दशमो विभागः (भाग 1/2)
वर्धमानं महावीरं मूर्ध्ना नत्वा कृताञ्जलिः ।
क्रमवृद्धोर्ध्वशाखाढ्य मूध्र्वलोकमितो ब्रुवे ॥१
अर्थ: मैं हाथ जोड़कर श्रीवर्धमान महावीर अन्तिम तीर्थंकरको शिरसे नमस्कार करता हुआ यहां क्रमसे वृद्धिगत उपरिम शाखाओंसे ( ? ) व्याप्त ऊर्ध्व लोकका वर्णन करता हूँ ॥१॥ सौधर्म, ईशान, सनत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, छठा लान्तव-कापिष्ठ, शुक्र-महाशुक्र
ऊर्ध्वं भावनदेवेभ्यो देवा वानान्तरा स्थिताः ।
नीचोपपातिकास्तेभ्यस्तेभ्यो दिग्वासिनः सुराः ॥२
ततश्चान्तरवासाख्या वसन्तोऽपि निरन्तरम् ।
कूष्माण्डाश्च परं तेभ्यस्तत उत्पन्नकाः सुराः ॥३
अर्थ (श्लोक 1 से 3): शतार-सहस्रार, आनत, प्राणत, आरण और अच्युत ये कल्प हैं। इनमें मध्यम चार युगलोंके पूर्व दो युगलोंमें अर्थात् ब्रह्म और लान्तवमें तथा अपर युगलों अर्थात् महाशुक्र और सहस्रारमें एक एक इन्द्र और शेष चार युगलोंमें सर्वत्र एक एक इन्द्र है। इस प्रकार बारह कल्प होते हैं ॥ १-३ ॥
अनुत्पन्नकनामानस्तत ऊर्ध्वं प्रमाणकाः ।
गन्धिकाश्च महागन्धा भुजगाः प्रीतिका अपि ॥४
अकाशोत्पन्नका नाम्ना ततो ज्योतिषिका अपि ।
कल्पोद्भवाः परे तेभ्यस्तेभ्यो वैमानिकाः परे ॥५
अर्थ (श्लोक 2 से 5): भवनवासी देवोंसे ऊपर वानव्यन्तर देव, उनसे ऊपर नीचोपपातिक देव, और उनसे ऊपर दिग्वासी देव स्थित हैं। उनके ऊपर निरन्तर अन्तरवासी देव निवास करते हैं, उनसे ऊपर कूष्माण्ड देव, उनसे ऊपर उत्पन्नक देव, उनसे ऊपर अनुत्पन्नक नामक देव, उनसे ऊपर प्रमाणक देव, उनसे ऊपर गन्धिक देव, उनसे ऊपर महागन्ध, उनसे ऊपर भुजग, उनसे ऊपर प्रीतिक, उनसे ऊपर आकाशोत्पन्नक नामक देव, उनसे ऊपर ज्योतिषी देव, उनसे ऊपर कल्पवासी देव, और उनसे ऊपर वैमानिक देव स्थित हैं ॥ २-५॥
आद्या ग्रैवेयकास्तेष्वनुदिशानुत्तराः सुराः ।
द्वितीया तत ऊर्ध्वास्ते सिद्धा ऊर्ध्वं ततः स्थिताः ॥६
अर्थ (श्लोक 4 से 6): वैमानिकों (कल्पातीतोंने) में प्रथम ग्रैवेयक देव और दूसरे अनुदिश एवं अनुत्तर देव हैं जो उनके ऊपर स्थित हैं। उनके ऊपर वे सिद्ध परमात्मा स्थित हैं॥६॥ ऋतु नामक इन्द्रक विमानकी चारों दिशाओंमेंसे प्रत्येक दिशामें बासठ श्रेणीबद्ध विमान स्थित हैं। आगे आदित्य इन्द्रक पर्यन्त शेष इन्द्रकोंकी पूर्वांदिक दिशाओंमें स्थित वे श्रेणीबद्ध विमान उत्तरोत्तर एक एक कम होते गये हैं ॥४॥ ऋतु इन्द्रक विमानकी एक एक दिशामें तिरेसठ श्रेणीबद्ध विमान हैं। आगे सर्वार्थसिद्धि पर्यन्त शेष इन्द्रकोंमें वे उत्तरोत्तर एक एक कम हैं [ पाठान्तर ] ॥५॥ गोल, अनेक प्रकारके दिव्य रत्नोंसे निर्मित और ध्वजा-पताओंसे सुशोभित वे सब श्रेणीबद्ध विमान अनुपम स्वरूपको धारण करते हुए सुशोभित होते हैं ॥६॥
हस्तमात्रं भुवो गत्वा देवा नीचोपपातिकाः ।
दशवर्षसहस्राणि जीवन्तस्तत्र भाषिताः ॥७
दशहस्तसहस्राणि तेभ्य ऊर्ध्वमतीत्य च ।
विंशत्यब्दसहस्राणि जीवन्त्यो नीचदेवताः ॥८
दशहस्तसहस्राणि तेभ्यो ह्यूर्ध्वमतीत्य च ।
त्रिंशदब्दसहस्राणि जीवन्त्यो नीचदेवताः ॥९
दशहस्तसहस्राणि तेभ्य ऊर्ध्वमतीत्य च ।
चत्वारिंशत्सहस्राणि जीवन्त्यो नीचदेवताः ॥१०
अर्थ (श्लोक 7 से 10): [चित्रा] पृथिवीसे एक हाथ ऊपर जाकर नीचोपपातिक देव स्थित हैं। उनकी आयु दस हजार वर्ष प्रमाण कही गई है- ऊंचाई १ हाथ, आयु १०००० वर्ष ॥७॥ उनके ऊपर दस हजार हाथ जाकर बीस हजार वर्ष प्रमाण आयुवाले नीच देव (दिग्वासी) रहते हैं - आयु २०००० वर्ष ॥८॥ उनके ऊपर दस हजार हाथ जाकर तीस हजार वर्ष तक जीवित रहनेवाले नीच देव (अन्तर निवासी) रहते हैं- आयु ३०००० वर्ष ॥९॥ उनके ऊपर दस हजार हाथ जाकर चालीस हजार वर्ष तक जीवित रहनेवाले नीच देव (कुष्माण्ड) स्थित हैं- ऊपर हाथ
विंशतिं तु सहस्राणां हस्तांस्तेभ्यो व्यतीत्य च । पञ्चाशतं सहस्राणि जीवन्त्यन्यास्तु देवताः ॥११॥
तावत्तावद् व्यतीत्यान्याः षष्टिसप्तत्यशीति च । चतुरशीतिं सहस्राणि जीवन्त्यः सन्ति देवताः ॥
पल्याष्टमायुषस्ताभ्यः पल्यपादायुषस्ततः । पल्योपमदलायुष्कास्ताभ्य ऊर्ध्वमतीत्य च ॥१३॥
अर्थ (श्लोक 10 से 13): १०।००, आयु ४०००० वर्ष ॥१०॥ उनसे बीस हजार हाथ ऊपर जाकर पचास हजार वर्ष तक जीवित रहनेवाले अन्य (उत्पन्न) देव स्थित है- ऊपर हाथ २००००, आयु ५००००, वर्ष ॥११॥ उतने उतने हाथ ऊपर जाकर क्रमसे साठ हजार, सत्तर हजार, अस्सी हजार और चौरासी हजार वर्ष तक जीवित रहनेवाले अन्य (अनुत्पन्न, प्रमाणक, गन्ध, महागन्ध) देव रहते हैं- आयु ६००००, ७००००, ८००००, ८४००० वर्ष ॥१२॥ उनके ऊपर [उतने हाथ] जाकर पल्यके आठवें भाग प्रमाण आयुवाले, पल्यके चतुर्थ भाग प्रमाण आयुवाले और आधा पल्य प्रमाण आयुवाले (भुजग, प्रीतिक और आकाशोत्पन्न) देव स्थित हैं- आयु पल्य १/८, पल्य १/४, पल्य १/२ ॥१३॥
ज्योतिर्देवाः परे तेभ्यः पल्यं जीवन्ति साधिकम् । दशवर्षसहस्राग्रं पल्यं जीवन्ति भास्कराः ॥१४॥
नियुतेनाधिकं पल्यं चन्द्रा जीवन्ति तत्परे । अयमायुःक्रमो वेद्यो देवस्थानक्रमोऽपि च ॥१५॥
अर्थ (श्लोक 14 से 15): उनके ऊपर ज्योतिषी देव रहते हैं जो कुछ अधिक पल्य प्रमाण काल तक जीवित रहते हैं। सूर्य ज्योतिषी देव दस हजार वर्षसे अधिक एक पल्य प्रमाण काल तक जीवित रहते हैं- आयु १ पल्य और १०००० वर्ष ॥१४॥ उनके ऊपर चन्द्र एक लाख वर्षसे अधिक एक पल्य काल तक जीवित रहते हैं। इस प्रकार यह आयुका क्रम और देवोंके स्थानका क्रम जानना चाहिये - आयु १ पल्य और १००००० वर्ष ॥ १५ ॥
द्विधा वैमानिका देवा कल्पातीताश्च कल्पजाः । कल्पा द्वादश तत्र स्युः कल्पातीतास्ततः परे ॥१६॥
सौधर्मः प्रथमः कल्प ऐशानश्च ततः परः । सनत्कुमारमाहेन्द्रौ ब्रह्मलोकोऽथ लान्तवः ॥१७॥
महाशुक्रः सहस्रार आनतः प्राणतोऽपि च । आरणश्चाच्युतश्चेति एते कल्पा उदाहृताः ॥१८॥
अर्थ (श्लोक 16 से 18): वैमानिक देव दो प्रकारके हैं- कल्पोत्पन्न और कल्पातीत। उनमें कल्प बारह हैं। उनके आगे कल्पातीत हैं ॥१६॥ प्रथम कल्प सौधर्म, तत्पश्चात् दूसरा ऐशान, सनत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्मलोक, लान्तव, महाशुक्र, सहस्रार, आनत, प्राणत, आरण और अच्युत; ये बारह कल्प कहे गये हैं ॥ १७-१८ ॥ इस सम्बन्धमें ये तीन गाथायें भी कही गई हैं–
सोहम्मोसाणसणक्कुमारमाहिंदगा हु कप्पा हु । बम्हब्बम्हुत्तरगो लंतवकाविट्ठगो छट्ठो ॥१
अर्थ: ग्रैवेयक तीन हैं- अधो ग्रैवेयक, मध्यम ग्रैवेयक और उत्तम ग्रैवेयक । इनमेंसे प्रत्येक भी ऊर्ध्व, मध्य और अधरके नामसे तीन प्रकारका है ॥ १९ ॥
अनुदिशनामकान्यूर्ध्वं ततोऽनुत्तरकाणि च ।
ऊर्ध्वलोकविभागोऽयमीषत्प्राग्भारकान्तिमः ॥ २०
अर्थ: इनके ऊपर अनुदिश नामक विमान और उनके भी ऊपर अनुत्तर विमान हैं। अन्तमें ईषत्प्राग्भार पृथिवी है। यह ऊर्ध्व लोकका विभाग है ॥ २० ॥
विमानानां च लक्षाणि चतुरशीतिर्भवन्ति च ।
सप्तनवतिसहस्राणि त्रयोविंशतिरत्र च ॥२१
अर्थ: यहाँ सब विमान चौरासी लाख संतानबे हजार तेईस हैं - ८४९७०२३ ॥ २१ ॥
इन्द्रकाणि त्रिषष्टिः स्युरूध्वंपङ्क्त्या स्थितानि च ।
पटलानां च मध्यानि त्रिषष्टिः पटलान्यतः ॥
अर्थ: पटल तिरेसठ (६३) हैं जो ऊर्ध्व-पंक्तिके क्रमसे स्थित हैं। इन पटलोंके मध्यमें तिरेसठ (६३) इन्द्रक विमान स्थित हैं॥ २२ ॥
त्रिंशदेकाधिका सप्तचतुर्द्व्येकैकषट्त्रिकम् ।
त्रिकत्रिकैकैकानि स्युरूध्वंलोकेन्द्रकाणि तु ॥२३
अर्थ: एक अधिक तीस अर्थात् इकतीस, सात, चार, दो, एक, एक, छह, तीन, तीन, तीन, एक और एक; इस प्रकार क्रमसे ऊर्ध्व लोकगत उन बारह स्थानोंमें इतने इन्द्रक स्थित हैं-- ३१, ७, ४, २, १, १, ६, ३, ३, ३, १, १ ॥ २३ ॥
ऋतुरादीन्द्रकं प्रोक्तं त्रिषष्टिस्तस्य दिक्षु च ।
श्रेणीबद्धविमानानि एकैकोनानि चोत्तरम् ॥२४
अर्थ: उनमें जो प्रथम ऋतु इन्द्रक कहा गया है उसकी पूर्वा दिक दिशाओंमें तिरेसठ तिरेसठ (६३-६३) श्रेणीबद्ध विमान स्थित हैं। इसके आगे वे उत्तरोत्तर एक एक कम (६२, ६१ आदि) हैं ॥२४॥
ऋतुश्चन्द्रोऽथ विमलो वल्गुवीरमथारुणम् ।
नन्दनं नलिनं चैव काञ्चनं रोहितं तथा ॥२५
चञ्चं च मरुतं भूयः ऋद्धीशं च त्रयोदशम् ।
वैडूर्यं रुचकं चापि रुचिराङ्के च नामतः ॥२६
स्फटिकं तपनीयं च मेघमभ्रमतः परम् ।
हारिद्रं पद्मसंज्ञं च लोहिताख्यं सवज्रकम् ॥२७
नन्द्यावर्तविमानं च प्रभाकरमतः परम् ।
पृष्ठकं गजमित्रे च प्रभा चाद्योऽस्तु कल्पयोः ॥२८
अञ्जनं वनमालं च नागं गरुडमित्यपि ।
लांग्लं बलभद्रं च चक्रं च परयोरपि ॥२९
अरिष्टं देवसमिति ब्रह्मं ब्रह्मोत्तराह्वयम् ।
ब्रह्मलोके च चत्वारि इन्द्रकाणीति लक्षयेत् ॥३०
नाम्ना तु ब्रह्महृदयं लान्तवं चेति तद्द्वयम् ।
लान्तवे शुक्रसंज्ञं च महाशुक्रेऽभिधीयते ॥३१
शतारारव्यं सहस्रारे आनतं प्राणतं तथा ।
पुष्पकं शातकारं च आरणं चाच्युतं च षट् ॥३२
आनतादिचतुष्के च ग्रैवेयेषु सुदर्शनम् ।
अमोघं सुप्रबुद्धं च अधस्ताद्वार्णितं त्रयम् ॥३३
यशोधरं सुभद्रं च सुविशालं च मध्यमे ।
सुमनः सौमनस्यं च ऊर्ध्वे प्रीतिकरं च तत् ॥३४
अनुदिग्मध्यमादित्यं मध्यं चानुत्तरेष्विति ।
सर्वार्थसिद्धिसंज्ञं च सर्वान्त्यप्रतरेन्द्रकम् ॥३५
अर्थ (श्लोक 25 से 35): ऋतु, चन्द्र, विमल, वल्गु, वीर, अरुण नन्दन, नलिन, कांचन, रोहित, चंच, मरुत, तेरहवां ऋद्धीश, वैडूर्य, रुचक, रुचिर, अंक, स्फटिक, तपनीय, मेघ, अभ्र, हारिद्र, पद्म, लोहित, वज्र, नन्द्यावर्त, प्रभाकर, पृष्ठक, गज, मित्र और प्रभा ये इकतीस इन्द्रक प्रथम दो कल्पों (सौधर्म-ऐशान) में अवस्थित हैं ॥ २५-२८॥ अंजन, वनमाल, नाग, गरुड, लांगल, बलभद्र और चक्र ये सात इन्द्रक विमान आगेके दो कल्पों (सनत्कुमार-माहेन्द्र) में अवस्थित हैं ॥२९॥ अरिष्ट, देवसमिति, ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर नामक चार इन्द्रक विमान ब्रह्म कल्पमें जानना चाहिये ॥ ३० ॥ ब्रह्महृदय और लान्तव नामक दो इन्द्रक विमान लान्तव कल्पमें हैं। महाशुक्र कल्पमें एक शुक्र नामका विमान कहा जाता है ॥ ३१ ॥ शतार नामका एक इन्द्रक विमान सहस्रार कल्पमें तथा आनत, प्राणत, पुष्पक, शातकार, आरण और अच्युत ये छह इन्द्रक विमान आनत आदि चार कल्पोंमें हैं। ग्रैवेयकोंमें सुदर्शन, अमोघ और सुप्रबुद्ध ये तीन इन्द्रक विमान नीचे; यशोधर, सुभद्र और सुविशाल ये तीन मध्यमें; तथा सुमनस्, सौमनस्य और प्रीतिकर ये तीन इन्द्रक विमान ऊपर स्थित हैं ॥ ३२-३४॥ अनुदिशोंके मध्यमें आदित्य तथा अनुत्तरोंके मध्यमें सर्वार्थसिद्धि नामका सबमें अन्तिम इन्द्रक पटल है ॥ ३५ ॥
षोडश कल्पांश्च केचिदिच्छन्ति तन्मते । तस्मिंस्तस्मिन् विमानानां परिमाणं वदाम्यहम् ॥३६॥
अर्थ: जो कितने ही आचार्य सोलह कल्पोंको स्वीकार करते हैं उनके मतानुसार मैं उस उस कल्पमें ( प्रत्येक कल्पमें ) विमानोंके प्रमाणको कहता हूँ ॥ ३६ ॥
द्वात्रिंशन्नियुतान्याद्ये विमानगणना भवेत् । अष्टाविंशतिरैशने तृतीये द्वादशापि च ॥३७
माहेन्द्रे नियुतान्यष्टौ षण्णवत्यधिकं द्वयम् । ब्रह्म ब्रह्मोत्तरे चापि चतुष्कं स्यात्तदूनकम् ॥३८
द्विचत्वारिंशदग्रं च पञ्चविंशतिसाहस्रकम् । लान्तवे तैः सहस्राणि पञ्चाशत्तु विना परे ॥३९
विंशतिः स्युः सहस्राणि शुक्रे शुद्धा च विंशतिः । चत्वारिंशत्सहस्राणि महाशुक्रे तु तैर्विना ॥४०
शतारे त्रिसहस्रं स्यादेकोनापि च विंशतिः । एकाशीतिः सहस्रारे शतानां त्रिंशदेकहा ॥४१
चत्वारिंशानि चत्वारि शतान्यानतयुग्मके । द्वे शते षष्टिसंयुक्ते आरणाच्युतयुग्मके ॥४२
अर्थ (श्लोक 37 से 42): उक्त विमानोंकी संख्या प्रथम कल्पमें बत्तीस लाख ( ३२००००० ), ऐशान कल्पमें अट्ठाईस लाख ( २८००००० ), तृतीय सनत्कुमार कल्पमें बारह लाख ( १२००००० ), माहेन्द्र कल्पमें आठ लाख ( ८००००० ), ब्रह्म कल्पमें छानबैसे अधिक दो लाख ( २०००९६ ), ब्रह्मोत्तर कल्पमें उससे ( २०००९६ ) हीन चार लाख ( ४०००००-२०००९६=१९९९०४ ), लान्तव कल्पमें ब्यालीस अधिक पच्चीस हजार ( २५०४२ ), आगेके कापिष्ठ कल्पमें इनके विना पचास हजार अर्थात् चौबीस हजार नौ सौ अट्ठावन ( ५००००-२५०४२=२४९५८ ), शुक्र कल्पमें बीस हजार बीस ( २००२० ), महाशुक्रमें उनके बिना चालीस हजार अर्थात् उन्नीस हजार नौ सौ अस्सी ( ४००००-२००२०=१९९८० ), शतारमें तीन हजार उन्नीस ( ३०१९ ), सहस्रारमें एक कम तीस सौ इक्यासी, ( २९८१ ), आनतयुगलमें चार सौ चालीस ( ४४० ), और आरण-अच्युत युगलमें दो सौ साठ ( २६० ) हैं ॥ ३७-४२ ॥
चतुःशतानि शुद्धानि आनतप्राणतद्विके । आरणाच्युतयुग्मे च त्रिशतान्यपरे विदुः ॥४३
अर्थ: मतान्तर- आनत और प्राणत इन दो कल्पोंमें शुद्ध चार सौ ( ४०० ) तथा आरण-अच्युत युगलमें शुद्ध तीन सौ ( ३०० ) विमान हैं, ऐसा दूसरे आचार्य कहते हैं ॥ ४३ ॥
एकादशं शतं चाद्ये शतं सप्त च मध्यमे । एकाप्रनवतिश्चोर्ध्वं अनुदिक्षु नवैव च ॥४४
अर्थ: उक्त विमानोंकी संख्या प्रथम ग्रैवेयकमें एक सौ ग्यारह ( १११ ), मध्यम ग्रैवेयकमें एक सौ सात ( १०७ ), उपरिम ग्रैवेयकमें इक्यानबे ( ९१ ), अनुदिशोंमें नौ ही ( ९ ) तथा
अनुत्तरेषु पञ्चैव विमानगणना इमे ।
इत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि तेषां संख्येयकादिकम् ॥४५
अर्थ (श्लोक 44 से 45): अनुत्तरोंमें पांच ( ५ ) ही हैं । इस प्रकार यहां तक यह विमानोंकी संख्या निर्दिष्ट की गई है । इसके आगे उन विमानोंका संख्येय विस्तार आदि कहा जाता है ॥ ४४-४५॥
अर्चिश्च मालिनी चैव वैरं वैरोचनाख्यकम् ।
सोमं सोमप्रभं चाङ्कं स्फटिकादित्यनामकम् ॥४६
अर्थ: अर्ची, मालिनी (अर्चिमालिनी ), वैर, वैरोचन, सोम, सोमप्रभ, अंक, स्फटिक और आदित्य ये नौ अनुदिश विमान हैं ॥ ४६ ॥
अर्चिर्वैरोचनाह्वयं च अर्चिमालिन्यपि क्रमात् ।
प्रभासापि च पूर्वाद्या आदित्यस्य चतुर्दिशम् ॥ ४७
अर्थ: इनमें अर्ची, वैरोचन, अर्चिमालिनी और प्रभासा ( वैर ) ये चार श्रेणी-बद्ध विमान आदित्य इन्द्रककी पूर्वादि चार दिशाओंमें स्थित हैं ॥ ४७ ॥
विजयं वैजयन्तं च जयन्तमपराजितम् ।
सर्वार्थसिद्धिसंज्ञस्य विमानस्य चतुर्दिशम् ॥४८
अर्थ: विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित ये चार विमान सर्वार्थसिद्धि नामक इन्द्रक विमानकी चारों दिशाओंमें स्थित हैं ॥ ४८ ॥
चतुःशून्याब्धिषट्कं चाद्ये संख्येयविस्तृताः ।
विमानाश्च परे शून्यचतुष्कं शून्यषट्ककम् ॥४९
अर्थ: संख्यात योजन विस्तारवाले विमान प्रथम कल्पमें चार शून्य, समुद्र अर्थात् चार और छह ( ६४०००० ) इतने अर्थात् छह लाख चालीस हजार तथा आगेके ऐशान कल्पमें चार शून्य, छह और [पांच] ( ५६०००० ) इतने अंकों प्रमाण अर्थात् पांच लाख साठ हजार हैं ॥ ४९ ॥
चत्वारिंशत्सहस्राणि तृतीये नियुतद्वयम् ।
षष्टिश्चैव सहस्राणि माहेन्द्रे नियुतं तथा ॥५०
अर्थ: उक्त संख्यात योजन विस्तारवाले विमान तीसरे कल्पमें दो लाख चालीस हजार ( २४०००० ) तथा माहेन्द्र कल्पमें एक लाख साठ हजार ( १६०००० ) हैं ॥ ५० ॥
संख्येयविस्तृता ब्रह्मयुग्मेऽशीतिसहस्रकम् ।
दशैव च सहस्राणि विज्ञेया लान्तवद्वये ॥५१
अर्थ: संख्यात योजन विस्तारवाले विमान ब्रह्मयुगलमें अस्सी हजार ( ८०००० ) तथा लान्तवयुगलमें दस हजार ( १०००० ) ही जानने चाहिये ॥ ५१ ॥
शुक्रद्वये सहस्राणि अष्टौ संख्येयविस्तृताः ।
द्वादशैव शतानि स्युः शतारद्वितये पुनः ॥५२
अर्थ: संख्यात विस्तारवाले विमान शुक्रयुगलमें आठ हजार ( ८००० ) तथा शतारयुगलमें बारह सौ ( १२०० ) ही हैं ॥ ५२ ॥
चत्वारिंशं शतं विद्यादानतादिचतुष्टये ।
चतुर्गुणास्तु संख्येयाः सर्वत्रासंख्येयविस्तृताः ॥५३
अर्थ: वे विमान आनत आदि चार कल्पोंमें एक सौ चालीस ( १४० ) जानना चाहिये । उपर्युक्त सब कल्पोंमें असंख्यात योजन विस्तारवाले विमान इन संख्यात विस्तारवाले विमानोंसे चौगुने जानने चाहिये-सौधर्म २५६००००, ऐशान २२४००००, सनत्कुमार ९६००००, माहेन्द्र ६४००००, ब्रह्मयुगल ३२००००, लान्तवयुगल ४००००, शुक्रयुगल ३२०००, शतारयुगल ४८००, आनतादि चार ५६० ।॥ ५३ ॥
कल्पेषु पञ्चमो भागो राशेः संख्येयविस्तृतः । चतुःपञ्चमभागाः स्युरसंख्येयकविस्तृताः ॥५४
अर्थ: कल्पोंमें अपनी अपनी विमानराशिके पांचवें भाग प्रमाण संख्यात योजन विस्तारवाले तथा चार पांचवें भाग ( ४/५ ) प्रमाण असंख्यात योजन विस्तारवाले हैं ॥ ५४ ॥
शतं चाष्टावसंख्येयास्त्रयः संख्येयविस्तृताः । अगण्या नवतिश्चैका गण्याश्चाष्टादशोदिताः ॥५५
चतुःसप्ततिरुर्ध्वं च असंख्येया उदाहृताः । दश सप्त च संख्येया अष्टौ चासंख्यविस्तृताः ॥५६
संख्येयमनुदिक्ष्वेकं तथैवानुत्तरेष्वपि । असंख्येयास्तु चत्वार इति सर्वज्ञदर्शनम् ॥५७
अर्थ (श्लोक 55 से 57): ग्रैवेयकोंमेंसे अधस्तन ग्रैवेयकमें असंख्यात विस्तारवाले विमान एक सौ आठ ( १०८ ) तथा संख्यात विस्तारवाले तीन ( ३ ) हैं, मध्यम ग्रैवेयकोंमें एक कम नब्बे ( ८९ ) विमान असंख्यात विस्तारवाले तथा अठारह ( १८ ) विमान संख्यात विस्तारवाले हैं, उपरिम ग्रैवेयकमें चौहत्तर ( ७४ ) असंख्यात विस्तारवाले तथा सत्तरह ( १७ ) संख्यात विस्तारवाले विमान कहे गये हैं । अनुदिशोंमें आठ (८) असंख्यात विस्तारवाले विमान तथा एक ( १) संख्यात विस्तारवाला है । उसी प्रकारसे अनुत्तरोंमें भी संख्यात विस्तारवाला एक ( १ ) तथा असंख्यात विस्तारवाले चार ( ४) विमान हैं, यह सर्वज्ञके द्वारा देखा गया है ॥ ५५-५७ ॥
शून्याष्टकं त्रिकं चैव नव च स्युः पुनर्नव । षडेकं च क्रमाद् ज्ञेया विमाना गणितागताः ॥५८
त्रयश्चत्वारि षट् सप्त नव सप्त षडेव च । असंख्यविस्तृता ज्ञेया विमाना सर्व एव ते ॥५९
अर्थ (श्लोक 58 से 59): सब विमानोंमें अंकक्रमसे शून्य, आठ, तीन, नौ, नौ, छह और एक ( १६९९३८० ) इतने विमान संख्यात विस्तारवाले तथा तीन, चार, छह सात, नौ, सात और छह ( ६७९७६४३ ) इतने विमान असंख्यात विस्तारवाले हैं ॥ ५८-५९ ॥
शतमष्टौ सहस्राणि विंशतिः सप्तसंयुता । सर्वाण्यापि विमानानि स्थितान्यावलिकासु वै ॥६०
चत्वारि च सहस्राणि चत्वार्येव शतानि च । नवतिश्चापि पञ्चाग्रा आवादावावलिकास्थिताः ॥६१
अर्थ (श्लोक 60 से 61): श्रेणियोंमें स्थित ( श्रेणीबद्ध) सब विमान आठ हजार एक सौ सत्ताईस ( ८१२७) हैं ॥ ६० ॥ प्रथम कल्पमें श्रेणीबद्ध विमान चार हजार चार सौ पंचानबे ( ४४९५) हैं ॥६१॥
चतुर्दश शतान्येव अष्टाशीतिश्च तत्परे ।
षट्शतं षोडशान्यस्मिन् माहेन्द्रे त्र्यधिके शते ॥६२
अर्थ: आगे ऐशान कल्पमें चौदह सौ अठासी (१४८८), सनत्कुमार कल्पमें छह सौ सोलह (६१६) तथा माहेन्द्र कल्पमें दो सौ तीन (२०३) श्रेणीबद्ध विमान हैं ॥ ६२ ॥
षडशीतिद्विशतं ब्रह्म नवतिश्चतुस्तरा ।
ब्रह्मोत्तरे परस्मिंस्तु पञ्चविंशं शतं भवेत् ॥६३
अर्थ: ब्रह्म कल्पमें दो सौ छयासी (२८६), ब्रह्मोत्तर कल्पमें चौरानबै (९४) और लान्तव कल्पमें एक सौ पच्चीस (१२५) श्रेणीबद्ध विमान हैं ॥ ६३॥
चत्वारिंशत्पुनः सैका कापिष्ठे शुक्रनामके ।
अष्टाग्रा खलु पञ्चाशन्महत्येकान्नविंशतिः ॥६४
अर्थ: कापिष्ठ कल्पमें इकतालीस (४१); शुक्रमें अट्ठावन (५८) और महाशुक्रमें उन्नीस श्रेणीबद्ध विमान हैं ॥६४॥
शतारे पञ्चपञ्चाशदष्टादश ततः परे ।
पञ्चोने द्वे शते चापि बोद्धव्या आनतद्वये ॥६५
अर्थ: शतार कल्पमें पचपन (५५), सहस्रारमें अठारह (१८) और आनतयुगलमें पांच कम दो सौ (१९५) श्रेणीबद्ध विमान हैं ॥ ६५ ॥
शतमेकान्नषष्टिश्च आरणाच्युतयुग्मके ।
त्रयोविंशं शतं विद्यादधस्तान्निःप्रकीर्णकाः ॥६६
अर्थ: आरण और अच्युत युगलमें एक सौ उनसठ (१५९) तथा अधो ग्रैवेयकमें एक सौ तेईस (१२३) प्रकीर्णकरहित (श्रेणीबद्ध) विमान जानना चाहिये ॥६६॥
सप्ताग्रा मध्यमेऽशीतिरेकपञ्चाशदुत्तरे । अनुदिक्षु नवैव स्युः पञ्चैवानुत्तरेषु च ॥६७
अर्थ: मध्यम ग्रैवेयकमें सतासी (८७), उपरिम ग्रैवेयकमें इक्यावन (५१), अनुदिशोंमें नौ (९) तथा अनुत्तरोंमें पांच (५) ही श्रेणीबद्ध विमान हैं ॥ ६७ ॥ .
ऋतुर्नृक्षेत्रविस्तारश्चरमो जम्बूसमस्तयोः । विशेषे रूपहीनेन्द्रकाप्ते हानिवृद्धिके ॥६८
अर्थ: ऋतु इन्द्रकका विस्तार मनुष्यक्षेत्रके बराबर पैंतालीस लाख तथा अन्तिम सर्वार्थसिद्धि इन्द्रकका विस्तार जम्बूद्वीपके प्रमाण एक लाख योजन है। उन दोनोंको परस्पर घटाकर शेषमें एक कम इन्द्रकप्रमाणका भाग देनेपर हानि-वृद्धिका प्रमाण प्राप्त होता है ॥६८॥
एकत्रिंशद्विमानानि श्रेणीषु चतसृष्वपि । स्वयम्भूजलधेरूर्ध्वं शेषा द्वीपाम्बुधित्रये ॥६९
अर्थ: चारों ही श्रेणियोंमें स्थित तिरेसठ तिरेसठ श्रेणीबद्ध विमानोंमें इकतीस विमान स्वयम्भूरमण समुद्रके ऊपर तथा शेष बत्तीस विमान तीन द्वीपों और तीन समुद्रोंमें (स्वयम्भूरमण द्वीपमें १६, अहीन्द्रवर समुद्रमें ८, अहीन्द्रवर द्वीपमें ४, देववर समुद्रमें २, देववर द्वीपमें १ और यक्षवर समुद्रमें १ = ३२ स्थित हैं ॥६९॥
चन्द्रे विमलवल्ग्वोश्च श्रेण्यर्धार्धं तथा परे । चूलिकां वालमात्रेण ऋतुर्न प्राप्य तिष्ठति ॥७०
अर्थ: विमल, चन्द्र और वल्गु इद्रक विमानोंके आधे आधे श्रेणीबद्ध विमान अनन्तर द्वीपों व समुद्रोंमें स्थित हैं (?) । ऋतु विमान मेरु पर्वतकी चूलिकाको बाल मात्रसे न पाकर (बाल प्रमाण अन्तरसे) स्थित है ॥७०॥
जलप्रतिष्ठिता आद्योः परयोर्वातप्रतिष्ठिताः । आ सहस्रारतो ब्रह्माज्जलवातप्रतिष्ठिताः ॥७१
आनतादिविमानाश्च शुद्धाकाशे प्रतिष्ठिताः । अयं प्रतिष्ठानियमः सिद्धो लोकानुभावतः ॥७२
अर्थ (श्लोक 71 से 72): प्रथम दो कल्पोंके विमान जलके ऊपर स्थित हैं, आगेके दो कल्पोंके विमान वायुके ऊपर स्थित हैं, तथा ब्रह्म कल्पसे लेकर सहस्रार कल्प तक आठ कल्पोंके विमान जल-वायुके ऊपर स्थित हैं। आनत आदि कल्पोंके विमान तथा कल्पातीत विमान शुद्ध आकाशमें स्थित हैं। यह विमानोंके अवस्थानका क्रम लोकानुयोगसे सिद्ध है ॥ ७१-७२ ॥
एकविंशशतं चैकं सहस्रं च घनो द्वयोः । एकोनशतहीनं च बहला परयोर्द्वयोः ॥७३
अर्थ: विमानतलका बाहल्य सौधर्म और ऐशान इन दो कल्पोंमें एक हजार एक सौ इक्कीस (११२१), तथा आगेके दो कल्पोंमें वह विमानतलबाहल्य निन्यानबै योजनसे हीन (११२१-९९=१०२२) है ॥ ७३ ॥
ब्रह्मो च लान्तवे शुक्रे शतारयुगलेऽपि च । आनतादिचतुष्के च अधस्तान्मध्यमे परे ॥७४
अर्थ: ब्रह्म, लान्तव, शुक्र, शतारयुगल, आनत आदि चार, अधो ग्रैवेयक, मध्यम ग्रैवेयक और उपरिम ग्रैवेयकमें वह विमानतलबाहल्य परस्पर क्रमशः उतने
तावदेव क्रमाद्धीना बाहल्येन परस्परात् ।
एकत्रिंशं शतं रन्ध्राः परस्मिन् पटलद्वये ॥७५
अर्थ (श्लोक 74 से 75): (९९) से ही उत्तरोत्तर हीन है। आगेके दो पटलोंमें वह बाहल्य एक सौ इकतीस योजन मात्र है ॥७४-७५॥ जैसे- ब्रह्म ९२३, लान्तव ८२४, शुक्र ७२५, शतारयुगल ६२६, आनतादि चार ५२७, अधो ग्रै. ४२८, मध्यम ग्रै. ३२९, उपरिम ग्रै. २३०, अनुदिश व अनुत्तर १३१ यो. ।
प्रासादा षट्छतोच्छाया योजनैः पूर्वकल्पयोः ।
ततः पञ्चशतोच्छायाः परयोः कल्पयोर्द्वयोः ॥७६
अर्थ: पूर्व दो कल्पोंमें स्थित प्रासाद छह सौ योजन और आगे दो कल्पोंमें पांच सौ योजन ऊंचे हैं- सौ. ऐ. ६०० यो., स. मा. ५०० यो. ॥७६॥
ब्रह्मे च लान्तवे शुक्रे शतारे चानतादिषु ।
आद्ये मध्ये तथोध्वें च शतार्धोनाः परस्परात् ॥७७
अर्थ: ये प्रासाद ब्रह्म, लान्तव, शुक्र, शतार, आनतादि चार, अधो ग्रैवेयक, मध्यम ग्रैवेयक और उपरिम ग्रैवेयकमें उत्तरोत्तर पचास योजनसे हीन हैं। यथा- ब्रह्म ४५०, लान्तव ४००, शुक्र ३५०, शतार ३००, आनतादि २५०, अ. ग्रै. २००, म. ग्रै. १५०, उ. ग्रै. १०० यो. ॥७७॥
प्रासादा ह्यनुदिक्ष्वत्र दृष्टाः पञ्चाशदुच्छ्रयाः ।
अनुत्तरेषु विज्ञेयाः पञ्चविंशतिमुच्छ्रिताः ॥७८
अर्थ: यहां अनुदिशोंमें स्थित वे प्रासाद पचास (५०) योजन और अनुत्तरोंमें पच्चीस (२५) योजन मात्र ऊंचे जानने चाहिये ॥७८॥
आद्ययोः पञ्चवर्णास्ते कृष्णवर्ज्याः परद्वये ।
परयोर्नीलवर्ज्याश्च ब्रह्मलान्तवयोरपि ॥७९
रक्तवर्ज्याश्च शुक्राख्ये सहस्रारे च भाषिताः ।
परतः पाण्डरा एव विमाना शङ्खसंनिभाः ॥८०
अर्थ (श्लोक 79 से 80): प्रथम दो कल्पोंमें स्थित विमान पांचों वर्णवाले, आगेके दो कल्पोंमें कृष्ण वर्णको छोड़कर चार वर्णवाले, उसके आगे ब्रह्म और लान्तव इन दो कल्पोंमें कृष्ण और नील वर्णसे रहित तीन वर्णवाले, शुक्र और सहस्रार कल्पोंमें लालको भी छोड़कर दो वर्णवाले तथा इसके आगे सब विमान शंखके सदृश धवल वर्णवाले ही हैं ॥७९-८०॥
व्रजन्ति तापसोत्कृष्टा आ ज्योतिषविमानतः ।
चरकाः सपरिव्राजा गच्छन्त्या ब्रह्मलोकतः ॥८१
अर्थ: उत्कृष्ट तापस ज्योतिष विमानों तक जाते हैं, अर्थात् वे भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंमें उत्पन्न होते हैं। नग्न अण्डलक्षण चरक और परिव्राजक (एकदण्डी व त्रिदण्डी आदि) ब्रह्मलोक तक जाते हैं ॥८१॥
अकामनिर्जरातप्तास्तिर्यक्पञ्चेन्द्रियाः पुनः ।
अन्यपाषण्डिनश्चापि आ सहस्रारतोऽधिकाः ॥८२
अर्थ: अकामनिर्जरासे सन्तप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच तथा दूसरे पाखण्डी तपस्वी भी अधिकसे अधिक सहस्रार कल्प तक जाते हैं ॥८२॥
आऽच्युताच्छावका यान्ति उत्कृष्टाऽऽजीवका अपि ।
स्त्रियः सम्यक्त्वयुक्ताश्च सच्चारित्रविभूषिताः ॥
अर्थ: श्रावक, उत्कृष्ट आजीवक (कंजिकादिभोजी) तथा सम्यग्दर्शनसे संयुक्त व चारित्रसे विभूषित स्त्रियां अच्युत कल्प तक जाती हैं ॥८३॥
निर्ग्रन्थाः शुद्धचारित्रा ज्ञानसम्यक्त्वभूषणाः । जातरूपधराः शूरा गच्छन्ति च ततः परम् ॥८४
अर्थ: निर्मल चारित्रसे संयुक्त, सम्यग्ज्ञान व सम्यग्दर्शनसे विभूषित तथा दिगम्बर रूपको धारण करनेवाले ऐसे शूर वीर निर्ग्रन्थ साधु अच्युत कल्पसे आगे अर्थात् कल्पातीत विमानोंमें जाते हैं ॥८४॥
आ ग्रैवेयाद् व्रजन्तीति मिथ्यादर्शनिनो मताः । ऊर्ध्वं सदृर्शनास्तेभ्यः संयमस्था नरोत्तमाः ॥८५
अर्थ: मिथ्यादृष्टि (द्रव्यलिंगी मुनि) मरकर ग्रैवेयक पर्यन्त तथा मनुष्योंमें श्रेष्ठ सम्यग्दृष्टि संयमी मुनि उससे आगे अनुदिश व अनुत्तर विमानोंमें जाते हैं ॥८५॥
निर्ग्रन्था निरहंकारा विमुक्तमदमत्सराः । निर्मोहा निर्विकाराश्च ज्ञानध्यानपरायणाः ॥८६
हत्वा कर्मरिपून् धीराः शुक्लध्यानासिधारया । मोक्षमक्षयसौख्याढ्यं व्रजन्ति पुरुषोत्तमाः ॥८७
अर्थ (श्लोक 86 से 87): मनुष्योंमें श्रेष्ठ जो धीर वीर साधु अहंकार, मद, मात्सर्य, मोह एवं क्रोधादि विकारोंसे रहित होकर ज्ञान और ध्यानमें तत्पर होते हैं वे महात्मा शुक्लध्यानरूप तलवारकी धारसे कर्मरूप शत्रुओंको नष्ट करके अविनश्वर सुखसे संपन्न मोक्षको प्राप्त करते हैं ॥८६-८७॥
पञ्च कल्पान् विहायाद्यान् कृत्स्नपूर्वधरोद्भवः । दशपूर्वधराः कल्पान् व्रजन्त्यूर्ध्वं च संयताः ॥८८
अर्थ: समस्त (चौदह) पूर्वोंके धारक प्रथम पांच कल्पोंको छोड़कर आगेके देवोंमें उत्पन्न होते हैं। दस पूर्वोंके धारक कल्पोंमें और संयत उसके आगे जाते हैं ॥८८॥
पञ्चेन्द्रियतिरश्चोऽपि आ सहस्रारतः सुराः । स्थावरानपि चेशानात् परतो यान्ति मानुषान् ॥८९
अर्थ: सहस्रार कल्प तकके देव पंचेन्द्रिय तिर्यंच तक होते हैं। ऐशान कल्प तकके देव स्थावर भी होते हैं। किन्तु आगेके देव मनुष्य ही होते हैं ॥८९॥
सौधर्माद्यास्तु चत्वारः अष्टौ ब्रह्मादयोऽपि च । प्राणतश्चाच्युतश्चेति चिह्नवन्तश्चतुर्दश ॥९०
वराहो मुकुटे चिह्नं मृगो महिषमीनवत् । कूर्मदर्दुरसप्तोभाश्चन्द्रः सर्पोऽथ खड्गकः ॥९१
छागलो वृषभश्चैव विटपीन्द्रस्तथाच्युतात् । क्रमेण चिह्नानीन्द्राणां प्रोक्तान्येवं चतुर्दश ॥९२
अर्थ (श्लोक 90 से 92): सौधर्म आदि चार, ब्रह्मा आदि आठ, प्राणत और अच्युत इन कल्पोंमें इन्द्रोंके मुकुटमें क्रमसे ये चौदह चिह्न होते हैं-वराह, मृग, भैंस, मछली, कछवा, मेंढक, घोड़ा, हाथी, चन्द्र, सर्प, खड्ग, छागल (बकरी), बैल और विटपीन्द्र (कल्पवृक्ष)। इस प्रकार अच्युत कल्प तक ये क्रमसे इन्द्रोंके चौदह चिह्न कहे गये हैं ॥९०-९२॥
इन्द्रकात्तु प्रभासंज्ञाद् दक्षिणावलिकास्थितम् । अष्टादशविमानं तत् सौधर्मं यत्र देवराट् ॥९३
अर्थ: प्रभ नामक इन्द्रकसे दक्षिण श्रेणीमें स्थित जो अठारहवां श्रेणीबद्ध विमान है उसमें
सहस्राणामशीतिं च चत्वार्येव च विस्तृतम् । नगरं तत्र शक्रस्य हेमप्राकारसंवृतम् ॥९४
क्वचिद्दोलाध्वजैश्चित्रैश्चक्रादोलनपङ्क्तिभिः । क्वचिन्मयूरयन्त्राढ्ये[द्ये] भ्राजन्ते शालकोटयः ॥९५
शतार्धमवगाढो गां तावदेव च विस्तृतः । प्राकारस्त्रिशतोच्छ्रायः प्राक्चतुःशतगोपुरम् ॥९६
विस्तृतानि शतं चैकं प्रांशूनि च चतुःशतम् । वज्रमूलाग्रवैडूर्यसर्वरत्नानि सर्वतः ॥९७
षष्टिमात्रं प्रविष्टो गां ततो द्विगुणविस्तृतः । प्रासादः षट्छतोच्छ्रायः सौधर्मे स्तम्भनामकः ॥९८
षष्ट्या देवीसहस्राणां नियुतेनैव सेवितः । नित्यप्रमुदितः शक्रः तत्रास्ते सुखसागरे ॥९९
अर्थ (श्लोक 93 से 99): सौधर्म इन्द्र रहता है ॥ ९३ ॥ वहांपर चौरासी हजार (८४०००) योजन विस्तृत और सुवर्णमय प्राकारसे वेष्टित सौधर्म इन्द्रका नगर है ॥ ९४ ॥ प्राकारके अग्रभाग कहींपर पंक्तिबद्ध विचित्र ध्वजाओंसे तथा कहींपर मयूराकार यंत्रोंसे सुशोभित होते हैं ॥ ९५ ॥ प्राकार पृथिवीके भीतर पचास (५०) योजन अवगाहसे सहित, उतना (५०) ही विस्तृत तथा तीन सौ (३००) योजन ऊंचा है। इसके पूर्वमें चार सौ (४००) गोपुरद्वार हैं ॥ ९६ ॥ ये गोपुरद्वार एक सौ (१००) योजन विस्तृत और चार सौ (४००) योजन ऊंचे हैं। उनका मूल भाग वज्रमय तथा उपरि म भाग सब ओर वैडूर्यमणिमय व सर्वरत्नमय है ॥ ९७ ॥ सौधर्म इन्द्रका स्तम्भ नामक प्रासाद साठ (६०) योजन मात्र पृथिवीके भीतर प्रविष्ट (अवगाढ), इससे दूना (१२० यो.) विस्तृत और छह सौ योजन (६००) ऊंचा है ॥ ९८ ॥ उक्त प्रासादके भीतर एक लाख साठ हजार (१६००००) देवियोंसे सेवित सौधर्म इन्द्र निरन्तर आनन्दको प्राप्त होकर सुखसमुद्रमें मग्न रहता है ॥ ९९ ॥
पञ्चाशतं प्रविष्टा गां ततो द्विगुणविस्तृताः । प्रासादा अग्रदेवीनामष्टौ पञ्चशतोच्छ्रयाः ॥१००
कनकश्रीरिति ख्याता देवी वल्लभिका शुभा । पूर्वस्यां शक्रतस्तस्याः प्रासादोऽत्र मनोहरः ॥१०१
अर्थ (श्लोक 100 से 101): सौधर्म इन्द्रकी अग्रदेवियोंके आठ प्रासाद पचास (५०) योजन पृथिवीमें प्रविष्ट, उससे दूने (१०० यो.) विस्तृत और पांच सौ (५००) योजन ऊंचे हैं ॥ १०० ॥ सौधर्म इन्द्रकी कनकश्री इस नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ वल्लभा देवी है। उसका मनोहर प्रासाद यहां सौधर्म इन्द्रके प्रासांदकी पूर्व दिशामें स्थित है ॥ १०१ ॥
उत्तरस्यां दिशायां तु प्रभायाः श्रेणिसंस्थितम् । अष्टादशविमानं तत् ईशानो यत्र देवराट् ॥१०२
अर्थ: प्रभा नामक इन्द्रककी उत्तर दिशामें जो अठारहवां श्रेणीबद्ध विमान स्थित है उसमें
सौधर्मस्येव मानेन प्रासादो नगरं तथा । अशीतिः स्यात् सहस्राणि हेममालास्य वल्लभा ॥१०३
अर्थ (श्लोक 102 से 103): ईशान इन्द्र रहता है ॥ १०२ ॥ उसका प्रासाद प्रमाणमें सौधर्म इन्द्रके समान है । उसके नगरका विस्तार अस्सी हजार (८००००) योजन तथा वल्लभा देवीका नाम हेममाला है ॥ १०३ ॥
ऊर्ध्वं प्रभायाश्चक्राख्यमष्टमं चेन्द्रकं ततः । सनत्कुमार इन्द्रश्च दक्षिणे षोडशे स्थितः ॥१०४
योजनानि त्वसंख्यानि दक्षिणां व्यतिपत्य च । द्विसप्ततिसहस्राणि विस्तृतं प्रवरं पुरम् ॥१०५
पञ्चवर्गविगाहश्च सालस्तावच्च विस्तृतः । सौवर्णः सर्वतस्तस्य प्रांशुः सार्धशतद्वयम् ॥१०६
त्रिशतं गोपुराणां च प्रत्येकं दिक् चतुष्टये । विस्तारो नवतिस्तेषामुच्छ्रयश्च शतत्रयम् ॥१०७
शतार्धमवगाढो गां शतमेव च विस्तृतः । प्रासादोऽर्धसहस्रोच्च इन्द्रानन्दकरः शुभः ॥१०८
द्विसप्तत्या सहस्राणां देवीभिर्नित्यसेवितः । अष्टावग्रमहिष्यस्तु वल्लभा कनकप्रभा ॥१०९
नवतिविस्तृतास्तासां तदर्धं च गताः क्षितौ । प्रासादाः परितस्तस्मादुच्चाः सार्धचतुःशतम् ॥११०
अर्थ (श्लोक 104 से 110): प्रभा नामक इन्द्रकके ऊपर चक्र नामका आठवां (प्रभाके साथ) इन्द्रक है । उसके दक्षिणमें स्थित सोलहवें श्रेणीबद्ध विमानमें सनत्कुमार इन्द्र स्थित है ॥ १०४ ॥ दक्षिणमें असंख्यात योजन जाकर उसका बहत्तर हजार (७२०००) योजन विस्तृत श्रेष्ठ नगर है ॥ १०५ ॥ इस नगरका सुवर्णमय प्राकार पच्चीस (२५) योजन नीवसे सहित, उतना (२५ यो.) ही विस्तृत और अढ़ाई सौ (२५०) योजन सब ओर ऊंचा है ॥ १०६ ॥ उसकी चारों दिशाओंमेंसे प्रत्येक दिशामें तीन सौ (३००) गोपुरद्वार हैं । उनका विस्तार नब्बे (९०) योजन और ऊंचाई तीन सौ (३००) योजन मात्र है ॥ १०७ ॥ वहां इन्द्रको आनन्दित करनेवाला जो उत्तम प्रासाद स्थित है वह पृथिवीमें पचास (५०) योजन प्रमाण अवगाहसे सहित, सौ (१००) योजन विस्तृत और पांच सौ (५००) योजन ऊंचा है ॥ १०८ ॥ उक्त सनत्कुमार इन्द्रकी बहत्तर हजार (७२०००) देवियां सदा सेवा करती हैं। उनमें आठ अग्रदेवियां हैं। उसकी वल्लभा देवीका नाम कनकप्रभा है ॥ १०९ ॥ उन देवियोंके प्रासाद नब्बे (९०) योजन विस्तृत, इससे आधे (४५ यो.) पृथिवीमें प्रविष्ट और साढ़े चार सौ (४५०) योजन ऊंचे हैं। ये प्रासाद उस इन्द्रप्रासादके चारों ओर हैं ॥ ११० ॥
उत्तरस्यां पुनश्चक्रात् षोडशावलिकास्थितम् ।
माहेन्द्रनगरं रुन्ध्रं सहस्राणां च सप्ततिः ॥१११
अष्टावग्रमहिष्यश्च देवी कनकमण्डिता ।
वल्लभा तस्य विख्याता तासां वेश्मानि पूर्ववत् ॥११२
अर्थ (श्लोक 111 से 112): उक्त चक्र इन्द्रककी उत्तर दिशामें स्थित सोलहवें श्रेणीबद्ध विमानमें माहेन्द्र इन्द्रका नगर स्थित है। उसका विस्तार सत्तर हजार (७००००) योजन है ॥१११॥ उसके आठ अग्रदेवियां और कनकमण्डिता नामकी प्रसिद्ध वल्लभा देवी है। उनके प्रासाद सनत्कुमार इन्द्रकी देवियोंके प्रासादोंके समान हैं ॥११२॥
चक्राद् ब्रह्मोत्तरं चोर्ध्वं पञ्चमं दक्षिणे ततः ।
पुरं चतुर्दशे षष्टि सहस्राणां च विस्तृतम् ॥११३
सार्धानि द्वादशागाहस्तावदेव च विस्तृतः ।
प्राकारो द्विशतोच्छ्रायो ब्रह्मणः पुरबाहिरः ॥११४
गोपुराणां शते द्वे च एकैकस्यां पुनर्द्दिशि ।
अशीतिं विस्तृतं वेद्यं शुद्धं द्विशतमुच्छ्रितम् ॥११५
प्रासादो नवतिं रुन्ध्रस्तदर्धं च क्षितौ गतः ।
ब्रह्मेन्द्रस्य शुभो दिव्य उच्चैः सार्धचतुःशतम् ॥११६
अशीतिरुन्ध्रा देवीनां तदर्धं च क्षितिं गताः ।
चतुःशतोच्छ्रयाश्चैव अष्टानामिति वर्णिताः ॥११७
चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि देव्यस्तं सतताश्रिताः ।
नीला वल्लभिका नाम्ना प्रासादोऽस्याश्च पूर्वतः ॥११८
अर्थ (श्लोक 113 से 118): चक्र इन्द्रकके ऊपर उसको लेकर पांचवां ब्रह्मोत्तर नामका इन्द्रक है। उसके दक्षिणमें चौदहवें श्रेणीबद्ध विमानमें ब्रह्मेन्द्रका पुर है। उसका विस्तार साठ हजार (६००००) योजन है। इस पुरके बाहिर साढ़े बारह ( २५/२ ) योजन अवगाहसे सहित, उतना ही ( २५/२ ) विस्तृत और दो सौ (२००) योजन ऊंचा प्राकार है ॥११३-११४॥ इस प्राकारकी प्रत्येक दिशामें दो सौ (२००) गोपुरद्वार हैं। गोपुरद्वारोंका विस्तार अस्सी (८०) योजन [इतना (८० यो.) ही अवगाह ] और ऊंचाई शुद्ध दो सौ योजन प्रमाण जाननी चाहिये ॥११५॥ ब्रह्मेन्द्रका दिव्य उत्तम प्रासाद नब्बे (९०) योजन विस्तृत, इससे आधा (४५) पृथिवीमें प्रविष्ट और चार सौ पचास (४५०) योजन ऊंचा है ॥११६॥ ब्रह्मेन्द्रकी आठ अग्रदेवियोंके प्रासाद अस्सी (८०) योजन विस्तृत, इससे आधे (४० यो.) पृथिवीमें प्रविष्ट और चार सौ (४००) योजन ऊंचे कहे गये हैं ॥११७॥ चौंतीस हजार (३४०००) देवियां निरन्तर उसके आश्रित रहती हैं। उसकी वल्लभा देवीका नाम नीला है। इसका प्रासाद इन्द्रप्रासादके पूर्वमें स्थित है ॥११८॥
उत्तरस्यां पुनः पङ्क्तौ इन्द्रो ब्रह्मोत्तरस्तथा ।
नीलोत्पलेति नाम्ना च तस्य वल्लभिकामरी ॥११९
अर्थ: ब्रह्मोत्तर इन्द्रककी उत्तरदिशागत पंक्तिके चौदहवें श्रेणीबद्ध विमानमें ब्रह्मोत्तर इन्द्र रहता है। उसकी वल्लभा देवीका नाम नीलोत्पला है ॥११९॥
ब्रह्मोत्तरात्तृतीयं तु नाम्ना लान्तवमिन्द्रकम् ।
दक्षिणस्यां ततः पङ्क्तौ द्वादशे लान्तवं पुरम् ॥१२०
अर्थ: ब्रह्मोत्तर इन्द्रकको लेकर जो तीसरा लान्तव नामका इन्द्रक है उसकी दक्षिण दिशागत
पञ्चाशतं सहस्राणि तद्विस्तारेण वर्णितम् । हेमसालपरिक्षिप्तं लान्तवेन्द्रमनःप्रियम् ॥१२१
सचतुर्भागषड्गाहस्तावदेव च विस्तृतः । पञ्चाशं शतमुद्विद्धः प्राकारस्तस्य माहुरः ॥१२२
गोपुराणां शतं षष्ट्या प्राच्यां सप्ततिविस्तृतम् । सषष्टिशतमुद्विद्धं दिक्षु सर्वासु लक्षयेत् ॥१२३
प्रासादोऽशीतिविस्तारस्तदर्धं च क्षितिं गतः । चतुःशतोच्छ्रयो रम्यो लान्तवो यत्र देवराट् ॥१२४
प्रासादाः सप्ततिं रुन्द्रास्तदर्धं च क्षितिं गताः । उच्छ्रितास्त्रिशतं सार्धं देवीनामिति वर्णिताः ॥१२५
सार्धैः षोडशभिः स्त्रीणां सहस्रैः परिवारितः । अष्टावग्रमहिष्यश्च पद्मा नाम्ना च वल्लभा ॥१२६
अर्थ (श्लोक 120 से 126): पंक्तिके बारहवें श्रेणीबद्ध विमानमें लान्तव इन्द्रका पुर है ॥१२०॥ उसका विस्तार पचास हजार (५००००) योजन प्रमाण बतलाया गया है । लान्तवेन्द्रके मनको प्रसन्न करनेवाला वह पुर सुवर्णमय प्राकारसे वेष्टित है ॥१२१॥ पुरका वह प्राकार सवा छह (६ १/४) योजन अवगाहसे सहित, उतना (६ १/४) ही विस्तृत और एक सौ पचास (१५०) योजन ऊंचा है ॥१२२॥ प्राकारकी पूर्व दिशामें एक सौ साठ (१६०) गोपुरद्वार हैं । उनका विस्तार सत्तर (७०) योजन और ऊंचाई एक सौ साठ (१६०) योजन मात्र है । इतने (१६०) गोपुरद्वार सब दिशाओंमें जानना चाहिये ॥१२३॥ उस पुरमें अस्सी (८०) योजन विस्तृत, इससे आधा (४० यो.) पृथिवीमें प्रविष्ट और चार सौ (४००) योजन ऊंचा रमणीय प्रासाद है, जहां लान्तव इन्द्र रहता है ॥१२४॥ लान्तवेन्द्रकी देवियोंके प्रासाद सत्तर (७०) योजन विस्तृत, इससे आधे (३५ यो.) पृथिवीमें प्रविष्ट और साढ़े तीन सौ (३५०) योजन ऊंचे कहे गये हैं ॥१२५॥ साढ़े सोलह हजार (१६५००) स्त्रियोंसे वेष्टित उस इन्द्रके आठ अग्रदेवियां और पद्मा नामकी वल्लभा देवी है ॥१२६॥
उत्तरस्तत्र कापिष्ठो लान्तवेन समः स्मृतः । पद्मोत्पलेति नाम्ना च वल्लभा तस्य विश्रुता ॥१२७
अर्थ: लान्तव इन्द्रककी उत्तर दिशामें स्थित बारहवें श्रेणीबद्ध विमानमें कापिष्ठ इन्द्र रहता है जो कि लान्तव इन्द्रके समान माना गया है । उसकी वल्लभा देवी पद्मोत्पला नामसे प्रसिद्ध है ॥१२७॥
लान्तवोर्ध्वं भवेच्छुक्रमिन्द्रकं दक्षिणे ततः । चत्वारिंशत्सहस्रो रुन्द[द]शमे शुक्रसत्पुरम् ॥१२८
चतुष्कमवगाढो गां तावदेव च विस्तृतः । विंशं च शतमुद्विद्धः प्राकारस्तस्य सर्वतः ॥१२९
अर्थ (श्लोक 128 से 129): लान्तव इन्द्रकके ऊपर शुक्र इन्द्रक है । उसके दक्षिणमें दसवें श्रेणीबद्धमें शुक्र इन्द्रका उत्तम पुर है जो चालीस हजार (४००००) योजन विस्तृत है ॥१२८॥ उसके सब ओर चार (४) योजन पृथिवीमें प्रविष्ट, उतना (४ यो.) ही विस्तृत और एक सौ बीस (१२०) योजन ऊंचा प्राकार स्थित है ।। १२९ ।।
चत्वारिंशं शतं तस्य गोपुराणि चतुर्दिशम् ।
पञ्चाशतं च विस्तीर्णं चत्वारिंश-शतोच्छ्रितम् ॥१३०
अर्थ: उसकी चारों दिशाओंमेंसे प्रत्येकमें एक सौ चालीस (१४०) गोपुरद्वार स्थित हैं । उनका विस्तार पचास (५०) योजन और ऊंचाई एक सौ चालीस (१४०) योजन है ।। १३० ।।
पञ्चत्रिंशत्तमागाहो विस्तृतो द्विगुणं ततः ।
प्रासादः शुक्रदेवस्य सार्धत्रिंशतमुच्छ्रितः ॥१३१
अर्थ: उस पुरमें पैंतीस (३५) योजन अवगाहसे सहित, इससे दूना (७० यो. ) विस्तृत और साढ़े तीन सौ (३५०) योजन ऊंचा शुक्र देवका प्रासाद है ।। १३१ ।।
प्रविष्टास्त्रिंशतं भौ[भू]मौ द्विगुणं चापि विस्तृताः ।
प्रासादास्त्रिशतोच्छ्राया देवीनां तत्र वर्णिताः ॥
अर्थ: वहां शुक्र इन्द्रकी देवियोंके प्रासाद तीस (३०) योजन पृथिवीमें प्रविष्ट, इससे दूने (६०यो.) विस्तृत और तीन सौ (३००) योजन ऊंचे कहे गये हैं ।। १३२ ।।
लान्तवार्धं प्रिया देव्यः शुक्रस्यापि च वर्णिताः ।
अष्टावग्रमहिष्यश्च नन्दा तासु च वल्लभा ॥१३३
अर्थ: शुक्र इन्द्रकी प्रिय देवियां लान्तव इन्द्रकी देवियोंसे आधी (८२५०) निर्दिष्ट की गई हैं । उनमें आठ अग्रदेवियां और नन्दा नामकी वल्लभा देवी है ।। १३३ ।।
उत्तरोऽत्र महाशुक्रो नन्दावत्यपि वल्लभा ।
शुक्रवत्परिवारोऽस्य नगरं च निदर्शितम् ॥१३४
अर्थ: शुक्र इन्द्रकके उत्तरमें दसवें श्रेणीबद्धमें महाशुक्र इन्द्र रहता है । उसकी वल्लभा देवीका नाम नन्दावती है । इसका परिवार और नगर शुक्र इन्द्रके समान निर्दिष्ट किया गया है ।। १३४ ।।
शुक्राच्छतारमूर्ध्वं स्यात्तस्माद्दक्षिणतो दिशि ।
त्रिंशत्सहस्रविस्तीर्णं शतारं पुरमष्टमे ॥१३५
अर्थ: शुक्र इन्द्रकके ऊपर शतार इन्द्रक स्थित है । उसकी दक्षिण दिशामें स्थित आठवें श्रेणीबद्ध विमानमें तीस हजार (३००००) योजन विस्तारवाला शतार इन्द्रका पुर है ।। १३५ ।।
त्रियोजनं गतो भूम्यां तावदेव च विस्तृतः ।
प्राकारः शतमुद्विद्धः सविंशशतगोपुरः ॥१३६
अर्थ: उस पुरको वेष्टित करके तीन (३) योजन पृथिवीमें प्रविष्ट, उतना (३ यो. ) ही विस्तृत और सौ (१००) योजन ऊंचा प्राकार स्थित है । उसकी प्रत्येक दिशामें एक सौ बीस (१२०) गोपुरद्वार हैं ।। १३६ ।।
चत्वारिंशत्स्वविस्तारं विंशं च शतमुच्छ्रितम् ।
एकैकगोपुरं विद्यात्तावन्त्येवान्यदिक्षु च ॥१३७
अर्थ: एक एक गोपुर द्वारका विस्तार चालीस (४०) योजन और ऊंचाई एक सौ बीस (१२०) योजन है । इतने (१२०) ही गोपुरद्वार अन्य तीन दिशाओंमें भी स्थित हैं ॥ १३७ ॥
त्रिंशतं भूमिमागाढस्तस्माद्द्विगुणविस्तृतः । प्रासादस्त्रिशतोच्छ्रायः शतारेन्द्रस्य भाषितः ॥१३८॥
अर्थ: शतार इन्द्रका प्रासाद तीस (३०) योजन पृथिवीमें प्रविष्ट, इससे दूना (६०) विस्तृत और तीन सौ (३००) योजन ऊंचा कहा गया है ॥ १३८ ॥
चत्वारि च सहस्राणि पञ्चविंशंपुनः शतम् । देव्यस्तस्य समाख्याताः सुसीमेति च वल्लभा ॥१३९॥
अर्थ: शतार इन्द्रके चार हजार एक सौ पच्चीस (४१२५) देवियां कही गई हैं । उसकी वल्लभा देवीका नाम सुसीमा है ॥१३९॥
पञ्चवर्गं प्रविष्टा गां तस्माद् द्विगुणविस्तृताः । पञ्चाशे द्वे शते चोच्चाः प्रासादास्तस्य योषिताम् ॥
अर्थ: उसकी देवियोंके प्रासाद पच्चीस (५×५) योजन पृथिवीमें प्रविष्ट, उससे दूने (५० यो.) विस्तृत और दो सौ पचास (२५०) योजन ऊंचे हैं ॥ १४० ॥
उत्तरतोऽत्र सहस्रारः शतारस्येव वर्णनम् । वल्लभा लक्ष्मणा नाम्ना देवी तस्य मनोहरा ॥१४१॥
अर्थ: शतार इन्द्रकी उत्तर दिशामें स्थित आठवें श्रेणीबद्ध विमानमें सहस्रार इन्द्र रहता है । उसका वर्णन शतार इन्द्रके समान है । उसके लक्ष्मणा नामकी मनोहर वल्लभा देवी है ॥ १४१ ॥
शताराख्यात्तदुत्पत्य सप्तमं त्वच्युतेन्द्रकम् । दक्षिणावलिकायां च षष्ठे चारणसेवितम् ॥१४२॥
विंशतिं च सहस्राणि विस्तृतं त्वारणं पुरम् । द्वे सार्धे गाहविस्तारः प्राकारोऽशीतिमुच्छ्रितः ॥१४३॥
अर्थ (श्लोक 142 से 143): शतार नामक इन्द्रकके ऊपर जाकर सातवां अच्युत इन्द्रक है । उसकी दक्षिण श्रेणीमें स्थित छठे श्रेणीबद्ध विमानमें चारणोंसे सेवित व बीस हजार (२००००) योजन विस्तृत आरण पुर है । उसके प्राकारका अवगाह और विस्तार अढ़ाई ( २ १/२ ) योजन तथा ऊंचाई अस्सी (८०) योजन है ॥ १४२-४३ ॥
गोपुराणां शतं दिक्षु त्रिंशद्विस्तारकाणि च । शतोच्छ्रितानि सर्वाणि नगरस्यारणस्य तु ॥१४४॥
अर्थ: आरण नगरकी चारों दिशाओंमें एक सौ एक सौ (१००-१००) गोपुरद्वार हैं । सब ही द्वार तीस (३०) योजन विस्तृत और सौ (१००) योजन ऊंचे हैं ॥ १४४ ॥
पञ्चवर्गं त[ग]तो भूमिं तस्माद्द्विगुणविस्तृतः । प्रासादश्चारणेन्द्रस्य सार्धं द्विशतमुच्छ्रितः ॥१४५॥
अर्थ: उस पुरमें जो आरण इन्द्रका प्रासाद है वह पच्चीस (२५) योजन पृथिवीमें प्रविष्ट उससे दूना (५० यो. ) विस्तृत और दो सौ पचास (२५०) योजन ऊंचा है ॥१४५॥
द्वे सहस्रे त्रिषष्टिश्च तस्य देव्यः प्रकीर्तिताः । अष्टावग्रमहिष्यश्च जिनदत्ता च वल्लभा ॥१४६॥
अर्थ: उसकी देवियां दो हजार तिरेसठ (२०६३) कही गई हैं । उनमें आठ अग्रदेवियां और जिनदत्ता नामकी वल्लभा देवी है ॥१४६॥
प्रविष्टा विंशतिं भूमिं तस्माद्द्विगुणविस्तृताः । प्रासादा द्विशतोच्छाया देवीनामिति वर्णिताः ॥१४७॥
अर्थ: देवियोंके प्रासाद बीस (२०) योजन पृथिवीमें प्रविष्ट, उससे दूने (४०) विस्तृत और दो सौ (२००) योजन ऊंचे कहे गये हैं॥१४७॥
देवीप्रासावमानेस्तु मता वल्लभिकालयाः । योजनानां तु विंशत्या उच्छ्रायाः केवलाधिकाः ॥१४८
अर्थ: वल्लभा देवियोंके प्रासाद प्रमाणमें देवियोंके प्रासादोंके समान हैं। वे केवल बीस (२०) योजनसे अधिक ऊंचे हैं॥१४८॥
उत्तरेऽत्राच्युतेन्द्रश्च आरणेन समो मतः । वल्लभा जिनदासीति देवी सर्वाङ्गिनोत्तमा ॥१४९
अर्थ: अच्युत इन्द्रकके उत्तरमें स्थित छठे श्रेणीबद्ध विमानमें अच्युत इन्द्र रहता है जो आरण इन्द्रके समान माना गया है। उसकी जो जिनदासी नामकी वल्लभा देवी है वह सब देवियोंमें श्रेष्ठ है ॥ १४९ ॥ कहा भी है -
सामानिकसहस्राणि अशीतिश्चतुरोत्तरा । अशीतिरेवेशानस्य तृतीयस्य द्विसप्ततिः ॥१५०
सप्ततिः स्युर्महेन्द्रस्य षष्टिइच परयोर्द्वयोः । पञ्चाशत्परयोश्चापि चत्वारिंशत्ततो द्वयोः ॥१५१
त्रिंशदेव सहस्राणि शतारस्योत्तरस्य च । विंशतिश्चानतेन्द्रस्य तावन्त्यश्चारणस्य च ॥१५२
अर्थ (श्लोक 150 से 152): सामानिक देवोंकी संख्या सौधर्म इन्द्रके चौरासी हजार (८४०००), ईशान इन्द्रके अस्सी हजार (८००००), तृतीय सनत्कुमार इन्द्रके बहत्तर हजार (७२०००), महेन्द्र इन्द्रके सत्तर हजार (७००००), आगेके दो इन्द्रों (ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर) के साठ हजार (६००००), इसके आगे दो इन्द्रोंके पचास हजार (५००००), इसके आगे दो इन्द्रोंके चालीस हजार (४००००), शतार और सहस्रार इन्द्रके तीस हजार (३००००), आनतेन्द्रके बीस हजार (२००००) और इतनी (२००००) ही आरण इन्द्रके सामानिक देवोंकी संख्या है ॥१५०-५२॥
त्रायस्त्रिंशास्त्रयस्त्रिंशदेकैकस्य तु भाषिताः । पुत्रस्थाने च ते तेषामिन्द्राणां प्रवराः सुराः ॥१५३
अर्थ: त्रायस्त्रिंश देव प्रत्येक इन्द्रके तेतीस (३३) कहे गये हैं। वे श्रेष्ठ देव इन्द्रोंके पुत्रोंके स्थानमें अर्थात् पुत्रोंके समान होते हैं ॥ १५३ ॥
षट्त्रिंशच्च सहस्राणि त्रीण्येव नियुतानि च ।
सौधर्मस्यात्मरक्षाणां त्रीणि द्वे चायुते परे ॥१५४
अष्टाशीतिः सहस्राणि तृतीये नियुतद्वयम् ।
अशीतिर्नियुते द्वे च माहेन्द्रस्यात्मरक्षिणाम् ॥१५५
चत्वारिंशत्सहस्रोना युग्मेषु खलु पञ्चसु ।
अशीतिः स्युः सहस्राणि एवमारणयुग्मके ॥१५६
आत्मरक्षा बहीरक्षा इन्द्राणां ते चतुर्दिशम् ।
प्रत्येकं तच्चतुर्भागः सामानिकसमो दिशि ॥१५७
अर्थ (श्लोक 154 से 157): आत्मरक्ष देव सौधर्म इन्द्रके तीन लाख छत्तीस हजार (३३६०००), ईशान इन्द्रके तीन लाख दो अयुत अर्थात् बीस हजार (३२००००), तृतीय इन्द्रके दो लाख अठासी हजार (२८८०००), माहेन्द्रके दो लाख अस्सी हजार (२८००००) तथा आगे पांच युगलोंमें उत्तरोत्तर चालीस हजार कम (२४००००, २०००००, १६००००, १२००००, ८००००) हैं। इसी प्रकार वे आत्मरक्ष देव आरणयुगलमें अस्सी हजार (८००००) हैं। इन्द्रोंके जो बाह्यरक्षक (लोकपाल) देव होते हैं वे चारों दिशाओंमें रहते हैं। ये देव सामानिक देवोंके समान अपने चतुर्थ भाग प्रमाण प्रत्येक दिशामें रहते हैं ॥ १५४-१५७ ॥
अभ्यन्तराः परिषदः सहस्रं द्वादशाहतम् ।
ईशाने द्विसहस्रोनं तृतीये च तथा परे ॥१५८
चतुर्गुणं सहस्रं तु ब्रह्मणश्चोत्तरस्य च ।
युग्मेषु त्रिषु शेषे च हानिरर्धार्धमिष्यते ॥१५९
समिता परिषदन्नाम्ना चन्द्रेति स्यादतः परा ।
द्विसहस्राधिका पूर्वाद् द्विगुणा लान्तवादिषु ॥१६०
द्विसहस्राधिका भूयः प्रत्येकं बाहिरा भवेत् ।
शुक्राद्या द्विगुणा मध्या जतुरेशा च नामतः ॥१६१
अर्थ (श्लोक 158 से 161): अभ्यन्तर पार्षद देव सौधर्म इन्द्रके बारह हजार (१२०००), ईशान इन्द्रके इनसे दो हजार कम (१००००), इनसे तृतीय और चतुर्थ इन्द्रके दो दो हजार कम (८०००, ६०००), ब्रह्म और ब्रह्मोत्तरके चार हजार (४०००), इसके आगे तीन युगलों और आनतादि चारमें उत्तरोत्तर इनसे आधे आधे (२०००, १०००, ५००, २५०) माने जाते हैं ॥ १५८-१५९ ॥ इस अभ्यन्तर परिषद्का नाम समिता है। दूसरी मध्यम परिषद्का नाम चन्द्रा है। पूर्व अभ्यन्तर पार्षद देवोंकी अपेक्षा मध्यम परिषद देव प्रथम पांच स्थानोंमें दो दो हजार अधिक तथा लान्तवादि शेष चार स्थानोंमें उनसे दूने हैं- सौ. १४०००, ई. १२०००, स. १००००, मा. ८०००, ब्रह्मयुगल ६०००, लां. का. ४०००, शु. म. २०००, श. स. १०००, आनतादि ५०० ॥ १६० ॥ इनसे बाह्य परिषद देव प्रत्येकके मध्यम पार्षदोंकी अपेक्षा दो दो हजार अधिक हैं। परन्तु शुक्र आदिके वे मध्यम परिषद देवोंसे दूने हैं - सौ १६००० ई. १४००० स. १२००० मा. १०००० ब्रह्मयुगल ८००० लां का. ६००० शु. म. ४००० श. स. २००० आनतादि १०००। यह परिषद् नामसे जतु कही जाती है ॥ १६१ ॥
पद्मा शिवा शची चैव अञ्जुका रोहिणीति च ।
नवमी च बला चेति अर्चिनी चाष्टमी मता ॥१६२
षोडशस्त्रीसहस्राणि रूपोनानि प्रकुर्वते ।
अष्टावग्रमहिष्योऽपि परिवारोऽपि तत्समः ॥१६३
अर्थ (श्लोक 162 से 163): पद्मा, शिवा, शची, अंजुका, रोहिणी, नवमी, बला और अर्चिनी ये आठ [सौधर्म इन्द्र की] अग्रदेवियां मानी गई हैं। वे आठों ही अग्रदेवियां एक कम सोलह हजार (१५९९९) स्त्रियोंकी विक्रिया करती हैं। उतना (१५९९९) ही उनका परिवार भी है ॥ १६२-१६३ ॥
द्वात्रिंशत्तु सहस्राणि सौधर्मेन्द्रस्य वल्लभाः ।
कनकश्रीर्मुखं चासां तावन्त्यस्तस्य योषितः ॥१६४
अर्थ: सौधर्म इन्द्रके बत्तीस हजार (३२०००) वल्लभा देवियां हैं। उनमें मुख्य वल्लभा देवीका नाम कनकश्री है। उस सौधर्म इन्द्रकी उतनी [(१६००० x ८)+३२०००=१६००००] देवियां हैं ॥ १६४ ॥
कृष्णा च मेघराजी च रामा वै रामरक्षिता ।
वसुश्च वसुमित्रा च वसुरम्या वसुंधरा ॥१६५
ईशानस्याग्रपत्न्यस्ताः सौधर्मस्येव वर्णना ।
देवी कनकमालेति वल्लभा चास्य कीर्तिता ॥१६६
अर्थ (श्लोक 165 से 166): कृष्णा, मेघराजी, रामा, रामरक्षिता, वसु, वसुमित्रा, वसुरम्या और वसुंधरा ये आठ ईशान इन्द्रकी अग्रदेवियां हैं। इनका वर्णन सौधर्म इन्द्रकी अग्रदेवियोंके समान है। उसके कनकमाला नामकी वल्लभा देवी कही गई है ॥ १६५-६६ ॥
अष्टौ सहस्राण्ये कस्याः परिवारोऽग्रयोषिताम् ।
वल्लभा अपि तावन्त्यस्तृतीयस्य द्विसप्ततिः ॥१६७
द्वात्रिंशत्तु सहस्राणि विक्रियाश्चैकयोषितः ।
अयमेव क्रमो वाच्यो माहेन्द्रस्य च योषिताम् ॥१६८
अर्थ (श्लोक 167 से 168): तृतीय सनत्कुमार इन्द्रकी अग्रदेवियोंमेंसे प्रत्येककी आठ हजार परिवारदेवियां हैं। इतनी (८०००) ही उसकी वल्लभा देवियां भी हैं। इस प्रकार तृतीय इन्द्रके सब बहत्तर हजार (अग्रदेवियां ८ x परि. दे. ८००० +वल्लभा ८००० = ७२०००) देवियां है। उनमें एक एक देवी बत्तीस हजार (३२०००) रूपोंकी विक्रिया करती है। यही क्रम माहेन्द्र इन्द्रकी भी देवियोंका कहना चाहिये ॥ १६७-६८
चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि ब्रह्मेन्द्रस्य वरस्त्रियः ।
वल्लभा द्वे सहस्रे च तासु देवीषु वर्णिताः ॥१६९
चतुःषष्टिसहस्राणि एकस्या अपि विक्रियाः ।
चतुःसहस्रसंयुक्ता अग्रदेव्योऽस्य भाषिताः ॥१७०
अर्थ (श्लोक 169 से 170): ब्रह्मा इन्द्रके चौंतीस हजार [(४००० x ८)+२०००] उत्तम स्त्रियां हैं। उन देवियोंमें दो हजार (२०००) वल्लभा देवियां कही गई हैं। इसकी अग्रदेवियां चार चार हजार (४०००) परिवारदेवियोंसे संयुक्त कही गई हैं। उनमें प्रत्येक चौंसठ हजार (६४०००) रूपोंकी विक्रिया करती हैं ॥ १६९-१७० ॥
तावन्त्य एव विज्ञेया देव्यो ब्रह्मोत्तरस्य तु ।
ब्रह्मवच्छेषमाख्येयं विक्रियादिषु योषिताम् ॥१७१
अर्थ: ब्रह्मोत्तर इन्द्रके भी उतनी (३४०००) ही देवियां जाननी चाहिये। देवियोंकी विक्रिया आदिके विषयमें शेष वर्णन ब्रह्मा इन्द्रके समान जानना चाहिये ॥ १७१ ॥
परिवारः सहस्रे द्वे लान्तवस्याङ्गनास्वपि ।
वल्लभास्तु सहस्रार्धं पूर्ववद्द्विगुणविक्रियाः ॥१७२
कापिष्ठे लान्तवस्येव तस्यार्धं शुक्रयोषितः ।
परीवारः सहस्रं तु शते सार्धे च वल्लभाः ॥१७३
तथैव स्यान्महाशुक्रे विक्रियाः द्विगुणा द्वयोः ।
अष्टावष्टौ महादेव्यः एतयोरपि भाषिताः ॥१७४
सहस्रार्धं परीवारः शतारस्याग्रयोषितः ।
पञ्चविंशं शतं चापि वल्लभास्तस्य कीर्तिताः ॥१७५
द्विगुणा विक्रिया चात्र सहस्रारेऽपि तादृशाः ।
सुरूपाणां पुनश्चासामर्धमानतयोषितः ॥१७६
शतद्वयं पुनः सार्धं परिवारोऽग्रयोषिताम् ।
त्रिषष्टिर्वल्लभा द्विगुणा विक्रिया आरणे तथा ॥१७७
अर्थ (श्लोक 172 से 177): लान्तव इन्द्रकी अग्रदेवियोंमें प्रत्येकका परिवार दो हजार (२०००) है । उसकी वल्लभा देवियां पांच सौ (५००) हैं । वे पूर्वके समान दूनी (१२८०००) विक्रिया करती हैं । (२००० x ८)+५०० = १६५०० सब देवियां ॥१७२॥ कापिष्ठ इन्द्रकी देवियोंका वर्णन लान्तव इन्द्रके समान है । शुक्र इन्द्रकी देवियां उससे आधी (८२५०) हैं । उसकी अग्रदेवियोंका परिवार एक एक हजार (१०००-१०००) और वल्लभा देवियां दो सौ पचास (२५०) हैं ॥ १७३ ॥ उसी प्रकार महाशुक्र इन्द्रकी भी देवियोंका प्रमाण (८२५०) है । उन दोनों इन्द्रोंकी अग्रदेवियां पूर्वसे दूनी (२५६०००) विक्रिया करती हैं । इनके भी आठ आठ महादेवियां कही गई हैं ॥ १७४ ॥ शतार इन्द्रकी प्रत्येक अग्रदेवीका परिवार पांच सौ (५००) है । उसकी वल्लभा देवियां एक सौ पच्चीस (१२५) कही गई हैं–(५०० x ८)+१२५=४१२५ सब देवियां ॥ १७५ ॥ यहां विक्रियाका प्रमाण पहिलेसे दूना (५१२०००) है । उक्त देवियां इसी प्रकार (४१२५) सहस्रार इन्द्रके भी हैं । सुन्दर रूपवाली इन देवियोंके अर्ध भाग प्रमाण देवियां आनत इन्द्रके हैं -(२५० x ८)+६३=२०६३ आनतदेवियां । उसकी अग्रदेवियोंका परिवार दो सौ पचास (२५०) है । वल्लभा देवियां उसकी तिरेसठ (६३) हैं । विक्रिया पूर्वकी अपेक्षा यहां दूनी (१०२४०००) है । आरण इन्द्रकी देवियोंकी प्ररूपणा आनत इन्द्रके समान हैं ॥ १७६-७७॥
सौधर्मदेवीनामानि दक्षिणेन्द्राग्रयोषिताम् ।
ईशानदेवीनामानि उत्तरेन्द्राग्रयोषिताम् ॥१७८
अर्थ: जो नाम सौधर्म इन्द्रकी अग्रदेवियोंके कहे गये हैं वे ही नाम सब दक्षिण इन्द्रोंकी अग्रदेवियोंके हैं । इसी प्रकार ईशान इन्द्रकी अग्रदेवियोंके जो नाम निर्दिष्ट किये गये हैं वे ही नाम सब उत्तर इन्द्रोंकी अग्रदेवियोंके हैं ॥ १७८ ॥
षड्युग्मशेषकल्पेषु आदिमध्यान्तवर्तिनाम् ।
देवीनां परिषदां संख्या कथ्यते च यथाक्रमम् ॥१७९
अर्थ: अब यहां छह युगलों और शेष चार कल्पोंमें क्रमसे आदि, मध्य और अन्तिम परिषद्में रहनेवाले पारिषद देवोंकी देवियोंकी संख्या कही जाती है- पांच सौ, छह सौ, सात सौ; चार सौ,
शतानि पञ्च षट् सप्त चतुःपञ्चकषट्शतम् ।
शतानां त्रिचतुःपञ्च द्विकत्रिकचतुःशतम् ॥१८०
एकद्वित्रिशतान्येव शतार्धं च शतं शते ।
पञ्चवर्गश्च पञ्चाशच्छतमेकं भवेदिति ॥१८१
अर्थ (श्लोक 179 से 181): पांच सौ, छह सौ; तीन सौ, चार सौ, पांच सौ; दो सौ, तीन सौ, चार सौ; एक सौ, दो सौ, तीन सौ; पचास, सौ, दो सौ; तथा पच्चीस, पचास व सौ। सौ. ई. आ. पा. ५०० म. ६०० अ ७००: स. मा. आ. ४०० म. ५०० अ. ६००; ब्रह्मयुगल आ. ३०० म. ४०० अ. ५००; लां. का. आ. २०० म. ३०० अ. ४००; शु. म. आ. १०० म. २०० अ. ३००; श. स. आ. ५० म. १०० अ. २००; आनतादि आ. २५ म. ५० अ. १०० ॥ १७९-१८१ ॥
कार्द्धिपरिवारैश्च विक्रिया चेन्द्रसंश्रिताः ।
तादृशस्तत्प्रतीन्द्रेषु त्रायस्त्रिंशसमेष्वपि ॥१८२
अर्थ: आयु, ऋद्धि, परिवार और विक्रिया इनका प्रमाण जिस प्रकार इन्द्रोंके कहा गया है उसी प्रकार वह सब उनके प्रतीन्द्रों, त्रायस्त्रिंशों और सामानिकोंके भी जानना चाहिये ॥१८२॥
वृषभास्तुरगाश्चैव रथा नागाः पदातयः ।
गन्धर्वा नर्तिकाश्चेति सप्तानीकानि चक्षते ॥१८३
अर्थ: बैल, घोड़ा, रथ, हाथी, पादचारी, गन्धर्व और नर्तकी; ये सात अनीक कही जाती हैं ॥१८३॥
पुरुषाः षडनीकानि सप्तमं नर्तिकास्त्रियः ।
सेनामहत्तरा षट् स्युरेका सेनामहत्तरी ॥१८४
अर्थ: प्रथम छह अनीक पुरुषरूप और सातवीं नर्तकी अनीक स्त्रीरूप है । उनमें छह सेनामहत्तर और एक सेनामहत्तरी होती है ॥१८४॥
दामेष्टंहरिदामा च मातत्यैरावतौ ततः ।
वायुश्चारिष्टकीर्तिश्च अग्रा नीलाञ्जनापि च ॥१८५
अर्थ: दामेष्टि, हरिदाम, मातलि, ऐरावत, वायु और अरिष्टकीर्ति ये छह सेनामहत्तर तथा सातवीं नीलांजना महत्तरी; ये सात सेनाप्रमुख [सौधर्म आदि दक्षिण इन्द्रोंके होते हैं] ॥१८५॥
महादामेष्टनामा च नाम्नामितगतिस्तथा ।
मन्थरो रथपूर्वश्च पुष्पदन्तस्तथैव च ॥१८६
पराक्रमो लघुपूर्वश्च नाम्ना गीतरतिस्तथा ।
महासेना क्रमेणैते ईशानानीकमुख्यकाः ॥१८७
अर्थ (श्लोक 186 से 187): महादामेष्टि, अमितगति, रथमन्थर, पुष्पदन्त, लघुपराक्रम, गीतरति और महासेना ये सात सेनाप्रमुख ईशान इन्द्रके होते हैं ॥१८६-१८७॥
पूर्वोक्तानीकमुख्यास्ते दक्षिणेन्द्रेषु कीर्तिताः ।
अपरोक्तानीकमुख्यास्ते चोत्तरेन्द्रेषु वर्णिताः ॥१८८
अर्थ: वे पूर्वोक्त सात सेनाप्रमुख दक्षिण इन्द्रोंके तथा बादमें कहे गये वे सात सेनाप्रमुख उत्तर इन्द्रोंके कहे गये हैं ॥१८८॥
सप्तकक्षं भवेदेकं कक्षाः पञ्चाशदेकहा ।
अशीतिश्चतुरग्रा च सहस्राण्यादिमाः पृथक् ॥१८९
अर्थ: उपर्युक्त सात अनीकोंमेंसे प्रत्येक सात कक्षाओंसे सहित होती है। इस प्रकार उन सात अनीकोंमें एक कम पचास (४९) कक्षायें होती हैं। सौधर्म इन्द्रकी सात अनीकोंकी पृथक् पृथक् प्रथम कक्षाका प्रमाण चौरासी हजार (८४०००) है ॥१८९॥
क्रमेण द्विगुणाः कक्षाः सर्वासामपि संग्रहः ।
त्रीणि शून्यानि षट्सप्तषट्चतुःसप्तकानि च ॥१९०
अर्थ: उसकी दूसरी-तीसरी आदि कक्षाओंका प्रमाण क्रमशः उत्तरोत्तर इससे दूना होता गया है। सौधर्म इन्द्रकी सब (४९) कक्षाओंका प्रमाण अंकक्रमसे तीन शून्य, छह, सात, छह, चार और सात (७४६७६०००) इतना है ॥१९०॥
शेषाणामाद्यकक्षाश्च स्वसामानिकसंख्यकाः ।
क्रमेण द्विगुणाः कक्षाः संग्रहं तासु लक्षयेत् ॥१९१
परं शून्यचतुष्कात्तु द्वे चैकैकं च सप्त च ।
शून्यत्रिकात्पुनश्चाष्टौ खखचत्वारि षट् तथा ॥१९२
चतुर्भ्य ऊर्ध्वं शून्येभ्यस्त्रीणि द्वे द्वे पुनश्च षट् ।
ब्रह्मे चत्वारि च त्रीणि त्रीणि पञ्च तथोत्तरे ॥१९३
पञ्च चत्वारि चत्वारि चत्वारि च पुनर्द्वयोः ।
षट् पञ्च पञ्च च त्रीणि शुक्रयुग्मे भवन्ति च ॥१९४
सप्त षट् षड् द्विकं चैव शतारद्वितये पुनः ।
अष्ट सप्त च सप्तैकमानतादिचतुष्टये ॥१९५
अर्थ (श्लोक 191 से 195): शेष ईशानादि इन्द्रोंकी प्रथम कक्षाओंका प्रमाण अपने अपने सामानिक देवोंकी संख्याके समान है। उनकी द्वितीय आदि कक्षाओंका प्रमाण उत्तरोत्तर इससे दूना है। उनकी समस्त कक्षाओंका संकलित प्रमाण क्रमशः इस प्रकार जानना चाहिये-- शून्य चार, दो, एक, एक और सात (७११२००००); इतना ईशान इन्द्रकी समस्त अनीकका प्रमाण है। तीन शून्य, आठ, शून्य, शून्य, चार और छह (६४००८०००); इतना सनत्कुमार इन्द्रकी समस्त अनीकका प्रमाण है। चार शून्य, तीन, दो, दो और छह (६२२३००००); इतना माहेन्द्र इन्द्रकी समस्त अनीकका प्रमाण है। चार शून्य, चार, तीन, तीन, और पांच (५३३४००००) इतना ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर इन्द्रकी पृथक् पृथक् समस्त अनीकका प्रमाण है। चार शून्य, पांच, चार, चार और चार (४४४५००००); इतना आगेके दो इन्द्रों (लान्तव और कापिष्ठ) की समस्त अनीकका प्रमाण है। चार शून्य, छह, पांच, पांच और तीन (३५५६००००); इतना शुक्रयुगलकी समस्त अनीकका प्रमाण है। चार शून्य, सात, छह, छह और दो (२६६७००००); इतना शतारयुगलकी समस्त अनीकका प्रमाण है। चार शून्य, आठ, सात, सात और एक (१७७८००००); इतना आनतादि चारकी समस्त अनीकका प्रमाण है ॥ १९१-१९५ ॥
सोमो यमश्च वरुणः कुबेरश्चेति लोकपाः । एकैकस्य तु चत्वारः पूर्वादौ दिक्षुचतुष्टये ॥१९६
तुल्यर्द्धयः सोमयमाः दक्षिणेन्द्रेषु कीर्तिताः । अधिका वरुणास्तेभ्यः कुबेरा अधिकास्ततः ॥१९७
महर्द्धिकास्तु वरुणा उत्तरेन्द्रेषु भाषिताः । तेभ्यो हीनाः कुबेराः स्युस्तेभ्यो हीनाः समाः परे ॥
प्रत्येकं लोकपालानां स्त्रीसहस्रं चतुर्गुणम् । सामानिकाश्च तावन्तो देव्य एषां च पूर्ववत् ॥१९९
अर्थ (श्लोक 196 से 199): एक एक इन्द्रके पूर्वादिक चार दिशाओंमें क्रमसे सोम, यम, वरुण और कुबेर ये चार लोकपाल होते हैं ॥ १९६ ॥ दक्षिण इन्द्रोंमें सोम और यम ये समान ऋद्धिवाले, उनसे अधिक वरुण तथा उनसे भी अधिक कुबेर कहे गये हैं ॥ १९७ ॥ उत्तर इन्द्रोंमें वरुण महाऋद्धिसे सम्पन्न होते हैं, उनसे हीन कुबेर और उनसे भी हीन होकर परस्पर समान ऋद्धिवाले सोम एवं यम कहे गये हैं ॥ १९८ ॥ प्रत्येक लोकपालके चार हजार (४०००) देवियां और उतने (४०००) ही सामानिक देव भी होते हैं। इन सामानिक देवोंकी देवियोंका क्रम पूर्वके समान अपने अपने लोकपालके समान जानना चाहिये ॥ १९९ ॥
सहस्रं परयोर्देव्यस्ताभिः सामानिकाः समाः । तेषामप्येकशो देव्यस्तावन्त्य इति भाषिताः ॥२००
अर्थ: आगेके दो इन्द्रों (सनत्कुमार व माहेन्द्र) के लोकपालोंमेंसे प्रत्येककी एक हजार (१०००) देवियां और उनके ही बराबर (१०००) सामानिक देव भी होते हैं। उन सामानिक
ब्रह्मयुग्मे सहस्रार्थं देव्यः सामानिका अपि ।
तदर्धं परयोर्देव्यः सामानिकचतुःशतम् ॥२०१
पञ्चविंशं शतं देव्यः शुक्रयुग्मे च भाषिताः ।
एकशो लोकपालानां सामानिकशतत्रयम् ॥२०२
शतारे सोत्तरे देव्यस्त्रिषष्टिर्लोकरक्षिणाम् ।
सामानिकाश्च तेषां स्युः शुद्धमेव शतद्वयम् ॥२०३
आनते त्वारणे देव्यो द्वात्रिंशल्लोकरक्षिणाम् ।
सामानिकशतं चैकमेककस्येति निर्दिशेत् ॥२०४
अर्थ (श्लोक 200 से 204): देवोंमेंसे भी प्रत्येकके उतनी (१०००) ही देवियां कही गई हैं ॥ २०० ॥ ब्रह्मयुगलमें प्रत्येक लोकपालकी देवियों और सामानिकोंकी संख्या पांच सौ (५००) है। आगे लान्तवयुगलमें उनकी देवियोंकी संख्या उनसे आधी (२५०) और सामानिक देवोंकी संख्या चार सौ (४००) है ॥ २०१ ॥ शुक्रयुगलमें प्रत्येक लोकपालकी देवियोंका प्रमाण एक सौ पच्चीस (१२५) और उनके सामानिकोंका प्रमाण तीन सौ (३००) है ॥ २०२ ॥ शतार और सहस्रारमें प्रत्येक लोकपालकी तिरेसठ तिरेसठ (६३-६३) देवियां और दो सौ (२००) सामानिक होते हैं॥२०३॥ आनत और आरणमें प्रत्येक लोकपालके बत्तीस (३२) देवियां और एक सौ (१००) सामानिक कहे जाते हैं ॥ २०४ ॥
लोकपालसुरस्त्रीभिः समाः सामानिकस्त्रियः ।
द्वयानामग्रदेव्यश्च चतस्रोऽप्येकशो मताः ॥२०५
अर्थ: सामानिक देवोंकी स्त्रियां प्रमाणमें लोकपालोंकी स्त्रियोंके समान होती हैं। इन दोनों मेंसे प्रत्येकके अग्रदेवियां चार मानी गई हैं ॥ २०५ ॥
सौधर्मे सोमयमयोस्तयोः सामानिकेष्वपि ।
पञ्चाशदन्तःपरिषच्चतुःपञ्चशते परे ॥२०६
वरुणस्य समानां च षष्टिः पञ्चशतानि च ।
षट्छतानि च वेद्यानि ईशानेऽपि तथा द्वयोः ॥२०७
कुबेरस्य समानां च सप्ततिः षट्छतानि च ।
गणिताः परिषद्वेवा बाह्याः सप्तशतानि च ॥२०८
दक्षिणे वरुणस्योक्ताः कुबेरस्योत्तरस्य ताः ।
कुबेरस्य च याः प्रोक्ता वरुणस्योत्तरस्य ताः ॥२०९
अर्थ (श्लोक 206 से 209): सौधर्म कल्पके भीतर सोम, यम और उन दोनोंके सामानिक देवोंमें भी अभ्यन्तर परिषद्का प्रमाण पचास तथा आगेकी मध्य और बाह्य परिषदोंका प्रमाण क्रमसे चार सौ और पांच सौ है। वरुण और उसके सामानिक देवोंकी उक्त तीनों परिषदोंका प्रमाण क्रमशः साठ, पांच सौ, और छह सौ जानना चाहिये। ईशान कल्पमें भी सोम व यम तथा इन दोनोंके सामानिक देवोंकी उक्त तीनों परिषदोंका प्रमाण सौधर्म कल्पके समान समझना चाहिये। सौधर्म कल्पमें कुबेर और उसके सामानिकोंकी प्रथम दो परिषदोंका प्रमाण क्रमसे सत्तर व छह सौ तथा बाह्य परिषद्का प्रमाण सात सौ है। दक्षिणमें जो वरुणकी परिषदोंका प्रमाण कहा गया है वह उत्तरमें कुबेरकी परिषदोंका तथा दक्षिणमें कुबेरकी जो परिषदोंका प्रमाण कहा गया है वह उत्तरमें वरुणकी परिषदोंका जानना चाहिये ॥ २०६-२०९ ॥ उक्त चार श्लोकोंमें निर्दिष्ट लोकपालों और सामानिकोंकी परिषदोंका प्रमाण इस प्रकार है-
तथैव सर्वकल्पेषु आच्युताल्लोकरक्षिणाम् ।
ज्ञातव्याः परिषद्देवा इत्याचार्यैरभीप्सितम् ॥२१०॥
अर्थ: अच्युत पर्यन्त सब कल्पोंमें लोकपालोंके पारिषद देवोंका प्रमाण उसी प्रकार जानना चाहिये, यह आचार्योंको अभीष्ट है ॥ २१० ॥
विंशतिश्चाष्टसंयुक्ता सहस्राणां पृथङ्मताः ।
सप्तानीकाद्यकक्षाणां द्विगुणाश्च क्रमोत्तराः ॥२११॥
एवं सर्वेषु कल्पेषु सर्वेषां लोकरक्षिणाम् ।
संख्यातव्यान्यनीकानि पौराणिकमहर्षिभिः ॥२१२॥
अर्थ (श्लोक 211 से 212): लोकपालोंकी सात अनीकोंकी प्रथम कक्षाका प्रमाण अट्ठाईस हजार माना गया है । आगेकी कक्षाओंमें वह क्रमसे उत्तरोत्तर दूना होता गया है । प्रथम कक्षा २८०००, समस्त एक अनीक ३५५६०००, समस्त सात अनीक २४८९२००० ॥ २११ ॥ इसी प्रकार सब कल्पोंमें सब लोकपालोंकी अनीकोंकी संख्या प्राचीन महर्षियोंके द्वारा निर्दिष्ट की गई है ॥ २१२ ॥
शाक्रयोः सोमयमयोस्तयोः सामानिकेष्वपि ।
आयुः पल्यद्वयं सार्धं तदर्धं खलु योषिताम् ॥२१३॥
अर्थ: सौधर्म इन्द्रके सोम और यम इन दो लोकपालों तथा उनके सामानिक देवोंकी भी आयु अढ़ाई (२ १/२) पल्य मात्र होती है । उनकी स्त्रियोंकी आयु उससे आधी (१ १/४) पल्य जानना चाहिये ॥ २१३ ॥
द्वादशाहात् पुनः सार्धान्मानसाहारसेवनम् ।
मुहूर्तैश्च तावद्भूस्तेषामुच्छ्वसनं मतम् ॥२१४॥
षडहात्पादसंयुक्ताद्देव्याहारनिषेवणम् ।
मुहूर्तैश्च तावद्भूस्तासामुच्छ्वसनक्षणम् ॥२१५॥
अर्थ (श्लोक 214 से 215): सौधर्म इन्द्रके लोकपाल साढ़े बारह (१२ १/२) दिनमें मानसिक आहारका उपभोग करते हैं । इतने (१२ १/२) ही मुहूर्तोंमें उनका उच्छ्वास लेना माना गया है ॥ २१४ ॥ उनकी देवियां सवा छह (६ १/४) दिनमें आहारका सेवन करती हैं तथा उतने (६ १/४) ही मुहूर्तोंमें वे उच्छ्वास लेती हैं ॥ २१५ ॥
वरुणस्य समानां च न्यूनपल्यत्रयं भवेत् ।
देशोनपक्षादाहारः श्वासस्तावन्मुहूर्तकैः ॥२१६॥
अर्थ: वरुण और उसके सामानिक देवोंकी आयु कुछ कम तीन (३) पल्य प्रमाण होती है । उनके आहारकालका प्रमाण कुछ कम एक पक्ष (१५ दिन) तथा उच्छ्वासकालका प्रमाण उतने (१५) ही मुहूर्त है ॥२१६॥
एतेषामपि देवीनां सार्धपल्यायुरूनकम् ।
आहारो न्यूनपक्षाद्र्धाच्छ्वासस्तावन्मुहूर्तकैः ॥२१७
अर्थ: इनकी देवियोंकी भी आयु कुछ कम डेढ़ (३/२) पल्य, आहारकाल कुछ कम आधा पक्ष (१५/२ दिन) और उच्छ्वासकाल उतने (१५/२) ही मुहूर्त प्रमाण है ॥२१७॥
कुबेरस्य समानां च स्त्रीणां च वरुणक्रमम् ।
किंतु संपूर्णमाख्येयं श्वासाहारायुषां स्थितम् ॥२१८
अर्थ: कुबेर, उसके सामानिक और उनकी स्त्रियोंकी आयु, आहार एवं उच्छ्वासका क्रम वरुण लोकपालके समान है । किन्तु उनका वह प्रमाण कुछ कमके स्थानमें सम्पूर्ण कहना चाहिये ॥२१८॥