जिनवर दर्शन का फल पाऊँ, निर्वांछक निर्द्वन्द रहाऊँ | Jinavar Darsan Ka Phal Pau Nirvamchak Nirdvand Rahau

तर्ज : वंदन हम करते मंगलमय…

जिनवर दर्शन का फल पाऊँ, निर्वांछक निर्द्वन्द रहाऊँ।। टेक ।।

सहजहिं आत्म भावना भाऊँ, प्रभु सम अक्षय प्रभुता पाऊँ।
पर में नहिं उपयोग भ्रमाऊँ, अपने में ही तृप्त रहाऊँ ।। 1 ।।

निज स्वरूप में रहूँ निःशंकित, निर्भय अरु निश्चित रहाऊँ।
पापोदय में ग्लानि न होवे, पुण्योदय के भोग न चाहूँ ।।2।।

दृढ़ता होवे सुगुरु वचन की, जग की बातों में नहीं आऊँ।
रहे विवेक प्रमुख हे स्वामी, हो निर्मूढ़ परम पद ध्याऊँ।।3।।

दोषों के प्रति रहे उपेक्षा, जिनशासन की शान बढ़ाऊँ।
मुक्तिमार्ग से च्युत होने पर, सम्यक् स्थितिकरण कराऊँ ।।4।।

परम प्रीति हो जिन धर्मी प्रति, वत्सलता सबके प्रति लाऊँ।
आत्म प्रभावना हो अन्तर में, श्री जिनधर्म प्रभाव बढाऊँ ।।5।।

अन्तर्मुख हो निर्मद वर्तं, परम समरसी भाव जगाऊँ।
ममता छूटे तृष्णा टूटे, एकाकी हो वन को जाऊँ ।।6।।

उपसर्गों औ परिषहों में, निश्चल आतम ध्यान लगाऊँ।
कर्म खिपाऊँ शिवपद पाऊँ, दुःखमय आवागमन मिटाऊँ ।।7 ।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’