शंका १३, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान
पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६७२ से ६९१
प्रतिशंका ३ का समाधान
\१. सारांश
हमने प्रथम उत्तरमें यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘पुण्य और पाप इन दोनोंका आस्रव और बन्धतत्त्वमें अन्तर्भाव होता है।’ साथ ही यह भी बतला दिया था कि ‘अशुभ कर्मका फल किसीको इष्ट नहीं हैं, इसलिए उसकी इच्छा तो किसीको नहीं होती। किन्तु पुण्यकर्मके फलका प्रलोभन छूटना बड़ा कठिन है, इसलिए प्रत्येक भव्यप्राणीकी मोक्षमार्गमें रुचि उत्पन्न हो और पुण्य अथा पुण्यके फलमें अटक न जाय इस अभिप्रायसे सभी आचार्य उसकी विविध शब्दों द्वारा निन्दा करते आ रहे हैं। यह शास्त्रोक्त है।’
अपर पक्षने अपनी प्रतिशंका २ में अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ‘हमारा प्रश्न पुण्य आचरणके विषयमें था।’ इसके बाद कुछ आगम प्रमाण देकर उसका समर्थन किया है।
अपने दूसरे उत्तरमें हमने उक्त प्रतिशंका पर सांगोपांग विचार कर अन्तमें अपर पक्षके शब्दोंको ध्यानमें रख कर ही यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘जितना रागांश है उससे आस्रव-बन्ध होता है और जितना शुद्धयंश है उससे संवर निर्जरा होती है।’ उक्त प्रतिशंकामें सारांश लिखते हुए इस तथ्यको अपर पक्षने भी स्वीकार कर लिया है।
\२. प्रतिशंका ३ के आधारसे विचार
प्रतिशंका ३ को प्रारम्भ करते हुए अपर पक्षने लिखा है-‘यह प्रश्न जीवके पुण्यभावकी अपेक्षासे है इस बातको हमने अपने प्रपत्र २में स्पष्ट भी कर दिया था तथा यह भी स्पष्ट कर दिया था कि शुभोपयोग, पुण्यभाव, व्यवहारधर्म एवं व्यवहारचारित्र ये एकार्थवाची शब्द हैं। फिर भी आपने पुण्यरूप द्रव्यकर्मकी अपेक्षासे ही उत्तर प्रारम्भ किया है।’
समाधान यह है कि हमने जो उत्तर दिया है वह सबके सामने है, अतः उसमें तो हम नहीं जावेंगे। यहाँ मूल शंका और अपर पक्षके इस वक्तव्य पर अवश्य ही विचार करेंगे।
अपर पक्षने यह प्रश्न प्रवचनसार गाथा ४५ (पुण्णफला अरहंता ) के आधारसे निबद्ध किया था इसमें सन्देह नहीं, क्योंकि मूल प्रश्नमें ही अपर पक्षने इस गाथाके प्रथम पादका उल्लेख किया है। प्रवचनसारमें यह गाथा क्यों लिखी गई है इसके लिए गाथा ४३-४४ के संदर्भमें इसके आशयको समझना होगा। गाथा ४३ में ‘संसारी जीवोंके उदयगत कर्मांश जिनवरने नियमसे कहे हैं। उनमें मोही, रागी और द्वेषी होता हुआ यह जीव बन्धका अनुभव करता है’ यह कहा गया है। इसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं कि 'इससे सिद्ध है कि क्रिया और क्रियाका फल मोहोदयसे अर्थात् मोहके उदयमें युक्त होनेके कारण होता है, ज्ञानसे नहीं होता अर्थात् ज्ञानस्वभावमें युक्त होनेके कारण नहीं होता-अतो मोहोदयात् क्रिया-क्रियाफले, न तु ज्ञानात्।
इस पर यह शंका होने पर कि अरिहन्तोंके क्रिया तो देखी जाती है पर उसका फल नहीं देखा जाता सो क्यों? भगवान् कुन्दकुन्दने इन्हीं दो प्रश्नोंका ४४ और ४५ संख्याक गाथाओं द्वारा उत्तर दिया है।
इससे स्पष्ट है कि प्रकृत मूल प्रश्नमें ‘पुण्णफला’ पदमें आये हुए ‘पुण्य’ पदसे पुण्यरूप द्रव्यकर्मका उदय ही गृहीत है। गमनादि क्रियाको गाथा ४५के पूर्वार्ध द्वारा औदयिक स्वीकार करनेका भी यही आशय है। ऐसा मालूम पड़ता है कि अब अपर पक्ष तीर्थंकर प्रकृति आदि पुण्य कर्मोंके उदयको दृष्टि ओझल करके अन्य मार्गसे अपने पक्षको जीवित बनाये रखना चाहता है। अन्यथा वह पक्ष मूल प्रश्न जिस आशयसे किया गया है वहीं तक अपनेको सीमित रखकर अपने विचार प्रस्तुत करता और उन्हींकी पुष्टिमें शास्त्राधार भी उपस्थित करता। अस्तु,
हमने पिछले उत्तरमें लिखा था-‘सम्यग्दृष्टि जीवके भेदविज्ञानकी जागृतिके साथ-साथ पापविरक्ति रूप शुभप्रवृत्ति होती है।’ इस पर अपर पक्षका कहना है कि ‘इस मिश्रित अखण्ड पर्यायका नाम शुभोपयोग है। इसमें प्रशस्त राग भी है तथा सम्यक्त्व व पापोंसे विरक्तिरूप चित्तकी निर्मलता भी है।’
अपने इस विचारकी पुष्टिमें अपर पक्षने पंचास्तिकाय गाथा १३१ की टीकाको उपस्थित किया है। इसमें ‘प्रशस्त राग और चित्तप्रसाद जहाँ है वहाँ शुभ परिणाम हैं’ यह कहा गया है। अब आगममें इन दोनों शब्दोंका क्या अर्थ किया है इस पर विचार करना है। आचार्य कुन्दकुन्दने पंचास्तिकाय गाथा १३५ में प्रशस्त राग, अनुकम्पापरिणति और चित्तकी अकुलषता इन तीनको शुभ परिणाम कहा है। इन तीनोंका अर्थ करते हुए आचार्य जयसेन इसकी टीकामें लिखते हैं-
अथ निरास्रवशुद्धात्मपदार्थात्प्रतिपक्षभूतं शुभास्रवमाख्याति-रागो जस्स पसत्थो-रागो यस्य प्रशस्तः वीतरागपरमात्मद्रव्याद्विलक्षणः पंचपरमेष्ठि-निर्भरगुणानुरागरूपः प्रशस्तधर्मानुरागः। अणुकंपासंसिदो य परिणामो-अनुकम्पासंश्रितश्च परिणामः दयासहितो मनोवचनकायव्यापाररूपः शुभपरिणामः। चित्तम्हि णत्थि कलुसो-चित्ते नास्ति कालुष्यं मनसि क्रोधादिकलुषपरिणामो नास्ति। पुण्णं जीवस्स आसवदि-यस्यैते पूर्वोक्ता त्रयः शुभपरिणामाः सन्ति तस्य जीवस्य द्रव्यपुण्यास्रवकारणभूतं भावपुण्यमास्रवतीति सूत्राभिप्रायः।
अब निरास्रव शुद्ध आत्मपदार्थसे प्रतिपक्षभूत शुभास्रवका व्याख्यान करते हैं-रागो जस्स पसत्थो-राग जिसका प्रशस्त है अर्थात् जिसका वीतराग परमात्मा द्रव्यसे विलक्षण जो पंच परमेष्ठीमें अत्यन्त गुणानुरागरूप प्रशस्त धर्मानुराग है। अणुकंपासंसिदो य परिणामो-जिसका अनुकम्पा युक्त परिणाम है अर्थात् जिसका दया सहित मन, वचन, कायके व्यापाररूप शुभ परिणाम है तथा चित्तम्हि णत्थि कलुसो-जिसके चित्तमें कलुषता नहीं है अर्थात् क्रोधादिरूप कलुष परिणाम नहीं है। पुण्णं जीवस्स आसवदि-जिसके पूर्वोक्त ये तीन शुभ परिणाम हैं उस जीवके द्रव्य पुण्यके आस्रवका निमित्तभूत भावपुण्यास्रव है यह मूल गाथाका तात्पर्य है।
यहाँपर ‘वीतरागपरमात्मद्रव्यसे विलक्षण’ यह विशेषण उक्त तीनों परिणामोंपर लागू होता है।
इससे स्पष्ट है कि शुभ परिणाम, शुभ भाव या शुभोपयोग उक्त विधिसे तीन प्रकारका ही होता है-१. अरिहन्तादिविषयक प्रशस्त राग, २. दयापरिणाम अर्थात् अणुव्रत-महाव्रतादिरूप शुभ परिणाम और ३. चित्तमें-क्रोधादिरूप कलुषताका न होना ।
प्रशस्त राग क्या है इसकी व्याख्या करते हुए स्वयं आचार्य कुन्दकुन्द पंचास्तिकाय गाथा १३६ में लिखते हैं-
अरहंतसिद्धसाहुसु भत्ती धम्मम्मि जा य खलु चेट्ठा ।
अणुगमणं पि गुरूणं पसत्थरागो त्ति वुच्चंति ॥ १३६ ॥
अरिहन्त, सिद्ध और साधुओंमें भक्ति, धर्ममें नियमसे चेष्टा तथा गुरुओंका अनुगमन करना यह सब प्रशस्त राग कहलाता है ॥ १३६ ॥
यहाँपर धर्म पदसे व्यवहार चारित्रका अनुष्ठान लिया गया है ।
आचार्य अमृतचन्द्र इसकी टीकामें लिखते हैं-
अयं हि स्थूललक्ष्यतया केवलभक्तिप्रधानस्याज्ञानिनो भवति । उपरितनभूमिकायामलब्धास्पदस्यास्थानरागनिषेधार्थं तीव्ररागज्वरविनोदार्थं वा कदाचिज्ज्ञानिनोऽपि भवति ।
यह ( प्रशस्त राग ) स्थूल लक्ष्यवाला होनेसे केवल भक्तिप्रधान अज्ञानीके होता है । तथा उपरितन भूमिकामें स्थिति न प्राप्तकी हो तब अस्थान राग ( इन्द्रियादि विषयक राग ) का निषेध करनेके लिए अथवा तीव्र रागज्वरका परिहार करनेके लिए कदाचित् ज्ञानीके भी होता है ॥१३६॥
जयसेनाचार्यके शब्दोंमें इसका आशय यह है-
तत्प्रशस्तरागमज्ञानी जीवो भोगाकांक्षारूपनिदानबन्धेन करोति, स ज्ञानी पुनर्निर्विकल्पसमाध्यभावे विषयकषायरूपाशुभरागविनासार्थं करोतीति भावार्थः ।
उस प्रशस्त रागको अज्ञानी जीव भोगाकांक्षारूप निदानबन्धके साथ करता है । किन्तु ज्ञानी जीव निर्विकल्प समाधिके अभावमें विषयकषायरूप अशुभ रागका विनाश करनेके लिए करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।
इसी प्रकार आचार्य कुन्दकुन्दने अनुकम्पा क्या है इसका निर्देश आगे १३७ वीं गाथामें किया है ।
अतएव इन प्रमाणोंसे स्पष्ट है कि अपर पक्ष सम्यग्दर्शन व सम्यक्चारित्ररूप शुद्धिके साथ कषायकी जिस मिश्रित अखण्ड पर्यायकी कल्पना कर उसे शुभभाव या शुभोपयोग कहना चाहता है वह ठीक नहीं है । यह उस पक्षकी अपनी कल्पना है । आगमका यह आशय नहीं है ।
जब यह जीव संसारके प्रयोजनभूत पंचेन्द्रियोंके विषयों आदिमें उपयुक्त रहता है तब अशुभोपयोग होता है, जब पंच परमेष्ठी आदिकी भक्ति-स्तुति आदिमें, व्रतोंके पालनेमें तथा अन्य शुभ प्रवृत्तिमें उपयुक्त रहता है तब शुभोपयोग होता है और जब विज्ञानघनस्वरूप अपने आत्मामें उपयुक्त होता है तब शुद्धोपयोग होता है । प्रवचनसार गाथा ९ का यही आशय है । जीव उपयोगलक्षणवाला है । वह अपने इस लक्षणसे सदा अनुगत रहता है यह उक्त गाथामें बतलाया गया है । हम अभी प्रवचनसार गाथा ४३ का आशय लिख आये हैं । उसके साथ इस गाथाको पढ़ने पर इसका आशय स्पष्ट हो जाता है ।
यह अपर पक्ष ही स्वीकार करेगा कि पर्याय दो ही प्रकारकी होती है-स्वभावपर्याय और विभावपर्याय । सम्यग्दर्शन यह श्रद्धागुणकी स्वभाव पर्याय है । यह चारित्रगुणकी पर्यायसे भिन्न है, इसलिए इसके साथ तो चारित्र गुणकी मिश्रित अखण्ड पर्याय बन नहीं सकती । चारित्र गुणकी अवश्य ही संयमासंयम और संयमरूप मिश्र पर्याय होती है, क्योंकि उसमें शुद्धयंश और अशुद्धयंश दोनोंका युगपत् सद्भाव होता है । उसमें जो शुद्धयंश है वह स्वयं संवर-निर्जरास्वरूप होनेसे संवर-निर्जराका कारण भी है । पण्डितप्रवर दौलतराम जी छहढालाके मंगलाचरणमें इसीकी स्तुति करते हुए लिखते हैं-
तीन भुवनमें सार वीतराग-विज्ञानता ।
शिवस्वरूप शिवकार नमहुँ त्रियोग सम्हारिके ॥१॥
यह अपने प्रतिपक्षभूत अशुद्धयंशका व्यय होकर उत्पन्न हुई है, इसलिए इसका स्वयं संवर-निर्जरा स्वरूप होकर संवर-निर्जराका कारण बनना युक्त ही है ।
तथा उस मिश्र पर्यायमें जो अशुद्धिअंश शेष है वह स्वयं अशुद्धिस्वरूप होनेसे आस्रव-बन्धरूप है और आस्रव बन्धका कारण भी है ।
इस प्रकार शुद्धपर्याय और अशुद्ध पर्यायके भेदसे जहाँ पर्याय दो प्रकारकी है वहाँ विषयभेदसे उपयोग तीन प्रकारका है-अशुभोपयोग, शुभोपयोग और शुद्धोपयोग । जब इस जीवका परलक्षी उपयोग होता है तब वह नियमसे मोह, राग या द्वेषसे अनुरंजित होकर प्रवर्तता है । उपयोगके शुभ और अशुभ इन दो भेदोंके होनेका यही कारण है । उनमेंसे इन्द्रियविषयोंमें अनुरक्त होना अशुभोपयोग है । कारण स्पष्ट है । तथा उक्त तीन प्रकारकी शुभ प्रवृत्तियोंमें उपयुक्त होना शुभोपयोग है । है तो यह भी रागसे अनुरंजित ही, उससे बहिर्भूत नहीं है । परन्तु इसमें जिन्होंने मुक्ति प्राप्त की है या मुक्तिमार्गका अनुसरण कर रहे हैं उनके प्रति अनुरागकी मुख्यता है, इसलिए इसे अशुभोपयोगमें परिगणित न कर उससे भिन्न बतलाया है । इनमेंसे अशुभोपयोग मुख्यतया मिथ्यादृष्टिके होता है और शुभोपयोग यथायोग्य सम्यग्दृष्टिके होता है । सम्यग्दृष्टिके अशुभोपयोगकी गौणता है, किन्तु सम्यग्दृष्टिके मात्र शुभोपयोग ही होता हो यह बात नहीं है, उनके शुद्धोपयोग भी होता है, क्योंकि सम्यग्दृष्टि निरन्तर आत्मस्वभावका अवलम्बन कर प्रवर्तना ही अपना प्रधान कर्तव्य समझता है । उसके अशुभके परिहार स्वरूप शुभप्रवृत्ति होती है, परन्तु उसे बन्धका कारण जान हेयबुद्धिसे ही वह उसमें प्रवर्तता है । सम्यग्दृष्टिके शुभ प्रवृत्तिका होना अन्य बात है और उसके शुभप्रवृत्तिके होते हुए भी उसमें हेय बुद्धिका बना रहना अन्य बात है । सम्यग्दृष्टि मोक्षके साक्षात् साधनभूत आत्मस्वभावको ही उपादेय समझता है, इसलिए उसकी उसके सिवाय अन्य सबमें स्वभावतः हेयबुद्धि बनी रहती है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।
इस प्रकार शुभोपयोग क्या है और वह पुण्यभाव, व्यवहारधर्म एवं व्यवहार चारित्ररूप कैसे है यह स्पष्ट हो जाने पर अपर पक्षकी इस कल्पनाका अपने आप निरास हो जाता है कि ‘शुभोपयोग या शुभ भाव सम्यक्त्व व चारित्रकी मिश्रित अखण्ड पर्यायरूप है ।’
अपर पक्षका कहना है कि ‘उस शुभ भाव या व्यवहार धर्ममें भी लक्ष्य या ध्येय वीतरागता एवं शुद्ध अवस्था अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति ही रहती है । पर्यायकी निर्बलताके कारण वह जीव वीतरागतामें स्थित नहीं हो पाता है । इस कारण उसको राग व विकल्प करने पड़ते हैं । किन्तु उस राग या विकल्पद्वारा भी वह वीतरागताको ही प्राप्त करना चाहता है ।’ आदि ।
समाधान यह है कि सर्व प्रथम तो अपर पक्षको यह ध्यानमें लेना है कि राग या विकल्प विरुद्ध स्वभाववाले हैं और उनसे वीतरागता विरुद्ध स्वभाववाली है, क्योंकि राग या विकल्पका अन्वय-व्यतिरेक परके साथ है और वीतरागताका अन्वय-व्यतिरेक आत्मस्वभावके साथ है। इसलिए सर्वप्रथम तो यह निर्णय करना आवश्यक है कि मुझे सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रयस्वरूप आत्मधर्मकी प्राप्ति आत्म-स्वभावके लक्ष्यसे तत्स्वरूप परिणमन द्वारा ही होगी, राग या विकल्प द्वारा त्रिकालमें प्राप्त नहीं होगी।
अपर पक्ष कह सकता है कि आत्मस्वभावके लक्ष्यसे तत्स्वरूप परिणमन द्वारा वीतरागताकी प्राप्ति होती है, ऐसा विचार करना भी तो विकल्प ही है? समाधान यह है कि इसमें भेद विज्ञानकी मुख्यता है और रागकी गौणता है, इसलिए स्वभावकी दृढ़ता होनेसे वह विकल्प स्वयं छूट जाता है और आत्मा स्वभाव-सन्मुख हो तत्स्वरूप परिणम जाता है। इसीका नाम है आत्मानुभूति। यह निराकुल आत्मसुखस्वरूप होनेसे स्वयं वीतरागतास्वरूप है।
दूसरे अपर पक्षने जब कि व्यवहारधर्ममें मोक्षप्राप्तिको लक्ष्य स्वीकार किया है। ऐसी अवस्थामें उस पक्षको निर्विवादरूपसे उसके स्थानमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसकी प्राप्तिका साक्षात् साधन भूतार्थनयका विषयभूत आत्माका आश्रय करना ही उपादेय है, अन्य सब हेय है। जैसे संसारमें रहते हुए भी मोक्षकी साधना तभी होती है जब संसारमें हेयबुद्धि हो जाती है। इसी प्रकार व्यवहार धर्मरूप प्रवर्तते हुए भी जिसकी उसमें हेय बुद्धि हो जाती है वही स्वभावके आलम्बन द्वारा तत्स्वरूप परिणमनरूप मोक्षका अधिकारी बनता है, अन्य नहीं। व्यवहारधर्म स्वयं आत्माका कर्तव्य नहीं है। वह तो पुरुषार्थहीनता का फल है।
तीसरे अपर पक्षने ‘उस शुभ भाव या व्यवहार धर्ममें भी लक्ष्य या ध्येय वीतरागता एवं शुद्ध अवस्था अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति ही रहती है।’ यह वचन लिखकर आत्माके पंचपरमेष्ठी विषयक या व्रतादि विषयक विकल्पको शुभभाव या व्यवहार धर्म कहते हैं इस तथ्यको स्वयं स्वीकार कर लिया है। अतएव अपर पक्षने सम्यक्त्व व चारित्रकी मिश्रित अखण्ड पर्यायको व्यवहार धर्म कहते हैं इस मान्यताको छोड़कर यही स्वीकार कर लेना चाहिए कि व्रतादिरूप जीवकी शुभ प्रवृत्ति या शुभ विकल्पको ही आगममें व्यवहार धर्म कहा है। वह रागानुरंजित जीवका परिणाम होनेसे बन्धका ही कारण है।
यहाँ पर यह शंका होती है कि उपयोगके समान पर्यायको भी विभाव पर्याय, स्वभाव पर्याय और मिश्र पर्याय ऐसा तीन प्रकारका माननेमें आपत्ति ही क्या है? समाधान यह है कि जिसे चारित्रकी मिश्र पर्याय कहते हैं उसमें जितना शुद्ध्यंश है वह स्वप्रत्यय जीवकी अवस्था है, क्योंकि वह स्वभावके लक्ष्यसे अपनी प्रतिपक्षी अवस्थाका नाश कर उत्पन्न हुई है और जितना अशुद्ध्यंश है वह स्व-परप्रत्यय जीवकी अवस्था है, क्योंकि वह परके लक्ष्यसे अपनी पूर्व प्रवृत्त विकाररूप अवस्थाके अनुरूप उत्पन्न हुई है, इसलिए शुद्ध्यंशका स्वभावपर्यायमें और अशुद्ध्यंशका विभाव पर्यायमें अन्तर्भाव हो जानेके कारण हमने पर्यायको दो ही प्रकारका बतलाया है। आगममें भी पर्यायको दो ही प्रकारका बतलाया है। प्रवचनसार गाथा ९३ में गुण पर्यायके इन भेदोंको बतलाते हुए लिखा है-
सोऽपि द्विविधः-स्वभावपर्यायो विभावपर्यायश्च।
वह गुणपर्याय भी दो प्रकारकी है-स्वभाव पर्याय और विभाव पर्याय।
आलापपद्धतिमें भी लिखा है-
गुणविकाराः पर्यायाः। ते द्वेधा-स्वभाव-विभावपर्यायभेदात्।
गुणविकारका नाम पर्याय है। वे स्वभावपर्याय और विभावपर्यायके भेदसे दो प्रकारकी हैं।
इसी तथ्यको नयचक्रादिसंग्रह पृ० २६ आदिमें स्पष्ट किया है। वहाँ लिखा है-
सब्भावं खु विहावं दव्वाणं पज्जयं जिणुद्दिट्ठं।
सव्वेसिं च सहावं विब्भावं जीव-पुग्गलाणं च ॥१८॥
जिनदेवने द्रव्योंकी पर्यायें दो प्रकारकी कही हैं-स्वभावपर्याय और विभावपर्याय। स्वभावपर्याय सब द्रव्योंकी होती हैं। विभावपर्याय मात्र जीवों और पुद्गलोंमें होती हैं ॥१८॥
आगे जीवमें विभाव गुणपर्यायोंका निर्देश करते हुए लिखा है-
मदिसुदओहीमणपज्जयं च अण्णाण तिण्णि जे भणिया।
एवं जीवस्स इमे विहावगुणपज्जया सव्वे ॥२४॥
आगममें जो मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ये चार ज्ञान और तीन अज्ञान कहे गये हैं ये सब जीवकी विभाव गुणपर्याय हैं ॥२४॥
जीवके मिथ्यात्व व रागादि विभाव गुणपर्याय हैं यह तो स्पष्ट ही है, इसलिए उनका यहाँ उल्लेख नहीं किया।
जीवकी स्वभावगुणपर्यायोंका निर्देश करते हुए वहाँ लिखा है-
णाणं दंसणं सुह वीरियं च जं उहयकम्मपरिहीणं।
तं सुद्धं जाण तुमं जीवे गुणपज्जयं सव्वं ॥२६॥
जो द्रव्य-भाव दोनों प्रकारके कर्मोंसे रहित ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्यपर्याय होती हैं उन सबको तुम जीवकी शुद्ध (स्वभाव) गुणपर्याय जानो ॥२६॥
इससे स्पष्ट है कि आगममें समस्त पर्यायोंका विचार दो ही प्रकारसे किया गया है।
पुरुषार्थसिद्धयुपायमें जो २१२, २१३ और २१४ श्लोक लिखे हैं उनमें बतलाया है कि जितने अंशमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र है उतने अंशमें बन्धन नहीं है और जितने अंशमें राग है उतने अंशमें बन्धन है।
प्रवचनसार गाथा १८०-१८१ में लिखा है-
परिणामसे बन्ध है। जो परिणाम राग, द्वेष और मोहसे युक्त है। उसमें मोह और द्वेषरूप परिणाम अशुभ है तथा शुभ और अशुभरूप राग है ॥१८०॥ इनमेंसे अन्य (अरिहन्तादि) के विषयमें जो शुभ परिणाम होता है उसे पुण्य कहते है तथा इन्द्रिय विषय आदि अन्यके विषयमें जो अशुभ परिणाम होता है उसे पाप कहते हैं और जो अन्यको लक्ष्यकर परिणाम नहीं होता है उसे आगममें दुःखके क्षयका कारण बतलाया है ॥१८१॥
गाथा १८१ की टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र उक्त विषयको स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-
द्विविधस्तावत् परिणामः-परद्रव्यप्रवृत्तः स्वद्रव्यप्रवृत्तश्च। तत्र परद्रव्यप्रवृत्तः परोपरक्तत्वाद्विशिष्टः परिणामः। स्वद्रव्यप्रवृत्तस्तु परानुपरक्तत्वादविशिष्टपरिणामः। तत्रोक्तौ-द्वौ विशिष्टपरिणामस्य विशेषौ-शुभपरिणामोऽशुभपरिणामश्च। तत्र पुण्यपुद्गलबन्धकारणत्वात् शुभपरिणामः पुण्यम्, पापपुद्गलबन्ध-
कारणत्वादशुभपरिणामः पापम् । अविशिष्टपरिणामस्य तु शुद्धत्वेनैकत्वान्नास्ति विशेषः । स काले संसारदुःखहेतुकर्मपुद्गलक्षयकारणत्वात्संसारदुःखहेतुकर्मपुद्गलक्षयात्मको मोक्ष एव ॥१८१॥
प्रथम तो परिणाम दो प्रकारका है- परद्रव्यप्रवृत्त और स्वद्रव्यप्रवृत्त । इनमेंसे परद्रव्यप्रवृत्त परिणाम परमें उपरक्त होनेसे विशिष्ट परिणाम है और स्वद्रव्यप्रवृत्त परिणाम परमें उपरक्त न होनेसे अविशिष्ट परिणाम है । उनमेंसे विशिष्ट परिणामके पूर्वोक्त दो भेद हैं-शुभ परिणाम और अशुभ परिणाम । उनमेंसे पुण्यरूप पुद्गलके बन्धका कारण होनेसे शुभ परिणाम पुण्य है और पापरूप पुद्गलके बन्धका कारण होनेसे अशुभ परिणाम पाप है । अविशिष्ट परिणाम तो शुद्ध होनेसे एक है, उसमें भेद नहीं है । वह स्वकालमें संसार दुःखके हेतुभूत कर्मपुद्गलके क्षयका कारण होनेसे संसार दुःखके हेतु कर्मपुद्गलके क्षयरूप मोक्ष ही है ॥१८१॥
आचार्य जयसेनने इसी गाथाकी टीकामें एक महत्त्वपूर्ण प्रश्नको उपस्थित कर उसका समाधान किया है । प्रश्न है कि-
नयविवक्षामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषायतक सभी गुणस्थानोंमें तो अशुद्ध निश्चयनय होता ही है अर्थात् अशुद्ध पर्याययुक्त जीव रहता ही है । इसलिए वहाँ अशुद्ध निश्चयमें शुद्धोपयोग कैसे प्राप्त होता है ? यह प्रश्न है इसका समाधान करते हुए वे लिखते हैं-
वस्त्वेकदेशपरीक्षा तावन्नयलक्षणं शुभाशुभशुद्धद्रव्यावलम्बनमुपयोगलक्षणं चेति, तेन कारणेनाशुद्धनिश्चयमध्येऽपि शुद्धात्मावलम्बनत्वात् शुद्धध्येयत्वात् शुद्धसाधकत्वाच्च शुद्धोपयोगपरिणामो लभ्यत इति नयलक्षणमुपयोगलक्षणं च यथासम्भवं सर्वत्र ज्ञातव्यम् ।
वस्तुके एकदेशकी परीक्षा तो नयका लक्षण है तथा शुभ, अशुभ और शुद्धद्रव्यका अवलम्बन उपयोगका लक्षण है । इस कारण अशुद्धनिश्चयस्वरूप आत्माके होनेपर भी शुद्ध आत्माका ( शुद्धनयका विषयभूत आत्माका ) अवलम्बन होनेसे; शुद्ध ( चिच्चमत्कारस्वरूप-त्रिकाली ज्ञायक आत्मा ) ध्येय होनेसे तथा शुद्ध ('सम्यग्दर्शनादि स्वभावपर्यायरूप ) आत्माका साधक होनेसे वहाँ भी शुद्धोपयोगरूप परिणाम प्राप्त हो जाता है । इस प्रकार नयके लक्षण और उपयोगके लक्षणको यथासम्भव सर्वत्र जानना चाहिये ।
इस प्रकार इतने विवेचनसे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि आगममें सर्वत्र परावलम्बी प्रशस्त रागसे अनुरंजित परिणामको ही शुभोपयोग कहा है । सम्यक्त्व युक्त मिश्रित अखण्ड एक पर्यायको नहीं । तथा इससे यह भी ज्ञात हो जाता है कि पुण्यभाव, व्यवहारधर्म या व्यवहारचारित्र इसी शुभोपयोगके पर्याय नाम हैं और यह परावलम्बी भाव होनेसे नियमसे बन्धका हेतु है ।
शुभोपयोगमें वीतराग देव, वीतराग गुरु और वीतरागताका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंका श्रद्धान, ज्ञान एवं पूजा, स्तुति, सत्कार सेवा परिणाम होता ही है इसमें सन्देह नहीं । परन्तु यह परावलम्बी भाव होनेसे इस अवस्थामें भी वह स्वावलम्बी भावके प्रति ही आदरवान् बना रहता है । यदि वह उस अवस्थामें अपने लक्ष्यको भूल जाय तो उसी समय वह नियमसे मिथ्यादृष्टि हो जाता है ।
स्वभावकी प्राप्ति तो नियमसे स्वभावके अवलम्बनस्वरूप उपयोगके होनेपर ही होती है, परके अवलम्बनरूप उपयोगसे नहीं । ऐसी श्रद्धा तो सम्यग्दृष्टिके होती ही है । फिर भी सम्यग्दर्शनादिरूपसे परिणत आत्माके सविकल्पदशामें वीतराग देवादिके प्रति भक्ति-श्रद्धारूप विकल्पका और योगप्रवृत्तिका नियमसे उत्थान होता है । वह ( व्यवहारधर्म ) भेदविज्ञानके कारण प्राप्त शुद्धिमें क्षति नहीं कर सकता, क्योंकि उसका सहचारी भाव है। मात्र इस अभिप्रायसे उसमें निमित्त व्यवहार किया जाता है। उसे साधक कहनेका यही तात्पर्य है। वह आत्मशुद्धिको उत्पन्न करता है ऐसा अभिप्राय इससे नहीं लेना चाहिये। सम्यग्दृष्टि जीव सदा अरिहन्तादिका पूजक क्यों नहीं बना रहना चाहता इसका कारण भी यही है। अपर पक्षको इस दृष्टिकोणसे विचार करना चाहिये। इससे वस्तुस्थितिके स्पष्ट होनेमें देर नहीं लगेगी। अपर पक्षने समाधितन्त्रका प्रमाण उपस्थित कर उसपरसे यह निष्कर्ष फलित किया है कि ‘भगवान्की उपासना उपासकको भगवान् ही बना देती है।’
समाधान यह है कि यदि अपर पक्ष उस वचनका यह आशय समझता है तो वह पक्ष ‘उसका भाव यह नहीं कि मैं सदा इसी प्रकार पूजक बना रहूँ।’ ऐसा लिखकर भगवान्की उपासनाका निषेध ही क्यों करता है ? जब कि भगवान्की उपासनासे ही उपासक भगवान् बन जाता है तो उसे परम ध्यान आदिरूप परिणत होनेका भाव नहीं करके मात्र भगवान्की उपासना करनी चाहिए, क्योंकि उसीसे वह भगवान् बन जायगा ?
यदि अपर पक्ष इसे नयवचन समझता है तो उसे समाधिशतकसे उक्त वचनके उसी आशयको ग्रहण करना चाहिए जिसका प्रतिपादन उसमें किया गया है। अपर पक्षने इस वचनके साथ श्लोक ९८ पर दृष्टिपात किया ही होगा। इन दोनोंको मिलाकर पढ़नेपर क्या तात्पर्य फलित होता है इसके लिए समयसार कलशके इस काव्यपर दृष्टिपात कीजिए-
एष ज्ञानघनो नित्यमात्मा सिद्धिमभीप्सुभिः।
साध्य-साधकभावेन द्विधैकः समुपास्यताम् ॥१५॥
साध्य-साधकभावके भेदसे दो प्रकारका एक यह ज्ञानस्वरूप आत्मा, स्वरूपकी प्राप्तिके इच्छुक पुरुषोंको नित्य सेवन करने योग्य है, उसका सेवन करो ॥१५॥
इसका भावार्थ लिखते हुए पण्डितप्रवर राजमलजी लिखते हैं-
भावार्थ इसौ-जु एक ही जीवद्रव्य कारणरूप तो अपुनपै ही परिणमै छै, कार्यरूप तो अपुनपै ही परिणवै छै। तिहितैं मोक्ष जातां कोई द्रव्यान्तरको सारो नहीं। तिहितैं शुद्धात्मानुभव कीजै।
इसका चालू हिन्दीमें अनुवाद है-
भावार्थ इस प्रकार है कि एक ही जीवद्रव्य कारणरूप भी अपनेमें ही परिणमता है और कार्यरूप भी अपनेमें ही परिणमता है। इस कारण मोक्ष जानेमें किसी द्रव्यान्तरका सहारा नहीं है, इसलिए शुद्ध आत्माका अनुभव करना चाहिये।
मोक्षप्राभृत गाथा ४८ में परमात्मा पदका अर्थ ‘ज्ञानघनस्वरूप निज आत्मा है। उसका ध्यान करनेसे अर्थात् तत्स्वरूप हो जानेसे यह जीव सब दोषोंसे मुक्त हो जाता है और उसके नये कर्मोंका आस्रव नहीं होता।’ ऐसा किया है।
अपर पक्षने प्रवचनसार गाथा ८० को उपस्थितकर इसका अर्थ भर दे दिया है और इसके बाद उसे स्पर्श किये बिना व्यापारीका उदाहरण देकर अपने अभिमतका समर्थन किया है। गाथामें यह कहा गया है कि जो अरिहन्तको जानता है वह अपने आत्माको जानता है। अर्थात् अरिहन्तका ज्ञान अपने आत्माका ज्ञान करनेमें निमित्त है। इसमें यह तो कहा नहीं गया है कि जो अरिहन्तके अवलम्बनसे पूजा-भक्तिरूप प्रवर्तता रहता है उसके परमात्मस्वरूप ज्ञायकभावके अवलम्बनरूपसे न प्रवर्तने पर भी मोहका समूल नाश हो जाता है। स्पष्ट है कि इस गाथाका आशय ही इतना है कि द्रव्य, गुण और पर्यायरूपसे जो अरिहन्तको जान लेता है उसे उस रूपसे अपने आत्माका ज्ञान नियमसे हो जाता है, क्योंकि निश्चयनयसे अरिहन्तके स्वरूपमें और अपने स्वरूपमें अन्तर नहीं है। जो आत्मा इस प्रकार आत्मस्वरूपको जानकर तत्स्वरूप परिणमता है उसका मोह नियमसे विलयको प्राप्त होता है यह तथ्य उक्त गाथामें प्ररूपित किया गया है। इसलिए इस परसे अपर पक्षने जो आशय लिया है वह ठीक नहीं है।
अपर पक्षने व्यापारका उदाहरण उपस्थित किया है, किन्तु उससे भी यही सिद्ध होता है, कि राग, द्वेष, मोहरूप परिणमन आत्माको हानि है, उससे आत्मलाभ होना सम्भव नहीं है।
समयसार गाथा १२ में यह नहीं कहा गया है कि व्यवहारधर्मसे परमार्थकी प्राप्ति होती है, अतः इससे भी अपर पक्षके अभिप्रायका समर्थन नहीं होता। अपर पक्षने यहाँ जो उक्त गाथाका भावार्थ उद्धृत किया है उसका आशय स्पष्ट है। यथापदवी व्यवहार प्रयोजनवान् है इसका निषेध नहीं। निषेध यदि किसी बातका है तो व्यवहारके अवलम्बनसे परमार्थकी प्राप्ति होती है इसका, क्योंकि व्यवहार कर्मस्वभाववाला है और परमार्थ ज्ञानस्वभाववाला है, अतः परावलम्बी कर्मस्वभाववाले व्यवहारसे स्वावलम्बी ज्ञानस्वभाववाले परमार्थकी प्राप्ति त्रिकालमें होना सम्भव नहीं है। इससे स्पष्ट है कि जब सम्यग्दृष्टिका व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका यथार्थ साधन नहीं, ऐसी अवस्थामें मिथ्यादृष्टिका व्यवहार निश्चयधर्मकी प्राप्तिका यथार्थ साधन कैसे हो सकता है।
‘जइ जिणमयं पवज्जह’ इस गाथामें दोनों नयोंको स्वीकार करनेकी बात कही गई है। उसका आशय यह है कि यदि व्यवहार नयको नहीं स्वीकार किया जायगा तो गुणस्थानभेद और मार्गणास्थानभेद आदि नहीं बनेगा और निश्चयनयको नहीं स्वीकार किया जायगा तो तत्त्वकी व्यवस्था नहीं बन सकेगी। इसमें यह कहाँ कहा गया है कि व्यवहारधर्मके बगैर निश्चयधर्मकी प्राप्ति नहीं होती। गाथामें कोई दूसरी बात कही गई हो और उससे दूसरा अभिप्राय फलित करना यह कहाँ तक ठीक है इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे।
अपर पक्षने मिष्ठान्नका उदाहरण दिया है सो इस उदाहरणसे हमारे पक्षका ही समर्थन होता है, क्योंकि जैसे मिष्ठान्नके स्वादकी इच्छावाला व्यक्ति मिष्ठान्नका ही अवलम्बन करेगा, आमका नहीं; उसी प्रकार आत्मानुभूतिका इच्छुक व्यक्ति आत्माका ही अवलम्बन करेगा, अन्यका नहीं। इसीलिए तो आगम कहता है कि परावलम्बी व्यवहारधर्मसे स्वावलम्बी आत्मधर्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती।
अनादिभेदवासित बुद्धिवालेके लिए भेदनयका अवलम्बन लेकर श्रद्धान क्या है और श्रद्धान करने योग्य क्या है यह जानकर आत्माके अवलम्बनसे मोक्षमार्गमें प्रवृत्त होना चाहिये यह तथ्य आचार्य अमृतचन्द्रने अनादिभेदवासितबुद्धयः 'इस वचन द्वारा स्पष्ट किया है। इसमें व्यवहारधर्मसे निश्चयधर्मकी प्राप्ति होती है यह नहीं कहा गया है। हम पहले समयसार कलश १५ का ‘एष ज्ञानघनो’ इत्यादि वचन उद्धृतकर आये हैं। उसी तथ्यको यहाँ दूसरे शब्दोंमें स्पष्ट किया है। अनादि भेदवासित बुद्धिवालोंको दूसरे प्रकारसे मोक्षमार्गकी प्राप्ति होती है और दूसरोंको दूसरे प्रकारसे उसकी प्राप्ति होती है ऐसा नहीं है। चाहे अनादि मिथ्यादृष्टि हो या सादि मिथ्यादृष्टि, जैसे इन्हें प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्राप्त करनेका एक ही मार्ग है वैसे ही मोक्षमार्गको प्राप्त करनेका एक ही मार्ग है-परसे भिन्न स्वको जानकर उसका अवलम्बन करना, मोक्षमार्गको प्राप्त करने या उसमें उत्तरोत्तर विशुद्धि प्राप्त करनेकी अन्य समस्त क्रिया उसी आधार पर होती है।
पंचाध्यायी पृ० २६७ के भावार्थका यह आशय तो है नहीं कि अशुभसे निवृत्ति और शुभमें प्रवृत्ति होने मात्रसे निश्चय धर्मकी प्राप्ति हो जाती है । क्या ऐसा है कि कोई व्यक्ति २८ मूलगुणोंका अच्छी तरहसे पालन कर रहा है, इसलिये उसे अधःकरण आदि तीन करण परिणाम किये विना निश्चय सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो जावेगी ? यदि नहीं तो व्यवहार धर्मसे निश्चय धर्मकी प्राप्ति होती है ऐसा कहनेकी उपयोगिता ही क्या रह जाती है इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे । यहाँ यह उदाहरण अनादि मिथ्यादृष्टि और जिसका वेदक काल व्यतीत हो गया है-ऐसे सादि मिथ्यादृष्टिको लक्ष्यमें रखकर उपस्थित किया है । स्पष्ट है कि निश्चय धर्मकी प्राप्तिके समय परावलम्बी व्यवहारधर्मरूप विकल्प छूट कर स्वका अवलम्बन होना आवश्यक है । समयसार गाथा १४५ में जीवके शुभ भावको व्यवहारनयसे मोक्षमार्ग वतलाया है, परन्तु बन्धमार्गके आश्रित होनेसे वहीं शुभ और अशुभ दोनोंको एक कर्म कहा है ।
अपर पक्षने यहाँ पं० जयचन्द्रजीके अनुवादसे और दिल्ली संस्करणसे जो वचन उद्धृत किये हैं वे अधूरे हैं । भ्रमका निरास करनेके लिये यहाँ हम उन्हें पूरा दे रहे हैं-'शुभ अथवा अशुभ मोक्षका और बन्धका मार्ग ये दोनों प्रथक् हैं, केवल जीवमय तो मोक्षका मार्ग है और केवल पुद्गलमय बन्धका मार्ग है । वे अनेक हैं एक नहीं हैं, उनके एक न होनेपर भी केवल पुद्गलमय बन्धमार्गकी आश्रितताके कारण आश्रयके अभेदसे कर्म एक ही है ।
अपर पक्षने प्रवचनसारकी आचार्य जयसेनकृत-टीकासे ‘तं देवदेवदेवं’ यह गाथा उद्धृत की है । इसके आशयको स्पष्ट करते हुए स्वयं आचार्य जयसेन लिखते हैं-
ते तदाराधनफलेन परम्परयाक्षयानन्तसौख्यं यान्ति लभन्त इति सूत्रार्थः ।
वे उनकी आराधनाके फलस्वरूप परम्परा अक्षयानन्त सुखको प्राप्त करते हैं यह उक्त गाथाका अर्थ है ।
इससे यह व्यवहार ( उपचार ) नय वचन है यह सुतरां सिद्ध है । ।
मोक्षप्राभृतकी ८२वीं गाथामें व्यवहार और निश्चय दोनोंका निरूपण है । यही तथ्य उसकी ५२वीं गाथामें स्पष्ट किया गया है । सो इसका कौन निषेध करता है । मोक्षमार्गी जीवकी सविकल्प दशामें क्या परिणति होती है और निर्विकल्प दशामें क्या परिणति होती है यह हमने अनेक बार स्पष्ट किया है । अपर पक्ष यदि यह कहना त्याग दे कि व्यवहारधर्मसे निश्चयधर्मकी प्राप्ति होती है तो विवाद ही समाप्त हो जाय । मोक्षमार्गीके व्यवहारधर्म होता ही नहीं यह तो हमारा कहना है नहीं । ऐसी अवस्थामें वह इन प्रमाणोंको उपस्थित कर क्या प्रयोजन साधना चाहता है यह हम नहीं समझ सके ।
अपर पक्षने रयणसार और मूलाचारकी भी कतिपय गाथायें उपस्थित की हैं । उनमें भी पूर्वोक्त तथ्यको ही स्पष्ट किया गया है । नियम यह है कि निश्चयनय यथार्थका निरूपण करता है और व्यवहारनय अन्यके कार्यको अन्यका कहता है । इन लक्षणोंको ध्यानमें रखकर उक्त सभी गाथाओंके अभिप्रायको स्पष्ट कर लेना चाहिये । जिन गाथाओंमें जिनके अन्तरंग गुणोंका निर्देश है वह निश्चय कथन है ।
धवला पु० १ पृ० ३०२ के वचनका यह आशय है कि सम्यग्दृष्टिके द्वादशांगमें श्रद्धा नियमसे होती है । इसलिए यहाँ द्वादशांगभक्तिको ही व्यवहारसे संसार विच्छेदका कारण कहा गया है ।
परमात्मप्रकाशमें सम्यग्दृष्टिके देव-गुरु-शास्त्रविषयक सम्यक् श्रद्धाका निर्देश किया गया है । यह सम्यक्त्वका बाह्य लक्षण है । इससे अन्तरंगकी पहिचान होती है । इसलिए जिसकी सच्चे देव, २८ मूल-गुणोंका समग्रभावसे पालन करनेवाले वीतराग गुरु और वीतराग वाणीमें श्रद्धा-भक्ति नहीं है वह अन्तरंगमें सम्यग्दृष्टि न होनेसे मोक्षका पात्र नहीं हो सकता। यह कथन यथार्थ है।
अपर पक्ष यदि परमात्मप्रकाशके इस कथनपर सम्यक् प्रकारसे दृष्टिपात करे तो उसका हम स्वागत ही करेंगे।
आचार्य समन्तभद्रने स्तुतिविद्यामें सम्यग्दृष्टिकी जिनदेवमें कैसी भक्ति होनी चाहिये उसे ही स्पष्ट किया है। पद्मपुराण, उपासकाध्ययन और पद्मनन्दिपंचविंशतिकाके वचनोंका भी यही आशय है। इसमें सन्देह नहीं कि यथार्थ व्यवहार क्या है और उसका क्या आशय है इसे सम्यग्दृष्टि ही जानता है।
अपर पक्षने प्रवचनसार गाथा २१७ उपस्थित कर उससे व्यवहारधर्मका समर्थन किया है। किन्तु इस गाथाका यथार्थ आशय समझनेके लिए उसकी टीकापर दृष्टिपात करनेकी आवश्यकता है। आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-
अशुद्धोपयोगोऽन्तरंगच्छेदः परप्राणव्यपरोपो बहिरंगः। तत्र प्राणव्यपरोपसद्भावे तदसद्भावे वा तदविनाभाविनाप्रयताचारेण प्रसिद्ध्यदशुद्धोपयोगसद्भावस्य सुनिश्चितहिंसाभावप्रसिद्धेः। तथा तद्विनाभाविना प्रयताचारेण प्रसिद्ध्यदशुद्धोपयोगासद्भावपरस्य परप्राणव्यपरोपसद्भावेऽपि बन्धाप्रसिद्ध्या सुनिश्चितहिंसाऽभावप्रसिद्धेश्चान्तरंग एव छेदो बलीयान् न पुनर्बहिरंगः। एवमप्यन्तरंगच्छेदायतनमात्रत्वाद् बहिरंगच्छेदोऽभ्युपगम्येतैव ॥२१७॥
अशुद्धोपयोग अन्तरंग छेद है, परप्राणोंका विच्छेद बहिरंग छेद है। किन्तु वहाँ जिसके अशुद्धोपयोगका अविनाभावी अप्रयत आचारसे प्रसिद्ध होनेवाला अशुद्धोपयोगका सद्भाव है उसके परप्राणोंका विच्छेद होनेपर या न होनेपर दोनों अवस्थाओंमें, हिंसाभावकी प्रसिद्धि सुनिश्चित है। तथा जिसके अशुद्धोपयोगके बिना होनेवाले प्रयत आचारसे प्रसिद्ध होनेवाला अशुद्धोपयोगका असद्भाव पाया जाता है उसके परप्राणोंका विच्छेद होनेपर भी, बन्धकी अप्रसिद्धि होनेसे हिंसाके अभावकी प्रसिद्धि सुनिश्चित है। इससे स्पष्ट है कि अन्तरंग छेद ही बलवान् है, बहिरंगच्छेद बलवान् नहीं है। ऐसा होनेपर भी अन्तरंग छेदका आयतनमात्र होनेसे बहिरंग छेदको स्वीकार करना ही चाहिए।
स्पष्ट है कि इस गाथाद्वारा अशुद्धोपयोगमात्रका निषेध कर शुद्धोपयोगकी प्रसिद्धि की गई है, क्योंकि शुद्धोपयोग बन्धका कारण न होकर स्वयं संवर-निर्जरास्वरूप है। समिति निश्चयस्वरूप भी होती है और व्यवहारस्वरूप भी। यहाँ निश्चय समिति बन्धका कारण नहीं है यह दिखलाकर उसकी महत्ता प्रस्थापित की गई है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। मालूम पड़ता है कि अपर पक्षने इस गाथाके पूरे आशयको ध्यानमें न लेकर ही यहाँ उसे अपने पक्षके समर्थनमें उपस्थित किया है। हमें विश्वास है कि वह पक्ष वहीं गाथा २१६ की आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीकाके इस वचनपर दृष्टिपात कर लेगा-
अशुद्धोपयोगो हि छेदः, शुद्धोपयोगरूपस्य श्रामण्यस्य छेदनात्। तस्य हिंसनात् स एव च हिंसा।
अशुद्धोपयोग ही छेद है, क्योंकि उससे शुद्धोपयोगस्वरूप श्रमणपने ( मुनिपने ) का छेद होता है और उसकी हिंसा ( छेद ) होनेसे वही हिंसा है।
इससे जहाँ यह ज्ञात होता है कि वास्तवमें शुद्धोपयोगरूप वर्तना ही मुनिपना है, अन्तरंगमें आत्मशुद्धिरूप निर्मलताके सद्भावमें भी शुभोपयोगकी अपेक्षा मुनिपना कहना यह उपचार कथन है, जिसे उसका आयतन होनेसे स्वीकार करना चाहिये। वहाँ यह भी ज्ञात होता है कि परमागममें यथार्थ अहिंसा वीतराग परिणामको ही स्वीकार किया गया है, रागपरिणामको नहीं । पुरुषार्थसिद्ध्युपायमें हिंसा और अहिंसाका विवेक कराते हुए जिनागमके सारको बड़े ही प्रांजल शब्दोंमें स्पष्ट करते हुए लिखा है-
अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति ।
तेषामेवोत्पत्तिर्हिंसेति जिनागमस्य संक्षेपः ।।४४।।
यथार्थमें रागादि भावोंका उत्पन्न न होना अहिंसा है और उन्हीं रागादि भावोंकी उत्पत्ति हिंसा है यह जिनागमका सार है ।।४४।।
यतः शुभभाव प्रशस्त रागभावरूप है, अतः वह बन्धका ही कारण है ऐसा निश्चय करना ही जिनमार्गकी यथार्थ श्रद्धा है ।
यहाँ पर कोई कह सकता है कि यदि शुभभाव, शुभोपयोग, व्यवहारधर्म या व्यवहार रत्नत्रय बन्धका हेतु है तो उसका जिनागममें उपदेश क्यों दिया गया है ? समाधान यह है कि-
\१. एक तो अशुभसे निवृत्तिरूप प्रयोजनको ध्यानमें रखकर उसका उपदेश दिया गया है । शुभमें प्रवृत्त रहनेसे ही परमार्थकी प्राप्ति हो जायगी इस दृष्टिसे उसका उपदेश नहीं दिया गया है ।
\२. दूसरे जिसे आत्माका निर्मल अनुभूतिमूलक भेदविज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे जीवकी संयमासंयम अथवा संयम आदि रूप आगेकी शुद्धिका ज्ञान करानेके हेतु आगममें ऐसा कथन आया है कि जो अणुव्रत आदि १२ व्रतोंका अथवा महाव्रत आदि २८ मूलगुणोंका पालन करता है वह देशसंयमी अथवा सकलसंयमी है । आगमके इस कथनका आशय यह है कि दो कषाय या तीन कषायके अभावस्वरूप जिस शुद्धिके सद्भावमें उसके साथ-साथ अणुव्रत या महाव्रतादिके शुभभाव बिना हट होते हैं, बिना हट सहजरूपसे होनेवाले उन भावोंसे अकषायरूप भीतरी शुद्धिका संकेत मिलता है । आगममें महाव्रत अंगीकार करो, समिति-गुप्तिका पालन करो इत्यादि रूपसे जो व्यवहारका उपदेश उपलब्ध होता है उसका यही आशय है कि जिस अकषायरूप शुद्धिके साथ-साथ बिना हट उक्त प्रकारके विकल्प होते हैं उस शुद्धिको ग्रहण करो, स्वात्मावलम्बी पुरुषार्थसे उक्त शुद्धिको प्राप्त करो । इस प्रकार इस प्रयोजनको लक्ष्यमें रखकर आगममें व्यवहारका उपदेश दिया गया है ।
\३. तीसरे असमग्र रत्नत्रयकी अवस्थारूपसे ज्ञानीके वर्तते समय उपयोगकी अस्थिरतावश ज्ञानका परिणाम और योगप्रवृत्ति कैसी होती है इसका सम्यक् ज्ञान करानेके लिए भी जिनागममें व्यवहार रत्नत्रयका उपदेश दिया गया है ।
परमागममें व्यवहारधर्मकी प्ररूपणाके ये तीन मुख्य प्रयोजन हैं । इन्हें यथावत् रूपसे जानता हुआ ही ज्ञानी सविकल्प दशाके होनेपर वर्तता है, इसलिए उसके प्रवृत्तिमें व्यवहारधर्मके होनेपर भी निश्चयधर्मको क्षति नहीं पहुँचती । ज्ञानीके निश्चय-व्यवहारनयमें साध्य-साधनभाव इसी दृष्टिसे बनता है, अन्य प्रकारसे नहीं ।
अपर पक्षने श्रावकों और मुनियोंके जिन आवश्यक कर्मोंका निर्देश किया है वे निश्चयरूप भी हैं और व्यवहाररूप भी ।
नियमसारमें इनका स्पष्ट निर्देश किया है । निश्चय प्रतिक्रमणका स्वरूप निर्देश करते हुए आचार्य कुंदकुंद वहाँ लिखते हैं-
मोत्तूण वयणरयणं रागादीभाववारणं किच्चा ।
अप्पाणं जो झायदि तस्स दु होदि त्ति पडिकमणं ॥८३॥
वचन रचनाको छोड़कर तथा रागादि भावोंका वारणकर जो आत्माको ध्याता है उसके प्रतिक्रमण होता है ॥८३॥
यह निश्चय प्रतिक्रमणका स्वरूप है। आचार्य निश्चय आवश्यकका स्पष्टीकरण करते हुए गाथा १४३-१४४ में बतलाते हैं कि जो श्रमण अशुभ भाव सहित वर्तता है वह अन्यवश (पराधीन) श्रमण कहलाता है, इसलिये उसके तो आवश्यकरूप कर्म होता ही नहीं । किन्तु जो श्रमण नियममें शुभ भावसे वर्तता है वह भी अन्यवश श्रमण है, इसलिये उसके भी आवश्यक कर्म नहीं होता ।
यह उक्त दोनों गाथाओंका आशय है । इससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ निश्चयधर्म होता है वहाँ प्रशस्त रागादिरूप परिणाममें व्यवहारधर्मका उपचार किया जाता है । निश्चय धर्म यथार्थ धर्म है और व्यवहारधर्म उपचार धर्म है ।
अपर पक्षका कहना है कि ‘जिन आगममें गृहस्थोंके लिये देवपूजा, गुरूपास्ति तथा दान और मुनियोंके लिये स्तवन वन्दना प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान आदि रूप व्यवहारधर्म नित्य षडावश्यक कार्योंमें गर्भित किया है । यदि यह कार्य मात्र बन्धके ही कारण हैं तो क्या महर्षियोंने बन्ध कराने और संसारमें डुबानेको उपदेश दिया है । ऐसा कभी सम्भव नहीं हो सकता है । इनको इसी कारण आवश्यक बतलाया है कि इनसे मोक्षप्राप्ति होती है ।’
समाधान स्वरूप सर्व प्रथम तो हमारा कहना यह है कि वस्तु विचारके समय यदि अपर पक्ष ऐसे तर्कको उपस्थित नहीं करता तो यथार्थके निर्णय करनेमें अनुकूलता होती । ऐसे तर्क श्रद्धालु जीवोंकी भावनाको उद्वेलित करनेके लिए ही दिये जाते हैं, इसलिए ये यथार्थका निर्णय करनेमें सहायक नहीं हुआ करते ।
अब रही यह बात कि आचार्योंने इनका उपदेश क्यों दिया है सो इस प्रश्नका समाधान हम इसी उत्तरमें पहले कर आये हैं ।
परमार्थरूप मोक्षहेतुके सिवाय अन्य जितना कर्म है उसका प्रतिषेध करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द समयसारमें लिखते हैं-
मोत्तूण णिच्छयट्ठं ववहारेण विदुसा पवट्टंति ।
परमट्ठमस्सिदाण दु जदीण कम्मक्खओ विहिओ ॥१५६॥
निश्चयनयके विषयको छोड़कर विद्वान् व्यवहाररूपसे प्रवर्तते हैं, परन्तु परमार्थके आश्रित यतियोंके ही कर्मोंका नाश आगममें कहा गया है ॥१५६॥
उक्त गाथाकी उत्थानिकामें आचार्य जयसेन लिखते हैं-
अथ निश्चयमोक्षमार्गहेतोः शुद्धात्मस्वरूपाद् यदन्यच्छुभाशुभमनो-वचन-कायव्यपाररूपं कर्म-तन्मोक्षमार्गो न भवति इति प्रतिपादयति ।
अब निश्चय मोक्षमार्गके हेतु शुद्धात्मस्वरूपसे अन्य जो शुभ और अशुभ मन, वचन, कायके व्यापाररूप कर्म है वह मोक्षमार्ग नहीं है यह बतलाते हैं ।
व्रत, तप आदि शुभोपयोग या व्यवहारधर्म यथार्थ मोक्षमार्ग क्यों नहीं है इसका स्पष्टीकरण उक्त गाथाकी टीकामें दोनों आचार्योंने स्पष्ट किया है । आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-
यः खलु परमार्थमोक्षहेतोरतिरिक्तो व्रत-तपःप्रभृतिशुभकर्मात्मा केषांचिन्मोक्षहेतुः स सर्वोऽपि प्रतिषिद्धः, तस्य द्रव्यान्तरस्वभावत्वात् तत्स्वभावेन ज्ञानभवनस्याभवनात्। परमार्थमोक्षहेतोरेवैकद्रव्यस्वभावत्वात् तत्स्वभावेन ज्ञानभवनस्य भवनात् ॥१५६॥
कुछ लोग परमार्थरूप मोक्षहेतुसे भिन्न जो व्रत, तप इत्यादि शुभ कर्मस्वरूप मोक्षहेतु मानते हैं, उस समस्त ही का निषेध किया है, क्योंकि वह अन्य द्रव्यके स्वभाववाला (पुद्गलस्वभाववाला) है, इसलिए उस रूपसे ज्ञानका होना नहीं बनता। मात्र परमार्थ मोक्षहेतु ही एक द्रव्यके स्वभाववाला है, इसलिए उस रूपसे ज्ञानका होना बनता है ॥१५६॥
ये कतिपय प्रमाण हैं जिनसे व्यवहार धर्मके स्वरूपपर यथार्थ प्रकाश पड़ता है। अपर पक्षने सम्यक्त्व व चारित्रकी मिश्रित अखण्ड पर्यायका नाम व्यवहारधर्म रखा है। इस कारण वह पक्ष व्यवहारधर्मको बन्धस्वरूप और बन्धका कारण स्वीकार करनेमें अड़चन देख रहा है इसे हम अच्छी तरहसे समझ रहे हैं। किन्तु कहाँ किस परिणामका क्या फल है, यदि यह बतलाया जाता है तो उसका अर्थ संसारमें घुमाना या संसारमें डुबाना नहीं होता है। बल्कि ज्ञानी उससे यही आशय ग्रहण करता है कि मुझे यह विकल्पकी भूमिका भी त्यागने योग्य है। विकल्पमें है और उसे छोड़नेका पुरुषार्थ करता है यह भी तो ज्ञानकी ही महिमा है।
अपर पक्षका कहना है कि ‘अतः इससे बन्ध होते हुए भी यह रागांश संसारका कारण नहीं हो सकता है।’ समाधान यह है कि आस्रव और बन्ध इन्हींका नाम तो संसार है। रागमें जितने काल अटका है उतने काल तो संसार है ही। इसे संसार स्वीकार न करनेमें लाभ ही क्या ? एक रागपरिणामका वह माहात्म्य है कि उसके फलस्वरूप यह जीव कुछ कम अर्ध पुद्गलपरिवर्तन काल तक आस्रव-बन्धकी परम्परामें रचता-पचता रहता है। जिसका जो स्वरूप है उसे स्वीकार करनेमें हानि नहीं, लाभ है। अन्यथा विवेकका उदय होना असम्भव है। ज्ञानीके रागमें उपादेय बुद्धि नहीं होती यह भेदविज्ञानका माहात्म्य है, व्यवहारधर्मका नहीं।
अज्ञानी भी स्वर्ग जाता है और ज्ञानी भी पुरुषार्थहीनता वश स्वर्ग जाता है। वहाँसे च्युत होकर दोनों ही राजपुत्र होते हैं। धर्मोपदेश भी सुनते हैं आदि। क्या कारण है कि ज्ञानी उसी भवसे मोक्ष जाता है, अज्ञानी नहीं। इससे स्पष्ट है कि बाह्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव न मोक्ष दिलाते हैं और न संसार ही। अपने अज्ञानका फल संसार है और अपने ज्ञानस्वभावके अवलम्बनका फल मोक्ष है। यही परमार्थ सत् है। बाह्य द्रव्यादि निमित्त हैं यह तो व्यवहार है।
इस प्रकार इतने विवेचनसे यह स्पष्ट हुआ कि पर्यायें विभाव और स्वभावके भेदसे मुख्यतया दो ही प्रकारकी हैं तथा उपयोग शुभ, अशुभ और शुद्धके भेदसे तीन प्रकारका है। उनमेंसे शुभोपयोग एक तो प्रशस्त रागरूप होता है, दूसरा अनुकम्पा परिणामरूप होता है और तीसरा चित्तमें क्रोधादि कलुष परिणामके अभावरूप होता है। यह तीनों प्रकारका उपयोग प्रशस्तविषयक शुभरागसे अनुरंजित होता है, इसलिए यह स्वयं आस्रव-बन्धस्वरूप होनेसे बन्धका कारण भी है।
पंचास्तिकाय गा० ८५ की टीकामें आचार्य जयसेनने 'गतिपरिणत जीवों और पुद्गलोंकी गतिमें धर्मद्रव्यकी निमित्तताका समर्थन करनेके अभिप्रायसे ‘निदानरहितपरिणामोपार्जित-’ इत्यादि वचन लिखा है। सो इसका आशय इतना ही है कि जो जीव स्वभावसन्मुख होकर अपनेमें आत्मकार्यकी प्रसिद्धि करता है, उसके पुण्यरूप द्रव्यकर्ममें निमित्तताका व्यवहार ऐसे ही किया जाता है जैसे गतिकार्यकी अपेक्षा धर्मद्रव्यमें निमित्तताका व्यवहार होता है । न धर्मद्रव्य गतिका कर्ता है और न पुण्यकर्म ही मोक्षका कर्ता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । ज्ञानीके मोक्षकार्यके सम्पादनके समय बाह्य परिकर कैसा होता है यह उक्त वचन द्वारा प्रसिद्ध किया गया है ।
\३. अन्य कतिपय प्रश्नोंका समाधान
\१. अपर पक्षने प्रवचनसार गा० ४५ की चरचा करते हुए लिखा है कि ‘यदि पुण्यका अर्थ भावपुण्य लिया जाय तो श्री समयसार गाथा १२ आदि उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह सिद्ध ही हो जाता है कि पुण्यभाव (व्यवहारधर्म) से केवलज्ञानकी प्राप्ति होती है ।’ आदि
समाधान यह है कि हम पहले ही शुभोपयोग अपर नाम व्यवहारधर्मका खुलासा कर आये हैं। उससे स्पष्ट है कि बारहवें गुणस्थानमें जिसे आगममें व्यवहारधर्म कहा गया है वह होता ही नहीं । परावलम्बी प्रवृत्तिरूप व्यवहारधर्म छटे गुणस्थान तक ही होता है । उसके आगे कषायलेशका सद्भाव होनेसे कारणकी अपेक्षा नौवें गुणस्थान तक भेदरूप छेदोपस्थापना संयमका निर्देश किया गया है । अतएव १२ वें गुणस्थानमें पुण्यभावकी कल्पना करना और उससे केवलज्ञानकी उत्पत्ति बतलाना उचित नहीं है । पण्डितप्रवर आशाधरजी अनगारधर्मामृत अ० १ श्लो० ११० की टीकामें लिखते हैं–
तदनन्तरमप्रमत्तादिक्षीणकषायपर्यन्तं जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदेन विवक्षितैकदेशेन शुद्धनयरूपः शुद्धोपयोगो वर्तते ।
तदनन्तर अप्रमत्त आदि क्षीणकषाय पर्यन्त गुणस्थानोंमें जघन्य, मध्यम और उत्कृष्टके भेदसे विवक्षित एकदेशरूपसे शुद्धनयरूप शुद्धोपयोग वर्तता है ।
यहाँ ‘विवक्षितैकदेशेन’ पदका आशय यह है कि ७ वें से लेकर १२ वें गुणस्थान तक इस जीवके शुद्धनयके विषयभूत एकमात्र त्रिकाली ज्ञायकभावका अवलम्बन होकर तत्स्वरूप परिणमनद्वारा शुद्धनयरूप शुद्धोपयोग वर्तता है ।
अतएव १२ वें गुणस्थानके अन्तिम समयके योग्य निश्चय रत्नत्रयपरिणत आत्मा ही केवलज्ञानको उत्पन्न करता है, बन्धस्वरूप व्यवहारधर्म नहीं ऐसा यहाँ निश्चय करना चाहिए ।
अपर पक्षने इससे पूर्ववर्ती प्रतिशंकामें लिखा है–‘निश्चयधर्म या शुद्धोपयोग यदि फल है तो शुभोपयोग उसका पूर्ववर्ती पुष्प है ।’ इससे भी स्पष्ट है कि अपर पक्ष भी स्वयं शुद्धोपयोगरूप निश्चयधर्मके पूर्व छटे गुणस्थान तक शुभोपयोग या व्यवहारधर्म स्वीकार कर चुका है । अतएव अपर पक्षके मतानुसार ही शुभोपयोगरूप व्यवहारधर्म १२ वें गुणस्थानमें नहीं बन सकनेके कारण व्यवहारधर्मसे केवलज्ञानकी उत्पत्ति बतलाना सर्वथा आगमविरुद्ध है ।
वैसे अपर पक्षने पिछली प्रतिशंकामें ७ वें गुणस्थान तक शुभोपयोग स्वीकार किया है । किन्तु पूर्वोक्त आगम प्रमाणसे स्पष्ट है कि ७ वें गुणस्थानमें शुभोपयोग न होकर शुद्धोपयोग ही होता है ।
अप्रमत्त गुणस्थानके दो भेद हैं–स्वस्थान अप्रमत्त और सातिशय अप्रमत्त । वहाँ श्रेणि आरोहणके पूर्व जीवके धर्मध्यान होता है और श्रेणिमें शुक्लध्यान होता है ऐसा आगमका अभिप्राय है । सर्वार्थसिद्धि अ० ९ सू० ३७ में लिखा है–
श्रेण्यारोहणात्प्राक् धर्म्यं, श्रेण्योः शुक्ले…।
श्रेणिके आरोहणके पूर्व धर्म्यध्यान होता है और दोनों श्रेणियोंमें दोनों शुक्लध्यान होते हैं।
इसी तथ्यको तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक और तत्त्वार्थवार्तिकमें उक्त सूत्रकी व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया गया है।
इसलिए प्रश्न होता है कि सातवें गुणस्थानमें भी स्वस्थान अप्रमत्तके शुभोपयोग होना चाहिए ? किन्तु वस्तुस्थिति यह नहीं है, क्योंकि धर्म्यध्यान शुभोपयोगरूप ही होता है ऐसा एकान्त नियम नहीं है। वह रागादि विकल्परहित आत्मानुभूतिरूप भी होता है और वीतराग देवादि, अणुव्रत-महाव्रतादि तथा परजीवविषयक अनुकम्पा आदि रागविकल्परूप भी होता है। इनमेंसे रागादि विकल्परूप धर्म्यध्यान मुख्यतया चतुर्थादि तीन गुणस्थानोंमें होता है और रागादि विकल्परहित धर्म्यध्यान स्वस्थान अप्रमत्तसंयतके होता है। इसी तथ्यको आचार्य जयसेनने पंचास्तिकाय गाथा १३६ की टीकामें ‘रागादिविकल्परहितधर्मध्यान-शुक्लध्यानद्वयेन’-रागादि विकल्प रहित धर्मध्यान और शुक्लध्यान इन दोके द्वारा-इन शब्दों द्वारा स्पष्ट किया है। स्पष्ट है कि ७ वें गुणस्थानमें स्वस्थान अप्रमत्तके धर्म्यध्यान होकर भी वह शुद्धोपयोगरूप ही होता है। अपेक्षाविशेषसे चतुर्थादि गुणस्थानोंमें भी क्वचित् कदाचित् शुद्धोपयोगकी व्यवस्था बन जाती है। आगम प्रमाणोंका उल्लेख अन्यत्र किया ही है।
समयसार गाथा १२ की टीकामें, रागादि विकल्पसे परिणत जीवके लिए व्यवहारनय प्रयोजनवान् है, अशुद्ध सोनेके समान। इसीका नाम अपरमभावमें स्थित है। ऐसे जीवके लिए व्रतादिका पालन करना, वीतराग देवादिकी स्तुति आदि करना, वीतराग मार्गकी प्ररूपक जिनवाणी सुनना प्रयोजनवान् है। किन्तु जो १६ वर्णिक शुद्ध सोनेके समान अभेद रत्नत्रय स्वरूप परमात्मतत्त्वके अनुभवनमें निरत हैं उनके लिए व्यवहारनय कुछ भी प्रयोजनवान् नहीं है यह कहा गया है। इसका अर्थ यह कहाँ हुआ कि ‘१२ वें गुणस्थानमें शुभोपयोग होता है, अतः पुण्यभावसे केवलज्ञानकी उत्पत्ति होती है ?’ अपर पक्षने उक्त गाथा और उसकी टीकाओंसे यह अर्थ कैसे फलित कर लिया इसका हमें आश्चर्य है। ज्ञानी जीवको अशुद्ध आत्माका अनुभव होना कहाँ तक सम्भव है इसका भी तो उस पक्षको विचार करना था। ६ टे गुणस्थानके आगे १२ वें गुणस्थान तक एकमात्र शुद्धनय-शुद्धात्मानुभूतिरूप शुद्धोपयोग ही होता है, अतः केवलज्ञानकी उत्पत्ति शुभाचारसे न होकर शुद्धात्मानुभूति परिणत आत्मा ही उसमें प्रगाढ़ता करके केवलज्ञानको उत्पन्न करता है ऐसा यहाँ निर्णय करना चाहिए।
\२. प्रवचनसार गाथा ४५ की दोनों टीकाओंपर दृष्टिपात करनेसे विदित तो यही होता है कि यहाँ ‘पुण्य’ पद द्रव्यकर्मके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। आचार्य जयसेन ‘पुण्यफला अरहंता’ पदकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं-
पञ्चमहाकल्याणकपूजाजनकं त्रैलोक्यविजयकरं यत्तीर्थंकरनाम पुण्यकर्म तत्फलभूता अर्हन्ता भवन्ति।
पञ्चमहाकल्याणक पूजाका जनक और तीन लोकको विजय करनेवाला जो तीर्थंकर नामक पुण्यकर्म है उसके फलस्वरूप अरिहन्त होते हैं।
अपर पक्षने प्रस्तुत प्रतिशंकामें इसका थोड़ा-सा स्पष्टीकरण अवश्य किया है। किन्तु मूल शंका जिस अभिप्रायसे की गई थी उससे तो यह भाव प्रगट नहीं होता था। ऐसा मालूम पड़ता था कि अपर पक्ष केवलज्ञानकी प्राप्ति भी द्रव्य पुण्यकर्म या शुभाचारका फल मानता है। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर हमने जो लिखा था उसका आशय यह है कि यदि अरिहन्त पदकी प्राप्ति यथार्थमें पुण्यकर्मका फल माना जाय तो आगममें 'मोहक्षयाज्ज्ञान-दर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् (त० सू०१०-१) इस वचनकी कोई उपयोगिता नहीं रह जायगी ।
प्रश्न १५ के उत्तरमें हमने इस सूत्रपर न तो कोई आपत्ति डाली है और न आपत्ति डाली ही जा सकती है । किसी वाक्य या सूत्रका आशय स्पष्ट करना इसे आपत्ति डालना नहीं कहते । प्रकृत प्रतिशंकामें अपर पक्षने ‘तीन लोकका अधिपतित्व’ इस वाक्यके आशयको स्पष्ट किया है । तो क्या इसे उस वाक्यपर आपत्ति डालना कहा जायगा । यह समग्र तत्त्वचरचा जिनागमका निश्चय-व्यवहार आदिके विषयमें आशय स्पष्ट करनेके अभिप्रायसे की जा रही है तो क्या इसे जिनागमपर आपत्ति डालना कहा जायगा ? इस प्रश्नका उत्तर अपर पक्ष स्वयं अपने विवेकसे प्राप्त कर ले । आक्षेपात्मक शब्दप्रयोग करना अन्य बात है और अपने परिणामोंका संतुलन रखते हुए तत्त्वविमर्श करना अन्य बात है । यदि सभी साधर्मी भाई दूसरे साधर्मी भाइयोंपर कीचड़ उछालनेकी भाषाका परित्याग कर विवेकके मार्गपर चलना प्रारम्भ कर दें तो इससे वीतराग मार्गकी ही प्रभावना होगी ।
\३. अपर पक्षने धवला पु० १४ पृ० ८९ का नामोल्लेख कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि ‘पंच महाव्रत, पंच समिति, त्रिगुप्ति आदि रूप व्यवहारचारित्र १२वें गुणस्थानमें भी होता है । उस पुण्यभावसे मोहनीय कर्म तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण एवं अन्तरायका क्षय होता है और इस कर्मके क्षयसे केवलज्ञान उत्पन्न होता है ।’
समाधान यह है कि धवला पुस्तक १४ पृ० ८९ में अप्रमाद’ पदकी व्याख्या की गई है । वहाँ लिखा है-
को अप्पमादो ? पंचमहव्वयाणि पंच समदीओ तिण्णि गुत्तीओ णिस्सेसकसायाभावो च अप्पमादो णाम ।
अप्रमाद क्या है ? पाँच महाव्रत, पाँच समिति, तीन गुप्ति और निःशेष कषायका अभाव अप्रमाद है ।
यहाँ पाँच महाव्रत आदिरूप परिणामसे निःशेष कषायके अभावका पृथक् रूपसे निर्देश किया है । इससे स्पष्ट है कि बारवें गुणस्थानमें निःशेष कषायका अभावरूप अप्रमाद भाव लिया गया है । वहाँ आचार्यका विकल्परूप पाँच महाव्रतादिका सद्भाव दिखलाना इस वाक्यका प्रयोजन नहीं है । विकल्परूप पाँच महाव्रतादि छटे गुणस्थानमें ही होते हैं, आगे तो स्वरूपस्थितिरूप एकमात्र वीतराग चारित्र ही होताहै । वहाँ ९वें गुणस्थानतक जो छेदोपस्थापना संयमका निर्देश किया है वह मात्र कषायलेशके सद्भावके कारण किया है, अतएव इस वचनके आधारसे १२वें गुणस्थानमें पुण्यभाव-शुभाचारकी प्रसिद्धि करना और उससे केवलज्ञानकी उत्पत्ति बतलाना आगमसम्मत कथन नहीं कहा जा सकता ।
\४. अपर पक्षने हमारा कथन बतलाकर लिखा है कि ‘१२वें गुणस्थानमें पुण्य प्रकृत्तियोंके उदयसे होनेवाले भावका नाम पुण्यभाव है ।’
किन्तु हमने अपने पिछले दोनों उत्तरोंपर दृष्टिपात किया है । एक तो हमने ऐसा वचन लिखा ही नहीं है । मालूम नहीं कि अपर पक्षने उक्त वचनकी कल्पनाकर उसे हमारा कैसे बतला दिया । दूसरे मनुष्य गति, तीर्थंकर प्रकृति ये जीवविपाकी पुण्यप्रकृतियाँ हैं । इनके उदयको निमित्तकर मनुष्यगति तथा तीर्थंकर आदि नोआगमभाव पर्याय होती हैं । ये १४वें गुणस्थातक बतलाई हैं । इस अपेक्षासे यदि १२वें गुणस्थानमें नोआगमभावरूप पुण्यभाव स्वीकार भी किया जाय तो यह कथन ‘आगमानुकूल नहीं है’, अपर पक्षका ऐसा लिखना कहाँतक आगमानुकूल हैं इसका वह स्वयं विचार करे। इस विषयमें बहुवक्तव्य होते हुए भी हम और कुछ नहीं लिखना चाहते।
\५. अपर पक्षने ‘तीन लोकका अधिपतित्व’ को अपनी व्याख्या द्वारा स्वयं उपचरित घोषित कर दिया। फिर भी हमने उसे ‘उपचरित कथन’ लिख दिया तो अपर पक्ष हमारे इस कथनको आगमका विपर्यास बतलाने लगा इसका हमें आश्चर्य है। इस सम्बन्धमें हमने पिछले उत्तरमें क्या लिखा है उसे पुनः उद्धृत कर देते हैं-‘बारहवें गुणस्थानमें सर्वमोहके क्षीण हो जानेपर जो वीतरागभाव होता है वह अरहंत पद ( केवली पद ) का निश्चयनयसे हेतु है। उस समय जो शुभ प्रकृतियोंका कार्य है उसमें इसका उपचार होनेसे उस पुण्यको भी अरहन्त पदका कारण ( उपचारसे ) आगममें कहा गया है।’
हमारा उक्त कथन अपनेमें स्पष्ट है। इसमें न तो कहीं स्व-स्वामिसम्बन्धकी चरचा है और न ही निष्परिग्रह शब्दका ही प्रयोग किया गया है। हम तो इस परसे इतना ही समझे हैं कि कुछ टीका करनी चाहिये, इसलिए अपर पक्षने यह टीका की है।
\६. अपर पक्षने लिखा है कि ‘यदि मिथ्यादृष्टि भी परमार्थकी अपेक्षा व्यवहारधर्मका पालन करता है तो उसके लिए वह सम्यक्त्वकी प्राप्तिका कारण होता है।’ आदि।
समाधान यह है कि प्रकृतमें उक्त वाक्यमें आये हुए ‘परमार्थकी अपेक्षा’ इस पदका क्या अर्थ है यह विचारणीय है। इस वाक्यका अर्थ ‘व्यवहारधर्मको परमार्थ मानकर’ यह तो हो नहीं सकता, क्योंकि आगममें निश्चयधर्मके साथ जो शुभाचार परिणाम होता है उसे व्यवहारधर्म कहा गया है। इसलिए बहुत सम्भव है कि अपर पक्षने उक्त वाक्यका प्रयोग ‘परमार्थको लक्ष्यमें रखकर’ इस अर्थमें किया होगा। यदि यह अर्थ अपर पक्षको इष्ट है तो अपर पक्षके उक्त कथनका यह आशय फलित होता है कि जो सम्यक्त्वको प्राप्त करनेके सन्मुख होता है उसके बाह्यमें परमागमका श्रवण, जीवादि नौ पदार्थोंका भूतार्थरूपसे विचार, वीतराग देवादिकी उपासना-भक्ति आदि पुण्य क्रिया नियमसे होती है। उसके अशुभाचरण नहीं होता, क्योंकि ऐसा व्यक्ति ही शुद्धनयके विषयभूत आत्माके अवलम्बनसे तत्स्वरूप परिणमन द्वारा स्वानुभूति लक्षणवाले सम्यक्त्वको प्राप्त होता है। स्पष्ट है कि यहाँपर सम्यक्त्व प्राप्तिका निश्चय कारण तो शुद्धनयके विषयभूत ज्ञायकस्वभाव आत्माका अवलम्बन होकर उपयोगका तत्स्वरूप परिणमन ही है, बाह्य विकल्परूप पुण्यभाव नहीं। फिर भी बाह्यमें इस जीवकी ऐसी भूमिका होती है, इसलिये शुभाचार या पुण्यभावको उसका व्यवहार हेतु कहा जाता है।
श्री धवला पु० ६ पृ० ४२ में तथा सर्वार्थसिद्धि १-७ में इसी आशयसे सम्यक्त्वके बाह्य साधनोंका निर्देश किया है। सम्यक्त्व प्राप्तिके समय यथासम्भव बाह्य परिकर ऐसा ही होता है इसमें सन्देह नहीं। मुख्यता तो उसकी है जो सम्यक्त्व प्राप्तिका यथार्थ कारण है। वह न हो और बाह्य परिकर हो तो सम्यक्त्व प्राप्त नहीं होता। इसलिए उसकी प्राप्तिका वही निश्चय हेतु है यह अपर पक्षके उक्त कथनसे ही सिद्ध हो जाता है।
\७. ‘सम्यक्त्वकी उत्पत्ति मिथ्यादृष्टिको होती है’ इसका तो हमने निषेध किया नहीं। पर मिथ्यादृष्टि रहते हुए नहीं होती, मिथ्यात्व पर्यायका व्यय होकर ही सम्यक्त्वकी उत्पत्ति होती है ऐसा उसका अर्थ समझना चाहिये। तथा भेदविवक्षामें सम्यक्त्वी भी सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है यह लिखा या कहा जाय तो भी कोई हानि नहीं, क्योंकि द्वितीयादि समयोंमें जो सम्यक्त्व पर्याय उत्पन्न होती है वह सम्यक्त्वीके ही
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होती है आदि । यतः मिथ्यात्व पर्यायका व्यय कर जीव ही सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है, अतः आत्म-स्वभावके सन्मुख हुआ आत्मा ही उसका साधकतम करण और निश्चय कर्ता है यह सिद्ध होता है ।
\८. धवला पु० ६ पृ० ४२७ का ‘कथं जिणबिम्बदंसणं’ इत्यादि वचनद्वारा अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें स्थित जीवपरिणामका निर्देश किया गया है । उसीको जिनबिम्बका देखना कहा गया है, क्योंकि वहींपर मिथ्यात्वादि कर्मके निधत्ति-निकाचित बन्धका विच्छेद होता है । अतएव इस वचनका कर्मशास्त्रके अनुसार अर्थ करना ही उचित है । व्यवहारनयका वक्तव्य इसीको कहते हैं । भावपाहुड़ गाथा १५३ तथा पद्मनन्दिपंचविंशति १४-२ का भी यही आशय है कि जो स्वभाव सन्मुख हो आत्माको प्राप्त करता है उसकी जिनदेवादिमें प्रगाढ़ भक्ति नियमसे होती है ।
\९. अपर पक्षने जो यह लिखा है कि 'जो मिथ्यादृष्टि, .परमार्थको न जानते हुए, मात्र विषयसामग्री तथा सांसारिक सुखकी प्राप्तिके लक्ष्यसे अप्रशस्त रागसहित कुछ शुभ क्रिया करता है और उससे जो पुण्यबन्ध होता है, वह पुण्यभाव तथा पुण्यबन्ध संसारका ही कारण है । आदि ।
सो इस सम्बन्धमें इतना ही कहना है कि अप्रशस्त राग हो और शुभ क्रिया तथा शुभभाव हो यह नहीं हो सकता । यह परस्पर विरुद्ध कथन है । प्रशस्त रागका ही शुभक्रिया तथा शुभभावके साथ अन्वय-व्यतिरेक है, अप्रशस्त रागका नहीं । इसी प्रकार शुभक्रियाका शुभभावके साथ ही अन्वय-व्यतिरेक है, अन्यके साथ नहीं ।
आगममें निदानका उल्लेख अवश्य है, पर उसका यह अर्थ नहीं कि पूजा-भक्ति आदिरूप शुभ परिणाम निदान है । उसके फलस्वरूप पंचेन्द्रियोंके विषयोंकी कामना करना निदान अवश्य है । यहाँ तो केवल प्रश्न इतना ही है कि जो शुभ मन, वचन, कायका व्यापार होता है उससे अल्प ही सही बन्ध होता है या नहीं ? इस विषयमें समस्त परमागमका एकमात्र यही अभिप्राय है कि उससे नरकादि दुर्गतियोंके हेतुभूत पापकर्मका बन्ध न होकर सुगतिके कारणभूत पुण्यकर्मका बन्ध होता है । यह जीव सम्यग्दृष्टि है, इसलिए इस अपेक्षासे उसे परम्परा मुक्तिका हेतु कहना अन्य बात है । इसका आशय तो इतना ही है कि रत्नत्रयपरिणत उक्त जीव मोक्षका पात्र होता है, इसलिए उसके सहचर शुभभावमें भी मोक्षहेतुताका व्यवहार किया जाता है ।
\१०. अपर पक्षका यह लिखना भी ठीक नहीं कि ‘प्रवचनसार प्रथम अध्याय आदि ग्रन्थोंमें मात्र परमार्थको न जाननेवाले मिथ्यादृष्टिके पुण्यको ही पूर्णतया हेय बतलाया गया है ।’ क्योंकि जिसके पुण्यभावमात्रमें उपादेय बुद्धि है वह सम्यग्दृष्टिका लक्षण नहीं है और न उसे परमार्थका जाननेवाला ही कहा जा सकता है । कारण कि जिसकी पुण्यभावमें उपादेय बुद्धि है उसकी उसके फलमें उपादेय बुद्धि न हो यह नहीं हो सकता । अतएव कोतवाल द्वारा पकड़े गये आत्मनिन्दा तत्पर चोरके समान ही वह बाह्य क्रियाओंमें प्रवृत्त होता है । अन्तरंगमें तो वह इन क्रियाओंको करते हुए भी एकमात्र अनन्त सुखके निधान निज परमात्मतत्त्वको ही आश्रय करनेयोग्य मानता है । सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टिमें यही अन्तर है । इसी दृष्टिसे प्रवचनसार गाथा ११ की टीकामें ‘अतः शुद्धोपयोग उपादेयः शुभोपयोगो हेयः’-अतः शुद्धोपयोग उपादेय है और शुभोपयोग हेय है यह वचन कहा गया है । यह प्रवचनसार प्रथम अध्यायका ही वचन है । इसमें सम्यग्दृष्टिके शुभोपयोगको या परमार्थको न जाननेवाले मिथ्यादृष्टिके शुभोपयोगको मात्र हेय बतलाकर शुभोपयोगमात्रको हेय बतलाया गया है । इसी प्रकार प्रवचनसार अ० २ गा० १५६ में सम्यग्दृष्टि कैसी और भावना करता है इसका निर्देश करते हुए जो यह लिखा है कि वह विचार करता है कि मैं अशुभोपयोग शुभोपयोगसे रहित होकर समस्त परद्रव्योंमें मध्यस्थ होता हुआ ज्ञानस्वरूप आत्माको ध्याता हूँ। गाथा इस प्रकार है-
असुहोवओगरहिदो सुहोवजुत्तो ण अण्णदवियम्हि ।
होज्जं मज्झत्थोऽहं णाणप्पगमप्पगं झाए ॥६७॥
यह सम्यग्दृष्टि होकी तो भावना है। श्रुत, गुरूपदेश और युक्तिके बलसे मिथ्यादृष्टि भी परद्रव्यभावोंसे भिन्न आत्माका निर्णय कर जब उक्त प्रकारकी भावना करता हुआ आत्मसन्मुख होकर उसमें लीन होता है तभी तो वह सम्यग्दृष्टि बनता है। सम्यग्दृष्टि बनने या सम्यग्दृष्टि बनकर आगे बढ़नेका इसके सिवाय अन्य कोई मार्ग नहीं है।
समयसार गाथा १४६ में चार प्रकारसे शुभाशुभभाव जीवपरिणाम होकर भी अज्ञानमय भाव होनेसे दोनों एक हैं, इसलिए कारणके अभेदसे दोनोंको एक कर्म बतलाया गया है। दूसरे शुभाशुभ जो द्रव्यकर्म हैं वे दोनों केवल पुद्गलमय होनेसे एक हैं, इसलिए स्वभावके अभेदसे उन दोनोंको एक कर्म कहा गया है। तीसरे इनके योगसे जो शुभाशुभ फल मिलता है वह भी केवल पुद्गलमय होनेसे एक है, इसलिए अनुभवके अभेदसे दोनोंको एक कहा गया है। चौथे शुभ-मोक्षमार्ग केवल जीवमय होनेसे और अशुभ-बन्धमार्ग केवल पुद्गलमय होनेसे उन्हें अनेक बतलाकर भी दोनोंके ही पुद्गलमय बन्धमार्गके आश्रित होनेसे आश्रयके अभेदसे दोनोंको एक कर्म कहा गया है।
इससे स्पष्ट है कि समयसार गाथा १४५ द्वारा शुभाशुभ द्रव्यकर्मोंके समान शुभाशुभरूप दोनों प्रकारके भावकर्मोंका भी निषेध किया गया है और गाथा १४७ में इन दोनोंको स्वाधीनताका विनाश करनेवाला कहा गया है। शुभभाव भी अशुभभावके समान औदयिकभाव तथा उसमें उपयुक्त आत्माका परिणाम है और ‘ओदइया वन्धयरा’ इस सिद्धान्तके अनुसार वह बन्धका ही कारण है, अतः ज्ञानीकी अशुभभावके समान शुभभावमें भी हेय बुद्धि ही होती है ऐसा यहाँ समझना चाहिए, क्योंकि पुरुषार्थकी हीनतावश शुभभाव और तदनुसार व्यापार होना अन्य बात है, किन्तु उसमें हेयबुद्धिका होना अन्य बात है। ज्ञानीके शुभभाव अवश्य होता है और तदनुसार मन, वचन, कायका व्यापार भी होता है इसमें आपत्ति नहीं। किन्तु ऐसा होते हुए भी उसकी उसमें हेयबुद्धि बनी रहती है तो ही वह मार्गस्थ है-ज्ञान, वैराग्यसम्पन्न है यह उक्त कथनका तात्पर्य है।
इस प्रकार प्रस्तुत प्रतिशंकाका सर्वाङ्ग समाधान किया।