शंका ९, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग १/२)
पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५७८ से ६००
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प्रतिशंका ३ का समाधान
१ उपसंहार
अपने प्रथम उत्तरमें ही हमने यह स्पष्ट कर दिया था कि संसारी जीव अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा बद्ध है और वह रागादि विकारी भावोंसे बद्ध है, असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा उसमें बद्ध होनेका व्यवहार है और इस अपेक्षासे वह ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है। शुद्ध निश्चयनयसे वह सदा चैतन्यमूर्ति है, इसलिए इनसे बद्ध नहीं है। परतन्त्रताका विचार भी इसी प्रकार कर लेना चाहिए। बन्धनसे छूटनेके उपायका निर्देश करते हुए बतलाया था कि अपने परम निश्चय परमात्मस्वरूप आत्माका अवलम्बन लेनेसे तन्मय परिणमन द्वारा वह मुक्त होता है। साथ ही यह भी बतला दिया गया था कि उसके अन्तरंगमें निश्चय रत्नत्रयस्वरूप जितनी जितनी विशुद्धि प्राप्त होती जाती है उसके अनुपातमें इसके द्रव्य-भाव कर्मका भी अभाव होता जाता है।
इस पर अपर पक्षका कहना है कि ‘जीवका राग-द्वेषादि भावोंके साथ व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है, बन्ध्य-बन्धक सम्बन्ध नहीं।…इसलिए जीव ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध और परतन्त्र है। मोहनीय आदि द्रव्य-कर्म राग-द्वेषादि विकारी भावोंके प्रेरक निमित्त कारण हैं तथा आत्माके राग-द्वेष आदि विकृत भाव मोहनीय आदि द्रव्य कर्मबन्धके प्रेरक निमित्त कारण हैं। जब आत्माके प्रबल पुरुषार्थसे मोहनीय आदि द्रव्यकर्मोंका क्षय होता है तब विकारका निमित्त कारण हट जानेसे राग-द्वेष आदि नैमित्तिक विकार भाव दूर हो जाते हैं। उस दशामें आत्माकी परतन्त्रता भी दूर हो जाती है।’ आदि,
अपने दूसरे उत्तरमें हमने अपने प्रथम उत्तरका तो समर्थन किया ही है, साथ ही पिछली प्रतिशंकामें जिन विशेष बातोंकी चरचा की गई है उन पर भी विचार किया है। इसमें प्रेरक कारणका आशय क्या है इस पर सुन्दर प्रकाश डाला गया है।
\२. प्रतिशंका ३ का समाधान
प्रतिशंका ३ उपस्थित करते हुए अपर पक्षने मूल प्रश्नको चार खण्डोंमें विभाजित कर दिया है। इनमेंसे (अ) खण्डका जो उत्तर हमने अपने प्रथम और द्वितीय उत्तरमें दिया है वह नयविभागको दिखलाते हुए दिया गया था। (आ) खण्डका उत्तर भी उसीसे हो जाता है।
(आ) इस खण्ड पर प्रकाश डालते हुए अपर पक्षका कहना है कि ‘रागादिक तो कर्मोदय जनित व्यवहारनयसे आत्माके विकारी भाव हैं, जो बन्धके कारण होनेसे भावबन्ध कहे जाते हैं। उनसे जीवका कथंचित् व्याप्य-व्यापकसंबन्ध तो है, क्योंकि विकार पर्याय है; किन्तु स्वपर्यायके साथ बन्ध्य-बन्धक सम्बन्ध कदापि नहीं हो सकता।’
समाधान यह है कि द्रव्यकर्मके उदयको निमित्तकर आत्मामें जो विकारी भाव रागादि उत्पन्न होते हैं वे अशुद्धनिश्चयनयसे जीवके ही हैं । अध्यात्ममें शुद्ध निश्चयनयकी मुख्यता है । इसलिए उन्हें वहाँ व्यवहारनयसे जीवका कहा गया है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य जयसेन समयसार गाथा ५७ की टीकामें लिखते हैं-
ननु वर्णादयो बहिरंगास्तत्र व्यवहारेण क्षीर-नीरवत्संश्लेषसम्बन्धो भवतु नाचाभ्यन्तराणां रागादीनाम्; तत्राशुद्धनिश्चयेन भवितव्यमिति ? नैवम्, द्रव्यकर्मबन्धापेक्षया योऽसौ असद्भूतव्यवहारस्तदपेक्षया तारतम्यज्ञापनार्थं रागादीनामशुद्धनिश्चयो भण्यते । वस्तुतस्तु शुद्धनिश्चयापेक्षया पुनरशुद्धनिश्चयोऽपि व्यवहार एवेति भावार्थः ।
शंका-वर्णादिक वहिरंग हैं । वहाँ व्यवहारसे क्षीर-नीरके समान संश्लेषसम्बन्ध होओ, अभ्यन्तर रागादिकका यह सम्बन्ध नहीं बनता, वहाँ अशुद्ध निश्चय होना चाहिए ?
समाधान-ऐसा नहीं, क्योंकि द्रव्यकर्मबन्धकी अपेक्षा जो असद्भूत व्यवहार है उसकी अपेक्षा तारतम्यका ज्ञान करानेके लिए रागादिको अशुद्ध निश्चय कहा जाता है। वास्तवमें तो शुद्ध निश्चयकी अपेचा अशुद्ध निश्चय भी व्यवहार ही है, यह उक्त कथनका भावार्थ है।
इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि रागादि जीवके हैं इस कथनको जो व्यवहार कहा गया है वह शुद्ध निश्चयकी अपेक्षा अशुद्ध निश्चय भी व्यवहार है इस तथ्यको ध्यानमें रख कर ही कहा गया है । अपर पक्षने जीवमें और रागादिकमें व्याप्य-व्यापकभाव तो स्वीकार किया ही है, इसलिए वे अशुद्धनिश्चयसे जीवके ही हैं ऐसा स्वीकार करनेमें भी अपर पक्षको आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।
अपर पक्षका कहना है कि वे (रागादि भाव) ‘बन्धके कारण होनेसे भावबन्ध कहे जाते हैं ।’ समाधान यह है कि वे मात्र बन्धके कारण होनेसे भावबन्ध नहीं कहे गये हैं, किन्तु वस्तुतः जीव उनके साथ एकत्व (तादात्म्य) रूप परिणम रहा है, इसलिए यथार्थमें जीवके साथ बद्ध होनेसे आगममें उन्हें भावबन्धरूप कहा गया है । धवला पु० १४ पृ० २ में बन्धका लक्षण करते हुए लिखा है-
दव्वस्स दव्वेण दव्व-भावाणं वा जो संजोगो समवाओ वा सो बंधो णाम ।
द्रव्यका द्रव्यके साथ तथा द्रव्य और भावका क्रमसे जो संयोग और समवाय है वह बन्ध कहलाता है ।
इससे सिद्ध है कि रागादि भाव द्रव्यकर्मबन्धके कारण होनेमात्रसे भावबन्ध नहीं कहलाते, किन्तु एक तो वे जीवके भाव हैं और दूसरे जीव उनसे बद्ध हैं, इसलिए उन्हें भावबन्ध कहते हैं । अपर पक्ष इसके लिए धवला पु० १४ पर दृष्टिपात करले, सब स्थिति स्पष्ट हो जायेगी ।
अपर पक्षका कहना है कि ‘स्वपर्यायके साथ वन्ध्य-वन्धक सम्बन्ध कदापि नहीं हो सकता ।’ समाधान यह है कि आगममें बन्धके तीन भेद बतलाये हैं-पुद्गलबन्ध, जीवबन्ध और तदुभयबन्ध । इनका स्वरूप निर्देश हम प्रथम उत्तरमें कर आये हैं । इनमेंसे पुद्गलबन्ध और तदुभयबन्ध ये दोनों बन्ध असद्भूत व्यवहारनयसे कहे गये हैं । तथा जीवबन्ध अशुद्ध निश्चयनयका विषय है । प्रवचनसार गा० १८९ की टीकामें आचार्य जयसेन लिखते हैं-
किं च रागादीनेवात्मा करोति तानेव भुंक्ते चेति निश्चयनयलक्षणमिदम् । अयं तु निश्चयनयो द्रव्यकर्मबन्धप्रतिपादकासद्भूतव्यवहारनयापेक्षया शुद्धद्रव्यनिरूपणात्मको विवक्षितनिश्चयस्तथैवाशुद्धनिश्चयश्च भण्यते । द्रव्यकर्माण्यात्मा करोति भुंक्ते चेत्यशुद्धद्रव्यनिरूपणात्मकासद्भूतव्यवहारनयो भण्यते ।
रागादिकको ही आत्मा करता है और उन्हींको भोगता है यह निश्चयनयका लक्षण है। किन्तु यह निश्चयनय द्रव्यकर्मबन्धके प्रतिपादक असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा शुद्ध द्रव्य अर्थात् स्वाश्रित निरूपण स्वरूप विवक्षित निश्चयनय उसीप्रकार अशुद्धनिश्चयनय कहा जाता है। द्रव्यकर्मोंको आत्मा करता है और भोगता है इस प्रकार अशुद्धद्रव्य अर्थात् पराश्रित निरूपणस्वरूप असद्भूत व्यवहारनय कहा जाता है।
इससे स्पष्ट है कि जैसे जीव और कर्ममें कर्ता-कर्मभाव तथा भोक्ता-भोग्य भाव असद्भूत व्यवहारनयका विषय है वैसे ही इन दोनोंमें बन्ध्य-बन्धकभाव यह भी असद्भूतव्यवहारनयका विषय है। असद्भूत व्यवहारका लक्षण है-भेद होने पर भी अभेदका उपचार करना।
प्रवचनसार गा० १८८ की आचार्य जयसेनकृत टीकामें कहा भी है-
भेदऽप्यभेदोपचारलक्षणेनासद्भूतव्यवहारेण बन्ध इत्यभिधीयते।
इस प्रकार उक्त आगम प्रमाणोंके प्रकाशमें विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि दो द्रव्योंमें बन्ध्य-बन्धकसम्बन्ध यथार्थ तो नहीं है। किन्तु असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा दो द्रव्योंमें परस्पर अत्यन्त भेद होने पर भी अभेदका उपचार करके वह कहा जाता है। इसी तथ्यको वे प्रवचनसार गाथा ९६ की टीकामें स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-
यथा वस्त्रं लोध्रादिद्रव्यैः कषायितं रञ्जितं सन्मञ्जीष्ठादिरङ्गद्रव्येण रञ्जितं सदभेदेन रक्तमित्युच्यते तथा वस्त्रस्थानीय आत्मा लोध्रादिद्रव्यस्थानीयमोहरागद्वेषैः कषायितो रञ्जितः परिणतो मञ्जीष्ठस्थानीयकर्मपुद्गलैः संश्लिष्टः सन् भेदेऽप्यभेदोपचारलक्षणेनासद्भूतव्यवहारेण बन्ध इत्यभिधीयते।
जैसे वस्त्र लोध्रादि द्रव्योंसे कषायित-रंजित होकर मजीठा आदि रंग द्रव्यसे रंगा जाकर अभेदसे रक्त ऐसा कहलाता है उसी प्रकार वस्त्रस्थानीय आत्मा लोध्रादि द्रव्यस्थानीय मोह, राग, द्वेषसे मोह राग द्वेषरूप परिणत होता हुआ मजीठास्थानीय कर्मपुद्गलोंसे संश्लिष्ट होकर भेदमें भी अभेदका उपचार करके असद्भूत व्यवहारनयसे बन्ध ऐसा कहा जाता है।
इससे यह स्पष्ट है कि आत्मा कर्म पुद्गलोंसे बद्ध है यह कथन असद्भूतव्यवहारनयका वक्तव्य होनेसे उपचरित ही है। वास्तविक बन्ध-बन्ध्यकसम्बन्ध कोई दूसरा होना चाहिए, अतः आगे उसीका विचार करते हैं-
\१. भावबन्धके स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए आचार्य अमृतचन्द्र पंचास्तिकाय गाथा १४७ की टीकामें लिखते हैं-
तदत्र मोहरागद्वेषस्निग्धः शुभोऽशुभो वा परिणामो जीवस्य भावबन्धः।
इसलिए यहाँ पर मोह, राग, द्वेषसे स्निग्ध हुआ शुभ और अशुभ परिणाम जीवका भावबन्ध है।
\२. समयसार गाथा ७४ की टीकामें आचार्य जयसेन लिखते हैं-
एते क्रोधाद्यास्रवाः जीवेन सह निबद्धा सम्बद्धा औपाधिकाः।
ये क्रोधादि आस्रव जीवके साथ निबद्ध अर्थात् सम्बद्ध हैं जो औपाधिक हैं।
आचार्य कुन्दकुन्दने उक्त गाथामें ‘जीवणिबद्धा एए’ पदका प्रयोग किया है।
\३. जीवका रागादिके साथ बन्ध है इसे स्पष्ट करते हुए प्रवचनसार गाथा १७७ में लिखा है-
जीवस्स रागमादीहिं।
जीवका रागादिकके साथ बन्ध है।
इसकी सूरिकृत टीकामें बतलाया है-
जीवस्यौपाधिकमोह-राग-द्वेषपर्यायैरेकत्वपरिणामः स केवलजीवबन्धः ।
जीवका औपाधिक मोह, राग और द्वेषरूप पर्यायोंके साथ जो एकत्व परिणाम है वह केवल जीव-बन्ध है ।
\४. बन्ध्य-बन्धकभाव जीव और उनके रागादिभावोंमें किस प्रकार घटित होता है इसे स्पष्ट करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र प्रवचनसार गाथा १७५ की टीकामें लिखते हैं-
अयमात्मा सर्वं एव तावत्सविकल्पनिर्विकल्पपरिच्छेदात्मकत्वादुपयोगमयः । तत्र यो हि नाम नानाकारान् परिच्छेद्यानर्थानासाद्य मोहं वा रागं वा द्वेषं वा समुपैति स नाम तैः परप्रत्ययैरपि मोहरागद्वेषैरुपरक्तात्मस्वभावत्वान्नीलपीतरक्तोपाश्रयप्रत्ययनीलपीतरक्तत्वैरुपरक्तस्वभावः स्फटिकमणिरिव स्वयमेक एव तद्भावद्वितीयत्वाद्बन्धो भवति ।
प्रथम तो यह आत्मा सर्व ही उपयोगमय है, क्योंकि वह सविकल्प और निर्विकल्प प्रतिभासस्वरूप है । उसमें जो आत्मा विविधाकार प्रतिभासित होनेवाले पदार्थोंको प्राप्त करके मोह, राग अथवा द्वेष करता है वह नील, पीत और रक्त पदार्थोंके आश्रयहेतुक नीलेपन, पीलेपन और ललाईरूपसे उपरक्त स्वभाववाले स्फटिक मणिकी भाँति यद्यपि जीवमें मोह, राग और द्वेष परको हेतु करके उत्पन्न हुए हैं तो भी उनसे उपरक्त आत्मस्वभाववाला होनेसे स्वयं अकेला ही बन्धरूप है, क्योंकि जीवके वे रागादिभाव उसके द्वितीय हैं ।
\५. अकेला जीव ही बन्ध है इसे स्पष्ट करते हुए प्रवचनसार गाथा १८८ की सूरिकृत टीकामें लिखा है-
यथात्र सप्रदेशत्वे सति लोध्रादिभिः कषायितत्वात् मञ्जिष्ठरङ्गादिभिरुपश्लिष्टमेकं रक्तं दृष्टं वासः तथात्मापि सप्रदेशत्वे सति काले मोहरागद्वेषैः कषायितत्वात् कर्मरजोभिरुपश्लिष्ट एको बन्धो द्रष्टव्यः, शुद्धद्रव्यविषयत्वान्निश्चयस्य ।
जैसे लोकमें वस्त्र सप्रदेशी होनेसे लोध्र आदिसे कसैला होता है और इसलिये वह मजीठादिके रंगसे संश्लिष्ट होता हुआ अकेला ही रक्त देखा जाता है उसी प्रकार आत्मा भी सप्रदेशी होनेसे यथाकाल मोह, राग, द्वषसे कषायित (मलिन) होनेके कारण कर्मरजसे श्लिष्ट होता हुआ अकेला ही बन्ध है ऐसा जानना चाहिए, क्योंकि निश्चयका विषय शुद्ध ( अकेला ) द्रव्य है ।
\६. इसी प्रवचनसारके परिशिष्टमें निश्चयनयसे अकेला आत्मा ही बन्ध और मोक्षस्वरूप है इसका स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है-
निश्चयनयेन केवलबध्यमानमुच्यमानबन्ध-मोक्षोचितस्निग्धरूक्षत्वगुणपरिणतपरमाणुबन्ध-मोक्षयोरद्वैतानुभूतिः ।
अकेले बध्यमान और मुच्यमान ऐसे बन्ध-मोक्षोचित स्निग्धत्व और रूक्षत्व गुणसे परिणत परमाणुके समान निश्चयनयसे एक आत्मा बन्ध और मोक्षमें अद्वैतका अनुसरण करनेवाला है ।
ये कतिपय आगमप्रमाण हैं कि ये राग, द्वेष और मोहरूप जीवभाव यतः जीवके साथ बद्ध हैं, अतः अज्ञानभावसे परिणत यह आत्मा ही निश्चयसे उनका बन्धक है । इस प्रकार जीव और रागादिभावोंमें भले प्रकार बन्ध्य-बन्धक सम्बन्ध सिद्ध हो जाता है ।
आत्मामें रागादि भाव उत्पन्न हों और वे भावबन्ध भी कहलावें, साथ ही परका आश्रय कर आत्मा ही उन्हें उत्पन्न करे, फिर भी अज्ञानभावसे परिणत आत्माको उनका बन्धक स्वीकार न करना युक्त-युक्त नहीं है ।
विभाव शब्दका स्पष्टीकरण करते हुए अनगारधर्मामृत अध्याय १ श्लोक १०६ की टीकामें लिखा है-
विभावो हि वहिरङ्गनिमित्तम् ।
विभाव बहिरंग निमित्तको कहते हैं ।
इसलिए जितनी भी वैभाविक पर्यायें उत्पन्न होती हैं वे सब स्व-परप्रत्यय होनेसे रागादिकका व्यवहार हेतु परको स्वीकार करनेपर भी निश्चय हेतु अज्ञानभावसे परिणत आत्माको स्वीकार कर लेना ही उचित है । अतः एक द्रव्यमें बन्ध्य-बन्धकभाव अपने गुणधर्मोंके साथ निश्चयसे बन जाता है । परमागमका भी यही अभिप्राय है ।
इसलिए न तो अपर पक्षका यह लिखना ही ठीक है कि ‘किन्तु स्वपर्यायके साथ बन्ध्य-बन्धकभाव कदापि नहीं हो सकता ।’ क्योंकि ऐसा मानने पर सब कार्योंकी उत्पत्ति केवल परसे माननी पड़ती है । किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि ऐसा होनेपर सिद्धोंमें भी रागादिभावोंके स्वीकार करनेका अतिप्रसंग उपस्थित होता है ।
और न अपर पक्षका यह लिखना ही ठीक है कि ‘इसका आपने कोई उत्तर नहीं दिया । इसका अर्थ है कि वह आपको स्वीकृत है ।’ क्योंकि जब कि हमने अपने प्रथम उत्तरमें ही यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘संसारी जीव अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा अपने रागादि भावोंसे बद्ध है और असद्भूतव्यवहार नयकी अपेक्षा कर्मोंसे बद्ध है ।’ ऐसी अवस्थामें संसारी जीव किस अपेक्षा बद्ध है और किससे किस प्रकार बद्ध है इन दोनों खण्डोंका उत्तर हो जाता है ।
( इ ) बंधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ?
यह अपर पक्ष द्वारा उपस्थित किये गये मूल प्रश्नका तीसरा खण्ड है । हम इसका नयविभागसे उत्तर देते हुए प्रथम वार ही लिख आये हैं कि ‘संसारी आत्मा अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा अपने अज्ञानभावसे बद्ध होनेके कारण वास्तवमें परतन्त्र है और असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा उपचरित रूपसे कर्म और नोकर्मकी अपेक्षा भी परतन्त्रता घटित होती है ।’ किन्तु नयविभागसे दिये गये सर्वांगपूर्ण इस उत्तरको अपर पक्ष सम्यक् नहीं मानना चाहता है । वैसे हमने जैसे ‘सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बंधा हुआ है ।’ मूल प्रश्नके इन दो खण्डोंका उत्तर देते हुए शुद्ध निश्चयनयके पक्षको भी उपस्थित कर दिया था । उसी प्रकार संसारी आत्मा सर्वथा परतन्त्र नहीं है, नयविभागसे इस पक्षको भी साथमें उपस्थित कर देना चाहिए था । फिर भी हमने इस पक्षको उपस्थित न कर संसारी जीवमें किस नयसे कैसी परतन्त्रता घटित होती है मात्र इतना ही निर्देश किया था । संसारी जीव मात्र परके कारण परतन्त्र है इस एकान्तके स्वीकार करने पर न केवल मोक्षमार्गकी व्यवस्था गड़बड़ा जायगी । किन्तु जीवके संसारी और मुक्त ये भेद भी नहीं बनेंगे और इस प्रकार जीवद्रव्यका अभाव हो जानेसे अजीव द्रव्यका भी अभाव हो जायगा । इन्हीं सब बातोंका विचारकर हमने नयविभागसे उक्त उत्तर दिया था ।
किन्तु अपर पक्षने इस तथ्यको ध्यानमें न लेकर और आप्तपरीक्षाके उद्धरण उपस्थित कर पिछली प्रतिशंकामें यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि ‘आत्मा पौद्गलिक द्रव्यकर्मोंके कारण परतन्त्र हो रहा है और रागादिभाव परतन्त्रतास्वरूप हैं, इसलिए आत्माके भाव स्वयं परतन्त्ररूप हैं। आत्माके परतन्त्रताके निमित्त नहीं हैं।’
समाधान यह है कि आप्तपरीक्षाका उक्त कथन व्यवहारनय वचन है। उसके आधारसे पौद्गलिक कर्मोंको एकान्तसे परतन्त्रताका कारण मान लेना उचित नहीं है। यथार्थमें आत्मा किस कारणसे परतन्त्र हो रहा है इस कथनके प्रसंगसे निश्चय नयवचनका उल्लेख करते हुए वे ( विद्यानन्दि ) ही आचार्य तत्त्वार्थ-श्लोकवार्तिक पृ० ४४४ में लिखते हैं-
कषायपरतन्त्रस्यात्मनः साम्परायिकास्रवः, तदपरतन्त्रस्येर्यापथास्रवः इति सूक्तम्।
कषायसे परतन्त्र हुए आत्माके साम्परायिक आस्रव होता है और उससे परतन्त्र नहीं हुए आत्माके ईर्यापथ आस्रव होता है यह उचित ही कहा है।
इस पर पुनः प्रश्न हुआ कि एक आत्मामें परतन्त्रता बनती है और दूसरेमें नहीं इसका क्या कारण है? इसका समाधान करते हुए वे पुनः लिखते हैं-
कषायहेतुकं पुंसः पारतन्त्र्यं समन्ततः।
सत्त्वान्तरानपेक्षीह पद्ममध्यगभृंगवत् ॥ ८ ॥
कषायविनिवृत्तौ तु पारतन्त्र्यं निवर्त्यते।
यथेह कस्यचिच्छान्तकषायावस्थितिक्षणे ॥ ९ ॥
इस लोकमें जैसे पद्मके मध्य स्थित भौंरेकी परतन्त्रता कषायहेतुक होती है उसी प्रकार इस जीवकी सत्त्वान्तरानपेक्षी समन्ततः परतन्त्रता कषायहेतुक होती है ॥ ८ ॥ परन्तु कषायके निकल जाने पर परतन्त्रता भी निकल जाती है। जैसे इस लोकमें किसीके कषायके शान्त होने पर उसी समय परतन्त्रता निकल जाती है ॥ ९ ॥
यह वास्तविक कथन है। भ्रमरको कमल अपने आधीन नहीं बनाता है, किन्तु इसका मूल हेतु उसकी कषाय-कमलविषयक आसक्ति ही है। इसीप्रकार यह जीव कर्माधीन कषायके कारण ही होता है, अतः निश्चयसे परतन्त्रताका मूल कारण जीवकी कषाय ही है।
अपर पक्ष एकान्तका परिग्रह कर और कषायको पारतन्त्र्यस्वरूप मानकर केवल कर्मको ही परतन्त्रताका हेतु मानता चाहता है जो युक्त नहीं है, क्योंकि परतन्त्रतारूप कार्यकी उत्पत्ति व्यवहारसे जहाँ परहेतुक कही गई है वहाँ उसे निश्चयसे स्वहेतुक ही जानना चाहिए। अष्टसहस्री पृ० ५१ में जीवमें अज्ञानादि दोषोंकी उत्पत्ति कैसे होती है इसका निर्देश करते हुए लिखा है-
तद्धेतुः पुनरावरणं कर्म जीवस्य पूर्वस्वपरिणामश्च। स्वपरिणामहेतुक एवाज्ञानादिरित्ययुक्तम्, तस्य कादाचित्कत्वविरोधात्, जीवत्वादिवत्। परपरिणामहेतुक एवेत्यपि न व्यवतिष्ठते, मुक्तात्मनोऽपि तत्प्रसंगात्। सर्वस्य कार्यस्योपादानसहकारिसामग्रीजन्यतयोपगमात्तथा प्रतीतेश्च।
उन अज्ञानादि दोषोंका हेतु तो आवरण कर्म और जीवका पूर्व स्वपरिणाम है। स्वपरिणामहेतुक ही अज्ञानादि दोष हैं यह कहना अयुक्त है, क्योंकि ऐसा मानने पर उनके कादाचित्पनेका विरोध होता है, जीवत्वादिके समान। परपरिणामहेतुक ही अज्ञानादि दोष नहीं बन सकते, क्योंकि ऐसा मानने पर उनका मुक्तात्माओंमें भी सद्भाव माननेका प्रसंग उपस्थित होता है। सभी कार्य उपादान और सहकारी सामग्रीसे उत्पन्न होते हुए स्वीकार किये गये हैं और वैसी प्रतीति होती है।
अपर पक्षके प्रश्नोंका पूर्ण उत्तर आगमकी उक्त बड़े टाईपमें मुद्रित पंक्तियोंसे हो जाता है।
इससे स्पष्ट है कि प्रकृतमें आत्माको परतन्त्रताका मुख्य हेतु जीवके कषायादि परिणामोंको ही मानना उचित है, क्योंकि उनके होनेपर ही परमें परतन्त्रताकी व्यवहारहेतुता स्वीकार की गई है, अन्यथा नहीं।
इस प्रकार अपर पक्षने अ०, आ० और इ० इन तीन खण्डोंके विषयमें पूर्व पक्षके रूपमें जो विचार रखे हैं वे ठीक नहीं हैं। अपर पक्ष जब तक स्वाश्रित निश्चय कथनकी यथार्थताको स्वीकार नहीं करता और मात्र पराश्रित व्यवहार कथनके आधार पर की गई कार्य-कारणकी व्यवस्थाको असद्भूत व्यवहार ( उपचरित ) रूप नहीं स्वीकार करता तब तक मतभेदका समाप्त होना कठिन है।
हमने मूल प्रश्नमें जितनी बातें पूछी गईं थीं उन सबका उत्तर दिया है। अपर पक्ष अपने मूल प्रश्न और अपनी पिछली प्रतिशंकाको सामने रखकर पिछले दोनों उत्तरों पर दृष्टिपात करनेकी कृपा करें। अपर पक्षने जयपुर ( खानियां ) में १७ प्रश्न पूछे थे। उन सबका सम्मिलित उत्तर यह है कि आगममें इन प्रश्नोंके उत्तर स्वरूप जितना भी स्वाश्रित विवेचन उपलब्ध होता है वह यथार्थ है और जितना पराश्रित विवेचन उपलब्ध होता है वह उपचरित है।
\३. असद्भूत व्यवहारनयके विषयमें स्पष्टीकरण
आलापपद्धतिमें असद्भूत व्यवहारनयके दो लक्षण कहे गये हैं-
\१. अन्यत्र प्रसिद्धस्य धर्मस्यान्यत्र समारोपणमसद्भूतव्यवहारः।
\१. अन्यत्र प्रसिद्ध धर्मका अन्यत्र समारोप करना असद्भूत व्यवहार है।
\२. भिन्नवस्तुविषयोऽसद्भूतव्यवहारः।
\२. भिन्न वस्तुको विषय करना असद्भूत व्यवहार है।
प्रथम लक्षणके अनुसार नौ प्रकारके उपचारको परिगृहीत किया गया है और दूसरे लक्षणके अनुसार असद्भूत व्यवहारके भेदको विषय करनेवाला बतलाया गया है। ये दो लक्षण दो दृष्टियोंसे किये गये हैं। प्रथम लक्षणके द्वारा अनादिरूढ़ लोकव्यवहारकी परमार्थके साथ कैसे संगति बैठती है इसकी व्यवस्था की गई है और दूसरे लक्षणके द्वारा मोक्षमार्गमें साधककी आत्मद्रव्यमें भेदव्यवहार-के प्रति कैसी दृष्टि होनी चाहिए इसे स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार पृथक्-पृथक् प्रयोजनोंको ध्यान में रखकर आगममें चारों प्रकारके व्यवहारोंको दो प्रकारसे निरूपित किया गया है।
हमने इसी प्रश्नके द्वितीय उत्तरमें असद्भूतव्यवहारनयके प्रथम लक्षणको ध्यानमें रखकर तो स्पष्टीकरण किया ही है। ८ वें प्रश्नके प्रथम उत्तरमें भी उसी दृष्टिको ध्यानमें रखकर स्पष्टीकरण किया गया है। दोनों कथनोंमें शब्दभेद अवश्य है, पर दोनोंका आशय एक ही है। दो भिन्न वस्तुओंका परस्पर जो भी सम्बन्ध कहा जायगा वह एक द्रव्यके गुण-धर्मको दूसरेका बतलाकर ही तो कहा जायगा। स्पष्टीकरण इस प्रकार है-
: १ :
असद्भूत व्यवहारका लक्षण है-एक द्रव्यके गुणधर्मको अन्य द्रव्यका कहना ।
उदाहरण-असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा ज्ञानावरणादि आठ द्रव्यकर्मों तथा औदारिक शरीरादि नोकर्मके साथ आत्मा बँधा है ।
यद्यपि संसारी आत्मा वास्तवमें अपने राग-द्वेषादि भावोंसे बद्ध है । तथापि ज्ञानावरणादि कर्मों और शरीरादि नोकर्मको निमित्तकर उनकी उत्पत्ति होती है, इसलिए निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धको देखते हुए जीव इनसे बद्ध हैं ऐसा व्यवहार किया जाता है । यहाँ जीवका अपने गुण-पर्यायोंके साथ जो बद्धता धर्म उपलब्ध होता है उसका ज्ञानावरणादि कर्मों आदिमें आरोपकर आत्मा उनसे बद्ध है यह कहा गया है ।
प्रश्न ८ के प्रथम उत्तरमें भी इसी दृष्टिको ध्यानमें रखकर ही ‘दो या दो से अधिक द्रव्यों और उनकी पर्यायोंमें जो सम्बन्ध होता है वह असद्भूत ही होता है ।’ यह वचन लिखा गया है । दोनोंका आशय एक है । भाषा वर्गणाओंमें भाषारूप परिणमनेकी निमित्तता ( उपादान कारणता ) है, उसका आरोप तीर्थंकर आदि प्रकृतियोंमें करके उन्हें निमित्त कहा गया है और वाणीको नैमित्तिक । यही दोका सम्बन्ध है । यह सम्बन्ध यद्यपि असद्भूत- उपचरित है । फिर भी ऐसा व्यवहार नियमसे होता है उसका मुख्य कारण काल प्रत्यासत्ति है, क्योंकि बाह्य व्याप्तिका नियम इसी आधार पर बनता है ।
इससे स्पष्ट है कि असद्भूतव्यवहारके हमारे द्वारा कहे गये ये दो लक्षण नहीं हैं, समझानेकी दो पद्धतियाँ हैं ।
: २ :
अपर पक्षका कहना है कि 'किन्तु यहाँ पर बन्धका प्रकरण है और बन्ध दो भिन्न वस्तुओंमें होता है । अतः इस प्रश्नमें-
भिन्नवस्तुविषयोऽसद्भूतव्यवहारः ।
अर्थात् भिन्न वस्तु जिसका विषय हो वह असद्भूत व्यवहारनय है, यह लक्षण उपयोगी है । दूसरे यह लक्षण आध्यात्मिक दृष्टिसे है और ‘स्वाश्रितो निश्चयः’ यह लक्षण भी आध्यात्मिक दृष्टिसे है । अतः दोनों लक्षण अध्यात्मदृष्टिवाले लेने चाहिए । जब निश्चयका लक्षण अध्यात्मनयकी अपेक्षासे ग्रहण किया जा रहा है तो व्यवहारनयका लक्षण भी अध्यात्मनयवाला लेना चाहिए ।’
समाधान यह है कि प्रत्येक वस्तु भेदाभेदस्वरूप है । वहाँ अभेदको विषय करनेवाला निश्चयनय है और भेदको विषय करनेवाला व्यवहारनय है-
तत्र निश्चयनयोऽभेदविषयो व्यवहारो भेदविषयः ।-आलापपद्धति ।
आलापपद्धतिमें निश्चयनय और व्यवहारनयके ये लक्षण अध्यात्मदृष्टिसे ही किये गये हैं । ‘स्वाश्रितो निश्चयनयः’ इस लक्षणमें भी स्व पद अभेदको ही सूचित करता है । हाँ ‘पराश्रितो व्यवहारनयः’ इस लक्षणमें आया हुआ ‘पर’ शब्द भेद व्यवहारको तो पर कहता ही है । किसी भी प्रकारके उपचार व्यवहारको भी पर कहता है । इसलिए इस लक्षण द्वारा जहाँ अनादिरूढ़ लोक व्यवहारका निषेध हो जाता है वहाँ भेदव्यवहारका भी निषेध हो जाता है । इस प्रकार स्वाश्रित निश्चयनयके कथनमें दोनों प्रकारका व्यवहार निषिद्ध है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।
एक बात और है और वह यह कि आध्यात्मिक दृष्टिसे व्यवहारनयके इस लक्षणमें ‘भिन्न वस्तु’ पदसे पर द्रव्य और उनके गुणधर्मोंका ग्रहण नहीं हुआ है । वे तो आत्मासे सर्वथा भिन्न हैं ही, इसलिए उनका प्रश्न ही नहीं है । उनमें ती जिस किसी भी प्रकार स्व व्यवहार होता है उसका तो त्याग करना ही है । साथ ही एक आत्मामें गुणभेद वा पर्यायभेद द्वारा कथनरूप जितना भी व्यवहार होता है, आलम्बनकी दृष्टिसे उसकी भी उपेक्षा करनी है, क्योंकि धर्म-धर्मीका स्वभावसे अभेद है, तो भी संज्ञा, लक्षण आदि रूपसे भेद उत्पन्न कर उन द्वारा समझानेके लिए अखण्ड वस्तुका कथन किया जाता है । अतएव प्रकृतमें ‘भिन्न वस्तु’ पदसे कहे गये गुणभेद और पर्यायभेदका ही ग्रहण होता है, क्योंकि दृष्टिमें अभेदकी मुख्यता होनेपर गुणभेद और पर्यायभेद भिन्न वस्तु हो जाते हैं ।
आलापपद्धतिमें इसी दृष्टिको साधकर उक्त दोनों नयों और उनके भेदोंका निरूपण हुआ है, क्योंकि वहाँ ‘भिन्न वस्तु’ पदसे पर वस्तुका ग्रहण न होकर गुणभेद और स्वाश्रित पर्यायभेदका ही मुख्यतासे ग्रहण हुआ है । ऐसी अवस्थामें आध्यात्मिक दृष्टिसे जीव किससे बँधा है ऐसा प्रश्न होनेपर उसका यह उत्तर होगा कि उपचरित असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा जीव अपने रागादि भावोंसे बँधा है, क्योंकि जीव कर्मोंसे बँधा है इसे तो आध्यात्मिक दृष्टि स्वीकार ही नहीं करती । यही कारण है कि हमने प्रकृतमें आगमिक दृष्टिको ध्यानमें रखकर उक्त प्रश्नका समाधान किया है ।
निश्चयनय और व्यवहारनयके आलापपद्धतिमें ये लक्षण दिये हैं-
अभेदानुपचारतया वस्तु निश्चीयत इति निश्चयः । भेदोपचारतया वस्तु व्यवह्रियत इति व्यवहारः ।
अभेद और अनुपचाररूपसे वस्तु निश्चित की जाती है यह निश्चय है तथा भेद और उपचाररूपसे वस्तु व्यवहृत की जाती है यह व्यवहार है ।
दूसरी बात यह है कि अपर पक्षने अधिकतर प्रायः सभी प्रश्न दो द्रव्योंमें निमित्त-नैमित्तिक व्यवहारकी मुख्यतासे किये हैं, इसलिए हमें आगमिक दृष्टिको ध्यानमें रखकर उत्तर देना पड़ा । १६ वें प्रश्नमें अवश्य ही निश्चयनय-व्यवहारनयके स्वरूप पर प्रकाश डालनेके लिए कहा गया था, इसलिए उस प्रश्नका उत्तर लिखते समय हमने अवश्य ही अध्यात्मदृष्टिको मुख्यता प्रदान की है । किन्तु उसके प्रति अपर पक्षने जैसी उपेक्षा दिखलाई वह उस पच द्वारा आगे उपस्थित किये गये दोनों प्रपत्रोंसे स्पष्ट है ।
तीसरी बात यह है कि अध्यात्ममें केवल आध्यात्मिक दृष्टिसे ही व्यवहारका प्रतिपादन नहीं हुआ है । किन्तु आगमिक दृष्टिको ध्यानमें रखकर भी व्यवहारका प्रतिपादन हुआ है, क्योंकि परमार्थ दृष्टिवालेके लिए दोनों प्रकारका व्यवहार हेय है यह ज्ञान कराना उसका मुख्य प्रयोजन है । इसलिए भी हमने अपने उत्तरोंमें उक्त पद्धतिको अपनाया है ।
ऐसी अवस्थामें अपर पक्षके यह लिखनेकी कि ‘जब निश्चयका लक्षण अध्यात्मकी अपेक्षासे ग्रहण किया जा रहा है तब व्यवहारनयका लक्षण भी अध्यात्मनयवाला लेना चाहिए ।’ कोई सार्थकता नहीं रह जाती ।
\४. कर्मबन्धसे छूटनेका उपाय
( ई ) यदि वह बद्ध है तो छूटनेका उपाय क्या है ?
यह मूल प्रश्नका चौथा खण्ड है । इसका उत्तर हमने निश्चय-व्यवहाररूप दोनों नयोंसे दिया था । प्रथम उत्तरमें हमने लिखा है-
\१. ‘आगममें सर्वत्र यह तो बतलाया है कि यदि संसारी आत्मा अपने बद्ध पर्यायरूप राग, द्वेष और मोह आदि अज्ञान भावोंका अभाव करनेके लिए अन्तरंग पुरुषार्थ नहीं करता है और केवल जिसे आगममें उपचारसे व्यवहारधर्म कहा है उसीमें प्रयत्नशील रहता है तो उसके द्रव्यकर्मोंकी निर्जरा न होनेके समान है।’
\२. ‘अतएव संसारी आत्माको द्रव्य-भावरूप उभय बन्धनोंसे छूटनेका उपाय करते समय निश्चय-व्यवहार उभयरूप धर्मका आश्रय लेनेकी आवश्यकता है। उसमें भी नियम है कि जब यह आत्मा अपने परम निश्चल परमात्मरूप ज्ञायकभावका आश्रय लेकर सम्यक् पुरुषार्थ करता है तब उसके अन्तरंगमें निश्चय रत्नत्रयस्वरूप जितनी जितनी विशुद्धि प्रगट होती जाती है उसीके अनुपातमें उसके बाह्यमें द्रव्यकर्मका अभाव होता हुआ व्यवहारधर्मकी भी प्राप्ति होती जाती है।’
यह मूल प्रश्नके हमारे प्रथम उत्तरका वक्तव्यांश है। इसमें व्यवहारधर्मका निषेध नहीं किया गया है। फिर भी अपर पक्षको इस उत्तरसे सन्तोष नहीं है। अपर पक्षका कहना है कि ‘इसका उत्तर भी बहुत सरल था सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र छूटनेका उपाय है।’ किन्तु इतने सामान्य उत्तरसे मूल समस्याका समाधान होना सरल न होनेसे ही हमें थोड़ा विस्तारसे खुलासा करना आवश्यक प्रतीत हुआ। बाह्य क्रिया आत्माका स्वभाव धर्म नहीं है ऐसा ज्ञान करानेसे हानि नहीं होती। किन्तु स्वभाव सन्मुख हो आत्मपुरुषार्थ प्रगट होता है। अपर पक्षके सामने इसीकी उपयोगिता स्पष्ट करनी है और इसी आशयसे उक्त निरूपण प्रथम उत्तरमें किया गया है।
अपर पक्ष समझता है कि हमने अपने प्रथम उत्तरमें व्यवहारधर्मका सर्वथा निषेध किया है। किन्तु वस्तुस्थिति यह नहीं है। हमारे किस वाक्यसे उस पक्षने यह आशय लिया इसका उसकी ओरसे कोई स्पष्टीकरण भी नहीं किया गया है। साधकके सविकल्प दशामें प्रवृत्तिरूप व्यवहार धर्म होता है इसका भला कौन समझदार निषेध करेगा। हाँ यदि ‘व्यवहार करते-करते उससे निश्चयधर्मकी प्राप्ति हो जाती है’ ऐसी जिसकी मान्यता है। साथ ही जो व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मकी प्राप्तिका यथार्थ साधन मानता है उसका यदि निषेध किया जाता है और इसे ही अपर पक्ष व्यवहारधर्मका निषेध समझता है तो समझे। मात्र उस पक्षकी समझसे हमारा कथन सदोष हो जायगा ऐसा नहीं है।
उदाहरणार्थ एक २८ मूलगुणोंका पालन करनेवाला मिथ्यादृष्टि है और दूसरा मिथ्यादृष्टि नारकी या देव है। ये दोनों यदि सम्यग्दृष्टि बनते हैं तो स्वभावसन्मुख होकर तीन करण परिणाम करके ही तो बनेंगे। इनके सम्यग्दृष्टि बननेका अन्य मार्ग नहीं है। अपर पक्षसे यदि पूछा जाय तो वह पच भी यही उत्तर देगा। स्पष्ट है कि न तो व्यवहारधर्म करते-करते निश्चयधर्मकी प्राप्ति होती है और न ही व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका यथार्थ साधन माना जा सकता है। अपर पक्षको यदि स्वीकार करना है तो इसी तथ्यको स्वीकार करना है। इसे स्वीकार करने पर उस पक्षकी यह समझ कि ‘हम व्यवहारधर्मका सर्वथा निषेध कर रहे हैं’ सुतरां दूर हो जायगी।
हमने इस प्रश्नके उत्तरमें निश्चयधर्मके साथ व्यवहारधर्मकी भी चरचा की है। इसे अपर पक्ष अप्रासंगिक समझता है। किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जब संसारी जीवके संसारसे छूटनेके उपायका निर्देश किया जायगा तब निश्चयधर्मके साथ व्यवहारधर्मका निरूपण करना अनिवार्य हो जाता है। यदि अपर पक्ष प्रश्नोंकी सीमामें रहा आता तो लाभ ही होता। किन्तु उसकी ओरसे सीमाका ध्यान ही नहीं रखा गया । लाचार होकर हमें प्रतिशंकाओंके आधार पर अपना उत्तर लिखनेके लिये वाध्य होना पड़ा । उदाहरणार्थ अपने इसी तृतीय पत्रकमें अपर पक्षने साध्य-साधकभावकी चरचा छेड़ दी है जब कि इसके लिए प्रश्न नं० ४ है । इतना ही नहीं, अपर पक्षने इस प्रसंगमें जिन तर्कोंको रखा है उनकी भी वह विविध प्रश्नोंमें अनेक बार चरचा कर चुका है । ऐसी अवस्थामें हमें उनका उत्तर लिखना पड़ता है, इसका इलाज नहीं ।
अपर पक्षने अपने पिछले पत्रकमें कर्मको राग-द्वेष आदिका प्रेरक निमित्त लिखा और राग-द्वेषको कर्मका प्रेरक निमित्त लिखा । यही कारण है कि हमें इसके सम्बन्धमें स्पष्टीकरण करना आवश्यक हो गया। कोई भी समाधान करनेवाला यदि प्रश्नकर्ताकी प्रत्येक बातका विचार न करे तो उससे सम्यक् समाधान होना कभी भी सम्भव नहीं है । भोजनके समय यदि व्यापारकी चरचा की जाती है तो कभी-कभी उसका उत्तर देना भी अनिवार्य हो जाता है । अपर पक्ष हमसे शिकायत करनेकी अपेक्षा अपने प्रपत्रोंपर दृष्टिपात करनेकी कृपा करे, सब बातोंका समाधान हो जायगा । संसारी प्राणी उलझन स्वयं उत्पन्न करता है और दोषी दूसरेको समझता है, इस मिथ्या व्यवहारका निषेध जितने जल्दी हो जाय, लाभकर ही है ।
आचार्य कुन्दकुन्द, अमृतचन्द्र सूरि और जयसेन आचार्य आदिने जहाँ भी व्यवहारधर्मको साधन और निश्चयधर्मको साध्य लिखा है वहाँ वह कथन समयसार गाथा ८ के विवेचनको ध्यानमें रखकर ही किया है । व्यवहार धर्म निश्चय धर्मका साधन है इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यवहारधर्म निश्चयधर्मको उत्पन्न करता है । किन्तु उसका आशय इतना ही है कि व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका व्यवहारसे हेतु है । जो हेतु होता है वह उसका साधन कहा जाता है और जो साधा जाता है वह साध्य कहा जाता है । इस प्रकार साधन-साध्यभाव व्यवहारधर्म-निश्चयधर्ममें है इसका निषेध नहीं है । सम्यग्दृष्टि ऐसे ही साधन-साध्यभावको दोनोंमें स्वीकार करता है, इसलिए वह सम्यग्दृष्टि है । किन्तु इससे अन्यथा माननेवाला मिथ्यादृष्टि है यह बृहद्द्रव्यसंग्रहके कथनका आशय है । व्यवहारधर्मको कर्ता कहना और निश्चयधर्मको उसका कर्म कहना यह इन दोनोंमें निमित्त-नैमित्तिक व्यवहारका ज्ञान करानेके लिए आगममें असद्भूत व्यवहारनयको लक्ष्यमें रखकर लिखा गया है । बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ३५ की टीकामें लिखा है-
निश्चयेन विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजात्मतत्त्वभावनोत्पन्नसुखसुधारसस्वादबलेन समस्तशुभाशुभ- रागादिविकल्पनिवृत्तिर्व्रतम् । व्यवहारेण तत्साधकं हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहाच्च यावज्जीवनिवृत्तिलक्षणं पंचविधं व्रतम् ।
निश्चयनयकी अपेक्षा विशुद्ध ज्ञान-दर्शनस्वभावरूप निज आत्मतत्त्वकी भावनासे उत्पन्न सुखरूपी अमृतके स्वादके बलसे समस्त शुभाशुभ रागादि विकल्पोंसे निवृत्त होना व्रत है । तथा व्यवहारनयसे उसका साधक हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्म और परिग्रहसे यावज्जीवन निवृत्तिलक्षण पांच प्रकारका व्रत है ।
यह आगमवचन है । इसमें निश्चय व्रतका साधक दर्शन-ज्ञानस्वभावरूप निज आत्मतत्त्वकी भावनाको बतलाया गया है । यह निश्चय है और व्यवहार नयसे इसका साधक अशुभनिवृत्तिरूप पाँच व्रतोंको बतलाया गया है । यह व्यवहार कथन है । इससे स्पष्ट है कि आगममें जहाँ भी व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका साधक लिखा है वहाँ वह कथन असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षासे ही किया गया है । यद्यपि निश्चयधर्मकी प्राप्ति होती तो है शुभाशुभ विकल्पकी निवृत्ति होनेपर ही । ऐसा नहीं है कि अशुभरूप हिंसादिरूप विकल्पसे निवृत्त होकर शुभरूप अहिंसादि विकल्पके सद्भावमें निश्चयधर्मकी प्राप्ति हो जाती है या उससे निश्चयधर्मको प्राप्ति हो जाती है। जब भी उस ( निश्चयधर्म ) को प्राप्ति होती है तब अशुभके समान शुभ विकल्पसे निवृत्त होकर स्वभावसन्मुख हो तत्स्वरूप परिणमन द्वारा ही होती है। परावलम्बी विकल्प तो इसकी प्राप्तिमें किसी भी अवस्थामें साधक नहीं हो सकता। फिर भी स्वभावसन्मुख होनेके पूर्व अशुभ विकल्प न होकर नियमसे शुभ विकल्प होता ही है, इसलिए ही व्यवहार-नयसे व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका साधक कहा है। इससे यह ज्ञान होता है कि जो निश्चयधर्मकी प्राप्तिके सन्मुख होता है उसकी बाह्य भूमिका कैसी होनी चाहिए। स्वर्णपाषाण और स्वर्णमें जो साधक-साध्यभावका निर्देश किया है उसका भी यही आशय है।
हमने जो यह वचन लिखा है कि ‘निश्चय रत्नत्रयस्वरूप जितनी विशुद्धि प्रगट होती जाती है उसके अनुपातमें उसके बाह्यमें द्रव्यकर्मका अभाव होता हुआ व्यवहार धर्मकी भी प्राप्ति होती जाती है।’ वह दोनोंका अविनाभाव सम्बन्ध कैसा है यह दिखलानेके लिए ही लिखा है। पहले कोई नहीं होता। साथ-साथ होते हैं यह लिखकर व्यवहारमें सम्यक्पनेकी हेतुताका निर्देश किया गया है। जो व्यवहार पहले मिथ्या था वह निश्चय रत्नत्रयकी प्राप्ति होनेपर सम्यक् व्यवहार पदवीको प्राप्त हो जाता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। जैसे जो ज्ञान पहले मिथ्या था वह सम्यक्त्वकी प्राप्ति होने पर सम्यक् हो जाता है उसी प्रकार व्रतादिके आचरणरूप जो व्यवहार पहले मिथ्या था वह निश्चय रत्नत्रयकी प्राप्ति होनेपर सम्यक् हो जाता है। इसको चाहे किन्हीं शब्दोंमें कहिए, हानि नहीं। इससे कार्य-कारणपरम्परामें किसी प्रकारका व्यत्यय उपस्थित नहीं होता। अन्यथा आचार्य अमृतचन्द्र समयसार गाथा ७४ की टीकामें यह कभी न लिखते-
यथा यथा विज्ञानघनस्वभावो भवति तथा तथास्रवेभ्यो निवर्तते।
जैसे जैसे विज्ञानघनस्वभाव होता है वैसे वैसे आस्रवोंसे निवृत्त होता है।
अपर पक्ष हमारे कथनको विलोमरूपसे समझता है तो समझे। किन्तु क्या वह पक्ष इस कथनको भी विलोमरूप कहनेका अभिप्राय रख सकता है? कभी नहीं। आक्षेप करना अन्य बात है पर पूरे जिनागम पर दृष्टि रखना अन्य बात है।
अपर पक्षका कहना है कि ‘अन्तरंग विशुद्धता कर्मोदयके अभावका ज्ञापक तो है किन्तु कारण नहीं है।’ यह पढ़कर हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। यदि अपर पक्ष तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६५ के इस वचन पर या इसी प्रकारके अन्य आगमवचनों पर दृष्टिपात कर लेता तो आग्रहपूर्ण ऐसा एकान्त वचन कभी न लिखता। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकका वह वचन इस प्रकार है-
तेनायोगिजिनस्यान्त्यक्षणवर्त्ति प्रकीर्त्तितम्।
रत्नत्रयमशेषाघविघातकारणं ध्रुवम् ॥४७॥
इसलिए अयोगिजिनका अन्त्य क्षणवर्ती रत्नत्रय नियमसे समस्त अघोंका विघात करनेवाला कहा गया है।
यहाँ पर ‘अघ’ पद नामादि अघातिकर्म और उनको निमित्त कर हुए भावोंका सूचक है।
कर्म हीनशक्ति होकर व उदीरित होकर झड़ जायें इसीका नाम तो अविपाकनिर्जरा है और इसका कारण जीवका विशुद्ध परिणाम है, इसलिए जैसे जैसे जीवका अन्तरंग विशुद्ध परिणाम होता जाता है वैसे वैसे कर्मोदयका अभाव होता जाता है इस सत्यको स्वीकार करनेमें अपर पक्षको आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पाँचवें गुणस्थानमें यदि अप्रत्याख्यानावरणका सत्त्व रहते हुए भी उदय नहीं होता और उसका स्तिबुक संक्रमण होता रहता है तो इसका मुख्य कारण पाँचवें गुणस्थानकी विशुद्धि ही है। मोक्षमार्गमें ऐसा ही कार्य-कारणभाव मुख्यतासे घटित होता है। यह विलोमप्रतिपादन नहीं है।
धवला पु० १ पृ० ५२ में ‘स्वावरण’ पद केवल द्रव्यकर्मको ही सूचित नहीं करता, किन्तु अन्तरंगमें जो अविशुद्धि बनी हुई है उसे भी सूचित करता है। आत्मा शुद्धोपयोगके बलसे जैसे जैसे अविशुद्धिको दूर करता जाता है वैसे वैसे उसके निमित्तभूत कर्मोंका भी अभाव होता जाता है यह उक्त उद्धरणका आशय है।
अपर पक्षने प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके क्रमका निर्देश किया है और साथ ही ‘जिनको इसका ज्ञान है।’ यह वचन भी लिखा है। इस पर हमें यह मान लेनेमें आपत्ति नहीं है कि अपर पक्षको इसका विशेष ज्ञान है, हमें उतना ज्ञान नहीं है। पर कम ज्ञानके साथ ही यदि हम यह जानना चाहें कि अनिवृत्तिकरणमें प्रथम स्थिति और द्वितीय स्थितिके मध्यवर्ती दर्शनमोहनीयके निषेकोंका जो अन्तरकरण होता है उसका कारण आत्मोत्थ विशुद्धि है या दर्शनमोहनीयका उदय ? तो यही उत्तर तो होगा कि वहाँ पर जो आत्मोत्थ विशुद्धि है वह उसका कारण है। इसका आशय यह हुआ कि जैसे जैसे विशुद्धिमें वृद्धि होती जाती है वैसे वैसे मिथ्यात्वका उदय उत्तरोत्तर क्षीण होता जाता है और अन्तमें वहाँके योग्य उत्कृष्ट विशुद्धिसे युक्त आत्माके होनेपर जिस समय वह अपने पुरुषार्थसे सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है उसी समय मिथ्यात्व परिणाम और उसके निमित्तभूत मिथ्यात्व कर्मके उदयका अभाव रहता है। वहाँ पर अन्तरायाम प्रमाण दर्शनमोहनीयका अभाव तो है ही। ऐसा यह योग है। इसीको कहीं बाह्य दृष्टिसे भी विवेचित किया जाता है उसमें आपत्ति नहीं। किन्तु उसका आशय क्या है यह लेना चाहिए।
अपर पक्षने ‘जइ जिणमयं पवज्जह’ गाथा उद्धृत की है। उसमें व्यवहार और निश्चय दोनोंकी स्वीकृति है। इसका निषेध तो किसीने किया नहीं है। जैसे व्यवहारनयसे गुणस्थान-मार्गणास्थान आदिरूप भेदव्यवहार है वैसे ही निश्चयनयसे तत्त्वकी भी स्वीकृति है।
तीर्थका स्पष्टीकरण करते हुए स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षामें लिखा है-
रयणत्तयसंजुत्तो जीवो वि हवेइ उत्तमं तित्थं।
संसारं तरइ जदो रयणत्तयदिव्वणावाए ॥१९१॥
रत्नत्रयसे युक्त जीव उत्तम तीर्थ है, क्योंकि वह रत्नत्रयरूपी दिव्य नावसे संसारको पार करता है ॥१९१॥
इससे स्पष्ट है कि वास्तवमें तो निश्चय रत्नत्रययुक्त आत्मा’ही उत्कृष्ट तीर्थ है। किन्तु उसके साथ जो व्यवहार रत्नत्रय होता है उसे भी व्यवहारसे तीर्थ कहना उपयुक्त है, क्योंकि निश्यय-व्यवहारका ऐसा ही योग है।
अतएव उक्त गाथापरसे यदि कोई यह फलित करे कि बाह्य व्यवहारसे परमार्थकी प्राप्ति हो जाती है। उसे स्वभावका अवलम्बन लेकर एकाग्र होनेकी आवश्यकता नहीं है तो उक्त गाथा परसे ऐसा आशय फलित करना ठीक नहीं है। अतएव भेदविज्ञानपूर्वक आत्मजागृति ही कर्मबन्धनसे छूटनेका यथार्थ उपाय है ऐसा यहाँ निर्णय करना चाहिए।
\५. निश्चयसे जीव रागादिसे बद्ध है इस तथ्यका समर्थन
अपर पक्षने हमारे ‘निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करने पर जीव स्वयं अपने अपराधके कारण बद्ध है, अन्य किसीने बलात् बाँध रखा हो और उसके कारण वह बंध रहा हो ऐसा नहीं है।’ इस वचनको आगमविरुद्ध लिखा है। अपर पक्षने यहाँपर अपने पक्षके समर्थनमें जो प्रमाण उपस्थित किये हैं उनमें शुद्ध निश्चयनयके विषयका निर्देश किया गया है। किन्तु यहाँपर ‘आत्माश्रितो निश्चयनयः’ इस लक्षणको ध्यानमें रखकर उक्त वचन लिखा गया है। अज्ञानी जीव रागादिरूप स्वयं परिणमता है, अन्य कोई उसे रागादिरूप परिणमाता नहीं। अतएव जीवके शुभाशुभ परिणाम भावबन्ध हैं और जीव उनसे बद्ध है इसे निश्चयस्वरूप माननेमें आगमसे कहाँ बाधा आती है इसे अपर पक्ष ही जाने।
हम इसी उत्तरमें प्रवचनसार गा० १८९ की आचार्य जयसेनकृत टीकाका उद्धरण दे आये हैं। उसमें रागादिकको ही आत्मा करता है और उन्हींको भोगता है इसे निश्चयनयका लक्षण कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि अपर पक्षने जो उक्त वचनको आगमविरुद्ध लिखा है सो उस पक्षका ऐसा लिखना ही आगमविरुद्ध है, उक्त वचन आगमविरुद्ध नहीं है। इसके लिए द्रव्यसंग्रहकी ‘ववहारा सुहदुक्खं’ इत्यादि गाथा देखिए।
अपर पक्षने समयसार गाथा १३ की टीकाका ‘स्वयमेकस्य’ इत्यादि वचन उद्धृतकर यह सिद्ध किया है कि अकेले जीवमें बन्धकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। समाधान यह है कि उक्त वचन द्वारा निश्चय-व्यवहार दोनोंको स्वीकार किया गया है। उस द्वारा बन्ध पर्यायकी दृष्टिसे यह बतलाया गया है कि जीव स्वयं रागादि रूप परिणमता है, अतएव रागादिरूप बन्धपर्यायका निश्चयसे वह स्वयं कर्ता है, अन्य द्रव्य उसका कर्ता नहीं। किन्तु जब भी वह रागादिरूपसे परिणमता है तब उसको कर्मका आश्रय नियमसे होता है। इसीको अकेले जीवमें बन्धकी उत्पत्ति नहीं होती है यह कहा जाता है। उक्त वचनका इससे भिन्न कोई दूसरा आशय नहीं है। तभी तो समयसारमें यह कहा है-
यदि जीवका कर्मके साथ ही रागादि परिणाम होता है अर्थात् यदि दोनों मिलकर रागादिरूप परिणमते हैं ऐसा माना जाय तो इसप्रकार जीव और कर्म दोनों रागादिभावको प्राप्त हो जायें। किन्तु रागादि रूप परिणाम तो अकेले जीवके ही होता है, अतएव कर्मोदयरूप निमित्तसे भिन्न ही वह जीवका परिणाम है ॥१३९-१४०॥
रागादिका नाम भावबन्ध है इसे तो अपर पक्ष स्वीकार करेगा ही। ऐसी अवस्थामें वह स्वयं निर्णय करे कि यह किसका परिणाम है और यथार्थमें इसे किसने किया है? उसका अपर पक्ष यही उत्तर तो देगा कि उपादानरूपसे इसे स्वयं जीवने किया है, कर्म तो उसमें निमित्तमात्र है। इससे सिद्ध हुआ कि निश्चयसे जीव अपने अपराधके कारण स्वयं रागादि भावोंसे बद्ध हो रहा है। यदि वह कर्मका आश्रय एवं परमें इष्टानिष्ट बुद्धि करना छोड़ दे तो उसके रागादिके विलय होनेमें देर न लगे।
\६. उपचार तथा आरोप पदकी सार्थकता
संसारी जीव ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है ऐसा कहना असद्भूत व्यवहारनयका वक्तव्य है, इसे स्वीकार करके भी अपर पक्षने लिखा है कि ‘किन्तु आपने इस सत्य सरल कथनको तरोड़-मरोड़ कर आरोपित आदि शब्दोंके प्रयोग द्वारा असत्य तथा जटिल बनानेका प्रयास किया है जो शोभनीय नहीं है।’ आदि। समाधान यह है कि जब अपर पक्षने संसारी जीव ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है इस कथनको असद्भूत व्यवहारनयका वक्तव्य स्वीकार कर लिया है तो उसे असद्भूतव्यवहारनयके लक्षणके अनुसार यह स्वीकार करनेमें हिचक नहीं होनी चाहिए कि आत्मामें जो अपने विकारी गुणपर्यायोंके साथ बद्धता पाई जाती है उसका ज्ञानावरणादि कर्मोंपर आरोप करके यह कहा जाता है कि आत्मा ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है । ऐसा स्वीकार करना ही सत्यार्थ है । ऐसा स्वीकार कर लेनेसे सद्भूत व्यवहारनय और निश्चयनयसे भिन्न असद्भूतव्यवहारनयके विषयकी व्यवस्था बन जाती है । फिर तो उसे आकाशकुसुमके समान कल्पनारोपित घोषित करनेकी अपर पक्षको आवश्यकता भी नहीं रह जायगी और नयमें सत्यार्थता भी उस पक्षकी प्रतीतिमें आ जायगी । असद्भूत व्यवहारनयके लक्षण आदिके विषयमें विशेष खुलासा इसी उत्तरमें पहले ही कर आये हैं । इससे अपर पक्षके ध्यानमें यह अच्छी तरह आजायगा कि तरोड़-मरोड़ कर अपर पक्ष ही अपना पक्ष रख रहा है, हम नहीं । अपर पच यदि असद्भूतव्यवहारके लक्षणके आधार पर लिखता तो उसे हमारे द्वारा प्रयोग किये गये ‘उपचार’ शब्द और ‘आरोप’ शब्दकी सार्थकता भी समझमें आ जाती । अपर पक्षको स्मरण रखना चाहिए कि इन शब्दोंका प्रयोग न किया जाय तो असद्भूतव्यवहारके विषयका स्पष्टीकरण करना सम्भव ही नहीं हो सकता ।
अपर पक्षका कहना है कि ‘किन्तु एक नयकी दृष्टिमें दूसरे नयका विषय न होनेसे उस दूसरे नयके विषयको अभूतार्थ कहा जाता है । किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि दूसरे नयका विषय आकाशके पुष्पके समान सर्वथा असत्यार्थ है ।’
समाधान यह है कि असद्भूत व्यवहारनयका विषय आकाशपुष्पके समान सर्वथा असत्यार्थ है यह तो हमने कहीं लिखा नहीं है और न ऐसा है ही । यह शब्दयोजना तो अपर पक्षने की है, इसलिए इसमें संशोधन उसीको करना है । फिर भी निश्चयनय वस्तुके स्वरूपका प्रतिपादन करता है अतएव वह निषेधक धर्मवाला है और असद्भूत व्यवहारनय दूसरेके धर्मको उससे भिन्न वस्तुका कहता है, इसलिए वह प्रतिषेध्य धर्मवाला है, इसलिए आचार्योंने निश्चयनयके विषयको सर्वत्र भूतार्थ ही कहा है तथा व्यवहारनयके विषयको एक दृष्टिसे भूतार्थ और दूसरी दृष्टिसे अभूतार्थ कहा है । जिसका निदर्शन आचार्य अमृतचन्द्रका वही वचन है जिसे अपर पक्षने यहाँ अपने पक्षके समर्थनमें उपस्थित किया है ( समयसार गाथा १४ की टीका ) । अपर पक्षने उक्त टीकावचनका आशय लिखनेके बाद फलितार्थ रूपमें जो यह वचन लिखा है कि 'अर्थात् जीवकी एक ही बन्ध अवस्थाको व्यवहार और निश्चय दो भिन्न भिन्न दृष्टियोंसे देखनेपर सत्यार्थ और असत्यार्थ दिखाई देती हैं ।" सो यह वचन उचित ही लिखा है । इसे अपर पक्षने किस आशयसे लिखा है यह तो हम जानते नहीं । किन्तु शब्दयोजनापर दृष्टिपात करनेसे विदित होता है कि जीवकी एक ही बन्ध अवस्था अर्थात् रागादिरूप जो बन्धपर्याय है वह व्यवहारनयसे सत्यार्थ है-सद्भूत है । किन्तु शुद्ध दृष्टिसे असत्यार्थ है, क्योंकि शुद्धनयमें भेदव्यवहार गौण है ।
इससे अपर पचको यह स्पष्ट हो जायगा कि असद्भूत व्यवहारनयके विषयका स्पष्टीकरण करते समय हमने जो ‘आरोपादि’ शब्दोंका प्रयोग किया है वह विपरीत मान्यताका फल है ? या अपर पक्ष स्वयं अपनी विपरीत मान्यता बनाकर ऐसा लिख रहा है ।
श्लोकवार्तिक पृ० १५१ में आचार्य अमृतचन्द्रने ‘तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे’ इत्यादि वचन किस आशयसे लिखा है इसके स्पष्टीकरणके लिए उनके द्वारा प्रयुक्त ‘व्यवहारनयसमाश्रयणे’ यह वचन ही पर्याप्त है। विशेष खुलासा पाँचवें-छटे प्रश्नके तृतीय उत्तरमें किया ही है।
हमने अन्य किन प्रश्नोंके उत्तरमें व्यवहारनयके विषयको सत्यार्थ किस रूपमें माना है इसका अपर पक्षने हमारे कथनका कोई प्रमाण उपस्थित नहीं किया, इसलिए अपर पक्षके ‘अन्य प्रश्नोंके उत्तरमें आपने भी व्यवहारनयके विषयको सत्यार्थ माना है’ इस कथन पर हमने विशेष विचार करना उचित नहीं समझा।
अपर पक्ष यदि प्रेरक निमित्तकारणका अर्थ व्यवहारनयसे करणनिमित्त या कर्तानिमित्त करता है और इस मान्यताका त्याग कर देता है कि समर्थ उपादान अनेक योग्यताओंवाला होता है, इसलिए जब जैसे निमित्त मिलते हैं उनके अनुसार कार्य होता है। तथा इस तथ्यको स्वीकार कर लेता है कि उत्तर कालमें जो कार्य होता है उसे समर्थ उपादान उस कार्यके अनुरूप अपनी विवक्षित एक द्रव्य-पर्याययोग्यतासे सम्पन्न होकर निश्चयसे स्वयं उत्पन्न करता है, क्योंकि प्रत्येक कार्य उपादानके सदृश होता है-उपादानसदृशं कार्यं भवतीति यावत्। कारण कि उसके बाद वह उसी कार्यको उत्पन्न करनेकी सामर्थ्यवाला है यह नियत है, तभी उन दोनोंमें उपादान-उपादेयभाव बनता है तो हमें 'स्व-परप्रत्यय पदमें जो ‘पर’ शब्दका प्रयोग हुआ है उसे प्रेरकनिमित्त कारण कहनेमें अणुमात्र भी आपत्ति नहीं है। उपासकाध्ययन श्लोक १०६ में इसी आशयसे 'प्रेर्यते, शब्दका प्रयोग हुआ है। तथा २४७ श्लोकमें इसी अभिप्रायसे कर्मको क्लेशका कारण कहा गया है। निश्चय-व्यवहारकी ऐसी युति है। मात्र इसीको बाह्याभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता कहते हैं।
अपर पक्षने लिखा है कि जिस प्रकारका जितने अनुभागको लिये घातिया कर्मोंका उदय होता है उससे आत्माके परिणाम अवश्य होते हैं।’ किन्तु यह कथन ठीक नहीं है। इस विषयको स्पष्ट करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द पंचास्तिकाय गाथा ५७में लिखते हैं-
कम्मं वेदयमाणो जीवो भावं करेदि जारिसयं
सो तेण तस्स कत्ता हवदि त्ति य सासणे पढिदं ॥५७॥
कर्मको वेदता हुआ जीव जैसा भाव करता है, इससे वह उस ( भाव ) का कर्ता होता है ऐसा जिनशासनमें कहा है ॥ ५७ ॥
इससे स्पष्ट है कि आत्मा अपना भाव करनेमें स्वतन्त्र है। उसमें कर्मकी पराधीनता नहीं है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए उसकी टीकामें आचार्य जयसेन लिखते हैं-
कर्मको वेदनेवाला अर्थात् वीतराग निर्भर आनन्दलक्षण प्रचण्ड अखण्ड ज्ञानकाण्डपरिणत आत्मभावनासे रहित होनेके कारण और मन,वचन,कायलक्षण व्यापाररूप कर्मकाण्डसे परिणत होनेके कारण जीव आप कर्ता होकर जैसे भाव ( परिणाम ) को करता है वह जीव उसी करणभूत भावके कारण कर्मभावको प्राप्त हुए उस रागादि भावका कर्ता होता है ऐसा शासन ( परमागम ) में कहा है यह उक्त गाथाका तात्पर्य है। -मूल टीकाके आधारसे
आचार्य अमृतचन्द्र उक्त गाथाकी टीका करते हुए लिखते हैं-
अमुना यो येन प्रकारेण जीवेन भावः क्रियते स जीवस्तस्य भावस्य तेन प्रकारेण कर्ता भवतीति।
इस विधिसे जीवके द्वारा जिस प्रकारसे जो भाव किया जाता है वह जीव उस भावका उस प्रकारसे कर्ता होता है।
५९४ जंयपुर ( खानिया ) तत्त्वचर्चा
यहाँ ‘येन प्रकारेण’ तथा ‘तेन प्रकारेण’ पद ध्यान देने योग्य हैं। इन पदों द्वारा अपने भाव करनेमें जीवकी स्वतन्त्रता घोषित की गई है। इसके साथ जीवकी इतनी विशेषता और है कि परको निमित्त कर उत्पन्न हुए इन भावोंमें यह जीव उपयुक्त हो या न हो यह उसकी अपनी दूसरी विशेषता है। यह मोक्षमार्गकी चाबी है। मोक्षके द्वारका उद्घाटन इसी चाबीसे होता है। अन्य जितना कथन है वह सब व्यवहारवचन है। आचार्य अमृतचन्द्र सम० सा० गा० १७२ की टीकामें लिखते हैं-
जो वास्तवमें ज्ञानी है उसके बुद्धिपूर्वक राग-द्वेष-मोहरूपी आस्रव भावोंका अभाव है। इसलिए वह निरास्रव ही है। परन्तु इतनी विशेषता है कि वह ज्ञानी भी जब तक ज्ञान ( आत्मा ) को सर्वोत्कृष्टभावसे देखने, जानने, अनुचरण करनेके लिए अशक्त होता हुआ जघन्यभावसे ही ज्ञान (आत्मा) को देखता, जानता और अनुचरता है तब तक उसके भी जघन्यभावकी अन्यथा उत्पत्ति नहीं हो सकती, इससे अनुमीयमान अबुद्धिपूर्वक कर्मकलंकके विपाकका सद्भाव होनेसे पुद्गल कर्मका बंध होता है। अतः तब तक आत्मा ( ज्ञान ) को देखना चाहिए, जानना चाहिए और अनुचरणा चाहिए जब तक ज्ञान ( आत्मा ) का पूर्ण भाव है उतना भले प्रकार देखने जानने और अनुचरणमें आजाय तबसे लेकर साक्षात् ज्ञानी होता हुआ वह आत्मा निरास्रव ही रहता है।
अपर पक्षकी इसी दृष्टिको ध्यानमें लेना है। इसे ध्यानमें लेनेपर उस पक्षका कौन कथन आगमानुकूल है और नहीं है तो क्यों नहीं है यह भी उसके ध्यानमें आ जायगा।
अपर पक्ष यदि यह नहीं मानता है कि ‘जो निमित्त बलात् कार्यके स्वकालको छोड़कर आगे-पीछे पर द्रव्यमें उत्पन्न करता हो वह प्रेरक निमित्त है’ तो हम उसका स्वागत करते हैं। ऐसी अवस्थामें उसे पंचाध्यायी पृ० ९५ का उद्धरण देनेकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। वहाँ स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावके निर्देशके प्रसंगसे स्वकाल शब्द पर्यायके अर्थमें आया है। यहाँ विचार यह करना है कि पर्यायें तो अनन्त हैं और उनका लक्षण क्रमभावीपना है, इसलिए उनका उत्पाद-व्यय क्रमानुपाती होता है या नहीं ? इसीके समाधानस्वरूप उपादानके आधार पर यह स्पष्ट किया जाता है कि जितनी उत्पादरूप पर्यायें हैं उनके उतने ही समर्थ उपादान हैं, इसलिए उनका उत्पाद क्रमानुपाती ही होता है और उनके व्यवहार हेतु भी क्रमानुपाती क्रमसे उसी विधिसे मिलते रहते हैं। निश्चय-व्यवहारकी ऐसी ही युति है। इसी अवस्थामें सम्यक् अनेकान्त बन सकता है, अन्यथा नहीं। अव्यवहित पूर्व समयवर्ती पर्याययुक्त द्रव्य समर्थ उपादान है और अव्यवहित उत्तर समयवर्ती पर्याययुक्त द्रव्य उसका उपादेय है यह क्रम है। इसी क्रमसे सब कार्य होते हैं। निमित्त व्यवहारके योग्य अन्यका संयोग भी इसी क्रमसे मिलता है। इस क्रमको कोई महाशय अन्यथा नहीं कर सकता।
अभी अपर पक्ष उपासकाध्ययनका ‘प्रेर्यते कर्म जीवेन’ इत्यादि वचन उद्धृत कर आया है। हम तो कर्मशास्त्रके विशेषज्ञ नहीं हैं। उसके विशेषज्ञ हमें अपर पक्षको माननेमें आपत्ति भी नहीं है। अतएव हम यदि यह जानना चाहे कि अपर पक्षने जो अपने पक्षके समर्थनमें उक्त उल्लेख उपस्थित किया है वह सार्वकालिक नियमको ध्यानमें रखकर उपस्थित किया है या इसे कादाचित्क नियमके रूपमें उपस्थित किया है। यदि सार्वकालिक नियम समझकर उपस्थित किया है तो अपर पक्षने कर्मशास्त्रकी विशेषताको प्रकाशमें लानेके अभिप्रायसे जो यह लिखा है कि ‘किन्तु जो कर्मशास्त्रके विशेषज्ञ हैं वे भलीभाँति जानते हैं कि प्रत्येक समयमें जो द्रव्यकर्म बंधता है उसमें नाना वर्गणाऐं होती हैं और सभी वर्गणाओंमें समान अनुभाग ( फलदान शक्ति ) नहीं होती, किन्तु भिन्न-भिन्न वर्गणाओंमें भिन्न-भिन्न अनुभाग अर्थात् किसी वर्गणामें जघन्य, किसीमें मध्यम और किसीमें उत्कृष्ट अनुभाग होता है । मध्यम अनुभागके अनेक भेद हैं और वर्गणा भी नाना हैं । इस प्रकार जिस समय जैसा अनुभाग उदयमें आता है उसके अनुरूप आत्माके परिणाम होते है ।……जिस समय मंद अनुभाग उदयमें आता है उस समय मंद कषायरूप परिणाम होते हैं और उस समय ज्ञान व वीर्यका क्षयोपशम विशेष होनेसे आत्माकी शक्ति विशेष होती है । उस समय यदि यथार्थ उपदेश आदिका वाह्य निमित्त मिले और यह जीव तत्त्वविचारादिका पुरुषार्थ करे तो सम्यक्त्व हो सकता है ।’ आदि । वह युक्तियुक्त नहीं ठहरता, क्योंकि इसमें भी तीव्र-मन्द भावसे परस्पराश्रयता वनी रहनेके कारण न तो आत्मा कर्मोदयके विरुद्ध पुरुषार्थ कर सकता है न ही ज्ञानका उदय हो सकता है और न ही उपदेश आदिका वाह्य निमित्त मिल सकता है, क्योंकि कर्मोदयमात्र मोक्षमार्गका प्रतिवन्धक है, अतः ‘कर्मोदय वलात् राग-द्वेषको उत्पन्न करते हैं और राग-द्वेष वलात् कर्मका वन्ध कराते हैं’ इस सिद्धान्तके स्वीकार करने पर मोक्षमार्गका पुरुषार्थ कभी नहीं वन सकेगा यह जो आपत्ति हमने दी है वह उचित ही है ।
यदि अपर पक्षने ‘प्रेर्यते कर्म जीवेन’ इत्यादि वचन कादाचित्क नियमके रूपमें उपस्थित किया है तो इससे अपर पक्षके इस सिद्धान्तका खण्डन हो जाता है कि ‘कर्म जीवमें बलात् राग-द्वेषादिको उत्पन्न करता है ।’
अतः प्रकृतमें यह सब कथन व्यवहारनयका वक्तव्य ही समझना चाहिए । ब्रह्मदेव सूरिने बृहद्द्रव्यसंग्रह गा० ३७ में जो कुछ लिखा है वह ठीक ही लिखा है । उन्होंने एक द्रव्य दूसरे द्रव्यमें बलात् कार्य करता है इस सिद्धान्तको स्वीकार करके वह वचन नहीं लिखा है, अतएव उनका वैसा लिखना उचित ही है । उनके लिखनेका आशय ही इतना है कि यदि यह जीव कर्मोदय और इसके फलमें उपयुक्त न हो तो वह संसारपरिपाटीसे मुक्त हो सकता है ।
अपर पक्षने इष्टोपदेश गाथा ३१की टीकासे ‘कत्थ वि वलिओ कम्मो’ यह वचन उद्धृत किया है । किन्तु इसका भी आशय इतना ही है कि जब तक यह जीव उदयाधीन होकर परिणमता है तब तक कर्मकी बलवत्ता कही जाती है । कर्मने उदयाधीन किया नहीं । वह स्वयं उसके आधीन हुआ है । किन्तु जब यह जीव कर्मोदयमें तन्मय न होकर अपने स्वभावके सन्मुख होता है तब आत्माकी बलवत्ता कही जाती है । इष्टोपदेश गा० ३१ की समग्र टीका पर दृष्टिपात करनेसे यही भाव व्यक्त होता है ।
अपर पक्षने लिखा है कि 'प्रेर्यमाणाः पुद्गलाः का जो वाच्य अर्थ है वह ही जिनागममें इष्ट है, क्योंकि शब्दोंका और अर्थका परस्पर वाच्य-वाचक सम्बन्ध है । किन्तु प्रश्न तो यही है कि ‘प्रेर्यमाणाः’ पदका वाच्यार्थ क्या है ? इसे तो स्पष्ट किया नहीं और लम्बी-चौड़ी टीका कर डाली । इसीका नाम तो चतुराई है । जिनागममें तो इसका यह अर्थ है कि राग-द्वेषसे मलीमस आत्माके योग और विकल्पको निमित्तकर जो पुद्गल शब्दरूपसे परिणमते हैं वे प्रेर्यमाण पुद्गल कहलाते हैं । अच्छी बात है यदि अपर पक्ष इस वाच्यको स्वीकार कर लेता है और अन्य द्रव्य अन्य द्रव्यमें बलात् कार्य कर देता है इत्यादि प्रकारकी गलत मान्यताको त्याग देता है । ऐसी अवस्थामें उसके द्वारा आगमका अर्थ करनेमें जो अनर्थ हो रहा है उसका सुतरां त्याग हो जायगा । समयसार गाथा ११६ आदिमें जीवको जो परिणामी नित्य सिद्ध किया है वह स्वमतका ही निरूपण है । परमतका खण्डन उसका मुख्य लक्ष्य नहीं है । प्रत्येक कार्यमें बाह्य निमित्तका स्वीकार है इसमें सन्देह नहीं । चाहे वह अगुरुलघु गुणका परिणमन हो या अन्य परिणमन, बाह्य निमित्तकी स्वीकृति सर्वत्र है । किन्तु यह परिणामी स्वभावमें बाधा न आवे इस रूपमें ही है, अन्य द्रव्य अन्य द्रव्यका बलात् कार्य करता है इस रूपमें नहीं । प्रत्येक परिणाम बाह्य निमित्तसे मिलकर नहीं होता, उससे पृथक् रूपमें उपादानमें ही होता है, इसलिए उस परिणामको उपादान ही उत्पन्न करता है, बाह्य निमित्त नहीं । समयसार गाथा ८०, ८१, ८२ का यही आशय है । यही कारण है कि समयसार गाथा १०७ में ‘करता है, परिणमता है, उत्पन्न करता है, ग्रहण करता है, त्यागता है, बाँधता है’ इत्यादि कथनको असद्भूत व्यवहारनयका वक्तव्य कहा है । अपर पक्ष इस गाथाके इस वचन पर दृष्टि डालनेका कष्ट करे-
यत्तु व्याप्य-व्यापकभावाभावेऽपि प्राप्यं विकार्यं निर्वृत्यं च पुद्गलद्रव्यात्मकं कर्म गृह्णाति, परिणमयत्युत्पादयति करोति बध्नाति वात्मेति विकल्पः स किलोपचारः ।
तथा व्याप्य-व्यापकभावका अभाव होने पर भी प्राप्य, विकार्य और निर्वृत्य पुद्गल द्रव्यात्मक कर्मको आत्मा ग्रहण करता है, परिणमाता है, उत्पन्न करता है, करता है और बाँधता है इत्यादिरूप जो विकल्प होता है वह उपचार है ।
इससे अपर पक्षका जो यह विचार है कि ‘वह गाथा निमित्त कारणकी अपेक्षासे नहीं लिखी गई, किन्तु उपादानकी अपेक्षासे लिखी गई’ उसका निरास हो जायगा । गाथामें ही जब ‘आदा’ पद कर्ताके अर्थमें और ‘पुग्गलकम्मं’ पद कर्मके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । ऐसी अवस्थामें यह लिखना कि ‘वह गाथा निमित्त कारणकी अपेक्षासे नहीं लिखी गई, किन्तु उपादानकी अपेक्षासे लिखी गई’ बहुत बड़ा साहस है । टीका यही कहती है कि आत्मा और पुद्गल कर्ममें व्याप्यव्यापकभाव नहीं है, फिर भी जो यह कहा जाता है कि ‘आत्माने पुद्गल कर्मको उत्पन्न किया’ वह अज्ञानीका विकल्पमात्र है, अतएव उपचरित कथन है, क्योंकि उपादान ही अपने कार्यको उत्पन्न करता है, अन्य द्रव्य अन्य द्रव्यके कार्यको उत्पन्न नहीं करता । मात्र अन्य द्रव्य अन्य द्रव्यके कार्यको उत्पन्न करता है ऐसा विकल्पमूलक व्यवहार होता है । हमने प्रश्न नं० १ व १६ में निमित्तकर्ताकी स्वीकृति समयसार गाथा १०० के अनुसार ही दी है । किन्तु इससे अपर पक्ष प्रेरक निमित्त कर्ताका स्वेच्छासे जैसा अर्थ करता है उसका समर्थन नहीं होता । विवाद शब्द प्रयोगमें नहीं है, उसके अर्थ करनेमें है ।
किसी व्यक्तिको स्त्री आदि विषयोंके आधीन देखकर स्त्रीको उपदेश नहीं दिया जाता कि तुमने इसे अपने आधीन क्यों बना रखा है, किन्तु पुरुषको ही उसके यथार्थ कर्तव्यका भान कराया जाता है । इससे स्पष्ट है कि यह जीव परमें आनन्दकी मिथ्या कल्पनावश स्वयं विषयाधीन बनता है, विषय उसे पराधीन नहीं बनाते । यहाँ जीवके पराधीन बननेमें विषय बाह्य निमित्त तो हैं, उसके कर्ता नहीं । इसी प्रकार कार्यमें बाह्य निमित्तका क्या स्थान है, इसका सर्वत्र निर्णय कर लेना चाहिए ।
तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ४१० में यद्यपि प्रारम्भमें आकाश द्रव्य और अन्य द्रव्योंकी आधाराधेयताका विचार किया गया है । परन्तु आगे वह कथन यहीं तक सीमित नहीं रहा है । किन्तु उस द्वारा सब द्रव्योंमें उत्पादादिक विस्रसा हैं या सहेतुक इसका उत्तर निश्चयनय और व्यवहारनयसे दिया गया है । अतः अपर पक्षका यह लिखना कि कि ‘श्लोकवार्तिक पृ० ४१० का कथन प्रेरक निमित्त कारणके विषयमें नहीं है, किन्तु धर्मादि द्रव्योंके विषयमें है जो अप्रेरक हैं ।’ युक्तियुक्त नहीं है ।
अपर पक्षका कहना है कि ‘निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध निश्चयनयका विषय नहीं हैं’ । पर इससे क्या ? देखना यह है कि यह सम्बन्ध उपचरित हैं या नहीं । हम इसी उत्तरमें पहले असद्भूत व्यवहारका आगमसे स्पष्टीकरण कर आये हैं । उसमें भेदमें अभेदका उपचार करना इसे असद्भूत व्यवहार बतलाया गया है । इससे यह सम्बन्ध उपचरित ही सिद्ध होता है ।
अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें आलापपद्धतिके ‘भिन्नवस्तुविषयो’ इस लक्षणका सहारा लिया है । किन्तु वहाँ एक वस्तुमें भेद व्यवहारको भिन्न वस्तु कहा गया है । अपर पक्ष आलापपद्धतिमें इसके उत्तर भेदोंके जो उदाहरण दिये हैं उन पर दृष्टिपात करले, सब स्पष्ट हो जायगा । वैसे यह लक्षण भी आलापपद्धतिमें किये गये असद्भूत व्यवहारनयके ‘अन्यत्र प्रसिद्धस्य’ इत्यादि लक्षणका पूरक ही है । समयसार गाथा ५६ की आत्मख्याति टीकामें व्यवहारनयका ‘इह हि व्यवहारनयः·······परभावं परस्य विदधाति’ यह लक्षण किया है । इससे हमारे उक्त कथनकी पुष्टि हो जाती है । अतएव उक्त लक्षणके आधारसे भी निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध उपचरित ही सिद्ध होता है । इस प्रश्नके प्रथम उत्तरमें हमने इसी आशयसे इसका निरूपण किया है ।
तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० १५१ में द्विष्ठ कार्य-कारणभावको व्यवहारनयसे परमार्थसत् लिखा है । इसलिए अपर पक्ष इस उल्लेखको बहुत महत्त्व देता है । अनेक प्रपत्रोंमें उस पक्षने इसकी अनेकबार चरचा की है । अब विचार यह करना है कि वहाँ विद्यानन्दि आचार्यने ऐसा क्यों लिखा । बात यह है कि बौद्धदर्शन रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा और संस्कार आदिको संवृतिसत् मानता है । क्योंकि वह दर्शन पर्यायोंमें अन्वित होनेवाले द्रव्यको नहीं स्वीकार करता । तत्त्वको मात्र क्षणिक मानता है । किन्तु जैनदर्शनकी यह स्थिति नहीं है । अतएव उपादान और उपादेयके कालभेदकी अपेक्षा भिन्न होने पर भी एक द्रव्यप्रत्यासत्तिके कारण इनमें कथंचित् तादात्म्य बन जानेसे आचार्य विद्यानन्दिने सद्भूत व्यवहारनयको ध्यानमें रखकर द्विष्ठ (दोमें स्थित) कार्य-कारणभावको वस्तुतः परमार्थसत् कहा है, क्योंकि उपादान अपने स्वरूपसे स्वतःसिद्ध है और उपादेय अपने स्वरूपसे स्वतःसिद्ध है । इनमें उपादान और उपादेयरूप धर्म वास्तविक हैं । इस सम्बन्धमें आचार्य विद्यानन्दिके ये शब्द लक्ष्यमें लेने योग्य हैं । वहीं पृ० १५० में वे लिखते हैं-
कार्य-कारणभावस्य हि सम्बन्धस्याबाधिततथाविधप्रत्ययारूढस्य स्व सम्बन्धिनो वृत्तिः कथंञ्चित्तादात्म्यमेवानेकान्तवादिनोच्यते ।
अबाधित तथाविध प्रत्ययारूढ़ कार्य-कारणभावरूप (उपादान-उपादेय-भावरूप) सम्बन्धकी अपने सम्बन्धियोंमें वृत्ति कथञ्चित् तादात्म्यरूप ही अनेकान्तवादियोंने स्वीकार की है ।
यह आचार्य विद्यानन्दिका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है । ‘तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे’ इत्यादि वचन लिख कर उन्होंने मुख्यतासे इसी कार्य-कारणभावको अर्थात् उपादान-उपादेयभावको परमार्थसत् कहा है । इसके लिए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० १५० अवलोकनीय है । बाह्य सामग्री और कार्यमें कार्य-कारणभाव (निमित्त-नैमित्तिकभाव) केवल कालप्रत्यासत्तिको ध्यानमें रखकर स्वीकार किया गया है, क्योंकि कालप्रत्यासत्तिरूपसे जैसे बाह्य सामग्रीकी सत्ता है उसी प्रकार कार्यद्रव्यकी भी सत्ता है । इस रूपसे ये दोनों परमार्थसत् हैं । इससे द्विष्ठ कार्य-कारणभावको परमार्थसत् कालप्रत्यासत्तिवश कहा है यह भी ज्ञात हो जाता है और इनमें निमित्त-नैमित्तिकव्यवहार असद्भूतव्यवहारनयका विषय कैसे है यह भी ज्ञात हो जाता है ।
अपर पक्षने धवला पु० ६ पृ० १६४ के उल्लेखके सन्दर्भमें उपादान कारणके अनुसार स्थितिबन्धमें विशेषताको स्वीकार कर लिया यह उचित ही किया है, क्योंकि सर्वत्र सभी कार्य उपादानके अनुसार होते हैं यह परमार्थसत् कथन है । इस उल्लेखमें ‘पयडिविसेसादो’ पदका यही आशय है । इस विशेषताका उल्लेख आचार्य वीरसेनने धवला और जयधवला दोनोंमें शताधिक बार किया है । कहीं ‘सहावदो’ लिखा है । इसके लिए धवला पु० ४ पृ०३४३ व ४६८, पु० ५ पृ० ८८ पु० ६ पृ० १४८ व ३१७, पु० १० पृ० २२६ व २४०, पु० ११ पृ० २४६, व ३०६, पु० १२ पृ० ३७; जयधवला पु० ७ पृ० ७४, ७५, ८३, ८४, ६५, ६६, १११, २४०, २४२, व २७४ आदि पृष्ठ द्रष्टव्य हैं । ‘पयडिविसेसादो’ इसके लिए धवला पु० ६ पृ० १७८, १६३, १६४, पु० १२ पृ० ४६ तथा जयधवला पु० ७ पृ० ७५, ८७, ६०, ६४, ६५, ६७, ६८, ६६, १११, ११५, ११६, ११७, १२१, १३१, १३२ आदि पृष्ठ अवलोकनीय हैं । इन सब उल्लेखों द्वारा उपादानकी महत्ता ही घोषित की गई है ।
ऐसी अवस्थामें धवला पु० ६ पृ० १६४ के उक्त उल्लेखमें आये हुए ‘एयंतेण’ पदका अपर पक्षने जो आशय लिया है वह ठीक नहीं है; क्योंकि इस पद द्वारा बाह्यार्थ सापेक्षपनेको कहनेवाले व्यवहारपक्षके एकान्तका निषेधकर परनिरपेक्ष निश्चयपक्षका समर्थन किया गया है । कारण कि सभी कार्य निश्चयसे परनिरपेक्ष ही होते हैं । व्यवहारसे ही उन्हें सहेतुक स्वीकार किया गया है, क्योंकि निश्चयनय मात्र वस्तुस्वरूपका उद्घाटन करता है, इसलिए वह परनिरपेक्षरूपसे ही वस्तुस्वरूपके दिखलानेमें प्रवृत्त होता है । परन्तु व्यवहारनयकी यह स्थिति नहीं है । कारण कि सापेक्षभावसे वस्तुकी सिद्धि करना उसका प्रयोजन है । उदाहरणार्थ भव्यों और अभव्योंका स्वरूप परनिरपेक्ष स्वतःसिद्ध है । मात्र इनका व्यवहार परस्पर सापेक्ष होता है । इसीप्रकार प्रकृतमें जान लेना चाहिए । यही कारण है कि आचार्य वीरसेनने धवला पु० ७ पृ० ११७ में सभी कार्य बाह्यार्थ कारण निरपेक्ष होते हैं’ इस तथ्यको स्वीकार करते हुए लिखा है-
बज्झत्थकारणणिरवेक्खो वत्थुपरिणामो ।
इससे स्पष्ट है कि प्रकृतमें अपर पक्षने 'उक्त उल्लेखमें आये हुए ‘एयंतेण’ पदका जो आशय लिया है वह ठीक नहीं है ।
इसी प्रसंगमें अपर पक्षका कहना है कि ‘यद्यपि कार्य उपादानके सदृश होता है तथापि ऐसा भी नहीं है कि उसपर बाह्य कारणोंका प्रभाव न पड़ता हो ।’ आदि । किन्तु अपर पक्षका ऐसा लिखना भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि जिसे अपर पक्ष ‘प्रभाव पड़ना’ कहता है वह क्या कोई वस्तु है या कथनमात्र है ? यदि वस्तु है तो क्या आगमके विरुद्ध यह स्वीकार किया जाय कि एक वस्तुके गुणधर्मका दूसरी वस्तुमें संक्रमण होता है । यदि नहीं तो वह कथनमात्र है इसके सिवाय उसे और क्या कहा जा सकता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं । यही कारण है कि ‘एक द्रव्य दूसरे द्रव्यके कार्यको करता है’ इसे आगममें असद्भूतव्यवहारनयका विषय बतलाया गया है ।
अपर पक्षने यहाँ पर बीज और भूमिका उदाहरण उपस्थित कर यह सिद्ध करना चाहा है कि एक ही बीज अलग अलग भूमिके कारण अलग अलग फलको उत्पन्न करता है और इसकी पुष्टिमें प्रवचनसार गाथा २५५ का उल्लेख किया है । समाधान यह है कि अन्तरंगकी सिद्धि करना यही तो व्यवहार हेतुका मुख्य प्रयोजन है । वह स्वयं अन्तरंगरूप नहीं हो जाता, किन्तु अन्तरंगकी सिद्धि करता है । पण्डितप्रवर आशा-धरजीने अनगारधर्मामृत अ० १ में ‘कर्त्राद्या वस्तुनो भिन्नाः’ इत्यादि श्लोक ( १०२ ) इसी आशयसे लिखा है। नियम यह है कि जितने कार्य होते हैं उतने ही उनके अन्तरंग ( उपादान ) कारण और बाह्य कारण होते हैं। धवला पु० ७ पृ० ७० में इसका समर्थन करते हुए आचार्य वीरसेन लिखते हैं-
तदो कज्जमेत्ताणि चेव कम्माणि वि अत्थि त्ति णिच्छओ कायव्वो ।
इसलिए जितने कार्य हैं उतने ही उनके कर्म है ऐसा निश्चय करना चाहिए।
इसलिए यदि प्रवचनसारके उक्त उल्लेखमें बाह्य कारणकी अपेक्षा विवेचन हुआ है तो इस परसे ऐसा गलत अभिप्राय नहीं फलित करना चाहिए कि 'अन्तरंग कारणके एक होने पर भी बाह्य कारणके भेदसे कार्यमें भेद देखा जाता है, क्योंकि वस्तुतः बीज एक नहीं है । जितने दाने हैं सब अपने अपने स्वचतुष्टयको लिये हुए पृथक् पृथक् हैं। इसलिए सिद्धान्त यह फलित होता है कि सबकी बाह्याभ्यन्तर सामग्री पृथक्-पृथक् होनेसे पृथक्-पृथक् फलनिष्पन्न होता है। नियत आभ्यन्तर सामग्रीके साथ नियत बाह्यसामग्रीके होनेका योग है। इसलिए उनको निमित्तकर नियत फलकी ही उत्पत्ति होती है। धवला पु० ६ पृ० १६४ के उक्त उल्लेखको और प्रवचनसार गाथा २५५के उल्लेखको मिलाकर समझनेकी आवश्यकता है। कार्य-कारण-परम्परामें नियत निश्चय पक्षके साथ नियत व्यवहार पक्षको स्वीकार करने पर ही अनेकान्तकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं।
अपर पक्षने इसी प्रसंगमें अन्य बहुतसी बातें लिखी हैं। उन सबसे अपर पक्षके सभी प्रपत्र भरे पड़े हैं। इसलिए उन सबकी हम विशेष चरचा नहीं करेंगे। किन्तु स्वयम्भूस्तोत्र ६० का उल्लेख कर अपर पक्षने जो यह लिखा है कि ‘कार्यकी उत्पत्ति अन्तरंग बहिरंग निमित्ताधीन है ऐसा वस्तुस्वभाव है।’ यह अवश्य ही विचारणीय है। अपर पक्षके इस कथनको पढ़कर ऐसा लगा कि वह अपने पक्षके समर्थनके अभिनिवेशमें यहाँ तक कहनेके लिए उद्यत हो गया। उस पक्षको ऐसा लिखकर ‘हम वस्तुस्वभावको पराधीन सिद्ध करने जा रहे हैं’ इस बातका अणुमात्र भी भय न हुआ इसका समग्र जैन परम्पराको आश्चर्य होगा। प्रत्येक वस्तु उत्पाद-व्यय-ध्रुवस्वभाव है। इनकी एक सत्ता है। लक्षण, संज्ञा आदिके भेदसे ही इनमें भेद स्वीकार किया गया है। पर्यायका लक्षण है-तद्भाव। तत्त्वार्थसूत्र अ० ५ में कहा भी है-‘तद्भावः परिणामः’ ( सू० ४२ ) इसकी व्याख्या करते हुए अष्टसहस्री पृ० १२९ में लिखा है-
तेन तेन प्रतिविशिष्टेन रूपेण भवनं हि परिणामः, सहक्रमभाविष्वशेषपर्यायेषु तस्य भावादव्याप्त्यसम्भवात्, तदभावे च द्रव्ये तदनुपपत्तेः ।
उस उस प्रतिविशिष्टरूपसे होना ही परिणाम है, क्योंकि सहभावी और क्रमभावी अशेष पर्यायोंमें अर्थात् गुणों और पर्यायोंमें उक्त लक्षणका सद्भाव होनेसे अव्याप्ति दोष नहीं आता। यदि उसका अभाव माना जाय तो द्रव्यमें परिणामविशेष नहीं बन सकता।
इससे स्पष्ट है कि गुणपर्यायवत्त्व यह द्रव्यका स्वरूप है। ऐसी अवस्थामें यदि कार्यको अपर पक्षके मतानुसार निमित्ताधीन स्वीकार कर लिया जाय तो वस्तुस्वभावके पराधीन हो जानेसे वस्तुको ही पराधीन स्वीकार करनेका प्रसंग उपस्थित होता है जो अनुभव, तर्क और आगम तीनोंके विरुद्ध है। स्पष्ट है कि कोई भी कार्य निमित्ताधीन नहीं होता। निमित्तकी निमित्तता विश्वके शाश्वत नियमानुसार प्रत्येक समयमें प्रतिविशिष्ट स्वभावयुक्त वस्तुके साथ बाह्य व्याप्तिमात्र है। कार्य-कारणपरम्परामें या अन्यत्र निमित्तको स्वीकार करनेका इतना ही तात्पर्य है। वह कार्यकी सापेक्षरूपसे सिद्धि करता है, इसलिए उसमें कर्ता आदिका व्यवहार किया जाता है । यदि बाह्य सामग्री कार्यका वास्तविक कर्ता हो तो वह कार्यका ‘स्व’ हो जायगा और ऐसी अवस्थामें वह व्यवहार कथन न कहलाकर स्वाश्रितपनेकी अपेक्षा निश्चय कथन ही माना जायगा । अतएव ‘कार्यकी उत्पत्ति अन्तरंग-बहिरंग निमित्ताधीन है ऐसा वस्तुस्वभाव है’ यह लिखना अपर पक्षके लिए योग्य नहीं है, हमने प्रश्न ११ के प्रथम उत्तरमें तथा प्रश्न १ के द्वितीय उत्तरमें बाह्य सामग्रीको ध्यानमें रखकर जो भी लिखा है वह व्यवहारदृष्टिको ध्यानमें रखकर ही लिखा है । अपर पक्ष निश्चय व्यवहारकी भेदक रेखाको यदि स्वीकार कर लेता है तो विश्वास है कि जिन तथ्योंका हम अपने उत्तरोंमें निर्देश कर रहे हैं उन्हें स्वीकार करनेमें उस पक्षको किसी प्रकारकी हिचकिचाहट नहीं होगी ।