सम्पादककी ओरसे
पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १५ से ३७
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सम्पादककी ओरसे
\१. भेदविज्ञानका माहात्म्य
एक ही जीवकी विविध अवस्थाओंके सूचक गुणस्थान चौदह हैं। नियम यह है कि सर्व प्रथम अनादि कालसे यह जीव मिथ्यात्व गुणस्थानमें स्थित हैं । मिथ्यात्व गुणस्थानका मुख्य कार्य अपने आत्मस्वरूपको भूल कर परमें निजबुद्धि कराना है। इसकी अदेवमें देवबुद्धि, अगुरुमें गुरुबुद्धि और अतत्त्वमें तत्त्वबुद्धि नियमसे होतो है । कषायकी मन्दतावश कदाचित् ऐसा जीव अणुव्रतों और महाव्रतोंका भी पालन करता है। कदाचित् क्षयोपशमकी विशेषता वश ग्यारह अंग और नौ पूर्वोंका पाठी भी हो जाता है, फिर भी मिथ्यादृष्टि बना रहता है। विषय-कषायकी मन्दता या क्षयोपशमकी विशेषताका होना अन्य बात है और आत्मकार्यमें सावधान होकर भेदविज्ञानके बलसे सम्यग्दृष्टि बन मोक्षके लिए उद्यमशील होना अन्य बात है। इसी तथ्यको ध्यानमें रख कर भगवान् कुन्दकुन्ददेवने दर्शनप्राभृतमें धर्मका मूल सम्यग्दर्शनको कहा है-दंसणमूलो धम्मो। सतत जागरूक रहते हुए परमागमका अभ्यास करना, अणुव्रत-महाव्रतोंका पालन करना तथा देव, गुरु, शास्त्रकी श्रद्धा भक्ति करना इसकी जहाँ बाह्य कर्तव्यके रूपमें परमागममें स्वीकृति है वहाँ उसी परमागममें अन्तरंग कर्तव्यके रूपमें भेदविज्ञानकी कलाको सम्पादित करना सबसे बड़ा पुरुषार्थ बतलाया गया है। आचार्य अमृतचन्द्रदेवने इसी तथ्यको हृदयंगम कर समयसार-कलशमें यह वचन कहा है कि आजतक जितने भी सिद्ध हुए वे एकमात्र भेदविज्ञानके बलसे ही सिद्ध हुए और जो संसारी बने हुए हैं वे भेदविज्ञानको नहीं प्राप्त करनेके कारण ही संसारी बने हुए हैं। भेदविज्ञानकी महिमा सर्वोपरि है।
\२. प्राचीन इतिहास
हमारे बुंदेलखण्डकी यह परिपाटी है कि प्रत्येक गाँव या नगरके प्रत्येक जिनालयमें रात्रिवचनिकामें दो शास्त्र अवश्य रखे जाते हैं। उसमें भी प्रथम शास्त्र तत्त्वज्ञानसे सम्बन्ध रखनेवाला होता है। इसका सर्वप्रथम वाचन किया जाता है और दूसरा शास्त्र पुण्य पुरुषोंकी जीवन चर्याका परिचायक होता है। इसका अन्तमें वाचन किया जाता है। प्रथम शास्त्रके रूपमें कभी-कभी चरणानुयोगसम्बन्धी शास्त्रका भी वाचन होता है और सबके अन्तमें शास्त्रसभामें उपस्थित महानुभावोंमेंसे कोई एक महाशय भजन बोलते हैं, जो अध्यात्मरससे ओत-प्रोत होता है। बचपनमें तो मैं इसके महत्त्वको नहीं जानता था, किन्तु अब इस पद्धतिकी विशेषता समझमें आने लगी है। यह संसारी प्राणी तत्त्वज्ञानका प्रयोजन समझकर आत्मकार्यमें सावधान बने यह इस पद्धतिका मुख्य प्रयोजन है। यह पद्धति मेरे ख्यालसे पूरे भारतवर्षमें प्रचलित होनेका भी यही कारण है। इतना अवश्य है कि किसी विशिष्ट ज्ञानीके आ जानेपर शास्त्रगोष्ठीमें तत्त्वज्ञानकी प्ररूपणा पर सदासे विशेष बल दिया जाता रहा है, जो अबाधितरूपसे आज तक प्रचलित है। स्वयं जब कोई विद्वान् किसी नगरमें जाते हैं तब वे तत्त्वज्ञानके आलम्बनसे ही शास्त्रप्ररूपणा करते हैं। अन्तमें प्रथमानुयोगका तो मंगलाचरण मात्र कर दिया जाता है। वहाँ उपस्थित श्रोताजन भी यही चाहते हैं कि पण्डितजी कुछ ऐसे तथ्योंका निर्देश करें जिन्हें समझ कर हम आत्मकल्याणमें लग सकें।
बहुत प्राचीनकालीन परिपाटीकी तो मैं चर्चा नहीं करता । अभी २-३ सौ वर्षकी पिछली परिपाटीकी ओर भी यदि ध्यान दिया जाय तो उससे विदित होता है कि प्रत्येक नगरमें ऐसी गोष्ठियाँ सदासे होती रही हैं जो तत्त्वज्ञानके उद्देश्यसे ही स्थापित की जाती थीं और उनमें प्रमुख रूपसे अध्यात्मके प्ररूपक शास्त्रोंका स्वाध्याय-मनन चिन्तन कर आत्मकार्यमें सावधानता प्राप्त की जाती थी । पण्डितप्रवर बनारसीदासजीकी जीवनीसे जैनसमाजका प्रत्येक गृहस्थ सुपरिचित है । उन्होंने नाटक समयसार की रचना कर जैन समाजका महान् उपकार किया है । उनकी लिखी हुई अर्धकथानक पुस्तकके पढ़नेसे भी यह विलकुल स्पष्ट हो जाता है कि एकमात्र अध्यात्मरससे ओतप्रोत अध्यात्म शास्त्रके वलसे ही वे दिगम्बर जैन परम्परामें आकृष्ट हुए थे । उनके कालमें आगरामें ऐसी एक गोष्ठी थी जिसमें समयसारादि महान् ग्रन्थोंका स्वाध्याय कर यथार्थ मोक्षमार्ग क्या है इसपर विशदरूपसे ऊहापोह किया जाता था । ऐसी ही एक गोष्ठी दिल्लीमें भी थी यह छहढाला जैसे महान् ग्रन्थके निर्माता पण्डितप्रवर दौलतरामजीकी जीवनी पर सम्यक् ध्यान देनेसे स्पष्ट हो जाता है ।
आचार्यकल्प पण्डित श्री टोडरमलजी द्वारा लिखित ‘रहस्यपूर्ण चिट्ठी’का स्वाध्याय तो सबने किया ही होगा । उससे भी मालूम पड़ता है कि मुलतान और जयपुरमें भी ऐसी गोष्ठियाँ सदासे चलती आई हैं । सदासे इन सब गोष्ठियोंके स्थापित करनेका एक ही उद्देश्य रहा है कि जैसे बने वैसे तत्त्वज्ञानकी जागृतिपूर्वक आत्मकार्यमें सावधान हुआ जाय । इसमें मैंने मुनिजनों और त्यागी गृहस्थोंकी चर्चा जानबूझ कर नहीं की है । क्योंकि ये महानुभाव आत्मकार्यमें सावधान बने रहनेके लिए ही गृहस्थी व परिग्रहका त्याग करते हैं । अणुव्रत-महाव्रतका पालना यह इनका मुख्य कार्य नहीं है, किन्तु सतत आत्मकार्यमें जागरूक रहते हुए विज्ञानघनस्वरूप आत्माको प्राप्त करना ही इनका मुख्य कार्य है । जो आत्मकार्यमें सावधान होता है उसके आत्मकार्यके अनुवर्ती देव-शास्त्र गुरुकी भक्ति-श्रद्धा, अणुव्रत-महाव्रतका पालन आदि कार्योंमें सावधानी तो होती है ।
\३. वर्तमान स्थिति
यह समग्र दिगम्बर परम्पराका प्राचीन इतिहास है । इसके प्रकाशमें हमें वर्तमानको जानना है । यदि विचारकर देखा जाय तो इस दृष्टिसे हम बड़े सौभाग्यशाली हैं, क्योंकि इस कालमें पुनः समस्त समाजका ध्यान उस शिक्षाकी ओर गया है जिससे दिगम्बर जैन धर्म ही यथार्थ धर्म कहलानेका अधिकारी है । धर्मका उपदेश तो अन्य पन्थोंके प्रवर्तकोंने भी दिया है । परन्तु उनका वह उपदेश बाह्य सदाचार और क्रियाकाण्ड तक ही सीमित है । इस पंचमकालमें जैनपरम्परामें भी ऐसे पन्थोंका उदय हुआ है, परन्तु उन्होंने धर्मके नामपर मोक्षमार्गकी चर्चा करके भी उसे पुनः लौकिक बनानेमें ही अपनी चरितार्थता समझी है । एकमात्र दिगम्बर परम्परा ही ऐसी धारा है जिसमें कल्याणके मार्गका यथार्थरूपमें निर्देश किया गया है ।
संसारी आत्मा अपने अपराधवश अनेक प्रकारके बन्धनोंमें जकड़ा हुआ है । उसे अन्तरंग और बहिरंग उन दोनों प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिए अपने त्रिकालाबाधित निज स्वरूपकी ओर ध्यान देना ही होगा । यदि हमारी अध्यात्मविद्या चरितार्थ है तो इसी मायनेमें चरितार्थ है । वह ऐसी अलौकिक ज्ञान ज्योति है जो इन अन्तरंग और बहिरंग दोनों प्रकारके बन्धनोंके मध्य सोये हुए ज्ञानज्योतिस्वरूप उस शाश्वत आत्माका दर्शन करा देती है । इसीलिए सभी आचार्योंने इस अध्यात्मज्ञानकी मुक्तकण्ठसे स्तुति की है । आचार्य कुन्दकुन्द तो इसकी स्तुति करते हुए समयसार जैसे परमागममें यहाँतक लिख गये कि-जिसने सर्व पर द्रव्य-परभावोंसे भिन्न, अनन्य, नियत, अविशेष और असंयुक्त इस आत्माको अनुभव लिया उसने पूरे जैन शासनको जान लिया। उक्त प्रकारके आत्माको अनुभवना ही समग्र जैन शासनका जानना है यह आचार्यका उपदेश है जो कि भगवद्वाणीके रूपमें मान्य है। और यह बात ठीक भी है, क्योंकि चक्रवर्तीके भोग और देवेन्द्र पदका प्राप्त करना यह धर्मका उद्देश्य नहीं है। सर्व प्रकारके कलंक दोषोंसे रहित विज्ञानघनस्वरूप निज आत्माको प्राप्त करना ही धर्मका उद्देश्य है। यही परमागमस्वरूप वीतराग वाणीका सार है।
\४. कुछ शंकाओंका निरसन
ऐसी अध्यात्मविद्याप्रवण वीतराग वाणी परमागमका प्रधान अंग अनादिकालसे बनी चली आरही है। हमारा परम सौभाग्य है कि वह वाणी इस कालमें पुनः मुखरित हुई है। सोनगढ़के अध्यात्म सन्त कानजी स्वामी तो उसके मुखरित होनेमें निमित्तमात्र हैं। वह उनकी वाणी नहीं है। वीतराग वाणी है, शुद्धात्माकी अपनी पुकार है। कुछ भाइयोंका कहना है कि कानजी स्वामी एकान्तकी प्ररूपणा करते हैं। वे व्यवहारको उड़ाते हैं। जब कि वस्तुस्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। निश्चयधर्म आत्मधर्म है, क्योंकि वह परमात्मस्वरूप है। ऐसी प्ररूपणा करते समय यदि यह कहा जाय कि यदि ऐसे आत्मधर्मको व्यवहारधर्म स्पर्श नहीं करता है, वह उससे सर्वथा भिन्न है तो ऐसी कथनीको व्यवहारधर्मका उड़ाना कैसे मान लिया जाय अर्थात् नहीं माना जा सकता है। हाँ यदि वे यह कहने लगें कि व्यवहारसे देव-गुरु-शास्त्रकी पूजा-भक्ति करना, स्वाध्याय करना, जिन वाणीका सुनना-सुनाना, अणुव्रत-महाव्रतका पालना इन सब क्रियाओं के करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। मोक्षमार्गीके ये होती भी नहीं हैं। तब तो माना जाय कि वे व्यवहारको उड़ाते हैं।
श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्टसे प्रकाशित प्रतिक्रमण पाठको हमने देखा है। उसमें यह भी निर्देश किया गया है कि जिसने जीवन पर्यन्तके लिए मद्य-मांस आदिका त्याग नहीं किया है वह नामका भी जैनी नहीं है। क्या यह व्यवस्थाकी प्ररूपणा नहीं है। क्या इससे हम यह नहीं समझ सकते कि वे व्यवहारको उड़ाना नहीं चाहते, बल्कि उसे प्राणवान् बनानेमें ही लगे हुए हैं। प्राण-वान् व्यवहार ही मोक्षमार्गका सच्चा व्यवहार है। ऐसी परमागमकी आज्ञा है। उनकी पूरी कथनी और करनी पर बारीकीसे ध्यान दिया जाय तो उससे यही सिद्ध होता है।
उन्होंने अपनी पुरानी प्रतिष्ठाको छोड़कर दिगम्बर परम्परा स्वीकार की और इस परम्परामें आनेके बाद अपनेको अव्रती श्रावक घोषित किया। एकमात्र उनकी यह घोषणा ही यह सिद्ध करनेके लिए पर्याप्त है कि वे मोक्षमार्गके अनुरूप सम्यक् व्यवहारको जीवनमें भीतरसे स्वीकार करते हैं। यदि वे एकान्तके पक्ष-पाती होते तो कह सकते थे कि मैं ‘पर्यायदृष्टिसे भी न गृहस्थ हूँ और न मुनि हूँ। मैं तो एकमात्र ज्ञायक-स्वरूप आत्मा हूँ।’ वे जिस स्थितिमें हैं उसे भीतरसे स्वीकार तो करते ही हैं और यह जीव अन्तरात्मा बन कर परमात्मा कैसे बनता है इस मार्गका भी दर्शन कराते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो जो भी ज्ञानी मोक्ष-मार्गका उपदेश देता है वह दूसरेके लिए नहीं देता है। उसके अन्तरात्माकी पुकार क्या है उसे ही वह अपने को सुनाता है। दूसरे भव्य प्राणी उसे सुनकर अपना आत्महितका कार्य साध लें यह दूसरी बात है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि वे अनेकान्तके आशयको समझते हैं और जीवनमें उसे स्वीकार करते हैं।
उनके विषयमें एक आक्षेप यह भी है कि वे पुण्यका निषेध करते हैं पर हमें उनपर किया गया यह आक्षेप भी उपहासास्पद प्रतीत होता है । वस्तुतः वे पुण्यका निषेध नहीं करते । किन्तु मुझे पुण्यका अर्जन करना है इस भावका निषेध अवश्य करते हैं । उनका कहना है कि इस संसारी प्राणीको अर्जन करने योग्य यदि कोई वस्तु है तो वह आत्मनिधि ही है । किन्तु जब उसके अर्जनके उपायोंका विचार करते हैं, उसकी कथा करते हैं, उसके अनुकूल क्रिया करते हैं तो पुण्यका अर्जन स्वयमेव हो जाता है । देव-शास्त्र-गुरुकी भक्ति पूजाका तथा अणुव्रत-महाव्रतके धारणका उपदेश शास्त्रोंमें पुण्यके अर्जनकी दृष्टिसे नहीं दिया गया है । किन्तु ये सब क्रियाएँ निश्चय मोक्षमार्गके परिकर्मस्वरूप हैं, मात्र इसीलिए इनका’ शास्त्रोंमें उपदेश दिया गया है । वे अपनी आगमानुकूल वाणी द्वारा इसी तथ्यका स्पष्टीकरण करते हैं ।
एक आक्षेप यह भी किया जाता है कि वे कार्य-कारण परम्परामें वाह्य निमित्तको नहीं स्वीकार करते । किन्तु इसके स्थानमें स्थिति यह है कि वे भेदविज्ञानको जीवनका प्रधान अंग बनानेकी दृष्टिसे कार्य-कारणपरम्पराके निश्चय कार्य-कारणपरम्परा और व्यवहार ( उपचरित ) कार्य-कारण ऐसे दो भेद करके निश्चय कार्य-कारणपरम्परा ही यथार्थ कार्य-कारणपरम्परा है, ऐसी घोषणा अवश्य करते हैं । साथ ही वे व्यवहार कार्य-कारणपरम्पराका निषेध तो नहीं करते, परन्तु उसे विकल्पमूलक बतलाकर मोक्षमार्गमें वह आश्रय करने योग्य नहीं है यह भी कहते हैं । वे अपने प्रवचनोंमें यह सर्वदा कहते रहते हैं कि प्रत्येक कार्य पाँचके समवायमें होता है । उनके इस कथनसे ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वे प्रत्येक कार्यके प्रति समन्वय-व्यतिरेकके आधारपर बाह्य सामग्रीमें निमित्तता ( व्यवहारहेतुता ) को स्वीकार अवश्य करते हैं । किन्तु यह व्यवहारहेतुता परमार्थस्वरूप नहीं है ऐसा यदि वे कहते हैं और इसे कोई उनके द्वारा बाह्य निमित्तको अस्वीकृति मानता है तो उसका इलाज नहीं । इतना अवश्य है कि जीवन में मोक्षमार्गकी सम्प्राप्ति स्वाश्रित उपयोगके बलसे ही होती है, इसलिए वे सर्वप्रकारके पराश्रितपनेका निषेधकर स्वाश्रितपनेका ज्ञान अवश्य कराते रहते हैं ।
\५. स्वामीजीके उपदेशोंका सुफल
यह उनके उपदेश देनेकी पद्धति है । मैंने सर्वप्रकारसे उनके उपदेशोंको समझनेका प्रयत्न किया है । किन्तु मुझे तो वह सर्व प्रकारसे मोक्षमार्गके अनुरूप ही प्रतीत हुआ । अभी कुछ दिन पूर्व श्री सवाई सिंघई धन्यकुमारजीकी लेखमाला जैन सन्देशमें प्रकाशित हुई थी । सोनगढ़से आकर ही उन्होंने एक प्रत्यक्ष द्रष्टाके नाते उसे प्रकाशित कराया है । स० सि० धन्यकुमारजी न केवल दूसरी भाषाओंके विद्वान् हैं, किन्तु वे संस्कृतके भी अच्छे ज्ञाता हैं । श्रीयुत् पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्रीका सानिध्य मिलनेसे उन्होंने धर्मशास्त्र का बारीकीसे अध्ययन किया है । प्रतिदिन उनका प्रातःकालीन स्वाध्याय अध्ययनके रूपमें ही होता है । वे हजार काम छोड़कर आत्मकल्याणकी इच्छासे धर्मशास्त्रका स्वाध्याय करते रहते हैं । यह उनके जीवनकी सर्वोपरि विशेषता है । उन्होंने सोनगढ़की स्थितिका अध्ययन कर जो कुछ भी लिखा है उससे भी स्वामीजी के उपदेश देनेकी शैलीपर विशद प्रकाश पड़ता है । यह उनके उपदेशका ही माहात्म्य है कि अबतक १५-२० हजार श्वेताम्बर बन्धुओंने दिगम्बर परम्पराको स्वीकार कर लिया है । उनके लेखसे यह भी ज्ञात होता है कि अबतक ७-८ अजैन बन्धु भी उनके उपदेशसे दिगम्बर धर्ममें दीक्षित हो गये हैं ।
\६. सौराष्ट्रकी स्थितिमें परिवर्तन
जिस सौराष्ट्रकी धरणीको भगवान् नेमिनाथने पुण्यभूमि बनानेका स्वरूप प्रदान किया । जिस सौराष्ट्रने धरसेन आचार्यके रूपमें अंग-पूर्वज्ञानको सुरक्षित बनाये रखा और जिस सौराष्ट्रने आचार्य पुष्पदन्त-भूतबलीको सादर आमन्त्रित कर अंग-पूर्वज्ञानकी सुरक्षाका महान् कार्य किया। वही सौराष्ट्र शताब्दियों तक अपने प्राचीन गौरवको ऐसे भुलाये हुए था मानो दिगम्बर परम्परामें उसका कभी कोई स्थान ही न रहा हो। किन्तु हर्षका विषय है कि उसी सौराष्ट्रने वर्तमान कालमें कानजी स्वामीके रूपमें पुनः अंगड़ाई ली है। आज वह दिगम्बर परम्पराका सजग प्रहरी बनकर समाजके सामने उपस्थित है। हम अपनी निधिको अपनी असावधानीके कारण खो देनेके लिए भले ही तैयार हो जाँय, पर वह खोने नहीं देगा। जैसे कोई सो कर जागता है और अपनी निधिकी सँम्हालमें जुट जाता है। आज समग्र सौराष्ट्रकी वही स्थिति बन पड़ी है। कोई कुछ भी क्यों न कहे, मैं तो कहता हूँ कि वर्तमानमें श्रीकानजी स्वामीका उदय दिगम्बर परम्पराके लिए अभ्युदयस्वरूप है। जिसके जीवनमें दिगम्बर परम्पराका माहात्म्य समाया हुआ है वह श्रीकानजी स्वामी और समग्र सौराष्ट्रको आदरकी दृष्टिसे देखे विना रह ही नहीं सकता। वहाँ पुनः प्रतिष्ठित हुए दिगम्बर बीसियों जिनालयोंके गगनचुम्बी शिखरोंकी लहराती हुई पताकाएँ सभी भव्य जनोंको बुला-बुला कर कह रही हैं कि आओ, इधर आओ, शुद्धस्वरूपका भान करनेका तुम्हें यह सुवर्ण अवसर प्राप्त है।
\७. तत्त्वचर्चाकी पृष्ठभूमि
यह वर्तमान स्थिति है। इसके ऐसा होते हुए भी कुछ कालसे समाजमें विरोधी प्रचार चल रहा है। अतीत कालमें उसे शमन करनेके लिए अनेक उपाय किये गये। ‘जैनतत्त्वमीमांसा’ ग्रन्थ भी इसी अभिप्रायसे लिखा गया। कई वर्ष पूर्व श्रीमान् पं० मक्खनलालजी सा० न्यायालंकारने जैनदर्शनमें प्रकाशित अपने वक्तव्य द्वारा चर्चाके लिए आमंत्रित किया। आमंत्रित विद्वानोंमें मेरा और श्रीयुक्त पं० जगन्मोहनलाल जी शास्त्री इन दो विद्वानोंके भी नाम थे। उसके बाद मथुरामें भी दि० जैन संघकी बैठकके समय भी श्रीयुक्त पं० राजेन्द्रकुमारजीके साथ इस सम्बन्धमें कुछ विचार विनिमय हुआ। अतएव श्रीयुक्त पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्यके साथ मिल कर तत्त्वचर्चाकी एक रूपरेखा तैयार की गई। वह तत्कालीन साप्ताहिक पत्रोंमें मुद्रित भी हो चुकी है। इस प्रकार एक ओर विरोध भी होता रहा और दूसरी ओर तत्त्वचर्चाका वातावरण भी बनता रहा।
\८. तत्त्वचर्चाके लिए आमन्त्रण
श्री १०८ आचार्य शिवसागर महाराज प्रकृतिसे शान्तपरिणामी हैं। सन् १९६३ में जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चाके पूर्व श्रीयुक्त पं० जगन्मोहनलाल जी शास्त्री उनके दर्शनोंके लिए गये थे। उस समय आचार्य महाराज और पण्डितजीके मध्य इस विषय पर पर्याप्त ऊहापोह हुआ। उसी वर्ष भाद्रपदमें श्री युक्त पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य भी दशलक्षण पर्वके निमित्त जयपुर आमन्त्रित किये गये थे। उस समय भी इस विषय पर विचार विनिमय हुआ। यतः स्वयं आचार्य महाराज चाहते थे कि दोनों ओरके विद्वानोंके मध्य तत्त्वचर्चा होकर यह विरोध शान्त हो जाय, अतः उनके भावको समझ कर संघके दो विवेकी ब्रह्मचारी श्रीयुक्त सेठ हीरालालजी पाटनी और श्रीयुक्त ब्र० लाडमलजीने एक आमंत्रणपत्र द्वारा दोनों ओरके मनीषियोंको तत्त्वचर्चाके लिए आमंत्रित किया जो इस प्रकार है-
तत्त्व-चर्चाके लिए आमंत्रण
खानियां जयपुर
दि० १३-९-६३
आदरणीय महानुभाव,
दर्शन विशुद्धि
जैन समाजकी वर्तमान दशासे आप परिचित हैं । वर्तमान कुछ सैद्धांतिक विवादग्रस्त विषयोंको लेकर समाजके मार्गदर्शक विद्वान् परस्पर दो मत हो रहे हैं और उनकी आपसी खींचतानसे साधारण जनता दुविधामें पड़ रही है । कई बार सोचा गया कि हमारे प्रमुख विद्वान् किसी एक स्थान पर एकत्रित हो चर्चा द्वारा किसी एक निर्णीत पथ पर पहुंचनेका कष्ट करते तो समाजका वहुत कल्याण होता, पर ऐसा हो नहीं सका । विद्वत्परिषद् किसे आमन्त्रित करे और किसे आमंत्रित न करे, इसका सामंजस्य न वैठनेके कारण स्वयं आयोजन करनेमें असमर्थता प्रकट करती है । साथ ही कुछ विद्वान् इसकी चर्चा स्वतंत्ररूपसे करना पसन्द करते हैं । अतः हमने विचार किया है कि खानियां जयपुरमें जहाँ कि परम पूज्य आचार्य श्री १०८ शिवसागरजी महाराजका संघ सहित चतुर्मास हो रहा है, इस चर्चाका आयोजन किया जावे । यह आयोजन चतुर्मास समाप्तिके पूर्व सम्पन्न होना चाहिए । चर्चामें निम्नलिखित विद्वानोंको आमंत्रित करने का विचार किया है । आप तथा आमंत्रित विद्वान् समाजके प्रकाशस्तम्भ हैं । अतः चर्चामें उपस्थित होकर आयोजनको अवश्य सफल करें । यह आयोजन दिनांक २० अक्टूबर १९६३ रविवारसे रखा गया है, इस अवसर पर पधारनेकी स्वीकृति प्रदान करें । विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और साथ ही जिनागमकी रक्षा करना हमारे विद्वानोंका सवसे प्रमुख कार्य । अतः हम आशा रखते हैं कि दोनों विचारधाराओंके विद्वान् अवश्य ही एकत्रित हों । आमंत्रित विद्वानोंके ठहरने आदिकी पूर्ण व्यवस्था रहेगी । आमंत्रित विद्वानोंके सिवाय यदि आप किसी अन्य विद्वान्को भी बुलाना उचित समझते हैं तो उसकी सूचना देनेकी कृपा करें । प्रत्येक विद्वानोंके नाम बुक पोस्टमें पत्रिका भेज दी है । यदि किसीको न मिली हो तो इस प्रकाशनको ही आमंत्रण समझनेकी कृपा करें ।
-:हितैषीः-
हीरालाल पाटनी पो० निवाई ( राजस्थान ), ब्र० लाडमल जैन, दीवानी का मंदिर, लालजी सांडका रास्ता, जयपुर ।
आमंत्रित विद्वान्
\१. श्री पं० वंशीधरजी शास्त्री, ईसरी वाजार २. श्री माणिकचंदजी न्यायाचार्य, फिरोजावाद ३. श्री मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना ४. श्री कैलाशचंदजी शास्त्री, वाराणसी ५. श्री जीवंधरजी न्यायतीर्थ, इन्दौर ६. श्री फूलचंद्र जी सिद्धान्तशास्त्री, वाराणसी ७. श्री वंशीधर जी व्याकरणाचार्य, बीना ८. श्री जगन्मोहनलाल की शास्त्री, कटनी ९. श्री इन्द्रलाल जी शास्त्री, जयपुर १०. श्री नाथूलाल जी शास्त्री, इन्दौर ११. श्री दयाचंद जी शास्त्री सागर, १२. श्री पन्नालाल जी साहित्याचार्य, सागर १३. श्री अजितकुमार जी शास्त्री, दिल्ली १४. श्री सुमेरचंद जी शास्त्री बी० ए०, सिवनी १५. श्री वर्धमान जी शास्त्री, शोलापुर १६. श्री पन्नालाल जी सोनी ब्यावर, १७. श्री रतनचंद जी मुख्तियार, सहारनपुर \१८. श्री बाबू नेमीचंद जी वकील, सहारनपुर १९. श्री ब्र० हुकमचंद जी सलावा, मेरठ २०. श्री पं० लालबहादुर जी शास्त्री, इन्दौर २१. श्री पं० चैनसुखदास जी शास्त्री, जयपुर २२. श्री कु० नेमीचंद जी पाटनी, आगरा २३. श्री ब्र० पं० श्रीलाल जी, महावीरजी २४. श्री पं० बाबूलाल जी, कलकत्ता २५. श्री रामजी भाई, सोनगढ़ २६. श्री हिम्मत भाई, सोनगढ़ २७. श्री सेठ बद्रीप्रसाद जी सरावगी, पटना २८. श्री बाबू हीराचंद जी बोहरा, कलकत्ता २९. श्री सेठ नेमीचंद जी बड़जात्या, नागौर ३०. श्री खेमचंद भाई, सोनगढ़ ३१. श्री बाबू भाई, सोनगढ़ ३२. श्री पं० मक्खनलाल जी, दिल्ली ३३. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार, दरियागंज दिल्ली ३४. श्री मूलचंद जी किशनदास जी कापड़िया, सूरत ३५. श्री पं० राजेन्द्रकुमार जी, मथुरा ३६. श्री ब्र० चाँदमल जी चूड़ीवाल, नागौर ३७. श्री सर सेठ भागचंद जी सोनी, अजमेर।
\९. तत्त्वचर्चाके आमन्त्रण की स्वीकृति
यह आमन्त्रण आमन्त्रणपत्रमें निर्दिष्ट सभी महानुभावोंके पास मुद्रित पत्रकके रूपमें ही भेजा गया था तथा इसे आमन्त्रणदाताओंने वर्तमान पत्रोंमें भी प्रकाशित करा दिया था। ऐसा करनेका उनका उद्देश्य यही था कि जिन महानुभावोंको तत्त्वगोष्ठीमें सम्मिलित करनेके लिए आमन्त्रित किया गया था उन्हें किसी न किसी रूपमें इसकी सूचना मिल जाय। मुझे यह आमन्त्रण २४-९-६३ को मिल सका, क्योंकि उस समय मैं कारंजा गया हुआ था। आमन्त्रण सद्भावना पूर्ण और अच्छे उद्देश्यको लिए हुए था, इसलिए मैंने विचार किया कि यदि तत्त्वचर्चाके अनुकूल परिस्थिति बनती है तो इसमें अवश्य ही सम्मिलित होना चाहिए। कारंजा ब्रह्मचर्याश्रमके अधिष्ठाता श्रीयुक्त पं० माणिकचन्द्र जी न्यायतीर्थ एक विचारक और सहृदय विद्वान् व्यक्ति हैं। उनकी शान्त और उदार प्रकृतिके कारण उन्हें सभी आश्रमवासी तथा सभी परिचित महानुभाव तात्याजी कहते हैं। महाराष्ट्रमें तात्या जी सम्मानित व्यक्तिको ही कहा जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि अपने सद्गुणोंके कारण वे सबके सम्मानास्पद बने हुए हैं। मैंने इस सम्बन्धमें जब उनसे परामर्श किया तो उनका भी यही कहना था कि मालूम पड़ता है कि यह सम्मेलन आचार्य श्री शिवसागर महाराजकी अनुमतिपूर्वक उनकी छत्रछायामें हो रहा है, अतएव आपको निर्भय होकर इसमें अवश्य ही भाग लेना चाहिए। मुझे उनकी यह प्रामाणिक सम्मति उचित प्रतीत हुई, अतएव जयपुरके पते पर मैंने श्रीयुक्त ब्र० लाडमल जी को लिखा कि यदि दोनों पक्षके प्रमुख विद्वान् तत्त्वगोष्ठीको सफल बनाने के लिए कतिपय नियमोंको स्वीकार कर लें तो मैं इस गोष्ठीमें सहर्ष सम्मिलित होनेके लिए तैयार हूँ और साथ ही पत्रके साथ वे नियम भी बनाकर भेज दिये।
यह तो पाठकोंने पढ़ा ही होगा कि मेरे और श्री पं० वंशीधरजी व्या० आ० के नामसे जैन सन्देश १७ अक्टूबर सन् ६३ के अंकमें ‘सैद्धान्तिक चर्चाके लिए आधारभूत कुछ नियम’ इस शीर्षकसे एक वक्तव्य प्रकाशित हुआ था। मैंने इन नियमोंको बनाते समय उस वक्तव्यको अपनी दृष्टिमें रखा है।
पहले तो ब्रह्मचारीजीका मेरे पास यही उत्तर आया कि कुछ पहले श्रीयुक्त पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्री यहाँ आये थे। उनके साथ इस विषयमें पर्याप्त ऊहापोह हो लिया है, अतः नियमोंके विषयमें आप उनसे बातचीत कर लें और अपनी स्वीकृति भेज दें।
किन्तु इसके उत्तरमें उनसे पुनः यही निवेदन किया गया कि उक्त नियम दोनों पक्षोंको ध्यानमें रख कर बनाये गये हैं, अतः तत्त्वगोष्ठीके पूर्व दूसरे पक्षकी ओरसे उनकी स्वीकृति आवश्यक है। तत्त्वचर्चामें सम्मिलित होनेके लिए मेरा बिस्तर बँधा रखा है । किन्तु मैं नियमोंकी स्वीकृति मिलने पर ही सम्मिलित हो सकूँगा ।
जैसा कि ब्रह्मचारीजीके पत्रसे मालूम हुआ था, मेरा उत्तर पहुँचने पर उन्होंने उन नियमोंकी प्रतिलिपि दूसरे पक्षके प्रमुख विद्वानोंके पास भेज दी थी और अन्तमें श्रीमान् पं० मक्खनलाल जी न्यायालंकार तथा श्री पं० बंशीधरजी व्याकरणाचार्यका अनुकूल उत्तर प्राप्त कर उसकी खबर मुझे दी थी । मुझे ब्रह्मचारीजीका यह पत्र १७ अक्टूबर ६३ को डोंगरगढ़में मिला था । तत्त्वचर्चा प्रारम्भ होनेके लिए कुल ३ दिन शेष थे, इसलिए मैंने तार द्वारा अपनी स्वीकृति दे दी और लिख दिया कि यहाँसे मैं सीधा जयपुर पहुँच रहा हूँ ।
\१०. जयपुरके लिए प्रस्थान
डोंगरगढ़ मेरे परम स्नेही दानवीर सेठ भागचन्दजीका निवास स्थान है । इन दोनों दम्पतिका मुझपर परम स्नेह है । मेरे बाह्य सुख-दुखका वे बराबर ख्याल रखते हैं । उन्होंने मुझसे कहा कि आप इतने बड़े सम्मेलनमें अकेले जा रहे हैं यह मुझे अच्छा नहीं लगता । मैं आपके साथ चलनेके लिए तैयार हूँ । पर मैं वहाँ चल कर भी आपकी क्या सहायता कर सकूँगा यह मुझे समझमें नहीं आता । उनकी इस परेशानीको देख कर मैंने उन्हें आश्वस्त किया और कहा कि मेरे लिए पंच परमेष्ठी और धर्मकी शरण है, भय किस बातका । आप चिन्ता न करें । यह सुवर्ण अवसर है । मुझे प्रेमपूर्वक विदा कीजिए । वहाँ जो भी महानुभाव पधारेंगे वे सब अपने धर्मबन्धु हैं, अतएव चिन्ता करनेकी कोई बात नहीं । और इस प्रकार विविध वार्तालाप द्वारा उन्हें आश्वस्त कर मैं उसी दिन रात्रिको गाड़ीसे जययुरके लिए रवाना हो गया और ता० १९ की शामको मैं जयपुर पहुँच गया ।
डोंगरगढ़से रवाना होनेके पूर्व मैंने एक जरूरी तार सोनगढ़ माननीय रामजी भाईको दिया था । उसमें लिखा था कि मैं तत्त्वगोष्ठीमें सम्मिलित होनेके लिए जयपुर जा रहा हूँ । आप किसी निजी विश्वस्त आदमीके हाथ जैन गजट और दूसरे साप्ताहिक पत्रोंकी फायल अवश्य भेज दें । क्योंकि उस समय तक यह स्पष्ट न हो सका था कि यह चर्चा किस विषय पर होगी । इसलिए मुझे इस ओर ध्यान देना आवश्यक प्रतीत हुआ ।
\११. श्रीमान् पं० चैनसुखदासजीके सानिध्यमें
जैसा कि मैं पहले ही संकेत कर आया हूँ कि मैं १९ ता० की शामको ही जयपुर पहुँच गया था । मैं अपने जीवनमें जयपुर कभी नहीं गया था, इसलिए इस विचारमें पड़ गया कि कहाँ जाया जाय । मेरे पास ब्र० लाडमलजीका पता तो था ही, इसलिए मैंने रिक्सा द्वारा सर्व प्रथम वहीं पहुँचनेका निश्चय किया । किन्तु वहाँ पहुंचने पर मालूम हुआ कि यहाँ सम्मेलनकी कोई तैयारी नहीं है । यहाँ तो मात्र एक जिनालय और उसीके अन्तर्गत दो-तीन कमरोंकी एक धर्मशाला है जो सदा बन्द रहती है । क्या किया जाय यह विचार ही कर रहा था कि इतनेमें एक सद्गृहस्थ सज्जनसे मेरी भेंट हो गई । पहले तो उन्होंने मेरा नाम और स्थान पूछा । उसकी जानकारी होनेपर वे बोले कि आप अच्छे आ गये । आप नहीं आते तो सम्मेलन स्थगित हो जाता । इसके बाद उन्होंने बतलाया कि तत्त्वचर्चाका आयोजन खानियामें किया गया है । मेरे यह कहने पर कि मुझे वहाँ पहुँचानेका प्रवन्ध करा दीजिए । रिक्सा वाला जो लेगा मैं दे दूँगा । उन्होंने कहा कि खानिया शहरके बाहर बहुत दूर जंगलमें है । रात्रिमें आपको लेकर वहाँ रिक्सावाला नहीं जायगा । इस बातको सुनकर मैं पुनः विचारमें पड़ गया कि अब क्या किया जाय। जो पता दिया था वहाँ तो ठहरनेका प्रबन्ध ही नहीं था। अन्तमें मुझे श्रीमान् पण्डित चैनसुखदासजीका स्मरण हो आया। मैंने उनसे कहा कि पण्डित जी यहाँसे कितनी दूर रहते हैं, मुझे उनके पास ही पहुँचानेका प्रबन्ध करा दीजीए। वे बोले यह ठीक है, उनका निवासस्थान यहीं नजदीक है। इसके बाद उन्होंने श्रीमन्दिरजीकी मालिनसे कहा कि इन्हें पण्डितजीके पास पहुँचा आओ ये तुम्हें चार आना पैसे दे देंगे। किन्तु मालिन तैयार नहीं हुई, वह बहुत अधिक पैसे माँगने लगी। मैं इसके लिए भी तैयार था पर ये महाशय नहीं माने और स्वयं मेरा सामान ले कर मुझे पण्डितजीके पास पहुँचा आये। मैं उनका नाम तो नहीं जानता, पर उनकी इस सहृदयताको जीवनभर नहीं भूल सकता। ऐसे उदारचरित महानुभाव आज भी अपनी समाजमें हैं यह गौरवकी बात है।
पण्डितजी एक उच्चकोटिके कर्मठ विद्वान् हैं। उनका पूरा समय समाज सेवा, साहित्यनिर्माण और छात्रोंके हितमें व्यतीत होता है। मेरे वहाँ पहुँचने पर उन्होंने मुझे इस प्रकारसे अपनाया जैसे मैं उनका चिरपरिचित आत्मीय जन होऊँ। प्रातःकाल किसी तरह श्रीनेमिचन्दजी पाटनीको मेरे आनेकी खबर लग गई। वे तत्काल मेरे पास आये। भेंट होने पर उन्होंने अपनी स्थिति बतलाई और साथ ही बोले कि जब आप आ ही गये तो मैं हर तरह आपके साथ हूँ।
\१२. चरणरजवन्दना
आपसकी बहुत कुछ बातें होनेके बाद मैंने उनसे कहा कि सर्व प्रथम मैं उस जिनालयमें जाना चाहता हूँ जहाँ बैठ कर आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमलजी सा० परमागमकी रचना करते थे। एक तो वह जिनालय है, दूसरे वह पण्डितजीके चरणस्पर्शसे भी मेरे लिए वन्दनीय है। पाटनीजी बोले, वहाँ तो मैं प्रतिदिन जाता हूँ। प्रातःकालीन प्रवचन मैं वहीं करता हूँ। यह जान मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं तत्काल उनके साथ हो लिया। श्री जिनालयमें पहुँच कर पहले तो वीतरागदेवके दर्शन किये। बादमें जहाँ पण्डित जी बैठते थे उस स्थानकी चरण रजको अपने मस्तक पर धारण किया। साथ ही यह निवेदन किया कि जिस कार्यके लिए मैं यहाँ आया हूँ यह आपका ही कार्य है, मुझे आपका बल चाहिए। पश्चात् प्रवचन करके पण्डितजीके निवासस्थान पर लौट आया।
मध्यान्हमें मैं और पाटनीजी खानियाजी गये। वहाँ आवश्यक कृतिकर्म करके आये हुए विद्वानोंसे मिले। अनेक विद्वान् आ चुके थे और कुछ आनेवाले थे। किन्तु प्रारम्भिक दिन होनेसे उस दिन कार्य प्रारम्भ न हो सका। ब्रह्मचारीजीसे मिलने पर मालूम हुआ कि अभी कुछ विद्वानोंका आना शेष है, इसलिए कल २१ ता० को दिनके १ बजेसे गोष्ठीका कार्य प्रारम्भ होगा। आप कल नियत समय पर अवश्य ही आ जावें। मैं वहाँसे लौटकर तथा पण्डितजीसे अनुज्ञा लेकर पाटनीजीके घर चला गया। वहाँ पहुँचने पर मालूम हुआ कि श्री दि० जैन महामुमुक्षुमण्डल और मुमुक्षुमण्डल बम्बईके मंत्री श्री चिमनलालजी सोनगढ़से आवश्यक सामग्री लेकर आ गये हैं। वे मुझसे मिले। बड़ी प्रसन्नता हुई। जहाँतक मुझे स्मरण है श्री सेठ लादूलालजी भी किशनगढ़से इसी दिन आ गये थे। ये पाटनीजीके बहनोई हैं। साथमें पाटनीजीकी बहिन भी आई थीं। आते ही भीतरकी पूरी व्यवस्था पाटनीजी की बहिनने सम्हाली और बाहरकी लिखापढ़ीका पूरा भार श्री सेठ लादूलालजीने सम्हाला । मेरा काम उत्तर पत्रोंका तैयार करना रहता था और उनकी तीन कापी तैयार कर देना इनका काम रहता था। ये धर्मशास्त्र और संस्कृतके अच्छे जानकार हैं। साथ ही मिलनसार और बड़े सहृदय व्यक्ति हैं।
\१३. अधिकृत कार्यवाहीका प्रारम्भ
ता० २१ को नियत समय पर हम सब लोग मिलकर खानियाजी पहुँच गये और आवश्यक कृतिकर्म सम्पन्न होनेके बाद बैठकमें सम्मिलित हो गये । इसके आगेकी प्रतिदिनकी पूरी कार्यवाही श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्यने लिपिबद्ध की है । वे बड़े कर्मठ व्यक्ति हैं । लिखापढ़ीका काम आसानीसे निपटा लेते हैं । प्रत्येक दिनकी उस कार्यवाहीपर मध्यस्थके हस्ताक्षर हैं, इसलिए मैं उसी रूपमें उसे यहाँ दे रहा हूँ । इतना अवश्य है कि ता० २१ की बैठक श्री १०८ आचार्य महाराजकी संरक्षतामें सम्पन्न हुई और ता० २२ की बैठक समाजमान्य सर सेठ भागचन्दजी सोनी अजमेरकी अध्यक्षतामें सम्पन्न हुई । अतएव इन दोनों दिनोंकी कार्यवाही पर अध्यक्षके हस्ताक्षर हैं । प्रत्येक दिनकी अधिकृत कार्यवाही और उपस्थिति इस प्रकार है-
श्री सिद्धपरमेष्ठिने नमः
तत्त्वगोष्ठीका विवरण
आज दिनांक २१-१०-६३ को मध्याह्न १२॥ बजे खानिया स्थित नसियाँ में श्रीमान् १०८ पूज्य आचार्य शिवसागरजी महाराजके सानिध्यमें समागत विद्वानोंकी गोष्ठी हुई जिसमें निम्नाङ्कित विद्वान् उपस्थित रहे-
\१. श्री पं० इन्द्रलालजी शास्त्री, जयपुर २. श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकार, इन्दौर ३. श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना ४. श्री पं० जीवन्धरजी शास्त्री, इन्दौर ५. श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री, वाराणसी ६. श्री नेमिचन्द्रजी पाटनी, जयपुर ७. श्री ब्र० श्रीलालजी काव्यतीर्थ, महावीरजी ८. श्री सेठ बद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना ९. श्री सेठ ब्र० पन्नालालजी उमाभाई, अहमदाबाद १०. श्री चन्दूलाल कस्तूरचन्द्रजी, बम्बई ११. श्री पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा १२. श्री सेठ रामचन्द्रजी कोठयारी, जयपुर १३. ब्र० सूरजमलजी, खानिया १४. श्री भाई कोदरलाल जीवराजजी, तलोद १५. श्री पं० कपूरचन्दजी बरैया, लश्कर १६. श्री सेठ सुमेरमलजी चौधरी, अजमेर १७. श्री पं० मिश्रीलालजी शास्त्री, लाडनूं ।
कार्य-
पारस्परिक ऊहापोह के बाद तत्त्वचर्चाके लिये निम्नलिखित नियम पारित किये-
(१) चर्चा वीतरागभावसे होगी ।
(२) चर्चा लिखित होगी ।
(३) वस्तुसिद्धिके लिये आगम ही प्रमाण होगा ।
(४) पूर्वाचार्यानुसार प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी ग्रन्थ प्रमाण माने जायेंगे ।
(५) चर्चा शङ्का-समाधानके रूपमें होगी ।
(६) दोनों ओरसे शङ्का-समाधानके रूपमें जो लिखित पत्रोंका आदान-प्रदान होगा उनमेंसे अपने-अपने पत्रोंपर अधिकसे अधिक ५-५ विद्वानों और मध्यस्थकी सही होगी । इसके लिये दोनों पक्षोंकी ओर से ५-५ प्रतिनिधि नियत होंगे ।
(७) किसी एक विषयसम्बन्धी किसी विशेष प्रश्नपर शङ्का-समाधानके रूपमें पत्रोंका आदान-प्रदान अधिकसे अधिक तीन बार तक होगा ।
आजकी बैठक ४ बजे समाप्त हुई ।
दिनांक २२-१०-६३
आज खानियास्थित छोटी नसियाके ऊपर दिनके १ बजेसे श्रीमान् १०८ आचार्य शिवसागरजी महाराजके सन्निधान एवं रायबहादुर सर सेठ भागचन्द्रजी सोनी अजमेरकी अध्यक्षतामें दूसरी बैठक प्रारम्भ हुई । जिसमें निम्नप्रकार उपस्थिति रही-
\१. श्री पं० बंशीधरजी न्यायालंकार, इन्दौर २. श्री पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य, फीरोजाबाद ३. श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री, वाराणसी ४. श्री नेमिचन्द्रजी पाटनी, आगरा ५. श्री पं० अजितकुमारजी, दिल्ली ६. श्री ब्र० पन्नालालजी उमाभाई, अहमदाबाद ७. श्री पं० मिश्रीलालजी शास्त्री, लाडनूं ८. श्री पं० मक्खनलालजो शास्त्री, मोरेना ९. श्री पं० इन्द्रलालजी शास्त्री, जयपुर १०. श्री पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य, वीना ११. श्रो पं० जीवन्धरजी न्यायतीर्थ, इन्दौर १२. श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य, सागर १३. श्रो रामचन्द्रजी कोटयारी, जयपुर १४. श्री सेठ चन्दूलाल कस्तूरचन्द्रजी, वम्बई १५. श्री सेठ कोदरलालजी, तलोद १६. श्रो सेठ वालचन्द्रजी पाटनी, सुजानगढ़ १७. श्री सेठ वद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना १८. श्री कपूरचन्द्रजी वरैया एम०ए०, लश्कर १९. श्री पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा २०. श्रो सेठ रायबहादुर भागचन्द्रजी सोनी, अजमेर २१. श्री ब्र० सूरजमलजी, खानिया २२. श्री ब्र० श्रीलालजी काव्यतीर्थ, महावोरजो २३. ब्र० श्री सेठ हीरालालजो पाटनी, निवाई २४. श्री सेठ सुमेरमलजी, अजमेर ।
कार्य-
चर्चाविषयक नियमोंमें निम्नलिखित आठवाँ नियम स्वीकृत किया गया-
(८) चर्चामें सामाजिक, पन्थसम्वन्धी तथा व्यक्तिविशेषसम्वन्धो विषयोंपर चर्चा न होकर तत्त्व-सम्वन्धी ही चर्चा होगी ।
मध्यस्थका चुनाव-
श्रीमान् पं० वंशीधरजी न्यायालंकार इन्दौर मध्यस्थ चुने गये । मध्यस्थका कार्य चर्चामें व्यवस्था बनाये रखना तथा दोनों ओरके लिखित पत्रोंका आदान-प्रदान करना रहेगा । मध्यस्थ निर्णायक नहीं होगा ।
चर्चाके विषय-
श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्रीने चर्चाके लिये निम्नलिखित विषय प्रस्तुत किये-
(१) द्रव्यकर्मोंके उदयसे संसारी आत्माका विकारभाव और चतुर्गति भ्रमण होता है या नहीं ?
(२) जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म अधर्म होता है या नहीं ?
(३) जीवदयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?
(४) व्यवहार धर्म निश्चयधर्ममें साधक है या नहीं ?
(५) द्रव्योंमें होने वाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं या अनियतक्रमसे भी ?
(६) उपादान की कार्यरूप परिणतिमें निमित्त कारण सहायक होता है या नहीं ?
तदनन्तर-
उल्लिखित प्रश्नोंकी एक प्रतिलिपि मध्यस्थ महोदयने श्रीमान् पं० फूलचन्द्रजी शास्त्रीको उनके हस्ताक्षर लेकर सौंपी । पं० फूलचन्द्रजी साहब इन प्रश्नोंका लिखित उत्तर दिनांक २३-१०-६३ के एक बजे मध्यस्थ महोदयको सौंप देंगे । साथ ही अपनी ओरसे चर्चणीय विषयोंकी सूची भी प्रस्तुत कर देंगे । उभय पक्षके ५-५ प्रतिनिधियोंके नाम कलकी बैठकमें प्रस्तुत कर देंगे यह निश्चित हुआ ।
आज की बैठकके अध्यक्ष श्री सेठ भागचन्द्रजी सोनीको धन्यवाद दिये जानेके बाद ४ बजे सहर्ष समाप्त हुआ ।
खानिया
दि० २०-१०-६३
श्रीमान् पं० फूलचन्द्रजी साहब !
आज दिनांक की बैठकमें चर्चणीय विषय निम्नप्रकार हैं । इनका उत्तर लिखकर आप दिनांक २३-१०-६३ को मध्याह्न १ बजे तक हमारे पास भेजनेका कष्ट करेंगे । साथ ही आपकी ओरसे चर्चणीय विषयों की सूची भी हमें १ बजे तक प्राप्त हो जावे ऐसी व्यवस्था कीजिये ।
चर्चणीय विषय
(१) द्रव्यकर्मोंके उदयसे संसारी आत्माका विकारभाव और चतुर्गति भ्रमण होता है या नहीं ?
(२) जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म-अधर्म होता है या नहीं ?
(३) जीव दयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?
(४) व्यवहारधर्म निश्चयधर्ममें साधक है या नहीं ?
(५) द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं या अनियतक्रमसे भी ?
(६) उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें निमित्तकारण सहायक होता है या नहीं ?
तृतीय बैठक दिनांक २३-१०-६३
आज दिनांक २३-१०-६३ को मध्याह्नके बाद १ बजेसे श्री पूज्यवर १०८ आचार्य शिवसागरजीके सन्निधान और श्री पं० बंशीधरजी शास्त्री इन्दौरकी मध्यस्थतामें कार्य प्रारम्भ हुआ । उपस्थिति निम्न प्रकार रही-
\१. श्री ब्र० सेठ पन्नालालजी उम्मेदभाई, अहमदाबाद २. श्री सेठ रायबहादुर भागचन्द्रजी सोनी, अजमेर ३. श्री पं० बंशीधरजी न्यायालंकार, इन्दौर ४. श्री पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य, फीरोजाबाद ५. श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री, वाराणसी ६. श्री नेमिचन्द्रजी पाटनी, जयपुर ७. श्री पं० अजितकुमारजी, दिल्ली ८. श्री पं० मिश्रीलालजी शास्त्री, लाडनूं ९. श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना १०. श्री पं० इन्द्रलालजी शास्त्री, जयपुर ११. श्री पं० बंशीधरजी व्याकरणाचार्य, बीना १२. श्री पं० जीवन्धरजी न्यायतीर्थ, इन्दौर १३. श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य, सागर १४. श्री रामचन्द्रजी कोटयारी, जयपुर १५. श्री सेठ चन्दूलाल कस्तूरचन्द्रजी, बम्बई १६. श्री सेठ बालचन्द्रजी पाटनी, सुजानगढ़ १७. श्री श्री सेठ बद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना १८. श्री कपूरचन्द्रजी बरैया, लश्कर १९. श्री पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा २०. श्री ब्र० सूरजमलजी, खानिया २१. श्री० ब्र० श्रीलालजी काव्यतीर्थ, श्रीमहावीरजी २२. श्री ब्र० सेठ हीरालालजी पाटनी, निवाई २३. श्री कोदरलालजी, तलोद २४. श्री ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्तार, सहारनपुर २५. श्री नेमिचन्द्रजी वकील, सहारनपुर २६. श्री ब्र० चाँदमलजी चूड़ीवाल, नागौद २७. श्री सेठ नेमिचन्द्रजी बड़जात्या, नागोद २८. श्री इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर ।
कार्य-
पाँच-पाँच प्रतिनिधियोंका चुनाव-
प्रथम पक्षसे निम्नलिखित पाँच-पाँच प्रतिनिधियोंके नाम प्रस्तुत किये गये-
\१. श्री पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य, फीरोजावाद २. श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना ३. श्री पं० जीवन्धरजी न्यायाचार्य, इन्दौर ४. श्री पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य, बीना ५. पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य, सागर।
(२) द्वितीय पक्षसे निम्नलिखित दो नाम प्रस्तुत किये गये शेष नाम अगले दिन प्रस्तुत करनेकी बात तय हुई-
(१) श्री पं० फूलचन्द जी शास्त्री, (२) श्री नेमिचन्द्र जी पाटनी, आगरा।
चर्चणीय विषय प्रस्तुत करने पर विचार
निश्चित हुआ कि दोनों पक्षोंके चर्चणीय विषय कल ता० २४-१०-६३ तक प्रस्तुत किये जा सकेंगे।
तदनन्तर श्री पं० फूलचन्द्र जी शास्त्रीने कल दिये गये ६ प्रश्नोंका उत्तर मध्यस्थ महोदयको सौंपा और मध्यस्थ महोदयकी आज्ञानुसार उपस्थित जनताकी जानकारीके लिये श्री पं० पन्नालाल जी साहित्याचार्यने उसे पढ़कर सुनाया।
प्रथम पक्षकी ओरसे निम्नलिखित तीन प्रश्न प्रस्तुत किये गये, जिन्हें मध्यस्थ महोदयने उत्तर देनेके लिये श्री पं० फूलचन्द्रजीको सौंपा। पण्डितजी इनका उत्तर कल १ बजे उपस्थित करेंगे।
(१) केवली भगवान्की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे ? यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?
(२) दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं ? यदि है तो कौन सम्बन्ध है ? वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्की आत्माके सम्बन्धसे ?
(३) सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बंधा हुआ है ? और किसीसे बँधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ? यदि वह बद्ध है तो उसके बन्धनसे छूटनेका उपाय क्या है ?
श्रीमान् पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री
२३-१०-६३
आपकी सेवामें निम्नाङ्कित तीन प्रश्न प्रस्तुत हैं। इनका उत्तर आप कल १ बजे तक उपस्थित करनेका कष्ट करेंगे।
(१) केवली भगवान्की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे। यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?
(२) दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं ? यदि है तो कौन सम्बन्ध है ? वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्की आत्माके सम्बन्धसे ?
(३) सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बंधा हुआ है ? और किसीसे बँधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ? यदि यह बद्ध है तो उसके बन्धनोंसे छूटनेका उपाय क्या है ?
चौथी बैठक दिनांक २४-१०-६३
आज दिनांक २४-१०-६३ को मध्याह्नके उपरान्त १ बजेसे श्री १०८ पूज्यवर आचार्य शिवसागरजी महाराजके सन्निधान और श्री पं० बंशोधरजी न्यायालंकार इन्दौरकी मध्यस्थतामें बैठक प्रारम्भ हुई । जिसमें उपस्थिति निम्नप्रकार हुई-
\१. श्री सेठ ब्र० पन्नालाल उम्मेद भाई, अहमदाबाद २. श्री वंशीधरजी न्यायालंकार इन्दौर, ३. श्री पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य ४. श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री ५. श्री नेमिचन्द्रजी पाटनी, आगरा ६. श्री पं० अजितकुमारजी शास्त्री, दिल्ली ७. श्री पं० मिश्रीलालजी शास्त्री, लाडनूं ८. श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना ९. श्री पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य, बीना १०. श्री पं० जीवन्धरजी न्यायतीर्थ इन्दौर ११. श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य, सागर १२. रामचन्द्रजी कोटयारी जयपुर, १३. श्री सेठ चन्दूलाल कस्तूरचन्द्रजी, बम्बई १४. श्री सेठ बालचन्द्रजी पाटनी, सुजानगढ़ १५. श्री सेठ बद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना १६. श्री कपूरचन्द्रजी बरैया, लश्कर १७. श्री पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा १८. श्री ब्र० सूरजमलजी, खानिया १९. श्री सेठ हीरालालजी पाटनी, निवाई २०. श्री सेठ कोदरलालजी, तलोद २१. श्री ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्त्यार, सहारनपुर २२. श्री नेमिचन्द्रजी वकील, सहारनपुर २३. श्री ब्र० चाँदमलजी चूड़ीवाल, नागौर २४. श्री सेठ नेमिचन्द्रजी बड़जात्या, नागौर २५. श्री इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर २६. श्री पं० जुगलकिशोरजी मुख्त्यार २७. श्री पं० कैलाशचन्द्रजी शास्त्री, वाराणसी २८. श्री पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्री, कटनी २९. श्री पं० परमानन्दजी शास्त्री, दिल्ली ३० श्री पं० गोरेलालजी शास्त्री, माधवराजपुरा ३१. श्री पं० सीमंधरजी, जयपुर ३२. श्री पं० इन्द्रलालजी शास्त्री, जयपुर ।
कार्य-
(१) श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्रीने २ प्रतिशंकायें उपस्थित कीं, जिनका वाचन मध्यस्थकी आज्ञानुसार पं० पन्नालालजी ने किया ।
(२) श्री पं० फूलचन्द्रजीकी ओरसे-श्री पं० जगन्मोहनलालजी, पं० फूलचन्द्रजी वाराणसी और नेमिचन्द्रजी पाटनी ये नाम प्रतिनिधिके रूपमें उपस्थित किये गये ।
(३) श्रीमान् पं० फूलचन्द्रजीने दिनांक २३-१०-६३ के तीन प्रश्नोंका उत्तर मध्यस्थ महोदयको सौंपा जिसे उनकी आज्ञानुसार पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाया । तदनन्तर दोनोंसे चर्चणीय प्रश्नोंको उपस्थित करनेके लिए कहा गया जिसके फलस्वरूप पं० मक्खनलालजोकी ओरसे निम्नलिखित प्रश्न उपस्थित किये गये-
(१) जीव तथा पुद्गलका एवं द्वयणुक आदि स्कन्धोंका बन्ध वास्तविक है या अवास्तविक ? यदि अवास्तविक है तो केवली भगवान् उसे जानते हैं या नहीं ?
(२) परिणमनके स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय दो भेद हैं, उनमें वास्तविक अन्तर क्या है ?
(३) 'कुगुरु, कुदेव, कुशास्त्रकी श्रद्धाके समान सुदेव, सुशास्त्र, सुगुरुकी श्रद्धा भी मिथ्याभाव है, क्या ऐसा मानना व कहना शास्त्रोक्त है ?
(४) पुण्यका फल जब अर्हन्त होना तक कहा है ( पुण्यफला अरहंता प्र० सा० ) और जिससे यह आत्मा तीन लोकका अधिपति बनता है उसे ‘सर्वातिशायी पुण्य’ बतलाया है ( सर्वातिशायि पुण्यं तत् त्रैलोक्याधिपतित्वकृत् ) तब ऐसे पुण्यको हीनोपमा देकर त्याज्य कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?
(५) पुण्य अपनी चरमसीमाको पहुँचकर अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणमन होने पर स्वतः छूट जाता है या उसके छुड़ानेके लिये किसी उपदेश और प्रयत्नकी जरूरत है ?
(६) भावलिङ्गी मुनि आजकल हैं या नहीं ? तथा भावलिङ्गकी प्रकटमें पहिचान क्या है ?
(७) बकरेको काटकर उसका मांस फकीरको धर्म मानकर धर्मबुद्धिसे खिलानेवाले तथा अरहन्तदेवकी पूजा करनेवालेमें कोई अन्तर नहीं है, ऐसा कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?
(८) जब अभाव चतुष्टय वस्तुस्वरूप है ( भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मः ) तो वे कार्य व कारणरूप क्यों नहीं माने जा सकते ? तदनुसार घातिया कर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको क्यों उत्पन्न नहीं करता ?
(९) निश्चय और व्यवहारनयका स्वरूप क्या है ? व्यवहारनयका विषय असत्य है क्या ? असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप है ?
(१०) उपचारका लक्षण क्या है ? निमित्तकारण और व्यवहारनयमें यदि क्रमशः कारण और नयत्वका उपचार है तो उनमें उपचारका लक्षण घटित कीजिये ।
उक्त प्रश्न पं० फूलचन्द्रजीको सौंपे जानेपर उनकी ओरसे ६ वाँ और ७ वाँ प्रश्नका उत्तर देनेमें आपत्ति प्रकट की गई जिससे प्रश्नकर्ताओंने उन्हें वापिस ले लिया । पण्डितजीने शेष ८ प्रश्नोंका उत्तर देना स्वीकृत किया ।
तदनन्तर ४॥ बजे कार्यवाही समाप्त हुई ।
५वीं बैठक दिनांक २५-१०-६३
आज पूज्यवर आचार्य श्री १०८ शिवसागरजी एवं उनके संघस्थ अन्य महाराजों के संनिधान और श्री पं० ब्र० वंशीधरजी की मध्यस्थतामें गोष्ठीकी पांचवीं बैठक हुई । उपस्थिति निम्न प्रकार रही-
कलकी उपस्थितिसे पं० राजेन्द्रकुमारजी मथुराकी उपस्थिति अधिक रही, श्री पं० सूरजमलजीने मंगलाचरण किया । तदनन्तर दोनों ओरसे अपने-अपने उत्तर मध्यस्थ महोदयको सौंपे गये । उनकी आज्ञानुसार पं० फूलचन्द्रजीकी ओरसे उत्तर श्री पं० जगन्मोहनलालजीने और पं० मक्खनलालजी आदि की ओरसे उत्तर पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाए । अनन्तर बैठक समाप्त हुई ।
६वीं बैठक दिनांक २६-१०-६३
आज दिनांक २६-१०-६३ शनिवारको पूज्यवर आचार्य श्री १०८ शिवसागरजी महाराज तथा अन्य संघस्थ महाराजोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी अध्यक्षतामें गोष्ठीकी छठवीं बैठक हुई । उपस्थिति निम्न प्रकार रही-
(१) श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकार (२) श्री रायबहादुर सेठ भागचन्द्रजी सोनी, (३) ब्र० चांदमलजी चूड़ीवाल (४) पं० कैलाशचन्द्रजी (५) पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य (६) पं० जीवन्धरजी न्या० तो० (७) पं० मक्खनलालजी (८) ब्र० रतनचन्द्रजी (९) पं० अजितकुमारजी (१०) पं० हेमचन्द्रजी कौन्देय अजमेर (११) पं० राजेन्द्रकुमारजी (१२) सेठ बद्रीप्रसादजी (१३) नेमिचन्द्रजी वकील (१४) पं० सीमन्धरजी (१५) पं० पन्नालालजी (१६) पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य (१७) पं० जगन्मोहनलालजी (१८) पं० फूलचन्द्रजी (१९) नेमिचन्द्रजी पाटनी (२०) पं० नरेन्द्रकुमारजी बड़जात्या (२१) पं० इन्द्रलाल जी (२२) सेठ रामचन्द्रजी कोटयारी, (२३) कपूरचन्द्रजी वरैया, लश्कर (२४) कोदरलालजी, तलोद (२५) इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर (२६) ब्र० लाभानन्दजी, (२७) पं० मिश्रीलालजी, लाडनूं (२८) चिमन भाई, बम्बई (२९) श्री सेठ चंदूलालजी (३०) ब्र० श्रीलालजी (३१) ब्र० सूरजमलजी (३२) ब्र० लाडमल जी (३३) ब्र० सेठ हीरालालजी पाटनी (३४) पं० पन्नालालकी सोनी, ब्यावर।
मंगलाचरण श्री पं० मक्खनलालजीने किया।
कार्य-
दोनों ओरसे उत्तर प्रत्युत्तरके कागजात मध्यस्थ महोदयको सौंपे गये। उनकी आज्ञानुसार उन्हें श्री पं० जगन्मोहनलालजी और पं० पन्नालालजी ने क्रमशः पढ़कर सुनाये।
कार्यवाही २॥ बजे समाप्त हुई।
७वीं बैठक दिनांक २७-१०-६३
आज श्री १०८ पूज्य आचार्य शिवसागरजी महाराज तथा संघस्थ अन्य महाराजोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजीकी मध्यस्थतामें गोष्ठीकी सातवीं बैठक हुई। दोनों ओरके कागजात मध्यस्थ महोदय को सौंपे गये। तदनन्तर उनकी आज्ञानुसार श्री पं० जगन्मोहनलालजी और श्री पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाये। उपस्थितिमें कलकी उपस्थितिके अनुसार रा० ब० सेठ भागचन्द्रजी तथा पं० हेमचन्द्रजी अजमेर अनुपस्थित रहे। ४ बजे कार्य समाप्त हुआ।
८वीं बैठक दिनांक २८-१०-६३
आज २८-१०-६३ को श्री १०८ पूज्य आचार्य शिवसागरजी तथा संघस्थ अन्य महाराजोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी मध्यस्थतामें गोष्ठीकी ८वीं बैठक हुई। उपस्थिति पूर्ववत् रही-
\१. श्री पं० वंशीधरजी ( मध्यस्थ ) २. पं० माणिकचन्द्रजी ३. पं० जगन्मोहनलालजी ४. पं० राजेन्द्रकुमारजी ५. नेमिचन्द्रजी पाटनी ६. पं० नरेन्द्रकुमारजी ७. चिमन भाई ८. इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा ९. कोदरलालजी १०. इन्द्रलालजी ११. कपूरचन्द्रजी वरैया १२. चन्दूलालजी बम्बई १३. संघपति मोतीलालजी बम्बई १४. पं० पन्नालालजी १५. पं० सीमंधरजी, जयपुर १६. नेमिचन्द्रजी वकील १७. पं० वंशीधरजी बीना १८ सेठ बद्रीप्रसादजी १९. पं० जीवन्धरजी २० पं० मक्खनलालजी २१. पं० वृन्दावनदासजी २२. ब्र० लाडमलजी २३. सेठ रामचन्द्रजी कोटयारी २४. पं० पन्नालालजी सोनी २५. ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्त्यार, २६. प्यारेलालजी बड़जात्या २७. पं० अजितकुमारजी दिल्ली २८. ब्र० सूरजमलजी २९. ब्र० सेठ हीरालालजी निवाई ३०. श्री मनोहरलालजी एम० ए०, अजमेर ३१. छगनलालजी पाटनी, अजमेर।
कार्य-
दोनों ओरसे कागजात पेश किये जानेपर मध्यस्थके आदेशानुसार पं० जगन्मोहनलालजी और पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाये।
अनन्तर ४ बजे कार्यवाही समाप्त हुई।
९वीं बैठक दिनांक २९-१०-६३
आज दिनांक २९-१०-६३ मंगलवारको श्री १०८ पूज्य आचार्य शिवसागरजी महाराज तथा संघस्थ अन्य महाराजोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी मध्यस्थामें तत्त्वगोष्ठीकी नवीं बैठक हुई। उपस्थिति निम्न प्रकार रही-
\१. सर सेठ भागचन्द्रजी, सोनी २ पं० वंशीधरजी, न्यायालंकार ३. पं० माणिकचन्द्रजी ४. पं० जगन्मोहनलालजी ५. पं० फूलचन्द्रजी ६. श्री नेमिचन्द्रजी, पाटनी ७. पं० नरेन्द्रकुमारजी, भिसीकर ८. कपूरचन्द्रजी एम० ए० लश्कर, ९. पं० वृन्दावनजी, १०. चिमन, भाई ११. मास्टर मनोहरलालजी एम० ए०, १२. इन्द्रलालजी, १३. छगनलालजी पाटनी, अजमेर १४. सेठ बद्रीप्रसादजी, सरावगी १५. सेठ मोतीलालजी संघपति, बम्बई १६. पं० पन्नालालजी, १७. पं० राजेन्द्रकुमारजी, १८. पं० हेमचन्द्रजी, अजमेर १९. पं० जीवन्धरजी, २०. पं० कैलाशचन्द्रजी २१. पं० अजितकुमारजी २२. पं० पन्नालालजी, सोनी २३. पं० मक्खनलालजी, २४. नेमिचन्द्रजी, वकील २५. ब्र० रतनचन्द्रजी, मुख्त्यार २६. ब्र० सेठ हीरालालजी, निवाई २७. इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर २८. प्यारेलालजी, बड़जात्या २९. रघुवरदयाल जैन, दिल्ली ३०. महेशचन्द्र मेरठ, ३१. ब्र० लाडमलजी, खानिया।
मध्यस्थ महोदयने दोनों पक्षके कागजात पेश किये और उनकी आज्ञानुसार पं० जगन्मोहनलालजी तथा पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाये।
तदनन्तर ४। बजे सभा समाप्त हुई।
१०वीं बैठक दिनांक ३०-१०-६३
आज दि० ३०-१०-६३ बुधवारको श्रीमान् पूज्यवर आचार्य शिवसागरजी महाराज और उनके संघस्थ अन्य महाराजोंके संनिधान एवं पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी मध्यस्थतामें गोष्ठीकी १०वीं बैठक हुई। उपस्थिति निम्न प्रकार रही-
(१) श्री पं० वंशीधरजी, न्यायालंकार (२) पं० कैलाशचन्द्रजी (३) पं० फूलचन्द्रजी (४) नेमिचन्द्र जी पाटनी (५) चिमनभाई, बम्बई (६) कपूरचन्द्रजी बरैया एम० ए (७) सेठ कोदरलालजी, तलोद (८) सेठ बद्रीप्रसादजी, पटना (९) पं० हेमचन्द्रजी एम० ए०, अजमेर (१०) पं० पन्नालालजी सा० आ० (११) पं० वंशीधरजी, बीना (१२) पं० सीमंधरजी जयपुर, (१३) पं० राजेन्द्रकुमारजी, मथुरा (१४) पं० जीवंधरजी, इन्दौर (१५) ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्त्यार, (१६) पं० पन्नालालजी सोनी, ब्यावर (१७) पं० मक्खनलालजी, मोरेना (१८) पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य (१९) पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा (२०) इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर (२१) सेठ मोतीलालजी संघपति, बम्बई (२२) सेठ ब्र० हीरालालजी पाटनी, निवाई (२३) ब्र० सूरजमलजी, खानियां (२४) पं० वृन्दावन प्रसादजी, वरैया (२५) नेमिचन्द्रजी वकील, सहारनपुर (२६) पं० जगन्मोहनलालजी, कटनी (२७) ब्र० लाडमलजी, खानियां।
कार्य-
पं० जगन्मोहनलालजी ने अपने द्वारा समर्पित सामग्री मध्यस्थ महोदय को सौंपी और उनकी आज्ञानुसार उन्होंने उनका वाचन किया। तदनन्तर पं० वंशीधरजीने उभय पक्षकी संमतिसे घोषित किया कि १।११।६३ को गोष्ठीका समारोप हो जायगा। चर्चाका तीसरा दौर स्थगित किया जायगा, फिर अन्य किसी समय अवशिष्ट चर्चाका आयोजन किया जायगा। आगामी दिन ३१।१०।६३ को मुनिदीक्षाका समारोह होने से चर्चा बन्द रहेगी।
११वीं बैठक दिनांक १-११-६३
आज दिनांक १-११-६३ शुक्रवारको २ बजे से श्रीमान् पूज्य आचार्य शिवसागरजी महाराज तथा संघस्थ अन्य मुनियोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी मध्यस्थतामें गोष्ठीकी ११वीं बैठक सम्पन्न हुई। जिसमें उपस्थिति निम्न प्रकार रही-
\१. श्री पं० पन्नालालजी, सोनी २. रायबहादुर सर सेठ भागचन्द्रजी, सोनी ३. पं० कैलाशचन्द्रजी ४. पं० वंशीधरजी, न्यायालंकार ५. पं० वंशीधरजी, व्याकरणाचार्य ६. पं० माणिकचन्द्रजी, न्यायाचार्य ७. पं० जगन्मोहनलालजी ८. पं० फूलचन्द्रजी ९. नेमिचन्द्रजी पाटनी, १०. कपूरचन्द्रजी वरैया एम० ए०, ११. कोदरलालजी तलोद, १२. पं० इन्द्रलालजी, शास्त्री १३. पं० जीवन्धरजी, न्यायतीर्थ १४. पं० सीमन्धरजी १५. संघपति मोतालालजी, बम्बई १६. सेठ बद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना १७. रामचन्द्रजी, कोटयारी १८. ब्र० नेमिचन्द्रजी, वकील १९. ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्त्यार, २०. पं० राजेन्द्रकुमारजी २१. पं० अजितकुमारजी, दिल्ली २२. पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना २३. इन्द्रचन्द्रजी छावडा, लश्कर २४. पं० श्रीलालजी काव्यतीर्थ, महावीरजी २५. चौ० सुमेरमलजी महामंत्री महासभा, अजमेर २६. प्यारेलालजी, बड़जात्या २७. ब्र० सेठ हीरालालजी, पाटनी २८. पं० वृन्दावनजी २९. चिमन भाई, बम्बई ३०. श्री सेठ चन्दूलालजी ,बम्बई।
८-१७ तक प्रतिशंकाओंके उत्तर समर्पित किये जाने पर मध्यस्थ महोदयकी आज्ञासे पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्रीने पढ़कर सुनाये। तदनन्तर आगेके लिये निम्न व्यवस्था निश्चित की गई-
(१) समय अधिक हो जानेके कारण तत्त्वचर्चाके दौर समाप्त करके आगेके लिये स्थगित की जाती है।
(२) तीसरे दौरके लिये निम्नलिखित व्यवस्था बनाई जाती है।
(क) प्रथम पक्ष समस्त प्रत्युत्तरों पर अपनी प्रतिशंकाएं आज ता० १-११-६३ से २ माह के अन्दर रजिस्ट्री द्वारा पं० फूलचन्द्रजी वाराणसीके पास भेज देगा। और जिस तारीखको यह सामग्री पं० फूलचन्द्रजीको प्राप्त होगी उससे २॥ माह होने पर यदि रविवार न हुआ न अगली तारीखको और रविवार हुआ तो दूसरी तारीखको पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्यजी बीनाके पास रजिस्ट्री द्वारा भेज देंगे।
(ख) दोनों ओरके वक्तव्य कुल मिलाकर अद्धा पुलिसकेपके १५०-१५० पृष्ठसे अधिक न हों।
(३) तीसरा दौर समाप्त होनेपर पुस्तकका प्रकाशन दोनों पक्षोंकी सम्मतिसे उनके निर्णयानुसार होगा, उसके पहले नहीं।
(४) समाचार-पत्रोंमें प्रश्नोत्तरोंका प्रकाशन तथा उनकी आलोचना प्रत्यालोचना बन्द रहेगी।
अधिकार-पत्र
हम नीचे लिखे प्रतिनिधि तत्त्वचर्चाके अन्तिम ( तृतीय ) दौरमें सभी प्रतिशङ्काओं व दीगर कागजातपर हस्ताक्षर करनेका अधिकार श्री पं० अजितकुमारजी शास्त्री दिल्लीको या प्रतिनिधियोंमेंसे जो भी समयपर उपस्थित रहेगा उसे यह अधिकार देते हैं कि वह हस्ताक्षर कर कागजातका आदान-प्रदान करें। इनमेंसे किसीके भी हस्ताक्षर हमलोगोंको मान्य होंगे। कोई भी पत्रव्यवहार निम्नाङ्कित पतोंपर किया जा सकता है-
\१. पं० अजितकुमारजी शास्त्री, अभय-प्रिंटिग प्रेस, अहाता केदारा, पहाड़ीधीरज, दिल्ली।
\२. पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य, बीना ( सागर ), मध्यप्रदेश।
१-११-६३
आवश्यक विवरण
यह विद्वत्सम्मेलनकी प्रत्येक दिनकी अधिकृत कार्यवाहीका विवरण है। इसे प्रतिदिन श्रीयुत् पण्डित पन्नालालजी साहित्याचार्य सागर तैयार करते थे। बादमें मध्यस्थके हस्ताक्षर होकर उसकी एक-एक प्रति दोनों पक्षोंको सौंप दी जाती थी और एक प्रति मध्यस्थके पास रहती थी। उसे यहाँ उसी रूपमें दे दिया गया है।
सम्मेलनकी कार्यवाही ता० २१-१०-६३ से १-११-६३ तक चली थी। इन दिनोंमें तत्त्वचर्चाके दो दौर सम्पन्न हो गये थे। तीसरा दौर होना शेष था। किन्तु सभी विद्वान् अपने-अपने घर जानेके लिए उत्सुक थे। इसलिए तीसरे दौरको सम्पन्न करनेके लिए अलगसे नियम बनाये गये। किन्तु उन नियमोंमेंसे पृष्ठसंख्या और समयकी मर्यादा निश्चित करनेवाले नियमोंका दोनों ओरसे समुचित पालन न हो सका। परन्तु इससे तीसरे दौरको सम्पन्न करनेमें कोई बाधा नहीं आई।
आगेके लिए भी व्यवस्था यह थी कि प्रत्येक सामग्री एक पक्ष दूसरेके पास मध्यस्थके माध्यमसे ही भेजेगा। परस्परके पत्र-व्यवहारमें तो इसका पूरी तरहसे पालन होना सम्भव नहीं था। हाँ तत्त्वचर्चासम्बन्धी पत्रकोंपर व्यवस्थानुसार मध्यस्थके हस्ताक्षर होना आवश्यक था। हमारी ओरसे तो इस व्यवस्थाको बराबर ध्यानमें रखा गया। परन्तु अपर पक्षने इसे विशेष महत्त्व न देकर पूरी सामग्री मेरे पास सीधी भेज दी। इतना संकेतमात्र इसलिए किया है कि अपर पक्षकी तीसरे दौरकी सामग्री पर मध्यस्थके हस्ताक्षर नहीं है।
अपर पक्षने अपनी प्रतिशंकाओंको जितने कालमें तैयार करके मेरे पास भेज दिया, मुझे उनके उत्तर तैयार करके अपर पक्षके सिपुर्द करनेमें उससे बहुत अधिक समय लग गया। इसका कारण एक तो मेरी कौटुम्बिक अड़चनें रहीं, दूसरे मैं महीनों बीमार पड़ा रहा। फिर भी अपर पक्षने पूरा धैर्य रखा इसकी मुझे प्रसन्नता है। अपर पक्षकी इस उदारता और सहिष्णुताके लिए मैं अपने पक्षकी ओरसे उसका जितना आभार मानूँ थोड़ा है। इसमें पं० श्री वंशीधरजी व्याकरणाचार्यका विवेक विशेष सराहनीय है।
अपर पक्षने तृतीय दौरकी पूरी सामग्री मेरे पास ता० २८-३-६४ को भेज दी थी, जो मुझे अहमदाबादमें १५-४-६४ के लगभग प्राप्त हुई। हमारी ओरसे तृतीय दौरकी .पूरी सामग्री ९-६-६५ को मध्यस्थजीके पास रवाना कर दी गई थी जो अपर पक्षके अन्यतम प्रतिनिधि श्री पं० बंशीधरजी व्याकरणाचार्यको २३-६-६५ को प्राप्त हो गई।
कटनीमें तृतीय दौरके उत्तरपत्रोंका वाचन और संशोधन
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यद्यपि तृतीय दौरके उत्तर पत्रोंकी पूरी सामग्री तैयार तो कर ली गई, पर अभी उसका संशोधन और सम्मिलित वाचन शेष था। इसके लिए कटनी और जयपुर दोनों जगह लिखा पढ़ी की गई। बहुत कुछ ऊहापोहके बाद कटनी नगर ही इसके लिए उपयुक्त समझा गया, क्योंकि कटनी श्रीयुत् पं० जगन्मोहनलालजीका निवासस्थान है और पूरे वाचनमें उनकी उपस्थिति अपना विशेष महत्त्व रखती थी। परिश्रमपूर्वक जो भी सामग्री तैयार की गई है उसमें किसी प्रकारकी त्रुटि न रह जाय इस ओर ध्यान देना अति आवश्यक था। मैं लगभग १७ मई सन् ६६ को कटनी गया। वाचनकी पूरी व्यवस्था जैन छात्रावास भवनमें की गई थी, अतएव मुझे वहाँ ठहरा दिया गया। साथ ही उसी दिनसे वाचन और संशोधनका कार्य भी प्रारम्भ हो गया। इसमें श्रीयुत् पं० जगन्मोहनलाल सा० तो नियमितरूपसे भाग लेते ही थे, क्योंकि एकमात्र उन्हींके कारण तो कटनीमें यह व्यवस्था की गई थी। साथ ही सवाई सिंघई धन्यकुमारजी भी नियमितरूपसे भाग लेते थे। बैठक लगभग २१-२२ दिन चली थी। इसलिए इतने दिनोंके लिए सवाई सिंघई धन्यकुमारजीने अपने व्यापार आदिके सब कार्योंको गौण कर दिया था। भोजनादिसम्बन्धी अन्य सब व्यवस्था भी उन्होंने अपने यहाँ ही रखी थी। आमंत्रण नहीं स्वीकार किया जाता था, क्योंकि इसमें फालतू समय जानेका भय था। बीचमें जयपुरसे श्रीयुत् नेमिचन्द्रजी पाटनी भी आ गये थे। इसमें सन्देह नहीं कि कटनीमें इस वाचनसे बड़ा लाभ हुआ। पण्डितजीकी पैनी दृष्टि स्खलित भागपर बराबर चली जाती थी। इससे पूरे भागके संशोधनमें बड़ी सहायता मिली। बैठक प्रातः, मध्याह्न और रात्रिमें इस प्रकार तीन समय नियमितरूपसे होती रही। श्रीयुत् पाटनीजीकी पकड़ भी अच्छी है उससे भी संशोधनमें सहायता मिली है। स्वाध्याय और वाचनद्वारा उन्होंने अपने ज्ञानमें पर्याप्त वृद्धि की है। इस सम्मिलित वाचन और तत्त्वमन्थनके समय मेरा ध्यान सर्वार्थसिद्धिकी ओर चला जाता था। इसी प्रकार वहाँके देव भी निरन्तर तत्त्वमन्थनद्वारा अपना समय यापन करते होंगे यह अनुभूति पद-पदपर होती थी। इसमें सन्देह नहीं कि इस पक्षकी ओरसे जो भी सामग्री प्रस्तुत की गई वह सभी विषयोंमें एक मत होकर प्रस्तुत की गई।
सम्पादन, संशोधन और प्रकाशन
सामग्री कितनी व्यवस्थित क्यों न हो मुद्रणके लिए देते समय उसपर पर्याप्त ध्यान देना पड़ता है। दोनों ओर की तीनों दौरकी सामग्रीमें आगम प्रमाणोंकी अत्यधिक प्रचुरता है। साथ ही यह पूरी सामग्री कुछ तो बालपेनसे लिखी गई है और कुछ टाईप की हुई है। सो भी जो सामग्री हमें प्रेसमैटरके रूपमें प्राप्त थी उसमें तीसरे नम्बरकी कापीकी बहुलता थी जिससे वह बहुत अस्पष्ट थी। इसमें विभक्ति, मात्रा और अक्षरों का भी पर्याप्त व्यत्यय था। प्रायः पैराका ध्यान बहुत कम रखा गया था। गाथा और श्लोकमें जो उद्धृत वाक्य थे वे भी कहीं-कहीं रनिंगके रूपमें लिखे गये थे। कहीं-कहीं तो उन्हें वचनिकामें ही सम्मिलित कर दिया गया था। जो पत्रक टाईप किये हुए थे उनमें उद्धृत वाक्योंका अशुद्ध होना स्वाभाविक था। अनेक स्थलोंपर वाक्योंमें स्खलन भी हो गया था। सम्पादनके समय ये सब कठिनाइयाँ मेरे सामने रही हैं। मेरे पास ऐसा व्यवस्थित आदमी भी नहीं था जिसकी सहायतासे मैं अपने भारको हलका करनेमें समर्थ होता। एकमात्र कतिपय छात्र ही मेरे सहायक थे। किन्तु उनके अध्ययनमें किसी प्रकारका व्यत्यय न हो जाय इसका मुझे पूरा ध्यान रखना पड़ता था। ऐसी विकट परिस्थिति में रहते हुए तत्त्वचर्चाके इतने बड़े कलेवरका मुझे सम्पादन करना पड़ा है। मुद्रणके समय प्रूफ करेक्शनका काम भी मुझे ही करना पड़ा है। थोड़ी-बहुत जो छात्रोंकी सहायता मिल गई उसीमें सन्तोष करना पड़ा है। किन्तु इन सब अड़चनोंके बावजूद मुझे इस बातका सन्तोष है कि किसी तरह यह पार पड़ गया है। आशा है शीघ्र ही वह पाठकोंके वाचन-मननके लिए सुलभ हो जायगा।
सम्पादनके समय जब मैंने अपर पक्षके तृतीय दौरपर दृष्टि डाली तो मालूम हुआ कि कुछ स्थलोंपर प्रतिशंकाके स्थानमें लिखते समय प्रत्युत्तर या उत्तर शब्दका प्रयोग हो गया है। नियमानुसार इसका संकेत मैंने श्रीयुत् पं० वंशीधरजी व्या० आ० को किया। उन्होंने तत्काल लिखा कि लिखनेके ओघमें ऐसे शब्दोंका प्रयोग जहाँ भी हो गया हो उसे सन्दर्भको ध्यानमें रखकर आप सुधारते जायँ। सन्दर्भमें व्यत्यय न हो इसका ध्यान रखें। अतएव मैं यहाँ यह संकेत कर देना अपना पुनीत कर्त्तव्य समझता हूँ कि तृतीय दौरकी अपर पक्षकी सामग्रीमें जहाँ भी ऐसा व्यत्यय मुझे मालूम पड़ा वहाँ एक-दो शब्दोंमें परिवर्तन किया गया है, परन्तु वहाँ प्रतिपादित किये गये विषयके आशयमें किसी प्रकारका भी अन्तर नहीं आने दिया है।
जैसा कि मैं पहले ही सूचित कर आया हूँ, हमारी ओरसे पूरी सामग्री सन् ६५ के जूनमें ही अपर पक्षको प्राप्त हो गई थी। अब नियमानुसार उसके मुद्रण और प्रकाशनकी संयुक्त व्यवस्था करनी थी। इसके लिए मैंने उसके वाद व्याकरणाचार्यजीको कुछ दिन वाद संकेत किया। व्याकरणाचार्यजीने २४-७-६५ के पत्रद्वारा जो उत्तर दिया उसका आशय यह है कि मैं इस सम्वन्धमें अपने पक्षके विद्वानोंको तत्काल लिख चुका हूँ। परन्तु कार्यव्यस्तता अथवा स्वास्थ्यकी गड़बड़ीके कारण विद्वान् एकत्रित न हो सके। फिलहालदो-तीन माह रुकना पड़ेगा। मैंने अपने पत्रद्वारा लिख दिया कि दो-तीन माह ठहरनेमें हमें कोई आपत्ति नहीं है।
इस प्रकार धीरे धीरे बहुत काल निकल गया। कुछ अवरोध सा मालूम हुआ। अन्तमें तय हुआ कि जब आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल ग्रन्थमाला इसका प्रकाशन करनेके लिए उद्यत है तो सबके स्वाध्याय लाभकी दृष्टिसे उसके सिपुर्द कर देना चाहिए। स्पष्ट है कि उसी व्यवस्थाके अनुसार इसका उक्त संस्था द्वारा प्रकाशन हो रहा है।
आपसमें पत्राचार द्वारा ऐसी एक चर्चा चल पड़ी थी कि इस तत्त्वचर्चाके पत्रकोंमें जो आक्षेपात्मक या प्रचारात्मक वाक्य या शब्द हों उन्हें दूर कर देना चाहिए। हमारे पक्षको यह विचार उचित प्रतीत हुआ, इसलिए मुद्रणके पूर्व और मुद्रणके समय हमने ऐसे शब्दोंको जो किसी न किसी रूपमें वैसे प्रतीत हुए उन्हें अलग कर दिया है और जिन शब्दोंको अलग किया गया उनकी सूची श्री युक्त पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्यके पास भेज दी है। पर ऐसा करते हुए न तो विषयके विवेचनको स्पर्श किया गया है और न ही सन्दर्भमें किसी प्रकारकी गड़बड़ी होने दी गई है। अप्रयोजनीय जानकर उस सूचीको यहाँ हम नहीं दे रहे हैं। इसकी चर्चा हमने श्री युक्त पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्यसे भी प्रत्यक्ष भेंटके समय कर दी है।
आभार प्रदर्शन
यह स्पष्ट है कि श्री १०८ आचार्य शिवसागरजी महाराज और उनके संघस्थ अन्य मुनिराजोंकी भावना इस तत्त्वचर्चाके अनुकूल रही है और यह भी स्पष्ट है कि उनके सानिध्यमें होनेके कारण ही तत्त्वचर्चाके समय पूरी शान्ति बनी रही। यद्यपि अभी तक मैं आचार्य महाराजकी सन्निकटता तो नहीं प्राप्त कर सका, पर तत्त्वचर्चाके समय मैं जितना समझ सका हूँ उसके आधारसे, मैं यह सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि वे सरल तो हैं ही, विवेकी भी हैं। मेरा विश्वास है कि उनके चित्तमें आने भरकी देर है, इस समय समाजमें जो द्वन्द्व चल रहा है उसके शान्त होनेमें देर नहीं लगेगी। यह तत्त्वचर्चा उनके सानिध्यमें सम्पन्न हुई और इसी उद्देश्यसे इसका आयोजन भी किया गया था। अतएव मेरा तो यही विश्वास है कि कभी न कभी आचार्य महाराजका इस ओर अवश्य ही ध्यान जायगा।
श्री ब्र० सेठ हीरालालजी पाटनी ( निवाई ) और ब्र० लाडमलजी का जितना भी आभार माना जाय थोड़ा है । ये दोनों महानुभाव इस ऐतिहासिक सम्मेलनके आयोजक थे । ये दोनों महानुभाव नहीं चाहते कि समाजमें कलहका वातावरण बना रहे । इनके द्वारा किया गया आतिथ्य सत्कार भी सराहनीय था । यह इस युगल जोड़ीका जीवन व्रत मालूम देता है । जिस उत्साह और निष्पक्षतासे इन्होंने अपने उत्तरदायित्वका निर्वाह किया उसका शब्दोंमें वर्णन करना कठिन है ।
इस सम्मेलनमें जितने विद्वानोंने भाग लिया उनमेंसे कोई किसीके लिए नया नहीं था । मेरे लिए तो उनमेंसे कई विद्वान् गुरुजन थे । कई गुरुतुल्य थे । कई समान पीढ़ीके थे । ये सब तो मेरे लिए मान्य हैं ही जो मुझसे पीछेकी पीढ़ीमें आते हैं उनके प्रति भी मेरे हृदयमें सदासे स्नेहका भाव रहा है । मेरा विश्वास है कि इन सब विद्वानोंमें अखण्डभावसे उत्तरदायित्वकी भावना जागृत होनेपर वर्तमान द्वन्द्वकी स्थिति समाप्त होनेमें देर नहीं लगेगी । सामाजिक क्षेत्रमें मतभेद होना कोई बुरी बात नहीं, द्वन्द्वका भाव नहीं होना चाहिए ।
यहाँ विशेष रूपसे मुझे श्री युक्त पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्रीका स्मरण कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है । उन जैसा सहिष्णु और विवेकशील विद्वान् बिरला ही होगा । मुझे तो उनका सदासे पृष्ठबल प्राप्त है । इस तत्त्वचर्चाको इतने सुन्दर ढंगसे सम्पादित करनेमें उनकी सहायता एक सहयोगीके नाते विशेष रूपसे उल्लेखनीय है । तत्त्वचर्चाको वर्तमान रूप देनेमें उनके बुद्धि कौशलकी जितनी भी प्रशंसा की जाय थोड़ी है ।
श्री युक्त नेमिचन्दजी पाटनी जयपुरमें थे मात्र इसीलिए इसका श्रीगणेश सुन्दर ढंगसे हो सका । जयपुरमें तत्त्वचर्चाके समय मैं और श्री युक्त पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्री उनके घर पर अपने ही घरमें जैसे रह रहे हों इतने अपनत्वके साथ रहे । उनका पूरा परिवार हम लोगोंके आतिथ्यमें जुटा रहता था । तत्त्वचर्चामें वे मेरे एक सहयोगी रहे हैं यह विशेष उल्लेखनीय है ।
श्री युक्त ब्र० चन्दूलालजी ( सोनगढ़ ) स्वामीजीकी छायाके ही समान हैं । किन्तु जब उन्हें यह अनुभव हुआ कि जयपुरमें मेरी आवश्यकता है, वे तत्काल यहाँ आ गये और प्रमाणोंके संग्रह करनेमें मेरी सहायता करने लगे । वे अत्यन्त भद्रपरिणामी पुरुष हैं ।
श्रीयुक्त चिमन भाई बम्बई एक कर्मठ व्यक्ति हैं । ये जिस कार्यमें जुट जाते हैं थकनेका नाम नहीं लेते । यही कारण है कि ये बम्बई मुमुक्षमण्डलके मंत्री तो हैं ही साथ ही दिगम्बर जैन महामुमुक्षु मण्डलके भी मंत्री हैं । जब आवश्यक कागजपत्र लेकर २० ता० के मध्याह्न तक जयपुर पहुँचा देनेके लिए सोनगढ़ मेरा तार पहुंचा तब ये वहीं थे । किसे भेजा जाय यह प्रश्न उठने पर ये आ गये और बोले, जैसे बनेगा मैं इस कार्यको सम्पादित करूँगा । १९ ता० को सायंकलकी बात है, २० ता० को जयपुर पहुँचना है, फिर भी चिमन भाई हामी भर रहे हैं । इन्हें काम सौंपा गया । रात्रिकी गाड़ीसे ये अहमदाबाद आये और सीधे हवाई अड्डे पर पहुँचकर किसी तरह जयपुरका हवाई टिकट प्राप्त करनेमें ये सफल हो गये । इन्होंने जो संकल्प किया था उसे पूरा किया । इसीसे इनकी कर्मठता जानी जा सकती है । जयपुरमें रहते समय आवश्यक कागज-पत्रोंका संकलन यही करते रहे । मैं बिलकुल निश्चिन्त था ।
इस प्रकार मैं देखता हूँ कि यह जो इतने सुन्दर ढंगसे पूरा कार्य सम्पन्न हुआ वह सब श्री ब्र० सेठ हीरालालजी पाटनी और श्री ब्र० लाडमलजी प्रभृति सब महानुभावोंके सहयोगका सुपरिणाम है अतः मैं इन सबका पुनः आभारी हूँ । यह तो सभी भुक्तभोगी जानते हैं कि प्रूफ करेक्शनके समय सावधानी रखते हुए भी स्खलन हो जाता है । अनेक अशुद्धियाँ भी रह जाती हैं, कहीं-कहीं शब्दोंमें उलट-फेर भी हो जाता है । अक्सर ऐसा होता है कि कभी-कभी प्रेसकापी सामने नहीं रहती और हड़बड़ीमें प्रूफ करेक्शन करना ही पड़ता है । ऐसे समयमें एक शब्दका स्थान कोई नया शब्द भी ले लेता है । दृष्टिकी मन्दता और साधनोंको अल्पता रहते हुए भी यद्यपि मैं पर्याप्त सतर्क रहा हूँ, फिर भी यदि कहीं कोई स्खलन आदि दिखलाई दे तो सर्वप्रथम उसकी सूचना मुझे दी जाय । मुझे मेरी असावधानी मालूम पड़नेपर मैं उसे सहर्ष स्वीकार कर लूँगा यही निवेदन है । ऐसी छोटी-छोटी बातोंके लिए तूल न दिया जाय ।
मेरी इच्छा तो यह रही है कि यदि दूसरा पक्ष स्वीकार कर ले तो इसके कतिपय उपयोगी परिशिष्ट बना दिये जायँ । साथ ही इसमें जो मोटी अशुद्धियाँ और स्खलन प्रतीत हों उनका भी एक शुद्धिपत्र लगा दिया जाय । किन्तु समयाभावके कारण मैं ऐसा नहीं कर सका इसके लिए मैं पाठकोंसे क्षमा चाहता हूँ इसके सम्पादन और मुद्रणमें मुझे जो श्रम करना पड़ा उसको मैं ही जानता हूँ । उसकी व्यापक चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं ।
अन्तमें इतना लिखकर कि इसमें मेरा कुछ भी कर्त्तव्य नहीं है, जो कुछ भी है वह सब भगवद्वाणीका प्रसाद है इस वक्तव्यको पूरा करता हूँ ।
यदर्थमात्रापदवाक्यहीनं मया प्रमादाद्यदि किंचनोक्तम् ।
तन्मे क्षमित्वा विदधातु देवी सरस्वती केवलबोधलब्धिम् ॥
श्री सन्मति जैन निकेतन
नरिया-वाराणसी
१०-२-६७
विनीत
फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री