शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ (भाग ३/४)
पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ २१६ से २३५
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सिद्धोंके कर्मबन्ध क्यों नहीं
फिर आपने जो अपने लेखमें यह बात लिखी है-
‘सिद्धोंको जिनमें वैभाविक शक्ति इस अवस्थामें विद्यमान है और लोकमें सर्वत्र बाह्य निमित्तकी भी विद्यमानता है, तब उन्हें संसारी बनानेसे कौन रोक सकता है ?’
आपकी इस शंकाका समाधान यह है कि जीवको संसारी बनानेवाला निमित्त कारण द्रव्य कर्म हैं जो सिद्धोंमें नहीं है। लोकमें यद्यपि कार्मणवर्गणाएँ भरी हुई हैं तथापि वे वर्गणायें, द्रव्यकर्म न होनेसे, जीवको संसारी बनानेकी निमित्त नहीं हो सकतीं।
इस पर यदि ऐसी आशंका की जावे कि सिद्धोंके द्रव्य कर्म क्यों नहीं है ? तो उसका समाधान यह है कि द्रव्य कर्मोंका आत्यन्तिक क्षय होनेसे ही सिद्ध होते हैं और नवीन द्रव्यकर्म-बंधके कारण रागादिका अभाव होनेसे नवीन द्रव्यकर्मका बन्ध भी नहीं होता, इसलिये सिद्धोंके द्रव्यकर्म नहीं है। कहा भी है-
बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः।
-त० सू० १०।२
अर्थ-बन्ध-हेतुओंके अभाव और निर्जरासे सब कर्मोंका आत्यन्तिक क्षय होना ही मोक्ष है।
अध्यात्म-वेत्ता यह बात भले प्रकार जानते हैं कि सिद्धोंको विकारी करनेवाला द्रव्यकर्मरूपी निमित्त लोकमें नहीं है, फिर भी यह कहना कि लोकमें निमित्त कारण भरे हुए हैं, असंगत है। प्रत्युत उपादानमात्रसे ही कार्यकी उत्पत्ति माननेवाले आपके माने हुए सिद्ध जब वैभाविक शक्तियुक्त हैं तब उनको अपने उपादान द्वारा ही संसारी बन जानेका कौन निराकरण कर सकेगा ! तथा आप भी अपनी उपादान शक्तिके द्वारा अभी सिद्ध क्यों नहीं बन जाते।
इस सम्बन्धमें श्री अमृतचन्द्रके निम्न वाक्य ध्यान देने योग्य हैं-
सक्रिया बहिरंगसाधनेन सहभूता जीवाः। जीवानां सक्रियत्वस्य बहिरंगसाधने कर्मनोकर्मोपचयरूपाः पुद्गला इति ते पुद्गलकरणाः। तदभावान्निःक्रियत्वं सिद्धानाम्। पुद्गलानां सक्रियत्वस्य बहिरंगसाधनं परिणामनिर्वर्तकः काल इति ते कालकरणाः। न च कर्मादीनामिव कालस्याभावः। ततो न सिद्धानामिव निष्क्रियत्वं पुद्गलानामिति।
-पञ्चास्तिकाय गाथा ९८ टीका
अर्थ-बहिरंग साधनके साथ रहनेवाला जीव सक्रिय है। जीवोंके सक्रियपनेका बहिरंग साधन कर्म-नोकर्म संचयरूप पुद्गल है, इसलिये जीव पुद्गलकरण माने हैं। उस ( पुद्गल करण ) के अभावके कारण सिद्धोंके निष्क्रियपना है। पुद्गलोंके सक्रियपनेका बहिरंग साधन परिणामनिष्पादक काल हैं, इसलिये पुद्गल कालकरणवाले हैं। जिस प्रकार कर्म-नोकर्मरूप पुद्गलोंका अभाव होता है उस प्रकार कालका अभाव नहीं होता। इसलिये जिस प्रकार सिद्धोंके निष्क्रियपना होता है उस प्रकार पुद्गलोंके निष्क्रयपना नहीं होता।
इसी प्रकार निमित्त कारणको बाह्य कारण कहते हैं। अंतरंग कारणको उपादान कारण कहते हैं। अंतरंग और बहिरंग दोनों ही कारणोंसे कार्य होता है। पौद्गलिक कार्मणवर्गणाओंके द्रव्य कर्म बन्धरूप अवस्था होनेमें अंतरंग ( उपादान ) कारण तो पुद्गल वर्गणा है और बहिरंग ( निमित्त ) कारण जीवके रागादि परिणाम हैं। अर्थात् शुभ या अशुभरूप जैसे जीवके भाव होंगे वैसे ही कार्मणवर्गणा शुभ या अशुभ द्रव्यकर्मरूप बन्ध अवस्थाको प्राप्त हो जावेंगी। इस प्रकार निमित्तके अनुसार कार्य होना आपने भी स्वीकार किया है। यही बात हमारे द्वारा कही गई थी, किन्तु उस पर आपत्ति उठाई जाकर यह लिखना कि ‘नरकायुके बन्ध योग्य जीव संक्लेश परिणाम करे, किन्तु बाह्य निमित्त देव, गुरु, शास्त्रका सानिध्य आदि देवगतिमें जाने योग्य हो तो उसे नरकायुका बन्ध न होकर देवायुका ही बन्ध होगा’ युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि कार्मणवर्गणाओंके देवायुरूप बन्ध होनेमें या नारकायुरूप बन्ध होनेमें जीवके विशुद्ध या संक्लेशरूप परिणाम बाह्य ( निमित्त ) कारण हैं, देव, गुरु, शास्त्रका सानिध्य कारण नहीं है। यह बात कर्मसिद्धान्तके विशेषज्ञोंसे ओझल नहीं है। देव-गुरु-शास्त्रका सानिध्य आदि बाह्य नो-कर्म तो भाव-कर्मके लिये आश्रयभूत हैं, नो-कर्मका भाव-कर्मके साथ अविनाभावी सम्बन्ध नहीं है। भावकर्मका द्रव्यकर्मके बन्धके साथ तथा द्रव्यकर्मके उदयका भावकर्मके साथ अविनाभावी सम्बन्ध है।
आगे आपने लिखा है कि-‘प्रत्येक द्रव्यकी संयोगकालमें होनेवाली पर्याय बाह्य निमित्तसापेक्ष निश्चय उपादानसे होती है यह तो है, पर साथमें इसके प्रत्येक कार्यके प्रति उपादानकी नियामकता ही स्वीकार की गयी है। इसलिए जब कार्यक्षम निश्चय उपादान उपस्थित होता है तब निमित्त भी उसीके अनुसार मिलते हैं यह भी नियम है।’
इसपर हमारा कहना यह है कि चूँकि वस्तुको जैन संस्कृतिमें स्वतःसिद्ध परिणमन स्वभाववाली स्वीकार किया गया है, इसलिए परिणमन होनेमें तो उपादानकी नियामकता रहा करती है, किन्तु उस परिणमनमें जो विशेषता या विलक्षणता आती है उसका नियामक तो निमित्त ही होता है। जैसे हमने पूर्वमें बतलाया है कि आत्माकी क्रोध पर्यायके अनन्तर क्षणमें जो मान, माया या लोभरूप विलक्षण पर्याय उत्पन्न होती हैं इसमें परिणमनका उपादान कारण तो आत्मा स्वयं है। कारण कि वह स्वतःसिद्ध परिणमनशील है, परन्तु उसमें जो क्रोधरूपताके बजाय विलक्षण मानरूपता, मायारूपता या लोभरूपता उत्पन्न हुई उसका निमित्त कारण मानादि उस उस कषायरूप द्रव्यकर्मके उदयको माना गया है। इसके अलावा यह भी सोचनेकी बात है कि स्वपर-प्रत्यय परिणमनमें उपादान जो कार्यक्षम निश्चयउपादानका रूप धारण करता है तो वह भी निमित्त कारणकी सहायतासे ही करता है। जैसे आत्माके परिणमनमें कार्याव्यवहित पूर्वपर्यायमें जो क्रोधरूपता पायी जाती है वह भी क्रोध कषायरूप द्रव्यकर्मके उदयरूप निमित्त कारणसे ही उत्पन्न हुई है। इसी प्रकार निष्पन्न क्षणवर्ती घटरूप पर्यायके अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायके अनन्तर क्षणमें जो घटरूप विलक्षण पर्याय उत्पन्न हुई उसका निमित्तकारण कुम्हारका तदनुकूल व्यापार ही तो है तथा उस निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती घट पर्यायके अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती मिट्टीकी पर्यायमें जो विलक्षणता पायी जाती है वह कुम्हारके तदनुकूल व्यापारके निमित्तसे ही उत्पन्न हुई है। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक वस्तुमें जितने भी क्रमसे प्रवर्तमान स्वपरप्रत्यय परिणमन होते हैं वे चाहे कार्यक्षम निश्चय उपादानरूप हों अथवा चाहे उसके उत्तर क्षणवर्ती कार्यरूप हों उनमें जिस विल-क्षणताके दर्शन होते हैं वह तदनुकूल निमित्तकारणके सहयोगकी बजहसे ही उत्पन्न हुई मानना चाहिये। आपने लिखा ‘निमित्त भी उसीके अनुसार मिलते हैं’, तो इसका अभिप्राय यही तो हुआ कि कार्यक्षम निश्चय उपादान अपने द्वारा होनेवाली कार्योत्पत्तिके लिये अनुकूल निमित्तोंका समागम भी आप ही प्राप्त कर लेता है, लेकिन इस विषयमें हम कह सकते हैं कि जब वह निश्चय उपादान स्वयं कार्य-क्षम है तो उसे फिर निमित्तोंके सहयोगकी आवश्यकता ही क्यों होती है ? और यदि आवश्यकता है तो फिर उन निमित्तोंकी प्राप्ति वह कार्यक्षम उपादान स्वयं कर लेता है-यह असंभव बात है, इसलिये यदि यह माना जाय कि प्रत्येक वस्तुके जब अनादि कालसे लेकर अनन्तकाल तकके परिणमन निश्चित हैं तो कार्यके प्रति उपादानभूत वस्तुका जब जैसा परिणमन होगा तब निमित्तभूत वस्तुकी अपनी अनादि क्रमसे प्रवर्तमान परिणति भी तदनुकूल ही होगी अन्यथा नहीं होगी, तो ऐसा माननेपर आपके प्रति हम कई बार कह चुके हैं कि फिर क्यों आप कार्य करनेका संकल्प मनमें करते हैं ? क्यों मस्तिष्कके सहारेपर कार्यकारणभावकी निमित्तभूत और उपादानभूत वस्तुओंके साथ संगति बिठलाते हैं तथा फिर क्यों अपनी श्रम शक्तिके आधारपर तदनुकूल व्यापार करते हैं। यदि कहा जाय कि यह सब कुछ अनादि कालीन नियतक्रमसे प्रवर्तमान परिणमन धाराके अनुसार ही हो रहा है तो फिर इसे यदि एकान्त नियतिवाद न कहा जाय तो एकान्त नियतिवाद अन्य क्या होगा ? जिसे जैन संस्कृतिके आगम ग्रन्थोंमें मिथ्यात्व कहा गया है।
हमें प्रसन्नता है कि आपने प्रत्येक द्रव्यकी संयोग कालमें उत्पन्न होनेवाली पर्यायोंको बाह्य निमित्त सापेक्ष उपादानसे उत्पन्न होनेवाली मान लिया है, परन्तु दुःख भी इस बातका है कि उस बाह्य निमित्तका उस पर्यायोत्पत्तिमें क्या उपयोग है ? इसे आप स्पष्ट नहीं कर सके हैं।
आपने लिखा है कि ‘नियममें अनेकान्त लागू नहीं होता। अनेकान्तकी अपनी मर्यादा है, उसे ध्यानमें रखकर ही उसे लागू करना चाहिये। अन्यथा द्रव्यमें ( सामान्यकी अपेक्षा ) जो नित्यता और पर्यायकी अपेक्षा जो अनित्यता स्वीकार की गयी है वह अनेकान्त नहीं बनेगा। तब तो यह भी माननेके लिये बाध्य होना पड़ेगा कि द्रव्य (सामान्य) स्वयं अपनी अपेक्षा ही कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है।’
इस विषयमें हमारा निवेदन यह है कि भो मनीषिणः ! प्रकृतमें जिसको आपने नियम कहा है उसे आप स्थापित तो कर लीजिये फिर उसके बारेमें एकान्त-अनेकान्तकी संभावना और असंभावनाका विचार कीजिये। सो ‘जब कार्यक्षम निश्चय उपादान उपस्थित होता है तब निमित्त भी उसीके अनुसार हो मिलते हैं’ इसकी स्थापना ही हमारे पूर्व विवेचनके अनुसार जब नहीं हो सकती है तब उसके बारेमें एकान्त-अनेकान्तकी चर्चा ही व्यर्थ है।
आपने लिखा कि ‘अनेकान्तकी अपनी मर्यादा है’, परन्तु क्या मर्यादा अनेकान्तकी है ? यह तो आपने स्पष्ट ही नहीं किया है। हमारी समझसे तो अनेकान्तको मर्यादा यही है जो आचार्य अमृतचन्द्रने अपनी समयसार टीका आत्मख्यातिके स्याद्वादाधिकारमें उसका ( अनेकान्तका ) स्वरूप कथनके आधारपर बतलाई है। वह स्वरूप कथन निम्न प्रकार है-
एकवस्तुवस्तुत्वनिष्पादकपरस्परविरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनं अनेकान्तः।
अर्थ-एक वस्तुके वस्तुत्वकी स्थापना करनेवाली परस्पर विरोधी दो शक्तियोंका प्रकाशन ही अनेकान्त है। ऐसा अनेकान्त द्रव्यमें सामान्यकी अपेक्षा नित्यता और पर्यायकी अपेक्षा अनित्यताकी मान्यतामें घटित होता ही है तथा उसमें यह दूषण भी प्रसक्त नहीं होता कि ‘द्रव्य ( सामान्य ) स्वयं अपनी अपेक्षा ही कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है।’
आपने लिखा है 'अकाम निर्जरा और तप द्वारा होनेवाली निर्जराका शास्त्रमें विधान है–इसमें सन्देह नहीं । पर कर्मशास्त्रके अभ्यासीसे यह बात छिपी हुई नहीं है कि ऐसी निर्जरा किन कर्मोंकी कैसी योग्यताके होने पर कैसी पद्धतिसे होती है ? इसके आगे अपनी इच्छानुसार कर्मोंके आगमविरुद्ध कुछ नियम बनाकर आपने लिखे हैं। उनमें पाया जानेवाला आगमका वह विरोध आगम प्रमाणसहित आगे दिखलाया जायगा। सर्व-प्रथम तो यह बात है कि जीवके सम्यग्दर्शन, संयम, तप, श्रेणी, मोक्ष आदिका कोई नियत काल नहीं है। जीवके इन परिणामों द्वारा होनेवाले कर्मोंका अपकर्षण, उत्कर्षण, स्थितिघात, अनुभागघात, संक्रमण और अविपाकनिर्जराका काल कैसे नियत हो सकता है ?
राजवार्तिक अध्याय १ सूत्र ३ में निम्न प्रकार कहा है-
भव्यस्य कालेन निःश्रेयसोपपत्तेः अधिगमसम्यक्त्वाभावः ॥७॥ यदि अवधृतमोक्षकालात् प्रागधिगमसम्यक्त्वबलात् मोक्षः स्यात् स्यादधिगमसम्यग्दर्शनस्य साफल्यम्। न चादोऽस्ति। अतः कालेन योऽस्य मोक्षोऽसौ, स निसर्गजसम्यक्त्वादेव सिद्ध इति।
कालानियमाच्च निर्जरायाः ॥९॥ यतो न भव्यानां कृत्स्नकर्मनिर्जरापूर्वकमोक्षकालस्य नियमोऽस्ति। केचिद् भव्याः संख्येयेन कालेन सेत्स्यन्ति, केचिदसंख्येयेन, केचिदनंतेन, अपरे अनन्तानंतेनापि न सेत्स्यन्तीति। ततश्च न युक्तम् ‘भव्यस्य कालेन निःश्रेयसोपपत्तेः’ इति।
चोदनानुपपत्तेश्च ॥१०॥ सर्वस्येयं चोदना नोपपद्यते। ज्ञानात् क्रियाया द्वयात् त्रितयाच्च मोक्षमाचक्षाणस्य सर्वस्य नेदं युक्तम्-‘भव्यस्य कालेन मोक्षः’ इति। यदि हि सर्वस्य कालो हेतुरिष्टः स्यात्, बाह्याभ्यन्तरकारणनियमस्य दृष्टस्येष्टस्य वा विरोधः स्यात्।
अर्थ–प्रश्न-भव्यके कालके नियमकरि ही मोक्षकी प्राप्ति होय है याते अधिगमज सम्यग्दर्शनका अभाव है।
टीकार्थ-प्रश्न-जो मोक्षका काल नियमरूप है। ताते पहिले अधिगमसम्यक्त्वके बलते मोक्ष कार्यकी उत्पत्ति होय तो अधिगम सम्यग्दर्शनके फलपना प्राप्त होय सो है नहीं। या कारणते जाकी जिस काल नियम करि मोक्ष है सो निसर्गज सम्यग्दर्शनके कारणते ही सिद्ध है। याते अधिगम सम्यग्दर्शनका मानना युक्त नहीं है।
समाधान-‘भव्यके नियमित काल करि ही मोक्षकी प्राप्ति है’ ऐसा कहना भी अनवधारणरूप है। जाते कर्मकी निर्जराको काल नियमरूप नाही हैं याते भव्यनिके समस्त कर्मनिकी निर्जरापूर्वक मोक्षकी प्राप्तिमें कालका नियम नाहीं सम्भवे है। कोई भव्य है ते संख्यात काल करि मोक्ष प्राप्त होयंगे। अर केई असंख्यात काल करि अर केई अनन्तकाल करि सिद्ध होयेंगे। बहुरि कोई अनन्तानन्त काल करिके भी सिद्ध नहीं होयेंगे। ताते ‘नियमिन काल ही करि भव्यके मोक्षकी उत्पत्ति है’ ऐसा कहना युक्त नहीं ऐसा जानना। आगे याही अर्थका समर्थन करे हैं-
वार्तिकार्थ-बहुरि नियमित काल मात्र ही करि मोच कार्यकी उत्पत्ति होय तो सर्व स्याद्वादीनिके ज्ञान यम नियमादिक उपदेशकी प्रवृत्तिका अभाव आवेगा। याते मोक्ष कार्यके प्रति केवल काल ही को असाधारण कारण मानना युक्त नाहीं है।
टीकार्थ-केई स्याद्वादी हैं तो ज्ञान ते मोक्ष कार्यकी उत्पत्ति माने हैं, केई क्रियाते ही मोक्ष कार्यकी उत्पत्ति माने हैं, केई ज्ञान क्रिया दोऊनि ते मोक्ष कहे हैं। केई यम नियम धारणा तीन ते मोक्ष कहे हैं। या प्रकार सर्व स्याद्वादीनिके या उपदेशकी प्रवृत्तिका अभाव आवे। तातें नियमित काल करि मोक्ष है यह कहना युक्त नाहीं। निश्चयकरि जो सर्व कार्य प्रति काल इष्ट होय तो प्रत्यक्षके विषयस्वरूप अथवा अनुमानके विषय-स्वरूप बाह्य आभ्यन्तर कारणके विरोध आवे। कार्य मात्रका आत्मलाभ है सो बाह्य तथा आभ्यन्तर कारणके निकट होते होय है यह नियम प्रत्यक्ष विषय करि बहुरि अनुमान विषय करि श्रद्धहै ताका विरोध होयगा। ताते मोक्ष कार्य प्रति काल ही को कारण कहना यह नियम नाहीं सम्भवे है।
-श्री पं० पन्नालालजी न्यायदिवाकरकृत तत्त्वार्थराजवार्तिककी हिन्दी टीका
अकामनिर्जरा या तपके द्वारा अकालमें भी निर्जरा होती है। इस तथ्यको नियतिके ढाँचेमें ढालनेके लिए आपके द्वारा स्वइच्छानुसार आगम विरुद्ध ये दो नियम बनाये गये हैं-१ जिस कालमें जिन कर्मोंकी जितने परिमाणमें जिन परिणामोंको निमित्तकर उत्कर्षित अपकर्षित संक्रमित और उदीरित होनेकी योग्यता होती है, उस कालमें उन कर्मोंका उतने परिमाणमें उन परिणामोंको निमित्तकर उत्कर्षण अपकर्षण संक्रमण और उदीरणा होती है ऐसा नियम है। २-बंधके कालमें जो स्थितिबंध और अनुभागबंध होता है, सो उस कालमें ही उन कर्मोंमें ऐसी योग्यता स्थापित हो जाती है, जिससे नियतकाल आने पर नियत परिणामों तथा बाह्य नोकर्मोंको निमित्त कर उन उन कर्मोंका अपकर्षणादिरूप परिणमन होता है।
किसी भी आगममें ऐसे नियमोंका उल्लेख नहीं है। इसी कारण इनके समर्थनमें कोई भी आगम प्रमाण नहीं दिया गया है। इस बातको छिपानेके लिये भ्रमोत्पादक निम्न शब्द लिखे गये हैं ‘कर्म-शास्त्रके अभ्यासीसे यह बात छिपी हुई नहीं है’ तथा ‘यह बात कर्मशास्त्रियोंको सुविदित है’ किन्तु यह सुविदित है कि आपके द्वारा बनाये गये उपरोक्त दोनों नियम आगमविरुद्ध हैं।
आपके उपर्युक्त नियमोंका खण्डन श्री धवल जयधवल आदि सिद्धान्त ग्रन्थोंसे भले प्रकार हो रहा है। बन्ध कालके समय या उसके पश्चात् ऐसा कोई एकान्त नियम नहीं बनता कि अमुक कालमें अमुक कर्म-प्रदेशोंका ही उत्कर्षण होगा, अमुक प्रदेशोंका अपकर्षण होगा, अमुक प्रदेशोंकी उदीरणा होगी। अमुक प्रदेशोंका संक्रमण होगा, अमुक समयमें अमुक प्रकृतिका उदय होगा, अमुक समयमें अमुक प्रकृतिका बंध होगा। कुछ कर्म ध्रुव उदयी हैं, कुछ कर्म अध्रुव उदयी हैं, कुछ कर्मोंका ध्रुवबंध होता है, कुछ कर्मोंका अध्रुव बंध होता है।
घादितिमिच्छकसाया भयतेजगुरुदुगणिमिणवण्णचओ।
सत्तेचालधुवाणं चदुधा सेसाणयं तु दुधा॥१२४॥
अवरो भिण्णमुहुत्तो तित्थाहाराण सव्वआऊणं।
समयो छावट्ठीणं बंधो तम्हा दुधा सेसा॥१२६॥
-गोम्मटसार कर्मकाण्ड
अर्थात् ४७ प्रकृतियोंका ध्रुव बंध होता है। शेष ७३ प्रकृतियोंमेंसे तीर्थंकर, आहारकद्विक, चार आयु इन सात प्रकृतियोंका जघन्य बंध काल अंतर्मुहूर्त है और ६६ प्रकृतियोंका एक समय है।
जयधवल पु० ९ पृ ४-६ के निम्न प्रकरणसे अपकर्षण आदि सम्बन्धी आपकी मान्यताका खण्डन हो रहा है-
सूत्र-पढमफड्ढयं ण ओकड्डिज्जदि। टीका-कुदो ? तत्थाइच्छावणा-णिक्खेवाणमदंसणादो।
अर्थ-प्रथम स्पर्धक अपकर्षित नहीं होता, क्योंकि वहाँ पर अतिस्थापना और निक्षेप नहीं देखे जाते।
सूत्र-विदियफड्ढयं ण ओकड्डिज्जदि। टीका-तत्थ वि अइच्छावणा-णिक्खेवाभावस्स समाणत्तादो।
अर्थ-द्वितीय स्पर्धक अपकर्षित नहीं होता, क्योंकि वहाँ पर भी अतिस्थापना और निक्षेपका अभाव पहलेके समान पाया जाता है।
सूत्र-एवमणंताणि फड्ढयाणि जहण्णिया अइच्छवणा, तत्तिययाणि फड्ढयाणिण ओकड्डिज्जंति।
अर्थ-इस प्रकार अनन्त स्पर्धक जो कि जघन्य अतिस्थापनाप्रमाण है उतने स्पर्धक अपकर्षित नहीं होते।
सूत्र-अण्णाणि अणंताणि फड्ढयाणि जहण्णणिक्खेवमेत्ताणि च ण ओकड्डिज्जंति। टीका-आदीदो प्पहुडि जहण्णाइच्छावणामेत्तफड्ढयाणमुवरिमफडुयं ताव ण ओकड्डिज्जदि, तस्साइच्छावणसंभवे णिक्खेवस्स विसायादंसणादो। किं कारणं? णिक्खेवविसयासंभवादो। एत्तो उवरि ओकड्डणाए पडिसेहो णत्थि त्ति पदुप्पायणट्ठमिदमाह-
अर्थ-जघन्य निक्षेप प्रमाण अन्य अनन्त स्पर्धक भी अपकर्षित नहीं होते। प्रारम्भसे लेकर जघन्य अतिस्थापना प्रमाण स्पर्धकोंसे आगेका स्पर्धक अपकर्षित नहीं होता, क्योंकि उसकी अतिस्थापना सम्भव होनेपर भी निक्षेपविषयक स्पर्धक नही देखे जाते। उससे अनन्तर उपरिम स्पर्धक भी अपकर्षित नहीं होता। इस प्रकार जघन्य निक्षेपप्रमाण अनन्त स्पर्धक अपकर्षित नहीं होता। इसका क्या कारण? क्योंकि निक्षेपविषयक स्पर्धकोंका अभाव है। अब इससे ऊपर अपकर्षणका निषेध नहीं है, इस बातका कथन करनेके लिये आगेका सूत्र कहते हैं-
सूत्र-जहण्णओ णिक्खेवो जहण्णिया अइच्छावणा च तेत्तियमेत्ताणि फड्ढयाणि आदीदो अधिच्छिदूण तदित्थफड्ढयमोकड्डिज्जइ। टीका-अइच्छावणणिक्खेवाणमेत्थ संपुण्णत्तदंसणादो।…
अर्थ-प्रारम्भसे लेकर जघन्य निक्षेप और जघन्य अतिस्थापना प्रमाण जितने स्पर्धक हैं उतने स्पर्धकोंको उल्लंघकर वहाँ जो स्पर्धक है वह अपकर्षित होता है, क्योंकि यहाँ पर अतिस्थापना और निक्षेप पूरे देखे जाते हैं।
सूत्र-तेण परं सव्वाणि फड्ढयाणि ओकड्डिज्जंति।
अर्थ-उससे आगे सब स्पर्धक अकर्षित हो सकते हैं।
ऊपरके प्रमाणसे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक स्पर्धकमें अपकर्षित होनेकी योग्यता है। किन्तु स्वगतयोग्यता होते हुये भी अतिस्थापना और निक्षेपके अथवा अकेले निक्षेपके अभावके कारण पहले अनन्ते स्पर्धकोंकी अपकर्षणरूपसे प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। अतः आपके इस सिद्धान्तका स्पष्टता खण्डन हो जाता है कि ‘उपादान ही नियामक है, जब उस योग्यताको लिये हुये उपादान होता है तो उसके अनुकूल अन्य सर्व कारण अवश्य मिल ही जाते हैं, ऐसा नहीं हो सकता कि उस योग्यताको लिये हुये उपादान हो किन्तु अन्य कारण न मिलें और कार्य होनेसे रुक जाय।’ क्योंकि यहाँ उपादानमें अपकर्षण होनेकी योग्यता विद्यमान है, किन्तु अभावरूप अन्य कारणके हेतुसे वह कार्यरूप प्रवृत्त नहीं हो सकता है, यदि योग्यता न होती तो आचार्य यही कहते कि इतने स्पर्धकोंमें योग्यता नहीं है। अतः वह अपकर्षित नहीं हो सकते हैं। किन्तु आचार्योंने अतिस्थापना और निक्षेपका अभाव इसका कारण बतलाया है, योग्यताका अभाव कारण नहीं बतलाया है।
इसी तरह आपके इस दूसरे नियमका भी खण्डन हो जाता है कि ‘वंधके समय जिस कर्ममें जिस समय जितने प्रमाणमें जिन भावोंको निमित्त करके अपकर्षण आदि होनेकी योग्यता पड़ गई है वह उस समय उतने ही प्रमाणमें उन्हीं भावोंको निमित्त करके अपकर्षण आदि रूप परिणमन करेगा ही।’ क्योंकि यहाँ आचार्य सब ही स्पर्धकोंमें समान योग्यता वतला रहे हैं। इसी कारण कहा है कि आगेके सब स्पर्धक अपकर्षित हो सकते हैं। यह नहीं कहा है कि सब स्पर्धक अपकर्षित होंगे ही, और वास्तवमें सर्व स्पर्धक अपकर्षित होते भी नहीं हैं, किन्तु यही कहा कि हो सकते हैं अर्थात् उनमें अपकर्षित होनेमें कोई वाधा नहीं है। आगे इसी पुस्तकके पत्र ९ पर कहा है कि अन्तिम स्पर्धकसे अनन्त स्पर्धक नीचे आकर जो स्पर्धक स्थित हैं उन सबका उत्कर्षण हो सकता है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि बीचके अनन्त स्पर्धक ऐसे भी हैं जिनके अपकर्षण तथा उत्कर्षण दोनों रूपसे प्रवृत्ति होनेकी योग्यता भी है और कोई वाधा ( निषेध ) भी नहीं है। जब दोनोंकी योग्यता है और दोनोंकी बाधाका अभाव है तो आपके नियमानुसार यह निश्चय ही नहीं हो सकता है कि अपकर्षण हो या उत्कर्षण हो। किन्तु सैद्धान्तिक दृष्टिसे इसका स्पष्ट निर्णय हो सकता है कि जब जैसा निमित मिलेगा तब वैसा परिणमन हो जायगा। इस प्रकार आपके दोनों नियम आगम विरुद्ध ही सिद्ध होते हैं।
उदीरणादिसम्बन्धी नियमोंके लिये आपने एक यह हेतु दिया हैं कि ‘उपरोक्त नियम वगैर उपशम, निधत्ति, निकाचितकरण नहीं वन सकते हैं, इनमें गड़वड़ी आ जायगी।’
यह बात सत्य है कि वंधके समय कुछ प्रदेशोंका उपशम, निधत्ति, निकाचितरूप वंध होना सम्भव है। किन्तु कारणकलाप पाकर यह उपशम, निधत्ति, निकाचितवंध टूट भी जाता है। जैसा कि धवल पु० ६ पृ० ४२७-२८ पर कहा है-
कधं जिणबिंबदंसणं पढमसम्मत्तुप्पत्तीए कारणं? जिणबिंबदंसणेण णिघत्तणिकाचिदस्स वि मिच्छत्तादिकम्मकलावस्स खयदंसणादो।
अर्थ-इस प्रकार है-
शंका-जिनबिम्बका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पतिका कारण किस प्रकार होता है ?
समाधान-जिनबिम्बके दर्शनसे निधत्त और निकाचितरूप भी मिथ्यात्वादि कर्मकलापका क्षय देखा जाता है, जिससे जिनबिम्बका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका कारण होता है।
उपशम, निधत्ति और निकाचितका स्वमुख ही उदय होता है ऐसा भी नियम नहीं है, क्योंकि उनकी स्थिति पूर्ण होने पर यदि उनके उदयके अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र, काल न हो, तो जाते जाते वे भी अपने रूपसे फल न देकर अन्य सजातीय प्रकृतिरूपसे फल देनेको बाध्य हो सकते हैं। इसी तथ्य को पं० फूलचन्दजी ने स्वयं तत्त्वार्थसूत्र पृ० १५७ (वर्णीग्रन्थमालासे प्रकाशित) पर स्वीकार किया है।
इस प्रकार उपशम, निधत्त और निकाचितरूप बंध प्रदेशोंके विषयमें भी कोई एकान्त नियम नहीं बन सकता, क्योंकि कारण कलापोंके मिलने पर निधत्त, निकाचितबंध टूट जाता है और उन कर्मप्रदेशोंका भी उत्कर्षण, अपकर्षण, उदीरणा, संक्रमण आदि होने लगता है।
जिन कर्मप्रदेशोंमें उपशम, निधत या निकाचित बंध नहीं होता है उनके लिये मात्र इतना ही नियम है कि वे कर्मप्रदेश अपने बंध-समयसे एक आवली तक अर्थात् बंधावली या अचलावली कालमें उदीदणा आदिके योग्य नहीं होते हैं। उसके पश्चात् अपकर्षण आदिके योग्य हो जाते हैं।
श्री जयधवल पु० ८ पृ० २५६ पर बंधावलीके पश्चात् अपकर्षण तथा उत्कर्षणका विधान कहा है। श्री धवल पु० १५ पृ० १०४ पर बंधावली पश्चात् कर्मोंकी उदीरणा कही है। श्री जयधवल पु० ६ पृ० २९९ पर बंधावलीके पश्चात् संक्रमण होना कहा है। इस प्रकार बंध कालसे एक आवली पश्चात् ही कर्मोंमें उदीरणा, अपकर्षण, उत्कर्षण, संक्रमण अदि होने लगते हैं। कालकृत नियम कोई नहीं रहता। अमुक घटी, मुहूर्त, दिवस आदिमें ही निश्चितरूपसे अपकर्षण आदि होंगे, अन्य घटी, मुहूर्त आदिमें नहीं होंगे अथवा इतने काल पश्चात् अपकर्षण आदि होंगे उससे पूर्व नहीं ऐसा कालकृत कोई नियम नहीं रहता।
अमुक समयमें अमुक कर्मका अपकर्षण, उत्कर्षण, संक्रमण अवश्य होगा यदि ऐसा कोई नियम होता तो बजाय बंधावलीमें अपकर्षणादिकी अयोग्यता बतलानेके यह ही कहा जाता कि बंधकालमें जिन कर्मप्रदेशोंमें जिस कालमें उदीरणा आदि होनेका नियम बन गया है, उन प्रदेशोंमें उसी कालमें अवश्य उदीरणा आदि होगी, उस कालसे पूर्व या पश्चात् वे कर्मप्रदेश उदीरणा आदिके अयोग्य हैं। किन्तु ऐसा किसी भी आगममें नहीं कहा है, धवल व जयधवल आदिमें तो बंधावलीका नियम दिया है। गोम्मटसार कर्मकाण्ड गाथा २७८ में भी यह कहा है कि जिस समय जिस प्रकृतिका उदय होता है उस समय उसको उदीरणा भी होती है, किन्तु कहीं पर कुछ अपवाद भी है।
श्री जयधवल पु० ८ पृ० २५६ पर बतलाया गया है कि बंधावलीके अनन्तर ही कोई जीव अपकर्षण द्वारा अवाधाकालमें भी निषेक रचना करके उसके अनन्तर समयमें उत्कर्षण कर सकता है।
इससे सिद्ध है कि बंधकालमें कर्मप्रदेशोंके उत्कर्षणादि सम्बन्धी कोई नियम नहीं बनता है, किन्तु बाह्य और अंतरंग निमित्तोंके अनुसार उत्कर्षण, अपकर्षण संक्रमण, उदीरणादि होते रहते हैं। उदीरणादिका कोई नियत काल नहीं है।
उद्वेलनाका उदाहरण देते हुए आपके द्वारा दूसरा हेतु यह दिया गया है कि ‘उदीरणादि किस क्रमसे होती है और कितने कालमें होती है, कर्मशास्त्रकी यह सब व्यवस्था बिगड़ जायेगी।’
यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि सम्यक्त्व प्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका उद्वेलना-संक्रमण मिथ्यात्व गुणस्थानमें होता है। मिथ्यात्व गुणस्थानमें सबसे जघन्य काल रहकर जिसने सम्यग्दर्शनको प्राप्त कर लिया है उसके उद्वेलना-संक्रमण नहीं होता है। यदि अधिक कालतक मिथ्यात्व गुणस्थानमें ठहर जाय और उद्वेलना-संक्रमण प्रारम्भ भी हो जाय, किन्तु सम्यग्दर्शन प्राप्त होनेपर उद्वेलना-संक्रमण रुक जाता है और मिथ्यात्व व मिश्र प्रकृतिके कर्मप्रदेशोंका सम्यक्त्व प्रकृतिरूप संक्रमण होने लगता है। सम्यग्दर्शन व मिथ्यात्वकी प्राप्तिका कोई नियत काल नहीं है, फिर उद्वेलना-संक्रमणका काल नियत कैसे हो सकता है।
मिथ्यात्व गुणस्थानमें मिथ्यात्व प्रकृतिकी उदीरणा होती है और क्षयोपशम सम्यक्त्व होनेपर मिथ्यात्व प्रकृतिकी उदीरणा रुक जाती है और सम्यक्त्व प्रकृतिकी उदीरणा होने लगती है। इस प्रकार सम्यक्त्व व मिथ्यात्व प्रकृतियोंकी उदीरणाका भी कोई नियत काल नहीं है।
गुणसंक्रमण व सर्वसंक्रमणका भी किसी जीवके लिये कालका कोई नियम नहीं है। जो अनादि मिथ्यादृष्टि जीव उपशम सम्यग्दर्शन उत्पन्न कर क्षयोपशम सम्यग्दर्शनके पश्चात् क्षायिक सम्यग्दृष्टि हो जाता है उसके सम्यक्त्व प्रकृतिका गुणसंक्रमण व सर्वसंक्रमण नहीं होता है।
उपशमश्रेणी अनिवृत्तिकरण गुणस्थानरर दो जीवोंने एक साथ आरोहण किया, अनिवृत्तिकरणमें एक कालवर्ती सब जीवोंके परिणाम समान होते हैं, अतः इन दोनों जीवोंके परिणाम भी समान चल रहे थे, किन्तु अनिवृत्तिकरणके अन्तिम समयमें एककी मृत्यु हो जाने पर चौथे गुणस्थानमें चला जाता है और दूसरा जीव सूक्ष्म-सांपराय दसवें गुणस्थानमें पहुँच जाता है इस प्रकार पूर्व क्षणवर्ती एक ही परिणामसे उत्तर क्षणमें दो प्रकारकी उत्तर पर्याय उत्पन्न हो जाती है।
जयधवल पुस्तक ६ धवल पु० ४ आदि सिद्धान्त ग्रन्थोंके आधारपर यह लिखा गया है। कर्मनिर्जरा सविपाक और अविपाकके भेदसे दो प्रकारकी है। सविपाक निर्जरा तो सभी संसारी जीवोंके होती है, किन्तु अविपाक निर्जरा प्रयत्नपूर्वक सम्यक् तपके द्वारा होती है।
सयमेव कम्मगलणं इच्छारहियाण होइ सत्ताणं।
सविपाकणिज्जरा सा अविपक्कउवायखवणादो ॥१५८॥
-नयचक्रसंग्रह पृ० ६३, माणिकचन्द ग्रंथमाला
अर्थात्-जीवोंके विना इच्छाके जो कर्म गलन होता है वह सविपाक निर्जरा है। उपायपूर्वक जो कर्मोंका क्षय होता है वह अविपाक निर्जरा है।
तपके लिये कोई काल नियत नहीं है, अतः अविपाक निर्जराके लिये भी कोई काल नियत नहीं है।
करणानुयोगसम्बन्धी विषयोंका विचार
इसके आगे जो हेतु दिये गये हैं उनका उपरोक्त दोनों नियम अथवा नियति अपर नाम क्रमबद्ध पर्यायके सिद्ध करनेसे कोई सम्बन्ध ही नहीं है अर्थात् प्रकृत विषयसे उनका कोई सम्बन्ध ही नहीं है। न मालूम वे यहाँ इस प्रकरणमें क्यों लिखे गये हैं? इनसे तो कुछ ऐसा सिद्ध करनेका आशय प्रतीत होता है कि सर्व कार्य मात्र उपादानसे ही होते हैं, निमित्त तो अकिंचित्कर है। यदि ऐसा है तो यह हेतु निमित्त सम्बन्धी प्रश्नके उत्तरमें लिखे जाने चाहिये थे। अप्रासंगिक होते हुये भी उनका स्पष्टीकरण किया जाता है।
हेतु नं० ३ व ४ :-एक ही परिणाम या योग निमित्तभूत होते हुये, भिन्न-भिन्न प्रकृतियोंमें भिन्न स्थिति, अनुभाग तथा प्रदेशबन्धका भेद कौन करता है। इस प्रकार प्रश्न करके छोड़ दिये गये हैं। ये किस प्रकार हेतु हैं, स्पष्ट नहीं किया गया है।
इन दोनों प्रश्नोंसे यह आशय प्रतीत होता है कि एक ही निमित्त कारण होनेसे एक ही कार्य होना चाहिये था, भिन्न-भिन्न नहीं। किन्तु ऐसा कोई नियम नहीं है कि एक कारणसे एक ही कार्य हो सकता है, भिन्न नहीं। एक ही कारणसे भिन्न भी कार्य हो सकते हैं। जैसे एक घड़ेपर एक लाठी मारी। लाठी लगने रूप एक ही कारण होने पर भी भिन्न-भिन्न आकारके तथा भिन्न-भिन्न प्रमाण ( पैमायश )के कपालोंका उपपाद हो जाता है। एक ही अग्निके निमित्तसे ईंधनके जलनेका, भात आदि पचने तथा प्रकाश होने रूप भिन्न कार्य होते हैं।
कज्जणाणत्तादो कारण-णाणत्तमणुमाणिज्जदि इदि एदमवि ण घडदे, एयादो मोग्गरादो बहुकोडिकवालोवलंभा ।-धवल पु० १ पृ० २१९।
अर्थ-इस प्रकार है-
शंका-अनेक प्रकारके कार्य होनेसे उनके साधनभूत अनेक प्रकारके कारणोंका अनुमान किया जाता है?
समाधान-यह कहना भी नहीं बनता है, क्योंकि एक मुद्गरसे अनेक प्रकारके कपालरूप कार्यकी उपलब्धि होती है।
दूसरी बात यह है कि अन्य सहकारी कारणोंसे भी जीवके एक ही परिणाम व योगसे भिन्न-भिन्न प्रकृतियोंमें स्थिति अनुभाग बंधमें भेद हो जाता है। इसके लिये आगम प्रमाण निम्न प्रकार है-
कधमेकसंकिलेसादो असंखेज्जलोगमेत्तअणुभागछट्ठाणाणं बंधो जुज्जदे ? ण एस दोसो, एक्कसंकिलेसादो असंखेज्जलोगमेत्तअणुभागबंधज्झवसाणट्ठाणसहकारिकारणाणं भेदेण सहकारिकारणमेत्तअणुभागट्ठाणाणं बंधाविरोहादो ।
-धवल पु० १२ पृ० ३८०
अर्थ इस प्रकार है-
शंका-संकलेशसे असंख्यात लोकप्रमाण अनुभागसम्बन्धी छह स्थानोंका बन्ध कैसे बन सकता है ?
समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि एक संक्लेशसे असंख्यात लोकप्रमाण छह स्थानोंसे सहित अनुभागबन्धाध्यवसानोंके सहकारी कारणोंके भेदसे सहकारी कारणोंके बराबर अनुभागबंधस्थान होनेमें कोई विरोध नहीं आता।
णाणावरणीएण सह जदि सेसछकम्मेहि उक्कस्सट्ठिदी पबद्धा तो णाणवरणीएण सह सेसछकम्माणि वि ट्ठिदिं पडुच्च उक्कस्साणि चेव होंति। जदि पुण विसेसपच्चएहि सेसकम्माणि विगलाणि होंति तो णाणावरणट्ठिदीए उक्कस्सीए संतीए सेसकम्मट्ठिदी अणुक्कसा होदि।
-धवल पु० १२ पृ० ४५१
अर्थ-ज्ञानवरणीयके साथ यदि शेष छह कर्मोंकी उत्कृष्ट स्थिति बाँधी गई है तो ज्ञानवरणीयके साथ शेष छह कर्म भी स्थितिकी अपेक्षा उत्कृष्ट ही होते हैं। परन्तु यदि विशेष प्रत्ययोंसे शेष कर्म विकल होते हैं तो ज्ञानवरणीयकी स्थितिके उत्कृष्ट होनेपर भी शेष कर्मोंकी स्थिति अनुत्कृष्ट होती है।
तीसरी बात यह है कि कर्म-प्रकृति विशेषके कारण भी वन्धमें विभिन्नता हो जाती है।
हेतु नं० ५ भी प्रश्न रूपमें ही है। यह नहीं बतलाया कि उससे क्या सिद्ध करना अभिप्रेत है ? प्रश्न हैः-‘किस समयमें विस्रसोपचयमेंसे किन कर्मवर्गणाओंका कितने परिमाणमें बंध होगा, यह भेद भी कौन करता है ? आत्मा तो मात्र परिणाम करता है, परन्तु उस समय वन्ध योग्य कर्मवर्गणाओंका ही वन्ध होता है, अन्यका नहीं, ऐसा फर्क क्यों पड़ता है ?’
यह कहना कि विस्रसोपचयमेंसे कुछ कर्मवर्गणायें वन्ध योग्य होती हैं तथा कुछ नहीं-युक्त नहीं है। क्योंकि कर्मवर्गणाका लक्षण ही यह है कि वह द्रव्य कर्मरूप परिणमन करनेके योग्य है। द्रव्यकर्मरूप परिणमन करनेका नाम ही वन्ध है। जैसे ऊपर कह आये हैं श्री वीरसेन स्वामीने श्री धवल पु. १२ पृ० २७६-७७ पर यह ही उत्तर दिया कि कर्मस्कन्धोंमें समान शक्ति होते हुए भी, जीवमें इतनी शक्ति नहीं है जो सर्वकर्मवर्गणाओंको एक समयमें कर्मरूप परिणमा सके। यह उत्तर नहीं दिया कि जिन कर्मवर्गणाओंमें योग्यता है वही कर्मरूप परिणमती हैं, शेष योग्यता नहीं होनेके कारण नहीं परिणमती हैं। प्रत्युत सबमें समान शक्ति ( योग्यता ) मानी गई है।
श्री धवल पु० १२ पृ० २७६-२७७ पर दिये गये निम्न शंका-समाधानसे विषय स्पष्ट हो जाता है-
पाणादिवादो जदि णाणावरणीयबंधस्स पच्चओ होज्ज तो तिहुवणे ठिदकम्मइयखंधा णाणावरणीयपच्चएण अक्कमेण किण्ण परिणमंते, कम्मजोगत्तं पडि विसेसाभावादो ? ण, तिहुवणब्भंतर कम्मइखंधेहि देसविसयपच्चासत्तीए अभावादो।
अर्थ-शंका यदि प्राणातिपात ज्ञानावरणीयके बन्धका कारण हैं, तो तीनों लोकोंमें स्थित कार्मणस्कन्ध ज्ञानावरणीय पर्याय स्वरूपसे एक साथ क्यों नहीं परिणत होते हैं ? क्योंकि उनमें कर्मयोग्यताकी अपेक्षा समानता है ?
समाधान-नहीं क्योंकि, तीनों लोकोंके भीतर स्थित कार्मणस्कन्धोंमें देशविषयक प्रत्यासत्तिका अभाव है ।
नोट-यह बात ध्यान देने योग्य है कि सर्व कार्मणस्कन्धोंमें कर्मयोग्यताकी अपेक्षा समानता कही गई है । समाधानमें इसको अस्वीकार नहीं किया गया, क्योंकि यह उत्तर नहीं दिया गया है कि जिनमें योग्यता है वही बँध गई और शेष नहीं बँधी है ।
जदि एयक्खेत्तोगाढा कम्मइयखंधा पाणादिवादादो कम्मपज्जाएण परिणमंति तो सव्वलोगगयजीवाणं पाणादिवादपच्चएण सव्वे कम्मइयखंधा अक्कमेण णाणावरणीयपज्जाएण परिणदा होंति । ण च एवं, विदियादिसमएसु कम्मइयखंधाभावेण सव्वजीवाणं णाणावरणीयबंधस्स अभावप्पसंगादो । ण च एवं, सव्वजीवाणं णिव्वाणगमणप्पसंगादो ? एत्थ परिहारो वुच्चदे-पच्चासत्तीए एगोमाहणविसयाए संतीए वि ण सव्वे कम्मइयक्खंधा णाणावरणीयसरूवेण एगसमएण परिणमंति, पत्तं दज्झं दहमाणदहणम्मि व जीवम्मि तहाविहसत्तीए अभावादो ।
अर्थ-शंका-यदि एक क्षेत्रावगाहरूप हुये कार्मणस्कंध प्राणातिपातके निमित्तसे कर्म पर्यायरूप परिणमते हैं तो समस्त लोकमें स्थित जीवोंके प्राणातिपात प्रत्ययके द्वारा सभी कार्मण स्कन्ध एक साथ ज्ञानावरणीय रूप पर्यायसे परिणत हो जाने चाहिये । परन्तु ऐसा हो नहीं सकता, क्योंकि वैसा होनेपर द्वितीयादि-समयोंमें कार्मणस्कन्धोंका अभाव हो जानेसे सब जीवोंके ज्ञानावरणीयका बन्ध न हो सकनेका प्रसंग आता है । किन्तु ऐसा सम्भव नहीं है, क्योंकि इस प्रकारसे समस्त जीवोंके मुक्तिका प्रसंग अनिवार्य है ।
समाधान-उपर्युक्त शंकाका परिहार किया जाता है-एक अवगाहनाविषयक प्रत्यासत्तिके होनेपर भी कार्मण स्कंध एक समयमें ज्ञानावरणीय स्वरूपसे नहीं परिणमते हैं, क्योंकि प्राप्त ईन्धन आदि दाह्य वस्तुको जलानेवाली अग्निके समान जीवोंमें उस प्रकारकी शक्ति नहीं है ।
जीवमें एक समयमें अभव्योंसे अनन्तगुणे तथा सिद्धोंसे अनन्तवें भागप्रमाण परमाणु बाँधनेको शक्ति है । उसमें योगके निमित्तसे यह भेद आता है कि कितने परिमाणमें कर्मवर्गणायें किसी एक समयमें बँधेंगी, जिस समय जिन वर्गणाओंसे निमित-नैमित्तिक सम्बन्ध होता है; उस समय वही वर्गणायें बँध जाती हैं । जैसे आहार वर्गणा, वचनवर्गणा एवं मनोवर्गणा तीनों वर्गणायें प्रत्येक समयमें आती हैं, किन्तु जीवके प्रदेशोंके परिस्पन्दका जिस समय इन तीनोंमेंसे जिस वर्गणासे निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध हो जाता है उस समय वह ही योग कहलाता है ।
उपरोक्त करणानुयोगका सर्व विषय छद्मस्थके ज्ञानगम्य नहीं है । इसका आधार मात्र आगम प्रमाण है जो युक्तियों व तर्कका विषय नहीं है । श्री धवल पु० १४ पृ. १५१ पर कहा है कि आगम तर्कका विषय नहीं है तथा पृ० ३५६ पर लिखा है कि युक्तिके द्वारा सूत्र बाधित नहीं किया जा सकता है । जो प्रश्न यहाँ उठाये गये हैं उन सबका समाधान श्री धवल, जयधवल आदि कर्म-ग्रन्थोंमें उपस्थित है । निमित्त कारणकी मुख्यतासे ही यह सर्व व्यवस्था, विशेषता या भेद बतलाये हैं । आश्चर्य इस बातका है कि फिर भी उन्हीं ग्रन्थोंके टीकाकार ही उक्त प्रश्नोंको उठाकर उन प्रमाणोंके विरुद्ध यह सिद्ध करना चाहते हैं कि यह सब व्यवस्था, विशेपता या भेद एकान्ततः मात्र उपादानकी योग्यताके कारण ही होते हैं। इस एकान्त मिथ्यावाद-को सिद्ध करनेके लिये यह भी मान लिया गया है कि ऐसी भी कर्मवर्गणायें है जो बंध योग्य नहीं है अर्थात् द्रव्य कर्म रूप परिणमन करनें योग्य नहीं है। जो किसी भी प्रकार आगम सम्मत नहीं हो सकता है । ०
छठेका उत्तर आगे दिया गया है।
आगे आपने लिखा है कि ‘निमित्तकी निमित्तता कार्यके समयमें मानी गयी है।’ इतना लिखनेके बाद आपने उपादानके कार्यरूप परिणत होते समय निमित्तमें होनेवाले व्यापारके विषयमें तीन आपत्तियाँ उपस्थित की हैं। वे निम्न प्रकार हैं.-
पहली आपत्ति आपने यह उपस्थित की है कि ‘उपादानके कार्यरूप परिणत होते समय निमित्तका व्यापार यदि उसकी अपनी परिणतिके लिये होता है तो फिर उसने उक्त उपादानकी कार्य परिणतिमें क्या किया ?’
दूसरी आपत्ति आपने यह उपस्थित की है कि ‘उपादानके कार्यरूप परिणत होते समय निमित्तका व्यापार यदि उपादानकी परिणतिके लिये होता है तो फिर उपादानमें उपादानके व्यापारकी तरह निमित्तका भी व्यापार दिखना चाहिये, साथ ही निमित्तका व्यापार निमित्तमें नहीं दिखना चाहिये।’
तीसरी आपत्ति आपने यह उपस्थित की है कि ‘उपादानकी कार्यरूप परिणति होते समय निमित्तका व्यापार यदि उसकी अपनी परिणति तथा उपादानकी परिणति दोनोंके लिये होता है तो फिर इस तरह निमित्तमें एक साथ दो तरहके व्यापार मानना अनिवार्य हो जायगा जो कि जिनागमके विरुद्ध है।’
इन आपत्तियोंका निराकरण आपने जो किया है वह निम्न प्रकार है :-
‘अतएव ऐसा मानना ही उचित है कि उपादानके कार्यके प्रति दूसरे एक या एकसे अधिक जिन द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें निमित्त-व्यवहार होता है वे सब कार्य तो अपना-अपना ही करते हैं। कोई किसी का कार्य नहीं करता, परन्तु उन सब द्रव्योंके उस उस कालमें उस उसरूप परिणमनकी द्रव्य-पर्यायात्मक उपादान योग्यता सहज ही होती है और उनका वैसा ही परिणमन भी होता है, मात्र इन दोनोंकी इस बाह्य व्याप्तिको देखकर ही उनमें निमित्तनैमित्तिकसम्बन्ध स्वीकार किया गया है ऐसा मानना आगमानुकूल है।’
इस विषयमें आगमकी दृष्टि यह है कि उपादानकी कार्यके साथ एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणता होती है अर्थात् उपादान ही कार्यरूप परिणत हुआ करता है। लेकिन जिसे लोकमें या आगममें निमित्त कहा गया है वह यद्यपि उस उपादानभूत अन्य वस्तुके कार्यरूप परिणत नहीं होता, फिर भी जब तक निमित्त अपना तदनुकूल व्यापार नहीं करता है तब तक उस उपादानकी वह विवक्षित कार्यरूप परिणति नहीं होती है ऐसा लोकमें देखा भी जाता है और आगममें प्रतिपादित भी किया गया है, अतः इस प्रकार अन्वयव्यतिरिकके आधार पर उस उपादानभूत वस्तुकी कार्यपरिणतिके साथ उस निमित्तभूत वस्तुकी कालप्रत्यासत्तिरूप कारणता सिद्ध हो जाती है। अर्थात् जिस क्षणमें निमित्तका उपादानभूत वस्तुकी कार्य-परिणतिके अनुकूल व्यापार होता है उस क्षणमें ही उपादान विवक्षित कार्यरूप परिणत होता है और उस निमित्तभूत वस्तुका उस उपादानभूत वस्तुके विवक्षित कार्यके अनुकूल जब तक व्यापार नहीं होता है या व्यापार बीच ही में रुक जाता है तो उसकी विवच्चित कार्यरूप परिणति या तो होती नहीं, अथवा या फिर बीचमें बन्द हो जाती है।
काल प्रत्यासत्तिका अर्थ यह है कि जिस कालमें निमित्त अपना व्यापार करता है उसी कालमें उपादान अपने कार्यरूप परिणत होता है और निमित्तकी उस कार्यके साथ अन्वय-व्यतिरेकव्याप्ति इस तरह सिद्ध होती है कि निमित्तका कार्योत्पत्तिके अनुकूल व्यापार होने पर ही कार्य होता है तथा निमित्तका कार्योत्पत्तिके अनुकूल व्यापार न होने पर कार्य नहीं होता है। इसी तरह निमित्तकी कार्योत्पत्तिके साथ बहिर्व्याप्ति पायी जाती है-इसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि निमित्तके कार्योत्पत्तिके अनुकूल व्यापार होने पर ही कार्योत्पत्ति होती है, परन्तु निमित्त स्वयं कार्यरूप परिणत नहीं होता है अथवा निमित्तके गुण-धर्म कार्यमें नहीं प्रविष्ट होते हैं।
इसमें संदेह नहीं कि निमित्तका कार्योत्पत्तिके अनुकूल जो भी व्यापार होता है उसके अतिरिक्त कोई अन्य व्यापार उसके साथ उस समय निमित्तका नहीं होता है अर्थात् एक समयमें एक ही व्यापार उसका होता है, परन्तु वही एक व्यापार स्वयं अपनेमें होनेवाले परिणमनका उपादान होता है और अन्य वस्तुके उसके साथ प्रतिनियत परिणमनमें वही निमित्त (सहायक) होता है। इस तरह निमित्तमें अपना और परका कार्य करनेके लिये दो व्यापार एक साथ होते हैं ऐसी मान्यता हमारी नहीं है। हमारी मान्यता तो यह है कि वही एक व्यापार अपने कार्यका उपादान होता है और परके कार्यका वही निमित्त होता है। इसी तरह कार्य एक होकर भी अपने उपादान कारणकी अपेक्षा उपादेय होता है और अपने निमित्त कारणकी अपेक्षा वही नैमित्तिक भी होता है। इस विवेचनसे यह बात स्पष्ट है कि आपने जो तीन आपत्तियाँ निमित्तोंको कार्यमें प्रयोजनभूत ( सार्थक या उपयोगी ) माननेमें उपस्थित की हैं वे नहीं आती हैं। जिनागममें यही तत्त्व प्रतिफलित किया गया है। हमारा विश्वास है कि आपका वह भय इस स्पष्टीकरणसे दूर हो जायगा जिसके कारण आप निमित्तोंको अकिंचित्कर माननेके लिये तैयार हुए हैं।
आपने लिखा है कि सब द्रव्योंके उस कालमें उस उस रूप परिणमनेकी द्रव्यपर्यायात्मक उपादान योग्यता सहज ही होती है आदि’
आपके ऐसा लिखनेसे ऐसा मालूम पड़ता है कि सभी प्रकारके निमित्तोंको आप एक ही आसन पर विठला देना चाहते है, लेकिन हम कहते हैं कि आप इस तरह प्रत्यक्ष, तर्क और आगमका अपलाप कर रहे हैं, क्योंकि आगममें प्रेरक और उदासीन दो प्रकारके निमित्त बतलाये गये हैं। जो वस्तुको उसकी अपनी कार्यपरिणतिमें प्रेरणा दें वे प्रेरक निमित्त कहलाते हैं। जैसे स्वर्णका आभूषण बननेमें स्वर्णकार और हथोड़ी आदि प्रेरक निमित्त कहे जाते हैं तथा जो वस्तुको उसकी अपनी कार्य परिणतिमें प्रेरणा न देते हुए भी निमित्त हों वे उदासीन निमित्त कहलाते हैं। जैसे आकाश, धर्म, अधर्म और काल ये तो सामान्य उदासीन निमित्त हैं तथा जल मछलीके लिए विशेष उदासीन निमित्त है, रेलकी पटरी रेलगाड़ीके लिए विशेष उदासीन निमित्त है, छाया पथिकके लिए विशेष उदासीन निमित्त है-आदि। रेलगाड़ीके गमनमें ऐंजन व ड्राइवर भी प्रेरक निमित्त ही होते हैं।
आगे आपने लिखा है-‘शब्द विवक्षित वाक्योंका रूप लेकर सीमित अर्थका ही प्रतिपादन करते हैं आदि।’ और फिर इसके अन्तमें आपने लिखा है कि ‘प्रकृतमें ३२१-३२२ गाथायें निश्चय नयकी मुख्यतासे लिखी गयी हैं। वह इसीसे स्पष्ट है कि उससे अगली गाथासे ‘एवं जो णिच्छयदो’ यह पाठ दिया गया है, हम इस गाथामें पठित ‘णिच्छयदो’ पदको गौण कर दें और उनका अपने विकल्पके अनुसार अर्थ करें यह उचित नहीं है।’
इसपर हमारा कहना यह है कि अर्थ करनेकी यह पद्धति है कि जहाँपर निश्चय नयकी मुख्यतासे कथन हो वहाँपर व्यवहार नयका कथन उसके प्रतिपक्षीपनेके रूपमें स्वीकार होता है। लेकिन आपके कथनानुसार यदि यह निश्चयनयका कथन है तो भी आपको इसका प्रतिपक्षी व्यवहार नयका कथन तो स्वीकार करना ही चाहिये, परन्तु जब आप व्यवहार नयके विषयको उपचरित, कल्पनारोपित, सद्भूत, मिथ्या आदि रूप मानते हैं तो फिर कैसे माना जाय कि आप व्यवहार नयके कथनको भी स्वीकार करते हैं।
हम कई जगह कह चुके हैं कि निश्चय और व्यवहार ये दोनों वस्तुमें विद्यमान सदात्मक अंश या धर्म ही हैं, उपचरित, कल्पित या असदात्मक नहीं हैं। इनमेंसे व्यवहार धर्मसापेक्ष निश्चय धर्मका प्रतिपादक शब्द और ज्ञापक ज्ञान निश्चय नय है और निश्चय धर्मसापेक्ष व्यवहार धर्मका प्रतिपादक शब्द और ज्ञापक ज्ञान व्यवहारनय है।
इस तरह आप वस्तुके वास्तविक वस्त्वंशरूप व्यवहाररूप धर्मको और उसके प्रतिपादक व ज्ञापक वास्तविक व्यवहार नयोंको स्वीकार तो कर लीजिए ताकि यह समझमें आ जाय कि आप निश्चय धर्म और निश्चय नयके साथ-साथ व्यवहार धर्म और व्यवहार नयको भी वास्तविक स्वीकार करते हैं। तभी तो निश्चय नयमें अंशरूप नयात्मकता और उसमें व्यवहारनय सापेक्षता सिद्ध होगी, अन्यथा उसमें नयात्मकता तो आनेसे रही और उसमें प्रमाणात्मकता इसलिए नहीं आ सकती है कि वस्तु निश्चय मात्र ही नहीं है, क्योंकि वह व्यवहारात्मक भी है, अतः आपकी मान्यता प्रमाणाभासमें ही गर्भित हो जायगी।
एक बात और है आप स्वामिकार्तिकेयानुपेक्षा की ३२१ व ३२२ वीं गाथाओंसे प्रतिपादित विषयको निश्चय नयका विषय मानते हैं, क्योंकि आप कहते हैं कि ३२३ वीं गाथामें ‘णिच्छयदो’ पदका पाठ है, लेकिन यह ख्याल कीजिए कि यह ‘णिच्छयदो’ पद निश्चय नयका वाचक नहीं है, किन्तु असंशयित भाव या आस्तिक्यभाव, अथवा ज्ञानकी निर्णयात्मक स्थितिका ही बोधक है। इस पर आपको विचार करना चाहिये।
आगे आपने अपने अभीष्ट अर्थको संपुष्ट करनेके लिये पद्म-पुराणका ‘यत्प्राप्तव्यं’ इत्यादि पद्य, पं० भैया भगवतीदासजीका ‘जो जो देखी वीतराग ने’ इत्यादि पद्य और स्वयंभूस्तोत्रका ‘अलंध्यशक्तिः’ इत्यादि पद्य इन सबका उद्धरण दिया है। चूँकि इनके विषयमें पहले हम विस्तारसे प्रकाश डाल चुके हैं, अतः यहाँ इनके विषयमें कुछ नहीं लिखा जा रहा है। इतना ध्यान अवश्य ही आपको दिला देना चाहते हैं कि ‘अलंध्यशक्तिः’ पदसे भवितव्यताको अटल शक्ति (जिसकी शक्तिको कभी टाला नहीं जा सकता है) मानकर आप उससे जो अपनी अभिलषित पुष्टि करना चाहते हैं वह इस तरह हो नहीं सकती है। कारण ‘अलंध्यशक्तिः’ पदका शक्तिको लाँघकर यानी शक्तिका अतिक्रमण करके-ऐसा अर्थ करके स्वामी समन्तभद्र उस पद्यसे इतना ही भाव प्रदर्शित करना चाहते हैं कि प्राणी अशक्त है, असमर्थ है, इसलिये वह कोई कार्य भवितव्यता (होनहार) की शक्तिका अतिक्रमण करके कदापि नहीं कर सकता है। ‘अलंध्यशक्तिः’ पदका अटलशक्ति अर्थ जैन संस्कृतिकी मान्यताके बिलकुल विपरीत है, इसलिये स्वामी समन्तभद्र जैसे तार्किक-शिरोमणि द्वारा जैन संस्कृतिके विरुद्ध भी कथन किया जा सकता है यह असंभव बात है।
आगे आपने लिखा है कि-पूर्वबद्ध आयुकर्ममें जितना स्थितिबन्ध होता है उसमें भोगकालमें उत्कर्षण तो संभव नहीं, निषेक स्थिति अपकर्षण हो सकता है। इस नियमको ध्यानमें रखकर जिन जीवोंमें यह निषेक स्थिति आकर्षण नहीं होता उन जीवोंका वह आयु कर्म इस नियमका अपवाद है-यह दिखलानेके लिये तत्त्वार्थसूत्रके अध्याय २. सूत्र ५३ में नियम वचन आया है। उस परसे बहुतसे बन्धु यह फलित करते हैं कि यह व्यवहार कथन न होकर निश्चय कथन हैं आदि ।’
आपके इस कथनसे हमें ऐसा मालूम पड़ता है कि आप कालमरण और जिसे अकलंक आदि आचार्यों के प्रमाणोंके आधारपर हम अकालमरण कहते हैं उसे भी निश्चय नयका विषय मानते हैं और इसके आधार पर आप हमारे ऊपर आक्षेप करते हैं कि ‘तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ सूत्र ५३ में जो नियम वचन आया है इस परसे बहुतसे बन्धु यह फलित करते हैं कि यह व्यवहार कथन न होकर निश्चय कथन है।’
वास्तवमें कालमरण और अकालमरणका जितना भी कथन आगममें पाया जाता हैं वह सब व्यवहार कथन ही है, क्योंकि निश्चय नयसे आत्मा अपने आपमें अमर ही है। हमें आश्चर्य होता है कि आप कालमरणको और अकालमरणको भी कालमरणकी ही संज्ञा देकर इसे भी निश्चय नयका ही विषय मानते हैं और फिर अपनी मान्यताकी पुष्टिके लिये यह कहते हैं कि तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ के ५३ वें सूत्रका कथन तथा अकलंकदेव आदि आचार्योंका इस विषयसम्बन्धी कथन व्यवहारनयका कथन है।
आपके इस विवेचनसे हम यह समझे हैं कि आप उसे निश्चयनयका कथन मानते है जिसका वाच्य या ज्ञेय सत्यार्थ हो और उसे व्यवहार नयका कथन मानते हैं जिसका वाच्य या ज्ञेय सत्यार्थ न हो। परन्तु निश्चय नय और व्यवहार नयकी ये परिभाषायें आगमकी परिभाषायें नहीं हैं। आगमकी परिभाषामें तो ये हैं कि जिस कथन या ज्ञानका विषय वस्तुका निश्चयांश या निश्चयरूप धर्म होता है वह तो निश्चय नय कहलाता है और जिस कथन या ज्ञानका विषय वस्तुका व्यवहारांश या व्यवहार रूप धर्म होता है वह व्यवहार नय कहलाता है।
तात्पर्य यह है और जैसा कि इस तत्त्वचर्चाके प्रसंगमें कई स्थानोंपर आपको देखनेके लिये मिलेगा कि प्रत्येक वस्तुमें परस्पर विरोधी दो अंश या धर्म-युगलके रूपमें अनन्त अंश या धर्मयुगल पाये जाते हैं। इनमेंसे प्रश्न नं० १७ के तृतीय दौरके हमारे प्रपत्रमें कतिपय वैसे अंश या धर्मयुगलोंका कथन आपको देखनेके लिये मिलेगा। प्रत्येक वस्तुके इन अंश या धर्म-युगलोंमेंसे प्रत्येक अंश या धर्म-युगलका एक भाग निश्चय रूप अंश या धर्मका है और दूसरा भाग व्यवहार रूप अंश या धर्मका है। इस तरह वस्तु परस्पर विरोधी दो अंशों या धर्मोंका समुदाय या आधार सिद्ध होती है। जैसे वस्तु सद्रूप है और असद्रूप भी है, वस्तु नित्यरूप है और अनित्यरूप भी है, वस्तु अभेदरूप है और भेदरूप भी है, वस्तु एकरूप है और अनेकरूप भी है, वस्तु तद्रूप है और अतद्रूप भी है, वस्तु द्रव्यरूप है और पर्यायरूप भी है, वस्तु गुणरूप है और पर्यायरूप भी है, वस्तु कार्यरूप है और कारणरूप भी है, वस्तु उपादानरूप है और निमित्तरूप भी है इत्यादि परस्परविरोधी वस्तुके दो अंश या धर्मोंको पकड़कर उनके युगल बनाते जाइये तथा इन अंश या धर्म-युगलोंमेंसे प्रत्येक अंश या धर्मयुगलके पूर्व पूर्वके भागको शब्दरूप निश्चय नयका प्रतिपाद्य और ज्ञानरूप निश्चय नयका ज्ञाप्य तथा उन्हीं अंश या धर्म-युगलोंमेंसे प्रत्येक अंश या धर्म-युगलके उत्तरके भागको शब्दरूप व्यवहार नयका प्रतिपाद्य औरज्ञानरूप व्यवहार नयका ज्ञाप्य समझते जाईये ।
इस विवेचनसे यह सिद्ध होता है कि निश्चय नयकी तरह व्यवहार नयका भी वाच्य या ज्ञेय वस्तुमें अपने अपने रूपमें विद्यमान अंश या धर्म ही होता है। ऐसी स्थितिमें यह कैसे कह सकते हैं कि निश्चय नय उसे कहते हैं जिसका वाच्य या ज्ञेय सत्यार्थ हो और व्यवहार नय उसे कहते हैं जिसका वाच्य या ज्ञेय सत्यार्थ न हो।
जहाँ तक हम आपकी दृष्टिको समझ सके हैं-यह है कि आपने जो निश्चय नय और व्यवहार नयकी परिभाषायें निश्चित की हैं उनके आधारपर ही आप व्यवहार नयको असत्यार्थ, असद्भुत, अवास्तविक, उपचरित, आरोपित, कल्पित, मिथ्या आदि रूप मान लेते हैं, क्योंकि आपकी दृष्टिसे व्यवहार नयका प्रतिपाद्य या ज्ञाप्य कोई विषय सत्यार्थ नहीं रहता है और इससे विपरीत निश्चय नयको सत्यार्थ, सद्भूत, वास्तविक, अनुपचरित, अनारोपित, अकल्पित, सत्य आदि रूप मान लेते हैं, क्योंकि आपकी दृष्टिसे निश्चय नयका प्रतिपाद्य या ज्ञाप्य विषय सत्यार्थ रहता है। परन्तु हम आपसे पूछ सकते हैं कि यदि द्रव्य वास्तविक है तो क्या पर्याय वास्तविक नहीं है। ध्रौव्य वास्तविक है तो क्या उत्पाद और व्यय वास्तविक नहीं हैं? गुण वास्तविक है तो क्या उसकी पर्याय वास्तविक नहीं है, नित्यता वास्तविक है तो क्या अनित्यता वास्तविक नहीं है, इत्यादि। तात्पर्य यह है कि ये सभी वास्तविक हैं, लेकिन एक निश्चयरूप है और दूसरा व्यवहार रूप। चूँकि दोनों ही अंश या धर्म एक ही वस्तुके अंश या धर्म जैन संस्कृतिमें माने गये हैं, इसलिये प्रत्येक वस्तुको वहाँ पर (जैन संस्कृतिमें) अनेकान्तात्मक माना गया है।
अब प्रश्न उठता है कि जब उक्त प्रकारके एक-एक अंश या धर्म युगलमें विद्यमान दोनों अंश या धर्म वास्तविक होते हुए परस्पर विरोधी हैं तो एक वस्तुमें उनका रहना कैसे संभव है? तो इसका उत्तर जैन संस्कृतिमें स्याद्वादके सिद्धान्तको अपनाकर दिया गया है अर्थात् प्रत्येक वस्तुमें परस्पर विरोधी दोनों वास्तविक अंशों या धर्मोंकी स्थितिकी भिन्न-भिन्न अपेक्षायें है। यानी यद्यपि दोनों धर्म परस्पर विरोधी हैं फिर भी इस आधारपर वे एक ही वस्तुमें एक साथ रहते हैं कि उनके रहनेमें अपेक्षा भेद पाया जाता है अर्थात् जिस अपेक्षासे वस्तु नित्य है उस अपेक्षासे वस्तु अनित्य नहीं है, किन्तु द्रव्यरूपमें वस्तु नित्य है तो पर्यायरूपमें वही वस्तु अनित्य है। अब यदि द्रव्य भी वास्तविक है और उसकी पर्याय भी वास्तविक है तो फिर वस्तुमें पायी जानेवाली नित्यताकी तरह उसमें पायी जानेवाली अनित्यता भी वास्तविक ही सिद्ध होती है-उपचरित, कल्पित, आरोपित, मिथ्या, असद्भूत आदि रूपमें उसे नहीं माना जा सकता है। इसी प्रकारकी व्यवस्था उपादान और निमित्त कारणोंके विषयमें भी जानना चाहिये अर्थात् उपादान कार्यका निश्चय कारण है याने कार्यका आश्रय वही है और निमित्त व्यवहार कारण है याने उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें उपादानका वह सहायकमात्र है, आश्रय कारण नहीं है। क्योंकि जब एक वस्तुके गुण-धर्म दूसरी वस्तुमें प्रविष्ट नहीं होते तो वह आश्रय कारण कैसे हो सकता है? लेकिन यदि निमित्त कार्यका आश्रय नहीं है तो इसका अर्थ यह भी नहीं कि वह कार्यमें उपादानका सहयोगी या सहायक भी नहीं है, क्योंकि कार्यरूप परिणतिमें उपादानको उसकी ( निमित्तकी ) सहायता तो अपेक्षित रहती ही है यह बात अनुभव सिद्ध है, प्रत्यक्ष सिद्ध है, अनुमान सिद्ध है और आगमप्रसिद्ध भी है। अब आप ही बतलाइये कि इस स्थितिमें निमित्तको अकिंचित्कर कैसे कहा जा सकता है? इस तरह वस्तु अपने कार्यकी उपादान होते हुए भी अन्य वस्तुके कार्यकी निमित भी अन्वयव्यतिरेकके आधारपर हुआ करती है; परन्तु यहाँ पर यह बात ध्यानमें रखनेकी है कि वह वस्तु अपने जिस व्यापारसे अपने कार्यकी उपादान है उसी व्यापारसे अन्य वस्तुके कार्यकी वह निमित्त ( सहायक ) है। इसलिये वस्तुमें द्विक्रियाओंके एक साथ रहनेकी जो आपत्ति दी जाती है वह नहीं जाती है।
हमारी आपसे प्रार्थना है कि उपर्युक्त तथ्यको पहिचानिये और अब आगमका सही अर्थ करने लग जाइये। इससे न केवल हमारा आपका विवाद समाप्त हो जायगा बल्कि हम और आप मिलकर भोले संसारी प्राणियोंको ऐसा प्रकाश-पुंज दे सकेंगे जिससे उनका कल्याणमार्ग प्रशस्त होगा।
आगे आपने लिखा है कि ‘यह तो आगमके अभ्यासी भलीभाँति जानते हैं कि मृत्युको प्राप्त हुआ जीव प्रथम, द्वितीय और तृतीय समयमें तथा अधिक-से-अधिक चौथे समयमें उत्तरभवको अवश्य धारण कर लेता है’ आदि ।
इस विषयमें हमारा कहना है कि आगमाभ्यासी व्यक्ति तो यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि बद्धायुष्क जीवका अकाल मरण नहीं होता, क्योंकि उसका आबाधा काल निश्चित हो चुका है ।
परभविआउए बद्धे पच्छा भुंजमाणाउस्स कदलीघादो णत्थि ।
-धवल पु० १० पृ० २३७
अर्थ-परभवसंबंधी आयुके बँधनेके पश्चात् भुज्यमान आयुका कदलीघात नहीं होता ।
तथा च जैसे नियत समयपर मरनेवाला. अवद्धायुष्क जीव मरणसे अन्तर्मुहूर्त पहले आगामी आयुका बन्ध करता है और तदनुसार वह १-२-३-४ समयमें आयुके उदयानुसार यथास्थानमें जन्म ग्रहण कर लेता है उसी प्रकार अकाल मरण यानी उदीरणा मरण करनेवाला जीव भी उदीरणाके पश्चात् मरनेसे अन्तर्मुहूर्त पहले आगामी आयुका बन्ध करके उसके अनुसार वह भी १-२-३-४ समयमें आयुके उदयानुसार यथास्थान जन्म ग्रहण किया करता है । यह आगमानुसार जमी हुई व्यवस्था है ।
आपने आगे इसमें लिखा है कि ‘अकालमरण स्वीकार करनेसे अकालजन्म भी स्वीकार करना होगा ।’ सो आपकी यह बात भी गलत है, कारण कि आगममें अकालमरण तो बतलाया गया है, परन्तु अकाल जन्मका विवेचन कहीं पर भी आगममें नहीं पाया जाता है । इसका कारण भी यह है कि भुज्यमान आयुकी उदीरणा हो सकती है, अतः आगममें अकाल मरणका कथन किया गया है, परन्तु बंध हुए बिना मरण होता नहीं और पूर्वबद्ध आयुके अनुसार ही जन्म होता है, अतः अकाल जन्मका प्रश्न ही पैदा नहीं होता और यही कारण है कि आगममें अकाल जन्मका कथन नहीं किया गया है ।
आगे यह भी आपने लिखा है कि ‘आनुपूर्वी कर्म, गति कर्म आदि तो जड़ हैं ये जानते नहीं कि ऐसी अनिश्चित अवस्थाके रहते हुए कहाँ इस जीवको ले जाया जाय ? आदि ।’
इसका उत्तर यह है कि काल मरण और अकाल मरणवाले जीवके आगामी आयुका उदय एक समान होता है तो जिस प्रकार काल मरण करनेवाले जीव आनुपूर्वी कर्म, गति कर्म आदि जड़ कर्मके सहारेसे यथास्थान पहुँच जाते हैं उसी प्रकारकी व्यवस्था अकाल मरण करनेवाले जीवोंके विषयमें भी जानना चाहिये । कृपया आगमका निम्न वचन देखिये-
अप्पा पंगुह अणुहरइ अप्पु ण जाइ ण एइ ।
भुवणत्तयहँ वि मज्झि जिय विहि आणइ विहि णेइ ॥१-६६॥
-परमात्मप्रकाश
अर्थ-यह आत्मा पंगु-के समान है, अपने आप न कहीं जाता है और न आता है । तीनों लोकमें इस जीवको कर्म ही ले आता है और कर्म ही ले जाता है ।
वास्तविक बात यह है कि अकालमरणके प्रकरणमें आपके प्रपत्रमें विचारणीय बातें निम्नलिखित हैं-
१-आप नियतिवादी हैं, इसलिये आपकी दृष्टिमें कालमरण और अकालमरणमें कोई अन्तर नहीं है अर्थात् अकालमरणका भी कालमरणके समान समय नियत है ।
२-यद्यपि आगममें अकालमरणका विवेचन पाया जाता है, परन्तु वह विवेचन व्यवहारनयसे ही किया गया है।
३-आपकी दृष्टिमें हम अकालमरणको निश्चय पक्ष स्वीकार करते हैं।
इन तीन बातोंमेंसे तीसरी बातके विषयमें तो हम पहले ही कह चुके हैं कि हम न तो कालमरणको निश्चय पक्ष मानते हैं और न अकालमरणको ही निश्चय पक्ष मानते हैं, किन्तु हमारी दृष्टिमें कालमरण और अकालमरण दोनों ही व्यवहार पक्ष हैं।
दूसरी बातके विषयमें हम इस ढंगसे विचार करेंगे कि आप भी अकालमरणको व्यवहार पक्ष स्वीकार करते हैं और हम भी अकालमरणको व्यवहार पक्ष मानते हैं तब हमारे आपके मध्य अन्तर किस बातका है ?
जहाँ तक हमने इस विषयके आपके अभिप्रायको समझनेका प्रयत्न किया है तो ऐसा मालूम पड़ता है कि आप व्यवहार नयके पक्षको असत्यार्थ मानते हैं जो कि उचित नहीं है, क्योंकि आगमकी दृष्टिमें व्यवहार पक्ष अपने ढंगसे उतना ही सत्यार्थ है जितना कि अपने ढंगसे निश्चय पक्ष सत्यार्थ है। आगमके निश्चय पक्ष और व्यवहार पक्षके सत्यार्थपनेकी स्वीकृतिरूप अभिप्रायको ध्यानमें रख कर ही हमने कालमरण और अकालमरण दोनोंको व्यवहार पक्ष स्वीकार किया है। आप स्पष्ट नहीं कर सके कि आप अकालमरणको भी कालमरण मान कर कालमरण और अकालमरण दोनोंको किस आधार पर निश्चय पक्ष मान लेते हैं। कारण कि आत्मा जब अमर है तो आत्माकी अमरता ही निश्चय पक्ष मानने योग्य है। इस तरह अकालमरणके समान कालमरणको भी व्यवहार पक्ष ही मानना चाहिये।
एक बात और विचारणीय है कि व्यवहार नयके प्रतिपाद्य विषयको आप अयथार्थ मानते हैं क्योंकि आपके मतसे व्यवहार नय वही है जिसका प्रतिपाद्य विषय सत्यार्थ नहीं होता-मिथ्या या कल्पित ही होता है तो इस विषयमें हमारा कहना यह है कि फिर आगममें व्यवहार नयके कथनकी आवश्यकता ही क्यों समझी गयी ? कारण कि जिसका प्रतिपाद्य विषय ही कल्पित हो वह नय कैसा ?
दूसरी भी बात यह विचारणीय है कि निश्चय नय भी तो कालमरणको व्यवहार रूपसे प्रतिपादित करता है। जिस प्रकार कि केवलज्ञान पदार्थोंको व्यवहाररूपसे जानता है अर्थात् जिस प्रकार केवलज्ञान द्वारा पदार्थोंको जानना व्यवहार है उसी प्रकार निश्चय नय द्वारा अकालमरणको प्रतिपादित करना भी तो व्यवहार ही माना जायगा। ऐसी स्थितिमें निश्चय नय और निश्चय नयका विषय ये दोनों भी अयथार्थ ही सिद्ध होंगे। इस तरह सम्पूर्ण तत्त्व ही अनिर्वचनीय हो जायगा और इसका अन्तिम परिणाम सर्वशून्यतापत्ति ही होगा, जिसे संभव है आप भी स्वीकार करनेके लिये तैयार नहीं होंगे । इसलिये जब निश्चय नयके विषयको आप सत्यार्थ मान लेते हैं तो फिर व्यवहार नयके विषयको भी आपके लिये सत्यार्थ ही मानना होगा। इस प्रकार व्यवहार नय अथवा व्यवहार नयके विषयको आपका मिथ्या या कल्पित आदि कहना असंगत ही है।
कुछ भी हो, हम तो आगमके प्रति श्रद्धावान् हैं, अतः इस प्रेरणासे अकालमरणके संबन्धमें निर्णयके लिये उपयोगी होनेके कारण तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ के सूत्र ५३ की तत्त्वार्थराजवार्तिक टीका और उसका श्री पं० पन्नालाल जी न्यायदिवाकर द्वारा किया गया हिन्दी अर्थ दोनों ही यहां दिये जा रहे हैं-
वार्तिक :-अप्राप्तकालस्य मरणानुपलब्धेरपवर्तनाभाव इति चेत्, न, दृष्टत्वादाम्रफलादिवत्।१०।
अर्थ :-प्रश्न-आयुबंधमें जितनी स्थिति पड़ी है ताका अंतिम समय आये विना मरणकी अनुपलब्धि है। जातें काल आये बिना तो मृत्यु होय नांही, तातें आयुके अपवर्तनका करना नांही सम्भवे है।
समाधान :-ऐसा कहना ठीक नाहीं है। जातें आम्रफलादिककी ज्यों अप्राप्त काल वस्तुका उदीरणा करि परिणमन देखिये हैं। जैसे आमका फल पालमें दियें शीघ्र पके है, तैसे कारणके वशतें जैसी स्थितिकों लिये आयु बांध्या था ताकी उदीरणा करि अपर्वतन होय पहिले ही मरण हो जाय है।
टीका-यथा अवधारितपाककालात् प्राक् सोपायोपक्रमे सत्याम्रफलादीनां दृष्टः पाकस्तथा परिच्छिन्नमरणकालात् प्रागुदीरणाप्रत्यय आयुषो भवत्यपवर्तः।
उत्तर-जैसे आम्रके पकनेका नियमरूप काल है, तातें पहले उपाय ज्ञानकरि क्रियाका आरंभ होते संते आम्रफलादिककें पकना देखिये, तैसें ही आयुबन्धके अनुसार नियमित मरणकालतें पहले उदीरणाके बलतें आयुकर्मका अपवर्तन कहिये घटना होय है ऐसा जानना।
वार्तिक-आयुर्वेदसामर्थ्याच्च ॥११॥
अर्थ-बहुरि आयुर्वेद कहिये अष्टांग चिकित्सा कहिये रोगके दूर करनेमें उपयोगी क्रिया ताका प्ररूपक वैथक शास्त्र ताकी सामर्थ्यतें अर्थात् कथनतें तथा अनुभवतें आयुका अपवर्तन सिद्ध होय है।
टीका-यथाष्टांगायुर्वेदविद् भिषक् प्रयोगे अतिनिपुणो यथाकालवाताद्युदयात् प्राक् वमनविरेचनादिना अनुदीर्णमेव श्लेष्मादि निराकरोति अकालमृत्युव्युदासार्थं रसायनं चोपदिशति, अन्यथा रसायनोपदेशस्य वैयर्थ्यम्। न चादोऽस्ति। अत आयुर्वेदसामर्थ्यादस्त्यकालमृत्युः।
अर्थः-जैसे अष्टांग आयुर्वेद कहिये वैद्यशास्त्र ताके जाननेमें चतुर वैद्य चिकित्सामें अतिनिपुण वायु आदि रोगका काल आये विना ही पहिले वमन विरेचन आदि प्रयोग करि, नहीं उदीरणाको प्राप्त भये जे श्लेष्मादिक, तिनका निराकरण करै है। बहुरि अकालमरणके अभावके अर्थ रसायनके सेवनका उपदेश करे है, प्रयोग करे है। ऐसा न होय तो वैद्यक शास्त्रके व्यर्थपना ठहरे। सो वैद्यकशास्त्र मिथ्या हैं नांही यातें वैद्यक शास्त्रके उपदेशकी सामर्थ्यतें अकालमृत्यु है ऐसा सिद्ध होय है।
वार्तिक-दुःखप्रतीकारार्थं इति चेत् न, उभयथा दर्शनात् ॥१२॥
अर्थ-प्रश्न-शिष्य बहुरि कहे है जो रोगतें दुःख होय ता दुःखके दूर करनेके अर्थ वैद्यक शास्त्रका प्रयोग है, अकाल मृत्युके अर्थ नांही।
सामाधान-ताकों कहिये ऐसा कहना भी ठीक नांही, जातें वैद्यकशास्त्रका प्रयोग दोऊ प्रकार कर देखिये है। तातें दुःख होय ताका भी प्रतीकार करैं हैं। बहुरि दुःख नांही होय, तहाँ अकालमरण न होनेके अर्थ भी प्रयोग करे हैं।
टीका-स्यान्मतम्-दुःखप्रतीकारोऽर्थ आयुर्वेदस्येति? तन्न, किं कारणम्? उभयथा दर्शनात्। उत्पन्नानुत्पन्नवेदनयोर्हि चिकित्सादर्शनात्।
अर्थ-प्रश्न-दुःखके दूर करनेके अर्थ वैद्यकका प्रयोग है?
समाधान-ताकों कहिये ऐसा नांही, क्योंकि जातें दोय प्रकार करि प्रयोग देखिये है। तहाँ वेदना जनित दुःख होय ताके दूर करने अर्थ भी चिकित्सा देखिये। अर वेदनाके अनुदयमें भी अकालमृत्युके दूर करने अर्थ चिकित्सा देखिये है। तातें अपमृत्यु सिद्ध होय है।
वार्तिक-कृतप्रणाशप्रसंग इति चेत्, न, दत्त्वैव फलं निवृत्तेः ॥१३॥
अर्थ-प्रश्न-बहुरि शिष्य कहे हैं जो आयु होते ही मरण होय तो तहां कर्मका फल दिये बिना ही नाशका प्रसंग आवे है। ऐसे, क्रिया जो कर्म ताका फल दिये बिना ही नाशका प्रसंग होय है। तहाँ कृतप्रणाश और अकृताम्यागम दोष आवे है ?
समाधान-ऐसा कहना भी ठीक नांही है; आयु कर्म भी जीवन्मात्र फल देकर ही उदीरणा करि निवृत्ति होय है।
टीका-स्यान्मतम्-यद्यकालमृत्युरस्ति कृतप्रणाशः प्रसज्येत इति, तन्न, किं कारणम्? दत्त्वैव फलं निवृत्तेः, नाकृतस्य कर्मणः फलमुपभुज्यते, न च कृतकर्मफलविनाशः, अनिर्मोक्षप्रसंगात्, दानादिक्रियारम्भाभावप्रसंगाच्च। किन्तु कृतं कर्मफलं दत्त्वैव निवर्तते विततार्द्रपटशोषवत् अयथाकालनिर्वृत्तः पाक इत्ययं विशेषः।
अर्थ-प्रश्न-शिष्य कहे हैं जो मरणका काल विना आये मृत्यु होय तो किये कर्मका फल दिये विना ही कर्मके नाशका प्रसंग प्राप्त होय है ?
समाधान-ऐसा कहना ठीक नांही है, जातें कर्म है सो फल देकरि के ही निर्जरे हैं। तातें बिना किये कर्मका तो फल नांही भोगवे है। यातें तो अकृताम्यागम दोष नांही होय है। बहुरि किये कर्मका फल दिये विना नाश नांही होय है। यातें कृतप्रणाश नामा दोष नांही आवे है। भावार्थ-यहाँ कोई कहे जो आयुकर्मकी उदीरणारूप क्षय है कारण जाको ऐसे अकालमरणको प्रतीकार कैसे संभवे? ताकों कहिये जो असाता वेदनीय कर्मके उदय करि उत्पन्न भया जो दुःख ताका प्रतीकार कैसे होय है। तहां असाता वेदनीय कर्मका उदयरूप अंतरंग कारण होते अर बाह्य वातादिक विकारके कारणतें प्रतिकूल वेदनारूप दुःख होय है ताके दूर करनेके अर्थ औषधादिकका प्रयोग कीजिये, तब दुःख मिट जाय है। तैसें ही आयु कर्मका उदय अंतरंगका कारण होतें, बाह्य जीवितव्यके कारण शुद्ध पथ्य आहारादिक तिनका विच्छेद होतें तथा दिनमें सोवना, विषयमें अधिक प्रवर्तना, मादक वस्तुका सेवन करना, प्रकृति विरुद्ध भोजनका करना, विशेष व्यायाम करना आदि कारणतें आयु की उदीरणा हो जाय, तब मरण हो जाय है। अर पथ्य आहारादिक बाह्य सामग्रीका अनुकूल मर्यादारूप संयोगकी प्राप्ति होते उदीरणा न होय है, जीवतव्य रहे है, तब अकालमरण न होय है ऐसा जाना। बहुरि अकृत कर्मके फलकों यह आत्मा भोगे तो या जीवके मोक्षके अभावका प्रसंग आवे। जातें बिना किये कर्मके फलका उपभोगपणां मोक्ष आत्माके ठहरे तहां मोंक्षका अभाव होय। बहुरि किये कर्म फल दिये बिना ही नाश होय तो दान, व्रत, संयम, पूजन, भजन, अध्ययन, आचरण आदि क्रियाका आरम्भ मिथ्या ठहरे। तातें क्रिया कर्म कर्ताके अर्थ फल जो है ताहि देकर ही निर्जरे है। जैसे जलकरि आला वस्त्र चौड़ा करि तापमें सुखावे तो शीघ्र सूखे, तैसें आयु कर्म निमित्तके बलतें उदीरणा होय निर्जर जाय। ऐसे फलका विशेष है ऐसा जाननां।
उपरोक्त आगम प्रमाणसे करतलरेखावत् यह स्पष्ट हो जाता है कि पर्यायोंका कोई नियत काल नहीं होता है। पर्यायोंका होना या न होना कारणों पर निर्भर करता है। जैसे यदि कुपथ्यादि या अतिविषय सेवन आदि कारण मिलते हैं तो आयुकी उदीरणा होकर अकालमरण हो जाता है। यदि उन कारणोंको हटा दिया जाय और पथ्य आदि कारण मिलाये जायें तो आयुकी उदीरणा तथा अकाल मरण रुक जाय है।