चतुर्दश गुणस्थानाधिकार (१३) | भाग २/२
दिनों में प्रोषध-विधि से उपवास करते हैं।
5. सचित्त-त्याग प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव सचित्त-वनस्पति आदि का सेवन नहीं करते।
- दिवा-मैथुन-त्याग प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव दिन में स्त्री-स्पर्श/सेवन के त्यागी होते हैं। 7. रात्रिभुक्ति-त्याग प्रतिमा/ब्रह्मचर्य प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी आठों-पहर स्त्री-सेवन के त्यागी होते हैं अर्थात् ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। 8. अारंभ-त्याग/निरारंभ-प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव सभीप्रकार के आरंभ के त्यागी होते हैं। 9. पापरूप परिग्रह-त्याग प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव पाप के कारणभूत परिग्रह के त्यागी होते हैं। 10. अनुमति-त्याग प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव स्वयं तो पापकार्य के त्यागी होते ही हैं, दूसरों को पापकार्य करने की अनुमति भी नहीं देते। 11. उद्दिष्ट-भोजन-त्याग-प्रतिमा- इस प्रतिमा के धारी जीव स्वयं के लिये विशेषरूप से बनाये आहार आदि के त्यागी होते है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार
(दोहा)
संजम-अंस जग्यौ जहाँ, भोग-अरुचि परिनाम।
उदै प्रतिग्याकौ भयौ, ‘प्रतिमा’ ताकौ नाम।। 58।।
शब्दार्थ :- संजम-अंस जग्यौ जहाँ= जहाँ संयम का अंश जागृत हुआ है, भोग-अरुचि परिनाम= भोगों के प्रति अरुचि का परिणाम है, उदै प्रतिग्याकौ भयौ= (उस समय) प्रतिज्ञा का उदय होना, प्रतिमा ताकौ नाम= उसी का नाम ‘प्रतिमा’ है। विशेषार्थ :- इस छंद में कवि ने ‘प्रतिमा’ के स्वरूप को परिभाषित किया है। ‘प्रतिमा’ से तात्पर्य उस परिणाम से है, जहाँ अंतरंग में संयम या आत्मिक-विशुद्धि का भाव हो, और बाह्य में पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों के प्रति सहज ही अरुचि का भाव हो, उस समय किसी प्रतिज्ञा या नियम लेने का भाव आये, उसे ‘प्रतिमा’ कहते हैं। ऐसे जीव के अनंतानुबंधी का क्षय या उपशम होने से ये नियम सहज पलते हैं, श्रावक को जबरन पालने नहीं पड़ते। यद्यपि इन नियमों का पालन मिथ्यादृष्टिजीव के भी देखा जाता है,परन्तु मिथ्यादृष्टि-जीव के अनंतानुबंधी का सद्भाव होने से उसे ये नियम ऊपरी तौर पर पालने पड़ते हैं, सहज नहीं पलते, इसीलिए नियमों का पालन करने पर भी वह जीव वास्तव में प्रतिमाधारी नहीं है।
(दोहा)
आठ-मूलगुण संग्रहै, कुविसन-क्रिया न कोइ।
दरसन-गुन निरमल करै, दरसन-प्रतिमा सोइ।। 59।।
शब्दार्थ :- आठ-मूलगुण संग्रहै= आठ-मूलगुणों को ग्रहण करे, कुविसन-क्रिया न कोइ= दुर्व्यसन की कोई क्रिया न हो, दरसन-गुन निरमल करै= दर्शन-गुण/सम्यग्दर्शन को निर्मल करे, दरसन-प्रतिमा सोइ= वही ‘दर्शन-प्रतिमा’ है। विशेषार्थ :- ‘दर्शन’ अर्थात् ‘आत्म-दर्शन’ ही पहली ‘दर्शन-प्रतिमा’ है। आत्मस्वरूप की अनुभूति होने पर ही श्रावक के जीवन में क्रमश: प्रतिमाओं की शुरूआत होती है। जबतक पहली-प्रतिमा न हो, तबतक अन्य-प्रतिमाओं का कोई मूल्य नहीं है। संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति-पूर्वक, स्वरूप की अनुभूति करते हुए दर्शन-प्रतिमाधारी श्रावक बाहर में अष्ट-मूलगुणों (मद्य, मांस, मधु त्याग के साथ-साथ बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर और पाकरफल इन पंच-उदुम्बर फलों का त्यागरूप) को ग्रहण करता है। साथ ही जुआ खेलना, माँस खाना, मदिरापान करना, वेश्यागमन, शिकार करना, चोरी करना, पर-स्त्री-सेवन- इन सात-व्यसनों का भी त्यागी होता है, जिससे सम्यग्दर्शन और अधिक निर्मल होता है।
(दोहा)
पंच-अनुव्रत आदरै, तीनों-गुनव्रत पाल।
सिच्छाव्रत-चारों धरै, यह व्रत-प्रतिमा चाल।। 60।।
शब्दार्थ :- पंच-अनुव्रत आदरै= पंच-अणुव्रतों का पालन करे, तीनों-गुनव्रत पाल= तीनों-गुणव्रतों का पालन करे, सिच्छाव्रत-चारों धरै= चारों-शिक्षाव्रतों को धारण करे, यह व्रत-प्रतिमा-चाल= यह (दूसरी) ‘व्रत-प्रतिमा’ की विधि है। विशेषार्थ :- दर्शन-प्रतिमा के धारी श्रावक हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह- इन पाँचों-पापों के एकदेश-त्यागरूप पाँच-अणुव्रतों- अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत और परिग्रह-परिमाणव्रत के साथ तीन-गुणव्रत- दिग्व्रत, देशव्रत और अनर्थदण्डव्रत, और चार-शिक्षाव्रत- सामायिक, प्रोषधोपवास, भोगोपभोग-परिमाण और अतिथि-संविभागव्रत- इन बारह व्रतों का निरतिचारपालन करते हैं, उसे दूसरी ‘व्रत-प्रतिमा’ कहते हैं।
(दोहा)
दर्व-भाव-विधि-संजुगत, हियै-प्रतिग्या टेक।
तजि-ममता समता-ग्रहै, अंतरमुहूरत एक।। 61।।
(चौपाई)
जो अरि-मित्र समान विचारै, आरत-रौद्र-कुध्यान निवारै।
संयम-सहित भावना भावै, सो सामायिकवंत कहावै।। 62।।
शब्दार्थ :- दर्व-भाव-विधि-संजुगत= द्रव्य और भाव दोनों से विधिपूर्वक, हियै-प्रतिग्या टेक= हृदय में प्रतिज्ञा रखकर, तजि-ममता समता ग्रहै= ममता को छोड़कर, समता को ग्रहण करे, अंतरमुहूरत एक= एक अंतर्मुहुर्त तक।। 61।। जो अरि-मित्र समान विचारै= जो शत्रु और मित्र को समान माने, आरत-रौद्र कुध्यान निवारै= आर्त और रौद्र कुध्यानों को दूरकर, संयम-सहित भावना भावै= संयम-सहित भावना भाये, सो सामायिकवंत कहावै= सो ‘सामायिक-प्रतिमा’ का धारी कहलाता है।। 62।। विशेषार्थ :- ‘व्रत-प्रतिमा’ के धारी श्रावक द्रव्य-विधि अर्थात् बाह्य-आसन, पाठ, शरीर की स्थिरता के साथ-साथ, भाव-विधि अर्थात् मन की स्थिरता और परिणामों में समता का भाव रखते हुए घड़ी, दो घड़ी या अंतर्मुहुर्त एक निश्चित समय की प्रतिज्ञा लेकर ममत्वभाव को छोड़कर साम्यभाव से पंचपरमेष्ठी के स्वरूप का और निज-स्वरूप का चिंतन करते हैं; उसे तीसरी ‘सामायिक’ प्रतिमा कहते हैं। इस प्रतिमा के धारी श्रावक मित्र और शत्रुु दोनों के प्रति समान-भाव रखते हैं। ‘आर्त-ध्यान’ (‘आर्त’ अर्थात् ‘दुःख’, और दुःख के अनुभव में चित्त का एकाग्र होना ‘आर्तध्यान’ है) और ‘रौद्र-ध्यान’ (‘रुद्र’ अर्थात् ‘निर्दयता’, ‘क्रूरता’, ऐसे खोटे-परिणाम से जो ध्यान होता है, वह ‘रौद्रध्यान’ है अर्थात् पाँचों-पापों में पाप करते हुये भी आनंद मानना ‘रौद्रध्यान’ है)- ये दोनों ही ध्यान स्व और पर दोनों को पीड़ाकारक होने से इन्हें ‘कुध्यान’ कहा गया है- इन दोनों कुध्यानों को दूर करते हैं। संयम की भावना रखते हुए समता-भाव से बारह-भावनाओं, वैराग्य-भावनाओं का चिंतन करते हैं- ऐसे जीवों को तीसरी ‘सामायिक-प्रतिमा’ के धारी कहते हैं।
(दोहा)
सामायिक-कीसी दसा, च्यारि-पहरलौं होइ।
अथवा आठ-पहर रहै, प्रोसह-प्रतिमा सोइ।। 63।।
शब्दार्थ :- सामायिक-कीसी दसा= सामायिक जैसी स्थिति, च्यारि-पहरलौं होइ= चार-पहर/बारह-घंटे तक हो, अथवा आठ-पहर रहै= अथवा आठ-पहर/चौबीस-घंटे तक रहे, प्रोसह-प्रतिमा सोइ= वही ‘प्रोषधप्रतिमा’ है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार विशेषार्थ :- कवि के अनुसार सामयिक-प्रतिमा का धारी श्रावक जब चार-पहर या आठ-पहर तक परिणामों में समताभाव रखते हुए सामायिक में लीन रहता है, तब चौथी ‘प्रोषध-प्रतिमा’ का धारी होता है। अन्य-ग्रंथों में प्रोषध का स्वरूप इसप्रकार वर्णित किया है- जब श्रावक एक माह की दोनों ‘अष्टमी’ और दोनों ‘चतुर्दशी’ को उपवास अर्थात् भोजन का पूर्ण-त्यागकर निजस्वरूप में वास करने का यत्न करे, और इन पर्वों के एक-दिन पहले और एक-दिन बाद एकासन या दिन में एक बार नीरस, शुद्धभोजन करे, तब वह श्रावक उत्कृष्ट ‘प्रोषध-प्रतिमा’ का धारी होता है।
(दोहा)
जो सचित्त-भोजन तजै, पीवै प्रासुक-नीर।
सो सचित्त-त्यागी पुरुष, पंच-प्रतिग्यागीर।। 64।।
शब्दार्थ :- जो सचित्त-भोजन तजै= जो सचित्त-भोजन का त्याग करे, पीवै प्रासुक-नीर= प्रासुक-जल का ही पान करे, सो सचित्त-त्यागी पुरुष= सो सचित्त का त्याग करनेवाला पुरुष, पंच-प्रतिग्यागीर= पाँचवी-प्रतिज्ञा को धारण करनेवाला होता है। विशेषार्थ :- प्रोषध-प्रतिमा का धारी श्रावक जब सचित्त-भोजन-पान आदि का त्यागी होता है, सचित्त-भोजन अर्थात् जीव-सहित भोज्य-पदार्थ/हरितकाय। ऐसे सचित्त भोज्य-पदार्थ धूप में सुखाने से, अग्नि में पकाने से, शोधने-सँवारने से अचित्त हो जाते हैं। और पाँचवीं-प्रतिमा का धारी श्रावक केवल अचित्त-भोज्य-पदार्थ और प्रासुक-जल या छानकर उबाला गया मर्यादित-जल ही ग्रहण करता है, अर्थात् बिना अग्नि में पकाये कच्ची-सब्जी, फल आदि का सीधे भक्षण नहीं करता।
(चौपाई)
जो दिन ब्रह्मचर्य-व्रत पालै, तिथि आये निसि-दिवस संभालै।
गहि नौ-बाड़ि करै व्रत रख्या, सो षट्-प्रतिमा श्रावक अाख्या।। 65।।
शब्दार्थ :- जो दिन ब्रह्मचर्य-व्रत पालै= जो दिन में ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करे, तिथि आये निसिदिवस संभालै= पर्व-तिथियों में रात और दिन दोनों में ही ब्रह्मचर्य पाले, गहि नौ बाड़ि करै व्रत रख्या= नव बाढ़-सहित व्रत का पालन करे, सो षट्-प्रतिमा श्रावक अाख्या= वह श्रावक छठवीं-प्रतिमा धारी कहा गया है। विशेषार्थ :- कवि के अनुसार पाँचवीं-प्रतिमा का धारी श्रावक जब दिन में स्त्री के स्पर्श-संबंधी सभीप्रकार की विषय-वासना का त्यागी होता है; तब वह श्रावक छठवीं ‘दिवा-मैथुन-त्याग प्रतिमा’ का धारी होता है। ‘आचार्य समन्तभद्र’ ने ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी’ में छठवीं-प्रतिमा को ‘रात्रिभुक्ति-त्याग प्रतिमा’ के नाम से विवेचित किया है। वहाँ आचार्यदेव कहते हैं कि इस प्रतिमा के धारी श्रावक रात्रि में पका/बना हुआ भोजन भी ग्रहण नहीं करते हैं। साथ ही दूध शर्बत, जल आदि पेय-पदार्थ, सूखे मेवा और सौंफ, इलायची, लौंग आदि सुगंधित-पदार्थ यहाँ तक कि औषधि, लेप आदि किसी भी प्रकार के पदार्थों का सेवन रात्रि में नहीं करते, अर्थात् रात्रिं में चारों-प्रकार के आहार के त्यागी होते हैं। यहाँ तक कि वे रात्रि में भोजन-संबंधी विचार/विकल्प/स्वपन तक से विरत होते हैं।
(चौपाई)
जो नौ-बाड़ि-सहित विधि साधै, निसि-दिन ब्रह्मचर्य आराधै।
सो सप्तम-प्रतिमाधर ग्याता, सील-सिरोमनि जग-विख्याता।। 66।।
शब्दार्थ :- जो नौ-बाड़ि-सहित विधि साधै= जो नव-बाढ़-सहित विधिपूर्वक, निसि-दिन ब्रह्मचर्य आराधै= रात और दिन ब्रह्मचर्य का पालन करे, सो सप्तम-प्रतिमा धर ग्याता= वे ज्ञानी-जीव सातवीं-प्रतिमा के धारक, सील-सिरोमनि जग-विख्याता= जगत्-प्रसिद्ध शील-शिरोमणि हैं। विशेषार्थ :- छठवीं-प्रतिमा का धारी श्रावक जब पूर्णरूप से ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करता है, अर्थात् दिन हो या रात स्त्री-सेवन का पूर्णरूप से त्यागी होता है, तब वह सातवीं ब्रह्मचर्य-प्रतिमा का धारी होता है। इस व्रत की रक्षा या निरतिचार-पालन करने के लिये ऐसे श्रावक आगम में वर्णित नव-बाढ़ का भी पालन करते हैं।
(कवित्त)
तियथल-वास, प्रेम-रुचि निरखन, दे परीछ भाखै मधु-वैन।
पूरब-भोग केलि-रस-चिंतन, गुरु-आहार लेत चित-चैन।।
करि शुचि-तन सिंगार बनावत, तिय-परजक-मध्य सुख-सैन।
मनमथ-कथा उदर-भरि-भोजन, ये नव-बाड़ि कहै जिन-बैन।। 67।।
शब्दार्थ :- तियथल-वास= स्त्रियों के निवासक्षेत्र में रहना, प्रेम-रुचि निरखन= राग से रुचिपूर्वक स्त्रियों को देखना, दे परीछ भाखै मधु-वैन= स्त्रियों को मुड़कर देखना और उनसे मीठे-वचन बोलना, पूरब-भोग केलि-रस चिंतन= पहले किये भोगों का एवं काम-क्रीड़ाओं के आनंद का चिंतन करना, गुरु-आहार लेत चित-चैन= गरिष्ठ-आहार लेकर हर्ष मनाना, करि-शुचि तन-सिंगार बनावत= शरीर को साफकर/नहा-धोकर शृंगार/मेकअप करना, तिय-परजक-मध्य सुख-सैन= स्त्रियों के पलंग/आसन पर सो-बैठकर आनंदित होना, मनमथ-कथा= कामोत्पादक-कथा सुनना, उदर-भरि भोजन= भरपेट-भोजन करना, ये नव बाड़ि कहै जिनबैन= ये नौ-बाड़ जिनवाणी में कही हैं अर्थात् अब्रह्म से बचने के कार्य कहे हैं (इन नौ कार्यों से अपने आपको बचाकर ही ब्रह्मचर्य की रक्षा की जा सकती है)। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने पिछले-छंद में आगत नव-बाड़ों का सटीक-स्पष्टीकरण किया है। ये नव-बाढ़ श्रावक के लिये ब्रह्मचर्य-व्रत के निरतिचार-पालन में अत्यंत-सहयोगी हैं। इसलिए सातवींप्रतिमा के धारक-जीवों को इन नव-बाढ़-सहित ही ब्रह्मचर्य-प्रतिमा का पालन करना चाहिए। बाड़ अर्थात् आड़/रोक/बचाव या कहें इन कार्यों व संयोगों से अपने को बचाने की एक मर्यादा निश्चित करना; जिससे मन पंचेन्द्रिय के विषय-भोगों के संपर्क से भी दूर रहे और संयमित भी रहे, ताकि आत्मसाधना निर्विघ्न हो। स्त्रियों के समागम/संपर्क में रहना, रागभाव से स्त्रियों को निरखना/देखना, परोक्षरूप से स्त्रियों से मीठे-वचनों से वार्तालाप करना, पूर्वकाल में भोगे हुये विलासितापूर्ण-भोगों का स्मरणकर आनंदित होना, आनंददायक गरिष्ठ-आहार लेना (क्योंकि गरिष्ठ-भोजन से वासनाजन्य-विकार और प्रमाद में वृद्धि होती है), स्वभाव से ही अशुचि-काया को स्नानादि के द्वारा साफ/पवित्र करके उसे सजाने-सँवारने का भाव करना, स्त्रियों के पलंग पर सोना उनके आसन पर बैठकर अानंदित होना, काम-वासनावर्धककथाओं को सुनना, भरपेट भोजन करना- ये नव-बाड़ें लगाकर अर्थात् इनसे अपने आप को बचाकर चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार शीलव्रत को सुरक्षित रखा जाता है। इसलिये ये नौ-उपाय जिनवाणी में कहे हैं। सातवीं ब्रह्मचर्य-प्रतिमा के धारी श्रावक को अपने ब्रह्मचर्य-व्रत को सुरक्षित रखने के लिये इन नव-बाड़ों से अपने आपको बचाना ही चाहिये। इस प्रसंग में एक बात विशेषरूप से विचारणीय है कि ये नव-बाड़ की सीमा जिनेन्द्र-देव ने एक पंचम-गुणस्थानवर्ती सातवीं-प्रतिमा के धारक श्रावक के लिए कही है, जबकि वह श्रावक अभी अणुव्रती है; फिर इससे आगे के क्षुल्लक, ऐलक जैसे उत्कृष्ट अणुव्रतियों एवं मुनिराज जैसे महाव्रतियों को तो इन नव-बाड़ों का प्रयोग करना ही चाहिये अर्थात् ऐसे संयोगों और कार्यों से बचना ही चाहिये।
(दोहा)
जो विवेक-विधि आदरै, करै न पापारंभ।
सो अष्टम-प्रतिमा-धनी, कुगति-विजै-रनथंभ।। 68।।
शब्दार्थ :- जो विवेक-विधि आदरै= जो विवेक-सहित आचरण करे, करै न पापारंभ= पाप-कार्यों के साधनों तक से बचकर रहे, सो अष्टम-प्रतिमा धनी= वह आठवीं प्रतिमा का स्वामी, कुगति-विजै रनथंभ= कुगति-विजय का रणस्तम्भ/कुगति-विजेता है। विशेषार्थ :- सातवीं-प्रतिमा का धारी जीव, जब जिन कार्यों को करने से जीवों की हिंसा होती है, ऐसे असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्यार्जन और शिल्प आदि धनार्जन करनेवाले सभी पापारंभ के कार्यों का त्याग करता है; तब वह नरकादि-कुगतियों को जीतनेवाला महायोद्धा आठवीं-प्रतिमा का धारक होता है।
(चौपाई)
जो दसधा-परिग्रह को त्यागी, सुख-संतोष-सहित वैरागी।
समरस-संचित किंचित-ग्राही, सो श्रावक नौ-प्रतिमा-वाही।। 69।।
शब्दार्थ :- जो दसधा-परिग्रह को त्यागी= जो दसप्रकार के परिग्रह का त्यागी हो, सुख-संतोष-सहित वैरागी= सुख-संतोषपूर्वक विरक्त हो, समरस-संचित किंचित-ग्राही= समताभाव-पूर्वक कुछ/सीमित वस्तुओं को ग्रहण करे; सो श्रावक नौ प्रतिमा वाही= वह श्रावक नौंवीं-प्रतिमा का धारी होता है। विशेषार्थ :- आठवीं-प्रतिमा का धारी जीव व्यापारादि से निवृत्त र् होने के बाद पहले से जमा दसप्रकार के बाह्य-परिग्रह का त्याग करता है। केवल अपने पहनने के वस्त्र और भोजन-पात्र के रूप में अंशमात्रपरिग्रह रखकर शेष परिग्रह का त्याग करता है। और साम्यभाव धारण करते हुए संसार से विरक्त होने का पुरुषार्थ करता है, तब वह श्रावक नौवीं ‘परिग्रह-त्याग प्रतिमा’ का धारी होता है।
(दोहा)
परकौं पापारंभकौ, जो न देइ उपदेस।
सो दसमी-प्रतिमा-सहित, श्रावक विगत-कलेस।। 70।।
शब्दार्थ :- परकौं पापारंभकौ जो= जो दूसरों को पाप-कार्यों को करने का, न देइ उपदेस= उपदेश/प्रेरणा (तक) नहीं देता है, (सो) दसमी प्रतिमा-सहित श्रावक विगत-कलेस= वह क्लेश-रहित श्रावक दसवींप्रतिमा को धारण करता है। विशेषार्थ :- नौवीं-प्रतिमा का धारक श्रावक स्वयं तो समस्त-प्रकार के पापारंभ का त्याग करता ही है, अन्य को भी पाप-कार्यों को करने की अनुमति/सलाह तक नहीं देता। यहाँ तक कि मकान बनवाना, बच्चों की शादी करना, व्यापारादि में सलाह देना, अच्छा-बुरा, खरा-खोटा आदि किसी भी प्रकार के कार्यों में परिवारीजनों के पूछने पर भी अनुमति/सलाह तक नहीं देता। कहने का अभिप्राय यही है कि समस्त-पापारंभ के कार्यों का कृत-कारित-अनुमोदना से पूर्णतः त्यागी होता है; तब वह श्रावक दसवीं ‘अनुमति-त्याग-प्रतिमा’ का धारी होता है।
(चौपाई)
जो सुछंद वरतै तजि-डेरा, मठ-मंडपमैं करैं बसेरा।
उचित-आहार उदंड-विहारी, सो एकादश-प्रतिमाधारी।। 71।।
शब्दार्थ :- जो सुछंद वरतै तजि-डेरा= जो अपने निवास-स्थान को छोड़कर स्वतंत्र-विचरण करते हैं, मठ- मंडपमैं करैं बसेरा= किसी मठ, मंडप/बरामदे में निवास करते हैं, उचित-आहार= योग्य/मर्यादित-आहार लेते हैं, उदंड-विहारी= वनादि (निर्जन-स्थलों) में विहार करते हैं; सो एकादश-प्रतिमाधारी= वे श्रावक ग्यारहवींप्रतिमा के धारी होते हैं। विशेषार्थ :- दसवीं-प्रतिमा के धारी श्रावक जब अपने घर-मकान को भी छोड़कर किसी मठ या निर्जन-वनादि में विरक्तजनों या महाव्रतियों के पास निवास करने लगते हैं। और इसके साथ ही उदिष्टआहार के त्यागी अर्थात् उनके निमित्त विशेषरूप से बनाये हुये भोजन को ग्रहण नहीं करते; बल्कि गृहस्थ ने अपने लिए जो भोजन बनाया है, उसी में से भक्तिपूर्वक दिया हुआ कुछ भोजन ग्रहण करते हैं, और साम्यभाव से महाव्रत-ग्रहण करने का अभ्यास करते हैं; तब वे श्रावक ग्यारहवीं-प्रतिमा के धारक होते हैं।
(दोहा)
एकादस-प्रतिमा-दसा, कही देसव्रत-माँहि।
वही अनुक्रम मूलसौं, गहौ सु छूटै नांहि।। 72।।
शब्दार्थ :- एकादस-प्रतिमा-दसा= ग्यारह प्रतिमाओं की ये स्थिति, कही देसव्रत-माँहि= देशव्रती-श्रावक के लिए कही, वही अनुक्रम मूलसौं गहौ सु छूटै नांहि= वही शुरू से क्रम से इन्हें ग्रहण करता है, फिर छोड़ता नहीं है। विशेषार्थ :- प्रतिमाओं के संबंध में विशेष-उल्लेख करते हुए कविवर कहते हैं कि पंचम-गुणस्थान- वर्ती श्रावक के लिये इन ग्यारह प्रतिमाओं का विशेषरूप से वर्णन किया गया है। सो देशव्रती-श्रावक को इन प्रतिमाओं को मूल से अर्थात् शुरू से क्रमश: उत्तरोत्तर-ग्रहण करना चाहिए, बीच में से न ग्रहण करना चाहिए और न ही छोड़ना चाहिए।
(दोहा)
षट्-प्रतिमा-तांई जघन, मध्यम नौ-परजंत।
उत्तम दसमी-ग्यारसी, इमि प्रतिमा-विरतंत।। 73।।
शब्दार्थ :- षट्-प्रतिमा-तांई जघन= छटवीं-प्रतिमा तक जघन्य, मध्यम नौ परजंत= नौवीं-प्रतिमा तक मध्यम, और उत्तम दसमी-ग्यारसी= दसवीं-ग्यारहवीं प्रतिमाधारी उत्तम श्रावक है, इमि प्रतिमा विरतंत= इसप्रकार प्रतिमाओं का वर्गीकरण/वृत्तान्त है। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार विशेषार्थ :- प्रतिमाओं की अपेक्षा श्रावकों के भेद करते हुए कविवर कहते हैं कि पहली-प्रतिमा से छठवीं-प्रतिमा तक के श्रावकों को ‘जघन्य-श्रावक’, सातवीं, आठवीं और नौवीं प्रतिमाओं के धारी को ‘मध्यम-श्रावक’, और दसवीं, ग्यारहवीं-प्रतिमाओं के धारी को ‘उत्तम-श्रावक’ कहते हैं।
(चौपाई)
एक-कोडि-पूरब गिनि लीजै, तामैं आठ-बरस घटि कीजै।
यह उत्कृष्ट-काल-थिति जाकी, अंतरमुहूरत जघन-दशाकी।। 74।।
शब्दार्थ :- एक-कोडि-पूरब गिनि लीजै= एक करोड़-पूर्व के काल की गणना करके, तामैं आठ बरस घटि कीजै= उसमें आठ वर्ष कम कर दो, यह उत्कृष्ट-काल थिति जाकी= यह इसकी कालगत उत्कृष्ट-स्थिति है। अंतरमुहूरत जघन-दशाकी= और इस दशा का जघन्य-स्थिति अंतर्मुहूर्त-काल है। विशेषार्थ :- पंचम-गुणस्थान की काल-सीमा का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि पाँचवें देशव्रतगुणस्थान का उत्कृष्ट-काल ‘आठ वर्ष कम एक करोड़ पूर्व’ है, और जघन्य-काल ‘अंतर्मुहूर्त’ है।
(दोहा)
सत्तर-लाख-किरोर-मित, छप्पन-सहस-किरोड़।
एते बरस मिलाइके, पूरब-संख्या जोड़।। 75।।
शब्दार्थ :- सत्तर-लाख-किरोर-मित= सत्तर-लाख करोड़, छप्पन-सहस किरोड़= छप्पन-हजार करोड़, एते बरस मिलाइके= इतने वर्ष मिलाने पर, पूरब-संख्या जोड़= एक-पूर्व की संख्या होती है। विशेषार्थ :- संख्या की दृष्टि से ‘एक-पूर्व’ के काल का प्रमाण देते हुए कविवर कहते हैं सत्तर-लाख छप्पन-हजार-करोड़ वर्ष का ‘एक-पूर्व’ होता है। चौरासी-लाख वर्ष का ‘एक-पूर्वांग’ होता है, और चौरासी-लाख पूर्वांगों का ‘एक-पूर्व’ होता है। इस तरह 8400000 x 8400000 वर्षों का गुणनफल ‘एकपूर्वं’ होगा।
(दोहा)
अंतर्मुहुरत द्वै-घरी, कछुक घाटि उतकिष्ट।
एक-समय एकावली, अंतरमुहूर्त-कनिष्ट।। 76।।
शब्दार्थ :- अंतर्मुहुरत द्वै-घरी= एक अंतर्मुहुर्त में दो-घड़ी, कछुक घाटि उतकिष्ट= एक-समय कम उत्कृष्ट- काल, एक-समय एकावली= एक-समय अधिक एक-आवली, अंतरमुहूर्त कनिष्ट= अंतर्मुहुर्त का जघन्यकाल है। विशेषार्थ :- अंतर्मुहुर्त का काल/समय वर्णित करते हुए कविवर कहते हैं कि एक-अंतर्मुहूर्त का काल दो घड़ी है। एक घड़ी 24 मिनिट की होती है। दो घड़ी अर्थात् 48 मििनट में से एक-समय कम अंतर्मुहूर्त का उत्कृष्ट-काल है, और एक-समय अधिक एक-आवली अंतर्मुहूर्त का जघन्य-काल है।
(दोहा)
यह पंचम-गुणथान की, रचना कही विचित्र।
अब छट्ठे-गुणथान की, दसा कहूँ, सुन मित्र।। 77।।
शब्दार्थ :- यह पंचम-गुणथान की= यह पाँचवे-गुणस्थान की, रचना कही विचित्र= विचित्र-रचना का वर्णन किया। अब छट्ठे-गुणथान की= अब छटवें-गुणस्थान का, दसा कहूँ सुन मित्र= स्वरूप कहता हूँ, हे मित्र! सुनो। विशेषार्थ :- छटवें-गुणस्थान का स्वरूप वर्णित करने की प्रतिज्ञा करते हुए कविवर कहते हैं ''पाँचवेगुणस्थान का विचित्र-वर्णन पूरा हुआ। अब छठवें-गुणस्थान का स्वरूप कहता हूँ, सो हे मित्र! तुम सुनो!
(दोहा)
पंच-प्रमाद-दसा धरै, अट्ठाइस-गुनवान।
थविरकल्पि जिनकल्पि-जुत, है प्रमत्त-गुनथान।। 78।।
शब्दार्थ :- पंच-प्रमाद-दसा धरै= पाँच-प्रमाद की दशा से सहित, अट्ठाइस गुनवान= 28 मूलगुण-सहित, थविरकल्पि= स्थविरकल्पि, जिनकल्पि-जुत= जिनकल्पि के भेदों से संयुक्त है, प्रमत्त-गुनथान= प्रमत्तगुणस्थान है। विशेषार्थ- ‘प्रमत्त-संयत’ नामक छठवें-गुणस्थान का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं कि जो पाँच- प्रकार के प्रमाद-सहित, 28 मूलगुणों का पालन करते हैं, और जिनके ‘स्थविरकल्पि’ और ‘जिनकल्पि’ - दोनों प्रकार हैं, वे मुनिराज छठवें-गुणस्थानवर्ती होते हैं।
(दोहा)
धर्मराग विकथा-वचन, निद्रा-विषय-कषाय।
पंच-प्रमाद-दसा-सहित, परमादी-मुनिराय।। 79।।
शब्दार्थ :- धर्मराग= धर्म में अनुराग, विकथा-वचन= विकथा-वचन, निद्रा= निद्रा, विषय= विषय, कषाय= कषाय, पंच-प्रमाद-दसा-सहित= इन पाँच प्रकार के प्रमाद-सहित, परमादी-मुनिराय= प्रमत्त-संयत मुनिराज होते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने प्रमत्त-मुनि-संबंधी पंच-प्रमादों का वर्णन किया है। ‘प्रमाद’ से तात्पर्य संज्वलन-कषायादि-सहित अवस्था का नाम ‘प्रमाद’ है। यद्यपि इस गुणस्थान में अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरणी, प्रत्याख्यानावरणी- तीन-कषाय चौकड़ी का तो क्षय या उपशम हो जाता है; परन्तु संज्वलन-कषाय-चौकड़ी और नव-नोकषाय का उदय रहता है, जो स्वरूप-स्थिरता में बाधक होता है, इसी का नाम ‘प्रमाद’ है। ऐसे पाँच-प्रमादों का वर्णन कवि ने यहाँ किया है - धर्म में अनुराग (जीवों को उपदेश देने, धर्ममार्ग में लगाने संबंधी-भाव होना), विकथा (आत्मस्वरूप से बाहर आने पर होनेवाली वचन-क्रिया), निद्रा (शयनरूप क्रिया), विषय (आहार, विहार, नीहार-संबंधी इन्द्रिय-विषयों में प्रवर्तन), और कषाय (संज्वलन-संबंधी क्रोध, मान, माया, लोभरूप-प्रवर्तन) छठवें गुणस्थानवर्ती प्रमत्तसंयत-मुनि इन पाँच-प्रमादों सहित होते हैं।
(सवैया इकतीसा)
पंच-महाव्रत पालै पंच-समिति संभालै, पंच-इंद्री जीति भयौ भोगी चित-चैनकौ।
षट-आवश्यक-क्रिया दर्वित-भावित साधै, प्रासुक-धरामैं एक-आसन है सैन को।।
चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार
मंजन न करै, केश लुंचै, तन-वस्त्र मुंचै, त्यागै-दंतवन, पै सुगंध-स्वास-वैनकौ।
ठाड़ौ करसे आहार लघु-भुंजी एकबार, अट्ठाइस-मूलगुनधारी जती जैनकौ।। 80।।
शब्दार्थ :- पंच-महाव्रत पालै= पाँच महाव्रतों का पालन कर, पंच-समिति संभालै= पंच-समितियों की संभाल कर, पंच-इंद्री जीति= पाँचों इन्द्रियों को जीतकर, भयौ भोगी चित-चैनकौ= आत्मिक-आनंद के भोगी होते हैं, षट-आवश्यक क्रिया दर्वित-भावित साधै= द्रव्य और भावरूप से षट्-आवश्यकों की क्रिया को साधते हैं, प्रासुक-धरामैं एक-आसन है सैन को= जीवरहित-भूमि पर एक-करवट सोना, मंजन न करै= स्नान नहीं करना, केश लुंच=ै केशलोंच करना, तन-वस्त्र मुंचै= तन के वस्त्र त्यागना, त्यागै दंतवन= दंतमंजन नहीं करना, पै सुगंध-स्वास-वैनकौ= फिर भी स्वांस और वचनों से सुगंधि ही निकलती है, ठाड़ौ करसे आहार= खड़े होकर आहार लेना, लघु-भुंजी= थोड़ा भोजन करना, एकबार= दिन में एकबार, अट्ठाइस-मूलगुनधारी जती जैन को= ऐसे 28 मूलगुणधारी जैन-साधु होते हैं। विशेषार्थ- इस-छंद में कवि ने मुनिराजों के 28 मूलगुणों का वर्णन किया है। अहिंसादि पाँच-महाव्रतों का पालन, ईर्या आदि पाँचों-समितियों की संभाल, पंचेन्द्रियों के विषय-भोगों को जीतकर आत्मिकआनंद का भोग करना, द्रव्य और भाव अर्थात् बहिरंग और अंतरंग- दोनों रूप से षट्-आवश्यकों का पालन करना, जीव-रहित प्रासुक-भूमि पर एक-करवट सोना, जीवन-पर्यंत अस्नान-व्रती रहना अर्थात् स्नान नहीं करना, केशलौंच करना, वस्त्र त्यागना अर्थात् दिगम्बरत्व को अंगीकार करना, अदन्तधोवन अर्थात् दाँत साफ नहीं करना फिर भी वचन और स्वांस सुगंधित रहना, खड़े होकर करपात्र में आहार लेना, अल्पभोजन करना, और दिन में एकबार भोजन करना- इसप्रकार जैन-साधु पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रिय-विजय, षट्-आवश्यक और शेष सात-उत्तरगुण- इसप्रकार कुल 28 मूलगुणों से सुशोभित होते हैं।
(दोहा)
हिंसा-मृस-अदत्तधन, मैथुन परिगह-साज।
किंचित् त्यागी-अनुव्रती, सब त्यागी-मुनिराज।। 81।।
शब्दार्थ :- हिंसा= हिंसा, मृस= झूठ, अदत्त-धन= बिना दिया धन/वस्तु ग्रहण करना अर्थात् चोरी, मैथुन= कुशील-सेवन, परिगह-साज= परिग्रह-सामग्री जोड़ना, किंचित्-त्यागी अनुव्रती= एकदेश-त्यागी ‘अणुव्रती’, सब-त्यागी मुनिराज= सर्वदेश-त्यागी ‘मुनिराज’ होते हैं। विशेषार्थ :- पाँच-महाव्रतों का वर्णन करते हुए कविवर कहते हैं हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह- इन पाँचों-पापों का जो एकदेश/आंशिक-त्याग करते हैं, वे अणुव्रती-श्रावक होते हैं। और जो इन पाँचों-पापों का सर्वदेश/सर्वथा त्याग करते हैं, वे महाव्रती-मुनिराज होते हैं। 28 मूलगुणों के अंतर्गत पाँच-महाव्रतों का स्वरूप इसप्रकार है - 1. अहिंसा-महाव्रत- दिगम्बर-मुनिराज आरंभ-परिग्रह से रहित होने से, बाहर में छहकाय के जीवों के घात नहीं करने से सभीप्रकार की ‘द्रव्यहिंसा’ और राग-द्वेष, क्रोध-मान-माया-लोभ आदि भावों पर नियंत्रण रखने से ‘भावहिंसा’ से भी रहित होने से ‘अहिंसा-महाव्रत’ के धनी होते हैं। 2. सत्य-महाव्रत- जिनके न लेश-मृषा- अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म- दोनोंप्रकार के झूठ का त्याग होने से दिगम्बर-मुनिराज ‘सत्य-महाव्रत’ के धारी होते है। 3. अचौर्य-महाव्रत- ‘‘मृण हू बिना दीयो न गहै’’- अन्य-वस्तु तो दूर, मिट्टी भी बिना दिये ग्रहण नहीं करते; वे दिगम्बर-मुनिराज ‘अचौर्य-महाव्रत’ के धारी होते हैं। 4. ब्रह्मचर्य-महाव्रत- ‘‘अठदस सहसविध शील धर’’… शील के अठारह हजार भेदों का पालन करते हैं और ‘‘चिद्ब्रह्म में नित रमि रहैं’’- चैतन्य-स्वरूप आत्मा में लीन रहते हैं, इसीलिये ‘ब्रह्मचर्यमहाव्रत’ के धारी होते हैं। 5. अपरिग्रह-महाव्रत- मुनिराज अंतरंग में कषायादि चौदह और बहिरंग-स्वर्ण, वास्तु आदि दसप्रकार के परिग्रह के त्यागी होने से ‘अपरिग्रह-महाव्रत’ के धारी होते है।
(दोहा)
चलै-निरखि भाखै-उचित, भखै अदोष-अहार।
लेइ-निरखि डारै-निरखि, समिति पंच-परकार।। 82।।
शब्दार्थ :- चलै-निरखि= देखकर चलें, भाखै-उचित= उचित-वचन बोलें, भखै-अदोष-अहार= निर्दोषआहार ग्रहण करें, लेइ-निरखि डारै-निरखि= देखकर रखें और देखकर उठायें, समिति पंच-परकार= ये पाँचप्रकार की समिति हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मुनियों के 28 मूलगुणों के अंतर्गत पाँच-प्रकार की समितियों का वर्णन किया हैं- प्रमाद-रहित, यत्नाचार-सहित सम्यक्-प्रवृत्ति ‘समिति’ कहलाती है, जिसका मुनिराज निरतिचारपालन करते हैं। समितियाँ पाँच-प्रकार की होती है। जो इसप्रकार हैं- 1. ईर्या-समिति- मुनिराज हमेशा दृष्टि झुकाकर अपने से आगे चार-हाथ जमीन देखकर ही गमन करते हैं, जिससे गमन करते समय किसी भी जीव की हिंसा न हो जाये। 2. भाषा-समिति- मुनिराज हमेशा हित-मित-प्रिय अर्थात् हितकारी, मीठे, प्रिय, योग्य-वचन ही बोलते हैं, ताकि उनके द्वारा बोले गये किसी वचन से भी किसी जीव को पीड़ा न पहुँचे। 3. एषणा-समिति- मुनिराज हमेशा भोजन-संबंधी 46 दोषों (16 उद्गम-दोष, 16 उत्पादन-दोष, 10 अशन या एेषणा-दोष और 4 अंगारक-दोष) से रहित अर्थात् निर्दोष-आहार ही ग्रहण करते हैं। ताकि भोजन बनाते समय से लेकर आहार लेते समय तक किसी जीव की हिंसा न हो और न ही प्राणपीड़न हो। 4. आदान-निक्षेपण-समिति- देखकर रखना और उठाना अर्थात् मुनिराज शास्त्र, पीछी, कमंडलु आदि कुछ भी सामान हमेशा देखकर ही रखते व उठाते हैं, जिससे अनजाने में भी जीव की विराधना न हो। 5. प्रतिष्ठापन-समिति- जीव-रहित प्रासुक-भूमि पर ही मुनिराज कफ-मल-मूत्रादि का क्षेपण करते हैं; ताकि किसी जीव की हिंसा न हो।
(दोहा)
समता, वंदन, थुतिकरन, पड़कौना सज्झाव।
काउसग्ग-मुद्रा-धरन, षडावसिक ये भाव।। 83।।
चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार शब्दार्थ :- समता= साम्यभाव, वंदन= नमस्कार करना, थुतिकरन= स्तुति करना, पड़कौना= प्रत्याख्यान, सज्झाव= स्वाध्याय, काउसग्ग-मुद्रा धरन= कायोत्सर्ग-मुद्रा धारण करना, षडावसिक ये भाव= ये छह षट्आवश्यक हैं। विशेषार्थ :- अवश्य करने योग्य कार्य को ‘आवश्यक’ कहते हैं। ‘मूलाचार’ के अनुसार ‘आवश्यक’ की परिभाषा इसप्रकार है- ‘‘ण वसो अवसो अवस्स, कम्ममावासगं त्ति वोधव्वा। जुत्तित्ति उवायत्ति य, णिरयवा होइ णिजुत्ति।।’’ -(मूलाचार 515) अर्थात् जो कषाय राग-द्वेषादि के वशीभूत न हो वह ‘अवश’ है, और उस ‘अवश’ का जो आचरण है, वह ‘आवश्यक’ है। ‘भगवती आराधना’ में तो आवश्यक की परिभाषा और भी मार्मिक दी गई है- ‘‘आवासयन्ति रत्नत्रयमपि इति आवश्यकाः’’ अर्थात् जो आत्मा को रत्नत्रय में निवास कराते हैं, उनको ‘आवश्यक’ कहते
हैं। श्रावकों की तरह मुनियों के भी ‘षट्-आवश्यक’ आगम में वर्णित हैं।
उन्हीं षट्-आवश्यकों का वर्णन कवि ने यहाँ किया है।
- समता- प्रत्येक अनुकूल और प्रतिकूल-परिस्थितियों में साम्यभाव रखना, और निर्धारित-समय पर
आत्मचिंतन-पूर्वक ‘सामायिक’ करना मुनिराज का ‘समता’ नामक पहला-आवश्यक है।
2. स्तुति- समस्त तीर्थंकर-भगवंतों का गुणानुवाद करना ‘स्तुति’ नामक दूसरा-आवश्यक है।
3. वंदना- समस्त-तीर्थंकर परमात्मा को विनयपूर्वक वंदन/नमन करना तीसरा ‘वंदना’ आवश्यक है।
- स्वाध्याय- आत्मस्वरूप में स्थिरता-हेतु स्वयं के परिणामों की संभाल, और बाह्य में शास्त्र
स्वाध्याय, चिंतन-मनन आदि करना।
5. प्रतिक्रमण- स्वयं के द्वारा किये दोषों का परिष्कार करना ही ‘प्रतिक्रमण’ है।
- कायोत्सर्ग- कायोत्सर्ग अर्थात् काया से ममत्व का उत्सर्ग यानि त्याग करना ही ‘कायोत्सर्ग’ नामक आवश्यक है।
(सवैया इकतीसा)
थविरकलपि जिनकलपि दुविध-मुनि, दोऊ वनवासी दोऊ नगन रहतु हैं।
दोऊ अट्ठाईसमूलगुन के धरैया दोऊ, सरव-त्यागी ह्वै विरागता गहतु हैं।।
थविरकलपि ते जिनके शिष्य-साखा होइ, बैठिकै सभामैं धर्मदेसना कहतु हैं।
एकाकी सहज जिनकलपि तपस्वी-घोर, उदै की मरोरसौं परीसह सहतु हैं।। 84।।
शब्दार्थ :- थविरकलपि जिनकलपि दुविध-मुनि= ‘स्थविरकल्पी’ और ‘जिनकल्पी’ दोनों मुनि है, दोऊ वनवासी दोऊ नगन रहतु हैं= दोनों ही वन में रहते हैं, दोनों ही नग्न रहते हैं, दोऊ अट्ठाईस-मूलगुन के धरैया= दोनों 28 मूलगुणों का पालन करते हैं, दोऊ सरव-त्यागी ह्वै= दोनों ही सर्वप्रकार से त्यागी होकर, विरागता गहतु हैं= वैराग्य को ग्रहण/धारण करते हैं, थविरकलपि ते= स्थविरकल्पी वे हैं, जिनके शिष्य-साखा होइ= जिनके शिष्यों का संघ होता है, बैठिकै सभामैं धर्मदेसना कहतु हैं= सभा में बैठकर धर्म का उपदेश देते हैं, एकाकी सहज जिनकलपि= जिनकल्पी सहज ही एकाकी होते हैं, तपस्वी घोर= घोर-तपस्वी होते हैं, उदै की मरोरसौं परीसह सहतु हैं= कर्म के उदय में होनेवाले परीषहों को सहन करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘स्थविरकल्पी’ और ‘जिनकल्पी’, ऐसे दो-प्रकार के मुनियों का स्वरूप विवेचित किया है। । ये दोनों ही प्रकार के साधु जिनाम्नाय में वर्णित-मुनिचर्या का पालन करते हैं, दोनों ही मुनि जंगल में रहते हैं, नग्न-दिगम्बर-रूप को ही अंगीकार करते हैं, दोनों ही 28 मूलगुणों का निरतिचार-पालन करते हैं। मुनिचर्या की दृष्टि से उनमें कोई भेद नहीं है, दोनों ही समान-आचरण करते हैं। दोनों में अंतर केवल इतना कि जो ‘स्थविरकल्पी-मुनिराज’ हैं, वे अपने संघ में रहते हैं, जिसमें एक संघ के आचार्य, नव-दीक्षित-साधुओं को पढ़ाने के लिये उपाध्याय, और सामान्य-साधु होते हैं। संघ के आचार्य का आदेश प्रत्येक-साधु के लिये मानना अनिवार्य होता है। साधुओं से चर्या-पालन में कोई दोष लगने पर वह साधु आचार्य के समक्ष अपने दोष को बताकर प्रायश्चित भी लेते हैं। संघ में रहने पर सभी साधु अनुशासन में रहते हैं, धर्मोपदेश देते व सुनते हैं, कर्म के उदयवश किसी भी साधु के जीवन में प्रतिकूलता आने पर या परिणाम विचलित होने पर, अन्य साधु उन्हें संबोधित करते हैं, स्थितिकरण कराते हैं। जबकि दूसरी ओर उग्र-पुरुषार्थी ‘जिनकल्पी-मुनि’ का कोई संघ नहीं होता, कोई शिष्य नहीं, वे एकलविहारी होते हैं। कर्म के उदय से होनेवाले परीषहों को स्वयं ही सहन करते हैं, अर्थात् अपने परिणामों की संभाल वे साधु स्वयं ही करते हैं।
(सवैया इकतीसा)
ग्रीषममैं धूप-थित, सीतमैं अकंप-चित, भूखै धरैं-धीर, प्यासे नीर न चहतु है।
डंसमसकादिसौं न डरैं, भूमि-सैन करै, वध-बंध-विथामैं अडोल ह्वै रहतु हैं।।
चर्या दु:ख भरै तिन फाससौं न थरहरै, मल-दुरगंधकी गिलानि न गहतु हैं।
रोगनिकौ न करैं इलाज एेसे मुनिराज, वेदनी के उदै ये परीसह सहतु हैं।। 85।।
शब्दार्थ :- ग्रीषममैं धूप-थित= गर्मी में धूप में स्थित रहते हैं, सीतमैं अकंप-चित= सर्दी में निश्चल-मन रहते हैं, भूखै धरैं-धीर= भूख लगने पर धैर्य रखते हैं, प्यासे नीर न चहतु है= प्यास लगने पर पानी नहीं चाहते, डंसमसकादिसौं न डरैं= डांस-मच्छर के काटने आदि का भय नहीं करते, भूमि-सैन करै= जमीन पर सोते हैं, वध-बंध-विथामैं अडोल ह्वै रहतु हैं= बाँधने-मारने के कष्ट/उपसर्ग में भी अचल रहते हैं, चर्या दु:ख भरै= नंगे पाँव चलने में होनेवाले कष्ट से (और), तिन-फाससौं न थरहरै= तिनका-फाँस आदि के लगने पर नहीं घबराते, मल-दुरगंधकी गिलानि न गहतु हैं= मल और दुर्गंधित-पदार्थों में ग्लानि नहीं करते, रोगनिकौ न करैं इलाज= रोग होने पर इलाज नहीं करते, एेसे मुनिराज वेदनी के उदै ये परीसह सहतु हैं= इसप्रकार मुनिराज वेदनीय-कर्म के उदय में इन परीषहों को सहन करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने वेदनीय-कर्म-जनित ग्यारह-परीषहों का वर्णन किया है। और मुनिराज कर्मोदय-जनित इन परीषहों को शांत-भाव से सहन करते हैं। आत्मसाधना-हेतु तेज-गर्मी में तपती-धूप में भी शांत-भाव से खड़े रहना, गर्म-सड़क पर नंगेपाँव विहार करना, भयंकर-गर्मी में तेज-लू के बीच में भी भेदविज्ञान के बल पर समताभाव रखना ‘उष्ण-परीषहजय’ है। तेज-सर्दी, तुषार, अत्यधिक ठंडी-हवाओं से भी भयभीत नहीं होना निर्भय और अचल रहकर आत्मसाधना करना ‘शीत-परीषहजय’ है। उपवास होने पर, अनेकप्रकार की तपस्याओं से चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार शरीर कृष होने पर भी क्षुधा के कारण अपने विशुद्ध-ध्यान से च्युत न होना, धैर्य रखना, शांत-भाव से सहना, और विशेष-उत्साह से मोक्षमार्ग में लगना ‘क्षुधा-परीषहजय’ है। प्रकृति-विरुद्ध आहार, तेजगर्मी, पित्त-ज्वर, अनशन आदि के कारण उत्पन्न प्यासरूपी अग्नि-शिखा को संतोषरूपी-जल से शांत करना ‘तृषा-परीषहजय’ है। डांस, मक्खी, मच्छर आदि के काटने पर उत्पन्न हुई पीड़ा को शांतभाव से सहन करना और सहज रहना ‘दंसमशक-परीषहजय’ है। रात्रि में कठोर-भूमि पर भी पूरा बदन सीधा रखकर एक करवट से कुछ देर तक ही सोना ‘शय्या-परीषहजय’ है। किसी चोर, डाकू, बैरी आदि के द्वारा मारने-बाँधने, यहाँ तक कि प्राणघात किये जाने पर भी क्रोध न करके उनका भला ही सोचना ‘वध-बंधन-परीषहजय’ है। पवन की तरह एकाकी-विहार करते हुए भयानक-वन में भी सिंह की तरह निर्भय रहना, और जमीन पर चलने से पैर में कंकर-पत्थर आदि चुभने पर होनेवाले कष्ट को शांत-भाव से सहन करना, मन में किसी भी प्रकार का खेद नहीं करना, यह ‘चर्या-परीषहजय’ है। तिनका, फाँस आदि के चुभने पर नहीं घबराना ‘तृणस्पर्शपरीषहजय’ है। अपने शरीर पर लगे मल को देखकर या बाह्य में दुर्गंधयुक्त-पदार्थो को देखकर भी ग्लानि का भाव न आना ‘मल-परीषहजय’ है। शरीर में रोगादि की वेदना होने पर मन में उसका इलाज करने का विचार भी नहीं करना, बल्कि सहज-शांतभाव से सहन करना ‘रोग-परीषहजय’ है- इसप्रकार वेदनीयकर्म के उदय में होनेवाले उपर्युक्त ग्यारह-प्रकार के परीषहों को मुनिराज शांत-भाव से सहन करते हैं।
(कुण्डलिया)
एते संकट मुनि सहैं, चारितमोह-उदोत।
लज्जा-संकुच-दु:ख धरैं, नगन-दिगम्बर होत।।
नगन-दिगम्बर होत, श्रोत-रति-स्वाद न सेवैं।
तिय-सनमुख दृग-रोकि, मान-अपमान न बेबैं।।
थिर ह्वै निरभै रहैं, सहैं कुवचन जग जेते।
भिच्छुक-पद संग्रहैं, लहैं मुनि संकट एेते।। 86।।
शब्दार्थ :- एते संकट मुनि सहैं= इतने संकट/परीषह मुनिराज सहन करते हैं, चारितमोह उदोत= चारित्रमोहनीय-कर्म के उदय से, लज्जा-संकुच-दुख धरै नगन-दिगम्बर होत= लज्जा और संकोचजनित-जो दुःख होता है नग्न-दिगम्बर रहने से, नगन-दिगम्बर होत श्रोत-रति-स्वाद न सेव=ै नग्नता के साथ-साथ श्रवण आदि इन्द्रिय-विषयों का उदय होने पर भी उस संबंधी स्वाद/इन्द्रिय-विषय का सेवन नहीं करते, तिय-सनमुख दृग-रोकि= स्त्रियों के सन्मुख होने पर नेत्रों से उनकी ओर देखने से स्वयं को रोकना, मान-अपमान न बेब=ैं मान-अपमान की परवाह नहीं करते, थिर ह्वै निरभै रहैं= भयरहित स्थिर रहते हैं, सहैं कुवचन जग जेत=े जगत्जनों के कुवचनों को सहन करते हैं, भिच्छुकपद-संग्रहैं लहैं मुनि संकट एेत=े लोगों के यहाँ आहार लेने जाने पर ‘याचक’ कहलाते हैं- मुनिराज इन संकटों को सहते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन सात-परीषहों का वर्णन किया है, जो चारित्र-मोहनीय-कर्म के उदय से होते हैं, और मुनिराज उन परीषहों को शांत-भाव से सहन करते हैं। सबसे पहला ‘नग्न रहना’ भी परीषह है, और इसके फलस्वरूप चित्त को मलिन करनेवाले अनेककारणों के मिलने पर भी लज्जा, संकोच आदि दुःखों को शांत-भाव से सहना, और अपनी आत्मसाधना निःसंकोच होकर करना ‘नग्न-परीषहजय’ है। नग्नता के साथ-साथ श्रवण आदि इन्द्रियों के विषयों के उपस्थित होने पर भी उनमें अनुराग नहीं करते हैं, और अनिष्ट-संयोग मिलने पर भी विरोध या ग्लानि का भाव नहीं करना, और आत्मसाधना में रत रहना यह दूसरा ‘अरति-परीषहजय’ है। तीसरा स्त्रियों के सन्मुख होने पर भी नेत्रों की चंचलता को रोकना अर्थात् उन पर मोहित न होना, सहज-निर्विकार रहना ‘स्त्री-परीषहजय’ है। अपने में गुणों की अधिकता होने पर भी यदि कोई सत्कार न करे, तो भी चित्त में मलिनता का न होना,अथवा कैसी भी विपरीत-परिस्थिति हो मान-अपमान की परवाह नहीं करना- यह चौथा ‘सत्कार-पुरस्कार-परीषहजय’ है। जिस आसन में ध्यान आदि में बैठे हों, उससे उपसर्ग आदि के आने पर भी विचलित नहीं होना अथवा भय का निमित्त मिलने पर भी अपने ध्यान में स्थिर रहना, अपने आसन से भी विचलित नहीं होना - यह पाँचवाँ ‘निषद्या-परीषहजय’ है। मूर्खों के द्वारा कठोर, कटु-वचन, गाली आदि का प्रयोग करने पर भी क्रोधित न होकर शांत रहना; बल्कि उन्हें क्षमा करने का ही भाव रखना- यह छठवाँ ‘आक्रोशपरीषहजय’ है। आहारादि न मिलने पर या अन्य किसी भी कार्य के लिये याचना/दीनतारूप-प्रवर्तन तो दूर चेहरे पर भी दीनता का भाव नहीं लाना,- यह सातवाँ ‘याचना-परीषहजय’ है। चारित्र-मोहनीय-कर्म के उदय में होनेवाले इन सभी परीषहों को मुनिराज शांत-भाव से सहन करते हैं।
(दोहा)
अलप-ग्यान लघुता लखैं, मति-उतकरष विलोइ।
ज्ञानावरन-उदोत मुनि, सहैं परीसह दोइ।। 87।।
शब्दार्थ :- अलप-ग्यान लघुता लखै= कम-ज्ञान होने पर अपने को छोटा मानना, मति-उतकरष विलोइ= अधिक-ज्ञान होने पर श्रेष्ठ मानना, ज्ञानावरन उदोत= ज्ञानावरणी-कर्म के उदय में होनेवाले, मुनि सहै परीसह दोइ= ये दोनों परीषह मुनिराज सहन करते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने मुनिराजों को ज्ञानावरणी-कर्म के उदय में होने वाले दो-परीषहों का वर्णन किया है। किसी भी जीव को ज्ञान की प्रगटता कम या अधिक मिलने में ज्ञानावरणी-कर्म का उदय निमित्त होता है। मुनिचर्या में ज्ञान की प्रगटता अल्प होने पर लघुता/हीनता का भाव आना ‘अज्ञान-परीषह’ है, और उसमें विचलित न होना, समता-भाव रखना ‘अज्ञान-परीषहजय’ है। मुनिचर्या में ज्ञान की उघाड़ या क्षयोपशम अधिक होने पर उस पर गर्वित होना ‘प्रज्ञा-परीषह’ है, और उसमें गर्व का भाव नहीं करते हुये साम्य-भाव रखना ‘प्रज्ञा-परीषहजय’ है। ज्ञानावरणी-कर्म के उदय में होने वाले दोनों परीषहों को मुनिराज साम्यभाव से सहन करते हैं।
(दोहा)
सहै अदरसन-दुरदसा, दरसन-मोह-उदोत।
रोकै उमंग-अलाभ की, अंतराय के होत।। 88।।
शब्दार्थ :- सहै अदरसन दुरदसा= अदर्शनरूपी-दुर्दशा को सहन करते हैं, दरसन-मोह उदोत= दर्शन मोहनीय के उदय में, रोकै उमंग अलाभ की= अलाभ होने पर अपने परिणामों की खेद-खिन्नता को रोकते हैं, अंतराय के होत= अंतराय-कर्म का उदय होने पर। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने दर्शन-मोहनीय और अंतराय-कर्मों के उदय में होनेवाले परीषहों का वर्णन किया है। साधु-चर्या में भी दर्शन-मोहनीय का उदय होने पर श्रद्धान में किंचित् भी मलिनता या दोष का चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार उत्पन्न होना, (जैसे कि बहुत समय तक कठोर-तपस्या करने पर भी विशेष-ऋद्धियाँ आदि प्रकट न होना) मुनिधर्म में ‘अदर्शन-परीषह’ कहा गया है, और उससमय सावधान रहना, चलायमान न होना, अश्रद्धान का भाव न आना ‘अदर्शन-परीषहजय’ है। इसीप्रकार अंतराय-कर्म के उदय में अनुकूलसामग्री आहार, औषधि आदि का लाभ न होना ‘अलाभ-परीषह’ है, और उससमय परिणामों में खेदखिन्नता का भाव न आना, आत्मलाभ में ही तृप्त रहना, ‘अलाभ-परीषहजय’ है। सच्चे मुनिराज इन दोनों परीषहों कों साम्यभाव से जीतते हैं।
(सवैया इकतीसा)
एकादस वेदनीकी, चारितमोह की सात, ग्यानावरनी की दोइ, एक अंतराय की।
दर्सनमोह की एक, द्वाविंसति-बाधा सबै, केई मनसाकी, केई वाकी, केई कायकी।।
काहूकौ अलप काहूकौ बहुत उनीस-तांई, एक ही समैमैं उदै आवै असहायकी।
चर्या-थित-सज्जा-माँहि, एक सीत-उस्न-माँहि, एक दोइ होहिं तीन नांहि समुदायकी।। 89।।
शब्दार्थ :- एकादस वेदनीकी= ग्यारह वेदनीय की, चारितमोह की सात= चारित्रमोहनीय की सात, ग्यानावरनी की दोइ= ज्ञानावरणी की दो, एक अंतराय की= अंतराय की एक, दर्सनमोह की एक= दर्शनमोहनीय की एक, द्वाविंसति बाधा सबै= सब (मिलाकर) बाईस बाधा/परीषह है, केई मनसाकी= कुछ मन की, केई वाकी= कुछ वचन की, केई कायकी= कुछ काया की, काहूकौ अलप= किसी को अल्प, काहूकौ बहुत= किसी को बहुत, उनीस-तांई= (अधिकतम एकसाथ) उन्नीस तक, एक ही समैमैं उदै आवै असहायकी= एकसमय में उदय में आ सकती हैं, चर्या-थित-सज्जामाँहि एक= चर्या, आसन और शय्या में से एक, सीतउस्न-माँहि एक= शीत-उष्ण में से एक, दोइ होहिं= दो का ही उदय होता है, तीन नांहि समुदायकी= (इन पाँच में से कभी भी) तीन का उदय एकसाथ नहीं होता। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने आत्मासाधना में बाधक, कर्म के उदय-जन्य बाईस-परीषहों का विशेष वर्णन किया है। भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, दंशमशक, नग्नता, अरति, स्त्री, चर्या , निषद्या (बैठना), शय्या, आक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कार-पुरस्कार, प्रज्ञा , अज्ञान, और अदर्शन ये 22 प्रकार के परीषह आगम में वर्णित हैं। इनमें से वेदनीय कर्म के उदय में ग्यारह, चारित्रमोहनीय कर्म के उदय में सात, ज्ञानावरणी कर्म के उदय में दो, अंतराय कर्म के उदय में एक, और दर्शन मोहनीय कर्म के उदय में एक, इस प्रकार कुल मिलाकर ये 22 परीषह आत्मसाधना में बाधक हैं, जिसमें से कुछ मन से, कुछ वचन
से और कुछ काया से संबंध रखते हैं।
इन बाईस-परीषहों में से किसी साधक को कुछ परीषहों का उदय होता है, किसी को बहुत का।
लेकिन एक जीव को एक ही समय में एक साथ 19 परीषहों का ही उदय हो सकता है, पूरे बाईस का नहीं। क्योंकि चर्या (चलना), आसन (बैठना या खड़े होना) या शय्या (सोना) इन तीन में से एक समय में एक का ही उदय रहता है। इसीप्रकार शीत (सर्दी) और उष्ण (गर्मी) में से भी एक समय में एक का ही उदय हो सकता है। इसप्रकार इन पाँच में से एकसमय में दो का ही उदय होता है, तीन का नहीं। परीषह से तात्पर्य साता/अनुकूलता में बाधक सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास, मच्छर, मक्खी के काटने आदि की अचानक बाधा आना ‘परीषह’ है, और इन बाधाओं के आने पर आर्त-परिणाम/संक्लेशपरिणाम न हों अथवा ध्यान से न डिगें, वह ‘परीषहजय’ है। जैसे हम सब कुछ देखभालकर ध्यान में बैठें, अचानक बारिश आ गई, तेज-हवा चलने लगी, जिससे सर्दी लगने लगी- यह है ‘परीषह’। और फिर भी हमारा ध्यान भंग नहीं हुआ, परिणाम मलिन/ विचलित नहीं हुये- यह है ‘परीषहजय’।
(दोहा)
नानाविधि संकट-दसा, सहि साधैं सिवपंथ।
थविरकल्पि-जिनकल्पि धर, दोऊ सम-निरग्रंथ।। 90।।
जो मुनि-संगतिमैं रहैं, थविर-कल्पि सो जान।
एकाकी जाकी दसा, सो जिन-कल्पि बखान।। 91।।
(चौपाई)
थविरकलपि धर कछुक सरागी, जिनकलपी महान् वैरागी।
इति प्रमत्त-गुनथानक-धरनी, पूरन भई जथारथ-वरनी।। 92।।
शब्दार्थ :- नानाविधि संकट-दसा= विभिन्नप्रकार के संकटों को, सहि साधै सिवपंथ= सहनकर मोक्षमार्ग को साधते हैं, थविर-कल्पि जिन-कल्पि धर= स्थविरकल्पी और जिनकल्पी (मुनिपना) धारणकर, दोऊ समनिरग्रंथ= दोनों ही समान निर्ग्रंथ होते हैं।। 90।। जो मुनि-संगतिमैं रहैं= जो मुनि-संघ में रहते हैं, थविरकल्पि सो जान= उन्हें ‘स्थविरकल्पी’ जानो, एकाकी जाकी दसा= जिसकी स्थिति अकेल/े संघरहित है, सो जिनकल्पि बखान= उन्हें ‘जिनकल्पी’ कहते हैं।। 91।। थविर-कलपि धर= स्थविरकल्प धारण करनेवाले, कछुक सरागी= कुछ रागसहित होते हैं, जिनकलपी महान्-वैरागी= जिनकल्पी अत्यंत-वैरागी होते हैं, इति प्रमत्त-गुनथानक-धरनी= इसप्रकार प्रमत्तगुणस्थान धारण करनेवालों का, पूरन भई जथारथ-वरनी= यथार्थ-वर्णन पूरा हु ।। 92।। विशेषार्थ :- इन तीनों-छंदों में कवि ने स्थविरकल्पी और जिनकल्पी-साधुओं का तुलनात्मक-वर्णन किया है। ‘स्थविरकल्पी’ और ‘जिनकल्पी’ -दोनों ही प्रकार के मुनि समानरूप से निर्ग्रंथ होते हैं, दोनों ही विभिन्न-प्रकार के संकटों को सहनकर मोक्षमार्ग को साधते हैं। दोनों ही साधु अंतरंग-साधना की दृष्टि से लगभग-समान होते हुए भी दोनों में कुछ अंतर है। स्थविरकल्पी-साधु संघ में रहते हैं, अनुशासन में रहते हैं, किंचित्-सरागी भी होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि संघ में रहनेवाले सभी साधुओं के प्रति किंचित् राग का भाव वर्तता है, जैसे साधुओं को पढ़ाना, अनुशासित करना, कदाचित् कोई भूल होने पर प्रायश्चित देना, रोगादि की वेदना होने पर सेवा करना, संबोधित करना, स्थितिकरण कराना इत्यादि। जबकि दूसरी ओर ‘जिनकल्पी’-साधु एकाकी-विचरण करते हैं। यद्यपि इन्हें कोई अनुशासित नहीं करता; परन्तु किसी भी प्रकार की प्रतिकूलता आने पर ये स्वयं ही अपने परिणामों को दृढ़ करते हैं, उपसर्ग और परीषहों को भेदविज्ञान के बल पर अकेले ही शांतभाव से सहन करते हैं, इसीलिए ये साधु अपेक्षाकृत अधिक-वैरागी एवं उग्र-पुरुषार्थी होते हैं। ज्ञातव्य है कि इस विषमकाल में ‘जिन-कल्पी’-साधुओं का अभाव कहा गया है। अत:
‘एकलविहारी’ होने का भी पूर्णत: निषेध जानना चाहिये।
इसप्रकार छठवें-गुणस्थान में प्रवर्तमान-साधुओं का यथार्थ-वर्णन पूर्ण हुआ।
(चौपाई)
अब वरनौं सप्तम-विसरामा, अपरमत्त-गुनथानक नामा।।
जहाँ प्रमाद-क्रिया-विधि नासै, धरम-ध्यान थिरता परगासै।। 93।।
चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार
(दोहा)
प्रथम-करन चारित्र कौ, जासु अंत-पद होइ।
जहाँ अहार-विहार नहिं, अपरमत्त है सोइ।। 94।।
शब्दार्थ :- अब वरनौं सप्तम-विसरामा= अब सातवें विश्राम-स्थल का वर्णन करता हूँ, अपरमत्तगुनथानक नामा= जिसका नाम अप्रमत्त-गुणस्थान हैं, जहां प्रमाद-क्रिया-विधि नासै= जहाँ प्रमाद-सहित क्रिया का अभाव होता है, धरम-ध्यान थिरता परगासै= और धर्मध्यान की दशा प्रगट होती है।। 93।। प्रथम-करन चारित्र कौ= यह चारित्र का प्रथम-करण है, जासु अंत-पद होइ= जो इस गुणस्थान के अंत तक रहता है, जहाँ अहार-विहार नहिं अपरमत्त है सोइ= जहाँ आहार-विहार की क्रिया नहीं होती, वही ‘अप्रमत्त’ है।। 94।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने सातवें-गुणस्थान का संक्षिप्त-विवेचन किया है। सातवें-गुणस्थान का नाम ‘अप्रमत्त-विरत-गुणस्थान’ है। ‘अ’ यानि ‘अभाव’, ‘प्रमत्त’ यानि ‘प्रमाद’ और ‘विरत’ यानि विरक्त। जहाँ विरति की स्थिति पूरी हो और प्रमाद का पूर्णतः अभाव हो, उसे ‘अप्रमत्तविरतगुणस्थान’ कहते हैं। इस गुणस्थान में अनंतानुबध ं ी, अप्रत्याख्यानावरणी और प्रत्याख्यानावरणी- तीनों कषाय-चौकड़ियों का क्षय या उपशम हो जाता है; परन्तु संज्वलन-कषाय और नोकषायों का यथायोग्यउदय वर्तता है। ‘अप्रमत्तविरत-गुणस्थान’ के पहले सभी गुणस्थानों में जीव प्रमाद-सहित ही होते हैं। अप्रमत्तविरतगुणस्थान आैर इसके बादवाले सभी गुणस्थानों में जीव प्रमाद-रहित ही होते हैं। अर्थात् यहाँ से आगे प्रमाद का सर्वथा-अभाव हो जाता है; क्योंकि आगे के गुणस्थान ‘स्वरूप में स्थिरता के गुणस्थान’ हैं। इसीलिए
मुनिराज छठवें से सातवें और सातवें से छठवें में झूलते रहते हैं।
सातवें गुणस्थान के दो भेद हैं- स्वस्थान-अप्रमत्तसंयत और सातिशय-अप्रमतसंयत।
- स्वस्थान-अप्रमत्तसंयत :- अपने स्थान पर स्थिर, श्रेणी-आरोहण का पुरुषार्थ नहीं चलता। प्रमादरहित, निरन्तर स्व-पर से भेदज्ञान और आत्मध्यान में लीन- ऐसे अप्रमत्तसंयत-मुनि जब तक उपशम या क्षपक-श्रेणी का आरोहण नहीं करते; तब तक वह ‘स्वस्थान-अप्रमत्तसंयत’ अथवा ‘निरतिशयअप्रमत्तसंयत’ कहलाते हैं। 2. सातिशय-अप्रमतसंयत :- जो अप्रमत्त-मुनि ‘उपशम’ या ‘क्षपक’-श्रेणी-आरोहण के लिये उद्यत होते हैं, वह पहले-करण ‘अधःप्रवृत्तकरण’ को करते हैं, इन्हें ‘सातिशय-अप्रमतसंयत’ कहते हैं।
(चौपाई)
अब वरनौं अष्टम-गुनथाना, नाम-अपूरवकरन बखाना।
कछुक-मोह उपसम करि राखै, अथवा किंचिंत-क्षय करि नाखै।। 95।।
जे-परिनाम भए नहिं कबही, तिनकौ उदै देखिये जबही।
तब अष्टम-गुनथानक होई, चारित-करन दूसरौ सोई।। 96।।
शब्दार्थ :- अब वरनौं अष्टम-गुनथाना= अब आठवें-गुणस्थान का वर्णन करता हू,ँ नाम-अपूरवकरन बखाना= जिसका नाम अपूर्वकरण है, कछुक-मोह उपसम करि राखैं= (इस गुणस्थान में) कुछ (साधक-जीव) मोह का उपशम करते हैं, अथवा किंचितं क्षय करि ना़ख=ैं अथवा कुछ (जीव) मोह का क्षय करते हैं।। 95।। जे-परिनाम भए नहिं कबही= जो परिणाम पहले कभी नहीं हुये, तिनकौ उदै देखिये जबही= उन (परिणामों) का उदय इस गुणस्थान में होता है, तब अष्टम-गुनथानक होई= तभी आठवाँ-गुणस्थान होता है, चारित-करन दूसरौ सोई= यह चारित्र का दूसरा-करण है।। 96।। विशेषार्थ :- इन-छंदों में कवि ने आठवें ‘अपूर्वकरण-गुणस्थान’ का स्वरूप विवेचित किया है। ‘करण’ आत्मोत्थान के साधक विशिष्ट-परिणामों की अवस्था-विशेष को कहते हैं। इसके तीन भेद हैं- 1. अधःप्रवृत्तकरण, 2. अपूर्वकरण, 3. अनिवृत्तिकरण ये विशिष्ट-करणरूप परिणाम दर्शनमोहनीय-कर्म के उपशम/क्षय आदि करने के समय भी होते हैं और चारित्र-मोहनीय-कर्म के उपशम/क्षय करने के समय भी होते हैं। इन विशिष्ट-परिणामों की प्रक्रिया के बिना न तो दर्शन-मोहनीय-कर्म का उपशम या क्षय होता है और न ही चारित्र-मोहनीय-कर्म का उपशम या क्षय होता है। सातवें-गुणस्थान के सातिशय-अप्रमत्तसंयतपने की स्थिति में ‘अधःप्रवृत्तकरण’ का काल बिताकर श्रेणी-आरोहण करनेवाले मुनिराज जब प्रतिसमय अनंत-गुणी-विशुद्धि को लिये हुये अपूर्व-जाति के परिणामों को करते है , तब उसे ‘अपूर्वकरण-गुणस्थान’ कहते हैं। इस गुणस्थान में जीव ‘अ+पूर्व’ अर्थात् पूर्व में जिनको कभी धारण नहीं किया, ऐसे ‘अपूर्व’ परिणामों को धारण करते हैं , इसलिये इस गुणस्थान का नाम ‘अपूर्वकरण-गुणस्थान’ सार्थक है। इसी क्रम में यह चारित्र-मोहनीय-कर्म के उपशम/क्षय का विधायक यह दूसरा-करण है। इस गुणस्थान में चार-आवश्यक कार्य होते हैं- 1. गुणश्रेणी-निर्जरा, 2. गुण-संक्रमण, 3. स्थिति-कांडक-घात, 4. अनुभाग-कांडक-घात -ये चारों ही कार्य पूर्वबद्ध-कर्मों में ही होते हैं। इस गुणस्थान का काल अंतर्मुहूर्त है। अपूर्वकरण-परिणामों के निमित्त से उपशम-श्रेणी चढ़नेवाले जीव के मोहनीयकर्म की 21 प्रकृतियों का उपशम, और क्षपक-श्रेणी चढ़नेवाले जीव के इन्हीं प्रकृतियों का क्षय होता है। -(आधार, गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा 50-51)
(चौपाई)
अब अनिवृत्ति-करन सुनु भाई, जहाँ भाव-थिरता अधिकाई।
पूरव-भाव चलाचल जेते, सहज-अडोल भए सब तेते।। 97।।
जहाँ न भाव उलटि अध आवै, सो नवमो-गुनथान कहावै।
चारितमोह जहाँ बहु-छीजा, सो है चरन-करन पद-तीजा।। 98।।
शब्दार्थ :- अब अनिवृत्ति-करन सुनु भाई= हे भाई! अब अनिवृत्तिकरण-गुणस्थान के बारे में सुनो, जहाँ भाव-थिरता अधिकाई= जहाँ परिणाम और अधिक स्थिर होते हैं, पूरव-भाव चलाचल जेत=े पूर्व में जो परिणाम चंचल/अस्थिर थे, सहज-अडोल भए सब तेत=े वे सब सहज ही स्थिरता को प्राप्त होते हैं।। 97।। जहाँ न भाव उलटि अध आवै= जहाँ भाव (ऊपर चढ़ने के बाद) लौटकर नीचे नहीं आते, सो नवमोगुनथान कहावै= वह नौंवा-गुणस्थान कहलाता है, चारितमोह जहाँ बहु-छीजा= जहाँ (इस गुणस्थान में) चारित्रमोह का बहुत-अंश नष्ट हो जाता है, सो है चरन-करन पद-तीजा= वह चारित्र का तीसरा-करण है।। 98।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने नौवें ‘अनिवृत्तिकरण-गुणस्थान’ का वर्णन किया है। इस गुणस्थान में आने पर आठवें-गुणस्थान में जो परिणाम ‘स्वरूप’ में स्थिर नहीं थे, वे भी चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार स्थिरता को प्राप्त होते हैं, अथवा स्वरूप में स्थिरता और अधिक बढ़ जाती है। ‘अ+निवृत्ति’ = नहीं है असमानता की स्थिति जिसमें, उसे ‘अनिवृत्तिकरण’ कहा गया है। इस गुणस्थान में अलग-अलग जीवों के परिणामों की विशुद्धि में परस्पर ‘निवृत्ति’ अर्थात् ‘भेद’ नहीं पाया जाता, इसीलिये इस गुणस्थान का नाम ‘अनिवृत्तिकरण’ सार्थक है। अनिवृत्तिकरण-गुणस्थान का जितना काल होता है, उतने ही परिणाम होते हैं। प्रत्येक समय में एक ही परिणाम होता है। इस गुणस्थान में चारित्र-मोह का बहु-अंश उपशम/क्षय होने से परिणाम नीचे नहीं गिरते, इसलिए इसे नौंवा ‘अनिवृत्तिकरण-गुणस्थान’ कहते हैं।
(चौपाई)
कहौं दसम-गुनथान दुसाखा, जहँ सूछम-सिवकी अभिलाखा।
सूछमलोभ-दसा जहँ लहिये, सूछम-सांपराय सो कहिये।। 99।।
शब्दार्थ :- कहौं दसम-गुनथान दुसाखा= अब दसवें-गुणस्थान का वर्णन करता हू,ँ जहँ सूछम सिवकी अभिलाखा= जहाँ मात्र मोक्ष-प्राप्ति की अति-सूक्ष्म इच्छारूप लोभकषाय शेष रहती है, सूछमलोभ-दसा जहँ लहिये= जहाँ सूक्ष्म-लोभ की स्थिति है, सूछम-सांपराय सो कहिये= उसे सूक्ष्म-सांपराय (गुणस्थान) कहते हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने दसवें ‘सूक्ष्म- सांपराय’ गुणस्थान के स्वरूप का वर्णन किया है। दसवें-गुणस्थान में यद्यपि अन्य सभी-कषायों का क्षय या उपशम हो जाता है, लेकिन संज्वलनसंबंधी लोभ-कषाय का अत्यंत-सूक्ष्म उदय रहता है; जिसके फलस्वरूप साधक-जीव को एकमात्र मोक्ष-प्राप्ति की अभिलाषा शेष रहती है। अन्य परिणामों की बात तो क्या करें, ‘मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो’- यह परिणाम भी जीव को मोक्ष-प्राप्ति में बाधक है। जिसप्रकार कुसम ु ली-रंग (लाइट-पिंक) भीतर से सूक्ष्म-रक्त अर्थात् अत्यंत-कम लालिमावाला होता है, उसीप्रकार इस गुणस्थान में जीव को ‘सूक्ष्म’ अर्थात् बहुत-कम, और ‘सांपराय’ अर्थात् ‘कषाय’ या कहें अति-सूक्ष्म लोभ-कषाय का अंश उदय में रहता है; इसीलिये इस गुणस्थान को ‘सूक्ष्मसांपरायगुणस्थान’ कहते हैं। इस गुणस्थान में ‘औपशमिक’ और ‘क्षायिक’- दो सम्यक्त्वों में से केवल एक ही सम्यक्त्व होता है, अर्थात् यदि मुनिराज क्षपक-श्रेणी में आरुढ हैं; तो नियम से क्षायिक-सम्यक्त्व ही रहता है। और ‘क्षपक-श्ण रे ी’ आरोहण करनेवाले मुनिराज के दसवें के अंत में सूक्ष्म-लोभादि सहित सभी कषायों का क्षय हो जाता है, इसीलिए ये मुनिराज यहाँ से सीधे बारहवें ‘क्षीणमोह-गुणस्थान’ में ही गमन करते हैं। लेकिन यदि मुनिराज उपशम-श्रेणी में आरूढ हैं, तो सूक्ष्मातिसूक्ष्म-लोभ-कषाय का उपशम ही हाेता है, क्षय नहीं, इसीलिए ये मुनिराज यहाँ से ग्यारहवें-गुणस्थान ‘उपशान्तमोह’ में गमन करते हैं।
(चौपाई)
अब उपशांतमोह-गुनथाना, कहौं तासु प्रभुता-परवांना।
जहाँ मोह उपशमै, न भासै, यथाख्यात-चारित परगासै।। 100।।
(दोहा)
जाहि फरसकै जीव गिर, परै करै गुन-रद्द।
सो एकादसमी-दसा, उपसम की सरहद्द।। 101।।
शब्दार्थ :- अब उपशांतमोह-गुनथाना= अब उपशांतमोह-गुणस्थान, कहौं तासु प्रभुता-परवांना= की प्रभुता/सामर्थ्य का वर्णन करता हूँ, जहाँ मोह उपशमै, न भासै= जहाँ मोह का पूर्णतः उपशम होता है, (उदयरूप) नहीं दिखता, यथाख्यात-चारित परगासै= यथाख्यात-चारित्र प्रकट होता है।। 100।। जाहि फरसकै जीव गिर परै= इस (सूक्ष्म-सांपराय गुणस्थान) का स्पर्श करके जीव (नियम से) गिरता है, करै गुन रद्द= और प्राप्त किये गुणों को नष्ट करता है, सो एकादसमी-दसा= वह ग्यारहवाँ-गुणस्थान है, उपसम की सरहद्द= यह उपशम-चारित्र (धारण करनेवालों के लिये) अंतिम-गुणस्थान है।। 101।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने ग्यारहवें गुणस्थान ‘उपशांत-कषाय-वीतराग-छद्मस्थ’ की सामर्थ्य का विवेचन किया है। प्रश्न उठता है कि ‘‘कवि ने ऐसा क्यों कहा?’’ ‘‘क्योंकि इस गुणस्थान को स्पर्श करनेवाले साधक-जीव आगे के गुणस्थानों में नहीं जा सकते, वे नियम से नीचे ही आते हैं’’। जिसप्रकार कतकफल या फिटकरी को गंदे पानी में डालने पर पानी की गंदगी नीचे बैठ जाती है, और पानी साफ दिखता है, ठीक उसीप्रकार इस गुणस्थान में साधक-जीव के मोहकर्म के उदयरूप कीचड़ अर्थात् संपूर्ण-कषायों का उपशमन हो जाता है, और परिणाम अत्यंत-निर्मल होते हैं। इसलिये इस गुणस्थान का पूरा नाम ‘उपशांत-कषाय वीतराग-छद्मस्थ’ है। ‘उपशांत-कषाय’ अर्थात् जिनकी कषाय उपशांत हो गई है, अर्थात् सत्ता में मौजूद हैं, परन्तु उदय में तनिक भी नहीं है, इसकारण इसे ‘उपशांत-कषाय’ कहा गया है। ‘वीतराग’ अर्थात् जिनका उदयरूप-राग नष्ट हो गया है, इसीलिये उन्हें ‘वीतराग’ कहा गया है। ‘छद्मस्थ’ अर्थात् ‘छद्म’ ज्ञानावरण-दर्शनावरण के उदयजन्य-अवस्था को कहते हैं, और वह अवस्था जिनके विद्यमान है, उन्हें ‘छद्मस्थ’ कहते हैं। छद्मस्थ’ भी दोप्रकार के होते हैं- ‘सराग-छद्मस्थ’ और ‘वीतराग-छद्मस्थ’। ग्याहरवें और बारहवें गुणस्थानवर्ती-जीव रागभाव के उदयरूप अभाव के कारण ‘वीतराग’ हैं और ज्ञानावरण-दर्शनावरणकर्मों के आंशिक-उदय/पूर्ण-अभाव न हो पाने के कारण ‘छद्मस्थ’ हैं। और इससे नीचे के सभी जीव रागभाव के स्पष्ट-सद्भाव व ज्ञानावरण-दर्शनावरण के स्पष्ट-उदय के कारण ‘सराग-छद्मस्थ’ हैं। जिनकी कषाय भी उपशांत हो गई है, और जो वीतराग होते हुये भी छद्मस्थ ही हैं- उन्हें ‘उपशांत-कषाय वीतराग-छद्मस्थ’ कहते हैं। इस गुणस्थान में संपूर्ण-कषायें उपशांत हो जाती है। चारित्र-मोह की अपेक्षा उपशम-चारित्र धारण करनेवालों का ये अंतिम-गुणस्थान है, अर्थात् इस गुणस्थान से आगे औपशमिक-चारित्र धारण करनेवाले जीव नहीं जाते, इसीलिए इन जीवों को मोक्ष की प्राप्ति भी नहीं होती। ध्यातव्य है कि इस गुणस्थान में सम्यग्दर्शन की अपेक्षा ‘औपशमिक’ और ‘क्षायिक’ दोनों भाव संभव हैं। जो चारित्रमोहनीय-कर्म का उपशम करते हैं, उनके ‘उपशम-श्रेणी’ कही गयी है। उपशम-श्रेणीवाले जीव नियम से नीचे गिरते हैं, अतः स्पष्ट है कि औपशमिक-चारित्र मोक्ष-प्राप्ति का कारण नहीं है; क्योंकि अंतर्मुहुर्त के बाद नियम से चारित्रमोह का उदय होता है, परिणाम संक्लेशरूप होते हैं, और गुणस्थान गिर जाता है। इस गुुणस्थान से गिरने का कारण आयु-क्षय या काल-क्षय माना गया है।
(चौपाई)
केवलज्ञान निकट जहँ आवे, तहाँ जीव सब-मोह खिपावै।
प्रगटै यथाख्यात-परधाना, सो द्वादशम खीन-गुनठाना।। 102।।
(दोहा)
षट सातैं आठैं नवैं, दस-एकादस-थान।
अंतरमुहूरत एक वा, एक-समै-थिति जान।। 103।।
चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार
छपक-श्रेनि आठैं नवैं, दस अर वलि बार।
थिति उत्कृष्ट-जघन्य भी, अंतरमुहूरत-काल।। 104।।
शब्दार्थ :- केवलज्ञान निकट जहँ आवे= जहाँ केवलज्ञान-प्राप्ति का समय नजदीक आता है, तहाँ जीव सब-मोह खिपावै= वहाँ जीव मोहकर्म का पूर्णतः क्षय करता है, प्रगटै यथाख्यात परधाना= (तब) उत्कृष्ट यथाख्यात-चारित्र प्रकट होता है, सो द्वादशम खीनगुनठाना= वह बारहवाँ क्षीणमोह-गुणस्थान है।। 102।। षट सातैं आठैं नवैं दस-एकादस-थान= (उपशम-श्रेणी की अपेक्षा) छठवें, सातवें, आठवें, नौवें, दसवें, ग्यारहवें-गुणस्थान की, अंतरमुहूरत एक= (उत्कृष्ट-स्थिति) एक अंतर्मुहुर्त, वा= और, एक-समै-थिति जान= (जघन्य-स्थिति) एक-समय जानना।। 103।। छपकश्रेनि= क्षपक-श्रेणी की अपेक्षा, आठैं नवैं दस अर वलि बार-थिति= आठवें, नवमें, दसवें और सीधे बारहवें गुणस्थानों की स्थिति/काल, उत्कृष्ट-जघन्य भी अंतरमुहूरत-काल= उत्कृष्ट भी और जघन्यस्थिति भी अंतर्मुहूर्त है।। 104।। विशेषार्थ :- इन तीनों-छंदों में कवि ने बारहवें ‘क्षीणकषाय-गुणस्थान’ का विवेचन किया है। जब मोहनीय-कर्म का पूर्ण-क्षय हो जाता है, और मुनिराज का चित्त अत्यंत-निर्मल हो जाता है; तब बारहवाँ गुणस्थान होता है। जैसे स्फटिक के पात्र में रखा निर्मल-जल हरप्रकार से निर्मल और स्वच्छ होता है, ठीक उसीप्रकार इस गुणस्थानवर्ती-जीव के परिणाम मोहरूपी-मलिनता के समूल-नष्ट हो जाने से पूरीतरह से निर्मल होते हैं। इस गुणस्थानवर्ती-जीव के मोहनीय-कर्म के प्रकृति, प्रदेश, स्थिति, अनुभाग चारों ही भेदों का सर्वथा बंध,उदय, उदीरणा एवं सत्त्व की अपेक्षा क्षय हो जाता है। इसीलिये इस गुणस्थान का नाम ‘क्षीणकषाय’ है। इस गुणस्थान में मोहनीय-कर्म का पूर्ण-क्षय होने से एकमात्र क्षायिक-भाव ही होता है। इस गुणस्थान में जीव दसवें-गुणस्थान से सीधे आते हैं, ग्याहरवें गुणस्थान में नहीं जाते। विशेष-बात कि इस गुणस्थान से जीव वापस नीचे कभी नहीं आता। मोह का सर्वथा क्षय होते ही जीव को अगले ही क्षण यानि तेरहवें-गुणस्थान में केवलज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। उपशम-श्रेणी की अपेक्षा (छटवें, सातवें, आठवे, नवमें, दसवें और ग्यारहवें) इन गुणस्थानोंं का उत्कृष्ट-काल अंतर्मुहुर्त और जघन्य-काल एकसमय है। जबकि क्षपक-श्रेणी की अपेक्षा (आठवे, नवमें, दसवें और बारहवें) इस गुणस्थानों का उत्कृष्ट और जघन्य-काल अंतर्मुहूर्त ही है।
(दोहा)
छीनमोह पूरन भयौ, करि चूरन चित-चाल।
अब सजोग-गुनथानकी, वरनौं दसा-रसाल।। 105।।
(सवैया इकतीसा)
जाकी दुखदाता घाती-चौकरी विनसि गई, चौकरी-अघाती जरी-जेवरी समान है।
प्रगट भयौ अनंत-दंसन अनंत-ग्यान, वीरज-अनंत-सुख सत्ता-समाधान है।।
जामैं आउ, नाम, गोत, वेदनी प्रकृति-अस्सी, इक्यासी, चौरासी वा पचासी-परवांन है।
सो है जिन-केवली जगतवासी-भगवान्, ताकी जो अवस्था, सो सजोगी-गुनथान है।। 106।।
शब्दार्थ :- करि चूरन चित-चाल= चित्त/मन की चाल को नष्ट करनेवाले, छीनमोह पूरन भयौ= क्षीण-मोह गुणस्थान का वर्णन पूर्ण हुआ, अब सजोग-गुनथानकी वरनौं दसा-रसाल= अब सयोगकेवली-गुणस्थान की रसपूर्ण/परमानंदमय-दशा का वर्णन करता हूँ।। 105।। जाकी दुखदाता-घाती चौकरी विनसि गई= जिसकी दु:ख देनेवाली घातिया-कर्म की चौकड़ी नष्ट हो गई है, चौकरी अघाती जरी-जेवरी समान है= अघाति-कर्म की चौकड़ी भी जली हुई रस्सी के समान रह गयी है, प्रगट भयौ अनंतदंसन अनंतग्यान वीरज-अनंत-सुख= (जिसके)अनंत-दर्शन, अनंत-ज्ञान, अनंत-वीर्य, अनंत-सुख प्रगट हुये हैं, सत्ता-समाधान है= स्वरूप में लीनता से, जामैं आउ, नाम, गोत, वेदनी प्रकृति-अस्सी= जिसमें आयु, नाम, गोत्र, वेदनीयकर्मों की अस्सी-प्रकृतियाँ, इक्यासी, चौरासी वा पचासी परवांन है= इक्यासी, चौरासी अथवा पचासी (प्रकृतियों की) सत्ता शेष है, सो है जिन-केवली जगतवासी-भगवान= वे जगत् में निवास करनेवाले केवली-जिन हैं, ताकी जो अवस्था, सो सजोगीगुनथान है= उनकी जो अवस्था है, वही सयोगकेवलीगुणस्थान है।। 106।। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने तेरहवें सयोगकेवली-गुणस्थान का सुन्दर-विवेचन किया है। कविवर कहते हैं कि मन की प्रवृत्ति/चंचलता को नष्ट करनेवाले बारहवें क्षीण-मोह गुणस्थान का वर्णन अब पूर्ण हुआ। अब आगे सयोगकेवली-गुणस्थान की परमानंदमय-स्थिति का वर्णन करता हूँ। जिनके दु:खदायक घातिया-कर्म की चौकड़ी अर्थात् ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, मोहनीय और अंतराय-कर्मों का विनाश हो गया है, (यद्यपि इन चारों-कर्मों में से मोहनीय-कर्म का पूर्ण-अभाव तो बारहवें गुणस्थान में ही हो जाता है, शेष तीन-कर्मों का अभाव इस गुणस्थान में होता है) और अघातिकर्म की चौकड़ी अर्थात् वेदनीय, आयु, नाम और गोत्रकर्मों की सत्ता जली हुई रस्सी के समान बची हुई है, अर्थात् जिसप्रकार जली हुई रस्सी देखने में तो उसी रस्सी के आकार में दिखती है; परन्तु उससे किसी को बाँधने आदि काम नहीं लिया जा सकता है। ठीक उसीप्रकार अघाति-कर्म सत्ता में मौजूद तो रहते हैं, परन्तु सामर्थ्यहीन रहते हैं अर्थात् ये कर्म ‘सयोग-केवली-जिन’-गुणस्थानवर्ती-जीव को विकार उत्पन्न नहीं करते। आत्मस्वरूप में पूर्णरूप से लीन होने से ज्ञानावरणी-कर्म के अभाव में ‘अनंतज्ञान’, दर्शनावरणीकर्म के अभाव में ‘अनंतदर्शन’, मोहनीय-कर्म के अभाव में ‘अनंतसुख’ और अंतराय-कर्म के अभाव में ‘अनंतबल’ रूप ‘अनंत-चतुष्टय’ प्रगट होते हैं। जिनके आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय-कर्म की अस्सी/इक्यासी/चौरासी/पचासी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। सामान्यरूप से तेरहवें-गुणस्थान में इन अघाति-कर्मों की पचासी-प्रकृतियों की ही सत्ता कही गई है, लेकिन किसी केवली-जिन को चौरासी, किसी को इक्यासी और किसी को अस्सी-प्रकृतियों की सत्ता भी कही गई है। जब तीर्थंकर-प्रकृति, आहारक-शरीर, आहारक-अंगोपांग, आहारक-बंधन और आहारक-संघात होता है; तब पचासी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। लेकिन जिनको तीर्थंकरप्रकृति का सत्त्व नहीं होता, उनको चौरासी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। और जिनको तीर्थंकर-प्रकृति का सत्त्व तो रहता है, परन्तु आहारक-चतुष्क का सत्त्व नहीं रहता; उनको इक्यासी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। और जिनको तीर्थंकर-प्रकृति और आहारक-चतुष्क इन पाँचों का ही सत्त्व नहीं रहता, उनको अस्सी-प्रकृतियों की सत्ता शेष रहती है। ऐसे सयोगकेवली-जिन अर्थात् जो मन-वचन-काय तीनों योगों से सहित हैं, जगत्-वासी हैं अर्थात् मध्यलोक में ही निवास करते हैं, उनको ‘सयोगकेवली-जिन’ नामक तेरहवाँ-गुणस्थान होता है। इस गुणस्थान में घातिया-कर्मों की 47 (ज्ञानावरणी की 5, दर्शनावरणी की 9, मोहनीय की 28, और अंतराय की 5) और अघातिया-कर्मों में से तीन अायु-कर्म की (नरकायु, तिर्यंचायु देवायु), 13 नामचतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार कर्म की नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, दो-इन्द्रिय, तीन-इन्द्रिय, चार-इन्द्रिय, उद्योत, आतप, एकेन्द्रिय, साधारण, सूक्ष्म और स्थावर, ये 16- इसप्रकार कुल 63 प्रकृतियों का क्षय हो जाता है।
(सवैया इकतीसा)
जो अडोल परजंक-मुद्राधारी सरवथा, अथवा सु काउसग्ग-मुद्रा थिर-पाल हैं।
खेत-सपरस कर्म-प्रकृतिके उदै आये, बिना डग भरै अंतरीच्छ जाकी चाल है।।
जाकी-थिति पूरब-करोड़ आठ-वर्ष घाटि, अंतरमुहूरत-जघन्य जग-जाल है।
सो है देव अठारह-दूषन-रहित ताकौं, बानारसि कहै मेरी वंदना त्रिकाल है।। 107।।
शब्दार्थ :- जो अडोल-परजंक-मुद्राधारी सरवथा= जो पूर्णतः अडिग पद्मासन-मुद्रा धारी, अथवा सु काउसग्ग-मुद्रा थिरपाल है= अथवा श्रेष्ठ कायोत्सर्ग-मुद्रा में स्थित हैं, खेत-सपरस कर्म-प्रकृतिके उदै आये= क्षेत्र-स्पर्श कर्म-प्रकृति के उदय से, बिना डग भरै अंतरीच्छ जाकी चाल है= जो बिना कदम चले अाकाश में गमन करते हैं, जाकी थिति पूरब-करोड़ आठ वर्ष घाटि= जिनकी (उत्कृष्ट) स्थिति आठ वर्ष कम एक करोड़ पूर्व है, अंतरमुहूरत जघन्य जगजाल है= और जघन्य-स्थिति अंतर्मुहूर्त है जगत् (में रहने की), सो है देव अठारह-दूषन-रहित= ऐसे जिनेन्द्र देव, जो अठारह-दोषों से रहित हैं, ताकौं बानारसि कहै मेरी वंदना त्रिकाल है= बनारसीदास जी कहते हैं, उनको मैं सदाकाल वंदन करता हूँ। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने तेरहवें गुणस्थान में विराजित ‘अरिहंत-परमात्मा’ की कुछ अन्य- विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें सविनय-वंदन किया है। केवलज्ञान-प्राप्ति के बाद जो अरिहंत-परमात्मा अडोल (हलन-चलन से रहित) ‘पद्मासन’ या ‘कायोत्सर्ग-मुद्रा’ में स्थित है, जिनके ‘क्षेत्र-स्पर्श’ कर्म-प्रकृति के उदय के कारण अरिहंत-परमात्मा भूमि पर गमन नहीं करते, बल्कि बिना कदम चले आकाश में गमन करते हैं। जिनकी संसार में रहने की उत्कृष्ट-स्थिति ‘आठ-वर्ष कम एक करोड़ पूर्व’ की है, और जघन्य-स्थिति मात्र ‘अंतर्मुहुर्त’ है। जो क्षुधा, तृषा आदि अठारह-दोषों से रहित हैं। बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘‘ऐसे जिनेन्द्र परमात्मा को मेरा मन, वचन, काय से त्रिकाल वंदन है।’’ ‘सयोग-केवली-जिन’ के कषाय का पूर्ण-अभाव होने से ‘सांपरायिक-आस्रव’ नहीं होता, परन्तु योग का सद्भाव होने से ‘ईर्यापथ-आस्रव’ होता है। इस गुणस्थान में ‘नोकर्माहार’ होता है, लेकिन ‘कवलाहार’ नहीं होता। इसके अलावा 22 परीषहों में से 11 परीषहों का होना संभव है; किन्तु उनका संयोग मात्र ही हो सकता है, उनके निमित्त से किसीप्रकार की बाधा केवली जिन को नहीं होती है। इस गुणस्थान से जीव केवल चौदहवें ‘अयोग-केवली-जिन-गुणस्थान’ में ही गमन करते हैं।
(कुण्डलिया)
दूषन-अठारह रहित, सो केवलि-संजोग।
जनम-मरन जाकै नहीं, नहिं निद्रा-भय-रोग।।
नहिं निद्रा-भय-रोग, सोग-विस्मय न मोह-मति।
जरा-खेद-परस्वेद, नांहि मद-बैर विषै-रति।।
चिंता नांहि सनेह, नांहि जहँ प्यास न भूखन।
थिर-समाधि सुख-सहित, रहित अट्ठारह-दूषन।। 108।।
शब्दार्थ :- दूषन-अठारह रहित= अठारह-दोषों से रहित, सो केवलि-संजोग= वह सयोग-केवली हैं, जनम-मरन जाकै नहीं= जिनके जन्म-मरण नहीं हैं, नहिं निद्रा-भय-रोग= निद्रा, भय, रोग नहीं है, नहिं निद्राभय-रोग-सोग-विस्मय न मोह-मति= निद्रा, भय, रोग तो नहीं हैं; शोक, विस्मय और मोह-बुद्धि भी नहीं है, जरा-खेद-परस्वेद नांहि= बुढ़ापा, खेद, पसीना नहीं होते, मद-बैर विषै-रति= मान, बैर, रति (नहीं है), चिंता नांहि सनेह= चिंता और स्नेह नहीं है, नांहि जहँ प्यास न भूखन= जहाँ भूख और प्यास नहीं है, थिर-समाधि सुख-सहित= अतीन्द्रिय-सुख का भोग करते हुये निर्विकल्प-स्वरूप में स्थिर/लीन रहते हैं, रहित अट्ठारहदूषन= अठारह-दोषों से रहित। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने उन अठारह-दोषों का वर्णन किया है, जिन दोषों से सयोग-केवली- जिन/अरिहंत-परमात्मा रहित होते हैं। जन्म, मरण, निद्रा, भय, रोग, शोक, विस्मय/आश्चर्य, मोह, जरा/बुढ़ापा, खेद, स्वेद/पसीना, मद/गर्व, बैर/द्वेष, रति, चिंता, स्नेह/राग, भूख, प्यास- इन अठारह दोषों से रहित सयोग-केवली-जिन अपने निर्विकल्प-स्वरूप में लीन रहते हैं।
(कुण्डलिया)
वानी जहाँ निरच्छरी, सप्त-धातु मल नांहि।
केस-रोम-नख नांहि बढैं, परम-उदारिक-माँहि।।
परम-उदारिक-माँहि, जांहि इंद्रिय-विकार नसि।
यथाख्यात-चारित प्रधान, थिर सुकलध्यान-ससि।।
लोकालोक प्रकास-करन, केवल-रजधानी।
सो तेरम-गुनथान, जहाँ अतिशयमय-वानी।। 109।।
शब्दार्थ :- वानी जहाँ निरच्छरी= (भगवान् की) वाणी अक्षर-रहित होती है, सप्त-धातु मल नांहि= सप्त- धातु और मल-मूत्रादि विकार नहीं होते हैं, केस-रोम-नख नांहि बढैं= बाल, रोम, नाखून नहीं बढ़ते हैं, परमउदारिक-माँहि= परमौदारिक-शरीर में, परम-उदारिक-माँहि जांहि इंद्रिय-विकार नसि= परमौदारिक-शरीर जिसमें इन्द्रियजन्य-विकार नष्ट हो जाते हैं, यथाख्यात-चारित प्रधान= श्रेष्ठ यथाख्यात-चारित्र प्रगट होता है, थिर सुकल-ध्यान-ससि= स्थिर शुक्लध्यानरूपी-चंद्रमा का उदय होता है, लोकालोक-प्रकास-करन केवल-रजधानी= लोकालोक को प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान जिनकी राजधानी है, सो तेरम-गुनथान जहाँ अतिशयमय-वानी= वह तेरहवाँ-गुणस्थान है, जहाँ अतिशयपूर्ण-वाणी/दिव्यध्वनि खिरती है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद परमौदारिक-शरीर में प्रकट होनेवाली विशेषताओं का सुंदर-वर्णन किया है। तेरहवें-गुणस्थानवर्ती सयोगकेवली-जिन का शरीर ‘परमौदारिक’ होता है। जो क्षुधादि अठारहदोषों के अलावा सप्तधातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र धातु- जो कि हर शरीर में पाई जाती है, लेकिन तेरहवें गुणस्थान में केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद स्वत: ही यह विनाश को प्राप्त होती है), मल-मूत्रादि से रहित होता है। नख, केश, रोम आदि मौजूद होने पर भी वृद्धि को प्राप्त नहीं होते हैं। इसीप्रकार इन्द्रियाँ होने पर भी इन्द्रियजन्य-विकार नहीं होते हैं। निरन्तर आत्मस्वरूप में स्थिरतारूप पवित्र ‘यथाख्यात-चारित्र’ प्रगट होता है। शुक्ल-ध्यानरूपी चंद्रमा का उदय होता है, चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार अर्थात् जिसप्रकार चंद्रमा के उदित होने पर सर्वत्र धवल-चाँदनी बिखर जाती है; ठीक उसीप्रकार केवलज्ञानरूपी-चंद्रमा के उदित होने पर उसके धवल-प्रकाश में संपूर्ण-लोकालोक प्रकाशित होने लगता है। यहाँ कवि ने केवलज्ञान को राजधानी के समान कहा, जिसपर तीर्थंकर अरिहंत-परमात्मा का शासन/साम्राज्य चलता है; यहाँ तक कि उस समय से आगामी-काल तक (जब तक अगले-तीर्थंकर नहीं होते) को उन तीर्थंकर के ‘शासनकाल’ के नाम से जाना जाता है। उपर्युक्त सभी विशेषतायें केवलज्ञानप्राप्ति के बाद ही घटित होतीं हैं, इसलिए ‘केवल-रजधानी’ नाम सार्थक और सटीक है। ऐसा तेरहवाँ-गुणस्थान है, जहाँ केवली-परमात्मा की ‘निरक्षरी अतिशयमयी-वाणी’ (दिव्यध्वनि) खिरती है, जिसे सुनकर जगत् के जीव अपना मोक्षमार्ग प्रशस्त करते हैं। दिव्यध्वनि का सबसे बड़ा अतिशय तो यही है कि वहाँ उपस्थित सभी-जीव अपनी-अपनी भाषा में अपने हित की बात समझ लेते हैं।
(दोहा)
यह सयोग-गुनथानकी, रचना कही अनूप।
अब अयोगकेवल-दसा, कहूँ जथारथ-रूप।। 110।।
(सवैया इकतीसा)
जहाँ काहू जीवकौं असाता-उदै साता नांहि, काहूकौ असाता नांहि साता-उदै पाइयै।
मन-वच-कायसौं अतीत भयौ जहाँ जीव, जाकौ जसगीत जगजीत-रूप गाइयै।।
जामैं कर्म-प्रकृति की सत्ता जोगी-जिन कीनी, अंतकाल द्वै-समैंमैं सकल खिपाइयै।
जाकी-थिति पंच-लघु-अच्छर-प्रमान सोई, चौदहौं अजोगी-गुनठाना ठहराइयै।। 111।।
शब्दार्थ :- यह सयोग-गुनथानकी रचना कही अनूप= यहाँ तक सयोगकेवली-जिन गुणस्थान की अनुपम- रचना का वर्णन किया, अब अयोगकेवल-दसा कहूँ जथारथ-रूप= अब अयोगकेवली-गुणस्थान का यथार्थवर्णन करता हूँ।। 110।। जहाँ काहू जीवकौं असाता-उदै साता नांहि= जहाँ किसी जीव को असाता का उदय रहता है, साता का नहीं रहता, काहूकौ असाता नांहि साता-उदै पाइयै= किसी को असाता का नहीं होकर साता का उदय रहता है, मन-वच-कायसौं अतीत भयौ जहाँ जीव= जहाँ जीव मन, वचन और काया की प्रवृत्ति से पूर्णतः शून्य हो जाता है, जाकौ जसगीत जगजीतरूप गाइयै= जिसका यशोगान जगत्-जयी के रूप में होता है, जामैं कर्म-प्रकृति की सत्ता जोगी-जिन कीनी= जिसमें कर्म-प्रकृतियों की सत्ता सयोगकेवली-जिन-गुणस्थान के समान ही रहती है, अंतकाल द्वै-समैं मैं सकल खिपाइयै= अंतिम दो-समय में समस्त-कर्मों का क्षय करते हैं, जाकी-थिति पंचलघु-अच्छर प्रमान= जिसकी-स्थिति पाँच-ह्रस्व-अक्षर के उच्चारण-प्रमाण है, सोई चौदहौं अजोगी-गुनठाना ठहराइयै= वही चौदहवाँ-अयोगकेवली-गुणस्थान कहा जानना चाहिये।। 111।। विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने चौदहवें अयोगकेवली-जिन-गुणस्थान का सुदं र-विवेचन किया है। ‘अ’+‘योग’+‘केवली’ अर्थात् तीनों योगों से रहित, और साथ ही अघातिया-कर्मों से भी रहित होने के सन्मुख- ऐसे चौदहवें-गुणस्थानवर्ती जीव ‘अयोगकेवली-जिन’ है। इस गुणस्थान में किसी जीव को साता-वेदनीय का और किसी जीव को असाता-वेदनीय का उदय रहता है, परन्तु वैसी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है; क्योंकि स्वरूप में लीनता एवं अनंतसुख की ही स्थिति रहती है। मन, वचन, काय तीनों का संयोग होने पर भी इनका परिस्पंदन या कहें प्रवृत्ति नहीं होती; इसीलिए इन्हें ‘अयोग-केवली’ कहा जाता है। कषाय का अभाव होने के साथ-साथ इस गुणस्थान में योगों का भी परिस्पंदन न होने से ‘सांपरायिक-आस्रव’ के साथ ‘ईर्यापथ-आस्रव’ का भी अभाव हो जाता है। इसीप्रकार इस गुणस्थान में सभीप्रकार के परीषहों का भी अभाव हो जाता है। छहोंप्रकार के आहार का भी अभाव होता है। यद्यपि शरीर मौजूद है, परन्तु योगों का प्रवर्तन पूर्णतः बंद हो जाता है; इसीलिए इस गुणस्थानवर्ती-जीवों का ‘जगत्जयी’ अर्थात् तीनों-लोकों को जीतनेवाले के रूप में यशोगान किया जाता है। घातिया-कर्मों का क्षय तो तेरहवें-गुणस्थान में ही हो जाता है, परन्तु इस गुणस्थान में अघातियाकर्मों की स्थिति भी सयोग-केवली के समान ही रहते हुये भी, अंतिम दो-समय शेष रहने पर अघातियाकर्मों की शेष 85 प्रकृतियों का भी क्षय हो जाता है। इस गुणस्थान का काल मात्र ‘अ, इ, उ, ऋ, लृ’- इन पाँच हृस्व-अक्षरों के उच्चारण के बराबर ही होता है। जैसे तेरहवें-गुणस्थानवर्ती जीव संसार में रहने से ‘संसारी’ कहलाते हैं, वैसे चौदहवें-गुणस्थानवर्ती जीव इस लोक में रहते हुये भी ‘संसारी’ नहीं कहलाते, और आयु-कर्म शेष होने से ‘मुक्त’ भी नहीं कहलाते।
(दोहा)
चौदह-गुनथानक-दसा, जगवासी-जिय भूल।
आस्रव-संवर भाव-द्वै, बंध-मोख के मूल।। 112।।
शब्दार्थ :- चौदह-गुनथानक-दसा= चौदह-गुणस्थानों की स्थिति, जगवासी-जिय-भूल= संसारी-जीवों की भूल है, आस्रव-संवर भाव-द्वै= आस्रव और संवर दो भाव, बंध-मोख के मूल= बंध और मोक्ष के मूलकारण हैं। विशेषार्थ :- इस-छंद में कविवर कहते हैं ‘‘ये चौदह-गुणस्थान संसारी-जीव की भूल हैं। ‘आस्रव’ और ‘संवर’ ये दो-भाव ही वास्तव में ‘बंध’ और ‘मोक्ष’ के मूलकारण हैं।’’ कहने का अभिप्राय यही है कि जब जीव अपने ज्ञान-स्वभाव को भूलकर पर की ओर उन्मुख होता है, और इष्ट-अनिष्ट-भाव करता है, तब आस्रव या मोह-राग-द्वेषादि विकारी-भावों की जो उत्पत्ति होती है; वही संसार की जड़ अर्थात् मूलकारण है। और जब जीव पर-सन्मुखता छोड़कर स्व-सन्मुख होता है, तब संवर अर्थात् जो स्वानुभूति के भाव होते हैं; वही वास्तव में मोक्ष के मूल-कारण है। जैसे किसी भी वृक्ष का आधार उसकी जड़ होती है, ठीक उसीप्रकार संसाररूपी वृक्ष की जड़ ‘आस्रव-भाव’, और मोक्षरूपी-वृक्ष का मूल ‘संवर-भाव’ है।
(चौपाई)
आस्रव-संवर-परनति जौलौं, जगत्-निवासी चेतन तौलौं।
आस्रव-संवर विधि-विवहारा, दोऊ भव-पथ सिव-पथ धारा।। 113।।
आस्रवरूप बंध-उतपाता, संवर ग्यान-मोख-पद-दाता।
जा संवरसौं आस्रव-छीजै, ताकौं नमस्कार अब कीजै।। 114।।
शब्दार्थ :- आस्रव-संवर-परनति जौलौं= जबतक आस्रव और संवर के परिणाम रहते हैं, जगत्-निवासी चेतन तौलौं= तबतक चेतन-आत्मा संसार में निवास करता है, आस्रव-संवर विधि-विवहारा= आस्रव और संवर दोनों ही विधि का व्यवहार या कर्म से सम्बद्ध परिणतियाँ हैं, दोऊ भव-पथ सिव-पथ धारा= दोनों (क्रमश:) संसार-मार्ग और मोक्ष-मार्ग की धारा है, आस्रवरूप बंध-उतपाता= अास्रव से बंध की उत्पत्ति होती है, संवर ग्यान-मोख-पद-दाता= संवर ज्ञान और मोक्ष-पद को देनेवाला हैं, संवरसौं आस्रव छीजै= संवर से आस्रव का विनाश होता है, ताकौं नमस्कार अब कीजै= इसलिये मैं संवर को नमस्कार करता हूँ। चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार विशेषार्थ :- इन दोनों-छंदों में कवि ने ‘संसार-वर्धक’ ‘आस्रव-भाव’ को हेय, और ‘मुक्ति-प्रदाता’ ‘संवर-भाव’ की उपादेयता सिद्ध करते हुए ‘संवर-भाव’ को नमस्कार किया है। हे आत्मन्! जबतक हम अपने जानन-स्वभाव को भूलकर पर में इष्ट-अनिष्ट-बुद्धि करते रहेंगे, तबतक मोह, राग, द्वेषादि आस्रव-भावों की उत्पत्ति होती रहेगी। और जबतक इन आस्रव-भावों की उत्पत्ति होती रहेगी, तबतक जीव इस संसार में परिभ्रमण करता रहेगा। आस्रव और संवर दोनों ही विधि का व्यवहार अर्थात् कर्म से सम्बद्ध परिणतियाँ है, एक कर्म के बंधनरूप है, तो दूसरी कर्म के निरोधरूप। हे चेतन! आस्रव और संवर इस ज्ञान-स्वरूपी चैतन्य-सरोवर से निकली दो धारायें हैं, जिनमें से एक (आस्रव) धारा संसार-सागर में प्रवेश कराती है। और दूसरी (संवर) धारा मोक्ष-महल में प्रवेश कराती है। पहली-धारा में अवगाहन करने से जीव को दुःख की प्राप्ति होती है, और दूसरी धारा में अवगाहन करने से जीव को अनंत सुख की प्राप्ति होती है; क्योंकि आस्रव-भाव कर्म-बंधन का उत्पादक है। जबकि संवर-भाव कर्म-बंधन से छुड़ाकर मोक्ष-सुख का उत्पादक है। अनादि से चले आ रहे कर्मरूपी-पर्वत को भेदने में एकमात्र संवर-भाव या ‘स्वात्मानुभूति’ ही कार्यकारी है; इसलिए कविवर बनारसीदास जी ने ‘संवर-भाव’ को विनय-पूर्वक वंदन किया है।
(सवैया इकतीसा)
जगत् के प्रानी जीति, ह्वै रह्यौ गुमानी ऐसौ, आस्रव-असुर दुखदानी-महाभीम है।
ताकौ परताप-खंडिवैकौ प्रगट भयौ, धर्म कौ धरैया, कर्मरोगकौ हकीम है।।
जाकै परभाव-आगै, भागै परभाव-सब, नागर-नवल सुखसागर की सीम है।
संवरकौ रूप धरै साधै सिवराह ऐसौ, ग्यान-पातसाह ताकौं मेरी तसलीम है।। 115।।
शब्दार्थ :- जगत् के प्रानी जीति= जगत् के प्राणियों को जीतकर, ह्वै रह्यौ गुमानी ऐसौ= अभिमानी हो रहा है, ऐसा, आस्रव-असुर दुखदानी महाभीम है= आस्रवरूपी राक्षस दु:खदायक और महाभयानक है, ताकौपरताप-खंडिवैकौ प्रगट भयौ= उसके प्रताप/तेज को खंडित/क्षीण करने के लिए, धर्म कौ धरैया कर्मरोगकौ हकीम है= धर्म को धारण करनेवाला और कर्मरूपी-रोग को दूर करने के लिए जो वैद्य के समान है, जाकै परभाव आगै= जिसके प्रभाव के सामने, भागै परभाव-सब= समस्त-परभाव भाग जाते हैं, नागर नवल सुखसागर की सीम है= प्रवीण है, नवीन है और सुखरूपी-सागर का किनारा है, संवरकौ रूप धरै साधै-सिवराह= संवर का रूप धारणकर मोक्षमार्ग को साधता है, ऐसौ ग्यान-पातसाह ताकौं मेरी तसलीम है= ऐसे ज्ञानरूपी बादशाह/ राजा को मेरा सलाम/वंदन है। विशेषार्थ :- इस-छंद में कवि ने ‘आस्रव’ को ‘अभिमानी’, ‘महाभयानक’ और जगत् को अपने वश में करनेवाले ‘राक्षस’ के समान कहा है। और ‘संवर’ को उस राक्षस का मान-मर्दन करनेवाले ‘राजा’ के रूप में सिद्ध किया है। जो अनादिकाल से जगत् के जीवों को अपने वश में करके स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानता है, जिसके आकर्षण में फँसकर जीव अपना सर्वस्व भूल जाता है, ऐसा वह आस्रवरूपी-राक्षस महा-भयानक, महादुःखदाई है। लेकिन यह भी सत्य है कि राक्षस कितना भी बलशाली क्यों न हो, एक दिन उसका अंत जरूर होता है। उसका अंत करने के लिए भी धर्मधारी, ज्ञानभावमय संवररूपी-राजा प्रकट हुआ है, जिसके प्रकट होते ही आस्रव का विनाश हो जाता है। जिसप्रकार शरीर के रोगों का इलाज वैद्य या हकीमों के पास होता है, ठीक उसीप्रकार कर्मरूपी रोग का इलाज करने के लिये ‘संवर’ भी वैद्य या हकीम के समान है। जिसके प्रभाव के आगे समस्त-परभाव विनाश को प्राप्त होते हैं, अर्थात् स्वभाव या आत्मानुभूति के सामने परभाव या परद्रव्य-जनित राग-द्वेषादि समस्त विकारी-भाव नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि ये ‘संवरभाव’ अत्यंत-‘प्रवीण’ (क्योंकि आस्रव को न केवल वश में करता है, बल्कि नष्ट भी करता है), ‘नवीन’ ( क्योंकि अनादि से नहीं था, नवीन प्राप्त हुआ), ‘सुख-सागर की सीमा’ है अर्थात् सुखरूपी-सागर का किनारा है। जैसे समुद्र के किनारे पर पहुँचकर ही जीवन का आनंद लिया जा सकता है, ठीक उसीप्रकार अतीन्द्रिय-सुख के आनंद का रसास्वादन करना है; तो संवररूपी किनारे तक पहुँचना अति-आवश्यक है, अथवा इसी से सुखानुभूति की शुरूआत होती है। कविवर पं बनारसीदास जी कहते हैं कि ‘‘जो संवर का रूप धारणकर शिवराह को साधता है अर्थात् मोक्षमार्ग को प्रशस्त करता है, ऐसे ज्ञान-स्वरूप बादशाह अर्थात् ज्ञायक भगवान्-आत्मा को मेरी ‘तसलीम’ है अर्थात् मेरा ‘सविनय-वंदन’ है।’’ विद्वान् के लिये अपेक्षित योग्यतायें
भाषा-कवित्त अध्यातम-माँहि। पंडित और दूसरो नांहि।।
क्षमावंत-संतोषी भला। भली कवित्त-पढ़वे की कला।।
पढ़ै संस्कृत-प्राकृत शुद्ध। विविध-देशभाषा-प्रतिबुद्ध।।
जाने शब्द-अर्थ को भेद। ठाने नहिं जगत् को खेद।।
मिठबोला सबहीं सौं प्रीति। जैनधर्म की दिढ़ परतीति।।
सहनशील नहिं कहैं कुबोल। सुथिर-चित्त नहिं डांवाडोल।।
कहैं सबनिसौं से हित-उपदेश। हिरदै-सुष्ट, दुष्ट नहिं लेश।।
पर-रमणी को त्यागी सोय। कुव्यसन और न ठानै कोय।।
हृदय शुद्ध-समकित की टेक। इत्यादिक गुन और अनेक।
अल्प जघन्य कहे गुन जोय। नहिं उतकिष्ट न निर्मल होय।।
अध्यात्म-शैली की महिमा निज-काज सबही को अध्यात्म-शैली माँझ, मूढ़ क्यों न खोज देखै खोज और-वान में। सदा यह लोक-रीति सुनी है ‘बनारसीजू’ वचन-प्रसाद नैकु ज्ञानिनके कान में।। चेरी जैसें मलि-मलि धोवत बिराने पाँव, पर-मन-रंजिवे को सांझ ओ विहान में। निज-पाँव क्यों न धौवे ? कोई सखी ऐसौ कहै, मोसी कोऊ आलसन और न जहान में।। -(‘बनारसीदास विलास’ से उद््धृत) चतुर्दश गुणस्थानाधिकार-द्वार