नंदीश्वर का पाठ, करो त्रय-मास, ठाठ से प्राणी।
फल पायो सोमा रानी।। टेक ।।
कार्तिक-फाल्गुन-आषाढ़ मास, यह पाठ करो उर हर्ष धार।
करके सरधा नंदीश्वर पूजा ठानी।। फल.।। 1।।
सम्यग्दृष्टि इक सोमा थी, जिसे निश्चय आत्म श्रद्धा थी।
पति ने नंदीश्वर जाने की थी ठानी।। फल.।। 2।।
रानी बरजे फिर बार-बार, पति एक न मानी बात सार।
मानुषोत्तर से मर कर, सुर पदवी पायी ।। फल.।। 3 ।।
सो क्षणभर में नंदीश्वर में जा, पूज करी मन-वच-तन से।
नृप भेष धार पहुँचा जहाँ बैठी रानी ।। फल.।। 4।।
रानी बोली तुम सुनो राव, इस भव से ही तुम नहीं जाओ।
मेरे उर निश्चय सत्य कही जिनवाणी।। फल.।। 5।।
ऐसी श्रद्धा लख रानी की, पति देव ने स्तुति की उसकी ।
फिर गया सुरग में देव आपने थानी ।। फल.।। 6।।
रानी ने सयंम धार लिया, तन प्रति ममत्व भी त्याग दिया।
स्त्रीलिंग छेद के सुर पद पायो ज्ञानी।। 7।।
तहँ तें चय गजपुर जन्म लिया, मुनिपद धर शुक्ल सुध्यान किया।
फिर कर्म श्रृंखला काट गये शिवथानी ।। फल. ।। 8 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २८२ से २८३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’