जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा, शंका-समाधान १ से १७ | Jaipur (Khaniya) Tattvacharcha

शंका १३, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६७२ से ६९१

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प्रतिशंका ३ का समाधान

\१. सारांश

हमने प्रथम उत्तरमें यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘पुण्य और पाप इन दोनोंका आस्रव और बन्धतत्त्वमें अन्तर्भाव होता है।’ साथ ही यह भी बतला दिया था कि ‘अशुभ कर्मका फल किसीको इष्ट नहीं हैं, इसलिए उसकी इच्छा तो किसीको नहीं होती। किन्तु पुण्यकर्मके फलका प्रलोभन छूटना बड़ा कठिन है, इसलिए प्रत्येक भव्यप्राणीकी मोक्षमार्गमें रुचि उत्पन्न हो और पुण्य अथा पुण्यके फलमें अटक न जाय इस अभिप्रायसे सभी आचार्य उसकी विविध शब्दों द्वारा निन्दा करते आ रहे हैं। यह शास्त्रोक्त है।’

अपर पक्षने अपनी प्रतिशंका २ में अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ‘हमारा प्रश्न पुण्य आचरणके विषयमें था।’ इसके बाद कुछ आगम प्रमाण देकर उसका समर्थन किया है।

अपने दूसरे उत्तरमें हमने उक्त प्रतिशंका पर सांगोपांग विचार कर अन्तमें अपर पक्षके शब्दोंको ध्यानमें रख कर ही यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘जितना रागांश है उससे आस्रव-बन्ध होता है और जितना शुद्धयंश है उससे संवर निर्जरा होती है।’ उक्त प्रतिशंकामें सारांश लिखते हुए इस तथ्यको अपर पक्षने भी स्वीकार कर लिया है।

\२. प्रतिशंका ३ के आधारसे विचार

प्रतिशंका ३ को प्रारम्भ करते हुए अपर पक्षने लिखा है-‘यह प्रश्न जीवके पुण्यभावकी अपेक्षासे है इस बातको हमने अपने प्रपत्र २में स्पष्ट भी कर दिया था तथा यह भी स्पष्ट कर दिया था कि शुभोपयोग, पुण्यभाव, व्यवहारधर्म एवं व्यवहारचारित्र ये एकार्थवाची शब्द हैं। फिर भी आपने पुण्यरूप द्रव्यकर्मकी अपेक्षासे ही उत्तर प्रारम्भ किया है।’

समाधान यह है कि हमने जो उत्तर दिया है वह सबके सामने है, अतः उसमें तो हम नहीं जावेंगे। यहाँ मूल शंका और अपर पक्षके इस वक्तव्य पर अवश्य ही विचार करेंगे।

अपर पक्षने यह प्रश्न प्रवचनसार गाथा ४५ (पुण्णफला अरहंता ) के आधारसे निबद्ध किया था इसमें सन्देह नहीं, क्योंकि मूल प्रश्नमें ही अपर पक्षने इस गाथाके प्रथम पादका उल्लेख किया है। प्रवचनसारमें यह गाथा क्यों लिखी गई है इसके लिए गाथा ४३-४४ के संदर्भमें इसके आशयको समझना होगा। गाथा ४३ में ‘संसारी जीवोंके उदयगत कर्मांश जिनवरने नियमसे कहे हैं। उनमें मोही, रागी और द्वेषी होता हुआ यह जीव बन्धका अनुभव करता है’ यह कहा गया है। इसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं कि 'इससे सिद्ध है कि क्रिया और क्रियाका फल मोहोदयसे अर्थात् मोहके उदयमें युक्त होनेके कारण होता है, ज्ञानसे नहीं होता अर्थात् ज्ञानस्वभावमें युक्त होनेके कारण नहीं होता-अतो मोहोदयात् क्रिया-क्रियाफले, न तु ज्ञानात्।

इस पर यह शंका होने पर कि अरिहन्तोंके क्रिया तो देखी जाती है पर उसका फल नहीं देखा जाता सो क्यों? भगवान् कुन्दकुन्दने इन्हीं दो प्रश्नोंका ४४ और ४५ संख्याक गाथाओं द्वारा उत्तर दिया है।

इससे स्पष्ट है कि प्रकृत मूल प्रश्नमें ‘पुण्णफला’ पदमें आये हुए ‘पुण्य’ पदसे पुण्यरूप द्रव्यकर्मका उदय ही गृहीत है। गमनादि क्रियाको गाथा ४५के पूर्वार्ध द्वारा औदयिक स्वीकार करनेका भी यही आशय है। ऐसा मालूम पड़ता है कि अब अपर पक्ष तीर्थंकर प्रकृति आदि पुण्य कर्मोंके उदयको दृष्टि ओझल करके अन्य मार्गसे अपने पक्षको जीवित बनाये रखना चाहता है। अन्यथा वह पक्ष मूल प्रश्न जिस आशयसे किया गया है वहीं तक अपनेको सीमित रखकर अपने विचार प्रस्तुत करता और उन्हींकी पुष्टिमें शास्त्राधार भी उपस्थित करता। अस्तु,

हमने पिछले उत्तरमें लिखा था-‘सम्यग्दृष्टि जीवके भेदविज्ञानकी जागृतिके साथ-साथ पापविरक्ति रूप शुभप्रवृत्ति होती है।’ इस पर अपर पक्षका कहना है कि ‘इस मिश्रित अखण्ड पर्यायका नाम शुभोपयोग है। इसमें प्रशस्त राग भी है तथा सम्यक्त्व व पापोंसे विरक्तिरूप चित्तकी निर्मलता भी है।’

अपने इस विचारकी पुष्टिमें अपर पक्षने पंचास्तिकाय गाथा १३१ की टीकाको उपस्थित किया है। इसमें ‘प्रशस्त राग और चित्तप्रसाद जहाँ है वहाँ शुभ परिणाम हैं’ यह कहा गया है। अब आगममें इन दोनों शब्दोंका क्या अर्थ किया है इस पर विचार करना है। आचार्य कुन्दकुन्दने पंचास्तिकाय गाथा १३५ में प्रशस्त राग, अनुकम्पापरिणति और चित्तकी अकुलषता इन तीनको शुभ परिणाम कहा है। इन तीनोंका अर्थ करते हुए आचार्य जयसेन इसकी टीकामें लिखते हैं-

अथ निरास्रवशुद्धात्मपदार्थात्प्रतिपक्षभूतं शुभास्रवमाख्याति-रागो जस्स पसत्थो-रागो यस्य प्रशस्तः वीतरागपरमात्मद्रव्याद्विलक्षणः पंचपरमेष्ठि-निर्भरगुणानुरागरूपः प्रशस्तधर्मानुरागः। अणुकंपासंसिदो य परिणामो-अनुकम्पासंश्रितश्च परिणामः दयासहितो मनोवचनकायव्यापाररूपः शुभपरिणामः। चित्तम्हि णत्थि कलुसो-चित्ते नास्ति कालुष्यं मनसि क्रोधादिकलुषपरिणामो नास्ति। पुण्णं जीवस्स आसवदि-यस्यैते पूर्वोक्ता त्रयः शुभपरिणामाः सन्ति तस्य जीवस्य द्रव्यपुण्यास्रवकारणभूतं भावपुण्यमास्रवतीति सूत्राभिप्रायः।

अब निरास्रव शुद्ध आत्मपदार्थसे प्रतिपक्षभूत शुभास्रवका व्याख्यान करते हैं-रागो जस्स पसत्थो-राग जिसका प्रशस्त है अर्थात् जिसका वीतराग परमात्मा द्रव्यसे विलक्षण जो पंच परमेष्ठीमें अत्यन्त गुणानुरागरूप प्रशस्त धर्मानुराग है। अणुकंपासंसिदो य परिणामो-जिसका अनुकम्पा युक्त परिणाम है अर्थात् जिसका दया सहित मन, वचन, कायके व्यापाररूप शुभ परिणाम है तथा चित्तम्हि णत्थि कलुसो-जिसके चित्तमें कलुषता नहीं है अर्थात् क्रोधादिरूप कलुष परिणाम नहीं है। पुण्णं जीवस्स आसवदि-जिसके पूर्वोक्त ये तीन शुभ परिणाम हैं उस जीवके द्रव्य पुण्यके आस्रवका निमित्तभूत भावपुण्यास्रव है यह मूल गाथाका तात्पर्य है।

यहाँपर ‘वीतरागपरमात्मद्रव्यसे विलक्षण’ यह विशेषण उक्त तीनों परिणामोंपर लागू होता है।

इससे स्पष्ट है कि शुभ परिणाम, शुभ भाव या शुभोपयोग उक्त विधिसे तीन प्रकारका ही होता है-१. अरिहन्तादिविषयक प्रशस्त राग, २. दयापरिणाम अर्थात् अणुव्रत-महाव्रतादिरूप शुभ परिणाम और ३. चित्तमें-क्रोधादिरूप कलुषताका न होना ।

प्रशस्त राग क्या है इसकी व्याख्या करते हुए स्वयं आचार्य कुन्दकुन्द पंचास्तिकाय गाथा १३६ में लिखते हैं-

अरहंतसिद्धसाहुसु भत्ती धम्मम्मि जा य खलु चेट्ठा ।
अणुगमणं पि गुरूणं पसत्थरागो त्ति वुच्चंति ॥ १३६ ॥

अरिहन्त, सिद्ध और साधुओंमें भक्ति, धर्ममें नियमसे चेष्टा तथा गुरुओंका अनुगमन करना यह सब प्रशस्त राग कहलाता है ॥ १३६ ॥

यहाँपर धर्म पदसे व्यवहार चारित्रका अनुष्ठान लिया गया है ।

आचार्य अमृतचन्द्र इसकी टीकामें लिखते हैं-

अयं हि स्थूललक्ष्यतया केवलभक्तिप्रधानस्याज्ञानिनो भवति । उपरितनभूमिकायामलब्धास्पदस्यास्थानरागनिषेधार्थं तीव्ररागज्वरविनोदार्थं वा कदाचिज्ज्ञानिनोऽपि भवति ।

यह ( प्रशस्त राग ) स्थूल लक्ष्यवाला होनेसे केवल भक्तिप्रधान अज्ञानीके होता है । तथा उपरितन भूमिकामें स्थिति न प्राप्तकी हो तब अस्थान राग ( इन्द्रियादि विषयक राग ) का निषेध करनेके लिए अथवा तीव्र रागज्वरका परिहार करनेके लिए कदाचित् ज्ञानीके भी होता है ॥१३६॥

जयसेनाचार्यके शब्दोंमें इसका आशय यह है-

तत्प्रशस्तरागमज्ञानी जीवो भोगाकांक्षारूपनिदानबन्धेन करोति, स ज्ञानी पुनर्निर्विकल्पसमाध्यभावे विषयकषायरूपाशुभरागविनासार्थं करोतीति भावार्थः ।

उस प्रशस्त रागको अज्ञानी जीव भोगाकांक्षारूप निदानबन्धके साथ करता है । किन्तु ज्ञानी जीव निर्विकल्प समाधिके अभावमें विषयकषायरूप अशुभ रागका विनाश करनेके लिए करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।

इसी प्रकार आचार्य कुन्दकुन्दने अनुकम्पा क्या है इसका निर्देश आगे १३७ वीं गाथामें किया है ।

अतएव इन प्रमाणोंसे स्पष्ट है कि अपर पक्ष सम्यग्दर्शन व सम्यक्चारित्ररूप शुद्धिके साथ कषायकी जिस मिश्रित अखण्ड पर्यायकी कल्पना कर उसे शुभभाव या शुभोपयोग कहना चाहता है वह ठीक नहीं है । यह उस पक्षकी अपनी कल्पना है । आगमका यह आशय नहीं है ।

जब यह जीव संसारके प्रयोजनभूत पंचेन्द्रियोंके विषयों आदिमें उपयुक्त रहता है तब अशुभोपयोग होता है, जब पंच परमेष्ठी आदिकी भक्ति-स्तुति आदिमें, व्रतोंके पालनेमें तथा अन्य शुभ प्रवृत्तिमें उपयुक्त रहता है तब शुभोपयोग होता है और जब विज्ञानघनस्वरूप अपने आत्मामें उपयुक्त होता है तब शुद्धोपयोग होता है । प्रवचनसार गाथा ९ का यही आशय है । जीव उपयोगलक्षणवाला है । वह अपने इस लक्षणसे सदा अनुगत रहता है यह उक्त गाथामें बतलाया गया है । हम अभी प्रवचनसार गाथा ४३ का आशय लिख आये हैं । उसके साथ इस गाथाको पढ़ने पर इसका आशय स्पष्ट हो जाता है ।

यह अपर पक्ष ही स्वीकार करेगा कि पर्याय दो ही प्रकारकी होती है-स्वभावपर्याय और विभावपर्याय । सम्यग्दर्शन यह श्रद्धागुणकी स्वभाव पर्याय है । यह चारित्रगुणकी पर्यायसे भिन्न है, इसलिए इसके साथ तो चारित्र गुणकी मिश्रित अखण्ड पर्याय बन नहीं सकती । चारित्र गुणकी अवश्य ही संयमासंयम और संयमरूप मिश्र पर्याय होती है, क्योंकि उसमें शुद्धयंश और अशुद्धयंश दोनोंका युगपत् सद्भाव होता है । उसमें जो शुद्धयंश है वह स्वयं संवर-निर्जरास्वरूप होनेसे संवर-निर्जराका कारण भी है । पण्डितप्रवर दौलतराम जी छहढालाके मंगलाचरणमें इसीकी स्तुति करते हुए लिखते हैं-

तीन भुवनमें सार वीतराग-विज्ञानता ।
शिवस्वरूप शिवकार नमहुँ त्रियोग सम्हारिके ॥१॥

यह अपने प्रतिपक्षभूत अशुद्धयंशका व्यय होकर उत्पन्न हुई है, इसलिए इसका स्वयं संवर-निर्जरा स्वरूप होकर संवर-निर्जराका कारण बनना युक्त ही है ।

तथा उस मिश्र पर्यायमें जो अशुद्धिअंश शेष है वह स्वयं अशुद्धिस्वरूप होनेसे आस्रव-बन्धरूप है और आस्रव बन्धका कारण भी है ।

इस प्रकार शुद्धपर्याय और अशुद्ध पर्यायके भेदसे जहाँ पर्याय दो प्रकारकी है वहाँ विषयभेदसे उपयोग तीन प्रकारका है-अशुभोपयोग, शुभोपयोग और शुद्धोपयोग । जब इस जीवका परलक्षी उपयोग होता है तब वह नियमसे मोह, राग या द्वेषसे अनुरंजित होकर प्रवर्तता है । उपयोगके शुभ और अशुभ इन दो भेदोंके होनेका यही कारण है । उनमेंसे इन्द्रियविषयोंमें अनुरक्त होना अशुभोपयोग है । कारण स्पष्ट है । तथा उक्त तीन प्रकारकी शुभ प्रवृत्तियोंमें उपयुक्त होना शुभोपयोग है । है तो यह भी रागसे अनुरंजित ही, उससे बहिर्भूत नहीं है । परन्तु इसमें जिन्होंने मुक्ति प्राप्त की है या मुक्तिमार्गका अनुसरण कर रहे हैं उनके प्रति अनुरागकी मुख्यता है, इसलिए इसे अशुभोपयोगमें परिगणित न कर उससे भिन्न बतलाया है । इनमेंसे अशुभोपयोग मुख्यतया मिथ्यादृष्टिके होता है और शुभोपयोग यथायोग्य सम्यग्दृष्टिके होता है । सम्यग्दृष्टिके अशुभोपयोगकी गौणता है, किन्तु सम्यग्दृष्टिके मात्र शुभोपयोग ही होता हो यह बात नहीं है, उनके शुद्धोपयोग भी होता है, क्योंकि सम्यग्दृष्टि निरन्तर आत्मस्वभावका अवलम्बन कर प्रवर्तना ही अपना प्रधान कर्तव्य समझता है । उसके अशुभके परिहार स्वरूप शुभप्रवृत्ति होती है, परन्तु उसे बन्धका कारण जान हेयबुद्धिसे ही वह उसमें प्रवर्तता है । सम्यग्दृष्टिके शुभ प्रवृत्तिका होना अन्य बात है और उसके शुभप्रवृत्तिके होते हुए भी उसमें हेय बुद्धिका बना रहना अन्य बात है । सम्यग्दृष्टि मोक्षके साक्षात् साधनभूत आत्मस्वभावको ही उपादेय समझता है, इसलिए उसकी उसके सिवाय अन्य सबमें स्वभावतः हेयबुद्धि बनी रहती है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।

इस प्रकार शुभोपयोग क्या है और वह पुण्यभाव, व्यवहारधर्म एवं व्यवहार चारित्ररूप कैसे है यह स्पष्ट हो जाने पर अपर पक्षकी इस कल्पनाका अपने आप निरास हो जाता है कि ‘शुभोपयोग या शुभ भाव सम्यक्त्व व चारित्रकी मिश्रित अखण्ड पर्यायरूप है ।’

अपर पक्षका कहना है कि ‘उस शुभ भाव या व्यवहार धर्ममें भी लक्ष्य या ध्येय वीतरागता एवं शुद्ध अवस्था अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति ही रहती है । पर्यायकी निर्बलताके कारण वह जीव वीतरागतामें स्थित नहीं हो पाता है । इस कारण उसको राग व विकल्प करने पड़ते हैं । किन्तु उस राग या विकल्पद्वारा भी वह वीतरागताको ही प्राप्त करना चाहता है ।’ आदि ।

समाधान यह है कि सर्व प्रथम तो अपर पक्षको यह ध्यानमें लेना है कि राग या विकल्प विरुद्ध स्वभाववाले हैं और उनसे वीतरागता विरुद्ध स्वभाववाली है, क्योंकि राग या विकल्पका अन्वय-व्यतिरेक परके साथ है और वीतरागताका अन्वय-व्यतिरेक आत्मस्वभावके साथ है। इसलिए सर्वप्रथम तो यह निर्णय करना आवश्यक है कि मुझे सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रयस्वरूप आत्मधर्मकी प्राप्ति आत्म-स्वभावके लक्ष्यसे तत्स्वरूप परिणमन द्वारा ही होगी, राग या विकल्प द्वारा त्रिकालमें प्राप्त नहीं होगी।

अपर पक्ष कह सकता है कि आत्मस्वभावके लक्ष्यसे तत्स्वरूप परिणमन द्वारा वीतरागताकी प्राप्ति होती है, ऐसा विचार करना भी तो विकल्प ही है? समाधान यह है कि इसमें भेद विज्ञानकी मुख्यता है और रागकी गौणता है, इसलिए स्वभावकी दृढ़ता होनेसे वह विकल्प स्वयं छूट जाता है और आत्मा स्वभाव-सन्मुख हो तत्स्वरूप परिणम जाता है। इसीका नाम है आत्मानुभूति। यह निराकुल आत्मसुखस्वरूप होनेसे स्वयं वीतरागतास्वरूप है।

दूसरे अपर पक्षने जब कि व्यवहारधर्ममें मोक्षप्राप्तिको लक्ष्य स्वीकार किया है। ऐसी अवस्थामें उस पक्षको निर्विवादरूपसे उसके स्थानमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसकी प्राप्तिका साक्षात् साधन भूतार्थनयका विषयभूत आत्माका आश्रय करना ही उपादेय है, अन्य सब हेय है। जैसे संसारमें रहते हुए भी मोक्षकी साधना तभी होती है जब संसारमें हेयबुद्धि हो जाती है। इसी प्रकार व्यवहार धर्मरूप प्रवर्तते हुए भी जिसकी उसमें हेय बुद्धि हो जाती है वही स्वभावके आलम्बन द्वारा तत्स्वरूप परिणमनरूप मोक्षका अधिकारी बनता है, अन्य नहीं। व्यवहारधर्म स्वयं आत्माका कर्तव्य नहीं है। वह तो पुरुषार्थहीनता का फल है।

तीसरे अपर पक्षने ‘उस शुभ भाव या व्यवहार धर्ममें भी लक्ष्य या ध्येय वीतरागता एवं शुद्ध अवस्था अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति ही रहती है।’ यह वचन लिखकर आत्माके पंचपरमेष्ठी विषयक या व्रतादि विषयक विकल्पको शुभभाव या व्यवहार धर्म कहते हैं इस तथ्यको स्वयं स्वीकार कर लिया है। अतएव अपर पक्षने सम्यक्त्व व चारित्रकी मिश्रित अखण्ड पर्यायको व्यवहार धर्म कहते हैं इस मान्यताको छोड़कर यही स्वीकार कर लेना चाहिए कि व्रतादिरूप जीवकी शुभ प्रवृत्ति या शुभ विकल्पको ही आगममें व्यवहार धर्म कहा है। वह रागानुरंजित जीवका परिणाम होनेसे बन्धका ही कारण है।

यहाँ पर यह शंका होती है कि उपयोगके समान पर्यायको भी विभाव पर्याय, स्वभाव पर्याय और मिश्र पर्याय ऐसा तीन प्रकारका माननेमें आपत्ति ही क्या है? समाधान यह है कि जिसे चारित्रकी मिश्र पर्याय कहते हैं उसमें जितना शुद्ध्यंश है वह स्वप्रत्यय जीवकी अवस्था है, क्योंकि वह स्वभावके लक्ष्यसे अपनी प्रतिपक्षी अवस्थाका नाश कर उत्पन्न हुई है और जितना अशुद्ध्यंश है वह स्व-परप्रत्यय जीवकी अवस्था है, क्योंकि वह परके लक्ष्यसे अपनी पूर्व प्रवृत्त विकाररूप अवस्थाके अनुरूप उत्पन्न हुई है, इसलिए शुद्ध्यंशका स्वभावपर्यायमें और अशुद्ध्यंशका विभाव पर्यायमें अन्तर्भाव हो जानेके कारण हमने पर्यायको दो ही प्रकारका बतलाया है। आगममें भी पर्यायको दो ही प्रकारका बतलाया है। प्रवचनसार गाथा ९३ में गुण पर्यायके इन भेदोंको बतलाते हुए लिखा है-

सोऽपि द्विविधः-स्वभावपर्यायो विभावपर्यायश्च।

वह गुणपर्याय भी दो प्रकारकी है-स्वभाव पर्याय और विभाव पर्याय।

आलापपद्धतिमें भी लिखा है-

गुणविकाराः पर्यायाः। ते द्वेधा-स्वभाव-विभावपर्यायभेदात्।

गुणविकारका नाम पर्याय है। वे स्वभावपर्याय और विभावपर्यायके भेदसे दो प्रकारकी हैं।

इसी तथ्यको नयचक्रादिसंग्रह पृ० २६ आदिमें स्पष्ट किया है। वहाँ लिखा है-

सब्भावं खु विहावं दव्वाणं पज्जयं जिणुद्दिट्ठं।
सव्वेसिं च सहावं विब्भावं जीव-पुग्गलाणं च ॥१८॥

जिनदेवने द्रव्योंकी पर्यायें दो प्रकारकी कही हैं-स्वभावपर्याय और विभावपर्याय। स्वभावपर्याय सब द्रव्योंकी होती हैं। विभावपर्याय मात्र जीवों और पुद्गलोंमें होती हैं ॥१८॥

आगे जीवमें विभाव गुणपर्यायोंका निर्देश करते हुए लिखा है-

मदिसुदओहीमणपज्जयं च अण्णाण तिण्णि जे भणिया।
एवं जीवस्स इमे विहावगुणपज्जया सव्वे ॥२४॥

आगममें जो मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ये चार ज्ञान और तीन अज्ञान कहे गये हैं ये सब जीवकी विभाव गुणपर्याय हैं ॥२४॥

जीवके मिथ्यात्व व रागादि विभाव गुणपर्याय हैं यह तो स्पष्ट ही है, इसलिए उनका यहाँ उल्लेख नहीं किया।

जीवकी स्वभावगुणपर्यायोंका निर्देश करते हुए वहाँ लिखा है-

णाणं दंसणं सुह वीरियं च जं उहयकम्मपरिहीणं।
तं सुद्धं जाण तुमं जीवे गुणपज्जयं सव्वं ॥२६॥

जो द्रव्य-भाव दोनों प्रकारके कर्मोंसे रहित ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्यपर्याय होती हैं उन सबको तुम जीवकी शुद्ध (स्वभाव) गुणपर्याय जानो ॥२६॥

इससे स्पष्ट है कि आगममें समस्त पर्यायोंका विचार दो ही प्रकारसे किया गया है।

पुरुषार्थसिद्धयुपायमें जो २१२, २१३ और २१४ श्लोक लिखे हैं उनमें बतलाया है कि जितने अंशमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र है उतने अंशमें बन्धन नहीं है और जितने अंशमें राग है उतने अंशमें बन्धन है।

प्रवचनसार गाथा १८०-१८१ में लिखा है-

परिणामसे बन्ध है। जो परिणाम राग, द्वेष और मोहसे युक्त है। उसमें मोह और द्वेषरूप परिणाम अशुभ है तथा शुभ और अशुभरूप राग है ॥१८०॥ इनमेंसे अन्य (अरिहन्तादि) के विषयमें जो शुभ परिणाम होता है उसे पुण्य कहते है तथा इन्द्रिय विषय आदि अन्यके विषयमें जो अशुभ परिणाम होता है उसे पाप कहते हैं और जो अन्यको लक्ष्यकर परिणाम नहीं होता है उसे आगममें दुःखके क्षयका कारण बतलाया है ॥१८१॥

गाथा १८१ की टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र उक्त विषयको स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-

द्विविधस्तावत् परिणामः-परद्रव्यप्रवृत्तः स्वद्रव्यप्रवृत्तश्च। तत्र परद्रव्यप्रवृत्तः परोपरक्तत्वाद्विशिष्टः परिणामः। स्वद्रव्यप्रवृत्तस्तु परानुपरक्तत्वादविशिष्टपरिणामः। तत्रोक्तौ-द्वौ विशिष्टपरिणामस्य विशेषौ-शुभपरिणामोऽशुभपरिणामश्च। तत्र पुण्यपुद्गलबन्धकारणत्वात् शुभपरिणामः पुण्यम्, पापपुद्गलबन्ध-
कारणत्वादशुभपरिणामः पापम् । अविशिष्टपरिणामस्य तु शुद्धत्वेनैकत्वान्नास्ति विशेषः । स काले संसारदुःखहेतुकर्मपुद्गलक्षयकारणत्वात्संसारदुःखहेतुकर्मपुद्गलक्षयात्मको मोक्ष एव ॥१८१॥

प्रथम तो परिणाम दो प्रकारका है- परद्रव्यप्रवृत्त और स्वद्रव्यप्रवृत्त । इनमेंसे परद्रव्यप्रवृत्त परिणाम परमें उपरक्त होनेसे विशिष्ट परिणाम है और स्वद्रव्यप्रवृत्त परिणाम परमें उपरक्त न होनेसे अविशिष्ट परिणाम है । उनमेंसे विशिष्ट परिणामके पूर्वोक्त दो भेद हैं-शुभ परिणाम और अशुभ परिणाम । उनमेंसे पुण्यरूप पुद्गलके बन्धका कारण होनेसे शुभ परिणाम पुण्य है और पापरूप पुद्गलके बन्धका कारण होनेसे अशुभ परिणाम पाप है । अविशिष्ट परिणाम तो शुद्ध होनेसे एक है, उसमें भेद नहीं है । वह स्वकालमें संसार दुःखके हेतुभूत कर्मपुद्गलके क्षयका कारण होनेसे संसार दुःखके हेतु कर्मपुद्गलके क्षयरूप मोक्ष ही है ॥१८१॥

आचार्य जयसेनने इसी गाथाकी टीकामें एक महत्त्वपूर्ण प्रश्नको उपस्थित कर उसका समाधान किया है । प्रश्न है कि-

नयविवक्षामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषायतक सभी गुणस्थानोंमें तो अशुद्ध निश्चयनय होता ही है अर्थात् अशुद्ध पर्याययुक्त जीव रहता ही है । इसलिए वहाँ अशुद्ध निश्चयमें शुद्धोपयोग कैसे प्राप्त होता है ? यह प्रश्न है इसका समाधान करते हुए वे लिखते हैं-

वस्त्वेकदेशपरीक्षा तावन्नयलक्षणं शुभाशुभशुद्धद्रव्यावलम्बनमुपयोगलक्षणं चेति, तेन कारणेनाशुद्धनिश्चयमध्येऽपि शुद्धात्मावलम्बनत्वात् शुद्धध्येयत्वात् शुद्धसाधकत्वाच्च शुद्धोपयोगपरिणामो लभ्यत इति नयलक्षणमुपयोगलक्षणं च यथासम्भवं सर्वत्र ज्ञातव्यम् ।

वस्तुके एकदेशकी परीक्षा तो नयका लक्षण है तथा शुभ, अशुभ और शुद्धद्रव्यका अवलम्बन उपयोगका लक्षण है । इस कारण अशुद्धनिश्चयस्वरूप आत्माके होनेपर भी शुद्ध आत्माका ( शुद्धनयका विषयभूत आत्माका ) अवलम्बन होनेसे; शुद्ध ( चिच्चमत्कारस्वरूप-त्रिकाली ज्ञायक आत्मा ) ध्येय होनेसे तथा शुद्ध ('सम्यग्दर्शनादि स्वभावपर्यायरूप ) आत्माका साधक होनेसे वहाँ भी शुद्धोपयोगरूप परिणाम प्राप्त हो जाता है । इस प्रकार नयके लक्षण और उपयोगके लक्षणको यथासम्भव सर्वत्र जानना चाहिये ।

इस प्रकार इतने विवेचनसे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि आगममें सर्वत्र परावलम्बी प्रशस्त रागसे अनुरंजित परिणामको ही शुभोपयोग कहा है । सम्यक्त्व युक्त मिश्रित अखण्ड एक पर्यायको नहीं । तथा इससे यह भी ज्ञात हो जाता है कि पुण्यभाव, व्यवहारधर्म या व्यवहारचारित्र इसी शुभोपयोगके पर्याय नाम हैं और यह परावलम्बी भाव होनेसे नियमसे बन्धका हेतु है ।

शुभोपयोगमें वीतराग देव, वीतराग गुरु और वीतरागताका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंका श्रद्धान, ज्ञान एवं पूजा, स्तुति, सत्कार सेवा परिणाम होता ही है इसमें सन्देह नहीं । परन्तु यह परावलम्बी भाव होनेसे इस अवस्थामें भी वह स्वावलम्बी भावके प्रति ही आदरवान् बना रहता है । यदि वह उस अवस्थामें अपने लक्ष्यको भूल जाय तो उसी समय वह नियमसे मिथ्यादृष्टि हो जाता है ।

स्वभावकी प्राप्ति तो नियमसे स्वभावके अवलम्बनस्वरूप उपयोगके होनेपर ही होती है, परके अवलम्बनरूप उपयोगसे नहीं । ऐसी श्रद्धा तो सम्यग्दृष्टिके होती ही है । फिर भी सम्यग्दर्शनादिरूपसे परिणत आत्माके सविकल्पदशामें वीतराग देवादिके प्रति भक्ति-श्रद्धारूप विकल्पका और योगप्रवृत्तिका नियमसे उत्थान होता है । वह ( व्यवहारधर्म ) भेदविज्ञानके कारण प्राप्त शुद्धिमें क्षति नहीं कर सकता, क्योंकि उसका सहचारी भाव है। मात्र इस अभिप्रायसे उसमें निमित्त व्यवहार किया जाता है। उसे साधक कहनेका यही तात्पर्य है। वह आत्मशुद्धिको उत्पन्न करता है ऐसा अभिप्राय इससे नहीं लेना चाहिये। सम्यग्दृष्टि जीव सदा अरिहन्तादिका पूजक क्यों नहीं बना रहना चाहता इसका कारण भी यही है। अपर पक्षको इस दृष्टिकोणसे विचार करना चाहिये। इससे वस्तुस्थितिके स्पष्ट होनेमें देर नहीं लगेगी। अपर पक्षने समाधितन्त्रका प्रमाण उपस्थित कर उसपरसे यह निष्कर्ष फलित किया है कि ‘भगवान्‌की उपासना उपासकको भगवान् ही बना देती है।’

समाधान यह है कि यदि अपर पक्ष उस वचनका यह आशय समझता है तो वह पक्ष ‘उसका भाव यह नहीं कि मैं सदा इसी प्रकार पूजक बना रहूँ।’ ऐसा लिखकर भगवान्‌की उपासनाका निषेध ही क्यों करता है ? जब कि भगवान्‌की उपासनासे ही उपासक भगवान् बन जाता है तो उसे परम ध्यान आदिरूप परिणत होनेका भाव नहीं करके मात्र भगवान्‌की उपासना करनी चाहिए, क्योंकि उसीसे वह भगवान् बन जायगा ?

यदि अपर पक्ष इसे नयवचन समझता है तो उसे समाधिशतकसे उक्त वचनके उसी आशयको ग्रहण करना चाहिए जिसका प्रतिपादन उसमें किया गया है। अपर पक्षने इस वचनके साथ श्लोक ९८ पर दृष्टिपात किया ही होगा। इन दोनोंको मिलाकर पढ़नेपर क्या तात्पर्य फलित होता है इसके लिए समयसार कलशके इस काव्यपर दृष्टिपात कीजिए-

एष ज्ञानघनो नित्यमात्मा सिद्धिमभीप्सुभिः।
साध्य-साधकभावेन द्विधैकः समुपास्यताम् ॥१५॥

साध्य-साधकभावके भेदसे दो प्रकारका एक यह ज्ञानस्वरूप आत्मा, स्वरूपकी प्राप्तिके इच्छुक पुरुषोंको नित्य सेवन करने योग्य है, उसका सेवन करो ॥१५॥

इसका भावार्थ लिखते हुए पण्डितप्रवर राजमलजी लिखते हैं-

भावार्थ इसौ-जु एक ही जीवद्रव्य कारणरूप तो अपुनपै ही परिणमै छै, कार्यरूप तो अपुनपै ही परिणवै छै। तिहितैं मोक्ष जातां कोई द्रव्यान्तरको सारो नहीं। तिहितैं शुद्धात्मानुभव कीजै।

इसका चालू हिन्दीमें अनुवाद है-

भावार्थ इस प्रकार है कि एक ही जीवद्रव्य कारणरूप भी अपनेमें ही परिणमता है और कार्यरूप भी अपनेमें ही परिणमता है। इस कारण मोक्ष जानेमें किसी द्रव्यान्तरका सहारा नहीं है, इसलिए शुद्ध आत्माका अनुभव करना चाहिये।

मोक्षप्राभृत गाथा ४८ में परमात्मा पदका अर्थ ‘ज्ञानघनस्वरूप निज आत्मा है। उसका ध्यान करनेसे अर्थात् तत्स्वरूप हो जानेसे यह जीव सब दोषोंसे मुक्त हो जाता है और उसके नये कर्मोंका आस्रव नहीं होता।’ ऐसा किया है।

अपर पक्षने प्रवचनसार गाथा ८० को उपस्थितकर इसका अर्थ भर दे दिया है और इसके बाद उसे स्पर्श किये बिना व्यापारीका उदाहरण देकर अपने अभिमतका समर्थन किया है। गाथामें यह कहा गया है कि जो अरिहन्तको जानता है वह अपने आत्माको जानता है। अर्थात् अरिहन्तका ज्ञान अपने आत्माका ज्ञान करनेमें निमित्त है। इसमें यह तो कहा नहीं गया है कि जो अरिहन्तके अवलम्बनसे पूजा-भक्तिरूप प्रवर्तता रहता है उसके परमात्मस्वरूप ज्ञायकभावके अवलम्बनरूपसे न प्रवर्तने पर भी मोहका समूल नाश हो जाता है। स्पष्ट है कि इस गाथाका आशय ही इतना है कि द्रव्य, गुण और पर्यायरूपसे जो अरिहन्तको जान लेता है उसे उस रूपसे अपने आत्माका ज्ञान नियमसे हो जाता है, क्योंकि निश्चयनयसे अरिहन्तके स्वरूपमें और अपने स्वरूपमें अन्तर नहीं है। जो आत्मा इस प्रकार आत्मस्वरूपको जानकर तत्स्वरूप परिणमता है उसका मोह नियमसे विलयको प्राप्त होता है यह तथ्य उक्त गाथामें प्ररूपित किया गया है। इसलिए इस परसे अपर पक्षने जो आशय लिया है वह ठीक नहीं है।

अपर पक्षने व्यापारका उदाहरण उपस्थित किया है, किन्तु उससे भी यही सिद्ध होता है, कि राग, द्वेष, मोहरूप परिणमन आत्माको हानि है, उससे आत्मलाभ होना सम्भव नहीं है।

समयसार गाथा १२ में यह नहीं कहा गया है कि व्यवहारधर्मसे परमार्थकी प्राप्ति होती है, अतः इससे भी अपर पक्षके अभिप्रायका समर्थन नहीं होता। अपर पक्षने यहाँ जो उक्त गाथाका भावार्थ उद्धृत किया है उसका आशय स्पष्ट है। यथापदवी व्यवहार प्रयोजनवान् है इसका निषेध नहीं। निषेध यदि किसी बातका है तो व्यवहारके अवलम्बनसे परमार्थकी प्राप्ति होती है इसका, क्योंकि व्यवहार कर्मस्वभाववाला है और परमार्थ ज्ञानस्वभाववाला है, अतः परावलम्बी कर्मस्वभाववाले व्यवहारसे स्वावलम्बी ज्ञानस्वभाववाले परमार्थकी प्राप्ति त्रिकालमें होना सम्भव नहीं है। इससे स्पष्ट है कि जब सम्यग्दृष्टिका व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका यथार्थ साधन नहीं, ऐसी अवस्थामें मिथ्यादृष्टिका व्यवहार निश्चयधर्मकी प्राप्तिका यथार्थ साधन कैसे हो सकता है।

‘जइ जिणमयं पवज्जह’ इस गाथामें दोनों नयोंको स्वीकार करनेकी बात कही गई है। उसका आशय यह है कि यदि व्यवहार नयको नहीं स्वीकार किया जायगा तो गुणस्थानभेद और मार्गणास्थानभेद आदि नहीं बनेगा और निश्चयनयको नहीं स्वीकार किया जायगा तो तत्त्वकी व्यवस्था नहीं बन सकेगी। इसमें यह कहाँ कहा गया है कि व्यवहारधर्मके बगैर निश्चयधर्मकी प्राप्ति नहीं होती। गाथामें कोई दूसरी बात कही गई हो और उससे दूसरा अभिप्राय फलित करना यह कहाँ तक ठीक है इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे।

अपर पक्षने मिष्ठान्नका उदाहरण दिया है सो इस उदाहरणसे हमारे पक्षका ही समर्थन होता है, क्योंकि जैसे मिष्ठान्नके स्वादकी इच्छावाला व्यक्ति मिष्ठान्नका ही अवलम्बन करेगा, आमका नहीं; उसी प्रकार आत्मानुभूतिका इच्छुक व्यक्ति आत्माका ही अवलम्बन करेगा, अन्यका नहीं। इसीलिए तो आगम कहता है कि परावलम्बी व्यवहारधर्मसे स्वावलम्बी आत्मधर्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती।

अनादिभेदवासित बुद्धिवालेके लिए भेदनयका अवलम्बन लेकर श्रद्धान क्या है और श्रद्धान करने योग्य क्या है यह जानकर आत्माके अवलम्बनसे मोक्षमार्गमें प्रवृत्त होना चाहिये यह तथ्य आचार्य अमृतचन्द्रने अनादिभेदवासितबुद्धयः 'इस वचन द्वारा स्पष्ट किया है। इसमें व्यवहारधर्मसे निश्चयधर्मकी प्राप्ति होती है यह नहीं कहा गया है। हम पहले समयसार कलश १५ का ‘एष ज्ञानघनो’ इत्यादि वचन उद्धृतकर आये हैं। उसी तथ्यको यहाँ दूसरे शब्दोंमें स्पष्ट किया है। अनादि भेदवासित बुद्धिवालोंको दूसरे प्रकारसे मोक्षमार्गकी प्राप्ति होती है और दूसरोंको दूसरे प्रकारसे उसकी प्राप्ति होती है ऐसा नहीं है। चाहे अनादि मिथ्यादृष्टि हो या सादि मिथ्यादृष्टि, जैसे इन्हें प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्राप्त करनेका एक ही मार्ग है वैसे ही मोक्षमार्गको प्राप्त करनेका एक ही मार्ग है-परसे भिन्न स्वको जानकर उसका अवलम्बन करना, मोक्षमार्गको प्राप्त करने या उसमें उत्तरोत्तर विशुद्धि प्राप्त करनेकी अन्य समस्त क्रिया उसी आधार पर होती है।

पंचाध्यायी पृ० २६७ के भावार्थका यह आशय तो है नहीं कि अशुभसे निवृत्ति और शुभमें प्रवृत्ति होने मात्रसे निश्चय धर्मकी प्राप्ति हो जाती है । क्या ऐसा है कि कोई व्यक्ति २८ मूलगुणोंका अच्छी तरहसे पालन कर रहा है, इसलिये उसे अधःकरण आदि तीन करण परिणाम किये विना निश्चय सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो जावेगी ? यदि नहीं तो व्यवहार धर्मसे निश्चय धर्मकी प्राप्ति होती है ऐसा कहनेकी उपयोगिता ही क्या रह जाती है इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे । यहाँ यह उदाहरण अनादि मिथ्यादृष्टि और जिसका वेदक काल व्यतीत हो गया है-ऐसे सादि मिथ्यादृष्टिको लक्ष्यमें रखकर उपस्थित किया है । स्पष्ट है कि निश्चय धर्मकी प्राप्तिके समय परावलम्बी व्यवहारधर्मरूप विकल्प छूट कर स्वका अवलम्बन होना आवश्यक है । समयसार गाथा १४५ में जीवके शुभ भावको व्यवहारनयसे मोक्षमार्ग वतलाया है, परन्तु बन्धमार्गके आश्रित होनेसे वहीं शुभ और अशुभ दोनोंको एक कर्म कहा है ।

अपर पक्षने यहाँ पं० जयचन्द्रजीके अनुवादसे और दिल्ली संस्करणसे जो वचन उद्धृत किये हैं वे अधूरे हैं । भ्रमका निरास करनेके लिये यहाँ हम उन्हें पूरा दे रहे हैं-'शुभ अथवा अशुभ मोक्षका और बन्धका मार्ग ये दोनों प्रथक् हैं, केवल जीवमय तो मोक्षका मार्ग है और केवल पुद्गलमय बन्धका मार्ग है । वे अनेक हैं एक नहीं हैं, उनके एक न होनेपर भी केवल पुद्गलमय बन्धमार्गकी आश्रितताके कारण आश्रयके अभेदसे कर्म एक ही है ।

अपर पक्षने प्रवचनसारकी आचार्य जयसेनकृत-टीकासे ‘तं देवदेवदेवं’ यह गाथा उद्धृत की है । इसके आशयको स्पष्ट करते हुए स्वयं आचार्य जयसेन लिखते हैं-

ते तदाराधनफलेन परम्परयाक्षयानन्तसौख्यं यान्ति लभन्त इति सूत्रार्थः ।

वे उनकी आराधनाके फलस्वरूप परम्परा अक्षयानन्त सुखको प्राप्त करते हैं यह उक्त गाथाका अर्थ है ।

इससे यह व्यवहार ( उपचार ) नय वचन है यह सुतरां सिद्ध है । ।

मोक्षप्राभृतकी ८२वीं गाथामें व्यवहार और निश्चय दोनोंका निरूपण है । यही तथ्य उसकी ५२वीं गाथामें स्पष्ट किया गया है । सो इसका कौन निषेध करता है । मोक्षमार्गी जीवकी सविकल्प दशामें क्या परिणति होती है और निर्विकल्प दशामें क्या परिणति होती है यह हमने अनेक बार स्पष्ट किया है । अपर पक्ष यदि यह कहना त्याग दे कि व्यवहारधर्मसे निश्चयधर्मकी प्राप्ति होती है तो विवाद ही समाप्त हो जाय । मोक्षमार्गीके व्यवहारधर्म होता ही नहीं यह तो हमारा कहना है नहीं । ऐसी अवस्थामें वह इन प्रमाणोंको उपस्थित कर क्या प्रयोजन साधना चाहता है यह हम नहीं समझ सके ।

अपर पक्षने रयणसार और मूलाचारकी भी कतिपय गाथायें उपस्थित की हैं । उनमें भी पूर्वोक्त तथ्यको ही स्पष्ट किया गया है । नियम यह है कि निश्चयनय यथार्थका निरूपण करता है और व्यवहारनय अन्यके कार्यको अन्यका कहता है । इन लक्षणोंको ध्यानमें रखकर उक्त सभी गाथाओंके अभिप्रायको स्पष्ट कर लेना चाहिये । जिन गाथाओंमें जिनके अन्तरंग गुणोंका निर्देश है वह निश्चय कथन है ।

धवला पु० १ पृ० ३०२ के वचनका यह आशय है कि सम्यग्दृष्टिके द्वादशांगमें श्रद्धा नियमसे होती है । इसलिए यहाँ द्वादशांगभक्तिको ही व्यवहारसे संसार विच्छेदका कारण कहा गया है ।

परमात्मप्रकाशमें सम्यग्दृष्टिके देव-गुरु-शास्त्रविषयक सम्यक् श्रद्धाका निर्देश किया गया है । यह सम्यक्त्वका बाह्य लक्षण है । इससे अन्तरंगकी पहिचान होती है । इसलिए जिसकी सच्चे देव, २८ मूल-गुणोंका समग्रभावसे पालन करनेवाले वीतराग गुरु और वीतराग वाणीमें श्रद्धा-भक्ति नहीं है वह अन्तरंगमें सम्यग्दृष्टि न होनेसे मोक्षका पात्र नहीं हो सकता। यह कथन यथार्थ है।

अपर पक्ष यदि परमात्मप्रकाशके इस कथनपर सम्यक् प्रकारसे दृष्टिपात करे तो उसका हम स्वागत ही करेंगे।

आचार्य समन्तभद्रने स्तुतिविद्यामें सम्यग्दृष्टिकी जिनदेवमें कैसी भक्ति होनी चाहिये उसे ही स्पष्ट किया है। पद्मपुराण, उपासकाध्ययन और पद्मनन्दिपंचविंशतिकाके वचनोंका भी यही आशय है। इसमें सन्देह नहीं कि यथार्थ व्यवहार क्या है और उसका क्या आशय है इसे सम्यग्दृष्टि ही जानता है।

अपर पक्षने प्रवचनसार गाथा २१७ उपस्थित कर उससे व्यवहारधर्मका समर्थन किया है। किन्तु इस गाथाका यथार्थ आशय समझनेके लिए उसकी टीकापर दृष्टिपात करनेकी आवश्यकता है। आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

अशुद्धोपयोगोऽन्तरंगच्छेदः परप्राणव्यपरोपो बहिरंगः। तत्र प्राणव्यपरोपसद्भावे तदसद्भावे वा तदविनाभाविनाप्रयताचारेण प्रसिद्ध्यदशुद्धोपयोगसद्भावस्य सुनिश्चितहिंसाभावप्रसिद्धेः। तथा तद्विनाभाविना प्रयताचारेण प्रसिद्ध्यदशुद्धोपयोगासद्भावपरस्य परप्राणव्यपरोपसद्भावेऽपि बन्धाप्रसिद्ध्या सुनिश्चितहिंसाऽभावप्रसिद्धेश्चान्तरंग एव छेदो बलीयान् न पुनर्बहिरंगः। एवमप्यन्तरंगच्छेदायतनमात्रत्वाद् बहिरंगच्छेदोऽभ्युपगम्येतैव ॥२१७॥

अशुद्धोपयोग अन्तरंग छेद है, परप्राणोंका विच्छेद बहिरंग छेद है। किन्तु वहाँ जिसके अशुद्धोपयोगका अविनाभावी अप्रयत आचारसे प्रसिद्ध होनेवाला अशुद्धोपयोगका सद्भाव है उसके परप्राणोंका विच्छेद होनेपर या न होनेपर दोनों अवस्थाओंमें, हिंसाभावकी प्रसिद्धि सुनिश्चित है। तथा जिसके अशुद्धोपयोगके बिना होनेवाले प्रयत आचारसे प्रसिद्ध होनेवाला अशुद्धोपयोगका असद्भाव पाया जाता है उसके परप्राणोंका विच्छेद होनेपर भी, बन्धकी अप्रसिद्धि होनेसे हिंसाके अभावकी प्रसिद्धि सुनिश्चित है। इससे स्पष्ट है कि अन्तरंग छेद ही बलवान् है, बहिरंगच्छेद बलवान् नहीं है। ऐसा होनेपर भी अन्तरंग छेदका आयतनमात्र होनेसे बहिरंग छेदको स्वीकार करना ही चाहिए।

स्पष्ट है कि इस गाथाद्वारा अशुद्धोपयोगमात्रका निषेध कर शुद्धोपयोगकी प्रसिद्धि की गई है, क्योंकि शुद्धोपयोग बन्धका कारण न होकर स्वयं संवर-निर्जरास्वरूप है। समिति निश्चयस्वरूप भी होती है और व्यवहारस्वरूप भी। यहाँ निश्चय समिति बन्धका कारण नहीं है यह दिखलाकर उसकी महत्ता प्रस्थापित की गई है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। मालूम पड़ता है कि अपर पक्षने इस गाथाके पूरे आशयको ध्यानमें न लेकर ही यहाँ उसे अपने पक्षके समर्थनमें उपस्थित किया है। हमें विश्वास है कि वह पक्ष वहीं गाथा २१६ की आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीकाके इस वचनपर दृष्टिपात कर लेगा-

अशुद्धोपयोगो हि छेदः, शुद्धोपयोगरूपस्य श्रामण्यस्य छेदनात्। तस्य हिंसनात् स एव च हिंसा।

अशुद्धोपयोग ही छेद है, क्योंकि उससे शुद्धोपयोगस्वरूप श्रमणपने ( मुनिपने ) का छेद होता है और उसकी हिंसा ( छेद ) होनेसे वही हिंसा है।

इससे जहाँ यह ज्ञात होता है कि वास्तवमें शुद्धोपयोगरूप वर्तना ही मुनिपना है, अन्तरंगमें आत्मशुद्धिरूप निर्मलताके सद्भावमें भी शुभोपयोगकी अपेक्षा मुनिपना कहना यह उपचार कथन है, जिसे उसका आयतन होनेसे स्वीकार करना चाहिये। वहाँ यह भी ज्ञात होता है कि परमागममें यथार्थ अहिंसा वीतराग परिणामको ही स्वीकार किया गया है, रागपरिणामको नहीं । पुरुषार्थसिद्ध्युपायमें हिंसा और अहिंसाका विवेक कराते हुए जिनागमके सारको बड़े ही प्रांजल शब्दोंमें स्पष्ट करते हुए लिखा है-

अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति ।
तेषामेवोत्पत्तिर्हिंसेति जिनागमस्य संक्षेपः ।।४४।।

यथार्थमें रागादि भावोंका उत्पन्न न होना अहिंसा है और उन्हीं रागादि भावोंकी उत्पत्ति हिंसा है यह जिनागमका सार है ।।४४।।

यतः शुभभाव प्रशस्त रागभावरूप है, अतः वह बन्धका ही कारण है ऐसा निश्चय करना ही जिनमार्गकी यथार्थ श्रद्धा है ।

यहाँ पर कोई कह सकता है कि यदि शुभभाव, शुभोपयोग, व्यवहारधर्म या व्यवहार रत्नत्रय बन्धका हेतु है तो उसका जिनागममें उपदेश क्यों दिया गया है ? समाधान यह है कि-

\१. एक तो अशुभसे निवृत्तिरूप प्रयोजनको ध्यानमें रखकर उसका उपदेश दिया गया है । शुभमें प्रवृत्त रहनेसे ही परमार्थकी प्राप्ति हो जायगी इस दृष्टिसे उसका उपदेश नहीं दिया गया है ।

\२. दूसरे जिसे आत्माका निर्मल अनुभूतिमूलक भेदविज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे जीवकी संयमासंयम अथवा संयम आदि रूप आगेकी शुद्धिका ज्ञान करानेके हेतु आगममें ऐसा कथन आया है कि जो अणुव्रत आदि १२ व्रतोंका अथवा महाव्रत आदि २८ मूलगुणोंका पालन करता है वह देशसंयमी अथवा सकलसंयमी है । आगमके इस कथनका आशय यह है कि दो कषाय या तीन कषायके अभावस्वरूप जिस शुद्धिके सद्भावमें उसके साथ-साथ अणुव्रत या महाव्रतादिके शुभभाव बिना हट होते हैं, बिना हट सहजरूपसे होनेवाले उन भावोंसे अकषायरूप भीतरी शुद्धिका संकेत मिलता है । आगममें महाव्रत अंगीकार करो, समिति-गुप्तिका पालन करो इत्यादि रूपसे जो व्यवहारका उपदेश उपलब्ध होता है उसका यही आशय है कि जिस अकषायरूप शुद्धिके साथ-साथ बिना हट उक्त प्रकारके विकल्प होते हैं उस शुद्धिको ग्रहण करो, स्वात्मावलम्बी पुरुषार्थसे उक्त शुद्धिको प्राप्त करो । इस प्रकार इस प्रयोजनको लक्ष्यमें रखकर आगममें व्यवहारका उपदेश दिया गया है ।

\३. तीसरे असमग्र रत्नत्रयकी अवस्थारूपसे ज्ञानीके वर्तते समय उपयोगकी अस्थिरतावश ज्ञानका परिणाम और योगप्रवृत्ति कैसी होती है इसका सम्यक् ज्ञान करानेके लिए भी जिनागममें व्यवहार रत्नत्रयका उपदेश दिया गया है ।

परमागममें व्यवहारधर्मकी प्ररूपणाके ये तीन मुख्य प्रयोजन हैं । इन्हें यथावत् रूपसे जानता हुआ ही ज्ञानी सविकल्प दशाके होनेपर वर्तता है, इसलिए उसके प्रवृत्तिमें व्यवहारधर्मके होनेपर भी निश्चयधर्मको क्षति नहीं पहुँचती । ज्ञानीके निश्चय-व्यवहारनयमें साध्य-साधनभाव इसी दृष्टिसे बनता है, अन्य प्रकारसे नहीं ।

अपर पक्षने श्रावकों और मुनियोंके जिन आवश्यक कर्मोंका निर्देश किया है वे निश्चयरूप भी हैं और व्यवहाररूप भी ।

नियमसारमें इनका स्पष्ट निर्देश किया है । निश्चय प्रतिक्रमणका स्वरूप निर्देश करते हुए आचार्य कुंदकुंद वहाँ लिखते हैं-

मोत्तूण वयणरयणं रागादीभाववारणं किच्चा ।
अप्पाणं जो झायदि तस्स दु होदि त्ति पडिकमणं ॥८३॥

वचन रचनाको छोड़कर तथा रागादि भावोंका वारणकर जो आत्माको ध्याता है उसके प्रतिक्रमण होता है ॥८३॥

यह निश्चय प्रतिक्रमणका स्वरूप है। आचार्य निश्चय आवश्यकका स्पष्टीकरण करते हुए गाथा १४३-१४४ में बतलाते हैं कि जो श्रमण अशुभ भाव सहित वर्तता है वह अन्यवश (पराधीन) श्रमण कहलाता है, इसलिये उसके तो आवश्यकरूप कर्म होता ही नहीं । किन्तु जो श्रमण नियममें शुभ भावसे वर्तता है वह भी अन्यवश श्रमण है, इसलिये उसके भी आवश्यक कर्म नहीं होता ।

यह उक्त दोनों गाथाओंका आशय है । इससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ निश्चयधर्म होता है वहाँ प्रशस्त रागादिरूप परिणाममें व्यवहारधर्मका उपचार किया जाता है । निश्चय धर्म यथार्थ धर्म है और व्यवहारधर्म उपचार धर्म है ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘जिन आगममें गृहस्थोंके लिये देवपूजा, गुरूपास्ति तथा दान और मुनियोंके लिये स्तवन वन्दना प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान आदि रूप व्यवहारधर्म नित्य षडावश्यक कार्योंमें गर्भित किया है । यदि यह कार्य मात्र बन्धके ही कारण हैं तो क्या महर्षियोंने बन्ध कराने और संसारमें डुबानेको उपदेश दिया है । ऐसा कभी सम्भव नहीं हो सकता है । इनको इसी कारण आवश्यक बतलाया है कि इनसे मोक्षप्राप्ति होती है ।’

समाधान स्वरूप सर्व प्रथम तो हमारा कहना यह है कि वस्तु विचारके समय यदि अपर पक्ष ऐसे तर्कको उपस्थित नहीं करता तो यथार्थके निर्णय करनेमें अनुकूलता होती । ऐसे तर्क श्रद्धालु जीवोंकी भावनाको उद्वेलित करनेके लिए ही दिये जाते हैं, इसलिए ये यथार्थका निर्णय करनेमें सहायक नहीं हुआ करते ।

अब रही यह बात कि आचार्योंने इनका उपदेश क्यों दिया है सो इस प्रश्नका समाधान हम इसी उत्तरमें पहले कर आये हैं ।

परमार्थरूप मोक्षहेतुके सिवाय अन्य जितना कर्म है उसका प्रतिषेध करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द समयसारमें लिखते हैं-

मोत्तूण णिच्छयट्ठं ववहारेण विदुसा पवट्टंति ।
परमट्ठमस्सिदाण दु जदीण कम्मक्खओ विहिओ ॥१५६॥

निश्चयनयके विषयको छोड़कर विद्वान् व्यवहाररूपसे प्रवर्तते हैं, परन्तु परमार्थके आश्रित यतियोंके ही कर्मोंका नाश आगममें कहा गया है ॥१५६॥

उक्त गाथाकी उत्थानिकामें आचार्य जयसेन लिखते हैं-

अथ निश्चयमोक्षमार्गहेतोः शुद्धात्मस्वरूपाद् यदन्यच्छुभाशुभमनो-वचन-कायव्यपाररूपं कर्म-तन्मोक्षमार्गो न भवति इति प्रतिपादयति ।

अब निश्चय मोक्षमार्गके हेतु शुद्धात्मस्वरूपसे अन्य जो शुभ और अशुभ मन, वचन, कायके व्यापाररूप कर्म है वह मोक्षमार्ग नहीं है यह बतलाते हैं ।

व्रत, तप आदि शुभोपयोग या व्यवहारधर्म यथार्थ मोक्षमार्ग क्यों नहीं है इसका स्पष्टीकरण उक्त गाथाकी टीकामें दोनों आचार्योंने स्पष्ट किया है । आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

यः खलु परमार्थमोक्षहेतोरतिरिक्तो व्रत-तपःप्रभृतिशुभकर्मात्मा केषांचिन्मोक्षहेतुः स सर्वोऽपि प्रतिषिद्धः, तस्य द्रव्यान्तरस्वभावत्वात् तत्स्वभावेन ज्ञानभवनस्याभवनात्। परमार्थमोक्षहेतोरेवैकद्रव्यस्वभावत्वात् तत्स्वभावेन ज्ञानभवनस्य भवनात् ॥१५६॥

कुछ लोग परमार्थरूप मोक्षहेतुसे भिन्न जो व्रत, तप इत्यादि शुभ कर्मस्वरूप मोक्षहेतु मानते हैं, उस समस्त ही का निषेध किया है, क्योंकि वह अन्य द्रव्यके स्वभाववाला (पुद्गलस्वभाववाला) है, इसलिए उस रूपसे ज्ञानका होना नहीं बनता। मात्र परमार्थ मोक्षहेतु ही एक द्रव्यके स्वभाववाला है, इसलिए उस रूपसे ज्ञानका होना बनता है ॥१५६॥

ये कतिपय प्रमाण हैं जिनसे व्यवहार धर्मके स्वरूपपर यथार्थ प्रकाश पड़ता है। अपर पक्षने सम्यक्त्व व चारित्रकी मिश्रित अखण्ड पर्यायका नाम व्यवहारधर्म रखा है। इस कारण वह पक्ष व्यवहारधर्मको बन्धस्वरूप और बन्धका कारण स्वीकार करनेमें अड़चन देख रहा है इसे हम अच्छी तरहसे समझ रहे हैं। किन्तु कहाँ किस परिणामका क्या फल है, यदि यह बतलाया जाता है तो उसका अर्थ संसारमें घुमाना या संसारमें डुबाना नहीं होता है। बल्कि ज्ञानी उससे यही आशय ग्रहण करता है कि मुझे यह विकल्पकी भूमिका भी त्यागने योग्य है। विकल्पमें है और उसे छोड़नेका पुरुषार्थ करता है यह भी तो ज्ञानकी ही महिमा है।

अपर पक्षका कहना है कि ‘अतः इससे बन्ध होते हुए भी यह रागांश संसारका कारण नहीं हो सकता है।’ समाधान यह है कि आस्रव और बन्ध इन्हींका नाम तो संसार है। रागमें जितने काल अटका है उतने काल तो संसार है ही। इसे संसार स्वीकार न करनेमें लाभ ही क्या ? एक रागपरिणामका वह माहात्म्य है कि उसके फलस्वरूप यह जीव कुछ कम अर्ध पुद्गलपरिवर्तन काल तक आस्रव-बन्धकी परम्परामें रचता-पचता रहता है। जिसका जो स्वरूप है उसे स्वीकार करनेमें हानि नहीं, लाभ है। अन्यथा विवेकका उदय होना असम्भव है। ज्ञानीके रागमें उपादेय बुद्धि नहीं होती यह भेदविज्ञानका माहात्म्य है, व्यवहारधर्मका नहीं।

अज्ञानी भी स्वर्ग जाता है और ज्ञानी भी पुरुषार्थहीनता वश स्वर्ग जाता है। वहाँसे च्युत होकर दोनों ही राजपुत्र होते हैं। धर्मोपदेश भी सुनते हैं आदि। क्या कारण है कि ज्ञानी उसी भवसे मोक्ष जाता है, अज्ञानी नहीं। इससे स्पष्ट है कि बाह्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव न मोक्ष दिलाते हैं और न संसार ही। अपने अज्ञानका फल संसार है और अपने ज्ञानस्वभावके अवलम्बनका फल मोक्ष है। यही परमार्थ सत् है। बाह्य द्रव्यादि निमित्त हैं यह तो व्यवहार है।

इस प्रकार इतने विवेचनसे यह स्पष्ट हुआ कि पर्यायें विभाव और स्वभावके भेदसे मुख्यतया दो ही प्रकारकी हैं तथा उपयोग शुभ, अशुभ और शुद्धके भेदसे तीन प्रकारका है। उनमेंसे शुभोपयोग एक तो प्रशस्त रागरूप होता है, दूसरा अनुकम्पा परिणामरूप होता है और तीसरा चित्तमें क्रोधादि कलुष परिणामके अभावरूप होता है। यह तीनों प्रकारका उपयोग प्रशस्तविषयक शुभरागसे अनुरंजित होता है, इसलिए यह स्वयं आस्रव-बन्धस्वरूप होनेसे बन्धका कारण भी है।

पंचास्तिकाय गा० ८५ की टीकामें आचार्य जयसेनने 'गतिपरिणत जीवों और पुद्गलोंकी गतिमें धर्मद्रव्यकी निमित्तताका समर्थन करनेके अभिप्रायसे ‘निदानरहितपरिणामोपार्जित-’ इत्यादि वचन लिखा है। सो इसका आशय इतना ही है कि जो जीव स्वभावसन्मुख होकर अपनेमें आत्मकार्यकी प्रसिद्धि करता है, उसके पुण्यरूप द्रव्यकर्ममें निमित्तताका व्यवहार ऐसे ही किया जाता है जैसे गतिकार्यकी अपेक्षा धर्मद्रव्यमें निमित्तताका व्यवहार होता है । न धर्मद्रव्य गतिका कर्ता है और न पुण्यकर्म ही मोक्षका कर्ता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । ज्ञानीके मोक्षकार्यके सम्पादनके समय बाह्य परिकर कैसा होता है यह उक्त वचन द्वारा प्रसिद्ध किया गया है ।

\३. अन्य कतिपय प्रश्नोंका समाधान

\१. अपर पक्षने प्रवचनसार गा० ४५ की चरचा करते हुए लिखा है कि ‘यदि पुण्यका अर्थ भावपुण्य लिया जाय तो श्री समयसार गाथा १२ आदि उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह सिद्ध ही हो जाता है कि पुण्यभाव (व्यवहारधर्म) से केवलज्ञानकी प्राप्ति होती है ।’ आदि

समाधान यह है कि हम पहले ही शुभोपयोग अपर नाम व्यवहारधर्मका खुलासा कर आये हैं। उससे स्पष्ट है कि बारहवें गुणस्थानमें जिसे आगममें व्यवहारधर्म कहा गया है वह होता ही नहीं । परावलम्बी प्रवृत्तिरूप व्यवहारधर्म छटे गुणस्थान तक ही होता है । उसके आगे कषायलेशका सद्भाव होनेसे कारणकी अपेक्षा नौवें गुणस्थान तक भेदरूप छेदोपस्थापना संयमका निर्देश किया गया है । अतएव १२ वें गुणस्थानमें पुण्यभावकी कल्पना करना और उससे केवलज्ञानकी उत्पत्ति बतलाना उचित नहीं है । पण्डितप्रवर आशाधरजी अनगारधर्मामृत अ० १ श्लो० ११० की टीकामें लिखते हैं–

तदनन्तरमप्रमत्तादिक्षीणकषायपर्यन्तं जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदेन विवक्षितैकदेशेन शुद्धनयरूपः शुद्धोपयोगो वर्तते ।

तदनन्तर अप्रमत्त आदि क्षीणकषाय पर्यन्त गुणस्थानोंमें जघन्य, मध्यम और उत्कृष्टके भेदसे विवक्षित एकदेशरूपसे शुद्धनयरूप शुद्धोपयोग वर्तता है ।

यहाँ ‘विवक्षितैकदेशेन’ पदका आशय यह है कि ७ वें से लेकर १२ वें गुणस्थान तक इस जीवके शुद्धनयके विषयभूत एकमात्र त्रिकाली ज्ञायकभावका अवलम्बन होकर तत्स्वरूप परिणमनद्वारा शुद्धनयरूप शुद्धोपयोग वर्तता है ।

अतएव १२ वें गुणस्थानके अन्तिम समयके योग्य निश्चय रत्नत्रयपरिणत आत्मा ही केवलज्ञानको उत्पन्न करता है, बन्धस्वरूप व्यवहारधर्म नहीं ऐसा यहाँ निश्चय करना चाहिए ।

अपर पक्षने इससे पूर्ववर्ती प्रतिशंकामें लिखा है–‘निश्चयधर्म या शुद्धोपयोग यदि फल है तो शुभोपयोग उसका पूर्ववर्ती पुष्प है ।’ इससे भी स्पष्ट है कि अपर पक्ष भी स्वयं शुद्धोपयोगरूप निश्चयधर्मके पूर्व छटे गुणस्थान तक शुभोपयोग या व्यवहारधर्म स्वीकार कर चुका है । अतएव अपर पक्षके मतानुसार ही शुभोपयोगरूप व्यवहारधर्म १२ वें गुणस्थानमें नहीं बन सकनेके कारण व्यवहारधर्मसे केवलज्ञानकी उत्पत्ति बतलाना सर्वथा आगमविरुद्ध है ।

वैसे अपर पक्षने पिछली प्रतिशंकामें ७ वें गुणस्थान तक शुभोपयोग स्वीकार किया है । किन्तु पूर्वोक्त आगम प्रमाणसे स्पष्ट है कि ७ वें गुणस्थानमें शुभोपयोग न होकर शुद्धोपयोग ही होता है ।

अप्रमत्त गुणस्थानके दो भेद हैं–स्वस्थान अप्रमत्त और सातिशय अप्रमत्त । वहाँ श्रेणि आरोहणके पूर्व जीवके धर्मध्यान होता है और श्रेणिमें शुक्लध्यान होता है ऐसा आगमका अभिप्राय है । सर्वार्थसिद्धि अ० ९ सू० ३७ में लिखा है–

श्रेण्यारोहणात्प्राक् धर्म्यं, श्रेण्योः शुक्ले…।

श्रेणिके आरोहणके पूर्व धर्म्यध्यान होता है और दोनों श्रेणियोंमें दोनों शुक्लध्यान होते हैं।

इसी तथ्यको तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक और तत्त्वार्थवार्तिकमें उक्त सूत्रकी व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया गया है।

इसलिए प्रश्न होता है कि सातवें गुणस्थानमें भी स्वस्थान अप्रमत्तके शुभोपयोग होना चाहिए ? किन्तु वस्तुस्थिति यह नहीं है, क्योंकि धर्म्यध्यान शुभोपयोगरूप ही होता है ऐसा एकान्त नियम नहीं है। वह रागादि विकल्परहित आत्मानुभूतिरूप भी होता है और वीतराग देवादि, अणुव्रत-महाव्रतादि तथा परजीवविषयक अनुकम्पा आदि रागविकल्परूप भी होता है। इनमेंसे रागादि विकल्परूप धर्म्यध्यान मुख्यतया चतुर्थादि तीन गुणस्थानोंमें होता है और रागादि विकल्परहित धर्म्यध्यान स्वस्थान अप्रमत्तसंयतके होता है। इसी तथ्यको आचार्य जयसेनने पंचास्तिकाय गाथा १३६ की टीकामें ‘रागादिविकल्परहितधर्मध्यान-शुक्लध्यानद्वयेन’-रागादि विकल्प रहित धर्मध्यान और शुक्लध्यान इन दोके द्वारा-इन शब्दों द्वारा स्पष्ट किया है। स्पष्ट है कि ७ वें गुणस्थानमें स्वस्थान अप्रमत्तके धर्म्यध्यान होकर भी वह शुद्धोपयोगरूप ही होता है। अपेक्षाविशेषसे चतुर्थादि गुणस्थानोंमें भी क्वचित् कदाचित् शुद्धोपयोगकी व्यवस्था बन जाती है। आगम प्रमाणोंका उल्लेख अन्यत्र किया ही है।

समयसार गाथा १२ की टीकामें, रागादि विकल्पसे परिणत जीवके लिए व्यवहारनय प्रयोजनवान् है, अशुद्ध सोनेके समान। इसीका नाम अपरमभावमें स्थित है। ऐसे जीवके लिए व्रतादिका पालन करना, वीतराग देवादिकी स्तुति आदि करना, वीतराग मार्गकी प्ररूपक जिनवाणी सुनना प्रयोजनवान् है। किन्तु जो १६ वर्णिक शुद्ध सोनेके समान अभेद रत्नत्रय स्वरूप परमात्मतत्त्वके अनुभवनमें निरत हैं उनके लिए व्यवहारनय कुछ भी प्रयोजनवान् नहीं है यह कहा गया है। इसका अर्थ यह कहाँ हुआ कि ‘१२ वें गुणस्थानमें शुभोपयोग होता है, अतः पुण्यभावसे केवलज्ञानकी उत्पत्ति होती है ?’ अपर पक्षने उक्त गाथा और उसकी टीकाओंसे यह अर्थ कैसे फलित कर लिया इसका हमें आश्चर्य है। ज्ञानी जीवको अशुद्ध आत्माका अनुभव होना कहाँ तक सम्भव है इसका भी तो उस पक्षको विचार करना था। ६ टे गुणस्थानके आगे १२ वें गुणस्थान तक एकमात्र शुद्धनय-शुद्धात्मानुभूतिरूप शुद्धोपयोग ही होता है, अतः केवलज्ञानकी उत्पत्ति शुभाचारसे न होकर शुद्धात्मानुभूति परिणत आत्मा ही उसमें प्रगाढ़ता करके केवलज्ञानको उत्पन्न करता है ऐसा यहाँ निर्णय करना चाहिए।

\२. प्रवचनसार गाथा ४५ की दोनों टीकाओंपर दृष्टिपात करनेसे विदित तो यही होता है कि यहाँ ‘पुण्य’ पद द्रव्यकर्मके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। आचार्य जयसेन ‘पुण्यफला अरहंता’ पदकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं-

पञ्चमहाकल्याणकपूजाजनकं त्रैलोक्यविजयकरं यत्तीर्थंकरनाम पुण्यकर्म तत्फलभूता अर्हन्ता भवन्ति।

पञ्चमहाकल्याणक पूजाका जनक और तीन लोकको विजय करनेवाला जो तीर्थंकर नामक पुण्यकर्म है उसके फलस्वरूप अरिहन्त होते हैं।

अपर पक्षने प्रस्तुत प्रतिशंकामें इसका थोड़ा-सा स्पष्टीकरण अवश्य किया है। किन्तु मूल शंका जिस अभिप्रायसे की गई थी उससे तो यह भाव प्रगट नहीं होता था। ऐसा मालूम पड़ता था कि अपर पक्ष केवलज्ञानकी प्राप्ति भी द्रव्य पुण्यकर्म या शुभाचारका फल मानता है। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर हमने जो लिखा था उसका आशय यह है कि यदि अरिहन्त पदकी प्राप्ति यथार्थमें पुण्यकर्मका फल माना जाय तो आगममें 'मोहक्षयाज्ज्ञान-दर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् (त० सू०१०-१) इस वचनकी कोई उपयोगिता नहीं रह जायगी ।

प्रश्न १५ के उत्तरमें हमने इस सूत्रपर न तो कोई आपत्ति डाली है और न आपत्ति डाली ही जा सकती है । किसी वाक्य या सूत्रका आशय स्पष्ट करना इसे आपत्ति डालना नहीं कहते । प्रकृत प्रतिशंकामें अपर पक्षने ‘तीन लोकका अधिपतित्व’ इस वाक्यके आशयको स्पष्ट किया है । तो क्या इसे उस वाक्यपर आपत्ति डालना कहा जायगा । यह समग्र तत्त्वचरचा जिनागमका निश्चय-व्यवहार आदिके विषयमें आशय स्पष्ट करनेके अभिप्रायसे की जा रही है तो क्या इसे जिनागमपर आपत्ति डालना कहा जायगा ? इस प्रश्नका उत्तर अपर पक्ष स्वयं अपने विवेकसे प्राप्त कर ले । आक्षेपात्मक शब्दप्रयोग करना अन्य बात है और अपने परिणामोंका संतुलन रखते हुए तत्त्वविमर्श करना अन्य बात है । यदि सभी साधर्मी भाई दूसरे साधर्मी भाइयोंपर कीचड़ उछालनेकी भाषाका परित्याग कर विवेकके मार्गपर चलना प्रारम्भ कर दें तो इससे वीतराग मार्गकी ही प्रभावना होगी ।

\३. अपर पक्षने धवला पु० १४ पृ० ८९ का नामोल्लेख कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि ‘पंच महाव्रत, पंच समिति, त्रिगुप्ति आदि रूप व्यवहारचारित्र १२वें गुणस्थानमें भी होता है । उस पुण्यभावसे मोहनीय कर्म तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण एवं अन्तरायका क्षय होता है और इस कर्मके क्षयसे केवलज्ञान उत्पन्न होता है ।’

समाधान यह है कि धवला पुस्तक १४ पृ० ८९ में अप्रमाद’ पदकी व्याख्या की गई है । वहाँ लिखा है-

को अप्पमादो ? पंचमहव्वयाणि पंच समदीओ तिण्णि गुत्तीओ णिस्सेसकसायाभावो च अप्पमादो णाम ।

अप्रमाद क्या है ? पाँच महाव्रत, पाँच समिति, तीन गुप्ति और निःशेष कषायका अभाव अप्रमाद है ।

यहाँ पाँच महाव्रत आदिरूप परिणामसे निःशेष कषायके अभावका पृथक् रूपसे निर्देश किया है । इससे स्पष्ट है कि बारवें गुणस्थानमें निःशेष कषायका अभावरूप अप्रमाद भाव लिया गया है । वहाँ आचार्यका विकल्परूप पाँच महाव्रतादिका सद्भाव दिखलाना इस वाक्यका प्रयोजन नहीं है । विकल्परूप पाँच महाव्रतादि छटे गुणस्थानमें ही होते हैं, आगे तो स्वरूपस्थितिरूप एकमात्र वीतराग चारित्र ही होताहै । वहाँ ९वें गुणस्थानतक जो छेदोपस्थापना संयमका निर्देश किया है वह मात्र कषायलेशके सद्भावके कारण किया है, अतएव इस वचनके आधारसे १२वें गुणस्थानमें पुण्यभाव-शुभाचारकी प्रसिद्धि करना और उससे केवलज्ञानकी उत्पत्ति बतलाना आगमसम्मत कथन नहीं कहा जा सकता ।

\४. अपर पक्षने हमारा कथन बतलाकर लिखा है कि ‘१२वें गुणस्थानमें पुण्य प्रकृत्तियोंके उदयसे होनेवाले भावका नाम पुण्यभाव है ।’

किन्तु हमने अपने पिछले दोनों उत्तरोंपर दृष्टिपात किया है । एक तो हमने ऐसा वचन लिखा ही नहीं है । मालूम नहीं कि अपर पक्षने उक्त वचनकी कल्पनाकर उसे हमारा कैसे बतला दिया । दूसरे मनुष्य गति, तीर्थंकर प्रकृति ये जीवविपाकी पुण्यप्रकृतियाँ हैं । इनके उदयको निमित्तकर मनुष्यगति तथा तीर्थंकर आदि नोआगमभाव पर्याय होती हैं । ये १४वें गुणस्थातक बतलाई हैं । इस अपेक्षासे यदि १२वें गुणस्थानमें नोआगमभावरूप पुण्यभाव स्वीकार भी किया जाय तो यह कथन ‘आगमानुकूल नहीं है’, अपर पक्षका ऐसा लिखना कहाँतक आगमानुकूल हैं इसका वह स्वयं विचार करे। इस विषयमें बहुवक्तव्य होते हुए भी हम और कुछ नहीं लिखना चाहते।

\५. अपर पक्षने ‘तीन लोकका अधिपतित्व’ को अपनी व्याख्या द्वारा स्वयं उपचरित घोषित कर दिया। फिर भी हमने उसे ‘उपचरित कथन’ लिख दिया तो अपर पक्ष हमारे इस कथनको आगमका विपर्यास बतलाने लगा इसका हमें आश्चर्य है। इस सम्बन्धमें हमने पिछले उत्तरमें क्या लिखा है उसे पुनः उद्धृत कर देते हैं-‘बारहवें गुणस्थानमें सर्वमोहके क्षीण हो जानेपर जो वीतरागभाव होता है वह अरहंत पद ( केवली पद ) का निश्चयनयसे हेतु है। उस समय जो शुभ प्रकृतियोंका कार्य है उसमें इसका उपचार होनेसे उस पुण्यको भी अरहन्त पदका कारण ( उपचारसे ) आगममें कहा गया है।’

हमारा उक्त कथन अपनेमें स्पष्ट है। इसमें न तो कहीं स्व-स्वामिसम्बन्धकी चरचा है और न ही निष्परिग्रह शब्दका ही प्रयोग किया गया है। हम तो इस परसे इतना ही समझे हैं कि कुछ टीका करनी चाहिये, इसलिए अपर पक्षने यह टीका की है।

\६. अपर पक्षने लिखा है कि ‘यदि मिथ्यादृष्टि भी परमार्थकी अपेक्षा व्यवहारधर्मका पालन करता है तो उसके लिए वह सम्यक्त्वकी प्राप्तिका कारण होता है।’ आदि।

समाधान यह है कि प्रकृतमें उक्त वाक्यमें आये हुए ‘परमार्थकी अपेक्षा’ इस पदका क्या अर्थ है यह विचारणीय है। इस वाक्यका अर्थ ‘व्यवहारधर्मको परमार्थ मानकर’ यह तो हो नहीं सकता, क्योंकि आगममें निश्चयधर्मके साथ जो शुभाचार परिणाम होता है उसे व्यवहारधर्म कहा गया है। इसलिए बहुत सम्भव है कि अपर पक्षने उक्त वाक्यका प्रयोग ‘परमार्थको लक्ष्यमें रखकर’ इस अर्थमें किया होगा। यदि यह अर्थ अपर पक्षको इष्ट है तो अपर पक्षके उक्त कथनका यह आशय फलित होता है कि जो सम्यक्त्वको प्राप्त करनेके सन्मुख होता है उसके बाह्यमें परमागमका श्रवण, जीवादि नौ पदार्थोंका भूतार्थरूपसे विचार, वीतराग देवादिकी उपासना-भक्ति आदि पुण्य क्रिया नियमसे होती है। उसके अशुभाचरण नहीं होता, क्योंकि ऐसा व्यक्ति ही शुद्धनयके विषयभूत आत्माके अवलम्बनसे तत्स्वरूप परिणमन द्वारा स्वानुभूति लक्षणवाले सम्यक्त्वको प्राप्त होता है। स्पष्ट है कि यहाँपर सम्यक्त्व प्राप्तिका निश्चय कारण तो शुद्धनयके विषयभूत ज्ञायकस्वभाव आत्माका अवलम्बन होकर उपयोगका तत्स्वरूप परिणमन ही है, बाह्य विकल्परूप पुण्यभाव नहीं। फिर भी बाह्यमें इस जीवकी ऐसी भूमिका होती है, इसलिये शुभाचार या पुण्यभावको उसका व्यवहार हेतु कहा जाता है।

श्री धवला पु० ६ पृ० ४२ में तथा सर्वार्थसिद्धि १-७ में इसी आशयसे सम्यक्त्वके बाह्य साधनोंका निर्देश किया है। सम्यक्त्व प्राप्तिके समय यथासम्भव बाह्य परिकर ऐसा ही होता है इसमें सन्देह नहीं। मुख्यता तो उसकी है जो सम्यक्त्व प्राप्तिका यथार्थ कारण है। वह न हो और बाह्य परिकर हो तो सम्यक्त्व प्राप्त नहीं होता। इसलिए उसकी प्राप्तिका वही निश्चय हेतु है यह अपर पक्षके उक्त कथनसे ही सिद्ध हो जाता है।

\७. ‘सम्यक्त्वकी उत्पत्ति मिथ्यादृष्टिको होती है’ इसका तो हमने निषेध किया नहीं। पर मिथ्यादृष्टि रहते हुए नहीं होती, मिथ्यात्व पर्यायका व्यय होकर ही सम्यक्त्वकी उत्पत्ति होती है ऐसा उसका अर्थ समझना चाहिये। तथा भेदविवक्षामें सम्यक्त्वी भी सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है यह लिखा या कहा जाय तो भी कोई हानि नहीं, क्योंकि द्वितीयादि समयोंमें जो सम्यक्त्व पर्याय उत्पन्न होती है वह सम्यक्त्वीके ही

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होती है आदि । यतः मिथ्यात्व पर्यायका व्यय कर जीव ही सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है, अतः आत्म-स्वभावके सन्मुख हुआ आत्मा ही उसका साधकतम करण और निश्चय कर्ता है यह सिद्ध होता है ।

\८. धवला पु० ६ पृ० ४२७ का ‘कथं जिणबिम्बदंसणं’ इत्यादि वचनद्वारा अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें स्थित जीवपरिणामका निर्देश किया गया है । उसीको जिनबिम्बका देखना कहा गया है, क्योंकि वहींपर मिथ्यात्वादि कर्मके निधत्ति-निकाचित बन्धका विच्छेद होता है । अतएव इस वचनका कर्मशास्त्रके अनुसार अर्थ करना ही उचित है । व्यवहारनयका वक्तव्य इसीको कहते हैं । भावपाहुड़ गाथा १५३ तथा पद्मनन्दिपंचविंशति १४-२ का भी यही आशय है कि जो स्वभाव सन्मुख हो आत्माको प्राप्त करता है उसकी जिनदेवादिमें प्रगाढ़ भक्ति नियमसे होती है ।

\९. अपर पक्षने जो यह लिखा है कि 'जो मिथ्यादृष्टि, .परमार्थको न जानते हुए, मात्र विषयसामग्री तथा सांसारिक सुखकी प्राप्तिके लक्ष्यसे अप्रशस्त रागसहित कुछ शुभ क्रिया करता है और उससे जो पुण्यबन्ध होता है, वह पुण्यभाव तथा पुण्यबन्ध संसारका ही कारण है । आदि ।

सो इस सम्बन्धमें इतना ही कहना है कि अप्रशस्त राग हो और शुभ क्रिया तथा शुभभाव हो यह नहीं हो सकता । यह परस्पर विरुद्ध कथन है । प्रशस्त रागका ही शुभक्रिया तथा शुभभावके साथ अन्वय-व्यतिरेक है, अप्रशस्त रागका नहीं । इसी प्रकार शुभक्रियाका शुभभावके साथ ही अन्वय-व्यतिरेक है, अन्यके साथ नहीं ।

आगममें निदानका उल्लेख अवश्य है, पर उसका यह अर्थ नहीं कि पूजा-भक्ति आदिरूप शुभ परिणाम निदान है । उसके फलस्वरूप पंचेन्द्रियोंके विषयोंकी कामना करना निदान अवश्य है । यहाँ तो केवल प्रश्न इतना ही है कि जो शुभ मन, वचन, कायका व्यापार होता है उससे अल्प ही सही बन्ध होता है या नहीं ? इस विषयमें समस्त परमागमका एकमात्र यही अभिप्राय है कि उससे नरकादि दुर्गतियोंके हेतुभूत पापकर्मका बन्ध न होकर सुगतिके कारणभूत पुण्यकर्मका बन्ध होता है । यह जीव सम्यग्दृष्टि है, इसलिए इस अपेक्षासे उसे परम्परा मुक्तिका हेतु कहना अन्य बात है । इसका आशय तो इतना ही है कि रत्नत्रयपरिणत उक्त जीव मोक्षका पात्र होता है, इसलिए उसके सहचर शुभभावमें भी मोक्षहेतुताका व्यवहार किया जाता है ।

\१०. अपर पक्षका यह लिखना भी ठीक नहीं कि ‘प्रवचनसार प्रथम अध्याय आदि ग्रन्थोंमें मात्र परमार्थको न जाननेवाले मिथ्यादृष्टिके पुण्यको ही पूर्णतया हेय बतलाया गया है ।’ क्योंकि जिसके पुण्यभावमात्रमें उपादेय बुद्धि है वह सम्यग्दृष्टिका लक्षण नहीं है और न उसे परमार्थका जाननेवाला ही कहा जा सकता है । कारण कि जिसकी पुण्यभावमें उपादेय बुद्धि है उसकी उसके फलमें उपादेय बुद्धि न हो यह नहीं हो सकता । अतएव कोतवाल द्वारा पकड़े गये आत्मनिन्दा तत्पर चोरके समान ही वह बाह्य क्रियाओंमें प्रवृत्त होता है । अन्तरंगमें तो वह इन क्रियाओंको करते हुए भी एकमात्र अनन्त सुखके निधान निज परमात्मतत्त्वको ही आश्रय करनेयोग्य मानता है । सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टिमें यही अन्तर है । इसी दृष्टिसे प्रवचनसार गाथा ११ की टीकामें ‘अतः शुद्धोपयोग उपादेयः शुभोपयोगो हेयः’-अतः शुद्धोपयोग उपादेय है और शुभोपयोग हेय है यह वचन कहा गया है । यह प्रवचनसार प्रथम अध्यायका ही वचन है । इसमें सम्यग्दृष्टिके शुभोपयोगको या परमार्थको न जाननेवाले मिथ्यादृष्टिके शुभोपयोगको मात्र हेय बतलाकर शुभोपयोगमात्रको हेय बतलाया गया है । इसी प्रकार प्रवचनसार अ० २ गा० १५६ में सम्यग्दृष्टि कैसी और भावना करता है इसका निर्देश करते हुए जो यह लिखा है कि वह विचार करता है कि मैं अशुभोपयोग शुभोपयोगसे रहित होकर समस्त परद्रव्योंमें मध्यस्थ होता हुआ ज्ञानस्वरूप आत्माको ध्याता हूँ। गाथा इस प्रकार है-

असुहोवओगरहिदो सुहोवजुत्तो ण अण्णदवियम्हि ।
होज्जं मज्झत्थोऽहं णाणप्पगमप्पगं झाए ॥६७॥

यह सम्यग्दृष्टि होकी तो भावना है। श्रुत, गुरूपदेश और युक्तिके बलसे मिथ्यादृष्टि भी परद्रव्यभावोंसे भिन्न आत्माका निर्णय कर जब उक्त प्रकारकी भावना करता हुआ आत्मसन्मुख होकर उसमें लीन होता है तभी तो वह सम्यग्दृष्टि बनता है। सम्यग्दृष्टि बनने या सम्यग्दृष्टि बनकर आगे बढ़नेका इसके सिवाय अन्य कोई मार्ग नहीं है।

समयसार गाथा १४६ में चार प्रकारसे शुभाशुभभाव जीवपरिणाम होकर भी अज्ञानमय भाव होनेसे दोनों एक हैं, इसलिए कारणके अभेदसे दोनोंको एक कर्म बतलाया गया है। दूसरे शुभाशुभ जो द्रव्यकर्म हैं वे दोनों केवल पुद्‌गलमय होनेसे एक हैं, इसलिए स्वभावके अभेदसे उन दोनोंको एक कर्म कहा गया है। तीसरे इनके योगसे जो शुभाशुभ फल मिलता है वह भी केवल पुद्‌गलमय होनेसे एक है, इसलिए अनुभवके अभेदसे दोनोंको एक कहा गया है। चौथे शुभ-मोक्षमार्ग केवल जीवमय होनेसे और अशुभ-बन्धमार्ग केवल पुद्‌गलमय होनेसे उन्हें अनेक बतलाकर भी दोनोंके ही पुद्‌गलमय बन्धमार्गके आश्रित होनेसे आश्रयके अभेदसे दोनोंको एक कर्म कहा गया है।

इससे स्पष्ट है कि समयसार गाथा १४५ द्वारा शुभाशुभ द्रव्यकर्मोंके समान शुभाशुभरूप दोनों प्रकारके भावकर्मोंका भी निषेध किया गया है और गाथा १४७ में इन दोनोंको स्वाधीनताका विनाश करनेवाला कहा गया है। शुभभाव भी अशुभभावके समान औदयिकभाव तथा उसमें उपयुक्त आत्माका परिणाम है और ‘ओदइया वन्धयरा’ इस सिद्धान्तके अनुसार वह बन्धका ही कारण है, अतः ज्ञानीकी अशुभभावके समान शुभभावमें भी हेय बुद्धि ही होती है ऐसा यहाँ समझना चाहिए, क्योंकि पुरुषार्थकी हीनतावश शुभभाव और तदनुसार व्यापार होना अन्य बात है, किन्तु उसमें हेयबुद्धिका होना अन्य बात है। ज्ञानीके शुभभाव अवश्य होता है और तदनुसार मन, वचन, कायका व्यापार भी होता है इसमें आपत्ति नहीं। किन्तु ऐसा होते हुए भी उसकी उसमें हेयबुद्धि बनी रहती है तो ही वह मार्गस्थ है-ज्ञान, वैराग्यसम्पन्न है यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

इस प्रकार प्रस्तुत प्रतिशंकाका सर्वाङ्ग समाधान किया।

शंका १४, प्रथम दौर: शंका १४ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६९२

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प्रथम दौर

: १ :

शंका १४

पुण्य अपनी चरम सीमाको पहुँचकर अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणत होनेपर स्वतः छूट जाता है या उसको छुड़ानेके लिये किसी उपदेश और प्रयत्नकी जरूरत होती है ?

समाधान १

आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणतिके कालमें निर्विकल्प अवस्था होती है। ऐसे समयमें उसके बाह्य उपदेशादिका योग बन ही नहीं सकता। साथ ही उसका उस अवस्थामें प्रति समयका पुरुषार्थ स्वरूप स्थितिके अनुरूप ही होता है। इस कारण उस अवस्थामें उसे पुण्यको छुड़ानेके लिए न तो किसी उपदेशकी आवश्यकता पड़ती है और न ही किसी स्वतन्त्र प्रयत्नकी भी। किन्तु जिस क्रमसे उसकी आत्मविशुद्धि बढ़ती जाती है उस क्रमसे यथास्थान आत्मविशुद्धिका योग पाकर पापके समान पुण्य भी स्वयं छूटता जाता है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्यवर्य अमृतचन्द्र समयसार गाथा ७४ की टीकामें कहते हैं-

सहजविजृम्भमाणचिच्छक्तितया यथा यथा विज्ञानघनस्वभावो भवति तथा तथा आस्रवेभ्यो निवर्तते, यथा यथा आस्रवेभ्यश्च निवर्तते तथा तथा विज्ञानघनस्वभावो भवतीति। तावत् विज्ञानघनस्वभावो भवति यावत् सम्यगास्रवेभ्यो निवर्तते, तावदास्रवेभ्यश्च निवर्तते यावत् सम्यग्विज्ञानघनस्वभावो भवतीति ज्ञानास्रवनिवृत्योः समकालत्वम् ।

सहजरूपसे विकाशको प्राप्त चित्तशक्तिसे ज्यों-ज्यों विज्ञानघनस्वभाव होता जाता है त्यों-त्यों आस्रयोंसे निवृत्त होता जाता है ( यह कथन निश्चयपक्षकी मुख्यतासे किया गया है ) और ज्यों-ज्यों आस्रवोंसे निवृत्त होता जाता है त्यों-त्यों विज्ञानस्वभाव होता जाता है ( यह कथन व्यवहारनयकी मुख्यतासे किया गया है तथा इन्हीं दोनों नयोंकी अपेक्षा यह भी लिखा गया है कि- ) उतना विज्ञानघनस्वभाव होता है जितना सम्यक् प्रकारसे आस्रवोंसे निवृत्त होता है और उतना आस्रवोंसे निवृत्त होता है जितना सम्यक्प्रकारसे विज्ञानघनस्वभाव होता है। इस प्रकार ज्ञानको और आस्रवोंकी निवृत्तिको समकालपना है।

इस प्रकरणसे यहाँ इतना समझ लेना चाहिये कि निश्चय और व्यवहार ये दो पक्ष हैं। तदनुसार प्रत्येक स्थानपर इनका उस उस स्थानके योग्य सुमेल होता है। यहाँपर इनकी समकालता इसी आधारसे बतलाई गई है। विवक्षित उपादान और विवक्षित निमित्तकी अपेक्षा कार्य-कारण परम्परामें भी इसी प्रकार प्रत्येक समयमें दोनोंकी समकालता है।

शंका १४, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६९३

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका १४

पुण्य अपनी चरम सीमाको पहुँचकर अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणत होनेपर स्वतः छूट जाता है या उसको छुड़ानेके लिए किसी उपदेश और प्रयत्नकी जरूरत होती है ?

प्रतिशंका २

आपने अपने उत्तरमें लिखा है-‘किन्तु जिस क्रमसे उसको आत्मविशुद्धि बढ़ती जाती है उस क्रमसे यथास्थान आत्मविशुद्धिका योग पाकर पापके समान पुण्य भी स्वयं छूटता जाता है।’ इसके लिए जो गाथा ७४ समयसारकी टीकाका प्रमाण दिया है वह आपके इस कथनको पुष्ट नहीं करता है।

यह उत्तर हमारे प्रश्नसे सम्बन्धित नहीं है, क्योंकि हमारा प्रश्न पुण्यकी चरम सीमाके अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणत अवस्थाके विषयमें था और पुण्यके छूटनेके विषयमें था। फिर भी आपने अप्रासंगिक ‘पापके स्वयं छूटनेका’ उल्लेख किया है। आपका यह कथन आगमविरुद्ध है।

हिंसा, असत्य आदि सब पापोंका बुद्धिपूर्वक प्रतिज्ञारूप त्याग किया जाता है जैसा कि धवल पुस्तक १ पृ० ३६९ पर कहा है-

सर्वसावद्ययोगात् विरतोऽस्मीति सकलसावद्ययोगविरतिः सामयिकशुद्धिसंयमो द्रव्यार्थिकत्वात्।

अर्थ-मैं सर्वप्रकारसे सावद्ययोगसे विरत हूँ’ इस प्रकार द्रव्यार्थिकनयकी अपेक्षा सकल सावद्ययोगके त्यागको सामायिकशुद्धिसंयम कहते हैं।

इसी कथनकी पुष्टि श्री कुंदकुंद भगवान्के प्रवचनसार गाथा २०८-२०९ में साधुके २८ मूलगुणोंका वर्णन करते हुए तथा श्री अमृतचन्द्रजी सूरिके इन वाक्योंसे होती है-

सर्वसावद्ययोगप्रत्याख्यानलक्षणैकमहाव्रतव्यक्तवशेन हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहविरत्यात्मकं पंचव्रतं व्रतं।

अर्थ-सर्व सावद्ययोगके त्यागस्वरूप एक महाव्रतके विशेष होनेसे हिंसा, असत्य, चोरी, ( अब्रह्म ) और परिग्रहकी विरत्तिस्वरूप पंच महाव्रत है।

इन आगमप्रमाणोंसे यह सिद्ध है कि हिंसादि पापोंका बुद्धिपूर्वक त्याग किया जाता है। किन्तु पुण्य अपनी चरम सीमाको पहुँचकर अथवा आत्माके शुद्धस्वभावरूप परिणत होनेपर छूट जाता है, अतः स्वयं छूटनेकी अपेक्षा पुण्य और पापको समान बताना उचित नहीं है। जितने भी जीव आजतक मोक्ष गये हैं, जा रहे हैं और जावेंगे वे सर्व पापोंका बुद्धिपूर्वक त्याग करके ही मोक्ष गये हैं, जा रहे हैं और जावेंगे।

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शंका १४

पुण्य अपनी चरम सीमाको पहुँचकर अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणत होनेपर स्वतः छूट जाता है या उसको छुड़ानेके लिए किसी उपदेश और प्रयत्नकी जरूरत होती है ?

शंका १४, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६९४

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प्रतिशंका २ का समाधान

इस प्रश्नका उत्तर देते हुए जो कुछ लिखा गया है उसके आधारसे उपस्थित की गई प्रतिशंका २ से विदित होता है कि यह तो मान लिया गया है कि ‘ जैसे-जैसे विशुद्धिमें वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे पुण्य स्वयं छूटता जाता है ।’ मात्र प्रतिशंका २ पापको आधार बनाकर उपस्थित की गई है । उसमें बतलाया गया है कि पापको छोड़ना पड़ता है, जब कि विशुद्धिका योग पाकर पुण्य स्वयं छूट जाता है ।

समाधान यह है कि चाहे पुण्यभाव हो या पापभाव दोनोंके छूटनेकी प्रक्रिया एक प्रकारकी ही है । उदाहरणार्थ एक ऐसा गृहस्थ लीजिए जो मुनिधर्मको अंगीकार करता है । विचार करनेपर विदित होता है कि जब वह मुनिधर्मको अंगीकार करता है तब व्यवहारसे वह भी अणुव्रतादिरूप पुण्यभावका त्याग कर ही महाव्रतादिरूप पुण्यभावको प्राप्त होता है, इसलिए यह कहना कि पापका त्याग करना पड़ता है और विशुद्धिका योग पाकर पुण्य स्वयं छूट जाता है ठीक प्रतीत नहीं होता । पर यह सब कथन आगममें व्यवहारनयकी अपेक्षा किया गया है । वस्तुतः विचार करनेपर पुण्यभावका योग पाकर पापभाव स्वयं छूट जाता है और विशुद्धिका योग पाकर पुण्यभाव स्वयं छूट जाता है । पापभाव, पुण्यभाव और शुद्धभाव ये तीनों आत्माके परिणाम हैं । अतः उत्पाद-व्ययके नियमानुसार जब एक भावकी प्राप्ति होती है तो उससे पूर्वके भावका स्वयं व्यय हो जाता है ।

प्रतिशंकामें जितने प्रमाण दिये गये हैं उन सबका व्यवहारनयकी मुख्यतासे ही उन उन शास्त्रोंमें प्रतिपादन किया गया है । परमार्थसे विचार करनेपर पाप, पुण्य या शुद्धरूप उत्तर पर्यायके प्राप्त होनेपर पूर्वकी पर्यायका व्यय होकर ही उसकी प्राप्ति होती है ।

शंका १४, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६९४ से ६९६

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका १४

मूल प्रश्न यह है-पुण्य अपनी चरम सीमाको पहुँचकर अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणत होने पर स्वतः छूट जाता है या उसे छुड़ानेके लिये किसी उपदेश या प्रयत्नकी जरूरत है ?

प्रतिशंका ३

आपने इसके प्रथम उत्तरमें यह तो स्वीकार कर लिया था कि ‘शुद्ध स्वभावरूप परिणतिके कालमें पुण्य स्वयं छूट जाता है’, किन्तु प्रसंगसे बाहर यह भी लिख दिया कि पाप भी स्वयं छूट जाता है । यद्यपि पापके सम्बन्धमें प्रश्न नहीं था तथापि अपनी मान्यताके कारण आपने पापको स्वयं छूट जानेवाला लिख दिया तथा इसके लिये किसी आर्षग्रन्थका प्रमाण भी नहीं दिया।

इसपर प्रतिशंका प्रस्तुत करते हुए श्री धवल व प्रवचनसारका प्रमाण देकर हमने यह सिद्ध किया था कि पापोंका बुद्धिपूर्वक त्याग किया जाता है, वे स्वयं नहीं छूटते ।

आपने दूसरे उत्तरमें हमारे द्वारा प्रदत्त प्रमाणोंकी यह लिखकर कि ‘जितने प्रमाण दिये गये हैं उन सबका व्यवहारनयकी मुख्यतासे ही उन शास्त्रोंमें प्रतिपादन किया गया है’ अवहेलना की और लिखा है ‘वस्तुतः विचार करनेपर पुण्यभावका योग पाकर पापभाव स्वयं छूट जाता है ।’ इसके साथ साथ आपने यह भी लिखनेका प्रयास किया है ‘गृहस्थ भी अणुव्रतादि पुण्यभावका त्यागकर महाव्रतरूप पुण्यभावको प्राप्त होता है ।’ आपने इस उत्तरमें भी किसी आगमप्रमाणको उद्धृत नहीं किया है ।

निश्चयनयकी अपेक्षासे तो आत्मा न प्रमत्त है, न अप्रमत्त है (समयसार गाथा ६) और न राग है, न द्वेष है, न पुण्य है, न पाप है (समयसार गाथा ५०-५५), किन्तु ज्ञायक है, अतः निश्चयनयकी अपेक्षासे राग-द्वेष या पुण्य-पापके छोड़ने या छूटनेका कथन ही नहीं हो सकता । जब राग-द्वेष, पुण्य, पाप व्यवहारनयकी अपेक्षासे हैं (समयसार गाथा ५६) तो इनके छोड़ने या छूटनेका कथन भी व्यवहारनयसे होगा ।

श्री कुन्दकुन्द स्वामी तथा श्री अमृतचन्द्रसूरिने प्रवचनसारमें तथा श्री वीरसेन स्वामीने धवल ग्रन्थमें सर्व सावद्ययोगके त्यागके विषयमें लिखा है वह आपकी दृष्टिमें अवास्तविक है, इसीलिये आपने यह लिख दिया कि वास्तविक तो पापभाव स्वयं छूट जाता है । आप ही इतना साहस कर सकते हैं, हमारे लिये तो आर्षवाक्य वास्तविक हैं ।

गृहस्थके संयमासंयम पांचवाँ गुणस्थान होता है अर्थात् त्रसहिंसाका त्याग होता है और स्थावर हिंसाका त्याग नहीं होता । जब वह मुनिदीक्षा ग्रहण करता है तब वह संयम अंशका त्याग नहीं करता, किन्तु शेष असंयमका त्यागकर पूर्ण संयमी बन जाता है । यहाँ पर भी उसने शेष असंयमरूपी पापका ही त्याग किया । जब आप अपने प्रथम उत्तरमें यह स्वीकार कर चुके हो कि पुण्य स्वयं छूट जाता है उसको छुड़ानेके लिये किसी उपदेश या प्रयत्नकी आवश्यकता नहीं होती तो अब उसके विरुद्ध कैसे लिखते हैं कि पुण्यभावका भी त्याग किया जाता है ।

संयमाचरण चारित्रके दो भेद हैं-१. सागार संयमाचरण और निरागार संयमाचरण चारित्र । श्री कुन्दकुन्द स्वामीने चारित्रपाहुड़ गाथा २१ में इस प्रकार कहा है-

दुविहं संजमचरणं सायारं तह हवे णिरायारं ।
सायारं सग्गंथे परिग्गहरहिय खलु णिरायारे ॥२१॥

अर्थात् संयम चरणके दो भेद हैं-सागार संयमचरण और निरागार संयमचरण । इनमें सागार संयमचरण परिग्रहसहित गृहस्थके और निरागार संयमचरण परिग्रह रहित मुनियोंके होता है ।

पंचेव पुव्वियपदं गुणव्वयाइं हवंति तह तिण्णि ।
सिक्खावय चत्तारि य संयमचरणं च सायारं ॥२३॥

अर्थ-पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत यह बारह प्रकारका सागार संयमचरण है ।

पंचेंदियसंवरणं पंच वया पंचविंसकिरियासु ।
पंच समिदि तय गुत्ती संयमचरणं णिरायारं ॥२८॥

अर्थ-पांच इन्द्रियोंका संवर, पांच महाव्रत, पच्चीस क्रिया, पांच समिति, तीन गुप्ति…यह निराकार संयमचरण है । इन दोनों प्रकारके संयमचरणोंसे पञ्चमादि गुणस्थानोंमें प्रतिसमय गुणश्रेणी निर्जरा होती है जिसे करणानुयोगके विशेषज्ञ भली-भाँति जानते हैं। कर्मनिर्जरा तथा आत्माकी पवित्रताके कारण हैं, इसीलिये व्रतोंको पुण्यभाव कहा जाता है। इस सम्बन्धमें विशेष कथन प्रश्न नं० ४ में किया जा चुका है, पुनरुक्ति दोषसे यहाँ नहीं किया गया है।

इस प्रकार पाप छोड़ा जाता है और पुण्य अपनी चरम सीमाको पहुँचकर स्वयं अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणमन होनेपर स्वतः छूट जाता है।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका १४

पुण्य अपनी चरम सीमाको पहुँचकर अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणत होने पर स्वतः छूट जाता है या उसे छुड़ानेके लिए किसी उपदेश या प्रयत्नकी जरूरत है ?

शंका १४, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६९६ से ६९८

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प्रतिशंका ३ का समाधान

हमारी ओरसे इस प्रश्नका प्रथम बार जो उत्तर दिया गया था उसमेंसे यह अंश तो प्रतिशंका २ में स्वीकार कर लिया गया है कि ‘आत्माके शुद्ध स्वभावरूपसे परिणत होने पर पुण्य स्वयं छूट जाता है।’ किन्तु ‘पाप स्वयं छूट जाता है’ यह कथन दूसरे पक्षको मान्य नहीं है। अपर पक्षने अपने इस अभिप्रायका समर्थन प्रतिशंका २ में तो किया ही है, प्रतिशंका ३ भी इसी अभिप्रायके समर्थनमें लिखी गई है। साथ ही इसमें कुछ ऐसी बातें और लिखी गई हैं जिनका उद्देश्य समाजको भ्रममें डालना प्रतीत होता है। अस्तु,

हम दूसरे पक्षकी ऐसी बातोंका उत्तर तो नहीं देंगे, किन्तु इतना अवश्य ही स्पष्टीकरण कर देना चाहते हैं कि प्रमाण प्ररूपणाके समान नयप्ररूपणा भी जिनागमका अंग है। अतएव जिनागममें जहाँ जिस नयसे प्ररूपणा हुई है वहाँ उसे उस नयसे समझना या अन्यके लिए प्रतिपादन करना क्या यह वास्तवमें जिनागमकी अवहेलना है या उससे विपरीत अर्थ फलितकर अपने विपरीत अभिप्रायकी पुष्टि करना यह वास्तवमें जिनागमकी अवहेलना है, इसका दूसरा पक्ष स्वयं विचार करे।

पाप भाव, पुण्य भाव और शुद्ध भाव ये तीनों आत्माकी परिणतिविशेष हैं। इनमेंसे आत्मा जब जिस भावरूपसे परिणत होता है तब तन्मय होता है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए प्रवचनसारमें कहा है-

जीवो परिणमदि जदा सुहेण असुहेण वा सुहो असुहो।
सुद्धेण तदा सुद्धो हवदि हि परिणामसब्भावो ॥९॥

जीव परिणामस्वभावी होनेसे जब शुभ या अशुभ भावरूपसे परिणमता है तब शुभ या अशुभ (स्वयं) होता है और जब शुद्धभावरूपसे परिणमता है तब शुद्ध होता है ॥९॥

यह वस्तुस्थिति है। इसे दृष्टिपथमें रखकर हमें मूल प्रश्न पर विचार करते हुए सर्व प्रथम यह देखना है कि चरम सीमाको प्राप्त हुए पुण्यका क्षय और आत्माके शुद्ध स्वभावकी प्राप्ति ये दोनों क्या हैं, इन दोनोंके कारण एक हैं या भिन्न-भिन्न, तथा ये दोनों एक कालमें होते हैं या भिन्न-भिन्न कालमें ? यह तो माना नहीं जा सकता कि चरम सीमाको प्राप्त हुए पुण्यका क्षय और आत्माके शुद्ध स्वभावकी प्राप्ति इन दोनोंमें सर्वथा भेद है, क्योंकि ऐसा मानने पर ‘कार्योत्पादः क्षयः’ क्षय कार्योत्पाद ही है ( आप्तमीमांसा श्लोक ५८) इस वचनके साथ विरोध आता है। इन दोनोंके कारण भी पृथक्-पृथक् नहीं माने जा सकते, क्योंकि ऐसा मानने पर ‘हेतोर्नियमात्’ ये दोनों एक हेतुसे होते है ऐसा नियम है (वही) इस वचनके साथ विरोध आता है। इन दोनोंके होनेमें कालभेद भी नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर ‘उपादानस्य पूर्वाकारेण क्षयः कार्योत्पाद एव’-उपादानका पूर्वाकारसे क्षय कार्यका उत्पाद ही है इस वचनके साथ विरोध आता है। अतएव जिस प्रकार आत्मलक्षी सम्यक् पुरुषार्थ द्वारा आत्माके शुद्धस्वभावकी प्राप्ति होने पर चरम सीमाको प्राप्त हुए पुण्यका स्वयं छूट जाना प्रतिशंका २-३ में स्वीकार कर लिया गया है उसी प्रकार शुभ भावके अनुरूप परलक्षी पुरुषार्थ द्वारा पुण्यभावके प्राप्त होने पर पापभावका स्वयं छूट जाना भी मान्य होनेमें आपत्ति नही होनी चाहिये, क्योंकि तीनों स्थलोंमें न्याय समान है।

यहाँ सर्वप्रथम पुण्यभाव या पापभाव स्वयं छूट जाता है इस कथनका क्या तात्पर्य है इसका स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक प्रतीत होता है । वात यह है कि शुद्धभावके समान ये दोनों आत्माके भावविशेष हैं। इसलिए एक भावका उत्पाद होनेपर दूसरे भावका व्यय नियमसे होता है। उत्पाद और व्यय इनको जो पृथक्-पृथक् कहा गया है वह संज्ञा, लक्षण आदिके भेदसे ही पृथक्-पृथक् कहा गया है-‘लक्षणात् पृथक्’ ( आप्तमीमांसा श्लोक ५८), अतएव जो पूर्वभावका व्यय है वही उत्तरभावका उत्पाद है, इसलिए यह कहना कि ‘पापभावको छोड़ना पड़ता है’ संगत प्रतीत नहीं होता। ऐसा कहना भाषाका प्रयोगमात्र है। पहले कोई पापभावको वलात् छोड़ता हो और वादमें पुण्य भावको ग्रहण करता हो ऐसा जिनागमके किसी भी वचनका अभिप्राय नहीं है। समझो, किसीने ‘मैं सर्व सावद्यसे विरत हूँ’ ऐसा भाव किया, केवल वचनात्मक प्रतिज्ञा ही नहीं की, क्योंकि उक्त प्रकारसे वचनात्मक प्रतिज्ञा (व्यापार) करनेपर भी भाव भी उक्त प्रतिज्ञाके अनुरूप हो ही जाय ऐसा कोई नियम नहीं है। आगममें व्रतोंका लक्षण वतलाते हुए ‘निःशल्यो व्रती’-जो माया, मिथ्यात्व और निदान इन तीनों शल्योंसे रहित होता है वह व्रती है (तत्त्वार्थसूत्र अ० ७ सूत्र १८) यह वचन इसी अभिप्रायसे दिया है। अतएव प्रकृतमें यही निर्णय करना चाहिए कि पुण्यरूप परिणाम होनेपर पाप भाव स्वयं छूट जाता है, क्योंकि पुण्यभावका उत्पन्न होना ही पापभावका छूटना है। यह दूसरी वात है कि पुण्यभावके होनेमें कहीं बाह्य उपदेशादि सामग्री निमित्त होती है और कहीं वह स्वयं अन्तरंगमें व्रतादिके स्वीकाररूप होता है। यद्यपि धवला पु० १ पृ० ३६९ का प्रतिशंका २ में उद्धरण दिया गया है, परन्तु उसका अभिप्राय हमारे उक्त कथनके अभिप्रायसे भिन्न नहीं है। अन्तरंगमें जो सर्व सावद्ययोगसे विरतिरूप परिणाम उत्पन्न होता है उसे ही श्री धवलाजीमें बाह्यमें प्रतिज्ञारूपमें निर्दिष्ट किया गया है। प्रतिज्ञा वाचनिक भी होती है और मानसिक भी। कोई वाचनिक या मानसिक जैसी भी शुभप्रतिज्ञा कर रहा है उसीके अनुरूप अन्तरंगमें परिणामकी प्राप्ति होना यह शुभभाव है जो कहीं पापभावकी निवृत्तिरूप होता है और कहीं अन्य प्रकारके शुभभावकी निवृत्तिरूप होता है। हमने अपने प्रथम और द्वितीय उत्तरमें यही अभिप्राय व्यक्त किया था। प्रवचनसार गाथा २०८ और २०९ से भी यही आशय झलकता है। अतएव हम पूर्वमें जो कुछ लिख आये हैं वह सब आगमानुकूल ही लिख आये हैं ऐसा यहाँ समझना चाहिये।

द्वितीय उत्तरमें हमने धवला प्रथम भाग और प्रवचनसारके उक्त उल्लेखोंको व्यवहारनयकी प्ररूपणा बतलाया था। परम पारिणामिक भावको ग्रहण करनेवाले शुद्ध निश्चयनयका निर्देश करते हुए अपर पक्षकी ओरसे भी यद्यपि पुण्य-पाप आदि भेद कथनको व्यवहारनयकी प्ररूपणा स्वयं स्वीकार किया गया है, फिर भी हमारी ओरसे ‘पापभाव छोड़ना पड़ता है’ यह कथन व्यवहारनयकी प्ररूपणा है ऐसा लिखनेपर हमपर अकारण रोष प्रगट किया गया है जो शोभनीक प्रतीत नहीं होता।

‘गृहस्थ भी अणुव्रतादि पुण्यभावका त्यागकर महाव्रतरूप पुण्यभावको प्राप्त होता है’ यह कथन हमारी ओरसे पर्यायदृष्टिसे लिखा गया था, क्योंकि प्रत्येक पर्यायका यह स्वभाव है कि उसका व्यय होकर उत्तर पर्यायका उत्पाद होता है। फिर भी प्रतिशंका ३ में इसका इस प्रकार तोड़-मरोड़कर खंडन किया गया जो स्वयं प्रतिशंका पक्षको ही कमजोर बनाता है। यह तो प्रत्येक आगमाभ्यासी जानता है कि जो संयमासंयमी संयमभावको अन्तरंगमें स्वीकार करता है वह आंशिक संयमभावकी निवृत्तिपूर्वक पूर्ण संयमभावको अन्तरंगमें स्वीकार करता है अर्थात् इसके पूर्व जो उसके बाह्याभ्यन्तर आंशिक संयमरूप प्रवृत्ति होती थी उसके स्थानमें पूर्ण संयमरूप प्रवृत्ति होने लगती है। संतानकी अपेक्षा आंशिक संयमभाव पूर्ण संयमभावमें अन्तर्निहित है यह दूसरी बात है। अतएव जो कथन जिस अभिप्रायसे जहाँ किया गया हो उसे समझकर ही वस्तुका निर्णय करना चाहिये। शास्त्रके रहस्यको हृदयंगम करनेकी यही परिपाटी है।

आगे प्रतिशंका ३ में संयमासंयमचरण और संयमाचरण क्या है इसका स्पष्टीकरण करते हुए जो यह लिखा है कि ‘इन दोनों संयमाचरणोंसे पंचमादि गुणस्थानोंमें प्रतिसमय गुणश्रेणि निर्जरा होती है जिसे करणानुयोगके अभ्यासी भलीभाँति जानते हैं।’ सो इस विषयमें यही निवेदन करना है कि जिस प्रकार करणानुयोगके अभ्यासी यह जानते हैं कि इन दोनों संयमाचरणोंमें गुणश्रेणि निर्जरा होती है उसी प्रकार वे यह भी जानते हैं कि स्वभावके लक्ष्यसे वहाँ प्राप्त हुई जिस आत्मविशुद्धिके कारण ये दोनों संयमाचरण पंचमादि गुणस्थान संज्ञाको प्राप्त होते हैं, एकमात्र वही आत्मविशुद्धि गुणश्रेणिनिर्जराका प्रधान हेतु है अन्य शुभोपयोग या अशुभोपयोग नहीं।

इस प्रकार पूर्वोक्त कथनसे यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि जिस प्रकार आत्माके शुद्ध स्वभावरूपसे परिणत होनेपर पुण्यभाव स्वयं छूट जाता है उसी प्रकार आत्माके पुण्यरूपसे परिणत होनेपर पापभाव भी स्वयं छूट जाता है।

शंका १५, प्रथम दौर: शंका १५ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६९९

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प्रथम दौर

: १ :

शंका १५

जब अभाव चतुष्टय वस्तुस्वरूप हैं (भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मः) तो वे कार्य व कारण-रूप क्यों नहीं माने जा सकते। तदनुसार घातिया कर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको क्यों उत्पन्न नहीं करता ?

समाधान १

इसमें सन्देह नहीं कि जैन आगममें चारों प्रकारके अभावोंको भावान्तर स्वभाव स्वीकार किया है। किन्तु प्रकृतमें चार घातिकर्मोंके ध्वंसका अर्थ भावान्तर स्वभाव करनेपर कर्मके ध्वंसाभावरूप अकर्म पर्यायको केवलज्ञानकी उत्पत्तिका निमित्त स्वीकार करना पड़ेगा। जिसका निमित्तरूपसे निर्देश आगममें दृष्टिगोचर नहीं होता, अतः इससे यही फलित होता है कि पूर्वमें जो ज्ञानावरणीयरूप कर्मपर्याय अज्ञानभावकी उत्पत्तिका निमित्त थी उस निमित्तका अभाव होनेसे अर्थात् उसके अकर्मरूप परिणम जानेसे अज्ञानभावके निमित्तका अभाव हो गया और उसका अभाव होनेसे नैमित्तिक अज्ञान पर्यायका भी अभाव हो गया और केवलज्ञान स्वभावसे प्रगट हो गया।

शंका १५, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६९९ से ७०१

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द्वितीय दौर

: २ :

प्रतिशंका १५

प्रश्न था-जब अभावचतुष्टय वस्तुस्वरूप हैं (भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मः) तो वे कार्य व कारणरूप क्यों नहीं माने जा सकते ? तदनुसार घातिया कर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको क्यों उत्पन्न नहीं करता ?

प्रतिशंका २

वस्तुस्थिति यह है कि जैनागममें अभावको भावान्तररूप स्वीकृत किया गया है, इसलिये घातिया कर्मोंके क्षय (ध्वंस) को पुद्गलकी अकर्म पर्यायके रूपमें स्वीकृत किया जाता है । चूँकि घातिया कर्मोंकी कर्म-रूपता केवलज्ञानके प्रकट होनेमें वाधक थी अतः उनका ध्वंस (अकर्मरूपता) केवलज्ञानके प्रकट होनेमें निमित्त है, क्योंकि यह उल्लेख सर्वसम्मत है-

निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः ।

अर्थात् निमित्तका अपाय हो जानेपर उसके निमित्तसे होनेवाला कार्य भी दूर हो जाता है । इस आगमसम्मत कार्यकारणकी प्रक्रियाको स्वीकृत करते हुए भी आप यह लिखते हैं कि ‘ध्वंसका अर्थ भावान्तर स्वभाव करनेपर कर्मकी ध्वंसाभावरूप अकर्म पर्यायको केवलज्ञानकी उत्पत्तिका निमित्त स्वीकार करना पड़ेगा ।’ सो आप निमित्तसे दूर क्यों भागना चाहते हैं ? सर्वत्र प्रसिद्ध कार्य-कारणभावकी शृङ्खलाको तोड़कर आखिर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? कार्यकी सिद्धिमें जब उपादान और निमित्त दोनों कारणोंकी उपयोगिता सर्वसम्मत है तब आप केवल उपादानका पक्ष लेकर निमित्तको क्यों छोड़ देना चाहते हैं ? उपादानका यह एकान्त ही समस्त विवादोंकी जड़ है । आगे आप लिखते हैं-‘जिसका निमित्तरूपसे निर्देश आगममें दृष्टिगोचर नहीं होता ।’ सो क्या

मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् ।
-तत्त्वार्थसूत्र अ० १०, सूत्र १

इस सूत्रपर आपने लक्ष्य नहीं किया ? वहाँ स्पष्ट बतलाया है कि मोहका क्षय होनेके बाद शेष ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायके क्षयसे केवलज्ञान उत्पन्न होता है ।

इसी सूत्रकी पूज्यपाद विरचित सर्वार्थसिद्धिके उल्लेखपर भी आपने लक्ष्य नहीं दिया ऐसा जान पड़ता है ।

फलितार्थ निकालते हुए आप लिखते हैं कि ‘पूर्वमें जो ज्ञानावरणीयरूप कर्मपर्याय अज्ञानभावकी उत्पत्तिका निमित्त थी उस निमित्तका अभाव होनेसे अर्थात् उसके अकर्मरूप परिणम जानेसे अज्ञानभावके निमित्तका अभाव हो गया और उसका अभाव होनेसे नैमित्तिक अज्ञान पर्यायका भी अभाव हो गया और केवलज्ञान स्वभावसे प्रकट हो गया ।’

यहाँ आप जब ज्ञानावरणादि कर्मपर्यायको अज्ञानभावकी उत्पत्तिमें निमित्त स्वीकार कर रहे हैं तब ज्ञानावरणीय कर्मपर्यायके ध्वसको जो कि अकर्मपर्यायरूप होता है अज्ञानभावके अभावरूप केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्त क्यों नहीं मानना चाहते हैं ? यह समझमें नहीं आता ।

‘केवलज्ञान स्वभावसे प्रकट हो गया’ इसका अभिप्राय तो यह है कि केवलज्ञान कहीं वाहरसे नहीं आया । ज्ञानावरणकर्मके उदयसे ज्ञानगुणकी जो केवलज्ञानरूप पर्याय अनादिकालसे प्रकट नहीं हो सकी थी वह आवरण करनेवाले ज्ञानावरण तथा साथ ही शेष तीन घातियकर्मोंका क्षय हो जानेसे प्रकट हो जाती है । भेदनयसे तद्भव मोक्षगामीका ज्ञानगुण और अभेदनयसे उसकी आत्मा ही केवलज्ञानरूप परिणत हो रहा है, इसलिए उपादान कारणकी अपेक्षा केवलज्ञानका उपादान कारण उसका ज्ञानगुण और आत्मा है, परन्तु निमित्त कारणकी अपेक्षा ज्ञानावरणादि कर्मोंका क्षय निमित्त कारण है । अनेकान्तकी शैलीसे विचार करनेपर सर्व विरोध दूर हो जाता है ।

तत्त्वार्थसूत्र, पञ्चास्तिकाय आदि ग्रन्थोंमें औपशमिकादि पाँच भावोंका जो वर्णन आया है उनमें केवलज्ञानको क्षायिकभाव कहा है और क्षायिकभावका लक्षण यही किया गया है कि जो कर्मोंके क्षयसे हो वह क्षायिकभाव है । जैसा कि कहा गया है-

ज्ञानावरणस्यात्यन्तक्षयात्केवलज्ञानं क्षायिकं तथा केवलदर्शनम् ।
-सर्वार्थसिद्धि अ० २ सूत्र ४

अर्थ-ज्ञानावरणके अत्यन्त क्षयसे केवलज्ञान उत्पन्न होता है, अतः वह क्षायिकभाव है। इसी प्रकार केवलदर्शनको भी क्षायिकभाव समझना चाहिये।

ज्ञानदर्शनावरणक्षयात् केवले क्षायिके ।
-राजवार्त्तिक अ० २ सूत्र ४

अर्थ-ज्ञानावरण और दर्शनावरणके क्षयसे होनेके कारण केवलज्ञान और केवलदर्शन क्षायिकभाव हैं। यही भाव उक्त वार्तिककी निम्नाङ्कित वृत्तिमें भी प्रकट किया गया है-

ज्ञानावरणस्य कर्मणः दर्शनावरणस्य च कृत्स्नस्य क्षयात्केवले ज्ञान-दर्शने क्षायिके भवतः।

अर्थ-पूर्ववत् स्पष्ट है।

शंका १५

मूल प्रश्न-जब अभाव-चतुष्टय वस्तुस्वरूप हैं ( भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मः ) तो वे कार्य व कारणरूप क्यों नहीं माने जा सकते ? तदनुसार घातिया कर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको क्यों उत्पन्न नहीं करता ?

शंका १५, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७०१ से ७०२

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प्रतिशंका २ का समाधान

इस प्रश्नके उत्तरमें यह स्पष्ट किया गया था कि ‘पूर्वमें जो ज्ञानावरणीय कर्मपर्याय अज्ञानभावकी उत्पत्तिका निमित्त थी उस निमित्तका अभाव होनेसे अर्थात् अकर्मरूप परिणम जानेसे अज्ञानभावके निमित्तका अभाव हो गया और उसका अभाव होनेसे नैमित्तिक अज्ञान पर्यायका भी अभाव हो गया और केवलज्ञान स्वभावसे प्रगट हो गया।’

प्रतिशंका २ में पुनः इसकी चरचा करते हुए ज्ञानावरणकी अभावरूप अकर्मपर्यायको केवलज्ञानकी उत्पत्तिका निमित्त बतलाया गया है। इसी प्रकार अन्यत्र जहाँ जहाँ भी क्षायिक भावोंकी उत्पत्तिका उल्लेख कर्मोंके क्षयसे आगममें लिखा है वहाँ वहाँ सर्वत्र प्रतिशंका २में इसी नियमको स्वीकार किया गया है। इसके समर्थनमें ‘मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम्।’ यह सूत्र उद्धृत किया गया है।

हम निमित्तोंसे नहीं घबड़ाते। उनसे घबड़ानेका कोई कारण भी नहीं, क्योंकि जब हम यह अच्छी तरहसे जानते हैं कि जो हमारी संसारकी परिपाटी चल रही है उसमें स्वयं हम अपराधी हैं। जो निमित्तोंकी बलजोरीवश अपना इष्टानिष्ट होना मानते हैं, घबड़ानेका प्रसंग यदि उपस्थित होता है तो मात्र उनके सामने ही होता है।

यहाँ तो मात्र विचार इस बातका करना है कि क्या ‘मोहक्षयात्’ इत्यादि सूत्रमें आये हुए ‘क्षय’ पदसे उसकी अकर्मपर्यायको केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्तरूपसे स्वीकार किया गया है, या वहाँ आचार्योंका मात्र इतना दिखलाना प्रयोजन है कि स्वभाव पर्यायकी उत्पत्तिके समय उससे पूर्व जो विभाव पर्यायके निमित्त थे उनका वहाँ अभाव है।

यह तो आगम परिपाटीको जाननेवाले अच्छी तरहसे जानते हैं कि मोहनीय कर्मका क्षय १०वें गुणस्थानके अन्तमें होता है और ज्ञानावरणादि तीन कर्मोंका क्षय १२वें गुणस्थानके अन्तमें होता है। फिर भी केवलज्ञानकी उत्पत्तिके कथनके प्रसंगसे मोहनीय कर्मके क्षयका भी हेतुरूपसे निर्देश किया गया है। ऐसी अवस्थामें क्या यह मानना उचित होगा कि मोहनीय कर्मका क्षय होकर जो अकर्मरूप पुद्गल वर्गणायें हैं वे भी केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्त हैं। मेरी नम्र सम्मतिमें उक्त वचनका ऐसा अर्थ करना उचित नहीं होगा। अतएव पूर्वमें उक्त प्रश्नका जो उत्तर दे आये हैं वही प्रकृतमें समीचीन प्रतीत होता है।

शंका १५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७०२ से ७०६

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका १९

जब अभावचतुष्टय वस्तुस्वरूप हैं ( भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मः ) तो वे कार्य व कारणरूप क्यों नहीं माने जा सकते ? तदनुसार घातियाकर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको क्यों उत्पन्न नहीं करता ?

इस प्रश्नके प्रथम उत्तरमें आपके द्वारा यह तो स्वीकृत कर लिया गया था कि ‘चारों प्रकारके अभावों ( अभाव चतुष्टय ) को भावान्तरस्वभाव स्वीकृत किया है।’ किन्तु ‘चार घातिया कर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको उत्पन्न करता है’ इसको स्वीकार नहीं किया गया था। और आपने यह भी लिखा था कि ऐसा निर्देश आगममें दृष्टिगोचर नहीं होता।

आपके इस प्रथम उत्तरको ध्यानमें रखकर श्री तत्त्वार्थसूत्र, सर्वार्थसिद्धि तथा राजवार्तिक आदि ग्रन्थोंके प्रमाण उद्धृत करते हुए यह बतलाया गया था कि श्री उमास्वामी आचार्य, श्री पूज्यपाद स्वामी, श्री अकलंकदेव और श्री कुन्दकुन्द स्वामीने कर्मोंके क्षयसे क्षायिकभाव तथा केवलज्ञानकी उत्पत्ति कही है, परन्तु उस ओर आपकी फिर भी दृष्टि नहीं गई। यहाँ यही प्रतीत होता है कि आप अभावको कारण नही मानना चाहते हैं। परन्तु जब हम आगमको देखते हैं तब जगह जगह अभावको कारणरूप स्वीकृत किया गया देखते हैं, क्योंकि अभाव तुच्छाभावरूप नहीं है, किन्तु भावान्तरस्वभाव है। इस संदर्भमें आप समन्तभद्र स्वामीका युक्त्यनुशासनमें निम्नांकित समुल्लेख देखिए-

भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मो भावान्तरं भाववदर्हतस्ते।
प्रमीयते च व्यपदिश्यते च वस्तुव्यवस्थांगममेयमन्यत् ॥५९॥

अर्थ-हे वीर अर्हन् ! आपके मतमें अभाव भी वस्तुधर्म होता है। यदि वह अभावधर्मका अभाव न होकर धर्मीका अभाव है तो वह भावकी तरह भावान्तर होता है और इस सबका कारण यह है कि अभावको प्रमाणसे जाना जाता है व्यपदिष्ट किया जाता है तथा वस्तुव्यवस्थाके अंगरूपमें निर्दिष्ट किया जाता है। जो अभावतत्त्व वस्तुव्यवस्थाका अंग नहीं है वह भावैकान्तकी तरह अप्रमेय ही है।

धवला पुस्तक ७ पृ० ९० पर-

खइयाए लद्धीए ॥४७॥

सूत्रका व्याख्यान करते हुए श्रीवीरसेन स्वामी लिखते हैं-

ण च केवलणाणावरणक्खओ तुच्छो त्ति ण कज्जयरो, केवलणाणावरणबंधसंतोदयाभावस्स अणंत-वीरिय-वेरग्ग-सम्मत्त-दंसणेदिगुणेहिं जुत्तजीवदव्वस्स तुच्छत्तविरोहादो। भावस्स-अभावत्तं ण विरुज्झदे, भावाभावाणमण्णोण्णं विस्ससेणेव सव्वप्पणा आलिंगिऊणाट्ठिदाणमुवलंभादो। ण च उवलंभमाणे विरोहो अत्थि, अणुवलद्धिविसयस्स तस्स उवलद्धीए अत्थित्तविरोहादो।

अर्थ-क्षायिक लब्धिसे जीव केवलज्ञानी होता है ॥४७॥

केवलज्ञानावरणका क्षय तुच्छ अर्थात् अभावरूपमात्र है, इसलिये वह कोई कार्य करनेमें समर्थ नहीं हो सकता, ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि, केवलज्ञानावरणके बन्ध, सत्त्व और उदयके अभाव सहित तथा अनन्तवीर्य, वैराग्य, सम्यक्त्व व दर्शन आदि गुणोंसे युक्त जीव द्रव्यको तुच्छ माननेमें विरोध आता है। किसी भावको अभावरूप मानना विरोधी बात नहीं है, क्योंकि भाव और अभाव स्वभावसे ही एक दूसरेको सर्वात्मरूपसे आलिंगन करके स्थित पाये जाते हैं। जो बात पाई जाती है उसमें विरोध नहीं रहता, क्योंकि, विरोधका विषय अनुपलब्धि है और इसलिए जहाँ जिस बातकी उपलब्धि होती है उसमें फिर विरोधका अस्तित्व माननेमें ही विरोध आता है।

इन सन्दर्भोंको देखते हुए आशा है आप पुनः विचार करेंगे। श्री उमास्वामी आचार्यके-

मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम्।
-त० सू०, अ० १०, सू० १

अर्थात् मोहका क्षय होनेके बाद शेष ज्ञानावरण, दर्शनावरण, और अन्तरायके क्षयसे केवलज्ञान उत्पन्न होता है।…इन वाक्यों पर आपके द्वारा यह आपत्ति उठाई गई है कि ‘मोहनीय कर्मका क्षय दशवें गुणस्थानके अन्तमें होता है और ज्ञानावरणादि तीन कर्मोंका क्षय बारहवें गुणस्थानके अन्तमें होता है, फिर भी केवलज्ञानकी उत्पत्तिके कथनके प्रसंगमें मोहनीय कर्मके क्षयको भी हेतुरूपसे निर्देश किया गया है। ऐसी अवस्थामें क्या यह मानना उचित होगा कि मोहनीयकर्मका क्षय होकर जो अकर्मरूप पुद्गल वर्गणाऐं हैं वे भी केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्त हैं।’

इस विषयमें हमारा नम्र निवेदन यह है कि श्री उमास्वामी महान् विद्वान् आचार्य हुए हैं। उन्होंने सागरको गागरमें बन्द कर दिया अर्थात् द्वादशांगको दशाध्याय सूत्रमें गुम्फित कर दिया। हमको आशा नहीं थी कि ऐसे महान् आचार्योंके वचनोंपर भी आप आपत्ति डालकर खण्डन करनेका प्रयास करेंगे। यदि आप इस सूत्र पर सर्वार्थसिद्धि टीका देखनेका प्रयास करते तो सम्भव था कि सूत्रके खण्डनपर आपकी लेखनी नहीं चलती।

शंका की गई कि ‘मोहज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयात्केवलम्’ यह सूत्र बनाना चाहिये था, क्योंकि ऐसा करनेसे सूत्र हलका हो जाता? इसका उत्तर देते हुए श्री पूज्यपाद स्वामी लिखते हैं-

'क्षयक्रमप्रतिपादनार्थो वाक्यभेदेन निर्देशः क्रियते। प्रागेव मोहं क्षयमुपनीयान्तमुहूर्तं क्षीणकषाय-
व्यपदेशमवाप्य ततो युगज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायाणां क्षयं कृत्वा केवलमवाप्नोति इति तत्क्षयो हेतुः केवलोत्पत्तेरिति हेतुलक्षणे विभक्ति-निर्देशः कृतः ।
-स० सि०, अ० १०, सू० १

अर्थ-क्षयके क्रमका कथन करनेके लिये वाक्योंका भेद करके निर्देश किया है । पहले ही मोहका क्षय करके अन्तर्मुहूर्त कालतक क्षीणकषाय संज्ञाको प्राप्त होकर अनन्तर ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मका एक साथ क्षय करके केवलज्ञानको प्राप्त होता है । इन कर्मोंका क्षय केवलज्ञानकी उत्पत्तिका हेतु है ऐसा जानकर ‘हेतुरूप’ विभक्तिका निर्देश किया है ।

इस सूत्रसे सिद्ध होता है कि मोहनीयकर्मका चय ज्ञानावरणादि तीन घातिया कर्मोंके क्षयका कारण है और उनके क्षयसे केवलज्ञान-केवलदर्शन उत्पन्न होता है । अतः मोहनीय कर्मका क्षय केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें साक्षात् कारण नहीं है ।

प्रायः केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें ज्ञानावरणके क्षयको अभावरूप तुच्छवस्तु बताकर कारणताका निषेध कर देते हैं । उसका समाधान यह है कि अभाव तुच्छरूप नहीं है, किसी भावान्तररूप ही है । चाहे वह पुद्गलका रूपान्तर ही हो, जब वह प्रतिबन्धात्मकताको छोड़कर प्रतिबन्धकाभावरूपमें ढल जाता है तब ही ज्ञान उत्पन्न होता है । उस प्रतिबन्धकाभावरूप सहकारी कारणके बिना भी ज्ञान नहीं उत्पन्न होता । इसलिये वह ज्ञानका (सहायक) कारण अवश्य है, प्रतिबन्धकाभावको तुच्छ बताकर कारणतासे हटाना अज्ञानमूलक बात है । घातिया कर्मोंके क्षयसे केवलज्ञान (अर्हंतपद) प्राप्त होता है यह बात स्वीकार करते हुए आपने स्वयं इस सूत्रको प्रश्न नं० १३ के उत्तरमें उद्धृत किया है ।

बाधक कारणोंका अभाव भी कार्योत्पत्तिमें कारण होता है जैसा कि मूलाराधना गाथा ४ की टीकामें कहा है-

अन्वय-व्यतिरेकसमधिगम्यो हि हेतुफलभावः सर्व एव । तावन्तरेण हेतुना प्रतिज्ञामात्रत एव । कस्यचित्सा वस्तुचिन्तायामनुपयोगिनीति प्रतिबन्धकसद्भावानुमानमागमेऽभिमते तावदसति न घटते ।

अर्थ-जगत्में पदार्थोंका सम्पूर्ण कार्य-कारणभाव अन्वय-व्यतिरेकसे जाना जाता है । अन्वय-व्यतिरेकके बिना कोई पदार्थ किसीका कारण मानना केवल प्रतिज्ञामात्र ही है । ऐसी प्रतिज्ञा वस्तुके विचारके समय कुछ भी उपयोगी नहीं है । आगममें स्पष्ट है कि प्रतिबन्धक कारणोंसे कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती । जैसे सहकारी कारणोंके अभावमें कार्य सिद्ध नहीं होता वैसे ही प्रतिबन्धक कारणोंके सद्भावमें कार्य नहीं होता । सार यह है कि सहकारी कारण होते हुए यदि प्रतिबन्धक कारणोंका अभाव होगा तो कार्य सिद्ध होगा, अन्यथा नहीं ।

स्वयं श्रीमान् पं० फूलचन्द्रने भी मोक्षशास्त्र पृ० ४५५ (वर्णी ग्रन्थमाला) पर लिखा है-

बात यह है कि जितने भी क्षायिकभाव हैं वे सब आत्माके निजभाव हैं पर संसारदशामें वे कर्मोंसे घातित रहते हैं और ज्यों ही उसके प्रतिबन्धक कर्मोंका अभाव होता है त्यों ही वे प्रकट हो जाते हैं ।

इस आगमसे सिद्ध होता है कि प्रतिबन्धकके अभावसे कार्यकी सिद्धि होती है । केवलज्ञान तो आत्माकी शक्तिरूपसे द्रव्यार्थिकनयकी अपेक्षा प्रत्येक आत्मामें है जो ज्ञानावरण कर्मोदयके कारण व्यक्त नहीं हो पाता । ज्ञानावरण कर्मरूपी बाधक कारणोंका क्षय हो जानेसे व्यक्त हो जाता है । अतः ज्ञानावरणादि घातिया कर्मोंका क्षय केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें कारण है यह हमारे मूल प्रश्नका उत्तर है ।

आपने अप्रासंगिक यह लिख दिया है कि ‘हमारी संसारकी परिपाटी चल रही है उसमें हम स्वयं अपराधी हैं।’ यहाँपर यह विचार करना है कि ‘अपराध’ क्या आत्माका स्वभाव है या आगन्तुक विभाव (विकारी भाव) है ? उपयोगके समान यदि अपराधको भी आत्माका त्रैकालिक स्वभाव मान लिया जावे तो उसका कभी नाश नहीं होगा और आगन्तुक विभाव है तो वह अवश्य ही कारणजन्य होगा। सिद्धान्ततः रागादि अपराध आगन्तुक होनेसे परसंगसे ही उत्पन्न माने गये हैं। जैसा कि नाटकसमयसारमें अमृतचन्द्र स्वामीका वचन है-

न जातु रागादिनिमित्तभावमात्मात्मनो याति यथार्ककान्तः।
तस्मिन्निमित्तं परसंग एव वस्तुस्वभावोऽयमुदेति तावत् ५१३॥
-बन्धाधिकार

अर्थ-आत्मा स्वयं ही अपने रागादि विकारका निमित्त नहीं होता, उसमें अवश्य ही परपदार्थका संग कारण है। जिस प्रकार कि सूर्यकान्तमणि स्वयं अग्निका निमित्त नहीं है, किन्तु उसके उत्पन्न होनेमें सूर्य रश्मियोंका सम्पर्क कारण है। वस्तुका यही स्वभाव है।

इससे सिद्ध होता है कि हमारा अपराधी होना भी मोहनीय कर्मोदयके अधीन है। जब तक मोहनीय कर्मका क्षय नहीं होगा तब तक अपराध अवश्य बना रहेगा, क्योंकि निमित्तके अभावके बिना नैमित्तिकभावका अभाव सम्भव नहीं है।

पुनश्च-‘मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम्’ तत्त्वार्थसूत्र अध्याय १० सूत्रका खण्डन करते हुए आपने यह युक्ति दी थी कि ‘मोहनीय कर्मका क्षय दसवें गुणस्थानके अन्तमें होता है और ज्ञानावरणादि तीन कर्मोंका क्षय बारहवें गुणस्थानके अन्तमें होता है फिर भी केवलज्ञानकी उत्पत्तिके कथनके प्रसंगमें मोहनीय कर्मके क्षयको हेतुरूपसे निर्देश किया गया है।’ इसका उत्तर सर्वार्थसिद्धिका उल्लेख करते हुए श्री पूज्यपाद आचार्यके वचनों द्वारा दिया जा चुका है। किन्तु इस आपत्तिके विरुद्ध श्री पं० फूलचन्द्रजी स्वयं इस प्रकार लिखते हैं-

इस कैवल्य प्राप्तिके लिये उसके प्रतिबन्धक कर्मोंका दूर किया जाना आवश्यक है, क्योंकि उनको दूर किये बिना इसकी प्राप्ति सम्भव नहीं। वे प्रतिबन्धक कर्म चार हैं। जिनमेंसे पहले मोहनीय कर्मका क्षय होता है। यद्यपि मोहनीय कर्म कैवल्य अवस्थाका सीधा प्रतिबन्ध नहीं करता है तथापि इसका अभाव हुए बिना शेष कर्मोंका अभाव नहीं होता, इसलिए यह भी कैवल्य अवस्थाका प्रतिबन्धक माना है। इस प्रकार मोहनीयका अभाव हो जानेके पश्चात् अन्तर्मुहूर्तमें तीनों कर्मोंका नाश होता है और तब जाकर कैवल्य अवस्था प्राप्त होती है।
-त० सू० पृ० ४५२-४५३ वर्णी ग्रंथमाला

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका १९

जब अभावचतुष्टय वस्तुस्वरूप हैं ( भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मः ) तो वे कार्य व कारणरूप क्यों नहीं माने जा सकते ? तदनुसार घातियाकर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको क्यों उत्पन्न नहीं करता ?

शंका १५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७०६ से ७११

↑ सूची


प्रतिशंका ३ का समाधान

इस प्रश्नके प्रथम उत्तरमें यह बतला दिया गया था कि ‘प्रकृतमें ध्वंसका अर्थ सर्वथा भावान्तर स्वभाव लेने पर घातिकर्मोंकी अकर्म पर्यायको केवलज्ञानकी उत्पत्तिका निमित्त कारण मानना पड़ेगा जो आगमसम्मत नहीं है । अतः जो अज्ञानभावके निमित्त थे उनका अभाव ( व्यय ) होने पर अज्ञान भावका अभाव हो गया और केवलज्ञान स्वभावसे प्रगट हो गया यह अर्थ करना प्रकृतमें संगत होगा ।’

इस पर प्रतिशंका करते हुए प्रतिशंका २ में मुख्यरूपसे घातिकर्मोंका ध्वंस ( अकर्मरूपता ) केवलज्ञानके प्रगट होनेमें निमित्त है यह स्वीकार किया गया है । इसमें अन्य जितना व्याख्यान है वह इसी अर्थकी पुष्टि करता है ।

इसके उत्तरमें पुनः प्रथम उत्तरकी पुष्टि की गई । साथमें दूसरी आपत्तियाँ भी उपस्थित की गईं ।

तत्काल प्रतिशंका ३ सामने है । उसमें सर्वप्रथम हमारी ओरसे चारों अभावोंको भावान्तर स्वभाव स्वीकार करनेकी जहाँ एक ओर पुष्टि की गई है वहाँ दूसरी ओर हमारे ऊपर यह आरोप भी किया गया है कि ‘चार घातिया कर्मोंके ध्वंससे केवलज्ञान होता है इस प्रकारका वचन आगममें नहीं उपलब्ध होता’ ऐसा हम उत्तरमें लिख आये हैं । किन्तु जब हमने पूर्वके दोनों उत्तर बारीकीसे देखे तो विदित हुआ कि बात कोई दूसरी है और उसे छिपानेके लिए यह उपक्रम किया गया है, इसलिए यहाँ सर्वप्रथम हम अपने उत्तरके उस अंशको उद्धृत कर देना चाहते हैं जिसके आधारसे ऐसा आरोप किया गया है । वह उल्लेख इस प्रकार हैं-

किन्तु प्रकृतमें चार घातिकर्मोंके ध्वंसका अर्थ भावान्तर स्वभाव करने पर कर्मके ध्वंसाभावरूप अकर्म पर्यायको केवलज्ञानकी उत्पत्तिका निमित्त स्वीकार करना पड़ेगा । जिसका निमित्तरूपके निर्देश आगममें दृष्टिगोचर नहीं होता ।’ ( प्रथम उत्तरसे उद्धृत )

इस उत्तरमें ‘प्रकृतमें’ यह पद ध्यान देने योग्य है । इस द्वारा यह बतलाया गया है कि यद्यपि ‘ध्वंस’ भावान्तर स्वभाव होता है इसमें सन्देह नहीं, पर प्रकृतमें उसका यह अर्थ नहीं लेना है ।

अब इस अंशके प्रकाशमें प्रतिशंका ३ के उस अंशको पढ़िए जिसे हमारा कथन बतलाया गया है । यथा-

‘आपके द्वारा·······किन्तु चार घातिया कर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको उत्पन्न करता है इसको नहीं स्वीकार किया गया था । और आपने यह भी लिखा था कि ऐसा निर्देश आगममें दृष्टिगोचर नहीं होता ।’

ये दोनों उल्लेख हैं । इन्हें पढ़नेसे यह भलीभाँति ज्ञात हो जाता है कि इन दोनोंमें कितना अन्तर है । जहाँ शंकाकार पक्ष ध्वंसको भावान्तर स्वभाव लिखकर अकर्मपर्यायको केवलज्ञानकी उत्पत्तिका जनक बतलाता है वहां हमारा यह कहना है कि प्रकृतमें ध्वंसका यह अर्थ गृहीत नहीं है, क्योंकि चार घातिकर्मोंकी ध्वंसरूप अकर्मपर्याय केवलज्ञानको उत्पन्न करती है ऐसा आगममें कहीं निर्देश नहीं है ।

अपने पक्षकी सिद्धिके लिए प्रतिशंका ३ में धवला पु० ७ पृ० ९० का ‘खइयाए लद्धीए’ यह सूत्र-वचन उद्धृत किया गया है, जिसमें ‘प्रतिपक्षी कर्मके क्षयसे कार्योत्पत्ति होती है ।’ ऐसा बतलाया गया है, जिससे हमारे अभिप्रायकी ही पुष्टि होती है । किन्तु अपर पक्षके द्वारा अपने अभिप्रायकी पुष्टिमें ऐसा एक भी उद्धरण उपस्थित न किया जा सका जिसमें ‘कर्मकी भावान्तरस्वभाव अकर्मपर्यायसे क्षायिकभावकी उत्पत्ति बतलाई गई हो ।’

ऐसा प्रतीत होता है कि अपर पक्ष कहाँ गलती हो रही है इसे समझ गया है, इसलिए प्रतिशंका ३ में उसकी ओरसे ध्वंसको भावान्तरस्वभाव कहकर अकर्मपर्याय केवलज्ञानकी उत्पत्तिका जनक है इस बात पर विशेष जोर न देकर दूसरी दूसरी बातोंसे प्रतिशंकाका कलेवर वृद्धिगत किया गया है । और मानों हम ध्वंसको तुच्छाभावरूप मानते हैं यह बतलानेका उपक्रम किया गया है। अतः प्रकृतमें चार घातियाकर्मोंके ध्वंसका अर्थ क्या लिया जाना चाहिये इस पर सर्व प्रथम विचार कर लेना इष्ट प्रतीत होता है। आप्तमीमांसामें बतलाया है-

कार्योत्पादः क्षयो हेतोर्नियमाल्लक्षणात्पृथक् ।
न तौ जात्याद्यवस्थानादनपेक्षाः खपुष्पवत् ॥५८॥

यतः उत्पाद और व्ययके होनेमें एक हेतुका नियम है, इसलिए क्षय कार्योत्पाद ही है। किन्तु लक्षणकी अपेक्षा दोनों पृथक्-पृथक् हैं । किन्तु ‘सद्द्रव्यम्’ इत्यादि रूपसे जाति आदिका अवस्थान होनेसे खपुष्पके समान वे सर्वथा निरपेक्ष भी नहीं हैं ॥५८॥

यह आप्तमीमांसाका उल्लेख है । इसमें व्यय और उत्पाद दोनों एक हेतुसे जायमान होनेके कारण ध्वंस ( व्यय ) को जहाँ उत्तर पर्याय ( उत्पाद ) रूप सिद्ध किया है वहाँ लक्षणभेदसे दोनोंको पृथक्-पृथक् भी सिद्ध किया है । इन दोनोंमें लक्षणभेद कैसे है यह बतलाते हुए अष्टसहस्री पृ० २१० में लिखा है-

कार्योत्पादस्य स्वरूपलाभलक्षणत्वात्कारणविनाशस्य च स्वभावप्रच्युतिलक्षणत्वात्तयोर्भिन्नलक्षणसम्बन्धित्वसिद्धेः ।

कार्योत्पादका स्वरूपलाभ यह लक्षण है और कारण विनाशका स्वभावप्रच्युति यह लक्षण है, इस प्रकार उन दोनोंमें भिन्न-भिन्न लक्षणोंका सम्बन्धीपना सिद्ध होता है ।

इस प्रकार इन आगम प्रमाणोंके प्रकाशमें यह स्पष्ट हो जाता है कि 'चार घातिया कर्मोंके क्षयसे केवलज्ञान उत्पन्न होता है इस कथनमें ‘ध्वंस भावान्तरस्वभाव होता है।’ इसके अनुसार चार घातिया कर्मोंकी ध्वंसरूप अकर्मपर्यायको निमित्त रूपसे नहीं ग्रहण करना है, क्योंकि चार घातिया कर्मोंकी ध्वंसरूप अकर्मपर्याय केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्त है ऐसा किसी भी आगममें स्वीकार नहीं किया गया है । किन्तु ध्वंसका अर्थ जो चार घातिया कर्म अज्ञानादिके निमित्त थे उनका विनाश ( व्यय ) रूप अर्थ ही प्रकृतमें लेना है, क्योंकि उत्पादसे कथञ्चित् भिन्न व्ययका यही लक्षण है। अतएव इस कथनसे अपर पक्षका प्रतिशंका २ में यह लिखना कि ‘चूँकि घातिया कर्मोंकी कर्मरूपता केवलज्ञानके प्रगट होनेमें बाधक थी अतः उनका ध्वंस ( अकर्मरूपता ) केवलज्ञानके प्रगट होनेमें निमित्त है।’ आगमसंगत न होकर हमारा यह लिखना कि ‘पूर्वमें जो ज्ञानावरणीयरूप कर्मपर्याय अज्ञानभावकी उत्पत्तिका निमित्त थी उस निमित्तका अभाव होनेसे अर्थात् उसके अकर्मरूप परिणम जानेसे अज्ञानभावके निमित्तका अभाव हो गया और उसका अभाव होनेसे नैमित्तिक अज्ञानपर्यायका भी अभाव हो गया और केवलज्ञान स्वभावसे प्रगट हो गया।’ आगमसंगत है। क्योंकि पूर्वमें अष्टसहस्रीके आधारसे जो ‘व्यय’ का लक्षण लिख आये हैं उसे दृष्टिपथमें रखकर ही आचार्य गृद्धपिच्छने तत्त्वार्थसूत्रके ‘मोहक्षयात्’ इत्यादि सूत्रमें ‘क्षय’ शब्दका प्रयोग किया है, ‘कार्योत्पादः क्षयो हेतोर्नियमात्’ इसके अनुसार ‘क्षय (व्यय)’ अनन्तर पर्याय (उत्पाद) रूप ही है इस अर्थमें नहीं।

अपर पक्षने प्रतिशंका २ में अपने पक्षके समर्थनके लिए ‘निमित्तापाये नैमित्तकस्याप्यपायः’ यह वचन उदधृत किया था सो यह वचन भी हमारे उक्त कथनकी ही पुष्टि करता है, क्योंकि हमारा यही तो लिखना है कि अज्ञानादिके निमित्त जो चार घातिया कर्म थे उनका अभाव होनेसे नैमित्तिक अज्ञानादिका अभाव हो गया और चूँकि केवलज्ञान स्वभावपर्याय है, इसलिए वह पर (कर्म) निरपेक्ष होनेके कारण स्वभावसे प्रगट हो गया। पता नहीं उक्त उल्लेखको अपर पक्षने अपने समर्थनमें कैसे समझ लिया। अथवा पूर्व पर्यायके व्यय और उत्तरपर्यायके उत्पाद इन दोनोंको सर्वथा एक माननेसे जो गलती होती है वही यहाँ हुई है और यही कारण है कि अपर पक्षने ‘निमित्तापाये’ इत्यादि वचनको भी अपने पक्षका समर्थक जानकर प्रमाणरूपमें उद्‌धृत करनेका उपक्रम किया है। अस्तु, अपर पक्ष उक्त विवेचन पर पूरा ध्यान देगा और प्रचारकी दृष्टिसे हमें उद्देश्य कर प्रतिशंकामें ३ जो यह लिखा है कि-

‘इस विषयमें हमारा नम्र निवेदन यह है कि उमास्वामी महान् विद्वान् आचार्य हुए हैं। उन्होंने सागरको गागरमें बन्द कर दिया अर्थात् द्वादशांगको दशाध्याय सूत्रमें गुम्फित कर दिया। हमको आशा नहीं थी कि ऐसे महान् आचार्योंके वचनोंपर भी आप आपत्ति डालकर खण्डन करनेका प्रयास करेंगे।’ सो वह ऐसे आक्षेपात्मक वचनोंके प्रयोगसे विरत होगा। वस्तुतः आचार्यके वचनोंका खण्डन हमारी ओरसे नहीं किया गया है। हमने तो उन महान् आचार्यके उक्त वचनमें जो रहस्य भरा है उसे ही उद्‌घाटित करनेका प्रयत्न किया है। यदि मण्डनके नाम पर खण्डन किया जा रहा है तो अपर पक्षकी ओरसे ही किया जा रहा है, क्योंकि वह पक्ष ही एकान्तसे व्यय और उत्पादमें सर्वथा अभेद मानकर चार घातिया कर्मोंकी ध्वंसरूप अकर्मपर्यायको केवलज्ञानका जनक बतला रहा है जो तत्त्वार्थसूत्रके उक्त वचनका आशय नहीं है।

आचार्य अकलंकदेव और आचार्य विद्यानन्दिने ‘दोषावरणयोर्हानिः’ इस आप्तमोमांसाकी कारिकाका व्याख्यान करते हुए क्रमसे अष्टशती और अष्टसहस्री टीकामें ‘प्रकृतमें क्षयका अर्थ ज्ञानावरणादि कर्मोंकी अकर्मरूप उत्तर पर्याय नहीं लिया गया है, किन्तु ज्ञानावरणादिरूप पर्यायकी हानि या व्यावृत्ति ही लिया गया है’ ऐसा स्पष्टीकरण करते हुए पृ० ५३ में लिखा है-

मलादेर्व्यावृत्तिः क्षयः, सतोऽत्यन्तविनाशानुपपत्तेः। तादृगात्मनोऽपि कर्मणो निवृत्तौ परिशुद्धिः। प्रध्वंसाभावो हि क्षयो हानिरिहाभिप्रेता। सा च व्यावृत्तिरेव मणेः कनकपाषाणाद्वा मलस्य किट्टादेर्वा…… तेन मणेः कैवल्यमेव मलादेर्वैकल्यम्। कर्मणोऽपि बैकल्यमात्मकैवल्यमस्त्येव ततो नातिप्रसज्यते।

मलादिककी व्यावृत्ति क्षय है, क्योंकि सत्का अत्यन्त विनाश नहीं बनता। उसी प्रकार आत्माकी भी कर्मकी निवृत्ति होने पर परिशुद्धि होती है। प्रकृतमें प्रध्वंसाभावका अर्थ क्षय या हानि अभिप्रेत है और वह व्यावृत्तिरूप ही है। जैसे कि मणिमेंसे मलकी और कनकपाषाणमेंसे किट्टादिकी व्यावृत्ति होती है।……इसलिए मणिका अकेला होना ही मलादिकी विकलता ( रहितपना ) है। उसी प्रकार कर्मकी भी विकलता आत्माका कैवल्य है ही, इसलिए अतिप्रसंग दोष नहीं आता। यह आचार्य अकलंकदेव और आचार्य विद्यानन्दि जैसे समर्थ महर्षियोंकी वाणीका प्रसाद है, इससे भी जिस अभिप्रायका हम प्रकाशन करते आये हैं उसकी पुष्टि होती है। आचार्य गृद्धपिच्छका भी यही अभिप्राय है।

पूर्व पर्यायका ध्वंस (व्यय) तुच्छाभाव है ऐसा तो हमने अपने उत्तरोंमें कहीं लिखा ही नहीं। स्वामी समन्तभद्रके युक्त्यनुशासनका ‘भवत्यभावोऽपि’ इत्यादि वचन प्रमाण है इस आशयका अपना अभिप्राय हम प्रथम प्रश्नके उत्तरके समय उत्तरके प्रारम्भमें ही प्रगट कर आये हैं, अतः प्रतिशंका ३ में तुच्छाभावकी अप्रस्तुत चर्चा उठाकर उसके खण्डनके लिए ‘भवत्यभावोऽपि’ इत्यादि वचनको उद्धृत करना कोई मतलब नहीं रखता। चर्चामें विधि और निषेध उसी वस्तुका होना चाहिए जिसमें मतभेद हो और जो आनुषंगिक होने पर भी प्रकरणमें उपयोगी हो। हाँ, इस वचन द्वारा अपर पक्ष ध्वंस (व्यय) को सर्वथा उत्तर पर्याय (उत्पाद) रूप मानना चाहता हो तो उसे अष्टसहस्री व अष्टशतीके पूर्वोक्त उल्लेखके आधार पर अपने अभिप्रायमें अवश्य ही संशोधन कर लेना चाहिए। इससे प्रकृत विवादके समाप्त होनेमें न केवल मदद मिलेगी, अपि तु उत्पाद-व्ययके सम्बन्धमें अपर पक्षके द्वारा स्वीकृत सर्वथा एकत्वकी एकान्त धारणाका भी निरास हो जायगा।

धवला पु० ७ पृ० ९० के ‘खइयाए लद्धीए ॥४७॥’ सूत्रकी टीकाको उद्धृतकर जो ‘अभाव जिनमतमें तुच्छाभावरूप नहीं है’ इस बातका समर्थन किया गया है सो वह समर्थन भी प्रकृतमें उपयोगी नहीं है, क्योंकि हमारी ओरसे अपने उत्तरोंमें यदि कहीं अभावको तुच्छाभाव सिद्ध किया गया होता तभी इस उल्लेखकी सार्थकता होती।

यदि अपर पक्ष घातिया कर्मोंके ध्वंस (व्यय) को सर्वथा अकर्म पर्यायरूप न लिखता तो हमारी ओरसे यह आपत्ति त्रिकालमें न की जाती कि-‘मोहनीय कर्मका क्षय दशवें गुणस्थानमें होता है और ज्ञानावरणादि ३ कर्मोंका क्षय बारहवें गुणस्थानके अन्तमें होता है, फिर भी केवलज्ञानकी उत्पत्तिके कथनके प्रसंगमें मोहनीय कर्मके क्षयका भी हेतुरूपसे निर्देश किया गया है। ऐसी अवस्थामें क्या यह मानना उचित होगा कि मोहनीय कर्मका क्षय होकर जो अकर्मरूप पुद्गल वर्गणाऐं हैं वे भी केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्त हैं।’

हमारी दृष्टि सर्वार्थसिद्धिके ‘मोहक्षयात्’ इत्यादि सूत्रके टीका वचन पर बराबर रही है और है। उसमें निहित रहस्यको भी हम समझते हैं, किन्तु अपर पक्ष द्वारा उल्लेखरूपमें इस वचनको उद्धृत करने मात्रसे ध्वंस (व्यय) को सर्वथा उत्तर पर्याय (उत्पाद) रूप मान लेने पर अष्टसहस्रीके उक्त कथनों द्वारा अपर पक्षके सामने जो आपत्ति हम उपस्थित कर आये हैं उसका वारण नहीं हो जाता। सर्वार्थसिद्धिका उक्त टीका वचन अपने स्थानमें है और अपर पक्षका व्यय और उत्पादको सर्वथा अभेदरूप स्वीकार करना अपने स्थानमें है। उक्त वचनके आधारसे अपने विचारोंमें संशोधन अपर पक्षको करना है, हमें नहीं।

प्रतिशंका ३ में ‘प्रायः केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें ज्ञानावरणके क्षयको अभावरूप तुच्छवस्तु बताकर कारणताका निषेध कर देते हैं।’ यह कथन मालूम नहीं किसको लक्ष्य कर पहले किया गया और बादमें उसका उत्तर प्रस्तुत किया गया। जैन परम्पराको जीवनमें स्वीकार करनेवाला शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो क्षयको सर्वथा अभावरूप तुच्छवस्तु बतलाता हो। केवलज्ञानकी अपेक्षा निमित्तकारणमें जो प्रतिबन्धात्मकता कही है उसका व्यय हो जाना ही केवलज्ञानके प्रति प्रतिबन्धकाभावरूपता है। ऐसे स्थल पर उत्पादसे व्यय कथंचित् भिन्न ही लक्षित किया गया है, चार घातिया कर्मोंको व्ययरूप उत्तरपर्याय नहीं। इसमें संदेह नहीं कि प्रकृतमें जो कोई महाशय ध्वंसको तुच्छाभावरूप समझते हों उन्हें तो अपना अज्ञान दूर करना ही है, साथ ही जो भी महाशय पूर्व पर्यायके ध्वंस और उत्तरपर्यायके उत्पादको सर्वथा एक माननेका उपक्रम करते हैं उन्हें भी उक्त प्रकारका अपना ऐकान्तिक आग्रह छोड़ना है। उनके लिए ‘एतद्विषयक अज्ञानको छोड़ना हैं’ ऐसा कटु प्रयोग करना हमारी सामर्थ्यके बाहर है।

मूलाराधना गाथा ४ का ‘अन्वय-व्यतिरेकसमधिगम्यो’ इत्यादि वचन देकर कार्यके प्रति कारणका अन्वय-व्यतिरेक सिद्ध किया गया है। सो यह हमें इष्ट है, क्योंकि यह तो जैन सिद्धान्त ही है कि उपादानके साथ कार्यकी आभ्यन्तर व्याप्ति होती है और निमित्तोंके साथ कार्यकी बाह्य व्याप्ति होती है। कार्यके प्रति कारणोंकी यही समग्रता है, साथ ही यह भी जैन सिद्धान्त है कि कार्यमें अन्य द्रव्यकी पर्यायकी निमित्तता व्यवहारनयसे है। संभवतः यह सिद्धान्त आपको भी मान्य होगा, हमें तो मान्य है ही। इसलिए प्रकृतमें इस प्रमाणको उपस्थित कर किस प्रयोजनकी सिद्धि की गई है यह हम नहीं समझ सके। जब कि हमने यह लिखा ही है कि ‘जो चार घातिया कर्म अज्ञानादिके निमित्त हैं, जो कि निमित्तपनेकी अपेक्षा केवलज्ञानकी उत्पत्तिके प्रतिबन्धक माने गये हैं उनका ध्वंस होने पर केवलज्ञान स्वभावसे उत्पन्न होता है।’ पं० फूलचन्द्र द्वारा लिखित मोक्षशास्त्र पृ ४५५ के उल्लेखको अपर पक्षने आगमरूपमें स्वीकार कर लिया यह जहाँ उचित हुआ वहाँ हम यह भी बतला देना चाहते हैं कि वह उल्लेख वस्तुतः अपर पक्षके मतका समर्थन न कर उत्तर पक्षका ही समर्थन करता है। यह बात हमारे द्वारा प्रथम उत्तरमें निरूपित तथ्य और इस वचनको सामने रखकर अवलोकन करनेसे भली भाँति समझी जा सकती है। प्रथम उत्तरमें हमने लिखा है-

‘अतः इससे यही फलित होता है कि पूर्वमें जो ज्ञानावरणीय रूप कर्मपर्याय अज्ञान भावकी उत्पत्तिका निमित्त थो उस निमित्तका अभाव होनेसे अर्थात् उसके अकर्मरूप परिणम जानेसे अज्ञानभावके निमित्तका अभाव हो गया और उसका अभाव होनेसे नैमित्तिक अज्ञानपर्यायका भी अभाव हो गया और केवलज्ञान स्वभावसे प्रगट हो गया।’

अब इसके प्रकाशमें मोक्षशास्त्रका उक्त वचन पढ़िए-

‘बात यह है कि जितने भी क्षायिक भाव हैं वे सब आत्माके निजभाव हैं। पर संसार दशामें वे कर्मोंसे घातित रहते हैं और ज्योंही उनके प्रतिबन्धक कर्मोंका अभाव होता है त्योंही वे प्रगट हो जाते हैं।’

पता नहीं हमारे पूर्वोक्त वचनमें और इस वचनमें अपर पक्षने क्या फर्क देखा जिससे उसे यह वचन तो आगम प्रतीत हुआ और पूर्वोक्त वचन आगम प्रतिकूल प्रतीत हुआ। लगता है कि ‘घातित रहते हैं’ ‘प्रतिबन्धक कर्मोंका अभाव’ इन पदोंको पढ़कर ही अपर पक्षने मोक्षशास्त्रके उल्लेखको आगम माना है। सो यह निमित्तोंकी निमित्तता क्या है इस पर सम्यक् प्रकारसे लक्ष्य न जानेका परिणाम प्रतीत होता है। अपर पक्षकी मान्यता है कि निमित्त दूसरे द्रव्यकी शक्तिको वास्तवमें घातित करते हैं या उसमें अतिशय उत्पन्न कर देते हैं। जब कि इस प्रकारका कथन जिनागममें व्यवहार ( उपचार ) नयसे किया गया है। प्रकृतमें भी उक्त पदोंका प्रयोग इसी अभिप्रायसे हुआ है। इस पद्धतिसे लिखना या कथन करना यह व्यवहारनयके कथनकी शैली है।

अपर पक्षने हमारे इस कथनको कि ‘हमारी संसारकी परिपाटी चल रही है उसमें हम स्वयं अपराधी हैं।’ अप्रासंगिक बतलाया है और हमसे ‘अपराध क्या स्वभाव है या आगन्तुक विभाव ( विकारी भाव ) है’ यह प्रश्न करके उसे आगन्तुक सिद्ध करते हुए परसंगको कारण बतलाकर संसाररूप परिपाटीको परसंगरूप

शंका १५ और उसका समाधानं ७११

कारणजन्य सिद्ध किया है। तथा प्रमाणस्वरूप आचार्य अमृतचन्द्रका ‘न जातु रागादि’ इत्यादि कलश उपस्थित किया गया है और अन्तमें निष्कर्षको फलित करते हुए लिखा है-

‘हमारा अपराधी होना भी मोहनीय कर्मोदयके आधीन है। जब तक मोहनीय कर्मका क्षय नहीं होगा तब तक अपराध अवश्य बना रहेगा, क्योंकि निमित्तके अभावके बिना नैमित्तिक भावका अभाव सम्भव नहीं है।’

सो प्रकृतमें यह देखना है कि संसारी जीवका ‘परका संग करना’ अपराध है कि ‘परसंग’ अपराध है। यदि केवल परसंगको अपराध माना जाए तो कोई भी जीव संसारसे मुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि किसी न किसी प्रकारसे अन्य द्रव्योंका संयोग संसारी और मुक्त जीवोंके सदा बना हुआ है। और यदि परका संग करना अपराध माना जाता है तो यह प्रकृतमें स्वीकृत है, क्योंकि आचार्य अमृतचन्द्रके ‘न जातु रागादि’ इत्यादि कलशका यही अभिप्राय है। आचार्य महाराज इस कलश द्वारा वस्तुस्थिति पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं-कि संसारी जीवने परसंग किया, इसलिए परका संग उसकी विभाव परिणतिमें निमित्त हो गया। प्रकृतमें यह अभिप्राय है कि संसारी जीव परमें एकत्वबुद्धि और राग-द्वेष द्वारा निरन्तर परसंग करता आ रहा है, इस कारण वह पराधीन बना हुआ है। इस प्रकारकी पराधीनता रूप स्वयं स्वतन्त्ररूपसे परिणम रहा है, इसलिए यह जीवकी सच्ची पराधीनता कही गई है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि अपने द्वारा किया गया ऐसा जो परसंग है वह संसारकी जड़ है। यदि यह जीव अपने उपयोगस्वभावके द्वारा स्वभावसन्मुख होकर उक्त प्रकारके परसंग करनेकी रुचिका त्याग करदे अर्थात् परमें एकत्वबुद्धि और राग-द्वेष न करे तो जो उसके परके साथ अनादिकालसे निमित्त-नैमितिकपना व्यवहारसे बना चला आ रहा है उसका सुतरां अन्त हो जाए। स्वभावप्राप्ति या मुक्ति इसीका दूसरा नाम है। हमें विश्वास है कि इस स्पष्टीकरणसे प्रकृतमें ‘परसंग’ पदका क्या तात्पर्य है और उसे अपराध किस रूपमें माना गया है इत्यादि तथ्योंका खुलासा होकर हमारा पूर्वोक्त कथन कैसे प्रकरणसंगत है इसका स्पष्ट प्रतिभास हो जाएगा।

प्रतिशंका ३ के अंतमें ‘पुनश्च’ पदके उल्लेखपूर्वक जो कुछ लिखा गया है वह केवल पिछले कथनका पिष्टपेषणमात्र है, उसमें विचार करने योग्य नई ऐसी कोई बात नहीं लिखी गई है, अतः उस पर अधिक विचार न करना ही श्रेयस्कर है। हाँ, अपने पूर्वोक्त कथनकी पुष्टिमें पंडित फूलचन्द्र द्वारा लिखित तत्त्वार्थसूत्र अ० १० सूत्र १ की टीकाका जो उद्धरण दिया है सो वह भी ध्वंस और उत्पादको सर्वथा एक सिद्ध नहीं करता। मात्र वह उस क्रमको बतलाता है जिस क्रमसे घातिया कर्मोंका अभाव होनेपर केवलज्ञान पर्याय प्रगट होती है। अतः प्रकृतमें यही निर्णय करना चाहिए कि अज्ञान-भावके निमित्तरूप चार घातियाकर्मोंका अभाव होने पर केवलज्ञान परकी अपेक्षा किए बिना ही स्वभावके आश्रयसे प्रगट होता है। तत्त्वार्थसूत्रके ‘मोहक्षयात्’ इत्यादि सूत्रका यही स्पष्ट आशय है और इसी आशयसे उसमें हेतुपरक पंचमी विभक्तिका प्रयोग हुआ है।

शंका १६, प्रथम दौर: शंका १६ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७१२ से ७१६

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प्रथम दौर

: १ :

नमः श्रीवीतरागाय

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुंदकुंदार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका १६

निश्चय और व्यवहारनयका स्वरूप क्या है ? व्यवहारनयका विषय असत्य है क्या ? असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप है ?

समाधान १

इस लोकमें जितने भी पदार्थ उपलब्ध होते हैं उनका परस्परमें ( एक पदार्थका दूसरे पदार्थमें ) अत्यन्ताभाव होने पर भी यह जीव अनादि अज्ञानवश संयोगको प्राप्त हुए पदार्थोंमें न केवल एकत्व बुद्धिको करता आ रहा है, अपितु स्वसहाय होने पर भी परकी सहायताके बिना मेरा निर्वाह नहीं हो सकता ऐसी मिथ्या मान्यतावश अपनेको परतन्त्र बनाये हुए चला आ रहा है। अतएव इसे परसे भिन्न एकत्वस्वरूप अपने आत्माका सम्यक् ज्ञान कराने और पराश्रित बुद्धिका त्याग करानेके अभिप्रायसे अध्यात्ममें मुख्यतया निश्चयनय और व्यवहारनयोंका प्ररूपण हुआ है। यही कारण है कि श्री समयसारजीकी ४ थी गाथामें आचार्यवर्य इस संसारी जीवको लक्ष्यकर कहते हैं-कि इस जीवने कामानुबन्धिनी और भोगानुबन्धिनी कथा अनन्त बार सुनी, अनन्तबार उनका परिचय प्राप्त किया और अनन्तबार उनका अनुभव किया, परन्तु परसे भिन्न एकत्वको इसने आज तक उपलब्ध नहीं किया। आगे ५वीं गाथामें कहते हैं कि ‘मैं उस विभक्त एकत्वका अपने विभवसे ( आगम, गुरुउपदेश, युक्ति और अनुभवसे ) दर्शन कराऊँगा। यदि दर्शन कराऊँ तो प्रमाण करना।’ आगे ६-७ वीं गाथाओं द्वारा अन्यके निषेध द्वारा वह विभक्त एकत्व क्या है इसका ज्ञान कराया गया है। ११वीं गाथामें जिसे भूतार्थ कहा है वह इस विभक्त एकत्वसे भिन्न अन्य कुछ नहीं। अन्य जितना भी है उस सबकी परिगणना अभूतार्थमें की गई है। इस प्रकार श्री समयसारजीको सम्यक्रूपसे हृदयङ्गम करने पर ज्ञात होता है कि प्रकृतमें निश्चयनय और व्यवहारनयके कथनसे आचार्य महाराजको क्या इष्ट है।

यह वस्तुस्थिति है। इसे ध्यानमें रखकर निश्चयनयका निर्दोष लक्षण क्या हो सकता है इसकी मीमांसा करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र समयसारजीकी ५६ वीं गाथामें कहते हैं-

निश्चयनयस्तु द्रव्याश्रितत्वात्केवलस्य जीवस्य स्वाभाविकं भावमवलम्ब्योत्प्लवमानः परभावं परस्य सर्वमेव प्रतिषेधयति।

अर्थः-निश्चयनय तो द्रव्याश्रित होनेसे, केवल एक जीवके स्वाभाविक भावका अवलम्बन लेकर प्रवर्तमान होता हुआ, दूसरेके भावको किंचित्मात्र भी दूसरेका नहीं कहता।

इसी अभिप्रायको ध्यानमें रखकर नयचक्रमें निश्चयनयका स्वरूप निर्देश करते हुए कहा है-

गेण्हइ दव्वसहावं असुद्ध-सुद्धोवयारपरिचत्तं ।
सो परमभावगाही णायव्वो सिद्धिकामेण ॥१९९॥

जो अशुद्ध, शुद्ध और उपचारसे रहित मात्र द्रव्यस्वभावको ग्रहण करता है, सिद्धिके इच्छुक पुरुषद्वारा वह परमभावग्राही द्रव्यार्थिकनय जानने योग्य है ॥१९९॥

इसमें ‘सिद्धिकामेण’ पद ध्यान देने योग्य है इस द्वारा संसारी जीवको उसका मुख्य प्रयोजन क्या है यह बतलाते हुए ज्ञान कराया गया है कि यदि तू अनादि अज्ञानवश अपनेमें आई हुई परतन्त्रतासे मुक्त होकर स्वाधीन सुखका उपभोग करना चाहता है तो अनन्त विकल्पोंको छोड़कर अपनी बुद्धिमें एकमात्र उस विभक्त एकत्वका अवलम्बन ले ।

स्पष्ट है कि जो एकमात्र परम भावस्वरूप ज्ञायकभावको ग्रहण करता है और उससे भिन्न अन्य सबका निषेध करता है वह निश्चयनय (समयसार गा० १४ के अनुसार शुद्धनय) कहलाता है ।

यह परम भावग्राही निश्चयनयका निर्दोष लक्षण है ।

अब देखना यह है कि इस द्वारा अन्य किसका निषेध किया गया है । जैसा कि पूर्वमें ६-७ वीं गाथा (समयसार) का निर्देश कर आये हैं उन पर सम्यक् प्रकारसे दृष्टिपात करने पर निषेध योग्य अन्य सब पर भावोंका ज्ञान हो जाता है । ६ वीं गाथा द्वारा ज्ञायकभावसे भिन्न तीन परभावोंका निषेध किया गया है । वे ये हैं-(१) प्रमत्तभाव, (२) अप्रमत्तभाव और (३) परसापेक्ष ज्ञायकभाव । तथा ७ वीं गाथा द्वारा (४) अखण्ड आत्मामें भेद विकल्पका निषेध किया गया है ।

यहाँ अपने आत्मासे भिन्न अन्य समस्त द्रव्य तो परभाव हैं ही, अतः उनका निषेध तो स्वयं हो जाता है । उनको ध्यानमें रखकर यहाँ परभावोंकी मीमांसा नहीं की गई है । किन्तु एक ही आत्मामें ज्ञायकभावसे भिन्न जितने प्रकारसे परभाव सम्भव हैं उन्हें यहाँ लिया गया है जो चार प्रकारके हैं । निर्देश पूर्वमें कर ही आये हैं ।

यद्यपि यहांपर यह कहा जा सकता है कि एक आत्मासे भिन्न अन्य अनन्त भाव भी परभाव हैं, उन्हें यहाँ परभाव रूपसे क्यों नहीं लिया गया है । समाधान यह है कि उन सब परभावोंका आत्मामें अत्यन्त अभाव तो स्वरूपसे ही है । उनका निषेध तो स्वयं ही हो जाता है । यहाँ मात्र एक आत्मामें ज्ञायक भावसे भिन्न अन्य जितने परभाव हैं उनसे प्रयोजन है । जिस वस्तुके जो धर्म हैं उन्हींको उसका जानना यह सम्यक् नय है । इसी अभिप्रायको ध्यानमें रखकर पंचाध्यायी (श्लोक ५६१) में सम्यक् नयका लक्षण करते हुए ‘तद्गुणसंविज्ञान’ ( जिस वस्तुका जो धर्म है मात्र उसे उसका जानना) को नय कहा है ।

इस प्रकार यहाँतकके विवेचन द्वारा विधि-निषेधमुखसे परम भावग्राही निश्चयनयका ज्ञान हो जानेपर प्रकृतमें व्यवहारनय और उसके भेदोंकी मीमांसा करनी है । यह तो सुनिश्चित है कि अपनी गुण-पर्याययुक्त आत्माको लक्ष्यमें लेनेपर यहाँ जिन्हें परभाव कहा है वे सब धर्म आत्माके हैं । उनका आत्मामें सर्वथा अभाव है ऐसा नहीं है, किन्तु उनमें बहुतसे धर्म ऐसे हैं जो आगन्तुक हैं और जो संसारकी विवक्षित भूमिका तक आत्मामें दृष्टिगोचर होते हैं, उसके बाद उसमें उपलब्ध नहीं होते हैं । इसलिए यदि आत्माकी सब अवस्थाओंको लक्ष्यमें रखकर उसका विचार किया जाता है तो वे आत्माको सब अवस्थाओंमें अनुगामी न होनेसे उन्हें असद्भूत कहा है । परन्तु जब तक वे आत्मामें उपलब्ध होते हैं तबतक उनके द्वारा आत्मामें यह आत्मा प्रमादी है, यह आत्मा अप्रमादी है ऐसा व्यवहार तो होता ही है, इसलिए त्रिकाली आत्मामें यह नहीं है और ज्ञायकस्वरूप आत्मासे वे भिन्न हैं इन सब प्रयोजनोंको ध्यानमें रखकर उनका असद्भूत व्यवहारनयमें अन्तर्भाव किया है। उसमें भी ये दोनों प्रकारके ( प्रमत्तभाव और अप्रमत्तभाव ) भाव बुद्धिपूर्वक ( बुद्धिमें आवें ऐसे ) भी होते हैं और अबुद्धिपूर्वक ( बुद्धिमें न आवें ऐसे ) भी होते हैं, अतएव जो अबुद्धिपूर्वक होते हैं उनमें अन्यकी अपेक्षा विवक्षित न होनेसे उन्हें अनुपचरित कहा गया है । तथा जो प्रमत्त और अप्रमत्तभाव बुद्धिपूर्वक होते हैं उनमें बुद्धिपूर्वकत्वकी अपेक्षा आनेसे परसापेक्षपनेकी अपेक्षा उपचरित कहा गया है । इसप्रकार विचार करनेपर असद्भूतव्यवहारनयके दो भेद प्राप्त होते हैं-अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनय और उपचरित असद्भूत व्यवहारनय । जो प्रमत्त और अप्रमत्तभाव अबुद्धिपूर्वक होते हैं वे अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनयके विषय हैं और जो प्रमत्तभ व और अप्रमत्तभाव बुद्धिपूर्वक होते हैं उन्हें उपचरित असद्भूत व्यवहारनयका विषय कहा है। यह तो अध्यात्मकी अपेचा असद्भूत व्यवहारनयके दो भेदोंकी मीमांसा है ।

आगे सद्भूत व्यवहारनयकी और उसके भेदोंकी मीमांसा करनी है। यह तो सुनिश्चित है कि अखंड आत्मामें ज्ञान है, दर्शन है और चारित्र है । ये गुण त्रिकाली हैं । यदि आत्मामें इनका सर्वथा अभाव माना जाता है तो अपने विशेषोंका सर्वथा अभाव होनेसे आत्माका ही अभाव प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं । इसलिए यह तो मानना ही पड़ता है कि वे सब धर्म आत्मामें हैं, परन्तु वे ऐसे नहीं हैं कि ज्ञान अलग हो, दर्शन अलग हो और चारित्र अलग हो । किन्तु पूरे आत्माको ज्ञान रूपसे देखनेपर वह ज्ञान है, दर्शनरूपसे देखनेपर वह दर्शन है और चारित्ररूपसे देखनेपर वह चारित्र है, इसलिए आत्मामें उनका सद्भाव होनेपर भी वे भेदरूपसे नहीं हैं यह सिद्ध होता है। इस प्रकार आत्मामें उनका सद्भाव होनेसे उन्हें सद्भूत मानकर उन द्वारा आत्माका अलग-अलग व्यवहार होनेसे उन्हें व्यवहारका विषय माना है । इसप्रकार आत्मा ज्ञान है, दर्शन है, चारित्र है ऐसा जानना सद्भूत व्यवहार होकर भी इसमें अन्य किसीकी अपेक्षा विवक्षित न होनेसे इन द्वारा आत्माको ग्रहण करना अनुपचरित सद्भूत व्यवहारनय है ।

अब यह देखना है कि जो यहाँ आत्माको ज्ञायकरूप कहा है सो वह परकी अपेक्षा ज्ञायक है कि स्वरूपसे ज्ञायक है । यदि एकान्तसे यह माना जाता है कि वह परकी अपेक्षा ज्ञायक है तो ज्ञायकभाव आत्माका स्वरूप सिद्ध न होनेसे ज्ञायकस्वरूप आत्माका सर्वथा अभाव प्राप्त होता है । यह तो है कि ज्ञायकभाव स्व-परप्रकाशक होनेसे परको जानता अवश्य है । पर वह परकी अपेक्षा मात्र ज्ञायक न होनेसे स्वरूपसे ज्ञायक है। फिर भी उसे ज्ञायक कहनेसे उसमें ज्ञेयकी ध्वनि आ जाती है, इसलिए उसपर ज्ञेयकी विवचा लागू पड़ जानेसे उसे उपचरित कहा है। इसप्रकार आत्माको ज्ञायक कहना यह सद्भूत व्यवहार है और उसे ज्ञेयकी अपेक्षा ज्ञायक ऐसा कहना यह उपचरित है । इस प्रकार जब ज्ञेयकी विवक्षासे ऐसा कहा जाता है कि आत्मा ज्ञायक है तब वह उपचरित सद्भूत व्यवहारनयका विषय होता है । इस प्रकार विचार करनेपर सद्भूतव्यवहार भी दो प्रकारका सिद्ध होता है-एक अनुपचरित सद्भूत व्यवहारनय और दूसरा उपचरित सद्भूत व्यवहारनय ।

यहाँ पर इतना विशेष जान लेना चाहिये कि ज्ञेयकी विवक्षा न करते हुए सहज स्वभावसे जो ज्ञायकभाव है जिसको नियमसारमें कारण परमात्मा या परम पारिणामिक भाव कहा गया है वह निश्चयनयका विषय है और शेष व्यवहार है । श्री पंचाध्यायीजीमें व्यवहारके चारों भेदोंका निरूपण इसी आशयसे किया गया है जिसका निर्देश श्री समयसारजीकी गाथा ६ और ७ में स्पष्ट रूपसे किया गया है ।

यह श्री समयसारजीका मुख्यरूपसे विवेचनीय विषय है जिसका निश्चयनय और व्यवहारनयको लक्ष्यमें रखकर यहाँ विचार किया गया है । किन्तु आत्मासे सर्वथा भिन्न ज्ञानावरणादि कर्म और नोकर्म ( शरीर, मन, वाणी और वाह्य विषय ) में भी एकत्वबुद्धि वनी हुई है । तथा वह पराश्रित बुद्धिवाला होनेसे कार्य-कारण परम्परामें भी कार्यके प्रति आत्माकी सहज योग्यताको उसका मुख्य कारण न मानकर कार्यकी उत्पत्ति परसे मानता आ रहा है । इस प्रकार उसकी विषय और कारणरूपसे जो परके साथ एकत्व बुद्धि हो रही है उसे दूर करनेके अभिप्रायसे तथा इतर जनोंको प्रकृतमें उपयोगी व्यवहारनय और निश्चयनयका विशेष ज्ञान करानेके अभिप्रायसे भी श्री समयसारजीमें यहाँ वहाँ सर्वत्र दूसरे प्रकारसे भी निश्चयनय और व्यवहारनयका निर्देश किया है । उदाहरणार्थ श्री समयसारजी गाथा २७ में देह और उसकी क्रियाके साथ, उसे आत्मा मानकर, जिसकी एकत्व बुद्धि वनी हुई है या जिसने नयज्ञानका विशेष परिचय नहीं प्राप्त किया है उसकी उस दृष्टिको दूर करनेके अभिप्रायसे इसे भी व्यवहारनयका विषय वतलाकर उपयोगस्वरूप आत्माका निश्चयनयके विषयरूपसे ग्रहणकर मात्र ऐसे व्यवहारको छुड़ानेका प्रयत्न किया गया है । इसीप्रकार कर्ता-कर्म अधिकारमें या अन्यत्र जहाँ भी निश्चयनय और व्यवहारनयका प्रयोग हुआ है वहाँ वह दो द्रव्यों और उनकी पर्यायोंमें हो रही अभेद बुद्धिको दूर करनेके अभिप्रायसे ही किया गया है इसलिए जहाँ पूर्वोक्त दृष्टिसे निश्चयनय व्यवहारनयका निरूपण किया गया हो उसे वहाँ उस दृष्टिसे और जहाँ अन्य प्रकारसे निश्चयनय व्यवहारनयका निरूपण हो वहाँ उसे उस प्रकारसे दृष्टिपथमें लेकर उसका निर्णय कर लेना चाहिये । लक्षणादि दृष्टिसे इनका विवेचन अन्यत्र किया ही है, इसलिए वहाँसे जान लेना चाहिये ।

यहाँ निश्चयनयके सम्बन्धमें इतना लिखना और आवश्यक है कि निश्चयनय दो प्रकारका है-सविकल्प निश्चयनय और निर्विकल्प निश्चयनय । नयचक्रमें कहा भी है-

सविपप्प णिवियप्प्यं पमाणरूवं जिणेहि णिद्दिट्ठं ।
तह विह णया वि भणिया सवियप्पा णिव्वियप्पा च ॥

जिनदेवने सविकल्प और निर्विकल्पके भेदसे प्रमाण दो प्रकारका कहा है । तथा उसी प्रकार सविकल्प और निर्विकल्पके भेदसे नय भी दो प्रकारके कहे गये हैं ।

अब विचार यह करना है कि-यहाँ निर्विकल्पनयसे क्या प्रयोजन है और उसका श्री समयसारजीमें कहाँ पर निरूपण किया है और वह कैसे बनता है ?

यह तो अनुभवियोंके अनुभवकी वात है कि जब तक स्व और परको निमित्तकर किसी प्रकारका विकल्प होता रहता है तब तक उसे निर्विकल्प संज्ञा प्राप्त नहीं हो सकती । किन्तु यह आत्मा सर्वदा विकल्पों से आक्रान्त रहता हो यह कभी भी संभव नहीं है । जिन्हें स्वसहाय केवलज्ञान हो गया है वे तो विकल्पातीत ही होते हैं इसमें संदेह नहीं । किन्तु जो आत्मा उससे नीचेकी भूमिकामें अवस्थित हैं वे भी स्वात्मानुभवकी अवस्थामें निर्विकल्प होते हैं, क्योंकि जब यह आत्मा व्यवहारमूलक अन्य सब विकल्पोंसे निवृत्त होकर और सविकल्प निश्चयनयके विषयरूप मात्र ज्ञायकभावका आलम्बन लेता है, अंतमें वह भी ज्ञायकभावसम्बन्धी विकल्पसे निवृत्त होकर निर्विकल्पस्वरूप स्वयं समयसार हो जाता है । श्री समयसारजीमें कहा भी है-

कम्मं बद्धमबद्धं एवं तु जाण णयपक्खं
पक्खातिक्कंतो पुण भण्णदि जो सो समयसारो ॥१४२॥

अर्थ-जीवमें कर्म बद्ध है अथवा अबद्ध है इस प्रकारके विकल्पको तो नयपक्ष जानो, किन्तु जो पक्षातिक्रान्त (उक्त दोनों प्रकारके विकल्पोंसे रहित) कहलाता है वह समयसार अर्थात् निर्विकल्प शुद्ध आत्मतत्त्व है ॥१४२॥

किन्तु जीवको इस प्रकार अनुभवकी भूमिका न प्रमाणज्ञानका आलम्बन लेनेसे ही प्राप्त हो सकती है और न व्यवहारस्वरूप नयज्ञानके आलम्बनसे ही प्राप्त हो सकती है। वह तो मात्र निश्चयनयके विषयभूत एकमात्र ज्ञायकभावके आलम्बनसे ही होती है। यही कारण है कि मोक्षमार्गमें एकमात्र निश्चयनयको आश्रयणीय कहा है। आत्मानुभूति शुद्धनयस्वरूप कहनेका कारण भी यही है। कहा भी है-

आत्मानुभूतिरिति शुद्धनयात्मिका या
ज्ञानानुभूतिरियमेव किलेति बुद्ध्वा।
आत्मानमात्मनि निवेश्य सुनिष्प्रकंप-
मेकोऽस्ति नित्यमवबोधघनः समंतात् ॥
-समयसार क० १३

अर्थ-इस प्रकार जो पूर्व कथित शुद्ध नयस्वरूप आत्माकी अनुभूति है वही वास्तवमें ज्ञानकी अनुभूति है, यह जानकर तथा आत्मामें आत्माको निश्चल स्थापित करके, सदा सर्व और एक ज्ञानघन आत्मा है, इस प्रकार अनुभवना चाहिए।

शंका १६, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७१६ से ७२३

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श्री वीतरागाय नमः

द्वितीय दौर

: २ :

शंका १६

प्रश्न यह है-निश्चय और व्यवहारनयका स्वरूप क्या है ? व्यवहारनयका विषय असत्य है क्या ? असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप ?

प्रतिशंका २

यह हमारा प्रश्न है, इसका उत्तर आपने ७ पृष्ठोंमें दिया है, परन्तु हमारे प्रश्नोंका कोई उत्तर नहीं है। आपके ७ पृष्ठोंके उत्तरमें यह बात कहीं नहीं आई है कि व्यवहार नयका विषय असत्य है क्या ? असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप ? इसलिए आप हमारे प्रश्नोंका उत्तर देनेकी कृपा करें। आपने जो उत्तर दिया है वह भी शास्त्राधारसे विपरीत ठहरता है। आपने लिखा है कि ‘यह जीव अनादि अज्ञान वश संयोगको प्राप्त हुए पदार्थोंमें न केवल एकत्वबुद्धिको करता आ रहा है। अपि तु स्वसहाय होनें पर भी परकी सहायताके बिना मेरा निर्वाह नहीं हो सकता ऐसी मिथ्या मान्यतावश अपनेको परतन्त्र बनाये हुए चला आ रहा है ।’ ये आपकी पंक्तियाँ हैं । इनको पढ़नेसे यह अर्थ सर्वविदित स्पष्ट हो जाता है कि आप आत्माकी परतन्त्रताको केवल कल्पनात्मक समझते हैं । और परपदार्थोंके संयोगको आप एकत्व बुद्धिरूप मिथ्या मान्यता बता रहे हैं । आपकी समझसे कर्मोंका आत्माके साथ न तो वास्तवमें सम्बन्ध है और न आत्माके राग-द्वेष विकारभाव एवं नारकादि आत्माकी व्यंजन पर्याय उनमें होती हैं । केवल एकत्वबुद्धि रूप मिथ्या मान्यता है । इसी समझके अनुसार आपने यह लिखा है कि ‘स्वसहाय होनेपर भी परकी सहायताके बिना मेरा निर्वाह नहीं हो सकता है, ऐसी मिथ्या मान्यता वश परतन्त्र मान रहा है ।’

इसी समझके अनुसार ‘व्यवहारनयका विषय असत्य है क्या ?’ इस हमारे प्रश्नको छुआ तक नहीं है, उसका कोई उत्तर नहीं दिया है । इसका भी कारण यह है कि आप अपनी निजी समझसे आत्माके विकारी भावोंमें कर्मोंका निमित्त और उनका प्रभाव आत्मा पर नहीं मानते हैं । किन्तु आत्माकी अनादि अज्ञानताको स्वयं आत्मीय योग्यतासे मान रहे हैं ।

परन्तु ऐसी मान्यता समयसार, मूलाचार, भावसंग्रह, रयणसार, धवल सिद्धांत, तत्त्वार्थवार्तिक, गोमट-सार आदि शास्त्रोंसे विपरीत है । इसका सप्रमाण स्पष्टीकरण करते हुए हम यह बता देना आवश्यक समझते हैं कि जीवकी अनादि अज्ञानता स्वयं आत्माके केवल निजी भावोंसे नहीं होती है । किन्तु वह अज्ञानता कर्मों जनित आत्माकी परतन्त्र कर्माधीन भाव व्यंजनपर्याय है । यदि अज्ञानताको आत्माकी ही स्वतन्त्र पर्याय मान लिया जाय तो वह अज्ञानता संसारी जीवोंमें क्यों पाई जाती है । परम-शुद्ध परमात्मा सिद्ध-भगवानमें क्यों नहीं हो सकती है । इसका क्या विशेष हेतु है ? इसका उत्तर शास्त्राधारसे दीजिये । आत्माका स्वभाव निश्चय नयसे केवलज्ञानरूप है, यथाख्यात चारित्ररूप विशुद्ध परिणामस्वरूप है, विशुद्ध सम्यग्दर्शनरूप है । तथा उस स्वभाव आत्मामें अज्ञानरूप विभावभाव किस कारणसे आगया इस बातका उत्तर देना चाहिये ।

दूसरी बात यह है कि आत्मामें परतंत्रता आप वास्तवमें नहीं बताते हैं, किन्तु उसे मिथ्या मान्यतावश केवल कल्पनात्मक बता रहे हैं । जैसी कि आपकी ऊपर पंक्तियाँ हैं । यह बात भी शास्त्रानुसार विपरीत है । कारण समस्त पूर्वाचार्योंने स्वरचित समस्त शास्त्रोंसे आत्माको वास्तवमें परतंत्र लिखा है । वह परतंत्रता शरीर एवं ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय आदि द्रव्यकर्मोंके उदयसे ही हुई है, जो पर्यायदृष्टिसे वास्तविक है । यदि परतंत्रता आत्माको निर्हेतुक एवं कोरी कल्पनात्मक हो हो तो वह परतंत्रता एवं अज्ञानता आत्मामें सदैव रहनी चाहिये । जो वस्तु निर्हेतुक होती है वह नित्य रहती है । जैसे धर्म अधर्म आकाशद्रव्य, ये निर्हेतुक होनेसे सदैव स्वकीय स्वभावमय रहते हैं । जीव पुद्गलोंमें वैभाविकी शक्ति उपादानरूप होनेसे और बाह्यमें कर्मोदय जनित उपाधि होनेसे दोनों द्रव्य विभाव भावपर्यायको धारण करते हैं, इसीलिये वह जीव पुद्गलोंकी विकृति सहेतुक है । और उसीसे जीव परतंत्र बना हुआ है । आत्मासे जब बाह्य कारण कर्मोदयजनित निमित्तसे बंधनेवाले द्रव्यकर्म हट जाते हैं तो आत्मा उन परजन्य विकारभावोंसे हट जाता है, परम शुद्ध बन जाता है । उस समय आत्माकी वैभाविक शक्ति स्वभावरूप परिणत हो जाती है । बिना बाह्य निमित्त कर्मोदयके वह शक्ति विभाव भावरूप पर्याय कभी नहीं बन सकती है । विना निमित्त कारणके केवल उपादान कुछ भी करनेमें सर्वथा असमर्थ है ।

जो बात सहेतुक नहीं होती, केवल कल्पनामात्र होती है, उससे वस्तुकी वास्तविकता सिद्ध नहीं होती । यदि कोई जड़को चेतन और चेतनको जड़ समझ बैठे तो वह उसकी समझका दोष है । उसकी समक्षमें जड़ चेतन नहीं हो जायेगा, और चेतन जड़ नहीं बन जायेगा । आत्माके साथ शरीरका सम्बन्ध है, इसीलिये आत्मा लोकाकाशके बराबर असंख्यातप्रदेशी होने पर भी वह शरीराकार ही रहता है। घनांगुलके असंख्यातवें भाग शरीर परिमाणवाले सूक्ष्म निगोदिया जीवसे लेकर स्वयंभूरमण समुद्रमें रहनेवाले एक हजार योजन शरीरकी अवगाहनावाले महामत्स्यमें रहनेवाला आत्मा समान आत्मप्रदेशी होनेपर भी उन शरीरोंमें रुद्ध एवं बद्ध होकर परतंत्र बना हुआ है। यह बात प्रमाणोंसे भलीभांति सिद्ध है। इसी प्रकार आत्माके राग, द्वेष और मनुष्यादि पर्यायोंमें जीव अपने आत्मीय शुद्ध स्वभावके विरुद्ध विकृत बना हुआ है। घोर दुःखमय नरकमें कोई नहीं जाना चाहता है, परन्तु जाना पड़ता है। इसका कारण कर्मोदयकी परतंत्रता ही है। यह परतंत्रता वास्तविक है। केवल मिथ्या समझसे नहीं है।

अब हम व्यवहार नयकी विषय-भूत व्यवहार क्रियायों पर थोड़ा प्रकाश डालते हैं। दिगम्बर जैनागममें व्यवहार धर्मके आधारपर ही निश्चयस्वरूप शुद्धात्माकी प्राप्ति अथवा मोक्षप्राप्ति बताई गई है। व्यवहार धर्मका निश्चयधर्मके साथ अविनाभाव सम्बन्ध है। विना व्यवहारधर्मके निश्चय धर्म त्रिकालमें न तो किसी ने प्राप्त किया है और न कोई प्राप्त कर सकता है। इसीलिये वह मोक्षप्राप्तिमें अनिवार्य परम साधक धर्म है। यही कारण है कि तीर्थंकर तकको उत्कट वैराग्य होनेपर भी साँतवाँ छठा गुणस्थान तब तक नहीं हो सकता है जब तक वे जङ्गलमें जाकर बुद्धिपूर्वक वस्त्राभूषण आदि समस्त परग्रहोंका त्यागकर नग्न दिगम्बर-रूप धारणकर केशलुंचन नहीं कर देते हैं। नग्न रूप धारण करनेके बाद ही उन्हें सातवाँ व छठवाँ गुणस्थान प्राप्त होता है। इसी प्रकार छठवें गुणस्थानसे सातवें गुणस्थान अप्रमत्तको छोड़कर जब वे सातिशय अप्रमत्त परिणामको अधःकरणादि तीन करणोंके साथ क्षपक-श्रेणीका आरोहणकर अन्तर्मुहूर्तमें केवलज्ञानमय परम विशुद्ध गुणोंको प्राप्तकर लेते हैं। इस जन्म-मरणकी अनादिकालीन कर्मजनित अज्ञानताको हटानेके लिये मुख्य कारण नग्नता, पंच महाव्रत, पंच समिति, षट् आवश्यक आदि व्यवहार धर्म ही है। इस व्यवहार धर्मरूप महाव्रतादि क्रियाओंके विकल्पको तथा मुनिधर्मकी जीवन भरकी चर्याको सफल बनानेवाली सल्लेखना समाधिके विकल्पको हेय एवं मिथ्या बताया जाता है, सो ठीक नहीं है, आगम विरुद्ध है। उन्हीं महाव्रतादि विकल्प-भावोंको शास्त्रकार पूर्वाचार्योंने आत्माकी विशुद्धता एवं मोक्षप्राप्तिमें मूल हेतु बताया है। इसीलिये यह फलितार्थ मानना आवश्यक होजाता है कि मुनिलिंग द्रव्यलिंग भावलिंगका साधक अनिवार्य कारण है। द्रव्य-लिंगकी प्राप्ति होनेपर ही भावलिंग प्रकट होसकता है अन्यथा असम्भव है। भावलिंगकी पहिचान छद्मस्थ-मतिज्ञानी-श्रुतज्ञानी करनेमें सर्वथा असमर्थ हैं। इसीलिये द्रव्यलिंग एवं अट्ठाईस मूलगुणरूप बाह्य क्रियाओंके पालनको देखकर मन-वचन-कायसे मुनिराजकी श्रद्धा भक्ति करना प्रत्येक सम्यग्दृष्टिका प्रथम कर्तव्य है। अपनी बाह्य चर्या एवं तपश्चरणमें पूर्ण सावधान भावलिंगी मुनिको हम लोग द्रव्यलिंगी (मिथ्यादृष्टि) समझते रहें और उन्हें नमस्कार आदि नहीं करें तो यह हमारा बहुत बड़ा अपराध होगा। और भावलिंगी मुनिको द्रव्यलिंगी मिथ्यादृष्टि कहकर हम स्वयं मिथ्यादृष्टि बन जाते हैं। आचार्योंने पंचमकालके अन्त तक भावलिंगी मुनि बताये हैं और साथ ही उन्हें चतुर्थ कालके समान भावलिंगी मानकर उनकी श्रद्धा-भक्ति करनेका विधान सम्यक्त्व प्राप्ति एवं सम्यग्दृष्टिका लक्षण बताया है।

इस कथनसे यह बात भी भलीभाँति सिद्ध हो जाती है कि जिस व्यवहारधर्मको अभूतार्थ कहकर अथवा उसे मिथ्या कहकर केवल निश्चयधर्मसे निश्चयधर्मको प्राप्ति बताई जाती है वह निराधार कल्पना है। किन्तु व्यवहारधर्म मोक्षसाधक अनिवार्य कारण है। वह वास्तविक परम सत्य है। इसी तत्त्वको भगवान् कुंदकुंद आचार्य देवसेनाचार्य, आचार्य वट्टकेर एवं आचार्य वीरसेन आदिने बताया है।

व्यवहार असद्भूत है ऐसा मानकर ही देवपूजा, मुनिदान, तीर्थ-वन्दना, स्वाध्याय, उपवासादि, तपश्चरण आदिको संसारवर्द्धक कहा जाता है, परन्तु न तो व्यवहार असत्य है और न देवपूजनादि क्रियाऐं संसारवर्द्धक हैं । किन्तु ये सब क्रियायें मोक्षसाधक ही हैं । ऐसा भगवान् कुन्दकुन्दने रमणसारमें, आचार्य देवसेनने भावसंग्रहमें, आचार्य पद्मनन्दिने पद्मनन्दि पंचविंशतिकामें स्पष्ट लिखा है । अन्य शास्त्रोंमें भी इन धार्मिक क्रियाओंको मोक्षसाधक ही कहा गया है ।

ऐसी अवस्थामें शास्त्रोंका पूर्वापर अविरोध समन्वय करनेके लिये यह कहना और समझना होगा कि व्यवहार नयको असद्भूत कहनेका आशय आचार्योंका यही है कि वह सत्यार्थ है, मोक्षसाधक है । परन्तु आत्माका निश्चयरूप पूर्ण शुद्धरूप नहीं है । वह मिश्रित पर्याय है, केवल शुद्ध पर्याय नहीं है । किन्तु शुद्धाशुद्ध है और स्थायी नहीं है ।

व्यवहार धर्म छठे गुणस्थानतक हो क्रियात्मक रहता है । आगे भावात्मक हो जाता है । इसलिये साधक होनेपर भी वह पूर्ण शुद्ध नहीं है । स्थायी भी नहीं है, इसलिये उसे असद्भूत कहा गया है । यही अर्थ व्यवहारधर्मका आपकी इन पंक्तियोंसे सिद्ध होता है ।

‘आत्माकी सब अवस्थाओंको लक्ष्यमें रखकर उसका विचार किया जाता है तो वे आत्माको सब अवस्थाओंमें अनुगामी न होनेसे उन्हें असद्भूत कहा है । परन्तु जबतक वे आत्मामें उपलब्ध होते हैं तबतक उनके द्वारा आत्मामें यह आत्मा प्रमादी है, यह आत्मा अप्रमादी है ऐसा व्यवहार तो होता ही है । इसलिये त्रिकाली आत्मामें यह नहीं है और ज्ञायकस्वरूप आत्मासे वे भिन्न हैं इन सब प्रयोजनोंको ध्यानमें रखकर उनका असद्भूत व्यवहार नयमें अन्तर्भाव किया है ।’ इन पंक्तियोंसे यह बात आपने स्वयं प्रकट कर दी है कि व्यवहार नयको असद्भूत कहनेका अर्थ असत्य नहीं है, किन्तु शुद्धाशुद्ध पर्याय है । वह स्थायी सब अवस्थाओंमें नहीं रहती है । अर्थात् निश्चयकी प्राप्ति होनेपर वह अवस्था छूट जाती है । इन पंक्तियोंमें आपने जो उसको ज्ञायक स्वरूप आत्मासे भिन्न बताया है यह बात शास्त्रविरुद्ध है । क्योंकि सातवें गुणस्थान एवं सूक्ष्म लोभोदयके साथ दसवें गुणस्थानतक होनेवाले उपशमभाव या क्षायकभाव ज्ञायक आत्मा से भिन्न नहीं हैं, किन्तु वे सब आत्मा ही के भाव हैं । वे परम शुद्ध क्षायिक भावके अंश रूप हैं ।

आगे आपने जो यह बताया है कि ‘कार्यके प्रति आत्माकी सहज योग्यताको उसका मुख्य कारण न मानकर कार्यकी उत्पत्ति परसे मानता आ रहा है ।’ आदि, सो हम आपसे स्पष्ट करना चाहते हैं कि वह सहज योग्यता क्या है जो बिना व्यवहारके निश्चयनयको प्राप्त करा देवे ? बिना महाव्रतादि व्यवहारचारित्रको धारण किये परतन्त्र एवं राग-द्वेषविशिष्ट आत्मा कर्मोंका क्षय कर सकता है क्या ? अथवा माँस मदिरादिकका त्याग किये बिना कोई मनुष्य सम्यक्त्वको भी प्राप्त कर सकता है क्या ? यदि यह कहा जाय कि माँस-मदिरादि सेवन और जीवोंको मारना आदि तो जड़ शरीरकी क्रियाऐं हैं, उनसे आत्माका कोई सम्बन्ध नहीं है, ऐसी दशामें कौन-सी वह सहज योग्यता है जिससे उन अशुद्धमय एवं अशुद्ध मूलक वस्तुओंको छोड़े बिना आत्माको शुद्ध पर्यायमें ले जा सके । हो तो शास्त्र-प्रमाणसे प्रकट कीजिये । शास्त्रकारोंने तो आत्माकी शुद्धता और मोक्ष प्राप्तिमें मूल हेतु त्यागको ही बताया है । अष्ट मूलगुण, अणुव्रत, महाव्रत आदि उसीके फल-स्वरूप आत्मशुद्धिके साधक सिद्ध होते हैं । ऐसा ही आगम है ।

आगे समयसारजीकी गाथा नं० २७ का प्रमाण देकर आपने जो यह लिखा है कि ‘देह और उसकी क्रियाके साथ उसे आत्मा मानकर जिसकी एकत्वबुद्धि बनी हुई है या जिसने नयज्ञानका विशेष परिचय नहीं किया है उसकी इस दृष्टिको दूर करनेके अभिप्रायसे इसे भी व्यवहारनयका विषय बताकर उपयोगस्वरूप आत्माका निश्चयनयके विषयरूपसे ग्रहणकर मात्र ऐसे व्यवहारको छुड़ानेका प्रयत्न किया है ।’ आदि ।

आपकी उपर्युक्त पंक्तियाँ भ्रम पैदा करतीं हैं। कारण जो शरीर और उसकी क्रियाको आत्मा मानता है वह तो मिथ्यादृष्टि है । उस विचारवाले मिथ्यादृष्टिका सम्बन्ध सम्यग्दृष्टिकी आत्माके साथ नहीं जोड़ना चाहिये । सम्यग्दृष्टि जीव शरीरको आत्मा नहीं समझता है, किन्तु वह तो निश्चयस्वरूपको समझकर उसके साधक व्यवहारधर्मको पालता है । उस व्यवहारधर्मको छोड़नेका प्रयत्न किसी शास्त्रमें नहीं बताया गया है, किन्तु उसे ग्रहण करनेका ही विधान है । हाँ सम्यग्दृष्टिका व्यवहारधर्म निश्चय प्राप्तिको कराकर स्वयं छूट जाता है ।

इसका प्रमाण यही है कि आत्मा छठे गुणस्थानकी क्रियाओंमें महाव्रतादि व्यवहारधर्मके द्वारा जब सातवें अप्रमत्त गुणस्थानमें पहुँच जाता है तब वह क्रियात्मक व्यवहारधर्म स्वयं छूट जाता है ।

दिगम्बर जैनधर्म अनेकान्तस्वरूप है । उसके अनुसार निश्चय और व्यवहार दोनों नय और उनके विषयभूत पदार्थ प्रमाणभूत सिद्ध हो जाते हैं । इसका खुलासा यह है कि प्रमाण वस्तुके सर्वांशको ग्रहण करता है, वस्तु द्रव्य-पर्यायात्मक है । इस वस्तु स्वरूपको ध्यानमें लेनेसे यदि केवल निश्चयनयको ही उपादेय माना जावे तो वह निरपेक्ष होनेसे मिथ्या नय ठहरेगा । ‘निरपेक्षाः नया मिथ्या’ ऐसा शास्त्रवाक्य है । यदि निश्चयनयको छोड़कर केवल व्यवहारको हो ठीक माना जाय तो भी वह मिथ्या ठहरेगा । क्योंकि वस्तुस्वरूप द्रव्य-पर्याय उभयरूप है । इसलिये जैसे निश्चय प्रमाणभूत उपादेय है उसी प्रकार व्यवहारनय भी प्रमाणभूत उपादेय है । प्रमाणज्ञान दोनों साक्षेप नयोंको एक साथ ग्रहण करता है । इसलिये दोनों नयोंके विषयभूत निश्चय और व्यवहारधर्म भी प्रमाणभूत एवं समीचीन हैं । क्रियात्मक एवं भावात्मक दोनों धर्मोंका सामंजस्य और समीचीनता अनेकान्त प्रमाणसे सहज सिद्ध हो जाती है । परन्तु ये निराधार स्वतंत्र मान्यताएँ अनेकान्त स्वरूपको छोड़कर मिथ्या एकान्तरूप बन गई हैं ।

इस प्रकारकी एकान्त मान्यताओंसे व्यवहारधर्मको हेय तथा निश्चयधर्मको ही उपादेय माना जाता है । इस मान्यताका कटुक फल यह दीखने लगा है कि जिनभक्ति, मुनिभक्ति, मुनिदान, तीर्थवन्दना आदि श्रावकधर्म विधायक एवं मोक्षफल प्रतिपादक मुनिधर्म विधायक शास्त्रोंमें परिवर्तन किया जा रहा है । तथा उन्हें कुशास्त्र कहनेका दुःसाहस भी किया जा रहा है । इन बातोंसे दिगम्बर जैनधर्ममें पूर्ण विकृति आये बिना नहीं रह सकती है ।

इसलिये यथार्थ वस्तुस्वरूप प्रतिपादक अनेकान्तका आश्रय लेना आवश्यक है । उसीसे व्यवहारधर्म एवं निश्चयधर्ममें हेतु-हेतुमद्भाव, कार्यकारणभाव एवं साध्य-साधकभावकी सिद्धि हो जाती है । इस समीचीन मान्यतासे ही आत्मा स्वपर-कल्याण एवं मोक्षमार्गमें प्रवृत्त हो जाता है ।

उपर्युक्त समस्त विवेचनकी पुष्टिमें यहाँ पर संक्षेपरूपसे कतिपय प्रमाणोंका उद्धरण हम प्रस्तुत करते हैं । वे प्रमाण इस प्रकार हैं-

देवागम स्तोत्रकी ‘दोषावरणयोर्हानिः’ आदि, इस कारिकाके भाष्यमें आचार्य विद्यानन्दि स्वामी लिखते हैं कि-

वचनसामर्थ्यादज्ञानादिर्दोषः स्वपरपरिणामहेतुः, न हि दोष एव आवरणमिति प्रतिपादने कारिकाया दोषावरणयोरिति द्विवचनं समर्थम् । ततः तत्सामर्थ्यादावरणात् पौद्गलिकज्ञानावरणादिकर्मणो भिन्न-
स्वभाव एव आवरणादिर्दोषोऽभ्यूह्यते, तद्धेतुः पुनरावरणकर्मं जीवस्य पूर्वस्वपरिणामश्च । स्वपरिणामहेतुक एवाज्ञानादिरित्ययुक्तम् । -अष्टसहस्री पृष्ठ ५१

दोष और आवरण इन दोनोंमें अज्ञानादि तो दोष है व स्वपर ( जीव और कर्म ) परिणामसे होता है । दोषका नाम ही आवरण नहीं है, वह अज्ञानादि दोष पौद्गलिक ज्ञानावरण कर्मसे भिन्न है और इस अज्ञानभावका कारण पौद्गलिक ज्ञानावरण कर्म है तथा जीवकी पूर्व पर्याय भी है । इसलिए जीवका अज्ञान भाव स्वपरहेतुक है ।

इस अष्टसहस्रीके प्रमाणसे आपकी इस बातका खंडन हो जाता है कि अज्ञानता स्वयं आत्माकी योग्यतासे होती है ।

इसी बातकी पुष्टिमें आचार्य अकलंकदेव ‘ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने’ इस तत्त्वार्थसूत्रकी वृत्तिमें लिखते हैं कि-

स्यादेतत् ज्ञानावरणे सति अज्ञानमनवबोधो भवति । न प्रज्ञा, ज्ञानस्वभावत्वादात्मनः इति, तन्न, किं कारणम्-अन्यज्ञानावरणसद्भावे तद्भावात्ततो ज्ञानावरण एव इति निश्चयः कर्त्तव्यः ।
-तत्त्वार्थवार्तिक अ० ९ सू० १३

प्रज्ञा और अज्ञान दो परिषह ज्ञानावरणके उदयसे ही होती हैं ।

आपका यह कहना कि अनादि अज्ञानता जीवकी स्वयं होती है, वह कर्मकृत नहीं है, इस बातका उपर्युक्त प्रमाणोंसे पूरा खंडन हो जाता है ।

व्यवहार धर्म मोक्षमार्ग और मोक्षप्राप्तिमें पूर्ण साधक है और वह स्वयं मोक्षमार्गस्वरूप है । इसके प्रमाणमें आचार्य वीरसेन स्वामी लिखते हैं कि-

अरहंतणमोक्कारं भावेण य जो करेदि पयडमदी ।
सो सव्वदुक्खमोक्खं पावइ अचिरेण कालेण ।
-श्री धवल पुस्तक १ पृष्ठ ९

तथा

कधं जिणबिंबदंसणं पढम-सम्मत्तुपत्तीए कारणं ? जिणबिंबदंसणेण णिधत्त-णिकाचिदस्स वि मिच्छत्तादिकम्मकलावस्स खयदंसणादो ।

जो विवेकी जीव भाव-पूर्वक अरहंतको नमस्कार करता है वह अति शीघ्र समस्त दुखोंसे मुक्त हो जाता है । तथा जिनबिंबके दर्शनसे निधत्ति और निकाचितरूप भी मिथ्यात्वादि कर्म कलापका क्षय देखा जाता है । तथा जिनबिंबका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका कारण होता है ।
-श्री धवल पु० ६ पृ० ४२७

प्रवचनसारकी टीकामें आचार्य जयसेन स्वामी लिखते हैं कि-

तं देवदेवदेवं जदिवरवसहं गुरुं तिलोयस्स ।
पणमंति जे मणुस्सा ते सोक्खं अक्खयं जंति ॥
-प्रवचनसार गाथा ७९ की टीका

उन देवाधिदेव जिनेन्द्रको, गणधरदेवको और साधुओंको जो मनुष्य वन्दना नमस्कार करता है वह अक्षय मोक्षसुखको प्राप्त करता है ।

पंचास्तिकायकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र सूरिने लिखा है कि-

निश्चयव्यवहारयोः साध्यसाधनभावत्वात् सुवर्ण-सुवर्णपाषाणवत् । अतएव उभयनयानत्ता पारमेश्वरी तीर्थ-प्रवर्तना इति ।
-पंचास्तिकाय गाथा १५९ की टीका

तथा-

निश्चयमोक्षमार्गसाधनभावेन पूर्वोद्दिष्टव्यवहारमोक्षमार्गनिर्देशोऽयम् ।
व्यवहारमोक्षमार्ग-साध्यभावेन निश्चयमोक्षमार्गोपन्यासोऽयम् ।
-पंचास्तिकाय गाथा १६०-१६१ की टीका

निश्चयनय और व्यवहारनय परस्पर साध्यसाधकभाव है । जैसे सोना साध्य है और सुवर्ण पाषाण साधन है । इन दोनों नयोंके ही अधीन सर्वज्ञ वीतरागके धर्मतीर्थकी प्रवृत्ति होती है ।

निश्चय मोक्षमार्गका साधन व्यवहार मोक्षमार्ग है । व्यवहार मोक्षमार्गसे ही निश्चय मोक्षमार्ग सिद्ध होता है ।

श्री परमात्मप्रकाशमें श्रीआचार्य कहते हैं कि-

एवं निश्चय-व्यवहाराभ्यां साध्यसाधकभावेन तीर्थगुरुदेवतास्वरूपं ज्ञातव्यम् ।
-परमात्माप्रकाश श्लोक ७ की टीका

तथा-

साधको व्यवहारमोक्षमार्गः साध्यो निश्चयमोक्षमार्ग : ।
-परमात्माप्रकाश टीका पृष्ठ१४२

अर्थ-इस प्रकार निश्चय और व्यवहारके साध्य-साधकभावसे तीर्थ, गुरु और देवताका स्वरूप जानना चाहिये ।

तथा-

व्यवहार मोक्षमार्ग साधक है और निश्चय मोक्षमार्ग साध्य है ।

श्री पंचास्तिकाय टीकामें आचार्य जयसेन स्वामी लिखते हैं कि-

निश्चयव्यवहारमोक्षकरणे सति मोक्षकार्यं संभवति इति ॥
-श्री पंचास्तिकाय गाथा १०६

अर्थ-निश्चय और व्यवहार इन दोनों मोक्षकरणोंसे (निश्चय और व्यवहार रत्नत्रयसे) ही मोक्षरूप कार्य सिद्ध होता है ।

व्यवहारधर्मकी मोक्ष-साधकतामें प्रमाण देते हुए अन्तमें हम इतना लिखना भी आवश्यक समझते हैं कि व्यवहारधर्मको धवल सिद्धान्त आदि सभी शास्त्रोंमें मोक्षसाधक धर्म बताया गया है । परन्तु अनेक प्रमाण सामने रहते हुए भी आप व्यवहारधर्मको धर्म नहीं मानते हैं । किन्तु पुण्य कहकर उसे संसारका कारण समझ रहे हैं । ऐसी धारणासे नीचे लिखी बातें पैदा होती हैं-

\१. मुनिधर्म जो मोक्षप्राप्तिका साक्षात् साधन है, वह धर्म नहीं ठहरता है । प्रत्युत मुनियोंकी चर्या संसार-वर्द्धक ठहरती है । शास्त्रोंमें मुनियोंको अरहंतका लघुनन्दन कहा गया है ।

\२. श्रावकधर्मकी क्रियाएँ भी धर्म नहीं ठहरती हैं, ऐसी दशामें क्रियात्मक चारित्रका कोई मूल्य नहीं रहता । आजकल वैसे ही लोग धर्मसे शिथिल बन रहे हैं । कुछ लोग देवदर्शन छोड़ चुके हैं । भक्ष्याभक्ष्य एवं स्पर्शास्पर्शका विवेक छोड़कर होटलोंमें खाने लगे हैं। कुछ भाई तो व्यवहारधर्मको धर्म नहीं समझकर एवं उसे केवल शरीरकी क्रिया समझकर बाजारू खान-पान एवं हीनाचारकी ओर भी झुक गये हैं। परन्तु वास्तवमें विचार किया जाये और शास्त्रों पर श्रद्धान किया जाये तो व्यवहारधर्म श्रावक और मुनियोंका मोक्षमार्ग है। उसके विना मुक्ति प्राप्ति असम्भव है।

\३. यह बात विचारणीय है कि यदि व्यवहारधर्मको धर्म नहीं माना जाय तो धर्मप्रवर्त्तक तीर्थंकर भगवान उसे क्यों धारण करते। वे तो सर्वोच्च अनुपम असाधारण एकमात्र धर्मनायक हैं। यह नियम है कि आठ वर्ष पीछे तीर्थंकर अणुव्रती बन जाते हैं। तो क्या उनकी इस व्यवहारधर्मकी प्रवृत्तिको धर्म नहीं माना जायेगा। उत्तर देने की कृपा करें।

\४. दूसरी बात यह है कि यदि व्यवहारधर्ममें होनेवाले राग-भाव (शुभराग एवं प्रशस्त राग) को संसार-वर्द्धक माना जाय तो दशवें गुणस्थानमें भी सूक्ष्म लोभके उदयमें जो सूक्ष्म सांपरायिक रागभाव है उसे भी संसारवर्द्धक मानना पड़ेगा और वहाँ भी रागके सद्भावमें शुद्धोपयोग नहीं बनेगा। परन्तु क्षपकश्रेणीमें चढ़े हुए दशवें गुणस्थानवर्ती शुक्लध्यानी मुनिराज उस रागके सद्भावमें भी कर्मोंकी अनन्तगुणी निर्जरा करते हैं और अन्तर्मुहूर्तमें नियमसे केवलज्ञान प्राप्त कर लेते हैं ऐसा शास्त्रीय विधान है। ऐसी अवस्थामें प्रशस्त राग संसारवर्द्धक सिद्ध नहीं होता है, किन्तु शुद्धध्यानका कारण एवं केवलज्ञान प्राप्तिका अन्तिम साधन है। परन्तु आप ऐसे शुभोपयोगवाले सम्यग्दृष्टि एवं महाव्रतीके प्रशस्त रागको भी धर्म न कहकर पुण्य कहते हुए उसे संसारवर्द्धक बता रहे हैं इसका आगमप्रमाणसे उत्तर दीजिये।

सारांश यह है कि शुद्धस्वरूपका प्रतिपादक निश्चयनय है और शुद्धाशुद्ध द्रव्य या पर्यायका प्रतिपादक व्यवहारनय है। निश्चयनय अपने स्थानपर सत्यार्थ है और व्यवहारनय अपने क्षेत्रमें सत्यार्थ है। दोनों-नय प्रमाणके ही उपभेद हैं, परस्पर सापेक्ष दोनों नय सत्य हैं, निरपेक्ष दोनों असत्य हैं।

जीवकी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर संसारी दशा भी असत्य नहीं और अव्यक्त शक्तिरूप शुद्ध-बुद्ध दशा भी सत्य है।

निश्चयधर्म सापेक्ष व्यवहारधर्म आत्मशुद्धिका साधक है, निश्चय-व्यवहारनयका समन्वय करनेवाला स्याद्वादसिद्धान्त जैनसिद्धान्तका मूल स्तम्भ है।

शंका १६, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७२३ से ७३२

↑ सूची


श्री वीतरागाय नमः

शंका १६

निश्चयनय और व्यवहारनयका स्वरूप क्या है? व्यवहारनयका विषय असत्य है या सत्य? असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप?

प्रतिशंका २ का समाधान

मूल प्रश्नके उत्तरस्वरूप जो लेख लिपिवद्ध किया गया था उसमें निश्चयनय और व्यवहारनयका स्वरूप बतलाकर व्यवहारनयके एक द्रव्यकी अपेक्षा जितने भेद होते हैं उनकी सप्रमाण चर्चा की गई थी। उसमें व्यवहारनयके सद्भूत और असद्भूत और उनके उपचरित और अनुपचरित भेदोंका भी निर्देश किया गया था। इसलिये यह आक्षेप तो समीचीन नहीं कि प्रश्नमें जो पूछा गया उसका उत्तर नहीं दिया गया। इतना अवश्य है कि प्रश्नकर्ता अपने मनमें यदि किसी हेतुको ध्यानमें रखकर प्रश्न करता है तो जिस हेतुसे उसने प्रश्न किया है उसका भी उल्लेख होना चाहिये। अस्तु,

हमारे द्वारा लिखी गई ‘यह जीव अनादि अज्ञानवश संयोगको प्राप्त हुए पर पदार्थोंमें न केवल एकत्व-बुद्धिको करता आरहा है, अपि तु स्वसहाय होनेपर भी परकी सहायताके विना मेरा निर्वाह नहीं हो सकता, ऐसी मिथ्या मान्यतावश अपनेको परतन्त्र बनाये हुए चला आ रहा है।’ इन पंक्तियोंपरसे जो प्रतिशंका २ में उक्त प्रकारकी मिथ्या धारणाको कल्पना की संज्ञा दी गई है यह पढ़कर आश्चर्य हुआ। अथवा अदेवमें देवबुद्धि, अगुरुमें गुरुबुद्धि और अशास्त्रमें शास्त्रबुद्धि तथा इसी प्रकार अनात्मीय पदार्थोंमें आत्मबुद्धि, जिसे कि सभी शास्त्रकार मिथ्या श्रद्धाके रूपमें मिथ्यादर्शन लिखते आये हैं, उसे आजकल यदि कल्पना माना जाता है तो आश्चर्य भी नहीं होना चाहिये। जीवादि सात पदार्थोंकी विपरीत श्रद्धाका नाम ही तो मिथ्यात्व है, इसे जैनागमका अभ्यासी प्रत्येक व्यक्ति जानता है, फिर वैसी मान्यता कल्पनात्मक कैसे हुई? विचार कीजिए। इसी प्रकार लेखमें अप्रासंगिक और भी अनेक चिन्तनीय विचार रखे गये हैं। आत्माकी नर, नारकादि पर्याय स्वयं आत्माकी अवस्था है। यदि पर द्रव्यरूप कर्मोंका आत्माके साथ होनेवाले बन्धका शास्त्रकार व्यवहार नयसे सद्भाव 'स्वीकार करते हैं और हमारी ओरसे उस कक्षाके भीतर रहकर उत्तर देकर शास्त्र-मर्यादाकी सीमा बनाये रखी जाती है तो इसमें हानि ही क्या है? इस सम्बन्धमें स्वयं आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

सर्वद्रव्याणां परैः सह तत्त्वतः समस्तसम्बन्धशून्यत्वात् ।
-प्रवचनसार ३, ४ टीका

अर्थ-आत्मा तत्त्वतः परद्रव्योंके साथ सब प्रकारके सम्बन्धसे शून्य है।

प्रतिशंकास्वरूप लिखे गये लेखमें अनेक आगमग्रन्थोंका नाम है। इनमें पंचाध्यायीका नाम लिखकर उसका नाम अलग क्योंकर दिया गया यह मेरी समझके बाहर है। यह कोई प्रशंसनीय कार्य नहीं हुआ इतनी सूचना देना मैं अपना श्रद्धामूलक प्रधान कर्तव्य मानता हूँ। जिन ग्रन्थोंके इस सूचीमें नाम हैं उनमें समयसारके साथ मूलाचार, भावसंग्रह, रयणसार, धवलसिद्धान्त, तत्त्वार्थवार्तिक और गोम्मटसार इन आगमशास्त्रोंका भी नाम है। इनमें समयसार अध्यात्मकी मुख्यतासे प्रतिपादन करनेवाला आगम ग्रन्थ है, शेष आगम ग्रन्थ व्यवहारनयकी मुख्यतासे लिखे गये हैं। पंचास्तिकायमें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

एवमनया दिशा व्यवहारनयेन कर्मग्रन्थप्रतिपादितजीवगुणमार्गणास्थानादिप्रपंचितविचित्रविकल्परूपैः।
-गाथा १२३ टीका।

इस उल्लेखसे स्पष्ट है कि जिन शास्त्रोंमें जीवस्थान, गुणस्थान और मार्गणास्थान आदिरूप विविध भेदोंका कथन किया गया है, जिनमें कर्मग्रन्थ मुख्य हैं, वे व्यवहारनयकी मुख्यतासे लिखे गये हैं।

अतएव इनमें निमित्तोंकी मुख्यतासे प्रतिपादन करते हुए जो यह कहा गया है कि ‘उनके कारण जीव संसारमें परिभ्रमण करता है या जीव कर्मोंके कारण ही संसारका पात्र बना हुआ है।’ तो ऐसे कथनको परमार्थभूत न कह कर व्यवहारनयकी अपेक्षा स्वीकार किया जाता है तो उस परसे विपरीत अर्थ फलित न यही फलित करना चाहिए कि 'यह संसारी जीव एकमात्र अपने अज्ञानके कारण ही संसारका पात्र बना हुआ है। इसमें जड़कर्मोंका अणुमात्र भी दोष नहीं है। अपनी परतन्त्रताका दोष कर्मों पर मढ़ना और उसमें अपना अपराध नहीं मानना इसे तो नैयायिक-वैशेषिकदर्शनका ही प्रभाव मानना चाहिये आत्मा परतन्त्र है, उसकी परतन्त्रता काल्पनिक नहीं है। पर उसका मूल कारण आत्माका अज्ञान-मिथ्यादर्शन परिणाम ही है, कर्म नहीं। इसी आशयको व्यक्त करते हुए चन्द्रप्रभु भगवान्‌की जयमालामें पण्डित रामचद्रजी कहते हैं-

कर्म विचारे कौन भूल मेरी अधिकाई । अग्नि सहे घनघात लोहकी संगति पाई॥

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए पण्डितप्रवर बनारसीदास कहते हैं-

करम करै फल भोगवै जीव अज्ञानी कोय।
यह कथनी व्यवहारकी वस्तुस्वरूप न होय॥

इसमें सन्देह नहीं कि जीवकी जब यह परतन्त्ररूप अवस्था होती है तब उसके मोहनीय आदि कर्मोंका उदय भी होता है। पर इस प्रकारके संयोगको देखकर यदि वह उसका कारण परको ही मानता रहता है और आप अपराधी हुआ उसका मूल कारण अपने अज्ञानकी ओर दृष्टिपात नहीं करता तो संसारमें ऐसा कोई उपाय नहीं है जो उसे उसकी परतन्त्रतासे विलग कर दे। व्रत धारण करो, समितिका पालन करो, मौन रहो, वचन मत बोलो, किन्तु जब तक जीवनमें अज्ञानका वास है तब तक यह सब करनेसे आत्माको अणुमात्र भी लाभ होनेवाला नहीं है। वह लाभ जो संसारकी परिपाटीको बढ़ानेवाला है यथार्थ लाभ नहीं माना जा सकता। ज्ञानी सम्यग्दृष्टि जीवके ही व्रतादि मोक्षमार्गमें सफल हैं। यह लिखना और कहना कि ‘इस जीवको कर्म ही परवश बनाये हुए हैं। उसीके कारण यह परतन्त्र हो रहा है ऐसा ही है जैसे कोई चोर चोरी करे और कहे कि इसमें मेरा क्या अपराध? अशुभ कर्मोदयकी परवशतावश मुझे चोरी करनेके लिए बाध्य होना पड़ता है।’ अतएव प्रकृतमें यही मानना उचित है कि इस जीवकी परतन्त्रताका मूल कारण आत्मा का अज्ञानभाव ही है। दर्शनमोहनीयका उदय-उदीरणा नहीं, वह तो निमित्तमात्र है।

आगे व्यवहारनयका विषय कह कर क्रियारूप व्यवहार धर्मसे निश्चयस्वरूप शुद्धताकी प्राप्ति अथवा मोक्षप्राप्ति बतलाते हुए लिखा है कि ‘व्यवहारधर्मका निश्चयधर्मके साथ अविनाभावसम्बन्ध है। बिना व्यवहारधर्मके निश्चय धर्म त्रिकालमें न तो किसीने प्राप्त किया है और न कोई प्राप्त कर सकता है इसलिए वह मोक्षप्राप्तिमें अनिवार्य परम साधक धर्म है।’ आदि।

प्रकृतमें देखना यह है कि वह व्यवहारधर्म क्या है और उसकी प्राप्ति कैसे होती है। आगममें बतलाया है कि जब तक संसारी जीव मिथ्यादृष्टि रहता है तब तक उसके जितना भी व्यवहार होता है उसकी परिगणना मिथ्या व्यवहारमें होती है। ऐसे मिथ्या व्यवहारको लक्ष्य कर ही समयसारमें लिखा है-

वद-णियमाणि धरंता सीलाणि तहा तवं च कुव्वंता।
परमट्ठबाहिरा जे णिव्वाणं ते ण विंदंति॥ १५३॥

अर्थ-व्रत और नियमोंको धारण करते हुए भी तथा शील पालते हुए भी जो परमार्थसे (परम ज्ञानस्वरूप आत्माके श्रद्धानसे) बाह्य हैं वे निर्वाणको नहीं प्राप्त होते॥१५३॥

इसकी टीका करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र कहते हैं-

"ज्ञानमेव मोक्षहेतुः, तदभावे स्वयमज्ञानभूतानामज्ञानिनामन्तर्व्रतनियमशीलतपःप्रभृतिशुभकर्म
सद्भावेऽपि मोक्षाभावात्। अज्ञानमेव बन्धहेतुः, तदभावे स्वयं ज्ञानभूतानां ज्ञानिनां बहिर्व्रतनियमशीलतःपप्रभृतिशुभकर्मासद्भावेऽपि मोक्षसद्भावात्।

अर्थ-ज्ञान ही मोक्षका हेतु है; क्योंकि ज्ञानके अभावमें स्वयं ही अज्ञानरूप होनेवाले अज्ञानियोंके अन्तरंगमें व्रत, नियम, शील, तप इत्यादि शुभकर्मोंका सद्भाव होनेपर भी मोक्षका अभाव है तथा अज्ञान ही बन्धका कारण है, क्योंकि उसके अभावमें स्वयं ही ज्ञानरूप होनेवाले ज्ञानियोंके बाह्य व्रत, नियम, शील, तप इत्यादि शुभकर्मोंका असद्भाव होनेपर भी मोक्षका सद्भाव है।

इस गाथामें अज्ञानभावका निषेध है और ज्ञानभावका समर्थन किया गया है । आशय यह है कि यदि अज्ञानभावके साथ व्रत, शील और तप हों तो भी वह ( अज्ञानभाव ) एकमात्र संसारका कारण है तथा ज्ञानभावके होनेपर भी कदाचित् व्रत, नियम, शील और तप न भी हों तो भी वह ( ज्ञानभाव ) मोक्षका हेतु है।

नियम यह है कि अधिकसे अधिक अर्धपुद्गल परावर्तनप्रमाण कालके शेष रहनेपर जीव काललब्धिके प्राप्त होनेपर आत्मसन्मुख पुरुषार्थद्वारा अधःकरण,अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण परिणाम करके अज्ञानभावका अन्त कर सम्यग्दर्शनको प्राप्त होता है । अधिक-से-अधिक कितना काल रहनेपर संसारी जीव सम्यग्दर्शनको प्राप्त करता है इस तथ्यका यह सूचक वचन है। तथा कम-से-कम संसारका अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहनेपर जीव सम्यग्दर्शनको प्राप्त करता है। ऐसा जीव शेष अन्तर्मुहूर्त कालके भीतर-भीतर गुणस्थान परिपाटीसे अयोगिकेवली होकर मोक्षका पात्र होता है। सम्यग्दर्शनको प्राप्त करनेका मध्यका काल अनेक प्रकार है।

उक्त उल्लेखमें आया हुआ ‘ज्ञान’ पद सम्यग्दर्शनका और ‘अज्ञान’ पद मिथ्यादर्शनका सूचक है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक इस जीवको सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं होती तब तक अन्य सब परिश्रम मोक्षमार्गकी दृष्टिसे निष्फल है। यही कारण है कि आचार्य कुन्दकुन्दने सम्यग्दर्शनको धर्मका मूल बतलाते हुए लिखा है-

दंसणमूलो धम्मो उवइट्ठो जिणवेरहिं सिस्साणं।
तं सोऊण सकण्णे दंसणहीणो ण वंदिव्वो ॥२॥

सम्यग्दर्शन धर्मका मूल है ऐसा जिनदेवने शिष्योंको उपदेश दिया है। उसे अपने कानोंसे सुननेके बाद सम्यग्दर्शनशून्य पुरुषकी वन्दना नहीं करनी चाहिये ॥२॥

मोक्ष आत्माकी शुद्ध स्वतन्त्र पर्यायका दूसरा नाम है, इसलिए देह, मन, वाणी, द्रव्यकर्म, भावकर्म और स्त्री-पुत्रादिसे भिन्न अपने आत्मस्वरूपका जबतक सम्यक् भान नहीं होता तबतक धर्म क्या है इसका सम्यक् निर्णय करना ही असम्भव है। सम्यग्दर्शन ही एक ऐसा अलौकिक प्रकाश है जो अनादि अज्ञानरूपी प्रगाढ़ अन्धकारका भेदन कर ज्ञानानन्द चिच्चमत्कारस्वरूप शुद्ध आत्मतत्त्वका दर्शन करानेमें समर्थ होता है। ऐसे आत्मस्वरूप निश्चय सम्यग्दर्शनके होनेपर ही परमार्थरूप देव, गुरु और शास्त्रके यथार्थस्वरूपकी तथा जीवादि नौ पदार्थोंकी सम्यक् प्रतीति होती है। देव, गुरु और जीवादि नौ पदार्थोंके सम्यक् स्वरूपपर सम्यक् प्रकाश डालनेवाली सच्ची जिनवाणी है। वीतराग, हितोपदेशी और सर्वज्ञ ही यथार्थ देव है तथा मोक्षमार्गमें लीन परम तपोनिधि वीतराग गुरु ही सच्चे गुरु हैं। विचारकर देखनेपर मेरी आत्माका स्वरूप इनके स्वरूपसे भिन्न नहीं है, क्योंकि द्रव्यदृष्टिसे अवलोकन करनेपर इनके स्वरूपसे मेरे स्वरूपमें अणुमात्र भी अन्तर नहीं है। इस प्रकार अपने आत्माके स्वरूपको देव और गुरुके स्वरूपसे मिलाकर इसकी भव और भोगमें सहज उदासीन वृत्ति हो जाती है।

अभीतक यह संसारी जीव अपने अज्ञानवश अन्य भवरोगसे पीड़ित संसारी सरागी देवताओंकी श्रद्धा करता आ रहा था। प्राप्त सांसारिक साधनोंको पुण्यका फल मानकर उन्हींमें तन्मय हो रहा था। किन्तु उसे सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होनेपर उसकी पंचेन्द्रिय भोगोंमें सहज उदासीन वृत्ति हो जाती है। ऐसा सम्यग्दृष्टि जीव अपने शुद्ध आत्माके प्रतिनिधिस्वरूप एकमात्र परमार्थरूप देव, गुरु और शास्त्रकी उपासनाको ही अपना आवश्यक कर्तव्य मानता है। इसी आशयको ध्यानमें रखकर देशव्रतोद्योतन पृ० १६ में कहा है-

आत्मा ज्ञानानन्दस्वभावी है ऐसी दिव्यशक्तिकी जिसे प्रतीत हुई हो उसे जब तक पूर्ण दशा प्राप्त न हो तब तक जिनेन्द्रदेवकी पूजन करनी चाहिए। सम्यक्त्वी श्रावकको उनकी पूजा करनेके भाव आते हैं। मुनि भी भावपूजा करते हैं। श्रावक सेवक बनकर पूजा करते हैं। जिसके अन्तरंगमें ज्ञानस्वभावका भान है वह कहता है-हे नाथ ! तेरे विरहमें अनन्त काल बीत गया। हे प्रभु ! अब कृपा करो और मेरे जन्म-मरणका अन्त कर दो। जन्म-मरणका अन्त अपने आत्मासे ही होता है, किन्तु अपूर्ण अवस्थामें भगवान्‌की पूजाका भाव होता है। स्वयंभूस्तोत्रमें समन्तभद्र आचार्य अनेक प्रकारसे स्तुति करते हैं। जिसे आत्माका भान है उसे पूर्णदशा प्राप्त भगवान्‌की स्तुति करनेके भाव आते हैं-हे नाथ ! आपको पूर्ण आनन्द मिल गया। आपमें अल्पज्ञता और विकार नहीं रहे। अब करूणा करें, ऐसे नम्र वचन निकले विना नहीं रहते।

आगे पृ० १७ में लिखा है-

जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान्‌की भक्ति नहीं देखता तथा भक्तिपूर्वक उनकी पूजा, स्तुति नहीं करता उस मनुष्यका जीवन निष्फल है। तथा उसके गृहस्थाश्रमको धिक्कार है। निर्ग्रन्थ वनवासी मुनि भी कहते हैं कि उन्हें धिक्कार है। आगे गाथा १६-१७ में कहा है कि भव्य जीवोंको प्रातःकाल उठकर श्री जिनेन्द्रदेव तथा गुरुके दर्शन करना चाहिये तथा भक्तिपूर्वक उनकी वन्दना स्तुति करनी चाहिये। तथा धर्मशास्त्र सुनना चाहिये। तत्पश्चात् गृहकार्य करने चाहिये। गणधरादि महान् पुरुषोंने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चार पुरुषार्थोंमें सर्व प्रथम धर्मका निरूपण किया तथा उसको मुख्य माना है।

यह सम्यग्दृष्टिकी सच्चे देव, गुरु, शास्त्रकी यथार्थ भक्ति है। इसके साथ सात व्यसनोंके सेवनमें उसकी त्याग भावना हो जाती है। वह शास्त्रोंमें प्रतिपादित आठ अंगोंका उक्त प्रकारसे पालन करते हुए सम्यग्दर्शनके पच्चीस दोषोंका त्याग कर देता है। इस प्रकार निश्चय सम्यग्दर्शनके साथ व्यवहार सम्यग्दर्शनका यथाविधि पालन करते हुए सहज आत्मरुचिकी दृढ़तावश आत्मविशुद्धिकी उत्तरोत्तर वृद्धि होनेपर जैसे ही अन्तरंगमें अंशरूपसे उसके वीतराग परिणतिके जागृत होनेके साथ अप्रत्याख्यानावरण कषायका अभाव होता है तब वह बाह्यमें अपनी शक्तिके अनुसार श्रावकके बारह व्रतोंको मनःपूर्वक पालन करने लगता है। इसके लिये वह द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावोंका सम्यक् विचारकर अपने सन्निकट जो सम्यक् गुरु होते हैं उनके चरणोंमें उपस्थित हो अपनी अन्तरंग विशुद्धिका प्रकाशन कर बुद्धिपूर्वक श्रावकके अहिंसाणुव्रत आदि बारह व्रतोंको धारण करता है।

परमानन्दस्वरूप नित्य एक ज्ञान-दर्शनस्वरूप ज्ञायकभावके सिवा अन्य सब पर है ऐसा भेदविज्ञान तो उसके सम्यग्दर्शनके कालमें ही उत्पन्न हो गया था। अब उसके रागभावमें भी और न्यूनता आई है, अतएव वह संयोगको प्राप्त हुए भोगोपभोगके साधनोंका परिमाण तो करता ही है। साथ ही संकल्पपूर्वक त्रसहिंसा का त्याग कर सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत और ब्रह्मचर्याणुव्रत पूर्वक सात शीलोंको धारण करता है। ये बारह व्रत हैं। इनके साथ अविरत सम्यग्दृष्टिके देव, गुरु शास्त्रकी पूजा अर्चा, वन्दना, नमस्कृति आदिरूप जितना श्रावकका कर्तव्य है आत्मोन्मुख परिणतिके साथ वह सब व्यवहार धर्म देशविरत गृहस्थके होता है। आत्मजागृतिके साथ इसके शरीर, भोग और संसारके प्रति जो सहज उदासीन वृत्ति उदित होती है उसके परिणामस्वरूप वह विचार करता है कि-

कब ह्वै मेरे वा दिनकी सुघरी ।
तन विन वसन अशन विन वनमें
निवसों नासादृष्टि धरी । कब०,

यह तो आगमसे ही स्पष्ट है कि श्रावकधर्म अपवादमार्ग है। उत्सर्गमार्ग तो मुनिधर्म ही है, इसलिए गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी आत्मजागृतिके कारण उसमें उसकी सहज उदासीनता बनी रहती है और अन्तरंगमें कषायकी मन्दताके साथ जैसे जैसे आत्मविशुद्धिकी वृद्धि होती जाती है वैसे वैसे उसका चित्त परम वीतराग मुद्राको धारणकर साक्षात् मोक्षमार्गपर आरूढ़ होनेके लिए उद्यत होता है।

मुनिधर्म लोकोत्तर साधना है। जिसके चित्तमें भोगोपभोगके प्रति पूर्णरूपसे सहज उदासीनता उत्पन्न हो गई है, अन्तरंगमें समता तत्त्वके अभ्यासवश जो पूर्ण आत्मजागृतिके लिए बद्धपरिकर है, जिसने पूर्ण अहिंसा, सत्य, अचौर्य और ब्रह्मचर्यकी पराकाष्ठा प्राप्त करनेका अन्तरंगमें निर्णय कर लिया है ऐसा आत्मार्थी गृहस्थ जब स्वभावभावके आश्रयसे अपनेमें पूर्ण वीतरागता प्राप्त करनेके लिए उद्यत होता है तब बाह्यमें वह बन्धुवर्ग, गुरुजन और सब इष्ट परिकरके समक्ष अपनी अन्तरंग भावना व्यक्त कर और उनसे विदा लेता हुआ कहता है-

बन्धुवर्गमें प्रवर्तमान आत्माओ ! इस पुरुषका आत्मा किंचित् मात्र भी तुम्हारा नहीं है ऐसा तुम निश्चयसे जानो। इसलिए मैं आप सबसे विदा लेता हूँ। जिसे ज्ञानज्योति प्रगट हुई है ऐसा यह आत्मा आज आत्मारूपी अपने अनादि बन्धुके पास जा रहा है।

अहो ! इस पुरुषके शरीरके जनकके आत्मा ! अहो ! इस पुरुषके शरीरकी जननीके आत्मा ! इस पुरुषका आत्मा आप दोनों द्वारा उत्पन्न नहीं है ऐसा आप दोनों निश्चयसे जानो। इसलिए आप दोनों इस आत्माको छोड़ो अर्थात् इस आत्मामें रहनेवाले रागका त्याग करो। जिसे ज्ञानज्योति प्रगट हुई है ऐसा यह आत्मा आज आत्मारूपी अपने अनादिजनकके पास जा रहा है।

अहो ! इस पुरुषके शरीरकी रमणी ( स्त्री ) के आत्मा ! तू इस पुरुषके आत्माको रमण नहीं करती ऐसा तू निश्चयसे जान । इसलिये तू इस आत्माको छोड़। जिसे ज्ञानज्योति प्रगट हुई है ऐसा यह आत्मा आज अपनी स्वानुभूतिरूपी अनादि-रमणीके पास जा रहा है।

अहो इस पुरुषके शरीरके पुत्रका आत्मा ! तू इस पुरुषके आत्माका जन्य नहीं है ऐसा तू निश्चयसे जान । इसलिये तू इस आत्माको छोड़। जिसे ज्ञानज्योति प्रगट हुई है ऐसा यह आत्मा आज आत्मारूपी अपने अनादि जन्यके पास जा रहा है। इस प्रकार बड़ोंसे, स्त्रीसे और पुत्रसे अपनेको छुड़ाता है।
-प्रवचनसार २०२ टीका पृ० २४९

इसके बाद ज्ञानाचार आदिकी सम्यक् प्रकारसे आराधना करता हुआ वह गुणाढ्य, क्रोधादि दोषोंसे रहित, और वयोवृद्ध आदि उत्तम गुणोंसे सम्पन्न गणी ( आचार्य ) को प्राप्त कर ‘मुझे स्वीकार करो’ ऐसा निवेदन कर प्रणत होता हुआ गणीके द्वारा अनुगृहीत होता है। तदनन्तर मैं दूसरोंका नहीं हूँ, दूसरे मेरे नहीं हैं, इस लोकमें मेरा कुछ भी नहीं है ऐसा निश्चयवान् और जितेन्द्रिय होता हुआ यथा जात रूपधर होकर केशलुंच करता है। उस समय उसकी वृत्ति हिंसादिसे रहित २८ मूलगुणयुक्त और शरीरके संस्कारसे रहित होती है। इस प्रकार यथाजात मुनिलिंगको स्वीकारकर जब वह नव दीक्षित स्वभावसन्मुख हो आत्मरमणताको प्राप्त होता है तब वह श्रावकधर्मके उत्कृष्ट विशुद्धिरूप परिणामोंका आलम्बन छोड़ सर्वप्रथम अप्रमत्तभावको प्राप्त होता है।

धन्य है यह आत्मस्वरूपमें स्थित परम वीतराग जिन मुद्रा ! जिन्होंने ऐसी जगत्पूज्य वीतरागस्वरूप साक्षात् जिनमुद्राको प्राप्तकर पूर्ण जिनत्व प्राप्त किया है वे तो धन्य हैं ही। किन्तु जिन्होंने पूर्ण आत्मजागृतिका हेतुभूत परम पवित्र वीतरागस्वरूप जिनमुद्राका भी आलम्बन लिया वे भी धन्य हैं।

इसके बाद ऐसा ज्ञानी वीतरागी साधु अति अल्प कालमें (अन्तर्मुहूर्तमें) प्रमत्तसंयत होता है। इसका अन्तर्मुहूर्त काल है। किन्तु अप्रमत्तसंयतका काल इससे आधा है। प्रमत्तसंयत अवस्थामें इसके स्वाध्याय, धर्मोपदेश, आहारग्रहण, विहार आदि क्रियाऐं होती हैं। ऐसा नियम है कि प्रमत्तसंयत गुणस्थानसे लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक सामायिक संयम और छेदोपस्थापना संयम ये दो संयम होते हैं। वीतराग साधुके सदा काल अरि-मित्र, महल-स्मशान, कञ्चन-काँच तथा निन्दा करनेवाला-स्तुति करनेवाला इनमें सर्वकाल समभाव रहता है। पर्यायरूपसे काच और कञ्चनको वह अलग अलग जानता अवश्य है, परन्तु स्वभावदृष्टिकी प्रधानता होनेसे वह दोनोंको पुद्गल समझकर एकको श्रेष्ठ और दूसरेको तुच्छभावसे नहीं देखता। जगतके सब पदार्थोंको देखनेकी उसकी यही दृष्टि रहती है।

शरीर और पर्यायसम्बन्धी मूर्च्छा तो उसकी छूट हो गई है, इसलिये उसका शरीर संस्कारकी ओर अणुमात्र भी ध्यान नहीं जाता। संज्वलन कषायके सद्भावमें आहार, पीछी, कमण्डलु और स्वाध्यायोपयोगी १-२ शास्त्र मात्रके ग्रहणके भावका विरोध नहीं है, इसलिये एषणा और प्रतिष्ठापन समितिके अनुसार ही वह इनमें प्रवृत्ति करता है।

श्रावकोंको यथाविधि श्रावकधर्मका उपदेश देते हुए भी श्रावकोचित किसी भी क्रियाके करनेकी न तो वह प्रेरणा करता है और न उसमें किसी प्रकारकी रुचि दिखलाता है।

मोक्षमार्गमें पूज्यता चारित्रके आधार पर है। मुख्यतया पञ्च परमेष्ठी ही पूज्य हैं। चारित्रधारीकी विनय पदके अनुसार यथायोग्य उचित है, भले ही वह ‘देशव्रती तिर्यञ्च ही हो।’ पर चारित्रसे रहित देव भी वन्दनीय नहीं है, अतएव साधु देशभेद, समाजभेद और पन्थभेदसे सम्बन्ध रखनेवाली रूढिजन्य क्रियाओंकी अपेक्षा किये बिना वीतरागभावकी अभिवृद्धिरूप 'स्वयं प्रवृत्ति करता है और तदनुरूप ही उपदेश करता है।

यह निश्चय मोक्षमार्गपूर्वक व्यवहार मोक्षमार्ग है। चरणानुयोगके ग्रन्थोंमें इसीका प्रतिपादन किया गया है। पण्डितप्रवर दौलतरामजीने छहढालाकी ६वीं ढालमें-

मुख्योपचार द्विभेद यों बडभागि रत्नत्रय धरैं।

इस वचन द्वारा जिस दो प्रकारके रत्नत्रयका सूचन किया है उसमेंसे मुख्य रत्नत्रय ही निश्चयधर्म है, क्योंकि वह स्वभावके आश्रयसे उत्पन्न हुई आत्माकी स्वभावपर्याय है तथा उपचाररत्नत्रय ही व्यवहारधर्म है, क्योंकि निश्चयधर्मके साथ गुणस्थान परिपाटीके अनुसार जो देव, शास्त्र, गुरु, अहिंसादि अणुव्रत और महाव्रत आदिरूप शुभ विकल्प होता है जो कि रागपर्याय है उसको यहाँ व्यवहारधर्म कहा गया है ।

परमात्मप्रकाशमें कहा है-

देवहं सत्थहं मुणिवरहं भत्तिए पुण्णु हवेइ ।
कम्मक्खउ पुणु होइ ण वि अज्जउ संति भणेइ ॥६१॥

देव, शास्त्र और गुरुकी भक्तिसे पुण्य होता है । परन्तु इससे कर्मक्षय नहीं होता है ऐसा शान्ति जिन कहते हैं ॥६१॥

नयचक्रमें भी कहा है-

देवगुरुसत्थभत्तो गुणोवयारकिरियाहिं संजुत्तो ।
पूजादाणाइरदो उवजोगो सो सुहो तस्स ॥३११॥

अर्थ-जो आत्माका उपयोग देव, गुरु, शास्त्रकी भक्ति तथा गुण-उपचार क्रियासे युक्त और पूजा-दान आदिमें लीन है वह शुभ उपयोग है ॥३११॥

इससे स्पष्ट है कि आगममें व्यवहारधर्मसे जीवकी आंशिक विशुद्धिके साथ होनेवाला रागांश ही लिया गया है । अतएव जब रागांशकी दृष्टिसे विचार करते हैं तो यही प्रतीत होता है कि वह एकमात्र बन्धमार्ग ही है । जहाँ कहीं आगममें उसे निर्जराका हेतु लिखा भी है तो वह केवल उसके साथ होनेवाले आत्माके निश्चय रत्नत्रयस्वरूप शुद्ध परिणामका रागांशमें उपचार करके ही लिखा है । अतएव आगमके ‘व्यवहारधर्म मोक्षका हेतु है’ ऐसे वचनको पढ़कर उसका कथन मात्र उपचारसे जानना चाहिये, परमार्थसे नहीं । आगममें व्यवहार-निश्चयकी मुख्यतासे अनेक प्रकारके वचन उपलब्ध होते हैं सो शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ, आगमार्थ, भावार्थ इनको समझकर ही वहाँ व्याख्यान करना चाहिये ।

अनेन प्रकारेण शब्दनयमतागमभावार्थो व्याख्यानकाले यथासम्भवं सर्वत्र ज्ञातव्य इति ।
-परमात्मप्रकाश १, २ पृ० ८

अनेन प्रकारेण शब्दनयमतागमभावार्थं व्याख्यानकाले सर्वत्र योजनीयं ।
-पञ्चास्तिकाय गाथा १ जयसेनीय टीका पृष्ठ ४

कई स्थानोंपर प्रतिशंका २ में मिली हुई शुद्धाशुद्ध पर्यायको शुभ कहा गया है । इससे स्पष्ट विदित होता है कि यह प्रतिशंकामें स्वीकार कर लिया गया है कि जितना रागांश है वह मात्र बन्धका कारण है, पर उसे निर्जराका हेतु सिद्ध करना इष्ट है, इसलिये पूरे परिणामको शुभ कहकर ऐसा अर्थ फलित करनेकी चेष्टा की गई है सो यह कथनकी चतुराई मात्र ही है ।

दसवें गुणस्थानमें रागभाव है यह आगमसे ही स्पष्ट है और वह बन्धका ही कारण है, परन्तु सातवें गुणस्थानसे लेकर ऐसा रागांश अबुद्धिपूर्वक होता है, इसलिये वहाँ शुद्धोपयोगकी सिद्धिमें कोई बाधा नहीं आती ।

प्रतिशंकामें एक मत यह प्रगट किया गया है कि यदि व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका साधक नहीं माना जाता है तो श्रावक-मुनिकी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं । सो मेरी नम्र सम्मतिमें ऐसा भय करनेका कोई कारण नहीं है, क्योंकि जब यह आत्मा शुद्धोपयोगसे च्युत होकर शुभोपयोगमें आता है तब उसके उस पदके अनुरूप वाह्य क्रियाऐं भी होती हैं। इतना अवश्य है कि श्रावकके गुणस्थानके अनुरूप शुद्ध परिणतिके साथ शुभोपयोगकी मुख्यता होती है और साधुके शुद्धोपयोगकी मुख्यता और शुभोपयोगकी गौणता होती है। शुभोपयोग या वाह्य क्रियाऐं तभी आत्मधर्ममें बाधक हैं जब यह जीव इनसे निश्चयधर्मकी प्राप्ति मानता है, किन्तु आगमका अभिप्राय यह है कि मोक्षमार्गमें साधक आत्मा सदाकाल स्वभावका ही आश्रय लेनेका उद्यम करता है। परन्तु उपयोगकी अस्थिरताके कारण उसके आत्मानुभूतिस्वरूप ध्यानसे च्युत होनेपर उस समय उसकी सहज प्रवृत्ति शुभोपयोगमें होती है और शुभोपयोगके साथ बाह्य क्रियाऐं भी होती हैं। शुभोपयोग संसारका कारण है और शुद्धोपयोग मोक्षका कारण है यह इससे स्पष्ट है कि शुभोपयोगके होनेपर कर्मबन्धकी स्थिति-अनुभागमें वृद्धि हो जाती है और शुद्धोपयोगके होनेपर उसकी स्थिति-अनुभागमें हानि हो जाती है। श्री समयसारजीमें जो व्यवहारको प्रतिषिद्ध और निश्चयको प्रतिषेधक कहा है वह इसी अभिप्रायसे कहा है। यथा-

एवं ववहारणओ पडिसिद्धो जाण णिच्छयणएण।
णिच्छयणयासिदा पुण मुणिणो पावंति णिव्वाणं ॥२७२॥

अर्थ-इस प्रकार व्यवहारनय निश्चयके द्वारा निषिद्ध जानो। परन्तु निश्चयनयका आश्रय लेनेवाले मुनि निर्वाणको प्राप्त होते है ॥२७२॥

अतएव जो मोक्षमार्गपर आरूढ़ होना चाहता है उसे मुख्यतासे स्वभावका आश्रय लेनेका ही उपदेश होना चाहिए, क्योंकि वह आत्माका कभी भी न छूटनेवाला स्वभावधर्म है तथा आत्मामें जो विशुद्धि उत्पन्न होती है वह स्वभावके आश्रय लेनेसे ही होती है, व्यवहारका आश्रय लेनेसे नहीं। प्रत्युत स्थिति यह है कि ज्यों ही साधक आत्मा स्वभावके स्थानमें शुभ और तदनुरूप क्रियाओंको निश्चयसे उपादेय मानकर उससे मोक्षप्राप्ति होती है ऐसी श्रद्धा करता है त्यों हो वह सम्यक्त्वरूपी रत्नपर्वतसे च्युत हो जाता है। व्यवहार धर्म गुणस्थान परिपाटीसे होकर भी उत्तरोत्तर गुणस्थानोंमें छूटता जाता है और स्वभावके आश्रयसे उत्पन्न हुई विशुद्धि उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होती हुई अन्तमें पूर्णताको प्राप्त हो जाती है, इसलिये जो छूटने योग्य है उसका मुख्यतासे उपदेश देना न्याय्य न होकर स्वभावका आश्रय लेकर मुख्यतासे उपदेश देना ही जिनमार्ग है ऐसा यहाँ समझना चाहिये।

प्रतिशंका २ में अनेकान्तकी पुष्टिके प्रसंगसे ‘निरपेक्षाः नयाः मिथ्या’ यह वचन उद्धृत किया गया है पर यह वचन वस्तुसिद्धिके प्रसंगमें आया है और प्रकृतमें मोक्षमार्गकी प्रसिद्धि की जा रही है। अतएव प्रकृतमें उसका उपयोग करना इष्ट नहीं है, यहाँ गुण-पर्यायात्मक वस्तुका निषेध नहीं किया जा रहा है। यहाँ तो यह बतलाना मात्र प्रयोजन है कि अपनी दृष्टिमें किसे मुख्यकर यह संसारी जीव मोक्षमार्गका अधिकारी बन सकता है। अतएव यह उपदेश दिया जाता है कि पर्याय बुद्धि तो तू अनादि कालसे बनाए चला आ रहा है; एक बार पुण्य-पापके, निमित्तके और गुण-पर्यायके विकल्पको छोड़कर स्वभावका आश्रय लेनेका प्रयत्न तो कर। अब विचार करके देखो कि ऐसे उपदेशमें एकान्त कहाँ हुआ। क्या इसमें पुण्य-पापके सद्भावको या गुण-पर्यायके सद्भावको अस्वीकार किया गया है या उनका विकल्प दूर करानेका प्रयत्न है। इसी कारण आचार्य कुन्दकुन्द समयसारमें विद्वानोंको शिक्षा देते हुए कहते हैं-

मोत्तूण णिच्छयट्ठं ववहारेण विदुसा पवट्टंति । परमट्ठमस्सिदाण दु जदीण कम्मक्खओ विहिओ ॥१५६॥

अर्थ-विद्वान् लोग निश्चयनयके विषयको छोड़कर व्यवहारके द्वारा प्रवृत्ति करते हैं, परन्तु परमार्थ-का आश्रय करनेवाले मुनियोंके ही कर्मोंका क्षय आगममें कहा गया है ।

अतएव उक्त प्रकारके भयको छोड़कर सम्यक्त्वरत्नकी प्राप्तिके अभिप्रायसे श्री समयसारजी आदि परमागमका आश्रय लेकर जो उपदेश दिया जाता है उसका विपर्यास न करके आशयको समझनेका विद्वद्वर्ग उपक्रम करेगा ऐसा विश्वास है ।

प्रतिशंका २ में वर्तमानको ध्यानमें रखकर और भी अनेक अप्रासंगिक अभिप्राय व्यक्त किये गये हैं जो केवल भ्रमपर आधारित हैं, सो इस सम्बन्धमें इतना ही निवेदन करना पर्याप्त है कि एक साधर्मी भाईका गलत धारणाके आधारपर ऐसे भ्रमपूर्ण विचार बनाना यह मोक्षमार्ग तो है ही नहीं, पुण्यार्जनका भी मार्ग नहीं है ।

यद्यपि प्रतिशंकारूपसे यह लेख विशिष्ट अभिप्रायसे लिखा गया है तथापि उसके स्थानमें जिनागमके अनुसार निश्चय-व्यवहार मोक्षमार्गकी पद्धति क्या है मात्र इतना विचारकर इस लेखद्वारा समाधान करनेका प्रयत्न किया गया है ।

यह सुनिश्चित सत्य है कि जो जीवनमें व्यवहारको गौण कर निश्चयसे शुद्ध स्वरूप स्वभावका आश्रय लेगा उसीको भेदाभेदरूप व्यवहार-निश्चय रत्नत्रयकी प्राप्ति होगी और वही अन्तमें मोक्षका भागी होगा । इसीलिये स्वभावका आश्रय लेना उपादेय है ऐसा यहाँ निष्कर्षरूपमें समझना चाहिये । इसी भावको व्यक्त करते हुए भगवान् कुन्दकुन्द समयप्राभृतमें कहते हैं-

सुद्धं तु वियाणंतो सुद्धं चेवप्पयं लहइ जीवो ।
जाणंतो दु असुद्धं असुद्धमेवप्पयं लहइ ॥१८६॥

अर्थ-शुद्ध आत्माका अनुभव करता हुआ जीव शुद्ध आत्माको ही प्राप्त करता है और अशुद्ध आत्माको अनुभव करता हुआ जीव अशुद्ध आत्माको ही प्राप्त करता है ॥१८६॥

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शंका १६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७३२ से ७५३

↑ सूची


तृतीय दौर

: ३ :

शंका १६

निश्चय और व्यवहारनय का स्वरूप क्या है ? व्यवहारनयका विषय असत्य है क्या ? असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप है ?

प्रतिशंका ३

इस प्रश्नमें निम्न विषय चर्चनीय हैं-

(क) निश्चयनयका स्वरूप क्या है ?

(ख) व्यवहारनयका स्वरूप क्या है ?

(ग) व्यवहारनयका विषय असत्य है क्या ?

(घ) व्यवहारनयका विषय यदि असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप है ?

आपके प्रथम व द्वितीय उत्तरमें (ग) व (घ) खण्डके विषयमें तो कुछ भी नहीं लिखा गया । निश्चय नय व व्यवहारनयका स्वरूप भी स्पष्ट नहीं लिखा । अप्रासंगिक बातोंको तथा जिसमें आर्षग्रन्थविरुद्ध भी कथन है ऐसी पुस्तकके वाक्योंको लिखकर व्यर्थ कलेवर बढ़ा दिया गया है । यदि ऐसा न किया जाता तो सुन्दर होता ।

'प्रत्येक वस्तु अनेकान्तात्मक हैं’ पद दो शब्दोंसे बना है-(१) अनेक (२) अन्त । ‘अनेक’ का अर्थ है ‘एकसे अधिक’ और ‘अन्त’ का अर्थ ‘धर्म’ है । इस प्रकार ‘अनेकान्तात्मक वस्तु’ का अर्थ ‘अनेक धर्मवाली वस्तु’ यह हो जाता है । परन्तु वे अनेक धर्म अर्थात् दो धर्म परस्पर विरुद्ध होने चाहिये । श्री अमृतचन्द्र आचार्यने समयसार स्याद्वादाधिकारमें कहा है-

परस्परविरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनमनेकान्तः ।

परस्पर विरुद्ध दो शक्तियोंका प्रकाशन अनेकान्त है । यह अनेकान्त परमागमका प्राण है तथा सिद्धान्तपद्धतिका जीवन है । इसी बातको श्री अमृतचन्द्राचार्य स्पष्ट करते हैं-

परमागमस्य जीवं निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् ।
सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥२॥
-पुरु० सि०

अर्थ-जन्मान्ध पुरुषोंके हस्तिविधानको दूर करनेवाले, समस्त नयोंसे प्रकाशित विरोधको मथन करनेवाले और परमागमके जीवनभूत अनेकान्तको नमस्कार करता हूँ ।

दुर्निवारनयानीकविरोधध्वंसनौषधिः ।
स्यात्कारजीविता जीयाज्जैनी सिद्धान्तपद्धतिः ॥२॥
-पंचास्तिकाय टीका मंगलाचरण

अर्थ-स्यात्कार जिसका जीवन है ऐसी जिनभगवान्‌की सिद्धान्तपद्धति, जो कि दुर्निवार नयके समूहके विरोधका नाश करनेवाली है, जयवन्त हो ।

एक वस्तुमें विवक्षाभेदसे दो प्रतिपक्ष धर्म पाये जाते हैं, अतः उन दोनों धर्मोंमेंसे प्रत्येक धर्मकी विवक्षाको ग्रहण करनेवाला पृथक्-पृथक् एक-एक नय है, जिनका विषय परस्पर विरुद्ध है । कहा भी है-

लोयाणं ववहारे धम्म-विवक्खाइ जो पसाहेदि ।
सुयणाणस्स वियप्पो सो वि णओ लिंगसंभूदो ॥२६३॥
-स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा

अर्थ-जो वस्तुके एक धर्मकी मुख्यतासे लोक व्यवहारको साधता है वह नय है । नय श्रुतज्ञानका भेद है तथा लिंगसे उत्पन्न होता है ।

णाणाधम्मजुदं पि य एयं धम्मं पि वुच्चदे अत्थं ।
तस्सेय विवक्खादो णत्थि विवक्खा हु सेसाणं ॥२६४॥
-स्वामी कार्तिकेय

अर्थ-यद्यपि पदार्थ नाना धर्मोंसे युक्त है तथापि नय एक धर्मको कहता है, क्योंकि उस समय उस धर्मकी विवक्षा है, शेष धर्मोंकी विवक्षा नहीं है। अथवा नयका लक्षण विकलादेश है। कोई भी एक नय वस्तुके पूर्ण स्वरूपको नहीं कह सकता। नय तो एकधर्ममुखेन वस्तुका कथन करता है। अत वस्तुःस्वरूप उतना ही नहीं है जितना कि निश्चयनय या व्यवहारनय कथन करता है। वस्तुस्वरूप तो दोनों नयोंके कथन मिलानेपर पूर्ण होता है।

प्रतिपक्षी दो धर्मोंको विवक्षा भेदसे ग्रहण करनेवाले दो मूल नय हैं जिनको द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नय कहते हैं। पंचास्तिकायकी गाथा चारकी टीकामें श्री अमृतचन्द्रसूरिने भी लिखा है-'भगवानने दो नय कहे हैं-द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक। भगवान्का उपदेश एक नय अधीन नहीं है, किन्तु दोनों नयोंके अधीन होता है। द्रव्यार्थिकनय निश्चयनय है और पर्यायार्थिकनय व्यवहारनय है, क्योंकि समयसार गाथा ५६ को टीकामें ‘द्रव्याश्रित निश्चयनय और पर्यायाश्रित व्यवहारनय’ कहा है। दोनों नयोंका विषय परस्पर प्रतिपक्षी है इस बातको श्री कुंदकुंद भगवान् भी समयसारमें कहते हैं-

जीवे कम्मं बद्धं पुट्ठं चेदि ववहारणयभणिदं।
सुद्धणयस्स दु जीवे अबद्धपुट्ठं हवइ कम्मं ॥१४१॥

अर्थ-जीवमें कर्म बद्ध है तथा स्पर्शता है ऐसा व्यवहारनयका वचन है। जीवमें कर्म न बँधता है और न स्पर्शता है ऐसा निश्चयनयका वचन है।

इसी बातको श्री अमृतचन्द्र सूरि कलश ७० से ८९ तक २० कलशों द्वारा दो परस्पर प्रतिपक्ष धर्मोंको कहकर यह कहते हैं कि एक नयका विषय एक धर्म है और दूसरे नयका विषय दूसरा धर्म है। उन कलशोंमें कथन किये गये प्रतिपक्ष धर्म इस प्रकार हैं-(१) बद्ध-अबद्ध (२) मूढ-अमूढ (३) रागी-अरागी (४) द्वेषी-अद्वेषी (५) कर्ता-अकर्ता (६) भोक्ता-अभोक्ता (७) जीव-जीव नहीं (८) सूक्ष्म-सूक्ष्म नहीं (९) हेतु-हेतु नहीं (१०) कार्य-कार्य नहीं (११) भाव-अभाव (१२) एक-अनेक (१३) शान्त-अशान्त (१४) नित्य-अनित्य (१५) वाच्य-अवाच्य (१६) नाना-अनाना (१७) चेत्य-अचेत्य (१८) दृश्य-अदृश्य (१९) वेद्य-अवेद्य (२०) भात-अभात। अर्थात् ‘जीव बद्ध है’ यह व्यवहार नय (पर्यायार्थिक नय) का पक्ष है। ‘जीव अबद्ध है’ यह निश्चय नयका पक्ष है। इसी प्रकार अन्य विकल्पोंके विषयमें भी जानना चाहिये।

जब दोनों नयोंमेंसे प्रत्येक नयका विषय, वस्तुके दोनों परस्पर प्रतिपक्ष धर्मोंमेंसे, एक-एक धर्म है तो उन दोनों नयोंमें किसी एक नयको यथार्थ और दूसरेको अयथार्थ कहना कैसे सम्भव हो सकता है, क्योंकि जो नय परपक्षका निराकरण नहीं करते हुए ही अपने पक्षके अस्तित्वका निश्चय करनेमें व्यापार करते हैं उनमें समीचीनता पाई जाती है। कहा भी है-

णिययवयणिज्जसच्चा सव्वणया परवियालणे मोहा।
ते उण ण दिट्ठसमओ विभयइ सच्चे व अलिए वा ॥१।२२८॥
-सन्मतितर्क

अर्थ-ये सभी नय अपने-अपने विषयके कथन करनेमें समीचीन हैं और दूसरे नयोंके निराकरण करनेमें मूढ़ हैं। अनेकान्तरूप समयके ज्ञाता पुरुष ( सम्यग्दृष्टि ) यह नय सच्चा है और यह नय झूठा है इस प्रकारका विभाग नहीं करते। अर्थात्-दोनों नयोंके विषय दोनों धर्म एक वस्तुके होनेसे दोनों ही नय अपनी-अपनी विवक्षासे सत्य हैं।

अनेकान्तरूप समयके ज्ञाता अर्थात् सम्यग्दृष्टि नयोंके विषयोंको जानते तो हैं, किन्तु किसी नयपक्षको ग्रहण नहीं करते । श्री कुन्दकुन्द भगवान्‌ने समयसारमें कहा भी है-

दोण्ण वि णयाण भणियं जाणइ णवरि तु समयपडिबद्धो ।
ण दु णयपक्खं गिण्हदि किंचि वि णयपक्खपरिहीणो ॥१४३॥

अर्थ-जो पुरुष आत्मासे प्रतिबद्ध है अर्थात् आत्माको जानता है वह दोनों ही नयोंके कथनको केवल जानता है परन्तु नयपक्षको कुछ भी ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वह नयोंके पक्षसे रहित है । अर्थात् किसी एक नयका पक्ष ( आग्रह ) नहीं करना चाहिये ।

इससे इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि यदि कोई निश्चयनयके एकान्तका पक्ष ग्रहण करके व्यवहार नयको सर्वथा झूठ कहता है तो वह आगमविरुद्ध है । श्री वीरसेन स्वामी जयधवल पु० १ पृ० ८ में निम्न प्रकार कहते हैं-

ण च ववहारणओ चप्पलओ, तत्तो (ववहाराणुसारि) सिस्साण पउत्तिदंसणादो । जो बहुजीवाणुग्गहकारी ववहारणओ सो चेव समस्सिदव्वो त्ति मणेणावहारिय गोदमथेरेण मंगलं तत्थ कयं ।

अर्थ-यदि कहा जाय कि व्यवहारनय असत्य है सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उससे व्यवहारका अनुसरण करनेवाले शिष्योंकी प्रवृत्ति देखी जाती है । अतः जो व्यवहार नय बहुत जीवोंका अनुग्रह करनेवाला है उसीका आश्रय करना चाहिये ऐसा मनमें निश्चय करके श्री गौतम स्थविरने चौबीस अनुयोगद्वारोंके आदिमें मंगल किया है ।

व्यवहारनयसे वस्तुस्वरूपका ज्ञान होता है, अतएव वह व्यवहारनय पूज्य है । इसी बातको श्री पद्मनन्दि आचार्य कहते हैं-

मुख्योपचारविवृत्तिं व्यवहारोपायतो यतः सन्तः ।
ज्ञात्वा श्रयन्ति शुद्धं तत्त्वमिति व्यवहृतिः पूज्या ॥११॥
-पद्मनन्दिपंचविंशति

अर्थ-चूँकि सज्जन मनुष्य व्यवहारनयके आश्रयसे ही मुख्य और उपचारभूत कथनको जानकर शुद्ध स्वरूपका आश्रय लेते हैं, अतएव वह व्यवहार पूज्य है ।

व्यवहारनयका विषय पर्याय है । पर्यायोंका समूह द्रव्य है अथवा गुण और पर्यायवाला द्रव्य है ‘गुणपर्ययवत् द्रव्यम् ।’ ( त० सू०, अ० ५, सूत्र ३८ ) इससे स्पष्ट है कि जिस समय तक पर्यायका भी यथार्थ श्रद्धान नहीं होगा उस समय तक द्रव्यका भी यथार्थ श्रद्धान नहीं हो सकता है । द्रव्यके आगम अनुकूल श्रद्धान करनेसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है और सम्यग्दर्शनविनय होती है ।

जे अत्थपज्जया खलु उवदिट्ठा जिणवरेहिं सुदणाणे ।
ते तह रोचेदि णरो दंसणविणओ हवदि एसो ॥१८९॥
-मूलाचार अ० ५

अर्थ-जो अर्थपर्याय जिनवरने आगममें कहीं हैं उनको उसी प्रकारसे रुचि करनेवाले पुरुषके दर्शन-विनय होती है । अर्थात् ( व्यवहारनयके विषयभूत ) उन पर्यायोंके यथार्थ स्वरूपपर भव्य जीव जिस परिणामसे श्रद्धा करता है उस परिणामको दर्शनविनय ( सम्यग्दर्शन ) कहते हैं ।

जो व्यवहारनयके बिना मात्र निश्चयके आश्रयसे मोक्ष चाहते हैं वे मूढ़ हैं, क्योंकि बीज विना वृक्षफल भोगना चाहते हैं अथवा वे आलसी हैं ।

व्यवहारपराचीनो निश्चयं यश्चिकीर्षति ।
बीजादिना विना मूढः स सस्यानि सिसृक्षति ॥
-प्राचीन श्लोक

सारांश-जो व्यवहारसे रहित होता हुआ निश्चयको उत्पन्न करनेकी इच्छा करता है वह मूढ है, जैसे जो बीज आदि ( क्षेत्र, खेत, जल आदि )के विना धान्य या वृक्ष आदिके फल उत्पन्न करना चाहता है वह मूढ़ है ।

निश्चयमबुध्यमानो यो निश्चयतस्तमेव संश्रयते ।
नाशयति करण-चरणं स बहिःकरणालसो बालः ॥५०॥
-पुरुषार्थसिद्ध्युपाय

अर्थ-जो निश्चय ( व्यवहारसापेक्ष निश्चय ) को तो जानता नहीं और ( एकान्त ) निश्चयको ग्रहण करता है वह बाल है अर्थात् मूढ़ है । बाह्य चरण-करणमें आलसी होकर करण-चरणको नाश करता है ।

जिस प्रकार निश्चयनयकी अपेक्षा व्यवहारनयको अभूतार्थ कहा है उसी प्रकार व्यवहारनयकी अपेक्षा निश्चयनयको अभूतार्थ कहा है ।

दव्वट्ठियवत्तव्वं अवत्थु णियमेण पज्जवणयस्स ।
तह पज्जववत्थु अवत्थुमेव दव्वट्ठियणयस्स ॥१०॥
-सन्मतितर्क

अर्थ-पर्यायार्थिक (व्यवहार) नयकी अपेक्षा द्रव्यार्थिक (निश्चय) नयके द्वारा कहा जानेवाला विषय अवस्तु है, उसी प्रकार द्रव्यार्थिक (निश्चय) नयकी अपेक्षा पर्यायार्थिक (व्यवहार) नयके द्वारा कहा जानेवाला विषय अवस्तु है ।

कुछका ऐसा विश्वास है कि मात्र निश्चयनय ही आत्मानुभूतिका कारण है, उनका ऐसा विचार उचित नहीं है, क्योंकि व्यवहारनिरपेक्ष निश्चयनय एकान्त मिथ्यात्व है । अथवा निश्चयनयका पक्ष भी तो एक विकल्प है और विकल्प अवस्थामें स्वानुभूति नहीं हो सकती । इसी बातको श्री पं० फूलचन्द्रजीने स्वयं इन शब्दोंमें स्वीकार किया है-

यद्यपि निश्चयनय द्रव्य है, गुण है इत्यादि विकल्पोंका निषेध करता है, इसलिये उसे परमार्थ सत् बतलाया है, किन्तु स्वानुभूतिमें ‘न तथा’ यह विकल्प भी नहीं होता । अतः निश्चयनय आत्मानुभूतिका कारण नहीं है ऐसा समझना चाहिये ।
–पंचाध्यायी पृ० १२७ विशेषार्थ (वर्णी ग्रन्थमालासे प्रकाशित)

इससे यह सिद्ध हो जाता है कि मात्र निश्चयनयके आश्रयसे भी मोक्षप्राप्ति नहीं हो सकती ।

निश्चयनय और व्यवहारनयका विषय परस्पर प्रतिपक्ष सहित है, अतः इनका लक्षण भी एक दूसरेके विरुद्ध होना चाहिए । इसीको दृष्टिमें रखते हुए इनके लक्षण आर्षग्रन्थोंमें इसी प्रकार कहे गये हैं । श्री देवसेन आचार्य लिखते हैं-

पुनरप्यध्यात्मभाषया नया उच्यन्ते। तावन्मूलनयौ द्वौ निश्चयो व्यवहारश्च। तत्र निश्चयनयोऽभेदविषयो व्यवहारो भेदविषयः।-आलापपद्धति

अर्थ-अध्यात्मभाषाकी अपेक्षा नय कहते हैं। मूल नय दो हैं-निश्चयनय और व्यवहारनय। उनमेंसे अभेद विषयवाला निश्चयनय है। और भेद विषयवाला व्यवहारनय है।

व्यवहार, विकल्प, भेद, पर्याय इनका एक ही अर्थ है अर्थात् ये पर्यायवाचक शब्द हैं। इसी बातको श्री नेमचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीने गो० जो० गाथा ४६२ में कहा है-

ववहारो य वियप्पो भेदो तह पज्जओ ति एयट्ठो।

अर्थात्-व्यवहार, विकल्प, भेद तथा पर्याय इन शब्दोंका एक अर्थ है।

इससे इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ पर विकल्प, भेद तथा पर्याय विवक्षासे कथन हो वह सब व्यवहारनय कथन है। इसके विपरीत जहाँ निर्विकल्प अभेद तथा द्रव्य विवक्षासे कथन हो वह निश्चयनयका कथन है।

श्री समयसार ग्रन्थमें भी व्यवहारनयको भेदाश्रित पर्यायाश्रित तथा पराश्रित कहा है और निश्चयनयको अभेदाश्रित, द्रव्याश्रित और स्वाश्रित कहा है-

ववहारेणुवदिस्सइ णाणिस्स चरित्त दंसणं णाणं।
ण वि णाणं ण चरित्तं ण दंसणं जाणगो सुद्धो॥ ७॥

अर्थ-ज्ञानीके चारित्र, दर्शन, ज्ञान ये तीन भाव व्यवहारनय द्वारा कहे जाते हैं। निश्चयनयसे ज्ञान भी नहीं, चारित्र भी नहीं, दर्शन भी नहीं। ज्ञानी तो एक ज्ञायक अभेदस्वरूप है।

यद्यपि ज्ञान, दर्शन, चारित्रको भेद विवक्षाके कारण व्यवहारनयके द्वारा जीवके कहे हैं तथापि ये सत्यार्थ हैं वास्तविक हैं।

‘व्यवहारनयः पर्यायाश्रितत्वात्’ ‘निश्चयनयस्तु द्रव्याश्रितत्वात्।’
-समयसार गाथा ५६ टीका

अर्थात्-व्यवहारनय पर्यायाश्रित और निश्चयनय द्रव्याश्रित है।

जीवकी शुद्ध तथा अशुद्ध दशा वास्तविक है, सत्यार्थ है तथापि जीवके पर्याय होनेके कारण व्यवहारनयका विषय कहा गया है। निश्चयनयका विषय त्रैकालिक द्रव्यस्वभाव है और इस दृष्टिमें कादाचित्क पर्याय अवस्तु है।

आत्माश्रितो निश्चयनयः पराश्रितो व्यवहारनयः।
-समयसार गा० २७२ की टीका

अर्थ-निश्चयनय स्वके आश्रित है और व्यवहारनय परके आश्रित है।

यद्यपि ज्ञेय-ज्ञायकसम्बन्ध, आधार-आधेयसम्बन्ध, निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध, प्रकाश्य-प्रकाशक आदि सम्बन्ध पराश्रित होनेसे व्यवहारनयका विषय है तथापि ये सर्व सम्बन्ध प्रत्यक्ष तथा वास्तविक हैं।

इस प्रकार आध्यात्मिक दृष्टिसे निश्चय व व्यवहारनयके लक्षणोंपर प्रकाश डाला गया और यह भी सिद्ध कर दिया गया है कि व्यवहारनय सत्य है। यहाँतक मूल प्रश्न समाप्त हो गया।

आपके वक्तव्योंमें सर्वत्र पुनः पुनः इसी बातपर जोर दिया गया कि अमुक कथन मात्र व्यवहारनयसे है, निश्चयनयसे नहीं है। व्यवहारनयके पूर्व ‘मात्र’ शब्द लगाया गया है और कहीं कहींपर व्यवहारनयके आगे कोष्टकमें ‘उपचरित’ शब्द भी दिया गया है। इस सर्वसे यही प्रगट किया जाता है कि एकमात्र निश्चयनय ही सर्वथा तथा एकान्त सत्य है, प्रामाणिक एवं मान्य है। तथा व्यवहारनय सर्वथा असत्य, अप्रामाणिक और अमान्य है। यह निर्विवाद सिद्धान्त है कि ऐसी मान्यता ही निश्चय एकान्तरूप मिथ्यात्व अथवा निश्चयाभास है। व्यवहारसे निरपेक्ष निश्चयनय मिथ्या है। पर सापेक्ष नय सुनय है। भगवान्‌का उपदेश ही दो नयके आधीन है। यदि व्यवहारनयका कथन असत्य है तो यह प्रश्न होता है कि क्या सर्वज्ञने व्यवहार सम्यक्त्व व व्यवहारमोक्षमार्गका असत्य उपदेश देकर जीवोंका अकल्याण करना चाहा है।

प्रत्येक द्रव्य उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यमयी है। निश्चयकी अपेक्षा द्रव्य ध्रुव ही है। उत्पाद-व्ययस्वरूप नहीं है। व्यवहारकी अपेक्षा ‘उत्पाद-व्ययस्वरूप’ ही है, ध्रुव नहीं है। यदि निश्चयनय ही सत्य व प्रामाणिक है और व्यवहारनय असत्य व अप्रामाणिक है, तो मात्र ध्रुव ही सत्य व प्रामाणिक रह जायगा और उत्पाद-व्यय असत्य व अप्रामाणिक हो जायेंगे। परन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि ध्रुवता अप्रणाशी और कूटस्थ है जिसके कारण द्रव्य भी अप्रणाशी व कूटस्थ हो जायगा। कूटस्थ हो जानेसे द्रव्य अर्थक्रियाकारी नहीं रहेगा। इसलिये वह खरविषाणवत् असत् हो जायगा। निश्चयनयके एकान्तसे द्रव्यकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती है, क्योंकि सत्‌का लक्षण उत्पाद-व्यय-ध्रुव कहा गया है।

जैन आगममें द्रव्यस्वभाव परिणामी बतलाया गया है। उत्पाद व्ययके विना परिणमन नहीं हो सकता है। इस प्रकार जैन आगममें ध्रुवताके समान उत्पाद-व्ययको भी सत्य माना है, अन्यथा सांख्यमतका प्रसंग आजायेगा। अतः मात्र निश्चयनयके कथनको ही सत्य व प्रामाणिक स्वीकार करना और व्यवहारनयके कथनको ‘मात्र व्यवहारसे’ या ‘उपचरितसे’ आदि शब्द कहकर स्वीकार न करना जैन आगमके विरूद्ध है। अन्य मतावलम्बियोंका कथन भी किसी-न-किसी एक नयकी अपेक्षा सत्य होनेपर भी प्रतिपक्षी नयसे निरपेक्ष तथा सर्वथा वैसा ही माना जानेसे मिथ्या है।

श्री अमृतचन्द्र आचार्यने समयसार गाथा ५६ की टीकामें निश्चयनयको द्रव्याश्रित और व्यवहारनयको पर्यायाश्रित कहा है। बन्ध व मोक्ष पर्याय हैं। निश्चयनयकी अपेक्षासे न बन्ध है और न मोक्ष है। यदि निश्चयनयसे बन्ध माना जाये तो सदा बन्ध ही रहेगा, कभी मोक्ष नहीं हो सकेगा। यदि निश्चयनयसे मोक्ष ही माना जाये तो वह भी घटित नहीं हो सकता है, क्योंकि मोक्ष ( मुक्त होना-छूटना ) बन्धपूर्वक ही होता है। बंधा ही नहीं, उसके लिये छूटना कैसे कहा जा सकता है। मोक्ष ‘मुञ्च’ धातुसे बना है, जिसका अर्थ ‘छूटना’ है। -बृ० द्र० सं० टीका।

जब निश्चयनय ( जिसको ही सत्य व प्रामाणिक कहा जा रहा है ) से बन्ध व मोक्ष ही नहीं है, तब जिनशासनमें जो मोक्षमार्गका उपदेश दिया गया है, वह सब व्यर्थ हो जायगा। दूसरे प्रत्यक्षसे विरोध आ जायगा, क्योंकि संसार प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है। अतः यह ही सिद्धान्त सम्यक् है कि निश्चयनय अर्थात् स्वभावकी अपेक्षा न बन्ध है और न मोक्ष है, किन्तु व्यवहारनय (पर्याय) की अपेक्षा बन्ध भी है और मोक्ष भी है। ये दोनों ही कथन सत्य व प्रामाणिक हैं। ऐसा नहीं, कोई नयका कथन सत्य व प्रामाणिक हो और प्रतिपक्षी नयका कथन असत्य व अप्रामाणिक हो।

प्रत्येक नयका विषय अपनी दृष्टिसे सत्य है, किन्तु व्यवहारनयकी अपेक्षा सत्य नहीं है, क्योंकि दोनोंके विषय परस्पर विरोधी हैं।

जो एक नयका विषय है वही विषय दूसरे नयका नहीं हो सकता। यदि ऐसा हो जाय तो दोनों नयोंमें कोई अन्तर ही नहीं रहेगा। दोनोंमें अन्तर नहीं रहनेसे नयोंका विभाजन व्यर्थ हो जावगा तथा सुव्यवस्था नहीं रहेगी। सर्व विप्लव हो जायेगा। जो व्यवहारनयका विषय है उसका कथन व्यवहारनयसे ही हो सकता है, निश्चयनयसे वह कथन नहीं हो सकता। अतः आर्ष प्रमाणोंको यह कहकर टाल देना कि ‘विवक्षित कथन व्यवहारनयसे है, निश्चयनयसे नहीं’ आगमसंगत नहीं है, क्योंकि जो व्यवहारका विषय है उसका निश्चयनयसे भी कथन होनेका प्रश्न नहीं हो सकता है।

निश्चयनयके एकान्तका कदाग्रह होनेसे तथा व्यवहारनयको असत्यार्थ माननेसे जो दुष्परिणाम होंगे उनमेंसे कुछ सूरिजीने श्री समयसार गा० ४६ की टीकामें स्पष्ट किये हैं-

तमन्तरेण ( व्यवहारमन्तरेण ) तु शरीराज्जीवस्य परमार्थतो भेददर्शनात् त्रसस्थावराणां भस्मन इव निशंकमुपमर्दनेन हिंसाभावाद् भवत्येव बंधस्याभावः। तथा रक्तद्विष्टविमूढो जीवो वध्यमानो मोचनीय इति रागद्वेषमोहेभ्यो जीवस्य परमार्थतो भेददर्शनेन मोक्षोपायपरिग्रहणाभावात् भवत्येव मोक्षस्याभावः।

अर्थ-यदि व्यवहारनयका कथन न किया जाय तो निश्चयनयसे शरीरसे जीवको भिन्न बताया जाने पर जैसे भस्मको मसल देनेसे हिंसाका अभाव है, उसी प्रकार त्रसस्थावर जीवोंको निशंकतया मसल देनेमें भी हिंसाका अभाव ठहरेगा और इस कारण बन्धका ही अभाव सिद्ध होगा। तथा परमार्थ द्वारा जीव राग, द्वेष और मोहसे भिन्न बताया जानेपर, ‘रागी, द्वेषी, मोही जीव कर्मोंसे बँधता है, उसे छुड़ाना है’ इस प्रकार मोक्षके उपायके ग्रहणका अभाव हो जायगा और इससे मोक्षका ही अभाव हो जायगा।

आपके द्वितीय वक्तव्यमें निम्न वाक्योंको पढ़कर बहुत आश्चर्य हुआ। यद्यपि यह कथन प्रसंगसे बाहर है और कोई प्रमाण भी नहीं दिया गया है, तथापि मिथ्या मान्यताको दूर करनेके लिये आपके निम्न वाक्योंपर आर्षप्रमाणसहित विचार किया जाता है।

(अ) आपके द्वारा हमारे इन वाक्योंपर आपत्ति उठाई गई है-‘इस जीवको कर्म परवश बनाये हुए हैं, उसीके कारण यह परतन्त्र हो रहा है।’ यह वाक्य श्री विद्यानन्द स्वामीके शब्दोंका अनुवादमात्र है। श्री विद्यानन्द आचार्य निर्ग्रन्थ, सत्य महाव्रतधारी तथा राग-द्वेषसे रहित थे, साथ-साथ वे महान् विद्वान् भी थे, जिन्होंने अष्टसहस्री आदि महान् ग्रन्थों की रचना की है। अष्टसहस्रीके विषयमें उसीके प्रथम पृष्ठपर निम्न श्लोक है-

श्रोतव्याष्टसहस्री श्रुतैः किमन्यैः सहस्रसंख्यानैः।
विज्ञायेत ययैव स्वसमयपरसमयसद्भावः॥

अर्थ-वह अष्टसहस्री सुनना चाहिये, अन्य हजारों ग्रन्थोंके सुननेसे क्या? कि जिसके सुननेसे स्वसमय और परसमयका सत्य स्वरूप जाना जाता है।

उन्हीं निर्ग्रन्थ महानाचार्य विद्यानन्दस्वामीके मूल वाक्य पुनः उपस्थित किये जाते हैं, जिनके वाक्योंपर दिगम्बर जैनमात्रको श्रद्धा होनी चाहियेः-

जीवं परतंत्रोकुर्वन्ति स परतंत्रीक्रियते वा यैस्तानि कर्माणि, जीवेन वा मिथ्यादर्शनादिपरिणामैः क्रियन्ते इति कर्माणि। तानि द्विप्रकाराणि-द्रव्यकर्माणि भावकर्माणि च। तत्र द्रव्यकर्माणि ज्ञानावरणादीन्यष्टौ मूलप्रकृतिभेदात्। तथाष्टचत्वारिंशदुत्तरशतम्, उत्तरप्रकृतिविकल्पात्। तथोत्तरोत्तरप्रकृतिभेदादनेकप्रकाराणि। तानि च पुद्गलपरिणामात्मकानि, जीवस्य पारतंत्र्यनिमित्तत्वात्, निगडादिवत्। क्रोधादिभि-
व्यंभिचार इति चेत्, न, तेषां जीवपरिणामानां पारतंत्र्यस्वरूपत्वात्। पारतंत्र्यं हि जीवस्य क्रोधादि-परिणामो न पुनः पारतंत्र्यनिमित्तम्।-आप्तपरीक्षा कारिका ११४-११५ टीका

अर्थ-जो जीवको परतंत्र करते हैं अथवा जीव जिनके द्वारा परतंत्र किया जाता है उन्हें कर्म कहते हैं। अथवा जीवके द्वारा मिथ्यादर्शनादि पणिामोंसे जो किये जाते हैं-उपार्जित होते हैं वे कर्म हैं। वे दो प्रकारके हैं-१. द्रव्यकर्म और २. भावकर्म। उनमें द्रव्यकर्म मूल प्रकृतियोंके भेदसे ज्ञानावरण आदि आठ प्रकारका है तथा उत्तर प्रकृतियोंके भेदसे एक-सौ अड़तालीस प्रकारका है तथा उत्तरोत्तर प्रकृतियोंके भेदसे अनेक प्रकारका है और वे सब पुद्गलपरिणामात्मक हैं, क्योंकि वे जीवकी परतंत्रतामें कारण हैं, जैसे निगड (वेड़ो) आदि ।

शंका-उपर्युक्त हेतु (जीवकी परतंत्रताका कारण) क्रोधादिके साथ व्यभिचारी है अर्थात् क्रोधादि परतंत्रताके कारण हैं?

समाधान-नहीं, क्योंकि क्रोधादि जीवके परिणाम हैं और इसलिये वे परतंत्रतारूप हैं-परतंत्रतामें कारण नहीं।

प्रकट है, जीवका क्रोधादि परिणाम स्वयं परतंत्रता है, परतंत्रताका कारण नहीं। अतः उक्त हेतु क्रोधादिके साथ व्यभिचारी नहीं है।

इसी प्रकार श्री अकलंकदेव भी जीवकी परतंत्रताका मूल कारण कर्मको ही मानते हैं।

तदात्मनोऽस्वतंत्रीकरणे मूलकारणं।-तत्त्वार्थवार्तिक ५-२४

इन आर्ष वाक्योंके रहते हुए एकान्तसे यह मानना कि जीव, मात्र अपने अज्ञानभावके कारण ही परतंत्र हो रहा है उचित (युक्त) प्रतीत नहीं होता।

इतना ही नहीं श्री पं० फूलचन्द्रजी स्वयं कर्मोंके कारण जीवकी परतंत्रता स्वीकार करते हैं-

जीवकी प्रति समयकी परिणति स्वतंत्र न होकर पुद्गलनिमित्तक होती है और पुद्गलकी भी परिणति स्वतंत्र न होकर जीवके परिणामानुसार विविध प्रकारके कर्मरूपसे होती है। इसीका नाम परतंत्रता है। इस तरह जीव पुद्गलके आधीन है और पुद्गल जीवके आधीन।
-विशेषार्थ पंचाध्यायी पृ० १७३ वर्णी ग्रन्थमाला

श्री पं० फूलचन्द्रजी स्वयं निम्न शब्दों द्वारा जीवकी अज्ञान अवस्थाको कर्मजनित स्वीकार करते हैं-

संसारी जीव आठ कर्मोंसे बँधा हुआ है, इससे वह अपने स्वरूपको भूला हुआ है और परस्वरूपको अपना मान रहा है।
-विशेषार्थ, पंचाध्यायी पृ० ३३८ वर्णीग्रन्थमाला

अब श्री पं० फूलचन्द्रजी स्वयं देखें कि उनके द्वितीय वक्तव्यमें और उनके द्वारा लिखे गये आगमानुकूल विशेषार्थमें पूर्वापर विरोध आ रहा है।

यदि मात्र अज्ञानभावको ही परतन्त्र करनेवाला मान लिया जावे तो चौथे गुणस्थानमें सम्यग्दर्शन होनेपर अज्ञानभावका नाश हो जानेसे १२वें गुणस्थानके शुरूमें अथवा हर प्रकारकी सम्पूर्ण अज्ञानता दूर हो जानेसे १३वें गुणस्थानके प्रथम समयमें ही जीव स्वतन्त्र हो जाना चाहिये, किन्तु ऐसा होता नहीं है, क्योंकि जिस समयतक चारों अघातिया कर्मोंका भी नाश नहीं हो जाता है उस समयतक जीव परतन्त्र ही है । इसो बातको श्री विद्यानन्द आचार्य स्पष्टरूपसे कहते हैं-

ननु च ज्ञानावरणदर्शनावरणमोहनीयान्तरायाणामेवानन्तज्ञानदर्शनसुखवीर्यलक्षणजीवस्वरूपघातित्वात्पारतंत्र्यनिमित्तत्वासिद्धेरिति पक्षाव्यापको हेतुः वनस्पतिचैतन्ये स्वापवत् इति चेत् ? न, तेषामपि जीवस्वरूपसिद्धत्वप्रतिबन्धित्वात्पारतंत्र्यनिमित्तत्वोपपत्तेः ।
-आप्तपरीक्षा पृ० २४६ वीरसेवामंदिर

अर्थ-यहाँ शंकाकार कहता है जि ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय ये चार घातिकर्म ही अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त वीर्यरूप जीवके स्वरूपघातक होनेसे परतन्त्रताके कारण हैं । नाम, गौत्र, वेदनीय और आयु ये चार अघातिकर्म नहीं, क्योंकि वे जीवके स्वरूपघातक नहीं हैं; अतः उनके परतन्त्रताकी कारणता असिद्ध है और इसीलिये हेतु पक्षाव्यापक है, जैसे वनस्पतिमें चैतन्य सिद्ध करनेके लिए प्रयुक्त किया गया स्वापहेतु ? इसका समाधान करते हुए आचार्य कहते हैं कि ऐसा नहीं है, क्योंकि नामादि अघातिकर्म भी जीवके स्वरूप-सिद्धपनेके प्रतिवन्धक हैं और इसीलिये उनके भी परतन्त्रताकी कारणता उत्पन्न है ।

इसी बातको श्री अमृतचन्द्र सूरि पंचास्तिकाय गाथा २ को टीकामें जिनवाणीको नमस्कार करते हुए कहते हैं-

पारतंत्र्यनिवृत्तिलक्षणस्य निर्वाणस्य ।

इसका तात्पर्य यह है कि निर्वाण होनेपर परतन्त्रतासे निवृत्ति होती है, उससे पूर्व नहीं ।

आपके द्वितीय वक्तव्यमें यह लिखा है-‘समयसार अध्यात्मकी मुख्यतासे प्रतिपादन करनेवाला आगमग्रन्थ है, शेष ग्रन्थ व्यवहारनयकी मुख्यतासे लिखे गये हैं ।’ इस सम्वन्धमें पंचास्तिकाय गाथा १२३ की टीका के-

एवमनया दिशा व्यवहारनयेन कर्मग्रन्थप्रतिपादितजीवगुणमार्गणास्थानादिप्रपञ्चितविचित्रविकल्परूपैः । ये वचन उद्धृत किये हैं । इस उल्लेखसे आपने वतलाया कि ‘जिन शास्त्रोंमें जीवस्थान, गुणस्थान और मार्गणास्थान आदिरूप विविध भेदोंका कथन किया गया है, जिनमें कर्मग्रन्थ मुख्य हैं, वे व्यवहारनयकी मुख्यतासे लिखे गये हैं ।’

उपर्युक्त वाक्य स्पष्टतया इस प्रकारके अन्तरंग अभिप्रायको द्योतित करता है कि समस्त जैन वांङ्मय (शास्त्रों) में एकमात्र समयसार ही अध्यात्म ग्रन्थ होनेके कारण सत्यार्थ, प्रामाणिक तथा मान्य है और अन्य समस्त ग्रन्थ (चाहे वह स्वयं श्री कुन्दकुन्द आचार्यकृत भी क्यों न हों) व्यवहारनयकी मुख्यतासे होनेके कारण असत्य, अप्रामाणिक एवं अमान्य हैं, क्योंकि आपके द्वारा व्यवहारनयको कल्पनारोपित, उपचरित या असत्य ही घोषित किया गया है । वरना इस वाक्यको लिखनेकी आवश्यकता ही न थी । श्री समयसारमें भी स्थान-स्थानपर व्यवहारका कथन है, अतः वह भी अमान्य ही होंगे । इस अपेक्षासे तो यह भी लिखा जाना चाहिये था कि श्री समयसारके भी मात्र वही अंश ग्राह्य हैं जिनमें केवल निश्चयनयसे कथन है । यह ही तो एकान्त निश्चय मिथ्यावाद है । जो व्यक्ति किसी भी नयको, किसी भी अनुयोगको या जिनवाणीके किसी भी शब्दको नहीं मानता वह सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता है ।
-मूलाराधना पृ० १३८

साधारण व्यक्ति भी इस बातको जानता है कि जो जिस नयका विषय होगा, उसका कथन उस ही नयसे हो सकता है, अन्यसे नहीं, और परसापेक्ष प्रत्येक नयका कथन (चाहे वह निश्चय हो या व्यवहार) सत्य, प्रामाणिक एवं मान्य ही है। आश्चर्य एवं महान् खेदकी बात है कि श्री समयसारके अतिरिक्त महान् ऋषि प्रणीत आर्षग्रन्थोंके प्रमाणोंकी उपर्युक्त वाक्य कहकर अवहेलना की जाती है और उनको अप्रामाणिक तथा अमान्य समझकर उनका उत्तर देनेकी भी आवश्यकता नहीं समझी जाती है। किन्तु शंकाओं या प्रतिशंकाओंका उत्तर देते हुए जहाँ अनुकूल समझा जाता है वहाँ इन्हीं व्यवहार आश्रित ग्रन्थोंका प्रमाण भी दे दिया जाता है। यह ही नहीं, बल्कि सर्व श्री विद्यानन्द, अकलंकदेव आदि महान् आचार्योंके प्रमाणोंकी अपेक्षा गृहस्थोंके द्वारा रचित भाषा-भजनोंको अधिक प्रामाणिक माना जाता है और उन भजनोंका प्रमाण देकर परम पूज्य महान् आचार्योंके आर्षग्रन्थोंका निराकरण (खण्डन) किया जाता है तथा उनके आधार पर सिद्धान्तका निर्माण किया जाता है। कैसी विचित्र परिस्थिति है ? क्या इस ही का नाम वीतराग चर्चा है ? उचित तो यही होता कि चर्चाके प्रारम्भमें ही यह स्पष्ट कर दिया जाता कि मात्र श्री समयसारके निश्चयाश्रित प्रकरण ही मान्य होंगे। अन्य समस्त ग्रन्थ व्यवहाराश्रित होनेसे मान्य न होंगे। किन्तु उपर्युक्त मान्यता ठीक नहीं है, क्योंकि सभी ऋषिप्रणीत शास्त्रोंमें प्रमाण तथा नयों द्वारा वस्तु-स्वरूपका ही प्रतिपादन किया गया है। अतः सब ही आर्षग्रन्थ प्रामाणिक एवं मान्य हैं।

धवल पु० १३ पृ० ३६ पर धवल ग्रन्थोंको शास्त्र कहा है और विशेषार्थमें श्री फूलचन्द्रने भी इस धवल ग्रन्थको अध्यात्मशास्त्र स्वीकार करते हुए लिखा है कि ‘अध्यात्म शास्त्रका अर्थ है आत्माकी विविध अवस्थाओं और उनके मुख्य निमित्तोंका प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र।’

सभी आर्षग्रन्थोंमें भगवान्‌की वाणीसे आया हुआ द्रव्य-गुण-पर्यायस्वभावका कथन है। इसीको श्री अमृतचन्द सूरिने इन शब्दों द्वारा कहा है-

इयं हि सर्वपदार्थानां द्रव्यगुणपर्यायस्वभावप्रकाशिका पारमेश्वरी व्यवस्था साधीयसी, न पुनरितरा।
–प्रवचनसार गाथा ९३ की टीका

अर्थ-यही सर्व पदार्थों के (जीव, पुद्‌गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल इन छह द्रव्योंके) द्रव्य, गुण और पर्यायोंके स्वभाव (स्वरूप) का प्रकाशन करनेवाली सर्वज्ञ भगवान्‌के द्वारा बतलाई हुई व्यवस्था समीचीन सिद्ध होती है और एकान्त नियतिवाद आदिका पोषण करनेवाली दूसरी व्यवस्था समीचीन सिद्ध नहीं हो सकती।

श्री समयसार गाथा १५३ की श्री अमृतचन्द्र सूरिकृत टीकाको उदधृत करते हुए यह अभिप्राय सिद्ध करनेकी चेष्टा की गई है कि कदाचित् व्रत, नियम, शील, तप विना भी मात्र ज्ञानसे मोक्ष हो सकती है। उक्त टीकामें शब्द ‘बहिः’ पद दे दिया जाता तो सम्भवतः यह भ्रम न होता। टीकाकारका आशय यह दिखलानेका है कि निर्विकल्प समाधिमें स्थित ज्ञानी बाह्य प्रवृत्तिरूप व्रत, नियम आदि न पालन करते हुए भी अंतरंगमें निवृत्तिरूप व्रत धारण करता हुआ मोक्ष प्राप्त करता है। श्री जयसेन आचार्यने भी यही आशय अपनी टीकामें स्पष्ट किया हैः-

निर्विकल्पत्रिगुप्तिसमाधिलक्षणभेदज्ञानसहितानां मोक्षो भवतीति विशेषेण बहुधा भणितं तिष्ठति। एवंभूतभेदज्ञानकाले शुभरूपा ये मनोवचनकायव्यापाराः परंपरया मुक्तिकारणभूतास्तेपि न संति।

अर्थ-निर्विकल्प तथा त्रिगुप्तिरूप समाधि है लक्षण जिसका ऐसे भेद-ज्ञान सहितवालोंके मोक्ष होती है-ऐसा विशेषरूपसे कहा गया है। इस प्रकारके भेदज्ञानके समय शुभरूप जो मन-वचन-कायका व्यापार है, जो परम्परासे मुक्तिके कारणभूत हैं वे भी नहीं होते हैं।

स्वर्गीय पं० श्री जयचन्दजीने भी अपने भावार्थमें सूरिजीकृत टीकाका यही आशय प्रगट किया है।

जहाँ ज्ञानको मोक्षमार्ग कहा है वहाँ ज्ञानपदमें श्रद्धान, ज्ञान, चारित्र तीनों गर्भित हैं, जैसा कि गाथा १५५ को टीकासे स्पष्ट है, अन्यथा गाथा १५५ से विरोध आजावेगा। श्री अमृतचन्दसूरि लिखते हैं-

अथ परमार्थमोक्षहेतुं तेषां दर्शयति-

परमार्थस्वरूप मोक्षका कारण दिखलाते हैं-

जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं तेसिमधिगमो णाणं।
रायादिपरिहरणं चरणं एसो दु मोक्खपहो ॥ १५५ ॥-समयसार

अर्थ-जीवादि पदार्थोंका श्रद्धान तो सम्यक्त्व है और उन जीवादि पदार्थोंका अधिगम ज्ञान तथा रागादिका त्याग चारित्र है, यही मोक्षका मार्ग है।

इस गाथासे स्पष्ट है कि श्री कुन्दकुन्द भगवानने मात्र ज्ञानको ही मोक्षका कारण नहीं कहा, किन्तु सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीनोंको मोक्षमार्ग कहा है।

एकान्तेन ज्ञानमपि न बंधनिरोधकं, एकान्तेन क्रियापि न बन्धनिरोधिका इति सिद्धं उभाभ्यां-मोक्षः। -समयसार पृ० ११८ टिप्पण, अहिंसामंदिर प्रकाशन

अर्थ-एकान्तसे ज्ञान भी बन्धका निरोधक नहीं है और एकान्तसे क्रिया भी बन्धकी निरोधक नहीं है। ज्ञान और क्रिया दोनोंसे ही मोक्ष होता है।

इसीको श्री अकलंकदेवने कहा है-

हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हता चाज्ञानिनां क्रिया।
धावन् किलान्धको दग्धः पश्यन्नपि च पङ्गुलः ॥
-राजवार्तिक १, १।

अर्थ-क्रियारहित ज्ञान व्यर्थ है और अज्ञानीको क्रिया व्यर्थ है। जंगलमें आग लग जानेपर अन्धेको मार्गका ज्ञान न होनेसे वह भागता हुआ भी जल जाता है और लंगड़ा मार्गको जानता हुआ भी न चलनेसे जल जाता है।

आपने लिखा है कि ‘काललब्धि प्राप्त होनेपर सम्यक्त्वकी प्राप्ति होती है’ यहाँ पर ‘काललब्धि’ देशामर्षक है। अतः काललब्धिसे प्रयोजन अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भाव आदिकी प्राप्ति है। कहा भी है-

कालादिलब्धियुक्तः कालद्रव्यक्षेत्रभव-भावादिसामग्रीप्राप्तः।
-स्वामीकार्तिकेयानुप्रेक्षा पृ० १५२, रायचन्द्र ग्रन्थमाला

अर्थ-कालादिलब्धियुक्तका अर्थ है-काल-द्रव्य-क्षेत्र-भव-भाव आदि सामग्रीको प्राप्त।

आपने लिखा है कि ‘अधिकसे अधिक अर्धपुद्‌गल परावर्तन प्रमाण कालके शेष रहनेपर सम्यग्दर्शनको प्राप्त कर लेता है।’ जहाँ कहीं भी ऐसा वाक्य आया हो उसका अभिप्राय यह है कि सम्यग्दर्शनके प्राप्त होनेपर अनन्त संसार काटकर अर्ध पुद्‌गल परिवर्तन काल शेष रह जाता है यह सम्यग्दर्शनकी सामार्थ्य है। जैसा कि श्री वीरसेन आचार्यने कहा भी है :-

एगो अणादियमिच्छादिट्ठी अपरित्तसंसारो अधापवत्तकरणं अपुव्वकरणं अणियट्टिकरणमिदि एदाणि तिण्णि करणाणि कादूण सम्मत्तं गहिदपढमसमए चेव सम्मत्तगुणेण पुव्विल्लो अपरित्तो संसारो ओहट्टिदूण परित्तो पोग्गलपरियट्टस्स अद्धमेत्तो होदूण उक्कसेण चिट्ठदि, जहण्णेण अंतोमुहुत्तमेत्तो ।
-धवल पु० ४ पृ० ३३५

अर्थ-एक अनादि मिथ्यादृष्टि अपरीत संसारी (दीर्घ संसारी) जीव अधःप्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इस प्रकार इन तीनों ही करणोंको करके सम्यक्त्व ग्रहणके प्रथम समयमें ही सम्यक्त्व गुणके द्वारा पूर्ववर्ती अपरीत संसारीपना हटाकर व परीतसंसारी (निकट संसारी) हो करके अधिकसे अधिक पुद्गल परिवर्तनके आधे कालप्रमाण ही संसारमें ठहरता है और कम-से-कम अन्तर्मुहूर्त मात्र काल तक संसारमें ठहरता है।

एक्केण अणादियमिच्छादिट्ठिणा तिण्णि करणाणि कादूण उवसमसम्मत्तं पडिवण्णपढमसमए अणंतो संसारो छिण्णो अद्धपोग्गलपरियट्टमेत्तो कदो ।
-धवल पु० ५, पृ० ११, १४, १५, १६, १९

अर्थ-एक अनादि मिथ्यादृष्टि जीवने अधःप्रवृत्तादि तीनों करण करके उपशम सम्यक्त्वको प्राप्त होनेके प्रथम समय अनन्त संसारको छिन्नकर अर्धपुद्गलपरिमाणमात्र कर दिया।

एक वेणुदण्डपर विचित्र चित्र बने हुए हैं, उनको प्रक्षाल अर्थात् धो डालनेपर वह वेणुदण्ड (बाँस) शुद्ध निर्मल हो जाता है इसी प्रकार इस जीवके अनन्त काल लम्बी भविष्य नाना प्रकारकी संसारी पर्याय पड़ी हुई है, किन्तु सम्यग्दर्शनके द्वारा उन भविष्य अनन्त पर्यायोंको धो देता है। इसी बातको श्री जयसेन आचार्य इन शब्दों द्वारा लिखते हैं-

यथा वेणुदण्डो विचित्रचित्रप्रक्षालने कृते शुद्धो भवति तथायं जीवोऽपि ।
-पंचास्तिकाय गाथा २० टीका

उपर्युक्त आगम प्रमाणोंसे तथा राजवार्तिक अ० १ सू० ३ से यह सिद्ध हो जाता है कि सम्यक्त्वोत्पत्तिका कोई नियत काल नहीं है। किन्तु जब कभी यह संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव अपने ज्ञानको अन्य ज्ञेयोंसे हटाकर स्वोमुख होता है तब अन्य ज्ञेयोंकी तरह स्वका ज्ञान भी इसको हो जाता है। स्वका ज्ञान होना कठिन नहीं है, क्योंकि यह रात-दिन कहता रहता है कि ‘मैंने यह कार्य किया, मैंने यह कार्य किया’ इन वाक्योंमें ‘मैं’ शब्दका उच्चारण तो करता है, किन्तु ‘मैं’ की ओर लक्ष्य न रहकर कार्यकी ओर लक्ष्य रहता है। यदि यह अन्यकी ओरसे लक्ष्य हटाकर ‘मैं’ की ओर लक्ष्य ले जावे तो ‘मैं’ अर्थात् 'स्व’का बोध होना कठिन नहीं है, क्योंकि ज्ञान स्व-परप्रकाशक है। यह ही बात परीक्षामुख प्रथम अध्यायमें इन सूत्रों द्वारा कही गई है-

स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणं। स्वोन्मुखतया प्रतिभासनं स्वस्य व्यवसायः। अर्थस्येव तदुन्मुखतया। घटमहमात्मना वेद्मि। कर्मवत्कर्तृकरणक्रियाप्रतीतेः। शब्दानुच्चारणेऽपि स्वस्यानुभवनमर्थवत्। को वा तत्प्रतिभासिनमर्थमध्यक्षमिच्छंस्तदेव तथा नेच्छेत्, प्रदीपवत्।
-सूत्र १ व ६-१२

अर्थ-स्व और अपूर्व अर्थका व्यवसायात्मक ज्ञान ही प्रमाण है। जैसे पदार्थकी ओर उन्मुख होनेसे पदार्थका निश्चय होता है वैसे ही स्वकी ओर उन्मुख होनेसे स्वका निश्चय (निर्णय) होता है, ‘मैं घटको अपने द्वारा जानता हूँ’ इसमें जिस प्रकार कर्म (घट)की प्रतीति होती है उसी प्रकार कर्ता (मैं), करण (ज्ञान) और क्रिया (जानना)की प्रतीति होती है। शब्दका उच्चारण किये बिना भी जैसे पदार्थका अनुभव होता है वैसे ही स्वका भी अनुभव होता है। ऐसा कौन होगा जो ज्ञान करि प्रतिभासित अर्थको तो प्रत्यक्ष इष्ट करे और तिस ज्ञानको इष्ट न करे ? अर्थात् इष्ट करे ही करे। जैसे दीपकके प्रत्यक्षता और प्रकाशता बिना तिस करि भासे जे घटादिक पदार्थ तिनके प्रकाशता प्रत्यक्षता न बने, तैसे ही प्रमाणस्वरूप ज्ञानके भी जो प्रत्यक्षता न होय तो तिस करि प्रतिभास्या अर्थके भी अर्थात् प्रतिभास्या अर्थके भी प्रत्यक्षता न बने।

जिस प्रकार घट-पट आदिकी ओर उपयोग ले जाकर जाननेका कोई नियत काल नहीं है, उसी प्रकार स्वोन्मुख होकर स्वको जाननेका भी कोई नियत काल नहीं है, क्योंकि सर्व कार्योंका नियामक कोई नियत काल नहीं है, किन्तु बाह्य-आभ्यन्तर समर्थ कारणसामग्री कार्यकी नियामक है। यदि मात्र कालको ही सब कार्योंका कारण मान लिया जाय तो अन्य सर्व कारण सामग्रीका ही लोप हो जायगा। जैसा कि अकलंकदेवने कहा है-

यदि हि सर्वस्य कालो हेतुरिष्टः स्यात् वाह्याभ्यन्तरकारणनियमस्व दृष्टस्येष्टस्य वा विरोधः स्यात्।
-तत्त्वार्थवार्तिक १।३

जो सम्यक्त्वोत्पत्तिके लिये मात्र काललब्धिकी प्रतीक्षा करते रहते हैं वे पुरुषार्थहीन पुरुष प्रमादी होकर अपने इस मनुष्यभवको ऐशोआराम (आनन्द-विनोद) में व्यर्थ खो देते हैं।

आगे आपने लिखा है ‘श्रावकके उत्कृष्ट विशुद्धरूप परिणामोंका आलम्बन छोड़ सर्व प्रथम अप्रमत्तभावको प्राप्त होता है।’ करणानुयोगके विशेषज्ञको भलि-भाँति ज्ञात है कि सप्तम गुणस्थानमें प्रत्याख्यान कषायोदयका अभाव होनेसे श्रावकके पंचम गुणस्थानकी अपेक्षा अप्रमत्तसंयत गुणस्थानवाले मुनिके परिणामों की विशुद्धता अनन्तगुणी है अर्थात् श्रावककी उत्कृष्ट विशुद्धता अप्रमत्तसंयतकी विशुद्धतामें लीन हो जाती हैं। अथवा श्रावकके उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामोंके द्वारा मुनिदीक्षाका कार्यक्रम होकर अप्रमत्तसंयतकी अनन्तगुणी विशुद्धता प्राप्त होती है। विशुद्धता छोड़ी नहीं जाती, किन्तु प्रति-प्रति गुणस्थान बढ़ती जाती है। जैसे पीपरकी ६३ वीं पुटवाली चरपराहट छोड़कर ६४ वीं पुटवाली चरपराई उत्पन्न नहीं होती है, किन्तु ६३ वीं पुटवाली चरपराहट ही उत्कर्ष करके ६४ वीं पुटवाली चरपराहटरूप परिणमित हो जाती है।

आपने लिखा है-‘अहिंसादि अणुव्रत और महाव्रत आदि शुभ विकल्प होता है, जोकि राग पर्याय है उसको यहाँ व्यवहारधर्म कहा गया है।’ सो सामायिक-छेदोपस्थापना संयमकी व्याख्याके विरुद्ध ये वाक्य लिखे गये हैं जो शोभनीक नहीं है। व्रतोंका तथा सामायिक छेदोपस्थापनाका लक्षण इस प्रकार है-

हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्।
-तत्त्वार्थसूत्र ७-१

अर्थ-हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रहसे निवृत्त होना व्रत है।

सर्वसावद्यनिवृत्तिलक्षणसामायिकापेक्षया एकं व्रतं, तदेव छेदोपस्थापनापेक्षया पंचविधमिहोच्यते।
-सर्वार्थसिद्धि ७-१

अर्थ-सब पापोंसे निवृत्त होनेरूप सामायिककी अपेक्षा एक व्रत है। वही व्रत छेदोपस्थापनाकी अपेक्षा पाँच प्रकारका है।

इस प्रकार पापोंसे निवृत्त होना ही व्रत है तथा सामायिक व छेदोस्थापना संयम अथवा चारित्र है चारित्र तो मोक्षमार्ग तथा संवरका कारण है, जैसा कि मोक्षशास्त्रमें कहा गया है। फिर व्रतोंको रागभाव कहना कैसे आगमसंगत हो सकता है।

सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।
-तत्त्वार्थसूत्र १, १

अर्थ-सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ये तीनों मिलकर मोक्षका मार्ग है अर्थात् साधन है।

स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरिषहजयचारित्रैः।
-त० सू० ९, २

अर्थ-गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चारित्रके द्वारा संवर होता है।

सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसाम्पराययथाख्यातमिति चारित्रं ॥९, १८॥

सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात यह पाँच प्रकारका चारित्र है।

इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि व्रत विकल्प भी नहीं है और राग भी नहीं है, किन्तु हिंसादि पापोंके रागके त्यागरूप है। जिनको हिंसा आदि पापोंसे राग होता है वे ही यह कहकर कि हिंसा आदि पापोंसे निवृत्ति (त्याग) तो राग है, विकल्प है, आस्रव बन्धका कारण है। स्वयं व्रत धारण नहीं करते और चारित्रवान् पुरुषोंका आदर आदि भी नहीं करते। अथवा यह कह देते हैं कि हमारी क्रमबद्ध-पर्यायोंमें व्रत धारण करना पड़ा हुआ ही नहीं है, पर्याय आगे पीछे हो नहीं सकती, फिर हम पापोंको कैसे छोड़ें अथवा सर्वज्ञने हमारी व्रतधारणरूप पर्याय देखी ही नहीं तो हम पापोंको कैसे त्याग कर सकते हैं।

यदि व्रतोंको राग माना जायगा तो वे व्यवहारधर्म नहीं हो सकते, क्योंकि व्यवहारधर्म तो निश्चय-धर्मका साधन है। जैसा कि श्री अमृतचन्द सूरिने पंचास्तिकाय गाथा १६० व १६१ की टीकामें कहा है और बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा १३ की टीकामें यह कहा है कि जो निश्चय व व्यवहारको साध्य-साधनरूपसे स्वीकार करता है वह सम्यग्दृष्टि है। अतः व्रत व व्यवहारधर्म रागांशरूप नहीं है। विशेष व्याख्याके लिये प्रश्न नं० ३, ४ व १३ पर हमारे प्रपन्न देखने चाहिये।

श्री प्रवचनसार गाथा ९ की टीकामें जीवके शुभ, अशुभ व शुद्ध तीन भाव कहे हैं। जिस समय जो भाव होता है उस समय वह जीव उस भावरूप हो जाता है। इस गाथाकी टीकामें श्री जयसेन आचार्यने कहा है कि ‘पहले तीन गुणस्थानोंमें अशुभोपयोग, अविरत सम्यग्दृष्टिसे प्रमत्तसंयत गुणस्थानतक शुभोपयोग और उसके पश्चात् अप्रमत्तसंयतसे क्षीणमोह गुणस्थानतक शुद्धोपयोग होता है।’ चौथे गुणस्थानमें सम्यग्दर्शन-रूप शुद्ध भाव है और कषायरूप अशुद्धभाव है इन दोनों शुद्धाशुद्ध भावोंके मिश्रितरूप उपयोगको शुभोपयोग कहा है। इसी प्रकार यथासंभव पाँचवे, छटे गुणस्थानमें भी शुद्धाशुद्ध मिश्रित भावरूप शुभोपयोग जानना चाहिये। यदि शुभोपयोगको शुद्धाशुद्ध भावरूप न माना जावेगा तो शुभोपयोग मोक्षका कारण नहीं हो सकेगा। किन्तु श्री अमृतचन्द्राचार्यने प्रवचनसार गाथा २५४ टीकामें शुभापयोगको मोक्षका कारण कहा है-

गृहिणां तु समस्तविरतेरभावेन शुद्धात्म-प्रकाशनस्याभावात्कषायसद्भावात्प्रवर्तमानोऽपि स्फटिक-संपर्केणार्कतेजस इवैधसां रागसंयोगेनाशुद्धात्मनोनुभवनात् क्रमतः परमनिर्वाणसौख्यकारणत्वाच्च मुख्यः।

अर्थ-वह शुभोपयोग गृहस्थोंके तो, सर्वविरतिके अभावसे शुद्धात्मप्रकाशनका अभाव होनेसे कषायके सद्भावके कारण प्रवर्तमान होता हुआ भी मुख्य है, क्योंकि जैसे ईंधनको स्फटिकके सम्पर्कसे सूर्यके तेजका अनुभव होता है, उस प्रकार गृहस्थको रागके संयोगसे शुद्धात्माका अनुभव होता है, क्रमशः परम निर्वाण सौख्यका कारण होता है।

आपने यह लिखकर ‘शुद्धाशुद्ध पूरे परिणामको शुभ कहकर ऐसा अर्थ फलित करनेकी चेष्टा की गई है सो यह कथनकी चतुराई मात्र ही है।’ उपर्युक्त आर्ष वाक्योंको कथनको चतुराई कहनेका साहस किया है सो यह बड़े खेदकी बात है और यह आर्ष वाक्योंपर अश्रद्धाका द्योतक है।

जिनभक्तिसे आप कर्मका क्षय होना नहीं मानते, किन्तु समयसारके रचयिता श्री कुंदकुंद भगवान् कहते हैं कि जो जिनेन्द्रको नमस्कार करता है वह संसार भ्रमणका नाश करता है-

जिणवरचरणंबुरुहं णमंति जे परमभत्तिराएण।
ते जम्मवेल्लिमूलं खणंति वरभावसत्थेण ॥१५१॥
-भावपाहुड

अर्थ-जे पुरुष परम भक्ति अनुराग करि जिनवरके चरणकमलकू नमे हैं ते पुरुष श्रेष्ठ भावरूप शस्त्र करि जन्म (संसार) रूपी वेलका मूल जो मिथ्यात्वादि कर्मको खणे (चय) करें हैं ।

इससे स्पष्ट है कि जिनेन्द्र भक्तिसे कर्मोंके राजा मोहनीय कर्मका क्षय होता है।

आपने जो परमात्मप्रकाश गाथा ६१ उद्धृत की है उसकी टीकामें लिखा है कि-

देवशास्त्रमुनीनां भक्त्या पुण्यं भवति कर्मक्षयः पुनर्मुख्यवृत्त्या नैव भवति।

अर्थ-देव-शास्त्र-मुनियोंकी भक्तिसे पुण्य होता है, किन्तु मुख्यतासे कर्मक्षय नहीं होता। अर्थात् गौणरूपसे कर्मक्षय होता है। मिश्रित अखण्ड पर्यायमें पापोंसे निवृत्ति भी होती है और रागांश भी होता है । यहांपर रागांशको मुख्य करके तथा निवृत्ति अंशको गौण करके यह कथन किया गया है। जैसे तत्त्वार्थसूत्रमें सम्यक्त्वको देव आयुका आस्रव बतलाया है।

आध्यात्मिक दृष्टिसे प्रथम द्वितीय और तृतीय गुणस्थानोंमें तो एक अशुभोपयोग होता है और असंयतसम्यग्दृष्टि चतुर्थ गुणस्थानसे प्रमत्तसंयत छटे गुणस्थानतक केवल एक शुभोपयोग और अप्रमत्तसंयत सातवें गुणस्थानसे एक शुद्धोपयोग होता है।

-प्रवचनसार गाथा ९ टीका श्री जयसेन आचार्य।

श्री ब्रह्मदेव सूरिने बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ३४ की टीकामें लिखा है कि शुद्धोपयोगका साधक शुभोपयोग है जो चौथेसे छटे गुणस्थान तक होता है। अतः शुभोपयोग मात्र बन्धका ही कारण नहीं हो सकता।

असंयतसम्यग्दृष्टि-श्रावक-प्रमत्तसंयतेषु पारम्पर्येण शुद्धोपयोगसाधक उपर्युपरि तारतम्येन शुभोपयोगो वर्तते।

अर्थ-असंयतसम्यग्दृष्टि, श्रावक और प्रमत्तसंयत (चौथे, पाँचवें एवं छटे गुणस्थान) में उत्तरोत्तर तारतम्य लिये शुभोपयोग होता है जो शुद्धोपयोगका साधक है।

किन्तु दूसरी दृष्टिसे ४ थे से १२ वें गुणस्थान तक शुभोपयोग और १३ वेंसे शुद्धोपयोग होता है।

आपके द्वारा आचार्योंके इन वाक्योंके कथनको चतुराई कहकर सम्यग्दृष्टिके शुभोपयोगको संसारका कारण कहा गया है, किन्तु श्री कुन्दकुन्द भगवान्ने तो समयसार निर्जरा अधिकारमें सम्यग्दृष्टिके भोगको भी निर्जराका कारण कहा है। भक्ति और शुभोपयोगके सम्बन्धमें विशेषके लिये प्रश्न ३ व ४ व १३ पर हमारे वक्तव्य देखने चाहिये।

आपने लिखा है-‘शुभोपयोगके होनेपर कर्मबंधकी स्थिति और अनुभागमें वृद्धि हो जाती है और शुद्धोपयोगके होनेपर उसकी स्थिति-अनुभागमें हानि हो जाती है।’ इन वाक्योंके देखनेसे तो ऐसा प्रतीत होता है कि इन वाक्योंको लिखते समय लेखकका लक्ष्य श्री वीरसेन आचार्य तथा श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीके आर्षवाक्यकी ओर नहीं रहा, इसलिये उन आर्षवाक्योंको यहाँपर उद्धृत किया जाता है जिससे ज्ञात होगा कि शुभोपयोग अर्थात् विशुद्ध परिणामोंसे तीन आयुके अतिरिक्त शेष समस्त कर्मबन्धकी स्थितिमें वृद्धि नहीं होती, किन्तु हानि होती है और अप्रशस्त प्रकृतियोंके अनुभाग बंधमें हानि होती है स्थिति तथा प्रशस्त प्रकृतियोंके अनुभागमें वृद्धि होती है। जहाँ कषायोदय नहीं होता अर्थात् ग्यारहवें गुणस्थानसे शुद्धोपयोग होता है वहाँ तो शुद्धोपयोगसे बन्ध नहीं होता। यदि उपशमश्रेणी या क्षपकश्रेणीके आदि तीन गुणस्थानोंमें भी शुद्धोपयोग माना जावे तो शुद्धोपयोगसे प्रशस्त प्रकृतियोंके अनुभाग बन्धमें वृद्धि होती है, हानि नहीं होती। इस सम्बन्धमें निम्नलिखित प्रमाण देखनेकी कृपा करें-

सव्वट्ठिदीणमुक्कस्सओ दु उक्कस्ससंकिलेसेण।
विवरीदेण जहण्णो आउगतियवज्जियाणं तु ॥२२४॥-गो० क०

अर्थ-तीन आयुको छोड़कर अन्य सब प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबंध उत्कृष्ट संक्लेश परिणामोंसे होता है और जघन्य स्थितिबंध विपरीत परिणामोंसे अर्थात् विशुद्ध परिणामों (शुभोपयोग) से होता है। तीन आयुका उत्कृष्ट स्थितिबंध विशुद्ध परिणामोंसे होता है तथा जघन्य स्थितिबंध संक्लेश परिणामोंसे होता है।

बादालं तु पसत्था विसोहिगुणमुक्कडस्स तिव्वाओ
वासीदि अप्पसत्था मिच्छुक्कडसंकिलिट्ठस्स ॥१६४॥-गो० क०

अर्थ-४२ प्रशस्त प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागबंध उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामवाले जीवके होता है और ८२ अप्रशस्त प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागबंध मिथ्यादृष्टि उत्कृष्ट संक्लेश परिणामवाले जीवोंके होता है।

धवल पु० ६ में भी लिखा है कि उत्कृष्ट विशुद्धिके द्वारा जघन्य स्थिति बँधती है, और विशुद्धिकी वृद्धिसे स्थितियोंकी हानि होती है।

उक्कस्सविसोहीए जा ट्ठिदी बज्झदि सा जहण्णिया होदि, सव्वासिं ट्ठिदीणं पसत्थभावाभावादो। संकिलेसवड्ढीदो सव्वपयडिट्ठिदीणं वड्ढी होदि, विसोहिवड्ढीदो तासिं चेव हाणी होदि।-पृ० १८०

अर्थ-उत्कृष्ट विशुद्धिके द्वारा जो स्थिति बँधती है, वह जघन्य होती है, क्योंकि सर्व स्थितियोंके प्रशस्त भावका अभाव है। संक्लेशकी वृद्धिसे सर्व प्रकृतिसंबंधी स्थितिकी वृद्धि होती है और विशुद्धि (शुभोपयोग)की वृद्धिसे उन्हीं स्थितियोंकी हानि होती है।

आपने जो समयसार गाथा २७२ उद्धृत करते हुए यह लिखा है-‘निश्चयनयके द्वारा व्यवहारनय निषिद्ध जानो।’ इसका यह अभिप्राय है कि वीतराग निर्विकल्प समाधिमें स्थित जीवोंके लिये व्यवहारनय का निषेध है, किन्तु प्राथमिक शिष्यके लिये यह प्रयोजनवान् है। श्री जयसेन आचार्य इसकी टीकामें लिखते हैं-

यद्यपि प्राथमिकापेक्षया प्रारम्भप्रस्तावे सविकल्पावस्थायां निश्चयसाधकत्वाद् व्यवहारनयः सप्रयोजनस्तथापि विशुद्धज्ञानदर्शनलक्षणे शुद्धात्मनि स्थितानां निष्प्रयोजन इति भावार्थः ।

इसका तात्पर्य यह है कि प्रारम्भिक शिष्यके लिये प्रथम सविकल्प अवस्थामें निश्चयनयका साधक होनेसे व्यवहारनय प्रयोजनवान् है, किन्तु जो विशुद्धज्ञान-दर्शनमयी आत्मामें स्थित हैं उनके लिये निष्प्रयोजन है।

इसी बातको श्री अमृतचन्द सूरि पंचास्तिकायके अन्तमें लिखते हैं-

व्यवहारनयेन भिन्नसाध्यसाधनभावमवलम्ब्यानादिभेदवासितबुद्धयः सुखेनैवावतरन्ति तीर्थं प्राथमिकाः ।

अर्थ-जो जीव अनादि कालसे भेदभावकर वासितबुद्धि हैं वे व्यवहारनयका अवलम्बन लेकर भिन्न साध्य-साधनभावको अंगीकार करते हैं, ऐसे प्राथमिक शिष्य सुखसे तीर्थमें प्रवेश करते हैं ।

आगमके आधारपर यह कहा जा चुका है कि यदि विवक्षित नय अपने प्रतिपक्षी नयके सापेक्ष है तो सुनय अथवा सम्यक् नय हैं जो सम्यग्दृष्टिके होते हैं । मिथ्यादृष्टिके वही नय पर निरपेच होनेसे कुनय अथवा मिथ्या नय होते हैं ।

इसी बातको श्री देवसेन आचार्यने भी नयचक्रसंग्रहमें कहा है-

भेदुवयारो णियमा मिच्छादिट्ठीणं मिच्छरूवं खु ।
सम्मे सम्मो भणिओ तेहि दु बंधो व मुक्खो वा ॥६८॥

अर्थ-भेदोपचार ( व्यवहारनय ) मिथ्यादृष्टिके नियमसे मिथ्यारूप ही होता है और सम्यग्दृष्टिके सम्यक्त्वरूप कहा गया है । मिथ्या व्यवहारनयसे बन्ध होता है और सम्यग्दृष्टि व्यवहारनयसे मोक्ष होता है ।

समयसार बन्ध अधिकारमें यह कहा गया है कि अध्यवसानके द्वारा बन्ध होता है । गाथा २७१ की टीकामें कहा गया है 'स्व-पर विवेकसे रहित ( मिथ्या ) बुद्धि व्यवसाय-मति-विज्ञान, चित्त-भाव-परिणाम-को अध्यवसाय कहते हैं । गाथा २७२ में निश्चयनयके द्वारा अध्यवसानरूप मिथ्या व्यवहारनयका प्रतिषेध किया गया है । जैसा कि टीकाके ‘पराश्रितव्यवहारनयस्यैकान्तेनामुच्यमानेनाभव्येनाश्रियमाणत्वात् ।’ ( पराश्रित व्यवहारनयके तो एकान्तसे कर्मसे नहीं छूटनेवाले अभव्य करि आश्रयमानपना है ) इन शब्दोंसे स्पष्ट है । गाथा २७३ के ‘अभव्वो अण्णाणी मिच्छदिट्ठी’ गाथा २७४ के ‘अभविय’ और गाथा २७५ की टीकाके ‘अभव्यः’ से स्पष्ट है कि गाथा २७१ आदिमें मिथ्यादृष्टियोंकी बुद्धि-व्रत शील-ज्ञान व श्रद्धान आदिकी अपेक्षा कथन है और उन्हींका प्रतिषेध है, क्योंकि सम्यग्दृष्टिका ज्ञान, श्रद्धान, व्रत, शील आदिरूप चारित्र तो मोक्षका कारण है उसका प्रतिषेध नहीं हो सकता ।

यदि २७२ गाथामें सम्यग्व्यवहारनयका प्रतिषेध मान लिया जावे तो पूर्वापर विरोधका प्रसंग आ जायगा, क्योंकि समयसार गाथा १२ में तथा उसकी टीकामें पूर्ण ज्ञान-चारित्र होने तक अर्थात् साधक अवस्थामें सम्यग्व्यवहारनयको प्रयोजनवान् बतलाया गया है ।

श्री समयसार गाथा १२ तथा उसकी टीकामें भी प्रगट किया गया है कि जो पूर्ण दर्शन-ज्ञान-चारित्रवान् हो गये उन्हें शुद्ध ( निश्चय ) नय प्रयोजनवान् है और जब तक दर्शन-ज्ञान-चारित्र पूर्ण नहीं होते हैं तब तक व्यवहारनय प्रयोजनवान् है । दर्शन-ज्ञान-चारित्रकी पूर्णता १३ वें गुणस्थानमें होती है, अतः १२ वें गुणस्थान तक व्यवहारनय प्रयोजनवान् है ।

सुद्धो सुद्धादेसो णायव्वो परमभावदरिसीहिं ।
ववहारदेसिदा पुण जे दु अपरमे ट्ठिदा भावे ॥१२॥
-श्री समयसार

अर्थ-जो शुद्धनय तक पहुँच कर श्रद्धावान् हुये तथा पूर्ण ज्ञान-चारित्रवान् हो गये हैं उन्हें तो शुद्धका उपदेश करनेवाला शुद्धनय जानने योग्य है और जो जीव अपरम भावमें स्थित हैं अर्थात् श्रद्धा तथा ज्ञान-चारित्रके पूर्ण भावको नहीं पहुँच सके हैं-साधक अवस्थामें ही स्थित हैं वे पुरुष व्यवहारद्वारा उपदेश करने योग्य हैं ।

श्री अमृतचन्द्राचार्य इसकी टीकामें लिखते हैं कि व्यवहारनय बारहवें गुणस्थान तक प्रयोजनवान् है । टीका यह है-

ये तु प्रथमद्वितीयाद्यनेकपाकपरम्परापच्यमानकार्त्तस्वरस्थानीयमपरमं भावमनुभवंति तेषां पर्यंतपाकोत्तीर्णजात्यकार्त्तस्वरस्थानीयपरमभावानुभवनशून्यत्वादशुद्धद्रव्यादेशितयोपदर्शितप्रतिविशिष्टैकभावानेकभावो व्यवहारनयो विचित्रवर्णमालिकास्थानीयत्वात्परिज्ञायमानस्तदात्वे प्रयोजनवान्, तीर्थतीर्थफलयोरित्थमेव व्यवस्थितत्वात् । उक्तं च-

जइ जिणमयं पवज्जह ता मा ववहारणिच्छए मुयह ।
एकेण विणा छिज्जइ तित्थं अण्णेण उण तच्चं ॥

अर्थ-जो पुरुष प्रथम द्वितीयादि अनेक पाकोंके परम्परासे पच्यमान अशुद्ध स्वर्णके समान जो आत्माकेऽनुत्कृष्ट-मध्यमभावका अनुभव करते हैं उन्हें अन्तिम तावसे उतरे हुए शुद्ध सोनेके समान उत्कृष्ट भावका अनुभव नहीं होता, इसलिए अशुद्ध द्रव्यको कहनेवाली, भिन्न भिन्न एक-एक भावस्वरूप अनेक भाव दिखानेवाली व्यवहारनय उस काल प्रयोजनवान् है, क्योंकि विचित्र अनेक वर्णमालाके समान जाननेमें आता है । तीर्थ और तीर्थफलकी ऐसी ही व्यवस्था है । कहा भी है-यदि तुम जिन मतकी प्रवर्तना करना चाहते हो तो व्यरहारनय और निश्चयनय दोनों नयोंको मत छोड़ो, क्योंकि व्यवहारनयके बिना तो तीर्थ (व्यवहारमार्ग) का नाश हो जायगा और निश्चयनयके बिना तत्त्वका नाश हो जायगा ।

भावार्थ-जहाँ तक यथार्थ ज्ञान श्रद्धानकी प्राप्तिरूप सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं हो वहाँ तक तो जिनसे यथार्थ उपदेश मिलता हो ऐसे जिन वचनोंको सुनना, धारण करना तथा जिन वचनोंको कहनेवाले श्री जिन गुरुकी भक्ति, जिनबिम्बके दर्शन इत्यादि व्यवहार मार्गमें प्रवृत्त होना प्रयोजनवान् है । और जिन्हें श्रद्धान-ज्ञान तो हुआ है, किन्तु साक्षात् प्राप्ति नहीं हुई उन्हें पूर्वकथित कार्य परद्रव्यका आलम्बन छोड़नेरूप अणुव्रत-महाव्रतका ग्रहण समिति, गुप्ति और पंच परमेष्ठीका ध्यानरूप प्रवर्तन तथा उसी प्रकार प्रवर्तन करनेवालोंकी संगति एवं विशेष जाननेके लिये शास्त्रोंका अभ्यास इत्यादि व्यवहारमार्गमें स्वयं प्रवर्तन करना और दूसरोंको प्रवर्तन कराना ऐसे व्यवहारनयके उपदेश प्रयोजनवान् है । व्यवहारनयको कथंचित् असत्यार्थ कहा गया है, किन्तु यदि कोई उसे सर्वथा असत्यार्थ जानकर छोड़ दे तो वह शुभोपयोग रूप व्यवहारको ही छोड़ देगा और उसे शुद्धोपयोगकी साक्षात् प्राप्ति तो नहीं हुई है, इसलिये उलटा अशुभोपयोगमें ही आकर, भ्रष्ट होकर चाहे जैसी स्वेच्छारूप प्रवृत्ति करेगा तो वह नरकादि गति तथा परम्परासे निगोदको प्राप्त होकर संसारमें ही भ्रमण करेगा । इसलिये शुद्धनयका विषय जो साक्षात् शुद्ध आत्मा है उसकी प्राप्ति जबतक न हो तबतक व्यवहार भी प्रयोजनवान् है-ऐसा स्याद्वाद मतके श्री गुरुओंका उपदेश है ।

‘व्यवहारनयका विषय व्यवहारनयकी अपेक्षा सत्य है ।’ इस बातको श्री अमृतचन्द्राचार्य समयसार गाथा १४ की टीकामें भी कहते हैं-

आत्मनोऽनादिबद्धस्य बद्धस्पृष्टत्वपर्यायेणानुभूयमानतायां बद्धस्पृष्टत्वं भूतार्थम् ।

अर्थ-अनादिकालसे बंधे हुए आत्माका पुद्गल कर्मोंसे बँधने स्पर्शित होने अवस्थासे (व्यवहारनयसे) अनुभव करनेपर बद्ध-स्पृष्टता भूतार्थ है ।

श्री पं० फूलचन्दने भी अपने लेखमें जो प्रेमी अभिनन्दन ग्रन्थमें पृ० ३४५ से ३५५ तक प्रकाशित हुआ है उसमें भी व्यवहारनयको सत्य सिद्ध किया है । वे वाक्य निम्न प्रकार हैं-

यदि निश्चय सत्याधिष्ठित है तो वह अपनी अपेक्षासे ही है । यदि व्यवहारकी अपेक्षासे ही (भी) उसे वैसा मान लिया जाय तो बन्ध-मोक्षकी चर्चा करना ही छोड़ देना चाहिये । कविवर पं० बनारसीदासजीने ऐसा किया था, पर अन्तमें उन्हें एकान्त निश्चयका त्याग करके व्यवहारकी शरणमें आना पड़ा । आचार्य कुन्दकुन्दने जो व्यवहारको अभूतार्थ कहा है वह व्यवहारकी अपेक्षा नहीं, किन्तु निश्चयकी अपेक्षासे कहा है । व्यवहार अपने अर्थमें उतना ही सत्य है, जितना कि निश्चय ।

आपने लिखा है कि ‘निरपेक्षा नया मिथ्या’ यह वचन वस्तुसिद्धिके प्रसंगमें आया है और प्रकृतमें मोक्ष-मार्गकी प्रसिद्धि की जा रही है । अतएव प्रकृतमें उसका उपयोग करना इष्ट नहीं है ।’ किन्तु आपका ऐसा लिखना आगमानुकूल नहीं है । प्रथम तो वस्तुसिद्धिसे ही मोक्ष-मार्गकी प्रसिद्धि है, वस्तुसिद्धि और मोक्ष-मार्गकी प्रसिद्धि दो नहीं हैं । दूसरे मोक्ष-मार्गकी प्रसिद्धि भी द्वयनयाधीन ही है, क्योंकि निश्चय-व्यवहार मोक्षमार्ग साध्य-साधकरूप है । इन दोनोंमें से किसी एकके अभावमें मोक्षकी सिद्धि (प्राप्ति) नहीं हो सकती । इसी बातको श्री जयसेन आचार्य भी पंचास्तिकाय ग्रन्थका तात्पर्य बताते हुए टीकाके अन्तमें लिखते हैं-

अथैवं पूर्वोक्तप्रकारेणास्य प्राभृतस्य शास्त्रस्य वीतरागत्वमेव तात्पर्यं ज्ञातव्यं । तच्च वीतरागत्वं निश्चयव्यवहारनयाभ्यां साध्यसाधकरूपेण परस्परसापेक्षाभ्यामेव भवति मुक्तिसिद्धये न च पुनर्निरपेक्षाभ्यामिति वार्तिकं । तद्यथा-ये केचन विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावशुद्धात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपनिश्चयमोक्षमार्गनिरपेक्षं केवलशुभानुष्ठानरूपं व्यवहारनयमेव मोक्षमार्गं मन्यंते तेन तु सुरलोकादिक्लेशपरम्परया संसारे परिभ्रमन्तीति । यदि पुनः शुद्धात्मानुभूतिलक्षणं निश्चयमोक्षमार्गं मन्यंते निश्चयमोक्षमार्गानुष्ठानशक्त्यभावान्निश्चयसाधकं शुभानुष्ठानं च कुर्वन्ति तर्हि सरागसम्यग्दृष्टयो भवन्ति परम्परया मोक्षं लभन्ते इति व्यवहारैकान्तनिराकरणमुख्यत्वेन वाक्यद्वयं गतं । येऽपि केवलनिश्चयनयावलंबिनः संतोऽपि रागादिविकल्परहितं परमसमाधिरूपं शुद्धात्मानमलभमाना अपि तपोधनाचरणयोग्यं षडावश्यकाद्यनुष्ठानं श्रावकचरणयोग्यं दानपूजाद्यनुष्ठानं च दूषयंते तेष्युभयभ्रष्टाः संतो निश्चयव्यवहारानुष्ठानयोग्यावस्थान्तरमजानन्तः पापमेव बध्नन्ति । यदि पुनः शुद्धात्मानुष्ठानरूपं मोक्षमार्गं तत्साधकं व्यवहारमोक्षमार्गं मन्यन्ते तर्हि चारित्रमोहोदयात् शक्त्यभावेन शुभाशुभानुष्ठानरहिता अपि यद्यपि शुद्धात्मभावनासापेक्षशुभानुष्ठानरतपुरुषसदृशा न भवन्ति तथापि सरागसम्यक्त्वादिव्यवहारसम्यग्दृष्टयो भवन्ति परम्परया मोक्षं च लभंते
इति निश्चयैकान्तनिराकरणमुख्यत्वेन वाक्यद्वयं गतं। ततः स्थितमेतन्निश्चयव्यवहारपरस्परसाधकभावेन रागादिविकल्परहितपरमसमाधिबलेनैव मोक्षं लभंते ।।१७२।।

अर्थ-अब पूर्वोक्त प्रकार इस ग्रन्थका तात्पर्य वीतरागता ही जानना चाहिये । वह वीतरागता निश्चय व व्यवहारनय द्वारा साध्य-साधकरूपसे परस्पर सापेक्षतासे ही मुक्ति कार्यकी सिद्धि होती है, किन्तु दोनों नयोंकी परस्पर निरपेक्षतासे मुक्तिकी सिद्धि नहीं होती । जो कोई, विशुद्ध ज्ञानस्वभावमयी शुद्धात्मतत्त्वका श्रद्धान-ज्ञानानुष्ठानरूप निश्चयमोक्षमार्गकी अपेक्षासे रहित, मात्र शुभ आचरणरूप व्यवहारनयको ही मोक्षमार्ग मानता है वह स्वर्ग आदिके संक्लेश भोगकर परम्परासे संसारमें भ्रमण करता है। यदि वही जीव पुनः शुद्धात्मानुभूतिमयी निश्चयमोक्षमार्गको मानता है, निश्चय मोक्षमार्गरूप अनुष्ठान करनेकी शक्ति न होनेसे, निश्चयका साधकरूप शुभ अनुष्ठानको करता है तो वह सरागसम्यग्दृष्टि होता हुआ परम्पराय मोक्षको प्राप्त करता है । इस प्रकार व्यवहार एकान्तके निराकरणकी मुख्यतासे दो वाक्य ही कहे गये ।

निश्चय एकान्तका कथन-

जो केवल निश्चयके अवलम्बी हैं वे भी, रागादि विकल्परहित परम समाधिरूप शुद्धात्माको प्राप्त न करनेपर भी तपश्चरणके योग्य षडावश्यक आदि अनुष्ठान अथवा श्रावकाचरणके योग्य दान-पूजादि अनुष्ठानको हेयरूप (बन्धरूप) मानकर उनसे भ्रष्ट होता हुआ अर्थात् उन आचरणोंको न करता हुआ निश्चय-व्यवहाररूप अनुष्ठानके योग्य अनेकान्त रूप अवस्थाको नहीं जाननेसे पापको ही बाँधता हैं । यदि पुनः वह जीव शुद्धात्मानुष्ठानरूप निश्चय मोक्षमार्गका साधक व्यवहार मोक्षमार्गको मानता है फिर भी चारित्रमोहके उदयके वश शक्तिके अभावसे शुभाशुभ अनुष्ठान नहीं करता है । यद्यपि शुद्धात्मभावनासे सापेक्ष शुभ अनुष्ठानमें रत ऐसे पुरुषके सदृश नहीं होता तथापि सरागसम्यक्त्व आदि सहित व्यवहार सम्यग्दृष्टि होता है और परम्परा मोक्षको प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार निश्चय एकान्तके निराकरणकी मुख्यतासे दो वाक्य कहे गये ।

इससे यह निश्चित होता है कि निश्चय और व्यवहार नयोंमें परस्पर साध्य-साधकभावके द्वारा सापेक्षता रखते हुये रागादि विकल्प-रहित परम समाधिके बलसे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है ।

श्री अमृतचन्द्रसूरि भी पंचास्तिकाय गाथा १७२ की टीकामें कहते हैं कि केवल निश्चयनयसे भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती और केवल व्यवहारनयसे भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती । इस प्रकार निश्चयाभासी और व्यवहाराभासीका कथन किया गया है । निश्चय और व्यवहारके अविरोधसे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है । सूरिजी इस बातको इन वाक्यों द्वारा कहते हैं जो ध्यान देने योग्य हैं-

तदिदं वीतरागत्वं व्यवहारनिश्चयाविरोधेनैवानुगम्यमानं भवति समीहितसिद्धये न पुनरन्यथा ।

अर्थ-व्यवहार और निश्चयका अविरोधपूर्वक अनुसरण करते हुए जो यह वीतरागता प्राप्त होती है उसीसे मोक्षकी सिद्धि होती है, अन्य प्रकारसे मोक्षकी सिद्धि नहीं ।

‘पर्यायबुद्धि तो तू अनादिकालसे बनाए चला आ रहा है’ इस वाक्यके लिखनेसे यदि आपका यह अभिप्राय रहा हो कि ‘व्यवहारनय अभूतार्थ है, इसलिये पर्यायका ज्ञान श्रद्धान निरर्थक है, मात्र द्रव्यज्ञान अर्थात् एकान्त निश्चयनयसे मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी सो ऐसा अभिप्राय उचित नहीं है । द्रव्य (स्वभाव) दृष्टिमें अर्थात् स्वभावग्राही निश्चयनयमें तो न बँध है और मोक्ष न है। पर्यायकी अपेक्षा ही बँध या अशुद्धता है। उस बन्ध या अशुद्धताका क्षय करके पर्यायको अपेक्षा ही मोच या शुद्धता प्राप्त करनी है।

श्री पंचास्तिकायके आधारसे ऊपर यह सिद्ध किया जा चुका है कि निश्चय और व्यवहार दोनोंके अविरोधरूप आश्रयसे मोक्षकी प्राप्ति है। जो एकान्तसे निश्चयनयका अवलम्बन लेते हैं वे मोक्षको तो प्राप्त करते ही नहीं, किन्तु उल्टा पापबन्ध ही करते हैं।

इस प्रश्नका आशय अनेकान्तपर दृष्टि लानेका था, क्योंकि प्रायः यह देखा जाता है कि अतिदुर्लभ मनुष्य भव पाकर भी जीव किसी न किसी एकान्त मिथ्या मान्यताके चक्करमें फँस जाता है। कोई तो एकान्त काललब्धिको श्रद्धा करके यह विचार कर, कि जब मेरी काललब्धि आयेगी उस समय मेरा कल्याण हो जावेगा और मेरी बुद्धि भी उसी समय कल्याणकी ओर लगेगी और काललब्धि बिना कल्याण हो नहीं सकता, कल्याणमार्गमें पुरुषार्थ-हीन हो जाता है। कोई भवितव्यता या होनहारके एकान्त पक्षको ग्रहणकर सोचता है कि जब मेरे कल्याणकी भवितव्यता होगी उसी समय मेरा कल्याण होगा उसके पूर्व या पश्चात् नहीं हो सकता, ऐसा सोचकर कल्याणमार्गसे वंचित रह जाता है। अन्य कोई सोचता है कि मेरा कल्याण तो नियति अपर नाम क्रमबद्ध पर्यायके आधीन है, मैं कल्याण करनेमें स्वाधीन नहीं हूँ। इतना ही नहीं वह विचारता है कि जो कुछ भी अन्याय, अत्याचार, व्यभिचार हो रहा है वह सर्व नियतिके अधीन हो रहा है, जिसमें कोई हेरफेर नहीं कर सकता। यदि मैं अन्यायादिरूप होता भी हूँ या व्रतोंमें दोष आदि लगते हैं, वे सब नियतिके अधीन हैं, मैं तो सर्वथा निर्दोष हूँ। कोई संयम व चारित्रको मात्र बन्धका कारण जानकर उनसे पराङ्मुख रहता है और स्वच्छन्द प्रवृत्ति करता है। ऐसे जीवोंकी दृष्टि अनेकान्तपर लानेके लिये यह प्रश्न था। अनेकान्तका ही उपदेश सर्वज्ञने दिया है। ‘अनेकान्त’ जैनधर्मकी विशेष देन है और अनेकान्त दृष्टि मोक्षमार्ग है। इति।

नोट-इस विषयमें प्रश्न १, ४, ५, ६ और १७ पर दृष्टि डालिये तथा इनके प्रत्येक दौरका विषय देखिये।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका १६

मूल प्रश्न १६-निश्चयनय और व्यवहारनयका स्वरूप क्या है? व्यवहारनयका विषय असत्य है क्या? असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप?

शंका १६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग १/३)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७५३ से ७७०

↑ सूची


प्रतिशंका ३ का समाधान

\१. प्रथम द्वितीय दौरका उपसंहार

प्रथम उत्तरमें हमने निश्चयनय और अवान्तर भेदोंके साथ व्यवहारनयके स्वरूप और विषयपर स्पष्ट प्रकाश डालनेके बाद निर्विकल्प निश्चयनय और उसके विषयका निर्देश कर दिया था। इन नयोंके विषयमें कुछ लिखनेके लिए शेष नहीं रहने दिया था। इन नयोंका इस पद्धतिसे विवेचन किया गया था जिससे निश्चयनय भूतार्थ क्यों है और व्यवहारनय अभूतार्थ क्यों कहे गये हैं इसका स्पष्ट ज्ञान हो जाय। विषय गहन होते हुए भी उसे सरल करनेका प्रयत्न किया गया था।

अपने दूसरे दौरमें अपर पक्षने हमारे प्रथम उत्तरको पढ़कर उसे अपने प्रश्नका उत्तर नहीं माना है इसका हमें आश्चर्य है। वह हमसे क्या कहलाना चाहता था यह उसके द्वितीय दौरमें उपस्थित किये गये निरूपणसे स्पष्ट हो जाता है। इसके प्रारम्भमें उस पक्षने इधर-उधरकी कुछ बातोंका संकेतकर असद्भूत व्यवहारनयकी विषयभूत व्यवहार क्रियाओंपर प्रकाश डाला है और इन क्रियाओंके आधारपर निश्चयस्वरूप शुद्धात्माकी प्राप्ति अथवा मोक्षकी प्राप्ति बतलाई है।

फलस्वरूप हमें अपने दूसरे दौरमें उत्तर लिखते समय अपनी दृष्टिको प्रस्तुत प्रतिशंकामें वर्णित विषयका आगमानुसार स्पष्टीकरण करनेकी दिशामें ही विशेषरूपसे केन्द्रित रखना पड़ा। इसमें उन सब विषयोंका स्पष्टीकरण किया गया है जिनका निर्देश अपर पक्षने अपनी प्रस्तुत प्रतिशंकामें किया है।

\२. दो प्रश्न और उनका समाधान

तत्काल प्रतिशंका ३ के आधारसे विचार करना है। इसके प्रारम्भमें अपर पक्षने मूल प्रश्नको चार भागोंमें विभक्त करनेके बाद अपनी पुरानी शिकायतको पुनः दुहराया है। साथ ही हमने जिन ग्रन्थोंके प्रमाण दिये हैं उनमेंसे एक पुस्तकके कथनको आर्ष विरुद्ध बतलाकर लिखा है कि ‘ऐसी पुस्तकके वाक्योंको लिखकर व्यर्थ कलेवर बढ़ा दिया गया है। यदि ऐसा न किया जाता तो सुन्दर होता।’ अपर पक्ष किस पुस्तकको आर्ष विरुद्ध समझता है और क्यों समझता है इसका उसकी ओरसे कोई खुलासा नहीं किया गया। इससे मालूम पड़ता है कि उसकी ओरसे यह टीका आवेश वश ही की गई है। जिस पुस्तकका स्वाध्यायकर हजारों ही नहीं, लाखों नर-नारी अपना कल्याण करते हों उसे आवेशवश अकारण आर्षविरुद्ध घोषित करना अनर्थकर घटना ही मानी जायगी।

आगे अनेकान्तका स्वरूप लिखनेके बाद अपर पक्षने लिखा है-‘एक वस्तुमें विवक्षाभेदसे दो प्रतिपक्ष धर्म पाये जाते हैं, अतः उन दोनों धर्मोंमेंसे प्रत्येक धर्मकी विवक्षाको ग्रहण करनेवाला पृथक्-पृथक् एक-एक नय है।’

यह अपर पक्षके वक्तव्यका कुछ अंश है। इस परसे विचारणीय दो प्रश्न उद्भूत होते हैं-

\१. एक वस्तुमें विवक्षाभेदसे दो प्रतिपक्ष धर्म पाये जाते हैं, क्या ऐसा वस्तुका स्वरूप है ?

\२. क्या प्रत्येक धर्मकी विवक्षाको ग्रहण करना यह नय है ?

आगे इनका क्रमसे समाधान किया जाता है-

\१. किसी भी वस्तुमें कोई भी धर्म विवक्षा भेदसे नहीं रहा करता, क्योंकि प्रत्येक धर्म वस्तुका स्वरूप होता है और जो धर्म जिस वस्तुका स्वरूप होता है वह स्वतःसिद्ध होता है। प्रयोजनवश विवक्षामें एक धर्मको मुख्यकर और दूसरे धर्मको गौणकर व्यवहारकी प्रसिद्धिके लिए वस्तुकी सिद्धि करना अन्य बात है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए सर्वार्थसिद्धि अ० ५ सू० ३२ में लिखा है-

अनेकान्तात्मकस्य वस्तुनः प्रयोजनवशाद्यस्य कस्यचिद्धर्मस्य विवक्षया प्रापितं प्राधान्यमर्पितमुपनीतमिति यावत्। तद्विपरीतमनर्पितम्। प्रयोजनाभावात् सतोऽप्यविवक्षा भवतीत्युपसर्जनीभूतमनर्पितमित्यु-
च्यते। अर्पितं चानर्पितं चार्पितानर्पिते। ताभ्यां सिद्धेरर्पितानर्पितसिद्धेः, नास्ति विरोधः। तद्यथा-एकस्य देवदत्तस्य पिता पुत्रो भ्राता भागिनेय इत्येवमादयः सम्बन्धा जनकत्वजन्यत्वादिनिमित्ता न विरुध्यन्ते, अर्पणाभेदात्। पुत्रापेक्षया पिता, पित्रपेक्षया पुत्र इत्येवमादिः। तथा द्रव्यमपि सामान्यार्पणया नित्यम्, विशेषार्पणयाऽनित्यमिति नास्ति विरोधः। तौ च सामान्य-विशेषौ कथञ्चित् भेदाभेदाभ्यां व्यवहार-हेतू भवतः।

प्रयोजनवश अनेकान्तात्मक वस्तुके जिस किसी धर्मकी विवक्षा द्वारा प्राप्त हुई प्रधानताका नाम अर्पित है। अर्पित अर्थात् उपनीत यह इसका तात्पर्य है। उससे विपरीत अनर्पित है। प्रयोजन न होनेसे सत्‌की भी अविवक्षा होती है। उपसर्जनीभूतका नाम ही अनर्पित है। इन दोनोंका अर्पितं च अनर्पितं च अर्पितानर्पिते ऐसा द्वन्द्व समास है। उनसे होनेवाली सिद्धि ही अर्पितानर्पितसिद्धि है, इसलिए कोई विरोध नहीं है। यथा-एक देवदत्तके जनकत्व तथा जन्यत्व आदि निमित्तक पिता, पुत्र, भ्राता और भागनेय इत्यादि सम्बन्ध अर्पणाभेदसे विरोधको प्राप्त नहीं होते। पुत्रकी अपेक्षा पिता है, पिताकी अपेक्षा पुत्र है-इसी प्रकार और भी। उसी प्रकार द्रव्य भी सामान्यकी अर्पणाकी अपेक्षा नित्य है और विशेषकी अर्पणा की अपेक्षा अनित्य है। इसलिए कोई विरोध नहीं है। वे सामान्य और विशेष कथंचित् भेद और अभेदके द्वारा व्यवहारके हेतु होते हैं।

इस विषयमें तत्त्वार्थवार्तिक और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकका भी यही आशय है। आप्तमीमांसा कारिका ७५ पर दृष्टिपात करनेपर उसका भी यही आशय प्रतीत होता है। इस तथ्यको स्पष्टरूपसे समझनेके लिए अष्टसहस्रीका यह कथन ध्यानमें लेने योग्य है-

न हि कर्तृस्वरूपं कर्मापेक्षं कर्मस्वरूपं वा कर्त्रपेक्षम्, उभयासत्त्वप्रसंगात्। नापि कर्तृत्वव्यवहारः कर्मत्वव्यवहारो वा परस्परानपेक्षः, कर्तृत्वस्य कर्मनिश्चयावसेयत्वात्, कर्मत्वस्यापि कर्तृप्रतिपत्तिसमधिगम्यमानत्वात्।

कर्ताका स्वरूप कर्मसापेक्ष नहीं है तथा कर्मका स्वरूप कर्तृसापेक्ष नहीं है, क्योंकि इस प्रकार दोनोंके असत्त्वका प्रसंग प्राप्त होता है। किन्तु कर्तृत्वव्यवहार और कर्मत्व व्यवहार परस्पर निरपेक्ष भी नहीं है, क्योंकि कर्तृत्वका ज्ञान कर्मके निश्चयपूर्वक होता है। उसी प्रकार कर्मत्वका भी ज्ञान कर्ताके निश्चयपूर्वक होता है।

इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि जिस द्रव्यमें सत्-असत् आदि जितने धर्म हैं उनका स्वरूप स्वतःसिद्ध है। उनका व्यवहार परस्परकी अपेक्षासे होता है इतना अवश्य है और इस प्रकार परस्पर सापेक्षभावसे सिद्धि करनेवाला जो नय है वही व्यवहारनय है। अतएव अपर पक्षका यह लिखना आगम, अनुभव और तर्कके विरुद्ध है कि ‘एक वस्तुमें विवक्षाभेदसे दो प्रतिपक्ष धर्म पाये जाते हैं।’ किन्तु उसके स्थानमें यही निर्णय करना चाहिये कि प्रत्येक वस्तुमें जितने भी धर्म पाये जाते हैं उनका स्वरूप स्वतःसिद्ध होता है।

\२. दूसरा प्रश्न है कि ‘क्या प्रत्येक धर्मकी विवक्षाको ग्रहण करनेवाला नय है।’ समाधान यह है कि किसी विवक्षाको ग्रहण करनेवाला नय नहीं कहलाता, किन्तु नाना धर्मयुक्त वस्तुमें प्रयोजन वश एक धर्मद्वारा वस्तुको जाननेवाला श्रुतविकल्प नय कहलाता है। अपर पक्षने स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी जो २६४ वीं गाथा उद्धृत की है उससे भी यही सिद्ध होता है। उक्त गाथाका तात्पर्य लिखते हुए अपर पक्षने स्वयं इन शब्दोंको लिखकर हमारे उक्त अभिप्रायको स्वीकार किया है। उस पक्ष द्वारा लिपिबद्ध किये गये वे शब्द इस प्रकार है-‘कोई भी एक नय वस्तुके पूर्ण स्वरूपको नहीं कह सकता। नय तो एक धर्ममुखेन वस्तुका कथन करता है ।’ इतना अवश्य है कि उक्त वाक्यमें ‘नय तो’ पदके आगे ‘प्रयोजनवश’ या ‘विवक्षित’ पद लगा देना उपयुक्त प्रतीत होता है। इस परसे यह निश्चित हो जाता है कि अपर पक्षने नयका लक्षण करते हुए जो यह लिखा है-‘अतः उन दोनों धर्मोंमेंसे प्रत्येक धर्मकी विवक्षाको ग्रहण करनेवाला पृथक्-पृथक् एक-एक नय है ।’ वह ठीक नहीं है ।

अपर पक्षने ‘प्रत्येक वस्तु अनेकान्तात्मक है’ यह स्वीकार करके भी उसकी पुष्टिमें आचार्य अमृतचन्द्रका मात्र ‘परस्परविरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनमनेकान्तः’ इतना वचन उद्धृत किया है। किन्तु मूलभूत सिद्धान्तका सूचक प्रारम्भका समग्र वचन छोड़ दिया है। वह इस प्रकार है-

तत्र यदेव तत् तदेवातत् यदेवैकं तदेवानेकं यदेव सत् तदेवासत् यदेव नित्यं तदेवानित्यमित्येकवस्तुवस्तुत्वनिष्पादकं परस्परविरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनमनेकान्तः ।

जो तत् है वही अतत् है, जो एक है वही अनेक है, जो सत् है वही असत् है तथा जो नित्य है वही अनित्य है ऐसे एक वस्तुमें वस्तुत्वकी निपजानेवाली परस्पर विरुद्ध दो शक्तियोंका प्रकाशित होंना अनेकान्त है।

यहाँ ‘एक वस्तुमें वस्तुत्वको निपजानेवाली’ यह मूल सिद्धान्तको सूचित करनेवाला वचन है। अपर पक्षने इस वचनको छोड़कर अनेकान्तके स्वरूपपर इस ढंगसे प्रकाश डालनेकी चेष्टा की है जिससे अनेकान्तके स्वरूपपर दृष्टि न जाकर असद्भूत व्यवहारनयके विषयको विवक्षित एक वस्तुका धर्म सिद्ध किया जा सके। किन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि विवक्षित एक वस्तुके वस्तुत्वको निपजानेवाले परस्पर विरुद्ध दो धर्म ही एक वस्तुमें पाये जाते हैं। इससे स्पष्ट है कि एक वस्तुके किसी भी धर्मका दूसरी वस्तुमें अत्यन्ताभाव है। उदाहरणार्थ जिस जीवमें भव्यत्व शक्ति हो उसमें अभव्यत्व शक्तिका सद्भाव नहीं हो सकता। यदि इन दोनों शक्तियोंका अस्तित्व एक आत्मामें स्वीकार कर लिया जाय तो वस्तुके वस्तुत्वका ही नाश हो जायगा। शंका-समाधानके रूपमें इस विषयको स्पष्ट करते हुए धवला पु० १ पृ० १६७ में लिखा है-

अस्त्येकस्मिन्नात्मनि भूयसां सहावस्थानं प्रत्यविरुद्धानां सम्भवो नाशेषाणामिति चेत् ? क एवमाह समस्तानामप्यवस्थितिरिति, चैतन्याचैतन्यभव्याभव्यादिधर्माणामप्यक्रमेणैकात्मन्यवस्थितिप्रसंगात् । किन्तु येषां धर्माणां नात्यन्ताभावो यस्मिन्नात्मनि तत्र कदाचित्क्वचिदक्रमेण तेषामस्तित्वं प्रतिजानीमहे ।

शंका-जिन धर्मोंका एक आत्मामें एक साथ रहनेमें विरोध नहीं है, वे रहें, परन्तु सम्पूर्ण धर्म तो एक साथ एक आत्मामें नहीं रह सकते ?

समाधान-कौन ऐसा कहता है कि समस्त ही धर्मोंको अवस्थिति है। यदि समस्त धर्मोंकी एक साथ एक आत्मामें अवस्थिति मान ली जाय तो चैतन्य-अचैतन्य, भव्यत्व-अभव्यत्व आदिका भी एक साथ एक आत्मामें अवस्थितिका प्रसंग आ जायगा। इसलिए जिन धर्मोंका जिस आत्मामें अत्यन्ताभाव नहीं है उसमें क्वचित् कदाचित् अक्रमसे उनका अस्तित्व जानते हैं।

इसी तथ्यको और भी स्पष्ट करते हुए धवल पु० १ पृ० ३३५ में लिखा है-

नियमेऽभ्युपगम्यमाने एकान्तवादः प्रसजतीति चेत् ? न, अनेकान्तगर्भैकान्तस्य सत्त्वाविरोधात् ।

शंका-सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थानमें पर्याप्त ही होते हैं ऐसे नियमके स्वीकार करने पर एकान्तवादका प्रसंग आता है ? समाधान-नहीं, क्योंकि अनेकान्तगर्भ एकान्तका सत्त्व स्वीकार करने पर कोई विरोध नहीं आता।

ये आगमके दो प्रमाण हैं । इनसे सम्यक् अनेकान्तका और सम्यक् अनेकान्तगर्भ सम्यक् एकान्तका क्या स्वरूप है इस पर स्पष्ट प्रकाश पड़ता है । जो मात्र परस्पर विरोधी अनेक धर्मोंका एक आत्मामें सद्भाव स्वीकार कर उसे अनेकान्त कहते हैं उनका वह कथन किस प्रकार अपमार्थभूत है इस पर उक्त समग्र कथनसे सुन्दर प्रकाश पड़ता है । एक आत्मामें एक साथ परस्पर विरोधी ऐसे ही धर्मयुगल स्वीकार किये गये हैं जो वस्तुमें वस्तुत्वके निष्पादक हों । अतएव अपर पक्षने अनेकान्तका जो स्वरूप निर्देश किया है वह कैसे आगम विरुद्ध है यह ज्ञात हो जाता है ।

\३. निश्चय और व्यवहारनयके विषयमें स्पष्ट खुलासा

आगे अपर पक्षने नयके द्रव्यार्थिकनय और पर्यायार्थिकनय ये दो भेद करके द्रव्यार्थिकनयको निश्चयनय और पर्यायार्थिकनयको व्यवहारनय लिखा है । तथा इसकी पुष्टि समयसार गाथा ५६ की आत्मख्याति टीकासे की है । अब विचार यह करना है कि अपर पक्षने जो द्रव्यार्थिकनयको निश्चयनय और पर्यायार्थिकनयको व्यवहारनय लिखा है वह किस अपेक्षासे ठीक है और किस अपेक्षासे ठीक नहीं है । हमने अपने प्रथम उत्तरमें प्रयोजन विशेषको लक्ष्यमें रखकर समयसार आदि अध्यात्म ग्रन्थोंमें निश्चयनय और व्यवहारनयका जिस रूपमें स्वरूप निर्देश किया गया है उसका सुस्पष्ट खुलासा करनेके बाद उसके अन्तमें यह सूचना कर दी थी कि जहाँ पूर्वोक्त दृष्टिसे निश्चयनय व्यवहारनयका निरूपण किया गया हो उसे वहाँ उस दृष्टिसे, और जहाँ अन्य प्रकारसे निश्चयनय-व्यवहारनयका निरूपण हो वहाँ उसे उस प्रकारसे दृष्टिपथमें लेकर उसका निर्णय कर लेना चाहिए। लक्षणादि दृष्टिसे इनका कथन अन्यत्र किया ही है, इसलिए वहाँसे जान लेना चाहिए। किन्तु अपर पक्षने इस ओर ध्यान व देकर लगता है कि आगममें जितना भी द्रव्यार्थिकनयका कथन है उस सबको निश्चयनयका कथन मान लिया है और जितना भो पर्यायार्थिकनयका कथन है उस सबको व्यवहारनयका कथन मान लिया है । आचार्य अमृतचन्द्रने समयसार गाथा ५६ में जो निश्चयनय-व्यवहारनयका स्वरूप निर्देश किया है वह सब मात्र समयसारकी कथनीको ध्यानमें रखकर ही लिखा है, इसलिए उसे उक्त प्रकारसे समस्त द्रव्यार्थिकनयके और समस्त पर्यायार्थिकनयके कथनपर लागू करना उचित नहीं है । नयचक्रसंग्रह पृ० ६९ में यह गाथा आई है-

णिच्छय-ववहारणया मूलिमभेया णयाण सव्वाणं ।
णिच्छयसाहणहेउं पज्जय-दव्वत्थियं मुणह ॥१८३॥

सब नयोंके मूल भेद दो हैं-निश्चयनय और व्यवहारनय। उनमेंसे निश्चयकी सिद्धिका हेतु पर्यायार्थिकनय और द्रव्यार्थिकनयको जानो ॥१८३॥

इसके बाद पुनः वहाँ लिखा है-

दो चेव य मूलणया भणिया दव्वत्थि-पज्जयत्थिगया ।
अण्णे असंख-संखा ते तब्भेया मुणेयव्वा ॥१८४॥

द्रव्यार्थिकनय और पर्यायार्थिकनय ये दो मूल भेद कहे गये हैं । अन्य जितने संख्यात-असंख्यात नय हैं वे सब उन दोनों नयोंके भेद जानने चाहिए॥ १८४ ॥

इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आगममें द्रव्यार्थिकनय और पर्यायार्थिकनय ये दो भेद तथा उनके उत्तर भेद भिन्न दृष्टिसे किये गये हैं और समयसार आदिमें निश्चयनय और व्यवहारनय ये दो भेद भिन्न दृष्टिसे किये गये हैं। समयसार आदि अध्यात्मशास्त्रोंमें क्या दृष्टि अपनाई गई है इसका स्पष्टीकरण नयचक्रसंग्रह पृ० ८८ की इस गाथासे हो जाता है-

तच्चं पि हेयमियरं हेयं खलु भणिय ताव परदव्वं ।
णियदव्वं पि य जाणसु हेयादेयं च णयजोगे ॥२६०॥

तत्त्व हेय और उपादेयके भेदसे दो प्रकारका है। पर द्रव्य तो नियमसे हेय ही कहा है। निज द्रव्यको भी नययोगसे हेय और उपादेय जानो ॥२६०॥

निज द्रव्यमें क्या हेय है और क्या उपादेय है इसका खुलासा करते हुए वहीं लिखा है-

मिच्छा-सरागभूयो हेयो आदा हवेइ णियमेण ।
तव्विवरीयो झेओ णायव्वो सिद्धिकामेण ॥२६१॥

मिथ्यात्व और सरागरूप आत्मा नियमसे हेय है। सिद्धिके इच्छुक पुरुषोंको उससे विपरीत आत्मा ध्येय जानना चाहिए ॥२६१॥

इसी तथ्यको समयसारमें इन शब्दोंमें स्पष्ट किया है-

पुग्गलकम्मं रागो तस्स विवागोदओ हवदि एसो ।
ण दु एस मज्झ भावो जाणगभावो हु अहमिक्को ॥१९९॥

राग पुद्गलकर्म है, उसका विपाकरूप उदय यह है, यह मेरा भाव नहीं, मैं तो निश्चयसे एक ज्ञायकभाव हूँ ॥१९९॥

इसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

अस्ति किल रागो नाम पुद्गलकर्म, तदुदयविपाकप्रभवोऽयं रागरूपो भावः, न पुनर्मम स्वभावः। एष टंकोत्कीर्णैकज्ञायकभावोऽहम्।

वास्तवमें राग पुद्गलकर्म है, उसके उदयके विपाकसे उत्पन्न हुआ यह रागभाव है। यह मेरा स्वभाव नहीं है। मैं तो यह टंकोत्कीर्ण एक ज्ञायकभाव हूँ।

इससे अध्यात्ममें निश्चयनयका विषय क्या है यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है। नयचक्रसंग्रहमें द्रव्यार्थिक नयके जिन दस भेदोंका निर्देश किया है उनमें एक परम भावग्राही द्रव्यार्थिकनय भी है। उसका स्वरूप निर्देश करते हुए वहाँ लिखा है-

गेण्हइ दव्वसहावं असुद्ध-सुद्धोवयारपरिचत्तं ।
सो परमभावगाहो णायव्वो सिद्धिकामेण ॥१९९॥

जो अशुद्ध, शुद्ध और उपचारसे रहित मात्र द्रव्यस्वभावको ग्रहण करता है, शुद्धिके इच्छुक पुरुषों द्वारा वह परम भावग्राही द्रव्यार्थिक नय जानने योग्य है ॥१९९॥

इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अध्यात्म निश्चयनयमें आगममें प्रतिपादित द्रव्यार्थिक नयके सभी भेदोंका अन्तर्भाव नहीं होता। मोक्षमार्गकी दृष्टिसे उसमें तो मात्र ज्ञायकस्वभाव आत्माकी अपेक्षा परम भावग्राही द्रव्यार्थिकनयका ही ग्रहण हुआ है। इसके सिवा द्रव्यार्थिकनय, पर्यायार्थिकनय और उपचारनयके जितने भी भेद-प्रभेद हैं उन सबका व्यवहारनयमें अन्तर्भाव किया गया है । इतना अवश्य है कि जहाँ रागादि अज्ञानभावोंका आत्माको कर्ता कहा गया है वहाँ वह कथन अज्ञानभावसे उपयुक्त आत्माकी अपेक्षा ही किया गया है । ज्ञानभावसे तन्मय होकर परिणत आत्मा तो एकमात्र ज्ञानभावका ही कर्ता है । यहाँ ज्ञानभाव स्वभावके अर्थमें गृहीत हुआ है इतना विशेष जानना चाहिए ।

इतने विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अपर पक्षने जो द्रव्यार्थिकनयमात्रको निश्चयनय और पर्यायार्थिकनयमात्रको व्यवहारनय कहा है वह ठीक नहीं है । पंचास्तिकाय गाथा ४ में नयोंके जो दो भेद द्रव्यार्थिकनय और पर्यायार्थिकनय किये गये हैं उनका उस प्रकार भेद करनेका प्रयोजन भिन्न है । वहाँ पदार्थ व्यवस्थाकी दृष्टि मुख्य है और यहाँ नयोंके निश्चयनय और व्यवहारनय इन भेदोंके करनेमें मोक्षमार्गकी दृष्टि मुख्य है । परमागममें यथास्थान प्रयोजनको ध्यानमें रखकर ही नयोंकी योजना की गई है । ऐसा एक भी नय या उपनयका भेद नहीं है जिसको प्रयोजनके बिना योजना की गई हो । उदाहरणार्थ चौबीस तीर्थंकरोंमें किसीको पीतवर्ण, किसीको शुक्लवर्ण और किसीको हरितवर्ण आदि लिखा है सो यह जिस प्रयोजनको ध्यानमें रखकर लिखा गया है उसी प्रयोजनको ध्यानमें रखकर उसको स्वीकार करनेवाले असद्भूत व्यवहारनयकी भी योजना की गई है । यहाँ असद्भूतका अर्थ स्पष्ट है, जीवमें वर्ण नहीं है, जीव उसको बनानेवाला भी नहीं है । फिर भी इसे जीवका कहना यह असद्भूत व्यवहारवचन है । इसी प्रकार सर्वत्र प्रयोजनको ध्यानमें रखकर नयोंका विचार कर लेना चाहिए । यहाँ अपर पक्षने समयसार गाथा १४१ तथा समयसार कलश १६९ से १८९ के आधारसे जिन विविध धर्मयुगलोंकी चरचा की है उनके विषयमें भी यही न्याय लागू कर लेना चाहिए । कौन धर्म जीवमें सद्भूत है और कौन सद्भूत नहीं है ऐसा विचार करनेसे एक द्रव्यकी स्वरूपस्थिति और दो द्रव्योंका पार्थक्य स्पष्ट प्रतिभासित होजाता है । ऐसा यथार्थ ज्ञान कराना ही नयोंका प्रयोजन है । एक द्रव्यके गुण-धर्मको दूसरे द्रव्यका स्वधर्म बतलाना यह नयोंका प्रयोजन नहीं है । यह नयज्ञानकी अपनी विशेषता है कि वह उपचरित धर्मको उपचरितरूपसे, विभावधर्मको विभावरूपसे और स्वभावधर्मको स्वभावरूपसे ही प्रसिद्ध करता है ।

जिस वस्तुका जो धर्म हो उसकी उसमें नास्ति कही जाय यह तो हमारा कहना है नहीं । किन्तु जिस वस्तुका जो धर्म ही न हो उसकी उसमें भूतार्थ-यथार्थरूपसे सिद्धि की जाय इसे हम ही क्या अपर पक्ष भी स्वीकार नहीं कर सकता । जैसे द्रव्यकर्मकी अपेक्षा जीवमें बद्धस्पृष्टता धर्म नहीं है, क्योंकि व्यवहारसे जिस प्रकारकी बद्धस्पृष्टता पुद्गलकी पुद्गलके साथ बनती है वैसी बद्धस्पृष्टता मूर्त पुद्गलकी अमूर्त जीवके साथ नहीं बन सकती । इस तथ्यको स्पष्ट करते हुए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें लिखा है-

जीव-कर्मणोः बन्धः कथमिति चेत् ? परस्परं प्रदेशानुप्रवेशान्न त्वेकत्वपरिणामात्, तयोरेकद्रव्यानुपपत्तेः । ‘चेतनाचेतनावेतौ बन्धं प्रत्येकतां गतौ’ इति वचनात्तयोरेकत्वपरिणामहेतुर्बन्धोऽस्तीति चेत् न, उपसर्पतस्तदेकत्ववचनात् । भिन्नौ लक्षणतोऽत्यन्तमिति द्रव्यभेदाभिधानात् ।

शंका-जीव और कर्मका बन्ध कैसे है ?

समाधान-परस्पर प्रदेशोंके अनुप्रवेशसे उनका बन्ध है, एकत्व परिणामरूपसे उनका बन्ध नहीं है, क्योंकि वे दोनों एक द्रव्य नहीं हो सकते ।

शंका-‘चेतन और अचेतन ये दोनों बन्धके प्रति एकपनेको प्राप्त हैं’ इस प्रकारका वचन होनेसे उन दोनोंका एकत्व परिणामका हेतुभूत बन्ध है ? समाधान-नहीं, क्योंकि वे दोनों परस्पर एक दूसरेका उपसर्पण करते हैं, इसलिए आगममें उन्हें बन्धकी अपेक्षा एक कहा है। वास्तवमें वे दोनों लक्षणकी अपेक्षा अत्यन्त भिन्न हैं इस प्रकार उन दोनोंमें द्रव्यभेद कहा है।

यह आगम वचन है। इससे सिद्ध है कि जीवमें कर्म बद्धस्पृष्ट है यह कथन उपचरित ही है। यह निराधार कल्पना भी नहीं है, क्योंकि दूध और पानीके समान संसार अवस्थामें ज्ञानावरणादि परिणामसे परिणत कर्म राग-द्वेषादि परिणामसे परिणत जीवके और राग-द्वेषादि परिणामसे परिणत जीव ज्ञानावरणादि परिणामसे परिणत कर्मके प्रति उपसर्पण करते हुए देखे जाते हैं। इसे ही आचार्य यहाँ ‘एकत्वपरिणाम’ पदसे व्यवहृत कर रहे हैं। जीव और कर्मका इससे भिन्न अन्य कोई एकत्वपरिणाम बन नहीं सकता। समयसार गाथा १४ की टीकामें आचार्य अमृतचन्द्रने ‘भूतार्थ’ पद द्वारा जिस बद्धस्पृष्टताका स्पष्टीकरण किया है वह यही है, अन्य नहीं। देखो, इस रूपसे जो कोई भव्य बद्धस्पृष्टताको जानेगा वह लक्षणभेदसे दोनोंको भिन्न-भिन्न भी अवश्य जानेगा। और जो कोई भव्य जीव लक्षणभेदसे दोनोंको भिन्न-भिन्न जानेगा उसकी दृष्टि स्वभावरूप तन्मय होकर परिणमे बिना रह ही नहीं सकती।

आचार्य कहते हैं कि जीवमें कर्म बद्ध है ऐसा विकल्प भी रागके उत्थान पूर्वक होनेसे चेतन आत्माका निर्मल परिणाम नहीं है और उसी प्रकार जीवमें कर्म अबद्धस्पृष्ट है ऐसा विकल्प भी रागके उत्थानपूर्वक होनेसे चेतन-आत्माका निर्मल परिणाम नहीं है। ये दोनों ही नयपक्ष हैं। जो आत्मामें अपने-अपने पक्षकी प्रसिद्धि करते हैं। आत्मामें कौन धर्म उपचरित रूपसे क्यों स्वीकार किया गया है और कौन धर्म उसी आत्माके पर्यायस्वभावको प्रसिद्ध करता है और इसी प्रकार कौन धर्म उसी आत्माके द्रव्य स्वभावको प्रसिद्ध करता है, नय दृष्टिसे इसे पृथक्-पृथक् जानकर अनेकान्तस्वरूप आत्माकी प्रसिद्धि करना अन्य बात है। किन्तु उनमेंसे उपचरित धर्मको स्वीकार करनेवाले और पर्याय धर्मको स्वीकार करनेवाले विकल्पको दूरसे ही त्यागकर तथा द्रव्यस्वभावको स्वीकार करनेवाले विकल्पमें भी हेय बुद्धि रखते हुए अपनेमें निर्विकल्प साक्षात् समयसारस्वरूप आत्माकी प्रसिद्धि करना अन्य बात है। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर समयसार गाथा १४२ की आत्मख्याति टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

यः किल जीवे बद्धं कर्मेति यश्च जीवेऽबद्धं कर्मेति विकल्पः स द्वितयोऽपि हि नयक्षप। य एवैनमतिक्रामति स एव सकलविकल्पातिक्रान्तः स्वयं निर्विकल्पैकविज्ञानघनस्वभावो भूत्वा साक्षात्समयसारः सम्भवति।

‘जीवमें कर्म बद्ध हैं’ ऐसा विकल्प तथा ‘जीवमें कर्म अबद्ध हैं’ ऐसा विकल्प ये दोनों ही नयपक्ष हैं। जो नियमसे उभय पक्षका अतिक्रम करता है वह समस्त विकल्पोंका अतिक्रम करके समस्त विकल्पोंसे अतिक्रान्त होकर स्वयं निर्विकल्प एक विज्ञानघनस्वभावरूप होता हुआ साक्षात् समयसार होता है।

अनेकान्तस्वरूप आत्माको स्वीकार करके निर्विकल्प विज्ञानघनस्वभाव आत्माकी प्रसिद्धि कैसे होती है यह बतलाना समयसार गाथा १४१ आदिका प्रयोजन है। ६९ से लेकर ८९ तकके कलशोंकी रचना भी इसी प्रयोजनको ध्यानमें रखकर हुई है। यहाँ उनकी रचनाका अन्य प्रयोजन नहीं है। अनेकान्तस्वरूप वस्तुकी प्रसिद्धिके कालमें सत्-असत् आदि दो-दो धर्मयुगलोंमेंसे एक-एक धर्मद्वारा वस्तुकी प्रसिद्धि करनेवाला एक-एक नय सापेक्षभावसे अपने-अपने विषयभूत धर्मद्वारा वस्तुकी प्रसिद्धि करे इसका निषेध कौन करता है। आचार्य समन्तभद्रने 'निरपेक्षा नया मिथ्या सापेक्षा वस्तु तेऽर्थकृत् ॥१०८॥ वचन इसी अभिप्रायसे लिखा है। जिसका अनेकान्तस्वरूप वस्तुकी सिद्धि करना मुख्य प्रयोजन है वह यदि नय दृष्टिको मुख्य कर तत्स्वरूप वस्तुकी सिद्धि करना चाहता है तो उसे इसी मार्गका अवलम्बन लेना होगा। इसमें सन्देह नहीं।

किन्तु जो रागादि विभावभावों और बद्धस्पृष्टत्वादि उपचरित भावोंसे मुक्त अपने आत्माकी प्रसिद्धि करना चाहता है उसे उक्त मार्गपर न चलकर स्वभावके अवलम्बनको ही सर्वस्व मानना होगा : यह है समयसारके कथनका प्रयोजनभूत तात्पर्य । उसमें निश्चयनयको प्रतिषेधकस्वभाव और सद्भूत-असद्भूत दोनों व्यवहारनयोंको प्रतिषेध्यस्वभाव ( समयसार गाथा २७२ में ) क्यों कहा यह स्पष्ट हो जाता है । इसका अर्थ उन दोनों नयोंके विषयकी अस्वीकृति नहीं है । यदि ऐसा होता तो आचार्य मात्र एक जीवपदार्थका ही विवेचन करते, शेष अजीवादि आठ पदार्थोंका विवेचन ही नहीं करते और न ही आचार्य अमृतचन्द्र 'नवतत्त्वगतत्वेऽपि यदेकत्वं न मुञ्चति ( स० क० ७ ) यह वचन ही लिखते । स्पष्ट है कि ऐसा लिखकर उक्त दोनों आचार्योंने अनेकान्तस्वरूप वस्तुको अपनी दृष्टिमें रखा है, उसका निषेध नहीं किया । अपर पक्षके ‘जो नय परपक्षका निराकरण नहीं करते हुए ही अपने पक्षके अस्तित्वका निश्चय करनेमें व्यापार करते हैं उनमें समीचीनता पाई जाती है ।’ इस कथनकी सार्थकता इस दृष्टिसे है । उसे हम अस्वीकार नहीं करते । हम ही क्या कोई भी व्यक्ति अस्वीकार नहीं कर सकता ।

किन्तु आत्मामें मोक्षमार्गकी प्रसिद्धि निश्चयनय ( निश्चयनयके विषय )के अवलम्बनसे ही हो सकती है । न तो प्रमाणके अवलम्बनसे होती है और न ही व्यवहारके अवलम्बनसे होती है । यही कारण है कि मोक्षमार्गमें इसीको मुख्यता दी गई है । अतः अन्य सब हेय है, स्वभावका अवलम्बन ही उपादेय है, क्योंकि स्वभावके अवलम्बन द्वारा तन्मय होकर परिणत होना ही मुख्य कार्य है, अतः निश्चयनय प्रतिषेधक स्वभाववाला होनेसे अन्य सबका प्रतिषेध करता है यह सिद्ध हो जाता है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए पद्मनन्दिपंचविंशतिका निश्चयपंचाशत् अधिकारमें लिखा है-

बद्धं पश्यन् बद्धो मुक्तं मुक्तो भवेत्सदात्मानम् ॥
याति यदीयेन पथा तदेव पुरमश्नुते पान्थः ॥४८॥

जो जीव सदा आत्माको कर्मसे बद्ध देखता है वह कर्मबद्ध ही रहता है, किन्तु जो उसे मुक्त देखता ( अनुभवता ) है वह मुक्त हो जाता है । ठीक है-पथिक जिस नगरके मार्गसे जाता है उसी नगरको वह प्राप्त होता है ॥४८॥

आशय यह है कि जैसे बम्बई और कलकत्ता जानेवाले दोनों मार्ग अपनी-अपनी स्थितिमें सही हैं, जो बम्बई जाना चाहता है उसके लिए कलकत्ताका मार्ग हेय होनेसे निषिद्ध है और बम्बईका मार्ग उपादेय होनेसे उसका निषेध करनेवाला है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए ।

‘सम्यग्दृष्टि जीव यह नय सच्चा है और यह नय झूठा है ऐसा विभाग नहीं करते’ यह ठीक है । किन्तु यह नय उपचरित धर्मद्वारा वस्तुका विषय करता है और यह नय जिस वस्तुका जो धर्म है उस द्वारा ही उस वस्तुका विषय करता है ऐसा विभाग तो करते हैं, अन्यथा मिट्टीके कर्तृत्व धर्मको कुम्भकारका स्वीकार कर लेनेपर मिट्टी और कुम्भकारमें एकत्व प्राप्त होनेसे पदार्थ व्यवस्था ही नहीं बन सकती । यदि कहा जाय कि मिट्टीका कर्तृत्व धर्म भी घटकार्यको करता है और कुम्भकारका कर्तृत्व धर्म भी उसी घटकार्यको करता है तो एक कार्यके दो कर्ता मानने पड़ते हैं जो जिनागमके विरुद्ध है । अतः जिस रूपमें जिस नयका जो विषय है उस रूपमें उसे स्वीकार करनेवाला हो वह नय सत्य है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।

इस प्रकार अन्य-चर्चित विषयोंके साथ परमागममें निश्चयनय और व्यवहारनयका किस रूपमें विवेचन हुआ है इसका संक्षेपमें स्पष्टीकरण किया ।

\४. समयसार गाथा १४३ का यथार्थ तात्पर्य

समयसार गाथा १४३ में ‘जो प्रमाण, नय और निक्षेपके समस्त विकल्पोंसे मुक्त होकर परमात्मा, ज्ञानात्मा, प्रत्यग्ज्योति, आत्मख्यातिरूप अनुभूतिमात्र समयसार हो जाता है वह दोनों नयोंके कथनको जानता तो है परन्तु किसी नयपक्षको ग्रहण नहीं करता अर्थात् समस्त नय विकल्पोंसे मुक्त हो जाता है ।’ यह कहा गया है, किन्तु अपर पक्ष इस गाथाका इस रूपमें अर्थ करता है जिससे यह मालूम पड़े कि इस गाथा द्वारा आचार्यने दोनों नयोंके कथनको एक समान माननेकी प्रेरणा की है । इसे हम उस पक्षका अति-साहस ही कहेंगे । समयसारकी वह गाथा इस प्रकार है-

दोण्ह वि णयाण भणियं जाणइ णवरं तु समयपडिवद्धो ।
ण दु णयपक्खं गिण्हदि किंचि वि णयपक्खपरिहीणो ॥१४३॥

समयप्रतिबद्ध अर्थात् चित्स्वरूप आत्माको अनुभवनेवाला जीव दोनों नयोंके कथनको मात्र जानता ही है। परन्तु वह नयपक्षसे अर्थात् नयोंके विकल्पसे रहित होता है, इसलिए नयपक्षको नहीं ग्रहण करता ॥१४३॥

उक्त गाथाका यह सही अर्थ है । किन्तु अपर पक्षने अपने अभिप्रायकी पुष्टिके लिये इसका यह अर्थ किया है-

जो पुरुष आत्मासे प्रतिबद्ध है अर्थात् आत्माको जानता है वह दोनों ही नयोंके कथनको केवल जानता है परन्तु नयपक्षको कुछ भी ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वह नयोंके पक्षसे रहित है अर्थात् किसी एक नयका पक्ष ( आग्रह ) नहीं करना चाहिए ।

इस प्रकार ये दो अर्थ हैं । अब इनमेंसे कौन ठीक है इसका निर्णय करना है । श्री पद्मनन्दि आचार्य पद्मनन्दिपंचविंशतिकाके निश्चयपंचाशत् में लिखते हैं-

बद्धो वा मुक्तो वा चिद्रूपो नयविचारविधिरेषः ।
सर्वनयपक्षरहितो भवति हि साक्षात्समयसारः ॥५३॥

चैतन्य आत्मा बद्ध है अथवा मुक्त है यह नयविचारका विधान है । किन्तु जो साक्षात् समयसार है वह सब नयपक्षोंसे रहित है ॥५३॥

यहाँ पर ‘नयपक्ष’ शब्दका अर्थ विकल्पमात्रसे है इसका स्पष्टीकरण अगले श्लोकसे हो जाता है-

नय-निक्षेप-प्रमितिप्रभृतिविकल्पोज्झितं परं शान्तम् ।
शुद्धानुभूतिगोचरमहमेकं धाम चिद्रूपम् ॥५४॥

जो नय, निक्षेप और प्रमाण आदि विकल्पोंसे रहित है, उत्कृष्ट है, शान्त है, एक है और शुद्ध अनुभूतिरूप है वही चैतन्यधाम आत्मा मैं हूँ ॥५४॥

इससे स्पष्ट है कि अपर पक्षने उक्त गाथाका जो आशय लिया है वह ठीक नहीं है । यदि वह उक्त गाथाओंकी दोनों संस्कृत टीकाओं पर दृष्टिपात कर लेता तो वह उस परसे ऐसा विपरीत आशय कभी भी ग्रहण नहीं करता ऐसा हमारा विश्वास है ।

इसमें सन्देह नहीं कि मोक्षमार्गकी दृष्टिसे विकल्पमात्र हेय है। परन्तु उसमें उतना विशेष है कि व्यवहारनय और व्यवहारनयका विषय ये दोनों तो सर्वथा हेय हैं ही, क्योंकि जिस प्राणीकी इनमें उपादेय बुद्धि होती है वह तो मोक्षमार्गमें प्रयोजनभूत कथा सुननेका भी पात्र नहीं। किन्तु सविकल्प निश्चयनय और उसके विषयमें इतना विवेक है कि निश्चयनय स्वयं एक विकल्प होनेसे वह तो हेय है, परन्तु उसका विषयभूत आत्मा उदादेय है, क्योंकि तत्स्वरूप अनुभूतिका नाम ही समयसार है। अतः उक्त गाथा द्वारा आचार्य यह वतला रहे हैं कि समयप्रतिबद्ध अर्थात् ज्ञायकस्वरूप आत्मानुभूतिरूपसे परिणत आत्मा दोनों नयोंके कथनरूप द्रव्य-पर्यायको मात्र जानता तो है परन्तु उनके विकल्परूपसे नहीं परिणमता। यहाँ अपर पक्ष कह सकता है कि यदि ऐसी वात है तो निश्चयनय उपादेय है ऐसा कथन क्यों किया जाता है? समाधान यह है कि अध्यात्ममें निश्चयनय और उसके विषयमें अभेदको स्वीकार करके ही यह कथन किया जाता है।

इतने विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अपर पक्षने समयसार गाथा १४३ का जो आशय लिया है वह ठीक नहीं है।

\५. विविध विषयोंका स्पष्टीकरण

अव इस वातका विचार करना है कि जहाँ व्यवहारको बहुजीवानुग्रहकारो या पूज्य आदि कहा है उसका क्या तात्पर्य है?

\१. इसके लिए सर्वप्रथम हम जयधवला पु०१ पृ० ८ का ‘ण च ववहारणओ चप्पलओ’ यह उदाहरण लेते हैं। आचार्य वीरसेनने यह वचन गौतम स्थविरने मंगल क्यों किया इस तथ्यके समर्थनमें लिखा है। विचारणीय यह है कि यदि मोक्षमार्गमें निश्चयनय और व्यवहारनय समानरूपसे पूज्य होते तो उनके चित्तमें ‘व्यवहारनय चपल नहीं है’ इस प्रकारका वचन लिखकर उसके समर्थन करनेका विकल्प ही नहीं उठना चाहिए था। हमने यथासम्भव उपलब्ध पूरे जिनागमका आलोडन किया है, परन्तु इस प्रकारका विकल्प निश्चयनयके विषयमें आचार्यने उठाया हो और फिर उसका समाधान किया हो यह हमारे देखनेमें अभी तक नहीं आया और न ही अपर पक्षने ही कोई ऐसा आगमप्रमाण उपस्थित किया जिससे उक्त वातका समर्थन होता हो। स्पष्ट है कि आचार्य वीरसेनने 'ण च ववहारणओ चप्पलओ’यह वचन व्यवहारनयसे अभिप्राय-विशेषको ध्यानमें रख कर ही लिखा है। वह अभिप्राय विशेष क्या हो सकता है इसका समाधान यह है कि वे इस वचन द्वारा निश्चयमूलक व्यवहारका समर्थन कर रहे हैं। ऐसा व्यवहार जो अन्तरंगमें निश्चयको लिये हुए हो साधकके सविकल्प अवस्थामें होता ही है। आचार्य उक्त वचन द्वारा ऐसे व्यवहारको बहुजीवानुग्रहकारी लिखकर उसका समर्थन कर रहे हैं, कोरे व्यवहारका नहीं। इसका आशय यह है कि सविकल्प अवस्थामें साधकके देव-गुरु-शास्त्रकी भक्ति-वन्दनारूप, पाँच अणुव्रत-महाव्रतरूप व्यवहार अवश्य होता है। किन्तु अन्तरंगमें वह निश्चयस्वरूप परिणतिको ही उस अवस्थामें उपादेय मानता रहता है। गुणस्थान परिपाटीसे आगे बढ़नेका यदि कोई मार्ग है तो एकमात्र यही मार्ग है, इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर आचार्य अमृतचन्द्रने समयसारकलशमें लिखा भी है-

भेदविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धा ये किल केचन । अस्यैभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन॥१३१॥

जो कोई सिद्ध हुए हैं वे भेदविज्ञानसे सिद्ध हुए हैं और जो कोई बँधे हैं वे उसीके अभावसे बँधे हैं ।

वीरसेन स्वामी आत्मज्ञानी महापुरुष थे । भला उन्हें उक्त वचन लिखते समय आगमके इस मूल अभिप्रायका विस्मरण कैसे हो सकता था । यदि अपर पक्ष इस वचनके प्रकाशमें उक्त वचनका अर्थ करेगा तो उसे यह समझनेमें देर नहीं लगेगी कि निश्चयमूलक सम्यक् व्यवहारको ध्यानमें रख कर ही उक्त वचन लिखा गया है । जैसा कि उनके इस कथनसे भले प्रकार समर्थन होता है-

पुण्णकम्मबंधत्थीणं देसव्वयाणं मंगलकरणं जुत्तं ण मुणीणं कम्मक्खयकंक्खुवाणमिदि ण वोत्तुंजुत्तं, पुण्णबंधहेउत्तं पडि विसेसाभावादो, मंगलस्सेव सरागसंजमस्स विपरिच्चागपसंगादो ।

यदि कहा जाय कि पुण्यकर्मके बाँधनेके इच्छुक देशव्रतियोंको मंगल करना युक्त है, किन्तु कर्मोंके क्षयके इच्कुक मुनियोंको मंगल करना युक्त नहीं है, सो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि पुण्यबन्धके हेतुपनेकी अपेक्षा उनमें कोई विशेषता नहीं है । अन्यथा मंगलके समान उनके सरागसंयमके भी त्यागका प्रसंग प्राप्त होता है ।

यह वचन बड़ा महत्त्व रखता है । इसका प्रारम्भ इस ढंगसे किया गया है जिससे यह मालूम पड़ता है कि देशव्रती पुण्यकर्म बाँधनेके इच्छुक होते हैं। किन्तु इस वचनका समाधान जिस ढंगसे किया गया है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि चाहे वीतरागी मुनि हों या देशव्रती, अन्तरंग अभिप्राय दोनोंका एक ही प्रकारका होता है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार वीतराग साधु पुण्यबन्धके अभिप्रायवाले नहीं होते वैसे देशव्रती भी नहीं होते । इस वचनसे जिन तथ्योंपर स्पष्ट प्रकाश पड़ता है वे ये हैं-

(क) वीतरागी मुनि और देशव्रती दोनों ही पुण्यबन्धके अभिप्रायवाले नहीं होते ।

(ख) उनका लक्ष्य स्वभावप्राप्ति रहता है ।

(ग) जितने अंशमें स्वभावप्राप्ति होती है, कर्मक्षपणा उतने ही अंशमें होती है ।

(घ) देशव्रत या सरागसंयम आदि कर्मक्षपणाके हेतु न होकर पुण्यबन्धके ही हेतु हैं ।

(ङ) आचार्य वीरसेनने उक्त ‘ण च ववहारणओ चप्पलओ’ इत्यादि वचन व्यवहारनयकी मुख्यतासे लिखा है जो अपने साथ होनेवाले निश्चयकी क्या महिमा है इसकी प्रसिद्धि करता है । अन्यके कार्यको अन्यका कहना यह उपचरित व्यवहारका मुख्य लक्षण है ।

\२. अपर पक्षने दूसरा उद्धरण पं० नं० पं० वि० के निश्चयपंचाशत्का दिया है । किन्तु इस वचनमें आचार्यने स्वयं इस तथ्यको स्वीकार कर लिया है कि जिसके द्वारा निश्चयकी प्रसिद्धि हो, व्यवहार उसीका नाम है और इसी कारण व्यवहारनयसे उन्होंने इसे पूज्य कहा है । वस्तुतः यह श्लोक समयसार गाथा ८ के प्रकाशमें लिखा गया है । अतएव इस वचनके आशयको ग्रहण करते समय आचार्य अमृतचन्द्रके इस कथनको सदा ध्यानमें रखना चाहिए-

एवं म्लेच्छस्थानीयत्वाज्जगतो व्यवहारनयोऽपि म्लेच्छभाषास्थानीयत्वेन परमार्थप्रतिपादकत्वादुपन्यसनीयः, अथ च ब्राह्मणो न म्लेच्छितव्य इति वचनाद् व्यवहारनयो नानुसर्तव्यः ।

इस प्रकार जगत् म्लेच्छ स्थानीय होनेसे और व्यवहार नय भी म्लेच्छभाषास्थानीय होनेसे वह परमार्थको कहनेवाला है, इसलिए व्यवहार नय स्थापित करने योग्य है । किन्तु ब्राह्मणको म्लेच्छ नहीं हो जाना चाहिए इस वचनसे वह (व्यवहारनय) अनुसरण करने योग्य नहीं है-यह सिद्ध होता है ।

शंका १६ और उसका समाधान ‘व्यवहारका विषय एक द्रव्यकी पर्याय है’ यह लिखकर अपर पक्षने भेद विवक्षामें मात्र सद्भूत व्यवहारका निर्देश किया है। किन्तु एक असद्भूत व्यवहार भी है जिसका विषय मात्र उपचार है इसे अपर पक्ष भुला देता है। अपर पक्षने यहाँपर पद्मनन्दिपंचविंशतिकाके जिस वचनको उद्धृत किया है उसमें ‘मुख्योपचारविवृत्तिं’ पद आया है जिससे निश्चयके साथ दोनों प्रकारके व्यवहारकी सूचना मिलती है। यदि वह उसमें आये हुए ‘उपचार’ पदसे केवल सद्भूत व्यवहारको ही स्वीकार करता है तो हम पूछते हैं कि वह ‘जीवित शरीरकी क्रियासे धर्म होता है’ इस कथनको क्यों नहीं त्याग देता। उसे चाहिए कि वह यह स्पष्ट शब्दोंमें घोषणा कर दे कि जीवित शरीरकी क्रियासे त्रिकालमें धर्म नहीं हो सकता। और साथ ही उसे यह भी घोषणा स्पष्ट शब्दोंमें कर देनी चाहिए कि एक द्रव्यका परिणाम दूसरे द्रव्यका कार्य अणुमात्र भी नहीं कर सकता। इतना ही क्यों उसे तो उक्त वचनके आधारसे यह भी घोषित कर देना चाहिए कि जितना भी व्यवहार है वह मोक्षप्राप्तिका यथार्थ हेतु तो त्रिकालमें नहीं है। उससे मात्र निश्चयका ज्ञान होता है, इसलिए उसे आगममें स्थान मिला हुआ है।

‘पर्यायोंका समूह द्रव्य है अथवा गुण और पर्यायवाला द्रव्य है’ अपर पक्षके इस कथनको हम स्वीकार करते हैं और इसी लिए हमारा कहना यह है कि जिस समय जो पर्याय उत्पन्न होती है वह पर्यायस्वरूप द्रव्यका स्वकाल होनेसे निश्चयसे उसे वह द्रव्य स्वयं उत्पन्न करता है। यदि वह पक्ष इसे स्वीकार नहीं करेगा और ऐसा मानेगा कि प्रत्येक पर्यायको दूसरा द्रव्य उत्पन्न करता है तो पर्यायसमूहस्वरूप द्रव्यका कर्ता भी अन्य द्रव्यको मानना पड़ेगा जो मानना न केवल आगमके विरुद्ध है, अपि तु तर्क और अनुभवके भी विरुद्ध है। अतएव अपने इस वक्तव्यके आधारपर भी अपर पक्षको यही मान लेना ही श्रेयस्कर प्रतीत होता है कि प्रत्येक द्रव्य अपने नियतकालमें नियत कार्यको ही करता है। और पद्मनन्दिपंचविंशतिकाके आधारपर उसे यह भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि ‘एक द्रव्य दूसरे द्रव्यका कार्य करता है’ इस प्रकारका व्यवहार वचन ‘प्रत्येक द्रव्य अपने नियत कालमें अपने नियत कार्यको स्वयं कर्ता होकर करता है’ इस निश्चय वचनका ज्ञान करानेके लिए आगममें लिखा गया है। अनगारधर्मामृतके 'कर्त्राद्या वस्तुनो भिन्नाः १-१०२ वचन भी इसी तथ्यको स्पष्ट करनेके लिये लिखा गया है। समयसार गाथा ८ और उसकी टीकाका भी यही आशय है।

सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिके लिए द्रव्य, गुण, पर्यायका वे जैसे हैं वैसा ज्ञान होना अतिआवश्यक है। किन्तु सम्यग्दर्शनकी उत्पत्ति कैसी होती है यह प्रश्न दूसरा है। इतना अवश्य है कि सम्यग्दृष्टिको इनका यथार्थ श्रद्धान अवश्य होता है, इसलिए उनके सम्यग्दर्शनविनय भी वन जाती है। मूलाचार अ० ५, गा० १८९ का यही आशय है। सम्यग्दृष्टिके अर्थपर्यायोंके विषयमें किस आधारसे कैसी श्रद्धा होकर दर्शनविनय गुण प्रगट होता है यह इस गाथामें वतलाया गया है।

\३. अपर पक्षने ‘जो व्यवहारनयके विना मात्र निश्चयके आश्रयसे मोक्ष चाहते हैं वे मूढ़ हैं, क्योंकि बीज विना वृक्षफल भोगना चाहते हैं अथवा वे आलसी हैं।’ यह लिखकर उसकी पुष्टि अनगारधर्मामृत अ० १ श्लो १०० से करनी चाही है। किन्तु अनगारधर्मामृतमें वह उल्लेख एकान्त निश्चयाभासियोंका निषेध करनेके लिए आया है इसे अपर पक्ष जानते हुए भी हमारे दृष्टि पथमें नहीं लाना चाहता है। वहुत सम्भव है कि इसी कारण अपर पक्षने यह वचन किस शास्त्रका है यह न वतलाकर ‘व्यवहार पराचीनो’ इत्यादिरूपसे उक्त श्लोकको उद्धृतकर उसके अन्तमें ‘प्राचीन श्लोक’ यह लिखकर छुट्टी पा ली है । आचार्य अमृतचन्द्रने समयसार कलश १११ में ‘मग्नाः ज्ञाननयैषिणोऽप्यतिस्वच्छन्दमन्दोद्यमाः’ यह वचन लिखा है । उसीको ध्यानमें रखकर पण्डित आशाधरजीने उक्त श्लोककी रचना की है, अतः उस परसे वही आशय लेना चाहिए जो समग्र कलशका है । इसी तथ्यको पण्डितप्रवर बनारसीदासजीने इन शब्दोंमें व्यक्त किया है-

ज्ञानचेतनाके जगे प्रगटे केवलराय ।
कर्मचेतनामें वसे कर्मबन्ध परिणाम ॥८६॥

अतएव उपादेय तो एकमात्र ज्ञायकभाव ही है ऐसा ही यहाँ निश्चय करना चाहिए ।

\४. अपर पक्षने पुरुषार्थसिद्ध्युपाय श्लो० ५० को उद्धृत कर उसका जो अर्थ दिया है वह ठीक न होनेपर भी हम उक्त श्लोकके आशयको स्वीकार करते हैं । उक्त श्लोक द्वारा ‘जो निश्चयको न जानकर यद्वा तद्वा विचार और प्रवृत्तिको ही मोक्षमार्ग जानते हैं वे करण-चरण दोनोंका नाश करते है । वे बाह्य करणमें आलसी होनेसे बाल है ।’ यह भाव ऐसे पुरुषोंके प्रति प्रगट किया गया है जो निश्चयके ज्ञानसे सर्वथा अनभिज्ञ हैं । उनके लिए नहीं जो निश्चयको जानकर तत्स्वरूप परिणतिमें तल्लीन हैं । मालूम नहीं कि इसे अपर पक्षने अपने अभिप्रायकी पुष्टिमें कैसे समझ लिया । यह वचन तो उनको उद्देश्यकर कहा गया है जो निश्चयको नहीं जानते ( नहीं अनुभवते ) और नाना वेष धरकर मोक्षमार्गी बनते हैं ।

\५. अपर पक्षने सन्मतितर्ककी गाथा १० ‘दव्वट्ठियवत्तव्वं’ इत्यादिको उद्धृतकर अपने अभिप्रायकी पुष्टि करनी चाही है, किन्तु यह गाथा वस्तुविचारके प्रसंगमें आई है और यहाँ मोक्षमार्गकी दृष्टिसे विचार हो रहा है, इसलिए वह यहाँ प्रयोजनभूत नहीं है । मोक्षमार्गमें किसका आलम्बन लेकर तन्मय परिणमन द्वारा मुक्ति प्राप्त होती है यह विचार मुख्य है । इसमें सन्देह नहीं कि वर्तमानमें संसारी आत्मा पर्यायदृष्टिसे रागी, द्वेषी भी है और द्रव्यार्थिकदृष्टिसे ज्ञायकस्वभाव भी है । ऐसी अवस्थामें इस जीवके राग-द्वेष आदिसे मुक्त होनेका उपाय क्या ? अपनेको सतत रागी-द्वेषी अनुभव करनेसे तो उनसे मुक्ति मिलेगी नहीं । उसे इनसे मुक्ति पानेके लिए कोई दूसरा उपाय करना होगा । इसी बातको ध्यानमें रखकर आचार्योंने उस मार्गका निर्देश किया है जिसपर चलकर अनन्त तीर्थंकरों और दूसरे महापुरुषोंने मुक्ति प्राप्त की है । वह मार्ग क्या है इसका निर्देश करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द समयसारमें लिखते हैं-

ववहारोऽभूयत्थो भूयत्थो देसिदो दु सुद्धणओ ।
भूयत्थमस्सिदो खलु सम्माइट्ठी हवइ जीवो ॥११॥

व्यवहारनय अभूतार्थ है और शुद्धनय भूतार्थ है ऐसा जिनदेवने कहा है । जो जीव भूतार्थका आश्रय लेता है वह नियमसे सम्यग्दृष्टि है ॥११॥

इसी तथ्यको पं० नं० पं० वि के निश्चयपंचाशत्में इन शब्दोंमें स्पष्ट किया गया है-

व्यवहारोऽभूतार्थो भूतार्थो देशितस्तु शुद्धनयः ।
शुद्धनयमाश्रिता ये प्राप्नुवन्ति यतयः पदं परमम् ॥

आशय पूर्वोक्त ही है ।

आचार्य कुन्दकुन्द करुणाभावसे रयणसारमें लिखते हैं-

एक्कु खणं ण विचिंतेइ मोक्खणिमित्तं णियप्पसहावं ।
अणिसं विचित्तपावं बहुलालावं मणे विचिंतेइ ॥५०॥

यह जीव दिन-रात मनमें विचित्र पापरूप अनेक प्रकारके विकल्प करता रहता है। किन्तु जो साक्षात् मोक्षप्राप्तिका उपाय है ऐसे अपने आत्मस्वभावका यह एक क्षण भी विचार नहीं करता ॥५०॥

नियमसारमें लिखा है-

जीवादि वहित्तच्चं हेयमुपादेयमप्पणो अप्पा।
कम्मोपाधिसमुब्भवगुण-पज्जाएहिं वदिरित्तो ॥१८॥

जीवादि बाह्य तत्त्व हेय हैं। मात्र कर्मोपाधिको निमित्त कर उत्पन्न हुई गुणपर्यायोंसे भिन्न अपना आत्मा उपादेय है ॥३८॥

ऐसी अवस्थामें अपर पक्ष ही बतलावे कि प्रकृतमें सन्मतितर्ककी उक्त गाथाका क्या प्रयोजन रह जाता है? वह गाथा तो मात्र प्रत्येक वस्तु सामान्य-विशेषात्मक है इसे प्रसिद्ध करनेमें चरितार्थ है। किन्तु जो सामान्य-विशेषात्मक वस्तुको जानता है और मोक्षमार्गका पदानुसरण कर मुक्ति प्राप्त करना चाहता है उसे तो समयसार आदि अध्यात्म ग्रन्थोंमें प्रतिपादित अध्यात्ममार्गका ही पदानुसरण करना होगा। आगममें बाह्य परिणतिरूप चरणानुयोगकी सफलता भी इसी आधारपर स्वीकार की गई है।

\६. अपर पक्षने व्यवहारनयसे जीवके ज्ञान, दर्शन और चारित्रको जो सत्यार्थ-वास्तविक घोषित किये हैं उसे हम स्वीकार करते हैं। सद्भूतव्यवहारनयकी अपेक्षा वे यथार्थ है, वास्तविक हैं इसमें सन्देह नहीं। इसी प्रकार जीवादि द्रव्योंकी शुद्धाशुद्ध सभी पर्यायें भी सत्यार्थ हैं, वास्तविक हैं। ये द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा अवस्तु हैं इसका इतना ही आशय है कि उस नयका विषय सामान्य है, पर्यायें उसका विषय नहीं हैं। इसी प्रकार पर्यायार्थिकनयकी अपेक्षा सामान्य अवस्तु है इसका भी यही आशय है कि उस नयका विषय विशेष है, सामान्य उसका विषय नहीं है। यहाँ एकको गौण और दूसरेको मुख्यकर यह कथन किया गया है, अन्यथा प्रत्येक नयकी चरितार्थता नहीं बन सकती। यहाँ एक नयकी विवक्षामें दूसरे नयके विषयको जो अवस्तु कहा गया है वह इस आशयसे नहीं कहा गया है कि ये खरविषण या आकाशकुसुमके समान वास्तवमें अवस्तु हैं, क्योंकि ऐसा स्वीकार करनेपर सामान्य और विशेष दोनोंका अभाव होकर प्रत्येक द्रव्यका ही अभाव प्राप्त होता है। यहाँ इतना विशेष और ज्ञातव्य है कि पर्यायार्थिकनयमें असद्भूतव्यवहारनयका भी अन्तर्भाव हो जाता है, क्योंकि यह नय भी पर्यायको ही विषय करता है। यदि इसमें सद्भूत व्यवहारनयसे कोई भेद है तो इतना ही कि यह नय प्रयोजनादिवश दूसरे द्रव्यकी पर्यायको अपनेसे भिन्न दूसरे द्रव्यकी कहता है। जब कि सद्भूत व्यवहारनय उसी द्रव्यकी पर्यायको भेदविवक्षामें उसीकी कहता है। आचार्य अमृतचन्द्रने समयसार कलश ४० में असद्भूत व्यवहारनयके विषयको एक उदाहरण उपस्थित कर समझाया है, अपर पक्ष उसपर दृष्टिपात कर ले यह हमारी प्रेरणा है।

\७. अपर पक्षने ज्ञेय-ज्ञायक सम्बन्ध आदिको प्रत्यक्ष और वास्तविक लिखा है, किन्तु इस कथनसे उस पक्षका क्या आशय है यह स्पष्ट नहीं किया। ज्ञान प्रत्येक समयमें त्रैकालिक पर्यायों सहित सब द्रव्योंको जानता है और समस्त द्रव्य अपनी-अपनी त्रैकालिक पर्यायों सहित ज्ञानके विषय होते हैं यह समझना ही ज्ञेय-ज्ञायकसम्बन्ध कहलाता है, अन्य कुछ नहीं। इसी प्रकार अपर पक्षने अन्य जितने सम्बन्धोंका उल्लेख किया है उनके विषयमें भी व्याख्यान कर लेना चाहिए। यहाँ ज्ञान पदसे मुख्यतासे केवलज्ञानको ग्रहणकर कथन किया है। वास्तवमें देखा जाय तो घटको जाननेवाला ज्ञान ज्ञानरूप ही प्रतिभासित होता है और घट उससे भिन्न घटरूप ही प्रतिभासित होता है, क्योंकि उस समय उत्पन्न हुआ घटज्ञान आत्माके ज्ञानगुणकी पर्याय है और जिस घटको उसने जाना वह मिट्टी आदि रूप पुद्गल द्रव्यकी व्यञ्जन पर्याय है। ज्ञान चेतनरूप है और घट जड़रूप है। इन दोनोंके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव अत्यन्त भिन्न है। अतएव इनका वास्तविक सम्बन्ध तो बनता नहीं यह प्रत्यक्ष है। फिर भी इनका सम्बन्ध कहा जाता है, उसे व्यवहार ही जानना चाहिए। प्रयोजन आदि वश लोकमें ऐसा व्यवहार किया जाता है इतना सच है। इसके लिए प्रवचनसार गाथा ३६ की आचार्य अमृतचन्द्र रचित टीकापर दृष्टिपात कीजिए।

इस प्रकार वस्तु विचारके प्रसंगमें द्रव्यार्थिक नय और पर्यायार्थिक नयका क्या तात्पर्य है और अध्यात्मदृष्टिसे निश्चयनय और व्यवहारनयका क्या तात्पर्य है इसका विशदरूपसे स्पष्टीकरण किया। अपर पक्षने अपनी प्रस्तुत प्रतिशंकाके प्रारम्भमें अनेकान्तका जो स्वरूप निर्देश किया है उसीसे यह स्पष्ट हो जाता है कि दो द्रव्यों और उनके गुणधर्मोंका अवलम्बन लेकर जितना भी कथन किया जाता है वह सब असद्भूत व्यवहार नयका ही विषय है, सद्भूत व्यवहारनयका विषय नहीं।

\८. अपर पक्षने ‘प्रत्येक द्रव्य उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यमयी है’ ऐसा लिखकर इसकी सिद्धि जो निश्चयनय और व्यवहार नयसे की है सो यहां व्यवहारनयसे सद्भूत व्यवहारनय ही लिया गया है, असद्भूत व्यवहारनय नहीं, क्योंकि असद्भूत व्यवहारनय त्रिकालमें उसी द्रव्यके गुण-पर्यायकी उसीमें प्रसिद्धि न कर प्रयोजनादिवश अन्य द्रव्यके गुण-धर्मको उससे भिन्न दूसरे द्रव्यका प्रसिद्ध करता है।

अपर पक्ष समझता है कि हम व्यवहार नयको असत्य और अप्रामाणिक मानते हैं, किन्तु उसकी ऐसी मान्यता ठीक नहीं है, क्योंकि उससे लोकव्यवहारकी प्रसिद्धि होती है, अतः इस दृष्टिसे आगममें उसे भी प्रामाणिक और सत्य ही माना गया है। यदि कोई नयवचन बिना प्रयोजन आदिके अन्य द्रव्यके गुणधर्मको अपनेसे भिन्न दूसरे द्रव्यका कहता है तो वह नयाभास होनेके कारण अवश्य ही असत्य और अप्रामाणिक माना जायगा।

\९. सर्वज्ञदेवने जो व्यवहार सम्यक्त्व व व्यवहार मोक्षमार्गका उपदेश दिया है वह इसलिए नहीं कि उसे वीतराग सम्यक्त्व व वीतराग मोक्षमार्ग मान लिया जाय, अन्यथा ये दो न होकर एक हो जावेंगे और ऐसी अवस्थामें परको निमित्त कर होनेवाले शुभभावोंका भी मोक्षमें सद्भाव मानना अनिवार्य हो जायगा। किन्तु भगवान्का तो यह उपदेश है-

कम्मबंधो हि णाम सुहासुहपरिणामेहिंतो जायदे, सुद्धपरिणामेहिंतो तेसिं दोण्णं पि णिम्मूलक्खओ।
-धवलापु० १२ पृ० २७९

शुभ और अशुभ परिणामोंसे नियमसे कर्मबन्ध होता है तथा शुद्ध परिणामोंसे उन दोनोंका नियमसे निर्मूल क्षय होता है।

और भगवान्का यह उपदेश भी है-

असुहादो विणिवित्ती सुहे पवित्ती य जाण चारित्तं।
वद-समिदि-गुत्तिरूवं ववहारणया दु जिणभणियं ॥४५॥
-बृहद्द्रव्य-संग्रह

व्यवहारनयसे अशुभसे निवृत्ति और शुभमें प्रवृत्तिको चारित्र जानो। उसे जिनदेवने व्रत, समिति और गुप्तिरूप कहा है ॥४५॥

इससे स्पष्ट है कि व्यवहार मोक्षमार्गसे निश्चय मोक्षमार्ग भिन्न है। फिर भी भगवान्ने निश्चय मोक्षमार्गकी सिद्धिका बाह्य हेतु जानकर इसे व्यवहार मोक्षमार्ग कहा है। और जो जिसकी सिद्धिका हेतु हो उसे उस नामसे पुकारना असत्य नहीं कहलाता। इससे स्पष्ट है कि सर्वज्ञने व्यवहार सम्यक्त्व व व्यवहार मोक्षमार्गका उपदेश देकर जीवोंका अकल्याण न कर निश्चय मोक्षमार्ग ही यथार्थ मोक्षमार्ग है यह स्पष्ट किया है। यही कारण है कि आचार्य अमृतचन्द्रने प्रवचनसार गाथा १९९ की टीकामें निश्चय मोक्षमार्गको ही मोक्षका एक-यथार्थ मार्ग बतलाते हुए लिखा है-

यतः सर्व एव सामान्यचरमशरीरास्तीर्थंकराः अचरमशरीरा मुमुक्षवश्चामुनैव यथोदितेन शुद्धात्मतत्त्वप्रवृत्तिलक्षणेन विधिना प्रवृत्तमोक्षस्य मार्गमधिगम्य सिद्धा बभूवुः, न पुनरन्यथापि। ततोऽवधार्यते केवलमयमेक एव मोक्षस्य मार्गो न द्वितीय इति।

सभी सामान्य चरमशरीरी, तीर्थंकर और अचरमशरीरी मुमुक्षु इसी यथोक्त शुद्धात्मतत्त्वप्रवृत्तिलक्षण विधिसे प्रवृत्त हुए मोक्षमार्गको प्राप्त करके सिद्ध हुए, परन्तु ऐसा नहीं है कि अन्य मार्गसे भी सिद्ध हुए हों। इससे निश्चित होता है कि केवल यह एक ही मोक्षका मार्ग है, दूसरा नहीं।

\६. बन्ध और मोक्षका नयदृष्टिसे स्पष्टीकरण

जैनदर्शन ध्रुवताके समान उत्पाद-व्ययको भी स्वीकार करता है। द्रव्यदृष्टिसे प्रत्येक द्रव्य ध्रुवस्वभाव सिद्ध होता है और पर्यायदृष्टिसे उत्पाद-व्ययरूप भी सिद्ध होता है। इस दृष्टिसे निश्चयनयका कथन जितना यथार्थ है, सद्भूत व्यवहारनय ( निश्चय पर्यायार्थिकनय )का कथन भी उतना ही यथार्थ है। अन्य दर्शन इस प्रकार नयभेदसे वस्तुकी सिद्धि नहीं करते, इसलिए उनका कथन एकान्तरूप होनेसे मिथ्या हैं इसमें सन्देह नहीं।

अब देखना यह है कि जीवकी जो बन्ध और मोक्ष पर्याय कही है वह क्या है? यह तो अपर पक्ष भी स्वीकार करेगा कि न तो एक द्रव्यकी पर्याय दूसरे द्रव्यमें होती है और न ही दो द्रव्य मिलकर उनकी एक पर्याय होती है। इसलिए जब हम जीवकी अपेक्षा विचार करते हैं तो यही सिद्ध होता है कि बन्ध और मोक्ष ये दोनों जीवकी ही पर्याय हैं। इस अपेक्षासे ये दोनों पर्यायें जीवमें सद्भूत है-यथार्थ हैं। भावसंसार और भावमोक्ष इन्हींका दूसरा नाम है। यह सद्भूत व्यवहारनयका वक्तव्य है। असद्भूत व्यवहारनयका वक्तव्य इससे भिन्न है। यह नय कार्मण वर्गणाओंके ज्ञानावरणादिरूपसे परिणमनको बन्ध कहता है और उन ज्ञानावरणादि कर्मोंके कर्मपर्यायको छोड़कर अकर्मरूपसे पारणमनेको मोक्ष कहता है। यद्यपि ये दोनों ( कार्मणवर्गणाओंकी कर्मपर्यायरूप बन्धपर्याय और कर्मोंकी अकर्मरूप मोक्षपर्याय ) जीवकी नहीं हैं, इन्हें जीवने उत्पन्न भी नहीं किया है। फिर भी असद्भूत व्यवहारनयसे ये जीवकी कही जाती हैं और जीवको ही इनका कर्ता भी कहा जाता है। ये पुद्गलपरिणाम आत्माका कार्य नहीं है. इस तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द प्रवचनसारमें लिखते हैं-

गेण्हदि णेव ण मुंचदि करेदि ण हि पोग्गलाणि कम्माणि।
जीवो पुग्गलमज्झे वट्टण्ण वि सव्वकालेसु ॥१८५॥

जीव सभी कालोंमें पुद्गलके मध्य रहता हुआ भी पौद्गलिक कर्मोंको न तो ग्रहण करता है, न त्यागता है और न करता है ॥१८५॥

अपर पक्षका कहना है कि ‘जो एक नयका विषय है वही विषय दूसरे नयका नहीं हो सकता । यदि ऐसा हो जाय तो दोनों नयोंमें कोई अन्तर ही नहीं रहेगा । दोनोंमें अन्तर नहीं रहनेसे नयोंका विभाजन व्यर्थ हो जायगा तथा सुव्यवस्था नहीं रहेगी, सर्व विप्लव हो जायगा । जो व्यवहारनयका विषय है उसका कथन व्यवहारनयसे ही हो सकता है, निश्चयनयसे वह कथन नहीं हो सकता । अतः आर्षप्रमाणोंको यह कह कर टाल देना कि ‘विवक्षित कथन व्यवहारनयसे है निश्चयसे नहीं’ आगम संगत नहीं है ।’

सो इस सम्बन्धमें हमारा भी यही कहना है कि जो असद्भूतव्यहारनयका विषय है वही सद्भूतव्यवहारनयका नहीं हो सकता । यदि ऐसा हो जाय तो दोनों नयोंमें कोई अन्तर ही नहीं रहेगा । दोनोंमें अन्तर नहीं रहनेसे नयोंका विभाजन व्यर्थ हो जायगा तथा दोनोंके कथनको एक माननेसे द्रव्यभेदकी प्रतीति नहीं होगी । द्रव्यभेदकी प्रतीति नहीं हो सकनेसे पृथक्-पृथक् द्रव्योंकी सत्ता नहीं सिद्ध होगी, सर्व विप्लव हो जायगा । अतः जो असद्भूत व्यवहारनयका विषय है उसे उपचरित मानना ही युक्त है । उसे सद्भूतरूपसे प्रसिद्ध करना आगमसंगत नहीं है । हमने अपने उत्तरोंमें आर्षप्रमाणोंको कहीं भी टालनेका प्रयत्न नहीं किया । हाँ, आगममें जो असद्भूत व्यवहारनयका वक्तव्य है उसे अवश्य ही उसी रूपमें प्रसिद्ध किया है ।

अपर पक्षने प्रस्तुत प्रतिशंकाको जिस प्रवीणतासे उपस्थित करनेका प्रयत्न किया है उसे हम अच्छी तरहसे समझ रहे हैं । पहले तो उस पक्षने प्रत्येक वस्तुको अनेकान्तात्मक प्रसिद्ध कर सामान्य-विशेष, नित्य-अनित्य आदिरूपसे दो दो धर्मयुगलोंकी स्थापना की । इसके बाद सामान्य और विशेषको विषय करनेवाले द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक इन दो नयोंकी स्थापना कर उनकी निश्चयनय और व्यवहारनय यह संज्ञा रखी । और इस प्रकार व्यवहारनयके उत्तर भेदोंका नाम लिये विना और सद्भूतव्यवहारनयके विषयमें असद्भूतव्यवहारनयके विषयको मिलाकर प्रस्तुत प्रतिशंकाका ढांचा खड़ा किया । किन्तु हमारे विचारसे तत्त्वविचारकी यह पद्धति नहीं है। क्या इस प्रकार एक द्रव्यकी पर्यायको उसीकी प्रसिद्ध करनेवाले पर्यायार्थिकनयको व्यवहारनय बतलाकर असद्भूत व्यवहारनयके विषयको सद्भूत सिद्ध किया जा सकता है, कभी नहीं । स्पष्ट है कि जब कि असद्भूत व्यवहारनयका विषय उपचरित है तो वह उपचरित ही रहेगा । आगमसे उसे सद्भूत सिद्ध करना ठीक नहीं है ।

इस प्रकार बन्ध-मोक्ष क्या है इसका नयदृष्टिसे स्पष्टीकरण किया ।

शंका १६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग २/३)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७७० से ७८८

↑ सूची


\७. एकान्तका आग्रह ठीक नहीं

अभी हमने आगममें किये गये व्यवहारनयके उत्तर भेदों और उनके विषयको ध्यानमें रखकर बन्ध मोक्षके विषयमें स्पष्टीकरण किया । किन्तु अध्यात्म आगममें इस विषयपर और भी सूक्ष्मतासे विचार किया गया है । उसमें बतलाया है कि आत्माकी जो पर्याय परके लक्ष्यसे (रागभावसे परमें उपयुक्त होनेसे या परका सम्पर्क करनेसे) उत्पन्न होती है वह जिसके लक्ष्यसे उत्पन्न होती है उसीकी है । यही कारण है कि अध्यात्म आगममें जिनदेवने अध्यवसान आदि भावोंको जो जीव कहा है उसे अभूतार्थरूप व्यवहारका कथन जानना चाहिए । इस पर प्रश्न होता है कि इन अध्यवसान आदि भावोंको जीव कहना यह जब कि अभूतार्थ व्यवहार है तो फिर जिनदेवने ऐसे व्यवहारका कथन ही क्यों किया ? यह प्रश्न है। इसीका समाधान करते हुए आचार्यने समयसार गाथा ४६ की टीकामें ‘व्यवहारो हि व्यवहारिणां’ इत्यादि वचन लिखा है । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि तीर्थप्रवृत्तिके निमित्तका ज्ञान करानेके लिए व्यवहार दिखलाना अन्य बात है और उसे परमार्थरूप मान लेना अन्य बात है। व्यवहारनय व्यवहाररूप निमित्तका ज्ञान कराता है इसमें सन्देह नहीं और इसी लिए अध्यात्म आगममें उसका प्रतिपादन भी किया गया है। पर इस परसे यदि कोई अपर पक्षके मतानुसार व्यवहारनयको अन्यके धर्मको अन्यका कहनेवाला न मानकर उसके विषयको परमार्थरूप ही मान ले तो इस जीवका शरीर और रागादिभावोंसे मुक्त होना त्रिकालमें नहीं बन सकेगा और ये जीवके स्वरूप सिद्ध हो जानेपर बन्धव्यवस्था भी नहीं बन सकेगी। क्या अपर पक्षने इस तथ्यपर ध्यान दिया? वह एकान्तका परिहार करनेके लिए ‘तमन्तरेण’ इत्यादि टीका वचनको तो उद्धृत करता है पर उसकी मान्यताके अनुसार जो एकान्तकी प्रसक्ति होती है उसकी ओर अणुमात्र भी ध्यान नहीं देता। अतः उक्त वचनके आधारपर अपर पक्षको प्रकृतमें ऐसे ही अनेकान्तको स्वीकार कर लेना चाहिए कि निश्चय भूतार्थरूप है, अभूतार्थरूप नहीं। अभूतार्थरूप तो मात्र व्यवहार है जिसे व्यवहार नयसे तीर्थप्रवृत्तिका निमित्त जानकर जिनदेवने निर्दिष्ट किया है। हाँ यदि अभूतार्थ व्यवहारको तीर्थप्रवृत्तिका व्यवहार हेतु भी नहीं स्वीकार किया जाय तो क्या आपत्ति आती है इसे आचार्य अमृतचन्द्रने ‘तमन्तरेण’ इत्यादि वचन द्वारा स्पष्ट किया है। अतः निश्चय और व्यवहार दोनों ही परमार्थरूप हैं ऐसा एकान्त आग्रह करना उचित नहीं है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। व्यवहारनय अन्यके धर्मको अन्यका कहता है इसके लिए समयसार गाथा ५६ को आत्मख्याति टीका तथा आचार्य जयसेनकृत टीकापर दृष्टिपात कीजिए।

\८. जीव परतन्त्र क्यों है इसका सांगोपांग विचार

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने जीवको परतन्त्र कौन बनाये हुए है इसकी सिद्धि करते हुए आचार्य विद्यानन्दिका ‘जीवं परतन्त्रीकुर्वन्ति’ इत्यादि वचन उद्धृत किया है। आचार्य विद्यानन्दि दर्शनप्रभावक महान् आचार्य हो गये हैं इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं। उनका नामस्मरण होते ही उनके प्रति श्रद्धासे मस्तक नत हो जाता है।

अपर पक्षने अपनी पिछली प्रतिशंकामें यह वाक्य लिखा है-‘इस जीवको कर्म परवश बनाये हुए हैं। उसीके कारण यह परतन्त्र हो रहा है।’ हमने इस वाक्यको एकान्त आग्रहका पोषक समझकर यथार्थ क्या है इसका पिछले उत्तरमें निर्देश किया था। किन्तु अपर पक्षने इस वचनको आचार्य विद्यानन्दिका बतलाकर पर्यायान्तरसे यह सूचित किया है कि हमारे द्वारा आचार्य विद्यानन्दिके वचनपर ही आपत्ति उठाई गई है। अपर पक्षने अपनी प्रस्तुत प्रतिशंकामें आचार्य विद्यानन्दिके मूल वाक्यको पुनः उपस्थित किये जानेका संकेत तो किया है पर पिछली प्रतिशंकामें वह वाक्य दृष्टिगोचर नहीं होता। इसी प्रकार हमारे जिन वचनोंपर यह प्रतिशंका उपस्थित की गई है उनके विषयमें यह तो लिखा है कि ‘आपके द्वितीय वक्तव्य में निम्न वाक्योंको पढ़कर बहुत आश्चर्य हुआ।’ और साथ ही यह भी लिखा है कि ‘आपके निम्न वाक्यों पर आर्षप्रमाण सहित विचार किया जाता है।’ परन्तु जिन वाक्योंपर विचार करनेकी अपर पक्ष यहाँ पर प्रतिज्ञा कर रहा है वे वाक्य यहाँ उद्धृत नहीं किये गये हैं। अस्तु,

आचार्य विद्यानन्दिके उक्त वचनको अपने पक्षमें समझकर अपर पक्षने उस आधारसे एक मत तो यह बनाया है-

‘प्रगट है, जीवका क्रोधादि परिणाम स्वयं परतन्त्रता है, परतन्त्रताका कारण नहीं।’

आगे अपर पक्षने लिखा है कि-

‘यदि मात्र अज्ञानभावको ही परतन्त्र करनेवाला मान लिया जावे…।’

इससे मालूम पड़ता है कि उस पक्षका एक मत यह भी है कि जीवका अज्ञान भाव भी परतन्त्रता का कारण है।

यह अपर पक्षका वक्तव्य है। इससे मालूम होता है कि अपर पक्ष एकान्तसे मात्र पुद्गल कर्मको जीवकी परतन्त्रताका हेतु मानता है, किन्तु उस पक्षका यह कथन स्वयं आचार्य विद्यानन्दिके अभिप्रायके विरुद्ध है। वे अष्टसहस्री पृ० ५१ में लिखते हैं-

तद्धेतुः पुनरावरणं कर्म जीवस्य पूर्वस्वपरिणामश्च ।

परन्तु उस अज्ञानादि दोषका हेतु आवरण कर्म है और अनन्तरपूर्व जीवका अपना परिणाम है।

इससे यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि आचार्य विद्यानन्दिने केवल ज्ञानावरणादि कर्मोंको ही परतन्त्रताका हेतु नहीं स्वीकार किया है, किन्तु उन्होंने राग, द्वेष और मोहको भी परतन्त्रताका हेतु स्वीकार किया है। ये रागादि भाव स्वयं पारतन्त्र्यस्वरूप हैं और परतन्त्रताके हेतु भी हैं। तथा ज्ञानावरणादि कर्म व्यवहारसे केवल जीवकी परतन्त्रताके हेतु तो हैं पर जीवके पारतन्त्र्यस्वरूप नहीं यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

इस प्रकार जीवकी परतन्त्रताके दो हेतु प्राप्त हुए-बाह्य और आभ्यन्तर। अब इनमें मुख्य हेतु कौन है इसका विचार करना है। हरिवंशपुराण सर्ग ७ में लिखा है-

जायते भिन्नजातीयो हेतुर्यत्रापि कार्यकृत् ।
तत्रासौ सहकारी स्यात् मुख्योपादानकारणः ।।१४।।

जहाँ भी भिन्नजातीय हेतु कार्यकृत होता है वहाँ वह सहकारी है और मुख्य उपादान कारण है ।।१४।।

इस प्रकार प्रत्येक कार्यका मुख्य कारण उपादान है, भिन्नजातीय पदार्थ नहीं इसका निर्णय होनेपर अब इस बातका विचार करना है कि बाह्य पदार्थको सहकारी क्यों कहा ? इसका स्पष्टीकरण करते हुए समयसार गाथा १६ के बाद आचार्य जयसेनकृत टीकामें लिखा है-

अथ शुद्धजीवे यदा रागादिरहितपरिणामस्तदा मोक्षो भवति। अजीवे देहादौ यदा रागादिपरिणामस्तदा बन्धो भवति।

शुद्ध जीवके विषयमें जब रागादि रहित परिणाम होता है तब मोक्ष होता है तथा अजीव देहादिमें जब रागादि परिणाम होता है तब बन्ध होता है।

इस आशयकी पुष्टिमें वहाँ एक गाथा दी है-

जीवे व अजीवे वा संपदि समयम्हि जत्थ उवजुत्तो ।
तत्थेव बन्ध मोक्खो होदि समासेण णिद्दिट्ठो ।।
-स० सा० गा० २० जयसेनकृत टीका

संक्षेपमें बन्ध और मोक्षका निदान यह है कि यदि यह जीव वर्तमान समयम जीवमें उपयुक्त होता है अर्थात् उपादेय बुद्धिसे तन्मय होकर परिणमता है तो ऐसा होने पर मोक्ष है और यदि यह जीव वर्तमान समयमें अजीव देहादि, कर्म और कर्मके फलमें उपादेय बुद्धिसे उपयुक्त होता है अर्थात् तन्मय होकर परिणमता है तो ऐसा होनेपर बन्ध है।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए प्रवचनसार में लिखा है-

भावेण जेण जीवो पेच्छदि जाणादि आगदं विसये।
रज्जदि तेणेव पुणो वज्झदि कम्मं ति उवऐसो ॥१७६॥

जिनदेवका ऐसा उपदेश है कि यह जीव प्राप्त विषयको जिस राग-द्वेष-मोहभावसे जानता-देखता है उस भावसे उपरंजित होकर कर्मबन्ध करता है ॥१७६॥

ये आगमप्रमाण हैं। इनसे विदित होता है कि कर्म ( राग-द्वेष )और उनके फलमें यदि यह जीव उपयुक्त होता है तो हो ज्ञानावरणादि कर्म अज्ञानादि जीव परिणामके होनेमें हेतु संज्ञाको प्राप्त होते हैं, अन्यथा नहीं। इसलिए यही सिद्ध होता है कि अपनी परतन्त्रताका मूल कारण यह जीव स्वयं है, ज्ञानावरणादि कर्म नहीं। ज्ञानावरणादि कर्मको आचार्यने परतन्त्रताका हेतु इसलिए कहा कि उनमें उपयुक्त होकर जीव अपनेमें परतन्त्रताको स्वयं उत्पन्न करता है। वे स्वयं जीवको परतन्त्र नहीं बनाते। जीवके परिणामको निमित्तकर कर्मवर्गणारूप पुद्गल कर्मपरिणामको प्राप्त होते हैं और उत्तर कालमें जीवके उनमें उपयुक्त होते समय वे जीवके राग-द्वेषरूप पारतन्त्र्यके होनेमें व्यवहार हेतु होते हैं। इससे भी स्पष्ट है कि यह जीव वास्तवमें स्वयं अपने अपराधवश परतन्त्र बनता है। चोरको कोतवाल ने परतन्त्र बनाया यह तो व्यवहार है। वास्तवमें वह स्वयं अपने अपराधके कारण परतन्त्र बनता है यह यथार्थ है। तत्त्वार्थवार्तिक ५-२४ के वचनका दूसरा अभिप्राय नहीं। यहाँ आया हुआ ‘मूलकारणं’ पद निमित्तकारण अर्थका सूचक है। यथा-संजोयमूलं-संजोयनिमित्तम्। मूलाचार प्र० भा० २-४६ टीका ।

पं० फूलचन्द्रने पंचाध्यायी पृ० १७३, पृ० ३३८ में जो कथन किया है वह व्यवहार हेतुको मुख्यतासे किया है। इसलिए पूर्वापरका विरोध उपस्थित नहीं होता। यदि पं० फूलचन्द्र व्यवहार हेतुको निश्चय हेतु मानने लगें तो ही पूर्वापरका विरोध आता है, अन्यथा नहीं। तभी तो पं० फूलचन्द्रने उसी पंचाध्यायी पृ० १७३ में यह भी लिखा है-‘किन्तु यह परतन्त्रता जीवकी निज उपार्जित वस्तु है। जीवमें स्वयं ऐसी योग्यता है जिससे वह सदासे परतन्त्र है।’ और इसी प्रकार उसी पंचाध्यायीके पृ० ३३८ में भी यह लिखा है-'यह कमी जो थोड़ी बहुत अरिहंत अवस्थामें रहती है वह अनादिकालसे चली आ रही है। इसका कारण कर्म माना जाता है अवश्य, पर यह मूलतः जीवकी अपनी परिणतिका ही परिणाम है। इसे ही संसारदशा कहते हैं।

यद्यपि पं० फूलचन्द्रके उक्त कथनसे तो पूर्वापर विरोध नहीं आता। परन्तु अपर पक्ष जो व्यवहार हेतुको यथार्थ हेतु मनवानेका प्रयत्न कर रहा है उससे अवश्य ही आगमका विरोध होता है। आगम जब यह स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार करता है कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्यका त्रिकालमें यथार्थ कर्ता नहीं हो सकता। ऐसी अवस्थामें अन्य द्रव्यके कार्यमें अन्य द्रव्यकी विवक्षित पर्यायको व्यवहार (उपचार) हेतु मान लेना ही आगम संगत है। यदि आगममें और आगमनुसारी कथनमें पूर्वापरका विरोध परिहार हो सकता है तो इसी स्वीकृतिसे हो सकता है, अन्यथा नहीं।

अपर पक्षने अपना मन्तव्य लिखनेके बाद एक उद्धरण आप्तपरीक्षा पृ० २४६ का भी उपस्थित किया है। उसमें परतन्त्रताके निमित्त (बाह्य हेतु) रूपसे कर्मको स्वीकार किया गया है। यहाँ ज्ञातव्य यह है कि इस परतन्त्रताका कोई आभ्यन्तर (निश्चय हेतु) अवश्य होना चाहिए, क्योंकि परतन्त्रतारूप कार्यकी उत्पत्ति केवल बाह्य हेतुसे होती हो यह तो अपर पक्षको भी मान्य नहीं होगा। आचार्य विद्यानन्दि तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक पृ० ६५ में लिखते हैं-

दण्ड-कपाट-प्रतर-लोकपूरणक्रियानुमेयोऽपकर्षण-परप्रकृतिसंक्रमणहेतुर्वा भगवतः स्वपरिणामविशेषः शक्तिविशेषः सोऽन्तरंगः सहकारी निःश्रेयसोत्पत्तौ रत्नत्रयस्य, तदभावे नामाद्यघातिकर्मत्रयस्य निर्जरानुपपत्तेर्निःश्रेयसानुत्पत्तेः। आयुषस्तु यथाकालमनुभवादेव निर्जरा न पुनरुपक्रमात्, तस्यानपवर्त्यत्वात्। तदपेक्षं क्षायिकरत्नत्रयं सयोगकेवलिनः प्रथमसमये मुक्तिं न सम्पादयत्येव, तदा तत्सहकारिणोऽसत्त्वात्।

जिसका दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण क्रियासे अनुमान होता है और जो अपकर्षण तथा परप्रकृति संक्रमणका हेतु है ऐसा भगवान्‌का शक्तिविशेषरूप जो अपना परिणामविशेष है वह रत्नत्रयका निःश्रेयसकी उत्पत्तिमें अन्तरंग सहकारी कारण है, क्योंकि उसके अभावमें नामादि तीन अघाति कर्मोंकी न तो निर्जरा बन सकती है और न ही निःश्रेयसकी उत्पत्ति हो सकती है। आयु कर्मकी तो यथाकाल अनुभवसे ही निर्जरा हो जाती है, उपक्रमसे नहीं, क्योंकि वह अनपवर्त्य है। उसकी अपेक्षासे युक्त क्षायिक रत्नत्रय सयोगकेवलीके प्रथम समयमें मुक्तिको नहीं ही सम्पादित करता है, क्योंकि उस समय उसके सहकारी (अन्तरंग हेतु) का असत्त्व है।

इससे स्पष्ट है कि चौदहवें गुणस्थान तक जो यह जीव परतन्त्र बना हुआ है उसका अन्तरंग कारण स्वयं इस जीवकी शक्तिहीनता ही है। आचार्य विद्यानन्दिने सर्वत्र कर्मको परतन्त्रताका हेतु बतलाते हुए उसका निमित्तरूपसे इसीलिए उल्लेख किया है ताकि कोई जीवकी परतन्त्रताका मुख्य कर्ता द्रव्यकर्मोदयको न मान ले। उन्होंने द्रव्यकर्मोंको परतन्त्रताका निमित्त बतलाते हुए उसकी पुष्टिमें बेड़ी ( निगड़ ) को दृष्टान्तरूपमें उपस्थित किया है। बेड़ी किसीको स्वयं परतन्त्र नहीं बनाती। यह उसका स्वभाव नहीं। किन्तु जब उसे अपने अपराधवश धारण किया जाता है तब वह परतन्त्रतामें बाह्य निमित्त होती है, अन्यथा नहीं। इससे स्पष्ट है कि जीवकी परतन्त्रताका मूल हेतु मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र ही हैं। इन्हें संसार (परतन्त्रता) के मूल हेतु कहनेका भी यही कारण है। कर्म शब्द द्रव्यकर्मके लिए तो प्रयुक्त होता ही है, भावकर्मके लिए मुख्यतासे प्रयुक्त होता है, क्योंकि यथार्थमें द्रव्यकर्मको करना जीवका अपना कार्य न होकर भावकर्मको करना जीवका अपना कार्य है। अतएव वस्तुतः ये मिथ्यात्वादिभाव ही सम्यक्त्वादिके प्रतिबन्धक स्वीकार किये गये हैं। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए भगवान् कुन्दकुन्द समयसारमें लिखते हैं-

सम्मत्तपडिणिबद्धं मिच्छत्तं जिणवरेहिं परिकहियं।
तस्सोदयेण जीवो मिच्छादिट्ठि त्ति णायव्वो ॥१६१॥
णाणस्स पडिणिबद्धं अण्णाणं जिणवरेहिं परिकहियं।
तस्सोदयेण जीवो अण्णाणी होदि णायव्वो ॥१६२॥
चारित्तपडिणिबद्धं कसायं जिणवरेहिं परिकहियं।
तस्सोदयेण जीवो अचरित्तो होदि णायव्वो ॥१६३॥

जिनदेवने सम्यक्त्वका प्रतिबन्धक मिथ्यात्वको कहा है। उसके उदयसे जीव मिथ्यादृष्टि है ऐसा जानना चाहिए ।।१६१।। जिनवरने ज्ञानका प्रतिबन्धक अज्ञानको कहा है। उसके उदयसे जीव अज्ञानी है ऐसा जानना चाहिए ।।१६२।। जिनवरने चारित्रका प्रतिबंधक कषायको कहा है। उसके उदयसे जीव अचारित्र है ऐसा जानना चाहिए ।।१६३।।

रत्नत्रय परिणत आत्मा पूर्ण स्वतन्त्र है इसे अपर पक्ष स्वीकार करता ही है और उसके प्रतिबन्धक ये मिथ्यात्वादि भाव हैं, इसलिए ये स्वयं परतन्त्रस्वरूप होकर भी परतन्त्रताके मूल हेतु भी हैं ऐसा यहाँ स्वीकार करना चाहिए। परमें एकत्व बुद्धि करके या रागबुद्धि करके जब यह जीव मिथ्यात्व आदिरूपसे परिणमता है तभी ज्ञानावरणादि कर्मोंमें परतन्त्रताकी व्यवहारहेतुता बनती है, अन्यथा नहीं। हमने अपने पिछले वक्तव्यमें यही आशय व्यक्त किया है, अतः वह आगमानुकूल होनेसे प्रमाण है। आचार्य जयसेनने प्रवचनसार गाथा ४५ की टीकामें इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर यह वचन लिखा है-

द्रव्यमोहोदयेऽपि सति यदि शुद्धात्मभावनाबलेन भावमोहेन न परिणमति तदा बन्धो न भवति ।

द्रव्यमोहके भी उदय रहने पर यदि जीव शुद्धात्मभावनाके बलसे भावमोहरूपसे नहीं परिणमता है तो उस समय बन्ध नहीं होता ।

‘बन्ध नहीं होता’ यह नयवचन है। इससे ज्ञात होता है कि शुद्धात्मभावनाके अभावमें जिस स्थिति-अनुभागको लिए हुए या मात्र तन्निमित्तक जिन प्रकृतियोंका बन्ध होता है उस प्रकारका या उन प्रकृतियोंका बन्ध नहीं होता ।

पूरे कथनका तात्पर्य यह है कि जीवकी परतन्त्रताका यथार्थ कारण कषाय है, द्रव्यकर्म नहीं। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य विद्यानन्दि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० ६ सू० ४ में लिखते हैं-

कषायहेतुकं पुंसः पारतन्त्र्यं समन्ततः ।
सत्त्वान्तरानपेक्षीह पद्ममध्यगभृंगवत् ॥८॥
कषायविनिवृत्तौ तु पारतन्त्र्यं निवर्त्यते ।
यथेह कस्यचिच्छान्तकषायावस्थितिक्षणे ॥९॥

इस लोकमें कमलके मध्यमें अवस्थित भौंरेके समान इस जीवकी परतन्त्रता सब ओरसे कषायहेतुक होती है ।।८।। और किसी जीवकी इस लोकमें कषायके शान्त रहते समय परतन्त्रता दूर हो जाती है उसी प्रकार कषायके निवृत्त हो जाने पर इस जीवकी परतन्त्रता भी निवृत्त हो जाती है ।

यद्यपि इन्हीं आचार्यने आप्तपरीक्षा कारिका ११४-११५ की टीकामें तथा पृष्ठ २४६ में द्रव्यकर्मको जीवकी परन्त्रताका हेतु बतलाया है और यहाँ वे ही आचार्य कषायको परतन्त्रताका हेतु लिख रहे हैं। परन्तु इसमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि जीवकी परतन्त्रताका यथार्थ हेतु कषाय है और उपचरित हेतु द्रव्यकर्म है। इसलिए हमने अपने पिछले उत्तरमें इस विषयको ध्यान में रख कर जिन तथ्योंका प्ररूपण किया है वे यथार्थ हैं ऐसा यहाँ निर्णय करना चाहिए ।

\९. समग्र आर्हतप्रवचन प्रमाण है

अपर पक्षने हमारे ‘समयसार अध्यात्मकी मुख्यतासे प्रतिपादन करनेवाला आगम ग्रन्थ है, शेष ग्रन्थ व्यवहारनयकी मुख्यतासे लिखे गये हैं।’ इस कथनको तूल देकर इस वीतराग चर्चाको जो विकृतरूप प्रदान करनेका प्रयत्न किया है वह श्लाघ्य नहीं है। हमने उक्त वाक्य किस ग्रन्थमें किस नयकी मुख्यतासे कथन है इस दृष्टिको ध्यानमें रख कर ही लिखा है और यह अभिप्राय हमारा नहीं है, जगन्मान्य गुरुपदसमलंकृत आचार्य अमृतचन्द्रका है यह स्पष्ट करते हुए पंचास्तिकाय गाथा १३२ का टीकावचन भी प्रमाणरूपमें दे दिया है। हमारे उक्त कथनके आधारसे ये तथ्य फलित होते हैं-

\१. समयसारमें मुख्यरूपसे निश्चयनयको लक्ष्यमें रख कर कथन किया गया है, गौणरूपसे व्यवहारनयको लक्ष्यमें रख कर भी कथन किया गया है।

\२. ‘समयसार’ यह वचन उपलक्षण है। इससे इसी प्रकारके अन्य आगमग्रन्थोंका भी परिग्रह हो जाता है,

\३. शेष ग्रन्थोंमें व्यवहार नयको लक्ष्यमें रख कर मुख्यरूपसे कथन किया गया है, गौणरूपसे निश्चयनयको लक्ष्यमें रख कर भी कथन किया गया है।

\४. ‘शेष ग्रन्थ’ यह वचन उपलक्षण है। इससे उन्हीं ग्रन्थोंका परिग्रह होता है जिनमें व्यवहारनयको लक्ष्यमें रख कर की गई कथनीकी मुख्यता है।

अपर पक्षने हमारे उक्त कथनके आधारसे विचित्र अभिप्राय फलित किया है और पर्यायान्तररूपसे आचार्य अमृतचन्द्रको भी उसमें सम्मिलित कर लिया है। यह आचार्य अमृतचन्द्रका ही तो वचन है-

इह हि व्यवहारनयः किल पर्यायाश्रितत्वात्…परभावं परस्य विदधाति।

यहाँ व्यवहारनय पर्यायाश्रित होनेसे…परभावको परका कहता है-समयसार गा० ५६

यह आचार्य वचन ही तो है-

अन्यत्र प्रसिद्धस्य धर्मस्यान्यत्र समारोपणमसद्भूतव्यवहारः। असद्भूतव्यवहार एव उपचारः।

अन्य द्रव्यमें प्रसिद्ध धर्मका अन्य द्रव्यमें समारोप करना असद्भूतव्यवहार है। असद्भूतव्यवहार ही उपचार है। -आलापपद्धति

और यह आचार्य वचन हो तो है-

अण्णेसि अण्णगुण मणइ असब्भूद…॥२२३॥-नयचक्रादिसंग्रह

असद्भूत व्यवहार अन्यके गुणको अन्यका कहता है।

ये हमारे वचन नहीं है। ऐसी अवस्थामें अपर पक्षका यह लिखना-कि उपरोक्त वाक्य स्पष्टतया इस प्रकारके अन्तरंग अभिप्रायको द्योतित करता है कि समस्त जैनवाङ्मय (शास्त्रों) में एकमात्र समयसार ही अध्यात्मग्रन्थ होनेके कारण सत्यार्थ, प्रामाणिक तथा मान्य है और अन्य समस्त ग्रन्थ (चाहे वह स्वयं श्री कुन्दकुन्द आचार्य कृत भी क्यों न हों) व्यवहारनयकी मुख्यतासे होनेके कारण असत्य, अप्रामाणिक एवं अमान्य हैं, क्योंकि आपके द्वारा व्यवहारनयको कल्पनारोपित उपचरित या असत्य ही घोषित किया गया है। वरना इस वाक्यको लिखनेकी आवश्यकता ही न थी। श्री समयसारमें भी स्थान-स्थान पर व्यवहारका कथन है, अतः वह भी असत्य ही होंगे, इस अपेक्षासे तो यह भी लिखा जाना चाहिये था कि श्री समयसारके तो मात्र वही अंश ग्राह्य हैं जिनमें केवल निश्चयनयसे कथन है। यह ही तो एकान्त निश्चय मिथ्यावाद है।’ आदि,

किन्तु यह शब्दावलि किसी भी अवस्थामें शोभनीक नहीं कही जा सकती। यह झुँझलाहट ही है, जिसे अपर पक्षने उक्त शब्दोंमें व्यक्त किया है।

यह अपर पक्षके वक्तव्यका कुछ अंश है। इसमें या इससे आगेके वक्तव्यमें बहुत कुछ कहा गया है। यदि हम उसके बहुत भीतर जायें तो उसके उत्तरमें बहुत कुछ लिखा जा सकता है और यह सप्रमाण सिद्ध किया जा सकता है कि प्रस्तुत चर्चामें अपर पक्षने कहाँ तक वीतरागताका निर्वाह किया है। यह तो हम पहले ही लिख आये हैं कि कोई भी नय कल्पनारोपित, अप्रामाणिक या असत्य नहीं होता। व्यवहारनयके लिये इन अव्दोंका प्रयोग अपर पक्ष ही कर रहा है, इसका हमें आश्चर्य ही नहीं खेद भी है। निश्चयनय जैसा वस्तुका स्वरूप है उसे उसी रूपमें निरूपित करता है, सद्भूत व्यवहारनय सद्भूत अर्थमें ही व्यवहारकी प्रसिद्धि करता है और असद्भूत व्यवहारनय उपचरित अर्थकी ही प्रसिद्धि करता है। सभी नय अपने-अपने विषयका ही निरूपण करते हैं, इसलिये वे यथार्थ हैं। कल्पनारोपित नहीं है। यह अपर पक्ष ही बतलावे कि क्या कोई ऐसा व्यवहारनय है जो गधेके सींगकी या आकाशकुसुमकी कहीं सिद्धि करता है जिससे कि उसे कल्पनारोपित, अप्रामाणिक या असत्य कहा जाय। अपर पक्षने हमारे किस कथनके आधारपर व्यवहारनयके लिये इन शब्दोंका प्रयोग कर हम पर यह आरोप किया है कि हम व्यवहारनयको कल्पनारोपित आदि कहते हैं यह हम नहीं समझ सके। यदि प्रयोजनवश मिट्टीके घड़ेको घीका घड़ा कहा जाता है तो वह कल्पनारोपित कैसे कहलाया इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे। फिर भी निश्चयनय मिट्टीके घड़ेको मिट्टीका ही कहेगा। स्वरूपका ज्ञापक होनेसे, घड़ा घीका है इसका तो, वह निषेध ही करेगा, क्योंकि प्रत्येक वस्तुका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह स्वरूपका उपादान और पररूपका अपोहन करे।

अपर पक्षका कहना है कि ‘जो प्ररूपणा जिस नयसे की गई है उस नयसे वह यथार्थ है।’ हम अपर पक्षको विश्वास दिलाते हैं कि हमने अपने समग्र उत्तर पत्रोंमें इसे मान्य रखा है। और यही कारण है कि अपर पक्षने जहाँ व्यवहारनयकी कथनीको उद्धृत किया है वहाँ अनेक स्थलोंपर हमने यह लिखकर उत्तर दिया है कि यह व्यवहारनयका कथन या वक्तव्य है।

अपर पक्षका हम पर यह भी आरोप है कि हमने ‘सर्वश्री अकलंकदेव या विद्यानन्दि द्वारा रचित शास्त्रोंके प्रमाणोंकी अपेक्षा गृहस्थोंके द्वारा रचित भाषा भजनोंको अधिक प्रामाणिक माना है और उन भजनोंका प्रमाण देकर परम पूज्य महान् आचार्योंके आर्षग्रन्थोंका निराकरण ( खण्डन ) किया।’ किन्तु यह विपरीत अर्थ अपर पक्षने कहाँसे फलित कर लिया ? क्या किसी आचार्यकी प्रयोजनवश की गई व्यवहार प्ररूपणाको उसी रूपमें सूचित करना उसका खण्डन है ? आचार्य कुन्दकुन्दने समवसार गाथा ९८ में ‘आत्मा घट पट रथको करता है’ इसे व्यवहार कथन कहा है। यदि अन्यत्र ऐसी कथनी उपलब्ध होती है और हम उसे व्यवहारनयकी कथनी प्रसिद्ध करते हैं तो क्या इसे उस कथनीका खण्डन माना जाय ? आचार्य ! महान् आश्चर्य !!

अपर पक्षको समझना चाहिए कि खण्डनका अर्थ होता है किसी कथनको विविध उपायोंका अवलम्बन लेकर अप्रमाणित घोषित करना। किसी कथनको यह किस नयका कथन है यह बतलाना खण्डन नहीं कहलाता। हमें तो आचार्योंके वचनोंके प्रति श्रद्धा है ही, गृहस्थों द्वारा रचित भाषा-भजनोंके प्रति भी श्रद्धा है। जो भगवद्वाणी है वह श्रद्धास्पद है ऐसा हमारा निर्णय है। अपर पक्ष गृहस्थों द्वारा रचित भाषा-भजनोंके प्रति हीनताका भाव भले ही रखे, परन्तु इससे हमारी श्रद्धापर आँच आनेवाली नहीं है। यह हम अच्छी तरहसे जानते हैं कि हजारों लाखों नर-नारी उन्हीं भाषा-भजनोंका आलम्बन लेकर वीतरागमार्गका अनुसरण

७७८ जयपुर ( खानियां ) तत्त्वचर्चा

करते हैं। वे भाषा-भजन उपेक्षणीय नहीं। उनके प्रति किसी भी प्रकारसे लघुता प्रगट करना अनर्थको आमंत्रण देना है।

हमने पंचास्तिकाय गाथा १२३ का ‘एवमनया दिशा’ इत्यादि टीका वचन जिस प्रयोजनसे पिछले उत्तरमें उद्धृत किया है उसका निर्देश वहां कर दिया है। अपर पक्षको उसकी व्याख्या करके यह बतलाना था कि जिस प्रयोजनसे हमने उसे उद्धृत किया है वह प्रयोजन इससे सिद्ध नहीं होता। किन्तु यह सब कुछ न लिखकर मात्र यह लिखना कि ‘वरना इस वाक्यको लिखनेकी आवश्यकता ही न थी।’ कोई मायने नहीं रखता।

पं० फूलचन्द्रने धवल पृ० १३ पृ० ३६ पर विशेषार्थमें धवलशास्त्रको अध्यात्मशास्त्र स्वीकार किया है, वह धवल शास्त्रके आधारपर ही स्वीकार किया है। वहाँ उसे अध्यात्मशास्त्र जिस कारण कहा गया है इसका निर्देश भी कर दिया है। हम चाहते हैं कि अपर पक्ष पंचास्तिकाय गा० १२३ के टीका वचन और धवला पु० १३ पृ० १३६ के उक्त वचन इन दोनोंको प्रमाण माने। हमें दोनोंकी प्रामाणिकतामें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है। जो कथन जिस दृष्टिकोणसे किया गया है वह वैसा ही है, अन्यथा नहीं है।

आचार्य अमृतचन्द्रने प्रवसनसार गाथा ६३ की टीकामें जो यह वचन लिखा है-‘इयं हि सर्वपदार्थानां’ इत्यादि। उसे समझकर अपर पक्षने जो एकान्त नियतिवादका निषेध किया है उसका हम स्वागत करते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि जिस प्रकार त्रिकाली ध्रुवस्वभाव सदाकाल एकरूप नियत रहता है उस प्रकार पर्याय क्रमनियमित होकर भी अर्थात् क्रमसे अपने-अपने नियत कालमें उत्पन्न होकर भी अनियत अर्थात् वही वही न होकर अन्य-अन्य होती है। ऐसा ही वस्तुका स्वभाव है, उसमें चारा किसका।

इस प्रकार द्वादशांग वाणीका अनुसरण करनेवाला प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश और वर्तमान कालमें बोली जानेवाली गुजराती, हिन्दी, मराठी, कनडी, तमिल आदि भाषामें जितना भी जिनागम लिखा गया है वह सब प्रमाण है। वह सब जिनागम द्वादशांग ही है ऐसी जो श्रद्धा करता है वह सम्यग्दृष्टि है। हमें विश्वास है कि अपर पक्ष गृहस्थों द्वारा लिखित भाषा-भजनोंको उक्त पद्धतिसे प्रमाणकोटिमें स्वीकार करेगा। वीतराग वाणीका नाम जिनवाणी है। अतएव जो वचन इसका पदानुसरण करते हैं वे भी जिनवाणीके समान पूज्य हैं ऐसा यहाँ निर्णय करना चाहिए। वे गृहस्थों द्वारा लिखे गये यह गौण है। उनमें जिन वाणीका गुण होना मुख्य है, क्योंकि पूज्यता उसीसे आती है।

\१०. व्यवहार व्रत, तप आदि मोक्षके साक्षात् साधक नहीं

अपर पक्षने प्रतिशंका २ में लिखा था-‘अब हम व्यवहारनयके विषयभूत व्यवहार क्रियाओंपर थोड़ा प्रकाश डालते हैं। दिगम्बर जैनागममें व्यवहार धर्मके आधारपर ही निश्चयस्वरूप शुद्धात्माकी प्राप्ति अथवा मोक्षप्राप्ति बतलाई गई है।’ आदि,

हमने इसे और इसके आगेके कथनको ध्यानमें रखकर समयसार गाथा १५३ के आधारसे स्पष्ट किया था कि ‘व्रत, नियमरूप व्यवहार तो मिथ्यादृष्टिके भी होता है, परन्तु इसे पालता हुआ भी वह परमार्थ बाह्य बना रहता है, इसलिए निर्वाणको प्राप्त नहीं होता।’ ऐसा हमारा लिखनेका आशय यह था कि अपर पक्षकी व्यवहार धर्मके आधारपर ही निश्चयस्वरूप शुद्धात्माकी प्राप्तिकी जो मान्यता बनी हुई है वह छूट जाय । उक्त गाथाकी आत्मख्याति टीकाको उद्धृत करनेका भी हमारा यही आशय था ।

प्रसन्नता है कि अपर पक्षने यह स्वीकार कर लिया है कि ‘निर्विकल्प दशामें ये शुभ प्रवृत्तिरूप बाह्य व्रतादिक नहीं होते ।’ आत्मख्याति टीकाका आशय स्पष्ट करते समय हम ‘व्रत, नियम, शील और तप’ पदके पूर्व ‘बाह्य’ पद लगाना छोड़ गये थे । अपर पक्षने इस ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया, हमें इसकी भी प्रसन्नता हैं, क्योंकि उस पच द्वारा उक्त तथ्य स्वीकार कर लेनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि निर्विकल्प समाधिरूप रत्नत्रय परिणत आत्मा ही मोक्षका साक्षात् साधन है, व्यवहार क्रियारूप व्रत आदि नहीं ।

फिर भी अपर पक्ष शुभरूप मन, वचन, कायके व्यापारको परम्परासे मुक्तिका साधन मानता है, इसलिए यह विचारणीय हो जाता है कि इस विषयमें आगमका आशय क्या है ?

यदि अपर पक्ष ‘शुभरूप मन-वचन-कायके व्यापार’ पदसे द्रव्यमन, भाषा वर्गणाओंकी वचनरूप पर्याय और औदारिकादि शरीरकी क्रिया लेता है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ये तीनों पुद्गल द्रव्यके परिणाम हैं । वे न तो शुभ होते हैं और न अशुभ ।

यदि अपर पक्ष उक्त पदसे मुख्यतया तीनों योगोंका परिग्रह करता है तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि शुभ परिणामके कारण ही ये तीनों योग शुभ कहलाते हैं ।

अतएव परिशेषन्यायसे अपर पक्षको इस पद द्वारा शुभ परिणामसे परिणत आत्माको ही ग्रहण करना पड़ेगा । प्रवचनसार गाथा ९ में भी यही कहा है । स्पष्ट है कि जहाँ भी आगममें बाह्य व्रतादिको शुभ कहा है वहाँ उनसे शुभ परिणामरूप व्रतादिको ही ग्रहण किया है । यदि कहीं वचन-कायक्रियाको शुभ या अशुभ कहा भी है तो उससे शुभाशुभ काययोग और शुभाशुभ वचनयोगका ही परिग्रह किया है, भाषारूप से परिणत वचनक्रियाका या औदारिकादि शरीरक्रियाका नहीं ।

अब देखना यह है कि आगममें जो शुभ व्रतादिको परम्परा मोक्षका हेतु कहा है उसका आशय क्या है ? यद्यपि इस प्रश्नका उत्तर सीधा है कि ये व्रतादि यदि मोक्षके परम्परा हेतु होते अर्थात् आंशिक आत्मशुद्धिके कारण होते और इस प्रकार उत्तरोत्तर शुद्धिको प्राप्त कर यह जीव मोक्ष प्राप्त करता होता तो आगम (प्रवचनसार) में यह न लिखा होता कि 'जब यह आत्मा राग-द्वेषसे युक्त होकर शुभ और अशुभरूपसे परिणमता है तब ज्ञानावरणादिरूपसे कर्मोंका बन्ध होता है (१८७) । और न यह लिखा होता कि 'परको लक्ष्य कर किया गया शुभ परिणाम पुण्य है और अशुभ परिणाम पाप है तथा जो परिणाम अन्यको लक्ष्य कर नहीं किया गया है वह दुःखके चयका कारण है (१८१) । तब तो ऐसा विवेक करनेकी आवश्यकता ही नहीं थी कि ‘मैं न देह हूँ, न मन हूँ, न वाणी हूँ । उनका कारण नहीं हूँ, कर्ता नहीं हूँ, करानेवाला नहीं हूँ और कर्ताका अनुमोदक नहीं हूँ’ (१६०) । यह विवेक करानेकी भी आवश्यकता नहीं रह जाती कि ‘मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, ज्ञान-दर्शनमय हूँ, अरूपी हूँ । अन्य परमाणुमात्र भी मेरा नहीं है’ (समयसार गा० ३८) । बस, यह जीव देवादिकी भक्ति करता रहे, व्रतादिका पालन करता रहे, उसीसे आंशिक शुद्धि उत्पन्न होकर परम्परा मोक्ष हो जायगी । क्या अपर पक्षने इसका भी कभी विचार किया कि आगममें जो उक्त प्रकारका उपदेश दिया है वह क्यों दिया है ? यदि वह पक्ष गहराईसे इसका विचार करे तो उसे यह निर्णय करनेमें देर न लगे कि शुभ परिणाम मात्र बन्धका कारण होनेसे मोक्षमार्गमें हेय है। साक्षात् मुक्तिका कारण तो हो ही नहीं सकता, आंशिक शुद्धिका भी कारण नहीं है। वह परिणाम सम्यग्दृष्टिका हो क्यों न हो, है वह बन्धका ही कारण, क्योंकि मोक्ष या आंशिक शुद्धिके कारणभूत परिणामसे उस परिणामकी जाति ही भिन्न है। यदि किसीके पगमें हलकी वेड़ी पड़ी हो, इसलिए कोई उसे देख कर यह कहे कि यह वेड़ी परम्परा अर्थात् क्रमसे मुक्तिका कारण है तो जैसे यह बात उपहासास्पद मानी जायगी वैसे ही प्रकृतमें जानना चाहिए। अतः आईए, मिलकर विचार करें कि आगममें जो शुभ व्रतादिको मुक्तिका कारण कहा है उसका क्या तात्पर्य है। समयसार कलशमें इस प्रश्नका उत्तर देते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

तज्ज्ञानस्यैव सामर्थ्यं विरागस्य वा किल।
यत्कोऽपि कर्मभिः कर्म भुञ्जानोऽपि न बध्यते ॥१३४॥

वास्तवमें वह सामर्थ्य ज्ञावकी ही है अथवा विरागकी ही है कि कोई भी सम्यग्दृष्टि जीव कर्मोंको भोगता हुआ भी कर्मोंसे नहीं बँधता ॥१३४॥

इसी तथ्यको और भी स्पष्ट शब्दोंमें समझाते हुए वहाँ लिखा है-

ज्ञानवान् स्वरसतोऽपि यतः स्यात् सर्वरागरसवर्जनशीलः।
लिप्यते सकलकर्मभिरेषः कर्ममध्यपतितोऽपि ततो न ॥१४९॥

ज्ञानी जीव निजरससे ही सर्व रागरसके वर्जनस्वभाववाला है, इसलिए वह कर्मोंके बीच पड़ा हुआ भी सब प्रकारके कर्मोंसे लिप्त नहीं होता ॥१४९॥

ज्ञानीकी ऐसी परिणति निरन्तर चलती रहती है। साथ ही इसमें जितनी प्रगाढ़ता आती जाती है उतनी ही विशुद्धिमें वृद्धि होती जाती है तथा कर्मबन्धके निमित्तभूत राग-द्वेषादिमें और सुख-दुखपरिणाममें हानि होती जाती है। यतः ये राग-द्वेषादि परिणाम आत्मविशुद्धिके सद्भाव और उसकी वृद्धिमें बाधक नहीं हो पाते, अतः देवादिविषयक और व्रतादि विषयक इन परिणामोंको व्यवहारसे परम्परा मोक्षका हेतु कहा है। ये आत्मशुद्धिको उत्पन्न करते हैं, इसलिए नहीं। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए वहीं लिखा है-

यावत्पाकमुपैति कर्मविरतिर्ज्ञानस्य सम्यङ्‌ न सा
कर्म-ज्ञानसमुच्चयोऽपि विहितस्तावन्न काचित्क्षतिः।
किन्त्वत्रापि समुल्लसत्यवशतो यत्कर्म बन्धाय तत्
मोक्षाय स्थितमेकमेव परमं ज्ञानं विमुक्तं स्वतः ॥११०॥

जब तक ज्ञानकी कर्मविरति भलीभाँति परिपूर्णताको नहीं प्राप्त होती तब तक कर्म और ज्ञानका समुच्चय (मिलकर रहना) भी शास्त्रमें कहा है, इस प्रकार दोनोंके मिलकर रहनेमें कोई क्षति नहीं है। किन्तु यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि आत्मामें अवशपने (हीन पुरुषार्थताके कारण) जो कर्म प्रगट होता है वह तो बन्धका कारण है और जो परद्रव्य-भावोंसे स्वतः विमुक्त परम ज्ञान है वह एकमात्र मोक्षका हेतु है ॥११०॥

ये व्रतादिक या अर्हद्भक्ति आदिक परम्परा मोक्षके हेतु हैं इसका यह आशय है कि जो ज्ञानी मोक्षके लिए उद्यतमन है जिसने अचिन्त्य संयम और तपभारको प्राप्त किया है। किन्तु जो वर्तमान भवमें परम वैराग्यभूमिकाको आरोहण करनेमें असमर्थ है वह जैसे धुनकीमें चिपकी हुई रुई जल्दी छूटती नहीं वैसे ही अर्हदादिविषयक या नौ पदार्थविषयक परसमय प्रवृत्तिको छोड़नेमें विशेष उत्साहवान् न होनेके कारण उसी भवमें मोक्षको न प्राप्तकर पहले सुरलोक आदि सम्बन्धी क्लेशपरम्पराको भोग कर अन्तमें मुक्तिको प्राप्त होता है। यह 'व्रतादि और अर्हद्भक्ति आदि परम्परासे मोक्षके हेतु हैं इसका तात्पर्य है, यह नहीं कि वे व्रतादिक और अर्हद्भक्ति आदिक प्रथम भूमिकामें आत्माकी आंशिक शुद्धिके हेतु हैं और इस प्रकार ये परम्परासे मोक्षके हेतु बन जाते हैं। इसी तथ्यको आचार्य अमृतचन्द्रने पंचास्तिकाय गाथा १७० की टीकामें स्पष्ट किया है। वे लिखते हैं-

यः खलु मोक्षार्थमुद्यतमनाः समुपार्जिताचिन्त्यसंयमतपोभारोऽप्यसंभावितपरमवैराग्यभूमिकाधिरोहणप्रभुशक्तिः पिञ्जनलग्नतूलन्यासन्यायेन नवपदार्थैः सहार्हदादिभक्तिरूपां परसमयप्रवृत्तिं परित्यक्तुं नोत्सहते स खलु नाम साक्षान्मोक्षं न लभते, किन्तु सुरलोकादिक्लेशप्राप्तिरूपया परम्परया तमवाप्नोति।

इस प्रकार व्यवहार व्रत आदि मोक्षके साक्षात् साधक न होने पर भी आगममें जो उन्हें परम्परा साधक कहा उसका क्या तात्पर्य है इसका स्पष्टीकरण किया।

\११. प्रकृतमें ‘ज्ञान’ पदका अर्थ

परमागमस्वरूप समयसारमें ‘ज्ञान ही मोक्षका साधन है’ ऐसा कहा है। उसका क्या तात्पर्य है इसका स्पष्टीकरण अपर पक्षने किया है। इस पर विशेष प्रकाश समयसार गाथा १५५ के विशेषार्थसे पड़ता है, इसलिए उसे यहाँ दे रहे हैं-

आत्माका असाधारण स्वरूप ज्ञान ही है और इस प्रकरणमें ज्ञानको ही प्रधान करके विवेचन किया है। इसलिए, ‘सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र इन तीनों स्वरूप ज्ञान ही परिणमित होता है’ यह कहकर ज्ञानको ही मोक्षका कारण कहा है। ज्ञान है वह अभेदविवक्षामें आत्मा ही है ऐसा कहनेमें कुछ भी विरोध नहीं है, इसलिए टीकामें कई स्थानोंपर आचार्यदेवने ज्ञानस्वरूप आत्माको ‘ज्ञान’ शब्दसे कहा है।

एक बात यह भी है कि जहाँ क्रियाको मोक्षका साधन कहा है वहाँ उसका अर्थ रागादिका परिहाररूप स्वरूपस्थिति ही करना चाहिए। पण्डितप्रवर टोडरमलजीने सांचा मोक्षमार्ग क्या है इसका स्पष्टीकरण करते हुए मोक्षमार्गप्रकाशक पृ० ३७० में लिखा है-

शुद्ध आत्माका अनुभव सांचा मोक्षमार्ग है।

पापक्रियाकी निवृत्ति चारित्र है इसका स्पष्टीकरण करते हुए आचार्य वीरसेन धवला पु० ६ पृ० ४० में लिखते हैं-

पापक्रियानिवृत्तिश्चारित्रम्। घातिकर्माणि पावं। तेसिं किरिया मिच्छत्तासंजमकसाया। तेसिमभावो चारित्तं।

पापक्रियाकी निवृत्ति चारित्र है। घातिकर्म पाप हैं। उनकी क्रिया मिथ्यात्व, असंयम और कषाय हैं। उनका अभाव चारित्र है।

स्पष्ट है कि मोक्षमार्गमें ‘क्रिया’ पद द्वारा स्वरूपस्थितिका ही ग्रहण किया है, मिथ्यात्वरूप और शुभाशुभ भावोंका नहीं।

तत्त्वार्थवार्तिक पृ० ११ के ‘हतं ज्ञानं क्रियाहीनं’ आदि उद्धृत श्लोकका यही तात्पर्य है।

यहाँ पर प्रश्न होता है कि यदि ऐसी बात है तो व्रत, शील आदिको परमागममें मोक्षमार्ग क्यों कहा ? यह प्रश्न है। इसका समाधान करते हुए पण्डितप्रवर टोडरमलजी मोक्षमार्गप्रकाशक पृ० ३७४ में लिखते हैं-

बहुरि परद्रव्यका निमित्त मेटनेकी अपेक्षा व्रत, शील, संयमादिककों मोक्षमार्ग कह्या सो इन ही कौं मोक्षमार्ग न मानि लेना। जातैं पर द्रव्यका ग्रहण-त्याग आत्माकै होय तौ आत्मा पर द्रव्यका कर्ता-हर्ता होय।

इस प्रकार ज्ञान ही मोक्षका साधन है इसका स्पष्टीकरण किया।

\१२. सम्यक्त्व प्राप्तिके उत्कृष्ट कालका विचार

परमागममें यह जीव अधिकसे अधिक कितने कालके शेष रहनेपर सम्यक्त्वको प्राप्त कर लेता है इसका विचार करते हुए तत्त्वार्थवार्तिक अ० २ सू० ३ में लिखा है-

तत्र काललब्धिस्तावत् कर्माविष्ट आत्मा भव्यः कालेऽर्धपुद्गलपरिवर्तनाख्येऽवशिष्टे प्रथमसम्यक्त्व-ग्रहणस्य योग्यो भवति नाधिक इतीयं काललब्धिरेका।

वहाँ काललब्धि तो कर्माविष्ट भव्य आत्मा अर्धपुद्गलपरिवर्तन नामवाले कालके शेष रहने पर प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होता है, अधिक काल रहने पर नहीं, यह एक काललब्धि है।

आचार्य पूज्यपादने भी सर्वार्थसिद्धि अ० २ सू० ३ में इन्हीं शब्दोंमें इसी बातको स्वीकार किया है।

\१. यहाँ ‘काल’ पद विशेष्य है और ‘अर्धपुद्गलपरिवर्तनाख्य’ पद विशेषण है। इससे हम जानते हैं कि प्रकृतमें एक समय, एक आवलि, एक उच्छ्वास, एक मुहूर्त, एक दिन-रात, एक पक्ष, एक मास, एक ऋतु, एक अयन, एक वर्ष, संख्यात वर्ष, असंख्यात वर्ष, पल्योयम-का असंख्यातवाँ भाग, पल्योयमका संख्यातवां भाग, एक सागरोपम, संख्यात सागरोपम, लोकका असंख्यातवां भाग, एक लोक, अंगुलका असंख्यातवां भाग, अंगुलका संख्यातवां भाग, क्षुल्लकभवग्रहण, पूर्वकोटि, पूर्वकोटिपृथक्त्व, असंख्यात लोक और अनन्तकाल आदि जिनका नाम है वे सब काल यहाँ पर नहीं लेने हैं। किन्तु यहाँ पर अर्धपुद्गलपरिवर्तन नामवाला काल लेना है। इसका यह आशय फलित हुआ कि आगममें जहाँ भी यह लिखा है कि अर्धपुद्गलपरिवर्तन कालके या अर्धपुद्गलपरिवर्तन नामवाले कालके शेष रहने पर यह जीव प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होता है वहाँ उसका यही तात्पर्य है कि जब इस जीवको मोक्ष जानेके लिए अधिकसे अधिक अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल शेष रहता है तब यह जीव प्रथम सम्यक्त्वको ग्रहण कर सकता है, इससे अधिक कालके शेष रहनेपर नहीं। जहाँ समय, आवलि, उच्छ्वास, अन्तर्मुहूर्त, दिन-रात, सप्ताह पक्ष, मास, ऋतु, अयन और वर्षादिके द्वारा कालका ज्ञान नहीं कराया जा सकता है वहाँ पल्योपम, सागरोपम, लोक, पुद्गलपरिवर्तन, और अर्धपुद्गलपरिवर्तन आदि उपमानोंके द्वारा उपमेयका ज्ञान कराया जाता है। यहाँ मोक्ष जानेके अधिकसे अधिक कितने काल पूर्व यह जीव सम्यक्त्वको प्राप्त कर सकता है इसका ज्ञान करानेके लिए इसी पद्धतिको अपनाया गया है।

\२. कालप्ररूपणामें और अन्तरकालप्ररूपणामें कालकी ही मुख्यता रहती है। कालप्ररूपणामें यह बतलाया जाता है कि कमसे कम कितने कालतक और अधिकसे अधिक कितने कालतक यह जीव विवक्षित गुणस्थान या मार्गणास्थान आदिमें रहेगा। और अन्तर काल प्ररूपणामें यह बतलाया जाता है कि कमसे कम कितने काल बाद और अधिकसे अधिक कितने कालबाद यह जीव पुनः विवक्षित गुणस्थान या मार्गणास्थान आदिको प्राप्त करेगा और जिस गुणस्थान या मार्गणास्थानका एक जीव या नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तरकाल नहीं बनता वहाँ उसका निषेध कर उसे निरन्तर बतलाया जाता है। इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि आगममें कालप्ररूपणामें जहाँ भी ‘अर्धपुद्गलपरिवर्तन’ पद आया है वहाँ उससे अर्धपुद्गलपरिवर्तनको ग्रहण न कर मात्र उसमें जितना काल लगता है उस कालको ग्रहण किया गया है।

प्रत्येक कार्य अपने प्रतिनियत कालके प्राप्त होने पर ही होता है, अन्यदा नहीं होता इस तथ्यका खण्डन करनेके लिए आजकल यह भी कहा जाने लगा है कि अधिकसे अधिक अर्धपुद्गलपरिवर्तन कालके शेष रहने पर सम्यक्त्व प्राप्त होता है इसका आशय यह है कि जब जब यह जीव पुद्गलपरिवर्तन करता है तब तब उस परिवर्तनके आधे शेष रह जाने पर सम्यक्त्वको प्राप्त करनेकी योग्यता उत्पन्न होती है।

हमारे सामने यह प्रश्न रहा है और यहाँ भी अपर पक्षने जो कुछ भी लिखा है उससे यह भाव झलकता है, इसलिए हमें पूर्वोक्त स्पष्टीकरण करनेकी आवश्यकता प्रतीत हुई।

\३. यह तो अपर पक्ष ही जानता है कि करणलब्धि द्रव्य, क्षेत्र आदि किसी भी परिवर्तनमें पड़े हुए जीवके न होकर उसका उच्छेद करने पर ही हो सकती है। स्पष्ट है कि जो जीव पुद्गलपरिवर्तन कर रहा है वह उसे करते हुए तो न करणलब्धि कर सकता है और न ही सम्यक्त्वको ही प्राप्त कर सकता है।

यदि कहा जाय कि जिस समय यह जीव सम्यक्त्वको प्राप्त करनेके सन्मुख होकर करणलब्धि करता है उस समय पुद्गलपरिवर्तनका विच्छेद होकर सम्यक्त्व प्राप्त करनेके समय सम्यक्त्व गुणके कारण उसका आधा काल रह जाता है? समाधान यह है कि सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिकके उक्त उल्लेखसे यह आशय व्यक्त नहीं होता, क्योंकि उसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि कितना काल अवशिष्ट रहने पर अनादि मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होता है। इसका आशय तो इतना ही है कि यहाँसे लेकर यह जीव सदा प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य है। जिस प्रकार संज्ञी पर्याप्तक कर्मभूमिज मनुष्यके सम्बन्धमें आगममें यह विधान है कि आठ वर्षका होने पर ऐसा मनुष्य सम्यक्त्व, संयमासंयम और संयमके ग्रहणके योग्य होता है। उसी प्रकारका यह विधान है। दोनोंमें कोई अन्तर नहीं। बाह्य सामग्रीके साथ यदि अन्तःसामग्रीकी अनुकूलता होती है तो कर लेता है, अन्यथा नहीं करता। कोई एक नियम नहीं, क्योंकि प्रत्येक जीवके अपने-अपने प्रतिनियत कार्योंका स्वकाल पृथक्-पृथक् है। तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ३ का भी यही आशय है।

\१. अपर पक्षने धवला पु० ४ और ५ के दो प्रमाण दिये हैं। धवला पु० ४ के प्रमाणमें सम्यक्त्वकी मात्र महत्ता दिखलाई गई है, अन्यथा जो जो अनादि मिथ्यादृष्टि प्रथम सम्यक्त्वको प्राप्त करे उन सबको अर्धपुद्गलपरिवर्तन काल तक संसारमें रहनेका प्रसंग उपस्थित होता है। किन्तु उक्त आगमका यह अभिप्राय नहीं है, क्योंकि कितने ही जीवोंको अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण कालके शेष रहने पर प्रथम सम्यक्त्व प्राप्त होता है और कितने ही जीवोंको इससे कम काल शेष रहने पर प्रथम सम्यक्त्व प्राप्त होता है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य विद्यानन्दि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६१ में लिखते हैं-

तथा कश्चित् संसारी सम्भवदासन्नमुक्तिरभिव्यक्तसम्यग्दर्शनादिपरिणामः, परोऽनन्तेनापि कालेन सम्भवदभिव्यक्तसद्दर्शनादिः ।

उसी प्रकार जिसे मुक्ति प्राप्त करना आसन्न-अतिनिकट है ऐसा संसारी जीव सम्यग्दर्शनादि परिणामको उत्पन्न करता है । दूसरा अनन्त कालके द्वारा भी सम्यग्दर्शनादि परिणामको उत्पन्न करता है ।

यदि अपर पक्ष कहे कि जो-जो अनादि मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्वको प्राप्त करता है उन सबका सम्यक्त्व गुणके कारण मोक्ष प्राप्त करनेका काल तो अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण ही शेष रहता है । किन्तु बादमें कोई जीव उसे घटा लेते हैं और कोई जीव नहीं घटा पाते ? समाधान यह है कि-

(क) एक तो अपर पक्षके इस कथनका तत्त्वार्थवार्तिक और सर्वार्थसिद्धिके उक्त कथनके साथ स्पष्ट विरोध आता है, क्योंकि उन ग्रन्थोंके उक्त कथनमें सामान्य योग्यताका निर्देश करते हुए मात्र इतना ही कहा गया है कि अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण कालके शेष रहने पर संसारी जीव प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होता है । अनादि मिथ्यादृष्टि जीव अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण कालके शेष रहने पर नियमसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है यह नहीं कहा गया है । अतः उक्त कथनको नियम वचन न जान कर मात्र सम्यक्त्वको प्राप्त करनेकी योग्यता, मोक्ष जानेके लिए संसारमें कितना काल शेष रह जानेपर, प्राप्त हो जाती है इस प्रकार योग्यताका सूचक वचन जानना चाहिए ।

(ख) दूसरे कोई जीव सम्यक्त्व गुणके कारण अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण कालमें और भी कमी कर लेते हैं और कोई जीव नहीं कर पाते, यदि ऐसा माना जाय तो पृथक्-पृथक् जीवोंकी अपेक्षा सम्यक्त्व गुणकी पृथक्-पृथक् सामर्थ्य माननेका प्रसंग उपस्थित होता है, जो युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर जो विविध आपत्तियाँ उपस्थित होती हैं उनसे अपर पक्ष अपने कथनकी रक्षा नहीं कर सकता । यथा-३ ऐसे जीव लीजिए, जिन्होंने एक साथ प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न किया है । उनमेंसे अन्तर्मुहूर्तबाद एक जीव वेदकसम्यग्दृष्टि बनता है, दूसरा मिश्र गुणस्थानमें जाता है और तीसरा मिथ्यादृष्टि हो जाता है । सो क्यों ? मालूम पड़ता है कि अपर पक्षने इस तथ्य पर अणुमात्र भी विचार नहीं किया । जब कि इन तीनों जीवोंने एक साथ सम्यक्त्व उत्पन्न किया है और वे तीनों ही जीव अनन्त संसारका उच्छेद कर सम्यक्त्व गुणके कारण उसे अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण कर लेते हैं । ऐसी अवस्थामें वे उसी सम्यक्त्व गुणके कारण ऐसी सामर्थ्य क्यों नहीं उत्पन्न कर पाते जिससे उन्हें पुनः मिथ्यादृष्टि या मिश्र गुणस्थानवाला बननेका प्रसंग ही उपस्थित न हो । अपर पक्ष इन जीवोंकी सम्यक्त्व गुणसम्बन्धी हीनाधिकताको तो इसका कारण कह नहीं सकता और न ही मिथ्यात्वादि द्रव्यकर्मोंकी बलवत्ताको इसका कारण कह सकता है, क्योंकि इन जीवोंमें सम्यक्त्व गुणकी हीनाधिकता मानने पर अपर पक्षका यह कथन कि वे जीव सम्यक्त्व गुणके कारण अनन्त संसारका उच्छेद कर समानरूपसे अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण कर लेते हैं कोई मायने नहीं रखता । अनन्त संसारका उच्छेद करनेकी सम्यक्त्व गुणकी सामर्थ्य मानी जाय और संसारकी जड़ मिथ्यात्वके समूल नाश करनेकी सामर्थ्य न मानी जाय इसे भला कौन बुद्धिमान् स्वीकार करेगा ।

(ग) तीसरे धवला पु० ४ पृ० ३३५ में यह वचन आया है कि-

सम्मत्तगुणेण पुव्विल्लो अपरित्तो संसारो ओहट्टिदूण परित्तो पोग्गलपरियट्टस्स अद्धमेत्तो होदूण उक्कस्सेण चिट्ठदि ।

सम्यक्त्व गुणके कारण पहलेके अपरीत संसारका उच्छेदकर परीत पुद्गलपरिवर्तनका अर्धमात्र होकर उत्कृष्टरूपसे ठहरता है ।

धवला पु० ५ में यह वचन भी आया है कि-

अणंतो संसारो छिण्णो अद्धपुग्गलपरियट्टमेत्तो कदो ।

अनन्त संसारका छेद हुआ, अर्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण किया ।

इस प्रकार अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें समझकर धवलाके ये दो वचन उद्धृत किये हैं । अब विचार यह करना है कि धवलाके उक्त कथनोंका आशय क्या है ? इन उल्लेखोंमेंसे प्रथममें ‘पहलेके अपरीत संसारका नाशकर उत्कृष्टरूपसे सम्यक्त्व गुणके कारण अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण परीत संसारकर लेनेकी’ बात कही गई है । तथा दूसरे उल्लेखमें ‘सम्यक्त्वगुणके कारण अनन्त संसारका छेदकर अर्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण काल कर लेनेकी’ बात कही गई है । किन्तु इन उल्लेखोंसे यह ज्ञात नहीं होता कि यहाँ ‘अपरीत’ और ‘अनन्त’ शब्दका क्या आशय है ? और सम्यक्त्व गुणके द्वारा यदि अपरीत या अनन्त संसारका उच्छेद होता है तो जो परीत संसार शेष रहता है उसका क्या आशय है ? वह अधिकसे अधिक अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण या कमसे कम अन्तर्मुहूर्तप्रमाण शेष रहता है, मात्र इतना ही उसका आशय है या ये ‘अपरीत, परीत और अनन्त’ शब्द नयवचन होनेसे किसी दूसरे अभिप्रायको सूचित करते हैं ? प्रश्न मार्मिक है, अतएव आगमके प्रकाशमें इन पर विचार करना होगा । आईए, इन शब्दोंमें निहित तथ्योंपर विचार करें-

मूलाचार अधिकार २ में मरणकालमें सम्यक्त्वकी विराधनाकर जो जीव मरण करते हैं उनको ध्यानमें रखकर विचार करते हुए आचार्य लिखते हैं-

मरणे विराहिए देवदुग्गई दुल्लहा य किर बोही ।
संसारो य अणंतो होइ पुण आगमे काले ॥६१॥

मरणके समय सम्यक्त्वकी विराधना करनेपर देवदुर्गति तकका प्राप्त करना दुर्लभ है, बोधि-रत्नत्रयका प्राप्त करना तो दुर्लभ है ही । जीवका संसार अनन्त होता है ॥६१॥

यहाँ ‘अनन्त’ पदका अर्थ करते हुए टीकामें लिखा है-

अणंतो अनन्तः अर्धपुद्गलप्रमाणः कुतोऽस्यानन्तत्वम्, केवलज्ञानविषयत्वात् ।

अनन्तका अर्थ है अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण ।

शंका-यह काल अनन्त कैसे है ?

समाधान-केवलज्ञानका विषय होनेसे इस कालको अनन्त कहा है ।

यह आगमप्रमाण है । इससे विदित होता है कि जहाँ भी आगममें ‘सम्यक्त्व गुणके कारण अनन्त संसारका छेद किया ।’ यह वचन आया है वहाँ उसका यही आशय है कि 'सम्यक्त्व गुणके प्राप्त होनेपर ऐसे जीवका संसारमें रहनेका जो उत्कृष्ट काल अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण शेष रहा था वह घटने तो अवश्य लगता है, किन्तु ऐसा जीव नियमसे पुनः मिथ्यादृष्टि हो जाता है, अतः वह पुनः अनन्तसंसारी कहलाने लगता है । यद्यपि ऐसा जीव अधिकसे अधिक कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल तक ही मिथ्यादृष्टि बना रहता है, पर वह कहलाता है अनन्तसंसारी ही । इससे यह तात्पर्य फलित हुआ कि मिथ्यादृष्टिकी अनन्त संसारी संज्ञा है और सम्यग्दृष्टिको इसके विपरीत सान्त संसारी कहते हैं। श्रीधवलजीमें आचार्य वीरसेनने जो ‘सम्मत्तगुणेण अणंतसंसारो छिण्णो’ यह वचन दिया है उसका भी यही आशय है । उस वचनका फलितार्थ यह है कि सम्यक्त्व गुणके कारण इस जीवने अनन्त संसार अर्थात् मिथ्यात्वका नाश किया। अन्यथा जो सम्यग्दृष्टि अपनी संक्लेशकी बहुलतावश पुनः मिथ्यादृष्टि हो जाता है उसे अनन्तसंसारी कहना नहीं बन सकता।

इस प्रकार प्रकृतमें ‘सम्यक्त्व गुणके कारण अनन्त संसारका छेद किया’ धवलाके इस वचनका क्या आशय है यह स्पष्ट किया। आगे इसी प्रसंगसे जो ‘परीत’ और ‘अपरीत’ शब्दोंका प्रयोग हुआ है इनका क्या आशय है इसका स्पष्टीकरण करते हैं-

मूलाचार अ० २ गा० ७२ की टीकामें ‘परीत’ शब्दके अर्थ पर प्रकाश डालते हुए संस्कृत टीकाकार लिखते हैं-

ते होंति-ते भवन्ति, परित्तसंसारा-परीतः परित्यक्तः परिमितो वा संसारः चतुर्गतिगमनं येषां यैर्वा ते परीतसंसाराः परित्यक्तसंसृतयो वा।

वे परीत संसारी होते हैं अर्थात् जिनका संसार अर्थात् चतुर्गतिगमन परीत अर्थात् परित्यक्त या परिमित हो जाता है वे परीतसंसारो या परित्यक्तसंसारी हैं।

इससे विदित होता है कि सम्यग्दृष्टिकी परित्यक्तसंसारी और मिथ्यादृष्टिकी अपरित्यक्त संसारी संज्ञा मुख्यरूपसे है, जो उचित ही है, क्योंकि मुख्यतासे मिथ्यात्वका नाम ही संसार है और मिथ्यात्वका दूर होना ही संसारका त्याग है। पण्डितप्रवर बनारसीदासजीने नाटक समयसारमें सम्यग्दृष्टिको जिनेश्वरका लघुनन्दन इसी अभिप्रायसे सूचित किया है। विचार कर देखा जाय तो मिथ्यात्वका उच्छेद होना ही संसारका उच्छेद है। आचार्य कुन्दकुन्दने सम्यग्दर्शनको धर्मका मूल इसी आशयसे कहा है। मिथ्यात्वरूपी महामल्लके परास्त करनेपर अन्य कषायादिका उच्छेद करना दुर्लभ नहीं है यह उक्त कथनका आशय है। अतएव प्रकृतमें धवलाके ‘अपरित्तो संसारो ओहट्टिदूण’ पदका अर्थ पूर्वोक्त प्रमाण करना ही उचित है।

धवलाके उक्त उल्लेखमें सम्यक्त्व गुणके कारण अनन्त या अपरीत संसारका नाशकर उससे उत्कृष्ट रूपसे परीत अर्थात् अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण किया यह कहा है। सो इस उल्लेख परसे उक्त काल तक संसारको बनाये रखना सम्यक्त्वका कार्य नहीं समझना चाहिए। फिर भी उक्त उल्लेखमें जो उत्कृष्टरूपसे ‘अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण किया’ यह कहा गया है वह मात्र इस तथ्यको सूचित करता है कि ऐसे जीवका उत्कृष्ट काल इतना शेष रहता है, तभी समग्र आगमकी संगति बैठ सकती है। सम्यक्त्वगुण संसारके उच्छेदमें हेतु है, संसारके बनाये रखनेमें नहीं। सम्यक्त्वके प्राप्त होने पर किसीका कम और किसीका अधिक जो संसार बना रहता है उसके अन्तरंग-बहिरंग हेतु अन्य हैं। उनमें प्रमुख हेतु काललब्धि है। सब कार्योंकी अपनी-अपनी काललब्धि होती है। इसके अनुसार अपने-अपने कालमें सब कार्य होकर आगेके कार्योंके लिए वे यथायोग्य हेतु संज्ञाको प्राप्त होते रहते हैं। जगत्का क्रम इसी पद्धतिसे चल रहा है और चलता रहेगा।

धवला पु० ६ पृ० २०५ में सम्यक्त्वके प्रसंगसे यह प्रश्न उठाया गया है कि सूत्रमें मात्र काललब्धि कही है। उसमें इन लब्धियोंका सम्भव कैसे है? इसका समाधान करते हुए वीरसेन आचार्य लिखते हैं कि सूत्रमें जो प्रति समय अनन्त गुणहीन अनुभाग उदीरणा, अनन्त गुणक्रमसे वर्धमान विशुद्धि और आचार्यके उपदेशकी प्राप्ति कही है वह सब उसी काललब्धिके होनेपर ही सम्भव हैं। इससे स्पष्ट है कि सब कार्य अपनी-अपनी काललब्धिके प्राप्त होने पर ही होते हैं। किसी अनादि मिथ्यादृष्टिको प्रथम सम्यक्त्व अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण कालके शेष रहनेपर होता है, किसीको इसमें एक समय, दो समय, तीन समय आदि संख्यात समय, असंख्यात समय काल कम होकर प्रथम सम्यक्त्व होता है उसका प्रमुख कारण काललब्धि ही है, अतः सम्यक्त्वोत्पत्तिका काल नियत नहीं है ऐसा लिखकर प्रत्येक कार्यकी काललब्धिको अवहेलना करना उचित नहीं है। सब जीवोंका विवक्षित एक कार्य एक कालमें न हो यह दूसरी बात है, परन्तु प्रत्येक जीवका प्रत्येक कार्य अपने-अपने नियत कालमें ही होता है यह सुनिश्चित है। काललब्धिका ऐसा ही माहात्म्य है। धवला पु० ६ पृ० २०५ का वह उल्लेख इस प्रकार है-

सुत्ते काललद्धी चेव परूविदा, तम्हि एदासिं लद्धीणं कधं सम्भवो ? ण, पडिसमयमणंतगुण-अणुभागुदीरणाए अणंतगुणकमेण वड्ढमाणविसोहीए आइरियोवदेसलंभस्स य तत्थेव संभवादो।

आशय पूर्वमें दिया ही है।

\५. अपर पक्षने पंचास्तिकाय गा० २० की आचार्य जयसेनकृत टीकाका एक वाक्यांश उद्धृतकर अपने पक्षका समर्थन करना चाहा है, किन्तु वह इसलिए ठीक नहीं, क्योंकि आचार्य जयसेनने वेणु (बाँस) दण्डको उदाहरणरूपमें उपस्थितकर उसके पूर्वार्ध भागको ही विचित्र-चित्ररूप बतलाया है। उसके उत्तरार्ध को तो वे विचित्र-चित्रपनेका अभाव होनेसे शुद्ध ही सूचित कर रहे हैं। स्पष्ट है कि इस उदाहरणसे तो यही सिद्ध होता है कि इस जीवकी जितनी सुनिश्चित संसार अवस्था है वह प्रतिनियत नानारूप है, मुक्त अवस्था नहीं। उनके उस कथनका प्रारम्भिक अंश इस प्रकार है-

यथैको महान् वेणुदण्डः पूर्वार्धभागे विचित्रचित्रेण खचितः शवलितो मिश्रितः तिष्ठति। तस्मादूर्ध्वार्धभागे विचित्रचित्राभावाच्छुद्ध एव तिष्ठति। तत्र यदा कोऽपि देवदत्तो दृष्टावलोकनं करोति तदा भ्रान्तिज्ञान-वशेन विचित्रचित्रवशादशुद्धत्वं ज्ञात्वा तस्मादुत्तरार्धभागेऽप्यशुद्धत्वं मन्यते। आदि,

जिस प्रकार एक बहुत बड़ा वेणुदण्ड पूर्वार्धभागमें विचित्र-चित्ररूपसे खचित होकर शवलित मिश्रित स्थित है। परन्तु उससे ऊपरके अर्धभागमें विचित्र-चित्रका अभाव होनेसे शुद्ध ही स्थित है। उसपर जब कोई देवदत्त दृष्टि डालता है तब भ्रान्तिज्ञानके कारण विचित्र-चित्रवश अशुद्धताको जानकर उससे उत्तरार्ध भागमें भी वह अशुद्धता मानता है। आदि।

यह आचार्य जयसेनकी टीकाका कुछ अंश है। आचार्य अमृतचन्द्रने भी एक बड़े भारी वेणुदण्डको उदाहरणरूपमें उपस्थितकर इस विषयको समझाया है। विद्वान् पाठक इन दोनों टीका वचनोंको सावधानी पूर्वक अवलोकन कर लें। इस उदाहरणसे ये तथ्य फलित होते हैं-

\१. द्रव्यार्थिक दृष्टिसे देखनेपर पूरा वेणुदण्ड शुद्ध ही है।

\२. पर्यायार्थिक दृष्टिसे देखनेपर वेणुदण्डका प्रारम्भका कुछ भाग अशुद्ध है, शेष बहुभाग शुद्ध है।

\३. वेणुदण्डमें पर्याय दृष्टिसे अशुद्धता वहीं तक प्राप्त होती है जहाँ तक वह अशुद्ध है। उसके बाद नियमसे पर्यायदृष्टिसे शुद्धता प्रगट हो जाती है।

यह उदाहरण है। इसे भव्य जीवपर लागू करनेपर विदित होता है कि यह जीव द्रव्यदृष्टिसे सदा शुद्ध है। पर्यायदृष्टिसे अशुद्धता नियत काल तक ही है। उसके व्यतीत होनेपर वह पर्यायमें भी शुद्ध ही है।

इससे स्पष्ट है कि सभी कार्य अपने-अपने स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं। आगममें जो कार्य-कारणभावका निर्देश किया है वह केवल यह बतलानेके लिए ही किया है कि प्रत्येक कार्य स्वकालमें होकर भी किस क्रमसे होते हैं। कार्य-कारणभाव मात्र इसी नियमको सूचित करता है। कोई भी कार्य अपने स्वकालको छोड़कर कभी भी किया जा सकता है इस नियमको नहीं।

शंका १६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ३/३)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ७८८ से ८०६

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\१३. प्रतिनियत कार्य प्रतिनयत कालमें ही होता है।

अपर पक्षने परीक्षामुख अ० १ के कुछ सूत्र और उनका अर्थ देकर यह लिखा है कि ‘जिस प्रकार घट-पट आदिकी ओर उपयोग ले जाकर जाननेका कोई नियत काल नहीं है, उसी प्रकार स्वोन्मुख होकर स्वको जाननेका भी कोई नियत काल नहीं है, क्योंकि सर्व कार्योंका नियामक कोई नियत काल नहीं है, किन्तु बाह्य-आभ्यन्तर समर्थ कारण सामग्री कार्यकी नियामक है।’ आदि,

समाधान यह है कि उस बाह्य-आभ्यन्तर प्रतिनियत सामग्रीमें प्रतिनियत काल भी सम्मिलित है। इससे सिद्ध होता है कि प्रतिनियत कालमें ही प्रतिनियत सामग्रीकी उपलब्धि होती है और उसे निमित्त कर प्रतिनियत कार्यकी ही उत्पत्ति होती है। कोई किसीकी प्रतीक्षा नहीं करता। अपने-अपने कालमें प्रतिनियत सामग्री प्राप्त होती है। अन्य सामग्रीके कालमें वह प्राप्त हो भी नहीं सकती, क्योंकि वह अन्य सामग्रीके प्राप्त होनेका स्वकाल है। यदि अन्य सामग्रीके कालमें उससे जुदी दूसरी सामग्री प्राप्त होने लगे तो किसी भी सामग्रीको प्राप्त होनेका अवसर न मिल सकनेसे कारणरूप बाह्याभ्यन्तर सामग्रीका अभाव हो जायगा और उसका अभाव होनेसे किसी भी कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकेगी। परिणामस्वरूप उत्पाद-व्ययका अभाव होनेसे द्रव्यका ही अभाव हो जायगा। यतः द्रव्यका अभाव न हो, अतः प्रतिनियत कालमें प्रतिनियत बाह्याभ्यन्तर सामग्रीके साथ प्रतिनियत पुरुषार्थको स्वीकार कर लेना चाहिए। इससे सिद्ध होता है कि प्रतिनियत कालमें प्रतिनियत बाह्याभ्यन्तर सामग्री प्राप्त होकर उससे प्रतिनियत कार्यकी ही उत्पत्ति हुआ करती है। भट्टाकलंकदेवने तत्त्वार्थवार्तिक १।३ में ‘यदि हि’ इत्यादि वचन सब कार्योंका मात्र एक काल ही कारण है इस एकान्तका निषेध करनेके लिए ही कहा है। प्रतिनियत कार्यका प्रतिनियत काल निमित्त है ऐसा होनेसे पुरुषार्थकी हानि हो जाती है ऐसा उनका कहना नहीं है। अतएव प्रतिनियत कार्यकी प्रतिनियत बाह्य-आभ्यन्तर सामग्रीमें जैसे प्रतिनियत अन्य सामग्रीका समावेश है उसी प्रकार उसमें प्रतिनियत काल और प्रतिनियत पुरुषार्थका भी समावेश है ऐसा यहाँ समझना चाहिए। प्रमादी बन कर ऐशोआराममें वे ही मस्त रहते हैं जिनकी सम्यक्त्वोत्पत्तिकी प्रतिनियत काललब्धि नहीं आई, अतएव मोक्षमार्गके अनुरूप पुरुषार्थ न कर विपरीत दिशामें किये गये पुरुषार्थको मोक्षमार्गका पुरुषार्थ मानते हैं। वे नहीं जिनकी सम्यक्त्वोत्पत्तिकी काललब्धि आगई है अतएव उसके अनुरूप पुरुषार्थमें लगे हुए हैं।

इस प्रकार सम्यक्त्वप्राप्तिके उत्कृष्ट कालका विचार करते हुए प्रस्तुत प्रतिशंकामें आई हुई अन्य बातोंका भी विचार किया।

\१४. प्रकृतमें विवक्षित आलम्बनके ग्रहण-त्यागका तात्पर्य

आगे अपर पक्षने हमारे ‘श्रावकके उत्कृष्ट विशुद्धरूप परिणामोंका आलम्बन छोड़ सर्व प्रथम अप्रमत्त-भावको प्राप्त होता है’ इस वाक्य पर कड़ी टीका करते हुए लिखा है-'करणानुयोगके विशेषज्ञको भलीभाँति ज्ञात है कि सप्तम गुणस्थानमें प्रत्याख्यान कषायोदयका अभाव होनेसे श्रावकके पंचम गुणस्थानकी अपेक्षा अप्रमत्तसंयत गुणस्थानवाले मुनिके परिणामोंकी विशुद्धता अनन्तगुणी है अर्थात् श्रावककी उत्कृष्ट विशुद्धता अप्रमत्तसंयतकी विशुद्धतामें लीन हो जाती है । आदि,

समाधान यह है कि हम अपनेको करणानुयोगका विशेषज्ञ तो नहीं मानते, किन्तु उसका अभ्यासी अवश्य मानते हैं । हमने जो पूर्वोक्त वचन लिखा है वह उसके अभ्यासको ध्यानमें रख कर ही लिखा है और यथार्थ लिखा है ।

उस वाक्यमें श्रावकके उत्कृष्ट विशुद्धरूप परिणामोंका आलम्बन छोड़नेकी बात कही गई है । वे परिणाम सप्तम गुणस्थानके परिणामोंमें लीन हो जाते हैं या उनका व्यय होकर अनन्तगुणी विशुद्धिको लिए हुए नये परिणामोंका उत्पाद होता है यह कुछ भी नहीं कहा गया है। जो जीव पाँचवें गुणस्थानसे सातवें गुणस्थानको प्राप्त होता है, वह नियमसे साकार उपयोगवाला होता है, अतएव ऐसे जीवके अपने उपयोगमें पंचम गुणस्थानके विशुद्ध परिणामोंसे परिणत आत्माका आलम्बन छूट कर नियमसे सातवें गुणस्थानके विशुद्ध परिणामोंसे परिणत आत्माका आलम्बन रहता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। स्पष्ट है कि प्रकृतमें हमारे उक्त वाक्यको ध्यानमें रखकर अपर पक्षने जो कुछ भी लिखा है वह युक्तियुक्त नहीं है । अपर पक्षका कहना है कि ‘विशुद्धता छोड़ी नहीं जाती किन्तु प्रति प्रति गुणस्थान बढ़ती जाती है ।’ आदि । इस सम्बन्धमें हम अधिक टीका-टिप्पणी किये बिना अपर पक्षका ध्यान उत्पाद-व्ययके सिद्धान्तकी ओर आकर्षित कर देना चाहते हैं । इससे उस पक्षके ध्यानमें यह बात भली-भाँति आजायगी कि ६३ पुटवाली चरपराईका व्यय होकर द्रव्यमें जो शक्तिरूपमें ६४ पुटवाली चरपराई पड़ी है उसका पर्यायरूपसे उत्पाद होता है । तात्पर्य यह है कि पूर्व पर्यायका व्यय होकर ही नवीन पर्याय उत्पन्न होती है । पिछली पर्यायें अगली पर्यायोंमें विलीन होकर उनका समुदाय नहीं बना करता ।

\१५. व्यवहारधर्मका खुलासा

हमने लिखा था कि ‘निश्चयधर्मके साथ गुणस्थान परिपाटीके अनुसार जो देव, शास्त्र, गुरु, अहिंसादि अणुव्रत और महाव्रत आदि रूप शुभ विकल्प होता है जो कि रागपर्याय है उसको यहाँ व्यवहारधर्म कहा गया है ।’ अपर पक्ष इस वाक्यमेंसे ‘अहिंसाआदि अणुव्रत’ इत्यादि वाक्यको सामायिक और छेदोपस्थापना-संयमके विरुद्ध मानता है, किन्तु उसकी यह मान्यता ठीक नहीं है, क्योंकि अहिंसादि पाँच महाव्रतोंका सराग संयममें अन्तर्भाव होता है और सरागसंयममें अशुभसे निवृत्ति तथा शुभमें प्रवृत्तिकी मुख्यता है । सरागसंयमका लक्षण करते हुए सर्वार्थसिद्धि अ० ६ सू० १२ में लिखा है-

संसारकारणविनिवृत्तिं प्रत्यागूर्णोऽक्षीणाशयः सराग इत्युच्यते । प्राणीन्द्रियेष्वशुभप्रवृत्तेर्विरतिः संयमः । सरागस्य संयमः सरागो वा संयमः सरागसंयमः ।

जो संसारके कारणोंकी निवृत्तिके प्रति उद्यत है, परन्तु जिसकी कषाय अभी क्षीण नहीं हुई है वह सराग कहलाता है । प्राणी और इन्द्रियोंके विषयमें अशुभ प्रवृत्तिसे विरति होना संयम है । रागी जीवका संयम या रागसहित संयम सराग संयम है ।

तत्त्वार्थवार्तिक और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें सरागसंयमका यही अर्थ किया है। इससे स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्र अ० ७ सू० १ में व्रतका जो लक्षण किया गया है वह उक्त अभिप्रायको ध्यानमें रखकर ही किया गया है । व्रतमें जहाँ अशुभसे निवृत्ति इष्ट होती है वहाँ शुभमें प्रवृत्ति हुए बिना नहीं रहती। परन्तु संवरका स्वरूप इससे सर्वथा भिन्न है। वह शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके परिणामोंके निरोधस्वरूप स्वीकार किया गया है। कहा भी है-

सः संवरो भावसंवरः शुभाशुभपरिणामनिरोधः। -अनगारधर्मामृत अ० २, श्लोक ४१

यही कारण है कि हमने अपने पूर्वोक्त कथनमें अहिंसादि अणुव्रत और महाव्रत आदिको रागरूप बतलाकर उनको परिगणना व्यवहारधर्ममें की है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए सर्वार्थसिद्धि ७-१ में लिखा है-

तत्र अहिंसाव्रतमादौ क्रियते, प्रधानत्वात्। सत्यादीनि ही तत्परिपालनार्थानि सस्यस्य वृत्तिपरिक्षेपवत्। सर्वसावद्यनिवृत्तिलक्षणसामायिकापेक्षया एकं व्रतम्। तदेव छेदोपस्थापनापेक्षया पञ्चविधमिहोच्यते। ननु च अस्य व्रतस्यास्रवहेतुत्वमनुपपन्नम्, संवरहेतुष्वन्तर्भावात्। संवरहेतवो वक्ष्यन्ते गुप्तिसमित्यादयः। तत्र दशविधे धर्मे संयमे वा व्रतानामन्तर्भाव इति? नैव दोषः, तत्र संवरो निवृत्तिलक्षणो वक्ष्यते। प्रवृत्तिश्चात्र दृश्यते, हिंसानृतादत्तादानादिपरित्यागे अहिंसासत्यदत्तादानादिक्रियाप्रतीतेः गुप्त्यादिसंवरपरिकर्मत्वाच्च। व्रतेषु हि कृतपरिकर्मा साधुः सुखेन संवरं करोतीति ततः पृथक्त्वेनोपदेशः कृतः।

यहाँ अहिंसाव्रतको आदिमें रखा है, क्योंकि वह प्रधान है। धान्यकी बाड़ोके समान ये सत्यादिक व्रत उसके परिपालनके लिए हैं।

सर्व सावद्यसे निवृत्तिलक्षण सामायिककी अपेचा एक व्रत है। वही छेदोपस्थापनाकी अपेक्षा पाँच प्रकारका है। वही यहाँ कहा है।

शंका-इस व्रतकी आस्रवहेतुता नहीं बनती, क्योंकि संवरके हेतुओंमें इसका अन्तर्भाव होता है। गुप्ति, समिति आदि संवरके हेतु कहेंगे। वहाँ दश प्रकारके धर्ममें अथवा संयममें व्रतोंका अन्तर्भाव होता है?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वहाँ निवृत्तिलचण संवर कहेंगे और यहाँ प्रवृत्ति देखी जाती है, क्योंकि हिंसा, असत्य और अदत्तादान आदिका त्याग होनेपर अहिंसा, सत्यवचन और दत्तादान आदिरूप क्रिया प्रतीत होती है तथा ये अहिंसा आदि गुप्त्यादिरूप संवरके परिकर्मस्वरूप हैं। व्रतोंमें जिसने परिकर्म किया है ऐसा साधु सुखपूर्वक संवर करता है, इसलिए इनका पृथक्से उपदेश दिया है।

तत्त्वार्थवार्तिक ६-१ में लिखा है-

न संवरो व्रतानि परिस्पंददर्शनात् ।१३। व्रतानि संवरव्यपदेशं नार्हन्ति। कुतः? परिस्पन्ददर्शनात्। परिस्पन्दो हि दृश्यते, अनृतादत्तादानपरित्यागे सत्यवचनदत्तादानक्रियाप्रतीतेः।

व्रत संवर नहीं हैं, क्योंकि परिस्पन्द देखा जाता है ॥१३॥ व्रत संवर व्यपदेशके योग्य नहीं हैं, क्योंकि परिस्पन्द देखा जाता है। परिस्पन्द नियमसे देखा जाता है, क्योंकि अनृत और अदत्तादानका त्याग होनेपर सत्य वचन और दत्तादान क्रियाकी प्रतीति होती है।

ये आगमप्रमाण हैं। इनसे भी अपर पक्षके अभिप्रायकी पुष्टि न होकर हमारे ही अभिप्रायकी पुष्टि होती है। यतः प्रकृतमें व्रत आस्रवरूप लिए गये हैं, अतः सामायिक और छेदोपस्थापना भी उक्तरूप होनेमें बाधा नहीं आती। हाँ, जहाँ संवरके प्रकरणमें इन्हें स्वीकार किया गया है वहाँ अवश्य ही ये सब परम वीतरागचारित्रस्वरूप प्राप्त होते हैं।

तत्त्वार्थसूत्र १।१ में जिस मोक्षमार्गका निर्देश है वह निश्चय रत्नत्रयस्वरूप आत्मधर्म है। उसे उपस्थित कर सरागचारित्र या सरागसंयमको वीतराग चारित्र या वीतराग संयम सिद्ध करना उचित नहीं है। तत्त्वार्थसूत्र ९।२ तथा ९।१८ में संवररूप गुप्ति आदिका तथा सामायिक संयम आदिका निर्देश है, शुभप्रवृत्तिरूप व्रतादि तथा सामायिक आदिका निर्देश नहीं है। आस्रवरूप व्रतादिमें तथा संवररूप गुप्ति आदिमें बड़ा अन्तर है। अपर पक्ष इन दोनोंको मिला कर भ्रममें रखनेका प्रयत्न कैसे कर रहा है इसका हमें ही क्या सभीको आश्चर्य होगा। जिसे शुभप्रवृत्तिरूप व्यवहारधर्म कहा है वह निश्चयधर्ममें अनुरागका हेतु है, इसलिए वह पुण्यबन्धस्वरूप होकर भी धर्मरूपसे उपचरित किया जाता है। यहाँ उपचारका निमित्त एकार्थसम्बन्धोपना है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए अनगारधर्मामृत अ० १ श्लो० २३ की व्याख्यामें कहा है-

यथोक्तधर्मानुरागहेतुकोऽपि पुण्यबन्धो धर्म इत्युपचर्यते। निमित्तं चात्रोपचारस्यैकार्थसम्बन्धित्वम्।

इससे सिद्ध है कि अशुभकी निवृत्ति और शुभमें प्रवृत्तिरूप जो व्रत है वह शुभ विकल्परूप होनेसे रागपरिणाम ही है। उसे संवररूप वे ही कह सकते हैं जिन्हें मात्र बाह्य क्रियामें धर्मसर्वस्व दिखलाई देता है। किन्तु जो निश्चयस्वरूप आत्मधर्मके पारखी हैं वे तो इसे स्वीकार करते ही नहीं। उनकी इस विपरीत मान्यताको तो आगम भी स्वीकार नहीं करता। आगम तो यही कहता है कि जिसे निश्चयधर्मकी प्राप्ति हुई है उसके ही समीचीन व्यवहारधर्म होता है। ऐसे धर्मात्मा पुरुषोंका सानिध्य होने पर भला कौन ऐसा ज्ञानी होगा जो उनके प्रति पदके अनुरूप बन्दना आदि नहीं करेगा। हाँ, जो आचार शास्त्रके अनुसार यथापदवी व्यवहारधर्मका पालन करें नहीं, प्रत्यक्ष ही जिनमें नाना विसंगतियाँ दिखलाई दें, फिर भी उन्हें चारित्रवान् कहा जाय इसे तो हम मोक्षमार्गका ही उपहास मानेंगे। हमारा किसीके प्रति विरोध नहीं है और न हम यह ही चाहते हैं कि मोक्षमार्गमें किसी प्रकारका अवरोध उत्पन्न हो। परन्तु हम इतना अवश्य जानते हैं कि आज-कल कल्पित की जा रहीं विपरीत मान्यताओंके आधार पर यदि शिथिलाचारको प्रोत्साहन दिया गया तो फिर समीचीन मोक्षमार्गकी रक्षा करना अतिदुष्कर हो जायगा।

अपर पक्षने लिखा है कि ‘अथवा यह कह देते हैं कि हमारी क्रमबद्धपर्यायोंमें व्रत धारण करना पड़ा हुआ ही नहीं है, पर्याय आगे पीछे हो नहीं सकती फिर हम पापोंका कैसे त्याग कर सकते हैं ?’

समाधान यह है कि जिसका क्रमबद्ध पर्यायमें विश्वास है, जो यह विश्वास करता है कि पर्याय आगे-पीछे नहीं हो सकती या नहीं की जा सकती तथा जिसे सर्वज्ञतामें विश्वास है वह अभिप्रायमें कुछ हो और बाहर कुछ करे ऐसा नहीं हो सकता। वास्तवमें देखा जाय तो वह निकटसंसारी है, वह शीघ्र ही निश्चयधर्मके अनुरूप व्रतोंको धारण कर मोक्षका पात्र बनेगा। वह ‘सर्वज्ञने हमारी पर्यायमें व्रत देखे ही नहीं’ ऐसा त्रिकालमें नहीं कह सकता। वह जब जिस पदवीमें होगा उस पदवीके अनुरूप बाह्य शुभाचारका नियमसे पालन करेगा। पापरूप प्रवृत्ति करनेकी उसकी स्वभावतः रुचि नहीं होगी।

\१६. साध्य-साधनविचार

अपर पक्षका कहना है कि ‘यदि व्रतोंको राग माना जायगा तो वे व्यवहारधर्म ही नहीं हो सकते, क्योंकि व्यवहारधर्म तो निश्चयधर्मका साधन है।’

समाधान यह है कि आचार्योंने संवरको शुभ-अशुभकी निवृत्तिस्वरूप कहा है और व्रत शुभमें प्रवृत्तिरूप हैं, इसलिए उन्हें प्रशस्त रागरूप मानना ही उचित है विशेष स्पष्टीकरण अन्यत्र किया ही है।

अब रह गया साधन-साध्यभावका विचार सो इसका निर्देश आचार्योंने परमागममें तीन प्रकारसे किया है-निश्चयनयसे, सद्भूतव्यवहारनयसे और असद्भूतव्यवहारनयसे । निश्चयनयसे सम्यग्दर्शनादिरूप परिणत आत्मा ही साधन है और वही साध्य है । सद्भूतव्यवहारनयसे निश्चय सम्यग्दर्शन आदि एक-एक साधन है और आत्मा साध्य है । असद्भूतव्यवहारनयसे शुभ प्रवृत्तिरूप व्यवहारधर्म साधन है और आत्मा साध्य है । यहाँ सर्वप्रथम व्रत, तप आदि रूप शुभ प्रवृत्तिमें धर्मका आरोपकर उसे व्यवहारधर्म कहा गया है और उसके बाद उसमें निश्चयधर्मके साधनपनेका व्यवहार किया गया है ।

यहाँ व्रतादिरूप शुभ प्रवृत्तिको जो धर्म कहा है वह उपचारसे ही कहा है । इससे सिद्ध होता है कि व्रत आदि निश्चय मोक्षमार्गके यथार्थ साधन नहीं हैं, सहचरसम्बन्ध आदिकी अपेक्षासे ही इन्हें साधन कहा गया है । पण्डितप्रवर टोडरमलजी मोक्षमार्गप्रकाशक पृ० ३६७ में लिखते हैं-

बहुरि व्रत तप आदि मोक्षमार्ग हैं नहीं, निमित्तादिकी अपेक्षा उपचारतैं इनको मोक्षमार्ग कहिए है । तातैं इनकौं व्यवहार कह्या ।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए वे वहीं पृ० ३७६ में लिखते हैं-

बहुरि नीचली दशा विषै केई जीवनिकै शुभोपयोग अर शुद्धोपयोगका युक्तपना पाईए है । तातैं उपचार करि व्रतादिक शुभोपयोगकौं मोक्षमार्ग कह्या है ।

आचार्य कुन्दकुन्दने पंचास्तिकाय गाथा १६० में निश्चय मोक्षमार्गके साथ अविनाभावरूपसे होनेवाले व्रतादिको उपचारसे व्यवहार मोक्षमार्ग कहा है । वह निश्चय मोक्षमार्गकी सिद्धिका हेतु है, इसलिए इसकी टीकामें आचार्यद्वयने व्यवहारनयसे व्यवहार मोक्षमार्गको साधन और निश्चय मोक्षमार्गको साध्य कहा है । इस गाथामें मोक्षमार्गका अनात्मभूत लक्षण कहा गया है, इसलिए वह मोक्षमार्ग कहलाया । अतः यह अनात्मभूत लक्षण होकर भी आत्मभूत यथार्थ मोक्षमार्गकी सिद्धि करता है, अतः व्यवहार मोक्षमार्ग साधन और निश्चय मोक्षमार्ग साध्य ऐसा व्यवहार करना उचित ही है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।

गाथा १६१ में निश्चयनयसे निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रसे समाहित आत्मा ही निश्चय मोक्षमार्ग कहा गया है । यह मोक्षमार्गका आत्मभूत लक्षण है । इससे हम जानते हैं कि निश्चय सम्यग्दर्शन, निश्चय सम्यग्ज्ञान और निश्चय सम्यक्चारित्र इन तीनोंमें एक-एकको मोक्षमार्ग कहना सद्भूतव्यवहार नयका वक्तव्य है और धर्मादि द्रव्योंकी श्रद्धा, अंग-पूर्वगत ज्ञान तथा अशुभसे निवृत्ति और शुभमें प्रवृत्तिको मोक्षमार्ग कहना यह असद्भूतव्यवहार नयका वक्तव्य है। इन्हें असद्भूतव्यवहारनयसे मोक्षमार्ग इसलिए कहा गया है कि इनमें यथार्थरूपमें मोक्षमार्गपना तो नहीं है, परन्तु ये यथार्थ मोक्षमार्गके अविनाभावी हैं, इसलिए इनमें एकार्थसम्बन्ध होनेसे मोक्षमार्गका उपचार किया गया है । इस प्रकार इस गाथाकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्रने व्यवहार मोक्षमार्गको साधन और निश्चय मोक्षमार्गको साध्य क्यों कहा इसका स्पष्टीकरण हो जाता है ।

लोकमें निश्चय मोक्षमार्गको भी धर्म कहते हैं और व्यवहार मोक्षमार्गको भी धर्म कहते हैं । परन्तु इन दोनोंमें अन्तर क्या है इसे समझनेके लिए अनगारधर्मामृत अ० १, श्लोक २४ पर दृष्टिपात कीजिए । पण्डितप्रवर आशाधरजी इन दोनोंमें भेदको दिखलाते हुए लिखते हैं-

निरुन्धति नवं पापमुपात्तं क्षपयत्यपि ।
धर्मेऽनुरागाद्यत्कर्म स धर्मोऽभ्युदयप्रदः ॥२४॥

जो नये पापको रोकता है और उपात्त पापका क्षय भी करता है ऐसे धर्म (निश्चय धर्म) में अनुरागसे जो कर्म होता है वह धर्म अभ्युदयको देनेवाला है ॥२४॥

यहाँ पर ‘कर्म’ शब्द द्रव्यबन्ध और उसके निमित्तभूत शुभ परिणति इन दोनोंका सूचक है।

यह प्रश्न था कि रत्नत्रयधारी मुनिवरोंके देवायु आदि शुभ प्रकृतियोंका बन्ध कैसे सिद्ध होता है ? इसी प्रश्नको ध्यानमें रखकर आचार्य अमृतचन्द्र उसका समाधान करते हुए पुरुषार्थसिद्धयुपायमें लिखते हैं-

रत्नत्रयमिह हेतुर्निर्वाणस्यैव भवति नान्यस्य ।
आस्रवति यत्तु पुण्यं शुभोपयोगोऽयमपराधः ॥२२०॥

इस लोकमें रत्नत्रय निर्वाणका ही हेतु है, अन्यका नहीं। और जो पुण्यका आस्रव होता है यह शुभोपयोगका ही अपराध है ॥२२०॥

इसी तथ्यको और भी स्पष्ट करते हुए वे वहीं लिखते हैं-

असमग्रं भावयतो रत्नत्रयमस्ति कर्मबन्धो यः ।
स विपक्षकृतोऽवश्यं मोक्षोपायो न बन्धनोपायः ॥२११॥

असमग्र रत्नत्रयको भाते हुए जीवके जो कर्मबन्ध होता है वह नियमसे विपक्ष (राग) का कार्य है, क्योंकि जो मोक्षका उपाय है वह बन्धनका उपाय नहीं हो सकता ॥२११॥

इस पर शंका होती है कि आगममें जो सम्यक्त्व और सम्यक्चारित्रको तीर्थकर प्रकृति और आहारकद्विक प्रकृतियोंके बन्धका हेतु कहा है वह कैसे बनेगा ? इस प्रश्नका समाधन करते हुए वे वहीं लिखते हैं-

सति सम्यक्त्व-चारित्रे तीर्थंकराहारबन्धकौ भवतः
योग-कषायौ नासति तत्पुनरस्मिन्नुदासीनम् ॥२१८॥

सम्यक्त्व और चारित्रके होने पर योग और कषाय तीर्थंकर और आहारकद्वय इनके बन्धक होते हैं, सम्यक्त्व और चारित्रके अभावमें नहीं। ( इसलिए उपचारसे सम्यक्त्व और चारित्रको बन्धका हेतु कहा है। (वस्तुतः देखा जाय तो) वे दोनों इस (बन्ध) में उदासीन हैं।

यदि कहा जाय कि जो जिस कार्यका हेतु नहीं उसे उसका उपचारसे भी हेतु क्यों कहा गया है ? इसका समाधान करते हुए वे वहीं लिखते हैं-

एकस्मिन् समवायादत्यन्तविरुद्धकार्ययोरपि हि ।
इह दहति घृतमिति यथा व्यवहारस्तादृशोऽपि रूढिमितः ॥२१९॥

एकमें समवाय होनेसे अर्थात् एक आत्मामें ( निश्चयधर्म और व्यवहारधर्मका ) समवाय होनेसे अत्यन्त विरुद्ध कार्योंका भी वैसा व्यवहार ऐसे रूढ़िको प्राप्त हुआ है जैसे घी जलाता है यह व्यवहार रूढ़िको प्राप्त हुआ है ॥२१९॥

ये कतिपय आगमप्रमाण हैं। इनसे यह स्पष्ट रूपसे समझमें आ जाता है कि निश्चयधर्म बन्धका वास्तविक हेतु न होने पर भी उसके सद्भावमें अमुक प्रकारका बन्ध होता है यह देख कर जैसे उसे उस बन्धका उपचारसे हेतु कहा जाता है वैसे ही व्यवहारधर्म निश्चयरत्नत्रयका वास्तविक हेतु नहीं, फिर भी अमुक प्रकारके व्यवहार धर्मके सद्भावमें अमुक प्रकारका निश्चयधर्म होता है यह देख कर उसे निश्चयधर्मका उपचार हेतु कहा गया है। पंचास्तिकाय गाथा १६० व १६१ की टीकामें इसी तथ्यको ध्यानमें रख कर व्यवहार मोक्षमार्गको साधन और निश्चयमोक्षमार्गको साध्य कहा गया है।

अपर पक्षका कहना है कि बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा १३ की टीकामें यह कहा है कि ‘जो निश्चय व व्यवहारको साध्य-साधनरूपसे स्वीकार करता है वह सम्यग्दृष्टि है।’ किन्तु उक्त टीकामें क्या कहा गया है यह यहाँ दे देना चाहते हैं। यथा-

स्वाभाविकानन्तज्ञानाद्यनन्तगुणाधारभूतं निजपरमात्मद्रव्यमुपादेयं इन्द्रियसुखादिपरद्रव्यं हि हेयमित्यर्हत्सर्वज्ञप्रणीतनिश्चय-व्यवहारनयसाध्य-साधकभावेन मन्यते परं किन्तु भूमिरेखादिसदृशक्रोधादि-द्वितीयकषायोदयेन मारणनिमित्तं तलवरगृहीततस्करवदात्मनिन्दासहितः सन्निन्द्रियसुखमनुभवतीत्य-विरतसम्यग्दृष्टेर्लक्षणम्।

जो स्वाभाविक अनन्त ज्ञान आदि अनन्त गुणोंका आधारभूत निज परमात्मद्रव्य उपादेय है तथा इन्द्रियसुख आदि पर द्रव्य त्याज्य है । इस तरह सर्वज्ञ देव प्रणीत निश्चय व व्यवहारनयको साध्य-साधक भावसे मानता है। परन्तु भूमिकी रेखाके समान क्रोध आदि द्वितीय कषायके उदयसे मारनेके लिए कोतवालके द्वारा पकड़े गये चोरकी भाँति आत्मनिन्दा सहित होकर इन्द्रिय सुखका अनुभव करता है वह अविरत-सम्यग्दृष्टिका लक्षण है।

यह बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा १३ की टीकाका वचन है, जिसके आधारसे अपर पक्षने आगे पीछेका सन्दर्भ छोड़कर पूर्वोक्त वाक्यकी रचना की है। इसमें त्रिकाली ज्ञायकस्वभाव आत्माको निज द्रव्य बतलाकर उसमें सम्यग्दृष्टिके उपादेय बुद्धि होती है और इन्द्रिय सुखादिको परद्रव्य बतलाकर उसमें सम्यग्दृष्टिके हेयबुद्धि होती है। इस विधिसे जो वह सम्यग्दृष्टि है उसके लिए यहाँ ऐसा बतलाया गया है कि वह अर्हत्सर्वज्ञ प्रणीत निश्चय-व्यवहारनयको साध्य-साधकभावसे मानता है। इससे यह तथ्य फलित होता है-

\१. सम्यग्दृष्टि ज्ञानादि अनन्त गुणोंके आधारभूत निज परमात्मद्रव्य ( त्रिकाली चिच्चमत्कारस्वरूप ज्ञायक आत्मा )को मात्र उपादेय मानता है और इसके सिवा अन्य इन्द्रिय सुख आदिको परद्रव्य समझकर हेय मानता है। और इस प्रकार हेय उपादेयरूपसे इन दोनोंमें साध्य-साधक भाव मानता है।

यह तथ्य है जो उक्त कथनसे सुतरां फलित होता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सम्यग्दृष्टि जो निश्चयको साध्य और व्यवहारको साधन मानता है वह इस रूपमें नहीं मानता कि व्यवहार करते-करते उससे निश्चयकी प्राप्ति हो जाती है। किन्तु वह यह अच्छी तरहसे समझता है कि निश्चयस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति निश्चय रत्नत्रयकी समग्रताके होनेपर ही होती है, मात्र व्यवहार धर्मके आलम्बन द्वारा विकल्परूप बने रहनेसे नहीं होती। साथ ही साथ वह यह भी अच्छी तरहसे समझता है कि इसके पूर्व जितने अंशमें रत्नत्रयकी प्राप्ति होती है वह भी निर्विकल्प ज्ञायक स्वरूप आत्माके अवलम्बनसे तन्मय परिणमन द्वारा ही होती है, व्यवहार धर्मका अवलम्बनकर उसमें अटके रहनेसे नहीं होती। सविकल्प दशामें प्रवृत्तिमें व्यवहार धर्मके होते हुए भी वह इन्द्रिय सुखके समान परमार्थसे है हेय ही। ऐसी यथार्थ श्रद्धापूर्वक जब सम्यग्दृष्टि वर्तता है तब निश्चय-व्यवहारनयमें साध्य-साधनभाव सुघटित होता है, अन्यथा नहीं। वह ऐसे कि साध्यभूत जो निश्चय है उसके ज्ञान करानेका हेतु व्यवहारनय है। यथा-

\१. कोई देव-शास्त्र-गुरुकी श्रद्धा-भक्ति-पूजाको छोड़कर कुदेवादि व शासनदेवता आदि रागी देवादिककी श्रद्धा-भक्ति-पूजा स्वप्नमें भी नहीं करता ।

\२. मद्य-मांस-मधु आदिका सेवन नहीं करता ।

\३. धर्मके नामपर एकेन्द्रियादि जीवों-तककी किसी भी प्रकारकी हिंसाको स्वप्नमें भी प्रश्रय नहीं देता ।

\४. वीतराग देवकी उपासना, वीतराग भावके प्रति श्रद्धावान् होकर की जानेपर ही यथार्थ उपासना मानता है ।

इस प्रकार अविरत सम्यग्दृष्टिके प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य आदि जितने भी बाह्य लक्षण हैं वे जिसमें पूरी तरहसे घटित होते हैं और जो निरन्तर अतीन्द्रिय आत्मसुखके वेदनको ही यथार्थ लाभ मानता है उसके व्यवहार धर्मरूप इस बाह्य लक्षणसे साध्यभूत निश्चयका ज्ञान होता है । यही कारण है कि आगममें व्यवहार धर्मको व्यवहार साधन और निश्चय धर्मको साध्य कहा है । इस द्वारा उस एकान्त निश्चयाभासीका परिहार किया गया है जो मेढ़केके समान अर्धनिमीलित लोचनवाला बन तथा कुछ भी चिन्ता मग्न होकर इच्छानुसार वर्तता है और प्रमादी होकर बाह्य क्रियाकाण्डसे सर्वदा विरत रहता है । आचार्य कहते हैं कि बाह्य क्रियाकाण्डसे निश्चयकी प्राप्ति नहीं होती यह जहाँ सच है वहाँ भूमिकानुसार यथाविधि बाह्य क्रियाकाण्ड होना ही चाहिए । अन्यथा यही समझना चाहिए कि इसे परमार्थस्वरूप निश्चयकी प्राप्ति नहीं हुई है ।

‘भूमिकानुसार यथाविधि बाह्य क्रियाकाण्ड होना ही चाहिये ।’ इसका आशय यह है कि चौथे, पाँचवें और छठे गुणस्थानवालेका जितना और जिस विधिसे आगममें क्रियाकाण्ड बतलाया है उतना और उस विधिसे उस गुणस्थानवालेका बाह्य-क्रियाकाण्ड नियमसे होता है । इसमें अपवाद नहीं । चौथे कालका बाह्य-क्रियाकाण्ड दूसरे प्रकारका हो और पाँचवें कालका बाह्य-क्रियाकाण्ड कोई दूसरे प्रकारका हो ऐसा नहीं है । जैसे उस गुणस्थानका अन्तरंग निश्चयधर्म एक प्रकारका है वैसे ही बहिरंग व्यवहारधर्म भी तदनुकूल एक प्रकारका है । ऐसा होनेपर ही इनमें उक्त प्रकारसे व्यवहारनयसे साध्य-साधनभाव बन सकता है, अन्यथा नहीं । आचार्य कहते हैं कि यह तो है कि बाह्य-क्रियाकाण्ड शास्त्रोक्त विधिसे भी हो, परन्तु अन्तरंग निश्चयधर्म उसके न हो । पर यह नहीं है कि अन्तरंग निश्चयधर्म तो हो पर उसका साधनभूत (ज्ञान करानेवाला) बाह्य क्रियाकाण्ड शास्त्रोक्तविधिसे उसके न हो । यह आगमविधि है । सम्यग्दृष्टि इसे यथावत् जानता है ।

स्पष्ट है कि इस वचन द्वारा अन्तरंग-बहिरंग दोनोंकी मर्यादाका ज्ञान कराया गया है । सम्यग्दृष्टि ऐसी मर्यादाको जानकर वर्तता है तभी वह अविरतसम्यग्दृष्टि कहलानेका पात्र है ।

इस प्रकार साध्य-साधनभावका आशय क्या है, इसका संक्षेपमें स्पष्टीकरण किया । इसपर विशद् प्रकाश समयसार गाथा ८ से पड़ता हैं । अपर पक्ष उस ओर दृष्टिपात करके साध्य-साधनभावका आशय क्या है इसे समझनेकी कृपा करे यह निवेदन है ।

\१६. उपयोग विचार

अपर पक्षने प्रवचनसार गा० ९ की टीकाके आधारसे अशुभोपयोग, शुभोपयोग और शुद्धोपयोग इस प्रकार जो इन तीन भेदोंका निर्देश किया है वह ठीक है । इतनी विशेषता है कि श्रावकोंके यद्यपि शुभोपयोगकी बहुलता है। परन्तु किसी कालमें उनके भी शुद्धोपयोग होता है ऐसा आगम है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य जयसेन प्रवचनसार गाथा २४८ की टीकामें लिखते हैं-

ननु शुभोपयोगिनामपि क्वापि काले शुद्धोपयोगभावना दृश्यते, शुद्धोपयोगिनामपि क्वापि काले शुभोपयोगभावना दृश्यते। श्रावकाणामपि सामायिकादिकाले शुद्धभावना दृश्यते। तेषां कथं विशेषो भेदो ज्ञायत इति ? परिहारमाह-युक्तमुक्तं भवता परं किन्तु ये प्रचुरेण शुभोपयोगेन वर्तन्ते, यद्यपि क्वापि काले शुद्धोपयोगभावनां कुर्वन्ति तथापि शुभोपयोगिन एव भण्यन्ते। येऽपि शुद्धोपयोगिनस्ते यद्यपि क्वापि काले शुभोपयोगेन वर्तन्ते तथापि शुद्धोपयोगिन एव। कस्मात् ? बहुपदस्य प्रधानत्वादाम्रवननिम्बवनवदिति।

शंका-शुभोपयोगवाले जीवोंके भी किसी समय शुद्धोपयोगभावना देखी जाती है। इसी प्रकार शुद्धोपयोगी जीवोंके भी किसी समय शुभोपयोगभावना देखी जाती है। श्रावकोंके भी सामायिक आदिके कालमें शुद्ध भावना देखी जाती है। इनका विशेष भेद कैसे ज्ञात होता है ?

समाधान-आपने ठीक कहा है, किन्तु इतनी विशेषता है कि जो बहुलतासे शुभोपयोगके साथ वर्तते हैं वे यद्यपि किसी समय शुद्धोपयोगरूप भावनाको करते हैं तो भी शुभोपयोगी ही कहे जाते हैं और जो शुद्धोपयोगी हैं वे यद्यपि किसी समय शुभोपयोगके साथ वर्तते हैं तो भी शुद्धोपयोगी ही हैं, क्योंकि इसमें आम्रवन और निम्बवनके समान बहुपदकी प्रधानता है।

आचार्य जयसेनके इस कथनसे यह बात तो स्पष्ट हुई कि उन्होंने इसी परमागमकी ६वीं गाथाकी टीकामें श्रावकोंके जो मात्र शुभोपयोग बतलाया है वह बहुलताकी अपेक्षा बहुपद वक्तव्य होनेसे ही बतलाया है। वैसे सम्यग्दृष्टि और श्रावक जब अपने ज्ञायकस्वभाव आत्माके लक्ष्यसे उपयोगस्वभावरूपसे परिणमते हैं तब उनके भी शुद्धोपयोग होता है। उक्त आगमका भी यही आशय है। शुद्धोपयोग उनके होता ही नहीं ऐसा आगमका आशय नहीं है।

अपर पक्षने लिखा है कि ‘चौथे गुणस्थानमें सम्यग्दर्शनरूप शुद्धभाव है और कषायरूप अशुद्धभाव है, इन दोनों शुद्धाशुद्ध भावोंके मिश्रित भावरूप शुभोपयोग कहा है। इसी प्रकार यथासम्भव पाँचवें, छठे गुणस्थानमें भी यही शुद्धाशुद्ध मिश्रित भावरूप शुभोपयोग जानना चाहिये।’ अपने इस कथनकी पुष्टिमें उसका तर्क यह है कि ‘यदि शुभोपयोगको शुद्धाशुद्धभावरूप न माना जायेगा तो शुभोपयोग मोक्षका कारण नहीं हो सकेगा।’ अपने इस कथनकी पुष्टिमें उस पक्षने प्रवचनसार गाथा २५४ की आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीकाका ‘गृहिणां तु समस्त एव’ इत्यादि वचन उद्धृत किया है।

अब यहाँ दो बातोंका विचार करना है। प्रथम तो यह देखना है कि शुभोपयोग कहते किसे हैं ? और दूसरे ‘गृहिणां तु समस्त’ इत्यादि टीका वचनका भी विचार करना है ?

\१. इस जीवके चौथे गुणस्थानसे सम्यग्दर्शन होनेपर भी कषायका सद्भाव १० वें गुणस्थानतक बराबर पाया जाता है, इसलिए अपर पक्षने जो इन दोनों शुद्धाशुद्धभावोंके मिश्रितरूप उपयोगको शुभोपयोग कहा है वह ठीक नहीं है। किन्तु जिस समय उपयोग स्वभाववाले इस जीवका अर्हदादिकी भक्तिरूप परिणाम होता है, प्रवचनरत जीवोंके प्रति वात्सल्य भाव होता है, अपनेसे गुणोंमें अधिक श्रमणोंको देखकर खड़ा होने, अनुगमन करने, प्रणाम-विनय आदि करनेका भाव होता है, सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानके उपदेशका भाव होता है, शिष्योंको स्वीकार करने और उन्हें सम्यग्दर्शनादि गुणोंसे पुष्ट करनेका भाव होता है तथा अशुभका निवारण करनेके अभिप्रायसे अहिंसादि व्रतोंको सम्यक् प्रकारसे पालनेका अभिप्राय होता है तब इस जीवको शुभोपयोगवाला कहा गया है । यह शुभोपयोग गृहस्थोंके बहुलतासे पाया जाता है । किन्तु मुनियोंके शुद्धोपयोगकी मुख्यता बतलाई है, क्योंकि गृहस्थोंके जहां अधिक मात्रामें परका अवलम्बन बना रहता है वहां साधु निरन्तर परके अवलम्बनको गौणकर अपने ज्ञायकस्वभाव आत्माके अवलम्बनके प्रति ही सदा उद्यमवान् रहते हैं। वे यद्यपि बाह्यमें आहारादि क्रिया करनेमें उपयुक्त प्रतीत होते हैं तथापि अन्तरंगमें उनके बहुलतासे आत्माका अवलम्बन बना रहता है, इसलिए इन क्रियाओंके कालमें भी उनके आत्मकार्यमें सावधानी देखी जाती है ।

अपर पक्षने अपने पक्षका समर्थन करनेवाला जानकर उक्त टीकावचन यद्यपि उद्धृत तो किया है, परन्तु वह इस समग्र कथनपर सन्दर्भके साथ दृष्टिपात कर लेता तो उसकी ओरसे शुभोपयोगका जो अर्थ किया गया है वह कभी भी नहीं किया गया होता । संक्षेपमें परके लक्ष्यसे शुभरागसे अनुवासित उपयोगका होना शुभोगयोग है और आत्माके लक्ष्यसे उपयोगका तन्मय होकर परिणमना शुद्धोपयोग है । इस प्रकार शुद्धोपयोगसे भिन्न शुभोपयोग क्या है इसका निर्देश किया ।

\२. अब उक्त टीकावचनपर दृष्टिपात कीजिए । इसमें गृहस्थके शुद्धात्माके अनुभवका सर्वथा निषेध नहीं किया गया है । इसमें बतलाया है कि जिस प्रकार ईंधन स्फटिक मणि (सूर्यकान्त मणि) के माध्यमसे सूर्यके तेजको अनुभवता है अर्थात् स्फटिकमणिके संयोगमें जिस प्रकार ईंधन सूर्य किरणोंको निमित्तकर प्रज्वलित हो उठता है उसी प्रकार गृहस्थ भी शुद्धात्मामें प्रशस्त राग होनेसे रागका संयोग रहते हुए भी शुद्धात्माके लक्ष्यसे उसका (शुद्धात्माका) अनुभव करता है । यहाँ रागका प्राचुर्य है और शुद्धिकी मन्दता । फिर भी यह जीव उग्र पुरुषार्थ द्वारा आत्माके लक्ष्यसे रागको हीन-हीनतर करता हुआ शुद्धिमें वृद्धि करता जाता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इससे स्पष्ट है कि जहाँ व्यवहारधर्मको मोक्षका परम्परा साधन कहा है वहाँ उसका अभिप्राय इतना ही है कि उसके सद्भावमें जो स्वभावके लक्ष्यसे शुद्धिमें आंशिक वृद्धि होती है वह व्यवहार धर्म उसकी वृद्धिमें बाधक नहीं है । शुद्धिकी उत्पत्ति और उसकी वृद्धिका यही क्रम है । यही कारण है कि श्रमणोंको लक्ष्यकर प्रवचनसार गाथा २४५ में यह कहा है कि श्रमण शुभोपयोगी और शुद्धोपयोगीके भेदसे दो प्रकारके होते हैं। उनमें जो शुद्धोपयोगी श्रमण है वे निरास्रव हैं और जो शुभोपयोगी श्रमण हैं वे सास्रव हैं । इस नियममें गृहस्थोंका भी अन्तर्भाव हो जाता है, क्योंकि यथार्थ मोक्षमार्ग एक है और वह यथापदवी सबके समानरूपसे लागू होता है । गृहस्थ शुभोपयोगके द्वारा कर्मोंकी क्षपणा करते हैं और मुनि शुद्धोपयोगके द्वारा कर्मोंकी क्षपणा करते हैं ऐसा न तो आगम ही कहता है और न तर्क तथा अनुभवसे ही सिद्ध होता है । स्पष्ट है कि उक्त वचनके आधारसे यह सिद्ध नहीं होता कि पर देवादिके लक्ष्यसे होनेवाला व्यवहारधर्म निराकुललक्षण मोक्षसुखका यथार्थ साधन है ।

अपर पक्षने सम्यग्दर्शनरूप शुद्धभाव और कषायरूप अशुद्धभाव इन दोनों शुद्धाशुद्धभावोंके मिश्रितरूप उपयोगको शुभोपयोग लिखा है१। किन्तु उस पक्षका यह लिखना ठीक नहीं, क्योंकि सम्यग्दर्शन श्रद्धाकी स्वभाव पर्याय है और राग चारित्र गुणकी विभाव पर्याय है । इन दोनोंका मिश्रण बन ही नहीं सकता । अपर पच्च कह सकता है कि सान्निपातिकपनेकी अपेक्षा हम इन दोनोंको मिश्रित कहते हैं, किन्तु उस पक्षका यह कहना क्यों ठीक नहीं, इसके लिए हम उसका ध्यान तत्त्वार्थवार्तिक अ० २ सू० ७ की इन पंक्तियोंकी ओर आकृष्ट करते हैं-

सान्निपातिक एको भावो नास्तीति ‘अभावात्’ इत्युच्यते, संयोगापेक्षया अस्तीत्यार्षं वचनम् ।

सान्निपातिक एक भाव नहीं है, इसलिए उसका अभाव कहा है, संयोगकी अपेक्षा है यह आर्षवचन है।

स्पष्ट है कि इन दोनोंके मिश्रित उपयोगको शुभोपयोग कहना उचित नहीं है। आगममें तो शुभोपयोगका यह लक्षण कहीं लिखा नहीं। फिर भी अपर पक्षने शुभोपयोगका यह लक्षण कल्पित करनेका साहस किया इसका हमें आश्चर्य है।

अपर पक्षने प्रतिशंका २में चारित्रगुणकी क्षायोपशमिक पर्यायको ध्यानमें रखकर यह लिखा है कि ‘वह मिश्रित पर्याय है, केवल शुद्ध पर्याय नहीं। किन्तु शुद्धाशुद्ध है और स्थाई नहीं है’ और प्रतिशंका ३ में वह पक्ष सम्यग्दर्शनरूप शुद्धभाव और कषायरूप अशुद्धभाव इन दोनों शुद्धाशुद्ध भावोंको मिलाकर मिश्रित भाव कह रहा है। इस प्रकार जो उसके कथनमें पूर्वापर विरोध है उसपर वह स्वयं दृष्टिपात करेगा ऐसी हमें आशा है।

इसलिए पिछले उत्तरमें हमने जो यह लिखा था कि ‘कई स्थानोंपर प्रतिशंका २ में मिली हुई शुद्धाशुद्ध पर्यायको शुभ कहा गया है, इससे स्पष्ट विदित होता है कि यह प्रतिशंका २ में स्वीकार कर लिया गया है कि जितना रागांश है वह मात्र बन्धका कारण है पर उसे निर्जराका हेतु सिद्ध करना इष्ट है, इसलिए पूरे परिणामको शुभ कहकर ऐसा अर्थ फलित करनेकी चेष्टा की गई है सो यह कथनकी चतुराईमात्र है।’ वह उचित ही लिखा था, क्योंकि आगममें कहीं भी मिश्र पर्यायको शुभभाव नहीं कहा है। शुभ और अशुभ ये भेद योग और उपयोगके हैं। इनके सिवाय उपयोग शुद्ध भी होता है। अतएव चारित्रगुणकी मिश्र-पर्यायको या सम्यक्त्व तथा रागकी कल्पित की गई मिश्र पर्यायको शुभ कहना आगमसंगत नहीं है।

अपर पक्षने भावपाहुडकी १५१ वीं गाथा उद्धृतकर यह सिद्ध करना चाहा है कि जिनभक्ति जन्म-मरणरूपी वेलके मूलका नाश करनेवाली है। इसमें सन्देह नहीं कि जिस सम्यग्दृष्टिके जिनदेवमें अपूर्व भक्ति होती है वह केवल भक्तिरूप प्रशस्त रागके कारण पुण्यबन्ध ही नहीं करता, किन्तु आत्मामें प्राप्त हुई सम्यग्दर्शनरूप विशुद्धिके कारण जन्म-मरणरूपी वेलको समूल नाश करनेमें भी समर्थ होता है। यही भाव भावपाहुडकी उक्त गाथामें व्यक्त किया गया है। एकके कार्यको सहचर सम्बन्धवश दूसरेका कहना ऐसा व्यवहार जिनागममें मान्य ठहराया गया है। प्रकृतमें इसी व्यवहारको ध्यानमें रखकर उक्त कथन किया गया है। पुरुषार्थसिद्ध्युपायके आधारसे विशेष खुलासा पूर्वमें ही कर आये हैं।

अपर पक्षने परमात्मप्रकाश अ० २ गाथा ६१ की टीकामें आये हुए ‘मुख्यवृत्त्या’ पदको देखकर यह स्वीकार कर लिया है कि ‘देव, शास्त्र, गुरुकी भक्तिको गौणरूपसे कर्मक्षयका हेतु कहा गया है’ इसकी हमें प्रसन्नता है, क्योंकि स्वभावके लक्ष्यसे जो आत्मशुद्धि उत्पन्न होती है उसमें बाह्य (व्यवहार) हेतु गौण है। परके लक्ष्यसे कर्मक्षपणा न होकर कर्मबन्ध होता है यह इसका तात्पर्य है।

चारित्रगुणकी मिश्रित अखण्ड पर्यायमें जितना शुद्ध्यंश है वह पाप-पुण्य दोनोंकी निवृत्तिरूप है और जितना रागांश है, वह पापकी निवृत्ति और पुण्यकी प्रवृत्तिरूप है, इसलिए उभयकी निवृत्तिरूप जितना शुद्ध्यंश है वह स्वयं कर्मक्षयरूप होनेसे कर्मक्षयका हेतु है और जितना प्रवृत्त्यंश है वह स्वयं आस्रव-बन्धरूप होनेसे बन्धका हेतु है। तत्त्वार्थसूत्रमें जो सम्यक्त्वको देवायुका आस्रव लिखा है उसका आशय इतना ही है कि सम्यक्त्वके कालमें मनुष्यों और तिर्यञ्चोंके रागनिमित्तक यदि आयुका बन्ध होता है तो देवायुका ही होता है। विशेष खुलासा आगम प्रमाणके साथ इसी उत्तरमें पहले ही कर आये हैं।

कहाँ कौन उपयोग किस दृष्टिसे कहा गया है इसका भी विशेष स्पष्टीकरण आगमप्रमाणके साथ पूर्वमें किया ही है । वृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ३४ की टीकामें ‘असंयतसम्यग्दृष्टिश्रावक’ इत्यादि वचन शुद्धोपयोगका व्यवहार (उपचरित) हेतु क्या है यह दिखलानेके लिए लिखा गया है । शुभोपयोग परम्परासे अर्थात् उपचारसे शुद्धोपयोगका साधक है इसका हमने निषेध भी नहीं किया है । यदि सचमुचमें शुभोपयोग शुद्धोपयोगका यथार्थ हेतु होता तो उसे शुद्धोपयोगका परम्परासे साधक त्रिकालमें नहीं लिखा जाता । स्पष्ट है कि इस वचन द्वारा केवल यह बतलाया गया है कि जब यह जीव स्वभावसन्मुख होकर शुद्धोपयोगको उत्पन्न करता है, उसके पूर्व इसके नियमसे शुभोपयोग होता है । उसके अशुभोपयोग त्रिकालमें नहीं होता यह दिखलाना ही उक्त वाक्यका प्रयोजन है ।

अपर पक्षने दूसरी दृष्टिसे ४ थे से १२ वें गुणस्थान तक जो शुभोपयोग लिखा है वह दृष्टि कौन सी और किस आधारसे यह कथन किया गया है यह हम न जान पाये । वस्तुतः यह कथन आगमविरुद्ध होनेसे इस पर विचार करना ही व्यर्थ है । फिर भी यहाँपर हम यह स्पष्ट कर देना अपना कर्तव्य समझते हैं कि किसी पर्यायका शुद्धाशुद्ध मिश्ररूप होना अन्य बात है और उपयोगका शुभ, अशुभ और शुद्धरूप होना अन्य बात है, क्योंकि उपयोग अनुष्ठानरूप होता है । जब विषयोंके आलम्बन से अशुभ क्रियामें यह जीव उपयुक्त होता है तब अशुभोपयोग कहलाता है, जब देवादि और व्रतादिके आलम्बनसे शुभ क्रियामें यह जीव उपयुक्त होता है तब शुभोपयोग कहलाता है और जब चिच्चमत्काररूप ज्ञायक आत्माके अवलम्बन द्वारा शुद्ध निश्चयनयरूपसे यह जीव उपयुक्त होता है तब शुद्धोपयोग कहलाता है । इस प्रकार आलम्बनभेदसे उपयुक्त आत्माका उपयोग तीन प्रकारका होता है । चारित्रकी मिश्ररूप पर्याय शुभोपयोगके कालमें भी है और शुद्धोपयोगके कालमें भी है, परन्तु आलम्बनके भेदसे उपयोग दो भागोंमें विभक्त हो जाता है, अतएव चारित्र गुणकी मिश्र पर्यायसे उपयोगको भिन्न ही जानना चाहिए। जहाँ शुभोपयोग होता है वहाँ वह और चारित्रगुणका रागांश ये दोनों तो बन्धके ही हेतु हैं । हाँ वहाँ जितना शुद्धयंश होता है वह स्वयं संवर-निर्जरारूप होनेसे संवर-निर्जराका हेतु है । तथा जहाँ शुद्धोपयोग होता है वहाँ वह और जितना शुद्धयंश है वे दोनों स्वयं संवर-निर्जरारूप होनेसे संवर-निर्जराके हेतु हैं तथा वहाँ जितना रागांश है वह बन्धका हेतु है । यह आगमकी व्यवस्था है, इसे जानकर तत्त्वका व्याख्यान करना ही उचित है ।

आचार्य कुन्दकुन्दने समयसार निर्जरा अधिकारमें भोगमें तन्मय होकर उपयुक्त हुए जीवके भोगको निर्जराका हेतु नहीं कहा है । किन्तु सम्यग्दृष्टिके सविकल्प दशामें भोगकी क्रिया होते हुए भी भोगमें जो विरक्ति है उसे निर्जराका हेतु कहा है । इसके लिए गाथा १९५ आदि पर दृष्टिपात कीजिये । समयसारकलशमें इसका विशदतासे स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है-

नाश्नुते विषयसेवनेऽपि यत् स्वं फलं विषसेवनस्य ना ।
ज्ञानवैभवविरागताबलात् सेवकोऽपि तदसावसेवकः ॥१३५॥

यह ज्ञानी पुरुष विषय सेवन करता हुआ भी ज्ञानवैभव और विरागताके बलसे विषयसेवनके निजफल ( रंजित परिणाम ) को नहीं भोगता, इसलिए वह सेवक होने पर भी असेवक है ॥१३५॥

सम्यग्दृष्टिके नियमसे ज्ञान-वैराग्य शक्ति होती है ( स० क० १५६ ) यह लिखकर तो आचार्य अमृतचन्द्रने उक्त विषयको और भी स्पष्ट कर दिया है ।

आचार्य कुन्दकुन्द समयसार निर्जराधिकारकी ‘उपभोगमिंदिएहिं’ गाथा द्वारा यह भाव व्यक्त कर रहे हैं कि सम्यग्दृष्टि जीवको कर्मोदयनिमित्तक भोग अवश्य प्राप्त होते हैं पर वह उनमें विरक्त ही रहता है, इसलिए वे निर्जराके हेतु हैं। यहाँ निर्जराकी हेतुताका बल विरक्त भावों पर है, भोगों पर नहीं। अपर पक्ष सम्भवतः यह भूल जाता है कि भोगोंमें आसक्ति अशुभोपयोग है, शुभोपयोग नहीं, अन्यथा वह पक्ष उक्त वचनको इस रूपमें प्रकृतमें उदाहरणरूपमें उपस्थित न करता।

अपर पक्षने यहाँ पर शुद्धोपयोग ११ वें गुणस्थानसे होता है यह लिखकर कर्मबन्धकी व्यवस्थाका निर्देश किया है और पहले वह एक अपेक्षासे ६ वें गुणस्थान तक तथा दूसरी अपेक्षासे १२ वें गुणस्थान तक शुभोपयोग लिख आया है। यहाँ उस पक्षने ‘यदि उपशमश्रेणि या क्षयकश्रेणिके आदि तीन गुणस्थानोंमें भी शुद्धोपयोग माना जावे’ यह लिख कर अपने पिछले कथनके विरुद्ध निर्विवादरूपसे यह भी घोषित कर दिया है कि ७ वें गुणस्थानमें शुभोपयोग होता है, जब कि वह एक अपेक्षासे ७ वें गुणस्थानमें भी शुद्धोपयोग स्वीकार कर आया है। इस प्रकार चौथे गुणस्थानसे १२ वें गुणस्थान तक कौन उपयोग होता है इस सम्बन्धमें उस पक्षकी ये परस्पर विरुद्ध मान्यताएँ हैं। और आश्चर्य इस बातका है कि इन परस्पर विरुद्ध मान्यताओंके आधार पर वह पक्ष कर्मशास्त्रमें प्रयुक्त हुए ‘संक्लेश’ और विशुद्धि’ शब्दोंके ऊपर ध्यान न देकर कर्मबन्धकी व्यवस्था करना चाहता है। अन्यथा वह पक्ष हमारे ‘शुभोपयोग होने पर कर्मबन्धकी स्थिति और अनुभागमें वृद्धि हो जाती है और शुद्धोपयोगके होने पर उसकी स्थिति अनुभागमें हानि हो जाती है।’ इस कथन पर अणुमात्र भी टीका न करता, क्योंकि सामान्यतः यह कथन आठों कर्मोंमें प्रधानभूत तथा जीवके अनुजीवी गुणोंका घात करनेमें निमित्त होनेवाले चार घातिकर्मोंको लक्ष्यमें रख कर किया गया है, उन पर अविकल घटित भी होता है। पुण्य-पाप प्रकृतियोंमेंसे पाप प्रकृतियोंका बन्ध शुद्धोपयोगके कालमें होता ही नहीं। आयुकर्मके लिए नियम ही अलग है। इसलिए अघाति कर्मोंकी दृष्टिसे उक्त वचन नहीं लिखा गया है।

अपर पक्षने शुभोपयोगका अर्थ विशुद्ध परिणाम किया है, वह ठीक नहीं, क्योंकि असाताके बन्धके योग्य परिणामका नाम संक्लेश है और साताके बन्धके योग्य परिणामका नाम विशुद्धि है। यथा-

को संकिलेसो णाम ? असादबंधजोग्गपरिणामो संकिलेसो णाम। का विसोही ? सादबंधजोग्गपरिणामो। -ध० पु० ६ पृ० १८१

शुभोपयोगमें ये संक्लेश और विशुद्धिरूप दोनों प्रकारके परिणाम होते हैं, इसलिए शुभोपयोगका अर्थ न तो विशुद्ध परिणाम करना उचित है और न ही शुभोपयोगके आधार पर सब कर्मोंके स्थितिबन्ध और अनुभागबन्धकी व्यवस्था करना ही उचित है। कर्मशास्त्रमें संक्लेश और विशुद्धि इन दोनों संज्ञाओंका स्वतन्त्ररूपसे प्रयोग हुआ है। उसे ध्यानमें रखकर यहाँ हमें विवेचन करना इष्ट नहीं था। यहाँ तो हमें केवल यह बतलाना इष्ट था कि जब यह जीव स्व-परप्रत्यय कषायसे उपयुक्त होता है तब घातिकर्मोंका स्थिति-बन्ध और अनुभागबन्ध कैसा होता है और जब यह जीव स्व-परप्रत्यय कषायसे उपयुक्त नहीं होता है तब घातिकर्मोंका स्थितिबन्ध-अनुभागबन्ध कैसा होता है। इसी दृष्टिको ध्यानमें रखकर हमने उक्त वाक्य लिखा था। किन्तु अपर पक्षने शुभोपयोगका अर्थ केवल विशुद्ध परिणाम करके उस आधार पर तीन आयुओंको छोड़कर सब कर्मोंके स्थिति और अनुभागबन्धकी व्यवस्था करनेकी चेष्टा की यह उचित नहीं है।

अपर पक्षके इस व्यवस्थासम्बन्धी वचनको पढ़ कर यह भी मालूम पड़ता है कि वह शुभोपयोग अर्थात् विशुद्ध परिणामोंसे अप्रशस्त प्रकृतियोंके स्थितिबन्धमें वृद्धि मानता है। हमें आश्चर्य होता है कि उस पक्षकी ओरसे गोम्मटसार गा० १३४ भी उद्धृत की गई है और फिर भी यह गलती हुई। यदि वह पक्ष विशुद्धि परिणामका अर्थ शुभोपयोग न करता तो सम्भवतः यह गलती न होती। वस्तुतः वह समग्र कथन ही भ्रमपूर्ण है, क्योंकि स्थितिबन्धके लिए अलग नियम हैं और अनुभागबन्धके लिए अलग नियम हैं। उनको पृथक्-पृथक् करने पर ही समग्र कर्मोंकी स्थिति-अनुभागबन्धसम्बन्धी व्यवस्थाका ज्ञान कराया जा सकता है।

इस प्रकार अशुभादि तीनों उपयोगोंका क्या तात्पर्य है इसका विचार किया।

\१७. समयसार गाथा २७२ का आशय

अपर पक्षने समयसार गाथा २७२ को ध्यानमें रख कर लिखा है कि ‘वीतराग निर्विकल्प समाधिमें स्थित जीवोंके लिए व्यवहारनयका निषेध है, किन्तु प्राथमिक शिष्यके लिए वह प्रयोजनवान् है।’ समाधान यह है कि जितना भी अध्यवसानभाव है वह पराश्रित होनेसे बन्धका हेतु है अतएव निश्चयनयके द्वारा उसका प्रतिषेध करते हुए आचार्यने व्यवहारनयमात्र प्रतिषिद्ध है ऐसा कहा है। इसलिए व्यवहारनयको प्रतिषेध्य ही जानना चाहिए, क्योंकि स्वाश्रित निश्चयनय पर आरूढ़ हुए ज्ञानियोंके ही कर्मोंसे छूटनापन सुघटित होता है।

जो सम्यग्दृष्टि जीव है वह सविकल्प अवस्थामें आने पर भी व्यवहारनयको तो आश्रय योग्य मानता ही नहीं, क्योंकि उसकी सदाकाल उसमें हेयबुद्धि बनी रहती है। वह यह अच्छी तरहसे जानता है कि स्वरूपस्थिति हुए बिना मेरा भवबन्धनसे छुटकारा होना सम्भव नहीं है। इसलिए उसके सविकल्प अवस्थामें पंच परमेष्ठीकी भक्ति आदि, मोक्षमार्गके प्ररूपक शास्त्रोंका सुनना तथा अणुव्रत-महाव्रतका पालना आदि रूप परिणाम होते अवश्य हैं, परन्तु इनके होते हुए भी उसके चित्तमें एकमात्र ज्ञायक आत्माका आश्रयकर तत्स्वरूप परिणमनकी उपादेयता ही बनी रहती है। इसलिए वह ( सम्यग्दृष्टि जीव ) व्यवहारनयको आश्रय करने योग्य मानता होगा यह तो प्रश्न ही नहीं उठता। हाँ जो प्राथमिक मिथ्यादृष्टि जीव व्यवहारनयको आश्रय करनेयोग्य जान कर उसके आलम्बन द्वारा निरन्तर अज्ञानादिरूप परिणमता रहता है उसके लिए यह उपदेश है। आचार्य जयसेनने समयसार गाथा २७२ की टीकामें जो ‘यद्यपि प्राथमिकापेक्षया’ इत्यादि वचन लिखा है वह समयसार गाथा ८ के अभिप्रायको ध्यानमें रख कर ही लिखा है। व्यवहारनय निश्चयका साधक है इसका आशय ही यह है कि व्यवहारनय निश्चयका ज्ञान करानेवाला या सूचक है, क्योंकि सविकल्प अवस्थासे निर्विकल्प अवस्थामें पहुँचाना व्यवहारनयका कार्य नहीं। यह कार्य तो निर्विकल्प ज्ञायक आत्माका अवलम्बन कर तत्स्वरूप परिणमन द्वारा ही सम्पादित हो सकता है। कारण कि ‘मैं ज्ञायकस्वरूप हूँ, परम आनन्दका निधान हूँ।’ इत्यादि विकल्प ही जब तक इस जीवके बना रहता है तब तक वह निर्विकल्प समाधिका अधिकारी नहीं हो पाता, ऐसी अवस्थामें बाह्य अणुव्रतादिरूप क्रिया व्यवहार उसका साधक होगा इसे कौन विवेकी स्वीकार कर सकता है।

आचार्य अमृतचन्द्रने पंचास्तिकायके अन्तमें जो ‘व्यवहारनयेन भिन्नसाध्य-साधनभावं’ इत्यादि वचन लिखा है वह भी समयसार गाथा ८ के आशयको ही सूचित करता है। जो अनादि मिथ्यादृष्टि प्राथमिक शिष्य या जिसका वेदककाल व्यतीत हो गया है ऐसा सादि मिथ्यादृष्टि प्राथमिक शिष्य यह नहीं जानता कि यह श्रद्धान करने योग्य है, यह श्रद्धान करने योग्य नहीं है, यह श्रद्धान करनेवाला है और यह श्रद्धान है आदि, म्लेच्छस्थानीय उसे म्लेच्छभाषास्थानीय व्यवहारनय द्वारा परमार्थका ज्ञान कराना आवश्यक है। ऐसे प्राथमिक शिष्यके लिए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं कि वह व्यवहारनयसे परमार्थको जानकर परमार्थके अवलम्बनसे तत्स्वरूप परिणमन द्वारा सुखसे-सहजरूपसे सम्यग्दर्शनादि मोक्षमार्गस्वरूप तीर्थमें प्रवेश करता है। न कि उनके लिए-जिन्हें परमागमका अभ्यास करते हुए चिरकाल व्यतीत हो गया है, जिन्होंने पंचपरमेष्ठीके स्वरूपको जानकर उनकी पूजा-वन्दनामें अपना जीवन निकाल दिया है या जो चिरकालसे अणुव्रत-महाव्रतादिका पालन कर रहे हैं और जो उनमें यत्किंचित् दोष लगनेपर कठोर प्रायश्चित्तादि द्वारा सदाकाल उसका वारण करनेमें तत्पर रहते हैं। यह अपर पक्ष ही बतलावे कि हम उन्हें म्लेच्छस्थानीय मानकर प्राथमिक शिष्यके रूपमें स्वीकार कैसे करें ? हमारा आत्मा तो इसे स्वीकार करनेके लिए तैयार नहीं। उनके लिए तो व्यवहारनय इस अर्थमें प्रयोजनवान् है कि वे जिस भूमिकामें हों उसके अनुरूप व्यवहारका चरणानुयोगके अनुसार उन्हें यथार्थ ज्ञान होना चाहिए। और सविकल्प अवस्थामें हेयबुद्धिसे उसका यथाविधि पालन करते हुए भी उनकी दृष्टि सदा परमार्थपर बनी रहनी चाहिए। यह है पंचास्तिकायके उक्त उल्लेखका आशय। इसी आशयको ध्यानमें रखकर पण्डितप्रवर जयचन्दजीने समयसार गाथा ८ के तात्पर्यको स्पष्ट करते हुए उसके भावार्थमें ये शब्द लिपिबद्ध किये हैं-

लोक शुद्धनयको जानते ही नहीं हैं, क्योंकि शुद्धनयका विषय अभेद एकरूप वस्तु है। तथा अशुद्धनयको ही जानते हैं, क्योंकि इसका विषय भेदरूप अनेक प्रकार है। इसलिए व्यवहारके द्वारा ही शुद्धनयस्वरूप परमार्थको समझ सकते हैं। इस कारण व्यवहारनयको परमार्थका कहनेवाला जान उसका उपदेश किया जाता है। यहाँ पर ऐसा न समझना कि व्यवहारका आलम्बन कराते हैं बल्कि यहाँ तो व्यवहारका आलम्बन छुड़ाके परमार्थको पहुँचाते हैं ऐसा जानना।

अपर पक्षका कहना है कि ‘यदि विवक्षित नय अपने अपने प्रतिपक्षी नयके सापेक्ष है तो सुनय अथवा सम्यक् नय है जो सम्यग्दृष्टिके होते हैं। मिथ्यादृष्टिके वही नय परनिरपेक्ष होनेसे कुनय अथवा मिथ्यानय होते हैं।’

समाधान यह है कि प्रत्येक नय सापेक्ष होता है इसका तो हमने कहीं निषेध किया ही नहीं। परन्तु यहाँ पर ‘सापेक्ष’ का अर्थ क्या इसे जान लेना आवश्यक है। अष्टसहस्री पृ० २९० में आचार्यद्वय ‘मिथ्या-समूहो मिथ्या’ इत्यादि कारिकाकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं-

सुनय-दुर्णययोर्यथास्माभिर्लक्षणं व्याख्यातं तथा न चोद्यं न परिहारः, निरपेक्षाणामेव नयानां मिथ्यात्वात् तद्विषयसमूहस्य मिथ्यात्वोपगमात्, सापेक्षाणां तु सुनयत्वात् तद्विषयाणां अर्थक्रियाकारित्वात् तत्समूहस्य वस्तुत्वोपपत्तेः। तथा हि निरपेक्षत्वं प्रत्यनीकधर्मस्य निराकृतिः, सापेक्षत्वमुपेक्षा, अन्यथा प्रमाण-नयाविशेषप्रसंगात् धर्मान्तरादानोपेक्षाहानिलक्षणत्वात् प्रमाण-नय-दुर्णयानां प्रकारान्तरासंभवाच्च प्रमाणात्त-दतत्स्वभावप्रतिपत्तेः नयात्तत्प्रतिपत्तेः दुर्णयात्तदन्यनिराकृतेश्च। इति विश्वोपसंहृतिः, व्यतिरिक्त-प्रतिपत्तिप्रकाराणामसम्भवात्।

सुनय और दुर्नयका जिस प्रकारसे हमने लक्षण कहा है उस प्रकारसे न शंका है और न उसका परिहार है, क्योंकि निरपेक्ष नय ही मिथ्या होते हैं, कारण कि उनके विषय-समूहको मिथ्यारूप स्वीकार किया है। सापेक्ष नय तो सुनय होते हैं, क्योंकि उनके विषय अर्थक्रियाकारी होते हैं तथा उनके विषयसमूहमें वस्तुपना बन जाता है । यथा-निरपेक्षत्वका अर्थ है प्रत्यनीक धर्मका निराकरण, तथा सापेक्षत्वका अर्थ है उपेक्षा, अन्यथा प्रमाण और नयमें अविशेषताका प्रसंग उपस्थित होता है । कारण कि प्रमाण धर्मान्तरके आदानलक्षणवाला होता है, नय धर्मान्तर की उपेक्षा लक्षणवाला होता है और दुर्नय धर्मान्तरकी हानिलक्षणवाला होता है, यहाँ अन्य प्रकार सम्भव नहीं । तथा प्रमाणसे तदतत्स्वभाव वस्तुकी प्रतिपत्ति होती है, नयसे तत्की प्रतिपत्ति होती है और दुर्नयसे अन्य (धर्मान्तर) का निराकरण होता है । इस प्रकार समस्त प्रमाण, नय और दुर्नयोंका संग्रह हो जाता है, क्योंकि इनके सिवाय जाननेके दूसरे प्रकार सम्भव नहीं हैं ।

यह आगमवचन है । इससे हमें तीन बातोंका स्पष्टतः ज्ञान होता है-

(१) सुनयका विषय अर्थक्रियाकारी होता है ।

(२) सुनयमें सापेक्षत्वका अर्थ उपेक्षा है ।

(३) और सुनय प्रतिपक्षी नयके विषयमें उपेक्षा धारण कर मात्र अपने विषयकी प्रतिपत्ति कराता है ।

यह तो प्रत्यक्ष अनुभवमें आता है कि लोकका समस्त व्यवहार पर्यायाश्रित होनेपर भी उसे मिथ्या नहीं माना जाता । कोई एक व्यक्ति सब्जीमण्डीमें जाकर यदि अनार लेना चाहता है तो दुकानदारसे यह नहीं कहता कि अनार पर्यायविशिष्ट पुद्गल दीजिए । किन्तु वह जाकर अनारकी माँग करता है, और दुकानदार इष्टार्थको जानकर उसको उपलब्धि करा देता है यह है अर्थक्रियाकारोपना जो सुनयसे सम्पन्न होता है । आचार्योंका यहाँ यही कहना है कि यह जितना भी पर्यायाश्रित व्यवहार है वह रागमूलक होनेसे मोक्षमार्गमें ऐसे व्यवहारको छुड़ाया गया है । ‘छुड़ाया गया है’ इसका अर्थ है-उसमें उपेक्षा कराई गई है । साधक व्यवहारको छोड़ता नहीं, किन्तु निश्चय प्राप्तिरूप मूल प्रयोजनको ध्यानमें रखकर उसे करता हुआ भी उसमें उपेक्षा रखता है और मात्र निश्चयके विषयको आश्रय करने योग्य स्वीकार कर निरन्तर अपने उपयोगको उस दिशामें मोड़नेका प्रयत्न करता रहता है। वह यह अच्छी तरह जानता है कि प्रत्येक वस्तु अनेकान्तस्वरूप होनेसे वह सत् भी है और असत् भी है परन्तु उसने पर्यायार्थिक नयके विषयभूत असत् धर्मकी उपेक्षाकर निश्चय नयके बिषयभूत ‘सत्’ को अपना केन्द्रविन्दु बनाया है । यतः ‘सत्’ धर्म सत्स्वरूप ही है उसमें ‘असत्’ धर्मका अभाव है, इसलिए प्रत्येक साधक व्यवहार नयके विषयके प्रति उपेक्षा धारण कर अपनी बुद्धिमें यह निर्णय करता है कि ‘मैं तो मात्र एक ज्ञायकस्वरूप हूँ, मैं न मनुष्य हूँ, न देव हूँ, न नारकी हूँ और न तिर्यञ्च हूँ’ आदि । यतः प्रत्येक सुनयका विषय अर्थक्रियाकारी स्वीकार किया गया है, इसलिए बुद्धिमें ऐसा निर्णय करनेसे वह (साधक) अपनी बुद्धिको उसमें युक्त कर देता है । फल होता है रागकी हानिके साथ स्वभावप्राप्ति । आचार्य कहते हैं कि यही मोक्षमार्ग है । यदि मोक्षकी प्राप्ति होती है तो एकमात्र इसी मार्गसे होती है । अन्य सब विडम्बना है-भव बन्धनकी रखड़ना है ।

इससे अपर पक्षको यह सुगमतासे समझमें आ जायगा कि नयप्ररूपणामें ‘सापेक्ष’ का अर्थ क्या इष्ट है और सुनयके विषयका अवलम्बन ही जीवनमें क्यों अर्थक्रियाकारी है ।

अपर पक्षने नयचक्रादिसंग्रहकी गाथा ६८ को उपस्थित कर यह सिद्ध करना चाहा है कि ‘मिथ्या-व्यवहार नयसे बन्ध होता है और सम्यक् व्यवहार नयसे मोक्ष होता है ।’ किन्तु वह पक्ष इस गाथासे ऐसा अभिप्राय फलित करते समय यदि उसीकी गाथा ७७ पर दृष्टिपात कर लेता तो सम्भव था कि वह उक्त प्रकारसे अपना मत न बनाता । गाथा ७७ इस प्रकार है-

ववहारादो बंधो मोक्खो जम्हा सहावसंजुत्तो ।
तम्हा कर (कुरु) तं गउणं सहावमाराहणाकाले ॥७७॥

यतः व्यवहारसे बन्ध है और स्वभावसंयुक्त मोक्ष है, इसलिए स्वभाव आराधनाके कालमें व्यवहारको गौण करो ।।७७।।

अतएव इस गाथाके प्रकाशमें गाथा ६८ का इतना ही आशय है कि सम्यग्दृष्टिको भेदोपचारका यथार्थ ज्ञान होता है, इसलिए वह मोक्षका अधिकारी है । उदाहरणार्थ जिसे ऐसा यथार्थ ज्ञान है कि मोहनीय कर्म मोह-राग-द्वेषको उत्पन्न करता है यह उपचरित कथन है वही यथार्थको जानकर स्वभावके आलम्बनसे मोक्षका अधिकारी होता है, अन्य मिथ्यादृष्टि नहीं, क्योंकि वह उपचारको भी आरोपित न जानकर यथार्थ जानता है, इसलिए वह कर्मबन्धनसे त्रिकालमें मुक्त नहीं हो सकता ।

समयसार गाथा २७२ में ‘पराश्रितो व्यवहारनयः’ और ‘आत्माश्रितो निश्चयनयः’ यह लिखकर व्यवहारनयमात्रका प्रतिषेध किया है । आत्मख्याति टीकाके शब्द हैं-

तत्रैवं निश्चयनयेन पराश्रितसमस्तमध्यवसानं बन्धुहेतुत्वेन सुमुक्षोः प्रतिषेधयता व्यवहारनय एव किल प्रतिषिद्धः, तस्यापि पराश्रितत्वाविशेषात् । प्रतिषेध्य एव चायं, आत्माश्रितनिश्चयनयाश्रितानामेव मुच्यमानत्वात् ।

इस टीकाका पं० जयचन्द्रजी कृत अनुवाद इस प्रकार है-

सो जैसे परके आश्रित समस्त अध्यवसान पर और आपको एक मानना वह बन्धका कारण होनेसे मोक्षके इच्छुकको छुड़ाता जो निश्चयनय उसकर उसी तरह निश्चयनयसे व्यवहारनय ही छुड़ाया है । इस कारण जैसे अध्यवसान पराश्रित है उसी तरह व्यवहारनय भी पराश्रित है इसमें विशेष नहीं है । इसलिए ऐसा सिद्ध हुआ कि यह व्यवहारनय प्रतिषेधने योग्य ही है, क्योंकि जो आत्माश्रित निश्चयनयके आश्रित पुरुष हैं उनके ही कर्मोंसे छूटनापना है ।

इससे स्पष्ट है कि समयसार गाथा २७२ में निश्चयनयके द्वारा समस्त व्यवहारनयको प्रतिषिद्ध ठहराया गया है । और इसे स्वीकार करने पर पूर्वापर विरोध भी नहीं आता, क्योंकि समयसार गाथा १२ में यह नहीं कहा गया है कि अपरम भाव ( सविकल्प अवस्था ) में स्थित जीवोंके लिए व्यवहारनय आश्रय करने योग्य है । आचार्य अमृतचन्द्रने जो ‘ये तु प्रथम-’ इत्यादि वचन लिखा है वह ‘जहाँ जितनी शुद्धि उत्पन्न होती है वहाँ तद्युक्त आत्माका भी अनुभव होता है’ यह बतलानेके लिए ही लिखा है । मालूम नहीं कि गाथा २७२ की टीकामें और १२ की टीकामें इतना स्पष्ट कथन होनेपर भी अपर पक्षने पूर्वापरके विरोधका भय दिखलाकर अपना अभिलषित अर्थ कैसे फलित कर लिया ! क्या गाथा १२ में व्यवहारनयको आश्रय करने योग्य बतलाकर १२ वें गुणस्थानतक वह निश्चयनयके द्वारा प्रतिषिद्ध नहीं है यह कहा गया है । यदि नहीं तो गाथा २७२ के साथ इसका पूर्वापर विरोध कहाँ रहा, अर्थात् नहीं रहा ।

अपर पक्षने भावार्थ लिखकर जो भाव व्यक्त किये हैं उस सम्बन्धमें यह निवेदन है कि व्यवहारनय प्रयोजनवान् है इसका यह अभिप्राय लेना चाहिए कि जब यह जीव सविकल्प अवस्थामें रहता है तब उस गुणस्थानके अनुरूप उसका व्यवहार नियमसे होता है । ऐसे व्यवहारके साथ उस गुणस्थानके अनुरूप शुद्धि बनी रहनेमें किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित नहीं होती । गुणस्थान परिपाटीके अनुसार व्यवहारका ज्ञान करानेके लिए उसका उपदेश भी दिया जाता है । किन्तु कोई भी मुमुक्षु व्यवहार करते रहनेमें इष्टार्थकी सिद्धि न मान स्वयं परमार्थस्वरूप बननेके लिए स्वभावका आलम्बन करनेको उद्यमशील रहता है । व्यवहार यथापदवी प्रयोजनवान् होनेपर भी साधककी दृष्टिमें वह हेय ही है और स्वभावका आश्रय करनेसे तत्स्वरूप परिणमनद्वारा मोक्षकी प्राप्ति होती है, इसलिए साधककी दृष्टिमें वह सदाकाल उपादेय ही है।

आचार्य अमृतचन्द्रने समयसार गाथा १४ की टीकामें बद्धस्पृष्टताको भूतार्थ कालप्रत्ययासत्तिको ध्यानमें रखकर ही लिखा है। एक कालमें जीवकी अपनेमें और कर्मकी अपनेमें ऐसी पर्याय होती हैं जिनमें बद्धस्पृष्टता व्यवहार होता है। वे दोनों पर्यायें यथार्थ हैं, इस अपेक्षासे उसे भूतार्थ माननेमें कोई बाधा नहीं है। पर इतनेमात्रसे उसे उपादेय नहीं स्वीकार किया जा सकता; क्या अपर पक्ष यह चाहता है कि प्रत्येक संसारी जीव संसारी बना रहे। व्यवहारनयसे कालप्रत्यासत्तिवश बद्धस्पृष्टता भूतार्थ ठहरो इसमें बाधा नहीं, पर है वह सर्वदा हेय ही।

पं० फूलचन्द्रने प्रेमी अभिनन्दन ग्रन्थ पृ० ३४५ से ३५५ के मध्य जो ‘यदि निश्चय सत्याधिष्ठित है’ इत्यादि वचन लिखा है वह मिथ्या एकान्तका परिहार करनेके अभिप्रायसे ही लिखा है। यद्यपि वहाँ सामान्यसे व्यवहारनय शब्दका प्रयोग हुआ है। पर उससे सद्भूतव्यवहारको ही ग्रहण करना चाहिये। पण्डितप्रवर बनारसीदासजी वर्तमानमें संसारी होते हुए भी अपनेको मुक्त मानने लगे थे। किन्तु सम्यग्ज्ञान होनेपर उन्होंने यह स्वीकार किया कि ‘पर्यायदृष्टिसे वर्तमानमें मैं संसारी ही हूँ, मुक्त नहीं।’ इसीको उस लेखमें कहा गया है कि ‘उन्हें व्यवहारमें आना पड़ा।’

‘निरपेक्षा नया मिथ्या’ इस वचनके सम्बन्धमें पिछले उत्तरमें हम जो कुछ भी लिख आये हैं वह अर्थक्रियाकारीपनेको ध्यानमें रखकर ही लिख आये हैं। विशेष खुलासा अनन्तर पूर्व किया ही है। उससे हमारा पूर्वोक्त कथन किस प्रकार आगमानुकूल है यह स्पष्ट हो जायगा।

‘मोक्षमार्गकी प्रसिद्धि भी द्वयनयाधीन है।’ यह अपर पक्षका कहना है। इस सम्बन्धमें इतना ही निवेदन है कि आगममें हमने यह तो पढ़ा है कि 'भगवान्‌की देशना एक नयके आधीन न होकर दो नयके आधीन है-

तत्र न खल्वेकनयायत्ता देशना किन्तु तदुभयायत्ता।
-पंचास्तिकाय गा० ४ टीका

किन्तु अपर पक्षका जैसा कहना है वैसा वचन अभीतक हमारे देखनेमें नहीं आया।

पंचास्तिकाय १७२ गाथाकी आ० जयसेनकृत टीकामें जो कुछ कहा गया है उसका आशय यह है कि जो व्यवहाराभासी होते हैं उनमें अणुव्रत महाव्रतादिरूप द्रव्यचारित्र होते हुए भी निश्चयकी प्राप्ति न होनेसे वे संसारी ही बने रहते हैं। जो निश्चयाभासी होते हैं उनमें न तो व्यवहार चारित्र ही होता है और न उन्हें निश्चयकी प्राप्ति ही होती है, इसलिए वे भी संसारी बने रहते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि निश्चयमूलक व्यवहार ही सच्चा व्यवहार कहलाता है। अतः अणुव्रत-महाव्रतके धारण करनेमात्रको परमार्थ न समझकर परमार्थकी प्राप्तिके लिए सदा उद्यमशील रहना चाहिए।

आचार्य अमृतचन्द्रने प्रवचनसार टीकामें यह तो लिखा है कि 'केवल यह (निश्चय) एक ही मोक्षमार्ग है-

तयोऽवधार्यते केवलमयमेक एव मोक्षस्य मार्गः। -गाथा १९९
ततो नाऽन्यद्वर्त्म निर्वाणस्येत्यवधार्यते । -गा० ८२

तथा उन्होंने समयसारमें द्रव्यलिंग मोक्षमार्ग है इसका निषेध भी किया है। -गा० ४१०-४११ और जो द्रव्यलिंगको मोक्षमार्ग कहते हैं उनके उस कथनको अज्ञानका फल कहा है (गा० ४०९)। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि मोक्षमार्गकी प्ररूपणा दो प्रकार की है, मोक्षमार्ग दो नहीं हैं। ऐसी अवस्थामें पंचास्तिकायका हवाला देकर अपर पक्षका यह लिखना तो ठीक नहीं कि ‘केवल निश्चयनयसे भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती और केवल व्यवहारनयसे भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती।’ किन्तु इसके स्थानमें यह लिखना ही समीचीन है कि निश्चयारूढ़ व्यक्तिके यथापदवी व्यवहार नियमसे होता है। यही इन दोनोंका अविरोध है। किन्तु जैसे-जैसे स्वतत्त्वमें विश्रान्ति प्रगाढ़ होती जाती है वैसे-वैसे क्रमशः कर्मका संन्यास होता जाता है और अन्तमें स्वतत्त्वमें परम विश्रान्ति होनेसे यह जीव आर्हन्त्यलक्षण परम विभूतिका स्वामी बनता है। अपर पक्षने जो ‘तदिदं वीतरागत्वं’ इत्यादि वचन उद्धृत किया है उसका भी यही आशय है।

हमने लिखा था कि ‘पर्यायबुद्धि तो अनादि कालसे बनाये चला आ रहा है।’ उसका जो आशय अपर पक्षने लिया है वह ठीक नहीं है। आचार्य कुन्दकुन्दने जिस अभिप्रायसे प्रवचनसार गा० ९३ में ‘पज्जयमूढा हि परसमया’ यह वचन लिखा है और जिस अभिप्रायसे उसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्रने

‘यतो हि बहवोऽपि पर्यायमात्रमेवावलम्ब्य तत्त्वाप्रतिपत्तिलक्षणं मोहमुपगच्छन्तः परसमया भवन्ति।’

जिससे कि बहुतसे जीव पर्यायमात्रका ही अवलम्बनकर तत्त्वकी अप्रतिपत्तिलक्षण मोहको प्राप्त होते हुए परसमय होते हैं।

यह वचन लिखा हैं वही भाव हमारा था। यदि अपर पक्षने इस वचन पर सम्यक् दृष्टिपात न किया हो तो अब कर ले। उससे उस पक्षको व्यवहारनयके विषयभूत पर्यायका अवलम्बन करनेसे आत्माकी क्या हानि होती है यह अच्छी तरह समझमें आ जायगा और उससे मोक्षमार्गमें व्यवहारनयका विषयभूत अणुव्रत-महाव्रतका पालना आश्रय करने योग्य क्यों नहीं बतलाया यह भी समझमें आ जायगा।

सम्भवतः अपर पक्षने ‘प्रयोजनवान् है’ और ‘आश्रय करने योग्य है’ इन पदोंके पृथक्-पृथक् आशयको ध्यानमें नहीं लिया तभी तो उसकी ओरसे यह वचन लिखा गया है-‘जो एकान्तसे निश्चयनयका अवलम्बन लेते हैं वे मोक्षको तो प्राप्त करते ही नहीं, किन्तु उल्टा पापबन्ध ही करते हैं।’ इसके लिए हम अपर पक्षका ध्यान समयसार कलश २३ की ओर आकृष्ट कर देना चाहते हैं। उससे यह स्पष्ट हो जायगा कि यदि एक मुहूर्तके लिये बुद्धि द्वारा यह जीव शरीरादि पर द्रव्य-परभावोंसे भिन्न होकर ज्ञायकस्वभाव आत्माका अनुभव कर ले तो उसके मोहके छेद होनेमें देर न लगे।

अन्तमें अपर पक्षने अपनी कल्पनासे ऐसी बहुतसी मान्यताओंका निर्देश किया है जिनका उसी स्तरसे उत्तर देना उचित प्रतीत नहीं होता। किन्तु इतना लिखे बिना नहीं रहा जाता कि अपर पक्षको स्वयं विचार करना चाहिए कि उनके सामने ऐसी कोई बाधा तो है जिससे समुचित बाह्य पुरुषार्थ करके भी और योग्य निमित्त मिलाने पर भी कार्यसिद्धि नहीं होती। स्पष्ट है कि काललब्धि नहीं आई। अन्य सब तथ्य इसीमें निहित हैं। यदि अपर पक्ष अनेकान्तकी वास्तवमें प्रतिष्ठा करना चाहता है तो उसे उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-स्वरूप वस्तुको प्रत्येक समयमें स्वतःसिद्ध परनिरपेक्ष स्वीकार कर लेना चाहिए। धर्म-धर्मीकी सिद्धिमें परस्पर सापेक्षताका व्यवहार किया जाय यह दूसरी बात है। वस्तुमें अनेकान्तकी प्रतिष्ठा इसी मार्गसे हो सकती है, अन्य मार्गसे नहीं।

इसप्रकार समयसार गाथा २७२ का क्या आशय है इसके स्पष्टीकरणके साथ प्रकृत प्रश्नसम्बन्धी प्रस्तुत प्रतिशंकाका सांगोपांग विचार किया।

शंका १७, प्रथम दौर: शंका १७ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ८०७ से ८०८

↑ सूची


प्रथम दौर

: १ :

शंका १७

उपचारका लक्षण क्या है ? निमित्तकारण और व्यवहारनयमें यदि क्रमशः कारणता और नयत्व उपचार है तो इनमें उपचारका लक्षण घटित कीजिये ?

समाधान १

(१) परके सम्बन्ध ( आश्रय )से जो व्यवहार किया जाता है उसे उपचार कहते हैं । इसका उदाहरण देते हुए समयसारकलशमें कहा है-

घृतकुम्भाभिधानेऽपि कुम्भो घृतमयो न चेत् ।
जीवो वर्णादिमज्जीवजल्पनेऽपि न तन्मयः ॥४०॥

अर्थ-यदि ‘घीका घड़ा’ ऐसा कहनेपर भी जो घड़ा है वह घीमय नहीं है ( मिट्टीमय ही है) तो इसी प्रकार ‘वर्णादिमान् जीव’ ऐसा कहनेपर भी जो जीव है वह वर्णादिमय नहीं है (ज्ञानघन ही है) ॥४०॥

परके योगसे जो व्यवहार किया जाता है उसे उपचार कहते हैं इसका विशदरूपसे स्पष्टीकरण श्लोकवार्त्तिकके इस वचनसे भी हो जाता है-

न हि उपचरितोऽग्निः पाकाद्युपयुज्यमानो दृष्टः, तस्य मुख्यत्वप्रसंगात् ।
-श्लोकवार्तिक अ० ५ सू० ९

अग्निके स्थानमें उपचरित अग्निका उपयोग नहीं देखा जाता, अन्यथा उसे मुख्य अग्नि ( यथार्थ अग्नि ) ही जानेका प्रसंग आता है ।

इसी प्रकार परमागममें उपचारके-

मुख्योपचारभेदैस्तेऽवयवैः परिवर्जिताः ।
-त० श्लो० पृ० ४१९

भूतादिव्यवहारोऽतः कालः स्यादुपचारतः ।
-त० श्लो० पृ० ४१९

अनेक उल्लेख उपलब्ध होते हैं । जिनके अनुगम करनेसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि मूल वस्तुके वैसा न होनेपर भी प्रयोजनादिवश उसमें परके सम्बन्धसे व्यवहार करनेको उपचार कहते हैं ।

मुख्यके अभावमें निमित्त और प्रयोजनादि बतलानेके लिये उपचार प्रवृत्त होता है ।

(२) जिस प्रकार निश्चय कारक छह प्रकारके हैं उसी प्रकार व्यवहार कारक भी छह प्रकारके हैं- कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण । ऐसा नियम है कि जिसप्रकार कार्यको निश्चय कारकों-के साथ आभ्यन्तर व्याप्ति होती है उसी प्रकार अनुकूल दूसरे एक या एकसे अधिक पदार्थोंमें कार्यकी बाह्य व्याप्ति नियमसे उपलब्ध होती है। एक मात्र वस्तुस्वभावके इस अटल नियमको ध्यानमें रखकर परमागममें जिसके साथ आभ्यन्तर व्याप्ति पाई जाती है उसे उपादान कर्ता आदि कहा गया है और उस कालमें जिस दूसरे पदार्थके साथ बाह्य व्याप्ति पाई जाती है उसमें निमित्तरूप व्यवहारका अवलम्बन कर जिसमें कर्तारूप व्यवहार होता है उसे कर्ता निमित्त कहते हैं, और जिसमें कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण कारकका व्यवहार होता है उसे कर्म निमित्त, करण निमित्त आदि कहते हैं। इस प्रकार कार्यके अनुकूल पर द्रव्यकी विवक्षित पर्यायमें कर्ता निमित्त आदिका किस प्रकार उपचार होता है इसका सम्यक् प्रकार ज्ञान हो जाता है। यहाँ आभ्यन्तर व्याप्ति और बाह्य व्याप्ति आदिके विषयमें जो कुछ लिखा गया है उसकी पुष्टि समयसार गाथा ८४ की टोकासे होती है। वहाँ लिखा है-

बहिर्व्याप्यव्यापकभावेन कलशसम्भवानुकूलं व्यापारं कुर्वाणः कलशकृततोयोपयोगजां तृप्तिं भाव्य-भावकभावेनानुभवंश्च कुलालः कलशं करोत्यनुभवति चेति लोकानामनादिरूढोऽस्ति तावद् व्यवहारः। तथान्तरव्याप्य-व्यापकभावेन पुद्गलद्रव्येण कर्माणि क्रियमाणे भाव्य-भावकभावेन पुद्गलद्रव्यमेवानुभूयमाने च…।

बाह्य-व्याप्य-व्यापकभावसे घड़ेकी उत्पत्तिमें अनुकूल ऐसे (इच्छारूप और हाथ आदिकी क्रियारूप अपने) व्यापारको करता हुआ तथा घड़ेके द्वारा किये गये पानीके उपयोगमें उत्पन्न तृप्तिको (अपने तृप्ति-भावको) भाव्य-भावकभावके द्वारा अनुभव करता हुआ-भोगता हुआ, कुम्हार घड़ेका कर्ता है और भोक्ता है ऐसा लोगोंका अनादिरूढ़ व्यवहार है। उसी प्रकार आभ्यन्तर व्याप्य-व्यापकभावसे पुद्गल द्रव्य कर्मको करता है और भाव्यभावकभावसे पुद्गल द्रव्य ही कर्मको भोगता है…।

व्यवहारनय नयज्ञानका एक भेद है। उसका कार्य जहाँ जैसा व्यवहार किया जाता हो उसको जाननामात्र है, उसे उसी रूपमें जानता है; इसलिए उसकी परिगणना सम्यग्ज्ञानमें की जाती है, अतः उसमें किसी प्रकारके उपचार करनेका कोई प्रयोजन न होनेसे वह अनुपचरित ही है।

शंका १७, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ८०८ से ८१२

↑ सूची


द्वितीय दौर

: २ :

शंका १७

प्रश्न यह था-उपचारका लक्षण क्या है ? निमित्त कारण और व्यवहारनयमें यदि क्रमशः कारणता या नयत्वका उपचार है तो इसमें उपचारका लक्षण घटित कीजिये ?

प्रतिशंका २

इस प्रश्नके उत्तरमें यद्यपि आपने उपचारका लक्षण ‘परके सम्बन्ध (आश्रय)से व्यवहार करना’ बतलाया है, परन्तु इस लक्षणमें जो व्यवहार शब्द पड़ा हुआ है उसका जब तक अर्थ स्पष्ट नहीं हो जाता तब तक उपचारको समझनेकी आवश्यकता बनी रहती है। दूसरी बात यह है कि इस लक्षणमें पठित ‘परके सम्वन्ध’ शब्दका अर्थ आपने ‘परके आश्रय’ किया है, लेकिन इससे उपचार शब्द विलकुल संकुचित अर्थका बोधक रह गया है, जिसका परिणाम यह है कि लक्षणके आधरपर जिस प्रकार आप घीके आधारभूत घटको घृतकुम्भ कह सकते हैं उस प्रकार ‘जीवो वर्णादिमान्’ नहीं कह सकते हैं, क्योंकि जीव न तो वर्णादिकका आधारभूत है और न वर्णादिविशिष्ट पुगद्ल द्रव्यका ही आधारभूत है। इसी प्रकार 'अन्नं वै प्राणाः, ‘सिंहो माणवकः’ इत्यादि स्थलोंमें भी इस लक्षणके आधारपर उपचारको प्रवृत्ति नहीं की जा सकती है।

यद्यपि आगे चलकर आपने ‘उपचार’ शब्दका कुछ पमार्जित दूसरा अर्थ भी किया है, जैसा कि आपने लिखा है कि ‘मूल वस्तुके वैसा न होनेपर भी प्रयोजनादिवश उसमें परके सम्बन्धसे व्यवहार करनेको उपचार कहते हैं’ परन्तु इसमें भी पठित ‘व्यवहार’ शब्दसे आपको क्या अर्थ अभीष्ट है? और ‘प्रयोजनादि’ शब्दके अन्तर्गत आदि शब्दसे आप किस अर्थका बोध कराना चाहते हैं? यदि इतनी बात आप स्पष्ट कर दें तो फिर हम और आप उपचारके लक्षणके सम्बन्धमें सम्भवतः एकमत हो सकते हैं।

वास्तवमें ‘एक वस्तु या धर्मको किसी वस्तु या धर्ममें आरोप करना’ ही उपचारका युक्तिसंगत लक्षण है, क्योंकि इस लक्षणके आधारपर ‘घृतकुम्भ’ ‘जीवो वर्णादिमान’ ‘अन्न’ वै प्राणाः’ और ‘सिंहो माणवकः’ आदि वाक्य प्रयोगोंकी संगति उचित ढंगसे हो जाती है। परन्तु यदि आपको हमारे द्वारा मान्य उपचारके इस लक्षणको, जो कि अपके द्वितीय लक्षणके बहुत समीप है, आप स्वीकार न करें तो कृपया नीचे लिखी बातोंका उत्तर दें-

(१) द्वितीय लक्षणमें पठित 'व्यवहार" शब्दसे आपको क्या अभिप्रेत है?

(२) उसीमें पठित ‘प्रयोजनादि’ पदके आदि शब्दसे भी आप कौन-सा पदार्थ गृहीत करना चाहते हैं?

आगे आपने लिखा है कि ‘मुख्यके अभाव में निमित्त तथा प्रयोजनको दिखलानेके लिये उपचार प्रवृत्त होता है’ हो सकता है यह आपने आलाप-पद्धतिके

मुख्याभावे सति प्रयोजने निमित्ते च उपचारः प्रवर्तते।

इस कथनके आधारपर ही लिखा हो। इसलिये हमें यहाँपर यह कह देना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि आलापपद्धतिके उक्त वाक्यका अर्थ करनेमें आपने थोड़ी भूल कर दी है। उसका सुसंगत अर्थ यह है कि ‘मुख्यका अभाव रहते हुये निमित्त और प्रयोजनके वश उपचार प्रवृत्त होता है।’

इस अर्थमें हमारे और आपके मध्य अन्तर यह है कि जहाँ आप उपचारकी प्रवृत्ति निमित्त और प्रयोजन दिखलानेके लिये करना चाहते हैं वहाँ हमारा कहना है कि उपचार करनेका कुछ प्रयोजन हमारे लक्ष्यमें हो और उसका (उपचारका) कोई निमित्त (कारण) वहाँ विद्यमान हो तो उपचारकी प्रवृत्ति होती है।

उपचारकी इस प्रकारकी यह प्रवृत्ति ‘घृतकुम्भः’, ‘जीवो वर्णादिमान्’, ‘अन्नं वै प्राणाः’ और ‘सिंहो माणवकः’ आदि जहाँ २ आवश्यकता होती है वहाँ वहाँ ही की जाती है।

अब विचार यह करना है कि निमित्त कारणमें कारणताका और व्यवहारनयमें नयत्वका उपचार करना क्या आवश्यक है? और यदि आवश्यक है तो क्या वह सम्भव है, तथा इनमें उपचारका लक्षण घटित होता है क्या?

आपके उत्तरमें इन बातोंपर आपका मत यह है कि कारणता उपादानमें ही रहा करती है उसी कारणताका निमितमें आरोप किया जाता है और तब इसके आधारपर ही निमित्तको उपचरित कारण कह दिया जाता है। जैसा कि 'जैन तत्त्वमीमांसा’में उद्धृत नयचक्रकी निम्नलिखित गाथाके वहाँ पर किये गये अर्थसे फलित होता है-

बंधे च मोक्ख हेऊ अण्णो ववहारदो य णायव्वो।
णिच्छयदो पुण जीवो भणिओ खलु सव्वदरसीहिं ॥२३५॥

इस गाथाका जो अर्थ 'जैन तत्त्वमीमांसा’में दिया है वह निम्न प्रकार है-

व्यवहारसे ( उपचारसे ) बन्ध और मोक्षका हेतु अन्य पदार्थ ( निमित्त ) को जानना चाहिये, किन्तु निश्चय ( परमार्थ ) से यह जीव स्वयं बन्धका हेतु है और यही जीव स्वयं मोक्षका हेतु है ॥२३५॥

यहाँ पर विचारना यह है कि जो यह अर्थ गाथाका 'जैन तत्त्वमीमांसा’में दिया गया है क्या वह ठीक है ? तो इस पर हमारा कहना है कि वह अर्थ ठीक नहीं है। कारण कि हमारी समझमें यह नहीं आता है कि गाथामें पठित अन्य शब्दका अर्थ वहाँ निमित्त किस आधारपर किया गया है। इसमें सन्देह नहीं कि यदि गाथामें निमित्तका विरोधी उपादान शब्द होता तो उस हालतमें अन्य शब्दका ‘निमित्त’ अर्थ करना अनुचित नहीं था, परन्तु जब गाथामें उपादान शब्द न होकर जीव शब्द पाया जाता है तो इससे स्पष्ट हो जाता है कि वहाँ अन्य शब्दसे जीवके प्रतिपक्षी कर्म तथा नोकर्मको ही ग्रहण करना चाहिये। यदि यह तथ्य आप स्वीकार कर लें तो फिर गाथामें पठित ‘ववहारदो’ और ‘णिच्छयदो’ शब्दोंके अर्थ भी आपको दृष्टिगत करने होंगे। इस तरह गाथाका जो अर्थ हमारी दृष्टिसे हो सकता है वह इस प्रकार होगा-

‘बन्ध और मोक्षमें जीव निश्चयनयसे कारण होता है अर्थात् उपादान कारण होता है और जीवसे अन्य-कर्म नोकर्मरूप पदार्थ व्यवहारनयसे कारण होते हैं अर्थात् निमित्त कारण होते हैं।’

अब आप अनुभव करेंगे कि बन्ध और मोक्षके प्रति इस गाथाके द्वारा जीवमें तो उपादान कारणता स्थापित की गई है। और कर्म तथा नोकर्ममें निमित्तकारणता स्थापित की गई है। इसी बातको प्रकट करनेके लिए यहाँपर निश्चय ( स्वाश्रित ) नय व व्यवहार ( पराश्रित ) नयका प्रयोग किया गया है। आप व्यवहारका उपचार अर्थ करके निमित्तकारणमें असत्यता सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं यह संगत नहीं मालूम होता। क्योंकि एक वस्तुका वस्तुत्व उपादान नहीं है और दूसरी वस्तुका वस्तुत्व निमित्त नहीं है। किन्तु अपने स्वतन्त्र वस्तुत्वको रखते हुए विवक्षित वस्तुमें विवक्षित कार्यके प्रति आश्रय होनेसे उपादान कारणता है और अपने स्वतन्त्र वस्तुत्वको रखती हुई अन्य विवक्षित वस्तुमें सहायक होनेसे निमित्त कारणता है। निमित्त और उपादान कारणोंके व्युत्पत्त्यर्थ पर यदि ध्यान दिया जाय तो एक वस्तुमें उपादानताका वास्तविक रूप क्या है ? और दूसरी वस्तुमें निमित्तका वास्तविक रूप क्या है ? यह अच्छी तरह समझमें आजाता है। इनका व्युत्पत्त्यर्थ निम्न प्रकार है-

‘उपादीयतेऽनेन’ इस विग्रहके आधारपर ‘उप’ उपसर्गपूर्वक आदानार्थक ‘आ’ उपसर्ग विशिष्ट ‘दा’ धातुसे कर्ताके अर्थमें ल्युट् प्रत्यय होकर उपादान शब्द निष्पन्न हुआ है। इस तरह जो वस्तु विवक्षित परिणमनको स्वीकार करे या ग्रहण करे अथवा जिसमें परिणमन निष्पन्न हो वह वस्तु उपादान कहलाती है इसी प्रकार ‘निमेद्यति’ इस विग्रहके आधारपर ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक ‘मिद्’ धातुसे भी कर्तृ अर्थमें ‘क्त’ प्रत्यय होकर निमित्त शब्द निष्पन्न हुआ है। इस तरह निमित्त शब्दका अर्थ उपादानके प्रति मित्रवत् स्नेह करनेवाला या उपादानको उसकी विवक्षित कार्यरूप परिणतिमें सहायता देनेवाला होता है।

इस तरह हम देखते हैं कि विवक्षित कार्यके प्रति कार्यका आश्रय होनेके कारण विवक्षित वस्तुमें विद्यमान उपादानकारणता जिस प्रकार वास्तविक है उसी प्रकार उसी विवक्षित कार्यके प्रति सहायक होनेके कारण विवक्षित अन्य वस्तुमें विद्यमान निमित्तकारणता भी वास्तविक सिद्ध होती है। इससे यह बात निष्पन्न होती है कि जिस प्रकार अपना स्वतन्त्र अस्तित्त्व रखती हुई विवक्षित वस्तु विवक्षित कार्यके प्रति वास्तविक उपादान कारण है उसी प्रकार अपना स्वतन्त्र अस्तित्त्व रखती हुई अन्य विवक्षित वस्तु भी उस विवक्षित कार्यके प्रति वास्तविक निमित्त कारण है। अब हम आपसे पूछना चाहते हैं-

उपादान वस्तुगत कारणताका निमित्तभूत वस्तुमें आरोप क्या आपको अभिष्ट है और यदि अभीष्ट भी है तो क्या संभव है। आगे इन्हीं प्रश्नोंपर विचार करना है।

यह तो निर्विवाद है कि लोकमें जिस प्रकार उपादानभूत वस्तुकी कार्यरूप परिणति देखी जाती है उस प्रकार निमित्तभूत वस्तुकी कार्यरूप परिणति नहीं देखी जाती। यही कारण है कि जैन संस्कृतिमें निमित्तकी कार्यरूप परिणति नहीं स्वीकार की गई है, इसलिये निमित्तभूत वस्तुमें एक तो कारणताका आरोप अभीष्ट नहीं हो सकता है, न वह आवश्यक है और न वह संभव हो है, क्योंकि आलापपद्धति ग्रन्थके अनुसार एक वस्तुमें अथवा धर्ममें दूसरी वस्तु अथवा धर्मका आरोप निमित्त और प्रयोजन रहते हुए ही हो सकता है जो कि यहाँ घटित नहीं होता है, क्योंकि उपादानभूत वस्तुगत कारणताका आरोप निमित्तभूत वस्तुमें करनेके लिये कोई निमित्त (कारण) नहीं है और न उस आरोपका कोई प्रयोजन ही रह जाता है। कारण कि विना आरोपके ही अभीष्ट सिद्धि हो जाती है।

जब हम अध्यात्मकी व्याख्याको पढ़ते और सुनते हैं तो वह केवल एक द्रव्यमें तादात्म्यसे स्थित सब धर्मोंको स्वाश्रित होनेसे वास्तविक मानता है और जहाँ परकी अपेक्षा वर्णन किया जाता है तब उसे व्यवहार-अवास्तविक एवं सरल भाषामें उपचरित शब्दसे कहा जाता है, किन्तु वस्तुतः जिस धर्मको उपादानकी दृष्टिसे उपादेय कहा जाता है वही धर्म निमित्तकी अपेक्षा नैमित्तिक कहलाने लगता है। इस तरह एक ही उपादानका परिणमन दो रूप कहा जाता है, इसलिये उसे अध्यात्मकी भाषामें स्वपरप्रत्यय कहते हैं। जैसे जीवकी नर-नारकादि पर्याय और मिट्टीकी घट कपालादि पर्याय। इन्हें आगम भाषामें वैभाविक पर्यायें भी कहते हैं।

इस तरह जब उपादानगत वह परिणमन उपादेय और नैमित्तिक उभयरूप है तब उपादानके व्यापार को वास्तविक और निमित्तके व्यापारको अवास्तविक कैसे कहा जा सकता है। जब कि उपादान और निमित्त दोनोंके वास्तविक व्यापारोंसे वह आत्मलाभ पाता है।

आगे आपने जो निश्चय और व्यवहारकारक बतलाये हैं तथा अन्तर्व्याप्ति और बहिर्व्याप्तिका प्रतिपादन किया है वह भी क्रमशः परस्पर सापेक्ष उपादान और निमित्तोंके पृथक्-पृथक् व्यापाराधीन है। अनेकान्तकी वस्तुव्यवस्था यही है अर्थात् जिस समय उपादान कारक और अन्तर्व्याप्तिका लक्ष्य रहता है तब निमित्त कारक और बहिर्व्याप्ति गौण हो जाती है और इसी तरह जब निमित्त कारक और बहिर्व्याप्तिका लक्ष्य रहता है तब उपादान कारक और अन्तर्व्याप्ति गौण हो जाती है। वस्तुतः कार्यकी उत्पत्तिमें दोनों आवश्यक हैं और दोनों ही वास्तविक हैं। लोकमें भी दोनों ही प्रकारके वचन प्रयोग पाये जाते हैं। जैसे ‘मिट्टीसे घड़ा बना है।’ अथवा ‘कुम्भकारने मिट्टीसे घड़ा बनाया है’ दोनों हो वचनप्रयोग लोकमें सत्यार्थका प्रतिपादन करते हैं।

जैन तत्त्वज्ञान उभयनयसापेक्ष है । यह बात जुदी है कि कहीं निश्चयप्रधान कथन है और कहीं व्यवहारप्रधान कथन है। जहाँ निश्चय प्रधान कथन है वहाँ व्यवहारनयसे उसे समन्वित कर लेना चाहिये और जहाँ व्यवहारप्रधान कथन हैं वहाँ उसे निश्चयनयसे समन्वित कर लेना चाहिये । आचार्य अमृतचन्द्र स्वामीके निम्नांकित वचन हमारे मार्गदर्शक है-

उभयनयविरोधध्वंसिनि स्यात्पदाङ्के
जिनवचसि रमन्ते ये स्वयं वान्तमोहाः ।
सपदि समयसारं ते परं ज्योतिरुच्चै-
रनवमनयपक्षाक्षुण्णमीक्षन्त एव ॥४॥
-समयसार गाथा १२ का कलश

अर्थ-जो पुरुष उभयनयके विरोधको नष्ट करनेवाले और स्यात् पदसे चिह्नित जिनेन्द्र भगवान्‌के वचनोंमें स्वयं मोह-मिथ्यात्व रहित होकर रमण करते हैं ये उत्कृष्ट तथा अनयपक्षसे अक्षुण्ण-मिथ्यानयोंके संचारसे रहित उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप समयसारका-आत्माकी शुद्ध परिणतिका शीघ्र ही अवलोकन करते हैं ।

शंका १७

उपचारका लक्षण क्या है ? निमित्त कारण और व्यवहार नयमें यदि क्रमशः कारणता और नयत्वका उपचार है तो इनमें उपचारका लक्षण घटित कीजिए ?