जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा, शंका-समाधान १ से १७ | Jaipur (Khaniya) Tattvacharcha

शंका ९, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५५१ से ५५९

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका ९

हमारा प्रश्न था कि-सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त? यदि बद्ध है तो किससे बँधा हुआ है और किसीसे बँधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं? यदि वह बद्ध है तो उसके बन्धनसे छूटनेका उपाय क्या है?

प्रतिशंका २

इस प्रश्नके उत्तरमें आपने संसारी जीवको परतन्त्र तो माना है, किन्तु किस ‘पर’ (पदार्थ) के ‘तन्त्र’ (अधीन) संसारी आत्मा है उस ‘पर’ का स्पष्ट उल्लेख आपके उत्तरमें नहीं आया।

बन्धका विवेचन करते हुए श्री कुन्दकुन्दाचार्यने समयसारमें लिखा है-

जोगणिमित्तं गहणं जोगो मण-वयण-कायसंभूदो।
भावणिमित्तो बंधो भावो रदि-राग-दोस-मोहजुदो ॥१४८॥

अर्थ-मन-वचन-कायके हलन, चलनसे उत्पन्न हुआ आत्मप्रदेशोंके परिस्पन्दरूप योग होता है। उस योगसे जो कार्मण वर्गणाओंका संसारी जीवको ग्रहण होता है वह बन्ध है। वह कर्मबन्ध जीवके राग, द्वेष, मोह आदि भावोंके निमित्तसे होता है।

श्री अमृतचन्द्र सूरिने इस गाथाकी टीकामें लिखा है-

बन्धस्तु कर्मपुद्गलानां विशिष्टशक्तिपरिणामेनावस्थानम्। तदत्र पुद्गलानां ग्रहणहेतुत्वाद् बहिरङ्गकारणं योगः। विशिष्टशक्तिस्थितिहेतुत्वादन्तरङ्गकारणं जीवभाव एवेति।

अर्थ-कर्मपुद्गलोंका विशिष्ट शक्तिरूप (जीवको विकारी बनानेरूप) परिणमनसे आत्मप्रदेशोंमें अवस्थित होना बन्ध है।……यहाँ पर कार्मणपुद्गलोंके ग्रहण करनेका बहिरङ्ग कारण योग है। स्थिति तथा अनुभागका कारणभूत अन्तरङ्ग कारण जीवका कषायरूप भाव है।

राग द्वेष मोह परिणाम जीवकी विकारी पर्याय है जिसके साथ जीवका व्याप्य-व्यापकसंबंध है। रागादिरूप पर्यायके साथ जीवका बंध्य-बंधक संबंध नहीं हो सकता। अतः मोह राग द्वेष आदि पर्यायका जीवके साथ बंध कहना अयुक्त है। मोह राग द्वेष परिणाम बंधके कारण हैं। कारणमें कार्यका उपचार करके आगममें इनको भावबंध कहा है।

इस तरह पंचास्तिकाय गाथा १४८ में द्रव्यबंध और भावबंध पर समुचित प्रकाश डाला है। तदनुसार द्रव्मकर्म (मोहनीयादिकर्म) से भावकर्म (द्रव्यकर्मका निमित्त कारणभूत राग द्वेष आदि) होता है और भावकर्मसे द्रव्यकर्म होता है। इस तरह द्रव्यकर्म भावकर्मकी परम्परा संसारी जीवके चलती रहती है और इसीको संसारचक्र कहते हैं।

श्री अमृतचन्द्रसूरिने इसी विषयपर पन्चास्तिकाय ग्रन्थकी १२८-१२९-१३०वीं गाथाकी व्याख्या करते हुए अच्छा प्रकाश डाला है-

इह हि संसारिणो जीवादनादिबन्धनोपाधिवशेन स्निग्धः परिणामो भवति। परिणामात्पुनः पुद्गलपरिणामात्मकं कर्म। कर्मणो नरकादिगतिषु गतिः। गत्यधिगमनाद्देहः। देहादिन्द्रियाणि। इन्द्रियेभ्यो विषयग्रहणं। विषयग्रहणाद्रागद्वेषौ। राग-द्वेषाभ्यां पुनः स्निग्धः परिणामः। परिणात्पुनः पुद्गल-परिणामात्मकं कर्म। कर्मणः पुनर्नरकादिगतिषु गतिः । तदत्र पुद्गलपरिणामनिमित्तो जीवपरिणामो जीवपरिणामनिमित्तश्च पुद्गलपरिणामः।

अर्थ-संसारी जीव अनादि कालसे मोहनीय कर्म-उपाधिसे स्निग्ध (रागादि रूप) होता है। उस स्निग्ध परिणामसे पुद्गल परिणामात्मक द्रव्यकर्म उत्पन्न होता है, द्रव्यकर्मके उदयसे नरक आदि गतियोंमें गमन होता है, गतिके कारण तदनुरूप शरीर मिलता है, शरीरसे इन्द्रियाँ होती हैं, इन्द्रियोंसे विषयोंका ग्रहण होता है, विषयसेवनसे रागद्वेष होते हैं, रागद्वेषसे आत्माके परिणाम स्निग्ध होते हैं, उस स्निग्ध परिणामसे पौद्गलिक कर्मबन्ध होता है।………इस तरह संसारमें पुद्गल कर्मके निमित्तसे जीवके रागद्वेषादि परिणाम होते हैं और जीवके रागद्वेषादि परिणामसे पुद्गल कर्मपरिणमन होता है।

मोहनीय आदि द्रव्यकर्म, राग द्वेष आदि आत्माके विकारी भावोंके प्रेरक निमित्त कारण हैं और राग द्वेष आदि आत्माके विकृतभाव मोहनीय आदि द्रव्यकर्मबन्धके प्रेरक निमित्त कारण हैं।

जब आत्माके प्रबल पुरुषार्थसे द्रव्यकर्मों-मोहनीय आदिका क्षय होता है तब विकारका निमित्तकारण हट जानेसे आत्माके राग-द्वेष आदि नैमित्तिक विकारभाव दूर हो जाते हैं। उस दशामें आत्माकी परतन्त्रता भी दूर हो जाती है।

तदनुसार आपने जो बन्ध और मुक्तिके विषयमें लिखा है कि-

‘वह (संसारी आत्मा) अज्ञानरूप अपने अशुद्धभावोंसे बद्ध है। उसे (संसारी जीवको) यदि बद्धताका अभाव करना है तो अपनी उसी बद्धताका (अज्ञान आदिका) अभाव करना है। उसका अभाव होनेसे जो असद्भूत व्यवहाररूप बद्धता कही गयी है उसका अभाव स्वयमेव नियमसे हो जाता है।’

आपका यह बद्धताके अभावका क्रम विचारणीय है, क्योंकि समयसारमें-

सम्मत्तपडिणिबद्धं मिच्छत्तं जिणवरेहिं परिकहियं।
तस्सोदयेण जीवो मिच्छादिट्ठि त्ति णायव्वो ॥१६१॥
णाणस्स पडिणिबद्धं अण्णाणं जिणवरेहिं परिकहियं।
तस्सोदयेण जीवो अण्णाणी होदि त्ति णायव्वो ॥१६२॥
चारित्तपडिणिबद्धं कषायं जिणवरेहिं परिकहियं।
तस्सोदयेण जीवो अचरित्तो होदि णायव्वो ॥१६३॥

इन तीन गाथाओं द्वारा सम्यक्त्वका, ज्ञानका और चारित्रका प्रतिबन्धक कारण क्रमसे मिथ्यात्व मोहनीय, ज्ञानावरण और चारित्रमोहनीय द्रव्यकर्म बतलाया है। उन प्रतिबन्धक निमित्तकारणोंरूप द्रव्यकर्मोंके प्रभावसे आत्मा मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी और असंयमी होता है।

इसके अनुसार यह बात सिद्ध होती है कि मिथ्यात्व, अज्ञान, असंयमरूप जीवके विकृतभाव दर्शनमोहनीय आदि द्रव्यकर्मरूप प्रतिबन्धक कारणोंके द्वारा होते हैं।

अतः कार्य-कारणभावके नियमानुसार जब प्रतिबन्धक निमित्त कारण दूर होते हैं तब ही आत्माके सम्यक्त्व, ज्ञान, चारित्र गुण प्रकट होते हैं। जैसे कि रात्रि या काली आँधी, प्रबल घनपटल आदि प्रतिबन्धक कारणोंके दूर हट जाने पर ही सूर्यका प्रकाश होता है। आसाममें लगातार १५-१५ दिन तक वर्षा होते रहनेसे १५-१५ दिन तक सूर्य बादलोंसे बाहर दिखाई नहीं देता।

इस कारण आपका यह लिखना कि पहले अज्ञानादिका नाश होता है तदनंतर ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मोंका नाश अपने आप हो जाता है विचारणीय है। श्री कुन्दकुन्दाचार्यने पञ्चास्तिकायमें इसके विरुद्ध लिखा है-

कम्मस्साभावेण य सव्वण्हू सव्वलोगदरसी य।
पावदि इंदियरहिदं अव्वाबाहं सुहमणंतं ॥१५१॥

गाथार्थ-द्रव्यकर्मोंके अभावसे आत्मा सर्वज्ञ, सर्वदर्शी हो जाता है तथा इन्द्रियातीत-अव्याबाध अनन्त सुख प्राप्त करता है।

इस गाथाकी टीका करते हुए श्री अमृतचन्द्रसूरि लिखते हैं-

ततः कर्माभावे स हि भगवान् सर्वज्ञः सर्वदर्शी व्युपरतेन्द्रियव्यापारोऽव्याबाधानन्तसुखश्च नित्यमेवावतिष्ठते।

टीकार्थ-इसलिये द्रव्यकर्मोंका अभाव हो जाने पर वह आत्मा सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, अतीन्द्रिय अव्याबाध अनन्त सुखी सदा रहता है।

श्री अमृतचन्द्रसूरि तत्त्वार्थसार ग्रन्थमें लिखते हैं-

घातिकर्मक्षयोत्पन्नं केवलं सर्वभावगम् ॥१-३१॥

अर्थ-घातिकर्मोंका क्षय हो जानेपर समस्त पदार्थोंको जाननेवाला केवलज्ञान उत्पन्न होता है ।

श्री वीरसेनाचार्य धवल सिद्धान्त ग्रन्थमें लिखते हैं-

तिरोहितस्य रत्नाभोगस्य स्वावरणविगमत आविर्भावोपलम्भात् ।
-पुस्तक १ पृष्ठ ५२

अर्थ-तिरोहित अर्थात् कर्म पटलोंके कारण पर्यायरूपसे अप्रकट रत्न (सम्यग्ज्ञान आदि) समूहका अपने आवरण कर्मके अभाव हो जानेके कारण आविर्भाव पाया जाता है अर्थात् जैसे जैसे कर्म पटलोंका अभाव होता जाता है वैसे-वैसे ही अप्रकट रत्नसमूह प्रकट होता जाता है ।

इन आर्षग्रन्थोंके वाक्योंसे यह बात प्रमाणित होती है कि द्रव्यकर्मोंका चय हो जानेपर ही आत्माके केवलज्ञानादि गुण प्रकट होते हैं ।

इसलिये आपकी यह बात सिद्धान्त-अनुसार विपरीत क्रम है कि पहले भावकर्म यानी राग द्वेष मोह अज्ञान आदिका नाश होता है तदनंतर मोहनीय आदि द्रव्यकर्मोंका नाश होता है ।

सिद्धान्तविरुद्ध इस विपरीत कार्यकारण मान्यताका सुधार अपेक्षित है ।

आपने जो यह लिखा है कि 'आगममें सर्वत्र यह तो बतलाया है कि यदि संसारी आत्मा अपने बद्ध पर्यायरूप राग द्वेष मोह आदि अज्ञान भावोंका अभाव करनेके लिये अन्तरङ्ग पुरुषार्थ नहीं करता है और केवल जिसे आगममें उपचारसे व्यवहारधर्म कहा है उसीमें प्रयत्नशील रहता है तो उसके द्रव्यकर्मोंकी निर्जरा न होनेके समान है । इसी आशयको ध्यानमें रखकर श्री छहढालामें जो यह कहा है कि-

कोटि जन्म तप तपे, ज्ञान विन कर्म झरैं जे ।
ज्ञानीके छिन माहिं, त्रिगुप्ति तैं सहज टरैं ते ॥

आत्मशुद्धिकी प्रक्रियामें आपकी यह मान्यता मेल नहीं खाती, क्योंकि आगमानुसार व्यवहारधर्मकी प्रगति ही निश्चयधर्मकी उपलब्धि कराती है । श्री कुंदकुंद आचार्यने आत्मशुद्धिके लिये द्रव्यप्रतिक्रमण ( भूतकालमें जिन जड़ चेतन पदार्थोंके निमित्तसे राग ममता आदि रूप दोष लगा हो उन पदार्थोंका त्याग ) और द्रव्य प्रत्याख्यान ( भविष्य कालमें होनेवाले राग द्वेष आदिके विषयभूत जड़ चेतनरूप पर पदार्थोंका त्याग ) पूर्वक भावप्रतिक्रमण और भावप्रत्याख्यानके क्रम पर प्रकाश डालते हुए श्री कुन्दकुन्द आचार्यने समयसारमें लिखा है-

अप्पडिकमणं दुविहं अप्पच्चक्खाणं तहेव विण्णेयं ।
एएणुवएसेण य अकारओ वण्णिओ चेया ॥२८३ ॥
अपडिक्कमणं दुविहं दव्वे भावे तहा अपच्चक्खाणं ।
एएणुवएसेण य अकारओ वण्णिओ चेया ॥२८४॥
जाव अपडिक्कमणं अपच्चक्खाणं च दव्वभावाणं ।
कुव्वइ आदा तावं कत्ता सो होइ णायव्वो ॥२८५॥

अर्थ-अप्रतिक्रमण (जड़-चेतन पदार्थोंसे भूतकालीन राग-द्वेष आदिका न छोड़ना) तथा अप्रत्याख्यान ( जड़-चेतन पदार्थोंके साथ होनेवाले भविष्यकालीन राग-द्वेषादि भावोंका न छोड़ना ) द्रव्य और भावके भेदसे दो-दो प्रकारके हैं। उन दोनों (द्रव्य तथा भावरूप अप्रतिक्रमण और अप्रत्याख्यान) के त्याग देनेरूप इस उपदेश द्वारा आत्मा अकारक बतलाया गया है। जब तक आत्मा द्रव्य-भावरूपसे अप्रतिकमण और अप्रत्याख्यान करता है तब तक वह राग-द्वेष आदिका कर्ता है, ऐसा समझना चाहिये। इसकी टीकामें श्री अमृतचन्द्रसूरिने लिखा है वह भी देखने योग्य है-

ततः परद्रव्यमेवात्मनो रागादिभावनिमित्तमस्तु, तथा सति तु रागादीनामकारक एवात्मा। तथापि यावन्निमित्तभूतं द्रव्यं न प्रतिक्रामति न प्रत्याचष्टे च ········ यावत्तु भावं न प्रतिक्रामति न प्रत्याचष्टे तादत्तत्कर्तैव स्यात् । यदैवं निमित्तभूतं द्रव्यं प्रतिक्रामति प्रत्याचष्टे च तदैव नैमित्तिकभूतं भावं प्रतिक्रामति प्रत्याचष्टे च यदा… साक्षादकर्तैव स्यात्।

अर्थ-इसलिये परद्रव्य ( अन्य जड़ चेतन पदार्थ ) ही आत्मामें राग द्वेषादि भाव उत्पन्न करनेके कारण हैं। यदि ऐसा न हो तो आत्मा रागादिभावोंका अकर्ता ही हो जावे। फिर भी जब तक आत्मा राग-द्वेषादिके निमित्तभूत पर पदार्थोंका प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान नहीं करता है तब तक वह नैमित्तिकभूत राग द्वेष आदि भावोंका प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान नहीं कर सकता। जब तक वह अपने उन नैमित्तक भावोंका प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान नहीं करता है तब तक उन रागद्वेषादि भावोंका कर्ता ही है। जब आत्मा निमित्तभूत परपदार्थोंका प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान करता है तब ही नैमित्तिकभूत ( पर पदार्थोंके निमित्तसे होनेवाले ) राग द्वेषादि भावोंका प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान करता है। जब भाव प्रतिक्रमण भाव प्रत्याख्यान करता है तब ही वह आत्मा राग-द्वेषादिका अकर्ता हो जाता है।

आचार्य कुन्दकुन्द तथा श्री अमृतचन्द्रसूरिके इस कथनसे दो बातें सिद्ध होती हैं :-

(१) राग द्वेष आदि विकृत परिणामोंसे मुक्ति पानेके लिये प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान आदि व्यवहारधर्म अति आवश्यक है।

(२) भावशुद्धिके लिये पहले पर पदार्थोंका त्याग करना परम आवश्यक है।

आपने जो अपने अभिप्राय की पुष्टिके लिये छहढालाकी चौथी ढालका पद्यांश (कोटि जन्म तप तपैं ज्ञान विन कर्म झरैं जे। ज्ञानीके छिन माहिं त्रिगुप्ति तैं सहज टरैं ते) उपस्थित किया है, वह आपके अभिप्राय के विरुद्ध जाता है, क्योंकि उससे यह सिद्ध नहीं होता कि 'सिर्फ ज्ञान द्वारा ही कर्मनिर्जरा होकर आत्मशुद्धि होती है। आप पद्यके अन्तिम अंश पर ध्यान दें। वहाँ कर्मनिर्जराके लिये ज्ञानके साथ गुप्तिरूप व्यवहार चारित्रको भी अनिवार्य आवश्यक रखा है। अतः यदि उस पद्यका अभिप्राय केवल ज्ञानद्वारा ही कर्मनिर्जरा माना जायगा तो ग्रन्थकार श्री पं० दौलतरामजीका इस पद्यसंबंधी अभिप्रायका घात होगा। उन्होंने तो व्यवहार धर्मको भी महत्त्व देते हुये इसी चौथी ढालमें श्रावकके १२ व्रतोंका तथा छठी ढालमें मुनिचर्याके २८ मूलगुणोंरूप व्यवहारधर्म या व्यवहारचारित्रका पठनीय एवं मननीय सुन्दर विवेचन किया है। अतः यह पद्य आपके अभिप्रायके विरुद्ध है।

ज्ञान सफल कब होता है

श्री कुन्दकुन्दाचार्यने समयसारमें भेदविज्ञानकी सफलता पर प्रकाश डालते हुये लिखा है-

णादूण आसवाणं असुचित्तं विवरीयभावं च।
दुक्खस्स कारणं ति य तदो णियत्तिं कुणदि जीवो ॥७२॥

अर्थ-आस्रवकी अशुचिता ( अपवित्रता ), विपरीतता तथा दुखकारणता जानकर भव्य जीव उनकी निवृत्ति ( निवारण ) करता है ।

इसकी टीकामें श्री अमृतचन्द्र सूरि लिखते हैं-

किं च यदिदमात्मास्रवयोर्भेदज्ञानं किं वाऽज्ञानं ? यद्यज्ञानं तदा तदभेदज्ञानान्न तस्य विशेषः । ज्ञानं चेत् किमास्रवेषु प्रवृत्तं, किमास्रवेषु निवृत्तं ? आस्रवेषु प्रवृत्तं चेत्तदपि तदभेदज्ञानान्न तस्य विशेषः । आस्रवेभ्यो निवृत्तं चेत्तर्हि कथं न ज्ञानादेव बन्धनिरोधः । इति निरस्तोऽज्ञानांशः क्रियानयः । यत्त्वात्मास्रवयोर्भेदज्ञानमपि नास्रवेभ्यो निवृत्तं भवति तज्ज्ञानमेव न भवतीति ज्ञानांशो ज्ञाननयोऽपि निरस्तः ।

अर्थ-यदि आत्मा और कर्म आस्रवमें भेदज्ञान है तो वह ज्ञानरूप है या अज्ञानरूप ? यदि अज्ञानरूप है तो वह आत्मा और आस्रवके अभेदज्ञानसे कुछ विशेष नहीं ठहरता । यदि वह ज्ञानरूप है तो क्या वह भेदज्ञान आस्रवों ( आस्रवके कारणों )में प्रवृत्त है या निवृत्त है ? यदि आस्रवोंमें प्रवृत्त है ( आस्रवके कारणभूत विषय भोगोंमें लगा हुआ है ) तो वह भेदज्ञानरूप नहीं, अभेदज्ञानसे उसमें कुछ विशेषता नहीं ( अर्थात् व्यर्थ है । ) यदि वह ज्ञान आस्रवोंसे निवृत्त है तो उस ज्ञानसे ही कर्मबन्धका विरोध हो जायगा । ( कर्म आस्रवके कारणभूत ) विषयभोगों-असंयमसे निवृत्त होकर संयम सहित ज्ञानसे कर्मबन्ध रुक जायगा । जो भेदविज्ञान आस्रवोंसे ( कर्म आस्रवोंके कारणोंसे ) निवृत्त नहीं होता वह भेदज्ञान ही नहीं है ।

इसका आशय यही है कि ज्ञानकी सफलता केवल तत्त्व जाननेमें ही नहीं है, अपि तु आस्रवके कारणभूत पापक्रिया तथा विषयभोगों आदिसे निवृत्त होकर व्यवहारधर्म आचरण करनेसे है ।

संवर और कर्मनिर्जरा किस तरह

भेदविज्ञानका उद्देश आत्माको कर्म-आस्रव तथा कर्मबन्धसे छुड़ाकर कर्मोंका संवर और कर्मनिर्जरा करनेका है जिससे क्रमशः आत्मशुद्धि होते हुए मोक्ष प्राप्त हो सके । अतः तत्त्वज्ञानके साथ व्यवहारचारित्र भी जब आचरणमें आता है तब ही कर्मसंवर और कर्मनिर्जरा हुआ करती है । अकेला ज्ञान मुक्तिका या संवर निर्जराका कारण त्रिकालमें भी नहीं है । श्री कुन्दकुन्द आचार्यने प्रवचनसार गाथा ७ में कहा है-चारित्तं खलु धम्मो’‘’'अर्थात् चारित्र वास्तवमें धर्म है । तथा च मोक्षपाहुड़ गाथा ५७ में कहा है-

णाणं चरित्तहीणं दंसणहीणं तवेहिं संजुत्तं ।
अण्णेसु सावरहियं लिंगग्गहणेण किं सोक्खं ॥

अर्थ-जहाँ ज्ञान तो चारित्र-रहित है, तप दर्शन ( सम्यक्त्व ) रहित है, आवश्यक आदि क्रिया रहित लिंग जो भेष है उसमें सुख कहाँ है ।

संस्कृत भाषामें आद्य सैद्धान्तिक सूत्रकार श्री उमास्वामी आचार्य तत्त्वार्थसूत्रमें कहते हैं-

स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः ॥ ९-२ ॥

अर्थ-वह कर्मसंवर गुप्ति समिति, क्षमादि धर्म, अनित्यादि भावना, परीषहजय और सामायिक आदि चारित्रसे होता है ।

तपसा निर्जरा च ॥ ९-३ ॥

अर्थ-अन्तरंग बहिरंग तपसे कर्मोंकी निर्जरा ( अविपाक निर्जरा ) होती है ।

इन दोनों सूत्रोंसे भी प्रमाणित होता है कि व्यवहारचारित्र कर्मसंवर और कर्मनिर्जराका कारण है ।

अनंतवार मुनिव्रत धार

श्री पं० दौलतरामजीने अपने छहढाला ग्रन्थकी चौथी ढालमें लिखा है-

मुनिव्रत धारि अनन्तवार ग्रीवक उपजायो।
पै निज आतम ज्ञान विना सुख लेश न पायो ॥

अर्थ-इस जीवने अनन्तों वार मुनिव्रत धारण करके नौवें ग्रैवेयिक तकका अहमिन्द्र पद पा लिया, परन्तु भेदविज्ञानके विना उसे ( अतीन्द्रिय ) सुखका लेशमात्र भी नहीं मिल सका।

इसमें दो बातें ध्वनित हो रही हैं-(१) तो यह कि ज्ञानकी सफलता कोरे तत्त्वज्ञानसे नहीं है, ज्ञानकी सफलता भेदविज्ञान ( सम्यग्ज्ञान ) से है। (२) भेदविज्ञानकी सफलता अथवा चारित्रकी सफलता भेदविज्ञानके साथ है।

अणुव्रत महाव्रत आदि व्यवहार चारित्र प्रत्येक दशामें सफल है। यदि कोई मनुष्य अभव्य है, मिथ्यादृष्टि (द्रव्यलिंगी) है या दूरातिदूर भव्य है तो वह भी मुनिचर्या द्वारा अहमिन्द्र पद पा सकता है। इससे अधिक उन्नत पद पानेकी उसमें योग्यता नहीं है। अतः ऐसे अभव्य आदि मुनियोंके उद्देश्यसे श्री पं० दौलतरामजी ने यह पद्य लिखा है।

दूसरे-इस पद्यसे यह बात भी प्रमाणित होती है कि मुक्तिके लिये भी अन्तरंग कारण ( भव्यत्व सम्यक्त्वरूप उपादानकारण ) तथा श्रावकधर्म मुनिधर्मरूप व्यवहार चारित्ररूप बहिरंगनिमित्त कारणकी अनिवार्य आवश्यकता है। यदि उन दोनों कारणोंमेंसे एक भी कारणकी कमी होगी तो मुक्ति न मिल सकेगी।

श्री कुन्दकुन्द आचार्यने व्यवहारचारित्रका कितनी दृढ़तासे समर्थन किया है। देखिये-

ण वि सिज्झइ वत्थधरो जिणसासणे जइ वि होइ तित्थयरो।
णग्गो वि मोक्खमग्गो सेसा उम्मग्गया सव्वे ॥ २३ ॥
-सूत्रपपाहुड

अर्थ-जिनशासनके अनुसार यदि तीर्थंकर भी वस्त्रधारी असंयमी हो तो वह आत्मसिद्धि नहीं पा सकता।

धुव सिद्धी तित्थयरो चउणाणजुदो करेइ तवयरणं।
णाऊण धुवं कुज्जा तवयरणं णाणजुत्तो वि ॥६०॥
-मोक्षपाउड

अर्थ-तीर्थंकरको उसी भवसे नियमसे मुक्ति होती है। तीर्थङ्करको सम्यक्त्वके साथ तीन ज्ञान जन्मसे तथा मुनिदीक्षा लेते समय मनःपर्ययज्ञान भी हो जाता है। इस तरह चार ज्ञानधारी होकर भी वे मुक्त होने के लिये तपश्चरण करते हैं ऐसा जानकर ज्ञानी पुरुषको तपश्चरण अवश्य करना चाहिये।

आपने अपने लेखके अन्तमें जो समयसार कलशके दो पद्य दिये हैं वे श्री अमृतचन्द्र सूरिने निश्चयनयकी दृष्टिसे लिखे हैं। किन्तु उन्होंने इन पद्योंसे शुद्ध आत्मतत्त्व प्राप्त करनेके लिये व्यवहारचारित्रका निषेध नहीं किया है। इसका प्रमाण उनका विरचित पुरुषार्थसिद्धयुपाय ग्रन्थ है, जिसमें कि सूरिने अहिंसा धर्मका तथा श्रावकधर्मका सुन्दर विवेचन किया है। इसके सिवाय आध्यात्मिक आचार्य श्री कुन्दकुन्द तथा अमृतचन्द्रसूरि आजन्म मुनिचारित्रका आचरण करते रहे-यह वार्ता इस बातका प्रमाण है कि वे व्यवहार-चारित्रको आत्मशुद्धिके लिये अनिवार्य आवश्यक समझते थे ।

मुनिचारित्रके बिना धर्मध्यान तथा शुक्लध्यान नहीं होते । सिद्धान्तकी यह बात भी व्यवहारचारित्रको अनिवार्य आवश्यकताको प्रमाणित करती है ।

विकारका कारण

द्रव्यमें निष्कारण विभाव ( विकार ) नहीं होता है । विकार परनिमित्तक हुआ करता है, जैसे कि जलके शीतल स्वभावमें उष्णतारूप विकार अग्निके निमित्तसे होता है इसी बातको श्री विद्यानन्दस्वामीने अष्टसहस्री ग्रन्थमें पत्र ५१ पर लिखा है-

दोषावरणयोर्हानिर्निश्शेषास्त्यतिशायनात् ।
क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो बहिरन्तर्मलक्षयः ॥४॥

इस कारिकाकी व्याख्या करते हुए-

दोषो हि तावदज्ञानं ज्ञानावरणस्योदये जीवस्य स्याददर्शनं दर्शनावरणस्य, मिथ्यात्वं दर्शनमोहस्य, विविधमचारित्रमनेकप्रकारचारित्रमोहस्य,………

इत्यादि लिखा है, जिसका अर्थ यह है कि जीवके अज्ञानदोष ज्ञानावरणकर्मके उदय होने पर होता है, दर्शनावरणकर्मके उदयसे अदर्शन, दर्शनमोहनीय कर्मके उदयसे मिथ्यात्व, चारित्रमोहनीय कर्मके उदयसे अनेक प्रकारका क्रोध, मान, राग-द्वेष आदि अचारित्र भाव होते हैं ।

इसके अनुसार आत्माके विकारी भाव ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मोंके निमित्तसे ही होते हैं । इसी बातकी पुष्टि श्री विद्यानन्दस्वामीने आप्तपरीक्षामें भी की है ।

न चायं भावबन्धो द्रव्यबन्धमन्तरेण भवति, मुक्तस्यापि तत्प्रसङ्गात् ।-पृष्ठ ५

अर्थ-यह भावबन्ध ( रागद्वेष अज्ञान आदि ) द्रव्यबंध ( ज्ञानावरण आदि कर्मके ) बिना नहीं होता है; क्योंकि यदि बिना द्रव्यबंधके भावबन्ध हो तो मुक्त जीवोंके भी राग द्वेष आदि भावबन्धके होनेका प्रसंग आजायगा ।

श्री विद्यानन्दस्वामीने भावबन्ध और द्रव्यबंधके विषयमें स्पष्टीकरण करते हुए आप्तपरीक्षाकी ‘भावकर्माणि’ आदि ११४ वीं कारिकाकी व्याख्यामें लिखा है-

तानि च पुद्गलपरिणामात्मकानि जीवस्य पारतन्त्र्यनिमित्तत्वात्, निगडादिवत् । क्रोधादिभिर्व्यभिचार इति चेत् न, तेषां जीवपरिणामानां पारतन्त्र्यस्वरूपत्वात् । पारतन्त्र्यं हि जीवस्य क्रोधादिपरिणामो न पुनः पारतन्त्र्यनिमित्तम् ।

अर्थ-वे पौद्गलिक द्रव्यकर्म ( ज्ञानावरणादि ) आत्माकी परतन्त्रताके निमित्त कारण हैं जैसे कि मनुष्यके पैरोंमें पड़ी बेड़ी मनुष्यकी परन्त्रताका कारण है ।

शंका-क्रोधादि आत्माके भाव ( भावकर्म ) भी आत्माके बंधके कारण हैं, इसलिये उनके साथ व्यभिचार आता है ?

समाधान-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आत्माके क्रोधादि भाव स्वयं परतन्त्रतास्वरूप है, इसलिये आत्माके वे भाव स्वयं परतन्त्ररूप हैं, आत्माकी परतंत्रताके निमित्त नहीं हैं ॥ -पृष्ठ १४६ आचार्य महाराजने उपर्युक्त विधानसे यह बात स्पष्ट कर दी है कि आत्माके राग द्वेष आदि भाव मोहनीय आदि द्रव्यकर्मके निमित्तसे हुआ करते हैं, बिना उन द्रव्यकर्मोंके निमित्तके कभी नहीं होते। इसलिये द्रव्यकर्म आत्माके रागादि भावकर्मोंके उत्पन्न होनेके निमित्त कारण हैं।

राग द्वेष आदि परिणामोंके निमित्तसे मोहनीय आदि द्रव्यकर्मोंका वंध हुआ करता है, इस कारण उन राग द्वेष आदि आत्माके विकारी भावोंको भाववंध कहा गया है। तदनुसार द्रव्यवंधके निमित्तसे भाववंध और भाववंधके निमित्तसे द्रव्यवंध हुआ करता है।

इनमेंसे द्रव्यवंध पर पदार्थ हैं और भाववंध आत्माका अपना विकारी भाव है, अतः वह आत्मस्वरूप है। इसलिये आत्माको परतंत्रताका कारण परद्रव्यरूप द्रव्यकर्म ही मुख्यतासे होता है और परद्रव्य होनेके कारण वास्तवमें आत्माके साथ वंध उन ज्ञानावरण आदि कार्मण द्रव्यका हुआ करता है।

नमः श्रीवीतरागाय

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥

शंका ९

मूल शंका-सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त? यदि बद्ध है तो किससे बँधा हुआ है और किसीसे बँधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं? यदि वह बद्ध है तो उसके बन्धनसे छूटने का उपाय क्या है?

शंका ९, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५५९ से ५६५

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प्रतिशंका २ का समाधान

इस प्रश्नका उत्तर व्यवहारनय और निश्चयनयकी अपेक्षा पूर्वमें दे आये हैं। इसका आशय यह है-एक द्रव्यके गुण धर्मको अन्य द्रव्यका कहना यह असद्भूत .व्यवहारनय है और स्वाश्रित कथन करना यह निश्चयनय है। इस प्रकार संक्षेपमें ये इन दोनों नयोंके लक्षण हैं। अतएव निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करने पर आत्मा स्वयं अपने अपराधके कारण बद्ध है, अन्य किसीने बलात् बाँध रखा हो और उसके कारण वह बँध रहा हो ऐसा नहीं है। परन्तु असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा उसके उस अपराधको ज्ञानावरणादि कर्मोंपर आरोपितकर यह कहा जाता है कि ज्ञानावरणादि कर्मोंके कारण वह बद्ध है। यह वस्तुस्थिति है। इसका सम्यक् निर्णय अनेक प्रमाणोंके साथ पिछले उत्तरमें किया गया था। किन्तु प्रतिशंका २ को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि सांसारिक जीव बद्ध क्यों है इसका मुख्य कारण ज्ञानावरणादि कर्मोंको समझा जा रहा है। प्रतिशंका २ में यह तो स्वीकार कर लिया,है कि जब आत्माके प्रबल पुरुषार्थसे द्रव्यकर्मों मोहनीय आदिका क्षय होता है तब विकारका निमित्त कारण हट जानेसे आत्माके राग-द्वेष आदि नैमित्तिक विकार भाव दूर हो जाते हैं।’ पर इसके साथ दूसरे स्थलपर उसी प्रतिशंकामें यह भी लिखा है कि मोहनीय आदि द्रव्यकर्म, राग द्वेष आदि आत्माके विभाव भावोंके प्रेरक निमित्त कारण हैं और राग द्वेष आदि आत्माके विकृत भाव मोहनीय आदि द्रव्यकर्मबन्धके प्रेरक निमित्त कारण हैं।’ इस प्रकार ये परस्पर विरुद्ध विचार एक ही लेखमें प्रगट किये गये हैं। प्रेरक निमित्तका अर्थ यदि निमित्त कर्ता या निमित्त करण करके उसका अर्थ ‘विशेष निमित्त’ किया जाता है तब तो कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि कर्मोंका उदय-उदीरणा आत्माके राग द्वेष आदि कार्यके विशेष निमित्त हैं और आत्माके राग-द्वेष आदि विभाव भाव ज्ञानावरणादि कर्म परिणामके विशेष निमित्त हैं। पर अभी तक प्रतिशंकासे हम जो तात्पर्य समझ सके हैं उससे यही ज्ञात होता है कि जो निमित्त बलात् कार्यके स्वकालको छोड़कर आगे-पीछे पर द्रव्यमें कार्य उत्पन्न करता है वह प्रेरक निमित्त है। यदि प्रतिशंकामें किये गये विवेचनका यही अभिप्राय हो तो कहना होगा कि आत्माको प्रबल पुरुषार्थ करनेका कभी अवसर ही नहीं मिल सकेगा। कारण कि प्रत्येक समयमें जिस प्रकार कर्मोदय-उदीरणा है, उसी प्रकार राग-द्वेष परिणाम भी है, अतः कर्म आत्माको बलात् परतन्त्र रखेगा और राग-द्वेष परिणाम बलात् कर्मबन्ध कराता रहेगा। इस प्रकार प्रतिसमय आत्माको कर्मोंके अधीन होकर परिणमना पड़ेगा और नये-नये कर्मोंको राग-द्वेषके अधीन होकर बँधना पड़ेगा। ऐसी अवस्थामें यह आत्मा त्रिकालमें बन्धनसे छूटनेके लिये प्रबल पुरुषार्थ कभी नहीं कर सकेगा और प्रबल पुरुषार्थके अभावमें मुक्तिकी व्यवस्था नहीं बन सकेगी। तब तो जितने भी संसारी जीव हैं वे सब मुक्तिके अभावमें संसारी ही बने रहेंगे। आगममें ‘प्रेर्यमाणाः पुद्गलाः’ इत्यादि वचन पढ़कर प्रेरक कारण स्वीकार करना अन्य बात है पर उसका जिनागममें क्या अर्थ इष्ट है इसे समझकर सम्यक् निर्णय पर पहुँचना अन्य बात है।

यह तो शास्त्रके अभ्यासी सभी विद्वान् जानते हैं कि प्रत्येक द्रव्य स्वभावसे परिणामी नित्य है। जिस प्रकार द्रव्यकी अपेक्षा नित्यता उसका स्वभाव है उसी प्रकार उत्पाद-व्ययरूपसे परिणमन करना भी उसका स्वभाव है। जब कि उत्पाद-व्ययरूपसे परिणमन करना उसका स्वभाव है, ऐसी अवस्थामें उसे अन्य कोई परिणमावे तभी वह परिणमन करे ऐसा नहीं है। इसका विशेष विचार श्री समयसारजीमें सुस्पष्टरूपसे किया गया है। विचार करते हुए वहाँ लिखा है-

यह पुद्गल द्रव्य जीवमें स्वयं नहीं बँधा और कर्मभावसे स्वयं नहीं परिणमता। यदि ऐसा माना जाये तो वह अपरिणामी सिद्ध होता है। और कार्मण वर्गणाऐं कर्मभावसे नहीं परिणमती होनेसे संसारका अभाव सिद्ध होता है अथवा सांख्यमतका प्रसंग आता है। जीव पुद्गलद्रव्योंको कर्मभावसे परिणमाता है ऐसा माना जाये तो यह प्रश्न होता है कि स्वयं नहीं परणमती हुई उन वर्गणाओंको चेतन आत्मा कैसे परिणमा सकता है। अथवा यदि पुद्गल द्रव्य अपने आप ही कर्मभावसे परिणमन करता है ऐसा माना जाये तो जीव कर्मको अर्थात् पुद्गलद्रव्यको कर्मरूप परिणमाता है यह कथन मिथ्या सिद्ध होता है, इसलिये जैसे नियमसे कर्मरूप (कर्ताकि कार्यरूपसे) परिणमन करनेवाला पुद्गल द्रव्य कर्म ही है इसी प्रकार ज्ञानावरणादिरूप परिणमन करनेवाला कार्मण पुद्गलद्रव्य ज्ञानावरणादि ही है ऐसा जानो।११६ से १२०।

तथापि आगममें ‘करता है, परिणमाता है, उत्पन्न करता है, ग्रहण करता है, त्यागता है, बाँधता है, प्रेरता है’ इत्यादि प्रयोग उपलब्ध होते हैं। स्वयं आचार्य कुन्दकुन्दने बन्धाधिकारमें बन्धरूप अवस्थामें बन्धको प्राप्त जीवद्रव्यकी संसाररूप पर्याय कर्म और नोकर्मको निमित्तकर ही होती हैं इस तथ्यको समझानेके लिये ‘जह फलिहमणी सुद्धो’ (२७८-२७९) इत्यादि दो गाथाएँ लिखते हुए ‘परिणमाता है’ जैसे शब्दोंका प्रयोग किया है। इस परसे बहुतसे मनोषी उन दोनों गाथाओंका आश्रय लेकर ‘परिणमाता’ है इस पदको ध्यानमें रखकर यह अर्थ फलित करते हैं कि प्रेरक निमित्तोंकी सामर्थ्यसे दूसरे द्रव्यका विवक्षित कार्य स्वकालको छोड़कर आगे-पीछे भी किया जा सकता है। वे प्रेरक निमित्तोंकी सार्थकता इसीमें मानते हैं। किन्तु उनका उन गाथाओंके आधारसे ऐसा अर्थ फलित करना क्यों तथ्ययुक्त नहीं है यह हम स्वयं भगवान् कुन्दकुन्दके शब्दोंमें ही बतला देना चाहते हैं। वे कर्ता-कर्म अधिकारमें इसी बोलका स्पष्टीकरण करते हुए स्वयं लिखते हैं-

उप्पादेदि करेदि य बंधदि परिणामएदि गिण्हदि य।
आदा पुग्गलदव्वं ववहारणयस्स वत्तव्वं ॥ १०७ ॥

अर्थ-आत्मा पुद्गल-द्रव्यको उत्पन्न करता है, करता है, बांधता है, परिणमाता है और ग्रहण करता है यह व्यवहारनयका कथन है।

इस गाथाकी व्याख्या करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

अयं खल्वात्मा न गृह्णाति न परिणमयति नोत्पादयति न करोति न बध्नाति व्याप्य-व्यापकभावाभावात् प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च पुद्गलद्रव्यात्मकं कर्म। यत्तु व्याप्य-व्यापकभावाभावेऽपि प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च पुद्गलद्रव्यात्मकं कर्म गृह्णाति परिणमयत्युत्पादयति करोति बध्नाति चात्मेति विकल्पः स किलोपचारः।

अर्थ-यह आत्मा वास्तवमें व्याप्य-व्यापकभावके अभावके कारण प्राप्य, विकार्य और निर्वर्त्यरूप पुद्गल-द्रव्यात्मक कर्मको ग्रहण नहीं करता, परिणमित नहीं करता, उत्पन्न नहीं करता, न उसे करता है और न बांधता है, फिर भी व्याप्य-व्यापक भावका अभाव होने पर भी प्राप्य, विकार्य और निर्वर्त्य पुद्गल-द्रव्यात्मक कर्मको आत्मा ग्रहण करता है, परिणमित करता है, उत्पन्न करता है, करता है और बांधता है इत्यादिरूप जो विकल्प होता है वह वास्तवमें उपचार है।

इससे विदित होता है कि जिनागममें ‘परिणमाता है’ इत्यादि प्रयोगोंका दूसरे मनीषी प्रेरक कारण मान कर जो अर्थ करते हैं वह नहीं लिया गया है। भगवान् कुन्दकुन्दके समान आचार्य विद्यानन्दि भी इसी अर्थको स्पष्ट करते हुए श्लोकवार्तिकमें लिखते हैं-

ततः सूक्तं लोकाकाशधर्मादिद्रव्याणामाधाराधेयता व्यवहारनयाश्रया प्रतिपत्तव्या, बाधकाभावादिति। निश्चयनयान्न तेषामाधाराधेयता युक्ता, व्योमवद्धर्मादीनामपि स्वरूपेऽवस्थानात्। अन्यस्यान्यत्र स्थितौ स्वरूपसंकरप्रसंगात्। स्वयं स्थानोरन्येन स्थितिकरणमनर्थकम्, स्वयमस्थानोः स्थितिकरणमसंभाव्यं शशविषाणवत्। शक्तिरूपेण स्वयं स्थानशीलस्यान्येन व्यक्तिरूपतया स्थितिः क्रियत इति चेत् तस्यापि व्यक्तिरूपा स्थितिः तत्स्वभावस्य वा क्रियते (अतत्स्वभावस्य वा)। न च तावत् तत्स्वभावस्य, वैयर्थ्यर्थात् करणव्यापारस्य। नाप्यतत्स्वभावस्य, खपुष्पवत्करणानुपपत्तेः। कथमेवं उत्पत्ति-विनाशयोः कारणम्? कस्यचित् तत्स्वभावस्यातत्स्वभास्य वा केनचित् तत्करणे स्थितिपक्षोक्तदोषानुषंगादिति चेत्? न, कथमपि तन्निश्चयनयात् सर्वस्य विस्रसोत्पाद-व्यय-ध्रौव्यव्यवस्थितेः। व्यवहारनयादेव उत्पादादीनां सहेतुकत्वप्रतीतेः।
श्लोकवार्तिक ५, १६, पृ० ४१०-

अर्थ-इसलिये यह अच्छा कहा कि लोकाकाश और धर्मादि द्रव्योंका आधाराधेयभाव व्यवहारनयसे जानना चाहिये, क्योंकि इसका बाधकप्रमाण नहीं है। निश्चयनयसे उनमें आधाराधेयभाव नहीं है, क्योंकि आकाशकी तरह धर्मादि द्रव्योंका भी स्वरूपमें अवस्थान है। तथा अन्य द्रव्यकी अन्य द्रव्यमें स्थिति मानने पर स्वरूपसंकरदोष प्राप्त होता है। स्वयं स्वरूपस्थित पदार्थका दूसरेसे स्थितिकरण होता है ऐसा मानना निरर्थक है, क्योंकि स्वयं स्वरूपमें अस्थित पदार्थका दूसरेके द्वारा स्थितिकरण ऐसे ही नहीं बनता जैसे शशविषाणका दूसरेके द्वारा स्थितिकरण नहीं बनता ।

स्वयं शक्तिरूपसे स्थानशील पदार्थकी अन्य पदार्थ व्यक्ति (प्रगट-पर्याय) रूप स्थिति करता है । यदि ऐसा माना जाय तो प्रश्न है कि वह दूसरा पदार्थ तत्स्वभाववाले दूसरे पदार्थकी व्यक्तिरूप स्थिति करता है या अतत्स्वभाववाले पदार्थकी । तत्स्वभाववालेकी तो कर नहीं सकता, क्यों कि ऐसा मानने पर करण-व्यापारकी व्यर्थता होती है । अतत्स्वभाववालेकी भी नहीं कर सकता, क्यों कि आकाशकुसुम जैसे नहीं किया जा सकता उसी प्रकार अतत्स्वभाववाले पदार्थकी स्थिति करना भी नहीं बनता । यदि ऐसा है तो दूसरा पदार्थ उत्पत्ति और विनाशका कारण कैसे होता है ? क्योंकि तत्स्वभाववाले या अतत्स्वभाववाले किसी पदार्थका किसी दूसरेके द्वारा करना मानने पर स्थितिपक्षमें जो दोष दे आये हैं वे सब प्राप्त हो जायेंगे । नहीं, क्यों कि किसी भी प्रकारसे निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करने पर सम्पूर्ण पदार्थोंका विस्रसा उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यकी व्यवस्था है । व्यवहारनयकी अपेक्षासे विचार करने पर ही उत्पादादिक सहेतुक प्रतीत होते हैं ।

इस प्रकार इन प्रमाणोंसे यह भलीभाँति सिद्ध होता है कि एक द्रव्यकी विवक्षित पर्याय दूसरे द्रव्यकी विवक्षित पर्यायमें अणुमात्र भी हेर-फेर नहीं कर सकती । केवल कार्यजननक्षम योग्यता तथा निमित्त-उपादानकी समव्याप्तिका ज्ञान न होनेके कारण ही यह विकल्प होता है कि अमुकने अमुक किया, वह न होता तो वह कार्य ही उत्पन्न नहीं हो सकता था, किन्तु पूर्वोक्त उल्लेखोंसे स्पष्ट है कि प्रत्येक कार्य अपनी उपादान शक्तिके बल पर ही होता है । इसी अर्थको स्पष्ट करते हुए षट्खण्डागम जीवस्थानचूलिका पृ० १६४ में भी कहा है-

कुदो ? पयडिविसेसादो। ण च सव्वाइं कज्जाइं एयंतेण वज्झत्थमवेक्खिय चे उप्पज्जंति,सालिबीजादो जवंकुरस्स वि उप्पत्तिप्पसंगा । ण च तारिसाइं सव्वाइं तिसु वि कालेसु कहिं वि अत्थि,जेसिं बलेण सालिबीजस्स जवंकुरुप्पायणसत्ती होज्ज, अणवत्थापसंगादो । तम्हा कम्हि वि अंतरंगकारणादो चेव कज्जुप्पत्ती होदि त्ति णिच्छओ कायव्वो ।

अर्थ-क्योंकि प्रकृतिविशेष होनेसे सूत्रोक्त इन प्रकृतियोंका यह स्थितिबन्ध होता है । सभी कार्य एकान्तसे बाह्य अर्थकी अपेक्षा करके नहीं उत्पन्न होते हैं, अन्यथा शालिधान्यके बीजसे जौके अंकुरकी भी उत्पत्तिका प्रसंग प्राप्त होगा । किन्तु उस प्रकारके द्रव्य तीनों ही कालोंमें किसी भी क्षेत्रमें नहीं हैं कि जिनके बलसे शालिधान्यके बीजको जौके अंकुररूपसे उत्पन्न करनेकी शक्ति हो सके । यदि ऐसा होने लगे तो अनवस्था दोष प्राप्त होगा, इसलिये कहीं पर भी अर्थात् सर्वत्र अन्तरंग कारणसे ही कार्यकी उत्पत्ति होती है ऐसा निश्चय करना चाहिये ।

यहाँ भिन्न टाईपके वाक्य ध्यान देने योग्य हैं । इस द्वारा दृढ़तापूर्वक आचार्य वीरसेनने यह स्पष्ट कर दिया है कि सर्वत्र कार्यकी उत्पत्ति मात्र अन्तरंग कारणसे ही होती है । मात्र जिस अन्य द्रव्यकी विवक्षित पर्यायकी उसके ( कार्यके ) साथ बाह्य व्याप्ति होती है उसमें निमित्तताका व्यवहार किया जाता है ।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य वीरसेन वेदनाभावविधानाद्यनुयोगद्वारोंमें कहते हैं-

तत्थ वि पहाणमंतरगं कारणं, तम्हि उक्कस्से संते बहिरंगकारणे थोवे वि बहुअणुभागघाददंसणादो, अंतरंगकारणे थोवे संते बहिरंगकारणे बहुए संते वि बहुअणुभागघादाणुवलंभादो ।
-धवला पु० ११ पृ० ३६ ।

अर्थ-उसमें भी अन्तरंगकारण प्रधान है, क्योंकि उसके उत्कृष्ट होनेपर बहिरंग कारणके स्तोक रहने पर भी बहुत अनुभागघात देखा जाता है। तथा अन्तरंग कारणके स्तोक होने पर बहिरंग कारणके बहुत होते हुए भी बहुत अनुभागघात नहीं उपलब्ध होता।

यह जिनागमका तात्पर्य है, जिससे वस्तुस्वभाव पर सम्यक् प्रकाश पड़ता है। पूर्वमें प्रश्न नं० ६ एवं उसकी प्रतिशंकाओंके उत्तर स्वरूप लिखे गये लेखोंमें हमने जिनागमके इसी तात्पर्यको ध्यानमें रखकर निश्चयनय और व्यवहारनयकी अपेक्षा उत्तर दिया था। किन्तु हमें देखकर आश्चर्य हुआ कि निश्चयनय और व्यवहारनयकी अपेक्षासे जिनागममें जो सम्यक् व्यवस्था की गई है उसे गौण कर और व्यवहारनयके विषयको मुख्यकर (निश्चयरूप) मानकर इस प्रतिशंका द्वारा यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है कि कर्मोंने बलात् जीवको बांध रखा है। अपने अभिप्रायकी पुष्टिमें अन्य व्यवहारनयके सूचक प्रमाणोंके साथ समयसारकी ‘सम्मतपडिणिबद्धं’ इत्यादि तीन गाथाऐं उपस्थित कर उनमें आये हुए ‘मिच्छत्त’, अण्णाणं, और कसाय’ पदोंका अर्थ प्रतिशंकामें मिथ्यात्व द्रव्यकर्म, ज्ञानावरणीय द्रव्यकर्म और चारित्रमोहनीय द्रव्यकर्म किया है किन्तु यहाँ पर इन पदोंका अर्थ मुख्यरूपसे मिथ्यात्वभाव, अज्ञानभाव और कषायभाव लिये गये हैं। इनके निमित्तरूप कर्मोंका यदि ग्रहण हुआ है तो गौणरूपसे ही। पण्डितप्रवर राजमलजीने इन तीन गाथाओंकी टीकामें आये हुए ‘सन्यस्तव्यमिदं समस्तमपि कर्म’ (१०९) इस कलशका अर्थ करते हुए ‘कर्म’ शब्दका अर्थ मुख्यरूपसे जीवके भाव ही किया है। उसकी टीकाका वचन इस प्रकार है-

…इसौ छे जो कोई जीव तेने, तत् इदं कहतां सोई कर्म जो उपर ही कह्यो थो, समस्तं अपि कहतां जावंत छै शुभ क्रियारूप अशुभ क्रियारूप अन्तर्जल्परूप बहिर्जल्परूप इत्यादि । करतूतीं रूप कर्म कहतां क्रिया अथवा ज्ञानावरणादि पुद्गलकौ पिंड अशुद्ध रागादि जीवके परिणाम इसौ कर्म…-समयसारकलश टीका पृ० १११ (सूरत वीर सं० २४५७)

यद्यपि निमित्तोंका सम्यक् ज्ञान करानेके लिये आगममें कर्मोंकी मुख्यतासे व्यवहारनय प्रधान कथन बहुलतासे आया है इसमें सन्देह नहीं, परन्तु इस जीवके संसारका कारण इसका अपना अपराध ही है ऐसा ज्ञान हुए विना उसकी अज्ञान, मोह, राग, द्वेषमें अरुचि होकर स्वभावका पुरुषार्थ नहीं हो सकता, इसलिये प्रत्येक संसारी जीवको निमित्तोंके विकल्पसे निवृत्त होकर यही निर्णय करना कार्यकारी है-

यदिह भवति रागद्वेषदोषप्रसूतिः
कतरदपि परेषां दूषणं नास्ति तत्र।
स्वयमयमपराधी तत्र सर्पत्यबोधो
भवतु विदितमस्तं यात्वबोधोऽस्मि बोधः ॥२२०॥
-समयसार कलश

अर्थ-इस आत्मामें जो रागद्वेषरूप दोषोंकी उत्पत्ति होती है उसमें परद्रव्यका कोई भी दोष नहीं है, वहां तो स्वयं अपराधी यह अज्ञान ही फैलता है-इस प्रकार विदित हो और अज्ञान अस्त हो जाये, मैं तो ज्ञान हूँ।

आगे चलकर इस प्रतिशंकामें अनेक प्रमाणोंसे यह सिद्ध किया गया है कि द्रव्यअप्रतिक्रमण और द्रव्य-अप्रत्याख्यानका त्याग पहिले होता है। तथा भाव-अप्रतिक्रमण और भाव-अप्रत्याख्यानका त्याग बादमें होता है । इस बातको प्रमाणित करनेके लिये समयसारजी गाथा २८३-२८४-२८५ के उल्लेख दिये गये हैं । तथा अमृतचन्द्रसूरिजीकी टीका भी दी है । टीकासे यह निष्कर्ष निकाला गया है कि-

(१) रागद्वेष आदि विकृत परिणामोंसे मुक्ति पानेके लिये प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान आदि व्यवहारधर्म अतिआवश्यक हैं ।

(२) भावशुद्धिके लिये पहिले पर पदार्थोंका त्याग करना परम आवश्यक है ।

दोनों निष्कर्ष संख्यामें दो होकर भी एक ही भाव व्यक्त करते हैं । वे इस तात्पर्यको प्रकट करते हैं कि द्रव्यप्रतिक्रमण और द्रव्यप्रत्याख्यान अर्थात् व्यवहारधर्म या व्यवहारचारित्र या द्रव्यचारित्र मुख्य है ।

पर बात ऐसी नहीं है । अमृतचन्द्र सूरिने इसी टीकामें द्रव्यत्यागके साथ ही भाव-त्याग जब तक नहीं होता तब तक जीवको रागादिका कर्ता बताकर भावत्यागकी मुख्यताको ही स्वीकार किया है । जिससे यह सूचित होता है कि भावप्रतिक्रमण और भावप्रत्याख्यानके साथ जो द्रव्यप्रतिक्रमण और द्रव्य-प्रत्याख्यान होता है वही जिनागममें मान्य है । टीकाके ये शब्द ध्यान देनेयोग्य हैं ।

यदैव निमित्तःभूतं द्रव्यं प्रतिक्रामति प्रत्याचष्टे च तदैव नैमित्तिकभूतं भावं प्रतिक्रामति प्रत्याचष्टे च, यदा तु भावं प्रतिक्रामति प्रत्याचष्टे च तदा साक्षादकर्तैव स्यात् ।

अर्थ-जब वह निमित्तभूत द्रव्यका प्रतिक्रमण तथा प्रत्याख्यान करता है तभी नैमित्तिकभूत भावोंका प्रतिक्रमण तथा प्रत्याख्यान करता है, और जब इन भावोंका प्रतिक्रमण तथा प्रत्याख्यान होता है तब वह साक्षात् अकर्ता ही है ।

-समयसार गाथा २८३-२८४ टीका

प्रतिशंकामें ‘व्यवहारचारित्र प्रत्येक दशामें सफल है’ इस प्रतिज्ञा वाक्यके साथ जो तर्क दिए गये हैं वे सम्यक् नहीं है,क्योंकि मिथ्यादृष्टि, अभव्य और दूरातिदूर भव्य जीव भी मुनिचर्या (व्यवहारचारित्र) के द्वारा अहमिन्द्र पद पा सकता है, जो मोक्षमार्गकी दृष्टिसे मिथ्यादर्शनका सहभावी होनेके कारण मिथ्याचारित्रका ही नाम पाता है । व्यवहार-चारित्राभास तो उसे कह सकते हैं पर व्यवहारचारित्र नहीं ।

जहाँ व्यवहारचारित्र और निश्चयचारित्रमें साधक-साध्यपना बताया है वहाँ सम्यग्दर्शन पूर्वक व्यवहार चारित्रको व्यवहारसे साधक ही बताया गया है, मिथ्याचारित्रको नहीं । अतः निश्चयचारित्रके साथ बाह्य चारित्रको ही व्यवहारचारित्र कहते हैं,वहाँ निश्चयचारित्र ही मुख्य है,क्योंकि वह आत्माका वीतराग भाव है ।

सर्वार्थसिद्धि ( अ० ७, सू० १९ ) में पूज्यपादस्वामीने यही व्यक्त किया है । वहाँ प्रश्न किया है कि ऐसा होने पर शून्यागार आदिमें वसनेवाला मुनि अगारी और किसी कारण घर छोड़कर वनमें वसनेवाला व्यक्ति अनगार माना जायगा । वहाँ आचार्य उत्तर देते हैं कि-

नैष दोषः, भावागारस्य विवक्षितत्वात् ।

अर्थात् अगार पदसे भावागार ही अर्थ लिया गया है । आगे लिखा है कि-

वने वसन्नपि च गृहे वसन्नपि तदभावदनगार इति च भवति ।

भावागारका त्याग अर्थात् जब अगारके प्रति रागभाव न रहे तब वह घरमें बैठा हो, या वनमें वसता हो ‘अनगार’ कहा जायगा ।

इस प्रकार विचार करने पर प्रतीत होता है कि जिनागममें सर्वत्र भावचारित्र या निश्चयचारित्रकी ही प्रधानता है, क्योंकि वह मोक्षका साक्षात् हेतु है। उसके होने पर साथमें गुणस्थानपरिपाटीके अनुसार व्यवहारचारित्र होता ही है, उसका निषेध नहीं है। परन्तु ज्ञानीकी सदा स्वरूपरमणकी दृष्टि बनी रहती है, इसलिये मोक्षमार्गमें उसकी मुख्यता है। मोक्षमार्गका तात्पर्य ही यह है। इस प्रतिशंकामें प्रसंगवश इसी प्रकारकी सम्बन्धित और भी अनेक चर्चाएँ आई हैं, परन्तु उन सबका समाधान उक्त कथनसे हो जाता है, अतः यहाँ और विस्तार नहीं किया गया है।

शंका ९, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५६५ से ५७८

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका ९

मूल प्रश्न-सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बंधा हुआ है ? और किसीसे बंधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ? यदि वह बद्ध है तो छूटनेका उपाय क्या है ?

प्रतिशंका ३

इस मूल प्रश्नके निम्न ४ खण्ड हो सकते हैं :-

(अ) संसारी जीव बद्ध है या मुक्त ?

(आ) यदि बद्ध है तो किससे बंधा हुध है ?

(इ) बंधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ?

(ई) यदि वह बद्ध है तो छूटनेका उपाय क्या है ?

(अ) संसारी जीव बद्ध है या मुक्त ? इस प्रश्नके सम्बन्धमें आपने अपने प्रथम उत्तरमें यह लिखा था कि ‘शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा परम-पारिणामिक भावस्वरूप शुद्ध जीवके द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्मका अभाव होनेसे वह सकल दोषोंसे विमुक्त है।’ इसके प्रमाणमें नियमसार गाथा ४५की टीकाका वाक्य दिया गया। इसका उपर्युक्त प्रश्नसे सम्बन्ध ही नहीं है, क्योंकि परम पारिणामिक भावस्वरूप शुद्ध जीव तीनों कर्मों व सकल दोषोंसे विमुक्त ( रहित ) है। इसमें न बद्धका कथन है और न मुक्त (बंधपूर्वक मुक्त) का कथन है। ‘यदि मुक्तसे अबद्धका अभिप्राय लिया जावे तो मात्र अबद्धका उत्तर हुआ, किन्तु फिर भी बद्धके विषयमें तो कोई उत्तर नहीं दिया गया। दूसरे उत्तरमें भी इसके विषयमें कुछ नहीं लिखा गया। आपके इस लिखनेसे यह जीव शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षासे विमुक्त ( अबद्ध ) है’ यह भी सिद्ध हो जाता है कि व्यवहार नयसे यह संसारी जीव बद्ध है जैसा कि श्री अमृतचन्द्र सूरिने कलश २५ में कहा है कि ‘एकस्य बद्धो न तथा परस्य’ अर्थात् ‘यह जीव व्यवहारनयसे बंधा है, निश्चय नयसे बंधा हुआ नहीं है ।’ यह हमको भी इष्ट है ।

(आ) यदि बंधा हुआ है तो किससे बंधा हुआ है ?

इसके प्रथम उत्तरमें आपने कहा था कि 'यह जीव सद्भूत व्यवहारनयसे अपने रागादि भावोंसे बंधा हुआ है । असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा ज्ञानावरणादि आठ द्रव्यकर्मों तथा औदारिक शरीर आदि नोकर्मोंके साथ बद्ध है । इसके पश्चात् प्रसंगके बिना पुद्गलबंधादिका कथन किया । फिर कहा ‘अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा जीव अज्ञानरूप अशुद्ध भावोंसे वास्तवसे बद्ध है ।’ इसपर हमने यह लिखा था कि रागादिक तो कर्मोदयजनित व्यवहारनयसे आत्माके विकारी भाव हैं, जो बंधके कारण होनेसे भावबंध कहे जाते हैं, उनसे जीवका कथंचित् व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध तो है, क्योंकि विकारी पर्याय है । किन्तु स्वपर्यायके साथ बंध्य-बंधकभाव कदापि नहीं हो सकता । इसका आपने कोई उत्तर नहीं दिया । इसका अर्थ है कि वह आपको स्वीकृत है ।

(इ) बंधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ?

आपने प्रथम उत्तरमें कहा था ‘संसारी आत्मा अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा अपने अज्ञान भावसे बद्ध होनेके कारण वास्तवमें परतन्त्र है और असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा उपचरितरूपसे कर्म और नोकर्मकी अपेक्षा भी परतन्त्रता घटित होती है ।’ इसके सम्बन्धमें हमने आप्तपरीक्षा कारिका ११४ की टीकाका प्रमाण देते हुए यह सिद्ध किया था कि आत्मा पौद्गलिक द्रव्यकर्मोंके कारण परतंत्र हो रहा है और रागादि भाव परतन्त्रता स्वरूप हैं, इसलिये आत्माके भाव स्वयं परतन्त्ररूप हैं, आत्माकी परतन्त्रताके निमित्त नहीं हैं । इसका भी आपने कोई उत्तर नहीं दिया । इसका अर्थ है कि यह भी स्वीकार है ।

मूल प्रश्नके इन तीनों खण्डोंके प्रश्नोत्तरोंसे यह स्पष्ट हो जाता है कि इन तीन खण्डोंके विषयमें हममें और आपमें कोई मतभेद नहीं है ।

अद्भूतव्यवहारनयका लक्षण प्रथम उत्तरमें है ।

आपने इसी प्रश्नके अपने द्वितीय उत्तरमें सर्व प्रथम असद्भूत व्यवहारनयका लक्षण इस प्रकार किया है-‘एक द्रव्यके गुण-धर्मको अन्य द्रव्यका कहना यह अद्भूत व्यवहारनय है ।’ किन्तु प्रथम उत्तरमें यह कहा था-‘असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा ज्ञानावरणादि आठ द्रव्यकर्मों तथा औदारिक शरीरादि नोकर्मके साथ बँधा है ।’ अर्थात् दो भिन्न वस्तुओंका परस्पर सम्बन्ध असद्भूत व्यवहारनयका विषय है । इसी लक्षणको आपने आठवें प्रश्नके प्रथम उत्तरमें इन शब्दों द्वारा लिखा है-‘दो या दोसे अधिक द्रव्यों और उनकी पर्यायोंमें जो सम्बन्ध होता है वह असद्भूत ही है ।’ इस प्रकार आपके द्वारा एक ही प्रश्नके दो उत्तरोंमें असद्भूत व्यवहारनयके दो लक्षण कहे गये हैं । किन्तु यहाँ पर बंधका प्रकरण है और बंध दो भिन्न वस्तुओंमें होता है । अतः इस प्रश्नमें ‘भिन्नवस्तुविषयोऽसद्भूतव्यवहारः’ ‘अर्थात् भिन्न वस्तु जिसका विषय हो वह असद्भूत व्यवहारनय है’, यह लक्षण उपयोगी है । दूसरे यह लक्षण आध्यात्मिक दृष्टिसे है और ‘स्वाश्रितो निश्चयः’ यह लक्षण भी आध्यात्मिक दृष्टिसे है । अतः दोनों लक्षण अध्यात्मदृष्टिवाले लेने चाहिये । जब निश्चयका लक्षण अध्यात्मनयकी अपेक्षासे ग्रहण किया जा रहा है तो व्यवहारनयका लचण भी अध्यात्मनय-वाला लेना चाहिये ।

चौथे खण्डमें यह प्रश्न शेष रह गया कि छूटनेका उपाय क्या है ? इसका उत्तर भी बहुत सरल था कि ‘सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित्र’ छूटनेका उपाय है। किन्तु यह उत्तर न देकर प्रथम उत्तरमें यह लिखकर कि व्यवहारधर्मसे जीव छूट नहीं सकता, व्यवहारधर्मका सर्वथा निषेध करना प्रारम्भ कर दिया। आपका ऐसा करना अप्रासंगिक था, क्योंकि निश्चय व व्यवहारधर्मसम्बन्धी स्वतंत्र प्रश्न नं० ४ है। फिर भी हमको इस पर लिखना पड़ा। अब द्वितीय उत्तरमें आपने निश्चय-व्यवहारधर्मके साथ-साथ प्रेरकनिमित्त तथा नियतिके नवीन प्रसंग उपस्थित कर दिये। यद्यपि निमित्तके लिये स्वतंत्र प्रश्न नं० ६ तथा नियतिके लिये स्वतंत्र प्रश्न नं० ५ हैं। फिर भी उत्तरोंमें अप्रासंगिक कथनोंसे चर्चा जटिल बन जाती है और उलझन पैदा हो जाती है।

यह तो सुनिश्चित है कि व्यवहारधर्म साधन और निश्चयधर्म साध्य है। श्री कुन्दकुन्द भगवान्ने समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय आदि ग्रन्थोंमें तथा श्री अमृतचन्द्रसूरि व श्री जयसेन आचार्यने श्री समयसार, श्री प्रवचनसार व श्री पंचास्तिकायकी टीकाओंमें तथा श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीने द्रव्यसंग्रहमें, श्री ब्रह्मदेवसूरिने बृहद्द्रव्यसंग्रहकी टीकामें तथा अन्य आचार्योंने भी भिन्न-भिन्न ग्रन्थोंमें यह कथन किया है कि व्यवहारधर्म तीर्थ या स्वर्णपाषाण है और निश्चयधर्म तीर्थफल अथवा स्वर्ण है। इसका विस्तारपूर्वक विवेचन प्रश्न नं० ४ के प्रपत्र २में हो चुका है जिसमें बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा १३ की टीकाका प्रमाण देते हुए यह भी बतलाया गया है-जो निश्चय-व्यवहारको साध्य-साधकभावसे मानता है वह सम्यग्दृष्टि है अर्थात् जो निश्चय-व्यवहारको साध्य-साधकभावसे नहीं मानता वह मिथ्यादृष्टि है। इस सम्बन्धमें सर्व प्रमाण प्रश्न नं० ४ में दिये जा चुके हैं। उनको पुनः लिखकर उत्तरका कलेवर बढ़ानेसे कुछ लाभ नहीं है। मात्र एक प्राचीन गाथा दी जाती है-

जइ जिणमयं पवज्जह ता मा ववहारणिच्छए मुयह ।
एएण विणा छिज्जइ तित्थं अण्णेण उण तच्चं ॥
-समयसार गाथा १२ की टीका

अर्थ-हे भव्य जीवो! यदि तुम जिन मतका प्रवर्तन करना चाहते हो तो व्यवहार और निश्चय दोनोंको मत छोड़ो, क्योंकि व्यवहारनयके विना तो तीर्थ (साधन)का नाश हो जायगा, निश्चयके विना तत्त्व (साध्य)का नाश हो जायगा।

इतना स्पष्ट आगम होने पर भी आप लिखते हैं-‘निश्चय रत्नत्रयस्वरूप जितनी विशुद्धि प्रगट होती जाती है उसके अनुपातमें उसके बाह्यमें द्रव्यकर्मका अभाव होता हुआ व्यवहारधर्मकी भी प्राप्ति होती जाती है।’ आपका यह लिखना आगमविरुद्ध है। प्रथम तो द्रव्य कर्मोदयके अभावमें अन्तरंग विशुद्धता प्रगट होती है, क्योंकि मलिनताका कारण द्रव्यकर्मोदय है और कारणके अभावमें कार्यका भी अभाव हो जाता है। जैसे दीपकके अभावमें प्रकाशका भी अभाव हो जाता है इसी प्रकार द्रव्यकर्मोदयके अभावमें मलिनताका अभाव हो जानेसे विशुद्धता प्रगट हो जाती है। जिस प्रकार प्रकाशका अभाव दीपकके अभावका ज्ञापक तो है, क्योंकि दीपक और प्रकाशमें अविनाभाविसम्बन्ध है, किन्तु कारण नहीं है उसी प्रकार अन्तरंग विशुद्धता कर्मोदयके अभावका ज्ञापक तो है, किन्तु प्रकट कारण नहीं है। जैसे-जैसे कर्मपटलोंका अभाव होता जाता है वैसे-वैसे ही अप्रकट सम्यग्दर्शनादि रत्नसमूह होता जाता है (धवल १ पृ० ४२) प्रथमोपशम सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिका क्या क्रम है, जिनको इसका ज्ञान है वे भलिभाँति जानते हैं कि मिथ्यात्वोदयमें अनिवृत्तिकरण कालमें प्रथम स्थितिके और द्वितीय स्थितिके मध्यके दर्शमोहनीय निषेकोंका अभाव हो जानेसे अन्तरायाममें दर्शनमोहनीयका द्रव्य नहीं रहता और द्वितीय स्थितिके दर्शनमोहनीय कर्मका उपशम हो जानेसे प्रथम स्थितिकालके समाप्त होनेपर प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन प्रगट हो जाता है, क्योंकि वहाँ पर दर्शनमोहनीयका अभाव पहले ही हो चुका था (लब्धिसार)। दूसरे उपर्युक्त गाथाके विरुद्ध निश्चय रत्नत्रयको साधन और व्यवहार रत्नत्रयको साध्य बतलाया वै। आप आगमविरुद्ध कार्यकारणभावको विलोमरूपसे कहते हैं यही मतभेदका कारण है।

दूसरे उत्तरमें ‘निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करनेपर जीव स्वयं अपने अपराधके कारण बद्ध है, अन्य किसीने बलात् बाँध रखा है और उसके कारण वह बँध रहा हो ऐसा नहीं है।’ आपका ऐसा कथन आगमविरुद्ध है, क्योंकि निश्चयनयकी दृष्टिमें आत्मा बद्ध नहीं है। जैसा कि समयसार गाथा १४१ की टीकामें श्री अमृतचन्द्र आचार्यने कहा है-‘जीव और पुद्गलकर्मको एक बन्ध पर्यायपनेसे देखनेपर उनमें अत्यन्त भिन्नताका अभाव है, इसलिये जीवमें कर्म बद्धस्पृष्ट है, ऐसा व्यवहारनयका पक्ष है। जीवको तथा पुद्गलको अनेक द्रव्यपनेसे देखनेपर उनमें अत्यन्त भिन्नता है, इसलिये जीवमें कर्म अबद्धस्पृष्ट है, यह निश्चयनयका पक्ष है।’ इसीको कर्ता कर्माधिकार कलश नं० २५ में इन शब्दोंमें कहा है-‘एकस्य बद्धो न तथा परस्य’ अर्थात् व्यवहारनयकी अपेक्षा आत्मा बद्ध है, निश्चयनयकी अपेक्षा आत्मा बद्ध नहीं है। क्योंकि निश्चयनयका विषय दो द्रव्योंका या दो द्रव्योंकी पर्यायोंका सम्बन्ध नहीं है और अकेले जीवके बंधकी उपपत्ति नहीं बनती; जैसा कहा भी है-'स्वयं एकस्य पुण्यपापास्रवसंवरनिर्जराबंधमोक्षानुपपत्तेः। -समयसार गाथा १३ टीका

आप लिखते हैं-असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा उसके उस अपराधको ज्ञानावरणादि कर्मोंपर आरोपित कर यह कहा जाता है कि ज्ञानावरणादि कर्मोंके कारण वह बद्ध है।’ असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा जीव ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है यह बात सत्यार्थ है, किन्तु आपने इस सत्य सरल कथनको तरोड़-मरोड़कर आरोपित आदि शब्दोंके प्रयोग द्वारा असत्य तथा जटिल बनानेका प्रयास किया है जो शोभनीक नहीं है। व्यवहार और निश्चय दो नय हैं और भगवान्का उपदेश भी इन दो नयों द्वारा हुआ है। दोनों ही नयोंका विषय अपनो-अपनी नयकी दृष्टिसे सत्यार्थ है। किन्तु एक नयकी दृष्टिमें दूसरे नयका विषय न होनेसे उस दूसरे नयके विषयको अभूतार्थ कहा जाता है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि दूसरे नयका विषय आकाशके पुष्पके समान सर्वथा असत्यार्थ है। इसी बातको श्री अमृतचन्द्र सूरि समयसार गाथा १४ में इन शब्दों द्वारा प्रकट करते हैं-अनादि कालसे बँधे हुए आत्माका, पुद्गलकर्मोंसे बंधने-स्पर्शित होनेरूप अवस्थासे अनुभव करनेपर बद्धस्पृष्टता भूतार्थ है-सत्यार्थ है, तथापि पुद्गलसे किंचित् मात्र भी स्पर्शित न होने योग्य आत्मस्वभावके समीप जाकर अनुभव करने पर बद्धस्पृष्टता अभूतार्थ है-असत्यार्थ है।’ अर्थात् जीवकी एक ही बंध अवस्थाको व्यवहार और निश्चय दो भिन्न-भिन्न दृष्टियोंसे देखने पर सत्यार्थ और असत्यार्थ दिखाई देती है। इसका यह अर्थ नहीं है कि व्यवहारनय असत्यार्थ है या व्यवहार नयका विषय सर्वथा असत्यार्थ है। ‘जीव ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है’ जब यह व्यवहारनयकी दृष्टिसे सत्यार्थ है तो उसमें जो आरोपादि शब्दोंका प्रयोग हुआ है वह विपरीत मान्यताके कारण हुआ है। श्री श्लोकवार्तिक पृ० १५१ पर भी कहा है-

तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे कार्यकारणभावो द्विष्ठः सम्बन्धः संयोग-समवायादिवत्प्रतीतिसिद्धत्वात् पारमार्थिकः एव न पुनः कल्पनारोपितः, सर्वथाप्यनवद्यत्वात्।

अर्थात् व्यवहारनयसे दो पदार्थोंमें रहनेवाला कार्य-कारणभाव परमार्थ है, काल्पनिक नहीं तथा सर्वथा निर्दोष है। अन्य प्रश्नोंके उत्तरमें आपने भी व्यवहारनयके विषयको सत्यार्थ माना है।

'मोहनीय आदि द्रव्यकर्मोंका चय होता है तब विकारका निमित्त कारण हट जानेसे आत्माके राग-द्वेष आदि नैमित्तिकभाव दूर हो जाते हैं, व ‘कर्म, रागद्वेष आदि आत्माके विभावभावोंके प्रेरक निमित्तकारण हैं और रागद्वेष आदि आत्माके विकृत भाव मोहनीय आदि द्रव्यकर्मके प्रेरक निमित्त कारण हैं।’ इन दोनों कथनोंको आप परस्पर विरुद्ध बतलाते हैं। किन्तु इन दोनों कथनोंमें कोई विरुद्धता नहीं है। जिस प्रकारका जितने अनुभागको लिये घातिया कर्मोंका उदय होता है उसके अनुरूप आत्माके परिणाम अवश्य होते हैं। इसका सविस्तर कथन प्रथम प्रश्नके द्वितीय प्रपत्रमें हम कर चुके हैं। सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती क्षपक-श्रेणीवाले जीवके परिणाम बहुत विशुद्ध होते हैं और उदयागत मोहनीय कर्मोंकी शक्ति अतिसूक्ष्म होती है, किन्तु उस सूक्ष्म लोभके अनुरूप आत्माके परिणाम होते हैं उदयागत घातिया कर्मोंके अनुरूप आत्माके परिणाम होते हैं, इसलिये कर्मोंको प्रेरक कारण कहा है। सहकारी कारणोंके सम्बन्ध सहित राग-द्वेषरूप आत्मापरिणामसे कर्मबंध होता है अतः आत्मपरिणाम कर्मबंधके कारण हैं। कहा भी है-

प्रेर्यते कर्म जीवेन जीवः प्रेर्यत कर्मणा। एतयोः प्रेरको नान्यो नौ-नाविकसमानयोः ॥ १०६ ॥
-उपासकध्ययन पृ० २९ ज्ञानपीठ बनारस अथवा यशस्तिलकचम्पू

अर्थ-जीव कर्मको प्रेरित करता है और कर्म जीवको प्रेरित करता है। इन दोनोंका सम्बन्ध नौका और नाविकके समान है। कोई तीसरा इन दोनोंका प्रेरक नहीं।

क्लेशाय कारणं कर्म विशुद्धे स्वयमात्मनि।
नोष्णमम्बु स्वतः किन्तु तदौष्ण्यं वह्निसंश्रयम् ॥ २४७ ॥ -उपासकाध्ययन

अर्थ-आत्मा स्वयं विशुद्ध है और कर्म उसके क्लेशका कारण है। जैसे जल स्वयं गर्म नहीं होता, किन्तु आगके सम्बन्धसे उसमें गर्मी आ जाती है।

कर्मोदय क्लेश ( रागद्वेष मोह ) का कारण है। कर्मोंका क्षय हो जानेपर अर्थात् कारणका अभाव हो जाने पर रागद्वेषादि कार्यका भी अभाव हो जाता है। मोक्षशास्त्र अध्याय १० प्रथम सूत्रमें भी इसी प्रकार कहा है। जब दोनों कथन आगमानुकूल हैं तब उनमें परस्पर विरोध आपको कैसे दृष्टिगोचर हो गया।

जिस निमित्तके अनुरूप कार्य हो वह प्रेरक निमित्त है। न मालूम आपको यह कैसे ज्ञात हो गया कि जो निमित्त बलात् कार्यके स्वकालको छोड़कर आगे-पीछे पर द्रव्यमें उत्पन्न करता हो वह प्रेरक निमित्त है।’

स्वकालका अर्थ परिणमन है, क्योंकि प्रत्येक द्रव्य अपने स्वभावसे प्रतिक्षण परिणमन करता रहता है। यह लक्षण सब द्रव्योंमें घटित हो जाता है, इसलिये यह उनका स्वकाल है। इसी प्रकार श्रीमान् पं० फूलचन्द्रजीने भी पंचाध्यायी पृ० ६५ के विशेषार्थमें कहा है-

स्वकालका अर्थ ग्रहण होनेसे उसका अर्थ परिणमन लिया गया है। जितने भी पदार्थ हैं वे यद्यपि सदा ही परिणमनशील हैं तथापि इस परिणमनकी धारामें एकरूपता बनी रहती है, जीवका अजीव हो जाय, या अजीवका जीव हो जाय ऐसा कभी नहीं होता।

स्वकालके इस लक्षण द्वारा आगे पीछेका प्रश्न ही नहीं उठता। दूसरे आप भी जानते हैं और प्रत्यक्ष अनुभवमें भी आता है कि विकारी पर्यायोंका कोई काल सर्वथा नियत नहीं है। जिस समय उभय ( अंतरंग-बहिरंग ) निमित्ताधीन जो कार्य हो गया वह ही उसका स्वकाल है। प्रतिसमय परिणमन करना द्रव्यका स्वभाव है, किन्तु अशुद्ध द्रव्यके अमुक समय अमुक ही पर्याय होगी ऐसा सर्वथा नियत नहीं है। जब काल, सर्वथा नियत नहीं तो आगे-पीछेका कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। इसका विशेष विवेचन प्रश्न नं० ५ में है।

आप लिखते है ‘जिस प्रकार कर्मोदय-उदीरणा है, उसी प्रकार राग द्वेष परिणाम भी हैं। अतः कर्म आत्माको बलात् परतंत्र रखेगा और राग द्वेष परिणाम बलात् कर्मबंध कराता रहेगा। ऐसी व्यवस्थामें यह आत्मा त्रिकालमें बन्धनसे छूटनेके लिये प्रबल पुरुषार्थ कभी नहीं कर सकेगा और प्रबल पुरुषार्थके अभाव में मुक्तिकी व्यवस्था नहीं बन सकेगी।’ जो कर्मशास्त्रसे अनभिज्ञ हैं उनको इस प्रकारकी शंका उठा करती है, किन्तु जो कर्मशास्त्रके विशेषज्ञ हैं वे भलीभाँति जानते हैं कि प्रत्येक समयमें जो द्रव्यकर्म बंधता है उसमें नाना वर्गणाएँ होती हैं और सभी वर्गणाओंमें समान अनुभाग (फलदान शक्ति) नहीं होती, किन्तु भिन्न-भिन्न वर्गणाओंमें भिन्न-भिन्न अनुभाग अर्थात् किसी वर्गणामें जघन्य किसीमें मध्यम और किसीमें उत्कृष्ट अनुभाग होता है। मध्यम अनुभागके अनेक भेद हैं और वर्गणा भी नाना हैं। इस प्रकार जिस समय जैसा अनुभाग उदयमें आता है उसके अनुरूप आत्माके परिणाम होते हैं, क्योंकि कर्मके अनुभवनका नाम उदय है।

कर्मणामनुभवनमुदयः। उदयो भोज्यकालः।
-प्राकृतपंचसंग्रह पृ० ६७६ भारतीय ज्ञानपीठ

अर्थात् कर्मका अनुभवन उदय है और कर्मके भोगनेका काल ही उदय है। हर समय एक प्रकारका उदय नहीं रहता, क्योंकि वर्गणाओंके अनुभागमें तरतमता पाई जाती है। जिस समय मंद अनुभाग उदयमें आता है उस समय मंद कषायरूप परिणाम होते हैं और उस समय ज्ञान व वीर्यका क्षयोपशमविशेष होनेसे आत्माकी शक्ति विशेष होती है। उस समय यदि यथार्थ उपदेश आदिका बाह्य निमित्त मिले और यह जीव तत्त्वविचारादिका पुरुषार्थ करे तो सम्यक्त्व हो सकता है। जैसे जिस समय नदीका बहाव मंद होता है उस समय मनुष्य यदि प्रयत्न करे तो पार हो सकता है। यह ही प्रश्न श्री ब्रह्मदेव सूरिके सामने भी उपस्थित हुआ था। उन्होंने बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ३७ की टीकामें इस प्रकार समाधान किया है जो ध्यान देने योग्य है-

यहाँ शिष्य कहता है-संसारी जीवके निरन्तर कर्मबन्ध होता रहता है, इसी प्रकार कर्मोंका उदय भी होता रहता है, शुद्ध आत्मध्यानका प्रसंग ही नहीं, तब मोक्ष कैसे हो सकती है? इसका उत्तर देते हैं- शत्रुकी निर्बल अवस्था देखकर जैसे कोई बुद्धिमान विचार करता है कि यह मेरे मारनेका अवसर है, इसलिये पुरुषार्थ करके शत्रुको मारता है। इसी प्रकार कर्मोंकी भी सदा एकरूप अवस्था नहीं रहती, स्थिति और अनुभागकी न्यूनता होने पर जब कर्म लघु अर्थात् मंद होते हैं तब बुद्धिमान् भव्य जीव, आगम भाषासे क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य और करण इन पाँच लब्धियोंसे और अध्यात्मभाषामें निज शुद्धात्माके सम्मुख परिणाममयी निर्मल भावना विशेषरूप खड्गसे पौरूष करके कर्म शत्रुको नष्ट करता है।

इसी बातको इष्टोपदेशके टीकाकारने भी इन शब्दों द्वारा कहा है-

कत्थ वि बालियो जीवो कत्थ वि कम्माइ हुंति बलियाइं।
जीवस्स य कम्मस्स य पुव्वविरुद्धाइ बइराइ॥
-इष्टोपदेश गाथा ३१ टीका

अर्थ-कभी जीव बलवान् होता है तो कभी कर्म बलवान् हो जाता है। इस तरह जीव और कर्मोंका अनादिसे वैर चला आ रहा है। इससे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि सदाकाल कर्मोदय एक प्रकारका नहीं रहता, इसलिये जब जीव बलवान् होता है तब जीव अपना हित चाहता है जैसा कि इष्टोपदेश गाथा ३१ में कहा है-

जीवो जीवहितस्पृहः ।····
स्वस्वप्रभावभूयस्त्वे स्वार्थं को वा न वाञ्छति ॥

अर्थात् जीव, जीवका हित चाहता है। सो ठीक ही है, अपने प्रभावके बढ़ने पर अपने स्वार्थको कौन नहीं चाहता। अर्थात् जीवके बलवान् हो जाने पर जीव अपना अनन्तसुखरूपी हित करता है।

इन आगमप्रमाणोंसे सिद्ध हो जाता है कि कर्मको प्रेरक निमित्तकारण मानने पर भी मोक्षरूपी पुरुषार्थमें कोई कठिनाई नहीं आती।

प्रेर्यमाणाः पुद्गलाः’ का जो वाच्य अर्थ है वह ही जिनागममें इष्ट है, क्योंकि शब्दोंका और अर्थका परस्पर वाच्य-वाचकसम्बन्ध है। इस सम्बन्धको स्वीकार न करके शब्दोंका यदि अपनी इच्छा अनुसार अर्थ किया जायगा तो सब विप्लव हो जायगा, संसारमें कोई व्यवस्था न रहेगी। ‘प्रेर्यमाणाः’ शब्दसे यदि आचार्योंको प्रेरक अर्थका बोध कराना इष्ट नहीं था तो वे अन्य शब्दका प्रयोग कर सकते थे। अतः आपका यह लिखना ‘आगममें प्रेर्यमाणाः पुद्गलाः इत्यादि वचन पढ़कर प्रेरक कारण स्वीकार करना अन्य बात है पर उसका जिनागममें क्या अर्थ इष्ट है इसे समझ कर सम्यक् निर्णयपर पहुँचना अन्य बात है।’ ठीक नहीं है, क्योंकि स्वइच्छा अनुसार अर्थका अनर्थ करके अपनी गलत मान्यताको पुष्ट करना उचित नहीं है।

आपने जो समयसार गाथा ११६ का टीकार्थ उद्धृत किया है उससे यह सिद्ध नहीं होता कि जीव परिणाम निमित्त बिना ही पुद्गल द्रव्य कर्मभावरूप परिणम जाता है। उसमें तो मात्र उन अन्य मतोंका खण्डन किया है जो द्रव्यको सर्वथा अपरिणामी अर्थात् नित्य कूटस्थ मानते हैं। यदि आपके अभिप्रायानुसार यह मान लिया जावे कि आत्मपरिणाम निमित्त बिना पुद्गल कर्मभावरूप परिणम जाता है तो समयसार गाथा ८०-८१ से विरोध आ जायगा जिसमें ‘जीवपरिणामहेदु’ शब्द है।

‘करता है, परिणमाता है, उत्पन्न करता है, ग्रहण करता है, त्यागता है, बाँधता है, प्रेरता है’ इत्यादि शब्दों द्वारा आगममें प्रायः प्रेरकनिमित्तकी सामर्थ्यको प्रकट किया है। स्वकालका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है। समयसार गाथा १०७ व उसकी टीकासे स्पष्ट है कि वह गाथा निमित्तकारणकी अपेक्षासे नहीं लिखी गई, किन्तु उपादानकी अपेक्षासे लिखी गई है। जैसा कि टीकामें ‘व्याप्यव्यापक’ शब्दसे स्पष्ट है। इससे प्रेरक निमित्तकर्ताका खण्डन नहीं होता। निमित्तकर्ताको आपने स्वयं प्रश्न नं० १ व प्रश्न नं० १६ के उत्तरमें स्वीकार भी किया है।

श्लोकवार्तिक पृ० ४१० का कथन प्रेरक निमित्तकारणके विषयमें नहीं है, किन्तु धर्मादि द्रव्योंके विषयमें है जो अप्रेरक हैं। दूसरे निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध निश्चयनयका विषय नहीं है, किन्तु व्यवहारनयका विषय है, क्योंकि दो या दोसे अधिक भिन्न वस्तुओंका परस्पर सम्बन्ध व्यवहारनयका विषय है। जैसा कि ‘भिन्नवस्तुविषयोऽसद्भूतव्यवहारः।’ आलापपद्धतिमें कहा है और आपने भी इसी प्रश्नके प्रथम उत्तरमें माना है। इसीलिये श्री श्लोकवार्तिक पृ० ४१० पर यह स्पष्ट लिख दिया है कि ‘व्यवहारनयकी अपेक्षासे विचार करने पर ही उत्पादादिक सहेतुक प्रतीत होते हैं।’ और पृ० १५१ पर भी लिखा है-‘व्यवहारनयका आश्रय करने पर कार्य-कारणभाव दो पदार्थोंमें रहनेवाला भाव सिद्ध होता है। वह वास्तविक है, काल्पनिक नहीं है, सर्वथा निर्दोष है।’

धवल पु ६ पृ० १६२ में पुरुषवेद, हास्य, रति तथा देवगति, समचतुरस्रसंस्थान आदि ११ शुभ-नामकर्म व उच्चगोत्र कर्मोंका उत्कृष्ट स्थितिबंध दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम बतलाया है और सूत्र १८ में नपुंसकवेद, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा तथा नरकगति, तिर्यग्गति, एकेन्द्रियजाति, पंचेन्द्रियजाति आदि नामकर्मकी प्रकृतियोंका व नीचगोत्रका उत्कृष्ट स्थितिबंध बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम कहा है। इसपर प्रश्न स्वाभाविक है कि नोकषाय, नामकर्म व गोत्रकी उत्तर प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबंध एक समान होना चाहिये, यह विभिन्नता क्यों? इसका उत्तर श्री वीरसेनस्वामीने पृ० १६४ में दिया है। उसका तात्पर्य यह है कि-

( १ ) सूत्र १६ की प्रकृतियोंकी अपेक्षा सूत्र १८ की प्रकृतियोंमें विशेषता है, इसलिये इनके उत्कृष्ट स्थितिबंधमें अन्तर है।

( २ ) सभी कार्य एकान्तसे बाह्य अर्थ ( कारण ) की अपेक्षा करके ही नहीं उत्पन्न होते । इसलिये कहीं पर भी अंतरंग कारणसे ही ( उपादान कारणके समान ) कार्यकी उत्पत्ति होती है ऐसा निश्चय करना चाहिये।

यहाँ पर शालि-धान्यके बीजसे जौकी उत्पत्तिका निषेध करनेसे भी यह ही फलितार्थ होता है कि अंतरंग कारणसे ही अर्थात् उपादानकारणके समान ही कार्यकी उत्पत्ति होती है, क्योंकि,

उपादानकारणसदृशं कार्यं भवतीति वचनात्।

अर्थात् उपादानकारणके सदृश कार्यकी उत्पत्ति होती है ऐसा आगमका वचन है। नं० २में ‘एकान्तसे’ शब्द पर ध्यान देनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि इस नं० २ में उनकी मान्यताका निषेध किया गया है जो उपादानकी शक्ति बिना ही मात्र निमित्तकारणोंसे कार्यकी उत्पत्ति मानते हैं, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि निमित्तकारणोंके बिना ही कार्यकी उत्पत्ति हो जायगी। ‘एकान्तसे’ शब्दके प्रयोगकी कोई आवश्यकता न थी। यद्यपि कार्य उपादानके सदृश होता है तथापि ऐसा भी नहीं है-उसपर बाह्य कारणोंका प्रभाव न पड़ता हो ! वहके वही बीज होनेपर भी भूमिकी विपरीततासे निष्पत्ति ( फल )की विपरीतता होती है, अर्थात् भूमिमें उसी बीजका अच्छा अन्न उत्पन्न होता है और खराब भूमिमें वही अन्न खराब हो जाता है या अन्न उत्पन्न ही नहीं होता ( प्रवचनसार गाथा २५५ की टीका )। इसी प्रकार वर्षाका जल एक ही प्रकारका है, किन्तु नीमके वृक्षके सम्बन्धसे वह कटुक रसरूप परिणम जाता है और ईखके सम्बन्धसे वह मधुर रसरूप परिणम जाता है। इस प्रकारके अनेकों दृष्टान्त आगममें दिये गये हैं और प्रत्यक्ष भी अनुभवमें आते हैं। इस प्रकार धवल पु ६ पृ० १६४ से निमित्तकारणका खण्डन नहीं होता, मात्र इतना सिद्ध होता है कि उपादानके सदृश कार्य होता है। लोहेसे लोहेके आभूषण बनेंगे और सुवर्णसे सुवर्णके आभूषण बनेंगे यह तो नियम है। किन्तु अमुक समय अमुक ही आभूषण बनेगा ऐसा कोई नियम नहीं है, क्योंकि कार्यकी उत्पत्ति अंतरंग और बहिरंग निमित्ताधीन है ऐसा वस्तुस्वभाव है। ( स्वयंभूस्तोत्र ६० )। अतः यह लिखना ‘सर्वत्र कार्यकी उत्पत्ति मात्र अंतरंग कारणसे ही होती है।’ एकान्त मिथ्यात्वका द्योतक तथा आगम व प्रत्यक्षविरुद्ध है तथा स्ववचन बाधित भी है, क्योंकि आपने प्रश्न नं० ११ के प्रथम उत्तरमें स्वभाव पर्यायमें कालादि साधारण निमित्त तथा विकारी पर्यायमें विशेष निमित्त स्वीकार किये हैं। इसी प्रकार अन्य प्रश्नोंके उत्तरमें भी आपने अंतरंग और बहिरंग दोनों कारणोंसे ही कार्यकी उत्पत्ति स्वीकार की है। प्रश्न नं० १ के द्वितीय उत्तरमें आपने स्वयं लिखा है-‘ऐसा नियम है कि प्रत्येक द्रव्यके किसी भी कार्यके पृथक् उपादान कारणके समान उसके स्वतंत्र एक या एकसे अधिक निमित्तकारण भी होते हैं। इसीका नाम कारकसाकल्य है। और इसीलिये जिन आगममें सर्वत्र यह स्वीकार किया गया है कि उभय निमित्तसे कार्यकी उत्पत्ति होती है।’

आपने धवल पु० १२ पृ० ३६ की कुछ पंक्तियोंको उद्धृत करते हुए यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि अंतरंग कारण प्रधान है। यदि वह पूर्ण प्रकरण दे दिया गया होता तो यह स्पष्ट हो जाता कि अंतरंग कारणसे क्या प्रयोजन है। अब प्रश्न यह रह जाता है कि सर्वत्र अंतरंग कारण प्रधान है या इस विवक्षित स्थलपर प्रधान है? सर्वप्रथम विवक्षित स्थलकी मीमांसा की जाती है। पृ० ३५ सूत्र ४६ में यह कहा गया है कि ‘भावकी अपेक्षा नामकर्मकी जघन्य वेदना अनन्तगुणी है॥४६॥’ इसके पश्चात् सूत्र ४७में यह कहा गया है कि ‘उससे ( नामकर्मकी जघन्य वेदनासे ) वेदनीयकर्मकी जघन्य वेदना अनन्तगुणी है ॥४७॥ वेदनीयकर्मकी जघन्य वेदना चौदहवें गुणस्थानके अन्तिम समयमें होती है। जिसके असाता वेदनीयका उदय होनेके कारण साता वेदनीयका द्विचरम समयमें क्षय हो गया है और चरम समयमें मात्र असातावेदनीय रह गई है। और नामकर्मका जघन्य अनुभाग, हतसमुत्पत्तिक कर्मवाले सूक्ष्म निगोदिया जीवके होता है। इसपर यह शंका हुई कि वेदनीय कर्म ( असाता वेदनीयकर्म ) का अनुभाग क्षपकश्रेणीमें संख्यात हजार अनुभाग काण्डकघातोंके द्वारा प्राप्त हो चुका है, इसलिये जो चिरंतन अनुभागकी अपेक्षा अनन्तगुणा हीन होता हुआ अयोगकेवलीके अन्तिम समयमें एक निषेकका अवलंबन लेकर स्थित है वह भला जो क्षपकश्रेणीमें घातको नहीं प्राप्त हुआ है और जो संसारी जीवोंके काण्डकघातोंके द्वारा अपने उत्कृष्टकी अपेक्षा अनन्तगुणा हीन है, ऐसे नामकर्मके अनुभागसे अनन्तगुणा कैसे हो सकता है? इसका उत्तर देते हुए श्री वीरसेन स्वामी लिखते हैं-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि केवल अकषाय परिणाम ही अनुभागघातका कारण नहीं है ( अर्थात् कर्मोंकी फलदानशक्तिके घातका कारण नहीं है )। किन्तु प्रकृतिगत शक्तिकी अपेक्षा रखनेवाला परिणाम अनुभागघातका कारण है। उसमें भी अंतरंग कारण प्रधान है, उसके उत्कृष्ट होनेपर बहिरंग कारणके स्तोक रहनेपर भी अनुभागघात बहुत देखा जाता है तथा अंतरंगके स्तोक रहनेपर बहिरंग कारणके बहुत होते हुए भी अनुभागघात बहुत नहीं होता।’ यहाँ पर यह विचार करना है कि अंतरंग कारण कौन है ‘अकषाय परिणाम’ या प्रकृतिगत शक्तिकी अपेक्षा रखनेवाला परिणाम। अकषाय परिणाम तो जीवका है और ‘प्रकृतिगत शक्तिकी अपेक्षा रखनेवाला परिणाम’ पुद्गलका है। यहाँपर पुद्गल परिणामको अंतरंग परिणामसे ग्रहण किया है और जीवपरिणामको बहिरंग कारण ग्रहण किया है। जो मात्र आत्मपरिणामसे मोक्ष मानते हैं उनके लिये यह विचारणीय हो जाता है कि द्रव्यकर्मकी शक्ति भी अपेक्षित है, मात्र अकषाय परिणामसे ही कर्मोंका घात संभव नहीं है।

इसी धवल पुस्तक १२ में सहकारी कारणोंकी प्रधानता स्वीकार की गई है-

'शंका-एक परिणाम भिन्न कार्योंको करनेवाला कैसे होता है? नहीं, ‘क्योंकि, सहकारी कारणोंके सम्बन्ध भेदसे उसके भिन्न कार्योंके करनेमें कोई विरोध नहीं है।’ -पृ० ४५३।

'शंका-एक संक्लेशसे असंख्यात लोकप्रमाण अनुभागसम्बन्धी छह स्थानोंका बन्ध कैसे बन सकता है?

उत्तर-यह कोई दोष नहीं, क्योंकि, अनुभागबन्धाध्यवसानोंके असंख्यात लोकप्रमाण छह स्थानोंसे सहित सहकारी कारणके भेदके कारण, एक ही संक्लेशसे सहकारी कारणोंके भेदोंकी संख्याके बराबर अनुभाग स्थानोंके बन्धमें कोई विरोध नहीं आता।'-पृ० ३८०।

‘असंख्यात लोकमात्र उत्तर (बहिरंग) कारणोंकी सहायतायुक्त उत्कृष्ट अन्तिम एक विशुद्धिके द्वारा बांधे जानेवाले अनुभागके स्थान असंख्यात लोकमात्र हैं ।’-पृ० १२० ।

इसी वेदनाभावविधानानुयोगद्वारके इन तीन कथनोंसे यह सिद्ध हो गया कि बाह्य सहकारी कारणोंके भेदसे एक ही परिणामसे नाना प्रकारका अनुभागबन्ध होता है । अर्थात् मात्र सहकारी कारणोंके भेदसे अनुभागबन्धमें अन्तर पड़ जाता है । यहाँ पर सहकारी कारणकी प्रधानता है । इस विषयमें एकान्त नियम नहीं, किन्तु अनेकान्त है । कहीं पर अन्तरंग कारणकी प्रधानता होती है तो कहीं पर सहकारी कारणोंकी प्रधानता होती है ।

सहकारी कारणोंकी प्रधानताको स्पष्ट करते हुए श्री वीरसेन स्वामी धवल पु० १ संतपरूवणाणुयोगद्वार सूत्र १२१ की टीका में लिखते हैं-

‘मात्र संयम ही मनःपर्ययज्ञानकी उत्पत्तिका कारण नहीं है, किन्तु अन्य भी मनःपर्ययज्ञानकी उत्पत्तिके कारण हैं, इसलिये उन दूसरे हेतुओंके न रहनेसे समस्त संयतोंके मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न नहीं होता है । वे दूसरे कौनसे कारण हैं ? विशेष जातिके द्रव्य, क्षेत्र, कालादि अन्य कारण हैं जिनके बिना संयतों के मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न नहीं होता है ।’

इस प्रकार 'मात्र उपादान कारणसे ही कार्यकी उत्पत्ति हो जाती है और बाह्य कारण अकिंचित्कर हैं इस एकान्त मान्यताका इन आगम प्रमाणोंसे खण्डन हो जाता है ।

प्रश्न नं० ६ के उत्तरोंकी चरचा तो यथास्थान की जा चुकी है । आपने यह लिखा है कि व्यवहारके विषयको निश्चयरूप मानकर उत्तर दिये गये हैं । इसमें यदि ‘निश्चय’ से अभिप्राय वास्तवका है तो हमको इष्ट है । यदि अभिप्राय निश्चयनयसे है, तो आपने निश्चयनयके स्वरूप पर दृष्टि नहीं दी । निश्चयनयकी दृष्टिमें न बंध है, न मोक्ष है । बन्ध तो व्यवहारनयका विषय है । आप बन्धको भी निश्चयनयका विषय बनाकर बाह्य कारणोंका लोप करना चाहते हैं जो कि आगम और प्रत्यक्षसे विरुद्ध है ।

समयसारकी ‘सम्मत्तपडिणिबद्धं’ इत्यादि तीन गाथाओंमें ‘मिच्छत्तं अण्णाणं और कषायं’ का अभिप्राय द्रव्यकर्मसे है, जैसा कि इन तीन गाथाओंकी उत्थानिका, टीका तथा कलश ११० से स्पष्ट है । उत्थानिका इस प्रकार है-

कर्मणो मोक्षहेतुतिरोधायिभावत्वं दर्शयति ।

अर्थ-आगे कर्मका मोक्षके कारणभूत सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रोंका तिरोधायिपन दिखलाते हैं । -

दूसरी टीकाकी उत्थानिका-

अथ पूर्वं मोक्षहेतुभूतानां सम्यक्त्वादिजीवगुणानां मिथ्यात्वादिकर्मणा प्रच्छन्नं भवतीति कथितम् । इदानीं तद्गुणाधारभूतो गुणी जीवो मिथ्यात्वादिकर्मणा प्रच्छाद्यते इति प्रकटीकरोति ।

अर्थात् पूर्व गाथा १६० में ‘सव्वणाणदरिसी कम्मरएण अवच्छण्णो’ (सबको जाननेवाला और देखनेवाला है तो भी कर्मरूपी रजसे आच्छादित हुआ ) पदके द्वारा यह बतलाया जा चुका है कि मोक्षके कारण सम्यक्त्वादि जीवगुण मिथ्यात्व आदि कर्मोंके द्वारा आच्छादित हैं । अब उन गुणोंका आधारभूत गुणी जीव, मिथ्यात्वादि कर्मोंके द्वारा आच्छादित है इस बातको प्रकट करते हैं । इन तीनों गाथाओंकी टीकामें श्री जयसेन आचार्य लिखते हैं-

शुभाशुभमनोवचनकायव्यापाररूपं तद्व्यापारेणोपार्जितं वाशुभाशुभकर्म मोक्षकारणं न भवति ।

अर्थात् - शुभाशुभ मन-वचन-कायका व्यापार तथा उस व्यापारसे उपार्जित शुभाशुभ कर्म मोक्षके कारण नहीं होते ।

शुभाशुभ मन-वचन-काययोगके द्वारा शुभाशुभ द्रव्यकर्मका आस्रव होता है ऐसा तत्त्वार्थसूत्र अध्याय छहमें कहा गया है । इस टीकासे भी स्पष्ट है कि इन तीन गाथाओंमें कर्मसे अभिप्राय द्रव्यकर्मसे है । इन गाथाओंके दूसरे कलशमें आये हुए ‘यावत्पाकमुपैति’ (जब तक कर्म विपाकका उदय है) तथा ‘समुल्लसत्य-वशतो यत्कर्म’ (कर्मके उदयकी जबरदस्तीसे आत्माके वश बिना कर्म उदय होता है) । इसी कलशकी उत्थानिकामें महान् विद्वान् तथा अनेकों ग्रन्थोंके आगमानुकूल अनुवाद करनेवाले श्रीमान् पं० जयचन्द्र जी इस प्रकार लिखते हैं -

आगे आशंका उत्पन्न होती है कि अविरतसम्यग्दृष्टि आदिके जब तक कर्मोदय है तब तक ज्ञान मोक्षका कारण कैसे हो सकता है ।

इस उत्थानिकासे भी यही ज्ञात होता है कि इन तीन गाथाओंमें द्रव्यकर्मका प्रकरण है । कलश नं० १११ का जो अर्थ आपने दिया है उसमें भी,ज्ञानावरणादि पुद्गलकर्मपिंड’ पद द्रव्यकर्मका द्योतक है ।

आप लिखते हैं कि ‘यद्यपि निमित्तोंका सम्यग्ज्ञान करानेके लिये आगममें कर्मोंकी मुख्यतासे व्यवहार-नयप्रधान कथन बहुबलतासे आया है इसमें सन्देह नहीं, परन्तु इस जीवको संसारका कारण इसका अपना अपराध है ।’ ‘इसमें यद्यपि निमित्तोंका सम्यग्ज्ञान करानेके लिये’ ये शब्द किसी आगमके तो हैं नहीं, किन्तु आपकी निजी नवीन कल्पना है जो कि मान्य नहीं है । व्यवहारनय प्रधान इसलिये है कि दो भिन्न द्रव्योंका परस्पर सम्बन्ध व्यवहारनयका विषय है, निश्चयनयका विषय नहीं है ऐसा आपको भी स्वीकार है । ‘अपराध’ सहेतुक है या निर्हेतुक है ? यदि निर्हेतुक है तो वह जीवका स्वभाव हो जायगा और नित्य हो जायगा, क्योंकि जो स्व-परप्रत्यय नहीं वह स्वाभाविक पर्याय है ऐसा आपने प्रश्न नं० ४ व ११ के उत्तरमें स्वीकार किया है । दूसरे जिसका कोई हेतु नहीं होता और विद्यमान है वह नित्य है ( आप्त-परीक्षा पृ० ४ वीरसेवामन्दिर ) । यदि अपराध सहेतुक है तो हेतुके अभावके बिना अपराधका भी अभाव नहीं हो सकता । जैसा कि समयसार गाथा २८३-२८५ की टीकामें श्री अमृतचन्द्र आचार्यने स्पष्ट शब्दोंमें लिखा है-‘आत्मा आपसे रागादि भावोंका अकारक है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि पर द्रव्य तो निमित्त हैं और नैमित्तिक आत्माके रागादिक भाव ( अपराध ) हैं । जब तक रागादिकका निमित्तभूत पर द्रव्यका प्रतिक्रमण तथा प्रत्याख्यान न करे तब तक नैमित्तिकभूत रागादि भावों ( अपराधों ) का प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान नहीं हो सकता ।’ इसलिये अपराधके कारणरूप पर-द्रव्यका प्रथम त्याग होना चाहिये । उस के पश्चात् ही अपराधका दूर होना सम्भव है । यह सत्य है कि अपराध दूर हुए बिना कल्याण नहीं हो सकता, किन्तु उस अपराधके त्यागका मार्ग क्या है । पर-वस्तुके त्याग बिना अपराधका त्याग सम्भव नहीं है । दिगम्बरेतर समाज तो बाह्य त्याग बिना भी अपराधका त्याग मानते हैं । किन्तु दिगम्बर धर्ममें तो प्रथम पर द्रव्यका त्याग बतलाया है । अथवा पूर्व संस्कारवश कुछ दिगम्बरी भी इतर समाजके समान प्रथम अपराध त्यागको बतलाते हैं ।

आपने कलश २२० उद्धृत किया । किन्तु वह तो एकान्तवादियोंके लिये लिखा गया है, जो मात्र परद्रव्यसे ही रागद्वेषकी उत्पत्ति मानते हैं । जैसा कि कलश नं० २११ में ‘रागजन्मनि निमित्ततां परद्रव्यमेव कलयन्ति ये तु ते’ ( जो पुरुष रागकी उत्पत्तिमें परद्रव्यका ही निमित्तपना मानते हैं ) इन शब्दोंसे स्पष्ट है । यदि ऐसा न माना जावे तो कलश नं० २२० का कलश नं० १६ बन्धाधिकार तथा टीका गाथा नं० २८३-२८५ से विरोधका प्रसंग आजावेगा, किन्तु एक ही ग्रन्थमें पूर्वापर विरोध सम्भव नहीं है ।

आपने लिखा है कि दूराति-दूर भव्य भी मुनिचर्या ( व्यवहारचारित्र )के द्वारा अहमिन्द्र पद पा सकता है, किन्तु आपका ऐसा लिखना आगमानुकूल नहीं है, क्योंकि दूरातिदूर भव्यको शीलवती विधवाका दृष्टान्त दिया गया है । अर्थात् जिस प्रकार शीलवती विधवाके पतिका निमित्तकारण न मिलनेसे पुत्रकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, उसी प्रकार दूरातिदूर भव्यको गुरु उपदेश आदिका निमित्त न मिलनेसे सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं होती, इसीलिये दूरातिदूर भव्य जीव मुनिलिंग अथवा व्यवहारचारित्र धारणकर अहमिन्द्र नहीं हो सकते । दूरातिदूर भव्य-नित्यनिगोदमें होते हैं, क्योंकि उनको कभी भी निमित्तकारण नहीं मिलेगा । जयधवल पु० १ पृ० ३८९ पर कहा भी है-'किन्हीं जीवोंके अवस्थित विभक्तिस्थान ( मोहनीय कर्मके २६ प्रकृतिकस्थान ) अनादि अनन्त होता है, क्योंकि जो अभव्य हैं या अभव्योंके समान नित्यनिगोदको प्राप्त हुए भव्य हैं उनके अवस्थित स्थानके सिवाय भुजगार या अल्पतर स्थान ( अन्य स्थान ) नहीं पाये जाते हैं । इस प्रकार दूरातिदूर भव्यके विषयमें आपका कथन आगमानुकूल नहीं है ।

‘व्यवहारचारित्र प्रत्येक दशामें सफल है’ ऐसा कहनेसे हमारा यह प्रयोजन रहा है कि जो भव्य हैं उनके लिये तो व्यवहारचारित्र परम्परा मोक्षका कारण है तथा निश्चय चारित्रका साधक है और जो अभव्य हैं उनको कुगतिमें गिरनेसे बचाता है । इस विषयमें निम्न उपयोगी श्लोक है-

वरं व्रतैः पदं दैवं नाव्रतैर्बत नारकं ।
छायातपस्थयोर्भेदः प्रतिपालयतोर्महान् ॥३॥
-इष्टोपदेश

अर्थ-व्रतोंके द्वारा देवपद प्राप्त करना अच्छा है, किन्तु अव्रतोंके द्वारा नरकपद प्राप्त करना अच्छा नहीं है । जैसे छाया और धूपमें बैठनेवालोंमें अन्तर पाया जाता है, वैसे ही व्रत अव्रतके आचरण पालन करनेवालोंमें अन्तर पाया जाता है ।

निश्चय व्यवहार चारित्रकी चर्चा प्रश्न नं० ४ के उत्तरमें सविस्तार हो चुकी है । उसको पुनः यहाँ लिखनेसे पुनरुक्तिका दोष आ जायगा । इस सम्बन्धमें प्रश्न नं० ४ पर हमारा प्रपत्र देखना चाहिये ।

आपने सर्वार्थसिद्धि ७।१९की टीका उद्धृत की है । उसमें आपने इन पदों पर ध्यान नहीं दिया है-

चारित्रमोहोदये सत्यगारसम्बन्धं प्रत्यनिवृत्तः परिणामो भावागारमित्युच्यते ।

चरित्रमोहके उदय होनेसे (२) परसे सम्बन्धका त्याग नहीं किया ऐसे जो परिणाम वे भावागार कहे जाते हैं । इससे तो आपके मतका ही खण्डन होता है-(१) कर्मोदयके होनेपर आत्म-परिणाम होते हैं यहाँ ऐसा कहा गया है जो आपकी मान्यताके विरुद्ध है । (२) ‘घरसे सम्बन्धका त्याग नहीं किया’ ( अर्थात् परवस्तुका त्याग नहीं किया ) इससे भी यह सिद्ध हुआ कि परवस्तुका त्याग किये विना भावोंका त्याग नहीं हो सकता । यह ही तो श्री अमृतचन्द्र सूरिने समयसार गाथा २८३-२८५ की टीकामें कहा है । जिसको आप स्वीकार नहीं कर रहे हैं । भावागारका त्यागवाला घरमें नहीं रह सकता, किन्तु शून्यागारमें ठहर सकता है । आपने यहाँ पर अर्थ ठीक नहीं किया । आपने स्वयं अर्थ इस प्रकार किया था-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ पर भावागार विवक्षित है । चारित्रमोहनीयका उदय होनेपर जो परिणाम घरसे निवृत्त नहीं है वह भावागार कहा जाता है । वह जिसके है वह वनमें निवास करते हुए और घरमें रहते हुए भी आगारी है और जिसके इस प्रकारका परिणाम नहीं वह अनगार है। (ज्ञानपीठ सर्वार्थसिद्धि पृ० ३५७)। इस अर्थमें अनगारको घरमें बैठना नहीं लिखा जब कि वर्तमान अर्थमें अनगारको घर बैठना लिखा है जो आगम अनुकूल नहीं।

आप लिखते हैं कि ‘निश्चयचारित्र होनेपर व्यवहारचारित्र होता है।’ यदि आपके कथनानुसार निश्चयचारित्रपूर्वक व्यवहारचारित्र माना जावेगा तो भावसंयमरूप सातवां गुणस्थान होनेपर वस्त्रत्याग, केशलोंच, महाव्रत धारण आदि व्यवहारचारित्रकी क्रिया होगी, जिसका अर्थ यह होगा कि सप्तम गुणस्थान वस्त्रधारीके हो जायगा और ऐसा होनेसे सवस्त्रमुक्ति सिद्ध हो जायगी जिसका दिगम्बर जैन आर्षग्रन्थोंमें खण्डन है। जिनके पूर्व संस्कार बने हुए हैं ऐसे दिगम्बर तो कह सकते हैं कि निश्चयचारित्रपूर्वक व्यवहार चारित्र होता है, किन्तु जिनको दिगम्बर जैन आर्षग्रन्थोंपर श्रद्धा है वे तो यह ही कहेंगे कि प्रथम केशलोंच, वस्त्रत्याग, महाव्रत आदि ग्रहणके द्वारा मुनिदीक्षाके होनेपर सप्तम गुणस्थान सम्भव है।

जिसके किंचित् मात्र भी त्यागरूप चारित्र नहीं अर्थात् मद्य, मांस, मधु, नवनीत और पाँच उदुम्बर फलका त्याग नहीं वे जिनधर्मोपदेशके भी पात्र नहीं हैं-

अष्टावनिष्टदुस्तरदुरितायतनान्यमूनि परिवर्ज्य।
जिनधर्मदेशनाया भवन्ति पात्राणि शुद्धधियः ॥७४॥
-पुरुषार्थसिद्ध्युपाय

अर्थ-अनिष्ट दुस्तर और पापोंके स्थान इन आठों (५ उदुंबरफल, मद्य-मांस-मधु)का त्याग करके निर्मल बुद्धिवाले पुरुष जिनधर्मके उपदेशके पात्र होते हैं।

मोक्षप्राप्तिका बहुत सुन्दर उपाय श्री अमृतचन्द्र सूरिने निम्न श्लोक द्वारा बतलाया है जिसमें निश्चय व व्यवहारको समान रखा है-

सम्यक्त्वचारित्रबोधलक्षणो मोक्षमार्ग इत्येषः।
मुख्योपचाररूपः प्रापयति परे पदे पुरुषं ॥२२२॥
-पुरुषार्थसिद्ध्युपाय

अर्थ-निश्चय-व्यवहाररूप सम्यग्दर्शन-चारित्र-ज्ञानलक्षणवाला मोक्षमार्ग आत्माको परम पद प्राप्त करावे है अर्थात् निश्चय-व्यवहाररूप धर्म ही बन्धसे छूटनेका उपाय है।

नोट-इस विषयमें प्रश्न नं० ४ का व्यवहार धर्म व निश्चय धर्मका विवरण देखिये।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका ९

मूल प्रश्न ९ - सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बंधा हुआ है और किसीसे बँधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ? यदि वह बद्ध है तो उसके बन्धनोंसे छूटनेका उपाय क्या है ?

शंका ९, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग १/२)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५७८ से ६००

↑ सूची


प्रतिशंका ३ का समाधान

१ उपसंहार

अपने प्रथम उत्तरमें ही हमने यह स्पष्ट कर दिया था कि संसारी जीव अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा बद्ध है और वह रागादि विकारी भावोंसे बद्ध है, असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा उसमें बद्ध होनेका व्यवहार है और इस अपेक्षासे वह ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है। शुद्ध निश्चयनयसे वह सदा चैतन्यमूर्ति है, इसलिए इनसे बद्ध नहीं है। परतन्त्रताका विचार भी इसी प्रकार कर लेना चाहिए। बन्धनसे छूटनेके उपायका निर्देश करते हुए बतलाया था कि अपने परम निश्चय परमात्मस्वरूप आत्माका अवलम्बन लेनेसे तन्मय परिणमन द्वारा वह मुक्त होता है। साथ ही यह भी बतला दिया गया था कि उसके अन्तरंगमें निश्चय रत्नत्रयस्वरूप जितनी जितनी विशुद्धि प्राप्त होती जाती है उसके अनुपातमें इसके द्रव्य-भाव कर्मका भी अभाव होता जाता है।

इस पर अपर पक्षका कहना है कि ‘जीवका राग-द्वेषादि भावोंके साथ व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है, बन्ध्य-बन्धक सम्बन्ध नहीं।…इसलिए जीव ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध और परतन्त्र है। मोहनीय आदि द्रव्य-कर्म राग-द्वेषादि विकारी भावोंके प्रेरक निमित्त कारण हैं तथा आत्माके राग-द्वेष आदि विकृत भाव मोहनीय आदि द्रव्य कर्मबन्धके प्रेरक निमित्त कारण हैं। जब आत्माके प्रबल पुरुषार्थसे मोहनीय आदि द्रव्यकर्मोंका क्षय होता है तब विकारका निमित्त कारण हट जानेसे राग-द्वेष आदि नैमित्तिक विकार भाव दूर हो जाते हैं। उस दशामें आत्माकी परतन्त्रता भी दूर हो जाती है।’ आदि,

अपने दूसरे उत्तरमें हमने अपने प्रथम उत्तरका तो समर्थन किया ही है, साथ ही पिछली प्रतिशंकामें जिन विशेष बातोंकी चरचा की गई है उन पर भी विचार किया है। इसमें प्रेरक कारणका आशय क्या है इस पर सुन्दर प्रकाश डाला गया है।

\२. प्रतिशंका ३ का समाधान

प्रतिशंका ३ उपस्थित करते हुए अपर पक्षने मूल प्रश्नको चार खण्डोंमें विभाजित कर दिया है। इनमेंसे (अ) खण्डका जो उत्तर हमने अपने प्रथम और द्वितीय उत्तरमें दिया है वह नयविभागको दिखलाते हुए दिया गया था। (आ) खण्डका उत्तर भी उसीसे हो जाता है।

(आ) इस खण्ड पर प्रकाश डालते हुए अपर पक्षका कहना है कि ‘रागादिक तो कर्मोदय जनित व्यवहारनयसे आत्माके विकारी भाव हैं, जो बन्धके कारण होनेसे भावबन्ध कहे जाते हैं। उनसे जीवका कथंचित् व्याप्य-व्यापकसंबन्ध तो है, क्योंकि विकार पर्याय है; किन्तु स्वपर्यायके साथ बन्ध्य-बन्धक सम्बन्ध कदापि नहीं हो सकता।’

समाधान यह है कि द्रव्यकर्मके उदयको निमित्तकर आत्मामें जो विकारी भाव रागादि उत्पन्न होते हैं वे अशुद्धनिश्चयनयसे जीवके ही हैं । अध्यात्ममें शुद्ध निश्चयनयकी मुख्यता है । इसलिए उन्हें वहाँ व्यवहारनयसे जीवका कहा गया है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य जयसेन समयसार गाथा ५७ की टीकामें लिखते हैं-

ननु वर्णादयो बहिरंगास्तत्र व्यवहारेण क्षीर-नीरवत्संश्लेषसम्बन्धो भवतु नाचाभ्यन्तराणां रागादीनाम्; तत्राशुद्धनिश्चयेन भवितव्यमिति ? नैवम्, द्रव्यकर्मबन्धापेक्षया योऽसौ असद्भूतव्यवहारस्तदपेक्षया तारतम्यज्ञापनार्थं रागादीनामशुद्धनिश्चयो भण्यते । वस्तुतस्तु शुद्धनिश्चयापेक्षया पुनरशुद्धनिश्चयोऽपि व्यवहार एवेति भावार्थः ।

शंका-वर्णादिक वहिरंग हैं । वहाँ व्यवहारसे क्षीर-नीरके समान संश्लेषसम्बन्ध होओ, अभ्यन्तर रागादिकका यह सम्बन्ध नहीं बनता, वहाँ अशुद्ध निश्चय होना चाहिए ?

समाधान-ऐसा नहीं, क्योंकि द्रव्यकर्मबन्धकी अपेक्षा जो असद्भूत व्यवहार है उसकी अपेक्षा तारतम्यका ज्ञान करानेके लिए रागादिको अशुद्ध निश्चय कहा जाता है। वास्तवमें तो शुद्ध निश्चयकी अपेचा अशुद्ध निश्चय भी व्यवहार ही है, यह उक्त कथनका भावार्थ है।

इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि रागादि जीवके हैं इस कथनको जो व्यवहार कहा गया है वह शुद्ध निश्चयकी अपेक्षा अशुद्ध निश्चय भी व्यवहार है इस तथ्यको ध्यानमें रख कर ही कहा गया है । अपर पक्षने जीवमें और रागादिकमें व्याप्य-व्यापकभाव तो स्वीकार किया ही है, इसलिए वे अशुद्धनिश्चयसे जीवके ही हैं ऐसा स्वीकार करनेमें भी अपर पक्षको आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।

अपर पक्षका कहना है कि वे (रागादि भाव) ‘बन्धके कारण होनेसे भावबन्ध कहे जाते हैं ।’ समाधान यह है कि वे मात्र बन्धके कारण होनेसे भावबन्ध नहीं कहे गये हैं, किन्तु वस्तुतः जीव उनके साथ एकत्व (तादात्म्य) रूप परिणम रहा है, इसलिए यथार्थमें जीवके साथ बद्ध होनेसे आगममें उन्हें भावबन्धरूप कहा गया है । धवला पु० १४ पृ० २ में बन्धका लक्षण करते हुए लिखा है-

दव्वस्स दव्वेण दव्व-भावाणं वा जो संजोगो समवाओ वा सो बंधो णाम ।

द्रव्यका द्रव्यके साथ तथा द्रव्य और भावका क्रमसे जो संयोग और समवाय है वह बन्ध कहलाता है ।

इससे सिद्ध है कि रागादि भाव द्रव्यकर्मबन्धके कारण होनेमात्रसे भावबन्ध नहीं कहलाते, किन्तु एक तो वे जीवके भाव हैं और दूसरे जीव उनसे बद्ध हैं, इसलिए उन्हें भावबन्ध कहते हैं । अपर पक्ष इसके लिए धवला पु० १४ पर दृष्टिपात करले, सब स्थिति स्पष्ट हो जायेगी ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘स्वपर्यायके साथ वन्ध्य-वन्धक सम्बन्ध कदापि नहीं हो सकता ।’ समाधान यह है कि आगममें बन्धके तीन भेद बतलाये हैं-पुद्गलबन्ध, जीवबन्ध और तदुभयबन्ध । इनका स्वरूप निर्देश हम प्रथम उत्तरमें कर आये हैं । इनमेंसे पुद्गलबन्ध और तदुभयबन्ध ये दोनों बन्ध असद्भूत व्यवहारनयसे कहे गये हैं । तथा जीवबन्ध अशुद्ध निश्चयनयका विषय है । प्रवचनसार गा० १८९ की टीकामें आचार्य जयसेन लिखते हैं-

किं च रागादीनेवात्मा करोति तानेव भुंक्ते चेति निश्चयनयलक्षणमिदम् । अयं तु निश्चयनयो द्रव्यकर्मबन्धप्रतिपादकासद्भूतव्यवहारनयापेक्षया शुद्धद्रव्यनिरूपणात्मको विवक्षितनिश्चयस्तथैवाशुद्धनिश्चयश्च भण्यते । द्रव्यकर्माण्यात्मा करोति भुंक्ते चेत्यशुद्धद्रव्यनिरूपणात्मकासद्भूतव्यवहारनयो भण्यते ।

रागादिकको ही आत्मा करता है और उन्हींको भोगता है यह निश्चयनयका लक्षण है। किन्तु यह निश्चयनय द्रव्यकर्मबन्धके प्रतिपादक असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा शुद्ध द्रव्य अर्थात् स्वाश्रित निरूपण स्वरूप विवक्षित निश्चयनय उसीप्रकार अशुद्धनिश्चयनय कहा जाता है। द्रव्यकर्मोंको आत्मा करता है और भोगता है इस प्रकार अशुद्धद्रव्य अर्थात् पराश्रित निरूपणस्वरूप असद्भूत व्यवहारनय कहा जाता है।

इससे स्पष्ट है कि जैसे जीव और कर्ममें कर्ता-कर्मभाव तथा भोक्ता-भोग्य भाव असद्भूत व्यवहारनयका विषय है वैसे ही इन दोनोंमें बन्ध्य-बन्धकभाव यह भी असद्भूतव्यवहारनयका विषय है। असद्भूत व्यवहारका लक्षण है-भेद होने पर भी अभेदका उपचार करना।

प्रवचनसार गा० १८८ की आचार्य जयसेनकृत टीकामें कहा भी है-

भेदऽप्यभेदोपचारलक्षणेनासद्भूतव्यवहारेण बन्ध इत्यभिधीयते।

इस प्रकार उक्त आगम प्रमाणोंके प्रकाशमें विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि दो द्रव्योंमें बन्ध्य-बन्धकसम्बन्ध यथार्थ तो नहीं है। किन्तु असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा दो द्रव्योंमें परस्पर अत्यन्त भेद होने पर भी अभेदका उपचार करके वह कहा जाता है। इसी तथ्यको वे प्रवचनसार गाथा ९६ की टीकामें स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-

यथा वस्त्रं लोध्रादिद्रव्यैः कषायितं रञ्जितं सन्मञ्जीष्ठादिरङ्गद्रव्येण रञ्जितं सदभेदेन रक्तमित्युच्यते तथा वस्त्रस्थानीय आत्मा लोध्रादिद्रव्यस्थानीयमोहरागद्वेषैः कषायितो रञ्जितः परिणतो मञ्जीष्ठस्थानीयकर्मपुद्गलैः संश्लिष्टः सन् भेदेऽप्यभेदोपचारलक्षणेनासद्भूतव्यवहारेण बन्ध इत्यभिधीयते।

जैसे वस्त्र लोध्रादि द्रव्योंसे कषायित-रंजित होकर मजीठा आदि रंग द्रव्यसे रंगा जाकर अभेदसे रक्त ऐसा कहलाता है उसी प्रकार वस्त्रस्थानीय आत्मा लोध्रादि द्रव्यस्थानीय मोह, राग, द्वेषसे मोह राग द्वेषरूप परिणत होता हुआ मजीठास्थानीय कर्मपुद्गलोंसे संश्लिष्ट होकर भेदमें भी अभेदका उपचार करके असद्भूत व्यवहारनयसे बन्ध ऐसा कहा जाता है।

इससे यह स्पष्ट है कि आत्मा कर्म पुद्गलोंसे बद्ध है यह कथन असद्भूतव्यवहारनयका वक्तव्य होनेसे उपचरित ही है। वास्तविक बन्ध-बन्ध्यकसम्बन्ध कोई दूसरा होना चाहिए, अतः आगे उसीका विचार करते हैं-

\१. भावबन्धके स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए आचार्य अमृतचन्द्र पंचास्तिकाय गाथा १४७ की टीकामें लिखते हैं-

तदत्र मोहरागद्वेषस्निग्धः शुभोऽशुभो वा परिणामो जीवस्य भावबन्धः।

इसलिए यहाँ पर मोह, राग, द्वेषसे स्निग्ध हुआ शुभ और अशुभ परिणाम जीवका भावबन्ध है।

\२. समयसार गाथा ७४ की टीकामें आचार्य जयसेन लिखते हैं-

एते क्रोधाद्यास्रवाः जीवेन सह निबद्धा सम्बद्धा औपाधिकाः।

ये क्रोधादि आस्रव जीवके साथ निबद्ध अर्थात् सम्बद्ध हैं जो औपाधिक हैं।

आचार्य कुन्दकुन्दने उक्त गाथामें ‘जीवणिबद्धा एए’ पदका प्रयोग किया है।

\३. जीवका रागादिके साथ बन्ध है इसे स्पष्ट करते हुए प्रवचनसार गाथा १७७ में लिखा है-

जीवस्स रागमादीहिं।

जीवका रागादिकके साथ बन्ध है।

इसकी सूरिकृत टीकामें बतलाया है-

जीवस्यौपाधिकमोह-राग-द्वेषपर्यायैरेकत्वपरिणामः स केवलजीवबन्धः ।

जीवका औपाधिक मोह, राग और द्वेषरूप पर्यायोंके साथ जो एकत्व परिणाम है वह केवल जीव-बन्ध है ।

\४. बन्ध्य-बन्धकभाव जीव और उनके रागादिभावोंमें किस प्रकार घटित होता है इसे स्पष्ट करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र प्रवचनसार गाथा १७५ की टीकामें लिखते हैं-

अयमात्मा सर्वं एव तावत्सविकल्पनिर्विकल्पपरिच्छेदात्मकत्वादुपयोगमयः । तत्र यो हि नाम नानाकारान् परिच्छेद्यानर्थानासाद्य मोहं वा रागं वा द्वेषं वा समुपैति स नाम तैः परप्रत्ययैरपि मोहरागद्वेषैरुपरक्तात्मस्वभावत्वान्नीलपीतरक्तोपाश्रयप्रत्ययनीलपीतरक्तत्वैरुपरक्तस्वभावः स्फटिकमणिरिव स्वयमेक एव तद्भावद्वितीयत्वाद्बन्धो भवति ।

प्रथम तो यह आत्मा सर्व ही उपयोगमय है, क्योंकि वह सविकल्प और निर्विकल्प प्रतिभासस्वरूप है । उसमें जो आत्मा विविधाकार प्रतिभासित होनेवाले पदार्थोंको प्राप्त करके मोह, राग अथवा द्वेष करता है वह नील, पीत और रक्त पदार्थोंके आश्रयहेतुक नीलेपन, पीलेपन और ललाईरूपसे उपरक्त स्वभाववाले स्फटिक मणिकी भाँति यद्यपि जीवमें मोह, राग और द्वेष परको हेतु करके उत्पन्न हुए हैं तो भी उनसे उपरक्त आत्मस्वभाववाला होनेसे स्वयं अकेला ही बन्धरूप है, क्योंकि जीवके वे रागादिभाव उसके द्वितीय हैं ।

\५. अकेला जीव ही बन्ध है इसे स्पष्ट करते हुए प्रवचनसार गाथा १८८ की सूरिकृत टीकामें लिखा है-

यथात्र सप्रदेशत्वे सति लोध्रादिभिः कषायितत्वात् मञ्जिष्ठरङ्गादिभिरुपश्लिष्टमेकं रक्तं दृष्टं वासः तथात्मापि सप्रदेशत्वे सति काले मोहरागद्वेषैः कषायितत्वात् कर्मरजोभिरुपश्लिष्ट एको बन्धो द्रष्टव्यः, शुद्धद्रव्यविषयत्वान्निश्चयस्य ।

जैसे लोकमें वस्त्र सप्रदेशी होनेसे लोध्र आदिसे कसैला होता है और इसलिये वह मजीठादिके रंगसे संश्लिष्ट होता हुआ अकेला ही रक्त देखा जाता है उसी प्रकार आत्मा भी सप्रदेशी होनेसे यथाकाल मोह, राग, द्वषसे कषायित (मलिन) होनेके कारण कर्मरजसे श्लिष्ट होता हुआ अकेला ही बन्ध है ऐसा जानना चाहिए, क्योंकि निश्चयका विषय शुद्ध ( अकेला ) द्रव्य है ।

\६. इसी प्रवचनसारके परिशिष्टमें निश्चयनयसे अकेला आत्मा ही बन्ध और मोक्षस्वरूप है इसका स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है-

निश्चयनयेन केवलबध्यमानमुच्यमानबन्ध-मोक्षोचितस्निग्धरूक्षत्वगुणपरिणतपरमाणुबन्ध-मोक्षयोरद्वैतानुभूतिः ।

अकेले बध्यमान और मुच्यमान ऐसे बन्ध-मोक्षोचित स्निग्धत्व और रूक्षत्व गुणसे परिणत परमाणुके समान निश्चयनयसे एक आत्मा बन्ध और मोक्षमें अद्वैतका अनुसरण करनेवाला है ।

ये कतिपय आगमप्रमाण हैं कि ये राग, द्वेष और मोहरूप जीवभाव यतः जीवके साथ बद्ध हैं, अतः अज्ञानभावसे परिणत यह आत्मा ही निश्चयसे उनका बन्धक है । इस प्रकार जीव और रागादिभावोंमें भले प्रकार बन्ध्य-बन्धक सम्बन्ध सिद्ध हो जाता है ।

आत्मामें रागादि भाव उत्पन्न हों और वे भावबन्ध भी कहलावें, साथ ही परका आश्रय कर आत्मा ही उन्हें उत्पन्न करे, फिर भी अज्ञानभावसे परिणत आत्माको उनका बन्धक स्वीकार न करना युक्त-युक्त नहीं है ।

विभाव शब्दका स्पष्टीकरण करते हुए अनगारधर्मामृत अध्याय १ श्लोक १०६ की टीकामें लिखा है-

विभावो हि वहिरङ्गनिमित्तम् ।

विभाव बहिरंग निमित्तको कहते हैं ।

इसलिए जितनी भी वैभाविक पर्यायें उत्पन्न होती हैं वे सब स्व-परप्रत्यय होनेसे रागादिकका व्यवहार हेतु परको स्वीकार करनेपर भी निश्चय हेतु अज्ञानभावसे परिणत आत्माको स्वीकार कर लेना ही उचित है । अतः एक द्रव्यमें बन्ध्य-बन्धकभाव अपने गुणधर्मोंके साथ निश्चयसे बन जाता है । परमागमका भी यही अभिप्राय है ।

इसलिए न तो अपर पक्षका यह लिखना ही ठीक है कि ‘किन्तु स्वपर्यायके साथ बन्ध्य-बन्धकभाव कदापि नहीं हो सकता ।’ क्योंकि ऐसा मानने पर सब कार्योंकी उत्पत्ति केवल परसे माननी पड़ती है । किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि ऐसा होनेपर सिद्धोंमें भी रागादिभावोंके स्वीकार करनेका अतिप्रसंग उपस्थित होता है ।

और न अपर पक्षका यह लिखना ही ठीक है कि ‘इसका आपने कोई उत्तर नहीं दिया । इसका अर्थ है कि वह आपको स्वीकृत है ।’ क्योंकि जब कि हमने अपने प्रथम उत्तरमें ही यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘संसारी जीव अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा अपने रागादि भावोंसे बद्ध है और असद्भूतव्यवहार नयकी अपेक्षा कर्मोंसे बद्ध है ।’ ऐसी अवस्थामें संसारी जीव किस अपेक्षा बद्ध है और किससे किस प्रकार बद्ध है इन दोनों खण्डोंका उत्तर हो जाता है ।

( इ ) बंधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ?

यह अपर पक्ष द्वारा उपस्थित किये गये मूल प्रश्नका तीसरा खण्ड है । हम इसका नयविभागसे उत्तर देते हुए प्रथम वार ही लिख आये हैं कि ‘संसारी आत्मा अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा अपने अज्ञानभावसे बद्ध होनेके कारण वास्तवमें परतन्त्र है और असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा उपचरित रूपसे कर्म और नोकर्मकी अपेक्षा भी परतन्त्रता घटित होती है ।’ किन्तु नयविभागसे दिये गये सर्वांगपूर्ण इस उत्तरको अपर पक्ष सम्यक् नहीं मानना चाहता है । वैसे हमने जैसे ‘सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बंधा हुआ है ।’ मूल प्रश्नके इन दो खण्डोंका उत्तर देते हुए शुद्ध निश्चयनयके पक्षको भी उपस्थित कर दिया था । उसी प्रकार संसारी आत्मा सर्वथा परतन्त्र नहीं है, नयविभागसे इस पक्षको भी साथमें उपस्थित कर देना चाहिए था । फिर भी हमने इस पक्षको उपस्थित न कर संसारी जीवमें किस नयसे कैसी परतन्त्रता घटित होती है मात्र इतना ही निर्देश किया था । संसारी जीव मात्र परके कारण परतन्त्र है इस एकान्तके स्वीकार करने पर न केवल मोक्षमार्गकी व्यवस्था गड़बड़ा जायगी । किन्तु जीवके संसारी और मुक्त ये भेद भी नहीं बनेंगे और इस प्रकार जीवद्रव्यका अभाव हो जानेसे अजीव द्रव्यका भी अभाव हो जायगा । इन्हीं सब बातोंका विचारकर हमने नयविभागसे उक्त उत्तर दिया था ।

किन्तु अपर पक्षने इस तथ्यको ध्यानमें न लेकर और आप्तपरीक्षाके उद्धरण उपस्थित कर पिछली प्रतिशंकामें यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि ‘आत्मा पौद्गलिक द्रव्यकर्मोंके कारण परतन्त्र हो रहा है और रागादिभाव परतन्त्रतास्वरूप हैं, इसलिए आत्माके भाव स्वयं परतन्त्ररूप हैं। आत्माके परतन्त्रताके निमित्त नहीं हैं।’

समाधान यह है कि आप्तपरीक्षाका उक्त कथन व्यवहारनय वचन है। उसके आधारसे पौद्गलिक कर्मोंको एकान्तसे परतन्त्रताका कारण मान लेना उचित नहीं है। यथार्थमें आत्मा किस कारणसे परतन्त्र हो रहा है इस कथनके प्रसंगसे निश्चय नयवचनका उल्लेख करते हुए वे ( विद्यानन्दि ) ही आचार्य तत्त्वार्थ-श्लोकवार्तिक पृ० ४४४ में लिखते हैं-

कषायपरतन्त्रस्यात्मनः साम्परायिकास्रवः, तदपरतन्त्रस्येर्यापथास्रवः इति सूक्तम्।

कषायसे परतन्त्र हुए आत्माके साम्परायिक आस्रव होता है और उससे परतन्त्र नहीं हुए आत्माके ईर्यापथ आस्रव होता है यह उचित ही कहा है।

इस पर पुनः प्रश्न हुआ कि एक आत्मामें परतन्त्रता बनती है और दूसरेमें नहीं इसका क्या कारण है? इसका समाधान करते हुए वे पुनः लिखते हैं-

कषायहेतुकं पुंसः पारतन्त्र्यं समन्ततः।
सत्त्वान्तरानपेक्षीह पद्ममध्यगभृंगवत् ॥ ८ ॥
कषायविनिवृत्तौ तु पारतन्त्र्यं निवर्त्यते।
यथेह कस्यचिच्छान्तकषायावस्थितिक्षणे ॥ ९ ॥

इस लोकमें जैसे पद्मके मध्य स्थित भौंरेकी परतन्त्रता कषायहेतुक होती है उसी प्रकार इस जीवकी सत्त्वान्तरानपेक्षी समन्ततः परतन्त्रता कषायहेतुक होती है ॥ ८ ॥ परन्तु कषायके निकल जाने पर परतन्त्रता भी निकल जाती है। जैसे इस लोकमें किसीके कषायके शान्त होने पर उसी समय परतन्त्रता निकल जाती है ॥ ९ ॥

यह वास्तविक कथन है। भ्रमरको कमल अपने आधीन नहीं बनाता है, किन्तु इसका मूल हेतु उसकी कषाय-कमलविषयक आसक्ति ही है। इसीप्रकार यह जीव कर्माधीन कषायके कारण ही होता है, अतः निश्चयसे परतन्त्रताका मूल कारण जीवकी कषाय ही है।

अपर पक्ष एकान्तका परिग्रह कर और कषायको पारतन्त्र्यस्वरूप मानकर केवल कर्मको ही परतन्त्रताका हेतु मानता चाहता है जो युक्त नहीं है, क्योंकि परतन्त्रतारूप कार्यकी उत्पत्ति व्यवहारसे जहाँ परहेतुक कही गई है वहाँ उसे निश्चयसे स्वहेतुक ही जानना चाहिए। अष्टसहस्री पृ० ५१ में जीवमें अज्ञानादि दोषोंकी उत्पत्ति कैसे होती है इसका निर्देश करते हुए लिखा है-

तद्धेतुः पुनरावरणं कर्म जीवस्य पूर्वस्वपरिणामश्च। स्वपरिणामहेतुक एवाज्ञानादिरित्ययुक्तम्, तस्य कादाचित्कत्वविरोधात्, जीवत्वादिवत्। परपरिणामहेतुक एवेत्यपि न व्यवतिष्ठते, मुक्तात्मनोऽपि तत्प्रसंगात्। सर्वस्य कार्यस्योपादानसहकारिसामग्रीजन्यतयोपगमात्तथा प्रतीतेश्च।

उन अज्ञानादि दोषोंका हेतु तो आवरण कर्म और जीवका पूर्व स्वपरिणाम है। स्वपरिणामहेतुक ही अज्ञानादि दोष हैं यह कहना अयुक्त है, क्योंकि ऐसा मानने पर उनके कादाचित्पनेका विरोध होता है, जीवत्वादिके समान। परपरिणामहेतुक ही अज्ञानादि दोष नहीं बन सकते, क्योंकि ऐसा मानने पर उनका मुक्तात्माओंमें भी सद्भाव माननेका प्रसंग उपस्थित होता है। सभी कार्य उपादान और सहकारी सामग्रीसे उत्पन्न होते हुए स्वीकार किये गये हैं और वैसी प्रतीति होती है।

अपर पक्षके प्रश्नोंका पूर्ण उत्तर आगमकी उक्त बड़े टाईपमें मुद्रित पंक्तियोंसे हो जाता है।

इससे स्पष्ट है कि प्रकृतमें आत्माको परतन्त्रताका मुख्य हेतु जीवके कषायादि परिणामोंको ही मानना उचित है, क्योंकि उनके होनेपर ही परमें परतन्त्रताकी व्यवहारहेतुता स्वीकार की गई है, अन्यथा नहीं।

इस प्रकार अपर पक्षने अ०, आ० और इ० इन तीन खण्डोंके विषयमें पूर्व पक्षके रूपमें जो विचार रखे हैं वे ठीक नहीं हैं। अपर पक्ष जब तक स्वाश्रित निश्चय कथनकी यथार्थताको स्वीकार नहीं करता और मात्र पराश्रित व्यवहार कथनके आधार पर की गई कार्य-कारणकी व्यवस्थाको असद्भूत व्यवहार ( उपचरित ) रूप नहीं स्वीकार करता तब तक मतभेदका समाप्त होना कठिन है।

हमने मूल प्रश्नमें जितनी बातें पूछी गईं थीं उन सबका उत्तर दिया है। अपर पक्ष अपने मूल प्रश्न और अपनी पिछली प्रतिशंकाको सामने रखकर पिछले दोनों उत्तरों पर दृष्टिपात करनेकी कृपा करें। अपर पक्षने जयपुर ( खानियां ) में १७ प्रश्न पूछे थे। उन सबका सम्मिलित उत्तर यह है कि आगममें इन प्रश्नोंके उत्तर स्वरूप जितना भी स्वाश्रित विवेचन उपलब्ध होता है वह यथार्थ है और जितना पराश्रित विवेचन उपलब्ध होता है वह उपचरित है।

\३. असद्भूत व्यवहारनयके विषयमें स्पष्टीकरण

आलापपद्धतिमें असद्भूत व्यवहारनयके दो लक्षण कहे गये हैं-

\१. अन्यत्र प्रसिद्धस्य धर्मस्यान्यत्र समारोपणमसद्भूतव्यवहारः।

\१. अन्यत्र प्रसिद्ध धर्मका अन्यत्र समारोप करना असद्भूत व्यवहार है।

\२. भिन्नवस्तुविषयोऽसद्भूतव्यवहारः।

\२. भिन्न वस्तुको विषय करना असद्भूत व्यवहार है।

प्रथम लक्षणके अनुसार नौ प्रकारके उपचारको परिगृहीत किया गया है और दूसरे लक्षणके अनुसार असद्भूत व्यवहारके भेदको विषय करनेवाला बतलाया गया है। ये दो लक्षण दो दृष्टियोंसे किये गये हैं। प्रथम लक्षणके द्वारा अनादिरूढ़ लोकव्यवहारकी परमार्थके साथ कैसे संगति बैठती है इसकी व्यवस्था की गई है और दूसरे लक्षणके द्वारा मोक्षमार्गमें साधककी आत्मद्रव्यमें भेदव्यवहार-के प्रति कैसी दृष्टि होनी चाहिए इसे स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार पृथक्-पृथक् प्रयोजनोंको ध्यान में रखकर आगममें चारों प्रकारके व्यवहारोंको दो प्रकारसे निरूपित किया गया है।

हमने इसी प्रश्नके द्वितीय उत्तरमें असद्भूतव्यवहारनयके प्रथम लक्षणको ध्यानमें रखकर तो स्पष्टीकरण किया ही है। ८ वें प्रश्नके प्रथम उत्तरमें भी उसी दृष्टिको ध्यानमें रखकर स्पष्टीकरण किया गया है। दोनों कथनोंमें शब्दभेद अवश्य है, पर दोनोंका आशय एक ही है। दो भिन्न वस्तुओंका परस्पर जो भी सम्बन्ध कहा जायगा वह एक द्रव्यके गुण-धर्मको दूसरेका बतलाकर ही तो कहा जायगा। स्पष्टीकरण इस प्रकार है-

: १ :

असद्भूत व्यवहारका लक्षण है-एक द्रव्यके गुणधर्मको अन्य द्रव्यका कहना ।

उदाहरण-असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा ज्ञानावरणादि आठ द्रव्यकर्मों तथा औदारिक शरीरादि नोकर्मके साथ आत्मा बँधा है ।

यद्यपि संसारी आत्मा वास्तवमें अपने राग-द्वेषादि भावोंसे बद्ध है । तथापि ज्ञानावरणादि कर्मों और शरीरादि नोकर्मको निमित्तकर उनकी उत्पत्ति होती है, इसलिए निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धको देखते हुए जीव इनसे बद्ध हैं ऐसा व्यवहार किया जाता है । यहाँ जीवका अपने गुण-पर्यायोंके साथ जो बद्धता धर्म उपलब्ध होता है उसका ज्ञानावरणादि कर्मों आदिमें आरोपकर आत्मा उनसे बद्ध है यह कहा गया है ।

प्रश्न ८ के प्रथम उत्तरमें भी इसी दृष्टिको ध्यानमें रखकर ही ‘दो या दो से अधिक द्रव्यों और उनकी पर्यायोंमें जो सम्बन्ध होता है वह असद्भूत ही होता है ।’ यह वचन लिखा गया है । दोनोंका आशय एक है । भाषा वर्गणाओंमें भाषारूप परिणमनेकी निमित्तता ( उपादान कारणता ) है, उसका आरोप तीर्थंकर आदि प्रकृतियोंमें करके उन्हें निमित्त कहा गया है और वाणीको नैमित्तिक । यही दोका सम्बन्ध है । यह सम्बन्ध यद्यपि असद्भूत- उपचरित है । फिर भी ऐसा व्यवहार नियमसे होता है उसका मुख्य कारण काल प्रत्यासत्ति है, क्योंकि बाह्य व्याप्तिका नियम इसी आधार पर बनता है ।

इससे स्पष्ट है कि असद्भूतव्यवहारके हमारे द्वारा कहे गये ये दो लक्षण नहीं हैं, समझानेकी दो पद्धतियाँ हैं ।

: २ :

अपर पक्षका कहना है कि 'किन्तु यहाँ पर बन्धका प्रकरण है और बन्ध दो भिन्न वस्तुओंमें होता है । अतः इस प्रश्नमें-

भिन्नवस्तुविषयोऽसद्भूतव्यवहारः ।

अर्थात् भिन्न वस्तु जिसका विषय हो वह असद्भूत व्यवहारनय है, यह लक्षण उपयोगी है । दूसरे यह लक्षण आध्यात्मिक दृष्टिसे है और ‘स्वाश्रितो निश्चयः’ यह लक्षण भी आध्यात्मिक दृष्टिसे है । अतः दोनों लक्षण अध्यात्मदृष्टिवाले लेने चाहिए । जब निश्चयका लक्षण अध्यात्मनयकी अपेक्षासे ग्रहण किया जा रहा है तो व्यवहारनयका लक्षण भी अध्यात्मनयवाला लेना चाहिए ।’

समाधान यह है कि प्रत्येक वस्तु भेदाभेदस्वरूप है । वहाँ अभेदको विषय करनेवाला निश्चयनय है और भेदको विषय करनेवाला व्यवहारनय है-

तत्र निश्चयनयोऽभेदविषयो व्यवहारो भेदविषयः ।-आलापपद्धति ।

आलापपद्धतिमें निश्चयनय और व्यवहारनयके ये लक्षण अध्यात्मदृष्टिसे ही किये गये हैं । ‘स्वाश्रितो निश्चयनयः’ इस लक्षणमें भी स्व पद अभेदको ही सूचित करता है । हाँ ‘पराश्रितो व्यवहारनयः’ इस लक्षणमें आया हुआ ‘पर’ शब्द भेद व्यवहारको तो पर कहता ही है । किसी भी प्रकारके उपचार व्यवहारको भी पर कहता है । इसलिए इस लक्षण द्वारा जहाँ अनादिरूढ़ लोक व्यवहारका निषेध हो जाता है वहाँ भेदव्यवहारका भी निषेध हो जाता है । इस प्रकार स्वाश्रित निश्चयनयके कथनमें दोनों प्रकारका व्यवहार निषिद्ध है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।

एक बात और है और वह यह कि आध्यात्मिक दृष्टिसे व्यवहारनयके इस लक्षणमें ‘भिन्न वस्तु’ पदसे पर द्रव्य और उनके गुणधर्मोंका ग्रहण नहीं हुआ है । वे तो आत्मासे सर्वथा भिन्न हैं ही, इसलिए उनका प्रश्न ही नहीं है । उनमें ती जिस किसी भी प्रकार स्व व्यवहार होता है उसका तो त्याग करना ही है । साथ ही एक आत्मामें गुणभेद वा पर्यायभेद द्वारा कथनरूप जितना भी व्यवहार होता है, आलम्बनकी दृष्टिसे उसकी भी उपेक्षा करनी है, क्योंकि धर्म-धर्मीका स्वभावसे अभेद है, तो भी संज्ञा, लक्षण आदि रूपसे भेद उत्पन्न कर उन द्वारा समझानेके लिए अखण्ड वस्तुका कथन किया जाता है । अतएव प्रकृतमें ‘भिन्न वस्तु’ पदसे कहे गये गुणभेद और पर्यायभेदका ही ग्रहण होता है, क्योंकि दृष्टिमें अभेदकी मुख्यता होनेपर गुणभेद और पर्यायभेद भिन्न वस्तु हो जाते हैं ।

आलापपद्धतिमें इसी दृष्टिको साधकर उक्त दोनों नयों और उनके भेदोंका निरूपण हुआ है, क्योंकि वहाँ ‘भिन्न वस्तु’ पदसे पर वस्तुका ग्रहण न होकर गुणभेद और स्वाश्रित पर्यायभेदका ही मुख्यतासे ग्रहण हुआ है । ऐसी अवस्थामें आध्यात्मिक दृष्टिसे जीव किससे बँधा है ऐसा प्रश्न होनेपर उसका यह उत्तर होगा कि उपचरित असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा जीव अपने रागादि भावोंसे बँधा है, क्योंकि जीव कर्मोंसे बँधा है इसे तो आध्यात्मिक दृष्टि स्वीकार ही नहीं करती । यही कारण है कि हमने प्रकृतमें आगमिक दृष्टिको ध्यानमें रखकर उक्त प्रश्नका समाधान किया है ।

निश्चयनय और व्यवहारनयके आलापपद्धतिमें ये लक्षण दिये हैं-

अभेदानुपचारतया वस्तु निश्चीयत इति निश्चयः । भेदोपचारतया वस्तु व्यवह्रियत इति व्यवहारः ।

अभेद और अनुपचाररूपसे वस्तु निश्चित की जाती है यह निश्चय है तथा भेद और उपचाररूपसे वस्तु व्यवहृत की जाती है यह व्यवहार है ।

दूसरी बात यह है कि अपर पक्षने अधिकतर प्रायः सभी प्रश्न दो द्रव्योंमें निमित्त-नैमित्तिक व्यवहारकी मुख्यतासे किये हैं, इसलिए हमें आगमिक दृष्टिको ध्यानमें रखकर उत्तर देना पड़ा । १६ वें प्रश्नमें अवश्य ही निश्चयनय-व्यवहारनयके स्वरूप पर प्रकाश डालनेके लिए कहा गया था, इसलिए उस प्रश्नका उत्तर लिखते समय हमने अवश्य ही अध्यात्मदृष्टिको मुख्यता प्रदान की है । किन्तु उसके प्रति अपर पक्षने जैसी उपेक्षा दिखलाई वह उस पच द्वारा आगे उपस्थित किये गये दोनों प्रपत्रोंसे स्पष्ट है ।

तीसरी बात यह है कि अध्यात्ममें केवल आध्यात्मिक दृष्टिसे ही व्यवहारका प्रतिपादन नहीं हुआ है । किन्तु आगमिक दृष्टिको ध्यानमें रखकर भी व्यवहारका प्रतिपादन हुआ है, क्योंकि परमार्थ दृष्टिवालेके लिए दोनों प्रकारका व्यवहार हेय है यह ज्ञान कराना उसका मुख्य प्रयोजन है । इसलिए भी हमने अपने उत्तरोंमें उक्त पद्धतिको अपनाया है ।

ऐसी अवस्थामें अपर पक्षके यह लिखनेकी कि ‘जब निश्चयका लक्षण अध्यात्मकी अपेक्षासे ग्रहण किया जा रहा है तब व्यवहारनयका लक्षण भी अध्यात्मनयवाला लेना चाहिए ।’ कोई सार्थकता नहीं रह जाती ।

\४. कर्मबन्धसे छूटनेका उपाय

( ई ) यदि वह बद्ध है तो छूटनेका उपाय क्या है ?

यह मूल प्रश्नका चौथा खण्ड है । इसका उत्तर हमने निश्चय-व्यवहाररूप दोनों नयोंसे दिया था । प्रथम उत्तरमें हमने लिखा है-

\१. ‘आगममें सर्वत्र यह तो बतलाया है कि यदि संसारी आत्मा अपने बद्ध पर्यायरूप राग, द्वेष और मोह आदि अज्ञान भावोंका अभाव करनेके लिए अन्तरंग पुरुषार्थ नहीं करता है और केवल जिसे आगममें उपचारसे व्यवहारधर्म कहा है उसीमें प्रयत्नशील रहता है तो उसके द्रव्यकर्मोंकी निर्जरा न होनेके समान है।’

\२. ‘अतएव संसारी आत्माको द्रव्य-भावरूप उभय बन्धनोंसे छूटनेका उपाय करते समय निश्चय-व्यवहार उभयरूप धर्मका आश्रय लेनेकी आवश्यकता है। उसमें भी नियम है कि जब यह आत्मा अपने परम निश्चल परमात्मरूप ज्ञायकभावका आश्रय लेकर सम्यक् पुरुषार्थ करता है तब उसके अन्तरंगमें निश्चय रत्नत्रयस्वरूप जितनी जितनी विशुद्धि प्रगट होती जाती है उसीके अनुपातमें उसके बाह्यमें द्रव्यकर्मका अभाव होता हुआ व्यवहारधर्मकी भी प्राप्ति होती जाती है।’

यह मूल प्रश्नके हमारे प्रथम उत्तरका वक्तव्यांश है। इसमें व्यवहारधर्मका निषेध नहीं किया गया है। फिर भी अपर पक्षको इस उत्तरसे सन्तोष नहीं है। अपर पक्षका कहना है कि ‘इसका उत्तर भी बहुत सरल था सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र छूटनेका उपाय है।’ किन्तु इतने सामान्य उत्तरसे मूल समस्याका समाधान होना सरल न होनेसे ही हमें थोड़ा विस्तारसे खुलासा करना आवश्यक प्रतीत हुआ। बाह्य क्रिया आत्माका स्वभाव धर्म नहीं है ऐसा ज्ञान करानेसे हानि नहीं होती। किन्तु स्वभाव सन्मुख हो आत्मपुरुषार्थ प्रगट होता है। अपर पक्षके सामने इसीकी उपयोगिता स्पष्ट करनी है और इसी आशयसे उक्त निरूपण प्रथम उत्तरमें किया गया है।

अपर पक्ष समझता है कि हमने अपने प्रथम उत्तरमें व्यवहारधर्मका सर्वथा निषेध किया है। किन्तु वस्तुस्थिति यह नहीं है। हमारे किस वाक्यसे उस पक्षने यह आशय लिया इसका उसकी ओरसे कोई स्पष्टीकरण भी नहीं किया गया है। साधकके सविकल्प दशामें प्रवृत्तिरूप व्यवहार धर्म होता है इसका भला कौन समझदार निषेध करेगा। हाँ यदि ‘व्यवहार करते-करते उससे निश्चयधर्मकी प्राप्ति हो जाती है’ ऐसी जिसकी मान्यता है। साथ ही जो व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मकी प्राप्तिका यथार्थ साधन मानता है उसका यदि निषेध किया जाता है और इसे ही अपर पक्ष व्यवहारधर्मका निषेध समझता है तो समझे। मात्र उस पक्षकी समझसे हमारा कथन सदोष हो जायगा ऐसा नहीं है।

उदाहरणार्थ एक २८ मूलगुणोंका पालन करनेवाला मिथ्यादृष्टि है और दूसरा मिथ्यादृष्टि नारकी या देव है। ये दोनों यदि सम्यग्दृष्टि बनते हैं तो स्वभावसन्मुख होकर तीन करण परिणाम करके ही तो बनेंगे। इनके सम्यग्दृष्टि बननेका अन्य मार्ग नहीं है। अपर पक्षसे यदि पूछा जाय तो वह पच भी यही उत्तर देगा। स्पष्ट है कि न तो व्यवहारधर्म करते-करते निश्चयधर्मकी प्राप्ति होती है और न ही व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका यथार्थ साधन माना जा सकता है। अपर पक्षको यदि स्वीकार करना है तो इसी तथ्यको स्वीकार करना है। इसे स्वीकार करने पर उस पक्षकी यह समझ कि ‘हम व्यवहारधर्मका सर्वथा निषेध कर रहे हैं’ सुतरां दूर हो जायगी।

हमने इस प्रश्नके उत्तरमें निश्चयधर्मके साथ व्यवहारधर्मकी भी चरचा की है। इसे अपर पक्ष अप्रासंगिक समझता है। किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जब संसारी जीवके संसारसे छूटनेके उपायका निर्देश किया जायगा तब निश्चयधर्मके साथ व्यवहारधर्मका निरूपण करना अनिवार्य हो जाता है। यदि अपर पक्ष प्रश्नोंकी सीमामें रहा आता तो लाभ ही होता। किन्तु उसकी ओरसे सीमाका ध्यान ही नहीं रखा गया । लाचार होकर हमें प्रतिशंकाओंके आधार पर अपना उत्तर लिखनेके लिये वाध्य होना पड़ा । उदाहरणार्थ अपने इसी तृतीय पत्रकमें अपर पक्षने साध्य-साधकभावकी चरचा छेड़ दी है जब कि इसके लिए प्रश्न नं० ४ है । इतना ही नहीं, अपर पक्षने इस प्रसंगमें जिन तर्कोंको रखा है उनकी भी वह विविध प्रश्नोंमें अनेक बार चरचा कर चुका है । ऐसी अवस्थामें हमें उनका उत्तर लिखना पड़ता है, इसका इलाज नहीं ।

अपर पक्षने अपने पिछले पत्रकमें कर्मको राग-द्वेष आदिका प्रेरक निमित्त लिखा और राग-द्वेषको कर्मका प्रेरक निमित्त लिखा । यही कारण है कि हमें इसके सम्बन्धमें स्पष्टीकरण करना आवश्यक हो गया। कोई भी समाधान करनेवाला यदि प्रश्नकर्ताकी प्रत्येक बातका विचार न करे तो उससे सम्यक् समाधान होना कभी भी सम्भव नहीं है । भोजनके समय यदि व्यापारकी चरचा की जाती है तो कभी-कभी उसका उत्तर देना भी अनिवार्य हो जाता है । अपर पक्ष हमसे शिकायत करनेकी अपेक्षा अपने प्रपत्रोंपर दृष्टिपात करनेकी कृपा करे, सब बातोंका समाधान हो जायगा । संसारी प्राणी उलझन स्वयं उत्पन्न करता है और दोषी दूसरेको समझता है, इस मिथ्या व्यवहारका निषेध जितने जल्दी हो जाय, लाभकर ही है ।

आचार्य कुन्दकुन्द, अमृतचन्द्र सूरि और जयसेन आचार्य आदिने जहाँ भी व्यवहारधर्मको साधन और निश्चयधर्मको साध्य लिखा है वहाँ वह कथन समयसार गाथा ८ के विवेचनको ध्यानमें रखकर ही किया है । व्यवहार धर्म निश्चय धर्मका साधन है इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यवहारधर्म निश्चयधर्मको उत्पन्न करता है । किन्तु उसका आशय इतना ही है कि व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका व्यवहारसे हेतु है । जो हेतु होता है वह उसका साधन कहा जाता है और जो साधा जाता है वह साध्य कहा जाता है । इस प्रकार साधन-साध्यभाव व्यवहारधर्म-निश्चयधर्ममें है इसका निषेध नहीं है । सम्यग्दृष्टि ऐसे ही साधन-साध्यभावको दोनोंमें स्वीकार करता है, इसलिए वह सम्यग्दृष्टि है । किन्तु इससे अन्यथा माननेवाला मिथ्यादृष्टि है यह बृहद्द्रव्यसंग्रहके कथनका आशय है । व्यवहारधर्मको कर्ता कहना और निश्चयधर्मको उसका कर्म कहना यह इन दोनोंमें निमित्त-नैमित्तिक व्यवहारका ज्ञान करानेके लिए आगममें असद्भूत व्यवहारनयको लक्ष्यमें रखकर लिखा गया है । बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ३५ की टीकामें लिखा है-

निश्चयेन विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजात्मतत्त्वभावनोत्पन्नसुखसुधारसस्वादबलेन समस्तशुभाशुभ- रागादिविकल्पनिवृत्तिर्व्रतम् । व्यवहारेण तत्साधकं हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहाच्च यावज्जीवनिवृत्तिलक्षणं पंचविधं व्रतम् ।

निश्चयनयकी अपेक्षा विशुद्ध ज्ञान-दर्शनस्वभावरूप निज आत्मतत्त्वकी भावनासे उत्पन्न सुखरूपी अमृतके स्वादके बलसे समस्त शुभाशुभ रागादि विकल्पोंसे निवृत्त होना व्रत है । तथा व्यवहारनयसे उसका साधक हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्म और परिग्रहसे यावज्जीवन निवृत्तिलक्षण पांच प्रकारका व्रत है ।

यह आगमवचन है । इसमें निश्चय व्रतका साधक दर्शन-ज्ञानस्वभावरूप निज आत्मतत्त्वकी भावनाको बतलाया गया है । यह निश्चय है और व्यवहार नयसे इसका साधक अशुभनिवृत्तिरूप पाँच व्रतोंको बतलाया गया है । यह व्यवहार कथन है । इससे स्पष्ट है कि आगममें जहाँ भी व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका साधक लिखा है वहाँ वह कथन असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षासे ही किया गया है । यद्यपि निश्चयधर्मकी प्राप्ति होती तो है शुभाशुभ विकल्पकी निवृत्ति होनेपर ही । ऐसा नहीं है कि अशुभरूप हिंसादिरूप विकल्पसे निवृत्त होकर शुभरूप अहिंसादि विकल्पके सद्भावमें निश्चयधर्मकी प्राप्ति हो जाती है या उससे निश्चयधर्मको प्राप्ति हो जाती है। जब भी उस ( निश्चयधर्म ) को प्राप्ति होती है तब अशुभके समान शुभ विकल्पसे निवृत्त होकर स्वभावसन्मुख हो तत्स्वरूप परिणमन द्वारा ही होती है। परावलम्बी विकल्प तो इसकी प्राप्तिमें किसी भी अवस्थामें साधक नहीं हो सकता। फिर भी स्वभावसन्मुख होनेके पूर्व अशुभ विकल्प न होकर नियमसे शुभ विकल्प होता ही है, इसलिए ही व्यवहार-नयसे व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका साधक कहा है। इससे यह ज्ञान होता है कि जो निश्चयधर्मकी प्राप्तिके सन्मुख होता है उसकी बाह्य भूमिका कैसी होनी चाहिए। स्वर्णपाषाण और स्वर्णमें जो साधक-साध्यभावका निर्देश किया है उसका भी यही आशय है।

हमने जो यह वचन लिखा है कि ‘निश्चय रत्नत्रयस्वरूप जितनी विशुद्धि प्रगट होती जाती है उसके अनुपातमें उसके बाह्यमें द्रव्यकर्मका अभाव होता हुआ व्यवहार धर्मकी भी प्राप्ति होती जाती है।’ वह दोनोंका अविनाभाव सम्बन्ध कैसा है यह दिखलानेके लिए ही लिखा है। पहले कोई नहीं होता। साथ-साथ होते हैं यह लिखकर व्यवहारमें सम्यक्पनेकी हेतुताका निर्देश किया गया है। जो व्यवहार पहले मिथ्या था वह निश्चय रत्नत्रयकी प्राप्ति होनेपर सम्यक् व्यवहार पदवीको प्राप्त हो जाता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। जैसे जो ज्ञान पहले मिथ्या था वह सम्यक्त्वकी प्राप्ति होने पर सम्यक् हो जाता है उसी प्रकार व्रतादिके आचरणरूप जो व्यवहार पहले मिथ्या था वह निश्चय रत्नत्रयकी प्राप्ति होनेपर सम्यक् हो जाता है। इसको चाहे किन्हीं शब्दोंमें कहिए, हानि नहीं। इससे कार्य-कारणपरम्परामें किसी प्रकारका व्यत्यय उपस्थित नहीं होता। अन्यथा आचार्य अमृतचन्द्र समयसार गाथा ७४ की टीकामें यह कभी न लिखते-

यथा यथा विज्ञानघनस्वभावो भवति तथा तथास्रवेभ्यो निवर्तते।

जैसे जैसे विज्ञानघनस्वभाव होता है वैसे वैसे आस्रवोंसे निवृत्त होता है।

अपर पक्ष हमारे कथनको विलोमरूपसे समझता है तो समझे। किन्तु क्या वह पक्ष इस कथनको भी विलोमरूप कहनेका अभिप्राय रख सकता है? कभी नहीं। आक्षेप करना अन्य बात है पर पूरे जिनागम पर दृष्टि रखना अन्य बात है।

अपर पक्षका कहना है कि ‘अन्तरंग विशुद्धता कर्मोदयके अभावका ज्ञापक तो है किन्तु कारण नहीं है।’ यह पढ़कर हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। यदि अपर पक्ष तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६५ के इस वचन पर या इसी प्रकारके अन्य आगमवचनों पर दृष्टिपात कर लेता तो आग्रहपूर्ण ऐसा एकान्त वचन कभी न लिखता। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकका वह वचन इस प्रकार है-

तेनायोगिजिनस्यान्त्यक्षणवर्त्ति प्रकीर्त्तितम्।
रत्नत्रयमशेषाघविघातकारणं ध्रुवम् ॥४७॥

इसलिए अयोगिजिनका अन्त्य क्षणवर्ती रत्नत्रय नियमसे समस्त अघोंका विघात करनेवाला कहा गया है।

यहाँ पर ‘अघ’ पद नामादि अघातिकर्म और उनको निमित्त कर हुए भावोंका सूचक है।

कर्म हीनशक्ति होकर व उदीरित होकर झड़ जायें इसीका नाम तो अविपाकनिर्जरा है और इसका कारण जीवका विशुद्ध परिणाम है, इसलिए जैसे जैसे जीवका अन्तरंग विशुद्ध परिणाम होता जाता है वैसे वैसे कर्मोदयका अभाव होता जाता है इस सत्यको स्वीकार करनेमें अपर पक्षको आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पाँचवें गुणस्थानमें यदि अप्रत्याख्यानावरणका सत्त्व रहते हुए भी उदय नहीं होता और उसका स्तिबुक संक्रमण होता रहता है तो इसका मुख्य कारण पाँचवें गुणस्थानकी विशुद्धि ही है। मोक्षमार्गमें ऐसा ही कार्य-कारणभाव मुख्यतासे घटित होता है। यह विलोमप्रतिपादन नहीं है।

धवला पु० १ पृ० ५२ में ‘स्वावरण’ पद केवल द्रव्यकर्मको ही सूचित नहीं करता, किन्तु अन्तरंगमें जो अविशुद्धि बनी हुई है उसे भी सूचित करता है। आत्मा शुद्धोपयोगके बलसे जैसे जैसे अविशुद्धिको दूर करता जाता है वैसे वैसे उसके निमित्तभूत कर्मोंका भी अभाव होता जाता है यह उक्त उद्धरणका आशय है।

अपर पक्षने प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके क्रमका निर्देश किया है और साथ ही ‘जिनको इसका ज्ञान है।’ यह वचन भी लिखा है। इस पर हमें यह मान लेनेमें आपत्ति नहीं है कि अपर पक्षको इसका विशेष ज्ञान है, हमें उतना ज्ञान नहीं है। पर कम ज्ञानके साथ ही यदि हम यह जानना चाहें कि अनिवृत्तिकरणमें प्रथम स्थिति और द्वितीय स्थितिके मध्यवर्ती दर्शनमोहनीयके निषेकोंका जो अन्तरकरण होता है उसका कारण आत्मोत्थ विशुद्धि है या दर्शनमोहनीयका उदय ? तो यही उत्तर तो होगा कि वहाँ पर जो आत्मोत्थ विशुद्धि है वह उसका कारण है। इसका आशय यह हुआ कि जैसे जैसे विशुद्धिमें वृद्धि होती जाती है वैसे वैसे मिथ्यात्वका उदय उत्तरोत्तर क्षीण होता जाता है और अन्तमें वहाँके योग्य उत्कृष्ट विशुद्धिसे युक्त आत्माके होनेपर जिस समय वह अपने पुरुषार्थसे सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है उसी समय मिथ्यात्व परिणाम और उसके निमित्तभूत मिथ्यात्व कर्मके उदयका अभाव रहता है। वहाँ पर अन्तरायाम प्रमाण दर्शनमोहनीयका अभाव तो है ही। ऐसा यह योग है। इसीको कहीं बाह्य दृष्टिसे भी विवेचित किया जाता है उसमें आपत्ति नहीं। किन्तु उसका आशय क्या है यह लेना चाहिए।

अपर पक्षने ‘जइ जिणमयं पवज्जह’ गाथा उद्धृत की है। उसमें व्यवहार और निश्चय दोनोंकी स्वीकृति है। इसका निषेध तो किसीने किया नहीं है। जैसे व्यवहारनयसे गुणस्थान-मार्गणास्थान आदिरूप भेदव्यवहार है वैसे ही निश्चयनयसे तत्त्वकी भी स्वीकृति है।

तीर्थका स्पष्टीकरण करते हुए स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षामें लिखा है-

रयणत्तयसंजुत्तो जीवो वि हवेइ उत्तमं तित्थं।
संसारं तरइ जदो रयणत्तयदिव्वणावाए ॥१९१॥

रत्नत्रयसे युक्त जीव उत्तम तीर्थ है, क्योंकि वह रत्नत्रयरूपी दिव्य नावसे संसारको पार करता है ॥१९१॥

इससे स्पष्ट है कि वास्तवमें तो निश्चय रत्नत्रययुक्त आत्मा’ही उत्कृष्ट तीर्थ है। किन्तु उसके साथ जो व्यवहार रत्नत्रय होता है उसे भी व्यवहारसे तीर्थ कहना उपयुक्त है, क्योंकि निश्यय-व्यवहारका ऐसा ही योग है।

अतएव उक्त गाथापरसे यदि कोई यह फलित करे कि बाह्य व्यवहारसे परमार्थकी प्राप्ति हो जाती है। उसे स्वभावका अवलम्बन लेकर एकाग्र होनेकी आवश्यकता नहीं है तो उक्त गाथा परसे ऐसा आशय फलित करना ठीक नहीं है। अतएव भेदविज्ञानपूर्वक आत्मजागृति ही कर्मबन्धनसे छूटनेका यथार्थ उपाय है ऐसा यहाँ निर्णय करना चाहिए।

\५. निश्चयसे जीव रागादिसे बद्ध है इस तथ्यका समर्थन

अपर पक्षने हमारे ‘निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करने पर जीव स्वयं अपने अपराधके कारण बद्ध है, अन्य किसीने बलात् बाँध रखा हो और उसके कारण वह बंध रहा हो ऐसा नहीं है।’ इस वचनको आगमविरुद्ध लिखा है। अपर पक्षने यहाँपर अपने पक्षके समर्थनमें जो प्रमाण उपस्थित किये हैं उनमें शुद्ध निश्चयनयके विषयका निर्देश किया गया है। किन्तु यहाँपर ‘आत्माश्रितो निश्चयनयः’ इस लक्षणको ध्यानमें रखकर उक्त वचन लिखा गया है। अज्ञानी जीव रागादिरूप स्वयं परिणमता है, अन्य कोई उसे रागादिरूप परिणमाता नहीं। अतएव जीवके शुभाशुभ परिणाम भावबन्ध हैं और जीव उनसे बद्ध है इसे निश्चयस्वरूप माननेमें आगमसे कहाँ बाधा आती है इसे अपर पक्ष ही जाने।

हम इसी उत्तरमें प्रवचनसार गा० १८९ की आचार्य जयसेनकृत टीकाका उद्धरण दे आये हैं। उसमें रागादिकको ही आत्मा करता है और उन्हींको भोगता है इसे निश्चयनयका लक्षण कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि अपर पक्षने जो उक्त वचनको आगमविरुद्ध लिखा है सो उस पक्षका ऐसा लिखना ही आगमविरुद्ध है, उक्त वचन आगमविरुद्ध नहीं है। इसके लिए द्रव्यसंग्रहकी ‘ववहारा सुहदुक्खं’ इत्यादि गाथा देखिए।

अपर पक्षने समयसार गाथा १३ की टीकाका ‘स्वयमेकस्य’ इत्यादि वचन उद्धृतकर यह सिद्ध किया है कि अकेले जीवमें बन्धकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। समाधान यह है कि उक्त वचन द्वारा निश्चय-व्यवहार दोनोंको स्वीकार किया गया है। उस द्वारा बन्ध पर्यायकी दृष्टिसे यह बतलाया गया है कि जीव स्वयं रागादि रूप परिणमता है, अतएव रागादिरूप बन्धपर्यायका निश्चयसे वह स्वयं कर्ता है, अन्य द्रव्य उसका कर्ता नहीं। किन्तु जब भी वह रागादिरूपसे परिणमता है तब उसको कर्मका आश्रय नियमसे होता है। इसीको अकेले जीवमें बन्धकी उत्पत्ति नहीं होती है यह कहा जाता है। उक्त वचनका इससे भिन्न कोई दूसरा आशय नहीं है। तभी तो समयसारमें यह कहा है-

यदि जीवका कर्मके साथ ही रागादि परिणाम होता है अर्थात् यदि दोनों मिलकर रागादिरूप परिणमते हैं ऐसा माना जाय तो इसप्रकार जीव और कर्म दोनों रागादिभावको प्राप्त हो जायें। किन्तु रागादि रूप परिणाम तो अकेले जीवके ही होता है, अतएव कर्मोदयरूप निमित्तसे भिन्न ही वह जीवका परिणाम है ॥१३९-१४०॥

रागादिका नाम भावबन्ध है इसे तो अपर पक्ष स्वीकार करेगा ही। ऐसी अवस्थामें वह स्वयं निर्णय करे कि यह किसका परिणाम है और यथार्थमें इसे किसने किया है? उसका अपर पक्ष यही उत्तर तो देगा कि उपादानरूपसे इसे स्वयं जीवने किया है, कर्म तो उसमें निमित्तमात्र है। इससे सिद्ध हुआ कि निश्चयसे जीव अपने अपराधके कारण स्वयं रागादि भावोंसे बद्ध हो रहा है। यदि वह कर्मका आश्रय एवं परमें इष्टानिष्ट बुद्धि करना छोड़ दे तो उसके रागादिके विलय होनेमें देर न लगे।

\६. उपचार तथा आरोप पदकी सार्थकता

संसारी जीव ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है ऐसा कहना असद्भूत व्यवहारनयका वक्तव्य है, इसे स्वीकार करके भी अपर पक्षने लिखा है कि ‘किन्तु आपने इस सत्य सरल कथनको तरोड़-मरोड़ कर आरोपित आदि शब्दोंके प्रयोग द्वारा असत्य तथा जटिल बनानेका प्रयास किया है जो शोभनीय नहीं है।’ आदि। समाधान यह है कि जब अपर पक्षने संसारी जीव ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है इस कथनको असद्भूत व्यवहारनयका वक्तव्य स्वीकार कर लिया है तो उसे असद्भूतव्यवहारनयके लक्षणके अनुसार यह स्वीकार करनेमें हिचक नहीं होनी चाहिए कि आत्मामें जो अपने विकारी गुणपर्यायोंके साथ बद्धता पाई जाती है उसका ज्ञानावरणादि कर्मोंपर आरोप करके यह कहा जाता है कि आत्मा ज्ञानावरणादि कर्मोंसे बद्ध है । ऐसा स्वीकार करना ही सत्यार्थ है । ऐसा स्वीकार कर लेनेसे सद्भूत व्यवहारनय और निश्चयनयसे भिन्न असद्भूतव्यवहारनयके विषयकी व्यवस्था बन जाती है । फिर तो उसे आकाशकुसुमके समान कल्पनारोपित घोषित करनेकी अपर पक्षको आवश्यकता भी नहीं रह जायगी और नयमें सत्यार्थता भी उस पक्षकी प्रतीतिमें आ जायगी । असद्भूत व्यवहारनयके लक्षण आदिके विषयमें विशेष खुलासा इसी उत्तरमें पहले ही कर आये हैं । इससे अपर पक्षके ध्यानमें यह अच्छी तरह आजायगा कि तरोड़-मरोड़ कर अपर पक्ष ही अपना पक्ष रख रहा है, हम नहीं । अपर पच यदि असद्भूतव्यवहारके लक्षणके आधार पर लिखता तो उसे हमारे द्वारा प्रयोग किये गये ‘उपचार’ शब्द और ‘आरोप’ शब्दकी सार्थकता भी समझमें आ जाती । अपर पक्षको स्मरण रखना चाहिए कि इन शब्दोंका प्रयोग न किया जाय तो असद्भूतव्यवहारके विषयका स्पष्टीकरण करना सम्भव ही नहीं हो सकता ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘किन्तु एक नयकी दृष्टिमें दूसरे नयका विषय न होनेसे उस दूसरे नयके विषयको अभूतार्थ कहा जाता है । किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि दूसरे नयका विषय आकाशके पुष्पके समान सर्वथा असत्यार्थ है ।’

समाधान यह है कि असद्भूत व्यवहारनयका विषय आकाशपुष्पके समान सर्वथा असत्यार्थ है यह तो हमने कहीं लिखा नहीं है और न ऐसा है ही । यह शब्दयोजना तो अपर पक्षने की है, इसलिए इसमें संशोधन उसीको करना है । फिर भी निश्चयनय वस्तुके स्वरूपका प्रतिपादन करता है अतएव वह निषेधक धर्मवाला है और असद्भूत व्यवहारनय दूसरेके धर्मको उससे भिन्न वस्तुका कहता है, इसलिए वह प्रतिषेध्य धर्मवाला है, इसलिए आचार्योंने निश्चयनयके विषयको सर्वत्र भूतार्थ ही कहा है तथा व्यवहारनयके विषयको एक दृष्टिसे भूतार्थ और दूसरी दृष्टिसे अभूतार्थ कहा है । जिसका निदर्शन आचार्य अमृतचन्द्रका वही वचन है जिसे अपर पक्षने यहाँ अपने पक्षके समर्थनमें उपस्थित किया है ( समयसार गाथा १४ की टीका ) । अपर पक्षने उक्त टीकावचनका आशय लिखनेके बाद फलितार्थ रूपमें जो यह वचन लिखा है कि 'अर्थात् जीवकी एक ही बन्ध अवस्थाको व्यवहार और निश्चय दो भिन्न भिन्न दृष्टियोंसे देखनेपर सत्यार्थ और असत्यार्थ दिखाई देती हैं ।" सो यह वचन उचित ही लिखा है । इसे अपर पक्षने किस आशयसे लिखा है यह तो हम जानते नहीं । किन्तु शब्दयोजनापर दृष्टिपात करनेसे विदित होता है कि जीवकी एक ही बन्ध अवस्था अर्थात् रागादिरूप जो बन्धपर्याय है वह व्यवहारनयसे सत्यार्थ है-सद्भूत है । किन्तु शुद्ध दृष्टिसे असत्यार्थ है, क्योंकि शुद्धनयमें भेदव्यवहार गौण है ।

इससे अपर पचको यह स्पष्ट हो जायगा कि असद्भूत व्यवहारनयके विषयका स्पष्टीकरण करते समय हमने जो ‘आरोपादि’ शब्दोंका प्रयोग किया है वह विपरीत मान्यताका फल है ? या अपर पक्ष स्वयं अपनी विपरीत मान्यता बनाकर ऐसा लिख रहा है ।

श्लोकवार्तिक पृ० १५१ में आचार्य अमृतचन्द्रने ‘तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे’ इत्यादि वचन किस आशयसे लिखा है इसके स्पष्टीकरणके लिए उनके द्वारा प्रयुक्त ‘व्यवहारनयसमाश्रयणे’ यह वचन ही पर्याप्त है। विशेष खुलासा पाँचवें-छटे प्रश्नके तृतीय उत्तरमें किया ही है।

हमने अन्य किन प्रश्नोंके उत्तरमें व्यवहारनयके विषयको सत्यार्थ किस रूपमें माना है इसका अपर पक्षने हमारे कथनका कोई प्रमाण उपस्थित नहीं किया, इसलिए अपर पक्षके ‘अन्य प्रश्नोंके उत्तरमें आपने भी व्यवहारनयके विषयको सत्यार्थ माना है’ इस कथन पर हमने विशेष विचार करना उचित नहीं समझा।

अपर पक्ष यदि प्रेरक निमित्तकारणका अर्थ व्यवहारनयसे करणनिमित्त या कर्तानिमित्त करता है और इस मान्यताका त्याग कर देता है कि समर्थ उपादान अनेक योग्यताओंवाला होता है, इसलिए जब जैसे निमित्त मिलते हैं उनके अनुसार कार्य होता है। तथा इस तथ्यको स्वीकार कर लेता है कि उत्तर कालमें जो कार्य होता है उसे समर्थ उपादान उस कार्यके अनुरूप अपनी विवक्षित एक द्रव्य-पर्याययोग्यतासे सम्पन्न होकर निश्चयसे स्वयं उत्पन्न करता है, क्योंकि प्रत्येक कार्य उपादानके सदृश होता है-उपादानसदृशं कार्यं भवतीति यावत्। कारण कि उसके बाद वह उसी कार्यको उत्पन्न करनेकी सामर्थ्यवाला है यह नियत है, तभी उन दोनोंमें उपादान-उपादेयभाव बनता है तो हमें 'स्व-परप्रत्यय पदमें जो ‘पर’ शब्दका प्रयोग हुआ है उसे प्रेरकनिमित्त कारण कहनेमें अणुमात्र भी आपत्ति नहीं है। उपासकाध्ययन श्लोक १०६ में इसी आशयसे 'प्रेर्यते, शब्दका प्रयोग हुआ है। तथा २४७ श्लोकमें इसी अभिप्रायसे कर्मको क्लेशका कारण कहा गया है। निश्चय-व्यवहारकी ऐसी युति है। मात्र इसीको बाह्याभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता कहते हैं।

अपर पक्षने लिखा है कि जिस प्रकारका जितने अनुभागको लिये घातिया कर्मोंका उदय होता है उससे आत्माके परिणाम अवश्य होते हैं।’ किन्तु यह कथन ठीक नहीं है। इस विषयको स्पष्ट करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द पंचास्तिकाय गाथा ५७में लिखते हैं-

कम्मं वेदयमाणो जीवो भावं करेदि जारिसयं
सो तेण तस्स कत्ता हवदि त्ति य सासणे पढिदं ॥५७॥

कर्मको वेदता हुआ जीव जैसा भाव करता है, इससे वह उस ( भाव ) का कर्ता होता है ऐसा जिनशासनमें कहा है ॥ ५७ ॥

इससे स्पष्ट है कि आत्मा अपना भाव करनेमें स्वतन्त्र है। उसमें कर्मकी पराधीनता नहीं है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए उसकी टीकामें आचार्य जयसेन लिखते हैं-

कर्मको वेदनेवाला अर्थात् वीतराग निर्भर आनन्दलक्षण प्रचण्ड अखण्ड ज्ञानकाण्डपरिणत आत्मभावनासे रहित होनेके कारण और मन,वचन,कायलक्षण व्यापाररूप कर्मकाण्डसे परिणत होनेके कारण जीव आप कर्ता होकर जैसे भाव ( परिणाम ) को करता है वह जीव उसी करणभूत भावके कारण कर्मभावको प्राप्त हुए उस रागादि भावका कर्ता होता है ऐसा शासन ( परमागम ) में कहा है यह उक्त गाथाका तात्पर्य है। -मूल टीकाके आधारसे

आचार्य अमृतचन्द्र उक्त गाथाकी टीका करते हुए लिखते हैं-

अमुना यो येन प्रकारेण जीवेन भावः क्रियते स जीवस्तस्य भावस्य तेन प्रकारेण कर्ता भवतीति।

इस विधिसे जीवके द्वारा जिस प्रकारसे जो भाव किया जाता है वह जीव उस भावका उस प्रकारसे कर्ता होता है।

५९४ जंयपुर ( खानिया ) तत्त्वचर्चा

यहाँ ‘येन प्रकारेण’ तथा ‘तेन प्रकारेण’ पद ध्यान देने योग्य हैं। इन पदों द्वारा अपने भाव करनेमें जीवकी स्वतन्त्रता घोषित की गई है। इसके साथ जीवकी इतनी विशेषता और है कि परको निमित्त कर उत्पन्न हुए इन भावोंमें यह जीव उपयुक्त हो या न हो यह उसकी अपनी दूसरी विशेषता है। यह मोक्षमार्गकी चाबी है। मोक्षके द्वारका उद्घाटन इसी चाबीसे होता है। अन्य जितना कथन है वह सब व्यवहारवचन है। आचार्य अमृतचन्द्र सम० सा० गा० १७२ की टीकामें लिखते हैं-

जो वास्तवमें ज्ञानी है उसके बुद्धिपूर्वक राग-द्वेष-मोहरूपी आस्रव भावोंका अभाव है। इसलिए वह निरास्रव ही है। परन्तु इतनी विशेषता है कि वह ज्ञानी भी जब तक ज्ञान ( आत्मा ) को सर्वोत्कृष्टभावसे देखने, जानने, अनुचरण करनेके लिए अशक्त होता हुआ जघन्यभावसे ही ज्ञान (आत्मा) को देखता, जानता और अनुचरता है तब तक उसके भी जघन्यभावकी अन्यथा उत्पत्ति नहीं हो सकती, इससे अनुमीयमान अबुद्धिपूर्वक कर्मकलंकके विपाकका सद्भाव होनेसे पुद्गल कर्मका बंध होता है। अतः तब तक आत्मा ( ज्ञान ) को देखना चाहिए, जानना चाहिए और अनुचरणा चाहिए जब तक ज्ञान ( आत्मा ) का पूर्ण भाव है उतना भले प्रकार देखने जानने और अनुचरणमें आजाय तबसे लेकर साक्षात् ज्ञानी होता हुआ वह आत्मा निरास्रव ही रहता है।

अपर पक्षकी इसी दृष्टिको ध्यानमें लेना है। इसे ध्यानमें लेनेपर उस पक्षका कौन कथन आगमानुकूल है और नहीं है तो क्यों नहीं है यह भी उसके ध्यानमें आ जायगा।

अपर पक्ष यदि यह नहीं मानता है कि ‘जो निमित्त बलात् कार्यके स्वकालको छोड़कर आगे-पीछे पर द्रव्यमें उत्पन्न करता हो वह प्रेरक निमित्त है’ तो हम उसका स्वागत करते हैं। ऐसी अवस्थामें उसे पंचाध्यायी पृ० ९५ का उद्धरण देनेकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। वहाँ स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावके निर्देशके प्रसंगसे स्वकाल शब्द पर्यायके अर्थमें आया है। यहाँ विचार यह करना है कि पर्यायें तो अनन्त हैं और उनका लक्षण क्रमभावीपना है, इसलिए उनका उत्पाद-व्यय क्रमानुपाती होता है या नहीं ? इसीके समाधानस्वरूप उपादानके आधार पर यह स्पष्ट किया जाता है कि जितनी उत्पादरूप पर्यायें हैं उनके उतने ही समर्थ उपादान हैं, इसलिए उनका उत्पाद क्रमानुपाती ही होता है और उनके व्यवहार हेतु भी क्रमानुपाती क्रमसे उसी विधिसे मिलते रहते हैं। निश्चय-व्यवहारकी ऐसी ही युति है। इसी अवस्थामें सम्यक् अनेकान्त बन सकता है, अन्यथा नहीं। अव्यवहित पूर्व समयवर्ती पर्याययुक्त द्रव्य समर्थ उपादान है और अव्यवहित उत्तर समयवर्ती पर्याययुक्त द्रव्य उसका उपादेय है यह क्रम है। इसी क्रमसे सब कार्य होते हैं। निमित्त व्यवहारके योग्य अन्यका संयोग भी इसी क्रमसे मिलता है। इस क्रमको कोई महाशय अन्यथा नहीं कर सकता।

अभी अपर पक्ष उपासकाध्ययनका ‘प्रेर्यते कर्म जीवेन’ इत्यादि वचन उद्धृत कर आया है। हम तो कर्मशास्त्रके विशेषज्ञ नहीं हैं। उसके विशेषज्ञ हमें अपर पक्षको माननेमें आपत्ति भी नहीं है। अतएव हम यदि यह जानना चाहे कि अपर पक्षने जो अपने पक्षके समर्थनमें उक्त उल्लेख उपस्थित किया है वह सार्वकालिक नियमको ध्यानमें रखकर उपस्थित किया है या इसे कादाचित्क नियमके रूपमें उपस्थित किया है। यदि सार्वकालिक नियम समझकर उपस्थित किया है तो अपर पक्षने कर्मशास्त्रकी विशेषताको प्रकाशमें लानेके अभिप्रायसे जो यह लिखा है कि ‘किन्तु जो कर्मशास्त्रके विशेषज्ञ हैं वे भलीभाँति जानते हैं कि प्रत्येक समयमें जो द्रव्यकर्म बंधता है उसमें नाना वर्गणाऐं होती हैं और सभी वर्गणाओंमें समान अनुभाग ( फलदान शक्ति ) नहीं होती, किन्तु भिन्न-भिन्न वर्गणाओंमें भिन्न-भिन्न अनुभाग अर्थात् किसी वर्गणामें जघन्य, किसीमें मध्यम और किसीमें उत्कृष्ट अनुभाग होता है । मध्यम अनुभागके अनेक भेद हैं और वर्गणा भी नाना हैं । इस प्रकार जिस समय जैसा अनुभाग उदयमें आता है उसके अनुरूप आत्माके परिणाम होते है ।……जिस समय मंद अनुभाग उदयमें आता है उस समय मंद कषायरूप परिणाम होते हैं और उस समय ज्ञान व वीर्यका क्षयोपशम विशेष होनेसे आत्माकी शक्ति विशेष होती है । उस समय यदि यथार्थ उपदेश आदिका वाह्य निमित्त मिले और यह जीव तत्त्वविचारादिका पुरुषार्थ करे तो सम्यक्त्व हो सकता है ।’ आदि । वह युक्तियुक्त नहीं ठहरता, क्योंकि इसमें भी तीव्र-मन्द भावसे परस्पराश्रयता वनी रहनेके कारण न तो आत्मा कर्मोदयके विरुद्ध पुरुषार्थ कर सकता है न ही ज्ञानका उदय हो सकता है और न ही उपदेश आदिका वाह्य निमित्त मिल सकता है, क्योंकि कर्मोदयमात्र मोक्षमार्गका प्रतिवन्धक है, अतः ‘कर्मोदय वलात् राग-द्वेषको उत्पन्न करते हैं और राग-द्वेष वलात् कर्मका वन्ध कराते हैं’ इस सिद्धान्तके स्वीकार करने पर मोक्षमार्गका पुरुषार्थ कभी नहीं वन सकेगा यह जो आपत्ति हमने दी है वह उचित ही है ।

यदि अपर पक्षने ‘प्रेर्यते कर्म जीवेन’ इत्यादि वचन कादाचित्क नियमके रूपमें उपस्थित किया है तो इससे अपर पक्षके इस सिद्धान्तका खण्डन हो जाता है कि ‘कर्म जीवमें बलात् राग-द्वेषादिको उत्पन्न करता है ।’

अतः प्रकृतमें यह सब कथन व्यवहारनयका वक्तव्य ही समझना चाहिए । ब्रह्मदेव सूरिने बृहद्द्रव्यसंग्रह गा० ३७ में जो कुछ लिखा है वह ठीक ही लिखा है । उन्होंने एक द्रव्य दूसरे द्रव्यमें बलात् कार्य करता है इस सिद्धान्तको स्वीकार करके वह वचन नहीं लिखा है, अतएव उनका वैसा लिखना उचित ही है । उनके लिखनेका आशय ही इतना है कि यदि यह जीव कर्मोदय और इसके फलमें उपयुक्त न हो तो वह संसारपरिपाटीसे मुक्त हो सकता है ।

अपर पक्षने इष्टोपदेश गाथा ३१की टीकासे ‘कत्थ वि वलिओ कम्मो’ यह वचन उद्धृत किया है । किन्तु इसका भी आशय इतना ही है कि जब तक यह जीव उदयाधीन होकर परिणमता है तब तक कर्मकी बलवत्ता कही जाती है । कर्मने उदयाधीन किया नहीं । वह स्वयं उसके आधीन हुआ है । किन्तु जब यह जीव कर्मोदयमें तन्मय न होकर अपने स्वभावके सन्मुख होता है तब आत्माकी बलवत्ता कही जाती है । इष्टोपदेश गा० ३१ की समग्र टीका पर दृष्टिपात करनेसे यही भाव व्यक्त होता है ।

अपर पक्षने लिखा है कि 'प्रेर्यमाणाः पुद्गलाः का जो वाच्य अर्थ है वह ही जिनागममें इष्ट है, क्योंकि शब्दोंका और अर्थका परस्पर वाच्य-वाचक सम्बन्ध है । किन्तु प्रश्न तो यही है कि ‘प्रेर्यमाणाः’ पदका वाच्यार्थ क्या है ? इसे तो स्पष्ट किया नहीं और लम्बी-चौड़ी टीका कर डाली । इसीका नाम तो चतुराई है । जिनागममें तो इसका यह अर्थ है कि राग-द्वेषसे मलीमस आत्माके योग और विकल्पको निमित्तकर जो पुद्गल शब्दरूपसे परिणमते हैं वे प्रेर्यमाण पुद्गल कहलाते हैं । अच्छी बात है यदि अपर पक्ष इस वाच्यको स्वीकार कर लेता है और अन्य द्रव्य अन्य द्रव्यमें बलात् कार्य कर देता है इत्यादि प्रकारकी गलत मान्यताको त्याग देता है । ऐसी अवस्थामें उसके द्वारा आगमका अर्थ करनेमें जो अनर्थ हो रहा है उसका सुतरां त्याग हो जायगा । समयसार गाथा ११६ आदिमें जीवको जो परिणामी नित्य सिद्ध किया है वह स्वमतका ही निरूपण है । परमतका खण्डन उसका मुख्य लक्ष्य नहीं है । प्रत्येक कार्यमें बाह्य निमित्तका स्वीकार है इसमें सन्देह नहीं । चाहे वह अगुरुलघु गुणका परिणमन हो या अन्य परिणमन, बाह्य निमित्तकी स्वीकृति सर्वत्र है । किन्तु यह परिणामी स्वभावमें बाधा न आवे इस रूपमें ही है, अन्य द्रव्य अन्य द्रव्यका बलात् कार्य करता है इस रूपमें नहीं । प्रत्येक परिणाम बाह्य निमित्तसे मिलकर नहीं होता, उससे पृथक् रूपमें उपादानमें ही होता है, इसलिए उस परिणामको उपादान ही उत्पन्न करता है, बाह्य निमित्त नहीं । समयसार गाथा ८०, ८१, ८२ का यही आशय है । यही कारण है कि समयसार गाथा १०७ में ‘करता है, परिणमता है, उत्पन्न करता है, ग्रहण करता है, त्यागता है, बाँधता है’ इत्यादि कथनको असद्भूत व्यवहारनयका वक्तव्य कहा है । अपर पक्ष इस गाथाके इस वचन पर दृष्टि डालनेका कष्ट करे-

यत्तु व्याप्य-व्यापकभावाभावेऽपि प्राप्यं विकार्यं निर्वृत्यं च पुद्गलद्रव्यात्मकं कर्म गृह्णाति, परिणमयत्युत्पादयति करोति बध्नाति वात्मेति विकल्पः स किलोपचारः ।

तथा व्याप्य-व्यापकभावका अभाव होने पर भी प्राप्य, विकार्य और निर्वृत्य पुद्गल द्रव्यात्मक कर्मको आत्मा ग्रहण करता है, परिणमाता है, उत्पन्न करता है, करता है और बाँधता है इत्यादिरूप जो विकल्प होता है वह उपचार है ।

इससे अपर पक्षका जो यह विचार है कि ‘वह गाथा निमित्त कारणकी अपेक्षासे नहीं लिखी गई, किन्तु उपादानकी अपेक्षासे लिखी गई’ उसका निरास हो जायगा । गाथामें ही जब ‘आदा’ पद कर्ताके अर्थमें और ‘पुग्गलकम्मं’ पद कर्मके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । ऐसी अवस्थामें यह लिखना कि ‘वह गाथा निमित्त कारणकी अपेक्षासे नहीं लिखी गई, किन्तु उपादानकी अपेक्षासे लिखी गई’ बहुत बड़ा साहस है । टीका यही कहती है कि आत्मा और पुद्गल कर्ममें व्याप्यव्यापकभाव नहीं है, फिर भी जो यह कहा जाता है कि ‘आत्माने पुद्गल कर्मको उत्पन्न किया’ वह अज्ञानीका विकल्पमात्र है, अतएव उपचरित कथन है, क्योंकि उपादान ही अपने कार्यको उत्पन्न करता है, अन्य द्रव्य अन्य द्रव्यके कार्यको उत्पन्न नहीं करता । मात्र अन्य द्रव्य अन्य द्रव्यके कार्यको उत्पन्न करता है ऐसा विकल्पमूलक व्यवहार होता है । हमने प्रश्न नं० १ व १६ में निमित्तकर्ताकी स्वीकृति समयसार गाथा १०० के अनुसार ही दी है । किन्तु इससे अपर पक्ष प्रेरक निमित्त कर्ताका स्वेच्छासे जैसा अर्थ करता है उसका समर्थन नहीं होता । विवाद शब्द प्रयोगमें नहीं है, उसके अर्थ करनेमें है ।

किसी व्यक्तिको स्त्री आदि विषयोंके आधीन देखकर स्त्रीको उपदेश नहीं दिया जाता कि तुमने इसे अपने आधीन क्यों बना रखा है, किन्तु पुरुषको ही उसके यथार्थ कर्तव्यका भान कराया जाता है । इससे स्पष्ट है कि यह जीव परमें आनन्दकी मिथ्या कल्पनावश स्वयं विषयाधीन बनता है, विषय उसे पराधीन नहीं बनाते । यहाँ जीवके पराधीन बननेमें विषय बाह्य निमित्त तो हैं, उसके कर्ता नहीं । इसी प्रकार कार्यमें बाह्य निमित्तका क्या स्थान है, इसका सर्वत्र निर्णय कर लेना चाहिए ।

तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ४१० में यद्यपि प्रारम्भमें आकाश द्रव्य और अन्य द्रव्योंकी आधाराधेयताका विचार किया गया है । परन्तु आगे वह कथन यहीं तक सीमित नहीं रहा है । किन्तु उस द्वारा सब द्रव्योंमें उत्पादादिक विस्रसा हैं या सहेतुक इसका उत्तर निश्चयनय और व्यवहारनयसे दिया गया है । अतः अपर पक्षका यह लिखना कि कि ‘श्लोकवार्तिक पृ० ४१० का कथन प्रेरक निमित्त कारणके विषयमें नहीं है, किन्तु धर्मादि द्रव्योंके विषयमें है जो अप्रेरक हैं ।’ युक्तियुक्त नहीं है ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध निश्चयनयका विषय नहीं हैं’ । पर इससे क्या ? देखना यह है कि यह सम्बन्ध उपचरित हैं या नहीं । हम इसी उत्तरमें पहले असद्भूत व्यवहारका आगमसे स्पष्टीकरण कर आये हैं । उसमें भेदमें अभेदका उपचार करना इसे असद्भूत व्यवहार बतलाया गया है । इससे यह सम्बन्ध उपचरित ही सिद्ध होता है ।

अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें आलापपद्धतिके ‘भिन्नवस्तुविषयो’ इस लक्षणका सहारा लिया है । किन्तु वहाँ एक वस्तुमें भेद व्यवहारको भिन्न वस्तु कहा गया है । अपर पक्ष आलापपद्धतिमें इसके उत्तर भेदोंके जो उदाहरण दिये हैं उन पर दृष्टिपात करले, सब स्पष्ट हो जायगा । वैसे यह लक्षण भी आलापपद्धतिमें किये गये असद्भूत व्यवहारनयके ‘अन्यत्र प्रसिद्धस्य’ इत्यादि लक्षणका पूरक ही है । समयसार गाथा ५६ की आत्मख्याति टीकामें व्यवहारनयका ‘इह हि व्यवहारनयः·······परभावं परस्य विदधाति’ यह लक्षण किया है । इससे हमारे उक्त कथनकी पुष्टि हो जाती है । अतएव उक्त लक्षणके आधारसे भी निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध उपचरित ही सिद्ध होता है । इस प्रश्नके प्रथम उत्तरमें हमने इसी आशयसे इसका निरूपण किया है ।

तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० १५१ में द्विष्ठ कार्य-कारणभावको व्यवहारनयसे परमार्थसत् लिखा है । इसलिए अपर पक्ष इस उल्लेखको बहुत महत्त्व देता है । अनेक प्रपत्रोंमें उस पक्षने इसकी अनेकबार चरचा की है । अब विचार यह करना है कि वहाँ विद्यानन्दि आचार्यने ऐसा क्यों लिखा । बात यह है कि बौद्धदर्शन रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा और संस्कार आदिको संवृतिसत् मानता है । क्योंकि वह दर्शन पर्यायोंमें अन्वित होनेवाले द्रव्यको नहीं स्वीकार करता । तत्त्वको मात्र क्षणिक मानता है । किन्तु जैनदर्शनकी यह स्थिति नहीं है । अतएव उपादान और उपादेयके कालभेदकी अपेक्षा भिन्न होने पर भी एक द्रव्यप्रत्यासत्तिके कारण इनमें कथंचित् तादात्म्य बन जानेसे आचार्य विद्यानन्दिने सद्भूत व्यवहारनयको ध्यानमें रखकर द्विष्ठ (दोमें स्थित) कार्य-कारणभावको वस्तुतः परमार्थसत् कहा है, क्योंकि उपादान अपने स्वरूपसे स्वतःसिद्ध है और उपादेय अपने स्वरूपसे स्वतःसिद्ध है । इनमें उपादान और उपादेयरूप धर्म वास्तविक हैं । इस सम्बन्धमें आचार्य विद्यानन्दिके ये शब्द लक्ष्यमें लेने योग्य हैं । वहीं पृ० १५० में वे लिखते हैं-

कार्य-कारणभावस्य हि सम्बन्धस्याबाधिततथाविधप्रत्ययारूढस्य स्व सम्बन्धिनो वृत्तिः कथंञ्चित्तादात्म्यमेवानेकान्तवादिनोच्यते ।

अबाधित तथाविध प्रत्ययारूढ़ कार्य-कारणभावरूप (उपादान-उपादेय-भावरूप) सम्बन्धकी अपने सम्बन्धियोंमें वृत्ति कथञ्चित् तादात्म्यरूप ही अनेकान्तवादियोंने स्वीकार की है ।

यह आचार्य विद्यानन्दिका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है । ‘तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे’ इत्यादि वचन लिख कर उन्होंने मुख्यतासे इसी कार्य-कारणभावको अर्थात् उपादान-उपादेयभावको परमार्थसत् कहा है । इसके लिए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० १५० अवलोकनीय है । बाह्य सामग्री और कार्यमें कार्य-कारणभाव (निमित्त-नैमित्तिकभाव) केवल कालप्रत्यासत्तिको ध्यानमें रखकर स्वीकार किया गया है, क्योंकि कालप्रत्यासत्तिरूपसे जैसे बाह्य सामग्रीकी सत्ता है उसी प्रकार कार्यद्रव्यकी भी सत्ता है । इस रूपसे ये दोनों परमार्थसत् हैं । इससे द्विष्ठ कार्य-कारणभावको परमार्थसत् कालप्रत्यासत्तिवश कहा है यह भी ज्ञात हो जाता है और इनमें निमित्त-नैमित्तिकव्यवहार असद्भूतव्यवहारनयका विषय कैसे है यह भी ज्ञात हो जाता है ।

अपर पक्षने धवला पु० ६ पृ० १६४ के उल्लेखके सन्दर्भमें उपादान कारणके अनुसार स्थितिबन्धमें विशेषताको स्वीकार कर लिया यह उचित ही किया है, क्योंकि सर्वत्र सभी कार्य उपादानके अनुसार होते हैं यह परमार्थसत् कथन है । इस उल्लेखमें ‘पयडिविसेसादो’ पदका यही आशय है । इस विशेषताका उल्लेख आचार्य वीरसेनने धवला और जयधवला दोनोंमें शताधिक बार किया है । कहीं ‘सहावदो’ लिखा है । इसके लिए धवला पु० ४ पृ०३४३ व ४६८, पु० ५ पृ० ८८ पु० ६ पृ० १४८ व ३१७, पु० १० पृ० २२६ व २४०, पु० ११ पृ० २४६, व ३०६, पु० १२ पृ० ३७; जयधवला पु० ७ पृ० ७४, ७५, ८३, ८४, ६५, ६६, १११, २४०, २४२, व २७४ आदि पृष्ठ द्रष्टव्य हैं । ‘पयडिविसेसादो’ इसके लिए धवला पु० ६ पृ० १७८, १६३, १६४, पु० १२ पृ० ४६ तथा जयधवला पु० ७ पृ० ७५, ८७, ६०, ६४, ६५, ६७, ६८, ६६, १११, ११५, ११६, ११७, १२१, १३१, १३२ आदि पृष्ठ अवलोकनीय हैं । इन सब उल्लेखों द्वारा उपादानकी महत्ता ही घोषित की गई है ।

ऐसी अवस्थामें धवला पु० ६ पृ० १६४ के उक्त उल्लेखमें आये हुए ‘एयंतेण’ पदका अपर पक्षने जो आशय लिया है वह ठीक नहीं है; क्योंकि इस पद द्वारा बाह्यार्थ सापेक्षपनेको कहनेवाले व्यवहारपक्षके एकान्तका निषेधकर परनिरपेक्ष निश्चयपक्षका समर्थन किया गया है । कारण कि सभी कार्य निश्चयसे परनिरपेक्ष ही होते हैं । व्यवहारसे ही उन्हें सहेतुक स्वीकार किया गया है, क्योंकि निश्चयनय मात्र वस्तुस्वरूपका उद्घाटन करता है, इसलिए वह परनिरपेक्षरूपसे ही वस्तुस्वरूपके दिखलानेमें प्रवृत्त होता है । परन्तु व्यवहारनयकी यह स्थिति नहीं है । कारण कि सापेक्षभावसे वस्तुकी सिद्धि करना उसका प्रयोजन है । उदाहरणार्थ भव्यों और अभव्योंका स्वरूप परनिरपेक्ष स्वतःसिद्ध है । मात्र इनका व्यवहार परस्पर सापेक्ष होता है । इसीप्रकार प्रकृतमें जान लेना चाहिए । यही कारण है कि आचार्य वीरसेनने धवला पु० ७ पृ० ११७ में सभी कार्य बाह्यार्थ कारण निरपेक्ष होते हैं’ इस तथ्यको स्वीकार करते हुए लिखा है-

बज्झत्थकारणणिरवेक्खो वत्थुपरिणामो ।

इससे स्पष्ट है कि प्रकृतमें अपर पक्षने 'उक्त उल्लेखमें आये हुए ‘एयंतेण’ पदका जो आशय लिया है वह ठीक नहीं है ।

इसी प्रसंगमें अपर पक्षका कहना है कि ‘यद्यपि कार्य उपादानके सदृश होता है तथापि ऐसा भी नहीं है कि उसपर बाह्य कारणोंका प्रभाव न पड़ता हो ।’ आदि । किन्तु अपर पक्षका ऐसा लिखना भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि जिसे अपर पक्ष ‘प्रभाव पड़ना’ कहता है वह क्या कोई वस्तु है या कथनमात्र है ? यदि वस्तु है तो क्या आगमके विरुद्ध यह स्वीकार किया जाय कि एक वस्तुके गुणधर्मका दूसरी वस्तुमें संक्रमण होता है । यदि नहीं तो वह कथनमात्र है इसके सिवाय उसे और क्या कहा जा सकता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं । यही कारण है कि ‘एक द्रव्य दूसरे द्रव्यके कार्यको करता है’ इसे आगममें असद्भूतव्यवहारनयका विषय बतलाया गया है ।

अपर पक्षने यहाँ पर बीज और भूमिका उदाहरण उपस्थित कर यह सिद्ध करना चाहा है कि एक ही बीज अलग अलग भूमिके कारण अलग अलग फलको उत्पन्न करता है और इसकी पुष्टिमें प्रवचनसार गाथा २५५ का उल्लेख किया है । समाधान यह है कि अन्तरंगकी सिद्धि करना यही तो व्यवहार हेतुका मुख्य प्रयोजन है । वह स्वयं अन्तरंगरूप नहीं हो जाता, किन्तु अन्तरंगकी सिद्धि करता है । पण्डितप्रवर आशा-धरजीने अनगारधर्मामृत अ० १ में ‘कर्त्राद्या वस्तुनो भिन्नाः’ इत्यादि श्लोक ( १०२ ) इसी आशयसे लिखा है। नियम यह है कि जितने कार्य होते हैं उतने ही उनके अन्तरंग ( उपादान ) कारण और बाह्य कारण होते हैं। धवला पु० ७ पृ० ७० में इसका समर्थन करते हुए आचार्य वीरसेन लिखते हैं-

तदो कज्जमेत्ताणि चेव कम्माणि वि अत्थि त्ति णिच्छओ कायव्वो ।

इसलिए जितने कार्य हैं उतने ही उनके कर्म है ऐसा निश्चय करना चाहिए।

इसलिए यदि प्रवचनसारके उक्त उल्लेखमें बाह्य कारणकी अपेक्षा विवेचन हुआ है तो इस परसे ऐसा गलत अभिप्राय नहीं फलित करना चाहिए कि 'अन्तरंग कारणके एक होने पर भी बाह्य कारणके भेदसे कार्यमें भेद देखा जाता है, क्योंकि वस्तुतः बीज एक नहीं है । जितने दाने हैं सब अपने अपने स्वचतुष्टयको लिये हुए पृथक् पृथक् हैं। इसलिए सिद्धान्त यह फलित होता है कि सबकी बाह्याभ्यन्तर सामग्री पृथक्-पृथक् होनेसे पृथक्-पृथक् फलनिष्पन्न होता है। नियत आभ्यन्तर सामग्रीके साथ नियत बाह्यसामग्रीके होनेका योग है। इसलिए उनको निमित्तकर नियत फलकी ही उत्पत्ति होती है। धवला पु० ६ पृ० १६४ के उक्त उल्लेखको और प्रवचनसार गाथा २५५के उल्लेखको मिलाकर समझनेकी आवश्यकता है। कार्य-कारण-परम्परामें नियत निश्चय पक्षके साथ नियत व्यवहार पक्षको स्वीकार करने पर ही अनेकान्तकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं।

अपर पक्षने इसी प्रसंगमें अन्य बहुतसी बातें लिखी हैं। उन सबसे अपर पक्षके सभी प्रपत्र भरे पड़े हैं। इसलिए उन सबकी हम विशेष चरचा नहीं करेंगे। किन्तु स्वयम्भूस्तोत्र ६० का उल्लेख कर अपर पक्षने जो यह लिखा है कि ‘कार्यकी उत्पत्ति अन्तरंग बहिरंग निमित्ताधीन है ऐसा वस्तुस्वभाव है।’ यह अवश्य ही विचारणीय है। अपर पक्षके इस कथनको पढ़कर ऐसा लगा कि वह अपने पक्षके समर्थनके अभिनिवेशमें यहाँ तक कहनेके लिए उद्यत हो गया। उस पक्षको ऐसा लिखकर ‘हम वस्तुस्वभावको पराधीन सिद्ध करने जा रहे हैं’ इस बातका अणुमात्र भी भय न हुआ इसका समग्र जैन परम्पराको आश्चर्य होगा। प्रत्येक वस्तु उत्पाद-व्यय-ध्रुवस्वभाव है। इनकी एक सत्ता है। लक्षण, संज्ञा आदिके भेदसे ही इनमें भेद स्वीकार किया गया है। पर्यायका लक्षण है-तद्भाव। तत्त्वार्थसूत्र अ० ५ में कहा भी है-‘तद्भावः परिणामः’ ( सू० ४२ ) इसकी व्याख्या करते हुए अष्टसहस्री पृ० १२९ में लिखा है-

तेन तेन प्रतिविशिष्टेन रूपेण भवनं हि परिणामः, सहक्रमभाविष्वशेषपर्यायेषु तस्य भावादव्याप्त्यसम्भवात्, तदभावे च द्रव्ये तदनुपपत्तेः ।

उस उस प्रतिविशिष्टरूपसे होना ही परिणाम है, क्योंकि सहभावी और क्रमभावी अशेष पर्यायोंमें अर्थात् गुणों और पर्यायोंमें उक्त लक्षणका सद्भाव होनेसे अव्याप्ति दोष नहीं आता। यदि उसका अभाव माना जाय तो द्रव्यमें परिणामविशेष नहीं बन सकता।

इससे स्पष्ट है कि गुणपर्यायवत्त्व यह द्रव्यका स्वरूप है। ऐसी अवस्थामें यदि कार्यको अपर पक्षके मतानुसार निमित्ताधीन स्वीकार कर लिया जाय तो वस्तुस्वभावके पराधीन हो जानेसे वस्तुको ही पराधीन स्वीकार करनेका प्रसंग उपस्थित होता है जो अनुभव, तर्क और आगम तीनोंके विरुद्ध है। स्पष्ट है कि कोई भी कार्य निमित्ताधीन नहीं होता। निमित्तकी निमित्तता विश्वके शाश्वत नियमानुसार प्रत्येक समयमें प्रतिविशिष्ट स्वभावयुक्त वस्तुके साथ बाह्य व्याप्तिमात्र है। कार्य-कारणपरम्परामें या अन्यत्र निमित्तको स्वीकार करनेका इतना ही तात्पर्य है। वह कार्यकी सापेक्षरूपसे सिद्धि करता है, इसलिए उसमें कर्ता आदिका व्यवहार किया जाता है । यदि बाह्य सामग्री कार्यका वास्तविक कर्ता हो तो वह कार्यका ‘स्व’ हो जायगा और ऐसी अवस्थामें वह व्यवहार कथन न कहलाकर स्वाश्रितपनेकी अपेक्षा निश्चय कथन ही माना जायगा । अतएव ‘कार्यकी उत्पत्ति अन्तरंग-बहिरंग निमित्ताधीन है ऐसा वस्तुस्वभाव है’ यह लिखना अपर पक्षके लिए योग्य नहीं है, हमने प्रश्न ११ के प्रथम उत्तरमें तथा प्रश्न १ के द्वितीय उत्तरमें बाह्य सामग्रीको ध्यानमें रखकर जो भी लिखा है वह व्यवहारदृष्टिको ध्यानमें रखकर ही लिखा है । अपर पक्ष निश्चय व्यवहारकी भेदक रेखाको यदि स्वीकार कर लेता है तो विश्वास है कि जिन तथ्योंका हम अपने उत्तरोंमें निर्देश कर रहे हैं उन्हें स्वीकार करनेमें उस पक्षको किसी प्रकारकी हिचकिचाहट नहीं होगी ।

शंका ९, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग २/२)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६०० से ६०८

↑ सूची


हमने धवला पु० १२ पृ० ३६ का उद्धरण उपस्थित कर अन्तरंग कारणकी कार्यके प्रति विशेषता ख्यापित की थी उसे अपर पक्षने किसी हद तक अपने विशेष विवरणके साथ मान्यता प्रदान की इसकी जहाँ प्रसन्नता है वहाँ यह संकेत कर देना आवश्यक प्रतीत होता है कि अन्तरंग कारण प्रत्येक वस्तुका स्वरूप है, अतः वह यथार्थ होनेसे उसके आधारपर बनाया गया नियम सर्वत्र एक समान लागू होता है । अपर पक्षने इसी पुस्तकसम्बन्धी पृ० ४५३, पृ० ३८० और पृ० १२० के जो उल्लेख उपस्थित किये हैं उनसे भी उक्त कथनका ही समर्थन होता है । विचारके लिए हम सर्व प्रथम अपर पक्षके निर्देशानुसार पृ० ४५३ का उल्लेख लेते हैं । जो जीव ज्ञानावरणीयका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध करता है उसके यदि आयुकर्मका बन्ध हो तो कैसा होता है इसी तथ्यका विचार इस प्रकरणमें चल रहा है । अन्तिम दो शंका-समाधान इस प्रकार हैं-

शंका-ज्ञानावरणीयकी उत्कृष्ट स्थितिप्रायोग्य परिणामोंके द्वारा आयुकर्मका चतुःस्थानपतित बन्ध कैसे होता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ज्ञानावरणीयकी उत्कृष्ट स्थितिबन्धके योग्य परिणामोंमें भी अन्तर्मुहूर्तमात्र आयुकी स्थितिके बन्धके योग्य परिणाम सम्भव हैं ।

शंका-एक परिणाम भिन्न कार्योंको करनेवाला कैसा होता है ?

समाधान-सहकारी कारणोंके सम्बन्धभेदसे उसके भिन्न कार्योंके करनेमें कोई विरोध नहीं है ।

यह आगमवचन है । अब यहाँ इस बातका विचार करना है कि वे सहकारी कारण कौन हैं जिनके सम्बन्धभेदसे एक परिणामको भिन्न कार्योंका करनेवाला कहा गया है ?

जहाँ तक स्वामीका सवाल है, जो एक जीव (मनुष्य या तिर्यञ्च) ज्ञानावरणकी उत्कृष्ट स्थिति बाँध रहा है वही आयुकर्मकी चतुःस्थानपतित स्थिति बाँध रहा है, इसलिए स्वामिभेद तो है नहीं । परिणामभेद भी नहीं है, क्योंकि एक ही परिणामसे दोनोंकी उक्त स्थितिका बन्ध हो रहा है । इसी प्रकार काल और क्षेत्रका भी भेद नहीं है, क्योंकि जिस काल या क्षेत्रमें विवक्षित जीव ज्ञानावरणकी उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध कर रहा है उसी काल या क्षेत्रमें वह आयुकर्मकी भी चतुःस्थानपतित स्थितिका बन्ध कर रहा है । इस प्रकार जो बाह्य सामग्री ज्ञानावरणके उत्कृष्ट स्थितिबन्धके लिए प्राप्त है वही बाह्य सामग्री आयुकर्मके चतुःस्थानपतित स्थितिबन्धके लिए भी प्राप्त है । फिर ऐसी कौनसी सहकारी सामग्री है जिसके सम्बन्धभेदसे एक परिणाम भिन्न कार्योंको करनेवाला प्रकृतमें स्वीकार किया गया है ? क्या कारण है कि उसी सामग्रीके सद्भावमें ज्ञानावरणका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध हो और आयुकर्मका चतुःस्थानपतित यथायोग्य स्थितिबन्ध हो ? अर्थात् उत्कृष्ट त्रिभागके प्रथम समयमें आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध हो, और बादमें आगममें बतलाई हुई विधिके अनुसार असंख्यात भागहानि आदिको लिए हुए स्थितिबन्ध हो। इतना ही क्यों ? कोई कर्मवर्गणा ज्ञानावरणादिरूप परि-णमे और कोई आयुकर्मरूप परिणमे, ऐसा क्यों ? इत्यादि अनेक प्रश्न हैं जो यहाँ समाधान चाहते हैं। अपर पक्षने मात्र उक्त उद्धरण तो उपस्थित कर दिया पर उसका आशय क्या है यह स्पष्ट नहीं किया। इसलिए अपर पक्ष यदि इस उद्धरण परसे यह तात्पर्य फलित करना चाहे कि ‘कहीं कार्यमें आभ्यन्तर सामग्रीकी प्रधानता रहती है और कहीं बाह्य सामग्रीकी प्रधानता रहती है’ तो ऐसी मान्यताके बनानेमें उसे किसी भी उल्लेखसे सफलता नहीं मिल सकती।

विचार कर देखा जाय तो यहाँ पर आचार्य सहकारी सामग्रीसे शक्तिभेदको लिए हुए ज्ञानावरण और आयुकर्मकी अपने-अपने स्थितिबन्धके योग्य सामग्रीको ही ग्रहण कर रहे हैं, क्योंकि जितने भी कार्य होते हैं वे अन्तरंग-बहिरंग सामग्रीसे प्रतिबद्ध होकर ही होते हैं। ( धवला पु० १२ पृ० ३७ )। धवला पु० ६ पृ० १४८ में आचार्य वीरसेन लिखते हैं कि जिस समयप्रबद्धमें तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थितिवाले परमाणु पुद्गल होते हैं उनमें एक समय, दो समय, तीन समय आदिसे लेकर तीन हजार वर्षप्रमाण काल-स्थितिवाले पुद्गल स्वभावसे नहीं होते। इससे स्पष्ट है कि प्रतिनियत बाह्य सामग्रीके साथ प्रतिनियत आभ्यन्तर सामग्रीके होनेका प्रतिनियम है और उसी प्रतिनियमका धवला पु० १२ पृ० ४५३ में उक्त शब्दों द्वारा उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार पृ० ३८० व १२० के अपर पक्ष द्वारा उल्लिखित उल्लेखोंके विषयमें भी स्पष्टीकरण समझ लेना चाहिए। सहकारी कारण कार्यकी अन्तरंग सामग्री के लिए भी कहा जाता है। इसके लिए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६५ के ‘दण्डकपाटप्रतरलोकपूरण-’ आदि वचन पर तथा सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० ७ पर दृष्टिपात कीजिए। बाह्य और आभ्यन्तर दोनों सहकारी सामग्री या सहकारी साधन कहलाते हैं। जहाँ सामान्य निर्देश हो वहाँ प्रकरणको देखकर उसका अर्थ करना चाहिए।

अपर पक्षने लिखा है कि ‘जो मात्र आत्मपरिणामसे मोक्ष मानते हैं उनके लिए यह विचारणीय हो जाता है कि द्रव्यकर्मकी शक्ति भी अपेक्षित है, मात्र अकषाय परिणामोंसे ही कर्मोंका घात सम्भव नहीं है।’ समाधान यह है कि कर्मोंका घात स्वयं उनके अपने परिणामका फल है, अकषाय परिणाम तो उसमें निमित्त-मात्र हैं। उसी प्रकार आत्माका मोक्ष स्वयं आत्माका कार्य है, द्रव्यकर्मोंकी निर्जरा तो उसमें निमित्तमात्र है। ऐसी ही निश्चय-व्यवहारकी व्यवस्था है। एक दूसरेका कार्य नहीं करता। किन्तु उसकी प्रसिद्धिका हेतु होनेसे वह व्यवहारहेतु कहलाता है। अपने कार्यका निश्चय हेतु वह द्रव्य स्वयं होता है। यदि अपर पक्षने उक्त वचन द्वारा इसी तथ्यको सूचित किया है तो उसे सर्वत्र कार्य-कारणपरम्परामें इस नियमको स्वीकार करनेमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए। ऐसी अवस्थामें उस पक्षको समर्थ उपादान किसे कहते हैं और बाह्य सामग्रीमें निमित्त व्यवहार क्यों किया जाता है इसे हृदयंगम करनेमें कठिनाई नहीं जायगी।

धवला पु० १ पृ० ३६६-३६७ में मनःपर्ययज्ञानकी उत्पत्तिके बाह्य हेतुओंका निर्देश किया गया है, आभ्यन्तर हेतुका नहीं। आभ्यन्तर हेतु समर्थ उपादान है। उससे युक्त संयमपरिणाम और द्रव्य-क्षेत्र-कालादि मनःपर्ययज्ञानकी उत्पत्तिके बाह्य हेतु हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। अवधिज्ञानकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें ऐसा ही एक प्रश्न धवला पु० १३ पृ० २९ में उठाकर उसका दूसरे प्रकारसे समाधान किया गया है। उल्लेख इस प्रकार है-

जदि सम्मत-अणुव्वद-महव्वदेहिंतो ओहिणाणमुप्पज्जदि तो सव्वेसु असंजदसम्माइट्ठि-संजदासंजद-संजदेसु ओहिणाणं किण्ण उवलब्भदे ? ण एस दोसो ? असंखेज्जलोगमेत्तसम्मत्त-संजम-संजमासंजमपरि-
णामेसु ओहिणाणावरणक्खओवसमणिमित्ताणं परिणामाणमइथोवत्तादो । ण च ते सव्वेसु संभवंति, तप्पडिवक्खपरिणामाण बहुत्तेण तदुवलद्धीए थोवत्तादो ।

शंका-यदि सम्यक्त्व, अणुव्रत और महाव्रतके निमित्तसे अवधिज्ञान उत्पन्न होता है तो सब असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयतोंके अवधिज्ञान क्यों नहीं पाया जाता ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सम्यक्त्व, संयमासंयम और संयमरूप परिणाम असंख्यात लोकप्रमाण हैं । उनमेंसे अवधिज्ञानावरणके क्षयोपशमके निमित्तभूत परिणाम अतिस्तोक हैं, वे सबके सम्भव नहीं हैं, क्योंकि उनके प्रतिपक्षभूत परिणाम बहुत हैं, इसलिए उनकी उपलब्धि बहुत थोड़ी होती है ।

ये दो समाधान हैं । एकका उल्लेख अपर पक्षने किया है और दूसरा यह है । इससे स्पष्ट है कि आचार्य एक ही प्रश्नका समाधान विविध प्रकारसे करते हैं, जिनसे प्रत्येक कार्यकी प्रतिनियत बाह्याभ्यन्तर सामग्रीकी सूचना मिलती है । अतएव यह व्याप्ति बन जाती है कि प्रत्येक कार्यकी आभ्यन्तर सामग्रीके अनुरूप ही बाह्य सामग्री होती है। इसमें व्यत्यय नहीं होता। मात्र बाह्य सामग्री पर द्रव्यका परिणाम होनेसे वह कार्यकी यथार्थ जनक नहीं है । इसी अर्थमें उसे कार्यके प्रति अकिंचित्कर कहा जाता है जो युक्तियुक्त है । पर वह निश्चयकी सिद्धिका हेतु है, इसलिए व्यवहारनयकी अपेक्षा उसके माध्यमसे वस्तुकी सिद्धि करनेमें आपत्ति नहीं। पर ऐसे कथनको उपचरित कथन ही समझना चाहिए ।

हमने प्रश्न ६ के उत्तरमें लिखा था कि ‘व्यवहारके विषयको निश्चयरूप मान कर उत्तर दिये गये हैं ।’ हमें प्रसन्नता है कि अपर पक्षने हमारे उक्त कथनको ‘यदि निश्चयसे अभिप्राय वास्तवका है तो हमको इष्ट है ।’ इन शब्दोंमें स्वीकार कर लिया है । किन्तु उस पक्षने इसी प्रसंगमें जो यह लिखा है कि ‘यदि अभिप्राय निश्चयनयसे है तो आपने निश्चयनयके स्वरूपपर दृष्टि नहीं दी ।’ आदि । समाधान यह है कि हमारी निश्चयनयके स्वरूप पर बराबर दृष्टि है । स्वाश्रित अभेदरूप जितना भी कथन है वह निश्चयनयका विषय है । जब आत्मोपलब्धिके अभिप्रायसे यह जीव प्रवृत्त होता है तब उसकी दृष्टिमें बन्ध-मोक्ष आदिरूप भेदव्यवहार तथा उपचरित व्यवहार गौण (उपेक्षित) होकर एक मात्र स्वाश्रित अभेदरूप ज्ञायकस्वभाव आत्माका अवलम्बन रहता है, क्योंकि इसके अवलम्बनसे तत्स्वरूप परिणमन द्वारा ही आत्मोपलब्धि होना सम्भव है । इसकी प्राप्तिका अन्य मार्ग नहीं है । किन्तु जब यह जीव संसारी बने रहनेके कारणका विचार करता है तब भी भेदव्यवहार और उपचरित व्यवहार दृष्टिमें गौण होकर अज्ञानरूप परिणत आत्माको ही उसका प्रधान हेतु मानता है । स्वाश्रित अभेदरूप कथन दोनों हैं, अन्तर इतना है कि मोक्षमार्गमें आलम्बनकी दृष्टिसे ‘स्व’ पदसे अभेदरूप ज्ञायक आत्मा लिया गया है और संसारके प्रमुख कारणकी दृष्टिमें ‘स्व’ पदसे अज्ञानभावरूप परिणत आत्मा लिया गया है । निश्चयनयका जो सामान्य लक्षण है वह सर्वत्र घटित होता है । यही कारण है कि प्रथम नय शुद्ध निश्चयनय कहलाता है । इसका स्वरूप निर्देश करते हुए नयचक्रादि संग्रह पृ० ७१ में लिखा है-

कम्माणं मज्झगदं जीवं जो गहइ सिद्धसंकासं ।
भण्णइ सो सुद्धणओ खलु कम्मोवाहिणिरवेक्खो ॥१९१॥

कर्मोंके मध्य स्थित जीवको जो सिद्ध जीवोंके समान ग्रहण करता है वह नियमसे कर्मोपाधिनिरपेक्ष शुद्ध नय कहलाता है ॥१९१॥

तथा इसके अतिरिक्त जो निश्चयनयका दूसरा भेद है वह सोपाधि अभेदरूप वस्तुको कहता है, इसलिए उसकी अशुद्ध निश्चयनय संज्ञा है । त्रैकालिक वस्तुस्वरूप वैसा नहीं है, इसलिए इसे अशुद्ध निश्चयनय कहा गया है । साथ ही शुद्ध निश्चयनयकी दृष्टिमें इसे व्यवहार माना गया है । पर निश्चयनयका लक्षण घटित होनेसे यह भी निश्चयनय है ऐसा यहाँ समझना चाहिए । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जैसा वस्तुका स्वरूप है निश्चयनय उसको उसी रूपमें कहता है । त्रैकालिक वस्तुस्वरूपको कहनेवाला शुद्ध निश्चयनय है, इसलिए उसकी दृष्टिमें पर्यायरूप बन्ध-मोक्षका निषेध किया गया है । परन्तु रागादिरूप परिणत आत्मा यदि निश्चयस्वरूप न माना जाय और उसे कहनेवाले नयको निश्चयनय न कहा जाय तो रागादि आत्माके प्रतिविशिष्ट स्वरूप नहीं ठहरेंगे और ऐसी अवस्थामें बन्ध-मोक्षका अभाव होकर आत्माका ही अभाव मानना पड़ेगा । हमें इस बातका आश्चर्य है कि अपर पक्ष आगममें निश्चयनय और व्यवहारनयके जो लक्षण और भेद किये हैं उन पर दृष्टिपात तो करता नहीं और इच्छानुसार टीका कर अपने अभिप्रायकी पुष्टि करना चाहता है । आलापपद्धतिमें निश्चयनयके लक्षण और भेदोंका निर्देश इन शब्दोंमें किया है-

तत्र निश्चयोऽभेदविषयः ।·······तत्र निश्चयनयो द्विविधः -शुद्धनिश्चयोऽशुद्धनिश्चयश्च ।

अतएव प्रकृतमें निश्चयनयको लक्ष्यमें रखकर अपर पक्षने ‘यदि अभिप्राय निश्चयनयसे है तो आपने निश्चयनयके स्वरूप पर दृष्टि नहीं दी ।’ आदि जो कुछ लिखा है वह सब युक्तियुक्त नहीं ।

अपर पक्ष बन्धको व्यवहारनयका विषय समझता है पर ऐसी बात नहीं है, क्योंकि रागादि बन्धरूप परिणत आत्मा अशुद्ध निश्चयनयका विषय है, उसका गुण-गुणी आदि भेदरूपसे कथन सद्भूत व्यवहारनयका विषय है और जीव द्रव्यकर्मोंसे बद्ध है इस प्रकार सर्वथा भेदमें अभेदरूप कथन असद्भूत व्यवहारनयका विषय है । अध्यात्मदृष्टिमें सद्भूत व्यवहारनयका जो विषय यहाँ बतलाया गया है वह असद्भूत व्यवहारनयका विषय हो जाता है, क्योंकि अध्यात्ममें रागादि परभाव हैं । उनको जीवका कहना असद्भूत व्यवहारनयका विषय है । इतना यहाँ विशेष समझना चाहिए । निश्चयनयसम्बन्धी विशेष स्पष्टीकरण इसके पूर्व ही कर आये हैं ।

अपर पक्षने यहाँ पर ‘सम्मत्तपडिणिबद्धं’ इत्यादि तीन गाथाओंका उल्लेखकर मिथ्यात्वादि पदसे मुख्यतया द्रव्यकर्मका ग्रहण किया है, जब कि उक्त गाथाओंमें मिथ्यात्व, अज्ञान और कषाय शब्दोंका प्रयोग है । इनकी टीकामें पण्डितप्रवर जयचन्दजीने भी इन्हीं शब्दोंको मूल आगमके अनुसार रखा है । अपर पक्षको इनका अर्थ करनेमें भ्रमका कारण ‘कर्म’ शब्द है । कर्म शब्द दोनों अर्थोंमें प्रयुक्त होता है-भावकर्म और द्रव्यकर्म । आत्मगुणोंका मुख्यतया प्रतिबन्धक भावकर्म है और उसका निमित्त होनेसे द्रव्यकर्म असद्भूत व्यवहारनयसे उसका प्रतिबन्धक कहा जाता है । समयसार गाथा ८८ में ये मिथ्यात्वादि भाव दोनों प्रकारके बतलाये हैं । आगमका भी यही अभिप्राय है । प्रवचनसार गा० ११७ की टीकामें लिखा है-

क्रिया खल्वात्मना प्राप्यत्वात्कर्म, तन्निमित्तप्राप्तपरिणामः पुद्गलोऽपि कर्म ।

क्रिया वास्तवमें आत्माके द्वारा प्राप्त होनेसे कर्म है । उसके निमित्तसे परिणमनको प्राप्त होता हुआ पुद्गल भी कर्म है ।

इसी तथ्यको गाथा १२२ में और भी स्पष्ट किया है । वहाँ लिखा है-

परिणामो सयमादा स पुण किरिय त्ति होदि जीवमया ।
किरियां कम्मं ति मदा तम्हा कम्मस्स ण दु कत्ता ॥१२२॥

परिणाम स्वयं आत्मा है और वह जीवमय क्रिया है तथा क्रियाको कर्म माना गया है, इसलिए आत्मा द्रव्यकर्मका कर्ता नहीं है ॥१२२॥

इस सम्बन्धमें उसकी टीका विशेषरूपसे अवलोकनीय है ।

अपर पक्षने यहाँ अपने पक्षके समर्थनमें जितने वचन दिये हैं उन सबमें कहीं भी द्रव्यकर्मकी मुख्यता परिलक्षित नहीं होती । आचार्य जयसेनका जो ‘शुभाशुभमनोवचनकायव्यापाररूपं’ इत्यादि वचन अपर पक्षने उपस्थित किया है उसमें भी प्रधानता मिथ्यात्वादि भावोंको ही दी गई है । इसलिये प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि वस्तुतः मिथ्यात्वादि भाव आत्माके सम्यक्त्व आदिके प्रतिबन्धक हैं । ये मिथ्यात्वादि भाव द्रव्यकर्मके संयोगमें उपलब्ध होते हैं, इसलिये असद्भूत व्यवहारनयसे द्रव्यकर्मका उदय भी इनका प्रतिबन्धक कहा जाता है । द्रव्यकर्म हेतुः तस्य, द्रव्यकर्मसंयुक्तत्वोपलभ्यमानत्वात् ( प्रवचनसार गा० १२१ टीका ) यही भाव हमने अपने पिछले उत्तरमें प्रगट किया है और पूरे प्रकरणपर दृष्टिपात करनेसे यही उचित प्रतीत होता है । इसमें निश्चयपक्ष और व्यवहारपक्ष दोनोंका अन्तर्भाव हो जानेसे एकान्तका परिहार भी होजाता है । पं० श्री जयचन्द्रजी महान् विद्वान् तथा अनेक ग्रन्थोंके आगमानुकूल अर्थ करनेवाले थे । उन्होंने इन तीन गाथाओंकी जिन शब्दोंमें व्याख्या की है तथा इनकी टीकाका अर्थ स्पष्ट किया है, कमसे कम अपर पक्ष उन्हीं शब्दों तक अपनेको सीमित रखता तब तो उनके नामस्मरणकी कुछ सार्थकता थी, अन्यथा उनका नाम लेकर अपने एकान्त पक्षके समर्थनमें कुछ सार नहीं ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘निमित्तोंका सम्यक् ज्ञान करानेके लिए ये शब्द किसी आगमके तो हैं नहीं, किन्तु आपकी निजी नवीन कल्पना है जो कि मान्य नहीं है ।’ सो मालूम पड़ता है कि अपर पक्ष बन्ध-मोक्षको तो जानना चाहता है पर उनके निमित्तोंको नहीं जानना चाहता । तभी तो उक्त शब्दोंको उस पक्षने टीका योग्य माना है । वास्तवमें देखा जाय तो आगममें छह द्रव्य, नौ पदार्थ, पाँच अस्तिकाय आदिका जितना भी उपदेश पाया जाता है वह सब सम्यक् ज्ञान करानेके लिए ही उपलब्ध होता है । अस्तु,

अपर पक्षने अपराध सहेतुक है या निर्हेतुक इसकी चरचा करते हुए यह तात्पर्य फलित किया है कि ‘इसलिए अपराधके कारणरूप पर द्रव्यका प्रथम त्याग होना चाहिए उसके पश्चात् ही अपराधका दूर होना सम्भव है । आदि ।’ समाधान यह है कि बाह्य वस्तुका त्याग और बाह्य वस्तुविषयक रागका त्याग ये दो वस्तु नहीं हैं, दो कथन हैं । अतएव यथार्थमें जहाँ बाह्य वस्तुविषयक रागसे निवृत्ति है वहीं बाह्य वस्तुके त्यागका व्यवहार यथार्थ माना जाता है, अन्यथा वह कोरा त्याग है । बाह्य वस्तुविषयक अपराध बना रहे और बाह्य वस्तुका त्याग उसके पूर्व हो जाय ऐसी मान्यताका समर्थन करना अपर पक्षको ही शोभा देता है । दिगम्बर परम्परा और इतर परम्पराकी प्ररूपणामें अन्तर यह है कि जहाँ बाह्य वस्तु वस्त्रादिविषयक राग नहीं है वहाँ बाह्य वस्तुविषयक ग्रहणका न तो विकल्प है और न प्रवृत्ति ही है यह तो दिगम्बर परम्पराकी मान्यता है और इतर परम्पराकी मान्यता यह है कि बाह्य वस्तु वस्त्रादिविषयक ग्रहणका विकल्प भी बना रहे और वैसी प्रवृत्ति भी हो तो भी वस्त्रादिविषयक राग नहीं होता । स्पष्ट है कि दिगम्बर परम्परा विवक्षित निश्चयकी प्राप्तिके साथ तदनुकूल व्यवहारको ही समीचीन मानती है, जब कि इतर परम्परा निश्चयकी प्राप्तिके पूर्व ही अकेले व्यवहारको यथार्थ मानती है । यही कारण है कि ‘कोटि जनम तप तपै ज्ञान बिन कर्म झरें जे ।’ इत्यादि रूप समीचीन कथन दिगम्बर परम्परा तक ही सीमित है । इस विषयमें दिगम्बर परम्पराका हार्द क्या है इसे भगवान् कुन्दकुन्दने समयसार गाथा २६५ में स्पष्ट किया है । वहाँ वे लिखते हैं-

वत्थुं पडुच्च जं पुण अज्झवसाणं तु होइ जीवाणं ।
ण य वत्थुदो दु बंधो अज्झवसाणेण बंधो त्थि ॥२६५॥

जीवोंके जो अध्यवसान होता है वह वस्तुको अवलम्बन कर होता है । तथापि वस्तुसे बन्ध नहीं होता, अध्यवसानसे बन्ध होता है ।।२६५।।

आचार्य अमृतचन्द्रने इस गाथाकी उत्थानिकामें ये शब्द लिखे हैं-

न च बाह्यवस्तु द्वितीयोऽपि बन्धहेतुरिति शंक्यम् ।

इसका आशय स्पष्ट करते हुए पं० श्री जयचन्द्र जी लिखते हैं-

आगे कहते हैं कि जो बाह्य वस्तु है वह बन्धका कारण है कि नहीं ? कोई समझेगा कि जैसे अध्यवसान बन्धका कारण है वैसे अन्य बाह्य वस्तु भी बन्धका कारण है सो ऐसा नहीं है, एक अध्यवसान ही बन्धका कारण है–

इसकी आत्मख्याति टीकामें लिखा है-

अध्यवसानमेव बन्धहेतुः न बाह्यवस्तु, तस्य बन्धहेतोरध्यवसानस्य हेतुत्वेनैव चरितार्थत्वात् । तर्हि किमर्थो बाह्यवस्तुप्रतिषेधः ? अध्यवसानप्रतिषेधार्थम् ।

अध्यावसान ही बन्धका कारण है, बाह्य वस्तु नहीं, क्योंकि बन्धका कारण जो अध्यवसान है उसके हेतुरूपसे ही उसकी चरितार्थता है ।

शंका-तो बाह्य वस्तुका प्रतिषेध किसलिए किया जाता है ?

समाधान-अध्यवसानके प्रतिषेधके लिए ।

बाह्य वस्तुसे बन्ध क्यों नहीं होता इसका समाधान आचार्य जयसेनने इन शब्दोंमें किया है-

अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां व्यभिचारात् । तथा हि-बाह्यवस्तुनि सति नियमेन बन्धो भवति इति अन्वयो नास्ति, तदभावे बन्धो भवतीति व्यतिरेकोऽपि नास्ति ।

बाह्य वस्तुके साथ बन्धका अन्वय-व्यतिरेक नहीं बनता, इसलिए बाह्य वस्तु बन्धका कारण नहीं है । यथा-बाह्य वस्तुके होनेपर नियमसे बन्ध होता है इसलिए अन्वय नहीं बनता तथा बाह्य वस्तुके अभावमें बन्ध होता है इसलिए व्यतिरेक भी नहीं बनता ।

इससे स्पष्ट है कि जिसे अपर पक्ष बाह्य वस्तुका त्याग कहता है वह तभी यथार्थ कहलाता है जब अध्यवसानका त्याग हो । दिगम्बर परम्परा ऐसे ही त्यागको यथार्थ कहती है । आगममें इच्छाको प्रमुखरूपसे परिग्रह कहनेका कारण भी यही है । आचार्योंका आशय यह है कि जहाँ बाह्य वस्तुविषयक इच्छा नहीं है वहाँ बाह्य वस्तुका ग्रहण बन ही नहीं सकता । उसका त्याग तो इच्छाके त्यागमें समाहित है ही । यही दिगम्बर परम्परा है जो नित्यशः वन्दनीय है ।

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने कलश नं० २२० आदिकी चरचा की है । परद्रव्य हो और राग-द्वेष न हो तथा परद्रव्य न हो और राग-द्वेषकी उत्पत्ति हो यह सम्भव है, इसलिए परद्रव्य स्वयं राग-द्वेषका उत्पादक नहीं है । इस तथ्यको स्पष्ट करनेके लिए कलश २२० लिखा गया है । परद्रव्यमें निमित्त व्यवहार कब होता है जब उसमें यह रागी, द्वेषी और मोही होता है यह तथ्य कलश २२१ द्वारा स्पष्ट किया गया है। परके लक्ष्यसे राग, द्वेष, मोह होता है, इसलिए जिनागममें परके त्यागका भी उपदेश है पर उस द्वारा परमें इष्टानिष्ट या निज बुद्धिसे उपयुक्त होनेका ही त्याग कराया गया है यह आशय समयसार गाथा २८३-२८५ का है। अतः इन सबकी संगति है। पूर्वापर विरोध तब आता है जब परको रागादिकी उत्पत्तिमें व्यवहार हेतु न स्वीकार कर उसे यथार्थ हेतु स्वीकार किया जाता है। अपर पक्षको परको यथार्थ हेतु माननेकी अपनी मान्यताका ही त्याग करना है। इसके त्याग होते ही जो हम लिख रहे हैं उसकी यथार्थता अपर पक्षको सुतरां भासित होने लगेगी।

इससे यह तथ्य सुतरां फलित हो जाता है कि परद्रव्य अपनेसे भिन्न दूसरे द्रव्यके कार्यका स्वयं निमित्त नहीं है, किन्तु उससे सम्पर्क कर जब अन्य द्रव्य व्यापार करता है तब उसमें निमित्त व्यवहार होता है।

हमने लिखा था कि ‘दूरातिदूर भव्य भी मुनिचर्या (व्यवहारचारित्र) के द्वारा अहमिन्द्र पद पा सकता है।’ इस पर टीका करते हुए अपर पक्षने जयधवला पु० २ पृ० ३८९ का उल्लेख उपस्थित कर उक्त अभिप्रायका खण्डन किया है जयधवलाका वह वचन इस प्रकार है-

केसिं पि अणादिओ अपज्जवसिदो, अभव्वेसु अभव्वसमाणभव्वेसु च णिच्चणिगोदभावमुपगएसु अवट्ठाणं मोत्तूण भुजगारमप्पदराणमभावादो।

किन्हीं जीवोंके अवस्थित विभक्तिस्थान अनादि-अनन्त होता है, क्योंकि जो नित्य निगोदभावको प्राप्त हुए अभव्य और अभव्योंके समान भव्य हैं उनके अवस्थित स्थानके सिवाय भुजगार और अल्पतरस्थान नहीं पाये जाते हैं।

इसलिए उक्त उल्लेखसे इस तथ्यका समर्थन नहीं होता कि ‘जो दूरातिदूर भव्य हैं वे निगोदमें ही रहते हैं। वे मुनिलिंग अथवा व्यवहारचारित्र धारण कर अहमिन्द्र नहीं हो सकते।’ मेरी समझसे जयधवलामें उक्त उल्लेखका अर्थ करनेमें गलती हुई है, अतः उसमें सुधार अपेक्षित है। दृष्टान्त इष्टार्थका ज्ञान कराता है। पर वह सर्वथा लागू नहीं होता। यह विषय परामर्श विशेषकी अपेक्षा रखता है, इसलिए उस पर परामर्श होना चाहिए। इसे विवादका विषय बनाना उचित नहीं है।

अपर पक्षने पिछले पत्रकमें ‘व्यवहारचारित्र प्रत्येक दशामें सफल है’ यह लिखा था। यहाँ उक्त कथनके आशयको स्पष्ट किया है। हमें व्यवहारचारित्रको परम्परा मोक्षका कारण कहनेमें या उसे निश्चयचारित्रका साधक कहनेमें आपत्ति नहीं है। हमारा कहना तो इतना ही है कि अपर पक्ष जो इन शब्दोंका अर्थ करता है वह ठीक नहीं है। व्यवहारके स्वरूप और प्रयोजनको समझ कर उन्हें इन शब्दोंका अर्थ करना चाहिए।

यदि हमसे कोई पूछे कि जो मिथ्यादृष्टिसे सम्यग्दृष्टि बनता है उसके मिथ्यादृष्टि अवस्थामें इसके पूर्व कितनी विशेषता हो जाती है तो हम अपर पक्षके कथनानुसार यह तो कहेंगे ही कि वह सच्चे देव-गुरु-शास्त्रमें गुरूपदेश आदिको ग्रहण कर श्रद्धावान् हो जाता है, आदि। किन्तु इसके सिवाय यह भी कहेंगे-

\१. वह मोक्षमार्गमें द्रव्यलिंगकी महिमा न स्वीकार कर भावलिंगकी महिमा स्वीकार करने लगता है। साथ ही उसके विशुद्धि आदि लब्धियोंका सन्निधान नियमसे होता है।

\२. पंच परमेष्ठीके सिवाय वह अन्य सबकी पूजा-भक्तिसे विरत हो जाता है।

\३. षट्द्रव्यादिके प्रज्ञानपूर्वक निश्चय मोक्षमार्गके उपदेशको वह श्रद्धापूर्वक स्वीकार करता है।

\४. इन्द्रिय विषयोंमें तीव्र आसक्तिके अभावस्वरूप उसके सम्यग्दृष्टिके अनुरूप बाह्य भूमिका नियमसे बन जाती है।

\५. उसके द्रव्यरूपमें २५ दोषों और छह अनायतनोंका त्याग होकर सम्यक्त्वके आठ अंगोंके प्रति आदरभाव प्रकट हो जाता है। आदि।

किन्तु यह सब होने पर भी उसे सम्यक्त्व प्राप्त हो ही जायगा ऐसा नहीं है। उसकी जब भी प्राप्ति होगी, स्वभावसन्मुख हो कर तत्स्वरूप अनुभूतिके प्रकाशमें ही होगी। इसलिए प्रत्येक भव्य जीवको मात्र मन्दकषायरूप बाह्य प्रवृत्तिमें मग्न न होकर स्वभावसन्मुख होनेका सतत अभ्यास करते रहना चाहिए।

अपर पक्ष हमारे कथनके आशयको स्वीकार कर ले तो फिर हमारा उस पक्षसे कोई विरोध नहीं है। मोक्षमार्गके निरूपणमें सांसारिक लाभालाभकी दृष्टि रखना हेय है, क्योंकि स्वर्गादिककी प्राप्ति मोक्षमार्गकी प्राप्ति नहीं है। और न यह भी नियम है कि जो स्वर्गादि गतिके अधिकारी होते हैं उन्हें मोक्षमार्गकी प्राप्ति नियमसे होती है, अन्यको नहीं होती। इसलिए यथार्थको जानकर स्वभाव प्राप्तिमें उद्यमशील होना यही प्रत्येक भव्यका कर्तव्य है।

अपर पक्षने सर्वार्थसिद्धि ७, १९ की चरचा करते हुए जिन तीन बातोंका निर्देश किया है उनका उत्तर है-

\१. इस जीवको परका त्याग करना है इसका अर्थ-परका सम्पर्क त्यागना है। स्पष्ट है कि पर दुख-दायक नहीं, परका सम्पर्क दुःखदायक है। परका सम्पर्क करे या न करे इसमें आत्मा स्वाधीन है।

\२. कर्मोदयमें उपयुक्त होना या न होना इसमें आत्मा स्वतन्त्र है।

\३. घरसे सम्बन्धका त्याग करना इसका अर्थ घरविषयक राग-मूर्च्छाका त्याग करना है। यही घरका त्याग व्यवहारसे कहलाता है। इसके सिवाय घरका त्याग अन्य वस्तु नहीं।

आचार्य अमृतचन्द्रने गा० २८३-२८५ की टीकामें जो कुछ कहा है उसका स्पष्टीकरण पहले इसी उत्तरमें कर आये हैं। तथा यहाँ भी अपर पक्षके तीन विकल्पोंको ध्यानमें रखकर क्रमशः किया है।

भावागारका त्यागवाला बुद्धिपूर्वक घरमें नहीं ठहरता यह तो ठीक है, पर घरमें ठहर नहीं सकता है यह ठीक नहीं है। शून्यागारमें मूर्च्छा हो जाय तो वह भी घर ही है। पर भावमुनिके होती नहीं। अन्यकी चरचा करना व्यर्थ है।

‘गृहे वसन्नपि’ का अर्थ हमने घरमें बैठा किया है। इसे अपर पक्ष आगमानुकूल नहीं मानता। घरमें रहना और बैठना इसमें विशेष क्या फरक हो गया इसे वही पक्ष जाने। हमें यह इष्ट है कि भावमुनिके लिए आत्माके सिवाय अन्य सब पर घर हैं। इसलिए वह अपने आत्मामें ही ठहरता है, स्थित होता है, बैठता है। वह शून्यागारमें ठहर सकता है यह कहना भी व्यवहार ही है।

निश्चय-व्यवहारका अविनाभाव है। इसलिए हमने निश्चयचारित्रके साथ व्यवहारचारित्रके होनेकी बात ‘दुविहं पि मोक्खहेउं झाणे पाऊण’ (द्रव्यसंग्रह गा० ४७) इस सिद्धान्तको ध्यानमें रखकर कही थी। अपर पक्षका कहना है कि ‘यदि यह माना जायगा तो सातवाँ गुणस्थान होनेपर वस्त्रत्याग, केशलोंच, महाव्रतधारण आदि व्यवहारचारित्रकी क्रिया होगी।’ समाधान यह है कि यह क्रिया तो भावमुनि होनेके पूर्व नियमसे होजाती है, क्योंकि यह क्रिया उसका बाह्य परिकर है, किन्तु वह सम्यक् व्यवहारचारित्र निश्चय चारित्रके होनेपर ही कहलाती है। अतएव हमने जो कुछ भी लिखा है वह आगमको ध्यानमें रखकर ही लिखा है। दिगम्बर परम्परामें ऐसे व्यवहारको ही समीचीन माना गया है जो निश्चयपूर्वक होता है । पुरुषार्थसिद्ध्युपायमें ऐसे मोक्षमार्गका ही निर्देश किया गया है। अतएव आत्मसिद्धिके इच्छुक प्रत्येक धर्मात्मा-का कर्तव्य है कि वह मोक्षमार्गमें अपने आत्माको स्थापित करे, उसीका ध्यान करे, उसीको अनुभव गोचर करे और उसी आत्मामें निरन्तर रमे। अन्य द्रव्योंमें भूलकर भी विहार न करे।

इसप्रकार प्रस्तुत प्रतिशंकाका सांगोपांग समाधान किया।

शंका १०, प्रथम दौर: शंका १० और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६०९ से ६१०

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प्रथम दौर

: १ :

नमः श्री वीतरागाय

मङ्गलं भगवान् वीरो मङ्गलं गौतमो गणी।
मङ्गलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मङ्गलम् ॥

शंका १०

जीव तथा पुद्गलका एवं द्वयणुक आदि स्कन्धोंका बन्ध वास्तविक है या अवास्तविक ? यदि अवास्तविक है तो केवली भगवान् उसे जानते हैं या नहीं।

समाधान १

इस प्रश्नका सम्यक् उत्तर प्राप्त करनेके लिए पहले जीव और पुद्गल तथा दो आदि परमाणुओंके मध्य किस प्रकारका बन्ध जिनागममें स्वीकार किया गया है यह जान लेना आवश्यक है। जीव और पुद्गल के बन्धका निर्देश प्रवचनसार गाथा १७७ की टीका में इस प्रकार किया है-

यः पुनः जीव-कर्मपुद्गलयोः परस्परपरिणामनिमित्तमात्रत्वेन विशिष्टतरः परस्परमवगाहः स तदुभयबन्धः।

जीव तथा कर्मपुद्गलके परस्पर परिणामके निमित्तमात्रसे जो विशिष्टतर परस्पर अवगाह होता है वह तदुभयबन्ध है।

इसी प्रकार दो या दो से अधिक परमाणुओंका परस्पर निमित्तमात्रसे विशिष्टतर परस्पर अवगाह लक्षण जो बन्ध होता है वह स्कन्ध कहलाता है।

जिस प्रकार वैशेषिक दर्शनमें संयोगको स्वतन्त्र गुण माना गया है उस प्रकार जिनागममें उसकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार नहीं की गई है। यही कारण है कि यहाँ व्यवहारनयका आश्रय लेकर दो द्रव्योंके परस्पर निमित्तमात्रसे जो विशिष्टतर परस्पर अवगाह होता है उसे बन्धरूपसे स्वीकार किया गया है।

ऐसी अवस्थामें यदि स्वचतुष्टयकी अपेक्षा विचार करते हैं तो दो या दो से अधिक द्रव्य उक्त प्रकारसे परस्पर अवगाहको प्राप्त होकर भी अपने अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावरूपसे पृथक्-पृथक् ही अपनी-अपनी सत्ता रखते हैं, अतएव निश्चयनयसे बन्ध नहीं है। जैसा कि स्कन्धकी अपेक्षा पंचास्तिकाय गाथा ८१ की टीकामें कहा भी है।

स्निग्ध-रूक्षत्वप्रत्ययबन्धवशादनेकपरमाण्वेकत्वपरिणतिरूपस्कन्धान्तरितोऽपि स्वभावमपरित्यजन्नुपात्तसंख्यत्वादेक एव द्रव्यमिति।

अर्थ-स्निग्ध-रूक्षत्वके कारण बन्ध होनेसे अनेक परमाणुओंकी एकत्व परिणतिरूप स्कन्धके भीतर रहा हो तथापि स्वभावको न छोड़ता हुआ संख्याको प्राप्त होनेसे ( अर्थात् परिपूर्णके समान पृथक् गिनतीमें आनेसे ) अकेला ही द्रव्य है ।

व्यवहार और निश्चयसे इसी विषयको स्पष्ट करते हुए नियमसारमें भी कहा है-

पोग्गलदव्वं उच्चइ परमाणू णिच्छएण इदरेण ।
पोग्गलदव्वो त्ति पुणो ववदेसो होदि खंधस्स ॥२९॥

अर्थ-निश्चयसे परमाणुको पुद्गल द्रव्य कहा जाता है और व्यवहारसे स्कन्धको पुद्गल द्रव्य ऐसा नाम होता है ॥२९॥

पुद्गलद्रव्यव्याख्यानोपसंहारोऽयम्-स्वभावशुद्धपर्यायात्मकस्य परमाणोरेव पुद्गलद्रव्यव्यपदेशः शुद्धनिश्चयेन । इतरेण व्यवहारनयेन विभावपर्यायात्मनां स्कन्धपुद्गलानां पुद्गलत्वमुपचारत सिद्धं भवति ।

यह पुद्गल द्रव्यके कथनका उपसंहार है-शुद्ध निश्चयनयसे स्वभावशुद्ध पर्यायात्मक परमाणुको ही पुद्गलद्रव्य ऐसा नाम होता है । इतर अर्थात् व्यवहारनयसे विभावपर्यायात्मक स्कन्धपुद्गलोंको पुद्गलपना उपचारसे सिद्ध होता है ।

इसी विषयको बहुत ही स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार करते हुए प्रवचनसार गाथा १६१ की टीकामें लिखा है-

अनेकपरमाणुद्रव्यस्वलक्षणभूतस्वरूपास्तित्वानामनेकत्वेऽपि कथञ्चिदेकत्वेनावभासनात् ।

क्योंकि अनेक परमाणु द्रव्योंके स्वलक्षणभूत स्वरूपास्तित्व (स्वद्रव्यचतुष्टय) अनेक होने पर भी कथंचित् (स्निग्धत्व-रूक्षत्वकृत बन्धपरिणामकी अपेक्षासे) एकत्वरूप’अवभासित होते हैं ।

इसप्रकार जब कि दो सजातीय द्रव्योंके बन्धको ही व्यवहारसे बन्ध लिखा है तो जीव पुद्गल दो विजातीय द्रव्योंके बन्धको भी व्यवहारस्वरूप कैसे नहीं कहा जायगा ।

इस प्रकार व्यवहारनयसे ही पुद्गल और पुद्गलका तथा जीव और पुद्गलका बन्ध आगममें कहा गया है। इससे यह फलित हुआ कि जिस द्रव्यके जिस कालमें जैसी अवस्था होती है केवली भगवान् उसे ठीक उसी प्रकारसे जानते हैं, और जिस प्रकारसे वे जानते हैं वही आगममें प्रतिपादित है ।

शंका १०, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६१० से ६१२

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका १०

प्रश्न यह है-जीव तथा पुद्गलका एवं द्वयणुक आदि स्कन्धोंका बन्ध वास्तविक हैं या अवास्तविक ? यदि अवास्तविक है तो केवली भगवान् उसे जानते हैं या नहीं ?

प्रतिशंका २

आपने अपने उत्तरमें जीव तथा पुद्गलका एवं द्यणुकादि स्कन्धोंका बन्ध स्वीकार करते हुए प्रवचनसार गाथा १७७ की टीकाका उद्धरण देते हुए बतलाया है कि ‘जीव तथा कर्म पुद्गलके परस्पर परिणामके निमित्तमात्रसे जो परस्पर विशिष्टतर अवगाह होता है वह तदुभयबन्ध है। इसी प्रकार दोसे अधिक परमाणुओंका परस्पर निमित्तमात्रसे विशिष्टतर परस्पर अवगाहलक्षण जो बन्ध होता है वह स्कन्ध कहलाता है।’

आगे आपने लिखा है कि वैशेषिक दर्शनमें संयोगको जैसा स्वतन्त्र गुण माना है वैसा जिनागममें संयोगकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं स्वीकार की है और इस आधारपर आपने यह निष्कर्ष निकाला है कि उपर्युक्त प्रकार दो द्रव्योंके परस्पर निमित्तमात्रसे जो विशिष्टतर परस्पर अवगाहरूपसे बन्ध होता है वह व्यवहार-नयका आश्रय लेकर ही होता है।

इसमें निम्न बातें विचारणीय हैं-

(१) इस बन्धमें आपने जो परस्पर बद्ध होनेवाले दो द्रव्योंमें परस्पर निमित्तता स्वीकार की है उस परस्पर निमित्ततासे आपका अभिप्राय क्या है ?

(२) विशिष्टतर परस्पर अवगाहसे आपने क्या समझा है ?

(३) व्यवहारनयका आश्रय लेकर बन्ध होता है इसमें व्यवहारनय और उसको बन्ध होनेमें आश्रयताका क्या आशय है ?

इसके भी आगे आपने लिखा है कि उक्त प्रकारसे परस्पर अवगाहको प्राप्त होकर भी बँधनेवाले दोनों द्रव्य या दोसे अधिक सभी द्रव्य अपने अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावरूपसे पृथक्-पृथक् ही अपनी अपनी सत्ता रखते हैं, अतएव आपका कहना है कि निश्चयनयसे बन्ध नहीं है। इसके लिए आपने पञ्चास्तिकाय गाथा ८१ की टीकाका प्रमाण भी उपस्थित किया है, जिसके आधारपर आपने कहा है कि ‘निश्चयसे परमाणुको पुद्गल द्रव्य कहा जाता है और व्यवहारसे स्कन्धको पुद्गल द्रव्य कहा जाता है।’

इस विषयमें भी हमारा आपसे प्रश्न है कि पृथक्-पृथक् दो आदि परमाणुओंमें तथा स्कन्धस्वरूप दो आदि परमाणुओंमें आप क्या अन्तर स्वीकार करते हैं ? और उस अन्तरको आप वास्तविक मानते हैं या नहीं ?

हमने यह प्रश्न आपके समक्ष इसलिये उपस्थित किया है कि हम देखते हैं कि जहाँ पृथक्-पृथक् अनेक परम णु व्याघात रहित हैं वहाँ हम यह भी देखते हैं कि अनेक परमाणुओंका स्थूल स्कन्ध व्याघात सहित देखनेमें आता है। हम देखते हैं कि शरीरमें चोट लगने पर जीव और नोकर्मरूप पुद्गलके एकरूप पिण्डका ही यह परिणाम है कि जीवको दुःखका अनुभव होने लगता है। बरसातमें जो नदियोंमें पानीकी बाढ़ आती है और वह जो हमारे सामने प्रलयका दर्दनाक रूप उपस्थित कर देती है यह भी अनेक पुद्गल परमाणुओंके स्थूल एक अखण्ड स्कन्धरूपताका ही परिणाम है। कहाँ तक गणना की जाय, जो कुछ भी दृश्य जगत है वह सब जीव और पुद्गल एवं नाना परमाणुओंके सत्यरूपमें अनुभूत होनेवाले बन्धका ही परिणाम है। तो आपकी दृष्टिमें क्या यह सब अवास्तविक ही है अर्थात् कुछ नहीं है क्या ? और यदि कुछ है और वह वास्तविक है तो फिर निश्चय एवं व्यवहारका जो भेद आप बतला रहे हैं उसका फलितार्थ क्या है ? कृपया स्पष्ट कीजिये।

जहाँ तक हमने आपके लेखसे यह समझा है कि जीव और पुद्गलके परस्पर बन्धमें तथा नाना परमाणुओंके बन्धमें जो कुछ स्कन्धरूपता देखनेमें आती है उसे आप अवास्तविक ही मानना चाहते हैं तो हम पुनः आपसे पूछना चाहते हैं कि सर्वज्ञको इस अवास्तविक पिण्डरूप जगत्का ज्ञान होता है या नहीं ? इस प्रश्नका संकेत हमने अपने मूल प्रश्नमें भी किया था जिसे आपने यह कहकर अपने उत्तरमें टाल दिया है कि ‘जिस द्रव्यकी जिस कालमें जैसी अवस्था होती है केवली भगवान् ठीक उसी प्रकारसे उसे जानते हैं ।’

हम पुनः आपसे कहना चाहते हैं कि आप हमारे मूल प्रश्नका तथा इस प्रतिप्रश्नमें दर्शाये गये अन्य प्रश्नोंका स्पष्ट उत्तर देनेका प्रयत्न करेंगे ।

शंका १०

मूल प्रश्न-जीव तथा पुद्गलका एवं द्वयणुक आदि स्कन्धोंका बन्ध वास्तविक है या अवास्तविक ? यदि अवास्तविक है तो केवली भगवान् उसे जानते हैं या नहीं ?

शंका १०, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६१२ से ६१३

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प्रतिशंका २ का समाधान

मूल प्रश्नका उत्तर अनेक शास्त्रीय प्रमाण देकर पूर्वमें यह दे आये हैं कि व्यवहारनयकी अपेक्षा बन्ध है ।

प्रतिशंका २ में पुनः ये प्रश्न उपस्थित किये गये हैं ।

१-इस बन्धमें आपने जो परस्पर बद्ध होनेवाले दो द्रव्योंमें परस्पर निमित्तता स्वीकार की है, उस परस्पर निमित्ततासे आपका अभिप्राय क्या है ?

२-विशिष्टतर परस्पर अवगाहसे आपने क्या समझा है ?

३-व्यवहारनयका आश्रय लेकर बन्ध होता है उसमें व्यवहारनय और उसकी बन्धमें होनेवाली आश्रयताका क्या आशय है ?

४-उसके आगे हमारे वक्तव्यको ध्यानमें रखकर यह प्रतिशंका की गई है कि पृथक्-पृथक् दो आदि परमाणुओंमें तथा स्कन्धस्वरूप दो आदि परमाणुओंमें आप क्या अन्तर स्वीकार करते हैं ? और उस अन्तरको आप वास्तविक मानते हैं या नहीं ?

५-इसके आगे कुछ निष्कर्षको फलितकर यह प्रश्न किया गया है कि सर्वज्ञको इस अवास्तविक पिण्डरूप जगत्का ज्ञान होता है या नहीं ?

ये पाँच मुख्य शंकाऐं हैं । समाधान इस प्रकार है-

: १ :

जीवके अज्ञानरूप मोह, राग, द्वेष परिणाम तथा योग द्रव्यकर्मके बन्धका निमित्त हैं और ज्ञानावरणादि कर्मोंका उदय अज्ञानरूप जीव भावोंके होनेमें निमित्त है । इसी प्रकार दो पुद्गल परमाणुओंमें स्निग्ध ओर रूक्ष गुणकी द्वयधिकता परस्परमें बन्धका निमित्त है, इसी प्रकार पुद्गल स्कन्धमें भी बन्धका निमित्त जान लेना चाहिये । यही यहाँ दो द्रव्योंकी परस्पर बद्धताकी निमित्तता है ।

: २ :

जिन्हें अन्यत्र संश्लेष बन्ध लिखा है उसका ठीक स्पष्टीकरण ‘विशिष्टतर परस्पर अवगाह’ पदसे होता है । यों तो छहों द्रव्य व्यवहारनयकी अपेक्षा एक क्षेत्रमें उपलब्ध होते हैं । परन्तु वहाँ उन सबका निमित्त-नैमित्तिक भावसे विशिष्टतर अवगाह उपलब्ध नहीं होता। हाँ उनमेंसे जिनमें निमित्त-नैमित्तिकभावसे विशिष्टतर अवगाह उपलब्ध होता है उनमें ही बन्धव्यवहार किया जाता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

: ३ :

‘व्यवहारनयका आश्रय लेकर’ इसका अर्थ ‘व्यवहारनयकी अपेक्षा’ इतना ही है। व्यवहारनय यह ज्ञानपर्याय है। दो द्रव्योंका निमित्त-नैमित्तिकभावसे जो विशिष्टतर परस्पर अवगाह होता है उसे व्यवहारनयकी अपेक्षा बन्ध कहा है यह हमारे कथनका तात्पर्य है। और इसी अभिप्रायसे हमने मूल प्रश्नका उत्तर देते हुए यह वाक्य लिखा था ‘यहाँ व्यवहारनयका आश्रय लेकर दो द्रव्योंके परस्पर निमित्तमात्रसे जो विशिष्टतर परस्पर अवगाह होता है उसे बन्धरूपसे स्वीकार किया है।’ इस वाक्यमें ‘व्यवहारनयका आश्रय लेकर’ इस वाक्यका ‘व्यवहारनयकी अपेक्षा’ ऐसा अर्थ करके उसको ‘बन्धरूपसे स्वीकार किया है।’ इस वाक्यके साथ सम्बन्ध कर लेने पर पूरे वाक्यका अर्थ स्पष्ट हो जाता है।

: ४ ः

पृथक्-पृथक् दो आदि परमाणुओंमें स्वभाव पर्याय होती है जो एक समान भी हो सकती है और विसदृश भी हो सकती है। तथा स्कन्धस्वरूप दो आदि परमाणुओंमें विभाव पर्याय होती है। नियम यह है कि बन्ध होने पर यदि दो परमाणुओंका बन्ध हो तो हीन गुणवाला परमाणु दो अधिक गुणवाले परमाणुरूप परिणम जाता है, इसलिए द्वयणुक स्कन्धका सदृश परिणाम ही होता है। किन्तु सभी स्कन्ध मात्र परमाणुओंका बन्ध होकर ही नहीं बनते। बहुतसे स्कन्ध अनेक स्कन्धोंके मेलसे भी बनते हैं, अतः उनमें सदृश और विसदृश दोनों प्रकारके परिणमन उपलब्ध होते हैं। जो सभीके अनुभवका विषय है। यही इनमें अन्तर है।

: ५ ः

पिण्डरूप जगत्को अवास्तविक शब्दका प्रयोग करना भ्रमोत्पादक है। आगममें सत्ता दो प्रकारकी मानी गई है -स्वरूपसत्ता और उपचरितसत्ता। स्वरूपसत्ताकी अपेक्षा प्रत्येक परमाणु स्वतन्त्र है, दो या दोसे अधिक परमाणु सर्वथा एक नहीं हुए हैं। किन्तु बन्ध होनेपर उनमें जो एक पिण्डरूपता प्राप्त होती है वह उपचरितसत् है । अतएव केवली जिन जैसे स्वरूप सत्को जानते हैं वैसे ही उपचरित सत्को भी जानते हैं। वर्गणाखण्ड प्रकृति अनुयोगद्वारमें कहा भी है -

सइं भयवं उप्पण्णणाणदरिसी सदेवासुरमाणुसस्स लोगस्स आगदिं गदिं चयणोववादं बंधं मोक्खं इड्ढि ट्ठिदिं अणुभागं तक्कं कलं माणो माणसियं सुत्तं कदं पडिसेविदं आदिकम्मं अरहकम्मं सव्वलोए सव्वजीवे सव्वभावे सम्मं समं जाणदि विहरदि त्ति ॥८२॥

अर्थ-उत्पन्न हुए केवलज्ञान और केवलदर्शनसे युक्त भगवान् स्वयं देवलोक और असुरलोकके साथ मनुष्य लोककी आगति, गति, चयन, उपपाद, बन्ध, मोक्ष, वृद्धि, स्थिति, युति, अनुभाग, तर्क, कल, मन, मानसिक, भुक्त, कृत, प्रतिसेवित, आदिकर्म, अरहःकर्म, सब लोकों, सब जीवों और सब भावोंको सम्यक् प्रकारसे युगपत् जानते हैं, देखते हैं और विहार करते हैं।८२।

शंका १०, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६१४ से ६२१

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका १०

प्रश्न यह था-जीव तथा पुद्गलका एवं द्वयणुक आदि स्कन्धोंका बन्ध वास्तविक है या अवास्तविक ? यदि अवास्तविक है तो केवली भगवान् उसे जानते हैं या नहीं ?

प्रतिशंका ३

इस प्रश्नपर आपका उत्तर आ जाने पर उसके आधारपर जो विषय चर्चनीय हो गये थे और जिनका उत्तर आपसे प्राप्त करनेकी भावनासे अपनी प्रतिशंका २ में हमने निबद्ध किये थे, वे निम्नप्रकार हैं :-

१-इस बन्धमें आपने जो परस्पर बद्ध होनेवाले दो द्रव्योंमें परस्पर निमित्तता स्वीकार की है उस परस्पर निमित्ततासे आपका क्या अभिप्राय है ?

२-विशिष्टतर परस्पर अवगाहसे आपने क्या समझा है ?

३-व्यवहारनयका आश्रय लेकर बन्ध होता है इसमें व्यवहारनय और उसकी बन्ध होनेमें आश्रयताका क्या आशय है ?

४-पृथक्-पृथक् दो आदि परमाणुओंमें तथा स्कन्धस्वरूप दो आदि परमाणुओंमें आप क्या अन्तर स्वीकार करते हैं ? और इस अन्तरको आप वास्तविक मानते हैं या नहीं ?

५-(यदि जगत् अवास्तविक पिण्डरूप है तो) सर्वज्ञको इस अवास्तविक पिण्डरूप जगत्का ज्ञान होता है या नहीं ?

: १ :

उक्त चर्चनीय विषयोंमेंसे प्रथम चर्चनीय विषयका उत्तर देते हुए यद्यपि आपने स्वीकार किया है कि ‘जीवके अज्ञानरूप मोह, राग द्वेष परिणाम तथा योग द्रव्यकर्मके बन्धका निमित्त हैं’ लेकिन ‘ज्ञानावरणादि कर्मोंका उदय अज्ञानरूप जीवभावोंके होनेमें निमित्त है’ यह वाक्य प्रत्युत्तरमें देखकर तो आश्चर्यका ठिकाना ही नहीं रह सकता है, कारण कि जितने अंशमें ज्ञानावरण कर्मका उदय जीवमें विद्यमान रहता है उससे तो ज्ञानका अभावरूप अज्ञान ही होता है जिसे द्रव्यकर्मके बन्धका कारण न तो आगममें माना गया है और न आप ही ने माना है। आपके द्वितीय वक्तव्यमें स्पष्ट लिखा हुआ है कि ‘अज्ञानरूप मोह, राग, द्वेष परिणाम तथा योग द्रव्यकर्मके बन्धके निमित्त हैं।’ इसमें आगमका भी प्रमाण देखिये……

मिच्छत्तं अविरमणं कसायजोगा य सण्णसण्णा दु।
बहुविहभेया जीवे तस्सेव अणण्णपरिणामा ॥१६४॥
णाणावरणादीयस्स ते दु कम्मस्स कारणं होंति।
तेसिं पि होदि जीवो य रागदोसादिभावकरो ॥१६५॥
-समयसार आस्रवाधिकार

टीका-मिथ्यात्वाविरतिकषाययोगाः पुद्गलपरिणामाः, ज्ञानावरणादिपुद्गलकर्मास्रवणनिमित्तत्वात्किलास्रवाः । तेषां तु तदास्रवणनिमित्तत्वनिमित्तं अज्ञानमया रागद्वेषमोहाः । तत आस्रवणनिमित्तत्वनिमित्तत्वाद् रागद्वेषमोहा एव आस्रवाः ।
-आत्मख्याति टीका

गाथाओंका अर्थ टीकाके अर्थसे ही समझा जा सकता है, अतः यहाँ टीकाका ही अर्थ दिया जाता है ।

मिथ्यात्व, अवरति, कषाय और योग ये सब पुद्गलके विकार हैं, ये चूँकि ज्ञानावरणादि पुद्गलकर्मोंके आस्रवमें निमित्त होते हैं, अतः इन्हें आस्रव नामसे कहा जाता है । पुद्गलके विकारभूत इन मिथ्यात्वादिकमें ज्ञानावरणादि कर्मोंके आस्रवणकी जो निमित्तता (कारणता) पायी जाती है, उसके निमित्त जीवके अज्ञानमय राग, द्वेष और मोहरूप परिणाम हैं, इसलिये ज्ञानावरणादि कर्मोंके आस्रवणके लिये मिथ्यात्वादि पुद्गल विकारोंमें पायी जानेवाली निमित्तताकी उत्पत्तिमें भी कारण होनेसे आत्माके परिणामस्वरूप राग, द्वेष और मोहरूप भाव ही अस्रव हैं ।

यहाँ राग, द्वेष और मोहरूप भावोंको ही अज्ञान शब्दका वाच्य अर्थ स्वीकार किया गया है और उन्हींको आस्रव (बन्धका कारण) कहा गया है ।

यदि कहा जाय कि मोह, राग और द्वेष उपयोग (ज्ञान) के ही तो विकार है और वह उपयोग ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे ही उत्पन्न होता है, इसलिये अज्ञानमें ज्ञानावरण कर्मके उदयको निमित्त कहना ठीक है, तो इसका उत्तर यह है कि जिस उपयोगके विकारको राग, द्वेष और मोह कहा गया है वह तो ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न होनेवाला ज्ञानभाव ही है, ज्ञानावरण कर्मके उदयसे होनेवाला ज्ञानके अभावरूप अज्ञानभाव वह नहीं है । समयसारमें कहा भी है-

उवओगस्स अणाई परिणामा तिण्णि मोहजुत्तस्स ।
मिच्छत्तं अण्णाणं अविरदिभावो य णायव्वो ॥८८॥

अर्थ-मोह कर्मसे युक्त जीवके उपयोग (ज्ञान) के अनादिसे ही मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरतिरूप विकार जानना चाहिये ।

गाथामें जो उपयोग शब्द आया है उसका अर्थ ज्ञान ही होता है, ज्ञानका अभाव नहीं । मिथ्यात्व और अविरतिके बीचमें जो अज्ञान शब्दका पाठ गाथामें किया गया है वह भी ज्ञानके अभावरूप अर्थका बोधक नहीं है । किन्तु उस ज्ञानभावका ही बोधक है जो मोहकर्मके उदयमें विकारी हो रहा है ।

ऐसा तो प्रतीत नहीं होता कि इतनी मोटी गलती आगमकी अजानकारीमें बुद्धिभ्रमसे ही की गई हो । वास्तविक बात तो यह मालूम देती है कि मोक्षमार्गमें सिर्फ वस्तुस्वरूपके ज्ञानको ही महत्त्व दिया जा रहा है और चारित्रके विषयमें तो यह ख्याल है कि वह तो अपने आप नियतिके अनुसार समय आनेपर हो ही जायगा, उसके लिये पुरुषार्थ करनेकी आवश्यकता नहीं है । बस । एक यही कारण मालूम देता है कि बन्धके कारणोंमें ज्ञानावरणकर्मके उदयसे होनेवाले ज्ञानके अभावरूप अज्ञानभावको कारण मानना आवश्यक समझा गया है और यह वाक्य लिखा गया है कि ‘ज्ञानावरणादि कर्मोंका उदय अज्ञानरूप जीवके भावोंके होनेमें निमित्त है ।’

परन्तु यह भी मोटी भूलका ही परिणाम है, क्योंकि यदि वस्तुस्वरूपके ज्ञानके लिये पुरुषार्थको महत्त्व दिया जाता है तो ‘चारित्र अपने आप हो जायगा’-यह सिद्धान्त संगत नहीं हो सकता है । यदि यह कहा जाय कि ज्ञानके साथ चारित्रके लिए भी पुरुषार्थ करना चाहिये, तो ‘भावलिंगके होने पर द्रव्यलिंग होता है’ ( देखो प्रश्न १ का उत्तर ) इस सिद्धान्तको कैसे मान्यता दी जा सकती है ? फिर तो जितना ज्ञानी बननेके लिए जनताको उपदेश दिया जाता है, कमसे कम उतना ही उपदेश चारित्रवान् बननेके लिये भी क्यों नहीं दिया जाता ? तथा व्यवहारचारित्रको अयथार्थ और उपचरित मानते हुए केवल संसारका कारण क्यों कहा जाता है ?

वास्तविक बात यह है कि चारित्रका पालन करना तलवारकी धारपर चलनेके समान है, इसलिए अपने जीवनको कष्टकर भासनेवाली प्रवृत्तियोंसे अलग रखकर ‘केवल वस्तुस्वरूपका ज्ञान करने तक सीमित करके भी मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है’-ऐसी धारणा जिसने बना ली हो वह व्यक्ति जीवनके लिये कष्टकर भासनेवाले चारित्रके मार्गपर चलनेके लिये क्यों उत्साहित होगा ? लेकिन ऐसे व्यक्तिकी यह तीसरी भूल होगी। कारण कि समयसारमें इस बातका स्पष्ट कथन किया गया है कि केवल वस्तुस्वरूपका ज्ञान कर लेनेसे मनुष्य सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता है। प्रमाण निम्न प्रकार है-

किं च यदिदमात्मास्रवयोर्भेदज्ञानं तत्किमज्ञानं किं वा ज्ञानम् ? यद्यज्ञानं तदा तदभेदज्ञानान्न तस्य विशेषः। ज्ञानं चेत्, किमास्रवेषु प्रवृत्तं किं वास्रवेभ्यो निवृत्तम् ? आस्रवेषु प्रवृत्तं चेत्तदपि तदभेदज्ञानान्न तस्य विशेषः। आस्रवेभ्यो निवृत्तं चेत्तर्हि कथं न ज्ञानादेव बन्धनिरोधः इति निरस्तो अज्ञानांशः क्रियानयः। यस्त्वात्मास्रवयोर्भेदज्ञानमपि नास्रवेभ्यो निवृत्तं भवति तज्ज्ञानमेव न भवतीति ज्ञानांशो ज्ञाननयोऽपि निरस्तः।
-समयसार गाथा ७२ की आत्मख्याति टीका

अर्थ-यह जो आत्मा और आस्रवका भेदज्ञान है उसका ज्ञान उस व्यक्तिको, जो अपनेको भेदज्ञानी समझता है, रहता है या नहीं। यदि उस भेदज्ञानका ज्ञान उसे नहीं रहता है तो उस व्यक्तिमें और जिसे अभी तक आत्मा तथा आस्रवका भेदज्ञान ही नहीं हुआ है उसमें विशेषता (अन्तर) ही क्या रह जायगी ? यदि कहा जाय कि भेदज्ञानका ज्ञान उस व्यक्तिको रहता है, तो फिर प्रश्न उठता है कि वह व्यक्ति भेदज्ञानका ज्ञान रखते हुए आस्रवोंमें प्रवृत्ति करता है अथवा आस्रवोंकी प्रवृत्तियोंको बन्द कर देता है ? यदि कहा जाय उसकी आस्रवोंमें प्रवृत्तियाँ तो होती रहती हैं, तो फिर भी वही बात होगी कि जिसे अभी तक आत्मा और आस्रवमें भेदज्ञान नहीं हो पाया है उस व्यक्तिसे इस व्यक्तिमें क्या अन्तर रह जायगा ? इसलिये जिसे आत्मा और आस्रवका भेदज्ञान प्राप्त हो चुका है, उसका भेदज्ञान तभी सार्थक होगा, जब कि वह आस्रवोंमें होनेवाली अपनी प्रवृत्तियाँ भी बन्द कर देगा और तभी उस व्यक्तिको ‘ज्ञानसे ही बन्धका निरोध होता है’ ऐसा कहना उपयुक्त होगा। इसका आशय यह है कि एक तरफ ज्ञान रहित क्रिया करना निरर्थक है तो दूसरी तरफ क्रियारहित ज्ञान भी निरर्थक है।

: २ ः

द्वितीय चर्चनीय विषयका उत्तर देते हुए जो ‘विशिष्टतर परस्पर अवगाह’ का स्पष्टीकरण किया गया है उससे सिर्फ इतनी बात स्पष्ट होती है कि एक ही क्षेत्रमें स्थित छहों द्रव्योंका जैसा परस्पर संस्पर्शरूप सम्बन्ध है उससे यह विलक्षण है तथा अन्यत्र जिसे संश्लेष बन्ध लिखा है वही यह है, परन्तु जब यह कहा जाता है कि उस विशिष्टतर परस्पर अवगाहमें ही बन्धका व्यवहार किया जाता है और यह भी कहा जाता है कि वह निमित्तनैमित्तिकभावके आधारपर ही होता है, फिर तो आपकी दृष्टिसे वह कल्पनारोपित ही होगा, क्योंकि निमित्तनैमित्तकभावरूप कार्यकारणभाव तथा व्यवहार इन दोनोंको आप उपचरित, कल्पनारोपित और असद्भूत ही स्वीकार करते हैं। ऐसी हालतमें छह द्रव्योंके परस्पर संस्पर्श और विशिष्टतर परस्पर अवगाह इन दोनोंमें अन्तर ही क्या रह जायगा ? यह आप ही जानें।

: ३ :

तीसरे चर्चनीय विषयका जो उत्तर आपने दिया है वह निम्नप्रकार है-

‘व्यवहारनयकी अपेक्षासे दो द्रव्योंके परस्पर निमित्तमात्रसे जो विशिष्टतर परस्पर अवगाह होता है उसे बन्धरूप स्वीकार किया है।’

पहले उत्तर पत्रमें जो वाक्य इस विषयमें लिखा गया था उसमेंसे ‘व्यवहारनयका आश्रय लेकर’ यह पद हटाकर इस उत्तरमें ‘व्यवहारनयकी अपेक्षासे’ यह पद जोड़ दिया गया है, लेकिन इससे अर्थमें कोई अन्तर नहीं आया है। हमारा कहना तो यह है और जैसा कि हमने ऊपर चर्चनीय विषय दोमें अभी अभी लिखा है कि आपकी दृष्टिमें निमित्तनैमित्तिकभाव और व्यवहार दोनों ही जब उपचरित, आरोपित और असद्भूत ही हैं तो इनके सहारेपर बन्धमें भी असद्भूतता आये बिना नहीं रह सकेगी तब व्यवहारनयरूपी ज्ञानांशका विषय वह कैसे होगा ? क्योंकि असद्भूत विषय जिसकी कोई सत्ता ही नहीं है वह ‘गधेके सींग’ तथा “आकाशके फूल” के समान ही है, अतः चाहे व्यवहारनय हो या चाहे निश्चयनय हो, अथवा चाहे केवलज्ञान ही क्यों न हो वह किसीका भी विषय नहीं हो सकता है।

: ४ :

चौथे चर्चनीय विषयके सम्बन्धमें हमें आपसे यह कहना है कि आपके द्वारा कही हुई पृथक्-पृथक् दो आदि परमाणुओंमें स्वभावपर्याय होती है। ‘वह समान भी होती है और विसदृश भी होती है’ यह बात ठीक है, परन्तु ‘परस्पर बन्ध हो जानेपर दो आदि परमाणुओंकी जो पर्याय होगी, वह विभावपर्याय होगी’ यह बात आपके मतसे कैसे संगत होगी ? जब आप बन्धको अवास्तविक मानते हैं, यह बात आपको सोचना है। आगमसम्मत हमारे पक्षमें तो दो द्रव्योंके बन्धसे विभाव पर्यायकी संगति इसलिए बैठ जाती है कि यह पक्ष बन्ध, व्यवहार, निमित्तनैमित्तकभाव आदिको अपने अपने रूपमें वास्तविक ही स्वीकार करता है।

: ५ :

पाचवें चर्चनीय विषयके उत्तरमें आपने लिखा है कि ‘प्रश्नमें लिखा गया अवास्तविक शब्द भ्रमोत्पादक है।’ यदि ‘अवास्तविक’ शब्दके प्रयोगसे भ्रम हो सकता है तो उसको अलग भी किया जा सकता है, परन्तु पहले यह तो मालूम हो जावे कि बन्धादिकी सत्ता क्या किसी भी रूपमें आव स्वीकार करते हैं। अभी तक तो हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आप बन्धको, व्यवहारको और निमित्तनैमित्तिकभाव आदिको असद्भूत अर्थात् सत्ताहीन ही स्वीकार करते हैं।

आप सत्ताके स्वरूपसत्ता और उपचरितसत्ता ऐसे दो भेद भले ही स्वीकार कर लें, परन्तु जब उपचरितसत्ताको आप कल्पनारोपित ही मानते हैं तो वह सत्ताहीन ही होगी, फिर ऐसे भेद करनेसे क्या लाभ ? हाँ। यदि पिण्डरूप सत्ताको कोई प्रकार भी सत् माननेको तैयार हैं, तो निर्णय कीजिये कि उसका वह प्रकार क्या हो सकता है। सत्ताहीन पिण्ड तो केवलज्ञानका भी विषय नहीं हो सकता है, जैसे गधेके सींग और आकाशके फूल केवलज्ञानके विषय नहीं होते हैं, इसलिए आपका यह लिखना भी संगत प्रतीत नहीं होता कि ‘केवली भगवान् जैसे स्वरूपसत्को जानते है वैसे उपचरितसत्को भी जानते हैं ।’ इस कारण आपके द्वारा दिया गया प्रकृति अनुयोगद्वारका उद्धरण भी आपके पक्षका समर्थन नहीं कर सकता है ।

अब थोड़ा आगम प्रतिपादित वस्तुव्यवस्था पर भी विचार कर लेना उपयुक्त जान पड़ता है-

सर्व प्रथम प्रवचनसारकी गाथा ८७ को देखिये, वह क्या प्रतिपादन करती है-

दव्वाणि गुणा तेसिं पज्जाया अट्ठसण्णया भणिया ।
तेसु गुण-पज्जयाणं अप्पा दव्व ति उवदेशो ॥

इस गाथामें आचार्यश्री ने द्रव्य, गुण व पर्याय इन सबको अर्थ बतलाते हुए इन सभीका द्रव्यमें समावेश किया है जो कि परमार्थरूपसे वस्तु है । टीकामें आचार्य अमृतचन्द्रने इस विषयको बहुत स्पष्ट करके दिखला दिया है । विस्तार होनेके भयसे यहाँ टीकाका उद्धरण नहीं दिया है, अतः वहाँ देखनेका कष्ट कीजिये ।

अब ज्ञेयतत्त्वाधिकार (२) की गाथा १ को देखिये-

अत्थो खलु दव्वमओ दव्वाणि गुणप्पगाणि भणिदाणि ।
तेहिं पुणो पज्जाया पज्जयमूढा हि परसमया ॥९३॥

टीका-इह किल यः कश्चन परिच्छिद्यमानः पदार्थः स सर्व एव विस्तारायतसामान्यसमुदायात्मना द्रव्येणाभिनिर्वृत्तत्वाद् द्रव्यमयः । द्रव्याणि तु पुनरेकाश्रयविस्तार-विशेषात्मकैरभिनिर्वृत्तत्वाद् गुणात्मकानि । पर्यायास्तु पुनरायतविशेषात्मका उक्तलक्षणैर्द्रव्यैपि गुणैरप्यभिनिर्वृत्तत्वाद् द्रव्यात्मका अपि गुणात्मका अपि । तत्रानेकद्रव्यात्मकैक्यप्रतिपत्तिनिबन्धनो द्रव्यपर्यायः । स द्विविधः-समानजातीयोऽसमानजातीयश्च । तत्र समानजातीयो नाम यथा-अनेकपुद्गलात्मको द्व्यणुकस्त्र्यणुक इत्यादि । असमानजातीयो नाम यथा-जीवपुद्गलात्मको देवो मनुष्य इत्यादि । गुणद्वारेणायतानैक्यप्रतिपत्तिनिबन्धनो गुणपर्यायः। सोऽपि द्विविधः-स्वभावपर्यायो विभावपर्यायश्च । तत्र स्वभावपर्यायो नाम समस्तद्रव्याणामात्मीयात्मीयागुरुलघुगुणद्वारेण प्रतिसमयसमुदीयमानषट्स्थानपतितवृद्धिहानिनानात्वानुभूतिः । विभावपर्याया नाम-रूपादीनां ज्ञानादीनां वा स्वपरप्रत्ययवर्तमानपूर्वोत्तरावस्थावतीर्णतादात्म्योपदर्शितस्वभावविशेषानेकत्वापत्तिः ।

टीकाका अर्थ-लोकमें जितना कुछ ज्ञेयरूप पदार्थ है वह सब विस्तारसामान्य अर्थात् तिर्यक्सामान्य और आयतसामान्य अर्थात् ऊर्ध्वतासामान्य-इन दोनोंके समूहरूप द्रव्यके रूपमें अस्तित्वको प्राप्त हो रहा है, अतः द्रव्यरूप है । जितने द्रव्य हैं वे सब गुणात्मक हैं, क्योंकि विस्तार गुणका नाम है और इस तरह प्रत्येक द्रव्य एक आश्रयमें रहनेवाले विस्तारविशेषों अर्थात् गुणभेदोंके आधार पर अस्तित्वको प्राप्त हो रहा है। इसी प्रकार आयत पर्यायका नाम है और वे पर्यायें उक्तलक्षणवाले द्रव्यों तथा गुणोंके आधारपर ही अस्तित्वको प्राप्त हो रही है, इसलिए पर्यायें द्रव्यात्मक भी हैं और गुणात्मक भी हैं । इन दोनों प्रकारकी पर्यायोंमेंसे जो पर्याय अनेक द्रव्योंसे बने हुए ऐक्यका ज्ञान करानेका कारण है वह द्रव्यपर्याय है। द्रव्यपर्याय दो प्रकारकी हैं-एक तो समानजातीय द्रव्यपर्याय और दूसरी असमानजातीय द्रव्यपर्याय । इनमेंसे समानजातीय द्रव्यपर्यायें तो द्व्यणुक आदि पुद्गलात्मक हैं और असमानजातीय द्रव्यपर्यायें जीव तथा पुद्गलके मिश्रणसे निष्पन्न होनेवाली देव, मनुष्यादि पर्यायें हैं । गुणोंके द्वारा आयत अर्थात् ऊर्ध्वरूपमें अनैक्यकी प्रतिपतिकी कारणभूत गुणपर्यायें हैं । ये गुणपर्यायें भी दो प्रकारकी हैं-स्वभावपर्याय और विभावपर्याय । समस्त द्रव्योंके अपने अगुरुलघुगुणोंके द्वारा प्रत्येक समयमें होनेवाली षड्गुणहानि-वृद्धिरूप स्वभावपर्यायें हैं और विभावपर्यायें रूपा-दिक तथा ज्ञानादिककी स्व (उपादान) तथा पर (निमित्त) इन दोनोंके सहयोगसे उत्पन्न होनेवाली पूर्व और उत्तर अवस्थाओंमें आनेवाले तारतम्यके आधारपर दिखाई देनेवाले स्वभावविशेषरूप हैं।

उक्त गाथाकी यह टीका जीव तथा पुद्गलकी बंधपर्यायकी एवं द्वयणुकादिरूप स्कन्धकी वास्तविकताका उद्घोष कर रही है। आगे पंचास्तिकाय ग्रन्थका भी प्रमाण देखिये-

खंधा वा खंधदेसा य खंधपदेसा होंति परमाणू।
इदि ते चदुव्वियप्पा पुग्गलकाया मुणेयव्वा ॥७४॥

अर्थ-स्कन्ध, स्कन्धके खण्ड, उन खण्डोंके खण्ड और परमाणु इस तरह पुद्गल द्रव्योंको चाररूप समझना चाहिए।

श्लोकवार्तिक पृ० ४३० पर तत्त्वार्थसूत्रके ‘अवणः स्कन्धाश्च’ सूत्रकी व्याख्या करते हुए आचार्य विद्यानन्दिने लिखा है-

नाणव एवेत्येकान्तः श्रेयान्, स्कन्धानामक्षबुद्धौ प्रतिभासनात्। स्कन्धैकान्तस्ततोऽस्त्वित्यपि न सम्यक्, परमाणूनामपि प्रमाणसिद्धत्वात्।

अर्थ-पुद्गल द्रव्य केवल अणुरूप ही हैं, ऐसा एकान्त नहीं समझना चाहिये, कारण कि इन्द्रियोंसे स्कन्धोंका भी ज्ञान होता है। केवल स्कन्धोंको मान लेना भी ठीक नहीं है, कारण कि परमाणु भी प्रमाणसिद्ध पदार्थ हैं।

इसी प्रकार तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५ में ‘भेदसंघातेभ्य उत्पद्यन्ते’ (५-२६) इस सूत्र द्वारा स्कन्धोंकी तथा ‘भेदादणुः।’ (५-२७) इस सूत्रद्वारा अणुकी उत्पत्ति बतलायी गयी है।

अष्टशती और अष्टसहस्रीका भी प्रमाण देखिये-

कार्यकारणादेरभेदैकान्ते धारणाकर्षणादयः।
परमाणूनां संघातेऽपि माभूवन् विभागवत् ॥६७॥

इसीके आगे अष्टसहस्रीकी पंक्तियाँ पढ़िये-

विभक्तेभ्यः परमाणुभ्यः संहतपरमाणूनां विशेषस्योत्पत्तेर्धारणाकर्षणादयः संगच्छन्ते।
-अष्टसहस्री पृष्ठ २२३ कारिका ६७ की व्याख्या

दोनोंका अर्थ-कार्य और कारणमें सर्वथा अभेद माननेसे परमाणुओंका स्कंध बन जाने पर धारण और आकर्षण नहीं होना चाहिये। अर्थात् परमाणु अकेलेमें धारण और आकर्षणरूप क्रिया होना जैसे सम्भव नहीं है उसी तरह संघातमें भी उस क्रियाका होना कार्य और कारणका अभेद माननेपर नहीं होगा । चूँकि पृथक् विद्यमान परमाणुओंकी अपेक्षा संहत (स्कन्धरूप) परमाणुओंमें विशेषता आ जाती है, अतएव उनका धारण और आकर्षण संभव हो जाता है।

ये सब प्रमाण पृथक् पृथक् पाये जानेवाले अणुओंकी और उन अणुओंकी बद्धतासे निष्पन्न द्वयणुकादि स्कंधोंकी वास्तविकताको सिद्ध करते हैं।

बंध होनेपर एकत्व हो जाता है, अर्थात् दोनोंकी पूर्व अवस्थाका त्याग होकर एक तीसरी अवस्था उत्पन्न हो जाती है। श्री पूज्यपाद आचार्यने सर्वार्थसिद्धिमें कहा भी है-

बधं पडि एयत्तं (२।७)

ततः पूर्वावस्थाप्रच्यवनपूर्वकं तार्तीयकमवस्थान्तरं प्रादुर्भवतीत्येकत्वमुपपद्यते (५।२४)

अर्थात्-बंधकी अपेक्षा एकत्व है। बंधसे पूर्वावस्थाका त्याग होकर उनसे भिन्न एक तीसरी अवस्था उत्पन्न होती है, अतः उनमें एकरूपता आजाती है।

इससे भी बन्धकी वास्तविकता ही सिद्ध होती है।

इन सब प्रमाणोंके प्रकाशमें स्कन्ध, देश, प्रदेश आदि पुद्गल द्रव्योंकी समानजातीय पर्यायें तथा जीव और पुद्गलके मिश्रणसे बननेवाली देव, मनुष्यादि पर्यायें तभी उत्पन्न हो सकती हैं जब कि मूल द्रव्यके अनित्यांशभूत स्वकाल और स्वभावमें परिणमन हो जावे। यदि उक्त पर्यायोंमें द्रव्यके अनित्यांशभूत स्वकाल और स्व-भाव भी स्वद्रव्यकी तरह तदवस्थ बनकर रहते हैं तो ऐसी हालतमें स्कन्धका निर्माण कभी संभव नहीं होगा। परन्तु बात दरअसल यह है कि परमाणु जब द्व्यणुक, त्र्यणुक आदि स्कंधकी अवस्थाको प्राप्त होते हैं तब वे अपनी अणुत्वपर्यायको छोड़कर स्कन्धरूप पर्यायको धारणकर लेते हैं। यदि ऐसा न हो तो फिर सूक्ष्मताको प्राप्त अणुओंके स्कन्धमें स्थूलता तथा अदृश्यताके स्थानपर दृश्यता किसी भी प्रकार संभव नहीं होगी। इसलिये परिवर्तित स्वरूपास्तित्वको लिये हुए ही स्कन्धपरिणति उन पुद्गलोंमें आती है। यह परिणति उसी पुद्गल द्रव्यके स्निग्धत्व और रूक्षत्व गुणकी विकृतिरूप उपादान शक्तिसे निर्मित कंथचित् एकत्वरूप है, इसलिए बन्धरूप अवस्था जिसे स्कंध कहो, चाहे अनेक द्रव्योंकी समानजातीय या असमानजातीय पर्याय कहो, ये सभी द्रव्यगत विशेष ही हैं, अतः वह पर्याय भी अर्थ है, वास्तविक परिणमन है, उन द्रव्योंसे जुदा नहीं है।

नैयायिक लोग तो गुणपदार्थको गुणीसे भिन्न मानते हैं, इसलिए उनके मतसे संयोग द्रव्यसे भिन्न एक गुण है। जैनागम यद्यपि द्रव्यसे भिन्न संयोगको गुण नहीं मानता है तो भी वह दो द्रव्योंके बन्धात्मक परिणमनको तो स्वीकार करता ही है। तो फिर दो पुद्गलोंकी बंधात्मक अवस्थारूप समानजातीय द्रव्यपर्यायको तथा जीव-पुद्गलोंकी बंधात्मक असमानजातीय द्रव्यपर्यायको अवास्तविक कैसे कहा जा सकता है। प्रवचनसार पृ० १२० पर भी लिखा है-

तत्रैव चानेकपुद्गलात्मको द्व्यणुकस्त्र्यणुक इति समानजातीयो द्रव्यपर्यायः
-गाथा ९३ टीका

अर्थ-अनेक पुद्गलोंके रूप ही द्व्यणुक और त्र्यणुक ये सब समानजातीय द्रव्यपर्याय ही हैं।

ऐसी स्थितिमें इन्हें वस्तुस्वरूप ही माना जाना युक्तिसंगत और आगमसम्मत है। अतः इन्हें व्यवहारनयाश्रितताके आधार पर उपचरित (कल्पनारोपित) बतलाना कहाँ तक उचित है।

इसीलिये प्रवचनसारके ज्ञेय तत्त्वाधिकारकी गाथा १ की टीका करते हुए आचार्य श्री अमृतचन्द्रने अन्तमें बहुत स्पष्टरूपसे लिखा है कि -

सर्वपदार्थानां द्रव्यगुणपर्यायस्वभावप्रकाशिका पारमेश्वरी व्यवस्था साधीयसी।

अर्थ-सर्व पदार्थोंकी द्रव्य-गुण-पर्यायरूप स्वभावकी प्रकाशक भगवान् सर्वज्ञ अर्हन्तदेव द्वारा उपदिष्ट व्यवस्था ही सत्य है।

इसी प्रकार इन्हीं पर्यायोंके आधार पर ही उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यकी व्यवस्था प्रतिपादित की गयी है। जो परमाणु, द्वयणुक और त्र्यणुक आदिमें द्रव्यत्वको ही लक्षित करता है। यदि स्वरूपास्तित्वमें जो अंश पर्यायको प्राप्त है वह यदि परिवर्तित हुए बिना ही रह जावे तो फिर द्वयणुकादि पर्यायें कैसे बनेंगी ? इतना अवश्य है कि परमाणुका जो अनुगामी अंश द्रव्यार्थिकनयगम्य होगा, वही अपरिवर्तित रह जावेगा और उसके अपरिवर्तित बने रहने पर भी जो पर्यायें होती हैं उनको स्व-परप्रत्यय माना गया है। विस्तरेण अलम्। इस पर आप विचार कीजिये। यही हमारा अन्तिम अनुरोध है ।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका १०

जीव तथा पुद्‌गलका एवं द्वयणुक आदि स्कन्धोंका बन्ध वास्तविक है या अवास्तविक ? यदि अवास्तविक है तो केवली भगवान् उसे जानते हैं या नहीं ?

शंका १०, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६२१ से ६३१

↑ सूची


प्रतिशंका ३ का समाधान

इस प्रश्नका समाधान करते हुए पिछले दो उत्तरोंमें बतलाया गया था कि परस्पर निमित्त-नैमित्तिकभावसे जीव और पुद्‌गलोंका तथा पुद्‌गल-पुद्‌गलका जो विशिष्टतर अवगाह होता है उसकी बंध संज्ञा है। यह वास्तविक है या अवास्तविक ? इसका निर्णय करते हुए बतलाया गया था कि सत्ता दो प्रकारकी मानी गई है-स्वरूपसत्ता और उपचरित सत्ता। स्वरूपसत्ताकी अपेक्षा प्रत्येक परमाणु या जीव अपने-अपने स्वचतुष्टयमें ही अवस्थित रहते हैं, इसलिए स्वतन्त्र हैं, क्योंकि दो या दोसे अधिक परमाणु या जीव और पुद्‌गल सर्वथा एक नहीं हुए हैं। किन्तु बन्ध होने पर उनमें जो एक क्षेत्रावगाहरूप एक पिण्डरूपता प्राप्त होती है वह उपचरितसत् है। अतएव केवली जिन जैसे स्वरूपसत्‌को जानते हैं वैसे ही एक पिण्ड व्यवहारको प्राप्त उपचरित सत्‌को भी जानते हैं, क्योंकि परस्पर निमित्त-नैमित्तिकभावसे उस उस पर्यायपरिणत एकक्षेत्रावगाहरूप वे केवलीके ज्ञानमें प्रतिभासित होते हैं।

: १ :

तत्काल प्रतिशंका ३ विचारके लिए प्रस्तुत है। इसमें सर्वप्रथम प्रतिशंका २ में उठाये गये ५ प्रश्नोंको पुनः निबद्ध कर प्रथम प्रश्नका उत्तर देते हुए हमारे द्वारा लिखे गये एक वाक्य पर आपत्ति की गई है। वह वाक्य इस प्रकार है-

‘जीवके अज्ञानरूप मोह, राग-द्वेष परिणाम तथा योग द्रव्यकर्मके बन्धके निमित्त हैं और ज्ञानावरणादि कर्मोंका उदय अज्ञानरूप जीवभावोंके होनेमें निमित्त है।’

सो यद्यपि यह वाक्य शास्त्रविरुद्ध तो नहीं है, परन्तु अपर पक्षने ‘ज्ञानावरणादि कर्मोंका उदय अज्ञानरूप जीवभावोंके होनेमें निमित्त है।’ इस वाक्यको पढ़कर इसपर अत्यधिक आश्चर्य प्रगट करते हुए लिखा है-'लेकिन ज्ञानावरणादि कर्मोंका उदय अज्ञानरूप जीवभावोंके होनेमें निमित्त है यह वाक्य-प्रत्युत्तरमें देखकर तो आश्चर्यका ठिकाना ही नहीं रह सकता है। कारण कि जितने अंशमें ज्ञानावरण कर्मका उदय जीवमें विद्यमान रहता है उससे तो ज्ञानका अभावरूप अज्ञान ही होता है जिसे द्रव्यकर्मके बन्धका कारण न तो आगममें माना गया है और न आपने ही माना है। आपके द्वितीय वक्तव्यमें स्पष्ट लिखा हुआ है कि ‘अज्ञानरूप मोह, राग, द्वेष परिणाम तथा योग द्रव्यकर्मके बन्धके निमित्त हैं।’

यह हमारे पूर्वोक्त वाक्यके सन्दर्भमें अपर पक्षका वक्तव्य है। प्रसन्नता है कि इसमें अपर पक्षद्वारा उस वाक्यांशको सदोष बतलानेका उपक्रम नहीं किया गया जिस द्वारा संसारी जीवके अज्ञानरूप रागादिभावों और योगको निमित्तकर ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मके बन्धका विधान किया गया है। अपर पक्षको उक्त उद्धृत वाक्यका उत्तरार्द्ध सदोष प्रतीत हुआ है। किन्तु उसने यदि सावधानीसे उक्त वाक्यांश पर विचार किया होता तो हमें विश्वास है कि वह इस अप्रासंगिक चर्चासे इस प्रतिशंकाके कलेवरको पुष्ट करनेका प्रयत्न नहीं करता। कारण कि उक्त वाक्यके पूर्वार्ध द्वारा जहाँ ज्ञानावरणादि कर्मबन्धके निमित्तकारणोंका निर्देश किया गया है वहाँ उसके उत्तरार्ध द्वारा ज्ञानावरणादि कर्मोंके उदयको निमित्त कर होनेवाले जीवके अज्ञान, अदर्शन, अचारित्र और अदानशीलता आदि अज्ञानरूप भावोंका निर्देश किया गया है। ये भाव जीवके चैतन्य स्वभावको स्पर्श नहीं करते, इसलिए इन सबको अज्ञानरूप कहा गया है। मालूम नहीं कि अपर पक्षने उक्त वाक्यमें आये हुए ‘अज्ञानरूप जीवभावों’ इतने कथनको देखकर उनसे अज्ञानरूप राग, द्वेष, मोह तथा योगका परिग्रह कैसे कर लिया। यदि रागादि भाव अज्ञानरूप माने जा सकते हैं तो अज्ञान, अदर्शन आदि भावोंको अज्ञानरूप माननेमें आपत्ति ही क्या है। जो राग-द्वेषादि भाव ज्ञानावरणादि कर्मके हेतु हैं उनका नामोल्लेखपूर्वक निर्देश जब अनन्तर पूर्व ही किया है ऐसी अवस्थामें अज्ञानरूप जीवभावोंसे अज्ञान, अदर्शन आदि औदयिक भाव लिये गये हैं यह अपने आप फलित हो जाता है। अतएव अपर पक्षने जो इस प्रकारकी आपत्ति उठाई है वह ठीक नहीं है, इतना संकेत करनेके बाद हम उनके उस निष्कर्ष पर सर्व प्रथम विचार करेंगे जो उस पक्षने इस आपत्तिके प्रसंगसे फलित किया है। वह निष्कर्ष इस प्रकार है-

'वास्तविक बात तो यह मालूम देती है कि मोक्षमार्गमें सिर्फ वस्तुस्वरूपके ज्ञानको ही महत्त्व दिया जा रहा है और चारित्रके विषयमें तो यह ख्याल है कि वह तो अपने नियतिके अनुसार समय आने पर ही हो जायगा, उसके लिए पुरुषार्थ करनेकी आवश्यकता नहीं है। बस! एक यही कारण मालूम देता है कि बन्धके कारणोंमें ज्ञानावरण कर्मके उदयसे होनेवाले ज्ञानके अभावरूप अज्ञानभावको कारण मानना आवश्यक समझा गया है और यह वाक्य लिखा गया है कि ‘ज्ञानावरणादि कर्मोंका उदय अज्ञानरूप जीवभावोंके होनेमें निमित्त है।’ आदि।

सो इसका उत्तर यह है कि जब किसीके मनमें दूसरोंके प्रति विपरीत धारणा बन जाती है तो वह किसी भी कथनसे उल्टा-सीधा कुछ भी अर्थ फलित कर स्वयं भ्रममें पड़ता है और दूसरेके लिए भी भ्रमका मार्ग प्रशस्त करता है। हमें तो प्रकृतमें अपर पक्षका ऐसा ही आचरण प्रतीत होता है, क्योंकि अपर पक्षने जिस बातको आपत्ति योग्य माना है उसमें तो केवल इतना ही बतलाया गया है कि ज्ञानावरणादि कर्मोंका उदय किन भावोंके होनेमें निमित्त है। वे भाव कर्मबन्धके हेतु हैं यह बात उसमें जब कही ही नहीं गई ऐसी अवस्थामें हमने ज्ञानावरण कर्मके उदयमें होनेवाले अज्ञान भावको कर्मबन्धका हेतु बतलाया, यह बात अपर पक्षने कैसे फलित कर ली, आश्चर्य है। हमारे वाक्यमें ज्ञानावरणके साथ ‘आदि’ शब्द जुड़ा है। साथ ही ‘अज्ञानरूप जीवभावों’ इस प्रकार बहुवचन पदका निर्देश है। ऐसी अवस्थामें अपर पक्षने उसका अर्थ ‘ज्ञानावरण कर्मके उदयसे होनेवाले ज्ञानके अभावरूप अज्ञानभाव’ कैसे किया, इसका वही शांत चित्तसे विचार करे। अतएव उस वाक्य परसे यह फलित करना कि ‘मोक्षमार्गमें सिर्फ वस्तुस्वरूपके ज्ञानको ही महत्त्व दिया जा रहा है और चारित्रके विषयमें तो यह ख्याल है कि वह तो अपने आप निमित्तिके अनुसार समय आनेपर ही हो जायगा, उसके लिए पुरुषार्थ करनेकी आवश्यकता नहीं है।’ कथन मात्र है, क्योंकि हमारा कहना तो यह है कि जो मुमुक्षु आत्मसिद्धिके लिए प्रयत्नशील हैं उनके लिए तत्त्वज्ञान पूर्वक हेय-उपादेयका विवेक और उसके साथ अन्तरङ्ग कषायका शमन करते हुए यथा पदवी चारित्रको स्वीकार कर उसे जीवनका अंग बनाना उतना ही आवश्यक है जितना कि चिरकालसे विपरीतदृष्टि पंगु पुरुषके लिए स्वयं इष्ट स्थान पर पहुँचनेके हेतु मार्गदर्शक आँखोंका निर्मल होना और उसके साथ यथाशक्ति पंगुपनेको दूर करते हुए यथासामर्थ्य मार्गका अनुसरण करना आवश्यक है।

हमें इस बातकी तो प्रसन्नता है कि अपर पक्षने प्रकृतमें इस तथ्यको तो स्वीकार कर लिया है कि हमारी ओरसे जो प्ररूपणा की जाती है वह वस्तुस्वरूपका ज्ञान करानेके अभिप्रायसे ही की जाती है। उसमें किसी प्रकारकी विपरीतता नहीं है। तभी तो उसकी ओरसे यह वाक्य लिखा गया है कि ‘मोक्षमार्गमें सिर्फ वस्तुस्वरूपके ज्ञानको ही महत्त्व दिया जारहा है।’ अन्यथा उस पक्षकी शंका चारित्रके विषयमें न उठाई जाकर सम्यक् ज्ञानके विषयमें उठाई जानी चाहिए थी। परन्तु वस्तुस्थिति ही दूसरी है। वास्तवमें तो वर्तमानमें चारित्रका अर्थ बाह्य क्रिया बतलाकर बाह्य क्रियाकाण्डमें ही जनताको उलझाये रखनेके अभिप्रायसे हमें लांछित किया जा रहा है। इसलिए अपर पक्षकी यह प्रवृत्ति अवश्य ही टीकास्पद है, ऐसा हमारा स्पष्ट मत है।

तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ पृ० १७ में ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः’ इस सूत्रकी व्याख्या करते हुए लिखा है-

एषां पूर्वस्य लाभे भजनीयमुत्तरम्।

इन सम्यग्दर्शनादि तीनोंमें से पूर्व अर्थात् सम्यग्दर्शन और तत्सहचर सम्यग्ज्ञानका लाभ होनेपर सम्यक्चारित्र भजनीय है।

इससे विदित होता है कि सम्यग्दर्शनके साथ होनेवाला ज्ञान ही सम्यग्ज्ञान है और इन दोनोंके होनेपर जो आत्मस्थितिरूप चारित्र होता है वही सम्यक्चारित्र है। ये तीनों आत्माकी स्वभावपर्यायें हैं, अथवा इन तीनमय स्वयं आत्मा है। क्या अपर पक्ष यह बतला सकता है कि ऐसे सम्यक्चारित्रधर्मका और उसके साथ होनेवाली तदनुकूल बाह्य प्रवृत्तिका हममें से किसीने कभी और कहीं निषेध किया है क्या? निषेध करनेकी बात तो दूर रहो, आत्माके निज वैभवको प्रकाशित करनेवाले अध्यात्मका जहाँ भी उपदेश दिया जाता है वहाँ यही कहा जाता है कि जो केवल ‘मैं शुद्ध, बुद्ध, निरंजन, नित्य हूँ’ ऐसे विकल्पमें मग्न होकर तत्स्वरूप आत्माको नहीं अनुभवता वह तो आत्मासे दूर है ही, साथ ही जो विकल्प और शरीरके आधीन क्रियाधर्मके अवलम्बन द्वारा मोक्षमार्गकी प्राप्ति मानता है वह आत्मासे और भी दूर है। अतएव बाह्य क्रियाधर्ममें आत्महित है इस व्यामोहको छोड़कर प्रत्येक भव्य जीवको आत्मप्राप्तिके मार्गमें लगना चाहिए। यह हम मानते हैं कि आत्मप्राप्तिके मार्गमें लगे अन्य जीवका क्रियाधर्म सर्वथा छूट नहीं जाता, क्योंकि सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिके बाद भी रागसे अनुरंजित उपयोगके कालमें क्रियाधर्म तो होता ही है, उसका निषेध नहीं। बात केवल इतनी है कि ज्ञानी पुरुष उसे केवल अपना स्वभाव न मानकर उसरूप प्रवृत्ति करता हुआ भी निर्विकल्प समाधिको ही हितकारी मानता है जो कि सम्यक्चारित्रस्वरूप है। पं० प्रवर आशाधरजीने सागारधर्मामृतका प्रारम्भ करते हुए ‘तद्धर्मरागिणाम्’ पद देकर यह प्रसिद्ध किया है कि अन्तरङ्गमें जिनके मुनिधर्म (आत्मधर्म) में गाढ़ प्रीति उत्पन्न हुई है उसीका गार्हस्थ्यजीवन सफल है। सविकल्प दशामें यथापदवी व्यवहारधर्म जहाँ उस उस कालमें प्रयोजनीय माना गया है वहाँ उसके होते हुए भी आत्मकार्यमें सावधान रहना जीवन माना गया है।

यह आध्यात्मिक उपदेशकी पद्धति है। इसी पद्धतिका अनुसरण कर अनादिकालसे 'सर्वत्र अध्यात्मके उपदेश दिये जानेकी परिपाटी है। ऐसी अवस्थामें प्रतिशंका ३ में प्रकृत विषयको लक्ष्यमें रखकर जो भाव व्यक्त किया गया है उसे मात्र कल्पनाके कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

नियति किसी एक कार्यके लिए आगममें स्वीकार की गई हो और दूसरेके लिए स्वीकार न की गई हो ऐसा नहीं है। साथ ही कोई एक कार्य पुरुषार्थपूर्वक होता हो और दूसरा बिना पुरुषार्थके हो जाता हो ऐसा भी नहीं है। इनका गौण मुख्यपना विवक्षामें हो सकता है, कार्यमें नहीं। इसी प्रकार जो भी कार्य होता है उसका कोई निमित्त न हो यह भी नहीं है। एकान्तके प्रति आग्रहवान् व्यक्ति ही ऐसी कल्पना कर सकते हैं कि अमुक कार्य मात्र पुरुषार्थसे होता है, अमुक कार्य मात्र नियतिके अनुसार अपने आप हो जाता है और अमुक कार्य मात्र निमित्तके बलसे होता है। जिन्होंने अपने जीवनमें अनेकान्तस्वरूप आत्मधर्मका रसास्वाद लिया है वे त्रिकालमें ऐसी मिथ्या कल्पना नहीं कर सकते। कार्यमें पुरुषार्थ, नियति, निमित्त आदि सबका समवाय है ऐसा निश्चय जिनके चित्तमें है वे ही मोक्षमार्गके पथिक बननेके अधिकारी हैं। अतएव जैसे आत्मविवेकको जागृत करनेके लिए परम पुरुषार्थकी आवश्यकता है उसी प्रकार आत्मस्थितिरूप चारित्रको संपादित करनेके लिए भी निरलसभावसे आत्मपुरुषार्थी होना भी आवश्यक है। सब आत्मकार्योंके सम्पादनमें पुरुषार्थ प्रथम कर्त्तव्य है। अतएव चर्चनीय विषयोंमेंसे प्रथम चर्चनीय विषयका उत्तर देते हुए हमने जो यह लिखा है कि ‘ज्ञानावरणादि कर्मोंका उदय अज्ञानरूप जीवभावोंके होनेमें निमित्त है।’ सो उक्त वाक्यको सदोष बतलाते हुए उसपरसे अन्यथा कल्पना करना श्रेयस्कर नहीं है।

हम प्रथम प्रश्नके उत्तरमें यह लिख आये हैं कि ‘जैसा कि भावलिंगके होनेपर द्रव्यलिंग होता है, इस नियमसे भी सिद्ध होता है।’ आदि, सो इस वाक्यके ऊपरसे भी अपर पक्षने अपने मनगढ़न्त विचार बना लिये हैं। उसने यदि इस वाक्यके आगे लिखे गये पूरे कथनपर ध्यान दिया होता और उसके सन्दर्भमें इस वाक्यको पढ़ता तो आशा थी कि वह अपनी कल्पित कल्पनाओंसे प्रतिशंकाके कलेवरको नहीं सजाता। क्या यह सच नहीं है कि भावलिंगके अभावमें नग्नता आदि रूपसे धारण किया गया द्रव्यलिंग मोक्षमार्गकी प्राप्तिमें अणुमात्र भी साधक नहीं है? और क्या यह सच नहीं है कि ऐसे भावशून्य द्रव्यलिंगको धारणकर जो महानुभाव तलवारकी धारपर चलनेके समान विविध प्रकारका कायक्लेश करते हैं उनका वह कायक्लेश मोक्षमार्गकी प्राप्तिमें अणुमात्र भी साधक नहीं है। द्रव्यलिंग सत्यार्थपनेको तभी प्राप्त हो सकता है जब वह भावलिंगका अनुवर्ती बनता है। इसी तथ्यको हमने प्रथम शंकाके उत्तरमें ‘भावलिंगके होनेपर द्रव्यलिंग होता है।’ इत्यादि वाक्यों द्वारा व्यक्त किया था। हमारे द्वारा व्यक्त किये गये वे भावपूर्ण वचन इस प्रकार हैं-

‘जैसा कि भावलिंगके होनेपर द्रव्यलिंग होता है इस नियमसे भी सिद्ध होता है। यद्यपि प्रत्येक मनुष्य भावलिंगके प्राप्त होनेके पूर्व ही द्रव्यलिंग स्वीकार कर लेता है, पर उस द्वारा भावलिंगकी प्राप्ति द्रव्यलिंगको स्वीकार करते समय ही हो जाती हो ऐसा नहीं है। किन्तु जब उपादानके अनुसार भावलिंग प्राप्त होता है तब उसका निमित्त द्रव्यलिंग रहता ही है।’

अपर पक्ष तत्त्वज्ञानको चाहे जितना गौण करनेका प्रयत्न करके बाह्य क्रियाकांडका चाहे जितना समर्थन क्यों न करे और अपने इस प्रयोजनकी सिद्धिके लिए समयसारके टीका वचनोंको उनके यथार्थ अभिप्रायकी ओर ध्यान न देकर भले ही उद्धृत करे, परन्तु इतने मात्रसे मोक्षमार्गमें केवल क्रियाकांडको महत्त्व नहीं मिल सकता, क्योंकि समयसारकी उक्त गाथा ७२ की आत्मख्याति टीकामें जो ‘अज्ञान’ और ‘आस्रव’ पदोंका प्रयोग हुआ है वह राग-द्वेषादि भावोंके अर्थमें ही हुआ है, बाह्य क्रियाकांडके अर्थमें नहीं। चारित्रका लक्षण करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द प्रवचनसारमें लिखते हैं-

चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समो त्ति णिद्दिट्ठो ।
मोहक्खोहविहीणो परिणामो अप्पणो हु समो॥ ७॥

चारित्र वास्तवमें धर्म है, जो धर्म है वह साम्य है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है और साम्य मोह तथा क्षोभसे रहित आत्माका परिणाम है॥७॥

इसकी टीका करते हुए आचार्य अमृतचन्द्रने और भी भावपूर्ण शब्दों द्वारा चारित्रकी व्याख्या की है। वे लिखते हैं-

स्वरूपे चरणं चारित्रम्। स्वसमयप्रवृत्तिरित्यर्थः। तदेव वस्तुस्वभावत्वाद्धर्मः। शुद्धचैतन्यप्रकाशनमित्यर्थः।

चारित्र क्या है इसकी सर्वप्रथम व्याख्या आचार्यवर्यने की-‘स्वरूपे चरणं चारित्रम्’-स्वरूपमें रमना चारित्र है। स्वरूपमें रमना किस वस्तुका नाम है इसे स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं-‘स्वसमयप्रवृत्तिरित्यर्थः’-जो रागद्वेषादि विभावभावों और समस्त परभावोंसे रहित ज्ञायकस्वरूप आत्मतत्त्व है उसमें तन्मय हो प्रवर्तना स्वसमयप्रवृत्ति है। ऐसा करनेसे क्या होगा इसका उत्तर देते हुए वे पुनः लिखते हैं-‘तदेव वस्तुस्वभावत्वाद्धर्मः’-स्वसमयप्रवृत्तिसे जो स्वरूपलाभ होता है वही वस्तुका स्वभाव होनेके कारण धर्म है। कोई कहे कि ऐसे धर्मकी प्राप्ति होने पर भी आत्माको क्या लब्ध हुआ तो आचार्य उत्तर देते हैं-‘शुद्धचैतन्यप्रकाशनमित्यर्थः’-इस तरह जो धर्मकी प्राप्ति होती है वही तो शुद्ध चैतन्यका प्रकाशन है। वास्तवमें देखा जाय तो यही आत्माका सच्चा लाभ है।

क्या अपर पक्ष यह बतला सकता है कि ऐसे स्वरूपरमणतारूप चारित्रकी प्राप्ति तत्त्वज्ञानके विना कभी हो सकती है। यदि कहो कि तत्त्वज्ञानके अभ्यास विना स्वरूपरमणतारूप उक्त प्रकारके चारित्रकी प्राप्ति होना त्रिकालमें संभव नहीं है तो फिर हमारा निवेदन है कि तत्त्वज्ञानका उपहास करना छोड़कर आईए, हम आपका स्वागत करते हैं। हम और आप मिलकर ऐसा मार्ग बनाऐं जो तत्त्वज्ञानपूर्वक चारित्रकी प्राप्तिमें सहायक बने। अस्तु,

: २ :

द्वितीय चर्चनीय विषयका स्पष्टीकरण करते हुए हमने परमागममें ‘बन्ध’ पदका क्या अर्थ स्वीकृत है इसका स्पष्टीकरण किया था। इसपर आपत्ति करते हुए अपर पक्षका कहना है कि 'परन्तु जब यह कहा जाता है कि उस विशिष्टतर परस्पर अवगाहमें ही ‘बन्ध’का व्यवहार किया जाता है और यह भी कहा जाता है कि वह निमित्त-नैमित्तिकभावके आधार पर ही होता है, फिर तो आपकी दृष्टिसे यह कल्पनारोपित ही होगा, क्योंकि निमित्त-नैमित्तिक भावरूप कार्यकारणभाव तथा व्यवहार इन दोनोंको आप उपचरित, कल्पनारोपित और असद्भूत ही स्वीकार करते हैं। ऐसी हालतमें ६ द्रव्योंके परस्पर संस्पर्श और विशिष्टतर परस्पर अवगाह इन दोनोंमें अन्तर ही क्या रह जायगा ? यह आप ही जानें।’

सो इस आपत्तिका समाधान यह है कि अपर पक्षने ‘६ द्रव्योंके परस्पर संस्पर्श और विशिष्टतर परस्पर अवगाह इन दोनोंमें अन्तर ही क्या रह जायगा।’ हमसे ऐसा प्रश्न करके संभवतः इस बातको तो स्वीकार कर लिया है कि छह द्रव्योंका परस्पर संस्पर्श उपचरित, कल्पनारोपित और असद्भूत ही है। केवल वह पक्ष विशिष्टतर परस्पर अवगाहको उपचरित सत् स्वीकार करनेसे हिचकिचाता है। उसके हिचकिचानेका कारण यह मालूम देता है कि वह समझता है कि यदि ऐसे अवगाह ( बन्ध ) को उपचरित मान लिया जायगा तो निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्धकी व्यवस्थाः गड़बड़ा जायगी। किन्तु वस्तुस्थिति यह नहीं है। देखिए, लोकमें घीका घड़ा ऐसा व्यवहार होता है, किन्तु ऐसा व्यवहार होनेमात्रसे घड़ा घीका नहीं हो जाता। मात्र अन्य घड़ोंसे विवक्षित घड़ेका पृथक् ज्ञान करानेके अभिप्रायसे ही मिट्टीके घड़ेको घीका घड़ा कहा जाता है। इसीका नाम लोकव्यवहार है। उसी प्रकार जिस द्रव्यकी विवक्षित पर्यायमें निमित्त व्यवहार किया गया है वह विवक्षित कार्यको उत्पन्न करता हो ऐसा नहीं है, किन्तु उसके सद्भावमें उपादानने अपना जो कार्य किया है उसकी सिद्धि या ज्ञान उस द्वारा होता है ऐसी बाह्य व्याप्ति देखकर ही उसे विवक्षित अन्य द्रव्यकी पर्यायका निमित्त यह संज्ञा प्राप्त होती है और उसके सद्भावमें हुआ कार्य नैमित्तिक कहा जाता है, इसलिए निमित्तनैमित्तिक व्यवहारको उपचरित या असद्भूत मानकर कार्यकारणपरम्पराके रूपमें उसे स्वीकार कर लेनेपर भी लोकमें और आगममें किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित नहीं होती। यदि अपर पक्षके मतानुसार निमित्त व्यवहारयोग्य बाह्य सामग्रीको कार्यका जनक यथार्थ रूपमें स्वीकार किया गया होता तो आगममें उसे व्यवहार हेतु न लिखकर यथार्थ हेतु लिखा गया होता, किन्तु आगम उसकी सर्वत्र व्यवहार हेतुरूपसे ही घोषणा करता है, ऐसी अवस्थामें अन्य द्रव्यकी पर्यायमें निश्चयका ज्ञान करानेके अभिप्रायसे किये गये निमित्त व्यवहारको उपचरित मानना ही समीचीन है। आगममें दस प्रकारके सत्योंका निरूपण करते हुए गोम्मटसार जीवकाण्डमें लिखा है-

जणवद सम्मदि ठवणा णामे रूवे पडुच्चववहारे।
संभावणे य भावे उवमाए दसविहे सच्चे ॥२२२॥

जनपदसत्य, सम्मतिसत्य, स्थापनासत्य, नामसत्य, रूपसत्य, प्रतीत्यसत्य, व्यवहारसत्य, सम्भावनासत्य, भावसत्य और उपमासत्य इस प्रकार सत्य १० प्रकारका है ॥२२२॥

अपर पक्ष यह भलीभाँति जानता है कि जिसका जिनचन्द्र या कोई दूसरा नाम रखा जाता है उसमें उस नाम शब्दसे व्यक्त होनेवाले अर्थकी प्रधानता नहीं होती, फिर भी उससे उसी व्यक्तिका ज्ञान होता है; इसलिये नामकी सत्यमें परिगणना की गई है। एक स्थापनासत्य भी है। जिसमें अरिहंतपरमेष्ठीकी स्थापना की जाती है उसमें अनन्त ज्ञानादि गुण नहीं पाये जाते, फिर भी बुद्धिमें उसके आलम्बनसे इष्टार्थकी सिद्धि होती है, इसलिये स्थापनाकी सत्यमें परिगणना की गई है। इसी प्रकार इन सत्योंमें और भी कई ऐसे सत्य हैं जिन्हें नैममादि नयोंकी अपेक्षा स्वीकार किया गया है। अतएव दो द्रव्योंके मध्य विवक्षित पर्यायोंकी अपेक्षा निमित्तनैमित्तिक सम्बन्धको उपचरित स्वीकार कर लेने मात्रसे लोकव्यवहारमें किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित होती है ऐसा तो नहीं है। हाँ, छह द्रव्योंके परस्पर संस्पर्श तथा विशिष्टतर परस्पर अवगाह इन दोनोंको जो पृथक्-पृथक् किया गया है उसके स्वीकार करनेमें हेतुभेद अवश्य है-जहाँ प्रथममें आकाशक्षेत्रकी अपेक्षा एक क्षेत्रमें छहों द्रव्योंकी अवस्थिति व्रतलाना मात्र मुख्य प्रयोजन है वहाँ दूसरेमें निमित्तनैमित्तिकताका ज्ञान कराना मुख्य प्रयोजन है। उसमें सर्वप्रथम जीव और कर्मके परस्पर विशिष्टतर अवगाहको जो बन्ध ( उभयबन्ध ) कहा है वह किस अपेक्षासे कहा गया है इसपर दृष्टिपात कर लेना चाहते हैं। प्रवचनसार गाथा १७४ की टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र कहते हैं-

एकावगाहभावावस्थितकर्म-पुद्गलनिमित्तोपयोगाधिरूढरागद्वेषादिभावसम्बन्धः कर्मपुद्गलबन्ध-व्यवहारसाधकस्त्वस्त्येव ॥ १७४ ॥

तथापि एकावगाहरूपसे रहनेवाले कर्मपुद्गल जिनके निमित्त हैं ऐसे उपयोगाधिरूढ़ राग-द्वेषादि भावोंके साथका सम्बन्ध कर्मपुद्गलोंके साथके बन्धरूप व्यवहारका साधक अवश्य है ॥१७४॥

यहाँ जीव और कर्मके एक क्षेत्रावगाहरूप विशिष्टतर अवगाहको स्पष्ट शब्दोंमें बन्धव्यवहार कहा गया है यह तो स्पष्ट ही है। अब इस व्यवहारको आगममें किस रूपमें स्वीकार किया गया है इसके लिए वृहद्द्रव्य-संग्रह गाथा १६ की टीकापर दृष्टिपात कीजिये-

कर्मबन्धपृथग्भूतस्वशुद्धात्मभावनारहितजीवस्यानुपचरितासद्भूतव्यवहारेण द्रव्यबन्धः।

कर्मबन्धसे पृथग्भूत निज शुद्धात्म भावनासे रहित जीवके अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे द्रव्यबन्ध है।

इस प्रकार जीव और कर्मका जो बन्ध कहा जाता है वह अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे ही कहा जाता है यह उक्त आगम प्रमाणोंसे स्पष्ट हो जाता है।

अब पुद्गल-पुद्गलका जो एकत्वपरिणामलक्षण बन्ध कहा है इसका क्या तात्पर्य है इसपर विचार करते हैं। धवला पु० १३ पृ० १२ में एकत्वका अर्थ करते हुए लिखा है-

पोग्गलदव्वभावेण परमाणुपोग्गलस्स सेसपोग्गलेहि सह एयत्तुवलंभादो।

पुद्गल द्रव्यरूपसे परमाणु पुद्गलका शेष पुद्गलोंके साथ एकत्व पाया जाता है।

इससे मालूम पड़ता है कि बन्धप्रकरणमें जो दो पुद्गल द्रव्योंका एकत्वपरिणाम कहा है उसका आशय ही इतना है कि दोनों पुद्गल अपने स्वरूपको न छोड़ते हुए यथासम्भव सदृश परिणामरूपसे परिणम जाते हैं। वे अपने स्वरूपको नहीं ही छोड़ते हैं इसका स्पष्टीकरण वहीं पृ० २४ में इन शब्दोंमें किया है-

तदो सरूवापरिच्चाएण सव्वप्पणा परमाणुस्स परमाणुम्मि पवेसो सव्वफासो····।

इसलिए अपने-अपने स्वरूपको छोड़े विना परमाणुका परमाणुमें सर्वात्मना प्रवेश सर्वस्पर्श कहलाता है।

इससे यह ज्ञात होता है कि स्कन्ध अवस्थामें रहते हुए भी कोई भी परमाणु अपने-अपने स्वचतुष्टयका त्याग नहीं करते। जैसे प्रत्येक परमाणु अपने-अपने द्रव्य, क्षेत्र, भावरूपसे अवस्थित रहते हैं वैसे ही प्रत्येक समयमें होनेवाली अपनी-अपनी पर्यायरूपसे भी वे अवस्थित रहते हैं।

अब हमें इस बातका विचार करना है कि स्कन्ध अवस्थामें भी यदि प्रत्येक परमाणु अपनी-अपनो पर्यायरूपसे परिणत होता रहता है तो स्कन्ध व्यवस्था कैसे बनती है? समाधान यह है कि शब्दनय और एवंभूतनयके विषयभूत भावबन्धपूर्वक हुए द्रव्यबन्धकी अपेक्षा नैगम, संग्रह, व्यवहार और स्थूल ऋजुसूत्रनयसे यह व्यवस्था बन जाती है। इसका विशद विचार धवला पु० १४ में किया है। वहाँ पृ० २७ में बन्धमें कौनसा सम्बन्ध विवक्षित है इसका स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है-

को एत्थ संबंधो घेप्पदे संजोगलक्खणो समवायलक्खणो वा ? तत्थ संजोगो दुविहो-देसपच्चासत्तिकओ गुणपच्चासत्तिकओ चेदि। तत्थ देसपच्चासत्तिकओ णाम दोण्णं दव्वाणमवयवफासं काऊण जमच्छणं सो देसपच्चासत्तिकओ संजोगो। गुणेहि जमण्णोण्णाणुहरणं सो गुणपच्चासत्तिकओ संजोगो। समवायसंजोगो सुगमो।

शंका-यहाँ कौन-सा सम्बन्ध लिया गया है ?

समाधान-वहाँ संयोग दो प्रकारका है-देशप्रत्यासत्तिकृत और गुणप्रत्यासत्तिकृत। दो द्रव्योंके अवयवोंका स्पर्श करके रहना यह देशप्रत्यासत्तिकृत सम्बन्ध है तथा गुणोंके द्वारा जो एक-दूसरेका अनुसरण करना यह गुणप्रत्यासत्तिकृत सम्बन्ध है। समवाय सम्बन्ध सुगम है।

इससे स्पष्ट है कि स्कन्ध अवस्थामें वे दोनों पुद्गल सर्वथा एक नहीं हो जाते, किन्तु द्रव्य, क्षेत्र काल और भावरूपसे वे अपनी-अपनी सत्ता रखते हुए भी क्षेत्रप्रत्यासत्ति और गुणप्रत्यासत्तिको प्राप्त हो जाते हैं, इसलिए स्कन्धव्यवस्था बन जाती है।

अतः स्वरूपसत्ता सबकी भिन्न-भिन्न है। फिर भी उनका देशकृत और भावकृत ऐसा परिणाम होता है जिससे उनमें बन्धव्यवहार होने लगता है। यही पुद्गलबन्ध कहलाता है। बन्धके स्कन्ध, स्कन्धदेश और स्कन्धप्रदेश ये भेद इसी आधारपर आगममें स्वीकार किये गये हैं। यही कारण है कि पंचास्तिकाय गाथा ७६ में यथार्थमें परमाणुको ही पुद्गल कहा गया है तथा सब प्रकारके स्कन्धोंको पुद्गल कहना इसे व्यवहार बतलाया गया है। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ४०६ में स्कन्धको जो परमार्थसत् कहा है वह देशप्रत्यासत्ति और भावप्रत्यासत्तिको ध्यानमें रखकर ही कहा है। पुद्गलोंकी देशप्रत्यासत्ति और भावप्रत्यासत्तिका होना इसका नाम ही एकत्वपरिणाम है। इसके सिवा एकत्वपरिणामको अन्य कुछ मानना दो द्रव्योंकी सत्ताका अपलाप करना है।

इस परसे अपर पक्ष स्वयं निर्णय कर ले कि दो द्रव्योंमें किया जानेवाला बन्धव्यवहार साधार है या कल्पनारोपित। वस्तुतः उस पक्षने उपचारकथनको आकाशकुसुमके समान कल्पनारोपित मान लिया यही धारणा उस पक्षको बदलनी है। ऐसा होनेसे कहाँ कौन कथन किस रूपमें किया गया है इसके स्पष्ट होनेमें देरी न लगेगी।

: ३ :

प्रथम उत्तरमें हमने ‘व्यवहारनयका आश्रय कर·····’ इत्यादि वचन लिखा था। इस पर प्रतिशंका २ में यह पृच्छा की गई थी कि ‘व्यवहारनयका आश्रय लेकर बन्ध होता है इसमें व्यवहारनय और उसकी बन्ध होनेमें आश्रयताका क्या आशय है ?’ इसका खुलासा करते हुए हमने पिछले उत्तरमें लिखा था कि ‘व्यवहारनयका आश्रय लेकर इसका अर्थ व्यवहार नयकी अपेक्षा इतना ही है।’ इसीको अपर पक्ष ‘व्यवहारनयका आश्रय कर’ इस पदका हटाना और ‘व्यवहार नयकी अपेक्षासे’ इस पदको जोड़ना लिख रहा है। अन्य कोई नई बात इस प्रश्नमें नहीं कही गई है। जो कुछ दुहराया गया है उसका उत्तर द्वितीय प्रश्नके समाधानके प्रसंगसे अनन्तर पूर्व ही लिख आये हैं। आगममें व्यवहारनयके आश्रयसे-व्यवहाराश्रयाद्यश्च ( नयचक्रादिसं० पृ० ७९ ) तथा ‘व्यवहारनयकी अपेक्षा’ ववहारादो ( नयचक्रादिसंग्र० पृ० ७८ ) इस तरह दोनों प्रकारके प्रयोग मिलते हैं। अतः किसी प्रकारसे भी लिखा जाय इसमें बाधा नहीं है। उससे प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि प्रथम उत्तरमें लिखे गये वाक्य पर अपर पक्ष द्वारा शंका उपस्थित करने पर अपने दूसरे उत्तरमें हमने उसका स्पष्टीकरण मात्र किया था।

: ४ :

चौथे प्रश्नका समाधान यह है कि ‘द्व्यधिकादिगुणानां तु’ ( त० सू० ५, ३६ ) सिद्धान्तके अनुसार प्रत्येक परमाणु विभावरूप होता हुआ देशप्रत्यासत्तिपनेको प्राप्त हो जाता है। इसीका नाम बन्ध है। जिनागममें दो या दोसे अधिक परमाणुओंका ऐसा ही बन्ध स्वीकार किया गया है। इस प्रकार जिनागमसे बन्धकी व्यवस्था बन जाती है। हमारा कहना भी यही है। यदि अपर पक्षको हमारे कथनमें और जिनागमके कथनमें कहीं अन्तर प्रतीत होता था तो उसका निर्देश करना था। क्या जिनागममें बन्धको असद्भूत व्यवहारनयका विषय नहीं लिखा है और क्या जिनागममें असद्भूत व्यवहार और उपचारको एकार्थक नहीं लिखा है? जब कि ये दोनों बातें जिनागममें लिखी हैं तो अपर पक्ष इन्हें इसी रूपमें स्वीकार करनेमें क्यों आनाकानी करता है? यदि उस पक्षको जिनागममें जो जिस रूपमें लिखा है वह उसी रूपमें स्वीकार है तो हम उससे आग्रहपूर्वक निवेदन करते हैं कि उस पक्षको ‘उपचार’ पदका अर्थ कल्पनारोपित लिखना छोड़ देना चाहिए।

: ५ :

पाँचवें प्रश्नका समाधान यह है कि वर्तमान जिनागममें निश्चयनय और व्यवहारनयकी प्ररूपणा जिस रूपमें की गई है वह जिनवाणी ही तो है। यह जिनदेवने ही तो कहा है कि निश्चयको भूतार्थ कहते हैं और व्यवहारको अभूतार्थ कहते हैं। भूतार्थका आश्रय करनेवाले मुनि निर्वाणको प्राप्त होते हैं। अतः वे इस कथनके प्रतिपाद्यरूप अर्थको नियमसे जानते हैं। वास्तविक बात यह है कि यदि अपर पक्ष उपचारको कल्पनारोपित कहना छोड़ दे तो केवलज्ञानमें ये सब विषय किस प्रकार प्रतिभासित होते हैं यह आसानीसे समझमें आ जाय, क्योंकि उनके ज्ञानमें जैसे यह भासता है कि घटके निश्चय षट्कारकधर्म मिट्टीमें ही हैं उसी प्रकार यह भी भासता है कि जब जब मिट्टी घट रूपसे परिणमती है तब तब कुम्भकारादिकी अमुक प्रकारकी क्रिया नियमसे होती है। वे यह अच्छी तरहसे जानते हैं कि निश्चय षट्कारक धर्म जिसके उसीमें होते हैं, दूसरे द्रव्यमें नहीं होते। किसका किसके साथ अन्वय-व्यतिरेक है इसे हम अल्पज्ञानी तो जान लें और केवलज्ञानी न जान सकें यह कैसे हो सकता है। आकाशकुसुम नहीं है, इसलिए वह उनके ज्ञानका विषय नहीं, पर यदि कोई आकाशकुसुमका विकल्प करता है तो उसे वे अवश्य जानते हैं। अपर पक्ष पिण्डको सत्ताहीन कहता है। किन्तु बात ऐसी नहीं है, क्योंकि संख्यात, असंख्यात और अनन्त परमाणुओंकी देशकृत और भावकृत जो प्रत्यासत्ति होती है उसीको जिनागममें संघात या स्कन्ध आदि नामोंसे पुकारा गया है। ऐसी प्रत्यासत्तिका निषेध नहीं। निषेध है उन परमाणुओंकी स्वरूप सत्ताके छोड़नेका। अतः इस रूपमें केवलीको स्कन्धका ज्ञान नियमसे होता है इसमें बाधा नहीं। देशकृत और भावकृत प्रत्यासत्तिरूपसे गधेके सींग नहीं होते, न हों पर गाय-भैंस आदिके तो होते हैं। इसी प्रकार देश-भावकृत प्रत्यासत्तिरूपसे आकाशकुसुम नहीं होता, न हो पर वृक्षोंमें, लताओंमें और गुल्मोंमें तो होते हैं। जहाँ जिस रूपमें जो होता है वहाँ उस रूपमें कालविशेषणसे विशिष्ट उसे वे अवश्य जानते हैं। यह केवलज्ञानकी महिमा है। इसी महिमाका निर्देश धवला वर्गणाखण्ड प्रकृति अनुयोगद्वारके ‘सइं भयवं’ इत्यादि सूत्रमें किया गया है।

अपर पक्षने आगम प्रतिपादित वस्तुव्यवस्थाके विचारके प्रसंगसे प्रवचनसार गाथा ८७ देनेके बाद ‘अत्थो खलु दव्वमओ’ गाथा और उसकी आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीका उपस्थित की है।

अपर पक्षने इस टीकाका जिस रूपमें अर्थ किया है उसमें हम नहीं जावेंगे। यहाँ तो मात्र टीकाके आधारसे विचार करना है।

अपर पक्ष इसके अन्तमें लिखता है कि ‘उक्त गाथाकी यह टीका जीव तथा पुद्गलकी वन्धपर्यायको एवं द्वयणुकादिरूप स्कन्धकी वास्तविकताका उद्घोष कर रही है।’

यह तो प्रत्येक समझदार अनुभव करेगा कि टीकामें नयविभाग किये विना सामान्यसे निर्देश किया गया है। यहाँ दो या दोसे अधिक पर्यायोंको एक कहा गया है। इससे यदि कोई यह समझे कि उन द्रव्योंकी स्वरूपसत्ताका त्याग होकर यह मनुष्यादिरूप या द्वयणुकादिरूप परिणाम उत्पन्न हुआ है सो यह बात नहीं है। यदि अपर पक्ष उसी प्रवचनसारकी गाथा १५२की आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीका पर दृष्टिपात कर लेता तो यह वर्णन किस अपेक्षासे किया गया है यह स्पष्ट हो जाता। वहाँ लिखा है-

स्वलक्षणभूतस्वरूपास्तित्वनिश्चितस्यैकस्यार्थस्य स्वलक्षणभूतस्वरूपास्तित्वनिश्चित एवान्यस्मिन्नर्थे विशिष्टरूपतया सम्भावितात्मलाभोऽर्थोऽनेकद्रव्यात्मकः पर्यायः। स खलु पुद्गलस्य पुद्गलान्तर इव जीवस्य पुद्गले संस्थानादिविशिष्टतया समुपजायमानः सम्भाव्यत एव। उपपन्नश्चैवंविधः पर्यायः। अनेकद्रव्यसंयोगात्मत्वेन केवलजीवव्यतिरेकमात्रस्यैकद्रव्यपर्यायस्यास्खलितस्यान्तरावभासनात्।

स्वलक्षणभूत स्वरूपास्तित्वसे निश्चित एक द्रव्यका स्वलक्षणभूत स्वरूपास्तित्वसे ही निश्चित दूसरे द्रव्यमें विशिष्ट (देश-भावप्रत्याशत्ति) रूपसे उत्पन्न होता हुआ अर्थ (भाव) अनेक द्रव्यात्मक पर्याय है। वह नियमसे जैसे एक पुद्गलकी दूसरे पुद्गलमें उत्पन्न होती हुई देखी जाती है वैसे ही जीवकी पुद्गलमें संस्थानादि विशिष्टरूपसे उत्पन्न होती हुई अनुभवमें आती ही है। और ऐसी पर्याय नियमसे बन जाती है, क्योंकि जो केवल जीवकी व्यतिरेकमात्र है ऐसी अस्खलित एक द्रव्यपर्यायका अनेक द्रव्योंके संयोगरूपसे भीतर अवभासन होता है।

इससे स्पष्ट है संयोग अवस्थामें भी जीवकी पर्याय जीवमें होती है और पुद्गलकी पर्याय पुद्गलमें होती है। वहाँ संयोग अवस्थामें जो रूप-रसादिरूप परिणाम होता है वह पुद्गलका ही होता है, जीवका नहीं। और इसी प्रकार ज्ञान-दर्शनादिरूप जो परिणाम होता है वह जीवका ही होता है, पुद्गलका नहीं। रूप-रसादिरूप और ज्ञान-दर्शनादिरूप ये दो परिणाम एक कालमें एक साथ होते हुए स्पष्टतया प्रतिभासित होते हैं। ऐसी अवस्थामें बन्धमें अनेक द्रव्योंकी पर्यायको यथार्थमें एक कहना उचित नहीं है। व्यवहारनयसे ही वे एक कही गई हैं। संस्थानादिके विषयमें तथा द्वयणुकादिके विषयमें भी इसी न्यायसे विचार कर लेना चाहिए।

पंचास्तिकाय गाथा ७४ में जो स्कन्ध आदिका निर्देश किया है सो उसका विचार भी उक्त न्यायसे कर लेना चाहिए। श्लोकवार्तिक पृ० ४३० में निश्चयनय और व्यवहारनय इनकी अपेक्षा क्रमशः अणु और स्कन्ध इन भेदोंको स्वीकार किया गया है, सो इससे भी पूर्वोक्त अर्थका ही समर्थन होता है।

तत्त्वार्थसूत्र अ० ५ के ‘भेद-संघातेभ्य उत्पद्यन्ते’ (सू० २६) इस सूत्रमें देश-भावप्रत्यासत्तिरूप परिणामको ‘संघात’ और इसके भंग होनेको ‘भेद’ कहा गया है। अष्टसहस्री पृ० २२३ द्वारा भी यही भाव व्यक्त किया गया है। जब अनन्तानन्त परमाणु देश-भावप्रत्यासत्तिपनेको प्राप्त होते हैं तब उनमें स्कन्ध व्यवहार बन कर धारण आकर्षण आदि क्रियाओंकी भी उत्पत्ति हो जाती है। इससे स्कन्ध क्या वस्तु है यह भी स्पष्ट हो जाता है और परमाणुओंकी स्वरूपसत्ता भी बनी रहती है। अपर पक्ष स्कन्ध या बन्ध वास्तविक है यह तो लिखता है पर उनका स्वरूप क्या है यह स्पष्ट नहीं करना चाहता।

सर्वार्थसिद्धि २-७ का वचन व्यवहारनयका वक्तव्य है। उसमें किस रूपमें एकत्व स्वीकार किया गया है इसके लिए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ४३० के इस वचन पर दृष्टिपात कीजिये-

जीव-कर्मणोर्बन्धः कथमिति चेत् ? परस्परं प्रदेशानुप्रवेशान्न त्वेकत्वपरिणामात्तयोरेकद्रव्यानुपपत्तेः।

शंका-जीव और पुद्गलका बन्ध कैसे है ?

समाधान-परस्पर प्रदेशोंके अनुप्रवेशसे उनका बन्ध है, एकत्व परिणामसे नहीं, क्योंकि वे दोनों एक द्रव्य नहीं हैं।

अपर पक्षने यहाँ इन स्कन्ध आदि और मनुष्यादि पर्यायोंकी उत्पत्ति मिश्रणसे बतलाई है। यदि वह मिश्रण शब्दका स्पष्टीकरण कर देता तो वह पक्ष क्या कहना चाहता है यह समझमें आ जाता। अपर पक्षने मूल द्रव्यके स्वकाल और स्वभाव इन दोनोंको अनित्यांश माना है इसका हमें आश्चर्य है। स्वकाल तो व्यतिरेकरूप होनेसे अनित्य होता है इसमें सन्देह नहीं, पर स्वभाव तो अन्वयी होता है, वह अनित्य कैसे होता है यह वही जाने। माना स्वकाल अनित्य होता है पर प्रत्येक द्रव्यकी पर्याय उसकी उसीमें तो होगी। वह अनित्य है, इसलिए वह स्वरूपचतुष्टयसे बाहर नहीं की जा सकती। जैसे प्रत्येक द्रव्यका स्वरूप चतुष्टय मुक्त अवस्थामें बना रहता है वैसे वह संयोग अवस्थामें भी बना रहता है। संयोग अवस्थामें विभाव पर्यायका होना और मुक्त अवस्थामें स्वभाव पर्यायका होना यह अन्य बात है। परमाणुओंका स्वरूपास्तित्व बना रहकर भी देश-भावप्रत्यासत्तिविशेषके कारण स्कन्धव्यवहार होता है तथा सूक्ष्मता, स्थूलता, दृश्यता या अदृश्यता बन जाती है। इसीको अपर पक्ष पुद्गलोंमें परिवर्तित स्वरूपास्तित्वको लिये हुए स्कन्धपरिणति कह रहा है।

जैनदर्शन नैयायिक दर्शनके समान संयोगको गुण नहीं मानता इसे अपर पक्षने स्वीकार कर लिया इसकी हमें प्रसन्नता है। किन्तु अपर पक्षने जो संयोगको दो द्रव्योंका बन्धात्मक परिणमन बतलाया सो विवाद तो इसीमें हैं कि वह क्या है ? अपर पक्ष’यह तो लिखता है कि वह सत्य है, वास्तविक है। उसे नहीं मानोगे तो यह आपत्ति आवेगी, वह आपत्ति आवेगी आदि, पर वह है क्या ? यह नहीं लिखता। कल्पनारोपित आदि कुछ शब्द चुन रखे हैं, इसलिए घूम-फिर कर उन शब्दोंका प्रयोग कर देना तथा व्यवहारनयके वक्तव्यको उपस्थितकर उसे परमार्थभूत ठहरानेका उपक्रम करना यह कोई वस्तुसिद्धिका प्रकार नहीं है। अस्तु, जैन दर्शनने बन्धको तथा स्कन्ध आदिको किस रूपमें स्वीकार किया है इसका हमने आगम प्रमाणके साथ स्पष्ट निर्देश किया है। हमें विश्वास है कि अपर पक्ष उसे स्वीकार कर इस विवादको समाप्त कर देगा।

शंका ११, प्रथम दौर: शंका ११ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६३२

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प्रथम दौर

: १ :

शंका ११

परिणमनके स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय दो भेद हैं, उनमें वास्तविक अन्तर क्या है ?

समाधान १

सब द्रव्योंकी स्वभावपर्यायें स्वप्रत्यय होती हैं तथा जीव और पुद्गलकी विभावपर्यायें स्व-परप्रत्यय होती हैं । यहाँ स्वप्रत्यय पद द्वारा उसी द्रव्यकी उपादान शक्ति ली गई है और स्व-परप्रत्यय पद द्वारा विविक्षित द्रव्यकी उपादान शक्तिके साथ उस उस पर्यायके कर्ता और करणरूप निमित्तोंका ग्रहण किया गया है । इस दृष्टिसे स्वभावपर्याय और विभावपर्यायके कारणोंका निर्देश करते हुए प्रवचनसार गाथा ९३ की टीकामें कहा भी है-

सोऽपि द्विविधः-स्वभावपर्यायो विभावपर्यायश्च । तत्र स्वभावपर्यायो नाम समस्तद्रव्याणामात्मीयात्मीयागुरुलघुगुणद्वारेण प्रतिसमयसमुदीयमानषट्स्थानपतितवृद्धि-हानिनानात्वानुभूतिः । विभावपर्यायो नाम रूपादीनां ज्ञानादीनां वा स्व-परप्रत्ययप्रवर्तमानपूर्वोत्तरावस्थावतीर्णतारतम्योपदर्शितस्वभावविशेषानेकत्वापत्तिः ।

वह भी दो प्रकार है-स्वभावपर्याय और विभावपर्याय । उसमें समस्त द्रव्योंकी अपने-अपने अगुरुलघुगुणद्वारा प्रतिसमय प्रगट होनेवाली षट्स्थानपतित हानि-वृद्धिरूप अनेकत्वकी अनुभूति स्वभावपर्याय है। तथा रूपादिके या ज्ञानादिके स्व-परके कारण प्रवर्तमान पूर्वोत्तर अवस्थामें होनेवाले तारतम्यके कारण देखनेमें आनेवाले स्वभावविशेषरूप अनेकत्वकी आपत्ति विभावपर्याय है ।

यहाँ इतना विशेष जानना चाहिये कि जिसप्रकार स्वपरप्रत्यय पर्यायोंकी उत्पत्तिमें कालादि द्रव्योंकी विविक्षित पर्यायें यथायोग्य आश्रय निमित्त होती हैं उसी प्रकार स्वप्रत्ययपर्यायोंकी उत्पत्तिमें कालादि द्रव्योंकी विविक्षित पर्यायें यथायोग्य आश्रय निमित्त होती हैं । परन्तु उनकी दोनों स्थलोंपर कथनकी अविवक्षा होनेसे यहाँ उनकी परिगणना नहीं की गई है । यही स्वप्रत्यय और स्व-परप्रत्यय इन दोनोंमें भेद है ।

शंका ११, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६३३ से ६३५

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द्वितीय दौर

२

शंका ११

प्रश्न यह था-

परिणमनके स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय दो भेद हैं, उनमें वास्तविक अन्तर क्या है ?

प्रतिशंका २

आपने इस प्रश्नका जो उत्तर दिया है उसमें आपने लिखा है कि ‘सभी द्रव्योंकी स्वभावपर्यायें स्वप्रत्यय होती हैं तथा जीव और पुद्गलकी विभावपर्यायें स्वपरप्रत्यय होती हैं ।’

इस कथनके विषयमें हमारा केवल इतना ही कहना है कि यद्यपि वस्तुकी स्वप्रत्यय पर्यायें स्वभावरूप ही होती हैं, परन्तु वस्तुकी सभी स्वभावपर्यायें स्वप्रत्यय नहीं होती हैं । जैसे आपने संपूर्ण द्रव्योंकी अगुरुलघुगुणद्वारा प्रतिसमय प्रवर्तमान षट्गुण हानि-वृद्धिरूप पर्यायोंको स्वप्रत्यय पर्यायें स्वीकृत किया है । यह तो ठीक है, परन्तु आकाश द्रव्यकी परपदार्थावगाहकत्व गुणकी अवगाह्यमान परपदार्थोंके निमित्तसे होनेवाली पर्यायें, धर्मद्रव्यकी गतिपरिणत जीवों तथा पुद्गलोंके निमित्तसे होनेवाली गतिहेतुकत्व गुणकी पर्यायें, अधर्म द्रव्यकी स्थितिपरिणत जीवों और पुद्गलोंके निमित्तसे होनेवाली स्थितिहेतुकत्व गुणकी पर्यायें, कालद्रव्यकी वृत्तिविशिष्ट संपूर्ण द्रव्योंके निमित्तसे होनेवाली वर्तनागुणकी पर्यायें, मुक्त जीवकी ज्ञेयभूत पर पदार्थोंके निमित्तसे होनेवाली ज्ञानगुणकी उपयोगाकार परिणमनरूप पर्यायें, कर्म तथा नोकर्मसे बद्ध संसारी जीवोंकी कर्मक्षय तथा कर्मोपशमके होनेपर उत्पन्न होनेवाली क्षायिक और औपशमिक पर्यायें तथा ज्ञेयतापन्न अणुरूप तथा स्कन्धरूप पुद्गल द्रव्योंको ज्ञातता आदि विविध पर्यायें-इस प्रकारकी सभी पर्यायें उस उस वस्तुकी स्वाभाविक पर्यायें होते हुए भी स्वपरप्रत्यय ही हुआ करती हैं, स्वप्रत्यय नहीं ।

इसी प्रकार जीवोंकी नर-नारकादि पर्यायें तथा पुद्गलोंकी कर्म और जीवशरीरादिरूप पर्यायें विभाव रूप होनेके कारण यद्यपि स्व-परप्रत्यय मानी गई हैं तथापि यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिये कि ऊपरके विवेचनके अनुसार प्रत्येक वस्तुकी बहुतसी स्वाभाविक पर्यायें भी स्वपरप्रत्यय पर्यायोंमें अन्तर्भूत होती हैं ।

आगममें भी वस्तुके स्वाभाविक स्वपरप्रत्यय परिणमनोंको स्वीकार किया गया है । यथा-

ज्ञेयपदार्थाः प्रतिक्षणं भङ्गत्रयेण परिणमन्ति तथा ज्ञानमपि परिच्छित्यपेक्षया भङ्गत्रयेण परिणमति ।
-प्रवचनसार गाथा १७ जयसेनीया टीका

अर्थ-ज्ञेय पदार्थ प्रतिक्षण उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यमय भङ्गत्रयसे परिणत होते रहते हैं उसीके अनुसार ज्ञान भी भङ्गत्रयरूपसे परिणत होता रहता है ।

इसी प्रकारके प्रमाण जयधवलमें भी पाये जाते हैं ।

आगममें जहाँ आकाश, धर्म, अधर्म कालद्रव्योंके स्वरूपका वर्णन किया गया है वहाँ यथायोग्य पर द्रव्योंके प्रति इनके उपकारकी भी चर्चा की गई है । जीवोंकी परपदार्थज्ञातृत्व और परपदार्थदर्शित्व आदि योग्यताओं एवं राग, द्वेष, मोह आदि परिणतियोंकी चर्चाओंसे भी आगम ग्रन्थ भरे पड़े हैं तथा विविध प्रकारके भौतिक विकासके रूपमें पुद्गल परिणतियाँ तो प्रत्यक्ष ही हमें दिखाई दे रही हैं और जिनका उपयोग लोकमें हो रहा है तथा हम और आप सभी करते चले आ रहे हैं ।

इस तरह विश्वके संपूर्ण पदार्थोंमें यथायोग्य होनेवाली पर्यायोंको उपर्युक्त प्रकारसे स्वप्रत्यय, स्वाभाविक स्वपरप्रत्यय और वैभाविक स्वपरप्रत्यय परिणमनोंमें ही अन्तर्भूत करना चाहिये ।

आपने अपने उत्तरके अन्तमें स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय परिणमनोंमें अन्तर दिखलानेके लिये जो यह बात लिखी है कि ‘जिस प्रकार स्वपरप्रत्यय पर्यायोंकी उत्पत्तिमें कालादि द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायें यथायोग्य आश्रय निमित्त होती हैं उसी प्रकार स्वप्रत्यय पर्यायोंकी उत्पत्तिमें कालादि द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायें यथायोग्य आश्रयनिमित्त होती हैं, परन्तु उनकी दोनों स्थानोंपर कथनकी अविवक्षा होनेसे यहाँ उनकी परिगणना नहीं की गई है यही स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय इन दोनोंमें भेद है ।’

आपकी यह बात विचारणीय है, क्योंकि स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय दोनों परिणमनोंमें केवल आश्रयनिमित्तोंके कथन करनेकी अविवक्षा और विवक्षा मात्रका ही भेद नहीं है । आपने भी अपने उत्तरमें स्वभाव पर्याय और विभाव पर्यायके कारणोंका निर्देश करते हुए प्रवचनसार गाथा ९३ की टीकाका उद्धरण देकर यह स्वीकार किया है कि स्वपरप्रत्यय परिणमनमें स्वके साथ पर भी कारण होता है । टीकाका व उसके हिन्दी अर्थका उल्लेख आपके उत्तरपत्रमें है । आपने अपने उत्तरके प्रारम्भमें तो स्पष्टरूपसे स्वपरप्रत्यय परिणमनमें कर्ता और करणरूप निमित्तोंको स्वीकार किया है जो कर्ता और करणरूप निमित्त स्वप्रत्यय परिणमनमें आपको भी मान्य नहीं है ।

इस तरह स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय परिणमनमें यदि कोई वास्तविक अन्तर है तो वह अन्तर यही है कि स्वप्रत्ययपरिणमनमें कर्ता-करणरूप निमित्त कारणोंको नहीं स्वीकार किया गया है जब कि स्वपरप्रत्यय परिणमनके होनेमें इनकी अनिवार्य आवश्यकता रहा करती है

विशेष विचारणा यह होती है कि जब अध्यात्मवादके अनुसार कार्य-कारणभावकी विवेचना करते हुए दो प्रकारकी ( स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय ) पर्यायोंका कथन किया गया है ऐसी दशामें स्वप्रत्यय पर्याय उपादानकी परिणति होनेसे स्वाश्रित है, इसलिये उसे स्वप्रत्यय नाम देना समुचित है, परन्तु स्वपरप्रत्यय पर्यायको उपादानकी परिणति होनेके कारण केवल उपादानजन्य माना जाय तो उसे स्व-परप्रत्यय कहना असंगत ही है । वास्तविक दृष्टिसे विचार किया जाय तो उपादानके साथ कारण-रूप ऐसा कौनसा पदार्थ है जो उपादानकी समतुलामें बैठकर उस पर्यायका निर्माण करे और तब उसके आधारपर उसका स्वप्रत्यय पर्यायसे वास्तविक भेद स्थापित हो सके ।

जब कि आपकी मान्यताके अनुसार जो आश्रय कारण कालादि पर पदार्थ हैं और जिन्हें आपने स्वप्रत्यय तथा स्वपरप्रत्यय दोनों तरहकी पर्यायोंमें समानरूपसे कारण माना है तो उन पर्यायोंकी उत्पत्तिमें केवल उनकी विवक्षा और अविवक्षा मात्रसे वास्तविक अन्तर कैसे लाया जा सकता है ।

यहाँ पर यह भी एक विचारणीय बात है कि आगमके निर्माता आचार्य उक्त दोनों पर्यायोंका कारण भेदसे पृथक्-पृथक् विवेचन करते हुए केवल कालादि आश्रय निमित्तोंकी विवक्षा और अविवक्षामात्रसे पार्थक्य दिखलायें ऐसा मानना उनके गहरे ज्ञानके प्रति हमारी अननुभूतिका द्योतक है । उपर्युक्त कथनसे यह बात विशदरूपसे स्पष्ट हो जाती है कि कालादि आश्रय निमित्तकारणोंको विवक्षा और अविवक्षा मात्रसे उल्लिखित पर्यायभेद नहीं बन सकता है, किन्तु निमित्तकारणोंको द्विविधतासे ही दोनों प्रकारकी पर्यायोंका यह आन्तरिक भेद युक्तिसंगत सिद्ध होता है। निमित्त कारणोंको यह द्विविधता निमित्तोंकी प्रेरकता और अप्रेरकताके आश्रय है। इस तरह जिस परिणमनमें उपादानके साथ कर्ता-करण आदि प्रेरक निमित्तोंका व्यापार आवश्यक नहीं है उसे स्वप्रत्यय परिणमन कहना चाहिये और जिस परिणमनमें उपादानके साथ कर्ता-करण आदि प्रेरक निमित्तोंका व्यापार आवश्यक हो उसे स्वपरप्रत्यय परिणमन मानना चाहिये।

शंका ११

मूल प्रश्न-परिणमनके स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय दो भेद हैं, उनमें वास्तविक अन्तर क्या है ?

शंका ११, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६३५ से ६३६

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प्रतिशंका २ का समाधान

प्रवचनसार गाथा ९३ की टीकाका उल्लेख कर हम पिछले समाधानमें यह बता चुके हैं कि पर्यायें दो प्रकारकी होती हैं-(१) स्वभावपर्याय (२) विभावपर्याय।

शुद्ध जीव, परमाणु व धर्म आदि चार द्रव्योंमें अपने २ अनन्त अगुरुलघुगुणों द्वारा प्रतिसमय षड्गुणी हानि-वृद्धिरूप उत्पादव्यय होते हैं, वे स्वभावरूप पर्यायें हैं और संसारी जीवोंके ज्ञानमें इन्द्रिय, आलोक, ज्ञानावरण क्षयोपशमादि निमित्तोंकी, तथा पुद्गल स्कंधोंमें रूपआदिके निमित्तोंकी अपेक्षासे अपने उपादानके साथ होनेवाली पर्यायें विभावपर्यायें हैं।

इन दोनों प्रकारकी पर्यायोंमें काल आदि जो उदासीन निमित्त हैं उनकी विवक्षा न करके प्रतिसमय जो अगुरुलघुकृत पर्यायें होती हैं उन्हें स्वप्रत्यय पर्याय कहा है। उदाहरणार्थ-धर्माधर्मादि द्रव्योंमें काल आदिके साथ-साथमें गतिहेतुत्व-स्थितिहेतुत्व आदि धर्मोंके आश्रयसे जीव और पुद्गलोंमें जो गति-स्थिति आदि पर्यायें होती हैं, वे भी अपनी विभिन्नरूप गति स्थिति आदिसे धर्म अधर्म द्रव्योंके पर्याय परिवर्तनमें व्यवहारसे आश्रय निमित्त हैं।

इसी आशयको ध्यानमें-रखकर श्री अकलंकदेव तथा पूज्यपाद स्वामीने राजवार्तिक तथा सर्वार्थसिद्धिके अध्याय ५ सूत्र ७ में यह वचन लिखा है-

द्विविधः उत्पादः-स्वनिमित्तः परप्रत्ययश्च। स्वनिमित्तस्तावत्-अनन्तानां अगुरुलघुगुणानां आगमप्रामाण्यात् अभ्युपगम्यमानानां षट्स्थानपतितया वृद्धया-हान्या च प्रवर्तमानानां स्वभावादेषां उत्पादो व्ययश्च। परप्रत्ययोऽपि अश्वादेर्गति-स्थिति-अवगाहनहेतुत्वात् क्षणे-क्षणे तेषां भेदात् तद्हेतुत्वं अपि भिन्नं इति परप्रत्ययापेक्षः उत्पादो विनाशश्च व्यवह्रियते।

अर्थ-उत्पाद दो प्रकारका है-स्वनिमित्तक और परनिमित्तक। आगम प्रामाण्यसे स्वीकृत अनन्त अगुरुलघुगुणोंमें षट्गुणी हानि-वृद्धिरूपसे प्रवर्तमान उत्पाद-व्यय स्वभावसे होता है वह स्वनिमित्तक उत्पाद-व्यय है तथा घोड़े आदिकी गति तथा स्थिति और अवगाहनहेतुरूप अवस्थाओंमें क्षण क्षणमें भेद होनेसे उन पर्यायोंमें परप्रत्यय उत्पाद-व्ययका व्यवहार किया जाता है।

तात्पर्य यह है कि धर्मादि द्रव्योंमें परिणमन तो स्वप्रत्यय ही होता है, जो यथार्थ है, तथापि मनुष्य, पशु, पक्षी आदि भिन्न-भिन्न जीवोंकी गति आदिकी अपेक्षा क्षण-क्षणमें भेद होनेसे उनमें परप्रत्यय परिणामका भी व्यवहार किया जाता है।

इसी तरह जीवकी स्वभाव पर्याय तो स्वप्रत्यय ही है, तथा पुद्गलरूप कर्म-नोकर्मके निमित्तसे जो पर्याय होती है वह विभावपर्याय स्वपरप्रत्यय कही जाती है। इसी प्रकार पुद्गल परमाणुकी स्वभावपर्याय स्वप्रत्यय है और स्कंधरूप पर्याय विभावपर्याय स्वपरप्रत्यय कही जाती है।

एक बात ध्यानमें रखनेकी है कि स्वपरप्रत्ययरूप पर्यायमें परकी निमित्तताका यह अर्थ नहीं है कि उपादानकी तरह निमित्त भी समतुलामें बैठकर उस पर्यायका निर्माण करता हो। यह व्यवस्था आगमकी नहीं है। इसका कारण यह है कि पर्यायका स्वामित्व द्रव्यमें है, पर पदार्थ तो निमित्तमात्र है। ऐसे स्थलों पर निमित्तकी मर्यादामें वह आश्रय निमित्त नहीं है, किन्तु विशेष निमित्त है यही आगम परम्परा है।

शंका ११, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६३६ से ६४०

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका ११

परिणमनके स्वप्रत्यय और स्वपर-प्रत्यय दो भेद हैं, उनमें वास्तविक अन्तर क्या है?

प्रतिशंका ३

हम अपनी द्वितीय प्रतिशंकामें इस बातको विस्तारके साथ स्पष्ट कर चुके हैं कि विश्वके सम्पूर्ण पदार्थोंमें यथायोग्य होनेवाली पर्यायोंको स्वप्रत्यय, स्वाभाविक स्वपरप्रत्यय और वैभाविक स्वपरप्रत्यय परिणमनोंमें ही अन्तर्भूत करना चाहिये।

आपने भी अपने द्वितीय प्रत्युतरमें स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय-ऐसे दो भेद स्वीकार करनेके अनन्तर लिखा है कि ‘धर्माधर्मादि द्रव्योंके गतिहेतुत्व-स्थितिहेतुत्व आदि धर्मोंके आश्रयसे जीव और पुद्गलोंमें जो गति-स्थिति आदि पर्यायें होती हैं वे भी अपनी विभिन्नरूप गति-स्थिति आदिसे धर्म-अधर्म आदि द्रव्योंके पर्याय परिवर्तनमें व्यवहारसे आश्रय निमित्त हैं।’ और आगे राजवार्तिक तथा सर्वार्थसिद्धिके अध्याय ५ सूत्र ७ का प्रमाण उपस्थित करते हुए धर्म-अधर्म आदि द्रव्योंमें भी परप्रत्यय परिणमन आपने स्वीकार कर लिये हैं।

आपके द्वारा स्वीकृत इस परप्रत्यय परिणमनको हमारे द्वारा स्वीकृत स्वाभाविक स्वपरप्रत्यय परिणमनमें ही अन्तर्भूत करना चाहिये, कारण कि जैन संस्कृतिमें स्वकी अपेक्षा रहित केवल परके द्वारा किसी भी वस्तुके परिणमनको नहीं स्वीकार किया गया है और यही कारण है कि आचार्य कुन्दकुन्दने समयसार गाथा ११८ में पुद्गल द्रव्यके कर्मरूपसे परिणमित होनेके सिलसिलेमें तथा गाथा १२३ में जीवद्रव्यके क्रोधादि रूपसे परिणमित होनेके सिलसिलेमें यह बात स्पष्ट कर दी है कि केवल परप्रत्यय परिणमन नहीं हो सकता है। वे गाथायें निम्न प्रकार हैं-

जीवो परिणामयदे पुग्गलदव्वाणि कम्मभावेण ।
ते सयमपरिणमंते कहं णु परिणामयदि चेदा ॥११८॥

अर्थ-जीव यदि पुद्गल द्रव्यको कर्मभावसे परिणत कराता है तो उस पुद्गलद्रव्यमें अपनी निजकी परिणत होनेकी योग्यताके अभावमें जीवद्रव्य उसको कैसे (कर्मरूप) परिणत करा सकता है?

इसी प्रकार-

पुग्गलकम्मं कोहो जीवं परिणामएदि कोहत्तं ।
तं सयमपरिणमंतं कहं णु परिणामयदि कोहो ॥१२३॥

अर्थ-क्रोधरूप पुद्गल कर्म यदि जीवको क्रोधभावसे परिणत कराता है तो उस जीवमें अपनी निज परिणत होनेकी योग्यताके अभावमें वह पुद्गल कर्मरूप क्रोध उसको कैसे (क्रोधरूप) परिणत करा सकता है?

आचार्य अमृतचन्द्रने भी उक्त गाथाओंकी व्याख्या करते हुए अपनी आत्मख्याति टीकामें लिखा है-

न तावत्तत्स्वयमपरिणमानं परेण परिणामयितुं पार्येत ।

अर्थ-जिसमें परिणत होनेकी निजी योग्यता नहीं है उसे दूसरा कैसे परिणत करा सकता है? अर्थात् नहीं करा सकता है।

यही बात आचार्य अमृतचन्दने गाथा १२३ की व्याख्या करते हुए उक्त टीकामें भी लिखी है।

इस प्रकार जीवके ज्ञानगुणके बाह्य पदार्थोंके जाननेरूप उपयोगाकार परिणमनको तथा धर्मादि द्रव्योंके गतिहेतुत्वादि गुणोंके जीवों और पुद्गलोंकी गति आदिके आधार पर होनेवाले परिणमनोंको स्वाभाविक स्व-परप्रत्यय परिणमन ही कहना चाहिये। इन्हें वैभाविक स्वपरप्रत्यय परिणमन इसलिये नहीं कहा जा सकता है कि ये सब परिणमन विभावरूप विकारी परिणमन नहीं हैं। स्वप्रत्यय परिणमन भी इन्हें इसलिये नहीं कहा जा सकता है कि इन परिणमनोंमें एक तो परकी अपेक्षा आगममें स्वीकार की गयी है, दूसरे आगममें जहाँ भी स्वप्रत्यय परिणमनोंका कथन मिलता है वहाँ सर्वत्र केवल अगुरुलघुगुणके द्वारा होनेवाली द्रव्यकी षड्गुणहानि-वृद्धिरूप परिणमनोंको ही स्वप्रत्यय परिणमन बतलाया गया है।

आगे आपने लिखा है कि ‘मनुष्य, पशु, पक्षी आदि भिन्न-भिन्न जीवोंकी गति आदिकी अपेक्षा क्षण-क्षणमें भेद होनेसे उनमें (धर्मादि द्रव्योंमें) परप्रत्यय परिणामका भी व्यवहार किया जाता है।’

इसके विषयमें हमारा आपसे कहना है कि व्यवहार शब्दका आपने स्थान-स्थान पर उपचार ही अर्थ किया है और उपचारका भी अर्थ कल्पनारोपित किया है। सो ऐसा अर्थ आगममें सर्वत्र नहीं लिया गया है। इसके लिए प्रश्न नं० १७ की हमारी प्रतिशंका ३ को देखिये, उसमें हम व्यवहार शब्दके विविध अर्थ बतलानेवाले हैं जिनका उपयोग आगममें यथासंभव और यथावश्यक अर्थमें ही किया गया है। इसलिये यहाँ पर भी राजवार्तिक तथा सर्वार्थसिद्धिके अध्याय ५ सूत्र ७ में धर्मादि द्रव्योंमें होनेवाले परप्रत्यय परिणमनोंके प्रसंग-में जो ‘व्यवह्रियते’ पाठ किया गया है उसका अर्थ उपचरित अर्थात् कल्पनारोपित नहीं करना चाहिये, कारण कि मनुष्य, पशु-पक्षी आदिकी सद्भूत गति आदि निमित्तोंकी सहायतापूर्वक उत्पन्न होनेसे उन परिणमनोंकी धर्मादि द्रव्योंमें सद्भूतता ही मानने योग्य है, अन्यथा यदि धर्मादि द्रव्योंके गतिहेतुकत्वादि गुणोंमें कूटस्थता आ जानेसे फिर धर्मादि द्रव्य उपर्युक्त मनुष्य पशु-पक्षी आदिकी भिन्न-भिन्न गति आदिमें सहायक नहीं हो सकेंगे । दूसरी बात यह है कि धर्मादि द्रव्योंमें होनेवाले परसापेक्ष परिणमनोंको व्यवहारमात्र कहकर यदि कल्पनारोपित ही माना जायगा, तो ज्ञेयभूत पदार्थोंके निमित्तसे होनेवाले ज्ञानके उपयोगाकार परिणमनोंको भी कल्पनारोपित (असद्भूत) ही माननेका प्रसंग उपस्थित हो जायगा । इसलिये जिस प्रकार ज्ञानके ज्ञेयभूत परपदार्थोंकी अपेक्षासे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानके उपयोगाकार परिणमन कल्पनारोपित (असद्भूत) नहीं हैं उसी प्रकार परपदार्थसापेक्ष होकर उत्पन्न होनेवाले धर्मादि द्रव्योंके परिणमन भी कल्पनारोपित (असद्भूत) नहीं हैं ।

अन्तमें आपने लिखा है कि ‘स्वपरप्रत्ययरूप पर्यायमें परकी निमित्तताका यह अर्थ नहीं है कि उपादानकी तरह निमित्त भी समतुलामें बैठकर उस पर्यायका निर्माण करता हो ।’

इस विषयमें भी हमारा कहना यह है कि हमने जो स्वपरप्रत्यय परिणमनमें उपादानभूत और निमित्तभूत वस्तुओंमें विद्यमान कारणभावकी परस्पर विलक्षणता रहते हुए भी कार्योत्पत्तिमें दोनोंकी समान अपेक्षा रहनेके कारण उपादान और निमित्त दोनों तरहकी वस्तुओंको ‘समतुला’ शब्द द्वारा समान सम्पन्न बतलाया है, सो हमने ‘समतुला’ शब्दका प्रयोग इस आशयसे नहीं किया है कि उपादानके समान निमित्तको भी कार्यरूप परिणत होना चाहिये अथवा उपादानके समान निमितको भी कार्यका आश्रय बन जाना चाहिये । किन्तु इस आशयसे किया है कि उपादानके स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप कार्यकी उत्पत्तिमें सहायक कारणरूप निमित्तकी उतनी ही अपेक्षा रहा करती है जितनी कि कार्यके आश्रयभूत उपादान की रहती है । अर्थात् उपादान और निमित्त याने आश्रयकारण और सहकारी कारण-इन दोनोंमें से एककी उपेक्षा कर देने पर कार्य (स्वपरप्रत्ययरूप परिणमन) कभी भी उत्पन्न नहीं हो सकता है, क्योंकि कार्योत्पत्तिमें जहाँ तक उपादान और निमित्तके बलाबलका सम्बन्ध है वहाँ तक तो यही माना जायगा कि उपादानशक्तिके अभावमें निमित्त अकिंचित्कर बना रहता है और इसी प्रकार उपादान भी निमित्तके सहयोगके विना कुछ नहीं कर सकता है । इस तरह परस्पर विलचण अपने-अपने ढंगकी कार्योत्पादनकारणता रखते हुए भी कार्योत्पादनकी दृष्टिसे दोनों ही समानरूपसे शक्तिशाली हैं, इसलिए उसमें ( कार्योत्पादनमें ) दोनों ही एक दूसरेका मुख ताकनेवाले हैं । इस तरह जब दोनों एक दूसरेकी अपेक्षा रखकर ही कार्योत्पादन कर सकते हैं, तो केवल सहायकमात्र होनेसे उपादानकी कार्यपरिणतिमें निमित्तकी उपयोगिता उपादानसे कम रहती हो-ऐसा सोचना गलत है । यही कारण है कि स्वामी समन्तभद्रने कार्यकी उत्पत्ति बहिरंग और अन्तरंग अर्थात् निमित्त और उपादान दोनों तरहके कारणोंकी समग्रताके सद्भावमें ही मानी है और यह भी प्रमाणित किया है कि द्रव्यगत स्वभाव ऐसा ही है कि बहिरंग तथा अन्तरंग उभय कारणोंकी समग्रता पर ही कार्यकी उत्पत्ति हो सकती है । उनका वचन निम्न प्रकार है-

बाह्येतरोपाधिसमग्रतेयं कार्येषु ते द्रव्यगतः स्वभावः ॥६०॥
-स्वयंभूस्तोत्र

इसका अर्थ ऊपर स्पष्ट किया जा चुका है । यहाँ पर ‘द्रव्यगत-स्वभावः’ पदसे इसका निराकरण हो जाता है कि किसी एक कार्योत्पत्तिके प्रति निमित्तता और उपादानता दोनों ही एक वस्तुके धर्म हैं, और इसका भी निराकरण हो जाता है कि निमित्तता उपादानताके पीछे-पीछे चलनेवाली वस्तु है तथा इसका भी निराकरण हो जाता है कि निमित्तताको उपादानता समुत्पन्न करती है, और यह सिद्ध होता है कि जिस प्रकार अगुरुलघु गुणोंसे वस्तुमें होनेवाले षड्गुणहानि-वृद्धिरूप परिणमनोंकी स्वप्रत्ययता अर्थात् स्वनिमित्तक कार्यपना द्रव्यगत स्वभाव है उसी प्रकार वस्तुके जो भी अन्तरंग ( उपादान ) और बहिरंग (निमित्त) कारणों के सहयोगसे परिणमन हुआ करते हैं उनमें पायी जानेवाली स्वपरप्रत्ययता अर्थात् स्वपर निमित्तक-कार्यपन भी द्रव्यगत स्वभाव ही है । याने वे परिणमन ही ऐसे हैं या उनका स्वभाव ही ऐसा है कि स्व ( उपादान ) और पर ( निमित्त ) का परस्पर सहयोग हुए विना वे कभी उत्पन्न ही नहीं हो सकते हैं । समयसारकी आचार्य अमृतचन्द्रकृत आत्मख्याति टीकामें निम्नलिखित कलश पद्य पाया जाता है-

न जातु रागादिनिमित्तभावमात्मात्मनो याति यथार्ककान्तः ।
तस्मिन्निमित्तं परसंग एव वस्तुस्वभावोऽयमुदेति तावत् ॥१७५॥

इस पद्यमें पठित ‘वस्तुस्वभावः’ पद भी इसी अर्थका प्रकाशन कर रहा है कि परके सम्बन्धसे ही आत्मामें रागादि उत्पन्न हो सकते हैं, ऐसा ही वस्तुस्वभाव है ।

आप्तपरीक्षामें आचार्य श्री विद्यानन्दीने लिखा है-

सामग्री जनिका कार्यस्य नैकं कारणम्, ततस्तदन्वयव्यतिरेकावेव कार्यस्यान्वेषणीयौ ।
-वीरसेवामंदिर प्रकाशन पृ० ४४

अर्थ-कार्यकी जनक सामग्री ( कारणोंकी समग्रता ) होती है, एक कारण कार्यका जनक नहीं होता है, इसलिये 'सम्पूर्ण कारणोंके अन्वय और व्यतिरेकका अन्वेषण करना चाहिये ।

यद्यपि यह वाक्य आचार्यने नैयायिककी ओरसे पूर्वपक्षके रूपमें उपस्थित किया है, परन्तु पूर्वपक्षकी समाप्ति पर ‘सत्यमेतत्’ पद द्वारा इसे स्वीकृत कर लिया है । आगे पृ० ४५ पर लिखा है-

प्रत्येकं सामग्र्येकदेशानां कार्योत्पत्तौ अन्वयव्यतिरेकनिश्चयस्य प्रेक्षापूर्वकारिभिः अन्वेषणात् ।

अर्थ-प्रेक्षापूर्वकारी ( बुद्धिपूर्वक कार्य करनेवाले ) लोग कार्यकी उत्पत्तिमें संपूर्ण कारणोंके अलग-अलग अन्वय-व्यतिरेककी खोज किया करते हैं ।

बात भी दरअसल ऐसी है कि यदि लोकमें कोई कार्य गड़बड़ीमें पड़ जाता है तो चतुर जानकार उसके प्रत्येक साधनकी ओर दृष्टि डालता है कि किस साधनकी गड़बड़ीसे यह कार्य गड़बड़ हो गया । पटको बनानेवाला जुलाहा पटनिर्माणके साधनभूत तन्तु, तुरी, वेम, शलाका आदि सभी साधनों पर समानरूपसे दृष्टि रखता है कि सब साधनोंकी स्थिति अच्छी है या नहीं, अथवा यह भी देखता है कि इनमेंसे किसी साधन की कमी तो नहीं है । सर्वसाधारण लोग भी किसी कार्यके करनेसे पहले उसके कारणों पर यथाबुद्धि दृष्टि डाल लिया करते हैं ।

कहाँ तक इस विषयको बढ़ाया जाय, प्रत्येक मनुष्य यहां तक कि जो निमित्तकारणको अवास्तविक, उपचरित या काल्पनिक सिद्ध करनेमें लगे हुए हैं वे भी अपने अनुभव और अपनी प्रवृत्तियोंकी ओर भी थोड़ा दृष्टिपात करें तो उन्हें मालूम होगा कि वे निमित्त उपादान दोनोंको ही समतुला पर बिठलाकर कार्योत्पत्तिके प्रति अग्रसर होते हैं । वे जानते हैं कि उनका कार्य निमित्तोंका सहारा लिये बिना नहीं सम्पन्न हो सकता है, इसलिये निमित्तोंको अपनाते हैं, फिर भी उन्हें अवास्तविक या काल्पनिक कहनेसे नहीं चूकते, यह महान् आश्चर्यकी बात है । निमित्त भी उपादानकी ही तरह वास्तविक है, उपयोगी है, काल्पनिक या अनुपयोगी नहीं है, वह उपचरित या आरोपित भी नहीं है, इत्यादि आवश्यक बातों पर प्रश्न १७ में प्रकाश डाला जायगा। वहाँसे देखिये।

नोट-इस विषयमें प्रश्न नं० १, ५, ६ और १७ देखिये तथा इनके प्रत्येक दौरका विषय भी देखिये।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुदार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥

शंका ११

मूल प्रश्न ११-परिणमनके स्वप्रत्यय और स्व-परप्रत्यय दो भेद हैं, उनमें वास्तविक अन्तर क्या है?

शंका ११, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६४० से ६५१

↑ सूची


प्रतिशंका ३ का समाधान

इस प्रश्नके प्रथम उत्तरमें समाधान करते हुए बतलाया गया था कि स्वभावपर्याय और विभावपर्यायके भेदसे पर्यायें दो प्रकारकी होती हैं। स्व-प्रत्यय पर्यायोंका नाम ही स्वभाव पर्याय है और स्व-परप्रत्यय पर्यायोंको ही विभाव पर्याय कहते हैं। साथ ही इनमेंसे किस द्रव्यमें दोनों या एक कौन-कौन पर्यायें किस प्रकार होती हैं इसका स्पष्टीकरण करते हुए समर्थनमें प्रवचनसार गाथा ९३ की टीका उपस्थित की गई थी। अन्तमें यह भी बतला दिया गया था कि ‘जिस प्रकार स्व-परप्रत्यय पर्यायोंकी उत्पत्तिमें कालादि द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायें यथायोग्य आश्रयनिमित्त होती हैं उसी प्रकार स्वप्रत्यय पर्यायोंकी उत्पत्तिमें भी कालादि द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायें यथायोग्य आश्रयनिमित्त होती हैं। वे साधारण-निमित्त हैं, इसलिए उनकी दोनों स्थलोंमें कथनकी अविवक्षा है। यही इन दोनोंमें भेद है?’ ऐसा लिखनेका हमारा आशय यह था कि ‘स्व-प्रत्यय’ शब्दमें आया हुआ ‘स्व’ शब्द अपने उपादानको सूचित करता है और स्व-परप्रत्यय पदमें आया हुआ ‘स्व’ शब्द अपने उपादानको तथा ‘पर’ शब्द अपने असाधारण ( विशेष ) निमित्तोंको सूचित करता है।

इतना स्पष्ट निर्देश करनेपर भी प्रतिशंका २ में एक तो ३ प्रकारकी पर्यायोंकी स्थापना करके अनन्त अगुरुलघु गुणद्वारा द्रव्योंकी प्रतिसमय प्रवर्तमान षड्गुण-हानि-वृद्धिरूप पर्यायें मात्र ‘स्व-प्रत्यय’ स्वीकार की गई हैं। इनके होनेमें एकान्तरूपसे मात्र निश्चय ( उपादान ) पक्षको ही स्वीकार किया गया है और व्यवहार ( उपचार ) पक्षको तिलाञ्जलि दे दी गई है। जब कि प्रत्येक निश्चयका तदनुकूल व्यवहार अविना-भावरूपसे होता ही है ऐसा आगमका अभिप्राय है। स्वामी समन्तभद्रके वचनानुसार चाहे वह स्वभावकार्य हो और चाहे विभावकार्य, दोनोंमें बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता तभी बन सकती है जब कार्योत्पत्तिमें उपादान और व्यवहारहेतु दोनोंकी सम व्याप्ति स्वीकार की जाये।-देखिये स्वयंभूस्तोत्र श्लोक ६०।

दूसरे आगममें सर्वत्र स्वभावपर्यायोंको स्व-प्रत्ययरूपसे ही उल्लिखित किया गया है। फिर भी उसका विचार किये बिना प्रतिशंका २ में अनन्त अगुरुलघु गुणरूपसे प्रवर्तमान षड्गुणहानि-वृद्धिरूप पर्यायोंके सिवाय अन्य समस्त स्वभावपर्यायोंको स्वपरप्रत्यय सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है। तथा इनके अनेक नाम भी गिनाये गये हैं। इस प्रकार प्रतिशंका २ में स्वभावपर्यायोंको दो भागोंमें विभक्त कर दिया गया है, जब कि आगममें स्वभावपर्यायों के उक्त प्रकार से दो भेदोंका उल्लेख दृष्टिगोचर नहीं होता। वस्तुतः आगममें जहाँ भी स्वभावपर्यायका लक्षण निर्देश करते हुए द्रव्योंको अगुरुलघु गुणद्वारा षड्गुणो हानि-वृद्धिरूप स्वप्रत्यय पर्यायोंका उल्लेख आता है वहाँ वह षट्द्रव्यसम्बन्धी सब स्वभावपर्यायोंमें घटित होनेवाले सामान्य लक्षणके रूपमें ही उल्लिखित किया गया है।

तीसरे हमने तो प्रथम उत्तरमें इतना ही लिखा था कि ‘जो साधारण निमित्त होते हैं उनकी दोनों स्थलों पर कथनकी अविवक्षा होनेसे परिगणना नहीं की जाती।’ किन्तु प्रतिशंका २ में इस प्रकारकी वाक्य-रचना निबद्ध की गई है जिससे यह ध्वनित हो कि ‘हम स्वभावपर्यायोंमें साधारण निमित्तोंके कथनकी अविवक्षा और विभावपर्यायोंमें साधारण निमित्तोंके कथनकी विवक्षा इतने मात्रसे दोनोंमें भेद स्वीकार करते हैं।’ यह एक प्रकारसे हमारे ऊपर आरोप है, किन्तु प्रथम उत्तरमें न तो हमारी ओरसे ऐसा लिखा ही गया है और न ऐसो वस्तुस्थिति हो है। प्रथम उत्तरके प्रारम्भमें ही हम यह स्पष्ट कर आये हैं कि ‘स्वभावपर्यायोंमें स्वप्रत्यय पदद्वारा उसी द्रव्यकी उपादान शक्ति ली गई है और विभाव पर्यायोंमें स्व-परप्रत्यय पदद्वारा विवक्षित द्रव्यकी उपादान शक्तिके साथ उस-उस पर्यायके कर्ता और करण निमित्तोंको भी स्वीकार किया गया है।’ स्पष्ट है कि प्रतिशंका २ अनेक ऐसे मन्तव्योंसे ओत-प्रोत है जिनका आगमसे समर्थन नहीं होता।

दूसरे उत्तरमें हमने उन्हीं तथ्यों पर पुनः प्रकाश डाला है जिनका सम्यक् प्रकारसे निर्देश प्रथम उत्तरके समय कर आये हैं। इसमें तत्त्वार्थवार्तिक और सर्वार्थसिद्धि अ० ५ सू० ७ का टीकावचन इसलिए उद्धृत किया गया था ताकि अपर पक्षकी समझमें यह बात भलीभाँति आ जाए कि स्वभावपर्यायें इसलिए ही स्वप्रत्यय स्वीकार की गई हैं, क्योंकि उनकी उत्पत्तिमें विभावके हेतुभूत बाह्य निमित्तोंका सर्वथा अभाव है। उनमें भी यद्यपि आश्रय निमित्तोंका निषेध नहीं है। राजवार्तिक और सर्वार्थसिद्धिके उक्त उल्लेखमें ‘पर’ शब्दका प्रयोग इसी अर्थमें किया गया है। किन्तु दूसरे पक्षने इस उल्लेखको अपने मन्तव्यकी पुष्टिमें समझकर उससे यह अभिप्राय फलित करनेकी चेष्टा की है कि स्वभाव पर्यायें भी विभाव पर्यायोंके समान स्व-परप्रत्यय होती हैं। हालाँ कि अपर पक्षने प्रतिशंका २ के अन्तमें यह लिखकर कि ‘इस तरह जिस परिणमनमें उपादानके साथ कर्ता-करण आदि प्रेरक निमित्तोंका व्यापार आवश्यक नहीं है उसे स्वप्रत्यय परिणमन कहना चाहिए।’ स्वभावपर्यायोंको स्वप्रत्यय भी स्वीकार कर लिया है जो आगमको दृष्टिसे हमें तो इष्ट है ही, अपर पक्षको भी स्वीकृत होना चाहिए।

इस प्रकार मूल प्रश्न, उसका उत्तर, प्रतिशंका २ और उसका उत्तर इन सबका यह सिंहावलोकन है। आगे प्रतिशंका ३ के आधारसे विचार करते हैं-

\१. पर्यायें दो ही प्रकारकी होती हैं

प्रतिशंका ३ में हमारे द्वारा पूर्वमें उद्धृत तत्त्वार्थवार्तिक और सर्वार्थसिद्धि अध्याय ५ सूत्र ७ के वचनका उल्लेखकर यह बतलानेका प्रयत्न किया गया है कि हमने भी स्वभाव पर्यायांको परप्रत्यय स्वीकार कर लिया है और इस प्रकार अपनी पुरानी मान्यताकी पुष्टि करते हुए लिखा है कि 'विश्वके सभी पदार्थोंमें यथायोग्य होनेवाली पर्यायोंको स्वप्रत्यय, स्वाभाविक स्व-परप्रत्यय, और वैभाविक स्व-परप्रत्यय परिणमनोंमें ही अन्तर्भूत करना चाहिए। इसी प्रसंगमें एक नमूनेदार यह वाक्य भी लिखा है कि ‘जैन संस्कृतिमें स्वकी अपेक्षा रहित केवल परके द्वारा किसी वस्तुके परिणमनको नहीं स्वीकार किया गया है।’ विचारकर देखने पर विदित होता है कि इस वाक्यमें सर्वप्रथम यह चतुराई की गई है कि जो विशेष्य है उसे विशेषण बनाया गया है और जो विशेषण है उसे विशेष्य बनाकर अपने अभिप्रायकी पुष्टि की गई है। साथ ही यह जाहिर करनेके लिए कि आचार्य कुन्दकुन्द कृत समयसारसे भी हमारे उक्त अभिप्रायकी पुष्टि होती है, उसकी गाथा ११८ और १२३ तथा उनका टीका वचन भी प्रमाणरूपमें उद्धृत किया गया है। इन उद्धृत वचनोंका जो अर्थ किया गया है वह क्यों ठीक नहीं है इसका विचार तो हम आगे करनेवाले हैं। यहाँ मात्र इतना संकेत कर देना चाहते हैं कि इस बार अनेक स्थलोंपर अपर पक्षने जैनदर्शन या जैनधर्म शब्दका प्रयोग न कर उनके स्थानमें जैन संस्कृति शब्दका प्रयोग किया है। ऐसा करनेमें जो भी रहस्य हो उसे तो अपर पक्ष ही जाने। प्रतिशंकामें ऐसे प्रयोगका खुलासा न होनेके कारण हम उसे सर्वत्र जैनदर्शन या जैनधर्मके अर्थमें ही स्वीकार करेंगे।

दूसरी बात यह है कि उक्त वचन द्वारा विशेष्यको विशेषण बनाकर जो यह स्वीकार किया गया है कि प्रत्येक परिणमनमें ‘स्व’की अपेक्षा रहती है, वह तो विचारणीय है ही, साथ ही यहाँ ‘स्व’ पदसे क्या अभिप्रेत है यह स्पष्ट न होनेसे यह भी विचारणीय है। सब ओरसे विचार करने पर विदित होता है कि है यह वाक्य भ्रामक ही। प्रतिशंका ३ में इस वाक्य द्वारा भले ही जैन संस्कृतिकी उद्घोषणा की गई हो पर विचार कर देखने पर यही विदित होता है कि इस वाक्यमें जो कुछ भी कहा गया है वह जैन संस्कृति तो नहीं ही है। इससे जैन संस्कृति पर पानी फिर जाएगा इतना अवश्य है।

अब थोड़ा इस वाक्यमें जो कुछ कहा गया है उसके विधिपरक अर्थ पर विचार कीजिए-

इसका विधिपरक निर्देश होता है कि 'स्व’की अपेक्षा सहित ‘पर’के द्वारा परिणमन सभी वस्तुओंका जैन संस्कृतिमें स्वीकार किया गया है।’ यह उक्त वाक्यका विधिपरक निर्देश है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि अपर पक्ष अपना यह मत जैन संस्कृतिके नामपर प्रचारित करना चाहता है कि प्रत्येक परिणमनमें ‘स्व’ की अपेक्षा रहती है अवश्य, पर होता है वह दूसरेके द्वारा ही। आश्चर्य है कि ऐसे विडम्बनापूर्ण वचनको जैन-संस्कृतिकी विशेषता घोषित किया गया है । कदाचित् ईश्वरवादी ऐसा वचन प्रयोग करें तो उनके लिए वह क्षम्य है, जैन-संस्कृतिके वाहकोंके द्वारा तो ऐसा वचन प्रयोग भूलसे भी नहीं होना चाहिए।

अब हम प्रकृत विषय पर आते हैं। प्रकृतमें यह विचार चल रहा है कि सब द्रव्योंमें जितनी भी पर्यायें होती हैं उन सबका वर्गीकरण करने पर वे ३ प्रकारकी न होकर मात्र २ ही प्रकारकी होती हैं। जहाँ कहीं साधारण निमित्तोंकी विवक्षावश स्वभाव पर्यायोंके वर्णनके प्रसंगसे परप्रत्यय शब्दका प्रयोग हुआ भी है तो इतने मात्रसे पर्यायोंकी त्रिविधताका समर्थन नहीं किया जा सकता, क्योंकि आगममें इन्हीं पर्यायोंको स्व-प्रत्यय पर्याय कहा है। और जहाँ केवल स्वप्रत्यय पर्यायोंका लक्षण आया है वहाँ इन्हींको लक्ष्यमें रखकर निर्दिष्ट किया गया है। आगे हम उदाहरणके रूपमें यहाँ कुछ ऐसे प्रमाण उपस्थित करेंगे जिनसे प्रतिशंकामें स्वीकृत स्वाभाविक स्व-पर प्रत्यय पर्यायें ही स्वभाव पर्यायें हैं यह भलीभाँति ज्ञात हो जाएगा, क्योंकि जहाँ भी ‘स्वप्रत्यय’ शब्दका प्रयोग हुआ है वह इन्हींके लिए हुआ है। सर्वप्रथम प्रमाणस्वरूप अनन्तसुखको लीजिए। इसका विवेचन करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द प्रवचनसारमें लिखते हैं-

अइसयमादसमुत्थं विसयातीदं अणोवममणंतं।
अव्वुच्छिण्णं च सुहं सुद्धुवओगप्पसिद्धाणं ॥१३॥

शुद्धोपयोगसे निष्पन्न हुए आत्माओंका सुख अतिशय, आत्मोत्पन्न, विषयातीत, अनुपम, अनन्त और अविच्छिन्न है ॥१३॥

इसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

आसंसारापूर्वपरमाद्भुताह्लादरूपत्त्वादात्मानमेवाश्रित्य प्रवृत्तत्वात्पराश्रयनिरपेक्षत्वादत्यन्तविलक्षणत्वात्समस्तायतिनिरपायित्वान्नैरन्तर्यप्रवर्तमानत्वाच्चातिशयवदात्मसमुत्थं विषयातीतमनौपम्यमनंतमव्युच्छिन्नं शुद्धोपयोगनिःपन्नानां सुखमतस्तत्सर्वथा प्रार्थनीयम् ॥१३॥

(१) अनादि संसारसे जो पहले कभी अनुभवमें नहीं आया ऐसे अपूर्व परम अद्भुत आह्लादरूप होनेसे अतिशय, (२) आत्माका ही आश्रय लेकर प्रवर्तमान होनेसे आत्मोत्पन्न, (३) पराश्रयसे निरपेक्ष होनेसे विषयातीत, (४) अत्यन्त विलक्षण होनेसे अनुपम, (५) समस्त आगामी कालमें कभी भी नाशको प्राप्त न होनेसे अनन्त और (६) विना ही अन्तरके प्रवर्तमान होनेसे अविच्छिन्न सुख शुद्धोपयोगसे निष्पन्न हुए आत्माओंके होता है, इसलिए वह सर्वथा प्रार्थनीय है ॥१३॥

यहाँ गाथामें उक्त सुखको ‘आदसमुत्थं’ कहा है जिसका तात्पर्य आत्मासे उत्पन्न अर्थात् ‘स्वप्रत्यय’ ही होता है, ‘स्व-पर-प्रत्यय’ नहीं। इस पदकी व्याख्या करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं -‘आत्मानमेवाश्रित्य प्रवृत्तत्वात्।’ इसका अर्थ है ‘आत्माका ही आश्रय लेकर प्रवर्त्तमान होनेसे।’ इससे स्पष्ट विदित होता है कि प्रत्येक द्रव्यकी जो स्वभाव पर्याय होती है, आगममें उसे स्वप्रत्यय ही कहा है। वह स्वप्रत्यय ही क्यों है इसका खुलासा आचार्य अमृतचन्द्रके ‘पराश्रयनिरपेक्षत्वात्’ इस वचनसे हो जाता है। इस प्रकार निश्चित होता है कि जिस पर्यायकी उत्पत्तिमें पराश्रय निरपेक्षता हो और स्वयं अपने आश्रयसे उत्पन्न हुई हो वह स्वप्रत्यय होनेसे स्वभाव पर्याय है। स्वभाव पर्यायका आगममें इससे भिन्न कोई दूसरा लक्षण या दूसरा नाम दृष्टिगोचर नहीं होता। उदाहरणके लिए पद्मनन्दि पंचविंशतिकाके धर्मोपदेश प्रकरणके इश श्लोक पर दृष्टिपात कीजिए-

सतताभ्यस्तभोगानामप्यसत्सुखमात्मजम्।
अप्यपूर्वं सदित्यास्था चित्ते यस्य स तत्त्ववित् ॥१५०॥

इस पर दृष्टिपात करनेसे विदित होता है कि इसमें जिस अपूर्व सुखका निर्देश है उसे आत्मज-आत्मोत्थ ही बतलाया गया है।

कविवर राजमल्लजी इसी तथ्यकी पुष्टि करते हुए अध्यात्मकमलमार्त्तण्डमें लिखते हैं कि जो पर्यायें द्रव्यान्तरनिरपेक्ष होती हैं वे स्वभावगुणपर्यायें हैं। वह वचन इस प्रकार है-

धर्मद्वारेण हि ये भावा धर्मांशात्मका [हि] द्रव्यस्य।
द्रव्यान्तरनिरपेक्षास्ते पर्यायाः स्वभावगुणतनवः ॥१४॥

आत्मोत्थ और स्वप्रत्यय पदका अर्थ एक ही है यह हम पूर्वमें ही लिख आये हैं। इस तथ्यको और भी विशदरूपमें समझनेके लिए पंचास्तिकाय गाथा २९ की आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीकाके इस वचन पर भी दृष्टिपात कीजिए-

स्वप्रत्ययममूर्तसम्बद्धमव्याबाधमनन्तं सुखमनुभवति च ।

तत्त्वार्थवार्तिक अ० १, सू० २ में क्षयोपशमसम्यक्त्वकी उत्पत्तिमें सम्यक्त्व प्रकृति निमित्त है इस बातको ध्यानमें रखकर प्रश्नकर्ताने यह प्रश्न किया है कि सम्यक्त्व प्रकृतिको भी मोक्षका कारण कहना चाहिए । इसका अन्तिम समाधान करते हुए भट्टाकलंकदेव लिखते हैं-

आत्मैव स्वशक्त्या दर्शनपर्यायेणोत्पद्यते इति तस्यैव मोक्षकारणत्वं युक्तम् ।

इस उद्धरणमें भी सम्यक्त्वकी उत्पत्ति स्वयं आत्मशक्तिके बलसे ही होती है यह स्पष्ट किया गया है जो उक्त अर्थके समर्थनके लिए पर्याप्त है ।

इस प्रकार उक्त आगम प्रमाणोंके बलसे यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि जिस प्रकार विभाव पर्यायोंकी उत्पत्तिमें कालादि द्रव्योंकी पर्यायरूपसे निमित्तता होनेपर भी सर्वसाधारण निमित्त होनेसे प्रत्येक विभाव पर्यायकी उत्पत्तिमें निमित्तरूपसे उनका उल्लेख नहीं किया जाता उसी प्रकार स्वभाव पर्यायोंकी उत्पत्तिमें कालादि द्रव्योंकी पर्यायरूपसे निमित्तता होनेपर भी सर्वसाधारण निमित्त होनेसे प्रत्येक स्वभाव पर्यायोंकी उत्पत्तिमें निमित्तरूपसे उनका उल्लेख नहीं किया जाता । यही कारण है कि आगममें सभी स्वभाव पर्यायें स्व-प्रत्यय ही निर्दिष्ट की गई हैं । वस्तुतः स्वभाव पर्याय और विभाव पर्याय इनके विभाजनका मुख्य हेतु वह है जिसका निर्देश हम प्रवचनसार गाथा ९३ और उसकी पूर्वोक्त टीकामें कर आये हैं । आशय यह है कि जो पर्यायें परनिरपेक्ष अपने स्वभावका ही आश्रय लेकर उत्पन्न होती हैं वे स्वभाव पर्यायें हैं और जो पर्यायें अपनी उत्पत्तिके कालमें उत्पन्न होनेवालीं पर द्रव्यकी पर्यायोंको ( निमित्तीकृत्य ) कर्ता या करण निमित्त करके उत्पन्न होती हैं वे विभाव पर्यायें हैं । स्वभाव पर्यायोंको स्वप्रत्यय और विभाव पर्यायोंको स्व-परप्रत्यय कहनेका यही मुख्य कारण है ।

यहाँ इतना विशेष जान लेना चाहिये कि विभाव पर्यायोंमें जो विशेष निमित्त होते हैं उन्हें कर्ता निमित्त, करण निमित्त या प्रेरकनिमित्त कहनेका कारण यह नहीं है कि वे बलात् अन्य द्रव्यमें पर्यायोंको उत्पन्न करते हैं । यदि वे अन्य द्रव्यकी पर्यायोंको बलात् उत्पन्न करें तो दो द्रव्योंमें या तो एकताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा या फिर एक द्रव्यमें दो क्रियाओंका कर्तृत्व स्वीकार करना पड़ेगा जो जिनागमके विरुद्ध है । अतएव परद्रव्यमें निमित्तकी विवक्षावश कर्ता आदिका व्यवहार उपचरित ही जानना चाहिये । इस प्रकार स्वभावपर्यायें स्वप्रत्यय क्यों कहलाती हैं इसका स्पष्टीकरण करते हुए विभाव पर्यायें स्वपरप्रत्यय क्यों कही गई हैं इसका भी प्रकरण संगत स्पष्टीकरण हो जानेपर उक्त प्रकारसे पर्यायें दो ही प्रकार की हैं यह सिद्ध होता है ।

\२. पर्यायोंकी द्विविधताका विशेष खुलासा

इस प्रकार स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय पर्यायें दो ही प्रकारकी हैं ऐसा निश्चय हो जानेपर प्रकृतमें इस बातका विचार करना है कि क्या द्रव्योंकी कुछ पर्यायें ऐसी भी हैं जिनमें कालको भी निमित्तरूपसे नहीं स्वीकार किया गया है, क्योंकि अपर पक्षका कहना है कि ‘अगुरुलघुगुणके द्वारा होनेवाली द्रव्यकी षड्गुणहानि-वृद्धिरूप परिणमनोंको ही स्वप्रत्यय परिणमन बतलाया गया है ।’ इसलिए यह प्रश्न विचारणीय हो जाता है । आगे इसका विचार करते हैं-

\१. अनन्तर पूर्व अनेक आगम प्रमाण देकर हम यह तो बतला ही आये हैं कि स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय पर्यायें दो ही प्रकारकी होती हैं । संसारी जीव और पुद्गलस्कन्धोंमें जितने विभाव ( आगन्तुक ) भाव हैं वे सब स्व-परप्रत्यय पर्यायें हैं और शेष स्वप्रत्यय पर्यायें परिगणित की गई है। किन्तु ये जितनी भी पर्यायें होती हैं उन सबमें काल द्रव्य आश्रयहेतु है। तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सूत्र २२ में लिखा है-

वर्तनाद्युपकारलिंगः कालः। २३। उक्ता वर्तनादयः उपकारा यस्यार्थस्य लिंगं स कालः।

वर्तनादि उपकार जिसका लिंग है वह काल है। २३। कहे गये वर्तनादि उपकार जिस अर्थके लिंग हैं वह काल है।

इससे विदित होता है कि प्रत्येक द्रव्यकी जितनी भी पर्यायें होती हैं उन सबका सामान्य बाह्य हेतु काल है।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए हरिवंशपुराण सर्ग ६ में कहा है-

निमित्तमान्तरं तत्र योग्यता वस्तुनि स्थिता।
बहिर्निश्चयकालस्तु निश्चितस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ७॥

इन परिणामादिरूप पर्यायोंमें अन्तरंग हेतु वस्तुमें स्थित योग्यता है और बहिरंग हेतु काल है ऐसा तत्त्वदर्शियोंने निश्चित किया है॥७॥

इससे स्पष्ट विदित होता है कि आगममें जहाँ भी अगुरुलघुगुणनिमित्तक षड्गुणहानि-वृद्धिरूप पर्यायें निर्दिष्ट की गई हैं वहाँ मात्र अन्तरंग हेतुका ज्ञान करानेके लिए ही वैसा निर्देश किया गया है। उसका यह अभिप्राय नहीं है कि उनका बहिरंग हेतु निश्चय काल भी नहीं है।

जहाँ विभावकी निमित्तभूत बहिरंग सामग्री नहीं होती वहाँ बहिरंग हेतुरूपसे कालको नियमसे स्वीकार किया गया है ऐसा आगमका अभिप्राय है। किन्तु स्वभावपर्यायोंमें उसके कथनकी अविवक्षा रहती है इतना अवश्य है।

\२. आकाशका अवगाहहेतुत्व यह सामान्य गुण है। विचार यह करना है कि आकाशमें उत्पाद-व्यय कैसे घटित होता है? तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सूत्र १८ में इसका विचार किया गया है। वहाँ बतलाया है-

द्रव्यार्थिकगुणभावे पर्यायार्थिकप्राधान्यात् स्वप्रत्ययागुरुलघुगुणवृद्धि-हानिविकल्पापेक्षया अवगाहकजीव-पुद्गलपरप्रत्ययावगाहभेदविवक्षया च आकाशस्य जातत्वोपपत्तेः।

द्रव्यार्थिक नयके गौण करनेपर पर्यायार्थिक नयकी प्रधानतावश स्वप्रत्यय अगुरुलघुगुणवृद्धि-हानिरूप भेदकी विवक्षासे और जीव-पुद्गल परप्रत्यय अवगाह भेदकी विवक्षासे आकाशका उत्पाद बन जाता है।

यह ऐसा प्रमाण है जो इस बातका साची है कि ऐसा एक भी कार्य नहीं है जिसमें उभयनिमित्तताका निर्देश नहीं किया गया हो। यहाँ अवगाहभेदसे आकाशका उत्पाद बतलाते हुए उसे अगुरुलघुगुणनिमित्तक स्वप्रत्यय बतलाकर भी परप्रत्यय कैसे घटित होता है यह सिद्ध किया गया है।

\३. इसी प्रकार तत्त्वार्थवार्त्तिक अ० १ सूत्र २९ में इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए लिखा है-

एवं धर्मास्तिकायादिष्वपि अमूर्तत्वाचेतनत्वासंख्येयप्रदेशत्वगतिकारणस्वभावास्तित्वादयोऽनन्तभेदागुरुलघुगुणहानिवृद्धिविकारैः स्वप्रत्ययैः परप्रत्ययैश्च गतिकारणत्वविशेषादिभिः अविरोधिनः परस्परविरोधिनश्च विज्ञेयाः।

इसी प्रकार धर्मास्तिकायादिकमें भी स्वप्रत्यय अनन्त अगुरुलघु गुण हानि-वृद्धि विकारोंके द्वारा और परप्रत्यय गतिकारणत्वविशेषादिके द्वारा अमूर्तत्व, अचेतनत्व, असंख्येयप्रदेशत्व, गतिकारणस्वभाव और अस्तित्व आदिक अविरोधी और परस्पर विरोधी धर्म जान लेने चाहिए।

\४. अपर पक्षके सामने ये प्रमाण तो रहे ही होंगे । उसके सामने स्वामी समन्तभद्रका ‘बाह्येतरोपाधि-समग्रतेयं’ यह वचन भी रहा होगा । इसमें स्पष्ट बतलाया गया है कि लोकमें जितने भी कार्य होते हैं वे सब बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रतामें होते हैं । यह नियम वचन है जो इस नियमकी घोषणा करता है कि बाह्य और आभ्यन्तर उपकरणोंकी समग्रतामें ही सब कार्य होते हैं । अतएव जिन्हें अपर पक्ष अगुरुलघु गुणके द्वारा षड्गुणी हानिवृद्धिरूप स्वप्रत्यय परिणमन कहता है उन्हें भी बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रतामें उत्पन्न हुए जानना चाहिए । पूर्वमें हमने तत्त्वार्थवार्तिकके जो दो उद्धरण उपस्थित किये हैं उनसे भी इसी तथ्यकी पुष्टि होती है ।

\५. हरिवंशपुराण सर्ग ९ में भी ऐसा ही एक श्लोक आता है । इसमें भी प्रत्येक परिणामके प्रति अगुरुलघुत्वरूप आत्मपरिणाम और परोपाधि इन दोनोंका परिग्रह किया गया है । श्लोक इसप्रकार है-

अगुरुलघुत्वात्मपरिणामसमन्विताः ।
परोपाधिविकारित्वादनित्यास्तु कथंचन ॥७॥

\६. जो विभाव पर्यायें हैं वे भी षड्गुणी हानि-वृद्धिरूप होती हैं । इसके लिए गोम्मटसार जीवकाण्ड गाथा ३२३ से ३२९ पर दृष्टिपात कीजिए । इन गाथाओंमें श्रुतज्ञानकी षड्गुणी हानि-वृद्धिरूप पर्यायोंका निर्देश किया गया है । स्वभावपर्यायें षड्गुणी हानि-वृद्धिरूप होती हैं इसे तो अपर पक्ष भी स्वीकार करता है ।

ये कतिपय प्रमाण हैं जो इस तथ्यके साक्षी हैं कि सभी परिणाम बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रतामें ही होते हैं । अतएव अपर पक्षका अगुरुलघु गुणके द्वारा षड्गुणी हानिवृद्धिरूप परिणाम इसके अपवाद हैं ऐसा आशय व्यक्त करना आगमविरुद्ध तो है ही, तर्क और अनुभवके भी विरुद्ध है ।

उक्त कथनसे यह जानकारी तो मिलती ही है कि अविभागप्रतिच्छेदोंकी षट्स्थानपतित हानि-वृद्धिका यह कथन सब द्रव्योंसम्बन्धी पर्यायोंकी अपेक्षा किया गया है । साथ ही यह जानकारी भी मिलती है कि जहाँ पर गुणविशेषकी पर्यायोंके कथनकी विवक्षा न होकर मात्र स्वभाव पर्यायका कथन करना इष्ट होता है वहाँ वह सर्वत्र घटित हो ऐसे सामान्य लक्षणका निर्देश किया जाता है । प्रवचनसार गाथा ९३ की सूरिकृत टीकामें तथा नियमसार गाथा १४ की टीका आदिमें पर्यायोंके दो भेद करके स्वभाव पर्यायके निर्देशके प्रसंगसे यही पद्धति अपनाई गई है । यतः वहाँ स्वभावपर्यायका सामान्य लक्षण बतलाना इष्ट है और स्वभावपर्याय (स्वप्रत्यय पर्याय) विभाव की हेतुभूत बाह्य उपाधिसे रहित होती है, इसलिए वहाँ उसका निर्देश करते समय जैसे विशेषणरूपसे गुणविशेषका उल्लेख नहीं किया गया है उसी प्रकार विशेषण-रूपसे बाह्य उपाधिका भी उल्लेख नहीं किया गया है । इसी प्रकार सर्वत्र जान लेना चाहिये । किन्तु पर्यायके इस सामान्य लक्षणमें रूपादि, ज्ञानादि या गतिहेतुत्वादि जिस गुणको विशेषणरूपसे उल्लिखित कर दिया जायगा वहाँ वह उस उस गुणकी स्वभाव पर्याय हो जायगी । और यदि इसके साथ पर प्रत्ययरूप उपाधिका उल्लेख कर दिया जायगा तो वह उस उस गुणकी विभाव पर्याय कहलाएगी । इस तथ्यको विशेषरूपसे समझनेके लिए प्रवचनसार गाथा ९३ की टीका हृदयङ्गम करने योग्य है ।

प्रत्येक द्रव्यके परिणाम दो ही प्रकारके होते हैं इसका समर्थन अष्टसहस्री पृ० ५४ के इस वचनसे भी होता है ।

द्विविधो ह्यात्मनः परिणाम :-स्वाभाविक आगन्तुकश्च । तत्र स्वाभाविकोऽनन्तज्ञानादिरात्मस्वरूपत्वात् । मलः पुनरज्ञानादिरागन्तुकः, कर्मोदयनिमित्तकत्वात् ।

आत्माका परिणाम दो प्रकारका है-(१) स्वाभाविक (२) आगन्तुक । इनमें आत्मस्वरूप होनेसे अनन्त ज्ञानादि स्वाभाविक परिणमन है और कर्मोदय निमित्तक अज्ञानादि दोष आगन्तुक परिणमन है ।

इस प्रकार पर्यायें दो ही प्रकारकी होती हैं इसका समर्थन समग्र जैन वाङ्मय करता है । जिन तीसरे प्रकारकी पर्यायोंका उल्लेख अपर पक्षने किया है वास्तवमें वह उसका पूरे जैनागमको सम्यक् प्रकारसे ध्यानमें न लेनेका ही फल है ।

\३. उपाधिके सम्बन्धमें विशेष खुलासा

यहाँ प्रकरण संगत होनेसे थोड़ा उपाधिके सम्बन्धमें स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक प्रतीत होता है । एक ऐसी ध्वजा लीजिये जो वायुसे संयोग कर रही है और एक दूसरा ऐसा पत्थर लीजिए जो वायुसे संयोग नहीं कर रहा है । देखने पर विदित होगा कि जिसके साथ वायुके संयोगरूप उपाधि लगी हुई है वह स्वयं वायुके ईरणरूप गुणकी योग्यतावाली होनेसे ईरण परिणाम परिणत वायुके संयोगको निमित्त कर स्वयं तदनुरूप लहराने लगती है और दूसरा पत्थर जो कि अपनेमें ईरण गुणका अभाव होनेसे वायुसे संयोग नहीं कर रहा है, उपाधिरहित होनेके कारण स्थिर बना रहता है अर्थात् नहीं लहराता है । किन्तु यहाँ ध्वजा और पत्थरके इन दोनों प्रकारके परिणमनोंमें कालद्रव्यकी निमित्तता है, अवगाहनमें आकाश द्रव्यकी निमित्तता है तथा ध्वजाके फहरानेमें धर्मद्रव्यकी निमित्तता है और पत्थरके स्थिर रहनेमें अधर्म द्रव्यकी निमित्तता है तथापि इन काल आदि द्रव्योंके रहनेपर भी इनको निमित्त कर उन दोमेंसे किसीमें भी सोपाधिपना दृष्टिगोचर नहीं होता । इससे स्पष्ट विदित होता है कि साधारण निमित्त विशेष उपाधि संज्ञाको न प्राप्त होनेके कारण इनकी अपेक्षा स्वभाव पर्यायोंको सोपाधि कहना उपयुक्त नहीं है । अतः पर्यायें दो ही प्रकारकी होती हैं-एक स्वप्रत्यय या स्वभाव पर्यायें और दूसरी स्व-परप्रत्यय या विभाव पर्यायें । इनके सिवाय जिनके होनेमें साधारण निमित्त भी नहीं हैं ऐसी कोई तीसरे प्रकारकी पर्यायें होती हों ऐसा जिनागमका अभिप्राय नहीं है ।

\४. गाथाओंका अर्थपरिवर्त्तन

यह तो मानी हुई बात है कि जो भी परिणमन होता है वह ‘स्व’ में होता है, ‘स्व’ के द्वारा होता है और वह स्वयं कर्ता बनकर स्वतन्त्ररूपसे उस परिणमनको करता है, क्योंकि कर्ताका ‘स्वतन्त्रः कर्ता’ यह लक्षण उसमें तभी घटित होता है । इतना अवश्य है कि यदि वह सोपाधि परिणमनको करता है तो वहाँ उस उपाधिका भी निर्देश किया जायगा । समयसार गाथा ११६ से लेकर १० गाथाओं द्वारा प्रत्येक द्रव्यके इसी परिणमन स्वभावकी सिद्धि की गई है । किन्तु प्रतिशंका ३ में अपने अभिप्रायकी पुष्टिके लिए उनमेंसे कतिपय गाथाओंके अर्थमें परिवर्तन किया गया है । आगे हम यही स्पष्ट करके बतलानेवाले हैं कि उन गाथाओं और उनके टीका वचनोंमें जो अर्थवरिवर्तनका उपक्रम किया गया है उसकी पुष्टि उन गाथाओं और उनके टीका वचनोंसे कथमपि नहीं होती । वे गाथा ११८ और १२३ हैं । ११८ गाथा इस प्रकार है-

जीवो परिणामयदे पुग्गलदव्वाणि कम्मभावेण ।
ते सयमपरिणमंते कहं णु परिणामयदि चेदा ॥११८॥

जीव यदि पुद्गल द्रव्योंको कर्मरूपसे परिणमाता है तो स्वयं कर्मरूपसे न परिणमन करते हुए उनको चेतन जीव कैसे परिणमाता है ॥११८॥

यह इस गाथाका शब्दार्थ है । इसके प्रकाशमें प्रतिशंका ३ में किये गये इसके अर्थको पढ़िये-

'जीव यदि पुद्गल द्रव्यको कर्मभावसे परिणत कराता है तो उस पुद्गल द्रव्यमें निजकी परिणत होनेकी योग्यताके अभावमें जीव द्रव्य उसको कैसे ( कर्मरूप ) परिणत करा सकता है ।

गाथा ११६ से १२० तककी गाथाओंका एक पंचक है । उनमेंसे बीचकी ११८ संख्याकी गाथा लेकर और उसका अर्थ बदलकर उसके द्वारा प्रतिशंका ३ में अपने अभिप्रायकी पुष्टि करनेका प्रयत्न किया गया है । उक्त गाथाके तीसरे पादमें ‘ते सयमपरिणमंते’ पद है । इसका अर्थ होता है ‘स्वयं नहीं परिणमनेवाले उनको ।’ किन्तु प्रतिशंका ३ में इसका अर्थ किया गया है-‘उस पुद्गल द्रव्यमें निजकी परिणत होनेकी योग्यताके अभावमें जीव द्रव्य उसको ।’

इसी प्रकार गाथा १२३ के ‘तं सयमपरिणमंतं’ पदके अर्थमें तथा गाथा ११८ की आत्मख्याति टीकाके ‘न तावत् तत्स्वयमपरिणममानं परेण परिणामयितुं पार्येत’ इस वचनको उद्धृत कर इसके ‘न तावत् स्वयमपरिणममानं’ पदके अर्थमें भी परिवर्तन किया गया है ।

गाथा ११६ से लेकर १२५ तककी गाथाओं द्वारा पुद्गल और जीवका स्वयं कर्ता होकर परिणामोपना सिद्ध किया गया है । उसी अर्थकी पुष्टिमें उक्त दो गाथायें और उनका टीका वचन आया है । इन द्वारा यह बतलाया गया है कि जीव और पुद्गलमें जो-जो परिणाम ( पर्याय ) होते हैं उनको वे स्वयं स्वतन्त्ररूपसे कर्ता बनकर करते हैं । किन्तु प्रतिशंका ३ में इस अभिप्रायको तिलाञ्जलि देकर उक्त प्रमाणों द्वारा यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है कि जीव और पुद्गलमें मात्र परिणमनेकी योग्यता होती है । स्वयं परिणमना उनका अपना कार्य नहीं, उन्हें परिणमाना उपाधिका कार्य है । यदि उक्त गाथाओं और उनके टीका वचनोंका यही अर्थ होता तो उन गाथाओंकी उक्त टीकामें जो यह कहा गया है कि-‘स्वयं परिणममानं तु न परं परिणमयितारमपेक्षेत । न हि वस्तुशक्तयः परमपेक्षन्ते ।’-‘स्वयं परिणमनेवाला तो परिणमानेवाले दूसरेकी अपेक्षा करता नहीं, क्योंकि वस्तुशक्तियाँ दूसरेकी अपेक्षा नहीं करतीं ।’ सो इसके कहनेकी क्या आवश्यकता थी । इससे सिद्ध है कि प्रतिशंका ३ में अपर पक्षने उक्त गाथाओं और उनके टीका वचनका जो अर्थ किया है वह समीचीन नहीं है ।

आगे प्रतिशंका ३ में तत्त्वार्थवार्तिक और सर्वार्थसिद्धि अ० ५ सू० ७ के आधारसे जो यह लिखा है कि ‘यदि मनुष्य, पशु, पक्षी आदिकी सद्भूत गति आदि निमित्तोंकी सहायता पूर्वक उत्पन्न होनेसे उन परिणामोंकी धर्मादि द्रव्योंमें सद्भूतता ही मानने योग्य है, अन्यथा यदि धर्मादि द्रव्योंके गतिहेतुत्वादि गुणोंमें कूटस्थता आ जानेसे फिर धर्मादि द्रव्य उपर्युक्त मनुष्य, पशु, पक्षी आदिकी भिन्न-भिन्न गति आदिमें सहायक नहीं हो सकेंगे ।’

सो इस सम्बन्धमें इतना ही कहना है कि मनुष्य, पशु, पक्षी आदिकी जो गति हो रही है वह सद्भूत है इसमें संदेह नहीं । इसी प्रकार धर्मादि द्रव्योंमें जो प्रति समय परिणमन हो रहा है वह भी सद्भूत है, इसमें भी संदेह नहीं । इन्हें हमने कहीं असद्भूत कहा भी नहीं है । ये असद्भूत हैं भी नहीं । तथा इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य स्वभावसे पर्यायकी अपेक्षा परिणमनशील होनेके कारण प्रतिसमय अपने उत्पादस्वभावके कारण पर्यायरूपसे उत्पन्न होता है, व्ययस्वभावके कारण पर्यायरूपसे व्ययको प्राप्त होता है और ध्रौव्य स्वभावके कारण द्रव्यरूपसे न उत्पन्न होता है और न व्ययको ही प्राप्त होता हैं । ऐसी वस्तु व्यवस्था है, फिर भी एक पर्यायसे दूसरी पर्यायमें जो अन्तर प्रतीत होता है वह अन्तर दूसरेके संयोग करनेका परिणाम ( फल ) होनेके कारण अलग-अलग प्रत्येक पर्यायमें उपाधिको भी स्वीकार किया गया है इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए अष्टसहस्री पृ० ११२ में कहा भी है-

विस्रसा परिणामिनः कारणान्तरानपेक्षोत्पादादित्रयव्यवस्थानात्, तद्विशेषे एव हेतुव्यापारोपगमात्।

विस्रसा ( स्वभावसे ) परिणमनशील द्रव्यका दूसरे कारणोंकी अपेक्षा किये विना उत्पादादित्रयकी व्यवस्था है, प्रत्येक समयमें होनेवाली पर्याय विशेषमें ही हेतुका व्यापार स्वीकार किया है।

इस प्रकार यह निश्चित होता है कि प्रत्येक द्रव्यमें उत्पादादित्रय स्वभावसे होते हैं उनमें कारणान्तरों की अपेक्षा नहीं होती, अन्यथा वह द्रव्यका स्वभाव नहीं माना जा सकता। फिर भी एक समयकी पर्यायसे जो दूसरे समयकी पर्यायमें भेद होता है सो उस भिन्न पर्यायको उत्पन्न तो करता है स्वयं द्रव्य ही, किन्तु उस पर्यायको उत्पन्न करते समय अन्य द्रव्यकी जिस पर्यायको उपाधि बनाकर वह उस पर्यायको उत्पन्न करता है उस ( उपाधि ) में निमित्तपनेका व्यवहार होनेके कारण उसकी सहायतासे उसने उस पर्यायको उत्पन्न किया यह व्यवहार किया जाता है। इस व्यवहारको उपचरित माननेका यही कारण है। इसलिए ऐसे व्यवहारको उपचरित माननेसे न तो किसी द्रव्यमें कूटस्थता आती है, न अन्य द्रव्यकी जिस पर्यायमें निमित्त व्यवहार किया गया है वह असद्भूत ठहरती है और न ही विवक्षित द्रव्यमें जो कार्य हुआ है वह भी असद्भूत ठहरता है। ऐसा होने पर भी निमित्त व्यवहार असद्भूत है ऐसा माननेमें कोई बाधा भी नहीं आती।

प्रतिशंका ३ में ज्ञानके उपयोगाकार परिणमनको दृष्टान्तरूपमें उपस्थित कर ज्ञेयभूत पदार्थोंको उसका निमित्त बतलाया गया है सो इन ज्ञेयभूत पदार्थोंको प्रकृतमें ज्ञापक निमित्तोंके रूपमें स्वीकार किया गया है या कारक निमित्तोंके रूपमें यह प्रतिशंका ३ में स्पष्ट नहीं किया गया है। वैसे जिस अभिप्रायकी पुष्टिमें उपयोगाकार परिणमनको उल्लिखित किया है उससे तो ऐसा ही विदित होता है कि प्रतिशंका ३ में ज्ञेयभूत पदार्थोंको उपयोगाकार परिणमनके कारकनिमित्तरूपसे ही स्वीकार किया गया है और इस प्रकार बौद्धमतका अनुसरणकर उपयोगाकार परिणमनकी उत्पत्ति ज्ञेयोंके आश्रित स्वीकार की गई है। किन्तु यदि अपर पक्षकी यही मान्यता है तो उसे आगमसम्मत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आगम ( तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक आ० १ सू० १४ ) में निमित्त दो प्रकारके बतलाये हैं-ज्ञापक और कारक। ज्ञेयभूत पदार्थ उपयोगके ज्ञापक निमित्त हैं, कारक निमित्त नहीं। अतएव प्रकृतमें यह उदाहरण लागू नहीं होता ऐसा यहाँ समझना चाहिए।

समतुलाका खुलासा करते हुए प्रतिशंका ३ में जो यह भाव व्यक्त किया गया है कि ‘स्व-परप्रत्यय परिणमनमें उपादानभूत और निमित्तभूत वस्तुओंमें विद्यमान कारणभावकी परस्पर विलक्षणता रहते हुए भी कार्योत्पत्तिमें दोनोंकी समान अपेक्षा होती है।’ सो प्रकृतमें यही विचारणीय है कि उपादानसे विलक्षण निमित्तरूपसे स्वीकृत उनमें रहनेवाली वह कारणता क्या वस्तु है जो उनमें पाई जाती है। यदि उनकी उस रूपसे कार्यके साथ बाह्य व्याप्तिका होना इसीमें कारणताका व्यवहार किया जाता है तो यह जिनागममें स्वीकृत है। इसके सिवाय अन्य किसी प्रकारकी यथार्थ कारणता उनमें बन नहीं सकती, क्योंकि कार्य पृथक् द्रव्यका परिणाम है और जिनमें उस कार्यकी अपेक्षा निमित्त व्यवहार हुआ है वे उससे सर्वथा भिन्न हैं। इन दोनोंमें परस्पर अत्यन्ताभाव है। जो कार्यका स्वचतुष्टय है उसका निमित्त व्यवहारके योग्य अन्य द्रव्योंमें अत्यन्ताभाव है और उनका अर्थात् निमित्त व्यवहारके योग्य अन्य द्रव्योंका जो स्वचतुष्टय है उसका कार्य द्रव्यमें अत्यन्ताभाव है। ऐसी अवस्थामें एकमें कार्य धर्म रहे और उसका कारण धर्म दूसरेमें रहे यह कैसे हो सकता है अर्थात् त्रिकालमें नहीं हो सकता। इसलिए वास्तविक कारणताकी अपेक्षासे दोनोंको समतुलामें नहीं बिठाया जा सकता। यही कारण है कि उपादानमें कारणता परमार्थभूत स्वीकार की गई है वह स्वरूपसे स्वतःसिद्ध उपादान है और जिनमें निमित्तव्यवहार किया जाता है उनमें वह कारणता उपचरित है, क्योंकि वे स्वरूपसे स्वतःसिद्ध परद्रव्यके कार्यके कारण नहीं हैं। अतएव दोनोंमें कारणताको यथार्थ माननेका आग्रह करना उचित नहीं है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।

यह लिखना कि ‘कार्योत्पादनमें निमित्त और उपादान दोनों ही एक दूसरेका मुख ताकनेवाले हैं’ अति साहसकी बात है । विचारकर देखा जाय तो यह ऐसा साहसपूर्ण कथन है जो द्रव्यके लक्षण पर ही सीधा प्रहार करता है । ऐसा मानने पर तो किसी भी वस्तुका स्वरूप स्वतःसिद्ध नहीं बनता है । वस्तुके स्वरूपका विवेचन करते हुए पंचाध्यायीमें लिखा है-

तत्त्वं सल्लाक्षणिकं सन्मात्रं वा यतः स्वतःसिद्धम् ।
तस्मादनादिनिधनं स्वसहायं निर्विकल्पं च ॥८॥

जिस दर्शनमें वस्तुका वस्तुत्व हो प्रतिसमय अर्थक्रियाकारित्व माना गया हो उस दर्शन पर ऐसी बात लादना आश्चर्य ही नहीं महान् आश्चर्य है । कोई ऐसा क्षण नहीं जब प्रत्येक द्रव्य अपना कार्य न करता हो और कोई ऐसा क्षण नहीं जब उपाधि योग्य अन्य द्रव्यका योग न मिलता हो । यह सहज योग है । इसे मिथ्या विकल्पों द्वारा बदला नहीं जा सकता । ऐसा स्वीकार कर लेने पर किसीको किसीके पीछे नहीं चलना है और न किसीको किसीका मुँह ही ताकना है । सब अपनी-अपनी स्थितिमें रहते हुए परस्परकी अपेक्षासे अपने-अपने योग्य उचित व्यवहारके अधिकारी होते हैं। कार्यसे सर्वथा भिन्न पर द्रव्यकी पर्यायमें कर्ता आदि व्यवहार करनेकी उपपत्तिका निर्देश करते हुए पंडितप्रवर आशाधरजी अनगारधर्मामृत अ० १ में लिखते हैं-

कर्त्राद्या वस्तुनो भिन्ना येन निश्चयसिद्धये ।
साध्यन्ते व्यवहारोऽसौ निश्चयस्तदभेददृक् ॥१२०॥

जिसके द्वारा निश्चयकी सिद्धिके लिए कर्ता आदिक वस्तुसे भिन्न साधे जाते हैं वह व्यवहार है और कर्ता आदिकको वस्तुसे अभिन्न जाननेवाला निश्चय है ॥१२०॥

इस प्रकार विवक्षित पर्याययुक्त अन्य द्रव्यमें निमित्त व्यवहार क्यों किया जाता है और उसमें भी कर्ता आदिरूप व्यवहार करनेका क्या प्रयोजन है यह आगमानुसार सम्यक् प्रकारसे ज्ञात हो जानेपर न तो उपादान और निमित्त इनमेंसे किसीको परमुखापेक्षी माननेकी आवश्यकता है और न ही किसीको किसीके पीछे लगनेकी आवश्यकता है । अपने-अपने उपादानके अनुसार प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें विवक्षित कार्यरूपसे परिणमते हैं और उस उस कार्यमें निमित्त व्यवहारके योग्य अन्य द्रव्योंकी प्रत्येक समयकी पर्यायें निमित्त व्यवहारको प्राप्त होती रहती हैं । ऐसी कार्यकारणपरम्पराके अनुसार वस्तुमर्यादा है और इसीलिए उनमें यथायोग्य उपादान-उपादेय व्यवहार और निमित्तनैमित्तिक व्यवहार प्रत्येक कालमें बनता रहता है । स्वामी समन्तभद्रने ‘बाह्येतरोपाधि’ ( स्व० स्तो०, श्लोक ६० ) इत्यादि श्लोक इसी अभिप्रायसे निबद्ध किया है । सभी कार्योंमें बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रताका होना द्रव्यगत स्वभाव है यह व्यवस्था भी तभी बनती है जब पूर्वोक्त कथनको पूरी तरह स्वीकार कर लिया जाता है । प्रकृतमें हमें इस बातका आश्चर्य होता है कि एक ओर तो प्रतिशंका ३ में प्रत्येक कार्यके प्रति निमित्तोंका व्यापार इसलिए आवश्यक बतलाया जाता है कि उसे न स्वीकार किया जायगा तो धर्मादि द्रव्योंमें कूटस्थता आ जायगी और दूसरी ओर अनन्त अगुरुलघुगुणोंकी षट्गुणी हानि-वृद्धिरूप प्रत्येक समयके कार्यको बाह्य उपाधिके बिना केवल आभ्यन्तर उपाधिजन्य स्वीकार करके भी उसमें कूटस्थता नहीं मानी जाती है और फिर आश्चर्य इस बातका होता है कि ऐसा स्वीकार करनेपर भी अपर पक्ष ‘बाह्येतरोपाधि’ की समग्रताके सिद्धान्तको भी खण्डित नहीं मानता। हमारे ख्यालसे अपर पक्षके द्वारा प्रस्थापित यह नया मत ही इस तथ्यकी घोषणा करता है कि उपादान स्वयं स्वतन्त्ररूपसे अपने कार्यको करता है तथापि विवक्षित परद्रव्यकी पर्याय उसकी प्रसिद्धिका हेतु है, इसलिए उपचारसे उसकी भी कारक साकल्यमें परिगणना की गई है।

आचार्य अमृतचन्द्रने जो ‘न जातु रागादिनिमित्तभावं’ इत्यादि कलश लिखा है उसमें ‘संग’ पद ध्यान देने योग्य है। यह शब्द ही इस मान्यताका खण्डन करता है कि अन्यमें तद्भिन्नकी कार्यकरण शक्ति वस्तुतः होती है। आचार्यवर्य इस द्वारा यह बतला रहे हैं कि इस जीवने अनादिसे ‘परके द्वारा हिताहित होगा’ ऐसा मानकर जो अपने विकल्प द्वारा परका संग किया है वही विकल्प इसके संसारी बने रहनेका मुख्य कारण है। वे कहते हैं कि ‘स्व’ का संग तो अनपायी है, वह अपराध नहीं है। अपराध यदि है तो परका संग करना ही है। परमें निमित्त व्यवहार होनेका यही कारण है। आप्तपरीक्षा पृ० ४४-४५ में आचार्य विद्यानन्दीने बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिरूप सामग्रीके साथ या एकदेशरूप सामग्रीके साथ जो कार्यका अन्वय-व्यतिरेक बतलाया है वह ठीक ही बतलाया है, क्योंकि जिस प्रकार आभ्यन्तर उपाधिके साथ कार्यकी आभ्यन्तर व्याप्ति उपलब्ध होती है उसी प्रकार बाह्य उपाधिके साथ भी कार्यकी बाह्य व्याप्ति जिनागममें स्वीकार की गई है। बाह्य उपाधिके साथ कार्यकी बाह्य व्याप्तिका उपलब्ध होना ही तो इस तथ्यका गमक है कि इस कार्यका कोई यथार्थ उपादान अवश्य है जिसने स्वयं स्वतन्त्र रूपसे कर्ता, करण और आश्रय आदि बनकर परिणामस्वभावी होनेसे इस कार्यको उत्पन्न किया है। स्पष्ट है कि जिनागममें जो निमित्त-उपादानकी स्वीकृति है और उनकी कार्यके प्रति जो बाह्य-आभ्यन्तर व्याप्ति बतलाई है वह भिन्न-भिन्न प्रयोजनसे ही बतलाई है, अतएव उसे सम्यक् प्रकारसे जानकर उसका उसी रूपमें व्याख्यान होना चाहिए, तभी वह व्याख्यान यथार्थ माना जा सकता है।

रही लोककी बात सो जो चतुर जानकार होता है वह संयोग कालमें होनेवाले कार्योंमें बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारकी उपाधिका विचार करता है, कल्पनाकी तरंगोंके आधारसे कार्यकारण परम्पराका विचार करनेवाले पुरुषोंकी बात निराली है। आगममें दोनोंकी मर्यादाका निर्देश किया है, अन्वय-व्यतिरेकके नियमसे इसीका परिज्ञान होता है। किन्तु जो बाह्य सामग्रीकी विकलताको देखकर यह अनुमान करता है कि केवल बाह्य सामग्रीके अभावमें यह कार्य नहीं हो रहा है और उस समय उपादान शक्तिकी जो विकलता है उसे नहीं अनुभवता उसका वैसा अनुमान करना ठीक नहीं है। इसलिए प्रकृतमें यही निर्णय करना चाहिए कि जिस समय प्रत्येक द्रव्य निश्चय उपादान होकर अपने कार्यके सन्मुख होता है उस समय निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीका सद्भाव नियमसे होता है। यही जिनागम है और यही मानना परमार्थ सत्य है।

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शंका १२, प्रथम दौर: शंका १२ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६५२

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प्रथम दौर

: १ :

शंका १२

कुगुरु, कुदेव, कुशास्त्रकी श्रद्धाके समान सुदेव, सुशास्त्र, सुगुरुकी श्रद्धा भी मिथ्यात्व है, क्या ऐसा मानना या कहना शास्त्रोक्त है ?

समाधान १

कुगुरु, कुदेव, कुशास्त्रको श्रद्धा गृहीत मिथ्यात्व है तथा सुदेव, सुशास्त्र, सुगुरुकी श्रद्धा व्यवहार-सम्यग्दर्शन है । इसो तथ्यको स्पष्ट करते हुए श्री नियमसारजीमें कहा है-

अत्तागमतच्चाणं सद्दहणादो हवेइ सम्मत्तं ॥५॥

अर्थ-आप्त, आगम और तत्त्वोंकी श्रद्धासे 'सम्यक्त्व होता है ।

उसकी टीकामें स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है-

व्यवहारसम्यक्त्वस्वरूपाख्यानमेतत् ।

यह व्यवहार सम्यक्त्वके स्वरूपका कथन है ।

सम्यग्दृष्टिके ऐसी श्रद्धा अवश्य होती है और वह ऐसे कथनको शास्त्रोक्त मानता है ।

शंका १३, प्रथम दौर: शंका १३ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६५३ से ६५४

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प्रथम दौर

: १ :

शंका १३

पुण्यका फल जब अरहंत तक होना कहा गया है ( पुण्यफला अरहंता प्र० सा० ) और जिससे यह आत्मा तीन लोकका अधिपति बनता है उसे ‘सर्वातिशायि’ पुण्य बतलाया है ( सर्वातिशायि पुण्यं तत् त्रैलोक्याधिपतित्वकृत् ) । तब ऐसे पुण्यको हीनोपमा देकर त्याज्य कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?

समाधान १

यह तो सुविदित सत्य है कि सर्वत्र प्रयोजनके अनुसार उपदेश दिया जाता है । ऐसी उपदेश देनेकी पद्धति है । पुण्य-पापका आस्रव-बन्ध पदार्थोंमें अन्तर्भाव होता है और ये दोनों पदार्थ अजीव पदार्थके साथ संसारके कारण हैं । इसलिये भगवान् कुंदकुंदने हेतु, स्वभाव, अनुभव और आश्रयके भेदसे पुण्य और पापमें भेद होनेपर भी द्रव्यार्थिकनयसे उनमें अभेद बतलाते हुए उन्हें संसारका कारण कहा है । वे कहते हैं-

कम्ममसुहं कुसीलं सुहकम्मं चावि जाणह सुसीलं ।
कह तं होदि सुसीलं जं संसारं पवेसेदि ॥१४५॥

अर्थ :-अशुभ कर्म कुशील है और शुभ कर्म सुशील है ऐसा तुम जानते हो, किन्तु वह सुशील कैसे हो सकता है जो शुभकर्म ( जीवको ) संसारमें प्रवेश कराता है ॥१४५॥

आचार्य महाराज इस विषयमें इतना ही कहना पर्याप्त न मानकर उसे आत्माकी स्वाधीनताका नाश करनेवाला तक बतलाते हैं । वे कहते हैं-

तम्हा दु कुसीलेहिं य रायं मा कुणह मा व संसग्गं ।
साहीणो हि विणासो कुसीलसंसग्गरायेण ॥१४७॥

अर्थ :-इसलिये इन दोनों कुशीलोंके साथ राग मत करो अथवा संसर्ग भी मत करो, क्योंकि कुशीलके साथ संसर्ग और राग करनेसे स्वाधीनताका नाश होता है ॥१४७॥

अशुभ कर्मका फल किसीको इष्ट नहीं है, इसलिये उसकी इच्छा तो किसीको नहीं होती । किन्तु पुण्य कर्मके फलका प्रलोभन छूटना बड़ा कठिन है, इसलिए प्रत्येक भव्य प्राणीको मोक्षमार्गमें रुचि उत्पन्न हो और पुण्य तथा पुण्यके फलमें ही अटक न जाय इस अभिप्रायसे सभी आचार्य उसकी निन्दा करते आ रहे हैं । इसी अभिप्रायको ध्यानमें रखकर पं० प्रवर द्यानतरायजीने दशलक्षणधर्म पूजामें स्त्रीको विषवेलकी उपमा दी है । इसका अभिप्राय यह नहीं कि वे परम पुण्यशालिनी तीर्थंकरकी माता अथवा ब्राह्मी, सुन्दरी, सीता, राजुल, चन्दना आदि जगत्पूजनीय सती साध्वी स्त्रियोंकी निन्दा करना चाहते हैं । इसी प्रकार अशुचि भावनामें शरीर-भोगोंके प्रति अरुचि उत्पन्न करनेके अभिप्रायसे यदि शरीरको घिन उत्पन्न करनेवाले अपने नौ द्वारोंसे मल-मूत्र आदि मलोंको बहानेवाला कहा गया है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उस द्वारा १००८ सुलक्षणोंके धारी उत्तम संहननवाले जगत्पूज्य तीर्थंकरके शरीरकी निन्दा की गई है।

स्पष्ट है कि जहाँ जो उपदेश जिस अभिप्रायसे दिया गया हो वहाँ उस अभिप्रायसे उसे शास्त्रोक्त मानना चाहिये।

शंका १३, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६५४ से ६६०

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका १३

प्रश्न था कि पुण्यका फल जब अर्हन्त होना तक कहा गया है ( ‘पुण्यफला अरहंता’ प्र० सा० ) और जिससे यह आत्मा तीन लोकका अधिपति बनता है, उसे सर्वातिशायी पुण्य बतलाया है ( सर्वातिशायि पुण्यं तत् त्रैलोक्याधिपतित्वकृत् ) तब ऐसे पुण्यको हीनोपमा देकर त्याज्य कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?

प्रतिशंका २

हमारा यह प्रश्न हेतुगर्भित था 'पुण्य क्यों ग्राह्य है ?-‘त्याज्य क्यों नहीं है ?’ इस बातको सिद्ध करनेके लिये हमारे प्रश्नमें दो शास्त्रीय वाक्योंके साथ सुन्दर हेतु भी उसी प्रश्नमें यथास्थान विद्यमान है । आप यदि उनपर निष्पक्षभावसे दृष्टिपात करते तो पुण्यके महत्त्व और उसकी उपयोगिताको अवश्य निःसंकोच स्वीकार करते। आपने ऐसा नहीं किया।

संसारी भव्य प्राणी, जोकि यथार्थमें अपना हितैषी है, उसका उद्देश्य सदा यही रहता है कि मैं अरहंत पद प्राप्त करके जगत्का उद्धार करूँ और मुक्ति प्राप्त कर स्वयं सर्वोच्च-नित्य-अव्याबाध सुखी, पूर्ण ज्ञातादृष्टा बनूँ । बुद्धिमान् भव्य प्राणीका यह पुनीत उद्देश्य पुण्य क्रियाओं द्वारा ही सिद्ध हुआ करता है। यह एक निर्विवाद सर्वशास्त्रसंमत बात है; इसी बातको हमारे सर्वोच्च आध्यात्मिक आचार्य श्रीकुन्दकुन्दने सर्वमान्य ग्रन्थ प्रवचनसारमें ‘पुण्यफला अरहंता’ आदि ४५ वीं गाथा द्वारा स्पष्ट एवं समर्थित किया है । कुन्दकुद आचार्यके प्रत्येक भक्तको निष्पक्ष भाव एवं शुद्धभावसे उस उल्लेखकी उपेक्षा नहीं करना चाहिये।

आपने उत्तर देते समय आध्यात्मिक आचार्यके उक्त स्पष्ट संकेतपर दृष्टिपात नहीं किया और न उसपर अपना अभिमत ही प्रकट किया। यह स्वयं एक चिन्तनीय वार्ता है जो कि वीतराग चर्चाका एक विशेष अंग है। हमारे लिये आर्ष वाक्य ही तो पथप्रदर्शक हैं उनके अवलम्बनसे ही हमको सिद्धान्तनिर्णय करना है।

आपने अपने लेखमें उत्तर देते हुए प्रारम्भमें जो यह लिखा है कि ‘सर्वत्र प्रयोजनके अनुसार उपदेश दिया जाता है, ऐसी उपदेश देनेकी पद्धति है।’ हम इसे हृदयसे स्वीकार करते हैं, परन्तु आप अपनी इस मान्यता पर ही गंभीरतासे विचार कर प्रकाश डालें कि जो बात चतुर्थ कालमें भी ग्राह्य थी वह वर्तमान अवनत युगमें अग्राह्य या त्याज्य कैसे हो गई ? जिससे पुण्यको त्याज्य बतलानेकी आवश्यकता आज प्रतीत होने लगी। मानवोचित कर्त्तव्यसे प्रायः विमुख आज-कलकी जनताके लिए तो पुण्याचरणकी मोक्षगमनके योग्य चतुर्थकालकी अपेक्षा और भी अधिक आवश्यकता है।

जिस कालमें तीर्थंकर, सामान्य केवली तथा चरमशरीरी महर्षियोंका समागम सुलभ था, उस चतुर्थकालमें वे आत्मशुद्धिके लिए जनसाधारणको अपने अध्यात्मिक प्रवचनमें पुण्य आचरण करनेका उपदेश देते थे, जिससे प्रभावित होकर चक्रवर्ती सम्राट् तक उसे शिरोधार्य करके महाव्रती पुण्याचरण करते हुए अपना मनुष्यभव सफल किया करते थे, शुभभावमय पुण्य चारित्रका अवलम्बन लेकर महान् बहिरङ्ग अन्तरङ्ग तपश्चरण करते हुए शुद्धभाव पाकर मुक्ति प्राप्त किया करते थे, भरतचक्रवर्ती, बाहुबली आदिकी पुण्यचर्या सर्वविदित है। ‘तब मुक्ति प्राप्तिके लिए शारीरिक तथा मानसिक क्षमताके अयोग्य निकृष्ट पञ्चमकालमें उस परस्परा मोक्षदायक पुण्यभावका उपदेश त्याज्य हो’ यह एक महान् आश्चर्यजनक बात इसलिये भी है कि आजके प्राणीके लिए आत्मकल्याणार्थ सिवाय पुण्याचरणके अन्य कोई मार्ग अवशिष्ट नहीं, तथा च आजका सर्वोच्च कोटिका आध्यात्मिक उपदेष्टा भी, स्वयं न तो पुण्य कर्मके शुभफलको त्याग सकता है, न वह पुण्याचरणके सिवाय अन्य कोई उच्चकोटिका शुद्धोपयोगी आचरण कर सकता है और न वह आत्महितके लिए पुण्यबन्धके सिवाय अन्य कुछ ( सर्व कर्मविध्वंस ) कर सकता है। तब बतलाइये कि यदि वह दूसरोंको पुण्याचरण त्याग देनेका उपदेश दे तो उसका उपदेश आज कलकी पात्रताके अनुसार क्या उचित माना जाता है ? क्या आजके श्रोताकी पात्रता चतुर्थकालसे भी उच्च है ?

इन बड़े टाईपमें मुद्रित वाक्योंपर निष्पक्ष स्पष्ट प्रकाश डालेंगे ऐसी वाञ्छनीय आशा है।

आपने जो अपने पक्ष पोषणमें समयसार ग्रन्थकी १४५ वीं गाथा उपस्थित की है, उस गाथाके रहस्य को स्पष्ट बतलानेवाली श्री अमृतचन्द्र सूरिकी टीकाको देखनेका भी यदि आप कष्ट करते तो आशा है पुण्यपोषक इस पद्यका उल्लेख करनेका प्रयास आप कभी न करते। टीकाकारने शुभ-अशुभ भावके अनेक विकल्प करके अन्तिम वाक्य जो लिखा है वह मननीय है । टीककार ऋषि लिखते हैं-

शुभाशुभौ मोक्ष-बन्धमार्गौ तु प्रत्येकं केवलजीवपुद्गलमयत्वादनेकौ तदनेकत्वे सत्यपि केवलपुद्गलमयबन्धमार्गाश्रितत्वेनाश्रयाभेदादेकं कर्म।

अर्थ-शुभ तथा अशुभ ( क्रमशः ) मोक्षका और बन्धका मार्गरूप है ( अर्थात् शुभ मोक्षका मार्ग है जब कि अशुभ बन्धका मार्ग है )। अतः दोनों पृथक् हैं, किन्तु केवल जीवमय तो मोक्षका मार्ग है और केवल पुद्गलमय बन्धका मार्ग है। वे अनेक हैं एक नहीं हैं, उनके एक न होने पर भी केवल पुद्गलमय बन्धमार्गकी आश्रितताके कारण आश्रयके अभेदसे कर्म एक ही है।

इस प्रकार इस गाथाकी टीकाका अभिप्राय जीवमय पुण्यको मोक्षमार्ग बतलाकर पुण्यकी उपादेयताकी पुष्टि करता है। अतः यह टीका आपके उद्देश्यके विपरीत है।

इसके अनन्तर आपने अपने पक्षको पुष्ट करनेके लिए उसी समयसार ग्रन्थकी एकसौ सैंतालीसवीं गाथा उपस्थित की है, किन्तु उसको उपस्थित करते समय सम्भवतः आपने यह विचार करनेका कष्ट नहीं उठाया कि इस गाथामें शुभ-अशुभ कर्मके साथ संसर्ग करने तथा उनके साथ राग करनेका निषेध ग्रन्थकारने किया है । आत्माके पुण्य-शुभ परिणामोंको त्यागनेका उल्लेख इस गाथामें किसी भी शब्दसे प्रगट नहीं किया गया । अतः आपका यह प्रमाण प्रकृतमें आपके अभिप्रायका पोषक नहीं है ।

टीकाकारकी निम्नलिखित टीका दर्शनीय है-

कुशीलशुभाशुभकर्मभ्यां सह रागसंसर्गौ प्रतिषिद्धौ बन्धहेतुत्वात् कुशीलमनोरमामनोरमकरेणुकुट्टनी-संसर्गवत् ।

अर्थ-कुशीलरूप शुभ-अशुभ कर्मोंके साथ राग ( मानसिक भाव ) और संसर्ग ( वाचनिक तथा शारीरिक प्रवृत्ति ) प्रतिषिद्ध है, क्योंकि शुभाशुभ कर्मके साथ राग और संसर्ग बन्धका कारण है, जैसे मनोज्ञ अमनोज्ञ कृत्रिम हथिनोके साथ वननिवासी स्वतन्त्र हाथीको ( परतन्त्र बनानेके कारण ) राग और संसर्ग करना निषिद्ध है ।

हमारा प्रश्न पुण्य आचरणके विषयमें था । तदनुसार आपको पुण्य आचरण त्याज्य प्रमाणित करनेवाला ही शास्त्रीय प्रमाण देना चाहिये । हमने शुभ कर्मकी उपयोगिताका समर्थन करनेवाला प्रश्न नहीं किया, अपि तु शुभाशुभ कर्मध्वंस करनेवाले तपोमय एवं परम्परासे मुक्तिके कारणभूत पुण्य आचरणके विषयमें ही हमारा प्रश्न है । अतः आप पुण्य-पाप द्रव्यकर्मकी बात छोड़कर पुण्यभाव-शुभोपयोगरूप व्यवहार सम्यक्-चारित्र पर शास्त्रीय प्रमाण सहित प्रकाश डालिये ।

इस प्रकार आपने अपने पत्रकी पुष्टिमें जो तीन बातें कहीं हैं, उन पर पर्याप्त प्रकाश डालकर, अब कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रन्थोंके पठनीय, माननीय एवं आचरणीय प्रमाण उपस्थित करते हैं । वे प्रमाण आपकी मान्यता को बदलनेमें आपके लिए अच्छे सहायक होंगे ।

श्री कुन्दकुन्दाचार्य प्रवचनसार अ० ३में लिखते हैं :-

असुभोपयोगरहिदा सुद्धुवजुत्ता सुहोवजुत्ता वा
णित्थारयंति लोगं तेसु पसत्थं लहदि भत्तो ॥ २६० ॥

अर्थ-अशुभ उपयोगसे रहित शुद्धोपयोगी अथवा शुभोपयोगी मुनि जनताको संसारसागरसे पार कर देते हैं, उन मुनियोंका भक्त प्रशस्त सुख या प्रशस्त पद प्राप्त कर लेता है ।

श्री अमृतचन्द्रसूरि इस गाथाकी टीका करते हुए लिखते हैं-

यथोक्तलक्षणा एव श्रमणा मोहद्वेषाप्रशस्तरागोच्छेदादशुभोपयोगवियुक्ताः अन्तःसकलकषायोदयविच्छेदात् कदाचित् शुद्धोपयोगयुक्ताः प्रशस्तरागविषाकात्कदाचिच्छुभोपयोगयुक्ताः स्वयं मोक्षायतनत्वेन लोकं निस्तारयन्ति तद्भक्तिभावप्रवृत्तप्रशस्तभावा भवन्ति परे च पुण्यभाजः ।

अर्थ-पूर्वोक्त लक्षणवाले मुनि मोह, द्वेष और दूषित रागरूप अशुभ उपयोगसे रहित, समस्त कषायों से रहित होनेके कारण कदाचित् शुद्धोपयोगी और प्रशस्त रागके उदयसे कदाचित् शुभोपयोगी मुनि स्वयं मोक्षायतन ( मोक्षस्थान ) रूप होनेसे जगतको तारते रहते हैं । जो व्यक्ति उनकी भक्ति करते हैं वे भी शुभपरिणामी बनकर पुण्यात्मा हो जाते हैं ।

इसी ग्रन्थका एक अन्य प्रमाण देखिये-

एसा पसत्थभूदा समणाणं वा पुण घरत्थाणं ।
चरिया परेत्ति भणिदा ता एव परं लहदि सोक्खं ॥३-२५४॥

अर्थ-मुनियोंकी प्रशस्त चर्या तथा गृहस्थोंकी प्रशस्त चर्या उत्तम है। वे मुनि तथा गृहस्थ अपनी उसी प्रशस्त चर्याद्वारा मोक्षसुखको प्राप्त करते हैं।

टीकामें श्री अमृतचन्द्रसूरिका भाव भी गाथाके अभिप्रायका पोषक है-

एवमेष शुद्धात्मानुरागयोगिप्रशस्तचर्यारूप उपवर्णितः शुभोपयोगः तदयं शुद्धात्मप्रकाशिकां समस्तविरतिमुपेयुषां कषायकणसद्भावात्प्रवर्तमानः शुद्धात्मवृत्ति-विरुद्धरागसंगतत्वाद्गौणः श्रमणानां, गृहिणां तु समस्तविरतेरभावेन शुद्धात्मप्रकाशनस्याभावात्कषायसद्भावात्प्रवर्तमानोऽपि स्फटिकसंपर्केणार्कतेजस इवैधसां रागसंयोगेन शुद्धात्मनोऽनुभवात्क्रमतः परमनिर्वाणसौख्यकारणत्वाच्च मुख्यः।

अर्थ-इस तरह यह शुद्ध आत्माका अनुरागरूप शुभ आचार है। यह शुभाचार शुद्ध आत्माको प्रकाशक सर्व विरतिवाले मुनियोंके कषाय अंश रहनेसे शुभ प्रवृत्तिमें वर्तमान मुनियोंके शुद्धात्मानुभवके विरोधी राग भाव होनेसे गौण है। गृहस्थोंके सकल चारित्रके अभाव द्वारा शुद्धात्माका प्रकाश न होनेसे और कषायके सद्भावसे तथा रागयुक्त अशुद्ध आत्माका अनुभव होते रहनेसे परम्परासे परम निर्वाणसुखका कारण होनेसे मुख्य है।

इस तरह टीकाकार श्री अमृतचन्द्रसूरि अपनी टीकामें श्री कुन्दकुन्द आचार्यके अभिप्रायको स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि मुनिचर्या तथा श्रावक-चर्यारूप शुभोपयोग-पुण्याचरण-सरागचारित्र या व्यवहारचारित्र मोक्षका कारण है, अतः उपादेय है।

इन दो प्रमाणोंसे यह बात सिद्ध होती है कि शुभोपयोग, पुण्य अथवा व्यवहार चारित्र एक ही अर्थ वाचक पर्याय शब्द हैं। इनको सरागचारित्र या सराग धर्म भी कहा जाता है। यह पुण्य भाव या शुभोपयोग राग भावके सहयोगसे पुण्य कर्मबन्धका कारण है, उसीके साथ-साथ अपनी यथासम्भव विषयभोगोंसे तथा पापक्रियाओंसे एवं मिथ्यात्वकी विरक्तिके कारण संवर और निर्जराका भी कारण है। यही विरक्ति बढ़ते-२ शुद्ध परिणतिमें परिणत हो जाती है। इस दृष्टिसे शुभोपयोग या पुण्यभाव शुद्धोपयोगका कारण है। सातवें गुणस्थानका पुण्य भाव ही आठवें गुणस्थानके शुद्धोपयोगमें परिणत हो जाता है। अर्थात् सातिशय अप्रमत्त (सातवें) गुणस्थानके अन्तिम समयकी पर्याय शुभोपयोगमयी है और उससे दूसरे समयकी आत्मपर्याय शुद्धोपयोगमयी होती है। इस कारण शुभोपयोग शुद्धोपयोगका साक्षात् कारण भी है और पाँचवें-छठे गुणस्थानका शुभोपयोग शुद्धोपयोगका परम्परा कारण है।

इस कार्य-कारणभावसे पुण्यभाव या शुभोपयोग परम उपयोगी है। संवर और निर्जराका कारण होनेसे धर्मरूप है। निश्चय धर्म या शुद्धोपयोग यदि फल है तो शुभोपयोग उसका पूर्ववर्ती पुष्प है। इस कारण सम्यग्दृष्टिका पुण्य परम्परासे मुक्तिका कारण होनेसे प्रत्येक व्यक्तिके लिये ग्राह्य या उपादेय है। आठवें गुणस्थानसे नीचेवाले प्रत्येक व्यक्तिके लिये रंचमात्र भी हेय या त्याज्य नहीं है। इसी बातको पुष्ट करते हुए श्री परम आध्यात्मिक श्री देवसेन आचार्यने भावसंग्रह ग्रन्थमें लिखा है :-

सम्मादिट्ठी पुण्णं ण होइ संसारकारणं णियमा।
मोक्खस्स होइ हेउं जइ वि णियाणं ण सो कुणइ॥

अर्थ-सम्यग्दृष्टिका पुण्यभाव नियमसे संसारका कारण नहीं है। सम्यग्दृष्टि जीव यदि निदान न करे तो उसका पुण्य मोक्षका कारण होता है।

अतः मोक्षका कारणभूत पुण्य त्याज्य किस तरह हो सकता है।

अणुव्रत-महाव्रतका आचरण तो कुछ दूरकी बात है, किन्तु जिनेन्द्र भगवान्का दर्शन करनेरूप पुण्य भाव भी कर्मनिर्जराका कारण होनेसे धर्मरूप है। धवल ग्रंथमें इसका समर्थन करते हुये श्री वीरसेन आचार्यने लिखा है :-

कधं जिणबिंबदंसणं पढमसम्मत्तुप्पत्तीए कारणं ? जिणबिंबदंसणेण णिधत्तणिकाचिदस्स वि मिच्छत्तादिकम्मकलावस्स खयदंसणादो।
-धवल पुस्तक ६ पृ० ४२७

अर्थ-प्रश्न-जिनेन्द्र प्रतिमाका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिमें किस प्रकार कारण है ?

उत्तर-जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमाका दर्शन करनेसे निधत्ति निकाचितरूप मिथ्यात्व आदि कर्म समूहका क्षय हो जाता है।

जयधवलमें शुभ परिणामोंको कर्मक्षयका कारण बतलाते हुए श्री वीरसेन आचार्य लिखते हैं :-

सुहसुद्धपरिणामेहि कम्मक्खयाभावे तक्खयाणुववत्तीदो।
जय-धवल पु० १ पृ० ६

अर्थ-शुभ और शुद्ध परिणामोंसे यदि कर्मोंका क्षय होना न माना जावे तो फिर किसी तरह कर्मोंका क्षय ही हो न सकेगा।

अर्थात् शुभ परिणामों (पुण्यभावों) से भी कर्मोंका क्षय हुआ करता है।

श्रीवीरसेन स्वामी श्री धवल सिद्धान्त ग्रंथमें शुभोपयोगरूप धर्मध्यानका कर्म निर्जराके लिये कारण रूपमें उल्लेख करते हुए निम्नप्रकार कथन करते हैं :-

जिणसाहुगुणुक्कितणपसंसणा विणयदाणसंपण्णा। सुहसीलसंजमरदा धम्मज्झाणे मुणेयव्वा ॥५५॥

किं फलमेदं धम्मज्झाणं ? अक्खवयेसु विउलामरसुहफलं गुणसेढीए कम्मणिज्जराफलं च। खवएसु पुण असंखेज्जगुणसेढीकम्मपदेसणिज्जरणफलं सुहकम्माणमुक्कस्साणुभाग-विहाणफलं च। अतएव धर्मादनपेतं धर्म्यध्यानमिति सिद्धं।
-धवल पु० १३ पृ० ७६-७७

अर्थ-जिन और साधुके गुणोंका कीर्तन करना, प्रशंसा करना, विनय करना, दान-सम्पन्नता, श्रुत, शील और संयममें रत होना-ये सब बातें धर्मध्यानमें होती हैं, ऐसा जानना चाहिये।

शंका-इस धर्मध्यानका क्या फल है ?

समाधान-अक्षपक जीवोंको देवपर्यायसम्बन्धी विपुल सुख मिलाना उसका फल है और गुणश्रेणीमें कर्मको निर्जरा होना भी उसका फल है। तथा क्षपक जीवोंके तो असंख्यात गुणश्रेणीरूपसे कर्मप्रदेशोंकी निर्जरा होना और शुभकर्मोंके उत्कृष्ट अनुभागका होना उसका फल है। अतएव जो धर्मसे अनपेत है वह धर्मध्यान है, यह बात सिद्ध होती है।

श्री अमृतचन्द्र सूरि व्यवहारधर्मके विषयमें लिखते हैं :-

असमग्रं भावयतो रत्नत्रयमस्ति कर्मबन्धो यः।
स विपक्षकृतोऽवश्यं मोक्षोपायो न बन्धनोपायः ॥२११॥
-पुरुषार्थसिद्ध्युपाय

अर्थ-अपूर्ण रत्नत्रय अर्थात् शुभोपयोगवाले व्यक्तिके भाव मोक्षके उपाय रूप होते हैं। उस व्यक्तिके जो कषायांश होता है, वह कर्म-बन्धकारक है, उसका अपूर्ण रत्नत्रय (व्यवहारचारित्र अंश) कर्म-बन्धका कारण नहीं है।

अर्थात्-अपूर्ण रत्नत्रयस्वरूप सरागसंयम या (५-६-७वें गुणस्थानका) पुण्य-आचरण कर्मबन्धके साथ कर्ममोक्षका भी कारण है।

निर्जराका कारण

श्री देवसेन आचार्य भावसंग्रहमें लिखते हैं :-

आवासयाइं कम्मं विज्जावच्चं य दाणपूजाइं।
जं कुणइ सम्मदिट्ठी तं सव्वं णिज्जरणिमित्तं ॥६१०॥

अर्थ-सम्यग्दृष्टि जो छह आवश्यक कर्म, वैयावृत्य, दान, पूजा आदि करता है, वे सब कार्य कर्मोंकी निर्जराके कारण हैं।

श्री परमात्मप्रकाशकी टीकामें श्री ब्रह्मदेवसूरि लिखते हैं-

यदि निजशुद्धात्मैवोपादेय इति मत्वा तत्साधकत्वेन तदनुकूलं तपश्चरणं करोति, तत्परिज्ञानसाधकं च पठति तदा परम्पराया मोक्षसाधकं भवति; नो चेत् पुण्यकारणं तत्रैवेति।
-अ० २ गा० १९१ की टीका

अर्थ-यदि निज शुद्ध आत्मा ही उपादेय है, ऐसा मानकर उसके साधकपनेसे उसके अनुकूल तप करता है और शास्त्र पढ़ता है तो वह परम्परासे मोक्षका ही कारण है, ऐसा नहीं कहना चाहिये कि वह केवल पुण्यबन्धका ही कारण है।

ये निदानरहितपुण्यसहिताः पुरुषास्ते भवान्तरे राज्यादिभोगे लब्धेऽपि भोगांस्त्यक्त्वा जिनदीक्षां गृहीत्वा चोर्ध्वगतिगामिनो भवन्ति।
-अ० २ गा० ५७ की टीका

अर्थ-जिन पुरुषोंने निदानरहित पुण्यबन्ध किया है वे दूसरे भवमें राजादिके भोग पाकर भी उन भोगोंको छोड़कर बलदेव आदिके समान जिनदीक्षा ग्रहण कर मोक्षको जाते हैं।

उभयभ्रष्टता

यदि पुनस्तथाविधामवस्थामलभमाना (निर्विकल्पसमाध्यलभमाना) अपि सन्तो गृहस्थावस्थायां दानपूजादिकं त्यजन्ति तपोधनावस्थायां षडावश्यकादिकं च त्यक्त्वोभयभ्रष्टाः सन्तः तिष्ठन्ति तदा दूषणमेवेति तात्पर्यम्।
-अ० २ दोहा ५५ की टीका

अर्थ-जिसने उस प्रकारकी अवस्थाको प्राप्त नहीं किया (निर्विकल्प समाधि प्राप्त नहीं की है) वह यदि गृहस्थ अवस्थामें दान, पूजा आदि छोड़ देता है और मुनि अवस्थामें षट् आवश्यकको छोड़ देता है तो वह दोनों ओरसे भ्रष्ट है और वह दूषण ही है।

निष्कर्ष

इस तरह परम आध्यात्मिक ऋषि श्रीआचार्य कुन्दकुन्द, श्रीअमृतचन्द्र सूरि, श्री वीरसेन आचार्य आदिके आर्ष प्रमाणोंसे प्रमाणित होता है कि पुण्यभाव अर्थात् चौथे, पाँचवें, छटे व सातवें गुणस्थानका शुभपरिणाम या व्यवहार चारित्र कर्मोंके संवर तथा निर्जराका भी कारण है। ( इनमें जितना रागांश है उससे शुभास्रव बन्ध होता है तथा जितना निवृत्ति अंश है उससे निर्जरा होती है। सातिशय अप्रमत्त गुणस्थानके अन्तिम समयका पुण्यभाव दूसरे समयमें शुद्धोपयोगरूप हो जाता है। इस तरह जब पुण्यभाव और शुद्ध भावमें उपादान-उपादेयभाव है तब शुद्ध परिणतिका भी जनक पुण्यभाव त्याज्य या हेय किस तरह हो सकता है ? अर्थात् सम्यग्दृष्टिका पुण्यभाव त्याज्य नहीं है।

अतः प्रवचसारवर्ती श्री कुन्दकुन्द आचार्यका वचन-‘पुण्णफला अरहन्ता’ श्री कुन्दकुन्दाचार्यके प्रत्येक भक्तको श्रद्धाके साथ सत्य मानते हुए अरहन्त पदपर भी बिठा देनेवाले पुण्यभावको हेय ( छोड़ने योग्य ) कभी न समझना चाहिये न कहना चाहिये, क्योंकि बिना पुण्यभावके ( गुणस्थान क्रमानुसार ) शुद्धभाव त्रिकालमें भी नहीं हो पाते।

शंका १२

पुण्यका फल जब अरहन्त होना तक कहा गया है ( पुण्यफला अरहंता प्र० सा० ) और जिससे यह आत्मा तीन लोकका अधिपति बनता है, उसे सर्वातिशायी पुण्य बताया है ( सर्वातिशायि पुण्यं तत् त्रैलोक्याधिपतित्वकृत् ) तब ऐसे पुण्यको हीनोपमा देकर त्याज्य कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?

शंका १३, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६६० से ६६१

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प्रतिशंका २ का समाधान

समाधानमें यह स्पष्ट बताया गया था कि सर्वत्र प्रयोजनके अनुसार उपदेश दिया जाता है। प्रतिशंका २ में उसे हृदयसे स्वीकार भी कर लिया गया है, फिर भी यह प्रश्न उठाया गया है कि ‘जो बात चतुर्थ कालमें भी ग्राह्य थी वह पंचमकालमें अग्राह्य कैसी ?’ समाधान यह है कि मोक्षमार्गका प्ररूपण कालभेदसे नहीं बदलता है, पुण्य और पाप ये दोनों कर्मके भेद हैं और इन्हें नाश कर ही मोक्ष प्राप्त होता है यह जैनमार्गकी प्रक्रिया है, जिसे सब जानते हैं।

‘पुण्यका फल अरहन्त है, वह सर्वातिशायि पुण्यसे त्रैलोक्यका अधिपति बनता है।’ ये शास्त्रोंमें वाक्य प्रमाणीभूत हैं पर देखना यह है कि किस विवक्षासे इनका निरूपण है। बारहवें गुणस्थानमें सर्वमोहके क्षीण हो जानेपर जो वीतराग भाव होता है वह अरहन्त पद ( केवलीपद ) का निश्चयसे हेतु है। उस समय जो शुभप्रकृतियोंका कार्य है उसमें इसका उपचार होनेसे उस पुण्यको भी अरहन्त पदका कारण ( उपचार ) से आगममें कहा गया है। अन्यथा-

मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम्।
-त० सू०, अ० १०, सू० १

इस आगम वचन द्वारा जो मोहके क्षय और ज्ञानावरण-दर्शनावरण-अन्तरायके क्षयसे केवलज्ञान बतलाया है उसमें उक्त प्रमाणकी संगति कैसे बैठ सकती है ।

वीतराग अन्तरंग-बहिरंग परिग्रहरहित केवली भगवान् अणुमात्र पर पदार्थके स्वामी नहीं हैं । फिर भी उन्हें तीन लोकका स्वामी कहा गया है सो क्या यह निश्चय कथन है या मात्र तीन लोकमें प्राणियोंके श्रद्धाभाजन होनेसे उनमें तीन लोकके अधिपतित्वका उपचार है, विचार कीजिये । स्पष्ट है कि इस उपचरित अधिपतित्वका कारण ही उस सर्वातिशायी पुण्यको कहा गया है ।

सम्यग्दृष्टि जीवके भेदविज्ञानकी जागृतिके साथ पापविरक्ति तथा शुभप्रवृत्ति होती है । यतः यह निश्चयधर्मका सहचर है । अतः इस व्यवहार धर्मस्वरूप पुण्याचरणका उपदेश आगममें दिया गया है । पर पुण्य मोक्षका हेतु नहीं है । मोक्षका हेतु तो वह वीतरागता है जो पुण्यभावके साथ चल रही है । अतः परमार्थसे पुण्य और पापको बन्धका तथा वीतराग भावको मोक्षका कारण मानना यथार्थ है ।

समयसार गाथा १४५ का प्रमाण हमने देकर यह सिद्ध किया था कि वह सुशील कैसे हो सकता है जो शुभ कर्म जीवको संसारमें प्रवेश कराता है । गाथाके अभिप्रायको ठीक तरहसे न समझ कर इसे पुण्य पोषक बतलाया गया है जो असंगत है । गाथाके उत्तरार्धका सीधा अन्वय है कि :-

‘यत् संसारं प्रवेशयति कथं तत् सुशीलं भवति’ अर्थात् जो जीवको संसारमें प्रवेश कराता है उसे सुशील कैसे कहें । टीका भी गाथाके अनुरूप ही है, टीकाके अर्थ करनेमें विपर्यास हुआ है इतना ही संकेत मात्र हम यहाँ करना चाहते हैं । उसे आगेकी गाथा १४६ और १४७ के प्रकाशमें देखें तो सब स्पष्ट हो जायगा । गाथा १४७ की टीकामें यह स्पष्ट बतलाया है कि-

कुशीलशुभाशुभकर्मभ्यां सह रागसंसर्गौ प्रतिषिद्धौ बंधहेतुत्वात् ।

अर्थ-कुशीलस्वरूप शुभ और अशुभ कर्मोंके साथ राग और संसर्गका निषेध है, क्योंकि वे बन्धके हेतु हैं ।

कुन्दकुन्दस्वामीने समयसार जीमें बन्धकी दृष्टिसे पुण्य-पापकी समानता इसमें स्पष्ट रूपसे बताई है । तब ‘पुण्णफला अरहंता’ का अर्थ इन्हीं कुन्दकुन्दस्वामीने प्रवचनसारमें किस नयसे लिखा है यह विवेकियोंके ज्ञानमें सहज ही आ जायगा । पुण्यका त्याज्यपना इसी दृष्टिसे आगममें प्रतिपादित है और पुण्यके साथ होने वाले वीतराग भावकी ओर लक्ष्य देकर पुण्यको उपचारसे उपादेय भी बताया गया है । दोनों दृष्टियोंको ध्यान में लेने पर कोई विरोध नहीं रह जाता ।

यदि उक्त प्रश्नमें पुण्य-पापरूप शुभाशुभ कर्म और शुभाशुभ परिणामसे अभिप्राय नहीं है, किन्तु ‘पुण्याचरण’से है जैसा कि प्रतिशंका २ में लिखा है तो पुण्यका अर्थ यहाँ ‘पवित्र’ समझा गया और पवित्राचरणका अर्थ पुण्यपापमल रहित वीतराग भाव ही हुआ सो वीतराग भावका फल ‘अरहन्त पद’ है, ऐसा माननेमें कोई आपत्ति नहीं है । पर मूल प्रश्नमें पुण्याचरण शब्द नहीं था ‘पुण्य’ शब्द था, अतः उसकी मीमांसा की गई थी । वीतराग भावरूप आचरण ही सर्वत्र सिद्धिका कारण बना है यह प्रतिशंकामें प्रयुक्त उदाहरणों से भी स्पष्ट है । प्रतिशंका २ के अन्तमें निष्कर्ष निकालते समय यह बात लिखते हुए कि ‘शुभपरिणाम संवर-निर्जराका भी कारण हैं’, यह भी स्वीकार कर लिया गया है कि ‘जितना रागांश है उससे शुभास्रव-बंध होता है, तथा जितना निवृत्ति अंश है उससे संवर-निर्जरा होती है ।’ इस निष्कर्षमें ही जब शुभ रागांशको बंध मान लिया गया है तब यह प्रश्न स्वयं प्रश्न नहीं रह जाता ।

शंका १३, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ६६२ से ६७२

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका १३

पुण्यका फल जब अरहंत होना तक कहा गया है ( पुण्यफला अरहंता प्र० सा० ) और जिससे यह आत्मा तीन लोकका अधिपति बनता है उसे सर्वातिशायी पुण्य बतलाया है, ( सर्वातिशायि पुण्यं तत् त्रैलोक्याधिपतित्वकृत् ) तब ऐसे पुण्यको हीनोपमा देकर त्याज्य कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?

प्रतिशंका ३

यह प्रश्न जीवके पुण्य भावकी अपेक्षासे है । इस बातको हमने अपने द्वितीय प्रपत्रमें स्पष्ट कर दिया था तथा यह भी स्पष्ट कर दिया था कि शुभोपयोग, पुण्यभाव व्यवहार धर्म एवं व्यवहार चारित्र-ये एकार्थवाची शब्द हैं । फिर भी आपने पुण्यरूप द्रव्यकर्मको अपेक्षासे ही उत्तर प्रारम्भ किया है । द्रव्यकर्मकी अपेक्षा से स्पष्टीकरण अन्तमें किया जायगा । प्रथम तो जीवके भावकी अपेक्षासे स्पष्टीकरण किया जाता है ।

आपने लिखा है कि ‘सम्यग्दृष्टि जीवके भेदविज्ञानकी जागृतिके साथ-साथ पापसे विरक्ति तथा शुभ-प्रवृत्ति होती है ।’ इस मिश्रित अखण्ड पर्यायका नाम शुभोपयोग है । इसमें प्रशस्त राग भी है तथा सम्यक्त्व व पापोंसे विरक्तिरूप चित्तकी निर्मलता भी है । श्री पंचास्तिकाय गाथा १३१ की टीकामें शुभभावका यह ही लक्षण दिया गया है :-

यत्र प्रशस्तरागश्चितप्रसादश्च तत्र शुभपरिणामः ।

अर्थ-जहाँ प्रसस्त राग तथा चित्तप्रसाद है वहाँ शुभ परिणाम है ।

यह टीका मूल गाथाके अनुरूप ही है । मूल गाथामें भी ‘चित्तप्रसाद’ दिया है । चित्तप्रसादका अर्थ चित्तको स्वच्छता, उज्ज्वलता, निर्मलता, पवित्रता । प्रसादका अंग्रेजीमें भी अर्थ Purity किया है । यह निर्मलता पापोंसे विरक्ति आदि रूप ही तो है । श्री प्रवचनसार गाथा ९ में भी कहा है कि जिस समय जीव अशुभ, शुभ या शुद्धरूप परिणमता है उस समय वह अशुभ, शुभ या शुद्ध है । अर्थात् एक समयमें एक ही भाव होता है और उस समयको अखण्ड (पूर्ण) पर्यायका नाम ही अशुभ, शुभ या शुद्ध भाव है । अतः यह सिद्ध हो जाता है कि सम्यग्दृष्टिके मात्र रागांशका नाम शुभ भाव नहीं है किन्तु उसकी मिश्रित अखण्ड पर्याय ही का नाम शुभ भाव है । उसमें रागांशसे बंध और निर्मल अंशसे संवर-निर्जरा होते हैं ।

उस शुभ भाव या व्यवहार धर्ममें भी लक्ष्य या ध्येय वीतरागता एवं शुद्ध अवस्था अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति ही रहती है । पर्यायकी निर्बलताके कारण वह जीव वीतरागतामें स्थित नहीं हो पाता है । इस कारण उसको राग व विकल्प करने पड़ते हैं, किन्तु उस राग या विकल्प द्वारा भी वह वीतरागताको ही प्राप्त करना चाहता है । जैसे पं० श्री दौलतरामजीने कहा है-

संयम धर न सके पै संयम धारणकी उर चटापटी ।

जो जिस वस्तुका इच्छुक होता है वह उसी वस्तुके धारीकी श्रद्धा, ज्ञान व पूजादि करता है। जैसे धनुर्विद्याका इच्छुक धनुर्वेदके विशेषज्ञका तथा धनार्थी राजा आदिका श्रद्धान, ज्ञान व पूजासत्कारादि करता है। कहा भी है-

यो हि यत्प्राप्त्यर्थी सः तं नमस्करोति यथा धनुर्वेदप्राप्त्यर्थी धनुर्विदं नमस्करोति।

इसी प्रकार वह व्यवहार सम्यग्दृष्टि वीतरागताकी प्राप्तिका इच्छुक होनेसे वीतराग देव, वीतराग गुरु और वीतरागताका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंका ही श्रद्धान, ज्ञान एवं पूजा, सत्कार, सेवा आदि करेगा। जैसे धनुर्वेदके विशेषज्ञ या राजादिकी पूजा सत्कारादि धनुर्विद्या या धनकी प्राप्तिमें साधक निमित्त कारण है, उसी प्रकार वीतराग देवादिकी पूजादि भी वीतरागताके प्राप्त करनेमें साधक निमित्त कारण है। अर्थात् वीतराग देवादिकी पूजादि रूप आचरण वीतरागताके ही कारण हैं। वीतराग देवके गुणोंमें जो उसका अनुराग है वह उन गुणोंकी प्राप्तिके लिये ही है। कहा भी है-‘वन्दे तद्गुणलब्धये’ अर्थात् उन गुणोंकी प्राप्तिके लिये ही वन्दना करता हूँ। उसका यह भाव नहीं कि मैं सदा इसी प्रकार बना रहूँ। किन्तु वह उसी समय तक पूजादि करता है जब तक वह स्वयं वीतरागी नहीं बन जाता है। जैसे धनुर्विद्याका इच्छुक उसी समय तक गुरुका आश्रय लेता है जब तक वह स्वयं धनुर्वेद विशेषज्ञ नहीं बन जाता है। कहा भी है-

भिन्नात्मानमुपास्यात्मा परो भवति तादृशः । वर्तिदीपं यथोपास्य भिन्ना भवति तादृशी ॥ ९७ ॥
-समाधिशतक

अर्थ-यह जीव अपनेसे भिन्न अर्हन्त-सिद्धस्वरूप परमात्माकी उपासना करके उन्हींके समान अर्हन्त-सिद्धरूप परमात्मा हो जाता है। जैसे कि बत्ती, दीपकसे भिन्न होकर भी, दीपककी उपासनासे दीपकस्वरूप हो जाती है।

इससे स्पष्ट हो जाता है कि भगवान्‌की उपासना उपासकको भगवान् ही बना देती है।

परमप्पं वै जाणंतो जोई मुच्चेइ मलवलोहेण।
णादियदि णवं कम्मं णिद्दिट्ठं जिणवरिंदेहिं ॥४८॥
-मोक्षपाहुड

अर्थ :-जो योगी परमात्माको ध्यावता संता वर्ते है सो मलका देनहारा जो लोभकषाय ताकरि छूटे है और नवीन कर्मका आश्रय न होय है-ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है अर्थात् परमात्माके ध्यानसे संवर तथा निर्जरा होती है एवं लोभके छूट जाने पर केवलज्ञान स्वयं प्राप्त हो जाता है।

श्री प्रवचनसार गाथा ८० में भी कहा है :-

जो जाणदि अरहंतं दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं।
सो जाणदि अप्पाणं मोहो खलु जादि तस्स लयं ॥८०॥

अर्थ-जो अरहन्तको द्रव्यपने, गुणपने और पर्यायपनेसे जानता है वह अपनी आत्माको जानता है और उसका मोह अवश्य लय (नाश) को प्राप्त हो जाता है।

जैसे कोई पुरुष धन कमानेके लिये कोई व्यापार शुरू करता है। उस व्यापारमें जो कुशल है उसका आश्रय भी लेता है और दुकान पर आवश्यक व्यय (खर्च) भी करता है। किन्तु इस प्रकार व्यय करके, कई

६६४ जयपुर (ख़ानिया) तत्त्वचर्चा

गुनी आय (आमदनी) करता है। वह व्यापारी बराबर व्ययको कम करता जाता है और आयको बढ़ाता जाता है। उस व्यापारमें व्यय होते हुए भी क्या उस व्यापारको व्यय या हानिका मार्ग कहा जा सकता है ? कदाचित् नहीं कहा जा सकता है। वह तो आयका ही मार्ग है। इसी प्रकार शुभोपयोगी जीव वीतरागताकी प्राप्तिके लिये वीतराग देव, गुरु तथा शास्त्रका आश्रय लेता है और उनकी भक्ति पूजादि करता है। इसमें जितना रागांश है उससे प्रशस्त बन्ध भी होता है, किन्तु विरक्ति अंश द्वारा बन्धसे निर्जरा कई गुनी अधिक होती है, क्योंकि वह उस समय सांसारिक इच्छाओं तथा भोगोंसे एवं पंच पापसे विरक्त है। इस प्रशस्त बन्धसे भी ऐसी सामग्री (द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भव) प्राप्त होती है जो मोक्षमार्गकी साधक होती है। वह स्वयं वीतरागताको बढ़ाता हुआ शुभरागको छोड़ता जाता है और इस प्रकार विशुद्धि बढ़ती जाती है। अन्तमें सम्पूर्ण मोहनीय कर्मका क्षयकर परम वीतरागी हो जाता है। ऐसी दशामें प्रशस्त बन्ध होते हुए भी, क्या उस शुभ भाव (व्यवहार धर्म) को बन्धका मार्ग कहा जा सकता है? कदापि नहीं कहा जा सकता है। यह तो मोक्षका ही मार्ग है अर्थात् संसार सागरके पार करनेको तीर्थ है।

श्री समयसार गाथा १२ व उसकी टीकामें भी यही कथन किया है कि जब तक आत्मा शुद्ध न हो जाय तबतक व्यवहार प्रयोजनवान् है। एक प्राचीन गाथा देकर यह सिद्ध किया है कि व्यवहार छोड़ देनेसे तीर्थ (मार्ग) छूट जायगा। यह स्पष्ट ही है कि मार्ग छूट जाने पर मोक्ष कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

सुद्धो सुद्धादेसो णायव्वो परमभावदरिसीहिं।
ववहारदेसिदा पुण जे हु अपरमे ठिदा भावे ॥१२॥
-समयसार

अर्थ-जो शुद्धनय तक पहुँचकर श्रद्धावान् हुये तथा पूर्ण ज्ञान चारित्रवान् हो गये उन्हें तो शुद्ध (आत्मा) का उपदेश (आज्ञा) करनेवाला शुद्धनय जानने योग्य है और जो जीव अपरम भावमें-अर्थात् श्रद्धा तथा ज्ञान-चारित्रके पूर्ण भावको नहीं पहुँच सके हैं, साधक अवस्थामें ही स्थित हैं वे व्यवहार द्वारा उपदेश करने योग्य हैं।

टीकाका उत्तरार्ध-ये तु प्रथमद्वितीयाद्यनेकपाकपरंपरापच्यमानकार्तस्वरस्थानीयमपरमं भावमनुभवंति तेषां पर्यंतपाकोत्तीर्णजात्यकार्तस्वरस्थानीयपरमभावानुभवनशून्यत्वादशुद्धद्रव्यादेशितयोपदर्शितप्रतिविशिष्टैकभावानेकभावो व्यवहारनयो विचित्रवर्णमालिकास्थानीयत्वात्परिज्ञायमानस्तदात्वे प्रयोजनवान्, तीर्थतीर्थफलयोरित्थमेव व्यवस्थितत्वात्। उक्तं च-जइ जिणमयं पवज्जह ता मा ववहारणिच्छए मुयह। एक्केण विणा छिज्जइ तित्थं अण्णेण उण तच्चं।

अर्थ-जो पुरुष प्रथम, द्वितीय आदि अनेक पाकों (तावों) की परम्परासे पच्यमान अशुद्ध स्वर्णके समान जो (वस्तुका) अनुत्कृष्ट-मध्यम भावका अनुभव करते हैं उन्हें अन्तिम तावसे उतरे हुए शुद्ध स्वर्णके समान उत्कृष्ट भावका अनुभव नहीं होता, इसलिये, अशुद्ध द्रव्यको कहनेवाला होनेसे जिसने भिन्न-भिन्न एक-एक भावस्वरूप अनेक भाव दिखलाये हैं ऐसा व्यवहारनय विचित्र अनेक वर्णमालाके समान होनेसे जाननेमें आता हुआ उस काल प्रयोजनवान् है, क्योंकि तीर्थ और तीर्थके फलकी ऐसी ही व्यवस्थिति है। (जिसे तिरा जाये वह तीर्थ है, ऐसा व्यवहार धर्म है, और पार होना व्यवहार धर्मका फल है अथवा अपने स्वरूपको प्राप्त होना तीर्थफल है)। अन्यत्र भी कहा है कि-यदि तुम जिनमतका प्रवर्ताना करना चाहते हो तो व्यवहार और निश्चय-दोनोंको मत छोड़ो, क्योंकि व्यवहारनयके विना तो तीर्थ-व्यवहारमार्गका नाश हो जायगा और निश्चयनयके बिना तत्त्व (वस्तु) का नाश हो जायेगा।

भावार्थका उत्तरार्ध :-जहाँतक यथार्थ ज्ञान-श्रद्धानकी प्राप्तिरूप सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं हुई हो वहाँतक तो जिनसे यथार्थ उपदेश मिलता है ऐसे जिन वचनोंको सुनना, धारण करना तथा जिन वचनोंको कहनेवाले श्री जिनगुरुकी भक्ति, जिनबिम्बके दर्शन इत्यादि व्यवहार मार्गमें प्रवृत्त होना प्रयोजनवान् है। जिन्हें श्रद्धान-ज्ञान तो हुआ है, किन्तु साक्षात् प्राप्ति नहीं हुई उन्हें पूर्वकथित कार्य परद्रव्यका अलम्बन छोड़नेरूप अणुव्रत, महाव्रतका ग्रहण, समिति, गुप्ति और पंच परमेष्ठीका ध्यान-रूप प्रवर्तन तथा उसी प्रकार प्रवर्तन करनेवालोंकी संगति एवं विशेष जाननेके लिये शास्त्रोंका अभ्यास करना, इत्यादि व्यवहार मार्गमें स्वयं प्रवर्तन करना और दूसरोंको प्रवर्तन कराना-ऐसे व्यवहारनयका उपदेश अंगीकार करना प्रयोजनवान् है। व्यवहारनयको कथंचित् असत्यार्थ कहा गया है, किन्तु यदि कोई उसे सर्वथा असत्यार्थ जानकर छोड़ दे तो वह शुभोपयोगरूप व्यवहारको ही छोड़ देगा और उसे शुद्धोपयोगकी साक्षात् प्राप्ति तो नहीं हुई है, इसलिये उल्टा अशुभोपयोगमें ही आकर, भ्रष्ट होकर, चाहे जैसी स्वेच्छारूप प्रवृत्ति करेगा तो वह नरकादिगति तथा परम्परासे निगोदको प्राप्त होकर संसारमें ही भ्रमण करेगा। इसलिए शुद्धनयका विषय जो साक्षात् शुद्ध आत्मा है उसकी प्राप्ति जबतक न हो तबतक व्यवहार भी प्रयोजनवान् है-ऐसा स्याद्वाद मतमें श्री गुरुओंका उपदेश है (सोनगढ़निवासी श्री हिम्मतलालकृत टीकाके हिन्दी अनुवादसहित मारोठसे प्रकाशित समयसारके पृष्ठ २५ से २७ तक।)

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रकी पूर्णता १३वें गुणस्थानमें होती है। अतः उपरोक्त कथनानुसार १२वें गुणस्थानतक साधक अवस्था है और वहाँतक व्यवहारधर्म प्रयोजनवान् है। सो ठीक है, क्योंकि साध्यके प्राप्त हो जानेपर साधक (मार्ग) का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है।

भावार्थ विशेष ध्यान देनेयोग्य है, क्योंकि इसमें गाथा तथा टीकाका भाव स्पष्ट किया गया है। पण्डितप्रवर जयचन्दजीने भी भावार्थमें यही आशय प्रगट किया है।

उपरोक्त कथनसे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि मिथ्यादृष्टिके द्वारा किया हुआ व्यवहारधर्म भी सम्यक्त्वकी प्राप्तिके लिये साधन है। इस विषयको आगम प्रमाणसहित आगे स्पष्ट किया जायगा।

टीकाके अन्तमें दी गई प्राचीन गाथासे स्पष्ट हो जाता है कि व्यवहार धर्मके बगैर शुद्ध आत्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। शुद्ध आत्माको प्राप्त किये बगैर तज्जन्य सुखका अनुभव भी नहीं हो सकता है। जैसे मिठाई का स्वरूप जाननेमात्रसे मिठाईका स्वाद और तज्जन्य सुख नहीं प्राप्त हो सकता है। निश्चयके बगैर साध्य नहीं रहेगा और साध्य बगैर साधन किसका किया जायगा। अतः व्यवहार व निश्चय दोनों आवश्यक हैं।

पुण्यरूप व्यवहार प्राथमिक अवस्थामें कार्यकारी है, क्योंकि यह निश्चयरूप साध्यका साधन है। कहा भी है-

व्यवहारनयेन भिन्नसाध्यसाधनभावमवलम्ब्यानादिभेदवासितबुद्धयः सुखेनैवावतरन्ति तीर्थं प्राथमिकाः।
-पंचास्तिकाय पृ० २४५-२४६ रायचन्द ग्रन्थमाला

अर्थात्-जो जीव अनादि कालसे लेकर भेदभाव कर वासितबुद्धि हैं, वे प्राथमिक व्यवहार अवलम्बी होकर भिन्न साध्य-साधनभावको अंगोकार कर तीर्थको प्राप्त करते हैं।

श्री अमृतचन्द्रके उपर्युक्त वाक्य ध्यान देने योग्य हैं ।

इसी बातको श्रीमान् पं० फूलचन्द्रने स्वयं इन शब्दोंद्वारा स्वीकार किया है-

कहीं-कहीं शुभक्रियाको धर्म कहा जाता है। माना कि यह कथन उपचारमात्र है । पर कहीं-कहीं उपचार कथन भी ग्राह्य होता है । कारण कि शुभक्रियामें हिंसादि अशुभ क्रियाओंकी निवृत्ति छिपी हुई है । बन्धनमुक्त होनेके लिए जीवको यद्यपि अशुभ और शुभ दोनों प्रकारकी क्रियाओंसे निवृत्त होना है, किन्तु प्रागवस्थामें अशुभसे निवृत्ति भी ग्राह्य मानी गई है । यही कारण है कि ग्रन्थकारने धर्मके स्वरूपका विवेचन करते हुए हिंसा आदि अशुभ क्रियाओंके त्यागको भी धर्म कहा है ।
-पंचाध्यायी पृ० २६७, वर्णी ग्रन्थमाला

श्री समयसार गाथा १४५ की टीकामें भी जीवके शुभभावको मोक्षमार्ग बतलाया है, जिसका उद्धरण हम दूसरे प्रपत्रमें दे चुके हैं। परन्तु आपने उसपर यह आपत्ति उठाई है कि ‘टीकाके अर्थ करनेमें विपर्यास हुआ है ।’ अतः पंडितप्रवर जयचन्दजीकृत तथा अहिंसा मंदिर, दिल्लीसे प्रकाशित अर्थ नीचे दिये जाते हैं-

'शुभ अथवा अशुभ मोक्षका और बन्धका मार्ग ये दोनों जुदे हैं। केवल जीवमय तो मोक्षका मार्ग है ओर केवल पुद्गलमय बन्धका मार्ग है ।
-पं० श्री जयचन्द्रजी

शुभ अथवा अशुभ मोक्षका और बन्धका मार्ग 'ये दोनों पृथक् हैं, केवल जीवमय तो मोक्षका मार्ग है और केवल पुद्गलमय बन्धका मार्ग है ।
-दिल्लीसे प्रकाशित

श्री समयसारके उपरोक्त स्पष्ट प्रमाण व्यवहारधर्मको मोक्षमार्ग सिद्ध करते हैं । इस सम्बन्धमें श्री धवल, जयधवल आदिक ग्रन्थोंके प्रमाण द्वितीय पत्रिकामें दिये जा चुके हैं । अब आगे कुछ अन्य प्रमाण भी दिये जाते हैं :-

तं देवदेवदेवं जदिवरवसहं गुरू तिलोयस्स ।
पणमंति जे मणुस्सा ते सोक्खं अक्खयं जंति ॥
-श्री प्रवचनसार गाथा ७९ के बाद श्री जयसेन टीका में दी गई है ।

अर्थ-उन देवाधिदेव, यतिवरवृषभ त्रिलोक गुरुको जो मनुष्य नमस्कार करता है वह अक्षय (मोक्ष) सुखको प्राप्त करता है ।

देवगुरूणं भत्ता णिव्वेयपरंपरा विचिंतित्ता ।
झाणरया सुचरित्ता ते गहिया मोक्खमग्गम्मि ॥८०॥
-मोक्षपाहुड

अर्थ-जो देव गुरुके भक्त हैं, निर्वेद कहिये संसार-देह-भोगतें विरागताकी परंपराको चिंतवन करे हैं, ध्यान विषें रत हैं, बहुरि सुचारित्रवाले हैं, ते मोक्षमार्ग विषें ग्रहण किये हैं ।

देवगुरुम्मि य भत्तो साहम्मिय-संजुदेसु अणुरत्तो ।
सम्मत्तमुव्वहंतो झाणरओ होइ जोई सो ॥५२॥
-मोक्षपाहुड

अर्थ-जो योगी सम्यक्त्व कूं धरता संता देव तथा गुरु विषें भक्तियुक्त है बहुरि साधर्मी संयमियोंमें अनुरक्त है सोई योगी ध्यानमें रत होय है।

निम्नलिखित गाथाएँ आचार्य कुन्दकुन्द विरचित श्री रयणसारकी हैं :-

भयवसणमलविवज्जियसंसारसरीरभोगणिव्विण्णो।
अट्ठगुणंगसमग्गो दंसणसुद्धो हु पंचगुरुभत्तो॥५॥

अर्थ :-भय व व्यसनके मलसे रहित और संसार-शरीर-भोगोंसे विरक्त पंचपरमेष्ठीका भक्त अष्ट-गुणांगसे पूर्ण सम्यग्दर्शन शुद्ध होता है।

देवगुरुसमयभत्ता संसारसरीरभोयपरिचत्ता।
रयणत्तयसंजुत्ता ते मणुवा सिवसुहं पत्ता॥९॥

अर्थ-देव-गुरु-शास्त्र भक्त, संसार-शरीर-भोगसे विरक्त और रत्नत्रय सहित मनुष्य ही शिवसुखको प्राप्त करता है।

दाणं पूजा सीलं उपवासं बहुविहं पि खवणं पि।
सम्मजुदं मोक्खसुहं सम्म विण दीहसंसारे॥१०॥

अर्थ-दान, पूजा, शील, उपवास और बहु प्रकार क्षमादि भी, यदि सम्यक्त्व सहित हैं तो मोक्ष सुखके कारण हैं, यदि सम्यक्त्व रहित हैं तो दीर्घ संसारके कारण हैं।

जिणपूजा मुणिदाणं करेइ जो देइ सत्तिरूवेण।
सम्माइट्ठी सावयधम्मी सो होइ मोक्खमग्गरओ॥१३॥

अर्थ-जो शक्तिपूर्वक जिनपूजा करता है और मुनियों को दान देता है, वह सम्यग्दृष्टि श्रावकधर्मी मोक्षमार्गरत होता है।

पूया (य) फलेण तिलोए सुरपुज्जो हवेइ सुद्धमणो।
दाणफलेण तिलोए सारसुहं भुंजदे णियदं॥१४॥

शुद्ध मनवाला पुरुष पूजाके फलसे तीन लोकमें देवोंकर पूज्य होता है और दानके फल से नियमपूर्वक तीन लोकमें सारसुख (मोक्ष सुख) भोगता है।

निम्नलिखित गाथाएँ आचार्य श्री कुन्दकुन्दकृत श्री मूलाचारकी हैं :-

अरहंतणमोक्कारं भावेण य जो करेदि पयडमदी।
सो सव्वदुक्खमोक्खं पावदि अचिरेण कालेण॥६॥

अर्थ-भक्तिसे एकाग्रचित्त होकर जो अरहन्तको नमस्कार करता है वह अति शीघ्र ही सम्पूर्ण दुःखोंसे मुक्त होता है।

श्री धवल पुस्तक १ पृ० ९ पर यही गाथा प्रमाणरूपसे दी गई है।

इसी प्रकार गाथा ९ में सिद्ध नमस्कारसे, गाथा १२ में आचार्य नमस्कारसे, गाथा १४ में उपध्याय नमस्कारसे, और गाथा १६ में साधु नमस्कारसे सम्पूर्ण दुःखोंसे मुक्त होना कहा है।

एवं गुणजुत्ताणं पंचगुरूणं विसुद्धकरणेहिं।
जो कुणदि णमोक्कारं सो पावदि णिव्वुदिं सिग्घं॥१७॥

अर्थ-इस प्रकार गुणयुक्त पंचपरमेष्ठियोंको जो भव्य निर्मल मन, वचन तथा कायसे नमस्कार करता है वह निर्वाण सुखको प्राप्त करता है।

भत्तीए जिणवराणं खीयदि य पुव्वसंचियं कम्मं ।
आयरियपसाएण य विज्जामंता य सिज्झंति ॥८१॥

अर्थ-जिनेश्वरकी भक्तिसे पूर्व संचित कर्मका नाश होता है। आचार्यकी कृपासे विद्याओंकी तथा मन्त्रोंकी सिद्धि होती है।

द्वादशांगमें तीव्र भक्ति संसार विच्छेदका कारण है।

-श्री धवल पु० १ पृ० ३०२

दाणु ण दिण्णउ मुनिवरहं ण वि पुज्जिउ जिणपाहु ।
पंच ण वंदिय परमगुरू किमु होसइ सिवलाहु ॥१६८॥
-परमात्मप्रकाश अ० २

अर्थ-मुनीश्वरोंको दान नहीं दिया, जिनेन्द्र भगवान्को नहीं पूजा, पंच परमेष्ठीकी वन्दना (पूजा) नहीं की, तब मोक्षकी प्राप्ति कैसे हो सकती है।

जन्मारण्यशिखी स्तवः स्मृतिरपि क्लेशाम्बुधेर्नौ पदे ।
भक्तानां परमो निधिः प्रतिकृतिः सर्वार्थसिद्धिः परा ।
वन्दीभूतवतोऽपि नोन्नतिहतिर्नन्तुश्च ये वां मुदा ।
दातारो जयिनो भवन्तु वरदा देवेश्वरास्ते सदा ॥११५॥
-श्री समन्तभद्र रचित स्तुतिविद्या

अर्थ-जिनका स्तवन संसाररूप अटवीको नष्ट करनेके लिये अग्निके समान है, जिनका स्मरण दुःखरूप समुद्रसे पार होनेके लिये नौकाके समान है, जिनके चरण भक्त पुरुषोंके लिये उत्कृष्ट निधान (खजानों) के समान हैं, जिनकी श्रेष्ठ प्रतिकृति (प्रतिमा) सब कार्योंकी सिद्धि करनेवाली है, जिन्हें हर्षपूर्वक प्रणाग करनेवाले एवं जिनका मंगलगान करनेवाले नग्नाचार्यरूपसे रहते हुये भी मुझ-समन्तभद्रकी उन्नतिमें कुछ बाधा नहीं होती, वे देवोंके देव जिनेन्द्र भगवान् दानशील, कर्मशत्रुओं पर विजय पानेवाले और सबके मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले होवें।

कर्म भक्त्या जिनेन्द्राणां क्षयं भरत गच्छति ।
क्षीणकर्मा पदं याति यस्मिन्ननुपमं सुखम् ॥१८३॥
-श्री पद्मपुराण पर्व ३२

अर्थ-हे भरत ! जिनेन्द्रदेवकी भक्तिसे कर्म क्षयको प्राप्त हो जाता है और जिसके कर्मक्षय हो जाता है वह अनुपम सुखसे सम्पन्न परम पदको प्राप्त होता है।

नमस्यत जिनं भक्त्या स्मरतानारतं तथा ।
संसारसागरं येन समुत्तरतं निश्चितम् ॥१२५॥
-श्री पद्मपुराण पर्व ३९

अर्थ-भक्तिपूर्वक जिनेन्द्र भगवानको नमस्कार करो और निरन्तर उन्हींका स्मरण करो, जिससे निश्चयपूर्वक संसारसागरको पार कर सको।

एकापि समर्थेयं जिनभक्तिर्दुर्गतिं निवारयितुम्।
पुण्यानि च पूरयितुं मुक्तिश्रियं कृतिनः ॥१२५॥
-उपासकाध्ययन

अर्थ-अकेली एक जिन-भक्ति ही जीवके दुर्गतिका निवारण, पुण्यका संचय करनेमें तथा मुक्तिरूपी लक्ष्मीको देनेमें समर्थ है।

नाममात्रकथया परात्मनो भूरिजन्मकृतपापसंक्षयः।
बोधवृत्तरुचयस्तु तद्गताः कुर्वते हि जगतां पतिं नरम् ॥४२॥
-पद्मनन्दि पंचविंशति अ० १०

अर्थ-परमात्माके नाममात्रकी कथासे ही अनेक जन्मोंमें संचित किये हुए पापोंका नाश होता है तथा उक्त परमात्मामें स्थित ज्ञान, चारित्र, सम्यग्दर्शन मनुष्यको जगत्‌का अधीश्वर बना देता है।

मरदु व जियदु व जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा।
पयदस्स णत्थि बंधो हिंसामत्तेण समिदस्स ॥२१७॥
-प्रवचनसार

अर्थ-जीव मरे या जिये, अप्रयत्न आचारवालेके हिंसा निश्चित है। प्रयत्नपूर्वक समिति पालन करनेवालेके (बहिरंग) हिंसामात्रसे बन्ध नहीं है।

समिति पालन करना व्यवहारधर्म है। ऐसे व्यवहार धर्मको पालन करनेसे, बहिरंगमें जीवादिकी हिंसा हो जाने पर, बन्ध नहीं होता है। इसी आशयको ‘श्री पुरुषार्थसिद्धि उपाय’ में बहुत स्पष्ट किया गया है। ऐसी परिस्थितिमें यह कहना कि व्यवहार धर्मरूप शुभभाव मात्र रागांशका नाम है और उससे बन्ध ही होता है, उपचार मात्रसे सहचर होनेके कारण मोक्षमार्ग कहा गया है-यह कथन कैसे आगमसे मेल खा सकता है, अर्थात् आगमविरुद्ध ही है।

ऐसे अनेकों ग्रन्थ भी प्रमाण हैं जिन आगममें गृहस्थोंके लिये देवपूजा, गुरूपास्ति तथा दान आदि और मुनियोंके लिये स्तवन, वन्दना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान आदिरूप व्यवहारधर्म नित्य षडावश्यक कार्योंमें गर्भित किया है। यदि यह कार्यमात्र बन्धके ही कारण हैं तो क्या महर्षियोंने बन्ध कराने और संसारमें डुबानेका उपदेश दिया है। ऐसा कभी सम्भव नहीं हो सकता है। इनको इसी कारण आवश्यक बतलाया है कि इनसे मोक्षकी प्राप्ति होती है, जैसे कि उपरोक्त प्रमाणोंसे सिद्ध है।

अब प्रश्न यह होता है कि इस व्यवहार धर्मके समय प्रशस्त रागसे जो सातिशय पुण्यबन्ध होता है तथा वह संसारका कारण है। परमार्थ दृष्टिसे इस व्यवहारधर्मको पालन करनेवाला शुभोपयोगी जीव उस रागांशसे पंचेन्द्रियोंके विषय या सांसारिक सुखकी प्राप्तिकी इच्छा नहीं करता है। पंचेन्द्रिय-विषय और सांसारिक सुखसे, हेय जानकर, विरक्त हो गया है। उसकी आसक्ति तो वीतरागतामें है। इस रागको छोड़नेका ही पूर्ण प्रयत्न है। अतः इससे बन्ध होते हुए भी यह रागांश संसारका कारण नहीं हो सकता है। संसारका कारण तो वास्तविकमें रागमें राग (उपादेय बुद्धि) है। उसकी तो विरागतामें उपादेय बुद्धि है। इन पुण्य प्रकृतियोंके उदयसे ऐसे द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भवकी प्राप्ति होती है,जो मोक्ष-मार्गमें सहायक हैं, बाधक नहीं हैं। उन द्रव्य, क्षेत्र, काल, भवके आश्रयसे मोक्षके लिये साधना होती है । अतः पुण्यबन्ध भी मोक्षका साधक है । महान् आचार्योंने इसे सातिशय पुण्य कहा और इससे अरहन्त आदि पदकी प्राप्ति बतलाई है ।

निदानरहितपरिणामोपार्जिततीर्थंकरप्रकृत्युत्तमसंहननादिविशिष्टपुण्यरूपधर्मोऽपि (सिद्धगतेः) सहकारी कारणं भवति ।

अर्थ-निदानरहित परिणामसे उपार्जित तीर्थंकर प्रकृति तथा उत्तम संहननादि विशिष्टरूपी धर्म भी सिद्धगतिका सहकारी कारण होता है ।

-पंचास्तिकाय गाथा ८५ श्री जयसेनाचार्यकृत टीका

अरहन्त शब्द प्रायः तीर्थंकर पदके लिये प्रयोग होता है । श्री प्रवचनसार गा० ४५ में जो कहा है ‘पुण्णफला अरहन्ता’ यहाँ यदि पुण्यका आशय पुण्य द्रव्यकर्मसे लिया जाय तो अरहन्तका अर्थ तीर्थंकर होता है । तीर्थंकर प्रकृति सबसे उत्कृष्ट पुण्य प्रकृति है । उसका उदय १३वें गुणस्थानसे ही प्रारम्भ होता है । उसके उदयसे ही तीर्थंकर पदकी प्राप्ति होती है । यदि पुण्यका अर्थ भाव पुण्य लिया जाय तो श्री समयसार गाथा १२ आदि उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह सिद्ध ही हो जाता है कि पुण्यभाव ( व्यवहार धर्म ) से केवलज्ञानकी प्राप्ति होती है । आपने पूछा कि ‘मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् की संगति कैसे बैठ सकती है ।’ प्रश्न नं० १५ में आपने इस सूत्रपर आपत्ति डालते हुए स्वयं लिखा है कि कर्मोंके क्षयसे केवलज्ञान नहीं होता है । दसवें तथा बारहवें गुणस्थानकी मिश्रित अखण्ड पर्यायका नाम पुण्यभाव है । पंच महाव्रत, पंच समिति, त्रिगुप्ति आदि रूप व्यवहारचरित्र १२वें गुणस्थानमें भी होता है । ( देखिए श्री धवल पुस्तक १४ पृ० ८९ ) उस पुण्यभावसे मोहनीय कर्म तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण एवं अन्तरायका क्षय होता है और इन कर्मोंके क्षयसे केवलज्ञान उत्पन्न होता है । इस प्रकार संगति ठीक बैठती है, न बैठनेका प्रश्न ही नहीं होता है । आपका यह लिखना कि १२वें गुणस्थानमें पुण्यप्रकृतियोंके उदयसे होनेवाले भावका नाम पुण्यभाव है-आगमानुकूल नहीं है ।

‘तीन लोकका अधिपतित्व’ इन शब्दोंसे स्व-स्वामी सम्बन्ध बतलानेका आशय नहीं है । इनका अर्थ है तीन लोकके प्राणियों द्वारा पूज्य ऐसा पद अर्थात् तीर्थंकर पद । जैसे कहा जाता है ‘शिवरमणि वरी-शिववधूके पति’ आदि । क्या इन शब्दों द्वारा पति-पत्नी सम्बन्ध द्योतित करनेका आशय है ? कदापि नहीं । इन शब्दोंसे शिवपदको द्योतित किया जाता है । सर्वसाधारण भी इस बातको जानते हैं । अतः स्व-स्वामी सम्बन्धको लाना, निष्परिग्रह तथा उपचार आदि कथन करना आगमका विपर्यास अर्थ करना हो हो सकता है, अन्य कुछ नहीं ।

यदि मिथ्यादृष्टि भी परमार्थकी अपेक्षा व्यवहार धर्म पालन करता है तो उसके लिए वह सम्यक्त्वकी प्राप्तिका कारण होता है । आगममें सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके प्रत्यय बतलाते हुए जिनबिम्बदर्शन तथा जिनमहिमा दर्शनको भी प्रत्यय ( कारण ) बतलाये हैं । ( श्री धवल पु० ६ पृ० ४२, श्री सर्वार्थसिद्धि अ० १ सूत्र ७ की टीका आदि ) । मिथ्यादृष्टिको ही तो सम्यक्त्व की उत्पत्ति होगी । सम्यग्दृष्टिके सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका प्रश्न ही पैदा नहीं होता है । जिनदर्शनरूप शुभ भावसे मिथ्यात्वके खण्ड-खण्ड हो जाते हैं और सम्यक्त्व प्राप्ति होती है-इसके कुछ प्रमाण ऊपर दिये जा चुके हैं । २-३ प्रमाण नीचे ओर जिये जाते हैं-

कथं जिणबिंबदंसणं पढमसम्मत्तुप्पत्तीए कारणं ? जिणबिंबदंसणेण णिधत्तणिकाचिदस्स वि मिच्छत्तादिकम्मकलावस्स खयदंसणादो ।’
-श्री धवल पु०, ६ पृ० ४२७

अर्थ-जिनबिंबका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका कारण किस प्रकार है ?

समाधान-जिनबिंब दर्शनसे निधत्ति और निकाचितरूप भी मिथ्यात्वादि कर्मकलापका क्षय देखा जाता है, जिससे जिनबिंबका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका कारण होता है ।

जिणवरचरणंबुरुहं णमंति जे परमभत्तिराएण ।
ते जम्मवेलिमूलं खणंति वरभावसत्थेण ॥१५३॥
-भावपाहुड़

अर्थ-वे पुरुष परम भक्ति अनुराग कर जिनवरके चरणकमलको नमे हैं ते श्रेष्ठ भावरूप शस्त्र कर जन्म कहिये संसाररूपी वेल ताका मूल जो मिथ्यात्व आदि ताहि खणें हैं, नष्ट करें हैं ।

दिट्ठे तुमम्मि जिणवर दिट्ठिहरासेसमोहतिमिरेण ।
तह णट्ठं जह दिट्ठं तं मए तच्चं ॥२॥
-पद्मनन्दि पंचविंशति अ० १४

अर्थ-हे जिनेन्द्र ! आपका दर्शन होनेपर दर्शनमें बाधा पहुँचानेवाला समस्त मोह ( दर्शनमोह ) रूप अन्धकार इस प्रकार नष्ट हो गया कि जिससे मैंने यथावस्थित तत्त्वको देख लिया है, अर्थात् सम्यग्दर्शनको प्राप्त कर लिया है ।

जो मिथ्यादृष्टि, परमार्थको न जानते हुए, मात्र विषय सामग्री तथा सांसारिक सुखकी प्राप्तिके लक्ष्यसे अप्रशस्त रागसहित कुछ शुभक्रिया करता है और उससे जो पुण्यबन्ध होता है, वह पुण्यभाव तथा पुण्यबन्ध संसारका ही कारण है । श्री प्रवचनसार प्रथम अध्याय आदि ग्रन्थोंमें ऐसे पुण्य या शुभभावको ही पूर्णतया हेय दिखलाया गया है । किन्तु परमार्थदृष्टिसे किये हुए शुभभाव या व्यवहार धर्मका कथन श्री प्रवचनसार तृतीय अध्याय आदि ग्रन्थोंमें है और उसको मोक्षका साधन बतलाया है । बहुत स्थानोंपर आगममें व्यवहाराभास ( एकान्त मिथ्या व्यवहार ) का भी व्यवहारके नामसे कहकर निषेध किया गया है । इत्यादि विशेषतायें भी ध्यान रखने योग्य हैं । श्री समयसार गा० १४५ व १४७ में ( जिनको आपने उद्धृत किया है ) मात्र पुण्य तथा पापरूप द्रव्यकर्मोंका व्याख्यान है । पुण्य या पापभावका नहीं है । यहाँ पुण्य तथा पाप कर्मोंको बन्धकी अपेक्षा समान बतलाया है । इसका अर्थ यह नहीं है कि वह एकान्तरूपसे सर्वथा समान ही है । जो सांसारिक विषय भोगोंकी अपेक्षासे पुण्य कर्मबन्धको ही उपादेय ग्रहण कर उसमें ही तल्लीन रहते हैं उनको समझाया जा रहा है कि पुण्यमें राग मत करो । ऐसे जीवको परमार्थकी तो खबर ही नहीं है । किन्तु १४५ की टीकामें श्री सूरिजीने स्पष्ट कर दिया है कि ( परमार्थदृष्टि सहित ) जीवका शुभभाव मोक्षका कारण है जिसका उद्धरण पत्रिका २में दिया जा चुका है ।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका १३

मूल प्रश्न १३-पुण्यका फल जब अरहंत होना तक कहा गया है ( पुण्णफला अरहंता प्र० सा० ) और जिससे यह आत्मा तीन लोकका अधिपति बनता है उसे सर्वातिशायी पुण्य बतलाया है, (सर्वातिशायि पुण्यं तत् त्रैलोक्याधिपतित्वकृत्) तब ऐसे पुण्यको हीनोपमा देकर त्याज्य कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?