नाटक-समयसार (कविवर पं. बनारसीदास जी) | शब्दार्थ एवं विशेषार्थ सहित | Natak Samaysar with Shabdarth and Visheshartha

चतुर्दश गुणस्थानाधिकार (१३) | भाग २/२

दिनों में प्रोषध-विधि से उपवास करते हैं।
5. सचित्त-त्याग प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव सचित्त-वनस्पति आदि का सेवन नहीं करते।

  1. दिवा-मैथुन-त्याग प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव दिन में स्त्री-स्पर्श/सेवन के त्यागी होते हैं। 7. रात्रिभुक्ति-त्याग प्रतिमा/ब्रह्मचर्य प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी आठों-पहर स्त्री-सेवन के त्यागी होते हैं अर्थात् ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। 8. अारंभ-त्याग/निरारंभ-प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव सभीप्रकार के आरंभ के त्यागी होते हैं। 9. पापरूप परिग्रह-त्याग प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव पाप के कारणभूत परिग्रह के त्यागी होते हैं। 10. अनुमति-त्याग प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव स्वयं तो पापकार्य के त्यागी होते ही हैं, दूसरों को पापकार्य करने की अनुमति भी नहीं देते। 11. उद्दिष्ट-भोजन-त्याग-प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव स्वयं के लिये विशेषरूप से बनाये आहार आदि के त्यागी होते है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार

(दोहा)

संजम-अंस जग्यौ जहाँ, भोग-अरुचि परिनाम।
उदै प्रतिग्याकौ भयौ, ‘प्रतिमा’ ताकौ नाम।। 58।।

शब्दार्थ :- संजम-अंस जग्यौ जहाँ= जहाँ संयम का अंश जागृत हुआ है, भोग-अरुचि परिनाम= भोगों के प्रति अरुचि का परिणाम है, उदै प्रतिग्याकौ भयौ= (उस समय) प्रतिज्ञा का उदय होना, प्रतिमा ताकौ नाम= उसी का नाम ‘प्रतिमा’ है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘प्रतिमा’ के स्वरूप को परिभाषित किया है। ‘प्रतिमा’ से तात्पर्य उस परिणाम से है, जहाँ अंतरंग में संयम या आत्मिक-विशुद्धि का भाव हो, और बाह्य में पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों के प्रति सहज ही अरुचि का भाव हो, उस समय किसी प्रतिज्ञा या नियम लेने का भाव आये, उसे ‘प्रतिमा’ कहते हैं। ऐसे जीव के अनंतानुबंधी का क्षय या उपशम होने से ये नियम सहज पलते हैं, श्रावक को जबरन पालने नहीं पड़ते। यद्यपि इन नियमों का पालन मिथ्यादृष्टिजीव के भी देखा जाता है,परन्तु मिथ्यादृष्टि-जीव के अनंतानुबंधी का सद्भाव होने से उसे ये नियम ऊपरी तौर पर पालने पड़ते हैं, सहज नहीं पलते, इसीलिए नियमों का पालन करने पर भी वह जीव वास्तव में प्रतिमाधारी नहीं है।

(दोहा)

आठ-मूलगुण संग्रहै, कुविसन-क्रिया न कोइ।
दरसन-गुन निरमल करै, दरसन-प्रतिमा सोइ।। 59।।

शब्दार्थ :- आठ-मूलगुण संग्रहै= आठ-मूलगुणों को ग्रहण करे, कुविसन-क्रिया न कोइ= दुर्व्यसन की कोई क्रिया न हो, दरसन-गुन निरमल करै= दर्शन-गुण/सम्यग्दर्शन को निर्मल करे, दरसन-प्रतिमा सोइ= वही ‘दर्शन-प्रतिमा’ है। विशेषार्थ :- ‘दर्शन’ अर्थात् ‘आत्म-दर्शन’ ही पहली ‘दर्शन-प्रतिमा’ है। आत्मस्वरूप की अनुभूति होने पर ही श्रावक के जीवन में क्रमश: प्रतिमाओं की शुरूआत होती है। जबतक पहली-प्रतिमा न हो, तबतक अन्य-प्रतिमाओं का कोई मूल्य नहीं है। संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति-पूर्वक, स्वरूप की अनुभूति करते हुए दर्शन-प्रतिमाधारी श्रावक बाहर में अष्ट-मूलगुणों (मद्य, मांस, मधु त्याग के साथ-साथ बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर और पाकरफल इन पंच-उदुम्बर फलों का त्यागरूप) को ग्रहण करता है। साथ ही जुआ खेलना, माँस खाना, मदिरापान करना, वेश्यागमन, शिकार करना, चोरी करना, पर-स्त्री-सेवन- इन सात-व्यसनों का भी त्यागी होता है, जिससे सम्यग्दर्शन और अधिक निर्मल होता है।

(दोहा)

पंच-अनुव्रत आदरै, तीनों-गुनव्रत पाल।
सिच्छाव्रत-चारों धरै, यह व्रत-प्रतिमा चाल।। 60।।

शब्दार्थ :- पंच-अनुव्रत आदरै= पंच-अणुव्रतों का पालन करे, तीनों-गुनव्रत पाल= तीनों-गुणव्रतों का पालन करे, सिच्छाव्रत-चारों धरै= चारों-शिक्षाव्रतों को धारण करे, यह व्रत-प्रतिमा-चाल= यह (दूसरी) ‘व्रत-प्रतिमा’ की विधि है। विशेषार्थ :- दर्शन-प्रतिमा के धारी श्रावक हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह- इन पाँचों-पापों के एकदेश-त्यागरूप पाँच-अणुव्रतों- अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत और परिग्रह-परिमाणव्रत के साथ तीन-गुणव्रत- दिग्व्रत, देशव्रत और अनर्थदण्डव्रत, और चार-शिक्षाव्रत- सामायिक, प्रोषधोपवास, भोगोपभोग-परिमाण और अतिथि-संविभागव्रत- इन बारह व्रतों का निरतिचारपालन करते हैं, उसे दूसरी ‘व्रत-प्रतिमा’ कहते हैं।

(दोहा)

दर्व-भाव-विधि-संजुगत, हियै-प्रतिग्या टेक।
तजि-ममता समता-ग्रहै, अंतरमुहूरत एक।। 61।।

(चौपाई)

जो अरि-मित्र समान विचारै, आरत-रौद्र-कुध्यान निवारै।
संयम-सहित भावना भावै, सो सामायिकवंत कहावै।। 62।।

शब्दार्थ :- दर्व-भाव-विधि-संजुगत= द्रव्य और भाव दोनों से विधिपूर्वक, हियै-प्रतिग्या टेक= हृदय में प्रतिज्ञा रखकर, तजि-ममता समता ग्रहै= ममता को छोड़कर, समता को ग्रहण करे, अंतरमुहूरत एक= एक अंतर्मुहुर्त तक।। 61।। जो अरि-मित्र समान विचारै= जो शत्रु और मित्र को समान माने, आरत-रौद्र कुध्यान निवारै= आर्त और रौद्र कुध्यानों को दूरकर, संयम-सहित भावना भावै= संयम-सहित भावना भाये, सो सामायिकवंत कहावै= सो ‘सामायिक-प्रतिमा’ का धारी कहलाता है।। 62।। विशेषार्थ :- ‘व्रत-प्रतिमा’ के धारी श्रावक द्रव्य-विधि अर्थात् बाह्य-आसन, पाठ, शरीर की स्थिरता के साथ-साथ, भाव-विधि अर्थात् मन की स्थिरता और परिणामों में समता का भाव रखते हुए घड़ी, दो घड़ी या अंतर्मुहुर्त एक निश्चित समय की प्रतिज्ञा लेकर ममत्वभाव को छोड़कर साम्यभाव से पंचपरमेष्ठी के स्वरूप का और निज-स्वरूप का चिंतन करते हैं; उसे तीसरी ‘सामायिक’ प्रतिमा कहते हैं। इस प्रतिमा के धारी श्रावक मित्र और शत्रुु दोनों के प्रति समान-भाव रखते हैं। ‘आर्त-ध्यान’ (‘आर्त’ अर्थात् ‘दुःख’, और दुःख के अनुभव में चित्त का एकाग्र होना ‘आर्तध्यान’ है) और ‘रौद्र-ध्यान’ (‘रुद्र’ अर्थात् ‘निर्दयता’, ‘क्रूरता’, ऐसे खोटे-परिणाम से जो ध्यान होता है, वह ‘रौद्रध्यान’ है अर्थात् पाँचों-पापों में पाप करते हुये भी आनंद मानना ‘रौद्रध्यान’ है)- ये दोनों ही ध्यान स्व और पर दोनों को पीड़ाकारक होने से इन्हें ‘कुध्यान’ कहा गया है- इन दोनों कुध्यानों को दूर करते हैं। संयम की भावना रखते हुए समता-भाव से बारह-भावनाओं, वैराग्य-भावनाओं का चिंतन करते हैं- ऐसे जीवों को तीसरी ‘सामायिक-प्रतिमा’ के धारी कहते हैं।

(दोहा)

सामायिक-कीसी दसा, च्यारि-पहरलौं होइ।
अथवा आठ-पहर रहै, प्रोसह-प्रतिमा सोइ।। 63।।

शब्दार्थ :- सामायिक-कीसी दसा= सामायिक जैसी स्थिति, च्यारि-पहरलौं होइ= चार-पहर/बारह-घंटे तक हो, अथवा आठ-पहर रहै= अथवा आठ-पहर/चौबीस-घंटे तक रहे, प्रोसह-प्रतिमा सोइ= वही ‘प्रोषधप्रतिमा’ है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार विशेषार्थ :- कवि के अनुसार सामयिक-प्रतिमा का धारी श्रावक जब चार-पहर या आठ-पहर तक परिणामों में समताभाव रखते हुए सामायिक में लीन रहता है, तब चौथी ‘प्रोषध-प्रतिमा’ का धारी होता है। अन्य-ग्रंथों में प्रोषध का स्वरूप इसप्रकार वर्णित किया है- जब श्रावक एक माह की दोनों ‘अष्टमी’ और दोनों ‘चतुर्दशी’ को उपवास अर्थात् भोजन का पूर्ण-त्यागकर निजस्वरूप में वास करने का यत्न करे, और इन पर्वों के एक-दिन पहले और एक-दिन बाद एकासन या दिन में एक बार नीरस, शुद्धभोजन करे, तब वह श्रावक उत्कृष्ट ‘प्रोषध-प्रतिमा’ का धारी होता है।

(दोहा)

जो सचित्त-भोजन तजै, पीवै प्रासुक-नीर।
सो सचित्त-त्यागी पुरुष, पंच-प्रतिग्यागीर।। 64।।

शब्दार्थ :- जो सचित्त-भोजन तजै= जो सचित्त-भोजन का त्याग करे, पीवै प्रासुक-नीर= प्रासुक-जल का ही पान करे, सो सचित्त-त्यागी पुरुष= सो सचित्त का त्याग करनेवाला पुरुष, पंच-प्रतिग्यागीर= पाँचवी-प्रतिज्ञा को धारण करनेवाला होता है। विशेषार्थ :- प्रोषध-प्रतिमा का धारी श्रावक जब सचित्त-भोजन-पान आदि का त्यागी होता है, सचित्त-भोजन अर्थात् जीव-सहित भोज्य-पदार्थ/हरितकाय। ऐसे सचित्त भोज्य-पदार्थ धूप में सुखाने से, अग्नि में पकाने से, शोधने-सँवारने से अचित्त हो जाते हैं। और पाँचवीं-प्रतिमा का धारी श्रावक केवल अचित्त-भोज्य-पदार्थ और प्रासुक-जल या छानकर उबाला गया मर्यादित-जल ही ग्रहण करता है, अर्थात् बिना अग्नि में पकाये कच्ची-सब्जी, फल आदि का सीधे भक्षण नहीं करता।

(चौपाई)

जो दिन ब्रह्मचर्य-व्रत पालै, तिथि आये निसि-दिवस संभालै।
गहि नौ-बाड़ि करै व्रत रख्या, सो षट्-प्रतिमा श्रावक अाख्या।। 65।।

शब्दार्थ :- जो दिन ब्रह्मचर्य-व्रत पालै= जो दिन में ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करे, तिथि आये निसिदिवस संभालै= पर्व-तिथियों में रात और दिन दोनों में ही ब्रह्मचर्य पाले, गहि नौ बाड़ि करै व्रत रख्या= नव बाढ़-सहित व्रत का पालन करे, सो षट्-प्रतिमा श्रावक अाख्या= वह श्रावक छठवीं-प्रतिमा धारी कहा गया है। विशेषार्थ :- कवि के अनुसार पाँचवीं-प्रतिमा का धारी श्रावक जब दिन में स्त्री के स्पर्श-संबंधी सभीप्रकार की विषय-वासना का त्यागी होता है; तब वह श्रावक छठवीं ‘दिवा-मैथुन-त्याग प्रतिमा’ का धारी होता है। ‘आचार्य समन्तभद्र’ ने ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी’ में छठवीं-प्रतिमा को ‘रात्रिभुक्ति-त्याग प्रतिमा’ के नाम से विवेचित किया है। वहाँ आचार्यदेव कहते हैं कि इस प्रतिमा के धारी श्रावक रात्रि में पका/बना हुआ भोजन भी ग्रहण नहीं करते हैं। साथ ही दूध शर्बत, जल आदि पेय-पदार्थ, सूखे मेवा और सौंफ, इलायची, लौंग आदि सुगंधित-पदार्थ यहाँ तक कि औषधि, लेप आदि किसी भी प्रकार के पदार्थों का सेवन रात्रि में नहीं करते, अर्थात् रात्रिं में चारों-प्रकार के आहार के त्यागी होते हैं। यहाँ तक कि वे रात्रि में भोजन-संबंधी विचार/विकल्प/स्वपन तक से विरत होते हैं।

(चौपाई)

जो नौ-बाड़ि-सहित विधि साधै, निसि-दिन ब्रह्मचर्य आराधै।
सो सप्तम-प्रतिमाधर ग्याता, सील-सिरोमनि जग-विख्याता।। 66।।

शब्दार्थ :- जो नौ-बाड़ि-सहित विधि साधै= जो नव-बाढ़-सहित विधिपूर्वक, निसि-दिन ब्रह्मचर्य आराधै= रात और दिन ब्रह्मचर्य का पालन करे, सो सप्तम-प्रतिमा धर ग्याता= वे ज्ञानी-जीव सातवीं-प्रतिमा के धारक, सील-सिरोमनि जग-विख्याता= जगत्-प्रसिद्ध शील-शिरोमणि हैं। विशेषार्थ :- छठवीं-प्रतिमा का धारी श्रावक जब पूर्णरूप से ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करता है, अर्थात् दिन हो या रात स्त्री-सेवन का पूर्णरूप से त्यागी होता है, तब वह सातवीं ब्रह्मचर्य-प्रतिमा का धारी होता है। इस व्रत की रक्षा या निरतिचार-पालन करने के लिये ऐसे श्रावक आगम में वर्णित नव-बाढ़ का भी पालन करते हैं।

(कवित्त)

तियथल-वास, प्रेम-रुचि निरखन, दे परीछ भाखै मधु-वैन।
पूरब-भोग केलि-रस-चिंतन, गुरु-आहार लेत चित-चैन।।
करि शुचि-तन सिंगार बनावत, तिय-परजक-मध्य सुख-सैन।
मनमथ-कथा उदर-भरि-भोजन, ये नव-बाड़ि कहै जिन-बैन।। 67।।

शब्दार्थ :- तियथल-वास= स्त्रियों के निवासक्षेत्र में रहना, प्रेम-रुचि निरखन= राग से रुचिपूर्वक स्त्रियों को देखना, दे परीछ भाखै मधु-वैन= स्त्रियों को मुड़कर देखना और उनसे मीठे-वचन बोलना, पूरब-भोग केलि-रस चिंतन= पहले किये भोगों का एवं काम-क्रीड़ाओं के आनंद का चिंतन करना, गुरु-आहार लेत चित-चैन= गरिष्ठ-आहार लेकर हर्ष मनाना, करि-शुचि तन-सिंगार बनावत= शरीर को साफकर/नहा-धोकर शृंगार/मेकअप करना, तिय-परजक-मध्य सुख-सैन= स्त्रियों के पलंग/आसन पर सो-बैठकर आनंदित होना, मनमथ-कथा= कामोत्पादक-कथा सुनना, उदर-भरि भोजन= भरपेट-भोजन करना, ये नव बाड़ि कहै जिनबैन= ये नौ-बाड़ जिनवाणी में कही हैं अर्थात् अब्रह्म से बचने के कार्य कहे हैं (इन नौ कार्यों से अपने आपको बचाकर ही ब्रह्मचर्य की रक्षा की जा सकती है)। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पिछले-छंद में आगत नव-बाड़ों का सटीक-स्पष्टीकरण किया है। ये नव-बाढ़ श्रावक के लिये ब्रह्मचर्य-व्रत के निरतिचार-पालन में अत्यंत-सहयोगी हैं। इसलिए सातवींप्रतिमा के धारक-जीवों को इन नव-बाढ़-सहित ही ब्रह्मचर्य-प्रतिमा का पालन करना चाहिए। बाड़ अर्थात् आड़/रोक/बचाव या कहें इन कार्यों व संयोगों से अपने को बचाने की एक मर्यादा निश्चित करना; जिससे मन पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों के संपर्क से भी दूर रहे और संयमित भी रहे, ताकि आत्मसाधना निर्विघ्न हो। स्त्रियों के समागम/संपर्क में रहना, रागभाव से स्त्रियों को निरखना/देखना, परोक्षरूप से स्त्रियों से मीठे-वचनों से वार्तालाप करना, पूर्वकाल में भोगे हुये विलासितापूर्ण-भोगों का स्मरणकर आनंदित होना, आनंददायक गरिष्ठ-आहार लेना (क्योंकि गरिष्ठ-भोजन से वासनाजन्य-विकार और प्रमाद में वृद्धि होती है), स्वभाव से ही अशुचि-काया को स्नानादि के द्वारा साफ/पवित्र करके उसे सजाने-सँवारने का भाव करना, स्त्रियों के पलंग पर सोना उनके आसन पर बैठकर अानंदित होना, काम-वासनावर्धककथाओं को सुनना, भरपेट भोजन करना- ये नव-बाड़ें लगाकर अर्थात् इनसे अपने आप को बचाकर चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार शीलव्रत को सुरक्षित रखा जाता है। इसलिये ये नौ-उपाय जिनवाणी में कहे हैं। सातवीं ब्रह्मचर्य-प्रतिमा के धारी श्रावक को अपने ब्रह्मचर्य-व्रत को सुरक्षित रखने के लिये इन नव-बाड़ों से अपने आपको बचाना ही चाहिये। इस प्रसंग में एक बात विशेषरूप से विचारणीय है कि ये नव-बाड़ की सीमा जिनेन्द्र-देव ने एक पंचम-गुणस्थानवर्ती सातवीं-प्रतिमा के धारक श्रावक के लिए कही है, जबकि वह श्रावक अभी अणुव्रती है; फिर इससे आगे के क्षुल्लक, ऐलक जैसे उत्कृष्ट अणुव्रतियों एवं मुनिराज जैसे महाव्रतियों को तो इन नव-बाड़ों का प्रयोग करना ही चाहिये अर्थात् ऐसे संयोगों और कार्यों से बचना ही चाहिये।

(दोहा)

जो विवेक-विधि आदरै, करै न पापारंभ।
सो अष्टम-प्रतिमा-धनी, कुगति-विजै-रनथंभ।। 68।।

शब्दार्थ :- जो विवेक-विधि आदरै= जो विवेक-सहित आचरण करे, करै न पापारंभ= पाप-कार्यों के साधनों तक से बचकर रहे, सो अष्टम-प्रतिमा धनी= वह आठवीं प्रतिमा का स्वामी, कुगति-विजै रनथंभ= कुगति-विजय का रणस्तम्भ/कुगति-विजेता है। विशेषार्थ :- सातवीं-प्रतिमा का धारी जीव, जब जिन कार्यों को करने से जीवों की हिंसा होती है, ऐसे असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्यार्जन और शिल्प आदि धनार्जन करनेवाले सभी पापारंभ के कार्यों का त्याग करता है; तब वह नरकादि-कुगतियों को जीतनेवाला महायोद्धा आठवीं-प्रतिमा का धारक होता है।

(चौपाई)

जो दसधा-परिग्रह को त्यागी, सुख-संतोष-सहित वैरागी।
समरस-संचित किंचित-ग्राही, सो श्रावक नौ-प्रतिमा-वाही।। 69।।

शब्दार्थ :- जो दसधा-परिग्रह को त्यागी= जो दसप्रकार के परिग्रह का त्यागी हो, सुख-संतोष-सहित वैरागी= सुख-संतोषपूर्वक विरक्त हो, समरस-संचित किंचित-ग्राही= समताभाव-पूर्वक कुछ/सीमित वस्तुओं को ग्रहण करे; सो श्रावक नौ प्रतिमा वाही= वह श्रावक नौंवीं-प्रतिमा का धारी होता है। विशेषार्थ :- आठवीं-प्रतिमा का धारी जीव व्यापारादि से निवृत्त र् होने के बाद पहले से जमा दसप्रकार के बाह्य-परिग्रह का त्याग करता है। केवल अपने पहनने के वस्त्र और भोजन-पात्र के रूप में अंशमात्रपरिग्रह रखकर शेष परिग्रह का त्याग करता है। और साम्यभाव धारण करते हुए संसार से विरक्त होने का पुरुषार्थ करता है, तब वह श्रावक नौवीं ‘परिग्रह-त्याग प्रतिमा’ का धारी होता है।

(दोहा)

परकौं पापारंभकौ, जो न देइ उपदेस।
सो दसमी-प्रतिमा-सहित, श्रावक विगत-कलेस।। 70।।

शब्दार्थ :- परकौं पापारंभकौ जो= जो दूसरों को पाप-कार्यों को करने का, न देइ उपदेस= उपदेश/प्रेरणा (तक) नहीं देता है, (सो) दसमी प्रतिमा-सहित श्रावक विगत-कलेस= वह क्लेश-रहित श्रावक दसवींप्रतिमा को धारण करता है। विशेषार्थ :- नौवीं-प्रतिमा का धारक श्रावक स्वयं तो समस्त-प्रकार के पापारंभ का त्याग करता ही है, अन्य को भी पाप-कार्यों को करने की अनुमति/सलाह तक नहीं देता। यहाँ तक कि मकान बनवाना, बच्चों की शादी करना, व्यापारादि में सलाह देना, अच्छा-बुरा, खरा-खोटा आदि किसी भी प्रकार के कार्यों में परिवारीजनों के पूछने पर भी अनुमति/सलाह तक नहीं देता। कहने का अभिप्राय यही है कि समस्त-पापारंभ के कार्यों का कृत-कारित-अनुमोदना से पूर्णतः त्यागी होता है; तब वह श्रावक दसवीं ‘अनुमति-त्याग-प्रतिमा’ का धारी होता है।

(चौपाई)

जो सुछंद वरतै तजि-डेरा, मठ-मंडपमैं करैं बसेरा।
उचित-आहार उदंड-विहारी, सो एकादश-प्रतिमाधारी।। 71।।

शब्दार्थ :- जो सुछंद वरतै तजि-डेरा= जो अपने निवास-स्थान को छोड़कर स्वतंत्र-विचरण करते हैं, मठ- मंडपमैं करैं बसेरा= किसी मठ, मंडप/बरामदे में निवास करते हैं, उचित-आहार= योग्य/मर्यादित-आहार लेते हैं, उदंड-विहारी= वनादि (निर्जन-स्थलों) में विहार करते हैं; सो एकादश-प्रतिमाधारी= वे श्रावक ग्यारहवींप्रतिमा के धारी होते हैं। विशेषार्थ :- दसवीं-प्रतिमा के धारी श्रावक जब अपने घर-मकान को भी छोड़कर किसी मठ या निर्जन-वनादि में विरक्तजनों या महाव्रतियों के पास निवास करने लगते हैं। और इसके साथ ही उदिष्टआहार के त्यागी अर्थात् उनके निमित्त विशेषरूप से बनाये हुये भोजन को ग्रहण नहीं करते; बल्कि गृहस्थ ने अपने लिए जो भोजन बनाया है, उसी में से भक्तिपूर्वक दिया हुआ कुछ भोजन ग्रहण करते हैं, और साम्यभाव से महाव्रत-ग्रहण करने का अभ्यास करते हैं; तब वे श्रावक ग्यारहवीं-प्रतिमा के धारक होते हैं।

(दोहा)

एकादस-प्रतिमा-दसा, कही देसव्रत-माँहि।
वही अनुक्रम मूलसौं, गहौ सु छूटै नांहि।। 72।।

शब्दार्थ :- एकादस-प्रतिमा-दसा= ग्यारह प्रतिमाओं की ये स्थिति, कही देसव्रत-माँहि= देशव्रती-श्रावक के लिए कही, वही अनुक्रम मूलसौं गहौ सु छूटै नांहि= वही शुरू से क्रम से इन्हें ग्रहण करता है, फिर छोड़ता नहीं है। विशेषार्थ :- प्रतिमाओं के संबंध में विशेष-उल्लेख करते हुए कविवर कहते हैं कि पंचम-गुणस्थान- वर्ती श्रावक के लिये इन ग्यारह प्रतिमाओं का विशेषरूप से वर्णन किया गया है। सो देशव्रती-श्रावक को इन प्रतिमाओं को मूल से अर्थात् शुरू से क्रमश: उत्तरोत्तर-ग्रहण करना चाहिए, बीच में से न ग्रहण करना चाहिए और न ही छोड़ना चाहिए।

(दोहा)

षट्-प्रतिमा-तांई जघन, मध्यम नौ-परजंत।
उत्तम दसमी-ग्यारसी, इमि प्रतिमा-विरतंत।। 73।।

शब्दार्थ :- षट्-प्रतिमा-तांई जघन= छटवीं-प्रतिमा तक जघन्य, मध्यम नौ परजंत= नौवीं-प्रतिमा तक मध्यम, और उत्तम दसमी-ग्यारसी= दसवीं-ग्यारहवीं प्रतिमाधारी उत्तम श्रावक है, इमि प्रतिमा विरतंत= इसप्रकार प्रतिमाओं का वर्गीकरण/वृत्तान्त है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार विशेषार्थ :- प्रतिमाओं की अपेक्षा श्रावकों के भेद करते हुए कविवर कहते हैं कि पहली-प्रतिमा से छठवीं-प्रतिमा तक के श्रावकों को ‘जघन्य-श्रावक’, सातवीं, आठवीं और नौवीं प्रतिमाओं के धारी को ‘मध्यम-श्रावक’, और दसवीं, ग्यारहवीं-प्रतिमाओं के धारी को ‘उत्तम-श्रावक’ कहते हैं।

(चौपाई)

एक-कोडि-पूरब गिनि लीजै, तामैं आठ-बरस घटि कीजै।
यह उत्कृष्ट-काल-थिति जाकी, अंतरमुहूरत जघन-दशाकी।। 74।।

शब्दार्थ :- एक-कोडि-पूरब गिनि लीजै= एक करोड़-पूर्व के काल की गणना करके, तामैं आठ बरस घटि कीजै= उसमें आठ वर्ष कम कर दो, यह उत्कृष्ट-काल थिति जाकी= यह इसकी कालगत उत्कृष्ट-स्थिति है। अंतरमुहूरत जघन-दशाकी= और इस दशा का जघन्य-स्थिति अंतर्मुहूर्त-काल है। विशेषार्थ :- पंचम-गुणस्थान की काल-सीमा का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि पाँचवें देशव्रतगुणस्थान का उत्कृष्ट-काल ‘आठ वर्ष कम एक करोड़ पूर्व’ है, और जघन्य-काल ‘अंतर्मुहूर्त’ है।

(दोहा)

सत्तर-लाख-किरोर-मित, छप्पन-सहस-किरोड़।
एते बरस मिलाइके, पूरब-संख्या जोड़।। 75।।

शब्दार्थ :- सत्तर-लाख-किरोर-मित= सत्तर-लाख करोड़, छप्पन-सहस किरोड़= छप्पन-हजार करोड़, एते बरस मिलाइके= इतने वर्ष मिलाने पर, पूरब-संख्या जोड़= एक-पूर्व की संख्या होती है। विशेषार्थ :- संख्या की दृष्टि से ‘एक-पूर्व’ के काल का प्रमाण देते हुए कविवर कहते हैं सत्तर-लाख छप्पन-हजार-करोड़ वर्ष का ‘एक-पूर्व’ होता है। चौरासी-लाख वर्ष का ‘एक-पूर्वांग’ होता है, और चौरासी-लाख पूर्वांगों का ‘एक-पूर्व’ होता है। इस तरह 8400000 x 8400000 वर्षों का गुणनफल ‘एकपूर्वं’ होगा।

(दोहा)

अंतर्मुहुरत द्वै-घरी, कछुक घाटि उतकिष्ट।
एक-समय एकावली, अंतरमुहूर्त-कनिष्ट।। 76।।

शब्दार्थ :- अंतर्मुहुरत द्वै-घरी= एक अंतर्मुहुर्त में दो-घड़ी, कछुक घाटि उतकिष्ट= एक-समय कम उत्कृष्ट- काल, एक-समय एकावली= एक-समय अधिक एक-आवली, अंतरमुहूर्त कनिष्ट= अंतर्मुहुर्त का जघन्यकाल है। विशेषार्थ :- अंतर्मुहुर्त का काल/समय वर्णित करते हुए कविवर कहते हैं कि एक-अंतर्मुहूर्त का काल दो घड़ी है। एक घड़ी 24 मिनिट की होती है। दो घड़ी अर्थात् 48 मििनट में से एक-समय कम अंतर्मुहूर्त का उत्कृष्ट-काल है, और एक-समय अधिक एक-आवली अंतर्मुहूर्त का जघन्य-काल है।

(दोहा)

यह पंचम-गुणथान की, रचना कही विचित्र।
अब छट्ठे-गुणथान की, दसा कहूँ, सुन मित्र।। 77।।

शब्दार्थ :- यह पंचम-गुणथान की= यह पाँचवे-गुणस्थान की, रचना कही विचित्र= विचित्र-रचना का वर्णन किया। अब छट्ठे-गुणथान की= अब छटवें-गुणस्थान का, दसा कहूँ सुन मित्र= स्वरूप कहता हूँ, हे मित्र! सुनो। विशेषार्थ :- छटवें-गुणस्थान का स्वरूप वर्णित करने की प्रतिज्ञा करते हुए कविवर कहते हैं ''पाँचवेगुणस्थान का विचित्र-वर्णन पूरा हुआ। अब छठवें-गुणस्थान का स्वरूप कहता हूँ, सो हे मित्र! तुम सुनो!

(दोहा)

पंच-प्रमाद-दसा धरै, अट्ठाइस-गुनवान।
थविरकल्पि जिनकल्पि-जुत, है प्रमत्त-गुनथान।। 78।।

शब्दार्थ :- पंच-प्रमाद-दसा धरै= पाँच-प्रमाद की दशा से सहित, अट्ठाइस गुनवान= 28 मूलगुण-सहित, थविरकल्पि= स्थविरकल्पि, जिनकल्पि-जुत= जिनकल्पि के भेदों से संयुक्त है, प्रमत्त-गुनथान= प्रमत्तगुणस्थान है। विशेषार्थ- ‘प्रमत्त-संयत’ नामक छठवें-गुणस्थान का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि जो पाँच- प्रकार के प्रमाद-सहित, 28 मूलगुणों का पालन करते हैं, और जिनके ‘स्थविरकल्पि’ और ‘जिनकल्पि’ - दोनों प्रकार हैं, वे मुनिराज छठवें-गुणस्थानवर्ती होते हैं।

(दोहा)

धर्मराग विकथा-वचन, निद्रा-विषय-कषाय।
पंच-प्रमाद-दसा-सहित, परमादी-मुनिराय।। 79।।

शब्दार्थ :- धर्मराग= धर्म में अनुराग, विकथा-वचन= विकथा-वचन, निद्रा= निद्रा, विषय= विषय, कषाय= कषाय, पंच-प्रमाद-दसा-सहित= इन पाँच प्रकार के प्रमाद-सहित, परमादी-मुनिराय= प्रमत्त-संयत मुनिराज होते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने प्रमत्त-मुनि-संबंधी पंच-प्रमादों का वर्णन किया है। ‘प्रमाद’ से तात्पर्य संज्वलन-कषायादि-सहित अवस्था का नाम ‘प्रमाद’ है। यद्यपि इस गुणस्थान में अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरणी, प्रत्याख्यानावरणी- तीन-कषाय चौकड़ी का तो क्षय या उपशम हो जाता है; परन्तु संज्वलन-कषाय-चौकड़ी और नव-नोकषाय का उदय रहता है, जो स्वरूप-स्थिरता में बाधक होता है, इसी का नाम ‘प्रमाद’ है। ऐसे पाँच-प्रमादों का वर्णन कवि ने यहाँ किया है - धर्म में अनुराग (जीवों को उपदेश देने, धर्ममार्ग में लगाने संबंधी-भाव होना), विकथा (आत्मस्वरूप से बाहर आने पर होनेवाली वचन-क्रिया), निद्रा (शयनरूप क्रिया), विषय (आहार, विहार, नीहार-संबंधी इन्द्रिय-विषयों में प्रवर्तन), और कषाय (संज्वलन-संबंधी क्रोध, मान, माया, लोभरूप-प्रवर्तन) छठवें गुणस्थानवर्ती प्रमत्तसंयत-मुनि इन पाँच-प्रमादों सहित होते हैं।

(सवैया इकतीसा)

पंच-महाव्रत पालै पंच-समिति संभालै, पंच-इंद्री जीति भयौ भोगी चित-चैनकौ।
षट-आवश्यक-क्रिया दर्वित-भावित साधै, प्रासुक-धरामैं एक-आसन है सैन को।।

चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार

मंजन न करै, केश लुंचै, तन-वस्त्र मुंचै, त्यागै-दंतवन, पै सुगंध-स्वास-वैनकौ।
ठाड़ौ करसे आहार लघु-भुंजी एकबार, अट्ठाइस-मूलगुनधारी जती जैनकौ।। 80।।

शब्दार्थ :- पंच-महाव्रत पालै= पाँच महाव्रतों का पालन कर, पंच-समिति संभालै= पंच-समितियों की संभाल कर, पंच-इंद्री जीति= पाँचों इन्द्रियों को जीतकर, भयौ भोगी चित-चैनकौ= आत्मिक-आनंद के भोगी होते हैं, षट-आवश्यक क्रिया दर्वित-भावित साधै= द्रव्य और भावरूप से षट्-आवश्यकों की क्रिया को साधते हैं, प्रासुक-धरामैं एक-आसन है सैन को= जीवरहित-भूमि पर एक-करवट सोना, मंजन न करै= स्नान नहीं करना, केश लुंच=ै केशलोंच करना, तन-वस्त्र मुंचै= तन के वस्त्र त्यागना, त्यागै दंतवन= दंतमंजन नहीं करना, पै सुगंध-स्वास-वैनकौ= फिर भी स्वांस और वचनों से सुगंधि ही निकलती है, ठाड़ौ करसे आहार= खड़े होकर आहार लेना, लघु-भुंजी= थोड़ा भोजन करना, एकबार= दिन में एकबार, अट्ठाइस-मूलगुनधारी जती जैन को= ऐसे 28 मूलगुणधारी जैन-साधु होते हैं। विशेषार्थ- इस-छंद में कवि ने मुनिराजों के 28 मूलगुणों का वर्णन किया है। अहिंसादि पाँच-महाव्रतों का पालन, ईर्या आदि पाँचों-समितियों की संभाल, पंचेन्द्रियों के विषय-भोगों को जीतकर आत्मिकआनंद का भोग करना, द्रव्य और भाव अर्थात् बहिरंग और अंतरंग- दोनों रूप से षट्-आवश्यकों का पालन करना, जीव-रहित प्रासुक-भूमि पर एक-करवट सोना, जीवन-पर्यंत अस्नान-व्रती रहना अर्थात् स्नान नहीं करना, केशलौंच करना, वस्त्र त्यागना अर्थात् दिगम्बरत्व को अंगीकार करना, अदन्तधोवन अर्थात् दाँत साफ नहीं करना फिर भी वचन और स्वांस सुगंधित रहना, खड़े होकर करपात्र में आहार लेना, अल्पभोजन करना, और दिन में एकबार भोजन करना- इसप्रकार जैन-साधु पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रिय-विजय, षट्-आवश्यक और शेष सात-उत्तरगुण- इसप्रकार कुल 28 मूलगुणों से सुशोभित होते हैं।

(दोहा)

हिंसा-मृस-अदत्तधन, मैथुन परिगह-साज।
किंचित् त्यागी-अनुव्रती, सब त्यागी-मुनिराज।। 81।।

शब्दार्थ :- हिंसा= हिंसा, मृस= झूठ, अदत्त-धन= बिना दिया धन/वस्तु ग्रहण करना अर्थात् चोरी, मैथुन= कुशील-सेवन, परिगह-साज= परिग्रह-सामग्री जोड़ना, किंचित्-त्यागी अनुव्रती= एकदेश-त्यागी ‘अणुव्रती’, सब-त्यागी मुनिराज= सर्वदेश-त्यागी ‘मुनिराज’ होते हैं। विशेषार्थ :- पाँच-महाव्रतों का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह- इन पाँचों-पापों का जो एकदेश/आंशिक-त्याग करते हैं, वे अणुव्रती-श्रावक होते हैं। और जो इन पाँचों-पापों का सर्वदेश/सर्वथा त्याग करते हैं, वे महाव्रती-मुनिराज होते हैं। 28 मूलगुणों के अंतर्गत पाँच-महाव्रतों का स्वरूप इसप्रकार है - 1. अहिंसा-महाव्रत- दिगम्बर-मुनिराज आरंभ-परिग्रह से रहित होने से, बाहर में छहकाय के जीवों के घात नहीं करने से सभीप्रकार की ‘द्रव्यहिंसा’ और राग-द्वेष, क्रोध-मान-माया-लोभ आदि भावों पर नियंत्रण रखने से ‘भावहिंसा’ से भी रहित होने से ‘अहिंसा-महाव्रत’ के धनी होते हैं। 2. सत्य-महाव्रत- जिनके न लेश-मृषा- अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म- दोनोंप्रकार के झूठ का त्याग होने से दिगम्बर-मुनिराज ‘सत्य-महाव्रत’ के धारी होते है। 3. अचौर्य-महाव्रत- ‘‘मृण हू बिना दीयो न गहै’’- अन्य-वस्तु तो दूर, मिट्टी भी बिना दिये ग्रहण नहीं करते; वे दिगम्बर-मुनिराज ‘अचौर्य-महाव्रत’ के धारी होते हैं। 4. ब्रह्मचर्य-महाव्रत- ‘‘अठदस सहसविध शील धर’’… शील के अठारह हजार भेदों का पालन करते हैं और ‘‘चिद्ब्रह्म में नित रमि रहैं’’- चैतन्य-स्वरूप आत्मा में लीन रहते हैं, इसीलिये ‘ब्रह्मचर्यमहाव्रत’ के धारी होते हैं। 5. अपरिग्रह-महाव्रत- मुनिराज अंतरंग में कषायादि चौदह और बहिरंग-स्वर्ण, वास्तु आदि दसप्रकार के परिग्रह के त्यागी होने से ‘अपरिग्रह-महाव्रत’ के धारी होते है।

(दोहा)

चलै-निरखि भाखै-उचित, भखै अदोष-अहार।
लेइ-निरखि डारै-निरखि, समिति पंच-परकार।। 82।।

शब्दार्थ :- चलै-निरखि= देखकर चलें, भाखै-उचित= उचित-वचन बोलें, भखै-अदोष-अहार= निर्दोषआहार ग्रहण करें, लेइ-निरखि डारै-निरखि= देखकर रखें और देखकर उठायें, समिति पंच-परकार= ये पाँचप्रकार की समिति हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मुनियों के 28 मूलगुणों के अंतर्गत पाँच-प्रकार की समितियों का वर्णन किया हैं- प्रमाद-रहित, यत्नाचार-सहित सम्यक्-प्रवृत्ति ‘समिति’ कहलाती है, जिसका मुनिराज निरतिचारपालन करते हैं। समितियाँ पाँच-प्रकार की होती है। जो इसप्रकार हैं- 1. ईर्या-समिति- मुनिराज हमेशा दृष्टि झुकाकर अपने से आगे चार-हाथ जमीन देखकर ही गमन करते हैं, जिससे गमन करते समय किसी भी जीव की हिंसा न हो जाये। 2. भाषा-समिति- मुनिराज हमेशा हित-मित-प्रिय अर्थात् हितकारी, मीठे, प्रिय, योग्य-वचन ही बोलते हैं, ताकि उनके द्वारा बोले गये किसी वचन से भी किसी जीव को पीड़ा न पहुँचे। 3. एषणा-समिति- मुनिराज हमेशा भोजन-संबंधी 46 दोषों (16 उद्गम-दोष, 16 उत्पादन-दोष, 10 अशन या एेषणा-दोष और 4 अंगारक-दोष) से रहित अर्थात् निर्दोष-आहार ही ग्रहण करते हैं। ताकि भोजन बनाते समय से लेकर आहार लेते समय तक किसी जीव की हिंसा न हो और न ही प्राणपीड़न हो। 4. आदान-निक्षेपण-समिति- देखकर रखना और उठाना अर्थात् मुनिराज शास्त्र, पीछी, कमंडलु आदि कुछ भी सामान हमेशा देखकर ही रखते व उठाते हैं, जिससे अनजाने में भी जीव की विराधना न हो। 5. प्रतिष्ठापन-समिति- जीव-रहित प्रासुक-भूमि पर ही मुनिराज कफ-मल-मूत्रादि का क्षेपण करते हैं; ताकि किसी जीव की हिंसा न हो।

(दोहा)

समता, वंदन, थुतिकरन, पड़कौना सज्झाव।
काउसग्ग-मुद्रा-धरन, षडावसिक ये भाव।। 83।।

चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार शब्दार्थ :- समता= साम्यभाव, वंदन= नमस्कार करना, थुतिकरन= स्तुति करना, पड़कौना= प्रत्याख्यान, सज्झाव= स्वाध्याय, काउसग्ग-मुद्रा धरन= कायोत्सर्ग-मुद्रा धारण करना, षडावसिक ये भाव= ये छह षट्आवश्यक हैं। विशेषार्थ :- अवश्य करने योग्य कार्य को ‘आवश्यक’ कहते हैं। ‘मूलाचार’ के अनुसार ‘आवश्यक’ की परिभाषा इसप्रकार है- ‘‘ण वसो अवसो अवस्स, कम्ममावासगं त्ति वोधव्वा। जुत्तित्ति उवायत्ति य, णिरयवा होइ णिजुत्ति।।’’ -(मूलाचार 515) अर्थात् जो कषाय राग-द्वेषादि के वशीभूत न हो वह ‘अवश’ है, और उस ‘अवश’ का जो आचरण है, वह ‘आवश्यक’ है। ‘भगवती आराधना’ में तो आवश्यक की परिभाषा और भी मार्मिक दी गई है- ‘‘आवासयन्ति रत्नत्रयमपि इति आवश्यकाः’’ अर्थात् जो आत्मा को रत्नत्रय में निवास कराते हैं, उनको ‘आवश्यक’ कहते

हैं। श्रावकों की तरह मुनियों के भी ‘षट्-आवश्यक’ आगम में वर्णित हैं।
उन्हीं षट्-आवश्यकों का वर्णन कवि ने यहाँ किया है।

  1. समता- प्रत्येक अनुकूल और प्रतिकूल-परिस्थितियों में साम्यभाव रखना, और निर्धारित-समय पर

आत्मचिंतन-पूर्वक ‘सामायिक’ करना मुनिराज का ‘समता’ नामक पहला-आवश्यक है।
2. स्तुति- समस्त तीर्थंकर-भगवंतों का गुणानुवाद करना ‘स्तुति’ नामक दूसरा-आवश्यक है।
3. वंदना- समस्त-तीर्थंकर परमात्मा को विनयपूर्वक वंदन/नमन करना तीसरा ‘वंदना’ आवश्यक है।

  1. स्वाध्याय- आत्मस्वरूप में स्थिरता-हेतु स्वयं के परिणामों की संभाल, और बाह्य में शास्त्र

स्वाध्याय, चिंतन-मनन आदि करना।
5. प्रतिक्रमण- स्वयं के द्वारा किये दोषों का परिष्कार करना ही ‘प्रतिक्रमण’ है।

  1. कायोत्सर्ग- कायोत्सर्ग अर्थात् काया से ममत्व का उत्सर्ग यानि त्याग करना ही ‘कायोत्सर्ग’ नामक आवश्यक है।

(सवैया इकतीसा)

थविरकलपि जिनकलपि दुविध-मुनि, दोऊ वनवासी दोऊ नगन रहतु हैं।
दोऊ अट्ठाईसमूलगुन के धरैया दोऊ, सरव-त्यागी ह्वै विरागता गहतु हैं।।
थविरकलपि ते जिनके शिष्य-साखा होइ, बैठिकै सभामैं धर्मदेसना कहतु हैं।
एकाकी सहज जिनकलपि तपस्वी-घोर, उदै की मरोरसौं परीसह सहतु हैं।। 84।।

शब्दार्थ :- थविरकलपि जिनकलपि दुविध-मुनि= ‘स्थविरकल्पी’ और ‘जिनकल्पी’ दोनों मुनि है, दोऊ वनवासी दोऊ नगन रहतु हैं= दोनों ही वन में रहते हैं, दोनों ही नग्न रहते हैं, दोऊ अट्ठाईस-मूलगुन के धरैया= दोनों 28 मूलगुणों का पालन करते हैं, दोऊ सरव-त्यागी ह्वै= दोनों ही सर्वप्रकार से त्यागी होकर, विरागता गहतु हैं= वैराग्य को ग्रहण/धारण करते हैं, थविरकलपि ते= स्थविरकल्पी वे हैं, जिनके शिष्य-साखा होइ= जिनके शिष्यों का संघ होता है, बैठिकै सभामैं धर्मदेसना कहतु हैं= सभा में बैठकर धर्म का उपदेश देते हैं, एकाकी सहज जिनकलपि= जिनकल्पी सहज ही एकाकी होते हैं, तपस्वी घोर= घोर-तपस्वी होते हैं, उदै की मरोरसौं परीसह सहतु हैं= कर्म के उदय में होनेवाले परीषहों को सहन करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘स्थविरकल्पी’ और ‘जिनकल्पी’, ऐसे दो-प्रकार के मुनियों का स्वरूप विवेचित किया है। । ये दोनों ही प्रकार के साधु जिनाम्नाय में वर्णित-मुनिचर्या का पालन करते हैं, दोनों ही मुनि जंगल में रहते हैं, नग्न-दिगम्बर-रूप को ही अंगीकार करते हैं, दोनों ही 28 मूलगुणों का निरतिचार-पालन करते हैं। मुनिचर्या की दृष्टि से उनमें कोई भेद नहीं है, दोनों ही समान-आचरण करते हैं। दोनों में अंतर केवल इतना कि जो ‘स्थविरकल्पी-मुनिराज’ हैं, वे अपने संघ में रहते हैं, जिसमें एक संघ के आचार्य, नव-दीक्षित-साधुओं को पढ़ाने के लिये उपाध्याय, और सामान्य-साधु होते हैं। संघ के आचार्य का आदेश प्रत्येक-साधु के लिये मानना अनिवार्य होता है। साधुओं से चर्या-पालन में कोई दोष लगने पर वह साधु आचार्य के समक्ष अपने दोष को बताकर प्रायश्चित भी लेते हैं। संघ में रहने पर सभी साधु अनुशासन में रहते हैं, धर्मोपदेश देते व सुनते हैं, कर्म के उदयवश किसी भी साधु के जीवन में प्रतिकूलता आने पर या परिणाम विचलित होने पर, अन्य साधु उन्हें संबोधित करते हैं, स्थितिकरण कराते हैं। जबकि दूसरी ओर उग्र-पुरुषार्थी ‘जिनकल्पी-मुनि’ का कोई संघ नहीं होता, कोई शिष्य नहीं, वे एकलविहारी होते हैं। कर्म के उदय से होनेवाले परीषहों को स्वयं ही सहन करते हैं, अर्थात् अपने परिणामों की संभाल वे साधु स्वयं ही करते हैं।

(सवैया इकतीसा)

ग्रीषममैं धूप-थित, सीतमैं अकंप-चित, भूखै धरैं-धीर, प्यासे नीर न चहतु है।
डंसमसकादिसौं न डरैं, भूमि-सैन करै, वध-बंध-विथामैं अडोल ह्वै रहतु हैं।।
चर्या दु:ख भरै तिन फाससौं न थरहरै, मल-दुरगंधकी गिलानि न गहतु हैं।
रोगनिकौ न करैं इलाज एेसे मुनिराज, वेदनी के उदै ये परीसह सहतु हैं।। 85।।

शब्दार्थ :- ग्रीषममैं धूप-थित= गर्मी में धूप में स्थित रहते हैं, सीतमैं अकंप-चित= सर्दी में निश्चल-मन रहते हैं, भूखै धरैं-धीर= भूख लगने पर धैर्य रखते हैं, प्यासे नीर न चहतु है= प्यास लगने पर पानी नहीं चाहते, डंसमसकादिसौं न डरैं= डांस-मच्छर के काटने आदि का भय नहीं करते, भूमि-सैन करै= जमीन पर सोते हैं, वध-बंध-विथामैं अडोल ह्वै रहतु हैं= बाँधने-मारने के कष्ट/उपसर्ग में भी अचल रहते हैं, चर्या दु:ख भरै= नंगे पाँव चलने में होनेवाले कष्ट से (और), तिन-फाससौं न थरहरै= तिनका-फाँस आदि के लगने पर नहीं घबराते, मल-दुरगंधकी गिलानि न गहतु हैं= मल और दुर्गंधित-पदार्थों में ग्लानि नहीं करते, रोगनिकौ न करैं इलाज= रोग होने पर इलाज नहीं करते, एेसे मुनिराज वेदनी के उदै ये परीसह सहतु हैं= इसप्रकार मुनिराज वेदनीय-कर्म के उदय में इन परीषहों को सहन करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने वेदनीय-कर्म-जनित ग्यारह-परीषहों का वर्णन किया है। और मुनिराज कर्मोदय-जनित इन परीषहों को शांत-भाव से सहन करते हैं। आत्मसाधना-हेतु तेज-गर्मी में तपती-धूप में भी शांत-भाव से खड़े रहना, गर्म-सड़क पर नंगेपाँव विहार करना, भयंकर-गर्मी में तेज-लू के बीच में भी भेदविज्ञान के बल पर समताभाव रखना ‘उष्ण-परीषहजय’ है। तेज-सर्दी, तुषार, अत्यधिक ठंडी-हवाओं से भी भयभीत नहीं होना निर्भय और अचल रहकर आत्मसाधना करना ‘शीत-परीषहजय’ है। उपवास होने पर, अनेकप्रकार की तपस्याओं से चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार शरीर कृष होने पर भी क्षुधा के कारण अपने विशुद्ध-ध्यान से च्युत न होना, धैर्य रखना, शांत-भाव से सहना, और विशेष-उत्साह से मोक्षमार्ग में लगना ‘क्षुधा-परीषहजय’ है। प्रकृति-विरुद्ध आहार, तेजगर्मी, पित्त-ज्वर, अनशन आदि के कारण उत्पन्न प्यासरूपी अग्नि-शिखा को संतोषरूपी-जल से शांत करना ‘तृषा-परीषहजय’ है। डांस, मक्खी, मच्छर आदि के काटने पर उत्पन्न हुई पीड़ा को शांतभाव से सहन करना और सहज रहना ‘दंसमशक-परीषहजय’ है। रात्रि में कठोर-भूमि पर भी पूरा बदन सीधा रखकर एक करवट से कुछ देर तक ही सोना ‘शय्या-परीषहजय’ है। किसी चोर, डाकू, बैरी आदि के द्वारा मारने-बाँधने, यहाँ तक कि प्राणघात किये जाने पर भी क्रोध न करके उनका भला ही सोचना ‘वध-बंधन-परीषहजय’ है। पवन की तरह एकाकी-विहार करते हुए भयानक-वन में भी सिंह की तरह निर्भय रहना, और जमीन पर चलने से पैर में कंकर-पत्थर आदि चुभने पर होनेवाले कष्ट को शांत-भाव से सहन करना, मन में किसी भी प्रकार का खेद नहीं करना, यह ‘चर्या-परीषहजय’ है। तिनका, फाँस आदि के चुभने पर नहीं घबराना ‘तृणस्पर्शपरीषहजय’ है। अपने शरीर पर लगे मल को देखकर या बाह्य में दुर्गंधयुक्त-पदार्थो को देखकर भी ग्लानि का भाव न आना ‘मल-परीषहजय’ है। शरीर में रोगादि की वेदना होने पर मन में उसका इलाज करने का विचार भी नहीं करना, बल्कि सहज-शांतभाव से सहन करना ‘रोग-परीषहजय’ है- इसप्रकार वेदनीयकर्म के उदय में होनेवाले उपर्युक्त ग्यारह-प्रकार के परीषहों को मुनिराज शांत-भाव से सहन करते हैं।

(कुण्डलिया)

एते संकट मुनि सहैं, चारितमोह-उदोत।
लज्जा-संकुच-दु:ख धरैं, नगन-दिगम्बर होत।।
नगन-दिगम्बर होत, श्रोत-रति-स्वाद न सेवैं।
तिय-सनमुख दृग-रोकि, मान-अपमान न बेबैं।।
थिर ह्वै निरभै रहैं, सहैं कुवचन जग जेते।
भिच्छुक-पद संग्रहैं, लहैं मुनि संकट एेते।। 86।।

शब्दार्थ :- एते संकट मुनि सहैं= इतने संकट/परीषह मुनिराज सहन करते हैं, चारितमोह उदोत= चारित्रमोहनीय-कर्म के उदय से, लज्जा-संकुच-दुख धरै नगन-दिगम्बर होत= लज्जा और संकोचजनित-जो दुःख होता है नग्न-दिगम्बर रहने से, नगन-दिगम्बर होत श्रोत-रति-स्वाद न सेव=ै नग्नता के साथ-साथ श्रवण आदि इन्द्रिय-विषयों का उदय होने पर भी उस संबंधी स्वाद/इन्द्रिय-विषय का सेवन नहीं करते, तिय-सनमुख दृग-रोकि= स्त्रियों के सन्मुख होने पर नेत्रों से उनकी ओर देखने से स्वयं को रोकना, मान-अपमान न बेब=ैं मान-अपमान की परवाह नहीं करते, थिर ह्वै निरभै रहैं= भयरहित स्थिर रहते हैं, सहैं कुवचन जग जेत=े जगत्जनों के कुवचनों को सहन करते हैं, भिच्छुकपद-संग्रहैं लहैं मुनि संकट एेत=े लोगों के यहाँ आहार लेने जाने पर ‘याचक’ कहलाते हैं- मुनिराज इन संकटों को सहते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन सात-परीषहों का वर्णन किया है, जो चारित्र-मोहनीय-कर्म के उदय से होते हैं, और मुनिराज उन परीषहों को शांत-भाव से सहन करते हैं। सबसे पहला ‘नग्न रहना’ भी परीषह है, और इसके फलस्वरूप चित्त को मलिन करनेवाले अनेककारणों के मिलने पर भी लज्जा, संकोच आदि दुःखों को शांत-भाव से सहना, और अपनी आत्मसाधना निःसंकोच होकर करना ‘नग्न-परीषहजय’ है। नग्नता के साथ-साथ श्रवण आदि इन्द्रियों के विषयों के उपस्थित होने पर भी उनमें अनुराग नहीं करते हैं, और अनिष्ट-संयोग मिलने पर भी विरोध या ग्लानि का भाव नहीं करना, और आत्मसाधना में रत रहना यह दूसरा ‘अरति-परीषहजय’ है। तीसरा स्त्रियों के सन्मुख होने पर भी नेत्रों की चंचलता को रोकना अर्थात् उन पर मोहित न होना, सहज-निर्विकार रहना ‘स्त्री-परीषहजय’ है। अपने में गुणों की अधिकता होने पर भी यदि कोई सत्कार न करे, तो भी चित्त में मलिनता का न होना,अथवा कैसी भी विपरीत-परिस्थिति हो मान-अपमान की परवाह नहीं करना- यह चौथा ‘सत्कार-पुरस्कार-परीषहजय’ है। जिस आसन में ध्यान आदि में बैठे हों, उससे उपसर्ग आदि के आने पर भी विचलित नहीं होना अथवा भय का निमित्त मिलने पर भी अपने ध्यान में स्थिर रहना, अपने आसन से भी विचलित नहीं होना - यह पाँचवाँ ‘निषद्या-परीषहजय’ है। मूर्खों के द्वारा कठोर, कटु-वचन, गाली आदि का प्रयोग करने पर भी क्रोधित न होकर शांत रहना; बल्कि उन्हें क्षमा करने का ही भाव रखना- यह छठवाँ ‘आक्रोशपरीषहजय’ है। आहारादि न मिलने पर या अन्य किसी भी कार्य के लिये याचना/दीनतारूप-प्रवर्तन तो दूर चेहरे पर भी दीनता का भाव नहीं लाना,- यह सातवाँ ‘याचना-परीषहजय’ है। चारित्र-मोहनीय-कर्म के उदय में होनेवाले इन सभी परीषहों को मुनिराज शांत-भाव से सहन करते हैं।

(दोहा)

अलप-ग्यान लघुता लखैं, मति-उतकरष विलोइ।
ज्ञानावरन-उदोत मुनि, सहैं परीसह दोइ।। 87।।

शब्दार्थ :- अलप-ग्यान लघुता लखै= कम-ज्ञान होने पर अपने को छोटा मानना, मति-उतकरष विलोइ= अधिक-ज्ञान होने पर श्रेष्ठ मानना, ज्ञानावरन उदोत= ज्ञानावरणी-कर्म के उदय में होनेवाले, मुनि सहै परीसह दोइ= ये दोनों परीषह मुनिराज सहन करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मुनिराजों को ज्ञानावरणी-कर्म के उदय में होने वाले दो-परीषहों का वर्णन किया है। किसी भी जीव को ज्ञान की प्रगटता कम या अधिक मिलने में ज्ञानावरणी-कर्म का उदय निमित्त होता है। मुनिचर्या में ज्ञान की प्रगटता अल्प होने पर लघुता/हीनता का भाव आना ‘अज्ञान-परीषह’ है, और उसमें विचलित न होना, समता-भाव रखना ‘अज्ञान-परीषहजय’ है। मुनिचर्या में ज्ञान की उघाड़ या क्षयोपशम अधिक होने पर उस पर गर्वित होना ‘प्रज्ञा-परीषह’ है, और उसमें गर्व का भाव नहीं करते हुये साम्य-भाव रखना ‘प्रज्ञा-परीषहजय’ है। ज्ञानावरणी-कर्म के उदय में होने वाले दोनों परीषहों को मुनिराज साम्यभाव से सहन करते हैं।

(दोहा)

सहै अदरसन-दुरदसा, दरसन-मोह-उदोत।
रोकै उमंग-अलाभ की, अंतराय के होत।। 88।।

शब्दार्थ :- सहै अदरसन दुरदसा= अदर्शनरूपी-दुर्दशा को सहन करते हैं, दरसन-मोह उदोत= दर्शन मोहनीय के उदय में, रोकै उमंग अलाभ की= अलाभ होने पर अपने परिणामों की खेद-खिन्नता को रोकते हैं, अंतराय के होत= अंतराय-कर्म का उदय होने पर। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने दर्शन-मोहनीय और अंतराय-कर्मों के उदय में होनेवाले परीषहों का वर्णन किया है। साधु-चर्या में भी दर्शन-मोहनीय का उदय होने पर श्रद्धान में किंचित् भी मलिनता या दोष का चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार उत्पन्न होना, (जैसे कि बहुत समय तक कठोर-तपस्या करने पर भी विशेष-ऋद्धियाँ आदि प्रकट न होना) मुनिधर्म में ‘अदर्शन-परीषह’ कहा गया है, और उससमय सावधान रहना, चलायमान न होना, अश्रद्धान का भाव न आना ‘अदर्शन-परीषहजय’ है। इसीप्रकार अंतराय-कर्म के उदय में अनुकूलसामग्री आहार, औषधि आदि का लाभ न होना ‘अलाभ-परीषह’ है, और उससमय परिणामों में खेदखिन्नता का भाव न आना, आत्मलाभ में ही तृप्त रहना, ‘अलाभ-परीषहजय’ है। सच्चे मुनिराज इन दोनों परीषहों कों साम्यभाव से जीतते हैं।

(सवैया इकतीसा)

एकादस वेदनीकी, चारितमोह की सात, ग्यानावरनी की दोइ, एक अंतराय की।
दर्सनमोह की एक, द्वाविंसति-बाधा सबै, केई मनसाकी, केई वाकी, केई कायकी।।
काहूकौ अलप काहूकौ बहुत उनीस-तांई, एक ही समैमैं उदै आवै असहायकी।
चर्या-थित-सज्जा-माँहि, एक सीत-उस्न-माँहि, एक दोइ होहिं तीन नांहि समुदायकी।। 89।।

शब्दार्थ :- एकादस वेदनीकी= ग्यारह वेदनीय की, चारितमोह की सात= चारित्रमोहनीय की सात, ग्यानावरनी की दोइ= ज्ञानावरणी की दो, एक अंतराय की= अंतराय की एक, दर्सनमोह की एक= दर्शनमोहनीय की एक, द्वाविंसति बाधा सबै= सब (मिलाकर) बाईस बाधा/परीषह है, केई मनसाकी= कुछ मन की, केई वाकी= कुछ वचन की, केई कायकी= कुछ काया की, काहूकौ अलप= किसी को अल्प, काहूकौ बहुत= किसी को बहुत, उनीस-तांई= (अधिकतम एकसाथ) उन्नीस तक, एक ही समैमैं उदै आवै असहायकी= एकसमय में उदय में आ सकती हैं, चर्या-थित-सज्जामाँहि एक= चर्या, आसन और शय्या में से एक, सीतउस्न-माँहि एक= शीत-उष्ण में से एक, दोइ होहिं= दो का ही उदय होता है, तीन नांहि समुदायकी= (इन पाँच में से कभी भी) तीन का उदय एकसाथ नहीं होता। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मासाधना में बाधक, कर्म के उदय-जन्य बाईस-परीषहों का विशेष वर्णन किया है। भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, दंशमशक, नग्नता, अरति, स्त्री, चर्या , निषद्या (बैठना), शय्या, आक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कार-पुरस्कार, प्रज्ञा , अज्ञान, और अदर्शन ये 22 प्रकार के परीषह आगम में वर्णित हैं। इनमें से वेदनीय कर्म के उदय में ग्यारह, चारित्रमोहनीय कर्म के उदय में सात, ज्ञानावरणी कर्म के उदय में दो, अंतराय कर्म के उदय में एक, और दर्शन मोहनीय कर्म के उदय में एक, इस प्रकार कुल मिलाकर ये 22 परीषह आत्मसाधना में बाधक हैं, जिसमें से कुछ मन से, कुछ वचन

से और कुछ काया से संबंध रखते हैं।
इन बाईस-परीषहों में से किसी साधक को कुछ परीषहों का उदय होता है, किसी को बहुत का।

लेकिन एक जीव को एक ही समय में एक साथ 19 परीषहों का ही उदय हो सकता है, पूरे बाईस का नहीं। क्योंकि चर्या (चलना), आसन (बैठना या खड़े होना) या शय्या (सोना) इन तीन में से एक समय में एक का ही उदय रहता है। इसीप्रकार शीत (सर्दी) और उष्ण (गर्मी) में से भी एक समय में एक का ही उदय हो सकता है। इसप्रकार इन पाँच में से एकसमय में दो का ही उदय होता है, तीन का नहीं। परीषह से तात्पर्य साता/अनुकूलता में बाधक सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास, मच्छर, मक्खी के काटने आदि की अचानक बाधा आना ‘परीषह’ है, और इन बाधाओं के आने पर आर्त-परिणाम/संक्लेशपरिणाम न हों अथवा ध्यान से न डिगें, वह ‘परीषहजय’ है। जैसे हम सब कुछ देखभालकर ध्यान में बैठें, अचानक बारिश आ गई, तेज-हवा चलने लगी, जिससे सर्दी लगने लगी- यह है ‘परीषह’। और फिर भी हमारा ध्यान भंग नहीं हुआ, परिणाम मलिन/ विचलित नहीं हुये- यह है ‘परीषहजय’।

(दोहा)

नानाविधि संकट-दसा, सहि साधैं सिवपंथ।
थविरकल्पि-जिनकल्पि धर, दोऊ सम-निरग्रंथ।। 90।।

जो मुनि-संगतिमैं रहैं, थविर-कल्पि सो जान।
एकाकी जाकी दसा, सो जिन-कल्पि बखान।। 91।।

(चौपाई)

थविरकलपि धर कछुक सरागी, जिनकलपी महान् वैरागी।
इति प्रमत्त-गुनथानक-धरनी, पूरन भई जथारथ-वरनी।। 92।।

शब्दार्थ :- नानाविधि संकट-दसा= विभिन्नप्रकार के संकटों को, सहि साधै सिवपंथ= सहनकर मोक्षमार्ग को साधते हैं, थविर-कल्पि जिन-कल्पि धर= स्थविरकल्पी और जिनकल्पी (मुनिपना) धारणकर, दोऊ समनिरग्रंथ= दोनों ही समान निर्ग्रंथ होते हैं।। 90।। जो मुनि-संगतिमैं रहैं= जो मुनि-संघ में रहते हैं, थविरकल्पि सो जान= उन्हें ‘स्थविरकल्पी’ जानो, एकाकी जाकी दसा= जिसकी स्थिति अकेल/े संघरहित है, सो जिनकल्पि बखान= उन्हें ‘जिनकल्पी’ कहते हैं।। 91।। थविर-कलपि धर= स्थविरकल्प धारण करनेवाले, कछुक सरागी= कुछ रागसहित होते हैं, जिनकलपी महान्-वैरागी= जिनकल्पी अत्यंत-वैरागी होते हैं, इति प्रमत्त-गुनथानक-धरनी= इसप्रकार प्रमत्तगुणस्थान धारण करनेवालों का, पूरन भई जथारथ-वरनी= यथार्थ-वर्णन पूरा हु ।। 92।। विशेषार्थ :- इन तीनों-छंदों में कवि ने स्थविरकल्पी और जिनकल्पी-साधुओं का तुलनात्मक-वर्णन किया है। ‘स्थविरकल्पी’ और ‘जिनकल्पी’ -दोनों ही प्रकार के मुनि समानरूप से निर्ग्रंथ होते हैं, दोनों ही विभिन्न-प्रकार के संकटों को सहनकर मोक्षमार्ग को साधते हैं। दोनों ही साधु अंतरंग-साधना की दृष्टि से लगभग-समान होते हुए भी दोनों में कुछ अंतर है। स्थविरकल्पी-साधु संघ में रहते हैं, अनुशासन में रहते हैं, किंचित्-सरागी भी होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि संघ में रहनेवाले सभी साधुओं के प्रति किंचित् राग का भाव वर्तता है, जैसे साधुओं को पढ़ाना, अनुशासित करना, कदाचित् कोई भूल होने पर प्रायश्चित देना, रोगादि की वेदना होने पर सेवा करना, संबोधित करना, स्थितिकरण कराना इत्यादि। जबकि दूसरी ओर ‘जिनकल्पी’-साधु एकाकी-विचरण करते हैं। यद्यपि इन्हें कोई अनुशासित नहीं करता; परन्तु किसी भी प्रकार की प्रतिकूलता आने पर ये स्वयं ही अपने परिणामों को दृढ़ करते हैं, उपसर्ग और परीषहों को भेदविज्ञान के बल पर अकेले ही शांतभाव से सहन करते हैं, इसीलिए ये साधु अपेक्षाकृत अधिक-वैरागी एवं उग्र-पुरुषार्थी होते हैं। ज्ञातव्य है कि इस विषमकाल में ‘जिन-कल्पी’-साधुओं का अभाव कहा गया है। अत:

‘एकलविहारी’ होने का भी पूर्णत: निषेध जानना चाहिये।
इसप्रकार छठवें-गुणस्थान में प्रवर्तमान-साधुओं का यथार्थ-वर्णन पूर्ण हुआ।

(चौपाई)

अब वरनौं सप्तम-विसरामा, अपरमत्त-गुनथानक नामा।।
जहाँ प्रमाद-क्रिया-विधि नासै, धरम-ध्यान थिरता परगासै।। 93।।

चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार

(दोहा)

प्रथम-करन चारित्र कौ, जासु अंत-पद होइ।
जहाँ अहार-विहार नहिं, अपरमत्त है सोइ।। 94।।

शब्दार्थ :- अब वरनौं सप्तम-विसरामा= अब सातवें विश्राम-स्थल का वर्णन करता हूँ, अपरमत्तगुनथानक नामा= जिसका नाम अप्रमत्त-गुणस्थान हैं, जहां प्रमाद-क्रिया-विधि नासै= जहाँ प्रमाद-सहित क्रिया का अभाव होता है, धरम-ध्यान थिरता परगासै= और धर्मध्यान की दशा प्रगट होती है।। 93।। प्रथम-करन चारित्र कौ= यह चारित्र का प्रथम-करण है, जासु अंत-पद होइ= जो इस गुणस्थान के अंत तक रहता है, जहाँ अहार-विहार नहिं अपरमत्त है सोइ= जहाँ आहार-विहार की क्रिया नहीं होती, वही ‘अप्रमत्त’ है।। 94।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने सातवें-गुणस्थान का संक्षिप्त-विवेचन किया है। सातवें-गुणस्थान का नाम ‘अप्रमत्त-विरत-गुणस्थान’ है। ‘अ’ यानि ‘अभाव’, ‘प्रमत्त’ यानि ‘प्रमाद’ और ‘विरत’ यानि विरक्त। जहाँ विरति की स्थिति पूरी हो और प्रमाद का पूर्णतः अभाव हो, उसे ‘अप्रमत्तविरतगुणस्थान’ कहते हैं। इस गुणस्थान में अनंतानुबध ं ी, अप्रत्याख्यानावरणी और प्रत्याख्यानावरणी- तीनों कषाय-चौकड़ियों का क्षय या उपशम हो जाता है; परन्तु संज्वलन-कषाय और नोकषायों का यथायोग्यउदय वर्तता है। ‘अप्रमत्तविरत-गुणस्थान’ के पहले सभी गुणस्थानों में जीव प्रमाद-सहित ही होते हैं। अप्रमत्तविरतगुणस्थान आैर इसके बादवाले सभी गुणस्थानों में जीव प्रमाद-रहित ही होते हैं। अर्थात् यहाँ से आगे प्रमाद का सर्वथा-अभाव हो जाता है; क्योंकि आगे के गुणस्थान ‘स्वरूप में स्थिरता के गुणस्थान’ हैं। इसीलिए

मुनिराज छठवें से सातवें और सातवें से छठवें में झूलते रहते हैं।
सातवें गुणस्थान के दो भेद हैं- स्वस्थान-अप्रमत्तसंयत और सातिशय-अप्रमतसंयत।

  1. स्वस्थान-अप्रमत्तसंयत :- अपने स्थान पर स्थिर, श्रेणी-आरोहण का पुरुषार्थ नहीं चलता। प्रमादरहित, निरन्तर स्व-पर से भेदज्ञान और आत्मध्यान में लीन- ऐसे अप्रमत्तसंयत-मुनि जब तक उपशम या क्षपक-श्रेणी का आरोहण नहीं करते; तब तक वह ‘स्वस्थान-अप्रमत्तसंयत’ अथवा ‘निरतिशयअप्रमत्तसंयत’ कहलाते हैं। 2. सातिशय-अप्रमतसंयत :- जो अप्रमत्त-मुनि ‘उपशम’ या ‘क्षपक’-श्रेणी-आरोहण के लिये उद्यत होते हैं, वह पहले-करण ‘अधःप्रवृत्तकरण’ को करते हैं, इन्हें ‘सातिशय-अप्रमतसंयत’ कहते हैं।

(चौपाई)

अब वरनौं अष्टम-गुनथाना, नाम-अपूरवकरन बखाना।
कछुक-मोह उपसम करि राखै, अथवा किंचिंत-क्षय करि नाखै।। 95।।

जे-परिनाम भए नहिं कबही, तिनकौ उदै देखिये जबही।
तब अष्टम-गुनथानक होई, चारित-करन दूसरौ सोई।। 96।।

शब्दार्थ :- अब वरनौं अष्टम-गुनथाना= अब आठवें-गुणस्थान का वर्णन करता हू,ँ नाम-अपूरवकरन बखाना= जिसका नाम अपूर्वकरण है, कछुक-मोह उपसम करि राखैं= (इस गुणस्थान में) कुछ (साधक-जीव) मोह का उपशम करते हैं, अथवा किंचितं क्षय करि ना़ख=ैं अथवा कुछ (जीव) मोह का क्षय करते हैं।। 95।। जे-परिनाम भए नहिं कबही= जो परिणाम पहले कभी नहीं हुये, तिनकौ उदै देखिये जबही= उन (परिणामों) का उदय इस गुणस्थान में होता है, तब अष्टम-गुनथानक होई= तभी आठवाँ-गुणस्थान होता है, चारित-करन दूसरौ सोई= यह चारित्र का दूसरा-करण है।। 96।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने आठवें ‘अपूर्वकरण-गुणस्थान’ का स्वरूप विवेचित किया है। ‘करण’ आत्मोत्थान के साधक विशिष्ट-परिणामों की अवस्था-विशेष को कहते हैं। इसके तीन भेद हैं- 1. अधःप्रवृत्तकरण, 2. अपूर्वकरण, 3. अनिवृत्तिकरण ये विशिष्ट-करणरूप परिणाम दर्शनमोहनीय-कर्म के उपशम/क्षय आदि करने के समय भी होते हैं और चारित्र-मोहनीय-कर्म के उपशम/क्षय करने के समय भी होते हैं। इन विशिष्ट-परिणामों की प्रक्रिया के बिना न तो दर्शन-मोहनीय-कर्म का उपशम या क्षय होता है और न ही चारित्र-मोहनीय-कर्म का उपशम या क्षय होता है। सातवें-गुणस्थान के सातिशय-अप्रमत्तसंयतपने की स्थिति में ‘अधःप्रवृत्तकरण’ का काल बिताकर श्रेणी-आरोहण करनेवाले मुनिराज जब प्रतिसमय अनंत-गुणी-विशुद्धि को लिये हुये अपूर्व-जाति के परिणामों को करते है , तब उसे ‘अपूर्वकरण-गुणस्थान’ कहते हैं। इस गुणस्थान में जीव ‘अ+पूर्व’ अर्थात् पूर्व में जिनको कभी धारण नहीं किया, ऐसे ‘अपूर्व’ परिणामों को धारण करते हैं , इसलिये इस गुणस्थान का नाम ‘अपूर्वकरण-गुणस्थान’ सार्थक है। इसी क्रम में यह चारित्र-मोहनीय-कर्म के उपशम/क्षय का विधायक यह दूसरा-करण है। इस गुणस्थान में चार-आवश्यक कार्य होते हैं- 1. गुणश्रेणी-निर्जरा, 2. गुण-संक्रमण, 3. स्थिति-कांडक-घात, 4. अनुभाग-कांडक-घात -ये चारों ही कार्य पूर्वबद्ध-कर्मों में ही होते हैं। इस गुणस्थान का काल अंतर्मुहूर्त है। अपूर्वकरण-परिणामों के निमित्त से उपशम-श्रेणी चढ़नेवाले जीव के मोहनीयकर्म की 21 प्रकृतियों का उपशम, और क्षपक-श्रेणी चढ़नेवाले जीव के इन्हीं प्रकृतियों का क्षय होता है। -(आधार, गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा 50-51)

(चौपाई)

अब अनिवृत्ति-करन सुनु भाई, जहाँ भाव-थिरता अधिकाई।
पूरव-भाव चलाचल जेते, सहज-अडोल भए सब तेते।। 97।।

जहाँ न भाव उलटि अध आवै, सो नवमो-गुनथान कहावै।
चारितमोह जहाँ बहु-छीजा, सो है चरन-करन पद-तीजा।। 98।।

शब्दार्थ :- अब अनिवृत्ति-करन सुनु भाई= हे भाई! अब अनिवृत्तिकरण-गुणस्थान के बारे में सुनो, जहाँ भाव-थिरता अधिकाई= जहाँ परिणाम और अधिक स्थिर होते हैं, पूरव-भाव चलाचल जेत=े पूर्व में जो परिणाम चंचल/अस्थिर थे, सहज-अडोल भए सब तेत=े वे सब सहज ही स्थिरता को प्राप्त होते हैं।। 97।। जहाँ न भाव उलटि अध आवै= जहाँ भाव (ऊपर चढ़ने के बाद) लौटकर नीचे नहीं आते, सो नवमोगुनथान कहावै= वह नौंवा-गुणस्थान कहलाता है, चारितमोह जहाँ बहु-छीजा= जहाँ (इस गुणस्थान में) चारित्रमोह का बहुत-अंश नष्ट हो जाता है, सो है चरन-करन पद-तीजा= वह चारित्र का तीसरा-करण है।। 98।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने नौवें ‘अनिवृत्तिकरण-गुणस्थान’ का वर्णन किया है। इस गुणस्थान में आने पर आठवें-गुणस्थान में जो परिणाम ‘स्वरूप’ में स्थिर नहीं थे, वे भी चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार स्थिरता को प्राप्त होते हैं, अथवा स्वरूप में स्थिरता और अधिक बढ़ जाती है। ‘अ+निवृत्ति’ = नहीं है असमानता की स्थिति जिसमें, उसे ‘अनिवृत्तिकरण’ कहा गया है। इस गुणस्थान में अलग-अलग जीवों के परिणामों की विशुद्धि में परस्पर ‘निवृत्ति’ अर्थात् ‘भेद’ नहीं पाया जाता, इसीलिये इस गुणस्थान का नाम ‘अनिवृत्तिकरण’ सार्थक है। अनिवृत्तिकरण-गुणस्थान का जितना काल होता है, उतने ही परिणाम होते हैं। प्रत्येक समय में एक ही परिणाम होता है। इस गुणस्थान में चारित्र-मोह का बहु-अंश उपशम/क्षय होने से परिणाम नीचे नहीं गिरते, इसलिए इसे नौंवा ‘अनिवृत्तिकरण-गुणस्थान’ कहते हैं।

(चौपाई)

कहौं दसम-गुनथान दुसाखा, जहँ सूछम-सिवकी अभिलाखा।
सूछमलोभ-दसा जहँ लहिये, सूछम-सांपराय सो कहिये।। 99।।

शब्दार्थ :- कहौं दसम-गुनथान दुसाखा= अब दसवें-गुणस्थान का वर्णन करता हू,ँ जहँ सूछम सिवकी अभिलाखा= जहाँ मात्र मोक्ष-प्राप्ति की अति-सूक्ष्म इच्छारूप लोभकषाय शेष रहती है, सूछमलोभ-दसा जहँ लहिये= जहाँ सूक्ष्म-लोभ की स्थिति है, सूछम-सांपराय सो कहिये= उसे सूक्ष्म-सांपराय (गुणस्थान) कहते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने दसवें ‘सूक्ष्म- सांपराय’ गुणस्थान के स्वरूप का वर्णन किया है। दसवें-गुणस्थान में यद्यपि अन्य सभी-कषायों का क्षय या उपशम हो जाता है, लेकिन संज्वलनसंबंधी लोभ-कषाय का अत्यंत-सूक्ष्म उदय रहता है; जिसके फलस्वरूप साधक-जीव को एकमात्र मोक्ष-प्राप्ति की अभिलाषा शेष रहती है। अन्य परिणामों की बात तो क्या करें, ‘मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो’- यह परिणाम भी जीव को मोक्ष-प्राप्ति में बाधक है। जिसप्रकार कुसम ु ली-रंग (लाइट-पिंक) भीतर से सूक्ष्म-रक्त अर्थात् अत्यंत-कम लालिमावाला होता है, उसीप्रकार इस गुणस्थान में जीव को ‘सूक्ष्म’ अर्थात् बहुत-कम, और ‘सांपराय’ अर्थात् ‘कषाय’ या कहें अति-सूक्ष्म लोभ-कषाय का अंश उदय में रहता है; इसीलिये इस गुणस्थान को ‘सूक्ष्मसांपरायगुणस्थान’ कहते हैं। इस गुणस्थान में ‘औपशमिक’ और ‘क्षायिक’- दो सम्यक्त्वों में से केवल एक ही सम्यक्त्व होता है, अर्थात् यदि मुनिराज क्षपक-श्रेणी में आरुढ हैं; तो नियम से क्षायिक-सम्यक्त्व ही रहता है। और ‘क्षपक-श्ण रे ी’ आरोहण करनेवाले मुनिराज के दसवें के अंत में सूक्ष्म-लोभादि सहित सभी कषायों का क्षय हो जाता है, इसीलिए ये मुनिराज यहाँ से सीधे बारहवें ‘क्षीणमोह-गुणस्थान’ में ही गमन करते हैं। लेकिन यदि मुनिराज उपशम-श्रेणी में आरूढ हैं, तो सूक्ष्मातिसूक्ष्म-लोभ-कषाय का उपशम ही हाेता है, क्षय नहीं, इसीलिए ये मुनिराज यहाँ से ग्यारहवें-गुणस्थान ‘उपशान्तमोह’ में गमन करते हैं।

(चौपाई)

अब उपशांतमोह-गुनथाना, कहौं तासु प्रभुता-परवांना।
जहाँ मोह उपशमै, न भासै, यथाख्यात-चारित परगासै।। 100।।

(दोहा)

जाहि फरसकै जीव गिर, परै करै गुन-रद्द।
सो एकादसमी-दसा, उपसम की सरहद्द।। 101।।

शब्दार्थ :- अब उपशांतमोह-गुनथाना= अब उपशांतमोह-गुणस्थान, कहौं तासु प्रभुता-परवांना= की प्रभुता/सामर्थ्य का वर्णन करता हूँ, जहाँ मोह उपशमै, न भासै= जहाँ मोह का पूर्णतः उपशम होता है, (उदयरूप) नहीं दिखता, यथाख्यात-चारित परगासै= यथाख्यात-चारित्र प्रकट होता है।। 100।। जाहि फरसकै जीव गिर परै= इस (सूक्ष्म-सांपराय गुणस्थान) का स्पर्श करके जीव (नियम से) गिरता है, करै गुन रद्द= और प्राप्त किये गुणों को नष्ट करता है, सो एकादसमी-दसा= वह ग्यारहवाँ-गुणस्थान है, उपसम की सरहद्द= यह उपशम-चारित्र (धारण करनेवालों के लिये) अंतिम-गुणस्थान है।। 101।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने ग्यारहवें गुणस्थान ‘उपशांत-कषाय-वीतराग-छद्मस्थ’ की सामर्थ्य का विवेचन किया है। प्रश्न उठता है कि ‘‘कवि ने ऐसा क्यों कहा?’’ ‘‘क्योंकि इस गुणस्थान को स्पर्श करनेवाले साधक-जीव आगे के गुणस्थानों में नहीं जा सकते, वे नियम से नीचे ही आते हैं’’। जिसप्रकार कतकफल या फिटकरी को गंदे पानी में डालने पर पानी की गंदगी नीचे बैठ जाती है, और पानी साफ दिखता है, ठीक उसीप्रकार इस गुणस्थान में साधक-जीव के मोहकर्म के उदयरूप कीचड़ अर्थात् संपूर्ण-कषायों का उपशमन हो जाता है, और परिणाम अत्यंत-निर्मल होते हैं। इसलिये इस गुणस्थान का पूरा नाम ‘उपशांत-कषाय वीतराग-छद्मस्थ’ है। ‘उपशांत-कषाय’ अर्थात् जिनकी कषाय उपशांत हो गई है, अर्थात् सत्ता में मौजूद हैं, परन्तु उदय में तनिक भी नहीं है, इसकारण इसे ‘उपशांत-कषाय’ कहा गया है। ‘वीतराग’ अर्थात् जिनका उदयरूप-राग नष्ट हो गया है, इसीलिये उन्हें ‘वीतराग’ कहा गया है। ‘छद्मस्थ’ अर्थात् ‘छद्म’ ज्ञानावरण-दर्शनावरण के उदयजन्य-अवस्था को कहते हैं, और वह अवस्था जिनके विद्यमान है, उन्हें ‘छद्मस्थ’ कहते हैं। छद्मस्थ’ भी दोप्रकार के होते हैं- ‘सराग-छद्मस्थ’ और ‘वीतराग-छद्मस्थ’। ग्याहरवें और बारहवें गुणस्थानवर्ती-जीव रागभाव के उदयरूप अभाव के कारण ‘वीतराग’ हैं और ज्ञानावरण-दर्शनावरणकर्मों के आंशिक-उदय/पूर्ण-अभाव न हो पाने के कारण ‘छद्मस्थ’ हैं। और इससे नीचे के सभी जीव रागभाव के स्पष्ट-सद्भाव व ज्ञानावरण-दर्शनावरण के स्पष्ट-उदय के कारण ‘सराग-छद्मस्थ’ हैं। जिनकी कषाय भी उपशांत हो गई है, और जो वीतराग होते हुये भी छद्मस्थ ही हैं- उन्हें ‘उपशांत-कषाय वीतराग-छद्मस्थ’ कहते हैं। इस गुणस्थान में संपूर्ण-कषायें उपशांत हो जाती है। चारित्र-मोह की अपेक्षा उपशम-चारित्र धारण करनेवालों का ये अंतिम-गुणस्थान है, अर्थात् इस गुणस्थान से आगे औपशमिक-चारित्र धारण करनेवाले जीव नहीं जाते, इसीलिए इन जीवों को मोक्ष की प्राप्ति भी नहीं होती। ध्यातव्य है कि इस गुणस्थान में सम्यग्दर्शन की अपेक्षा ‘औपशमिक’ और ‘क्षायिक’ दोनों भाव संभव हैं। जो चारित्रमोहनीय-कर्म का उपशम करते हैं, उनके ‘उपशम-श्रेणी’ कही गयी है। उपशम-श्रेणीवाले जीव नियम से नीचे गिरते हैं, अतः स्पष्ट है कि औपशमिक-चारित्र मोक्ष-प्राप्ति का कारण नहीं है; क्योंकि अंतर्मुहुर्त के बाद नियम से चारित्रमोह का उदय होता है, परिणाम संक्लेशरूप होते हैं, और गुणस्थान गिर जाता है। इस गुुणस्थान से गिरने का कारण आयु-क्षय या काल-क्षय माना गया है।

(चौपाई)

केवलज्ञान निकट जहँ आवे, तहाँ जीव सब-मोह खिपावै।
प्रगटै यथाख्यात-परधाना, सो द्वादशम खीन-गुनठाना।। 102।।

(दोहा)

षट सातैं आठैं नवैं, दस-एकादस-थान।
अंतरमुहूरत एक वा, एक-समै-थिति जान।। 103।।

चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार

छपक-श्रेनि आठैं नवैं, दस अर वलि बार।
थिति उत्कृष्ट-जघन्य भी, अंतरमुहूरत-काल।। 104।।

शब्दार्थ :- केवलज्ञान निकट जहँ आवे= जहाँ केवलज्ञान-प्राप्ति का समय नजदीक आता है, तहाँ जीव सब-मोह खिपावै= वहाँ जीव मोहकर्म का पूर्णतः क्षय करता है, प्रगटै यथाख्यात परधाना= (तब) उत्कृष्ट यथाख्यात-चारित्र प्रकट होता है, सो द्वादशम खीनगुनठाना= वह बारहवाँ क्षीणमोह-गुणस्थान है।। 102।। षट सातैं आठैं नवैं दस-एकादस-थान= (उपशम-श्रेणी की अपेक्षा) छठवें, सातवें, आठवें, नौवें, दसवें, ग्यारहवें-गुणस्थान की, अंतरमुहूरत एक= (उत्कृष्ट-स्थिति) एक अंतर्मुहुर्त, वा= और, एक-समै-थिति जान= (जघन्य-स्थिति) एक-समय जानना।। 103।। छपकश्रेनि= क्षपक-श्रेणी की अपेक्षा, आठैं नवैं दस अर वलि बार-थिति= आठवें, नवमें, दसवें और सीधे बारहवें गुणस्थानों की स्थिति/काल, उत्कृष्ट-जघन्य भी अंतरमुहूरत-काल= उत्कृष्ट भी और जघन्यस्थिति भी अंतर्मुहूर्त है।। 104।। विशेषार्थ :- इन तीनों-छंदों में कवि ने बारहवें ‘क्षीणकषाय-गुणस्थान’ का विवेचन किया है। जब मोहनीय-कर्म का पूर्ण-क्षय हो जाता है, और मुनिराज का चित्त अत्यंत-निर्मल हो जाता है; तब बारहवाँ गुणस्थान होता है। जैसे स्फटिक के पात्र में रखा निर्मल-जल हरप्रकार से निर्मल और स्वच्छ होता है, ठीक उसीप्रकार इस गुणस्थानवर्ती-जीव के परिणाम मोहरूपी-मलिनता के समूल-नष्ट हो जाने से पूरीतरह से निर्मल होते हैं। इस गुणस्थानवर्ती-जीव के मोहनीय-कर्म के प्रकृति, प्रदेश, स्थिति, अनुभाग चारों ही भेदों का सर्वथा बंध,उदय, उदीरणा एवं सत्त्व की अपेक्षा क्षय हो जाता है। इसीलिये इस गुणस्थान का नाम ‘क्षीणकषाय’ है। इस गुणस्थान में मोहनीय-कर्म का पूर्ण-क्षय होने से एकमात्र क्षायिक-भाव ही होता है। इस गुणस्थान में जीव दसवें-गुणस्थान से सीधे आते हैं, ग्याहरवें गुणस्थान में नहीं जाते। विशेष-बात कि इस गुणस्थान से जीव वापस नीचे कभी नहीं आता। मोह का सर्वथा क्षय होते ही जीव को अगले ही क्षण यानि तेरहवें-गुणस्थान में केवलज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। उपशम-श्रेणी की अपेक्षा (छटवें, सातवें, आठवे, नवमें, दसवें और ग्यारहवें) इन गुणस्थानोंं का उत्कृष्ट-काल अंतर्मुहुर्त और जघन्य-काल एकसमय है। जबकि क्षपक-श्रेणी की अपेक्षा (आठवे, नवमें, दसवें और बारहवें) इस गुणस्थानों का उत्कृष्ट और जघन्य-काल अंतर्मुहूर्त ही है।

(दोहा)

छीनमोह पूरन भयौ, करि चूरन चित-चाल।
अब सजोग-गुनथानकी, वरनौं दसा-रसाल।। 105।।

(सवैया इकतीसा)

जाकी दुखदाता घाती-चौकरी विनसि गई, चौकरी-अघाती जरी-जेवरी समान है।
प्रगट भयौ अनंत-दंसन अनंत-ग्यान, वीरज-अनंत-सुख सत्ता-समाधान है।।
जामैं आउ, नाम, गोत, वेदनी प्रकृति-अस्सी, इक्यासी, चौरासी वा पचासी-परवांन है।
सो है जिन-केवली जगतवासी-भगवान्, ताकी जो अवस्था, सो सजोगी-गुनथान है।। 106।।

शब्दार्थ :- करि चूरन चित-चाल= चित्त/मन की चाल को नष्ट करनेवाले, छीनमोह पूरन भयौ= क्षीण-मोह गुणस्थान का वर्णन पूर्ण हुआ, अब सजोग-गुनथानकी वरनौं दसा-रसाल= अब सयोगकेवली-गुणस्थान की रसपूर्ण/परमानंदमय-दशा का वर्णन करता हूँ।। 105।। जाकी दुखदाता-घाती चौकरी विनसि गई= जिसकी दु:ख देनेवाली घातिया-कर्म की चौकड़ी नष्ट हो गई है, चौकरी अघाती जरी-जेवरी समान है= अघाति-कर्म की चौकड़ी भी जली हुई रस्सी के समान रह गयी है, प्रगट भयौ अनंतदंसन अनंतग्यान वीरज-अनंत-सुख= (जिसके)अनंत-दर्शन, अनंत-ज्ञान, अनंत-वीर्य, अनंत-सुख प्रगट हुये हैं, सत्ता-समाधान है= स्वरूप में लीनता से, जामैं आउ, नाम, गोत, वेदनी प्रकृति-अस्सी= जिसमें आयु, नाम, गोत्र, वेदनीयकर्मों की अस्सी-प्रकृतियाँ, इक्यासी, चौरासी वा पचासी परवांन है= इक्यासी, चौरासी अथवा पचासी (प्रकृतियों की) सत्ता शेष है, सो है जिन-केवली जगतवासी-भगवान= वे जगत् में निवास करनेवाले केवली-जिन हैं, ताकी जो अवस्था, सो सजोगीगुनथान है= उनकी जो अवस्था है, वही सयोगकेवलीगुणस्थान है।। 106।। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने तेरहवें सयोगकेवली-गुणस्थान का सुन्दर-विवेचन किया है। कविवर कहते हैं कि मन की प्रवृत्ति/चंचलता को नष्ट करनेवाले बारहवें क्षीण-मोह गुणस्थान का वर्णन अब पूर्ण हुआ। अब आगे सयोगकेवली-गुणस्थान की परमानंदमय-स्थिति का वर्णन करता हूँ। जिनके दु:खदायक घातिया-कर्म की चौकड़ी अर्थात् ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, मोहनीय और अंतराय-कर्मों का विनाश हो गया है, (यद्यपि इन चारों-कर्मों में से मोहनीय-कर्म का पूर्ण-अभाव तो बारहवें गुणस्थान में ही हो जाता है, शेष तीन-कर्मों का अभाव इस गुणस्थान में होता है) और अघातिकर्म की चौकड़ी अर्थात् वेदनीय, आयु, नाम और गोत्रकर्मों की सत्ता जली हुई रस्सी के समान बची हुई है, अर्थात् जिसप्रकार जली हुई रस्सी देखने में तो उसी रस्सी के आकार में दिखती है; परन्तु उससे किसी को बाँधने आदि काम नहीं लिया जा सकता है। ठीक उसीप्रकार अघाति-कर्म सत्ता में मौजूद तो रहते हैं, परन्तु सामर्थ्यहीन रहते हैं अर्थात् ये कर्म ‘सयोग-केवली-जिन’-गुणस्थानवर्ती-जीव को विकार उत्पन्न नहीं करते। आत्मस्वरूप में पूर्णरूप से लीन होने से ज्ञानावरणी-कर्म के अभाव में ‘अनंतज्ञान’, दर्शनावरणीकर्म के अभाव में ‘अनंतदर्शन’, मोहनीय-कर्म के अभाव में ‘अनंतसुख’ और अंतराय-कर्म के अभाव में ‘अनंतबल’ रूप ‘अनंत-चतुष्टय’ प्रगट होते हैं। जिनके आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय-कर्म की अस्सी/इक्यासी/चौरासी/पचासी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। सामान्यरूप से तेरहवें-गुणस्थान में इन अघाति-कर्मों की पचासी-प्रकृतियों की ही सत्ता कही गई है, लेकिन किसी केवली-जिन को चौरासी, किसी को इक्यासी और किसी को अस्सी-प्रकृतियों की सत्ता भी कही गई है। जब तीर्थंकर-प्रकृति, आहारक-शरीर, आहारक-अंगोपांग, आहारक-बंधन और आहारक-संघात होता है; तब पचासी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। लेकिन जिनको तीर्थंकरप्रकृति का सत्त्व नहीं होता, उनको चौरासी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। और जिनको तीर्थंकर-प्रकृति का सत्त्व तो रहता है, परन्तु आहारक-चतुष्क का सत्त्व नहीं रहता; उनको इक्यासी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। और जिनको तीर्थंकर-प्रकृति और आहारक-चतुष्क इन पाँचों का ही सत्त्व नहीं रहता, उनको अस्सी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। ऐसे सयोगकेवली-जिन अर्थात् जो मन-वचन-काय तीनों योगों से सहित हैं, जगत्-वासी हैं अर्थात् मध्यलोक में ही निवास करते हैं, उनको ‘सयोगकेवली-जिन’ नामक तेरहवाँ-गुणस्थान होता है। इस गुणस्थान में घातिया-कर्मों की 47 (ज्ञानावरणी की 5, दर्शनावरणी की 9, मोहनीय की 28, और अंतराय की 5) और अघातिया-कर्मों में से तीन अायु-कर्म की (नरकायु, तिर्यंचायु देवायु), 13 नामचतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार कर्म की नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, दो-इन्द्रिय, तीन-इन्द्रिय, चार-इन्द्रिय, उद्योत, आतप, एकेन्द्रिय, साधारण, सूक्ष्म और स्थावर, ये 16- इसप्रकार कुल 63 प्रकृतियों का क्षय हो जाता है।

(सवैया इकतीसा)

जो अडोल परजंक-मुद्राधारी सरवथा, अथवा सु काउसग्ग-मुद्रा थिर-पाल हैं।
खेत-सपरस कर्म-प्रकृतिके उदै आये, बिना डग भरै अंतरीच्छ जाकी चाल है।।
जाकी-थिति पूरब-करोड़ आठ-वर्ष घाटि, अंतरमुहूरत-जघन्य जग-जाल है।
सो है देव अठारह-दूषन-रहित ताकौं, बानारसि कहै मेरी वंदना त्रिकाल है।। 107।।

शब्दार्थ :- जो अडोल-परजंक-मुद्राधारी सरवथा= जो पूर्णतः अडिग पद्मासन-मुद्रा धारी, अथवा सु काउसग्ग-मुद्रा थिरपाल है= अथवा श्रेष्ठ कायोत्सर्ग-मुद्रा में स्थित हैं, खेत-सपरस कर्म-प्रकृतिके उदै आये= क्षेत्र-स्पर्श कर्म-प्रकृति के उदय से, बिना डग भरै अंतरीच्छ जाकी चाल है= जो बिना कदम चले अाकाश में गमन करते हैं, जाकी थिति पूरब-करोड़ आठ वर्ष घाटि= जिनकी (उत्कृष्ट) स्थिति आठ वर्ष कम एक करोड़ पूर्व है, अंतरमुहूरत जघन्य जगजाल है= और जघन्य-स्थिति अंतर्मुहूर्त है जगत् (में रहने की), सो है देव अठारह-दूषन-रहित= ऐसे जिनेन्द्र देव, जो अठारह-दोषों से रहित हैं, ताकौं बानारसि कहै मेरी वंदना त्रिकाल है= बनारसीदास जी कहते हैं, उनको मैं सदाकाल वंदन करता हूँ। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने तेरहवें गुणस्थान में विराजित ‘अरिहंत-परमात्मा’ की कुछ अन्य- विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें सविनय-वंदन किया है। केवलज्ञान-प्राप्ति के बाद जो अरिहंत-परमात्मा अडोल (हलन-चलन से रहित) ‘पद्मासन’ या ‘कायोत्सर्ग-मुद्रा’ में स्थित है, जिनके ‘क्षेत्र-स्पर्श’ कर्म-प्रकृति के उदय के कारण अरिहंत-परमात्मा भूमि पर गमन नहीं करते, बल्कि बिना कदम चले आकाश में गमन करते हैं। जिनकी संसार में रहने की उत्कृष्ट-स्थिति ‘आठ-वर्ष कम एक करोड़ पूर्व’ की है, और जघन्य-स्थिति मात्र ‘अंतर्मुहुर्त’ है। जो क्षुधा, तृषा आदि अठारह-दोषों से रहित हैं। बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘‘ऐसे जिनेन्द्र परमात्मा को मेरा मन, वचन, काय से त्रिकाल वंदन है।’’ ‘सयोग-केवली-जिन’ के कषाय का पूर्ण-अभाव होने से ‘सांपरायिक-आस्रव’ नहीं होता, परन्तु योग का सद्भाव होने से ‘ईर्यापथ-आस्रव’ होता है। इस गुणस्थान में ‘नोकर्माहार’ होता है, लेकिन ‘कवलाहार’ नहीं होता। इसके अलावा 22 परीषहों में से 11 परीषहों का होना संभव है; किन्तु उनका संयोग मात्र ही हो सकता है, उनके निमित्त से किसीप्रकार की बाधा केवली जिन को नहीं होती है। इस गुणस्थान से जीव केवल चौदहवें ‘अयोग-केवली-जिन-गुणस्थान’ में ही गमन करते हैं।

(कुण्डलिया)

दूषन-अठारह रहित, सो केवलि-संजोग।
जनम-मरन जाकै नहीं, नहिं निद्रा-भय-रोग।।
नहिं निद्रा-भय-रोग, सोग-विस्मय न मोह-मति।
जरा-खेद-परस्वेद, नांहि मद-बैर विषै-रति।।
चिंता नांहि सनेह, नांहि जहँ प्यास न भूखन।
थिर-समाधि सुख-सहित, रहित अट्ठारह-दूषन।। 108।।

शब्दार्थ :- दूषन-अठारह रहित= अठारह-दोषों से रहित, सो केवलि-संजोग= वह सयोग-केवली हैं, जनम-मरन जाकै नहीं= जिनके जन्म-मरण नहीं हैं, नहिं निद्रा-भय-रोग= निद्रा, भय, रोग नहीं है, नहिं निद्राभय-रोग-सोग-विस्मय न मोह-मति= निद्रा, भय, रोग तो नहीं हैं; शोक, विस्मय और मोह-बुद्धि भी नहीं है, जरा-खेद-परस्वेद नांहि= बुढ़ापा, खेद, पसीना नहीं होते, मद-बैर विषै-रति= मान, बैर, रति (नहीं है), चिंता नांहि सनेह= चिंता और स्नेह नहीं है, नांहि जहँ प्यास न भूखन= जहाँ भूख और प्यास नहीं है, थिर-समाधि सुख-सहित= अतीन्द्रिय-सुख का भोग करते हुये निर्विकल्प-स्वरूप में स्थिर/लीन रहते हैं, रहित अट्ठारहदूषन= अठारह-दोषों से रहित। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन अठारह-दोषों का वर्णन किया है, जिन दोषों से सयोग-केवली- जिन/अरिहंत-परमात्मा रहित होते हैं। जन्म, मरण, निद्रा, भय, रोग, शोक, विस्मय/आश्चर्य, मोह, जरा/बुढ़ापा, खेद, स्वेद/पसीना, मद/गर्व, बैर/द्वेष, रति, चिंता, स्नेह/राग, भूख, प्यास- इन अठारह दोषों से रहित सयोग-केवली-जिन अपने निर्विकल्प-स्वरूप में लीन रहते हैं।

(कुण्डलिया)

वानी जहाँ निरच्छरी, सप्त-धातु मल नांहि।
केस-रोम-नख नांहि बढैं, परम-उदारिक-माँहि।।
परम-उदारिक-माँहि, जांहि इंद्रिय-विकार नसि।
यथाख्यात-चारित प्रधान, थिर सुकलध्यान-ससि।।
लोकालोक प्रकास-करन, केवल-रजधानी।
सो तेरम-गुनथान, जहाँ अतिशयमय-वानी।। 109।।

शब्दार्थ :- वानी जहाँ निरच्छरी= (भगवान् की) वाणी अक्षर-रहित होती है, सप्त-धातु मल नांहि= सप्त- धातु और मल-मूत्रादि विकार नहीं होते हैं, केस-रोम-नख नांहि बढैं= बाल, रोम, नाखून नहीं बढ़ते हैं, परमउदारिक-माँहि= परमौदारिक-शरीर में, परम-उदारिक-माँहि जांहि इंद्रिय-विकार नसि= परमौदारिक-शरीर जिसमें इन्द्रियजन्य-विकार नष्ट हो जाते हैं, यथाख्यात-चारित प्रधान= श्रेष्ठ यथाख्यात-चारित्र प्रगट होता है, थिर सुकल-ध्यान-ससि= स्थिर शुक्लध्यानरूपी-चंद्रमा का उदय होता है, लोकालोक-प्रकास-करन केवल-रजधानी= लोकालोक को प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान जिनकी राजधानी है, सो तेरम-गुनथान जहाँ अतिशयमय-वानी= वह तेरहवाँ-गुणस्थान है, जहाँ अतिशयपूर्ण-वाणी/दिव्यध्वनि खिरती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद परमौदारिक-शरीर में प्रकट होनेवाली विशेषताओं का सुंदर-वर्णन किया है। तेरहवें-गुणस्थानवर्ती सयोगकेवली-जिन का शरीर ‘परमौदारिक’ होता है। जो क्षुधादि अठारहदोषों के अलावा सप्तधातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र धातु- जो कि हर शरीर में पाई जाती है, लेकिन तेरहवें गुणस्थान में केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद स्वत: ही यह विनाश को प्राप्त होती है), मल-मूत्रादि से रहित होता है। नख, केश, रोम आदि मौजूद होने पर भी वृद्धि को प्राप्त नहीं होते हैं। इसीप्रकार इन्द्रियाँ होने पर भी इन्द्रियजन्य-विकार नहीं होते हैं। निरन्तर आत्मस्वरूप में स्थिरतारूप पवित्र ‘यथाख्यात-चारित्र’ प्रगट होता है। शुक्ल-ध्यानरूपी चंद्रमा का उदय होता है, चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार अर्थात् जिसप्रकार चंद्रमा के उदित होने पर सर्वत्र धवल-चाँदनी बिखर जाती है; ठीक उसीप्रकार केवलज्ञानरूपी-चंद्रमा के उदित होने पर उसके धवल-प्रकाश में संपूर्ण-लोकालोक प्रकाशित होने लगता है। यहाँ कवि ने केवलज्ञान को राजधानी के समान कहा, जिसपर तीर्थंकर अरिहंत-परमात्मा का शासन/साम्राज्य चलता है; यहाँ तक कि उस समय से आगामी-काल तक (जब तक अगले-तीर्थंकर नहीं होते) को उन तीर्थंकर के ‘शासनकाल’ के नाम से जाना जाता है। उपर्युक्त सभी विशेषतायें केवलज्ञानप्राप्ति के बाद ही घटित होतीं हैं, इसलिए ‘केवल-रजधानी’ नाम सार्थक और सटीक है। ऐसा तेरहवाँ-गुणस्थान है, जहाँ केवली-परमात्मा की ‘निरक्षरी अतिशयमयी-वाणी’ (दिव्यध्वनि) खिरती है, जिसे सुनकर जगत् के जीव अपना मोक्षमार्ग प्रशस्त करते हैं। दिव्यध्वनि का सबसे बड़ा अतिशय तो यही है कि वहाँ उपस्थित सभी-जीव अपनी-अपनी भाषा में अपने हित की बात समझ लेते हैं।

(दोहा)

यह सयोग-गुनथानकी, रचना कही अनूप।
अब अयोगकेवल-दसा, कहूँ जथारथ-रूप।। 110।।

(सवैया इकतीसा)

जहाँ काहू जीवकौं असाता-उदै साता नांहि, काहूकौ असाता नांहि साता-उदै पाइयै।
मन-वच-कायसौं अतीत भयौ जहाँ जीव, जाकौ जसगीत जगजीत-रूप गाइयै।।
जामैं कर्म-प्रकृति की सत्ता जोगी-जिन कीनी, अंतकाल द्वै-समैंमैं सकल खिपाइयै।
जाकी-थिति पंच-लघु-अच्छर-प्रमान सोई, चौदहौं अजोगी-गुनठाना ठहराइयै।। 111।।

शब्दार्थ :- यह सयोग-गुनथानकी रचना कही अनूप= यहाँ तक सयोगकेवली-जिन गुणस्थान की अनुपम- रचना का वर्णन किया, अब अयोगकेवल-दसा कहूँ जथारथ-रूप= अब अयोगकेवली-गुणस्थान का यथार्थवर्णन करता हूँ।। 110।। जहाँ काहू जीवकौं असाता-उदै साता नांहि= जहाँ किसी जीव को असाता का उदय रहता है, साता का नहीं रहता, काहूकौ असाता नांहि साता-उदै पाइयै= किसी को असाता का नहीं होकर साता का उदय रहता है, मन-वच-कायसौं अतीत भयौ जहाँ जीव= जहाँ जीव मन, वचन और काया की प्रवृत्ति से पूर्णतः शून्य हो जाता है, जाकौ जसगीत जगजीतरूप गाइयै= जिसका यशोगान जगत्-जयी के रूप में होता है, जामैं कर्म-प्रकृति की सत्ता जोगी-जिन कीनी= जिसमें कर्म-प्रकृतियों की सत्ता सयोगकेवली-जिन-गुणस्थान के समान ही रहती है, अंतकाल द्वै-समैं मैं सकल खिपाइयै= अंतिम दो-समय में समस्त-कर्मों का क्षय करते हैं, जाकी-थिति पंचलघु-अच्छर प्रमान= जिसकी-स्थिति पाँच-ह्रस्व-अक्षर के उच्चारण-प्रमाण है, सोई चौदहौं अजोगी-गुनठाना ठहराइयै= वही चौदहवाँ-अयोगकेवली-गुणस्थान कहा जानना चाहिये।। 111।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने चौदहवें अयोगकेवली-जिन-गुणस्थान का सुदं र-विवेचन किया है। ‘अ’+‘योग’+‘केवली’ अर्थात् तीनों योगों से रहित, और साथ ही अघातिया-कर्मों से भी रहित होने के सन्मुख- ऐसे चौदहवें-गुणस्थानवर्ती जीव ‘अयोगकेवली-जिन’ है। इस गुणस्थान में किसी जीव को साता-वेदनीय का और किसी जीव को असाता-वेदनीय का उदय रहता है, परन्तु वैसी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है; क्योंकि स्वरूप में लीनता एवं अनंतसुख की ही स्थिति रहती है। मन, वचन, काय तीनों का संयोग होने पर भी इनका परिस्पंदन या कहें प्रवृत्ति नहीं होती; इसीलिए इन्हें ‘अयोग-केवली’ कहा जाता है। कषाय का अभाव होने के साथ-साथ इस गुणस्थान में योगों का भी परिस्पंदन न होने से ‘सांपरायिक-आस्रव’ के साथ ‘ईर्यापथ-आस्रव’ का भी अभाव हो जाता है। इसीप्रकार इस गुणस्थान में सभीप्रकार के परीषहों का भी अभाव हो जाता है। छहोंप्रकार के आहार का भी अभाव होता है। यद्यपि शरीर मौजूद है, परन्तु योगों का प्रवर्तन पूर्णतः बंद हो जाता है; इसीलिए इस गुणस्थानवर्ती-जीवों का ‘जगत्जयी’ अर्थात् तीनों-लोकों को जीतनेवाले के रूप में यशोगान किया जाता है। घातिया-कर्मों का क्षय तो तेरहवें-गुणस्थान में ही हो जाता है, परन्तु इस गुणस्थान में अघातियाकर्मों की स्थिति भी सयोग-केवली के समान ही रहते हुये भी, अंतिम दो-समय शेष रहने पर अघातियाकर्मों की शेष 85 प्रकृतियों का भी क्षय हो जाता है। इस गुणस्थान का काल मात्र ‘अ, इ, उ, ऋ, लृ’- इन पाँच हृस्व-अक्षरों के उच्चारण के बराबर ही होता है। जैसे तेरहवें-गुणस्थानवर्ती जीव संसार में रहने से ‘संसारी’ कहलाते हैं, वैसे चौदहवें-गुणस्थानवर्ती जीव इस लोक में रहते हुये भी ‘संसारी’ नहीं कहलाते, और आयु-कर्म शेष होने से ‘मुक्त’ भी नहीं कहलाते।

(दोहा)

चौदह-गुनथानक-दसा, जगवासी-जिय भूल।
आस्रव-संवर भाव-द्वै, बंध-मोख के मूल।। 112।।

शब्दार्थ :- चौदह-गुनथानक-दसा= चौदह-गुणस्थानों की स्थिति, जगवासी-जिय-भूल= संसारी-जीवों की भूल है, आस्रव-संवर भाव-द्वै= आस्रव और संवर दो भाव, बंध-मोख के मूल= बंध और मोक्ष के मूलकारण हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कविवर कहते हैं ‘‘ये चौदह-गुणस्थान संसारी-जीव की भूल हैं। ‘आस्रव’ और ‘संवर’ ये दो-भाव ही वास्तव में ‘बंध’ और ‘मोक्ष’ के मूलकारण हैं।’’ कहने का अभिप्राय यही है कि जब जीव अपने ज्ञान-स्वभाव को भूलकर पर की ओर उन्मुख होता है, और इष्ट-अनिष्ट-भाव करता है, तब आस्रव या मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भावों की जो उत्पत्ति होती है; वही संसार की जड़ अर्थात् मूलकारण है। और जब जीव पर-सन्मुखता छोड़कर स्व-सन्मुख होता है, तब संवर अर्थात् जो स्वानुभूति के भाव होते हैं; वही वास्तव में मोक्ष के मूल-कारण है। जैसे किसी भी वृक्ष का आधार उसकी जड़ होती है, ठीक उसीप्रकार संसाररूपी वृक्ष की जड़ ‘आस्रव-भाव’, और मोक्षरूपी-वृक्ष का मूल ‘संवर-भाव’ है।

(चौपाई)

आस्रव-संवर-परनति जौलौं, जगत्-निवासी चेतन तौलौं।
आस्रव-संवर विधि-विवहारा, दोऊ भव-पथ सिव-पथ धारा।। 113।।

आस्रवरूप बंध-उतपाता, संवर ग्यान-मोख-पद-दाता।
जा संवरसौं आस्रव-छीजै, ताकौं नमस्कार अब कीजै।। 114।।

शब्दार्थ :- आस्रव-संवर-परनति जौलौं= जबतक आस्रव और संवर के परिणाम रहते हैं, जगत्-निवासी चेतन तौलौं= तबतक चेतन-आत्मा संसार में निवास करता है, आस्रव-संवर विधि-विवहारा= आस्रव और संवर दोनों ही विधि का व्यवहार या कर्म से सम्बद्ध परिणतियाँ हैं, दोऊ भव-पथ सिव-पथ धारा= दोनों (क्रमश:) संसार-मार्ग और मोक्ष-मार्ग की धारा है, आस्रवरूप बंध-उतपाता= अास्रव से बंध की उत्पत्ति होती है, संवर ग्यान-मोख-पद-दाता= संवर ज्ञान और मोक्ष-पद को देनेवाला हैं, संवरसौं आस्रव छीजै= संवर से आस्रव का विनाश होता है, ताकौं नमस्कार अब कीजै= इसलिये मैं संवर को नमस्कार करता हूँ। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने ‘संसार-वर्धक’ ‘आस्रव-भाव’ को हेय, और ‘मुक्ति-प्रदाता’ ‘संवर-भाव’ की उपादेयता सिद्ध करते हुए ‘संवर-भाव’ को नमस्कार किया है। हे आत्मन्! जबतक हम अपने जानन-स्वभाव को भूलकर पर में इष्ट-अनिष्ट-बुद्धि करते रहेंगे, तबतक मोह, राग, द्वेषादि आस्रव-भावों की उत्पत्ति होती रहेगी। और जबतक इन आस्रव-भावों की उत्पत्ति होती रहेगी, तबतक जीव इस संसार में परिभ्रमण करता रहेगा। आस्रव और संवर दोनों ही विधि का व्यवहार अर्थात् कर्म से सम्बद्ध परिणतियाँ है, एक कर्म के बंधनरूप है, तो दूसरी कर्म के निरोधरूप। हे चेतन! आस्रव और संवर इस ज्ञान-स्वरूपी चैतन्य-सरोवर से निकली दो धारायें हैं, जिनमें से एक (आस्रव) धारा संसार-सागर में प्रवेश कराती है। और दूसरी (संवर) धारा मोक्ष-महल में प्रवेश कराती है। पहली-धारा में अवगाहन करने से जीव को दुःख की प्राप्ति होती है, और दूसरी धारा में अवगाहन करने से जीव को अनंत सुख की प्राप्ति होती है; क्योंकि आस्रव-भाव कर्म-बंधन का उत्पादक है। जबकि संवर-भाव कर्म-बंधन से छुड़ाकर मोक्ष-सुख का उत्पादक है। अनादि से चले आ रहे कर्मरूपी-पर्वत को भेदने में एकमात्र संवर-भाव या ‘स्वात्मानुभूति’ ही कार्यकारी है; इसलिए कविवर बनारसीदास जी ने ‘संवर-भाव’ को विनय-पूर्वक वंदन किया है।

(सवैया इकतीसा)

जगत् के प्रानी जीति, ह्वै रह्यौ गुमानी ऐसौ, आस्रव-असुर दुखदानी-महाभीम है।
ताकौ परताप-खंडिवैकौ प्रगट भयौ, धर्म कौ धरैया, कर्मरोगकौ हकीम है।।
जाकै परभाव-आगै, भागै परभाव-सब, नागर-नवल सुखसागर की सीम है।
संवरकौ रूप धरै साधै सिवराह ऐसौ, ग्यान-पातसाह ताकौं मेरी तसलीम है।। 115।।

शब्दार्थ :- जगत् के प्रानी जीति= जगत् के प्राणियों को जीतकर, ह्वै रह्यौ गुमानी ऐसौ= अभिमानी हो रहा है, ऐसा, आस्रव-असुर दुखदानी महाभीम है= आस्रवरूपी राक्षस दु:खदायक और महाभयानक है, ताकौपरताप-खंडिवैकौ प्रगट भयौ= उसके प्रताप/तेज को खंडित/क्षीण करने के लिए, धर्म कौ धरैया कर्मरोगकौ हकीम है= धर्म को धारण करनेवाला और कर्मरूपी-रोग को दूर करने के लिए जो वैद्य के समान है, जाकै परभाव आगै= जिसके प्रभाव के सामने, भागै परभाव-सब= समस्त-परभाव भाग जाते हैं, नागर नवल सुखसागर की सीम है= प्रवीण है, नवीन है और सुखरूपी-सागर का किनारा है, संवरकौ रूप धरै साधै-सिवराह= संवर का रूप धारणकर मोक्षमार्ग को साधता है, ऐसौ ग्यान-पातसाह ताकौं मेरी तसलीम है= ऐसे ज्ञानरूपी बादशाह/ राजा को मेरा सलाम/वंदन है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘आस्रव’ को ‘अभिमानी’, ‘महाभयानक’ और जगत् को अपने वश में करनेवाले ‘राक्षस’ के समान कहा है। और ‘संवर’ को उस राक्षस का मान-मर्दन करनेवाले ‘राजा’ के रूप में सिद्ध किया है। जो अनादिकाल से जगत् के जीवों को अपने वश में करके स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानता है, जिसके आकर्षण में फँसकर जीव अपना सर्वस्व भूल जाता है, ऐसा वह आस्रवरूपी-राक्षस महा-भयानक, महादुःखदाई है। लेकिन यह भी सत्य है कि राक्षस कितना भी बलशाली क्यों न हो, एक दिन उसका अंत जरूर होता है। उसका अंत करने के लिए भी धर्मधारी, ज्ञानभावमय संवररूपी-राजा प्रकट हुआ है, जिसके प्रकट होते ही आस्रव का विनाश हो जाता है। जिसप्रकार शरीर के रोगों का इलाज वैद्य या हकीमों के पास होता है, ठीक उसीप्रकार कर्मरूपी रोग का इलाज करने के लिये ‘संवर’ भी वैद्य या हकीम के समान है। जिसके प्रभाव के आगे समस्त-परभाव विनाश को प्राप्त होते हैं, अर्थात् स्वभाव या आत्मानुभूति के सामने परभाव या परद्रव्य-जनित राग-द्वेषादि समस्त विकारी-भाव नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि ये ‘संवरभाव’ अत्यंत-‘प्रवीण’ (क्योंकि आस्रव को न केवल वश में करता है, बल्कि नष्ट भी करता है), ‘नवीन’ ( क्योंकि अनादि से नहीं था, नवीन प्राप्त हुआ), ‘सुख-सागर की सीमा’ है अर्थात् सुखरूपी-सागर का किनारा है। जैसे समुद्र के किनारे पर पहुँचकर ही जीवन का आनंद लिया जा सकता है, ठीक उसीप्रकार अतीन्द्रिय-सुख के आनंद का रसास्वादन करना है; तो संवररूपी किनारे तक पहुँचना अति-आवश्यक है, अथवा इसी से सुखानुभूति की शुरूआत होती है। कविवर पं बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘‘जो संवर का रूप धारणकर शिवराह को साधता है अर्थात् मोक्षमार्ग को प्रशस्त करता है, ऐसे ज्ञान-स्वरूप बादशाह अर्थात् ज्ञायक भगवान्-आत्मा को मेरी ‘तसलीम’ है अर्थात् मेरा ‘सविनय-वंदन’ है।’’ विद्वान् के लिये अपेक्षित योग्यतायें

भाषा-कवित्त अध्यातम-माँहि। पंडित और दूसरो नांहि।।
क्षमावंत-संतोषी भला। भली कवित्त-पढ़वे की कला।।
पढ़ै संस्कृत-प्राकृत शुद्ध। विविध-देशभाषा-प्रतिबुद्ध।।
जाने शब्द-अर्थ को भेद। ठाने नहिं जगत् को खेद।।
मिठबोला सबहीं सौं प्रीति। जैनधर्म की दिढ़ परतीति।।
सहनशील नहिं कहैं कुबोल। सुथिर-चित्त नहिं डांवाडोल।।
कहैं सबनिसौं से हित-उपदेश। हिरदै-सुष्ट, दुष्ट नहिं लेश।।
पर-रमणी को त्यागी सोय। कुव्यसन और न ठानै कोय।।
हृदय शुद्ध-समकित की टेक। इत्यादिक गुन और अनेक।
अल्प जघन्य कहे गुन जोय। नहिं उतकिष्ट न निर्मल होय।।

अध्यात्म-शैली की महिमा निज-काज सबही को अध्यात्म-शैली माँझ, मूढ़ क्यों न खोज देखै खोज और-वान में। सदा यह लोक-रीति सुनी है ‘बनारसीजू’ वचन-प्रसाद नैकु ज्ञानिनके कान में।। चेरी जैसें मलि-मलि धोवत बिराने पाँव, पर-मन-रंजिवे को सांझ ओ विहान में। निज-पाँव क्यों न धौवे ? कोई सखी ऐसौ कहै, मोसी कोऊ आलसन और न जहान में।। -(‘बनारसीदास विलास’ से उद््धृत) चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार

प्रशस्ति

(कविवर पं बनारसीदास जी द्वारा अंतिम-विनय)

(चौपाई)

भयौ ग्रंथ संपूरन-भाखा, वरनी गुनथानक की साखा।
वरनन और कहांलौं कहिये, जथा-सकति कहि चुप ह्ववै रहिये।। 1।।

शब्दार्थ :- भयौ ग्रंथ संपूरन-भाखा= समयसार ग्रंथ देसी-भाषा/हिन्दी में निबद्ध पूरा हुआ, वरनी गुनथानक की साखा= गुणस्थान-अधिकार का वर्णन किया, वरनन और कहाँलौं कहिये= कहाँ तक इसका वर्णन करें, जथा-सकति कहि चुप ह्वै रहिये= (इसलिये) यथाशक्ति कहकर चुप हो जाना चाहिए। विशेषार्थ :- नाटक-समयसार-ग्रंथ का समापन करते हुए कविवर स्वयं कहते हैं कि ग्रंथ की महिमा तो अथाह है, जिसका संपूर्ण-वर्णन करने मैं समर्थ नहीं हूँ। फिर भी मैंने अपनी अल्पबुद्धि से गुणस्थान का कुछ विवेचन किया, लेकिन अब अतिविस्तार की अपेक्षा चुप रहना ही बेहतर है।

(चौपाई)

लहिये और न ग्रंथ-उदधिका, ज्यौं-ज्यौं कहिये त्यौं-त्यौं अधिका।
तातैं नाटक अगम-अपारा, अलप कवीसुर की मतिधारा।। 2।।

शब्दार्थ :- लहिये ओर न ग्रंथ-उदधिका= ग्रंथरूपी-समुद्र का किनारा कभी नहीं मिल सकता, ज्यौं-ज्यौं कहिये त्यौं-त्यौं अधिका= जैस-े जैसे कथन करते हैं, वैस-े वैसे बढ़ता ही जाता है, तातैं नाटक अगम-अपारा= क्योंकि नाटक अगम और अपार है, अल्प कवीसुर की मतिधारा= और कवि की बुद्धि अत्यंत अल्प/सीमित है। विशेषार्थ :- यह समयसार-ग्रंथ एक समुद्र के समान है, जिसप्रकार समुद्र का कोई ओर छोर नहीं होता, जल भी अपरिमित होता है; ठीक उसीप्रकार ये ग्रंथाधिराज ‘समयसार’ का भी कोई ओर छोर नहीं है। इसमें आत्मस्वरूप की महिमा का जो वर्णन किया गया है, उसका भी कोई अंत नहीं, जितना-जितना मर्म खोलते हैं, उतना-उतना ही विस्तार होता जाता है। इस ग्रंथ की महिमा अगम और अपार है अर्थात् विस्तार और गहराई दोनों की ही कोई सीमा नहीं है,और मेरी बुद्धि तो अति-अल्प है, इसलिये मैं इसका सांगोपांग-वर्णन करने में असमर्थ हूँ।

(दोहा)

समयसार-नाटक अकथ, कवि की मति लघु होइ।
तातैं कहत बनारसी, पूरन कथै न कोइ।। 3।।

शब्दार्थ :- समयसार-नाटक अकथ= समयसार-नाटक महान् है, अकथनीय है, कवि की मति लघु होइ= कवि की बुद्धि सीमित होती है; तातैं कहत बनारसी= इसलिये बनारसीदास कहते हैं, पूरन कथै न कोइ= इसे कोई पूरा नहीं कह सकता। विशेषार्थ :- कविवर कहते हैं समयसार नाटक महान् है, अकथनीय है, इसमें आत्म-स्वरूप की महिमा वर्णित है, आत्मा चेतन है और वाणी जड़ है, फिर भला इन जड़-शब्दों से चेतन-आत्मा का वर्णन कैसे संभव है? इसीप्रकार आत्मा तो अनंतज्ञान का धनी है, और कवि की कर्माश्रित अति-अल्प क्षयोपशम-बुद्धि, सो कोई भी कवि इसका संपूर्ण-वर्णन नहीं कर सकता है।

(सवैया इकतीसा)

जैंसैं कोऊ एकाकी-सुभट पराक्रम करि, जीते किहि भाँति चक्री-कटकसौं लरनौ।
जैंसें कोऊ परवीन-तारू भुजभारू-नर, तैरै कैसै स्वयंभूरमन-सिंधु तरनौ।।
जौंसैं कोऊ-उद्दमी उछाह-मनमाँहि धरै, करै कैसै कारज विधाता कैसौ करनौ।
तैंसैं तुच्छ-मति मोरी तामैं कविकला थोरी, नाटक-अपार मैं कहाँलौं याहि वरनौ।। 4।।

शब्दार्थ :- जैंसैं कोऊ एकाकी सुभट पराक्रम करि= जैसे कोई अकेला-योद्धा अपने बल पर, जीते किहिभाँति चक्री-कटकसौं लरनौ= चक्रवर्ती की सेना को कैसे जीत सकता है? जैंसें कोऊ परवीन-तारू भुजभारूनर= जैसे कोई होशियार तैराक, विशाल-भुजाओंवाला मनुष्य, तैरै कैसैं स्वयंभूरमन-सिंधु तरनौ= स्वयंभूरमणसमुद्र को तैरकर कैसे पार कर सकता है? जैंसैं कोऊ उद्दमी उछाह मनमाँहि धरै= जैसे कोई पुरुषार्थी-व्यक्ति मन में बहुत उत्साह रखकर (भी), करै कैसै कारज विधाता कैसौ करनौ= विधाता/ब्रह्मा जैसे कार्य कैसे कर सकता है? तैंसैं तुच्छ-मति मोरी तामैं कवि-कला थोरी= उसीप्रकार मेरी अल्प-बुद्धि, और उसमें काव्य-चातुर्य भी कम, नाटक अपार मैं कहाँलौं याहि वरनौ= नाटक अपार/महान् है, मैं कहाँ तक इसका वर्णन करूँ? विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने महान्-ग्रंथ ‘समयसार जी’ की महिमा को सुन्दर-उदाहरणों के माध्यम से वर्णित किया है। जैसे कोई योद्धा भले ही वह युद्ध-कौशल में निपुण हो, फिर भी वह अपने अकेले के बल पर चक्रवर्ती की अपार-सेना को कैसे जीत सकता है? अर्थात् कभी नहीं जीत सकता। जैसे कोई चतुर-तैराक तैरने की विद्या में निपुण होने पर भी, अपनी भुजाओं के बल पर विशाल, अपार ‘स्वयंभूरमण-समुद्र’ को तैरकर कैसे पार कर सकता है? अर्थात् कभी नहीं कर सकता। जैसे कोई व्यक्ति बहुत-परोपकारी हो, दानी हो, दूसरों की भलाई करने में बहुत उत्साही हो, सभी दोषों से भी रहित हो; फिर भी वह विधाता के समान कार्य/उपकार कैसे कर सकता है? अर्थात् कभी नहीं कर सकता। ठीक उसीप्रकार मैं बनारसीदास पहले ही अति-अल्प-बुद्धिवाला हूँ, और ऊपर से काव्य-रचना के कौशल से भी अनभिज्ञ हूँ, और नाटक (समयसार) अति-महान् अर्थात् बहुत विशाल है; मैं कहाँ तक उसका वर्णन करूँ? अर्थात् मैं उसका सांगोपांग-वर्णन नहीं कर सकता हूँ?- ऐसे वचनों से कवि ने अपनी लघुता प्रकट की है, जो वास्तव में एक महापुरुष की गरिमा की परिचायक है ।

(सवैया इकतीसा)

जैसे वट-वृच्छ एक, तामैं फल हैं अनेक, फल-फल बहुबीज, बीज-बीज वट है।
वट-माँहि फल, फल-माँहि बीज तामैं वट, कीजै जो विचार, तौ अनंतता अघट है।।
तैंसैं एक-सत्ता मैं, अनंत-गुन-परजाय, पर्जैमैं अनंत-नृत्य तामैंऽनंत-ठट है।
ठटमैं अनंतकला, कलामैं अनंतरूप, रूपमैं अनंतसत्ता, ऐसौ जीव-नट है।। 5।।

शब्दार्थ :- जैसे वट-वृच्छ एक तामैं फल हैं अनेक= जैसे एक वट-वृक्ष और उसमें अनेक-फल, फल-फल बहुबीज= प्रत्येक फल में बहुत सारे बीज हैं, बीज-बीज वट है= हर बीज में एक वट-वृक्ष समाहित है, वटमाँहिफल= वट में फल, फल-माँहि बीज तामैं वट = फल में बीज और बीज में वट, कीजै जो विचार तौ अनंतता अघट है= यदि विचार करें, तो इसका कोई अंत नहीं है, तैंसैं एक-सत्ता मैं अनंत-गुन-परजाय= उसीप्रकार एक आत्मसत्ता में अनंत-गुण, और उनकी अनंत-पर्यायें, पर्जैमैं अनंत-नृत्य= पर्याय में अनंत-नृत्य, तामैं नंत-ठट है= और उसमें अनंत-ठठ, ठटमैं अनंतकला= और उस ठठ में अनंत-कलायें, कलामैं अनंतरूप= कला में अनंतरूप, रूपमैं अनंतसत्ता= रूप में अनंत-सत्ता, ऐसौ जीव-नट है= ऐसा जीवरूपी नट है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने जीवरूपी नट की अनंत-सत्ता का उदाहरण-सहित संुदर विवेचन किया है। जैसे एक वट का वृक्ष है, उस एक वृक्ष में अनेक-फल लगते हैं। उन अनेक-फलों में अर्थात् प्रत्येकफल में अलग-अलग बहुत सारे बीज होते हैं। फिर वे सभी बीज एक-एक वट वृक्ष की सामर्थ्यरूप हैं। और फिर उन सभी-वृक्षों में अनेकानेक-फल, और फिर उन सभी-फलों में अनेकानेक-बीज, इसप्रकार देखा जाये, तो ये सिलसिला इसीप्रकार चलता रहता है; कभी उसका अंत नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार एक-आत्मसत्ता में अनंत-गुण, और फिर उन अनंत-गुणों की अनंत-पर्यायें, फिर उन अनंत-पर्यायों में अनंत-नृत्य, फिर उन अनंत-नृत्यों में अनंत-ठट, फिर उन अनंत-ठटों में अनंतकलायें, और फिर अनंत-कलाओं में अनंत-रूप, और उन अनंत-रूपों में फिर अनंत-सत्ता- ऐसा ये जीवरूपी-नट है। कहने का अभिप्राय यही है कि जिसप्रकार नट अपनी-कला प्रदर्शन करते समय प्रतिदिन नानाप्रकार के रूप, स्वांग धारण करता है, और फिर उसके अनुरूप नृत्य और कलाबाजियाँ दिखाता है; ठीक उसीप्रकार यह जीव विभिन्न-पर्यायों में, नानाप्रकार के स्वांग धारण करता है, अपने विभिन्न-रूपों के साथ प्रवर्तन करता हुआ अपनी अनंत-आत्मसत्ता के साथ विद्यमान रहता है।

(दोहा)

ब्रह्मग्यान-आकासमैं, उड़ै सुमति-खग होइ।
यथा-सकति उद्दिम करै, पार न पावै कोइ।। 6।।

(चौपाई)

ब्रह्मग्यान-नभ अंत न पावै, सुमति-परोछ कहाँलौं धावै।
जिहि-विधि समयसार जिनि कीनौं, तिनके नाम कहौं अब तीनौं।। 7।।

शब्दार्थ :- ब्रह्मग्यान-आकासमैं= ब्रह्मज्ञान/आत्मज्ञानरूपी आकाश में, उड़ै सुमति-खग होइ= सुमति/ सम्यग्ज्ञानरूपी-पक्षी उड़ता है, यथा-सकति उद्दिम करै पार न पावै कोइ= यथाशक्ति-पुरुषार्थ भी करता है, पर उसके पार को प्राप्त नहीं कर पाता।। 6।। ब्रह्मग्यान-नभ अंत न पावै= ब्रह्मज्ञानरूपी आकाश की सीमा का कोई अंत नहीं है, सुमति-परोछ कहाँलौं धावै= सुमतिज्ञान-रूपी पक्षी कहाँ तक भागे/उड़े? जिहि-विधि समयसार जिनि कीनौं= इसलिए जिसतरह जिन्होंने इस समयसार की रचना की है, तिनके नाम कहौं अब तीनौं= अब उन तीनों के नाम कहता हूँ।। 7।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने उदाहरण-सहित स्पष्ट किया है कि परोक्ष-ज्ञान कभी प्रत्यक्ष- ज्ञान की बराबरी नहीं कर सकता। आत्मिक-अनंतज्ञान को कवि ने आकाश के समान अनंत माना है, और मति-श्रुतज्ञान को पक्षी के समान माना है। जिसप्रकार कोई भी पक्षी आकाश में कितनी भी उड़ान भरे, फिर भी वह आकाश के छोर को प्राप्त नहीं कर सकता; क्योंकि आकाश अनंत है और पक्षी की उड़ान उसके सामने अतिसीमित। ठीक उसीप्रकार आत्मा, आकाश के समान अनंतज्ञान का धनी है, सुबुद्धिरूपी-पक्षी कितनी भी लंबी उड़ान भरे; फिर भी वह उसके अंतिम-छोर को प्राप्त नहीं कर सकता। क्योंकि आत्मा प्रत्यक्षगोचर है, और मति-श्रुतज्ञान परोक्ष है। परोक्ष-ज्ञानरूपी पक्षी आत्मिक-ज्ञानरूप आकाश में उड़ान तो भर सकता है; परन्तु प्रत्यक्ष-ज्ञान का पार नहीं पा सकता। इसलिये अब मैं उन लोगों का कथन करता हूँ, जो इस ग्रंथ के मूल-आधार और ग्रन्थ के प्रणेता रहे हैं।

(सवैया इकतीसा)

कुंदकुंदाचारिज प्रथम गाथाबद्ध करि, समैसार-नाटक विचारि नाम दयौ है।
ताही की परंपरा अमृतचंद्र भये तिन, संसकृत-कलस सम्हारि सुख लयौ है।।
प्रगट्यौ बनारसी गृहस्थ-सिरीमाल अब, किये हैं कवित्त हियै बोधिबीज बयौ है।
सबद-अनादि तामैं अरथ-अनादि जीव- नाटक-अनादि यौं अनादि ही कौ भयौ है।। 8।।

शब्दार्थ :- प्रथम गाथाबद्ध करि= सर्वप्रथम कुन्दकुन्द आचार्य ने गाथाबद्ध करके, समैसार नाटक विचारि नाम दयौ है= समयसार नाटक ऐसा विचाररूप नाम दिया, ताही की परंपरा अमृतचंद्र भये= उन्हीं की परम्परा में आचार्य अमृतचंद्र हुये, तिन संसकृत-कलस सम्हारि सुख लयौ है= जिन्होंने संस्कृतभाषा में समयसार-कलश रचकर सुख प्राप्त किया, प्रगट्यौ बनारसी गृहस्थ सिरीमाल अब= (उसी परम्परा में) श्रीमाल-जाति में गृहस्थ बनारसीदास हुये, किये हैं कवित्त हियै बोधिबीज बयौ है= कवित्तों की रचना करके हृदय में बोधिरूपी-बीज को बोया है, सबद अनादि तामैं अरथ अनादि= शब्द अनादि से हैं, और उनके अर्थ भी अनादि से हैं, जीव-नाटक अनादि= जीव का नाटक भी अनादि है, यौं अनादि ही कौ भयौ है= इसप्रकार ये समयसार-नाटक भी अनादिकाल से ही है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘समयसार जी’ की रचना करनेवाले ज्ञानी-जीवों का विवेचन किया है। सर्वप्रथम ‘आचार्य कुन्दकुन्द देव’ ने विचारपूर्वक ‘समयसार जी’ की गाथाओं को ‘प्राकृत-भाषा’ में निबद्ध करके इस नाटक का नाम ‘समयसार’ दिया। उनके पश्चात् उनकी ही परम्परा में ‘आचार्य अमृतचंद्र’ हुये, जो ‘प्राकृत-भाषा’ में निबद्ध-गाथाओं पर ‘संस्कृत-भाषा’ में कलशारोहण कर अत्यंतहर्षित हुये, अर्थात् ‘समयसार-कलश’ नामक ग्रंथ की रचना की। फिर ‘श्रीमाल’ जाति में गृहस्थ-धर्म का पालन करनेवाले ‘बनारसीदास’ हुये, जिन्होंने उन कलशों पर हिन्दी-भाषा में काव्य-रचना कर स्वयं अपने हृदय में बोधि यानि रत्नत्रय का बीज बोया, अर्थात् सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। कविवर कहते हैं वास्तविकता तो यह है कि शब्द भी अनादि से हैं, और उनके अर्थ भी अनादि से हैं, और सात-तत्वों के साथ खेला जाने वाला जीव का नाटक भी अनादि से है, सो यह ‘समयसार-नाटक’ भी अनादि से ही है।

(चौपाई)

अब कछु कहौं जथारथ-वानी, सुकवि-कुकवि की कथा-कहानी।
प्रथमहिं सुकवि कहावै सोई, परमारथ-रस वरनै जोई।। 9।।

कलपित-बात हियै नहिं आनै, गुरु-परंपरा-रीति बखानै।
सत्यारथ-सैली नहिं छंडै, मृषावादसौं प्रीति न मंडै।। 10।।

(दोहा)

छंद-सबद-अच्छर-अरथ, कहै सिद्धांत-प्रवांन।
जो इहविधि-रचना रचै, सो है सुकवि सुजान।। 11।।

शब्दार्थ :- अब कछु कहौं जथारथ-वानी= अब कुछ यथार्थ-वचन कहता हूँ, सुकवि-कुकवि की कथा कहानी= सुकवि और कुकवि के बारे में वर्णन करता हूँ, प्रथमहिं सुकवि कहावै सोई परमारथ-रस वरनै जोई= सर्वश्रेष्ठ-सुकवि वही कहलाता है, जो परमार्थ-रस/आत्मिक-आनंद का वर्णन करता है।। 9।। कलपित-बात हियै नहिं आनै= काल्पनिक-बातें तो जिसके हृदय में ही नहीं आती, गुरु-परंपरा-रीति बखानै= गुरु-परम्परा के अनुसार कथन करते हैं, सत्यारथ-सैली नहिं छंडै= सत्य-स्वरूप को कहने की शैली नहीं छोड़ते हैं, मृषावादसौं प्रीति न मंड=ै असत्य-वचनों से न प्रीति करते हैं और न समर्थन।। 10।। छंद-सबद-अच्छर-अरथ कहै सिद्धांत- प्रवांन= छंद, शब्द, अक्षर, अर्थ सिद्धांत के अनुसार कहते हैं, जो इहविधि रचना रचै, सो है सुकवि सुजान= जो इस विधि से रचना करते हैं, उन्हें चतुर-सुकवि कहते हैं।। 11।। विशेषार्थ :- ‘सुकवि’ और ‘कुकवि’ की कथा को वर्णित करने की प्रतिज्ञा करते हुये उपर्युक्त तीनों-

छंदों में कवि ने ‘सुकवि’ की विचारधारा को सुंदरता से विवेचित किया है।
हिन्दी-साहित्य-जगत् में पद्यमय-काव्य-रचना करनेवालों को ‘कवि’ नाम से पुकारा जाता है।
इसलिये सभी प्रकार के रचनाकारों को ‘कवि’ एवं सभीप्रकार की रचनाओं को ‘काव्य’ कहा जाता है।

कवियों की विचारधारा भी भिन्न-भिन्न होती है, कुछ कवि धर्म-मार्ग का अनुसरण करते हुए, वस्तुस्थिति का निर्भय होकर केवल सत्य और सटीक-विवेचन करते हैं। और कुछ स्वार्थवश, लोभवश, समय की माँग के अनुसार लोग जिसे सुनना या पढ़ना चाहते हैं, उनके अनुरूप ही काव्य-रचना करते हैं। कविवर बनारसीदास जी ने इन दोनों ही प्रकार के कवियों को क्रमशः ‘सुकवि’ और ‘कुकवि’ के नाम से विवेचित किया है। कविवर की दृष्टि में ‘सुकवि’ वे हैं, जो पारमार्थिक-रस का वर्णन करते हैं, अर्थात् अध्यात्मपरकरचनायें करते हैं; क्योंकि इन रचनाओं में जीव का हित निहित होता है; इन्हें पढ़कर, समझकर जीव अपना कल्याण कर सकते है। ऐसे कवि कभी कपोल-कल्पित या सत्य से परे काल्पनिक-बातों को अपने हृदय में भी स्थान नहीं देते, फिर रचनाओं में तो इन बातों की पुष्टि की गुंजाइश भी नहीं रहती। बल्कि अपनी गुरु-परम्परा का निर्वाह करते हुए, गुरुओं से प्राप्त सम्यक्-ज्ञान को ही अपनी रचनाओं में वर्णित करते हैं। स्वार्थवश, लोभवश, किसी के दबाब में आकर भी अपने सत्य-धर्म को कभी नहीं छोड़ते, और असत्य-धर्म का मंडन/समर्थन तो दूर, उससे कभी प्रीति भी नहीं करते। दूसरे शब्दों में कहें तो ‘सुकवि’ अपनी रचनाओं में कभी भी किसी भी कीमत पर असत्य-धर्म का प्रतिपादन नहीं करते। इसीलिए इन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ सुकवि’ के नाम से संबोधित किया जाता है। इसप्रकार जो कवि छंद, शब्द, अक्षर, अर्थ इन सबकी बारीकियों का ध्यान रखते हुए, सिद्धांत-प्रमाण या आगम-प्रमाण रचना/कथन करते हैं, उन्हें ‘सुकवि’ कहते हैं।

(चौपाई)

अब सुनु कुकवि कहौं है जैसा, अपराधी हिय-अंध अनेसा।
मृषाभाव-रस वरनै हितसौं, नई-उकति उपजावैं चितसौं।। 12।।

ख्याति-लाभ-पूजा मन आनै, परमारथ-पथ भेद न जानै।
वानी-जीव एक करि बूझै, जाकौ चित जड़-ग्रंथ न सूझै।। 13।।

वानी-लीन भयौ जग डोलै, वानी-ममता त्यागि न बोलै।
है अनादि-वानी जगमाँहि, कुकवि बात ये समझै नांही।। 14।।

शब्दार्थ :- अब सुनु कुकवि कहौं है जैसा= अब कुकवि कैसा होता है, सो कहता हूँ, सुनो, अपराधी हिय- अंध अनेसा= पापी, हृदय का अंधा और हठग्राही, मृषाभाव-रस वरनै हितसौं= असत्य-बातों को भी ‘हितकारी’ कहकर वर्णन करता है, नई-उकति उपजावैं चितसौं= मन से नित नई-नई कल्पनाओं को जन्म देता है।। 12।। ख्याति-लाभ-पूजा मन आनै= ख्याति, लाभ, सम्मान की हमेशा मन में चाह रहती है, परमारथ-पथ भेद न जानै= मोक्षमार्ग के मर्म को नहीं जानता, वानी-जीव एक करि बूझै= वाणी और आत्मा को एक जानता है, जाकौ चित जड़-ग्रंथ न सूझै= जिसका मन जड़-ग्रंथों के समान है, अर्थात् जिसे कुछ भी समझ में नहीं आता है।। 13।। वानी-लीन भयौ जग-डोलै= अपने-वचनों में मस्त होकर संसार में डोलता रहता है, वानी-ममता त्यागि न बोलै है= वाणी से ममत्व त्यागकर नहीं बोलता, है अनादि-वानी जगमाँहि= वचन तो संसार में अनादि से है, कुकवि बात ये समझै नांही= ये बात कुकवि नहीं समझता।। 14।। विशेषार्थ :- इन तीनों-छंदों में कवि ने ‘कुकवि’ की विचारधारा का सटीक-विवेचन किया है। ‘कुकवि’ जैसाकि नाम से ही स्पष्ट है कि ऐसा कवि जो कुरीतियों, कुमार्ग का अनुसरण करता हो, जो सत्य के विपरीत अपनी बात रखता हो। ऐसे सत्य से विपरीत-कथन करनेवाले को काव्य-जगत् में ‘अपराधी’ या ‘पापी’ कहा जाता है। कवि ने भी उसे ‘हृदय का अंधा’ कहा, क्योंकि जो व्यक्ति सत्य को जानते-देखते हुए भी स्वीकार नहीं करता, वह अंधे के समान ही है। ‘हठग्राही’ यानि अपनी असत्य-बात को भी हठ-पूर्वक प्रस्तुत करता है। ऐसा व्यक्ति जो अपने मन में उठे कपोल- कल्पित विचारों को भी हितकारी बताकर सरस-भाव से वर्णित करता है, वह काव्य-रचना की दृष्टि से ‘कुकवि’ है। अपनी काव्य-रचना के बदले में ख्याति/नाम/प्रशंसा की चाहत रखना, लाभ या काव्य-रचना के बदले में धन प्राप्ति की वांक्षा रखना, बदले में स्वयं के सम्मान की चाहत होना- ये सभी लक्षण ‘कुकवि’ की पहचान है। इसके अलावा कुकवि परमार्थ, सत्य और हितकारी-मार्ग अर्थात् मोक्षमार्ग के वास्तविक-स्वरूप को तो जानता नहीं, और सांसारिक-रसों का वर्णन बहुत ही चाव से करता है। दूसरे शब्दों में कहें उसकी रचनाओं में संसार-मार्ग की ही प्रधानता रहती है। सिद्धांतत: वचन/वाणी/बोलना जीव का गुण नहीं है, इसलिए ‘सुकवि’ को अपनी वाक्-कला पर अभिमान नहीं होता; जबकि ‘कुकवि’ वाक्-कला और जीव को एक मानता है, इसलिये उसे अहंकार भी वर्तता है। कवि ने कुकवि को जड़-ग्रंथों के समान कहा है; क्योंकि जैसे किसी ग्रन्थ या पोथी में कितनी ही ज्ञान की बात लिखी हो, किन्तु वह पोथी उसे नहीं समझती/जानती है; इसीप्रकार कुकवि भी अपने द्वारा कहे गये वचनों के मर्म को नहीं पहिचानता है, कि इनसे जीव का हित नहीं अहित होनेवाला है। इसीलिए अपनी वाणी/वाक्-कला के अहंकार में लीन होकर चार-गति चौरासी-लाख-योनियों में ही डोलता रहता है। वाणी के ममत्व को त्यागकर काव्य-रचना नहीं करता; क्योंकि वह वाणी/शब्दों को अपना आविष्कार मानता है। जबकि वास्तव में ये शब्द तो जगत् में अनादिकाल से हैं, और ये काव्यकला उसे इस पर्याय में ही मिली है, इस बात को कुकवि नहीं समझता।

(सवैया इकतीसा)

जैसै काहू-देसमैं सलिल-धारा कारंज की, नदीसौं निकसि फिर नदी मैं समानी है।।
नगरमैं ठौर-ठौर फैलि रही चहुँ-ओर, जाकै ढिंग बहै सोइ कहै मेरौ-पानी है।।
त्यौंही घट-सदन सदनमैं अनादि-ब्रह्म, वदन-वदन मैं अनादिहीकी वानी है।
करम-कलोलसौं उसासकी बयारि बाजै, तासौं कहै मेरी-धुनि ऐसौ मूढ़-प्रानी है।। 15।।

शब्दार्थ :- जैसै काहू-देसमैं सलिल-धारा कारंज की= जैसे किसी देश में जल की धारा शाखाओं में बहती हुई, नदीसौं निकसि फिर नदी मैं समानी है= नदी से निकलकर फिर नदी में समा जाती है, नगरमैं ठौर-ठौर फैलि रही चहुँ-ओर= नगर में जगह-जगह पर चारों ओर बह रही है, जाकै ढिंग बहै सोइ कहै मेरौ-पानी है= जिसके घर के पास से बहती है, वही कहता है ‘‘यह मेरा-पानी है,’’ त्यौंही घट-सदन सदनमैं अनादि-ब्रह्म= उसीप्रकार हृदयरूपी घर में अनादि-ब्रह्म/आत्मतत्त्व का वास है, वदन-वदन मैं अनादिहीकी वानी है= प्रत्येक मुख में अनादि की ही वाणी विद्यमान है, करम-कलोलसौं उसासकी बयारि बाजै= कर्म की लहरों से निःश्वास के माध्यम से हवा बजती है, तासौं कहै मेरी-धुनि ऐसौ मूढ़-प्रानी है= उसको कहता है ‘‘यह मेरी आवाज़ है’’,- ऐसा मूर्ख-प्राणी है। विशेषार्थ :- पिछले-छंद में कवि ने स्पष्ट किया था कि जगत् में शब्द अनादिकाल से हैं, और स्वतंत्ररूप से ध्वनित होते हैं। इस-छंद में सोदाहरण-स्पष्ट किया है कि शब्द जीव से पूर्णतः भिन्न हैं, और ये किसप्रकार ध्वनित होते हैं? जैसे किसी नदी से निकली कोई जलधारा गाँव या शहर में विभिन्न-शाखाओं के रूप में बहती हुई वापस उसी नदी में ही समा जाती है। लेकिन इस बीच जलधारा जिसके घर के पास से निकलती है, (यद्यपि वह जलधारा स्वतंत्र बह रही है, फिर भी) वे लोग कहते हैं कि ‘‘यह मेरा पानी है’’, तो ये उनकी अज्ञानता ही है। ठीक उसीप्रकार इस ह्रदयरूपी-घर में अनादि-ब्रह्म का निवास है, और प्रत्येक-शरीर में अनादि की वाणी भी विद्यमान है। आयु-कर्म की तरंगों से या सद्भाव से उसमें निःश्वासरूपी-हवा का आवागमन होता है, और उसके चलने से आती-जाती हवा ध्वनित होती है, या शब्दरूप परिणमित होती है। यह प्रक्रिया पूर्णरूप से स्वतंत्र है, लेकिन फिर भी अज्ञानी मिथ्यादृष्टि-जीव या कुकवि कहता है कि ‘‘यह मेरी वाणी है’’ और उसे अपनी वाणी मानकर अभिमानी होता है, तब यह तो प्रत्यक्ष उसकी अज्ञानता का ही परिचायक है।

(दोहा)

ऐसे मूढ़-कुकवि कुधी, गहै मृषा-मग दौर।
रहै मगन अभिमानमैं, कहैं और की और।। 16।।

वस्तु-सरूप लखैं नहीं, बाहिज-द्रिष्टि प्रवांन।
मृषा-विलास विलोकिकैं, करैं मृषा-गुनगान।। 17।।

शब्दार्थ :- ऐसे मूढ़-कुकवि कुधी= ऐसे मिथ्यादृष्टि कुकवि, गहैं मृषा-मग दौर= असत्य-मार्ग को ग्रहण करते/चलते हैं, रहैं मगन अभिमानमैं= दिन-रात अभिमान में मगन रहते हैं, कहैं और की और= और कुछ की कुछ कहते हैं।। 16।। बाहिज-द्रिष्टि-प्रवांन= बाह्य-दृष्टि के अनुसार चलने के कारण, वस्तु-सरूप लखै नहीं= वस्तु-स्वरूप देखते नहीं हैं, मृषा-विलास विलोकिकैं करै मृषा-गुनगान= झूठे-वैभव को देखकर झूठा ही गुणगान करते हैं।। 17।। विशेषार्थ :- कविवर आगे कहते हैं कि इसप्रकार मूढ़-कुकवि कुमार्ग या असत्य के मार्ग पर चलता है। और स्वयं को वाणी का कर्त्ता मानकर अभिमान में मगन रहता है; फिर जो उसे सही लगता है, वह उसी का बखान करता है। इसका मुख्य-कारण यही है कि वह वस्तु के सत्य या यथार्थ-स्वरूप को तो जानता नहीं है, और इन्द्रियाधीन बाह्य-दृष्टि को प्रमाण/सत्य मानता है। बाह्य झूठे-वैभव को देखकर झूठा ही विवेचन करता है, और खुश होता है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि ऐसा करके वह स्वयं अपना भी अहित करता है, और संसारीजनों का भी अहित करता है।

(सवैया इकतीसा)

मांस की गरंथि कुच कंचन-कलस कहैं, कहैं मुख-चंद जो सलेषमा को घरु है।
हाड़ के दसन आहि हीरा-मोती कहैं ताहि, मांस के अधर ओंठ कहैं बिंबफरु है।।
हाड़-दंड भुजा कहैं कौंलनाल कामधुजा, हाड़हीकै थंभा जंघा कहैं रंभातरु है।
योंही झूठी-जुगति बनावैं और कहावैं कवि, येते पर कहैं ‘‘हमैं सारदाको वरु है’’।। 18।।

शब्दार्थ :- मांस की गरंथि कुच कंचन-कलस कहैं= माँस के पिण्डरूप कुचों को ‘स्वर्णकलश’ कहते हैं, कहैं मुख-चंद जो सलेषमा को घरु है= जो श्लेष्मा/कफ़ का घर है, उस मुख को ‘चंद्रमा’ कहते हैं, हाड़ के दसन आहि हीरा-मोती कहैं ताहि= हड्डी के बने दाँतों को ‘हीरा-मोती’ कहते हैं, मांस के अधर ओंठ कहैं बिंबफरु है= मांस के ओठों को ‘बिंबाफल’ कहते हैं, हाड़-दंड भुजा कहैं कौंलनाल कामधुजा= हड्डी के दंडोंरूप भुजाओं को ‘कमलनाल’ और ‘कामदेव की ध्वजा’ कहते हैं, हाड़हीकै थंभा जंघा कहैं रंभातरु है= हाड़ ही की खंभरू े प जंघाओं को ‘केले का वृक्ष’ कहते हैं, योंही झूठी-जुगति बनावैं और कहावैं कवि= इसप्रकार झूठी-झूठी युक्तियाँ बनाते हैं और अपने को ‘कवि’ कहते हैं, येतपे र कहैं हमैं सारदाको वरु है= ऊपर से कहते हैं कि ‘‘हमें सरस्वती का वरदान है’’। विशेषार्थ :- इस-छंद में कविवर बनारसीदास जी ने ‘कुकवि’ की मानसिकता अथवा वस्तुस्थिति के प्रति उसकी दृष्टि/नजरिये को बताते हुये वास्तविकता क्या है- इसका यथार्थ-चित्रण किया है। अधिकांशतः काव्य-रचनाकारों ने अपने काव्य की विषय-वस्तु नारी के रूप-सौंदर्य (भोगविलास की दृष्टि से) को बनाया है, और शृंगार-परक रचनायें की है। वास्तव में देखा जाये, तो शरीर चाहे नारी का हो या पुरुष का हड्डी, मज्जा आदि सप्तधातु से निर्मित, मल का पिटारा है। लेकिन कवियों की कल्पनायें उसे भी नये-नये रूप में प्रस्तुत करतीं हैं, उसी की वास्तविकता का वर्णन बनारसीदास जी ने इस छंद में किया है। जैसे कुकवि माँस के पिण्डरूप-कुचों को ‘स्वर्णघट’ या सोने के कलश कहता है; जो मुख कफ़, लार आदि घृणित-वस्तुओं का घर है, उसे वह ‘चंद्रमा’ के समान कहता है। हड्डी से निर्मित दाँतों को वह ‘हीरे-मोती’ कहता है; इसीप्रकार उसी माँस से बने ओठों को वह ‘लाल-बिंबाफल’ के समान कहता है। हड्डियों की दंडोंरूप भुजाओं को ‘कमलनाल’ कहता है, कछ कुकवि तो उसे ‘कामदेव की पताका’ भी कहते हैं। हड्डियों के ही स्तम्भरूप जंघाओं को ‘केले के वृक्ष के तने’ के समान कहता है। इसप्रकार अनेक झूठी-झूठी युक्तियों और कल्पनाओं का अपनी रचनाओं में वर्णन करता है, और स्वयं को कवि कहता है। इतना ही नहीं, साथ ही ‘करेला और नीम चढ़ा’ की कहावत को चरितार्थ करते हुये निर्लज्जता पूर्वक वह कुकवि यह भी कहता है कि ‘‘मुझे ‘शारदा’ अर्थात् ‘माँ सरस्वती’ का वरदान है, तभी तो मैं ऐसी कल्पनायें करके काव्य-रचना करता हूँ।’’

(चौपाई)

मिथ्यावंत-कुकवि जे प्रानी, मिथ्या तिनकी भाषित-वानी।
मिथ्यामती-सुकवि जो होई, वचन-प्रवांन करै सब कोई।। 19।।

(दोहा)

वचन-प्रवांन करै सुकवि, पुरुष हिए-परवांन।
दोऊ-अंग प्रवांन जो, सो है सहज-सुजान।। 20।।

शब्दार्थ :- मिथ्यावंत-कुकवि जे प्रानी= जो मिथ्यादृष्टि-कुकवि प्राणी होते हैं, मिथ्या तिनकी भाषितवानी= उनकी कही गई वाणी भी मिथ्या होती है, मिथ्यामती सुकवि जो होई= (भले ही) मिथ्यादृष्टि हो, पर जो सुकवि होते हैं, वचन-प्रवांन करै सब कोई= वे सभी वचनों के अनुसार ही प्रवर्तन करते हैं। (अर्थात् यथार्थ ही प्ररूपण करते हैं और तदनुसार ही स्वयं आचरण करते हैं।) ।। 19।। वचन-प्रवांन करै सुकवि-पुरुष= सुकवि-व्यक्ति वचनों के अनुसार आचरण करते हैं, हिए-परवांन= जो उनका हृदय स्वीकार करता है, दोऊ अंग प्रवांन जो, सो है सहज सुजान= (जिनके) मन और वचन दोनों प्रामाणिक होते हैं, (अर्थात् जानते कुछ हैं, परन्तु कहते कुछ हैं- ऐसा छल नहीं करते हैं) वे ही स्वाभाविक रूप से सुजान/सज्जन या सुकवि होते हैं।। 20।। विशेषार्थ :- अंत में निष्कर्षरूप में कविवर कहते हैं, जो केवल सांसारिक भोग-विलास से संबंधित शृंगारपरक-रचनायें करते हैं, वे सभी मिथ्यादृष्टि-कवि ‘कुकवि’ हैं, उनकी वाणी भी मिथ्या है। और जो कवि यद्यपि अभी वे भले ही मिथ्यादृष्टि हैं; परन्तु फिर भी आत्महितकारी, आध्यात्मिक, वैराग्यपरकरचनायें लिखते हैं, वे ‘सुकवि’ की श्रेणी में आते हैं; उनके वचन भी प्रामाणिक होते हैं। जिनके वचन भी प्रामाणिक हैं, जिनके हृदय में आत्मस्वरूप का सच्चा-श्रद्धान भी है, जिनके मन और वचन- दोनों में ही समानता है (छल नहीं है), वे ही वास्तव में ‘सर्वश्रेष्ठ सुकवि’ हैं।

(चौपाई)

अब यह बात कहूँ है जैसे, नाटक-भाषा भयौ सु एेसे।
कुंदकुंद-मुनि मूल-उधरता, अमृतचंद्र टीका के करता।। 21।।

समैसार-नाटक सुखदानी, टीका-सहित संस्कृत-वानी।
पंडित पढ़ै सु दिढ़मति बूझै, अलपमतीकौं अरथ न सूझै।। 22।।

शब्दार्थ :- अब यह बात कहूँ है= अब यह बात कहता हूँ कि जैसे नाटक-भाषा भयौ सु एेसे= जिसप्रकार समयसार-नाटक की रचना हुई, कुंदकुंद-मुनि मूल-उधरता= कुन्दकुन्दाचार्य मूल-उद्धारक/कर्त्ता हैं, अमृतचंद्र टीका के करता= और अमृतचंद्राचार्य उसकी टीका के कर्त्ता हैं।। 21।। समैसार-नाटक सुखदानी= समयसार- नाटक सुखदायक है, टीका-सहित संस्कृत-वानी= संस्कृतभाषा की टीका के साथ, पंडित पढ़ै सु दिढ़मति बूझ=ै पंड़ितजन पढ़ते हैं, विशेष-ज्ञानी समझते हैं, अलपमतीकौं अरथ न सूझ=ै अल्पबुद्धि-जीवों को उसका अर्थ समझ में नहीं आता था।। 22।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने ‘नाटक समयसार’ की रचना क्यों हुई?- इसका सुंदर-वर्णन किया है। सर्वप्रथम महान्-ग्रंथ ‘समयसार’ जी की रचना ‘गाथा-छंद’ में ‘आचार्य कुन्दकुन्द देव’ ने की, जो कि प्राकृत-भाषा में निबद्ध हैं। उसके बाद जब ‘समयसार जी’ ग्रंथ ‘आचार्य अमृतचंद्र’ के हाथों में आया, तो उन्होंने इन गाथाओं का रहस्य खोलते हुये ‘आत्मख्याति’ नामक टीका लिखी, जो संस्कृत-भाषा में निबद्ध है। इस टीका के बीच-बीच में उन्होंने कई भावप्रवण-पद्य लिखे हैं, जिन्हें ‘समयसार-कलश’ कहा गया है। जिन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि मानो आचार्यदेव ने ‘समयसार-रूपी मंदिर’ के ऊपर कलशारोहण किया हो। इतना महान्-ग्रंथ उपलब्ध होने के बाद कविवर बनारसीदास जी के सामने एक समस्या थी कि उस समय जनभाषा-हिन्दी थी, और मूल-ग्रंथ ‘प्राकृत-भाषा’ में और टीका ‘संस्कृत-भाषा’ में होने के कारण जनसामान्य को समझने के लिए बहुत-कठिन था। परिणाम यह होता था कि पंड़ित और विशेषज्ञानीजन तो उसका अर्थ समझते थे, पर अल्पबुद्धि-जीवों/जनसामान्य की समझ से वह बाहर था।

(चौपाई)

पांडे राजमल्ल-जिनधर्मी, समैसार-नाटक के मर्मी।
तिन गिरंथ की टीका कीनी, ‘बालबोध’ सुगम करि दीनी।। 23।।

इहि-विधि बोध-वचनिका फैली, समै पाय अध्यातम-सैली।
प्रगटी जगमाँही जिनवानी, घर-घर नाटक-कथा बखानी।। 24।।

शब्दार्थ :- पांडे राजमल्ल जिनधर्मी= पांडे राजमल्ल जी जिनधर्म के अनुयायी, समैसार-नाटक के मर्मी= समयसार-नाटक के मर्म को जाननेवाले हैं, तिन गिरंथ की टीका कीनी= उन्होंने इस ग्रंथ की टीका की, बालबोध सुगम करि दीनी= जिसका नाम ‘बालबोधिनी’ था, जिसमें (समयसार के गांभीर्य को बालबुद्धि-जनों के लिये भी) सरल कर दिया है।। 23।। इहि-विधि बोध-वचनिका फैली= इसप्रकार बालबोधिनी-टीका का सबजगह प्रचार-प्रसार होने लगा, समै पाय अध्यातम-सैली प्रगटी= समय के साथ अध्यात्म की शैली भी प्रगट हुई, जगमाँही जिनवानी घर-घर नाटक कथा बखानी= लोक में सर्वत्र जिनवाणी की और घर-घर ‘नाटक-समयसार’ की चर्चा होने लगी।। 24।। विशेषार्थ :- कविवर आगे कहते हैं कुछ समय पश्चात् जैनधर्म के विशेष-श्रद्धानी ‘पांडे राजमल्ल जी’ हुये, जो ‘समयसार नाटक’ के मर्म से भली-भाँति परिचित थे। फिर उन्होंने इस ग्रंथ पर सरलभाषा में ‘बालबोधिनी’ नामक टीका लिखी और इसके मर्म/रहस्य का बहुत अच्छे से स्पष्टीकरण किया, और अपने नाम के अनुरूप बालबोध के समान सरल कर दिया है। फिर कविवर बनारसीदास जी के काल में प्रचलित आध्यात्मिक-चर्चा की गोष्ठियों में ‘बालबोधिनी-टीका’ की चर्चा हुई और तब कविवर बनारसीदास जी ने इसके आधार पर अपने सुंदर-कवित्तों की रचना की। और जो ‘समयसार-नाटक’ अभी तक गद्यरूप में था, उसे बहुत ही सरलता और सुंदरता के साथ पद्यरूप में प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप जो जिनवाणी अभी तक अलमारियों में विराजमान थी, जिसकी मात्र पूजा होती थी, घर-घर उसका वाचन और गायन होने लगा। कविवर बनारसीदास जी द्वारा रचित-छंद सरल-भाषा और गेयात्मक होने के कारण चारों ओर ‘नाटक-समयसार’ के छंदों की धूम मच गई।

(चौपाई)

नगर-आगरे-माँहि विख्याता, कारन पाइ भए बहु-ग्याता।
पंच-पुरुष अति-निपुन प्रवीने, निसि-दिन ग्यान-कथा रस-भीने।। 25।।

(दोहा)

रूपचंद-पंडित प्रथम, दुतिय चतुर्भुज-नाम।
तृतिय भगोतीदास-नर, कौंरपाल-गुनधाम।। 26।।

धर्मदास ये पंचजन, मिलि बैंठैं इक ठौर।
परमारथ-चरचा करैं, इनके कथा न और।। 27।।

शब्दार्थ :- नगर-आगरे-माँहि विख्याता= प्रसिद्ध ‘आगरा-नगर’ में, कारन पाइ भए बहु-ग्याता= निमित्त पाकर बहुत से ज्ञानी हुये, पंच-पुरुष अति-निपुन प्रवीने= उनमें से पाँच-पुरुष अत्यंत-बुद्धिमान् थे, निसिदिन ग्यान-कथा रस-भीने= रात-दिन ज्ञान/आत्मचर्चा के आनंद में ही मग्न रहते थे।। 25।। रूपचंद-पंडित प्रथम= पहले ‘रूपचंद पंडित’, दुतिय चतुर्भुज नाम= दूसरे पंडित का नाम ‘चतुर्भुज’, तृतिय भगोतीदास नर= तीसरे पंडित ‘भगवतीदास’, कौंरपाल गुनधाम= चौथे पंडित गुणों के धनी ‘कुँवरपाल जी’।। 26।। धर्मदास= (पाँचवे पंडित) ‘धर्मदास’,= ये पंचजन मिलि बैंठैं इक ठौर= पाँचों-सज्जन एकसाथ/एकस्थान पर मिल-बैठकर, परमारथ-चरचा करैं= परमार्थ-तत्त्व की ही चर्चा करते थे, इनके कथा न और= कोई दूसरी बात नहीं करते थे।। 27।। विशेषार्थ :- यह घटना प्रसिद्ध-नगर आगरा की है। ‘समयसार’-नाटक’ के स्वाध्याय का सुयोग पाकर कुछ व्यक्ति विशेष-ज्ञानी हुये। जिनमें से पाँच-विद्वानों की चर्चा कवि ने यहाँ की है, जो दिन-रात स्वाध्याय और आत्मचर्चा में लीन रहते थे। पहले विद्वान् थे ‘रूपचंद’ पंड़ित, दूसरे विद्वान् जिनका नाम ‘चतुर्भुज’ था, तीसरे विद्वान् ‘भगवतीदास’, चौथे विद्वान् ‘कुँवरपाल’, और पाँचवें विद्वान् ‘धर्मदास’ थे। ये सभी विद्वान् एक साथ बैठकर एकमात्र आत्मस्वरूप की ही चर्चा करते थे, संसार की किसी भी प्रकार की चर्चा इनके बीच नहीं होती थी।

(दोहा)

कबहूँ नाटक-रस सुनैं, कबहूँ और सिद्धंत।
कबहूँ बिंग बनाइकै, कहैं बोध-विरतंत।। 28।।

चित-कौंरा करि धरमधर, सुमति-भगोतीदास।
चतुरभाव थिरता भये, रूपचंद-परगास।। 29।।

शब्दार्थ :- कबहूँ नाटक-रस सुनैं= कभी (समयसार) नाटक का रस/रहस्य सुनते हैं, कबहूँ और सिद्धंत= कभी अन्य सिद्धांत/शास्त्र सुनते हैं, कबहूँ बिंग बनाइकै= और कभी युक्ति उपस्थित करके कहैं बोध विरतंत= बोधपरक विस्तृत-चर्चा करते थे।। 28।। चित-कौंरा करि= चित्त/परिणाम कौंरा/मुलायम करके, धरमधर= धर्म के धारक (धर्मदास जी) थे, सुमति-भगोतीदास= भगवतीदास सुबुद्धिवान् थे, चतुरभाव थिरता भये= चतुरभाव-वाले चतुर्भुज स्थिरमति थे, रूपचंद-परगास= रूपचंद जी प्रकाश के समान (अपने व दूसरों के उपकारी) थे।। 29।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में उन विद्वानों की विशेषताओं का वर्णन करते हुये कविवर कहते हैं ‘‘अथाह- जिनवाणी में से इन विद्वानों के बीच चर्चा का विषय मुख्यतः तो ‘नाटक-समयसार’ ही रहता था, कभी-कभार सिद्धांतशास्त्र और कभी किसी अन्य तात्त्विक-विषय की भी चर्चा कर लेते थे। ये सभी विषय का खुलासा करने के लिये स्वयं ही तर्क खड़े करते और फिर स्वयं ही विस्तार से चर्चा करके उसका समाधान भी खोजते।’’ नाम के अनुरूप इन पाँचों विद्वानों के स्वभाव और गुणों की चर्चा करते हुए बनारसीदास जी कहते हैं, ‘कुँवरपाल जी’ तो गुणों के धनी थे, कोमल चित्त वाले ‘धर्मदास जी’ ‘धर्मधारक’ थे अर्थात् मंद-कषायी और धर्मानुकूल-आचरण करते थे, ‘भगवतीदास’ सुमतिवान् थे अर्थात् सम्यक् और तीक्ष्ण-बुद्धिवाले थे, ‘चतुर्भुज जी’ के परिणामों में स्थिरता थी अर्थात् शांत-परिणामी थे, और ‘रूपचंद जी’ प्रकाश के समान थे अर्थात् उस विषय को स्वयं भी समझते थे और दूसरों को भी समझाते थे।

(चौपाई)

जहाँ-तहाँ जिनवानी फैली, लखै न सो जाकी मति-मैली।
जाकै सहज बोध-उतपाता, सो ततकाल लखै यह बाता।। 30।।

शब्दार्थ :- जहाँ-तहाँ जिनवानी फैली= सर्वत्र जिनवाणी का प्रसार हुआ, लखै न सो जाकी मति-मैली= जिसकी बुद्धि मलिन थी, उसे समझ में नहीं आयी (या इसकी रुचि नहीं हुई), जाकै सहज-बोध उतपाता= जिसके सहज-ज्ञान की उत्पत्ति हुई, सो ततकाल लखै यह बाता= उसे यह बात तत्काल दिखी। विशेषार्थ :- कविवर कहते हैं उन पाँचों-विद्वानों के प्रयास से सर्वत्र जिनवाणी का प्रचार-प्रसार हुआ। लेकिन फिर भी जिनकी बुद्धि मलिन थी अथवा जो विषय-कषाय में अति-तल्लीन थे, उन्हें इन अमूल्यजिनवचनों का मर्म समझ में नहीं आया, और वे कोरे ही रह गये। लेकिन जो अल्प-रुचिवान् भी थे, अर्थात् जिन्हें संसार में अति-अनुरक्ति नहीं थी; उन्हें इन जिनवचनों का मर्म सहज समझ में आया, और उन लोगों ने उसका भरपूर-लाभ लिया।

(दोहा)

घट-घट-अंतर जिन बसै, घट-घट अंतर जैन।
मति-मदिरा के पानसौं, मतवाला समुझै न।। 31।।

शब्दार्थ :- घट-घट अंतर जिन बसै= प्रत्येक हृदय में भगवान्-आत्मा का वास है, घट-घट अंतर जैन= प्रत्येक हृदय में जैनत्व है, मति-मदिरा के पानसौं= मिथ्या-बुद्धिरूपी मदिरा के पीने से, मतवाला समुझै न= (मान के) नशे में धुत प्राणी इसको समझ नहीं पाता है। विशेषार्थ :- कविवर आगे कहते हैं सत्य तो यही है, कि हर जीवात्मा स्वयं भगवान् है; अंतरंग से प्रत्येक में जैनत्व भी विद्यमान है; परन्तु जैसे मदिरापान करनेवाले जीव को मदिरा का नशा होने पर कुछ नहीं सूझता; ठीक उसीप्रकार ये जीवात्मा भी अनादिकाल से मोहरूपी मदिरा का पान करता आ रहा है, सो उस मोह-मदिरा के नशे में इसे अपना वास्तविक-स्वरूप दिखाई नहीं देता।

(चौपाई)

बहुत बढ़ाई कहाँलौं कीजै, कारिजरूप बात कहि लीजै।
नगर-आगरे-माँहि विख्याता, बानारसी नाम लघु-ग्याता।। 32।।

तामैं कवित-कला चतुराई, कृपा करैं ये पाँचों-भाई।
पंच-प्रपंच-रहित हिय खोलै, ते बनारसीसौं हँसि बौलै।। 33।।

नाटक-समैसार हित जीका, सुगमरूप राजमली-टीका।
कवितबद्ध-रचन जो होई, भाषा-ग्रंथ पढ़ै सब कोई।। 34।।

तब बनारसी-मनमँहि आनी, कीजै तो प्रगटै जिनवानी।
पंच-पुरुष की आज्ञा लीनी, कवितबद्ध की रचना कीनी।। 35।।

शब्दार्थ :- बहुत बढ़ाई कहाँलौं कीजै= बहुत-प्रशंसा कहाँ तक करूँ, कारिजरूप बात कहि लीजै= काम की बात कहता हूँ, नगर-आगरे-माँहि विख्याता= आगरा-नगर जो विख्यात है, बानारसी नाम लघु-ग्याता= (वहाँ) बनारसी नाम का छोटा-सा एक अल्पज्ञानी था।। 32।। तामैं कवितकला-चतुराई= उनमें काव्य-रचना की कला का कौशल था, कृपा करैं ये पाँचों-भाई= इन पाँचों विद्वान् भाईयों की उनपर कृपा थी, पंच प्रपंच-रहित हिय खोलै= इन पाँचों-भाईयों ने निष्कपट, सरल-हृदय से, ते बनारसीसौं हँसि बौलै= बनारसीदास से हँसकर कहा।। 33।। नाटक-समैसार हित जीका= नाटक-समयसार (मूल-ग्रंथ) जीव के लिए हितकारी है, सुगमरूप राजमली-टीका= राजमल जी की टीका उसे समझने के लिये आसान-तरीका है, कवितबद्ध रचना जो होई= यदि इसकी काव्यबद्ध-रचना हो जाये, भाषा-ग्रंथ पढ़ै सब कोई= तो इस भाषा-ग्रंथ को सभी पढ़ सकेगें।। 34।। तब बनारसी-मनमँहि आनी= तब बनारसीदास के मन में यह बात जँच गयी कि, कीजै तो प्रगटै जिनवानी= यदि मैं ऐसा करूँ, तो जिनवाणी का बहुत-प्रचार होगा, पंच-पुरुष की आज्ञा लीनी= पाँचों-पुरुषों की आज्ञा लेकर (इसकी), कवितबद्ध की रचना कीनी= छंदबद्ध काव्य-रचना की।। 35।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने उस घटनाक्रम का वर्णन किया, जिससे उन्हें नाटक-समयसार को छंदबद्ध करने की प्रेरणा मिली। कविवर आगे कहते हैं ''बहुत प्रशंसा क्या करूँ? मैं तो अति-अल्प-मतिवान् हूँ ‘’ अर्थात् समयसार नाटक में अपार-गाम्भीर्य हैं, और मैं तो बहुत ही अल्पबुद्धि वाला हूँ। अर्थात् मेरे से इसका संपूर्ण-वर्णन करना अत्यन्त-कठिन है, इसलिए सीधे काम की बात कहता हूँ। प्रसिद्ध-नगर आगरा में एक अल्पज्ञानी बनारसीदास हुये, जो छंदोबद्ध काव्य-रचना में निपुण थे। उपर्युक्त पाँचों विद्वान्-भाइयों का उन पर अपार-स्नेह था। एक दिन बिना किसी प्रपंच के सहज ही प्रमुदित-भाव से वे बनारसीदास से बोले- ‘‘नाटक-समयसार सभी-जीवों के लिए बहुत हितकारी है, ‘पांडे राजमल्ल जी’ ने उस पर भाषा-टीका लिखकर उसे सरल भी कर दिया है; परन्तु यदि यह काव्यरूप में अर्थात् छंदबद्ध हो जाये, तो सभी जीव इसको आसानी से पढ़ व समझ सकेगें।’’ उन पाँचों विद्वान्-भाईयों की बात सुनकर बनारसीदास के मन में आया कि ‘‘यदि मैं ऐसा करूँ, तो जिनवाणी का अधिक प्रचार-प्रसार होगा।’’ और फिर उन पंच-पुरुषों या पाँचों-विद्वान् भाईयों की बात मानकर कविवर बनारसीदास जी ने ‘नाटक समयसार’ के रूप में इसे छंदों में निबद्ध कर दिया।

(चौपाई)

सोरहसौं-तिरानवे बीते, आसौ-मास सित-पच्छ बितीतै।
तिथि-तेरस रविवार प्रवीना, ता-दिन ग्रंथ समापत कीना।। 36।।

(दोहा)

सुख-निधान सक-बंध नर, साहिब-साह किरान।
सहस-साह सिर-मुकुट-मनि, साहजहां-सुलतान।। 37।।

जाकै राज सुचैनसौं, कीनौं आगम सार।
ईति-भीति व्यापी नहीं, यह उनकौ उपगार।। 38।।

शब्दार्थ :- सोरहसौं-तिरानवे बीतै= संवत् सोलह सो तिरानवे (1693) के, आसौ-मास सित-पच्छ बितीतै= आश्विन-माह का शुक्ल-पक्ष लगभग व्यतीत होने पर, तिथि-तेरस रविवार प्रवीना= त्रयोदशी-तिथि, शुभ रविवार के दिन, ता-दिन ग्रंथ समापत कीना= उस-दिन ग्रंथ (रचना) पूर्ण किया।। 36।। सुख-निधान सक-बंध नर साहिब-साह किरान= सुखों के निधान, दुष्टों को बाँधने/दंडित करनेवाले, मुगल-शहंशाह, सहस-साह सिर-मुकुट-मनि= हजारों मुकुटबद्ध राजाओं के शिरोमणि साहजहां-सुलतान= शाहजहाँ नामक सुल्तान/बादशाह थे।। 37।। जाकै राज सुचैनसौं= जिनके राज्य में सुख-चैन से, कीनौं आगम-सार= आगम के सारभूत इस ग्रंथ की रचना की, ईति-भीति व्यापी नहीं= कोई ईति-भीति आदि उपद्रव-बाधा का भय/कष्ट नहीं हुआ, यह उनकौ उपगार= ये उनका उपकार है।। 38।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने नाटक-समयसार का रचनाकाल और समकालीन-सम्राट का परिचय दिया है। (कविवर के शब्दों के अनुरूप ही यहाँ लिखा जा रहा है, न कि मेरी ओर से किसी की महिमा की जा रही है।) पंच-पुरुषों की बात मानकर कवि ने ‘समयसार’ को छंदबद्ध करना प्रारंभ किया। और संवत् 1693, आश्विन माह के शुक्लपक्ष की त्रयोदशी-तिथि, रविवार के दिन इस अमूल्य काव्य-कृति

‘नाटक-समयसार’ को पूर्ण किया।
उस समय सुखों के निधान हजारों-राजाओं में श्रेष्ठ बादशाह ‘शाहजहाँ’ का शासन चल रहा था।

कविवर कहते हैं उनके शासनकाल में बिना किसी उपद्रव, बाधा आदि के इस ग्रंथ को भलीभाँति पूर्ण किया, ये ‘सम्राट’ का हमारे ऊपर उपकार है।

(सवैया इकतीसा)

तीनसै-दसोत्तर सोरठा, दोहा-छंद दोऊ, युगलसै-पैंतालीस इकतीसा आने हैं।
छयासी-चौपाई, सैंतींस-तेईसे-सवैये, बीस-छप्पै अठारह-कवित्त बखाने हैं।।
सात पुनि ही अडिल्ल, चारि-कुंडलिए मिलि, सकल सातसै-सत्ताइस ठीक ठानै हैं।
बत्तीस-अच्छर के सिलोक कीने लेखै, ग्रंथ-संख्या सत्रह सै सात अधिकानै हैं।। 39।।

शब्दार्थ :- तीनसै-दसोत्तर सोरठा दोहा-छंद दोऊ= तीन सौ दस(310) सोरठा और दोहे दोनों-छंद, युगलसै-पैंतालीस इकतीसा आने हैं= दो-सौ-पैंतालीस (245) इकतीसा -छंद हैं, छयासी-चौपाई, सैंतींसतेईसे सवैये= छयासी(86) -चौपाई और सैंतीस (37)-सवैया तेईसा हैं, बीस-छप्पै अठारह-कवित्त बखाने हैं= बीस (20)-छप्पय और अठारह (18)-कवित्त का वर्णन है, सात पुनि ही अडिल्ल चारि कुंडलिए मिलि= फिर सात (7)-अडिल्ल छंद और चार(4)-कुंडलिए, सकल सातसै-सत्ताइस ठीक ठानै हैं= ऐसे कुल मिलाकर सात सौ सत्ताइस (727) छंद हैं, बत्तीस-अच्छर के सिलोक कीने लेखै= बत्तीस-अक्षर के श्लोकप्रमाण के अनुसार, ग्रंथ संख्या सत्रह सै सात अधिकानै हैं= यह ग्रंथ सत्रह सौ सात(1707) श्लोकप्रमाण है।। 39।। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘नाटक समयसार’ नामक कृति के छंदों एवं परिमाण का परिचय दिया है। छंद-रचना की दृष्टि से इस ग्रंथ में 310 सोरठा और दोहे हैं, 245 सवैया इकतीसा हैं, 86 चौपाई, 37 सवैया तेईसा, 20 छप्पय, 18 कवित्त, 7 अडिल्ल और 4 कुंडलिया- इसप्रकार कुल मिलाकर 727 छंद हैं। 32 अक्षरोंवाले श्लोक के अनुसार इसकी ग्रंथ-संख्या 1707 श्लोकप्रमाण है।

प्रस्तावना | भाग १/२

यदि वर्तमान-जिनाम्नाय में से युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव के अवदानों को एकतरफ कर दिया जाये, तो फिर सामान्यजनों को आत्मबोध करानेवाला कोई पथप्रदर्शक-वाङ्मय शेष नहीं रह जाता है। आचार्य कुन्दकुन्द देव के पहले लिखित सभी आगम-ग्रन्थों में या तो क्रोधादि विकारी-भावों का परिचयात्मक-विश्लेषण मिलता है (द्र. ‘पेज्ज-दोस-पाहुडं’ या ‘कसायपाहुडसुत्तं’) अथवा इन विकारी-भावों के निमित्त से बंधनेवाले ज्ञानावरणादिककर्मों और उनकी प्रकृतियों आदि का सूक्ष्मता से विश्लेषण (द्र. ‘छक्खंडागमसुत्तं’ या ‘षट्खण्डागमसूत्र’) प्राप्त होता है। किन्तु कोई भी आगम-ग्रन्थ ऐसा नहीं लिखा गया था, जिसमें आत्मा के शुद्ध-स्वरूप का और उसके अवलम्बन से आत्म-कल्याण का मार्गदर्शन मिलता हो। - यह पुनीत-कार्य वर्तमान-युग में मात्र आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ही किया है, इसीलिये उन्हें ‘युगप्रधान’ कहा गया है। उक्त दो कर्मपरक मूल-आगम-ग्रन्थों एवं उनके व्याख्या-ग्रन्थों के अलावा जिनाम्नाय के शेष सभी उपलब्ध ग्रन्थ तो आचार्य कुन्दकुन्द देव से अनुप्राणित होकर ही लिखे गये हैं, अतः उनकी तो प्रामाणिकता के आधार स्वयं आचार्य कुन्दकुन्द देव ही हैं। अतः युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव का व्यक्तित्व एवं उनके अवदानों के विषय में जिज्ञासा होना स्वाभाविक ही है। आचार्य कुन्दकुन्द देव के नाम युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव का नाम यद्यपि प्रसिद्ध तो ‘कुन्दकुन्द’ ही हुआ है। परन्तु यह इनका ‘जन्मनाम’ तो था ही नहीं; ‘दीक्षानाम’ भी नहीं था। इनका दीक्षानाम तो ‘पद्मनंदि’ ही था, जो कि इनकी संघ की परम्परा के अनुरूप भी था। चूँकि इनकी दीक्षा ‘नंदिसंघ’ में हुई थी, जिसके संस्थापक आचार्य ‘माघनंदि’ थे; तो उसके अनुरूप इनका दीक्षानाम ‘पद्मनंदि’ होना स्वाभाविक भी है। हमारे यहाँ ‘सेनसंघ’ के अधिकांश आचार्यों के नाम ‘सेन’-नामान्त मिलते हैं, यथा- नयसेन, जिनसेन, वीरसेन आदि; तो ‘देवसंघ’ के अधिकांश-आचार्यों के नाम ‘देव’-नामान्त मिलते हैं, यथा- गंगदेव,जयदेव,बप्पदेव, सोमदेव आदि। इसीप्रकार नंदिसंघ की परम्परा के आचार्यों के नाम के अंत में ‘नंदि’ नाम मिलता है, यथा-देवनंदि, जयनंदि, वज्रनंदि, कुमारनंदि आदि। यद्यपि यह कोई विधान नहीं था, और संभवतः इसीलिये आचार्य माघनंदि के शिष्य एवं आचार्य कुन्दकुन्द के गुरु का नाम ‘जिनचन्द्र’ था, न कि जिननंदि। परन्तु यह ध्रुव-सत्य है कि आचार्य कुन्दकुन्द का दीक्षानाम ‘पद्मनंदि’ ही था, भले ही इनका प्रचलित-नाम ‘कुन्दकुन्द’ हुआ है। ‘नंदिसंघ की पट्टावली’ में लिखा है- ‘‘पट्टे तदीये मुनिमान्यवृत्तौ, जिनादिचन्द्रः समभूदतन्द्रः। ततोSभवत् पञ्च-सुनामधामा, श्रीपद्मनंदिः मुनिचक्रवर्ती।।’’ अर्थात् उनके (नंदिसंघ के संस्थापक आचार्य माघनंदि के) पट्ट पर मुनिजनों में मान्य-आचरणवाले अप्रमादीआचार्य जिनचन्द्र हुय।े उनके बाद (उस पट्ट पर) पाँच प्रसिद्ध नामोंवाले ‘पद्मनंदि’ नामक मुनि-चक्रवर्ती हुय।े इससे स्पष्ट है कि ‘पद्मनंदि’ इनका दीक्षानाम था। तो प्रश्न उठता है कि फिर ‘कुन्दकुन्द’ नाम कैसे प्रचलित हुआ? -इसका उत्तर विभिन्न स्रोतों में निम्नानुसार दिया गया है - ‘‘गुरुपरिपाट्या ज्ञातः सिद्धान्तः कोण्डकुण्डपुरे श्रीपद्मनन्दिमुनिना…’’ -( श्रुतावतार,160-161) अर्थात् ‘‘गुरु-परम्परा से प्राप्त सिद्धांत के ज्ञान के धारी श्री पद्मनंदि मुनि के द्वारा कोण्डकुण्डपुर में…’’ इससे स्पष्ट है कि ‘कोण्डकुण्ड’ या ‘कुन्दकुन्दपुर’ नामक नगर के संभवतः ये निवासी थे, या उस नगर में रहकर इन्होंने ‘परिकर्म’ नामक सिद्धांत-टीका लिखी थी। जो भी हो, चाहे यह इनके जन्मस्थान का वाची हो, या फिर सिद्धांत-ग्रंथ का रचनास्थल; किन्तु यह स्पष्ट है कि यह नगर/ स्थान का नाम था, न कि आचार्यदेव का ‘मूलनाम’ या ‘दीक्षानाम’। वैसे अद्यतन-अनुसन्धानों से इनका जन्मस्थान ‘कोणकोंडला’ या ‘कोण्डकुण्डपुर’ ज्ञापित है। इसके प्रचलन का संभवतः यह कारण रहा हो कि उस समय संघ में या निकटवर्ती-काल में ‘पद्म’ नामवाले और भी अनेक मुनिवृंद रहे होंगे। हम पाते हैं कि यह एक युगधर्म-सा हमारे देश में प्रचलित रहा है कि एक समय में समान-नामवाले कई लोग मिलते हैं। आधुनिक समय में आज से पच्चीस वर्ष पहले प्रायः हर मोहल्ले में कई सुरेश, रमेश, महेश, दिनेश नामवाले लोग होते थे। तब उस स्थिति में उन्हें कुल-गोत्र आदि के नाम से पहिचाना जाता था। पंजाब-प्रान्त में आज भी जितने ‘सरनेम’ प्रचलित हैं, वे अधिकांश उनके ग्राम या नगर के वाचक हैं, यथा- खन्ना, तलवंडी, बादल, कोहल आदि सभी कुल-गोत्र के वाचक न होकर जिस ग्राम-नगर का वह व्यक्ति निवासी है, उस ग्राम या नगर का नाम है। प्राचीनकाल में भी ऐसी रूढि प्रचलित रही है। गांधारी, कैकेयी, माद्री- ये इनके वास्तविक नाम नहीं थे, बल्कि क्षेत्रवाची थे। कैकेय-प्रान्त की ‘कैकेयी’, गांधार-प्रान्त की ‘गांधारी’, तो मद्र-देश की ‘माद्री’। मेरे कहने का अभिप्राय मात्र इतना ही है कि भारतवर्ष में व्यक्तियों के नाम ग्राम, नगर, प्रान्त या देश पर आधारित भी रहे हैं। आज से पच्चीस-वर्ष पहले तक संयुक्त-परिवारों में वधुओं को नागपुरवाली, कानपुरवाली, मथुरावाली- जैसे नामों से ही जाना व बुलाया जाता था। उनका वास्तविक-नाम शायद ही किसी को ज्ञात होता था। आचार्य कुन्दकुन्द देव के नाम के साथ भी लगभग यही स्थिति है, कि ‘कोण्डकुण्ड’ परिवर्तित रूप (कुन्दकुन्द) नामक ग्राम के कारण ये ‘कुन्दकुन्दवाले पद्मनंदि’ कहे जाते रहे होंग।े किन्तु धीरे-धीरे इन्हें मात्र ‘कुन्दकुन्द’ ही कहा जाने लगा और इनका मूलनाम ‘पद्मनंदि’ अधिक-प्रयुक्त होने के कारण लोग प्रायः भूल ही गये। चन्द्रगिरि के शिलालेख ( 45/66) में स्पष्ट लिखा है- ‘‘श्रीपद्मनन्दीत्यनवद्यनामा ह्याचार्य-शब्दोत्तरकुन्दकुन्दः’’ अर्थात् ‘पद्मनंदि’-इस निर्दोष/यथार्थ नामवाले आचार्य हुये, जिनका नामान्तर ‘कुन्दकुन्द’ था। यह विशेष बात है कि ‘नंदिसंघ’ में ‘बलात्कारगण’ के अग्रणी तो आचार्य कुन्दकुन्द देव ही थे। ‘मूलाचारप्रदीपिका’ में स्पष्ट लिखा है कि ‘’ पद्मनंदि-गुरुर्जातो बलात्कार-गणाग्रणी ‘’ इस बात का समर्थन आचार्य शुभचन्द्रकृत ‘पाण्डवपुराण’ में भी मिलता है। आचार्य कुन्दकुन्द देव के पाँच नामों की चर्चा षट्प्राभृत के टीकाकार आचार्य श्रुतसागर जी ने ही की है - ‘‘इति श्रीपद्मनंदि-कुन्दकुन्दाचार्य-वक्रग्रीवाचार्यैलाचार्य-गृद्धपिच्छाचार्य-नामपञ्चक-विराजितेन…’’ -( मो. पा. टी. प्रशस्ति, पृ. 379) अर्थात् ‘‘पद्मनंदि, कुन्दकुन्द, वक्रग्रीव, एलाचार्य, गृद्धपिच्छाचार्य- इन पाँच नामों से प्रसिद्ध…’’ इन पाँच नामों की चर्चा अन्यत्र कहीं नहीं मिलती है। हाँ, इतना अवश्य है कि अनेकों उल्लेखों में पद्मनंदि एवं कुन्दकुन्द- इन दो नामों के साथ बहुवचन का प्रयोग यह प्रमाणित अवश्य करता है कि इन दो नामों के अतिरिक्त अन्य-नाम भी इनके प्रचलित थे। इन पाँच नामों में प्रथम दो नामों (पद्मनंदि एवं कुन्दकुन्द) के विषय में तो स्पष्टीकरण किया जा चुका है कि ‘पद्मनंदि’ तो उनका दीक्षानाम था, एवं ‘कुन्दकुन्द’ नामक स्थान के होने के कारण यह नाम उनका प्रचलित हुआ है। किन्तु शेष तीन नामों के विषय में कोई प्रामाणिक जानकारियाँ नहीं मिलतीं हैं। मात्र कुछ कथाग्रंथों में ही इनके विवरण मिलते हैं, जो सब मिलकर यही बताते हैं कि आचार्य कुन्दकुन्द देव विदेहक्षेत्र में सीमंधर स्वामी की वंदनार्थ गये थे, तभी कुछ परिस्थितियों के कारण इन नामों की स्थिति बनी। जैसे कि- सीमंधर स्वामी के दर्शनार्थ जाते समय उनकी मयूर-पिच्छिका रास्ते में कहीं गिर गयी, तो ईर्यासमिति के निर्दोष-पालनार्थ अपवादरूप में गृद्धपक्षी के गिरे हुये पंखों की पिच्छी लेकर उन्होंने कुछ समय काम चलाया था, इसलिये उनका ‘गृद्धपिच्छाचार्य’ नाम पड़ा। (मुझे यह तर्क समझ नहीं आया, क्योंकि गृद्ध्र-पक्षी के पंख मयूर जैसे सुकोमल नहीं होते हैं, अतः उनसे जीवरक्षा वैसी संभव नहीं है। इसे मात्र आपवादिक ही माना जा सकता है; परन्तु इसके कारण कुन्दकुन्द आचार्यदेव का नामकरण किया जाये- यह मुझे बहुत समीचीन प्रतीत नहीं होता है।) वैसे हमारी आचार्य-परम्परा में उमास्वामी आचार्य को भी ‘गृद्धपिच्छाचार्य’ कहा गया है। तथा कोई अाचार्य ‘बलाकपिच्छाचार्य’ के नाम से भी इन्हीं कारणों से प्रसिद्ध हुये हैं। तथा सीमंधर स्वामी की सभा में पाँच सौ धनुष की अवगाहनावाले विशालकाय-लोगों के बीच ये लघुआकारवाले आचार्य थे, अतः इन्हें ‘एलाचार्य’ कहा गया। (ज्ञातव्य है कि जिनागम में ‘एलाचार्य’ पद एक पारिभाषिक-पद है, उसके अनुसार आचार्य कुन्दकुन्द देव को ‘एलाचार्य’ संज्ञा उपयुक्त नहीं है। क्योंकि वह आज की भाषा में किसी ‘जूनियर’ जैसी स्थिति है। ‘भगवती आराधना’ (177/365) ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है कि ‘‘गुरु-आचार्य के पश्चात् जो चारित्र के क्रम का उपदेश अन्य-मुनिराजों व आर्यिकादिक को कहता है, उसे ‘एलाचार्य’ कहते हैं।)’’ ‘वक्रग्रीवाचार्य’ नाम की कोई विशेष-कथा तो नहीं मिलती है, किन्तु कहा जाता है कि चौरासी पाहुडों के लेखन कार्य में निरन्तर-व्यस्त रहने से इनकी गर्दन कुछ टेढ़ी हो गयी थी, अतः इनकी ‘वक्रग्रीवाचार्य’ संज्ञा प्रचलित हुई। महत्त्वपूर्ण-बात यह उभरकर सामने आती है कि इन नामों से कुन्दकुन्द आचार्यदेव की गरिमा तनिक भी बढ़ती नहीं है। उनके सुचरित्र व महनीय-लेखन का आभामण्डल पहले से ही इतना ज्योतित है, कि उसे किसी अन्य पहिचान की अपेक्षा ही नहीं है। इन नामों के साथ जो घटनायें प्रचलित की गयीं हैं, उनसे कुन्दकुन्द आचार्य की गरिमा घटती ही है एवं विवादास्पद-स्थिति बनती है। इनके कोई तथ्यात्मक-प्रमाण भी नहीं मिल रहे हैं; अतः इनको कुन्दकुन्द आचार्य देव के साथ जोड़ने का प्रयास किसी सार्थक-प्रतिपत्ति को जन्म नहीं देता है। स्पष्ट कहा जाये, तो कुन्दकुन्द आचार्य देव के साथ जुड़कर ये घटनायें प्रसिद्धि को प्राप्त हो गयीं हैं, किन्तु इनसे कुन्दकुन्द आचार्य देव की गरिमा रंचमात्र भी बढ़ती नहीं है। आचार्य कुन्दकुन्द के पाहुड-ग्रंथ- आचार्य कुन्दकुन्द देव के उपलब्ध पाहुड-ग्रंथों के अतिरिक्त कई पाहुड-ग्रंथों के नाम विद्वानों ने विविध साक्ष्यों के आधार पर खोज निकाले हैं। इनके निर्विवादरूप से माने गये उपलब्ध पाहुड-ग्रंथों के नाम इसप्रकार हैं- 1. पंचत्थिकायसारसंगहो,2. पवयणसारो, 3. समयपाहुडं, 4. णियमसारो, 5. दंसणपाहुडं, 6. सुत्तपाहुडं, 7. चरित्तपाहुडं, 8. बोधपाहुडं, 9. भावपाहुडं, 10. मोक्खपाहुडं, 11. लिंगपाहुडं, 12. सीलपाहुडं, 13. बारसअणुवेक्खा, एवं 14. दसभत्तिसंगहो। इनके अतिरिक्त ‘रयणसारो’ एवं ‘मूलायारो’- ये दो ग्रंथ भी आचार्य कुन्दकुन्द देव द्वारा प्रणीत माने जाते हैं। किन्तु कई विद्वान् विभिन्न-कारणों से इन्हें आचार्य कुन्दकुन्द देव की रचना नहीं मानते हैं। ये भी सम्प्रति उपलब्ध हैं। इनके कुल चौरासी पाहुड-ग्रंथ माने गये हैं, जिनमें उपर्युक्त पाहुड-ग्रंथों के अतिरिक्त शेष सब अनुपलब्ध हैं। उनमें से अधिकांश के तो नाम भी ज्ञात नहीं हो सके हैं। किन्तु डॉ. ए.एन.उपाध्ये ने विविध-प्रमाणों के आधार पर उनमें से तेतालीस (43) पाहुड-ग्रंथों के नाम पता करने का दावा किया है। वे नाम इसप्रकार से हैं- 1. आयारपाहुडं, 2. आलापपाहुडं, 3. अंगपाहुडं, 4. आराहणापाहुडं, 5. बंधपाहुडं, 6. बुद्धिपाहुडं, 7. चरणपाहुडं, 8. चुण्णिपाहुडं, 9. चूलिपाहुडं, 10. दिव्वपाहुडं, 11. दव्वपाहुडं, 12. दिट्ठिपाहुडं, 13. एयंतपाहुडं, 14. जीवपाहुडं, 15.जोणिपाहुडं, 16. कम्मविवायपाहुडं, 17. कम्मपाहुडं, 18. किरियासारपाहुडं, 19. खवणपाहुडं, 20. लद्धिपाहुडं, 21. लोवपाहुडं, 22. णिच्चपाहुडं, 23. णमपाहुडं (?), 24.णोकम्मपाहुडं, 25. पंचवग्गपाहुडं, 26. पयद्धपाहुडं, 27. पयपाहुडं, 28. पयडिपाहुडं, 29. पमाणपाहुडं, 30. सलमीपाहुडं (?), 31. समवायपाहुडं, 32. सद्दंसणपाहुडं, 33. सद्दंसणपाहुडं, 34. सिद्धंतपाहुडं, 35. सिक्खापाहुडं, 36. ठाणपाहुडं, 37. तच्चपाहुडं, 38. तोसपाहुडं, 39. उप्पादपाहुडं, 40. ओघाणपाहुडं, 41. विज्जापाहुडं, 42. वत्थुपाहुडं, और 43. विहियपाहुडं। रोचक-बात यह है कि जैन-इतिहास, संस्कृति व दर्शन के शोधकर्त्ता-मनीषियों ने इन नामों को कोई वरीयता नहीं दी है। यही नहीं, इनकी प्रचलित-कथाओं व कारणों को उन्होंने पूरीतरह उपेक्षित कर दिया है। अतः इनकी चर्चा में समय नष्ट करना ही होगा, इसलिये इसे यहीं विश्राम देता हूँ। आचार्य कुन्दकुन्द देव की जन्मभूमि ‘कोणकुंडला’ युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव तब से लेकर आज तक की सम्पूर्ण निर्ग्रन्थ-आचार्य-परम्परा के सिरमौर हैं, यह तथ्य सर्व-स्वीकृत है। कुछ समय पहले आज के एक दिगम्बर-जैन-मुनिपद-धारक आचार्य ने अपने शिष्यों को कहकर अपने नाम को जैन-आचार्य-परम्परा के सर्वश्रेष्ठ-आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिये षट्खण्डागम के लिपिकर्त्ताओं में से एक आचार्य पुष्पदन्त स्वामी के नाम-सादृश्य की ओट लेकर ‘‘मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो’’ के स्थान पर ‘‘मंगलं पुष्पदन्ताद्यो’’ लिखवाने एवं छपवाकर प्रचारित करने का अतिसाहस किया था। तब मैंने अनेकों प्रबल-प्रमाणों से पुष्ट सामग्री देकर इस बात को नितान्त-अनुचित-चेष्टा सिद्ध करते हुये यह भी प्रमाणित किया था कि आचार्य कुन्दकुन्द देव सम्पूर्ण दिगम्बर जैन आचार्य-परम्परा में सर्वश्रेष्ठ-आचार्य क्यों हैं और वस्तुतः अनेकों महान् आचार्य भगवन्तों के होते हुये भी उन्हें ही शासननायक भगवान् महावीर स्वामी व प्रधान-गणधर इन्द्रभूति गौतम के बाद सर्वश्रेष्ठ-आचार्य के रूप में क्यों स्मरण किया गया है? और उन्हें अन्य किसी भी आचार्य से स्थानान्तरित (री-प्लेस) नहीं किया जा सकता है। दिगम्बर जैन आचार्य-परम्परा के इन निर्विवाद-सर्वश्रेष्ठ आचार्यप्रवर के विषय में अनेकप्रकार की किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। जिनमें कुछ को तो अकाट्य-प्रमाणों से मैं प्रमाणित कर चुका हूँ (जैसे कि आचार्य कुन्दकुन्द देव का विदेहगमन, उनके लिये ऋद्धियाँ प्रकट होना, उनके मूलागमों का अधिकारी-वैदुष्य इत्यादि) और कुछ की प्रामाणिकता की जाँच-हेतु मैं तथ्य एकत्रित कर रहा हूँ। इसी क्रम में मैंने आचार्य कुन्दकुन्द देव की ‘तपोभूमि’ एवं विदेहगमन-भूमि ‘पोन्नूरमलै’ की तथा उनकी ‘समाधिस्थली’ ‘कुन्दाद्रि’ की विशेषरूप से यात्रायें कीं और तथ्यों का संचय किया। किन्तु उनकी जन्मभूमि ‘कोणकुंडला’ की वर्तमान-दशा एवं एवं वास्तविकता को तथ्यात्मकरूप से जानने के लिये मैंने मई 2018 माह की 25-26 दिनांकों को उस क्षेत्र की यात्रा की तथा तथ्यों को एकत्रित किया, जिनमें वीडियोज़, स्टिल-पिक्स, कोर्ट के निर्णयों की प्रतियाँ, और अन्य विविधप्रकार के दस्तावेज़ शामिल हैं। आचार्य कुन्दकुन्द देव की जन्मभूमि ‘कोणकुंडला’ वर्तमान आंध्रप्रदेश के अनंतपुर नामक कर्नाटक-सीमान्त जिले में है। जो कि अनंतपुर जिला-मुख्यालय से लगभग 70 किमी. की दूरी पर स्थित है। दक्षिण-रेल्वे के महत्त्वपूर्ण रेल्वे स्टेशन ‘गुंटकल’ से लगभग आठ किमी की दूरी पर ‘गुंटकल’ कस्बे से ‘अनंतपुर’ जिला-मुख्यालय के मार्ग, जो कि ‘स्टेट-हाईवे’ कहा जाता है, पर स्थित है। यहाँ पर तीन पहाड़ हैं, एक तो राजमार्ग से सबसे निकट व सबसे छोटा पहाड़ है, दूसरा पहाड़ उसके पीछे है व उससे कुछ बड़ा है। तथा तीसरा पहाड़ इन दोनों के पीछे है और इन दोनों से भी कुछ बड़ा है। इनमें से पहला व सबसे छोटा पहाड़ ही आचार्य कुन्दकुन्द देव की जन्मस्थली के रूप में विख्यात है। इस पहाड़ पर जैन-क्षेत्र होने के दो बड़े प्रमाण विद्यमान हैं। ये दोनों ही बगल-बगल में हैं। पहले प्रमाण के रुप में अपेक्षाकृत ऊँचे भाग पर जंबूद्वीप का चट्टान पर उत्कीर्ण एक रेखाचित्र विद्यमान है, जिसे आंध्रप्रदेश राज्य के राजकीय पुरातत्त्व-विभाग के रिकार्ड के अनुसार ‘जम्बूद्वीपचक्रमु’ कहा गया है। इस विषयक राज्य-पुरातत्त्व-विभाग का एक सूचनापट्ट भी वहाँ लगा हुआ है। इसके कुछ निचले-भाग में उसी चट्टान पर एक रेखाचित्र के रूप में ही एक दिगम्बर-जैन मुनि की आकृति उकेरी हुई है, जिसे लोग आचार्य कुन्दकुन्द देव की आकृति के रूप में बताते हैं। इसके बगल में स्थित एक अन्य अस्थायी-कक्ष में भूतल से भी निचली-सतह पर (जिसे कहा जा सकता है कि कुछ गहराई में) दो अर्हन्त-जिनबिम्ब स्थित हैं, जिनकी स्थानीय-जैन-समाज के न होने के कारण पूर्णतः उपेक्षा हो रही है। स्थानीय व आसपास के पचास किमी. के गाँवों तक के जैनेतर लोग उनकी ‘जलवृष्टि के देवता’ के रूप में प्रतिष्ठा है। आज भी उस सबसे कम वर्षावाले ‘अनंतपुर’ जिले में जब भी जलसंकट उत्पन्न होता है, तो सब लोग मिलकर इन बिम्बों की पूजा करते हैं व श्रीफल समर्पित करते हैं। तो जितने लोगों से (पढ़े-लिखे से अनपढ़ तक, व्यापारी से नौकरीपेशा तक, श्रीमन्त से निर्धन तक सभी) मेरी बातचीत हुई, सभी ने एकमत से इसकी पुष्टि की है कि इन बिम्बों की पूजा से इस क्षेत्र में सुनिश्चितरूप से बारिश होती है। यद्यपि यह एक गृहीत-मिथ्यात्व की मान्यता के अलावा और कुछ नहीं है, परन्तु लोकरूढि आज इसी रूप में प्रचलित है। इस गाँव में कहीं आचार्य कुन्दकुन्द देव बालक के रूप में जन्मे थे या कि इस पहाड़ पर उनका जन्म हुआ था?- यह कहना तो पोषक-प्रमाणों के अभाव में कठिन है; किन्तु यह सत्य है कि यह क्षेत्र सर्वश्रेष्ठ-आचार्य कुन्दकुन्द देव की जन्मभूमि रहा है। चूँकि शिलालेखों से लेकर अन्य विविध-ग्रंथों व लोक-मान्यताओं से इस तथ्य की पुष्टि होती है, तथा ‘‘बाधक-प्रमाणाभावात्’’ की प्रबलतम-युक्ति इस तथ्य का पोषण करती है; क्योंकि अन्य कोई क्षेत्र आचार्य कुन्दकुन्द देव की जन्मभूमि के रूप में विख्यात नहीं है और न ही किसी अन्य ग्राम या नगर का नाम मुझे पर्याप्त-शोधकार्य के बाद भी ‘कोणकुंडला’ के नाम से नहीं मिला है। इसका मूलनाम सुनिश्चितरूप से यह (‘कोणकुंडला’) नहीं रहा होगा। क्योंकि ग्रन्थों में आचार्य कुन्दकुन्द देव की जन्मभूमि का नाम 'कुन्दकुन्दपरु ’ या ‘कोण्डकुण्डपुर’ मिलता है; अतः वही समीचीन मालूम होता है। चूकि ँ आचार्य कुन्दकुन्द देव का मूलनाम तो ‘पद्मनंदि’ था और उन्हें 'कुन्दकुन्दपरु ’ का निवासी होने के कारण अन्य पद्मनंदि-नाम वालों से भिन्न पहिचानने के लिये ‘‘कौन से पद्मनंदि?’’- ‘‘कुन्दकुन्दपरु वाले’’- ऐसा कहे जाने से वे ‘कुन्दकुन्द’ के नाम से ही प्रसिद्ध हो गये थे। अतः इस ग्राम या स्थान का मूलनाम तो ‘कोण्डकुण्डपुर’ या 'कुन्दकुन्दपरु ’ ही रहा होगा। बाद में इसे युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द को भूतल पर लानेवाले के रूप में कुन्दकुन्द के नाम के साथ ‘ला’ यानि ‘लानेवाला’ जोड़कर इसे ‘कोणकुंडला’ बना दिया गया होगा -ऐसा मेरा प्रबल-अनुमान है। आचार्य कुन्दकुन्द देव की साधनाभूमि : पोन्नूरमळै युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव के पावन-सान्निध्य का प्रचुर-लाभ पाकर जो धन्य-धरा बनी, उस पुनीता-स्थली का नाम है ‘पोन्नूरमळै’। इस स्थान पर रहकर उन्होंने अपनी अधिकांश साहित्य-साधना सम्पन्न की थी। यह स्थली आज भी जन-कोलाहल से दूर सुरम्य एवं शांतिपूर्ण है, तो आज से दो हजार वर्ष पहले तो और भी शांतिमय रही होगी। संभवतः इस स्थली का यही गुण आचार्य कुन्दकुन्द देव को साहित्य-साधना के लिये सर्वाधिक-उपयुक्त प्रतीत हुआ था और इसीकारण उन्होंने इस पुनीता-स्थली पर लंबे समय तक रहकर अपने चौरासी (84) पाहुड-ग्रन्थों में से अधिकांश ग्रन्थों की रचना सम्पन्न की थी। विचार करने पर रोमांच हो आता है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव जैसे युगप्रधान-आचार्य, जो न केवल अपनी ज्ञानसाधना के लिये विश्वविख्यात हैं, बल्कि वर्धमान-चारित्र के धनी सर्वाधिक विशुद्ध-चर्या के निदर्शन के रूप में भी आदर्श-व्यक्तित्व रहे हैं, ने अपने पवित्रतम-जीवन का अधिकांश-भाग इसी क्षेत्र में व्यतीत किया था। यह इस क्षेत्र का तो सौभाग्य था ही, साथ ही इस क्षेत्र की कैसी अनुपम-गरिमा रही होगी, जिसने वायु के समान निःसंग एवं आकाश के समान निर्लिप्त मनःस्थितिवाले आचार्य कुन्दकुन्द देव जैसे महापुरुष को अपने अंचल में रहकर तपःसाधना एवं साहित्य-साधना के लिये आकर्षित कर लिया था। इतना ही नहीं, यही वह पुण्यधरा है, जहाँ से आचार्य कुन्दकुन्द देव पूर्वविदेह-क्षेत्र में विहरमानतीर्थंकर सीमन्धर स्वामी का सान्निध्यलाभ लेने एवं उनकी पवित्र दिव्यध्वनि का श्रवण करने गये थे। इस पंचमकाल की अभूतपूर्व-घटना की साक्षी भी यही धरा है। और सात दिनों तक विदेहक्षेत्र में रहकर साक्षात् तीर्थंकर परमात्मा का सान्निध्यलाभ एवं मंगल-दिव्यध्वनि प्राप्त कर जब वे वापस इस भारतभूमि पर लौटे, तो इसी स्थली पर आये थे और यहीं पर उन्होंने तीर्थंकर-परमात्मा सीमन्धर स्वामी के मंगलप्रवचनों के सारभूत ‘प्रवचनसार’ नामक प्रमाण-ग्रन्थ की रचना की थी। यह उनकी साहित्य-साधना का चरम-ग्रन्थ था। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि ‘पोन्नूरमळै’ नामक यह क्षेत्र दिगम्बर-जैन मूलसंघ के सर्वाधिक महान् आचार्य कुन्दकुन्द देव के सुदीर्घ-सान्निध्यलाभ के साथ-साथ अनेकों कालजयी जिनाम्नाय के सर्वोत्कृष्ट-ग्रन्थों के प्रणयन की साक्षी भी रही है। कल्पना करें कि इसका कितना अभूतपूर्वसौभाग्य रहा था। किन्तु आज हमारी समाज के एवं विद्वज्जगत् के अधिकांश लोग इसके नाम एवं परिचय से अनभिज्ञ बने हुये हैं- यह एक बहुत बड़ी बिडम्बना है। इस पावन-स्थली का संक्षिप्त-परिचय निम्नानुसार प्रस्तुत है- भौगोलिक-स्थिति (लोकेशन)- यह स्थान भारत गणराज्य के तमिलनाडु प्रान्त में तिरुमण्णामलै जिले में स्थित वन्देवासी तालुके में वडक्कमवाडी ग्राम के निकट पोन्नूर नामक पर्वत विद्यमान है। यहाँ का पिनकोड नंबर 604506 है। राजधानी चेन्नई से यह ‘चेन्नई-कांचीपुरम’ राजकीय-राजमार्ग पर कुछ वंदवे ासी से कुछ पहले तक, फिर छोटे सम्पर्क-मार्ग पर चेन्नई से लगभग 130 किमी. दूरी पर स्थित है। यहाँ की जनसंख्या तो लगभग नगण्य ही थी, क्योंकि यह कोई ग्राम भी नहीं है। यह तो एक निर्जन-पहाड़ी के रूप में तीर्थस्थली है। (किन्तु आज यहाँ आचार्य कुन्दकुन्द देव के नाम से एक संस्थान एवं शोध-केन्द्र की स्थापना के बाद कुछ गतिविधियों के संचालन से यहाँ आवागमन बढ़ा है और कुछ स्थायीरूप से निवास करनेवाले लोगों की संख्या एवं संसाधन बढ़े हैं।) इस पर्वत के नीलाभ-वर्ण का होने से इसे स्थानीय लोग नीलगिरि के नाम से भी अभिहित करते हैं। किन्तु इसका मूलनाम पोन्नूरमळै ही है। प्राचीन तमिलभाषा में पोन्नूर शब्द का अर्थ ‘स्वर्ण’ या ‘सोना’ (Gold) होता है और मळै शब्द पर्वतवाची है। संभवतः दक्षिण भारत में ‘मलयाचल या मलयगिरि’ की वैसी ही महत्ता मानी गयी है, जैसी कि उत्तर भी में हिमाचल पर्वत की; इसीलिये वहाँ मलय या मळै शब्द पर्वत के अर्थ में रूढ़ हो गया हो सकता है। इसतरह इस पर्वत को हम सरल-हिंदी भाषा में ‘स्वर्णगिरि’ भी कह सकते हैं। (क्या इसे एक सुसंयोग नहीं कह सकते हैं कि मूल-ग्रन्थकार आचार्य कुन्दकुन्द देव ने अपने पाहुड-ग्रन्थों की रचना ‘स्वर्णगिरि’ पर की थी, और उनके लगभग दो हजार वर्ष बाद उनके सर्वाधिक समर्थ व्याख्यान एवं प्रभावना का पुनीत-कार्य ‘स्वर्णपुरी’ के नाम से विख्यात ‘सोनगढ़’ से हुआ। यह भी संयोग ही है कि मूलकर्त्ता की प्रथम-नामाक्षर भी ‘क’ वर्ण था और प्रभावकव्याख्यानकर्त्ता का भी प्रथम-नामाक्षर ‘क’ वर्ण से ही है। वे ‘कुन्दकुन्द’ नाम से विभूषित थे और ये ‘कानजी स्वामी’ के नाम से विख्यात हुये। है न रोचक संयोग?) इस पर्वत की ऊँचाई अधिक नहीं है, मात्र लगभग 300 सीढ़ियाँ चढ़कर 15-20 मिनिट में कोई भी इसके ऊपर पहुँच सकता है। ऊपर एक हॉल टाइप बना है, जिसमें एक विशाल-शिलाफलक पर बहुत ही नयनाभिराम चरण-युगल उत्कीर्णित हैं। इन्हें आचार्य कुन्दकुन्द देव के चरण-युगल के चिह्न के रूप में मान्यता प्राप्त है। यहीं दो प्राकृतिक बहुत छोटी-गुफायें भी हैं, संभवतः जिनमें बैठकर आचार्य कुन्दकुन्द देव ने अपनी साधना की होगी। इसी पर्वत-शिखर पर हॉल के बाहर दो अतिप्राचीन चम्पक-वृक्ष (चम्पा के फूल के पेड़) भी हैं। ऐसे उल्ख ले मिलते हैं कि इन्हीं वृक्षों के नीचे बैठकर आचार्य कुन्दकुन्द देव अपनी साहित्य-साधना करते रहे। मैं एक वनस्पति-विज्ञानी के रूप में इन वृक्षों के दो हजार वर्ष प्राचीन यानि कुन्दकुन्द-कालीन होने का दावा तो नहीं कर सकता हू,ँ किन्तु ये अतिप्राचीन हैं- यह इनको देखने मात्र से स्पष्ट प्रतीत होता है। साथ ही इनमें प्रचुर-मात्रा में चम्पक-पुष्पों की बहार बारहों महीने रहती है, जिनकी मंत्रमुग्ध कर देनव े ाली सुगन्ध में आचार्य कुन्दकुन्द देव के चरित्र एवं उनके सन्देशों की पवित्र-भीनी-गन्ध का साम्य प्रतीत होता है। इस पर्वत के ठीक नीचे सीढ़ियों के ठीक सामने धर्मानुरागी भाई श्री अनन्तभाई अमूलक जी शेठ, मुंबई ने ट्रस्ट के माध्यम से आचार्य कुन्दकुन्द देव की इस पुण्य-तपोभूमि के बहुमान के निमित्त ‘आचार्य कुन्दकुन्द सेंटर’ नाम से एक संस्था आज से लगभग बीस वर्ष पहले स्थापित की थी और एक भव्य-जिनमंदिर जी की स्थापना की थी। उसके पहले यहाँ की स्थायी-जनसंख्या लगभग-शून्य थी। उसके बाद जैनसमाज के ही विभिन्न-संस्थानों एवं व्यक्तियों ने यहाँ कई शैक्षणिक एवं धार्मिक-केन्द्र स्थापित किये हैं, दिनमें लगभग 100 जैनभाई-बहिन स्थायी-तौर पर रह रहे हैं। आसपास के क्षेत्र में आज तीन दिगम्बर-जिनमंदिर जी हैं, जिनमें वीतरागी-जिनबिम्ब विराजमान हैं और इस सम्पूर्ण-क्षेत्र को एक जैन-तीर्थ के रूप में प्रमाणित कर रहे हैं। इसके आसपास लगभग पचास किलोमीटर क्षेत्र में पचासों जिनमंदिर जी हैं, जो बहुत-प्राचीन एवं भव्य हैं। यह आचार्य कुन्दकुन्द देव के व्यक्तित्व एवं सदेह-उपस्थिति का ही विशिष्ट-प्रभाव कहा जा सकता है कि जहाँ दक्षिण भारत के आंध्र, केरल जैसे प्रान्तों में आज जैनधर्म के प्राच्यावशेष मुख्यतः मात्र संग्रहालयों में ही मिलते हैं, लोकजीवन में मध्य वे मात्र इतिवृत्त के रूप में ही स्मृतिशेष रह गये हैं। कोई भी प्राचीन जिनमंदिर एवं पुरावशेष वहाँ नहीं मिलते हैं, दो-एक अपवादों को छोड़कर। जबकि तमिलनाडु के प्रायः हर-गाँव, नगर में प्राचीन जिनमंदिर जी भी विद्यमान हैं और उनकी सेवा-पूजा करनेवाले जिनधर्मानुयायी भी हैं। यह आचार्य कुन्दकुन्द देव के सान्निध्य का जीवन्त-प्रभाव आज भी दृष्टिगोचर हो रहा है। ‘वन्देवासी-ग्राम’ के एक जिनमंदिर जी के परिसर में तो आचार्य कुन्दकुन्द देव की एक अतिप्राचीन विशाल, भव्य-प्रतिमा विराजमान है। इतना ही नहीं, तमिलनाडु में आचार्य कुन्दकुन्द देव की समकालीन-परिस्थितियों में ही इनकी त्रिआयामी-आकृतिवाला एक सिक्का राजकीय-मुद्रा (सरकारी करेंसी) के रूप में प्रचलित होना इनके इस क्षेत्र में अनन्य-प्रभाव का द्योतक-प्रमाण है। इसीप्रकार इनका नामान्तर ‘एलाचार्य’ तो आज भी तमिलनाडु के जनजीवन में भगवान् से भी ज्यादा स्थान-प्राप्त है। किसी भी धर्म या जाति का व्यक्ति (स्त्री-पुरुष) हो, वह उत्तरभारत में प्रचलित ‘‘भगवान् की कसम’’ जैसे वाक्य की जगह ‘‘एलाचार्य की सौगंध’’ जैसे प्रयोग करते हैं। यहाँ तक कि खेतों में अनाज बोते समय, धान की रोपाई करते समय सब एलाचार्य की ही वंदना मंगलकामना के लिये करते हैं। फसल कटने पर पहली धान्य की अँजलि ु एलाचार्य का नाम लेकर उन्हें भावपूर्वक समर्पित करने के बाद ही फसल को बेचने या भोजन के निमित्त उपयोग करते हैं। - ये ही नहीं, और भी अनेकों लोकरूढियाँ, किंवदन्तियाँ एवं परम्परायें इस क्षेत्र के जनसामान्य में आचार्य कुन्दकुन्द देव के विशिष्ट-प्रभाव को प्रमाणित करती हैं। एक ‘अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान-सम्मेलन’ (इंटरनेशनल साइंस कांग्रेस) में मुझे मिले इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) के उपग्रह-प्रक्षेपण-कार्यक्रम के निदेशक (सैटेलाइट-डॉयरेक्टर) ने मुझे यहाँ से आचार्य कुन्दकुन्द देव के विदेहगमन के बारे में एक अद्भुत-जानकारी प्रदान की। उन्होंने कहा कि ‘‘पूरे भारत में सुदूर अंतरिक्ष-मार्ग से दूर-गमन के लिये यह क्षेत्र सबसे अनुकूल है, इसीलिये भारत का उपग्रह-प्रक्षेपणकेन्द्र श्रीहरिकोटा इसी के पास बनाया गया है। अतः आचार्य कुन्दकुन्द यदि विदेहक्षेत्र गये होंगे, तो सुनिश्चितरूप से यहीं से गये होंगे।’’ इसप्रकार इस क्षेत्र से आचार्य कुन्दकुन्द देव के सम्पर्क एवं प्रभाव के बारे में कुछ जानकारियाँ मैंने यहाँ प्रस्तुत कीं हैं, किन्तु यदि वहाँ के पुरावशेषों, अभिलेखों आदि की निष्ठापूर्वक शोध की जाये, तो आचार्य कुन्दकुन्द देव के बारे में एवं इस क्षेत्र में उनकी उपस्थिति व प्रभाव के बारे में कई महनीय-तथ्य प्रकाश में आ सकते हैं। कुल मिलाकर संक्षेप में यही कह सकते हैं कि ‘पोन्नूरमळै’ नामक यह क्षेत्र आचार्य कुन्दकुन्द देव की तपोभूमि या साधनास्थली के रूप में गौरवान्वित रहा है। इसके आसपास स्थित सैकड़ों जिनमंदिरों के शास्त्रागारों में एवं जिनवाणी के भक्त जिनधर्मानुयायियों के निजी-ग्रन्थभंडारों में आज भी हजारों प्राचीन ताड़पत्रीय-पांडुलिपियाँ संचित हैं। इनमें आचार्य कुन्दकुन्द देव के 84 पाहुड-ग्रन्थों में से आज तक अनुपलब्ध-ग्रन्थ भी मिल सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति या संस्था लोकरंजन के या दिखावे के कार्यों में आकर्षण छोड़कर इसे एक प्रॉजेक्ट के रूप में चलाये, तो यह क्षेत्र आज भी हमें कोई अमूल्य-उपहार दे सकता है। ज्ञातव्य है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव के ग्रंथों को ‘पाहुड’ कहा गया है और ‘पाहुड’ शब्द का अर्थ ही ‘उपहार’ होता है। आचार्य कुन्दकुन्द की समाधि-स्थली ‘कुन्दाद्रि’ कुन्दाद्रि की वंदना के लिये ‘मूडबिद्री’ से चलकर मैं ‘वरांग-क्षेत्र’ होते हुए ‘तीर्थहल्ली’ होकर हुम्मचा पहुँचा। वहाँ से प्रकाशित दो पुस्तकें मुझे उपलब्ध करायीं, जिनमें उनके अनुसार कुन्दाद्रि-पर्वत के बारे में कुछ सामग्री प्रकाशित थी। मैं उन पुस्तकों को लेकर वहाँ से कुन्दाद्रि-पर्वत के लिए चल पड़ा। वहाँ से चलते समय मैंने भट्टारक जी से कहकर कुन्दाद्रि पर्वत पर स्थित दिगम्बर-जिनमंदिर के पुजारी श्री शांतिनाथ को फोन भी करवाया कि ‘‘वह मुझे क्षेत्र की जानकारी देने में वह दिखाने में मदद करें।’’ इसका अच्छा-प्रभाव रहा और वहाँ पहुँचने पर उस पुजारी ने मेरी भरपूर मदद की। ‘आगुम्बै’ से ‘तीर्थहल्ली’ के राजकीय-राजमार्ग (state highway) पर ‘गुंटकेरे’ नामक स्थान आता है, जो कि कुन्दाद्रि पर्वत जाने के लिये मुख्य-बिंदु है। यहीं से कुन्दाद्रि-पर्वत जाने का रास्ता है। अच्छी बात यह है कि कुन्दाद्रि पर्वत पर जाने के लिये यहाँ पहिचान के लिये एक विशालकाय-प्रवेशद्वार बना हुआ है, जिस पर शीर्षभाग पर ‘कुन्दाद्रि-पर्वत पर जाने का प्रवेशद्वार’ लिखा हुआ है। यद्यपि यह कन्नड़-भाषा में लिखा हुआ है, परन्तु साथ ही इसके बगल में एक बड़े से सूचनापट्ट पर अंग्रेजी-भाषा में भी ‘कुन्दाद्रि-पर्वत जाने का रास्ता’ (way to Kundadri hill) लिखा हुआ है। यह भी अच्छी-सूचना है कि कर्नाटक राज्य के यहाँ तक आने के सभी मार्ग (Road) बहुत अच्छी स्थिति में हैं। अतः किसी भी वाहन से यहाँ तक आने में बिल्कुल भी थकान नहीं लगती है। तथा गुंटकेरे से कुन्दाद्रि-पर्वत पर जाने का जो पाँच किलोमीटर का रास्ता है, वह भी पहले तो बिल्कुल भी किसी भी वाहन से जाने योग्य नहीं था; किन्तु विगत लगभग दस वर्ष पूर्व मुंबई के धर्मानुरागी भाई श्री अनंतभाई अमूलक जी शेठ ने पक्के रास्ते का निर्माण करवाया। हाँ, इतना अवश्य है कि वनविभाग के निर्देशों का पालन करने के कारण यह मार्ग बड़ी बसों या ट्रकों के जाने योग्य बड़ा व चौड़ा तो नहीं है, किन्तु अन्य सभी प्रकार के वाहनों से इस पर आसानी से जाया जा सकता है। इस पार्किंग-स्थल से लगभग इकसठ (61) पक्की सीढ़याँ दोनों ओर से सपोर्ट-सहित बनीं हुईं हैं, जिन पर बड़ी आसानी से चढ़कर हम कुन्दाद्रि-पर्वत के शिखर पर स्थित आचार्य कुन्दकुन्द देव के समाधि-स्थल तक जा सकते हैं। लगभग मात्र दो मिनिट की चढ़ाई के बाद हम लोग इस पर्वत के शिखर पर स्थित जिनालय एवं अतिप्राचीन-चरणचिह्नों से अंकित आचार्य कुन्दकुन्द देव के समाधि-स्थल तक पहुँच गये। ऊपर पहुँचने पर हमने एक अतिप्राचीन-शिलालेख देखा, जो बहुत पुरानी कन्नड़-लिपि में लिखा हुआ था; यद्यपि वह मौसम के प्रभाव से बहुत जीर्ण-शीर्ण व धुंधला हो रहा था; तथापि उसे परिश्रम करके उसके चित्रों को कंप्यूटर से साफ किया जा सकता था। अतः उसकी हर कोण से वीडियोग्राफी कराई और कई स्टिल-फोटो भी लिये। इसप्रकार हमारे पास वहाँ की तकनीकीरूप से बहुत-सारी सामग्री एकत्रित हो गई। हमें वहाँ प्रकृति का एक अद्भुत-चमत्कार दिखाई दिया; क्योंकि वहाँ पहाड़ पर विशालकाय-चट्टानों में बने तीन प्राकृतिक-कुंड मिले, जो वर्षा के जल से प्रपूरित हो जाते थे। इनमें दो कुंडों में तो अभी भी जलराशि थी, परन्तु एक कुंड पिछले दो वर्षों से उस क्षेत्र में बारिश नहीं होने के कारण सूखा हुआ था। मुझे बताया गया कि जब कोई दिगम्बर-मुनिराज यहाँ रहते थे, तो इन कुंडों का जल सुबह 9.00 बजे बाद सूर्य की धूप से प्रासुक हो जाने के कारण उनके लिये शुद्धि आदि के लिये कमण्डलु में भरकर उपयोग करने लायक हो जाता था। इसप्रकार उनकी चर्या के लिये प्रासुक-जल के निमित्त पर्वत पर ही प्रकृति ने मानों सविनय-व्यवस्था कर रखी है, ताकि हमारे आचार्य कुन्दकुन्द देव जैसे परम-तपस्वी मुनिवृदं ों की समाधि-साधना में कोई बाधा नहीं हो और न ही पराधीनता की स्थिति बने। शिखर पर प्रवेश करते ही सबसे पहले मनोहारी अतिप्राचीन-मानस्तम्भ के दर्शन हुये। देखते ही सहज ही मुँह से निकल पड़ा ‘‘दृष्टं जिनेन्द्र-भवनं भवतापहारी..’’। ज्यों ही मंदिर जी के परकोटे के अंदर प्रवेश किया, त्यों ही अतिप्राचीन दिगम्बर-जिनबिम्ब खंडित-अवस्था में दिखे। खंडित-मुद्रा देखकर मन में अवसाद तो हुआ; किन्तु उनके अतिप्राचीन-स्वरूप को देखते हुये उस क्षेत्र पर विद्यमान दिगम्बर-जैनत्व के प्राचीन-वैभव का गहराई से अहसास हुआ। खंडित होते हुये भी उनके शिल्पगत-सौन्दर्य अत्यन्त-नयनाभिराम था। उनका चित्रांकन करते हुये मानस्तम्भ-परिसर में प्रवेश किया। वहाँ प्रवेश करते ही सर्वप्रथम एक विशाल एवं अतिप्राचीन-शिलालेख दृष्टिगोचर हुआ। वह अभिलेख प्राचीन कन्नड़-लिपि में लिखा हुआ था। यद्यपि मैं प्राचीन कन्नड़-लिपि, जिसे स्थानीय-भाषा में ‘हड़े-कन्नड़’ भी कहते हैं, का जानकर हूँ; किन्तु ताड़पत्रों में इतनी प्राचीन व जटिल-शैली की कन्नड़-लिपि मैंने नहीं पढ़ी थी। यही कारण रहा कि मैं प्रयास करके भी उसे बहुत स्पष्टरूप से नहीं पढ़ सका। कुछ तेज धूप में तपते हुये पत्थर पर खड़ा होना भी लगभग असंभव हो रहा था, और इसके साथ ही खुले वातावरण में रखे रहने से उसका क्षरण भी बहुत हो गया था। अतः उसे पढ़ने के लिये अभिलेखों के अध्ययन की वैज्ञानिक-प्रक्रिया अपनाना अपेक्षित था। अतः मैंने अपने मोबाइल फोन के कैमरे से उसके विभिन्न-कोणों से चित्र ले लिये; ताकि बाद में विशेषज्ञ-विद्वानों की देखरेख में उसका वैज्ञानिक-रीति से अध्ययन एवं पाठ-सम्पादन कराया जा सके। सर्वप्रथम मंदिर जी के मुख्य-प्रवेशद्वार के दोनों पार्श्वों में स्थित भगवान् श्री चन्द्रप्रभ स्वामी एवं भगवान् श्री शीतलनाथ स्वामी के अतिप्राचीन-जिनबिम्बों का परिचय देते हुये दर्शन कराये। वे निश्चितरूप से अतिप्राचीन थे, किन्तु तथाकथित वज्रलेप के कारण उन बिम्बों का प्राचीनरूप अस्पष्ट हो गया। मात्र प्राचीन मूर्ति-शिल्प के विशेषज्ञविद्वान् ही उनकी प्राचीनता को परख सकते थे। मैं इस विद्या से किसी सीमा तक परिचित होने से उनकी प्राचीनता को किसी सीमा तक समझ सका। इसके बाद छोटे से प्रवेशद्वार से सविनय झुककर मंदिर जी में प्रवेश करते ही एक मध्यम-आकार (मीडियम साइज़) के हॉल में पहुच ँ ,े जिसमें लगभग आठ-स्तम्भ थे। वे सभी प्राचीन कर्नाटकीय जिनमंदिर-शैली के बने हुये थे। उसे पार करते ही भीतरी गर्भगृह का बहुत ही छोटा-प्रवेशद्वार दिखाई दिया, जो बाहरी-प्रवेशद्वार से भी तुलनात्मकरूप से बहुत छोटा था। सामान्य आकार-प्रकार का व्यक्ति भी किसी तरह अंगों को सिकोड़कर ही उसमें प्रवेश कर सकता है। गर्भगृह में मूलनायक पार्श्वनाथ स्वामी का खड्गासन-मुद्रा के श्यामवर्णी-जिनबिम्ब विराजमान थे। उनकी सबसे बड़ी-विशेषता प्रतिमाविज्ञान की दृष्टि से यह थी, कि जहाँ अन्य जिनबिम्बों में भामण्डल मात्र शिरोभाग के चारों ओर ही होता है, जो कि शास्त्रोक्त-विधि नहीं है; क्योंकि शास्त्रोक्त-विधि के अनुसार भामण्डल सम्पूर्ण शरीर के चारों ओर बनता है। {आधुनिक विज्ञान भी इसे स्वीकार करता है, और इसे वह ‘औरा’ (Aura) कहता है।} यहाँ पर विराजमान खड्गासन-मुद्रावाले मूलनायक पार्श्वनाथ स्वामी के जिनबिम्ब की पूरी अवगाहना के चारों ओर यह भामण्डल बना हुआ था, जो कि पूर्णतः जिनाम्नाय-सम्मत था। जिनबिम्ब प्रशान्तमुद्रामयी व दक्षिण-भारतीय-शिल्प का होते हुये भी विशिष्ट-प्रभाव उत्पन्न करता है। अपूर्व-वीतरीगता का प्रभाव उसमें अंग-अंग से छलक रहा था। भक्ति-भावपूर्वक दर्शन-वंदन करने के बाद मैंने पुजारी जी से आचार्य कुन्दकुन्द देव के चरण-चिह्नों की वंदना करने का भाव व्यक्त किया। तब वे उस मंदिर जी के पिछले भाग में विद्यमान एक बड़े कक्ष में ले गये। वहाँ पर उस कक्ष के भीतर विद्यमान एक छोटे से शिखरबंद कक्ष में ले गये, जिसमें फर्श के बीचोंबीच एक सुंदर कमलाकृति बनी हुई थी,जिस पर गुलाबी रंग से अंकित पँखुड़ियों के बीचोंबीच कोश-भाग पर एक गोलाकार प्रस्तर-फलक लगा हुआ था। उसे गौर से देखने पर उस पर रेखांकित रूप में दो चरणों की आकृति उकेरी गयी दिखाई दी। यह बिल्कुल वैसी स्वाभाविकरूप से निर्मित आकृति थी, कि जैसे किसी के चरणों के चारों ओर रेखांकन करके उन्हें चिह्नित कर दिया गया हो। ऐसा सहज, स्वाभाविक एवं अद्भुत चरण-चिह्नों का अंकन कहीं अन्यत्र दृष्टिगोचर मुझे नहीं हुआ। मैंने भावपूर्वक उन चरण-चिह्नों की वंदना की, और साक्षात् रूप से समाधिस्थ आचार्य कुन्दकुन्द देव के चरणों के पावन-स्पर्श की आनंदानुभूति का अनुभवन किया। मैं वह संस्पर्श पाकर भाव-विभोर हो गया। तब मैंने पुजारी जी से पूछा कि ‘‘यहाँ इस कक्ष के बाहर सन् 1961 ई. का एक शिलाफलक भी लगा हुआ था, जिस पर तत्कालीन भट्टारक हुम्मच-क्षेत्र स्वस्ति देवेन्द्रकीर्ति जी के द्वारा सुवर्णपुरी के संत श्री कानजी स्वामी के ससंघ वहाँ इस क्षेत्र की वंदनार्थ आने तथा उनके संघ द्वारा उस समय लगभग 11000₹ की धनराशि द्वारा उस चरण-चिह्नोंवाले स्थल पर एक बड़े हॉल के निर्माण कराये जाने का उल्लेख किया गया था|’’ तब पुजारी जी ने बताया कि ‘‘आप सही कह रहे हैं। वह शिलाफलक पिछले वर्ष तक यहाँ लगा हुआ था, किन्तु पिछले एक वर्ष में यहाँ हुये जीर्णोद्धार के कार्य में किसी मजदूर के द्वारा उस मार्बल के अभिलेख को खंडित कर दिया गया था। वह खंडित-अवस्था में हुम्मच के जैनमठ में वर्तमान भट्टारक जी के पास रखा हुआ है।’’ इसके बाद मैंने पुजारी जी से यह भाव व्यक्त किया कि ''यह सारा निर्माण-कार्य तो परवर्ती है, आचार्य कुन्दकुन्द देव के समय में तो यह कक्ष आदि नहीं थे। तब वे यहाँ किस जगह बैठकर साधना करते रहे होंग?े ‘’ तब पुजारी जी ने मुझे उस कक्ष के पिछले दरवाजे से पीछे की ओर ले जाकर एक भूगर्भकक्ष का द्वार खोला, और उसके अंदर ले जाकर वह चबूतरा दिखाया, जिसे आचार्य कुन्दकुन्द देव की समाधि-साधना का स्थान बताया गया। उस चबूतरे के कोने पर एक छोटा-सा चौकोर-भाग कुछ उभरा हुआ था, जो संभवतः उनका सिरहाना रहा होगा। उसके नीचे भूभाग पर बैठकर मुझे समाधि-साधना में रत आचार्य कुन्दकुन्द देव के संस्पर्श का रोमांचकारी-अनुभव प्राप्त हुआ। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि तकनीकीरूप से यह क्षेत्र हुम्मच-जैनमठ के संरक्षण है। तथा यहाँ जो अभी हाल में ही जीर्णोद्धार किया गया है, वह सब स्थानीय विधायक, जो कि जैन समाज के सदस्य हैं; ने हुम्मच जैनमठ के भट्टारक जी की प्रेरणा से सरकारी-अनुदान से कराया है। अतः हुम्मच जैनमठ के वर्तमान भट्टारक जी एवं स्थानीय जैन विधायक का यह कार्य निश्चय ही अभिनंदनीय है। आचार्य कुन्दकुन्द के ग्रन्थों की ‘शास्त्र’ संज्ञा की सार्थकता- मैं यह सिद्ध करने का नैष्ठिक-प्रयास करूँगा कि आचार्य कुन्दकुन्द देव के समस्त ग्रन्थ ‘शास्त्र’ संज्ञा के सुपात्र हैं। यह ‘शास्त्र’- संज्ञा किसी भी कृति को यों ही नहीं मिल जाती है, बल्कि शास्त्र-रचना (ग्रंथ-निर्माण) के सात निश्चित-नियमों के निर्दोष-रीति से पालन करने पर मिलती है। इनका आचार्य कुन्दकुन्द देव के ग्रंथों में निर्दोषरीति से पालन किया गया है, अतः आचार्य कुन्दकुन्द देव के ग्रन्थ ‘शास्त्र’ संज्ञा के सुपात्र-ग्रन्थ हैं। उदाहरणस्वरूप ‘समयसार’ में इन सातों नियमों को घटित करके मैं सिद्ध करूँगा कि यह ग्रन्थ ‘शास्त्र’ संज्ञा का सुपात्र-ग्रन्थ है। ‘शास्त्र’-संज्ञा के योग्य ग्रंथ-निर्माण के वे सात नियम इसप्रकार हैं- ‘‘उपक्रमोपसंहारोऽभ्यासोऽपूर्वता फलम्। अर्थवादोपपत्ती च लिंगं तात्पर्य-निर्णये।।’’ अर्थ- उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति- ये सात बिन्दु या लक्षण हैं, जिनके आधार पर किसी ग्रंथ को ‘शास्त्र’ संज्ञा दी जा सकती है। किसी भी कथन के तात्पर्य का निर्णय करने के ये सात आधार एवं ग्रंथरचना-शैली के सात-अंग या लक्षण माने गये हैं। वैदिक-परम्परा के प्रसिद्ध-ग्रन्थ ‘वेदान्तसार’ में भी इन्हें इसप्रकार बताया गया है- ‘‘उपक्रमोपसंहाराभ्यासापूर्वता-फलार्थवादोपपत्त्याख्यानि सप्तांगानि’’ -(वेदान्तसार, पृ.160) इनका परिचय एवं ‘समयसार’ में इनके प्रयोग का विवरण निम्नानुसार है- 1. उपक्रम- ग्रंथ प्रारंभ करने को ‘उपक्रम’ कहते हैं। ‘समयसार’ में ‘आचार्य कुन्दकुन्द देव’ ने पहली ही गाथा में ‘‘वोच्छामि समयपाहुडं’’ अर्थात् ‘‘मैं ‘समयपाहुडं’ या ‘समयसार’ ग्रंथ का कथन करता हूँ’’- यह कहकर उपक्रम प्रस्तुत किया है। 2. उपसंहार- ग्रंथ के समापन को ‘उपसंहार’ कहते हैं। ‘समयसार’ की अंतिम गाथा (415) में ‘‘जो समयपाहुडमिणं…’’ -यह वाक्यांश लिखकर आचार्यदेव ने ‘उपसंहार’ का प्रयोग किया है। 3. अभ्यास- विशिष्ट-विषय का महत्त्व ज्ञापित करने एवं स्पष्टीकरण के लिये उसी विषय का प्रकारान्तर से एकाधिक -बार प्रतिपादन करना ‘अभ्यास’ कहलाता है। सामान्यतः न्यायशास्त्र आदि में ‘पुनरुक्ति’ को दोष माना जाता है, किन्तु अध्यात्मशास्त्र में पुनरुक्ति को दोषरूप नहीं माना गया है। महान् अध्यात्मवादी आचार्य योगीन्द्रदेव लिखते हैं- ‘‘इत्थु ण लेवउ पंडिएहिं, गुण-दोसु वि पुणरुत्तु।’’ इसके व्याख्याकार आचार्य ब्रह्मदेवसूरि स्पष्ट कहते हैं- ‘‘भावनाग्रंथे समाधिशतकवत्पुनरुक्तदूषणं नास्ति।’’ -(द्रष्टव्य, परमात्मप्रकाश,दोहा क्र.2/221 एवं उसकी टीका) ‘समयसार’ के टीकाकार आचार्य जयसेन ने भी अपनी टीका (गाथा-सूत्र 73 की टीका) में इस तथ्य का समर्थन किया है। चूँकि ‘समयसार’ विशुद्ध रूप से आत्मभावना-प्रधान ग्रंथ है, अतः इसमें अनेकों विषयों की प्रकारान्तर से अनेकत्र पुनः प्रस्तुति हुई है। ऐसे विषयों में प्रमुख हैं- ज्ञानी का स्वरूप एवं मान्यता °°, व्यवहार और निश्चय•• , अज्ञानी की मान्यता∆ , स्व-पर भेदविज्ञान का स्वरूप और प्रक्रिया , एवं मोक्षमार्ग का निरूपण आदि। एक विषय कर्ता-कर्म-संबंधी विवेचन आचार्य कुन्दकुन्द को इतना प्रिय लगा कि ग्रंथ के मूल वर्ण्यविषय ‘नौ पदार्थ-विवेचन’ (द्र. ‘समयसार’, गा.13) में समाहित न होते हुये भी उन्होंने पहले ‘कर्ता-कर्म अधिकार’ की रचना कर उसका निरूपण किया तथा फिर भी मन नहीं भरा, तो ग्रंथ के अंत में ‘सर्वविशुद्धिज्ञान-अधिकार’ नामक एक और अधिकार लिखा, जिसमें कि मुख्यतः कर्ता-कर्म-संबंधी मान्यताओं की ही समीक्षा की गई है। यहाँ पर ध्यातव्य है कि कुन्दकुन्द-साहित्य में विषय के बारे में स्थूल-दृष्टि से ही पुनरुक्ति है ; किन्तु शैली, भाषा, एवं प्रसंग के अनुसार पुनरुक्ति नहीं है। 4. अपूर्वता- शैलीगत-नवीनता को ‘अपूर्वता’ कहा जाता है। अाचार्य कुन्दकुन्द के साहित्य में जिस शैली का प्रयोग हुआ है, उनके निकट पूर्ववर्ती-ग्रंथों में वह शैली नहीं है। उनकी इस विशिष्ट-शैली का ही यह प्रभाव है कि 1 द्रष्टव्य, ‘समयसार’, गाथासूत्र क्र. 35,74-78,93,101, 128,151,169,195-198,207-216,218,224-227, 247,250,253,280, 316-320 इत्यादि। 2 द्रष्टव्य, ‘समयसार’, गाथासूत्र क्र. 7,11,12,27-29,46-48, 56,58-60,83-85,272,276-277,414 इत्यादि। 3 द्रष्टव्य, ‘समयसार’, गाथासूत्र क्र. 19-22,28,39-43, 69,94, 102,129,152-153,219 इत्यादि।

4 द्रष्टव्य, ‘समयसार’, गाथासूत्र क्र. 38,181-185,293-295,390-412 इत्यादि।
5 द्रष्टव्य, ‘समयसार’, गाथासूत्र क्र. 16,18,408-412 इत्यादि।

कुन्दकुन्द आज भी युगप्रमुख-आचार्य हैं। और संपूर्ण आचार्य एवं विद्वत्-परम्परा आज तक अपने को ‘कुन्दकुन्द की आम्नाय की अनुयायी’ कहलाने में गौरव का अनुभव करती है। तथा ‘समयसार’ आज भी कुन्दकुन्द के साहित्य का प्रतिनिधि-परिचायक-ग्रंथ बना हुआ है। ‘समयसार’ में शैलीगत-नवीनता के साथ-साथ ‘अध्यवसान के नामान्तरों’ (‘समयसार’,गा.271), ‘विषकुम्भअमृतकुम्भ’(‘समयसार’,गा.306-307),‘सम्यग्दृष्टि के भोग निर्जरा के हेतु हैं’ (‘समयसार’,गा.193), प्रतिक्रमणप्रत्याख्यान-आलोचना (‘समयसार’, गा.383-385) तथा ‘ज्ञान ही दीक्षा आदि है’ (‘समयसार’, गा.404-405)-इत्यादि विषयों के प्रतिपादन-सम्बन्धी विशिष्ट-प्रयोग प्राप्त होते हैं। 5. फल- ग्रंथ के ‘परिणाम’ या निष्कर्षरूप-बिंदु के कथन को ‘फल’ कहते हैं। सामान्यतः धर्मग्रंथों में मोक्ष को ही मुख्यरूप से फल माना गया है- ‘‘फलं प्रकीर्तितं प्राज्ञैर्मुख्यं मोक्षैक-लक्षणम्।’’ -(विचारचन्द्रोदय,15) ‘समयसार’ ग्रंथ के अंत में आचार्य कुन्दकुन्द ने इस ग्रंथ का ‘फल’ प्ररूपित करते हुये कहा है कि ‘‘जो कोई भी भव्यजीव इस ‘समयप्राभृत’ नामक ग्रंथ को ‘अर्थ’ एवं ‘तत्त्व’ को जानने के लिये पढ़कर ‘अर्थ’ (शुद्धात्म-पदार्थ) में ठहरेगा, वह उत्तम-सुखरूप हो जायेगा।’’- इसप्रकार उन्होंने इस ग्रंथ का ‘फल’ उत्तम-या अनंत-सुख की प्राप्ति होना बताया है। 6. अर्थवाद- ग्रंथ में स्थान-स्थान पर हितकारी-तथ्यों की प्रशंसा करना ‘अर्थवाद’ कहलाता है। ‘समयसार’ के प्रारंभ में ही आचार्य कुन्दकुन्द ने ‘समय’ की प्रशंसा की है - ‘‘एयत्तणिच्छयगदो समओ सव्वत्थ सुंदरो लोगे’’। अर्थात् एकत्व में निश्चय को प्राप्त ‘समय’ अर्थात् आत्मा ही लोक में सर्वत्र सुन्दर है। (भले ही वह आत्मा इस समय नरक के दुःखों में क्यों न हो, किन्तु यदि निज-ज्ञायक-स्वरूप में जिसने अपनी परिणतियों को परिसीमित कर लिया है, वह वहाँ भी तीनों लोगों में सबसे सुंदर ही है। आत्मस्वभाव तो सर्वोत्कृष्ट है ही, किंतु परिणति भी जिसकी स्वरूप में परिसीमित हो गयी है, वह पर्याय की दृष्टि से भी सर्वोत्कृष्ट ही है। उदाहरण के तौर पर राजा श्रेणिक का जीव पहले नरक में है, किंतु आत्मस्वभाव में परिसीमित हो जाने से भावीतीर्थंकर का जीव है, अतः उसे वहाँ भी कोई कष्ट नहीं है। स्वरूप के आनंद में मग्न है। कोई नारकी उसे किसी तरह की पीड़ा नहीं दे पाता है। यही अचिंत्य-महिमा आत्मस्वभाव में परिसीमित होने की है। आचार्य कुन्दकुन्द देव ने यहाँ इसी तथ्य को रेखांकित किया है।) इसीप्रकार अन्यत्र ‘ज्ञान से सुख की प्राप्ति’ का प्रशंसात्मक-वर्णन किया है - ‘‘एदम्हि रदो णिच्चं संतुट्ठो होहि णिच्चमेदम्हि। एदेण होहि तित्तो होहिदि तुह उत्तमं सोक्खं।।’’ अर्थात् हो जीव! तुम इसी (ज्ञायकस्वरूप) में नित्य-रमण करो, इसी में नित्य-संतुष्ट रहो (ताकि अन्य किसी की अपेक्षा तक नहीं होवे), इसी में तृप्त हो जाओ (ताकि अन्य किसी का विकल्प तक उत्पन्न नहीं होवे); इसी विधि से तुम्हें उत्तम-सुख (अनंतसुख) की प्राप्ति होगी। इनके अतिरिक्त भी अन्य अनेक-स्थलों6 पर हितकारी-विषयों की प्रशंसा ‘समयसार’ ग्रंथ में की गई है। यहीं अर्थवाद है। 7. उपपत्ति- बाधक-प्रमाणों का निराकरण और साधक-प्रमाणों का तर्क द्वारा मण्डन करना, स्थान-स्थान पर युक्ति एवं हेतु देना- ‘उपपत्ति’ कहलाता है। यद्यपि तर्क और हेतु आदि न्यायशास्त्र के अंग हैं, तथापि द्रव्यानुयोगविषयक साहित्य में ‘न्यायशास्त्र’ की पद्धति प्रमुख होने से यहाँ न्यायशास्त्रीय-अंगों का प्रयोग अत्यंत-स्वाभाविक 6 द्रष्टव्य, ‘समयसार’, गाथासूत्र क्र. 15,31-33,73,184, 189,204,218,236,272,305,318-320 इत्यादि। है। इस बारे में पंडितप्रवर टोडरमल जी के विचार द्रष्टव्य हैं- ‘’ यहाँ (द्रव्यानुयोग में) …जीवादितत्त्वों का विशेषयुक्ति, हेतु एवं दृष्टांतादि द्वारा निरूपण करते हैं। द्रव्यानुयोग में न्यायशास्त्र की पद्धति मुख्य है।‘’ -(मोक्षमार्ग-प्रकाशक, अध्याय 8, पृष्ठ 284 & 287) इसीलिये स्वाभाविकरूप से आचार्य कुन्दकुन्द ने तो हेतुपरक-कथनशैली का भरपूर-प्रयोग ‘समयसार’ में किया है। स्थान-स्थान पर ‘जम्हा-तम्हा’ (जिसप्रकार-उसीप्रकार), ‘जेण-कारणेण - तेण-कारणेण’ (जिसकारण से- उसीकारण से) एवं ‘हेदुणा-हेदूहिं’ (हेतु या हेतुओं के द्वारा)- इत्यादि शब्दों के प्रयोग से अनेक-स्थलों7 पर हेतुपरक-शैली का स्पष्ट-संकेत दिया है। तो कई स्थलों8 पर हेतुपरक-शब्दों का प्रयोग किये बिना ही सहेतुकसाध्यसिद्धि की गयी है। सम्पूर्ण-ग्रन्थ का सूक्ष्मता से स्वाध्याय करने पर स्पष्टरूप से प्रतिबोध होता है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव न्यायशास्त्र के पारंगत-मनीषी थे, तथा उन्होंने आध्यात्मिक-तत्त्वज्ञान के प्रतिपादन में ‘न्यायशास्त्र’ की शैली भरपूरप्रयोग किया है। इसप्रकार उपर्युक्त-वर्णन से यह स्पष्टरूप से संकेतित होता है कि जहाँ एक ओर विषय-प्रतिपादन एवं उसकी जीवन्त-साधना की दृष्टि से आचार्य कुन्दकुन्द देव उत्कृष्टतम-कोटि के आध्यात्मिक-साधक व्यक्तित्व थे, वहीं दूसरी ओर इनके ग्रन्थों में शास्त्र-रचना के सभी निर्दिष्ट-अंगोपांगों का निर्दोष-रीति से पालन मिलने से उनके साहित्यशास्त्रीय-वैदुष्य एवं अगाध-दार्शनिक-प्रतिभा के साक्षात्-दर्शन होते हैं। इससे वे आज की भाषा में ‘शास्त्रीय-मनीषी’ (‘क्लासिकल-स्कॉलर’) भी प्रमाणित होते हैं। उनके मात्र एक ही पक्ष को स्वीकार करना कि वे मात्र आध्यात्मिक-साधक थे, शास्त्रीय-मनीषा के धनी नहीं था; उन जैसे महान् समर्थ-मनीषा के धनी आचार्यप्रवर के व्यक्तित्व को सीमित करके देखना होगा तथा उनका एकांगी-आकलन करने की पूर्वाग्रही-चेष्टा होगी। यह संक्षिप्त-विवरण आचार्य कुन्दकुन्द देव की बहुआयामी-प्रतिभा और बहुज्ञ-व्यक्तित्व को व्यापकदृष्टि से आकलित करने की प्रेरणार्थ लिखा गया छोटा-सा प्रयास है। इसके माध्यम से उनके विशाल-वाङ्मय के बहुआयामी-अध्ययन के लिये पूर्ण-स्तरीय शोधकार्य की प्रेरणा मिलती है। आचार्य कुन्दकुन्द देव के ग्रंथ ‘समयपाहुड/समयसार’ की अन्तर्दृष्टि:- यह अप्रतिबुद्धों को प्रतिबुद्ध बनाने की दृष्टि से लिखा गया ग्रंथ है। इसीलिये टीकाकार आचार्य अमृत चंद्र सूरि प्रारम्भ में ही उत्थानिका-स्वरूप लिखते हैं ‘‘अथाह अप्रतिबुद्धः’’। और यहाँ आचार्य यह स्पष्ट-संकेत कर रहे हैं कि वह अप्रतिबुद्ध-जीव ‘स्थूल-अज्ञानी’ नहीं है, ‘असंज्ञी’ भी नहीं है, ‘जैनत्व के बाह्यरूप से भी अपरिचित’ भी नहीं है, और आत्महित के लिये भी वह अपनी समझ के अनुसार प्रयत्नशील है ; फिर भी उससे जो तत्त्वज्ञान के विषय में और आत्मस्वरूप के विषय में भूल हो रही है, उसीकारण उसे ‘अप्रतिबुद्ध’ कहा गया है। और उस भूल को सुधारने व आत्मानुभूति प्राप्त करने के लिये जो सही-तरीका आचार्य कुन्दकुन्द देव ने उपयुक्त समझा, वह ‘समयसार’ में बताया है। यही ‘अप्रतिबुद्ध-जीव’ को ‘प्रतिबुद्ध’ बनाने की दृष्टि ‘समयसार’ ग्रंथ की मूल-दृष्टि है। ‘समयसार’ वस्तु-स्वरूप को समझाने की मुख्यतावाला-ग्रंथ नहीं है, बल्कि आत्मस्वरूप को समझने व अनुभवने की दृष्टि देनेवाला ग्रंथ है। इसीलिये इसे ‘दृष्टिप्रधान-ग्रंथ’ कहा गया है। 7 द्रष्टव्य, ‘समयसार’, गाथासूत्र क्र. 4,8,11,34,57,62,93, 74,86,99,103,104,112,127,145,147,150,154, 168, 170,208,335 आदि। 8 द्रष्टव्य, ‘समयसार’, गाथासूत्र क्र.1 7-19,26-27,30,35, 116-120,1 37-138,210-213,257-259,325-331, 345-346,371372,390-402 इत्यादि। जैसे कि ‘समयसार’ में 'पर्याय बिना का द्रव्य ’ जो कहा गया है, तो यह दृष्टि की अपेक्षा कथन है, न कि वस्तु की अपेक्षा। ‘पर्याय’ को ‘पर्याय-दृष्टि’ छुड़ाने के लिये यह प्ररूपण किया गया है। यह आचार्य कुन्दकुन्द देव का अद्भुत मनोवैज्ञानिक-प्रयोग है। जीव जब तक पर्याय के चाकचिक्य में उलझा रहेगा, तब तक निज-शुद्ध ज्ञायक-स्वभाव की दृष्टि/अनुभूति इसे नहीं हो सकेगी, और ज्ञायक-स्वभाव की अनुभूति के बिना इसे सुख किसे कहते हैं?- इसका कभी बोध नहीं हो सकता है। वह सुखाभास में ही सुख की कल्पना करके अपने आप को धोखा देता रहता है। इसीलिये परिवर्तनशीलपर्याय की दृष्टि छुड़ाकर निज त्रिकाली-ज्ञायकस्वभाव की दृष्टि कराने का अत्यन्त मनोवैज्ञानिक-प्रयोग आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ‘समयसार’ में किया है। जब तक पर्याय-दृष्टि जीव के रहेगी, तब तक ‘कर्त्ता-कर्म’ की मिथ्या-कल्पना भी चलेगी। इसीलिये पर्यायदृष्टि छुड़ाने के लिये ही उन्होंने ग्रंथ का घोषित प्रतिपाद्य-विषय ‘नव-पदार्थ’ होते हुये भी दो अतिरिक्त एवं सबसे बड़े अधिकार (‘कर्त्ता-कर्म-अधिकार’ और ‘सर्वविशुद्धज्ञान-अधिकार’) कर्त्ता-कर्म की मिथ्या-मान्यता को छुड़ाने के लिए लिखे हैं। - यह प्रतिपादन स्पष्ट-संकेत करता है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ‘समयसार’ ग्रंथ की रचना किस विशिष्ट-प्रयोजन के लिये की है। इसीलिये ‘निश्चय’ और ‘व्यवहार’ -नयों की विशिष्ट-शैली का उन्होंने इसमें पदे-पदे प्रयोग किया है, ताकि वे आत्महित के लिये ‘असली-नकली’ या ‘उपयोगी-अनुपयोगी’ का दोटूक-रीति से भेद बता सकें। आचार्य कुन्दकुन्द देव के पहले यह शैली प्रयोग में न्यूनतर थी। उन्होंने अपने अन्य अधिकांश-ग्रंथों में भी इन दोनों नयों की शैली का उपयोग किया है, किंतु ‘समयसार’ तो मानो ‘निश्चय’ और ‘व्यवहार’-नयों के लिये ही जाना जाता है। यहाँ ‘निश्चयनय’ का अर्थ वस्तुगतरूप से असली/उपयोगी होना नहीं है, और न ही ‘व्यवहारनय’ का अर्थ वस्तुगतरूप से नकली/अनुपयोगी होना है ; बल्कि आत्महित के प्रयोजन की दृष्टि से ही यहाँ ‘निश्चय’ का अर्थ ‘असली’ यानि उपयोगी और ‘व्यवहार’ का अर्थ ‘नकली’ यानि अनुपयोगी है। क्योंकि ‘व्यवहारनय’ के द्वारा जो-जो कथन इसमें कराये गये हैं, वे यदि मिथ्या/नकली/अप्रयोजनभूत/काम के नहीं /अनुपयोगी कहे गये हैं, तो मात्र आत्महित के प्रयोजन की दृष्टि से ही कहे गये हैं। ऐसा कहने का यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि वह सचमुच में झूठा ही है या जिनवाणी में उसका कहीं कथन ही नहीं आया है। और समयसार में ‘निश्चयनय’ के द्वारा जो-जो कथन हैं, वे ही वस्तुगतरूप से जिनवाणी में वैसे ही बताये गये हैं- ऐसा नहीं है। अन्यथा ‘पर्याय बिना का द्रव्य’ कहने से ‘‘गुण-पर्ययवद् द्रव्यम्’’ का सूत्रवचन मिथ्या सिद्ध होगा। किंतु ‘समयसार’ की परिधि में यह कथन शत-प्रतिशत सही है, क्योंकि पर्याय पर दृष्टि रहते आत्मानुभूति कभी संभव ही नहीं है। वे स्पष्ट कहते हैं कि ''पज्जयमूढा हि परसमया ‘’ अर्थात् जो जीव पर्याय में ही मूढ बने हुये हैं, वे ‘परसमय’ यानि अन्यमती हैं, वे जिनाम्नाय की परिधि के बाहर हैं- यह चमत्कार आचार्य कुन्दकुन्द देव की ही देन व सामर्थ्य है, जो पंचमकाल में भी आबाल-गोपाल के लिये आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त कर गया है। इतना ही नहीं, आचार्य कुन्दकुन्द देव ‘समयसार’ ग्रंथ में ‘नय’-विपक्षा का पर्याप्त-प्रयोग करते हुये भी ‘नय’ को भी बहुत अधिक तात्त्विक-महत्त्व नहीं देते हैं। क्योंकि आत्मानुभूति के द्वार तक पहुँचाने में सीमित-भूमिका ‘नय’ की होते हुये भी आत्मानुभूति की स्थिति में वही नय-विकल्प बाधक हैं, अतः उनका भी निषेध करना पड़ा। इसीलिये समयसार ग्रंथ के प्रमुख-व्याख्याकार आचार्य अमृतचंद्र सूरि को यह कलश लिखना पड़ा- ‘‘उदयति न नयश्री-रस्तमेति प्रमाणम्। क्वचिदपि च न विद्मो, याति निक्षेपचक्रम्।। किमपरमभिदध्मो, धाम्नि सर्वंकषैस्मिन्। अनुभवमुपयाते, भाति न द्वैतमेव।।’’ इस कलश में अनुभव-काल में किसी भी तरह के नय-विकल्प का स्पष्ट-अभाव प्ररूपित किया है। इसीप्रकार ‘पुण्य’ और ‘पाप’ के प्रति एकत्व या एकसमान-हेय समझाने के लिये जो एड़ी-चोटी का जोर आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ‘समयसार’ ग्रंथ के ‘पुण्य-पाप-अधिकार’ में लगाया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। और इस प्ररूपण के पीछे उद्शदे ्य यही समझाना है कि ‘जीव मात्र पुण्य-परिणामों की आसक्ति में उलझकर आत्महित से वंचित रह जाता है’। इसीलिये आचार्य कुन्दकुन्द देव ने पुण्य को आत्मानुभतू ि में पाप से भी अधिक बड़ा बाधक बताया है। यह बहुत बड़ा-सत्य है, जिसे सबसे पहले आचार्य कुन्दकुन्द ने ही इतनी दृढ़ता के साथ बताया है। और यह भी सत्य है कि स्वयं आचार्य कुन्दकुन्द देव जिन महाव्रतादि का पूरी-निष्ठा से साधन करते थे, वे भी पुण्यरूप परिणाम ही हैं, अतः पुण्य के निषेध में उनके महाव्रतादि रूप आचरण भी परिगणित हो रहे हैं- यह वे अच्छी तरह से समझ रहे थे। और वे यह भी प्रत्यक्ष निरन्तर-अनुभव करते थे कि महाव्रतादि के साधनरूप परिणाम रहते हुये आत्मानुभूति नहीं होती है, बल्कि इन्हें छोड़ने पर ही उपयोग अन्तर्मुखी होकर चैतन्यघन की निर्मल-अनुभूतिरूप परिणत हो पाता है। अतः यह उनका चिरकाल से अनुभूत-सत्य था कि पुण्य-परिणाम में अटकना, पुण्य का आकर्षण ही वास्तव में आत्मानुभूति में सबसे प्रबल-बाधक-तत्त्व है। अन्यथा तो बच्चे भी इतनी समझ रखते हैं कि हिंसादिरूपाप-परिणामों की तुलना में देव-वंदना आदि रूप या व्रतादिरूप पुण्य-परिणाम लौकिक-दृष्टि से बेहतर हैं। किन्तु आत्मानुभतू ि के साधकजीव इन पुण्य-परिणामों में अटककर ही अपना सबसे अधिक अहित करते हैं, इसीलिये आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ‘समयसार’ में पुण्य के परिणामों को पाप-परिणामों के समान बताया और फिर पाप से भी अधिक बाधक बताया- यह विशुद्ध अनुभव-दृष्टि का ही प्रतिपादन है। यदि वे वास्तव में पुण्य-परिणामों को पाप से अधिक बुरा मानते, तो महाव्रतादि का साधन छोड़कर अव्रतादिरूप-आचरण करने लगते। किंतु ऐसा नहीं होना यह सिद्ध करता है कि यह प्रतिपादन उपयोग को ‘पर’ से हटाकर ‘स्वरूप’ में समाने की उदात्त-दृष्टि से किया गया है। इसे ‘किसी अन्य सन्दर्भ’ में जोड़ना या ‘सर्वथा’ की दृष्टि से किया गया कथन मानना आचार्य कुन्दकुन्द देव के प्रतिपादन के प्रति हमारी नासमझी कहलायेगी। ऐसी अनेकों प्रतिपत्तियाँ ‘समयसार’ ग्रंथ में पदे-पदे मिलतीं हैं, जो यह सिद्ध करतीं हैं कि ‘समयसार’ ग्रंथ आत्मानुभूति की प्रधानता से ही लिखा गया है। और चूँकि अनुभवी-जीवों को तो यह सब पहले से ही पता होता है, अतः उन्हें यह सब समझाने की आवश्यकता नहीं होती है। किन्तु जो जीव अप्रतिबुद्ध हैं, उन्हें ही अनादि-मोहपरिणति के पाश से छुड़ाकर स्वरूप के निर्मल-गगन में गगनचारी बनाने के लिए ही ‘समयसार’ के प्रत्येक प्ररूपण का निहित-अभिप्राय है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि ‘समयसार’ ग्रंथ की रचना जो ‘प्रतिबुद्ध’ हो सकता है, ऐसे ‘अप्रतिबुद्ध’ -जीव को मात्र आत्मानुभूति में बाधक-विचारों/मान्यताओं के निवारणार्थ की गयी है। अतः यह विशुद्धरूप से आत्मानुभूति की दृष्टि देनेवाला और आत्मानुभूति में बाधक-विचारों को दृढ़तापूर्वक हटाने के प्रतिपादनोंवाला ग्रंथ है। इसी दृष्टि की प्रधानता को समक्ष रखकर इसका स्वाध्याय एवं व्याख्यान किया जाना चाहिये। यही इसकी समीचीन-पद्धति है। इसीप्रकार आचार्य कुन्दकुन्द देव के प्रत्येक ग्रन्थ की रचना के पीछे विशिष्ट-अन्तर्दृष्टि निहित है। जिसे पहिचाने बिना उस ग्रन्थ के वर्ण्य-विषय एवं प्रतिपादन शैली का वास्तविक-मर्म नहीं पहिचाना जा सकता है। चूँकि यहाँ ‘समयसार’ जी ग्रन्थ का ही प्रकरण है, अत: अन्य ग्रन्थों की अन्तर्दृष्टि का कथन यहाँ नहीं किया जा रहा है। आचार्य कुन्दकुन्द ‘कलिकाल-सर्वज्ञ’ थे- ‘‘रे रे! कलिकालमहागइंद! गलगज्जियस्स को कालो? अज्ज वि सुपरु सि-केसरि- किसोर-चलणंकिया जा पुहवी।।’’ -( वज्जालग्गं, सज्जणवज्जा, कवि जयवल्लभ सूरि) अर्थात् ‘‘अरे! कलिकालरूपी महागजेन्द्र! तुम्हारी गलगर्जना करने का यह कौन सा समय है? (अर्थात् अभी से क्यों इतना चिंघाड़ रहे हो?) अभी तो सत्पुरुषों रूपी सिंह-शावकों के चरण-चिह्नों से यह पृथ्वी अलंकृत (सुशोभित) है ।’’ इससे हम संकेत-ग्रहण कर सकते हैं, कि वर्तमानकाल में ‘सिंह’ रूपी ‘सर्वज्ञ’ भले ही यहाँ नहीं हैं, परन्तु उनके दर्शन के प्रभावक जिनेश्वर के लघुनदं न अभी भी हैं, तो कलिकाल को चिंघाड़ने की अावश्यकता नहीं हैं। उनकी कलिकालसर्वज्ञता का प्रबल-समर्थक ‘प्रवचनसार’ ग्रन्थ है। इसी के आधार पर यहाँ यह विवेचन प्रस्तुत है। 1. पहला प्रश्न यह उठता है कि अन्यमति तो अपनी सर्वज्ञता स्वयम्भूरूप में मानते हैं, अर्थात् उनका सर्वज्ञ अनादिकाल से वैसा ही स्वयंसिद्ध है, किसी पुरुषार्थ से वह सर्वज्ञ नहीं बना है । तो क्या जैनमत में भी सर्वज्ञता ऐसी ही अनादि व स्वयंसिद्ध मानी गयी है? इसका समाधान करते हुये आचार्य कुन्दकुन्द देव लिखते हैं कि जिनाम्नाय में प्रत्येक आत्मा सर्वज्ञ-स्वभावी ही है। अपने इसी सर्वज्ञ-स्वभाव का आश्रय लेकर ही जिनाम्नाय में सर्वज्ञ होते हैं। इसलिये जिनाम्नाय में भी सर्वज्ञता ‘स्वयम्भू’ ही है- ‘‘तह सो लद्धसहावो सव्वण्हू सव्वलोगपदि-महिदो। भूदो सयमेवादा हवदि सयंभु त्ति णिद्दिट्ठो।। 16।।’’ अर्थात् इसप्रकार वह स्वभाव को प्राप्त हुये सर्वज्ञ सर्वलोकपति (त्रिलोकीनाथ) के रूप में पूजित होकर वह आत्मा स्वयमेव ही होता है, इसलिये उसे ‘स्वयम्भू’ कहा गया है । 2. तो प्रश्न उठता है कि क्या जिनाम्नाय में लोकालोक के प्रत्येक पदार्थ को एक-एक करके जानकर सर्वज्ञता मानी गयी है? अर्थात् जिनमत में क्रमशः पदार्थों को जान-जानकर जीव सर्वज्ञ बनता है क्या? इसका समाधान करते हुये आचार्य कुन्दकुन्द देव कहते हैं कि जिनाम्नाय के अनुसार सर्वज्ञ के ज्ञान के स्वाभाविक-परिणमन करने मात्र से ही लोकालोक के सभी द्रव्य और उनकी त्रिकालवर्ती-पर्यायें उन्हें प्रत्यक्ष हो जातीं हैं, वे उन्हें ‘अवग्रह-ईहा’ आदि के क्रम से नहीं जानते हैं; क्योंकि क्रमिक-ज्ञान का नाम सर्वज्ञता है ही नहीं - ‘‘परिणमदो खलु णाणं, पच्चक्खा सव्वदव्वपज्जाया। सो णेव ते विजाणदि, उग्गहपुव्वाहिं किरियाहिं।। 21।।’’ अर्थात् ज्ञान के परिणमन करने से समस्त द्रव्य और उनकी समस्त पर्यायें उसे प्रत्यक्ष होतीं हैं । किन्तु वह उन्हें अवग्रहपूर्वक होनेवाली क्रियाओं (ईहा, अवाय और धारणा आदि) से नहीं जानता है । 3. तब वह यह प्रश्न करता है कि यदि जिनाम्नाय के अनुसार सर्वज्ञ ‘अवग्रह’ आदि के क्रम से पदार्थों को नहीं जानता है, तो फिर वह उन्हें कैसे जानता है; क्योंकि हमारे मत में तो इंद्रिय-सन्निकर्ष से होने वाले ज्ञान को ही प्रत्यक्ष माना गया है? इसका उत्तर देते हुये आचार्य कुन्दकुन्द देव लिखते हैं कि इंद्रियों के माध्यम से प्रवृत्त होनेवाला ज्ञान कभी भी समस्त द्रव्यों और उनकी सभी पर्यायों को नहीं जान सकता है, ऐसी जानने की क्षमता तो मात्र अतीन्द्रिय-ज्ञान में ही होती है । चूँकि हमारे सर्वज्ञ अतीन्द्रिय-ज्ञान के धनी हैं, अतः उन्हें कुछ भी परोक्ष नहीं रहता है- ‘‘णत्थि परोक्खं किंचि वि, समंत-सव्वगुणसमिद्धस्स। अक्खातीदस्स पुणो, सयमेव हि णाणजादस्स ।। 22।।’’ अर्थात् स्वयमेव ही ज्ञान से उत्पन्न इंद्रियातीत और सर्वतः सभी गुणों से समृद्ध (उस सर्वज्ञ पर्याय) के लिये कुछ भी परोक्ष नहीं है । (अर्थात् वह सबको प्रत्यक्ष ही जानता है।) 4. तब वह प्रश्न करता है कि इन्द्रिय आदि से सन्निकर्ष के बिना ज्ञान परपदार्थों को कैसे जान सकता है, और अपने बल पर सर्वज्ञ कैसे कोई हो सकता है? इसका गज़ब का तार्किक-उत्तर देते हुये आचार्य कुन्दकुन्द देव लिखते हैं कि ‘‘आत्मा ज्ञान-प्रमाण है, ज्ञान के अतिरिक्त आत्मा नहीं है (अर्थात् जहाँ ज्ञान नहीं है, वहाँ आत्मा भी नहीं है), और ज्ञान अपने विषयों अर्थात् ज्ञेयों को जानता हुआ चरितार्थ होता है, अतः ज्ञान ज्ञेय-प्रमाण हुआ । चूँकि लोकालोक के सभी द्रव्यों और उनकी त्रिकालवर्ती-पर्यायों को ज्ञेय माना गया है,’’ तो वे सभी जब ज्ञान की ज्ञेय बन गयीं, तब सर्वज्ञता कैसे सिद्ध नहीं होगी। वह तो स्वतः ही सिद्ध होगी- ‘‘आदा णाणपमाणं, णाणं णेयप्पमाणमुद्दिट्ठं। णेयं लोयालोयं, तम्हा णाणं तु सव्वगदं ।। 23।।’’ आत्मा ज्ञानप्रमाण है, ज्ञान ज्ञेयप्रमाण है, और ज्ञेय सम्पूर्ण लोकालोक है ; इसीलिये ज्ञान सर्वगत है। (और जब ज्ञान स्वभावतः सर्वगत यानि सबको जाननेवाला है, तो ज्ञानस्वभावी-आत्मा तो सर्वज्ञ ही सिद्ध हुआ न?) 5. तब वह पुनः प्रश्न करता है कि आपका सर्वज्ञ जब अपने आत्मस्वभाव में लीन रहता है, तब वह लोकालोक को कैसे जानता है? इसका स्पष्टीकरण करते हुये आचार्य कुन्दकुन्द देव कहते हैं कि ‘प्रतिबिम्ब-प्रतिबिम्बक-भाव’ से सर्वज्ञ के ज्ञान में लोकालोक अवस्थित रहते हैं। इसप्रकार सर्वज्ञ आत्मस्वभाव में लीन रहकर भी लोकालोक के ज्ञाता रहते हैं- ‘‘सव्वगदो जिणवसहो, सव्वे वि य तग्गदा जगदि अट्ठा। णाणमयादो य जिणो, विसयादो तस्स ते भणिदा।। 26।।’’ अर्थात् जिनवृषभ सर्वगत हैं, जगत् के समस्त पदार्थ तद््गत अर्थात् उसके ज्ञान में विद्यमान हैं। और जिनेन्द्र भगवान् के ज्ञानमय होने से वे (जगत् के सभी पदार्थ) उनके विषयरूप कहे गये हैं। 6. तब वह जिज्ञासु पुनः प्रश्न करता है कि यदि लोकालोक आपके/सर्वज्ञ के ज्ञान में अवस्थित है, तो क्या आपका सर्वज्ञ लोकालोक के सभी पदार्थों व उनकी पर्यायों को पीकर बैठा है? हमारे यहाँ तो इन्द्रियार्थसन्निकर्षपूर्वक ही प्रत्यक्ष-ज्ञान माना गया है, जबकि आपके मत में तो सर्वज्ञ इंद्रियों से जानता ही नहीं है? तब वह लोकालोक का ज्ञाता कैसे हो सकता है? इसका अत्यन्त-मार्मिक एवं न्यायसंगत-समाधान देते हुये आचार्य कुन्दकुन्द देव लिखते हैं कि तुम्हारे मत में भले ही इन्द्रियाँ पदार्थ के साथ सन्निकर्षपूर्वक (अर्थात् छूकर) ज्ञान करने की बात कही गयी हो, किन्तु यह तो तुम भी जानते हो कि चक्षु-इंद्रिय पदार्थों से सन्निकर्ष किये बिना (छुये बिना) ही पदार्थ को जानती है । जब चक्षु-इंद्रिय पदार्थों को छुये बिना उनका ज्ञान कर सकती है, तो अन्य इंद्रियाँ क्यों नहीं कर सकतीं हैं? और फिर केवलज्ञानी अर्थात् सर्वज्ञ तो किसी भी पदार्थ के पास जाये बिना, उसे छुये बिना ही उसको जानते हैं- यही जिनाम्नाय में केवली का स्वरूप है - ‘‘ण पविट्ठो णाविट्ठो, णाणी णेयेसु रूवमिव चक्खू। जाणदि पस्सदि णियदं, अक्खातीदो जगमसेसं।। 29।।’’ अर्थात् ज्ञानी-जीव ज्ञेयभूत-पदार्थों में न तो ‘प्रविष्ट’ होता है उनमें जाता है और न ही उन पदार्थों को अपने में आविष्ट करता है उन्हें अपने में लाता है। फिर भी नियतरूप से वह सम्पूर्ण विश्व को इंद्रियातीत होकर जानता और देखता है । 7. इतना समझाने पर भी उसे संतोष नहीं होता है, और वह पूछता है कि यदि आपके सर्वज्ञ को परपदार्थों से कुछ लेना देना ही नहीं है, तो वह उन्हें जानने की चेष्टा करता ही क्यों है? तब आचार्य कुन्दकुन्द देव उसकी इस जिज्ञासा का भी अत्यन्त-वात्सल्यपूर्वक समाधान करते हुये कहते हैं कि हमारे केवली भगवान् किसी भी परपदार्थ का ग्रहण या त्याग किये बिना ही उन्हें सम्पूर्णरूप से प्रत्यक्ष प्रतिपल जानते देखते हैं- ‘‘गेण्हदि णेव ण मुंचदि, ण परं परिणमदि केवली भगवं। पेच्छदि समंतदो सो, जाणदि सव्वं णिरवसेसं।। 32।।’’ अर्थात् केवली भगवान् न तो परपदार्थों को ग्रहण करते हैं, न छोड़ते हैं ( जब ग्रहण ही नहीं करते, तो छोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता), और न ही परपदार्थों को परिणमित करते हैं; (वे मात्र उन) सभी पदार्थों को समग्रतः देखते और जानते हैं। 8. इतना समझाने पर भी उसे यह बात समझ में नहीं आ पाती है कि जैनों के सर्वज्ञ भगवान् के ज्ञान में लोकालोक के सभी द्रव्य और उनकी त्रिकालवर्ती-पर्यायें कैसे एकसमय में एकसाथ प्रत्यक्ष हो सकतीं हैं? तब उसकी इस जिज्ञासा का समाधान करते हुये आचार्य कुन्दकुन्द देव लिखते हैं कि हमारे मत के अनुसार तो केवली के ज्ञान में भूतकाल एवं भविष्यत्््काल की अविद्यमान-पर्यायें भी अभी हाल में घटित हो रहीं पर्यायों की भाँति स्पष्टरूप से प्रत्यक्ष होतीं रहतीं हैं - ‘‘तक्कालिगेव सव्वे, सदसब्भूदा हि पज्जया तासिं। वट्टंते ते णाणे, विसेसिदो दव्वजादीणं।। 37।।’’ उनके (केवली के) ज्ञान में उन सभी द्रव्यों की सर्वकालवर्ती विद्यमान और अविद्यमान-पर्यायें उनके ज्ञान में वर्ततीं हैं । 9. तब उसके प्रश्न को और अधिक अपनी ओर से स्पष्ट करते हुये आचार्य कुन्दकुन्द देव स्वयं लिखते हैं- ‘‘जे णेव हि संजादा, जे खलु णट्ठा भवीय पज्जाया। ते होंति असब्भूदा, पज्जाया णाण-पच्चक्खा।। 38।।’’ अर्थात् जो पर्यायें अभी उत्पन्न ही नहीं हुईं हैं, और जो पर्यायें नष्ट (व्यय को प्राप्त) हो चुकीं हैं; वे अविद्यमान-पर्यायें भी (केवली के) ज्ञान में प्रत्यक्ष होतीं हैं। यदि ऐसा न हो, तो सर्वज्ञ के ज्ञान की दिव्यता क्या रहेगी? यदि सर्वज्ञ भी हमारे आपकी तरह क्रमिकरूप से, इंद्रियों का अवलम्बन लेकर ही जानेगा, तो उस ज्ञान की महिमा किसे आयेगी?- यह बात अत्यन्त-दृढ़ता से स्पष्ट करते हुये आचार्य कुन्दकुन्द देव लिखते हैं -

प्रस्तावना | भाग २/२

जदि पच्चक्खमजादं, पज्जायं पलयिदं च णाणस्स।
ण हवदि वा तं णाणं, दिव्वं ति हि के परूवेंति।। 39।।

अर्थात् यदि अनुत्पन्न और विनष्ट हो चुकीं पर्यायें केवली के ज्ञान में प्रत्यक्ष नहीं हों, तो उस ज्ञान को दिव्य कौन कहेंगे? 10. तो ‘सावरण-ज्ञान’ एवं ‘निरावरण-ज्ञान’ की व्यवस्था से अनभिज्ञ वह जिज्ञासु पूछता है कि ज्ञान में ऐसी दिव्यता कैसे प्रकट हो सकती है कि हरतरह के पदार्थों को एवं उनकी त्रिकालवर्ती-पर्यायों को एकसमय में प्रत्यक्ष जान ले और वह भी उनकी तरफ झाँके बिना ही? हम भी ज्ञान से पदार्थों को जानते हैं, किन्तु हमें वे पदार्थ ही युगपत् रूप से पूर्णतः स्पष्ट प्रत्यक्ष नहीं होते, उनकी वर्तमान की भी पूरी पर्यायें (प्रत्येक गुण की भिन्न भिन्न) स्पष्ट-प्रतिभासित नहीं होतीं हैं; जबकि हम उन्हें जानने का भरपूर प्रयत्न करते हैं, सारे साधन जुटाते हैं । तब आपके केवली भगवान् कैसे उन्हें बिना किसी प्रयत्न के प्रत्यक्ष जान सकते हैं। ज्ञान-स्वभाव तो आप प्राणीमात्र का समान मानते हैं, तो हमारे ज्ञान में ऐसा क्यों नहीं होता है? उसके इस प्रश्न पर आचार्य कुन्दकुन्द देव अत्यन्त-करुणापूर्वक केवलज्ञान-पर्याय की विशेषता जिनाम्नाय के अनुसार स्पष्ट करते हुये लिखते हैं कि ‘‘अरे भोले प्राणी! केवली भगवान् की ज्ञान पर्याय क्षायिक-अवस्था को प्राप्त हो चुकी है, इसलिये उनके साथ यह सब सहज ही होता है । क्योंकि जिनाम्नाय में क्षायिक या निरावरण- ज्ञान उसे ही माना गया है, जो परपदार्थों की ओर उपयोग किये बिना ही हरतरह के द्रव्यों और उनकी त्रिकालवर्ती- पर्यायों को युगपत् रूप से बिना किसी बाधा के और बिना किसी की सहायता के, पूर्णतः स्वाधीनरूप से जानने में समर्थ होता है’’ - ‘‘जं तक्कालियमिदरं, जाणदि जुगवं समंतदो सव्वं । अत्थं विचित्त-विसमं, तं णाणं खायिगं भणिदं।। 47।।’’ अर्थात् तात्कालिक ( यानि विद्यमान) और इतर (यानि अविद्यमान (पर्यायों को) युगपत् और सभी विचित्र एवं विषम-पदार्थों को समग्रतः जो ज्ञान जानता है, उसी ज्ञान को ‘क्षायिक’ कहा गया है । 11. इस क्षायिक-ज्ञान की विशेषता को और स्पष्ट करते हुये वे लिखते हैं कि जो ज्ञान परपदार्थों की प्रतीति की अपेक्षा रखता है, अथवा जो क्रमशः एक-एक पदार्थ को जानता है, वह ज्ञान न तो क्षायिक हो सकता है और न ही कभी सर्वगत अर्थात् सभी पदार्थों को व उनकी त्रिकालवर्ती-पर्यायों को युगपत् रूप से जानने में समर्थ हो सकता है- ‘‘उप्पज्जदि जदि णाणं, कमसो अट्ठे पडुच्च णाणिस्स। तं णेव हवदि णिच्चं, ण खायिगं णेव सव्वगदं।। 50।।’’ अर्थात् यदि ज्ञानी का ज्ञान प्रत्येक पदार्थ की क्रमशः प्रतीति करता हुआ उत्पन्न हो, तो वह ज्ञान न तो नित्य अर्थात् अविनाशी हो सकता है, न क्षायिक हो सकता है, और न ही सर्वगत (सभी पदार्थों को जाननेवाला) हो सकता है। 12. इसके बाद वे स्वयं अपनी ओर से स्पष्ट करते हुये लिखते हैं कि लोकालोक में अनंतानंत-द्रव्य और प्रत्येक द्रव्य में अनंत-अनंत गुण, और प्रत्येक गुण की त्रिकालवर्ती अनंतानंत-पर्यायें- इन सबको एकसमय में एकसाथ जानने में समर्थ केवलज्ञान की पर्याय; और ऐसी अनंतानंत केवलज्ञान की पर्यायें जिसमें से निकलें, परन्तु उसकी सत्ता में तनिक भी न्यूनता न आये- ऐसा ‘ज्ञान’ नामक गुण है । और उस ज्ञान-गुण की स्वाभाविक सामर्थ्य ऐसी अद्भुत है कि उसकी पर्यायों को परपदार्थों के ज्ञान के लिये परपदार्थों के पास जाने की जरूरत ही नहीं है । वह अपने में लीन रहकर निरावरणरूप से समस्त द्रव्यों और उनकी त्रिकालवर्ती पर्यायों को पूर्णतः प्रत्यक्षरूप से जानती है- यही तो ज्ञान स्वभाव की अचिन्त्य-महिमा है, जो जिनाम्नाय में ही वर्णित है-

तिक्काल-णिच्च-विसमं, सयलं सव्वत्थ-संभवं चित्तं।
जुगवं जाणदि जोण्हं, अहो हि णाणस्स माहप्पं।। 51।।

अर्थात् यह जिनेन्द्र भगवान् के ज्ञान का माहात्म्य है कि वह त्रिकालवर्ती, नित्य, विषम, सम्पूर्ण, सभी पदार्थों में होने वाले बहुरूपी (पर्यायों) को युगपत् रूप से (बिना किसी बाधा या व्यवधान के) जान लेता है। इसप्रकार से कलिकाल के सर्वज्ञ-स्वभाव और सर्वज्ञता से अनभिज्ञ प्राणियों आत्मस्वरूप में ही पूर्णतः स्वाश्रित-सर्वज्ञता की सिद्धि जिस अनुपम-शब्दावलि और अकाट्य-शैली में आचार्य कुन्दकुन्द देव ने प्रवचनसार-परमागम में की है, वह अतुलनीय है। इसी कालजयी-प्रतिपादन के कारण वे वर्तमान-पंचमकाल के पहले आचार्य बने, जिन्हें ‘कलिकालसर्वज्ञ’ के विरुद से अर्चित किया गया है। ‘समयसार’ के मंगलाचरण में ‘‘सुदकेवली-भणिदं’’ क्यों कहा?- यह तो सर्वविदित ही है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव-प्रणीत कालजयी आगम-ग्रंथ ‘समयसार’ जी में मंगलाचरण के जिनाम्नाय-सम्मत सभी अंगोपांगों का उत्कृष्ट-रीति से अनुपालन दृष्टिगत होता है। किन्तु उसमें ग्रंथ को ‘‘सुदकेवली-भणिदं ‘’ कहकर श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी द्वारा कथित कहना कहीं जिज्ञासा-विशेष उत्पन्न करता है। यह तो स्पष्ट ही है कि इस ग्रंथ के वर्तमान-स्वरूप के प्रणेता युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव हैं। यदि आत्मश्लाघा से बचकर अपनी विनम्रता प्रकट करने रूप शालीनता की प्रस्तुति ही उन्हें यहाँ अपेक्षित थी, तो वे अपने दीक्षागुरु आचार्य जिनचन्द्र जी का नामोल्लेख कर सकते थे। इससे विनय भी हो जाती, और ‘’ गुरु-नाम न छिपाइये’’ के शिष्टाचार का परिपालन भी हो जाता। यदि वह नहीं कहना था, तो अपने दीक्षा-संघ ‘नंदिसंघ’ के संस्थापक महान् तपस्वी एवं श्रुतवेत्ता आचार्य माघनंदि का नामोल्लेख कर सकते थे। किन्तु इन दोनों साक्षात् गुरुवर्यों का उल्लेख करना छोड़कर जिन्हें आचार्य कुन्दकुन्द देव ने देखा तक नहीं, ऐसे पंचम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी को ‘समयसार’ ग्रंथ का वक्ता कहना कुछ जिज्ञासा-विशेष उत्पन्न करता है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव जैसी महान् विवेकी एवं सारस्वत-आचार्य ने ऐसा क्यों किया? अवश्य ही इसके पीछे कोई गंभीर-कारण रहे होंगे, जिनका विश्लेषण लिखितरूप में कहीं नहीं मिलता है; परन्तु इनका विश्लेषण अवश्य ही अपेक्षित है। यही प्रयास यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। 1. प्रथम-बिन्दु है कि उन्होंने श्रुतकेवली भद्रबाहु का ही स्मरण/वंदन क्यों किया? जबकि उनकी साक्षात् गुरुपरम्परा थी? -इसका एक उत्तर तो मैंने अपने आलेखों में दिया ही है, जिनका निष्कर्ष यही है कि वे दोनों आचार्यगण (माघनंदि एवं जिनचन्द्र) अपने मुनिजीवन में दिगम्बर-मुनिचर्या की गरिमा के विपरीत कुछ कार्य कर चुके थे, जिसका भले ही उन्होंने का परिमार्जन कर लिया था; पर वह कार्य किये तो मुनिपद पर रहते हुये ही थे। अतः दिगम्बर जैन-मुनिधर्म में प्रसक्त हुये शिथिलाचार का पुरजोर-निषेध करके निर्दोष-मुनिचर्या की स्थापना का बीड़ा उठानेवाले युगप्रवर्तक आचार्य कुन्दकुन्द देव ने कथंचित् भी सदोष-मुनिधर्मवाले इन दोनों का नामोल्लेख करना संभवतः समीचीन नहीं समझा। इस विषय में कुछ उन्होंने अलग से उल्लेख तो नहीं किया है, किन्तु ‘‘पीनो देवदत्तः दिवा न भुंक्ते’’ के प्रचलित-न्याय के अनुसार सब स्वीकार करते हैं कि ‘‘यदि वह देवदत्त मोटा-ताजा है तथा दिन में कुछ नहीं खाता है; तो कोई भी सहज ही समझ सकता है कि वह रात में खाता होगा।’’ इसीप्रकार जिन आचार्य कुन्दकुन्द देव को दिगम्बर जैन मुनिधर्म में रंचमात्र भी शिथिलाचार स्वीकार्य नहीं था, तो कोई भी समझ सकता है कि उन्होंने इसीकारण शिथिलाचार के दोष लगानेवाले अपने इन गुरुवर्यों का नाम लेना उचित नहीं समझा। इसका समर्थक-प्रमाण यह भी है कि इन दोनों आचार्यों ने जब ऐसे शिथिलाचार के कार्य किये, तो परिष्कार के बाद जितने समय तक वे आचार्य-पद पर रहे, उतने समय के काल को श्रुतावतारों व पट्टावलियों में स्थान नहीं दिया गया है; वह समय खाली दिखाया गया है। यह श्रुतावतार एवं पट्टाववियों वाले ग्रंथ कुन्दकुन्द आचार्य देव के परवर्ती-रचनायें हैं, अतः उनमें ऐसा किया जाना इनके रचयिताओं पर आचार्य कुन्दकुन्द देव का स्पष्ट-प्रभाव माना जा सकता है। यही कारण है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव ने अपने इन दोनों गुरुवर्यों का नामोल्लेख नहीं किया। तब यह कहा जा सकता है कि वे आचार्य अर्हद्बलि आदि का उल्लेख कर सकते थे, जो इनके स्पष्ट-पूर्ववर्ती थे। किन्तु वे नंदिसंघ की स्थापना से पहले के थे, किन्तु नंदिसंघ की नीति यही है कि या तो अपने साक्षात्-गुरुवर्यों का उल्लेख किया जाये, या फिर स्थापित-पदों (तीर्थंकर/ केवली/श्रुतकेवली) का उल्लेख मंगलाचरण में किया जाये; तो आचार्य कुन्दकुन्द देव ने इसी परम्परा का पालन करते हुये अंतिम-श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी को ‘समयसार’ का प्रवक्ता कहा है। इस कथन से आचार्य कुन्दकुन्द देव की गरिमा व आगम-निष्ठता प्रकट हुई है। 2. दूसरी-बात यह भी है कि इस वाक्यांश में अंतिम-श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी का साक्षात्-स्मरण किया जाना कुन्दकुन्द आचार्य देव के ग्रंथों का आगमिकता व जिनवाणीरूप होना प्रमाणित करता है। क्योंकि ‘समयसार’ में जिस शैली में वे पर और पर्याय से भिन्न, त्रिकालशुद्ध, ज्ञायक भगवान् आत्मा की बात करने जा रहे थे, उसे कोई आचार्य कुन्दकुन्द देव की निजी-प्रतिपत्ति न मान ले,कि ‘‘यह तो आचार्य कुन्दकुन्द देव की निजी मान्यता है, मूल-आगम-परम्परा में ऐसी त्रिकाल-शुद्धता की बात नहीं रही होगी। भला नर-नारकादि पर्यायों में संसार-परिभ्रमण करनेवाले मोही-जीव को त्रिकालशुद्ध कैसे कहा जा सकता है?’’-ऐसी आशंकाओं का निवारण तभी संभव था, जब यह कथन मूल-आगम-परम्परा का सिद्ध हो; न कि आचार्य कुन्दकुन्द देव का निजी-कथन। क्योंकि कुन्दकुन्द आचार्य देव के समकालीन लिपिबद्ध किये गये आगम-साहित्य में कर्म-सिद्धान्तपरक ग्रंथ थे, जो कि आत्मा को कर्मों के बंधन में पड़ा हुआ सिद्ध कर रहे थे। ऐसी स्थिति में आत्मा को ‘‘कर्मों से त्रिकाल अबद्ध-अस्पृष्ट’’ घोषित करना जैनधर्म का मूलभूत-सिद्धान्त है, न कि आचार्य कुन्दकुन्द देव की निश्चयनय-वाली अपनी अवधारणा- यह सिद्ध करना आत्मा के स्वरूप के विषय में बहुत बड़ा धर्मसंकट था। आज भी अन्य लोगों की तो बात छोड़ दीजिये, हम अधिकांश मुमक् ु -षु लोग भी निश्चयनय की अपेक्षा से आत्मा को शुद्ध मानते हैं, न कि इसी संसारावस्था में उसे स्वभावतः त्रिकालशुद्ध स्वीकार करने का साहस कर पाते हैं। आचार्य कुन्दकुन्द देव के इस कथन को उनके टीकाकारों ने तो स्वीकार किया ही था, तभी तो उन्होंने लिखा था कि ‘‘प्रागेव शुद्धता येषां, सुधियां कुधियामपि। नयेन केनचित्तेषां भेदं किमपि विदाम्यहम्।।’’ -अर्थात् जिन संसारी-जीवों में स्वभाव से ही त्रिकालशुद्धता विद्यमान है, उन्हें किसी नय से शुद्ध और किसी नय से अशुद्ध कहना- यह कैसे संभव है? परवर्ती आचार्य-परम्परा में भी यदि ये स्वर मुखरित हुये हैं, तो उसका श्रेय आचार्य कुन्दकुन्द देव को ही जाता है, जो कि ‘‘जारसिया सिद्धप्पा, तारिसिया भवमल्लिया जीवा’’ अर्थात् ‘‘जैसे सिद्ध भगवान् शुद्ध हैं, वैसी ही शुद्धता संसार-सागर में निमग्न-जीवों के स्वभाव में भी त्रिकाल विद्यमान है’’- जैसे वाक्यों में परवर्ती आचार्यपरम्परा में जगह-जगह मुखरित हुये हैं। इनके बाद इस तथ्य की सर्वाधिक समर्थ-ढंग से उद्घोषणा यदि किसी ने की है, तो वे हैं पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी। इसीलिये उन्हें ‘आचार्य कुन्दकुन्द देव का सर्वाधिक-समर्थ-उत्तराधिकारी’ कहा जाता है। वे सारे जीवन लोगों को ‘‘भगवान् आत्मा’’ के मृदल ु तम-सम्बोधन से पुकारते रहे और कहते रहे कि ‘‘यदि मैंने किसी को पर्याय-दृष्टि से देखा हो, तो मुझे क्षमा करना’’। अहो! ऐसी अद्भुत-क्षमावणी और किसी के मुख से सुनने को नहीं मिली। यह हमारा परम-सौभाग्य है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव के हृदय को खोलकर रख देनवे ाले ऐसे महान् व्वक्तित्व का पावनसान्निध्य हमें इस विषम-पंचमकाल में मिला और हम भोगों के युग में ‘‘भगवान् आत्मा’’ का सम्बोधन सुन पाये। यह जिनागम का सारभूत-मर्म है, जैनदर्शन की मौलिकता है। यदि इसे आचार्य कुन्दकुन्द देव की निजीप्रतिपत्ति (कथन) मान लिया जाता, तो जिनवाणी का यह मूल-सिद्धान्त व्यक्ति-विशेष की मान्यता बनकर रह जाता। यह भयंकर-चूक लोग न कर लें, इसलिये आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ‘‘सुदकेवली-भणिदं’’ कहकर ‘समयसार का प्रवक्ता सीधे अंतिम-श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु स्वामी को बताया है’। 3. इसी क्रम में तीसरा-तथ्य मैं यह बताना चाहता हूँ कि ‘‘श्रुतकेवली-कथित’’- यह प्रयोग कुन्दकुन्दवाङ्मय का सीधा तीर्थंकर-वचनरूप महिमा ज्ञापित करता है। क्योंकि श्रुतकेवली कभी अपनी कोई अवधारणा प्रकट नहीं करते हैं। वे द्वादशांग के रूप में वही जानते व कहते हैं, जो शासन-नायक तीर्थंकर-भगवान् के, व केवलियों के प्रवचनों में आता है और जो गणधरों ने द्वादशांगी-जिनवाणी के रूप में वर्गीकृत किया है। इसीलिये परवर्ती-आचार्यों ने अपने कथनों की प्रामाणिकता ज्ञापित करने के लिये आचार्य कुन्दकुन्द देव के वचनों को, उनके अन्वय व आम्नाय को (‘अन्वय’ अर्थात् उनकी शिष्य-परम्परा, और ‘आम्नाय’ अर्थात् उनकी कथन-परम्परा के अनुयायी) परम-प्रमाण मानकर ऐसा कथन करना पड़ा कि ‘‘कुन्दकुन्दान्वय-नन्दनवनशुकोSहम्’’ अर्थात् ‘‘कुन्दकुन्द आचार्य देव के अन्वयरूपी नन्दनवन का मैं तोता हूँ।’’ जैसे तोता अपने स्वामी के जैसे वचन सुनता है, वैसे ही दोहराता है। तो हम लोग (अर्थात् कुन्दकुन्द आचार्य देव के परवर्ती समस्त ग्रंथकार) तो कुन्दकुन्द आचार्यदेव की ही बातों को तोते की तरह दोहराये हैं। इसीलिये तो ‘अनुवाद’ शब्द प्रचलित हुआ, जिसका मूल-अर्थ है कि ‘जैसा सुना, वैसा ही ज्यों का त्यों दोहरा दिया। ‘(अनु+वाद, अनु= ज्यों का त्यों/अनुसार, वाद= कथन करना) उसमें अपनी ओर से कुछ भी नहीं मिलाया, न घटाया न बढ़ाया। (क्या आज के अनुवादक इस गरिमा का अनुपालन करते हैं?) इसप्रकार ‘समयसार’ का प्रत्येक सिद्धांत सीधे भगवान् की वाणी है- यह बात ‘‘सुदकेवली-भणिदं’’ वाक्यांश से प्रमाणित होती है। इसमें कोई आशंका जो करता है, वह सीधे केवली पर आशंका करता है। और केवली पर आशंका करना केवली का अवर्णवाद है, जो कि दर्शन- मोहनीयकर्म के तीव्र-बंध का हेतु है- यह तो सभी जानते ही हैं (’‘केवलि-श्रुत-संघ-धर्म-देवावर्णवादो दर्शनमोहस्य’’- तत्त्वार्थसूत्र)। इसीलिये कुन्दकुन्द आचार्य देव ने ‘समयसार’ के मंगलाचरण में ‘‘सुदकेवली-भणिदं’’ कहकर सम्पूर्ण ‘समयसार’ को भगवान् की वाणी कह दिया है और उसकी चरम-प्रामाणिकता की असन्दिग्धता पुष्ट कर दी है। 4. इसी क्रम में चौथा-तथ्य मैं यह बताना चाहता हूँ कि कुन्दकुन्द आचार्यदेव स्वयं ‘साक्षात् श्रुतधरआचार्य’ थे- यह बात ‘श्रुतकेवली-कथित’ पद के प्रयोग से प्रमाणित होती है। क्योंकि श्रुतकेवली हमेशा केवली के द्वारा प्रतिपादित बात को ही कहते हैं, और श्रुतकेवली के द्वारा कही गयी बात श्रुतधर-आचार्य के अतिरिक्त अन्य कोई जानने का दावा नहीं कर सकता है। यदि कुन्दकुन्द आचार्य देव ने श्रुतकेवली के द्वारा कथित बात को ‘समयसार’ ग्रंथ में लिखा है, तो स्पष्ट है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव स्वयं श्रुतधर-आचार्य थे। इसलिये जो लोग ऐसा मानते हैं कि कर्म-सिद्धान्त की चर्चा करनेवाले ही मात्र श्रुतधर-आचार्य रहे हैं, उनको अपनी मान्यता में सुधार कर लेना चाहिये। मात्र कर्म-सिद्धान्त की चर्चा ही श्रुत का विषय नहीं है और न ही मात्र कर्म-सिद्धान्त की बात करनेवाले श्रुतधर-आचार्य हुये हैं। ज्ञायक भगवान् आत्मा के गीत भी केवली की वाणी में गूँजते थे, और भगवान् आत्मा की धुन भी केवली की, मूल-जिनवाणी की ही धुन है- यह बात आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ‘‘सुदकेवली-भणिदं’’ कहकर प्रमाणित कर दी है। 5. इस क्रम में पाँचवीं बात यह है कि ‘’ समयसार का प्रतिपादन स्वयं श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी ने किया’'- यह कहकर आचार्य कुन्दकुन्द देव ने यह प्रमाणित कर दिया कि इस ग्रंथ का एक एक वाक्य स्वयं में जिनवाणी है। जरूरत है इसकी आगमता के पोषक अन्य-प्रमाण खोजने की, वे ‘समयसार’ में ही हैं, पर उनका उद्घाटन अपेक्षित है। इसके पोषक कुछ निदर्शन निम्नानुसार हैं- A. अरसमरूवमगंधं…- यह गाथा दिगम्बर जैन-आम्नाय के प्रायः उपलब्ध-मूलग्रंथों में तो पायी जाती है, श्वेताम्बर-जैन-परम्परा के आगम-ग्रंथों में भी पायी जाती है। इसतरह से यह गाथा निर्विवादरूप से भगवान् की मूल-वाणी के रूप में मानी गयी है, जो कुन्दकुन्द आचार्य देव ने भी अनेकत्र अपने ग्रंथों में लिखी है। B. ''अहमेक्को खलु सुद्धो… ‘’ वाक्यांश से प्रारम्भ होनेवाली गाथायें कुन्दकुन्द-वाङ्मय में तो अनेकत्र मिलतीं ही हैं, अन्य आचार्यों के ग्रंथों में भी इनकी झलक मिलती है। C. पहले ‘कर्त्ता-कर्म-अधिकार’ में कर्तृत्व के मद को उतारने की पुरजोर कोशिश उन्होंने की, जब उतने से संतुष्ट नहीं हुये, तो ‘सर्वविशुद्ध-ज्ञान-अधिकार’ लिखकर स्पष्ट कर दिया कि यदि जिनवाणी का स्वाध्याय करके भी ज्ञान में परकर्तृत्व का लेश भी शेष रहता है, तो वह ज्ञान परिशुद्ध नहीं है, उसमें ‘कर्तृत्व के अहं का कर्दम’ मिश्रित है। D. पुण्यभाव की महिमा का लेश भी जीव को स्वरूपोपलब्धि में प्रमुख बाधक-तत्त्व है- इसकी जैसी प्रबलघोषणा आचार्य कुन्दकुन्द देव ने न केवल ‘समयसार’ ग्रंथ में, बल्कि उनके अन्य-ग्रंथों में भी मुखरित हुये हैं- वहघोषणा सम्पूर्ण-परम्परा के लिये आदर्श बन गयी है। इनके अतिरिक्त बहुत से तथ्य ऐसे हैं, जो प्रमाणित करते हैं कि आचार्य कुन्दकुन्द देव ने उसी मूलआगम-परम्परा का परिरक्षण अपनी लेखनी के माध्यम से किया, जिसका प्रवर्तन केवलियों के द्वारा किया गया और जिसकी सुरक्षा श्रुतकेवली के द्वारा द्वादशांग के माध्यम से की थी। उन स्वरों को आचार्य कुन्दकुन्द देव ने अत्यन्तकौशलपूर्वक अपने ग्रंथों में संजोया है। अतः उनका ‘‘सुदकेवली-भणिदं’’ कथन पूर्णतः सार्थक है। 6. श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी को अपने अन्य-ग्रंथों में कुन्दकुन्द आचार्य देव ने अपने ‘गमकगुरु’ की संज्ञा दी है। यह प्रयोग सामान्यतः जिनवाणी में अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता है। ‘गमक’ शब्द का अर्थ ‘ज्ञान-प्रदाता’ के रूप में लें, तो भी ठीक नहीं प्रतीत होता है। क्योंकि अंतिम-श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी एवं आचार्य कुन्दकुन्द देव के बीच इतना कालगत-अन्तर है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव का अंतिम-श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी से साक्षात्कार संभव नहीं है। तब इस स्थिति में उन्हें आचार्य कुन्दकुन्द अपना ‘गमकगुरु’ कैसे कह सकते थे? हाँ, इतना अवश्य है कि वे अपने को परम्परा से प्राप्त ज्ञान का संबंध प्रामाणिकता की दृष्टि से अंतिमश्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी के साथ अवश्य जोड़ सकते थे। संभवतः उन्होंने यही किया है। इससे एक बात और स्पष्ट हो जाती है कि ‘समयसार’ ग्रंथ की रचना उनके विदेहगमन से पहले की है। न केवल ‘समयसार’ ग्रंथ, अपितु अन्य पाहुडों की भी, जिनमें वे या उनके टीकाकार अंतिम-श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी का किसी न किसी महनीय-संदर्भ में उल्लेख करते हैं। उनके अतिसंक्षिप्त-ग्रंथों की रचना तो किसी तात्कालिक उद्देश्य की पूर्ति के लिये की गयी प्रतीत होती है, क्योंकि उनका आकार-प्रकार एवं वर्ण्य-विषय- दोनों ही आचार्य कुन्दकुन्द देव के प्रसिद्ध-परमागमों की गरिमा के साथ साम्य नहीं रखते हैं। प्रसिद्ध चार परमागमों (क्योंकि पाँचवें परमागम के रूप में प्रसिद्ध ‘अष्टपाहुड’ मूलतः आठ पाहुडों का संग्रह है। कुन्दकुन्द आचार्य देव ने इस नाम से कोई ग्रंथ नहीं लिखा था। और इनमें से एक-दो पाहुडों को छोड़कर कोई भी ग्रंथ सौ गाथाओं के आंकड़े को भी नहीं छू सका है; जबकि प्रसिद्ध चार परमागम द्विशताधिक-गाथाओं में ही निबद्ध हैं। परन्तु यह कहकर मैं उन अपेक्षाकतृ लघुकाय-ग्रंथों के प्रतिपाद्य की महत्ता को प्रश्नचिह्नित नहीं कर रहा हू।ँ मैं मात्र इस तथ्य की ओर ध्यानाकर्षण करा रहा हू)ँ में ‘प्रवचनसार’ ग्रंथ के अतिरिक्त सभी कुन्दकुन्द आचार्य देव के विदेहगमन से पहले की रचनायें हैं। एकमात्र ‘प्रवचनसार’ ग्रंथ ही उनके विदेहगमन के बाद की रचना है। इसीलिये ‘प्रवचनसार’ ग्रंथ में कहीं श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी का उल्लेख नहीं है। उसमें प्रायः सर्वत्र केवली और केवलज्ञान की साक्षी से ही कथन मिलते हैं। ‘समयसार’ ग्रंथ उन्होंने नितान्त-अप्रतिबुद्धों के लिये लिखा है, तथा ‘पंचत्थिकायसारसंगहो’ की रचना जैन दार्शनिक-तत्त्वमीमांसा, प्रमाण-नय-मीमांसा के लिये की है; जबकि ‘नियमसार’ ग्रंथ को उन्होंने स्वयं की भावना के निमित्त लिखा कहा है, साथ ही अभिप्राय से समकालीन-मुनिपदधारकों को मुनिधर्म के आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक-पक्षों का बारीकी से विश्लेषण करके उनका भी स्थितिकरण किया है। इन तीनों का विषय कहीं भी ऐसा नहीं रहा है कि जिसके लिये केवली और केवलज्ञान की साक्षी देनी अपरिहार्य हो गयी हो। किन्तु ‘प्रवचनसार’ ग्रंथ के प्रतिपाद्य को इनकी दृष्टि से समीक्षण किये बिना उसका समीचीन-अर्थ पूर्णतः संभव प्रतीत नहीं होता है। और विचारणीय-तथ्य यह भी है कि इन तीन परमागमों में मूलरूप में एवं टीकाकारों के द्वारा कहीं न कहीं श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी या श्रुतकेवली-पद का उल्लेख आया है। जबकि ‘प्रवचनसार’ ग्रंथ में मात्र केवली और केवलज्ञान की ही चर्चा आती है। उनके साक्ष्यपूर्वक ही सभी विषयों की विवेचना की गयी है। (एक अन्य-तथ्य यह भी है कि ‘समयसार’ आदि सभी ‘ग्रंथ’ संज्ञा के सुपात्र ग्रंथ हैं। हममें से बहुत से विचारक तो यह भी नहीं जानते होंगे कि जिनाम्नाय में ‘ग्रंथ’ शब्द भी एक पारिभाषिक-पद है तथा इसके भी नियम और उपनियम बने हुये हैं। हम हर किसी धार्मिक-रचना को ‘ग्रंथ’ कहने लगते हैं, बिना यह जाँचे कि वह ग्रंथ-रचना की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं? यदि श्रद्धा को तर्क और प्रमाण से संवलित कर दिया जाये, तो वह सुमेरू की भाँति अचल बन जाती है। पर उसके लिये हमें समुचित-प्रमाणों की अपेक्षा होती है, और उन पर कसने का श्रम भी हमें करना होता है। यह विषय मैं पहिले विवेचित कर चुका हूँ।) 7. श्रुतकेवली का पारम्परिक-स्वरूप तो उन्होंने स्वीकार किया ही है (बारस-अंग-वियाणं, चउदस-पुव्वंग विउल-वित्थरणं…), साथ ही सम्यक् श्रुतज्ञान के विषयभूत शुद्धात्मतत्त्व के ज्ञान के धारक को भी ‘श्रुतकेवली’ कहकर ‘‘आत्मज्ञान ही ज्ञान है’’ की पुष्टि की और श्रुतकेवली की नूतन आध्यात्मिक-परिभाषा प्रस्तुत की है- ‘‘सुदणाणमाद सव्वं, जम्हा सुदकेवली तम्हा।’’ अर्थात् सम्पूर्ण श्रुतज्ञान या जिनवाणी में एकमात्र आत्मतत्त्व के प्रतिबोध का ही लक्ष्य है, अतः उस निजात्मतत्त्व को जिसने जान लिया अर्थात् उसकी निर्विकल्प-अनुभूति प्राप्त कर ली, उसने सम्पूर्ण-श्रुत (जिनवाणी) को जान लिया, इसलिये वह भी ‘श्रुतकेवली’ है। - यह बात कुन्दकुन्द आचार्य देव के पहले तो किसी भी श्रुतधर-आचार्य ने नहीं कही, उनके बाद भी उनके टीकाकारों के अलावा अन्य कहीं स्वतन्त्र-प्रतिपादन के रूप में यह बात नहीं मिली है। मोही-जीव अज्ञानी और मिथ्यादृष्टि तो होता ही है- यह तो कई ग्रन्थों में लिखा है। किन्तु यह आचार्य कुन्दकुन्द देव का ही विशेष-प्रतिपादन है कि व्रतादि करनेवाला जीव ‘अभव्य’ तक हो सकता है। यह बात इस गाथासूत्र में स्पष्ट शब्दों में कही गयी है- वद-समिदी-गुत्तीओ, सील-तव जिणवरेहि पण्णत्तं। कुव्वंतो वि अभव्वो, अण्णाणी मिच्छदिट्ठी दु।। -( समयसार, गा. 273) 9. ‘आत्मज्ञानरूपी लोकोत्तर एवं भवभ्रमण-नाशिनी-विद्या के रथ पर सवार होकर जो जीव अपने मनचाहे मार्गों पर यथारुचि-भ्रमण करता है, उसे जिनेन्द्र परमात्मा के द्वारा प्ररूपित तत्त्वज्ञान की प्रभावना करनेवाला सम्यग्दृष्टि-जीव जानना चाहिये’। - यह कहकर आचार्य कुन्दकुन्द देव ने स्पष्ट कर दिया है कि सम्यग्दृष्टिजीव भले ही व्रतों को धारण नहीं करने से अविरति-अवस्था में रहे, तब भी उसके कथन और आचरण जिनाम्नाय की मर्यादा से बाहर नहीं होते हैं। वह अविरत-अवस्था में होता हुआ भी अपने कथन और आचरण से जिनेन्द्र परमात्मा के द्वारा प्रतिपादित तत्त्वज्ञान की प्रभावना ही करता है। - यह बात आज के केवल बाह्य-आचरण को सर्वस्व माननेवाले तथा इसके अहं में सम्यग्दृष्टि-जीव की उपेक्षा करनेवाले लोगों को अपने कथन और व्यवहार पर गम्भीरता से विचार करना होगा और जिनाम्नाय की वास्तविकता को समझना होगा।

मूल-गाथा इसप्रकार है- विज्जारहमारूढो, मणोरहपहेसु भमदि जो चेदा।
सो जिणणाण-पहावी, सम्मादिट्ठी मुणेदव्वो।।

-( समयसार, गा. 236) 10. कई लोग खुलकर कहते हैं कि ‘‘कोरी शुद्ध-आत्मा-आत्मा की बातें करने से क्या होगा? अभी तो आत्मानुभूतिरूप-परिणाम ‘अशुद्ध’ है, उसे संयम-तप से शुद्ध करना है। अभी संसार के काम-भोग के प्रपंचों में पड़ा हुआ है। अतः अभी से शुद्ध-आत्मा की चर्चा क्यों कर कहे हो? इससे और भ्रष्ट हो जाओगे।’’ किंतु आचार्य कुन्दकुन्द देव स्पष्ट लिखते हैं कि ‘‘इस जीव ने अनादिकाल से काम-भोग-बंधन की ही कथा सुनी है और उसी को सुन-सुनकर यह अपने को दीन-हीन व पतित मानने लगा है। जबकि वह त्रिकाली-ज्ञायकस्वभावी शुद्ध-तत्त्व है। वह काम-भोग आदि के विकारों से भिन्न त्रिकाल-शुद्ध-स्वभाववाला है। - इस स्वभाव से एकत्वरूप और विकारों से भिन्नरूप चर्चा इसे सुलभ ही नहीं हो सकी है। - यही इसके संसार-चक्र की बिडम्बना का कारण है।’’ - इस विषय का दोटूक-शैली में कथन करनेवाली गाथा इसप्रकार है - सुद-परिचिदाणुभूदा, सव्वस्स वि काम-भोग-बंधकहा। एयत्तस्सुवलंभो, णवरि ण सुलहो विहत्तस्स।। -( समयसार, गा.4) इसप्रकार आचार्य कुन्दकुन्द देव ने अनेकों गाथासूत्रों के माध्यम से ऐसे तथ्यों का स्पष्ट-शब्दों में प्रतिपादन किया है, जो सामान्यतः उपलब्ध-आगमग्रन्थों के आलोक में संभव ही नहीं था। क्योंकि उनके समक्ष उपलब्धआगमग्रन्थों में या तो कर्मों से बद्ध आत्मा का कथन आया है (छक्खंडागमसुत्तं) और या फिर आत्मा के कामक्रोधादि-विकारी-भावों का प्ररूपण मिलता है (‘कसायपाहुडसुत्तं’)। कोई ग्रंथ उनके समक्ष ऐसा नहीं था, जिसमें आत्मा के शुद्धरूप का वर्णन हो। अतः उन्होंने अपनी बात की प्रामाणिकता ज्ञापित करने के लिये ‘‘सुदकेवलीभणिदं’’ कहकर अपने प्ररूपणों की सत्यता व तथ्यात्मकता सिद्ध की है। क्योंकि प्राप्त दो ग्रन्थों (‘छक्खंडागमसुत्तं’ और ‘कसायपाहुडसुत्तं’) का वर्ण्य-विषय तो शुद्धात्मा था ही नहीं। किन्तु केवलियों और श्रुतकेवलियों ने आत्मा के शुद्धरूप का प्रतिपादन किया है। अतएव आचार्य कुन्दकुन्द देव ने अपने कथनों की प्रामाणिकता के लिये ‘श्रुतकेवलि-भणित’ (सुदकेवली-भणिदं) कहा। यह बेहद सुविचारित-प्रयोग है, अविचारित या भावावेश का कथन नहीं है। - इसी की पुष्टि के लिये यहाँ कतिपय-तथ्यों की प्रस्तुति की गयी है। क्योंकि हांडी पकी है या नहीं यह जानने के लिये दो-चार चावल देखना ही पर्याप्त होता है। उन्हें देखने भर से पूरी हांडी का हर चावल पक गया है- यह समझदार-लोग आसानी से समझ जाते हैं। आचार्य कुन्दकुन्द देव अपने सभी ग्रन्थों में पूर्णतः जिनाम्नाय-सम्मत ही प्रतिपादन करते रहे हैं, किन्तु इतना विशेष है कि जिस बेलाग़ और सटीक प्रतिपादन-शैली को उन्होंने अपनाया है, वैसी शैली अपनाने का साहस उनसे पूर्ववर्ती या परवर्ती-आचार्यों/लेखकों ने प्रायः नहीं दिखाया है। यही कारण है कि आज के बहुत से समाजशास्त्रीविचारधारावाले लोगों को आचार्य कुन्दकुन्द देव के ‘पुण्य की हेयता और पाप के समकक्ष बताना,-निश्चय के प्रतिपादन के समक्ष व्यवहार की पूर्ण-उपेक्षा, सम्यग्दर्शन के बिना बाह्याचरण की निरर्थकता, अकर्त्तावाद’- इत्यादि प्ररूपण ‘अतिवादी’ प्रतीत होते हैं। किन्तु जो जिनधर्म के मर्म को समझते हैं, वे इन्हीं स्पष्ट-प्रतिपादनों के कारण आचार्य कुन्दकुन्द को सर्वाधिक महनीय-स्थान देते हैं। क्योंकि यदि आचार्य कुन्दकुन्द देव के ग्रंथों में इन विषयों का ऐसा दोटूक-प्रतिपादन नहीं मिलता, तो जैनदर्शन की वास्तविकता ही लोगों को ज्ञात नहीं हो पाती और यह दर्शन अपनी वास्तविक-महत्ता से वंचित रह जाता। तब इसके अनुयायी भी स्थूल-बाह्याचरण में ही धर्मबुद्धि करके किसी तरह अपने को संतुष्ट करते कि उन्होंने भी कुछ धर्म किया। और जो बाह्याचरण में विशेष नहीं कर पाते, वे यथासंभव पूजा-भक्ति, दया-दान-उपवास-तीर्थयात्रा आदि करके अपने को ऐसी ही तसल्ली देते। कहीं न कहीं ‘‘ईश्वर कुछ तो भला करेगा, नहीं तो पुण्य-कर्मों से ही कुछ भला हो जायेगा। इस भव में सह लो, तो अगले भव में तो सबतरह की सुख-साता मिल ही जायेगी।’’- ऐसी अन्य ईश्वर-कर्त्तावादी, पुण्य-कार्यों को धर्म बतानेवाले दर्शनों की विचारधारा और जैनदर्शन के व्यावहारिकस्वरूप में कोई अंतर नहीं रह जाता। अंतर ऊपरी तौर पर यही दिखता कि वे स्पष्टरूप से स्त्री, हथियार, परिग्रह आदि सहित मूर्तियों को पूज रहे होते और तथाकथित जैन वीतरागी-जिनबिम्बों की पूजा करते। किन्तु उस पूजा के पीछे अभिप्रायों की वासना दोनों की समान रहती। इसकारण न केवल जैन-तत्त्वज्ञान का मर्म वे नहीं समझ पाते, बल्कि कर्मकांडी-दायरे से बाहर आत्मज्ञान और आत्मोन्नतिपरक-साधना से भी वे वंचित रह जाते। इस दृष्टि से आचार्यवर्य कुन्दकुन्द देव का विषय-चयन एवं प्रतिपादन-शैली- दोनों दृष्टियों से अप्रतिम-योगदान जिनाम्नाय के मौलिक-स्वरूप के संरक्षण के लिये है। यह आचार्य कुन्दकुन्द देव एवं उनकी कालजयी-रचना ‘समयसार’ जी के बारे में कुछ संक्षिप्त, किंतु अति-आवश्यक प्रतिपादन किया। चूँकि ‘नाटक-समयसार’ नामक यह रचना इसी पर आधािरत है, अत: यह वर्णन आवश्यक था। ‘समयसार’ और आचार्य अमृतचंद्र सूरि- आचार्य कुन्दकुन्द देव के कालजयी-ग्रन्थों पर कई आचार्यों और मनीषियों ने टीकायें लिखीं हैं ; किन्तु उनके सबसे यशस्वी-टीकाकार के रूप में आचार्य अमृतचन्द्र सूरि का नाम आता है। यद्यपि उनकी कुन्दकुन्द आचार्य देव के हर ग्रन्थ की टीका एक ‘मील के पत्थर’ की तरह महत्त्वपूर्ण है, तथापि आचार्य कुन्दकुन्द देव के सर्वाधिक-चर्चित ग्रन्थ ‘समयसार’ की ‘आत्मख्याति’ नामक टीका, जिसे लोग आचार्य अमृतचंद्र सूरि के वैशिष्ट्य के कारण ‘अमृतभाष्य’ भी कहते हैं, का यहाँ मैं विशेषरूप से उल्लेख करना चाहता हूँ। आचार्य अमृतचंद्र सूरि अपने की विशिष्ट-प्रतिपादनों एवं अनोखी प्रतिपादन-शैली के कारण चर्चित रहे हैं।’ समयसार’ ग्रंथ की टीका में आगत उनका यह कलशरूप काव्य उपर्युक्त-विषय में मानो सब कुछ कह देता है - ‘‘सर्वत्राध्यवसानमेवमखिलं, त्याज्यं यदुक्तं जिनै स्तन्मन्ये व्यवहार एव निखिलोऽप्यन्याश्रितस्त्याजितः। सम्यङ्निश्चयमेकमेव तदमी, निष्कम्पमाक्रम्य किं, शुद्धज्ञानघने महिम्नि न निजे, बध्नन्ति सन्तो धृतिम्।।’’ इसमें आचार्य अमृतचंद्र सूरि आचार्य कुन्दकुन्द देव के कथन ‘‘सभी अध्यवसान-भाव त्यागने योग्य हैं’’- को साक्षात् जिनेन्द्रदेव का वचन बताते हुये यह कहते हैं कि ‘‘मैं तो इस कथन का अभिप्राय यह समझ रहा हूँ कि यह कहकर जिनेन्द्र देव ने समस्त पराश्रित-व्यवहार को ही त्यागने योग्य बतलाया है।’’ ‘आत्मख्याति-टीका’ की यह बहुत बड़ी विशेषता रही है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव के वचनों का व्याख्यान तो आचार्य अमृतचंद्र सूरि ने इसमें गद्य-भाग में स्फुट-रीति से किया है। किन्तु जहाँ कहीं वे उस विषय के विशदीकरण के लिये कुछ स्वतन्त्ररूप से भी या अपनी ही शैली में कहना चाहते थे, वहाँ उन्होंने गद्य-प्रबन्ध छोड़कर पद्य-शैली का आश्रय लिया है। इन पद्यों को मनीषियों ने ‘कलश’ की समुचित-संज्ञा प्रदान की है। जैसे कि ‘कलश’ मूल-भवन का सीधे अंगरूप तो नहीं होता है, किन्तु उस भवन का शोभा-सौन्दर्य उसके बिना अपूर्ण रहता है साथ ही ये कलश मांगलिकता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होते हैं। लगभग यही स्थिति ‘समयसार’ ग्रन्थ की ‘आत्मख्याति-टीका’ में आगत इन पद्यात्मक-कलशों की है। अतः इनकी यह ‘कलश’ संज्ञा अन्वर्थक है। इन कलशों को आचार्य कुन्दकुन्द देव के ‘समयसार’ ग्रन्थ के प्रतिपाद्य पर आधारित होते हुये भी आचार्य अमृतचंद्र सूरि के शैलीगत-वैशिष्ट्य के आधार पर मौलिक मानकर दोनों ही आचार्यों का प्रतिनिधित्व इनमें समानरूप से स्वीकार किया गया है। पांडे राजमल्ल जी और उनकी ‘बालबोधिनी-टीका’- जयपुर के निकट स्थित ‘विराट’ नगर में मुगल बाहशाह अकबर के शासनकाल में ये हुये, और शाहजहाँ के काल तक रहे। इन्हें इनके निकट-उत्तरकालवर्ती कविवर पं. बनारसीदास जी ने ‘पांडे’ विरुद से ससम्मान उल्लिखित किया है- ‘‘पांडे राजमल्ल जिनधर्मी, नाटक-समयसार के मर्मी।’’ संभवत: इन्हें आज के जातिवाचक-शब्द के रूप में ‘पांडे’ विरुद का प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि ‘पंडित’ या ‘विद्वान्’ के रूप में इसका प्रयोग सादर बहुमान व्यक्त करने के लिये कविवर पं. बनारसीदास जी ने वहाँ किया है, जो कि इनके इतिवृत्त से भी ज्ञापित होता है। पांडे राजमल्ल जी का इतिवृत्त- बादशाह अकबर के काल मे विराटनगर में क्षेमकीर्ति नामक भट्टारक के आम्नाय में ‘भारु’ नामक वैश्य/ व्यापारी निवास करते थे। इन्हीं भारु वैश्य के चार पुत्र हुये- 1.दूदा, 2. ठाकुर, 3. जागसी और 4. तिलोक। इनमें से दूदा के तीन पुत्र हुये- 1. न्यौता, 2. भोल्हा,और 3. फामन। इनमें से ‘फामन’ नामक पुत्र किसी कार्यवश विराटनगर आया और वहाँ पर उसने हेमचन्द्राचार्य की आम्नाय के ‘ताल्हू’ नामक विद्वान् से जैनधर्म की शिक्षा प्राप्त की। फिर वह ‘ताल्हू’ नामक वैश्यपुत्र कविराज पांडे राजमल्ल जी के पास आया और उसी ताल्हू के अनुरोध पर राजमल्ल जी ने ‘लाटीसंहिता’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी। उसके बाद पांडे राजमल्ल जी ने आचार्य कुन्दकुन्द देव द्वारा विरचित ‘समयसार’ ग्रन्थ पर आचार्य अमृतचंद्र सूरि द्वारा विरचित ‘आत्मख्याति’ नामक टीका में आगत ‘कलश’ संज्ञा से विख्यात पद्यों पर ‘समयसार-कलश टीका’ नामक विश्रुत व्याख्या-ग्रन्थ लिखा। इनके अतिरिक्त इन्होंने ‘पंचास्तिकाय-टीका’, ‘पंचाध्यायी’, ‘जंबूस्वामीचरित्र’, ‘पिंगल-छन्द:शास्त्र’ एवं

‘अध्यात्म-कमल-मार्त्तण्ड’ नामक ग्रन्थों की रचना भी की है।
इनका समय विक्रम-संवत् 1632-1650 यानि विक्रम की सत्रहवीं शताब्दी माना जाता है।

इनके विषय में प्रायः यह आक्षेपात्मक-आशंका व्यक्त की जाती है कि ‘‘ये तो काष्ठासंघी थे। तो इन्हें कुन्दकुन्द के आम्नाय का कैसे माना जा सकता है?’’ किन्तु यह आशंका महत्त्वहीन है; क्योंकि इनके काष्ठासंघी होने का कोई प्रमाण नहीं है। वस्तुस्थिति यह है कि इनके समकालीन भट्टारक क्षेमकीर्ति ‘काष्ठासंघ’ के ‘माथुरगच्छ’ के ‘पुष्करगण’ के भट्टारकों की आम्नाय में हुये थे। यद्यपि यह आम्नाय आचार्य कुन्दकुन्द देव के आम्नाय के अनुकूल नहीं है ; तथापि वे भट्टारक क्षेमकीर्ति आचार्य कुन्दकुन्द देव के आध्यात्मिक-तत्त्वज्ञान से बहुत प्रभावित थे और उन्होंने विद्वद्वर्य पांडे राजमल्ल जी की जैनदर्शन की तलस्पर्शी-मनीषा को परखकर उनसे आचार्य कुन्दकुन्द देव के ग्रन्थों पर विशदव्याख्यात्मक-रचनायें लोकभाषा में लिखने की प्रेरणा दी थी, ताकि जो आम जैनी-जन संस्कृत और प्राकृत-भाषाओं के अभ्यस्त नहीं हैं, वे भी आचार्य कुन्दकुन्द देव के परमागमों का रहस्य समझ सकें। इस उल्लेख से भट्टारक क्षेमकीर्ति के काष्ठासंघ की आम्नाय का होते हुए भी आचार्य कुन्दकुन्द देव की आम्नाय से अतिप्रभावित होने का प्रमाण तो मिलता है, किन्तु पांडे राजमल्ल जी के काष्ठासंघी होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है। यह एक संयोग मात्र है कि ये दोनों न केवल समकालीन थे, बल्कि भट्टारक क्षेमकीर्ति ने पांडे राजमल्ल जी को कुन्दकुन्द आचार्य देव के परमागमों की लोकभाषा में व्याख्या करने का परामर्श उनकी प्रतिभा और क्षमता को परखकर दिया था। इस विवरण से तो यह सिद्ध होता है कि पांडे राजमल्ल जी जैन-तत्त्वज्ञान के मर्मज्ञ मनीषी-साधक थे और उन्होंने अपने ज्ञान व साधना से समकालीन भिन्न-आम्नायवाले भट्टारकों को भी प्रभावित करके आचार्य कुन्दकुन्द देव की मूल-आम्नाय से अनुप्राणित कर लिया था। अत: ‘समयसार कलश-टीका’ के यशस्वी-प्रणेता तत्त्वज्ञान-मनीषी कविवर पांडे राजमल्ल जी के काष्ठासंघ की आम्नाय के अनुयायी होने की बात निरर्थक एवं निर्मूल है। पांडे राजमल्ल जी का वैदुष्य- ‘समयसार कलश-टीका’ के प्रणेता एवं अन्य कई कलजयी-ग्रन्थों के रचयिता पांडे राजमल्ल जी व्याकरण, छंदशास्त्र, जैनसिद्धान्त, स्याद्वाद और आध्यात्मिक-तत्त्वज्ञान के अधिकारी मनीषी थे; जिनकी प्रतिभा का लोहा प्रायः सभी इनके समकालीन व उत्तरकालवर्ती-मनीषियों ने माना है। ‘लाटीसंहिता’ नामक जैन-श्रावक आचार के ग्रन्थ में उन्होंने स्वयं को ‘‘स्याद्वादानवद्य-गद्य-पद्य-विद्या-विशारद..’’ कहा है। आधुनिक विद्वान् पं. परमानंद शास्त्री जी ने पांडे राजमल्ल जी के वैदुष्य एवं व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुये लिखा है कि ‘‘पांडे राजमल्ल जी की कलश-टीका से अनेक लोग अध्यात्म-रस का पान करने में समर्थ हो सके हैं। आपका व्यक्तित्व प्रभावशाली था और उनके चित्त में जनकल्याण की भावना सदा जागृत रहती थी। खासकर राजस्थान के ‘मारवाड़’ और ‘मेवाड़’-प्रांत में विहार करके जनकल्याण करते हुये यश और प्रतिष्ठा प्राप्त की। उनके विशुद्ध-परिणाम और सर्वोपकारिणी-बुद्धि- इन दोनों गुणों का एकत्र सम्मेलन उनके बौद्धिक-जीवन की विशेषता थी। उनकी ‘अध्यात्म कमल-मार्त्तण्ड’ और ‘पंचाध्यायी’ कृतियाँ उनके अध्यात्मानुभव और स्याद्वाद-सरणी की निर्देशक हैं। वे जहाँ जाते, वहाँ उनका स्वागत होता था। ‘’ बालबोधिनी-टीका का वैशिष्ट्य- इस टीका का नामकरण लेखक ने ‘बालबोधिनी-टीका’ किया है। और संभवत: इसे चरितार्थ करने के लिए ही उन्होंने ‘पद-व्याख्या-शैली’ को इस टीका में अपनाया है। यद्यपि यह टीका ‘समयसार’ ग्रंथ पर आचार्य अमृतचंद्र सूरि कृत ‘आत्मख्याति’ नामक टीका में आगत-पद्यों पर है, जिन्हें ‘कलश’ की संज्ञा दी गयी है। किन्तु इन कलशों को लगभग स्वतंत्र-कृति मानकर यह टीका लिखी गयी है, न कि सम्पूर्ण ‘आत्मख्याति’ टीका पर। इससे स्पष्ट है कि ‘आत्मख्याति’ नामक इस टीका में आगत ये कलश इस टीका के अंग होते हुये भी पांडे राजमल्ल जी ने इन कलशों को लगभग स्वतंत्र व मौलिक-रचना मानकर इन पर यह ‘बालबोधिनी-टीका’ लिखी है। इसका नामकरण अवश्य ‘बालबोधिनी’ है; किन्तु ऐसा नहीं है कि यह मात्र बालबोधिनी-स्तर की ही टीका हो। यह कविवर पांडे राजमल्ल जी के वैदुष्य के प्रतिमानों के अनुरूप भरपूर प्रगल्भ-टीका है। बस, इसकी प्रस्तुतीकरण की भाषा-शैली ही सरल होने से इसकी ‘बालबोधिनी’ संज्ञा अन्वर्थक सिद्ध होती है। इस टीका के विषय में बीसवीं शताब्दी के मूर्धन्य जैन-मनीषी पं. फूलचन्द्र जी सिद्धान्ताचार्य के विचार मननीय हैं- ‘’ यह टीका मोक्षमार्ग के अनुरूप अपने स्वरूप को स्वयं प्रकाशित करती है, इसलिये तो प्रमाण है ही। साथ ही वह जिनागम, गुरु-उपदेश, युक्ति और स्वानुभव-प्रत्यक्ष को प्रमाण कर लिखी गयी है, इसलिये भी प्रमाण है। क्योंकि जो स्वरूप से प्रमाण न हो, उसमें परत: प्रामाणिकता नहीं आती है- ऐसा न्याय है। यद्यपि यह ढूँढारी-भाषा में लिखी गयी है, फिर भी गद्यकाव्य-सम्बन्धी शैली और पद-लालित्य आदि सब विशेषताओं से ओतप्रोत होने के कारण यह भव्यजनों के चित्त को आह्लाद उत्पन्न करने में समर्थ है। वस्तुतः इसकी रचनाशैली और पद-लालित्य की अपनी विशेषता है।’’ वे आगे इस टीका की विशेषता को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि कविवर ने प्रत्येक शब्द का अर्थ प्रायः शब्दानुगामिनी-पद्धति से न करके भावानुगामिनी-पद्धति से किया है।… इसप्रकार यह टीका प्रत्येक कलश के मात्र शब्दानुगामी-अर्थ को स्पष्ट करनेवाली टीका न होकर उसके रहस्य को प्रकाशित करनेवाली भावप्रवण-टीका है।‘’ आचार्य कुन्दकुन्द देव और आचार्य अमृतचंद्र सूरि- दोनों के वचनों को यहाँ आधार बनाकर पांडे राजमल्ल जी ने अपनी ‘बालबोधिनी-टीका’ में, जिसे आज ‘समयसार-कलश-टीका’ के नाम से भी जाना जाता है, में युगधर्मिता के अनुरूप भाषा-शैली एवं प्रतिपाद्य- तीनों में कई विशिष्ट-प्रयोग किये हैं। ऐसे प्रयोगों में कुछ बानगियाँ द्रष्टव्य हैं- कलश 1. ‘‘शुद्ध-जीव के सुख है, ज्ञान भी है… इसलिये शुद्ध-जीव के सारपना घटता है।’’- यह तर्क पांडे राजमल्ल जी की बेलाग और असन्दिग्ध-व्याख्याशैली का निदर्शन है। जीव-पदार्थ ही सारभूत क्यों है?- इसकी सिद्धि इस छोटे से वाक्य में पांडे राजमल्ल जी ने सक्षमरीति से कई है। कलश 2. ‘‘वितर्क’’- ‘‘दिव्यध्वनि तो पुद््गलात्मक है, अचेतन है, अचेतन को नमस्कार निषिद्ध है।’’ समाधान- ‘‘वाणी सर्वज्ञस्वरूप-अनुसारिणी है।… उसको सुनने पर जी आदि पदार्थ का स्वरूप-ज्ञान जिसप्रकार उपजता है, उसीप्रकार जानना, वाणी का पूज्यपना भी है।’’- इसमें तर्कों से अप्रभावित हुये बिना तथ्य की पुष्टि के लिये बेहतर-आधार प्रस्तुत करके उसे समीचीन सिद्ध किया है। कलश 4. ‘‘वचन पुद््गल है, उसकी रुचि करने पर स्वरूप की प्राप्ति नहीं। इसलिये वचन द्वारा कही जाती है जो कोई उपादेय-वस्तु, उसका अनुभव करने पर फल-प्राप्ति है।’’- इस कथन में परस्पर-विरोध का परिहार अत्यन्त-सावधानी से निर्भ्रान्त-रीति किया गया है। कलश 7. ‘‘जो नौ परिणाम में ही देखा जाये, तो नौ ही तत्त्व साँचे हैं और जो चेतना-मात्र अनुभव किया जाये, तो नौ ही विकल्प झूठे हैं।’’- इसमें ‘नवतत्त्वगतत्वेSपि यदेकत्वं न मुञ्चति’ का बेहद सरल, संक्षिप्त, लेकिन सटीक-स्पष्टीकरण किया गया है। कलश 11. ‘‘निरुपाधिरूप से जीवद्रव्य जैसा है, वैसा ही प्रत्यक्षरूप से आस्वाद आवे, इसका नाम शुद्धात्मानुभव है।’’ -इसमें निर्मल-आत्मानुभूति की विधि का बेलाग और स्पष्ट-प्रतिपादन किया गया है। कलश 14. ‘‘शुद्धात्मानुभति ू मोक्षमार्ग है, इसलिये शुद्धात्मानुभति ू के होने पर शास्त्र पढ़ने की कुछ अटक नहीं है।’’ -यह निर्णय मननीय है, क्योंकि शास्त्र से अब उस ज्ञानी-जीव को आत्महित के लिये कुछ नया जानना शेष नहीं है- यह सत्य है, इसलिये अटक नहीं है कि शास्त्रों को पढ़े ही पढ़े। फिर भी जब तक उपयोग स्वरूप में स्थिर नहीं हो जाता है, तब तक जिनवाणी माँ में उपयोग नहीं रमायेगा, तो कहाँ रमायेगा? अतः इसे आत्मानुभवियों के लिये स्वाध्याय के निषेध का प्रमाणपत्र नहीं मानना, मात्र अटक या मजबूरी/अनिवार्यता नहीं है- यही इसका अभिप्राय लेना। कलश 15. ‘‘मोक्ष जाने में किसी द्रव्यान्तर का सहारा नहीं है, इसलिये शुद्ध-आत्मा का अनुभव करना चाहिए।’’- यह बहुत दोटूक-निर्णयात्मक मार्गदर्शन है, जिससे पराश्रितता की आशात्मक-बुद्धि छूटकर मात्र स्वानुभूति की ही रुचि जागृत होती है। कलश 37. ‘‘शुद्ध-स्वरूप का अनुभव जानना, जो सम्यग्दृष्टि के होता है।’’- यह सम्यग्दृष्टि-मात्र के लिये कहा गया है, चाहे वह प्रथमोपशम-सम्यग्दृष्टि हो, अविरति हो, देशव्रती हो या महाव्रती, सबके लिये आत्मानुभूति सम्यग्दर्शन के लिये अनिवार्य-तत्त्व है- यह स्पष्ट-दिशानिर्देश किया गया है। कलश 51. ‘‘जीवद्रव्य का और पुद््गलद्रव्य का एकसत्त्व नहीं है, कर्त्ता-कर्म-क्रिया की कौन घटना?’’- इसका स्पष्टीकरण कविवर पं. बनारसीदास जी ने ‘नाटक-समयसार’ में बहुत अच्छे ढंग से किया है। जिनका सत्त्व ही भिन्न हो, उनमें कर्त्ता-कर्म-क्रिया के संबंध घटित करने की संभावना तक का यहाँ पूर्णतः निषेध कर दिया गया है। कलश 52-53. ‘‘एकसत्त्व में कर्त्ता-कर्म-क्रिया उपचार से कहा जाता है। भिन्न-सत्त्वरूप है जो जीवद्रव्यपुद््गलद्रव्य, उनको कर्त्ता-कर्म-क्रिया कहाँ से घटेगा?’’- इसमें ऊपर की बात को ही स्पष्ट किया गया है। साथ ही यह कथन बेहद मननीय है कि एकसत्त्व में भी जो कर्त्ता-कर्म-क्रिया के संबंध कहे जाते हैं, वे भी उपचरित ही हैं। तो अन्यसत्त्व के साथ तो ये संबंध उपचार से भी नहीं कहे जा सकते हैं। अन्य-सत्त्व में ऐसे संबंधों की कल्पना करना स्पष्टरूप से मिथ्यात्व ही है। कलश 91. ‘‘शुद्ध चैतन्य-वस्तु है, सो मेरा स्वभाव है, अन्य समस्त कर्म की उपाधि है।’’- आज कुछ लोग तो बाहरी हर्ष-विषाद आदिरूप राग-द्वेष-मोह की वृत्तियों को भी आत्मा की कहते हैं, वे जिनाज्ञा का स्पष्टरूप से उल्लंघन कर रहे हैं- यह इस कथन से प्रमाणित होता है। मात्र निष्कलंक-चैतन्य के अलावा कोई भी वृत्ति आत्मा का स्वरूप न तो हो सकती है और न ही कही जा सकती है। कलश 92-93. ‘‘जितना नय है, उतना श्रुतज्ञानरूप है। श्रुतज्ञान परोक्ष है, अनुभव प्रत्यक्ष है। इसलिये श्रुतज्ञान बिना जो ज्ञान है, वह प्रत्यक्ष अनुभवता है।’’- यह अद््भुत-स्पष्टीकरण है। छद्मस्थ-जीव के और कौन-सा ज्ञान संभव है? क्योंकि केवलज्ञान उसे है नहीं, अवधि-मनःपर्ययज्ञान मात्र पुद््गल को ही विषय करते हैं। तब मतिश्रुत ही बचे, जिनका यहाँ निषेध कर दिया है, तो कौन-सा ज्ञान हो सकता है, जिससे छद्मस्थ-जीव को आत्मानुभूति होती है?- यह तो यक्षप्रश्न जैसी बात हो गयी। चूँकि पाँच ज्ञानों में से तो तकनीकरूप से उसे ‘श्रुतज्ञान’ ही कहा गया है, किन्तु उस आत्मानुभूति करनेवाले ज्ञान की श्रुतात्मकता का दो टूक-शब्दों में निषेध पांडे राजमल्ल जी के द्वारा किया जाना बेहद-महत्त्वपूर्ण है। इससे उन्होंने श्रुतज्ञान की पराश्रयी, विकल्पात्मक एवं परोक्षरूप-वृत्तियों का स्पष्टरूप से निषेध करके बहुत-बड़ा निर्णय दे दिया है। कलश 101. ‘‘कोई जीव शुभोपयोगी होता हुआ यतिक्रिया में मग्न होता हुआ शुद्धोपयोग को नहीं जानता, केवल यतिक्रिया मात्र में मग्न है। वह जीव ऐसा जानता है कि ‘मैं तो मुनीश्वर हूँ, हमको विषय-कषाय-सामग्री निषिद्ध है’- ऐसा जानकर विषय-कषाय-सामग्री को छोड़ता है, आपको धन्य मानता है, मोक्षमार्ग मानता है। सो विचार करने पर ऐसा जीव मिथ्यादृष्टि है। कर्मबन्ध को करता है, कोई भलापना तो नहीं है।’’- इसमें तो आज के सभी मुनिपदधारकों का मनोवैज्ञानिक-विश्लेषण ही प्रस्तुत कर दिया है। परन्तु आज तो कई मुनिपद-धारक बड़े ही ईमानदार(?) हो गये हैं, वे स्वीकार करते हैं कि ‘‘वे वास्तव में दिगम्बर-जैन-मुनिराज की चर्या बिल्कुल नहीं कर रहे हैं’’, फिर भी वे अपने आप को दिगम्बर-जैन मुनिराज के रूप में मनवाने व पुजवाने में पीछे नहीं रहते- इस मनोवृत्ति की कल्पना तो यहाँ पांडे राजमल्ल जी ने भी नहीं की है। कलश 104. ‘‘शुभ-अशुभ-क्रिया में मग्न होता हुआ जीव ‘विकल्पी’ है, इससे दुःखी है। क्रिया-संस्कार छूटकर शुद्ध-स्वरूप का अनुभव होते ही जीव निर्विकल्प है, इससे सुखी है।’’- भाषा के कुछ अंतर को भुला दें, तो इसमें पुण्य और पाप-दोनों के परिणामों से जीव दुःखी ही रहता है- इसकी आत्मिक-कारण-मीमांसा को पांडे राजमल्ल जी ने बड़े कौशल से सिद्ध किया है। और इसी आधार पर सुखी होने के लिये पुण्य और पाप- दोनों की क्रियाओं में जो अपनत्व या हेयोपादेयपने का संस्कार है, उसको भी त्यागने की अनिवार्यता प्ररूपित की है। - न्यूनतम-शब्दों में इतनी गहराई की यह बात अन्यत्र दुर्लभ है। कलश 109. ‘‘यहाँ ज्ञानमात्र को मोक्षमार्ग कहा, सो क्यों कहा? उसका समाधान ऐसा है- शुद्ध-स्वरूप-ज्ञान में सम्यग्दर्शन, सम्यक्चारित्र सहज ही गर्भित है, इसलिये दोष तो कुछ है नहीं, गुण है।’’- इसमें शंका-समाधान-शैली में जो बात पांडे राजमल्ल जी ने कही है, वह ‘ज्ञान ही सर्व-समाधानकारक है’- इस आगम-कथन की सतर्क-सिद्धि करती है। यह विषय मुमक् ु -षु जगत् के लिये भी बहुत मननीय है, क्योंकि हम लोग श्रद्धा के सुधार को ही सब कुछ मानते हैं, कि ज्ञान और चारित्र- दोनों इसके सुधरते ही सम्यक् हो जाते हैं। किंतु पांडे राजमल्ल जी ने यहाँ जो ज्ञान को ही मोक्षमार्ग कह दिया, और युक्तिपर्वू क सिद्ध भी कर दिया है, उसका मर्म वस्तुतत्त्व की दृष्टि से बहुत मननीय है। कलश 153. ‘‘जिसप्रकार किसी को रोग, शोक, दारिद्र्य बिना वांछा के ही होते हैं, उसीप्रकार सम्यग्दृष्टिजीव के जो कोई क्रिया होती है, सो बिना वांछा के ही होती है।’’- जो यह कहा गया है कि ‘‘सम्यग्दृष्टि के भोग निर्जरा के हेतु हैं’’- इसकी कारणता को पांडे राजमल्ल जी ने अद््भुत-कौशल से सरलतम-शब्दों में स्पष्ट किया है। आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ‘प्रवचनसार’ जी ग्रन्थ में ‘‘अरिहंत-अवस्था में बैठना, गमन करना आदि कार्य बिना सोच-विचार किये ही स्त्रियों में जन्मजात-संस्कारवश पायी जानेवाली मायाचार की प्रवृत्ति के समान सहज होते हैं’’- यह सिद्ध किया है; तो पांडे राजमल्ल जी ने सम्यग्दृष्टि के भोग भी अबंधक हैं- यह बात यहाँ अद्भुत-दृष्टांत का प्रयोग करके सिद्ध की है। अकाट्य व सभी को तत्काल समझ में आने योग्य दृष्टान्त का यह प्रयोग अतुलनीय है। कलश 212. ‘‘जीवद्रव्य समस्त ज्ञेयवस्तु को जानता है- ऐसा तो स्वभाव है; परन्तु ज्ञान ज्ञेयरूप नहीं होता है, ज्ञेय भी ज्ञानरूप नहीं परिणमता है- ऐसी वस्तु की मर्यादा है।’’- जो ज्ञान के स्व-पर-प्रकाशकत्व की दुविधायें हैं, उन सभी का सरलता-समाधान अकाट्य-शब्दों में पांडे राजमल्ल जी ने यहाँ प्रस्तुत किया है। ज्ञान-ज्ञेय-सम्बन्ध जानने के स्तर पर भिन्न हैं और वस्तुगत-सम्बन्धों के स्तर पर भिन्न हैं- यह जिनाम्नाय की गम्भीरतम-विवेचना पांडे राजमल्ल जी ने जैसे चुटकियों में हल कर दी है, और वह भी नितान्त असन्दिग्धरूप से!! अद्भुत-कौशल है यह। ये पांडे राजमल्ल जी की कलश-टीका की कुछ बानगियाँ मैंने चुनकर आपके समक्ष रखीं हैं। ऐसे प्रयोगों के मनोहारी-संग्रह का नाम ही तो ‘कलश-टीका’ है। अतः इनसे आकर्षित भले ही होइये, परन्तु कलश-टीका का पूरामर्म तो आमूलचूल-स्वाध्याय करने से ही मिलेगा। कलश-टीका के आधार-ग्रन्थ ‘आत्मख्याति’ का वैशिष्ट्य- यह बात मैं यहाँ विशेषरूप से उल्लेखनीय मानता हूँ कि पांडे राजमल्ल जी ने इस कलश-टीका में अनेकत्र आचार्य कुन्दकुन्द देव के ‘समयसार’ ग्रन्थ को ‘नाटक’ या ‘नाटक-समयसार’ की संज्ञा प्रयोग की है। वैसे इसके मूल-प्रयोक्ता तो ‘आत्मख्याति-टीका’ के रचयिता आचार्य अमृतचंद्र सूरि हैं, जिन्होंने नाट्यशास्त्रीय-प्रयोगों को परिलक्षित करते हुये यह टीका लिखी है। इसमें आगत ‘पूर्वरंग’, ‘अथ सूत्रावतारः’ जैसे पदों/वाक्यांशों का प्रयोग किया है। साथ ही नाटक में होनेवाले संवादों (डॉयलॉग्स) की शैली में टीका की उत्थानिकाओं में जीवंत-भाषाशैली में प्रश्नों को लिखकर गाथाओं को उनका उत्तर बनाया है। कुछ बानगियाँ देखें -

1. ‘‘कोSसौ शुद्धात्मा इति चेत्?’’- इस प्रश्न के उत्तर में छठवीं गाथा दी है।
2. ‘‘तर्हि परमार्थ एव वक्तव्य इति चेत्’’- इस प्रश्न के उत्तर स्वरूप आठवीं गाथा दी है।

3.‘‘कुतो व्यवहारनयो नानुसर्तव्यः इति चेत्’’- इस प्रश्न के उत्तर में ग्यारहवीं गाथा दी है। ऐसे प्रश्नोत्तर निरन्तर संवाद-शैली में चलते रहते हैं। जब पहला-अधिकार पूर्ण होता है, तो उसे ‘पीठिका’ मानकर नाट्यशास्त्रीय-शैली का अनिवार्य-प्रयोग ‘पूर्वरंग’ पूरा हुआ- ऐसा मानकर जैसे नाटक में ‘पूर्वरंग’ की समाप्ति पर सूत्रधार सभी दर्शकों/सभासदों को नाटक के रस का आनन्द उठाने की प्रेरणा देता है, बिल्कुल उसी भाषा-शैली में आचार्य अमृतचंद्र सूरि ने भी समस्त लोक को इस ‘समयसार’ रूपी नाटक के शांतरस के प्रवाह में आमग्न होने की प्रेरणापूर्ण-आह्वान किया है - ‘‘मज्जंतु निर्भरममी सममेव लोका, आलोकमुच्छलति शांतरसे समस्ताः। आप्लाव्य विभ्रम-तिरस्करिणीं भरेण, प्रोन्मग्न एष भगवानवबोधसिन्धुः।।’’ और इसके साथ ही वे ‘‘इति श्रीसमयसारव्याख्यायामात्मख्यातौ पूर्वरङ्गः समाप्त’’ कहकर इसकी पुष्टि करते हैं। यह भी आश्चर्य की बात है कि जहाँ नाटक शांतरस-प्रधान नहीं होकर शृंगार, वीर, हास्य आदि रसों की प्रधानता लिये होता है, तो आचार्य अमृतचंद्र सूरि ने अपनी इस टीका में अपने शब्दचयन के कौशल से उन सभी रसों का आस्वादन कराते हुये इसके शांतरस की प्रधानता को चरितार्थ करके बताया है। - एक साहित्यकार के रूप में उनका यह प्रयोग सम्पूर्ण नाट्य-साहित्य के लिये अनोखा तो है ही, अद्वितीय भी बन गया है। चूँकि पांडे राजमल्ल जी ने अपनी टीका आचार्य अमृतचंद्र सूरि के कलशों पर भले ही लिखी है, किन्तु वस्तुगतरूप से ये कलश हैं तो ‘आत्मख्याति-टीका’ के ही अंग, अतः नाटकत्व की अवधारणा को उन्होंने यहीं से पूरीतरह से स्वीकार करते हुये ‘समयसार’ ग्रंथ को ‘नाटक-समयसार’ की ही संज्ञा प्रयुक्त की है। देखिये - ‘‘नाटक-समयसार में अमृतचन्द्र सूरि ने कहा जो यह साध्य-साधक-भाव, सो सम्पूर्ण हुआ। नाटकसमयसार शास्त्र पूर्ण हुआ। - यह आशीर्वाद-वचन है।’’ - इसप्रकार उन्होंने अधिकांश-स्थलों पर ग्रन्थ का नाम ‘नाटक-समयसार’ ही उल्लिखित किया है। ‘समयसार-कलश-टीका’ और कविवर बनारसीदास जी- प्रतीत होता है कि कविवर पं. बनारसीदास जी ने जो अपनी कृति का नाम ‘नाटक-समयसार’ रखा है, वह पांडे राजमल्ल जी की इस कलश-टीका से ही लिया गया है। यद्यपि ऐसे प्रयोगों इस कृति में प्रचुर-परिमाण में उपलब्ध हैं और उनका वर्गीकृत-विवेचन ही नहीं, बल्कि तुलनात्मक-अध्ययन शोधपरक-दृष्टि से स्वतंत्र-शोधप्रबन्ध का निर्माण कर किसी मर्मज्ञ-मनीषी के निर्देशन में हो, तो इस कृति के साथ संभवतः सही न्याय हो सकेगा। इसका अप्रतिम-महत्त्व समझने के लिये ‘नाटक-समयसार’ ग्रंथ के प्रणेता कविवर पं. बनारसीदास जी के पांडे राजमल्ल जी एवं इस कलश-टीका के विषय में कहे गये वचनों को ही मूलरूप में प्रस्तुत करना अपेक्षित समझता हूँ-

''पांडे राजमल्ल जिनधर्मी, नाटक-समयसार के मर्मी।
तिन्हें ग्रन्थ की टीका कीन्ही, बालबोध सुगम करि दीन्ही।।
इहविधि बोध-वचनिका फैली, समै पाय अध्यातम-सैली।

प्रगटी जगत्-माँहिं जिनवाणी, घर-घर नाटक-कथा बखानी।।‘’

''नाटक-समयसार हित जीका, सुगमरूप राजमल टीका।
कवितबद्ध-रचना जो होई, भाषा-ग्रन्थ पढ़ै सब कोई।।
तब बनारसी मन में आनी, कीजे तो प्रगटै जिनवानी।

पंच-पुरुस की आज्ञा लीनी, कवितबन्ध की रचना कीनी।।‘’ (वे पाँच-पुरुष थे- 1.पं. रूपचंद जी, 2.चतुर्भुज जी, 3. भैया भगवतीदास जी, 4. कोरपाल/कुँअरपाल जी, और 5. धर्मदास जी।)

ग्रंथकार कविवर पं. बनारसीदास जी का संक्षिप्त जीवन-परिचय

जैसे नारियल के व्यक्तित्व में अधिकांश-स्वरूप नीरस व रूखा ही प्रतीत होता है, क्योंकि उसका तना अत्यन्त-कंटीलावत् होने से उस पर आरोहण करना अति-दुष्कर होता है; उसके फल पर भी बेहद जटिल-आवरण और कठोर-खोल चढ़ा होता है, जिसके परिणामस्वरूप उसको पाना तक बहुत कष्टप्रद एवं श्रमसाध्य हो जाता है। इतने अपार-कष्टों को सहने के बाद जाकर कहीं वह नारिकेल-फल का मधुरिम-सार प्राप्त हो पाता है। इसीप्रकार जैन-विद्वज्जगत् के महामनीषी कविवर पं. बनारसीदास जी का जीवनवृत्त भी आपके नरदेह-ग्रहण करने के पहले से ही मानो उस परिवार में प्रादुर्भूत होने लगा था। उनके दादाजी एवं पिताश्री के जीवनरूपी वंशबेलि नारियल के वृक्ष की तरह दुराराध्य रही, तो स्वयं कविवर का जीवन बाल्यावस्था में नारियल के जटाजूट की तरह नीरस व जटिलताओं से आपूर्ण रहा। पुनः विषमताओं से जूझते हुये किसीतरह यौवनावस्था प्राप्त हुई, तो विषयों के कठोर-कवच ने मानों उनके व्यक्तित्व को पूरीतरह से जकड़कर अभिभूत करके रखा। कहीं से भी तत्त्वज्ञान के प्रवेश-हेतु अवकाश नहीं दिख रहा था। तभी मानो नारियल के कवच के शिरोभाग पर बने तीन संक्षिप्त-छिद्रों से पोषित नारिकेल-फल का निर्माण होने के लिये 1. पांडे राजमल्ल जी, 2. पाँच साधकजन एवं 3. कविवर की होनहार- ये तीन प्रवेशद्वार उनके जीवन में धर्म और तत्त्वज्ञान के आगमन के हेतु बने। क्या आप जानते हैं कि नारियल का फल सबसे मंगलरूप क्यों माना जाता है? मनीषियों ने बताया है कि नारियल के पौधे को बाल्यावस्था में मनुष्य कुछ लोटे सादा-जल पिलाता है, ताकि वह पनप सके। उस छोटे से उपकार के बदले में वह नारियल का पौधा वृक्ष बनने पर अमृत-तुल्य मधुर-जलवाले सैकड़ों लोटे प्रतिवर्ष मनुष्यों को नारिकेल-फल के रूप में लौटता है। इसी कृतज्ञता की आदर्श-वृत्ति के कारण नारिकेल-फल को सभी फलों में सर्वश्रेष्ठ-मंगल के रूप में माना गया है और हर पवित्र-अनुष्ठान में उसका सर्वोत्तम-सामग्री के रूप में प्रयोग किया जाता है। ठीक इसी के समानांतर-रूप में हम कविवर पं. बनारसीदास जी को पाते हैं, जिन्होंने स्वयं अपार-विषम परिस्थितियों में रहते हुये भी जिनशासन के तत्त्वज्ञान को अपने जीवन में उतारकर उससे स्वयं को तो सार्थक बनाया ही था, साथ ही कृतज्ञता-स्वरूप ‘नाटक-समयसार’ जैसी कालजयी-कृति के साथ-साथ अनेकों अन्य-रचनाओं का युग की माँग व आवश्यकता के अनुरूप निर्माण करके आगामी सैकड़ों पीढ़ियों को निजानन्द-रसामृत की अमृतोपम-भेंट प्रदान की। इसलिये आज विगत लगभग पाँच सौ वर्षों से तत्त्वानुरागी-जन उनसे आप्यायित तो हैं ही, कृतज्ञ भी हैं। क्योंकि यदि कविवर पं. बनारसीदास जी की ये कृतियाँ नहीं होतीं, तो आज की सरल भाषा-शैली में हमें गूढ़-जैन-तत्त्वज्ञान इतने सरल व सुबोधगम्य-रूप में नहीं मिल सकता था। ऐसे महामना यशस्वी आत्माराधक कविवर पं. बनारसीदास जी के जीवन एवं अवदानों को समझने के लिये हमें तथ्यों के आधार पर गुणग्राही बनकर उनके जीवन की खुली-किताब को पढ़ना व समझना होगा। ‘कविवर पं. बनारसीदास जी’ का जीवन अत्यधिक उतार-चढ़ाव से भरपूर रहा। पुण्य और पाप के उदय के जैसे विचित्र-संयोग उनके जीवन में देखने को मिलते हैं, वैसे अन्य किसी महापुरुष के जीवन में अतिदुर्लभ हैं। कवि ने अपने जीवन में अत्यधिक-कठिनाइयों का सामना किया, फिर भी इतने आध्यात्मिकग्रंथों का सृजन कवि के अतुल्य-धैर्य का परिचायक है। इनकी जीवन-यात्रा के वृत्तान्त को जो भी पढ़ता है, वह एकबार सोचने को विवश हो जाता है कि इतनी अपार-प्रतिकूलताओं का तीव्र-उदय होने पर भी वे इतने सहज और सरल-हृदय कैसे रह पाये थे और इतनी विशाल-परिमाण में साहित्य-साधना उन्होंने किस अद्भुत मानसिक-क्षमता से की थी।? इस जिज्ञासा की पूर्ति के लिये हम उनकी यशस्विनी-जीवनगाथा को उन्हीं की शब्दावली में जानने का प्रयास करते हैं। वंश-परिचय- यह विवरण यहाँ पर स्वयं कविवर बनारसीदास जी के शब्दों में प्रस्तुत है-

''याही भरत-सुखेत में, मध्यदेश शुभ-ठाँव। बसै नगर-रोहतगपुर, निकट बिहोली-गाँव।।
गाँव बिहोली में बसे, राजवंश-रजपूत। तै गुरु-मुख जैनी भये, त्यागि करम-अघ-भूत।।

पहिरी माला मंत्र की, पायौ कुल श्रीमाल। थाप्यो गोत बिहोलिया, बीहोली रखपाल।।‘’ इसके अनुसार तत्कालीन ‘मध्य-भारत’ में ‘रोहतकपुर’ नामक नगर के पास ‘बिहोली’ नाम का एक गाँव है, जहाँ पहले राजवंशीय-राजपूतों का बहुलता से निवास था। एक दिन उस गाँव में किन्हीं एक जैन-मुनिराज का आगमन हुआ। मुनिराज के पावन-चरित्र और सरल-स्वभाव एवं उपदेशों से प्रभावित होकर वहाँ के सभी लोगों ने जैनधर्म को अंगीकार किया। और पंच-नमस्कार-मंत्र की माला धारणकर अपने गाँव के नाम पर अपना गोत्र का नाम बीहोलिया रख लिया। -इस पद्य के अनुसार इनका वंश-कुल आदि का सांकेतिक-रूप से परिचय मिलता है। किंवदन्ती है कि इस प्रसिद्ध बीहोलिया कुल की सुदीर्घ-परम्परा में अनेक धर्मात्मा और विद्वान् पुरुष हुये। उन्ही में से एक महापुरुष ‘मूलदास’ जी थे, जो कविवर बनारसीदास जी के पितामह थे। ‘मूलदास जी’ के दो पुत्र हुये एक का नाम ‘खरगसेन’ और दूसरे का नाम ‘घनमल’ था। दुर्भाग्यवश ‘घनमल’ जी तीन वर्ष की अल्पायु में दिवंगत हो गये। मूलदास जी अपने पुत्र घनमल के इस असामयिक-वियोग के आघात को सहन नहीं कर पाये और वे भी देवलोक को प्राप्त हो गये। मूलदास जी के वियोग के बाद उनकी बेसहारा विधवा-पत्नी अर्थात् बनारसीदास जी की दादी जी अपने जीवित बचे पुत्र’ खरगसेन’ को लेकर अपने पिता के घर आ गई। वहीं उनके साथ बनारसीदास जी के जन्मदाता खरगसेन जी का लालन-पालन हुआ। धीरे-धीरे समय बीतता गया और एक दिन ‘खरगसेन’ के युवा होने पर उनका विवाह मेरठ-निवासी ‘सूरदास जी श्रीमाल’ की पुत्री के साथ सम्पन्न हुआ। विवाह के उपरान्त संवत् 1635 में इन्हीं ‘खरगसेन’ जी के घर पहलीसन्तान के रूप में पुत्र का जन्म हुआ, जिसके फलस्वरूप घर में खुशियाँ छा गई। लेकिन मात्र दस दिन की अल्पायु में ही उस पुत्र का देहांत हो गया। जिसके परिणाम-स्वरूप पुत्र-जन्म की सारी खुशियाँ विलीन हो गयीं और परिवार में दुःख के बादल छा गये। इसके बाद कुछ समय तक वंशवृद्धि की कामना पूरी नहीं हो सकी। और वह ऐसा समय था, जब विवाह के उपरान्त यदि सन्तान और वह भी विशेषतः पुत्र न हो जाये, तो अनेक तरह के लोकापवाद होते थे। यह एक विकट मनोवैज्ञानिक-संकट की स्थिति थी। जिससे बनारसीदास जी के पिता खरगसेन जी भी अछूते नहीं थे। उस समय भारतीय जनमानस में अनेकतरह के अंधविश्वास व्याप्त थे। जिनमें रागी क्षुद्र व कल्पित-देवों (व्यंतरों आदि) से मनोकामना पूरी करने के लिये विविध-प्रकार के अनुष्ठान एवं मनौतियाँ करना शामिल था। ऐसी ही मनोकामना लेकर संवत् 1637 में ‘खरगसेन’ जी ने पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से ‘सती की यात्रा’ की, ताकि उनकी मनौती करके अपने घर में कुलदीपक प्राप्त कर सकें। पर दुर्भाग्यवश इस निमित्त जाते समय रास्ते में वे चोरों के हाथ अपना सब कुछ लुटा बैठे। कविवर बनारसीदास जी इस संबंध में ‘अर्धकथानक’ नामक अपनी आत्मकथारूप ग्रन्थ में लिखते हैं-

गये हुते माँगन को पूत, यहु फल दीनों सती अऊत।
तउ न समझै मिथ्या-बात, फिर मानी उनहीं की बात।।
प्रगट-रूप देखें सब सोग, तउ न समझै मूरख-लोग।।

(यहाँ यह ज्ञातव्य है कि जो विवाहिता-स्त्री अपने पति के दिवंगत होने पर तात्कालिक सामाजिक एवं पारिवारिक-परिस्थितियों के कारण पति की मृत-देह के साथ ही उसकी जलती चिता में अपनी आहुति देकर सजीव आत्मदाह कर लेती थी, उसे भारतीय जनमानस ‘सती’ कहकर महिमा-मंडित करता था। यह कुप्रथा स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद तक कुछ समय तक भारतवर्ष में प्रचलित रही। कुछ समाज-सुधारकों ने अपार-संघर्षों के बाद इस कुप्रथा का उन्मूलन किया। उस सती के चिता-स्थल या आत्मदाह-स्थल को लोग ‘सती का चौंतरा’ आदि नामों से कहते थे। और उसकी आत्मदाह-तिथि पर मेला/यात्रा जैसे आयोजन करके उसे महिमा-मंडित किया जाता था और लोग-बाग अनेकों मनौतियाँ करके गृहीत-मिथ्यात्व को पोषित करते थे।) कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य के परिणाम कितने विचित्र होते हैं, कि दुःख और निराशाजनक विपाक (फल) देख लेने पर भी इसका लोभी-मन नहीं मानता है। इतनी दुर्दशा होने पर भी पुत्रलाभ की अदम्य-आकांक्षा ने खरगसेन जी को इस मिथ्या-मान्यता के वशीभूत बनाये रखा और संवत् 1643 में पुनः पुत्र-लाभ की आकांक्षा में ‘खरगसेन’ ने ‘सती की यात्रा’ की। और संयोगवश इस बार इनकी इच्छा पूरी भी हो गई। इसप्रकार खरगसेन जी के विवाह के आठ वर्ष के पश्चात् इनके घर पुनः पुत्र का जन्म हुआ, जिसका अपारउत्सव उन्होंने परिवारजनों व इष्ट-संबंधियों के साथ मनाया गया। यही पुत्र आगे चलकर कविवर पं. बनारसीदास जी के नाम से जैन-मनीषा के अप्रतिम-प्रतिमान के रूप में विख्यात हुआ। इनकीं ‘जन्म-तिथि’ और ‘जन्म-नाम’ के संबंध में यह छंद द्रष्टव्य है -

संवत् सोलह सौ तेताल, माघ-मास सित-पक्ष रसाल।
एकादशी वार-रविनन्द, नखत-रोहिणी वृष को चंद।।
रोहिणी तृतिय-चरन-अनुसार, खरगसेन-घर सुत-अवतार।
दीनों नाम ‘विक्रमाजीत’, गावहिं कामिनि मंगल-गीत।।

अर्थात् ‘कविवर बनारसीदास जी’ का जन्म विक्रम-संवत् 1643 के माघ-मास के शुक्ल-पक्ष की एकादशीतिथि को रविवार के दिन, जब रोहिणी-नक्षत्र का तृतीय-चरण चल रहा था तथा चंद्रमा वृष-राशि में विचरण कर रहा था, तब हुआ। जन्म के समय इनका नाम विक्रमाजीत रखा गया। बनारसीदास’ नाम कैसे पड़ा? जब बालक ‘विक्रमाजीत’ छह-सात महीने का हुआ, तब खडगसेन जी परिवार-सहित ‘पार्श्वनाथ’ की जन्मभूमि की वंदना करने काशी गये। वहाँ पर उन्होंने जन्मभूमि के जिनमंदिर जी में बड़े भक्ति-भाव से पूजन की, और बालक को प्रभु के चरणों में रखकर उसके दीर्घायु होने की प्रार्थना की - ‘‘चिरजीवी कीजै यह बाल, तुम शरनागत के रखपाल। इस बालक पर कीजै दया, अब यह दास तुम्हारा भया।।’’ उस समय वहाँ मंदिर का पुजारी खड़ा था, उसने इनके भोलेपन को जानकर अपनी महत्ता सिद्ध करना चाही। वह बनावटी-ध्यान लगाकर बोला- ‘‘भगवान् पार्श्वनाथ के यक्ष ने मुझे संकेत किया है कि ये बालक दीर्घायु होगा, लेकिन इसके लिये तुम्हें इस बालक का नाम भगवान् श्री पार्श्वनाथ की जन्मभूमि ‘बनारस’ के नाम पर रखना होगा-’’ ‘‘जो प्रभु पार्श्व-जन्म को गाँव, सो दीजै बालक को नांव। तो बालक चिरजीवी होय, यह कहि लोप भयो सुर सोय।।’’ कुटिलमति-पुजारी की इस मायामयी-बात को सही मानकर पिता श्री ‘खरगसेन’ ने अपने उस पुत्र को दीर्घायु होने की अभिलाषा में उसका नाम बनारसीदास रख दिया। धीरे-धीरे दूज के चंद्रमा की तरह वह बालक बढ़ने लगा। लेकिन पूर्व-कर्मोदयवश पाँच साल की अल्पायु में ‘बनारसीदास जी’ को ‘संग्रहणी’ नामक बीमारी ने घेर लिया। एक वर्ष तक भारी-वेदना सहकर ठीक हुये कि शीतला ( जिसे आज हम ‘चेचक’ या मीजल्स/चिकन-पॉक्स कहते हैं ) का प्रकोप हुआ। इसप्रकार लगभग दो वर्ष तक का समय भयंकर-वेदना में व्यतीत हुआ। इन परिस्थितियों में पिताश्री खरगसेन जी को कई बार बालक बनारसीदास के जीवन का भारी-संकट लगा। किन्तु आयुकर्म शेष होने से प्राणान्त-वेदनायें सहकर भी वह बालक जीवित रहा। शिक्षा- भयंकर-बीमारी से जर्जर होने के बाद भी बालक ‘बनारसीदास जी’ को विद्याध्ययन के लिये गुरु के आश्रम में भेज दिया गया। बनारसीदास जी की बौद्धिक-क्षमता अत्यधिक होने से अल्प-समय में ही पर्याप्त-ज्ञान अर्जित किया। कवि के शब्दों में -

''आठ बरस कौ हुऔ बाल, विद्या पठन गयौ चटसाल।
गुरु पांडे से विद्या सिखै, अक्सर वाँचे लेख लिखै।।
बरस एक-लौं विद्या पढी, दिन-दिन अधिक-अधिक मति बढ़ी।

विद्या पढ़ी हूऔ वितपन्न, संवत् सोलह सै बावन्न।।‘’ अभी शिक्षार्जन करते हुये एक साल ही बीता था कि 9 वर्ष की अल्पायु में ही बनारसीदास जी की सगाई हो गई। और दो वर्ष बाद संवत् 1654 में विवाह भी हो गया। विवाह के बाद पारिवारिक-जिम्मेवारियों के चलते यद्यपि पढाई के लिये समय नहीं मिलता था, फिर भी 14 वर्ष की उम्र तक कवि ने ‘अनेकार्थ-नाममाला’, ‘ज्योतिष-शास्त्र’, ‘अलंकार’ आदि शास्त्रों का अध्ययन किया। फिर आगे चलकर अध्यात्म के प्रखर-पंडित ‘भानुचंद्र जी’ से भी विविध-शास्त्रों का अध्ययन किया। युवावस्था में प्रवेश- जब कवि ने युवावस्था में प्रवेश किया, उस समय देश में मुसलमानों का शासन चल रहा था। उनके अत्याचारों से परेशान देशवासी अपने बेटे-बेटियों की शादी छोटी उम्र में कर लेते थे। बनारसीदास जी का विवाह भी संवत् 1654 में 11 वर्ष में खैराबाद के निवासी ‘कल्याणमल जी’ की बेटी के साथ सम्पन्न हुआ। बड़ी धूमधाम के साथ खडगसेन अपनी पुत्रवधु को विदा कराकर घर लाये। लेकिन कर्मों की विचित्रता देखो! जिस दिन पुत्रवधु घर आई, उसी दिन खरगसेन के घर बेटी का जन्म हुआ और बनारसीदास जी की नानी का देहांत हो गया!! इस सुख एवं दुःखमय प्रसंग का वर्णन कविवर के शब्दों में इसप्रकार मिलता है - ‘‘नानी-मरण, सुता-जनम, पुत्रवधु-आगौन। तीनों कारज एक दिन, भये एक ही भौन।। यह संसार-विडम्बना, देख प्रगट दुःख-खेद। चतुर-चित्त त्यागी भये, मूढ न जाने भेद।।’’ विवाह के पश्चात् जिम्मेवारी के चलते पढ़ाई तो लगभग खत्म हो गई। आर्थिक-विपन्नता के कारण परिवारसहित इधर-उधर भटकते रहे, इस बीच बनारसीदास जी ने कौड़ियाँ खरीदने-बेचने का छोटा-सा काम किया। इस समय तक बनारसीदास जी 14 वर्ष के हो चुके थे। इकलौते-पुत्र होने के कारण माता-पिता के बहुत लाड़ले थे। जैसा कि युवावस्था कामान्धता के लिये प्रसिद्ध होती है, कविवर बनारसीदास जी भी इससे अछूते नहीं रहे। कुल की प्रतिष्ठा, धन-संपत्ति और आत्म-सम्मान कामांध-पुरुष के लिये मायने नहीं रखता। इस समय शास्त्र-ज्ञान, माता-पिता और गुरुजनों की सीख निरर्थक सिद्ध होती है। बनारसीदास जी भी इस समय इतने कामान्ध हुये कि पढ़ाई- लिखाई छोड़कर उनके ऊपर एकमात्र विषयासक्ति का नशा-सा छा गया। वे स्वयं अपने बारे में लिखते हैं- ‘‘तजि कुल-कान लोक की लाज, भयो बनारसि आसिखबाज।’’ माता-पिता से छिपाकर घर से मणि, रत्न और रुपये चुराकर विषय-भोग पर खर्च करना उनकी आदत बन गई। यह सिलसिला इतना लंबा चला कि इस बीच कवि ने ‘नव-रस’ विशेषरूप से शृंगार एवं वासनापरक लगभग एक हजार दोहों और चौपाईयों से युक्त एक पद्यमय-काव्यरचना भी की। जिसमें यद्यपि सभी रस थे; परन्तु आशिकी और संभोग-प्रधान कविताओं की अधिकता थी। कहा जाता है कि यदि आज वह कृति उपलब्ध होती, तो शृंगारजगत् की सर्वश्रेष्ठ-रचनाओं में अपना स्थान रखती। यद्यपि बनारसीदास जी बहुत विवेकी थे, और समय-समय पर अपनी इस कामुक-प्रवृत्ति की निंदा भी करते थे और इससे छूटने का प्रयास भी करते थे, परन्तु चारित्र-मोहनीयकर्म का ऐसा प्रबल-उदय था कि उसके सामने उनका पुरुषार्थ हार जाता था। वे स्वयं लिखते हैं -

''पोथी एक बनाई नई, मित हजार दोहा चौपाई।।
तामैं नवरस रचना लिखी, पै विशेष-वर्णन आसिखी।
ऐसे कुकवि-बनारसि भये, मिथ्या-ग्रंथ बनाये नये।।
कै पढ़ना कै आसिखी, मगन दुहुँ रस-माँहि।

खान-पान की सुध नहिं, रोजगार कछु नाहिं।।‘’ ऐसा कब तक चला?- इस बारे में कवि लिखते हैं- ‘‘ऐसी दसा बरस द्वै रही, मात-पिता की सीख न गही। करी आसिखी पाठ सब पढ़े, संवत सोलह सौ उनसठे।।’’ इसप्रकार भौतिक-प्रेम की चकाचौंध में दो वर्ष तक जीवन व्यतीत करते हुये। एक बार अपनी पत्नी को लेने ससुराल गये और वहाँ एक माह तक सुखपूर्वक रहे। लेकिन घर लौटते समय पूर्वोपार्जित अशुभ-कर्मों के उदय में कवि को भयंकर कुष्ठ-रोग हुआ। रसिक-हृदय बनारसीदास जी का सुंदर- शरीर रोग की दुर्गंध से भर गया। अंग-अंग में विस्फोटक अर्थात् बदबूदार-फोड़े हो गये। सभी संबंधी उनसे दूर हो गये, केवल पत्नी और सास ने इनकी सेवा की। कविवर बनारसीदास जी के शब्दों में -

''भयौ बनारसिदास तन, कुष्टरूप सर-संग। हाड़-हाड़ उपजी विथा, केस-रोम-भ्रुव-भंग।।
विस्फोटक अगनित भये, हस्त-चरन चौरंग। कोऊ नर साला-ससुर, भोजन करहिं न संग।।
ऐसी अशुभ-दशा भई, निकट न आवै कोई। सासू और विवाहिता, करहिं सेव तिय दोइ।।
जल-भोजन की लेहिं सुध, देहिं आन मुख- माँहि। ओखद ल्यावहिं अंग में, नाक मूदँ उठ जाहिं।।
विचार कीजिये उस समय कवि की कितनी असहनीय और वेदना से भरपूर भयानक-स्थिति रही होगी।

कईप्रकार की औषधियाँ बनारसीदास जी को दी गईं, पर उनकी पीड़ा कम होने के बजाय असह्य से असह्यतर होती चली गई। कुछ समय पश्चात् भाग्यवशात् एक नाई-चिकित्सक मिला,और उसने इन्हें छह महीने में स्वस्थ कर दिया। लेकिन ससुराल से लौटते समय ये अकेले ही आये, ससुरालवालों ने पत्नी को इनके साथ नहीं भेजा। घर आकर पुनः आशिकी़ में मगन हो गये। लगभग चार महीने के बाद इनकी पत्नी वापस इनके पास आ गई, पर इनकी कामान्ध- प्रवृत्ति पर कोई रोक नहीं लगी। किसी ने सच ही कहा है - ‘‘विषयासक्तचित्तानां, गुणः को वा न नश्यति। न वैदुष्यं न मानुष्यं, नाभिजात्यं न सत्यवाक्।।’’ अर्थात् विषयासक्त-मनुष्य के सभी गुण नष्ट हो जाते हैं, विद्वत्ता, विवेक, कुलीनता और सत्य तो जैसे उससे छूमंतर हो जाते हैं। संयोगवश इसी वर्ष बनारसीदास जी के एक कन्या का जन्म हुआ; परन्तु छह-सात दिन में ही वह कन्या तो चल बसी, साथ ही बनारसीदास जी को दीर्घकालीन-ज्वर की पीड़ा हो गई। वैद्य ने उन्हें बीस दिन तक भोजन नहीं करने दिया। भूख से बेहाल बनारसीदास जी ने एक दिन रात के समय में सबके सो जाने पर आधा सेर (किलो) पूड़ियाँ उठाकर खा लीं। और संयोग की बात कि वे स्वस्थ भी हो गये। वे स्वयं लिखते हैं - ‘‘आध सेर की पूरी दोइ। खाट हेट ले धरी दुराइ, सो बनारसि भखी चुराइ। वाही पथ सों नीकौ भयौ, देख्यौ लोगनि कौतुक नयौ।’’ अंधविश्वास के धनी- कविवर बनारसीदास जी इस समय तक घोर-अंधविश्वासी थे। एक दिन एक सन्यासी ने कहा कि- ‘‘मेरे पास एक मंत्र है, एक वर्ष तक उसका विधिपूर्वक-जाप करने से एक वर्ष बाद एक स्वर्णमुद्रा प्रतिदिन दरवाजे पर मिलेगी।’’ फिर क्या बनारसीदास जी ने बहुत धन देकर तत्काल मंत्र लिया और जपना प्रारंभ कर दिया। एक वर्ष तक वे इस मायाजाल में फँसे रहे। एक साल बाद जब फूटी- कौड़ी भी हाथ नहीं लगी, तो पश्चात्ताप में भोजन-पानी भी छोड़ दिया। (इस घटना का उल्लेख कवि ने स्वयं किया है।) अभी ये घटना बीते बहुत दिन नहीं हुये थे कि फिर एक छलिया-साधुबाबा के मायाजाल में फँस गये। उसने इन्हें मुक्ति-प्राप्ति के अमर-आनंद का प्रलोभन देकर कुछ पूजन-सामग्री और शंख देकर उस साधु ने कहा कि ‘‘ये शिवजी की मूर्ति है, इसकी पूजा करने से मुक्ति मिलती है।’’ बनारसीदास जी ने भावुकता में आकर शीघ्र उस मूर्ति को उठा लिया और शिवजी का जाप और अष्टद्रव्य से उस मूर्ति की पूजा करने लगे। यदि किसी दिन कोई भूल हो जाती, तो अगले दिन पश्चात्ताप करते और रूखा-भोजन करते। वे स्वयं लिखते हैं -‘‘पूजैं तब भोजन करें, अनपूजैं पछिताइ। तासु दण्ड अगले दिवस, रूखा-भोजन खाइ।।’’ घर में बिना किसी को बताये वे इस क्रिया को बहुत दिन तक करते रहे। ऐसी कई अंधविश्वासों से भरी अनेकों घटनाओं का उल्लेख कवि ने स्वयं किया है। पत्नियाँ और बच्चे- बनारसीदास जी की तीन शादियाँ हुई। और तीनों ही पत्नियों से कुल मिलाकर नौ संतानें हुई। लेकिन दुर्भाग्यवश तीनों ही पत्नियाँ और सभी बच्चे एक-एक करके इनके सामने ही मरण को प्राप्त हुये। विचार करो कि जब एक संतान के मरण का दुःख भी असह्य होता है, तो सोचिये जिसकी नौ संतानें उसके सामने काल-कवलित हुई हों, उसकी वेदना और टीस का अनुमान लगाना भी कल्पना से परे है। कवि स्वयं लिखते हैं -

''तीन विवाहीं भारजा, सुता दोइ सुत सात।
नौ बालक हुये मुए, रहे नारि-नर दोइ।

ज्यों तरुवर पतझार ह्वै, रहें ठूँठ से होइ।।‘’ अर्थात् मेरे नौ बच्चे हुये; लेकिन एक भी जीवित नहीं रहा। केवल हम पति-पत्नी बचे, ठीक उसीप्रकार जैसे पतझड़ के आने पर सारे पत्तों के झड़ जाने पर पेड़ ठूँठ से खड़े रह जाते हैं। लेकिन होनहार बलवान् …और तीसरी पत्नी की मृत्यु से पहले कवि को संसार की असारता का भान होने लगा। अब राग से विराग की ओर मुड़ने का सामान उनके जीवन में घटनेवाली अनेकमौतों और व्यापारादि में निराशाओं ने जुटा दिया था। लम्बे समय तक राग-रंग में रमनेवाले कविवर बनारसीदास जी ने अब वैराग्य की ओर प्रयाण किया। एक दिन कविवर बनारसीदास जी अपनी मित्र- मंडली के साथ गोमती-नदी के किनारे बैठे थे। शृंगार-रस का ग्रंथ ‘नवरस’ उनके हाथ में था। और अपने मित्रों को उसके दोहे सुना रहे थे। अचानक अध्यात्म की ऐसी लहर आई कि उसने शृंगारिकता और भावुक-मनोवृत्ति को चकनाचूर कर दिया। अपनी कपोल-कल्पित कविताओं पर कवि को इतना पश्चात्ताप हुआ कि वह ‘नवरस’ का ग्रंथ कवि ने स्वयं अपने हाथों से गोमती-नदी में बहा दिया। इसका वर्णन करते हुये कवि लिखते हैं-

''एक दिवस मित्रन्ह के साथ, नौकृत पोथी लीन्ही हाथ।
नदी गोमती के बिच आइ, पुल के ऊपर बैठे जाइ।।
वाचैं सब पोथी के बोल, तब मन में ये उठी किलोल।
एक झूठ जो बोले कोइ, नरक जाइ दुःख देखे सोइ।।
मैं तो कलपित-वचन अनेक, कहैं झूठ सब, साँचु न एक।
कैसे बने हमारी बात, भइ बुद्धि यह अकस्मात्।।

यह कहि देखन लागै नदी, पोथी डार दइ ज्यों रदी।‘’… उस दिन से बनारसीदास जी के जीवन की दिशा ही बदल गई। शृंगार का रसिक अब अध्यात्म का रसिक बन ग़या। उनके आध्यात्मिक जीवन की झलक, उन्हीं के शब्दों में इसप्रकार है- निश्चयाभासी होना- सम्वत् 1680 में 37 वर्ष की अवस्था में कवि को ‘अरथमल जी ढोर’ का समागम मिला। उन्होंने ‘पांडे राजमल जी’ द्वारा लिखित ‘समयसार-कलश’ की टीका पढ़ने की प्रेरणा दी। कवि ने बड़ी लगन से उसका स्वाध्याय किया, लेकिन अध्यात्म का मर्म न समझने से वे स्वच्छंदी हो गये। परिणाम-स्वरूप उनका झुकाव ठेठ-निश्चयाभास की ओर हो गया, उन्हें क्रियाकाण्ड अत्यंत-थोथा प्रतीत होने लगा। जप, तप, सामायिक, पूजन आदि सब छोड़कर एक मात्र आत्मतत्त्व पर ही उनकी रुचि केन्द्रित हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि लोग इन्हें ‘खोसरामती’ यानि एक ‘असंतुलित-मत का अनुयायी’ कहने लगे। ऐसी अवस्था में कवि ने जीवन के बहुमूल्य 12 वर्ष बिता दिये। दिगम्बरत्व का समर्थन- एक दिन सौभाग्य से ‘पंडित रूपचंद जी पांडे’ से कवि की भेंट हुई। उनका गुणस्थान-विवेचन पर प्रवचन सुनकर बनारसीदास जी को ज्ञान और क्रिया का समन्वय अर्थात् निश्चय और व्यवहार का मेल समझ में आया। अनेकांत, स्याद्वाद आदि सिद्धांतों का सच्चा-स्वरूप समझ में आया। अब उन्हें क्रियाकाण्ड सर्वथा-हेय नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के मार्ग में सीमित-उपयोगी लगने लगा। इसके बाद कवि का हृदय कुछ शांत और स्थिर हुआ। स्वयं श्वेताम्बर-संप्रदाय से होने के बाद भी न केवल दृढ़ता-पूर्वक दिगम्बर-पंथ को ‘सही’ कहा, बल्कि स्वीकार भी किया। बाद में कवि की आध्यात्मिक-भावना इतनी प्रबल हो गई कि 1693 में समयसार जी को ‘नाटक समयसार’ के रूप में सुन्दर-पद्यों में आबद्ध किया, और ‘नाटक-समयसार’ के छंदों की सर्वत्र धूम मच गयी। कवि का यह आध्यात्मिक-ग्रंथ इतना लोकप्रिय हुआ कि घर-घर में नाटक-समयसार की चर्चा होने लगी। ग्याहरवीं शती से ही दिगम्बर-साधुओं का लगभग अभाव-सा हो गया था। और कविवर बनारसीदास जी के समय तक तो लोग दिगम्बर-साधुओं के बारे में सिर्फ पुराणों/कथाओं में पढ़ा करते थे और उनकी की चर्या के बारे में केवल अनुमान लगाया करते थे। उस समय धर्म की बागडोर परिग्रहधारी-भट्टारकों के हाथ में थी। क्रियाकाण्ड को ही ‘धर्म’ घोषित कर दिया गया था, अध्यात्म-चर्चा को तो लोग बिल्कुल ही भूल गये थे। भट्टारकों की बात ही ‘धर्मवाक्य’ के रूप में मानी जाती थी। कविवर बनारसीदास कुशाग्र-बुद्धि के धनी तो थे ही, साथ ही जैन-शास्त्रों का अध्ययन भी अच्छी तरह से कर चुके थे, सो इस मायाचार को शीघ्र समझ गये। वे स्वयं आगे आये और इस थोथे-क्रियाकाण्ड और परिग्रह की मान्यता का जमकर खंडन किया, और जनता के समक्ष धर्म का वास्तविक-स्वरूप रखा। अंतिम-समय- यद्यपि कवि के देहवियोग के बारे में कोई ठोस-जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन इस संबंध में एक किंवदंती प्रसिद्ध है कि अंतसम़य में उनका गला रुँध गया था, जिस कारण वे बोल नहीं सकते थे। उन्हें अहसास हो गया था कि मृत्यु का समय अब नजदीक है, सो ध्यान में लीन हो गये। लोगों ने समझ लिया अब ये दोचार घंटे के मेहमान हैं। लेकिन जब समय अधिक निकल गया और प्राण शेष रहे, तो आस-पास के लोग कहने लगे कि शायद कवि के प्राण परिवारीजनों के मोह में फँसे हुये हैं। कुछ लोग तो यहाँ तक कहने लगे कि ‘‘जीवनभर धन के पीछे भागते रहे, फिर भी उन्हें धन की प्राप्ति नहीं हुई, लगता है आज भी इनके प्राण उसी में अटके हुये हैं। अब जब तक इनके आगे दौलत की गठरी नहीं होगी, तब तक इनके प्राण नहीं निकलेंगें।’’ कविवर बनारसीदास जी लोगों की इन मूर्खतापूर्ण-बातों से विचलित हो उठे, पर शक्तिहीन इतने थे कि बोल तो न सके, पर कुछ लेखन-सामग्री देने के लिये लोगों को संकेत किया। बड़े प्रयत्न के बाद लोगों को उनका संकेत समझ में आया और उनको एक लेखनी लाकर दी। लेखनी पाकर कवि ने अपने जीवन का अंतिम-छंद लिखा, जिसे पढ़कर लोगों की धारणा एकदम बदल गई। वह छंद इसप्रकार था - ‘‘ज्ञान कुतक्का हाथ मारि अरि-मोहना। प्रगट्यो रूप-स्वरूप अनंत जु सोहना।। जा परजै को अंत सत्य कर मानना। चले बनारसिदास फेर नहिं आवना।।’’ रचनायें- ‘‘कविवर बनारसीदास जी’’ की चार पद्यमय-रचनायें आज उपलब्ध हैं, जो उनकी काव्य- प्रतिभा और ज्ञान-गरिमा को आज भी द्योतित कर रही हैं। वे इसप्रकार हैं - 1- नाममाला 2- बनारसी-विलास 3- अर्द्धकथानक 4- नाटक-समयसार 1. नाममाला- यह एक पद्यबद्ध-कोश है, जिसमें 175 दोहे हैं। यह कवि की सर्वप्रथम-रचना है। जो ‘आश्विन सुदी दसमी, सोमवार’ विक्रम- संवत् 1670 में जौनपुर में लिखी जा चुकी थी। इसके रचनाकाल के बारे

में कवि स्वयं लिखते हैं- सोरह सै सत्तरि समै, आसौ मास सित पच्छ।
विजैदसमी ससिवार तह, स्रवन-नखत परतच्छ।।

  1. बनारसी-विलास- इस ग्रंथ में कवि द्वारा समय - समय पर विविध-विषयों पर विविध-छंदों में रचितरचनाओं का संग्रह है। जिसमें धार्मिक और आध्यात्मिक-कवितायें अनूदित और उपदेशपरक-कवितायें संग्रहीत हैं। 3. अर्द्धकथानक- कविवर बनारसीदास जी की उपलब्ध-रचनाओं में यह तीसरी-रचना है। यह समस्त भारतीय-भाषाओं में प्रथम हिन्दी-पद्यों में रचित आत्मकथा है। कवि ने इसमें अपने जीवन के 55 वर्षों को अत्यंत सरल, संक्षिप्त और निष्पक्षता के साथ प्रस्तुत किया है। इस कृति का नाम ‘अर्द्धकथानक’ रखने का कारण बताते हुये कवि कहते हैं कि वर्तमान में मनुष्य की आयु 110 वर्ष मानी गई है, और इसमें 55 वर्ष की कहानी है, इसलिये इसका ‘अर्द्धकथानक’ नाम सार्थक है। अपनी भूलों, त्रुटियों और असफलताओं का वर्णन जितने सीधे और सरल स्पष्ट-शब्दों में कवि ने किया कि इसको पढ़कर मानव-मन श्रद्धा से कवि के चरणों में सहज झुक जाता है। इस कृति में आत्मकथा के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक-स्थिति का भी ऐसा उल्लेख किया है कि जिनसे आज भी इतिहास के कलेवर में एक सुंदर-अध्याय और जोड़ा जा सकता है। 4. नाटक-समयसार का परिचयात्मक-अनुशीलन नाटक-समयसार’ कवि की सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक और लोकप्रिय-रचना है। शुद्धात्म-तत्त्व की हिंदी भाषा में इतनी सरल व स्पष्ट-विवेचना अन्यत्र दुर्लभ है। संसार के वास्तविक-स्वरूप का दिग्दर्शन कराते हुये आत्मा की शुद्धातिशुद्ध-अवस्था का निरूपण अत्यंत-स्पष्टता और युक्तियों के साथ किया है। इस ग्रंथ में 310 दोहे-सोरठा, 245 सवैया इकतीसा, 86 चौपाई, 37 सवैया तेईसा, 20 छप्पय, 18 कवित्त, 7 अडिल्ल और 4 कुंडलियाँ हैं। कुल मिलाकर नौ प्रकार के 727 छंद हैं। इस कृति में कवि ने भावों के पात्र उपस्थित किये हैं। जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष -ये सात तत्त्व ही अभिनय करनेवाले पात्र हैं। भावों का नाटकीय-ढंग से चित्रण करने के कारण ही इसके साथ ‘नाटक’ शब्द जोड़ा गया है। और ‘समयसार’ शब्द आत्मा यानि स्वयं के लिये है, इसप्रकार इस कृति का नाम ‘समयसार नाटक’ सार्थक है। ‘आचार्यप्रवर कुन्दकुन्द’ का ‘समयप्राभृत’ अपरनाम ‘समयसार’, उस पर ‘आचार्य अमृतचंद्र’ की ‘आत्मख्याति’ संस्कृत-टीका, और 'पं. राजमल’कृत भाषा-टीका -इन तीनों ग्रंथों के आधार पर ही कविवर बनारसीदास जी ने इस ग्रंथ की रचना की है। स्वतः स्पष्ट है उपर्युक्त तीनों ग्रंथों का आधार होने से यह कृति कविवर बनारसीदास जी की मौलिककृति तो नहीं है, परन्तु कवि ने उन भावों का सारमात्र लेकर अपनी काव्य-प्रतिभा से इस कृति को इतना रोचक बना दिया कि वह कृति मूलाधारों से भी बढ़कर प्रतीत होती है। पग-पग पर सुंदर-दृष्टांत देकर उसे और भी सुगम कर दिया। कवित्व की दृष्टि से उनकी ये रचना अपूर्व है। मूल-ग्रंथों जो विषय नहीं थे उनका भी प्रतिपादन कवि ने इसमें किया। जिन गुणस्थानों का समुचितज्ञान न होने से कविवर बनारसीदास जी 12 वर्ष तक अंधेरे में रहे, उन गुणस्थानों का बहुत ही सुंदर और विस्तृत-विवेचन कवि ने इस कृति में किया। भाषा, भाव, विषय और प्रतिपादन-शैली हर दृष्टि से ये कृति बेजोड़ है। अध्यात्मिक-कवि होने से सर्वत्र आत्मानुभूति को ही सर्वोपरि-स्थान दिया। आत्म-अनुभव को मुक्ति का मार्ग ही नहीं मोक्षस्वरूप ही माना। कविवर बनारसीदास जी लिखते हैं - ‘‘अनुभव चिंतामणि-रत्न, अनुभव है रस-कूप। अनुभव मारग-मोक्ष को, अनुभव मोक्ष-स्वरूप।।’’ केवल अनुभव कहने से कहीं जीव लौकिक-अनुभव में भ्रमित न हो जाये, इसलिये अनुभव का स्वरूप भी स्पष्ट किया - ‘‘वस्तु-विचारत ध्यावतैं, मन पावे विश्राम। रस-स्वादत सुख ऊपजै, अनुभौ याको नाम।।’’ वस्तु से कवि का अभिप्राय निजात्मा से है और रसस्वाद से तात्पर्य आत्मानुभव से है- अर्थात् आत्मिकसुख की अनुभूति का नाम ही अनुभव है। इस कृति का रचनाकाल आश्विन शुक्ल त्रयोदशी, रविवार, संवत् 1693 है। इस कृति की रचना ‘आगरा’ में ‘शाहजहाँ के शासनकाल के समय’ पूर्ण हुई थी। कवि ने बाह्य क्रियाकाण्ड की अपेक्षा हमेशा ज्ञान को ही मुख्यता दी। उनका मानना है कि ग्यान बिना शिवपंथ न सूझै। वे लिखते हैं - ‘‘बहुविधि क्रिया-क्लेश सौं, शिवपद लहै न कोइ। ग्यानकला-परकाशसौ, सहज मोखपद होइ।। ग्यानकला घट-घट बसै, जोग जुगति के पार। निज-निज कला-उद्योत करि, मुकत होइ संसार।।’’ यहाँ ज्ञान से कवि का आशय क्षयोपशमज्ञान या शास्त्रज्ञान से नहीं, भेदज्ञान से है, क्यों कि भेदज्ञान ही वह साबुन है, जिससे आत्मा को शुद्ध किया जा सकता है। वे लिखते हैं - ‘‘भेदग्यान साबू भयौ, समरस निर्मल-नीर। धोबी अंतरात्मा, धोवै निजगुण-चीर।।’’

भेदग्यान संवर जिन पायौ। सो चेतन शिवरूप कहायौ।।
भेदग्यान जिनके घट नाहीं। ते जड़ जीव बंधै घट-माँहीं।।

कहने का तात्पर्य यही हैं कि ‘नाटक-समयसार’ कवि की वह सर्वोत्कृष्ट-रचना है, जिसने इन्हें ‘आचार्य कुन्दकुन्द’ और ‘आचार्य अमृतचंद्र’ की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ‘कविवर बनारसीदास जी’ असाधारण-व्यक्तित्व के धनी थे, उनके द्वारा रचित साहित्य ‘अध्यात्म की रीढ़’ है, उनका स्थान आध्यात्मिक-जगत् में सदैव अक्षुण्ण रहेगा।

नाटक-समयसार का समीक्षात्मक-विश्लेषण

जैन-अध्यात्म-जगत् की वर्तमान में सर्वाधिक-समादृत-रचना ‘नाटक-समयसार’ आज विद्वज्जगत् में किसी परिचय की मोहताज नहीं है। इस कृति का पूर्णता-काल आश्विन शुक्ल त्रयोदशी, रविवार, संवत् 1693 है। इसकी रचना सुविख्यात नगर ‘आगरा’ में मुगल-सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल के समय पूर्ण हुई थी। कविवर बनारसीदास जी स्वयं बादशाह शाहजहाँ के मित्र थे तथा बादशाह के साथ अपना आत्मसम्मान बनाये रखते हुये शतरंज तक खेलते थे। यह कृति कविवर बनारसीदास जी की मौलिक-कृति तो नहीं है, परन्तु कवि ने पूर्ववर्ती-आचार्यों एवं मनीषियों की रचनाओं के भावों का सारमात्र लेकर अपनी काव्य-प्रतिभा से इस कृति को इतना रोचक बना दिया कि वह कृति कहीं भी अपने मूलाधार-ग्रन्थों से न्यून प्रतीत नहीं होती है। आवश्यकतानुसार सुंदर-दृष्टांत देकर उसे और भी सुगम कर दिया। कवित्व की दृष्टि से भी उनकी यह रचना अपूर्व है। यद्यपि कविवर पं. बनारसीदास जी की सर्वाङ्गीण-प्रतिभा अद्भुत थी और उनकी समस्त कृतियों में ‘नाटकसमयसार’ सर्वाधिक गम्भीर-रचना है, अतः इसकी गरिमा तो स्वतः ही उत्कृष्ट होनी स्वाभाविक है। यही कारण है कि इसकी समीक्षा करने में गुणानुवाद करने के अतिरिक्त कुछ कहना दुष्कर है। तथापि ऐसे ग्रन्थ का सम्पादकीय-दायित्व एवं प्रस्तावना-लेखन जैसी गुरुतर-जिम्मेदारी का निर्वहन कामचलाऊ-ढंग से नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि विविध-आयामों से इसके समीक्षण जैसे कार्य में प्रवृत्त हुआ हू,ँ तो उसका निर्वहन भी निष्ठापूर्वक ही करना होगा। अतः इस ग्रन्थ की समीक्षा विविध-बिन्दुओं के वर्गीकरण-पूर्वक साधार यहाँ प्रस्तुत करने का नैष्ठिक-प्रयास कर रहा हू।ँ 1. विषय-विवेचनपरक समीक्षा- यह ध्यातव्य है कि यह कृति अपने आप में कोई पूरीतरह से स्वतन्त्र-ग्रन्थ नहीं है, बल्कि आचार्य कुन्दकुन्द देव के कालजयी-ग्रन्थ ‘समयसार’ के ऊपर आचार्य अमृतचंद्र सूरि द्वारा लिखित ‘आत्मख्याति’ नामक गद्य-मूलक टीका के बीच-बीच में प्रयुक्त पद्यात्मक-कलशों के ऊपर जो पांडे राजमल्ल जी ने ‘बालबोधिनी-टीका’ प्राचीन-हिन्दी-भाषा में लिखी गयी थी, उसे आधार बनाकर एक स्वतन्त्र-रचना के रूप में यह ‘नाटक-समयसार’ नामक ग्रन्थ निर्मित हुआ था। अतः इसकी विषय-वस्तु का मूलस्रोत तो आचार्य कुन्दकुन्द देव कृत ‘समयसार’ ग्रन्थ है, अतः सभी कथनों की जड़ हमें इसी में मिलेगी। फिर टीकाकार आचार्य अमृतचंद्र सूरि ने अपनी ‘आत्मख्याति’ नामक टीका में जो व्याख्या की है, वह भी मूल-कथ्य के अन्वेषण के लिये उपयोगी है। तथा उसमें आगत जो पद्यात्मक-मनोहारी-प्रयोग हैं, जिन्हें ‘कलश’ संज्ञा दी गयी है, वे वस्तुतः इसकी सीधी आधार-सामग्री है। किन्तु उनके स्पष्टीकरण के लिये कविवर पं. बनारसीदास जी ने इस नाटक-समयसार जी में उन कलशों के व्याख्याकार-मनीषी पांडे राजमल्ल जी के द्वारा विरचित इन कलशों की ‘बालबोधिनी-टीका’ (जिसे आजकल 'समयसार-कलश-टीका के नाम से जाना जाता है) की भरपूर-मदद ली है। फिर भी कई बातें कविवर पं. बनारसीदास जी ने इन सबसे हटकर अपने मौलिक-प्रतिपादन के रूप में भी प्रस्तुत कीं हैं। अतः इसके वर्ण्य-विषयगत समीक्षण के लिये हमें यह बारीकी से अध्ययन करना होगा कि कौन-सी बात तो वे सीधे आचार्य कुन्दकुन्द देव के ‘समयसार’ जी से ले रहे हैं, कौन-सी चर्चा उन्होंने आचार्य अमृतचंद्र सूरि के ‘समयसार-कलशों’ से सीधी ग्रहण की है और कौन-से ऐसे विषय हैं, जिनके प्रस्तुतीकरण के लिये कविवर पं. बनारसीदास जी सीधे तौर पर पांडे राजमल्ल जी की इस ‘बालबोधिनी-टीका’ के प्रति कृतज्ञ हैं। ऐसे कतिपय पद्यों को अतिसंक्षेप में सांकेतिकरूप से मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ - जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं हैं, ऐसे चौदह भावरत्नों का वर्णन -

लक्ष्मी-सुबुद्धि अनुभूति-कउस्तुभ-मनि, वैराग-कलपवृच्छ संख-सुवचन है।
ऐरावत-उद्दिम-प्रतीति रंभा उदै-विष, कामधेनु-निर्जरा सुधा-प्रमोदधन है।।
ध्यान-चाप प्रेमरीति-मदिरा विवेक-वैद्य, सुद्धभाव-चन्द्रमा तुरंगरूप-मन है।
चौदह-रतन ये प्रगट होंहि जहां तहां, ग्यान के उदोत घट-सिंधुकौ मथन है।।

चौदह-रत्नों में हेय और उपादेय-

किये अवस्थामैं प्रगट, चौदह-रतन रसाल। कछु त्यागै, कछु संग्रहै, विधि-निषेधकी चाल।।
रमा-संख-विष-धनु-सुरा, वैद्य-धेनु-हय हेय। मनि-रंभा-गज-कलपतरु, सुधा-सोम आदेय।।
इहविधि जो परभाव-विष, वमै रमै-निजरूप। सो साधक-सिवपंथकौ, चिद-वेदक चिद्रूप।।

-(साध्य-साधक-द्वार, 31-34) उपर्युक्त विवेचन कविवर पं. बनारसीदास जी की मौलिक-देन है। यद्यपि नव-निधि एवं चौदह-रत्नों की चर्चा भारतीय साहित्य तथा जैन-साहित्य में चिर-प्रचलित रही है। किन्तु उनके विषय में जो दृष्टि एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन बनारसीदास जी ने यहाँ दिया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। विशेषतः हेय और उपादेय की दृष्टि से जो विवेचन उन्होंने किया है, वह लोक-साहित्य में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। यह कोई अकेला-प्रसंग नहीं है, बल्कि पूरे ‘नाटक-समयसार’ में ऐसे अनेकों प्रसंग और भी हैं, जिनका आगे के विषयों के अन्तर्गत विवेचन प्रस्तुत किया जायेगा। 2. दार्शनिक-समीक्षा- इसमें आचार्य कुन्दकुन्द देव, आचार्य अमृतचंद्र सूरि या पांडे राजमल्ल जी की बालबोधिनी-टीका से तुलनात्मक-समीक्षण प्रस्तुत नहीं किया जायेगा, बल्कि जैनदर्शन के मूलभूत-सैद्धान्तिकविवेचनों के साथ कविवर पं. बनारसीदास जी के ‘नाटक-समयसार’ के प्रतिपादनों की तुलनात्मक-समीक्षा अतिसंक्षेप में प्रस्तुत की जायेगी, ताकि वस्तुस्थिति की जानकारी भी हो जाये और अतिविस्तार भी नहीं हो पाये। (क) आत्मा ‘प्रकाशित’ नहीं होता, बल्कि ‘चकासित’ होता है- इस तथ्य को मूल व ‘नाटकसमयसार’ में तुलनात्मक-रूप से देखिये- ‘‘स्वानुभूत्या चकासते’’= ‘‘जो अपनी दुति आप विराजत’’ -(जीवद्वार, पद्य 2) सर्वत्र ज्ञान के प्रकाशकत्व की चर्चा मिलती है, उसे सूर्य के प्रकाश की भाँति स्व-पर-प्रकाशक कहा जाता है ; किन्तु यहाँ मूल में आचार्य अमृतचंद्र सूरि ने उसके लिये ‘चकासते’ क्रियापद का मौलिक-प्रयोग करके वैशिष्ट्य बताया है, तो कविवर पं. बनारसीदास जी ने भी यहाँ उसे ‘अपनी दुति आप विराजत’ कहकर उसकी अनन्तस्वाधीनता की घोषणा की है। (ख) आत्मानुभूति ही मोक्षमार्ग है- ‘‘मुकतिपंथ-कारन कहौं, अनुभौ को अधिकार’’ एवं ‘‘अनुभव मारग मोख कौ, अनुभव मोख-सरूप’’ -(उत्थानिका, पद्य 16-19) आज जब अविरति-सम्यग्दृष्टि-जीव को निर्मल-आत्मानुभूति होने की बात जैन भी आसानी से स्वीकार करने तैयार नहीं हैं तथा कोई सातवें गुणस्थान से आत्मानुभूति की शुरूआत कह रहे हैं, तो कुछ सीधे तेरहवें गुणस्थान में ही आत्मानुभूति होना स्वीकार कर रहे हैं। ऐसी विषम-स्थिति में आद्योपान्त-मोक्षमार्ग व मोक्ष में आत्मानुभूति का ही विलास दो-टूक शब्दों में बतलानेवाले पं. बनारसीदास जी का यह कथन अपने आप में ‘मील के पत्थर’ की तरह मार्गदर्शक है। (ग) मिथ्यादृष्टि का व्यावहारिक-स्वरूप-

''धरम न जानत, बखानत भरमरूप, ठौर-ठौर ठानत, लराई पच्छपात की।
भूल्यौ अभिमान में, न पाउ धरै धरनी में, हिरदै में करनी, बिचारे उतपात की।।
फिरै डांवाडोल-सौ, करम के कलोलनि में, ह्वै रही अवस्था, सु बघेलू कैसे पात की।
जाकी छाती ताती कारी कुटिल कुवाती भारी, ऐसौ ब्रह्मघाती है मिथ्याती महापातकी।। 9।।

आज जब अन्तरंग-मिथ्यात्व को दूर करने की जगह बाहरी पुण्य-कार्यों एवं व्रतादिक के पालने में ही धर्म बताया जा रहा है, तब मिथ्यात्व ही सबसे खतरनाक है और उसके विनाश के बिना मोक्षमार्ग शुरू ही नहीं हो सकता है- ऐसे स्पष्ट-संकेत इस पद्य में बनारसीदास जी ने दिये हैं, जिनमें मिथ्यादृष्टि-जीव को ‘ब्रह्मघाती’ और ‘महापातकी’ कहकर उसकी घोर-भर्त्स्ना की है। साथ ही उसकी व्यावहारिक-पहिचानों का जो विवरण यहाँ दिया गया है, वह अन्यत्र दुर्लभतम है। (घ) अविरति-सम्यग्दृष्टि की स्तुति- उत्थानिका के कुछ पद्य द्रष्टव्य हैं-

''भेदविज्ञान जग्यौ जिन्हके घट, सीतल-चित्त भयौ जिमि चंदन।
केलि करैं सिवमारग में, जगमाँहि जिणेसुर के लघुनंदन।।
सत्यसरूप सदा जिन्हकैं, प्रगट्यौ अवदात मिथ्यात-निकंदन।
सांतदशा तिन्हकी पहिचानि, करैं करजोरि बनारसि वंदन।। 6।।

स्वारथ के साँचे, परमारथ के साँचे चित्त, साँचे-साँचे बैन कहें, साँचे जैनमती हैं।
काहू के विरुद्ध नाहिं, परजाय-बुद्धि नाहिं, आतम-गवेषी, न गृहस्थ हैं न जती है।।
सिद्धि-रिद्धि-वृद्धि दीसै घट मेैं प्रगट सदा, अंतर की लच्छिसौं अजाची लच्छपती है।
दास भगवंत के उदास रहैं जगत् सौं, सुखिया सदैव ऐसे जीव समकिती हैं।। 7।।

जाकै घट प्रगट विवेक गणधरकौसौ, हिरदै हरखि महामोह को हरतु हैं।
साचौं सुख मानै निज-महिमा अडोल जानै, आपुही मैं आपनौ सुभाउ ले धरतु है।।
जैसे जल-कर्दम कतकफल भिन्न करै, तैसे जीव-अजीव विलछनु करतु है।
आतम-सकति साधैं ग्यान कौ उदौ आराधै, सोई समकिती भवसागर तरतु है।। 8।।

इन पद्यों में अविरति-सम्यग्दृष्टि-जीव की अनेकों आयामों से महिमा की गयी है। यह बात आज के वातावरण में विशेष तौर पर मननीय है, जबकि बिना बाह्य-त्याग के तो धर्म की शुरूआत तक नहीं मानी जाती है। जबकि जिनवाणी स्पष्ट कहती है कि ‘‘अविरति-सम्यग्दृष्टि नामक चतुर्थ-गुणस्थान की भूमिका के बिना धर्म के क्षेत्र में जीव का पदार्पण ही नहीं होता है।’’ और ऐसे सम्यग्दृष्टि-जीवों की महिमा हर स्थिति में महनीय है, चाहे वे अविरति ही क्यों न हों? वस्तुतः तो व्रतियों के व्रतों की सत्यता और पूज्यता का आधार भी सम्यग्दर्शन ही है। यही मोक्ष की एकमात्र-गारंटी है, जिसके हो जाने पर मोक्षमार्ग और मोक्ष होगा ही, और इसके बिना कितना ही कुछ क्यों न मिल जाये, न तो मोक्षमार्ग हो सकता है और न ही मोक्ष। (ङ) साधु-स्तुति-

''ग्यान को उजागर, सहज-सुखसागर, सुगुन-रत्नागर, विराग-रस भरयौ है।
सरन की रीति हरै, मरनकौ न भै करे, करनसौं पीठि दे, चरन अनुसरयौ है।।
धरम को मंडन, भरम को विहंडन है, परम-नरम ह्वै कै, करम सौ लरयौ है।
ऐसौ मुनिराज भुव-लोक में विराजमान, निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है।। 5।।

इस एक ही पद्य में जिनाम्नाय में मुनिधर्म के स्वरूप का सारा रहस्य समाहित कर दिया है और सच्चे मुनिराजों की बाह्य-पहिचान भी सुतरां स्पष्ट कर दी है। कौन-से लक्षण देखकर मुनिराज को नमस्कार/वंदना करनी चाहिये- यह असन्दिग्धरूप में यहाँ स्पष्ट कर दिया है। आज जो मात्र बाह्य-नग्नमुद्रा देखकर ही वंदना करने का जोर आध्यात्मिक-विद्वज्जगत् भी देने लगा है, उन्हें तो यह पद्य मानो पथ-प्रदर्शक की भाँति दिशाबोध कर रहा है। इसके अनुसार जिनका 1. असन्दिग्ध-तत्त्वज्ञान स्पष्ट-परिलक्षित हो रहा हो, 2. जिनके जीवन में आनन्दमयता का उत्कर्ष साफ दिखायी देता हो अर्थात् दुःखों की झलक तक जिनके व्यक्तित्व में नहीं हो, 3. जिनशासन में मुनिधर्म के श्रेष्ठ-गुणों में से कोई एकाध नहीं, बल्कि अपार-गुणसमूह जिनके व्यक्तित्व में विद्यमान हो, 4. वैराग्य के रस में जिनका अन्तर्बाह्य-व्यक्तित्व रचा-बसा हो अर्थात् जिन्हें वैराग्य दिखाना नहीं पड़ता हो, बल्कि अनाड़ी को भी जिनके जीवन में सच्चा-वैराग्य बिना कहे ही समझ में आ सके, 5. जो अपने स्वरूप के अलावा अन्य किसी की भी शरण ग्रहण करने की मानसिकता तक कभी भी नहीं विचार तक में लाते हों अर्थात् अपने आत्मस्वरूप में ही परम-तृप्त हों, 6. मरण का भय जिनके जीवन में कहीं दूर-दूर तक भी नहीं दिखायी देता हो (कोरोना जैसे वायरस का भी डर न तो जिन्हें सताये और न ही उससे बचने के टोटके जो बतायें), 7. इन्द्रियों की माँगों (गर्मी में ए. सी. व सर्दियों में हीटर, स्वादिष्ट रसों व पकवानों का आहार, विलासितापूर्ण भवन आदि) का भाव तक जिनके नहीं जागता हो, इन्द्रिय-विषयों से दो अत्यन्त-विरक्त हों, 8. जिनवाणी में निर्दिष्ट मुनिधर्म का बिना किसी बहाने के (कि ‘पंचमकाल है’ या ‘जैसे श्रावक, वैसे मुनि’ अथवा 'हमसे तो अच्छे ही हैं) निर्दोषरीति से शत-प्रतिशत पालन करते हों, 9. जिनकी चर्या एवं वचनों से धर्म सुशोभित होता हो, 10. जिन्हें देखने के बाद धर्म, धर्मात्मा एवं आत्महित के बारे में सारे भ्रम दूर हो जाते हों, 11. जिनकी सम्पूर्ण-चर्या अत्यन्त अहिंसक एवं विनम्र हो (अर्थात् न तो ईर्या समिति के विपरीत चलें, न ही कठोर-वचन बोलें, न ही जोर-जोर से चीखकर भाषण दें, न ही किसी का अपमान करें और न ही अपने स्वरूप की विराधना करें), 12. जो कर्मों की निर्जरा करने में ही सदा तत्पर रहते हों (अर्थात् शेष विश्व में किसी भी व्यक्ति या वस्तु/ संस्था/संगठन/सम्प्रदाय आदि से जिनके मन में स्वप्न में भी द्वेषभाव नहीं हो)- ऐसे मुनिराज यदि इस लोक में कहीं भी मिल जायें, तो ही बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘‘उन्हें नमस्कार/वंदना करना चाहिये।’’ (च) ज्ञानी के भोग निर्जरा के हेतु हैं- ‘कर्त्ता-कर्म-अधिकार’ में यह प्रकरण मननीय है-

ग्यानवंतकौं भोग निरजरा-हेतु हैं, अज्ञानीकौ भोग बंध-फल देतु है।।
यह अचरज की बात हिये नहीं आवही, पूछै कोऊ सिष्य गुरू समझावही।। 22।।

दया-दान-पूजादिक विषय-कषायादिक, दोऊ-कर्मबंध पै दुहूकौ एक-खेतु है।
ग्यानी-मूढ़ करम करत दीसैं एकसै पै, परिनामभेद न्यारौ-न्यारौ फल देतु हैं।।
ग्यानवंत करनी करै पै उदासीनरूप, ममता न धरैं तातैं निर्जराकौ हेतु है।
वहै करतूति मूढ़ करै पै मगनरूप, अंध भयौ ममतासौं बंध-फल लेतु है।। 23।।

जिन्हें ‘ज्ञानी के भोग भी निर्जरा के हेतु हैं’ -यह पढ़ते सुनते ही करंट जैसा लगता हो, उन्हें पूरीतरह से जिनशासन-सम्मत यह पद्य गम्भीरतापूर्वक मननीय हैं। इस प्रकरण में असंख्यातगुनी-निर्जरावाला ‘तत्त्वार्थसूत्र’ जी का सूत्र (9/45) एवं उसकी व्याख्या मननीय है, जिसमें देशव्रती और महाव्रतियों की तुलना में अनन्तानुबंधीकषाय-चौकड़ी का विसंयोजन करनेवालों एवं क्षायिक-सम्यग्दृष्टियों को असंख्यातगुनी-अधिक निर्जरा कही है।

इस पद्य में तो इस तथ्य की सकारण-सिद्धि सरल, किन्तु अकाट्य-शैली में की गयी है।
(छ) जैन-द्रव्य-मीमांसा- इसका सटीक-प्ररूपण उत्थानिका के पद्य 20 से 25 तक किया गया है।
इनमें छोटे-छोटे सूत्रात्मक-दोहों में गम्भीर-स्वरूप का सटीक-प्रस्तुतीकरण हुआ है।

(ज) जैन-नवपदार्थ-मीमांसा- उत्थानिका के ही पद्य संख्या 26 से 34 तक यह विषय अत्यन्त- प्रभावीरूप से विवेचित हुआ है। इन पद्यों में भी द्रव्य-मीमांसा और पदार्थ-मीमांसा की सूक्ष्म-विभाजकता को बहुत ही सरलता से स्पष्ट किया गया है। विशेषतः वे विद्वान् व जिज्ञासु शांतमन से इन्हें पढ़ें, मनन करें, जिनको यह भ्रम है कि जिनाम्नाय में पदार्थ की अवधारणा काल-विवक्षा से की गयी है। उनका भ्रम इस विवेचन से सफलता से दूर हो सकता है और पदार्थ-दृष्टि का मर्म समझ में आ सकता है। (झ) अनेकान्त-विवेचन- यह जैनदर्शन का वस्तुस्वरूप-विवेचक अद्वितीय-सिद्धान्त है। इसकी परिभाषा तो अलग से बनारसीदास जी ने यहाँ नहीं बतायी है, किन्तु प्रयोग के माध्यम से उसके स्वरूप एवं प्रयोगविधि- दोनों को भलीभाँति समझाया है। देखिये -

''अस्तिरूप-नासति अनेक-एक थिररूप- अथिर इत्यादि नानारूप जीव कहियै।
दीसै एक-नैकी प्रतिपच्छी न अपर दूजी, नैकी न दिखाइ वाद-विवादमैं रहियै।।
थिरता न होइ विकलप की तरंगनिमैं, चंचलता बढ़ै अनुभौ-दसा न लहियै।
तातैं जीव अचल-अबाधित-अखंड-एक, ऐसौ पद साधिकै समाधि-सुख गहियै।। 43।।

(ञ) स्याद्वाद-विवेचन- ‘अनेकान्त’ जहाँ वस्तु का अबाधित-स्वरूप है, वहीं ‘स्याद्वाद’ उस अनेकान्तात्मक-वस्तुस्वरूप के प्रतिपादन की एकमात्र व सबसे निर्दोष-वचनशैली है। इसका भी लक्षण लिखने की जगह इसकी प्रयोगविधि के माध्यम से ही इसका स्वरूप एवं व्यावहारिक-पक्ष स्पष्ट किया है-

''करम-अवस्थामैं असुद्धसौं विलोकयित, करम-कलंकसौं रहित सुद्ध-अंग है।
उभै-नै-प्रवांन समकाल सुद्धासुद्ध-रूप, ऐसौ परजाइधारी-जीव नाना-रंग है।।
एकही समै-मैं त्रिधारूप, पै तथापि याकी, अखंडित-चेतना-सकति सरवंग है।
यहै स्यादवाद याकौ भेद स्यादवादी जानै, मूरख न मानै जाकौ हियौ दृग-भंग है।। 48।।

(ट) गुणस्थान-विवेचन- इसके लिये तो बनारसीदास जी ने पूरा स्वतंत्र-अधिकार ही लिख दिया है, जिसमें चौदह-गुणस्थानों का जैन-दार्शनिक-दृष्टि से महत्त्वपूर्ण-विवेचन किया गया है। अधिकांश-विवेचन तो इस विषय के पूर्ववर्ती-ग्रन्थों में वर्णित प्रचलित-बातों के अनुरूप ही है ; किन्तु कुछ विषय ऐसे भी लिये गये हैं, जो बहुत-प्रसिद्ध नहीं हैं और बनारसीदास जी ने ही लगभग पहली बार उनका इसतरह निरूपण किया है। ऐसे विषयों में कुछ निम्नानुसार हैं- सम्यक्त्व के आठ-विवरण-

समकित उतपति चिहन गुन, भूषन दोष विनास।
अतीचार-जुत अष्ट-विधि, वरनौं विवरन तास।। 26।।

इनका विस्तृत-वर्णन कवि ने 27-33 तक के छंदों में किया है। यह विषय अन्यत्र कहीं इस तरह से दृष्टिगत नहीं होता है। मिथ्यात्व-गुणस्थान में पाँच प्रकार का मिथ्यात्व:-

प्रथम ‘एकांत’ नाम मिथ्यात अभिग्रहीत, दूजौ ‘विपरीत अभिनिवेसिक’ गोत है।
तीजौ ‘विनै-मिथ्यात’ अनाभिग्रह नाम जाकौ, चौथौ ‘संसै’ जहां चित्त भौंरकौसौ पोत है।।
पांचमौ ‘अग्यान’ अनाभोगिक-गहलरूप, जाकै उदै चेतन अचेतसौ होत है।
एई पांचौं-मिथ्यात जीवकौ जगमैं भ्रमावे, इनकौ विनास समकितकौ उदोत है।। 10।।

इसमें अभिगृहीत, आभिनिवेशिक, अनाभिग्रह, संशय एवं अज्ञान जो भेद मिथ्यात्व के कहे हैं, उनमें से अंत के दो को छोड़कर पहले के तीन नाम प्रचलित नहीं हैं। इनकी जगह विपरीत, एकान्त और विनय- ये तीन नाम प्रचलित हैं। सम्यक्त्व के चार प्रकार:-

मिथ्यामति गंठि-भेद, जगी निरमल-जोति, जोगसौं अतीत, सो तो निहचै प्रमानियै।
वहै दुंद-दसासौं कहावे, जोग-मुद्रा धरै, मति-श्रुतग्यान-भेद विवहार मानियै।।
चेतना-चिहन पहिचानि, आपा-पर वेदै, पौरुष अलख तातैं, सामान्य बखानियै।
करै भेदाभेदकौ, विचार विसतार-रूप, हेय-गेय-उपादेयसौं विशेष जानियै।। 51।।

इसमें निश्चय-सम्यक्त्व, व्यवहार-सम्यक्त्व, सामान्य-सम्यक्त्व एवं विशेष-सम्यक्त्व- ये चार भेद - बताये गये हैं। इनमें से पहले दो भेद तो प्रचलित हैं, लेकिन बाद के दो भेद प्रचलित नहीं हैं। लक्षणों को दिये जाने से आपत्ति के योग्य कुछ भी नहीं है, सब जिनाम्नाय-सम्मत है। बस, भेदों के नाम ही अप्रचलित जैसे हैं- यही इस कथन का अभिप्राय है। श्रावक के इक्कीस गुण-

लज्जावंत दयावंत प्रसंत प्रतीतवंत, परदोषकौ ढकैया पर-उपगारी है।
सौमदृष्टी गुनग्राही गरिष्ट सबकौं-इष्ट, शिष्टपक्षी मिष्टवादी दीरघ-विचारी है।।
विशेषग्य रसग्य कृतग्य तग्य धरमग्य, न दीन न अभिमानी मध्य-विवहारी है।
सहज-विनीत पापक्रियासौं अतीत ऐसौ, श्रावक पुनीत इकवीस-गुनधारी है।। 54।।

इसके अनुसार तो ‘श्रावक’ कहलाने यो वही है, जो - 1. उद्दंड न होकर सांसारिक-कार्यों के प्रति लज्जावंत तो हो ही, लौकिक-भाषा में उसकी ‘आँख का पानी नहीं मर गया’ होना चाहिये। 2. उसे स्वाभाविकरूप से ही दयालु होना चाहिये, क्रूरता के भाव उसके मन में कदापि नहीं आने चाहिये।

3. वह प्रशान्तचित्त होना चाहिये, न कि जरा सी प्रतिकूलता आते ही व्यग्र हो जाये।
4. वह संवेदनशील हो, ताकि संवेदनाओं को समझ सके व तदनुरूप-आचरण कर सके।

  1. दूसरों के दोषों को जानते हुये भी उनका प्रचार नहीं करे। विचार करें कि यदि हम सब यह गुण अपना लें, तो हमें आपस में बतियाने के लिये सारी मसालेदार-सामग्री ही गायब हो जायेगी और हम आपस में मात्र ‘जय जिनेन्द्र’ या संक्षिप्त-कुशलक्षेम ही पूछ सकेंगे। 6. परोपकारी-प्रवृत्ति का होना भी यहाँ श्रावक के लिये अनिवार्य-गुण बताया गया है, जबकि हममें से कई लोग दूसरों की कमजोरी या दुर्दशा को भाँपकर उसको सुनाकर या कुछ विपरीत करके कष्ट देकर आनन्दित होते हैं। यह आत्मालोचन का विषय है कि ऐसा करके भी हम अपने को ‘श्रावक’ कैसे कहला सकते हैं? 7. सौम्यतापूर्ण-दृष्टि जिसकी हो, अर्थात् दूसरों के दोषों को ग्रहण करने की मानसिकता जिसकी नहीं हो और न ही ऐसे काम-क्रोध आदि के विकार जिसकी नज़रों में हों कि भद्र-महिलायें व बच्चे जिसकी नज़रों से बचकर रहना चाहें। 8. जो दूसरों के गुणों को ही मात्र ग्रहण करता हो, दोषों को नहीं। यदि दोष जानने में आ जायें, तो वह उन्हें ग्रहण ही नहीं करे, बल्कि उनकी उपेक्षा कर दे। 9. जो गम्भीर-व्यक्तित्व का धनी हो, ओछी-बातें जिसके मन में तक कभी भी नहीं आतीं हों और न ही संकुचित-सोच से जो कभी किसी के प्रति व्यवहार करता हो। (विचार करें कि आज सेठों को गरीबों के प्रति, शास्त्रज्ञों को कम-जानकारों के प्रति, सुन्दर-देहवालों का सामान्य-रूपवालों की कुरूपों के प्रति हेयता या तुच्छता की मनोवृत्ति एवं वैसा व्यवहार यदि है, तो इसके अनुसार हम ‘जैन-श्रावक’ कहे जाने योग्य नहीं हैं। ) 10. आपका व्यवहार सभी को अच्छा प्रतीत हो, अर्थात् हम ऐसा कोई व्यवहार ही नहीं करें कि जिससे किसी को पीड़ा पहुँचे। 11. ‘शिष्टपक्षी’ यानि जो सभ्य/शिष्ट-लोगों/बातों का ही समर्थन करे, कभी भी गलत-बात का समर्थन नहीं करे। 12. ‘मिष्टवादी’ अर्थात् जो हित-मित-प्रिय-वचन ही बोले। ‘‘परवधकार-कठोर-निंद्य नहिं वचन उचारे’’ की मर्यादा का पालन करता हो। 13. ‘दीरघ-विचारी’ अर्थात् अच्छी तरह से आगा-पीछा सोचकर ही जो कार्य करे। हड़बड़ी या अविवेकपूर्ण कार्य कदापि नहीं करे। 14. ‘विशेषज्ञ’ हो अर्थात् हर कार्य के अच्छे एवं बुरे-दोनों पक्षों को जानता हो और तदनुरूप ही आचरण करता हो। 15. ‘रसज्ञ’ हो अर्थात् अच्छे-संस्कारों एवं तत्त्वज्ञान की चर्चा में ही जिसे अच्छा लगता हो, बुराई एवं विषय-कषाय की चर्चा में जिसकी रुचि ही नहीं हो। 16. ‘कृतज्ञ’ हो, दूसरों के द्वारा अपने प्रति किये गये उपकारों को कभी भी नहीं भुलाये और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखे। नीतिज्ञों का कहना है कि हर पाप का कोई न कोई प्रायश्चित्त होता है, लेकिन कृतघ्नता का कोई प्रायश्चित्त नहीं है, वह अक्षम्य-अपराध की श्रेणी में आता है। 17. जो ‘तज्ञ’ हो, अर्थात् जैनकुल के अनुरूप सभी शिष्टाचारों व सदाचारों को जानता हो। विचार करें कि आज के शहरियों के घर में कोई सदाचारी-धार्मिक व्यक्ति आ जाये, तो कई लोगों को तो छानकर पानी देना तक नहीं आता है, वे प्लास्टिक की चाय-छन्नी से छानकर पानी दे देते हैं, तो जलगालन की विधि भला उन्हें कैसे पता होगी? बाकी धर्मचर्या के बारे में भी इसीतरह समझ लें। 18. ‘धर्मज्ञ’ हो अर्थात् किसी भी स्थिति में जिनधर्म का क्या निर्देश है?- उससे परिचित हो व तदनुरूप ही व्यवहार करता हो। 19. जिसके व्यवहार में न तो अपने से कमजोरों के प्रति अभिमान की भावना हो और न ही अपने से अधिक सम्पन्नों के प्रति दीनता का भाव जगता हो। अनुकूल-प्रतिकूल- दोनों स्थितियों में जो समभावी हो व संतुलित-व्यवहार करता हो। 20. जो सहज ही विनयशील हो, शिष्टाचार का दिखावा जिसे नहीं करना पड़ता हो, कि सामने तो प्रशंसा करे और पीठ पीछे बुराई करे। 21. जो पापाचरण से रहित हो। हम प्रक्षाल के पाठ में भी पढ़ते हैं कि ‘‘पापाचरण तज न्हवन करता’’ अर्थात् पापमय-आचरण करनेवालों को तो जिनेन्द्रदेव के बिम्ब को स्पर्श करने या उनकी प्रक्षालनविधि करने तक का अधिकार नहीं है। -इन इक्कीस-गुणों से जो रहित है, या ये इक्कीस-गुण जिसमें पूरे नहीं पाये जाते हैं, वह ‘श्रावक’ संज्ञा का पात्र नहीं है। हम विचार करें कि इनके परिप्रेक्ष्य में हममें से कितने लोग ‘श्रावक’ कहलाने योग्य हैं? (ठ) कर्त्ता-कर्म-मीमांसा- तीसरे ‘कर्त्ता-कर्म-अधिकार’ में इस संबंध में आचार्य कुन्दकुन्द एवं आचार्य अमृतचंद्र सूरि का अनुसरण तो किया ही गया है, कई स्थलों पर कविवर पं. बनारसीदास जी ने अपनी मौलिक-विवेचना भी की है। जैसे कि- कुंभकार के माध्यम से मिथ्यादृष्टि-जीव के कर्तापने की सिद्धि ‘‘ज्यों माटी में कलस होन की सकति रहे ध्रुव। दंड-चक्र चीवर-कुलाल, बाहिज-निमित्त हुव।। त्यों पुदगल-परवांनु-पुंज वरगना-भेष धरि। ग्यानावरनादिक रूप, विचरंत विविध परि।।’’ ‘‘बाहिज-निमित्त बहिरात्मा, गहि संसै अग्यानमति। जगमाँहि अहंकृत-भावसौं, करमरूप ह्वै परिनमति।। 24।।’’ इसमें पर-कर्तृत्व का निषेध कुम्हार और घड़े के सरल-दृष्टान्त-पूर्वक किया गया है। साथ ही निमित्तनैमित्तिक एवं उपादान-उपादेय-सम्बन्धों की भी समीचीन-व्याख्या की गयी है। कर्ता-कर्म-सम्बन्ध के साथ-साथ जीव और पौद्गलिक-कर्मों के बंध-विधान के मूल में भी यही कर्त्ता-कर्म-विषयक अज्ञानभाव ही काम कर रहा है, यह बात दूसरे पद्य में स्पष्ट की गयी है। 3. धार्मिक-समीक्षा- सामान्यतः लोगों को धर्म और दर्शन में तात्त्विकरूप से अन्तर ही पता नहीं होता है, इसलिये वे सब कुछ मिश्रितरूप में बात करते हैं। किन्तु वस्तुस्थिति यह है, कि ये दोनों निकटतः सम्बद्ध होते हुये भी मौलिकरूप से भिन्न-भिन्न होते हैं। इसीलिये यहाँ धार्मिक-बिन्दुओं की दार्शनिक-विषयों से अलगपहिचानपूर्वक प्रस्तुति की जा रही है। दार्शनिक-विषय जहाँ विचार-प्रधान होते हैं, वहीं धार्मिक-विषय आचार-प्रधान होते हैं। ‘नाटक-समयसार’ में आगत धार्मिक-विवेचनों की समीक्षा निम्नानुसार प्रस्तुत है - (क) जिन-प्रतिमा-महिमा- गुणस्थान-अधिकार में पहले पद्य में देखिये-

''जिन-प्रतिमा जिन-सारिखी, नमै बनारसि ताहि।
जिन-प्रतिमा जन-दोष निकंदै। सीस-नमाइ बनारसि बंदैं।। 4।।

जो जिन-प्रतिमा को नवदेवों में कल्पित बताकर उनकी पूज्यता सन्दिग्ध बता रहे हैं, उन्हें कविवर पं. बनारसीदास जी के इस विषय में स्पष्ट-मन्तव्य को (जो कि जिनाम्नाय का ही मन्तव्य है) असन्दिग्धरूप से समझ लेना चाहिये कि जिनाम्नाय में जिन-प्रतिमा या जिनबिम्ब की पूज्यता एवं आध्यात्मिक-प्रभाव किसतरह माना गया है। और इसका विरोध जिनशासन का विरोध है तथा देव के अवर्णवाद का ही एक-रूप है। (ख) जिनबिम्ब के मर्मज्ञों की पहिचान- वहीं पर यह छंद देखिये-

''जाके उर-अंतर सुद्रिष्टि की लहर लसी, विनसी-मिथ्यात मोहनिद्राकी ममारखी।
सैली जिनशासन की फैली जाके घट भयौ, गरबकौ-त्यागी षट-दरब कौ पारखी।।
आगमकै अच्छर परे हैं जाके श्रवनमैं, हिरदै-भंडार मैं समानी वानी-आरखी।
कहत बनारसि अलप-भवथिति जाकी, सोई जिन-प्रतिमा प्रवांनै जिन-सारिखी।।3।।

उपर्युक्त विषय को ही और अधिक बहुआयामी-तरीके से स्पष्ट करते हुये कविवर पं. बनारसीदास जी इस पद्य में दो-टूक शब्दों में कहते हैं कि - 1. जिसके हृदय में सम्यग्दर्शन की प्रकटता एवं मिथ्यात्व का विनाश हुआ है, 2. जिनशासन की शैली जिसे भलीभाँति समझ में आयी है, 3. जिसके हृदय से दुरभिमान-रूपी अंधकार नष्ट हुआ है, 4. छह-द्रव्यों की परख अर्थात् जिनोपदिष्ट-वस्तु-व्यवस्था जिसे अच्छी तरह से समझ में आ गयी है, 5. जिसके कानों में जिनागम की अनुश्रुति हुई है, 6. जिसके हृदय में जिनेन्द्रदेव की वाणी दर्पण की तरह सुस्पष्ट हुई है अर्थात् जिनवचनों में जिसे तनिक भी सन्देह नहीं है, 7. जिसकी संसार-सागर में स्थिति अत्यन्त-अल्प रह गयी है अर्थात् जो आसन्न-भव्य है; वही जीव जिन-प्रतिमा को साक्षात् जिनेन्द्र देव के समान प्रमाणित करता है। यदि जिसे जिनबिम्ब की पूज्यता में और आत्महित में उनकी उपादेयता में तनिक भी सन्देह है अथवा ऐसा प्रतिपादन वह किसी भी लौकिक या निजी-स्वार्थवश करता है, तो उसका सीधा-अभिप्राय यही लेना चाहिये कि उसने उपर्युक्त सातों बातों को अभी तक आत्मसात् नहीं किया है, अर्थात् वह जीव स्पष्टरूप से मिथ्यादृष्टि व दीर्घ-संसारी है। (घ) अभक्ष्यों का विवेचन- गुणस्थान-अधिकार में ही यह विवेचन द्रष्टव्य है-

''ओरा घोरबरा निसिभोजन, बहुबीजा बैंगन संधान।
पीपर बर ऊमर कठूंबर, पाकर, जो फल होइ अजान।।
कंदमूल माटी विष आमिष, मधु माखन अरु मदिरापान।

फल अति-तुच्छ तुसार चलित-रस, जिनमत ए बाईस-अखान।। 55।।‘’ इन अभक्ष्यों में से कुछ से तो हम परिचित हैं और उनसे यथाशक्ति बचते भी हैं, किन्तु कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें हम अभक्ष्य के रूप में न तो स्वरूप से जानते हैं और न ही उनके अभक्ष्य कहे जाने का कारण ही जानते हैं। जैसे कि अतितुच्छ-फल, तुषार यानि बर्फ, चलितरस, मिट्टी, कठूंबर (कटहल) आदि। इनके बारे में परिचित होने के लिये यह वर्णन उपयोगी है। (ङ) सप्त-व्यसनों का आध्यात्मिक-पक्ष- ‘साध्य-साधक-द्वार’ में आगत यह विषय मननीय है-

''जूवा-आमिष-मदिरा-दारी।sआखेटक-चोरी-परनारी।।
एई सात-विसन दुखदाई। दुरित-मूल दुरगति के भाई।। 27।।

दरवित ये सातौं-विसन, दुराचार-दु:खधाम।
भावित अंतर-कल्पना, मृषा-मोह परिनाम।। 28।।

अशुभमैं हारि शुभमैं जीति यहै द्यूत-कर्म, देह की मगनताई यहै मांस-भखिबौ।
मोह की गहलसौं अजान यहै सुरापान, कुमतिकी रीति गनिकाकौ रस चखिबौ।।
निरदै ह्वै प्रानघात करवौ यहै सिकार, परनारी-संग परबुद्धिकौ परखिबौ।
प्यारसौं पराई-सौंज गहिवे की चाह चोरी, एई सातौं-विसन विडारैं ब्रह्म लखिबौ।। 29।।

आज के वातावरण में सबसे बड़ी-बिडम्बना यह बन गयी है कि जो सप्तव्यसन पहले आचरण के कलंक माने जाते थे, इसीलिये छुपकर नजरें चुराकर लोग करते थे; आज वे ही स्तर की पहिचान (स्टेटस-सिंबल) बन गये हैं, इसीलिये अब जैनी लोग तक इन्हें छुपकर नहीं, बल्कि सबके सामने ससम्मान करने लगे हैं। यह तो बात द्रव्यव्यसनों की है। बनारसीदास जी ने यहाँ इन सप्तव्यसनों के जिन भावनात्मक-रूपों की चर्चा की है, उनका सेवन तो वाकई अधिकांश लोग, यहाँ तक कि पंडितजन भी सगर्व करते हैं। जैसे कि पुण्योदय की अनुकूलताओं में अपनी जीत मानना कि ‘‘मैंने कितनी समझदारी से सब किया,’’ और पापकर्म के उदय में अपनी हार मानना कि ‘‘मैं क्या कर सकता हूँ, कर्मोदय के आगे किसकी चलती है?’’ तथा ‘‘परनारी-संग परबुद्धि को परखिबौ’’ के तो विशेषज्ञ ही कुछ पंडितजन होते हैं। अधिक क्या कहूँ, समझदार को इशारा ही बहुत है। ग्रन्थ में प्रकरण में इनका अच्छा स्पष्टीकरण किया गया है। अतः यहाँ संकेतमात्र करके विराम लेता हूँ। (च) धर्मी-जीव की अनिवार्य-चर्या/पहिचान- इसी अधिकार में यह महत्त्वपूर्ण-प्रतिपादन भी है-

''कृपा-प्रसम-संवेग-दम, अस्तिभाव-वैराग्य।
ये लच्छन जाकै हियै, सप्त-व्यसनकौ त्याग।। 26।।

क्या हम अपनी समीक्षा इन सात-लक्षणों के आधार पर करने को तैयार हैं? क्या हम आत्म-निरीक्षण करने के लिये सहमत हैं कि ये सात-गुण हमारे व्यक्तित्व एवं जीवन के अभिन्न-अंग बन सके हैं या नहीं? मुनिराजों के सम्बन्ध में दिशानिर्देश- इसीप्रकार के कई विषयों के अनुरूप अनेकों प्ररूपण इस ग्रन्थ में आये हैं, जैसे कि ‘गुणस्थान-अधिकार’ में (79-89) मुनिवरों के अट्ठाईस-मूलगुणों आदि का वर्णन भी मुनिधर्म का धार्मिक-पक्ष ही है। किन्तु बनारसीदास जी ने जो ‘स्थविरकल्पी’ और ‘जिनकल्पी’ साधुओं का धार्मिक-स्वरूप दिया है, वह मननीय है-

''थविर-कलपि जिन-कलपि दुविधि मुनि, दोऊ वनवासी दोऊ नगन रहतु हैं।
दोऊ अट्ठाईस मूलगुन के धरैया दोऊ, सरव-त्यागी ह्वै विरागता गहतु हैं।।
थविर-कलपि ते जिनके शिष्य साखा होइ, बैठिकै सभामैं धर्मदेसना कहतु हैं।
एकाकी सहज जिनकलपि तपस्वी घोर, उदै की मरोरसौं परीसह सहतु हैं।। 84।।

नानाविधि संकट-दसा,सहि साधै सिवपंथ।
थविरकल्पि-जिनकल्पि धर, दोऊ सम-निरग्रंथ।। 90।।

जो मुनि-संगतिमैं रहैं, थविरकल्पि सो जान।
एकाकी जाकी दसा, सो जिनकल्पि बखान।। 91।।

इसके अनुसार स्वच्छन्दता से रहित निर्दोष-मुनिचर्यावाले एकलविहारी-मुनिराज को ‘जिनकल्पी’ कहा गया है। जबकि आज के एकलविहारी मुनिपद-धारक तो स्वच्छन्दता एवं निरंकुश-वृत्ति के निदर्शन हैं। जबकि जो इसमें ‘स्थविरकल्पी’ कहे गये हैं, वे संघ में अन्य मुनिराजों के सान्निध्य में रहते हों तथा निर्दोष-मुनिधर्म का पालन करते हैं। किन्तु आजकल बहुत से संघ तो शिथिलाचार के नये प्रतिमान बना रहे हैं। बल्कि यह कह सकते हैं कि कुछ शिथिलाचारी-मुनि मिलकर अपने अलग-संघ बना रहे हैं। इस बिडम्बना को देखते हुये कहा जा सकता है कि आज न तो ‘स्थविरकल्पी-मुनि’ हैं और न ही ‘जिनकल्पी-मुनि’। और जब मुनियों के दोनों वर्गों में नहीं हैं, तो इनकी वास्तविकता क्या है? आप स्वयं विचार कर सकते हैं। कविवर पं. बनारसीदास जी ने इस ‘नाटक-समयसार’ नामक ग्रन्थ में दार्शनिक-विषयों पर अनेकों स्थलों पर तो जिनागम में प्रतिपादित-तथ्यों को ही स्पष्ट किया है, तथा कई स्थल ऐसे भी हैं, जहाँ उपलब्ध-पूर्वागम-परम्परा में तो वैसा विवेचन ज्यों का त्यों नहीं मिलता है ; परन्तु मूल-अभिप्राय से भिन्न न होकर मूलाम्नाय का पोषक ही होने से उन प्रतिपादनों की महत्ता स्वतः ज्ञापित होती है। ऐसे प्रतिपादनों में से सांकेतिकरूप में कुछ ही विषयों का परिग्रहण यहाँ किया गया है ; क्योंकि सर्वांगीण-समीक्षण के लिये तो चार-पाँच सौ पृष्ठों के विस्तृत शोध-प्रबन्ध के निर्माण की अपेक्षा होगी। प्रास्ताविक-निबन्ध में उन सबका समावेश एवं समीक्षण संभव ही नहीं है। अतः इस विवेचन को यहीं विराम देते हुये शेष-बिन्दुओं पर संक्षिप्त-विवेचन करना अपेक्षित समझता हूँ। 4. साहित्यिक-समीक्षा- इस ग्रन्थ का साहित्य-शास्त्रीय-स्वरूप दृश्य-श्रव्य-काव्य-विधा के अन्तर्गत ‘नाटक’ का माना गया है, क्योंकि ‘समयसार’ जी ग्रन्थ के टीकाकार आचार्य अमृतचंद्र सूरि जी ने इसकी टीका एक आध्यात्मिक-नाटक के रूप में ही की की थी। तदनुसार ही कविवर पं. बनारसीदास जी ने इस कृति को ‘नाटक’ संज्ञा दी है। जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष -ये नव-पदार्थ ही अभिनय करनेवाले पात्र हैं। भावों का नाटकीय-शैली में चित्रण करने केे कारण ही इसके साथ ‘नाटक’ शब्द जोड़ा गया है। और ‘समयसार’ शब्द ‘आत्मा’ यानि स्वयं के लिये है, इसप्रकार इस कृति का नाम ‘समयसार नाटक’ किसीरूप में सार्थक है। यद्यपि कविवर बनारसीदास जी पर शोधकार्य करनेवाले विद्वान् डॉ. रवीन्द्र कुमार जैन, चेन्नई ने अपनी शोधकृति ‘कविवर बनारसीदास : जीवनी और कृतित्व’ में इसके महाकाव्य रूप होने की संभावना व्यक्त की है। किन्तु ‘समयसार कलश’ के कर्त्ता आचार्य अमृतचंद्र सूरि ने इसे ‘नाटक’ ही कहा है और उसी के अनुरूप इसकी व्याख्या की है। तथा इस ग्रन्थ के प्रणेता कविवर पं. बनारसीदास जी ने भी इसे ‘नाटक-समयसार’ ही कहा है। इसलिये इसके महाकाव्यत्व की बात कहीं से भी समर्थित होती प्रतीत नहीं होती है। इसके आध्यात्मिक-नाटकत्व को ही इसका साहित्यशास्त्रीय-स्वरूप स्वीकार करते हुये मैं इस विषय में विशेष ऊहापोह किये बिना इसरी साहित्यिक समीक्षा संक्षेपतः यहाँ प्रस्तुत करूँगा। इसकी ‘साहित्यिक-समीक्षा’ के अन्तर्गत मैं यहाँ छन्दों, रसों, रीतियों एवं अलंकारों का ही मुख्यतः वर्णन करूँगा। अन्य साहित्यिक-विषयों के बारे में विस्तारभय से मौन रहूँगा। अतः इन्हीं चार-बिन्दुओं को केन्द्रित करके नाटक-समयसार की संक्षिप्त साहित्यिक-समीक्षा यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। (क) छंदों के प्रयोग की दृष्टि से समीक्षा- छन्दों के प्रयोग की दो दृष्टियाँ होतीं हैं। पहली यह कि कवि को जितने छन्दों में महारत हासिल है, उनका प्रयोग करके छन्दो-वैविध्य का प्रदर्शन किया जाये। और दूसरा यह कि छन्दःशास्त्रीय-दृष्टि से जहाँ जिस वर्ण्य-विषय के अनुरूप जैसे छन्द के प्रयोग का विधान साहित्य-शास्त्रियों ने किये हैं, उनके अनुसार ही छन्दों का प्रयोग किया जाये। तो समग्रतः सूचनार्थ कविवर पं. बनारसीदास जी ने इस नाटक-समयसार नामक कृति में कुल 9 प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया है, जिनमें 1 छन्द (कुंडलिया) ‘वार्णिक-छन्द’ है और शेष 8 छन्द ‘मात्रिक-छन्द’ हैं। इनका विवरण निम्नानुसार है - इस ग्रंथ में 310 दोहे-सोरठा, 245 सवैया इकतीसा, 86 चौपाई, 37 सवैया तेईसा, 20 छप्पय, 18 कवित्त, 7 अडिल्ल और 4 कुंडलियाँ हैं। कुल मिलाकर 727 छंद हैं। किन्तु श्लोक-प्रमाण के अनुसार इन्हीं का कुलपरिमाण 1707 श्लोक-प्रमाण होता है। इन छन्दों के प्रयोग को मैं यादृच्छिक अर्थात् कवि ने जब जैसा मन किया, तब वैसे छन्द का प्रयोग कर दिया- यह तो नहीं कह सकता हूँ, क्योंकि कविवर पं. बनारसीदास जी कवित्व के प्रगल्भ-मनीषी थे। किन्तु साहित्य-शास्त्रीय-ग्रन्थों में विशिष्ट-छंद के प्रयोग के लिये जैसी विशिष्ट-भावभूमि एवं रस का विधान किया है, वैसी परिस्थितियाँ यहाँ स्थूलरूप में दृष्टिगोचर नहीं होतीं हैं, क्योंकि शृंगारादि-रसों का यहाँ प्रयोग है नहीं। विषय की गरिमा के अनुरूप मात्र शांतरस का ही प्रसार अधिकांशतः दिखाई देता है। और मात्र शांतरस में ही ये सारे छंद विहित किये गये हों- ऐसी साहित्य-शास्त्रियों की धारणा प्रतीत नहीं होती है। (ख) रसों के प्रयोग की दृष्टि से समीक्षा- रस को काव्य की आत्मा माना गया है, अतः यह तो संभव ही नहीं है कि काव्य का सृजन हो और रस का प्रयोग न किया जाये। तथापि लोगों को रस के नाम पर विशेष-प्रिय शृंगार-रस के रूपों का प्रयोग इसमें कदाचित् किसी प्रसंग-विशेष को छोड़कर कहीं भी नहीं मिलता है; क्योंकि यह कृति अध्यात्म, तत्त्वज्ञान एवं दर्शन पर केन्द्रित है। इसीलिये इस पर कविवर अश्वघोष की यह उक्ति सटीकरूप से घटित होती है इत्येषा व्युपशान्तये न रतये, मोक्षार्थगर्भा कृतिः। इसीलिये ‘मोक्ष’ नामक पुरुषार्थ के लिये अनुकूल

‘शान्त-रस’ का ही इसमें मुख्यतः प्रयोग कवि ने किया है।
सप्तम-भय, अट्ठम-रस अद्भुत, नवमो-शांत रसनिकौ नायक।
ए नव-रस एई नव-नाटक, जो जहं मगन सोइ तिहि लायक।। 133।।

सोभामैं सिंगार बसै, वीर पुरुषारथमैं, कोमल हिएमैं करुना-रस बखानिये।
आनंद में हास्य, रुंड-मुंडमैं विराजै रुद्र, वीभत्स तहाँ जहाँ ग्लानि मन आनिये।।
चिंतामैं भयानक, अथाहता में अद्भुत, माया की अरुचि तामैं सांत-रस मानिये।
एई नवरस भवरूप, एई भावरूप, इनिकौ विलेछिन सुद्रिष्टि जागैं जानिये।। 134।।

इसमे प्रसंगवश वीर-रस, हास्य-रस, रौद्र-रस आदि के भी प्रयोग इसमें दृष्टिगोचर होते हैं। जैसे कि- बीभत्स-रस-

''रेत-कीसी गढ़ी किधौं मढ़ी है मसान-कीसी, अंदर अंधेरी जैसी कंदरा है सैलकी।
ऊपर चमक-दमक पट-भूसनकी, धोखै लागै भली जैसी कली है कनैलकी।।
औगुनकी औंडी महा-भौंडी मोहकी कनौडी, मायाकी मसूरति है मूरति है मैल की।
ऐसी देह याहीके सनेह याकी संगतिसौं, ह्वै रही हमारी मति कोल्हू-केसे बैलकी।।
''ठौर-ठौर रकतके कुंड केसनिके झुंड, हाड़निसौं भरी जैसें थरी है चुरैलकी।
नैकुसे धकाके लगे आसै फचि जाये मानौ, कागदकी पूरी किधौं चादरि है चैलकी।।

‘‘जैसे नाक सिनकी… नरक की साई है… माखनिके चूटत मिठाई जैसे भिनकी’’

(बंधद्वार,40,41,44)

करुण-रस -

''पाटी बांधी लोचनिसौं सकुतै दबोचनिसौं, कोचनिके सोचसौं न बेदै खेद तनकौ।
धायबो ही धंधा अरु कंधा-माहिं लग्यो जोत, बार-बार आर सहै कायर है मनकौ।।
भूख सहै प्यास सहै दुर्जनकौ त्रास सहै, थिरता न गहै न उसास लहै छनकौ।

पराधीन घूमै जैसौ कोल्हूकौ कमेरौ बैल, तैसोई सुभाव या जगतवासी जनकौ।।‘’

(बंधद्वार,42)

वीर-रस- ‘’ जैसे कोऊ मनुष्य अजान महाबलवान, खोदि मूल वृच्छकौ उखारै गहि बाहूसौं।‘’

(बंधद्वार,58)

‘‘भेदग्यान-आरासौं दुफारा करै ग्यानी-जीव, आतम-करम-धारा भिन्न-भिन्न चरचै। अनुभौ-अभ्यास लहै परम-धरम गहै, करम-भरमकौ खजानौ खोलि खरचै।।’’

(मोक्षद्वार, 2)

जेते जगवासी जीव थावर-जंगमरूप, तेते निज-बस करि राखे बल तोरिकैं।
महाअभिमानी ऐसौ आस्रव अगाध-जोधा, रोपि रन-थंभ ठाड़ौ भयौ मूछ मोरिकैं’'।।
आयौ तिहि थानक अचानक परम-धाम, ‘ग्यान’ नाम सुभट सवायौ बल फोरिकैं।
आस्रव पछारयौ रन-थंभ तोरि डारयौ ताहि, निरखि बनारसी नमत कर-जोरिकैं’'।।

-(आस्रव-द्वार छंद नं, 2) (ग) रीतियों के प्रयोग की दृष्टि से समीक्षा- यद्यपि हिन्दी के कवियों ने दीर्घ-समासान्त-पदावलियों का प्रयोग बहुत कम किया है, उनमें भी दार्शनिक-कृतियों में तो यह और भी कम मिलता है। इसलिये ‘समासबहुला’ गौडी-रीति का प्रयोग इसमें बहुत ही कम देखने को मिलता है। ‘समास-मध्यमा’ पांचाली-रीति का प्रयोग भी अपेक्षाकृत कम ही है, क्योंकि बात को सीधे व सरल-शब्दों में कहने का उद्देश्य कवि का था। इसीकारण ‘समासन्यूना’ वैदर्भी-रीति की ही छटा इस ग्रन्थ में अधिकांशतः मिलती है। गौडी-रीति का उदाहरण- ‘‘परमत-जलधर-पवन, सकल-घन-सम-तन-समकर। पर-अघ-रजहर जलद, सकल-जन-नत भव-भय-हर।।’’ -(मंगलाचरण, पद्य 2) पाञ्चाली-रीति का उदाहरण- ‘‘ग्यानकौ उजागर सहज-सुखसागर, सुगुन-रत्नाकर विराग-रस भर्यौ है।’’ -(मंगलाचरण, पद्य 5) वैदर्भी-रीति का उदाहरण- ‘‘अविनासी अविकार परमरस-धाम हैं, समाधान सरवंग सहज-अभिराम हैं। सुद्ध-बुद्ध-अविरुद्ध अनादि-अनंत हैं, जगत्-सिरोमनि सिद्ध सदा जयवंत हैं।।’’ -(मंगलाचरण, पद्य 4) ‘‘भेदविग्यान जग्यौ जिन्हके घट, सीतल चित्त भयौ जिमि चंदन। केलि करैं सिवमारग में, जगमाहिं जिनेसुर के लघुनंदन।।’’ -(वही, पद्य 6) 5. सांस्कृतिक-समीक्षा समसामयिक-युग के लोकजीवन को अतिरंजित करनेवाले चरित्रों, घटनाओं एवं लोकरूढियों से कोई भी साहित्य या साहित्यकार पूरीतरह से अछूता नहीं रह सकता है। भले ही वह उससे भले ही निजी तौर पर प्रभावित या सहमत न रहा हो। किंतु समसामयिक संस्कृति की झलक उसमें किसी न किसी रूप में बरबस ही अंकित हो जाती है। कविवर पं. बनारसीदास जी एवं उनकी अमर-कृति नाटक-समयसार भी इसका अपवाद नहीं है। जब नाटक-समयसार जी का रचना हुई, तब तक कविवर पं. बनारसीदास जी पूर्णतः व्यवस्थित मानसिकता में आ चुके थे और उनके जीवन के पूर्वार्द्ध की उथल-पुथल पूरीतरह शांत हो चुकी थी। उनके चिंतन की प्रौढि एवं व्यक्तित्व की गरिमा इतनी बढ़ चुकी थी कि स्वयं तत्कालीन बादशाह शाहजहाँ उनके साथ ससम्मान मित्रभाव रखते हुये शतरंज खेलने उन्हें निमंत्रित करते थे। जैनसमाज में भी उनकी विद्वत्ता की गरिमापूर्ण-पहिचान स्थापित हो चुकी थी। अतः नाटक-समयसार में प्रतिबिम्बित सांस्कृतिक-तत्त्व उनकी गम्भीर-मानसिकता के अनुरूप हैं। ऐसे कुछ सांस्कृतिक-तथ्यों का संतुलित समीक्षात्मक-विवेचन संक्षेपतः यहाँ प्रस्तुत है। 1. स्थानीय ब्रज-संस्कृति का प्रभाव- यद्यपि कविवर पं. बनारसीदास जी नाटक-समयसार जी की रचना के समय स्थिरमति जिनधर्म-श्रद्धानी बन चुके थे और वैदिक-परम्परा-मान्य नारायण श्रीकृष्ण एवं राधा के जीवनचरित्र पर उनकी दार्शनिक या धार्मिक आस्था कदापि नहीं थी। फिर भी नाटक-समयसार जी में अनेकत्र राधा की सच्चरित्रता की जैसी आदर्श-प्रस्तुति हुई है, वह पाठकों को विस्मित करने के लिये पर्याप्त है। विशेषतः ‘सर्वविशुद्धि-द्वार’ में ऐसे अनेकों पद्य हैं, जिनमें कविवर राधा के व्यक्तित्व एवं चरित्र से प्रभावित प्रतीत होते हैं और उसे अनुकरणीय-आदर्श के रूप में महिमामंडित करते हैं। इतना ही नहीं, वे कृष्ण के जीवन में खलनायिका के रूप में आयी कुब्जा के चरित्र की भी दुश्चरित्र-पात्र के रूप में भरपूर भर्त्सना करते हैं। एक ही उदाहरण इस तथ्य की

पुष्टि के लिये पर्याप्त है- कुबजा कारी-कूबरी, करै जगतमैं खेद।
अलख जगावै राधिका, जानै निज-पर-भेद।। 73।।

दुरमति-कुबिजा करम कमावै, सुमति-राधिका राम रमावै।72।

जाकै उर कुबिजा बसै, सोई अलख-अजान।
जाकै हृदय राधिका, सो बुध-सम्यग्ज्ञान।। 81।।

यद्यपि यह नामकरण तक ही सीमित है, अर्थात् उन्होंने कुब्जा एवं राधिका/राधा नामक चरित्रों के नाम ही लिये हैं, उनके कथानक या जीवन के घटनाक्रमों को कहीं भी ग्रहण नहीं किया है। आध्यात्मिक-प्रतीकों के रूप में इन नामों का उपयोग हुआ है, जिनमें कुब्जा को दुर्बुद्धि का एवं राधिका को सुबुद्धि का प्रतीक मानकर इनकी निंदास्तुति की गयी है। रोचक-तथ्य तो यह है कि युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द देव के कालजयी-ग्रन्थ ‘समयसार’ जी में भी शुद्धात्म-स्वरूप को ‘राध/राधा’ के रूप में प्ररूपित किया गया है-

संसिद्धि-राध-सिद्धि, साधियमाराधियं च एयट्ठं।
अवगदराधो जो खलु, चेदा सो हवदि अवराधो।।

इसमें निज-शुद्धात्मारूपी राध/राधा के साधक को ‘साराध’, एवं उसे भुलाकर परपदार्थों में रमनेवाली बुद्धि को ‘अपराध/अपराधी’ कहा गया है। इसीप्रकार शुद्धात्मस्वरूप को ब्रह्म एवं उसकी अनुभूति को ब्रह्म की उपासना/अनुभूति जिनाम्नाय के ग्रन्थों में अनेकत्र कहा गया है। कविवर पं. बनारसीदास जी ने नाटक-समयसार जी में भी ऐसे प्रयोग अनेकत्र किये हैं। 2. कविवर स्वयं शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे- यह बात मैं ऊपर बता ही चुका हूँ। इस खेल का दृष्टान्तरूप में उल्लेख नाटक-समयसार जी में भी है-

जैसे नर खिलार-सतरंज कौ, समुझै सब सतरंजकी घात।
चलै चाल निरखै दोऊ-दल, मौंहरा गिनै विचार मात।।
तैसैं साधु निपुन-सिवपथ मैं, लच्छन-लखै तजै-उतपात।
साधै-गुन चिंतवै-अभयपद, यह सुविवेक-चक्रकी बात।। 79।।

इसीप्रकार चौपड़ के खेल को भी कविवर ने उल्लिखित किया है-

जैसे नर खिलार चौपरि कौ, लाभ विचारि करै चित-चाउ।
धरै संवारि सारि बुधि-बलसौं, पासा जो कछु परै सु दाउ।।
तैंसैं जगत्-जीव स्वारथकौ, करि उद्दिम चिंतवै उपाउ।
लिख्यौ ललाट होई सोई फल, करम-चक्रकौ यही सुभाऊ।। 78।।

नाट्यविधि में प्रयुक्त होने वाले रंगमंच, नट-नटी आदि का तो इस ग्रन्थ में अनेकत्र भरपूर-उपयोग किया गया है। इसका एक कारण इस ग्रन्थ की परिकल्पना ‘नाटक’ के रूप में किया जाना भी है और दृष्टान्तरूप में भी इनके अनेकत्र उल्लेख मिलते हैं। मोक्ष-द्वार के इस पद्य को संकेतरूप में ले सकते हैं-

ज्यौं नट एक धरै बहु-भेख, कला प्रगटै बहु-कौतुक देखै।
आपु लखै अपनी करतूति, वहै नट भिन्न-विलोकत भेखै।।
त्यौं घट में नट चेतन-राव, विभाउ-दसा धरि रूप विसेखै।
खोलि-सुदृष्टि लखैं अपनों पद, दुंद-विचारि दसा नहिं लेखै।। 14।।

इसीप्रकार वे ‘आस्रव-द्वार’ में बाजीगर एवं भगलविद्या की भी दृष्टान्त के रूप में सक्षम-प्रस्तुति करते हैं-

जैसे काहू बाजीगर चौहटे बजाइ ढोल, नानारूप धरिकैं भगल-विद्या ठानी है।
तैंसे मैं अनादिकौं मिथ्यातकी तरंगनिसौं, भरम में धाइ बहु काय-निज मानी है।।
अब ग्यानकला-जागी भरम की दृष्टि भागी, अपनी-पराई सब सौंज पहिचानी है।
जाकै उदै होत परवांन ऐसो भांति भई, निहचै हमारी जोति सोई हम जानी है।। 28।।

लौकिक-आजीविकाओं का जितना संपर्क कविवर का रहा, उनकी भी झलक विविध-प्रसंगों में मिलती है।

जैसे कि ‘संवर-द्वार’ में ‘रजसोधा’ का दृष्टान्त इस विषय में उनके पुष्ट-ज्ञान का परिचायक है-

जैसे रज-सोधा रज सोधिकैं दरब काढैं, पावक कनक-काढ़ि दाहत उपलकौं।
पंक के गरभ में ज्यों डारिये कतक-फल, नीर करै उज्जल नितारि डारै मलकौं।।
दधिकौ मथैया मथि काढ़ै जैसे माखनकौं, राजहंस जैंसे दूध पीवैं त्यागि जलकौं।
तैंसैं ग्यानवंत भेदग्यान की सकति साधि, वेदै निज-संपति उछेदै पर-दलकौं।। 10।।

‘रंगरेज’ के कलाकौशल की भी उन्होंने प्रभावी-प्रस्तुति निर्जरा-द्वार के इस पद्य में की है-

जैंसे फिटकड़ी लौद हरड़े की पुट बिना, स्वेत-वस्त्र डारिये मजीठ-रंग नीर में।
भीग्यौ रहै चिरकाल सर्वथा न होइ लाल, भेदै नहिं अंतर-सुफेदी रहै चीर मैं’'।।
तैंसे समकितवंत राग-द्वेष-मोह बिनु, रहै निशि-वासर परिग्रह की भीर में।
पूरब-करम हरै, नूतन न बंध करै, जाचै न जगत्-सुख राचै न शरीर में।। 34।।

इसी में कविवर ने शाही-शयनागार की विशेषताओं का भी विशेषज्ञ की तरह चित्रण उदाहरणार्थ करते हुये लिखा है-

काया-चित्रसारी में करम-परजंक भारी, माया की संवारी सेज चादरि-कलपना।
सैन करै चेतन अचेतनता-नींद लिये, मोह की मरोर यहै लोचन कौ ढपना।।
उदै-बल जोर यहै स्वासकौ सबद-घोर, विषै-सुख-कारज की दौर यहै सपना।
ऐसी मूढ़-दसामैं मगन रहै तिहूं-काल, धावै भ्रमजाल में न पावैं रूप अपना।। 14।।

चित्रसारी न्यारी, परजंक न्यारौ, सेज न्यारी, चादरि भी न्यारी, इहां झूठी मेरी थपना।
अतीत-अवस्था सैन निद्रावाहि कोउ पै, न विद्यमान पलक न यामैं अब छपना।।
स्वास औ सुपन दोऊ निद्रा की अलंग बूझै। सूझै सब अंग लखि आतम दरपना।
त्यागी भयौ चेतन, अचेतनता भाव त्यागि, भालै दृष्टि खोलिकैं संभालै रूप अपना।। 15।।

इसीप्रकार मोक्ष-द्वार में सुनार का दृष्टान्त इस व्यवसाय पर उनकी गहरी-पकड़ को ज्ञापित करता है-

ज्यौं कलधौत सुनार की संगति, ‘भूषण’ नाम कहै सब कोई।
कंचनता न मिटी तिहि-हेतु, वहै फिरि औटिकै कंचन होई।।
त्यौं यह जीव अजीव-संजोग, भयौ बहुरूप भयौ नहिं दोई।
चेतनता न गई कबहूं, तिहि-कारन ‘ब्रह्म’ कहावत सोई।। 12।।

‘साध्य-साधक-द्वार’ में लोकप्रचलित चक्रवर्ती के चौदह-रत्नों की महिमा आध्यात्मिक रूप में निम्नानुसार की है-

लक्ष्मी-सुबुद्धि अनुभूति-कउस्तुभ-मनि, वैराग-कलपवृच्छ संख-सुवचन है।
ऐरावत-उद्दिम-प्रतीति रंभा उदै-विष, कामधेनु-निर्जरा सुधा-प्रमोदधन है।।
ध्यान-चाप प्रेमरीति-मदिरा विवेक-वैद्य, सुद्धभाव-चन्द्रमा तुरंगरूप-मन है।
चौदह-रतन ये प्रगट होंहि जहां तहां, ग्यान के उदोत घट-सिंधुकौ मथन है।। 31।।

इसप्रकार हम देख सकते हैं कि तत्कालीन भारतीय संस्कृति के विविध पक्षों की सक्षम-प्रस्तुति कविवर पं. बनारसीदास जी ने नाटक-समयसार जी में प्रसंगवश अनेकत्र की है। 6. भाषिक-समीक्षा नाटक-समयसार जी ग्रन्थ तत्कालीन-लोकभाषा में निबद्ध ग्रन्थ है। सामान्य-तौर पर कह सकते हैं कि इसकी भाषा हिन्दी है। परन्तु वास्तविकता यह है कि इसमें मात्र आज की परिनिष्ठित या साहित्यिक-हिन्दी के ही प्रयोग नहीं हैं, बल्कि आज से चार-पाँच सौ वर्ष पहले की उस हिन्दी के प्रयोग हैं, जो ब्रज-अंचल में उससमय लोकजीवन में प्रचलित थी। किन्तु इसका भाषिक-स्तर साहित्यिक ही है, ग्राम्यता-दोष इसमें परिलक्षित नहीं होता है। हाँ, इतना अवश्य है कि जब लोकजीवन में प्रचलित-दृष्टान्तों या लोकोक्ति/मुहावरों का वे प्रयोग करते हैं, तो उसमें आंचलिकता की झलक स्पष्ट प्रतिबिंबित होती है। साथ ही वे तत्कालीन मुगल-सम्राट शाहजहाँ के निजी-मित्रों में थे और शाहजहाँ के साथ उनका उठनाबैठना रहता था, इसलिये कहीं-कहीं जहाँ मुगल-दरबार के शिष्टाचार का किसी प्रसंग में संकेत करना चाहा है, वहाँ उर्दूभाषा एवं मुगलिया-सल्तनत के दरबारी-वाग्व्यवहार की झलक भी मिलती है। इसीप्रकार वे ब्रज-अंचल के निवासी थे और नाटक-समयसार जी की रचना उन्होंने आगरा-नगर में रहकर ही की थी, अतः ब्रज-भूमि में व्याप्त लोकधर्म की आदर्श ‘राधा’ और खलनायिका ‘कुब्जा’ को उपादान बनाकर उन्होंने सांगरूपक-प्रयोग भी कतिपय-स्थलों पर प्रभावी-ढंग से किये हैं। साथ ही वे भाषाशास्त्र एवं कोश-कौशल के निष्णात-मनीषी थे, इसलिये उनकी एतत्संबंधी-प्रतिभा के प्रगल्भ-निदर्शन भी इस कृति में अनेकत्र सुशोभित हुये हैं। वे आजीविका से रत्न-शास्त्र के मर्मज्ञ (जौहरी) एवं सोने के गहनों के व्यापारी रहे थे, इसलिये रत्नों की परख एवं गहनों के निर्माण आदि की प्रविधियों के उल्लेख उन्होंने इस ग्रन्थ में दृष्टान्त-स्वरूप अनेकत्र प्रस्तुत किये हैं। वह युग युद्ध-कौशल का युग था। आये दिन कहीं न कहीं सत्ता का संघर्ष चलता ही रहता था। अतः स्वयं युद्धविद्या में निपुण-सैनिक नहीं होते हुये भी युद्ध-कौशल के विभिन्न-पक्षों से वे सुपरिचित थे। अतः एतत्संबंधी कई विशेषज्ञ-प्ररूपण उनकी इस कृति में प्रसंगवशात् बरबस आ ही गये हैं। रस-शास्त्र के तो वे प्रकांड-पंडित ही रहे थे, भले ही ‘नाटक-समयसार’ जी की रचना के समय तक वे उससे विमुख हो चुके थे ; परन्तु तत्संबंधी-ज्ञान को तो उन्होंने तिलांजलि नहीं दे दी थी। इसलिये ‘नाटक-समयसार’ जी में आगत ऐसे प्रयोग प्रसंगवशात् रसशास्त्र के प्रगल्भ-पंडित के रूप में उनके कथन किसी भी रसशास्त्री को दिशाबोध देने समर्थ हैं। चूकि ँ यह ग्रन्थ हिन्दी-भाषा में जैनदर्शन, उसमें विशेषतः अध्यात्मविद्या का प्रतिनिधि-ग्रन्थ माना जाता है, अतः इसमें इन विषयों की शब्दावली के प्रयोग बनारसीदास जी के कवित्व-गौरव के अनुरूप आने स्वाभाविक ही हैं। इन सभी वर्गीकृत-बिन्दुओं को लक्षित करते हुये नाटक-समयसार जी में आगत भाषिक-प्रयोगों को समीक्षात्मक-टिप्पण-सहित यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ- 1. परिनिष्ठित-प्रयोगों की गौरवशाली-प्रस्तुति- यद्यपि ऐसे शब्दों को तत्कालीन वर्णपरिवर्तनों के साथ ही प्रस्तुत किया गया है, तथापि इनकी संस्कृत-निष्ठता स्पष्ट परिलक्षित होती है। जैसे किउसनोदक(उष्णोदक), लौन(लवण), द्रिष्टि(दृष्टि), निसंसै(निःसंशय), ग्यान(ज्ञान), ग्यानी(ज्ञानी), पच्छ (पक्ष), परतच्छ (प्रत्यक्ष), परोच्छ (परोक्ष), विचच्छन (विचक्षण), दुंदज-अवस्था (द्वन्दज-अवस्था) इत्यादि। कुछ प्रयोग सामान्य होते हुये भी लिखने की भिन्नता के कारण विशिष्ट बन गये हैं, यथा- समै(समय), नै (नय), फेरि (फिर), उदै (उदय), विषै (विषय)- इत्यादि। 2. अनेकार्थ-नाममाला सदृश प्रयोग- ऐसे प्रयोगों के निदर्शन ‘उत्थानिका’ नामक प्रथम-खंड में प्रचुरता से मिलते हैं। इनके माध्यम से कविवर ने विभिन्न वस्तुओं का प्ररूपण किया है। देखिये- भाव पदारथ समय धन, तत्त्व वित्त वसु दर्व। द्रविन अरथ इत्यादि बहु, ‘वस्तु-नाम’ ये सर्व।।35।।

परम-पुरुष परमेसुर परम-ज्योति, परब्रह्म पूरन परम-परधान।
अनादि-अनंत अविगत अविनाशी अज, निरदुंद सुकत मुकुंद अमलान है।।
निराबाध निगम निरंजन निरविकार, निराकार संसार-सिरोमनि सुजान है।
सरब-दरसी सरवज्ञ सिद्ध स्वामी सिव धनी नाथ ईस जगदीस ‘भगवान्’ है।। 36।।

चिदानन्द चेतन अलख जीव समैसार, बुद्धरूप अबुद्ध असुद्ध-उपजोगी है।
चिद्रूप स्वयंभू चिनमूरति धरमवंत, प्रानवंत प्रानी जंतु भूत भवभोगी है।।
गुनधारी कलाधारी भेषधारी विद्याधारी, अंगधारी संगधारी जोगधारी जोगी है।
चिन्मय अखंड हंस अक्षर ‘आतमराम’, करम कौ करतार परम-विजोगी है।। 37।।

खं विहाय अंबर गगन, अंतरिक्ष जगधाम। व्योम वियत नभ मेघपथ ये ‘आकाश’ के नाम।। 38।।

जम कृतांत अंतक त्रिदस, आवर्ती मृतथान। प्रानहरन आदित-तनय, ‘काल’ नाम परवान।। 39।।

पुन्य सुकृत ऊरधवदन, अकररोग ‘शुभकर्म’ । सुखदायक संसारफल, भाग बहिर्मुख धर्म।। 40।।

पाप अधोमुख एन-अघ, कंपरोग दुःखधाम। कलिल-कलुस किल्विष दुरित, ‘असुभ-करम’ के नाम।। 41।।

सिद्धक्षेत्र त्रिभुवनमुकुट, शिवपथ अविचलथान। मोख मुकति वैकुंठ सिव, पंचमगति ‘निरवान’।। 42।। प्रज्ञा धिसना सेमुसी, धी मेधा मति ‘बुद्धि’। सुरति मनीषा चेतना, आशय अंस विशुद्धि।। 43।। निपुन विचच्छन विबुध बुध, विद्याधर ‘विद्वान्’। पटु प्रवीन पंडित चतुर, सुधी सुजन मतिमान।। 44।।

कलावंत कोविद कुसल, सुमन दच्छ धीमंत। ज्ञाता सज्जन ब्रह्मविद, तज्ञ ‘गुनीजन’ संत।। 45।।

मुनि महंत तापस तपी, भिच्छुक चारितधाम। जती तपोधन संयमीव्रती, ‘साधु’ ऋषि नाम।। 46।।

दरस विलोकनि देखनौ, अवलोकनि दृगचाल। लखन ‘दृष्टि’ निरखनि जुवनि, चितवनि चाहनि भाल।। 47।।

‘ज्ञान’ बोध अवगम मनन, जगतभान जगजान। संजम ‘चारित’ आचरन, चरन वृत्ति थिरवान।। 48।।

सम्यक् ‘सत्य’ अमोघ सत्, निसंदेह निरधार। ठीक जथारथ ‘उचित’ तथ, मिथ्या आदि अकार।। 49।।

अजथारथ ‘मिथ्या’ मृषा, वृथा असत्त अलीक। मुधा मोघ निःफल वितथ ‘अनुचित’ असत अठीक।। 50।।

  1. एकार्थक-शब्दों के प्रयोग- इनमें कहीं संज्ञापद, कहीं विशेषण-पद, कहीं क्रिया-पदों का प्रयोग युगपत् किये गये हैं, जो अद्भुत-सौंदर्य की सृष्टि करते हैं। यथा-

अविनाशी अविकार परमरस-धाम है, समाधान सरवंग सहज-अभिराम है।
सुद्ध-बुद्ध-अविरुद्ध अनादि- अनंत हैं, जगत्-शिरोमनि सिद्ध सदा जयवंत हैं।। 4।।

ग्यान को उजागर, सहज-सुखसागर, सुगुन-रत्नागर, विराग-रस भरयौ है।
सरन की रीति हरै, मरन कौ न भै करे, करनसौं पीठि दे, चरन अनुसरयौ है।।
धरम को मंडन, भरम को विहंडन है, परम नरम ह्वै कै, करम सौ लरयौ है।
ऐसौ मुनिराज भुव-लोक में विराजमान, निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है।। 5।।

  1. क्रियामाला- समता वंदन थुतिकरन, पड़कौना सज्झाय। काउसग्ग-मुद्राधरन, षडावसिक ये भाव।। तथा

नंदन वंदन थुतिकरन श्रवन चिंतवन जाप। पढ़न पढ़ावन उपदिसन बहुविध क्रियाकलाप।।
5. विशेषणमाला- लज्जावंत दयावंत प्रसंत प्रकीतवंत। विसेसग्य रसग्य कृतग्य तग्य धरमग्य।
6. भाववाची-प्रयोग- करुना वच्छल सुजनता आतम-निंदा पाठ।
समता भगति विरागता, धरमराग गुन-आठ।।

  1. विशिष्ट-विद्याओं एवं कलाओं के शब्दों के प्रयोग- इन प्रयोगों से हमें न केवल कविवर की इन विषयों की तज्ञता का अवबोध होता है, बल्कि इनके प्रयोगवाची इन शब्दों को आज के नवीन-तकनीकि-प्रधानयुग में हम प्रायः भूल ही चुके हैं। अतः नाटक-समयसार जी के माध्यम से इनका पुनः परिचय हमें एतत्संबंधी-ज्ञान को संजीवनी प्रदान करता है। कतिपय प्रयोग मननीय हैं- सुनार-कला के प्रयोग- बनवारी, सराफ, बान के प्रवांन, कसौटी कसिकै, पन्ना के पकायें जैसें कंचन विमल होत इत्यादि। नाट्यकला के प्रयोग- पातुर(नटी/अभिनेत्री), अखारे (रंगमंच पर), आड़ौ पट करिकै, दुहूँ ओर दीवट संवारि पट दूर कीजै- इत्यादि। नाट्यकला के प्रयोगों की आध्यात्मिक प्रस्तुति इस पद्य में दर्शनीय है-

पूर्व-बंध नासै सो तो संगीत-कला प्रकासै, नव-बंध रुंधि ताल-तोरत उछरिकै।
निसंकित आदि अष्ट-अंग संग सखा जोरि, समता-अलापचारी करै सुर भरिकै।।
निरजरा-नाद गाजै ध्यान-मिरदंग बाजै, छक्यौ महानंद में समाधि रीझ करिकै।
सत्ता-रंगभूमि में मुकत भयौ तिहूंकाल, नाचै सुद्धदिष्टि-नट ग्यान- स्वांग धरिकै।।
बाजीगरी के शब्द- बाजीगर, चौहटे बजाइ ढोल, भगलविद्या इत्यादि।

युद्ध-संबंधी प्रयोग- खांडौ कनक-म्यान-संयोग, रनथंभ इत्यादि। एक पद्य में तो पूरा युद्ध का ही रूपक प्रयोग किया गया है। देखिये-

जेते जगवासी-जीव थावर-जंगमरूप, तेते निज-बस करि राखे बल-तोरिकैं।
महाअभिमानी ऐसौ आस्रव अगाध-जोधा, रोपि रन-थंभ ठाड़ौ भयौ मूछ-मोरिकैं।।
आयौ तिहि-थानक अचानक परम-धाम, ग्यान-नाम सुभट सवायौ-बल फोरिकैं।
आस्रव-पछारयौ रन-थंभ तोरि डारयौ ताहि, निरखि बनारसी नमत कर-जोरिकैं।।
कुम्हार-कर्म के प्रयोग- माटी (मिट्टी), दंड, चक्र, चीवर, कुलाल, कलस इत्यादि।

खानपान-संबंधी प्रयोग- नाज (अनाज), सुवाद(स्वाद), खारौ (नमकीन), गरास (ग्रास/कौर/ निवाला), सिखरनि (श्रीखंड), भच्छत(खाता हुआ) इत्यादि। शयनागार-संबंधी प्रयोग- चित्रसारी, परजंक(पलंग), सेज (शय्या), चादरि(ओढ़ने की चादर) इत्यादि। 8. मुहावरों एवं लोकोक्तियों के प्रयोग- ऐसे प्रयोग भाषा की प्रभावोत्पादकता बढ़ाते हैं और कम शब्दों में ही सटीक-संप्रेषणीयता की समर्थ-प्रस्तुति करते हैं। ऐसे कुछ प्रयोग दर्शनीय हैं- ''पयार कैसे पूलै हैं (सूखी घास के पुंज जैसे, अर्थात् या तो ज्वलनशील हैं या निरर्थक/निःसार हैं), वयारि कै बघूले हैं (हवा का बवंडर है, सब कुछ बहा/उड़ा ले जानेवाला है), लियै दिढ-पेंचन फिरै लोटन-कबूतर सौं (जैसे कबूतर के पंजों में पतंग का मांझा उलझ जाता है, तो वह उलझकर गोल-गोल गुलाटें खाता षा लोटता है), सहत-चपेटी असिधारा सी चटतु है (शहद में लिपटी तलवार की धार को चाटने के समान है), आगे कौ धुकत धाइ पीछै बकरा चबाई (आगै को रस्सी बटता जाये, पीछै बकरा चबाकर खाता जाये), जैसे कोई कूकर छुधित सूके हाड़ चाबै (जैसे कोई भूखा-कुत्ता सूखी हड्डी चबाता हो), माखिन के चूटत मिठाई जैसें भिनकी (मक्खियों के चाटने से मिठाई को जैसे भिनका/सदोष/गन्दी कहते हैं), साधन अडारी ऐसैं जैसें नाक सिनकी (परिग्रह के साधनों का समूह वैसा ही है जैसे छिनकी हुई नाक हो) - इत्यादि। 9. विशिष्ट शाब्दिक प्रयोग- कविवर पं. बनारसीदास जी ने विशिष्ट-शब्दों के प्रयोग भी इस ग्रन्थ में किये हैं, जिनकी सांकेतिक प्रस्तुति इसप्रकार है- टाबरौ (बालक), साबू (साबुन), मथैया (मथनेवाला), सुछंद (स्वच्छंद), सुपन (स्वप्न), मतवारौ (मतवाला/मदोन्मत्त), आरसी (दर्पण), अरुझी (उलझन), डूघ ँ ा (परमात्मा), सूघ ँ ा (शुद्ध-रुतिवान्), चूघ ँ ा (चतुर), घूघ ँ ा (महा-अज्ञानी ), ऊँघा (दुर्बुद्धि/दुःखी), अजान (अज्ञानी), मूढ़न में मुखिया (मूर्खाधिपति), अहूट(ै भरपूर), दाख (द्राक्षा/किसमिस), गार-सी (गाली जैसी), कुलफ की कीली (ताले की चाबी), दानाऊँगी (प्रतापी), खानाजंगी (युद्ध में शूरवीर), ममारखी (मूर्च्छा/ममत्वभाव) इत्यादि। 10. विशिष्ट क्रियाप्रयोग- कविवर पं. बनारसीदास जी ने नाटक-समयसार जी ग्रन्थ में कई मौलिक क्रियापदों का भी प्रयोग किया है, जिनका विशेष-अर्थ है। जैसे कि- परिनौन (परिणमन करना), अचौन (आचमन करना), विलेछि (अलग करना), पचारि (बुलाना/पुचकारकर कहना), दुफारा करै (दो टुकड़े करना), ऐंचत (खींचने पर), गरुवाई (प्रशंसा करना), चुँघाई करै लालिपालि (अपना दूध पिलाकर लालन-पालन करना), वमि डारै (वमन कर देना), फुरी (स्फुरित हुई), दुरी (छुपी हुई), टोइकै (टटोलकर/खोजकर) इत्यादि। इनके अतिरिक्त कहीं-कहीं उन्होंने एक ही पद्य में विभिन्न-क्रियापदों का लीक से हटकर जीवन्तरूप में प्रयोग किये हैं। उदाहरण के तौर पर यह पद्य देखिये- बात ही सौं चौंकि उठे, बात ही सौं भौंकि उठे। बात ही सौं नरम होइ, बात ही सौं अकरी।। 11. उर्दू-भाषा के प्रयोग- जैसा कहा जा चुका है कि मुगल-बादशाह की संगति एवं लोकजीवन में उर्दू भाषा के शब्दों का प्रचलन होने से इस ग्रन्थ में भी कहीं-कहीं उनकी झलक मिलती है। देखिये- ज्ञान-पातशाह को हमारी तसलीम है अर्थात् सम्यग्ज्ञानरूपी-सम्राट को हमारा सविनय-नमस्कार है, नूर की निशानी अर्थात् तेज का चिह्न- इत्यादि। 12. संख्यावाची-शब्दों के प्रयोग- ग्रन्थ के अंत में पद्यों में प्रयुक्त छन्दों का परिमाण बताने के क्रम में संख्यावाची-शब्दों का प्रयोग मिलता है, जो इसप्रकार है- तीन सै दसोत्तर (310), पैंतालीस (45), इकतीसा (31), छियासी (86), सैंतीस (37), बीस (20), अठारह (18), सात सै सत्ताईस (727), सत्रह सै सात (1707) इत्यादि। 13. दृढ़ता-सूचक विशिष्ट प्रयोग- कविवर पं. बनारसीदास जी ने नाटक-समयसार जी में इसतरह के जीवन्त-प्रयोग भी किये हैं। जैसे कि इस वाक्यांश को देखिये- नाहीं नाहीं नाहीं यामैं धोखो नाहीं, सही है। 14. मौलिक-पारिभाषिक-प्रयोग- कविवर पं. बनारसीदास जी ने नाटक-समयसार जी नामक इस कृति में ऐसे प्रयोग भी अपनी विशिष्ट भाषा-शैली में किये हैं, जो नितान्त-मौलिक हैं। जैसे कि हम सुकवि का यह लक्षण उदाहरण-स्वरूप ले सकते हैं- छंद-सबद-अच्छर-अरथ कहै सिद्धांत-प्रवांन। जो इहविधि रचना करै, सो है सुकवि सुजान।। 15. आत्मीयतापूर्ण-सम्बोधनों के प्रयोग- कवि ने इस ग्रन्थ में अनेकत्र सम्बोधन-पदों का प्रयोग किया है, किन्तु वे सभी आत्मीयता से भरे हुये हैं। उनमें सर्वाधिक प्रयुक्त-पद दो हैं, एक भैया! और दूसरा स्वामी‍! कविवर पं. बनारसीदास जी ने जिस सुसमृद्ध-परम्परा का उत्तरदायित्व ग्रहण किया था, उसकी गरिमा को युगधर्मिता की आकांक्षाओं को समाहित करते हुये कविवर ने परम्परा का सार्थक-निर्वहन एवं मौलिक-प्रस्तुतियों से श्रीवृद्धि करके एक अत्यन्त गुरुतर-दायित्व का सफ़लतापूर्वक-निर्वाह इस ‘नाटक-समयसार’ नामक कृति में किया है। दार्शनिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, नैतिक एवं साहित्यिकमूल्यों का समवेतरूप से जितना सफल-निर्वहन इसमें हुआ है, उसकी तुलनीय-कृति का उदाहरण देना कठिन है। इतनी महती-परम्परा के निर्वाहक कविवर पं. बनारसीदास जी एवं उनकी कालजयी-रचना ‘नाटक-समयसार’ के विषय में कुछ भी कहने या लिखने में पर्याप्त सावधानी चाहिये। मैंने हरसंभव प्रयास किया है कि कहीं भी उनकी गरिमा एवं मर्यादा का अतिक्रम न हो, फिर भी यदि कोई स्खलन हुआ हो, तो विज्ञों से क्षमाप्रार्थी हूँ। - सुदीप कुमार जैन