहते हैं कि हे भगवन्! आपने शत्रु- समान समस्त-कर्मों को नष्ट कर दिया है, अर्थात् आप ज्ञानावरणादि-आठों-कर्मों से रहित ‘निष्कर्म’ हो, कमठ के उपसर्गोंरूपी आँधी के बीच में भी आप सुमेरू-पर्वत के समान अडिग रहे, अर्थात् कमठ द्वारा किये गये घोर-उपसर्गों में भी आपका चित्त तनिक भी विचलित नहीं हुआ, और हम अज्ञानी-जीव जरासी प्रतिकूलता आते ही डगमगा जाते हैं, यह जानते हुये भी कि ‘जो होना है सो निश्चित है’। हे भगवन्! आप तो सदाकाल अपने परम-स्वच्छ आत्मस्वरूप में ही रमण करते हो, लेकिन आपकी निर्मलता का प्रभाव ऐसा है कि आपके दरबार में आने पर जगत् के जीव सहज ही विकारोंरूपी मल से रहित/अमल हो जाते हैं। जिसप्रकार सूर्य के उदय होने पर कमल स्वयं खिल जाता है, ठीक उसीप्रकार हे भगवन्! आप भव्यजीवों के मनरूपी कमल को खिलाने के लिये सूर्य के समान हो, अर्थात् आपके समक्ष आने पर जगत् के जीवों को स्वयं ही आनंद की अनुभूति होती है। ‘परमत’ यानि अन्यमतरूपी सघन-बादलों को उड़ाने के लिये आप वायु के प्रचण्ड-वेग के समान हो अर्थात् जिसप्रकार आकाश में छाये घनघोर-बादलों को भी हवा अपने वेग से उड़ा ले जाती है, ठीक उसीप्रकार कुगुरु-कुदेव-कुधर्म और उनके प्रशंसकों की मिथ्या-मान्यताओं का खंडन करने के लिये अाप प्रचण्ड-पवन के वेग के समान हो। जिसप्रकार जल से भरे बादल श्यामल और शीतलता प्रदान करनेवाले होते है, ठीक उसी प्रकार आपकी श्यामल-काया निर्मल-जल से भरे बादलों के समान शीतलता और समता प्रदान करनेवाली है। परलक्षी-पापभावों रूपी ‘रज’ या धूल को धोने के लिये आप जलधर-मेघ के समान हो, अर्थात् जिसप्रकार कितनी भी अधिक रज या धूल क्यों न हो जल से साफ हो जाती है, ठीक उसीप्रकार पापभावों की गंदगी कितनी भी अधिक क्यों न हो आपकी भक्तिरूपी-जल से क्षणभर में ही सारे पाप धुल जाते हैं। आप संसारी-जीवों के भयंकर जन्म-मरणरूपी दुःखों को हरनेवाले हो, इसीलिये तीनों-लोकों के समस्त-जीव आपको बारम्बार नमन करते हैं। आपने ‘जम’ यानि मृत्यु को जीत लिया है, अर्थात् आप जन्म-मरण से रहित अविनाशी हो। हे भगवन्! भावपूर्वक आपकी भक्ति करनेवाले जीवों को कभी नरक गति की प्राप्ति नहीं होती है। आपकी महिमा ‘अगम’ है, अर्थात् आपकी महिमा का गुणगान करने में जब गणधरदेव भी समर्थ नहीं है, तो मैं अल्पबुद्धि आपकी महिमा का गुणगान कैसे कर सकता हूँ? ‘अतट’ यानि आपके गुणोंरूपी समुद्र काे पार पाना अशक्य है, जैसे समुद्र के जल को पार करना अशक्य है, ठीक उसीप्रकार भगवन् आपके अनंत गुणों का वर्णन करना अशक्य है। आप ‘भव-जल’ अर्थात् संसाररूपी समुद्र को पार करने के लिये जहाज के समान हो। जिसप्रकार जहाज में बैठकर हम समुद्र के उस पार जाने में समर्थ होते हैं, ठीक उसीप्रकार आपके स्मरण/भक्ति/गुणगानरूपी जहाज से हम जगत् के जीव संसार-सागर के उस पार यानि मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। हे भगवन्! आप जगत् में सर्वश्रेष्ठ हो, बलवान हो। कहा जाता है कि शंकर जी की तीसरी आँख ने कामदेव को भस्म कर दिया था; ठीक उसीप्रकार आप जगत् के जीवों को वश में करने वाले कामदेव को भस्म करने के लिये शंकर जी की तीसरी आँख के समान हो। हे जगत् के सर्वश्रेष्ठ रक्षक भगवान् पार्श्वनाथ! आपकी सदैव जय हो। (यह कर्त्तावादी-कथन नहीं है, बल्कि उस युग में जैन-मनीषी भी जिनेन्द्र-भक्ति में बहुमानपूर्वक ऐसे विशेषण जिनेन्द्रदेव की सर्वोत्कृष्टता बताने के लिये प्रयोग करते थे। उसी के अनुरूप यह युगप्रभावी-प्रयोग है।)
(सवैया इकतीसा)
जिन्हि के वचन उर-धारत जुगल-नाग, भए धरनिंद-पदुमावति पलक में।
जाकी नाम-महिमा सौं कुधातु कनक धरैं, पारस-पखान नामी भयौ है खलक में।।
जिन्ह के जनमपुरी-नाम के प्रभाव हम, अपनौ-स्वरूप लख्यौ भानु सौं भलक में।।
तेई प्रभु-पारस महारस के दाता अब, दीजै मोहि साता दृगलीला की ललक में।। 3।।
शब्दार्थ :- जिन्हिं के वचन उर-धारत जुगल-नाग= जिन भगवान् पार्श्वनाथ के वचन/उपदेश हृदय में धारण करके नाग-नागिनी का जोड़ा, भए धरनिंद-पदुमावति पलक में= पलक झपकते ही यानि बहुत कम समय में धरणेन्द्र-पद्मावती हो गए, जाकी नाम-महिमा सौं कुधातु कनक धरैं= जिनके नाम-स्मरण से लोहा सोना हो जाता है, पारस-पखान नामी भयौ है खलक में= पारस-पत्थर प्रसिद्ध हुआ है जगत् में, जिन्ह की जनमपुरीनाम के प्रभाव हम= जिनकी जन्मनगरी के नाम के प्रभाव से हमने, अपनौ-स्वरूप लख्यौ भानुसौं भलक में= अपने आत्मस्वरूप का अनुभव किया सूर्य की चमक में, (अर्थात् जैसे सूर्य के प्रकाश में कोई जीव खोयी वस्तु को पहिचान लेता है, उसीप्रकार मैंने आपकी जन्मनगरी का नाम पाकर विस्मृत निज-निधि को पाया है), तेई प्रभु पारस महारस के दाता अब= वे प्रभु पार्श्वनाथ भगवान् अतीन्द्रिय-आनंद को देनेवाले अब, दीजै मोहि साता दृगलीला की ललक में= मुझे शांति प्रदान करें पलक झपकते ही अर्थात् क्षणभर में। विशेषार्थ :- भगवान् पार्श्वनाथ की स्तुति करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जिन ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ के संबोधन को जलते हुये नाग-नागिनी के जोड़े ने भी जब अपने हृदय में धारण किया, तो अल्प-समय में ही उस जोड़े ने धरणेन्द्र-पद्मावती के रूप में देव-पर्याय प्राप्त कर ली थी। भगवान् पार्श्वनाथ के प्रति बहुमान व्यक्त करते हुये कविवर कहते हैं कि इनके नाम की ही महिमा है कि लोहे को सोने में बदलने वाला पारस-पत्थर भी आज जगत् में प्रसिद्ध है, अर्थात् भगवान् के गुणों का स्मरण करने से संसार के जीव कितने भी पापों से लिप्त क्यों न हों, कंचन के समान पवित्र होकर मोक्ष
के मार्ग पर अग्रसर हो जाते है।
मेरा नाम ‘बनारसी’ भी ‘भगवान् पार्श्वनाथ’ की जन्म-नगरी ‘बनारस’ के नाम पर ही रखा गया था।
जिसप्रकार सूर्य के प्रकाश में जगत् के पदार्थ प्रकाशित होते हैं, ठीक उसीप्रकार भगवन्! आपकी प्रतिमा को देखकर मुझे अपना स्वरूप अनुभव में आता है। अतीन्द्रिय-आनंद को प्रदान करनेवाले हे पार्श्वनाथ भगवान्! मुझे पलक झपकते ही अर्थात् शीध्रतिशीघ्र शांति प्रदान करें। यद्यपि भगवान् अपने भक्तों को कभी कुछ नहीं देते,- ऐसा जानते हुये भी बनारसीदास जी भगवान् से अपनी सुख-शांति की कामना करते हैं, ये वास्तव में भक्ति का अतिरेक मात्र है। लेकिन हाँ, भगवान् की प्रतिमा का ऐसा अतिशय अवश्य है कि उनके दरबार में आने पर संसार के दु:खों से आकुलित दु:खी-जीवों को सहज ही शांति का अनुभव होता है, और स्वयं ही सातिशय-पुण्य का बंध
होता है, जो आगे भी आकुलता से छुटकारा दिलाने में निमित्त बनता है।
''तुम भक्तों को कुछ नहीं देत, अपने समान बस बना लेत।
यह मैंने तेरी सुनी आन, जो लेवे तुमको बस पिछान।
वह पाता है कैवल्य-ज्ञान, होता परिपूर्ण कला-निधान।।‘’ -(जिन-स्तुति)
(अडिल्ल-छंद)
'अविनाशी अविकार परमरस-धाम है, समाधान सरवंग सहज-अभिराम है।
सुद्ध-बुद्ध-अविरुद्ध अनादि-अनंत हैं, जगत्-शिरोमनि सिद्ध सदा जयवंत हैं।। 4।।
शब्दार्थ :- अविनाशी-अविकार परमरस-धाम है= विनाशरहित/ शाश्वत, विकाररहित, अतीन्द्रिय-आनंद की खान, समाधान-सरवंग सहज-अभिराम है= समाधानस्वरूप अर्थात् निःशंकरूप, सर्वांग, सहज, बहुत रमणीय, सुद्ध-बुद्ध-अविरुद्ध अनादि अनंत है= पवित्र, ज्ञानमय, विरोध- रहित, जिसकी आदि न हो, जिसका अंत न हो, जगत्-शिरोमनि सिद्ध सदा जयवंत हैं= लोक के, सिरताज, सिद्ध भगवान् हमेशा जयवंत रहें। विशेषार्थ :- ‘सिद्ध-परमेष्ठी’ का गुणगान करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं, हे सिद्ध भगवन्! आप शाश्वत अर्थात् जन्म-मरण से रहित सदाकाल रहनेवाले हो, मोह-राग-द्वेष आदि विकारीभावों से रहित अविकारी हो, और परमआनंद-रस की खान हो अर्थात् सदाकाल अतीन्द्रिय-सुख का वेदन करते हो, आप सर्वसमाधान-स्वरूप हो, सर्वांग सहज और सुंदर हो। आप परम-पवित्र, परमज्ञानी हो, आपकी न आदि है और अंत है,- ऐसे आप अनादि-अनंत हो। आपसे श्रेष्ठ संसार में कोई और नहीं,- ऐसे तीनों लोकों के सरताज सिद्ध भगवान् सदा जयवंत रहें।
(सवैया इकतीसा)
ग्यान को उजागर, सहज-सुखसागर, सुगुन-रत्नागर, विराग-रस भरयौ है।
सरन की रीति हरै, मरन कौ न भै करे, करनसौं पीठि दे, चरन अनुसरयौ है।।
धरम को मंडन, भरम को विहंडन है, परम नरम ह्वै कै, करम सौ लरयौ है।
ऐसौ मुनिराज भुव-लोक में विराजमान, निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है।। 5।।
शब्दार्थ :- ग्यानकौ उजागर सहज-सुखसागर= ज्ञान के प्रकाशक, सहज-सुख के समुद्र हैं, सुगुन-रत्नागर विराग रस भरयौ है= सुगुणों की खान, वैराग्य-रस से भरे हुये हैं, सरन की रीति हरै= शरण की रीति को हरनेवाले, मरण कौ न भै करै= मरण के भय से रहित हैं, करनसौं पीठि दे= इन्द्रिय-विषयों से पीठ दिखाते है यानि विरक्त हैं, चरन अनुसरयौ है= चारित्र का अनुसरण यानि पालन करते हैं, धरम को मंडन= धर्म को सुशोभित करनेवाले हैं, भरम को विहंडन= भ्रम का खंडन करनेवाले हैं, परम-नरम ह्वै कै करमसौं लरयौ है= अतिनम्र होकर कर्मों से लड़ते हैं, ऐसो मुनिराज भुवलोक में विराजमान= ऐसे मुनिराज, तीनों लोक में विराजमान हैं, उन्हें निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है= उन्हें देखकर बनारसीदास ने नमन किया है। विशेषार्थ :- साधु-परमेष्ठी की स्तुति करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जो ज्ञान के प्रकाशक हैं अर्थात् जगत् के संतप्त-जीवों को ज्ञानामृत का पान करानेवाले हैं, जो सहज आत्मिक-सुख के सागर है, अर्थात् जो अपने समतारूपी-वचनों से जगत् के जीवों को शांति प्रदान करते हैं। जो गुणोंरूपी मणियों की खान है अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी मणियों की खान है। पंचेन्द्रिय के विषयों से विरक्त होने से वैराग्यरस से सराबोर हैं। दिगम्बरत्व धारण करने से जो किसी के अाश्रित नहीं है, इसलिये उनको मरण का भी भय नहीं है, जंगलों में निवास करते हैं, संसार-शरीर और भोगों से विरक्त होकर सम्यक् रूप से चारित्र का पालन करते हैं। जिनसे धर्म महिमा-मंडित होता है या जो धर्म की शान हैं, जो देहादिक समस्त पर-पदार्थों को अपना मानने रूप भ्रम का खंडन करनेवाले हैं। जो कर्मों को द्वेषपूर्वक क्षय नहीं करते हैं, बल्कि वे तो स्वरूप में लीन रहने का अभ्यास करते हैं, तो कर्मादिक सहज और स्वयं क्षय हो जाते हैं। ऐसे जितने भी भावलिंगी दिगम्बर-मुनिराज तीनों लोकों में विराजमान है, बनारसीदास उन सभी को परखकर विनय से भावसहित वंदन करते हैं।
(सवैया छन्द, भगण)
भेदविज्ञान जग्यौ जिन्हके घट, सीतल-चित्त भयौ जिमि चंदन।
केलि करैं सिवमारग में, जगमाँहि जिनेसुर के लघुनंदन।।
सत्य-सरूप सदा जिन्हकैं, प्रगट्यौ अवदात मिथ्यात-निकंदन।
सांत-दशा तिन्हकी पहिचानि, करैं करजोरि बनारसि वंदन।। 6।।
शब्दार्थ :- भेदविज्ञान जग्यौ जिन्हकैं घट= स्व और पर का भेदविज्ञान जिनके हृदय में प्रगट हुआ है, सीतलचित्त भयौ जिमि चंदन= जिनका मन चंदन की तरह शीतल हुआ है, केलि करैं सिवमारग में= मोक्षमार्ग में क्रीड़ा/आनंद करते हैं, जगमाँहि जिनेसुर के लघुनंदन= संसार में रहकर भी जिनेन्द्रदेव के छोटे पुत्र, सत्य, सरूप सदा जिन्हकैं= जिनके सदा वस्तु का यथार्थ-स्वरूप प्रगट/ज्ञात हुआ है, प्रगट्यौ अवदात मिथ्यात-निकंदन= जो मिथ्यात्व को नष्ट करनेवाला है, सांतदशा तिन्हकी पहिचानि= उनकी शांत-स्थिति को पहिचानकर, करैं करजोरि बनारसि वंदन= हाथ जोड़कर बनारसीदास जी नमस्कार करते हैं। विशेषार्थ :- पंचपरेष्ठी-भगवंतों की वंदना करने के बाद सम्यग्दृष्टि-जीव की महिमा का वर्णन करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जिस जीव के हृदय में ‘स्व’ और ‘पर’ का ‘भेदविज्ञान’ प्रकट हुआ है अर्थात् जिसे अपने आत्मस्वरूप का सच्चा श्रद्धान है, उसका चित्त/मन चंदन के समान शीतल हो गया है अर्थात् अब मोह-राग-द्वेष आदि विकारीभावों और कषायों की अग्नि उसे प्रभावित नहीं करती। इसे हम इसप्रकार भी कह सकते हैं कि जिसप्रकार चंदन के वृक्ष पर प्रतिसमय काले विषधर-नाग लिपटे रहते हैं; लेकिन फिर भी चंदन की शीतलता व सुगंधि पर कोई फर्क नहीं पड़ता, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव बाहर में भले ही विषधर के समान पंचेन्द्रिय के विषयों से घिरे दिखाई दें, फिर भी सुखस्वरूप भगवान् आत्मा का वेदन उनके चित्त में चंदन की सुगंधि के समान प्रतिसमय व्याप्त रहता है। वास्तव में सम्यग्दृष्टि तो अपने आत्मिक-आनंद की मस्ती में ही केलि करते हैं अर्थात् आनंदमग्न रहते हैं और मोक्षमार्ग पर अग्रसर भी। इसीलिये उन्हें ‘जिनेन्द्रदेव का लघुनदं न’ अर्थात् छोटा-पुत्र कहा जाता है, जिसप्रकार छोटा-पुत्र हमेशा अपने पिता का लाड़ला ही होता है, उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव भी अविरत-अवस्था में भी जिनेन्द्रदेव के प्रिय ही हैं, उनके अनुगामी ही हैं। जैसे छोटा-पुत्र पिता के मार्ग का ही अनुसरण करता है,और पिता के जैसा ही बनना चाहता है, ठीक उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि-जीव भी जिनेन्द्रदेव के मार्ग का अनुसरण करता हुआ जिनेन्द्र देव के समान ही अल्पकाल में मोक्ष को प्राप्त करता है। एक बात विशेषरूप से ध्यान देने योग्य कि बिना-परखे बनारसीदास जी ने न साधु को वंदन किया (निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है) और न ही सम्यग्दृष्टि को (सांतदशा तिनकी पहिचानि…)- इस बात की गहराई की झलक हमें उनके जीवन में घटित-घटनाओं में भी देखने को मिलती है। उन्होंने जिनाम्नाय में निर्दिष्ट सभी पूज्यपदों को उनकी गुणवत्ता पहिचानकर ही नमस्कार किया है, इसे परखे बिना उन्होंनें कभी किसी को भी नमस्कार नहीं किया, फिर चाहे वह किसी भी पद पर आरूढ़ क्यों न हो। कवि के द्वारा रचित इन पंक्तियों से हमें शिक्षा मिलती है कि बिना परखे किसी भी मुनि-वेषधारी को या धर्मात्मा को कभी नमस्कार नहीं करना चाहिए।
(सवैया इकतीसा)
स्वारथ के साँचे, परमारथ के साँचे चित्त, साँचे-साँचे बैन कहें, साँचे जैनमती हैं।
काहू के विरुद्ध नाहिं, परजाय-बुद्धि नाहिं, आतम-गवेषी, न गृहस्थ हैं न जती है।।
सिद्धि-रिद्धि-वृद्धि दीसै घट मेैं प्रगट सदा, अंतर की लच्छिसौं अजाची लच्छपती है।
दास भगवंत के उदास रहैं जगत् सौं, सुखिया सदैव ऐसे जीव समकिती हैं।। 7।।
शब्दार्थ :- स्वारथ के साँच=े स्व+अरथ = स्व यानि आत्मा अर्थ यानि प्रयोजन के सच्चे, परमारथ के साँचे चित्त= परम-अर्थ यानि मोक्ष के लिये भी जिनका सच्चा-पुरुषार्थ है, साँचे-साँचे बैन कहे= सत्य-वचन बोलनेवाले, साँचे जैनमती हैं= जैनमत या जिनधर्म के सच्चे-श्रद्धानी हैं, काहू के विरुद्ध नाहिं= किसी से भी विरोध नहीं है, परजाय-बुद्धि नाहिं= स्वयं को पर्यायरूप से देखने की बुद्धि का अभाव है, आतम-गवेषी= आत्मस्वरूप की खोज करनेवाले हैं, न गृहस्थ न जती हैं= न तो गृहस्थ हैं और न साधु हैं, सिद्धि= आत्मस्वरूप की सिद्धि, रिद्धि= आत्मशक्ति की ऋद्धि, वृद्धि दीसै= निरन्तर स्वरूप के प्रति सावधानी की वृध्दि दिखाई देती हैं, घट में प्रगट सदा= सदैव अंतरंग में, अंतर की लच्छिसौं= जो आत्मानुभूतिरूपी अंतरंग-लक्ष्मी से संपन्न हैं, अजाची= किसी से याचना या आकांक्षा नहीं करते हैं, लच्छपती= लक्ष्मीपति होते हुये भी, भगवंत के दास= जिनेन्द्रदेव के भक्त रहकर, उदास रहैं जगतसौं= संसार से विरक्त रहते हैं सुखिया सदैव= जो हमेशा सुखी/संतुष्ट रहते हैं, ऐसे जीव समकिती हैं= ऐसे जीव सम्यग्दृष्टि होते हैं। विशेषार्थ :- इस छंद में ‘सम्यग्दृष्टि-जीव’ के स्वरूप का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि वे सम्यग्दृष्टि-जीव अपने आत्मस्वरूप के सच्चे-ज्ञानी हैं, और मोक्षमार्ग की ओर जिनका चित्त उन्मुख है, जो सत्य-वचन बोलते हैं, और जिन-आज्ञा को मानने से सच्चे-जैनी है। जिनका किसी से कोई विरोध या आपसी-मतभेद नहीं है, जो स्वयं को भी और जगत् के अन्य जीवों को भी पर्याय-दृष्टि से नहीं देखते, जिनका चित्त निरन्तर आत्मस्वरूप की खोज में ही लगा रहता है, जो विषय-भोगों से विरक्त होने से न तो पूरीतरह से गृहस्थों के समान संसार-मग्न हैं, और स्थूलरूप से व्रत अंगीकार न करने से पूरीतरह से व्रती भी नहीं हैं। जिन्हें अपने आत्मस्वरूप की सिद्धि या अनुभूति हो चुकी है, आत्मशक्ति से परिचित होने से निरन्तर ऋद्धियों की वृद्धि अंतरंग में प्रत्यक्ष दिखाई देती है। आत्मवैभवरूपी लक्ष्मी से संपन्न होने के
कारण सच में लक्ष्मी के पति हैं, जगत् की लक्ष्मी की अब कोई वांक्षा नहीं है।
ये जिनेन्द्रदेव के सच्चे-सेवक हैं, इसलिये सांसारिक विषय-भोगों से सदा विरक्त रहते हैं।
आत्मिक-आनंद में मग्न रहने से सुखिया हैं, ऐसे गुणों को धारण करनेवाले जीव ही सम्यग्दृष्टि होते हैं।
(सवैया इकतीसा)
जाकै घट प्रगट विवेक गणधरकौसौ, हिरदै हरखि महामोहकौं हरतु हैं।
साचौ सुख मानै निज-महिमा अडोल जानै, आपुही मैं आपनौ सुभाउ ले धरतु है।।
जैसे जल-कर्दम कतक फल भिन्न करै, तैसे जीव-अजीव विलछनु करतु है।
आतम-सकति साधैं ग्यान कौ उदौ आराधै, सोई समकिती भवसागर तरतु है।। 8।।
शब्दार्थ :- जाकै घट प्रगट विवेक गणधरकौसौ= जिसके हृदय में गणधर के समान विवेक प्रकट हुआ है, हिरदै हरखि महामोहकौं हरतु है= हृदय हर्षित यानि प्रसन्न रहता है, सबसे बड़ा मोह अर्थात् मिथ्यात्व को हरण अर्थात् नष्ट करता है, साचौ सुख मानै= (उसे ही) सच्चा-सुख मानता है, निज-महिमा अडोल जानै= अपनी महिमा को अविचल जानता है, आपुही मैं आपनौ सुभाउ ले धरतु है अपने आप में ही अपना स्वभाव अनुभव करता है, जैसे जल-कर्दम कतकफल भिन्न करै= जिसप्रकार जल में मिली कीचड़ को निर्मली/ फिटकरी अलग-अलग कर देती है, तैसें जीव-अजीव विलछनु करतु है= ठीक उसीप्रकार आत्मा-अनात्मा का भेदविज्ञान करता है, आतम सकति साधै ग्यान को उदौ आराधै= आत्म-शक्ति को साधता है, ज्ञान के उघाड़ को सार्थक करता है, सोई समकिती भवसागर तरतु है= वही सम्यग्दृष्टि-जीव संसार-सागर से पार उतरता है। विशेषार्थ :- सम्यग्दृष्टि-जीव की परिणति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जिसके हृदय में गणधर के समान स्व-पर-भेदविज्ञान की कला जागृत हुई है, जिससे महा-भयंकर मिथ्यात्व का अभाव हो गया है और आत्मस्वरूप की सच्ची-प्रतीति/अनुभूति होने से उसका हृदय हर्षित है, यानि अब उसे जो आत्मिक-सुख की अनुभूति हो रही है,उसी को वह सच्चा-सुख मानता है। सम्यग्दृष्टि-जीव को आत्मस्वरूप का अविचल-श्रद्धान होता है अर्थात् संसार का कोई भी प्रलोभन अब उसके श्रद्धान को हिला नहीं सकता। अब तो वह प्रतिसमय स्वयं को स्वयं में ही अनुभव करता है। प्रतिसमय यही भावना भाता है - ‘‘स्वयं स्वयं में तृप्त रहूँ मैं, रमूँ नहीं संसार में।’’ जिसप्रकार गंदे पानी में कतकफल यानि निर्मली या फिटकरी डालने पर गंदगी और स्वच्छ-पानी अलग अलग हो जाते हैं, ठीक उसीप्रकार प्रज्ञा-रूपी कतकफल का प्रयोग करने पर अनादिकाल की देहादिक समस्त पर-पदार्थों को अपना माननेरूप मिथ्यात्व की गंदगी और निजात्मारूपी स्वच्छ-जल भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। सम्यग्दर्शन होने पर ज्ञान भी स्वतः सम्यक् हो जाता है, जिससे सम्यग्ज्ञान के प्रकाश में सम्यग्दृष्टिजीव निरन्तर अपनी आत्मा की ही आराधना करता है, अर्थात् अपनी आत्मिक-शक्ति को बढ़ाने के लिये सतत जागरुक रहता है। कविवर बनारसीदास जी कहते हैं ऐसे सम्यग्दृष्टि-जीव ही संसाररूपी-समुद्र को पार करते हैं।
(सवैया इकतीसा)
धरम न जानत, बखानत भरमरूप, ठौर-ठौर ठानत, लराई पच्छपात की।
भूल्यौ अभिमान में, न पाउ धरै धरनी में, हिरदै में करनी, बिचारे उतपात की।।
फिरै डांवाडोल-सौ, करम के कलोलनि में, ह्वै रही अवस्था, सु बघेलू कैसे पात की।
जाकी छाती ताती कारी कुटिल कुवाती भारी, ऐसौ ब्रह्मघाती, है मिथ्याती महापातकी।। 9।।
शब्दार्थ :- धरम न जानत= वस्तुस्वरूप को नहीं जानता, बखानत भरमरूप= भ्रामक-बातें बतलाता है, ठौर-ठौर ठानत लराई पच्छपात की= जगह-जगह एक पक्ष को लेकर यानि एकांती होकर लड़ाई करता है, भूल्यौ अभिमान में न पाउ धरै धरनी पर= घमंड में चूर होकर धरती पर पाँव नहीं रखता है, हिरदै में करनी बिचारै उतपात की= हृदय में उपद्रव/खुरापात की करतूतें सोचता है, फिरैं डांवाडोल सौ= डांवाडोल/अस्थिरचित्त होकर भटकता है, कर्म के कलोलनि में= कर्म के उदयरूपी लहरों में, ह्वै रही अवस्था सु बघेलू कैसे पात की= बवंडर के पत्ते की तरह इसकी स्थिति हो रही है, जाकी छाती ताती कारी कुटिल-कुबाती भारी= जिसका हृदय संतप्त, काला, वक्र, बुरी-बातों के बोझ से वजनदार है, ऐसौ ब्रह्मघाती मिथ्याती महापातकी= ऐसा ‘ब्रह्म’ अर्थात् आत्मस्वरूप का घात/तिरस्कार करनेवाला मिथ्यादृष्टि महापापी है। विशेषार्थ :- मिथ्यादृष्टि-जीव की प्रवृत्ति का वर्णन करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि मिथ्यादृष्टि-जीव धरम के अर्थात् वस्तु के वास्तविक-स्वरूप को तो जानता नहीं, और अपनी मनमर्जी से भ्रमरूप यानि कपोल-कल्पित धर्म का स्वरूप बखान करता है। धर्म के नाम पर अपने मिथ्या-विकल्पों और एकांती-पक्ष को सत्य साबित करने के लिये हर किसी से लड़ाई करने को भी प्रतिसमय तैयार रहता है। अपने मिथ्याज्ञान के अभिमान में इतना डूबा रहता है कि उसके पैर जमीन पर ही नहीं टिकते, हमेशा आसमान में उड़ने को तैयार रहता है अर्थात् हमेशा अभिमान से भरा रहता है। इतने से भी उसे तसल्ली नहीं होती, तो दिन-रात इसका चित्त नये-नये उपद्रवों को सोचने में ही चलायमान रहता है। जैसे समुद्र में तूफान आने पर लहरें इतनी तेज हो जाती है कि पानी पर चलनेवाली नाव भी डगमगाने लगती है, ठीक उसीप्रकार मिथ्यादृष्टि-जीव के जीवन में कर्म का तीव्र-उदयरूपी तूफान आने पर प्रतिकूलतारूपी लहरें इतनी तेज हो जाती है कि इसकी जीवनरूपी नैया डगमगाने लगती है। जिससे इसकी दशा बघेलू यानि चक्रवाती-तूफान के बवंडर में फँसे पत्ते के जैसी हो जाती है, जो बेबस होकर उड़ता ही जाता है। जैसे चक्रवाती-तूफान में फँसी नाव आखिरकार डूब ही जाती है, ठीक उसीप्रकार मिथ्यात्व के भँवर में फँसी नाव आखिरकार भवसागर में डूब ही जाती है। जिसकी ‘छाती ताती’ है अर्थात् जिसका हृदय क्रोधकषाय के कारण संतप्त रहता है, ‘कारी’ अर्थात् लोभकषाय के कारण मलिन रहता है, ‘कुटिल’ अर्थात् मायाकषाय से कुटिल रहता है, और ‘कुवाती’ अर्थात् बुरे विचारों के बोझ तले मानकषाय के कारण पत्थर की तरह भारी रहता है। चारों कषायों की तीव्रता होने से वह मिथ्यादृष्टि-जीव प्रतिसमय अपने आत्मस्वरूप का ही घात करता है, और आगम के अनुसार- आत्मघाती महापापी नरकगामी अर्थात् आत्मघात करनेवाला महापापी मिथ्यादृष्टि-जीव नरकगामी होता है। (मध्ययुग में ब्रह्महत्या अर्थात् ब्राह्मण को मार डालना अक्षम्य-अपराध माना जाता था। उसी को लक्ष्य में रखकर कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि उसी प्रकार ब्रह्म-स्वरूप आत्मा का विस्मरण करना भी अक्षम्य-अपराध है। अन्य अपराधों की माफी कदाचित् संभव हो जाये, किन्तु इस अपराध को किसी भी हालत में, किसी भी अदालत में माफ नहीं किया जा सकता है।)
(दोहा)
बंदौ सिव अवगाहना, अरु बंदौं सिवपंथ।
जसु प्रसाद भाषा करौं, नाटक नामक ग्रंथ।। 10।।
शब्दार्थ :- बंदौं सिव-अवगाहना= सिद्ध-भगवान् को नमस्कार करता हूँ, अरु बंदौं सिवपंथ= और मोक्षमार्ग को नमस्कार करता हूँ जसु प्रसाद भाषा करौं नाटक नामक ग्रंथ= (क्योंकि) जिनकी कृपा से ‘नाटक’ नामक इस ग्रंथ की भाषाबद्ध-रचना कर रहा हूँ। विशेषार्थ :- ग्रंथ-रचना की प्रतिज्ञा करते हुये कविवर कहते हैं कि मैं सिद्ध-परमेष्ठी को और मोक्षमार्ग अर्थात् रत्नत्रय को नमस्कार करता हूँ; क्योंकि जिनके प्रसाद से या जिनकी कृपा से मैं प्रचलित- जनभाषा में ‘नाटक-समयसार’ नाम के इस ग्रंथ की रचना कर रहा हूँ। उत्थानिका
(सवैया मत्तगयन्द)
चेतनरूप अनूप अमूरति, सिद्ध-समान सदा पद मेरौ।
मोह-महातम आतम-अंग, कियौ पर-संग महातम घेरौ।।
ग्यानकला उपजी अब मोहि, कहौं गुन नाटक आगमकेरौ।
जासु प्रसाद सधै सिव-मारग, वैगि मिटै भव-वास-बसेरौ।। 11।।
शब्दार्थ :- चेतनरूप अनूप अमूरति= चैतन्यरूप आत्मा, अनुपम, अमूर्तिक है, सिद्ध-समान सदा पद मेरौ= मेरा पद या स्वरूप हमेशा सिद्ध-परमेष्ठी के समान, मोह-महातम आतम-अंग= मोहरूपी भयंकर-अंधकार आत्मा में, कियौ पर-संग महातम घेरौ= पर का संग करने से इस घोर-अंधकार ने घेर लिया है, ग्यानकला उपजी अब मोहि= अब मुझे विशेष-ज्ञानरूपी कला उत्पन्न हुई है, कहौं गुन नाटक आगमकेरौ= आगमसम्बन्धी/आगम-तुल्य ‘नाटक’ ग्रंथ को कहता हूँ, जासु प्रसाद सधै सिवमारग= जिसके कारण मोक्ष का मार्ग सधेगा या प्राप्त होगा, वैगि मिटै भववास बसैरो= शीघ्र ही मिट जायेगा भवभ्रमण का निवास। विशेषार्थ :- ग्रंथ-रचना का कारण और फल बताते हुये कविवर कहते हैं कि मैं चेतन-स्वरूप भगवान् आत्मा अनुपम अर्थात् जगत् में जिसकी कोई उपमा नहीं है, ‘अमूर्तिक’ अर्थात् जिसका इन्द्रिय- गोचर रूप नहीं है, सिद्ध-परमेष्ठी के समान पूर्ण-शुद्ध हूँ; लेकिन अनादिकाल से ‘पर’ यानि आठ कर्मों के साथ रहने से मोहरूपी भयंकर-अंधकार के कारण अंधा बना हुआ था अर्थात् मोह के कारण मैंने सिद्ध-समान शुद्ध-आत्मा का कभी अनुभव नहीं किया। लेकिन आज तीव्र-पुण्य का उदय है कि मुझे विशेष-ज्ञानरूपी-ज्योति प्रगट हुई है, जिससे आज मैं आगम के आलोक में महान्-ग्रंथ ‘नाटक समयसार’ की रचना कर रहा हूँ। जिसकी रचना से मोक्ष का मार्ग भी सधेगा और शीघ्रतिशीघ्र संसार-अटवी में निवास भी खतम हो जायेगा अर्थात् जन्म-मरण के दुःख से छूटकर अजर-अमर अविनाशी सिद्ध-पद की प्राप्ति होगी।
(छंद मनहर)
जैसे कोऊ मूरख महा-समुद्र तिरवें कौं, भुजानिसौं उद्यत भयौ है तजि नावरौ।
जैसे गिरि ऊपर विरख-फल तोरिवेकौं, बाबनु पुरुष कोऊ उमगै उतावरौ।।
जैसे जलकुंड में निरखि शशि-प्रतिबिम्ब, ताके गहिबै कौं कर नीचौ करै टाबरौ।
तैसें मैं अलपबुद्धि नाटक आरंभ कीनौ, गुनी मोहि हसैंगें कहैंगें कोऊ बाबरौ।। 12।।
शब्दार्थ :- जैसें कोऊ मूरख महासमुद्र तिरवेंकौं= जिसप्रकार कोई अज्ञानी-जीव विशाल-समुद्र पार करने के लिये, भुजानिसौं उद्यत भयौ है तजि नावरौ= नाव को छोड़कर अपनी बाँहों से (पार करने को) उद्यत/ प्रयत्नशील हुआ है, जैंसे गिरि ऊपर विरखफल तोरिवैंकौं= जिसप्रकार पहाड़ के ऊपर वृक्ष पर लगे फलों को तोड़ने के लिये, बाबनु पुरुष कोऊ उमगै उतावरौ,= कोई बौना अर्थात् बहुत छोटा-पुरुष उतावला होकर जल्दी से (हाथ बढ़ाता है), जैंसें जलकुंडमैं निरखि शशि-प्रतिबिम्ब= जिसप्रकार पानी से भरे कुंड में चंद्रमा का प्रतिबिम्ब या रूप देखकर, ताके गहिबैकौं कर नीचो करै टाबरौ= उसको पकड़ने के लिये छोटा-बच्चा हाथ नीचे करता है, तैसें मैं अलपबुद्धि नाटक आरंभ कीनौ= उसीप्रकार मुझ अल्पबुद्धि बनारसीदास ने ‘नाटक समयसार’ शुरू किया है, गुनी मोहि हसैंगें कहैंगे कोऊ बाबरौ= गुणवान् यानि विद्वान् मेरे ऊपर हँसेंगे और कहेंगे कि यह तो कोई बाबरा या पागल है। विशेषार्थ :- श्रेष्ठ-ग्रंथ की रचना करने में अपने को अशक्य बताते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार कोई मूर्ख-व्यक्ति नाव को छोड़कर अपने बाँहों के बल पर विशाल और अथाह-समुद्र को पार करने की चेष्टा करता है (वो ये समझ ही नहीं पाता कि जिस-समुद्र का कोई ओर-छोर ही नहीं है, मैं उसे अपनी बाँहों से कैसे पार कर सकता हूँ?) जिसप्रकार कोई बौना-व्यक्ति पर्वत पर वृक्ष पर लगे फलों को देखकर उन्हें तोड़ने के लिये खुशी के कारण जल्दबाजी में अपना हाथ बढ़ाने की चेष्टा करता है, (अर्थात् खुशी के कारण वह यह बात भूल ही जाता है पहले पर्वत विशाल, फिर पेड़ भी इतना ऊँचा, मैं इस पर लगे फलों को कैसे तोड़ सकता हूँ?) जिसप्रकार कोई छोटा-बच्चा पानी से भरे कुंड में चंद्रमा का प्रतिबिम्ब देखकर उसे पकड़ने के लिये अपना हाथ नीचे करता है, (वह सोचता ही नहीं है कि चंद्रमा तो ऊपर है, पानी में तो उसका प्रतिबिम्ब है, मैं इसे कैसे पकड़ सकता हूँ?) ठीक उसीप्रकार मैं अल्पबुद्धि यानि बनारसीदास इतने विशाल, अथाह, गूढ़, मार्मिक, अध्यात्मिक-ग्रंथ ‘समयसार’, जिसकी महिमा अकथनीय है, ऐसे ग्रंथ पर नाटक लिखने का दुस्साहस कर रहा हूँ, मेरे इस कृत्य को देखकर गुणवान् या विद्वान् लोग मेरे ऊपर हँसेंगे और कहेंगे
कि यह तो कोई बाबरा या पागल-व्यक्ति है, जिसने ऐसी चेष्टा की।
वास्तव में देखा जाये, तो इस छंद में गर्भित-भाव कवि की विनम्रता के परिचायक हैं।
(सवैया इकतीसा)
जैंसे काहू रतनसौं बींध्यौ है रतन कोऊ, तामैं सूत रेसम की डोरी पोई गई है।
तैंसे बुध-टीकाकार नाटक सुगम कीनौ, तापरि अलपबुद्धि सूधी परिनई है।।
जैसे काहू देस के, पुरुष जैसी भाषा कहैं, तैंसी तिनिहूँ के, बालकनि सीख लई है।
तैंसे ज्यौं गरंथ कौ, अरथ कह्यौ गुरु त्योंहि, हमारीमति कहिवे, कौं सावधान भई है।। 13।।
शब्दार्थ :- जैंसे काहू रतनसौं बींध्यौ है रतन कोऊ= जिसप्रकार किसी रत्न से बींधा गया है कोई रत्न, तामैं सूत रेसम की डोरी पोई गई है= उसमें सूती या रेशम का धागा पिरोया गया हो, तैंसे बुध-टीकाकार नाटक सुगम कीनौ= उसीप्रकार ज्ञानीजन जिन्होंने समयसार जी की टीका लिखी यानि आचार्य अमृतचन्द्रकृत ‘आत्मख्याति’ टीका और पांडे राजमल्लकृत ‘समयसार-कलश-टीका’ लिखकर इस ग्रन्थ को बहुत सरल कर दिया है, तापरि अलपबुद्धि सूधी परिनई है= उसपर मेरी कम-बुद्धि आसानी से चल सकी है, जैसे काहू देस के पुरुष जैसी भाषा कहैं= जिसप्रकार किसी स्थान के लोग जैसी भाषा बोलते हैं, तैंसी तिनिहूँ के बालकनि सीख लई है= वैसी ही उनके बच्चे भी सीख लेते हैं, तैंसे ज्यों गरंथ कौ अरथ कह्यौ गुरु त्योंहि= उसीप्रकार गुरु ने जैसा कहा उनके अनुसार इस ग्रंथ का भाव, हमारी मति कहिवे कौं सावधान भई है= कहने के लिये हमारी बुद्धि सावधान हुई है। विशेषार्थ :- जिसप्रकार हीरे की कणी से किसी रत्न में छेद कर दिया हो, बस उसमें सूत या रेशम की डोरी डालने का काम रह गया हो, उसीप्रकार समयसार के टीकाकार आचार्य अमृतचंद्र ने ‘समयसार जी’ पर टीका लिखकर एवं पांडे राजमल्ल जी ने समयसार के कलशों पर टीका लिखकर मेरा काम बहुत आसान कर दिया है, मुझे तो बस मात्र डोरी डालनी है, अर्थात् उन टीकाओं के अभिप्राय को छंदोबद्ध करना है। कहने का तात्पर्य यही है कि जो कठिन काम था रत्न में छेद करना अर्थात् टीका लिखना, वह तो पहले ही टीकाकार कर चुके हैं, अब तो डोरी डालने जैसा बहुत सरल-सा काम मुझे करना है। जिसप्रकार जिस देश में जैसी भाषा बोली जाती है, उस देश के बच्चे भी अपने आप ही वैसी ही भाषा सीख लेते हैं, उसीप्रकार गुरु-परम्परा से जो ज्ञान चला आ रहा है, मैंने भी वैसा ही सीख लिया है, अर्थात् मैंने कुछ नया काम नहीं किया है, और जो मैंने गुरु-परम्परा से सीखा था, उसी को बताने के लिये मेरी बुद्धि तत्पर हुई है।
(सवैया इकतीसा)
कबहू सुमति ह्वै कुमति को विनाश करै, कबहू विमल-जोति अंतर जगति है।
कबहू दया ह्वै चित्त करत दयालरूप, कबहू सुलालसा ह्वै लोचन लगति है’'।।
कबहू आरती ह्वै कै प्रभु सन्मुख आवै, कबहू सुभारती ह्वै बाहर बगति है।
धरै दसा जैसी तब करै रीति तैसी ऐसी, हिरदै हमारे भगवंत की भगति है।। 14।।
शब्दार्थ :- कबहू सुमति ह्वै= कभी सद्बुद्धि होकर, कुमति को विनास करै= कुबुद्धि को नष्ट करती है, कबहू विमल-जोति अंतर जगति है= कभी निर्मल-ज्ञानज्योति अंतरंग में जागृत होती है, कबहू दया ह्वै चित्त करत दयालरूप= कभी दया का भाव मन को दयालुतारूप करता है, कबहू सुलालसा ह्वै लोचन लगति है= कभी आपकी भक्ति की इच्छा नेत्रों को अच्छी लगती है, कबहू आरती ह्वै कै प्रभु सन्मुख आवै= कभी आरतीरूप होकर प्रभु के नजदीक आती है, कबहू सुभारती ह्वै बाहर बगति है= कभी सुन्दर स्तोत्र-पाठ के रूप में बाहर में भी प्रकट होती है, धरै दसा जैसी तब करै रीति तैसी ऐसी= जैसी स्थिति तब वैसा ही व्यवहार अर्थात् परिणमन होता है, हिरदै हमारै भगवंत की भगति है= हृदय में मेरे यानि बनारसीदास जी के जिनेन्द्र भगवान् की भक्ति है। विशेषार्थ :- कविवर कहते हैं मुझे जो ज्ञान-ज्योति मिली है, वह भगवान् की भक्ति का ही फल है, जिसकी वजह से कभी तो सद्बुद्धि अनादि से पड़ी कुबुद्धि का विनाश करती है, तो कभी निर्मलज्ञानज्योति बनकर अंतरंग में जागृत होती है; कभी अंतर में दया का भाव जगता है, तो बाहर में भी जीवदया और करुणा के परिणाम वर्तते हैं, कभी नेत्रों को आपको देखने की तीव्र-इच्छा होती है अर्थात् बस आपको ही निहारता रहूँ- ऐसा अंतरंग में भाव उमड़ता है। कभी तो अंतर्मन में उमड़े भाव आरती अर्थात् पूजन के रूप में प्रभु के सन्मुख आते है, कभी प्रभु की महिमा का गुणगान करते हुये सुन्दर-स्तोत्र के रूप में बाहर आते हैं, कवि कहते हैं जब जैसी स्थिति होती है, तब वैसा ही व्यवहार होता है, जिनेन्द्र-भगवान् की ऐसी सुदं र-भक्ति मेरे हृदय में प्रतिसमय उमड़ती है।
(सवैया इकतीसा)
मोख चलिबै को सोन करमकौ करै बौन, जाके रस-भौन बुध लौन ज्यों घुलत है।
गुन को गरंथ निरगुन कौ सुगम-पंथ, जाकौ जस कहत सुरेश अकुलत हैं।।
याही के जु पच्छी ते उड़त ग्यान-गगन में, याही के विपच्छी जग-जाल में रुलत हैं।
हाटकसौ विमल विराटकसौ विसतार, नाटक सुनत हिये फाटक खुलत हैं।। 15।।
शब्दार्थ :- मोख चलिबै को सोन= मोक्षमार्ग पर चलने के लिये सीढ़ी, करम कौ करै बौन= कर्म का वमन करती है, जाके रस भौन बुध लौन ज्यों घुलत हैं= जिसके रसरूपी जल में ज्ञानीजन नमक की तरह घुल जाते हैं, गुन को गरंथ= गुणों का ग्रंथ, निरगुन कौ सुगम-पंथ= निर्गुणों का सरल-रास्ता, जाकौ जस कहत सुरेश अकुलत हैं= जिसकी महिमा का गुणगान करने में सुरों के ईश (इन्द्र) भी व्याकुल रहते हैं अर्थात् समर्थ नहीं हैं, याही के जु पच्छी ते उड़त ग्यानगगन में= जो इसके पक्षधर हैं, वे ज्ञानरूपी आकाश में उड़ते हैं, याही के विपच्छी जग-जाल में रुलत हैं= इसके विरोधी संसाररूपी वन में दुःखी होते हैं, हाटक सौं विमल= स्वर्ण के समान निर्मल, विराटक सो विसतार= विष्णुकुमार-मुनि के विराटरूप की तरह विस्तृत, नाटक सुनत हिये फाटक खुलत हैं= इस नाटक को सुनते ही हृदय के दरवाजे खुल जाते हैं। विशेषार्थ :- प्रस्तुत-छंद में ‘समयसार’ जी की महिमा का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि ‘समयसार’ जी ग्रंथ मोक्षमार्ग पर चलनेवाले जीवों के लिये सोने की सीढ़ी के समान है, अर्थात् इस ग्रंथ का आद्योपांत-अध्ययन, मनन-चिंतन एवं अनुभवन करनेवाला जीव निश्चित ही मोक्ष प्राप्त करता है। साथ ही इस ग्रंथ का भावपूर्वक स्वाध्याय करनेवाले जीव के कषाय का वमन होता है, अर्थात् कषायरूपी गंदगी निकल जाती है, और परिणाम निर्मल होते हैं। यह ग्रंथ इतना मधुर है कि इसके रसास्वादन में ज्ञानीजन इसप्रकार तन्मय हो जाते हैं, जिसप्रकार पानी में नमक घुलकर एकमेक-सा हो जाता है। 'यह ग्थ रं आत्मिक-गुणों का भंडार है, अर्थात् इस ग्रंथ में आत्मा के अनंत-गुणों का वर्णन किया गया है। और निर्गुण (गुणभेद के विकल्प से मुक्त) होने के लिये सबसे सरल रास्ता है अर्थात् मुक्ति का सरलपंथ इसमें वर्णित है। कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘‘इस ग्रंथ की महिमा अगम है, इसका वर्णन करने में, मैं तो क्या सुरों के ईश अर्थात् इन्द्र भी संकोच करते हैं अर्थात् वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं।’’ ‘समयसार जी’ की महिमा का गुणगान करते हुये कवि कहते हैं कि जो ‘समयसार’ जी के पक्षधर है वे ज्ञानरूपी आकाश में पक्षियों के समान उड़ान भरते हैं, अर्थात् जिसप्रकार पक्षी अपने पंखों के सहारे खुले गगन में विचरण करते हैं, ठीक उसी प्रकार जो ‘समयसार’ जी ग्रंथ के मर्म को समझते हैं वे आत्मस्वरूप के अनंत-गुणों में केलि करते हैं। और जो ‘समयसार’ जी के विरोधी हैं, वे संसार-अटवी में रुलते हैं, अर्थात् जो आत्मस्वरूप के विरोधी हैं या जो बाहरी-क्रियाकाण्ड से ही मोक्ष होना मानते हैं, वे संसाररूपी वन में अनंतकाल तक भ्रमण करते हुये दुःखी होते हैं। जैसे बियावान-जंगल का कोई ओरछोर नहीं होता, वैसे ही आत्मस्वरूप के विरोधी-जीवों के संसार-परिभ्रमण का कोई अंत नहीं होता। स्वरूप के आराधकों के लिये ये ग्रंथ स्वर्ण की तरह निर्मल है और विष्णुकुमार मुनि जी के विराटरूप की तरह विस्तृत भी। (जब सातसौ मुनियों की रक्षा करने के निमित्त विष्णु कुमार मुनि ने विक्रिया-ऋद्धि का प्रयोग करके विराट-रूप बनाकर बलि को हराया था)। यदि ‘समयसार’ जी ग्रंथ का भाव-भासनपूर्वक स्वाध्याय किया जाये, तो हृदय के फाटक खुल जाते हैं, अर्थात् अनादि की मिथ्याकुटेव/बुरी आदत क्षणभर में दूर हो जाती है।
(दोहा)
कहौं सुद्ध निहचै-कथा, कहौं सुद्ध-विवहार।
मुकतिपंथ-कारन कहौं, अनुभौ को अधिकार।। 16।।
शब्दार्थ :- कहौं सुद्ध-निहचै-कथा= शुद्ध-निश्चयनय की बात कहता हूँ, कहौं सुद्ध-विवहार= शुद्ध- व्यवहारनय की बात कहता हूँ, मुकतिपंथ-कारन= मोक्षमार्ग के कारणभूत, अनुभौ को अधिकार= अनुभव का अध्याय या वर्णन। विशेषार्थ :- मैं अब शुद्ध-निश्चयनय से, शुद्ध-व्यवहारनय से मोक्षमार्ग के कारणभूत अनुभव की चर्चा करता हूँ, अर्थात् आत्मानुभूति के बिना मोक्षमार्ग की शुरूआत भी नहीं होती- यह बात वे स्पष्टरूप से घोषित कर रहे हैं। निश्चय-मोक्षमार्ग तो आत्मानुभूति के बिना होता ही नहीं है, व्यवहार-मोक्षमार्ग भी आत्मानुभूति के बिना नहीं होता है- यह उनका दोटूक-अभिप्राय है।
(दोहा)
वस्तु विचारत ध्यावतैं, मन पावे विश्राम।
रस-स्वादत सुख ऊपजै, अनुभव याकौ नाम।। 17।।
शब्दार्थ :- वस्तु विचारत ध्यावतैं= वस्तु-स्वरूप का चिंतन व ध्यान करने से, मन पावे विश्राम= मन को विश्रांति मिलती है अर्थात् चंचलता मिट जाती है, रस स्वादत सुख ऊपजै= आत्मिक-रस का पान करने से जो सुख उत्पन्न होता है, अनुभव याकौ नाम= इसी का नाम अनुभव है। विशेषार्थ :- वस्तु-स्वरूप का विचार करने से अर्थात् आत्म-स्वरूप का चिंतन करने से, उसी का ध्यान करने से मन विश्रांति को प्राप्त होता है अर्थात् उसकी संकल्प-विकल्परूप चंचलता मिट जाती है जिससे साम्यभाव प्रकट होता है। और जब ऐसा करते हैं, तो आत्मिक-रस का स्वाद अर्थात् आत्मानुभूति होने पर जो अतीन्द्रिय-आनंद या सुख का वेदन होता है, उसी का नाम ‘अनुभव’ है।
(दोहा)
अनुभव चिंतामणि-रतन, अनुभव है रसकूप।
अनुभव मारग मोख कौ, अनुभव मोखसरूप।। 18।।
शब्दार्थ :- अनुभव चिंतामणि-रतन= अनुभूति चिंतामणि-रत्न है, अनुभव है रसकूप= अनुभूति रस के कुँयें के (समान) है, अनुभव मारग-मोख कौ= अनुभूति ही मोक्ष का मार्ग है, अनुभव मोख-सरूप= अनुभूति मोक्षरूप ही है। विशेषार्थ :- आत्मानुभूति चिंतामणि-रत्न के समान है, अर्थात् जिसप्रकार चिंतामणि-रत्न से हम जो चाहते हैं, वह प्राप्त हो जाता है, उसीप्रकार हम सभी सुखी होना चाहते हैं, तो सच्चे सुख की प्राप्ति आत्मानुभूतिरूपी चिंतामणि-रत्न से ही होती है। आत्मानुभूति ही समतारस का कुँआ है, अर्थात् जैसे कुँये के पास जाने पर जल की प्राप्ति होती है, ठीक उसीप्रकार आत्मानुभूति होने पर चित्त को शांति अवश्य मिलती है। आत्मानुभूति ही मोक्ष का मार्ग है, अर्थात् आत्मानुभूति ही मोक्षमार्ग अर्थात् रत्नत्रय है। अात्मानुभूति मोक्षस्वरूप ही है, अर्थात् ऐसा लगता है कि मोक्ष कुछ और नहीं बल्कि अखंड-आत्मानुभूति ही मोक्ष है।
(सवैया मनहर)
अनुभौ के रस को रसायन कहत जग, अनुभौ-अभ्यास यहु तीरथ की ठौर है।
अनुभौ की रसा कहावै सोई पोरसा सु, अनुभौ अधोरसा सौं ऊरध की दौर है।।
अनुभौ की केलि यहै कामधेनु चित्रावेलि, अनुभौ को स्वाद पंच-अमृतकौ कौर है।
अनुभौ करम तोरै परमसौं प्रीति जोरै, अनुभौ-समान न धरम कोऊ और है।। 19।।
शब्दार्थ :- अनुभौ के रस को रसायन कहत जग= आत्मानुभूति के रस को संसार ‘रसायन’ (जीवनदायिनी औषधि) कहता है, अनुभौ-अभ्यास यहु तीरथ की ठौर है= आत्मानुभूति का अभ्यास यही तीर्थस्थान है, अनुभौ की जो रसा कहावै पोरसा सु= आत्मानुभूति की जो पृथ्वी है, वही उपजाऊ-भूमि कहलाती है, अनुभौ अधोरसा-सौं ऊरध की दौर है= आत्मानुभूति अधोलोक की पृथ्वी से ऊर्ध्वलोक की दौ़ड़ है, अनुभौ की केलि यहै कामधेनुचित्रावेलि= आत्मानुभूति का यह अानंद ‘कामधेनु’ और ‘चित्रावेलि’ के समान है, अनुभौ को स्वाद पंच-अमृत कौर है= अनुभूति का स्वाद पंचामृत-भोजन के निवाले/ग्रास के समान है, अनुभौ करम तोरै= आत्मानुभूति कर्मों के बंध को तोड़नेवाली है, परमसौं प्रीति जौरे= परमपद अर्थात् मोक्ष से लगन लगाने/ जोड़नेवाली है, अनुभौ समान न धरम कोऊ और है= आत्मानुभूति के समान कोई और धर्म नहीं है। विशेषार्थ :- आत्मानुभूति की विशेष-महिमा का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं आत्मानुभूति के रस को समस्त ज्ञानीजन ‘रसायन’ कहते हैं, अर्थात् आत्मानुभूति एक ऐसा रस है, जो भवरोग के नाश के लिये औषधि के समान है। आत्मानुभूति का अभ्यास ही पवित्र-तीर्थस्थान है, अर्थात् आत्मानुभूति होने के बाद मुक्ति पाने के लिये किसी भी तीर्थस्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं है। आत्मानुभूति के साधक जहाँ विराजमान होते हैं, वही स्थान ‘तीर्थ’ बन जाता है। आत्मानुभूति उस उपजाऊ भूमि के समान है, जहाँ पर हरप्रकार की खेती की जा सकती है अर्थात् सभीप्रकार की शंकाओं का समाधान हो जाता है। आत्मानुभूति ही अधोलोक से ऊर्ध्वलोक की दौड़ है, अर्थात् आत्मानुभूति जीव को अधोलोक से निकालकर ऊर्ध्वलोक के शिखर ‘मोक्ष’ में ले जानेवाली है। जो आत्मानुभूति के आनंद में केलि करता है, अर्थात् आत्मा के आनंद का रसास्वादन करता है, उसके लिये ये ‘कामधेनु’ और ‘चित्रावेलि’ के समान है। जिसप्रकार घी, तेल, दूध, दही, मीठा- इन पाँच रसों से बना भोजन अति-पोषक एवं स्वादिष्ट होने से ‘पंचामृत’ कहलाता है, ठीक उसीप्रकार आत्मानुभूति का स्वाद पंचामृत-भोजन के निवाले के समान ‘अमृतत्व की प्राप्ति का नियामक’ है। एकमात्र आत्मानुभव ही ऐसा हथौड़ा है, जो कर्मों के बंधन को तोड़ सकता है और परमपद अर्थात् मोक्षमहल में प्रवेश करवा सकता है। अात्मानुभव के समान दूसरा कोई धर्म इस संसार में नहीं है।
(दोहा)
चेतनवंत अनंत-गुन, परजै-सकति अनंत।
अलख अखंडित सर्वगत, जीवदरब-विरतंत।। 20।।
शब्दार्थ :- चेतनवंत अनंतगुन= चैतन्य-स्वरूप अनंत-गुणों का धनी, परजै-सकति अनंत= पर्याय की शक्ति अनंत है, अलख अखंडित सर्वगत= जो दिखाई न दे, जो अखंडित हो, सर्व में व्याप्त, जीव दरब विरतंत= (एेसा) जीव द्रव्य का वृत्तांत/स्वरूप है। विशेषार्थ :- जीवद्रव्य का स्वरूप वर्णित करते हुये कविवर कहते हैं कि जीवद्रव्य चैतन्य-स्वरूप है, अर्थात् जिसमें स्व-पर-प्रकाशक चेतना-शक्ति विद्यमान है, जो अनंत-गुणों का स्वामी है, उसमें अनंतपर्याय प्रकट करने की शक्ति है, जो ‘अलख’ है, अर्थात् लख यानि देखना और अलख यानि जो दिखाई न दे अर्थात् अरूपी है, जो ‘अखंडित’ है, अर्थात् जो कभी खंडरूप नहीं होता, त्रिकाल एक जैसा, जो ‘सर्वगत’ है, अर्थात् जो सर्व में व्याप्त है- ऐसा जीवद्रव्य का स्वरूप है।
(दोहा)
फरस-वरन-रस-गंध मय, नरद-पास संठान।
अनुरूपी पुदगल-दरब, नभ-प्रदेश-परवान।। 21।।
शब्दार्थ :- फरस-वरन-रस-गंधमय= स्पर्श-वर्ण-रस-गंध से सहित, नरद-पास संठान - चौपड़ के पाँसे के आकारवाला, अनुरूपी पुदगल-दरब= उसके समान रूपवाला पुदगलद्रव्य, नभ-प्रदेश-परवान= आकाश के प्रदेश के प्रमाण या बराबर। विशेषार्थ :- पुद््गल-द्रव्य का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि जो स्पर्श (छूने योग्य), वर्ण (रंग), रस (स्वाद), गंध (महक) आदि गुणों से सहित है, चौपड़ के पाँसे के समान जिसका आकार है, वह पुदगलद्रव्य है। जो आकाश के प्रदेश के अनुरूप कहा गया है, अर्थात् उत्कृष्ट-परिमाण लोकाकाश के अनुरूप एवं सूक्ष्मतम शुद्ध-परमाणु आकाशद्रव्य के एक प्रदेश के बराबर आकार का माना गया है।
(दोहा)
जैसे सलिल-समूह में, करैं मीन गति-कर्म।
तैसें पुद््गल-जीव को, चलन-सहाई धर्म।। 22।।
शब्दार्थ :- जैंसे सलिल-समूहमें= जिसप्रकार पानी के समूह में अर्थात् सरोवर आदि में, करैं मीन गतिकर्म= मछली चलने का कार्य करती है, तैंसे पुद््गल-जीव को= उसीप्रकार पुद््गल और जीव को, चलन सहाई धर्म= चलने में सहायक ‘धर्मद्रव्य’ होता है। विशेषार्थ :- ‘धर्मद्रव्य’ का स्वरूप बताते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जिसप्रकार स्वयं गमन करती हुई मछली को गमन करने में सरोवर आदि का पानी सहायक होता है, ठीक उसीप्रकार स्वयं चलते हुये पुद््गलों और जीवों को चलने में ‘धर्मद्रव्य’ सहायक होता है। सरोवर का पानी मछली को जबरन नहीं चलाता है, जब मछली स्वयं चलना चाहे, तब पानी उसकी सहायता करता है। यदि पानी मछली को चलाता, तो मछली कभी ठहरती ही नहीं, चलती ही रहती, ठीक उसीप्रकार धर्मद्रव्य जीवों और पुद््गलों को जबरन नहीं चलाता है, जब जीव और पुद््गल स्वयं गमन करना चाहें, तब धर्मद्रव्य चलने में उनकी सहायता करता है।
(दोहा)
ज्यौं पंथी ग्रीषम-समै, बैठे छाया-माँहि।
त्यौं अधर्म की भूमि में, जड़-चेतन ठहराँहिं।। 23।।
शब्दार्थ :- ज्यौं पंथी ग्रीषम-समै बैठे छायामाँहि= जिसप्रकार राहगीर गर्मी के समय में छाया में बैठता है, त्यौं अधर्म की भूमि में= उसीप्रकार अधर्म- द्रव्य की भूमि/स्थिति में, जड़ चेतन ठहराँहि=ं पुद््गलद्रव्य और जीवद्रव्य ठहरते हैं। विशेषार्थ :- ‘अधर्मद्रव्य’ का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार गर्मी से संतप्त-मनुष्य वृक्ष की छाया देखकर उसके नीचे बैठकर विश्राम करता है, ठीक उसीप्रकार जब भी जीव और पुद््गल स्वयं गतिपूर्वक ठहरना चाहते हैं, तब ‘अधर्मद्रव्य’ उन्हें ठहरने में सहायक होता है। जैसे वृक्ष की छाया पथिक को बुलाकर ठहरने के लिये नहीं कहती; बल्कि पथिक स्वयं ठहरने की इच्छा करता है, तब वह छाया निमित्त बनती है । ठीक उसीप्रकार ‘अधर्मद्रव्य’ जीवों और पुद््गलों को ठहरने के लिये प्रेरित नहीं करता; बल्कि जीव और पुद््गल जब स्वयं ठहरना चाहते हैं, तब ‘अधर्मद्रव्य’ सहायक होता है।
(दोहा)
संतत जाके उदरमैं, सकल पदारथवास।
जो भाजन सब जगतकौं, सोई दरब अकास।। 24।।
शब्दार्थ :- संतत जाके उदर मैं= संतति/बच्चे की तरह जिसके पेट में, सकल पदारथवास= समस्त पदार्थ निवास करते हैं, जो भाजन सब जगत्कौं= जो संपूर्ण-जगत् का भाजन/पात्र है, सोई= वही आकाशद्रव्य है। विशेषार्थ :- ‘आकाशद्रव्य’ का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि जिसप्रकार माँ के उदर में बच्चे का निवास होता है, ठीक उसीप्रकार जगत् के समस्त पदार्थों का निवास जिसमें होता है, जो जगत् के समस्त द्रव्यों के लिये पात्र/बर्तन के समान आधारभूत है, अर्थात् जिसप्रकार बर्तन किसी भी वस्तु के लिये आधार होता है, ठीक उसीप्रकार जगत् के समस्त द्रव्यों का जो आधार है, वही ‘आकाशद्रव्य’ है।
(दोहा)
जो नवकरि जीरन करै, सकल वस्तुथिति ठानि।
परावर्त वर्तन धरै, काल-दरब सो जानि।। 25।।
शब्दार्थ :- जो नवकरि जीरन करै= जो नवीन को जीर्ण करे, सकल वस्तुथिति ठानि= समस्त वस्तुस्थिति ठानकर, परावर्त वर्तन धरे= पाँचों परावर्तनों में परिवर्तन/ परिणमन कराये, काल दरब सो जानि= उसे कालद्रव्य जानो। विशेषार्थ :- काल-द्रव्य का स्वरूप बताते हुये कविवर कहते हैं कि जो जगत् के समस्त पदार्थों को नवीन से जीर्ण अर्थात् पुराना करे अर्थात् नवीन-पर्याय की उत्पत्ति और पूर्व-पर्याय के विनाश का कारण बने, ऐसा वर्तना-लक्षण वाला ‘काल-द्रव्य’ है।
(दोहा)
समता-रमता-उरधता, ग्यायकता-सुखभास।
वेदकता-चैतन्यता, ये सब जीव-विलास।। 26।।
शब्दार्थ :- समता-रमता-उधरता= साम्यभाव, रमण करना, ऊर्ध्वगमन-स्वभाव, ग्याकता सुखभाष= ज्ञायक-स्वभाव, सुख का अनुभव करना, वेदकता चैतन्यता= वेदन करना, चैतन्यरूप परिणमन, ये सब जीवविलास= ये सब जीव के कार्य हैं। विशेषार्थ :- जीव की परिणतियों का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि साम्यभाव अर्थात् राग-द्वेष से रहित वीतराग-स्वरूप में रमण करना, ऊर्ध्वगमन करना अर्थात् ऊपर की ओर गमन करना जीव का स्वभाव है, ज्ञाता-दृष्टारूप रहना, सहज आत्मिक-सुख का प्रतिसमय वेदन करना, चेतनरूप अर्थात् स्व-पर प्रकाशीपना- ये सब जीव के विलास हैं अर्थात् ये जीव के सहज-कार्य हैं।
(दोहा)
तनता मनता वचनता, जड़ता जड़-सम्मेल।
लघुता गुरुता गमनता, ये अजीव के खेल।। 27।।
शब्दार्थ :- तनता मनता वचनता= शरीररूप परिणमन, मनरूप परिणमन, वचनरूप परिणमन, जड़ता जड़सम्मेल= अचेतनपना, अन्य जड़-पदार्थों में मिलन का भाव, लघुता गुरुता गमनता= छोटा या हल्कापना, बड़ा या भारीपना, गमन करना, ये अजीव के खेल= ये सब अजीव का परिणमन हैं। विशेषार्थ :- ‘अजीव-द्रव्य’ की परिणति का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि शरीर, मन, वचन, अचेतनपना अर्थात् सुख-दुःख का वेदन न होना, जड़ का जड़ में ही मिल जाना, हल्का या छोटा होना, भारी या बड़ा होना, गमन करने अर्थात् क्षेत्र से क्षेत्रान्तर होना- ये सब अजीव-द्रव्यों की परिणतियाँ हैं, अर्थात् संसार का ये सारा खेल जीव का नहीं ‘अजीव-द्रव्य’ का है। उपर्युक्त दोनों दोहों में कविवर बनारसीदास जी ने जीव-द्रव्य और अजीव-द्रव्य के स्वरूप और कार्यों का सरल और सुंदर-वर्णन करके दोनों द्रव्यों की भिन्नता का सुंदर-चित्रण किया है। इनका इसीरूप में ज्यों का त्यों श्रद्धान, ज्ञान और तदनुरूप आचरण करना ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र है। लेकिन हम अज्ञानी-जीवों को इन दोनों-द्रव्यों का मिलाजुला श्रद्धान, ज्ञान और तदनुरूप आचरण होने से ही हम प्रतिसमय दुःखी हैं। अर्थात् सारा दुःख दृष्टि के मिथ्यारूप होने का है, और जिस दिन दृष्टि सम्यक् हुई, उसी क्षण हम सुखी।
(दोहा)
जो विशुद्धभावनि बंधै, अरु ऊरधमुख होइ।
जो सुखदायक जगत् में, पुन्य-पदारथ सोइ।। 28।।
शब्दार्थ :- जो विशुद्धभावनि बंध=ै संकलेश-रहित शुद्ध अर्थात् शुभभावों से बँधता है, अरु ऊरधमुख होइ= और ऊर्ध्वमुखी होता है, जो सुखदायक जगत् में= सुख देनेवाला संसार में, पुन्य-पदारथ सोइ= वही पुण्य नामक पदार्थ है। विशेषार्थ :- पुण्य का स्वरूप और फल का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जो विशुद्धभावों से अर्थात् संक्लेश-रहित शुभ-भावों से बंधे और जो ऊर्ध्वमुखी अर्थात् ऊपर की ओर गमन करे या जिसके फल में स्वर्ग आदि की प्राप्ति हो, जो सांसारिक-सुख को देनेवाला हो, वही पदार्थ ‘पुण्य’ है।
(दोहा)
संक्लेश-भावनि बँधै, सहज अधोमुख होइ।
दुःखदायक संसार में, पाप-पदारथ सोइ।। 29।।
शब्दार्थ :- संक्लेश-भावनि बँध=ै संक्लेश-परिणामों से बँधता है, सहज-अधोमुख होइ= सहज अधोगति (नरक, तिर्यंच का कारण) होता है, दुःखदायक संसार में= दुःख देनेवाला संसार में, पाप-पदारथ सोइ= वही ‘पाप’ नामक पदार्थ है। विशेषार्थ :- पाप के स्वरूप एवं उसके फल का वर्णन करते हुये कविवर बनारसीदास जी कहते हैं कि जो संक्लेश-परिणामों से अर्थात् तीव्र-कषाय से बंधता है, और जिसके फल में अधोगति अर्थात् नरक और तिर्यंच-गतियों की प्राप्ति होती है, जो संसार में भी निरन्तर दुःख देनेवाला है, वह पदार्थ जगत् में दुःखरूप है। उपर्युक्त दोनों दोहों में कवि ने पुण्य और पाप का सुंदर-वर्णन किया है। पुण्य भाव- जो परिणाम आपको सन्मार्ग पर ले जाये। पाप भाव- जो परिणाम आपका पतन कराये। कवि ने यहाँ ‘‘पुण्य-बंध भी विशुद्ध-भावों से होता है’’- कहकर स्पष्ट किया कि पुण्य-फल की वांक्षा रखते हुये यदि पुण्य-क्रियायें की जायें,- तो ऐसे अशुद्ध-भावों से तो पुण्य भी नहीं बंधता। अर्थात् सांसारिक-सुख की इच्छा रूप निदानभाव रखते हुये यदि भगवान् की पूजा-अर्चना, व्रत-तप, दयादानादिक के भाव किये, तो उनसे पुण्य-बंध भी नहीं होगा। क्या कभी किसान भूसा पाने के लिये खेती करता है? लेकिन यदि वही किसान गेहूँ की खेती करता है, तो भूसा तो उसे सहज प्राप्त होता है; ठीक उसीप्रकार यदि साधक बिना किसी स्वार्थ के आत्महित के लक्ष्य से जिनेन्द्र की पूजा-अर्चना, व्रत-तप, दया-दानादिक के भाव करता है, तो अशुभकर्मों की आंशिक-निर्जरा के साथ-साथ पुण्य उसे सहज प्राप्त होता ही है।
(दोहा)
जोई करम-उद्योत धरि, होइ क्रिया-रसरत्त।
करषै नूतन-करम कौं, सोई आस्रव-तत्त।। 30।।
शब्दार्थ :- जोई करम उद्योत धरि= जब कर्म उदय में आता है, होइ क्रिया रसरत्त= तब कार्य या प्रवृत्ति राग-सहित होती है, करषै नूतनकरम कौं= जिससे नवीन कर्मों का आस्रव होता है, सोई आस्रव-तत्त= वही ‘आस्रव-तत्त्व’ है। विशेषार्थ :- आस्रव-तत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जब कर्म का उदय आता है, तब उस उदयजनित-परिणाम में मन, वचन और काया से रागरूप जुड़ने की जो प्रवृत्ति होती है, वह नवीनकर्मों को अपनी ओर खींचती है, जिसे आस्रव-तत्त्व कहते हैं। ‘आस्रव’ अर्थात् कर्मों का आना। संपूर्ण-लोक में कर्मरूपी पुद््गल-वर्गणायें ठसाठस भरी हुई हैं, जब पूर्वबद्ध-कर्म का उदय आता है, तो हम अज्ञानी-जीव उससे प्रभावित होकर अाकुलित होते हैं, कभी रागरूप तो कभी द्वेषरूप। वास्तव में देखा जाये, तो यही आकुलता हमारे लिये नवीन-कर्मों के आस्रव का कारण बनती है, वरना कर्म तो निर्जरित होने के लिये ही उदय में आया है, यदि हम उस समय साम्यभाव रखें, तो नवीन-कर्म का आस्रव नहीं होगा। यही ‘ज्ञानी’ और ‘अज्ञानी’ की परिणति में फर्क़ है, ज्ञानी जीव उदयजनित-परिणाम में आकुलित न होकर साम्यभाव रखते हैं, जिससे पुराना-कर्म भी निर्जरित हो जाता है और नवीन-कर्म का आस्रव भी नहीं होता। जबकि अज्ञानी-जीव कर्मोदय में मूर्च्छित होकर नवीन-कर्मबंध करता रहता है।
(दोहा)
जो उपयोग स्वरूप धरि, वरतै जोग-विरत्त।
रौकें आवत-करम कौं, सो है संवर-तत्त।। 31।।
शब्दार्थ :- जो उपयोगस्वरूप धरि= जब उपयोग स्वरूप में स्थिर होकर, वरतै जोग विरत्त= योग की चंचलता से विरक्तिरूप प्रवर्तन करता है, रौकें आवत करमकौं = तब वह आनेवाले कर्मों को रोकता है, सो है संवर-तत्त= वही संवर-तत्त्व है। विशेषार्थ :- संवर-तत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जब उपयोग स्वरूप में स्थिर होता है, तब सहज ही मन, वचन और काया का व्यापार रुक जाता है अर्थात् योगों से विरक्तिरूप प्रवृत्ति होती है, जिससे आनेवाला नवीन-कर्म रुक जाता है, वही संवर-तत्त्व है। कहने का तात्पर्य यही है कि यदि हमें नवीन-कर्मों को आने से रोकना है, तो इसका एकमात्रसाधन स्वरूप में स्थिरता ही है। इसी से मन-वचन-काया का व्यापार रुकता है, और नवीन-कर्मों का आना भी। इसलिये यदि हमें भी सुखी होना है, तो आत्मानुभूति का पुरुषार्थ करना चाहिये, शुभाशुभविकल्पों का नहीं।
(दोहा)
जो पूरब-सत्ता करम, करि थिति-पूरन आउ।
खिरबै को उद्यत भयौ, सो निर्जरा लखाउ।। 32।।
शब्दार्थ :- जो पूरब-सत्ता करम= पहले से सत्ता में मौजूद हैं, एेसे कर्म, करि थिति पूरन आउ= स्थिति पूरी करके उदय में आते हैं, वह खिरबै को उद्यत भयौ= इसप्रकार जो कर्म निर्जरित होने को तैयार हुआ है, सो निर्जरा लखाउ= उसे ही निर्जरा देखो/जानो। विशेषार्थ :- निर्जरा-तत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जो कर्म पहले से सत्ता में मौजूद हैं, और अपनी आयु की स्थिति पूरी करके खिरने को तैयार हैं, उसे ‘निर्जरा-तत्त्व’ कहते हैं। ‘निर्जरा’ अर्थात् कर्म-वर्गणाओं का अात्म-प्रदेशों से अलग होना। यूँ तो देखा जाये, तो कर्मों की निर्जरा तो प्रतिसमय स्वयं हो रही है, लेकिन मोक्षमार्ग में इस निर्जरा की कोई कीमत नहीं है, क्योंकि ये ‘सविपाक’ अर्थात् कर्मफल-सहित निर्जरा हो रही है। जब साधक आत्मस्वरूप में स्थिर होता है, तब वही निर्जरा कर्म-फल से रहित होती है, जिसे ‘अविपाक-निर्जरा’ कहते हैं, जो मोक्षमार्ग में सहकारी होती है, इसलिये यही वास्तविक-निर्जरा है।
(दोहा)
जो नव-करम पुरानसौं, मिले गाँठ दिढ़ होइ।
सकति बढ़ावै वंश की, बंध-पदारथ सोइ।। 33।।
शब्दार्थ :- जो नवकरम पुरानसौं= जब नवीन-कर्म पुराने-कर्मों सेे, मिले गाँठ दिढ़ होइ= मिलते हैं, तो और मजबूती से दृढ़ हो जाते हैं, सकति गाँठ दिढ़ होइ= वंश-परम्परा की शक्ति को बढ़ाते हैं, बंध-पदारथ सोइ= वही ‘बंध-पदार्थ’ है। विशेषार्थ :- बंध-तत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जब नवीन-कर्म पुराने-कर्मों से मिलते हैं, तो कर्मशक्ति और मजबूत हो जाती है, जो कर्मों की वंश-परम्परा को बढ़ाता है, वही ‘बंध-पदार्थ’ है। कवि ने इन दो-पंक्तियों में बंध-तत्त्व का बहुत ही सटीक-वर्णन किया है। जब नवीन-कर्म पुरानेकर्म से मिलते हैं, अर्थात् पूर्व-कर्म तो उदय में निर्जरित होने के लिये ही आया है, उससे नवीन-कर्मबंध तभी होता है, जब हमारा उपयोग उस उदयजनित-कर्म से जुड़ता है, यदि हम उस उदयजनित-कर्म से न जुड़ें, तो नवीन-कर्मों का बंध अर्थात् कर्मों की वंश-परम्परा में वृद्धि नहीं होगी, और पुराना-कर्म तो अपनी स्थिति पूरी कर चुका है, सो वह तो खिरेगा ही। इस विवक्षा से सिद्ध होता है कि यदि हम कर्म के उदय में समता-भाव रखें, तो वर्तमान में होने वाली आकुलता और नवीन-कर्मबंध- दोनों से बच जायेगें, और सच्चे-सुख का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
(दोहा)
थिति-पूरन करि जो करम, खिरै बंधपद-हानि।
हंस-अंस उज्ज्वल करै, मोक्षतत्त्व सो भानि।। 34।।
शब्दार्थ :- थिति-पूरन करि जो करम= स्थितिबंध पूरा करके जो कर्म, खिरै बंधपद-हानि= बंधदशा को नष्ट करके खिरता हैं, हंस-अंस उज्ज्वल करै= आत्मा की पर्याय को निर्मल करता है, मोक्षतत्त्व सो भानि= उसे मोक्षतत्त्व जानो। विशेषार्थ :- मोक्षतत्त्व का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जो कर्म अपनी स्थिति पूर्ण करके खिरने से पहले बंधदशा को भी नष्ट कर लेता है, और हंस यानि आत्मा के गुणों को निर्मल करता है, उसे मोक्षतत्त्व जानो। ‘मोक्ष’ अर्थात् संपूर्ण-कर्मों का आत्मप्रदेशों से अलग हो जाना। जो कर्म-क्षय होने से पहले बंधदशा को भी नष्ट करता है अर्थात् जिन कर्मों का उदय आकर निर्जरा तो हो जाये, किन्तु पुनः बंध न हो, वही मोक्ष-अवस्था है।
(दोहा)
भाव पदारथ समय धन, तत्त्व वित्त वसु दर्व।
द्रविन अरथ इत्यादि बहु, वस्तु नाम ये सर्व।। 35।।
शब्दार्थ :- भाव पदारथ समय धन= भाव, पदार्थ, समय, धन, तत्त्व वित्त वसु दर्व= तत्त्व, वित्त, वसु, दर्व, द्रविन अरथ आदि बहुत से= द्रविन अर्थ आदि बहुत से, वस्तु नाम ये सर्व= ये सभी वस्तु के नाम हैं। विशेषार्थ :- ‘वस्तु’ के पर्यायवाची-शब्दों का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि भाव, पदार्थ, समय, धन, तत्त्व, वित्त, वसु, दरव, द्रविन, अर्थ- ये सब ‘वस्तु’ के पर्यायवाची नाम हैं।
(सवैया इकतीसा)
परम-पुरुष परमेसुर परम-ज्योति, परब्रह्म पूरन परम-परधान है।
अनादि-अनंत अविगत अविनाशी अज, निरदुंद सुकत मुकुंद अमलान है।।
निराबाध निगम निरंजन निरविकार, निराकार संसार-सिरोमनि सुजान है।
सरब-दरसी सरवज्ञ सिद्ध स्वामी सिव, धनी नाथ ईस जगदीस भगवान् है।। 36।।
शब्दार्थ :- परम-पुरुष परमेसुर परम-ज्योति= प्रधान-पुरुष, परमेश्वर, परम-ज्योति, परब्रह्म पूरन परम परधान= परब्रह्म, पूर्ण, परम (श्रेष्ठ), प्रधान, अनादि-अनंत अविगत अविनाशी अज= अनादि-अनंत, अमर, विनाश-रहित, अजन्मा, निरदुंद सुकत मुकुंद अमलान है= निर्द्वन्द (द्वन्द-रहित), सुकृत अर्थात् पवित्रकार्यरूप, कमल के समान निर्मल हैं, निराबाध निगम निरंजन निरविकार= बाधा से रहित, ज्ञानस्रोत, कालिमा/ दोषरहित, विकार से रहित, निराकार संसार-सिरोमनि सुजान है= आकार-रहित, संसार के शिरोमणि, सुज्ञानी हैं, सरब-दरसी सर्वज्ञ सिद्ध स्वामी सिव= सर्वदर्शी, सर्वज्ञ, सिद्ध, नाथ, शिव, धनी नाथ ईस जगदीस भगवान् है= (सर्वगुण) सम्पन्न, जिसकी आदि या शुरूआत न हो, ईश्वर, जगत् के ईश, भगवान् हैं। विशेषार्थ :- शुद्ध-जीव के नामों का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि शुद्ध-जीव ‘प्रधानपुरुष’ अर्थात् परमपुरुष, ‘परमेश्वर’, ‘परमज्योति’, ‘परमब्रह्म’, ‘पूर्ण’, ‘परमप्रधान’, आदि से रहित ‘अनादि’, अंत से रहित ‘अनंत’, ‘अविगत’ अर्थात् अमर, कभी विनष्ट नहीं होने से ‘अविनाशी’, ‘अज’ अर्थात् अजन्मा, समस्त-द्वन्द से रहित ‘निर्द्वन्द’, पवित्र कार्यरूप अर्थात् ‘सुकृत’ और ‘मुकुंद-अम्लान’ अर्थात् कमल के समान निर्मल है। शुद्ध-जीव के बाधारहित अर्थात् ‘निराबाध’, ज्ञान के स्रोत ‘निगम’, कालिमा-रहित ‘निरंजन’, विकारों से रहित’ निर्विकार’, देह के आकार से रहित ‘निराकार’, संसार के शिरोमणि अर्थात् ‘सिरताज’, ‘सुज्ञानी’ अर्थात् सुजान, सर्वलोक को देखनेवाले ‘सर्वदर्शी’, समस्त लोक को जाननेवाले ‘सर्वज्ञ’, अनंतगुणों की सिद्धि करनेवाले ‘सिद्ध’, स्वयं के अधिपति अर्थात् ‘स्वामी’, मुक्त आत्मा अर्थात् ‘शिव’, सर्वगुण-संपन्न अर्थात् ‘धनी’, आदि-अंत से रहित त्रिकाल एकसमान अर्थात् ‘नाथ’, जगत् के स्वामी अर्थात् ‘जगदीश’, तथा ’ ऐश्वर्य’, ‘वीर्य’, ‘स्मृति’,’ यश’, ‘ज्ञान’ और ‘सौम्यता’ आदि गुणों के धारी अर्थात् ‘भगवान्’ इत्यादि नाम हैं।
(सवैया इकतीसा)
चिदानन्द चेतन अलख जीव समैसार, बुद्धरूप अबुद्ध असुद्ध-उपजोगी है।
चिद्रूप स्वयंभू चिनमूरति धरमवंत, प्रानवंत प्रानी जंतु भूत भवभोगी है।।
गुनधारी कलाधारी भेषधारी विद्याधारी, अंगधारी संगधारी जोगधारी जोगी है।
चिन्मय अखंड हंस अक्षर आतमराम, करम कौ करतार परम-विजोगी है।। 37।।
शब्दार्थ :- चिदानन्द चेतन अलख जीव समैसार= चिदानन्दरूपी, चेतन, इंद्रियों से अगोचर, जीव, समयसार, बुद्धरूप अबुद्ध असुद्ध-उपजोगी है= ज्ञानी, अज्ञानी, अशुद्ध-उपयोग-स्वरूपी है, चिद्रूप स्वयंभू चिनमूरति धरमवंत= चिद्रूप, स्वयंभ,ू चैतन्य की मूर्ति, धर्मात्मा, प्रानवंत प्रानी जंतु भूत भवभोगी है= दस प्राण-सहित प्राणी, जंत,ु भूत, संसार का भोग करनेवाला है, गुनधारी कलाधारी भेषधारी विद्याधारी= गुणों को धारण करनेवाला, कलाओं में निपुण, नानारूप रखनेवाला, विद्याओं में निपुण, अंगधारी संगधारी जोगधारी जोगी है= अंगोपांग सहित, संयोगीभाव सहित, योग को धारण करनेवाला, योगी, चिन्मय अखंड हंस अक्षर आतमराम= चैतन्यमय, खंडरहित, आत्मा, अविनाशी, आत्माराम, करम कौ करतार परम विजोगी= कर्म को करनेवाला, श्रेष्ठ-त्यागी। विशेषार्थ :- जीवद्रव्य के नामों का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं कि जीवद्रव्य के ‘चिदानन्द’ अर्थात् चैतन्य के आनंद का रसास्वादन करनेवाला, ‘चेतन’ अर्थात् जड़ता से रहित ‘अलख’ अर्थात् इन्द्रियों से अगोचर, ‘जीव’ अर्थात् सुख-दुःख का वेदन करनेवाला, ‘समयसार’ अर्थात् शुद्धात्मा, बुद्धरूप अर्थात् ज्ञानी, अबुद्धरूप अर्थात् अज्ञानी, अशुद्ध-उपयोग-स्वरूपी अर्थात् मोह-राग-द्वेषरूपी विकार-सहित है, जो चिद्रूप अर्थात् चैतन्य-स्वरूप, स्वयंभू, चैतन्य की मूर्ति, धर्म को धारण करनेवाला धर्मात्मा, दसप्राणों से सहित प्राणवंत, प्राणी, जंतु, भूत, भवभोगी अर्थात् संसार या कर्मफल का भोग करनेवाला है। वह जीव अनंतगुणों को धारण करनेवाला, कलाओं में निपुण, विभिन्न-रूपों को धारण करनेवाला, विद्याओं का पारगामी, अंगोपांग से सहित, संयोगी-भावों से सहित, मन, वचन, काय तीनों योगों को धारण करनेवाला, योगी यानि तपस्वी है। जो चैतन्यरूप, खंडरहित अखंड, आत्मा, अविनाशी, कर्म का बंध करनेवाला और परम-वियोगी अर्थात् श्रेष्ठ त्यागी है।
(दोहा)
खं विहाय अंबर गगन, अंतरिक्ष जगधाम।
व्योम वियत नभ मेघपथ ये आकाश के नाम।। 38।।
शब्दार्थ :- खं= आकाश, विहाय= वह स्थान जहाँ पक्षी उड़ते हैं, अंबर= अम्बर, गगन= गगन, अंतरिक्ष= जहाँ तारामंडल विद्यमान हो, जगधाम= लोक जिसमें रहता हो, व्योम= व्योम, वियत= आकाश, नभ= नभ, मेघपथ= मेघों के गमन का मार्ग। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आकाश-द्रव्य के विविध-नामों का उल्लेख किया है। खं, विहाय, अंबर, गगन, अंतरिक्ष, जगधाम, व्योम, वियत, नभ, मेघपथ- ये सभी ‘आकाश-द्रव्य’ के विविध नामान्तर हैं।
(दोहा)
जम कृतांत अंतक त्रिदस, आवर्ती मृतथान।
प्रानहरन आदित-तनय, काल नाम परवान।। 39।।
शब्दार्थ :- जम= यमराज, कृतांत= जो जीवन का अंत करता हो, अंतक= आयुकर्म का अंत करानेवाला, त्रिदश= भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों दशाओं रूप, आवर्ती= जन्म-मरणरूप परिभ्रमण करानेवाला, मृतथान= मरण का स्थान, प्रानहरन= प्राण-हरण करनेवाला, आदिततनय= आदित्य/सूर्य का पुत्र। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘काल-द्रव्य’ के विविध-नामों का उल्लेख किया हैं। जम, कृतांत, अंतक, त्रिदस, आवर्ती, मृतथान, प्रानहरन, आदित-तनय - ये सभी ‘काल-द्रव्य’ के विविध नामान्तर हैं। इनमें मात्र जैन-परम्परागत प्रयोग ही किये गये हों- ऐसा नहीं है, बल्कि लोक में प्रचलित-नामों व मान्यताओं का भी समावेश इनमें है- यह बात ध्यान रखना अनिवार्य है।
(दोहा)
पुन्य सुकृत ऊरधवदन, अकररोग शुभकर्म।
सुखदायक संसारफल, भाग बहिर्मुख धर्म।। 40।।
शब्दार्थ :- पुण्य= पुण्य, सुकृत= अच्छा कार्य, ऊरधवदन= ऊपर मुँह रखनेवाला, अकररोग= मानकषाय के परिणामस्वरूप होनेवाली अकड़ने रूप रोग, शुभकर्म= अच्छे कार्य, सुखदायक= सुख देने वाला, संसारफल= जिसके होने पर संसार को सफल माना जाता है, भाग= भाग्य, बहिर्मुख= जो जीव को बहिर्मुखी बनानेवाला है, धर्म= जिसे व्यवहार-धर्म कहा जाता है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘पुण्य’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। पुण्य, सुकृत, ऊरधवदन, अकररोग, शुभकर्म, सुखदायक संसारफल, भाग, बहिर्मुख, धर्म - ये सब ‘पुण्य’ के विविध नामान्तर हैं।
(दोहा)
पाप अधोमुख एन-अघ, कंपरोग दुःखधाम।
कलिल-कलुस किल्विष दुरित, असुभ-करम के नाम।। 41।।
शब्दार्थ :- पाप= पाप, अधोमुख= नीचे की ओर मुख अर्थात् नरकादि नीचगतियों में ले जानेवाला, एन-अघ= घोर पाप, कंपरोग= जिसके उदय से भयभीत होकर जीव काँपता है ऐसा कंपन-रोग, दुःख-धाम= दुःखों का घर, कलिल-कलुस= कलिकाल का मैल, किल्विष= शत्रु, दुरित= दुर्भाव। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘पाप’ के विविध-नामों का उल्लेख किया है। पाप, अधोमुख, एन- अघ, कंपरोग, दुःखधाम, कलिल-कलुस, किल्विष, दुरित- ये सब ‘अशुभकर्म’ या ‘पाप’ के विविध नामांतर हैं।
(दोहा)
सिद्धक्षेत्र त्रिभुवनमुकुट, शिवपथ अविचलथान।
मोख मुकति वैकुंठ सिव, पंचमगति निरवान।। 42।।
शब्दार्थ :- सिद्धक्षेत्र= मुक्त-जीव जहाँ रहते हैं, त्रिभुवनमुकुट= जो तीनों लोकों का मुकुट है, शिवपथ= जो मुक्ति का मार्ग है, अविचलथान= ऐसा स्थान जहाँ जाने के बाद अनंतकाल तक स्थिर रहते हैं, पुनः संसार में जन्म-मरण नहीं होगा, मोख= मोक्षस्वरूप, मुकति= मुक्ति, वैकुंठ= वयः यानि आयुकर्म जहाँ कुंठित हो जाये अर्थात् जन्म-मरण से रहित अवस्था- अन्य दर्शन जिसे ‘वैंकुंठ’ कहते हैं, सिव= शिव/मोक्ष, पंचमगति= चारों गतियों से पूर्णतः भिन्न, इसीलिये मोक्ष को पंचमगति भी कहते हैं, निरवान= निर्वाण अर्थात् जन्म-मरण आदि दोषों से रहित अवस्था। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने मोक्ष के विविध नामों का उल्लेख किया है। सिद्धक्षेत्र, त्रिभुवनमुकुट, शिवपथ, अविचलथान, मोख, मुकति, वैकुंठ, सिव, पंचमगति, निरवान- इत्यादि ‘मोक्ष’ के विविध नामांतर हैं।
(दोहा)
प्रज्ञा धिसना सेमुसी, धी मेधा मति बुद्धि।
सुरति मनीषा चेतना, आशय अंस विशुद्धि।। 43।।
शब्दार्थ :- प्रज्ञा= तीक्ष्ण धार, धिसना= वाक्-शक्ति, सेमुसी= बुद्धि/समझ , धी= ज्ञान, मेधा= प्रतिभा, मति= बुद्धि, सुरति= सद्बुद्धि, मनीषा= अक्ल, चेतना= ज्ञान, आशय= संस्कार, अंस= विवेक , विसुद्धि= विशेष ज्ञान विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘बुद्धि’ के विविध-नामों का उल्लेख किया है। प्रज्ञा, धिसना, सेमुसी, धी, मेधा, मति, बुद्धि, सुरति, मनीषा, चेतना, आशय, अंस, विशुद्धि- इत्यादि ‘बुद्धि’ के विविध-नामान्तर है।
(दोहा)
निपुन विचच्छन विबुध बुध, विद्याधर विद्वान्।
पटु प्रवीन पंडित चतुर, सुधी सुजन मतिमान।। 44।।
कलावंत कोविद कुसल, सुमन दच्छ धीमंत।
ज्ञाता सज्जन ब्रह्मविद, तज्ञ गुनीजन संत।। 45।।
शब्दार्थ :- निपुण= चतुर, विचच्छन= विलक्षण, विबुध-बुध= विविध-शास्त्रों का ज्ञाता, विद्याधर= विद्याओं के धारी, विद्वान्= विशेष-ज्ञानी, पटु= चतुर, प्रवीन= बुद्धिमान्, पंड़ित= पंड़ित, चतुर= चतुर, सुधी= सुधारक, सुजन= सुजान, मतिमान= बुद्धिमान् कलावंत= कलाओं के धनी, कोविद= पंडित या वेदज्ञ, कुसल= चतुर, सुमन= विवेकी या विचारवान, दच्छ= निपुण, धीमंत= विद्वान्, ज्ञाता= जानकार, सज्जन= सज्जन, ब्रह्मविद्= ब्रह्म विद्या के जानकार, तज्ञ= विशेष ज्ञानी, गुनीजन= गुणवान्, संत= निस्पृही। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘विचक्षण-पुरुष’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। निपुन, विचच्छन, विबुध-बुध, विद्याधर, विद्वान्, पटु प्रवीन, पंडित, चतुर, सुधी, सुजन, मतिमान, कलावंत, कोविद, कुसल, सुमन, दच्छ, धीमंत, ज्ञाता, सज्जन, ब्रह्मविद, तज्ञ, गुनीजन, संत- इत्यादि ‘विचक्षणपुरुष’ के विविध नामान्तर हैं।
(दोहा)
मुनि महंत तापस तपी, भिच्छुक चारितधाम।
जती तपोधन संयमी व्रती, साधु ऋषि नाम।। 46।।
शब्दार्थ :- मुनि, महंत= महिमायुक्त, तापस=तपस्वी, तपी= तप करनेवाले, भिच्छुक= भिच्छा लेनेवाले, चारितधाम= चारित्र को धारण करनेवाले, जती= यती, तपोधन= तपस्वी, संयमी= इन्द्रियों को वश में करनेवाले, व्रती= व्रतादिक धारण करनेवाले,साधु ऋषि= साधु और ऋषि। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘मुनि’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। मुनि, महंत, तापस, तपी, भिच्छुक, चारितधाम, जती, तपोधन, संयमी व्रती, साधु, ऋषि- इत्यादि ‘मुनिराज’ के विविध-नामान्तर है।
(दोहा)
दरस विलोकनि देखनौ, अवलोकनि दृगचाल।
लखन दृष्टि निरखनि जुवनि, चितवनि चाहनि भाल।। 47।।
शब्दार्थ :- दरस= दर्शन, विलोकनि= विशेषरूप से देखना, देखनौ= देखना, अवलोकनि, अवलोकन करना, दृगचाल= नेत्रों को घुमाकर देखना, लखन= लखना/देखना, दृष्टि= देखना, निरखनि= निरखना/ निहारना, जुवनि= जोवना, चितवन= चितैना/देखना, चाहनि= देखने की इच्छा, भाल= देखना-भालना। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘दर्शन’ के विविध-नामों का उल्लेख किया है। दरस, विलोकनि, देखनौ, अवलोकनि, दृगचाल, लखन, दृष्टि, निरखनि, जुवनि, चितवनि, चाहनि, भाल- इत्यादि ‘दर्शन’ के विविध-नामांतर हैं।
(दोहा)
ज्ञान बोध अवगम मनन, जगतभान जगजान।
संजम चारित आचरन, चरन वृत्ति थिरवान।। 48।।
शब्दार्थ :- ग्यान= ज्ञान, बोध= ज्ञान, अवगम= विशेष ज्ञान, मनन= चिंतन, जगतभान= जगत् को प्रकाशित करना, जगजान= जगत् को जानना। संजम= संयम/इन्द्रियों और मन को वश में करना, चारित= चारित्र, आचरन= आचरण, चरन= चरण अर्थात् चरणानुयोग के अनुरूप आचरण करना, वृत्ति= चर्या, थिरवान= स्थिरता धारण करना। विशेषार्थ :-इस छंद में कवि ने’ ज्ञान’ और’ चारित्र’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। ज्ञान, बोध, अवगम, मनन, जगतभान, जगजान- ये ‘ज्ञान’ के विविध नाम हैं, और संजम, चारित, आचरन, चरन, वृत्ति, थिरवान- ये ‘चारित्र’ के विविध नाम हैं।
(दोहा)
सम्यक् सत्य अमोघ सत्, निसंदेह निरधार।
ठीक जथारथ उचित तथ, मिथ्या आदि अकार।। 49।।
शब्दार्थ :- सम्यक्= यथार्थ, सत्य, अमोघ= अकाट्य, सत्= सत्य, निसंदहे = संदहे -रहित, निरधार= निर्णयात्मक, न कि ढुलमुल-रूप, ठीक= सही, जथारथ= यथार्थ, उचित=ठीक, तथ= तथ्यात्मक। विशेषार्थ :-इस छंद में कवि ने सत्य के विविध नामों का उल्लेख किया है। सम्यक्, सत्य, अमोघ, सत्, निसंदेह, निरधार, ठीक, जथारथ, उचित, तथ- ये ‘सत्य’ के विविध नाम हैं। इनमें शुरू में ‘अकार’ अर्थात् ‘अ’ जोड़ने से ‘मिथ्या’ अर्थात् ‘झूठ’ के नाम बनते हैं।
(दोहा)
अजयारथ मिथ्या मृषा, वृथा असत्त अलीक।
मुधा मोघ निःफल वितथ’ अनुचित असत अठीक।। 50।।
शब्दार्थ :- अजयारथ= अयथार्थ, मिथ्या= झूठ, मृषा= झूठ, वृथा= व्यर्थ की बकवास, असत्त= असत्य, अलीक= झूठ, मुधा= मिथ्या, मोघ= जो अकाट्य न हो, निःफल= निष्फल, वितथ= अयथार्थ, अनुचित= उचित नहीं, असत्= सत्य के विपरीत, अठीक= ठीक नहीं। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘झूठ’ के विविध नामों का उल्लेख किया है। अजयारथ, मिथ्या, मृषा, वृथा, असत्त, अलीक, मुधा, मोघ, निःफल, वितथ, अनुचित, असत, अठीक- ये ‘झूठ’ के विविधनामान्तर हैं।
(सवैया इकतीसा)
जीव निरजीव करता-करम पुन्न-पाप, आस्रव संवर निरजरा बंध मोष है।
सरव-विसुद्धि स्यादवाद साध्य-साधक, दुवादश दुवार धरै समैसार कोष है।।
दरवानुयोग दरवानुजोग दूरि करै, निगमकौ नाटक परमरस-पोष है।
सो परमागम बनारसी बखानै जामै, ग्यानकौ निदान सुद्ध चारित की चोष है।। 51।।
शब्दार्थ :- जीव निरजीव करता-करम पुन्न-पाप= जीव, अजीव, कर्ता-कर्म, पुण्य-पाप, अास्रव संवर निरजरा बंध मोष है= आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्ष, सरव-विसुद्धि स्यादवाद साध्य-साधक= सर्वविशुद्धि, स्याद्वाद, साध्य-साधक, दुवादश दुवार धरै समैसार कोष हैं= समयसार कोश में बारह (12) द्वार/ अधिकार हैं, दरवानुयोग दरवानुजोग दूरि करै= द्रव्यानुयोग, द्रव्यों के अनुयोग यानि संबंध से दूर करके, निगम कौ नाटक परमरस-पोष है= आत्मा का नाटक परमशांति का पोषक है, सो परमागम बनारसी बखानै= उस श्रेष्ठ-आगम का बनारसीदास बखान करते हैं या कहते हैं, जामै ग्यानकौ निदान सुद्ध-चारित की चोष है= इसमें ज्ञान का कारण शुद्ध-चारित्र की प्राप्ति होती है। विशेषार्थ :- ‘समयसार जी’ की ‘आत्मख्याति-टीका’ के बारह-अधिकारों का उल्लेख करते हुये कविवर कहते हैं कि समयसार जी ग्रंथ के खजाने में ‘जीव-अधिकार’, ‘अजीव-अधिकार’, ‘कर्ता-कर्म अधिकार’, ‘पुण्य-पाप अधिकार’, ‘आस्रव-अधिकार’, संवर-अधिकार, ‘निर्जरा-अधिकार’, ‘बंध-अधिकार’, ‘मोक्षअधिकार’, ‘सर्वविशुद्धि-अधिकार’,‘स्यादवाद-अधिकार’, ‘साध्य-साधक अधिकार’- ये बारह-द्वार है, इन दरवाजों से गुजरने पर अर्थात् आत्मसात् करने पर मोक्षरूपी महल का दरवाजा खुलता है। ‘समयसार जी’ की महिमा का गुणगान करते हुये कविवर कहते हैं कि यह ‘समयसार जी’ ग्रंथ ‘द्रव्यानुयोग’ का सर्वश्रेष्ठ-ग्रंथ है। और आत्मा को द्रव्यों के अनुयोग से अर्थात् पर-द्रव्यों के संयोग से भिन्न करके स्वानुभूति अर्थात् मोक्ष के मार्ग पर चलने की कला सिखाता है। यह आत्मा का नाटक अर्थात् समय का सार परमशांत-रस का पोषक है, अर्थात् ‘समयसार जी’ को पढ़कर आत्मचिंतन-मनन करने से अद्भुत-शांति की प्राप्ति होती है। इसके चिंतन-मनन से सम्यग्ज्ञान का उदय और सम्यक्चारित्र की प्राप्ति होती है, इसीलिये ‘पंडित बनारसीदास जी’ कहते हैं कि ‘‘मैं इसका पद्य-शैली में बखान अर्थात् वर्णन करता हूँ।’’