जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा, शंका-समाधान १ से १७ | Jaipur (Khaniya) Tattvacharcha

जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा

सम्पादक: सिद्धान्ताचार्य पं० फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, वाराणसी
प्रकाशक: आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल ग्रन्थमाला, गाँधी रोड, बापूनगर, जयपुर (राजस्थान)
संस्करण: प्रथमावृत्ति, फरवरी १९६७ (पुस्तक १: शंका-समाधान १ से ५, पुस्तक २: शंका-समाधान ६ से १७)

अक्टूबर १९६३ में खानिया (जयपुर) में आचार्य शिवसागरजी महाराजके सान्निध्यमें दो पक्षोंके विद्वानोंके बीच लिखित रूपमें हुई तत्त्वचर्चा। इसमें १७ शंकाएँ हैं और प्रायः प्रत्येक पर तीन दौर: शंका और उसका समाधान, प्रतिशंका २ और उसका समाधान, प्रतिशंका ३ और उसका समाधान। विषय: निमित्त और उपादान, क्रमबद्ध पर्याय, निश्चय और व्यवहार, पुण्य, केवलीकी सर्वज्ञता, दिव्यध्वनि, उपचार आदि।

Jaipur (Khaniya) Tattvacharcha: the written debate held at Khaniya, Jaipur in October 1963 on 17 questions, each in up to three rounds, edited by Pt. Phoolchandra Siddhantashastri (Todarmal Granthamala, Jaipur, first edition 1967).

पूरा पाठ नीचे शंका और दौर के क्रमसे अलग अलग पोस्टों में है, हर पोस्ट में पुस्तक के मुद्रित पृष्ठ दिए हैं।


:paperclip: मूल पुस्तक (PDF):


:open_book: पढ़ें (शंका और दौर अनुसार):

शंका १: द्रव्य कर्मके उदयसे संसारी आत्माका विकार भाव और चतुर्गति भ्रमण होता है या नहीं ?

शंका २: जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म अधर्म होता है या नहीं ?

शंका ३: जीव दयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?

शंका ४: व्यवहार धर्म निश्चय धर्ममें साधक है या नहीं ?

शंका ५: द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत-क्रमसे ही होती हैं या अनियत क्रमसे भी ?

शंका ६: उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें निमित्त कारण सहायक होता है या नहीं ?

शंका ७: केवली भगवान्की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे ? यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?

शंका ८: दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवलीआत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं । यदि है तो कौन सम्बन्ध है ? वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवानकी आत्माके सम्बन्धसे ?

शंका ९: सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बँधा हुआ है और किसीसे बँधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ? यदि वह बद्ध है तो उसके बंधनोंसे छूटनेका उपाय क्या है ?

शंका १०: जीव तथा पुद्गलका एवं द्वयणुक आदि स्कन्धोंका बन्ध वास्तविक है या अवास्तविक ? यदि अवास्तविक है तो केवली भगवान् उसे जानते हैं या नहीं।

शंका ११: परिणमनके स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय दो भेद हैं, उनमें वास्तविक अन्तर क्या है ?

शंका १२: कुगुरु, कुदेव, कुशास्त्रकी श्रद्धाके समान सुदेव, सुशास्त्र, सुगुरुकी श्रद्धा भी मिथ्यात्व है, क्या ऐसा मानना या कहना शास्त्रोक्त है ?

शंका १३: पुण्यका फल जब अरहंत तक होना कहा गया है ( पुण्यफला अरहंता प्र० सा० ) और जिससे यह आत्मा तीन लोकका अधिपति बनता है उसे ‘सर्वातिशायि’ पुण्य बतलाया है ( सर्वातिशायि पुण्यं तत् त्रैलोक्याधिपतित्वकृत् ) । तब ऐसे पुण्यको हीनोपमा देकर त्याज्य कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?

शंका १४: पुण्य अपनी चरम सीमाको पहुँचकर अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणत होनेपर स्वतः छूट जाता है या उसको छुड़ानेके लिये किसी उपदेश और प्रयत्नकी जरूरत होती है ?

शंका १५: जब अभाव चतुष्टय वस्तुस्वरूप हैं (भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मः) तो वे कार्य व कारण-रूप क्यों नहीं माने जा सकते। तदनुसार घातिया कर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको क्यों उत्पन्न नहीं करता ?

शंका १६: निश्चय और व्यवहारनयका स्वरूप क्या है ? व्यवहारनयका विषय असत्य है क्या ? असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप है ?

शंका १७: उपचारका लक्षण क्या है ? निमित्तकारण और व्यवहारनयमें यदि क्रमशः कारणता और नयत्व उपचार है तो इनमें उपचारका लक्षण घटित कीजिये ?

प्रकाशकीय वक्तव्य

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ७ से १४

↑ सूची


प्रकाशकीय वक्तव्य

लगभग २०० वर्षकी अवधिमें जितने भी पुण्यपुरुष हुए हैं उनमें आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमलजी का नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है। वे अपने कालके मनीषियोंमें तो अग्रणी थे ही, आजका विद्वत्समाज भी उनकी अनुपम प्रतिभा और विद्वत्ताका लोहा मानता है। अभी तकके इतिहासमें इनके सिवाय शायद ही कोई ऐसा भाग्यवान गृहस्थ विद्वान् हुआ होगा जो ‘आचार्यकल्प’ जैसे प्रख्यात विशेषणसे अलंकृत किया गया हो। इनकी परिमार्जित लेखनीसे जो कुछ भी लिखा गया है वह सब सर्वज्ञ वीतराग देवकी दिव्य-ध्वनिका अनुसरण करनेवाला होनेसे आगम ही है, ये छन्द, व्याकरण, न्याय, अलंकार, गणित और धर्म-शास्त्रके मर्मज्ञ विद्वान् होनेके साथ सदाचारकी मूर्ति थे। जिस प्रकार यह बात सच है कि यदि भगवान् वीतराग सर्वज्ञदेवकी दिव्यध्वनिको अवधारण करनेवाले उत्तरकालीन आचार्योंकी आगमरूपमें वाणीका प्रसाद हमें न मिला होता तो हमें उससे सर्वथा वंचित हो रहना पड़ता उसी प्रकार यह बात भी सच है कि सटीक गोम्मटसारादि महान् सिद्धान्त ग्रन्थोंको भाषावचनिकारूपमें यदि आपने प्रस्तुत न किया होता तो आज उनके मर्मको जानने-समझनेवाले विद्वानोंका सर्वथा अभाव ही होता।

जैनधर्मका दूसरा नाम आत्मधर्म है। प्रत्येक संसारी आत्माका प्रधान कर्तव्य है कि वह अपने स्वरूपको समझकर उसे प्राप्त करनेके मार्गमें लगे। इस तथ्यको हृदयंगम करके आपने स्वतन्त्र रूपसे तीर्थंकरोंकी वाणीके प्रसादरूपमें ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’ जैसे महान् शास्त्रकी रचना द्वारा हमारे समान अगणित भव्य जीवोंका महान् उपकार किया है। जैन अध्यात्म क्या है इस विषयका सांगोपांग विवेचन करनेवाला भाषावचनिकारूप यह प्रतिनिधि ग्रन्थराज है। इसमें निश्चय-व्यवहार निमित्त-उपादान, कार्य-कारणभाव तथा सम्यग्दर्शनादिके स्वरूपको बड़ी ही मनोरम सुस्पष्ट शैलीमें समझाया गया है। स्वसमय और परसमयको ठीक तरह समझकर जिसे जैन अध्यात्ममें प्रवेश कर साक्षात् समयसार बनना है उसे मनोयोगपूर्वक इस ग्रन्थराजको स्वाध्याय, चिन्तन, मनन द्वारा आत्मसात् करनेकी अति आवश्यकता है। इसमें पण्डितजीकी विवेकशालिनी प्रतिभासम्पन्न दृष्टिका दर्शन पद-पद पर होता है। यह उनके दिग्दिगन्तव्यापी निर्मल यशका उज्ज्वल प्रकाश है। वे लोकोत्तर महान् पुरुष थे यह इससे सिद्ध होता है।

जिस समय पण्डितजी इस भूतलको अलंकृत कर रहे थे उस समय शीघ्रगामी रेल, मोटरकार आदि वाहनोंका सर्वथा अभाव था। फिर भी अध्यात्म रहस्यके ज्ञाताके रूपमें पूरे देशमें उन्होंने प्रख्याति प्राप्त कर ली थी। दूर-दूर से आत्मकल्याणके इच्छुक भव्य जन उनकी पुनीत वाणीका प्रसाद पानेके लिए उनकी शरणमें आकर कृतकृत्य होते थे। जो आने में असमर्थ रहते वे लेख द्वारा अपनी जिज्ञासा प्रगट कर लेख द्वारा ही उसका सम्यक् समाधान प्राप्त करते थे। मुलतानकी धर्मवत्सल समाजके लिए पण्डितजी द्वारा लिखी गई ‘रहस्य पूर्ण चिट्ठी’ इसका जीता-जागता उदाहरण है। जैसा इसका नाम है उसीके अनुरूप यह अध्यात्मरससे ओतप्रोत है। जिसका अध्यात्ममें भले प्रकार प्रवेश हो गया है वह ही इसके मर्मको समझनेका अधिकारी है। सम्यग्दृष्टि जीव आत्मानुभूतिसे किस प्रकार ओत-प्रोत होता है इसे पण्डितजीने इस चिट्ठीमें बड़े ही मार्मिक शब्दोंमें समझाया है।

यह पण्डितजीके जीवनका एक पहलू है। उनके जीवनका दूसरा पहलू है समाज सुधार और धर्मके नामपर क्रियाकाण्डमें आये हुए विकारको दूर करना । उन्होंने देखा कि सर्वज्ञदेव, वीतराग गुरु और वीतराग वाणीका अनुयायी आजका समाज पाखण्डियोंके बहकावेमें आकर अनेक विपरीत मान्यताओंका उपासक बनता जा रहा है । सम्यग्दृष्टि जीव स्वामी समन्तभद्रके शब्दोंमें तीन मूढ़ता और छह अनायतनोंसे रहित होता है । किन्तु आजका समाज इनके चक्करमें पड़ा हुआ है, अतएव उन्होंने क्रियाकाण्डमें आये हुए विकारको न केवल दूर किया, अपितु समाजको सनातन सत्य मार्गपर ले जानेमें भी पूरी सफलता प्राप्त की । यह गुरुतर कार्य करते हुए उन्हें अनेक विपत्तियोंका सामना करना पड़ा पर वे इससे विचलित न हुए । सम्यग्दृष्टि पुरुष वज्रपात होनेपर भी सम्यग्दर्शनसे विचलित नहीं होता यह परमागमकी आज्ञा है जो उनके जीवनमें अक्षरशः घटित होती है । उनको षडयन्त्रका सामना करते हुए प्राणान्त जैसी महान् आपत्तिका सामना करना पड़ा परन्तु वे अपने धर्म (कर्त्तव्य) से अणुमात्र भी विचलित न हुए । यह है उनके जीवित कार्योंका संक्षेपमें लेखा-जोखा ।

ऐसा महान् पुरुष जिस देश और जिस नगरीमें जन्म लेता है वह तो धन्य है ही, जिस परिवारको और माता-पिताको अपने जन्मसे अलंकृत करता है वह भी धन्य है । जैसा कि प्राप्त तथ्योंसे ज्ञात होता है कि भारतवर्ष राजस्थानके अन्तर्गत जयपुर यह नगरी उनकी कार्यक्षेत्र रही है । अभी २०० वर्षसे कुछ ही अधिक हुआ है जब उन्होंने अपने जन्मसे इस भूमण्डलको अलंकृत किया था । वे गोदीका वंशके लाड़ले लाल थे । उनके पिताका नाम जोगीदास और माताका नाम रम्भादेवी था । पं० बंशीधरजी उनके शिक्षा गुरु थे । स्वाध्याय, शास्त्रगोष्ठी और ग्रन्थ लेखन यह उनका मुख्य कार्य था । अल्प आयुमें ही यद्यपि उन्हें अपने वर्तमान जीवनसे हाथ धोना पड़ा, परन्तु इतने स्वल्प कालमें उन्होंने जो साहित्य सेवा की है उसकी तुलना नहीं । उन्होंने अपने जीवनकालमें गोम्मटसार जीवकाण्ड, गोम्मटसार कर्ममाण्ड, लब्धिसार, क्षपणासार, त्रिलोकसार, आत्मानुशासन और पुरुषार्थसिद्ध्युपाय इन छह ग्रन्थोंका ढूंढारी भाषामें अनुवाद किया तथा मोक्षमार्गप्रकाशक, अर्थसंदृष्टि अधिकार, गोम्मटसारपूजा और रहस्यपूर्ण चिट्ठी इन चार ग्रन्थोंकी स्वतन्त्र रचना की । उनकी ये सभी रचनायें मौलिक होनेके साथ सिद्धान्त और अध्यात्मरससे ओत-प्रोत हैं । गोम्मटसारादि ग्रन्थोंका अनुवाद करते समय इनके साथ उनकी संस्कृत टीकाओंका भी उन्होंने अनुवाद किया है । यह सब साहित्यिक कार्य करते हुए उनके चित्तमें अपने विशेषज्ञपनेका अहंकार छूकर भी नहीं गया था । उन्होंने यह सब कार्य स्व-परकल्याणकी भावनासे ही किया है । उनके लिखे हुए किसी भी ग्रंथका आप स्वाध्याय कीजिए, पद-पदपर उनकी इस उदात्त वृत्तिके दर्शन उसमें आप करेंगे । यों तो गोम्मदसारादि सभी ग्रन्थोंमें गणितका भरपूर उपयोग हुआ है । किन्तु त्रिलोकसार और उसकी टीकामें और भी बारीकीके साथ इसका उपयोग किया गया है । वहाँ लोक और उसके अवान्तरभेदोंका क्षेत्रफल, घनफल बतलाते समय अधोलोकको यवमध्य, यवमुरज और पिनष्टि आदि अनेक आकाररूपसे प्रस्तुत कर विविध प्रकारसे उसके घनफल निकालनेकी विधि बतलाई गई है । पण्डितजी गणितके विशेषज्ञ तो थे ही, इसलिए उन सब विधियोंको स्पष्ट करनेमें उन्होंने किसी प्रकारकी कोर-कसर नहीं रहने दी । पिनष्टिके आकारमें अधोलोककी रचना करने पर उसके घनफलके लानेकी क्या विधि है और ठीक अधोलोकका जो घनफल है वह इस विधिसे भी कैसे प्राप्त किया जा सकता है यह सब स्पष्टीकरण भी पण्डितजीने किया है । फिर भी अपनी लघुता दिखलाते हुए वहाँ उन्होंने लिखा है-‘याका भाव मेरे ठीक समझमें नहीं आया ।’ यह एक उदाहरण है जो उनकी उदात्तवृत्ति और महानताको प्रकट करनेके लिए पर्याप्त है । ऐसे विपुल उदाहरण उनकी सभी रचनाओंमें पद-पद पर मिलेंगे जो उनकी निरभिमानवृत्तिके सूचक हैं । ऐसे महान् मनीषीकी स्मृतिको चिरस्थायी बनाये रखनेके लिए उनके नाम और व्यक्तित्वके अनुरूप एक स्मारक होना चाहिए इसे पूरा समाज चिरकालसे अनुभव करता आ रहा था । इसे योगायोग ही समझना चाहिए कि सोनगढ़के महान् सन्त पूज्य श्रीकानजी स्वामीका इस कमीकी ओर सर्वप्रथम ध्यान गया। उन्होंने अपने प्रवचनके मध्य इसका अनेक बार संकेत भी किया ।

एक तो जयपुर निवासी श्रीमान् सेठ पूरणचन्दजी गोदीका पण्डितजीके वंशज हैं, लक्ष्मीकी उन्हें सब प्रकारसे अनुकूलता मिली हुई है, स्वभावके भद्र और आत्मकल्याणके इच्छुक हैं, अपनी गाढ़ी कमाईका उपयोग धर्मकार्योंके प्रवर्तनमें विशेषरूपसे हो यह उनकी भीतरी भावना है, साथ ही उनका पूरा परिवार ऐसे धार्मिक कार्योंमें उनके साथ है ।

दूसरे आत्मकल्याणके इच्छुक और स्वाध्यायप्रेमी होनेके कारण पूज्य श्रीकानजी स्वामीके प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा है । इसलिए वे अपने व्यापारादि कार्योंको गौणकर बीच-बीचमें पूज्य स्वामीजीका सानिध्य प्राप्त करने और उनके अध्यात्मरससे ओत-प्रोत मार्मिक प्रवचनोंसे लाभान्वित होनेके अभिप्रायवश सोनगढ़ जाते रहते हैं और महीनों वहाँ रहते हैं ।

आचार्यकल्प पं० श्रीटोडरमल भवनका शिलान्यास

जब किसी महान् कार्य होनेकी वेला आ जाती है तब भीतरी और बाहरी सब प्रकारकी अनुकूलताएँ सहज सुलभ हो जाती हैं यह प्रकृतिका अकाटच नियम है । एक तो पूज्य स्वामीजीका पण्डितजीकी स्मृतिस्वरूप स्मारककी कमीकी ओर ध्यान जाना और दूसरे गोदीकाजीका पण्डितजीका वंशज होना यह ऐसा अपूर्व योग मिला कि गोदीकाजीने सहज ही इस कमीको पूरा करनेके लिए अपने परिवारकी ओरसे स्वीकारता दे दी । यतः पण्डितजीका मुख्य कार्यक्षेत्र जयपुर नगर रहा है, अतः निश्चय हुआ कि जयपुरमें ही योग्य स्थानकी तजवीज करके शीघ्रातिशीघ्र पण्डितजीके व्यक्तित्व और साधनाके अनुरूप स्मारक निर्माणका कार्य प्रारम्भ किया जाय ।

गोदीकाजी और उनके समस्त सहयोगी चाहते थे कि स्मारककी शिलान्यास विधि स्वयं पूज्य स्वामीजीके करकमलों द्वारा सम्पन्न हो । इसके लिए पूज्य स्वामीजीसे निवेदन भी किया गया । किन्तु इस कार्यको सम्पन्न करनेके लिए स्वयं स्वामीजी तो नहीं पधार सके । फिर भी उनकी आज्ञासे उनके अनन्य शिष्य श्रीमान् पं० खेमचन्द्रजी जेठालालजी सेठ शिलान्यास विधिके समय सपरिवार जयपुर पधारे और बड़े समारोहके साथ उनके हाथसे धार्मिक विधिपूर्वक शिलान्यास विधि सम्पन्न की गई ।

पं० श्री खेमचन्द्रजी जहाँ अध्यात्मके प्रगाढ़ विद्वान् और सुयोग्य वक्ता हैं वहाँ वे उदार दानी भी हैं । उनका परिवार बहुत बड़ा है । परिवारमें सबसे बड़े तो वे स्वयं हैं । किन्तु उनकी व्यापार आदि लौकिक कार्योंमें रुचि न होनेके कारण वे स्वयं पूज्य स्वामीजीके सानिध्यमें सोनगढ़ ही रहकर स्वाध्याय आदि में अपना समय यापन करते रहते हैं । इस दृष्टिसे वे बड़े भाग्यवान हैं । इस कार्यमें उन्हें उनके पूरे परिवार का सहयोग प्राप्त है ।

उनके भाइयोंमें दूसरे भाई श्री मणिलाल जेठालालजी सेठ हैं । बम्बईमें मुम्बादेवीके मन्दिरके पास जो श्री १००८ सीमंधर भगवान्के विशाल जिनालयका निर्माण हुआ है और दादरमें विशाल जिनालय व समवसरण मन्दिर तथा मानस्तम्भके साथ कान्ह नगर की स्थापना हुई है यह सब विशेषकर इनके दीर्घ परिश्रम और त्यागभावनाका सुपरिणाम है। इस समय बम्बईमें जो दिगम्बर धर्मका विशेष प्रचार दृष्टिगोचर होता है इसमें भी इनका बड़ा हाथ है। इनके अन्य दो भाई और हैं। वे भी बड़े योग्य हैं। इनके कुटुम्ब में सब भाइयोंके जितने पुत्र, पुत्री आदि हैं वे सब अपने बड़ोंका अनुवर्तन करते हैं। इनकी कौटुम्बिक व्यवस्था बड़ी सुन्दर है। मुझे प्रसंगवश इतना संकेत करना आवश्यक प्रतीत होता है कि इस समय श्री मणिलाल जेठालालजी सेठका स्वास्थ्य कई कारणोंसे कुछ अधिक कमजोर प्रतीत होता है। वे पूरा स्वास्थ्य लाभकर पूर्ववत् धर्मकार्योंके सम्पन्न करनेमें दत्तावधान बनें यह मेरी अन्तःकरण पूर्वक भावना है।

आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल ग्रन्थमालाका श्रीगणेश

जब श्री पं० खेमचन्दजी जेठालालजी सेठके हाथसे जयपुरमें शिलान्यास विधिका मंगल कार्य सम्पन्न हो रहा था उस समय वहाँ उपस्थित सभी विद्वानोंके मनमें यह विचार आया कि पण्डितजीके जीवित कार्योंमें उनकी साहित्य सेवा मुख्य है, इसलिए उसकी स्मृतिस्वरूप भवन निर्माणके साथ उनके नामसे एक ग्रन्थमाला की स्थापना भी अवश्य होनी चाहिए। विचार प्रशंसायोग्य और करणीय था, अतः जैसे ही पं० श्री खेमचन्द जी जेठालालजी सेठको इसकी जानकारी मिली, तत्काल उन्होंने इसके लिए ५००१) रुपयों के उदार दान की घोषणा करदी। फिर क्या था, स्वयं श्री सेठ पूरणचन्दजी गोदीका जी भी आगे आये और उन्होंने इसके लिए अपनी और अपने परिवारकी ओरसे २१००१) रुपयोंके दान की उदार घोषणा कर इस मंगल कार्य को आगे बढ़ाया। जैन समाजकी उदारता सुप्रसिद्ध है। यदि किसी परमार्थके अनुरूप कार्यकी योजना बने तो वह तत्काल उसकी पूर्तिमें सहायक होती है। मुझे यह संकेत करते हुए प्रसन्नता होती है कि जैसे ही वहाँ उपस्थित पूरी समाजको इसकी जानकारी हुई, तत्काल उसकी ओरसे भी लगभग १००००) दस हजार रुपयोंकी स्वीकृति मिल गई। इस प्रकार जहाँ भवननिर्माणका कार्य प्रारम्भ हुआ वहाँ उसके साथ ही ‘आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल ग्रन्थमाला’ का श्रीगणेश भी उसके साथ कर दिया गया।

ग्रन्थमालासे प्रथम पुष्पके रूपमें मोक्षमार्ग प्रकाशकके प्रकाशनका निश्चय

आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमलजीकी मातृभाषा ढूंढारी हिन्दी थी। उन्होंने अपने पूरे साहित्यके साथ मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रन्थका निर्माण इसी भाषामें किया है। यद्यपि यह भाषा बहुत ही सुगम और सुननेमें मधुर है फिर भी पूरे देशका ख्याल कर आधुनिक हिन्दीमें मोक्षमार्गप्रकाशकका एक प्रामाणिक संस्करण तैयार कराया जाय यह विचार कर ग्रन्थमालाकी ओरसे सर्व प्रथम इस कार्यको हाथमें लिया गया। इस कार्यको सम्पन्न करनेके लिए जयपुरके भण्डारोंसे प्राप्त अनेक हस्तलिखित प्राचीन प्रतियोंके आधारसे इस ग्रन्थकी आधुनिक हिन्दीमें एक प्रति तैयार कराई गई। जहाँ तक सम्भव हुआ इसे प्रामाणिक बनानेका पूरा प्रयत्न किया गया है। मुझे प्रसन्नता है कि आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमलजीकी स्मृतिमें इस ग्रन्थमालाकी स्थापना की गई और इतनी अल्प अवधिमें उन्हींके द्वारा रचित इस महान् ग्रन्थका इसकी ओरसे प्रथम पुष्पके रूपमें प्रकाशन हो रहा है। जितना भव्य इसका श्रीगणेश है उतनी ही भव्यताको लिए हुए यह संस्था अपना कार्य सम्पन्न करती रहेगी ऐसा मुझे विश्वास है।

जयपुर ( खानिया ) तत्त्वचर्चाका संक्षिप्त इतिहास

चिरकालसे जयपुर तत्त्वचर्चाका केन्द्र रहा है। इसके लिए यह पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। आज पूरे जैन समाजमें जो तत्त्वज्ञानकी जागृति दृष्टिगोचर होती है उसमें यहाँके मनीषियोंका बड़ा योगदान है। आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमलजी तो यहाँकी विभूति थे ही। श्री शाह पं० दीपचन्दजी काशलीवाल, श्री पं० गुमानीरामजी, श्री पं० जयचन्दजी छावड़ा, श्री पं० सदासुखजी और श्री पं० दौलतरामजी आदि गण्य-मान्य समर्थ विद्वान् भी जयपुरकी ही देन हैं। इन सब विद्वानोंने अपने जीवनकालमें जो साहित्यकी सृष्टि की है उससे पूरा जैन समाज अनुप्राणित हुआ है। इसलिए इस नगरका वातावरण तत्त्वचर्चाके लिए उपयुक्त रहा है।

इसे तो विधिकी विडम्बना ही कहनी चाहिए कि दिगम्बर परम्परामें पूज्य श्री कानजी स्वामीके दीक्षित होनेके बाद समाजमें मतभेदका प्राबल्य दृष्टिगोचर होने लगा। पूज्य श्री कानजी स्वामीका त्याग अपूर्व है। दिगम्बर परम्परा ही मोक्षमार्गके अनुरूप सनातन समीचीन परम्परा है इसकी व्यापक घोषणा इस कालमें यदि किसीके त्यागने की है तो वे एकमात्र पूज्य श्री कानजी स्वामी ही हैं। उनके व्यक्तित्व, त्याग, विद्वत्ता और वक्तृत्व आदि गुणोंके विषयमें जितना भी लिखा जाय थोड़ा है। मोक्षमार्गके अनुरूप अध्यात्मका आत्मानुभवी ऐसा अपूर्व वक्ता इस कालमें हम सबके लिए सुलभ है इसे मैं हम सबका महान् पुण्योदय ही मानता हूँ। उनके पवित्र सान्निध्यकी छाया चिर कालतक हम सबके ऊपर बनी रहे यह मेरी मंगल कामना है।

यों तो स्वपरके कल्याणके लिए जिन मंगल कार्योंका प्रारम्भ किया जाता है उनके मध्य कुछ न कुछ बाधाएँ उपस्थित हुआ ही करती हैं यह संसारका नियम है। पर उन बाधाओंको बाधा न गिनकर जो महान् पुरुष होते हैं वे अपने उद्दिष्ट कार्योंमें ही लगे रहते हैं यही उनके जीवन की सर्वोपरि विशेषता होती है। इस कसौटीपर जब हम पूज्य श्री कानजी स्वामीको कसकर देखते-परखते हैं तो वे महान्से महान्तर ही सिद्ध होते हैं। उनके इस लोकोत्तर गुणका पूरा समाज अनुवर्ती बने यह मेरी अन्तःकरणकी पवित्र भावना है। विश्वास है कि पूरा समाज कालान्तरमें उनकी इस महत्ताको अनुभव करेगा।

जैसा कि मैं पूर्वमें निर्देश कर आया हूँ जयपुर सदासे तत्त्वचर्चाका केन्द्र रहा है। जब इस कालमें अध्यात्मको लेकर विद्वानोंमें मतभेद बढ़ने लगा और इसकी जानकारी पूज्य श्री १०८ आचार्य शिवसागरजी महाराज और उनके संघको हुई तब ( उनके निकटवर्ती साधर्मी भाइयोंसे ज्ञात हुआ है ) पूज्य श्री आचार्य महाराजने अपने संघमें यह भावना व्यक्त की कि यदि दोनों ओरके सभी प्रमुख विद्वान् एक स्थानपर बैठकर तत्त्वचर्चा द्वारा आपसी मतभेदको दूर कर लें तो सर्वोत्तम हो। उनके संघमें श्री ब्र० सेठ हीरालालजी पाटनी (निवाई) और श्री ब्र० लाडमलजी जयपुर शान्तपरिणामी और सेवाभावी महानुभाव हैं। इन्होंने पूज्य श्री महाराजकी सद्भावनाको जानकर दोनों ओरके विद्वानोंका एक सम्मेलन बुलानेका संकल्प किया। साथ ही इस सम्मेलनके करनेमें जो अर्थव्यय होगा उसका उत्तरदायित्व श्री ब्र० सेठ हीरालालजी (निवाई) ने लिया। यह सम्मेलन २०-९-१९६३ से उक्त दोनों ब्रह्मचारियोंके आमन्त्रणपर बुलाया गया था जिसकी सानन्द समाप्ति १-१०-१९६३ के दिन हुई थी। प्रसन्नता है कि इसे सभी विद्वानोंने साभार स्वीकार कर लिया और यथासम्भव अधिकतर प्रमुख विद्वान् प्रसन्नता पूर्वक सम्मेलनमें सम्मिलित भी हुए। यद्यपि यह सम्मेलन २० ता० से प्रारम्भ होना था, परन्तु प्रथम दिन होनेके कारण उसका प्रारम्भ २१ ता० से हो सका जो १-१०-१९६३ तक निर्बाधगतिसे चलता रहा। सम्मेलन की पूरी कार्यवाही लिखितरूपमें होती थी, इससे किसीको किसी प्रकार शिकायत करनेका अवसर ही नहीं आया। इस सम्मेलनकी समस्त कार्यवाही पूज्य श्री १०८ आचार्य शिवसागरजी महाराज और उनके संघके सानिध्यमें होनेके कारण बड़ी शान्ति बनी रही। इसका विशेष स्पष्टीकरण सम्पादकीय वक्तव्यमें पढ़नेको मिलेगा।

जैसा कि सम्मेलनके नियमोंसे ज्ञात होगा, यह निश्चय हुआ था कि शंका-समाधानपद्धतिसे लिखित रूपमें पूरी चर्चाके तीन दौर रखे जायें । तदनुसार दो दौर तो श्री १०८ आचार्य महाराजके सानिध्यमें ही सम्पन्न हो गये थे । दोनों ओरसे तीसरा दौर वहाँ सम्पन्न न हो सका । अतएव उसकी व्यवस्था परोक्ष-रूपमें करनेकी योजना स्वीकार की गई । प्रसन्नता है कि पिछले वर्षके जून माहमें तीसरा दौर भी सम्पन्न हो गया है ।

शंका-समाधानपद्धतिसे लिखितरूपमें इस तत्त्वचर्चाका ऐतिहासिक बड़ा महत्त्व है । वस्तुतः देखा जाय तो यह तत्त्वचर्चा स्वयं अपनेमें एक जीवित इतिहास बन गया है ।

वर्तमान विद्वानोंमें आपसमें मतभेदका मूल कारण क्या है इस तथ्यको समझनेके लिए भी यह तत्त्वचर्चा बड़ी उपयोगी है । शंका-समाधानके प्रसंगसे यत्र-तत्र बीच-बीचमें दोनों ओरसे जो विचार व्यक्त किये गये हैं उनसे आपसी मतभेदके मूल कारण पर सम्यक् प्रकाश पड़ता है । मैंने स्वयं तत्त्वचर्चामें सक्रिय भाग लिया है, इसलिए मैं इस विषयमें तत्काल इससे और अधिक लिखना वांछनीय नहीं मानता । अस्तु ।

ग्रन्थमालासे जयपुर ( खानिया ) तत्त्वचर्चाके प्रकाशनका निश्चय

इस प्रकार सविधि तत्त्वचर्चाके सम्पन्न होनेके बाद उसके मुद्रण-प्रकाशनकी ओर ध्यान जाना स्वाभाविक था, क्योंकि इतनी महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तत्त्वचर्चा बिना मुद्रण-प्रकाशनके रह जाय यह उचित न होता । पूरी समाज उसकी ओर उत्कण्ठापूर्वक देख रही थी । जब आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल ग्रन्थमालाकी प्रबन्ध समितिको यह ज्ञात हुआ कि दोनों ही पक्ष निर्णयानुसार मिलकर उसे प्रकाशित करानेकी स्थितिमें नहीं हैं तो इस दिशामें उसकी ओरसे मुद्रण-प्रकाशनका निश्चय किया गया । तदनुसार इसकी सूचना सिद्धान्ताचार्य पं० श्री फूलचन्द्रजी सिद्धान्तशास्त्रीको दी गई क्योंकि एक तो उनका इस तत्त्वचर्चामें सक्रिय महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । दूसरे तत्त्वचर्चाके प्रकाशनके सम्बन्धमें दोनों ओरकी लिखा-पढ़ीको ध्यानमें रहते हुए उन्हें अपने पक्षसे मिलकर इसके प्रकाशनका निर्णय भी लेना था ।। मुझे प्रसन्नता है कि प्रबन्ध समितिके प्रस्तावको अपने पक्षकी सम्मतिपूर्वक उन्होंने अन्तमें सहर्ष स्वीकार कर लिया और तत्त्वचर्चाकी पाण्डुलिपि सविधि ग्रन्थमालाकी प्रबन्ध समितिके अधिकारमें दे दी ।

यद्यपि ग्रन्थमाला की प्रबन्ध समितिने इसके प्रकाशनका भार तो सम्हाला, परन्तु योग्य सम्पादनके बिना उसका प्रकाशित करना उचित न समझकर सिद्धान्ताचार्य पं० श्री फूलचन्द्रजी से ही इसके सम्पादनकी और प्रकाशनमें योगदान करनेकी प्रार्थना की गई । चूंकि पं० जी का वर्तमान निवास वाराणसी ही है, अतः वहीं इसके मुद्रणका भी विचार किया गया । स्पष्ट है कि इसका योग्यतापूर्वक सम्पादन तो उन्होंने किया ही, इसके मुद्रण और प्रकाशनमें भी उनका पूरा योगदान मिला है ।

पण्डितजी इस कालमें जैन सिद्धान्तके उच्चकोटिके मर्मज्ञ विद्वान् हैं इसे सभी मनीषी यहाँ तक कि उनसे विचार-भेद रखनेवाले मनीषी भी एक स्वरसे स्वीकार करते हैं । उनकी प्रतिभा चहुमुखी है । उन जैसा कर्मठ विद्वान् आज समाजके लिए सुलभ है इसे समग्र जैन समाजका सौभाग्य ही समझना चाहिए । अतएव उनकी देखरेख में यह कार्य सम्पन्न हो यह ग्रन्थमाला प्रबन्ध समितिकी भावना थी । जिसे उन्होंने कार्यान्वित करके पूरी समाजका बड़ा उपकार किया ।

यह जयपुर ( खानिया ) तत्त्वचर्चा आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल ग्रन्थमालाका दूसरा और तीसरा पुष्प है जो ग्रन्थमालासे प्रकाशित हो रहा है ।

आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल स्मारक भवनका मनोरम रूप

मैं यह तो पहले ही बतला आया हूँ कि पूज्य श्री कानजी स्वामीकी सत्प्रेरणासे जयपुरमें ही आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमलकी स्मृति स्वरूप स्मारक बनानेका निर्णय हुआ था जो अब उनकी स्मृतिके अनुरूप विशालरूपमें निर्मित हो चुका है। जयपुरमें जिस स्थान पर इसका निर्माण हुआ है वह शिक्षाका केन्द्र है। जयपुर राजस्थानका विश्वविद्यालय और दूसरी शिक्षा संस्थाओंके सन्निकट यह स्मारक भवन अति आकर्षक अपने ढंगका एक है। इसके मध्य लगभग ११० फुट लम्बा और ६४ फुट चौड़ा एक विशाल हाल है। सामनेकी ओर एक तरफ सुन्दर चैत्यालय और दूसरी तरफ स्वाध्यायशालाका निर्माण किया गया है। तथा दाएँ-वाएँ दोनों ओर स्नातकोंके निवास योग्य कमरे बनाये गये हैं। कमरोंके आगे छायादार दहलान है। दूसरे मंजिल पर भी हॉलके ऊपरी भागके दोनों ओर इसी प्रकार व्यवस्थित कमरोंकी पंक्ति बनी हुई है। हॉल इतना ऊँचा बनाया गया है कि उसके ऊपरकी छतसे पूरे जयपुरकी रमणीय छटाके दर्शन होते हैं। हॉलके पीछेकी ओर नीचे और ऊपरकी मंजिलमें स्नानगृह आदिकी सुन्दर व्यवस्था है। इस भव्य इमारतके पीछे अलगसे अतिथिभवनका भी निर्माण किया गया है। चारों ओर खुला मैदान पर्याप्त है जिससे इस इमारतकी शोभा द्विगुणित हो गई है। मुख्य प्रवेश द्वार भी कलात्मक बनाया गया है। इस सबके दर्शन करने मात्रसे यह स्पष्ट हो जाता है कि श्री सेठ पूरणचन्दजी गोदीका और उनके पूरे परिवारने अपनी प्रगाढ़ श्रद्धाको इसमें ओत दिया है। जयपुर राजस्थानमें ही नहीं पूरे देशमें यह स्मारक अपनी विशेषता रखता है।

पूज्य श्री कानजी स्वामी द्वारा स्मारक भवनका उद्घाटन

मुझे यह सूचित करते हुए अति आनन्दका अनुभव हो रहा है कि इसी मार्च माहके मध्य सोनगढ़के आध्यात्मिक सन्त पूज्य श्री कानजी स्वामीके करकमलों द्वारा इसका उद्घाटन हो रहा है और उसी समय उन्हींके पुनीत करकमलों द्वारा ग्रन्थमालाके उक्त खिले हुए सौरभमय दो सुन्दर पुष्पोंके दर्शन भी सबके लिए सुलभ होंगे।

आभारप्रदर्शन

मैं इस तत्त्वचर्चाके आयोजक और प्रबन्धक ब्र० श्री सेठ हीरालालजी पाटनी निवाई और श्री ब्र० लाडमलजी जयपुरका सर्व प्रथम आभार मानना अपना प्रधान कर्तव्य मानता हूँ। यह उक्त दोनों महानुभावोंके परिश्रमका ही सुपरिणाम है कि जिसके कारण यह तत्त्वचर्चा एक ऐतिहासिक रूप धारण कर सकी।

मुझे यहाँ दोनों पक्षके उन नामांकित विद्वानोंके प्रति भी आभार प्रदर्शित करते हुए अपूर्व आनन्दका अनुभव हो रहा है, क्योंकि उनके मनोयोग और दीर्घ अध्यवसायका ही यह सुपरिणाम है जो विशाल ग्रन्थके रूपमें आज समाजको उपलब्ध हो रहा है। तत्त्वज्ञानकी जागृतिमें समाज और दूसरे मनीषी विद्वान् पूरा लाभ उठावेंगे ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है।

आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल ग्रन्थमालाकी प्रबन्ध समितिके सब सदस्य और उनका तत्त्वचर्चाके प्रकाशनका निर्णय तो स्तुति योग्य है ही, क्योंकि उसने अपने निर्णय द्वारा पूरी समाजके समक्ष यह स्पष्ट कर दिया है कि जिस प्रकार उक्त तत्त्वचर्चाका ऐतिहासिक महत्त्व है उसी प्रकार उक्त तत्त्वचर्चा जयपुरमें होनेके कारण जयपुरको ही उसके प्रकाशनका श्रेय मिले इसका भी अपना महत्त्व है । प्रबन्धसमिति के इस निर्णयसे जयपुरकी ख्यातिमें वृद्धि ही हुई है ऐसा मेरा विश्वास है ।

मुझे यह नहीं भूलना चाहिये कि इस तत्त्वचर्चाको जो ऐतिहासिक स्वरूप मिला है उसमें सिद्धान्ताचार्य पण्डित श्री फूलचन्द्रजी सा० का विशिष्ट योगदान है । इतना ही नहीं, जिस रूपमें वह है उस रूपमें उसका सुन्दर सम्पादन होकर वह प्रकाशित हो जाय इस महत्त्वपूर्ण कार्यका उत्तरदायित्व भी उन्हींको सम्हालना पड़ा है। एतदर्थ मैं प्रबन्ध समितिकी ओरसे उनका जितना आभार मानूं थोड़ा है । उनकी सेवाओंसे चिरकालतक समाज इसी प्रकार अनुप्राणित होती रहे यह भावना है ।

कोई भी वस्तु चाहे जितनी सुन्दर क्यों न हो, पर यदि उसका बाह्य परिवेश उसके अनुरूप न हो तो उसकी सुन्दरता छिप जाती है। मुझे प्रसन्नता है कि इस तत्त्वचर्चाका आन्तररूप जितना हृदयग्राही है उतना ही हृदयग्राही उसका मुद्रण भी हुआ है । इसके लिए मैं श्रीमहावीर प्रेस, वाराणसीके मालिक श्री बाबूलालजी फागुल्लका विशेषरूपसे आभारी हूँ । और महावीर प्रेसके उन कर्मचारियोंका भी जिन्होंने मनोयोगपूर्वक इस कार्यको समयके भीतर ही सम्पन्न किया है ।

यह प्रकाशन मात्र स्व-परकल्याणकी भावनासे किया गया है । विश्वास है कि आत्मकल्याणके इच्छुक प्रत्येक प्राणीको यथार्थ तत्त्वका निर्णय करनेमें यह प्रकाशन बहुत उपयोगी सिद्ध होगा ।

विनीत
नेमिचन्द पाटनी
व्यवस्थापक
आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल ग्रन्थमाला
जयपुर

सम्पादककी ओरसे

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १५ से ३७

↑ सूची


सम्पादककी ओरसे

\१. भेदविज्ञानका माहात्म्य

एक ही जीवकी विविध अवस्थाओंके सूचक गुणस्थान चौदह हैं। नियम यह है कि सर्व प्रथम अनादि कालसे यह जीव मिथ्यात्व गुणस्थानमें स्थित हैं । मिथ्यात्व गुणस्थानका मुख्य कार्य अपने आत्मस्वरूपको भूल कर परमें निजबुद्धि कराना है। इसकी अदेवमें देवबुद्धि, अगुरुमें गुरुबुद्धि और अतत्त्वमें तत्त्वबुद्धि नियमसे होतो है । कषायकी मन्दतावश कदाचित् ऐसा जीव अणुव्रतों और महाव्रतोंका भी पालन करता है। कदाचित् क्षयोपशमकी विशेषता वश ग्यारह अंग और नौ पूर्वोंका पाठी भी हो जाता है, फिर भी मिथ्यादृष्टि बना रहता है। विषय-कषायकी मन्दता या क्षयोपशमकी विशेषताका होना अन्य बात है और आत्मकार्यमें सावधान होकर भेदविज्ञानके बलसे सम्यग्दृष्टि बन मोक्षके लिए उद्यमशील होना अन्य बात है। इसी तथ्यको ध्यानमें रख कर भगवान् कुन्दकुन्ददेवने दर्शनप्राभृतमें धर्मका मूल सम्यग्दर्शनको कहा है-दंसणमूलो धम्मो। सतत जागरूक रहते हुए परमागमका अभ्यास करना, अणुव्रत-महाव्रतोंका पालन करना तथा देव, गुरु, शास्त्रकी श्रद्धा भक्ति करना इसकी जहाँ बाह्य कर्तव्यके रूपमें परमागममें स्वीकृति है वहाँ उसी परमागममें अन्तरंग कर्तव्यके रूपमें भेदविज्ञानकी कलाको सम्पादित करना सबसे बड़ा पुरुषार्थ बतलाया गया है। आचार्य अमृतचन्द्रदेवने इसी तथ्यको हृदयंगम कर समयसार-कलशमें यह वचन कहा है कि आजतक जितने भी सिद्ध हुए वे एकमात्र भेदविज्ञानके बलसे ही सिद्ध हुए और जो संसारी बने हुए हैं वे भेदविज्ञानको नहीं प्राप्त करनेके कारण ही संसारी बने हुए हैं। भेदविज्ञानकी महिमा सर्वोपरि है।

\२. प्राचीन इतिहास

हमारे बुंदेलखण्डकी यह परिपाटी है कि प्रत्येक गाँव या नगरके प्रत्येक जिनालयमें रात्रिवचनिकामें दो शास्त्र अवश्य रखे जाते हैं। उसमें भी प्रथम शास्त्र तत्त्वज्ञानसे सम्बन्ध रखनेवाला होता है। इसका सर्वप्रथम वाचन किया जाता है और दूसरा शास्त्र पुण्य पुरुषोंकी जीवन चर्याका परिचायक होता है। इसका अन्तमें वाचन किया जाता है। प्रथम शास्त्रके रूपमें कभी-कभी चरणानुयोगसम्बन्धी शास्त्रका भी वाचन होता है और सबके अन्तमें शास्त्रसभामें उपस्थित महानुभावोंमेंसे कोई एक महाशय भजन बोलते हैं, जो अध्यात्मरससे ओत-प्रोत होता है। बचपनमें तो मैं इसके महत्त्वको नहीं जानता था, किन्तु अब इस पद्धतिकी विशेषता समझमें आने लगी है। यह संसारी प्राणी तत्त्वज्ञानका प्रयोजन समझकर आत्मकार्यमें सावधान बने यह इस पद्धतिका मुख्य प्रयोजन है। यह पद्धति मेरे ख्यालसे पूरे भारतवर्षमें प्रचलित होनेका भी यही कारण है। इतना अवश्य है कि किसी विशिष्ट ज्ञानीके आ जानेपर शास्त्रगोष्ठीमें तत्त्वज्ञानकी प्ररूपणा पर सदासे विशेष बल दिया जाता रहा है, जो अबाधितरूपसे आज तक प्रचलित है। स्वयं जब कोई विद्वान् किसी नगरमें जाते हैं तब वे तत्त्वज्ञानके आलम्बनसे ही शास्त्रप्ररूपणा करते हैं। अन्तमें प्रथमानुयोगका तो मंगलाचरण मात्र कर दिया जाता है। वहाँ उपस्थित श्रोताजन भी यही चाहते हैं कि पण्डितजी कुछ ऐसे तथ्योंका निर्देश करें जिन्हें समझ कर हम आत्मकल्याणमें लग सकें।

बहुत प्राचीनकालीन परिपाटीकी तो मैं चर्चा नहीं करता । अभी २-३ सौ वर्षकी पिछली परिपाटीकी ओर भी यदि ध्यान दिया जाय तो उससे विदित होता है कि प्रत्येक नगरमें ऐसी गोष्ठियाँ सदासे होती रही हैं जो तत्त्वज्ञानके उद्देश्यसे ही स्थापित की जाती थीं और उनमें प्रमुख रूपसे अध्यात्मके प्ररूपक शास्त्रोंका स्वाध्याय-मनन चिन्तन कर आत्मकार्यमें सावधानता प्राप्त की जाती थी । पण्डितप्रवर बनारसीदासजीकी जीवनीसे जैनसमाजका प्रत्येक गृहस्थ सुपरिचित है । उन्होंने नाटक समयसार की रचना कर जैन समाजका महान् उपकार किया है । उनकी लिखी हुई अर्धकथानक पुस्तकके पढ़नेसे भी यह विलकुल स्पष्ट हो जाता है कि एकमात्र अध्यात्मरससे ओतप्रोत अध्यात्म शास्त्रके वलसे ही वे दिगम्बर जैन परम्परामें आकृष्ट हुए थे । उनके कालमें आगरामें ऐसी एक गोष्ठी थी जिसमें समयसारादि महान् ग्रन्थोंका स्वाध्याय कर यथार्थ मोक्षमार्ग क्या है इसपर विशदरूपसे ऊहापोह किया जाता था । ऐसी ही एक गोष्ठी दिल्लीमें भी थी यह छहढाला जैसे महान् ग्रन्थके निर्माता पण्डितप्रवर दौलतरामजीकी जीवनी पर सम्यक् ध्यान देनेसे स्पष्ट हो जाता है ।

आचार्यकल्प पण्डित श्री टोडरमलजी द्वारा लिखित ‘रहस्यपूर्ण चिट्ठी’का स्वाध्याय तो सबने किया ही होगा । उससे भी मालूम पड़ता है कि मुलतान और जयपुरमें भी ऐसी गोष्ठियाँ सदासे चलती आई हैं । सदासे इन सब गोष्ठियोंके स्थापित करनेका एक ही उद्देश्य रहा है कि जैसे बने वैसे तत्त्वज्ञानकी जागृतिपूर्वक आत्मकार्यमें सावधान हुआ जाय । इसमें मैंने मुनिजनों और त्यागी गृहस्थोंकी चर्चा जानबूझ कर नहीं की है । क्योंकि ये महानुभाव आत्मकार्यमें सावधान बने रहनेके लिए ही गृहस्थी व परिग्रहका त्याग करते हैं । अणुव्रत-महाव्रतका पालना यह इनका मुख्य कार्य नहीं है, किन्तु सतत आत्मकार्यमें जागरूक रहते हुए विज्ञानघनस्वरूप आत्माको प्राप्त करना ही इनका मुख्य कार्य है । जो आत्मकार्यमें सावधान होता है उसके आत्मकार्यके अनुवर्ती देव-शास्त्र गुरुकी भक्ति-श्रद्धा, अणुव्रत-महाव्रतका पालन आदि कार्योंमें सावधानी तो होती है ।

\३. वर्तमान स्थिति

यह समग्र दिगम्बर परम्पराका प्राचीन इतिहास है । इसके प्रकाशमें हमें वर्तमानको जानना है । यदि विचारकर देखा जाय तो इस दृष्टिसे हम बड़े सौभाग्यशाली हैं, क्योंकि इस कालमें पुनः समस्त समाजका ध्यान उस शिक्षाकी ओर गया है जिससे दिगम्बर जैन धर्म ही यथार्थ धर्म कहलानेका अधिकारी है । धर्मका उपदेश तो अन्य पन्थोंके प्रवर्तकोंने भी दिया है । परन्तु उनका वह उपदेश बाह्य सदाचार और क्रियाकाण्ड तक ही सीमित है । इस पंचमकालमें जैनपरम्परामें भी ऐसे पन्थोंका उदय हुआ है, परन्तु उन्होंने धर्मके नामपर मोक्षमार्गकी चर्चा करके भी उसे पुनः लौकिक बनानेमें ही अपनी चरितार्थता समझी है । एकमात्र दिगम्बर परम्परा ही ऐसी धारा है जिसमें कल्याणके मार्गका यथार्थरूपमें निर्देश किया गया है ।

संसारी आत्मा अपने अपराधवश अनेक प्रकारके बन्धनोंमें जकड़ा हुआ है । उसे अन्तरंग और बहिरंग उन दोनों प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिए अपने त्रिकालाबाधित निज स्वरूपकी ओर ध्यान देना ही होगा । यदि हमारी अध्यात्मविद्या चरितार्थ है तो इसी मायनेमें चरितार्थ है । वह ऐसी अलौकिक ज्ञान ज्योति है जो इन अन्तरंग और बहिरंग दोनों प्रकारके बन्धनोंके मध्य सोये हुए ज्ञानज्योतिस्वरूप उस शाश्वत आत्माका दर्शन करा देती है । इसीलिए सभी आचार्योंने इस अध्यात्मज्ञानकी मुक्तकण्ठसे स्तुति की है । आचार्य कुन्दकुन्द तो इसकी स्तुति करते हुए समयसार जैसे परमागममें यहाँतक लिख गये कि-जिसने सर्व पर द्रव्य-परभावोंसे भिन्न, अनन्य, नियत, अविशेष और असंयुक्त इस आत्माको अनुभव लिया उसने पूरे जैन शासनको जान लिया। उक्त प्रकारके आत्माको अनुभवना ही समग्र जैन शासनका जानना है यह आचार्यका उपदेश है जो कि भगवद्वाणीके रूपमें मान्य है। और यह बात ठीक भी है, क्योंकि चक्रवर्तीके भोग और देवेन्द्र पदका प्राप्त करना यह धर्मका उद्देश्य नहीं है। सर्व प्रकारके कलंक दोषोंसे रहित विज्ञानघनस्वरूप निज आत्माको प्राप्त करना ही धर्मका उद्देश्य है। यही परमागमस्वरूप वीतराग वाणीका सार है।

\४. कुछ शंकाओंका निरसन

ऐसी अध्यात्मविद्याप्रवण वीतराग वाणी परमागमका प्रधान अंग अनादिकालसे बनी चली आरही है। हमारा परम सौभाग्य है कि वह वाणी इस कालमें पुनः मुखरित हुई है। सोनगढ़के अध्यात्म सन्त कानजी स्वामी तो उसके मुखरित होनेमें निमित्तमात्र हैं। वह उनकी वाणी नहीं है। वीतराग वाणी है, शुद्धात्माकी अपनी पुकार है। कुछ भाइयोंका कहना है कि कानजी स्वामी एकान्तकी प्ररूपणा करते हैं। वे व्यवहारको उड़ाते हैं। जब कि वस्तुस्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। निश्चयधर्म आत्मधर्म है, क्योंकि वह परमात्मस्वरूप है। ऐसी प्ररूपणा करते समय यदि यह कहा जाय कि यदि ऐसे आत्मधर्मको व्यवहारधर्म स्पर्श नहीं करता है, वह उससे सर्वथा भिन्न है तो ऐसी कथनीको व्यवहारधर्मका उड़ाना कैसे मान लिया जाय अर्थात् नहीं माना जा सकता है। हाँ यदि वे यह कहने लगें कि व्यवहारसे देव-गुरु-शास्त्रकी पूजा-भक्ति करना, स्वाध्याय करना, जिन वाणीका सुनना-सुनाना, अणुव्रत-महाव्रतका पालना इन सब क्रियाओं के करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। मोक्षमार्गीके ये होती भी नहीं हैं। तब तो माना जाय कि वे व्यवहारको उड़ाते हैं।

श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्टसे प्रकाशित प्रतिक्रमण पाठको हमने देखा है। उसमें यह भी निर्देश किया गया है कि जिसने जीवन पर्यन्तके लिए मद्य-मांस आदिका त्याग नहीं किया है वह नामका भी जैनी नहीं है। क्या यह व्यवस्थाकी प्ररूपणा नहीं है। क्या इससे हम यह नहीं समझ सकते कि वे व्यवहारको उड़ाना नहीं चाहते, बल्कि उसे प्राणवान् बनानेमें ही लगे हुए हैं। प्राण-वान् व्यवहार ही मोक्षमार्गका सच्चा व्यवहार है। ऐसी परमागमकी आज्ञा है। उनकी पूरी कथनी और करनी पर बारीकीसे ध्यान दिया जाय तो उससे यही सिद्ध होता है।

उन्होंने अपनी पुरानी प्रतिष्ठाको छोड़कर दिगम्बर परम्परा स्वीकार की और इस परम्परामें आनेके बाद अपनेको अव्रती श्रावक घोषित किया। एकमात्र उनकी यह घोषणा ही यह सिद्ध करनेके लिए पर्याप्त है कि वे मोक्षमार्गके अनुरूप सम्यक् व्यवहारको जीवनमें भीतरसे स्वीकार करते हैं। यदि वे एकान्तके पक्ष-पाती होते तो कह सकते थे कि मैं ‘पर्यायदृष्टिसे भी न गृहस्थ हूँ और न मुनि हूँ। मैं तो एकमात्र ज्ञायक-स्वरूप आत्मा हूँ।’ वे जिस स्थितिमें हैं उसे भीतरसे स्वीकार तो करते ही हैं और यह जीव अन्तरात्मा बन कर परमात्मा कैसे बनता है इस मार्गका भी दर्शन कराते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो जो भी ज्ञानी मोक्ष-मार्गका उपदेश देता है वह दूसरेके लिए नहीं देता है। उसके अन्तरात्माकी पुकार क्या है उसे ही वह अपने को सुनाता है। दूसरे भव्य प्राणी उसे सुनकर अपना आत्महितका कार्य साध लें यह दूसरी बात है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि वे अनेकान्तके आशयको समझते हैं और जीवनमें उसे स्वीकार करते हैं।

उनके विषयमें एक आक्षेप यह भी है कि वे पुण्यका निषेध करते हैं पर हमें उनपर किया गया यह आक्षेप भी उपहासास्पद प्रतीत होता है । वस्तुतः वे पुण्यका निषेध नहीं करते । किन्तु मुझे पुण्यका अर्जन करना है इस भावका निषेध अवश्य करते हैं । उनका कहना है कि इस संसारी प्राणीको अर्जन करने योग्य यदि कोई वस्तु है तो वह आत्मनिधि ही है । किन्तु जब उसके अर्जनके उपायोंका विचार करते हैं, उसकी कथा करते हैं, उसके अनुकूल क्रिया करते हैं तो पुण्यका अर्जन स्वयमेव हो जाता है । देव-शास्त्र-गुरुकी भक्ति पूजाका तथा अणुव्रत-महाव्रतके धारणका उपदेश शास्त्रोंमें पुण्यके अर्जनकी दृष्टिसे नहीं दिया गया है । किन्तु ये सब क्रियाएँ निश्चय मोक्षमार्गके परिकर्मस्वरूप हैं, मात्र इसीलिए इनका’ शास्त्रोंमें उपदेश दिया गया है । वे अपनी आगमानुकूल वाणी द्वारा इसी तथ्यका स्पष्टीकरण करते हैं ।

एक आक्षेप यह भी किया जाता है कि वे कार्य-कारण परम्परामें वाह्य निमित्तको नहीं स्वीकार करते । किन्तु इसके स्थानमें स्थिति यह है कि वे भेदविज्ञानको जीवनका प्रधान अंग बनानेकी दृष्टिसे कार्य-कारणपरम्पराके निश्चय कार्य-कारणपरम्परा और व्यवहार ( उपचरित ) कार्य-कारण ऐसे दो भेद करके निश्चय कार्य-कारणपरम्परा ही यथार्थ कार्य-कारणपरम्परा है, ऐसी घोषणा अवश्य करते हैं । साथ ही वे व्यवहार कार्य-कारणपरम्पराका निषेध तो नहीं करते, परन्तु उसे विकल्पमूलक बतलाकर मोक्षमार्गमें वह आश्रय करने योग्य नहीं है यह भी कहते हैं । वे अपने प्रवचनोंमें यह सर्वदा कहते रहते हैं कि प्रत्येक कार्य पाँचके समवायमें होता है । उनके इस कथनसे ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वे प्रत्येक कार्यके प्रति समन्वय-व्यतिरेकके आधारपर बाह्य सामग्रीमें निमित्तता ( व्यवहारहेतुता ) को स्वीकार अवश्य करते हैं । किन्तु यह व्यवहारहेतुता परमार्थस्वरूप नहीं है ऐसा यदि वे कहते हैं और इसे कोई उनके द्वारा बाह्य निमित्तको अस्वीकृति मानता है तो उसका इलाज नहीं । इतना अवश्य है कि जीवन में मोक्षमार्गकी सम्प्राप्ति स्वाश्रित उपयोगके बलसे ही होती है, इसलिए वे सर्वप्रकारके पराश्रितपनेका निषेधकर स्वाश्रितपनेका ज्ञान अवश्य कराते रहते हैं ।

\५. स्वामीजीके उपदेशोंका सुफल

यह उनके उपदेश देनेकी पद्धति है । मैंने सर्वप्रकारसे उनके उपदेशोंको समझनेका प्रयत्न किया है । किन्तु मुझे तो वह सर्व प्रकारसे मोक्षमार्गके अनुरूप ही प्रतीत हुआ । अभी कुछ दिन पूर्व श्री सवाई सिंघई धन्यकुमारजीकी लेखमाला जैन सन्देशमें प्रकाशित हुई थी । सोनगढ़से आकर ही उन्होंने एक प्रत्यक्ष द्रष्टाके नाते उसे प्रकाशित कराया है । स० सि० धन्यकुमारजी न केवल दूसरी भाषाओंके विद्वान् हैं, किन्तु वे संस्कृतके भी अच्छे ज्ञाता हैं । श्रीयुत् पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्रीका सानिध्य मिलनेसे उन्होंने धर्मशास्त्र का बारीकीसे अध्ययन किया है । प्रतिदिन उनका प्रातःकालीन स्वाध्याय अध्ययनके रूपमें ही होता है । वे हजार काम छोड़कर आत्मकल्याणकी इच्छासे धर्मशास्त्रका स्वाध्याय करते रहते हैं । यह उनके जीवनकी सर्वोपरि विशेषता है । उन्होंने सोनगढ़की स्थितिका अध्ययन कर जो कुछ भी लिखा है उससे भी स्वामीजी के उपदेश देनेकी शैलीपर विशद प्रकाश पड़ता है । यह उनके उपदेशका ही माहात्म्य है कि अबतक १५-२० हजार श्वेताम्बर बन्धुओंने दिगम्बर परम्पराको स्वीकार कर लिया है । उनके लेखसे यह भी ज्ञात होता है कि अबतक ७-८ अजैन बन्धु भी उनके उपदेशसे दिगम्बर धर्ममें दीक्षित हो गये हैं ।

\६. सौराष्ट्रकी स्थितिमें परिवर्तन

जिस सौराष्ट्रकी धरणीको भगवान् नेमिनाथने पुण्यभूमि बनानेका स्वरूप प्रदान किया । जिस सौराष्ट्रने धरसेन आचार्यके रूपमें अंग-पूर्वज्ञानको सुरक्षित बनाये रखा और जिस सौराष्ट्रने आचार्य पुष्पदन्त-भूतबलीको सादर आमन्त्रित कर अंग-पूर्वज्ञानकी सुरक्षाका महान् कार्य किया। वही सौराष्ट्र शताब्दियों तक अपने प्राचीन गौरवको ऐसे भुलाये हुए था मानो दिगम्बर परम्परामें उसका कभी कोई स्थान ही न रहा हो। किन्तु हर्षका विषय है कि उसी सौराष्ट्रने वर्तमान कालमें कानजी स्वामीके रूपमें पुनः अंगड़ाई ली है। आज वह दिगम्बर परम्पराका सजग प्रहरी बनकर समाजके सामने उपस्थित है। हम अपनी निधिको अपनी असावधानीके कारण खो देनेके लिए भले ही तैयार हो जाँय, पर वह खोने नहीं देगा। जैसे कोई सो कर जागता है और अपनी निधिकी सँम्हालमें जुट जाता है। आज समग्र सौराष्ट्रकी वही स्थिति बन पड़ी है। कोई कुछ भी क्यों न कहे, मैं तो कहता हूँ कि वर्तमानमें श्रीकानजी स्वामीका उदय दिगम्बर परम्पराके लिए अभ्युदयस्वरूप है। जिसके जीवनमें दिगम्बर परम्पराका माहात्म्य समाया हुआ है वह श्रीकानजी स्वामी और समग्र सौराष्ट्रको आदरकी दृष्टिसे देखे विना रह ही नहीं सकता। वहाँ पुनः प्रतिष्ठित हुए दिगम्बर बीसियों जिनालयोंके गगनचुम्बी शिखरोंकी लहराती हुई पताकाएँ सभी भव्य जनोंको बुला-बुला कर कह रही हैं कि आओ, इधर आओ, शुद्धस्वरूपका भान करनेका तुम्हें यह सुवर्ण अवसर प्राप्त है।

\७. तत्त्वचर्चाकी पृष्ठभूमि

यह वर्तमान स्थिति है। इसके ऐसा होते हुए भी कुछ कालसे समाजमें विरोधी प्रचार चल रहा है। अतीत कालमें उसे शमन करनेके लिए अनेक उपाय किये गये। ‘जैनतत्त्वमीमांसा’ ग्रन्थ भी इसी अभिप्रायसे लिखा गया। कई वर्ष पूर्व श्रीमान् पं० मक्खनलालजी सा० न्यायालंकारने जैनदर्शनमें प्रकाशित अपने वक्तव्य द्वारा चर्चाके लिए आमंत्रित किया। आमंत्रित विद्वानोंमें मेरा और श्रीयुक्त पं० जगन्मोहनलाल जी शास्त्री इन दो विद्वानोंके भी नाम थे। उसके बाद मथुरामें भी दि० जैन संघकी बैठकके समय भी श्रीयुक्त पं० राजेन्द्रकुमारजीके साथ इस सम्बन्धमें कुछ विचार विनिमय हुआ। अतएव श्रीयुक्त पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्यके साथ मिल कर तत्त्वचर्चाकी एक रूपरेखा तैयार की गई। वह तत्कालीन साप्ताहिक पत्रोंमें मुद्रित भी हो चुकी है। इस प्रकार एक ओर विरोध भी होता रहा और दूसरी ओर तत्त्वचर्चाका वातावरण भी बनता रहा।

\८. तत्त्वचर्चाके लिए आमन्त्रण

श्री १०८ आचार्य शिवसागर महाराज प्रकृतिसे शान्तपरिणामी हैं। सन् १९६३ में जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चाके पूर्व श्रीयुक्त पं० जगन्मोहनलाल जी शास्त्री उनके दर्शनोंके लिए गये थे। उस समय आचार्य महाराज और पण्डितजीके मध्य इस विषय पर पर्याप्त ऊहापोह हुआ। उसी वर्ष भाद्रपदमें श्री युक्त पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य भी दशलक्षण पर्वके निमित्त जयपुर आमन्त्रित किये गये थे। उस समय भी इस विषय पर विचार विनिमय हुआ। यतः स्वयं आचार्य महाराज चाहते थे कि दोनों ओरके विद्वानोंके मध्य तत्त्वचर्चा होकर यह विरोध शान्त हो जाय, अतः उनके भावको समझ कर संघके दो विवेकी ब्रह्मचारी श्रीयुक्त सेठ हीरालालजी पाटनी और श्रीयुक्त ब्र० लाडमलजीने एक आमंत्रणपत्र द्वारा दोनों ओरके मनीषियोंको तत्त्वचर्चाके लिए आमंत्रित किया जो इस प्रकार है-

तत्त्व-चर्चाके लिए आमंत्रण

खानियां जयपुर
दि० १३-९-६३

आदरणीय महानुभाव,

दर्शन विशुद्धि

जैन समाजकी वर्तमान दशासे आप परिचित हैं । वर्तमान कुछ सैद्धांतिक विवादग्रस्त विषयोंको लेकर समाजके मार्गदर्शक विद्वान् परस्पर दो मत हो रहे हैं और उनकी आपसी खींचतानसे साधारण जनता दुविधामें पड़ रही है । कई बार सोचा गया कि हमारे प्रमुख विद्वान् किसी एक स्थान पर एकत्रित हो चर्चा द्वारा किसी एक निर्णीत पथ पर पहुंचनेका कष्ट करते तो समाजका वहुत कल्याण होता, पर ऐसा हो नहीं सका । विद्वत्परिषद् किसे आमन्त्रित करे और किसे आमंत्रित न करे, इसका सामंजस्य न वैठनेके कारण स्वयं आयोजन करनेमें असमर्थता प्रकट करती है । साथ ही कुछ विद्वान् इसकी चर्चा स्वतंत्ररूपसे करना पसन्द करते हैं । अतः हमने विचार किया है कि खानियां जयपुरमें जहाँ कि परम पूज्य आचार्य श्री १०८ शिवसागरजी महाराजका संघ सहित चतुर्मास हो रहा है, इस चर्चाका आयोजन किया जावे । यह आयोजन चतुर्मास समाप्तिके पूर्व सम्पन्न होना चाहिए । चर्चामें निम्नलिखित विद्वानोंको आमंत्रित करने का विचार किया है । आप तथा आमंत्रित विद्वान् समाजके प्रकाशस्तम्भ हैं । अतः चर्चामें उपस्थित होकर आयोजनको अवश्य सफल करें । यह आयोजन दिनांक २० अक्टूबर १९६३ रविवारसे रखा गया है, इस अवसर पर पधारनेकी स्वीकृति प्रदान करें । विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और साथ ही जिनागमकी रक्षा करना हमारे विद्वानोंका सवसे प्रमुख कार्य । अतः हम आशा रखते हैं कि दोनों विचारधाराओंके विद्वान् अवश्य ही एकत्रित हों । आमंत्रित विद्वानोंके ठहरने आदिकी पूर्ण व्यवस्था रहेगी । आमंत्रित विद्वानोंके सिवाय यदि आप किसी अन्य विद्वान्को भी बुलाना उचित समझते हैं तो उसकी सूचना देनेकी कृपा करें । प्रत्येक विद्वानोंके नाम बुक पोस्टमें पत्रिका भेज दी है । यदि किसीको न मिली हो तो इस प्रकाशनको ही आमंत्रण समझनेकी कृपा करें ।

-:हितैषीः-

हीरालाल पाटनी पो० निवाई ( राजस्थान ), ब्र० लाडमल जैन, दीवानी का मंदिर, लालजी सांडका रास्ता, जयपुर ।

आमंत्रित विद्वान्

\१. श्री पं० वंशीधरजी शास्त्री, ईसरी वाजार २. श्री माणिकचंदजी न्यायाचार्य, फिरोजावाद ३. श्री मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना ४. श्री कैलाशचंदजी शास्त्री, वाराणसी ५. श्री जीवंधरजी न्यायतीर्थ, इन्दौर ६. श्री फूलचंद्र जी सिद्धान्तशास्त्री, वाराणसी ७. श्री वंशीधर जी व्याकरणाचार्य, बीना ८. श्री जगन्मोहनलाल की शास्त्री, कटनी ९. श्री इन्द्रलाल जी शास्त्री, जयपुर १०. श्री नाथूलाल जी शास्त्री, इन्दौर ११. श्री दयाचंद जी शास्त्री सागर, १२. श्री पन्नालाल जी साहित्याचार्य, सागर १३. श्री अजितकुमार जी शास्त्री, दिल्ली १४. श्री सुमेरचंद जी शास्त्री बी० ए०, सिवनी १५. श्री वर्धमान जी शास्त्री, शोलापुर १६. श्री पन्नालाल जी सोनी ब्यावर, १७. श्री रतनचंद जी मुख्तियार, सहारनपुर \१८. श्री बाबू नेमीचंद जी वकील, सहारनपुर १९. श्री ब्र० हुकमचंद जी सलावा, मेरठ २०. श्री पं० लालबहादुर जी शास्त्री, इन्दौर २१. श्री पं० चैनसुखदास जी शास्त्री, जयपुर २२. श्री कु० नेमीचंद जी पाटनी, आगरा २३. श्री ब्र० पं० श्रीलाल जी, महावीरजी २४. श्री पं० बाबूलाल जी, कलकत्ता २५. श्री रामजी भाई, सोनगढ़ २६. श्री हिम्मत भाई, सोनगढ़ २७. श्री सेठ बद्रीप्रसाद जी सरावगी, पटना २८. श्री बाबू हीराचंद जी बोहरा, कलकत्ता २९. श्री सेठ नेमीचंद जी बड़जात्या, नागौर ३०. श्री खेमचंद भाई, सोनगढ़ ३१. श्री बाबू भाई, सोनगढ़ ३२. श्री पं० मक्खनलाल जी, दिल्ली ३३. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार, दरियागंज दिल्ली ३४. श्री मूलचंद जी किशनदास जी कापड़िया, सूरत ३५. श्री पं० राजेन्द्रकुमार जी, मथुरा ३६. श्री ब्र० चाँदमल जी चूड़ीवाल, नागौर ३७. श्री सर सेठ भागचंद जी सोनी, अजमेर।

\९. तत्त्वचर्चाके आमन्त्रण की स्वीकृति

यह आमन्त्रण आमन्त्रणपत्रमें निर्दिष्ट सभी महानुभावोंके पास मुद्रित पत्रकके रूपमें ही भेजा गया था तथा इसे आमन्त्रणदाताओंने वर्तमान पत्रोंमें भी प्रकाशित करा दिया था। ऐसा करनेका उनका उद्देश्य यही था कि जिन महानुभावोंको तत्त्वगोष्ठीमें सम्मिलित करनेके लिए आमन्त्रित किया गया था उन्हें किसी न किसी रूपमें इसकी सूचना मिल जाय। मुझे यह आमन्त्रण २४-९-६३ को मिल सका, क्योंकि उस समय मैं कारंजा गया हुआ था। आमन्त्रण सद्भावना पूर्ण और अच्छे उद्देश्यको लिए हुए था, इसलिए मैंने विचार किया कि यदि तत्त्वचर्चाके अनुकूल परिस्थिति बनती है तो इसमें अवश्य ही सम्मिलित होना चाहिए। कारंजा ब्रह्मचर्याश्रमके अधिष्ठाता श्रीयुक्त पं० माणिकचन्द्र जी न्यायतीर्थ एक विचारक और सहृदय विद्वान् व्यक्ति हैं। उनकी शान्त और उदार प्रकृतिके कारण उन्हें सभी आश्रमवासी तथा सभी परिचित महानुभाव तात्याजी कहते हैं। महाराष्ट्रमें तात्या जी सम्मानित व्यक्तिको ही कहा जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि अपने सद्गुणोंके कारण वे सबके सम्मानास्पद बने हुए हैं। मैंने इस सम्बन्धमें जब उनसे परामर्श किया तो उनका भी यही कहना था कि मालूम पड़ता है कि यह सम्मेलन आचार्य श्री शिवसागर महाराजकी अनुमतिपूर्वक उनकी छत्रछायामें हो रहा है, अतएव आपको निर्भय होकर इसमें अवश्य ही भाग लेना चाहिए। मुझे उनकी यह प्रामाणिक सम्मति उचित प्रतीत हुई, अतएव जयपुरके पते पर मैंने श्रीयुक्त ब्र० लाडमल जी को लिखा कि यदि दोनों पक्षके प्रमुख विद्वान् तत्त्वगोष्ठीको सफल बनाने के लिए कतिपय नियमोंको स्वीकार कर लें तो मैं इस गोष्ठीमें सहर्ष सम्मिलित होनेके लिए तैयार हूँ और साथ ही पत्रके साथ वे नियम भी बनाकर भेज दिये।

यह तो पाठकोंने पढ़ा ही होगा कि मेरे और श्री पं० वंशीधरजी व्या० आ० के नामसे जैन सन्देश १७ अक्टूबर सन् ६३ के अंकमें ‘सैद्धान्तिक चर्चाके लिए आधारभूत कुछ नियम’ इस शीर्षकसे एक वक्तव्य प्रकाशित हुआ था। मैंने इन नियमोंको बनाते समय उस वक्तव्यको अपनी दृष्टिमें रखा है।

पहले तो ब्रह्मचारीजीका मेरे पास यही उत्तर आया कि कुछ पहले श्रीयुक्त पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्री यहाँ आये थे। उनके साथ इस विषयमें पर्याप्त ऊहापोह हो लिया है, अतः नियमोंके विषयमें आप उनसे बातचीत कर लें और अपनी स्वीकृति भेज दें।

किन्तु इसके उत्तरमें उनसे पुनः यही निवेदन किया गया कि उक्त नियम दोनों पक्षोंको ध्यानमें रख कर बनाये गये हैं, अतः तत्त्वगोष्ठीके पूर्व दूसरे पक्षकी ओरसे उनकी स्वीकृति आवश्यक है। तत्त्वचर्चामें सम्मिलित होनेके लिए मेरा बिस्तर बँधा रखा है । किन्तु मैं नियमोंकी स्वीकृति मिलने पर ही सम्मिलित हो सकूँगा ।

जैसा कि ब्रह्मचारीजीके पत्रसे मालूम हुआ था, मेरा उत्तर पहुँचने पर उन्होंने उन नियमोंकी प्रतिलिपि दूसरे पक्षके प्रमुख विद्वानोंके पास भेज दी थी और अन्तमें श्रीमान् पं० मक्खनलाल जी न्यायालंकार तथा श्री पं० बंशीधरजी व्याकरणाचार्यका अनुकूल उत्तर प्राप्त कर उसकी खबर मुझे दी थी । मुझे ब्रह्मचारीजीका यह पत्र १७ अक्टूबर ६३ को डोंगरगढ़में मिला था । तत्त्वचर्चा प्रारम्भ होनेके लिए कुल ३ दिन शेष थे, इसलिए मैंने तार द्वारा अपनी स्वीकृति दे दी और लिख दिया कि यहाँसे मैं सीधा जयपुर पहुँच रहा हूँ ।

\१०. जयपुरके लिए प्रस्थान

डोंगरगढ़ मेरे परम स्नेही दानवीर सेठ भागचन्दजीका निवास स्थान है । इन दोनों दम्पतिका मुझपर परम स्नेह है । मेरे बाह्य सुख-दुखका वे बराबर ख्याल रखते हैं । उन्होंने मुझसे कहा कि आप इतने बड़े सम्मेलनमें अकेले जा रहे हैं यह मुझे अच्छा नहीं लगता । मैं आपके साथ चलनेके लिए तैयार हूँ । पर मैं वहाँ चल कर भी आपकी क्या सहायता कर सकूँगा यह मुझे समझमें नहीं आता । उनकी इस परेशानीको देख कर मैंने उन्हें आश्वस्त किया और कहा कि मेरे लिए पंच परमेष्ठी और धर्मकी शरण है, भय किस बातका । आप चिन्ता न करें । यह सुवर्ण अवसर है । मुझे प्रेमपूर्वक विदा कीजिए । वहाँ जो भी महानुभाव पधारेंगे वे सब अपने धर्मबन्धु हैं, अतएव चिन्ता करनेकी कोई बात नहीं । और इस प्रकार विविध वार्तालाप द्वारा उन्हें आश्वस्त कर मैं उसी दिन रात्रिको गाड़ीसे जययुरके लिए रवाना हो गया और ता० १९ की शामको मैं जयपुर पहुँच गया ।

डोंगरगढ़से रवाना होनेके पूर्व मैंने एक जरूरी तार सोनगढ़ माननीय रामजी भाईको दिया था । उसमें लिखा था कि मैं तत्त्वगोष्ठीमें सम्मिलित होनेके लिए जयपुर जा रहा हूँ । आप किसी निजी विश्वस्त आदमीके हाथ जैन गजट और दूसरे साप्ताहिक पत्रोंकी फायल अवश्य भेज दें । क्योंकि उस समय तक यह स्पष्ट न हो सका था कि यह चर्चा किस विषय पर होगी । इसलिए मुझे इस ओर ध्यान देना आवश्यक प्रतीत हुआ ।

\११. श्रीमान् पं० चैनसुखदासजीके सानिध्यमें

जैसा कि मैं पहले ही संकेत कर आया हूँ कि मैं १९ ता० की शामको ही जयपुर पहुँच गया था । मैं अपने जीवनमें जयपुर कभी नहीं गया था, इसलिए इस विचारमें पड़ गया कि कहाँ जाया जाय । मेरे पास ब्र० लाडमलजीका पता तो था ही, इसलिए मैंने रिक्सा द्वारा सर्व प्रथम वहीं पहुँचनेका निश्चय किया । किन्तु वहाँ पहुंचने पर मालूम हुआ कि यहाँ सम्मेलनकी कोई तैयारी नहीं है । यहाँ तो मात्र एक जिनालय और उसीके अन्तर्गत दो-तीन कमरोंकी एक धर्मशाला है जो सदा बन्द रहती है । क्या किया जाय यह विचार ही कर रहा था कि इतनेमें एक सद्गृहस्थ सज्जनसे मेरी भेंट हो गई । पहले तो उन्होंने मेरा नाम और स्थान पूछा । उसकी जानकारी होनेपर वे बोले कि आप अच्छे आ गये । आप नहीं आते तो सम्मेलन स्थगित हो जाता । इसके बाद उन्होंने बतलाया कि तत्त्वचर्चाका आयोजन खानियामें किया गया है । मेरे यह कहने पर कि मुझे वहाँ पहुँचानेका प्रवन्ध करा दीजिए । रिक्सा वाला जो लेगा मैं दे दूँगा । उन्होंने कहा कि खानिया शहरके बाहर बहुत दूर जंगलमें है । रात्रिमें आपको लेकर वहाँ रिक्सावाला नहीं जायगा । इस बातको सुनकर मैं पुनः विचारमें पड़ गया कि अब क्या किया जाय। जो पता दिया था वहाँ तो ठहरनेका प्रबन्ध ही नहीं था। अन्तमें मुझे श्रीमान् पण्डित चैनसुखदासजीका स्मरण हो आया। मैंने उनसे कहा कि पण्डित जी यहाँसे कितनी दूर रहते हैं, मुझे उनके पास ही पहुँचानेका प्रबन्ध करा दीजीए। वे बोले यह ठीक है, उनका निवासस्थान यहीं नजदीक है। इसके बाद उन्होंने श्रीमन्दिरजीकी मालिनसे कहा कि इन्हें पण्डितजीके पास पहुँचा आओ ये तुम्हें चार आना पैसे दे देंगे। किन्तु मालिन तैयार नहीं हुई, वह बहुत अधिक पैसे माँगने लगी। मैं इसके लिए भी तैयार था पर ये महाशय नहीं माने और स्वयं मेरा सामान ले कर मुझे पण्डितजीके पास पहुँचा आये। मैं उनका नाम तो नहीं जानता, पर उनकी इस सहृदयताको जीवनभर नहीं भूल सकता। ऐसे उदारचरित महानुभाव आज भी अपनी समाजमें हैं यह गौरवकी बात है।

पण्डितजी एक उच्चकोटिके कर्मठ विद्वान् हैं। उनका पूरा समय समाज सेवा, साहित्यनिर्माण और छात्रोंके हितमें व्यतीत होता है। मेरे वहाँ पहुँचने पर उन्होंने मुझे इस प्रकारसे अपनाया जैसे मैं उनका चिरपरिचित आत्मीय जन होऊँ। प्रातःकाल किसी तरह श्रीनेमिचन्दजी पाटनीको मेरे आनेकी खबर लग गई। वे तत्काल मेरे पास आये। भेंट होने पर उन्होंने अपनी स्थिति बतलाई और साथ ही बोले कि जब आप आ ही गये तो मैं हर तरह आपके साथ हूँ।

\१२. चरणरजवन्दना

आपसकी बहुत कुछ बातें होनेके बाद मैंने उनसे कहा कि सर्व प्रथम मैं उस जिनालयमें जाना चाहता हूँ जहाँ बैठ कर आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमलजी सा० परमागमकी रचना करते थे। एक तो वह जिनालय है, दूसरे वह पण्डितजीके चरणस्पर्शसे भी मेरे लिए वन्दनीय है। पाटनीजी बोले, वहाँ तो मैं प्रतिदिन जाता हूँ। प्रातःकालीन प्रवचन मैं वहीं करता हूँ। यह जान मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं तत्काल उनके साथ हो लिया। श्री जिनालयमें पहुँच कर पहले तो वीतरागदेवके दर्शन किये। बादमें जहाँ पण्डित जी बैठते थे उस स्थानकी चरण रजको अपने मस्तक पर धारण किया। साथ ही यह निवेदन किया कि जिस कार्यके लिए मैं यहाँ आया हूँ यह आपका ही कार्य है, मुझे आपका बल चाहिए। पश्चात् प्रवचन करके पण्डितजीके निवासस्थान पर लौट आया।

मध्यान्हमें मैं और पाटनीजी खानियाजी गये। वहाँ आवश्यक कृतिकर्म करके आये हुए विद्वानोंसे मिले। अनेक विद्वान् आ चुके थे और कुछ आनेवाले थे। किन्तु प्रारम्भिक दिन होनेसे उस दिन कार्य प्रारम्भ न हो सका। ब्रह्मचारीजीसे मिलने पर मालूम हुआ कि अभी कुछ विद्वानोंका आना शेष है, इसलिए कल २१ ता० को दिनके १ बजेसे गोष्ठीका कार्य प्रारम्भ होगा। आप कल नियत समय पर अवश्य ही आ जावें। मैं वहाँसे लौटकर तथा पण्डितजीसे अनुज्ञा लेकर पाटनीजीके घर चला गया। वहाँ पहुँचने पर मालूम हुआ कि श्री दि० जैन महामुमुक्षुमण्डल और मुमुक्षुमण्डल बम्बईके मंत्री श्री चिमनलालजी सोनगढ़से आवश्यक सामग्री लेकर आ गये हैं। वे मुझसे मिले। बड़ी प्रसन्नता हुई। जहाँतक मुझे स्मरण है श्री सेठ लादूलालजी भी किशनगढ़से इसी दिन आ गये थे। ये पाटनीजीके बहनोई हैं। साथमें पाटनीजीकी बहिन भी आई थीं। आते ही भीतरकी पूरी व्यवस्था पाटनीजी की बहिनने सम्हाली और बाहरकी लिखापढ़ीका पूरा भार श्री सेठ लादूलालजीने सम्हाला । मेरा काम उत्तर पत्रोंका तैयार करना रहता था और उनकी तीन कापी तैयार कर देना इनका काम रहता था। ये धर्मशास्त्र और संस्कृतके अच्छे जानकार हैं। साथ ही मिलनसार और बड़े सहृदय व्यक्ति हैं।

\१३. अधिकृत कार्यवाहीका प्रारम्भ

ता० २१ को नियत समय पर हम सब लोग मिलकर खानियाजी पहुँच गये और आवश्यक कृतिकर्म सम्पन्न होनेके बाद बैठकमें सम्मिलित हो गये । इसके आगेकी प्रतिदिनकी पूरी कार्यवाही श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्यने लिपिबद्ध की है । वे बड़े कर्मठ व्यक्ति हैं । लिखापढ़ीका काम आसानीसे निपटा लेते हैं । प्रत्येक दिनकी उस कार्यवाहीपर मध्यस्थके हस्ताक्षर हैं, इसलिए मैं उसी रूपमें उसे यहाँ दे रहा हूँ । इतना अवश्य है कि ता० २१ की बैठक श्री १०८ आचार्य महाराजकी संरक्षतामें सम्पन्न हुई और ता० २२ की बैठक समाजमान्य सर सेठ भागचन्दजी सोनी अजमेरकी अध्यक्षतामें सम्पन्न हुई । अतएव इन दोनों दिनोंकी कार्यवाही पर अध्यक्षके हस्ताक्षर हैं । प्रत्येक दिनकी अधिकृत कार्यवाही और उपस्थिति इस प्रकार है-

श्री सिद्धपरमेष्ठिने नमः

तत्त्वगोष्ठीका विवरण

आज दिनांक २१-१०-६३ को मध्याह्न १२॥ बजे खानिया स्थित नसियाँ में श्रीमान् १०८ पूज्य आचार्य शिवसागरजी महाराजके सानिध्यमें समागत विद्वानोंकी गोष्ठी हुई जिसमें निम्नाङ्कित विद्वान् उपस्थित रहे-

\१. श्री पं० इन्द्रलालजी शास्त्री, जयपुर २. श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकार, इन्दौर ३. श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना ४. श्री पं० जीवन्धरजी शास्त्री, इन्दौर ५. श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री, वाराणसी ६. श्री नेमिचन्द्रजी पाटनी, जयपुर ७. श्री ब्र० श्रीलालजी काव्यतीर्थ, महावीरजी ८. श्री सेठ बद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना ९. श्री सेठ ब्र० पन्नालालजी उमाभाई, अहमदाबाद १०. श्री चन्दूलाल कस्तूरचन्द्रजी, बम्बई ११. श्री पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा १२. श्री सेठ रामचन्द्रजी कोठयारी, जयपुर १३. ब्र० सूरजमलजी, खानिया १४. श्री भाई कोदरलाल जीवराजजी, तलोद १५. श्री पं० कपूरचन्दजी बरैया, लश्कर १६. श्री सेठ सुमेरमलजी चौधरी, अजमेर १७. श्री पं० मिश्रीलालजी शास्त्री, लाडनूं ।

कार्य-

पारस्परिक ऊहापोह के बाद तत्त्वचर्चाके लिये निम्नलिखित नियम पारित किये-

(१) चर्चा वीतरागभावसे होगी ।

(२) चर्चा लिखित होगी ।

(३) वस्तुसिद्धिके लिये आगम ही प्रमाण होगा ।

(४) पूर्वाचार्यानुसार प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी ग्रन्थ प्रमाण माने जायेंगे ।

(५) चर्चा शङ्का-समाधानके रूपमें होगी ।

(६) दोनों ओरसे शङ्का-समाधानके रूपमें जो लिखित पत्रोंका आदान-प्रदान होगा उनमेंसे अपने-अपने पत्रोंपर अधिकसे अधिक ५-५ विद्वानों और मध्यस्थकी सही होगी । इसके लिये दोनों पक्षोंकी ओर से ५-५ प्रतिनिधि नियत होंगे ।

(७) किसी एक विषयसम्बन्धी किसी विशेष प्रश्नपर शङ्का-समाधानके रूपमें पत्रोंका आदान-प्रदान अधिकसे अधिक तीन बार तक होगा ।

आजकी बैठक ४ बजे समाप्त हुई ।

दिनांक २२-१०-६३

आज खानियास्थित छोटी नसियाके ऊपर दिनके १ बजेसे श्रीमान् १०८ आचार्य शिवसागरजी महाराजके सन्निधान एवं रायबहादुर सर सेठ भागचन्द्रजी सोनी अजमेरकी अध्यक्षतामें दूसरी बैठक प्रारम्भ हुई । जिसमें निम्नप्रकार उपस्थिति रही-

\१. श्री पं० बंशीधरजी न्यायालंकार, इन्दौर २. श्री पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य, फीरोजाबाद ३. श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री, वाराणसी ४. श्री नेमिचन्द्रजी पाटनी, आगरा ५. श्री पं० अजितकुमारजी, दिल्ली ६. श्री ब्र० पन्नालालजी उमाभाई, अहमदाबाद ७. श्री पं० मिश्रीलालजी शास्त्री, लाडनूं ८. श्री पं० मक्खनलालजो शास्त्री, मोरेना ९. श्री पं० इन्द्रलालजी शास्त्री, जयपुर १०. श्री पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य, वीना ११. श्रो पं० जीवन्धरजी न्यायतीर्थ, इन्दौर १२. श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य, सागर १३. श्रो रामचन्द्रजी कोटयारी, जयपुर १४. श्री सेठ चन्दूलाल कस्तूरचन्द्रजी, वम्बई १५. श्री सेठ कोदरलालजी, तलोद १६. श्रो सेठ वालचन्द्रजी पाटनी, सुजानगढ़ १७. श्री सेठ वद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना १८. श्री कपूरचन्द्रजी वरैया एम०ए०, लश्कर १९. श्री पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा २०. श्रो सेठ रायबहादुर भागचन्द्रजी सोनी, अजमेर २१. श्री ब्र० सूरजमलजी, खानिया २२. श्री ब्र० श्रीलालजी काव्यतीर्थ, महावोरजो २३. ब्र० श्री सेठ हीरालालजो पाटनी, निवाई २४. श्री सेठ सुमेरमलजी, अजमेर ।

कार्य-

चर्चाविषयक नियमोंमें निम्नलिखित आठवाँ नियम स्वीकृत किया गया-

(८) चर्चामें सामाजिक, पन्थसम्वन्धी तथा व्यक्तिविशेषसम्वन्धो विषयोंपर चर्चा न होकर तत्त्व-सम्वन्धी ही चर्चा होगी ।

मध्यस्थका चुनाव-

श्रीमान् पं० वंशीधरजी न्यायालंकार इन्दौर मध्यस्थ चुने गये । मध्यस्थका कार्य चर्चामें व्यवस्था बनाये रखना तथा दोनों ओरके लिखित पत्रोंका आदान-प्रदान करना रहेगा । मध्यस्थ निर्णायक नहीं होगा ।

चर्चाके विषय-

श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्रीने चर्चाके लिये निम्नलिखित विषय प्रस्तुत किये-

(१) द्रव्यकर्मोंके उदयसे संसारी आत्माका विकारभाव और चतुर्गति भ्रमण होता है या नहीं ?

(२) जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म अधर्म होता है या नहीं ?

(३) जीवदयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?

(४) व्यवहार धर्म निश्चयधर्ममें साधक है या नहीं ?

(५) द्रव्योंमें होने वाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं या अनियतक्रमसे भी ?

(६) उपादान की कार्यरूप परिणतिमें निमित्त कारण सहायक होता है या नहीं ?

तदनन्तर-

उल्लिखित प्रश्नोंकी एक प्रतिलिपि मध्यस्थ महोदयने श्रीमान् पं० फूलचन्द्रजी शास्त्रीको उनके हस्ताक्षर लेकर सौंपी । पं० फूलचन्द्रजी साहब इन प्रश्नोंका लिखित उत्तर दिनांक २३-१०-६३ के एक बजे मध्यस्थ महोदयको सौंप देंगे । साथ ही अपनी ओरसे चर्चणीय विषयोंकी सूची भी प्रस्तुत कर देंगे । उभय पक्षके ५-५ प्रतिनिधियोंके नाम कलकी बैठकमें प्रस्तुत कर देंगे यह निश्चित हुआ ।

आज की बैठकके अध्यक्ष श्री सेठ भागचन्द्रजी सोनीको धन्यवाद दिये जानेके बाद ४ बजे सहर्ष समाप्त हुआ ।

खानिया
दि० २०-१०-६३

श्रीमान् पं० फूलचन्द्रजी साहब !

आज दिनांक की बैठकमें चर्चणीय विषय निम्नप्रकार हैं । इनका उत्तर लिखकर आप दिनांक २३-१०-६३ को मध्याह्न १ बजे तक हमारे पास भेजनेका कष्ट करेंगे । साथ ही आपकी ओरसे चर्चणीय विषयों की सूची भी हमें १ बजे तक प्राप्त हो जावे ऐसी व्यवस्था कीजिये ।

चर्चणीय विषय

(१) द्रव्यकर्मोंके उदयसे संसारी आत्माका विकारभाव और चतुर्गति भ्रमण होता है या नहीं ?

(२) जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म-अधर्म होता है या नहीं ?

(३) जीव दयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?

(४) व्यवहारधर्म निश्चयधर्ममें साधक है या नहीं ?

(५) द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं या अनियतक्रमसे भी ?

(६) उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें निमित्तकारण सहायक होता है या नहीं ?

तृतीय बैठक दिनांक २३-१०-६३

आज दिनांक २३-१०-६३ को मध्याह्नके बाद १ बजेसे श्री पूज्यवर १०८ आचार्य शिवसागरजीके सन्निधान और श्री पं० बंशीधरजी शास्त्री इन्दौरकी मध्यस्थतामें कार्य प्रारम्भ हुआ । उपस्थिति निम्न प्रकार रही-

\१. श्री ब्र० सेठ पन्नालालजी उम्मेदभाई, अहमदाबाद २. श्री सेठ रायबहादुर भागचन्द्रजी सोनी, अजमेर ३. श्री पं० बंशीधरजी न्यायालंकार, इन्दौर ४. श्री पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य, फीरोजाबाद ५. श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री, वाराणसी ६. श्री नेमिचन्द्रजी पाटनी, जयपुर ७. श्री पं० अजितकुमारजी, दिल्ली ८. श्री पं० मिश्रीलालजी शास्त्री, लाडनूं ९. श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना १०. श्री पं० इन्द्रलालजी शास्त्री, जयपुर ११. श्री पं० बंशीधरजी व्याकरणाचार्य, बीना १२. श्री पं० जीवन्धरजी न्यायतीर्थ, इन्दौर १३. श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य, सागर १४. श्री रामचन्द्रजी कोटयारी, जयपुर १५. श्री सेठ चन्दूलाल कस्तूरचन्द्रजी, बम्बई १६. श्री सेठ बालचन्द्रजी पाटनी, सुजानगढ़ १७. श्री श्री सेठ बद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना १८. श्री कपूरचन्द्रजी बरैया, लश्कर १९. श्री पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा २०. श्री ब्र० सूरजमलजी, खानिया २१. श्री० ब्र० श्रीलालजी काव्यतीर्थ, श्रीमहावीरजी २२. श्री ब्र० सेठ हीरालालजी पाटनी, निवाई २३. श्री कोदरलालजी, तलोद २४. श्री ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्तार, सहारनपुर २५. श्री नेमिचन्द्रजी वकील, सहारनपुर २६. श्री ब्र० चाँदमलजी चूड़ीवाल, नागौद २७. श्री सेठ नेमिचन्द्रजी बड़जात्या, नागोद २८. श्री इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर ।

कार्य-

पाँच-पाँच प्रतिनिधियोंका चुनाव-

प्रथम पक्षसे निम्नलिखित पाँच-पाँच प्रतिनिधियोंके नाम प्रस्तुत किये गये-

\१. श्री पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य, फीरोजावाद २. श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना ३. श्री पं० जीवन्धरजी न्यायाचार्य, इन्दौर ४. श्री पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य, बीना ५. पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य, सागर।

(२) द्वितीय पक्षसे निम्नलिखित दो नाम प्रस्तुत किये गये शेष नाम अगले दिन प्रस्तुत करनेकी बात तय हुई-

(१) श्री पं० फूलचन्द जी शास्त्री, (२) श्री नेमिचन्द्र जी पाटनी, आगरा।

चर्चणीय विषय प्रस्तुत करने पर विचार

निश्चित हुआ कि दोनों पक्षोंके चर्चणीय विषय कल ता० २४-१०-६३ तक प्रस्तुत किये जा सकेंगे।

तदनन्तर श्री पं० फूलचन्द्र जी शास्त्रीने कल दिये गये ६ प्रश्नोंका उत्तर मध्यस्थ महोदयको सौंपा और मध्यस्थ महोदयकी आज्ञानुसार उपस्थित जनताकी जानकारीके लिये श्री पं० पन्नालाल जी साहित्याचार्यने उसे पढ़कर सुनाया।

प्रथम पक्षकी ओरसे निम्नलिखित तीन प्रश्न प्रस्तुत किये गये, जिन्हें मध्यस्थ महोदयने उत्तर देनेके लिये श्री पं० फूलचन्द्रजीको सौंपा। पण्डितजी इनका उत्तर कल १ बजे उपस्थित करेंगे।

(१) केवली भगवान्‌की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे ? यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?

(२) दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं ? यदि है तो कौन सम्बन्ध है ? वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्‌की आत्माके सम्बन्धसे ?

(३) सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बंधा हुआ है ? और किसीसे बँधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ? यदि वह बद्ध है तो उसके बन्धनसे छूटनेका उपाय क्या है ?

श्रीमान् पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री

२३-१०-६३

आपकी सेवामें निम्नाङ्कित तीन प्रश्न प्रस्तुत हैं। इनका उत्तर आप कल १ बजे तक उपस्थित करनेका कष्ट करेंगे।

(१) केवली भगवान्‌की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे। यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?

(२) दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं ? यदि है तो कौन सम्बन्ध है ? वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्‌की आत्माके सम्बन्धसे ?

(३) सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बंधा हुआ है ? और किसीसे बँधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ? यदि यह बद्ध है तो उसके बन्धनोंसे छूटनेका उपाय क्या है ?

चौथी बैठक दिनांक २४-१०-६३

आज दिनांक २४-१०-६३ को मध्याह्नके उपरान्त १ बजेसे श्री १०८ पूज्यवर आचार्य शिवसागरजी महाराजके सन्निधान और श्री पं० बंशोधरजी न्यायालंकार इन्दौरकी मध्यस्थतामें बैठक प्रारम्भ हुई । जिसमें उपस्थिति निम्नप्रकार हुई-

\१. श्री सेठ ब्र० पन्नालाल उम्मेद भाई, अहमदाबाद २. श्री वंशीधरजी न्यायालंकार इन्दौर, ३. श्री पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य ४. श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री ५. श्री नेमिचन्द्रजी पाटनी, आगरा ६. श्री पं० अजितकुमारजी शास्त्री, दिल्ली ७. श्री पं० मिश्रीलालजी शास्त्री, लाडनूं ८. श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना ९. श्री पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य, बीना १०. श्री पं० जीवन्धरजी न्यायतीर्थ इन्दौर ११. श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्य, सागर १२. रामचन्द्रजी कोटयारी जयपुर, १३. श्री सेठ चन्दूलाल कस्तूरचन्द्रजी, बम्बई १४. श्री सेठ बालचन्द्रजी पाटनी, सुजानगढ़ १५. श्री सेठ बद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना १६. श्री कपूरचन्द्रजी बरैया, लश्कर १७. श्री पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा १८. श्री ब्र० सूरजमलजी, खानिया १९. श्री सेठ हीरालालजी पाटनी, निवाई २०. श्री सेठ कोदरलालजी, तलोद २१. श्री ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्त्यार, सहारनपुर २२. श्री नेमिचन्द्रजी वकील, सहारनपुर २३. श्री ब्र० चाँदमलजी चूड़ीवाल, नागौर २४. श्री सेठ नेमिचन्द्रजी बड़जात्या, नागौर २५. श्री इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर २६. श्री पं० जुगलकिशोरजी मुख्त्यार २७. श्री पं० कैलाशचन्द्रजी शास्त्री, वाराणसी २८. श्री पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्री, कटनी २९. श्री पं० परमानन्दजी शास्त्री, दिल्ली ३० श्री पं० गोरेलालजी शास्त्री, माधवराजपुरा ३१. श्री पं० सीमंधरजी, जयपुर ३२. श्री पं० इन्द्रलालजी शास्त्री, जयपुर ।

कार्य-

(१) श्री पं० मक्खनलालजी शास्त्रीने २ प्रतिशंकायें उपस्थित कीं, जिनका वाचन मध्यस्थकी आज्ञानुसार पं० पन्नालालजी ने किया ।

(२) श्री पं० फूलचन्द्रजीकी ओरसे-श्री पं० जगन्मोहनलालजी, पं० फूलचन्द्रजी वाराणसी और नेमिचन्द्रजी पाटनी ये नाम प्रतिनिधिके रूपमें उपस्थित किये गये ।

(३) श्रीमान् पं० फूलचन्द्रजीने दिनांक २३-१०-६३ के तीन प्रश्नोंका उत्तर मध्यस्थ महोदयको सौंपा जिसे उनकी आज्ञानुसार पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाया । तदनन्तर दोनोंसे चर्चणीय प्रश्नोंको उपस्थित करनेके लिए कहा गया जिसके फलस्वरूप पं० मक्खनलालजोकी ओरसे निम्नलिखित प्रश्न उपस्थित किये गये-

(१) जीव तथा पुद्गलका एवं द्वयणुक आदि स्कन्धोंका बन्ध वास्तविक है या अवास्तविक ? यदि अवास्तविक है तो केवली भगवान् उसे जानते हैं या नहीं ?

(२) परिणमनके स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय दो भेद हैं, उनमें वास्तविक अन्तर क्या है ?

(३) 'कुगुरु, कुदेव, कुशास्त्रकी श्रद्धाके समान सुदेव, सुशास्त्र, सुगुरुकी श्रद्धा भी मिथ्याभाव है, क्या ऐसा मानना व कहना शास्त्रोक्त है ?

(४) पुण्यका फल जब अर्हन्त होना तक कहा है ( पुण्यफला अरहंता प्र० सा० ) और जिससे यह आत्मा तीन लोकका अधिपति बनता है उसे ‘सर्वातिशायी पुण्य’ बतलाया है ( सर्वातिशायि पुण्यं तत् त्रैलोक्याधिपतित्वकृत् ) तब ऐसे पुण्यको हीनोपमा देकर त्याज्य कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?

(५) पुण्य अपनी चरमसीमाको पहुँचकर अथवा आत्माके शुद्ध स्वभावरूप परिणमन होने पर स्वतः छूट जाता है या उसके छुड़ानेके लिये किसी उपदेश और प्रयत्नकी जरूरत है ?

(६) भावलिङ्गी मुनि आजकल हैं या नहीं ? तथा भावलिङ्गकी प्रकटमें पहिचान क्या है ?

(७) बकरेको काटकर उसका मांस फकीरको धर्म मानकर धर्मबुद्धिसे खिलानेवाले तथा अरहन्तदेवकी पूजा करनेवालेमें कोई अन्तर नहीं है, ऐसा कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ?

(८) जब अभाव चतुष्टय वस्तुस्वरूप है ( भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मः ) तो वे कार्य व कारणरूप क्यों नहीं माने जा सकते ? तदनुसार घातिया कर्मोंका ध्वंस केवलज्ञानको क्यों उत्पन्न नहीं करता ?

(९) निश्चय और व्यवहारनयका स्वरूप क्या है ? व्यवहारनयका विषय असत्य है क्या ? असत्य है तो अभावात्मक है या मिथ्यारूप है ?

(१०) उपचारका लक्षण क्या है ? निमित्तकारण और व्यवहारनयमें यदि क्रमशः कारण और नयत्वका उपचार है तो उनमें उपचारका लक्षण घटित कीजिये ।

उक्त प्रश्न पं० फूलचन्द्रजीको सौंपे जानेपर उनकी ओरसे ६ वाँ और ७ वाँ प्रश्नका उत्तर देनेमें आपत्ति प्रकट की गई जिससे प्रश्नकर्ताओंने उन्हें वापिस ले लिया । पण्डितजीने शेष ८ प्रश्नोंका उत्तर देना स्वीकृत किया ।

तदनन्तर ४॥ बजे कार्यवाही समाप्त हुई ।

५वीं बैठक दिनांक २५-१०-६३

आज पूज्यवर आचार्य श्री १०८ शिवसागरजी एवं उनके संघस्थ अन्य महाराजों के संनिधान और श्री पं० ब्र० वंशीधरजी की मध्यस्थतामें गोष्ठीकी पांचवीं बैठक हुई । उपस्थिति निम्न प्रकार रही-

कलकी उपस्थितिसे पं० राजेन्द्रकुमारजी मथुराकी उपस्थिति अधिक रही, श्री पं० सूरजमलजीने मंगलाचरण किया । तदनन्तर दोनों ओरसे अपने-अपने उत्तर मध्यस्थ महोदयको सौंपे गये । उनकी आज्ञानुसार पं० फूलचन्द्रजीकी ओरसे उत्तर श्री पं० जगन्मोहनलालजीने और पं० मक्खनलालजी आदि की ओरसे उत्तर पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाए । अनन्तर बैठक समाप्त हुई ।

६वीं बैठक दिनांक २६-१०-६३

आज दिनांक २६-१०-६३ शनिवारको पूज्यवर आचार्य श्री १०८ शिवसागरजी महाराज तथा अन्य संघस्थ महाराजोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी अध्यक्षतामें गोष्ठीकी छठवीं बैठक हुई । उपस्थिति निम्न प्रकार रही-

(१) श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकार (२) श्री रायबहादुर सेठ भागचन्द्रजी सोनी, (३) ब्र० चांदमलजी चूड़ीवाल (४) पं० कैलाशचन्द्रजी (५) पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य (६) पं० जीवन्धरजी न्या० तो० (७) पं० मक्खनलालजी (८) ब्र० रतनचन्द्रजी (९) पं० अजितकुमारजी (१०) पं० हेमचन्द्रजी कौन्देय अजमेर (११) पं० राजेन्द्रकुमारजी (१२) सेठ बद्रीप्रसादजी (१३) नेमिचन्द्रजी वकील (१४) पं० सीमन्धरजी (१५) पं० पन्नालालजी (१६) पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य (१७) पं० जगन्मोहनलालजी (१८) पं० फूलचन्द्रजी (१९) नेमिचन्द्रजी पाटनी (२०) पं० नरेन्द्रकुमारजी बड़जात्या (२१) पं० इन्द्रलाल जी (२२) सेठ रामचन्द्रजी कोटयारी, (२३) कपूरचन्द्रजी वरैया, लश्कर (२४) कोदरलालजी, तलोद (२५) इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर (२६) ब्र० लाभानन्दजी, (२७) पं० मिश्रीलालजी, लाडनूं (२८) चिमन भाई, बम्बई (२९) श्री सेठ चंदूलालजी (३०) ब्र० श्रीलालजी (३१) ब्र० सूरजमलजी (३२) ब्र० लाडमल जी (३३) ब्र० सेठ हीरालालजी पाटनी (३४) पं० पन्नालालकी सोनी, ब्यावर।

मंगलाचरण श्री पं० मक्खनलालजीने किया।

कार्य-

दोनों ओरसे उत्तर प्रत्युत्तरके कागजात मध्यस्थ महोदयको सौंपे गये। उनकी आज्ञानुसार उन्हें श्री पं० जगन्मोहनलालजी और पं० पन्नालालजी ने क्रमशः पढ़कर सुनाये।

कार्यवाही २॥ बजे समाप्त हुई।

७वीं बैठक दिनांक २७-१०-६३

आज श्री १०८ पूज्य आचार्य शिवसागरजी महाराज तथा संघस्थ अन्य महाराजोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजीकी मध्यस्थतामें गोष्ठीकी सातवीं बैठक हुई। दोनों ओरके कागजात मध्यस्थ महोदय को सौंपे गये। तदनन्तर उनकी आज्ञानुसार श्री पं० जगन्मोहनलालजी और श्री पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाये। उपस्थितिमें कलकी उपस्थितिके अनुसार रा० ब० सेठ भागचन्द्रजी तथा पं० हेमचन्द्रजी अजमेर अनुपस्थित रहे। ४ बजे कार्य समाप्त हुआ।

८वीं बैठक दिनांक २८-१०-६३

आज २८-१०-६३ को श्री १०८ पूज्य आचार्य शिवसागरजी तथा संघस्थ अन्य महाराजोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी मध्यस्थतामें गोष्ठीकी ८वीं बैठक हुई। उपस्थिति पूर्ववत् रही-

\१. श्री पं० वंशीधरजी ( मध्यस्थ ) २. पं० माणिकचन्द्रजी ३. पं० जगन्मोहनलालजी ४. पं० राजेन्द्रकुमारजी ५. नेमिचन्द्रजी पाटनी ६. पं० नरेन्द्रकुमारजी ७. चिमन भाई ८. इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा ९. कोदरलालजी १०. इन्द्रलालजी ११. कपूरचन्द्रजी वरैया १२. चन्दूलालजी बम्बई १३. संघपति मोतीलालजी बम्बई १४. पं० पन्नालालजी १५. पं० सीमंधरजी, जयपुर १६. नेमिचन्द्रजी वकील १७. पं० वंशीधरजी बीना १८ सेठ बद्रीप्रसादजी १९. पं० जीवन्धरजी २० पं० मक्खनलालजी २१. पं० वृन्दावनदासजी २२. ब्र० लाडमलजी २३. सेठ रामचन्द्रजी कोटयारी २४. पं० पन्नालालजी सोनी २५. ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्त्यार, २६. प्यारेलालजी बड़जात्या २७. पं० अजितकुमारजी दिल्ली २८. ब्र० सूरजमलजी २९. ब्र० सेठ हीरालालजी निवाई ३०. श्री मनोहरलालजी एम० ए०, अजमेर ३१. छगनलालजी पाटनी, अजमेर।

कार्य-

दोनों ओरसे कागजात पेश किये जानेपर मध्यस्थके आदेशानुसार पं० जगन्मोहनलालजी और पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाये।

अनन्तर ४ बजे कार्यवाही समाप्त हुई।

९वीं बैठक दिनांक २९-१०-६३

आज दिनांक २९-१०-६३ मंगलवारको श्री १०८ पूज्य आचार्य शिवसागरजी महाराज तथा संघस्थ अन्य महाराजोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी मध्यस्थामें तत्त्वगोष्ठीकी नवीं बैठक हुई। उपस्थिति निम्न प्रकार रही-

\१. सर सेठ भागचन्द्रजी, सोनी २ पं० वंशीधरजी, न्यायालंकार ३. पं० माणिकचन्द्रजी ४. पं० जगन्मोहनलालजी ५. पं० फूलचन्द्रजी ६. श्री नेमिचन्द्रजी, पाटनी ७. पं० नरेन्द्रकुमारजी, भिसीकर ८. कपूरचन्द्रजी एम० ए० लश्कर, ९. पं० वृन्दावनजी, १०. चिमन, भाई ११. मास्टर मनोहरलालजी एम० ए०, १२. इन्द्रलालजी, १३. छगनलालजी पाटनी, अजमेर १४. सेठ बद्रीप्रसादजी, सरावगी १५. सेठ मोतीलालजी संघपति, बम्बई १६. पं० पन्नालालजी, १७. पं० राजेन्द्रकुमारजी, १८. पं० हेमचन्द्रजी, अजमेर १९. पं० जीवन्धरजी, २०. पं० कैलाशचन्द्रजी २१. पं० अजितकुमारजी २२. पं० पन्नालालजी, सोनी २३. पं० मक्खनलालजी, २४. नेमिचन्द्रजी, वकील २५. ब्र० रतनचन्द्रजी, मुख्त्यार २६. ब्र० सेठ हीरालालजी, निवाई २७. इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर २८. प्यारेलालजी, बड़जात्या २९. रघुवरदयाल जैन, दिल्ली ३०. महेशचन्द्र मेरठ, ३१. ब्र० लाडमलजी, खानिया।

मध्यस्थ महोदयने दोनों पक्षके कागजात पेश किये और उनकी आज्ञानुसार पं० जगन्मोहनलालजी तथा पं० पन्नालालजीने पढ़कर सुनाये।

तदनन्तर ४। बजे सभा समाप्त हुई।

१०वीं बैठक दिनांक ३०-१०-६३

आज दि० ३०-१०-६३ बुधवारको श्रीमान् पूज्यवर आचार्य शिवसागरजी महाराज और उनके संघस्थ अन्य महाराजोंके संनिधान एवं पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी मध्यस्थतामें गोष्ठीकी १०वीं बैठक हुई। उपस्थिति निम्न प्रकार रही-

(१) श्री पं० वंशीधरजी, न्यायालंकार (२) पं० कैलाशचन्द्रजी (३) पं० फूलचन्द्रजी (४) नेमिचन्द्र जी पाटनी (५) चिमनभाई, बम्बई (६) कपूरचन्द्रजी बरैया एम० ए (७) सेठ कोदरलालजी, तलोद (८) सेठ बद्रीप्रसादजी, पटना (९) पं० हेमचन्द्रजी एम० ए०, अजमेर (१०) पं० पन्नालालजी सा० आ० (११) पं० वंशीधरजी, बीना (१२) पं० सीमंधरजी जयपुर, (१३) पं० राजेन्द्रकुमारजी, मथुरा (१४) पं० जीवंधरजी, इन्दौर (१५) ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्त्यार, (१६) पं० पन्नालालजी सोनी, ब्यावर (१७) पं० मक्खनलालजी, मोरेना (१८) पं० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्य (१९) पं० नरेन्द्रकुमारजी भिसीकर, कारंजा (२०) इन्द्रचन्द्रजी छावड़ा, लश्कर (२१) सेठ मोतीलालजी संघपति, बम्बई (२२) सेठ ब्र० हीरालालजी पाटनी, निवाई (२३) ब्र० सूरजमलजी, खानियां (२४) पं० वृन्दावन प्रसादजी, वरैया (२५) नेमिचन्द्रजी वकील, सहारनपुर (२६) पं० जगन्मोहनलालजी, कटनी (२७) ब्र० लाडमलजी, खानियां।

कार्य-

पं० जगन्मोहनलालजी ने अपने द्वारा समर्पित सामग्री मध्यस्थ महोदय को सौंपी और उनकी आज्ञानुसार उन्होंने उनका वाचन किया। तदनन्तर पं० वंशीधरजीने उभय पक्षकी संमतिसे घोषित किया कि १।११।६३ को गोष्ठीका समारोप हो जायगा। चर्चाका तीसरा दौर स्थगित किया जायगा, फिर अन्य किसी समय अवशिष्ट चर्चाका आयोजन किया जायगा। आगामी दिन ३१।१०।६३ को मुनिदीक्षाका समारोह होने से चर्चा बन्द रहेगी।

११वीं बैठक दिनांक १-११-६३

आज दिनांक १-११-६३ शुक्रवारको २ बजे से श्रीमान् पूज्य आचार्य शिवसागरजी महाराज तथा संघस्थ अन्य मुनियोंके संनिधान और श्री पं० वंशीधरजी न्यायालंकारकी मध्यस्थतामें गोष्ठीकी ११वीं बैठक सम्पन्न हुई। जिसमें उपस्थिति निम्न प्रकार रही-

\१. श्री पं० पन्नालालजी, सोनी २. रायबहादुर सर सेठ भागचन्द्रजी, सोनी ३. पं० कैलाशचन्द्रजी ४. पं० वंशीधरजी, न्यायालंकार ५. पं० वंशीधरजी, व्याकरणाचार्य ६. पं० माणिकचन्द्रजी, न्यायाचार्य ७. पं० जगन्मोहनलालजी ८. पं० फूलचन्द्रजी ९. नेमिचन्द्रजी पाटनी, १०. कपूरचन्द्रजी वरैया एम० ए०, ११. कोदरलालजी तलोद, १२. पं० इन्द्रलालजी, शास्त्री १३. पं० जीवन्धरजी, न्यायतीर्थ १४. पं० सीमन्धरजी १५. संघपति मोतालालजी, बम्बई १६. सेठ बद्रीप्रसादजी सरावगी, पटना १७. रामचन्द्रजी, कोटयारी १८. ब्र० नेमिचन्द्रजी, वकील १९. ब्र० रतनचन्द्रजी मुख्त्यार, २०. पं० राजेन्द्रकुमारजी २१. पं० अजितकुमारजी, दिल्ली २२. पं० मक्खनलालजी शास्त्री, मोरेना २३. इन्द्रचन्द्रजी छावडा, लश्कर २४. पं० श्रीलालजी काव्यतीर्थ, महावीरजी २५. चौ० सुमेरमलजी महामंत्री महासभा, अजमेर २६. प्यारेलालजी, बड़जात्या २७. ब्र० सेठ हीरालालजी, पाटनी २८. पं० वृन्दावनजी २९. चिमन भाई, बम्बई ३०. श्री सेठ चन्दूलालजी ,बम्बई।

८-१७ तक प्रतिशंकाओंके उत्तर समर्पित किये जाने पर मध्यस्थ महोदयकी आज्ञासे पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्रीने पढ़कर सुनाये। तदनन्तर आगेके लिये निम्न व्यवस्था निश्चित की गई-

(१) समय अधिक हो जानेके कारण तत्त्वचर्चाके दौर समाप्त करके आगेके लिये स्थगित की जाती है।

(२) तीसरे दौरके लिये निम्नलिखित व्यवस्था बनाई जाती है।

(क) प्रथम पक्ष समस्त प्रत्युत्तरों पर अपनी प्रतिशंकाएं आज ता० १-११-६३ से २ माह के अन्दर रजिस्ट्री द्वारा पं० फूलचन्द्रजी वाराणसीके पास भेज देगा। और जिस तारीखको यह सामग्री पं० फूलचन्द्रजीको प्राप्त होगी उससे २॥ माह होने पर यदि रविवार न हुआ न अगली तारीखको और रविवार हुआ तो दूसरी तारीखको पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्यजी बीनाके पास रजिस्ट्री द्वारा भेज देंगे।

(ख) दोनों ओरके वक्तव्य कुल मिलाकर अद्धा पुलिसकेपके १५०-१५० पृष्ठसे अधिक न हों।

(३) तीसरा दौर समाप्त होनेपर पुस्तकका प्रकाशन दोनों पक्षोंकी सम्मतिसे उनके निर्णयानुसार होगा, उसके पहले नहीं।

(४) समाचार-पत्रोंमें प्रश्नोत्तरोंका प्रकाशन तथा उनकी आलोचना प्रत्यालोचना बन्द रहेगी।

अधिकार-पत्र

हम नीचे लिखे प्रतिनिधि तत्त्वचर्चाके अन्तिम ( तृतीय ) दौरमें सभी प्रतिशङ्काओं व दीगर कागजातपर हस्ताक्षर करनेका अधिकार श्री पं० अजितकुमारजी शास्त्री दिल्लीको या प्रतिनिधियोंमेंसे जो भी समयपर उपस्थित रहेगा उसे यह अधिकार देते हैं कि वह हस्ताक्षर कर कागजातका आदान-प्रदान करें। इनमेंसे किसीके भी हस्ताक्षर हमलोगोंको मान्य होंगे। कोई भी पत्रव्यवहार निम्नाङ्कित पतोंपर किया जा सकता है-

\१. पं० अजितकुमारजी शास्त्री, अभय-प्रिंटिग प्रेस, अहाता केदारा, पहाड़ीधीरज, दिल्ली।

\२. पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्य, बीना ( सागर ), मध्यप्रदेश।

१-११-६३

आवश्यक विवरण

यह विद्वत्सम्मेलनकी प्रत्येक दिनकी अधिकृत कार्यवाहीका विवरण है। इसे प्रतिदिन श्रीयुत् पण्डित पन्नालालजी साहित्याचार्य सागर तैयार करते थे। बादमें मध्यस्थके हस्ताक्षर होकर उसकी एक-एक प्रति दोनों पक्षोंको सौंप दी जाती थी और एक प्रति मध्यस्थके पास रहती थी। उसे यहाँ उसी रूपमें दे दिया गया है।

सम्मेलनकी कार्यवाही ता० २१-१०-६३ से १-११-६३ तक चली थी। इन दिनोंमें तत्त्वचर्चाके दो दौर सम्पन्न हो गये थे। तीसरा दौर होना शेष था। किन्तु सभी विद्वान् अपने-अपने घर जानेके लिए उत्सुक थे। इसलिए तीसरे दौरको सम्पन्न करनेके लिए अलगसे नियम बनाये गये। किन्तु उन नियमोंमेंसे पृष्ठसंख्या और समयकी मर्यादा निश्चित करनेवाले नियमोंका दोनों ओरसे समुचित पालन न हो सका। परन्तु इससे तीसरे दौरको सम्पन्न करनेमें कोई बाधा नहीं आई।

आगेके लिए भी व्यवस्था यह थी कि प्रत्येक सामग्री एक पक्ष दूसरेके पास मध्यस्थके माध्यमसे ही भेजेगा। परस्परके पत्र-व्यवहारमें तो इसका पूरी तरहसे पालन होना सम्भव नहीं था। हाँ तत्त्वचर्चासम्बन्धी पत्रकोंपर व्यवस्थानुसार मध्यस्थके हस्ताक्षर होना आवश्यक था। हमारी ओरसे तो इस व्यवस्थाको बराबर ध्यानमें रखा गया। परन्तु अपर पक्षने इसे विशेष महत्त्व न देकर पूरी सामग्री मेरे पास सीधी भेज दी। इतना संकेतमात्र इसलिए किया है कि अपर पक्षकी तीसरे दौरकी सामग्री पर मध्यस्थके हस्ताक्षर नहीं है।

अपर पक्षने अपनी प्रतिशंकाओंको जितने कालमें तैयार करके मेरे पास भेज दिया, मुझे उनके उत्तर तैयार करके अपर पक्षके सिपुर्द करनेमें उससे बहुत अधिक समय लग गया। इसका कारण एक तो मेरी कौटुम्बिक अड़चनें रहीं, दूसरे मैं महीनों बीमार पड़ा रहा। फिर भी अपर पक्षने पूरा धैर्य रखा इसकी मुझे प्रसन्नता है। अपर पक्षकी इस उदारता और सहिष्णुताके लिए मैं अपने पक्षकी ओरसे उसका जितना आभार मानूँ थोड़ा है। इसमें पं० श्री वंशीधरजी व्याकरणाचार्यका विवेक विशेष सराहनीय है।

अपर पक्षने तृतीय दौरकी पूरी सामग्री मेरे पास ता० २८-३-६४ को भेज दी थी, जो मुझे अहमदाबादमें १५-४-६४ के लगभग प्राप्त हुई। हमारी ओरसे तृतीय दौरकी .पूरी सामग्री ९-६-६५ को मध्यस्थजीके पास रवाना कर दी गई थी जो अपर पक्षके अन्यतम प्रतिनिधि श्री पं० बंशीधरजी व्याकरणाचार्यको २३-६-६५ को प्राप्त हो गई।

कटनीमें तृतीय दौरके उत्तरपत्रोंका वाचन और संशोधन

यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यद्यपि तृतीय दौरके उत्तर पत्रोंकी पूरी सामग्री तैयार तो कर ली गई, पर अभी उसका संशोधन और सम्मिलित वाचन शेष था। इसके लिए कटनी और जयपुर दोनों जगह लिखा पढ़ी की गई। बहुत कुछ ऊहापोहके बाद कटनी नगर ही इसके लिए उपयुक्त समझा गया, क्योंकि कटनी श्रीयुत् पं० जगन्मोहनलालजीका निवासस्थान है और पूरे वाचनमें उनकी उपस्थिति अपना विशेष महत्त्व रखती थी। परिश्रमपूर्वक जो भी सामग्री तैयार की गई है उसमें किसी प्रकारकी त्रुटि न रह जाय इस ओर ध्यान देना अति आवश्यक था। मैं लगभग १७ मई सन् ६६ को कटनी गया। वाचनकी पूरी व्यवस्था जैन छात्रावास भवनमें की गई थी, अतएव मुझे वहाँ ठहरा दिया गया। साथ ही उसी दिनसे वाचन और संशोधनका कार्य भी प्रारम्भ हो गया। इसमें श्रीयुत् पं० जगन्मोहनलाल सा० तो नियमितरूपसे भाग लेते ही थे, क्योंकि एकमात्र उन्हींके कारण तो कटनीमें यह व्यवस्था की गई थी। साथ ही सवाई सिंघई धन्यकुमारजी भी नियमितरूपसे भाग लेते थे। बैठक लगभग २१-२२ दिन चली थी। इसलिए इतने दिनोंके लिए सवाई सिंघई धन्यकुमारजीने अपने व्यापार आदिके सब कार्योंको गौण कर दिया था। भोजनादिसम्बन्धी अन्य सब व्यवस्था भी उन्होंने अपने यहाँ ही रखी थी। आमंत्रण नहीं स्वीकार किया जाता था, क्योंकि इसमें फालतू समय जानेका भय था। बीचमें जयपुरसे श्रीयुत् नेमिचन्द्रजी पाटनी भी आ गये थे। इसमें सन्देह नहीं कि कटनीमें इस वाचनसे बड़ा लाभ हुआ। पण्डितजीकी पैनी दृष्टि स्खलित भागपर बराबर चली जाती थी। इससे पूरे भागके संशोधनमें बड़ी सहायता मिली। बैठक प्रातः, मध्याह्न और रात्रिमें इस प्रकार तीन समय नियमितरूपसे होती रही। श्रीयुत् पाटनीजीकी पकड़ भी अच्छी है उससे भी संशोधनमें सहायता मिली है। स्वाध्याय और वाचनद्वारा उन्होंने अपने ज्ञानमें पर्याप्त वृद्धि की है। इस सम्मिलित वाचन और तत्त्वमन्थनके समय मेरा ध्यान सर्वार्थसिद्धिकी ओर चला जाता था। इसी प्रकार वहाँके देव भी निरन्तर तत्त्वमन्थनद्वारा अपना समय यापन करते होंगे यह अनुभूति पद-पदपर होती थी। इसमें सन्देह नहीं कि इस पक्षकी ओरसे जो भी सामग्री प्रस्तुत की गई वह सभी विषयोंमें एक मत होकर प्रस्तुत की गई।

सम्पादन, संशोधन और प्रकाशन

सामग्री कितनी व्यवस्थित क्यों न हो मुद्रणके लिए देते समय उसपर पर्याप्त ध्यान देना पड़ता है। दोनों ओर की तीनों दौरकी सामग्रीमें आगम प्रमाणोंकी अत्यधिक प्रचुरता है। साथ ही यह पूरी सामग्री कुछ तो बालपेनसे लिखी गई है और कुछ टाईप की हुई है। सो भी जो सामग्री हमें प्रेसमैटरके रूपमें प्राप्त थी उसमें तीसरे नम्बरकी कापीकी बहुलता थी जिससे वह बहुत अस्पष्ट थी। इसमें विभक्ति, मात्रा और अक्षरों का भी पर्याप्त व्यत्यय था। प्रायः पैराका ध्यान बहुत कम रखा गया था। गाथा और श्लोकमें जो उद्धृत वाक्य थे वे भी कहीं-कहीं रनिंगके रूपमें लिखे गये थे। कहीं-कहीं तो उन्हें वचनिकामें ही सम्मिलित कर दिया गया था। जो पत्रक टाईप किये हुए थे उनमें उद्धृत वाक्योंका अशुद्ध होना स्वाभाविक था। अनेक स्थलोंपर वाक्योंमें स्खलन भी हो गया था। सम्पादनके समय ये सब कठिनाइयाँ मेरे सामने रही हैं। मेरे पास ऐसा व्यवस्थित आदमी भी नहीं था जिसकी सहायतासे मैं अपने भारको हलका करनेमें समर्थ होता। एकमात्र कतिपय छात्र ही मेरे सहायक थे। किन्तु उनके अध्ययनमें किसी प्रकारका व्यत्यय न हो जाय इसका मुझे पूरा ध्यान रखना पड़ता था। ऐसी विकट परिस्थिति में रहते हुए तत्त्वचर्चाके इतने बड़े कलेवरका मुझे सम्पादन करना पड़ा है। मुद्रणके समय प्रूफ करेक्शनका काम भी मुझे ही करना पड़ा है। थोड़ी-बहुत जो छात्रोंकी सहायता मिल गई उसीमें सन्तोष करना पड़ा है। किन्तु इन सब अड़चनोंके बावजूद मुझे इस बातका सन्तोष है कि किसी तरह यह पार पड़ गया है। आशा है शीघ्र ही वह पाठकोंके वाचन-मननके लिए सुलभ हो जायगा।

सम्पादनके समय जब मैंने अपर पक्षके तृतीय दौरपर दृष्टि डाली तो मालूम हुआ कि कुछ स्थलोंपर प्रतिशंकाके स्थानमें लिखते समय प्रत्युत्तर या उत्तर शब्दका प्रयोग हो गया है। नियमानुसार इसका संकेत मैंने श्रीयुत् पं० वंशीधरजी व्या० आ० को किया। उन्होंने तत्काल लिखा कि लिखनेके ओघमें ऐसे शब्दोंका प्रयोग जहाँ भी हो गया हो उसे सन्दर्भको ध्यानमें रखकर आप सुधारते जायँ। सन्दर्भमें व्यत्यय न हो इसका ध्यान रखें। अतएव मैं यहाँ यह संकेत कर देना अपना पुनीत कर्त्तव्य समझता हूँ कि तृतीय दौरकी अपर पक्षकी सामग्रीमें जहाँ भी ऐसा व्यत्यय मुझे मालूम पड़ा वहाँ एक-दो शब्दोंमें परिवर्तन किया गया है, परन्तु वहाँ प्रतिपादित किये गये विषयके आशयमें किसी प्रकारका भी अन्तर नहीं आने दिया है।

जैसा कि मैं पहले ही सूचित कर आया हूँ, हमारी ओरसे पूरी सामग्री सन् ६५ के जूनमें ही अपर पक्षको प्राप्त हो गई थी। अब नियमानुसार उसके मुद्रण और प्रकाशनकी संयुक्त व्यवस्था करनी थी। इसके लिए मैंने उसके वाद व्याकरणाचार्यजीको कुछ दिन वाद संकेत किया। व्याकरणाचार्यजीने २४-७-६५ के पत्रद्वारा जो उत्तर दिया उसका आशय यह है कि मैं इस सम्वन्धमें अपने पक्षके विद्वानोंको तत्काल लिख चुका हूँ। परन्तु कार्यव्यस्तता अथवा स्वास्थ्यकी गड़बड़ीके कारण विद्वान् एकत्रित न हो सके। फिलहालदो-तीन माह रुकना पड़ेगा। मैंने अपने पत्रद्वारा लिख दिया कि दो-तीन माह ठहरनेमें हमें कोई आपत्ति नहीं है।

इस प्रकार धीरे धीरे बहुत काल निकल गया। कुछ अवरोध सा मालूम हुआ। अन्तमें तय हुआ कि जब आचार्यकल्प पं० श्री टोडरमल ग्रन्थमाला इसका प्रकाशन करनेके लिए उद्यत है तो सबके स्वाध्याय लाभकी दृष्टिसे उसके सिपुर्द कर देना चाहिए। स्पष्ट है कि उसी व्यवस्थाके अनुसार इसका उक्त संस्था द्वारा प्रकाशन हो रहा है।

आपसमें पत्राचार द्वारा ऐसी एक चर्चा चल पड़ी थी कि इस तत्त्वचर्चाके पत्रकोंमें जो आक्षेपात्मक या प्रचारात्मक वाक्य या शब्द हों उन्हें दूर कर देना चाहिए। हमारे पक्षको यह विचार उचित प्रतीत हुआ, इसलिए मुद्रणके पूर्व और मुद्रणके समय हमने ऐसे शब्दोंको जो किसी न किसी रूपमें वैसे प्रतीत हुए उन्हें अलग कर दिया है और जिन शब्दोंको अलग किया गया उनकी सूची श्री युक्त पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्यके पास भेज दी है। पर ऐसा करते हुए न तो विषयके विवेचनको स्पर्श किया गया है और न ही सन्दर्भमें किसी प्रकारकी गड़बड़ी होने दी गई है। अप्रयोजनीय जानकर उस सूचीको यहाँ हम नहीं दे रहे हैं। इसकी चर्चा हमने श्री युक्त पं० वंशीधरजी व्याकरणाचार्यसे भी प्रत्यक्ष भेंटके समय कर दी है।

आभार प्रदर्शन

यह स्पष्ट है कि श्री १०८ आचार्य शिवसागरजी महाराज और उनके संघस्थ अन्य मुनिराजोंकी भावना इस तत्त्वचर्चाके अनुकूल रही है और यह भी स्पष्ट है कि उनके सानिध्यमें होनेके कारण ही तत्त्वचर्चाके समय पूरी शान्ति बनी रही। यद्यपि अभी तक मैं आचार्य महाराजकी सन्निकटता तो नहीं प्राप्त कर सका, पर तत्त्वचर्चाके समय मैं जितना समझ सका हूँ उसके आधारसे, मैं यह सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि वे सरल तो हैं ही, विवेकी भी हैं। मेरा विश्वास है कि उनके चित्तमें आने भरकी देर है, इस समय समाजमें जो द्वन्द्व चल रहा है उसके शान्त होनेमें देर नहीं लगेगी। यह तत्त्वचर्चा उनके सानिध्यमें सम्पन्न हुई और इसी उद्देश्यसे इसका आयोजन भी किया गया था। अतएव मेरा तो यही विश्वास है कि कभी न कभी आचार्य महाराजका इस ओर अवश्य ही ध्यान जायगा।

श्री ब्र० सेठ हीरालालजी पाटनी ( निवाई ) और ब्र० लाडमलजी का जितना भी आभार माना जाय थोड़ा है । ये दोनों महानुभाव इस ऐतिहासिक सम्मेलनके आयोजक थे । ये दोनों महानुभाव नहीं चाहते कि समाजमें कलहका वातावरण बना रहे । इनके द्वारा किया गया आतिथ्य सत्कार भी सराहनीय था । यह इस युगल जोड़ीका जीवन व्रत मालूम देता है । जिस उत्साह और निष्पक्षतासे इन्होंने अपने उत्तरदायित्वका निर्वाह किया उसका शब्दोंमें वर्णन करना कठिन है ।

इस सम्मेलनमें जितने विद्वानोंने भाग लिया उनमेंसे कोई किसीके लिए नया नहीं था । मेरे लिए तो उनमेंसे कई विद्वान् गुरुजन थे । कई गुरुतुल्य थे । कई समान पीढ़ीके थे । ये सब तो मेरे लिए मान्य हैं ही जो मुझसे पीछेकी पीढ़ीमें आते हैं उनके प्रति भी मेरे हृदयमें सदासे स्नेहका भाव रहा है । मेरा विश्वास है कि इन सब विद्वानोंमें अखण्डभावसे उत्तरदायित्वकी भावना जागृत होनेपर वर्तमान द्वन्द्वकी स्थिति समाप्त होनेमें देर नहीं लगेगी । सामाजिक क्षेत्रमें मतभेद होना कोई बुरी बात नहीं, द्वन्द्वका भाव नहीं होना चाहिए ।

यहाँ विशेष रूपसे मुझे श्री युक्त पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्रीका स्मरण कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है । उन जैसा सहिष्णु और विवेकशील विद्वान् बिरला ही होगा । मुझे तो उनका सदासे पृष्ठबल प्राप्त है । इस तत्त्वचर्चाको इतने सुन्दर ढंगसे सम्पादित करनेमें उनकी सहायता एक सहयोगीके नाते विशेष रूपसे उल्लेखनीय है । तत्त्वचर्चाको वर्तमान रूप देनेमें उनके बुद्धि कौशलकी जितनी भी प्रशंसा की जाय थोड़ी है ।

श्री युक्त नेमिचन्दजी पाटनी जयपुरमें थे मात्र इसीलिए इसका श्रीगणेश सुन्दर ढंगसे हो सका । जयपुरमें तत्त्वचर्चाके समय मैं और श्री युक्त पं० जगन्मोहनलालजी शास्त्री उनके घर पर अपने ही घरमें जैसे रह रहे हों इतने अपनत्वके साथ रहे । उनका पूरा परिवार हम लोगोंके आतिथ्यमें जुटा रहता था । तत्त्वचर्चामें वे मेरे एक सहयोगी रहे हैं यह विशेष उल्लेखनीय है ।

श्री युक्त ब्र० चन्दूलालजी ( सोनगढ़ ) स्वामीजीकी छायाके ही समान हैं । किन्तु जब उन्हें यह अनुभव हुआ कि जयपुरमें मेरी आवश्यकता है, वे तत्काल यहाँ आ गये और प्रमाणोंके संग्रह करनेमें मेरी सहायता करने लगे । वे अत्यन्त भद्रपरिणामी पुरुष हैं ।

श्रीयुक्त चिमन भाई बम्बई एक कर्मठ व्यक्ति हैं । ये जिस कार्यमें जुट जाते हैं थकनेका नाम नहीं लेते । यही कारण है कि ये बम्बई मुमुक्षमण्डलके मंत्री तो हैं ही साथ ही दिगम्बर जैन महामुमुक्षु मण्डलके भी मंत्री हैं । जब आवश्यक कागजपत्र लेकर २० ता० के मध्याह्न तक जयपुर पहुँचा देनेके लिए सोनगढ़ मेरा तार पहुंचा तब ये वहीं थे । किसे भेजा जाय यह प्रश्न उठने पर ये आ गये और बोले, जैसे बनेगा मैं इस कार्यको सम्पादित करूँगा । १९ ता० को सायंकलकी बात है, २० ता० को जयपुर पहुँचना है, फिर भी चिमन भाई हामी भर रहे हैं । इन्हें काम सौंपा गया । रात्रिकी गाड़ीसे ये अहमदाबाद आये और सीधे हवाई अड्डे पर पहुँचकर किसी तरह जयपुरका हवाई टिकट प्राप्त करनेमें ये सफल हो गये । इन्होंने जो संकल्प किया था उसे पूरा किया । इसीसे इनकी कर्मठता जानी जा सकती है । जयपुरमें रहते समय आवश्यक कागज-पत्रोंका संकलन यही करते रहे । मैं बिलकुल निश्चिन्त था ।

इस प्रकार मैं देखता हूँ कि यह जो इतने सुन्दर ढंगसे पूरा कार्य सम्पन्न हुआ वह सब श्री ब्र० सेठ हीरालालजी पाटनी और श्री ब्र० लाडमलजी प्रभृति सब महानुभावोंके सहयोगका सुपरिणाम है अतः मैं इन सबका पुनः आभारी हूँ । यह तो सभी भुक्तभोगी जानते हैं कि प्रूफ करेक्शनके समय सावधानी रखते हुए भी स्खलन हो जाता है । अनेक अशुद्धियाँ भी रह जाती हैं, कहीं-कहीं शब्दोंमें उलट-फेर भी हो जाता है । अक्सर ऐसा होता है कि कभी-कभी प्रेसकापी सामने नहीं रहती और हड़बड़ीमें प्रूफ करेक्शन करना ही पड़ता है । ऐसे समयमें एक शब्दका स्थान कोई नया शब्द भी ले लेता है । दृष्टिकी मन्दता और साधनोंको अल्पता रहते हुए भी यद्यपि मैं पर्याप्त सतर्क रहा हूँ, फिर भी यदि कहीं कोई स्खलन आदि दिखलाई दे तो सर्वप्रथम उसकी सूचना मुझे दी जाय । मुझे मेरी असावधानी मालूम पड़नेपर मैं उसे सहर्ष स्वीकार कर लूँगा यही निवेदन है । ऐसी छोटी-छोटी बातोंके लिए तूल न दिया जाय ।

मेरी इच्छा तो यह रही है कि यदि दूसरा पक्ष स्वीकार कर ले तो इसके कतिपय उपयोगी परिशिष्ट बना दिये जायँ । साथ ही इसमें जो मोटी अशुद्धियाँ और स्खलन प्रतीत हों उनका भी एक शुद्धिपत्र लगा दिया जाय । किन्तु समयाभावके कारण मैं ऐसा नहीं कर सका इसके लिए मैं पाठकोंसे क्षमा चाहता हूँ इसके सम्पादन और मुद्रणमें मुझे जो श्रम करना पड़ा उसको मैं ही जानता हूँ । उसकी व्यापक चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं ।

अन्तमें इतना लिखकर कि इसमें मेरा कुछ भी कर्त्तव्य नहीं है, जो कुछ भी है वह सब भगवद्वाणीका प्रसाद है इस वक्तव्यको पूरा करता हूँ ।

यदर्थमात्रापदवाक्यहीनं मया प्रमादाद्यदि किंचनोक्तम् ।
तन्मे क्षमित्वा विदधातु देवी सरस्वती केवलबोधलब्धिम् ॥

श्री सन्मति जैन निकेतन
नरिया-वाराणसी
१०-२-६७

विनीत
फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री

शंका १, प्रथम दौर: शंका १ और उसका समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १ से २

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श्री वीतरागाय नमः

प्रथम दौर

: १ :

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका १

द्रव्य कर्मके उदयसे संसारी आत्माका विकार भाव और चतुर्गति भ्रमण होता है या नहीं ?

समाधान

द्रव्य कर्मोंके उदय और संसारी आत्माके विकार भाव तथा चतुर्गतिभ्रमणमें व्यवहारसे निमित्त-नैमित्तक सम्वन्ध है, कर्ता-कर्म सम्वन्ध नहीं है । भगवान् कुन्दकुन्द इसी विषयको स्पष्ट करते हुए समयप्राभृतमें लिखते हैं-

जीवपरिणामहेदुं कम्मत्तं पुग्गला परिणमंति ।
पुग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो वि परिणमइ ॥८०॥
ण वि कुव्वइ कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीवगुणे ।
अण्णोण्णणिमित्तेण दु परिणामं जाण दोण्हं पि ॥८१॥
एएण कारणेण दु कत्ता आदा सएण भावेण ।
पुग्गलकम्मकयाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं ॥८२॥

अर्थ-पुद्गल जीवके परिणामके निमित्तसे कर्मरूप परिणमित होते हैं तथा जीव भी पुद्गल कर्मके निमित्तसे परिणमन करता है । जीव कर्ममें विशेषताको ( पर्यायको ) उत्पन्न नहीं करता । उसी प्रकार कर्म जीवमें विशेषताको ( पर्याय ) को उत्पन्न नहीं करता, परन्तु परस्परके निमित्तसे दोनोंका परिणाम जानो । इस कारणसे आत्मा अपने ही भावसे कर्ता है परन्तु पुद्गल कर्मके द्वारा किये गये समस्त भावोंका कर्ता नहीं है ॥८०-८२॥

दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध व्यवहार नयसे है इसका स्पष्टीकरण पञ्चास्तिकायकी गाथा ८९ की श्रीमत् अमृतचन्द्राचार्यकृत टीकासे हो जाता है । टीका इस प्रकार है-

…तत एकेषामपि गति-स्थितिदर्शनादनुमीयते न तौ तयोर्मुख्यहेतू । किन्तु व्यवहार-व्यवस्थापितौ उदासीनौ ।

इस कारण एकके ही गति और स्थिति देखनेमें आती है, इसलिए अनुमान होता है कि वे गति-स्थितिके मुख्य हेतु नहीं हैं । किन्तु व्यवहारनय द्वारा स्थापित उदासीन हेतु हैं ।

इस प्रकार परमागमके इस उद्धरणसे यह फलित होता है कि दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध व्यवहारनयसे है, निश्चयनयसे नहीं ।

दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें कर्ता-कर्मसंबंध क्यों नहीं है इसका स्पष्टीकरण करते हुए प्रवचनसारमें कहा है-

कम्मत्तणपाओग्गा खंधा जीवस्स परिणइं पप्पा ।
गच्छंति कम्मभावं ण हि ते जीवेण परिणमिदा ॥ २-७७॥१६९॥

अर्थ-कर्मत्वके योग्य स्कन्ध जीवकी परिणतिको प्राप्त करके कर्मभावको प्राप्त होते हैं, जीव उनको परिणमाता नहीं है ॥ २-७७।१६९ ॥

इस विषयका विशेष स्पष्टीकरण करते हुए अमृतचन्द्र आचार्य उक्त गाथाकी टीकामें लिखते हैं-

यतो हि तुल्यक्षेत्रावगाहजीवपरिणाममात्रं बहिरंगसाधनमाश्रित्य जीवं परिणमयितारमन्तरेणापि कर्मत्वपरिणमनशक्तियोगिनः पुद्गलस्कन्धाः स्वयमेव कर्मभावेन परिणमन्ति । ततोऽवधार्यते न पुद्गलपिण्डानां कर्मत्वकर्ता पुरुषोऽस्ति ॥१६९॥

अर्थ-कर्मरूप परिणमित होनेकी शक्तिवाले पुद्गलस्कंध तुल्यक्षेत्रावगाहसे युक्त जीवके परिणाममात्रका-जो कि बहिरंग साधन है उसका-आश्रय लेकर जीव उनको परिणमानेवाला नहीं होने पर भी स्वयमेव कर्मभावसे परिणमित होते हैं । इससे निश्चित होता है कि पुद्गलपिण्डोंके कर्मपनेका कर्ता आत्मा नहीं है ॥ १६९ ॥

इसीप्रकार इस उल्लेखसे यह भी फलित होता है कि कर्मरूप पुद्गलपिण्ड जीवके भावोंका कर्ता नहीं है ।

इसप्रकार दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें कर्ता-कर्म सम्बन्ध नहीं है, फिर भी आगममें जहाँ भी दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें कर्ता-कर्मसंबंध कहा है सो वह वहाँपर उपचारमात्रसे कहा है ।

जीवम्हि हेदुभूदे बंधस्स दु पस्सिदूण परिणामं ।
जीवेण कदं कम्मं भण्णदि उवयारमत्तेण ॥१०५॥ ( समयसार )

अर्थ-जीव निमित्तभूत होनेपर कर्मबन्धका परिणाम होता हुआ देखकर जीवने कर्म किया यह उपचारमात्रसे कहा जाता है ॥ १०५ ॥

इसकी टीकामें इसी विषयको स्पष्ट करते हुए अमृतचन्द्र आचार्य कहते हैं-

इह खलु पौद्गलिककर्मणः स्वभावादनिमित्तभूतेऽप्यात्मन्यनादेरज्ञानात्तन्निमित्तभूतेनाज्ञानभावेन परिणमनान्निमित्तीभूते सति सम्पद्यमानत्वात् पौद्गलिकं कर्मात्मना कृतमिति निर्विकल्पविज्ञानघनभ्रष्टानां विकल्पपरायणानां परेषामस्ति विकल्पः । स तूपचार एव न तु परमार्थः ॥ १०५ ॥

अर्थ-इस लोकमें वास्तवमें आत्मा स्वभावसे पौद्गलिक कर्मका निमित्तभूत न होने पर भी अनादि अज्ञानके कारण उसके निमित्तभूत अज्ञान भावरूप परिणमन करनेसे पुद्गल कर्मका निमित्तरूप होनेपर पुद्गल कर्मकी उत्पत्ति होती है, इसलिए आत्माने कर्मको किया ऐसा विकल्प उन जीवोंके होता है जो निर्विकल्प विज्ञानघनसे भ्रष्ट होकर विकल्पपरायण हो रहे हैं । परन्तु आत्माने कर्मको किया यह उपचार ही है, परमार्थ नहीं ॥ १०५ ॥

शंका १, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ३ से ६

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द्वितीय दौर

: २ :

नमः श्रीवर्द्धमानाय निर्धूतकलिलात्मने ।
सालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ॥

शंका १

द्रव्यकर्मके उदयसे संसारी आत्माका विकारभाव और चतुर्गतिभ्रमण होता है या नहीं ?

प्रतिशंका २

इस प्रश्नका उत्तर जो आपने यह दिया है कि ‘व्यवहारसे निमित्त-नैमित्तिकसम्वन्ध है, कर्ता-कर्म सम्वन्ध नहीं है’ सो यह उत्तर हमारे प्रश्नका नहीं है, क्योंकि हमने द्रव्यकर्म और आत्माका निमित्त-नैमित्तिक तथा कर्तृ-कर्मसम्वन्ध नहीं पूछा है ।

इस विषयमें आपने जो समयसारकी गाथा ८०, ८१, ८२ का प्रमाण दिया है वह प्रमाण आपके उत्तरके विरुद्ध पड़ता है, क्योंकि इन गाथाओंका स्पष्ट अर्थ यह है कि-

‘पुद्गलोंका कर्मरूप परिणमन जीवके भावोंके निमित्तसे होता है और जीवके भावोंका परिणमन पुद्गल कर्मके निमित्तसे होता है ।’ ऐसा ही अर्थ आपने भी किया है । किन्तु ८१ वीं गाथाका अर्थ करते हुए आपने जो उसमें विशेषता ( पर्याय ) शव्दका प्रयोग किया है वह मूल गाथासे विपरीत है, क्योंकि विशेषता ( पर्याय ) परिणामको छोड़कर अन्य कुछ नहीं है । इसके सिवाय आपने इन गाथाओंका जो निष्कर्ष निकाला है वह भी वाधित है । साथ ही इस सम्वन्धमें जो कर्तृ-कर्म सम्वन्धका निषेध किया है वह भ्रम उत्पादक है, क्योंकि हमारा प्रश्न निमित्त-कर्ताके उद्देश्यसे ही है उपादान कर्ताके उद्देश्यसे नहीं है । जैसा कि पञ्चास्तिकायकी ८८ वीं गाथाकी टीकामें श्री अमृतचन्द्र सूरिने स्पष्ट रूपसे ध्वजाके फहरानेमें वायुकी हेतुकर्तृता वतलाई है ।

यथा हि गतिपरिणतः प्रभञ्जनो वैजयन्तीनां गतिपरिणामस्य हेतुकर्ताऽवलोक्यते ।

इसी टीकामें-

यथा गतिपूर्वस्थितिपरिणतस्तुरङ्गो अश्ववारस्य स्थितिपरिणामस्य हेतुकर्ताऽवलोक्यते ।

वाक्य द्वारा घुड़सवारके रुकनेमें रुके हुए घोड़ेको हेतुकर्ता माना है ।

पञ्चास्तिकायकी निम्नलिखित ५५ और ५८ वीं गाथाओंमें श्री कुन्दकुन्दाचार्यने कहा है कि कर्म प्रकृतियाँ जीवके नर-नारकादि पर्यायरूप भावोंके सत्का नाश और असत्का उत्पाद करती हैं ।

णेरइय-तिरिय-मणुआ देवा इदि णामसंजुदा पयडी ।
कुव्वंति सदो णासं असदो भावस्स उप्पादं ॥ ५५ ॥
कम्मेण विणा उदयं जीवस्स ण विज्जदे उवसमं वा ।
खइयं खओवसमियं तम्हा भावं दु कम्मकदं ॥ ५८ ॥

प्रवचनसारकी निम्नलिखित गाथामें श्री कुन्दकुन्दाचार्यने जीवको मनुष्य आदि पर्यायोंका कर्मको कर्ता माना है-

कम्मं णामसमक्खं सभावमध अप्पणो सहावेण ।
अभिभूय णरं तिरियं णेरइयं वा सुरं कुणदि ॥ ११७ ॥

इसकी टीकामें श्री अमृतचन्द्र सूरिने भी इसकी पुष्टि की है। समयसारकी निम्नलिखित गाथाकी टीकामें श्री अमृतचन्द्र सूरिने निमित्तकर्ता स्वीकृत किया है । यथा-

अनित्यौ योगोपयोगावेव तत्र निमित्तत्वेन कर्तारौ ।

द्रव्यसंग्रहमें लिखा है-

पुद्गलकम्मादीणं कत्ता ववहारदो दु णिच्छयदो ।
चेदणकम्माणादा सुद्धणया सुद्धभावाणं ॥ ८ ॥

स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी निम्नलिखित गाथामें लिखा है कि पुद्गलमें ऐसी शक्ति है कि वह आत्माके केवलज्ञानका विनाश कर देती है-

कावि अपुव्वा दीसदि पुग्गलदव्वस्स एरिसी सत्ती ।
केवलणाणसहावो विणासिदो जाइ जीवस्स ॥ २११ ॥

देवागमकी-

दोषावरणयोर्हानिर्निःशेषास्त्यतिशायनात् ।
क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो बहिरन्तर्मलक्षयः ॥ ४ ॥

कारिका सम्बन्धी अष्टशतीमें श्री अकलङ्कदेवने लिखा है कि-

वचनसामर्थ्यादज्ञानादिर्दोषः स्वपरपरिणामहेतुः ।

इसकी व्याख्यामें श्री विद्यानन्द स्वामीने अष्टसहस्रीमें अज्ञान मोह आदि दोष तथा ज्ञानावरण मोहनीय आदि पौद्गलिक कर्मोंमें परस्पर कार्य-कारणभाव विस्तारसे बतलाया है ।

समयसारकी गाथा १३ की टीकामें श्री अमृतचन्द्र सूरिने लिखा है-

तत्र विकार्य-विकारकोभयं पुण्यं तथा पापं, आस्राव्यास्रावकोभयमास्रवः, संवार्य-संवारकोभयं संवरः………………स्वयमेकस्य पुण्यपापास्रवसंवरनिर्जराबन्धमोक्षानुपपत्तेः । तदुभयं च जीवाजीवाविति ।

श्री अमृतचन्द्र सूरिने समयसारकलश १७४ में आत्माके रागादि विकारभाव केवल आत्मामात्र ( उपादान ) में नहीं होता । उसके लिये पर ( कर्म ) सम्बन्ध आवश्यक कारण बतलाया है ।

न जातु रागादिविकारभावमात्मात्मनो याति यथार्ककान्तः ।
तस्मिन्निमित्तं परसङ्ग एव वस्तुस्वभावोऽयमुदेति तावत् ॥ १७५ ॥

समयसारकी निम्नलिखित गाथामें व्यवहारसे जीवको द्रव्यकर्मोंका कर्ता बतलाया है-

ववहारस्स दु आदा पुद्गलकम्मं करेदि णेयविहं ॥ ८४ ॥

श्री विद्यानन्द स्वामीने कर्मका लक्षण करते हुए आप्तपरीक्षाके पृष्ठ २४६ पर लिखा है-

जीवं परतन्त्री कुर्वन्ति, स परतन्त्री क्रियते वा यैस्तानि कर्माणि ।

अर्थात् जो आत्माको परतन्त्र करते हैं वे कर्म हैं।

समयसारकी निम्नलिखित गाथामें श्री कुन्दकुन्दाचार्यने पौद्गलिक कर्मका फल आत्माको दुःख होना बतलाया है-

अट्ठविहं पि य कम्मं सव्वं पुद्गलमयं जिणा विंति।
जस्स फलं तं वुच्चइ दुक्खं ति विपच्चमाणस्स ॥ ४५ ॥

धवला पुस्तक ६ पृष्ठ ६ पर लिखा है-

तं आवरेदि त्ति णाणावरणीयं कम्मं।

अर्थात् आत्माके ज्ञानगुणका जो आवरण करता है वह ज्ञानावरण कर्म है।

धवला पुस्तक ५ पृष्ठ १८५ तथा २२३ तथा पुस्तक १६ पृष्ठ ५१२ पर रागादि विभावभावोंको कर्मजनित कहा है-

तत्थ ओधभवो णाम अट्ठकम्माणि अट्ठकम्मजणिदजीवपरिणामो वा।

इनके अतिरिक्त समस्त धवल, जयधवल, महाधवल, राजवार्तिक, श्लोकवार्तिक, सर्वार्थसिद्धि, गोम्मटसार, तत्त्वार्थसूत्र आदि सिद्धान्त ग्रन्थोंमें आत्मा तथा द्रव्यकर्मोंका परस्पर विकार्य-विकारभाव स्पष्ट बतलाया है।

इसके आगे आपने जो पञ्चास्तिकायकी गाथा ८९ का उद्धरण दिया है, वह भी हमारे प्रश्नसे संगत नहीं है, क्योंकि यह उद्धरण उदासीन निमित्त कारणसे सम्बन्धित है। साथ ही स्वयं अमृतचन्द्र सूरिने उसी पञ्चास्तिकायकी ८७ और ९४ वीं गाथा की टीकामें उदासीनको भी अनिवार्य निमित्त कारण बतलाया है।

गाथा ८७ की टीका-

तत्र जीव-पुद्गलौ स्वरसत एव गतितत्पूर्वस्थितिपरिणाममापन्नौ। तयोर्यदि गतिपरिणामं तत्पूर्वस्थितिपरिणामं वा स्वयमनुभवतोर्बहिरङ्गहेतू धर्माधर्मौ न भवेतां तदा तयोर्निरर्गलगतिस्थितिपरिणामत्वादलोकेऽपि वृत्तिः केन वार्येत ?

अर्थ-वहाँ जीव और पुद्गल स्वभावसे ही गति और स्थिति परिणामको प्राप्त हैं। सो उनके इस परिणमनको स्वयं अनुभव करते हुए यदि धर्म और अधर्म द्रव्य बहिरङ्ग कारण न हों तो उनका यह परिणमन निरर्गल-निर्बाध हो जायगा और इस दशामें उनका सद्भाव अलोकमें भी कौन रोक सकेगा ?

गाथा ९४ की टीका-

यदि गतिस्थित्योराकाशमेव निमित्तमिष्येत् तदा तस्य सर्वत्र सद्भावाज्जीवपुद्गलानां गतिस्थित्योर्निःसीमत्वात्प्रतिक्षणमलोको हीयते।

अर्थ-यदि आकाश ही गति और स्थितिका कारण माना जाय तो उसका सर्वत्र सद्भाव होनेसे जीव और पुद्गलकी गति तथा स्थिति सीमा रहित हो जायगी अर्थात् वह अलोकमें भी होने लगेगी और ऐसा होनेसे अलोकका परिमाण प्रति समय कम होता जायगा।

सर्वार्थसिद्धि अध्याय ५ सूत्र २२ में काल द्रव्यकी अनिवार्य उदासीन कारणता बतलाई है-

धर्मादीनां द्रव्याणां स्वपर्यायनिर्वृत्तिं प्रति स्वात्मनैव वर्तमानानां बाह्योपग्रहाद्विना तद्वृत्त्यभावात् तत्प्रवर्तनोपलक्षितः कालः।

अर्थ-धर्मादि द्रव्य अपनी-अपनी पर्यायकी उत्पत्तिके प्रति यद्यपि स्वयं ही प्रवृत्ति करते हैं तथापि बाह्य सहायकके बिना उनकी वह प्रवृत्ति नहीं हो सकती, अतः उन्हें प्रवर्तानेवाला काल द्रव्य है।

आपने जो प्रवचनसारकी गाथा १६६ तथा उसकी भी अमृतचन्द्र सूरिकृत टीकाका उद्धरण दिया है उसमें स्वयं शब्दका अर्थ ‘स्वयमेव’ ( अपने आप ) न होकर ‘अपने रूप’ है। इसके अतिरिक्त उनसे जो यह फलितार्थ निकाला है कि दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें कर्तृकर्म सम्बन्ध नहीं है उसका आशय केवल उपादान कारणकी दृष्टिसे है, निमित्त कारणकी दृष्टिसे नहीं।

समयसारकी गाथा १०५ में जो उपचार शब्द आया है वह इस अर्थका द्योतक है कि पुद्गलका कर्म रूप परिणमन पुद्गलमें ही होता है, जीव रूप नहीं होता। किन्तु जीवके परिणामोंका निमित्त पाकर होता है अर्थात् जीव पुद्गल कर्मोंका उपादान कर्ता नहीं, निमित्त कर्ता है।

आशा है आप हमारे मूल प्रश्नका उत्तर देनेकी कृपा करेंगे।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥

शंका १

द्रव्य कर्मके उदयसे संसारी आत्माका विकारी भाव और चतुर्गति भ्रमण होता है या नहीं?

शंका १, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ६ से १०

↑ सूची


प्रतिशंका २ का-समाधान

प्रतिशंका नं० २ में शंकारूपमें उपस्थित किये गये विषयोंका वर्गीकरण-

( १ ) पंचास्ति० गा० ८८ तथा ५५-५८; प्र० सार० गा० ११७; स० सार गा० १०० की टीका, द्रव्य सं० गा० ८, स्वा० कार्तिके० गा० २११; दे० स्तो० श्लो० ४; स-सार गा० १३ टीका; स-सार कलश १७५; स-सार गा० ८४; आप्तप० पृ० २४६; स-सार गा० ४५, धवला पु०६-पृ०६; और धवला पु० ५ पृ० १८५-२२३ तथा पुस्तक १६ पृष्ठ ५१२; इस प्रकार विविध ग्रन्थोंके लगभग १७ प्रमाणोंके आधारसे निमित्तमें हेतुकर्तृता सिद्ध करते हुए संसारी जीव और कर्मोदयमें जो निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है उसे गौण दिखानेका प्रयत्न किया गया है।

( २ ) पंचास्ति० गा० ८९ का उद्धरण किसी भी प्रकारके निमित्तिको व्यवहार हेतु बतानेके लिए उद्धृत किया गया है, पर उसे प्रकृतमें असंगत बतलाया गया है।

( ३ ) पंचास्ति० गा० ८७-९४ तथा सर्वा० सि०, अ० ५ सू० २२ के उद्धरणों द्वारा उदासीन निमित्तोंकी कार्यके प्रति अनिवार्य निमित्तता सिद्ध की गई है।

( ४ ) प्र० सार गा० १६९ में स्वयमेव पदका अर्थ प्रतिशंकामें अपने आपका निषेधकर ‘अपने रूप’ किया गया है।

( ५ ) स० सार, गा० १०५ में आये हुए उपचार शब्दके अर्थको बदलनेका प्रयत्न किया गया है।

समाधान इस प्रकार है-

( १ ) प्रतिशंका १ में विविध प्रमाण देकर जो संसारी जीव और कर्मोदयमें हेतुकर्तृता सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है सो ऐसा करनेमें क्या उद्देश्य रहा है यह समझमें नहीं आया। यदि हेतुकर्तृता सिद्ध करते हुए निमित्तोंमें उदासीन निमित्त और प्रेरक निमित्त ऐसा भेद करनेका अभिप्राय रहा हो तो वह इष्ट है, क्योंकि पंचास्तिकाय गाथा ८८ में यह भेद स्पष्ट शब्दोंमें दिखलाया गया है। परन्तु वहाँ ऐसे भेदको दिखलाते हुए भी उक्त वचनके आधारसे यदि यह सिद्ध करनेका अभिप्राय हो कि प्रेरक कारणके बलसे किसी द्रव्यमें कार्य आगे-पीछे कभी भी किया जा सकता है तो यह सिद्ध करना संगत न होगा, क्योंकि हेतुकर्तृ’ पदका व्यपदेश निमित्तमात्र में देखा जाता है ऐसा आगम प्रमाण है। सर्वार्थसिद्धिमें कहा भी है-

यद्येवं कालस्य क्रियावत्त्वं प्राप्नोति। यथा शिष्यो अधीते, उपाध्यायोऽध्यापयतीति ? नैष दोषः, निमित्तमात्रेऽपि हेतुकर्तृव्यपदेशो दृष्टः। यथा कारीषोऽग्निरध्यापयति। एवं कालस्य हेतुकर्तृता।

अर्थ-शंका-यदि ऐसा है तो कालको क्रियावत्त्व प्राप्त होता है। यथा-शिष्य पढ़ता है, अध्यापक पढ़ाता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्योकि निमित्तमात्रमें भी हेतुकर्तृ व्यपदेश देखा गया है । यथा-कुण्डेकी अग्नि पढ़ाती हैं। इस प्रकार कालकी हेतुकर्तृता हैं।

यह आगमवचन है। इससे यह ज्ञात तो होता है कि निमित्तकारण दो प्रकारके हैं-एक वे जो अपनी क्रिया द्वारा अन्य द्रव्यके कार्यमें निमित्त होते हैं और दूसरे वे जो चाहे क्रियावान् द्रव्य हों और चाहे अक्रियावान् द्रव्य हों; परन्तु जो क्रियाके माध्यमसे निमित्त न होकर निष्क्रिय द्रव्योंके समान अन्य द्रव्योंके कार्यमें निमित्त होते हैं। आचार्य पूज्यपाद सब निमित्तोंको समान मानते हैं इस सिद्धान्तकी पुष्टि उनके द्वारा रचित इष्टोपदेशके इस वचनसे भी होती है-

नाज्ञो विज्ञत्वमायाति विज्ञो नाज्ञत्वमृच्छति।
निमित्तमात्रमन्यस्तु गतेर्धर्मास्तिकायवत् ॥ ३५ ॥

अर्थः-अज्ञ विज्ञपनेको प्राप्त नहीं होता और विज्ञ अज्ञपनेको प्राप्त नहीं होता। किन्तु अन्य द्रव्य अपनी विवक्षित पर्यायके द्वारा उस प्रकार निमित्त हैं जिस प्रकार धर्मास्तिकाय गतिका निमित्त है ॥३५॥

इसका स्पष्टीकरण करते हुए इसी श्लोककी टीकामें लिखा है-

भद्र ! अज्ञस्तत्त्वज्ञानोत्पत्त्ययोग्योऽभव्यादिर्विज्ञत्वं तत्त्वज्ञत्वं धर्माचार्याद्युपदेशसहस्रेणापि न गच्छति। तथा चोक्तम्-

स्वाभाविकं हि निष्पत्तौ क्रियागुणमपेक्ष्यते।
न व्यापारशतेनापि शुकवत्पाठ्यते बकः ॥

तथा विज्ञस्तत्त्वज्ञानपरिणतोऽज्ञत्वं तत्त्वज्ञानात्परिभ्रंशमुपायसहस्रेणापि न गच्छति। तथा चोक्तम्-

वज्रे पतत्यपि भयद्रुतविश्वलोके मुक्ताध्वनि प्रशमिनो न चलन्ति योगात्।
बोधप्रदीपहतमोहमहान्धकाराः सम्यग्दृशः किमुत शेषपरीषहेषु ॥

नन्वेवं बाह्यनिमित्तक्षेपः प्राप्नोतीत्यत्राह-अन्यः पुनर्गुरुविपक्षादिः प्रकृतार्थसमुत्पादभ्रंशयोर्निमित्तमात्रं स्यात्, तत्र योग्यताया एव साक्षात् साधकत्वात् ।

कस्या को यथा-इत्यत्राह-गतेरित्यादि । अयमर्थो यथा युगपद्भाविगतिपरिणामोन्मुखाना भावानां स्वकीया गतिशक्तिरेव गतेः साक्षाज्जनिका । तद्वैकल्ये तस्याः केनापि कर्तुं मशक्यत्वात् । धर्मास्तिकायस्तु गत्युपग्राहकद्रव्यविशेषस्तस्याः सहकारिकारणमात्रं स्यात् । एवं प्रकृतेऽपि । अतो व्यवहारादेव गुर्वादेः सुश्रूषा प्रतिपत्तव्याः ।

हे भद्र ! अज्ञ अर्थात् तत्त्वज्ञानकी उत्पत्तिके लिए अयोग्य अभव्य आदि विज्ञपनेको अर्थात् तत्त्वज्ञपनेको धर्माचार्य आदिके हजारों उपदेशोंसे भी नहीं प्राप्त होता । कहा भी है-

कार्यकी उत्पत्तिमें स्वाभाविक क्रिया गुण अपेक्षित हैं, क्योंकि सैकड़ों व्यापार करनेपर भी बक तोतेके समान नहीं पढ़ाया जा सकता ।

उसी प्रकार विज्ञ अर्थात् तत्त्वज्ञानरूपसे परिणत हुआ जीव अज्ञपनेको अर्थात् तत्त्वज्ञानसे भ्रंसको हजारों उपायोंके द्वारा भी नहीं प्राप्त होता । उसी प्रकार कहा है-

भयसे भागते हुए समस्त लोकपर वज्रके गिरनेपर भी मोक्षमार्गमें उपशमको प्राप्त हुए जीव योगसे चलायमान नहीं होते । तो फिर बोधरूपी प्रदीपसे जिनका मोहरूपी अन्धकार नष्ट हो गया है ऐसे सम्यग्दृष्टि जीव शेष परीषहोंसे चलायमान कैसे हो सकते हैं ।

किस योग्यताका कौन निमित्त है । यथा-इसलिए यहाँ कहा है-गतेरित्यादि ।

जिस प्रकार एक साथ होनेवाली गति परिणामके सम्मुख हुए पदार्थोंकी अपनी गति शक्ति ही गतिकी साक्षात् जनिका है । उसके विरुद्ध योग्यताके होनेपर उसे कोई भी करनेमें समर्थ नहीं है । धर्मास्तिकाय द्रव्य तो गतिका उपग्राहक द्रव्य विशेष होकर उस ( योग्यता ) का सहकारी कारणमात्र है । इसीप्रकार प्रकृतमें भी जानना चाहिये । इसलिए व्यवहारसे ही गुरु आदिकी सुश्रूषा जाननी चाहिए ।

इस प्रकार इष्टोपदेशके उक्त आगम वचन और उसकी टीकासे स्पष्ट ज्ञात होता है कि निमित्त कारणोंमें पूर्वोक्त प्रकारसे दो भेद होनेपर भी उनकी निमित्तता प्रत्येक द्रव्यके कार्यके प्रति समान है । कार्यका साक्षात् उत्पादक कार्यकालकी योग्यता ही है, निमित्त नहीं ।

यह ठीक है कि प्रश्न १ का उत्तर देते हुए समयसारकी ८१ से ८३ तककी जिन तीन गाथाओंका उद्धरण देकर निमित्त-नैमित्तिकभाव दिखलाया गया है वहाँ कर्तृ-कर्म सम्बन्धका निर्देश मात्र इसलिए किया गया है ताकि कोई ऐसे भ्रममें न पड़ जाय कि यदि आगममें निमित्तमें कर्तृपनेका व्यवहारसे व्यपदेश किया गया है तो वह यथार्थमें कर्ता बनकर कार्यको उत्पन्न करता होगा । वस्तुतः जैनागममें कर्ता तो उपादानको ही स्वीकार किया है और यही कारण है कि जिनागममें कर्ताका लक्षण ‘जो परिणमन करता है वह कर्ता होता है’ यह किया गया है । समयसार कलशमें कहा भी है-

यः परिणमति स कर्ता यः परिणामो भवेत्तु तत्कर्म ।
या परिणतिः क्रिया सा त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया ॥५१॥

जो परिणमन करता है वह कर्ता है, जो परिणाम होता है वह कर्म है और जो परिणति होती है वह क्रिया है । वास्तवमें ये तीनों अलग नहीं हैं ।

अतएव निमित्तकर्ताको व्यवहार (उपचार) से ही कर्ता मानना युक्ति-संगत है, क्योंकि एक द्रव्यका कर्तृधर्म दूसरे द्रव्यमें नहीं उपलव्ध होता । मात्र कार्यमें कौन द्रव्य उस समय निमित्त हेतु है यह दिखलानेके लिए ही कर्ता आदि रूपसे निमित्तका उपचारसे उल्लेख किया जाता है । स्पष्ट है कि प्रथम प्रश्नका जो उत्तर दिया गया है वह यथार्थ है ।

(२) पञ्चास्तिकाय गाथा ८९ में निःसन्देहरूपसे उदासीन निमित्तकी व्यवहारहेतुता सिद्ध की गई है । पर इतने मात्रसे क्रियाके द्वारा निमित्त होनेवाले निमित्तोंको व्यवहार हेतु माननेमें कोई वाधा नहीं आती, क्योंकि अभी पूर्वमें इष्टोपदेश टीकाका जो उद्धरण दे आये हैं उसमें स्पष्टरूपसे ऐसे निमित्तोंको व्यवहार हेतु वतलाकर इस दृष्टिसे दोनोंमें समानता सिद्ध की गई है ।

(३) ऐसा नियत है कि प्रत्येक द्रव्यके किसी भी कार्यका पृथक् उपादान कारणके समान उसके स्वतन्त्र एक या एकसे अधिक निमित्त कारण भी होते हैं । इसीका नाम कारक-साकल्य है । और इसीलिए जिनागममें सर्वत्र यह स्वीकार किया गया है कि उभय निमित्तसे कार्यकी उत्पत्ति होती है । श्री समन्तभद्र स्वामीने इसे द्रव्यगत स्वभाव इसी अभिप्रायसे कहा है । वे लिखते हैं-

वाह्येतरोपाधिसमग्रतेऽयं कार्येषु ते द्रव्यगतः स्वभावः ।
नैवान्यथा मोक्षविधिश्च पुंसां तेनाभिवंद्यस्त्वमृषिर्वुधानां ॥-स्वयंभू-स्तोत्र ॥ ६० ॥

कार्योंमें बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता होती है, यह द्रव्यगत स्वभाव है । अन्यथा अर्थात् ऐसा स्वीकार नहीं करनेपर पुरुषोंकी मोक्ष-विधि नहीं बन सकती । यही कारण है कि ऋषि स्वरूप आप वुधजनोंके द्वारा वन्दनीय हैं ।

यह तो है कि कार्योंमें बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता होती है, क्योंकि ऐसा द्रव्यगत स्वभाव हैं कि जव निश्चय उपादान अपना कार्य करता है तब अन्य द्रव्य पर्यायद्वारा उसका व्यवहार हेतु होता है । पर नियम यह है कि प्रत्येक समयमें निमित्तकी प्राप्ति उपादानके अनुसार होती है । तभी जीवोंकी मोक्षविधि भी वन सकती है । जैसा कि भावलिंगके होनेपर द्रव्यलिंग होता है इस नियमसे भी सिद्ध होता है । यद्यपि प्रत्येक मनुष्य भावलिंगके प्राप्त होनेके पूर्व ही द्रव्यलिंग स्वीकार कर लेता है पर उस द्वारा भावलिंगकी प्राप्ति द्रव्यलिंगको स्वीकार करते समय ही हो जाती हो ऐसा नहीं है । किन्तु जब उपादानके अनुसार भावलिंग प्राप्त होता है तब उसका निमित्त द्रव्यलिंग रहता ही है । तीर्थंकरादि किसी महान् पुरुषको दोनोंकी एक साथ प्राप्ति होती हो यह बात अलग है, इसलिए प्रत्येक कार्यमें निमित्त अनिवार्य है ऐसा मानना यद्यपि आगमविरुद्ध नहीं है, पर इस परसे यदि कोई यह फलितार्थ निकालना चाहे कि जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है आगम-संगत नहीं है । उपचारसे ऐसा कथन करना अन्य वात है और उसे यथार्थ मानना अन्य वात है ।

(४) प्रवचनसार गाथा १६९ में ‘स्वयमेव’ पदका अर्थ स्वयं ही है अपने रूप नहीं । इसके लिए समयसार गाथा ११६ आदि तथा १६८ संख्याक गाथाओंका अवलोकन करना प्रकृतमें उपयोगी होगा । आगममें सर्वत्र ‘स्वयमेव’ पद ‘स्वयं ही’ इसी अर्थमें व्यवहृत हुआ है । यदि कहीं ‘अपने रूप’ अर्थ किया गया हो तो वह प्रमाण सामने आना चाहिये ।

(५) समयसार गाथा १०५ में उपचारका जो अर्थ प्रथम प्रश्नके उत्तरमें किया गया है वह अर्थ संगत है । इसकी पुष्टि धवला पुस्तक ६ पृष्ठ ५९ से होती है । प्रमाण इस प्रकार है-

मुह्यत इति मोहनीयम् । एवं संते जीवस्स मोहणीयत्तं पसज्जदि त्ति णासंकणिज्जं, जीवादो अभिण्णम्हि पोग्गलदव्वे कम्मसण्णिदे उवयारेण कत्तारत्तमारोविय तधा उत्तीदो ।

जिसके द्वारा मोहित किया जाता है वह मोहनीय कर्म है ।

शंका-ऐसा होनेपर जीवको मोहनीय कर्मपना प्राप्त होता है ?

समाधान-ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि जीवसे अभिन्न ( विशेष संयोगरूप, परस्पर विशिष्ट एक क्षेत्रावगाही ) कर्मसंज्ञक पुद्गल-द्रव्यमें उपचारसे कर्तापनेका आरोप कर वैसा कहा है ।

इस आगम वचनमें ‘उवयारेण’ और ‘आरोविय’ पद ध्यान देने योग्य हैं । स्पष्ट है कि कार्यका निष्पादक वस्तुतः उपादान कर्ता ही होता है । निमित्तमें तो उपचारसे कर्तापनेका आरोप किया जाता है ।

शंका १, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १० से ३२

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तृतीय दौर

शंका

द्रव्यकर्मके उदयसे संसारी आत्माका विकार भाव और चतुर्गति प्रमाण होता है या नहीं ?

प्रतिशंका ३

इस प्रश्नका आशय यह था कि जीवमें जो क्रोध आदि विकारी भाव उत्पन्न होते हुए प्रत्यक्ष देखे जाते हैं क्या वे द्रव्य कर्मोदयके बिना होते हैं या द्रव्य कर्मोदयके अनुरूप होते हैं । संसारी जीवका जो जन्म-मरणरूप चतुर्गति भ्रमण प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है क्या यह भी कर्मोदयके अधीन हो रहा है या यह जीव स्वतन्त्र अपनी योग्यतानुसार चतुर्गति भ्रमण कर रहा है ?

आपके द्वारा इस प्रश्नका उत्तर न तो प्रथम वक्तव्यमें दिया गया है और न इस दूसरे वक्तव्यमें दिया गया है-यद्यपि आपके प्रथम वक्तव्यके ऊपर प्रतिशंका उपस्थित करते हुए इस ओर आपका ध्यान दिलाया गया था । आपने अपने दोनों वक्तव्य निमित्त कर्ता-कर्मकी अप्रासंगिक चर्चा प्रारम्भ करके मूल प्रश्नके उत्तरको टालनेका प्रयत्न किया है ।

यह तो सर्व सम्मत है कि जीव अनादि कालसे विकारी हो रहा है । विकारका कारण कर्मबन्ध है, क्योंकि दो पदार्थोंके परस्पर बन्ध बिना लोकमें विकार नहीं होता । कहा भी है-

द्वयकृतो लोके विकारो भवेत् । -पद्मनन्दिपंचविंशति २३-७ ।

यदि क्रोध आदि विकारी भावोंको कर्मोदय बिना मान लिया जावे तो उपयोगके समान ये भी जीवके स्वभाव भाव हो जायेंगे और ऐसा मानने पर इन विकारी भावोंका नाश न होनेसे मोक्षके अभावका प्रसंग आजावेगा, क्योंकि-

सदकारणवन्नित्यम् । -आप्तपरीक्षा कारिका २ टीका

जो सत् ( मौजूद ) है और अकारण है वह नित्य होता है । अथवा मुक्त जीवके भी विकारी भावोंका प्रसंग आ जायगा। यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि किसीमें ज्ञान अधिक है और किसीमें ज्ञान हीन है। एक ही पुरुषमें ज्ञानकी हीनाधिकता देखी जाती है। यह तरतमभाव निष्कारण नहीं हो सकता है। अतः ज्ञानमें जो तर-तमभावका कारण है वह ज्ञानावरण कर्म है। कहा भी है-

एदस्स पमाणस्स वड्ढिहाणितरतमभावो ण ताव णिक्कारणो, वड्ढि-हाणीहि विणा एगसरूवेणावट्ठाणप्पसंगादो। ण च एवं, तहाणुवलंभादो। तम्हा सकारणाहि ताहि होदव्वं। जं तं हाणितर-तमभावकारणं तमावरणमिदि सिद्धं। -जयधवल १-५६

इसका तात्पर्य भाव ऊपर दिया जा चुका है।

इस कर्मोदयसे जीवकी नाना अवस्था तथा विचित्र विकारी भाव हो रहे हैं, जिनका समयसार आदि ग्रन्थोंमें विवेचन किया है और वह इस प्रकार है-

समयसारकी बत्तीसवीं गाथामें आत्माको ‘भाव्य’ और फल देनेकी सामर्थ्य सहित उदय होनेवाले मोहनीय कर्मको ‘भावक’ बतलाया है। एकसौ-अठानवी गाथामें कर्मोदय विपाकसे उत्पन्न होनेवाले विविध भावोंको आत्मस्वभाव नहीं बतलाया है। गाथा १९९ में-

पुग्गलकम्मं रागो तस्स विवागोदओ हवदि एसो।

और इसकी टीकामें-

अस्ति किल रागो नाम पुद्गलकर्म, तदुदयविपाकप्रभवोऽयं रागरूपो भावः।

ये वाक्य दिये हैं, जिनमें बतलाया है कि राग पुद्गलकर्म है और पुद्गल कर्मके विपाककर उत्पन्न यह प्रत्यक्ष अनुभवगोचर रागरूप भाव है। और गाथा २८१ की टीकामें लिखा है कि रागादिक भाव कर्मविपाक उदयसे उत्पन्न हुए हैं।

पंचास्तिकायकी गाथा १३१ की टीकामें-

इह हि दर्शनमोहनीयविपाककलुषपरिणामता मोहः, विचित्रचारित्रमोहनीयविपाकप्रत्यये प्रीत्य-प्रीती रागद्वेषौ।

इन वाक्योंमें बतलाया है कि निश्चयसे इस जीवके जब दर्शनमोहनीय कर्मका उदय होता है तब उसके रस विपाकसे समुत्पन्न अश्रद्धानरूप भावका नाम मोह है।

गाथा १४८ की टीकामें बताया है कि जीवके राग द्वेष मोहरूप परिणाम मोहनीय कर्मके विपाकसे उत्पन्न हुए विकार हैं-

जीवभावः पुना रतिरागद्वेषमोहयुतः मोहनीयविपाकसंपादितविकार इत्यर्थः।

१५० वीं गाथाकी टीकामें बतलाया है कि वास्तवमें संसारी जीव अनादि मोहनीय कर्मके उदयका अनुसरण करनेवाली परिणतिसे अशुद्ध है। और गाथा १५६में बतलाया है कि वास्तवमें मोहनीय कर्मके उदयका अनुसरण करनेवाली परिणतिके वशसे रंजित उपयोगवाला वर्तता हुआ जीव पर द्रव्यमें शुभ या अशुभ भावको करता है।

अप्पा पगुंह अणुहरइ अप्पु ण जांइ ण एइ।
भुवणत्तयहँ वि मज्झि जिय विहि आणइ विहि णेइ॥१-६६॥ -परमात्मप्रकाश

अर्थ-हे जीव ! यह आत्मा पंगुके समान है । आप न कहीं जाता है, न आता है । तीन लोकमें इस जीवको कर्म ही ले जाता है, कर्म ही ले आता है ॥ १-६६ ॥

कम्मइँ दिढ-घण-चिक्कणइँ गरुवइँ वज्जसमाइँ ।
णाण-वियक्खणु जीवडउ उप्पहि पाडहिँ ताइँ ॥ १-७८ ॥ -प० प्र०

अर्थ-वे ज्ञानावरण आदि कर्म बलवान् हैं, बहुत हैं, जिनका विनाश करना अशक्य है; इसलिये चिकने हैं, भारी हैं और वज्रके समान अभेद्य हैं, इस ज्ञानादि गुणसे चतुर जीवको खोटे मार्गमें पटकते हैं ॥

कम्माइं बलियाइं बलिओ कम्मादु णत्थि कोइ जगे ।
सव्व बलाइं कम्मं मलेदि हत्थीवं णलिणि वणं ॥ १६२१ ॥ -मूलाराधना

अर्थ-जगतमें कर्म ही अतिशय बलवान् है, उससे दूसरा कोई भी बलवान् नहीं हैं । जैसे हाथी कमलवनका नाश करता है, वैसे ही यह बलवान् कर्म भी सर्व बन्धु विद्या द्रव्य शरीर परिवार सामर्थ्य इत्यादिका नाश करता है ॥१६२१॥

का वि अउव्वा दीसदि पुग्गलदव्वस्स एरिसी सत्ती ।
केवलणाणसहावे विणासिदो जाइ जीवस्स ॥ २११ ॥ -स्वा० का० अ०

अर्थ-पुद्गल द्रव्यकी कोई ऐसी अपूर्व शक्ति है जो जीवके केवलज्ञानस्वभावको भी नष्ट कर देती है ॥

प्रश्न नं० ५ के द्वितीय उत्तरमें स्वा० का० अ० गाथा ३१९ उद्धृत करते हुए आपने स्वयं स्वीकार किया है कि जीवका उपकार या अपकार शुभाशुभ कर्म करते हैं । तथा प्रश्न नं० १६ के प्रथम उत्तरमें भी आपने यह स्वीकार किया है कि जीवमें बहुतसे धर्म ऐसे हैं जो आगन्तुक हैं और जो संसारकी विवक्षित भूमिका तक आत्मामें दृष्टिगोचर होते हैं, उसके बाद उसमें उपलब्ध नहीं होते ।

इन आगम प्रमाणोंसे सिद्ध होता है कि वास्तवमें विकारी भाव द्रव्यकर्मोदयके अनुरूप होते हैं । समयसार गाथा ८९ व २७८-२७९ में स्फटिक मणिका दृष्टान्त देकर यह सिद्ध किया गया है कि यद्यपि जीवका परिणमन स्वभाव है तथापि उसके भाव कर्मोदयके द्वारा किये जाते हैं, इसीलिये ५० से ५६ तक की गाथाओं में यह बतलाया है कि ये रागादिक भाव पौद्गलिक हैं और व्यवहार नयसे जीवके हैं । समयसार गाथा ६८ की टीकामें यह कहा गया है कि जिस प्रकार जौसे जौ उत्पन्न होता है उसी प्रकार रागादि पुद्गल कर्मोंसे रागादि उत्पन्न होते हैं, इसी कारण निश्चय नयसे रागादिक ( भाव ) पौद्गलिक हैं । समयसार गाथा ११३-११६ में कहा है कि जिस प्रकार उपयोग जीवसे अनन्य है उस प्रकार क्रोध जीवसे अनन्य नहीं है ।

अन्य कारणों और कर्मोदयरूप कारणोंमें मौलिक अन्तर है, क्योंकि बाह्य सामग्री और अन्तरंगकी योग्यता मिलने पर कार्य होता है। किन्तु घातिया कर्मोदयके साथ ऐसी बात नहीं है, वह तो अन्तरंग योग्यता का सूचक है। जैसा कि स्वयं श्रीमान् पं० फूलचन्द्र जी ने कर्मग्रन्थ पुस्तक ६ की प्रस्तावना पृ० ४४ पर लिखा है-

अन्तरंगमें वैसी योग्यताके अभावमें बाह्य सामग्री कुछ भी नहीं कर सकती है । जिस योगीके राग भाव नष्ट हो गये हैं, उसके सामने प्रबल रागकी सामग्री उपस्थित होने पर भी राग पैदा नहीं होता। इससे मालूम पड़ता है कि अन्तरंग योग्यताके बिना बाह्य सामग्रीका मूल्य नहीं है । यद्यपि कर्मके विषयमें भी ऐसा ही कहा जा सकता है पर कर्म और बाह्य सामग्री इनमें मौलिक अन्तर है । कर्म वैसी

योग्यताका सूचक है, पर वाह्य सामग्रीका वैसी योग्यतासे कोई सम्बन्ध नहीं। कभी वैसी योग्यताके सद्भावमें भी वाह्य सामग्री नहीं मिलती और उसके अभावमें भी वाह्य सामग्रीका संयोग देखा जाता है, किन्तु कर्मके विषयमें ऐसी बात नहीं है। उसका सम्बन्ध तभी तक आत्मामें रहता है जब तक उसमें तदनुकूल योग्यता पाई जाती है। अतः कर्मका स्थान वाह्य सामग्री नहीं ले सकती। अतः कर्मके निमित्त-से जीवकी विविध प्रकारकी अवस्था होती है और जीवमें ऐसी योग्यता आती है।

इसी बातको इष्टोपदेश पद्य ७ की टीका में कहा है -

मलविद्धमणेर्व्यक्तिर्यथा नैकप्रकारतः।
कर्मविद्धात्मविज्ञप्तिस्तथा नैकप्रकारतः॥

अर्थ-जिस तरह मलके सम्बन्धसे मणिके अनेक रूप दीखने लगते हैं उसी तरह कर्मके सम्बन्धसे आत्माकी भी अनेक अवस्थाऐं दीखने लगती हैं॥

इसी प्रकार पद्य ७ की टीकामें भी मदिराका दृष्टान्त देकर यह सिद्ध किया है कि जीव मोहनीय कर्मोदयके कारण पदार्थोंका वास्तविक स्वरूप नहीं जान सकता। इष्टोपदेशका वह पद्य इस प्रकार है-

मोहेन संवृतं ज्ञानं स्वभावं लभते न हि।
मत्तः पुमान् पदार्थानां यथा मदनकोद्रवैः॥ ७॥

अर्थ-जिस तरह मादक कोदोंके खानेसे उन्मत्त हुआ पुरुष पदार्थोंका यथार्थ स्वरूप नहीं जानता, उसी प्रकार मोहनीय कर्मके द्वारा आच्छादित ज्ञान भी पदार्थोंके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान सकता॥७॥

कर्म वलवान् है, उदयमें आकर नवीन कर्मोंका बन्ध जीवके साथ कर देता है। ऐसा ही श्री अमृतचन्द्र सूरिने कहा है-

किंत्वत्रापि समुल्लसत्यवशतो यत् कर्म बंधाय तत्॥११०॥ -कलश

अर्थ-किन्तु आत्मामें अवशपने जो कर्म प्रगट होता है वह बंधका कारण है॥११०॥

श्री पं० फूलचन्द्रजी भी कर्मकी वलवत्ताको इन शब्दोंमें स्वीकार करते हैं-

कर्म तो आत्माकी विविध अवस्थाओंके होनेमें निमित्त है और उसमें ऐसी योग्यता उत्पन्न करता है जिससे वह अवस्थानुसार शरीर वचन मन और श्वासोच्छ्वासके योग्य पुद्गलोंको योग द्वारा ग्रहण करके तद्रूप परिणमाता है। -पंचाध्यायी पृ० १५९ विशेषार्थ (वर्णी ग्रन्थमाला)

कर्मोंकी सदा एकसी दशा नहीं रहती। कभी कर्म वलवान् होता है और कभी जीव वलवान् हो जाता है। जब जीव वलवान् होता है तो वह अपना कल्याण कर सकता है। कहा भी है-

कत्थ वि वलिओ जीवो कत्थ वि कम्माइ हुंति वलियाइ।
जीवस्स य कम्मस्स य पुव्वविरुद्धाइ वइराइ॥ -इष्टोपदेश गाथा ३१ की टीका

अर्थ-कभी यह जीव वलवान् हो जाता है और कभी कर्म वलवान् होता है। इस तरह जीव और कर्मोंका अनादि कालसे परस्पर विरुद्ध वैर है॥

इस कर्मकी वलवत्ताके कारण यह जीव अनादि कालसे चतुर्गति भ्रमण कर रहा है इस बातको श्री अकलंकदेव राजवार्तिक पृ० २ में कहते हैं-

यथा बलीवर्दपरिभ्रमणापादितारगर्तभ्रान्तिं घटीयन्त्रभ्रान्तिजनिकां बलीवर्दपरिभ्रमणाभावे चारगर्तभ्रान्त्यभावाद् घटीयन्त्रभ्रान्तिनिवृत्तिं च प्रत्यक्षत उपलभ्य सामान्यतो दृष्टादनुमानाद् बलीवर्दतुल्यकर्मोदयापादितां चतुर्गत्यरगर्तभ्रान्तिं शारीर-मानसविविधवेदनाघटीयन्त्रभ्रान्तिजनिकां प्रत्यक्षत उपलभ्य ज्ञानदर्शनचारित्राग्निनिर्दग्धस्य कर्मण उदयाभावे चतुर्गत्यरगर्तभ्रान्त्यभावात् संसारघटीयन्त्रभ्रान्तिनिवृत्त्या भवितव्यमित्यनुमीयते यासौ संसारघटीयन्त्रभ्रान्तिनिवृत्तिः स एव मोक्ष इति ।

अर्थात्-जैसे घटीयंत्र ( रेंहट ) का घूमना उसके धुरेके घूमनेसे होता है और धुरेका घूमना उसमें जुते हुए बैलके घूमने पर । यदि बैलका घूमना बन्द हो जाय तो धुरेका घूमना रुक जाता है और धुरेके रुक जाने पर घटीयन्त्रका घूमना बन्द हो जाता है । उसी तरह कर्मोदयरूपी बैलके चलनेपर ही चार गतिरूपी धुरेका चक्र चलता है और चतुर्गतिरूपी धुरा ही अनेक प्रकारको शारीरिक मानसिक आदि वेदनारूपी घटी-यन्त्रको घुमाता रहता है । कर्मोदयकी निवृत्ति होने पर चतुर्गतिका चक्र रुक जाता है और उसके रुकनेसे संसार रूपी घटीयंत्रका परिचलन समाप्त हो जाता है, इसीका नाम मोक्ष है ।

इसी सम्बन्धमें निम्न प्रमाण भी दृष्टव्य हैं-

प्रेर्यते कर्म जीवेन जीवः प्रेर्यत कर्मणा ।
एतयोः प्रेरको नान्यो नौनाविकसमानयोः ॥१०६॥ -उपासकाध्ययन पृ० २९

अर्थ-जीव कर्मको प्रेरित करता है और कर्म जीवको प्रेरित करता है । इन दोनोंका सम्बन्ध नौका और नाविकके समान है, कोई तीसरा इन दोनोंका प्रेरक नहीं है ॥१०६॥

क्लेशाय कारणं कर्म विशुद्धे स्वयमात्मनि ।
नोष्णमम्बु स्वतः किन्तु तदौष्ण्यं वह्निसंश्रयम् ॥ २४७ ॥ -उपासकाध्ययन पृ० १२०

अर्थ-आत्मा स्वयं विशुद्ध है और कर्म उसके क्लेशका कारण है । जैसे जल स्वयं गरम नहीं होता, आगके सम्बन्धसे उसमें गर्मी आ जाती है ॥२४७॥

उत्पाद्य मोहमदविह्वलमेव विश्वं वेधाः स्वयं गतघृणष्ठकवद्यथेष्टम् ।
संसारभीकरमहागहनान्तराले हन्ता निवारयितुमत्र हि कः समर्थः ॥७७॥ -आत्मानुशासन

अर्थ-कर्मरूपी ब्रह्मा समस्त विश्वको ही मोहरूपी मदिरामें मूर्छित करके तत्पश्चात् स्वयं ही ठगके समान निर्दय बनकर इच्छानुसार संसाररूपी भयानक महावनके मध्यमें उसका घात करता है । उससे रक्षा करनेके लिए भला दूसरा कौन समर्थ है ? अर्थात् कोई नहीं ॥७७॥

आपने स्वयं भी प्रश्न नं० ५ के उत्तर में कर्मकी बलवत्ता स्वीकार करते हुए माना है कि सुख दुःख मरण आदि सब कर्मोदयके अनुसार होता है । किन्तु इस प्रश्नके उत्तरमें आप उसको स्वीकार नहीं कर रहे हैं यह आश्चर्यकी बात है ।

यह हमारे प्रश्नका आगम सम्मत उत्तर है । प्रश्नका उत्तर न देकर आपने जो अप्रासंगिक विवेचन एकान्त नियतिवाद तथा नोकर्म आदि निमित्तोंके विषयमें कर दिया है अब उस पर भी विचार किया जाता है-

आपने लिखा है कि-‘प्रेरक कारणसे किसी द्रव्यमें कार्य आगे पीछे कभी भी किया जा सकता है, सो यह सिद्ध करना संगत न होगा ।’ आपका ऐसा लिखना उचित नहीं है ।

(अ) सर्व कार्योंका सर्वथा कोई नियत काल हो ऐसा एकान्त नियम नहीं है, क्योंकि प्रवचनसारमें श्री अमृतचन्द्र आचार्यने कालनय और अकालनय, नियतिनय और अनियतिनय इन नयोंकी अपेक्षा कार्यकी सिद्धि बतलाई है और ऐसा प्रत्यक्ष भी देखा जाता है, और किसीने कोई क्रम नियत भी नहीं किया है। अतः आगे पीछे करनेका प्रश्न ही नहीं उठता।

(आ) कर्मस्थितिबंधके समय निषेक रचना होकर यह नियत हो जाता है कि अमुक कर्म वर्गणा अमुक समय उदयमें आवेगी, किन्तु बन्धावलिके पश्चात् उत्कर्षण, अपकर्षण, स्थितिकांडकघात, उदीरणा, अविपाकनिर्जरा आदिके द्वारा कर्मवर्गणा आगे पीछे भी उदयमें आती हैं जिसको कर्मशास्त्रके विशेषज्ञ भलीभांति जानते हैं। किन्तु इतना नियत है कि कोई भी कर्म स्वमुख या परमुखरूपसे अपना फल दिये विना अकर्मभावको प्राप्त नहीं होता। ( जयधवल पु. ३ पृ० २४५)। इस विषयका विशेष विवेचन प्रश्न नं० ५ के पत्रक में किया जावेगा तथा आगे भी यथा अवसर कुछ लिखा जावेगा।

आपने लिखा है कि-‘दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध व्यवहारनयसे है, निश्चयनयसे नहीं।’ सर्वत्र स्थान २ पर इसीपर जोर दिया गया है। 'व्यवहारनय’के पूर्व ‘मात्र’ शब्द लगाकर या उसका अर्थ ‘उपचार’ करके यह भी दर्शाया गया है कि व्यवहारसे जो कथन है वह वस्तुतः वास्तविक नहीं है।

यदि नयोंके स्वरूप तथा विषयपर ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धका कथन निश्चयनयसे होनेका प्रसंग ही उत्पन्न नहीं हो सकता है। जो विषय जिस नयका है उसका कथन उस ही नयसे किया जा सकता है, अन्य नयसे नहीं। यदि उस ही विषयको अन्य नयका विषय बना दिया जायगा तो सर्व विप्लव हो जायगा और नय विभाजन अर्थात् नय व्यवस्था भी समीचीन नहीं रह सकेगी। जैसे प्रत्येक द्रव्य व्यवहार नयकी अपेक्षासे अनित्य है। यदि निश्चयनयकी अपेक्षासे भी द्रव्यको अनित्य कहा जायगा तो व्यवहारनय तथा निश्चयनयमें कोई अन्तर ही न रहेगा। दोनों एक ही हो जायेंगे। द्रव्यको नित्य बतलानेवाला कोई नय ही न रहेगा। इस प्रकार द्रव्यके दूसरे धर्मका कथन नहीं हो सकनेके कारण वस्तु स्वरूपका ज्ञान एकांगी ( सर्वथा एकान्तरूप ) एवं मिथ्या हो जायगा। अर्थात् द्रव्य एकान्ततः ( सर्वथा ) अनित्य हो जायगा और इस प्रकार पूर्ण क्षणिकवाद आ जायगा। अतः अनित्यताका कथन व्यवहारनयसे ही हो सकता है, निश्चयनयसे नहीं हो सकता है। निश्चयनय तो व्यवहारनयके विषयको ग्रहण करनेमें अंध-पुरुषके समान है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यवहारनयका विषय होनेसे अनित्यता प्रामाणिक, वास्तविक या सत्य नहीं है। अनित्यता भी उतनी ही प्रामाणिक, वास्तविक व सत्य है जितनी नित्यता।

यदि व्यवहारनयके विषयको प्रामाणिक नहीं माना जायगा तो व्यवहार नय मिथ्या हो जायगा, किन्तु आगममें प्रत्येक नय प्रामाणिक माना गया है। जो परनिरपेक्ष कुनय होता है उसीको मिथ्या माना गया है, सम्यक् नयको मिथ्या नहीं माना गया है।

एक द्रव्यके खण्ड या दो द्रव्योंका सम्बन्ध व्यवहारनयका विषय है। अतः दो द्रव्योंका सम्बन्ध होनेके कारण निमित्त-नैमितिक सम्बन्धका कथन व्यवहारनयसे ही हो सकता है, निश्चयनयसे नहीं। जैसे पर द्रव्यों के साथ जो ज्ञेय-ज्ञायकसम्बन्ध है उसका कथन व्यवहारनयसे ही हो सकता है, निश्चयनयसे नहीं । चूंकि यहाँ भी दो द्रव्योंका सम्बन्ध है। जैसे वर्णको आँख ही बतला सकती है, नाक आदि अन्य इन्द्रियाँ नहीं। अतः नाकादि अन्य इन्द्रियोंसे वर्ण नहीं है-यह कहनेका प्रसंग ही नहीं आता है। इसी प्रकार निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध निश्चय नयसे नहीं यह प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि दो द्रव्योंका सम्बन्ध निश्चय-नयका विषय ही नहीं है।

पुनश्च-आपने लिखा है कि ‘संसारी आत्माके विकारभाव तथा चतुर्गति भ्रमणमें द्रव्य कर्मोंके उदयका व्यवहारसे निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है, कर्तृकर्मसम्बन्ध नहीं है।’ आगे आपने अपने उत्तरमें एक स्थान पर यह भी लिखा है कि ‘द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें कर्तृकर्मसम्बन्ध नहीं है, फिर भी आगममें जहाँ भी दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें कर्तृ-कर्मसम्बन्ध कहा है वहाँ वह उपचारमात्रसे कहा है।’ इससे यह तो फलित हो ही जाता है कि आगममें द्रव्य कर्मोंके उदयका आत्माके विकारभाव और चतुर्गति भ्रमणके साथ कर्तृकर्म-सम्बन्धका प्रतिपादन किया गया है और आगमका यह प्रतिपादन आपको भी स्वीकार है। केवल आप उस कर्तृ-कर्मसम्बन्धको उपचारमात्र स्वीकार करके कार्यके प्रति निमित्तकी अकिंचित्करता सिद्ध कर देना चाहते हैं। इस तरह हमारे आपके मध्य मतभेद केवल इतना ही रह जाता है कि जहाँ हमारा पक्ष आत्मामें उत्पन्न होनेवाले रागादि विकार और चतुर्गतिभ्रमण रूप कार्यकी उत्पत्तिमें द्रव्यकर्मके उदयरूप निमित्तकारण या निमित्तकर्ताको सहकारी कारण या सहकारी कर्ताके रूपमें सार्थक ( उपयोगी ) मानता है वहाँ आपका पक्ष उसे उपचरित कहकर उक्त कार्यमें अकिंचित्कर अर्थात् निरर्थक ( निरुपयोगी ) मानता है और तब आपका पक्ष अपना यह सिद्धान्त निश्चित कर लेता है कि कार्य केवल उपादानकी अपनी सामर्थ्यसे स्वतः ही निष्पन्न हो जाता है। उसकी निष्पत्तिमें निमित्तकी कुछ भी अपेक्षा नहीं रह जाती है। जब कि हमारा पक्ष यह घोषणा करता है कि अनुभव, तर्क और आगम सभी प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि यद्यपि कार्यकी निष्पत्ति उपादानमें हुआ करती है अर्थात् उपादान ही कार्यरूप परिणत होता है फिर भी उपादान की उस कार्यरूप परिणतिमें निमित्तकी अपेक्षा बराबर बनी हुई है अर्थात् उपादानकी जो परिणति आगममें स्वपरप्रत्यय स्वीकार की गयी है वह परिणति उपादानकी अपनी परिणति होकर भी निमित्तकी सहायतासे ही हुआ करती है, अपने आप नहीं हो जाया करती है । चूंकि आत्माके रागादिरूप परिणमन और चतुर्गति भ्रमणको उसका ( आत्माका ) स्वपरप्रत्यय परिणमन आगम द्वारा प्रतिपादित किया गया है, अतः वह परिणमन आत्माका अपना परिणमन होकर भी द्रव्यकर्मोंके उदयकी सहायतासे ही हुआ करता है। जैसे-

न जातु रागादिनिमित्तभावमात्मात्मनो याति यथार्ककान्तः ।
तस्मिन्निमित्तं परसंग एव वस्तुस्वभावोऽयमुदेति तावत् ॥१७५॥
-समयसार-आत्मख्याति टीका कलश

इसमें अमृतचन्द्र सूरिने स्पष्ट कर दिया है।

कलशका भाव यह है कि आत्मामें उत्पन्न होनेवाले रागादिभावोंका आत्मा स्वयं निमित्त नहीं है, किन्तु परवस्तुके संसर्गसे ही आत्मामें रागादिभाव उत्पन्न होते हैं, जिस प्रकार कि सूर्यकान्त मणि परके संसर्गसे ही तदनुरूप विविध रंगोंके रूप परिणत होता है। वस्तुका स्वभाव ही ऐसा है कि परवस्तुके संयोगसे वह तदनुरूप परिणमन करती रहती है।

इसी बातको ‘जीवपरिणाम हेदु’’ …इत्यादि समयसारकी ८०वीं गाथा भी पुष्ट कर रही है, जिसको आपने अपने पक्षकी पुष्टिके लिये अपने उत्तरमें उपस्थित किया है, लेकिन जिसके विषयमें हम अपनी द्वितीय प्रतिशंकामें लिख चुके हैं कि यह गाथा आपके मन्तव्य के विरुद्ध ही अभिप्राय प्रगट करती है । याने जीवके परिणमनकी सहायतासे ही पुद्गल कर्मरूप परिणमन करते हैं और पुद्गल कर्मकी सहायतासे ही जीव रागादि विभावरूप परिणमन करता है।

समयसारकी ८२वीं गाथा भी ऐसी बातको वतला रही है कि ८० और ८१वीं गाथाओंके अनुसार चूँकि पुद्गलोंका ही कर्मरूप परिणमन होता है। पुद्गलोंमें होनेवाला कर्मरूप वह परिणमन आत्माका परिणमन नहीं है, वह तो उस परिणमनमें केवल निमित्तकारण ( सहकारी कारण ) या निमित्त कर्ता ( सहकारी कर्ता ) ही होता है। इसी प्रकार आत्माका ही रागादिरूप परिणमन होता है। आत्मामें होनेवाला रागादिरूप वह परिणमन पुद्गलका परिणमन नहीं है, वह तो उस परिणमनमें केवल निमित्तकारण ( सहकारी कारण ) या निमित्त कर्ता ( सहकारी कर्ता ) ही होता है, इसलिए आत्मामें जो भी परिणमन होता है उसके होनेमें यद्यपि पुद्गल कर्मका सहयोग अपेक्षित होता है, लेकिन उस परिणमनका उपादान कारण या कर्ता आत्मा ही होता है, पुद्गल कर्म नहीं। इसी तरह पुद्गलमें जो भी ( कर्म नोकर्मरूप ) परिणमन होता है, यद्यपि उसके होनेमें आत्माके रागादि भावोंका सहयोग अपेक्षित होता है, लेकिन उस परिणमनका उपादान कारण या कर्ता पुद्गल ही होता है आत्माके रागादिभाव नहीं।

समयसारकी ८०, ८१ और ८२वीं गाथाओंके उक्त अभिप्रायको लक्ष्यमें रखकर ही समयसारकी निम्नलिखित गाथाका अर्थ करना चाहिये-

जीवम्हि हेदुभूदे बंधस्स दु पस्सिदूण परिणामं।
जीवेण कदं कम्मं भण्णदि उपयारमत्तेण ॥१०५॥

वह अर्थ इस प्रकार है कि चूंकि जीवका सहयोग मिलने पर ही पुद्गल कर्मका वन्धरूप परिणमन देखा जाता है, इसलिये जीवने पुद्गलका कर्मरूप परिणमन कर दिया-ऐसा उपचारमात्रसे अर्थात् निमित्त-नैमित्तिकभावकी अपेक्षासे कहा जाता है। यहाँ पर ‘उपचारमात्रसे’ इस पदका अर्थ निमित्त-नैमित्तिकभावसे ही उल्लिखित ८०, ८१ और ८२ वीं गाथाओंके आधार पर करना सुसंगत है। तात्पर्य यह है कि लोकव्यवहार में जिस प्रकार उपादानोपादेयभावकी अपेक्षा शिष्यका अध्ययन करना और निमित्त-नैमित्तिक भावकी अपेक्षा उपाध्यायका शिष्यको पढ़ाना दोनों ही वास्तविक हैं उसी प्रकार उपादानोपादेयभावकी अपेक्षा पुद्गलका कर्मरूप परिणत होना और आत्माका रागादिरूप परिणत होना तथा निमित्त-नैमित्तिक भावकी अपेक्षा जीव द्वारा पुद्गलका कर्मरूप किया जाना और पुद्गल द्वारा आत्माका रागादिरूप किया जाना दोनों ही वास्तविक हैं। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें तत्त्वार्थसूत्रके अध्याय प्रथम सूत्र ७ की व्याख्या करते हुए आचार्य विद्यानन्दिने भी पृष्ठ १५१ पर उपादानोपादेयभावके समान निमित्त-नैमित्तिक भावको वास्तविक ही कहा है। वह कथन निम्न प्रकार है-

सहकारिकारणेन कार्यस्य कथं तद् ( कार्यकारणत्वम् ) स्यादेकद्रव्यप्रत्यासत्तेरभावादिति चेत्, कालप्रत्यासत्तिविशेषात् तत्सिद्धिः। यदनन्तरं हि यदवश्यं भवति तत्तस्य सहकारिकारणमितरत्कार्यमिति प्रतीतम्। न चेदं सहकारित्वं क्वचिद् भावप्रत्यासत्तिः क्षेत्रप्रत्यासत्तिर्वा, नियमाभावात्। निकटदेशस्यापि चक्षुषो रूपज्ञानोत्पत्तौ सहकारित्वदर्शनात्, संदंशकादेश्चासुवर्णस्वभावस्य सौवर्णकटकोत्पत्तौ। यदि पुनर्यावत्क्षेत्रं यद्यस्योत्पत्तौ सहकारि दृष्टं यथाभावं च तत्तावत् क्षेत्रं तथाभावमेव सर्वत्रेति नियता क्षेत्रभावप्रत्यासत्तिः सहकारित्वं कार्ये निगद्यते, तदा न दोषो, विरोधाभावात्। तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे कार्यकारणभावो द्विष्ठः सम्बन्धः संयोगसमवायादिवत् प्रतीतिसिद्धत्वात् पारमार्थिक एव न पुनः कल्पनारोपितः, सर्वथाप्यनवद्यत्वात्।

अर्थ-सहकारी कारणके साथ कार्यका कार्यकारणभाव कैसे सिद्ध होता है ? क्योंकि सहकारी कारण और कार्यमें एक द्रव्यताका अभाव है, यदि ऐसा कहा जाय तो इसका उत्तर यह है कि सहकारिकारणके साथ कार्यका कार्यकारणभाव कालप्रत्यासत्तिके रूपमें माना गया है, क्योंकि जिसके अनन्तर जो अवश्य होता है वह सहकारी कारण कहा जाता है और दूसरा कार्य कहलाता है ऐसा ही प्रतीत होता है। ऐसा सहकारित्व कहीं पर भी भावप्रत्यासत्ति अथवा क्षेत्रप्रत्यासत्तिरूप नहीं होता है, क्योंकि इनका नियम बनता नहीं है। देखनेमें आता है कि निकट देशमें स्थित चक्षुको भी रूपज्ञानकी उत्पत्तिमें सहकारिता होती है इसी प्रकार सुवर्णभावसे रहित अर्थात् लोह धातुसे निर्मित संदंशक ( संडासी ) आदि को भी सुवर्णनिर्मित कटक आदि की उत्पत्तिमें सहकारिता होती है। यदि जितने क्षेत्रमें जो जिस कार्यकी उत्पत्तिमें सहकारी कारण होता है, इसी प्रकार जो जिस भावरूपसे सहकारी कारण होता है वह उतने क्षेत्रमें और उस भावरूपमें सहकारी होता है-ऐसी क्षेत्र और भावरूप प्रत्यासत्तिको कार्यमें सहकारित्व कह दिया जाय तो फिर काल प्रत्यासत्ति की तरह क्षेत्र प्रत्यासत्ति और भाव प्रत्यासत्तिरूप भी सहकारित्वको माना जा सकता है। इसमें कोई विरोध नहीं है। इस प्रकार व्यवहारनयका आश्रय लेने पर दो पदार्थोंमें रहनेवाला कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध भी संयोग और समवाय आदिके समान प्रतीतिसिद्ध होनेके सबब पारमार्थिक ही है, कल्पना द्वारा आरोपित नहीं है; कारण कि यह सर्वथा निर्दोष है।

इसी प्रकार अष्टशतीमें श्रीमद् भट्टाकलंकदेवने भी सहकारी कारणको कार्यके प्रति उपादानके लिये सहयोगदाताके रूपमें प्रतिपादित किया है। वह वचन निम्न प्रकार है-

तदसामर्थ्यमखण्डयदकिञ्चित्करं किं सहकारिकारणं स्यात् ?
-अष्टसहस्री पृष्ठ १०५

अर्थ-उसकी अर्थात् उपादानकी असामर्थ्यका खण्डन नहीं करते हुए सहकारिकारण यदि अकिंचित्कार ही बना रहता है तो उस हालतमें वह सहकारी कारण कहला सकता है क्या ? अर्थात् नहीं कहला सकता है।

ये सब आगमके प्रमाण सहकारी कारणको और निमित्तनैमित्तिकभावको वास्तविक तथा कार्यके प्रति सार्थक और उपयोगी ही सिद्ध करते हैं, केवल कल्पनारोपित या उपचरित नहीं। इसलिये समयसारकी ‘जीवम्हि हेदुभूदे-’ गाथामें पठित उपचार शब्दका अर्थ कल्पना या आरोप न करके निमित्तनैमित्तिकभावरूप जो अर्थ हमने किया है वही सुसंगत है।

इसी प्रकार उक्त गाथाकी ‘इह खलु पौद्‌गलिककर्मण…………’ इत्यादि रूप जो टीका आचार्य अमृतचन्द्रने की है उसमें भी उपचार शब्दका अर्थ निमित्तनैमित्तिकभावरूप ही किया गया है। संपूर्ण टीका निम्नप्रकार है-

इह खलु पौद्‌गलिककर्मणः स्वभावादनिमित्तभूतेऽप्यात्मन्यनादेरज्ञानान्निमित्तभूतेनाज्ञानभावेन परिणमनान्निमित्तीभूते सति सम्पद्यमानत्वात् पौद्‌गलिकं कर्मात्मना कृतमिति निर्विकल्पविज्ञानघनभ्रष्टानां विकल्पपराणां परेषामस्ति विकल्पः स तूपचार एव न तु परमार्थः ॥ १०५ ॥

अर्थ-यद्यपि आत्मा ( शुद्ध ) स्वभावरूपसे पौद्‌गलिक कर्मका ( पुद्‌गलके कर्मरूप परिणमनका ) निमित्तभूत नहीं है तथापि अनादिकालसे उसकी विभावस्थिति रहनेके कारण पौद्‌गलिक कर्ममें निमित्तभूत अज्ञानके रूपमें परिणमन होनेसे उसके ( आत्माके ) निमित्त बन जाने पर ही पुद्‌गलका कर्मरूप परिणमन होता है, इसलिये आत्मा द्वारा पुद्गलका कर्मरूप परिणमन किया गया-ऐसा विकल्प उन लोगोंका होता है जो निर्विकल्प विज्ञानघनसे भ्रष्ट अर्थात् विकारी परिणतिमें वर्तमान अतएव विकल्पपरायण हैं। लेकिन ‘आत्मा द्वारा पुद्गलका कर्मरूप किया जाना’ यह उपचार ही है अर्थात् निमित्तनैमित्तिकभावकी अपेक्षासे ही है, परमार्थरूप नहीं है अर्थात् उपादानोपादेयभावकी अपेक्षासे नहीं है ॥१०५॥

आचार्य अमृतचन्द्रने जो यह समयसार कलश रचा है-

यः परिणमति स कर्ता यः परिणामो भवेत्तु तत्कर्म।
या परिणतिः क्रिया सा त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया ॥ ५१ ॥

इसमें ‘जो परिणमन होता है अर्थात् जिसमें या जिसका परिणमन होता है वह कर्ता है’ कर्ताका यह लक्षण उपादानोपादेयभावको लक्ष्यमें रखकर ही माना गया है, परन्तु इस पर ध्यान न देते हुए उस लक्षणको सामान्यरूपसे कर्ताका लक्षण मानकर निमित्तनैमित्तकभावकी अपेक्षा आगममें प्रतिपादित कर्तृकर्मभावको उपचरित ( कल्पनारोपित ) मानते हुए आपके द्वारा निमित्तकर्ताको अकिंचित्कर ( कार्यके प्रति निरुपयोगी ) करार दिया जाना गलत ही है, क्योंकि निमित्तकर्ताको समयसार गाथा १०० में आचार्य कुन्दकुन्दने तथा इसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्रने सार्थकरूपमें ही स्वीकार किया है, जो निम्न प्रकार है-

जीवो ण करेदि घडं णेव पडं णेव सेसगे दव्वे।
जोगुवओगा उप्पादगा य तेसिं हवदि कत्ता ॥ १०० ॥

गाथाका अर्थ-जीव घट, पट और शेष सभी द्रव्योंको नहीं करता है, किन्तु जीवके योग और उपयोग ही उनके कर्ता हैं तथा उनका कर्ता आत्मा है ॥१००॥

टीका-यत्किल घटादि क्रोधादि वा परद्रव्यात्मकं कर्म तदयमात्मा तन्मयत्वानुषंगाद् व्याप्यव्यापकभावेन तावन्न करोति, नित्यकर्तृत्वानुषंगात् निमित्तनैमित्तिकभावेनापि न तत्कुर्यात्। अनित्यौ योगोपयोगावेव तत्र निमित्तत्वेन कर्तारौ, योगोपयोगयोस्त्वात्मविकल्पव्यापारयोः कदाचिदज्ञानेन करणादात्मापि कर्तास्तु तथापि न परद्रव्यात्मककर्मकर्ता स्यात् ॥ १०० ॥

अर्थ-जो घटादि अथवा क्रोधादिरूप परद्रव्यात्मक कर्म है उसको यह आत्मा नामका द्रव्य व्याप्यव्यापकभावसे अर्थात् उपादानोपादेयभावसे तो करता नहीं है, क्योंकि इस तरहसे उसमें तन्मयत्व ( परद्रव्यात्मक घटादि और क्रोधादिरूप कर्ममयत्व ) का प्रसंग उपस्थित होता है तथा वह आत्मा नामका द्रव्य परद्रव्यात्मक घटादि और क्रोधादिरूप कर्मको निमित्तनैमित्तिकभावरूपसे भी नहीं करता है, क्योंकि निमित्तनैमित्तिकभावरूपसे कर्ता मानने पर उसका ( आत्माका ) शाश्वत होनेके कारण परद्रव्यात्मक घटादि और क्रोधादिरूप कर्मके करनेमें नित्यकर्तृत्व प्रसक्त हो जायगा; अतः आत्मद्रव्य स्वयं कर्ता न होकर उसकी अनित्यभूत योग और उपयोगरूप पर्याय ही परद्रव्यात्मक घटादि अथवा क्रोधादिरूप कर्मकी निमित्तरूपसे कर्ता होती है। यद्यपि आत्मा स्वके विकल्प और व्यापाररूप योग तथा उपयोगको कदाचित् अपनी विभावपरिणतिके कारण करता है, अतः आत्मा भी कर्ता होता है तो भी वह ( आत्मा ) परद्रव्यात्मक कर्मका कर्ता नहीं होता है। अर्थात् आत्माके अनित्यभूत योग और उपयोग ही परद्रव्यात्मक कर्मके निमित्तरूपसे कर्ता होते हैं ॥१००॥

इस प्रकार ‘यः परिणमति स कर्ता’ कर्ताके इस लक्षणके आधार पर आपके द्वारा निमित्तकर्तृत्वको उपचारसे ( कल्पनारोपितरूपसे ) कर्तृत्व बताना असंगत ही है।

आपने अपने उत्तरमें निमित्तकर्ताको उपचारसे ( कल्पनारोपितरूपसे ) कर्ता माननेमें यद्यपि यह युक्ति दी है कि ‘एक द्रव्यका कर्तृधर्म दूसरे द्रव्यमें नहीं उपलब्ध होता’ लेकिन इससे भी निमित्तकर्ताका उपचारसे (कल्पनारोपितरूपसे) कर्तृत्व समर्थित नहीं होता है, क्योंकि इस युक्तिसे केवल इस बातका ही समर्थन होता है कि निमित्तका कोई भी धर्म कार्यमें प्रवेश नहीं पाता है, निमित्तरूप कोई कर्ता ही नहीं होता-यह बात इससे समर्थित नहीं होती है और चूंकि ऊपर लिखे अनुसार निमित्तरूप कर्ता आगम प्रतिपादित है, इसलिये निमित्तरूप कर्ताको वास्तविक स्वीकार करना गलत नहीं है, बल्कि उसे आपके द्वारा उपचारसे अर्थात् केवल कल्पितरूपसे स्वीकार करना ही गलत है।

आगममें सर्वत्र कार्यकारणभावको अन्वय-व्यतिरेकके आधार पर ही माना गया है अर्थात् जिस वस्तुका जिस कार्यके साथ अन्वय-व्यतिरेक पाया जाता है वह वस्तु उस कार्यके प्रति कारण होती है ऐसा कथन आगमका है यथा-

अन्वयव्यतिरेकसमधिगम्यो हि सर्वत्र कार्यकारणभावः। तौ च कार्यं प्रति कारणव्यापारसव्यपेक्षावेवोपपद्येते कुलालस्येव कलशं प्रति। -प्रमेयरत्नमाला तृतीय समुद्देश सूत्र ६३ की व्याख्या।

कार्यकारणभाव सर्वत्र अन्वय और व्यतिरेकके आधार पर ही मानना चाहिये। वे अन्वय और व्यतिरेक कार्यके प्रति कारणव्यापारसापेक्ष ही उपन्न होते हैं, जैसे कि कलशके प्रति कुम्हारके अन्वय और व्यतिरेक उत्पन्न होते हैं।

इसमें उपादान कारणके समान निमित्तकारणमें भी कार्यके प्रति अन्वय और व्यतिरेक माने गये हैं, अतः जिस प्रकार कार्यके प्रति उपादानभूत वस्तु अपने ढंगसे अर्थात् आश्रयरूपसे वास्तविक कारण होती है उसी प्रकार कार्यके प्रति निमित्तभूत वस्तु भी अपने ढंगसे अर्थात् उपादानके सहकारिरूपसे वास्तविक कारण होती है। उसकी (निमित्तभूत वस्तुकी) यह उपादान सहकारितारूप कारणता काल्पनिक नहीं है।

वास्तविक बात यह भी है कि आगममें स्वपरप्रत्यय परिणामरूप कार्यको समानरूपसे उभयशक्तिजन्य माना गया है। यथा-

एवं दुसंजोगादिणा अणुभागपरूवणा कायव्वा, जहा (मट्टिआ) पिंड-दंड-चक्क-चीवर-जल-कुंभारादीणं घडुप्पायणाणुभागो। -धवल १३ पृ० ३४९

अर्थ-इसी प्रकार द्विसंयोगादिरूपसे अनुभागका कथन करना चाहिये। जैसे-मिट्टी पिंड, दण्ड, चक्र, चीवर, जल और कुम्हार आदिका घटोत्पादनरूप अनुभाग।

धवलाका यह वचन स्वपरप्रत्यय परिणमनकी उभयशक्तिजन्यताका स्पष्ट उपदेश दे रहा है।

आगममें उपचारकी व्याख्या इस प्रकार की गई है-

मुख्याभावे सति प्रयोजने निमित्ते च उपचारः प्रवर्तते। -आलापपद्धति

अर्थ-मुख्यका अभाव रहते हुए यदि प्रयोजन और निमित्त उपस्थित हों तो उपचारकी प्रवृत्ति होती है।

उपचारकी यह व्याख्या स्पष्ट बतला रही है कि जहाँ उपचारकी प्रवृत्तिके लिए प्रयोजन तथा निमित हों वहींपर वह उपचारप्रवृत्ति हुआ करती हैं। जैसे अन्नमें प्राणोंका या बालकमें सिंहका उपचार लोकमें किया जाता है। इन दोनों स्थलोंमें चूंकि उपचारप्रवृत्तिके लिए प्रयोजन तथा निमित्त दोनोंका सद्भाव पाया जाता है, अतः अन्नमें प्राणोंका और बालकमें सिंहका उपचार संगत है। अन्नमें प्राणोंका उपचार करनेके लिये अन्नमें पायी जानेवाली प्राणसंरक्षकता ही निमित्त है और लोकमें इस तरह प्राणसंरक्षकताके रूपमें अन्नका महत्त्व प्रस्थापित करना ही प्रयोजन है। इसी प्रकार वालकमें सिंहका उपचार करनेके लिये वालकमें पाया जानेवाला सिंह सदृश शौर्य ही निमित्त है और इस तरह सिंहके सदृश शौर्य गुण संपन्नताके रूपमें वालककी प्रसिद्धि करना ही प्रयोजन है। इस तरह निमित्त और प्रयोजन-का सद्भाव रहते हुए ही अन्नमें प्राणोंका तथा बालकमें सिंहका उपचार किया गया है। इसी प्रकार आगममें भी उपचार प्रवृत्तिके दृष्टान्त उपलब्ध होते हैं। जैसे परार्थानुमान यद्यपि ज्ञानात्मक ही है, परन्तु उसका उपचार वचनमें किया गया है, क्योंकि वचन ज्ञानरूप परार्थानुमानका कारण होता है।

तद्वचनमपि तद्धेतुत्वादिति। -परीक्षामुख सूत्र ५६

यहाँपर कारणमें कार्यका उपचार किया गया है। इसमें भी उपचार प्रवृत्तिके लिये निमित्त और प्रयोजनका सद्भाव है। इन सब दृष्टान्तोंके आधारपर प्रकृतमें हमारा आपसे यह कहना है कि निमित्त नामकी वस्तुमें कारणत्व या कर्तृत्वका जब आपको उपचार करना है तो इस उपचार प्रवृत्तिके लिये यहाँपर निमित्त तथा प्रयोजनके सद्भावकी भी आपको खोज करनी होगी, जिसका ( निमित्त तथा प्रयोजनके सद्भावका ) यहाँपर सर्वथा अभाव है। यदि आपकी दृष्टिमें निमित्तमें कारणता या कर्तृत्वका उपचार करनेके लिये यहाँपर निमित्त तथा प्रयोजनका सद्भाव हो, तो बतलाना चाहिये। यदि आप कहें कि कार्यके प्रति निमित्त नामकी वस्तुका जो उपादानके लिये सहयोग अपेक्षित रहता है यही यहाँपर उपचार प्रवृत्तिमें निमित्त है और इस तरह कार्यके प्रति निमित्त नामकी वस्तुकी उपयोगिताको लोकमें प्रस्थापित कर देना ही प्रयोजन है तो इस विषयमें हम आपसे केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि निमित्तका कार्यके प्रति उपादानको सहयोग देना यदि आपको मान्य हो जाता है तो इससे फिर निमित्तकी वास्तविकता ही सिद्ध हो जाती है। ऐसी हालतमें उसे उपचरित कैसे कहा जा सकता है?

‘उपादीयते अनेन’ इस विग्रहके आधारपर ‘उप’ उपसर्गपूर्वक आदानार्थक ‘आ’ उपसर्ग विशिष्ट ‘दा’ धातुसे कर्ताके अर्थमें “ल्युट्” प्रत्यय होकर उपादान शब्द निष्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ यह होता है कि जो परिणमनको स्वीकार करे, ग्रहण करे या जिसमें परिणमन हो उसे उपादान कहते हैं। इस तरह उपादान कार्यका आश्रय ठहरता है। इसी प्रकार ‘निमेद्यति’ इस विग्रहके आधारपर ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक स्नेहार्थक ‘मिद्’ धातुसे कर्ताके अर्थमें ‘क्त’ प्रत्यय होकर निमित्त शब्द निष्पन्न हुआ है। मित्र शब्द भी इसी ‘मिद्’ धातुसे ‘क्र’ प्रत्यय होकर बना है। इस प्रकार जो मित्रके समान उपादानका स्नेहन करे अर्थात् उसकी कार्यपरिणतिमें जो मित्रके समान सहयोगी हो वह निमित्त कहलाता है। इस विवेचनसे यह बात अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है कि कार्यके प्रति निमित्त उपचरित (काल्पनिक) नहीं है, बल्कि उपादानके सहयोगीके रूपमें वह वास्तविक ही है।

इस प्रकार आगममें जहां भी निमित्तनैमित्तिकभावको लेकर उपचारहेतु या उपचारकर्ता, व्यवहारहेतु या व्यवहारकर्ता, बाह्य हेतु या बाह्य कर्ता, गौण हेतु या गौण कर्ता आदि शब्द प्रयोग पाये जाते हैं उन सबका अर्थ निमित्तकारण ( सहकारी कारण ) या निमित्तकर्ता ( सहकारी कर्ता ) ही करना चाहिए। उनका आरोपित हेतु ( काल्पनिक हेतु ) या आरोपित कर्ता ( काल्पनिक कर्ता ) अर्थ करना असंगत ही जानना चाहिए। इसी प्रकार आगममें जहां भी उपादानोपादेयभावको लेकर परमार्थ हेतु या परमार्थ कर्ता, निश्चय हेतु या निश्चय कर्ता, अन्तरंग हेतु या अन्तरंग कर्ता, मुख्य हेतु या मुख्य कर्ता आदि शब्द प्रयोग पाये जाते हैं उन सबका अर्थ उपादान कारण या उपादान कर्ता ही करना चाहिए। इसका कारण यह है कि कार्यकरणत्वकी दृष्टिसे जब विचार किया जाता है तो निमित्त और उपादान दोनों ही कारण स्वपरप्रत्ययरूप कार्यमें समानरूपसे ही अपने-अपने स्वभावानुसार अपने-अपने ढंगसे सार्थक या उपयोगी हुआ करते हैं । ऐसा नहीं है कि उक्त स्वपरप्रत्ययरूप कार्यको केवल उपादान ही सम्पन्न कर लेता है और निमित्त बैठा-बैठा केवल हाजिरी ही दिया करता है । इस विषयमें आचार्य विद्यानन्दिके निम्नलिखित वचनोंपर भी ध्यान देना जरूरी है-

सुवर्णं हि सुवर्णत्वादिद्रव्यार्थादेशात् सदेव, केयूरादिसंस्थानपर्यायार्थादेशाच्चासदिति तथा परिणमनशक्तिलक्षणायाः प्रतिविशिष्टान्तःसामग्र्याः, सुवर्णकारकव्यापारादिलक्षणायाश्च बहिःसामग्र्याः सन्निपाते केयूरादिसंस्थानात्मनोत्पद्यते ।
-अष्टसहस्री पृष्ठ १५०

अर्थ-सुवर्णत्वादि द्रव्यांशरूपमें सत् और केयूरादिके आकारभूत पर्यायांशरूपमें असत् सुवर्ण द्रव्य ही केयूरादिके आकारोंसे परिणत होनेकी शक्तिरूप अन्तरंग सामग्री और स्वर्णकारके व्यापार आदिरूप बहिरंग सामग्रीका सन्निपात हो जानेपर केयूरादिके आकाररूपसे उत्पन्न होता है ।

इसके साथ ही इस बातपर भी ध्यान देना आवश्यक है कि उपादान कारणकी समानता रहते हुए भी निमित्तकारणोंकी विचित्रताके अवलम्बनसे कार्योंमें भी विचित्रता देखी जाती है । स्वामी समन्तभद्रने कहा भी है-

कामादिप्रभवश्चित्रः कर्मबन्धानुरूपतः ॥९९॥ -देवागमस्तोत्र
-अष्टसहस्री पृष्ठ २६७

अर्थ-पौद्‌गलिक कर्मोंके बन्धके अनुसार ही जीवोंमें कामादिकी विविधरूपता हुआ करती है ।

इस विषयमें प्रवचनसार गाथा २५५ की टीकाकी निम्नलिखित पंक्तियां भी दृष्टव्य हैं-

यथैकेषामपि बीजानां भूमिवैपरीत्यान्निष्पत्तिवैपरीत्यं तथैकस्यापि प्रशस्तरागलक्षणस्य शुभोपयोगस्य पात्रवैपरीत्यात्फलवैपरीत्यं कारणविशेषात्कार्यविशेषस्यावश्यंभावित्वात् ।

अर्थ-जिस प्रकार भूमिकी विपरीततासे एक ही प्रकारके बीजोंमें कार्योत्पत्तिकी विपरीतता देखी जाती है उसी प्रकार एक ही तरहका शुभोपयोग भी पात्रोंकी विपरीतताके कारण फलमें विपरीतता ला देता है, क्योंकि कारणविशेषसे कार्यमें विशेषताका होना अवश्यंभावी है ।

इन प्रमाणोंसे स्पष्ट है कि निमित्तकारण उपादानकी कार्यपरिणतिमें केवल हाजिरी ही नहीं दिया करता है, बल्कि अपने ढंगसे उपादानका अनुरंजन किया करता है ।

हमने अपनी द्वितीय प्रतिशंकामें भी ऐसे बहुतसे आगम प्रमाण उपस्थित किये हैं जिनसे सिद्ध होता है कि निमित्तोंका कार्य उपादानको कार्यके प्रति सहायता पहुँचाना ही रहा करता है । इसलिये जिस प्रकार उपादानकारण अपनेरूपमें याने कार्यके आश्रयरूपमें वास्तविक है, यथार्थ है और सद्भूत है उसी प्रकार निमित्तकारण भी अपने रूपमें याने कार्यके प्रति उपादान सहकारीरूपमें वास्तविक है, यथार्थ है और सद्भूत है ।

आपने अपने उत्तरमें उदासीन और प्रेरक ऐसे दो भेद स्वीकार कर लिए यह तो प्रसन्नताकी बात है, परन्तु आप इन दोनोंके कार्यभेदको अभी तक माननेके लिए तैयार नहीं हैं ऐसी स्थितिमें आपकी इस भेदद्वयकी मान्यताका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है । आप लिखते हैं कि 'पंचास्तिकाय गाथा ८८ में निमित्तोंके उदासीन और प्रेरक ऐसे दो भेद स्वीकार किये गये हैं। मालूम पड़ता है कि केवल इसीलिये ही आप निमित्तोंके प्रेरक और उदासीन ये दो भेद माननेके लिए बाध्य हुए हैं, परन्तु इनमें पाया जानेवाला अन्तर आपको मान्य नहीं है। यही कारण है कि इस प्रसंगमें आपने ‘शिष्योऽधीते, उपाध्यायोऽध्यापयति’ इस प्रेरक निमित्तके उदाहरणके साथ ‘कारीषोऽग्निरध्यापयति’ इस उदासीन निमित्तको समकक्ष रख दिया है और अपने इस अभिप्रायको सर्वार्थसिद्धिके वचन द्वारा समर्थित करनेका भी प्रयत्न किया है। लेकिन इस प्रयत्नमें आप इसलिए सफल नहीं हो सकते हैं कि सर्वार्थसिद्धिका वह वचन केवल इतनी ही बात बतलाता है कि हेतुकर्तृ शब्दका प्रयोग उदासीन और प्रेरक दोनों प्रकारके निमित्तोंके विषयमें आगममें किया गया है, जिसके माननेमें हमें भी कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु उनमें पाये जानेवाले अन्तरका निषेध उससे समर्थित नहीं होता है। इस विषयमें आपने अपने उत्तरमें सर्वार्थसिद्धिके उस वचनको उद्धृत किया है और उसका अर्थ भी किया है, परन्तु उसका अभिप्राय ही आपने गलत लिया है; अतः आप इस पर पुनः ध्यान दें।

आगे आपने लिखा है कि ‘निमित्त कारण दो प्रकार के हैं-एक वे जो अपनी क्रिया द्वारा अन्य द्रव्यके कार्यमें निमित्त होते हैं और दूसरे वे जो चाहे क्रियावान् हों और चाहे अक्रियावान् हों, परन्तु जो क्रियाके माध्यमसे निमित्त न होकर निष्क्रिय द्रव्योंके समान ही अन्य द्रव्योंके कार्योंसे निमित्त होते हैं।’ इस विषयमें हमारा कहना यह है कि यदि सभी प्रकारके निमित्त उपादानके कार्य करते समय केवल हाजिरी ही दिया करते हैं तो क्रियाके माध्यमसे निमित्त होना तथा क्रिया करते हुए या न करते हुए भी क्रियाके माध्यमके बिना ही निमित्त होना इन दोनों अवस्थाओंमें कोई अन्तर नहीं रह जाता है। कारण कि आपके मतानुसार सभी निमित्तोंका कार्य उपादानके कार्य करते समय उसकी केवल हाजिरी बजाना ही है, इसलिये जब आगममें प्रेरक और उदासीन दो प्रकारके पृथक् पृथक् निमित्त बतलाये गये हैं और उन्हें आपने भी निश्छलभावसे स्वीकार कर लिया है तो इन दोनोंके अन्तरको भी आपको स्वीकार कर लेना चाहिये। वह अन्तर यह है कि जिस अन्य वस्तुके व्यापारके अनुसार उपादानके कार्यमें वैशिष्ट्य आता है वह वस्तु प्रेरक निमित्त कहलती है। जैसे द्वितीय प्रतिशंकामें ऐसे आगम प्रमाणोंका हम उल्लेख कर आये हैं जिनमें प्रेरक निमित्तोंके उदाहरण दिये गये हैं। उनमेंसे एक यह है कि गतिरूपसे परिणत वायु पताकाकी गतिमें कारण होती है। इसमें प्रेरकता यह है कि हवाका रुख जिस ओर होगा ध्वजा उसी ओर अवश्य फहरायगी।

आगे आपने लिखा है कि ‘प्रेरक कारणके बलसे किसी द्रव्यके कार्यको आगे पीछे कभी भी नहीं किया जा सकता है,’ सो इस विषयमें हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि कर्मबन्धकी नानारूपतासे कामादिमें भी नानारूपता आ जाती है तथा भूमिकी विपरीततासे बीजकी उत्पत्तिमें भी विपरीतता आ जाती है। इससे सिद्ध होता है कि प्रेरक निमित्तके बलसे कार्य कभी भी किया जा सकता है। आपने भी प्रश्न नं०५ के द्वितीय उत्तरमें कर्मानुसार कार्य होना स्वीकार किया है, जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है।

थोड़ा विचार कीजिये, कि एक व्यक्तिने शीत ऋतुके आ जाने पर गर्म ( ऊनी ) कपड़ाका कोट बनवाना आवश्यक समझकर बाजारसे कपड़ा खरीदा, परन्तु जब वह उसे दर्जीके पास ले गया तो दर्जीने समयाभावके कारण उसकी आकांक्षाके अनुसार शीघ्र कोट बनानेमें अपनी असमर्थता बतलायी, इस तरह कोटका बनना तब तक रुका रहा जब तक कि दर्जीके पास कोटके बनानेका अवकाश नहीं निकल आया। इस दृष्टान्तमें विचारना यह है कि कोट पहिननेकी आकांक्षा रखनेवाले व्यक्ति द्वारा खरीदे हुए उस कपड़ेमें, जब कि उसे दर्जीकी मर्जी पर छोड़ दिया गया है, कौनसी ऐसी उपादाननिष्ठ योग्यताका अभाव बना हुआ है कि वह कपड़ा कोटरूपसे परिणत नहीं हो पा रहा है और जिस समय वह दर्जी कोटके सीनेका व्यापार करने लगता है तो उस कपड़ेमें कौनसी उपादाननिष्ठ योग्यताका अपने आप सद्भाव हो जाता है कि वह कपड़ा कोट बनकर तैयार हो जाता है। विचार कर देखा जाय तो यह सब साम्राज्य निमित्तकारण सामग्रीका ही है, उपादान तो बेचारा अपनी योग्यता लिये तभीसे तैयार बैठा है जब वह दर्जीके पास पहुँचा था। यहाँ पर हम उस कपड़ेकी एक एक क्षणमें होनेवाली पर्यायोंकी बात नहीं कर रहे हैं, क्योंकि कोट पर्याय के निर्माणसे उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। हम तो यह कह रहे हैं कि पहले से ही एक निश्चित आकारवाले कपड़ेका वह टुकड़ा कोटके आकारको क्यों तो दर्जीके व्यापार करने पर प्राप्त हो गया और जब तक दर्जीने कोट बनाने रूप अपना व्यापार चालू नहीं किया तब तक वह क्यों जैसाका तैसा पड़ा रहा। जिस अन्वय व्यतिरेकगम्य कार्यकारणभावकी सिद्धि आगम प्रमाणसे हम पहले कर आये हैं उससे यही सिद्ध होता है कि सिर्फ निमित्तकारणभूत दर्जीकी बदौलत ही उस कपड़ेकी कोटरूप पर्याय आगेको पिछड़ गयी। कोटके निर्माण कार्यको उस कपड़ेकी सम्भाव्य क्षणवर्ती क्रमिक पर्यायोंके साथ जोड़ना कहाँतक बुद्धिगम्य हो सकता है ? यह आप ही जानें, क्योंकि एक तो प्रत्येक वस्तुमें अगुरुलघुगुणोंके आधार पर क्षणिक पर्यायोंका होना सम्भव प्रतीत होता है, दूसरे कालिक सम्बन्धसे समयादिकी अपेक्षा नवीनसे पुराने रूप परिवर्तनके रूपमें पर्यायोंका क्षणिकत्व सम्भव है। इसमें विचारनेकी बात यह है कि क्या इन पर्यायोंकी क्रमोत्पत्तिके आधार पर कपड़ेमें कोटरूप स्थूल पर्यायका निर्माण सम्भव है ? यदि नहीं, तो फिर और कौनसी ऐसी क्षणिक पर्यायोंका ताँता उस कपड़ेमें विद्यमान है जिनकी क्रमिकताके आधार पर कपड़ेकी अन्तिम पर्याय दर्जी आदि बाह्य सामग्रीके व्यापारकी अपेक्षाके बिना ही कोटका रूप धारण करनेमें समर्थ हो सकी। यह बात अनुभवगम्य है कि दर्जीके द्वारा कपड़ेकी कोट पर्यायके निर्माणके अनुरूप व्यापार करनेसे पहले उस कपड़ेमें जो भी पर्यायें क्रम या अक्रम रूपसे होती आ रही हों, उन पर्यायोंके साथ कोट पर्यायका कोई भी क्रमिक सम्बन्ध नहीं जुड़ता है, क्योंकि कोट पर्यायके निर्माणसे पहले जहाँ तक सम्भव है वहाँ तक कपड़ेका स्वामी कोटको छोड़कर यदि अन्य कोई वस्तुका निर्माण दर्जीसे करानेका निर्णय कर लेता है तो दर्जी उस कपड़ेके विषयमें अपना व्यापार कोट पर्याय के अनुरूप न करके उस वस्तुके अनुरूप करने लगता है जिसको कपड़ेका स्वामी उससे बनवाना चाहता है। इतनी बात अवश्य है कि दर्जी जब कोट पर्यायके निर्माणका कार्य प्रारम्भ करता है तो कोटके जितने अंग उसे काटने हैं और उनकी सिलाई करना है उन सब अंगोंके काटने व सीनेका कोई क्रम न होते हुए भी उनमें-से जिस अंगको जब वह काटना व सीना प्रारम्भ करता है तब उस कपड़ेकी उस अंग रूप कटाई और सिलाईमें क्रमिकता विद्यमान रहेगी ही याने उस अंगके जितने सिलसिलेवार प्रदेश हैं उन्हें क्रमसे ही काटेगा और क्रम से ही उनकी सिलाई होगी, फिर भी इसमें भी यह सम्भव है कि कटाई व सिलाईके व्यापारके विषयमें स्वतन्त्र होनेके कारण वह दर्जी कपड़ेकी कटाई व सिलाईको बीचमें अधूरी छोड़कर भी दूसरा व्यापार कर सकता है और बादमें कटाई व सिलाईके व्यापारको पुनः चालू कर सकता है। या दूसरा अन्य व्यक्ति भी उस कटाई व सिलाई रूप व्यापारको चालू कर सकता है। हमें आश्चर्य होता है कि यह सब व्यवस्था अनुभवगम्य और आपके पक्ष द्वारा जीवन व्यवहारोंमें अनिवार्य रूपसे अपनाई जाने पर भी इस वस्तु तत्त्व व्यवस्थामें आप इसकी उपेक्षा कर रहे हैं।

आगे आपने आचार्य पूज्यपादके इष्टोपदेशका ‘नाज्ञो विज्ञत्वमायाति’ इत्यादि श्लोक उपस्थित करके यह बतलानेका प्रयत्न किया है कि ‘जो कुछ होता है वह केवल उपादानकी अपनी योग्यताके बलपर ही होता है’ परन्तु इसके विषयमें हम आपको बतला देना चाहते हैं कि इससे भी आप अपने मतकी पुष्टि करने में असमर्थ ही रहेंगे। कारण कि उक्त श्लोक एक तो द्रव्यकर्मके विषयमें नहीं है। दूसरे वह हमें इतना ही बतलाता है कि जिसमें जिस कार्यके निष्पन्न होनेकी योग्यता विद्यमान नहीं है उसमें निमित्त अपने बलसे उस कार्यको उत्पन्न नहीं कर सकता है और यह बात हम भी मानते ही हैं कि मिट्टीमें जब पटरूपसे परिणत होनेकी योग्यता नहीं पायी जाती है तो जुलाहा आदि निमित्तोंका सहयोग मिल जाने पर भी मिट्टीसे पटका निर्माण असम्भव ही रहेगा। इसका तात्पर्य यह है कि उपादानमें अनुकूल स्वपरप्रत्यय परिणमनकी योग्यता न हो, लेकिन निमित्त सामग्री विद्यमान हो तो कार्य निष्पन्न नहीं होगा। इसी तरह उपादानमें अनुकूल स्वपरप्रत्यय परिणमनकी योग्यता हो लेकिन निमित्त सामग्री प्राप्त न हो तो कार्य नहीं होगा, यदि उपादानमें उक्त प्रकारकी योग्यता हो और निमित्त सामग्री विद्यमान हो, लेकिन प्रतिबन्धक बाह्य सामग्री उपस्थित हो जावे तो भी कार्य नहीं होगा। इस भौतिक विकासके युगमें व्यक्ति या राष्ट्र जितनी अभूतपूर्व एवं आश्चर्यमें डालनेवाली वैज्ञानिक खोजें कर रहे हैं ये सब हमें निमित्तोंके असीम शक्तिविस्तारकी सूचना दे रही हैं।

पूज्यपाद आचार्यके उक्त श्लोकमें जो ‘निमित्तमात्रमन्यस्तु’ पद पड़ा हुआ है उसका आशय यह नहीं है कि निमित्त उपादानकी कार्य परिणतिमें अकिंचित्कर ही बना रहता है जैसा कि आप मान रहे हैं, किन्तु उसका आशय यह है कि उपादानमें यदि कार्योत्पादनकी क्षमता विद्यमान हो तो निमित्त उसे केवल अपना सहयोग प्रदान कर सकता है। ऐसा नहीं, कि उपादानमें अविद्यमान योग्यताकी निष्पत्ति भी निमित्त द्वारा की जा सकती है। इससे यह तथ्य फलित होता है कि जिस प्रकार जैन संस्कृति वस्तुमें स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय परिणमनोंको स्वीकार करती है उसी प्रकार वह मात्र परप्रत्यय परिणमनका दृढ़ताके साथ निषेध भी करती है। अर्थात् प्रत्येक वस्तुमें स्व अर्थात् उपादान और पर अर्थात् निमित्त दोनोंके संयुक्त व्यापारसे निष्पन्न होनेवाले स्वपरप्रत्यय परिणमनोंके साथ साथ जैन संस्कृति ऐसे परिणमन भी स्वीकार करती है जो निमित्तोंकी अपेक्षाके बिना केवल उपादानके अपने बल पर ही उत्पन्न हुआ करते हैं और जिन्हें वहाँ स्वप्रत्यय नाम दिया गया है, परन्तु किसी भी वस्तुमें ऐसा एक भी परिणमन किसी क्षेत्र और किसी कालमें उत्पन्न नहीं हो सकता है जो स्व अर्थात् उपादानकी उपेक्षा करके केवल पर अर्थात् निमित्त के बलपर निष्पन्न हो सकता हो। इस तरह जैन संस्कृतिमें मात्र परप्रत्यय परिणमनको दृढ़ताके साथ अस्वीकृत कर दिया गया है।

इस प्रकार आपका यह लिखना असंगत है कि ‘निमित्त कारणोंमें पूर्वोक्त दो भेद होनेपर भी उनकी निमित्तता प्रत्येक द्रव्यके कार्यके प्रति समान है। कार्यका साक्षात् उत्पादक कार्यकालकी योग्यता ही है, निमित्त नहीं।’ क्योंकि इस तरहकी मान्यताकी संगति हमारे ऊपर लिखे कथनके अनुसार जैन संस्कृति की मान्यताके विरुद्ध बैठती है।

आगे आपने स्वामी समन्तभद्रकी ‘बाह्येतरोपाधिसमग्रतेयं’ इस कारिकाका उल्लेख करके बाह्य और आभ्यन्तर कारणोंकी अर्थात् उपादान और निमित्तकारणोंकी समग्रताको कार्योत्पत्तिमें साधक मान लिया है यह तो ठीक है, परन्तु कारिकामें पठित ‘द्रव्यगतस्वभावः’ पदका अर्थ समझनेमें आपने भूल कर दी है और उस भूलके कारण ही आप निमित्तको उपादानसे कार्योत्पत्ति होनेमें उपचरित अर्थात् कल्पनारोपित कारण मानकर केवल उपादानसे ही कार्योत्पत्ति मान बैठे हैं। इसके साथ अपना एक कल्पित सिद्धान्त भी आपने बिना आगमप्रमाणके अनुभव और तर्कके विपरीत प्रस्थापित कर लिया है कि प्रत्येक समयमें निमित्तकी प्राप्ति उपादानके अनुसार ही होती है; जिसका आशय सम्भवतः आपने यह लिया है कि उपादान स्वयं कार्योत्पत्तिके समय अपने अनुकूल निमित्तोंको एकत्रित कर लेता है। और इस संभावनाकी सत्यता इस आधारपर भी मानी जा सकती है कि आपने-

तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायश्च तादृशः ।
सहायास्तादृशाः सन्ति यादृशी भवितव्यता ॥

इस पद्यको अपने अभिप्रायके अनुसार अर्थ कर प्रश्नके उत्तरमें प्रमाणरूपसे उपस्थित किया है ।

इस पद्यकी प्रमाणता और अप्रमाणता तथा आपके द्वारा स्वीकृत इसके अर्थकी समालोचना तो हम उसी प्रश्नके प्रकरणमें ही करेंगे, यहाँ तो सिर्फ हमें इतना ही कहना है कि स्वामी समन्तभद्रकी ‘बाह्येतरोपाधिसमग्रतेयं’ इस कारिकामें पठित ‘द्रव्यगतस्वभावः’ पदका अर्थ जो आपने समझा है वह ठीक नहीं है । उसका अर्थ तो यह है कि प्रत्येक द्रव्यमें परिणमन करनेके विषयमें दो प्रकारके स्वभाव विद्यमान हैं । उनमेंसे एक स्वभाव तो यह है कि वह कितने ही परिणमनों ( षड्गुणहानिवृद्धिरूप परिणमनों ) की केवल अपने ही बलपर क्षण क्षणमें उत्पत्ति होनेकी योग्यता रखता है । और उसका दूसरा स्वभाव यह है कि कितने ही परिणमनोंकी अनुकूल निमित्तोंके सहयोगपूर्वक यथायोग्य प्रत्येक क्षणमें अथवा नाना क्षणोंके एक समूहमें उत्पत्ति होनेकी योग्यता उसमें पायी जाती है । ये दोनों वस्तुके स्वभाव ही हैं अर्थात् निमित्तकी अपेक्षाके बिना केवल उपादानके अपने ही बलपर परिणमनका होना और निमित्तोंका सहयोग लेकर उपादानके परिणमनका होना ये दोनों ही स्वभाव द्रव्यगत हैं ।

आगे आपने लिखा है कि ‘यदि प्रत्येक क्षणमें निमित्तकी प्राप्ति उपादानके अनुसार न मानी जाय तो मोक्षविधि नहीं बन सकती है ।’ इस विषयमें हमारा कहना यह है कि जीवकी मोक्षपर्याय स्वप्रत्यय पर्याय न होकर स्वपरप्रत्यय पर्याय ही है । कारण कि मुक्तिका स्वरूप आगमग्रन्थोंमें द्रव्यकर्म, नो-कर्म और भाव-कर्मोंके क्षपणके आधारपर ही निश्चित किया गया है ।

बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः । -तत्त्वा० अ० १०, सूत्र २ ।

अर्थ-संवर और निर्जरापूर्वक सम्पूर्ण कर्मोंका क्षय हो जाना ही मोक्षका स्वरूप है । इस तरह आगामी कर्मोंके आस्रवका निरोध और विद्यमान कर्मोंकी निर्जराको आत्माकी पूर्ण स्वातंत्र्यदशाके विकसित होनेमें निमित्तरूपसे जैन संस्कृतिमें स्वीकृत किया गया है । इसी प्रकार चरणानुयोगपर आधारित पंचमहाव्रतादि बाह्य अर्थात् व्यवहार चारित्र और करणानुयोगपर आधारित आत्मविशुद्धि स्वरूप अन्तरंग अर्थात् निश्चय चारित्रके समन्वयको ही मुक्तिका साधन जैन संस्कृतिमें स्वीकार किया गया है । इस तरह जब जीव चरणानुयोग और करणानुयोगके अनुसार पुरुषार्थ करता हुआ अपने भाव शुद्ध करता है तब इन शुद्ध भावोंके निमित्तसे नवीन कर्मोंका संवर तथा बंधे हुए कर्मोंकी निर्जरा होती है और इस प्रकार घातिया कर्मोंका क्षय कर केवलज्ञानको प्राप्त कर लेता है । तथा अन्तमें शेष सभी प्रकारके कर्मोंका नाश कर मुक्ति प्राप्त कर लेता है । अतः आगम सम्मत सिद्धान्तानुसार तो मोक्षकी प्राप्तिमें कोई बाधा नहीं आती । किन्तु आपके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तके अनुसार जीव पुरुषार्थ करनेके लिये स्वतन्त्र नहीं रहता है, वह तो नियतिके अधीन रहता है, अतः मोक्षकी विधि नहीं बन सकती है ।

आगे आपने लिखा है कि ‘यद्यपि प्रत्येक मनुष्य भावलिंगके प्राप्त होनेके पूर्व ही द्रव्यलिंग स्वीकार कर लेता है, पर उस द्वारा भावलिंगकी प्राप्ति द्रव्यलिंगको स्वीकार करते समय ही हो जाती हो, ऐसा नहीं है । किन्तु जब उपादानके अनुसार भावलिंग प्राप्त होता है तब उसका निमित्त द्रव्यलिंग रहता ही है । तीर्थंकरादि किसी महान् पुरुषको दोनोंकी एक साथ प्राप्ति होती हो, यह बात अलग है ।’

इसके विषयमें हमारा कहना है कि आगममें व्यवहार चारित्रको निश्चय चारित्रमें कारण स्वीकार किया गया है-

बाह्यं तपः परमदुश्चरमाचरन्स्त्वम्, आध्यात्मिकस्य तपसः परिबृंहणार्थम् ॥
-स्वयंभूस्तोत्र कुन्थजिन स्तुति पद्य ८३

अर्थ-हे भगवन् ! आपने अन्तरंग तपकी वृद्धिके लिए अत्यन्त दुर्धर वाह्य तपका आचरण किया था ।

इस विषयके अन्य अनेकों प्रमाण प्रश्न नं० ३, ४ व १३ के उत्तरोंमें देखनेको मिलेंगे ।

उपरोक्त आपके कथनमें भी प्रकारान्तरसे यह तो स्वीकार कर ही लिया गया है कि भावलिंगकी प्राप्तिके लिए द्रव्यलिंग अनिवार्य कारण है अर्थात् द्रव्यलिंग ग्रहण किये विना भावलिंगकी प्राप्ति नहीं हो सकती है । जहां इन दोनोंकी एक साथ प्राप्ति वतलाई गई है वहाँ भी वास्तवमें द्रव्यलिंग पूर्वमें ही ग्रहण किया जाता है और कुछ क्षण पश्चात् ही भावलिंग हो जानेसे, वह अन्तर ज्ञानमें नहीं आता है, इस कारण एक साथ प्राप्ति कहलाती है । यदि विल्कुल एक साथ भी प्राप्ति मानी जाती है, तव भी द्रव्यलिंग कारण है और भावलिंग कार्य है । जैसे-

युगपत् होते हू प्रकाश दीपक तैं होई । -छहढाला चौथी ढाल छन्द २

भावलिंगकी प्राप्तिके लिए जीव अपने पुरुषार्थ द्वारा अनिवार्य कारणरूपसे द्रव्यलिंगको ग्रहण करता है । भावलिंगकी प्राप्तिके समय द्रव्यलिंग स्वयमेव, बिना जीवके पुरुषार्थके, आकर उपस्थित नहीं हो जाता है । अतः यह कहना ठीक नहीं है कि ‘भावलिंग होने पर द्रव्यलिंग होता है ।’ प्रत्युत भावलिंग होनेसे पूर्व द्रव्यलिंगको तो उसकी उत्पत्तिके लिये कारणरूपसे मिलाया जाता है । द्रव्यलिंगके ग्रहण करनेपर ही भावलिंगकी उत्पत्ति हो सकती है, इसके ग्रहण किये वग़ैर उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है । जैसे धूम्र अग्निके होनेपर ही हो सकता है, अग्निके बिना नहीं हो सकता है; अपितु अग्निके होनेपर हो भी या न भी हो । किन्तु भावलिंगकी उत्पत्तिके लिए मात्र द्रव्यलिंग ही कारण नहीं है । उसके साथ अन्य कारणोंकी भी आवश्यकता है-जैसे चारित्रमोहनीय कर्मका क्षयोपशम, क्षेत्रकी अपेक्षा कर्मभूमिका आर्य खण्ड, कालकी अपेक्षा दुषमा-सुषमा या दुषमा काल तथा स्वयं जीवका पुरुषार्थ आदि । यदि अन्य यह सब या इनमेंसे कोई कारण नहीं मिलेगा तो भावलिंगकी उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि कार्यकी उत्पत्ति समस्त कारणोंके मिलनेपर ही होती है । किन्तु अन्य कारण न मिलनेपर कार्य न होनेका यह अर्थ नहीं कि जो कारण मिले हैं उनमें कारणत्व भाव (धर्म) नहीं है । यदि इनमें कारणत्व न हो तो इनके बगैर भी, अन्य कारणोंके मिल जाने मात्रसे ही कार्य हो जाना चाहिए, किन्तु ऐसा होता नहीं है । अतः इनमें स्वभावतः वास्तविकरूप कारणत्व शक्ति सिद्ध हो जाती है और इसी प्रकार अन्य कारणोंमें भी सिद्ध हो जाती है । कारणका लक्षण भी मात्र इतना ही है कि-‘जिसके बिना कार्य न हो ।’

जेण विणा जं ण होदि चेव तं तस्स कारणं । -श्री धवल १४-९०

अर्थ-जिसके बिना जो नहीं होता है वह उसका कारण है ।

यह बात दूसरी है कि कार्यके हो जाने पर, उस कार्यको देखकर यह अनुमान लगा लिया जाय कि इस कार्यके लिए जो-जो कारण आवश्यक थे वह सब मिले हैं, क्योंकि सर्व कारण मिले विना उस कार्यका होना असम्भव था । यह भी अनुमान हो जाता है कि जो कारण साथमें रहनेवाले हैं वे साथमें हैं और जो पूर्वमें हो जानेवाले हैं वे हो चुके हैं । जैसे प्रकाशको देखकर दीपकका या धूमको देखकर अग्निका अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार कार्य अपने कारणोंका मात्र ज्ञापक ही हो सकता है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि जब प्रकाश या धूम अपने उपादानके अनुसार उत्पन्न हुआ तो दीपक या अग्निको स्वयमेव ही उसके निमित्तरूपसे उपस्थित होना पड़ा। जिसको प्रकाश या धूमकी आवश्यकता होती है उसको उसके कारणभूत दीपक या अग्निको अपने पुरुषार्थ द्वारा जुटाना पड़ता है। अतः आपका उपर्युक्त सिद्धान्त प्रत्यक्षके भी विरुद्ध है।

यदि आपका उपर्युक्त सिद्धान्त माना जायगा तो कार्य-कारणभाव बिल्कुल उल्टा हो जायगा, क्योंकि जब स्वयमेव उपादानसे होनेवाले कार्यके अनुसार कारणों को उपस्थित होना पड़ा तो वह कार्य उन कारणोंकी उपस्थितिमें कारण हो गया अर्थात् कार्य कारण बन गया और कारण कार्य बन गये। इसका फलितार्थ यह हुआ कि उपरोक्त दृष्टान्तोंमें भावलिंग, प्रकाश या धूम (जो कार्य हैं) द्रव्यलिंग, दीपक या अग्निके होनेमें कारण बन गये, क्योंकि जब भावलिंग आदि अपने उपादानसे हुए तो अनिवार्यरूपसे द्रव्यलिंग आदिको होना पड़ा। यह बात आगम तथा प्रत्यक्षके विरुद्ध है।

‘उपादानके अनुसार भावलिंग प्राप्त होता है’ केवल यह मान्यता भी ठीक नहीं है। भावलिंग क्षायोपशमिक भाव है। इसकी प्राप्ति चारित्र मोहनीय कर्मके क्षयोपशमरूप निमित्तके अनुसार ही उपादानमें होती है।

तत्र···क्षयोपशमेन युक्तः क्षायोपशमिकः। -श्री पञ्चास्तिकाय गा० ५६ की टीका

अर्थ-कर्मोंके क्षयोपशम सहित जो भाव है वह क्षायोपशमिक भाव है।

इस भावको, पौद्गलिक कर्मके क्षयोपशम द्वारा जन्य होनेके कारण ही कथंचित् मूर्तीक तथा अवधिज्ञानका विषय माना है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि चारित्रमोहनीय कर्मके क्षयोपशमसे ही भावलिंग आत्मामें उत्पन्न होता है, अन्यथा नहीं। अतः आपका यह फलितार्थ निकालना कि ‘निमित्तकी प्राप्ति उपादानके अनुसार होती है’ आगम विरुद्ध है।

आपके उपरोक्त सिद्धान्तके अनुसार जब उपादान अपने अनुसार कार्य कर ही लेता है, तब निमित्तकी आवश्यकता ही क्या रह जाती है। चूंकि आगममें सर्वत्र यह प्ररूपण किया गया है कि निमित्त तथा उपादान रूप उभय कारणोंसे ही कार्य होता है और निमित्त हेतु कर्ता भी होता है, अतः शब्दोंमें तो आपने उसे ( निमित्तको ) इन्कार नहीं किया, किन्तु मात्र शब्दोंमें स्वीकार करते हुए भी, आप निमित्तभूत वस्तुमें कारणत्वभाव स्वीकार नहीं करते हैं, तथा निमित्तको अकिंचित्कर बतलाते हुए, मात्र उपादानके अनुसार ही अर्थात् एकान्ततः मात्र उपादानसे ही कार्यकी उत्पत्ति मानते हैं। आगमके शब्दोंको केवल निबाहनेके लिये यह कह दिया गया है कि निमित्तकी प्राप्ति उपादानके अनुसार हुआ करती है। ताकि यह न समझा जाय कि आगम माननीय नहीं है। इस एकान्त सिद्धान्तकी मान्यतासे यह स्पष्ट हो जाता है कि निमित्त कारण मात्र शब्दोंमें ही माना जा रहा है, वास्तवमें उसको कारणरूपसे नहीं माना जा रहा है।

हमने अपनी दूसरी प्रतिशंकामें यह स्पष्ट किया था कि प्रवचनसारकी गाथा १६९ तथा उसकी श्री अमृतचन्द्रकृत टीकामें जो ‘स्वयं’ शब्द आया है उसका अर्थ ‘अपने आप’ न होकर ‘अपने रूप’ ही है। इसके अनन्तर पुनः आपने अपने प्रत्युत्तरमें यह कहा है कि 'स्वयमेव पदका अर्थ ‘स्वयं ही’ है अपने रूप नहीं।

इस विषयमें हमारा कहना यह है कि ‘स्वयमेव’ पद कुन्दकुन्द स्वामीके ग्रन्थोंमें जहाँ भी कार्य-कारणभावके प्रकरणमें आया है वहां सर्वत्र उसका अर्थ ‘अपने रूप’ अर्थात् ‘स्वयं की वह परिणति है’ ‘या स्वयंमें ही वह परिणति होती है’ ऐसा ही करना चाहिये । ‘बिना सहकारी कारणके अपने आप वह परिणति होती है’ ऐसा अर्थ कदापि संगत नहीं हो सकता है। इसका कारण यह है कि समयसार गाथा ८० व ८१ में तथा गाथा १०५ में और इसके अतिरिक्त अन्य वहुतसे स्थानोंमें भी आचार्य कुन्दकुन्द तथा आचार्य अमृतचन्द्र द्वारा तथा इसी प्रकार समस्त आचार्य परम्पराके आगमसाहित्यमें उपादानकी स्वपरप्रत्यय-रूप प्रत्येक परिणति निमित्तसापेक्ष ही स्वीकार की गयी है और यह हम पूर्वमें स्पष्ट कर चुके हैं कि निमित्त भी उपादानकी तरह कार्योत्पत्तिमें सहकारी कारणके रूपमें वास्तविक तथा अनिवार्य ही है, कल्पित नहीं; अतः उपादानकी स्वपरप्रत्यय परिणति निमित्तकारणके सहयोगके बिना अपने आप ही हो जाया करती है-यह मान्यता आगम विरुद्ध है। इसलिये यही मानना श्रेयस्कर है कि कार्यकारणभावके प्रकरणमें जहाँ भी आगम साहित्यमें ‘स्वयमेव’ पद आया है वहां पर उसका अर्थ वही करना चाहिये जो हमने ऊपर लिखा है।

आपने लिखा है कि प्रवचनसार गाथा १६९ में ‘स्वयमेव’ पदका अर्थ ‘स्वयं ही’ है, ‘अपने रूप’ नहीं। और आगे लिखा है कि ‘इसके लिये समयसार गाथा ११६ आदि तथा १६८ संख्याक गाथाओंका अवलोकन करना प्रकृतमें उपयोगी होगा।’

इस पर हमारा कहना यह है कि किसी भी शव्दका अर्थ प्रकरणके अनुसार निश्चित किया जाता है। जैसे प्रवचनसार गाथा १६८ की श्री अमृतचन्द्र आचार्यकृत टीकामें पठित ‘स्वयमेव’ शव्दका अर्थ प्रकरणानुसार ‘अपने आप’ ही आपने ठीक माना है और हम भी वहाँ इसी अर्थको ठीक समझते हैं। कारण कि वहाँ प्रकरणके अनुसार यह दिखलाया गया है कि लोक पुद्‌गलकायोंसे स्वतः ही व्याप्त हो रहा है, उसका कारण अन्य नहीं है; लेकिन इसका मतलव यह नहीं कि आगममें जहाँ भी ‘स्वयमेव’ पदका पाठ किया गया है वहाँ सर्वत्र उक्त १६८वीं गाथाकी टीकाके ‘स्वयमेव’ पदके समान ‘अपने आप’ अर्थ करना ही उचित होगा। जैसे भोजनके समय ‘सैंन्वव’ शव्दका नमक अर्थ लोकमें लिया जाता है और युद्धादि कार्योंके अवसर पर ‘सैन्धव’ शव्दका ‘घोड़ा’ ही अर्थ लिया जाता है इसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये।

समयसार गाथा ११६ आदिमें जो ‘स्वयं’ शव्द आया है उसका भी अर्थ ‘अपने आप’ नहीं माना जा सकता है। कारण कि उन गाथाओंमें पठित ‘स्वयं’ शव्दका इतना ही प्रयोजन ग्राह्य है कि पुद्‌गल कर्मवर्गणाएँ ही कर्मरूपसे परिणत होती हैं, जीवका पुद्‌गलमें कर्मरूपसे परिणमन नहीं होता। वे गाथाएँ निम्न प्रकार हैं-

जीवे ण सयं वद्धं ण सयं परिणमदि कम्मभावेण।
जइ पुग्गलदव्वमिणं अप्परिणामी तदा होदि ॥११६॥
कम्मइयवग्गणासु य अपरिणमंतीसु कम्मभावेण।
संसारस्स अभावो पसज्जदे संखसमओ वा ॥११७॥
जीवो परिणामयदे पुग्गलदव्वाणि कम्मभावेण।
ते सयमपरिणमंते कहं तु परिणामयदि चेदा ॥११८॥
अह सयमेव हि परिणमदि कम्मभावेण पुग्गलं दव्वं।
जीवो परिणामयदे कम्मं कम्मत्तमिदि मिच्छा ॥११९॥
णियमा कम्मपरिणदं कम्मं चि य होदि पुग्गलं दव्वं ।
तह तं णाणावरणाइपरिणदं मुणसु तच्चेव ॥१२०॥ ( पंचकम् )

इन गाथाओं द्वारा आचार्य कुन्दकुन्दने पुद्गलद्रव्यके परिणामी स्वभावकी सिद्धि की है । जैसे-

अथ पुद्गलद्रव्यस्य परिणामिस्वभावत्वं साधयति सांख्यमतानुयायिशिष्यं प्रति ।
-उल्लिखित गाथाओंकी अवतरणिका

अर्थ-उक्त गाथाओंके द्वारा सांख्यमतानुयायी शिष्यके प्रति पुद्गलद्रव्यका परिणामी स्वभाव सिद्ध करते हैं ।

यहाँपर पहली बात तो यह है कि सांख्यमतानुयायी पुद्गल द्रव्यके परिणामी स्वभावको नहीं मानता है, इसलिये आचार्यको इसके सिद्ध करनेकी आवश्यकताकी अनुभूति हुई है । दूसरी बात यह है कि इस अवतरणिकामें ‘स्वयं’ शब्दका पाठ नहीं होनेसे भी यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उक्त गाथाओं द्वारा केवल वस्तुके परिणामी स्वभावकी सिद्धि करना ही आचार्यको अभीष्ट रही है, अपने आप परिणामी स्वभावकी नहीं । अब विचारना यह है कि यदि आचार्य कुन्दकुन्दको उक्त गाथाओंके द्वारा अपने आप अर्थात् अन्य ( आत्मा ) की सहायताकी अपेक्षा रहित पुद्गलद्रव्यका कर्मरूपसे परिणामी स्वभाव सिद्ध करना अभीष्ट होता तो आचार्य अमृतचन्द्र इनकी उक्त अवतरणिकामें ‘स्वयमेव’ शब्दका पाठ अवश्य करते । दूसरी बात यह है कि गाथा ११७ के उत्तरार्धमें जो संसारके अभावकी अथवा सांख्यमतकी प्रसक्तिरूप आपत्ति उपस्थित की है वह पुद्गलको परिणामी स्वभाव न माननेपर ही उपस्थित हो सकती है ‘अपने आप परिणामी स्वभाव’ के अभाव में नहीं । कारण कि परिणामी स्वभावके अभावमें तो उक्त दोनों आपत्तियोंकी प्रसक्ति सम्भव है, परन्तु ‘अपने आप परिणामी स्वभाव’ के अभावमें वे आपत्तियाँ इसलिए सम्भव नहीं मालूम देतीं कि पुद्गल द्रव्यमें ‘अपने आप परिणामी स्वभाव’ के अभावमें परसापेक्ष परिणामी स्वभावका सद्भाव सिद्ध हो जायगा । ऐसी हालतमें संसारका अभाव अथवा सांख्य समय कैसे प्रसक्त हो सकेगा ? यह बात विचारणीय है । एक बात और विचारणीय है कि यदि इन गाथाओंमें ‘स्वयं’ शब्दका अर्थ ‘अपने आप’ ग्राह्य माना जायगा तो गाथा ११७के पूर्वार्द्धमें भी ‘स्वयं’ शब्दके पाठकी आवश्यकता अनिवार्य हो जायगी, ऐसी हालतमें उसमें आचार्य कुन्दकुन्द ‘स्वयं’ शब्दके पाठ करनेकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे । इन सब कारणोंसे स्पष्ट है कि ११६ आदि गाथाओंमें आचार्य कुन्दकुन्दको ‘स्वयं’ शब्दका अर्थ ‘अपने आप’ अभीष्ट नहीं था, बल्कि ‘अपने रूप’ ही अभीष्ट था । इस निष्कर्षके साथ जो इन गाथाओंका अर्थ होना चाहिये वह निम्न प्रकार है-

अर्थ-यदि पुद्गलद्रव्य जीवमें अपने रूपसे बद्ध नहीं होता और उसकी अपने रूपसे कर्मरूप परिणति नहीं होती तो ऐसी हालतमें वह अपरिणामी ही ठहरता है । इस तरह जब कार्मणवर्गणाएँ कर्मरूपसे परिणत न हों तो एक तो संसारका अभाव हो जायगा, दूसरे शब्दोंमें परिणामी स्वभावका निषेध करनेवाले सांख्यमत की प्रसक्ति हो जायगी । यदि कहा जाय कि जीवद्रव्य पुद्गलद्रव्यको कर्मभावसे परिणत करा देगा, इसलिए न तो संसारका अभाव होगा और न सांख्यमतकी प्रसक्ति ही प्राप्त होगी, तो जीवद्रव्य कर्मरूपसे परिणत होनेकी योग्यता रखनेवाले पुद्गलद्रव्यको कर्मरूपसे परिणत करायगा अथवा ऐसे पुद्गलको कर्मरूपसे परिणत करायगा जिसमें कर्मरूपसे परिणत होनेको योग्यता विद्यमान नहीं है । यदि जीव उन पुद्गलोंको कर्मरूपसे परिणत करावेगा जिनमें कर्मरूपसे परिणत होनेकी योग्यता विद्यमान नहीं है तो जिन पुद्गलोंमें कर्मरूपसे परिणत होनेकी योग्यताका अभाव है याने जो कभी कर्मरूपसे परिणत हो ही नहीं सकते हैं उन्हें जीव द्रव्य कैसे कर्मरूप वना सकेगा, इसलिए यदि यह माना जाय कि ऐसे पुद्गलोंको जीव द्रव्य कर्मरूपसे परिणत करेगा जिनमें कर्मरूपसे परिणत होनेकी योग्यता विद्यमान है तो फिर ‘जीव अपरिणमनशील अर्थात् परिणमनकी योग्यतासे रहित पुद्गलको कर्मरूपसे परिणमन कराता है’ यह ऊपर गाथा ११८ के पूर्वार्द्धमें प्रतिज्ञात सिद्धान्त मिथ्या हो जाता है। इस तरह गाथा ११६ से संसूचित यह सिद्धान्त ही ठीक है कि जीवके साथ पुद्गलकी अपनी वद्धता होती है। ऐसा नहीं समझना चाहिये कि जीवके साथ संयोग होनेपर भी पुद्गल स्वयं अवद्ध ही वना रहता है। इसी तरह ‘जीवके साथ संयुक्त होनेपर पुद्गलमें स्वयंकी कर्मरूप परिणति हो जाया करती है।’ ऐसा नहीं समझना चाहिये कि जीवके साथ संयुक्त होकर भी पुद्गल स्वयं कर्मरूप परिणतिसे अलग ही वना रहता है। इस प्रकार यह वात निश्चित हो जाती है कि कर्मरूप परिणतिको प्राप्त पुद्गलद्रव्यकी ही कर्मरूप अवस्था है और इस तरह ज्ञानावरणादि आठ कर्मरूप जितनी भी अवस्थाएँ बनती हैं वे सब पुद्गलकी ही अवस्थाएँ हैं।

इस विवेचनसे विल्कुल स्पष्ट है कि ११६ आदि गाथाओंमें पठित ‘स्वयं’ शव्दका अर्थ ‘अपने आप’ न होकर ‘अपने रूप’ ही करना चाहिये।

हम अव आगमके एक दो और भी ऐसे प्रमाण यहाँ दे रहे हैं जिनमें ‘स्वयमेव’ या ‘स्वयं’ शब्दका ‘अपने आप’ अर्थ न होकर ‘आप ही’ अर्थ होता है। इसके लिये समयसारकी ३०६ व ३०७ गाथाओंकी आत्मख्याति टीकाको देखिये। इन गाथाओंकी टीकामें पठित ‘स्वयमेवापराधत्वात्’ तथा ‘स्वयममृतकुम्भो भवति’ इन वाक्योंमें ‘स्वयं’ शव्दका ‘आप ही’ यह अर्थ ही ग्रहण करना चाहिये। इसी प्रकार समयसार-गाथा १३ की आत्मख्याति टीकामें पठित ‘स्वयमेकस्य पुण्यपापास्रवसंवरनिर्जरावन्धमोक्षानुपपत्तेः’ इस वाक्यमें भी ‘स्वयं’ शव्दका ‘आप रूप’ अर्थ ही अभीष्ट है।

आगे आपने लिखा है कि ‘समयसार गाथा १०५ में उपचारका जो अर्थ प्रथम प्रश्नके उत्तरमें किया गया है वह अर्थ संगत है।’ इस विषयमें हमने द्वितीय प्रतिशंकामें जो आशय व्यक्त किया था, उसके ऊपर आपने गम्भीरतापूर्वक विचार नहीं किया। अब इस प्रतिशंकामें भी पूर्वमें उपचारके अर्थके विषयमें हम विस्तार पूर्वक लिख आये हैं जिसपर आप अवश्य ही गम्भीरतापूर्वक विचार करेंगे।

आपने उपचार शव्दके अपने द्वारा किये अर्थकी संगतिके लिये जो धवल पुस्तक ६ पृष्ठ ११का प्रमाण उपस्थित किया है उसके विषयमें हमारा कहना यह है कि उक्त प्रकरणमें आत्मामें विद्यमान कर्तृत्वका उपचार उससे ( आत्मासे ) अभिन्न ( एक क्षेत्रावगाही ) पुद्गलद्रव्यमें किया गया है, इसलिये ‘मुख्याभावे सति प्रयोजने निमित्ते च उपचारः प्रवर्तते’ उपचारकी यह व्याख्या यहाँपर घटित हो जाती है, परन्तु ऐसा उपचार प्रकृतमें सम्भव नहीं है। कारण कि आत्माके कर्तृत्वका उपचार यदि द्रव्यकर्ममें आप करेंगे तो इस उपचारके लिये सर्वप्रथम आपको निमित्त तथा प्रयोजनको देखना होगा, जिनका कि यहाँपर सर्वथा अभाव हैं। इस विषयका विवेचन हम इस लेखमें पहले कर ही चुके हैं।

नोट-इस विषयमें प्रश्न ५,६,११ और १७ पर भी दृष्टि डालिये।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका १

द्रव्यकर्मके उदयसे संसारी आत्माका विकारभाव और चतुर्गतिभ्रमण होता है या नहीं ?

शंका १, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग १/३)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ३२ से ४९

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प्रतिशंका ३ का समाधान

इस प्रश्नका समाधान करते हुए प्रथम उत्तरमें ही हम यह बतला आये हैं कि संसारी आत्माके विकारभाव और चतुर्गतिपरिभ्रमणमें द्रव्यकर्मका उदय निमित्तमात्र है। विकारभाव तथा चतुर्गति परिभ्रमणका मुख्यकर्ता तो स्वयं आत्मा ही है। इस तथ्यकी पुष्टिमें हमने समयसार, पंचास्तिकाय टीका, प्रवचनसार और उसकी टीकाके अनेक प्रमाण दिये हैं। किन्तु अपर पक्ष इस उत्तरको अपने प्रश्नका समाधान माननेके लिए तैयार नहीं प्रतीत होता। एक ओर तो वह द्रव्यकर्मके उदयको निमित्तरूपसे स्वीकार करता है और दूसरी ओर द्रव्य कर्मोदय और संसारी आत्माके विकारभाव तथा चतुर्गतिपरिभ्रमणमें व्यवहार नयसे बतलाये गये निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्धको अपने मूल प्रश्नका उत्तर नहीं मानता इसका हमें आश्चर्य है। हमारे प्रथम उत्तरको लक्ष्य कर अपर पक्षकी ओरसे उपस्थित की गई प्रतिशंका २ के उत्तरमें भी हमारी ओरसे अपने प्रथम उत्तरमें निहित अभिप्रायकी ही पुष्टि की गई है।

तत्काल हमारे सामने हमारे द्वितीय उत्तरके आधारसे लिखी गई प्रतिशंका ३ विचारके लिए उपस्थित है। इस द्वारा सर्वप्रथम यह शिकायत की गई है कि हमारी ओरसे अपर पक्षके मूल प्रश्नका उत्तर न तो प्रथम वक्तव्यमें ही दिया गया है और न ही दूसरे वक्तव्यमें दिया गया है। ‘संसारी जीवके विकारभाव और चतुर्गति परिभ्रमणमें कर्मोदय व्यवहारनयसे निमित्तमात्र है, मुख्य कर्ता नहीं’ इस उत्तरको अपर पक्ष अप्रासंगिक मानता है। अब देखना यह है कि वस्तुस्वरूपको स्पष्ट करनेकी दृष्टिसे जो उत्तर हमारी ओरसे दिया गया है वह अप्रासंगिक है या अपर पक्षका वह कथन अप्रासंगिक ही नहीं सिद्धान्तविरुद्ध है जिसमें उसकी ओरसे विकारका कारण बाह्य सामग्री है इसे यथार्थ कथन माना गया है।

अपर पक्षने पद्मनन्दि पंचविंशतिका २३, ७ का ‘द्वयकतो लोके विकारो भवेत्’ इस वचनको उद्धृत कर जो विकारको दोका कार्य बतलाया है सो यहाँ देखना यह है कि जो विकाररूप कार्य होता है वह किसी एक द्रव्यकी विभाव परिणति है या दो द्रव्योंकी मिलकर एक विभाव परिणति है? वह दो द्रव्योंकी मिलकर एक विभाव परिणति है यह तो कहा नहीं जा सकता, क्योंकि दो द्रव्य मिलकर एक कार्यको त्रिकालमें नहीं कर सकते। इसी बातको समयसार आत्मख्याति टीकामें स्पष्ट करते हुए बतलाया है-

नोभौ परिणमतः खलु परिणामो नोभयोः प्रजायेत।
उभयोर्न परिणतिः स्याद्यदनेकमनेकमेव सदा ॥५३॥

इसकी टीका करते हुए पं० श्री जयचन्द जी लिखते हैं-

दो द्रव्य एक होके नहीं परिणमते और दो द्रव्यका एक परिणाम भी नहीं होता तथा दो द्रव्यकी एक परिणति क्रिया भी नहीं होती, क्योंकि जो अनेक द्रव्य हैं वे अनेक ही हैं एक नहीं होते ॥५३॥

इसके भावार्थ में वे लिखते हैं-

दो वस्तु हैं वे सर्वथा भिन्न ही हैं, प्रदेश भेदरूप ही हैं, दोनों एकरूप होकर नहीं परिणमतीं, एक परिणामको भी नहीं उपजातीं और एक क्रिया भी उनकी नहीं होती ऐसा नियम है । जो दो द्रव्य एकरूप हो परिणमैं तो सब द्रव्योंका लोप हो जाय ।

यह वस्तुस्थिति है । इसके प्रकाशमें ‘द्वयकृतो लोके विकारो भवेत्’ । इस वचनका वास्तविक यही अर्थ फलित होता है कि संयोगरूप भूमिकामें एक द्रव्यके विकार परिणतिके करने पर अन्य द्रव्य विवक्षित पर्यायके द्वारा उसमें निमित्त होता है । इससे स्पष्ट विदित हो जाता है कि निश्चय व्यवहार दोनों नयवचनोंको स्वीकार कर ‘द्वयकृतो लोके विकारो भवेत्’ यह वचन लिखा गया है । स्पष्ट है कि मूल प्रश्नका उत्तर लिखते समय जो हम यह सिद्ध कर आये हैं कि ‘संसारी आत्माके विकार भाव और चतुर्गति परिभ्रमणमें द्रव्यकर्मका उदय निमित्तमात्र है । उसका मुख्य कर्ता तो स्वयं आत्मा ही है ।’ वह यथार्थ लिख आये हैं । पद्मनन्दिपंचविंशतिकाके उक्त वचनसे भी यही सिद्ध होता है ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘यदि क्रोध आदि विकारी भावोंको कर्मोदय विना मान लिया जावे तो उपयोगके समान ये भी जीवके स्वभाव हो जायेंगे और ऐसा मानने पर इन विकारी भावोंका नाश न होनेसे मोक्षके अभाव का प्रसंग आजावेगा ।’ आदि,

समाधान यह है कि क्रोध आदि विकारी भावोंको जीव स्वयं करता है, इसलिए निश्चयनयसे वे परनिरपेक्ष ही होते हैं इसमें सन्देह नहीं । कारण कि एक द्रव्यके स्वचतुष्टयमें अन्य द्रव्यके स्वचतुष्टयका अत्यन्तर अभाव है । इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर श्री जयधवला पु० ७ पृ० ११७ में कहा है-

वज्झकारणणिरवेक्खो वत्थुपरिणामो ।

प्रत्येक वस्तुका परिणाम बाह्य कारण निरपेक्ष होता है ।

किन्तु जिस-जिस समय जीव क्रोधादि भावरूपसे परिणमता है उस-उस समय क्रोधादि द्रव्यकर्मके उदयकी नियमसे कालप्रत्यासत्ति होती है, इसलिए व्यवहार नयसे क्रोधादि कषायके उदयको निमित्तकर क्रोधादि भाव हुए यह कहा जाता है । कारण दो प्रकारके हैं-बाह्य कारण और आभ्यन्तर कारण । बाह्य कारणको उपचरित कारण कहा है और आभ्यन्तर कारणको अनुपचरित कारण संज्ञा है । इन दोनोंकी समग्रतामें कार्यकी उत्पत्ति होनेका नियम है । अतएव न तो संसारका ही अभाव होता है और न ही मोक्षमें क्रोधादि भावोंकी उत्पत्तिका प्रसंग ही उपस्थित होता है ।

क्रोधादि कर्मोंको निमित्त किये विना क्रोधादि भाव होते हैं ऐसा हमारा कहना नहीं है और न ऐसा आगम ही है । हमारा कहना यह है कि क्रोधादि विकारी भावोंको स्वयं स्वतन्त्र होकर जीव उत्पन्न करता है, क्रोधादि कर्म नहीं । आगमका भी यही अभिप्राय है । यदि ऐसा न माना जायगा तो न तो क्रोधादि भावोंका कभी अभाव होकर इस जीवको मुक्तिकी ही प्राप्ति हो सकेगी और न ही दो द्रव्योंमें भिन्नता सिद्ध हो सकेगी । इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर तत्त्वानुशासनमें यह वचन उपलब्ध होता है-

अभिन्नकर्तृ-कर्मादिविषयो निश्चयो नयः ।
व्यवहारनयो भिन्नकर्तृ-कर्मादिगोचरः ॥ २९ ॥

जिस द्रव्यके उसी द्रव्यमें कर्ता और कर्म आदिको विषय करनेवाला निश्चयनय है तथा विविध द्रव्योंमें एक-दूसरेके कर्ता और कर्म आदिको विषय करनेवाला व्यवहारनय है ॥ २९ ॥

यहाँ विविध द्रव्योंमें एक-दूसरेके कर्ता आदि धर्मोंको व्यवहारनयसे स्वीकार किया गया है सो यह कथन तभी बन सकता है जब एकके धर्मको दूसरेमें आरोपित किया जाय । इसीको असद्भूत व्यवहार कहते हैं । इस तथ्यको विशदरूपसे समझनेके लिए आलापपद्धतिके ‘अन्यत्र प्रसिद्धस्य धर्मस्यान्यत्र समारोपणमसद्भूतव्यवहारः-अन्यत्र प्रसिद्ध धर्मका अन्यत्र समारोप करना असद्भूत व्यवहार है’ इत्यादि वचनपर दृष्टिपात कीजिए ।

अपर पक्षने आप्तपरीक्षा कारिका २से ‘सदकारणवन्नित्यम्’ वचनको क्यों उद्धृत किया इसका विशेष प्रयोजन हम नहीं समझ सके । क्या ऐसा एकान्त नियम है कि जो-जो जीवका स्वभाव होता है वह सर्वथा नित्य होता है । अपर पक्ष इस बातको भूल जाता है कि जैन दर्शनके अनुसार आप्तपरीक्षाका उक्त वचन द्रव्यार्थिकनयका ही वक्तव्य हो सकता है, पर्यायार्थिकनयका वक्तव्य नहीं, क्योंकि जैन-दर्शनमें कोई भी वस्तु सर्वथा नित्य नहीं स्वीकार की गई है । और स्वभाव पर्याय सर्वथा कारणके अभावमें होती हो यह भी नहीं है । वहाँ भी प्रत्येक कार्यके प्रति बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रताको जैनदर्शन स्वीकार करता है । जहाँ भी आगममें स्वभाव कार्यको परनिरपेक्ष बतलाया है वहाँ उसका आशय इतना ही है कि जिस प्रकार क्रोधादि भाव कर्मोदय आदिको निमित्तकर होते हैं उस प्रकार स्वभाव कार्य कर्मोदय आदिको निमित्तकर नहीं होते । स्पष्ट है कि आप्तपरीक्षाका उक्त वचन प्रकृतमें उपयोगी नहीं है ।

अपर पक्षने जयधवला १-५६ के वचनको उद्धृतकर जो यह प्रसिद्ध किया है कि प्रत्येक कार्य बाह्याभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें होता है सो इसका हमने कहाँ निषेध किया है । रागादि भावकी उत्पत्तिमें कर्मकी निमित्तताको जैसे अपर पक्ष स्वीकार करता है उसी प्रकार हम भी स्वीकार करते हैं । विवाद इसमें नहीं है । किन्तु विवाद इसमें है कि पर द्रव्यकी विवक्षित पर्यायको निमित्तकर दूसरे द्रव्यमें जो कार्य होता है उसका यथार्थ कर्ता कौन है ? अपर पक्षने परमात्मप्रकाश गाथा ६६ और ७८को उपस्थित कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि जीवको सुख-दुःख व नरक-निगोद आदि दुर्गति देनेवाला कर्म ही है । आत्मा तो पंगुके समान है । वह न कहीं जाता है और न आता है । तीन लोकमें इस जीवको कर्म ही ले जाता है और कर्म ही ले आता है । शायद अपर पक्ष निमित्त कर्ताका यही अर्थ करता है और इसीको वह अपने प्रश्नका समुचित उत्तर मानता है । किन्तु यह व्यवहारनयका वक्तव्य है इसे अपर पक्ष भूल जाता है । परका सम्पर्क करनेसे जीवकी कैसी गति होती है यह इन वचनों द्वारा प्रसिद्ध किया गया है । यहाँ यह स्मरण रखने योग्य बात है कि परका सम्पर्क करना और न करना इसमें जीवकी स्वतन्त्रता है । इसमें उसकी स्वतन्त्रता है कि जैसे कोई पुरुष या स्त्री अपने ऊपर किरासिन तेल डालकर और अग्नि लगाकर जल मरे । जो ऐसा करता है वह नियमसे मरकर दुर्गतिका पात्र होता है और जो ऐसा नहीं करता वह मरकर दुर्गतिका पात्र नहीं होता । ऐसा ही इनमें निमित्तनैमित्तक योग है । इसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए । परमात्मप्रकाशके कर्ता इस संसारी जीवको परके सम्पर्क करनेका क्या फल है यह दिखलाकर उससे विरत करना चाहते हैं । यह तो है कि यह जीव परका सम्पर्क करके नरक-निगोदका पात्र होता है और अपना पुरुषार्थ भूलकर पंगुके समान बना रहता है । पर इसका अर्थ यह नहीं कि यह जीव परका सम्पर्क तो करे नहीं, फिर भी पर द्रव्य इसे सुखी-दुखी या नरक-निगोद आदिका पात्र बना देवे । परका सम्पर्क करनेसे जीवका सुखी-दुखी होना और बात है और परसे यह जीव सुखी-दुखी होता है, ऐसा मानना और बात है । परमात्मप्रकाशके कर्ताने इनमेंसे प्रथम वचनको ध्यानमें रखकर ही ‘अप्पा पंगुह’ तथा ‘कम्मइँ दिढघणचिक्कणइँ’ इत्यादि वचन कहे हैं। यद्यपि संसारी जीव परका सम्पर्क करनेके फलस्वरूप स्वयं सुखी-दुखी तथा नरक-निगोद आदि गतियोंका पात्र होता है। पर यह कार्य जिनके सम्पर्कमें होता है उनकी निमित्तता दिखलानेके लिए ही यह कहा गया है कि आत्मा पंगुके समान है। वह न आता है और न जाता है। विधि ही तीन लोकमें इस जीवको ले जाता है और ले आता है। इत्यादि।

यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि परमात्मप्रकाश दोहा ६६ में आया हुआ विधि शब्द जहाँ द्रव्य-कर्मका सूचक है वहाँ वह परमात्माकी प्राप्तिके प्रतिपक्षभूत भावकर्मको भी सूचित करता है। जब इस जीवकी द्रव्य -पर्यायस्वरूप जिस प्रकारकी योग्यता होती है तब उसकी उसके अनुसार ही परिणति होती है और उसमें निमित्त होने योग्य बाह्य सामग्री भी उसीके अनुरूप मिलती है ऐसा ही त्रिकालाबाधित नियम है, इसमें कहीं अपवाद नहीं, तथा यदि परको लक्ष्यकर परिणमन होता है तो नियमसे विभाव परिणतिकी उत्पत्ति होती है और स्वभावको लक्ष्यकर परिणमन होता है तो नियमसे स्वभाव पर्यायकी उत्पत्ति होती है। जीवके संसारी बने रहने और मुक्ति प्राप्त करनेकी यह चाबी है। इसमें भी कहीं कोई अपवाद नहीं। यहाँ परके सम्पर्क करनेका अभिप्राय ही परको लक्ष्यकर परिणमन करना लिया है। पर वस्तु विभाव परिणतिमें तभी निमित्त होती है जब यह जीव उसको लक्ष्यकर परिणमन करता है, अन्यथा संसारी जीव कभी भी मुक्ति प्राप्त करनेका अधिकारी नहीं हो सकता। अतएव प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि जब विवक्षित द्रव्य अपना कार्य करता है तब बाह्य सामग्री उसमें यथायोग्य निमित्त होती है। परमात्मप्रकाशके उक्त कथनका यही अभिप्राय है। समयसार गाथा २७८ व २७९ से भी यही सिद्ध होता है। उक्त गाथाओंमें यद्यपि यह कहा गया है कि जिस प्रकार स्फटिक मणि आप शुद्ध है, वह लालिमा आदि रूप स्वयं नहीं परिणमता है। किन्तु वह अन्य रक्त आदि द्रव्यों द्वारा लालिमारूप परिणमाया जाता है उसी प्रकार ज्ञानी आप शुद्ध है, वह राग आदि रूप स्वयं नहीं परिणमता है। किन्तु वह रागादिरूप दोषों द्वारा रागी किया जाता है। परन्तु इस कथनका ठीक आशय क्या है इसका स्पष्टीकरण आचार्य अमृतचन्द्रने ‘न जातु रागादि’ इत्यादि कलश द्वारा किया है। इसमें पर पदार्थको निमित्त न बतलाकर परके संगमें निमित्तता सूचित की गई है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि आगममें जहाँ-जहाँ इस प्रकारका कथन आता है कि जीवको कर्म सुख-दुख देते हैं, कर्म बड़े बलवान् हैं, वे ही इसे नरकादि दुर्गतियोंमें और देवादि सुगतियोंमें ले जाते हैं वहाँ-वहाँ उक्त कथनका यही अर्थ करना चाहिए कि जब तक यह जीव कर्मोदयकी संगति करता रहता है तब तक इसे संसार परिभ्रमणका पात्र होना पड़ता है। कर्मोदय जीवके सुख-दुःखादिमें निमित्त है इसका आशय इतना ही है। परमात्मप्रकाशमें इसी आशयको इन शब्दोंमें व्यक्त किया गया है कि यह जीव पंगुके समान है। वह न कहीं जाता है और न आता है, कर्म ही इसे तीन लोकमें ले जाता है और ले आता है आदि।

आगममें दोनों प्रकारका कथन उपलब्ध होता है। कहीं उपादानकी मुख्यतासे कथन किया गया है और कहीं निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीकी मुख्यतासे कथन किया गया है। जहाँ उपादानकी मुख्यतासे कथन किया गया है वहाँ उसे निश्चय ( यथार्थ ) कथन जानना चाहिए और जहाँ निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीकी मुख्यतासे कथन किया गया है वहाँ उसे असद्भूतव्यवहार ( उपचरित) कथन जानना चाहिए।

श्री समयसार गाथा ३२ की टीकामें निमित्त व्यवहारके योग्य मोहोदयको भावक और आत्माको भाव्य कहा गया है सो उसका आशय इतना ही है कि जब तक यह जीव मोहोदयके सम्पर्कमें एकत्वबुद्धि करता रहता है तभी तक मोहोदयमें भावक व्यवहार होता है और आत्मा भाव्य कहा जाता है। यदि ऐसा न माना जाय तो सतत मोहोदयके विद्यमान रहनेके कारण यह आत्मा भेदविज्ञानके बलसे कभी भी भाव्य-भावक संकर दोषका परिहार नहीं कर सकता। इस प्रकार उक्त कथन द्वारा आत्माकी स्वतन्त्रताको अक्षुण्ण बनाये रखा गया है। आत्मा स्वयं स्वतन्त्रपने मोहोदयसे अनुरंजित हो तो ही मोहोदय रंजक है, अन्यथा नहीं यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

समयसार गाथा १९८ में भी इसी तथ्यको सूचित किया गया है। जितने अंशमें जीव पुरुषार्थ हीन होकर कर्मोदयरूप विपाकसे युक्त होता है उतने अंशमें जीवमें विभाव भाव होते हैं। अतः ये परके सम्पर्कमें हुए हैं इसलिए इन्हें परभाव भी कहते हैं और ये आत्माके विभावरूप भाव होनेसे स्वभावरूप भावोंसे बहिर्भूत हैं, इसलिए हेय हैं। यदि इनमें इस जीवकी हेय बुद्धि हो जाय तो परके सम्पर्कमें भी हेय बुद्धि हो जाय यह तथ्य इस गाथा द्वारा सूचित किया गया है। स्पष्ट है कि यहाँ भी आत्माकी स्वतन्त्रताको अक्षुण्ण बनाये रखा गया है। कर्मोदय बलपूर्वक इसे विभावरूप परिणमाता है यह इसका आशय नहीं है। किन्तु जब वह जीव स्वयं स्वतन्त्रतापूर्वक कर्मोदयसे युक्त होता है तब नियमसे विभावरूप परिणमता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। समयसार गाथा १९९ का भी यही आशय है। समयसार गाथा २८१ में उक्त कथनसे भिन्न कोई दूसरी बात कही गई हो ऐसा नहीं समझना चाहिए। जिसको निमित्त कर जो भाव होता है वह उससे जायमान हुआ है ऐसा कहना आगम परिपाटी है जो मात्र किस कार्यमें कौन निमित्त है इसे सूचित करनेके अभिप्रायसे ही आगममें निर्दिष्ट की गई है। विशेष खुलासा हम पूर्वमें ही कर आये हैं। उपादानमें होनेवाले व्यापारको पृथक् सत्ताक बाह्य सामग्री त्रिकालमें नहीं कर सकती इस तथ्यको तो अपर पक्ष भी स्वीकार करेगा। अतएव आत्मामें उत्पन्न होनेवाले राग, द्वेष और मोह कर्मोदयसे उत्पन्न होते हैं ऐसा कहना व्यवहार कथन ही तो ठहरेगा। इसे परमार्थभूत ( यथार्थ ) कथन तो किसी भी अवस्थामें नहीं माना जा सकता। समयसारकी उक्त गाथाओंमें इसी सरणिको लक्ष्यमें रखकर उक्त कथन किया गया है। तथा यही आशय उनकी टीका द्वारा भी व्यक्त किया गया है। यदि अपर पक्ष निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीमें यथार्थ कर्तृत्वकी बुद्धिका त्याग कर दे तो पूरे जिनागमकी संगति बैठ जाय। विज्ञेषु किमधिकम्।

पञ्चास्तिकाय गाथा १३१ की टीकापर हमने दृष्टिपात किया है। इसमें मोह तथा पुण्य-पापके योग्य शुभाशुभ भावोंका निर्देश किया गया है और साथ ही वे किसको निमित्त कर होते हैं यह भी बतलाया गया है। पञ्चास्तिकाय गाथा १४८ का भी यही आशय है इस तथ्यको स्वयं आचार्य अमृतचन्द्र ‘बहिरङ्गान्तरङ्गबन्धकारणाख्यानमेतत्-यह बन्धके बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग कारणका कथन है’ इन शब्दों द्वारा स्वीकार करते हैं। गाथा १५०-१५१ में तो द्रव्यकर्ममोक्षके हेतुभूत परम संवररूपसे भावमोक्षके स्वरूपका विधान है। गाथा १५६ की टीकाका ‘मोहनीयोदयानुवृत्तिवशात्’ पद ध्यान देने योग्य है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि जब यह जीव मोहनीयके उदयका अनुवर्तन करता है तभी यह उससे रञ्जित उपयोगवाला होता है और तभी यह पर द्रव्यमें शुभ या अशुभ भावको धारण करता है।

इस प्रकार समयसार और पञ्चास्तिकायके उक्त उल्लेखोंसे उसी तथ्यकी पुष्टि होती है जिसका हम पूर्वमें निर्देश कर आये हैं। बाह्य सामग्री दूसरेको बलात् अन्यथा परिणमाती है यह उक्त वचनोंका आशय नहीं है, जैसा कि अपर पक्ष उन वचनों द्वारा फलित करना चाहता है।

परमात्मप्रकाशके उल्लेखोंका आशय क्या है इसकी चर्चा हम पूर्वमें ही विस्तारके साथ कर आये हैं। मूलाराधना गा० १६२१ तथा स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा २११ का भी आशय पूर्वोक्त कथनसे भिन्न नहीं है। मूलाराधनामें ‘कम्माइं वलियाइं’ यह गाथा उस प्रसंगमें आई है जब निर्यापकाचार्य क्षपकको अपनी समाधिमें दृढ़ करनेके अभिप्रायसे कर्मकी बलवत्ता बतला रहे हैं और साथ ही उसमें अनुरञ्जायमान न होकर समताभाव धारण करनेकी प्रेरणा दे रहे हैं। यह तो है कि जिस समय जिस कर्मका उदय-उदीरणा होती है उस समय आत्मा स्वयं उसके अनुरूप परिणामका कर्ता बनता है, क्योंकि अपने उपादानके साथ उस परिणामकी जिस प्रकार अन्तर्व्याप्ति है उसी प्रकार उस कर्मके उदयके साथ उसकी बाह्य व्याप्ति है। फिर भी आचार्यने यहाँपर कर्मोदयकी बलवत्ता बतलाकर उसमें अनुरंजायमान न होनेकी प्रेरणा इसलिए दी है कि जिससे यह आत्मा अपनी स्वतन्त्रताके भावपूर्वक कर्मोदयको निमित्तकर होनेवाले भावोंमें अपनेको आबद्ध न किये रहे।

स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा २११ द्वारा पुद्गल द्रव्यकी जिस शक्तिका निर्देश किया है उसका आशय इतना ही है कि जब यह जीव केवलज्ञानके अभावरूपसे परिणमता है तब केवलज्ञानावरण द्रव्यकर्मका उदय उसमें निमित्त होता है। यदि ऐसा न माना जाय और पुद्गल द्रव्यकी सर्वकाल यह शक्ति मानी जाय कि वह केवलज्ञान स्वभावका सर्वदा विनाश करनेकी सामर्थ्य रखता है तो कोई भी जीव केवलज्ञानी नहीं हो सकता। स्पष्ट है कि उक्त वचन द्वारा आचार्यने पुद्गल द्रव्यकी केवलज्ञानावरणरूप उस पर्यायकी उदयशक्तिका निर्देश किया है जिसको निमित्तकर जीव केवलज्ञान स्वभावरूपसे स्वयं नहीं परिणमता। ऐसा ही इनमें निमित्त-नैमित्तिक योग है कि जब यह जीव केवलज्ञानरूपसे नहीं परिणमता तब उसमें केवलज्ञानावरणका उदय सहज निमित्त होता है। इसीको व्यवहारनयसे यों कहा जाता है कि केवलज्ञानावरणके उदयके कारण इस जीवके केवलज्ञानका घात होता है। स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाका यह उपकार प्रकरण है। उसी प्रसंगसे उक्त गाथा आई है, अतएव प्रकरणको ध्यानमें रखकर उसके हार्दको ग्रहण करना चाहिए।

शंका५ के द्वितीय उत्तरमें स्वा० का० अ० गाथा ३१९ के आधारसे जो हमने यह लिखा है कि शुभाशुभ कर्म जीवका उपकार या अपकार करते हैं सो यह कथन शुभाशुभ कर्मके उदयके साथ जीवके उपकार या अपकारकी बाह्य व्याप्तिको ध्यानमें रखकर ही किया गया है। इस जीवको कोई लक्ष्मी देता है या कोई उपकार करता है यह प्रश्न है। इसी प्रश्नका समाधान गाथा ३१९ में करते हुए बतलाया है कि लोकमें इस जीवको न तो कोई लक्ष्मी देता है और न अन्य कोई उपकार ही करता है। किन्तु उपकार या अपकार जो भी कुछ होता है वह सब शुभाशुभ कर्मको निमित्त कर होता है।

यह आचार्य वचन है। इस द्वारा दो बातें स्पष्ट की गईं हैं। पूर्वार्ध द्वारा तो जो मनुष्य यह मानते हैं कि ‘अमुक देवी-देवता आदिसे मुझे लक्ष्मी प्राप्त होगी या मेरी अमुक आपत्ति टल जायेगी’ उसका निषेध यह कह कर किया गया है कि लोकमें जो कुछ भी होता है वह शुभाशुभ कर्मके उदयको निमित्त कर ही होता है। तूं बाह्य सामग्रीके मिलानेकी चिन्तामें आत्मवंचना क्यों करता है? अनुकूल बाह्य सामग्री हो और अशुभ कर्मका उदय हो तो बाह्य सामग्रीसे क्या लाभ? उसका होना और न होना बराबर है। तथा उत्तरार्ध द्वारा यह सूचित किया गया है कि शुभाशुभ कर्म तेरी करणीका फल है, इसलिए जैसी तूं करणी करेगा उसीके अनुरूप कर्मबन्ध होगा और उत्तर कालमें उसका फल भी उसीके अनुरूप मिलेगा। अतएव तूं अपनी करणीकी ओर ध्यान दे। शुभाशुभ कर्म तो उपकार-अपकारमें निमित्तमात्र हैं, वस्तुतः उनका कर्ता तो तूं स्वयं है। यह नय वचन है; इसे समझकर यथार्थको ग्रहण करना प्रत्येक सत्पुरुषका कर्तव्य है। अन्यथा शुभाशुभ कर्मका सद्भाव सदा रहनेसे कभी भी यह जीव उससे मुक्त न हो सकेगा।

जिसे उपकार कहते हैं वह भी मान्यताका फल है और जिसे अपकार कहते हैं वह भी मान्यताका फल है। यह संयोगी अवस्था है। अतएव जिसके संयोगमें इसके होनेका नियम है उनका ज्ञान इस वचन द्वारा कराया गया है। इतना ही आशय इस गाथाका लेना चाहिए। हमने शंका ५ के अपने दूसरे उत्तरमें जो कुछ भी लिखा है, इसी आशयको ध्यानमें रखकर लिखा है। अतएव इस परसे अन्य आशय फलित करना उचित नहीं है।

प्रश्न १६ के प्रथम उत्तरमें हमने मोह, राग, द्वेष आदि जिन आगन्तुक भावोंका निर्देश किया है उसका आशय यह नहीं कि वे जीवके स्वयंकृत भाव नहीं हैं। जीव ही स्वयं बाह्य सामग्रीमें इष्टानिष्ट या एकत्व बुद्धि कर उन भावोंरूप परिणमता है, इसलिए वे जीवके ही परिणाम हैं। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर आचार्य कुन्दकुन्दने प्रवचनसारमें यह वचन कहा है-

जीवो परिणमदि जदा सुहेण असुहेण वा सुहो असुहो।
सुद्धेण तदा सुद्धो हवदि हि परिणामसब्भावो ॥ ९ ॥

ऐसा इस जीवका परिणामस्वभाव है कि जब यह शुभ या अशुभरूपसे परिणमता है तब शुभ या अशुभ होता है और जब शुद्धरूपसे परिणमता है तब शुद्ध होता है ॥ ९ ॥

फिर भी मोह, राग, द्वेष आदि भावोंको आगममें जो आगन्तुक कहा गया है उसका कारण इतना ही है कि वे भाव स्वभावके लक्ष्यसे न होकर परके लक्ष्यसे होते हैं। हैं वे जीवके ही भाव और जीव ही स्वयं स्वतंत्र कर्ता होकर उन्हें उत्पन्न करता है ,पर वे परके लक्ष्यसे उत्पन्न होते हैं ,इसलिए उन्हें आगन्तुक कहा गया है यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

इस प्रकार अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें यहाँ तक जितने भी आगम प्रमाण दिये हैं उनसे यह तो त्रिकालमें सिद्ध नहीं होता कि अन्य द्रव्य तद्भिन्न अन्य द्रव्यके कार्यका वास्तविक कर्ता होता है। किन्तु उनसे यही सिद्ध होता है कि प्रत्येक द्रव्य स्वयं उपादान होकर अपना कार्य करता है और उसके योग्य बाह्य सामग्री उसमें निमित्त होती है। समयसार गाथा २७८-२७९ का क्या आशय है इसका विशेष खुलासा हम पूर्वमें ही कर आये हैं। एक जीव ही क्या प्रत्येक द्रव्य स्वयं परिणमन स्वभाववाला है, अतएव जिस भावरूप वह परिणमता है उसका कर्ता वह स्वयं होता है। परिणमन करनेवाला, परिणाम और परिणमन क्रिया ये तीनों वस्तुपनेकी अपेक्षा एक हैं, भिन्न-भिन्न नहीं, इस लिये जब जो परिणाम उत्पन्न होता है उसरूप वह स्वयं परिणम जाता है, इसमें अन्यका कुछ भी हस्तक्षेप नहीं। राग, द्वेष आदि भाव कर्मोदयके द्वारा किये जाते हैं यह व्यवहार कथन है। कर्मका उदय कर्ममें होता है और जीवका परिणाम जीवमें होता है ऐसी दो क्रियाएँ और दो परिणाम दोनों द्रव्योंमें एक कालमें होते हैं, इसलिए कर्मोदयमें निमित्त व्यवहार किया जाता है और इसी निमित्त व्यवहारको लक्ष्यमें रखकर यह कहा जाता है कि इसने इसे किया। यह उसी प्रकारका उपचार वचन है जैसे मिट्टीके घड़ेको घीका घड़ा कहना उपचार वचन है। तभी तो आचार्य कुन्दकुन्दने समयसार गाथा १०७ में ऐसे कथनको व्यवहारनयका वक्तव्य कहा है।

\१. अध्यात्ममें रागादिको पौद्गलिक बतलानेका कारण

समयसार ५० से ५६ तक की गाथाओंमें रागादिकको जो पौद्गलिक बतलाया है उसका आशय यह नहीं कि उनका वास्तविक कर्ता पुद्गल है ,जीव नहीं ;या वे जीवके भाव न होकर पुद्गलकी पर्याय हैं। हैं तो वे जीवके ही भाव और स्वयं जीव ही उन्हें उत्पन्न करता है। उनकी उत्पत्तिमें पुद्गल अणुमात्र भी व्यापार नहीं करता, क्योंकि एक द्रव्यकी परिणाम क्रियाको दूसरा द्रव्य त्रिकालमें नहीं कर सकता, अन्यथा तन्मयपनेका प्रसंग होनेसे दोनों द्रव्योंमें एकता प्राप्त होती है ( समयसार गाथा ९९ ) ,या दो क्रियाओंका कर्ता एक द्रव्यको स्वीकार करना पड़ता है ( समयसार गाथा ८५ )। किन्तु ऐसा मानना जिनाज्ञाके विरुद्ध है। जिनाज्ञा यह है-

जो जम्हि गुणे दव्वे सो अण्णम्हि दु ण संकमदि दव्वे ।
सो अण्णमसंकंतो कह तं परिणामए दव्वं ॥१०३॥

जो वस्तु जिस द्रव्य और गुणमें वर्तती है वह अन्य द्रव्य और गुणमें संक्रमणको नहीं प्राप्त होती, अन्यरूपसे संक्रमणको नहीं प्राप्त होती हुई वह अन्य वस्तुको कैसे परिणमा सकती है, अर्थात् नहीं परिणमा सकती ॥१०३॥

ऐसी अवस्थामें जीवमें होनेवाले मोह, राग और द्वेष आदि भाव अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करनेपर जीव ही हैं। यह कथन यथार्थ है, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर उक्त गाथाओंकी ( ५०-५६ ) टीकामें आचार्य जयसेनने अशुद्ध पर्यायार्थिक निश्चयनयकी अपेक्षा उन्हें जीव स्वरूप ही स्वीकार किया है। इतना ही नहीं, कर्ता-कर्म अधिकार गाथा ८८ में स्वयं आचार्य कुन्दकुन्द उन्हें जीव भावरूपसे स्वीकार करते हैं। इसी तथ्यको आचार्य अमृतचन्द्रने उक्त गाथाकी टीकामें इन शब्दोंमें स्वीकार किया है-

यस्तु मिथ्यादर्शनमज्ञानमविरतिरित्यादि जीवः स मूर्तात्पुद्गलकर्मणोऽन्यश्चैतन्यपरिणामस्य विकारः ॥८८॥

और जो मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति आदि जीव हैं वे मूर्तीक पुद्गलकर्मसे अन्य चैतन्य परिणामके विकार हैं ॥ ८८ ॥

इस प्रकार उक्त विवेचनसे यह भली-भाँति सिद्ध हो जाता है कि मोह, राग, द्वेष आदि भाव जीवके ही हैं। ‘स्वतन्त्रः कर्ता’ इस नियमके अनुसार स्वयं जीव ही आप कर्ता होकर उनरूप परिणमता है। फिर भी समयसारमें उन्हें पौद्लिक इसलिए नहीं कहा कि वे रूप, रस, गन्ध और स्पर्शस्वरूप हैं या पुद्गल आप कर्ता बनकर उनरूप परिणमता है। उन्हें पौद्गलिक कहनेका कारण अन्य है। बात यह है कि परम पारिणामिक भावको ग्रहण करनेवाले शुद्ध निश्चयनयके विषयभूत चिच्चमत्कार ज्ञायकस्वरूप आत्माके लक्ष्यसे उत्पन्न हुई आत्मानुभूतिमें उनका भान नहीं होता, इसलिए वे रागादि भाव जीवके नहीं ऐसा समयसार ५० से ५६ तककी गाथाओंमें कहा गया है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए उक्त गाथाओंकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

यः प्रीतिरूपो रागः स सर्वोऽपि नास्ति जीवस्य, पुद्गलद्रव्यपरिणाममयत्वे सत्यनुभूतेर्भिन्नत्वात् । योऽप्रीतिरूपो द्वेषः स सर्वोऽपि नास्ति जीवस्य, पुद्गलद्रव्यपरिणाममयत्वे सत्यनुभूतेर्भिन्नत्वात् । यस्त-त्वाप्रतिपत्तिरूपो मोहः स सर्वोऽपि नास्ति जीवस्य, पुद्गलद्रव्यपरिणाममयत्वे सत्यनुभूतेर्भिन्नत्वात् ।

जो प्रीतिरूप राग है वह सर्व ही जीवका नहीं है, क्योंकि पुद्गल द्रव्यके परिणामरूप होनेसे वह आत्मानुभूतिसे भिन्न है। जो अप्रीतिरूप द्वेष है वह सर्व ही जीवका नहीं है, क्योंकि पुद्गलद्रव्यके परिणामरूप होनेसे वह आत्मानुभूतिसे भिन्न है । जो तत्त्वोंकी अप्रतिपत्तिरूप मोह है वह सर्व ही जीवका नहीं है, क्योंकि पुद्गलद्रव्यके परिणामरूप होनेसे वह आत्मानुभूतिसे भिन्न है।

आगममें द्रव्यार्थिकनयके जितने भेद निर्दिष्ट किये गये हैं उनमें एक परमभावग्राहक द्रव्यार्थिकनय भी है। इसके विषयका निर्देश करते हुए आलापपद्धतिमें लिखा है-

परमभावग्राहकद्रव्यार्थिको यथा-ज्ञानस्वरूप आत्मा।

आत्मा ज्ञानस्वरूप है इसे स्वीकार करनेवाला परमभावग्राहक द्रव्यार्थिकनय है।

इसी तथ्यको नयचक्रादिसंग्रहमें इन शब्दोंमें व्यक्त किया है-

गेह्णइ दव्वसहावं असुद्ध-सुद्धोवयारपरिचत्तं।
सो परमभावगाही णायव्वो सिद्धिकामेण ॥१९९॥

जो अशुद्ध, शुद्ध और उपचरित भावोंसे रहित द्रव्यस्वभावको ग्रहण करता है उसे सिद्धि (मुक्ति) के इच्छुक भव्य जीवोंने परमभावग्राही द्रव्यार्थिकनय जानना चाहिए ॥१९९॥

तात्पर्य यह है कि मोक्षमार्गमें अशुद्ध, शुद्ध और उपचरित भावोंको गौणकर एक त्रिकाली ज्ञायक स्वभाव आत्मा ही आश्रय करने योग्य बतलाया गया है। जो आसन्न भव्य जीव ऐसे अभेद स्वरूप आत्माको लक्ष्य कर (ध्येय बनाकर) तन्मय होकर परिणमता है उसे जो आत्मानुभूति होती है उसे उस कालमें रागानुभूति त्रिकालमें नहीं होती। यही कारण है कि समयसारकी उक्त गाथाओं द्वारा ये रागादि भाव जीवके नहीं हैं यह कहा गया है।

इस प्रकार ये रागादि भाव जीवके नहीं है इस तथ्यका सकारण ज्ञान हो जाने पर भी इन्हें पौद्गलिक कहनेका कारण क्या है यह जान लेना आवश्यक है। यह तो सभी मुमुक्षु जानते हैं कि जिसे जिनागममें मिथ्यादर्शन या मोह कहा गया है उसका फल स्व-परमें एकत्वबुद्धिके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है और जिसे राग-द्वेष कहा गया है उसका फल भी परमें इष्टानिष्ट बुद्धिके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है। यतः परके संयोगमें एकत्व बुद्धि तथा इष्टानिष्ट बुद्धि इस जीवके अनादि कालसे होती आ रही है। इसका कर्ता यह जीव स्वयं है। पर पदार्थ इसका कर्ता नहीं। परका संयोग बना रहे फिर भी यह जीव उसके आश्रयसे एकत्व बुद्धि या इष्टानिष्ट बुद्धि न करे यह तो है। किन्तु पर पदार्थ स्वयं कर्ता बनकर इस (जीव) में एकत्वबुद्धि या इष्टानिष्ट बुद्धि उत्पन्न कर दे यह त्रिकालमें सम्भव नहीं है। यतः उक्त प्रकारकी एकत्वबुद्धि या इष्टानिष्ट बुद्धि पुद्गलकी विविध प्रकारकी रचनाका आलम्बन करनेसे होती है, अन्यथा नहीं होती, यही कारण है कि अध्यात्ममें मोह, राग और द्वेष आदि भावोंको पौद्गलिक कहा गया है।

यह वस्तुस्थिति है। मोक्षमार्गमें आलम्बन या ध्येयकी दृष्टिसे मोह, राग और द्वेषमें निजत्व बुद्धि करनेका तो निषेध है ही। ज्ञेयके करण मैं जानता हूँ इस प्रकारके विकल्पका भी निषेध है। इतना ही क्यों? सम्यग्दर्शनादि स्वभाव भाव मेरा स्वरूप है, इन्हें आलम्बन बनानेसे मुझमें मोक्षमार्गका प्रकाश होकर मुक्तिकी प्राप्ति होगी ऐसे विकल्पका भी निषेध है, क्योंकि जहाँतक विकल्प-बुद्धि है वहाँतक रागकी चरितार्थता है। ज्ञायक स्वभाव आत्माके अवलम्बनसे तन्मय परिणमन द्वारा जो सम्यग्दर्शनादिरूप शुद्धि उत्पन्न होती है, तन्मय आत्माकी अनुभूति अन्य वस्तु है और भेद-बुद्धि द्वारा उत्पन्न हुई विकल्पानुभूति अन्य वस्तु है। यह रागानुभूति ही है, आत्मानुभूति नहीं। आचार्य कहते हैं कि जबतक अवलम्बन (ध्येय) निर्विकल्प नहीं होगा तबतक निर्विकल्प अनुभूतिका होना असम्भव है। यही कारण है कि मोक्षमार्गकी दृष्टिसे सभी प्रकारके व्यवहारको गौणकर एकमात्र निश्चयस्वरूप ज्ञायक आत्माके अवलम्बन करनेका उपदेश दिया गया है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए समयसार कलशमें कहा भी है-

सर्वत्राध्यवसानमेवमखिलं त्याज्यं यदुक्तं जिनै-
स्तन्मन्ये व्यवहार एक निखिलोऽप्यन्याश्रितस्त्याजितः ।
सम्यक् निश्चयमेकमेव तदमी निष्कम्पमाक्रम्य किं
शुद्धज्ञानघने महिम्नि न निजे बध्नन्ति सन्तो धृतिम् ॥१७३॥

सर्व वस्तुओंमें जो अध्यवसान होते हैं वे सब जिनेन्द्रदेवने पूर्वोक्त रीतिसे त्यागने योग्य कहे हैं, इसलिए हम यह मानते हैं कि जिनेन्द्रदेवने अन्यके आश्रयसे होनेवाला समस्त व्यवहार छुड़ाया है। तब फिर, ये सत्पुरुष एक सम्यक् निश्चयको ही निश्चलतया अङ्गीकार करके शुद्ध ज्ञानघनस्वरूप निज महिमामें स्थिरता क्यों धारण नहीं करते ?

इस प्रकार इतने विवेचनसे यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि आत्मामें रागादिकी उत्पत्ति मुख्यतया पुद्गलका आलम्बन करनेसे ही होती है, स्वभावका आलम्बन करनेसे नहीं होती, इसलिए तो उन्हें अध्यात्ममें पौद्गलिक कहा गया है। पुद्गल आप कर्ता होकर उन्हें उत्पन्न करता है या वे पुद्गलकी पर्याय हैं, इसलिए उन्हें पौद्गलिक नहीं कहा गया है। इस अपेक्षासे विचार करनेपर तो जीव आप अपराधी होकर उन्हें उत्पन्न करता है और आप तन्मय होकर मोह, राग, द्वेष आदिरूप परिणमता है, इसलिए वे चिद्विकार ही हैं। फिर भी ज्ञायक स्वभाव आत्माके अवलम्बन द्वारा उत्पन्न हुई आत्मानुभूतिमें उनका प्रकाश नहीं होता, इसलिए उससे भिन्न होनेके कारण व्यवहारनयसे उन्हें जीवका कहा गया है। इस प्रकार समयसारकी उक्त गाथाओंमें वर्णादिके समान रागादिको क्यों तो पौद्गलिक कहा गया है और क्यों वे व्यवहारनयसे जीवके कहे गये हैं इसका संक्षेपमें विचार किया।

\२. समयसार गाथा ६८ की टीकाका आशय

अब समयसार गाथा ६८ की टीकापर विचार करते हैं। इसमें ‘कारणके अनुसार कार्य होता है। जैसे जौपूर्वक उत्पन्न हुए जौ जौ ही हैं।’ इस न्यायके अनुसार गुणस्थान या रागादि भावोंको पौद्गलिक सिद्ध किया गया है। इसपरसे अपर पक्ष निश्चयनयसे उन्हें पौद्गलिक स्वीकार करता है। किन्तु अपर पक्ष यदि पुद्गल आप कर्ता होकर उन्हें उत्पन्न करता है, इसलिए वे निश्चयनयसे पौद्गलिक हैं या पुद्गलके समान रूप, रस, गन्ध और स्पर्शवाले होनेके कारण निश्चयनयसे वे पौद्गलिक हैं ऐसा मानता हो तो उसका दोनों प्रकारका मानना सर्वथा आगमविरुद्ध है, क्योंकि परके अवलम्बनसे उत्पन्न हुए वे जीवके ही चिद्विकार हैं और जीवने आप कर्ता होकर उन्हें उत्पन्न किया है। अतएव अशुद्ध पर्यायार्थिकनयसे वे जीव ही हैं। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य जयसेन उक्त गाथाकी टीकामें लिखते हैं-

यद्यप्यशुद्धनिश्चयेन चेतनानि तथापि शुद्धनिश्चयेन नित्यं सर्वकालमचेतनानि। अशुद्धनिश्चयस्तु वस्तुतो यद्यपि द्रव्यकर्मापेक्षयाभ्यन्तररागादयश्चेतना इति मत्वा निश्चयसंज्ञां लभते तथापि शुद्धनिश्चयापेक्षया व्यवहार एव।

गुणस्थान यद्यपि अशुद्ध निश्चयनयसे चेतन हैं तथापि शुद्ध निश्चयनयसे नित्य-सर्वकाल अचेतन हैं। द्रव्यकर्मकी अपेक्षा आभ्यन्तर रागादिक चेतन हैं ऐसा मानकर यद्यपि अशुद्ध निश्चय वास्तवमें निश्चय संज्ञाको प्राप्त होता है तथापि शुद्ध निश्चयकी अपेक्षा वह व्यवहार ही है। इस प्रकार उक्त कथनसे यह बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि मोहनीय कर्मके उदयको आलम्बन ( निमित्त ) कर जो गुणस्थान या रागादि. होते हैं वे अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा जीव ही हैं। यहाँ जो उन्हें जीव होनेका निषेध कर अचेतन कहा है वह शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा ही कहा है। तात्पर्य यह है कि ( १ ) त्रिकाली ज्ञायक स्वभाव आत्माके अवलम्बनसे उत्पन्न हुई आत्मानुभूतिमें गुणस्थानभाव या रागादि-भावका प्रकाश दृष्टिगोचर नहीं होता। ( २ ) वे पुद्गलादि पर द्रव्यका अवलम्बन करनेसे उत्पन्न होनेके कारण शुद्ध चैतन्यप्रकाश स्वरूप न होकर चिद्विकार स्वरूप हैं अतएव अचेतन हैं तथा ( ३ ) उनकी जीवके साथ त्रैकालिक व्याप्ति नहीं पाई जाती, इसलिए शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा वे जीव नहीं हैं, अतएव पौद्गलिक हैं। ऐसा अध्यात्म परमागममें कहा गया है। यह जीव अनादि कालसे स्वको भूलकर परका अवलम्बन करता आ रहा है और परके अवलम्बनसे उत्पन्न चिद्विकारोंमें उपादेय बुद्धि करता आ रहा है, इनमें हेय बुद्धिकर उनसे विरत करना उक्त कथनका प्रयोजन है। यही कारण है कि कर्ता-कर्म अधिकारमें रागादि भावोंका कर्ता स्वतन्त्रपने स्वयं जीव ही है यह बतलाकर भी जीवाजीवाधिकारमें परका अवलम्बन करनेसे होनेके कारण उनमें परबुद्धि कराई गई है। आशा है अपर पक्ष समयसार गाथा ६८ की टीकासे यही तात्पर्य ग्रहण करेगा, न कि यह कि पुद्गल स्वयं स्वतन्त्रतया आप कर्ता होकर उन गुणस्थान या रागादिको करता है, इसलिए यहाँ उन्हें पौद्गलिक कहा गया है। समयसार गाथा ११३-११६ में भी यही आशय व्यक्त किया गया है। यदि अपर पक्ष निमित्त-नैमित्तिकभाव और कर्ता-कर्मभावमें निहित अभिप्रायको हृदयङ्गम करनेका प्रयत्न करे तो उसे वस्तुस्थितिको समझनेमें देर न लगे।

\३. कर्मोदय जीवकी अन्तरंग योग्यताका सूचक है, जीवभावका कर्ता नहीं

आगे अपर पक्षने ‘अन्य कारणों और कर्मोदय रूप कारणोंमें मौलिक अन्तर है, क्योंकि बाह्य सामग्री और अन्तरंगकी योग्यता मिलने पर कार्य होता है। किन्तु घातिया कर्मोदयके साथ ऐसी बात नहीं है, वह तो अन्तरंग योग्यताका सूचक है।’ यह वचन लिखकर अपने इस वक्तव्यकी पुष्टिमें हमारी ( पं० फूलचन्द्र शास्त्रीकी ) कर्मग्रन्थ पु० ६ की प्रस्तावना पृ० ४४ का कुछ अंश उद्धृत किया है।

हमें इस बातकी प्रसन्नता है कि अपर पक्षने अपने उक्त कथन द्वारा घातिया कर्मोदयको जीवकी अन्तरंग योग्यताका सूचक स्वीकार कर लिया है। इससे यह सुतरां फलित हो जाता है कि संसारी जीव कर्म और जीवके अन्योन्यावगाहरूप संयोग कालमें स्वयं कर्ता होकर अपने अज्ञानादिरूप कार्यको करता है और कर्मोदय कर्ता न होकर मात्र उसका सूचक होता है। इसीको जीवके अज्ञानादि भावोंमें कर्मोदयकी निमित्तता कही गई है। हमारे जिस वचनको यहाँ प्रमाणरूपमें उपस्थित किया गया है उसका भी यही आशय है।

किन्तु अपर पक्षने हमारे उक्त वचनोंको उद्धृत करते हुए ‘अतः कर्मका स्थान बाह्य सामग्री नहीं ले सकती।’ इसके बाद उक्त उल्लेखके इस वचनको तो छोड़ दिया है-

‘फिर भी अन्तरंगमें योग्यताके रहते हुए बाह्य सामग्रीके मिलनेपर न्यूनाधिक प्रमाणमें कार्य तो होता ही है इसलिए निमित्तोंकी परिगणनामें बाह्य सामग्रीकी भी गिनती हो जाती है। पर यह परम्परा निमित्त है, इसलिए इसकी परिगणना नोकर्मके स्थानमें की गई है।’

और इसके स्थानमें हमारे वक्तव्यके रूपमें अपने इस वचनको सम्मिलित कर दिया है- ‘अतः कर्मके निमित्तसे जीवकी विविध प्रकारकी अवस्था होती है और जीवमें ऐसी योग्यता आती है।’

अब हमारे और अपर पक्षके उक्त उल्लेखके आधारपर जब अकालमरणका विचार करते हैं तो विदित होता है कि जब जब आत्मामें मनुष्यादि एक पर्यायके व्ययकी और देवादिरूप दूसरी पर्यायके उत्पादकी अन्तरंग योग्यता होती है तब तब विषभक्षण, गिरिपात आदि बाह्य सामग्री तथा मनुष्यादि आयुका व्यय और देवादि आयुका उदय उसकी सूचक होती है और ऐसी अवस्थामें आत्मा स्वयं अपनी मनुष्यादि पर्यायका व्यय कर देवादि पर्यायरूपसे उत्पन्न होता है। स्पष्ट है कि एक पर्यायके व्यय और दूसरी पर्यायके उत्पादरूप उपादान योग्यताके कालकी अपेक्षा विचार करने पर मरणकी कालमरण संज्ञा है और इसको गौणकर अन्य कर्म तथा नोकर्मरूप सूचक सामग्रीकी अपेक्षा विचार करने पर उसी मरणकी अकालमरण संज्ञा है।

यह वस्तुस्थिति है जो अपर पक्षके उक्त वक्तव्यसे भी फलित होती है। हमें आशा है कि अपर पक्ष अपने वक्तव्यके ‘किन्तु घातिया कर्मोदयके साथ ऐसी बात नहीं है, वह तो अन्तरंग योग्यताका सूचक है।’ इस वचनको ध्यानमें रखकर सर्वत्र कार्य-कारणभावका निर्णय करेगा।

\४. प्रस्तुत प्रतिशंकामें उल्लिखित अन्य उद्धरणोंका स्पष्टीकरण

अब प्रस्तुत प्रतिशंकामें उद्धृत उन उल्लेखोंपर विचार करते हैं जिन्हें अपर पक्ष अपने पक्षके समर्थनमें समझता है। उनमेंसे प्रथम उल्लेख इष्टोपदेशका श्लोक ७ है। इसमें मोह अर्थात् मिथ्यादर्शनसे सम्पृक्त हुआ ज्ञान अपने स्वभावको नहीं प्राप्त करता है यह कहा गया है और उसकी पुष्टिमें ‘मदनकोद्रवको निमित्त कर मत्त हुआ पुरुष पदार्थोंका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं कर पाता।’ यह दृष्टान्त दिया गया है।

दूसरा उल्लेख समयसार कलश ११० का तीसरा चरण है। इसमें बतलाया है कि आत्मामें अपनी पुरुषार्थहीनताके कारण जो कर्म ( भाव कर्म ) प्रगट होता है वह नये कर्मबन्धका हेतु ( निमित्त ) है।

तीसरा उल्लेख पंचाध्यायी पृ० १५९ के विशेषार्थका है। इसमें कर्मकी निमित्तताको स्वीकार कर व्यवहार कर्तारूपसे उसका उल्लेख करके मन-वाणी और श्वासोच्छ्वासके प्रति जीवका भी व्यवहार कर्ता रूपसे उल्लेख किया गया है।

चौथा उल्लेख इष्टोपदेश श्लोक ३१ की संस्कृत टीकासे उद्धृत किया गया है। इसमें कहीं ( अपने परिणामविशेषमें ) कर्मकी और कहीं ( अपने परिणामविशेषमें ) जीवकी बलवत्ता स्वीकार की गई है।

पाँचवाँ उल्लेख तत्त्वार्थवार्तिकका है। इसमें जीवके चतुर्गतिपरिभ्रमणमें कर्मोदयकी हेतुता और उसकी विश्रान्तिमें कर्मके उदयाभावको हेतुरूपसे स्वीकार किया गया है।

छठा उल्लेख उपासकाध्ययनका है। इसमें व्यवहारनयसे जीव और कर्मको परस्पर प्रेरक बतलाया गया है। इसकी पुष्टि नौ और नाविकके दृष्टान्त द्वारा की गई है। सातवाँ उद्धरण भी उपासकाध्ययनका ही है। इसमें अग्निके संयोगको निमित्त कर गरम हुए जलके दृष्टान्त द्वारा कर्मको निमित्त कर जीवमें संक्लेश भावको स्वीकार किया गया है।

आठवाँ उदाहरण आत्मानुशासनका है। इसमें व्यवहारनयसे कर्मको ब्रह्मा बतला कर संसार परिपाटी उसका फल बतलाया गया है।

अपने पक्षके समर्थनमें अपर पक्षने ये आठ प्रमाण उपस्थित किये हैं। इन सब द्वारा किस कार्यमें कौन किस रूपमें निमित्त है इसका व्यवहारनयसे निर्देश किया गया है। इसको स्पष्ट रूपसे समझनेके लिये समयसारका यह वचन पर्याप्त है-

जह राया ववहारा दोसगुणुप्पादगो त्ति आलविदो ।
तह जीवो ववहारा दव्वगुणुप्पादगो भणिदो ॥ १०८ ॥

जिस प्रकार राजा व्यवहारसे प्रजाके दोष-गुणका उत्पादक कहा गया है उसी प्रकार जीव व्यवहारसे पुद्गल द्रव्यके गुणोंका उत्पादक कहा गया है ॥ १०८ ॥

आशय यह है कि यथार्थमें प्रत्येक द्रव्य अपना कार्य स्वयं करता है और अन्य बाह्य सामग्री उसमें निमित्त होती है। फिर भी लोकमें निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीकी अपेक्षा यह कहा जाता है कि-‘इसने यह कार्य किया।’ पूर्वमें अपर पक्षने जो आठ आगम प्रमाण उपस्थित किये हैं वे सब व्यवहारनयके वचन हैं, अतः उन द्वारा यही सूचित किया गया है कि किस कार्यमें कौन निमित्त है। प्रत्येक कार्यमें उपादान और निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीकी युति नियमसे होती है इसमें सन्देह नहीं। परन्तु उपादान जैसे अपने कार्यमें स्वयं व्यापारवान् होता है वैसे बाह्य सामग्री उसके कार्यमें व्यापारवान् नहीं होती यह सिद्धान्त है। इसे हृदयंगम करके यथार्थका निर्णय करना चाहिए। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए पुरुषार्थसिद्धयुपायमें कहा है-

जीवकृतं परिणामं निमित्तमात्रं प्रपद्य पुनरन्ये।
स्वयमेव परिणमन्तेऽत्र पुद्गलाः कर्मभावेन ॥ १२ ॥

जीवके द्वारा किये गये परिणामको निमित्तमात्र करके उससे भिन्न पुद्गल स्वयं ही कर्मरूपसे परिणम जाते हैं ॥ १२ ॥

यहाँ ‘जीवकृतं’ और स्वयमेव’ ये दोनों पद ध्यान देने योग्य हैं। जीवके राग-द्वेष आदि परिणामोंकी उत्पत्तिमें यद्यपि कर्मोदय निमित्त है फिर भी उन्हें जीवकृत कहा गया है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि जिस द्रव्यमें जो कार्य होता है उसका मुख्य ( निश्चय-यथार्थ ) कर्ता वही द्रव्य होता है, निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्री नहीं। उसे कर्ता कहना उपचार कथन है। जिस द्रव्यमें जो कार्य होता है उसका मुख्य कर्ता वह द्रव्य तो है ही, साथ ही वह परनिरपेक्ष होकर ही उसे करता है यह ‘स्वयमेव’ पदसे सूचित होता है। प्रस्तुत प्रतिशंकामें अपर पक्षने कर्मोदयको जीवकी आन्तरिक योग्यताका सूचक स्वीकार कर लिया है, अतः इससे भी उक्त कथनकी ही पुष्टि होती है। स्पष्ट है कि उक्त आठों आगम प्रमाण अपर पक्षके विचारोंके समर्थक न होकर समयसारके उक्त कथनका ही समर्थन करते हैं। अतएव उनसे हमारे विचारोंकी ही पुष्टि होती है।

अपर पक्षने इन प्रमाणोंमें एक प्रमाण ‘कत्थ वि बलिओ जीवो’ यह वचन भी उपस्थित किया है और इसकी उत्थानिकामें लिखा है कि-‘जब जीव बलवान् होता है तो वह अपना कल्याण कर सकता है।’

यहाँ विचार यह करना है कि ऐसी अवस्थामें जीव स्वयं अपना कल्याण करता है या बाह्य सामग्री द्वारा उसका कल्याण होता है। यदि बाह्य सामग्री द्वारा उसका कल्याण होता है यह माना जाय तो ‘जीव अपना कल्याण कर सकता है’ ऐसा लिखना निरर्थक है और यदि वह स्वयं अपना कल्याण कर लेता है यह माना जाय तो प्रत्येक कार्य अन्यके द्वारा होता है यह लिखना निरर्थक हो जाता है। प्रकृतमें इन दो विकल्पोंके सिवाय तीसरा विकल्प तो स्वीकार किया ही नहीं जा सकता, क्योंकि उसके स्वीकार करने पर बाह्य सामग्री अकिंचित्कर माननी पड़ती है। अतएव ‘कत्थ वि बलिओ’ इत्यादि वचनको व्यवहारनयका कथन ही जानना चाहिए जो कर्मकी बलवत्तामें जीवकी पुरुषार्थ हीनताको और कर्मकी हीनतामें जीवकी उत्कृष्ट पुरुषार्थताको सूचित करता है। स्पष्ट है कि उक्त कथनसे यह तात्पर्य समझना चाहिए कि जब जीव पुरुषार्थहीन होता है तब स्वयं अपने कारण वह अपना कल्याण करनेमें असमर्थ रहता है और जब उत्कट पुरुषार्थी होकर आत्मोन्मुख होता है तब वह अपना कल्याण कर लेता है।

इस प्रकार उक्त आठों आगम प्रमाण किस प्रयोजनसे लिपिबद्ध किये गये हैं और उनका क्या आशय लेना चाहिए इसका खुलासा किया।

\५. सम्यक् नियतिका स्वरूपनिर्देश

अब हम अपर पक्षकी प्रतिशंका ३ को ध्यानमें रखकर नियतिवादके सम्यक् स्वरूपपर संक्षेपमें प्रकाश डालेंगे। इसका विशेष विचार यद्यपि पाँचवीं शंकाके तीसरे दौरके उत्तरमें करेंगे, फिर भी जब प्रस्तुत प्रतिशंकामें इसकी चरचा की है तो यहाँ भी उसका विचार कर लेना आवश्यक समझते हैं।

अपर पक्षने सभी कार्योंका सर्वथा कोई काल नियत नहीं है इसके समर्थनमें तीन हेतु दिये हैं-

\१. आचार्य अमृतचन्द्रने कालनय-अकालनय तथा नियतिनय-अनियतिनय इन नयोंकी अपेक्षा कार्य की सिद्धि बतलाई है, इसलिए सभी कार्योंका सर्वथा कोई काल नियत नहीं है।

\२. सभी कार्योंका काल सर्वथा नियत नहीं है ऐसा प्रत्यक्ष भी देखा जाता है और किसीने कोई क्रम नियत भी नहीं किया है, अतः आगे-पीछे करनेका प्रश्न ही नहीं उठता।

\३. कर्म स्थितिबन्धके समय निषेक रचना होकर यह नियत हो जाता है कि अमुक कर्मवर्गणा अमुक समय उदयमें आवेगी, किन्तु बन्धावलिके पश्चात् उत्कर्षण अपकर्षण, स्थितिकाण्डकघात, उदीरणा, अविपाक निर्जरा आदिसे कर्मवर्गणा आगे-पीछे भी उदय आती है । इससे भी ज्ञात होता है कि सभी कार्य सर्वथा नियत कालमें ही होते हैं यह नहीं कहा जा सकता।

ये तीन हेतु हैं। इनके आधारसे अपर पक्ष सभी कार्योंके सर्वथा नियत कालका निषेध करता है। अब आगे इनके आधारसे क्रमसे विचार किया जाता है-

\१. प्रथम तो प्रवचनसारमें निर्दिष्ट कालनय-अकालनय तथा नियतिनय-अनियतिनयके आधारसे विचार करते हैं। यहाँ प्रथमतः यह समझने योग्य बात है कि वे दोनों सप्रतिपक्ष नययुगल हैं, अतः अस्तिनय-नास्तिनय इस सप्रतिपक्ष नययुगलके समान ये दोनों नययुगल भी एक ही कालमें एक ही अर्थमें विवक्षाभेदसे लागू पड़ते हैं, अन्यथा वे नय नहीं माने जा सकते। अपर पक्ष इन नययुगलोंको नयरूपसे तो स्वीकार करता है, परन्तु कालभेद आदिकी अपेक्षा उनके विषयको अलग-अलग मानना चाहता है इसका हमें आश्चर्य है। वस्तुतः कालनय और अकालनय ये दोनों नय एक कालमें एक ही अर्थको विषय करते हैं। यदि इन दोनोंमें अन्तर है तो इतना ही कि कालनय कालकी मुख्यतासे उसी अर्थको विषय करता है और अकालनय कालको गौणकर अन्य हेतुओंकी मुख्यतासे उसी अर्थको विषय करता है। यहाँ अकालका अर्थ है कालके सिवाय अन्य हेतु। इसी अभिप्रायको ध्यानमें रखकर तत्त्वार्थसूत्रमें ‘अर्पितानर्पितसिद्धेः’ ( ५-३२ ) यह सूत्र निबद्ध हुआ है। स्पष्ट है कि जो पर्याय काल विशेषकी मुख्यतासे कालनयका विषय है, वही पर्याय कालको गौण कर अन्य हेतुओंकी मुख्यतासे अकालनयका विषय है। प्रवचनसारकी आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीकामें इन दोनों नयोंका यही अभिप्राय लिया गया है।

इन नयोंका प्रारम्भ करनेके पूर्व यह प्रश्न उठा कि आत्मा कौन है और वह कैसे प्राप्त किया जाता है ? इसका समाधान करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र कहते हैं कि यह आत्मा चैतन्य सामान्यसे व्याप्त अनन्त धर्मोंका अधिष्ठाता एक द्रव्य है, क्योंकि अनन्त धर्मोंको ग्रहण करनेवाले अनन्त नय हैं और उनमें व्याप्त होकर रहनेवाले एक श्रुतज्ञान प्रमाण पूर्वक स्वानुभवसे वह जाना जाता है ( प्रवचनसार परिशिष्ट )। इससे स्पष्ट विदित होता है कि यहाँ जिन ४७ नयोंका निर्देश किया गया है उनके विषयभूत ४७ धर्म एक साथ एक आत्मामें उपलब्ध होते हैं, अन्यथा उन नयोंमें एक साथ श्रुतज्ञान प्रमाणकी व्याप्ति नहीं बन सकती। अतएव प्रकृतमें कालनय और अकालनयके आधारसे तो यह सिद्ध करना सम्भव नहीं है कि सब कर्मोंका सर्वथा कोई नियत काल नहीं है। प्रत्युत इनके आधारसे यही सिद्ध होता है कि कालनयकी विषयभूत वस्तु ही उसी समय विवक्षाभेदसे अकालनयकी भी विषय है। अतएव सभी कार्य अपने-अपने कालमें नियतक्रमसे ही होते हैं ऐसा निर्णय करना ही सम्यक् अनेकान्त है।

यह तो कालनय और अकालनयकी अपेक्षा विचार है। नियतिनय और अनियतिनयकी अपेक्षा विचार करनेपर भी उक्त तथ्यकी ही पुष्टि होती है, क्योंकि प्रकृतमें द्रव्योंकी कुछ पर्यायें क्रमनियत हों और कुछ पर्यायें अनियतक्रमसे होती हों यह अर्थ इन नयोंका नहीं है। यदि यह अर्थ इन नयोंका लिया जाता है तो ये दोनों सप्रतिपक्ष नय नहीं बन सकते। अतएव विवक्षाभेदसे ये दोनों नय एक ही कालमें एक ही अर्थको विषय करते हैं यह अर्थ ही प्रकृतमें इन नयोंका लेना चाहिए। आचार्य अमृतचन्द्रने प्रवचनसारमें इन नयोंका जो स्पष्टीकरण किया है उससे भी इसी अभिप्रायकी पुष्टि होती है। उनके उक्त कथनके अनुसार नियति पदका अर्थ है द्रव्यकी सब अवस्थाओंमें व्याप्त होकर रहनेवाला त्रिकाली अन्वयरूप द्रव्य-स्वभाव और अनियति पदका अर्थ है क्षण-क्षणमें परिवर्तनशील पर्याय स्वभाव। ‘उत्पाद-व्यय ध्रौव्ययुक्तं सत्’ ( त० सू० ५-३० ) तथा ‘सद्द्रव्यलक्षणम्’ ( त० सू० ५-२९ ) इन आगम वचनोंके अनुसार भी प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें जहाँ उक्त दोनों प्रकारके स्वभावोंको लिये हुए है वहाँ विवक्षा भेदसे उसे ( द्रव्यको ) ग्रहण करनेवाले ये दोनों नय हैं। नियतिनय प्रत्येक द्रव्यके द्रव्यस्वभावको विषय करता है और अनियतिनय प्रत्येक द्रव्यके पर्याय स्वभावको विषय करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। अतएव उक्त दोनों नयोंके आधारसे भी यह सिद्ध नहीं होता कि द्रव्योंकी कुछ पर्यायें क्रमनियत होती हैं और कुछ पर्यायें अनियत क्रमसे होती हैं, प्रत्युत इन नयोंके स्वरूप और विषयपर दृष्टिपात करनेसे यही सिद्ध होता है कि धर्मादि द्रव्योंके समान जीव और पुद्गल इन दो द्रव्योंकी भी सभी पर्यायें अपने-अपने कालमें नियतक्रमसे ही होती हैं। सत्का अर्थ ही यह है कि जिस कालमें जो जिसरूपमें सत् है उस कालमें वह उस रूपमें स्वरूपसे स्वतःसिद्ध स्वयं सत् है। उसकी परसे प्रसिद्धि करना यह तो मात्र व्यवहार है, जो मात्र इस तथ्यको सूचित करता है कि विवक्षित समयमें विवक्षित द्रव्य जिस रूपमें सत् है, उससे अगले समयमें सद्रूपमें वह किस प्रकारका होगा। कारण-कार्यभावकी चरितार्थता भी इसी व्यवहारको प्रसिद्ध करनेमें है। उससे अन्य प्रयोजन फलित करना यह तो सत्के स्वरूपमें हस्तक्षेप करनेके समान है। आशा है अपर पक्ष इस तथ्यपर दृष्टिपात कर हृदयसे इस बातको स्वीकार कर लेगा कि जिस द्रव्यकी जो पर्याय जिस कालमें जिस देशमें जिस विधिसे होना निश्चित है उस द्रव्यकी वह पर्याय उस कालमें उस देशमें उस विधिसे नियमसे होती है।

\२. अपर पक्षका अपने पक्षके समर्थनमें दूसरा तर्क है कि सभी कार्योंका काल सर्वथा नियत है ऐसा प्रत्यक्षसे ज्ञात नहीं होता। इसके साथ उस पक्षका यह भी कहना है कि उनका किसीने कोई क्रम भी नियत नहीं किया है, अतः कौन कार्य पहले होनेवाला बादमें हुआ और बादमें होनेवाला पहले हो गया यह प्रश्न ही नहीं उठता।

यह अपर पक्षका अपने कथनके समर्थनमें वक्तव्यका सार है। इस द्वारा अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें दो तर्क उपस्थित किये हैं। प्रथम तर्कको उपस्थित कर वह अपने इन्द्रिय प्रत्यक्ष और मानस प्रत्यक्ष (जो परोक्ष हैं ) द्वारा यह दावा करता है कि वह अपने उक्त ज्ञान द्वारा द्रव्यमें अवस्थित कार्यकरणक्षम उस योग्यताका प्रत्यक्ष ज्ञान कर लेता है जिसे सभी आचार्योंने अतीन्द्रिय कहा है। किन्तु उस पक्षका ऐसा दावा करना उचित नहीं है, क्योंकि सभी आचार्योंने एक स्वरसे कार्यको हेतु मानकर उस द्वारा विवक्षित कार्य करनेमें समर्थ अन्तरंग योग्यताके ज्ञान करनेका निर्देश किया है। आचार्य प्रभाचन्द्र प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० २३७ में लिखते हैं-

तत्रापि हि कारणं कार्येऽनुपक्रियमाणं यावत्प्रतिनियतं कार्यमुत्पादयति तावत्सर्वं कस्मान्नोत्पादयतीति चोद्ये योग्यतैव शरणम्।

उसमें भी कार्यसे उपक्रियमाण न होता हुआ कारण जब तक प्रतिनियत कार्यको उत्पन्न करता है तब तक सबको क्यों उत्पन्न नहीं करता ऐसा प्रश्न होनेपर आचार्य कहते हैं कि योग्यता ही शरण है।

इस उल्लेखमें योग्यताको परोक्ष मानकर ही यह प्रश्न किया गया है कि कार्य कारणका तो उपकार करता नहीं, फिर भी वह प्रतिनियत कार्यको ही क्यों उत्पन्न करता है, सब कार्योंको क्यों उत्पन्न नहीं करता? स्पष्ट है कि इस उल्लेखमें प्रतिनियत कार्य द्वारा कारणमें निहित प्रतिनियत कार्यकरणक्षम योग्यताका ज्ञान कराया गया है। इस प्रकार प्रकृतमें कार्यहेतुको ही मान्यता दी गई है, हमारे या अपर पक्षके प्रत्यक्ष प्रमाणको नहीं।

स्वामी समन्तभद्र तो इसी तथ्यको और भी स्पष्ट शब्दोंमें सूचित करते हुए स्वयंभूस्तोत्रमें सुपार्श्वं जिनकी स्तुतिके प्रसंगसे कहते हैं-

अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं हेतुद्वयाविष्कृतकार्यलिंगा।
अनीश्वरो जन्तुरहंक्रियार्तः संहत्य कार्येष्विति साध्ववादीः ॥३॥

हेतुद्वयसे उत्पन्न होनेवाला कार्य ही जिसका ज्ञापक है ऐसी यह भवितव्यता अलंघ्यशक्ति है। किन्तु मैं इसे कर सकता हूँ ऐसे विकल्पसे पीड़ित हुआ प्राणी बाह्य सामग्रीको मिलाकर भी कार्योंके करनेमें समर्थ नहीं होता। हे जिन! आपने यह ठीक ही कहा है ॥३॥

इसमें भी यही बतलाया गया है कि कार्यको देखकर ही यह अनुमान किया जाता है कि इस कारणमें इस कालमें इस कार्यको उत्पन्न करनेकी योग्यता रही है, तभी यह कार्य हुआ है।

यद्यपि कहीं-कहीं कारणको देखकर भी कार्यका अनुमान किया जाता है यह सच है, परन्तु इस पद्धतिसे कार्यका ज्ञान वहीं पर सम्भव है जहाँ पर विवक्षित कार्यके अविकल कारणोंकी उपस्थितिकी सम्यक् जानकारी हो और साथ ही उससे भिन्न कार्यके कारण उपस्थित न हों। इतने पर भी इस कारणमें इस कार्यके करनेकी आन्तरिक योग्यता है ऐसा ज्ञान तो अनुमान प्रमाणसे ही होता है। अतः सभी कार्योंका काल सर्वथा नियत नहीं है ऐसा दावा अपर पक्ष अपने प्रत्यक्ष प्रमाणके बलपर तो त्रिकालमें कर नहीं सकता।

अब रह गया यह तर्क ‘कि किसीने कार्योंका कोई क्रम नियत भी नहीं किया है, अतः आगे पीछे करनेका प्रश्न ही नहीं उठता।’ सो यह तर्क पढ़नेमें जितना सुहावना लगता है उतना यथार्थताको लिये हुए नहीं है, क्योंकि हमारे समान सभी श्रुतज्ञानी ‘जं जस्स जम्मि देसे’ इत्यादि तथा ‘पुव्वपरिणामजुत्तं कारणभावेण वट्टदे दव्वं’ इत्यादि श्रुतिके बलसे यह अच्छी तरहसे जानते हैं कि जो कार्य जिस कालमें और जिस देशमें जिस विधिसे होता है वह कार्य उस कालमें और उस देशमें उस विधिसे नियमसे होता है इसमें इन्द्र, चक्रवर्ती और स्वयं तीर्थंकर भी परिवर्तन नहीं कर सकते। अतएव श्रुतिके बल पर हमारा ऐसा जानना प्रमाण है। और वह श्रुति दिव्यध्वनिके आधारसे लिपिबद्ध हुई है, इसलिए दिव्यध्वनिके बलपर वह श्रुति भी प्रमाण है। और वह दिव्यध्वनि केवलज्ञानके आधारपर प्रवृत हुई है, इसलिए केवलज्ञानके बलपर दिव्यध्वनि भी प्रमाण है। और केवलज्ञानकी ऐसी महिमा है कि वह तीन लोक और त्रिकालवर्ती समस्त पदार्थोंको वर्तमानके समान जानता है। इसलिए केवलज्ञान प्रमाण है। यहाँ यह तो है कि प्रत्येक पदार्थका जिस कालमें और जिस देशमें जिस विधिसे परिणमन होनेका नियम है वह स्वयं होता है, कुछ केवलज्ञानके कारण नहीं होता। परन्तु साथमें यह भी नियम है कि प्रत्येक पदार्थका जब जैसे परिणमन होनेका नियम है उसे केवलज्ञान उसी प्रकार जानता है। ऐसा ही इनमें ज्ञेय-ज्ञायक सम्बन्ध है। अतः कार्योंका किसीने कोई क्रम नियत नहीं किया यह लिखकर सम्यक् नियतिका निषेध करना उचित नहीं है। एक ओर तो अपर पक्ष ‘कार्योंका किसीने कोई क्रम नियत भी नहीं किया’ यह लिखकर कार्योंका आगे-पीछे होना मानना नहीं चाहता और दूसरी ओर उत्कर्षण आदिके द्वारा कर्मवर्गणाओंका आगे-पीछे उदयमें आना भी स्वीकार करता है। यह क्या है? इसे उस पक्षकी मान्यताकी विडम्बना ही कहनी चाहिए। स्पष्ट है कि अपर पक्षने ‘सभी कार्योंका काल सर्वथा नियत नहीं है’ इत्यादि लिखकर जो सभी कार्योंके क्रम नियमितपनेका निषेध किया है वह उक्त प्रमाणोंके बलसे तर्ककी कसौटी पर करनेपर यथार्थ प्रतीत नहीं होता।

\३. अपर पक्षने अपने तीसरे हेतुमें कर्मस्थिति आदिके आधारसे विचार कर यह निष्कर्ष फलित करनेकी चेष्टा की है कि बन्धके समय जो स्थितिबन्ध होता है उसमें बन्धावलिके बाद उत्कर्षणादि देखे जाते हैं, अतः जो कार्य जिस समय होना हैं उसे आगे-पीछे किया जा सकता है। यद्यपि इस विषयपर विशेष विचार शंका पाँचके अन्तिम उत्तरमें करनेवाले हैं। यहाँ तो मात्र इतना ही सूचित करना पर्याप्त है कि सत्तामें स्थित जिस कर्मका जिस कालमें जिसको निमित्तकर उत्कर्षण आदि होना नियत है उस कर्मका उस कालमें उसको निमित्तकर ही वह होता है, अन्यका नहीं ऐसी बन्धके समय ही उसमें योग्यता स्थापित हो जाती है। कर्मशास्त्रमें कर्मकी बन्ध, उदय और उत्कर्षणादि जो दस अवस्थाएँ बतलाई हैं वे इसी आधारपर बतलाई गई हैं। हाँ जिस व्यवस्थाको कर्मशास्त्रमें स्वीकार नहीं किया गया है, कर्ममें ऐसे किसी कार्यका केवल बाह्य सामग्रीके बलपर अपर पक्ष होना सिद्ध कर सके तो अवश्य ही यह माना जा सकता है कि यह कार्य बिना उपादानशक्तिके केवल बाह्य सामग्रीके बलपर कर्ममें हो गया। व्यवस्था व्यवस्था है। व्यवस्थाके अनुसार कार्यका होना अनियममें नहीं आता। कर्मशास्त्रके प्रगाढ़ अभ्यासका हम दावा तो नहीं करते। परन्तु कर्मशास्त्रके थोड़े बहुत अभ्यासके बलपर इतना अवश्य ही निर्देश कर देना चाहते हैं कि कर्मशास्त्रकी व्यवस्थाके अनुसार जिस कर्ममें जिस समय जो कार्य होता है वह नियमित क्रमसे ही होता है। अतः कर्मशास्त्रके अनुसार किसी भी कार्यको आगे-पीछे होनेका दावा करना किसी भी अवस्थामें उचित नहीं कहा जा सकता।

इस प्रकार जिन तीन हेतुओंके आधारसे अपर पक्षने सम्यक् नियतिका विरोध किया है वे तीनों हेतु यथार्थ कैसे नहीं हैं इसका आगमके आधारसे यहाँ विचार किया। अतएव प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि सम्यक् नियति आगमसिद्ध है, अन्यथा न तो पदार्थव्यवस्था ही बन सकती है और न ही कार्य-कारणव्यवस्था ही बन सकती है।

शंका १, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग २/३)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ४९ से ७०

↑ सूची


\६. प्रसंगसे प्रकृतोपयोगी नयोंका खुलासा

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने नयोंकी चरचा करते हुए व्यवहार नयको असद्भूत माननेसे अस्वीकार किया है। उस पक्षका ऐसा कहना मालूम पड़ता है कि जितने प्रकारके व्यवहार नय आगममें बतलाये गये हैं वे सब सद्भूत ही हैं। यह प्रश्न अनेक प्रसंगों पर अनेक प्रश्नोंमें उठाया गया है। यदि अपर पक्ष आगमपर दृष्टिपात करता तो उसे स्वयं ज्ञात हो जाता कि आगममें व्यवहारनयके जो चार भेद किये हैं उनमेंसे दो सद्भूत व्यवहारनयके भेद हैं और दो असद्भूत व्यवहारनयके भेद हैं। जहाँ प्रत्येक द्रव्यको व्यवहारनयसे अनित्य कहा है वहाँ वह सद्भूत व्यवहारनयसे ही कहा गया है, जिसे आगम पद्धतिमें पर्यायार्थिक निश्चय नयरूपसे स्वीकार किया गया है। किन्तु जहाँ किसी एक द्रव्यमें दूसरे द्रव्यके कार्यकी अपेक्षा निमित्त व्यवहार किया गया है वहाँ वह सद्भूत व्यवहारनयका विषय न होकर असद्भूत व्यवहारनयका ही विषय है। कारण कि एक द्रव्यके कार्यका कारण धर्म दूसरे द्रव्यमें रहता हो यह त्रिकालमें सम्भव नहीं है। अतः एक द्रव्यके कार्यका दूसरे द्रव्यको निमित्त अर्थात् कारण कहना उपचरित ही ठहरता है। यही कारण है कि आलापपद्धतिमें असद्भूत व्यवहारका लक्षण करते हुए लिखा है-

अन्यत्र प्रसिद्धस्य धर्मस्यान्यत्र समारोपणमसद्भूतव्यवहारः। असद्भूतव्यवहार एवोपचारः। उपचारादप्युपचारं यः करोति स उपचरितासद्भूतव्यवहारः।

अन्यत्र प्रसिद्ध हुए धर्मका अन्यत्र आरोप करना असद्भूत व्यवहार है। असद्भूत व्यवहारका नाम ही उपचार है। उपचारके बाद भी जो उपचार करता है वह उपचरितासद्भूतव्यवहार है। ( देखो समयसार गाथा ५६ टीका, आलापपद्धति तथा नयचक्रादिसंग्रह पृ० ७९ गाथा २२३ )

यह तो अपर पक्ष भी स्वीकार करेगा कि प्रत्येक द्रव्यके गुण-धर्म उसके उसीमें रहते हैं। विचार कीजिए कि कुम्भकार भिन्न वस्तु है और मिट्टी भिन्न वस्तु है। यदि मिट्टीके किसी धर्मको कुम्भकारमें या कुम्भकारके किसी धर्मको मिट्टीमें परमार्थसे स्वीकार किया जाता है तो इन दोनोंमें एकता प्राप्त होती है। किन्तु मिट्टी अपने स्वचतुष्टयकी अपेक्षा भिन्न वस्तु है, उसमें कुम्भकारके स्वचतुष्टयका अत्यन्त अभाव है। उसी प्रकार कुम्भकार अपने स्वचतुष्टयकी अपेक्षा भिन्न वस्तु है, उसमें मिट्टीके स्वचतुष्टयका अत्यन्त अभाव है। ऐसी अवस्थामें यदि घटका कर्ता कुम्भकारको कहा जाता है तो घटका कर्ता धर्म कुम्भकारमें आरोपित ही तो मानना पड़ेगा और इसी प्रकार कुम्भकारका कर्म यदि घटको कहा जाता है तो कुम्भकारका कर्मधर्म घटमें आरोपित ही तो मानना पड़ेगा। यही कारण है कि हमने सर्वत्र निमित्तनैमित्तिक सम्बन्धको असद्भूतव्यवहारनयका विषय बतलाकर उसे उपचरित ही प्रसिद्ध किया है। नय एक विकल्प है। वह सद्भूतको तो विषय करता ही है। कालप्रत्यासत्ति आदिकी अपेक्षा जिसमें निमित्त व्यवहार या नैमित्तिक व्यवहार किया गया है या निक्षेप व्यवस्थाके अनुसार जो नाम, स्थापना और द्रव्य निक्षेपका विषय है उसे भी विषय करता है।

अथवा नैगमनयके स्वरूप द्वारा असद्भूत व्यवहारनयको समझा जा सकता है। जिस पर्यायका संकल्प है वह वर्तमानमें अनिष्पन्न है फिर भी उसके आलम्बनसे संकल्पमात्रको ग्रहण करनेवाले नयको नैगमनय कहा है। इसी प्रकार असद्भूतव्यवहारनय इष्टार्थका ज्ञान करानेमें समर्थ है, इसीलिए उसे सम्यक् नयोंमें परिगणित किया है।

भेद द्वारा वस्तुको ग्रहण करना जहाँ सद्भूत - व्यवहारनय कहा गया है वहाँ उसकी विवक्षाभेदसे निश्चयनय संज्ञा भी आगममें प्रतिपादित की गई है। किन्तु निमित्तनैमित्तिक सम्बन्धको ( दो द्रव्योंमें ) बतलानेवाला व्यवहारनय असद्भूत व्यवहारनय ही है, वह किसी भी अवस्थामें निश्चय संज्ञाको प्राप्त करनेका अधिकारी नहीं, अतएव व्यवहार कहकर भेदव्यवहार और निमित्त-नैमित्तिक व्यवहार इन दोनोंको एक कोटिमें रखकर प्रतिपादन करना उचित नहीं है।

ज्ञेय स्वरूपसे ज्ञेय है और ज्ञायक स्वरूपसे ज्ञायक है। ये आरोपित धर्म नहीं हैं, अतः इनका सम्बन्ध कहना भले ही व्यवहार ( उपचार ) होओ, इसमें बाधा नहीं, परन्तु हैं ये दोनों धर्म अपने-अपनेमें सद्भूत ही, असद्भूत नहीं। किन्तु ऐसी बात निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्धके विषयमें नहीं है। कुम्भकार स्वरूपसे घटका निमित्त नहीं है और न ही घट ( मिट्टी ) स्वरूपसे कुम्भकारका कर्म ( नैमित्तिक ) हो है। फिर भी अन्यके धर्मका अन्यमें आरोप करके अर्थात् मिट्टीके कर्ता धर्मका कुम्भकारमें और कुम्भकारके कर्म धर्मका 'घटमें आरोप करके कुम्भकारको घटका कर्ता और घटको कुम्भकारका कर्म कहना असद्भूत व्यवहार ही है। यदि यह सद्भूत व्यवहार होता तो विवक्षाभेदसे निश्चय संज्ञाको भी प्राप्त होता। किन्तु यह व्यवहार असद्भूत ही है, अतएव यह विवक्षाभेदसे निश्चय संज्ञाको प्राप्त करनेका भी अधिकारी नहीं और इस अपेक्षासे अपर पक्ष द्वारा दिया गया नेत्रका उदाहरण प्रकृतमें अक्षरशः लागू पड़ता है। नेत्र रूपको ही जानता है, रसको नहीं। फिर भी उसे रसको जाननेवाला कहा जायगा तो वह असद्भूत व्यवहार ही ठहरेगा। उसी प्रकार कुम्भकार अपने योग और विकल्पका ही कर्ता है, घटका नहीं, फिर भी उसे घटका कर्ता कहा जायगा तो वह असद्भूत व्यवहार ही ठहरेगा, क्योंकि निश्चयसे जैसे नेत्र रसको जाननेमें असमर्थ है उसी प्रकार कुम्भकार भी निश्चयसे घटकी क्रिया करनेमें सर्वथा असमर्थ है।

इस प्रकार नयोंका प्रसंग उपस्थित कर अपर पक्षने जो हमारे ‘दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध व्यवहारनयसे है, निश्चयनयसे नहीं।’ इस कथन पर टीका की है वह कैसे आगम विरुद्ध है इसका विचार किया।

\७. कर्ता-कर्म आदिका विचार

आगे अपर पक्षने कर्ता-कर्म भाव और निमित्त-नैमित्तिक भावकी चरचा उपस्थित कर अपने उन विचारोंको यहाँ भी दुहरा दिया है जिनकी विशेष चरचा शंका ५के तीसरे दौरमें की है। इसी प्रसंगमें अपर पक्षने लिखा है-

‘इस तरह हमारे आपके मध्य मतभेद केवल इतना ही रह जाता है कि जहाँ हमारा पक्ष आत्मामें उत्पन्न होनेवाले रागादि विकार और चतुर्गतिभ्रमणरूप कार्यकी उत्पत्तिमें द्रव्यकर्मके उदयरूप निमित्त कारण या निमित्त कर्ताको सहकारी कारण या सहकारी कर्ताके रूपमें सार्थक ( उपयोगी ) मानता है वहाँ आपका पक्ष उसे उपचरित कह कर उक्त कार्यमें अकिंचित्कर अर्थात् निरर्थक ( निरुपयोगी ) मानता है और तब आपका पक्ष अपना यह सिद्धान्त निश्चित कर लेता है कि कार्य केवल उपादानकी अपनी सामर्थ्यसे स्वतः ही निष्पन्न हो जाता है । उसकी निष्पत्तिमें निमित्तकी कुछ भी अपेक्षा नहीं रह जाती है । जब कि हमारा पक्ष यह घोषणा करता है कि अनुभव, तर्क और आगम सभी प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि यद्यपि कार्यकी निष्पत्ति उपादानमें ही हुआ करती है अर्थात् उपादान ही कार्यरूप परिणत होता है फिर भी उपादानकी उस कार्यरूप परिणतिमें निमित्तकी अपेक्षा बराबर बनी हुई है अर्थात् उपादानकी जो परिणति आगममें स्व-परप्रत्यय स्वीकार की गई है वह परिणति उपादानकी अपनी परिणति होकर भी निमित्तकी सहायतासे ही हुआ करती है, अपने आप नहीं हो जाया करती है । चूँकि आत्माके रागादिरूप परिणमन और चतुर्गति भ्रमणको उसका ( आत्माका ) स्वपरप्रत्यय परिणमन आगम द्वारा प्रतिपादित किया गया है, अतः वह परिणमन आत्माका अपना परिणमन होकर भी द्रव्यकर्मोंके उदयकी सहायतासे ही हुआ करता है ।’ आदि ।

यह अपर पक्षके वक्तव्यका अंश है । इसमें उन सब बातोंका उल्लेख हो गया है जिन्हें अपर पक्ष सिद्ध करनेके प्रयत्नमें है । आगे इसे ध्यानमें रखकर पूरे वक्तव्यपर विचार किया जाता है-

यह तो अपर पक्ष ही स्वीकार करेगा कि एक अखण्ड सत्को भेद विवक्षामें तीन भागोंमें विभक्त कियी गया है-द्रव्यसत्, गुणसत् और पर्यायसत् । अपर पक्ष द्रव्यसत् और गुणसत्के स्वरूपको तो स्वतः सिद्ध मानने के लिए तैयार है, किन्तु पर्यायसत् के विषयमें उसका कहना है कि वह परकी सहायतासे अर्थात् परके द्वारा उत्पन्न होता है । उपादान तो स्व है और अभेद विवक्षामें जो उपादान है वही उपोदय है, इसलिए वह अपनेसे, अपनेमें, अपने द्वारा आप कर्ता होकर कर्मरूपसे उत्पन्न हुआ यह कथन यथार्थ बन जाता है । किन्तु जिस बाह्य सामग्रीमें निमित्त व्यवहार किया गया है वह ( वह स्वयं परके कार्यका स्वरूपसे निमित्तकारण नहीं है यह बात यहाँ ध्यानमें रखना चाहिए । ) पर है, अतः उसमें यह कार्य हुआ इसे तो यथार्थ न माना जाय और उसके द्वारा आप कर्ता होकर परके इस कार्यको उसने उत्पन्न किया इसे यथार्थ कैसे माना जा सकता है, अर्थात् त्रिकालमें यथार्थ नहीं माना जा सकता, क्योंकि दोनोंमें सर्वथा सत्ताभेद है, प्रदेशभेद है, कर्ता आदिका सर्वथा भेद तो है ही । परके द्वारा कार्य हुआ या परकी सहायतासे कार्य हुआ इसे आगम प्रमाणसे यदि हम असद्भूत व्यवहार कथन या उपचरित कथन बतलाते हैं तो अपर पक्ष उसे निरर्थक या निरुपयोगी लिखनेमें ही अपनी चरितार्थता समझता है इसका हमें आश्चर्य है । जहाँ उपादान और उपादेयमें भेद विवक्षा करके उपादानसे उपादेयकी उत्पत्ति हुई यह कथन ही व्यवहार कथन ठहरता है वहाँ परके द्वारा उससे सर्वथा भिन्न परके कार्यकी उत्पत्ति होती है इसे असद्भूत व्यवहार कथन न मानकर सद्भूत व्यवहार या निश्चय कथन कैसे माना जा सकता है, इसका स्वमतके समर्थनका पक्ष छोड़कर अपर पक्ष ही विचार करे । क्या यह अपर पक्ष आगमसे बतला सकता है कि एक द्रव्यके कार्यके कर्ता आदि कारण धर्म दूसरे द्रव्यमें वास्तवमें पाये जाते हैं ? यदि नहीं तो वह पंक्ष कुम्भकार घटका कर्ता है इस कथन को असद्भूतव्यवहारनय ( उपचरितोपचारनय ) का कथन माननेमें क्यों हिचकिचाता है ? पहले तो उसे इस तथ्यको निःसंकोच रूपमें स्वीकार कर लेना चाहिए और फिर इसके बाद इसकी सार्थकता या उपयोगिता क्या है इस पर विचार करना चाहिये । हमें आशा है कि यदि वह इस पद्धतिसे विचार करेगा तो उसे इस कथनकी सार्थकता और उपयोगिता भी समझमें आ जायगी । यह कथन इष्टार्थ अर्थात् निश्चयका ज्ञान करानेमें समर्थ है, इससे इसकी सार्थकता या उपयोगिता सिद्ध होती है, इससे नहीं कि वह स्वयं अपनेमें यथार्थ कथन है। इसे यथार्थ कथन मानना अन्य बात है और सार्थक अर्थात् उपयोगी मानना अन्य बात है। यह कथन उपयोगी तो है पर यथार्थ नहीं यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

आचार्य विद्यानन्दिने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृष्ठ १५१ में सहकारी कारणका और कार्यका लक्षण करते हुए लिखा है-

यदनन्तरं हि यदवश्यं भवति तत्तस्य सहकारिकारणमितरत्कार्यमिति ।

जो जिसके अनन्तर नियमसे होता है वह उसका सहकारी कारण है और इतर कार्य है।

इसका तात्पर्य ही यह है कि जब जो कार्य होता है तब उसका जो सहकारी कारण कहा गया है वह नियमसे रहता है ऐसी इन दोनोंमें कालप्रत्यासत्ति है। यह यथार्थ है। अर्थात् उस समय विवक्षित कार्यका होना भी यथार्थ है और जिसमें सहकारी कारणता स्थापित की गई है उसका होना भी यथार्थ है। यह इन दोनोंकी कालप्रत्यासत्ति है।

किन्तु इसके स्थानमें उक्त कथनका यदि यह अर्थ किया जाय कि जिसे सहकारी कारण कहा गया है वह अपने व्यापार द्वारा अन्य द्रव्यके कार्यको उत्पन्न करता है तो उक्त कथनका ऐसा अर्थ करना यथार्थ न होकर उपचरित ही होगा। आचार्यने सहकारी कारणका लक्षण करते हुए जो वाक्य रचना निबद्ध की है थोड़ा उसपर दृष्टिपात कीजिए। वे सहकारी कारणका यह लक्षण नहीं लिख रहे हैं कि जिसका व्यापार जिसे उत्पन्न करता है वह सहकारी कारण है। किन्तु इसके स्थानमें यह लिख रहे हैं कि जिसके अनन्तर जो नियमसे होता है वह सहकारी कारण है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि बाह्य सामग्रीका व्यापार अन्य द्रव्यमें कार्यको त्रिकालमें उत्पन्न नहीं करता। यदि उसे अन्य द्रव्यके कार्यका सहकारी कारण कहा भी गया है तो केवल इसलिए कि उसके अनन्तर अन्य द्रव्यका वह कार्य नियमसे होता है।

इससे तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके उक्त कथनका क्या तात्पर्य है यह आसानीसे समझमें आ जाता है। समयसार कलशमें जो ‘न जातु’ इत्यादि कलश निबद्ध किया गया है वह भी इसी अभिप्रायसे निबद्ध किया गया है कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्यको परिणमाता नहीं। इसमें आया हुआ ‘परसंग’ पद ध्यान देने योग्य है। अपने रागरूप परिणामके कारण आत्मा परकी संगति अर्थात् परमें रागबुद्धि करता है और इसलिए वह परके संयोगमें सुख-दुःखादि रूप फलका भोक्ता होता है। यदि वह परमें रागबुद्धि करना छोड़ दे तो परके संयोगमें जो उसे सुख-दुःखादि फलका भागी होना पड़ता है उससे बच जाय। स्पष्ट है कि यहाँ परको सुख-दुःखादि रूप परिणमानेवाला नहीं कहा गया है, किन्तु परकी संगति करनेरूप अपने अपराधको ही सुख-दुःखादिका मूल हेतु कहा गया है।

समयसारकी ‘जीवपरिणामहेदु’ इत्यादि ८०वीं गाथा भी यही प्रगट करती है कि किसकी संगति करनेके फलस्वरूप किसकी कैसी परिणति होती है। वह परका दोष नहीं है, अपना ही दोष है इस तथ्यको सूचित करनेके लिए ‘ण वि कुव्वइ’ इत्यादि ८१वीं गाथा लिखी है। और अन्तमें ‘एएण कारणेण’ इत्यादि ८२वीं गाथा द्वारा उपसंहार करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि सब द्रव्य अपने-अपने परिणामके ही वास्तवमें कर्ता हैं, कोई किसी दूसरेके परिणामका वास्तविक कर्ता नहीं है। फिर भी यदि अपर पक्ष सहकारी कारणका यह अर्थ करता है कि वह दूसरे द्रव्यकी क्रियाको सहायक रूपमें करता है तो उसे अपने इस सदोष विचारके संशोधनके लिए समयसार गाथा ८५-८६ पर दृष्टिपात करना चाहिए और यदि वह उसका काल प्रत्यासत्तिवश ‘यदनन्तरं यद्भवति’ इतना ही अर्थ करता है तो इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं। ऐसा अर्थ करना आगमसम्मत है। ‘जीवम्हि हेदुभूदे’ इत्यादि गाथामें आया हुआ ‘उवयारमत्तेण’ पद ‘अतद्भूतव्यवहार’ इस अर्थका सूचक है जैसा कि हम आलापपद्धतिका उद्धरण उपस्थित कर पूर्वमें ही सूचित कर आये हैं। पर द्रव्य अन्य द्रव्यके कार्यका वास्तविक निमित्त नहीं और न वह कार्य उसका नैमित्तिक है। यह व्यवहार है जो असद्भूत है यही बात ‘उवयारमत्तेण’ इस पद द्वारा सूचित की गई है। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० १५१ के उद्धरणका जो अभिप्राय है इसका खुलासा हमने पूर्वमें ही किया है। उससे अधिक उसका दूसरा आशय नहीं है।

मीमांसादर्शन शब्दको सर्वथा नित्य मानकर सहकारी कारणसे ध्वनिकी प्रसिद्धि मानता है और फिर भी वह कहता है कि इससे शब्द अविकृतरूपसे नित्य ही बना रहता है। अष्टशती (अष्टसहस्री पृ० १०५) का ‘तदसामर्थ्यमखण्डयत्’ इत्यादि वचन इसी प्रसंगमें आया है। इस द्वारा भट्टाकलंकदेवने मीमांसादर्शन पर दोषका आपादन किया है, इस द्वारा जैनदर्शनके सिद्धान्तका उद्घाटन किया गया है ऐसा यदि अपर पक्ष समझता है तो उसे हम उस पक्षकी भ्रमपूर्ण स्थिति ही मानेंगे। हमें इसका दुःख है कि उसकी ओरसे अपने पक्षके समर्थनमें ऐसे वचनोंका भी उपयोग किया गया है। सर्वथा नित्यवादी मीमांसक यदि शब्दको सर्वथा नित्य मानता रहे, फिर भी वह उसमें ध्वनि आदि कार्यकी प्रसिद्धि सहकारी कारणोंसे माने और ऐसा होनेपर भी वह शब्दोंमें विकृतिको स्वीकार न करे तो उसके लिए यही दोष तो दिया जायगा कि सहकारी कारणोंने उसकी सामर्थ्यका यदि खण्डन नहीं किया है तो उन्होंने ध्वनि कार्य किया यह कैसे कहा जा सकता है, वे तो अकिंचित्कर ही बने रहे। स्पष्ट है कि इस वचनसे अपर पक्षके अभिप्रायकी अणुमात्र भी पुष्टि नहीं होती।

अपर पक्षने अष्टशतीके उक्त वचनमें आये हुए ‘तत्’ पदका अर्थ उपादान जानबूझ कर किया है। जब कि उसका अर्थ ‘सर्वथा नित्य शब्द’ है। यह सूचना हमने बुद्धिपूर्वक की है और इस अभिप्रायसे की है कि जैनदर्शनमें उपादानका अर्थ नित्यानित्य वस्तु लिया गया है। किन्तु मीमांसादर्शन शब्दको ऐसा स्वीकार नहीं करता।

अपर पक्षने समयसार गाथा १०५ की आत्मख्याति टीकाको उपस्थित कर जो अपने विचारकी पुष्टि करनी चाही है वह ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त टीकाके अन्तमें आये हुए ‘स तूपचार एव न तु परमार्थः’ इस पदका अर्थ है-‘वह विकल्प तो उपचार ही है अर्थात् उपचरित अर्थको विषय करनेवाला ही है, परमार्थरूप नहीं है अर्थात् यथार्थ अर्थको विषय करनेवाला नहीं है।’ किन्तु इसे बदलकर अपर पक्षने इस वाक्यका यह अर्थ किया है-‘आत्मा द्वारा पुद्गलका कर्मरूप किया जाना यह उपचार ही है अर्थात् निमित्त-नैमित्तिक भावकी अपेक्षासे ही है परमार्थरूप नहीं है अर्थात् उपादानोपादेय भावकी अपेक्षासे नहीं है।’ हमें आश्चर्य है कि अपर पक्षने उक्त वाक्यके प्रारम्भमें आये हुए ‘सः’ पदका अर्थ ‘विकल्प’ न करके ‘आत्मा द्वारा पुद्गलका कर्मरूप किया जाना’ यह अर्थ कैसे कर लिया। अपर पक्षको यह स्मरण रखना चाहिए कि निमित्त व्यवहार और नैमित्तिक व्यवहार उपचरित होता है और यह तब बनता है जब परने परके कार्यको किया ऐसे विकल्पकी उत्पत्ति होती है। यही तथ्य उक्त गाथा और उसकी टीका द्वारा प्रगट किया गया है।

अपर पक्षने ‘यः परिणमति स कर्ता’ इत्यादि कलशको उद्धृत कर ‘यः परिणमति’ पदका अर्थ किया है-‘जो परिणमन होता है अर्थात् जिसमें या जिसका परिणमन होता है।’ जब कि इस पदका वास्तविक अर्थ है-‘जो परिणमता है या परिणमन करता है।’ उक्त पदमें ‘यः परिणमति’ पद है ‘यत्परिणमनं भवति’ पद नहीं है, फिर नहीं मालूम, अपर पक्षने उक्त पदके यथार्थ अर्थको न करके स्वमतिसे अन्यथा अर्थ क्यों किया। स्पष्ट है कि वह पक्ष उपादानको यथार्थ कर्ता बनाये रखनेमें अपने पक्षकी हानि समझता है तभी तो उस पक्षके द्वारा इस प्रकारसे अर्थमें परिवर्तन किया गया।

आगममें निमित्त व्यवहार या निमित्तकर्ता आदि व्यवहारको सूचित करनेवाले वचन पर्याप्त मात्रामें उपलब्ध होते हैं इसमें सन्देह नहीं, पर उसी आगममें यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि ये सब वचन असद्भूतव्यवहारनयको लक्ष्यमें रखकर आगममें निबद्ध किये गये हैं। ( इसके लिये देखो समयसार गाथा १०५ से १०८ तथा उनकी आत्मख्याति टीका, बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ८ की टीका आदि। )

यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि जिस प्रकार आगममें उपादानकर्ता और उपादान कारणके लक्षण उपलब्ध होते हैं और साथ ही उन्हें यथार्थ कहा गया है उस प्रकार आगममें निमित्तकर्ता या निमित्त कारणके न तो कहीं लक्षण ही उपलब्ध होते हैं और न ही कहीं उन्हें यथार्थ ही कहा गया है। प्रत्युत ऐसे अर्थात् निमित्तकर्ता या निमित्तकारणपरक व्यवहारको अनेक स्थलोंपर अज्ञानियोंका अनादि रूढ़ लोकव्यवहार ही बतलाया गया है ( देखो समयसार गाथा ८४ व उसकी दोनों संस्कृत टीकाएँ आदि )।

अपर पक्षने हमारे कथनको लक्ष्य कर जो यह लिखा है कि ‘परन्तु इस पर ध्यान न देते हुए उस लक्षणको सामान्यरूपसे कर्ताका लक्षण मानकर निमित्त-नैमित्तिक भावकी अपेक्षा आगममें प्रतिपादित कर्तृ-कर्मभावको उपचरित ( कल्पनारोपित ) मानते हुए आपके द्वारा निमित्तकर्ताको अकिंचित्कर ( कार्यके प्रति निरुपयोगी ) करार दिया जाना गलत ही है।’

किन्तु अपर पक्षकी हमारे कथनपर टिप्पणी करना इसलिए अनुचित है, क्योंकि परमागममें एक कार्यके दो कर्ता वास्तवमें स्वीकार ही नहीं किये गये हैं। समयसार कलशमें कहा भी है-

नैकस्य हि कर्तारौ द्वौ स्तो द्वे कर्मणी न चैकस्य।
नैकस्य च क्रिये द्वे एकमनेकं यतो न स्यात् ॥५४॥

एक द्रव्य ( कार्य ) के दो कर्ता नहीं होते, एक द्रव्यके दो कर्म नहीं होते और एक द्रव्यकी दो क्रियाएँ नहीं होतीं, क्योंकि एक द्रव्य अनेक द्रव्यरूप नहीं होता ॥५४॥

इससे स्पष्ट विदित होता है कि जब एक कार्यके परमार्थरूप दो कर्ता ही नहीं हैं, ऐसी अवस्थामें परमागममें दो कर्ताओंके दो लक्षण निबद्ध किया जाना किसी भी अवस्थामें सम्भव नहीं है, इसलिए प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि ‘यः परिणमति स कर्ता’ इस रूपमें कर्ताका जो लक्षण निबद्ध किया गया है वह सामान्यरूपसे भी कर्ताका लक्षण है और विशेषरूपसे भी, क्योंकि जहाँ पर दो या दोसे अधिक एक जातिकी वस्तुएँ हों वहाँ पर ही सामान्य और विशेष ऐसा भेद करना सम्भव है। यहाँ जब एक कार्यका कर्ता ही एक है तो एक कर्ताके दो लक्षण हो ही कैसे सकते हैं? यही कारण है कि एक कार्यका एक कर्ता होनेसे परमागममें कर्ताका एक ही लक्षण लिपिबद्ध किया गया है। निमित्तकर्ता वास्तवमें कर्ता नहीं, इसलिए परमागममें उसका लक्षण भी उपलब्ध नहीं होता। वह तो व्यवहारमात्र है। अतएव इस सम्बन्धमें हमारा जो कुछ भी कथन है वह यथार्थ है ऐसा यहाँ समझना चाहिए।

अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें समयसार गाथा १०० को उपस्थित किया है, किन्तु यह गाथा किस अभिप्रायसे निबद्ध की गई है इसके लिए समयसार १०७ गाथा अवलोकनीय है। उसके प्रकाशमें इस गाथाको पढ़नेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि गाथा १०० में आचार्य कुन्दकुन्दने जो कुम्भकारके योग और विकल्पको घटका उत्पादक कहा है और आचार्य अमृतचन्द्रने कुम्भकारके योग और विकल्पको जो निमित्त कर्ता कहा है वह किस अभिप्रायसे कहा है। गाथा १०७ में यह स्पष्ट बतलाया गया है कि आत्मा पुद्गल कर्मको उत्पन्न करता है, करता है, बाँधता है, परिणमाता है और ग्रहण करता है यह सब कथन व्यवहारनय का वक्तव्य है। गाथा १०० में तो मात्र निमित्त कर्ताके अर्थमें किस प्रकारका प्रयोग किया जाता है यह बतलाया गया है। किन्तु गाथा १०७ में ऐसा प्रयोग किस नयका विषय है इसे स्पष्ट किया गया है। अतः इस परसे भी अपर पक्षके अभिप्रायकी पुष्टि न होकर हमारे ही अभिप्रायकी पुष्टि होती है।

अपर पक्ष यह तो बतलावे कि जब जिसमें निमित्त व्यवहार किया गया है उसका कोई भी धर्म जिसमें नैमित्तिक व्यवहार किया गया है उसमें प्रविष्ट नहीं होता तो फिर वह उसका यथार्थमें निमित्त कर्ता-कारण-रूपसे कर्ता कैसे बन जाता है ? आगममें जब कि ऐसे कथनको उपचरित या उपचरितोपचरित स्पष्ट शब्दोंमें घोषित किया गया है तो अपर पक्षको ऐसे आगमको मान लेनेमें आपत्ति ही क्या है। हमारी रायमें तो उसे ऐसे कथनको विना हिचकिचाहटके प्रमाण मान लेना चाहिए।

अपर पक्षने प्रमेयरत्नमाला समुद्देश ३ सू० ६३ से ‘अन्वय-व्यतिरेक’ इत्यादि वचन उद्धृत कर अपने पक्षका समर्थन करना चाहा है, किन्तु इस वचनसे भी इतना ही ज्ञात होता है कि जिसके अनन्तर जो होता है वह उसका कारण है और इतर कार्य है। यही बात इसी सूत्रकी व्याख्यामें इन शब्दोंमें कही गई है-

तस्य कारणस्य भावे कार्यस्य भावित्वं तद्भावभावित्वम्।

उसके अर्थात् कारणके होने पर कार्यका होना यह तद्भावभावित्व है।

किन्तु यह सामान्य निर्देश है। इससे बाह्य सामग्रीको उपचरित कारण क्यों कहा और आभ्यन्तर सामग्रीको अनुपचरित कारण क्यों कहा यह ज्ञान नहीं होता। इसका विचार तो उन्हीं प्रमाणोंके आधार पर करना पड़ेगा जिनका हम पूर्वमें निर्देश कर आये हैं।

यह तो अपर पक्ष भी स्वीकार करेगा कि एक द्रव्यमें एक कालमें एक ही कारण धर्म होता है और उस धर्मके अनुसार वह अपना कार्य भी करता है। जैसे कुम्भकारमें जब अपनी क्रिया और विकल्प करनेका कारण धर्म है तब वह अपनी क्रिया और विकल्प करता है, मिट्टीकी घट निष्पत्तिरूप क्रिया नहीं करता। ऐसी अवस्थामें कुम्भकारको घटका कर्ता उपचारसे ही तो कहा जायगा। और उस उपचारका कारण यह है कि जब कुम्भकारकी विवक्षित क्रिया और विकल्प होता है तब मिट्टी भी उपादान होकर घटरूपसे परिणमती है। इस प्रकार कुभकारकी विवक्षित क्रियाके साथ घट कार्यका अन्वय-व्यतिरेक बन जाता है। यही कारण है कि कुम्भकारको घटका कर्ता उपचारसे कहा गया है। किन्तु ऐसा उपचार करना तभी सार्थक है जब वह यथार्थका ज्ञान करावे, अन्यथा वह व्यवहाराभास ही होगा। यह वस्तुस्थितिका स्वरूप निर्देश है। इससे बाह्य सामग्रीमें अन्य द्रव्यके कार्यकी कारणता काल्पनिक ही है यह ज्ञान हो जाता है। फिर भी आगममें इस कारणताको काल्पनिक न कहकर जो उपचरित कहा है वह सप्रयोजन कहा है। खुलासा पूर्वमें ही किया है और आगे भी करेंगे।

धवला पु० १३ पृ० ३४९ का उद्धरण ( जिसे अपर पक्षने प्रस्तुत किया है ) संयोगकी भूमिकामें उपचरित अनुभागका ही निरूपण करता है। प्रत्येक द्रव्यका वास्तविक अनुभाग क्या है यह ‘तत्थ असेस-दव्वावगमो जीवाणुभागो’ इत्यादि वचनसे ही जाना जाता है।

अपर पक्षने ‘मुख्याभावे सति’ इत्यादि वचनको उपचारकी व्याख्या माना है जो अयुक्त है। इस वचन द्वारा तो मात्र उसकी प्रवृत्ति कहाँ होती है यह बतलाया गया है। उपचारकी व्याख्या उसी आलापपद्धतिमें इस प्रकार दी है-

अन्यत्र प्रसिद्धस्य धर्मस्यान्यत्र समारोपणमसद्भूतव्यवहारः। असद्भूतव्यवहार एव उपचारः।

अन्यत्र प्रसिद्ध हुए धर्मका अन्यत्र आरोप करना असद्भूत व्यवहार है। असद्भूत व्यवहार ही उपचार है।

अपर पक्षने उपचार कहाँ प्रवृत्त होता है इसके समर्थनमें तीन उदाहरण दिये हैं, किन्तु उनका आशय क्या है इसे समझना है। एक उदाहरण बालकका है। बालकमें यथार्थमें सिंहपना तो नहीं है। हाँ जिस प्रकार सिंहमें क्रौर्य-शौर्य गुण होता है, उसके समान जिस बालकमें यह गुण उपलब्ध होता है उस बालकमें सिंहका उपचार किया जाता है। यहाँ तत्सदृश गुण उपचारका कारण है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि सिंहमें जो गुण है वही गुण बालकमें तो नहीं है। फिर भी बालकको जो सिंह कहा गया है वह केवल तत्सदृश गुणको देखकर ही कहा गया है। अतएव यह उपचार कथन ही है, वास्तविक नहीं। यह दृष्टान्त है अब इसे दार्ष्टान्तिपर लागू कीजिए।

प्रकृतमें कार्य-कारणभावका विचार प्रस्तुत है। कार्य एक है और कारण दो-एक बाह्य सामग्री, जो अपने स्वचतुष्टय द्वारा कार्यके स्वचतुष्टयको स्पर्श करनेमें सर्वथा असमर्थ है और दूसरी अन्तःसामग्री, जो कार्यके अव्यवहित प्राक् रूपस्वरूप है। ऐसी अवस्थामें इन दोनों कारणोंमें कार्यका वास्तविक कारण कौन ? दोनों या एक ? इसे यथार्थरूपमें समझनेके लिए कारकोंके स्वरूपपर दृष्टिपात करना होगा। कारक दो प्रकारके हैं-एक निश्चय कारक और दूसरे व्यवहार कारक। निश्चय कारक जिस द्रव्यमें कार्य होता है उससे अभिन्न होते हैं और व्यवहार कारक जिस द्रव्यमें कार्य होता है उससे भिन्न माने गये हैं। प्रत्येक द्रव्यमें अपना कार्य करनेमें समर्थ उससे अभिन्न छह कारक नियमसे होते हैं, इसको समझनेके लिए पंचास्तिकाय गाथा ६२ और उसकी टीका देखने योग्य है। इसकी उत्थानिकाका निर्देश करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

अत्र निश्चयनयेनाभिन्नकारकत्वात्कर्मणो जीवस्य च स्वयं स्वरूपकर्तृत्वमुक्तम्।

निश्चयसे अभिन्न कारक होनेसे कर्म और जीव स्वयं स्वरूपके ( अपने-अपने स्वरूपके ) कर्ता हैं ऐसा यहाँ कहा है।

आगममें जहाँ स्वरूप प्राप्तिका निर्देश किया गया है वहाँ यही कहा गया है।

अयमात्मात्मनात्मानमात्मन्यात्मन आत्मने।
समादधानो हि परां विशुद्धिं प्रतिपद्यते ॥ १-११३ ॥-अनगारधर्मामृत।

स्वसंवेदनसे सुव्यक्त हुआ यह आत्मा स्वसंवेदनरूप अपने द्वारा शुद्ध चिदानन्दस्वरूप अपनी प्राप्तिके लिए इन्द्रिय ज्ञान और अन्तःकरण ज्ञानरूप अपनेसे भिन्न होकर निर्विकल्पस्वरूप अपनेमें शुद्ध चिदानन्दस्वरूप अपनेको ध्याता हुआ उत्कृष्ट विशुद्धिको प्राप्त होता है ॥१-११३॥

इसी तथ्यको परमात्मप्रकाश अध्याय एकमें इन शब्दोंमें व्यक्त किया है-

भवतणुभोयविरत्तमणु जो अप्पा झाएइ ।
तासु गुरुक्की वेल्लडी संसारिणि तुट्टेइ ॥३२॥

संसार, शरीर और भोगोंमें विरक्त मन हुआ जो जीव आत्माको ध्याता है उसकी वड़ी भारी संसाररूपी वेल छिन्न-भिन्न हो जाती है ॥३२॥

इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि प्रत्येक समयमें निश्चय षट्कारकरूपसे परिणत हुआ प्रत्येक द्रव्य स्वयं अपना कार्य करनेमें समर्थ है । इसको विशदरूपसे समझनेके लिए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ४१० का ‘ततः सूक्तं लोकाकाशधर्मादिद्रव्याणामाधाराधेयता’ यह वक्तव्य दृष्टिपथमें लेने योग्य है । इसमें स्पष्ट वतलाया है कि निश्चयनयसे ( यथार्थरूपसे ) विचार करनेपर प्रत्येक द्रव्यमें स्थितिरूप, गमनरूप और परिणमन आदि रूप जो भी कार्य होता है उसे वह द्रव्य स्वयं अपने द्वारा अपनेमें आप कर्ता होकर करनेमें समर्थ है, क्योंकि प्रत्येक द्रव्यका उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यरूप जो भी स्वरूप है वह विस्रसा है । अभेद विवक्षामें ये तीनों एक है, भेदविवक्षामें ही ये तीन कहे जाते हैं ।

इसपर यह प्रश्न होता है कि ये तीनों जब कि द्रव्यस्वरूप हैं तो कालभेदसे प्रत्येक द्रव्य अन्य-अन्य क्यों प्रतीत होता है, उसे जो प्रथम समयमें है वही दूसरे समयमें रहना चाहिए ? इसी प्रश्नका समाधान व्यवहारनयसे करते हुए यह वचन लिखा है-

व्यवहारनयादेव उत्पादादीनां सहेतुकत्वप्रतीतेः :
व्यवहारनयसे ही उत्पादादिक सहेतुक प्रतीत होते हैं ।

यह तो अपर पक्ष भी स्वीकार करेगा कि व्यवहारनयके दो भेद हैं-सद्भूत व्यवहारनय और असद्भूत व्यवहारनय । सद्भूत व्यवहारनयमें भेदविवक्षा मुख्य है और असद्भूतव्यवहारनयमें उपचारविवक्षा मुख्य है । इससे दो तथ्य फलित होते हैं कि सद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा विचार करनेपर किस पर्याययुक्त द्रव्यके वाद अगले समयमें किस पर्याय युक्त द्रव्य रहेगा यह ज्ञात होता है और असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा विचार करनेपर वाह्य किस प्रकारके संयोगमें किस प्रकारकी पर्याययुक्त द्रव्य रहेगा यह ज्ञात होता है । यहाँ आचार्य विद्यानन्दिने जो उत्पादादिकको व्यवहारनयसे सहेतुक कहा है उसका आशय भी यही है । इसी तथ्यको उन्होंने अष्टसहस्री पृ० ११२ में इन शब्दोंमें व्यक्त किया है-

स्वयमुत्पित्सोरपि स्वभावान्तरापेक्षणे विनश्वरस्यापि तदपेक्षणप्रसंगात् । एतेन स्थास्नोः स्वभावान्तरानपेक्षणमुक्तम्, विस्रसा परिणामिनः कारणान्तरानपेक्षोत्पादादित्रयव्यवस्थानात् । तद्विशेषे एव हेतुव्यापारोपगमात् ।

स्वयं उत्पादशील है फिर भी उसमें यदि स्वभावान्तरकी अपेक्षा मानी जाय तो जो स्वयं विनाशशील है उसमें भी स्वभावान्तरकी अपेक्षा माननेका प्रसंग आता है । इससे स्वयं स्थितिशीलमें स्वभावान्तरकी अपेक्षा नहीं होती यह कहा गया है, क्योंकि विस्रसा परिणमनशील पदार्थमें कारणान्तरकी अपेक्षा किये बिना उत्पादादित्रयकी व्यवस्था है; तद्विशेषमें ही हेतुका व्यापार स्वीकार किया है ।

यहाँ ‘तद्विशेषे एव हेतुव्यापारोपगमात्’ इस वचनके तात्पर्यको समझनेके लिए अष्टसहस्री पृ० १५० के ‘परिणमनशक्तिलक्षणायाः प्रतिविशिष्टान्तःसामग्र्याः सुवर्णकारकव्यापारादिलक्षणायाश्च बहिःसामग्र्याः सन्निपाते’ पद ध्यान देने योग्य है। इस द्वारा कैसी अन्तःसामग्री और कैसी बाह्य सामग्रीका सन्निपात होने पर कैसा उत्पाद होता है यह बतलाया गया है। इससे यही ज्ञात होता है कि स्वभावसे द्रव्य उत्पादादि त्रय-स्वरूप होनेके कारण अपने परिणामस्वभावके आलम्बन द्वारा यद्यपि इन तीन रूप स्वयं परिणमता है, अन्य कोई उसे इनरूप परिणमाता नहीं है। फिर भी अन्तः-बाह्य सामग्रीके किस रूप होने पर किस रूप परिणमता है इसकी प्रसिद्धि उससे होती है, अतः सद्भूत व्यवहारनयसे अन्तःसामग्रीको और असद्भूत व्यवहार नयसे बाह्य सामग्रीको उसका उत्पादक कहा गया है। एकको दूसरेका उत्पादक कहना यह व्यवहार है और स्वयं उत्पन्न होता है कहना निश्चय है। अर्थात् निश्चय नयका विषय है।

यहाँ सद्भूत व्यवहारनयका खुलासा यह है कि उपादान और उपादेयका स्वरूप स्वतःसिद्ध होनेपर भी यह नय उपादेयको उपादान सापेक्ष स्वीकार करता है।

असद्भूत व्यवहारनयका खुलासा यह है कि बाह्य सामग्री स्वरूपसे अन्यके कार्यका निमित्त नहीं है फिर भी यह नय उसे अन्य बाह्य सामग्री सापेक्ष स्वीकार करता है।

यहाँ इन दोनों व्यवहारोंमें हमने उपचरितोपचारकी विवक्षा नहीं की है। उसकी विवक्षामें उपादान उपादेयका उत्पादक है यह कथन उपचरित सद्भूत व्यवहारनयका विषय होगा और कुम्भकार घटका कर्ता है यह कथन उपचरित असद्भूत व्यवहारनयका विषय ठहरेगा। अन्यत्र जहाँ कहीं हमने उपादानसे उपादेयकी उपपत्तिको यदि निश्चयनयका वक्तव्य कहा भी है तो वहाँ अभेद विवक्षामें ही वैसा प्रतिपादन किया गया है ऐसा यहाँ समझना चाहिए।

यह वस्तुस्थिति है। इसके प्रकाशमें जब हम बाह्य सामग्रीकी अपेक्षा विचार करते हैं तो विदित होता है कि कुम्भकारमें जो षट् कारक धर्म हैं वे अपने हैं, मिट्टीके नहीं। तथा मिट्टीमें जो षट् कारक धर्म हैं वे मिट्टीके हैं, कुम्भकारके नहीं। अतएव कुम्भकारको अपने कर्तादि धर्मोंके कारण योग और विकल्पका कर्ता कहना तथा मिट्टीको अपने कर्तादि धर्मोंके कारण घटका कर्ता कहना तो परमार्थभूत है। फिर भी जिस समय मिट्टी अपना घटरूप व्यापार करती है उस समय कुम्भकार भी अपना योग और विकल्परूप ऐसा व्यापार करता है जो घट परिणामके अनुकूल कहा जाता है। वस्तुतः यही कुम्भकारमें घटके कर्तापनेके उपचारका हेतु है। इसी तथ्यको समयसार गाथा ८४ की आत्मख्याति टीका ‘कलशसम्भवानुकूलं व्यापारं कुर्वाणः-कलशको उत्पत्तिके अनुकूल व्यापारको करता हुआ’ इन शब्दोंमें व्यक्त करती है। जैसे बालक सिंहका कार्य तो नहीं करता। फिर भी वह अपने क्रौर्य-शौर्य गुणके कारण सिंह कहनेमें आता है। यही उपचार है। वैसे ही कुम्भकार मिट्टीमें घटक्रिया तो नहीं करता। फिर भी वह मिट्टी द्वारा की जानेवाली घटक्रियाके समय अपनी योग और विकल्परूप ऐसी क्रिया करता है जिससे उसे मिट्टीमें घट क्रियाका कर्ता कहा जाता है। यही उपचार है। हमें विश्वास है कि अपर पक्ष पूर्वोक्त उदाहरण द्वारा आगम प्रमाणोंके प्रकाशमें इस तथ्यको ग्रहण करेगा।

अपर पक्षने उपचार कहाँ प्रवृत्त होता है यह दिखलानेके लिए जो अन्य दो उदाहरण प्रस्तुत किये हैं उनका आशय भी यही है। अन्न अपने परिणाम लक्षण क्रियाका कर्ता है और प्राण अपने परिणाम लक्षण क्रियाके कर्ता हैं। ये परस्पर एक-दूसरेकी क्रिया नहीं करते। फिर भी काल प्रत्यासत्ति वश यहाँ अन्नमें प्राणोंकी निमित्तता उपचरित की गई है। अतएव अन्न जैसे प्राणोंका उपचरित हेतु है उसी प्रकार प्रकृतमें जान लेना चाहिए । वचनमें परार्थानुमानका उपचार क्यों किया जाता है इसका खुलासा भी इससे हो जाता है और इस उदाहरणसे भी यही ज्ञात होता है कि कुम्भकार वास्तवमें घटोत्पत्तिका हेतु नहीं है ।

अपर पक्षने अपने प्रकृत विवेचनमें सबसे बड़ी भूल तो यह की है कि उसने बाह्य सामग्रीको स्वरूपसे अन्यके कार्यका निमित्त स्वीकार करके अपना पक्ष उपस्थित किया है । किन्तु उस पक्षकी ओरसे ऐसा लिखा जाना ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त कथनको वास्तविक मानने पर अन्य द्रव्यके कार्यका कारणधर्म दूसरे द्रव्यमें वास्तवमें रहता है यह स्वीकार करना पड़ता है और ऐसा स्वीकार करने पर दो द्रव्योंमें एकताका प्रसंग उपस्थित होता है । अतएव अपर पक्षको प्रकृतमें यह स्वीकार करना चाहिए कि बाह्य सामग्रीको अन्यके कार्यका हेतु कहना यह प्रथम उपचार है और उस आधारसे उसे वही कहना या उसका कर्ता कहना यह दूसरा उपचार है । ‘अन्नं वै प्राणाः’ यह वास्तवमें उपचरितोपचारका उदाहरण है । सर्व प्रथम तो यहाँ व्यवहार ( उपचार ) नयसे अन्नमें प्राणोंकी निमित्तता स्वीकार की गई है और उसके बाद पुनः व्यवहार ( उपचार ) नयका आश्रय कर अन्न प्राण ही हैं ऐसा कहा गया है । यहाँ व्यवहार पद उपचारका पर्यायवाची है । अतएव आगममें जहाँ भी एक द्रव्यको दूसरे द्रव्यके कार्यका व्यवहारनयसे निमित्त कहा गया है वहाँ उसे उस कार्यका उपचारनयसे निमित्त कहा गया है ऐसा समझना चाहिए ।

उपचार और व्यवहार ये एकार्थवाची हैं इसके लिए देखो समयसार गाथा १०८ तथा उसकी आत्मख्याति टीका । समयसारकी उक्त गाथामें ‘ववहारा’ पद आया है और उसकी व्याख्या करते हुए आचार्य अमृतचन्द्रने उसके स्थानमें ‘उपचार’ पदका प्रयोग किया है । समयसार गाथा १०६ और १०७ तथा उनकी आत्मख्याति टीकामें भी यही बात कही गई है । इतना ही क्यों, इसी अर्थको बतलानेके लिए स्वयं आचार्य कुन्दकुन्दने गाथा १०५ में ‘उपचारमात्र’ पदका प्रयोग किया है । स्पष्ट है कि आगममें जहाँ जहाँ व्यवहारसे निमित्त है, हेतु है या कारण है ऐसा कहा गया हैं वहाँ वह कथन उपचारसे किया गया है ऐसा समझना चाहिए ।

तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सू० १२ से भी यही तथ्य फलित होता है । यहाँ भट्टाकलंकदेवने जब ‘सब द्रव्य परमार्थसे स्वप्रतिष्ठ हैं’ इस वचनकी स्वीकृति दी तब यह प्रश्न उठा कि ऐसा मानने पर तो अन्योन्य आधारके व्याघातका प्रसंग उपस्थित होता है । इसी प्रश्नका समाधान करते हुए उन्होंने लिखा है कि एक को दूसरेका आधार बतलाना यह व्यवहारनयका वक्तव्य है, परमार्थसे तो सब द्रव्य स्वप्रतिष्ठ ही हैं । यदि कोई शंका करे कि यहाँ परमार्थका अर्थ द्रव्यार्थिक है तो यह बात भी नहीं है । किन्तु यहाँ परमार्थ पदका अर्थ पर्यायार्थिक निश्चयरूप एवम्भूतनय ही लिया गया है । इस प्रकार इस विवेचनसे भी यही ज्ञात होता है कि समयसारमें जिस प्रकार व्यवहार पद उपचारके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है उसी प्रकार अन्य आचार्योंने भी इस ( व्यवहार ) पदका उपचारके अर्थमें ही प्रयोग किया है ।

यह तथ्य है । इस तथ्यको ध्यानमें रखकर आलाप पद्धतिके ‘मुख्याभावे सति प्रयोजने निमित्ते चोपचारः प्रवर्तते ।’ इस पदका असद्भूत व्यवहारनयसे यह अर्थ फलित होता है कि यदि मुख्य ( यथार्थ ) प्रयोजन और निमित्त ( कारण ) का अभाव हो अर्थात् अविवक्षा हो तथा असद्भूत व्यवहार प्रयोजन और असद्भूत व्यवहार निमित्तकी विवक्षा हो तो उपचार प्रवृत्त होता है ।

तथा अखण्ड द्रव्यमें भेदविवक्षा वश इसका यह अर्थ होगा कि मुख्य अर्थात् द्रव्यार्थिक नयका विषयभूत यथार्थ प्रयोजन और यथार्थ निमित्तका अभाव हो अर्थात् अविवक्षा हो तथा सद्भूत व्यवहाररूप प्रयोजन और सद्भूत व्यवहाररूप निमित्तकी विवक्षा हो तो उपचार प्रवृत्त होता है । यही कारण है कि ‘मुख्याभावे’ इत्यादि वचनके बाद उस उपचारको कहीं अविनाभाव सम्बन्धरूप, कहीं संश्लेषसम्बन्धरूप और कहीं परिणामपरिणामिसम्बन्ध आदि रूप बतलाया गया है ।

इसलिए आलापपद्धतिके उक्त वाक्यको ध्यानमें रखकर अपर पक्षने उसके आधारसे यहाँ जो कुछ भी लिखा है वह ठीक नहीं यह तात्पर्य हमारे उक्त विवेचनसे सुतरां फलित हो जाता है ।

अपर पक्षने इसी प्रसंगमें उपादान पदकी निरुक्ति तथा व्याकरणसे सिद्धि करते हुए लिखा हैं कि ‘जो परिणमनको स्वीकार करे, ग्रहण करे या जिसमें परिणमन हो उसे उपादान कहते हैं । इस तरह उपादान कार्यका आश्रय ठहरता है ।’ तथा निमित्त पदकी निरुक्ति और व्याकरणसे सिद्धि करते हुए उसके विषयमें लिखा है कि 'जो मित्रके समान उपादानका स्नेहन करे अर्थात् उसकी कार्यपरिणतिमें जो मित्रके समान सहयोगी हो वह निमित्त कहलाता है ।

उपादान और निमित्तके विषयमें यह अपर पक्षका वक्तव्य है । इससे विदित होता है कि अपर पक्ष उपादानको मात्र आश्रय कारण मानता है और निमित्तको सहयोगी । अतएव प्रश्न होता है कि कार्यका कर्ता कौन होता है ? अपर पक्ष अपने उक्त कथन द्वारा कार्यको उपादानका तो स्वीकार कर लेता है इसमें सन्देह नहीं, अन्यथा वह उपापादनके लिए ‘उसकी कार्यपरिणतिमें’ ऐसे शब्दोंका प्रयोग नहीं करता । परन्तु वह उपादानको कार्यका मुख्य ( वास्तविक ) कर्ता नहीं मानना चाहता इसका हमें आश्चर्य है । समयसार कलशमें यदि जीव पुद्गलकर्मको नहीं करता है तो कौन करता है ऐसा प्रश्न उठा कर उसका समाधान करते हुए लिखा हैं कि यदि तुम अपना तीव्र मोह ( अज्ञान ) दूर करना चाहते हो तो कान खोलकर सुनो कि वास्तवमें पुद्गल ही अपने कार्यका कर्ता है, जीव नहीं । समयसार कलशका वह वचन इस प्रकार है-

जीवः करोति यदि पुद्गलकर्म नैव कस्तर्हि तत्कुरुत इत्यभिशंकयैव ॥
एतर्हि तीव्ररयमोहनिवर्हणाय संकीर्त्यते शृणुत पुद्गलकर्म कर्तृ ॥ ६३ ॥

अपर पक्ष जब कि कार्य के प्रति व्यवहार कर्ता या व्यवहार हेतु आदि शब्दों द्वारा प्रयुक्त हुए बाह्य पदार्थको उपचार कर्ता या उपचारहेतु स्वीकार कर लेता है, ऐसी अवस्थामें उसे आगममें किये गये ‘उपचार’ पदके अर्थको ध्यानमें रखकर इस कथनको अवास्तविक मान लेनेमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए । इससे उपादानकर्ता वास्तविक है यह सुतरां फलित हो जाता है । बाह्य सामग्रीमें निमित्त व्यवहारको लक्ष्यमें रखकर उपचार कर्ता या उपचार हेतुका आगममें कथन क्यों किया गया है इसका प्रयोजन है और इस प्रयोजनको लक्ष्यमें रख कर यह कथन व्यर्थ न होकर सार्थक और उपयोगी भी है । किन्तु इस आधारपर अपर पक्ष द्वारा उस कथनको ही वास्तविक ठहराना किसी भी अवस्थामें उचित या परमार्थभूत नहीं कहा जा सकता ।

अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें आगमके जो तीन उदाहरण उपस्थित किये हैं उनमेंसे अष्टसहस्री पृ० १५० का उदाहरण निश्चय उपादानके साथ बाह्य सामग्रीकी मात्र कालप्रत्यासत्तिको सूचित करता है । देवागम कारिका ९९ से मात्र इतना ही सूचित होता है कि यह जीव अपने रागादि भावोंको मुख्य कर जैसा कर्मबन्ध करता है उसके अनुसार उसे फलका भागी होना पड़ता है । फलभोगमें कर्म तो निमित्तमात्र है, उसका मुख्य कर्ता तो स्वयं जीव ही है । अपर पक्षने इस कारिकाके उत्तरार्ध को छोड़कर उसे आगम प्रमाणके रूपमें उपस्थित किया है । इससे कर्म और जीवके रागादि भावोंमें निमित्त-नैमित्तिक योग कैसे बनता है इतना ही सिद्ध होता है; अतएव उससे अन्य अर्थ फलित करना उचित नहीं है। तीसरा उदाहरण प्रवचनसार गाथा २५५ की टीकाका है। किन्तु इस वचनको प्रवचनसार गाथा २५४ और उसकी टीकाके प्रकाशमें पढ़ने पर विदित होता है कि इससे उपादानके कार्यकारी पनेका ही ससर्थन होता है। रसपाक कालमें बीजके समान भूमि फलका स्वयं उपादान भी है इसे अपर पक्ष यदि ध्यानमें ले ले तो उसे इस उदाहरण द्वारा आचार्य किस तथ्यको सूचित कर रहे हैं इसका ज्ञान होनेमें देर न लगे। निमित्त-नैमित्तिक भावकी अपेक्षा विचार करने पर इस आगमप्रमाणसे यह विदित होता है कि बीजका जिस रूप अपने कालमें रसपाक होता है तदनुकूल भूमि उसमें निमित्त होती है और उपादान-उपादेय भावकी अपेक्षा विचार करने पर इस आगमप्रमाणसे यह विदित होता है कि भूमि वीजके साथ स्वयं उपादान होकर जैसे अपने कालमें इष्टार्थको फलित करती है वैसे ही प्रकृतमें जानना चाहिए। स्पष्ट है कि इन तीन आगगप्रमाणोंसे अपर पत्तके मतका समर्थन न होकर हमारे अभिप्रायकी ही पुष्टि होती है। बाह्य सामग्री उपादानके कार्यकालमें उपादानकी क्रिया न करके स्वयं उपादान होकर अपनी ही क्रिया करती है, फिर भी बाह्य सामग्रीके क्रियाकालमें उपादानका वह कार्य होनेका योग है, इसलिए वाह्य सामग्रीमें निमित्त व्यवहार किया जाता है। इसे यदि अपर पक्ष निमित्तकी हाजिरी समझता है तो इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है। निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्री उपादानके कार्यका अनुरंजन करती है, उपकार करती है, सहायक होती है आदि यह सव कथन व्यवहारनय ( उपचारनय ) का ही वक्तव्य है, निश्चयनयका नहीं। अपने प्रतिषेधक स्वभावके कारण निश्चयनयकी दृष्टिमें यह प्रतिपेध्य ही है। आशा है कि अपर पक्ष इस तथ्यके प्रकाशमें उपादानके कार्य कालमें बाह्य सामग्रीमें किये गये निमित्त व्यवहारको वास्तविक ( यथार्थ ) माननेका आग्रह छोड़ देगा।

हमने पञ्चास्तिकाय गाथा ८८ के प्रकाशमें बाह्य सामग्रीमें किये गये निमित्तव्यवहारको जहाँ दो प्रकारका वतलाया है वहाँ उसी टीका वचनसे इन भेदोंको स्वीकार करनेके कारणका भी पता लग जाता है। जो मुख्यतः अपने क्रिया परिणाम द्वारा या राग और क्रिया परिणाम द्वारा उपादानके कार्यमें निमित्त व्यवहार पदवीको धारण करता है उसे आगममें निमित्तकर्ता या हेतुकर्ता कहा गया है। इसीको लोकमें प्रेरक कारण भी कहते हैं और जो उक्त प्रकारके सिवाय अन्य प्रकारसे व्यवहार हेतु होता है उसे आगममें उदासीन निमित्त कहनेमें आया है। यही इन दोनोंमें प्रयोग भेदका मुख्य कारण है। पंचास्तिकायके उक्त वचनसे भी यही सिद्धि होता है। इस प्रकार हमने इन दोनों भेदोंको क्यों स्वीकार किया है इसका यह स्पष्टीकरण है।

अपर पक्ष इन दोनोंको स्वीकार करनेमें उपादानके कार्यभेदको मुख्यता देता है सो उपादानमें कार्य भेद तो दोनोंके सद्भावमें होता है। प्रश्न यह नहीं है, किन्तु प्रश्न यह है कि उस कार्यको वास्तवमें कौन करता है ? जिसे आगममें हेतुकर्ता कहा गया है वह कि उपादान ? यदि जिसे आगममें हेतुकर्ता कहा गया है वह करता है तो उसे उपादान ही मानना होगा। किन्तु ऐसा मानना स्वयं अपर पक्षको भी इष्ट नहीं होगा, इसे हम हृदयसे स्वीकार करते हैं। ऐसी अवस्थामें फलित तो यही तथ्य होता है कि उपादानने स्वयं यथार्थ कर्ता होकर अपना कार्य किया और बाह्य सामग्री उसमें व्यवहारसे हेतु हुई। इस अपेक्षासे विचार करने पर बाह्य सामग्रीकी व्यवहारहेतुता एक ही प्रकारकी है, दो प्रकारकी नहीं यह सिद्ध होता है। आचार्य पूज्यपादने इष्टोपदेशमें ‘नाज्ञो विज्ञत्वमायाति’ इत्यादि वचन इसी अभिप्रायसे लिखा है। इस वचन द्वारा वे यह सूचित कर रहे हैं कि व्यवहारहेतुता किसी प्रकारसे क्यों न मानी गई हो, अन्यके कार्यमें वह वास्तविक न होनेसे इस अपेक्षासे समान हैं। अर्थात् अन्यका कार्य करनेमें धर्मद्रव्यके समान दोनों ही उदासीन हैं।

अब रही प्रेरक निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीके अनुरूप परिणमनकी बात सो यह हम अपर पक्षसे ही जानना चाहेंगे कि यह अनुरूप परिणमन क्या वस्तु है ? उदाहरणार्थ कर्मको निमित्त कर जीवके भावसंसारकी सृष्टि होती है और जीवके राग-द्वेषको निमित्त कर कर्मकी सृष्टि होती है। यहाँ कर्म निमित्त है और राग-द्वेष परिणाम नैमित्तिक। इसी प्रकार राग-द्वेष परिणाम निमित्त हैं और कर्म नैमित्तिक। तो क्या इसका यह अर्थ लिया जाय कि निमित्तमें जो गुणधर्म होते हैं वे नैमित्तिकमें संक्रमित हो जाते हैं, या क्या इसका यह अर्थ लिया जाय कि जिसको उपादान निमित्त बनाता है उस जैसा क्रिया परिणाम या भाव परिणाम अपनी उपादान शक्तिके बलसे वह अपना स्वयं उत्पन्न कर लेता है ? प्रथम पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं, क्योंकि एक द्रव्यके गुण-धर्मका दूसरे द्रव्यमें संक्रमण नहीं होता। ऐसी अवस्थामें दूसरा पक्ष ही स्वीकार करना पड़ता है। समयसार गाथा ८०-८२ की आत्मख्याति टीकामें ‘निमित्तीकृत्य’ पदका प्रयोग इसी अभिप्रायसे किया गया है। अन्य द्रव्य दूसरेके कार्यमें स्वयं निमित्त नहीं है। किन्तु अन्य द्रव्यको लक्ष्य कर-आलम्बन कर अन्य जिस द्रव्यका परिणाम होता है उसकी अपेक्षा उसमें प्रेरक निमित्त व्यवहार किया जाता है। पुद्गल द्रव्य अपनी विशिष्ट स्पर्श पर्यायके कारण दूसरेका सम्पर्क करके अपनी उपादान शक्तिके बलसे जिसका सम्पर्क किया है उसके समान धर्मरूपसे परिणाम जाता है और जीव अपने कषायके कारण दूसरेको लक्ष्य करके अपनी उपादान शक्तिके बलसे जिसको लक्ष्य किया है वैसा रागपरिणाम अपनेमें उत्पन्न कर लेता है। यही संसार और तदनुरूप कर्मबन्धका बीज है। यही कारण है कि प्रत्येक मोक्षार्थीको आत्मस्वभावको लक्ष्यमें लेनेका उपदेश आगममें दिया गया है, इसलिए प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि प्रत्येक उपादानके कार्यमें जो वैशिष्ट्य आता है उसे अपनी आन्तरिक योग्यता वश स्वयं उपादान ही उत्पन्न करता है, बाह्य सामग्री नहीं। फिर भी कालप्रत्यासत्ति वश क्रियाकी और परिणामकी सदृशता देखकर जिसके लक्ष्यसे वह परिणाम होता है उसमें प्रेरक निमित्त व्यवहार किया जाता है। अन्य द्रव्यके कार्यमें प्रेरक निमित्त व्यवहार करनेकी यह सार्थकता है। इसके सिवाय अपर पक्षने इसके सम्बन्धमें अन्य जो कुछ भी लिखा है वह यथार्थ नहीं है।

हमने जो यह लिखा है कि प्रेरक कारणके बलसे किसी द्रव्यके कार्यको आगे-पीछे कभी भी नहीं किया जा सकता है, वह यथार्थ लिखा है, क्योंकि उपादानके अभावमें जब कि बाह्य सामग्रीमें प्रेरक निमित्त व्यवहार भी नहीं किया जा सकता तो उसके द्वारा कार्यका आगे-पीछे किया जाना तो अत्यन्त ही असम्भव है। कर्मकी नानारूपता भावसंसारके उपादानकी नानारूपताको तथा भूमिकी विपरीतता बीजकी वैसी उपादानताको ही सूचित करती है। अतएव उपादानके अभावमें जब कि बाह्य सामग्रीमें प्रेरक निमित्त व्यवहार ही नहीं किया जा सकता। ऐसी अवस्थामें अपर पक्ष द्वारा ‘प्रेरक निमित्तके बलसे कार्य कभी भी किया जा सकता है’ ऐसा लिखा जाना उसके एकान्त आग्रहको ही सूचित करता है।

अपर पक्षने यहाँपर शीतऋतु, कपड़ा और दर्जीका उदाहरण देकर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि कपड़ेसे बननेवाले कोट आदिके समान जितने भी कार्य होते हैं उनमें एकमात्र निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीका ही बोलबाला है। इस सम्बन्धमें अपर पक्ष अपने एकान्त आग्रहवश क्या लिखता है उसपर ध्यान दीजिए। उसका कहना है कि-

‘इस तरह कोटका बनना तबतक रुका रहा जबतक कि दर्जीके पास कोटके बनानेका अवकाश नहीं निकल आया । इस दृष्टान्तमें विचारना यह है कि कोट पहिननेकी आकांक्षा रखनेवाले व्यक्ति द्वारा खरीदे हुए उस कपड़ेमें, जब कि उसे दर्जीकी मर्जीपर छोड़ दिया गया है, कौनसी ऐसी उपादाननिष्ठ योग्यताका अभाव बना हुआ है कि वह कपड़ा कोटरूपसे परिणत नहीं हो पा रहा है और जिस समय वह दर्जी कोटके सीनेका व्यापार करने लगता है तो उस कपड़ेमें कौनसी उपादाननिष्ठ योग्यताका अपने-आप सद्भाव हो जाता है कि वह कपड़ा कोट बनकर तैयार हो जाता है । विचार कर देखा जाय तो यह सब साम्राज्य निमित्तकारण सामग्रीका ही है, उपादान तो बेचारा अपनी योग्यता लिए तभीसे तैयार बैठा है जब वह दर्जीके पास पहुँचा था । यहाँपर हम उस कपड़ेकी एक एक क्षणमें होनेवाली पर्यायोंकी बात नहीं कर रहे हैं, क्योंकि कोट पर्यायके निर्माणसे उनका कोई सम्बन्ध नहीं है । हम तो यह कह रहे हैं कि पहलेसे ही एक निश्चित आकारवाले कपड़ेका वह टुकड़ा कोटके आकारको क्यों तो दर्जीके व्यापार करनेपर प्राप्त हो गया और जबतक दर्जीने कोट बनानेरूप अपना व्यापार चालू नहीं किया तबतक वह क्यों जैसाका-तैसा पड़ा रहा । जिस अन्वय-व्यतिरेकगम्य कार्य-कारणभावकी सिद्धि आगमप्रमाणसे हम पहले कर आये हैं उससे यही सिद्ध होता है कि सिर्फ़ निमित्त कारणभूत दर्जीकी बदौलत ही उस कपड़ेकी कोटरूप पर्याय आनेको पिछड़ गई कोटके निर्माण कार्यको उस कपड़ेकी सम्भाव्य क्षणवर्ती क्रमिक पर्यायोंके साथ जोड़ना कहाँतक बुद्धिगम्य हो सकता है यह आप ही जानें ।’ आदि ।

यह प्रकृतमें अपर पक्षके वक्तव्यका कुछ अंश है । इस द्वारा अपर पक्ष यह बतलाना चाहता है कि अनन्त पुद्गल परमाणुओंका अपने-अपने स्पर्शविशेषके कारण संश्लेष सम्बन्ध होकर जो आहारवर्गणाओंकी निष्पत्ति हुई और उनका कार्पास व्यञ्जन पर्यायरूपसे परिणमन होकर जुलाहेके विकल्प और योगको निमित्त-कर जो वस्त्र बना उस वस्त्रकी कोट आदिरूप पर्याय दर्जीके योग और विकल्पपर निर्भर है कि जब चाहे वह उसकी कोटपर्यायका निष्पादन करे । न करना चाहे न करे । जो व्यवहारनयसे उस वस्त्रका स्वामी है वह भी अपनी इच्छानुसार उस वस्त्रको नानारूप प्रदान कर सकता है । वस्त्रका अगला परिणाम क्या हो यह वस्त्रपर निर्भर न होकर दर्जी और स्वामी आदिकी इच्छापर ही निर्भर है । ऐसे सब कार्योंमें एक मात्र निमित्तका ही बोलबाला है, उपादानका नहीं । अपर पक्षके कथनका आशय यह है कि विवक्षित कार्य परिणामके योग्य उपादानमें योग्यता हो, परन्तु सहकारी सामग्रीका योग न हो या आगे-पीछे हो तो उसीके अनुसार कार्य होगा । किन्तु अपर पक्षका यह सब कथन कार्य-कारणपरम्पराके सर्वथा विरुद्ध है, क्योंकि जिसे व्यवहारनयसे सहकारी सामग्री कहते हैं उसे यदि उपादान कारणके समान कार्यका यथार्थ कारण मान लिया जाता है तो कार्यको जैसे उपादानसे उत्पन्न होनेके कारण तत्स्वरूप माना गया है वैसे ही उसे सहकारी सामग्रीस्वरूप भी मानना पड़ता है, अन्यथा सहकारी सामग्रीमें यथार्थ कारणता नहीं बन सकती । दूसरे दर्शनमें सन्निकर्षको प्रमाण माना गया है । किन्तु जैनाचार्योंने उस मान्यताका खण्डन यह कह कर ही किया है कि सन्निकर्ष दोमें स्थित होनेके कारण उसका फल अर्थाधिगम दोनोंको प्राप्त होना चाहिए । ( सर्वार्थसिद्धि अ. १. सू. १० ) वैसे ही एक कार्यकी कारणता यदि दोमें यथार्थ मानी जाती है तो कार्यको भी उभयरूप माननेका प्रसंग आता है । यतः कार्य उभयरूप नहीं होता, अतः अपर पक्षमें सहकारी सामग्रीको निर्विवादरूपसे उपचरित कारण मान लेना चाहिये ।

अपर पक्ष जानना चाहता है कि बाजारसे कोटका कपड़ा खरीदनेके बाद जब तक दर्जी उसका कोट नहीं बनाता तब तक मध्य कालमें कपड़ेमें कौन सी ऐसी उपादान योग्यताका अभाव बना हुआ है जिसके बिना कपड़ा कोट नहीं बनता । समाधान यह है कि जिस अव्यवहित पूर्व पर्यायके बाद कपड़ा कोट पर्यायको उत्पन्न करता है वह पर्याय जब उस कपड़ेमें उत्पन्न हो जाती है तब उसके बाद ही वह कपड़ा कोट पर्याय-रूपसे परिणत होता है । इसके पूर्व उस कपड़ेको कोटका उपादान कहना द्रव्यार्थिक नयका वक्तव्य है ।

अपर पक्ष कोट पहिननेकी आकांक्षा रखनेवाले व्यक्तिकी इच्छा और दर्जीकी इच्छाके आधारपर कोटका कपड़ा कब कोट बन सका यह निर्णय करके कोट कार्यमें बाह्य सामग्रीके साम्राज्यकी भले ही घोषणा करे । किन्तु वस्तुस्थिति इससे सर्वथा भिन्न है । अपर पक्षके उक्त कथनको उलटकर हम यह भी कह सकते हैं कि कोट पहिननेकी आकांक्षा रखनेवाले व्यक्तिने बाजारसे कोटका कपड़ा खरीदा और बड़ी उत्सुकता पूर्वक वह उसे दर्जीके पास ले भी गया । किन्तु अभी उस कपड़ेके कोट पर्यायरूपसे परिणत होनेका स्वकाल नहीं आया था, इसलिए उसे देखते ही दर्जीकी ऐसी इच्छा हो गई कि अभी हम इसका कोट नहीं बना सकते और जब उस कपड़ेकी कोट पर्याय सन्निहित हो गई तो दर्जी, मशीन आदि भी उसकी उत्पत्तिमें निमित्त हो गये ।

अपर पक्ष यदि इस तथ्यको समझ ले कि केवल द्रव्यशक्ति जैन दर्शनमें कार्यकारी नहीं मानी गई है, क्योंकि वह अकेली पाई नहीं जाती और न केवल पर्याय शक्ति ही जैन दर्शनमें कार्यकारी मानी गई है, क्योंकि वह भी अकेली पाई नहीं जाती । अतएव प्रतिविशिष्ट पर्याय शक्ति युक्त असाधारण द्रव्यशक्ति ही जैनदर्शनमें कार्यकारी मानी गई है । तो कपड़ा कब कोट बने यह भी उसे समझमें आ जाय । और इस बातके समझमें आने पर उसके विशिष्ट कालका भी निर्णय हो जाय । प्रत्येक कार्य स्वकालमें ही होता है । हरिवंशपुराण सर्ग ५२ में लिखा है-

चतुरंगबलं कालः पुत्रा मित्राणि पौरुषम् ।
कार्यकृत्तावदेवात्र यावद्दैवबलं परम् ॥७१॥
दैवे तु विकले काल-पौरुषादिर्निरर्थकः ।
इति यत्कथ्यते विद्भिस्तत्तथ्यमिति नान्यथा ॥७२॥

जब तक उत्कृष्ट दैवबल है तभी तक चतुरंग बल, काल, पुत्र, मित्र और पौरुष कार्यकारी हैं । दैवके विकल होने पर काल और पौरुष आदि सब निरर्थक हैं ऐसा जो विद्वत्पुरुष कहते हैं वह यथार्थ है, अन्यथा नहीं है ॥७१-७२॥

यह आगम प्रमाण है । इससे जहाँ प्रत्येक कार्यके विशिष्ट कालका ज्ञान होता है वहाँ उससे यह भी ज्ञात हो जाता है कि दैव अर्थात् द्रव्यमें कार्यकारी अन्तरंग योग्यताके सद्भावमें ही बाह्य सामग्रीकी उपयोगिता है, अन्यथा नहीं ।

यहाँ पर हमने ‘दैव’ पदका अर्थ ‘कार्यकारी अन्तरंग योग्यता’ आप्तमीमांसा कारिका ८८ की अष्टशती टीकाके आधार पर ही किया है । भट्टाकलंकदेव ‘दैव’ पदका अर्थ करते हुए वहाँ पर लिखते हैं-

योग्यता कर्म पूर्वं वा दैवमुभयमदृष्टम् । पौरुषं पुनरिहचेष्टितं दृष्टम् ।

योग्यता और पूर्व कर्म इनकी दैव संज्ञा है । ये दोनों अदृष्ट हैं । किन्तु इहचेष्टितका नाम पौरुष है जो दृष्ट है ।

आचार्य समन्तभद्रने कार्यमें इन दोनोंके गौण-मुख्यभावसे ही अनेकान्तका निर्देश किया है । इससे स्पष्ट विदित होता है कि कपड़ा जब भी कोट बनता है अपनी द्रव्य-पर्यायात्मक अन्तरंग योग्यताके बलसे ही बनता है और तभी दर्जीका योग तथा विकल्प आदि अन्य सामग्री उसकी उस पर्यायकी उत्पत्तिमें निमित्त होती है।

अपर पक्ष यद्यपि केवल बाह्य सामग्रीके आधार पर कार्य-कारणभावका निर्णय करना चाहता है और उसे वह अनुभवगम्य बतलाता है। किन्तु उसकी यह मान्यता कार्यकारी अन्तरंग योग्यताको न स्वीकार करनेका ही फल है जो आगमविरुद्ध होनेसे प्रकृतमें स्वीकार करने योग्य नहीं है। लोकमें हमें जितना हमारी इन्द्रियोंसे दिखलाई देता है और उस आधार पर हम जितना निश्चय करते हैं, केवल उतनेको ही अनुभव मान लेना तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। हमारी समझसे अपर पक्ष प्रकृतमें कार्यकारी अन्तरंग योग्यताको स्वीकार किये बिना इसी प्रकारकी भूल कर रहा है जो युक्त नहीं है। अतएव उसे प्रतिविशिष्ट बाह्य सामग्रीकी स्वीकृतिके साथ यह भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि जिस समय कोट पर्यायके अनुरूप प्रतिविशिष्ट द्रव्य-पर्याय योग्यता उस कपड़ेमें उत्पन्न हो जाती है तभी वह कपड़ा कोट पर्यायका उपादान बनता है, अन्य कालमें नहीं। बाह्य सामग्री तो निमित्तमात्र है।

अपर पक्ष कालक्रमसे होनेवाली क्षणिक पर्यायोंके साथ कपड़ेकी कोटरूप पर्यायका सम्बन्ध जोड़ना उचित नहीं मानता, किन्तु कोई भी व्यंजन पर्याय क्षण-क्षणमें होनेवाली पर्यायोंसे सर्वथा भिन्न हो ऐसा नहीं है। अपने सदृश परिणामके कारण हम किसी भी व्यंजन पर्यायको घटी, घंटा आदि व्यवहार कालके अनुसार चिरस्थयी कहें यह दूसरी बात है, पर होती हैं वे प्रत्येक समयमें उत्पाद-व्ययशील ही। पर्यायदृष्टिसे जब कि प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें अन्य-अन्य होता है, ऐसी अवस्थामें उक्त कपड़ेको भी प्रत्येक समयमें अन्य-अन्य रूपसे स्वीकार करना ही तर्क, आगम और अनुभवसम्मत माना जा सकता है। अतएव कपड़ेकी कोट पर्याय कालक्रमसे होनेवाली नियत क्रमानुपाती ही है ऐसा यहाँ समझना चाहिए। अपर पक्षने बाह्य सामग्रीको कारण मानकर जो कुछ भी लिखा है वह सब व्यवहारनयका ही वक्तव्य है। निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करनेपर अनन्त पुद्गलोंके परिणामस्वरूप कपड़ेकी जिस कालमें अपने उपादानके अनुसार संघात या भेदरूप जिस पर्यायके होनेका नियम है उस कालमें वही पर्याय होती है, क्योंकि प्रत्येक कार्य उपादान कारणके सदृश होता है ऐसा नियम है। इसी तथ्यको प्रगट करते हुए आचार्य जयसेन समयसार गाथा ३७२ की टीकामें लिखते हैं-

उपादानकारणसदृशं कार्यं भवतीति यस्मात्।

दर्जी जब उसकी इच्छामें आता है तब कपड़ेका कोट बनाता है यह पराश्रित अनुभव है और कपड़ा उपादानके अनुसार स्वकालमें कोट बनता है यह स्वाश्रित अनुभव है। अनुभव दोनों हैं। प्रथम अनुभव पराधीनताका सूचक है और दूसरा अनुभव स्वाधीनताका सूचक है। यह अपर पक्ष ही निर्णय करे कि इनमेंसे किसे यथार्थके आश्रय माना जाय।

अपर पक्ष इष्टोपदेशके ‘नाज्ञो विज्ञत्वमायाति’ इत्यादि श्लोकको द्रव्यकर्मके विषयमें स्वीकार नहीं करता। क्यों स्वीकार नहीं करता इसका उसकी ओरसे कोई कारण नहीं दिया गया है। वस्तुतः इस द्वारा कर्म और नोकर्म सबका परिग्रह किया गया है। अपर पक्ष मिट्टीमें पट बननेकी योग्यताको स्वीकार नहीं करता। किन्तु मिट्टी पुद्गल द्रव्य है। घट और पट दोनों ही पुद्गलकी व्यंजन पर्यायें हैं। ऐसी अवस्थामें मिट्टीमें पटरूप बननेकी योग्यता नहीं है यह तो कहा नहीं जा सकता। परस्परमें एक दूसरे रूप परिणमनेकी योग्यताको ध्यानमें रखकर ही इनमें आचार्योंने इतरेतराभावका निर्देश किया है। फिर क्या कारण है कि मिट्टीसे जुलाहा पट पर्यायका निर्माण करनेमें सर्वथा असमर्थ रहता है। यदि अपर पक्ष कहे कि वर्तमानमें मिट्टीमें पटरूप बननेकी पर्याय योग्यता न होनेसे ही जुलाहा मिट्टीसे पट बनानेमें असमर्थ है तो इससे सिद्ध हुआ कि जो द्रव्य जब जिस पर्यायके परिणमनके सन्मुख होता है तभी अन्य सामग्री उसमें व्यवहारसे निमित्त होती है और इस दृष्टिसे विचार कर देखने पर यही निर्णय होता है कि बाह्य सामग्री मात्र अन्यके कार्य करनेमें वैसे ही उदासीन है जैसे धर्मद्रव्य गतिमें उदासीन है। सब द्रव्य प्रत्येक समयमें अपना-अपना कार्य करनेमें ही व्यस्त रहते हैं। उन्हें तीनों कालोंमें एक क्षणका भी विश्राम नहीं मिलता कि वे अपना कार्य छोड़कर दूसरे द्रव्यका कार्य करने लगें। अतएव इष्टोपदेशके उक्त वचनके अनुसार प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि जिस प्रकार धर्म द्रव्य अन्यका कार्य करनेमें उदासीन है उसी प्रकार अन्य सभी द्रव्य अन्य द्रव्यका कार्य करनेमें उदासीन हैं। यह तो काल प्रत्यासत्तिका ही साम्राज्य समझिए कि कभी और कहीं वे अन्यके कार्यमें प्रेरक निमित्त व्यवहार पदवीको प्राप्त हो जाते हैं और कभी तथा कहीं वे अन्यके कार्यमें उदासीन निमित्त व्यवहार पदवीको प्राप्त हो जाते हैं।

बौद्ध दर्शन कारणको देखकर भी कार्यका अनुमान किया जा सकता है इसे स्वीकार नहीं करता। इसी बातको ध्यानमें रखकर कैसा कारणरूप लिंग कार्यका अनुमापक होता है यह सिद्ध करनेके लिये यह लिखा है कि जहाँ कारणसामग्रीकी अविकलता हो और उससे भिन्न कार्यकी ज्ञापक सामग्री उपस्थित न हो वहाँ कारणसे कार्यका अनुमान करनेमें कोई बाधा नहीं आती। किन्तु हमें खेद है कि अपर पक्ष इस कथनका ऐसा विपर्यास करता है जिसका प्रकृतमें कोई प्रयोजन ही नहीं। इसका विशेष विचार हम छठी शंकाके तीसरे दौरके उत्तरमें करनेवाले हैं, इसलिए इस आधारसे यहाँ इसकी विशेष चर्चा करना हम इष्ट नहीं मानते। किन्तु यहाँ इतना संकेत कर देना आवश्यक समझते हैं कि जिस प्रकार विवक्षित कार्यकी विवक्षित बाह्य सामग्री ही नियत हेतु होती है उसी प्रकार उसकी विवक्षित उपादान सामग्री ही नियत हेतु हो सकेगी। अतएव प्रत्येक कार्य प्रत्येक समयमें प्रतिनियत आभ्यन्तर-बाह्य सामग्रीको निमित्त कर ही उत्पन्न होता है ऐसा समझना चाहिए। स्व-परप्रत्यय परिणमनका अभिप्राय भी यही है। इस परसे उपादानको अनेक योग्यतावाला कह कर बाह्य सामग्रीके बलपर चाहे जिस कार्यकी उत्पत्तिकी कल्पना करना मिथ्या है।

अपर पक्षका कहना है कि बाह्य सामग्री उपादानके कार्यमें सहयोग करती है सो यह सहयोग क्या वस्तु है? क्या दोनों मिलकर एक कार्य करते हैं यह सहयोगका अर्थ है? किन्तु यह तो माना नहीं जा सकता, क्योंकि दो द्रव्य मिलकर एक क्रिया नहीं कर सकते ऐसा द्रव्यस्वभाव है (देखो समयसार कलश ५४)। क्या एक द्रव्य दूसरे द्रव्यकी क्रिया कर देता है यह सहयोगका अर्थ है? किन्तु यह कथन भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि एक द्रव्य अपनेसे भिन्न दूसरे द्रव्यकी क्रिया करनेमें सर्वथा असमर्थ है (देखो प्रवचनसार अ० २ गा० ९५ जयसेनीय टीका)। क्या एक द्रव्य दूसरे द्रव्यकी पर्यायमें विशेषता उत्पन्न कर देता है यह सहयोगका अर्थ है? किन्तु जब कि एक द्रव्यका गुणधर्म दूसरे द्रव्यमें संक्रमित ही नहीं हो सकता ऐसी अवस्थामें एक द्रव्य दूसरे द्रव्यकी पर्यायमें विशेषता उत्पन्न कर देता है यह कहना किसी भी अवस्थामें परमार्थभूत नहीं माना जा सकता (देखो समयसार गाथा १०३ और उसकी आत्मख्याति टीका)। उपादान अनेक योग्यतावाला होता है, इसलिए बाह्य सामग्री उसे एक योग्यता द्वारा एक कार्य करनेमें ही प्रवृत्त करती रहती है क्या यह सहयोगका अर्थ है? किन्तु अपर पक्षकी यह तर्कणा भी असंगत है, क्योंकि आगममें विशिष्ट पर्याययुक्त द्रव्यको ही कार्यकारी माना गया है ( देखो अष्टसहस्री पृ० १५०, स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा २३०, श्लोकवार्तिक पृ० ६९ तथा प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० २०० आदि )। क्या क्षेत्रप्रत्यासत्ति या भावप्रत्यासत्तिके होनेपर उपादानमें कार्य होता है यह सहयोगका अर्थ है ? किन्तु सहयोगका यह अर्थ करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि देशप्रत्यासत्ति और भावप्रत्यासत्तिके होनेपर अन्य द्रव्य नियमसे अन्यके कार्यको उत्पन्न करता है ऐसा कोई नियम नहीं है ( देखो श्लोकवार्तिक पृ० १५१ )। इस प्रकार सहयोगका अर्थ उक्त प्रकारसे करना तो बनता नहीं। उक्त विकल्पोंके आधारपर जितनी भी तर्कणाएँ की जाती हैं वे सब असत् ठहरती हैं। अब रही कालप्रत्यासत्ति सो यदि अपर पक्ष बाह्य सामग्री उपादानके कार्यमें सहयोग करती है इसका अर्थ कालप्रत्यासत्तिरूप करता है तो उसके द्वारा सहयोगका यह अर्थ किया जाना आगम, तर्क और अनुभवसम्मत है, क्योंकि प्रकृतमें ‘कालप्रत्यासत्ति’ पद जहाँ कालकी विवक्षित पर्यायको सूचित करता है वहाँ वह विवक्षित पर्याययुक्त बाह्याभ्यन्तर सामग्रीको भी सूचित करता है। प्रत्येक समयमें प्रत्येक द्रव्यको अपना कार्य करनेके लिए ऐसा योग नियमसे मिलता है और उसके मिलनेपर प्रत्येक समयमें प्रतिनियत कार्यकी उत्पत्ति भी होती है, ऐसा ही द्रव्यस्वभाव है। उसमें किसीका हस्तक्षेप करना सम्भव नहीं। स्पष्ट है कि प्रकृतमें निमित्तके सहयोगकी चर्चा करके अपर पक्षने स्वप्रत्यय और स्व-परप्रत्यय परिणमनोंके विषयमें जो कुछ भी लिखा है वह आगम, तर्क और अनुभवपूर्ण न होनेसे तत्त्वमीमांसामें ग्राह्य नहीं माना जा सकता।

इस प्रकार पूर्वोक्त विवेचनके आधारपर हमारा यह लिखना सर्वथा युक्तियुक्त है कि ‘निमित्त कारणोंमें पूर्वोक्त दो भेद होनेपर भी उनकी निमित्तता प्रत्येक द्रव्यके कार्यके प्रति समान है।’ यही जैनदर्शनका आशय है। अनादिकालसे जैन संस्कृति इसी आधारपर जीवित चली आ रही है और अनन्त काल तक एकमात्र इसी आधार पर जीवित रहेगी। इससे अपर पक्ष यह अच्छी तरहसे जान सकता है कि जैन संस्कृतिके विरुद्ध अपर पक्षकी ही मान्यता है, हमारी नहीं। विचारकर देखा जाय तो हरिवंशपुराण सर्ग ५८ का यह कथन तो जैन संस्कृतिका प्राण है-

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्राम्यति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते ॥१२॥

यह आत्मा स्वयं अपना कार्य करता है, स्वयं उसके फलको भोगता है, स्वयं ही संसारमें परिभ्रमण करता है और स्वयं ही उससे मुक्त होता है ॥१२॥

मालूम नहीं अपर पक्ष पराश्रित जीवनका समर्थनकर किस उलझनमें पड़ा हुआ है, इसे वह जाने। वैज्ञानिकोंकी भौतिक खोजसे हम भलीभाँति परिचित हैं। उससे तो यही सिद्ध होता है कि किस विशिष्ट पर्याय युक्त बाह्याभ्यन्तर सामग्रीके सद्भावमें क्या कार्य होता है। हमें मालूम हुआ है कि जापानमें दो नगरोंपर अणुबमका विस्फोट होनेपर जहाँ असंख्य प्राणी कालकवलित हुए वहाँ बहुतसे क्षुद्र जन्तु रेंगते हुए भी पाये गये। क्या इस उदाहरणसे उपादानके स्वकार्यकर्तृत्वकी प्रसिद्धि नहीं होती है, अपि तु अवश्य होती है।

आगे अपर पक्षने हमारे द्वारा उल्लिखित स्वामी समन्तभद्रकी ‘बाह्येतरोपाधि’ इत्यादि कारिकाकी चर्चा करते हुए हमारी मान्यताके रूपमें लिखा है कि सम्भवतः हम यह मानते हैं कि ‘उपादान स्वयं कार्योत्पत्तिके समय अपने अनुकूल निमित्तोंको एकत्रित कर लेता है।’ किन्तु अपर पक्षने हमारे किस कथनके आधारपर हमारा यह अर्थ फलित किया है यह हम नहीं समझ सके। हमने भट्टाकलंकदेवकी अष्टशतीके ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इस वचनको प्रमाणरूपमें अवश्य ही उद्धृत किया है और वह निर्विवादरूपसे प्रमाण है। पर उससे भी उक्त आशय सूचित नहीं होता। निमित्तोंको जुटानेकी बात अपर पक्षकी ओरसे ही यथार्थ मानी जाती है। उसकी ओरसे इस आशयका कथन ५वीं शंकाके तीसरे दौरमें किया भी गया है। हम तो ऐसे कथनको केवल विकल्पका परिणाम ही मानते हैं। अतएव इस बातको लेकर अपर पक्षने यहाँ पर ‘द्रव्यगतस्वभावः’ पदकी जो भी विवेचना की है वह युक्त नहीं है। किन्तु उसका आशय इतना ही है कि जिसे आगममें स्वप्रत्यय परिणाम ( स्वभाव पर्याय ) कहा है और जिसे आगममें स्व-परप्रत्यय ( विभाव पर्याय ) कहा है वह सब बाह्य-आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रतामें होता है ऐसा द्रव्यगत स्वभाव है।

आगे अपर पक्षने हमारे कथनको उद्धृतकर मोक्षको स्व-परप्रत्यय सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है। किन्तु आगममें इसे किस रूपमें स्वीकार किया गया है इसके विस्तृत विवेचनमें तत्काल न पड़कर उसकी पुष्टिमें एक आगमप्रमाण दे देना उचित समझते हैं। पंचास्तिकाय गाथा ३६ की आचार्य अमृतचन्द्र कृत टीकामें लिखा है-

सिद्धो हि उभयकर्मक्षये स्वयमात्मानमुत्पादयन्नान्यत्किंचिदुत्पादयति।

उभय कर्मका क्षय होनेपर सिद्ध स्वयं आत्मा ( सिद्ध पर्याय ) को उत्पन्न करते हुए अन्य किसीको उत्पन्न नहीं करते।

इससे स्वप्रत्यय पर्याय और स्व-परप्रत्यय पर्यायके कथनमें अन्तर्निहित रहस्यका स्पष्ट ज्ञान हो जाता है। किन्तु अपर पक्ष इन दोनोंको एक कोटिमें रखकर उक्त रहस्यको दृष्टिपथमें नहीं ले रहा है इतना ही हम यहाँ कहना चाहेंगे।

हमने पंचास्तिकायका अनन्तर पूर्व ही वचन उद्धृत किया है। उसका जो आशय है वही आशय तत्त्वार्थसूत्रके ‘बन्धहेत्वभाव-’ इत्यादि वचनका भी है।

यहाँ अपर पक्षने करणानुयोग और चरणानुयोगकी चर्चाकर जो निश्चयचारित्र और व्यवहारचारित्रके एक साथ होनेका संकेत किया है सो उसका हमारी ओरसे कहाँ निषेध किया गया है। हमारा कहना तो इतना ही है कि निश्चयचारित्रके साथ होनेवाला पंच महाव्रतादिरूप परिणाम व्यवहारचारित्र संज्ञाको प्राप्त होता है। अन्यथा मोक्षमार्गकी दृष्टिसे वह निष्फल है। साथ ही पंच महाव्रतादिरूप परिणाम उसी अवस्थामें निश्चयचारित्रका कारण अर्थात् व्यवहारहेतु कहा जाता है जब कि निश्चयचारित्रसे वह अनुप्राणित होता रहे। स्वभावके आलम्बन द्वारा अन्तर्मुख होनेसे आत्मामें जो निश्चयचारित्ररूप शुद्धि उत्पन्न होती है उसका मूल हेतु तो आत्माका आत्मस्वभावके सन्मुख होना ही है। अबुद्धिपूर्वक या बुद्धिपूर्वक संज्वलन परिणाम मात्र उसके अस्तित्वका विरोधी नहीं, इसलिए व्यवहारचारित्र संज्ञक वह व्यवहारनयसे निश्चयचारित्रका साधक कहा गया है। एतद्विषयक आगममें जितने वचन मिलते हैं उनका एकमात्र यही आशय है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए समयसार कलशमें कहा भी है-

क्लिश्यन्तां स्वयमेव दुष्करतरैर्मोक्षोन्मुखैः कर्मभिः,
क्लिश्यन्तां च परे महाव्रततपोभारेण भग्नाश्चिरम्।
साक्षान्मोक्ष इदं निरामयपदं संवेद्यमानं स्वयं
ज्ञानं ज्ञानगुणं विना कथमपि प्राप्तुं क्षमन्ते न हि ॥१४२॥

कोई जीव दुष्करतर और मोक्षसे पराङ्मुख कर्मोंके द्वारा स्वयमेव ( जिनाज्ञाके विना ) क्लेश पाते हैं तो पाओ और अन्य कोई जीव ( मोक्षोन्मुख अर्थात् कथंचित् जिनाज्ञामें कथित ) महाव्रत और तपके भारसे बहुत समय तक भग्न होते हुए क्लेश करें तो करो, किन्तु जो साक्षात् मोक्षस्वरूप है, निरामयका स्थान है और स्वयं संवेद्यमान है ऐसे इस ज्ञानको ज्ञानगुणके विना किसी भी प्रकारसे वे प्राप्त नहीं कर सकते ॥ १४२ ॥

इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि परम वीतराग चारित्रकी प्राप्तिका साक्षात् मार्ग एकमात्र स्वभाव सन्मुख हो तन्मय होकर परिणमना ही है, इसके सिवाय अन्य सब निमित्तमात्र है। यही कारण है कि आचार्य कुन्दकुन्दने समयसारमें गृहस्थ और मुनियों द्वारा ग्रहण किये गये द्रव्यलिंगके विकल्पको छोड़कर दर्शन-ज्ञान-चारित्रस्वरूप मोक्षमार्गमें अपने आत्माको युक्त करनेका उपदेश दिया है। समयसारका वह वचन इस प्रकार है-

तम्हा जहित्तु लिंगे सागारणगारएहिं व गहिए।
दंसण-णाण-चरित्ते अप्पाणं जुंज मोक्खपहे ॥४११॥

इसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

यतो द्रव्यलिंगं न मोक्षमार्गः ततः समस्तमपि द्रव्यलिंगं त्यक्त्वा दर्शन-ज्ञान-चारित्रे चैव मोक्षमार्गत्वात् आत्मा योक्तव्य इति सूत्रानुमतिः ॥४११॥

यतः द्रव्यलिंग मोक्षमार्ग नहीं है, अतः सभी द्रव्यलिंगोंको छोड़कर मोक्षमार्ग होनेसे दर्शन-ज्ञान-चारित्रमें ही आत्माको युक्त करना चाहिए ऐसा परमागमका उपदेश है ॥४११॥

अपर पक्षका कहना है कि ‘भावलिंग होनेसे पूर्व द्रव्यलिंगको तो उसकी उत्पत्तिके लिए कारणरूपसे मिलाया जाता है।’ किन्तु अपर पक्षका यह कथन इसीसे भ्रान्त ठहर जाता है कि एक द्रव्यलिंगी साधु आठ वर्ष अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि काल तक द्रव्यलिंगको धारण करके भी उस द्वारा एक क्षणके लिए भी भावलिंगको धारण नहीं कर पाता और आत्माके सन्मुख हुआ एक गृहस्थ परिणाम विशुद्धिकी वृद्धिके साथ बाह्यमें निर्ग्रन्थ होकर अन्तर्मुहूर्तमें क्षपकश्रेणिका अधिकारी होता है। स्पष्ट है कि जो द्रव्यलिंग भावलिंगका सहचर होनेसे निमित्त संज्ञाको प्राप्त होता है वह मिलाया नहीं जाता, किन्तु परिणाम विशुद्धिकी वृद्धिके साथ स्वयमेव प्राप्त होता है। आगममें द्रव्यलिंगको मोक्षमार्गका उपचारसे साधक कहा है तो ऐसे ही द्रव्यलिंगको कहा है। मिथ्या अहंकारसे पुष्ट हुए बाह्य क्रियाकाण्डके प्रतीकस्वरूप द्रव्यलिंगको नहीं। अपरपक्षने

युगपत् होते हू प्रकाश दीपक तें होइ।-छहढाला ढाल ४,१

वचनको उद्धृतकर यह स्वयं ही स्पष्ट कर दिया है कि निश्चय चारित्रका सहचर द्रव्यलिंग ही आगममें व्यवहारनयसे उसका साधन कहा गया है। अतः पूर्वमें धारण किया गया द्रव्यलिंग भावलिंगका साधन है, अपर पक्षके इस कथनका महत्त्व सुतरां कम हो जाता है। थाली भोजनका साधन कहा जाता है, पर जैसे थालीसे भोजन नहीं किया जाता उसी प्रकार अन्य जिन साधनोंका उल्लेख यहाँ पर अपर पक्षने किया है उनके विषयमें जान लेना चाहिए। वे यथार्थ साधन नहीं हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। मुख्य साधन वह कहलाता है जो स्वयं अपनी क्रिया करके कार्यरूप परिणमता है। अन्यको यथार्थ साधन कहना कल्पनामात्र है। यह प्रत्यक्षसे ही दिखलाई देता है कि बाह्य सामग्री न तो स्वयं कार्यरूप ही परिणमती है और न कार्यद्रव्यकी क्रिया ही करती है। ऐसी अवस्थामें उन्हें यथार्थ साधन कहना मार्गमें किसीको लुटता हुआ देखकर ‘मार्ग लुटता है’ इस कथनको यथार्थ माननेके समान ही है।

शंका १, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ३/३)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ७० से ७५

↑ सूची


अपर पक्षने हमारे कथनको ध्यानमें लिये बिना जो कार्य-कारणभावका उल्टा चित्र उपस्थित किया है वह इसलिए ठीक नहीं, क्योंकि न तो उपादानके कारण निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीको उपस्थित होना पड़ता है और न ही निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीके कारण उपादानको ही उपस्थित होना पड़ता है। यह सहज योग है जो प्रत्येक कार्यमें प्रत्येक समयमें सहज ही मिलता रहता है। ‘मैंने अमुक कार्यके निमित्त मिलाये’ यह भी कथनमात्र है जो पुरुषके योग और विकल्पको लक्ष्यमें रखकर किया जाता है। वस्तुतः एक द्रव्य दूसरे द्रव्यकी क्रियाका कर्ता त्रिकालमें नहीं हो सकता। अतः यहाँ हमारे कथनको लक्ष्यमें रखकर अपर पक्षने कार्य-कारणभावका जो उल्टा चित्र उपस्थित किया है उसे कल्पनामात्र ही जानना चाहिए।

हमारा ‘उपादानके अनुसार भावलिंग होता है।’ यह कथन इसलिए परमार्थभूत है, क्योंकि कर्मके क्षयोपशम और भावलिंगके एक कालमें होनेका नियम होनेसे उपचारसे यह कहा जाता है कि योग्य क्षयोपशमके अनुसार आत्मामें भावलिंगकी प्राप्ति होती है। जिस पंचास्तिकायका यहाँ अपर पक्षने हवाला दिया है उसी पंचास्तिकाय गाथा ५८ में पहले सब भावोंको कर्मकृत बतलाकर गाथा ५९ में उसका निषेध कर यह स्पष्ट कर दिया है कि आत्माके भावोंको स्वयं आत्मा उत्पन्न करता है, कर्म नहीं। अतः चारित्रमोहनीय कर्मके क्षयोपशमके अनुसार भावलिंग होता है इसे यथार्थ कथन न समझकर अपने उपादानके अनुसार भावलिंग होता है इसे ही आगमसम्मत यथार्थ कथन जानना चाहिए। इस परसे अपर पक्ष भी स्वयं निर्णय कर सकता है कि यथार्थ कथन अपर पक्षका न होकर हमारा ही है।

आगे अपर पक्षने निमित्त व्यवहारको यथार्थ सिद्ध करनेके लिए उलाहनेके रूपमें जो कुछ भी वक्तव्य दिया है उससे इतना ही ज्ञात होता है कि अपर पक्ष किस नयकी अपेक्षा क्या वक्तव्य आगममें किया गया है इस ओर ध्यान न देकर मात्र अपनी मान्यताको आगम बनानेके फेरमें है, अन्यथा वह पक्ष असद्भूत व्यवहारनयके वक्तव्यको असद्भूत मानकर इस नयकी अपेक्षा कथन आगममें किस प्रयोजनसे किया गया है उसपर दृष्टिपात करता। विशेष खुलासा हम पूर्वमें ही कर आये हैं, इसलिए यहाँ उन सब तथ्योंका पुनः खुलासा नहीं करते।

प्रवचनसार गाथा १६९ की आचार्य अमृतचन्द्र कृत टीकामें ‘स्वयं’ पद आया है। हमने इसका अर्थ प्रकृत शंकाके प्रथम उत्तरमें ‘स्वयं’ ही किया है। किन्तु अपर पक्षको यह अर्थ मान्य नहीं। वह इसका अर्थ ‘अपने रूप’ करता है। इसके समर्थनमें उस पक्षकी मुख्य युक्ति यह है कि सहकारी कारणके बिना कोई भी परिणति नहीं होती, इसलिए कार्य-कारणभावके प्रसंगमें सर्वत्र इस पदका अर्थ ‘अपने रूप’ या ‘अपनेमें’ करना ही उचित है। इस प्रकार अपर पक्षके इस कथनसे मालूम पड़ता है कि वह पक्ष उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यस्वरूप प्रत्येक सत्की उत्पत्ति परकी सहायतासे या परसे होती है यह सिद्ध करना चाहता है। किन्तु उस पक्षकी यह मान्यता सर्वथा आगमविरुद्ध है, अतएव जहाँ भी निश्चयनयकी अपेक्षा कथन किया गया है वहाँ प्रत्येक कार्य यथार्थमें परनिरपेक्ष ही होता है इस सिद्धान्तको ध्यानमें रखकर ‘स्वयमेव’ पदका ‘स्वयं ही’ अर्थ करना उचित है। इतना अवश्य है कि यदि विस्तारसे ही इस पदका अर्थ करना हो तो निश्चय षट्कारकरूप भी इस पदका अर्थ किया जा सकता है, क्योंकि प्रत्येक द्रव्य निश्चयसे आप कर्ता होकर अपनेमें अपने लिए अपनी पिछली पर्यायका अपादान करके अपने द्वारा अपनी पर्यायरूपको आप उत्पन्न करता है। इसमें परका अणुमात्र भी योगदान नहीं होता। हाँ असद्भूत व्यवहारनयसे परसापेक्ष कार्य होता है यह कहना अन्य बात है। किन्तु इस कथनको परमार्थभूत नहीं जानना चाहिए। यही कारण है कि समयसारमें सर्वत्र व्यवहार पक्षको उपस्थितकर निश्चयनयके कथन द्वारा असत् कहकर उसका निषेध कर दिया गया है। कार्य-कारणभावमें भी इसी पद्धतिको अपनाया गया है।

अपर पक्षने प्रवचनसार गाथा १६९ की उक्त टीकाके आधारसे यह चर्चा चलाई है। उसमें ‘पुद्गलस्कन्धाः स्वयमेव कर्मभावेन परिणमन्ति’ यह वाक्य आया है, जिसका अर्थ होगा-‘पुद्गलस्कन्ध स्वयं ही कर्मरूपसे परिणमते हैं।’ जैसा कि अपर पक्षका कहना है उसके अनुसार यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि-‘पुद्गलस्कन्ध अपनेरूप कर्मरूपसे परिणमते हैं।’ क्योंकि ऐसा अर्थ करने पर ‘अपने रूप’ तथा ‘कर्मरूपसे’ इन दोनों वचनोंमें एक वचन पुनरुक्त हो जाता है।

अपर पक्षने इसी प्रसंगमें समयसार ११६ से १२० तककी गाथाएँ उपस्थित कर इन गाथाओंकी अवतरणिकामें ‘स्वयमेव’ पद न होनेके कारण सर्व प्रथम यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि आचार्य कुन्दकुन्द इन गाथाओं द्वारा परिणामस्वभावकी सिद्धि कर रहे हैं, अपने आप (स्वतःसिद्ध) परिणामस्वभावकी सिद्धि नहीं कर रहे हैं। किन्तु अपर पक्ष इस बातको भूल जाता है कि जिसका जो स्वभाव होता है वह उसका स्वरूप होनेसे स्वतःसिद्ध होता है, इसलिए आचार्य अमृतचन्द्रने उक्त गाथाओंकी अवतरणिकामें ‘स्वयमेव’ पद न देकर प्रत्येक द्रव्यकी स्वतःसिद्ध स्वरूपस्थितिका ही निर्देश किया है। अतएव उक्त अवतरणिकाके आधारसे अपर पक्षने जो यह लिखा है कि ‘उक्त गाथाओं द्वारा केवल वस्तुके परिणामस्वभावकी सिद्धि करना ही आचार्यको अभीष्ट रही है अपने आप परिणामस्वभावकी नहीं।’ वह युक्त प्रतीत नहीं होता।

इसी प्रसंगमें दूसरी आपत्ति उपस्थित करते हुए अपर पक्षने लिखा है कि ‘गाथा ११७ के उत्तरार्धमें जो संसारके अभावकी अथवा सांख्यमतकी प्रसक्तिरूप आपत्ति उपस्थित की है वह पुद्गलको परिणामी स्वभाव न मानने पर ही उपस्थित हो सकती है अपने आप (स्वतःसिद्ध) परिणामी स्वभावके अभावमें नहीं।’ आदि। किन्तु यह आपत्ति इसलिए ठीक नहीं; क्योंकि प्रत्येक द्रव्यको परतः परिणामस्वभावी मान लेनेपर एक तो वह द्रव्यका स्वभाव नहीं ठहरेगा और ऐसी अवस्थामें द्रव्यका ही अभाव मानना पड़ेगा। दूसरे यह जीव पुद्गल कर्मसे सदा ही बद्ध बना रहेगा, अतएव मुक्तिके लिए यह आत्मा स्वतन्त्ररूपसे प्रयत्न भी न कर सकेगा। यदि अपर पक्ष इस आपत्तिको उपस्थित करते समय गाथा ११६ के पूर्वार्धपर दृष्टिपात कर लेता तो उसके द्वारा यह आपत्ति ही उपस्थित न की गई होती। पुद्गल अपने परिणाम स्वभावके कारण आप स्वतन्त्र कर्ता होकर जीवके साथ बद्ध है और आप मुक्त होता है, इसीसे बद्ध दशामें जीवका संसार बना हुआ है। यदि ऐसा न माना जाय और पुद्गलको स्वभावसे अपरिणामी माना जाय तो एक तो संसारका अभाव प्राप्त होता है, दूसरे सांख्यमतका प्रसंग आता है यह उक्त गाथाओंका तात्पर्य है, न कि यह जिसे अपर पक्ष फलित कर रहा है। स्पष्ट है कि यह दूसरी आपत्ति भी प्रकृतमें अपर पक्षके इष्टार्थकी सिद्धि नहीं करती। आचार्य अमृतचन्द्रने इस विषयको विशदरूपसे स्पष्ट करते हुए लिखा है-

अथ जीवः पुद्गलद्रव्यं कर्मभावेन परिणमयति ततो न संसाराभावः इति तर्कः? किं स्वयमपरिणममानं परिणममानं वा जीवः पुद्गलद्रव्यं कर्मभावेन परिणामयेत् ? न तावत्तत्स्वयमपरिणममानं
परेण परिणमयितुं पार्येत । न हि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तुमन्येन पार्येत । स्वयं परिणममानं तु न परं परिणमयितारमपेक्षेत । न हि वस्तुशक्तयः परमपेक्षन्ते । ततः पुद्गलद्रव्यं परिणामस्वभावं स्वयमेवास्तु । तथा सति कलशपरिणता मृत्तिका स्वयं कलश इव जडस्वभावज्ञानावरणादिकर्मपरिणतं तदेव स्वयं ज्ञानावरणादि कर्म स्यात् । इति सिद्धं पुद्गलद्रव्यस्य परिणामस्वभावत्वम् ।

इसका अर्थ करते हुए पं० श्री जयचन्दजी लिखते हैं-

और जो ऐसा तर्क करे कि जीव पुद्गल द्रव्यको कर्म भावकर परिणमाता है इसलिये संसारका अभाव नहीं हो सकता ? उसका समाधान यह है कि पहले दो पक्ष लेकर पूछते हैं-जो जीव पुद्गलको परिणमाता है वह स्वयं अपरिणमतेको परिणमाता है या स्वयं परिणमतेको परिणमाता है ? उनमेंसे पहला पक्ष लिया जाय तो स्वयं अपरिणमतेको नहीं परिणमा सकता, क्योंकि आप न परिणमतेको परके (द्वारा) परिणमानेकी सामर्थ्य नहीं होती, स्वतः शक्ति जिसमें नहीं होती वह पर कर भी नहीं की जा सकती । और जो पुद्गलद्रव्यको स्वयं परिणमतेको जीव कर्मभावकर परिणमाता है ऐसा दूसरा पक्ष लिया जाय तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि अपने आप परिणमते हुए को अन्य परिणमानेवालेकी आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि वस्तुकी शक्ति परकी अपेक्षा नहीं करती । इसलिये पुद्गलद्रव्य परिणामस्वभाव स्वयमेव होवे । ऐसा होने पर जैसे कलशरूप परिणत हुई मिट्टी अपने आप कलश ही है उसी तरह जड़ स्वभाव ज्ञानावरण आदि कर्मरूप परिणत हुआ पुद्गल द्रव्य ही आप ज्ञानावरण आदि कर्म ही है । ऐसे पुद्गल द्रव्यको परिणामस्वभावता सिद्ध हुआ ।

यह परमागमकी स्पष्टोक्ति है जो निश्चयपक्ष और व्यवहारपक्षके कथनका आशय क्या है इसे विशदरूपसे स्पष्ट कर देती है । निश्चयनयसे देखा जाय तो प्रत्येक द्रव्य स्वयं परिणामस्वभाववाला होनेसे अपने उत्पाद-व्ययरूप परिणामको अपनेमें, अपने द्वारा, अपने लिए, आप ही करता है । उसे इसके लिये परकी सहायताकी अणुमात्र भी अपेक्षा नहीं होती । यह कथन वस्तुस्वरूपको उद्घाटन करनेवाला है, इसलिए वास्तविक है, कथनमात्र नहीं है । व्यवहारनयसे देखा जाय तो कुम्भकारके विवक्षित क्रिया परिणामके समय मिट्टीका विवक्षित क्रियापरिणाम दृष्टिपथमें आता है, यतः कुम्भकारका विवक्षित क्रिया परिणाम मिट्टीके घटपरिणामकी प्रसिद्धिका निमित्त (हेतु) है, अतः इस नयसे यह कहा जाता है कि कुम्भकारने अपने क्रियापरिणामद्वारा मिट्टीमें घट किया । यतः यह कथन वस्तुस्वरूपको उद्घाटन करनेवाला न होकर उसे आच्छादित करनेवाला है, अतःवास्तविक नहीं है, कथनमात्र है । परमागममें निश्चयनयको प्रतिषेधक और व्यवहारनयको प्रतिषेध्य क्यों बतलाया गया है यह इससे स्पष्ट हो जाता है । स्वरूपका उपादान और पररूपका अपोहन करना यह जब कि वस्तुका वस्तुत्व है । ऐसी अवस्थामें उस द्वारा असत् पक्षको कहनेवाले व्यवहारनयका अपोहन अपने आप हो जाता है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए अष्टसहस्री पृ० १३१ में लिखा है-

स्वपररूपोपादानापोहनव्यवस्थापाद्यत्वाद्वस्तुनि वस्तुत्वस्य ।

अर्थ पूर्वमें लिखा ही है ।

व्यवहारनय असत् पक्षको कहनेवाला है यह इसीसे स्पष्ट है कि वह अन्यके धर्मको अन्यका कहता है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य अमृतचन्द्रने समयसार गाथा ५६ की टीकामें यह वचन लिखा है-

इह हि व्यवहारनयः किल पर्यायाश्रितत्वाज्जीवस्य पुद्गलसंयोगवशादनादिप्रसिद्धवन्धपर्यायस्य कुसुम्भरक्तस्य कार्पासिकवासस इवौपाधिकं भावमवलम्ब्योत्प्लवमानः परभावं परस्य विदधाति ।

यहाँ व्यवहारनय पर्यायाश्रित होनेसे कुसुम्बी रंगसे रंगे हुए तथा सफेद रूईसे बने हुए वस्त्रके औपाधिक भावकी भाँति पुद्गलके संयोगवश अनादिकालसे जिसकी बन्ध पर्याय प्रसिद्ध है ऐसे जीवके औपाधिक भावका अवलम्बन लेकर प्रवर्तमान होता हुआ दूसरेके भावको दूसरेके कहता है ।

पण्डितप्रवर टोडरमलजीने अपने मोक्षमार्गप्रकाशक अध्याय ७के अनेक स्थलोंपर निश्चय-व्यवहारके विषयमें इसी कारण यह लिखा है-

तहाँ जिन आगम विषै निश्चय-व्यवहाररूप वर्णन है। तिनविषै यथार्थका नाम निश्चय है, उपचारका नाम व्यवहार है । ( पृ० २८७ )

एक ही द्रव्यके भावको तिस स्वरूप ही निरूपण करना सो निश्चयनय है। उपचारकरि तिस द्रव्यके भावकौं अन्य द्रव्यके भावस्वरूप निरूपण करना सो व्यवहार है । ( पृ० ३६९ )

इस प्रकार इतने विवेचन द्वारा यह सुगमतासे समझमें आ जाता है कि समयसारकी उक्त गाथाओं द्वारा पुद्गल द्रव्यके स्वतःसिद्ध परिणामस्वभावका ही कथन किया गया है। जब कि पुद्गलद्रव्य परकी अपेक्षा किये विना स्वरूपसे स्वयं परिणामीस्वभाव है ऐसी अवस्थामें वह परसापेक्ष परिणामीस्वभाव है इसका निषेध ही होता है, समर्थन नहीं यह बात इतनी स्पष्ट है जितना कि सूर्यका प्रकाश ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘यदि इन गाथाओंमें ‘स्वयं’ शब्दका अर्थ ‘अपने आप’ ग्राह्य माना जायगा तो गाथा ११७ के पूर्वार्धमें भी ‘स्वयं’ शब्दके पाठकी आवश्यकता अनिवार्य हो जायगी । ऐसी हालतमें उसमें आचार्य कुन्दकुन्द ‘स्वयं’ शब्दके पाठ करनेकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे ।’

इसका समाधान यह है कि एक तो गाथा ११६ और गाथा ११८ में आये हुए ‘स्वयं’ पदकी अनुवृत्ति हो जानेसे गाथा ११७ के अर्थकी संगति बैठ जाती है, इसलिए अपर पक्षने गाथा ११७ के पूर्वार्धमें ‘स्वयं’ पदको न देखकर जो आपत्ति उपस्थित की है वह ठीक नहीं । दूसरे समयसारकी इस गाथाको गाथा १२२ के प्रकाशमें पढ़नेपर यह स्पष्ट विदित हो जाता है कि इस गाथामें आचार्यको ‘स्वयं’ पद इष्ट है । गाथा १२२ में वही बात कही गयी है जिसका निर्देश गाथा ११७ में आचार्यने किया है । अन्तर केवल इतना ही है कि गाथा १२२ में जीवको विवक्षित कर उक्त विषयका विवेचन किया गया है और गाथा ११७ में पुद्गलको विवक्षित कर उक्त विषयका विवेचन किया गया है । अभिप्रायकी दृष्टिसे दोनोंका प्रतिपाद्य विषय एक ही है । अतः गाथा ११७ के पूर्वार्धमें ‘स्वयं’ पदको न देखकर अपर पक्षने जो उक्त सभी गाथाओंमें ‘स्वयं’ पदके ‘अपने आप’ ‘स्वयं ही’ अर्थ करनेमें आपत्ति उपस्थित की है वह ठीक नहीं ।

इस प्रकार उक्त विवेचनसे एकमात्र यही सिद्ध होता है कि पुद्गल स्वयं परिणामीस्वभाव है और साथ ही उक्त विवेचनसे यह अभिप्राय सुतरां फलित हो जाता है कि अपरपक्षने अपने तर्कोंके आधारपर उक्त गाथाओंका जो अर्थ किया है वह ठीक नहीं है । वैसे तो यहाँपर उक्त गाथाओंका अर्थ देनेकी आवश्यकता नहीं थी । किन्तु अपर पक्षने जब उनका अपनी मतिसे कल्पित अर्थ अपनी प्रस्तुत प्रतिशंकामें दिया है, ऐसी अवस्थामें यहाँ सही अर्थ दे देना आवश्यक है। वह इस प्रकार है-

यदि यह पुद्गल द्रव्य जीवमें स्वयं नहीं बँधा और कर्मभावसे स्वयं नहीं परिणमता तो वह अपरिणामी सिद्ध होता है । ऐसी अवस्थामें कर्मवर्गणाओंके कर्मरूपसे स्वयं नहीं परिणमनेपर संसारका अभाव प्राप्त होता है अथवा सांख्यमतका प्रसंग आता है । यदि यह माना जाय कि जीव पुद्गल द्रव्योंको कर्मरूपसे परिणमाता है तो ( प्रश्न होता है कि ) स्वयं नहीं परिणमते हुए उन पुद्गल द्रव्योंको चेतन आत्मा कैसे परिणमा सकता है । इसलिए यदि यह माना जाय कि पुद्गल द्रव्य अपने आप ही कर्मरूपसे परिणमता है तो जीव कर्म अर्थात् पुद्गल द्रव्यको कर्मरूपसे परिणमाता है यह कथन मिथ्या सिद्ध होता है । इसलिए जैसे नियमसे कर्मरूप परिगत पुद्गल द्रव्य कर्म ही है वैसे ही ज्ञानावरणादिरूप परिणत पुद्गल द्रव्य ज्ञानावरणादि ही है ऐसा जानो ॥११६-१२०॥

इस प्रकार इस अर्थपर दृष्टिपात करनेसे ये दो तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं-प्रथम तो यह कि अपर पक्षने उक्त गाथाओंका जो अर्थ किया है वह उन गाथाओंकी शब्दयोजनासे फलित नहीं होता । दूसरे इन गाथाओंमें आये हुए ‘स्वयं’ पदका जो मात्र ‘अपने रूप’ अर्थ किया है वह ऐकान्तिक होनेसे ग्राह्य नहीं है । कर्ताके अर्थमें उसका अर्थ ‘स्वयं ही’ या ‘आप ही’ करना संगत है । और यह बात आगमविरुद्ध भी नहीं है, क्योंकि निश्चयनयसे प्रत्येक द्रव्य आप कर्ता होकर अपने परिणामको उत्पन्न करता है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए समयसारमें कहा भी है-

जं भावं सुहमसुहं करेदि आदा स तस्स खलु कत्ता ।
तं तस्स होदि कम्मं सो तस्स दु वेदगो अप्पा ॥१०२॥

आत्मा जिस शुभ या अशुभ अपने भावको करता है उस भावका वह वास्तवमें कर्ता होता है और वह भाव उसका कर्म होता है और वह आत्मा कर्मरूप उस भावका भोक्ता होता है ॥१०२॥

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए हरिवंशपुराण सर्ग ५८ में भी कहा है-

अविद्यारागसंश्लिष्टो बम्भ्रमीति भवार्णवे ।
विद्यावैराग्यशुद्धः सन् सिद्धगत्यविकलस्थितिः ॥१३॥
इत्यध्यात्मविशेषस्य दीपिका दीपिकेव सा ।
रूपादेः समयत्याशु तमिस्रं तत्र सन्ततम् ॥१४॥

अविद्यारागसे संश्लिष्ट हुआ यह जीव संसाररूपी समुद्रमें घूमता रहता है और विद्यावैराग्यसे शुद्ध होकर सिद्धगतिमें अविकल स्थितिवाला होता है ॥१३॥ यह अध्यात्म विशेषको वतानेवाली दीपिका है । इसलिए जैसे दीपक रूपादि विषयक अन्धकारको शीघ्र नष्ट कर देता है उसी प्रकार यह भी अज्ञानान्धकारको शीघ्र नष्ट कर देता है ॥१४॥

इससे प्रकृतमें स्वयं पदका क्या अर्थ होना चाहिए यह स्पष्ट हो जाता है ।

यहाँ अपर पक्षने ‘स्वयं’ पदके ‘अपने आप’ अर्थका विरोध दिखलानेके लिए जो प्रमाण दिये हैं उनके विषयमें तो हमें विशेष कुछ नहीं कहना है । किन्तु यहाँ हम इतना संकेत कर देना आवश्यक समझते हैं कि एक तो प्रस्तुत प्रश्नके प्रथम व दूसरे उत्तरमें हमने ‘स्वयमेव’ पदका अर्थ ‘अपने आप’ न करके ‘स्वयं ही’ किया है । इस पदका ‘अपने आप’ यह अर्थ अपर पक्षने हमारे कथनके रूपमें प्रस्तुत प्रश्नकी दूसरी प्रतिशंकामें मानकर टीका करनी प्रारम्भ कर दी है जो युक्त नहीं है । हमने इसका विरोध इसलिए नहीं किया कि निश्चयकर्ताके अर्थमें ‘स्वयमेव’ पदका यह अर्थ ग्रहण करनेमें भी कोई आपत्ति नहीं । ऐसी अवस्थामें ‘अपने आप’ पदका अर्थ होगा ‘परकी सहायता विना आप कर्ता होकर ।’ आशय इतना ही है कि जिसकी क्रिया अपनेमें हो, कार्य अपनेमें हो वह दूसरेकी सहायता लिये विना अपने कार्यका आप ही कर्ता होता है, अन्य पदार्थ नहीं।

इस प्रकार प्रवचनसार गाथा १६६ की टीकामें ‘स्वयमेव’ पदका क्या अर्थ लेना चाहिए इसका खुलासा किया। अन्यत्र जहाँ-जहाँ कार्य-कारणभावके प्रसंगसे यह पद आया है वहाँ-वहाँ इस पदका अर्थ करनेमें यही स्पष्टीकरण जानना चाहिये। यदि और गहराईसे विचार किया जाय तो यह पद निश्चय-कर्ताके अर्थमें तो प्रयुक्त हुआ ही है, इसके सिवाय इस पदसे अन्य निश्चयकारकोंका भी ग्रहण हो जाता है।

आगे अपर पक्षने ‘उपचार’ पदके अर्थके विषयमें निर्देश करते हुए धवल पु० ६ पृ० ११ के आधारसे जो उस पदके ‘अन्यके धर्मको अन्यमें आरोपित करना उपचार है।’ इस अर्थको स्वीकार कर लिया है वह उचित ही किया है। उसी प्रकार वह पक्ष समयसार गाथा १०५ में आये हुए ‘उपचार’ पदका भी उक्त अर्थ ग्रहण करेगा ऐसी हमें आशा है, क्योंकि जिस प्रकार धवल पु० ६ पृ० ११ में जीवके कर्तृत्व धर्मका उपचार जीवसे अभिन्न ( एक क्षेत्रावगाही ) मोहनीय द्रव्यकर्ममें करके जीवको मोहनीय कहा गया है उसी प्रकार समयसार गाथा १०५ में कर्मवर्गणाओंके कर्तृत्व धर्मका आरोप जीवमें करके जीवको पुद्गल कर्मका कर्ता कहा गया है। दोनों स्थलोंपर न्याय समान है। यहाँ मोहनीय कर्मोदय जीवके अज्ञानभावके होनेमें निमित्त है। समयसार गाथा १०५में जीवका अज्ञान परिणाम ज्ञानावरणादिरूप कर्म परिणाममें निमित्त है। इस प्रकार दोनों स्थलोंपर बाह्य सामग्रीरूपसे व्यवहार हेतुका सद्भाव है। अतएव समयसार गाथा १०५ में ‘मुख्याभावे सति प्रयोजने’ इत्यादि वचनकी चरितार्थता बन जाती है।

समयसार गाथा १०५ को लक्ष्यमें रखकर अपर पक्षका कहना है कि ‘परन्तु ऐसा उपचार प्रकृतमें सम्भव नहीं है, कारण कि आत्माके कर्तृत्वका उपचार यदि द्रव्यकर्ममें आप करेंगे तो इस उपचारके लिए सर्वप्रथम आपको निमित्त तथा प्रयोजन देखना होगा जिसका कि सर्वथा अभाव है।’ समाधान यह है कि यहाँपर व्यवहारहेतु और व्यवहार प्रयोजनका न तो अभाव ही है और न ही आत्माके कर्तृत्वका उपचार द्रव्यकर्ममें कर रहे हैं। किन्तु प्रकृतमें हम कर्मपरिणामके सन्मुख हुई कर्मवर्गणाओंके कर्तृत्वका आरोप व्यवहारहेतु संज्ञाको प्राप्त अज्ञानभावसे परिणत आत्मामें कर रहे हैं। अतएव ‘अतः यहाँ बाह्य हेतु और बाह्य प्रयोजनका सर्वथा अभाव है, इसलिए उपचारको प्रवृत्ति नहीं हो सकती’ अपर पक्षका ऐसा अभिप्राय व्यक्त करना आगम विरुद्ध तो है ही, तर्क और अनुभवके भी विरुद्ध है। अपर पक्ष यदि उक्त गाथाकी रचनापर दृष्टिपात करे तो उसे ज्ञात होगा कि स्वयं आचार्यने गाथाके पूर्वार्धमें ‘हेदुभूदे’ पदका उल्लेख कर बाह्य निमित्तका निर्देश कर दिया है तथा ‘बंधस्स दु पस्सिदूण परिणामं’ वचनका उल्लेख कर मुख्यकर्ता और मुख्य कर्मकी सूचना कर दी है। फिर भी बाह्य निमित्तके ज्ञान करानेरूप बाह्य प्रयोजनको लक्ष्यमें रखकर मुख्यकर्ताके स्थानमें पुद्गलकर्मवर्गणाओंके कर्तृत्वका उनसे अभिन्न ( एक क्षेत्रावगाही ) अज्ञान परिणत जीवमें उपचार करके उपचारसे उक्त जीवको कर्मका कर्ता कहा गया है। स्पष्ट है कि समयसार गाथा १०५ में उपचार पदका वही अर्थ लिया गया है जिसका कि हम पिछले उत्तरमें संकेत कर आये हैं और जिसे धवल पु० ६ पृ० ११ के ‘मुह्यत इति मोहनीयम्’ वचनके अनुसार अपर पक्षने भी स्वीकार कर लिया है।

इस प्रकार अपर पक्ष द्वारा उपस्थित किये गये मूल प्रश्नका अवान्तर विषयोंके साथ सांगोपांग विचार किया।

शंका २, प्रथम दौर: शंका २ और उसका समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ७६

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प्रथम दौर

: १ :

शंका २

जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म अधर्म होता है या नहीं ?

समाधान

जीवित शरीरकी क्रिया पुद्गल द्रव्यकी पर्याय होनेके कारण उसका अजीव तत्त्वमें अन्तर्भाव होता है, इसलिए वह स्वयं जीवका न तो धर्मभाव है और न अधर्मभाव ही है। मात्र जीवित शरीरकी क्रिया धर्म नहीं है इसे स्पष्ट करते हुए नाटक समयसारमें पण्डितप्रवर बनारसीदासजी कहते हैं-

जे व्यवहारी मूढ़ नर पर्यायबुद्धि जीव।
तिनके बाह्य क्रिया ही को है अवलंब सदीव ॥ १२१ ॥

कुमति बाहिज दृष्टि सो बाहिज क्रिया करंत।
माने मोक्ष परंपरा मनमें हरष धरंत ॥ १२२ ॥

शुद्धातम अनुभव कथा कहे समकिती कोय।
सो सुनिके तासों कहें यह शिवपंथ न होय ॥ १२३ ॥

इस तथ्यका समर्थन आचार्यवर्य अमृतचन्द्रके इस कलशसे होता है-

व्यवहारविमूढदृष्टयः परमार्थं कलयन्ति नो जनाः।
तुषबोधविमुग्धबुद्धयः कलयन्तीह तुषं न तन्दुलम् ॥ २४२ ॥

इस कलशका अर्थ पूर्वोक्त दोहोंसे स्पष्ट है।

इसी विषयपर विशेष प्रकाश डालते हुए परमात्मप्रकाशमें भी कहा है-

घोरु करंतु वि तव-चरणु सयल वि सत्थ मुणंतु।
परमसमाहिविवज्जियउ ण वि देक्खइ सिउ संतु ॥ २-१९१ ॥

अर्थ-जो घोर तपश्चरण करता है और सकल शास्त्रका भी मनन करता है, परन्तु परम समाधिसे रहित है वह राग, द्वेष और मोह आदि दोषोंसे रहित मोक्षको प्राप्त नहीं होता ॥ २-१९१ ॥

फिर भी जीवित शरीरकी क्रियाका धर्म-अधर्मके साथ नोकर्मरूपसे निमित्त-नैमित्तक सम्बन्ध होनेके कारण जीवके शुभ, अशुभ और शुद्ध जो भी परिणाम होते हैं उनको लक्ष्यमें लेते हुए उपचार नयका आश्रय कर जीवित शरीरकी क्रियासे धर्म अधर्म होता है यह कहा जाता है।

शंका २, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ७७ से ७८

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका २

जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म अधर्म होता है या नहीं ?

प्रतिशंका २

हमारे उक्त प्रश्नके उत्तरमें जो आपने यह लिखा है कि ‘जीवित शरीरकी क्रिया पुद्गल द्रव्यकी पर्याय होनेके कारण उसका अजीव तत्त्वमें अन्तर्भाव होता है।’ सो आपका यह लिखना आगम, अनुभव तथा प्रत्यक्षसे विरुद्ध है, क्योंकि जीवित शरीरको सर्वथा अजीव तत्त्व मान लेनेपर जीवित तथा मृतक शरीरमें कुछ अन्तर नहीं रहता। जीवित शरीर इष्ट स्थानपर जाता है, पर मृतक शरीर इष्ट स्थानपर नहीं जा आ सकता । दांतोंसे काटना, मारना, पीटना, तलवार बन्दूक लाठी चलाकर दूसरेका घात करना, पूजा-प्रक्षाल करना, सत्पात्रोंको दान देना, लिखना, केशलोंच करना, देखना, सुनना, सूँघना, बोलना, प्रश्न-उत्तर करना, शराब पीना, मांस खाना आदि क्रियाएँ यदि अजीव तत्त्वकी ही हैं तो इन क्रियाओं-द्वारा आत्माको सन्मान, अपमान, दण्ड, जेल आदि क्यों भोगना पड़ता है ? तथा स्वर्ग-नरक आदि क्यों जाना पड़ता है ?

अणुव्रत, महाव्रत, बहिरङ्ग तप, समिति आदि जीवित शरीरसे ही होते हैं, भगवान् ऋषभदेवने १००० वर्षतक तपस्या शरीर द्वारा की थी। अर्हन्त भगवान्का विहार तथा दिव्यध्वनि शरीर द्वारा ही होती है।

कायवाङ्मनःकर्म योगः ( ६-१ त० सू० ) इस सूत्र के अनुसार कर्मास्रवमें शरीर तथा तत्सम्बन्धी वचन एवं द्रव्यमन कारण हैं । अजीवाधिकरण आस्रवका कारण है। वह भी जीवित शरीरके अनुसार है। जीवित शरीरसे ही उपदेश दिया जाता है, प्रवचन किया जाता है, शास्त्र लिखा जाता है, प्रवचन सुना जाता है।

आपने जो अपने कथनकी पुष्टिमें श्री पं० बनारसीदास जीके नाटक समयसार कलश तथा परमात्मप्रकाशके पद्योंका अवतरण दिया है, उनका आशय तो केवल इतना है कि मिथ्यादृष्टि मात्र अपनी शारीरिक क्रियासे मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। फिर भी बहिरात्माका शरीर द्वारा बालतपसे स्वर्गगमन होता ही है। तथा असत् शारीरिक क्रियाओं द्वारा संसारभ्रमण होता है। जैसा कि तत्त्वार्थसूत्रमें कहा है। ( त० सू० ६-२० )

बज्रवृषभनाराचसंहननवाले जीवित शरीरसे शुक्लध्यान होकर मुक्ति होती है, उसी संहननवाले शरीरसे तीव्रतम पापमयी क्रिया द्वारा सातवां नरक भी मिलता है।

पञ्चास्तिकायकी गाथा १७१ की टीकामें लिखा है-

संहननादिशक्त्यभावात् शुद्धात्मस्वरूपे स्थातुमशक्यात्वात् वर्तमानभवे पुण्यबन्धं करोति ।

अर्थ-शारीरिक संहननशक्तिके अभावसे शुद्ध आत्मस्वरूपमें स्थिर न हो सकनेके कारण वर्तमान-भवमें पुण्यबन्ध करता है ।

श्री कुन्दकुन्दाचार्यने रयणसारमें कहा है-

दाणं पूजा मुक्खं सावयधम्मे ण सावया तेण विणा ॥११॥

अर्थ-दान करना और पूजा करना श्रावक धर्ममें मुख्य है, उनके विना श्रावक नहीं होता ॥११॥

कुन्दकुन्दाचार्यका बतलाया हुआ यह धर्म जीवित शरीर द्वारा ही होता है ।

अन्तमें आपने स्वयं अशुभ, शुभ और शुद्धभावोंका नोकर्म शरीरको निमित्तकारण मान लिया है, किन्तु निराधार उपचार शब्दका प्रयोगकर अर्थान्तर करनेका प्रयास किया है ।

शंका २, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ७८ से ८०

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शंका २

जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म अधर्म होता है या नहीं ?

प्रतिशंका २ का समाधान

प्रतिशंका नं० २ को उपस्थित करते हुए तत्त्वार्थसूत्र अ० ६, सू० १, ६ व ७ तथा पंचास्ति० गा० १७१ और रयणसार गा० ११ को प्रमाणरूसमें उपस्थित कर तथा कतिपय लौकिक उदाहरण देकर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है कि जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म होता है ।

यह तो सुविदित सत्य है कि आगममें निश्चयरत्नत्रयको यथार्थ धर्म कहकर उसके साथ जो देवादिकी श्रद्धा, संयमासंयम और संयमसम्बन्धी व्रतादिमें प्रवृत्तिरूप परिणाम होता है उसे व्यवहार धर्म कहा है । और सम्यग्दृष्टिके शरीरमें एकत्वबुद्धि नहीं रहती । यदि कोई जीव शरीरमें एकत्वबुद्धि कर शरीरकी क्रियाको आत्माकी क्रिया मानता है तो उसे अप्रतिबुद्ध कहा है । वहाँ ( समयसारमें ) कहा है -

कम्मे णोकम्मम्हि य अहमिदि अहकं च कम्म णोकम्मं ।
जा एसा खलु बुद्धी अप्पडिबुद्धो हवदि ताव ॥ १९ ॥

अर्थ-कर्म और नोकर्म ( देहादि तथा शरीरकी क्रिया ) में मैं हूँ, तथा मैं कर्म-नोकर्म हूँ 'जो ऐसी दुद्धि करता है तबतक वह अप्रतिबुद्ध है ॥ १९ ॥

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए प्रवचनसार गाथा १६० में भी कहा है -

णाहं देहो ण मणो ण चेव वाणी ण कारणं तेसिं ।
कत्ता ण कारयिदा अणुमंता णेव कत्तीणं ॥ १६० ॥

अर्थ-मैं न देह हूँ, न मन हूँ और न वाणी हूँ । उनका कारण नहीं हूँ, कर्ता नहीं हूँ, कारयिता नहीं हूँ और कर्ताका अनुमोदक नही हूँ ॥ १६० ॥

इसकी टीकामें कहा है -

शरीरं च वाचं च मनश्च परद्रव्यत्वेनाहं प्रपद्ये । ततो न तेषु कश्चिदपि मम पक्षपातोऽस्ति । सर्वत्राप्यहमत्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । तथाहि न खल्वहं शरीरवाङ्मनसां स्वरूपाधारभूतमचेतनद्रव्यमस्मि । तानि खलु मां स्वरूपाधारमन्तरेणाप्यात्मनः स्वरूपं धारयन्ति । ततोऽहं शरीर-वाङ्मनःपक्षपातमपास्यात्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । इत्यादि ।

अर्थ-मैं शरीर, वाणी और मनको परद्रव्यके रूपमें समझता हूँ, इसलिए मुझे उनके प्रति कुछ भी पक्षपात नहीं है । मैं उन सबके प्रति अत्यन्त मध्यस्थ हूँ । यथा-वास्तवमें मैं शरीर, वाणी और मनके स्वरूपका आधारभूत अचेतन द्रव्य नहीं हूँ । मेरे स्वरूपाधार हुए विना ही वे वास्तवमें अपने स्वरूपको धारण करते हैं । इसलिए मैं शरीर, वाणी और मनका पक्षपात छोड़कर अत्यन्त मध्यस्थ हूँ ।

आगे पुनः लिखा है -

देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्ति णिद्दिट्ठा ।
पोग्गलदव्वं हि पुणो पिंडो परमाणुदव्वाणं ॥ १६१ ॥

अर्थ-देह, मन और वाणी पुद्गलद्रव्यात्मक हैं ऐसा जिनदेवने कहा है । और वे पुद्गलद्रव्य परमाणु द्रव्योंका पिण्ड हैं ॥१६१॥

प्रवचनसार गा. १६२ तथा नियमसारमें भी यही स्वीकार किया गया है, इसलिए इनका अजीव तत्त्वमें अन्तर्भाव नहीं होता यह तो कहा नहीं जा सकता ।

प्रतिशंका २ द्वारा श्री तत्त्वार्थसूत्र आदिके उद्धरण देकर जो जीवित शरीरसे धर्मकी प्राप्तिका समर्थन किया गया है सो वह आस्रवका प्रकरण है । उस अध्यायमें धर्मका निर्देश नहीं किया गया है । उसमें भी जहाँ कहीं निमित्तकी अपेक्षा निर्देश भी हुआ है सो निमित्त तो अनेक पदार्थ होते हैं तो क्या इतने मात्रसे उन सबसे धर्मकी प्राप्ति मानी जायगी । शरीर आदि पदार्थोंको जहाँ भी निमित्त लिखा है सो वह विजातीय असद्भूत व्यवहार नयकी अपेक्षा ही निमित्त कहा है । इसी तथ्यको स्वीकार करते हुए सोलापुरसे मुद्रित नयचक्र पृ० ४५ में इन शब्दों द्वारा स्वीकार किया है-

शरीरमपि यो जीवं प्राणी प्राणिनो वदति स्फुटम् ।
असद्भूतो विजातीयो ज्ञातव्यो मुनिवाक्यतः ॥१॥

अर्थ-जो प्राणियोंके शरीरको भी जीव कहता है उसे जिनदेवके उपदेशानुसार विजातीय असद्भूत व्यवहार जानना चाहिए ॥१॥

स्वयंभूस्तोत्रमें श्री वासुपूज्य भगवान्की स्तुति करते हुए कहा है-

यद्वस्तु बाह्यं गुणदोषसूतेः निमित्तमाभ्यन्तरमूलहेतोः ।
अध्यात्मवृत्तस्य तदङ्गभूतमाभ्यन्तरं केवलमप्यलं ते ॥५९॥

अर्थ-अभ्यन्तर अर्थात् उपादानकारण जिसका मूल हेतु है ऐसी गुण और दोषोंकी उत्पत्तिका जो बाह्य वस्तु निमित्तमात्र है, मोक्षमार्गपर आरूढ़ हुए जीवके लिए वह गौण है, क्योंकि हे भगवन् ! आपके मतमें उपादान हेतु कार्य करनेके लिये पर्याप्त है ॥५९॥

तात्पर्य यह है कि जो अपने उपादानकी सम्हाल करता है उसके लिए उपादानके अनुसार कार्य कालमें निमित्त अवश्य ही मिलते हैं। ऐसा नहीं है कि उपादान अपना कार्य करनेके सन्मुख हो और उस कार्यमें अनुकूल ऐसे निमित्त न मिलें। इस जीवका अनादिकालसे पर द्रव्यके साथ संयोग बना चला आ रहा है, इसलिये वह संयोगकालमें होनेवाले कार्योंको जब जिस पदार्थका संयोग होता है उससे मानता आ रहा है, यही इसकी मिथ्या मान्यता है। फिर भी यदि जीवित शरीरकी क्रियासे धर्म माना जावे तो मुनिके ईर्यापथसे गमन करते समय कदाचित् किसी जीवके उसके पगका निमित्त पाकर मरनेपर उस क्रियासे मुनिको भी पाप-बन्ध मानना पड़ेगा। पर ऐसा नहीं है। जिनागममें कहा भी है-

वियोजयति चासुभिर्न च वधेन संयुज्यते। -सर्वार्थसिद्धि ७-१३

दूसरेको निमित्तकर दूसरेके प्राणोंका वियोग हो जाता है, फिर भी वह हिंसाका भागी नहीं होता।

अत एव प्रत्येक प्राणीके अपने परिणामोंके अनुसार ही पुण्य, पाप और धर्म होता है जीवित शरीरकी क्रियाके अनुसार नहीं यही यहाँ निर्णय करना चाहिए और ऐसा मानना ही जिनागमके अनुसार है।

शंका २, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ८० से ८५

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका २

जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म अधर्म होता है या नहीं ?

प्रतिशंका ३

इसके उत्तरमें आपने यह लिखा कि ‘जीवित शरीरकी क्रिया पुद्गल द्रव्यकी पर्याय होनेके कारण उसका अजीव तत्त्वमें अन्तर्भाव होता है, इसलिये वह स्वयं जीवका न तो धर्म भाव है और न अधर्मभाव ही है। मात्र जीवित शरीरकी क्रिया धर्म नहीं।’

इस उत्तरमें आपने जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म अधर्म होता है या नहीं, इस मूल प्रश्नको तो छुआ ही नहीं, सिर्फ इतना लिख दिया कि शरीरकी क्रिया धर्म-अधर्म नहीं है। जैसा कि हमने पूछा हो कि जीवित शरीरकी क्रिया धर्म है या अधर्म ?

यह सर्व विदित है कि धर्म और अधर्म आत्माकी परिणतियाँ हैं और वे आत्मामें ही अभिव्यक्त होते हैं। परन्तु उनके अभिव्यक्त होनेमें जीवित शरीरकी क्रियाएँ निमित्त पड़ती हैं। यदि ऐसा न हो तो शरीर द्वारा होनेवाली समीचीन और असमीचीन प्रवृत्तियाँ निरर्थक हो जावें। कार्यकी सिद्धिमें निमित्त और उपादान-दोनों कारण आवश्यक हैं, परन्तु केवल उपादानकी मान्यता शास्त्र संमत कार्य-कारण व्यवस्था पर कुठाराघात कर रही है।

आपने नाटक समयसारके दोहे उद्धृत करते हुए मात्र जीवित शरीरकी क्रियाको धर्म माननेवाले मिथ्यादृष्टिका उल्लेख किया है सो उससे प्रश्नका समाधान नहीं होता, क्योंकि शरीरकी क्रियाको तो सर्वथा हम भी धर्म-अधर्म नहीं मानते । हमारा अभिप्राय तो यह है कि आत्माकी धर्म और अधर्म परिणतिमें जीवित शरीरकी क्रिया निमित्त है, जिसे आप निमित्त या उपचार मात्र कहकर अवस्तुभूत-असत्यार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, पर क्या वास्तवमें यह सब अवस्तुभूत है ? यदि अवस्तुभूत ही है तो मोक्षप्राप्तिके लिये कर्मभूमिज मनुष्यका देह और ध्यानकी सिद्धिके लिये उत्तम संहनन आदिकी अनिवार्यता शास्त्र संमत नहीं रह जायगी ।

बाह्येतरोपाधिसमग्रतेयं कार्येषु ते द्रव्यगतः स्वभावः ।
नैवान्यथा मोक्षविधिश्च पुंसां तेनाभिवन्द्यस्त्वमृषिर्बुधानाम् ॥६०॥
-स्वयंभूस्तोत्र

समन्तभद्र स्वामीके इस उल्लेखसे यह स्पष्ट है कि कार्यकी उत्पत्तिमें बाह्य और आभ्यन्तर दोनों कारणोंकी पूर्णता आवश्यक है । द्रव्यका-पदार्थका कार्योत्पत्तिके विषयमें यही स्वभाव है । अन्यथा-मात्र बाह्य या आभ्यन्तरके ही कारण माननेपर पुरुषके मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती ।

स्वयंभूस्तोत्रके इससे पूर्ववर्ती श्लोक-‘यद्वस्तु बाह्यं गुणदोषसूते’-का जो अर्थ आपने अपने प्रत्युत्तरमें किया है उससे बाह्येतरोपाधि-श्लोकके साथ पूर्वापर विरोध प्रतीत होता है, इसलिये हमारी दृष्टिसे यदि उसका निम्न प्रकार अर्थ किया जाय तो उससे पूर्वापर विरोध ही दूर नहीं होता, बल्कि संस्कृत टीकाकारके भावकी भी सुरक्षा होती है ।

अर्थ-गुण-दोषकी उत्पत्तिमें जो बाह्य वस्तु निमित्त है वह चूँकि अध्यात्मवृत्त-आत्मामें होनेवाले शुभाशुभ लक्षणरूप अन्तरंग मूल कारणका अंगभूत है-सहकारी कारण है, अतः केवल अन्तरंग भी कारण कहा जा सकता है ।

फिर यह पात्रकी विशेषताको लक्ष्यमें रखकर कथन किया गया है, अतः इससे कार्यकारणकी व्यवस्थाको असंगत नहीं माना जा सकता । पात्रकी विशेषताको दृष्टिमें रखकर किसी कथनको विवक्षित-मुख्य और अविवक्षित-गौण तो किया जा सकता है । परन्तु उसे अवस्तुभूत-अपरमार्थ नहीं कहा जा सकता ।

धर्मे धर्मेऽन्य एवार्थो धर्मिणोऽनन्तधर्मणः ।
अङ्गित्वेऽन्यतमान्तस्य शेषान्तानां तदङ्गता ॥२२॥-अष्टसहस्री

समन्तभद्र स्वामीने अंग शब्दका प्रयोग किया है, जिसका अर्थ टीकाकारने-

शेषान्तानां स्याच्छब्दसूचितान्यधर्मणां तदगंता तद्गुणभावः ।

पंक्ति में गौण अर्थ किया है और गौणका अर्थ-

विवक्षितो मुख्य इतीष्यतेऽन्यो गुणो विवक्षो न निरात्मकस्ते ।
-स्वयंभूस्तोत्र ५३

श्लोक द्वारा अविवक्षित बतलाया है, परन्तु अविवक्षितको निरात्मक-असद्भूत नहीं बतलाया ।

तत्त्वार्थसूत्रके उद्धरणोंके विषयमें आपने लिखा सो उसका स्पष्टीकरण यह है कि मूल प्रश्नमें धर्म-अधर्म दोनोंकी चर्चा है, न केवल धर्मकी । वहाँ अभिप्राय मात्र इतना है कि कार्यसिद्धिमें पर पदार्थ कारण पड़ता है या नहीं । उसी ओर आपकी समन्वयात्मक दृष्टि नहीं गई मालूम होती है ।

आगे आप लिखते हैं कि ‘जो उपादानकी सम्हाल करता है उसके लिये उपादानके अनुसार कार्य-कालमें निमित्त अवश्य मिलते हैं। ऐसा नहीं है कि उपादान अपना कार्य करनेके सन्मुख हो और उस कार्यमें अनुकूल ऐसे निमित्त न मिलें।’ सो आपका ऐसा लिखना आगम विरुद्ध पड़ता है, क्योंकि धवला पु० १ पृ० १५० पर

निर्वाणपुरस्कृतो भव्यः, उक्तञ्च-
सिद्धत्तणस्स जोग्गा जे जीवा ते हवंति भवसिद्धा।
ण उ मलविगमे णियमो ताणं कणगोवलाणमिव ॥

इस गाथाका अर्थ लिखते हुए लिखा है कि जिसने निर्वाणको पुरस्कृत किया है उसको भव्य कहते हैं। कहा भी है-जो जीव सिद्धत्वके योग्य हैं उन्हें भव्य कहते हैं, किन्तु उनके कनकोपलके समान मलका नाश होनेका नियम नहीं है।

इसके विशेषार्थमें पं० फूलचन्द्रजी ने स्वयं लिखा है-

सिद्धत्वकी योग्यता रखते हुए भी कोई जीव सिद्ध अवस्थाको प्राप्त कर लेते हैं और कोई जीव सिद्ध अवस्थाको नहीं प्राप्त कर सकते हैं। जो भव्य होते हुए भी सिद्ध अवस्थाको प्राप्त नहीं कर सकते हैं उनके लिये यह कारण बतलाया है कि जिस प्रकार स्वर्ण पाषाणमें सोना रहते हुए भी उसका अलग किया जाना निश्चित नहीं है उसी प्रकार सिद्ध अवस्थाकी योग्यता रखते हुए भी तदनुकूल सामग्रीके न मिलनेसे सिद्ध पदवी प्राप्त नहीं होती है।

इस प्रकार यह स्वीकार किया गया है कि भव्य जीवमें योग्यता होते हुए भी उपदेश आदि सामग्री रूप निमित्तोंके न मिलनेसे सिद्धपदकी प्राप्ति नहीं होती। इसीके लिये शीलवती विधवा स्त्री का दृष्टान्त दिया गया है। जिस प्रकार शीलवती विधवा स्त्रीमें पुत्र उत्पन्न करनेकी योग्यता तो है, किन्तु पतिका मरण हो जानेके कारण पतिरूप निमित्तका संयोग न मिलनेसे पुत्रोत्पत्ति नहीं होती।

ऐसे अनेकों उदाहरण हैं कि उपादानमें योग्यता है, परन्तु निमित्त न मिलनेसे कार्य नहीं होता। वर्णी ग्रन्थमालासे प्रकाशित तत्त्वार्थसूत्रके पृष्ठ २१८ पर पं० फूलचन्द्रने स्वयं इस प्रकार लिखा है-

जो कारण स्वयं कार्यरूप परिणम जाता है वह उपादान कारण कहलाता है। किन्तु ऐसा नियम है कि प्रत्येक कार्य उपादान कारण और निमित्तकारण इन दोके मेलसे होता है, केवल एक कारण से कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती। छात्र सुबोध है पर अध्यापक या पुस्तकका निमित्त न मिले तो वह पढ़ नहीं सकता। यहाँ उपादान है किन्तु निमित्त नहीं, इसलिये कार्य नहीं हुआ। छात्रको अध्यापक या पुस्तकका निमित्त मिल रहा है पर वह मन्दबुद्धि है, इसलिये भी वह पढ़ नहीं सकता। यहाँ निमित्त है किन्तु उपादान नहीं, इसलिये कार्य नहीं हुआ। निमित्तके बिना केवल उपादानसे कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती।

इस प्रकार जब यह स्वीकार किया जा चुका है कि उपादान उपस्थित है, किन्तु निमित्त नहीं है, इसलिये कार्य नहीं हुआ, इसके विरुद्ध आपकी ‘ऐसा नहीं कि उपादान अपना कार्य करनेके सन्मुख हो और उस कार्यमें अनुकूल निमित्त न मिलें’, इस बातको ठीक मान लेगा ?

प्रत्यक्षमें देखा जाता है कि मनुष्य देखना चाहता है, किन्तु मोतियाबिन्द आ जानेसे अथवा अन्य कोई चीजकी आड़ आ जानेसे नहीं देख सकता। चलना चाहता है पर लकवा मार जानेसे चल नहीं सकता। चित्तकी स्थिरतारूप ध्यानके विना मोक्ष नहीं हो सकता और चित्तकी स्थिरता शरीर बलके बिना नहीं हो सकती। कहा भी है-

विशिष्टसंहननादिशक्त्यभावान्निरन्तरं तत्र स्थातुं न शक्नोति।
-पञ्चास्तिकाय गाथा १७० की टीका

अर्थात् विशिष्ट शक्तिके अभावके कारण निजस्वभावमें निरन्तर नहीं ठहर सकता।

इसी बातको पं० फूलचन्द्रजीने तत्त्वार्थसूत्रकी टीकामें लिखा है-

चित्तको स्थिर रखनेके लिये आवश्यक शरीरबल अपेक्षित रहता है जो उक्त तीन संहननवालोंके सिवा अन्यके नहीं हो सकता।

अतः मोक्षमार्गमें शरीर बल अपेक्षित रहता है अर्थात् शरीर बलरूप निमित्तके बिना मुक्ति नहीं हो सकती। पार्श्वपुराणमें कहा भी है-

यह तन पाय महा तप कीजे यामें सार यही है।

मात्र शरीरकी क्रियासे धर्म-अधर्म नहीं होता ऐसा एकान्त नियम भी नहीं है, क्योंकि कहीं-कहीं मात्र शरीरकी क्रियासे भी धर्म-अधर्म होता है। जैसे कि मात्र शरीरकी चेष्टासे संयमका छेद होना। प्रवचनसारकी गाथा २११-२१२ की टीका देखिये-

द्विविधः किल संयमस्य छेदः-बहिरङ्गोऽन्तरङ्गश्च। तत्र कायचेष्टामात्राधिकृतो बहिरंगः, उपयोगाधिकृतः पुनरन्तरङ्गः। तत्र यदि सम्यगुपयुक्तस्य श्रमणस्य प्रयत्नसमारब्धायाः कायचेष्टायाः कथंचिद्बहिरङ्गच्छेदो जायते तदा तस्य सर्वथान्तरङ्गच्छेदवर्जितत्वादालोचनपूर्विकया क्रिययैव प्रतीकारः। यदा तु स एवोपयोगाधिकृतच्छेदत्वेन साक्षाच्छेद एवोपयुक्तो भवति तदा जिनोदितव्यवहारविधिविदग्ध-श्रमणाश्रयालोचनपूर्वकतदुपदिष्टानुष्ठानेन प्रतिसंधानम्।

अर्थ-संयमका छेद दो प्रकारका है-बहिरंग और अन्तरंग। उसमें मात्र कायचेष्टासम्बन्धी बहिरंगच्छेद है और उपयोगसम्बन्धी अन्तरंग छेद है। उसमें यदि भलीभाँति उपयुक्त श्रमणके प्रयत्नकृत कायचेष्टाका कथंचित् बहिरंगच्छेद होता है तो वह सर्वथा अन्तरंग छेदसे रहित है इसलिये आलोचना पूर्वक क्रियासे ही उसका प्रतीकार होता है, किन्तु यदि वही श्रमण उपयोगसम्बन्धी छेद होनेसे साक्षात् छेदमें ही उपयुक्त होता है तो जिनोक्त व्यवहार विधिमें कुशल श्रमणके आश्रयसे, आलोचनापूर्वक, उनसे उपदिष्ट अनुष्ठानद्वारा प्रतिसंधान होता है।

इस प्रकार प्रवचनसारके उक्त उल्लेखसे यह सिद्ध है कि मात्र कायचेष्टासे भी अधर्म होता है। यह ही बात श्री १०८ मणिमालीकी कथासे भी सिद्ध होती है कि मात्र शरीरकी क्रियासे कायगुप्तिरूपो संयम का छेद हो गया। वह कथा इस प्रकार है-श्री १०८ मणिमाली मुनिराज विहार करते हुए एक दिन उज्जयिनी पहुँचे और वहाँकी श्मशान भूमिमें ध्यानकी सिद्धि निमित्त निश्चलरूपसे स्थिर हो गये। उसी समय एक कोरिया मंत्रवादी महावेतालीय विद्या सिद्ध करनेके लिये वहाँ आया। ध्यानमें स्थित मुनि महाराजके शरीरको उसने मुर्देका शरीर समझा। कहींसे वह एक दूसरा मस्तक उठा लाया और पीछेसे मुनिराजके मस्तकके साथ जोड़ दिया। खीर पकानेके लिये उस कोरियाने एक मस्तकका चूला बनाया और अग्नि जला दी। अग्निके तापसे मुनि महाराजकी नसें संकुचित हो गईं, जिससे उनके दोनों हाथ ऊपरको उठ गये । इससे उनकी कायगुप्ति भंग हो गई । ( महारानी चेलनाचरित्र पृ० ११२, सूरतसे प्रकाशित वीर सं० २४८६ ) ।

अब यह बात सिद्ध की जाती है कि मात्र शरीरकी क्रियासे ऐसा धर्म होता है जो सर्व कर्मक्षयका व संसार विच्छेदका कारण है-

यह तो सुनिश्चित है कि केवली जिनके मोह राग द्वेषका अभाव है, इसीलिये उनके जो पुण्योदयसे चलने बैठने तथा उपदेश देने रूप शारीरिक क्रिया होती है वह बन्ध का कारण नहीं होती, अपि तु कथंचित् क्षायिकी होनेसे मोक्षका कारण होती है । प्रवचनसारमें श्री कुन्दकुन्द स्वामीने कहा भी है-

पुण्णफला अरहंता तेसिं किरिया पुणो हि ओदइया ।
मोहादीहिं विरहिया तम्हा सा खाइय त्ति मदा ॥४५॥

अर्थ-पुण्यफलवाले अरहन्त हैं और उनकी क्रिया औदयिकी है । अरहन्त भगवान् मोहादिसे रहित हैं, इसलिये उनकी क्रिया क्षायिकी मानी गई है ।

इसकी टीकामें भी अमृतचन्द्र सूरिने लिखा है-

मोह-राग-द्वेषरूपाणामुपरञ्जकानामभावाच्चैतन्यविकारकारणतामनासादयन्ती नित्यमौदयिकी कार्यभूतस्य बन्धस्याकारणभूततया कार्यभूतस्य मोक्षस्य कारणभूततया च क्षायिक्येव कथं हि नाम नानुमन्येत ।

अर्थ-मोह-राग-द्वेषरूपी उपरञ्जकों ( विकारी भावों ) का अभाव होनेसे अरहन्त भगवान्की बिहार आदि क्रिया चैतन्य विकारका कारण नहीं होती, इसलिये कार्यभूत बन्धकी अकारणभूततासे और कार्यभूत मोक्षकी कारणभूततासे क्षायिकी ही क्यों नहीं माननी चाहिये, अर्थात् अवश्य माननी चाहिये ।

केवली भगवान्के वेदनीय, नाम और गोत्र कर्मकी स्थिति यदि आयुकर्मकी स्थितिसे अधिक होती है तो वेदनीय आदि तीन कर्मोंकी अधिक स्थितिका नाश करनेके लिये उस रूप प्रयत्न या उपयोगके बिना ही केवलीसमुद्घात होता है, क्योंकि इन तीन कर्मोंकी अधिक स्थितिका नाश हुए विना संसारका विच्छेद नहीं हो सकता ।

श्री धवलसिद्धान्त पु० २ पृ० ३०२ में कहा भी है-

संसारविच्छित्तौ किं कारणम् ? द्वादशांगावगमः तत्तीव्रभक्तिः केवलिसमुद्घातोऽनिवृत्तिपरिणामाश्च ।

अर्थ-संसार विच्छेदका क्या कारण है ? द्वादशाङ्गका ज्ञान, उनमें तीव्रभक्ति, केवलिसमुद्घात और अनिवृत्तिरूप परिणाम ये सब संसार विच्छेदके कारण हैं ।

चार घातिया कर्मोंका नाश हो जानेसे केवलि जिनका उपयोग स्थिर हो जाता है । किसी भी शारीरिक क्रियाके लिये उस रूप प्रयत्न या उपयोगकी आवश्यकता नहीं होती, किन्तु वे क्रियाएँ स्वाभाविक होती हैं, अतः केवलिसमुद्घातरूप क्रिया भी स्वाभाविक होती है जो संसार विच्छेदका कारण है । संसारविच्छेदका जो भी कारण है वह सब धर्म है ।

इस प्रकार उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह सिद्ध हो गया कि धर्म-अधर्ममें शरीरकी क्रिया सहकारी कारण तो है ही, किन्तु किन्हीं अवस्थाओंमें मात्र शरीरकी क्रियासे संयमका छेद रूपी अधर्म तथा संसारविच्छेदका कारण रूप धर्म भी होता है ।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका २

जीवित शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म-अधर्म होता है या नहीं ?

शंका २, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ८५ से ९२

↑ सूची


प्रतिशंका ३ का समाधान

\१. प्रथम-द्वितीय प्रश्नोत्तरोंका उपसंहार

इस प्रश्नके प्रथम उत्तरमें हमने सर्वप्रथम यह स्पष्ट कर दिया था कि जीवित शरीरकी क्रिया पुद्गल द्रव्यकी पर्याय है, इसलिए उसका अजीव तत्त्वमें अन्तर्भाव होता है । वह न तो जीवका धर्मभाव ही है और न अधर्मभाव ही । दूसरी यह बात स्पष्ट कर दी थी कि इसकी नोकर्ममें परिगणना की गई है । अतएव जीवभावमें यह निमित्तमात्र कही गई है । किन्तु निमित्तकथन असद्भूत व्यवहारनयका विषय होनेसे इस कथनको उपचरित ही जानना चाहिए ।

किन्तु अपर पक्ष जीवित शरीरकी क्रियाका अजीव तत्त्वमें अन्तर्भाव करनेके लिए तैयार नहीं हैं । इसका खुलासा करते हुए प्रतिशंका २ में उसका कहना है कि ‘जीवित शरीरको सर्वथा अजीव तत्त्वमें मान लेने पर जीवित तथा मृतक शरीरमें कुछ अन्तर नहीं रह जाता ।’ इस प्रतिशंकामें अन्य जो भी कथन हुआ है वह इसी आशयकी पुष्टि करता है ।

अतएव इसके उत्तरमें निश्चय-व्यवहार धर्मका स्वरूप बतलाकर हमने लिखा है कि शरीर और शरीरकी क्रियामें एकत्व बुद्धि यह अप्रतिबुद्धका लक्षण है । अतएव सम्यग्दृष्टि उससे धर्मकी प्राप्ति नहीं मानता । अधर्मकी प्राप्ति भी उससे होती है ऐसी भी मान्यता उसकी नहीं रहती । वह तो कार्यकालमें निमित्तमात्र है ।

\२. प्रतिशंका ३ के आधारसे विचार

हमने प्रथम उत्तरमें ही यह स्पष्टीकरण किया है कि जीवित शरीरकी क्रिया जीवका न धर्म है और न अधर्म ही । इसपर अपर पक्षका कहना है कि यह हमारे मूल प्रश्नका उत्तर नहीं है । समाधान यह है कि यदि जीवित शरीरकी क्रियासे धर्म-अधर्मकी प्राप्ति स्वीकार की जाय तो उसे आत्माका धर्म-अधर्म मानना भी अनिवार्य हो जाता है । समयसारमें बन्ध और मोक्षके कारणोंका निर्देश करते हुए लिखा है-

भावो रागादिजुदो जीवेण कदो दु बंधगो भणिदो ।
रागादिविप्पमुक्को अबंधगो जाणगो णवरि ॥१६७॥

जीवकृत रागादि युक्त भाव नये कर्मका बन्ध करानेवाला कहा गया है । किन्तु रागादिसे रहित भाव बन्धक नहीं है, वह मात्र ज्ञायक ही है ॥१६७॥

इसी अभिप्रायको ध्यानमें रखकर मुक्ति और संसारके कारणोंका निर्देश करते हुए रत्नकरण्ड-श्रावकाचारमें भी कहा है-

सद्दृष्टि-ज्ञान-वृत्तानि धर्मं धर्मेश्वरा विदुः ।
यदीयप्रत्यनीकानि भवन्ति भवपद्धतिः ॥३॥

तीर्थंकरादि गणधर देवोंने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रको धर्म कहा है तथा इनसे उलटे मिथ्यादर्शनादि तीनों संसारके कारण हैं ॥३॥

इन प्रमाणोंसे स्पष्ट है कि जो धर्म और अधर्मके कारण हैं वे स्वयं धर्म और अधर्म भी हैं । यतः अपर पक्ष जीवित शरीरकी क्रियासे धर्म और अधर्मकी प्राप्ति मानता है अतः उस पक्षके इस कथनसे जीवित शरीरकी क्रिया भी स्वयं धर्म-अधर्म सिद्ध हो जाती है । यही कारण है कि मूल प्रश्नके उत्तरके प्रारम्भमें ही हमने यह स्पष्टीकरण करना उचित समझा कि जीवित शरीरकी क्रिया न तो स्वयं आत्माका धर्म ही है और न अधर्म ही । अपर पक्षने अपनी इस प्रतिशंका ३ में विधिमुखसे यह तो स्वीकार कर लिया है कि ‘धर्म और अधर्म आत्माकी परिणतियाँ हैं और वे आत्मामें ही अभिव्यक्त होते हैं ।’ किन्तु निषेध मुखसे वह पक्ष यह और स्वीकार कर लेता कि जीवित शरीरकी क्रिया न तो स्वयं धर्म है और न अधर्म ही, तो उस पक्षके इस कथनसे यह शंका दूर हो जाती कि वह पक्ष अपनी मूल शंका द्वारा कहीं जीवित शरीरकी क्रियाको ही तो धर्म-अधर्म नहीं ठहराना चाह रहा है । यतः इस शंकाका निर्मूलन हो जाय इसी भावको ध्यानमें रखकर हमने प्रथम उत्तरके प्रारम्भमें यह खुलासा किया है कि जीवित शरीरकी क्रिया न तो स्वयं आत्माका धर्म है और न अधर्म ही ।

अपर पक्षका कहना है कि आत्माके धर्म-अधर्मके अभिव्यक्त होनेमें जीवित शरीरकी क्रियाएँ निमित्त हैं सो इसको हमारी ओरसे अस्वीकार कहाँ किया गया है । अपने दोनों उत्तरोंमें हमने इसे स्पष्ट कर दिया है । किन्तु शरीर द्वारा होनेवालीं समीचीन और असमीचीन प्रवृत्तियोंके सम्बन्धमें यह खुलासा कर देना आवश्यक हैं कि आत्माके शुभाशुभ परिणामोंके आधारपर ही उन्हें समीचीन और असमीचीन कहा जाता है । वे स्वयं समीचीन और असमीचीन नहीं होतीं । यदि वे स्वयं समीचीन और असमीचीन होने लगें तो अपने परिणामोंके सम्हालकी आवश्यकता ही न रह जाय । सागारधर्मामृत अ० ४ में इसका स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है-

विष्वग्जीवचिते लोके क्व चरन् कोऽप्यमोक्ष्यत ।
भावैकसाधनौ बन्ध-मोक्षौ चेन्नाभविष्यताम् ॥ २३ ॥

यदि बन्ध और मोक्षके भाव ही एकमात्र कारण न हों तो जीवोंसे व्याप्त पूरे लोकमें कहाँ विचरता हुआ कोई भी प्राणी मोक्षको प्राप्त करे ॥ २३ ॥

इसी तथ्यको स्पष्ट करनेवाला सर्वार्थसिद्धिका यह वचन भी लक्ष्यमें लेने योग्य है । उसके छठे अध्याय सूत्र तीनमें कहा है-

कथं योगस्य शुभाशुभत्वम् ? शुभपरिणामनिर्वृत्तो योगः शुभः । अशुभपरिणामनिर्वृत्तश्चाशुभः ।

शंका-योगका शुभाशुभपना किस कारणसे है ?

समाधान-जो योग शुभ परिणामोंको निमित्त कर होता है वह शुभ योग है और जो योग अशुभ परिणामोंको निमित्त कर होता है वह अशुभ योग है ।

इससे स्पष्ट है कि जीवित शरीरकी क्रिया स्वयं समीचीन और असमीचीन नहीं हुआ करती, किन्तु जीवके शुभाशुभ परिणामोंके आधारसे उसमें समीचीन और असमीचीनपनेका व्यवहार किया जाता है ।

हमें विश्वास है कि इस स्पष्टीकरणके आधारपर अपर पक्ष जीवित शरीरकी क्रियाओंके स्वयं समीचीन और असमीचीन होनेके विचारका त्यागकर अपने इस विचारको मुख्यता देगा कि प्रत्येक प्राणीको मोक्षके साधनभूत स्वभाव सन्मुख हुए परिणामोंकी सम्हालमें लगना चाहिए। संसारके छेदका एकमात्र यही भाव मूल कारण है, अन्यथा संसारकी ही वृद्धि होगी।

बाह्य क्रिया धर्म नहीं है इस अभिप्रायकी पुष्टिमें ही हमने नाटक समयसारके वचनका उल्लेख किया था।

अपर पक्षका कहना है कि क्रियाको तो सर्वथा धर्म-अधर्म हम भी नहीं मानते। तो क्या इस परसे यह आशय फलित किया जाय कि अपर पक्ष जीवित शरीरकी क्रियाको कथंचित् धर्म-अधर्म मानता है ? यदि यही बात है तो अपर पक्षके इस कथनकी कि ‘धर्म और अधर्म आत्माकी परिणतियाँ हैं और वे आत्मामें ही अभिव्यक्त होते हैं’ क्या सार्थकता रही ? इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे। यदि यह बात नहीं है तो उस पक्षको इस बातका स्पष्ट खुलासा करना था।

यह तो अपर पक्ष भी जानता है कि निमित्त और कारण पर्यायवाची संज्ञाऐं हैं । वह बाह्य भी होता है और आभ्यन्तर भी। उनमें-से आभ्यन्तर निमित्त कार्यका मुख्य-निश्चय हेतु है। यही कारण है कि आचार्य समन्तभद्रने स्वयंभूस्तोत्र कारिका ५९ में मोक्षमार्गमें बाह्य निमित्तकी गौणता बतलाकर आभ्यन्तर हेतुको पर्याप्त कहा है। इस कारिकामें आया हुआ ‘अंगभूतम्’ पद गौणपनेका ही सूचक है और तभी ‘अभ्यन्तरं केवलमप्यलं ते’ इस वचनकी सार्थकता बन सकती है। ‘अंगभूत’ पदका अर्थ ‘गौण’ है इसके लिए अष्टसहस्री पृ० १५३ ‘तदंगता तद्गुणभावः’ इस वचनपर दृष्टिपात करना चाहिए।

अपर पक्षने जीवित शरीरकी क्रियाको आत्माके धर्म-अधर्ममें निमित्त स्वीकार करके यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि प्रत्येक कार्यकी उत्पत्तिमें दोनों करणोंकी पूर्णता आवश्यक है और इसके समर्थनमें स्वयंभूस्तोत्रका ‘बाह्येतरोपाधिसमग्रतेयम्’ वचन उद्धृत किया है। किन्तु प्रकृतमें विचार यह करना है कि मोक्ष दिलाता कौन है ? क्या शरीर मोक्ष दिलाता है या वज्रवृषभनाराच संहनन या शरीरकी क्रिया मोक्ष दिलाती है ? मोक्षकी प्राप्तिमें विशिष्ट कालको भी हेतु कहा है। क्या वह मोक्ष दिलाता है ? यदि यही बात होती तो आचार्य गृद्धपिच्छ तत्त्वार्थसूत्रके प्रारम्भमें ‘सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्गः।’ १-१ इस सूत्रकी रचना न कर इसमें बाह्याभ्यन्तर सभी सामग्रीका निर्देश अवश्य करते। क्या कारण हैं कि उन्होंने बाह्य सामग्रीका निर्देश न कर मात्र आभ्यन्तर सामग्रीका निर्देश किया है, अपर पक्षको इसपर ध्यान देना चाहिए। किसी कार्यकी उत्पत्तिके समय आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रताके साथ बाह्य सामग्रीकी समग्रताका होना अन्य बात है और आभ्यन्तर सामग्रीके समान ही बाह्य सामग्रीको भी कार्यकी उत्पादक मानना अन्य बात है। अन्तरं महदन्तरम्। इस महान् अन्तरको अपर पक्ष ध्यानमें ले यही हमारी भावना है। यदि वह इस अन्तरको ध्यानमें ले ले तो उस पक्षको यह हृदयंगम करनेमें सुगमता जाय कि हम बाह्य सामग्रीको उपचरित कारण और आभ्यन्तर सामग्रीको अनुपचरित कारण क्यों कहते हैं। यह तो कोई भी साहस पूर्वक कह सकता है कि आत्मसन्मुख हुआ आत्मा रत्नत्रयको उत्पन्न करता है और रत्नत्रयपरिणत आत्मा मोक्षको उत्पन्न करता है, परन्तु यह बात कोई साहसपूर्वक नहीं कह सकता कि जीवित शरीरकी क्रिया रत्नत्रय या मोक्षको उत्पन्न करती है। सर्वार्थ-सिद्धि अ० १ सू० १ में सम्यक्चारित्रका लक्षण करते हुए लिखा है-

संसारकारणनिवृत्तिं प्रत्यागूर्णस्य ज्ञानवतः कर्मादाननिमित्तक्रियोपरमः सम्यक्चारित्रम्।

८८ जयपुर ( खनिया ) तत्त्वचर्चा

संसारके कारणकी निवृत्तिके प्रति उद्यत हुए ज्ञानी पुरुषके कर्मके ग्रहणमें निमित्तभूत क्रियाका उपरत होना सम्यक्चारित्र है ।

यह आगम वचन है । इससे तो यही विदित होता है कि रागमूलक या योगमूलक जो भी क्रिया होती है वह मात्र बन्धका हेतु है । अब अपर पक्ष ही बतलावे कि उक्त क्रियाके सिवाय और ऐसी शरीरकी कौन-सी क्रिया बचती है जिसे मोक्षका हेतु माना जाय । हमने भी जीवित शरीरकी क्रियाको धर्म-अधर्मका निमित्त कहा है । किन्तु उसका इतना ही आशय है कि बाह्य विषयमें इष्टानिष्ट बुद्धि होने पर उसके साथ जो भी शरीरकी क्रिया होती हैं उसे उपचारसे अधर्मका निमित्त कहा जाता है और इसी प्रकार आत्म-सन्मुख हुए जीवके धर्मपरिणतिके कालमें शरीरकी जो भी क्रिया होती है उसे उपचारसे धर्मका निमित्त कहा जाता है । इसी प्रकार देव-गुरु-शास्त्रको लक्ष्यकर शुभभावके होने पर उसके साथ जो भी क्रिया होती है उसे उपचारसे उसी भावका निमित्त कहा जाता है ।

आचार्य विद्यानन्दिने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६५ में ‘सम्यग्दर्शन-ज्ञान’ इत्यादि सूत्रकी व्याख्या करते हुए बतलाया है कि विशिष्ट सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ही साक्षात् मोक्षमार्ग है । इसपर शंका हुई कि इस प्रकार अवधारण करने पर एकान्तकी प्रसक्ति होती है । तब इसका समाधान करते हुए वे क्या लिखते हैं इस पर ध्यान दीजिए-

नन्वेवमप्यवधारणे तदेकान्तानुषंग इति चेत् ? नायमनेकान्तवादिनामुपालम्भः, नयार्पणादेकान्तस्येष्टत्वात्, प्रमाणार्पणादेवानेकान्तस्य व्यवस्थितेः ।

शंका-इस प्रकार भी अवधारण करने पर उस ( मोक्षमार्ग ) के एकान्तका अनुषंग होता है ?

समाधान-नहीं, यह एकान्तवादियोंका उपालम्भ ठीक नहीं, क्योंकि नय ( निश्चयनय )की मुख्यतामें ऐसा एकान्त हमें इष्ट है । प्रमाणकी मुख्यतासे ही अनेकान्तकी व्यवस्था है ।

कथंचित् सम्यग्दर्शन आदि एक-एकको और साथ ही कथंचित् सम्यग्दर्शनादि तीनोंको मिलाकर युगपत् मोक्ष का कारण कहना यह प्रमाणदृष्टि है । निश्चयनय दृष्टि तो यही है कि सम्यग्दर्शनादि तीनरूप परिणत आत्मा ही मोक्षका साक्षात् कारण है । इसी तथ्यको श्लोक वार्तिकके उक्त वचन द्वारा स्पष्ट किया गया है ।

यह प्रमाणदृष्टि और निश्चयनयदृष्टिका निर्देशक वचन हैं । इससे हमें यह सुस्पष्ट रूपसे ज्ञात हो जाता है कि सम्यग्दर्शनादि एक-एकको मोक्षका कारण कहना यह सद्भूत होकर भी जब कि व्यवहारनयका सूचक वचन है । ऐसी अवस्थामें विशिष्ट काल या शरीरकी क्रियाको उसका हेतु कहना यह तो असद्भूतव्यवहार वचन ही ठहरेगा । इसे यथार्थ कहना तो दो द्रव्योंको मिलाकर एक कहनेके बराबर है ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘मात्र बाह्य या आभ्यन्तरके ही कारण माननेपर पुरुषके मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती ।’ आदि ।

समाधान यह है कि जिस समय जो कार्य होता है उस समय उसके अनुकूल आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रताके समान बाह्य सामग्रीकी समग्रता होती ही है । इसीका नाम द्रव्यगत स्वभाव है । किन्तु इन दोनोंमें-से किसमें किस रूपसे कारणता है इसका विचार करनेपर विदित होता है कि बाह्य सामग्रीमें कारणता असद्भूत व्यवहारनयसे ही बन सकती है । आभ्यन्तर सामग्रीमें कारणताको जिस प्रकार सद्भूत माना गया है उसी प्रकार यदि बाह्य सामग्रीमें भी कारणताको सद्भूत माना जाय तो पुरुषकी मोक्षविधि नहीं बन सकती यह उक्त कारिकाका आशय है ।

अपर पक्षने इसी प्रसंगमें ‘यद्वस्तु बाह्यं’ इत्यादि कारिकाका उल्लेख कर अपनी दृष्टिसे उसका अर्थ दिया है । किन्तु वह ठीक नहीं, क्योंकि उसका अर्थ करते समय एक तो ‘अभ्यन्तरमूलहेतोः’ पदको ‘गुण-दोषसूतेः’ का विशेषण नहीं बनाकर ‘अध्यात्मवृत्तस्य अभ्यन्तरमूलहेतोः तत् अंगभूतम्’ ऐसा अन्वय कर उसका अर्थ किया है । दूसरे ‘अंगभूतम्’ पदका अर्थ प्रकृतमें ‘गौण’ है । किन्तु यह अर्थ न कर उसका अर्थ करते समय साभिप्राय उस पदको वैसा ही रख दिया है । तीसरे चौथे चरणमें आये हुए ‘अलम्’ पदकी सर्वथा उपेक्षा करके उसका ऐसा अर्थ किया है जिससे पूरी कारिकासे ध्वनित होनेवाला अभिप्राय ही मटियामेट हो गया है ।

उसका सही अर्थ इस प्रकार है-अभ्यन्तर वस्तु मूल हेतु है जिसका ऐसे गुण-दोषकी उत्पत्तिमें जो बाह्य वस्तु निमित्त है वह अध्यात्मवृत्त अर्थात् मोक्ष-मार्गीके लिए गौण है, क्योंकि उसके लिए अभ्यन्तर कारण ही पर्याप्त है ।

इस कारिकामें आया हुआ ‘अपि’ पद ‘एव’ अर्थको सूचित करता है ।

अपर पक्षने उक्त कारिकाका अपने अभिप्रायसे अर्थ करनेके बाद जो यह लिखा है कि ‘फिर यह पात्रकी विशेषताको लक्ष्यमें रखकर कथन किया गया है, अतः इससे कार्य-कारणकी व्यवस्थाको असंगत नहीं माना जा सकता । पात्रकी विशेषताको दृष्टिमें रखकर किसी कथनको विवक्षित-मुख्य और अविवक्षित-गौण तो किया जा सकता है, परन्तु उसे अवस्तुभूत-अपरमार्थ नहीं कहा जा सकता ।’ उसका समाधान यह है कि इसमें सन्देह नहीं कि पात्रविशेषको लक्ष्यमें रखकर यह कारिका लिखी गई है, क्योंकि जो अध्यात्म-वृत्त जीव होता है उसकी दृष्टिमें असद्भूत और सद्भूत दोनों प्रकारका व्यवहार गौण रहता है, क्योंकि परम भावग्राही निश्चयको दृष्टिमें गौण कर तथा सद्भूत व्यवहार और असद्भूत व्यवहारको दृष्टिमें मुख्यकर प्रवृत्ति करना यह तो मिथ्यादृष्टिका लक्षण है, सम्यग्दृष्टिका नहीं । यही कारण है कि आचार्य कुन्दकुन्दने समयसार गाथा २ में स्वसमय ( सम्यग्दृष्टि ) और परसमय ( मिथ्यादृष्टि ) का लक्षण करते हुए लिखा है कि जो दर्शन-ज्ञान-चारित्रमें स्थित है वह स्वसमय है और जो पुद्गल कर्मप्रदेशोंमें स्थित है वह परसमय है । यह दृष्टिकी अपेक्षा कथन है । इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर पण्डितप्रवर दौलतरामजी एक भजनमें कहते हैं-

हम तो कबहूँ न निज घर आये ।
पर घर फिरत बहुत दिन बीते नाम अनेक धराये ।
हम तो कबहूँ न निज घर आये ।
परपद निजपद मान मगन ह्वै पर परिणति लिपटाये ।
शुद्ध बुद्ध चित्कन्द मनोहर चेतन भाव न भाये ।
हम तो कबहूँ न निज घर आये ।

अपर पक्षने जो यह लिखा है कि ‘अतः इससे कार्य-कारणकी व्यवस्थाको असंगत नहीं माना जा सकता ।’ हम इसे भी स्वीकार करते हैं, क्योंकि उपचरित और अनुपचरित दोनों दृष्टियोंको मिलाकर प्रमाण दृष्टिसे आगममें कार्य-कारणकी जो व्यवस्था की गई है वह ‘बाह्य और अभ्यन्तर उपाधिकी समग्रतामें प्रत्येक कार्य होता है यह द्रव्यगत स्वभाव है’ इस व्यवस्थाको ध्यानमें रखकर ही की गई है । दोनोंकी समग्रतामें प्रत्येक कार्य होता है यह यथार्थ है, कल्पना नहीं। किन्तु इनमेंसे अभ्यन्तर कारण यथार्थ है और वह यथार्थ क्यों है तथा बाह्य कारण अयथार्थ है और वह अयथार्थ क्यों है यह विचार दूसरा है। इसे जो ठीक तरहसे जानकर वैसी श्रद्धा करता है वह कार्य-कारण भावका यथार्थ ज्ञाता होता है ऐसा यदि हम कहें तो कोई अत्युक्ति न होगी।

विचार तो कीजिए कि यदि बाह्याभ्यन्तर दोनों प्रकारकी सामग्री यथार्थ होती तो आचार्य अध्यात्म-वृत्तके लिए निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीको दृष्टिमें गौण करनेका उपदेश क्यों देते और क्यों मोक्षकी प्रसिद्धिमें अभ्यन्तर कारणको ही पर्याप्त बतलाते। वस्तुतः इसमें संसारी बने रहने और मुक्त होनेका बीज छिपा हुआ है। जो पुरुष बाह्य सामग्रीको यथार्थ कारण जान अपनी मिथ्या बुद्धि या रागबुद्धिके कारण उसमें लिपटा रहता है वह सदाकाल संसारी बना रहता है और जो पुरुष अपने आत्माको ही यथार्थ कारण जान तथा व्यवहारसे कारण संज्ञाको प्राप्त बाह्य सामग्रीमें हेयबुद्धि कर अपने आत्माकी शरण जाता है वह परममात्मपदका अधिकारी होता है।

अपर पक्षने अपने प्रत्यक्षको प्रमाण मानकर और लौकिक दृष्टिसे दो-तीन दृष्टान्त उपस्थित कर इस सिद्धान्तका खण्डन करनेका प्रयत्न किया है कि ‘उपादानके अपने कार्यके सन्मुख होनेपर निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्री मिलती ही है।’ किन्तु उस पक्षका यह समग्र कथन कार्यकारणकी विडम्बना करनेवाला ही है, उसकी सिद्धि करनेवाला नहीं। हम पूछते हैं कि मन्दबुद्धि शिष्यके सामने अध्यापन क्रिया करते हुए अध्यापकके रहनेपर शिष्यने अपना कोई कार्य किया या नहीं? यदि कहो कि उस समय शिष्यने अपना कोई कार्य नहीं किया तो शिष्यको उस समय अपरिणामी मानना पड़ेगा। किन्तु इस दोषसे बचनेके लिये अपर पक्ष कहेगा कि शिष्यने उस समय भी अध्ययन कार्यको छोड़कर अपना अन्य कोई कार्य किया है। तो फिर अपर पक्षको यह मान लेना चाहिए कि उस समय शिष्यका जैसा उपादान था उसके अनुरूप उसने अपना कार्य किया और उसमें निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्री निमित्त हुई, अध्यापक निमित्त नहीं हुआ। जिस कार्यको लक्ष्यमें रखकर अपर पक्षने यहाँ दोष दिया है, वस्तुतः उस कार्यका शिष्य उस समय उपादान ही नहीं था। यही कारण है कि अध्यापन क्रियामें रत अध्यापकके होनेपर भी वह निमित्त व्यवहारके अयोग्य ही बना रहा। यह कार्यकारण व्यवस्था है, जो प्रत्येक द्रव्यके परिणाम स्वभावके अनुरूप होनेसे इस तथ्यकी पुष्टि करती है कि ‘उपादानके कार्यके सन्मुख होनेपर निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्री मिलती ही है।’

प्रकृतमें अपर पक्षकी सबसे बड़ी भूल यह है कि विवक्षित कार्य तो हुआ नहीं फिर भी वह, जिसमें उस समय उसने जिस कार्यकी कल्पना कर रखी है, उसे उस समय उसका उपादान मानता है और इस आधारपर यह लिखनेका साहस करता है कि सुबोध छात्र है पर अध्यापक आदि नहीं मिले, इसलिए कार्य नहीं हुआ। अपर पक्षको समझना चाहिए कि सुबोध छात्रका होना अन्य बात है और छात्रका उपादान होकर अध्ययन क्रियासे परिणत होना अन्य बात है। इसी प्रकार अपर पक्षको यह भी समझना चाहिए कि अध्यापकका अध्यापनरूप क्रियाका करना अन्य बात है और उस क्रिया द्वारा अन्यके कार्यमें व्यवहारसे निमित्त बनना अन्य बात है।

अध्यापक अध्यापन कला सीखनेके लिए एकान्तमें भी अध्यापन क्रिया कर सकता है और मन्दबुद्धि छात्रके सामने भी इस क्रियाको कर सकता है। पर इन दोनों स्थलोंपर वह निमित्त व्यवहार पदवीका पात्र नहीं। उसमें अध्यापनरूप निमित्त व्यवहार तभी होता है जब कोई छात्र उसे निमित्त कर स्वयं पढ़ रहा है। यह कार्य-कारण व्यवस्था है जो सदाकाल प्रत्येक कार्यपर लागू होती है। अतः अपर पक्षने अपने प्रत्यक्ष ज्ञानको प्रमाण मानकर जो कुछ भी यहाँ लिखा है वह यथार्थ नहीं है ऐसा समझना चाहिए।

अपर पक्षने प्रकृतमें पंचास्तिकाय गाथा १७० की टीका, पं० फूलचन्द्रकृत तत्त्वार्थसूत्र टीका और पार्श्वपुराणके प्रमाण देकर प्रत्येक कार्यमें बाह्य सामग्रीकी आवश्यकता सिद्ध की है। समाधान यह है कि प्रत्येक कार्य बाह्याभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें होता है इस सिद्धान्तके अनुसार नियत बाह्य सामग्री नियत आभ्यन्तर सामग्रीकी सूचक होनेसे व्यवहार नयसे आगममें ऐसा कथन किया गया है। किन्तु इतने मात्रसे इसे यथार्थ कथन न समझकर व्यवहार कथन ही समझना चाहिए। एकके गुण-धर्मको दूसरेका कहना यह व्यवहारका लक्षण है। अतएव व्यवहारनयसे ऐसा ही कथन किया जाता है जो व्यवहार वचन होनेसे आगममें और लोकमें स्वीकार किया गया है।

अपर पक्षने प्रवचनसार गाथा २११-२१२ की टीकाका प्रमाण उपस्थित कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि 'कहीं-कहीं मात्र शरीरकी क्रियासे भी धर्म-अधर्म होता है। जैसे कि मात्र शरीरकी चेष्टासे संयमका छेद होना ।’ किन्तु अपर पक्षका यह कथन एकान्तका सूचक होनेसे ठीक नहीं, क्योंकि प्रकृतमें यथामार्ग न की गई कायचेष्टाके अभावको सूचित करनेके लिए आचार्यने कायचेष्टामात्राधिकृत संयम-छेदको बहिरंग संमयछेद कहा है और इसलिए आचार्यने इसका अल्प प्रायश्चित कहा है। स्पष्ट है कि इस वचनसे अपर पक्षके अभिमतकी सिद्धि नहीं होती। प्रत्युत इस वचनसे तो यही सिद्ध होता है कि आत्म-कार्यमें सावधान व्यक्ति यदि बाह्य शरीरचेष्टाको प्रयत्नपूर्वक भी करता है तो भी शरीर क्रिया करनेका भाव दोषाधायक माना गया है और यही कारण है कि परमागममें सूत्रोक्त विधिपूर्वक की गई प्रत्येक क्रिया-का प्रायश्चित्त कहा है।

यहाँ अपर पक्षने जो मणिमाली मुनिकी कथा दी है वह शयन समयकी घटनासे सम्बन्ध रखती है। उस समय मुनिकी कायगुप्ति ऐसी होनी चाहिए थी कि उसको निमित्त कर शरीर चेष्टा नहीं होती। किन्तु मुनि अपनी कायगुप्ति न रख सके। यह दोष है। इसी दोषका उद्घाटन उस कथा द्वारा किया गया है। मालूम पड़ता है कि यहाँ अपर पक्ष ऐसे उदाहरण उपस्थित कर यह सिद्ध करना चाहता है कि आत्मकार्यमें सावधान अन्तरंग परिणामोंके अभावमें भी शरीरकी क्रियामात्रसे धर्म हो जाता है जो युक्त नहीं है।

केवली जिनके पुण्यको निमित्तकर चलने आदि रूप क्रिया होती है इसमें सन्देह नहीं, पर इतने मात्रसे वह मुक्तिकी साधन नहीं मानी जा सकती। अन्यथा योगनिरोध करके केवली जिन सूक्ष्मक्रिया-प्रतिपाती तथा व्युपरतक्रियानिवृत्ति ध्यानको क्यों ध्याते। जिस जिनागममें क्षायिक-चारित्रके होनेपर भी योगका सद्भाव होनेसे क्षायिक चारित्रको सम्पूर्ण चारित्ररूपसे स्वीकार न किया गया हो उस जिनागमसे यह फलित करना कि केवली जिनकी चलने आदि रूप क्रिया मोक्षका कारण है उचित नहीं है। प्रत्युत इससे यही मानना चाहिए कि केवली जिनके जबतक योग और तदनुसार बाह्य क्रिया है तबतक ईर्यापथ आस्रव ही है।

केवली जिन समुद्घात अपने वीर्य विशेषसे करते हैं और उसे निमित्त कर तीन कर्मोंका स्थितिघात होता है। अन्तरंगमें वीतराग परिणाम नहीं हैं और वीर्यविशेष भी नहीं है, फिर भी यह क्रिया हो गई और उसे निमित्तकर उक्त प्रकारसे कर्मोंका स्थितिघात हो गया ऐसा नहीं है।

अपर पक्षने धवल पु० १ पृ० ३०२ का प्रमाण उपस्थित करनेके बाद लिखा है कि ‘चार घातिया कर्मोंका नाश हो जानेसे केवलि जिनका उपयोग स्थिरि हो जाता है। किसी भी शारीरिक क्रियाके लिए उस रूप प्रयत्न या उपयोगकी आवश्यकता नहीं होती, किन्तु वे क्रियाएँ स्वाभाविक होती हैं, अतः केवलिसमुद्घातरूप क्रिया भी स्वाभाविक होती है जो संसार विच्छेदका कारण है। संसारविच्छेदका जो भी कारण है वह सब धर्म है।’

समाधान यह है कि केवली जिनके जो भी शारीरिक क्रिया होती है वह रागपूर्वक नहीं होती इसी अर्थमें आचार्योंने उसे स्वाभाविकी अतएव क्षायिकी कहा है। परन्तु केवलिसमुद्घातरूप क्रिया तो आत्मप्रदेशों की क्रिया है, शरीरकी क्रिया नहीं और उसका हेतु योग तथा आत्माका वीर्यविशेष है, अतः वह तीन अघातिया कर्मोंकी स्थितिघातका हेतु ( निमित्त ) रही आओ, इसमें बाधा नहीं। किन्तु इससे यह कहाँ सिद्ध हुआ कि शरीरकी क्रियासे आत्मामें धर्म-अधर्म होता है, अर्थात् त्रिकालमें सिद्ध नहीं होता। अतएव पूर्वोक्त विवेचनके आधारसे यही निर्णय करना समीचीन है कि शरीरकी क्रिया पर द्रव्य ( पुद्गल ) की पर्याय होनेसे उसका अजीव तत्त्वमें ही अन्तर्भाव होता है, अतः उसे आत्माके धर्म-अधर्ममें उपचारसे निमित्त कहना अन्य बात है। वस्तुतः यह आत्मा अपने शुभ, अशुभ और शुद्ध परिणामोंका कर्ता स्वयं है, अतः वही उनका मुख्य ( निश्चय ) हेतु है। विशेष स्पष्टीकरण पूर्वमें किया ही है।

शंका ३, प्रथम दौर: शंका ३ और उसका समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ९३

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प्रथम दौर

: १ :

शंका ३

जीव दयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?

समाधान १

इस प्रश्नमें यदि धर्म पदका अर्थ पुण्य भाव है तो जीव दयाको पुण्य भाव मानना मिथ्यात्व नहीं है, क्योंकि जीव दयाकी परिगणना शुभ परिणामोंमें की गई है और शुभ परिणामको आगममें पुण्य भाव माना हैं । परमात्मप्रकाशमें कहा भी है-

सुहपरिणामेँ धम्मु पर असुहेँ होइ अहम्मु ।
दोहिँ वि एहिँ विवज्जियउ सुद्धु ण बंधइ कम्मु ॥२-७१॥

अर्थ-शुभ परिणामसे मुख्यतया धर्म-पुण्य भाव होता है और अशुभ परिणामसे अधर्म-पाप भाव होता है तथा इन दोनों ही प्रकारके भावोंसे रहित शुद्ध परिणामवाला जीव कर्मबन्ध नहीं करता ॥ २-७१ ॥

सुह इत्यादि पदखण्डनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । ‘सुहपरिणामें धम्मु पर’ शुभपरिणामेन धर्मः पुण्यं भवति मुख्यवृत्या । ‘असुहँ होइ अहम्मु’ अशुभपरिणामेन भवत्यधर्मः पापम् ।

टीकाका तात्पर्य गाथार्थसे स्पष्ट है ।

यदि इस प्रश्नमें ‘धर्म’ पदका अर्थ वीतराग परिणति लिया जाय तो जीवदयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है, क्योंकि जीवदया पुण्यभाव होनेके कारण उसका आस्रव और बन्धतत्त्वमें अन्तर्भाव होता है, संवर और निर्जरातत्त्वमें अन्तर्भाव नहीं होता । जैसा कि श्री समयसारजी गाथा २६४ से स्पष्ट है-

तह वि य सच्चे दत्ते बंभे अपरिग्गहत्तणे चेव ।
कीरइ अज्झवसाणं जं तेण दु बज्झए पुण्णं ॥२६४॥

और इसी प्रकार सत्यमें, अचौर्यमें, ब्रह्मचर्यमें और अपरिग्रहमें जो अध्यवसान किया जाता है उससे पुण्यका बन्ध होता है ॥२६४॥

इसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र कहते हैं-

…………यस्तु अहिंसायां यथा विधीयते अध्यवसायः तथा यश्च सत्य-दत्त-ब्रह्मापरिग्रहेषु विधीयते स सर्वोऽपि केवल एव पुण्यबन्धहेतुः ।

…………और जो अहिंसामें अध्यवसाय किया जाता है, उसी प्रकार सत्य, अचौर्य ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहमें भी जो अध्यवसाय किया जाता है वह सभी एकमात्र पुण्यबन्धका ही कारण है ।

शंका ३, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ९४ से ९८

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका ३

जीवदयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?

प्रतिशंका २

इस प्रश्नके उत्तरमें आपने जीवदयाको धर्म मानते हुए उसकी शुभ परिणामोंमें परिगणना की है । यह एक अपेक्षासे ठीक होते हुए भी आपका यह कथन कि 'उसका आस्रव और बन्धतत्त्वमें अन्तर्भाव होता है, ‘संवर और निर्जरामें नहीं’ यह आगमके अनुकूल नहीं है । आपने अपने कथनकी पुष्टिमें जो समयसारकी गाथा २६४ को उद्घृत किया है उसमें अहिंसा आदिको पुण्यबन्धका कारण नहीं कहा है किन्तु इसके विषयमें होनेवाले अध्यवसानको ही पुण्यबन्धका कारण कहा है । टीकाकार श्री अमृतचन्द्रसूरिने गाथाकी टीका प्रारम्भ करते हुए जो ‘एवमयमज्ञानात्’ पदका प्रयोग किया है उससे भी सिद्ध होता है कि अध्यवसान ही कर्मबन्धका कारण है । यह प्रकरण ग्रन्थकाँर श्रीकुन्दकुन्दाचार्यने २४७ वीं गाथासे प्रारम्भ किया है और इन गाथाओंमें मूढ़, अज्ञानी आदि शब्दोंका प्रयोग करते हुए यह दर्शाया है कि मिथ्यादृष्टिका अज्ञानमय अध्यवसान भाव ही बन्धका कारण है ।

आपने अपने अभिप्रायकी पुष्टिके लिये जो परमात्मप्रकाश की ७१ वीं गाथाको प्रमाण रूपमें उपस्थित किया है उसमें भी ‘सुहपरिणामे धम्मु’ पद द्वारा शुभ परिणामको धर्म बतलाया गया है । टीकाकार श्री ब्रह्मदेवने 'धर्मः पुण्यं भवति ‘मुख्यवृत्त्या’ पद में मुख्यवृत्त्या शब्दसे शुभपरिणाम द्वारा संवर निर्जरा होना भी द्योतित किया है । इसके समर्थनमें अन्य आगम प्रमाण भी द्रष्टव्य हैं-

स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी संवर भावनाकी गाथा ३ क्रमिक संख्या ९७ निम्न प्रकार है-

गुत्ती जोगणिरोहो समिदी य पमादवज्जणं चेव ।
धम्मो दयापहाणो सुतत्तचिंता अणुप्पेहा ॥९७॥

अर्थ-योग निरोधरूप गुप्ति, प्रमाद त्यागरूप समिति, दयाप्रधान धर्म और सुतत्त्व चिन्तनरूप अनुप्रेक्षा है ।

संवर भावनामें कही जानेके कारण इस गाथामें प्रोक्त चारों क्रियाएँ संवरकी कारण हैं । उक्त गाथामें स्पष्ट रूपसे धर्मको दयाप्रधान बतलाया है । संस्कृत टीकाकारने भी इसी बातका समर्थन किया है ।

पद्मनन्दि पञ्चविंशतिकामें लिखा है-

अन्तस्तत्त्वं विशुद्धात्मा बहिस्तत्त्वं दयाङ्गिषु ।
द्वयोः सन्मीलने मोक्षस्तस्माद् द्वितयमाश्रयेत् ॥ ६-६० ॥

अर्थ-विशुद्ध आत्मा अन्तस्तत्त्व है और प्राणियोंकी दया बहिस्तत्त्व है । अन्तस्तत्त्व तथा बहिस्तत्त्व-इन दोनोंके मिलने पर मोक्ष होता है इसलिये इन दोनोंका आश्रय करना चाहिये ।

इसकी पुष्टि संस्कृत टीकाकारने भी की है । बोधपाहुडमें श्री कुन्दकुन्दाचार्यने कहा है-

धम्मो दयाविसुद्धो पव्वज्जा सव्वसंगपरिचत्ता ।
देवो ववगयमोहो उदययरो भव्वजीवाणं ॥२५॥

अर्थ-दयासे विशुद्ध धर्म, समस्त परिग्रहसे रहित मुनिदीक्षा ( प्रव्रज्या ), वीतराग देव ये तीनों भव्य जीवोंका कल्याण करनेवाले हैं ।

पद्मनन्दिपञ्चविंशतिकामें कहा है-

आद्या सद्व्रतसंचयस्य जननी सौख्यस्य सत्संपदां
मूलं धर्मतरोरनश्वरपदारोहैकनिःश्रेणिका ।
कार्या सद्भिरिहाङ्गिषु प्रथमतो नित्यं दया धार्मिकै-
धिङ्नामाप्यदयस्य तस्य च परं सर्वत्र शून्या दिशः ॥ १-८ ॥

अर्थ-यहाँ धर्मात्मा सज्जनोंको सबसे पहले प्राणियोंकी सदा दया करनी चाहिये, क्योंकि वह समीचीन व्रतसमूहकी आद्य-प्रमुख है, सुख एवं उत्कृष्ट संपदाओंकी जननी है, धर्मरूपी वृक्षकी जड़ है तथा अविनश्वर पद ( मोक्षमहल ) पर चढ़नेके लिये अपूर्व नसैनी है । निर्दय पुरुषके नामको भी धिक्कार है, उसके लिये समस्त दिशाएँ शून्यरूप हैं ।

इसी ग्रन्थमें आगे कहा है-

देवः स किं भवति यत्र विकारभावो,
धर्मः स किं न करुणाङ्गिषु यत्र मुख्या ।
तत् किं तपो गुरुरथास्ति न यत्र बोधः
सा किं विभूतिरिह यत्र न पात्रदानम् ॥२-१८॥

अर्थ-वह देव क्या ? जिसमें कि विकार भाव हो, वह धर्म क्या ? जहाँ कि प्राणियोंमें दया नहीं है, वह तप भी क्या है ? जिसमें विशाल ज्ञान नहीं है और वह विभूति भी क्या है ? जिसमें पात्रदान नहीं किया जाता ।

दयाको धर्म बतलानेका यही कथन इसी ग्रन्थके छठे अधिकारके ३७ से ४० तकके श्लोकोंमें भी स्पष्ट किया है । श्री कुन्दकुन्दाचार्यने भावपाहुडमें लिखा है-

मोहमयगारवेहि य मुक्का करुणभावसंजुत्ता ।
ते सव्वदुरियखंभं हणंति चारित्तखग्गेण ॥१५९॥

अर्थ-जो व्यक्ति मोह, मद, गारवसे रहित और करुणाभावसे सहित हैं वे अपने चारित्ररूपी खड्ग द्वारा समस्त पापरूपी स्तम्भको छिन्न-भिन्न कर डालते हैं ।

श्री धवलामें भी वीरसेनाचार्यने दयाको जीवका स्वभाव बतलाया है, जो निम्न प्रकार है-

करुणाए जीवसहावस्स कम्मजणिदत्तविरोहादो ।
-धवल पुस्तक १३ पृष्ठ ३६२

अर्थ-करुणा जीवका स्वभाव है, अतः उसे कर्मजनित कहनेमें विरोध आता है ।

श्री राजवार्तिक अ० १ सू० २ में सम्यग्दृष्टिके जो प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य ये चार लक्षण श्री अकलंकदेवने बतलाये हैं। उनमें अनुकम्पा ( दया ) भी संमिलित है। प्रमाण देखिए-

प्रशम-संवेगानुकम्पास्तिक्याद्यभिव्यक्तिलक्षणं प्रथमम्।

अर्थ-प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्यकी अभिव्यक्ति हो जाना सराग सम्यग्दर्शनका लक्षण है।

इनमेंसे अनुकम्पाका अर्थ दया किया गया है। इस कारण दया सम्यग्दर्शनका अङ्ग होनेसे धर्म-रूप है।

आपने दयाको शुभ भाव बतलाकर मात्र आस्रव और बन्धका कारण बतलाया है यह उचित नहीं है, क्योंकि शुभ भाव संवर और निर्जराके भी कारण हैं। प्रमाण निम्न प्रकार है। श्री वीरसेनाचार्यने जयधवलाके मंगलाचरणकी व्याख्यामें कहा है-

सुह-सुद्धपरिणामेहिं कम्मक्खयाभावे तक्खयाणुववत्तीदो।

अर्थ-यदि शुभ और शुद्ध परिणामोंसे कर्मोंका क्षय न माना जाय तो फिर कर्मोंका क्षय हो ही नहीं सकता।

इसके आगे वीरसेनाचार्य जयधवला पु० १ पृ० ९ में लिखते हैं-

अरहंतणमोक्कारो संपहियबंधादो असंखेज्जगुणकम्मक्खयकारओ त्ति तत्थ वि मुणीणं पवुत्ति-प्पसंगादो।

अरहंतणमोक्कारं भावेण य जो करेदि पयडमदी।
सो सव्वदुक्खमोक्खं पावइ अचिरेण कालेण ॥ ३ ॥

अर्थ-अरहंत नमस्कार तत्कालीन बन्धकी अपेक्षा असंख्यातगुणी कर्मनिर्जराका कारण है, इसलिये सरागसंयमके समान उसमें भी मुनियोंकी प्रवृत्ति प्राप्त होती है।

जो विवेकी जीव भावपूर्वक अरहन्तको नमस्कार करता है वह अतिशीघ्र समस्त दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।

जिणसाहुगुणुक्कित्तणपसंसणविणयदाणसंपण्णा।
सुद-सील-संजमरदा धम्मज्झाणं मुणेयव्वा ॥ ५५ ॥

किं फलमेदं धम्मज्झाणं ? अक्खवएसु विउलामरसुहफलं गुणसेणीये कम्मणिज्जराफलं च। खवएसु पुण असंखेज्जगुणसेढिकम्मपदेसणिज्जरणफलं सुहकम्माणमुक्कस्साणुभागविहाणफलं च। अतएव धर्मादनपेतं धर्म्यं ध्यानमिति सिद्धं। एत्थ गाहाओ-

होंति सुहासवसंवरणिज्जरासुहाइं विउलाइं।
ज्झाणवरस्स फलाइं सुहाणुबंधीण धम्मस्स ॥ ५६ ॥
जह वा घणसंघाया खणेण पवणाहया विलिज्जंति।
ज्झाणप्पवणोवहया तह कम्मघणा विलिज्जंति ॥५७॥
-धवला पु० १३ पृ० ७६-७७

अर्थ-जिन और साधुके गुणोंका कीर्तन करना, प्रशंसा करना, विनय करना, दानसम्पन्नता, श्रुत, शील और संयममें रत होना ये सब बातें धर्मध्यानमें होती हैं ऐसा जानना चाहिये।

शंका-इस धर्मध्यानका क्या फल है ?

समाधान-अक्षपक जीवोंको देव पर्यायसम्बन्धी विपुल सुख मिलना उसका फल है और गुणश्रेणीमें कर्मोंकी निर्जरा होना भी उसका फल है। तथा क्षपक जीवोंके तो असंख्यात गुणश्रेणीरूपसे कर्मप्रदेशोंकी निर्जरा होना और शुभ कर्मोंके उत्कृष्ट अनुभागका होना उसका फल है। अतएव जो धर्मसे अनपेत वह धर्मध्यान है यह बात सिद्ध होती है । इस विषयमें गाथाएँ-

उत्कृष्ट धर्मध्यानसे शुभ आस्रव, संवर, निर्जरा और देवोंका सुख ये शुभानुबन्धी विपुल फल होते हैं ॥ ५६ ॥

जैसे मेघपटल पवनसे ताडित होकर क्षणमात्रमें विलीन हो जाते हैं वैसे ही ध्यानरूपी पवनसे उपहत होकर कर्ममेघ भी विलीन हो जाते हैं ॥ ५७ ॥

देवसेनाचार्य कृत भावसंग्रहमें भी कहा है-

आवासयाइं कम्मं विज्जावच्चं च दाण-पूजाइं ।
जं कुणइ सम्मदिट्ठी तं सव्वं णिज्जरणिमित्तं ॥ ६१० ॥

अर्थ-जो सम्यग्दृष्टि पुरुष प्रतिदिन अपने आवश्यकोंका पालन करता है, व्रत, नियम आदिका पालन करता है, वैयावृत्य करता है, पात्रदान देता है और भगवान् जिनेन्द्रकी पूजन करता है उस पुरुष का वह सब कार्य कर्मोंकी निर्जराका कारण है।

श्री प्रवचनसारमें गाथा ७९ के वाद श्री जयसेन स्वामीकी टीकामें निम्न प्रकार गाथा है-

तं देवदेवं जदि गणवसहं गुरुतिलोयस्स ।
पणमंति जे मणुस्सा ते सोक्खं अक्खयं जंति ॥२॥

अर्थ-उन देवाधिदेव जिनेन्द्रको, गणधरदेवको और साधुमहाराजको जो मनुष्य वन्दन करता है वह अक्षय अर्थात् मोक्ष सुखको प्राप्त करता है।

श्री धवल पुस्तक ६ पृष्ठ ४२७ पर निम्नलिखित उल्लेख है-

कथं जिणविम्बदंसणं पढमसम्मत्तुप्पत्तीए कारणं ? जिणबिंबदंसणेण णिधत्ति-णिकाचिदस्स वि मिच्छत्तादिकम्मकलावस्स खयदंसणादो।

अर्थ-शंका-जिनबिम्बका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका कारण किस प्रकार है ?

समाधान-जिनबिम्ब दर्शनसे निधत्ति और णिकाचितरूप भी मिथ्यात्वादि कर्मकलापका क्षय देखा जाता है, जिससे जिनविम्बका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका कारण है।

जयधवल पुस्तक १ पृष्ठ ३६९ पर उल्लेख है-

तिरयणसाहणविसयलोहादो सग्गापवग्गाणमुप्पत्तिदंसणादो।

अर्थ-रत्नत्रयके साधन विषयक लोभसे स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति देखी जाती है।

आपने दयाको पुण्यरूप धर्म स्वीकृत किया है सो पुण्य भी साधारण वस्तु नहीं है। उसे भी जिनसेन स्वामीने

पुण्यात्तीर्थकरश्रियं च परमां नैःश्रेयसीञ्चाश्नुते।

९८ · जयपुर ( खानिया ) तत्त्वचर्चा

महापुराणके प्रथम भाग पृष्ठ ६५ श्लोक १२९ में मुक्तिलक्ष्मीका साधक बतलाया है।

श्री भावसंग्रहमें भी कहा है :-

सम्मादिट्ठीपुण्णं ण होइ संसारकारणं णियमा।
मोक्खस्स होइ हेउं जइ वि णियाणं ण सो कुणइ ॥४०४॥

अर्थ-सम्यग्दृष्टि द्वारा किया हुआ पुण्य संसारका कारण नियमसे नहीं होता है। यदि सम्यग्दृष्टि पुरुष द्वारा निदान न किया जाय तो वह पुण्य मोक्षका ही कारण है।

यदि निजशुद्धात्मैवोपादेय इति मत्त्वा तत्साधकत्वेन तदनुकूलं तपश्चरणं करोति तत्परिज्ञान-साधकं च पठति तदा परम्परया मोक्षसाधकं भवति। नो चेत् पुण्यबन्धकारणं तमेवेति ॥
-परमात्मप्रकाश अ० २ गा० १९१ टीका

अर्थ-यदि निज शुद्ध आत्मा ही उपादेय है ऐसा मानकर उसके साधकपनेसे उसके अनुकूल तप करता है और शास्त्र पढ़ता है तो वह परम्परासे मोक्षका ही कारण है। ऐसा नहीं कहना चाहिए कि वह केवल पुण्यबंधका ही कारण है।

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शंका ३, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ९८ से १००

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शंका ३

जीव दयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?

प्रतिशंका २ का समाधान

उक्त शंकाका जो उत्तर दिया गया था उस पर प्रतिशंका करते हुए लगभग ऐसे २० शास्त्रोंके प्रमाण उपस्थित कर यह सिद्ध करनेकी चेष्टा की गई है कि जीवदयाको धर्म मानना मिथ्यात्व नहीं है। इसमें संदेह नहीं कि उनमें कुछ ऐसे भी प्रमाण हैं जिनमें संवरके कारणोंमें दयाका अन्तर्भाव हुआ है। जयधवलाका एक ऐसा भी प्रमाण है जिसमें शुद्ध भावके साथ शुभ भावको भी कर्मक्षयका कारण कहा है। श्री धवलाजीके एक प्रमाणमें यह भी बतलाया है कि जिनबिम्बदर्शनसे निधत्ति-निकाचित बन्धकी व्युच्छित्ति होती है। इसीप्रकार भावसंग्रहमें यह भी कहा है कि जिनपूजासे कर्मक्षय होता है। ऐसे ही यहाँ जो अनेक प्रमाण संग्रह किये गये हैं उनके विविध प्रयोजन बतलाकर उन द्वारा पर्यायान्तरसे दयाको पुण्य और धर्म उभयरूप सिद्ध किया गया है। ये सब प्रमाण तो लगभग २० ही हैं। यदि पूरे जिनागममें-से ऐसे प्रमाणोंका संग्रह किया जाय तो एक स्वतन्त्र विशाल ग्रन्थ हो जाय। पर इन प्रमाणोंके आधारसे क्या पुण्यभावरूप दयाको इतने मात्रसे मोक्षका कारण माना जा सकता है? आचार्य अमृतचन्द्रने पुरुषार्थसिद्ध्युपायमें निर्जरा और पुण्यके कारणरूप सिद्धान्तका निर्देश करते हुए लिखा है-

येनांशेन सुदृष्टिस्तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति।
येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥२१२॥
येनांशेन ज्ञानं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति।
येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥२१३॥
येनांशेन चरित्रं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति।
येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥२१४॥

इस जीवके जिस अंशसे सम्यग्दर्शन है उस अंशसे इसके बन्धन नहीं है। परन्तु जिस अंशसे राग है उस अंशसे इसके बन्धन है। जिस अंशसे इसके ज्ञान है उस अंशसे इसके बंधन नहीं है। परन्तु जिस अंशसे राग है उस अंशसे इसके बन्धन है। जिस अंशसे इसके चारित्र है उस अंशसे इसके बन्धन नहीं है। परन्तु जिस अंशसे इसके राग है उस अंशसे इसके बन्धन है॥ २१२-२१४॥

आगे इसी आगमके २१६ वें श्लोकमें वे इसी तथ्यका समर्थन करते हुए पुनः कहते हैं-

दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोधः।
स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बन्धः॥ २१६॥

आत्मश्रद्धाका नाम सम्यग्दर्शन है, आत्मज्ञानको सम्यग्ज्ञान कहते हैं और आत्मामें स्थितिका नाम सम्यक्चारित्र है, इनसे बन्ध कैसे हो सकता है॥ २१६॥

श्री समयसारजीमें कहा है-

रत्तो बंधदि कम्मं मुंचदि जीवो विरागसंपत्तो।
एसो जिणोवदेसो तम्हा कम्मेसु मा रज्ज॥ १४०॥

रागी जीव कर्म बाँधता है और वैराग्य प्राप्त जीव कर्मसे छूटता है, यह जिनेन्द्र भगवान्का उपदेश है, इसलिये हे भव्यजीव! तू कर्मोंमें प्रीति-राग मत कर।

इसकी टीकामें लिखा है-

यः खलु रक्तोऽवश्यमेव कर्म बध्नीयात् विरक्त एव मुच्येतेत्ययमागमः स सामान्येन रक्तत्वनिमित्तत्वाच्छुभमशुभमुभयकर्माविशेषेण बन्धहेतुं साधयति, तदुभयमपि कर्म प्रतिषेधयति।

अर्थ-‘रक्त अर्थात् रागी अवश्य कर्म बाँधता है, और विरक्त अर्थात् विरागी ही कर्मसे छूटता है’ ऐसा जो यह आगम वचन है सो सामान्यतया रागीपनकी निमित्तताके कारण शुभाशुभ दोनों कर्मोंको अविशेषतया बन्धके कारणरूप सिद्ध करता है और इसलिए दोनों कर्मोंका निषेध करता है॥ १४०॥

इस प्रकार इस कथनसे स्पष्ट है कि शुभभाव चाहे वह दया हो, करुणा हो जिनबिम्ब दर्शन हो, व्रतोंका पालन करना हो, अन्य कुछ भी क्यों न हो यदि वह शुभ परिणाम है तो उससे मात्र बन्ध ही होता है, उससे संवर, निर्जरा और मोक्षकी सिद्धि होना असम्भव है। जिस प्रकार कोई मनुष्य भोजन करनेके बाद भी यदि यह मानता है कि मेरे उपवास है उसी प्रकार पर द्रव्यमें प्रीति करनेवाला उससे यदि अपनी कर्मक्षपणा मानता है तो उसका ऐसा मानना आगम, अनुभव और युक्ति तीनोंके विरुद्ध है।

श्री समयसारजीमें सम्यग्दृष्टिको जो अबन्धक कहा है इसका यह अर्थ नहीं कि उसके बन्धका सर्वथा प्रतिषेध किया है। उसका तो मात्र यही अर्थ है कि सम्यग्दृष्टिके रागभावका स्वामित्व न होनेसे उसे अबन्धक कहा है, क्योंकि सम्यग्दृष्टि और रागदृष्टिमें बड़ा अन्तर है। जो सम्यग्दृष्टि होता है वह रागदृष्टि नहीं होता और जो रागदृष्टि होता है वह सम्यग्दृष्टि नहीं होता। इसी अभिप्रायको ध्यानमें रखकर श्री समयसारजीमें कहा भी है-

पुग्गलकम्मं रागो तस्स विवागोदओ हवदि एसो।
ण दु एस मज्झ भावो जाणगभावो हु अहमिक्को ॥१९९॥

अर्थ-राग पुद्गल कर्म है। उसका विपाकरूप उदय यह है। यह मेरा भाव नहीं है। मैं तो निश्चयसे एक ज्ञायकभाव हूँ ॥१९९॥

वहाँ पुनः कहा है-

एवं सम्मद्दिट्ठी अप्पाणं मुणदि जाणगसहावं।
उदयं कम्मविवागं य मुअदि तच्च वियाणंतो ॥२००॥

अर्थ-इस प्रकार सम्यग्दृष्टि आत्माको (अपनेको) ज्ञायकस्वभाव जानता है और तत्त्वको अर्थात् यथार्थ स्वरूपको जानता हुआ कर्मके विपाकरूप उदयको छोड़ता है ॥२००॥

चेतना तीन प्रकारकी है-ज्ञानचेतना, कर्मचेतना और कर्मफलचेतना । उनमें-से सम्यग्दृष्टि अपनेको ज्ञानचेतनाका स्वामी मानता है, कर्मचेतना और कर्मफलचेतनाका नहीं। किन्तु शुभ रागरूप दयाका अन्तर्भाव कर्मचेतनामें होता है, इसलिये कर्मके विपाकस्वरूप उसके ऐसी दया अवश्य होती है पर वह इसका स्वामी नहीं होता।

यदि प्रकृतमें दयासे वीतराग परिणाम स्वीकार किया जाता है और इसके फल स्वरूप जिन उल्लेखोंके आश्रयसे प्रतिशंका२में दयाको कर्मक्षपणा या मोक्षका कारण कहा है तो उसे उस रूप स्वीकार करनेमें तत्त्वकी कोई हानि नहीं होती, क्योंकि राग परिणाम एक मात्र बन्धका ही कारण है, फिर भले ही वह दसवें गुणस्थानका सूक्ष्मसाम्पराय रूप राग परिणाम ही क्यों न हो और वीतराग भाव एक मात्र कर्मक्षपणाका ही हेतु है, फिर भले ही वह अविरत सम्यग्दृष्टिका वीतराग परिणाम क्यों न हो। इसी अभिप्रायको ध्यानमें रखकर श्री समयसारजीके कलशोंमें कहा भी है-

वृत्तं ज्ञानस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं सदा।
एकद्रव्यस्वभावत्वान्मोक्षहेतुस्तदेव तत् ॥१०६॥
वृत्तं कर्मस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं न हि।
द्रव्यान्तरस्वभावत्वान्मोक्षहेतुर्न कर्म तत् ॥१०७॥

अर्थ-ज्ञान एक द्रव्यस्वभावी (जीवस्वभावी) होनेसे ज्ञानके स्वभावसे सदा ज्ञानका भवन बनता है, इसलिये ज्ञान ही मोक्षका कारण है ॥१०६॥

कर्म अन्य द्रव्यस्वभावी (पुद्गलस्वभावी) होनेसे कर्मके स्वभावसे ज्ञानका भवन नहीं बनता, इसलिए कर्म मोक्षका कारण नहीं है ॥१०७॥

शंका ३, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १०१ से ११०

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका ३

प्रश्न था कि-

जीव दयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?

प्रतिशंका ३

इस प्रश्नके उत्तरमें आपने पहले पत्रकमें जीवदयाको धर्म न माननेके लिये तीन बातें लिखी थीं-

\१. जीव दया पुण्यभाव है, जो कि शुभ परिणामरूप तो है किन्तु धर्मरूप नहीं है।

\२. परमात्मप्रकाशकी ७१वीं गाथाका प्रमाण दिया जिसमें शुभपरिणामको धर्म बतलाया है परन्तु टीकाकारके ‘शुभपरिणामेन धर्मः पुण्यं भवति मुख्यवृत्या’ अर्थात् 'शुभपरिणामसे धर्म होता है जो कि मुख्यवृत्तिसे पुण्यरूप हैं । इस वाक्यके आधारसे आपने शुभ परिणामको धर्मरूप होनेकी उपेक्षा कर पुण्यरूप निश्चित कर दिया । ऐसा करते हुए आपने ग्रन्थकार तथा टीकाकार द्वारा शुभ परिणामोंको धर्मरूप बतलाये जानेपर भी आपने उसे पुण्यका आधार लेकर, जीव दयाको आस्रव-बन्ध तत्त्वमें बलात् स्वेच्छासे अधर्ममें डाल दिया। तथा च जीवदयाको धर्म मानना मिथ्यात्व भी बतला दिया।

\३. समयसारकी २६४वीं गाथाका उद्धरण देकर जीवदयाको अध्यवसान ( कषायप्रभावित गलत अभिप्राय-अभिमान आदिके कारण यों मान लेना कि मैंने उसे मरनेसे बचा लिया आदि ) रूप बतलाया, तदनुसार जीवदयाको धर्म न मानकर मात्र पुण्यबन्धरूप बतलाया।

आपके इस उत्तरके निराकरणमें हमने आपको दूसरा पत्रक दिया जिसमें श्री आचार्य कुन्दकुन्द, वीरसेन, अकलंक, देवसेन, स्वामी कार्तिकेय आदि ऋषियोंके प्रणीत प्रामाणिक-आर्षग्रन्थों-धवल, जयधवल, राजवार्तिक, बोधपाहुड, भावपाहुड, भावसंग्रह, स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा आदिके लगभग २० प्रमाण देकर दो बातें सिद्ध की थीं-

\१. जीवदया करना धर्म है।

\२. पुण्यभाव धर्मरूप है। पुण्यभाव या शुभभावोंसे संवर निर्जरा तथा पुण्य कर्मबन्ध होता है।

आर्षग्रन्थोंके श्रद्धालु बन्धु इन ऋषियों तथा उनके ग्रन्थोंकी प्रामाणिकतापर अप्रामाणिकताकी अँगुली नहीं उठा सकते, क्योंकि हमको सैद्धान्तिक एवं धार्मिक पथप्रदर्शन इन ऋषियों तथा इनके आर्षग्रन्थोंसे ही प्राप्त होता है और उसका कारण है कि उनमें निर्विवाद जिनवाणी निबद्ध है। यह तो हो सकता है कि इन आर्षग्रन्थोंकी कोई बात कदाचित् हमारी समझमें न आवे, किन्तु यह बात कदापि नहीं हो सकती कि उन ग्रन्थोंकी कोई भी बात अप्रामाणिक या अमान्य हो।

तदनुसार आशा थी कि इन ग्रन्थोंके प्रमाण देखकर चरणानुयोग तथा जैनधर्मके मूलाधार दयाभावको धर्मरूप स्वीकार कर लिया जाता, परन्तु आशा फलवती नहीं हुई।

आपके-दूसरे पत्रकमें उन आर्ष प्रमाणोंकी प्रामाणिकताकी उपेक्षा करते हुए उनकी अवहेलनामें निम्न पंक्तियाँ लिखी गई हैं-‘ये सब प्रमाण तो लगभग २० ही हैं, यदि पूरे जिनागममें-से ऐसे प्रमाणोंका संग्रह किया जावे तो एक स्वतन्त्र विशाल ग्रन्थ हो जाय, पर इन प्रमाणोंके आधारपर क्या पुण्यभावरूप दयाको इतने मात्रसे मोक्षका कारण माना जा सकता है ?’····फिर पुनः अप्रासंगिक उद्धरण देकर लिखा गया है ‘शुभभाव चाहे वह दया हो, करुणा हो, जिनविम्बदर्शन हो, व्रतोंका पालन हो, अन्य कुछ भी क्यों न हो, यदि वह शुभ परिणाम है तो उससे मात्र बन्ध ही होता है उससे संवर, निर्जरा और मोक्षकी सिद्धि होना असंभव है।’ इसका स्पष्ट अर्थ यह हुआ कि उपर्युक्त महान् आचार्योंका यह कथन कि शुभभावसे संवर व निर्जरा भी होती है····असंभव होनेके कारण मिथ्या है। आश्चर्य है कि कोई भी जिनवाणीका भक्त इन महान् आचार्यों एवं महान् ग्रन्थोंके स्पष्ट कथनको मिथ्यारूप कहनेका साहस कैसे कर सकता है ?

इसके साथ ही मूल विषयको अछूता रखकर विषयान्तरमें प्रवेश किया गया है। उसमें जो समयसार, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय तथा समयसार कलशके ४-५ प्रमाण उद्धृत किये गये हैं उनमेंसे एक भी प्रमाण, एक भी वाक्य तथा एक भी शब्द ऐसा नहीं है जिसमें जीवदयाको धर्म माननेपर मिथ्यात्वकी संभावना सिद्ध होती है।

आपने अपने इस पत्रकमें केवल रागभावको बन्धका कारण बतलानेकी चेष्टा की है, उस विषयमें हम असहमत नहीं हैं, अतः उक्त दोनों ग्रन्थोंके उद्धरण हमें स्वीकार हैं। कितना अच्छा होता कि आप भी उन आर्ष ग्रन्थोंको प्रमाण मानकर ‘धम्मो दयापहाणो’-धर्म दया प्रधान है।

धम्मो दयाविसुद्धो पव्वज्जा सव्वसंगपरिचत्ता।
देवो ववगयमोहो उदययरो भव्वजीवाणं ॥२५॥
-वोधपाहुड़

अर्थ-दयासे विशुद्ध धर्म, सर्वपरिग्रह रहित दीक्षा-साधु मुद्रा और मोह रहित वीतराग देव ये तीनों भव्य जीवोंके अभ्युदयको करनेवाले हैं।

करुणाए जीवसहावस्स कम्मजणिदत्तविरोहादो।

अर्थ-करुणा जीवका स्वभाव है, अतः उसे कर्मजनित कहनेमें विरोध आता है।
-धवल पु० १३ पृ० ३६२

तथा-

सम्मादिट्ठीपुण्णं ण होइ संसारकारणं णियमा।
मोक्खस्स होइ हेऊ जइ वि णियाणं ण सो कुणइ ॥४०४॥
-भावसंग्रह

अर्थ-सम्यग्दृष्टिका पुण्य संसारका कारण नहीं है, नियमसे मोक्षका कारण है।

आदि निर्विवाद वाक्योंको श्रद्धाभावसे ही यदि स्वीकार कर लेते तो जैनधर्मके मूल तत्त्व पर हमारा और आपका मतभेद दूर हो जाता।

रागभावकी कर्मबन्धकी कारणता पर विचार करनेसे पहले हम एक महत्त्वपूर्ण आर्ष विधानकी ओर पुनः आपका ध्यान आकर्षित करनेका लोभ संवरण नहीं कर सकते। आशा है आप उस शिरसा मान्य वाक्य पर एकवार पुनः गंभीरतासे विचार करनेका प्रयत्न करेंगे।

सुहसुद्धपरिणामेहिं कम्मक्खयाभावे तक्खयाणुववत्तीदो।

अर्थ-शुभ और शुद्ध भावों द्वारा यदि कर्मोंका क्षय न हो तो फिर कर्मोंका क्षय किसी तरह हो ही नहीं सकता।

जयधवल पु० १ पृ० ६ के इस मुद्रित अर्थसे भी स्पष्ट हो जाता है कि शुभसे भी कर्मोंका क्षय होता है और शुद्धसे भी। अतः आपका ‘शुद्धके साथ शुभ’ ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं है।

हम आशावादी हैं, अतः आशा रखते हैं कि ये पुष्ट प्रमाण दया और पुण्यविषयक आपकी धारणाको परिवर्तित करनेमें सहायक होंगे। आपने रागभावको केन्द्र बना कर पुण्यभावों या शुभभावोंको केवल कर्म-बन्धके साथ बाँधनेका प्रयत्न किया है यह शुभभावोंकी अवान्तर परिणतियों पर दृष्टि न जानेका फल जान पड़ता है। इतनी बात तो अवश्य है कि दशवें गुणस्थान तक रागभाव लघु, लघुतर, लघुतम रूपसे पाया जाता है और यह भी सत्य है कि रागभावसे कर्मोंका आस्रव तथा बन्ध हुआ करता है। तथा च अमृतचन्द्र सूरिने जो असंयत सम्यग्दृष्टि, संयमासंयमी एवं सरागसंयतके मिश्रित भावोंको अपनी प्रज्ञा छैनीसे भिन्न-भिन्न करते हुए रागांश और रत्नत्रयांश द्वारा कर्मके बन्धन और अबन्धनकी सुन्दर व्यवस्था पुरुषार्थसिद्ध्युपाय ग्रन्थके तीन श्लोकोंमें की है उनमें एक अखण्डित मिश्रित भावका विश्लेषण समझानेके लिए प्रयत्न किया गया है। यह मिश्रित अखण्ड भाव ही शुभ भाव है, अतः उससे आस्रव बन्ध भी होता है तथा संवर निर्जरा भी होती है। यह मिश्रित शुभ भावकी अखण्डता निम्न प्रकारसे स्पष्ट होती है-

हम जिस प्रकार दाल भात रोटी शाक पानी आदि पदार्थोंका मिश्रित भोजन करते रहते हैं, काली मिर्च, सौंठ, पीपल, हरड़, गिलोय आदि सम्मिलित पदार्थोंको पानीमें मिलाकर आगकी गर्मीसे जिस प्रकार काढ़ा बनाया जाता है जिसका कि मिला हुआ रस होता है, उसमें वात पित्त कफसे उत्पन्न हुए विविध प्रकारके खाँसी ज्वर आदि रोगोंको कम करने, दूर करने तथा शरीरमें बल उत्पन्न करने आदिकी सम्मिलित शक्ति होती है उसी प्रकार मुख द्वारा पहुँचे हुए उस विविध प्रकारके खाये हुए भोजनसे एक ही साथ अनेक तरहके सम्मिलित परिणाम हुआ करते हैं। पेटमें काढ़ेकी तरह रस बनता है उससे खून, मांस, हड्डी आदि धातु-उपधातुओंकी रचना होती है। उसी भोजनसे अनेक प्रकारके रोग भी दूर होते हैं तथा अनेक प्रकार-के छोटे-मोटे नवीन रोग भी उत्पन्न हुआ करते हैं। ठीक ऐसी ही बात कर्मबन्ध और कर्मफलके विषयमें प्रति समय हुआ करती है। इन्द्रियों, शरीर, मन, वचन, कषाय आदिकी सम्मिलित क्रियासे प्रति समय सात कर्मोंका बन्ध हुआ करता है और किसी एक समय आयु कर्म सहित ज्ञानावरण आदि आठों कर्मोंका भी बन्ध हुआ करता है। योगों और कषायोंकी तीव्र, मन्द आदि परिणतिके अनुसार उन कर्म प्रकृतियोंकी स्थिति, अनुभाग आदिमें विविध प्रकारका परिणमन होता है। किसी कर्मप्रकृतिमें तीव्रता आती है, किसीमें मन्दता, किसीमें कर्मप्रदेश कम और किसीमें अधिक आते हैं।

इसी तरहकी सम्मिलित विविधता आठों कर्मोंके उदय कालमें भी हुआ करती है। ज्ञान, दर्शन, श्रद्धा, चारित्र, आत्मशक्ति आदि गुणोंका हीनाधिक होना, आकुलता-व्याकुलता होना, चिन्ता, राग, द्वेष, क्रोध, मान आदि कषायोंकी तरतमता होना आदि विविध प्रकारके फल प्रति समय मिला करते हैं। जिस तरह अनेक प्रकारके खाये हुए सम्मिलित भोजनमें उसके द्वारा होनेवाले सम्मिलित परिणमनमें बुद्धि द्वारा विभाजन किया जाता है कि अमुक पदार्थके कारण अमुक-अमुक शरीरके धातु उपधातु रोग आदिपर अमुक-अमुक तरहका प्रभाव हुआ आदि। इसी तरह सम्मिलित कर्म बन्ध और कर्म उदयके विषयमें भी आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा विभाजन किया जाता है। अतएव कर्मोदयके समय आत्मामें विविध प्रकारका मिश्रित परिणाम होता रहता है। उस सम्मिलित परिणामके विभाजनको विचारा तो जा सकता है किन्तु किया नहीं जा साकता। जब हम शुभोपयोगके विषयमें विचार करते हैं तब वहाँ भी ऐसा ही मिश्रित फल प्रगट होता हुआ प्रतीत होता है। राग और विराग अंशोंका सम्मिलित रूप शुभोपयोग हुआ करता है जिसको कि अंश विभाजन द्वारा विचारा तो जा सकता है कि इसमें इतना अंश राग परिणामका है और इतना अंश विराग परिणामका है, परन्तु उस मिश्रित परिणामका क्रियात्मक विभाजन नहीं किया जा सकता।

तदनुसार चौथे, पाँचवे, छठे, सातवें गुणस्थानोंकी शुभ परिणतिमें सम्मिलित सम्यक्त्व, ज्ञान, चारित्र, चारित्राचारित्रकृत विराग अंश भी होता है और कुछ कषाय नोकषायकृत रागांश भी होता हैं, तदनुसार उन गुणस्थानोंमें सम्मिलित एक विचित्र प्रकारका परिणाम होता है जैसा कि मिश्र गुणस्थानमें सम्यक्त्व तथा मिथ्यात्व भावसे पृथक् विचित्र प्रकारका मिश्र परिणाम होता है, उस मिश्र गुणस्थानके विचित्र मिश्रित परिणाममें श्रद्धा, अश्रद्धाका क्रियात्मक विभाजन अशक्य होता है। तदनुसार शुभ परिणतिकी मिश्रित तदनुसार शुभ परिणतिकी मिश्रित अवस्था हुआ करती है जिससे कि कर्म बन्ध, कर्मसंवर और कर्म निर्जरा ये तीनों कार्य एक साथ हुआ करते हैं।

यह बात भी ध्यानमें रखने योग्य है कि चौथेसे सातवें गुणस्थान तक शुभोपयोग ही होता है, अन्य कोई शुद्धोपयोगांश आदि उन गुणस्थानोंमें नहीं होता, क्योंकि एक समयमें एक ही उपयोग होता है और आत्मा उस समय अपने उपयोगसे तन्मय होता है। एक समयमें दो उपयोग साथ साथ नहीं हो सकते हैं। इसके प्रमाणमें श्री प्रवचनसारकी गाथा ८व९ देखनेकी कृपा करें।

जीवो परिणमदि जदा सुहेण असुहेण वा सुहो असुहो।
सुद्धेण तदा सुद्धो हवदि हि परिणामसब्भावो ॥९॥

अर्थ-जब यह परिणाम स्वभाववाला जीव शुभ-अशुभ या शुद्धभावकरि परिणमता है, तब शुभ-अशुभ या शुद्ध रूप ही होता है।

जिस तरह जलता हुआ दीपक अपने एक ही ज्वलित परिणामसे प्रकाश, अन्धकारनाश, उष्णता, तैलशोष ( तेलसुखाना ), बत्ती जलाना आदि अनेक कार्य करता है उसी तरह एक समयमें होनेवाले केवल एक शुभ उपयोग परिणाम द्वारा कार्यकारणभावसे कर्मबन्ध, कर्मसंवर और कर्मनिर्जरारूप तीनों कार्य होते रहते हैं। यही शुभ उपयोगरूप पुण्य आत्माको मुक्तिके निकट लाता है।

पहला गुणस्थानवर्ती मिथ्यादृष्टि जीव जब सम्यक्त्वके सम्मुख होता है तब शुद्ध परिणामोंके अभावमें भी असंख्यातगुणी निर्जरा, स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात करता ही है। तद्वत् शुभोपयोग रूप पुण्यका प्रत्येक भाव कर्म-संवर, कर्म-निर्जरा, कर्मबन्धरूप तीनों कार्य प्रतिसमय किया करता है, अतः जीव-दया, दान, पूजा, व्रत आदि कार्य गुणस्थानानुसार संवर, निर्जराके भी निर्विवाद कारण हैं। जिसके कुछ अन्य प्रमाण भी नीचे दिए जाते हैं। स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी निम्न गाथा ध्यानमें देनेके योग्य है-

णिज्जियदोसं देवं सव्वजिवाणं दयावरं धम्मं।
वज्जियगंथं च गुरुं जो मण्णदि सो हु होदि सद्दिट्ठी ॥३१७॥

अर्थ-जो क्षुधा तृषा आदि अठारह दोषोंसे रहित देव, सर्व जीवों पर दया करने वाले धर्म और ग्रन्थ-परिग्रह रहित गुरुको मानता है वह सम्यग्दृष्टि है।

संस्कृत टीका का अंश भी द्रष्टव्य है-

च पुनः धर्मं वृषं श्रेयः मन्यते श्रद्दधाति । कथंभूतं धर्मम् ? सर्वजीवानां दयापरं सर्वेषां जीवानां प्राणिनां पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसकायिकानां शरीरिणां मनोवचनकायकृतकारितानुमतप्रकारेण दयापरं कृपोत्कृष्टं धर्मं श्रद्दधाति यः । तथा च धम्मो वत्थुसहावो खमादिभावो य दसविहो धम्मो । रयणत्तयं च धम्मो जीवाणं रक्खणं धम्मो ॥ इति धर्मं मनुते ।

इस टीकासे भी दयाको धर्म मानना सिद्ध है ।

नियमसार गाथा ६ की टीकामें उद्धृत प्राचीन गाथा द्रष्टव्य है, जिसमें दयाको धर्म कहा गया है-

सो धम्मो जत्थ दया सो वि तवो विसयणिग्गहो जस्स ।
दसअट्ठदोसरहिओ सो देवो णत्थि संदेहो ॥

अर्थ-धर्म वही है जिसमें दया है, तप वही है जहाँ विषयोंका निग्रह है और देव वही है जिसमें अठारह दोष नहीं हैं ।

दया-दम-त्याग-समाधिसंततेः पथि प्रयाहि प्रगुणं प्रयत्नवान् ।
नयत्यवश्यं वचसामगोचरं विकल्पदूरं परमं किमप्यसौ ॥१०७॥
-आत्मानुशासन

अर्थ-हे भव्य ! तूं प्रयत्न करके सरल भावसे दया, इन्द्रियदमन, दान और ध्यानकी परम्पराके मार्गमें प्रवृत्त हो जा, वह मार्ग निश्चयसे किसी ऐसे उत्कृष्ट पद ( मोक्ष ) को प्राप्त कराता है जो वचनों-से अनिर्वचनीय एवं समस्त विकल्पोंसे रहित है ।

एकजीवदयैकत्र परत्र सकलाः क्रियाः ।
परं फलं तु पूर्वत्र कृपेश्चिन्तामणेरिव ॥३६१॥
-यशस्तिलक उपासकाध्ययन

अर्थ-अकेली जीवदया एक ओर है और शेषकी सब क्रियाएँ दूसरी ओर हैं । शेष क्रियाओं-का फल खेतीके समान है और जीवदयाका फल चिन्तामणिके समान है ।

उपसम दया य खंती वड्ढइ वेरागदा य जह जह से ।
तह तह य मोक्खसोक्खं अक्खीणं भावियं होइ ॥६२॥
-मूलाचार द्वादशानुप्रेक्षा

अर्थ-उपशम, दया, शान्ति और वैराग्य जैसे-जैसे जीवके बढ़ते है वैसे-वैसे ही अक्षय मोक्ष सुख-की प्राप्ति होती है ।

छज्जीवसडायदणं णिच्चं मणवयणकायजोगेहिं ।
कुरु दया परिहर मुणिवर भावि अपुव्वं महासत्तं ॥१३३॥ -भावपाहुड

अर्थ-हे मुनिवर । तू मन, वचन, कायसे छः कायके जीवोंकी दया कर, छः अनायतन-को छोड़ और अपूर्व महासत्त्व ( चेतना भाव ) को भाय ।

मोहमयगारवेहिं य मुक्का जे करुणाभावसंजुता ।
ते सव्वदूरियखंमं हणंति चारित्तखग्गेण ॥१५७॥-भावपाहुड़

अर्थ-जे मुनि मोह मद, गौरव इन करि रहित अर करुणा भाव कर सहित हैं, वे चारित्ररूपी खड्ग करि पापरूपी स्तम्भको हणें हैं ।

जीवदया दम सच्चं अचोरियं वंभचेरसंतोसे ।
सम्मदंसणणाणं तओ य सीलस्स परिवारा ॥ १९ ॥ -शीलपाहुड़

अर्थ-जीवदया, इन्द्रियनिका दमन, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, संतोष, सम्यग्दर्शन, ज्ञान और तप-ये सब शीलके परिवार हैं ।

आगे गाथा २० में कहा है-सीलं मोक्खस्स सोपाणं-शील मोक्षके लिये नसैनीके समान है ।

जह-जह णिव्वेदसयं वेरागदया पवट्टंति ।
तह तह अब्भासयरं णिव्वाणं होइ पुरिसस्स ॥ १८६४ ॥
-मूलाराधना

अर्थ-जैसे जैसे निर्वेद, प्रशम, दया और इन्द्रियोंका दमन बढ़ता है वैसे-वैसे ही पुरुषके पास मोक्ष आता जाता है ॥ १८६४ ॥

जीवदया संयम है और संयम केवल वंधका ही कारण नहीं, किन्तु संवर-निर्जराका भी कारण है, क्योंकि संयम आत्मधर्म है । उत्तम क्षमा आदि दस धर्मोंमें संयम भी एक धर्म है । संयम धर्मके स्वरूपका कथन करते हुए श्रीपद्मनन्दि आचार्य कहते हैं-

जन्तुकृपार्दितमनसः समितिषु साधोः प्रवर्तमानस्य ।
प्राणेन्द्रियपरिहारं संयममाहुर्महामुनयः ॥ ११९६ ॥

अर्थात्-जिसका मन जीवदयासे भीग रहा है तथा जो ईर्या-भाषा आदि पांच समितियोंमें प्रवर्तमान है ऐसे साधुके द्वारा जो षट्काय जीवोंकी रक्षा और अपनी इन्द्रियोंका दमन किया जाता है उसे गणधर देवादि महामुनि संयम कहते हैं ।

इसी बातको श्री पं० फूलचन्द्रजीने स्वयं इन शब्दोंमें लिखा है-

षट्कायके जीवोंकी भले प्रकारसे रक्षा करना और इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयोंमें नहीं प्रवृत्त होने देना संयम है ।
-तत्त्वार्थसूत्र पृ० ४१७ वर्णी ग्रन्थमालासे प्रकाशित

मिथ्यादृष्टिके जो दया आदिक शुभभाव सांसारिक सुखकी प्राप्तिके उद्देश्यसे किये जाते हैं वे मात्र रागरूप होनेसे और इन्द्रिय सुखकी इच्छा लिये हुए होनेसे केवल बन्धके ही कारण हैं । ऐसे ही शुभभावोंको श्री प्रवचनसार प्रथम-अध्याय आदिक ग्रन्थोंमें हेय वतलाया है । जो शुभभाव सम्यग्दृष्टिके वीतरागता एवं मोक्षप्राप्तिके लिये होते हैं उनसे संवर निर्जरा भी होती है । उन्हींसे सम्बन्धित यह प्रश्न है । उनका कथन प्रवचनसार तृतीय अध्याय आदिक ग्रन्थोंमें है । इन्हींको निरतिशय तथा सातिशयके नामसे भी कहा जा सकता है । सम्यग्दृष्टिका दया आदि शुभभाव, कर्मचेतना न मानकर ज्ञानचेतना माना गया है, इसलिये उसे मात्र बन्धका कारण मानना आगमविरुद्ध है ।

आपने अन्तमें लिखा है-यदि ‘प्रकृतमें दयासे वीतराग परिणाम स्वीकार किया जाता है…’ आदि। इसके विषयमें हमारा कहना है कि जब आगमके आधार पर सैद्धान्तिक चर्चा होती है तब किसी व्यक्ति विशेषकी मान्यताका प्रश्न नहीं रह जाता। हमारी तो आगम पर ही पूर्ण श्रद्धा है और आगमके उल्लेखोंकी संगति बैठानेका ही प्रयत्न करते हैं यही हमारी मान्यता है। किसी व्यक्ति विशेषकी स्वेच्छानुसार मान्यता या प्रतिपादनके अनुसार अपना पूर्वका आगमानुकूल श्रद्धान बदला नहीं जा सकता है और न बदलना ही चाहिये। आगममें क्या माना गया है यह सिद्ध करनेके लिये आपके समक्ष आर्ष ग्रन्थोंके प्रमाण उपस्थित हैं, उन पर आप विचार करेंगे ऐसी आशा है।

अन्तमें आपने समयसार कलश १०६-१०७ वें श्लोक उद्धृत कर मथितार्थके रूपमें निम्नलिखित शब्द लिखे हैं-‘इसलिये ज्ञान ही मोक्षका कारण है।’ इसपर हमारा इतना ही संकेत है कि आपने जैसा समझा है वह ठीक नहीं है।

यदि ज्ञानमात्र ही मोक्षका कारण होता तो श्री कुन्दकुन्द आचार्य मोक्षपाहुड़ ग्रन्थमें यों न लिखते-

धुवसिद्धी तित्थयरा चउणाणजुदो करेइ तवयरणं।
णाऊण धुवं कुज्जा तवयरणं णाणजुत्तो वि ॥६०॥

अर्थ-तीर्थंकरको उसी भवसे अवश्य आत्मसिद्धि (मुक्ति) होती है, तथा वे जन्मसे मति, श्रुत, अवधि ज्ञान सहित और मुनिदीक्षा लेते ही मनःपर्ययज्ञानसहित चार ज्ञानधारक हो जाते हैं, चार ज्ञानधारक होकर भी वे तपश्चरण करते हैं। (तपस्या करनेके बाद ही तीर्थंकर मुक्त होते हैं।) ऐसा जानकर ज्ञानसहित व्यक्तिको अवश्य तपस्या करनी चाहिये। यानी विना चारित्रके ज्ञानमात्रसे मुक्ति नहीं होती।

तथात्र-

तीर्थंकरा जगज्ज्येष्ठा यद्यपि मोक्षगामिनः।
तथापि पालितञ्चैव चारित्रं मोक्षहेतुकम् ॥

अर्थ-यद्यपि तीर्थंकर जगत्श्रेष्ठ तथा मुक्तिगामी होते हैं तो भी तीर्थंकरोंने मोक्षके कारणभूत चारित्रका पालन अवश्य किया है। सूत्रपाहुडमें श्री कुन्दकुन्द आचार्य लिखते हैं-

ण वि सिज्झइ वत्थधरो जिणसासणे जइ वि होइ तित्थयरो।
णग्गो वि मोक्खमग्गो सेसा उम्मग्गया सव्वे ॥३२॥

अर्थ-जैनधर्ममें वस्त्रधारक (संयमरहित) तीर्थंकर भी क्यों न हों, वह मुक्त नहीं हो सकते। मोक्षमार्ग नग्न दिगम्बर रूप है, शेष सभी उन्मार्ग हैं।

मोक्षप्राभृतमें श्री कुन्दकुन्द आचार्य लिखते हैं-

णाणं चरित्तहीणं दंसणहीणं तवेहिं संजुत्तं।
अण्णेसु भावरहियं लिंगग्गहणेण किं सोक्खं ॥५७॥

अर्थात्-चारित्रसे रहित ज्ञान सुखकारी नहीं है।

सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः। तत्त्वार्थसूत्र १-१।

अर्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र (रत्नत्रय) मोक्षका मार्ग है। राजवार्तिकमें इसी सूत्रकी टीकामें श्री अकलंकदेवने लिखा है-

हतं ज्ञानं क्रियाहीनं, हता चाज्ञानिनां क्रिया।

अर्थ-चारित्र रहित ज्ञान मोक्षमार्गमें कार्यकारी नहीं है ।

इत्यादि अनेक आर्ष प्रमाणों द्वारा आपका यह लिखना कि ‘ज्ञान ही मोक्षका कारण है ।’ अप्रामाणिक सिद्ध होता है ।

इस विषयमें समयसार ( अहिंसा मन्दिर, १ दरयागंज, दिल्लीसे प्रकाशित ) के पृष्ठ ११८ की टिप्पणीमें लिखा है-

एकान्तेन ज्ञानमपि न बन्धनिरोधकं, एकान्तेन क्रियापि न बन्धमिरोधिका इति सिद्धं उभाभ्यामेव मोक्षः ।

अर्थ-एकान्तसे न तो मात्र ज्ञान ही कर्म-बन्धका रोकनेवाला है और न केवल चारित्र क्रिया ही कर्म-बन्धकी रोकनेवाली है । इससे यह सिद्ध हुआ कि ज्ञान चारित्र दोनोंके द्वारा ही मोक्ष होता है ।

इसी विषयको श्रीकुन्दकुन्द आचार्यने समयसार की १५५वीं गाथामें कहा है-

जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं तेसिमधिगमो णाणं ।
रायादीपरिहरणं चरणं एसो दु मोक्खपहो ॥

अर्थ-जीव अजीव आदि तत्त्वोंका श्रद्धान करना सम्यक्त्व है, उन तत्त्वोंका जानना ज्ञान है, राग आदि भावोंका परिहार सम्यक्चारित्र है । ये सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र मोक्षमार्ग है ।

इस गाथाकी टीकामें श्री अमृतचन्द्र सूरि लिखते हैं-

मोक्षहेतुः किल सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि । तत्र सम्यग्दर्शनं तु जीवादिश्रद्धानस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं । जीवादिज्ञानस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं ज्ञानं । रागादिपरिहरणस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं चारित्रं । तदेवं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राण्येकमेव ज्ञानस्य भवनमायातम् । ततो ज्ञानमेव परमार्थमोक्षहेतुः ।

अर्थ-मोक्षका कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र हैं । यहाँ सम्यग्दर्शन तो जीवादिक तत्त्वोंके श्रद्धानस्वभावसे ज्ञानका होना है । जीवादिकके ज्ञानस्वभावसे ज्ञानका होना ज्ञान है । राग आदिके परिहार स्वभावसे ज्ञानका होना चारित्र है । इस प्रकार सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र एक ही ज्ञानरूप होना सिद्ध हुआ । इसलिये ज्ञान ही परमार्थसे मोचका कारण है ।

श्री अमृतचन्द्र सूरिके इस कथनके अनुरूप ही १०६-१०७ वें कलशका अभिप्राय है । तदनुसार ‘ज्ञान मोक्षका कारण है’ इसका स्पष्ट अभिप्राय यही है कि ‘सम्यग्दर्शन सम्यक्चारित्र सहित ज्ञान मोक्षका कारण है’-मात्र ज्ञान ( जीवादि तत्त्वोंका अधिगम ) मोक्षका कारण नहीं है ।

इन उपर्युक्त आर्ष प्रमाणों द्वारा स्पष्ट प्रमाणित होता है कि जीव दया संयमरूप है तथा संवर और निर्जराका कारण होनेसे धर्म है ।

आपने व्रतपालनको शुभ भावमें गर्भित करके उससे संवर-निर्जरा तथा मोक्षसिद्धि होना असम्भव बतलाया है । इस विषयका निर्णय करनेके लिये सर्व प्रथम व्रतोंका स्वरूप देखना आवश्यक हो जाता है । श्री तत्त्वार्थसूत्रके अध्याय ७ के सूत्र १ में व्रतोंका लक्षण निम्न प्रकार दिया है-

हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् ।

अर्थ-हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्म तथा परिग्रहसे विरक्ति व्रत है । उक्त लक्षणसे यह स्पष्ट हो जाता है कि व्रत विरक्ति अर्थात् निवृत्तिरूप हैं, प्रवृत्तिरूप नहीं हैं। इसी कारण यह सम्यक्चारित्रमें गर्भित हैं। जितनी भी निवृत्ति है वह केवल संवर तथा निर्जराकी ही कारण है, वह कभी भी बन्धका कारण नहीं हो सकती है। अतः व्रतोंका पालन संवर-निर्जराका कारण है। सिद्धान्तमें अणुव्रती एवं महाव्रतीके प्रत्येक समय असंख्यातगुणी निर्जरा बतलाई है। अव्रत सम्यग्दृष्टिके लिये ऐसा नियम नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि वहाँ व्रत ही असंख्यातगुणी निर्जराके कारण हैं।

दत्तादान ग्रहण करना या सत्य बोलना आदि व्रतोंका लक्षण नहीं है। इनको व्रतोंका लक्षण स्वीकार कर लेने पर अव्याप्ति दोष आता है, क्योंकि दत्तादानको न ग्रहण करनेकी अवस्थामें या मौनस्थ आदि अवस्थामें मुनियोंके, यह लक्षण घटित न होनेके कारण, महाव्रत ही न रहेंगे। किन्तु यह इष्ट नहीं हो सकता है, क्योंकि मुनियोंके हर समय महाव्रत रहते हैं, श्रेणी आदिके गुणस्थानोंमें स्थित मुनियोंके भी महाव्रत होना स्वीकार किया गया है। १२वें गुणस्थानमें अप्रमाद बतलाते हुये कहा है-

पंच महव्वयाणि पंच समिदीयो तिण्णि गुत्तीओ णिस्सेसकसायाभावो च अप्पमादो णाम।
-धवल पु. १४ पृ० ८६

अर्थ-पंच महाव्रत, पंच समिति, तीन गुप्ति और समस्त कषायोंके अभावका नाम अप्रमाद है।

इससे प्रमाणित होता है कि १२वें गुणस्थानमें भी पंच महाव्रत आदिक होते हैं और वे अप्रमादरूप हैं।

यह व्रत सम्यक्चारित्ररूप हैं। इसके कुछ प्रमाण नीचे दिये जाते हैं-

हिंसातोऽनृतवचनात् स्तेयादब्रह्मतः परिग्रहतः।
कार्त्स्न्यैकदेशविरतेश्चारित्रं जायते द्विविधम् ॥४०॥-पुरुषार्थसिद्ध्युपाय

अर्थ-हिंसासे, असत्यभाषणसे, चोरीसे, कुशीलसे और परिग्रहसे सर्वदेश तथा एकदेश त्याग से, वह चारित्र दो प्रकारका होता है।

हिंसानृतचौरेभ्यो मैथुनसेवापरिग्रहाभ्यां च।
पापप्रणालिकाभ्यो विरतिः संज्ञस्य चारित्रम् ॥४९॥-रत्नकरण्डश्रावकाचार

अर्थ-हिंसा, अनृत, चौर्य, मैथुनसेवन, परिग्रह ये पाप आवनेके प्रनाला हैं, इनसे जो विरक्त होना सो सम्यग्ज्ञानीके चारित्र है।

पावारंभणिवित्ती पुण्णारंभे पउत्तिकरणं पि।
णाणं धम्मज्झाणं जिणभणियं सव्वजीवाणं ॥९७॥ -रयणसार

अर्थ-पापारम्भसे निवृत्ति तथा पुण्यारम्भमें प्रवृत्ति भी सर्व जीवोंके ज्ञान एवं धर्म्यध्यान हैं, ऐसा जिनेन्द्र भगवान्ने कहा है।

इस प्रकार श्री कुन्दकुन्द आचार्यने व्रतोंको ज्ञान एवं धर्म्यध्यान प्ररूपित किया है तथा चारित्रपाहुड़ गा० २७ में इनको संयम और चारित्र बतलाया है-

पंचिंदियसंवरणं पंचवया पंचविंसकिरियासु।
पंचसमिदि तयगुत्ती संजमचरणं निरायारं ॥२७॥

अर्थ-पंचेन्द्रियोंका संवरण, पंच व्रत, पच्चीस क्रिया, पंच समिति तथा तीन गुप्ति मुनियोंके संयम एवं चारित्र हैं।

प्रत्येक जैम आगम अभ्यासीको यह तो सुविदित ही है कि चारित्र, संयम तसा धर्म्यध्यान संवर-निर्जरा एवं मोक्ष सिद्धिके कारण हैं। व्रत भी चारित्र, संयम एवं धर्म्यध्यानरूप होनेसे संवर-निर्जरा एवं मोक्षसिद्धिके कारण सिद्ध हो जाते हैं। अतः यह कहना कि व्रतपालनसे संवर-निर्जरा तथा मोक्षसिद्धि होना असम्भव है-सर्वथा आगमविरुद्ध है।

यह प्रश्न हो सकता है कि कहीं-कहीं आगममें व्रतोंको शुभ आस्रव-बन्धका भी कारण क्यों बतलाया है? उसका समाधान यह है कि उन व्रतोंके साथ दत्तादानका ग्रहण, सत्यभाषण आदिरूप जो रागसहित प्रवृत्ति अंश रहता है और जिसका इन व्रतोंमें त्याग नहीं किया गया है, उससे ही शुभ आस्रव-बन्ध होता है। जैसे कि देव आयुके आस्रवके प्रत्ययोंमें तत्त्वार्थसूत्रमें ‘सम्यक्त्वं च’ अर्थात् सम्यक्त्वसे भी देव आयुका बन्ध होता है, ऐसा कहा गया है। वास्तवमें सम्यक्त्व बन्धका कारण नहीं है, किन्तु सम्यक्त्वके साथ रहनेवाला रागांश ही देव आयुके बन्धका कारण है। जैसे एक मिश्रित अखण्ड पर्याय होनेके कारण सम्यक्त्वको बन्धका कारण कहा जाता है उसी प्रकार एक मिश्रित अखण्ड पर्याय होनेके कारण व्रतोंको भी शुभ बन्धका कारण कहा जाता है।

एक मिश्रित अखण्ड पर्यायमें निवृत्ति तथा प्रवृत्ति ( राग ) दोनों अंश सम्मिलित हैं। अतः उससे आस्रव-बन्ध भी है और संवर-निर्जरा भी है। क्रमशः प्रवृत्ति ( राग ) अंशके क्षीण हो जाने पर मात्र संवर-निर्जरा ही होती है। रागके साथ जो पापोंसे निवृत्ति बनी रहती है, उससे उस समय भी संवर-निर्जरा बराबर होती रहती है।

आगममें जिस-जिस स्थानपर व्रतोंको छोड़नेका उपदेश पाया जाता है, वहाँ सविकल्पसे निर्विकल्प समाधिमें पहुँचानेके लिये व्रतोंमें होनेवाला अध्यवसान या उसके प्रवृत्तिरूप रागांश अथवा व्रतोंके विकल्पको ही छुड़ानेका उपदेश है, न कि निवृत्तिरूप स्वयं व्रतोंको छोड़नेका। क्योंकि पापोंसे निवृत्तिरूप व्रतोंके छोड़नेका अर्थ होगा पापोंमें प्रवृत्ति करना, जो कि कभी इष्ट नहीं हो सकता है। जैसे ऊपर सप्रमाण बतलाया गया है-व्रत तो ऊपरके श्रेणीके गुणस्थान आदिमें भी कायम रहते हैं, छोड़े नहीं जाते हैं।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥

शंका ३, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ११० से १२८

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शंका ३

जीवदयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या ?

प्रतिशंका ३ का समाधान

\१. प्रथम-द्वितीय प्रश्नोत्तरोंका उपसंहार

जीवदया पदके स्वदया और परदया दोनों अर्थ सम्भव हैं। किन्तु प्रकृतमें मूल प्रश्न परदयाको ध्यानमें रखकर ही है, इस बातको ध्यानमें रखकर हमने प्रथम उत्तरमें यह स्पष्टीकरण किया कि यदि धर्म पदका अर्थ पुण्यभाव लिया जाय तो जीवदयाको पुण्य मानना मिथ्यात्व नहीं है। इस उत्तरमें आगम प्रमाण भी इसी अर्थकी पुष्टिमें दिये गये।

अपर पक्षने अपनी प्रथम प्रतिशंकामें एक अपेक्षासे हमारे उक्त कथनको तो स्वीकार कर लिया। किन्तु साथमें आगमके लगभग बीस प्रमाण उपस्थित कर यह भी सिद्ध करनेका प्रयत्न किया कि जीवदयाका संवर और निर्जरा तत्त्वमें भी अन्तर्भाव होता है, इसलिए वह मोक्षका भी कारण है।

अपर पक्षने जो प्रमाण उपस्थित किये उनमें कुछ ऐसे भी प्रमाण हैं जिनमें धर्मको दयाप्रधान कहा गया है, या करुणाको जीवका स्वभाव कहा गया है या शुभ और शुद्धभावोंसे कर्मोंकी क्षपणा कही गई है और साथ ही ऐसे प्रमाण भी उपस्थित किये जिनमें स्पष्टरूपसे रागरूप पुण्यभावकी सूचना है। किन्तु इनमेंसे किस प्रमाणका क्या आशय है यह स्पष्ट नहीं किया गया। वे कहाँ किस अपेक्षासे लिखे गये हैं यह भी नहीं खोला गया। इसलिए हमें अपने दूसरे उत्तरमें यह टिप्पणी करनेके लिए बाध्य होना पड़ा कि ‘ये सब प्रमाण तो लगभग २० ही हैं। यदि पूरे जिनागममेंसे ऐसे प्रमाणोंका संग्रह किया जाय तो स्वतन्त्र ग्रन्थ बन जाय।’

फिर भी उन प्रमाणोंको ध्यानमें रखकर हमने अपने दूसरे उत्तरमें यह स्पष्टीकरण कर दिया कि पुण्य ( शुभराग ) भावरूप जो दया है वह तो मोक्षका कारण नहीं है। हाँ इसका अर्थ वीतरागभाव यदि लिया जाय तो वह संवर और निर्जरारूप होनेसे अवश्य ही मोक्षका कारण है।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि आगममें सराग सम्यक्त्वको या सरागचारित्र आदिको जहाँ बन्धका कारण कहा है वहाँ उन्हें परम्परा मोक्षका कारण भी कहा है। पर उसका आशय दूसरा है, इसलिए प्रकृतमें उसकी विवक्षा नहीं है। यहाँ तो निर्णय इस बातका करना है कि रागरूप शुभभाव या पुण्यभाव भी क्या उसी तरह मोक्षका कारण है जिस तरह निश्चय रत्नत्रय। इन दोनोंमें कुछ अन्तर है या दोनों एक समान हैं। पूरी चर्चाका केन्द्रबिन्दु भी यही है। हमने अपने प्रथम और दूसरे उत्तरमें इसी आशयको स्पष्ट करनेका प्रयत्न किया है।

\२. प्रतिशंका ३ के आधारसे विचार

तत्काल प्रतिशंका ३ विचारके लिए प्रस्तुत है। इसके प्रारम्भमें हमारे प्रथम उत्तरको लक्ष्यमें रखकर तीन निष्कर्ष फलित किये गये हैं। प्रथम उत्तर हमने अन्य जीवोंकी दयाको लक्ष्यमें रखकर दिया था, इसलिए इस अपेक्षासे अपर पक्षने हमारे प्रथम उत्तरका जो यह निष्कर्ष फलित किया है कि ‘जीवदया पुण्यभाव है, जो कि शुभ परिणामरूप तो है, किन्तु धर्मरूप नहीं है।’ वह यथार्थ है, पर जीवोंकी दया पर भाव अर्थात् रागभाव है, इसलिए वह धर्म अर्थात् वीतराग भाव कथमपि नहीं हो सकता।

दूसरा निष्कर्ष हमारे आशयको स्पष्ट नहीं करता। परमात्मप्रकाश गाथा ७१ में भावोंके तीन भेद किये गये हैं-धर्म, अधर्म और शुद्ध। स्पष्ट है कि यहाँ धर्म पद शुद्धभावोंसे भिन्न शुभभावके अर्थमें आया है। इसकी टीकाका भी यही आशय है। उसमें स्पष्ट कहा गया है कि शुभभावसे धर्म अर्थात् मुख्यरूपसे पुण्य होता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि शुभभावसे वीतराग भावरूप धर्म होता है यह उपचार कथन है। किन्तु अपर पक्षने इसका ऐसा अर्थ किया है जिससे भ्रम होना सम्भव है।

तीसरे निष्कर्षके विषयमें मात्र यही खुलासा करना है कि पर जीवोंकी दयाका विकल्प तो सम्यग्दृष्टियों यहाँ तक कि मुनियोंको भी होता है। यदि ऐसा न माना जाय तो इनके पूजा, भक्ति, व्रतग्रहण आदि व्यवहार धर्म नहीं बन सकता। हमारी समझसे यह बात अपर पक्षको भी मान्य होगी, अतः अपर पक्षको निःसंकोचरूपसे यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि पुण्यबन्धरूप जीवदया सम्यग्दृष्टियोंके भी होती हैं ।

अपर पक्षने अपने प्रतिशंकारूप दूसरे पत्रकमें विविध ग्रन्थोंके अनेक आगमप्रमाण दिये हैं यह सच है और उनमेंसे कुछमें जीवदया धर्म है तथा शुभभावसे कर्मक्षय होता है यह भी कहा गया है। किन्तु कहाँ किस आगमवाक्यका नयदृष्टिसे क्या आशय है इसका स्पष्टीकरण करना विवेकियोंका काम है। हमने अपने दूसरे उत्तरमें वही किया है। क्या इसे आर्ष ग्रन्थोंकी प्रामाणिकता पर अपर पक्ष द्वारा अप्रामाणिकताकी अंगुली उठाना कहना उपयुक्त है। इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे। यदि यही बात है तो वह स्वयं अपनेको इस दोषसे बरी नहीं रख सकता। अपर पक्षको यह समझना चाहिए कि किसी आर्षवाक्यको अप्रमाणित घोषित करना अन्य बात है और जहाँ जिस दृष्टिसे विवेचन किया गया है, नयदृष्टिसे उसके आशयको खोलना अन्य बात है।

अपर पक्ष यदि व्यवहारधर्म और निश्चयधर्म दोनोंको मिलाकर निश्चयधर्म कहना चाहता है और वह हमसे भी ऐसा कहलानेकी यदि आशा रखता है तो उसकी यह आशा कमसे कम हमारे द्वारा कभी भी पूरी नहीं की जा सकेगी। जब कि जिनागममें ये दो भेद किये हैं और उनके कारणों तथा फलका अलग-अलग विवेचन किया है ऐसी अवस्थामें हम तो वही कहेंगे जिसे स्थान-स्थानपर जिनागममें स्पष्ट किया गया है।

श्री प्रवचनसारमें शुभ, अशुभ और शुद्ध भावका निर्देश करते हुए लिखा है-

जीवो परिणमदि जदा सुहेण असुहेण वा सुहो असुहो।
सुद्धेण तदा सुद्धो हवदि हि परिणामसब्भावो ॥९॥

परिणामस्वभाववाला यह जीव जब शुभ या अशुभरूपसे परिणमता है तब शुभ या अशुभ होता है और जब शुद्धरूपसे परिणमता है तब शुद्ध होता है ॥९॥

आगे इनमेंसे किसमें उपादान बुद्धिकी जाय और किसमें त्याग बुद्धि रखी जाय इस अभिप्रायसे इनके फलका निर्देश करते हुए लिखा है-

धम्मेण परिणदप्पा अप्पा जदि सुद्धसंपयोगजुदो।
पावदि णिव्वाणसुहं सुहोवजुत्तो व सग्गसुहं ॥११॥

धर्मसे परिणित स्वभाववाला यह आत्मा यदि शुद्धोपयोगमें युक्त होता है तो मोक्षसुखको प्राप्त करता है और यदि शुभोपयोगवाला होता है तो स्वर्गसुखको प्राप्त करता है ॥११॥

ये आगम प्रमाण हैं। इनकी प्रामाणिकता पर कोई भी श्रद्धालु बन्धु अप्रामाणिकताकी अंगुली उठानेका साहस नहीं कर सकता। ऐसी अवस्थामें दूसरे जीवोंकी दयारूप शुभभावोंको यदि हमने पुण्यबन्धका कारण लिखा तो आगमकी अवहेलना कहाँ हुई। इस कथन द्वारा तो हमने आगमका रहस्य खोलकर मोक्षमार्ग ही प्रशस्त किया। क्या अपर पक्ष यह चाहता है कि प्रत्येक भव्य जीव पर जीवोंकी दयाको मोक्षका कारण जान उसीमें उलझा रहे और आत्मस्वभावके सन्मुख हो सच्चे आत्मकल्याणके मार्गमें न लगे। हम नहीं समझते कि वह ऐसा चाहता होगा। यदि यही बात है तो उस पक्षको प्रवचनसारके उक्त उल्लेखोंके आधारपर शुभ और शुद्धभावोंमें अन्तर तो करना ही चाहिए। साथ ही उनके कारणभेद और फलभेदको भी अपने दृष्टिपथमें लेना चाहिए।

अपर पक्षने अपने दूसरे पत्रकमें जो आगम प्रमाण दिये हैं, भला वह पक्ष ही वतलावे कि उनकी उपेक्षा करनेका साहस हम कैसे कर सकते थे । तभी तो हमने जीवदयाके स्वदया और परदया ऐसे दो भेद करके स्वदयाका अन्तर्भाव वीतरागभावमें और परदयाका अन्तर्भाव रागरूप पुण्यभावमें करके अपने दूसरे उत्तरमें उनके फलका भी पृथक्-पृथक् निर्देश कर दिया है । अपर पक्षने सब प्रमाणोंको एक पंक्तिमें रख कर और उनका आशय खोले विना उन सभी प्रमाणोंसे अपने अभिप्रायकी पुष्टि करनी चाही है । यह देखकर ही हमें अपने दूसरे उत्तरमें यह लिखना पड़ा है कि ‘ये सब प्रमाण तो लगभग २० ही हैं । यदि पूरे जिनागममें-से ऐसे प्रमाणोंका संग्रह किया जावे तो एक स्वतंत्र विशाल ग्रन्थ हो जाय, पर इन प्रमाणोंके आधारसे क्या पुण्यभावरूप दयाको इतने मात्रसे मोक्षका कारण माना जा सकता है ।’

हमने अपने पिछले उत्तरमें जो यह लिखा है कि ‘शुभभाव चाहे वह दया हो, करूणा हो, जिन-विम्वदर्शन हो, व्रतोंका पालन हो, अन्य कुछ भी क्यों न हो, यदि वह शुभ परिणाम है तो उससे मात्र वन्ध ही होता है । उससे संवर, निर्जरा और मोक्षकी सिद्धि होना असम्भव है ।’ वह प्रवचनसार गाथा ११ तथा उसकी दोनों आचार्यों द्वारा रचित संस्कृत टीकाओंको लक्ष्यमें रखकर ही लिखा है । हम आशा करते थे कि अपर पक्ष भी इसी प्रकार प्रत्येक आगम प्रमाणको उपस्थित करते हुए आगमका कौन वचन किस आशयसे लिखा गया है इसे सुस्पष्ट करता जाता । उदाहरणार्थ जयधवलामें कहा है-

शुभ-शुद्धपरिणामेहिं कम्मक्खयाभावे तक्खयाणुववत्तीदो ।

यदि शुभ और शुद्धपरिणामोंसे कर्मोंका क्षय नहीं होता तो कर्मोंका क्षय हो ही नहीं सकता ।

इसमें शुभ परिणामोंको शुद्ध परिणामोंके समान कर्मक्षयका कारण कहा है । इसलिए ऐसे स्थलपर अपर पक्षको चाहिए था कि वह इस वचनका आशय अन्य आगम वचनके प्रकाशमें अवश्य ही स्पष्ट कर देता तो इससे कौन कथन किस विवक्षासे किया गया है यह सबकी समझमें सुगमतासे आ जाता । प्रकृतमें कमसे कम इसका खुलासा किस प्रकारसे किया जाना इष्ट था इसके लिए प्रवचनसार गाथा ११ की आचार्य जयसेनकृत टीकापर दृष्टिपात कीजिए-

तत्र यच्छुद्धसंप्रयोगशब्दवाच्यं शुद्धोपयोगस्वरूपं वीतरागचारित्रं तेन निर्वाणं लभते । निर्विकल्पसमाधिरूपशुद्धोपयोगशक्त्यभावे सति यदा शुभोपयोगरूपसरागचारित्रेण परिणमति तदा पूर्वमनाकुलत्वलक्षणपारमार्थिकसुखविपरीतमाकुलत्वोत्पादकं स्वर्गसुखं लभते । पश्चात् परमसमाधिसामग्रीसद्भावे मोक्षं च लभते ।

वहाँ जो शुद्ध संप्रयोग शब्दका वाच्य शुद्धोपयोग स्वरूप वीतराग चारित्र है उससे निर्वाणको प्राप्त करता है । तथा निर्विकल्प समाधिरूप शुद्धोपयोगरूप शक्तिके अभावमें जब शुभोपयोगरूप सरागचारित्र रूपसे परिणमता है तब पहलेके अनाकुलत्वलक्षण पारमार्थिक सुखसे विपरीत आकुलताके उत्पादक स्वर्गसुखको प्राप्त करता है । पश्चात् परम समाधिरूप सामग्रीके सद्भावमें मोक्षसुखको प्राप्त करता है ।

यह आगमप्रमाण है । इस द्वारा शुभ और शुद्ध दोनों प्रकारके भावोंका क्या फल है यह स्पष्ट किया गया है । इस द्वारा हम यह अच्छी तरह जान लेते हैं कि शुभ भावोंको जो श्रीजयधवलामें कर्मक्षयका हेतु कहा है वह किस रूपमें कहा है । वस्तुतः तो वह पुण्यबन्धका ही हेतु है । उसे जो कर्मक्षयका हेतु कहा गया है वह इस अपेक्षासे ही कहा गया है कि उसके अनन्तर जो शुद्धोपयोग होता है वह वस्तुतः कर्मक्षयका हेतु है, इसलिए उपचारसे उसे भी कर्मक्षयका हेतु कहा गया है। शुभभाव बन्धका कारण है इसका निर्देश करते हुए पंचास्तिकायमें भी कहा है-

जं सुहमसुहमुदिण्णं भावं रत्तो करेदि जदि अप्पा।
सो तेण हवदि बद्धो पोग्गलकम्मेण विवहेण ॥१४७॥

यदि आत्मा विकारी वर्तता हुआ उदीर्ण शुभ–अशुभ भावको करता है तो वह उस भावके निमित्तसे नाना प्रकारके पुद्गल कर्मोंसे बद्ध होता है ॥१४७॥

इससे शुभ परिणाम करनेका क्या फल है इसका सहज पता लग जाता है।

यह अपर पक्ष द्वारा अपने द्वितीय पत्रकमें उपस्थित किया गया एक उदाहरण है जिसका यहाँ हमने दो आगम प्रमाणोंके प्रकाशमें स्पष्टीकरण किया है। अपर पक्ष द्वारा उपस्थित किये गये प्रमाणोंके विषयमें भी इसी प्रकार स्पष्टीकरण जान लेना चाहिए। हमारी तो दृष्टि सदा कालसे तत्त्वविमर्शकी रही है और रहेगी। इसका विचार तो अपर पक्षको ही करना है कि कोई भी जिनवाणीका भक्त महान् आचार्य और महान् ग्रन्थोंके नयविशेषसे किये गये कथनको उसी रूपमें ग्रहण न कर उसे सर्वथा रूपमें क्यों स्वीकार करता है? इसका हमें विशेष आश्चर्य है।

हमने तो जीवदया किस अपेक्षासे शुभभाव है और किस अपेक्षासे वीतराग भाव है, मात्र इसका अपने पिछले उत्तरोंमें खुलासा किया। यदि अपर पक्ष उसे हमारा मूल विषयको छुए बिना विषयान्तरमें प्रवेश करना मानता है तो भले ही मानता रहे, उसकी इच्छा। किन्तु जिसका हमने पिछले उत्तरोंमें निर्देश किया है वह हमारा विषयान्तरमें प्रवेश करना नहीं है, अपि तु मूल प्रश्नका स्पष्टीकरणमात्र है।

जीवदया स्वतन्त्र कोई द्रव्य नहीं है। वह जीवका परिणाम है जो नयविशेषसे शुभ भी हो सकता है और शुद्ध भी । पुरुषार्थसिद्ध्युपाय आदि शास्त्रीय प्रमाणों द्वारा इसीका स्पष्टीकरण किया गया है कि यदि जीवदयाको शुभ परिणामरूप लिया जाता है तो उसका अन्तर्भाव आस्रव और बन्धतत्त्वमें होता है और उसे शुद्ध परिणामरूप लिया जाता है तो उसका अन्तर्भाव संवर, निर्जरा और मोक्ष तत्त्वमें होता है। अपर पक्ष इसे निर्विवादरूपमें स्वीकार करले यही इस प्रयासका फल है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए प्रवचनसारमें लिखा है-

सुहपरिणामो पुण्णं असुहो पावं ति भणियमण्णेसु।
परिणामो णण्णगदो दुक्खक्खयकारणं समये ॥१८१॥

परके प्रति शुभ परिणाम पुण्य है और अशुभ परिणाम पाप है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। तथा जो परिणाम अन्यको लक्ष्यकर नहीं होता है उसे शास्त्रमें दुःखके क्षयका कारण कहा है ॥१८१॥

हमने पिछले उत्तरमें इसी जिनागमको लक्ष्यमें रखकर दूसरे जीवोंकी दयाको पुण्यभाव और स्वदयाको वीतराग भाव कहा है। शुभभावका फल कर्मास्रव है और शुद्धभावका फल कर्मनिरोध है, इसके लिए प्रवचनसार गाथा १५६ तथा २४५ पर दृष्टिपात कीजिए।

दया कहो, करुणा कहो या अनुकम्पा कहो इन तीनोंका आशय एक ही है। आचार्य कुन्दकुन्द प्रवचनसारमें जीवोंमें की गई अनुकम्पाको शुभोपयोग बतलाते हुए लिखते हैं-

जो जाणदि जिणिंदे पेच्छदि सिद्धे तहेव अणगारे।
जीवेसु साणुकंपो उवओगो सो सुहो तस्स ॥१५७॥

जो जिनेन्द्रको जानता है, सिद्धों तथा अनगारोंकी श्रद्धा करता है और जीवोंके प्रति अनुकम्पायुक्त है उसका वह शुभोपयोग है ॥१५७॥

यदि अपर पक्ष कहे कि हम इन सब प्रमाणोंको प्रकृतमें उपयोगी नहीं मानते। हमें तो ऐसा प्रमाण दीजिए जिसमें स्पष्टरूपसे दयाका उल्लेख हो और उसे आस्रव भाव बतलाया गया हो तो इसके लिये तत्त्वार्थसारके आस्रव प्रकरणके इस वचन पर दृष्टिपात कीजिए :-

दया दानं तपः शीलं सत्यं शौचं दमः क्षमा।
वैयावृत्त्यं विनीतिश्च जिनपूजार्जवं तथा ॥ २५ ॥
सरागसंयमश्चैव संयमासंयमस्तथा।
भूतव्रत्यनुकम्पा च सद्वेद्यास्रवहेतवः ॥ २६ ॥

दया, दान, तप, शील, सत्य, शौच, दम, क्षमा, वैयावृत्य, विनय, जिनपूजा, आर्जव, सरागसंयम, संयमासंयम तथा जीवों और व्रतियोंपर अनुकम्पा ये सब सातावेदनीयके आस्रवके हेतु हैं ॥ २५-२६ ॥

इस प्रकार उक्त प्रमाणोंसे स्पष्ट है कि हम प्रथम और द्वितीय उत्तरमें जो कुछ भी लिख आये हैं वह आगमका आशय होनेसे प्रमाण है।

अपर पक्षने बोधप्राभृतका उद्धरण उपस्थित कर जो धर्मको दयाप्रधान बतलाकर अपने अभिमतकी सिद्धि करनी चाही है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि जहाँ भी धर्मको दयाप्रधान कहा है वहाँ ‘दया’ पद मुख्यतया वीतरागभावका सूचक ही लिया गया है। यह इसीसे स्पष्ट है कि स्वयम्भूस्तोत्रमें अभिनन्दन जिनकी स्तुति करते समय उन्हें दयावधूका आश्रय करनेवाला तथा शान्ति जिनकी स्तुति करते समय उन्हें दयामूर्ति कहा गया है। जिन सहस्रनाम तो स्पष्टतः सर्वज्ञ वीतराग जिनकी स्तुति है। इसमें जिनदेवको दयाध्वज, महाकारुणिक, दयागर्भ, दयायाग और दयानिधि नामों द्वारा सम्बोधित किया गया है। जिनदेवके ये सब नाम अर्थगर्भ अर्थात् गुणनाम हैं। इससे भी यही सिद्ध होता है कि ‘दया’ यह शब्द जहाँ जिनागममें शुभ रागरूप पुण्यभावके अर्थमें आता है वहाँ वह वीतरागरूप धर्मके अर्थमें भी आता है। इसलिए बोधप्राभृतके ‘धम्मो दयाविसुद्धो’ इस उल्लेखके आधार पर ‘धर्म’ पदका अर्थ मुख्यरूपसे वीतराग भाव ही लेना चाहिए, क्योंकि जिससे रागकी पुष्टि होती हो वह जिनागम ही नहीं हो सकता।

धवल पुस्तक १३ के ‘करुणाए जीवसहावस्स’ इत्यादि उल्लेखका भी यही आशय है। तभी तो उसमें करुणाके कर्म जनित होनेका विरोध किया गया है। जो कर्मको निमित्त कर उत्पन्न नहीं होता वह तो मात्र निश्चय रत्नत्रयरूप आत्मपरिणाम ही हो सकता है।

अपने अभिमतकी पुष्टिमें अपर पक्षने भावसंग्रहकी ‘सम्माइट्ठीपुण्णं’ इत्यादि गाथा उपस्थित की है। यदि अपर पक्ष इसके अन्तिम चरणपर ध्यान दे तो नयविशेषसे कहे गये इस वचनका अर्थ सहज ही स्पष्ट हो जाय। आगममें व्यवहार रत्नत्रयको व्यवहारसे मोक्षका हेतु बतलाया ही है। इस वचनसे उसी अभिप्रायकी पुष्टि होती है। अथवा सम्यग्दृष्टिका पुण्य दीर्घ संसारका कारण नहीं है, अल्प कालमें ही वह मोक्षका पात्र होगा यह आशय भी इस गाथाका हो सकता है।

जयधवला पु० १ पृ० ६ के ‘शुभ-शुद्धपरिणामेहिं’ का क्या आशय है इसका स्पष्टीकरण इसी उत्तरमें हम पहले ही कर आये हैं ।

अब तक प्ररूपित समग्र कथनका सार यह है-

\१. दया पद आगममें दोनों अर्थोंमें व्यवहृत हुआ है-शुभ भावके अर्थमें भी और वीतरागभावके अर्थमें भी ।

\२. शुभभाव परभाव होनेके कारण उसका यथार्थमें आस्रव और बन्ध तत्त्वमें ही अन्तर्भाव होता है । जहाँ भी इसे निर्जराका हेतु कहा है वहाँ वैसा कथन व्यवहारनयसे ही किया गया है ।

\३. वीतरागभाव निजभाव होनेसे उसका अन्तर्भाव संवर, निर्जरा और मोक्षतत्त्वमें ही होता है ।

\४. वीतरागभाग व्यवहारसे आस्रव और बन्धका कारण है यह व्यवहार वीतरागभाव पर लागू नहीं होता, क्योंकि वह सब प्रकारके व्यवहारको दृष्टिमें गौण कर एकमात्र निश्चयस्वरूप ज्ञायक आत्माके आलम्बनसे तन्मयस्वरूप उत्पन्न होता है । अतः वह स्वरूपसे ही सब प्रकारके व्यवहारसे अतीत है । उस पर किसी प्रकारका उपचार लागू नहीं होता ।

अपर पक्ष जिस प्रकार आशावादी है, उसी प्रकार हम भी आशावादी हैं । क्या ही अच्छा हो कि अपर पक्ष रागरूप पुण्यभाव और वीतराग भावमें वास्तविक अन्तरको समझकर ‘दया’ पदका जहाँ जो अर्थ इष्ट हो उसे उसीरूपमें स्वीकार कर ले और इस प्रकार शुभभाव और वीतरागभावमें एकत्व स्थापित करनेसे अपनेको जुदा रखे ।

हमें शुभ भावोंकी अवान्तर परिणतियोंका पूरा ज्ञान हो या न हो । पर हम इतना निश्चयसे जानते हैं कि जो भी शुभभाव उत्पन्न होता है वह कर्म तथा नोकर्मके सम्पर्कके फलस्वरूप ही उत्पन्न होता है, इसलिए वह कर्मस्वभाववाला होनेसे नियमसे कर्मबन्धका हेतु है वह मोक्षका हेतु त्रिकालमें नहीं हो सकता । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र समयसार गाथा १५६ की टीकामें लिखते हैं-

यःखलु परमार्थमोक्षहेतोरतिरिक्तो व्रततपःप्रभृतिशुभकर्मात्मा केषांचिन्मोक्षहेतुः स सर्वोऽपि प्रतिसिद्धः, तस्य द्रव्यान्तरस्वभावत्वात् तत्स्वभावेन ज्ञानभवनस्याभवनात् ।

कितने ही प्राणी परमार्थरूप मोक्षहेतुके सिवाय व्रत, तप आदि शुभकर्म मोक्षके हेतु हैं ऐसा मानते हैं । किन्तु वह सभी निषिद्ध हैं, क्योंकि वह द्रव्यान्तरस्वभाव है, उसके स्वभावसे ज्ञानका होना नहीं बनता ।

इसी अर्थको स्पष्ट रूपसे समझनेके लिए इस कलश पर दृष्टिपात कीजिए-

वृत्तं कर्मस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं न हि ।
द्रव्यान्तरस्वभावत्वान्मोक्षहेतुर्न कर्म तत् ॥ १०७ ॥

कर्मस्वभावसे वर्तना ज्ञानका होना नहीं है, इसलिए वह ( शुभ भाव ) मोक्षका हेतु नहीं है, क्योंकि वह अन्य ( पुद्गल ) द्रव्यके स्वभाववाला है ॥ १०७ ॥

हमें प्रसन्नता है कि अपर पक्षने रागमात्रको बन्धका हेतु मान लिया है । किन्तु इतना स्वीकार करनेके बाद भी उसकी ओरसे जो रागांश और रत्नत्रयांशमें एकत्व स्थापित करनेके लिए युक्ति दी गई है वह सर्वथा अयोग्य है । इस सम्बन्धमें उस पक्षका कहना है-

‘तथा च अमृतचन्द्रसूरिने जो असंयत सम्यग्दृष्टि, संयमासंयमी एवं सरागसंयतके मिश्रित भावोंको अपनी प्रज्ञा छैनीसे भिन्न-भिन्न करते हुए रागांश और रत्नत्रयांश द्वारा कर्मके बन्धन और अबन्धनकी सुन्दर व्यवस्था पुरुषार्थसिद्ध्युपाय ग्रन्थके तीन श्लोकोंमें की है उनमें एक अखण्डित मिश्रित भावका विश्लेषण समझानेके लिए प्रयत्न किया गया है। यह मिश्रित अखण्ड भाव ही शुभ भाव है, अतः उससे आस्रव-बन्ध भी होता है तथा संवर-निर्जरा भी होती है।’

अपने इस अभिप्रायकी पुष्टिके लिये अपर पक्षने भोजन, काढ़ा और कर्मको दृष्टान्त रूपमें उपस्थित किया है। किन्तु उसका यह सब कथन वस्तुस्वरूपको स्पष्ट करनेवाला न होनेसे प्रकृतमें ग्राह्य नहीं है। खुलासा इस प्रकार है-

सर्व प्रथम विचार यह करना है कि आचार्य अमृतचन्द्रने रागांश और रत्नत्रयांशको भिन्न-भिन्न क्यों बतलाया। आचार्य श्री कुन्दकुन्द समयसारमें लिखते हैं-

जीवो बंधो य तहा छिज्जंति सलक्खणेहिं णियएहिं।
पण्णाछेदणएण उ छिण्णा णाणत्तमावण्णा ॥२९४॥

जीव और बन्ध ये दोनों निश्चित अपने-अपने लक्षणों द्वारा बुद्धिरूपी छैनीसे इस तरह छेदने चाहिए कि जिस तरह छेदे हुए वे दोनों नाना हो जाँय ॥२९४॥

इसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

आत्मा और बन्धके द्विधा करनेरूप कार्यमें कर्ता आत्माके करण सम्बन्धी विचार करनेपर निश्चयतः अपनेसे भिन्न करणका अभाव होनेसे भगवती प्रज्ञा ही छेदनात्मक करण है। उसके द्वारा छिन्न हुए वे दोनों नानापनेको अवश्य ही प्राप्त होते हैं। इसलिए प्रज्ञा द्वारा ही आत्मा और बन्ध भिन्न-भिन्न किये जाते हैं।

शंका-आत्मा और बन्ध चेत्य-चेतकभावके कारण अत्यन्त प्रत्यासन्न होनेसे एकीभूत हैं तथा भेदविज्ञानका अभाव होनेके कारण वे एक चेतक ही हों ऐसे व्यवहारको प्राप्त होते हैं, अतः उनका प्रज्ञाके द्वारा छेदना कैसे शक्य है?

समाधान-आत्मा और बन्धके नियत स्वलक्षण हैं, उनकी सूक्ष्म अन्तःसन्धिमें प्रज्ञारूपी छैनीको सावधान होकर पटकनेसे उनको छेदा जा सकता है ऐसा हम जानते हैं।-गाथा २९४ की टीकाके कुछ अंशका अर्थ।

ऐसा करनेका फल (प्रयोजन) क्या है इसका स्पष्टीकरण करते हुए गाथा २९५ की टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

आत्मा और बन्धको प्रथम तो उनके नियत स्वलक्षणोंके ज्ञान द्वारा सर्वथा ही छेदना चाहिए। तत्पश्चात् रागादिलक्षणवाले समस्त बन्धको तो छोड़ना चाहिए और उपयोग लक्षणवाले शुद्ध आत्माको ही ग्रहण करना चाहिए। आत्मा और बन्धके द्विधा करनेका वास्तवमें यही प्रयोजन है कि बन्धके त्यागसे शुद्ध आत्माका ग्रहण हो जाय।

अत्यन्त प्रत्यासन्न दो को भिन्न-भिन्न करनेकी यह रीति है। एकमात्र इसी पद्धतिसे दोको भिन्न-भिन्न जाना जाता है। जो उत्पाद है वही व्यय है ऐसा होनेपर भी लक्षण भेदसे आगममें उन्हें दो बतलाया है। ( आप्तमीमांसा कारिका ५८ । ) प्रकृतमें आचार्य अमृतचन्द्रने इसी न्यायसे पुरुषार्थसिद्ध्युपायमें ‘येनांशेन विशुद्धिः’ इत्यादि वचन लिखे हैं ।

रागका कारण कर्मोपाधिसे संपृक्त होकर परिणमना है और निश्चय रत्नत्रयका कारण ज्ञायक स्वभाव आत्माके आलम्बन द्वारा तन्मय होकर परिणमना है । रागका ( शुभाशुभका ) लक्षण पराश्रय भाव करना है और रत्नत्रयका लक्षण शुद्ध चैतन्यका स्वाश्रय प्रकाशमात्र है । रागका फल संसारकी परिपाटी है और निश्चय रत्नत्रयका फल शुद्ध आत्माकी प्राप्ति है । इस प्रकार कारणभेद, लक्षणभेद और कार्यभेदसे ये दोनों भिन्न-भिन्न हैं, एक नहीं हैं । ऐसी अवस्थामें इन्हें मिश्रित कहकर दोनोंका कार्य आस्रव और बन्ध तथा संवर और निर्जरा मानना संगत नहीं है ।

जब कि अपर पक्ष ही उन्हें मिश्रित स्वीकार करता है तो इससे वे दो अंश सुतरां सिद्ध हो जाते हैं । इससे तो वे दोनों अंश मिले हुए सरीखे दीखते हैं, एक नहीं हैं यही सिद्ध होता है । और जब कि वे दोनों एक नहीं हैं, दो हैं तो उनके दो होनेका कारणभेद, कार्यभेद और लक्षणभेद भी अपर पक्षको निर्विवाद रूपमें स्वीकार कर लेना चाहिए । स्पष्ट है कि शुभभावका कार्य निश्चयसे एकमात्र आस्रव और बन्ध है तथा निश्चय रत्नत्रयका कार्य एकमात्र संवर और निर्जरा तथा अन्तमें मोक्ष है यही सिद्ध होता है ।

एक बात और है कि रागभाव और रागपर्याय विकार संपृक्त और विभावभाव होनेसे स्वयं बन्धस्वरूप हैं । ऐसी अवस्थामें वह संवर और निर्जराका हेतु कैसे हो सकता है, अर्थात् त्रिकालमें नहीं हो सकता । संवर और निर्जराका हेतु वही हो सकता है जो स्वयं संवर-निर्जरास्वरूप है । फिर भी अपर पक्ष निश्चयसे रागको यदि संवर और निर्जराका हेतु मानना चाहता है तो उसका यह मानना रागको संवर, निर्जरा और मोक्षस्वरूप मानना ही कहा जायगा, क्योंकि आगमका ऐसा अभिप्राय है कि निश्चयसे जो जिसका हेतु होता है वह स्वयं तत्स्वरूप ही होता है । किन्तु जहाँ जितने अंशमें वीतरागता उत्पन्न होती है वह उतने अंशमें रागका अभाव होकर ही उत्पन्न होती है, अतः राग निश्चयसे वीतरागताको त्रिकालमें उत्पन्न नहीं कर सकता ऐसा ही यहाँ निर्णय करना चाहिए । फिर भी आगममें जो रागको निश्चय रत्नत्रयका व्यवहारनयसे हेतु कहा गया है वह सहचर सम्बन्धको देखकर उपचारसे ही कहा गया है । विवक्षित रत्नत्रयके साथ विवक्षित रागांशके रहनेमें कोई हानि नहीं यह ज्ञान कराना ही इसका प्रयोजन है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए समयसार कलशमें कहा है-

यावत्पाकमुपैति कर्मविपरतिर्ज्ञानस्य सम्यङ् न सा
कर्मज्ञानसमुच्चयोऽपि विहितस्तावन्न काचित्क्षतिः ।
किन्त्वत्रापि समुल्लसत्यवशतो यत्कर्म बन्धाय तत्
मोक्षाय स्थितमेकमेव परमं ज्ञानं विमुक्तं स्वतः ॥ ११० ॥

जब तक ज्ञानकी कर्मविरति भलीभाँति पूर्णताको नहीं प्राप्त होती तबतक कर्म और ज्ञानका समुच्चय भी विहित है, उसमें कोई हानि या विरोध नहीं । किन्तु इस अवस्थामें भी आत्मामें अवशपने जो कर्म उदित होता है वह तो बन्धका हेतु है और पर द्रव्य-भावोंसे स्वयं भिन्न जो परम ज्ञान है वह एक ही मोक्षका हेतु है ॥ ११० ॥

इस प्रकार पूर्वोक्त कथनसे अपर पक्षके इस मतका खण्डन हो जाता है कि चतुर्थादि गुणस्थानोंमें रागांश और रत्नत्रयांशरूप जो मिश्रित शुभभाव है वह आस्रव और बन्धका भी हेतु है तथा संवर और निर्जराका भी हेतु है । किन्तु इससे यही सिद्ध होता है कि जो रागांश है वह एकमात्र आस्रव और बन्धका हेतु है और जो रत्नत्रयांश है वह संवर और निर्जराका हेतु है ।

यह तो अपर पक्षने भी स्वीकार कर लिया है कि रागांश १०वें गुणस्थानके अन्त तक पाया जाता है ऐसी अवस्थामें वह रागांश और रत्नत्रयांशके मिश्रित रूप शुभभावको छठे गुणस्थान तक ही क्यों स्वीकार करता है, आगे क्यों स्वीकार नहीं करता ? यदि वह कहे कि आगे ध्यानकी भूमिका है, इसलिए वहाँ पर लक्ष्यसे बुद्धिपूर्वक रागकी प्रवृत्ति नहीं पाई जाती है । अतः वहाँ रागांश एकमात्र बन्धका ही हेतु है । तब तो इससे यही सिद्ध होता है कि अबुद्धिपूर्वक जितना भी रागांश है वह तो मात्र बन्धका कारण है ही । बुद्धिपूर्वक राग भी बन्धका ही कारण है । और इस कथनसे यह तथ्य सुतरां फलित हो जाता है कि रत्नत्रयांश स्वयं आत्मस्वरूप होनेसे अणुमात्र भी बन्धका हेतु नहीं ।

अपर पक्षने अपने विचारोंके समर्थनमें एक भोजनका उदाहरण दिया है और दूसरा काढ़ेका उदाहरण दिया है । किन्तु ये उदाहरण ही इस बातका समर्थन करते हैं कि भोजनमें या काढ़ेमें जिन तत्त्वोंका समावेश होता है उनसे उन्हीं तत्त्वोंकी पुष्टि होती है । उदाहरणार्थ काढ़ेमें कफ क्षयकारक द्रव्यका समावेश करने पर ही उस काढ़ेके पान करने पर कफकी हानि होती है, अन्यथा नहीं होती । इससे सिद्ध है कि प्रत्येक तत्त्व अपना-अपना ही कार्य करता है, अन्यका नहीं । कर्मशास्त्र भी इसी आशयका समर्थन करता है । बारहवें गुणस्थानमें ज्ञानावरणका उदय है । पर उससे मोह या रागपर्यायकी उत्पत्ति त्रिकालमें नहीं हो सकती । कर्मका विपाक किस प्रकार होता है इसका ज्ञान कराते हुए तत्त्वार्थसूत्र अ० ८ सू० २२ में बतलाया है-‘स यथानाम ।’ जिस कर्मका जो नाम है, उसके अनुसार ही उसका फल होता है। इससे सिद्ध है कि जिसका जो कार्य है उससे उसी कार्यकी निष्पत्ति होती है, अन्यके कार्यकी निष्पत्ति होना त्रिकालमें सम्भव नहीं । फिर भले ही वे मिलकर ही क्यों न रहें । किन्तु करेंगे अपना-अपना ही कार्य। इसी प्रकार रागभाव और रत्नत्रयके विषयमें भी जान लेना चाहिए ।

अपर पक्षने चौथेसे लेकर सातवें गुणस्थान तकके परिणामको मिश्रगुणस्थानके परिणामके समान बतलाते हुए लिखा है कि ‘उन गुणस्थानोंमें सम्मिलित एक विचित्र प्रकारका परिणाम होता है जैसा कि मिश्र गुणस्थानमें सम्यक्त्व तथा मिथ्यात्वभावसे पृथक् विचित्र प्रकारका परिणाम होता है, उस मिश्र गुणस्थानके विचित्र मिश्रित परिणाममें श्रद्धा-अश्रद्धाका क्रियात्मक विभाजन अशक्य होता है । तदनुसार शुभ परिणतिकी मिश्रित अवस्था हुआ करती है जिससे कि कर्मबन्ध, कर्मसंवर और कर्मनिर्जरा ये तीनों कार्य एकसाथ हुआ करते हैं ।’ किन्तु अपर पक्षका यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि इससे पूरी मोक्षमार्गकी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाती है । जो कर्मशास्त्रका साधारण जानकार भी होगा वह भी ऐसे विचित्र कथनको त्रिकालमें स्वीकार नहीं करेगा ।

यह तो सभी जानते हैं कि तीसरे गुणस्थानमें कारण एक है-सर्वघाति मिश्र प्रकृतिका उदय । तदनुसार उसका कार्य भी एक है-मिश्र परिणाम । इसलिए उसे अशक्यविवेचन कहा है । गोम्मटसार जीवकाण्डमें कहा भी है-

सम्मामिच्छुदयेण य जत्तंतरसव्वघादिकज्जेण ।
ण य सम्मं मिच्छं पि य सम्मिस्सो होदि परिणामो ॥२१॥

जात्यन्तर सर्वघातिके कार्यस्वरूप सम्यग्मिथ्यात्वके उदयसे जो सम्यक्त्व भी नहीं है, मिथ्यात्व भी नहीं है ऐसा सम्मिश्र परिणाम होता है ॥२१॥

किन्तु यह स्थिति चतुर्थादि गुणस्थानोंमें क्षायोपशमिक भावोंकी नहीं है । वहाँ कारणभेदके अनुसार कार्यभेदका आगममें स्पष्ट उल्लेख दृष्टिगोचर होता है । उदाहरणस्वरूप वेदक सम्यकत्वको लीजिए । इसे वेदक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें सम्यक्त्व प्रकृतिका उदय बना रहता है । और सम्यक्त्व इसलिए है, क्योंकि यह मिथ्यात्व आदि छह प्रकृतियोंके उदयाभावी क्षय और सदवस्थारूप उपशमसे होता है । अब विचार कीजिए कि क्या वेदक सम्यक्त्वकी तुलना मिश्र गुणस्थानके मिश्रभावसे की जा सकती है ? दोनोंका लक्षण भिन्न है । मिश्र गुणस्थानका मिश्रभाव सर्वघाति प्रकृतिके उदयसे होनेके कारण विभाव भाव है । और वेदक सम्यक्त्व सर्वघाति प्रकृतियोंके क्षयोपशमसे होनेके कारण आत्माका स्वभावभाव है । इसी प्रकार पाँचवें गुणस्थानके विरताविरत परिणामकी स्थिति है । यहाँ अप्रत्याख्यानावरण कषायका उदय नहीं है, इसलिए तो विरत भाव है और प्रत्याख्यानावरण कषायका उदय है, इसलिए अविरतभाव है । तदनुसार इनके कार्य भी पृथक्-पृथक् देखे जाते हैं । विरतभावके कारण यह जीव त्रसहिंसासे विरत रहता है और अविरतभावके कारण स्थावर हिंसाका त्याग नहीं कर पाता । इस प्रकार जब यहाँ कार्यभेद है तो उससे होनेवाले फलमें भी भेद हो जाता है । जितने अंशमें आत्मस्थितिरूप चारित्र प्रगट हुआ है उतने अंशमें इस जीवके संवर-निर्जरा है और जितने अंशमें अविरतिभाव है उतने अंशमें आस्रव-बन्ध है । इसलिए चतुर्थादि गुणस्थानोंके क्षायोपशमिक भावोंकी मिश्र गुणस्थानके मिश्रभावके साथ तुलना करना सर्वथा असंगत है । मिश्र गुणस्थानका मिश्रभाव जहाँ अशक्यविवेचन है, वहाँ चतुर्थादि गुणस्थानोंका क्षायोपशमिकभाव शक्यविवेचन है ।

अपर पक्षका कहना है कि चौथेसे सातवें गुणस्थान तक शुभोपयोग ही होता है । अन्य कोई शुद्धोपयोग आदि उन गुणस्थानोंमें नहीं होता । किन्तु यह कथन भी युक्त नहीं, क्योंकि चतुर्थादि गुणस्थानोंमें आत्मानुभूति होती ही नहीं यह मानना आगमविरुद्ध है । बृहद्द्रव्यसंग्रहमें गाथा ४७ की टीकामें लिखा है-

तद् द्विविधमपि निर्विकारस्वसंवित्त्यात्मकपरमध्यानेन मुनिः प्राप्नोति ।

उस दोनों प्रकारके मोक्षमार्गको मुनि निर्विकार स्वसंवित्तिस्वरूप परम ध्यानके द्वारा प्राप्त करता है ।

यह सम्यक्चारित्रका प्रकरण है, इसलिए यहाँ मुनिको लक्ष्य कर उक्त कथन किया गया है । इससे विदित होता है कि निर्विकार स्वसंवित्तिरूप परम ध्यान मुनिके नियमसे होता है ।

इसी आर्षग्रन्थकी ४६वीं गाथामें ‘णाणिस्स’ पद आया है । इसकी व्याख्या करते हुए टीकामें लिखा है-

इत्युभयक्रियानिरोधलक्षणचारित्रं कस्य भवति ? ‘णाणिस्स’ निश्चयरत्नत्रयात्मकाभेदज्ञानिनः ।

शंका-उभय क्रियानिरोधलक्षण चारित्र किसके होता है ?

समाधान-ज्ञानीके अर्थात् निश्चय रत्नत्रयात्मक अभेद ज्ञानीके होता है ।

इन प्रमाणोंसे हम जानते हैं कि सातवें गुणस्थानमें मुनिके शुद्धोपयोग नियमसे होता है, क्योंकि वहाँ पर बाह्य विषयमें शुभाशुभ वचन-काय व्यापाररूप क्रियाव्यापारका तथा भीतर शुभाशुभ मानसिक विकल्परूप क्रियाव्यापारका सर्वथा निरोध होकर यह आत्मा निष्क्रिय नित्य निरंजन विशुद्ध ज्ञान-दर्शनस्वभाव द्वारा अपने आत्मामें तन्मय होकर परिणम जाता है। इसीका नाम परम ध्यान है और इसीका नाम आत्मानुभूति है। ऐसी आत्मानुभूति यदि मुनिके न हो तो वह मुनि कहलानेका पात्र नहीं।

किन्तु ज्ञानी यह संज्ञा तो सम्यग्दृष्टिकी भी है। कोई अपने आत्माको न जाने ( न अनुभवे ) और रागके परवश हुआ बाह्य विषयोंमें ही इष्टानिष्ट या हेयोपादेय बुद्धि करता रहे तो वह सच्चा ज्ञानी नहीं। ज्ञानीका लक्षण ही यह है कि जो ज्ञान स्वभावरूपसे परिणमता है वह ज्ञानी। और इसके विपरीत जो रागस्वभावरूपसे परिणमता है वह अज्ञानी । ज्ञानीं यह सम्यग्दृष्टिकी संज्ञा है और अज्ञानी मिथ्यादृष्टिको कहते हैं। सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० ३२ में कारणविपर्यास, भेदाभेदविपर्यास और स्वरूपविपर्याय इन तीनका निर्देश किया है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि सम्यग्दृष्टिको कारणविपर्यास, भेदाभेदविपर्यास और स्वरूपविपर्यास नहीं होता। वह परसे भिन्न आत्मस्वरूपको यथावत् जानता है और परद्रव्य-भावोंसे भिन्न जाननक्रियारूप आत्माका परिणमना इसीका नाम आत्मानुभूति है। स्पष्ट है कि ऐसी आत्मानुभूति सम्यग्दृष्टिके भी होती है जिसे शुभोपयोग कहना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि शुभोपपोगका विषय पर पदार्थ है। आत्मानुभूति उससे भिन्न है। अतएव सिद्ध हुआ कि चतुर्थादि गुणस्थानोंमें भी शुद्धोपयोग होता है।

अपर पक्ष कहेगा कि चतुर्थादि गुणस्थानोंमें शुद्धोपयोग होता है इसका आगममें कहाँ निर्देश है? समाधान यह है कि चतुर्थादि गुणास्थानोंमें धर्मध्यान बहुलतासे होता है और आत्मानुभूति दीर्घकाल बाद अल्प होती है, इसलिए इन गुणस्थानोंमें उसका निर्देश नहीं किया। इसी विषयको स्पष्ट करते हुए पण्डितप्रवर टोडरमलजी अपनी रहस्यपूर्ण चिट्ठीमें लिखते हैं-

यहाँ प्रश्न-जो ऐसे अनुभव कौन गुणस्थानमें कहे हैं?

ताका समाधान-चौथे ही से होय है, परन्तु चौथे तो बहुत कालके अन्तरालमें होय है और ऊपरके गुणठाने शीघ्र-शीघ्र होय है।

बहुरि प्रश्न-जो अनुभव तो निर्विकल्प है तहाँ ऊपरके और नीचेके गुणस्थाननिमें भेद कहा?

ताका उत्तर-परिणामनकी मग्नता विषै विशेष है। जैसे दोय पुरुष नाम ले हैं अर दो ही का परिणाम नाम विसै है, तहाँ एक कै तो मग्नता विशेष है अर एक कै स्तोक है तैसे जानना।

इससे स्पष्ट है कि चौथेसे सातवें गुणस्थान तक केवल शुभोपयोग ही होता है ऐसा जानना-समझना मिथ्या है। इतना अवश्य है कि इन गुणस्थानोंमें जो आत्मानुभूति होती है उसे धर्मध्यान ही कहते हैं, शुक्लध्यान नहीं। शुक्लध्यानमें एक मात्र शुद्धोपयोग ही होता है, परन्तु धर्मध्यानमें शुभोपयोग भी होता है और शुद्धोपयोग भी यही इन दोनोंमें विशेषता है।

चतुर्थादि गुणस्थानोंमें शुभोपयोगके कालमें उससे आस्रव बन्ध तथा संवर-निर्जरा दोनों होते होंगे ऐसा कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि तब आत्मामें जो सम्यग्दर्शनादिरूप विशुद्धि होती है इसके कारण संवर-निर्जरा होती है और शुभोपयोगके कारण आस्रव-बन्ध होता है। तथा जब आत्मानुभूति होती है तब इसके कारण संवर-निर्जरा होती है और अबुद्धिपूर्वक रागके कारण आस्रव-बन्ध होता है। इससे एक कालमें एक ही उपयोग होता है यह व्यवस्था भी बन जाती है और किसका कौन यथार्थ कारण है इसका भी ज्ञान हो जाता है।

अपर पक्षका कहना है कि एक कारणसे अनेक कार्य होते हुए देखे जाते हैं। समाधान यह है कि शुभोपयोग संवर-निर्जराका विरोधी है। पंचास्तिकाय गाथा १४४ की टीकामें बतलाया है-

शुभाशुभपरिणामनिरोधः संवरः ।

शुभ और अशुभ परिणामका निरोध करना संवर है ।

इसी तथ्यको और भी स्पष्ट करते हुए पंचास्तिकाय गाथा १२४ में कहा है-

जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व सव्वदव्वेसु ।
णासवदि सुहं असुहं समसुहदुक्खस्स भिक्खुस्स ॥ १४२ ॥

जिसका सब द्रव्योंमें राग, द्वेष या मोह परिणाम नहीं है, सुख-दुखमें सम परिणामवाले उस भिक्षुके शुभ और अशुभ कर्मका आस्रव नहीं होता ॥ १४२ ॥

इसलिए शुभोपयोगसे संवर निर्जरारूप कार्य मानना योग्य नहीं है ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘पहला गुणस्थानवर्ती मिथ्यादृष्टि जीव जब सम्यक्त्वके सन्मुख होता है तब शुद्ध परिणामोंके अभावमें भी असंख्यातगुणी निर्जरा, स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात करता ही है । तद्वत् शुभोपयोगरूप पुण्यका प्रत्येक भाव कर्मसंवर, कर्म-निर्जरा, कर्मबन्धरूप तीनों कार्य प्रतिसमय किया करता है । अतः जीवदया, दान, पूजा, व्रत आदि कार्य गुणस्थानानुसार संवर, निर्जराके भी निर्विवाद कारण हैं ।’

समाधान यह है कि प्रथम गुणस्थानमें इस जीवके परद्रव्य-भावोंसे भिन्न आत्मस्वभावके सन्मुख होनेपर जो विशुद्धि उत्पन्न होती है वह विशुद्धि ही असंख्यातगुणी निर्जरा आदिका कारण है, परद्रव्य-भावोंमें प्रवृत्त हुआ शुभोपयोग परिणाम नहीं । यह जीव जब कि मिथ्यादृष्टि है, ऐसी अवस्थामें उसके शुद्धोपयोगके समान शुभोपयोग कहना भी उपयुक्त नहीं है । फिर भी वहाँपर जो भी विशेषता देखी जाती है वह आत्मस्वभाव सन्मुख हुए परिणामका ही फल है ।

अपर पक्षने दया धर्म है इसकी पुष्टिमें स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा, उसकी टीका, नियमसार गाथा ६ की टीका, आत्मानुसाशन, यशस्तिलक, आचार्य कुन्कुन्दकृत द्वादशानुप्रेक्षा, भावपाहुड, शीलपाहुड और मूलाराधनाके अनेक प्रमाण उपस्थित किये हैं । किन्तु उन सब प्रमाणोंसे यही प्रख्यापन होता है कि जो निश्चय दया अर्थात् वीतरागपरिणाम है वही आत्माका यथार्थ धर्म है, सराग परिणाम आत्माका यथार्थ धर्म नहीं है, फिर चाहे वह व्रत परिणाम हो, भूतदया हो, अन्य कुछ भी क्यों न हो । सरागभाव होनेसे वह जीवका निश्चयस्वरूप यथार्थ धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि मोह, राग और द्वेषरूपसे परिणत हुए जीवके नाना प्रकारका बन्ध होता है, इसलिए उनका क्षय करना ही उचित है । प्रवचनसारमें इसी अभिप्रायको व्यक्त करते हुए लिखा भी है-

मोहेण व रागेण व दोसेण व परिणदस्स जीवस्स ।
जायदि विविहो बंधो तन्हा ते संखवइदव्वा ॥८४॥

मोहसे, रागसे और दोषसे परिणत हुए जीवके विविध प्रकारका बन्ध होता है, इसलिए उन्हें उत्तरोत्तर घटाना चाहिए ॥८४॥

अतएव पर जीवोंमें किये गये करुणाभाव या दयाभावको धर्म माननेके प्रति ज्ञानी जीवोंकी क्या दृष्टि होनी चाहिए इसके लिए प्रवचनसारके इस वचनपर दृष्टिपात कीजिए-

अट्ठे अजधागहणं करुणाभावो य मणुव-तिरिएसु ।
विसएसु अ प्पसंगो मोहस्सेदाणि लिंगाणि ॥८५॥

पदार्थोंका अयथाग्रहण, तिर्यञ्चों तथा मनुष्योंमें करुणाभाव और विषयोंकी संगति ये मोहके लक्षण हैं ॥ ८५ ॥

इसकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

पदार्थोंकी अयथातथ्य प्रतिपत्ति द्वारा तथा तिर्यंच और मनुष्यमात्र प्रेक्षायोग्य हैं फिर भी उनमें करुणाबुद्धि द्वारा मोहको, अभीष्ट विषयोंके प्रसंगसे रागको और अनभीष्ट विषयोंमें अप्रीतिसे द्वेषको इस प्रकार इन तीन लिंगोंसे इन तीनोंको जानकर जैसे ही यह तीन प्रकारका मोह उत्पन्न हो वैसे ही उसे नष्टकर देना चाहिए। संस्कृत टीका ग्रन्थमें देखिए।

इसी गाथापर टीका करते हुए आचार्य जयसेन लिखते हैं-

शुद्ध आत्मादि पदार्थ यथास्वरूप अवस्थित हैं, फिर भी उन्हें विपरीताभिनिवेश वश अयथार्थरूपसे ग्रहण करना तथा मनुष्यों और तिर्यंचोंमें शुद्धात्मोपलब्धिलक्षण परम उपेक्षासंयमके विपरीत करुणाभाव और दयाभाव करना अथवा व्यवहारसे करुणा नहीं करना यह दर्शनमोहका चिह्न है। निर्विषय सुखके आस्वादसे रहित बहिरात्मा जीवोंका जो मनोज्ञ और अमनोज्ञ विषयोंमें प्रकर्षरूपसे संसर्ग होता है उसे देखकर प्रीति और अप्रीतिलक्षण चारित्रमोहसंज्ञावाले राग-द्वेष जाने जाते हैं। विवेकी जन उक्त चिह्नों द्वारा मोह, राग और द्वेषको जान लेते हैं। इसलिए उनका परिज्ञान होनेके अनन्तर ही निर्विकार स्वशुद्धात्मभावना द्वारा राग, द्वेष और मोहका नाशकर देना चाहिए। संस्कृत टीका मूलमें देखिए।

आशय यह है पर जीवोंके लक्ष्यसे उत्पन्न हुई दया शुभराग है, उसे आत्माका निश्चयधर्म मानना मिथ्यात्व है और व्यवहारधर्म मानना मिथ्यात्व नहीं है।

ज्ञानी जीवके कृपा या करुणाभावसे जीवोंमें अनुकम्पा होती है पर वह मनःखेद ही है इसे स्पष्ट करते हुए पंचास्तिकाय गाथा १३७की टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

कञ्चिदुदन्यादिदुःखप्लुतमवलोक्य करुणया तत्प्रतिचिकीर्षाकुलितचित्तत्वमज्ञानिनोऽनुकम्पा। ज्ञानिनस्त्वधस्तनभूमिकासु विहरमाणस्य जन्मार्णवनिमग्नजगदवलोकनान्मनाग्मनःखेद इति।

तृषादि दुःखसे पीड़ित प्राणीको देखकर करुणाके कारण उसका प्रतीकार करनेकी इच्छासे आकुलित चित्त होना अज्ञानीकी अनुकम्पा है तथा जन्मार्णवमें निमग्न जगत्‌के अवलोकनसे किंचित् मनःखेद होना यह सविकल्प भूमिकामें वर्तते हुए ज्ञानीकी अनुकम्पा है।

दया, करुणा, क्षमा, व्रत, संयम, दम, यम, नियम और तप इत्यादि शब्द निश्चय धर्मके अर्थमें भी आगममें प्रयुक्त हुए हैं और व्यवहार धर्मके अर्थमें भी प्रयुक्त हुए हैं। यह विवेकियोंका कर्तव्य है कि कहाँ किस अर्थमें इनका प्रयोग हुआ है इसे जानकर यथार्थका निर्णय करें। दोनोंको मिलाकर एक कहना और मानना उचित नहीं है।

अज्ञानीका शुभ और अशुभभाव बन्धका हेतु है ही। ज्ञानीका भी शुभ भाव पुण्यरूप और अशुभ भाव पापरूप होनेसे निश्चयसे एकमात्र बन्ध करानेवाला ही है। पुण्य और पापपदार्थका निर्णय करते हुए पंचास्तिकाय गाथा १०८ की टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

शुभपरिणामो जीवस्य तन्निमित्तः कर्मपरिणामः पुद्‌गलानां च पुण्यम्। अशुभपरिणामो जीवस्य तन्निमित्तः कर्मपरिणामः पुद्‌गलानां च पापम्।

जीवका शुभ परिणाम और तन्निमित्तक पुद्गलोंका कर्मपरिणाम पुण्य है। तथा जीवका अशुभपरिणाम और तन्निमित्तक पुद्गलोंका कर्मपरिणाम पाप है ।

अपर पक्षने सम्यग्दृष्टिके शुभभावोंको वीतरागता और मोक्ष प्राप्तिका हेतु कहा है और उसकी पुष्टिमें प्रवचनसार आदि ग्रन्थोंका नामोल्लेख भी किया है । साथ ही यह भी लिखा है कि ‘सम्यग्दृष्टिका शुभभाव कर्मचेतना न होकर ज्ञानचेतना माना गया है ।’ किन्तु यह सब कथनमात्र हैं, क्योंकि आगममें न तो कहीं शुभभावोंको वीतरागता और मोक्षप्राप्तिका निश्चय हेतु बतलाया है और न कर्मचेतनाका अन्तर्भाव ज्ञानचेतनामें ही किया है । इन दोनोंके लक्षण ही आगममें जुदे-जुदे प्ररूपित किये गये हैं । समयसार गाथा ३८७ आदिकी टीकामें कर्मचेतनाका लक्षण करते हुए लिखा है-

तत्र ज्ञानादन्यत्रेदमहं करोमीति चेतनं कर्मचेतना ।

उसमें, ज्ञानसे भिन्न अन्य भावोंमें ऐसा चेतना कि ‘मैं इसको करता हूँ ।’ कर्म चेतना है ।

इससे स्पष्ट है कि शुभभावोंका ज्ञानचेतनामें कथमपि अन्तर्भाव नहीं हो सकता ।

दया शब्द सरागभाव और वीतरागभाव दोनोंके अर्थमें आगममें प्रयुक्त हुआ है, जैसा कि अपरपक्ष द्वारा उपस्थित किये गये आगमप्रमाणोंसे भी विदित होता है, मात्र इसी अभिप्रायसे हमने ‘यदि प्रकृतमें दयासे वीतराग परिणाम स्वीकार किया जाता है’ इत्यादि कथन अपने दूसरे उत्तरमें किया था । इस आधारसे अपर पक्षने जो अभिप्राय व्यक्त किया है वह प्रधानतासे स्वयं उस पक्षको ही ध्यान देने योग्य है, हमारा तो उस ओर ध्यान सदासे रहा है और इसीलिए हम शुद्ध परिणति और शुभपरिणतिको मिलाकर एक नहीं लिख या कह रहे हैं । अपर पक्षको भी इन दोनोंके वास्तविक भेदको स्वीकार कर लेना चाहिए । समग्र आगममें सुमेल विठलानेका एकमात्र यही मार्ग है ।

ज्ञान आत्माका प्रधान गुण है, उस द्वारा अखण्ड आत्माका कथन हुआ है, इसलिए मोक्षप्राभृतके साथ संगति बैठ जाती है । समयसार कलश १०६-१०७ में इसी अर्थमें ‘ज्ञान’ शब्द आया है । अन्यत्र भी ऐसा ही समझना चाहिए । इसका विशेष खुलासा आचार्य अमृतचन्द्रने समयसारके परिशिष्टमें किया ही है । उस पर दृष्टिपात कीजिए ।

मोक्षप्राभृत गाथा ६० में जो तपश्चरण करनेकी प्रेरणा की है वह इच्छानिरोधरूप तपश्चरण करनेके लिए ही कहा गया है । इच्छांनिरोधस्तपः’ यह प्रसिद्ध आगम वचन है 'चारित्र भी ‘स्वरूपस्थिति’ का दूसरा नाम है-‘स्वरूपे चरणं चारित्रम् ।’ प्रवचनसार गाथा ७, आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीका । बाह्य तप या चारित्रको जो तप या चारित्र संज्ञा प्राप्त है वह निश्चयतप और निश्चय चारित्रका सहचर होनेसे ही प्राप्त है । आचार्यने मोक्षप्राभृत गा० ६० में ऐसे ही तपश्चरण करनेकी प्रेरणा की है । मुनिदीक्षा स्वरूपस्थितिका ,दूसरा नाम है । वह न हो और बाह्य तप करनेका विकल्प और क्रियाकाण्ड मात्र हो तो वह न सच्ची मुनिदीक्षा है और न सच्चा तपश्चरण ही है ।

अपर पक्षने आगे सूत्रप्राभृत, मोक्षप्राभृत तथा तत्त्वार्थसूत्र-तत्त्वार्थवार्तिकके जो प्रमाण दिये हैं वे पूर्वोक्त अभिप्रायकी ही पुष्टि करते हैं । तभी तो तत्त्वार्थवार्तिकमें चारित्रका यह लक्षण किया है-

संसारकारणनिवृत्तिं प्रत्यागूर्णस्य ज्ञानवतो बाह्याभ्यन्तरक्रियाविशेषोपरमः सम्यक्चारित्रम् ।

संसारके कारणोंकी निर्वृत्तिके प्रति उद्यत हुए ज्ञानीके बाह्य और अभ्यन्तर क्रियाका उपरम होना सम्यक्चारित्र है ।

देखिए, इस वचनमें बाह्य अनशनादि और आभ्यन्तर विकल्परूप क्रियाके प्रति उपरमभावको सम्यक्चारित्र कहा है, इन क्रियाओंको नहीं। इससे स्पष्ट है कि यथार्थ ज्ञानी वही है जो इन क्रियाओंके करनेमात्रसे आत्माका हित न मानकर स्वरूपमें रमणता करनेके लिए प्रयत्नशील रहता है। अन्तस्तत्व समझनेके लिए कठिन तो है पर वह हितकारी होनेसे समझने योग्य अवश्य है।

अपर पक्षने अहिंसा मन्दिर दरियागंज १ दिल्लीसे प्रकाशित समयसार पृ० ११८ की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया सो वहाँ पर ‘क्रिया’ शब्द आत्मा और आस्रवोंमें भेदको जानकर आत्मस्वरूप परिणमनेके अर्थमें ही आया है। इसे गाथा ७२ की अमृतचन्द्र आचार्यकृत टीकासे समझा जा सकता है। ४७ संख्याक कलश भी इसी अभिप्रायको सूचित करता है।

अपर पक्षने समयसार गाथा १५५ और उसकी टीकाका प्रमाण दिया है, उससे हमारे इसी अभिप्रायकी ही पुष्टि होती है कि रागादिकी निवृत्तिका नाम ही सच्चा चारित्र है। ज्ञान पदसे सम्यग्दर्शनादि तीनरूप परिणत आत्मा ही लिया गया है इसमें हमें तो विवाद नहीं, अपर पक्ष भी इस विकल्पको छोड़ दे कि समयसार कलश १०६-१०७ में ‘ज्ञान’ पद अकेले ज्ञानके अर्थमें आया है। यदि वह ऐसा नहीं समझता था तो उसकी ओरसे यह शंका ही उपस्थित नहीं की जानी चाहिए थी, क्योंकि प्रकृत विषयसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं।

यहाँ पर अपर पक्षने उक्त प्रमाणोंके आधारसे जो यह फलित किया है कि ‘जीवदया संयम तपरूप है तथा संवर और निर्जराका कारण होनेसे धर्म है,’ वह ठीक नहीं, क्योंकि एक तो उन प्रमाणों द्वारा दूसरी वस्तु कही गई है, दूसरे जीवदया पदसे वह पक्ष यदि शुभभावको ग्रहण करता है तो न तो वह यथार्थ तपसंयमरूप है और न ही निश्चयधर्मका यथार्थ हेतु है, अतएव उसे यथार्थ धर्म नहीं माना जा सकता। हाँ उसे व्यवहार धर्म माननेमें आगमसे कोई बाधा नहीं आती और इसीलिए उसे आगममें निश्चय धर्मका उपचरित हेतु कहा गया है।

अपर पक्षने हमारे एक कथनको गलतरूपमें उपस्थित कर जो आशय लिया है वह ठीक नहीं। दूसरे उत्तरमें हमारा कहना यह है-‘शुभभाव चाहे वह दया हो, करुणा हो, जिनबिम्बदर्शन हो, व्रतोंका पालन करना हो, अन्य कुछ भी क्यों न हो यदि वह शुभ परिणाम है तो उससे मात्र बन्ध ही होता है, उससे संवर, निर्जरा और मोक्षकी सिद्धि होना असम्भव है।’

इसके स्थानमें अपर पक्षने हमारे इस कथनको इन शब्दोंमें उपस्थित किया है-

‘आपने व्रतपालनको शुभभावमें गर्भित करके उससे संवर-निर्जरा तथा मोक्षसिद्धि होना असम्भव बतलाया है।’

अपर पक्षको हम बतला देना चाहते हैं कि हमने व्रत पालनको शुभभावमें गर्भित नहीं किया है। किन्तु हमने यह लिखा है ‘शुभभाव चाहे वह…व्रतोंका पालन करना हो,…यदि वह शुभ परिणाम है तो उससे मात्र बन्ध ही होता है, उससे संवर, निर्जरा मोक्षकी सिद्धि होना असम्भव है।’

कोई भी निष्पक्ष विचारक यह जान सकता है कि अपर पक्षके उक्त वाक्यमें और हमारे इस कथनमें कितना अन्तर है। अस्तु,

अपर पक्षने यहाँ तत्त्वार्थसूत्र अ० ७ सू० १ को उपस्थितकर और उस द्वारा प्रतिपादित व्यवहार चारित्रको निवृत्तिरूपसे सम्यक्चारित्रमें गर्भितकर लिखा है कि ‘जितनी भी निवृत्ति है वह केवल संवर तथा निर्जराकी ही कारण है, वह कभी भी बन्धका कारण नहीं हो सकती है। अतः व्रतोंका पालन संवर-निर्जरा है।’

किन्तु अपर पक्ष यह भूल जाता है कि इस सूत्र द्वारा मात्र अशुभसे निवृत्ति कही गई है, शुभ और अशुभ दोनोंसे निवृत्ति नहीं कही गई है। अतः इस सूत्र द्वारा आस्रव तत्त्वका ही निरूपण हुआ है, संवर-निर्जरा या मोक्षतत्त्वका नहीं। हमारे इस कथनकी पुष्टि उस सूत्रकी उत्थानिकासे हो जाती है। सर्वार्थसिद्धिमें इसकी उत्थानिकामें लिखा है-

आस्रवपदार्थो व्याख्यातः। तत्प्रारम्भकाले एवोक्तं ‘शुभः पुण्यस्य’ इति तत् सामान्येनोक्तम्। तद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थं कः पुनः शुभः इत्युक्ते इदमुच्यते।

आस्रव पदार्थका व्याख्यान किया। इसके प्रारम्भ कालमें ही कहा है-‘शुभः पुण्यस्य।’ पर वह सामान्यरूपसे कहा है। उसके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए ‘शुभ क्या है’ ऐसी पृच्छा होनेपर यह सूत्र कहते हैं।

इससे स्पष्ट है कि इस सूत्र द्वारा आस्रवतत्त्वका ही कथन किया गया है, संवर, निर्जरा और मोक्षतत्त्वका नहीं।

तत्त्वार्थसूत्रके उक्त सूत्रमें किस प्रकारकी निवृत्ति कही गई है इसके लिए बृहद्द्रव्यसंग्रहके इस वचनपर दृष्टिपात कीजिए-

असुहादो विणिवित्ती सुहे पवित्ती य जाण चारित्तं।
वदसमिदिगुत्तिरूवं ववहारणया दु जिणभणियं ॥४५॥

जो अशुभसे निवृत्ति और शुभमें प्रवृत्ति है उसे चारित्र जानो। इसे जिनदेवने व्यवहारनयसे व्रत, समिति और गुप्तिरूप कहा है ॥४५॥

अपर पक्षका कहना है कि ‘दत्तादानग्रहण करना या सत्य बोलना आदि व्रतोंका लक्षण नहीं है। इनको व्रतोंका लक्षण स्वीकार कर लेनेपर अव्याप्ति दोष आता है।’ किन्तु अपर पक्षका यह लिखना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि इसे स्वीकार कर लेनेपर एक तो बृहद् द्रव्यसंग्रहके उक्त आगम वचनके साथ विरोध आता है। उसमें स्पष्ट शब्दों द्वारा शुभमें प्रवृत्तिको चारित्र घोषित किया गया है। दूसरे साधुके जबतक आहार आदिके ग्रहणका विकल्प या कषायांश बना हुआ है तब तक व्यवहारसे शुभ प्रवृत्तिका सर्वथा निषेध नहीं किया जा सकता। आगेके गुणस्थानोंमें यथायोग्य संज्ञाओंका सद्भाव और छेदोपस्थापना संयम इसी आधारपर स्वीकार किया गया है। इसके लिए नौवें अध्यायमें २२ परीषहोंका प्रकरण द्रष्टव्य है।

धवल पु० १४ पृ० ८९ में जो अप्रमादका लक्षण दिया है, उसका आशय इतना ही है कि पाँच महाव्रत और पाँच समितिरूप विकल्प तो ६वें गुणस्थानमें होता है। आगे छेदोपस्थापना संयम रूपसे इनका सद्भाव स्वीकार किया गया है। उसके भी आगे सूक्ष्मसांपराय संयम और यथाख्यात संयममें इन्हें गर्भित कर लिया है।

इससे स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रके ७वें अध्यायके प्रारम्भमें जिन व्रतोंका निर्देश है उनका आस्रव तत्त्वमें ही अन्तर्भाव होता है। यही कारण है कि देवायुके आस्रवोंमें सरागसंयम और संयमासंयमको भी परिगणित किया गया है। तत्त्वार्थवार्तिक अ० ६ सू० २० में लिखा है-

प्राक् शुभपरिणामाः सरागसंयमादयः व्याख्याताः। ते दैवस्यायुष आस्रवहेतवो भवन्तीति संक्षेपः।

पहले शुभपरिणाम सरागसंयमादिक कह आये हैं, वे देवायुके आस्रवके हेतु हैं यह इस सूत्रका संक्षेप है।

अतः तत्त्वार्थसूत्रके उक्त वचनके आधारपर तो अशुभसे निवृत्तिरूप और शुभमें प्रवृत्तिरूप व्रतोंको संवर-निर्जराका कारण कहा नहीं जा सकता। अब रहे पुरुषार्थसिद्धचुपाय, रत्नकरण्डश्रावकाचार, रयणसार और चारित्रप्राभृतके अन्य प्रमाण सो इन प्रमाणोंका भी पूर्वोक्त कथनमें ही अन्तर्भाव होता है। इन सभी प्रमाणों द्वारा निश्चय सम्यक्चारित्रके साथ होनेवाले व्यवहार सम्यक्चारित्रका ही स्वरूप निर्देश किया गया है।

प्रत्येक जैन आगमाभ्यासीको उक्त प्रमाणोंके प्रकाशमें यह अच्छी तरह ज्ञात है कि निश्चयस्वरूप चारित्र, संयम तथा धर्मध्यान संवर-निर्जरा एवं मोक्षसिद्धिके कारण हैं। व्यवहार नयसे कहे गये चारित्र, संयम तथा धर्मध्यान नहीं। ये तो स्वयं आस्रव होनेसे बन्धके ही कारण हैं। व्यवहार नयसे कहे गये व्रतोंका व्यवहार चारित्र, संयम और धर्मध्यानमें ही अन्तर्भाव होता है, अतः इनसे संवर-निर्जरा और मोक्षकी निश्चयसे सिद्धि होती है ऐसा कहना सर्वथा आगमविरुद्ध है।

हमें प्रसन्नता है कि रागसहित प्रवृत्त्यंशकी अपेक्षा अपर पक्षने व्रतोंको आस्रव-बन्धका हेतु मान लिया है। किन्तु उस पक्षका यह लिखना कि ‘दत्तादानग्रहण, सत्यभाषण आदि रूप जो रागसहित प्रवृत्त्यंश है उसका इन व्रतोंमें ग्रहण नहीं किया गया है’ सर्वथा आगमविरुद्ध है। मालूम पड़ता है कि अपर पक्ष ऐसा लिखकर व्यवहारमें व्रतरूपसे स्वीकृत पूजा, भक्ति, दान, स्वाध्याय, दया आदि सभी सत्प्रवृत्तिरूप व्यवहार धर्मकी उपेक्षा कर देना चाहता है। ये सभी दत्तादान और सत्यभाषणके समान सत्प्रवृत्तियाँ व्रत ही तो हैं। मोक्षमार्गमें निश्चयधर्मके साथ होनेवालीं इन सभी सत्प्रवृत्तियोंको आचार्योंने व्यवहारधर्म ही तो कहा है। हम इसी उत्तरमें बृहद्द्रव्यसंग्रहका उद्धरण उपस्थित कर आये हैं, उसमें स्पष्टतया बतलाया है कि जिस प्रकार अशुभरूप हिंसा, असत्य आदिसे निवृत्ति व्यवहार सम्यक्चारित्र है उसी प्रकार अहिंसा, सत्यभाषण आदि शुभमें प्रवृत्ति भी व्यवहार सम्यक्चारित्र है।

अपर पक्षने जीवदयाको धर्म मानना मिथ्यात्व है क्या? यह प्रश्न किया है। साथ ही इसकी पुष्टिमें अनेक आगमप्रमाण देकर यह भी सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि जीवदया धर्म है और उससे संवर-निर्जरा भी होती है। अब पूछना यह है कि अपर पक्षके मतानुसार यदि जीवदया धर्म है तो सत्यभाषण और दत्तादानादि धर्म क्यों नहीं? क्या जीवदया रागसहित प्रवृत्त्यंश नहीं है? हम यह अच्छी तरह समझ रहे हैं कि अपर पक्ष अशुभसे निवृत्तिको धर्म कह कर उसे संवररूप सिद्ध करनेकी चेष्टामें है, परन्तु इससे उसने जिस अन्यथा प्ररूपणाको जन्म दिया है उससे वह परस्पर विरुद्ध कथनके दोषसे अपनी रक्षा नहीं कर सकता। एक ओर तो जीवदयाको धर्म मानना और दूसरी ओर सत्यभाषण तथा दत्तादानादिको व्रत नहीं मानना यह परस्पर विरुद्ध कथन नहीं है तो और क्या है? इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे।

अपर पक्षका हमारे पक्षके ऊपर यह दोषारोपण है कि हमारा पक्ष व्यवहार धर्मका लोप करने पर तुला हुआ है। किन्तु उसके उक्त आगमविरुद्ध कथनसे जिस अनर्थ परम्पराको जन्म मिलेगा उसे वह पक्ष अभी नहीं समझ रहा है। पक्षव्यामोह इसीका दूसरा नाम है। यदि इसे उल्टी गंगा बहाना कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। हम तो अपर पक्षके उक्त कथनसे यह समझे हैं कि हमारा पक्ष व्यवहार धर्मका लोप करना चाहता है यह तो उस पक्षका प्रचारमात्र है। वस्तुतः वह पक्ष स्वयं लोकमेंसे पूजा, भक्ति, दान आदि सभी सत्प्रवृत्तियोंका लोप कर देना चाहता है तभी तो वह पक्ष सत्यभाषण आदिकों व्रतरूपसे स्वीकार करनेके लिए तैयार नहीं दिखाई देता ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘दत्तादान ग्रहण करना या सत्य बोलना व्रतोंका लक्षण नहीं है, इनको व्रतोंका लक्षण स्वीकार करनेपर अव्याप्ति दोष आता है । कारण कि दत्तादानको न ग्रहण करनेकी अवस्थामें या मौनस्थ आदि अवस्थामें मुनियोंके यह लक्षण घटित न होनेके कारण महाव्रत ही न रहेंगे ।’

समाधान यह है कि अभिप्रायमें दत्तादानका ग्रहण या सत्य बोलनेरूप परिणामके बने रहनेके कारण दत्तादानको न ग्रहण करनेकी अवस्थामें या मौनस्थ अवस्थामें भी व्रतोंका लक्षण घटित हो जाता है, इसलिए अव्याप्ति दोष नहीं आता ।

साधुओंके २८ मूलगुण बतलाये हैं । उनमें पाँच समितियाँ भी सम्मिलित हैं । ये पाँचों समितियाँ प्रवृत्तिरूप ही स्वीकार की गई हैं । इसी प्रकार गृहस्थोंके १२ व्रतोंमें अतिथिसंविभाग व्रत भी प्रवृत्तिरूप ही स्वीकार किया गया है । इससे स्पष्ट है कि व्यवहार धर्ममें अशुभसे निवृत्ति और शुभमें प्रवृत्ति ही मुख्यरूपसे ली गई है, क्योंकि अशुभ निवृत्तिका अर्थ ही शुभप्रवृत्ति है । इनको इस प्रकार पृथक् नहीं किया जा सकता जैसा कि अपर पक्षने इनका पृथक् रूपसे विधान किया है । इतने विवेचनके बाद भी यदि अपर पक्ष सत्यभाषण आदिको व्यवहार व्रतरूपसे स्वीकार नहीं करना चाहता तो इन्हें अव्रत तो कहा जा सकता नहीं और व्रतोंमें इनकी गणना आप करना चाहते नहीं ऐसी अवस्थामें इनकी क्या स्थिति होगी इसका अपर पक्ष स्वयं निर्णय करे ।

यहाँ पर अपर पक्षने जिस प्रकार यह स्वीकार कर लिया है कि वास्तवमें सम्यक्त्व बन्धका कारण नहीं है, किन्तु सम्यक्त्वके साथ रहनेवाला रागांश ही देवआयुके बन्धका कारण है । उसी प्रकार वह यह भी स्वीकार कर लेगा कि शुभ-अशुभकी निवृत्तिरूप निश्चय चारित्रांश या रत्नत्रयांश वास्तवमें बन्धका कारण नहीं है, किन्तु उसके साथ रहनेवाला रागांश ही वास्तवमें बन्धका कारण है । इसे स्वीकार कर लेने पर उस पक्षने जो यह लिखा है कि एक मिश्रित अखण्ड पर्यायमें निवृत्ति तथा प्रवृत्ति ( राग ) दोनों अंश सम्मिलित हैं । अतः उससे आस्रव-बंध भी है और संवर निर्जरा भी है ।’ इसका सुतरां निरास हो जायगा । निश्चय रत्नत्रयांशमें केवल अशुभकी ही निवृत्ति नहीं है, किन्तु शुभकी भी निवृत्ति है । अतः सिद्ध हुआ कि जो निश्चय रत्नत्रयांश है उससे संवर और निर्जरा है और गृहस्थों तथा मुनियोंके उस उस पदके योग्य जो शुभ-अशुभरूप प्रवृत्त्यंश या रागांश है उससे आस्रव और बन्ध है ।

आगममें अपर पक्षके कथनानुसार व्रतोंके छोड़नेका उपदेश तो कहीं नहीं है । इन व्रतोंके धारण करनेमात्रसे ही मैं मुक्तिका पात्र बनूँगा ऐसे विकल्पके छुड़ानेका उपदेश अवश्य है । जब यह जीव स्वभाव सम्मुख हो निर्विकल्प समाधिका अधिकारी बनता है तब व्रतरूप विकल्प स्वयं विलयमान हो जाते हैं इतना अवश्य है । शुभ-अशुभकी निवृत्तिरूप जो व्रत है वह तो एक मात्र वीतरागभाव है । उसकी संज्ञा कुछ भी रख ली जाय, है वह स्वयं एक मात्र वीतराग भाव ही । सप्तमादि गुणस्थानोंमें यदि व्रतोंका सद्भाव है भी तो एक मात्र इसी रूपमें है ।

इस प्रकार किस रूपमें दया आत्मधर्म है और किस रूपमें पुण्यभाव है इसका स्पष्टीकरण किया ।