जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा, शंका-समाधान १ से १७ | Jaipur (Khaniya) Tattvacharcha

शंका ४, प्रथम दौर: शंका ४ और उसका समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १२९

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प्रथम दौर

: १ :

शंका ४

व्यवहार धर्म निश्चय धर्ममें साधक है या नहीं ?

समाधान

निश्चय रत्नत्रयस्वरूप निश्चय धर्मकी उत्पत्तिकी अपेक्षा यदि विचार किया जाता है तो व्यवहार धर्म निश्चय धर्ममें साधक नहीं है, क्योंकि निश्चय धर्मकी उत्पत्ति परनिरपेक्ष होती है। श्री नियमसारजी में कहा भी है-

तह दंसणउवओगो ससहावेदरवियप्पदो दुविहो।
केवलमिंदियरहियं असहायं तं सहावमिदि भणिदं ॥ १३ ॥
चक्खु अचक्खू ओही तिण्णि वि भणिदं विभावदिच्छि त्ति।
पज्जाओ दुवियप्पो सपरावेक्खो य णिरवेक्खो ॥ १४ ॥

अर्थ-उसी प्रकार दर्शनोपयोग स्वभाव और विभावके भेदसे दो प्रकारका है। जो केवल इन्द्रिय रहित और असहाय है वह स्वभाव दर्शनोपयोग कहा गया है। तथा चक्षु अचक्षु और अवधि ये तीनों विभाव दर्शन कहे गये हैं, क्योंकि पर्याय दो प्रकारकी है-स्वपरसापेक्ष और निरपेक्ष ॥ १३-१४।॥

तात्पर्य यह है कि सर्वत्र विभाव पर्याय स्वपरसापेक्ष होती है और स्वभाव पर्याय परनिरपेक्ष होती है।

पुद्गल द्रव्यकी अपेक्षा इसी बातको स्पष्ट करते हुए इसी नियमसारकी गाथा २८ में भी कहा है-

अण्णणिरावेक्खो जो परिणामो सो सहावपज्जावो।
खंधसरूवेण पुणो परिणामो सो विहावपज्जावो ॥ २८ ॥

अर्थ-अन्य निरपेक्ष जो परिणाम होता है वह स्वभावपर्याय है और स्कन्धरूप जो परिणाम होता है वह विभाव पर्याय है ॥ २८ ॥

यतः निश्चय रत्नत्रय स्वभाव पर्याय है, अतः उसकी उत्पत्तिका साधक व्यवहार धर्म नहीं हो सकता यह उक्त प्रमाणसे स्पष्ट है।

तथापि चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर सविकल्प दशामें व्यवहार धर्म निश्चय धर्मके साथ रहता है, इसलिये व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका सहचर होनेके कारण साधक ( निमित्त ) कहा जाता है।

शंका ४, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १३० से १३२

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका ४

व्यवहार धर्म निश्चय धर्मका साधक है या नहीं ?

प्रतिशंका २

इसका उत्तर आपने यह दिया है-‘निश्चय रत्नत्रयस्वरूप निश्चयधर्मकी उत्पत्तिकी अपेक्षा यदि विचार किया जाता है तो व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका साधक नहीं है, क्योंकि निश्चयधर्मकी उत्पत्ति पर निरपेक्ष होती है।’

आपके इस अभिप्रायकी सिद्धिके लिये नियमसारकी गाथा १३ और १४ का प्रमाण उपस्थित किया है, जिसके आधार पर आपने यह निष्कर्ष निकाला है कि चूँकि स्वभाव पर्याय परनिरपेक्ष है और इस तरह निश्चयधर्म जब पर निरपेक्ष सिद्ध होता है तो इसे व्यवहारधर्म सापेक्ष कैसे माना जा सकता है।

आपके उत्तरसे यह मालूम होता है कि सबसे बड़ी चिन्ता आपको यही है कि यदि निश्चयधर्मको व्यवहारधर्म सापेक्ष माना जाता है तो फिर निश्चयधर्मको आत्माकी विभाव पर्याय माननेका प्रसंग उपस्थित हो जायगा, परन्तु इस पर हमारा कहना यह है कि व्यवहारधर्म और निश्चयधर्म दोनों आत्माके ही धर्म हैं। निश्चयधर्ममें व्यवहारधर्मकी साध्यता मान लेने पर भी परनिरपेक्षताका सद्भाव बना रहनेसे ( निश्चय धर्मके समान व्यवहारधर्म भी पर नहीं है, इसलिये ) निश्चयधर्मको आत्माकी स्वभावपर्यायताका अभाव नहीं हो सकता।

आगममें व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका साधक बतलाया है। जिसके कुछ प्रमाण निम्नलिखित हैं-

निश्चय-व्यवहारयोः साध्य-साधनभावत्वात्सुवर्णसुवर्णपाषाणवत्।

अर्थ-निश्चय और व्यवहारमें परस्पर साध्य-साधनभाव है, जैसे सोना साध्य है और सुवर्णपाषाण साधन है। पंचास्तिकाय गा० १५६, श्री अमृतचन्द्रजीकृत टीका तथा परमात्मप्रकाश अ० २-१२ टीका।

भिन्नविषयश्रद्धान-ज्ञान-चारित्रैरधिरोप्यमाणसंस्कारस्य भिन्नसाध्य-साधनभावस्य रजकशिला-तलस्फाल्यमानविमलसलिलाप्लुतविहितोषपरिष्वङ्गमलिनवासस इव मनाङ्मनाग्विशुद्धिमधिगम्य निश्चय-नयस्य भिन्नसाध्य-साधनभावाभावाद्दर्शन-ज्ञान-चारित्रसमाहितस्वरूपे विश्रान्तसकलक्रियाकाण्डाडम्बर-निस्तरंगपरमचैतन्यशालिनि निर्भरानन्दमालिनि भगवत्यात्मनि विश्रान्तिमासूत्रयन्तः।
-पंचास्तिकाय गा० १७२ अमृतचन्द्रसूरिकृत टीका

अर्थ-जीव पहले भिन्नस्वरूप श्रद्धान-ज्ञान-चारित्ररूप व्यवहाररत्नत्रयसे शुद्धता करते हैं-जैसे मलीन वस्त्रको धोबी भिन्न साध्य-साधनभावकर शिलाके ऊपर साबुन आदि सामग्रियोंसे उज्ज्वल करता है, तैसे ही जीव व्यवहार नयका अवलम्बन पाय भिन्न साध्यसाधन भावके द्वारा क्रमसे विशुद्धताको प्राप्त होता है। तदनन्तर निश्चय नयकी मुख्यतासे भिन्न साध्य-साधनभावका अभाव होनेसे दर्शन-ज्ञान-चारित्र स्वरूप विषैं सावधान होकर अन्तरंग गुप्त अवस्थाको धारण करता है।

श्री जयसेनजीने भी पंचास्तिकाय गा० १०५ की टीकामें लिखा है-

निश्चयमोक्षमार्गस्य परम्परया कारणभूतं व्यवहारमोक्षमार्गः ।

अर्थ-व्यवहार मोक्षमार्ग परम्परा करके निश्चय मोक्षमार्गका कारणभूत है।

इसी ग्रन्थकी गाथा १६० तथा १६१ के शीर्षकमें सूरिजीने निम्नप्रकार दिये हैं-

निश्चयमोक्षमार्गसाधनभावेन व्यवहारमोक्षमार्गनिर्देशोऽयम् । तथा व्यवहारमोक्षमार्गसाध्यभावेन निश्चयमोक्षमार्गोपन्यासोऽयम् ।

अर्थ-निश्चय मोक्षमार्गका साधनरूप व्यवहार मोक्षमार्ग तथा व्यवहार मोक्षमार्गसे साध्यरूप निश्चय मोक्षमार्ग ।

इसी प्रकार इन्हीं गाथाओंकी टीकामें श्री जयसेनजीने भी स्पष्टरूपसे व्यवहार मोक्षमार्गको निश्चयका साधक बतलाया है ।

निश्चय मोक्षमार्गसाधकव्यवहारमोक्षमार्गकथनरूपेण ।-पृष्ठ २६२

श्री प्रवचनसार गा० २०२ की टीकामें सूरिजीने व्यवहार ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचारके विषयमें स्पष्ट कहा है कि इनके प्रसादसे जीव शुद्धात्मस्थितिको प्राप्त होता है ।

श्री परमात्मप्रकाशजी श्लोक ७ की टीकामें भी व्यवहार पंचाचारको निश्चय पंचाचारका साधक बतलाया है ।

अध्याय २ श्लोक की टीका में भी व्यवहार रत्नत्रयको निश्चयरत्नत्रयका साधक बतलाया है-

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूपनिश्चयरत्नत्रयलक्षणनिश्चयमोक्षमार्गसाधकं व्यवहारमोक्षमार्गं जानीहि ।

श्रीद्रव्यसंग्रहजीकी टीकाके प्रमाण निम्न प्रकार हैं-

निश्चयरत्नत्रयं तत्साधकं व्यवहाररत्नत्रयरूपं । -पृ० ८१

निश्चयरत्नत्रयपरिणतं स्वशुद्धात्मद्रव्यं तद्बहिरंगसहकारिकारणभूतं पंचपरमेष्ठ्याराधनञ्च शरणम् ।’ -पृ० १०२

अर्हत्सर्वज्ञप्रणीतनिश्चय-व्यवहारनयसाध्य-साधकभावेन मन्यते…सम्यग्दृष्टेर्लक्षणम् । -पृ० २३

अत्र व्यवहारसम्यक्त्वमध्ये निश्चयसम्यक्त्वं किमर्थं व्याख्यातमिति चेत् ? व्यवहारसम्यक्त्वेन निश्चयसम्यक्त्वं साध्यत इति साध्य-साधकभावज्ञापनार्थमिति । -पृ० १७६

निश्चयध्यानस्य परम्परया कारणभूतं यच्छुभोपयोगलक्षणं व्यवहारध्यानम् । -पृ० २०४

निश्चयरत्नत्रयात्मकनिश्चयध्यानस्य परम्परया कारणभूतं बाह्याभ्यन्तरमोक्षमार्गसाधकं परमसाधुभक्तिरूपं । -पृ० २१५

द्वादशविधं तपः । तेनैव साध्यं शुद्धात्मस्वरूपे प्रतपनं विजयनं निश्चयतपश्च । -पृ० २२३

आपने अपने उत्तरके अन्तमें जो यह लिखा है कि ‘चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर सविकल्प दशामें व्यवहार धर्म निश्चयधर्मके साथ रहता है, इसलिए व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका सहचर होनेके कारण साधक कहा गया है ।’ इसके विषयमें हमारा आपसे यह निवेदन है कि व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका सहचर होनेके कारण साधक किस उद्देश्यसे माना जाता है ? कृपया इसका स्पष्टीकरण कीजिये । पदार्थोंमें सहचरभाव तो बहुतसे विद्यमान रहते हैं फिर भी उनमें एकका दूसरेके साथ साध्य-साधकभाव माना जाना अनिवार्य नहीं होता है। दूसरी बात यह है कि जिस तरह आप सहचर होनेके कारण व्यवहार धर्मको निश्चयधर्मका साधक कहते हैं उसी तरह सहचर रहनेवाले निश्चयधर्मको क्या आप व्यवहारधर्मका साधक मानते हैं ?

उपरोक्त प्रमाणोंके आधारपर यह सिद्ध होता है कि आगममें व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका साधक सहचर होनेके कारण नहीं माना गया है। यदि माना गया हो तो कृपया आप स्पष्ट कीजिये।

शंका ४, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १३२ से १३३

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शंका ४

व्यवहारधर्म निश्चयधर्ममें साधक है, या नहीं ?

प्रतिशंका ३ का समाधान

शंका ४ में व्यवहारधर्म निश्यधर्मका साधक है या नहीं ? यह पृच्छा की गई थी। इसके उत्तर स्वरूप बतलाया गया था कि उत्पत्तिकी अपेक्षा तो व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका साधक नहीं हैं, क्योंकि निश्चयधर्मकी सर्वदा सर्वत्र एकमात्र स्वभावके आश्रयसे ही उत्पत्ति होती है। नयचक्रमें कहा भी है-

ववहारदो बंधो मोक्खो जम्हा सहावसंजुत्तो।
तम्हा कुरु तं गउणं सहावमाराहणाकाले ॥७७॥

अर्थ-यतः व्यवहारसे बन्ध होता है और स्वभावका आश्रय लेनेसे मोक्ष होता है, इसलिए स्वभावकी आराधनाके कालमें अर्थात् मोक्षमार्गमें व्यवहारको गौण करो ॥७७॥

इस सम्बन्धी प्रतिशंकामें प्रवचनसार, पञ्चास्तिकाय, परमात्मप्रकाश और द्रव्यसंग्रहके विविध प्रमाण उपस्थितकर जो यह सिद्ध किया गया है कि व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका साधक है सो वह कथन असद्भूत व्यवहारकी अपेक्षासे ही किया गया है। यही कारण है कि श्रीजयसेनाचार्यने पञ्चास्तिकाय गाथा १०५ की टीकामें और द्रव्यसंग्रह पृ० २०४ में व्यवहार रत्नत्रयको परंपरासे निश्चयरत्नत्रयका साधक कहा है। श्री पण्डितप्रवर टोडरमलजी सा० ने मोक्षमार्गप्रकाशकमें इस विषयको स्पष्ट करते हुए लिखा है-

सम्यग्दृष्टिकै शुभोपयोग भए निकट शुद्धोपयोग प्राप्ति होय ऐसा मुख्यपना करि कहीं शुभोपयोगकौं शुद्धोपयोगका कारण भी कहिए है । पृ० ३७७ दिल्ली संस्करण

श्री पंचास्तिकाय गाथा १०५ की जयसेनाचार्यकृत टीकामें और बृहद्द्रव्यसंग्रह टीका पृ० २०४ में जो व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका परम्परासे साधक कहा है सो वह इसी अभिप्रायसे कहा है। वस्तुतः मोक्षमार्ग एक ही है। उसका निरूपण दो प्रकारका है। इसलिए जहाँ निश्चय मोक्षमार्ग होता है वहाँ उसके साथ होनेवाले व्यवहारधर्मरूप रागपरिणामको व्यवहार मोक्षमार्ग आगममें कहा है और यतः वह सहचर होनेसे निश्चय मोक्षमार्गके अनुकूल है, इसलिए उपचारसे निश्चय मोक्षमार्गका साधक भी कहा है । श्रीपंडितप्रवर टोडरमलजीने खुलासा करते हुए लिखा है-

जहां सांचा मोक्षमार्गकौ मोक्षमार्ग निरूपण सो निश्चय मोक्षमार्ग है और जहाँ जो मोक्षमार्ग तो
है नाहीं, परन्तु मोक्षमार्गका निमित्त है वा सहचारी है ताकौ उपचार करि मोक्षमार्ग कहिए सो व्यवहार मोक्षमार्ग है । जातैं निश्चय व्यवहारका सर्वत्र ऐसा ही लक्षण है। सांचा निरूपण सो निश्चय, उपचार निरूपण सो व्यवहार, तातैं निरूपण अपेक्षा दोय प्रकार मोक्षमार्ग जानना। एक निश्चय मोक्षमार्ग है, एक व्यवहार मोक्षमार्ग है ऐसे दोय मोक्षमार्ग मानना मिथ्या है। बहुरि निश्चय व्यवहार दोऊनिकूं उपादेय मानैं है सो भी भ्रम है । जातैं निश्चय-व्यवहारका स्वरूप तौ परस्पर विरोध लिए है।
-मोक्षमार्गप्रकाशक पृ० ३६५-३६६ देहली संस्करण

तात्पर्य यह है कि निश्चय धर्म और व्यवहार धर्म दोनों ही आत्माके धर्म अर्थात् पर्यायांश हैं । किन्तु निश्चयधर्म आत्माका स्वाश्रित पर्यायांश है और व्यवहार धर्म आत्माका पराश्रित पर्यायांश है। प्राथमिक भूमिकामें ये दोनों मिश्ररूप होते हैं। ऐसी अवस्थामें निश्चयधर्मकी उत्पत्ति व्यवहार धर्मके द्वारा मानने पर आत्माको स्वभाव सन्मुख होनेका प्रसंग ही नहीं आ सकता। अतएव इस सम्बन्धमें जो पूर्वमें स्पष्टीकरण किया है वैसा श्रद्धान और ज्ञान करना ही शास्त्रानुकूल है।

श्री प्रवचनसारमें इन दोनोंमें महान् भेद है इस तथ्यका बहुत सारगर्भित शब्दों द्वारा स्पष्टीकरण किया गया है। उसे अपनी सूक्ष्मेक्षणिकासे ध्यानमें लेनेपर व्यवहार धर्मको निश्चय धर्मका जो साधक कहा है वह कथन उपचरितमात्र है यह तथ्य अच्छी तरहसे स्पष्ट हो जाता है। वहाँ कहा है-

संपद्यते हि दर्शनज्ञानप्रधानाच्चारित्राद्वीतरागान्मोक्षः। तत एव च सरागाद्देवासुरमनुजराजविभव- क्लेशरूपो बन्धः । अतो मुमुक्षुणेष्टफलत्वाद्वीतरागचारित्रमुपादेयमनिष्टफलत्वात्सरागचारित्रं हेयम् ॥ ६ ॥

अर्थ-दर्शन-ज्ञानप्रधान चारित्रसे, यदि वह (चारित्र) वीतराग हो तो मोक्ष प्राप्त होता है, और उससे ही, यदि वह सराग हो तो देवेन्द्र-असुरेन्द्र-नरेन्द्रके वैभवक्लेशरूप बन्धकी प्राप्ति होती है । इसलिये मुमुक्षुओंको इष्टफलवाला होनेसे वीतराग चारित्र ग्रहण करने योग्य (उपादेय) है, और अनिष्ट फलवाला होनेसे सराग चारित्र त्यागने योग्य (हेय) है ॥ ६ ॥

शंका ४, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १३३ से १४४

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका ४

हमारा प्रश्न था-

व्यवहार धर्म निश्चय धर्मका साधक है या नहीं?

प्रतिशंका ३

इस प्रश्नके उत्तरमें आपके पत्रकमें मूल प्रश्नको न छूते हुए स्वभाव और विभाव दर्शनोपयोगपर तथा पुद्गल द्रव्यकी स्वभाव विभाव पर्यायपर प्रकाश डालकर नियमसारकी तीन गाथाएँ उद्धत की गई थीं, परन्तु उन प्रमाणोंका मूल विषयसे कुछ सम्बन्ध नहीं है।

आपके उस पत्रकपर हमने प्रवचनसार, पञ्चास्तिकाय, परमात्मप्रकाश और द्रव्यसंग्रह ग्रन्थोंके अनेक प्रमाण देकर यह सिद्ध किया था कि व्यवहारधर्म ( व्यवहार रत्नत्रय ) साधन है और निश्चयधर्म ( निश्चय रत्नत्रय ) साध्य है । परम प्रमाणभूत, मूलसंघके प्रतिष्ठापक श्रीकुन्दकुन्दाचार्य तथा अन्य आध्यात्मिक प्रामाणिक आचार्योंके आर्ष प्रमाण देखकर जिनवाणीका श्रद्धालु तत्त्ववेत्ता नतमस्तक होकर उन्हें स्वीकार कर लेता है, ऐसी ही आशा आपसे भी थी; किन्तु आपने उन प्रमाणोंको स्वीकार नहीं किया और असद्भूत व्यवहारनयकी आड़ लेकर उन्हें टाल दिया है जब कि उक्त कथन असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षासे नहीं है और न उसकी अपेक्षासे हो ही सकता है । इसके लिये आलापपद्धतिके अन्तमें दिया हुआ अध्यात्म नयोंका प्रकरण द्रष्टव्य है । वहाँ सद्भूत तथा असद्भूत व्यवहारनयका निम्न प्रकार लक्षण दिया है-

व्यवहारो भेदविषयः, एकवस्तुविषयः सद्भूतव्यवहारः, भिन्नवस्तुविषयोऽसद्भूतव्यवहारः ।

अर्थ-व्यवहारनय भेद विषयवाला है । एक ही वस्तु जिसका विषय है वह सद्भूतव्यवहारनय है और भिन्न वस्तु जिसका विषय है वह असद्भूतव्यवहारनय है ।

इस विवेचनसे आत्माका व्यवहार रत्नत्रय है यह सद्भूतव्यवहारनयका विषय ठहरता है । अपनी पक्षपुष्टिके लिये आपने कोई भी ऐसा आगम प्रमाण उपस्थित नहीं किया जो व्यवहार धर्मको निश्चयधर्मका साधन न मानता हो ।

हमारे प्रश्न १२ के उत्तरमें आपने स्पष्टरूपसे स्वीकार कर लिया है कि ‘कुगुरु कुधर्म कुशास्त्रकी श्रद्धा गृहीत मिथ्यात्व है तथा सुदेव सुशास्त्र सुगुरुकी श्रद्धा सम्यग्दर्शन है।’ इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए श्री नियमसारमें निम्न गाथा दी है-

अत्तागमतच्चाणं सद्दहणादो हवेइ सम्मत्तं ॥५॥

अर्थ-आप्त, आगम और तत्त्वोंकी श्रद्धासे सम्यक्त्व होता है ।

उसकी टीकामें स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है-

व्यवहारसम्यक्त्वाख्यानमेतत् ।

यह व्यवहार सम्यक्त्वके स्वरूपका कथन है ।

‘सम्यग्दृष्टिके ऐसी श्रद्धा अवश्य होती है और वह ऐसे कथनको शास्त्रोक्त मानता है’ आपका यह उत्तर ठीक है, अतः हमने इसे स्वीकार कर लिया है । परन्तु आपने हमारे चौथे प्रश्नके उत्तरमें जो लिखा है वह आपके इस उक्त १२ वें प्रश्नके उत्तरसे विरुद्ध है ।

आपने इस चौथे प्रश्नके उत्तरमें लिखा है कि ‘व्यवहार धर्मरूप रागपरिणामको व्यवहार मोक्षमार्ग आगममें कहा है’ तथा यह भी कहा है कि ‘वह ( रागपरिणाम ) सहचर होनेसे निश्चय मोक्षमार्गके अनुकूल है ।’ आपका राग परिणामको निश्चय मोक्षमार्गके अनुकूल लिखना उचित नहीं है । राग परिणाम तो निश्चय मोक्षमार्गके अनुकूल नहीं हो सकता । अतः आपका यह लिखना आगम सम्मत नहीं है, क्योंकि किसी भी आगम ग्रन्थमें मात्र राग परिणामको व्यवहार मोक्षमार्ग नहीं कहा है । यद्यपि व्यवहार मोक्षमार्ग अर्थात् व्यवहार रत्नत्रयके साथ प्रशस्त रागभाव रहता है, परन्तु मोक्षमार्ग मात्र रागभावको नहीं बतलाया गया है । सर्वत्र सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रको रत्नत्रय या मोक्षमार्ग कहा है । जैसा कि निम्न प्रमाणोंसे स्पष्ट सिद्ध होता है-

नियमसारकी उल्लिखित ५ वीं गाथामें व्यवहार सम्यक्त्वका लक्षण आप्त, आगम और तत्त्वकी श्रद्धा बतलाया है, रागको नहीं।

श्रीपञ्चास्तिकायमें गाथा १०६ के पश्चात् श्रीजयसेनाचार्यकृत टीकामें भी एक गाथा आई है, जो इस प्रकार है-

एवं जिणपण्णत्ते सद्दहमाणस्स भावदो भावे।
पुरिसस्साभिणिबोधे दंसणसद्दो हवदि जुत्ते ॥

अर्थ-इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान् द्वारा प्रणीत पदार्थोंमें रुचिरूप श्रद्धान करते हुए पुरुषको जो मति श्रुत ज्ञान होते हैं उनसे युक्त जीव सम्यग्दृष्टि होता है।

श्रीजयसेनाचार्य इसकी टीकामें लिखते हैं-

अत्र सूत्रे यद्यपि क्वापि निर्विकल्पसमाधिकाले निर्विकारशुद्धात्मरुचिरूपं निश्चयसम्यक्त्वं स्पृशति तथापि प्रचुरेण बहिरंगपदार्थरुचिरूपं यद् व्यवहारसम्यक्त्वं तस्यैव तत्र मुख्यता।

अर्थ-इस आगम वाक्यमें यद्यपि कभी निर्विकल्प समाधिकालमें निर्विकार शुद्धात्मरुचिरूप निश्चय सम्यक्त्वका स्पर्श होता है तो भी अधिकतासे बहिरंग पदार्थ रुचिरूप जो व्यवहार सम्यक्त्व रहता है उसीकी यहाँ पर मुख्यता है।

रुचि, प्रतीति, श्रद्धा एक पर्यायवाची शब्द हैं।

इसी ग्रन्थमें व्यवहार मोक्षमार्गका स्वरूप निम्न प्रकार बतलाया है-

धम्मादीसद्दहणं सम्मत्तं णाणमंगपुव्वगदं।
चिट्ठा तवम्हि चरिया ववहारो मोक्खमग्गो त्ति ॥१६०॥

अर्थ-धर्मादि द्रव्योंके श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन, अंग-पूर्वगत ज्ञान और तपश्चरणरूप चारित्र यह व्यवहार मोक्षमार्ग है।

इस गाथाका शीर्षक वाक्य श्री अमृतचन्द्र सूरिने निम्न प्रकार दिया है-

निश्चयमोक्षमार्गसाधनभावेन पूर्वोद्दिष्टव्यवहारमोक्षमार्गनिर्देशोऽयम् ।

अर्थ-आगे निश्चय मोक्षमार्गके साधनरूपसे पहले कहे गये व्यवहार मोक्षमार्गका निर्देश है।

श्री अमृतचन्द्रसूरिने टीकामें इसीका विस्तारसे कथन किया है तथा व्यवहार मोक्षमार्गका साधकभाव और निश्चय मोक्षमार्गका साध्यभाव सिद्ध किया है।

द्रव्यसंग्रहकी १३वीं गाथाकी टीकामें भी स्पष्ट लिखा है-

अर्हत्सर्वज्ञप्रणीतनिश्चय-व्यवहारनयसाध्य-साधकभावेन मन्यते… सम्यग्दृष्टिलक्षणम् ।

अर्थ-श्री अर्हन्त सर्वज्ञ भगवान्के द्वारा कहे हुए निश्चय-व्यवहारनयको जो साध्यसाधक भावसे मानता है वह सम्यग्दृष्टिका लक्षण है।

इसका स्पष्ट आशय यह हुआ कि जो निश्चयनयको साध्य और व्यवहार नयको साधकभावसे नहीं मानता है वह सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता है।

परमात्मप्रकाशके दूसरे अध्यायकी १४ वीं गाथा की टीका देखिये-

वीतरागसर्वज्ञप्रणीतषड्द्रव्यादिसम्यक्श्रद्धानज्ञानव्रताद्यनुष्ठानरूपो व्यवहारमोक्षमार्गः।

अर्थ-वीतराग सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित छह द्रव्यादिका सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान तथा व्रतादिका अनुष्ठान-रूप व्यवहार मोक्षमार्ग है।

श्री नियमसारमें पूर्वोक्त ५ वीं गाथाके अतिरिक्त ५१ से ५५ तक पांच गाथाओंमें भी रत्नत्रयका विस्तृत स्वरूप कथन है-

विवरीयाभिणिवेसविवज्जियसद्दहणमेव सम्मत्तं ।
संसयविमोहविब्भमविवज्जियं होदि सण्णाणं ॥ ५१ ॥
चल-मलिनमगाढत्तविवज्जियसद्दहणमेव सम्मत्तं ।
अधिगमभावे णाणं हेयोपादेयतच्चाणं ॥ ५२ ॥
सम्मत्तस्स णिमित्तं जिणसुत्तं तस्स जाणया पुरिसा ।
अंतरहोऊ भणिदा दंसणमोहस्स खयपहुदी ॥ ५३ ॥
सम्मत्तं सण्णाणं विज्जदि मोक्खस्स होदि सुण चरणं ।
ववहार-णिच्छएण दु तम्हा चरणं पवक्खामि ॥ ५४ ॥
ववहारणयचरित्ते ववहारणयस्स होदि तवचरणम् ।
णिच्छयणयचारित्ते तवयरणं होदि णिच्छयदो ॥ ५५ ॥

अर्थ-विपरीताभिनिवेश रहित श्रद्धान ही सम्यक्त्व है, संशय-विमोह-विभ्रम रहित सम्यग्ज्ञान होता है ॥ ५१ ॥ चल-मलिन-अगाढ़ रहित श्रद्धान ही सम्यक्त्व होता है। हेय उपादेय तत्त्वोंका ज्ञान सम्यग्ज्ञान है ॥ ५२ ॥ जिनसूत्र तथा उनका ज्ञायक पुरुष सम्यक्त्वका वहिरंग निमित्त है, और दर्शनमोहके क्षयादिक अन्तरंग हेतु कहे गये हैं ॥ ५३ ॥ हे भव्य जीव ! सुन, मोक्षके लिये सम्यक्त्व, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र होते हैं, इसलिये व्यवहार तथा निश्चय चारित्रका कथन करता हूँ ॥ ५४ ॥ व्यवहार नयके चारित्रमें व्यवहार नयका तपश्चरण होता है और निश्चय नयके चारित्रमें निश्चय नयका तपश्चरण होता है ॥ ५५ ॥

इन गाथाओंके टीकाकारने निम्नलिखित टीका द्वारा गाथार्थका विस्तार करते हुए स्पष्ट किया है कि ५५वीं गाथाके उत्तरार्धके अतिरिक्त शेष सब व्यवहार रत्नत्रयके स्वरूपका कथन है। टीका देखिये-

भेदोपचाररत्नत्रयमपि तावद् विपरीताभिनिवेशविवर्जितश्रद्धानरूपं भगवतां सिद्धिपरम्पराहेतुभूतानां पञ्चपरमेष्ठिनां चलमलिनागाढवर्जितसमयजनितनिश्चलभक्तियुक्तत्वमेव । विपरीते हरिहरहिरण्यगर्भादिप्रणीते पदार्थसार्थे ह्यभिनिवेशाभाव इत्यर्थः। संज्ञानमपि च संशयविमोहविभ्रमविवर्जितमेव । तत्र संशयस्तावत् जिनो वा शिवो वा देव इति । विमोहः शाक्यादिप्रोक्ते वस्तुनि निश्चयः। विभ्रमो ह्यज्ञानमेव । पापक्रियानिवृत्तिपरिणामश्चारित्रम् । इति भेदोपचाररत्नत्रयपरिणतिः । तत्र जिनप्रणीतहेयोपादेयतत्त्वपरिच्छित्तिरेव सम्यग्ज्ञानम् ।

अर्थ-भेदोपचार रत्नत्रय भी विपरीताभिनिवेश रहित श्रद्धान, आत्मसिद्धिके परम्परा कारणभूत पञ्च परमेष्ठी भगवान्की चल, मलिन एवं अगाढ़ रहित निश्चल भक्ति ही है, जो कि हरि हर ब्रह्मादिप्रणीत विपरीत पदार्थसमूहमें अभिनिवेशका अभावरूप है और सम्यग्ज्ञान भी संशय विमोह विभ्रमसे रहित ही है। इनमें संशयका रूप यह है कि ‘जिन’ देव हैं ? या ‘शिव’ देव हैं ? शाक्यादि-बौद्धादि द्वारा कही हुई वस्तुओंमें निश्चय होना विमोह है। विभ्रम अज्ञानता ही है और पापक्रियासे निवृत्तिरूप परिणाम चारित्र है। ये भेदोपचार रत्नत्रयकी परिणति है। इनमें जिन प्रणीत हेयोपादेय तत्त्वका ज्ञान ही सम्यग्ज्ञान है।

आगे चलकर इसी ग्रन्थके चौथे अध्यायमें व्यवहारचारित्रका कथन है, जिसमें पाँच पापोंसे निवृत्ति अर्थात् पञ्च व्रत, पाँच समिति तथा तीन गुप्तिको व्यवहार चारित्र कहा है । इस अध्यायकी अन्तिम गाथा ७६ द्वारा यह स्पष्ट किया है कि इस अध्यायमें व्यवहार चारित्रका कथन किया है । पञ्च पापोंके त्यागका नाम व्रत वतलाया है, क्रिया करते समय प्रमाद असावधानीका त्याग समिति है और मन वचन कायकी क्रियाका निरोध करना गुप्ति है ।

श्री कुन्दकुन्दाचार्य दर्शनपाहुडमें लिखते हैं-

छह दव्व णव पयत्था पंचत्थी सत्त तच्च णिद्दिट्ठा ।
सद्दहइ ताण रूपं सो सद्दिट्ठी मुणेयव्वो ॥ १९ ॥

अर्थ-जिनेन्द्र द्वारा निर्दिष्ट छह द्रव्य, नव पदार्थ पाँच अस्तिकाय तथा सप्त तत्त्वोंके स्वरूपका जो श्रद्धान करता है उसे सम्यग्दृष्टि जानना चाहिये ॥ १९ ॥

श्री समन्तभद्राचार्य रत्नकरण्डश्रावकाचारमें लिखते हैं-

श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् ।
त्रिमूढापोढमष्टांगं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥ ४ ॥

अर्थ-सत्यार्थ आप्त, आगम और गुरुका श्रद्धान करना सो सम्यग्दर्शन है । यह तीन मूढता रहित, आठ अंग सहित और आठ मद रहित होता है ।

ऐसे अन्य भी बहुत प्रमाण हैं । इन सब प्रमाणोंसे स्पष्ट हो जाता है कि व्यवहार रत्नत्रयको मात्र रागरूप कहना अर्थात् ‘निश्चय रत्नत्रयके साथ जो राग रहता है उस रागांशका नाम व्यवहार रत्नत्रय है’ कहना आगम विरुद्ध है । प्रत्युत ‘राग, भेद या विकल्प सहित जो सप्त तत्त्व आदिका श्रद्धान व ज्ञान तथा पापोंसे निवृत्तिरूप चारित्र है वह व्यवहार रत्नत्रय या व्यवहार मोक्षमार्ग है ।’ इसीको उपचार रत्नत्रय भी कहा जाता है । यह निश्चय रत्नत्रय एवं मोक्षका हेतु है । जिसके कुछ प्रमाण पहले पत्रकमें तथा इसी लेखमें ऊपर दिये हैं । और भी देखिये-

श्री अमृतचन्द्र सूरि पुरुषार्थसिद्धयुपाय ग्रन्थमें निश्चयके साथ व्यवहार रत्नत्रयको मुक्तिका कारण बतलाते हैं-

सम्यक्त्वबोधचारित्रलक्षणो मोक्षमार्ग इत्येषः ।
मुख्योपचाररूपः प्रापयति परं पदं पुरुषम् ॥ २२ ॥

अर्थ-इस प्रकार यह पूर्व कथित निश्चय और उपचार-व्यवहाररूप सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र लक्षणवाला मोक्षमार्ग आत्माको परमात्मपद प्राप्त कराता है ।

पञ्चास्तिकायकी गाथा ७० की टीकामें जयसेनाचार्य लिखते हैं-

निश्चय-व्यवहारमोक्षमार्गचारी······गच्छति······निर्वाणनगरम् ।

अर्थ-निश्चय तथा व्यवहार मोक्ष मार्गपर चलनेवाला व्यक्ति मोक्ष नगरको पहुँच जाता है ।

निश्चय-व्यवहारमोक्षकारणे सति मोक्षकार्यं संम्भवति ।
-पञ्चास्तिकाय गाथा १०६ जयसेनीया टीका
वीतरागत्वं निश्चय-व्यवहारनयाभ्यां साध्यसाधकरूपेण परस्परसापेक्षाभ्यामेव भवति मुक्तिसिद्धये न च पुनर्निरपेक्षाभ्यामिति वार्तिकम् ।
-पञ्चास्तिकाय १७२ गाथा श्री जयसेनाचार्यकृत टीका

अर्थ-वीतरागता, निश्चय तथा व्यवहार नयके साध्यसाधक भावसे परस्पर सापेक्ष होनेपर ही मुक्तिकी सिद्धिके लिये होती है, दोनों नयोंके निरपेक्ष होनेपर वह वीतरागता मुक्तिसिद्धिके लिये नहीं होती ।

श्री पं० दौलतरामजी छहढाला ग्रन्थकी तीसरी ढालमें लिखते हैं-

अब व्यवहार मोक्षमग सुनिये, हेतु नियतको होई ॥ २ ॥

अर्थ-अब व्यवहार मोक्षमार्गका स्वरूप सुनो जो कि निश्चय मोक्षमार्गका कारण है ।

छठवीं ढालके अन्तमें वे निष्कर्ष ( ग्रन्थका निचोड़ ) कहते हैं-

मुख्योपचार दुभेद यों बड़भागि रत्नत्रय धरें ।
अरु धरेंगे ते शिव लहैं तिन सुयश-जल जगमल हरें ॥

अर्थ-इस प्रकार जो भाग्यशाली पुरुष निश्चय तथा व्यवहार रत्नत्रयको धारण करते हैं अथवा भविष्यमें धारण करेंगे वे मोक्ष प्राप्त करते हैं और उनका स्वच्छ यशरूपी जल संसारके मैलको दूर करता है ।

यहाँ दोनों ढालोंमें पं० दौलतरामजीने व्यवहार रत्नत्रयको भी निश्चय रत्नत्रयका कारण बतलाते हुए मोक्षका कारण बतलाया है ।

अब प्रसंगवश निश्चय रत्नत्रय ( मोक्षमार्ग ) का स्वरूप दिखलानेके लिये कुछ प्रमाण दिये जाते हैं-

श्री कुन्दकुन्दाचार्य पञ्चास्तिकायमें लिखते हैं-

जो चरदि णादि पिच्छदि अप्पाणं अप्पणा अणण्णमयं ।
सो चारित्तं णाणं दंसणमिदि णिच्छिदो होदि ॥१६२॥

अर्थ-जो ( आत्मा ) आत्माको आत्मासे अनन्यमय आचरता है, जानता है, देखता है वह ( आत्मा ही ) चारित्र है, ज्ञान है, दर्शन है ऐसा निश्चय रत्नत्रय है ।

ये ही कुन्दकुन्दाचार्य भावपाहुडमें लिखते हैं-

अप्पा अप्पम्मि रओ सम्मादिट्ठी हवेइ फुड जीवो ।
जाणइ तं सण्णाणं चरदिह चारित्तमग्गु त्ति ॥३१॥

अर्थ-जो आत्मामें रत है वह सम्यग्दृष्टि है, उसे जानना सम्यग्ज्ञान है और उसमें आचरण करना सो सम्यक्चारित्र है ।

अमृतचन्द्र सूरि पुरुषार्थसिद्धयुपायमें एक प्रश्नका उत्तर देते हुए लिखते हैं-

दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोधः ।
स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बन्धः ॥२१६॥

अर्थ-अपनी आत्माका विनिश्चय सम्यग्दर्शन है, आत्माका विशेष ज्ञान सम्यग्ज्ञान है और आत्मामें स्थिरता सम्यक्चारित्र है । इन तीनोंसे बन्ध कैसे हो सकता है ?

श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती अपने द्रव्यसंग्रहमें लिखते हैं-

सम्मद्दंसणणाणं चरणं मोक्खस्स कारणं जाणे।
ववहारा णिच्छयदो तत्तियमइओ णिओ अप्पा ॥३९॥

अर्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रको व्यवहारसे मोक्षका कारण जानो और निश्चयसे सम्यग्दर्शनादि त्रिरूप आत्मा मोक्षका कारण है ॥

परमात्मप्रकाश अध्याय २ दोहक १४ की टीकामें लिखा है-

वीतरागसम्यक्त्वं निजशुद्धात्मानुभूतिलक्षणम्।
वीतरागचारित्राविनाभूतं तदेव निश्चयसम्यक्त्वम् ॥

अर्थ-वीतराग सम्यक्त्वका लक्षण स्वशुद्धात्मानुभूति है और वह वीतराग चारित्रका अविनाभूत है। वह ही निश्चय सम्यक्त्व है।

पं० दौलतराम जी ने भी छहढाला तीसरी ढालमें निश्चय रत्नत्रयका स्वरूप इस प्रकार निर्दिष्ट किया है-

पर द्रव्यनतें भिन्न आपमें रुचि सम्यक्त्व भला है
आप-रूपको जानपनौं सो सम्यग्ज्ञान कला है।
आप-रूपमें लीन रहे थिर सम्यक्चारित्र सोई
अब व्यवहार मोक्ख मग सुनिये हेतु नियतको होई ॥ २ ॥

अर्थ-अन्य द्रव्योंसे पृथक् अपनी आत्माकी रुचि होना निश्चय सम्यग्दर्शन है, केवल निज आत्माको जानना निश्चय सम्यग्ज्ञान है और अपने आत्मामें लीन होना सो निश्चय सम्यक्चारित्र है। अब व्यवहार मोक्षमार्गका वर्णन करते हैं जो कि निश्चय मोक्षमार्गका कारण है।

उपर्युक्त प्रमाणों और व्यवहार तथा निश्चय रत्नत्रयके स्वरूपपर विचार करनेसे यह स्फुट रूप से प्रकट हो जाता है कि सहचरताके कारण निश्चय व्यवहार रत्नत्रयमें साध्य-साधकभाव नहीं माना गया है, अपि तु कार्य-कारण भावसे माना गया है।

इस प्रकार यह कहना कि ‘जहाँ निश्चय मोक्षमार्ग होता है वहाँ उसके साथ होनेवाले व्यवहार धर्मरूप राग परिणामको व्यवहार मोक्षमार्ग आगममें कहा है’ आगम संगत नहीं जान पड़ता है, क्योंकि मात्र रागांशका नाम व्यवहार रत्नत्रय नहीं है और न मात्र रागांश निश्चय रत्नत्रयका साधक हो सकता है।

आपसे पहले उत्तरमें निवेदन किया गया था कि ‘आप ऐसे प्रमाण देनेकी कृपा करें जहाँ मात्र रागांशको व्यवहार रत्नत्रय कहा गया हो और इस प्रकार सहचरताके कारण साध्य-साधक भाव सिद्ध किया गया हो’ किन्तु उसके लिए आपने एक भी प्रमाण नहीं दिया, प्रत्युत पञ्चास्तिकाय गाथा १०५ पर श्री जयसेनाचार्यकृत टीका और बृहद्द्रव्यसंग्रह पृष्ठ २०९ का प्रमाण देकर यही सिद्ध किया है कि व्यवहार रत्नत्रय निश्चय रत्नत्रयका परम्परासे साधक है।

‘व्यवहार धर्म निश्चय धर्ममें साधक है या नहीं? इस प्रश्नके मूलमें आशय यह था कि आज समाजके अन्दर प्रवचनकी ऐसी धारा चल पड़ी है जिसमें कहा जाता है "मैं शुद्ध बुद्ध निरञ्जन हूँ, त्रैकालिक अखण्ड द्रव्य हूँ, बाह्य चारित्रसे आत्माका कल्याण होनेवाला नहीं, प्रत्युत कर्मबन्ध होता है। इसे धारण कर तो यह जीव अनन्त बार ग्रैवेयकमें उत्पन्न हो चुका है।’ इसके फल स्वरूप समाजमें व्यवहार धर्मसे अरुचि फैलने लगी है। कितने ही त्यागियोंने गृहीत व्रत छोड़ दिये हैं, जनतामें रात्रिभोजन और अभक्ष्य-भक्षणकी प्रवृत्ति चल पड़ी है। और साधारण गृहस्थका जो कुलाचार है उसे भी लोग छोड़ रहे हैं। फिर देशव्रत और महाव्रतकी ओर लोगोंकी अभिरुचि जागृत हो यह दूरकी बात रह गई है। लोगोंकी यह मान्यता बनती जाती है कि धर्म तो एक निश्चय धर्म है, व्यवहार धर्म कोई धर्म नहीं है। वह तो मात्र बन्धका कारण है, उसके पालनेसे कुछ लाभ नहीं होता। अनादि कालसे लगे हुए मोहके संस्कारवश जनता तो त्यागके मार्गसे दूर रहती है, उस पर उसे ऐसे उपदेश मिलें कि व्यवहार धर्ममें क्या रखा है? तब तो उसे त्यागकी प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ हो जायगी। इसी अभिप्रायसे यह प्रश्न था कि "व्यवहार धर्म निश्चय धर्ममें कारण है या नहीं? पर इस ओर आपका लक्ष्य नहीं गया ऐसा जान पड़ता है।

मोक्षमार्गप्रकाशकके जो अवतरण आपने दिये हैं उनसे यह अभीष्ट सिद्ध नहीं होता कि व्यवहार निश्चयका साधक नहीं है। किन्तु उससे तो यही सिद्ध होता है कि व्यवहार निश्चयका साधक है, क्योंकि वहाँ पर भी व्यवहारको निश्चयका निमित्त कहा गया है। जिनागमका उपदेश नयवादको लिये हुए है और नयवाद पात्रके अनुसार होता है। इसीलिए नयको परार्थ श्रुतज्ञानका भेद माना गया है। श्री अमृतचन्द्र स्वामीने पञ्चास्तिकायके अन्तमें प्राथमिक शिष्योंके विषयमें निम्नांकित पंक्तियाँ बड़ी महत्त्वपूर्ण लिखी हैं-

व्यवहारनयेन भिन्नसाध्यसाधनभावमवलम्ब्यानादिभेदवासितबुद्धयः सुखेनैवावतरन्ति तीर्थं प्राथमिकाः।

अर्थ-जिनकी बुद्धि अनादि कालसे भेदभाव कर वासित हो रही है ऐसे प्राथमिक शिष्य भिन्न साध्यसाधनभावका अवलम्बन लेकर सुखसे ही धर्मतीर्थमें अवतीर्ण हो जाते हैं। धर्मको अनायास प्राप्त हो जाते हैं।

इसके आगेकी पंक्तियाँ भी द्रष्टव्य हैं, जिनमें उन्होंने प्राथमिक शिष्य व्यवहार धर्मसे आत्मसाधना करता हुआ निश्चय धर्मको प्राप्त होता है इसका उल्लेख किया है-

तदाहीदं श्रद्धेयमश्रद्धेयमिदमयं श्रद्धातेदं श्रद्धानमिदमश्रद्धानमिदं ज्ञेयमिदलज्ञेयमयं ज्ञातेदं ज्ञानमिदमज्ञानमिदं चरणीयमिदमचरणीयमयं चरितेदं चरणमिति कर्त्तव्याकर्त्तव्यकर्तृकर्मविभागावलोकनोल्लसितपेशलोत्साहाः शनैः शनैर्मोहमल्लमुन्मूलयन्तः कदाचिदज्ञानान्मदप्रमादतन्त्रतया शिथिलितात्माधिकारस्यात्मनो न्याय्यपथप्रवर्तनाय प्रयुक्तप्रचण्डदण्डनीतयः पुनः पुनर्दोषानुसारेण दत्तप्रायश्चित्ताः सन्ततोद्युक्ताः सन्तोऽथ तस्यैवात्मनो भिन्नविषयश्रद्धानज्ञानचारित्रैरधिरोप्यमाणसंस्कारस्य भिन्नसाध्यसाधनभावस्य रजकशिलातलस्फाल्यमानविमलसलिलाप्लुतविहितोषपरिष्वंगमलिनवासस इव मनाङ्मनाग्विशुद्धिमधिगम्य निश्चयनयस्य भिन्नसाध्यसाधनभावाभावाद्दर्शनज्ञानचारित्रसमाहितत्वरूपे विश्रान्तसकलक्रियाकाण्डाडम्बरनिस्तरंगपरमचैतन्यशालिनि निर्भरानन्दमालिनि भगवत्यात्मनि विश्रान्तिमासूचयन्तः क्रमेण समुपजातसमरसीभावाः परमवीतरागभावमधिगम्य साक्षान्मोक्षमनुभवन्तीति।

अर्थ-'तीर्थ क्या है? सो दिखाते हैं-जिन जीवोंके ऐसे विकल्प होंहि कि यह वस्तु श्रद्धा करने योग्य है, यह वस्तु श्रद्धा करने योग्य नहीं है, श्रद्धा करनेवाला पुरुष ऐसा है, यह श्रद्धान है, इसका नाम अश्रद्धान है, यह वस्तु जानने योग्य है, यह नहीं जानने योग्य है, यह स्वरूप ज्ञाताका हैं, यह ज्ञान है, यह अज्ञान है, यह आचरने योग्य है, यह वस्तु आचरने योग्य नहीं है, यह आचारमयी भाव है, यह आचरण करनेवाला है, यह चारित्र है, ऐसे अनेक प्रकारके करने न करनेके कर्ता कर्मके भेद उपजते हैं, उन विकल्पोंके होते हुए उन पुरुष तीर्थोंको सुदृष्टिके बढ़ावसे बार-बार उन पूर्वोक्त गुणोंके देखनेसे प्रकट उल्लास लिये उत्साह बढ़े हैं। जैसे द्वितीयाके चन्द्रमाकी कला बढ़ती जाती है तैसें ही ज्ञान दर्शन चारित्ररूप अमृत-चन्द्रमाकी कलाओंका कर्तव्याकर्तव्य भेदोंसे उन जीवोंकी बढ़वारी होती है। फिर उन्हीं जीवोंके शनैः शनैः मोहरूप महामल्लका सत्तासे विनाश होता है। किस ही एक कालमें अज्ञानताके आवेश हैं प्रमादकी आधीनतासे उनही जीवोंके आत्मधर्मकी शिथिलता है, फिर आत्माको न्याय मार्गमें चलानेके लिये आपको दण्ड देते हैं। शास्त्र न्यायसे फिर ये ही जिनमार्गी बारंवार जैसा कुछ रत्नत्रयमें दोष लगा होय उसी प्रकार प्रायश्चित्त करते हैं। फिर निरन्तर उद्यमी रहकर अपनी आत्माको जो आत्मस्वरूपसे भिन्न स्वरूप ( भिन्न पदार्थोंको विषय करनेवाला ) श्रद्धान ज्ञान चारित्ररूप व्यवहार रत्नत्रयसे शुद्धता करते हैं, जैसे मलीन वस्त्रको धोबी भिन्न साध्य-साधनभाव कर शिलाके ऊपर साबुन आदि सामग्रियोंसे उज्ज्वल करता है। तैसें ही व्यवहारनयका अवलम्ब पाय भिन्न साध्यसाधनभावके द्वारा गुणस्थान चढ़नेकी परिपाटीसे क्रमसे विशुद्धताको प्राप्त होता है। फिर उन ही मोक्षमार्गके साधक जीवोंके निश्चयनयकी मुख्यतासे भेदस्वरूप पर अवलम्बी व्यवहारमयी भिन्न साध्य-साधनका अभाव है, इस कारण अपने दर्शन ज्ञान चारित्र स्वरूप विषैं सावधान होकर अन्तरंग गुप्त अवस्थाको धारण करता है। और जो समस्त बहिरंग योगोंसे उत्पन्न है क्रियाकाण्डका आडम्बर तिनसे रहित निरन्तर संकल्प-विकल्पोंसे रहित परम चैतन्य भावोंके द्वारा सुन्दर परिपूर्ण आनन्दवंत भगवान् परम ब्रह्म आत्मामें स्थिरताको करे हैं ऐसे जे पुरुष हैं वे ही निश्चयावलम्बी जीव हैं। व्यवहारनयसे अविरोधी क्रमसे परम समरसीभावके भोक्ता होते हैं।

-पांडे हेमराज कृत हिन्दी टीका पृ० २४७-४८

श्रीकुन्दकुन्द स्वामीकी निम्नलिखित गाथा भी हमें यही पथ प्रदर्शन करती है कि कहाँ किसके लिये कौन नय प्रयोजनवान् है-

सुद्धो सुद्धादेसो णायव्वो परमभावदरिसीहिं।
ववहारदेसिदा पुण जे दु अपरमे ट्ठिदा भावे ॥१२॥-समयसार

अर्थ-जो शुद्ध नय तक पहुँचकर श्रद्धावान् हुए तथा पूर्ण ज्ञान चरित्रवान् हो गये उनको तो शुद्ध नयका उपदेश करनेवाला शुद्धनय जानने योग्य है। और जो अपरमभाव अर्थात् श्रद्धा ज्ञान और चारित्रके पूर्णभावको नहीं पहुँच सके तथा साधक अवस्थामें ही ठहरे हुए हैं वे व्यवहार द्वारा उपदेश करने योग्य हैं।

लोकमें जिनधर्मकी देशना ,परस्पर सापेक्ष उभयनयके ही आधीन है, एकनयके आधीन नहीं। जैसा कि कहा है-

जइ जिणमयं पवज्जह ता मा ववहारणिच्छए मुयह । एक्केण विणा छिज्जइ तित्थं अण्णेण उण तच्चं ॥
-समयसार गाथा १२ की आत्मख्यातिटीका

अर्थ-यदि तुम जैनधर्मका प्रवर्तन चाहते हो तो व्यवहार और निश्चय इन दोनों नयोंको मत छोड़ो, क्योंकि व्यवहारनयके बिना तो तीर्थ-व्यवहार मार्गका नाश हो जायगा और दूसरे निश्चयके बिना तत्त्व ( वस्तु ) का नाश हो जायगा।

नोट-निश्चयनय और व्यवहारनयके स्वरूपको समझनेके लिये प्रश्न संख्या, १,५,६,१६ व १७ भी देखिये। इसके साथ इसका परिशिष्ट भी है।

प्रश्न चारका परिशिष्ट

संक्षेपमें इसका अन्तिम फलितार्थ यह है कि चतुर्थ गुणस्थानवर्ती अविरत सम्यग्दृष्टि, पंचम गुणस्थान वर्ती श्रावक और संयमी मुनियोंका जो बाह्य आचार जैन संस्कृतिमें निश्चित किया गया है वह तो व्यवहार धर्म कहलाता है तथा सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्ररूप आत्माकी विशुद्ध अविकारी-वीतरागता पूर्ण जो स्थिति बनती है उसे निश्चय धर्म कहते हैं।

वीतरागी देव, वीतरागी गुरु और वीतरागताके पोषक आगमके प्रति भक्ति प्रगट करना, इनके प्रति आकृष्ट हो जाना यह सब अविरत सम्यग्दृष्टिका बाह्य आचार अर्थात् व्यवहार सम्यग्दर्शन रूप व्यवहार धर्म कहलाता है और सांसारिक प्रवृत्तियोंके एकदेश त्यागने रूप अणुव्रतोंको धारण करना यह सब श्रावकका बाह्य आचार अर्थात् व्यवहार चारित्र रूप व्यवहारधर्म तथा उन्हीं सांसारिक प्रवृत्तियोंके सर्वदेश त्यागने रूप महाव्रतोंको धारण करना यह सब संयमी मुनियोंका बाह्य आचार अर्थात् व्यवहार चारित्र रूप व्यवहार धर्म कहलाता है।

प्राणीका लक्ष्य आत्माको विशुद्ध-निर्विकार-वीतराग और स्वतन्त्र बनानेका जैन संस्कृतिमें निर्धारित किया गया है इसलिये इस प्रकारका निश्चयधर्म प्राणीके सामने साध्यके रूपमें उपस्थित होता है और जब वह प्राणी यथायोग्य प्रकारसे क्रमशः अविरतसम्यग्दृष्टि, श्रावक तथा मुनियोंके उपर्युक्त बाह्याचारके रूपमें व्यवहारधर्मको अपनाता है।

अविरतसम्यग्दृष्टि, श्रावक और मुनियोंके बाह्याचार रूप व्यवहारधर्मको द्रव्यलिंग और इनके अन्तरंग आत्मविशुद्धिमय निश्चयधर्मको भावलिंग भी कहते हैं। व्यवहारधर्मका प्रतिपादक चरणानुयोग है और निश्चयधर्मका प्रतिपादक करणानुयोग है। चतुर्थ, पंचम और षष्ठ गुणस्थानवर्ती जीव जीवनकी बाह्य स्थितिमें प्रवर्तमान रहते हैं, अतः ऐसे जीवोंका मुख्यतया बाह्य पुरुषार्थ पर लक्ष्य रहना आवश्यक हो जाता है और यही कारण है कि इन जीवोंके व्यवहार धर्मकी मुख्यता तथा निश्चयधर्मकी गौणता स्वभावतः रहती है। सप्तम गुणस्थानसे लेकर आगेके गुणस्थानोंमें रहनेवाले जीव जीवनकी अन्तरंग स्थितिमें प्रवर्तमान हो जाते हैं, अतः ऐसे जीवोंकी वृत्ति बाह्य पुरुषार्थसे हटकर अन्तरंग पुरुषार्थके उन्मुख हो जाती है। यही कारण है कि सप्तम आदि गुणस्थानोंमें पहुँचे हुए जीवोंके निश्चय धर्मकी प्रधानता तथा व्यवहार धर्मकी गौणता स्वभावतः हो जाती है। इस अभिप्रायको ध्यानमें रखकर ही आचार्य कुन्दकुन्दने निम्नलिखित गाथाकी रचना की है-

सुद्धो सुद्धादेसो णायव्वो परमभावदरसीहिं।
ववहारदेसिदा पुण जे दु अपरमे ट्ठिदा भावे ॥ १२ ॥-समयसार

अर्थ-जो जीव जीवनकी बाह्य स्थितिसे हटकर अन्तरङ्ग स्थितिमें पहुँच गये हैं उन्हें अपने परम ( उत्कृष्ट ) स्वाश्रित भावके दर्शन होते ही इस कारण उन जीवोंके शुद्ध ( स्वाश्रित ) निश्चयधर्मकी प्रमुखता पायी जाती है। तथा जो अभी अपने जीवनकी बाह्य स्थितिमें ही प्रवर्तमान हैं उन्हें इस हालतमें अपरम भावके ही दर्शन हुआ करते हैं, अतः इन जीवोंके पराश्रित व्यवहार धर्मकी ही प्रमुखता पायी जाती है।

व्यवहार धर्मका सद्भाव निश्चय धर्मके अभावमें भी पाया जाता है और जहाँ निश्चय धर्मका सद्भाव होगा वहाँ व्यवहार धर्मका सद्भाव रहना ही चाहिए। इससे व्यवहार धर्मकी कारणता और निश्चय धर्मकी कार्यतामें कोई बाधा उपस्थित नहीं होती है, क्योंकि आगमका अभिप्राय व्यवहार धर्मको कारण और निश्चय धर्मको उसका कार्य स्वीकार करनेमें यह है कि निश्चय धर्मकी उत्पत्ति और स्थिति व्यवहार धर्मको अंगीकार किये विना असम्भव है, इसलिये आपका ऐसा सोचना भी गलत है कि निश्चय धर्मको प्राप्त होनेपर व्यवहार धर्मकी प्राप्ति अपने आप हो जाती है। समयसारकी “अपडिक्कमणं दुविहं” इत्यादि २८३ से २८५ वीं गाथाओंकी आत्मख्याति टीकासे स्पष्ट रूपमें यह बात सिद्ध होती है कि व्यवहार धर्म निश्चय धर्मकी उत्पत्ति और स्थितिमें कारण होता है। वह टीका निम्न प्रकार है-

ततः एतत् स्थितं, परद्रव्यं निमित्तं, नैमित्तिका आत्मनो रागादिभावाः। यद्येवं नेष्येत तदा द्रव्याप्रतिक्रमणाप्रत्याख्यानयोः कर्तृत्वनिमित्तत्वोपदेशोऽनर्थक एव स्यात्। तदनर्थकत्वे त्वेकस्यैवात्मनो रागादिभावनिमित्तत्वापत्तौ नित्यकर्तृत्वानुषंगान्मोक्षाभावः प्रसजेच्च। ततः परद्रव्यमेवात्मनो रागादिभाव-निमित्तमस्तु। तथा सति तु रागादिनामकारक एवात्मा, तथापि यावन्निमित्तभूतं द्रव्यं न प्रतिक्रामति न प्रत्याचष्टे च। तावन्नैमित्तिकभूतं भावं न प्रतिक्रामति न प्रत्याचष्टे च। यावत्तु भावं न प्रतिक्रामति न प्रत्याचष्टे तावत्तत्कर्तैव स्यात्। यदैवं निमित्तभूतं द्रव्यं प्रतिक्रामति प्रत्याचष्टे च तदैव नैमिरिकभूतं भावं प्रतिक्रामति प्रत्याचष्टे च। यदा तु भावं प्रतिक्रामति प्रत्याचष्टे च तदा साक्षात् अकर्तैव स्यात्॥ २८३, २८४, २८५॥

अर्थ-इस तरह यह निश्चित हो जाता है कि पर द्रव्य निमित्तकारण है और आत्माके रागादि-विकार पर द्रव्यके निमित्तसे उत्पन्न होनेवाले हैं। यदि ऐसा नहीं माना जाय तो आगममें द्रव्य अप्रतिक्रमण और द्रव्य अप्रत्याख्यानमें जो आत्माके राग-द्वेषादि विकारोंकी उत्पत्तिकी निमित्तता प्रतिपादित की गयी है वह अनर्थक हो जायगी। इसके अनर्थक हो जाने पर एक आत्मामें ही रागादिकी उत्पत्ति-का प्रसंग प्राप्त होजानेपर आत्मामें रागादिके नित्यकर्तृत्वकी भी प्रसक्ति हो जानेसे रागादिके अभावका भी प्रसंग उपस्थित हो जायगा, इसलिये आत्मामें उत्पन्न होनेवाले रागादि विकारोंका निमित्त पर द्रव्य ही ठहरता है। इस तरह यद्यपि आत्मा स्वयं तो रागादिका अकारक ही है तो भी जब तक जीव निमित्तभूत पर द्रव्यका प्रत्याख्यान और प्रतिक्रमण नहीं करेगा तब तक भावरूप रागादि विकारोंका प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान नहीं हो सकता है। इस तरह तब तक आत्मा रागादिका कर्ता ही बना रहता है और जब निमित्तभूत पर द्रव्यका प्रतिक्रमण व प्रत्याख्यान जीव करता है तभी वह उसके निमित्तसे होनेवाले रागादिका भी प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान करता है। इस प्रकार जब रागादि विकारोंका भी प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान हो जाता है तब आत्मा रागादिका साक्षात् अकर्ता हो जाता है। २८३, २८४,२८५॥

इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि आत्माकी परिणतिमें जो क्रोधादिरूपता पायी जाती है उसका कारण क्रोधादि द्रव्यकर्मोंका उदय ही होता है। आत्मामें क्रोधादि विकारोंकी उत्पत्ति स्वतः अपने आप नहीं हो जाती है। पण्डित दौलतरामजीने छहढालाकी तीसरी ढालमें व्यवहार धर्मकी निश्चय धर्ममें कारणताका स्पष्ट उल्लेख किया है-

जो सत्यारथ रूप सो निश्चय कारण सो ववहारो॥

इसी प्रकार स्वामी समन्तभद्रने भी लिखा है-

बाह्यं तपः परमदुश्चरमाचरंस्त्वमाध्यात्मिकस्य तपसः परिबृंहणार्थम् ॥८३॥
-स्वयंभूस्तोत्र

अर्थ-हे भगवन् ! आपने आध्यात्मिक ( निश्चय ) तप की वृद्धिके लिये बाह्य ( व्यवहार ) तपका कठोरताके साथ आचरण किया था ।

नोट-व्यवहारनय और निश्चयनयके स्वरूपको समझनेके लिये अन्य प्रश्नोंपर भी दृष्टि डालिये ।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका ४, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १४४ से १५७

↑ सूची


शंका ४

व्यवहारधर्म निश्चयधर्ममें साधक है या नहीं ?

प्रतिशंका ३ का समाधान

\१. उपसंहार

हमने अपने प्रथम उत्तरमें लिखा है कि निश्चय रत्नत्रय स्वभावभाव है, इसलिए निश्चयसे व्यवहार धर्म उसका साधक नहीं है । तथापि सहचर सम्बन्धके कारण व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका साधक ( निमित्त ) कहा जाता है ।

अपर पक्षने इसपर शंका करते हुए अपने दूसरे पत्रकमें कुछ आगम प्रमाण देकर व्यवहार धर्म निश्चयधर्मका साधक है यह सिद्ध किया है । साथ ही यह भी लिखा है कि व्यवहार धर्मको निश्चयधर्मका साधक मान लेनेपर भी निश्चयधर्म परनिरपेक्ष बना रह सकता है ।

इसका उत्तर देते हुए हमने अपने दूसरे उत्तरमें लिखा कि व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका असद्भूत व्यवहार नयसे साधक बतलाया है । साथ ही व्यवहार मोक्षमार्ग निश्चय मोक्षमार्गका सहचर होनेसे अनुकूल है, इसलिए इसमें निश्चय मोक्षमार्गके साधकपनेका व्यवहार किया है यह भी बतलाया है ।

\२. प्रतिशंका ३ के आधारसे विवेचन

तत्काल प्रतिशंका ३ के आधारसे तृतीय पत्रक पर विचार करना है । इसके प्रारम्भमें अपर पक्षने यह संकेत किया है कि हमने प्रथम उत्तरमें नियमसारकी जो तीन गाथाएँ उद्धृत की हैं उनका प्रकृत विषयसे कोई सम्बन्ध नहीं, किन्तु बात ऐसी नहीं हैं । उन गाथाओं द्वारा हमारा यह दिखलाना ही प्रयोजन था कि निश्चय मोक्षमार्ग निश्चय रत्नत्रय परिणत आत्मा है वह आत्मस्वभावके अवलम्बन करनेसे ही उत्पन्न होता है । अतः व्यवहार धर्मको उसका साधक व्यवहार नयसे ही माना जा सकता है । यह परमार्थ कथन नहीं है, निमित्तका ज्ञान कराना मात्र इसका प्रयोजन है । अपने दूसरे पत्रकमें अपर पक्षने प्रवचनसार आदि अनेक ग्रन्थोंके प्रमाण दिये हैं इसमें सन्देह नहीं, किन्तु किस नयसे उन शास्त्रोंमें वे प्रमाण उल्लिखित किये गये हैं और उनका आशय क्या है इस विषयमें अपर पक्षने एक शब्द भी नहीं लिखा है। हमारी दृष्टि तो नयदृष्टिसे उनका आशय स्पष्ट करनेकी है, जब कि अपर पक्ष उस स्पष्टीकरणको उपेक्षाकी दृष्टिसे देखकर उसकी अवहेलना करता है। क्या इसे ही परम-प्रमाणभूत, मूलसंघके प्रतिष्ठापक श्री कुन्दकुन्दाचार्य तथा अन्य आध्यात्मिक प्रामाणिक आचार्योंके आर्ष वाक्योंको परम श्रद्धालु और तत्त्ववेत्ता बनकर स्वीकार करना कहा जाय इसका अपर पक्षको ही निर्णय करना है। पूरे जिनागमको दृष्टिमें रखकर उसके हार्दको ग्रहण कर अपने कल्याणके मार्गमें लगा जाय यह हमारी दृष्टि है और इसी दृष्टिसे प्रत्येक उत्तरमें हम यथार्थका निर्णय करनेका प्रयत्न करते आ रहे हैं। अपर पक्ष भी इसी मार्गको स्वीकार कर ले ऐसा मानस है। स्व-परके कल्याणका यदि कोई मार्ग है तो एकमात्र यही है।

हमने अपने दूसरे उत्तरमें व्यवहारधर्मको असद्भूत व्यवहार नयसे निश्चयधर्मका साधक लिखकर उन प्रमाणोंको टालनेका प्रयत्न नहीं किया है, किन्तु उनके हार्दको ही स्पष्ट करनेका प्रयत्न किया है। व्यवहारधर्म आत्माका धर्म किस नयकी अपेक्षा कहा गया है इसका स्पष्टीकरण करते हुए बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ४५ में बतलाया है-

तत्र योऽसौ बहिर्विषये पञ्चेन्द्रियविषयादिपरित्यागः स उपचरितासद्भूतव्यवहारेण।

उसमें बाह्यमें जो पाँचों इन्द्रियोंके विषय आदिका त्याग है वह उपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे चारित्र है।

यह आगम प्रमाण है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि उपचरित असद्भूतव्यवहारनयकी अपेक्षा ही व्यवहारधर्म चारित्र या धर्म संज्ञाको धारण करता है। वह वास्तवमें आत्माका धर्म नहीं है। ऐसी अवस्थामें उसे निश्चय धर्मका साधक उपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे ही तो माना जा सकता है। निश्चय-धर्म केवल हो और व्यवहारधर्म न हो ऐसा नहीं है। ये चतुर्थादि गुणस्थानोंमें युगपत् वर्तते हैं ऐसा एकान्त नियम है। परस्पर अविनाभावी हैं। इसीसे आगममें व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका साधन (निमित्त) कहा गया है ऐसी जिसकी श्रद्धा होती है उसके निश्चयधर्मके साथ व्यवहारधर्म होता ही है। किन्तु इसके विपरीत जिसकी यह श्रद्धा बनी हुई है कि व्यवहारधर्मको अंगीकार करना मेरा परम कर्तव्य है, मात्र उसके पालन करनेसे आत्मधर्मकी उत्पत्ति हो जायगी और ऐसी श्रद्धावश ज्ञायकस्वभाव स्वरूप यथार्थ साधन आत्माके अवलम्बनकी ओर दृष्टिपात नहीं करता वह त्रिकालमें निश्चयधर्मका अधिकारी बननेका पात्र नहीं होता। इससे यह बात आसानीसे समझमें आ जाती है कि मोक्षमार्गकी प्राप्तिका यथार्थ साधन तो निर्विकार चिद्घनस्वरूप आत्माका अवलम्बन ही है। वही मेरा परम कर्तव्य है, उसका अवलम्बन लेनेपर निश्चय मोक्षमार्गकी उत्पत्तिमें व्यवहारधर्म निमित्तमात्र है, निश्चय मोक्षमार्गकी प्राप्तिका निश्चय साधन नहीं। पंचास्तिकाय आदि परमागममें इसी रहस्यको स्पष्ट किया गया है और इसीलिए ही पारमेश्वरी तीर्थप्रवर्तनाको उभयनयायत्त कहा गया है। पंचास्तिकाय गाथा १५९ की सूरिरचित टीका।

निश्चयधर्मकी प्राप्ति तभी निरपेक्ष समझमें आती है जब कि अभेदरत्नत्रयस्वरूप आत्मा की प्राप्ति आत्मामें अभेदरत्नत्रयके परम साधनभूत आत्मासे स्वीकार की जाय और इसके विपरीत व्यवहारधर्मसे उसकी उत्पत्ति यथार्थमें मानी जाय तो वह निरपेक्षता कैसी ? वह तो निरपेक्षताका उपहासमात्र है । यही- कारण है कि आगममें उपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे ही व्यवहारधर्मको निश्चयधर्मका साधन कहा है ।

अपर पक्षने आलापपद्धतिका उद्धरण उपस्थित कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि आत्माका व्यवहार रत्नत्रय असद्भूत व्यवहारनयका विषय नहीं है, किन्तु अपर पक्षका यह लिखना इसलिए ठीक नहीं है, क्योंकि व्यवहार रत्नत्रय आत्माका यथार्थ रत्नत्रय नहीं है। उसमें यथार्थ रत्नत्रयका समारोप करके उसे रत्नत्रय कहा गया है, इसलिए तो वह ( व्यवहार रत्नत्रय ) असद्भूत व्यवहारनयका विषय ठहरता है, क्योंकि निश्चय रत्नत्रय भिन्न वस्तु है और व्यवहार रत्नत्रय भिन्न वस्तु है। ये दोनों एक नहीं। यदि एक होते तो ये दो कैसे कहलाते और एक आत्मामें एक साथ अपनी-अपनी पृथक्-पृथक् सत्ता रखते हुए कैसे रहते ?

इसकी पुष्टिमें अपर पक्षने प्रमाण न देनेकी शिकायत की है सो एक प्रमाण तो हमने वृहद्द्रव्यसंग्रहका पूर्वमें दिया ही है । दूसरा प्रमाण यह है-

पापक्रियानिवृत्तिश्चारित्रं इति भेदोपचाररत्नत्रयपरिणतिः ।

पापक्रिया निवृत्ति चारित्र है यह भेदोपचार रत्नत्रय परिणति है ।

अपर पक्षने लिखा है कि हमने प्रश्न १२ के उत्तरमें ‘कुगुरु कुधर्म कुशास्त्रकी श्रद्धा गृहीत मिथ्यात्व है तथा सुदेव सुशास्त्र सुगुरुकी श्रद्धा सम्यग्दर्शन है।’ ऐसा स्वीकार किया है। निवेदन यह है कि सुदेवादिकी श्रद्धा सम्यग्दर्शन है यह कथन हमने व्यवहारनयसे ही स्वीकार किया है। अपर पक्षने यहाँ जो नियमसारका प्रमाण दिया है उससे भी यही सिद्ध होता है ।

हमने प्रस्तुत प्रश्नके दूसरे उत्तरमें व्यवहारधर्मको रागपरिणाम लिखकर उसे निश्चय मोक्षमार्गके अनुकूल लिखा है। यह अपर पक्षको मान्य नहीं। उसका कहना है कि ‘रागपरिणाम तो निश्चय मोक्षमार्गके अनुकूल नहीं हो सकता।’ आदि ।

निवेदन है कि अपर पक्षने हमारे कथनका हवाला देते हुए एक तो उसे पूरा उद्धृत नहीं किया, दूसरे उसके एक शब्दको पकड़कर टीका करनी प्रारम्भ कर दी । यह तत्त्वविमर्शका मार्ग नहीं कहा जा सकता । हमारा वह पूरा वाक्य इस प्रकार है-

‘वहाँ उसके साथ होनेवाले व्यवहार धर्मरूप रागपरिणामको व्यवहार मोक्षमार्ग आगममें कहा है और यतः वह सहचर होनेसे मोक्षमार्गके अनुकूल है इसलिए उसे उपचारसे निश्चय मोक्षमार्गका साधक भी कहा है ।’

अपर पक्षने इसी वाक्यको अपने तीसरे पत्रकमें उद्धृत किया है। किन्तु उसे उद्धृत करते हुए एक तो ‘वहाँ उसके साथ होनेवाले’ प्रारम्भके इस वचनको छोड़ दिया है। दूसरे बीचका कुछ अंश छोड़कर दो कथनके रूपमें उसे उद्धृत किया है। तीसरे हमारे वाक्यमें आये हुए ‘वह’ पदके आगे कौंसमें ( रागपरिणाम ) यह पद अपनी ओरसे जोड़ दिया है। और इस प्रकार उस वाक्यके आशयको नष्टकर अपनी टीका प्रारम्भ कर दी है ।

अपर पक्षका कहना है कि मात्र राग परिणामको किसी भी आगम ग्रन्थमें व्यवहार मोक्षमार्ग नहीं कहा है। किन्तु अपर पक्षका यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि मात्र रागपरिणामको हमने भी मोक्षमार्ग नहीं लिखा है और ऐसा है भी नहीं कि जो जो रागपरिणाम होता है वह सब मोक्षमार्ग ही होता है। किन्तु ऐसा अवश्य है कि निश्चय मोक्षमार्गके साथ सच्चे देवादिकी श्रद्धा, सच्चे शास्त्रके अभ्यास तथा अणुव्रत-महाव्रत आदिके पालनरूप जो शुभ परिणति होती है उसे परमागममें व्यवहार मोक्षमार्ग कहा है। इससे हमारा यह कथन सिद्ध हो जाता है कि निश्चय मोक्षमार्गके साथ होनेवाला व्यवहार धर्मरूप रागपरिणाम व्यवहार मोक्षमार्ग है। हमारे उक्त कथनकी पुष्टिमें बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ३९के इस वचन पर दृष्टिपात कीजिए-

वीतरागसर्वज्ञप्रणीतषड्द्रव्यपञ्चास्तिकायसप्ततत्त्वनवपदार्थसम्यक्श्रद्धान-ज्ञानव्रताद्यनुष्ठानविकल्परूपो व्यवहारमोक्षमार्गः। निजनिरंजनशुद्धात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुचरणैकाग्र्यपरिणतिरूपो निश्चय मोक्षमार्गः।

श्री वीतराग सर्वज्ञदेव कथित छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय, सात तत्त्व और नौ पदार्थोंके सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान और व्रत आदि रूप आचरणके विकल्परूप व्यवहार मोक्षमार्ग है तथा निज निरंजन शुद्ध आत्मतत्त्वके सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान और अनुचरणकी एकाग्र परिणतिरूप निश्चय मोक्षमार्ग है।

सराग चारित्रका ,लक्षण करते हुए इसी ग्रन्थकी ४५वीं गाथामें अशुभसे निवृत्ति और शुभमें प्रवृत्तिको व्यवहार चारित्र कहा है और उसे व्रत, समिति तथा गुप्तिरूप बतलाया है। तथा इसकी व्याख्यामें देशचारित्रको इसका एक अवयवरूप बतलाया है।

आगे इसी गाथाकी व्याख्यामें यह भी लिखा है-

तच्चाचाराराधनादिचरणशास्त्रोक्तप्रकारेण पंचमहाव्रतपंचसमिति-त्रिगुप्तिरूपमप्यपहृतसंयमाख्यं शुभोपयोगलक्षणं सरागचारित्राभिधानं भवति।

और वह आचार-आराधना आदि चरणानुयोगके शास्त्रोंमें कहे अनुसार पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिरूप होता हुआ भी अपहृतसंयम नामक शुभोपयोग लक्षणवाला सरागसंयम नामवाला होता है।

पंचास्तिकायमें लिखा है-

अरहंतसिद्धसाहुसु भत्ती धम्मम्मि जा य खलु चेट्ठा।
अणुगमणं पि गुरूणं पसत्थरागो त्ति वुच्चंति ॥ १३६ ॥

अरिहन्त, सिद्ध और साधुओंके प्रति भक्ति, धर्ममें नियमसे चेष्टा और गुरुओंका अनुगमन वह प्रशस्त राग कहलाता है ॥ १३६ ॥

यहाँ टीकामें धर्मका अर्थ व्यवहार धर्म किया है और लिखा है कि प्रशस्त ( अरिहन्तादि ) इसके विषय हैं, इसलिए यह प्रशस्त राग है।

प्रशस्त राग क्या है इसका निर्देश करते हुए मूलाचार ( षडावश्यक अधिकार ) में भी लिखा है-

अरहंतेसु य राओ ववगदरागेसु दोसरहिएसु।
धम्मम्हि य जो राओ सुदे यजो बारसविधम्हि ॥७३॥
आइरिएसु य राओ समणेसु य बहुसुदे चरित्तड्ढे।
एसो पसत्थराओ हवदि सरागेसु सव्वेसु ॥७४॥

राग-द्वेषसे रहित अरिहंतोंमें जो राग है, धर्ममें और बारह प्रकारके श्रुतमें जो राग है, तथा चारित्रसे विभूषित आचार्यों, श्रमणों और उपाध्यायोंमें जो राग है वह प्रशस्त राग है। यह सब सराग जीवोंके होता है ॥ ७३-७४ ॥

यहाँ तक हमने जो प्रमाण उपस्थित किये हैं उनको ध्यानमें रखकर यदि विचारकर देखा जाय तो निश्चय सम्यक्त्वके साथ होनेवाला यह प्रशस्त राग ही व्यवहार सम्यग्दर्शन और व्यवहार सम्यग्ज्ञान है। तथा अशुभसे निवृत्तिपूर्वक शुभमें प्रवृत्तिरूप जो प्रशस्त राग है वही व्यवहार सम्यक् चारित्र है। यह व्यवहार सम्यक् चारित्र भी नियमसे निश्चय सम्यक् चारित्रका अविनाभावी है।

मूलाचार मूलगुणाधिकार गाथा ३ की टीकामें व्रतका लक्षण करते हुए लिखा है-

व्रतशब्दोऽपि सावद्यनिवृत्तौ मोक्षावाप्तिनिमित्ताचरणे वर्तते।

व्रत शब्द भी सावद्यकी निवृत्ति होने पर मोक्ष प्राप्तिके निमित्तभूत आचरणमें व्यवहृत होता है।

ये जितने भी व्रत हैं वे अशुभसे निवृत्तिरूप और शुभमें प्रवृत्तिरूप ही हैं। इसीसे द्रव्यसंग्रहमें अशुभसे निवृत्ति और शुभमें प्रवृत्तिको चारित्र बतलाया है। व्रतोंका आस्रव तत्त्वमें अन्तर्भाव करनेका कारण भी यही है। इनके लक्ष्यसे शुभोपयोग होता है, शुद्धोपयोग नहीं होता, इसका भी यही कारण है। शुभोपयोग संवर और निर्जराका कारण न होकर मात्र आस्रव बन्धका हेतु है इसका विशेष खुलासा हम तीसरे प्रश्नके तीसरे उत्तरमें विशेष रूपसे कर आये हैं।

नियमसारमें जो आप्त, आगम और पदार्थोंके श्रद्धानको व्यवहार सम्यग्दर्शन कहा है उसका आशय ही इतना है कि इनके यथार्थ स्वरूपको जानकर इनमें प्रगाढ़ रुचि अर्थात् प्रगाढ़ भक्ति रखनी चाहिए और भक्ति प्रशस्त रागका उद्रेक विशेष है। अरिहन्तादिकमें ऐसा प्रशस्त राग सम्यग्दृष्टिके ही होता है, इसलिए इसे निश्चय सम्यक्त्वसे भिन्न व्यवहार सम्यक्त्व कहा है। मिथ्यात्व आदि सात प्रकृतियोंके उपशम, क्षय, क्षयोपशम होनेपर जो श्रद्धा गुणकी मिथ्यात्व पर्यायका व्यय होकर सम्यक्त्वरूप परिणाम होता है, जो कि आत्माकी विशुद्धिरूप है वह निश्चय सम्यक्त्व है। और उसके होनेपर जो सच्चे देवादिमें विशेष अनुराग होता है वह व्यवहार सम्यक्त्व है। इस प्रकार इन दोनोंमें महान् अन्तर है।

सम्भवतः अपर पक्षका यह ख्याल बना हुआ है कि रागविशेषके कारण निश्चय सम्यक्त्वको ही व्यवहार सम्यक्त्व कहते हैं, किन्तु यह बात नहीं है। वस्तुस्थिति यह है कि निश्चय सम्यक्त्व साथ जो सच्चे देवादि पर द्रव्यविषयक प्रशस्त राग होता है उसे ही व्यवहार सम्यक्त्व कहते हैं। इसी प्रकार व्यवहार सम्यग्ज्ञान और व्यवहार सम्यक् चारित्रके विषयमें खुलासा कर लेना चाहिए। अध्यात्ममें व्यवहारका लक्षण ही यह है कि जो जिस रूप न हो उसको उस रूप कहना व्यवहार कहलाता है। व्यवहारका यह लक्षण सद्भूत और असद्भूत दोनों प्रकारके व्यवहारोंमें घटित होता है। यदि इनमें अन्तर है तो इतना ही कि सद्भूत रूप वस्तु है तो, परन्तु सर्वथा पृथक् नहीं है। पर असद्भूत व्यवहारकी विषयभूत वस्तु मात्र उपचरित होती है उदाहरणार्थ हम पहले बृहद्द्रव्यसंग्रहका प्रमाण उपस्थित कर आये हैं। उसमें व्यवहार चारित्रको चारित्र उपचरित’असद्भूत व्यवहारनयसे बतलाया गया है। उसका आशय ही यह है कि व्यवहार चारित्र वास्तवमें चारित्र नहीं है किन्तु निश्चय चारित्रका सहचर होनेसे व्रतादिरूप प्रशस्त रागको उपचारसे चारित्र कहा गया है।

अपरपक्षने बृहद्व्यसंग्रह गाथा ४७ के ‘दुविहं पि मोक्खहेउं’’ इस वचनपर तो दृष्टिपात किया ही होगा। उसने आगममें यह भी पढ़ा होगा कि व्यवहार मोक्षमार्ग मोक्षका परम्परा हेतु है और निश्चय मोक्ष-मार्ग साक्षात् हेतु है। वह यह लिख ही रहा है कि व्यवहार मोक्षमार्ग साधक है और निश्चय मोक्षमार्ग साध्य है। ऐसी अवस्थामें वह पक्ष दो को एक ही क्यों बतलाने लगा है यह हमारी समझके बाहर है। जो निश्चयमोक्षमार्ग है वही यदि व्यवहार मोक्षमार्ग है तो फिर वे दोनों एक हुए। इनमें साधकसाध्यभावकी चरचा करना ही व्यर्थ है। और यदि वह इन्हें वास्तवमें दो मानता है तो इन दोनोंके पृथक्-पृथक् लक्षण भी स्वीकार करने चाहिए। साथ ही उन दोनोंको इस रूपमें मानना चाहिए कि एक आत्मामें उन दोनोंका सद्भाव एक साथ बन जाय। तभी तो उनमें-से एकको साधन ( निमित्त ) और दूसरेको साध्य कहा जा सकेगा। मिट्टी घटरूप परिणम रही हो, फिर भी उसका बाह्य साधन कुम्भकारादि न हो ऐसा मानना विचित्र बात है। तात्पर्य यह है कि निश्चय रत्नत्रयके साथ उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु अवश्य होनी चाहिए जिसमें साधन व्यवहार किया जा सके और वे दोनों परस्पर अविनाभावी होने चाहिए। स्पष्ट है कि यहाँपर श्रद्धाके विषयभूत देवादिकमें प्रशस्त रागको व्यवहार सम्यग्दर्शन कहा गया है, ज्ञानोपयोगके विषयभूत आगमाभ्यासमें प्रशस्त रागको व्यवहार सम्यग्ज्ञान कहा गया है और चर्याके विषयभूत व्रतादिके नियमरूप प्रशस्त रागको व्यवहार सम्यक्चारित्र कहा गया है। तथा आत्माके श्रद्धा, ज्ञान और चारित्रकी शुद्धिरूप परिणतिको निश्चय सम्यग्दर्शन, निश्चयसम्यग्ज्ञान और निश्चय सम्यक्चारित्र कहा गया है।

अपरपक्षने तीसरे प्रश्नके अपने तीसरे पत्रकमें तत्त्वार्थसूत्र अ० ७ सू० १ के आधारसे एक बात यह भी लिखी है कि ‘व्रत विरक्ति अर्थात् निवृत्तिरूप हैं, प्रवृत्तिरूप नहीं हैं।’ मालूम पड़ता है कि इसी कारण अपरपक्षको व्यवहार रत्नत्रयको देवादि विषयक प्रशस्त रागरूप माननेमें बाधा पड़ रही है। परन्तु उस पक्षका यह विधान मोक्षमार्गपर गहरा प्रहार करनेवाला है इसे वह पक्ष नहीं समझ रहा है। यह जीव मोक्षमार्गी कैसे बनता है उसका क्रम यह है कि ‘सर्वप्रथम यह जीव तत्त्वज्ञानपूर्वक कुदेवादिका त्यागकर सच्चे देवादिमें रुचि करता है, कुशास्त्रोंको छोड़कर सम्यक् शास्त्रोंका अध्ययन करता है, गुरुका उपदेश सुनता है और मिथ्यात्वकी पोषक क्रियाओंको छोड़कर देवपूजा आदि क्रिया करता है। इस प्रकार अशुभसे निवृत्त होकर शुभमें प्रवृत्त होता है।’ किन्तु इतना करनेमात्रसे उसे सम्यक्त्वकी प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि ये मोक्ष प्राप्तिके साक्षात् साधन नहीं हैं। मोक्षमार्गकी प्राप्तिके कालमें निमित्तमात्र हैं। इतनी भूमिका तो मिथ्यादृष्टिके ही बन जाती है फिर भी सम्यक्त्व नहीं होता है। कारण यह है कि इतना तो उसने अनन्त बार किया, परन्तु इसके साथ उसने स्वभाव सम्मुख होकर अपने आत्माका अनुभव एक बार भी नहीं किया। सम्यक्त्व-प्राप्तिका जो साक्षात् साधन है उसका अवलम्बन करे नहीं और सम्यक्त्व हो जाय यह नहीं हो सकता। और स्वभाव सम्मुख होनेका उपाय यह है कि उक्त जीवको ‘शुभमें न मग्न होय शुद्धता विसरनी नहीं’ वचनके अनुसार शुभमें मग्न होकर उपयोगमय चिच्चमत्काररूप आत्माके साथ सतत अनुगमन करनेवाले अपने आत्मस्वभावको दृष्टि ओझल नहीं कर देना चाहिए। कुम्भकारका मिट्टीको संयोगकर व्यापार हो नहीं तथा मनमें घट बनानेका विकल्प रखे नहीं। मात्र क्रिया तो वह दूसरेको लक्ष्यमें रखकर करे और विकल्प भी दूसरेका करता रहे फिर भी घटका निमित्त कहलावै। जैसे यह सम्भव नहीं है उसी प्रकार शुभ क्रियामें रत यह जीव क्रिया तो आत्मासे भिन्न अन्यको लक्ष्यमें रखकर करता रहे और मनमें विचार भी अन्यका करता रहे फिर भी वह क्रिया आत्मशुद्धिका निमित्त कहलावे यह भी सम्भव नहीं है। पहले आत्मप्राप्ति रूप प्रयोजन समझना चाहिए और उस प्रयोजनको लक्ष्यमें रखकर क्रिया होनी चाहिए, तभी वह क्रिया या वह विचार उसका निमित्त कहलानेका पात्र होता है। यहाँ मुख्य प्रयोजन संवर, निर्जरा और मुक्ति है। वह आत्माके अवलम्बन करनेसे ही होते हैं, परके अवलम्बन करनेसे नहीं। सच्चे देव, गुरु और शास्त्र आत्माके प्रतिनिधि हैं, इसलिए उनका गुणानुवाद, भक्ति और श्रद्धा करनेका उपदेश आगममें दिया गया है। जिन पुण्य पुरुषोंने आत्मस्वभावका अवलम्बनकर उसे प्राप्त किया है, निरन्तर उसका अपनी वाणी द्वारा भान कराते रहते हैं ऐसे सत्पुरुषोंके निरन्तर समागम करनेका उपदेश भी आगममें इसीलिए दिया गया है। किन्तु यही करना मुख्य नहीं है, मुख्य तो आत्मस्वभावका अवलम्बनकर तद्रूप परिणमन द्वारा अपनेमें संवरादिरूप शुद्धि उत्पन्न करना है। अतएव प्रकृतमें यही तात्पर्य समझना चाहिए कि अशुभ क्रियाके निरोधसे शुभ क्रिया होती है। स्वभाव सन्मुख होनेके लक्ष्यसे की गई वही क्रिया व्यवहारधर्म कहलाती है। संवर शुभाशुभपरिणामके निरोधस्वरूप होनेके कारण इन दोनोंसे भिन्न है। अनगारधर्मामृत अ० २ श्लोक ४१ की टीकामें कहा भी है-

भावसंवरः शुभाशुभपरिणामनिरोधः द्रव्यपुण्य-पापसंवरस्य हेतुरित्यर्थः।

शुभाशुभ परिणामका निरोध भावसंवर है। वह द्रव्य पुण्य-पापके संवरका निमित्त है।

जो जीव मोक्षमार्गके सन्मुख होता है या उत्तरोत्तरभाव संवर-निर्जरारूप विशुद्धि उत्पन्न करता है उसके लिए उसे प्राप्त करनेका क्रम ही यही है कि स्वभावके लक्ष्यसे पहले यह जीव अशुभसे निवृत्त होकर शुभमें जाता है। किन्तु शुभमें जाना ही इसका मुख्य प्रयोजन न होनेसे उसमें भी अशुभके समान हेय बुद्धि रखता हुआ स्वभाव सन्मुख होनेका उपक्रम करता रहता है। ऐसा करते रहनेसे कोई ऐसा अपूर्व अवसर आता है जब वह स्वभावमें मग्न हो तत्स्वरूप परिणमन द्वारा अपने संवरादिरूप शुद्धिको उत्पन्न करता है या उसमें वृद्धि करता है।

अपरपक्षने पंचास्तिकाय गाथा १०६ तथा जयसेनाचार्य कृत उसकी टीकाका जो उद्धरण दिया है उनका भी यही आशय है। आचार्य जयसेनने व्यवहार सम्यक्त्वका स्वरूप निर्देश करते हुए स्पष्ट कहा है- ‘बहिरंगपदार्थरुचिरूपम्।’ यह वचन ही सच्चे आप्त, आगम, पदार्थ विषयक प्रगाढ़ अनुरागको सूचित करता है। यहाँ रुचि शब्द प्रगाढ़ अनुरागके अर्थमें व्यवहृत हुआ है। यही भाव पंचास्तिकाय गाथा १६० का भी है। उसमें अन्य बात नहीं कही गई है। उस गाथाके शीर्षकके भावको हम मनसा स्वीकार करते हैं। वहाँ साधन शब्द निमित्तके अर्थमें आया है इसे अपर पक्ष भी स्वीकार करेगा और एकको दूसरेका निमित्त कहना यह उपचार है। तभी वह व्यवहार मोक्षमार्ग संज्ञाका अधिकारी है और तभी उस रूप परिणामको आस्रवतत्त्वमें गर्भित कर उसे बन्धका हेतु कहा गया है और तभी उसे संवर तत्त्वसे विलक्षण बतलाया गया है। उसकी आचार्य अमृतचन्द्र कृत टीकाका यही आशय है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जो बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा १३ की टीकाके वचनानुसार व्यवहारनयको साध्यभूत निश्चयनयका उपचरित हेतु स्वीकार न कर उसे परमार्थरूप मानता है वह सम्यग्दृष्टि नहीं है। हमने परमात्मप्रकाशके दूसरे अध्यायकी गाथा १४ पर दृष्टिपात किया है, उस द्वारा उसी व्यवहार मोक्षमार्गका निर्देश किया गया है जिसका हम पूर्वमें स्पष्टीकरण कर आये हैं। नियमसारकी ५१ प्रभृति पाँच गाथाओंपर हमने दृष्टिपात किया है। इनकी टीका करते हुए श्री पद्मप्रभमलधारीदेव भेदोपचार रत्नत्रयको निश्चयभक्ति रूप घोषित कर रहे हैं। टीका पर दृष्टिपात कीजिए। पदकी श्रद्धा आदि इसके सिवा और अन्य क्या हो सकता है। अपर पक्ष यदि इसे दृष्टिपथमें ले तो उसे यह स्वीकार करनेमें देर न लगे कि निश्चय रत्नत्रयसे भिन्न वह निश्चय भक्तिरूप अनुराग ही हो सकता है, अन्य कुछ नहीं।

नियमसारके चौथे अध्यायमें पाँच पापोंकी निवृत्तिको व्रत बतलाया है और उसे व्रत, समिति, गुप्तिरूप कहा है । इसीसे यह स्पष्ट है कि पापक्रियाओंसे निवृत्ति और व्रतादिरूप पुण्यक्रियाओंमें प्रवृत्तिका नाम ही व्रत है। दर्शनप्राभृतके उल्लेखसे भी यही सिद्ध होता है कि छह द्रव्यादिकी सच्ची श्रद्धा सम्यग्दृष्टिके ही होती है। यही बात रत्नकरण्डश्रावकाचारके वचनसे भी ज्ञात होती है। इसमें विरोध किसे है यह हमारी समझमें नहीं आया। यहाँ तो विचार इस बातका हो रहा है कि व्यवहार रत्नत्रय और निश्चय रत्नत्रय क्या वस्तु है, क्या वे दोनों एक हैं या भिन्न-भिन्न वस्तु हैं और उनमें साध्य-साधन भाव किस नयसे कहा गया है। यह अपर पक्ष ही विचार करे कि क्या उल्लेखोंका आशय स्पष्ट किये विना उनके उपस्थित कर देने मात्रसे देवादिविषयक प्रशस्त राग व्यवहार रत्नत्रय नहीं है इसकी पुष्टि हो जाती है? पूर्वोक्त प्रमाणोंके प्रकाशमें विचार कर देखा जाय तो अपर पक्षको विदित होगा कि आगम विरुद्ध हमारा कथन न होकर वस्तुतः अपर पक्ष ही ऐसा प्रयत्न कर रहा है जिसे आगम विरुद्ध कहना उपयुक्त होगा। दूसरेको शब्दों द्वारा लांछित करनेकी चेष्टा करना अन्य बात है और आगम प्रमाणोंके प्रकाशमें यथार्थका निर्णय करना अन्य बात है।

अपर पक्षने लिखा है कि ‘राग, भेद या विकल्प सहित जो सप्ततत्त्व आदिका श्रद्धान व ज्ञान तथा पापोंसे निवृत्तिरूप चारित्र है वह व्यवहार रत्नत्रय या व्यवहार मोक्षमार्ग है।’

हमने अपर पक्षके इस कथन पर दृष्टिपात किया। किन्तु अपर पक्ष हमारी इस धृष्टताको क्षमा करेगा कि वह जो कहना चाहता है वह शब्दों द्वारा व्यक्त नहीं हो पा रहा है। हमारी समझसे सद्भूत व्यवहार नयका आश्रय लेकर वह कहना यह चाहता है कि निश्चय सम्यक्त्वादि तीनोंमें-से एक-एकको मुक्तिका साधन कहना व्यवहार रत्नत्रय है। यहाँ तीनों मिलकर मुक्तिके साधन हैं, एक-एक नहीं, इसलिए तो यह व्यवहार उपचरित हुआ और प्रत्येकमें मुक्तिकी साधनता विद्यमान है, इसलिए वह व्यवहार सद्भूत हुआ। इस प्रकार निश्चय रत्नत्रयमें-से एक-एकको साधन कहना उपचरित सद्भूत व्यवहार नयका विषय है। या मुक्तिरूप परिणत आत्मा कार्य है और रत्नत्रय परिणत आत्मा उसका कारण है ऐसा भेद द्वारा कथन करना सद्भूत व्यवहार नयका विषय है। किन्तु अपर पक्षने वाक्य योजनाकर उस द्वारा जो कथन किया है वह असद्भूत व्यवहार नयसे ही कहा जा सकता है और ऐसी अवस्थामें देवादि विषयक श्रद्धा आदि प्रशस्त रागरूप ही ठहरते हैं। निश्चय नयकी दृष्टिमें प्रथम दो तो उपचरित हैं ही, क्योंकि अन्य कारण हो और अन्य कार्य हो या एक-एक कारण हो और मुक्ति कार्य हो यह यथार्थ न होनेसे इसे यह नय स्वीकार नहीं करता, प्रत्युत उसका निषेध ही करता है। इसके लिए समयसार गाथा २७२ पर दृष्टिपात कीजिए। किन्तु उपचरित असद्भूत व्यवहार नयसे जो कुछ कहा जाता है, वस्तु वैसी न होनेसे यह निश्चयनयकी दृष्टिमें सर्वथा हेय है। क्योंकि एक तो यह नय वस्तु जैसी नहीं है वैसी कहता है। दूसरे उसका साधन-साध्य आदि भावसे अन्यके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है, अतएव यह उपचरित असद्भूत व्यवहार नयका ही विषय है।

अपर पक्षने यहाँ जो पुरुषार्थसिद्ध्युपाय पंचास्तिकायकी आचार्य जयसेन कृत टीका तथा छहढालाके जो उदाहरण उपस्थित किये हैं वे सब उक्त कथनकी ही पुष्टि करते हैं। कोई समझे कि मोक्षमार्गीके व्यवहार रत्नत्रय होता ही नहीं, मात्र निश्चय रत्नत्रय ही होता है इस एकान्तका परिहार उन वचनोंसे होता है। किन्तु इन दोनोंका स्वरूप क्या है इसे समझना अन्य बात है। परमात्मप्रकाशमें धर्मपुरुषार्थ ( व्यवहारधर्म ) से मोक्षपुरुषार्थ ( निश्चयधर्म ) भिन्न है यह बतलाते हुए लिखा है-

धम्मह अत्थहँ कामहँ वि एवहँ सयलहँ मोक्खु ।
उत्तमु पभणहिं णाणि जिय अण्णें जेण ण सोक्खु ॥ २-३ ॥

हे जीव ! धर्म, अर्थ और काम इन सब पुरुषार्थोंसे ज्ञानी पुरुष मोक्षको उत्तम कहते हैं, क्योंकि अन्य पुरुषार्थोंसे परम सुख नहीं मिलता ॥ २-३ ॥

व्यवहार मोक्षमार्ग और निश्चय मोक्षमार्गमें साधन-साध्यभाव किस रूपमें है इसके लिए परमात्मप्रकाश अ० २ दोहा १४ के इस टीकावचन पर दृष्टिपात कीजिए-

अत्राह शिष्यः-निश्चयमोक्षमार्गो निर्विकल्पः, तत्काले सविकल्पमोक्षमार्गो नास्ति कथं साधको भवतीति । अत्र परिहारमाह-भूतनैगमनयेन परम्परया भवतीति । अथवा सविकल्प-निर्विकल्पभेदेन निश्चयमोक्षमार्गो द्विधा । तत्रानन्तज्ञानरूपोऽहमित्यादि सविकल्पसाधको भवति, निर्विकल्पसमाधिरूपो साध्यो भवतीति भावार्थः ।

यहाँ शिष्य प्रश्न करता है-निश्चय मोक्षमार्ग निर्विकल्प है, उस समय सविकल्प (व्यवहार रत्नत्रयरूप) मोक्षमार्ग नहीं है, वह साधक कैसे होता है ?

यहाँ समाधान करते हैं-भूत नैगमनयकी अपेक्षा परम्परासे साधन है । अथवा सविकल्प और निर्विकल्पके भेदसे निश्चय मोक्षमार्ग दो प्रकारका है । उनमें-से ‘मैं अनन्त ज्ञानरूप हूँ’ ऐसे विकल्पका नाम सविकल्प मोक्षमार्ग साधक है और निर्विकल्प समाधिरूप साध्य है यह इस कथनका भावार्थ है-

इससे व्यवहार मोक्षमार्ग क्या है और उसे साधन किस रूपमें कहा है इसका कुछ हद तक ज्ञान हो जाता है ।

अपर पक्षने निश्चय रत्नत्रयका ज्ञान करानेके लिए यहाँ पंचास्तिकाय, भावपाहुड, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, द्रव्यसंग्रह, परमात्मप्रकाश और छहढालाके कुछ प्रमाण उपस्थित किये हैं । उनसे इन बातोंका ज्ञान होता है-

\१. आत्माकी आत्मा द्वारा आत्मामें जो श्रद्धा, ज्ञान और आत्मस्थितिरूप स्वभाव परिणति होती है उसका नाम निश्चय रत्नत्रय है ।

\२. ऐसे रत्नत्रयसे बन्ध कैसे हो सकता है, अर्थात् त्रिकालमें नहीं होता ।

\३. निश्चयसे ऐसे रत्नत्रयकी उत्पत्तिका साधन आत्मा ही है । वह करण साधन होकर अपने द्वारा अपने आत्मामें आप कर्ता बनता हुआ निश्चय रत्नत्रयको उत्पन्न करता है ।

किन्तु व्यवहार रत्नत्रय इससे विरुद्ध स्वभाववाला है । इसका विषय स्व नहीं है, पर है, वह बन्ध स्वभाववाला है और वह निश्चय रत्नत्रयके कारण रत्नत्रय कहलाता है । साथ ही वह वीतराग देवादि पर पदार्थोंको साधन बनाकर उत्पन्न होता है, इसलिए वह प्रशस्त रागस्वभाववाला होनेके कारण सहचर सम्बन्धवश साधक कहा गया है । अतएव हमने जो यह लिखा है कि 'जहाँ निश्चय मोक्षमार्ग होता है वहाँ उसके साथ होनेवाले व्यवहार धर्मरूप रागपरिणामको व्यवहार मोक्षमार्ग आगममें कहा है वह आगम संगत ही लिखा है ।

अपर पक्षने उक्त कथनके स्पष्टतः पाषक जिन प्रमाणोंकी जिज्ञासा की थी वे यहाँ दिये ही हैं । हमें विश्वास है कि अपर पक्षको उनके आधार पर यथार्थका निर्णय करनेमें सहायता मिलेगी ।

तत्त्वार्थसूत्रमें हिंसादि क्रियाकी निवृत्तिका आस्रवतत्त्वमें अन्तर्भाव करना और द्रव्यसंग्रहमें व्रत, समिति और गुप्तिकी शुभक्रिया लिखकर उस रूप प्रवृत्तिको व्यवहार धर्म कहना ही यह सिद्ध करता है कि व्यवहार धर्म सच्चे देवादिविषयक प्रशस्त राग परिणामका ही दूसरा नाम है। जो भी बन्ध होता है वह पर्यायार्थिक नयसे योग और कषायको निमित्त कर ही होता है और व्यवहारधर्म बन्धका हेतु है, क्योंकि आचार्योंने उसका आस्रव तत्त्वमें अन्तर्भाव किया है; इसलिए उसे सच्चे देवादिविषयक प्रशस्त रागरूप ही जानना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

अपर पक्षने ‘व्यवहारधर्म निश्चयधर्ममें साधक है या नहीं ?’ यह प्रश्न किस अभिप्रायसे किया है इसे हम तत्काल समझ गये थे। किन्तु अपर पक्षने वर्तमानमें प्रवचनकी जो धारा चल रही है उसके आशयकी ओर लक्ष्य न देकर उसके प्रति विरोधका जो वातावरण बतलाया है वह उचित नहीं है। इससे समाजकी जो हानि हो रही है वह वचनातीत है। हम कुछ काल पूर्व हो गये ऐसे मनुष्योंको जानते हैं जिन्होंने मुनिलिंग तक धारण कर अपना पतन तो किया ही, समाजमें मोक्षमार्गके प्रति अश्रद्धा भी उत्पन्न की, पूर्वमें हो गये ऐसे त्यागियोंको भी जानते हैं। वर्तमानकालकी हम बात नहीं करना चाहते, क्या इतने मात्रसे जैसे व्यवहार कथनीका निषेध नहीं किया जा सकता उसी प्रकार यह देखकर कि कुछ मनुष्योंने निश्चय कथनीको सुनकर यद्वा तद्वा प्रवृत्तिको प्रारम्भ कर दिया है यह बात सच्ची हो तो, निश्चय कथनीका निषेध करना और उसके लिए आन्दोलन तकका मार्ग ग्रहण करना कहाँ तक उचित है इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे। जहाँतक समाजके उस वर्गका प्रश्न है जो निश्चय कथनीके शास्त्रोंका विशेषरूपसे अभ्यास करते हैं, उनके अनुरूप प्रवचनोंमें सम्मिलित होते हैं, उसके सम्बन्धमें हम यह दृढ़तापूर्वक कह सकते हैं कि न तो उनमेंसे बहुधा आलू आदि कन्दमूल, बेगन और शहद आदि अभक्ष्य भक्षण करते हैं, जो पूर्वमें करते रहे हैं उन्होंने उनका त्याग कर दिया है। प्रतिदिन देवदर्शन करना या देवपूजा करना तथा शास्त्रस्वाध्यायमें सम्मिलित होना यह उनका प्रधान कर्तव्य हो गया है। रात्रिभोजन भी उनमें प्रायः नहीं देखा जाता। किन्तु इसके विपरीत जो स्थिति समाजमें है उसकी हम अपर पक्षके समान लांछनके रूपमें चर्चा नहीं करना चाहते। हम तो यही चाहते हैं कि जिससे समाजमें प्रचलित व्यवहारधर्म प्राणवान् बन जाय और रही सही कुरीतियाँ भी नाम-शेष हो जायँ ऐसे मार्गको अंगीकार करना ही श्रेयस्कर है। क्या हम आशा करें कि अपर पक्ष विरोधके रुखको छोड़कर हमारे इस प्रयत्नमें सहयोगी बनेगा। हमारी ओरसे स्वागत है। वीतरागताकी दृष्टिसे एक मात्र यही मार्ग है जिसपर सबको मिलकर चलनेका संकल्प करना चाहिए।

यदि अपर पक्ष मोक्षमार्गप्रकाशकके आधारसे ही यह स्वीकार कर लेता है कि निश्चय धर्मकी प्राप्तिमें व्यवहारधर्म निमित्तमात्र है तो समस्या ही हल हो जाती है। ऐसी अवस्थामें अपर पक्षको व्यवहार धर्मका वही अर्थ स्वीकार करना होगा जिसका निर्देश हम पूर्वमें कर आये हैं।

अपर पक्षका कहना है कि ‘नयवाद पात्रके अनुसार होता है।’ इसका आशय इतना ही है कि पात्र उपदेशको सुनकर अपनी शक्तिके अनुसार उसे अंगीकार कर अपने जीवनमें उतारनेका प्रयत्न करता है।

आचार्य अमृतचन्द्रने ‘व्यवहारनयेन’ इत्यादि पंक्ति सविकल्प बुद्धिवाले जीवोंको लक्ष्यमें रखकर ही लिखी है। यहाँ ‘प्राथमिकाः’ पदका अर्थ सविकल्प बुद्धिवाले जीव ही है। जब कोई जीव विकल्पकी भूमिकामें होता है तो वह अपना उपयोग क्या श्रद्धान करने योग्य है और क्या श्रद्धान करने योग्य नहीं है इत्यादि तथ्यों के निर्णय करनेमें ही लगाता है। और ऐसा निर्णय करके वह अपने पुरुषार्थ द्वारा क्रमशः निर्विकल्पताकी ओर ढलने लगता है। जो अनादि कालसे भेदबुद्धिसे वासित चित्तवाले हैं उन्हें ऐसे निर्णय द्वारा तीर्थपर आरोहण करना सुगम होता है यह आचार्यके कथनका सार है । उनके द्वारा दिये गये उदाहरणसे भी यही सिद्ध होता है ।

अपर पक्षने समयसारकी १२वीं गाथा उद्धृत की है । उसके द्वारा जिस तत्त्वका प्रतिपादन हुआ है उसके लिए पद्मनन्दिपंचविंशतिकान्तर्गत एकत्वसप्तति अधिकारका यह श्लोक मार्गदर्शक है-

प्रमाण-नय-निक्षेपा अर्वाचीने पदे स्थिताः ।
केवले च पुनस्तस्मिंस्तदेकं प्रतिभासिते ॥ १६ ॥

सविकल्प अवस्थामें प्रमाण, नय और निक्षेप सब हैं । केवल निर्विकल्प अवस्थामें तो एक चैतन्य ही अनुभवमें आता है ॥१६॥

यहाँ अर्वाचीन पदका अर्थ व्यवहारपद सविकल्प अवस्था है और ‘केवले तस्मिन्’ पदसे निर्विकल्प अवस्थाका ग्रहण हुआ है । यही तथ्य समयसारकी १२वीं गाथामें प्ररूपित हुआ है । वहाँ भी “परमभावदरसीहिं” पद द्वारा शुद्ध आत्मतत्त्वको अनुभवनेवाले जीवोंका ग्रहण किया गया है और ‘अपरमे ट्ठिदा भावे’ पद द्वारा सविकल्प अवस्थाका ग्रहण हुआ है । इस तथ्यको समझनेपर ही उक्त गाथाका आशय स्पष्ट समझमें आता है । आचार्य अमृतचन्द्रने सोलह वानके सोनेका उदाहरण देकर यह स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार यह सोना अत्यन्त निर्मल होता है उसी प्रकार द्रव्यार्थिक नयका विषयभूत आत्मा समस्त परद्रव्य-भावोंसे भिन्न होनेके कारण अत्यन्त निर्मल है । ऐसा आत्मा ही शुद्धनयका विषय है । जो परम भावदर्शी-शुद्धात्म-भावदर्शी-जीव हैं वे ऐसे ही आत्माको अनुभवते हैं । किन्तु जो सविकल्प अवस्थामें स्थित जीव हैं उनका अशुद्ध सोनेके समान अशुद्ध आत्मा जाना हुआ प्रयोजनवान् है । इससे निश्चय-व्यवहार नयके कथनका प्रयोजन क्या है यह समझमें आ जाता है । यही परस्पर सापेक्ष उभय नयकी देशनाका तात्पर्य है । संसारी आत्मा परमभावग्राही द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा अत्यन्त शुद्ध है और पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा अत्यन्त अशुद्ध है । इस प्रकार एक ही आत्मा एक कालमें कथंचित् शुद्ध है और कथंचित् अशुद्ध है । जिनवाणी भी यही है ऐसा जानकर और पर्यायार्थिक नयके विषयको गौण कर जो द्रव्यार्थिक नयके विषयभूत आत्माको दृष्टिमें अवलम्बनकर तत्स्वरूप परिणमता है वही परम पदका अधिकारी होता है । यह १२वीं गाथा और उसकी दोनों टीकाओंका आशय है । इससे व्यवहार नयका विषय जाननेके लिए तो प्रयोजनवान् बतलाया पर आदर करने योग्य नहीं बतलाया यह तथ्य भी समझमें आ जाता है, क्योंकि कौन ऐसा मुमुक्षु जीव है कि जो जिस गुणस्थानमें है उसीमें रहना चाहेगा । उसका प्रयत्न तो निरन्तर आगे बढ़नेका ही होगा । और आगे बढ़ना उसी गुणस्थानके भावोंमें रत रहनेसे बन नहीं सकता । वह जिस गुणस्थानमें है उस गुणस्थानके अनुरूप ही प्रवृत्ति करेगा इसमें सन्देह नहीं । किन्तु उस प्रवृत्तिको आगे बढ़नेका साधन न मानकर अन्तरंगमें उस साधनको अपनानेकी चेष्टा करता रहेगा जो उसे वर्तमान गुणस्थानसे उठाकर यथायोग्य आगेके गुणस्थानोंमें पहुँचा देगा । ऐसा यदि कोई साधन है तो वह एकमात्र ज्ञायक भावका अवलम्बन ले तत्स्वरूप परिणमना ही है । इसमें जितनी प्रगाढ़ता आती जायगी उतना ही वह आगे बढ़ता जायगा । इसके सिवा मोक्षमार्गमें आगे बढ़नेका अन्य कोई साधन नहीं । यही कारण है कि निश्चय धर्मकी प्राप्तिमें व्यवहार धर्मको निमित्त मात्र कहा है । साक्षात् साधन तो ज्ञायक स्वभावका अवलम्बन कर तत्स्वरूप परिणमना ही है ।

आचार्य अमृतचन्द्र ने जो ‘जइ जिणमयं’ इत्यादि गाथा उद्धृत की है उसका भी यही आशय है । व्यवहार नयके अनुसार गुणस्थान भेद हैं, मार्गणास्थान भेद हैं और जीवसमास भेद हैं आदि । भला ऐसा कौन मुमुक्षु जीव है जो इसकी सत्ता नहीं मानेगा। यदि इन्हें न स्वीकार किया जाय तो उत्कृष्ट तीर्थकी प्रवृत्ति ही नहीं बन सकती और उसके अभावमें व्यवहार तीर्थकी सिद्धि नहीं होती। स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षामें उत्तम तीर्थका निर्देश करते हुए लिखा है-

रयणत्तयसंजुत्तो जीवो वि हवेइ उत्तमं तित्थं।
संसारं तरेइ जदो रयणत्तयदिव्वणावाए॥ १९१॥

रत्नत्रयसे संयुक्त यही जीव उत्तम तीर्थ है, क्योंकि वह रत्नत्रयरूपी दिव्य नावसे संसारको पार करता है॥ १९१॥

और इसी प्रकार ऐसा कौन मुमुक्षु जीव है जो शुद्ध नयके विषयभूत नित्य चिद्घनस्वभाव शुद्ध आत्मतत्त्वको नहीं स्वीकार करेगा, क्योंकि उसके अभावमें तत्त्वकी व्यवस्था ही नहीं बन सकती। फिर तो भेदव्यवहार या उपचरित व्यवहारकी बात करना ही व्यर्थ हो जाता है-‘मूलो नास्ति कुतः शाखा।’

इस प्रकार दो नय हैं और दोनोंके विषय हैं ऐसा प्रत्येक ज्ञानी जानता ही है। जिनमतकी प्रवृत्तिका यह मूल है।

\३. प्रश्न चारके परिशिष्टका ऊहापोह

इस परिशिष्टके प्रारम्भमें यह तो स्वीकार कर लिया है कि सच्चे देवादिविषयक भक्ति प्रमुख उत्कृष्ट अनुराग व्यवहार धर्म है। साथ ही इसमें बाह्य क्रियाको भी व्यवहार धर्ममें गर्भित किया गया है। किन्तु उस बाह्य क्रियासे आत्माकी प्रशस्त रागरूप परिणति ली गई है या पुद्गल द्रव्यकी क्रिया ली गयी है इसका स्पष्टीकरण नहीं किया गया है। क्रिया शब्द परिणामके अर्थमें भी आता है और परिस्पन्दके अर्थमें भी आता है। यदि अपर पक्षको बाह्य क्रियासे सच्चे देवादिविषयक प्रशस्त राग अपेक्षित है तो सम्यग्दृष्टिके ऐसे परिणामको सम्यक् व्यवहार धर्म मानना उपयुक्त ही है। किन्तु यदि बाह्य क्रियासे पुद्गलद्रव्यकी क्रिया ली गयी है तो वह पर द्रव्यका परिणाम है। सम्यग्दृष्टिके उसमें पर बुद्धि हो गई, इसलिए उसे आत्माका व्यवहार-धर्म कहना उचित नहीं है। प्रशस्त राग परिणतिमें वह निमित्त है, इसलिए उसे व्यवहार धर्म कहनेमें आता है यह तो उपचरितोपचारका भी उपचरितोपचार है। तथ्य समझमें आजावे इसलिए यह स्पष्टीकरण किया है।

अपर पक्षने परिशिष्टके तीसरे पैरामें आत्माके विशुद्ध-निर्विकार-वीतराग और स्वतन्त्र बननेके लक्ष्यको निश्चयधर्म संज्ञा दी है। किन्तु ऐसा लिखना ठीक नहीं है, क्योंकि लक्ष्यका नाम निश्चय धर्म न होकर विशुद्ध-निर्विकार-वीतरागरूप परिणतिका नाम निश्चय धर्म है।

अपर पक्षका कहना है कि “अविरत सम्यग्दृष्टि श्रावक और मुनियोंके बाह्याचाररूप व्यवहार धर्मको द्रव्यलिंग और इनके अन्तरंग आत्मविशुद्धिमय निश्चय धर्मको भाव लिंग भी कहते हैं।” समाधान यह है कि अपर पक्षने जो लिखा है उसपर विशेष ऊहापोह न करके मात्र उसका ध्यान भाव प्राभृतके इस वचनकी ओर आकर्षित कर देना चाहते हैं-

भावेण होइ लिंगी ण हु लिंगी होइ दव्वमित्तेण।
तम्हा कुणिज्ज भावं किं कीरइ दव्वलिंगेण॥ ४८॥

भावसे ही मुनि लिंगी होता है, द्रव्य मात्रसे लिंगी नहीं होता। इसलिए भाव लिंगको धारण करना चाहिए, क्योंकि द्रव्य लिंगसे क्या कार्य सध सकता है॥ ४८॥

इस गाथामें द्रव्यलिंगी पद भावशून्य मुनिके लिए ही आया है। गाथा ५० में इसके लिए द्रव्य श्रमण पदका भी प्रयोग किया गया है। गाथा ७२ में तो ऐसे मुनि को ही द्रव्य निर्ग्रन्थ लिखा है जो राग संयुक्त है और जिनभावनासे रहित है। देखिए-

जे रागसंगजुत्ता जिणभावणरहियदव्वणिग्गंथा।
ण लहंति ते समाहिं बोहिं जिणसासणे विमला॥ ७२॥

जो द्रव्य निर्ग्रन्थ राग संगसे युक्त होकर जिन भावनासे रहित हैं वे जिन शासनमें समाधि और बोधिको नहीं प्राप्त होते॥ ७२॥

अपर पक्षका कहना है कि 'निश्चयधर्मका प्रतिपादक करणानुयोग है, किन्तु यह बात नहीं है, क्योंकि निश्चयधर्मका कथन मुख्यतया द्रव्यानुयोगका विषय है। रत्नकरण्डश्रावकाचारमें द्रव्यानुयोगके स्वरूपका निर्देश करते हुए लिखा है-

जीवाजीवसुतत्त्वे पुण्यापुण्ये च बन्ध-मोक्षौ च।
द्रव्यानुयोगदीपः श्रुतविद्यालोकमातनुते॥ ४६॥

द्रव्यानुयोगरूपी दीपक जीव, अजीव, पुण्य, पाप, बन्ध और मोक्षतत्त्वरूपसे श्रुतविद्यारूपी आलोकको विस्तारता है॥ ४६॥

निश्चयधर्मका संवर, निर्जरा और मोक्षतत्त्वमें ही अन्तर्भाव होता है। अतः निश्चयधर्मका कथन द्रव्यानुयोगमें किया गया है ऐसा निर्णय करना ही उचित है।

अपर पक्षका कहना है कि ‘चौथे, पाँचवें और छठे गुणस्थानवाले जीवोंका लक्ष्य मुख्यतया बाह्य पुरुषार्थ पर रहना आवश्यक है।’ किन्तु ऐसा विधान करते हुए अपर पक्षने यहाँ बाह्य पुरुषार्थसे अर्थ पुरुषार्थ और कामपुरुषार्थ लिया है या धर्मपुरुषार्थ लिया है यह उक्त कथनसे ज्ञात न हो सका। जो कुछ भी हो, अपर पक्षका यह कथन है आगमविरुद्ध ही, क्योंकि अविरतसम्यग्दृष्टि और श्रावक जो भी बाह्य क्रिया करता है वह हेयबुद्धिसे ही करता है, अन्यथा वह अविरतसम्यग्दृष्टि और श्रावक कहलानेका पात्र नहीं। समयसार निर्जराधिकारमें ऐसे जीवोंकी बाह्य परिणतिको तीन दृष्टान्तों द्वारा स्पष्ट किया गया है-पहला उदाहरण विष खानेवाले वैद्यका दिया है, दूसरा उदाहरण अरतिभावसे मद्य पीनेवालेका दिया है और तीसरा उदाहरण पर घरमें प्रकरणचेष्टा करनेवालेका दिया है। सागारधर्मामृतमें कोतवालके द्वारा पकड़े गये चोरके समान सम्यग्दृष्टिको बतलाया है। इससे स्पष्ट है कि उक्त जीवोंके व्यवहार धर्मको करते हुए भी अन्तरंगमें मुख्यता निश्चयधर्मकी ही रहती है। सागारधर्मामृतके मंगलाचरणका ‘तद्धर्मरागिणाम्’ पद विशेषरूपसे ध्यान देने योग्य है। नीची पदवीमें रहना यह न तो सम्यग्दृष्टिको ही इष्ट होता है और न श्रावकको ही। अब रही मुनिकी बात सो उसके तो संज्वलन कषायजन्य अल्प प्रमादके कालमें ही अन्तर्मुहूर्त कालके लिए बाह्य प्रवृत्ति देखी जाती है। उनकी जो सामायिक आदि षट्क्रियाएँ होती हैं वे नियमसे सामायिक पूर्वक ही होती हैं। इसीसे उन्हें निश्चय षट्क्रिया संज्ञा मूलाचारमें दी गई है। मूलाचार प्रथम भाग गा० ३ की टीका में लिखा है-

आवश्यककर्तव्यानि आवश्यकानि निश्चयक्रियाः सर्वकर्मनिर्मूलनसमर्थनियमाः।

इससे स्पष्ट है कि बाह्यक्रिया करते हुए भी मुनिके जीवनमें निश्चयधर्म गौण हो ही नहीं सकता।

अपर पक्षने यहाँ पर अपने विचारोंकी पुष्टिमें समयसार गाथा १२ का उपयोग किया है। किन्तु उस गाथाका आशय ही दूसरा है। इसका स्पष्ट खुलासा थोड़े ही पहले हम कर आये हैं। अपर पक्षने इसका जो आशय लिया है वह ठीक नहीं यह उक्त विवेचनसे स्पष्ट हो जाता है।

अपर पक्षका यह लिखना भी आगम विरुद्ध है कि व्यवहारधर्मका सद्भाव निश्चयधर्मके अभावमें भी पाया जाता है, क्योंकि जैसे सम्यग्दर्शनके पूर्व जितना भी ज्ञान होता है वह मिथ्याज्ञान माना गया है इसी प्रकार निश्चयधर्मके पूर्व जितनी भी क्रिया होती है वह यथार्थ नहीं मानी गई है। निश्चयधर्मके साथ होनेवाली पुण्यपरिणतिरूप बाह्य क्रियाको ही आगममें व्यवहार धर्म कहा है, अन्यथा अट्ठाईस मूलगुण रूप द्रव्यलिंगकी आगममें निन्दा नहीं की गई होती। इससे स्पष्ट है कि निश्चयधर्मके पूर्व व्यवहारधर्म होता ही नहीं । जो होता है वह उस पदका व्यवहारधर्म नहीं। अन्तरंगमें अनन्तानुबन्धी आदिका उदय बना रहे और कोई जीव मन्दकषाय वश बाह्य क्रिया करने लगे, फिर भी वह निश्चयधर्मके कालमें होनेवाले अविरत सम्यग्दृष्टि आदि पदका व्यवहारधर्म कहलावे यह विचित्र बात है। निमित्त-नैमित्तिक योग एक कालमें होता है। पहले निमित्त था और बादमें नैमित्तिक हुआ ऐसा कार्य-कारणभाव नहीं है। हाँ अपर पक्ष अपने विधान द्वारा यह स्वीकार करना चाहता है कि निश्चयधर्मकी प्राप्तिके पूर्व जो क्रिया होती थी वह निश्चयधर्मकी प्राप्तिके कालमें व्यवहारधर्म संज्ञाको प्राप्त हो जाती है। तो बात दूसरी है किन्तु अपर पक्ष उससे जो यह अर्थ फलित करना चाहता है कि पहलेकी क्रियाके कारण निश्चयधर्मकी प्राप्ति होती है वह गलत है। कौन कार्य किस क्रमसे होता है इसका कथन करना अन्य बात है और निमित्त-नैमित्तिकपनेके आधार पर कार्य-कारणका विचार करना अन्य बात है।

अपर पक्षने समयसारकी ‘अप्पडिकमणं दुविहं’ गाथा उद्धृत कर तीन गाथाओंकी टीका दी है। और उस परसे यह सिद्ध किया है कि ‘पर द्रव्य निमित्त कारण है और आत्माके रागादि विकार पर द्रव्यके निमित्तसे होते हैं।’ पर अपर पक्ष इस तथ्यको भूल जाता है कि पर द्रव्यमें रागादिकी निमित्तताका व्यवहार कब होता है, उनके प्रति प्रीति-अप्रीति करने पर या सदा काल ही। यदि वे सदा काल निमित्त हैं तो इस जीवके रागादिका परिहार होना सदा काल असम्भव है। यदि इस दोषसे बचनेके लिए अपर पक्षका यह कहना हो कि जब यह जीव उनके प्रति प्रीति-अप्रीतिरूप परिणाम करता है तभी वे रागादिकी उत्पत्तिमें निमित्त हैं, अन्यथा नहीं। तो इससे सिद्ध हुआ कि यह रागाविष्ट जीव आप कर्ता होकर रागादिको उत्पन्न करता है, पर जिनको लक्ष्य कर यह रागादिको उत्पन्न करता है उनके साथ रागादि परिणामोंका निमित्त-नैमित्तिकपना बन जानेसे उनका प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान कराया जाता है। जैसे आत्मा स्वभावसे रागादिकका कर्ता नहीं है, वैसे ही पर द्रव्य भी स्वभावसे रागादिकके उत्पादक नहीं हैं। उनमें उत्पादकताका व्यवहार तभी बनता है जब कि उनके लक्ष्यसे आत्मा रागी, द्वेषी हो परिणमता है। आत्मामें पायी जानेवाली क्रोधादिरूपताके सम्बन्धमें भी इसी न्यायसे विचार कर लेना चाहिए। इसका विशेष ऊहापोह ५वें प्रश्नके तीसरे उत्तरमें करनेवाले हैं ही। पण्डित प्रवर दौलतरामजीने छहढालाकी तीसरी ढालमें व्यवहारधर्ममें जो निश्चयधर्मकी हेतुताका उल्लेख किया है वह व्यवहारहेतुताकी दृष्टिसे ही किया है। व्यवहार धर्म जब कि स्वयं उपचरित धर्म है तो वह निश्चयधर्मका उपचरित हेतु ही हो सकता है। इससे सिद्ध होता है कि व्यवहारधर्म निश्चयधर्मका परमार्थसे साधक नहीं है। उसे निश्चयधर्मका साधक उपचार नयका आश्रय करके ही कहा गया है।

शंका ५, प्रथम दौर: शंका ५ और उसका समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १५८ से १५९

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प्रथम दौर

:१ः

शंका ५

द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत-क्रमसे ही होती हैं या अनियत क्रमसे भी ?

समाधान

(१) द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं। सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं, इसका स्पष्टीकरण करते हुए स्वामी कार्तिकेय द्वादशानुप्रेक्षामें कहते हैं-

जं जस्स जम्मि देसे, जेण विहाणेण जम्मि कालम्मि।
णादं जिणेण णियदं जम्मं वा अह व मरणं वा ॥३२१॥
तं तस्स तम्मि देसे तेण विहाणेण तम्मि कालम्मि।
को सक्कइ चालेदुं इंदो वा अह जिणिंदो वा ॥३२२॥
एवं जो णिच्छयदो जाणदि दव्वाणि सव्वपज्जाए।
सो सद्दिट्ठी सुद्धो जो संकदि सो दु कुदिट्ठी ॥३२३॥

अर्थ-जिनेन्द्रदेवने जिस जन्म अथवा मरणको जिस जीवके जिस देशमें जिस विधिसे जिस कालमें नियत जाना है उसे उस जीवके उस देशमें उस विधिसे उस कालमें शक्र अथवा जिनेन्द्रदेव इनमेंसे कौन चलायमान कर सकता है, अर्थात् कोई भी चलायमान नहीं कर सकता। इस प्रकार जो निश्चयसे सब द्रव्यों और उनकी सब पर्यायोंको जानता है वह शुद्ध सम्यग्दृष्टि है और जो शंका करता है वह कुदृष्टि है ॥३२१-३२३॥

यह आगम प्रमाण है इसमें भिन्न टाईपमें दिये गये पद ध्यान देने योग्य हैं। उनसे स्पष्ट ज्ञात होता है कि सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायें जिस देश और जिस कालमें होती हैं वे उस देश और उस कालमें नियत क्रमसे ही होती हैं, अनियत क्रमसे नहीं होतीं।

(२) आगममें उपादान कारणका जो लक्षण स्वीकार किया है उसका सम्यक् प्रकारसे पर्यालोचन करनेपर भी यही ज्ञात होता है कि सभी द्रव्योंकी सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती है, अनियत क्रमसे नहीं होतीं। लक्षण इस प्रकार है-

पुव्वपरिणामजुत्तं कारणभावेण वट्टदे दव्वं।
उत्तरपरिणामजुदं तं चिय कज्जं हवे णियमा ॥२३०॥
-स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा

अर्थ-अनन्तर पूर्व परिणामसे युक्त द्रव्य कारणरूपसे ( उपादान कारण रूपसे ) प्रवर्तित होता है और अनन्तर उत्तर परिणामसे युक्त वही द्रव्य नियमसे कार्यरूप होता है ॥२३०॥

यह उपादान कारणका अव्यभिचारी लक्षण है। इसका स्पष्ट रूपसे विश्लेषण करनेपर उससे यही फलित होता है कि सभी द्रव्योंकी सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं, क्योंकि पूर्व-पूर्व क्षणवर्ती उस-उस पर्याय युक्त द्रव्य यथार्थ उपादान कारण होनेसे उस द्वारा प्रत्येक समयमें नियत क्रमसे ही कार्य उत्पत्तिको प्रसिद्धि होती है, अनियत क्रमसे कार्य उत्पत्तिकी प्रसिद्धि त्रिकालमें होना सम्भव नहीं है।

यहाँपर उपादान कारणके लक्षणका आश्रय लेकर सभी द्रव्योंकी होनेवाली सभी पर्यायोंका जो नियत क्रमसे होनेका समर्थन किया गया है वह कथन केवल तर्कका सहारा लेकर ही नहीं किया गया है। किन्तु आगममें ऐसे अनेक प्रमाण उपलब्ध होते हैं जो इस विषयके समर्थनके लिये पर्याप्त हैं। प्रकृतमें इस प्रमाणको पढ़िये-

निश्चयनयाश्रयणे तु यदनन्तरं मोक्षोत्पादस्तदेव मुख्यं मोक्षस्य कारणं अयोगिकेवलिचरमसमय-वर्तिरत्नत्रयमिति । -तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० १ पृ० ७१

अर्थ-निश्चयनयका आश्रय लेनेपर तो जिसके अनन्तर मोक्षका उत्पाद होता है, अयोगकेवलीके अन्तिम समयमें होनेवाला वही रत्नत्रय मोक्षका मुख्य (प्रधान-साक्षात्) कारण (उपादान कारण) है।

आचार्यवर्य विद्यानन्दि स्वामी इसके पूर्व इसी तथ्यका दृढ़ता पूर्वक समर्थन करते हुए क्या कहते हैं यह उन्हींके आगमस्वरूप शब्दोंमें पढ़िए-

न हि-द्वत्रयादिसिद्धक्षणैः सहायोगिकेवलिचरमसमयवर्तिनो रत्नत्रयस्य कार्य-कारणभावो विचारयितु-मुपक्रान्तः येन तत्र तस्यासामर्थ्यं प्रसज्यते। किं तर्हि प्रथमसिद्धक्षणेन सह। तत्र च तत् समर्थमेवेत्यसच्चोद्य-मेतत् । कथमन्यथाग्निः प्रथमधूमक्षणमुपजनयन्नपि तत्र समर्थः स्यात्, धूमक्षणजनितद्वितीयादिधूम-क्षणोत्पादे तस्यासमर्थत्वेन प्रथमधूमक्षणोत्पादनेऽप्यसामर्थ्यप्रसक्तेः । तथा च न किंचित् कस्यचित् समर्थं कारणम्। न चासमर्थात्कारणादुत्पत्तिरिति क्वेयं वराकी तिष्ठेत् कार्यकारणता।
-श्लोकवार्तिक अ० १ पृ० ७१

अर्थ-प्रकृतमें द्वितीय आदि सिद्धक्षणोंके साथ अयोमकेवलीके अन्तिम समयवर्ती रत्नत्रयका कार्य-कारणभाव विचार करनेके लिए प्रस्तुत नहीं है, जिससे उसकी उत्पत्तिमें उसकी असामर्थ्य प्राप्त होवे। तो क्या है? प्रथम सिद्धक्षणके साथ ही प्रकृतमें उसका विचार चल रहा है और उसकी उत्पत्तिमें वह समर्थ उपादान कारण ही है, इसलिये पूर्वोक्त शंका ठीक नहीं है। यदि ऐसा न माना जावे तो अग्नि ( उपादान कारण बनकर ) प्रथम धूमक्षणको उत्पन्न करती हुई भी उसकी उत्पत्तिमें वह समर्थ कैसे हो सकती है, क्योंकि ऐसी स्थितिमें धूमक्षणोंके द्वारा उत्पन्न किये गये द्वितीय आदि धूमक्षणोंके उत्पन्न करनेमें उसके (अग्निके ) असमर्थ होनेसे प्रथम धूमक्षणके उत्पन्न करनेमें भी उसकी असामर्थ्यके प्राप्त होनेका प्रसंग आता है। और ऐसा होनेपर कोई भी किसीका समर्थ कारण नहीं बन सकता। और असमर्थ कारणसे कार्यकी उत्पत्ति होती नहीं, ऐसी स्थितिमें यह विचारी कार्य-कारणता कैसे ठहरेगी अर्थात् तब कार्य-कारणताका स्वीकार करना ही निष्फल हो जायगा।

इस प्रकार इस उल्लेखका सम्यक् प्रकारसे विचार करनेपर यही निष्पन्न होता कि प्रत्येक समयमें नियत कार्यकी ही उत्पत्ति होती है और उसका उपादान कारण भी नियत ही होता है। अतएव समस्त आगमपर दृष्टिपात करनेपर विचारकोंको एकमात्र यही मानना उचित है कि सभी द्रव्योंकी होनेवाली सभी पर्यायें नियत-क्रमसे ही होती हैं अनियत क्रमसे त्रिकालमें नहीं होतीं।

शंका ५, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १६० से १६६

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका ५

द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं या अनियत क्रमसे भी ?

प्रतिशंका २

इस प्रश्नके उत्तरमें जो आपने यह लिखा है कि ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं’ आपका यह लिखना निराधार है, क्योंकि किसी भी सिद्धान्त ग्रंथमें समस्त पर्यायोंको नियत क्रमसे ही होना नहीं बतलाया है। अतः किसी भी ग्रन्थमें क्रमबद्धपर्यायका उल्लेख नहीं पाया जाता। यदि किसी भी ग्रन्थमें क्रमबद्धपर्यायका उल्लेख हो तो बतलानेकी कृपा करें।

आपने अपने कथनकी पुष्टिमें जो स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा की ‘जं जस्स जम्मि देसे’ आदि तीन गाथाओंका उद्धरण दिया है, उनमें न तो कहीं क्रमबद्ध-पर्यायका उल्लेख है, न उनसे क्रमबद्ध पर्यायका समर्थन होता है।

यदि कोई व्यक्ति अपना मरण टालनेके लिये किसी देवी-देवताकी आराधना द्वारा प्रयास करे तो उसको समझानेके लिये स्वामिकार्तिकेयने इन गाथाओं द्वारा यह अभिव्यक्त किया है कि मरण कालको इन्द्र या देव यहाँ तक कि जिनेन्द्र भी नहीं टाल सकते। इस तरह जीवन बचानेके अभिप्रायसे कुदेव आदिकी आराधनासे बचानेके लिये ग्रन्थकारने गाथाओंको लिखा है, जिसका स्पष्टीकरण निम्न प्रकार है।

श्री स्वामिकार्तिकेयने धर्मानुप्रेक्षामें गाथा ३११-३१८ तक ‘सम्यग्दृष्टिको तत्त्व श्रद्धान किस प्रकार होता है’ उसका कथन किया है। उसमें प्रथम यह कहा है-‘जो तच्चमणेयंतं णियमा सद्दहदि’ अर्थात् सम्यग्दृष्टि नियमसे तत्त्वोंका अनेकान्तात्मकरूपसे श्रद्धान करता है यानी एकान्त रूपसे श्रद्धान नहीं करता। जब सम्यग्दृष्टि अनेकान्त रूपसे श्रद्धान करता है तो उसको एकान्त नियतिवादका जिसको कि द्वादशाङ्गमें मिथ्यात्व कहा है, कैसे उपदेश दिया जा सकता है।

गाथा ३१९ से ३२२ तक चार गाथाओंमें कुदेवकी पूजाके निषेधके लिए इस प्रकार उपदेश दिया है-

ण य को वि देदि लच्छी ण को वि जीवस्स कुणदि उपयारं ।
उवयारं अवयारं कम्मं पि सुहासुहं कुणदि ॥ ३१९ ॥

अर्थ-न तो कोई जीवको लक्ष्मी देता है और न कोई उसका उपकार करता है, शुभाशुभ कर्म ही जीवका उपकार और अपकार करते हैं ॥ ३१९ ॥

भत्तीए पुज्जमाणो विंतर-देवो वि देदि जदि लच्छी।
तो किं धम्मे कीरदि एवं चिंतेइ सद्दिट्ठी ॥ ३२० ॥

अर्थ-यदि व्यन्तर देवी-देवता भक्ति-पूजा करनेसे लक्ष्मी देते हैं तो फिर धर्म क्यों किया जावे, सम्यग्दृष्टि ऐसा विचार करता है।

इसी विचारको दृढ़ करनेके लिये यह उपदेश दिया गया है । अथवा सम्यग्दृष्टि यह विचार करता है कि जब इन्द्र व जिनेन्द्र भी तेरे कर्मोंको नहीं टाल सकते तो अन्य तुच्छ देव तेरे कर्मोंको कैसे टाल सकेंगे ।

जं जस्स जम्मि देसे जेण विहाणेण जम्मि कालम्मि ।
णादं जिणेण णियदं जम्मं वा अह व मरणं वा ॥ ३२१ ॥
तं तस्स तम्मि देसे तेण विहाणेण तम्मि कालम्मि ।
को सक्कदि चालेदुं इंदो वा अह जिणिंदो वा ॥ ३२२ ॥

अर्थ-जिस जीवके जिस देशमें जिस कालमें जिस विधानसे जो जन्म अथवा मरण जिन देवने नियत रूपसे जाना उस जीवको उसी देशमें उसी कालमें उसी विधानसे वह अवश्य होता है, उसे इन्द्र अथवा जिनेन्द्र कौन टाल सकनेमें समर्थ है ॥ ३२१-३२२ ॥

इन गाथाओंका जो निष्कर्ष यहाँ बतलाया गया है उसकी पुष्टि गाथा नं० ३१९ से इस तरह होती है कि उसमें एकान्त नियतिवादके विरुद्ध शुभाशुभ कर्मोंको जीवके उपकार-अपकारका निमित्त कारण स्पष्ट बतलाया है । अर्थात् जीवका उपकार या अपकार मात्र काल पर निर्भर नहीं है, किन्तु बाह्य कारणोंके अनुसार शुभाशुभ कर्मोदयके अधीन है ।

इसी ग्रन्थ की गाथा नं० २१९ भी है जो हमें यह बतलाती है कि काल, द्रव्य, क्षेत्र, भव, भावादि लब्धियोंसे युक्त और नाना शक्तियोंसे संयुक्त पदार्थोंके परिणमनको कोई भी वारण करनेमें समर्थ नहीं है । इसका भी आशय केवल यह है कि यदि निमितभूत और उपादानभूत परिपूर्ण सामग्री जहाँ निराबाध उपस्थित है वहाँ कार्योत्पत्ति टालनेमें कोई भी समर्थ नहीं है । टीकामें भी इसी प्रकार कहा है-

यथा तण्डुलाः ओदनशक्तियुक्ताः इन्धनाग्निस्थालीजलादिसामग्रीं प्राप्य भक्तपरिणामं लभन्ते ।

अर्थ-जैसे भात शक्ति युक्त चावल ईंधन, आग, बटलोई, जल आदि सामग्रीके मिलने पर ही भातरूप हो जाते हैं ।

इस तरह ये सब प्रमाण ऐकान्तिक नियतिवादका समर्थन करनेमें बिल्कुल असमर्थ हैं । गाथा २१९ इस प्रकार है-

कालाइलद्धिजुत्ता णाणासत्तीहि संजुदा अत्था ।
परिणममाणा हि सयं ण सक्कदे को वि वारेदुं ॥ २१९ ॥

इस गाथा २१९ में पदार्थोंको नाना शक्तियुक्त बतलाया गया है, किन्तु पदार्थ उत्तर समयमें उसी कार्यरूप परिणत होते हैं जिसके अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र आदि निमित्त कारणरूप सामग्री प्राप्त होती है । अर्थात् उत्तर पर्यायका कार्य नियत नहीं ।

इसकी पुष्टि इसी ग्रंथकी गाथा २२२ की टीकाके निम्नलिखित वाक्योंसे होती है ।

द्रव्यं जीवादि वस्तु पूर्वपरिणामयुक्तं पूर्वपर्यायाविष्टं कारणभावेन उपादानकारणत्वेन वर्तते । तदेव द्रव्यं जीवादि वस्तु उत्तरपरिणामयुक्तं उत्तरपर्यायाविष्टं तदेव द्रव्यं पूर्वपर्यायाविष्टं कारणभूतं मणिमन्त्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन उत्तरक्षणे कार्यं निष्पादयत्येव ।

अर्थ-जो जीवादि वस्तु पूर्व पर्यायकी हालतमें उपादान कारण रूपसे रहती है वही जीवादि वस्तु यदि निर्मापक संपूर्ण निमित्तोंके साथ मणि मंत्रादिक बाह्य सामग्री और अप्रतिबद्ध सामर्थ्यसे संपन्न हो तो वह उत्तर क्षणमें कार्यको निष्पन्न करती ही है । अर्थात् उसको कोई वारण करनेमें समर्थ नहीं है । इतना ही अभिप्राय ग्रंथकर्ताका है ।

स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा ३१९-३२२ में वस्तु स्वरूप नहीं बतलाया गया है, किन्तु कुदेव आदि की पूजाके निषेधार्थ यह उपदेश दिया गया है। जैसे बारह भावनाओंमें वैराग्य उत्पन्न करानेके लिए ‘अनित्य भावना’ का उपदेश है। किन्तु वस्तु स्वरूप मात्र अनित्य नहीं है. वस्तु स्वरूप तो नित्यानित्यात्मक है। दूसरी बात यह है कि यद्यपि इन्द्र या जिनेन्द्र किसी अन्य जीवके कर्मोंको टालनेमें असमर्थ हैं, किन्तु वह जीव तो स्वयं अपने पुरुषार्थ द्वारा कर्मोंके उदयादिको टाल सकता है, अन्यथा मोक्षमार्गका उपदेश निरर्थक हो जावेगा ।

श्री पं० फूलचन्दजी इसी ग्रंथकी ३२३ गाथाका सम्बन्ध सिर्फ ३२१ और ३२२ से ही जोड़ना चाहते हैं जो गलत है, कारण कि उसका सम्बन्ध ३११ से ३२२ तककी गाथाओंसे है ।

यदि जीव अपने परिणामों द्वारा कर्मोंकी स्थिति-अनुभागको खण्डन करके अविपाक निर्जरा (नियत कालसे पूर्व उदयमें लाकर खिराना) नहीं कर सकता तो मोक्षका अभाव हो जायगा और ‘तपसा निर्जरा च ।’ त० सू० ९-३ सूत्र से विरोध आजायगा ।

इसके अतिरिक्त इन गाथाओंमें यह बात कही नहीं बतलाई कि कोई भी व्यक्ति अपने पुरुषार्थसे अपने पूर्वबद्ध कर्मोंको उत्कर्षण, अपकर्षण, संक्रमण, उदीरणा आदि रूपमें घटाना, बढ़ाना, पलटना नियत समयसे पूर्व उदयमें लेआना, कर्मोंकी नियत स्थिति तथा अनुभागका खंडन करना आदि नहीं कर सकता, यानी जिस कर्म पर्यायके पलटनेमें जिनेन्द्र, इन्द्र आदि भी समर्थ नहीं हैं उस पर्याय परिवर्तन को जीव अपने पुरुषार्थसे करनेमें समर्थ है ।

इसीलिये ‘जिनका जहाँ जब जिस प्रकार जिससे जिसके द्वारा जो होना होता है, तब तहाँ तिसका तिस प्रकार उससे उसके द्वारा वह होना नियत है, अन्य कुछ नहीं कर सकता’ ऐसा एकान्त नियतिवादका लक्षण करके उसको अमितगति आचार्यने पंचसंग्रह श्लोक ३१२ तथा श्रीसिद्धान्त चक्रवर्तीने गो० क० गाथा ८८२ तथा प्राकृत पंचसंग्रह पृ० ५४७ में एकान्त मिथ्यात्व कहा है ।

इसके सिवाय ऐसा भी एकान्त नहीं है कि पूर्वबद्ध आयुकर्मके अनुसार नियत समय पर ही जीवोंकी मृत्यु अवश्य हो जाती है, क्योंकि सर्वज्ञदेवने अकालमृत्युका भी विधान किया है और जिसका श्री कुन्दकुन्दाचार्यने भावपाहुड की २५-२६-२७ वीं गाथाओंमें स्पष्ट उल्लेख किया है ।

श्री उमास्वामी आचार्यने तत्त्वार्थसूत्रके द्वितीयाध्यायके अन्तिम सूत्रमें भी निश्चित आयुकी समाप्ति से पहले भी बाहरी निमित्त कारणों द्वारा मृत्यु(अकाल मृत्यु) हो जाना अनेक जीवोंके बतलाया है। उस सूत्रकी व्याख्या करते हुए श्री अकलंकदेवने तत्त्वार्थराजवार्तिकमें निम्नलिखित रूपसे उल्लेख किया है-

अप्राप्तकालस्य मरणानुपलब्धेरपवर्ताभाव इति चेन्न, दृष्टत्वादाम्रफलादिवत् ॥ १० ॥

व्याख्या-यथावधारितपाककालात्प्राक् सोपायोपक्रमे सति आम्रफलादिनां दृष्टः पाकः तथा परिच्छिन्नमरणकालात्प्राक् उदीरणाप्रत्यय आयुषो भवत्यपवर्तः ।

अर्थ-शङ्का-अप्राप्त कालवाले जीवका मरण उपलब्ध नहीं होता, इसलिये अकालमृत्यु नही है ?

उत्तर-यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि अप्राप्तकाल मरण भी देखा जाता है । जैसे कि आम्रफल निश्चित कालसे पहले उपाय द्वारा पका लिया जाता है वैसे ही निश्चित मरण कालसे पहले उदीरणा द्वारा आयुका व्याघात होता हैं ।

आयुर्वेदसामर्थ्याच्च ॥ ११ ॥

अर्थ-आयुर्वेदकी सामर्थ्यसे भी अकाल मृत्युकी सिद्धि होती है ।

इसका विशेष स्पष्टीकरण इस वार्तिककी वृत्तिमें देखिये। इस अकाल मृत्युके विधानसे प्रमाणित होता है कि आयु समाप्तिसे पूर्व भी दुर्घटनावश आयुक्रमका भंगकर साधारण जीवोंका मरण हो जाता है ।

अकाल में दिव्यध्वनि

तीर्थकरकी दिव्यध्वनिका समय यद्यपि नियत होता है तथापि बाहरी प्रबल निमित्त कारण मिलने पर असमयमें भी उस नियमको भंगकर दिव्यध्वनि खिरा करती है ।

जयधवला पु० १ पृ० १२६ में लिखा है-

तिसंज्झविसयछघडियासु णिरंतरं पयट्टमाणिया इयरकालेसु संसयविवज्जासाणज्झवसायभावगयगणहरदेवं पडि वट्टमाणसहावा संकरवदिगराभावादो विसदसरूवा ।

अर्थ-जो दिव्यध्वनि प्रातः मध्याह्न और सायंकाल इन तीन संध्याओंमें छह छह घड़ी तक खिरती रहती है और उक्त समयको छोड़कर इतर समयमें गणधरदेवके संशय विपर्यय और अनध्यवसाय भावको प्राप्त होने पर उनके प्रति प्रवृत्ति करना अर्थात् उनके संशयादिकको दूर करना जिसका स्वभाव है तथा संकर व्यतिकर दोषोंसे रहित विशद स्वभाववाली है ।

इसी प्रकार चक्रवर्तीके समवसरणमें आ जाने पर भी दिव्यध्वनि असमयमें भी खिरा करती है ।

निर्जरा तथा मुक्तिका अनियत समय

राजवार्तिक अ० १ सूत्र ३ पृ० २४ पर लिखा है-

कालानियमाच्च निर्जरायाः ॥ ९ ॥

अर्थ-जीवोंकी कर्मोंकी निर्जराका समय अनियत है ।

इससे सिद्ध होता है कि जीव अपने पुरुषार्थ द्वारा अन्तरङ्ग वहिरङ्ग अनुकूल निमित्त कारण प्राप्त कर कर्मोंकी निर्जरा करता हुआ मुक्त होता है । अतः कर्मनिर्जरा और कर्ममुक्तिका समय नियत नहीं है ।

अनियत गुण-पर्याय

पञ्चास्तिकायमें पर समय जीवकी पर्याय अनियत बतलाते हुए लिखा है-

जीवो सहावणियदो अणियदगुणपज्जओध परसमयो ।
जदि कुणदि सगं समयं पब्भसदि कम्मवंधादो ॥ १५५ ॥

अर्थ-अपने चैतन्य स्वभावमें नियत होता हुआ भी संसारी जीव अनियत गुण-पर्यायवाला होता हुआ पर समय होता है । यदि वह स्वसमय होता है तव कर्मबन्धसे छूट जाता है ।

इस तरह संसारी जीवकी नियत तथा अनियत दोनों प्रकारको पर्यायें हुआ करती हैं । अनियत गुण-पर्यायका निमित्त कारण मोहनीय कर्मको टीकाकारने बतलाया है ।

क्रम-अक्रम परिणमन

धवल पुस्तक १३ ( ५-५-८२ ) पृष्ठ ३४९ पर लिखा है-

अण्णेसिं दव्वाणं कमाकमेहिं परिणमणहेदुत्तं कालदव्वाणुभागो । एवं दुसंजोगादिणा अणुभाग- परूवणा कापव्वा । जहा ( मट्टिया ) पिंड-दंड-चक्क-चीवर-जल-कुंभारादीणं घडुप्पायणाणुभागो ।

अर्थ-अन्य द्रव्योंके क्रम और अक्रमसे परिणमनमें हेतु होना कालद्रव्यानुभाग हैं ।

इसी प्रकार द्विसंयोगादिरूपसे अनुभागका कथन करना चाहिये । जैसे मृत्तिका पिण्ड, दण्ड, चक्र, चीवर, जल, कुम्हार आदिका घटोत्पादनरूप अनुभाग ।

इस तरह श्री वीरसेनाचार्यने धवलसिद्धान्तके उक्त विधान द्वारा स्पष्ट बतलाया है कि कालद्रव्यमें यह शक्ति है कि वह अन्य द्रव्योंके निमित्ति कारण वश होनेवाले क्रमिक अक्रमिक पर्याय-परिणमनमें सहायक होता है । तथा च यह भी उन्होंने बतलाया है कि दो द्रव्योंकी संयुक्त शक्तिसे भी घट आदि बननेरूप कार्य होता है । निमित्त कारणोंके अभावमें केवल उपादानसे घट आदि पर्यायका होना अटक जाता है ।

द्रव्यकर्मकी अनियत पर्याय

कर्मबन्ध हो जानेपर प्रकृति, स्थिति, अनुभाग निश्चित ( नियत ) हो जाने पर भी वहिरङ्ग-अन्तरङ्ग निमित्तकारणोंके बलसे संचित द्रव्यकर्मोंकी प्रकृति-स्थिति-अनुभागमें उत्कर्षण, अपकर्षण, संक्रमण और उदीरणा-रूप परिवर्तन हो जाता है । इससे सिद्ध होता है कि बद्ध कर्मोंकी पर्याय नियत और अनियत दोनों प्रकार की हुआ करती है । तदनुसार सातावेदनीय आदि कर्म असातावेदनीय आदि रूप भी हो जाता है । श्रेणिकने अपनी सातवें नरक की बाँधी हुई ३३ सागरकी आयुको अपने प्रयत्नसे बदलकर प्रथम नरक की ८४ हजार वर्षकी आयुरूप कर दिया । इस तरह कर्मोंकी निकाचित रूपमें नियत पर्याय और संक्रमण, उत्कर्षण, अपकर्षण और उदीरणा ( अकाल मरणके समान ) रूपमें अनियत पर्याय होती है ।

इसके सिवाय द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावके अनुसार कर्म अपना फल नियत और अनियत रूपसे दिया करते हैं ।

अर्हन्त भगवान्के असातावेदनीय कर्मका उदय सातारूपसे हुआ करता है । नरकमें सातावेदनीयका उदय ( फल ) असातावेदनीयके रूपमें होता है । देवगतिमें दुःखदायक साधन न होनेसे असातावेदनीयका उदय दुःखदायक नहीं होता ।

इसी बातकी पुष्टि श्री वीरसेन आचार्यके जयधवल सिद्धान्तग्रन्थ पु० १ पृ० २८९ के निम्नलिखित कथनसे होती है-

पागभावस्स विणासो वि दव्व-खेत्त-काल-भाव ( भावा ) वेक्खाए जायदे । तदो ण सव्वद्धं दव्व-कम्माइं सगफलं कुणंति त्ति सिद्धं ।

अर्थ-प्रागभावका नाश हुए विना कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है और प्रागभावका विनाश द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावकी अपेक्षा लेकर होता है, इसलिये द्रव्यकर्म सर्वदा अपने कार्यको उत्पन्न नहीं करते हैं, यह सिद्ध होता है ।

श्री वीरसेनाचार्यके उक्त कथनसे दो बातें सिद्ध होती हैं-

१-कार्य अपने निमित्त-उपादान कारणोंके अनुसार ही होता है, किसी नियतिके अनुसार या केवलज्ञानके अनुसार नहीं होता है ।

२-द्रव्यकर्मोंका फल भी अपरिवर्तनीय-नियत नहीं है ।

निमित्त-उपादान कारण

इसके वाद आपने जो उपादान कारणके अनुसार पर्यायको नियत-क्रमवद्ध ठहरानेका प्रयत्न किया है और उसके लिये स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा तथा श्लोकवार्तिकके वांक्योंको उद्‌धृत किया हैं वह कार्य-कारण भावका सूचक होते हुए भी नियत कालका सूचक नहीं हैं।

जो पर्याय जिस समय होती है वह उसका स्वकाल अवश्य है, किन्तु पर्यायका वह स्वकाल एकान्त-रूपसे नियत नहीं है। उसका कारण यह है कि कार्य केवल उपादान कारणसे ही नहीं होता, उसके लिये निमित्त कारणोंका व्यापार अनिवार्यरूपसे आवश्यक है। कोई भी स्व-परप्रत्यय पर्याय निमित्त कारणके विना कभी नहीं होती।

निमित्त कारणका व्यापार कालक्रमके अनुसार ही नियत हो ऐसा एकान्त नहीं है, क्योंकि कार्य-सिद्धिके लिये अनुकूल कारण जब भी आगे-पीछे क्रमसे या अक्रमसे उपलब्ध होंगे तब ही उन निमित्त कारणों-के व्यापारके अनुसार कार्य पहले या पीछे, क्रमसे या अक्रमसे होगा। जैसे आम या केले वृक्षपर कालक्रमसे प्राप्त सूर्य आदि अन्य पदार्थोंके निमित्तसे देरमें पका करते हैं, परन्तु मनुष्य अपनी आवश्यकताके अनुसार उन फलोंको पेड़से तोड़कर भुस आदिकी गर्मी द्वारा पहले भी पका लेता है।

रसोई वनानेवाला रसोइया भोजन बनानेके लिये अपनी इच्छानुसार लकड़ी, कोयला, विजली या गैस की मन्द, तीव्र, तीव्रतर आदि अग्निका निमित्त मिलाकर दाल, चावल, शाक, रोटी आदि शीघ्र या देरसे बना लेता है। अपनी इच्छानुसार चावल, दाल, रोटी आदिमेंसे जिस द्रव्यकी पर्यायको पहले या पीछे करना चाहता है कर डालता है। रोटी बनाते हुए यदि वह पूड़ी बनाना आवश्यक समझता है तो वह आटेकी रोटी पर्यायको वन्द कर पूड़ी पर्यायको करने लगता है।

ऐसे अनियत अनन्त कार्योंको होते हुए हम प्रत्यक्ष देखते हैं। यदि हम ऐसे अनियत कार्योंको सिद्धान्त ग्रन्थोंमें देखें तो वहाँ भी कर्मोंके उत्कर्षण, संक्रमण, उदीरणा आदि अवस्थाओंमें जीवके अनियत भावोंके कारण अनियत कार्य होना उपलब्ध होता है।

इससे फलित होता है कि कार्यका होना कारणके व्यापारके अनुसार है। यतश्च कारण व्यापार काल-क्रमसे तथा कालके अक्रमसे उपलब्ध होता है, अतः कारणभूत पूर्व पर्यायका स्वकाल नियत रूपसे क्रमिक तथा अनियत रूपसे अक्रमिक भी होता है-कारणक्रमाक्रमानुविधायित्वात्कार्यक्रमाक्रमस्य।

केवलज्ञानकी अपेक्षा

उपलब्ध क्रमिक अक्रमिक निमित्त तथा उपादान कारणोंके अनुसार होनेवाली पदार्थोंकी क्रमिक अक्रमिक पर्यायें केवलज्ञानमें उसी क्रम-अक्रमरूपसे झलकती हैं-

दर्पणतल इव सकला प्रतिफलति पदार्थमालिका यत्र।

जैसे कि कालमृत्यु तथा अकालमृत्यु। अतः केवलज्ञान द्वारा भी पदार्थोंकी पर्यायें नियत-क्रमिक एवं अनियत-अक्रमिकरूपमें सिद्ध होती हैं। इस तरह पर्याय क्रम-अक्रमके विषयमें एकान्त नहीं है-अनेकान्त है।

यतश्च केवलज्ञान ज्ञापक है, कारक नहीं है और कार्य, कारकके अनुसार होता है ज्ञापकके अनुसार नहीं-

णाणं णेयपमाणं।-प्रवचनसार गाथा २३

अतः पर्याय क्रमका नियामक केवलज्ञान नहीं है, 'निमित्त-उपादान कारणरूप कारक ही पर्याय-क्रमका नियामक है ।

अतः आपका उत्तर युक्ति तथा आगमसे गलत सिद्ध होता है । श्री अमृतचन्द्र सूरिने प्रवचनसारके अन्तमें चरणानुयोग-सूचक चूलिकामें नयोंका वर्णन करते हुए निम्नलिखित भङ्गोंका उल्लेख किया है-

यथा कालनयेन निदाघदिवसानुसारिपच्यमानसहकारफलवत्समयायत्तसिद्धिः ॥३०॥ अकालनयेन कृत्रिमौष्ण्यपाच्यमानसहकारफलवत्समयानायत्तसिद्धिः ॥३१॥

अर्थ स्पष्ट है ।

इस उल्लेखसे पदार्थके क्रमिक-अक्रमिक परिणमन पर स्पष्ट प्रकाश पड़ता है ।

नमः श्री वीतरागाय

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका ५, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १६६ से १७९

↑ सूची


शंका ५

द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे होती हैं या अनियत क्रमसे ?

प्रतिशंका २ का समाधान

इस प्रश्नका उत्तर व्यवहार नय और निश्चय नय दोनों प्रकारसे दिया गया है । व्यवहार नयसे उत्तर देते हुए स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षासे तीन गाथायें उद्धृत कर केवलज्ञानके ज्ञेयरूपसे द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे होती हैं यह सिद्ध किया गया था और निश्चयनयसे उत्तर देते हुए उपादानकी अपेक्षा द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे होती है यह अनेक आगम प्रमाण देकर सिद्ध किया गया था, किन्तु द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे नहीं होतीं इस अभिप्रायकी पुष्टि करते हुए पुनः प्रतिशंका २ उपस्थित की गई है । प्रतिशंका २ में विषयोंका वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है-

१-स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी तीन गाथाऐं तथा तत्सम्बन्धी अन्य सामग्री ।

२-अकालमें दिव्यध्वनि

३-निर्जरा तथा मुक्तिका अनियत समय

४-अनियत गुण-पर्याय

५-क्रम-अक्रम परिणाम

६-द्रव्य कर्मकी अनियत पर्याय

७-निमित्त-उपादान कारण ।

आगे इसका समाधान किया जाता है ।

: १ :

स्वामी कार्तिकेयने स्वलिखित द्वादशानुप्रेक्षामें सम्यग्दृष्टि निश्चय नयसे कैसा निर्णय करता है यह बतलानेके लिये जं जस्स जम्मि देसे इत्यादि दो गाथाएँ देकर अन्तमें यह लिखा है कि इस प्रकार सब द्रव्य और उनकी पर्यायोंको जो जानता है वह सम्यग्दृष्टि है और जो इसमें शंका करता है वह मिथ्यादृष्टि है। गाथा इस प्रकार है-

एवं जो णिच्छयदो जाणदि दव्वाणि सव्वज्जापए।
सो सद्दिट्ठी सुद्धो जो संकदि सो हु कुदिट्ठी ॥३२३॥

इस गाथामें भिन्न टाईपमें दिये गये पद ध्यानमें लेने योग्य हैं। णिच्छयदो का अर्थ निश्चयसे ( यथार्थमें ) है। इससे विदित होता है कि पूर्वोक्त दो गाथाओंमें जिस तत्त्वका प्रतिपादन किया गया है वह यथार्थ है। आगे एवं जो दव्वाणि सव्वपज्जाए पद देकर यह स्पष्ट किया गया है कि पिछली दो गाथाओंमें जिस तत्त्वकी व्यवस्था की गई है वह सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायोंके विषयमें है। सद्दिट्ठी सुद्धो पद देकर यह बतलाया गया है कि निश्चयसे सब द्रव्यों और उनकी सब पर्यायोंको जो पूर्वोक्त प्रकारसे जानता है वह शुद्ध सम्यग्दृष्टि है तथा आगे कुदिट्ठी पद देकर यह बतलाया गया है कि जो पूर्वोक्त प्रकारसे सब द्रव्यों और उनकी पर्यायोंको निश्चयसे नहीं जानता वह मिथ्यादृष्टि है।

इस गाथामें णिच्छयदो पद देनेका एक दूसरा अभिप्राय भी है। इस द्वारा यह ज्ञान कराया गया है कि यह कथन निश्चय ( यथार्थ ) नयकी ( उपादानकी ) प्रधानतासे किया गया है। इससे पर्यायान्तरसे यह भी ज्ञात हो जाता है कि आगममें जहाँ भी अकाल मृत्यु आदिका निर्देश किया गया है, वहाँ वह व्यवहार नयकी ( उपचरित नयकी ) अपेक्षा ही किया गया है निश्चय नयकी अपेक्षासे नहीं।

इन गाथाओंके आशयको ध्यानमें न रखकर जो यह कहा जाता है कि जो ‘कोई व्यक्ति अपना मरण टालनेके लिये किसी देवी-देवताकी आराधना द्वारा प्रयास करे तो उसको समझानेके लिए स्वामिकार्तिकेयने इन गाथाओं द्वारा यह अभिव्यक्त किया है कि मरण कालको भी इन्द्र या देव यहाँ तक कि जिनेन्द्र भी नहीं टाल सकते।’ सो उन गाथाओं परसे ऐसा आशय फलित करना उचित नहीं है। कारण कि इन दो गाथाओंके पूर्वमें जो गाथा आई है उसके अन्तमें ‘सद्दिट्ठी’ पद स्वतन्त्र पड़ा है, अतः इस गाथाका इन दो गाथाओंके साथ सीधा सम्बन्ध नहीं है। दूसरे ३१९ और ३२० गाथाओं द्वारा जो प्रतिपादन किया गया है वह मात्र सम्यग्दृष्टिकी भावना नहीं है, किन्तु उन द्वारा वस्तुस्थितिका ही प्रतिपादन किया गया है। इसके लिये समयसार की २४७ से लेकर २६१ तककी गाथाओंके साथ इन दो गाथाओंका मिलान कीजिए। वहाँ कहा है-

जो अप्पणा दु मण्णदि दुक्खिद-सुहिदे करेमि सत्ते त्ति।
सो मूढो अण्णाणी णाणी एत्तो दु विवरीदो ॥ २५३ ॥

अर्थ-जो यह मानता है कि अपने द्वारा मैं जीवोंको दुःखी-सुखी करता हूँ वह मूढ़ है, अज्ञानी है। परन्तु जो ऐसा नहीं मानता वह ज्ञानी है ॥ २५३ ॥

अब इसके प्रकाशमें स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी यह गाथा पढ़िए-

ण य को वि देदि लच्छी ण को वि जीवस्स कुणदि उवयारे।
उवयारं अवयारं कम्मं पि सुहासुहं कुणदि ॥ ३१९ ॥

अर्थ-कोई किसीको लक्ष्मी नहीं देता और न कोई जीवका उपकार करता है। उपकार और अपकार शुभ और अशुभ कर्म करते हैं ॥ ३१९ ॥

यों तो श्री समयसार जीमें ऐसी अनेक गाथाऐं हैं जिन द्वारा यह बतलाया गया है कि न तो कोई किसीको मार सकता है और न जिला सकता है। कर्मके उदयसे जीव मरता और जीता है आदि। उदाहरण-स्वरूप एक गाथा और देखिए।

जो मण्णदि जीवेमि य जीविज्जामि परेहिं सत्तेहिं।
सो मूढो अण्णाणी णाणी एत्तो दु विवरीदो ॥२५०॥

अर्थ-जो जीव मानता है कि मैं दूसरे जीवोंको जिलाता हूँ और दूसरे जीव मुझे जिलाते हैं वह मूढ़ है-अज्ञानी है और ज्ञानी इससे विपरीत है ॥ २५० ॥

अब इसके प्रकाशमें स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी ३१९ नं० की गाथा पढ़िए-

भत्तीए पुज्जमाणो विंतरदेवो वि देदि जदि लच्छी।
तो किं धम्में कीरदि एवं चिंतेइ सद्दिट्ठी ॥ ३२० ॥

अर्थ-भक्तिसे पूजित व्यन्तर देव यदि लक्ष्मी देता है तो धर्म क्यों किया जाता है ऐसा सम्यग्दृष्टि विचार करता है ॥ ३२० ॥

इससे ज्ञात होता है कि पूर्वोक्त ३२१ और ३२२ गाथाओं द्वारा तथा ३१९ और ३२० गाथाओं द्वारा ऐसा कोई तत्त्व नहीं कहा गया है जो मात्र भावनासे सम्बन्ध रखता हो। स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी इन सब गाथाओं द्वारा एकमात्र इसी सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया है कि अन्य अन्यका अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं कर सकता। सब अपने अपने कर्मानुसार ही होता है। यही बात श्री समयसार जी में कही गई है। अतएव सम्यग्दृष्टिकी इस भावना को यथार्थ ही जानना चाहिये। इसी ग्रन्थ में २१९ नं० की एक गाथा और आई है, जिसमें बतलाया गया है कि निश्चय से कालादि लब्धि से युक्त और नाना शक्तियों से स्वयं परिणमन करनेवाले पदार्थों को कोई भी वारण नहीं कर सकता। गाथा इस प्रकार है-

कालाइलद्धिजुत्ता णाणासत्तीहिं संजुदा अत्था।
परिणममाणा हि सयं ण सक्कदे को वि वारेदुं ॥ २१९ ॥

इसमें ‘परिणममाणा हि सयं’ पद ध्यान देने योग्य हैं। इन पदों द्वारा यह स्पष्ट शब्दोंमें ज्ञान कराया गया है कि यथार्थमें प्रत्येक यथार्थ स्वयं परिणमन करते हैं, अन्यके द्वारा नहीं परिणमाये जाते हैं। इसलिये इस गाथाके आधारसे यदि कोई यह फलित करे कि कार्य उत्तर समयमें उसी कार्यरूप परिणत होते हैं जिसके अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र आदि निमित्त कारणरूप सामग्री प्राप्त होती है। अर्थात् उत्तर पर्यायका कार्य नियत नहीं है। सो यह लिखना पदार्थ व्यवस्थाके प्रतिकूल है। प्रत्येक पदार्थमें प्रत्येक समयमें जो द्रव्य-पर्यायात्मक शक्ति होती है जिसे कि आचार्योंने यथार्थ (निश्चय) उपादान कहा है उसके अनुसार ही कार्यकी उत्पत्ति होती है। तभी तो आचार्य अकलंकदेव और विद्यानन्दि स्वामी जैसे समर्थ आचार्य ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ यह कहनेमें समर्थ हुए। यदि उपादानके इस लक्षणको, जिसे कि सभी आचार्योंने अनेक तर्क देकर सिद्ध किया है, यथार्थ नहीं माना जाता है और यह स्वीकार किया जाता है कि जब जैसा बाह्य निमित्त मिलता है तब उसके अनुसार कार्य होता है तो सिद्धोंको जिनमें वैभाविक शक्ति इस अवस्थामें भी विद्यमान है और लोकमें सर्वत्र वाह्य निमित्तोंकी भी विद्यमानता है तब उन्हें संसारी वनानेसे कौन रोक सकता है, क्योंकि ऐसा माननेपर जीवके राग-द्वेषरूपसे परिणमन करनेपर ही उसको निमित्त कर द्रव्य कर्मोंका बन्ध होता है यह सिद्धान्त’ ही खण्डित हो जाता है। इसके साथ तब यही मानना पड़ेगा कि कोई जीव सातवें नरकमें जाने योग्य संक्लेश परिणाम करे परन्तु वाह्य निमित्त देव-गुरु-शास्त्रका सानिध्य आदि देवगतिमें जानेके योग्य हो तो उसे नरकायुका बन्ध न होकर देवायुका ही बन्ध होगा, क्योंकि जब कि यह स्वीकार किया जाता है कि 'कार्य तो बाह्य निमित्तके अनुसार होता है। ऐसी अवस्थामें अमुक प्रकारके परिणामोंके होनेपर अमुक प्रकार-का बन्ध होता है यह जो आगममें व्यवस्था की गई है वह सबकी सब छिन्न-भिन्न हो जाती है। प्रत्येक द्रव्यकी संयोग कालमें होनेवाली पर्याय बाह्य निमित्तसापेक्ष निश्चय उपादानसे होती है यह तो है, पर साथमें इसके प्रत्येक कार्यके प्रति उपादानकी नियामकता ही स्वीकार की गई है। इसलिये जब कार्यक्षम निश्चय उपादान उपस्थित होता है तब निमित्त भी ,उसीके अनुसार ही मिलते हैं यह भी नियम है। नियममें अनेकान्त लागू नहीं होता। अनेकान्तकी अपनी मर्यादा है, इसलिये उसे ध्यानमें रख कर ही उसे लागू करना चाहिये। अन्यथा द्रव्यमें सामान्यकी अपेक्षा जो नित्यता और पर्यायअपेक्षा जो अनित्यता स्वीकार की गई है वह अनेकान्त नहीं बनेगा। तब तो यह भी माननेके लिये बाध्य होना पड़ेगा कि-‘द्रव्य (सामान्य) स्वयं अपनी अपेक्षा ही कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है।’ अतएव ज्ञानी विद्वान् पुरुषोंका कार्य है कि वे शास्त्रकी मर्यादाको ध्यानमें रखकर ही उसकी व्याख्या करें। अतएव स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी २२२ नं० की गाथाकी टीकासे, जो उसका यथार्थ तात्पर्य है, वही फलित करना चाहिये। उसमें ‘मणिमन्त्रादिना अप्रतिबद्ध-सामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन’ के पूर्व यदि ‘यदि’ अर्थको सूचित करनेवाला कोई पाठ मूल टीकामें होता तब तो निमित्तोंकी अनिश्चितता भी समझमें आती, परन्तु उसमें इस आशयको सूचित करनेवाला कोई पाठ नहीं है, इसलिये उसे ‘तदेव द्रव्यं पूर्वपर्यायाविष्टं कारणभूतम्’ का विशेषण बना कर ही उसका अर्थ करना चाहिये और ऐसा अर्थ करनेपर निमित्त-उपादानके योगकी अच्छी तरह सुसंगति बैठ जाती है।

वारह भावनाओंमें अनित्य भावनाका उपदेश संवेग और वैराग्य उत्पन्न करानेके अभिप्रायसे ही आया है इसमें सन्देह नहीं। परन्तु अर्पितानर्पितसिद्धेः त० सू० ५-३२ सूत्रके अनुसार नित्य पक्षको गौण कर ही ऐसी भावना कराई गई है। ऐसा करनेका कारण भी है। बात यह है कि संसारमें धन, पुत्र, स्त्री आदिका संयोग होता है। जिसमें कि मिथ्यादृष्टिकी निज बुद्धि वनी आ रही है, उस संयोगके प्रति अरुचि उत्पन्न कराना वहाँ प्रयोजन है। स्त्रीपर्यायविशिष्ट द्रव्य नित्यानित्य हो सकता है, पर स्त्रीपर्याय नहीं, और मिथ्यादृष्टि जीव स्त्रीपर्यायविशिष्ट द्रव्यमें निज बुद्धि नहीं कर रहा है, किन्तु जो जीव उस कालमें स्त्री-पर्यायविशिष्ट है उसकी उस कालमें होनेवाली स्त्रीपर्यायमें निज बुद्धि कर रहा है। अतएव वहाँ उस पर्यायसम्बन्धी आसक्ति छुड़ानेके अभिप्रायसे ही वैसी भावनाका उपदेश दिया गया है। अतएव अनित्य भावनाको उदाहरणस्वरूप उपस्थित कर ३१९-३२२ गाथाओंको उसी अर्थमें लेना उचित नहीं है।

३२३ नं० की गाथाका सम्बन्ध ३२१-३२२ गाथाओंके साथ तो है ही। और यदि इसका सम्बन्ध इसके पूर्वकी ३१९-३२० नं० की गाथाओंके साथ भी जोड़ा जाता है तो भी कोई आपत्ति नहीं है। जैसा कि पूर्वमें श्री समयसार जी के आधारसे सिद्ध कर आये हैं।

अकामनिर्जरा और तपद्वारा होनेवाली निर्जराका शास्त्रमें विधान है इसमें सन्देह नहीं। पर कर्म-शास्त्रके अभ्यासीसे यह बात छिपी हुई नहीं है कि ऐसी निर्जरा किन कर्मोंकी कैसी योग्यताके होने पर कैसी पद्धतिसे होती है। जिस कालमें जिन कर्मोंकी जितने परिमाणमें जिन परिणामोंको निमित्त कर उत्कर्षित, अपकर्षित, संक्रमित और उदीरित होनेकी योग्यता होती है उस कालमें उन कर्मोंका उतने परिमाणमें उन परिणामोंको निमित्त कर उत्कर्षण, अपकर्षण, संक्रमण और उदीरणा होती है ऐसा नियम है। जीवके विवक्षित परिणामोंके साथ उन कर्मोंके अपकर्षणादिकी व्यवस्था की गई है यह बात कर्मशास्त्रियोंको सुविदित है।

दूसरे बन्धकालमें जो स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध होता है सो उस कालमें ही उन-उन कर्मोंमें ऐसी योग्यता स्थापित हो जाती है, जिससे नियत काल आनेपर नियत परिणामों तथा बाह्य नोकर्मोंको निमित्त कर उन-उन कर्मोंका अपकर्षणादि रूप परिणमन होता है। यदि ऐसा न माना जाय तो एक तो कर्मशास्त्रमें जो उपशमकरण, निधत्तिकरण और निकाचितकरणकी व्यवस्थानुसार यह बतलाया गया है कि जो कर्म उदयमें नहीं दिये जा सकते उनकी उपशमकरण संज्ञा है, जो कर्म उदयमें नहीं दिये जा सकते और संक्रमणके अयोग्य होते हैं उनकी निधत्ति संज्ञा है तथा जो कर्म उदयमें नहीं दिये जा सकते और जो संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षणके अयोग्य होते हैं उनकी निकाचित संज्ञा है वह पूरीकी पूरी व्यवस्था गड़बड़ा जाती है।

दूसरे उदीरणादिमें वह किस क्रमसे होती है और कितने कालमें होती है यह जो व्यवस्था कर्मशास्त्रमें बतलाई है वह व्यवस्था भी गड़बड़ा जायगी। उदाहरणार्थ जो उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सम्यक्त्वसे च्युत होकर मिथ्यात्व गुणस्थानमें आता है वह मिथ्यात्वमें रहते हुए सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिकी उद्वेलना पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कालमें करता है। उसमें भी प्रथम समयमें अमुक परिमाणमें उद्वेलना होती है, द्वितीय समयमें अमुक परिमाणमें उद्वेलना होती है इत्यादि रूपसे जो व्यवस्था बताई गई है वह व्यवस्था भी नहीं बन सकती। देवादिका सम्यक् निमित्त मिलनेपर वह अन्तर्मुहूर्तमें, एक दिन में, एक पक्षमें, एक मासमें, एक वर्षमें या सैकड़ों वर्षोंमें उनकी उद्वेलना क्यों नहीं कर लेता है, क्योंकि उद्वेलनाके योग्य बाह्य सामग्री है ही, फिर अमुक काल ही उसके लिये लगे ऐसा नियम नहीं रहना चाहिये।

तीसरे बन्धके योग्य एक प्रकारका अमुक परिणाम होनेपर जो बन्ध होता है, उस परिणामको निमित्त कर मोहनीयकी सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर स्थिति पड़े और ज्ञानावरणादि कर्मोंकी अन्य स्थितिबन्ध हो, स्थितिबन्धमें यह भेद कौन करता है ?

चौथे एक शुभ परिणामके होने पर विविध कर्मोंमें जो अनुभागबन्धमें या योगके अनुसार प्रदेशबन्धमें भेद होता है यह भेद भी कौन करता है ?

पाँचवें प्रत्येक आत्माके साथ विस्रसोपचय इतना अधिक होता है कि यदि नया विस्रसोपचय संचित न हो और उसीमेंसे नया-नया बन्ध होता रहे तो भी वह चिरकाल तक समाप्त नहीं होगा। ऐसी स्थितिके रहते हुए भी किस समयमें विस्रसोपचयमेंसे किन कर्मवर्गणाओंका कितने परिमाणमें बन्ध होगा यह भेद भी कौन करता है ? आत्मा तो मात्र परिणाम करता है, परन्तु उस समय बन्धयोग्य कर्मवर्गणाओंका ही बन्ध होता है, अन्यका नहीं ऐसा फरक क्यों पड़ता है ?

छठे ऐसा नियम है कि निमित्तकी निमित्तता कार्यके समयमें मानी गई है। अतएव (१) जिस समय उपादान कारण कार्यरूपसे परिणमता है उस समय जो उसका निमित्त कारण है वह स्वयं अपना उपादान बन कर अपनी पर्यायको उत्पन्न करनेके लिये व्यापार करता है या जिसका वह निमित्त है उसके व्यापारमें लगता है ? यदि कहो कि उस समय वह स्वयंका उपादान बनकर करता तो अपना कार्यरूप व्यापार ही है, किन्तु जिसका वह निमित्त है उसके कार्यरूप व्यापारको नहीं करता है तो फिर दोनोंने जब कि उस समय एक साथ अपने-अपने कार्यको करनेका व्यापार किया । ऐसी अवस्थामें निमित्तके अनुसार उपादानको परिणमना पड़ता है यह नियम कैसे वन सकता है ?

यदि कहो कि (२) जिस समय उपादान अपना कार्य करता है उस समय जो उसका निमित्त है वह स्वयं का उपादान बनकर अपना व्यापार न करके मात्र जिसका वह निमित्त है उसका व्यापार करता है तो फिर दोनोंका मिलकर एक व्यापार दिखलाई देना चाहिये । उदाहरणार्थ जिस समय कुम्भकार घटका निर्माण करता है उस समय उक्त प्रकारसे मिट्टीमें ही दोनोंके परिणमनकी क्रिया दिखलाई देनी चाहिये । मिट्टी में होनेवाली परिणमनरूप क्रियाके साथ कुम्भकारके जो हाथ आदि हिलते हुए दिखलाई देते हैं वे नहीं दिखलाई देने चाहिये ।

यदि कहो कि (३) जिस समय उपादान अपना कार्य करता है उस समय उसका जो निमित्त है वह अपना कार्य तो करता ही है पर उसके साथ-साथ जिसका वह निमित्त है उसका भी व्यापार करता है तो इस प्रकार उसे एक साथ उपादान बन कर अपनी और जिसका वह निमित्त है उसकी इस प्रकार एक साथ दो क्रियाएँ करनी पड़ेंगी । परन्तु ऐसा तो जिनागममें माना नहीं गया है, कि एक पदार्थ दो क्रियाका कर्ता हो ।

अतएव ऐसा मानना ही उचित है कि उपादानके कार्यके प्रति दूसरे एक या एकसे अधिक जिन द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें निमित्त व्यवहार होता है वे सब कार्य तो अपना-अपना ही करते हैं । कोई किसीका कार्य नहीं करता, परन्तु उन सब द्रव्योंके उस-उस कालमें उस-उसरूप परिणमनेकी द्रव्य-पर्यायात्मक उपादान योग्यता सहज ही होती हैं और उनका वैसा ही परिणमन भी होता है, मात्र इन दोनोंकी इस बाह्य व्याप्तिको देखकर ही उनमें निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध स्वीकार किया गया है । ऐसा मानना यहाँ आगमानुकूल है ।

शब्द विवक्षित वाक्योंका रूप लेकर सीमित अर्थका ही प्रतिपादन करते हैं, अतः यदि ३२१-३२२ गाथाओं द्वारा मात्र नियति ( निश्चय ) के अनुसार ही कथन किया गया है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उन गाथाओं द्वारा व्यवहार पक्षका भी कथन किया जाना चाहिए था और नहीं किया गया है तो वह कथन एकान्त हो जायगा । कथन कहीं प्रमाणकी अपेक्षा किया गया है । कहीं व्यवहार नयकी अपेक्षा कथन किया गया है और कहीं निश्चय नयकी अपेक्षा कथन किया गया है । इसलिये जहाँ जिस नयकी अपेक्षा कथन हो उसे उसी रूपमें घटित कर विवक्षित प्रमाणरूप अर्थको फलित कर लेना चाहिये । यही शास्त्रके अर्थ करनेकी पद्धति है जो शास्त्रकारोंने सर्वत्र अपनाई है ।

कथन करनेकी पद्धति तीन हैं-प्रमाणकी अपेक्षा, निश्चय नयकी अपेक्षा, और व्यवहार नयकी अपेक्षा । ये तीन पद्धतियाँ आगममें यथास्थान सर्वत्र स्वीकार की गई हैं, अतएव उनकी संगति बिठलाते हुए इष्टार्थको फलित करना चाहिये ।

प्रकृत में ३२१-३२२ गाथाएँ निश्चय नयकी मुख्यतासे लिखी गई हैं, वह इसीसे स्पष्ट है कि उनसे अगली गाथा में ‘एवं जो णिच्छयदो’ यह पाठ दिया गया है । हम इस गाथामें पठित णिच्छयदो पदको गौण कर दें और उनका अपने विकल्पके अनुसार अर्थ करें यह उचित नहीं है । अर्थ करनेकी यह पद्धति भी नहीं है । इसी आशयका एक श्लोक पद्मपुराणमें भी उपलब्ध होता है सो उसका भी प्रकृतके अनुरूप अर्थ करना चाहिये । वह श्लोक इस प्रकार है-

यत्प्राप्तव्यं यदा येन यत्र यावत्यतोऽपि वा ।
तत्प्राप्यते तदा तेन तत्र तावत्ततो ध्रुवम् ॥२९-८३॥

अर्थ-जिस जीवके द्वारा जहाँ पर जिस कालमें जिस कारणसे जिस परिमाणमें जो प्राप्तव्य है उस जीवके द्वारा वहाँ पर उस कालमें उस कारणसे उस परिमाणमें वह नियमसे प्राप्त किया जाता है ।

पण्डितप्रवर भैया भगवतीदास जी तत्त्वज्ञानसे भली-भाँति परिचित लोकोत्तर पुरुष थे । जिनागमका सार वीतरागता जानकर पर्याय और निमित्तोंके प्रति एकत्वबुद्धिका त्याग करानेके अभिप्रायसे उन्होंने भी अपनी समर्थ वाणीके द्वारा निश्चय नयकी अपेक्षा यह वचन कहा है-

जो जो देखी वीतरागने सो सो होसी वीरा रे ।
अनहोनी कबहुँ न होसी काहे होत अधीरा रे ॥

भगवन् ! जीवन में वीतरागता उत्पन्न हो, क्यों कि वह संसारी आत्माका मुख्य कार्य है, इसलिये वर्तमान पर्यायमें अनासक्ति उत्पन्न होने तथा निमित्तोंके प्रति इष्टानिष्ट बुद्धिका त्याग करनेके अभिप्रायसे प्रत्येक संसारी प्राणीकी निश्चयके आश्रयसे ऐसी बुद्धि सदा काल बनी रहे यह भावना है । यह सिद्धान्त जीवनका वह प्रेरणास्रोत है जो प्रत्येक प्राणीको आकुलतासे बचाकर निराकुलस्वरूप अनन्त सुखकी ओर ले जाता है । अन्यथा निमित्तोंकी उठाधरीके सिवा जीवनमें आत्मीक लाभ मिलना इतना दुर्लभ है जिस प्रकार बालुका समुद्रमें गिरा हुआ मणिका मिलना दुर्लभ है ।

प्रायः हम पुरुषार्थकी बात तो करते हैं; परन्तु परद्रव्यके कार्य करनेमें उसकी सफलता मानते हैं जो कर सकना असम्भव है । संसारी जीवने विकल्पके अनुसार क्रियाको ही सच्चा पुरुषार्थ मान लिया है । यदि वह इसमें और सच्चे पुरुषार्थमें वास्तविक अन्तरको जान ले तो उसके जीवनमें परके कार्य करनेका विकल्प ही न रहे । स्वामी समन्तभद्र इसी परमार्थभूत तत्त्वका स्मरण कराते हुए स्वयम्भूस्तोत्रमें कहते हैं-

अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं हेतुद्वयाविष्कृतकार्यलिंगा ।
अनीश्वरो जन्तुरहंक्रियार्तः संहत्य कार्येष्विति साध्ववादीः ॥३३॥

अर्थ-आपने ( जिनदेवने ) यह ठीक ही कहा है कि हेतुद्वयसे उत्पन्न होनेवाला कार्य ही जिसका ज्ञापक है ऐसी यह भवितव्यता अलंघ्य-शक्ति है, क्योंकि संसारी प्राणी ‘मैं इस कार्यको कर सकता हूँ’ इस प्रकारके अहंकारसे पीड़ित है, वह ( भवितव्यता ) के बिना अनेक सहकारी कारणोंको मिलाकर भी कार्योंके सम्पन्न करनेमें समर्थ नहीं होता ॥३३॥

पूर्वबद्ध आयु कर्ममें जितना स्थितिबन्ध होता है उसमें भोगकालमें उत्कर्षण तो सम्भव नहीं, निषेक स्थिति अपकर्षण हो सकता है इस नियमको ध्यानमें रखकर जिन जीवोंमें यह निषेक स्थिति अपकर्षण नहीं होता उन जीवोंका वह आयुकर्म इस नियमका अपवाद है यह दिखलानेके लिए तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २, सू० ५३ में नियम वचन आया है । उस परसे बहुतसे बन्धु यह फलित करते हैं कि यह व्यवहार कथन न होकर निश्चयकथन है । आचार्य अकलंकदेवने इस वचनके आश्रयसे जो व्यवहार पक्षका समर्थन किया है उसे ही हमारे बन्धु निश्चयपक्ष मानकर वैसी श्रद्धा किये हुए हैं और उसीको मात्र जिनागम बतलाकर जोरदार शब्दोंद्वारा उसका समर्थन करते हैं । अब यह विचार करना है कि क्या यह निश्चय कथन है या मात्र व्यवहाररूप विशेष निमित्तोंका ज्ञान करानेके लिए यह कथन किया गया है । आगे यही विचार करना है ।

यह तो आगमाभ्यासी भलीभाँति जानते हैं कि मृत्युको प्राप्त हुआ जीव प्रथम, द्वितीय और तृतीय समयमें तथा अधिकसे अधिक चौथे समयमें उत्तरभवको अवश्य धारण कर लेता है । मान लो किसी जीवका अकालमरण होता है परन्तु ऐसा जीव कहाँ जाकर जन्म धारण करे इसकी तो कोई नियत व्यवस्था है ही नहीं, क्योंकि अकालमरणके कथनको यथार्थ माननेवाले महानुभाव इस नियमका प्रतिपादन तो कर नहीं सकते कि उसके जन्मका नियत स्थान है और न यह ही कहनेकी क्षमता रखते हैं कि वहाँ जन्मयोग्य गर्भादिकके आवश्यक निमित्त भी नियमसे तैयार रहते हैं। ऐसी अवस्थामें जिसका अकालमरण हुआ उसका अकाल जन्म मानना पड़ेगा और अकाल जन्मके स्वीकार कर लेनेपर जन्मस्थान आदिका कोई निश्चित नियम न होनेसे ऐसा जीव कहाँ जाकर जन्म लेगा यह निश्चित नहीं किया जा सकता। आनुपूर्वी कर्म, गतिकर्म आदि तो जड़ हैं, वे जानते नहीं कि ऐसी अनिश्चित व्यवस्थाके रहते हुए कहाँ इस जीवको ले जाया जाय। और फिर जब सब अनिश्चित है और अनिश्चित सिद्धान्तके आधारपर कार्य-कारण व्यवस्था बनानी है। ऐसी अवस्थामें यही मानना पड़ेगा कि मरणके बाद कितने समयमें कौन जीव कहाँ जन्म धारण करेगा इसका कोई नियम नहीं किया जा सकता है। किन्तु जब लोकमें चारों गतियोंकी और गत्यागति आदिकी सब सुनिश्चित व्यवस्था है। ऐसी अवस्थामें अकालमरणके कथनको व्यवहारपक्षका कथन ही जानना चाहिये।

: २ ः

तीर्थंकरकी वाणी ‘किसी विशेष पुण्यशाली गणधर आदिको निमित्तकर अन्य समयमें भी खिरती है’ ऐसा जयधवला पुस्तक १ पृ० १२६ में उल्लेख है। इसपरसे यह फलित किया जाता है कि तीर्थंकरकी दिव्यध्वनि अकालमें भी खिरती है। परन्तु उक्त उल्लेखपरसे ऐसा फलित नहीं होता। वहाँ मूलमें तो ‘इदरकालेसु’ ऐसा पाठ है। उसका अर्थ ‘अन्य कालोंमें’ होता है। इस द्वारा दिव्यध्वनि कब-कब खिरती है यह नियम किया गया है। जिसका जो नियम हो वह उसका स्वकाल है, अकाल नहीं। और संयोगकी भूमिकामें होनेवाला कार्य हो तो उस समय वैसा निमित्त भी मिलता है। उसका भी वह स्वकाल है, क्योंकि जिसे उपादानरूपसे विवक्षित किया जाता है उसका प्रत्येक परिणाम जैसे अपने-अपने कालमें होता है। उसी प्रकार जिसे निमित्त रूपसे विवक्षित किया जाता है वह स्वयं अपने कार्यके प्रति उपादान होनेसे उसका भी प्रत्येक परिणाम अपने-अपने कालमें होता है। इस प्रकार कार्यके प्रति निमित्त-उपादानकी संगति बैठती जाती है। उसमें बाधा नहीं आती। इस तथ्यको जयधवलामें इन्द्र द्वारा गौतमगणधरको समवसरणमें लानेके समयके प्रसंगको लेकर भले प्रकार सिद्ध कर दिया गया है। वहाँ यह प्रश्न किया गया है कि इन्द्र पहले ही गणधरको ले आता, ६६ दिनतक क्यों रुका रहा? उत्तरमें कहा गया है कि काललब्धिके अभावमें पहले वैसा करना संभव नहीं था। जयधवलाका वह कथन इस प्रकार है-

सोहम्मिंदेण तक्खणे चेव गणिंदो किण्ण ढोइदो ? ण, काललद्धीए विणा असहेज्जस्स देविंदस्स तड्ढोयणसत्तीए अभावादो । पृ० ७६।

शंका-सौधर्म इन्द्रने केवलज्ञानके प्राप्त होनेके समय ही गणधरको क्यों नहीं उपस्थित किया?

समाधान-नहीं, क्योंकि काललब्धिके विना सौधर्म इन्द्र गणधरको उपस्थित करनेमें असमर्थ था, उसमें उस समय गणधरको उपस्थित करनेकी शक्ति नहीं थी।

इसमें ‘काललब्धि’ पद ध्यान देने योग्य है। इसे सर्वत्र कार्य उत्पत्तिमें स्वीकार किया गया है। सब कार्य काललब्धिके प्राप्त होने पर ही होते हैं ऐसा निश्चित नियम है। अतएव तीर्थंकरदेवकी दिव्यध्वनि इतर कालमें खिरती है इस उल्लेखको देखकर उसपरसे अकालमें खिरती है ऐसा फलित करना योग्य नहीं है।

: ३ :

निर्जरा और मुक्तिका काल अनियत है यदि यह सिद्धान्त माना जाता है तो जैसा कि पूर्वमें बतला आये हैं तदनुसार निमित्त-उपादानकी सम्यक् व्यवस्था ही नहीं बन सकती । आचार्य विद्यानन्दि श्लोकवार्तिक पृ० ७० में कहते हैं-

कालादिसामग्रीको हि मोहक्षयस्तद्रूपाविर्भावहेतुः न केवलः, तथा प्रतीतेः ।

अर्थ-यथार्थमें कालादि सामग्रीसे युक्त मोहक्षय केवलज्ञानकी उत्पत्तिका हेतु है, अकेला नहीं, क्योंकि उस प्रकार प्रतीत होता है ।

उसी स्थलपर वे पुनः कहते हैं-

क्षीणकषायप्रथमसमये तदाविर्भावप्रसक्तिरपि न वाच्या, कालविशेषस्य सहकारिणोऽपेक्षणीयस्य तदा विरहात् ।

अर्थ-शंका क्षीणकषायके प्रथम समयमें केवलज्ञानके प्रादुर्भावकी प्रसक्ति होती है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि सहकारीरूपसे अपेक्षित कालविशेषका उस समय अभाव है ।

श्लोकवार्तिकके ये दो ऐसे पुष्ट प्रमाण हैं जो इस तथ्यको सूचित करते हैं कि जिस कार्यका जो स्वकाल है उसके प्राप्त होने पर ही कार्यकी उत्पत्ति होती है, अन्य कालमें नहीं । अतएव जिस प्रकार केवलज्ञानकी उत्पत्ति निश्चित कालमें होती है उसी प्रकार विवक्षित निर्जरा और मोक्षकी प्राप्ति भी नियतकालमें होती है ऐसा यहाँ स्वीकार करना चाहिए ।

: ४ :

पञ्चास्तिकायकी १५५ वीं गाथामें आये ‘णियदो’ और ‘अणियद’ पदके प्रकृत अर्थको छोड़कर नियत और ‘अनियत’ अर्थ करके जो गुण-पर्यायोंको नियत और अनियत सिद्ध किया गया है वह संगत नहीं है । वहाँ उसमें आये हुए ‘सहावणियदो’ पदका अर्थ ‘स्वभावमें नियत-अवस्थित अर्थात् लीन’ है तथा ‘अणियद-गुणपज्जाओ’ पदका अर्थ-स्वभावगुण पर्यायोंमें अनियत-अनवस्थित अर्थात् विभाव-गुणपर्यायों में अवस्थित (लीन) है,’ क्योंकि उस गाथामें स्वसमय और परसमयकी व्याख्या की गई है और फलितार्थ रूपमें यह बतलाया गया है कि जो स्वसमयरूप परिणमता है वह कर्मबन्धसे छूट जाता है । अतः इस गाथा पर से 'संसारी जीवकी नियत ( क्रम नियत ) तथा अनियत ( क्रम अनियत ) दोनों प्रकारकी पर्यायें हुआ करती हैं यह अर्थ करना संगत नहीं है । जिसमें सब विषय स्पष्ट हो जाय इसके लिए यहाँ उक्त गाथा और उसकी टीका दी जा रही है-

जीवो सहावणियदो अणियदगुणपज्जाओध परसमओ ।
जीवो कुणदि सगं समयं पब्भस्सदि कम्मबंधादो ॥१५५॥

अर्थः-जीव स्वभावमें अवस्थित होनेपर भी यदि विभाव गुणपर्यायोंमें लीन हो तो परसमय है । यदि वह स्वसमयको प्राप्त करता है तो कर्मबन्ध से छूट जाता है ॥१५५॥

टीका-स्वसमयपरसमयोपादानव्युदासपुरस्सरकर्मक्षयद्वारेण जीवस्वभावनियतचरितस्य मोक्षमार्गत्वद्योतनमेतत् । संसारिणो हि जीवस्य ज्ञानदर्शनावस्थितत्वात् स्वभावनियतस्यापि अनादिमोहनीयोदयानुवृत्तिपरत्वेनोपरक्तोपयोगस्य सतः समुपात्तभाववैश्वरूप्यत्वादनियतगुणपर्यायत्वं परसमयः परचरितमिति यावत् । तस्यैवानादिमोहनीयोदयानुवृत्तिपरत्वमपास्यात्यन्तशुद्धोपयोगस्य सतः समुपात्तभावैक्यरूप्य-

त्वान्नियतगुणपर्यायत्वं स्वसमयः स्वचरितमिति यावत्। अथ खलु यदि कथञ्चनोद्भिन्नसम्यग्ज्ञानज्योतिर्जीवः परसमयं व्युदस्य स्वसमयमुपादत्ते तदा कर्मबन्धादवश्यं भ्रश्यति। यतो हि जीवस्वभावनियतं चरितं मोक्षमार्ग इति ॥१५५॥

अर्थः-स्वसमयके ग्रहण और परसमयके त्यागपूर्वक कर्मक्षय होता है-ऐसे प्रतिपादन द्वारा यहाँ (इस गाथामें) ‘जीव स्वभावमें नियत चारित्र वह मोक्षमार्ग है’ ऐसा दर्शाया है। संसारी जीव, (द्रव्य-अपेक्षासे) ज्ञानदर्शनमें अवस्थित होनेके कारण स्वभावमें नियत (निश्चलरूपसे स्थित) होनेपर भी जब अनादि मोहनीयके उदयका अनुसरण करके परिणत करनेके कारण उपरक्त उपयोगवाला (अशुद्ध उपयोग-वाला) होता है तब (स्वयं) भावोंका विश्वरूपपना (अनेकरूपपना) ग्रहण किया होनेके कारण उसे जो अनियतगुणपर्यायपना होता है वह परसमय अर्थात् परचारित्र है; वही (जीव) जब अनादि मोहनीयके उदयका अनुसरण करनेवाली परिणतिको छोड़कर अत्यन्त शुद्ध उपयोगवाला होता है तब (स्वयं) भावका एकरूपपना ग्रहण किया होनेके कारण उसे जो नियतगुणपर्यायपना होता है वह स्वसमय अर्थात् स्वचारित्र है।

अब, वास्तवमें यदि किसी भी प्रकार सम्यग्ज्ञानज्योति प्रकट करके जीव परसमयको छोड़कर स्वसमयको ग्रहण करता है तो कर्मबन्धसे अवश्य छूटता है; इसलिए वास्तवमें (ऐसा निश्चित होता है कि) जीवस्वभावमें नियत चारित्र वह मोक्षमार्ग है ॥१५५॥

: ५ :

आचार्य वीरसेनके जयधवला पु० १ पृ० २८९ के उल्लेखपरसे प्रतिशंकामें यह निष्कर्ष निकाला है कि ‘प्रागभावका अभाव द्रव्य, क्षेत्र, कालपर निर्भर है। जबतक द्रव्य, क्षेत्र, कालका योग नहीं मिलता तबतक प्रागभावका नाश नहीं होता, सब कार्योंका कोई स्वकाल न होनेसे कार्य, क्रमसे भी होते हैं और अक्रमसे भी होते हैं। अक्रमसे होते हैं अर्थात् क्रमको छोड़कर होते हैं।’

अब यहाँ विचार यह करना है कि क्या जयधवलाके उक्त वाक्यपरसे यह अर्थ फलित होता है। वह वचन इस प्रकार है-

पागभावस्स विणासो वि दव्व-खेत्त-काल-भवावेक्खाए जायदे।

अर्थ-प्रागभावका विनाश भी द्रव्य, क्षेत्र, काल और भवकी अपेक्षासे होता है।

अब इस वचनपर विचार कीजिए-प्रागभाव और उपादान इन दोनोंका एक ही अर्थ है और इस द्वारा मात्र इतना कथन किया गया है कि प्रागभावका अभाव द्रव्य, क्षेत्र, काल और भवसापेक्ष होता है। इसमें यह नहीं कहा गया है कि यदि द्रव्य, क्षेत्र और काल आदि न मिलें तो कार्य नहीं होता। अतः इस परसे क्रम-अक्रम परिणामका समर्थन करना तो योग्य नहीं है।

रही कर्मादिकके संक्रम आदिकी बात सो ऐसा मान लेनेपर कि कर्मका उदय होनेपर भी उदयके विरुद्ध साधन मिलनेसे उन कर्मोंका फल नहीं मिलता। यह एक ऐसा गम्भीर प्रश्न है जिसपर इस समय लिखना उचित न होगा। विशेष प्रसंग आनेपर अवश्य ही विचार करेंगे। संक्रमादिके विषयमें पूर्वमें विचार कर ही आये हैं। अतएव उपादान निश्चय पक्ष होनेसे और निमित्त व्यवहार पक्ष होनेसे यही मानना चाहिए कि दोनोंका मेल होनेपर कार्य होता है। सिद्धान्त यह है कि निश्चय उपादानके प्राप्त होनेपर यतः उस समय जो अन्य द्रव्यकी पर्याय उसका निमित्त है वह अपने परिणमनके लिए उसी समय निश्चय उपादान भी है इसलिए प्रत्येक समयमें निश्चय व्यवहारका सुमेल होते जानेसे प्रत्येक कार्य अपने-अपने कालमें ही होता है ऐसा यहाँ निश्चय करना चाहिए।

: ६ :

उपादान निमित्तका विचार स्वतन्त्र प्रकरण लिखकर पूर्वमें कर आये हैं। कार्य उत्पत्तिमें उपादान और निमित्त इन दोका कारण रूपसे उल्लेख किया गया है इसका तात्पर्य यह नहीं कि उपादान हो और निमित्त न हो इसलिए कार्य नहीं होगा ऐसा अर्थ करना संगत नहीं है। जबकि शास्त्रकारोंने उपादानकी अन्तर्व्याप्ति और निमित्तकी बाह्य व्याप्तिका निर्देश किया है ऐसी अवस्थामें दोनोंकी व्याप्ति एक साथ प्रत्येक समयमें मिलती रहती है और प्रत्येक समयमें प्रत्येक द्रव्य उत्पाद-व्ययरूप अपने अपने कार्यको उत्पन्न करता रहता है। प्रत्येक समयमें द्रव्यका परिणमन अन्यथा नहीं बन सकता और न ही उपादान-निमित्त की विषमव्याप्ति बनाई जा सकती है इस तथ्यको प्रमेयकमलमार्तण्ड २, २ पृ० २०१ में इन शब्दों द्वारा स्वीकार किया है-

यद्यप्यभिहितम्-शक्तादशक्ताद्वा तस्याः प्रादुर्भाव इत्यादि। तत्र शक्तादेवास्याः प्रादुर्भावः। न चानवस्था दोषाय बीजाङ्कुरादिवदनादित्वात्तत्प्रवाहस्य। वर्तमाना हि शक्तिः प्राक्तनशक्तियुक्तेनेति पूर्व-पूर्वावस्थायुक्तार्थानामुत्तरोतरावस्थाप्रादुर्भाववत् ।

और जो यह कहा है कि समर्थ उपादानसे उस द्रव्य-पर्यायात्मक शक्ति की उत्पत्ति होती है या असमर्थ उपादानसे उस द्रव्य-पर्यायात्मक शक्तिकी उत्पत्ति होती है इत्यादि। उसमें समर्थ उपादानसे ही द्रव्य-पर्यायात्मक शक्तिकी उत्पत्ति होती है। और अनवस्था दोषके लिए नहीं हैं, क्योंकि बीजांकुर प्रवाहके समान उसका प्रवाह अनादि है। वर्तमान शक्ति पूर्व शक्तियुक्त अर्थसे उत्पन्न होती हैं। वह भी उससे पूर्वकी शक्तियुक्त अर्थसे उत्पन्न होती है, पूर्व पूर्व अवस्थायुक्त पदार्थोंका उत्तरोत्तर अवस्था रूपसे जैसे प्रादुर्भाव होता है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिये।

इस प्रकार निमित्त-उपादान की अपेक्षा विचार करनेपर सब कार्योंकी उत्पत्ति नियत क्रमसे ही होती है ऐसा निर्णय करना समीचीन है। यहाँ प्रमेय कमलमार्तण्डका जो उद्धरण पूर्वमें दिया है उसके आधारसे प्रत्येक समयके उपादानकी सम्यग्व्यवस्था बन जाती है। उक्त उल्लेखमें उसे समर्थ उपादान प्रतिपादित किया है। इससे यह भी भली-भाँति सिद्ध हो जाता है कि उपादानके अनुसार तो नियत कार्य होता ही है, साथ ही कार्यके समय उसके नियत निमित्तोंका योग भी होता रहता है। अतः प्रत्येक कार्य स्वकालमें ही होता है ऐसा निर्णय करना ही उचित है।

: ७ :

उपादानके कार्य और निमित्तकी समव्याप्ति है इस व्यवस्थाके रहते हुए तथा उपादानका 'अनन्तर पूर्व पर्यायविशिष्ट द्रव्यको उपादान कहते हैं, यह सुनिश्चित लक्षणके होनेपर भी यह लिखना कि कार्यके प्रति जब जैसे अनुकूल निमित्त मिलते हैं तब कार्य होता है युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक पदार्थ उपादान बनकर प्रत्येक समयमें अपना अपना कार्य कर रहा है; उसमें कहीं किसी प्रकारकी गड़बड़ी नहीं देखी जाती। यदि निमित्ताधीन कार्यकी व्यवस्था होती तो द्रव्यको जो उत्पाद,-व्यय-ध्रौव्य स्वभाववाला आगममें सर्वत्र स्वीकार किया है वह नहीं बन सकता।

क्या ऐसा है कि किसी द्रव्यको किसी समय अनुकूल निमित्त नहीं मिले इसलिए उस समय उसने अपना कार्य नहीं किया इस अभिप्रायको ध्यानमें रखकर यह वचन बोला जाता है कि अनुकूल निमित्तोंके अभावमें कार्य नहीं होता या किसी विवक्षित द्रव्यसे किसी विवक्षित समयमें विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिकी अपेक्षासे व्यापार किया गया था परन्तु बीचमें कुछ ऐसी सामग्री उपस्थित हो गई जिस कारण यह विवक्षित कार्य या तो विवक्षित समयमें नहीं हो सका या हो ही नहीं सका इसलिए यह वचन बोला जाता है कि अनुकूल निमित्तोंके अभावमें कार्य नहीं होता ? इनमेंसे प्रथम पक्षके स्वीकार करनेपर तो आगम विरोध आता है, क्योंकि सूक्ष्म-स्थूल, जड़-चेतन, ऐसा एक भी द्रव्य नहीं है जो प्रत्येक समयमें परिणमन न करता हो। और प्रत्येक समय में परिणमन करना यही उसका स्वभाव है, अतएव इस आधारसे विचार करनेपर अनुकूल निमित्त न मिलनेसे कार्य नहीं हुआ यह तो कहा नहीं जा सकता। दूसरे पक्षके स्वीकार करनेपर यह तो कहा जा सकता है कि जैसी इच्छा हुई थी उसके अनुसार कार्य नहीं हुआ। पर किसी पदार्थने किसीकी इच्छाके अनुसार परिणामन करनेका ठेका थोड़े ही लिया है। और जिन्हें प्रतिबन्धक कारण कहा जाता है सो वह कथन विवक्षित कार्यकी अपेक्षासे ही किया गया है। इसमें संदेह नहीं कि प्रत्येक पदार्थ कार्य तो स्वयं ही करता है, निमित्त उसका कार्य नहीं करता। परन्तु जिस कार्यका जो निमित्त होता है उसकी अनुकूलता होनेपर और जो जिसका अनुकूल निमित्त नहीं है उसके अभावमें ही वह कार्य होता है। पर यह नियम विवक्षित कार्यकी अपेक्षा सिद्धान्त रूपसे स्वीकार किया गया है। अविवक्षित कार्य की अपेक्षा विचार करनेपर तो तब भी उस पदार्थने अपना कार्य किया जब उक्त स्थितिके रहते हुए भी विवक्षित कार्य नहीं हुआ। अतएव जैसा कि आगम प्रमाणसे सिद्ध कर आये हैं प्रत्येक कार्य स्वकालमें ही होता है यह नियम स्वीकार कर लेना चाहिये। पूरे उपचरित और अनुपचरित कारणोंका विचार करते हुए पण्डितप्रवर बनारसीदास जी कहते हैं-

पदस्वभाव पूरव उदय निहचै उद्यम काल।
पक्षपात मिथ्यात पथ सरवंगी शिवचाल ॥

पदार्थका स्वभाव, पूर्वका उदय ( निमित्त ), निश्चय उपादान, उद्यम ( पुरुषार्थ ) और काल ये पाँच कारण हैं। इनके समवायमें कार्यकी उत्पत्ति होती है। इनमेंसे किसी एकका पक्षपात करना मिथ्यात्व अर्थात् संसारका मार्ग है और सबके सद्भावमें कार्यको स्वीकार करना मोक्षमार्ग है।

गोमट्टसार कर्मकाण्डमें काल, ईश्वर ( निमित्त ), आत्मा, नियति और स्वभाव इन पाँच एकान्तोंका निर्देश किया गया है वह इसी अभिप्रायसे ही किया गया है। देखो पदार्थके स्वभावकी महिमा, कार्यरूप परिणाम यह निश्चय उपादानका ही कार्य है। पर निश्चय उपादानकी स्थिति आई और कार्य हो गया ऐसा एकान्त भी नहीं है। क्योंकि कार्य पुरुषार्थ पूर्वक ही होता है और जब कार्य होता है तब उसके अनुकूल निमित्त भी होते हैं। साथ ही निश्चय उपादानकी स्थिति उस पदार्थके स्वभावकी कक्षाके भीतर ही बनती है। इन चारोंका योग कब हो इसका अभ्यंतर दृष्टिसे विचार करनेपर निश्चय उपादान उनके योगका नियामक है और निश्चय उपादान कभी भी उत्पन्न हो जाय यह नहीं है। बाह्यकी अपेक्षा विचार करनेपर वह विवक्षित कालके प्राप्त होने पर ही होता है। इस प्रकारके पाँचोंके समवायमें कार्यकी उत्पत्ति होती है ऐसा नियम बन जाता है। अतएव एकान्त नियतिका जहाँ आचार्योंने निषेध किया है वहाँ सम्यक् नियतिको स्वीकार भी किया है। अतएव प्रत्येक द्रव्यका प्रत्येक कार्य उक्त पाँचोंके समवायकी अपेक्षा क्रमनियत होता है अनियत क्रमसे नहीं होता ऐसे अनेकान्तको स्वीकार करना ही मोक्षमार्ग है ऐसा यहाँ समझना चाहिए।

हम अंतमें श्रीस्वामीकार्तिकेयके द्वादशानुप्रेक्षाके वे तीन श्लोक श्री शुभचन्द्र सूरिरचित संस्कृत टीकाके साथ प्रस्तुत कर रहे हैं जिन्हें यह बताया जाता है कि मात्र व्यंतरादिसे लक्ष्मी आदि चाहनेवालोंको समझाने मात्रके लिए लिखे गये हैं । श्लोकोंका क्या भाव है और परम्परासे उनका क्या अर्थ प्राचीन आचार्य तथा विद्वान् करते आये हैं इसे उनके ही शब्दोंमें पढ़कर यथार्थ निर्णय कीजिये ।

अथ सम्यग्दृष्टिः एवं वक्ष्यमाणलक्षणं विचारयतीति गाथात्रयेण आह

जं जस्स जम्मि देसे जेण विधाणेण जम्मि कालम्मि ।
णादं जिणेण णियदं जम्मं वा अह व मरणं वा ॥३२१॥
तं तस्स तम्हि देसे तेण विहाणेण तम्हि कालम्मि ।
को सक्कइ चालेदुं इंदो वा अह जिणिंदो वा ॥३२२॥

संस्कृत टीका-यस्य पुंसः जीवस्य यस्मिन् देशे अंग-वंग-कलिंग-तिलंग-मरु-मालव-मलयाट-गुर्जर-सौराष्ट्रविषये पुर-नगर-करवट-खेट-ग्राम-वनादिके वा येन विधानेन शस्त्रेण विषेण वैश्वानरेण जलेन शीतेन श्वासोच्छ्वासरुन्धनेनान्नादिविकारेण कुष्ठ-भगंदर-रक्तोदर-प्रचंडपीडादिप्रमुखरोगेण वा यस्मिन् काले समय-मुहूर्त-प्रहर-पूर्वाह्न मध्याह्न-अपराह्न-संध्या-दिवस-पक्ष-मास-वर्षादिके नियतं निश्चितं यत् जन्म-अवतरणं उत्पत्तिः अथवा मरणं वा शब्दः समुच्चयार्थः सुखं दुःखं लाभालाभमिष्टानिष्टादिकं गृह्यते । तत्सर्वं कीदृशं देश-विधान-कालादिकं ? जिनेन ज्ञातं केवलज्ञानिना अवगतं ॥३२१॥

टीका-तस्य पुंसः जीवस्य तस्मिन् देशे अंग-वंग-तिलंग-गुर्जरादिके नगर-ग्राम-वनादिप्रदेशे वा तेन विधानेन शस्त्रविषादियोगेन तस्मिन् काले समय-पल-घटिका-प्रहर-दिन-पक्षादिके तत् जन्म-मरण-सुख-दुःखादिकं कः इन्द्रः शक्रः अथवा जिनेन्द्रः सर्वज्ञः वा शब्दोऽत्र समुच्चयार्थः राजा गुरुर्वा पितृ-मात्रादिर्वा चालयितुं निवारयितुं शक्नोति समर्थो भवति कोऽपि ? अपि तु न ॥३२२॥

अर्थः-जिस जीवके या पुरुषके जिस देशमें अर्थात् अंग, वंग, कलिंग, तिलंग, मरु, मालव, मलयाट, गुर्जर, सौराष्ट्र देशमें अथवा पुर, नगर, करवट, खेट, ग्राम, वनादिकोंमें जिस प्रकारसे अर्थात् शस्त्रसे, विषसे, अग्निसे, जलसे, शीतसे, श्वासोच्छ्वासके रुकनेसे, तथा अन्नादि विकारसे अथवा कोढ़, भगंदर, रक्तोदर, प्रचंड पीडाकर आदि प्रमुख रोगोंसे जिस कालमें अर्थात् समय, मुहूर्त, प्रहर, प्रभात, मध्याह्न, अपराह्न, संध्या, दिन, पक्ष, महिना, वर्ष आदिकमें नियत अर्थात् निश्चित जो जन्म अर्थात् उत्पत्ति, अथवा मरण, तथा ‘वा’ शब्दके द्वारा सूचित सुख-दुख, लाभ, अलाभ, इष्ट-अनिष्ट आदि भी ग्रहण कर लेना चाहिये । वह सब देश, विधान और कालादिकके रूपसे (उसी प्रकार ) जिनेन्द्रके द्वारा ज्ञात है अर्थात् केवलज्ञानियोंके द्वारा जाना जा चुका है ॥३२१॥

अर्थ :-उस पुरुषके याने जीवके उस देशमें अर्थात् अंग, वंग, तिलंग, गुजरात आदिकमें तथा नगरमें, ग्राममें या वनादिक प्रदेशोंमें उसी विधिसे अर्थात् शस्त्र, विषादि (उक्त) संयोगसे उसी कालमें अर्थात् समय, पल, घडी, प्रहर, दिन, पक्षादिकमें उन जन्म, मरण, अथवा सुख-दुखादिकोंको कोई इन्द्र याने देवेन्द्र-शक्र (शक्तिशाली) अथवा जिनेन्द्र याने सर्वज्ञदेव ‘वा’ शब्दसे सूचित राजा, गुरु, पिता, माता आदि टालनेके लिये समर्थ हो सकता है क्या कोई ? अर्थात् नहीं हो सकता ॥३२२॥

अथ सम्यग्दृष्टि-मिथ्यादृष्टिलक्षणं लक्षयति-

एवं जो णिच्छयदो जाणदि दव्वाणि सव्वपज्जाए ।
सो सद्दिट्ठी सुद्धो जो संकदि सो हु कुदिट्ठी ॥३२३॥

सं० टीका-स भव्यात्मा सम्यग्दृष्टिः शुद्धः निर्मलः मूढत्रयादिपंचविंशतिमलरहितः, स कः ? य एवं पूर्वोक्तप्रकारेण निश्चयतः परमार्थतः द्रव्याणि जीव-पुद्गल-धर्माधर्माकाशकालाख्यानि, सर्वपर्यायांश्च अर्थपर्यायान् ( उत्पाद-व्यययुक्तान् ) व्यंजनपर्यायांश्च (नरनारकादीन्) जानाति वेत्ति श्रद्दधाति स्पृशति निश्चिनोति स सम्यग्दृष्टिर्भवति । उक्तं च तथा सूत्रेण

त्रैकाल्यं द्रव्यषट्कं नवपदसहितं जीव - षट्कायलेश्याः
पंचान्ये चास्तिकाया व्रतसमितिगतिज्ञानचारित्रभेदाः ।
इत्येतन् मोक्षमूलं त्रिभुवनमहितैः प्रोक्तमर्हद्भिरीशैः
प्रत्येति श्रद्धधाति स्पृशति च मतिमान् यः स वै शुद्धदृष्टिः ॥

इति ‘दु’ इति स्फुटम् । सः पुमान् कुदृष्टिः । सः कः ? शंकते यः जिनवचने दवे गुरौ धर्मे तत्त्वादिके शंकां संशयं संदेहं करोति स मिथ्यादृष्टिर्भवेत् ॥३२३॥

अर्थ :-वह भव्यात्मा तीन मूढ़ता आदि २५ मल रहित निर्मल शुद्ध सम्यग्दृष्टि है जो पूर्वोक्त प्रकारसे निश्चयसे याने परमार्थसे जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश काल नामक (छः) द्रव्योंको तथा उत्पाद-व्यय युक्त अर्थ पर्यायोंको और नर-नारकादि व्यंजनपर्यायोंको इस तरह सब पर्यायोंको जानता है, श्रद्धान करता है, अनुभव करता है, निश्चय करता है वह सम्यग्दृष्टि होता है ।-जैसा कि सूत्रसे प्रतिपादित है-

अर्थ :-त्रिकाल संबंधी छः द्रव्य, नव पदार्थ, छः जीवकाय, छः लेश्या, पंचास्तिकाय तथा व्रत, समिति, गति, ज्ञान, चारित्र और उनके भेद त्रिभुवनपूज्य सर्वज्ञ अर्हंत भगवानने मोक्षके मूलभूत तत्त्व कहे हैं । जो बुद्धिमान् उन्हें जानता है, श्रद्धा रखता है और अनुभव करता है वह निश्चयसे शुद्ध सम्यग्दृष्टि है ।

गाथामें ‘दु’ शब्दका अर्थ स्फुट या स्पष्ट है । अब सूत्रके उक्त कथनके अनुसार जो जीव जिनेन्द्रके वचनमें तथा देव-गुरु-धर्ममें, तत्त्वोंमें शंका, संशय अथवा संदेह करता है वह मिथ्यादृष्टि है-यह बात स्पष्ट है ॥३२३॥

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ (भाग १/४)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १७९ से १९९

↑ सूची


तृतीय दौर

: ३ :

शंका ५

प्रश्न था-द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे हो होती हैं या अनियत क्रमसे भी ?

प्रतिशंका ३

इस प्रश्नके उत्तरमें आपने लिखा है कि ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं ।’ इसीको आपने दूसरे शब्दोंमें ऐसा लिखा है कि ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं ।’ इसके समर्थनमें आपने आगमके निम्नलिखित प्रमाण भी उपस्थित किये हैं :-

: १ :

जं जस्स जम्मि देसे जेण विहाणेण जम्मि कालम्मि ।
णादं जिणेण णियदं जम्मं व अह व मरणं वा ॥ ३२१ ॥
तं तस्स तम्मि देसे तेण विहाणेण तम्मि कालम्मि ।
को सक्कइ चालेदुं इंदो व अह जिणिंदो वा ॥ ३२२ ॥
-स्वामि कार्तिकेयानुप्रेक्षा

इन गाथाओंका आपने यह अर्थ किया है-‘जिनेन्द्र देवने जिस जन्म अथवा मरणको जिस जीव के जिस देशमें जिस विधिसे जिस कालमें नियत जाना है उसे उस जीवके उस देशमें उस विधिसे उस कालमें शक्र अथवा जिनेन्द्रदेव इनमेसे कौन चलायमान कर सकता है ? अर्थात् कोई चलायमान नहीं कर सकता है ।’

: २ :

‘यत्प्राप्तव्यं यदा येन यत्र यावद्यतोऽपि वा ।
तत्प्राप्यते तदा तेन तत्र तावत्ततो ध्रुवम् ॥ २९-८३ ॥’-पद्मपुराण

इस पद्यका भी आपने यह अर्थ किया है कि-‘जिस जीवके द्वारा जहाँ पर जिस कालमें जिस कारणसे जिस परिमाणमें जो प्राप्तव्य है उस जीवके द्वारा वहाँ पर उस कालमें उस कारणसे उस परिमाणमें वह नियमसे प्राप्त किया जाता है ।’

: ३ :

अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं हेतुद्वयाविष्कृतकार्यलिंगा ।
अनीश्वरो जन्तुरहंक्रियार्तः संहत्य कार्येष्विति साध्ववादीः ॥ १३३ ॥
-स्वयंभूस्तोत्र

इस पद्यका भी अर्थ आपने यह किया है-‘आपने ( जिन देवने ) यह ठीक ही कहा है कि हेतुद्वयसे उत्पन्न होनेवाला कार्य ही जिसका ज्ञापक है ऐसी यह भवितव्यता अलंघ्यशक्ति है, क्योंकि संसारी प्राणी ‘मैं इस कार्यको कर सकता हूँ’ इस प्रकारके अहंकारसे पीडित है वह उस ( भवितव्यता ) के विना अनेक सहकारी कारणोंको मिलाकर भी कार्योंके सम्पन्न करनेमें समर्थ नहीं होता ॥ १३३ ॥’

: ४ :

जो जो देखी वीतरागने सो सो होसी वीरारे ।
अनहोनी कबहूँ न होसी काहे होत अधीरा रे ॥-पंडितप्रवर भैया भगवतीदासजी

इन प्रमाणोंके आधारपर आपने अपना यह मत स्थिर कर लिया है कि चूँकि जिनेन्द्र भगवान् केवल ज्ञानी होनेके नाते त्रिकालज्ञ हैं, इसलिये प्रत्येक द्रव्यकी त्रिकालवर्ती पर्यायोंमें से कौन-सी पर्याय किस कालमें हुई या होगी-यह बात उन्हें मालूम है । दूसरे भवितव्यता ( होनहार ) अटल रहा करती है, इसलिये जिस कालमें जिसका जो कुछ होनेवाला है वह होता ही है और इस तरह आपका कहना है कि प्रत्येक द्रव्यकी प्रत्येक पर्यायके उत्पन्न होनेका समय निश्चित है । आपकी इस मान्यताके ऊपर ही हमें यहाँपर विचार करना है ।

यह हम मानते हैं कि जिनेन्द्रदेवको केवलज्ञानके द्वारा प्रत्येक कार्यके उत्पन्न होनेका समय मालूम है। कारण कि केवलज्ञानमें विश्वके सम्पूर्ण पदार्थोंकी त्रिकालवर्ती समस्त पर्यायोंका केवलज्ञानी जीवोंको युगपत् ज्ञान करानेको सामर्थ्य जैन संस्कृतिद्वारा स्वीकार की गयी है। इसी आधारपर यह बात भी हम मानते हैं कि प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति उसी कालमें होती है जिस कालमें उसकी उस उत्पत्तिका होना केवलज्ञानी जीवके केवलज्ञानमें प्रतिभासित हो रहा है। परन्तु किसी भी कार्यकी उत्पत्ति जिस कालमें होती है उस कालमें वह इस आधारपर नहीं होती है कि उस कालमें उस कार्यकी उस उत्पत्तिका होना केवलज्ञानीके ज्ञानमें प्रतिभासित हो रहा है, क्योंकि वस्तुकी जिस कालमें जैसी अवस्था हो उस अवस्थाको जाननामात्र केवलज्ञानका कार्य है, उस कार्यका होना केवलज्ञानका कार्य नहीं है। स्वयं पं० फूलचन्दजीने भी जैन तत्त्वमीमांसाके केवलज्ञान स्वभावमीमांसा प्रकरणमें इस बात को स्वीकार किया है। उन्होंने लिखा है कि-

केवलज्ञानको सब द्रव्यों और उनकी सब पर्यायोंको जाननेवाला मानकर भी क्रमबद्ध पर्यायोंकी सिद्धि मात्र केवलज्ञानके आलम्बनसे न करके कार्यकारण परम्पराको ध्यानमें रखकर ही की जानी चाहिये।

दूसरी बात यह है कि स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी उल्लिखित ३२१ और ३२२वीं गाथाओंमें ‘जेण विहाणेण’ और ‘तेण विहाणेण’ पदोंका पाठ, पद्मपुराणके उल्लिखित पद्यमें ‘यतो’ और ‘ततो’ पदोंका पाठ और स्वयंभूस्तोत्रके उल्लिखित पद्यमें ‘हेतुद्वयाविष्कृतकार्यलिंगा’ पदका पाठ ये तीनों ही पाठ हमें कम-से-कम इस बातकी सूचना तो दे ही रहे हैं कि कार्य केवलज्ञानद्वारा ज्ञात कालमें उत्पन्न होते हुए भी अपने-अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही उत्पन्न हुआ करते हैं। श्री पं० फूलचन्दजी द्वारा जैन तत्त्वमीमांसाके उल्लिखित कथनमें यह बात भी स्वीकार कर ली गई है कि ‘क्रमबद्ध पर्यायोंकी सिद्धि कार्यकारणपरम्पराको ध्यानमें रखकर ही की जानी चाहिये।’ और ऐसी हालतमें पंडितप्रवर भैया भगवतीदासजीके उल्लिखित पद्यका भी वही आशय लेना चाहिये जो श्री पं० फूलचन्दजीको स्वीकार है। अर्थात् वीतराग (केवलज्ञानी)का ज्ञान कार्यकी उत्पत्तिमें कारण नहीं है।

इस तरह कार्योत्पत्तिके विषयमें आपके द्वारा उपर्युक्त आगम प्रमाणोंको आधार बनाकर केवल इतना स्वीकार किया जाना ही पर्याप्त नहीं है कि 'सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होने पर ही होते हैं, किन्तु उक्त उन्हीं आगम प्रमाणोंके आधार पर स्वकालके साथ कार्योत्पत्तिके अनुकूल कारणोंको भी ग्रहण कर आपके द्वारा यही स्वीकार किया जाना चाहिये कि सभी कार्य केवलज्ञान द्वारा ज्ञात कालमें होने पर भी अपने-अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही उत्पन्न हुआ करते हैं, क्योंकि स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी उक्त ३२१ व ३२२ वीं गाथाओंमें जिस प्रकार यह बतलाया गया है कि जिनेन्द्र भगवानके ज्ञानमें कार्योत्पत्तिका स्वकाल प्रतिभासित होता है उसी प्रकार उन गाथाओंमें यह भी बतला दिया है कि जिनेन्द्र भगवानके ज्ञानमें प्रत्येक कार्यकी उत्पत्तिके प्रतिनियत कारण भी प्रतिभासित होते हैं। इस कथनका आशय यह है कि कोई भी कार्य जिस कालमें उत्पन्न होता है उस कालमें वह अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही उत्पन्न होता है, अन्यथा नहीं।

यदि ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होने पर ही होते हैं’ इस कथनसे आपका यह अभिप्राय हो कि ‘यद्यपि कार्य स्वकालमें अपने प्रतिनियत कारणोंके प्राप्त होने पर ही हुआ करते हैं। परन्तु चूँकि कार्यकी उत्पत्तिका काल आनेपर उसके अनुकूल कारणोंकी प्राप्ति नियमसे हो ही जाया करती है इसलिये सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होने पर ही होते हैं’ इस कथनमें स्वाभाविक रूपसे कार्योत्पत्तिके प्रतिनियत कारणोंका भी समावेश हो जाता है तो फिर हमारा आपसे यह कहना है कि उल्लिखित आगम प्रमाणोंके आधार पर जिस प्रकार आप यह कहते हैं कि ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होने पर ही होते हैं’ उसी प्रकार उन्हीं प्रमाणोंके आधार पर आपको ऐसा कहनेमें भी कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए कि ‘सभी कार्य अपने प्रतिनियत कारणोंके प्राप्त होने पर ही हुआ करते है’ और जिस प्रकार आप ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होने पर ही होते हैं’ इस कथनमें कार्योत्पत्तिके अनुकूल कारणोंका समावेश कर लेना चाहते हैं उसी प्रकार ‘सभी कार्य अपने प्रतिनियत कारणोंके प्राप्त होने पर ही होते हैं’ ऐसा कथन करके इसमें स्वकालका समावेश करनेमें भी आपको कोई आपत्ति नहीं होना चाहिये ।

एक यह भी बात है कि स्वामी समन्तभद्रके स्वयंभूस्तोत्रके पद्य ‘अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं’ इत्यादिमें पठित ‘अलंघ्यशक्तिः’ पदका अर्थ आप इस आशयसे करते हैं कि अन्तरंग और बहिरंग हेतुओंको उसके अधीन बन जाना पड़ता है, परन्तु ऐसा अर्थ ‘अलंघ्यशक्तिः’ पदका नहीं है । अर्थात् ‘अलंघ्यशक्तिः’ पदका अर्थ ‘अटल-शक्ति’ यहाँपर नहीं है । इस पदसे स्वामी समन्तभद्र यह बतलाना चाहते हैं कि जिस कार्यके उत्पन्न होनेके अनुकूल भवितव्यता होगी कार्य वही उत्पन्न होगा, यह नहीं हो सकता है कि कोई भी प्राणी किसी वस्तुमें ऐसा कार्य उत्पन्न कर दे जिसकी भवितव्यता वस्तुमें स्वभावतः विद्यमान नहीं है लेकिन ऐसी भवितव्यता कार्यरूप तभी परिणत होगी जब उस भवितव्यताके अनुकूल अन्तरंग और बहिरंग हेतु प्राप्त होते हैं और तब अन्तरंग तथा बहिरंग हेतुओं द्वारा उत्पन्न कार्यसे ही हम जान लेते हैं कि अमुक वस्तुमें चूँकि अमुक कार्यके अनुकूल भवितव्यता थी तभी यह कार्य हो सका । इस तरह इसका अभिप्राय यह होता है कि जिस प्रकार वस्तुमें स्वभावतः रहनेवाली भवितव्यता अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखती है । इसी प्रकार तदनुकूल अन्तरंग और बहिरंग हेतु भी अपना स्वतन्त्र ही अस्तित्व रखते हैं और जब वे कारण वस्तुमें रहनेवाली भवितव्यताके अनुकूल अपना व्यापार करते हैं तब उस भवितव्यताके अनुकूल कार्य उत्पन्न हो जाता है । कृपया यह ख्याल कीजिये कि भवितव्यताका अर्थ वस्तुमें विद्यमान कार्योत्पत्तिकी आधारभूत स्वतःसिद्ध योग्यता है और अन्तरङ्ग हेतुका अर्थ कार्याव्यवहित पूर्व पर्यायरूप उपादानशक्ति व बहिरङ्ग हेतुका अर्थ निमित्तकारण है ।

इस तरह अब अपने सामने दो मत विचारणीय हो जाते हैं-एक तो यह कि अपने प्रतिनियत कारणोंसे कार्य जिस कालमें उत्पन्न होता है उसे ही कार्यका प्रधान कारण माना जाय और दूसरा यह कि कार्य जब भी होता है अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही होता है और जिस कालमें वह उत्पन्न होता है वही उसका स्वकाल कहलाता है । इसलिए कार्यके यथायोग्य अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग दोनों हेतुओंको ही कार्यका प्रधान कारण माना जाय ।

चूँकि आपका सिद्धान्त कार्योत्पत्तिके स्वकालको अर्थात् जिस कालमें कार्य उत्पन्न होता है उस कालको प्रधान कारण माननेका है अर्थात् आप कहना चाहते हैं कि कार्योत्पत्तिका काल आ जानेपर ही कार्योत्पत्ति हुआ करती है । और हमारा सिद्धान्त कालको तो कार्योत्पत्तिमें प्रधानता नहीं देता है किन्तु यदि कार्य केवल अन्तरंग हेतु उपादान-कारणसे उत्पन्न होनेवाला हो तो यहाँ अन्तरङ्ग हेतुको ही प्रधानता देता है और कार्य यदि अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग ( उपादान और निमित्त ) दोनों कारणोंसे उत्पन्न होनेवाला हो तो वहाँ उपादान और निमित्त दोनोंको ही प्रधानता देता है । अर्थात् कार्योत्पत्ति तो अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही होती है लेकिन जिस कालमें वह होती है वहीं उसका स्वकाल कहलाने लगता है ।

आपका अपने सिद्धान्तको मान्य करनेमें तर्क यह है 'या हो सकता है कि कालके जितने त्रैकालिक समय हैं उतनी ही प्रत्येक वस्तुकी पर्यायोंकी उत्पत्ति निश्चित होती है, कालके त्रैकालिक समयोंसे अधिक किसी भी वस्तुकी पर्यायोंकी उत्पत्ति होना असम्भव है और चूँकि केवलज्ञानमें प्रत्येक वस्तुकी प्रत्येक समयवर्ती पर्याय प्रकाशित हो रही है अतः यह निश्चित हो जाता है कि प्रत्येक वस्तुकी प्रत्येक पर्याय अपने-अपने नियत कालमें ही उत्पन्न होगी। जिस समयमें कार्यभूत वस्तुको एक नियत पर्याय होगी उस समयमें निमित्त कारणभूत वस्तुकी भी कार्यके अनुकूल दिखती हुई एक नियत पर्याय होगी। इस तरह एक वस्तुकी कार्यरूप पर्यायके साथ दृश्यमान अनुकूलताके आधारपर निमित्तभूत वस्तुमें कारणताका आरोप किया जाता है और चूंकि कार्यभूत वस्तुको कार्यरूप पर्यायसे अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायके बाद ही वह कार्यरूप पर्याय निष्पन्न होनो है, अतः उसे उसे उसका वास्तविक कारण, प्रधान कारण अथवा उपादान कारण कहा जाता है। इस तरह कार्य अपने नियत कालमें ही उत्पन्न होता है यह सिद्धान्त स्थिर हो जाता है और प्रत्येक वस्तुकी पर्यायें नियतक्रमसे ही उत्पन्न होती हैं अनियत क्रमसे नहीं इस सिद्धान्तकी भी पुष्टि हो जाती है। यह आपकी मान्यता है। आगे इस विषय पर विचार किया जाता है :-

उल्लिखित जो सिद्धान्त आपका है वह यद्यपि कालके त्रैकालिक समयों तथा स्वतःसिद्ध परिणमनशील प्रत्येक वस्तुकी त्रैकालिक पर्यायों और उनका प्रत्येक क्षणमें युगपत् प्रतिभास करनेवाले केवलज्ञानके परस्पर सम्बन्धकी व्यवस्था पर आधारित है। परन्तु यहाँ यह एक प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या इतनी मान्यतासे श्रुतज्ञानी जीवोंकी समस्त समस्याऐं हल हो सकती हैं ? यदि इस प्रश्नका उत्तर आप हाँ में देते हैं तब तो हमें कहना पड़ेगा कि आप अपने अनुभव, प्रत्यक्ष और तर्कका ही अपलाप कर देना चाहते हैं, क्योंकि प्रत्येक संसारी प्राणीके सामने उसके जीवनकी तथा जन्म-मरण, सुख दुःख, संसार परिभ्रमण एवं मुक्तिसम्बन्धी असंख्य समस्याऐं उपस्थित हैं जिनका समाधान केवल आपके द्वारा मान्य सिद्धान्तसे नहीं हो सकता है।

प्रत्येक प्राणीके सामने यह प्रश्न है कि जिस पर्यायमें वह विद्यमान है, वह क्यों ? सुखी हो रहा है तो क्यों ? वह कभी दुःखी होता है तो क्यों ?, भिन्न-भिन्न विलक्षण पर्यायोंको धारण करता है तो क्यों ? एक ही पर्यायमें कभी राजा होता है तो क्यों ?, रंक होता है तो क्यों ? स्वर्गमें जाता है तो क्यों ? नरकमें जाता है तो क्यों ? भिन्न-भिन्न प्रकारके प्राणी जो दृष्टिगोचर हो रहे हैं तो ये सब क्यों अच्छी और बुरी हालतों में नजर आ रहे हैं ? क्यों अच्छे और बुरे कृत्य दृष्टिगोचर हो रहे हैं ? क्यों जीवनमें धर्म और अधर्मका विश्लेषण किया जाता है ?, विविध संस्कृतियोंका प्रादुर्भाव क्यों हुआ, नाना प्रकारके दार्शनिक सिद्धान्त क्यों प्रकाशमें आये ? पुद्गलोंके विलक्षण विलक्षण विविध रूप देखनेको मिलते हैं तो ये सब क्यों हैं ? क्यों विविध प्रकारकी वैज्ञानिक खोजें हो रही हैं ? सामाजिक, राष्ट्रीय, और धार्मिक संस्थाओंका निर्माण क्यों हुआ ? क्यों इनकी आचार पद्धतियाँ कायम की गयीं ? क्यों आप अपने सिद्धान्त या दृष्टिकोणके प्रचारमें लगे हुए हैं ? आदि आदि।

इस तरह जो असंख्य प्रश्न प्रत्येक व्यक्तिके सामने उभरे हुए दिखाई देते हैं इनका समाधान आपके पास क्या यही है ? कि केवलज्ञानमें यही झलका है कि अमुक वस्तुकी अमुक समयमें अमुक पर्याय ही होना थी-यंत्रवत विश्वकी समस्त प्रक्रिया चल रही है, चलती आयी है और चलती जायगी। यदि केवल यह समाधान आपके पास है और इसे आप युक्तियुक्त या आगमसम्मत मानते हैं तो आप आवश्यकता या इच्छाके अनुकूल कार्य करनेकी अपनी उधेड़-बुनको समाप्त कीजिये, अपने सिद्धान्त या दृष्टिकोणके प्रचारमें जोड़-तोड़का धंधा भी समाप्त कीजिये। इतना आपके कह देनेसे कार्य चलनेवाला नहीं है कि आप भी सब कुछ यंत्रकी नांई ही करते जा रहे हैं, क्योंकि आप सचेतन हैं, ज्ञानी हैं, हृदय आपके पास है। उसका आप उपयोग करते हैं। मस्तिष्क आपके पास है, उसका भी उपयोग आप करते हैं। शरीर आपके पास है, उसका भी उपयोग आप करते हैं। इन्द्रियाँ आपके पास हैं, उनका भी उपयोग आप करते हैं। बाह्य साधन सामग्रीकी जोड़-तोड़ भी आप बिठलाते हैं। आपके द्वारा यह सब किया जाना आपको मान्य सिद्धान्तके बिल्कुल विपरीत है। जो सिद्धान्त आपने मान्य किया है, उसके अनुसार तो केवल ज्ञाता और दृष्टा ही आपको बने रहना चाहिये और वह भी मनसे नहीं, मस्तिष्कसे नहीं, इन्द्रियोंसे नहीं; क्योंकि आप मनसे, मस्तिष्कसे अथवा इन्द्रियोंसे जितना ज्ञान करते हैं वह तो पराश्रित ही है। इसलिए इस ज्ञानमें जब तक पराश्रितता है तब तक आप पदार्थोंके मात्र ज्ञाता और दृष्टा नहीं बने रह सकते हैं और जब तक आप ज्ञाता-दृष्टा मात्र नहीं बन जाते तब तक निष्क्रियतामें आप रम नहीं सकते। इसी तरह जब तक आप निष्क्रियतामें नहीं रम जाते तब तक कार्यकारण पद्धतिकी उपेक्षा करके यह नहीं कह सकते हैं कि सभी कार्य स्वकालमें ही होते हैं या यह भी नहीं कह सकते कि ‘द्रव्योंकी समस्त पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं।’ और यदि आप उनकी उक्त मौजूदा अवस्थाओंमें भी ‘सभी कार्य स्वकालमें ही होते हैं’ या 'द्रव्योंकी समस्त पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं अथवा कार्यकी उत्पत्तिके कालमें निमित्त कारण हाजिर रहते हैं परन्तु कार्यमें उनका कुछ उपयोग नहीं होता आदि मान्यताओंको स्वीकार करते हैं तो फिर इन्हें कर्मकाण्ड आदि आगम ग्रन्थोंके अनुसार नियतिवादरूप मिथ्यात्वके अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता है।

यदि आप यह कहें कि स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा ३२१ और गाथा ३२२ में तो ‘सभी कार्य स्वकालमें ही होते हैं’ या ‘द्रव्योंकी सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं’ इन सिद्धान्तोंको ही फलित किया गया है और इन दोनों गाथाओंके अनन्तर गाथा ३२३ द्वारा यह बतला दिया गया है कि इन सिद्धान्तोंको माननेवाला ही शुद्ध सम्यग्दृष्टि हैं।

तो इसके उत्तरमें हमारा कहना यह है कि जैन संस्कृतिके आगम ग्रन्थोंमें कार्योत्पत्तिके विषयमें श्रुतज्ञानी जीवोंके लिये दो प्रकारसे विवेचना की गयी है-एक तो केवलज्ञानके विषयकी अपेक्षा श्रद्धा दृष्टिसे और दूसरी श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षा कर्त्तव्यदृष्टिसे। ‘जं जस्स जम्मि देसे’ इत्यादि आगम वाक्योंमें पहली दृष्टिकी उपलब्धि होती है। इसके अलावा कार्यके स्वप्रत्यय और स्व-परप्रत्यय भेद करके कार्यकारण-भावपद्धतिका जो जैन संस्कृतिके आगम ग्रन्थोंमें विस्तारसे विवेचन पाया जाता है वह सब श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षा कर्त्तव्यकी दृष्टिसे ही किया गया है।

यह सब विवेचन श्रुतज्ञानी जीवोंके लिये क्यों किया गया है? इसका कारण यह है कि श्रुतज्ञानी जीव केवलज्ञानी जीवोंकी अपेक्षा बिल्कुल भिन्न दशामें विद्यमान रह रहे हैं अर्थात् केवलज्ञानी जीव जहाँ कृतकृत्य है वहाँ श्रुतज्ञानियोंके सामने हमेशा कृत्यों ( कार्यों ) के करनेकी समस्या खड़ी ही रहती है, जहाँ केवलज्ञानी जीव प्रत्येक वस्तुके और उनके प्रत्येक क्षणमें होनेवाले व्यापारोंके केवल ज्ञाता दृष्टा मात्र बनकर रह रहे हैं वहाँ कार्योत्पत्तिके लिए श्रुतज्ञानी जीवोंको अपनी मौजूदा हालतोंमें अनुभवमें आनेवाली जोड़-तोड़ बिठलानेकी आवश्यकता है। अतः श्रुतज्ञानियोंके लिये कर्योत्पत्तिकी कार्यकारणभाव पद्धतिको अपनानेके सिवाय कोई चारा ही नहीं रह जाता है।

इसका फलितार्थ यह हुआ कि यदि केवलज्ञानके विषयकी अपेक्षासे विचार किया जाय तो केवलज्ञानमें सभी कार्य अपने प्रतिनियत कारणोंसे स्वकालमें उत्पन्न होते हुए झलक रहे हैं और श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षासे विचार किया जाय तो सभी कार्य स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय होनेके कारण यथायोग्य केवल उपादान कारणसे अथवा उपादान और निमित्तरूप दोनों कारणोंसे ही उत्पन्न होते हुए अनुभवमें आ रहे हैं। चूँकि श्रुतज्ञानी जीवको केवलज्ञानका विषय केवल आस्थाका है, अतः उस पर केवल आस्था रखनेका ही उसे उपदेश दिया गया है। और केवल ऐसी आस्था रखना श्रुतज्ञानी जीवोंके लिये उपयोगी नहीं हो सकता है, अतः उनके लिये कार्यकारणभाव पद्धतिको अपनानेका भी उपदेश दिया गया है। इसलिये जिसने कार्योत्पत्तिके लिये कार्यकारणभाव पद्धतिके मार्गको समाप्त करनेका प्रयत्न किया वह नियतिवादी एकान्त मिथ्यादृष्टि ही हो जायगा। अतः केवलज्ञानीने जैसा देखा है वैसा ही कार्य होगा इस पर श्रद्धा करना प्रत्येक श्रुतज्ञानी जीवका कर्त्तव्य है। कारण कि इस तरहकी श्रद्धा करनेसे अपने पुरुषार्थद्वारा होनेवाले कार्यकी सफलतासे उसके अन्तःकरणमें अहंकार पैदा नहीं होगा और असफलता मिलनेपर कभी दुःख पैदा नहीं होगा। लेकिन अपनी उक्त प्रकारकी श्रद्धाके आधारपर यदि वह श्रुतज्ञानी जीव पुरुषार्थहीन और कृतघ्न होकर पथभ्रष्ट हो गया तो फिर इस मिथ्यात्वके प्रभावसे उसका अनन्त संसारमें परिभ्रमण होनेके सिवाय और क्या हो सकता है? इस प्रकार श्रुतज्ञानकी अपेक्षा प्रत्येक वस्तुकी कोई पर्यायें-तो नियतक्रमसे ही होती हैं और प्रत्येक वस्तुकी कोई पर्यायें अनियतक्रमसे भी होती हैं। इस तरह ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही हैं अनियतक्रमसे नहीं’ आपका यह सिद्धान्त आगमसम्मत नहीं और यह है तो आप कह नहीं सकते कि श्रुतज्ञान प्रमाण नहीं है, अतः आपके सिद्धान्तपर हमारे लिये विचार करना आवश्यक हो गया है।

सामान्यरूपसे सर्वत्र क्रम शब्दका प्रयोग कालिक सम्बन्धके आधारपर हुआ करता है। प्रकृतमें भी क्रम शब्दका प्रयोग पर्यायोंके कालिक सम्बन्धको ही प्रगट करनेवाला है, अतः उसका अर्थ यहाँपर यौगपद्यका विरोधी ‘एकके बाद एक’ ही ग्रहण करना चाहिये।

इस कथनका निष्कर्ष यह है कि पर्यायें एकके बाद एक रूपमें क्रमवर्ती ही हुआ करती हैं। वे न तो कभी एक साथ रहती हैं और न उनकी उत्पत्ति ही कभी एक साथ होती है। पर्याय शब्दका अर्थ भी परिणमन होता है, इसलिये पर्याय स्वभावतः एकके बाद एक रूपमें क्रमवर्ती अथवा क्रमसे उत्पन्न होनेवाली सिद्ध होती है।

प्रत्येक वस्तुमें तीन रूप देखनेको मिलते हैं-आकृति, प्रकृति और इन दोनोंमें होनेवाली विकृति अर्थात् परिणमन। इनमेंसे आकृति प्रदेश रचनाके रूपमें द्रव्यात्मक हुआ करती है, प्रकृति वस्तुके स्वतःसिद्ध स्वभावके रूपमें गुणात्मक हुआ करती है और विकृति आकृति तथा प्रकृति इन दोनोंमें होनेवाले परिणमनके रूपमें पर्यायात्मक हुआ करती है। यह पर्याय यदि आकृतिमें होनेवाले परिणमनसे उत्पन्न हुई हो तो द्रव्यपर्याय कहलाती है और यदि प्रकृतिमें होनेवाले परिणमनसे उत्पन्न हुई हो तो गुणपर्याय कहलाती है। इन दोनों ही प्रकारकी पर्यायोंका विभाजन यथायोग्य कालके अखण्ड एक समय और नाना समयोंके उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त समूहभूत आवली, घड़ी, घंटा, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास, वर्ष आदिके आधारपर हुआ करता है अर्थात् किन्हीं-किन्हीं पर्यायोंका विभाजन एक-एक समयके आधारपर हुआ करता है। जैसे वस्तुकी सम्पूर्ण अर्थपर्यायें अथवा अगुरुलघुगुणकी षड्गुण-हानिवृद्धिरूप पर्यायें आदि। इसी प्रकार किन्हीं-किन्हीं पर्यायोंका विभाजन आवली आदि नाना समयोंके समूहोंके आधारपर हुआ करता है। जैसे घट-निर्माणके लिये मिट्टीकी कम-से-कम एक अन्तर्मुहूर्तवर्ती पिंडपर्यायके बाद होनेवाली स्थास पर्याय तथा कमसे कम एक अन्तर्मुहूर्तवर्ती इस स्थासपर्यायके बाद होनेवाली कोश पर्याय आदि एवं जीवकी मनुष्य पर्यायके बाद होनेवाली देव, मनुष्य, तिर्यक्, नारक आदि कोई भी पर्याय आदि।

वस्तु द्रव्यात्मक रूपसे एक होनेपर भी उसमें नाना गुणोंका पाया जाना सम्भव है। जैसे जीवमें स्थूलरूपसे ज्ञान और दर्शनरूप तथा पुद्गलमें वर्ण, रस, गंध और स्पर्शरूप नाना गुणोंका एक साथ सद्भाव पाया जाता है। इस तरह एक ही वस्तुमें एक ही साथ नाना गुणोंका सद्भाव पाया जानेके सबब उन गुणोंकी अपनी-अपनी एक-एक पर्यायके रूपमें यद्यपि नाना पर्यायोंका भी उस वस्तुमें एक साथ सद्भाव सिद्ध होता है, परन्तु एक गुणकी नाना पर्यायोंका एक ही साथ एक वस्तुमें सद्भाव रहना असम्भव होनेके कारण उनकी वृत्ति या उत्पत्तिमें यौगपद्य सिद्ध न होकर क्रम ही सिद्ध होता है। इसी प्रकारके क्रमकी व्यवस्था वस्तुकी द्रव्यपर्यायोंके विषयमें भी जान लेना चाहिये।

वस्तुकी उक्त द्रव्यपर्यायों और गुणपर्यायोंकी वृत्ति या उत्पत्तिका जो यह एकके बाद एकरूप क्रम है उसमें श्रुतज्ञानकी दृष्टिसे उन पर्यायोंके नियतपने और अनियतपने रूप दोनों ही प्रकारकी अनुभवपूर्ण स्थिति यथासंभव जैन संस्कृति द्वारा मान्य की गयी है अर्थात् वस्तुकी बहुतसी पर्यायोंमें तो अमुक पर्यायके बाद अमुक पर्याय-इस प्रकार नियतक्रम ही रहा करता है। और उसकी बहुत-सी पर्यायोंमें एकके बाद एकरूप सिर्फ क्रम ही रहता करता है नियतक्रम नहीं। जैसे जीवकी क्रोध पर्यायके बाद क्रोध, मान, माया और लोभ रूप पर्यायोंमें से यथा-संभव कोई भी एक पर्याय हो सकती है। इसी प्रकार मानादि पर्यायके बाद भी उक्त चारों पर्यायोंमेंसे कोई भी एक पर्याय हो सकती है, नियत कोई एक पर्याय नहीं। इसी प्रकारकी व्यवस्था यथा-सम्भव मनुष्य, तिर्यंच, देव और नारक पर्यायोंके बारेमें भी समझना चाहिये। इन सब पर्यायोंमें ‘एकके बाद एक’ रूप क्रम तो रहता है परन्तु नियतक्रम नहीं रहता। इतनी बात अवश्य है कि मुक्तिरूप पर्याय केवल मनुष्य पर्यायके बाद ही हुआ करती है और नारक तथा देव पर्यायके बाद सिर्फ तिर्यंच अथवा मनुष्य पर्याय ही हुआ करती है और किसी-किसी नारक पर्यायसे सिर्फ तिर्यंच पर्याय तथा किसी-किसी देव पर्यायसे केवल मनुष्य पर्याय ही हुआ करती है। कोई मनुष्य पर्याय भी ऐसी होती है जिसके बाद केवल मनुष्य या देव पर्याय और कोई-कोई मनुष्य पर्यायसे केवल देव पर्याय ही सम्भव होती है, तिर्यंच पर्यायके बाद भी आगम सम्मत अपने ढंगकी ऐसी ही व्यवस्था है। इस तरह नियतक्रम और केवल क्रम ( अनियतक्रम ) पर्यायोंमें यथायोग्य समझना चाहिये।

मिट्टीकी पिंड, स्थास, कोश, कुशूल और घट रूप पर्यायोंमें से प्रथम तो यथासम्भव पिंड पर्यायका, इस पिंड पर्यायके बाद ही स्थास पर्यायका, इस स्थास पर्यायके बाद ही कोश पर्यायका, इस कोश पर्यायके बाद ही कुशूल पर्यायका और इस कुशूल पर्यायके बाद ही घट पर्यायका होना सम्भव है, अतः इन पर्यायोंमें इस तरह नियत क्रम जानना चाहिये। वैसे मिट्टी पिंड बन तो सकती है परन्तु नहीं भी बने। इसी तरह पिंड स्थास बन तो सकता है परन्तु नहीं भी बने, स्थास कोश बन तो सकता है परन्तु न भी बने, कोश कुशूल बन तो सकता है परन्तु न भी बने और कुशूल घट बन तो सकता है परन्तु न भी बने।

वस्तुमें पायी जानेवाली सभी द्रव्यपर्याय तो स्वपरप्रत्यय ही हुआ करती हैं लेकिन गुणपर्यायोंको दो भागोंमें विभक्त किया जा सकता है-एक तो स्वप्रत्यय पर्यायोंका विभाग और दूसरा स्वपरप्रत्यय पर्यायोंका विभाग। इसमेंसे वस्तुके सिर्फ अपने ही बलपर होनेवाली पर्यायें स्वप्रत्यय पर्यायें कहलाती हैं और वस्तुके अपने बलके साथ-साथ दूसरी एक वस्तु तथा अनेक वस्तुओंका बल पाकर होनेवाली पर्यायें स्वपर प्रत्यय पर्यायें कहलाती हैं।

इन स्वप्रत्यय और स्वपरप्रत्यय दोनों प्रकारकी पर्यायोंमेंसे जितनी स्वप्रत्यय पर्यायें वस्तुमें हुआ करती हैं वे सब नियत क्रमसे ही हुआ करती हैं। ऐसी पर्यायें वस्तुमें अगुरुलघुगुणके आधारपर होनेवाली षट्स्थान पतित हानि-वृद्धिके रूपमें जैन संस्कृति द्वारा मान्य की गयी हैं। अर्थात् वस्तुके अगुरुलघुगुणके अविभागी प्रतिच्छेदोंमें अनन्त भागहानि, असंख्यात भागहानि, संख्यात भागहानि, संख्यात गुणहानि, असंख्यात गुण-हानि और अनन्त गुणहानि, इस तरह नियत क्रमसे होनेवाली हानिकी प्रक्रिया तथा इसके समाप्त होनेपर अनन्त भागवृद्धि, असंख्यात भागवृद्धि, संख्यात भागवृद्धि, संख्यात गुणवृद्धि, असंख्यात गुणवृद्धि और अनन्त-गुणवृद्धि–इस तरह नियतक्रमसे होनेवाली वृद्धिकी प्रक्रिया–ये दोनों ही प्रकारकी प्रक्रियायें अमुकके बाद अमुकके रूपमें वस्तुमें अनादि कालसे चालू हैं और अनन्त कालतक इसी तरह चालू रहनेवाली हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि वस्तुमें होनेवाली सभी स्वप्रत्यय पर्यायें नियत क्रमसे ही हुआ करती हैं।

वस्तुमें होनेवाली स्वपरप्रत्यय पर्यायोंके विषयमें यथासम्भव नियतक्रम और अनियतक्रम दोनों ही तरहकी प्रक्रियायें यद्यपि जैन संस्कृति द्वारा मान्य की गयी हैं परन्तु आप इन स्वपरप्रत्यय पर्यायोंके विषयमें भी स्वप्रत्यय पर्यायोंकी तरह नियतक्रम ही मान लेना चाहते हैं, जिससे यह विषय विवादपूर्ण बन गया है। यद्यपि इस पत्रकमें हमें मुख्य रूपसे पर्यायोंके नियतक्रम और अनियतक्रमपर आगमकी स्थितिको प्रगट करना है, परन्तु आपने अपने द्वितीय पत्रकमें स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी ‘एवं जो णिच्छयदो’ इत्यादि ३२३ वीं गाथाकी जिस टीकाको अपने ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं’ इस पक्षकी पुष्टिमें उद्धृत किया है उस टीकामें उद्धृत ‘त्रैकाल्यं द्रव्यषट्कं’ इत्यादि पद्य प्रकृत विषयकी मर्यादाके बाहर होते हुए भी आपने उसका उपयोग अपने पक्षकी पुष्टिके लिए करनेका प्रयत्न किया है जो-मालूम पड़ता है-कि प्रकृत प्रश्नके महत्त्वको पाठकोंकी दृष्टिमें कम करनेके उद्देश्यसे ही आपने किया है, इसलिए उक्त पद्यमें निर्दिष्ट विषयोंमें हमारी आगमअनुकूल दृष्टि क्या है? इसे सर्वप्रथम हम यहाँपर स्पष्ट कर देना चाहते हैं।

हम स्वयं ‘त्रैकाल्यं द्रव्यषट्कं’ इत्यादि पद्यमें प्रतिपादित विषयको सत्य मानते हैं और उसपर आस्था रखते हैं, लेकिन इस पद्यमें प्रतिपादित विषयोंकी अपने ढंगकी ऐकान्तिक नियतताके समर्थनसे वस्तुकी स्वपरप्रत्यय परिणमनोंमें पायी जानेवाली अपने ढंगकी कुत्रचित् ऐकान्तिक नियतता, और कुत्रचित् कथंचित् नियतता तथा कथंचित् अनियतताका निषेध करना बुद्धिगम्य नहीं माना जा सकता है।

बात वास्तवमें यह है कि भूत, वर्तमान और भविष्यत् ये तीन काल; जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छह द्रव्य; जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पाप ये नव पदार्थ; पाँच स्थावर और एक त्रस ये छह कायिक जीव; कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल ये छह लेश्यायें; पाँच अस्तिकाय, पाँच व्रत, पाँच समिति, पाँच गति, पाँच ज्ञान और पाँच चारित्र इन सबकी व्यवस्थाको भगवान् अरहन्त देवने मोक्ष प्राप्तिके लिए कारणरूपसे प्रतिपादित किया है जो कि असंदिग्ध रूपसे सर्वमान्य व्यवस्था है, लेकिन इससे पर्यायोंके नियतक्रम या अनियतक्रमसे क्या सम्बन्ध है? यह आप जानें। फिर भी इससे हमारे सामने नियतता और अनियतताका विशद अर्थ करनेकी समस्या अवश्य खड़ी हो गयी है, अतः यहाँपर प्रसंगवश कहाँ किस ढंगकी नियतता और अनियतताको स्थान प्राप्त है इसे कुछ उदाहरणों द्वारा हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं।

हम मानते हैं कि विश्वमें विद्यमान वस्तुओंके जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छह प्रकार नियत हैं अर्थात् निश्चित हैं। यह भी नियत है कि इन छह प्रकारोंमेंसे जीवनामकी वस्तुएँ भी अनन्तानन्त हैं, पुद्गल नामकी वस्तुएँ भी अनन्तानन्त हैं, धर्म, अधर्म आकाश ये तीनों वस्तुएँ एक एक ही हैं तथा काल नामकी वस्तुएँ असंख्यात हैं।

धर्म, अधर्म, आकाश और सम्पूर्ण काल ये सभी वस्तुएँ अपनी-अपनी आकृति ( प्रवेश रचना ) की अपेक्षा नियत हैं अर्थात् इनकी आकृतिमें कभी बदलाहट नहीं होती। ऐसा ही नियतपना मुक्त जीवोंका तथा स्वतन्त्र स्थितिको प्राप्त पुद्गल परमाणुओंकी आकृति (प्रदेश रचना) में भी विद्यमान है, लेकिन संसारी जीवों और द्वयणुकादि पुद्गल-स्कन्धोंकी आकृति ( प्रदेश रचना ) नियत नहीं है अनियत है। जैसे एक द्वयणुककी आकृति ऐसी बनती है कि वह आकाशके दो प्रदेशोंपर अवस्थान प्राप्त करता है और एक द्वयणुककी आकृति ऐसी बनती है कि वह आकाशके एक ही प्रदेशपर अवस्थान प्राप्त कर लेता है। इसी तरहकी आकृतिका भेद त्र्यणुक आदि पुद्गल स्कन्धोंमें भी जान लेना चाहिये। संसारी जीवोंका और स्थूल पुद्गल स्कन्धोंका आकृति भेद तो स्पष्ट ही है।

धर्म, अधर्म, आकाश और सम्पूर्ण काल इन सभीकी अवस्थिति नियत है अर्थात् ये वस्तुयें कभी गतिमान् नहीं होतीं। लेकिन जीवों और पुद्गलोंकी गति और अवस्थिति दोनों ही अनियत हैं। यहाँ पर अनियतपनेका स्पष्टीकरण यह है कि ये कभी सामने गति करते हैं तो कभी विपरीत गति करते हैं अर्थात् पीछेको लौटते हैं, कभी ऊपर गति करते हैं, कभी नीचे गति करते हैं, कभी तिरछी गति करते हैं, कभी तीव्र, तीव्रतर अथवा तीव्रतम गति करते हैं तो कभी मन्द, मन्दतर अथवा मन्दतम गति करते हैं-इस तरह इनकी गतिमें अनियतपना पाया जाता है। इतना ही नहीं, ये कभी गति करते हैं तो कभी अवस्थित भी रहते हैं। इस तरह गतिका स्थितिके साथ भी जीवों और पुद्गलोंमें अनियतपना पाया जाता है।

जीवों और पुद्गलोंकी गति और स्थितिके विषयमें इतनी विशेषता और समझना चाहिये कि जीवोंका स्वतःसिद्ध स्वभाव ऊर्ध्वगमन करनेका है, अतः उनका जब तक परपदार्थोंके साथ मिश्रण रहता है तभी तक उनमें अधोगमन, तिर्यग्गमन और उलटा गमन आदि सम्भव हैं। इसी प्रकार मुक्त जीवोंका लोकके अग्रभागमें अवस्थान स्वभावतः नहीं है, क्योंकि उनका स्वभाव तो ऊर्ध्वगमन करनेका ही है। परन्तु गमन करनेके लिये उन्हें चूंकि धर्म द्रव्यका अवलम्बन आगे प्राप्त नहीं है, अतः लोकके अग्र भागमें ही उनका अवस्थान हो जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं, कि धर्म द्रव्य जीवों और पुद्गलोंको गमन करनेके लिये प्रेरित करता है, क्योंकि गमन करना तो जीवों और पुद्गलोंका अपने ही कारणोंसे होता है, फिर भी गमन करनेमें धर्म द्रव्यका अवलंबन उन्हें अपेक्षणीय अवश्य रहता है। जिस प्रकार कि मछलीका या रेलगाड़ीका गमन करना इनके अपने कारणोंसे होते हुए भी जहाँ तक जल रहता है मछली वहीं तक गमन करती है और जहाँ तक रेलकी पटरी रहती हैं वहीं तक रेलगाड़ी गमन करती है। अलावा इसके किन्हीं किन्हीं पुद्गलों की अवस्थिति नियत है और किन्हीं किन्हीं पुद्गलोंकी गति भी नियत है। जैसे स्वर्ग लोकके विमान, अधोलोकके नरकादि, मध्यलोकके सुमेरु पर्वत, असंख्यात द्वीप और समुद्रादि एवं सिद्धशिला आदि यथास्थान नियत ( स्थिर ) हैं तथा ढाई द्वीपके सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र आदि सर्वदा गतिमान् ही हैं।

गणितकी व्यवस्थायें नियत हैं अर्थात् निश्चित हैं। दो और दो जोड़ कर चार ही होते हैं, कम या अधिक त्रिकालमें कभी नहीं होते। कितने वेगसे गति की जावे कि एक घंटामें अमुक स्थानसे अमुक स्थान तक पहुँचा जा सकता है यह व्यवस्था नियत होनेके कारण ही रेलगाड़ीकी समयसारिणी बना ली जाती है। गणितकी व्यवस्थायें नियत रहनेके कारण ही सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणकी व्यवस्थित जानकारी ज्योतिषी या गणितज्ञ लोग लोकको दिया करते हैं।

द्वयणुक दो अणुओं के मेलसे ही बनता है, एक अणु अथवा तीन आदि अणु मिलकर कभी द्वयणुकका रूप धारण नहीं करते। समयकी मात्रा नियत ( निश्चित ) कर दी गयी है। उसके आधारपर आवली, घड़ी, घंटा, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्ष आदिकी मात्रा भी नियत ( निश्चित परिमाणमें ) मान ली गयी है। समयके निश्चित परिमाणके आधारपर ही पल्य, सागर, उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी आदि कालोंकी मात्रा आगममें नियत रूपसे बतला दी गयी है। प्रदेशों (वस्तुके सबसे छोटे अंशों) की मात्रा नियत होनेसे ही धर्म, अधर्म और प्रत्येक जीवकी समान असंख्यात प्रदेशात्मकता तथा आकाशकी अनन्त प्रदेशात्मकता नियत है।

ऊपर, नीचे अथवा तिर्यक्-कैसा भी गमन क्यों न किया जावे, वह गमन नियत रूपसे आकाशके एक प्रदेशसे अव्यवहित दूसरे प्रदेशको स्पर्श करते हुए ही आगेको होता है। पुद्गल परमाणु जो एक समयमें ही चौदह राज गमन कर जाता है–भी अपने गमनके मार्गमें पड़े हुए आकाशके असंख्यात प्रदेशोंको एक एक प्रदेशके नियमसे स्पर्श करता हुआ ही गमन करता है। प्रत्येक वस्तुका अपना अपना स्वभाव नियत ही रहता है अर्थात् एक द्रव्यका स्वभाव कभी अन्य द्रव्यका स्वभाव नहीं बन जाता है। ज्ञानका स्वभाव नियत होनेसे केवलज्ञानका स्वभाव भी स्व और परको जानना नियत है। इस तरह वह अपनी सामर्थ्यसे सतत विश्वके सम्पूर्ण पदार्थोंको उनकी त्रैकालिक पर्यायों सहित युगपत् जानता है तथा समय समयके विभागपूर्वक जानता है-- ऐसा भी नियत है, परन्तु वह कितने और पदार्थोंको भी जाननेकी क्षमता रखता है यह नियत नहीं है, क्योंकि लोक और अलोकको मिलाकर जितने सम्पूर्ण अनन्तानन्त पदार्थोंको और उनकी जितनी सम्पूर्ण अनन्तानन्त पर्यायोंको केवलज्ञान जानता है उनसे भी अनन्तगुणे पदार्थों और उनकी अनन्तानन्त पर्यायोंको जाननेकी क्षमता केवलज्ञान अपनेमें रखता है। अर्थात् केवलज्ञानके अन्दर जाननेकी शक्ति असीम है। स्वयं पं० फूलचन्दजीने भी अपनी जैनतत्त्वमीमांसाके ‘केवलज्ञानस्वभावमीमांसा’ प्रकरणमें यही बात लिखी है जो निम्न प्रकार है।:–

• लोक में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो केवलज्ञानके विषयके बाहर है। उसका माहात्म्य अपरिमित है। लोक और अलोकके जितने पदार्थ और उनकी पर्यायें है उनसे भी अनन्तगुणे पदार्थ और उनकी पर्यायें यदि हों तो उन्हें भी उसमें जाननेकी सामर्थ्य है।

योगीन्द्रदेव विरचित परमात्मप्रकाशमें भी बतलाया है-

णेयाभावे विल्लि जिम थक्कइ णाणु वलेवि।
मुक्कहँ जसु पय विंबियउ परम - सहाउ भणेवि ॥४७॥

इसका अर्थ संस्कृत टीकाके आधार पर यह है कि जिस तरह बेल वहीं तक चढ़ती हैं जहां तक मंडपका सहारा है। इसका अर्थ यह नहीं हैं कि आगे चढ़ने की योग्यता यहाँ बेलमें नहीं है उसी प्रकार मुक्त जीवों का ज्ञान वहीं तक फैलता है जहाँ तक ज्ञेय पदार्थ होते हैं। ऐसा नहीं समझना चाहिए कि उनके ज्ञानमें आगे जाननेकी शक्ति नहीं हैं। अर्थात् शक्ति तो केवलज्ञानको पदार्थोंको जाननेकी असीम है, परन्तु जितने ज्ञेय पदार्थ विद्यमान हैं केवल उनको ही इसलिये जानता है कि विद्यमान पदार्थोंसे अतिरिक्त पदार्थोंका विश्वमें अभाव ही पाया जाता है।

इसी प्रकार पदार्थोंको अवगाहित करना (अपने अन्दर समा लेना) आकाशका स्वभाव नियत है, अतः विश्वके समस्त पदार्थोंको वह अपनेमें अवगाहित कर रहा है-ऐसा भी नियत है, परन्तु कितने और पदार्थोंको अवगाहित करनेकी क्षमता आकाशमें विद्यमान है यह नियत नहीं है, क्योंकि विश्वके जितने सम्पूर्ण पदार्थ हैं उनसे भी अनन्तगुणे पदार्थ यदि हों तो आकाश उन्हें भी अपने अन्दर अवगाहित कर लेनेकी क्षमता रखता है। नियतपने और अनियतपनेकी यही व्यवस्था धर्म, अधर्म और काल-द्रव्योंके अपने-अपने स्वभावके विषयमें भी जान लेना चाहिये। ऐसे ही कुम्हारको मिट्टीसे घड़ा आदि वस्तुओंके निर्माणके अनकूल व्यापार करनेकी योग्यता प्राप्त है, परन्तु कितने और कौन-कौन घटादि पदार्थोंके निर्माणके अनुकूल व्यापार करनेकी योग्यता उसको प्राप्त है यह नियत नहीं है। यही बात जुलाहामें पट-निर्माणके अनुकूल व्यापार करनेकी योग्यताके विषयमें भी जान लेना चाहिये। अध्यापक शिष्यको पढ़ाता है परन्तु जिस पुस्तकको अध्यापकने शिष्यको पढ़ाया, केवल उसके पढ़नेकी ही योग्यता शिष्यको प्राप्त हुई हो, सो बात नहीं है वह उस विषयकी अन्य अनेक पुस्तकें पढ़ सकता है। प्राणीमें आँखोंसे देखनेकी योग्यता पायी जाती है, इसलिये जो दृश्य पदार्थ उसकी आँखोंके सामने आते हैं उन्हें वह देखता है, लेकिन इसका यह अभिप्राय लेना गलत ही है कि जिनको वह देखता है उन्हींके देखनेकी उसे योग्यता प्राप्त है अन्यकी नहीं।

हम यह स्वीकार करते हैं कि प्रत्येक वस्तुकी नियत ( निश्चित ) योग्यताएँ हुआ करती हैं। इसका अभिप्राय यह है कि मिट्टीसे जिस प्रकार घटादिका निर्माण हो जाता है उस प्रकार उससे पटादिका निर्माण कभी नहीं होता। इसका भी अभिप्राय यह है कि मिट्टीमें घटादि निर्माणकी योग्यता नियत है और पटादि निर्माणकी अयोग्यता उसमें नियत है और चूँकि कुम्हारको उसमें रहनेवाली घटादि निर्माणकी योग्यताका परिज्ञान रहता है, इसलिये वह उससे घटादि निर्माणके अनुकूल व्यापार करनेमें प्रवृत्त होता है। परन्तु चूँकि जुलाहेको उसमें रहनेवाली पटनिर्माणकी अयोग्यताका भी ज्ञान रहता है अतः वह उससे पटनिर्माणके अनुकूल व्यापार करनेमें भी प्रवृत्त नहीं होता है। इस प्रकारके नियतपनेके साथ-साथ मिट्टीकी पर्यायोंमें अनियतपना भी इस प्रकार सिद्ध होता है कि एक ही प्रकारकी मिट्टीसे कुम्हार बिना किसी भेदभावके आवश्यकतानुसार कभी तो घटनिर्माणमें बुद्धिपूर्वक प्रवृत्त होता है और कभी उस एक ही प्रकारकी मिट्टीसे सकोरा आदिके निर्माणमें भी बुद्धिपूर्वक ही प्रवृत्त होता है। इस विषयको आगे स्पष्ट किया जायगा।

हम यह भी स्वीकार करते हैं कि प्रत्येक वस्तुकी त्रैकालिक पर्यायें उत्पत्तिके लिहाजसे उतनी संख्यामें मानी जा सकती हैं जितने त्रिकालके समय निश्चित हैं। परन्तु इससे वस्तुकी पर्यायोंके उत्पन्न होनेकी योग्यताएँ निश्चित नहीं की जा सकती हैं। हम पहले भी स्पष्ट कर आये हैं कि केवलज्ञानमें पदार्थोंको जाननेकी योग्यता उतनी ही नहीं है जितने कि लोकमें पदार्थ विद्यमान हैं, किन्तु लोकमें विद्यमान पदार्थोंसे भी अधिक असीम पदार्थोंके जाननेकी योग्यता केवलज्ञानमें विद्यमान है। इसी प्रकार आकाश, धर्म, अधर्म और कालमें भी उनकी अपनी-अपनी असीम योग्यताका सद्भाव वहींपर बतला आये हैं। आगे भी इस विषयको स्पष्ट किया जायगा कि कारणोंके प्राप्त होनेपर वस्तुकी किसी योग्यतानुसार कार्यकी उत्पत्ति होना अलग बात है और कार्योंकी योग्यताओंका वस्तुमें सद्भाव रहना अलग बात है।

कोई भी कार्य स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावकी सीमामें ही होता है; परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावमें नहीं होता है यह सब नियत है। अर्थात् कार्यकी जो वस्तु उपादान है कार्य उसी उपादानभूत वस्तुमें होता है, उपादानभूत वस्तुसे भिन्न अन्य वस्तुमें वह कार्य कदापि नहीं होता है। जैसे घटकी उत्पत्ति मिट्टीमें ही होती है। कार्य उतने ही छोटे-बड़े परिमाणका होगा जितना छोटा-बड़ा परिमाण उस कार्यकी उपादानभूत वस्तुका होगा। यह कभी नहीं होगा कि उपादानभूत वस्तुके परिमाणसे छोटे परिमाणका अथवा बड़े परिमाणका कभी कार्य उत्पन्न हो जावे। जैसे घटनिर्माणके लिये मिट्टीका जितना परिमाण होगा घट भी उतने ही परिमाणका बनेगा। वस्तुकी जिस पर्यायके अनन्तर ही जिस पर्यायका होना संभव हो वह पर्याय उस पर्यायके अनन्तर ही होगी, किसी अन्य पर्यायके अनन्तर वह पर्याय नहीं होती है। जैसे स्थूल रूपसे मिट्टीकी कुशूल पर्यायके बाद ही घटका निर्माण सम्भव है। पिंड, स्थास अथवा कोश पर्यायके बाद कुशूल पर्यायके हुए बिना घट पर्यायका होना सम्भव नहीं है और यदि सूक्ष्म रूपसे कहा जाय तो एक क्षणवर्ती निष्पन्न घट पर्यायसे अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायके अनन्तर ही घटका निर्माण सम्भव है व्यवहित द्वितीयादि पूर्वक्षणवर्ती किसी भी पर्यायके अनन्तर एक क्षणवर्ती उस घट पर्यायका निर्माण सम्भव नहीं है,असम्भव ही है । यहाँ पर ‘वस्तुकी जिस पर्यायके अनन्तर जिस पर्यायका होना सम्भव हो’ इस वाक्यमें ‘सम्भव हो’ के स्थानमें ‘नियत हो’ यह प्रयोग इसलिये नहीं किया गया है कि कार्यके अनन्तर पूर्ववर्ती उस पर्यायके अनन्तर विवक्षित पर्याय ही उत्पन्न होगी-यह नियम नहीं बनाया जा सकता है । कारण कि उस पर्यायके अनन्तर उपादानगत योग्यताके आधारपर भिन्न-भिन्न निमित्तोंका योग मिलनेपर विविध प्रकारकी पयार्योंमेंसे कोई एक पर्यायका होना सम्भव है, केवल किसी एक नियत पर्यायका होना ही सम्भव नहीं है । इसी प्रकार वस्तुमें जिस जातिकी योग्यता होगी कार्य भी उसी जातिका होगा । यह कभी नहीं होगा कि वस्तुमें योग्यता तो किसी जातिकी हो और कार्य किसी जातिका हो जावे । जैसे मिट्टीसे घड़ा, सकोरा आदिका निर्माण तो हो सकता है, क्योंकि उस जातिकी योग्यता मिट्टीमें विद्यमान रहती है, परन्तु पटका निर्माण मिट्टीसे नहीं हो सकता है, क्योंकि पट निर्माणकी योग्यता मिट्टीमें नहीं पायी जाती है ।

यदि कार्यके स्वदेश और स्वकालका अभिप्राय जैसा कि स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा ३२१ और गाथा ३२२ में प्रगट किया गया है वैसा गृहीत किया जावे, तो वह भी इस प्रकारसे सही होगा कि केवलज्ञानमें सभी कार्य प्रतिनियत कारणोंसे स्वकालमें उत्पन्न होते हुए झलक रहे हैं, लेकिन केवलज्ञानमें यदि कार्य ऐसा झलक रहा है तो श्रुतज्ञानमें भी केवलज्ञानकी तरह ही कार्य झलकना चाहिये-यह अभिप्राय उन गाथाओंका नहीं है । कारण कि केवलज्ञानी और श्रुतज्ञानियोंका ज्ञानभेद और अवस्थाभेद पूर्वमें बतलाया जा चुका है, अतः स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा ३२३ द्वारा श्रुतज्ञानीको केवलज्ञानके विषयके प्रति मात्र श्रद्धा करनेका उपदेश देते हुए ऐसे श्रद्धावान् व्यक्तिको सम्यग्दृष्टि प्रतिपादित किया गया है । श्रुतज्ञान और केवलज्ञानके अन्तरको स्वामी समन्तभद्रने आप्त मीमांसामें भी बतलाया है । यथा-

स्याद्वादकेवलज्ञाने सर्वतत्त्वप्रकाशने ।
भेदः साक्षादसाक्षाच्च ह्यवस्त्वन्यतमं भवेत् ॥१०५॥

अर्थ-स्याद्वाद ( श्रुत ) तथा केवलज्ञान ये दोनों ही वस्तुतत्त्वके प्रकाशक हैं, इनमेंसे स्याद्वाद तो असाक्षात्कार अर्थात् परोक्षरूपसे वस्तुतत्त्वका प्रकाशक है और केवलज्ञान प्रत्यक्षरूपसे वस्तुतत्त्वका प्रकाशक है ।

इसी प्रकार आप्तमीमांसामें ही जहाँ केवलज्ञानमें सर्वसतत्त्व प्रकाशनका यौगपद्य स्वीकार किया गया है वहाँ श्रुतज्ञानमें तत्त्वप्रकाशनकी क्रमिकता बतलायी गयी है । वह कथन भी निम्न प्रकार है -

तत्त्वज्ञानं प्रमाणं ते युगपत्सर्वभासनम् ।
क्रमभावि च यज्ज्ञानं स्याद्वादनयसंस्कृतम् ॥१०१॥

अर्थ-( हे जिनदेव ) आपका युगपत् सर्व पदार्थोंका प्रतिभासन स्वरूप तत्त्वज्ञान प्रमाणभूत है तथा जितना क्रमभावि तत्त्वज्ञान है वह भी इसलिये प्रमाणभूत है कि वह स्याद्वाद तथा नयों से संस्कृत ( परिष्कृत ) हो रहा है ।

इस कारिकासे जहाँ केवलज्ञान और श्रुतज्ञानमें यौगपद्य तथा क्रमका भेद प्रकट किया गया है वहां यह बात भी बतला दी गयी है कि यदि प्रमाणताकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो दोनों ही प्रमाणभूत ही हैं । इससे यह तत्त्व फलित हो जाता है कि कार्य-कारणभावके आधारपर पर्यायोंका श्रुतज्ञान द्वारा ज्ञात नियत क्रमवर्तित्व और अनियत-क्रमवर्तित्व प्रमाणित ही है ।

फिर एक बात और है । धवल पुस्तक १३ में निम्नलिखित सूत्र पाया जाता है-

सइं भयवं उप्पण्णणाणदरिसी सदेवासुरमाणुसस्स लोगस्स आगदिं गदिं चयणोववादं बंधं मोक्खं इड्ढिं, ट्ठिदिं जुदिं अणुमागं तक्कं कलं माणो माणसियं भुत्तं कदं पडिसेविदं आदिकम्मं अरहकम्मं सव्वलोए सव्वजीवे सव्वभावे सम्मं समं जाणदि पस्सदि विहरदि त्ति ॥८२५ (पृष्ठ ३४६)

अर्थ-जिनके ज्ञान और दर्शन स्वयं उत्पन्न हो गये हैं ऐसे भगवान देवलोक और असुर-लोकके साथ मनुष्य लोककी आगति, गति, चयन, उपपाद, बन्ध, मोक्ष, ऋद्धि, स्थिति, युति, अनुभाग, तर्क, कल, मन, मानसिक, भुक्त, कृत, प्रतिसेवित, आदिकर्म, अर्हकर्म, सब लोकों, सब जीवों और सब भावोंको सम्यक् प्रकारसे युगपत् जानते हैं, देखते हैं और विहार करते हैं।

इसमें अनुभागका व्याख्यान करते हुए टीकामें लिखा है-

अण्णेसिं दव्वाणं कमाकमेहि परिणमणहेदुत्तं कालदव्वाणुभागो। (पृ० ३४९)

अर्थ-अन्य द्रव्योंके क्रम और अक्रमसे परिणमनमें हेतु होना कालद्रव्यानुभाग है।

इस उदाहरणसे मालूम पड़ता है कि केवलीका ज्ञान उपर्युक्त सब बातोंके साथ-साथ द्रव्योंके क्रम और अक्रमसे होनेवाले परिणमनोंको भी जानता है।

तात्पर्य यह है कि नियतक्रमता और अनियतक्रमता ये दोनों वस्तु-परिणमनके ही धर्म हैं और वे अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही उनमें सम्पन्न होते हैं और चूँकि पदार्थकी जैसी स्थिति हो; वैसी ही केवलज्ञानीके ज्ञानमें झलकती है, अतः वस्तुपरिणमनमें पाये जानेवाले नियतक्रमता और अनियतक्रमता रूप दोनों धर्म केवलज्ञानके भी विषय होते हैं। वस्तु परिणमनमें केवलज्ञान अथवा श्रुतज्ञानके विषय होनेसे नियतक्रमता या अनियतक्रमता आती हो-ऐसी बात नहीं है, किन्तु अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही वस्तु परिणमनोंमें नियतक्रमता और अनियतक्रमता आती है। यह बात पूर्वमें ही बतला चुके हैं कि किसी भी कार्यकी उत्पत्ति केवलज्ञान द्वारा ज्ञात होनेके कारण नहीं हुआ करती है, किन्तु अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही उसकी उत्पत्ति हुआ करती है और यह व्यवस्था श्री पं० फूलचन्दजीको भी स्वीकार है - यह बात भी वहीं पर बतला आये हैं।

इस प्रकार श्रुतज्ञानी केवलज्ञानके विषयकी अपेक्षासे तो यही मानता है यानी श्रद्धा और विश्वास करता है कि जिस देशमें और जिस कालमें जिस विधि-विधानसे ( यथायोग्य स्वरूपकारणसे अथवा स्व और पर उभयरूप कारणोंसे ) केवली भगवान्‌ने जैसा जाना है वैसा नियमसे होता है और वही श्रुतज्ञानी यह भी आवश्यक समझता है कि कार्यके कार्य-कारणभावको जाने विना तथा तदनुकूल पुरुषार्थ किये बिना कार्यकी उत्पत्ति नहीं होगी-इस तरह श्रुतज्ञानीकी मान्यता श्रद्धा और अपने कर्त्तव्यपर समानरूपसे आधारित होनी चाहिये। विवक्षावशात् दोनोंमेंसे एकको मुख्य और दूसरेको गौण कर देना दूसरी बात है। जैसे हम पहले बतला चुके हैं कि कार्यमें सफलताकी दृष्टिसे वह अहंकारी न बन जावे अथवा असफलताकी दृष्टिसे दुःखी न हो जावे-इसके लिए तो वह ऐसा ही समझता है कि मेरा कर्त्तव्य तो पुरुषार्थ करनेका था या है सो किया या करूँगा, परन्तु केवलज्ञानी भगवानने जैसा देखा, वैसा ही हुआ या होगा। इसमें मेरा कुछ कर्त्तव्य निहित नहीं है, अथवा इसके लिए मेरा कुछ वश नहीं है। इसी प्रकार पदार्थमें जैसी भवितव्यता अर्थात् आगे होने योग्य कार्योंकी सम्भावनापूर्ण स्थिति ( होनहार ) विद्यमान होगी वैसा ही कार्य उस पदार्थमें हो सकता है। कोई भी प्राणी उक्त प्रकारकी भवितव्यताको लांघकर यानी भवितव्यताके अलावा कार्य उत्पन्न नहीं कर सकता है या यों कहिये कि प्राणी पदार्थमें नवीन भवितव्यता नहीं पैदा कर सकता है। जैसे मिट्टीमें घटादिके उत्पन्न होनेकी भवितव्यता पायी जाती है, इसलिए जिस प्रकार मिट्टीमें घटादिकी उत्पत्ति सम्भव है उस प्रकार पटादिके उत्पन्न होनेकी भवितव्यता मिट्टीमें नहीं पायी जानेके सबब, कितने ही प्रयत्न क्यों न किये जावें-कदापि पटादिकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है । इस प्रकार श्रुतज्ञानी जीव श्रद्धाको प्रधान और कार्यानुकूल पुरुषार्थको गौण बना लेता है तथा इसके साथ ही कार्यको उत्पन्न करनेकी दृष्टिसे वह जब अपने कर्त्तव्य मार्गकी ओर उन्मुख होता है तो उस समय उसकी दृष्टिमें श्रद्धापक्षकी गौणता व कर्तव्य पक्षकी प्रधानता स्वाभाविक रूपसे हो जाती है । यह तो ठीक है और इस तरह प्रवृत्ति करनेवाला श्रुतज्ञानी जीव सम्यग्दृष्टि है । लेकिन ऐसा न करके यदि कोई व्यक्ति उक्त प्रकारके नियतिवादको ही कार्योत्पत्तिके लिए आधार बना कर पुरुषार्थहीन बन जाय तो उसका कार्य कभी सम्पन्न नहीं होगा । आप फिर भले ही कहते जावें कि ऐसा ही भगवान्ने देखा था या ऐसी ही भवितव्यता थी, परन्तु कबतक ऐसा मानकर बैठा जा सकता है । कार्य निष्पन्न करना होगा तो पुरुषार्थ करना ही होगा । मुक्ति पानी होगी तो नग्न दिगम्बर मुद्रा धारण करनेके लिए बाध्य होना ही पड़ेगा । यह नहीं हो सकता कि इसके लिए पुरुषार्थ न करके सिर्फ ऐसी मान्यतासे ही वह प्राप्त हो जायगी कि सर्वज्ञके ज्ञानमें जब मुक्ति झलकी होगी तब वह हो ही जायगी या जब हमारी भवितव्यतामें वह होगी तब वह हो ही जायगी, हमें उसके लिए पुरुषार्थ करनेकी जरूरत नहीं है अर्थात् नग्न दिगम्बर मुद्रा धारण करना जरूरी नहीं है और यदि जरूरी है भी, तो जब हमारा मुक्ति पाना सर्वज्ञके ज्ञानमें झलका होगा तब अपने आप हम नग्न दिगम्बर मुद्राके धारी बन जावेंगे या भवितव्यता ही यह सब कुछ हमसे करा लेगी । ऐसी या इसी प्रकारकी सब बातें नियतिवादरूप मिथ्यात्वके ही रूपमें हैं ।

इस प्रकार कार्यसिद्धिके लिए कार्यकारणभावको समझिये, पुरुषार्थ कीजिए, आवश्यकतानुसार निमित्तोंको भी जुटाईये, लेकिन इसमें अहंकारी मत बनिये, अधीरता मत दिखाइये, असफलतासे दुःखी मत हूजिये, विवेकी गम्भीर और स्थिरबुद्धि बनकर अपनी दृढ़ श्रद्धाके साथ कर्त्तव्य पथपर डट जाईये, डट जावें, तो फिर डटे रहिये, उस कर्तव्य पथसे च्युत नहीं हूजिये-यही सम्यक्त्वका चिह्न है, इसीमें आस्तिक्यभाव ( श्रद्धाका भाव ) झलकता है, इसीमें अनेकान्तवादका प्रकाशपुंज आपको दिखेगा और निर्वेदभाव, अनासक्तिभावकी छाया इसीमें प्राप्त होगी । निम्नलिखित पद्योंसे हमें यही उपदेश प्राप्त होता है-

अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं हेतुद्वयाविष्कृतकार्यलिंगा ।
अनीश्वरो जन्तुरहंक्रियार्तः संहत्य कार्येष्विति साध्ववादीः ॥१३३॥
-स्वयंभूस्तोत्र

इस पद्यका आशय हम पूर्वमें प्रगट कर चुके हैं ।

जो जो देखी वीतरागने सो सो होसी वीरा रे ।
अनहोनी कबहूँ न होसी काहे होत अधीरा रे ॥
-पंडितप्रवर मैया भगवतीदासजी

आप देखेंगे कि प्रथम पद्यके प्रथम चरण और द्वितीय चरणमें श्रद्धा और कर्त्तव्यका कितना सुन्दर समन्वय किया गया है और तीसरे चरणमें एकान्त पक्षको माननेवाले निमित्तवादियोंको कहा गया है कि अनेकान्त तत्त्वको पहिचानो और निरहंकारी बनो । दूसरे पद्यमें अपनी कार्यसिद्धिमें अधीरता प्रगट करनेवालोंको कहा गया है कि होगा वही जो वीतराग महाप्रभुके ज्ञानमें झलका है, फिर इतनी अधीरता क्यों दिखलाते हो ? इसमें भी पुरुषार्थ व निमित्तोंको जुटानेका निषेध नहीं किया गया है इसी पद्यके आगेके पद्योंको भी पढ़ा जावे तो आप देखेंगे कि उनमें फिर पुरुषार्थ करनेकी भी प्रेरणा की गयी है। वे पद्य निम्न प्रकार है-

तू सम्हारि पौरुष बल अपनो, सुख अनन्त तो तीरा रे। ( तीसरे पद्यका उत्तरार्ध )
निश्चय ध्यान धरहु वा प्रभुको जो टारै भव पीरा रे। (चौथे पद्यका पूर्वाद्ध )

आप देखेंगे कि इसमें उन्होंने अपने पौरुषको सम्हालने व प्रभुका ध्यान करनेके लिये प्राणियोंको प्रेरणा दी है जो नियतिवादके सर्वथा विरुद्ध है। पूर्वमें बतलाया जा चुका है तथा स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा ३२३ में ‘णिच्छयदो’ पद डाल कर आचार्य महाराजने हमें इस बातका उपदेश दे दिया है कि श्रद्धाकी लगाम लगा कर कर्त्तव्यरूपी घोड़े पर सवार हो जाईये, आपका कार्य सफल होगा। वह गाथा निम्न प्रकार है :-

एवं जो णिच्छयदो जाणदि सव्वाणि दव्वपज्जाए।
सो सद्दिट्ठी सुद्धो जो संकदि सो हु कुदिट्ठी ॥३२३॥

अर्थ-इस प्रकार ( पूर्वोक्त प्रकार ) से जो जीव समस्त द्रव्यों और समस्त पर्यायोंके विषयमें आस्था रखता है वह शुद्ध सम्यग्दृष्टि है और जो इसमें शंका करता है वह मिथ्यादृष्टि है।

यदि उक्त प्रकारसे श्रद्धा और कर्त्तव्यका समन्वय न किया जाय तो जैसा कि स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा की ३२१ और ३२२ वीं गाथाओंमें वर्णन किया और जिसके स्वीकार करने पर उक्त गाथा ३२३ में प्राणीको शुद्ध सम्यग्दृष्टि बतलाया है उसी प्रकारका वर्णन तो पंचसंग्रह आदि आगम ग्रन्थोंमें भी किया है जिसे स्वीकार करने पर वहाँ पर प्राणीको मिथ्यादृष्टि बतला दिया गया है। इन दोनों कथनोंकी संगति किस प्रकार हो सकेगी ? पंचसंग्रहका वह कथन निम्न प्रकार है जिसको वहाँ पर नियतिवादरूप एकान्त मिथ्यात्व बतलाया है।

यद् भवति तद् भवति, यथा भवति तथा भवति, येन भवति तेन भवति, यदा भवति तदा भवति, यस्य भवति तस्य भवति इति नियतिवादः।
-प्रा० पं० सं० पृ० ५४७ ज्ञानपी० से प्रकाशित

अर्थ-जो होना है वह होता है, जैसे होना है वैसे होता है, जिसके द्वारा होना है उसके द्वारा होता है, जब होना है तब होता है, जिसके होना है उसके होता है यह नियतिवाद है।

सिद्धान्तचक्रवर्ती श्रीनेमिचन्द्राचार्यने गोम्मटसार कर्मकाण्डमें भी नियतिवादरूप एकान्त मिथ्यात्वका कथन निम्न प्रकार किया है :-

जत्तु जदा जेण जहा जस्स य णियमेण होदि तत्तु तदा।
तेण तहा तस्स हवे इदि वादो णितदिवादो दु ॥८८३॥

अर्थ-जो जिस समय जिससे जैसे जिसके नियमसे होना है वह उस समय उससे वैसे उसके होता है-ऐसा मानना नियतिवाद है।

श्री अमितिगति आचार्यके पंचसंग्रहमें प्र० अ०, पृ० ११२ में भी देखिये-

यदा यथा यत्र यतोऽस्ति येन यत् तदा तथा तत्र ततोऽस्ति तेन तत्।
स्फुटं नियत्येह नियंत्र्यमाणं परो न शक्तः किमपीह कर्तुम् ॥३१२॥

अर्थ-जब जैसे जहाँ जिस हेतुसे जिसके द्वारा जो होना है तब तैसे वहाँ उस हेतुसे उसके द्वारा वह होता है यह सब नियतिके नियंत्रणमें होता है, दूसरा कोई कुछ भी नहीं कर सकता है ।

अब आप देखेंगे कि स्वामिकार्तिकेयानुपेक्षाकी गाथा ३२१ और गाथा ३२२ पद्मपुराणके ‘यत्प्राप्तव्यं यदा येन’ इत्यादि पद्य और स्वयंभूस्तोत्रके ‘अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं’ इत्यादि पद्यके कथनोंमें और प्राकृत पंचसंग्रह, गोमट्टसार तथा अमितिगति आचार्यकृत पंचसंग्रहके उक्त कथनोंमें, कुछ अन्तर नहीं है, फिर भी स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा आदिके उन कथनों पर आस्था रखनेसे प्राणी सम्यग्दृष्टि माना जाता है और उसी प्रकारके पंच-संग्रह आदिके कथनोंको स्वीकार करनेवाला नियतिवादी मिथ्यादृष्टि कहलाता है । इसका आशय केवल इतना ही है कि यदि द्वादशांग प्रतिपादित कार्यकारणभाव पद्धतिको अपनाते हुए कर्तव्य परायण बनकर उक्त कथनोंपर श्रद्धा रक्खी जावे तब तो प्राणी सम्यग्दृष्टि बनता है और यदि द्वादशांग प्रतिपादित कार्यकारणभाव पद्धतिकी सर्वथा उपेक्षा करके या उसे आरोपित, मिथ्या, कल्पित, अकिंचित्कर आदिके रूपमें मान कर कर्त्तव्यसे शून्य होता हुआ नियतिके ही आश्रित प्राणी हो जाता है तो उस हालतमें वह एकान्तनियतिवादी मिथ्यादृष्टि हो जाता है ।

इस उपर्युक्त विवेचनसे हमने आगमानुसार यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि दिव्यध्वनिसे लेकर गणधरों द्वारा रचित द्वादशांग रूप द्रव्यश्रुतमें तथा उनके पश्चात् अन्य महर्षि-आचार्यों द्वारा रचित द्रव्य श्रुतमें श्रुत-ज्ञानियोंके लिये ही वस्तुतत्त्व व्यवस्था प्रतिपादित की गयी है तथा उस व्यवस्थामें श्रद्धा और कर्त्तव्य-पथका समावेश कर दिया गया है । कारण कि इन दोनोंका समावेश किये विना प्राणीको सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होना असम्भव है । तात्पर्य यह है कि केवलज्ञानियोंके लिये वस्तुतत्त्व व्यवस्थाकी कोई उपयोगिता नहीं है । कारण कि केवलज्ञानी जीव तो समस्त वस्तु तत्त्वके स्वतः पूर्ण ज्ञाता हैं, अतः वे वस्तुतत्त्व के व्यवस्थापक तो हैं किन्तु वस्तुतत्त्व व्यवस्था उनके लिये नहीं है । उनके ज्ञानमें निश्चय नय और व्यवहार नयका भी भेद नहीं है । उनका सम्पूर्ण ज्ञान निरंश रूपसे प्रमाण रूप है जब कि श्रुतज्ञानियोंका श्रुतज्ञान अंशी रूपसे ही प्रमाण रूप हो सकता है । इसलिये केवलज्ञानियोंका जो केवलज्ञान निरंशरूपसे प्रमाण रूप है उसमें निश्चय नय और व्यवहार नयका भेद कैसे सम्भव हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता है । इस प्रकार केवलज्ञानी जीव वस्तु तत्त्वके सिर्फ ज्ञाता दृष्टा ही बने हुए हैं । दूसरी बात हम यह भी बतला आये हैं कि वे कृतकृत्य भी हो चुके हैं-इत्यादि बातोंसे आप समझ सकते हैं कि केवलज्ञानी जीवोंके लिये वस्तु तत्त्व व्यवस्थाकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है, अतः सिर्फ श्रुतज्ञानी जीवोंके लिये ही वस्तु तत्त्व व्यवस्थाकी उपयोगिता है ।

वस्तु तत्त्व व्यवस्थाके श्रुतज्ञानी जीवोंके लिये दो रूप ही हो सकते हैं-एक तो केवलज्ञानके विषयकी अपेक्षा श्रद्धाका रूप और दूसरा श्रुतज्ञानके विषयको अपेक्षा कर्तव्यका रूप । और तत्त्व व्यवस्थाके दोनों ही रूप प्रमाणभूत हैं, अतः श्रुतज्ञानी जीवोंको दोनों ही रूप प्रमाण रूपसे स्वीकार करने योग्य हैं अर्थात् श्रुतज्ञानी जीव यदि केवलज्ञानकी दृष्टिसे विचार करें तो उन्हें मालूम होगा कि चूँकि प्रत्येक वस्तुकी एक-एक समयमें एक-एक पर्याय ही उत्पन्न हो सकती है, इसलिये कालके जितने त्रैकालिक समय हैं उतनी ही प्रत्येक वस्तुकी पर्यायोंकी उत्पत्ति होना सम्भव है और चूँकि केवलज्ञानी जीव समस्त वस्तुओंकी उनकी अपनी-अपनी समस्त त्रैकालिक पर्यायोंका सतत ज्ञान कर रहे हैं । अर्थात् भूतमें कब किस वस्तुकी कौन-सी पर्याय हुई यह भी उन्हें ज्ञात हो रहा है, वर्तमान समयमें किस वस्तुकी कौन-सी पर्याय हो रही है यह भी उन्हें ज्ञात हो रहा है और भविष्यत्में कब किस वस्तुकी कौन-सी पर्याय होगी यह भी उन्हें ज्ञात हो रहा है इसलिये यह निश्चित हो जाता है कि प्रत्येक वस्तुकी त्रैकालिक पर्यायोंमेसे एक-एक पर्याय केवलज्ञान गम्य नियत क्रमसे ही उत्पन्न होती हैं और वे ही श्रुतज्ञानी जीव यदि अपने श्रुतज्ञानकी दृष्टिसे विचार करें तो यह उनके अनुभव, तर्क तथा आगमसे भी प्रसिद्ध बात होगी कि मिट्टीसे ही घट सकोरा आदि बनते हैं सूतसे नहीं, मिट्टीसे घट, सकोरा आदि ही बनते हैं वस्त्रादिकी उत्पत्ति मिट्टीसे कदापि नहीं होती है, कुम्हारके पुरुषार्थका मिट्टीको अनुकूल सहयोग मिलनेपर ही इससे घटका निर्माण होता है अन्यथा नहीं और कुम्हार भी दण्ड, चक्र, वस्त्र, जल आदिकी सहायतापूर्वक ही अपने पुरुषार्थका उपयोग मिट्टीसे घटनिर्माणमें करता है-इस प्रकार प्रत्येक वस्तुकी प्रत्येक स्वपरप्रत्यय पर्यायकी उत्पत्तिमें उपादानोपादेयभावके साथ-साथ निमित्तनैमित्तिकभाव रूप कार्यकारणभावकी प्रक्रिया सतत विद्यमान रहती है। इसी प्रकार अगुरुलघुगुणके अविभागी प्रतिच्छेदोंमें षड्गुण हानि-वृद्धि रूपसे होनेवाली स्वप्रत्यय पर्यायों ( परिणमनों ) की उत्पत्तिमें भी केवल उपादानोपादेयभावरूप कार्यकारणभावकी प्रक्रिया आगममें प्रतिपादित की गयी है इसलिये यह भी निश्चित है कि प्रत्येक वस्तुकी प्रत्येक पर्याय अपने-अपने प्रतिनियत कारणोंके आधारपर यथायोग्य नियतक्रम अथवा अनियतक्रमसे ही उत्पन्न होती है।

एक बात और है कि श्रुतज्ञानीके सामने करनेके लिये उचित-अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक, ऐहिक-पारलौकिक, जीवन-सम्बन्धी-मुक्ति-सम्बन्धी, वैयक्तिक, कौटुम्बिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक आदि आदि असंख्य प्रकारके कार्योंका अम्बार लगा रहता है, उनकी सम्पन्नता उस उस कार्यके अनुकूल सामग्रीके जुटनेपर अथवा जुटानेपर ही होती है और उस उस कार्यके अनुकूल सामग्री जुटानेके लिये हमें यथायोग्य अपनी इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति तथा श्रमशक्तिका उपयोग भी करना होता है तथा करते भी हैं। यह बात हम पहले कह चुके हैं कि हम नियतिके नियंत्रणमें बँधकर यंत्रवत् यह सब कुछ नहीं कर रहे हैं, अन्यथा हमें अपने अनुभवको अप्रमाण मानना होगा, तर्क भी अप्रमाण मानना होगा और इसी तरह कार्यकारणभाव व्यवस्थाके प्रतिपादक आगमको भी अप्रमाण मानना होगा, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, हिंसा-अहिंसा आदिकी आगम सम्मत सम्पूर्ण व्यवस्थायें समाप्त हो जायँगी, केवल नियतिका विश्वमें एकछत्र साम्राज्य प्रस्थापित हो जायगा जिसे आगम ग्रन्थोंमें मिथ्यात्व कहा गया है । जैनी दृष्टि यह नहीं है । जैनी दृष्टि तो श्रद्धा और कर्त्तव्य दोनोंके समन्वय करनेसे ही सम्पन्न होती है जिसपर आपका ध्यान जाना चाहिये।

चूंकि आगममें कार्यकारण व्यवथाका प्रभावशाली वर्णन पाया जाता है, अतः आपने कार्यकारण व्यवस्थाको स्वीकार तो किया है। परन्तु आपने उसे इस रूपमें रखनेका प्रयत्न किया है कि जिससे आपको मान्य ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होने पर ही होते हैं’ इस सिद्धान्तको न केवल आंच न आने पावे बल्कि इसका आपके द्वारा मानी हुई कार्यकारण व्यवस्थासे पोषण हो सके, साथ ही आगममें महत्त्वपूर्ण स्थानको प्राप्त निमित्त कारणको आप अकिंचित्कर भी बना सकें। आपने अपने इस मतका समर्थन करनेके लिए कार्यकारणभाव पर प्रभाव डालनेवाली स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी निम्नलिखित गाथाको उद्धृत किया है-

पुव्वपरिणामजुत्तं कारणभावेण वट्टदे दव्वं।
उत्तरपरिणामजुदं तं च्चिय कज्जं हवे णियमा ॥२३०॥ (२२२)

इसका अर्थ आपने यह किया है कि अनन्तर पूर्व परिणामसे युक्त द्रव्य कारण रूपसे ( उपादान कारण रूपसे ) प्रवर्तित होता है और अनन्तर उत्तर परिणामसे युक्त वही द्रव्य नियमसे कार्यरूप होता है।

हम उक्त गाथाका यों अर्थ करते हैं-‘द्रव्य अपने पूर्व परिणामकी अवस्थामें कारण रूपसे रहता है और जब वह उत्तर परिणामसे युक्त होता है तब वह नियमसे कार्यरूप हो जाता है।’

हमारे द्वारा कृत और आपके द्वारा कृत उक्त दोनों अर्थोके अभिप्रायोंमें अन्तर यह है कि जहाँ आप पूर्व पर्यायसे सिर्फ वस्तुकी कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायको ही कारण रूपसे स्वीकार करते हैं वहाँ हम सूक्ष्म पर्यायोंकी दृष्टिसे वस्तुकी कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायको तो कारणरूपसे स्वीकार करते ही हैं लेकिन इसके साथ ही स्थूल पर्यायोंकी दृष्टिसे मिट्टी घटादि संभव पर्यायोंमेंसे किसी भी पर्यायसे अव्यवहित पूर्वकालमें स्थित कुशूल पर्यायको भी हम कारणरूपसे स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि जिस प्रकार आगममें क्षणिक पर्यायोंके आधारपर कार्यकारणभाव प्रतिपादित किया गया है उसी प्रकार स्थूल पिंड, स्थास, कोश, कुशूल और घट आदि पर्यायोंके आधारपर भी उत्तरोत्तर कार्यकारणभावको स्वीकार किया गया है। फिर भी हम मानते हैं कि प्रकृतमें हमारे आपके मध्य पाये जानेवाले उक्त अन्तरसे कोई समस्या खड़ी नहीं होती है, अतः हम आपके लिये मान्य विवक्षित क्षणिक पर्यायोंमें पाये जानेवाले कार्यकारणभावके आधारपर ही आगेका विवेचन प्रारम्भ कर रहे हैं।

क्षणिक पर्यायोंके आधारपर उल्लिखित गाथामें उपादान कारण और कार्यकी व्यवस्था इस तरह बतलायी गयी है कि वस्तुकी उत्तर क्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्याय विशिष्ट वस्तु कारण कहलाती है और उस पूर्व पर्यायसे अव्यवहित उत्तरक्षणवर्ती पर्याय विशिष्ट वस्तु कार्य कहलाती है। हमारे और आपके मध्य इस तरहकी कार्यकारणभावव्यवस्थाकी स्वीकृतिमें कोई विवाद नहीं है और इस विषयमें भी हमारे आपके मध्य कोई विवाद नहीं है कि वस्तुकी पूर्वक्षणिकपर्यायके बाद उत्तर क्षणिक पर्याय अवश्य होगी तथा वह एक ही होगी, कारण कि पर्यायोंकी क्रमिक एक धारामें एक साथ दो आदि पर्यायें कदापि नहीं होंगी, परन्तु वह एक उत्तर पर्याय किस रूपमें होगी? इसकी नियामक आगमके अनुसार निमित्त सामग्री है। जैसे चनेको खप्परमें डालकर अग्निके जरिये भूना भी जा सकता है और बटलोईमें उबलते हुए पानीमें डालकर उसी चनेको उसी अग्निके द्वारा पकाया भी जा सकता है। लेकिन आप ऐसा माननेके लिए तैयार नहीं हैं। आपकी मान्यता तो इस विषयमें मात्र इतनी ही है कि पूर्व पर्यायके बाद एक नियत ही उत्तर पर्याय होगी, परन्तु इस पर हमारा कहना यह है कि आपकी मान्यतामें पूर्व पर्यायके बाद एक नियत उत्तर पर्यायके होनेका नियामक कौन होगा? यदि कहा जाय कि गाथामें जो ‘णियमा’ पद पड़ा हुआ है उससे ही यह सिद्ध होता है कि पूर्व पर्याय ही उत्तर पर्यायकी नियामक हो जाती है, क्योंकि वह ‘णियमा’ पद उस पूर्व पर्यायके अनन्तर दो आदि पर्यायोंमेंसे एक पर्याय होगी-इसका विरोधक ही है, तो इस पर भी हमारा कहना यह है कि गाथामें पठित ‘णियमा’ पद किसी एक निश्चित पर्यायकी सूचना देनेके लिए नहीं है, उससे तो केवल इतनी ही बात जानी जा सकती है कि पूर्व पर्याय विशिष्ट द्रव्य कारण कहलाती है और उत्तर पर्याय विशिष्ट वस्तु नियमसे कार्य कहलाती है फिर भले ही वह उत्तर पर्याय किसी रूपमें क्यों न हो। इस तरह पूर्व पर्यायके बाद जो भी उत्तर पर्याय होगी वह नियमसे उस पूर्व पर्यायका कार्य होगी। हमारे इस निष्कर्षकी पुष्टि इसी गाथा नं० २२२ को आचार्य शुभचन्द्र कृत टीकासे भी होती है। वह टीका निम्न प्रकार है :-

द्रव्यं जीवादि वस्तु पूर्वपरिणामयुक्तं पूर्वपर्यायाविष्टं कारणभावेन उपादानकारणत्वेन वर्तते तदेव द्रव्यं जीवादि वस्तु उत्तरपरिणामयुक्तं उत्तरपर्यायाविष्टं तदेव द्रव्यं पूर्वपर्यायाविष्टं कारणभूतं मणि-मन्त्रादिना अप्रतिवद्धसामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन उत्तरक्षणे कार्यं निष्पादयत्येव। यथा आतान-वितानात्मकास्तन्तवः अप्रतिवद्धसामर्थ्याः कारणन्तरावैकल्याश्च अन्त्यक्षणं प्राप्ताः पटस्य कारणं, उत्तरक्षणे तु कार्यम्।

अर्थ-जीव आदि, द्रव्य अपनी पूर्व पर्याय सहित उपादान कारणरूप होता है और अपनी पूर्व पर्याय सहित वही जीव आदि द्रव्य यदि मणि, मन्त्र आदि कार्यकी प्रतिरोधक सामग्रीसे अप्रतिबद्ध सामर्थ्य वाला हो तथा कारणान्तरों ( अन्य अनुकूल कारणों ) की विकलता ( अपूर्णता ) से भी रहित हो तो उत्तर क्षणमें विवक्षित उत्तरपर्याय रूप कार्यका निष्पादन करता ही है । जिस प्रकार आतान और वितान (ताने और बाने ) की अवस्थाको प्राप्त तन्तु समूह यदि प्रतिरोधक कारण सामग्रीके द्वारा होनेवाले अपनी पटोत्पादन रूप सामर्थ्यके प्रतिरोधसे रहित तथा कारणान्तरों (जुलाहा, तुरी, वेम, शलाका आदि) की विकलतासे रहित होता हुआ अन्तिम क्षण ( कार्याव्यवहित पूर्व क्षण ) को प्राप्त है तो वह तन्तु समूह पट रूप कार्यके प्रति कारण होता है और उसके उत्तर क्षणमें वही तन्तु समूह पट रूप कार्य होता है ।

इस टीकामें आचार्य शुभचन्द्रने उपादान कारणके साथ-साथ अन्य समस्त अनुकूल कारणभूत बाह्य सामग्रीकी अपूर्णताके अभावको अर्थात् उक्त बाह्य सामग्रीकी पूर्णताको भी विवक्षित कार्यके प्रति आवश्यक कारण बतलाया है । इसी उद्देश्यसे ही उन्होंने उक्त टीकामें ‘कारणान्तरावैकल्य’ शब्दका पाठ किया है । इस प्रकार यह बात अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती है कि कार्यसे अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायमें उपादान कारणभूत वस्तुके विद्यमान रहते हुए भी यदि विवक्षित कार्यके अनुकूल अन्य कारणोंकी अविकलता ( पूर्णता ) विद्यमान नहीं होगी तो उस समय वहाँ पर उस उपादानसे विवक्षित कार्यकी उत्पत्ति कदापि नहीं होगी, फिर तो जिस कार्यके अनुकूल अन्य कारणोंकी पूर्णता वहाँ विद्यमान होगी उसके अनुसार ही कार्य निष्पन्न होगा । यदि आप कहें कि होगा तो वही जो केवलज्ञानमें झलका होगा । तो इस पर हमारा कहना यह है कि बेचारे श्रुतज्ञानीको क्या मालूम, कि केवलज्ञानीके ज्ञानमें क्या झलका है ? इसलिये जो कुछ होता है उसकी दृष्टिमें कार्यकारणभावके आधार पर ही होता है कार्योत्पत्तिके विषयमें इससे अधिक वह सोच ही तो नहीं सकता है । इस विषयको विस्तारपूर्वक पूर्वमें लिखा जा चुका है, अतः और विस्तारसे लिखना हम अनावश्यक समझते हैं ।

इस संपूर्ण कथनका अभिप्राय यह है कि अन्त्यचण अर्थात् कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायको प्राप्त उपादानकारणभूत द्रव्यसे उत्तर क्षणमें वही पर्याय उत्पन्न होती है जिस पर्यायके अनुकूल अन्य बाह्य कारण सामग्री अपनी पूर्णताके साथ वहाँ प्राप्त रहती है । जैसे मान लो, जीवकी उत्तरक्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्याय क्रोध रूप हो रही है तो यह क्रोध रूप पर्याय जीवकी पर्याय ही तो है और उत्तर क्षणमें जो भी उस जीवकी पर्याय होनेवाली है वह भी जीव की ही पर्याय होगी, इसलिये यह बात तो ठीक है कि पूर्वकी क्रोध रूप पर्याय विशिष्ट जीव आगे अव्यवहित उत्तर क्षणमें उत्पन्न होनेवाली अपनी पर्यायका उपादान कारण है, परन्तु श्रुतज्ञानीकी दृष्टिमें यह नियम नहीं बन सकता है कि उत्तर क्षणमें उस पूर्वकी क्रोध पर्याय विशिष्ट जीवके क्रोधरूप, मानरूप, मायारूप और लोभरूप पर्यायोंमेंसे अनुक पर्याय ही होना चाहिये अर्थात् चूंकि वस्तु परिणमन स्वभाववाली होती है अतः क्रोधरूप पूर्व पर्याय-विशिष्ट उस जीवका उत्तर क्षणमें परिणमन तो अवश्यंभावी है परन्तु क्रोधरूप, मानरूप, मायारूप और लोभरूप परिणमनोंमेंसे कौनसा परिणमन होगा यह बात अन्य अनुकूल बाह्य सामग्री पर ही निर्भर है । याने जीवको पूर्व पर्यायमें जो क्रोधरूपता है वह क्रोधरूपता जीवके अपने स्वतःसिद्ध स्वभावरूपके नहीं है, अपने स्वतःसिद्ध स्वभाव रूपसे तो केवल पर्यायरूपता ही है, क्योंकि जीवका उसका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव केवल परिणमनशीलता ही है क्रोधादि रूप परिणमनशीलता उसका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव नहीं है, इसलिये मानना पड़ता है कि जीवकी अपनी पर्यायमें जो क्रोधादिरूपता पायी जाती है वह क्रोधादिरूपता पौद्गलिक क्रोधादि कर्मोंके उदयके निमित्तसे ही पायी जाती हैं। इस तरह पूर्व पर्यायमें जो क्रोधरूपता विद्यमान है वह इसलिये है कि उस समय उस जीवके पौद्गलिक क्रोध कर्मका उदय हो रहा है और इस स्थितिमें ही जब उसी जीवके आगे अव्यवहित उत्तर क्षणकी पर्यायके विषयमें विचार करना है कि कौन-सी पर्याय उस समय होना चाहिये ? तो इस विषयमें यह तो निश्चित है कि जीवके परिणमनशील होनेके कारण उसकी कोई-न-कोई पर्याय अवश्य होगी, परन्तु यह भी निश्चित हो समझना चाहिये कि यदि उत्तर क्षणमें पौद्गलिक क्रोध कर्मका उदय होगा तो क्रोधरूप पर्याय होगी और यदि उस उत्तर क्षणमें पौद्गलिक मान, माया और लोभमेंसे किसी एक कर्मका उदय होगा तो क्रोध पर्याय विशिष्ट पूर्व क्षणसे अव्यवहित उस उत्तर क्षणमें उन मानादिक पौद्गलिक कर्मोंमेंसे किसी एक कर्मके उदयानुसार मानादि पर्यायोंमेंसे कोई भी एक नियत पर्याय होगी।

इस तरह उपादानकारण रूप निश्चयकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो वह क्रोध पर्याय विशिष्ट जीव उत्तर क्षणमें क्रोध, मान, माया और लोभ रूप पर्यायोंमेंसे जो भी पर्याय अपने अनुकूल अन्य कारणोंकी सहायतासे होगी उसका उपादान कारण होगा। कारण कि परिणमन कैसा ही क्यों न हो, आखिर होता तो जीवका ही है, परन्तु उस पर्यायमें ( परिणमनमें ) उक्त क्रोध, मान, माया और लोभ इन चारों रूपोंमेंसे कौन-सा रूप आता है ? वह जीवके अपने स्वतःसिद्ध स्वभाव रूपसे न होकर पौद्गलिक क्रोध, मान, माया और लोभ कषायरूप कर्मोंमेंसे जिसका उस समय उदय होगा उसकी नियामकताके आधारपर होगा, अतः निमित्तकारणरूप व्यवहारकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो उन पौद्गलिक क्रोधादि कषायरूप कर्मोंमेंसे कोई एक कर्मका उदय यथायोग्य रूपसे उसका निमित्तकारण होगा। इस विवेचनसे यह बात भी अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है कि ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं’ इस मान्यताके आधारपर आप जो निमित्तोंको अकिंचित्कर मान लेना चाहते हैं वह असंगत है और इसीलिये ही आचार्य अकलंकदेवको अपनी अष्टशतीमें निमित्तकरणोंको अकिंचित्कर माननेका खण्डन करना पड़ा है। उनका वह कथन निम्न प्रकार है-

तदसामर्थ्यमखण्डयदकिंचित्करं किं सहकारिकारणं स्यात् ?
-अष्टसहस्री पृष्ठ १०५

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ (भाग २/४)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ १९९ से २१६

↑ सूची


अर्थ-उसकी अर्थात् उपादानकी असामर्थ्यका खण्डन न करता हुआ सहकारी कारण यदि अकिंचित्कर ही बना रहे तो उसे सहकारी कारण कैसे कहा जा सकता है ?

इसी तरह इस कथनसे एक बात यह भी स्पष्ट होजाती है कि जब जीवकी उत्तर क्षणवर्ती कार्यरूप पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती कारणरूप पर्याय क्रोधरूप है और उसके उत्तरक्षणमें पौद्गलिक क्रोध, मान, माया और लोभ कर्मोंमेंसे किसी भी कर्मका उदय संभव है जिसके कारण जीवकी वह पर्याय क्रोध, मान, माया और लोभमेंसे किसी एकके उदयानुसार क्रोध, मान, माया अथवा लोभ रूप हो सकती हैं तो इसका फलितार्थ यह हो जाता है कि उस कारणरूप पूर्वक्षणवर्ती क्रोध पर्याय विशिष्ट जीवमें उक्त चारों प्रकारकी उपादान शक्तियोंका अस्तित्व विद्यमान रहता है। इस प्रकार यह मानना अनिवार्य हो जाता है कि उत्तर क्षणमें उस क्रोध पर्याय विशिष्ट जीवकी क्रोधादि चारोंमेंसे वही पर्याय उत्पन्न होगी जिसके अनुकूल पौद्गलिक क्रोधादिकके उदयरूप निमित्त सामग्री प्राप्त होगी। इसलिये कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायके अवसर पर भी विविध प्रकारकी नाना उपादान शक्तियोंका सद्भाव मानना असंगत नहीं है। ऐसी स्थितिमें आपकी यह मान्यता कि ‘उपादानके कार्याव्यवहित पूर्णक्षणमें पहुंच जानेपर नियमसे विवक्षित कार्यकी ही उत्पत्ति होती है’ खण्डित हो जाती है। कारण कि पूर्वोक्त क्रोधविशिष्ट जीव का उदाहरण हमें इस बातका स्पष्ट संकेत दे रहा है कि उस क्रोध पर्याय विशिष्ट जीवकी पर्याय क्रोध, मान, माया और लोभमेंसे क्रोधादि कर्मोंके उदयानुसार कोई भी हो सकती है। तात्पर्य यह है कि उत्तरक्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायके अनन्तर एक ही पर्याय होगी, दो आदि अनेक पर्यायें नहीं होंगी-यह सिद्धान्त तो ठीक है परन्तु वह एक पर्याय अमुक रूप ही होगी इसकी नियामक पूर्वोक्त रीत्या वह पूर्व पर्याय नहीं हो सकती है, किन्तु उसकी नियामक वहाँ पर उपस्थित अन्य अनुकूल बाह्य कारण ( निमित्त कारण ) सामग्री ही होती है, इसलिए उस पूर्व पर्याय विशिष्ट वस्तुमें उस समय उत्तर पर्यायसे परिणत होनेके लिए नाना उपादान शक्तियोंका सद्भाव अनायास ही सिद्ध हो जाता है और तब उनमें से उत्तर क्षणमें उस योग्यताका ही विकास उस वस्तुमें माना जा सकता है जिसके लिये अनुकूल बाह्य निमित्तरूप सामग्री प्राप्त होती है। उस पूर्व पर्याय विशिष्ट वस्तुमें नाना उपादान शक्तियोंका सद्भाव माननेमें यह तो प्रमाण है ही कि स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी २२२वीं गाथाकी उल्लिखित टीकामें कार्योत्पत्तिके लिये कारणभूत पूर्व पर्याय विशिष्ट द्रव्यको मणि-मंत्रादि प्रतिरोधक कारणोंसे अप्रतिबद्ध सामर्थ्यवाला तथा अन्य प्रतिनियत कारणोंकी अविकलता ( पूर्णता ) वाला इस तरह दो विशेषण विशिष्ट स्वीकार किया गया है। इसके साथ ही निम्न लिखित प्रमाण भी देखिये-

कालाइलद्धिजुत्ता णाणासत्तीहिं संजुदा अत्था।
परिणममाणा हि सयं ण सक्कदे को वि वारेदुं ॥२१९॥
-स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा

अर्थ-अपनी अनेक उपादान शक्तियोंसे युक्त पदार्थ कालादि लब्धिके प्राप्त होने पर जब स्वयं ( आप ) परिणमन करते हैं तब उसका वारण कोई भी नहीं कर सकता है।

इस गाथा में जो ‘णाणासत्तीहिं संजुदा’ पद पड़ा हुआ है वह स्पष्टरूपसे बतला रहा है कि पूर्व पर्यायविशिष्ट वस्तुमें एक ही साथ नाना उपादान शक्तियां विद्यमान रहती हैं और ‘कालाइलद्धिजुत्ता’ पद यह बतला रहा है कि उन नाना उपादान शक्तियोंमें से एक उसी शक्तिका विकास उत्तर क्षणमें होगा जिसके अनुकूल काललब्धि आदि यानी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप बाह्य साधन सामग्री उस समय प्राप्त होगी। गाथाकी आचार्य शुभचन्द्र कृत टीका और भी स्पष्टताके साथ उक्त अभिप्रायको प्रगट कर रही है। टीका निम्न प्रकार है-

अर्थ-जीवादिपदार्थाः, हीति स्फुटम्, स्वयमेव परिणममाणा परिणमन्तः पर्यायान्तरं गच्छन्तः सन्तः कैरपि इन्द्रधरणेन्द्रचक्रवर्त्यादिभिः वारयितुं न शक्यंते। …कीदृक्षास्ते अर्थाः ? नानाशक्तिभिः अनेकसमर्थताभिः नानाप्रकारस्वभावयुक्ताभिः संयुक्ता। यथा जीवाः भव्यत्वादिशक्तियुक्ताः रत्नत्रयादिकाललब्धिं प्राप्य निर्वान्ति, यथा तण्डुलाः ओदनशक्तियुक्ताः इन्धनाग्निस्थालीजलादिसामग्रीं प्राप्य भक्तपरिणामं लभन्ते। तत्र भक्तपर्यायं तण्डुलानामुभयकारणे सति कोपि निषेद्धुं न शक्नोतीति भावः।

अर्थ-जीव आदि पदार्थ अपनी अनेक प्रकारके स्वभाववाली उपादान शक्तियोंसे युक्त हैं। वे पदार्थ जब द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावादिरूप विविध प्रकारकी निमित्त सामग्रीको प्राप्त होते हैं तब उनके विवक्षित परिणमनको इन्द्र, धरणेन्द्र, चक्रवर्ती आदि कोई भी वारण करनेमें समर्थ नहीं होते हैं। जिस प्रकार भव्यत्वादि उपादान शक्तियोंसे युक्त जीव रत्नत्रयादि ( आदि पदसे मनुष्यभव, वज्रर्षभनाराचसंहनन, कर्मभूमिजपना, मुनिदीक्षा आदि निमित्तकारण ) सामग्रीसे सहित होते हैं तब वे मुक्त होते हैं। इसी प्रकार जैसे भात बननेकी उपादान शक्तिसे युक्त चावल, इन्धनाग्नि, बटलोई, जल आदि निमित्तकारण सामग्रीको पाकर भात-रूप परिणित होते हैं। इस प्रकार उभय कारणों ( उपादान और निमित्तकारणों ) के रहते हुए चावलोंके भातरूप परिणमनको कोई वारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकता है।

यह सब कथन हमें यह बतला रहा है कि ‘कार्यके स्वकालके सद्भावमें नियत कार्यके अनुकूल अन्य कारणोंका सद्भाव नियम से पाया जाता है’ यह मान्यता सही नहीं है, बल्कि स्वामी कार्तिकेयानुपेक्षाकी उपर्युक्त गाथा २२२गाथा २१९ से तथा इन दोनों गाथाओंकी उल्लिखित टीकाओंसे इस मान्यताके विरुद्ध इस मान्यताकी ही पुष्टि होती है कि नाना योग्यताओंसे विशिष्ट वस्तुके कार्य स्वकालमें अर्थात् जहाँ पहुँच जाने पर उस वस्तुसे कार्योत्पत्तिकी निश्चित संभावना हो जाती है वहाँ पहुँच जाने पर भी यदि विवक्षित कार्यके अनुकूल निमित्तसामग्री हो तो विवक्षित कार्य ही होगा और उस स्वकालमें अन्य जिस कार्यके उत्पन्न होनेकी संभावना हो सकती है यदि उसके अनुकूल निमित्त सामग्री उपस्थित होगी तो फिर वही कार्य उत्पन्न हो जायगा याने उस समय जैसी निमित्त सामग्री उपस्थित होगी उसीके अनुसार ही उस वस्तुसे कार्य उत्पन्न होगा।

इसी तरह इस प्रकारणमें एक बात और भी ध्यानमें रखने लायक है कि कार्यके उक्त प्रकारके स्वकालमें अर्थात् कार्याव्यवहित पूर्व पर्यायमें वस्तुके पहुँच जाने पर तथा उस कार्यके अनुकूल निमित्त सामग्रीके उपस्थित रहने पर भी यदि उस अवसर पर कार्यकी प्रतिरोधक सामग्री उपस्थित हो जावे तो ऐसी हालत में स्वकाल और अन्य अनुकूल कारणोंकी पूर्णता इनका सद्भाव मिलकर भी कार्यको उत्पन्न नहीं कर सकता है यह बात भी स्वामीकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा २२२ की आचार्य शुभचन्द्रकृत पूर्वोक्त टीकामें पठित ‘मणिमंत्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यः’ वाक्यांश द्वारा जानी जाती है। इसका भाव यह है कि कार्यरूप उत्तर पर्यायके पूर्वकी पर्यायसे युक्त द्रव्य विवक्षित कार्यके प्रति तभी कारण होता है जब कि उसकी कार्योत्पादक सामर्थ्यका प्रतिबन्धक कारणों द्वारा प्रतिरोध न किया जा रहा हो। यदि विवक्षित कार्योत्पादक सामर्थ्यका प्रतिरोधक कारणों द्वारा प्रतिरोध किया जा रहा हो तो विवक्षित कार्यके स्वकाल और अनुकूल अन्य कारण सामग्रीके सद्भावमें वहाँ पर वह विवक्षित कार्य उत्पन्न नहीं होगा। जैसे किसी संस्थाके चुनावकी पूरी पूरी तैयारी हो जाने पर भी यदि यकायक स्थगन आदेश प्राप्त हो जाता है तो चुनाव रोक दिया जाता है। इस प्रकार कार्योत्पत्तिके विषयमें पूर्वोक्त आगम प्रमाणों और लौकिक व्यवहारोंके आधार पर निम्नलिखित व्यवस्था जानना चाहिये।

(क) उपादान शक्ति अर्थात् आपके मतसे क्षणिक उपादान-जिसे आपने स्वकाल नामसे पुकारा है लेकिन जो आगमानुसार स्थूल रूपसे कार्याव्यवहित पूर्व पर्यायरूप तथा सूक्ष्म रूपसे उत्तर क्षणवर्ती कार्यरूप पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूप होता है-विद्यमान हो लेकिन विवक्षित कार्यकी उत्पत्ति के अनुकूल निमित्त सामग्री उपस्थित न रह कर दूसरे प्रकारकी ही निमित्त सामग्री उपस्थित हो तो वहाँ पर वह विवक्षित कार्य न होकर वही कार्य होगा जिसके अनुकूल निमित्तसामग्री मिला दी गयी हो या अनायास मिल गयी हो व उपादानमें उसकी सामर्थ्य हो।

(ख) उक्त प्रकारकी उपादान शक्ति विद्यमान हो तथा विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिके अनुकूल बाह्य निमित्त सामग्री भी वहाँ मौजूद हो, लेकिन उस अनुकूल निमित्त सामग्रीकी पूर्णता न हो तो भी विवक्षित कार्य नहीं होगा, किन्तु वही कार्य होगा जिसके अनुकूल उक्त सब प्रकारकी सामग्री वहाँ उपस्थित होगी।

(ग) उक्त प्रकारकी उपादान शक्ति विद्यमान हो, विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिके अनुकूल बाह्य निमित्त सामग्री भी अपनी पूर्णताके साथ उपस्थित हो, लेकिन साथमें प्रतिबन्धक सामग्री उपस्थित हो जावे तो भी वहाँ पर विवक्षित कार्य नहीं होगा। किन्तु वही कार्य होगा जिसके अनुकूल सम्पूर्ण कारण सामग्री उपस्थित होगी और कोई भी बाधक सामग्री नहीं होगी।

(घ) यदि उक्त प्रकारकी उपादान शक्ति ही विद्यमान न हो और विवक्षित कार्यके अनुकूल निमित्त सामग्री पूर्णरूपसे उपस्थित हो तथा बाधक सामग्रीका अभाव भी हो तो भी विवक्षित कार्य नहीं होगा, किन्तु वह ही कार्य होगा जिसके अनुकूल उपादान शक्ति और अनुकूल बाह्य कारण सामग्री बिना किसी बाधक कारण सामग्रीके उपस्थित रहेगी।

यहाँ पर इतना और जान लेना चाहिए कि विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिके अनुकूल उक्त प्रकारकी उपादान शक्ति विद्यमान हो, उसके अनुकूल बाह्य निमित्त सामग्री भी अपनी पूर्णताके साथ उपस्थित हो और कार्यरूप परिणतिकी प्रतिरोधक सामग्रीका अभाव भी सुनिश्चित हो, लेकिन यकायक विस्रसा या प्रायोगिकरूपसे विनाशकी सामग्री उपस्थित हो जावे तो कार्यकी उत्पत्तिकी शृंखला वहीं पर समाप्त होकर आगे विनाशको प्रक्रिया चालू हो जायगी।

ऐसा नहीं है कि इन सब बातोंसे आप अनभिज्ञ हैं और ऐसा भी नहीं है कि कार्यकी उत्पत्तिके लिये इन सब बातों पर आप लक्ष्य नहीं रखते है । जब तक प्राणी सर्वज्ञ नहीं हो जाता अथवा इसके पूर्वमें भी निर्विकल्प समाधिमें स्थिर नहीं हो जाता तब तक उसका कार्यकारण पद्धतिमें इन सब बातों पर लक्ष्य नहीं जाना असम्भव भी है, परन्तु व्यवहार और निश्चयके सत्य स्वरूपको न समझ सकनेके कारण निमित्तोंको व्यवहाराश्रित कारणताके आधार पर कार्यके प्रति अकिंचित्कर सिद्ध करनेके लिए ही आपने इस मान्यताको जन्म दिया है कि सभी कार्य केवल स्वकालके प्राप्त हो जाने पर ही हो जाया करते हैं, लेकिन इसके पहले कि आप आगम स्वीकृत निमित्तकारणोंको अकिंचित्कर मानें, इस बात पर भी आपको ख्याल करना चाहिये कि स्वामिकार्तिकेयानुपेक्षा की ३२१, ३२२, २१९ और २३० वीं गाथाओंमें व पद्मपुराणके उल्लिखित ( २९-८३ ) पद्यमें तथा स्वयंभूस्तोत्रके उल्लिखित १३३ वें पद्यमें भी निमित्तकारणको उपादानकारणके साथ स्वरूप और कार्यकर्तृत्वका भेद रहने पर भी समान दर्जा स्वीकार किया गया है। इस विषयकी पुष्टिके लिए आगममें दूसरे भी अनेक प्रमाण भरे पड़े हैं। उनमेंसे कुछ प्रमाण तो यहाँ पर भी दिये गये हैं, कुछ आपको इस तत्त्व-चर्चाके अन्तर्गत दूसरे प्रश्नोंमें भी देखनेको मिलेंगे, परन्तु या तो इन सब आगम प्रमाणोंको आप दुर्लक्षित कर रहे हैं अथवा गलत अभिप्राय समझकर उनका अपने पक्षकी पुष्टिमें उपयोग कर रहे हैं। जैसे स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी ३२१ और ३२२ वीं गाथाओं, पद्मपुराणके पद्य ( २९-८३ ) तथा स्वयंभूस्तोत्रके पद्य १३३ एवं स्वामिकार्तिकेयानुपेक्षाकी २१९ और २३० वीं गाथाओंकी टीकाके अभिप्रायको अपने पक्षकी पुष्टिका ध्यान रखते हुए दुर्लक्षित कर दिया है और स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी २१९ तथा २३० वीं गाथाओंके अभिप्रायको अपने पक्षकी पुष्टिमें उपयोग भी किया है। यह प्रक्रिया आपने प्रायः सर्वत्र अपनायी है। परन्तु जहाँ जहाँ आवश्यक जान पड़ा-हमने स्थितिको स्पष्ट करनेका पूरा-पूरा प्रयत्न किया है। क्या हम आशा रक्खें कि यह सब कुछ आपने मतिभ्रम होनेसे किया है और यह सब आपने यदि मतिभ्रमसे ही किया है तो हमें विश्वास है कि हमारे स्पष्टीकरणसे आपका मतिभ्रम अवश्य दूर हो जायगा। लेकिन यदि अपने संकल्पित अभिप्रायको पुष्ट करनेकी गरजसे यह सब कुछ आपने किया है तो हम समझते हैं कि हमारे इस प्रयत्नका लाभ सम्भवतः आप नहीं लेंगे। कुछ भी हो, हमारा दृष्टिकोण तो तत्त्वसम्बन्धी स्थिति-को साफ करनेमात्रका है। यदि इससे आप लाभ ले सकें तो उत्तम बात होगी।

आपने स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा २३० का अभिप्राय गलत लिया है और इस तरह आप उससे अपनी संकल्पित जिस गलत मान्यताका पोषण करना चाहते हैं, आपकी वह संकल्पित गलत मान्यता यह है कि अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्याय अव्यवहित उत्तरक्षणवर्ती एक निश्चित पर्यायको ही जन्म देनेवाली है। परन्तु हम पूर्वमें अत्यन्त स्पष्टताके साथ विवेचन कर चुके हैं कि वस्तुका स्वभाव परिणामी होनेके कारण वस्तुकी अव्यवहित पूर्व पर्यायके अनन्तर उत्तरपर्याय अवश्य होगी। इसके विषयमें आपका कहना यह है कि जो पर्याय उस कालमें नियत होगी वही होगी और हमारा कहना यह है कि जिस पर्यायकी उत्पत्तिके योग्य उपादान शक्तिके साथ साथ अन्य अनुकूल बाह्य सामग्रीकी पूर्णता और प्रतिबन्धक सामग्रीका अभाव-यह सब सामग्री उपस्थित होगी वह पर्याय होगी। हम अपनी इस मान्यताकी पुष्टि पूर्वमें आगम प्रमाणोंसे कर चुके हैं तथा इसके लिये और भी नीचे लिखे प्रमाण देखिये-

कारणस्याप्रतिबन्धस्य स्वकार्यजनकत्वप्रतीते।-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अध्याय १, पृ० ७०।

अर्थ-प्रतिबन्धक कारणके अभावसे युक्त कारण ही अपने कार्यका जनक होता है।

स्वसामग्र्या विना कार्यं न हि जातुचिदीक्ष्यते ॥८८॥-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अध्याय १, पृष्ठ ७०।

अर्थ-कोई भी कार्य जब तक उसकी पूर्ण सामग्री उपस्थित न हो तब तक नहीं उत्पन्न होता है।

इस तरहके आगम प्रमाणोंके आधार पर ही हम आपकी उक्त संकल्पित मान्यताको गलत कहते हैं। और चूँकि अपनी उक्त संकल्पित मान्यताकी पुष्टि आप स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा २३० के द्वारा करना चाहते हैं, इसलिये इस गाथाका अभिप्राय भी आपने अपने ढंगसे लेनेका प्रयत्न किया है अर्थात् गाथा में पठित ‘णियमा’ पदको आप उस कालमें नियत पर्यायके साथ जोड़ देना चाहते हैं जब कि उल्लिखित आगम प्रमाणोंके आधार पर ‘णियमा’ पदका केवल इतना आशय उस २३० वीं गाथामें ग्रहण करना है कि ‘उत्तर पर्याय नियमसे पूर्व पर्यायकी कार्यरूप ही होगी, फिर भले ही वह पर्याय अपनी कारण सामग्रीके आधार पर होनेवाली कोई भी पर्याय क्यों न हो?’

इसी प्रकार अपनी संकल्पित उक्त मान्यताकी ही पुष्टि के लिये इस गाथाके दूसरे नं० २२२ की टीकामें पठित ‘मणिमंत्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यं कारणन्तरावैकल्येन’ इस वाक्यांशको भी आप विलकुल उपेक्षित कर देना चाहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि आपकी मान्यताके अनुसार वस्तुके कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायमें पहुँच जाने पर उसके अनन्तर क्षणमें एक निश्चित कार्यकी उत्पत्ति होनेका नियम है, क्योंकि आपकी मान्यताके ही अनुसार वस्तुमें एक समयमें एक ही कार्यकी उत्पत्तिके अनुकूल एक ही योग्यता पायी जाती है, नाना कार्योंकी उत्पत्तिके अनुकूल नाना योग्यताएँ एक साथ नहीं पायी जाती हैं, इसलिये आपका कहना है कि ‘प्रत्येक कार्यके प्रति उपादानकी नियामकता ही स्वीकार की गई है, इस लिये जब कार्यक्षम निश्चय उपादान (क्षणिक उपादान) उपस्थित होता है तब निमित्त भी उसीके अनुसार ही मिलते हैं।’ इसके आगे आपने यह भी लिखा है कि ‘अतएव स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा की २२२ नं० की गाथाकी टीकासे जो उसका यथार्थ तात्पर्य है वही फलित करना चाहिये। उसमें ‘मणिमंत्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन’ से पूर्व यदि ‘यदि’ अर्थको सूचित करनेवाला कोई पाठ मूल टीकामें होता तब तो निमित्तोंकी अनिश्चितता भी समझमें आती, परन्तु उसमें इस आशयको सूचित करनेवाला कोई पाठ नहीं है, इसलिए उसे तदेव, द्रव्यं पूर्वपर्यायाविष्टं कारणभूतं’ का विशेषण बनाकर ही उसका अर्थ करना चाहिये और ऐसा अर्थ करने पर निमित्त-उपादानके योगकी अच्छी तरह सुसंगति बैठ जाती है ।’

आपके इस कथन पर हमें आपसे इतना ही कहना है कि आपके कथनानुसार ‘मणि-मंत्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन’ वाक्यांश वस्तुके कार्यान्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायमें पहुँच जाने पर तभी निमित्तकारणोंकी अनिश्चितता बतला सकता था जब कि उक्त टीकामें ‘मणिमंत्रादिना अप्रतिबद्ध-सामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन’ इस वाक्यांशके पूर्व ‘यदि’ अर्थको सूचित करनेवाला कोई पद विद्यमान होता, परन्तु इसके विषयमें हम आपसे कहते हैं कि जब आपकी मान्यताके अनुसार प्रत्येक द्रव्य उतनी ही उपादानरूप योग्यताओंवाला है जितनी कालके त्रैकालिक समयोंके आधार पर उसकी पर्यायें संभव हैं और जब आपकी मान्यताके अनुसार ही वस्तुकी प्रत्येक क्षणवर्ती पर्यायसे उसके उत्तर क्षणमें एक निश्चित उत्तर पर्याय ही उत्पन्न होती है तो ऐसी हालतमें आपकी दृष्टिसे फिर उक्त टीकामें ‘मणिमंत्रादिना अप्रतिबद्ध-सामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन’ वाक्यांश की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती है । लेकिन चूँकि टीकामें उक्त वाक्यांशका सद्भाव पाया जाता है, इसलिये ‘यदि’ अर्थको सूचित करनेवाले पदका उक्त टीकामें अभाव होने पर भी ‘मणिमंत्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन’ वाक्यांश वस्तुके कार्यान्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायमें पहुंच जाने पर भी वहाँ निमित्तकारणोंकी अनिश्चितताको बतलानेसे ही सार्थक हो सकता है। कारण कि निमित्तकारणोंकी अनिश्चितता बतलानेके अतिरिक्त और दूसरा कोई प्रयोजन उस वाक्यांशका वहाँ पर नहीं हो सकता है और न आप ही ने बतलाया है। हम आपसे पूछ सकते हैं कि ‘मणिमंत्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन’ वाक्यांशको आपके कथनानुसार यदि ‘तदेव द्रव्यं पूर्वपर्यायाविष्टं कारणभूतं’ का भी विशेषण मान लिया जाय तो फिर उक्त टीकामें आपके मतानुसार ‘मणिमंत्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन’ वाक्यांशकी क्या सार्थकता है ? हमें पूर्ण विश्वास है कि यदि आपने हमारे इस कथन पर गंभीरताके साथ ध्यान दिया तो निश्चित ही आपको स्वीकार करना पड़ेगा कि वस्तुके कार्यान्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायमें पहुँच जाने पर भी इसमें उस पूर्व पर्यायके उत्तरक्षणमें कार्यरूप परिणत होनेके लिये अनेक उपादान शक्तियाँ लालायित हो रही हैं और उनमेंसे वही उपादान शक्ति कार्यरूप परिणत होती है जिसके अनुकूल उस समय निमित्त सामग्री अनायास या पुरुषकृत प्रयोगसे प्राप्त हो जाती है । इसलिये आपका यह लिखना सर्वथा गलत है कि ‘जब कार्यक्षम उपादान उपस्थित होता है तब निमित्त सामग्री उसीके अनुसार मिल ही जाती है ।’ और इसलिए आपकी यह मान्यता भी गलत है कि ‘कार्यान्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायके अनन्तर क्षणमें वही पर्याय उत्पन्न होगी जो नियत होगी ।’ इससे भिन्न हमारा यही कहना सही है कि कार्यान्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायसे अनंतर क्षणमें वही पर्याय उत्पन्न होगी जिसकी उत्पत्तिके अनुकूल निमित्त सामग्री उस समय वहाँ उपस्थित होगी ।

आपने अपनी उक्त संकल्पित मान्यताको पुष्टिके लिये निम्नलिखित और भी प्रमाण उपस्थित किये हैं :–

(१) निश्चयनयाश्रयणे तु यदनन्तरं मोक्षोत्पादस्तदेव मुख्यं मोक्षस्य कारणं आयोगिकेवलि-चरमसमयवर्ति रत्नत्रयमिति ।
-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अध्याय १, पृष्ठ १०१

(२) न हि द्व्यादिसिद्धक्षणैः सहायोगिकेवलिचरमसमयवर्तिनो रत्नत्रयस्य कार्यकारणभावो विचारयितुमुपक्रान्तः येन तत्र तस्यासामर्थ्यं प्रसज्यते । किं तर्हि ? प्रथमसिद्धक्षणेन सह, तत्र च तत्समर्थमेवेत्य-
सद्बोधमेतत् । कथमन्यथाग्निः प्रथमधूमक्षणमुपजनयन्नपि तत्र समर्थः स्यात्? धूमक्षणजनितद्वितीयादिधूमक्षणोत्पादे तस्यासमर्थत्वेन प्रथमधूमक्षणोत्पादनेप्यसामर्थ्यप्रसक्तेः । तथा च न किंचित्कस्यचित्समर्थं कारणं, न चासमर्थात् कारणादुत्पत्तिरिति क्वेयं वराकी तिष्ठेत् कार्यकारणता ?
-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अध्याय १ पृष्ठ ७१ ।

आपने उक्त दोनों कथनोंका निम्नलिखित अर्थ दिया है-

( १ ) निश्चय नयका आश्रय लेनेपर तो जिसके अनन्तर मोक्षका उत्पाद होता है, अयोगकेवलीके अन्तिम समयमें होनेवाला वही रत्नत्रय मोक्षका मुख्य (प्रधान-साक्षात्) कारण (उपादान कारण) है ।

( २ ) प्रकृतमें द्वितीयादि सिद्धक्षणोंके साथ अयोगकेवलीके अन्तिम समयवर्ती रत्नत्रयका कार्य-कारण-भाव विचारके लिये प्रस्तुत नहीं है, जिससे उसकी उत्पत्तिमें उसकी असमार्थ्य प्राप्त होवे । तो क्या है ? प्रथम सिद्धक्षणके साथ ही प्रकृतमें उसका विचार चल रहा है और उसकी उत्पत्तिमें वह समर्थ (उपादान) कारण ही है इसलिये पूर्वोक्त शंका ठीक नहीं है ।

यदि ऐसा न माना जाय तो अग्नि (उपादान कारण बनकर) प्रथम धूमक्षणको उत्पन्न करती हुई भी उसको उत्पत्तिमें वह समर्थ कैसे हो सकती है ? क्योंकि ऐसी स्थितिमें धूमक्षणोंके द्वारा उत्पन्न किये गये द्वितीयादि धूमक्षणोंके उत्पन्न करनेमें उसके (अग्निके) असमर्थ होनेसे प्रथम धूमक्षणके उत्पन्न करनेमें भी उसकी असामर्थ्यके प्राप्त होनेका प्रसंग आता है । और ऐसा होनेपर कोई भी किसीका समर्थकारण नहीं बन सकता । और असमर्थकारणसे कार्यकी उत्पत्ति होती नहीं, ऐसी स्थितिमें यह विचारी कार्यकारणता कैसे ठहरेगी : अर्थात् तब कार्यकारणताका स्वीकार करना ही निष्फल हो जायगा ।

तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके इन दोनों उद्धरणोंसे आप एक ही बात सिद्ध करना चाहते हैं कि ‘सभी द्रव्योंकी सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं ।’ अब देखना यह है कि क्या ये दोनों उद्धरण आपकी उक्त बातको सिद्ध करनेमें समर्थ हैं ? तो हमें कहना पड़ता है कि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके उल्लिखित दोनों ही कथन आपकी ‘सभी द्रव्योंकी सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं’ इस बातको सिद्ध नहीं करते हैं, क्योंकि जिस प्रसंगसे तत्त्वार्थ-श्लोक-वार्तिकमें उक्त दोनों कथन किये गये हैं वह प्रसंग एक तो इस बातका है कि समर्थ कारण ही कार्यकी उत्पत्तिका कारण होता है, असमर्थ कारण कार्योत्पत्तिका कारण नहीं होता है । दूसरे इस बातका प्रसंग है कि एक कार्यकी उत्पत्तिमें कोई कारण यदि असमर्थ है तो इतने मात्रसे वह दूसरे कार्यकी उत्पत्तिमें कदापि असमर्थ नहीं होता है अर्थात् प्रत्येक कारणकी एक कार्यके प्रति असामर्थ्य रहना एक बात है और उसकी (प्रत्येक कारणकी) दूसरे कार्यके प्रति सामर्थ्य रहना दूसरी बात है । एक ही कारणमें उक्त भिन्न-भिन्न प्रकारसे असामर्थ्य और सामर्थ्य दोनों ही बातें एक साथ रह सकती हैं, उनका एक साथ रहनेमें कोई विरोध नहीं है ।

इस तरह बतलाया गया है कि अयोगकेवली गुणस्थानके चरम समयमें रहनेवाला रत्नत्रय चूंकि मुक्तिके लिये समर्थ कारण है, इसलिये उसके अनन्तर मुक्ति होती ही है । इसी प्रकार अग्नि भी प्रथम धूमक्षणकी उत्पत्तिके लिये समर्थ कारण है, इसलिये वह भी प्रथम धूमक्षणको उत्पन्न कर देती है । परन्तु मुक्तिके लिये अयोगकेवली गुणस्थानके चरम समयमें विद्यमान रत्नत्रय समर्थ क्यों है ? और प्रथम धूमक्षणकी उत्पत्तिके लिये अग्नि समर्थ क्यों है ? यदि ये प्रश्न उपस्थित हो जावें तो इनका समाधान यही होगा, कि वहाँ पर कारणान्तरावैकल्य अर्थात् अन्य सहकारी कारणोंकी पूर्णता तथा प्रतिबन्धक कारणोंका अभाव दोनों ही बातें पायी जाती हैं । अयोगकेवली गुणस्थानके चरम समयके रत्नत्रयमें अघाती कर्मोंका क्षय हो जानेसे कारणन्तरावैकल्य अर्थात् अन्य सहकारी कारणोंकी पूर्णता वहाँ पर हो जाती है तथा प्रतिवन्धक कारणोंका अभाव उस समय प्रथम मोक्षक्षणकी उत्पत्तिके लिये मोक्षके कारणभूत क्षायिकरूप रत्नत्रयको मिला हुआ है । इस प्रकार अयोगकेवली गुणस्थानके चरम समयका रत्नत्रय प्रथम मोक्षक्षणकी उत्पत्तिके लिये समर्थ कारण हो जाता है । तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० १, पृ० ७० में लिखा है-

केवलात्प्रागेव क्षायिकं यथाख्यातचारित्रं सम्पूर्णं ज्ञानकारणकमिति न शंकनीयं, तस्य मुक्त्युत्पादने सहकारिविशेषापेक्षितया पूर्णत्वानुपपत्तेः । विवक्षितस्वकार्यकारणेंत्यक्षणप्राप्तत्वं हि संपूर्णं, तच्च न केवलात् प्रागस्ति चारित्रस्य, ततोप्यूर्ध्वमंघातिप्रतिध्वंसिकरणोपेतरूपतया सम्पूर्णस्य तस्योदयात् । न च यथाख्यातं पूर्णं चारित्रमिति प्रवचनस्यैवं बाधास्ति, तस्य क्षायिकत्वेन तत्र पूर्णत्वाभिधानात् । न हि सकलमोहक्षयादुद्भवच्चारित्रमंशतोऽपि मलवदिति शश्वदमलवदात्यंतिकं तदभिष्टूयते । कथं पुनस्तदसंपूर्णादेव ज्ञानात्क्षायोपशमिकादुत्पद्यमानं तथापि सम्पूर्णमिति चेत् न, सकलश्रुताशेषतत्त्वार्थपरिच्छेदिनस्तस्योत्पत्तेः । पूर्णं ततएव तदस्त्विति चेन्न, विशिष्टस्य रूपस्य तदनंतरमभावात् । किं तद् विशिष्टं रूपं चारित्रस्येति चेत्, नामाद्यघातिकर्मत्रयनिर्जरणसमर्थं समुच्छिन्नक्रियाप्रतिपातिध्यानमित्युक्तप्रायम् ।

अर्थ-ज्ञानरूप कारणसे उत्पन्न होनेवाला क्षायिक यथाख्यात चारित्र केवलज्ञानसे पहले ही सम्पूर्ण ( समर्थ ) बन जाता है ऐसी शंका नहीं करना चाहिये, क्योंकि वह चारित्र मुक्तिके उत्पन्न करनेमें सहकारी कारणोंकी अपेक्षा रखता है, इसलिये वह पूर्णत्वको प्राप्त नहीं है । विवक्षित कार्य करनेमें अन्तिम क्षणको प्राप्त हो जाना ही पूर्णत्व कहलाता है, ऐसा पूर्णत्व केवलज्ञानसे पहले चारित्रमें नहीं है । केवलज्ञानके ऊर्ध्व ( केवलज्ञानकी उत्पत्ति हो जानेके वाद ) अघाती कर्मोंका ध्वंस हो जाने पर ही उसमें ( चारित्रमें ) सम्पूर्णता मानी गयी है ।

शंका-यदि कहा जाय कि आगममें जो यह कथन पाया जाता है कि ‘यथाख्यातचारित्र पूर्ण चारित्र कहलाता है’ तो पूर्वोक्त कथनसे इसका विरोध आता है ?

उत्तर-शंका ठीक नहीं है, क्योंकि यथाख्यातचारित्रमें जो पूर्णत्वका प्रतिपादन किया गया है वह प्रतिपादन उसके ( यथाख्यात चात्रिके ) क्षायिक ( मोहनीय कर्मके क्षयसे प्राप्त ) होनेके कारणसे ही किया गया है । कारण यह है कि सकल मोहक्षयसे उत्पन्न होता हुआ वह चारित्र अंशमात्रसे भी सदोष नहीं है यही कारण है कि उसकी हमेशा सर्वोत्कृष्ट रूपसे स्तुति की जाती है ।

शंका-उक्त प्रकारके चारित्रकी उत्पत्ति अपरिपूर्ण क्षायोपशमिक ज्ञानसे होने पर भी सम्पूर्ण कैसे हो सकता है ?

उत्तर-यह शंका भी ठीक नहीं है, क्योंकि द्वादशांगश्रुतके विषयभूत समस्त तत्त्वार्थका ज्ञान करानेवाले क्षायोपशमिक ज्ञानसे ही उसकी उत्पत्ति होती है ।

शंका-उक्त प्रकारसे वह क्षायिक यथाख्यात चारित्र जब पूर्णताको प्राप्त है तो उससे फिर मुक्ति हो जानी चाहिये ?

उत्तर-यह शंका भी ठीक नहीं है, क्योंकि उस समय इस क्षायिक यथाख्यात चारित्रमें विशेषरूपताका अभाव रहता है ।

शंका-कौनसा ऐसा चारित्रका वह विशेष रूप है जिसके अभावमें वह चारित्र जीवको मुक्ति प्राप्त नहीं करा सकता है ?

उत्तर-नाम, गोत्र और वेदनीय इन तीन कर्मोंकी स्थितिकी निर्जरा करनेमें समर्थ समुच्छिन्नक्रिया-प्रतिपातिध्यान ही उस चारित्रका वह विशेष रूप है।

यह उद्धरण हमने यहाँ पर इसलिए दिया है ताकि क्षायिकरूप यथाख्यात चारित्रकी मोक्षोत्पादनमें पूर्णता ( सामर्थ्य ) है उसका ज्ञान लौकिक जनोंको हो जावे। वह पूर्णत्व या सामर्थ्य सहकारी कारणोंकी सापेक्षताके अतिरिक्त क्षायिक यथाख्यातचारित्रमें और कुछ नहीं है यही ग्रन्थकर्ता आचार्य विद्यानन्दीका अभिप्राय है।

कालादिसामग्रीको हि मोहक्षयस्तद्रूपाविर्भावहेतुर्न केवलस्तथाप्रतीतेः।
-तत्त्वा० श्लोकवार्तिक पृष्ठ ७०

अर्थ-मोहक्षय कालादि ( द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव ) सामग्री सहित होकर ही आत्माकी उस मुक्तिरूपताकी उत्पत्तिका कारण होता है, केवल मोहक्षयसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती है।

इस कथनसे भी यह सिद्ध होता है कि मोहक्षय अर्थात् क्षायिक यथाख्यात चारित्रको जब तक बाह्य कारण सामग्री प्राप्त नहीं हो जाती है तब तक उससे जीवको मुक्ति प्राप्त नहीं होती है। लेकिन जब जीव समुच्छिन्नक्रियाप्रतिपाति ध्यान में पहुँच जाता है तब भी इतर सहायक कारणोंके अभावमें मुक्ति प्राप्त नहीं होती है। जीव जब उस समुच्छिन्नक्रियाप्रतिपाती ध्यानसे नाम, गोत्र और वेदनीय कर्मोंकी स्थितिका आयुकर्म की स्थितिके साथ समीकरण कर देता है तब उक्त चारों कर्मोंकी उदयानुसार समय समय प्रति प्रत्येक आघाति कर्मके एक एक निषेककी सविपाक निर्जरा करता हुआ जब उक्त चारों अघातिया कर्मोंके क्षयका अन्त समय आ जाता है तब वह यथाख्यात क्षायिक चारित्र मुक्तिके लिए समर्थ कारण होता है. और उसके अव्यवहित उत्तर क्षणमें जीव मुक्त हो जाता है।

यहाँ पर इतना विशेष समझना चाहिये कि अयोगकेवली गुणस्थानके चरम समयमें सम्पूर्ण अघाती कर्मोंका क्षय हो जानेसे रत्नत्रयमें कारणन्तरावैकल्य और प्रतिबन्धकाभाव निश्चित हो जाता है, इसलिए वह रत्नत्रय ती मुक्तिका नियत कारण है, परन्तु सब प्रकारकी अग्नि धूमकी उत्पत्तिकी नियत कारण नहीं बन सकती है। केवल वही अग्नि धूमोत्पत्तिके लिए कारण बनती है जो अन्य कारण सामग्रीकी पूर्णता तथा प्रतिबन्धकाभावसे विशिष्ट होती है।

अयोगकेवली गुणस्थानके चरम समयवर्ती रत्नत्रयके विषयमें एक बात और विचारणीय है कि सयोग केवली गुणस्थानके रत्नत्रय और अयोगकेवली गुणस्थानके चरम समयमें विद्यमान रत्नत्रयके स्वरूपमें कोई अन्तर नहीं है इस बात को हमने ऊपर बतलाया है और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके उसी प्रकरणमें और भी विस्तारसे बतलाया गया है तथा यह भी वहांपर विस्तारसे बतलाया गया है कि केवल सामग्रीकी पूर्णता न होनेसे ही सयोगकेवली गुणस्थानवर्ती जीव मुक्ति पानेमें सदा असमर्थ रहते हैं। हमारा आपसे निवेदन है कि इस विषयको ठीक-ठीक समझनेके लिये तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके पृष्ठ ७० और ७१ को अवश्य पढ़िये, उसके अभिप्रायको समझनेका प्रयत्न कीजिये, केवल अपने संस्कारोंके आधारपर उसमें जोड़-तोड़ विठलानेका प्रयत्न मत कीजिये।

'प्रत्येक समयमें नियत कार्यकी ही उत्पत्ति होती है और उसका उपादान कारण भी नियत ही होता है तथा आवश्यकतानुसार निमित्तकारण भी स्वयंमेव मिल जाते हैं यह जो आपकी मान्यता है इसके समर्थनमें एक कारण आप यह भी बतलाते हैं कि स्वयंभूस्तोत्रके पद्य १३३ में भवितव्यताको अलंघ्यशक्ति बतलाया गया है और जिसका अभिप्राय है कि कार्योत्पत्ति तो भवितव्यताके आधारपर ही हुआ करती है, निमित्तोंका कार्योत्पत्तिमें कुछ उपयोग नहीं होता, वे तो कार्योत्पत्तिके अवसरपर हाजिरी ही दिया करते हैं।

इस विषयमें बात तो दरअसल हम यह कहना चाहते हैं कि ‘अलंघ्यशक्ति’ पदका जो अर्थ आप करना चाहते हैं वह उसका अर्थ नहीं है यानी अलंघ्यशक्तिका अर्थ वहाँ पर अटलशक्ति नहीं है, किन्तु उसका अर्थ यह है कि भवितव्यताकी शक्तिको लांघकर अर्थात् भवितव्यताकी शक्ति बाहर कोई कार्य उसमें नहीं उत्पन्न हो सकता है। इसे हमने पूर्वमें स्पष्ट कर दिया है। और फिर आपके मन्तव्यको मानकर भी हम यह कहना चाहते हैं कि उसी पद्य १३३ में ‘हेतुद्वयाविष्कृतकार्यलिंगा’ पद कार्योत्पत्तिमें निमित्तोंकी उपयोगिताको भी बतला रहा है। यद्यपि इसपर आप यह कहते हैं कि वे निमित्त उसी भवितव्यताकी अधीनतामें ही प्राप्त हो जाया करते हैं तथा इसके समर्थनमें आप निम्नलिखित पद्यको भी उपस्थित करते हैं-

तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायश्च तादृशः।
सहायास्तादृशाः सन्ति यादृशी भवितव्यता ॥

अर्थ-जैसी भवितव्यता होती है वैसी ही बुद्धि होती है, व्यवसाय (पुरुषार्थ) भी उसी तरहका होता है और सहायक भी उसी प्रकारके मिलते हैं।

लेकिन इस विषयमें हमारा कहना यह है कि जब भवितव्यता कार्यकी जनक है और वे निमित्त भी आपकी मान्यताके अनुसार भवितव्यताकी अधीनतामें ही प्राप्त किये जा सकते हैं जिनकी आवश्यकता कार्योत्पत्तिके अवसरपर रहा करती है, तो इस तरह कार्योत्पत्तिके लिये अपेक्षित निमित्तोंकी प्राप्तिको भवितव्यताके ही आधार पर स्वीकार करनेसे यहाँ पर अनवस्था दोषका प्रसंग उपस्थित हो जायगा, क्योंकि जिस प्रकार विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिके लिये भवितव्यताको निमित्तोंका सहयोग अपेक्षित है उसी प्रकार उन निमित्तोंकी प्राप्तिरूप कार्यकी उत्पत्तिके लिए भी अन्य निमित्तोंके सहयोगकी अपेक्षा उसे (भवितव्यताको) नियमसे होगी और फिर उन निमित्तोंकी प्राप्ति भी भवितव्यताको अन्य निमित्तोंके सहयोगसे ही हो सकेगी। इस प्रकार यह प्रक्रिया अनवस्थाकी जनक होनेके कारण कार्योत्पत्तिके विषयमें स्वीकार करनेके अयोग्य है।

इसलिए यदि कहा जाय कि उक्त अनवस्था दोषके भयसे ही तो आप निमित्तोंको अकिंचित्कर मान रहे हैं, तो इस पर भी हमारा कहना यह होगा कि ‘अलंघ्यशक्ति’ इत्यादि पद्यमें पठित ‘हेतुद्वयाविष्कृत कार्यलिंगा’ पद ‘जं जस्स जम्मि देसे’ इत्यादि गाथाओंमें पठित ‘जेण विहाणेण’ और ‘तेण विहाणेण’ ये दोनों पद तथा ‘यत्प्राप्तव्यं’ इत्यादि पद्यमें पठित ‘यतः’ और ‘ततः’ पद निरर्थक ही सिद्ध हो जावेंगे। इनके अलावा आगममें कार्यके प्रति निमित्तोंकी सार्थकताको बतलानेवाले जितने भी कथन पाये जाते हैं और जिनमें से बहुत कुछ हमारी १, ६, १०, ११, १७ आदि संख्यांक शंकाओं और प्रतिशंकाओंमें भी देखनेके लिये मिलेंगे, वे सब अप्रमाणभूत ठहर जावेंगे तथा उन कथनोंके अप्रमाणभूत हो जाने पर जैन संस्कृतिका सम्पूर्ण आगम ही अप्रमाणभूत ठहर जावेगा। इसलिए अब यह बात आप ही को सोचना है कि निमित्तोंकी सार्थकता के समर्थक शास्त्रीय कथनोंकी अनुभव और तर्क गम्य एवं आस्थाके विषय होनेके कारण अप्रमाणभूत कैसे कहा जा सकता है? अतः यही मानना श्रेयस्कर है कि भवितव्यताकी तरह कार्योत्पत्तिमें निमित्त कारण भी अकिंचित्कर न होकर सार्थक ही हुआ करते हैं।

यदि आप कहें, जैसा कि पूर्वमें भी इस पक्षको रक्खा गया है कि प्रत्येक वस्तु अपनी अपनी नियत पर्यायोंमें परिणमन करती हुई यन्त्रवत् चल रही है, एक वस्तुके परिणमनमें अन्य वस्तु न तो सहयोग देती है और न, परिणमन करनेवाली वस्तुके लिए ही उस वस्तुके सहयोगकी अपेक्षा रहती है, सब अपनी अपनी चालसे चले जा रहे हैं, तो इसका अर्थ यह होगा कि छद्मस्थ प्राणियोंके मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान और मनःपर्यायज्ञान इन सभी ज्ञानजन्य अनुभवोंको अप्रमाणभूत माननेका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। और फिर दिव्य-ध्वनिसे लेकर द्वादशांग द्रव्यश्रुत तथा अन्य आचार्यों द्वारा प्रणीत श्रुत सभी अप्रमाणभूत ठहर जायगा, वस्तुव्यवस्थाका आधार सिर्फ केवलज्ञान ही रह जायगा, इस प्रकार समस्त वस्तुतत्त्व अनिर्वचनीयताको ही प्राप्त हो जायगा।

यदि फिर आप कहें कि व्यवहारनयसे समस्त वस्तुजात प्रतिपादनीय है, दृश्य है और मतिज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानका भी वह ज्ञेय है, तो इस पर भी हमारा कहना यह है कि व्यवहारको और व्यवहारके प्रतिपादक द्रव्यश्रुतरूप व्यवहारनयको तथा ज्ञापक ज्ञानश्रुतरूप व्यवहारनयको तो आप स्वयं आरोपित, कल्पित, उपचरित, मिथ्या, असत्य, असद्भूत एवं अभावात्मक मान लेना चाहते हैं तो इससे अनिर्वचनीयताके प्रसंगकी समस्या हल होनेवाली नहीं है। इतना ही नहीं, जब व्यवहार या व्यवहारनय असद्भूत हैं तो केवलज्ञानी भी तो समस्त वस्तुजातको व्यवहाररूपसे ही जानता है इसका अर्थ यह है कि केवलज्ञानसे भी वस्तुतत्त्वका ज्ञान करना असंभव ही होगा। इस तरह समस्त जगत् वस्तुतत्त्व व्यवस्थासे ही शून्य हो जायगा। सिर्फ केवलज्ञानी जीव ही विश्वमें रह जायगा और फिर जब जैन संस्कृतिमें अनादि-निधन केवलज्ञानी नामका जीवतत्त्व स्वीकार ही नहीं किया गया है, हमी-आप जैसे संसारी प्राणी ही पुरुषार्थ करके आगे चल कर केवलज्ञानी बनते हैं तो जब संसारी प्राणियोंका अस्तित्व ऊपर समाप्त किया जा चुका है तो फिर केवलज्ञानीका भी अस्तित्व समाप्त हो जायगा, इस तरह सर्व प्रकारसे शून्यवादका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। धवल पुस्तक १४ पृष्ठ २३४ का कथन भी इस बातका समर्थन कर रहा है जो निम्न प्रकार है-

संसारिणामभावे संते कथमसंसारिणामभावो ? वुच्चदे, तं जहा-संसारिणामभावे संते असंसारिणो वि णत्थि, सव्वस्स सप्पडिवक्खस्स उवलंभण्णहाणुववत्तीदो।

अर्थ-संसारी जीवोंका अभाव होनेपर असंसारी जीवोंका अभाव कैसे संभव है ? इसका उत्तर यह है कि संसारी जीवोंका अभाव होने पर असंसारी जीव भी नहीं हो सकते हैं, क्योंकि सब पदार्थ अपने सत्प्रतिपक्ष पदार्थोंकी उपलब्धिमें ही उपलब्ध होते हैं, अन्यथा नहीं।

हमारा विश्वास है कि यह सब हमारी तरह आपको भी अभीष्ट नहीं होगा, अतः व्यवहार और व्यवहारके प्रतिपादक एवं ज्ञापक नयोंको आरोपित, कल्पित, उपचरित, मिथ्या, असत्य, असद्भूत एवं अभावात्मक न मानकर हमारी तरह आपको भी वास्तविक, सत्य, सद्भूत, सद्भावात्मक ही मानना होगा। ऐसी स्थितिमें कार्यकारण भावमें अन्तर्भूत निमित्त नैमित्तिकभाव और उसका प्रतिपादक आगम तथा उसका ज्ञापक ज्ञान ये सभी वास्तविक हो जावेंगे और जब आप इस बातको स्वीकार कर लेगें तब आपको स्वयं सोचनेका अवसर प्राप्त होगा कि ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं’ या ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं’ आपकी ये मान्यतायें कहां तक अपनी स्थिति कायम रख सकेंगी । ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यके विषयमें सर्वांगीण विवेचन आपको प्रश्न नं० ६ में देखनेको मिलेगा। कृपया वहाँ पर देखनेका कष्ट कीजियेगा।

यद्यपि हम पहले बतला चुके हैं कि प्रत्येक वस्तुकी स्वप्रत्यय पर्यायें नियतक्रमसे ही हुआ करती हैं, परन्तु वस्तुकी स्वपरप्रत्यय पर्यायें भी नियतक्रमसे ही हुआ करती हैं यह आज्ञा जैन आगमकी नहीं है। यहाँ स्वपरप्रत्यय परिणमनके विषयमें थोड़ा विचार लेना उचित प्रतीत होता है, अतः विचार किया जाता है।

ऊपर गिनायी गयी सभी वस्तुयें यथासंभव एक दूसरी वस्तुके साथ स्पृष्ट होकर रह रही हैं और चूँकि प्रत्येक वस्तु सतत परिणमन करती रहती है, अतः परिणमनके आधार पर स्पर्शमें भी भेद होनेके कारण स्पृष्ट वस्तुमें भी परिणमनको स्वीकार करना स्वाभाविक है। और चूँकि एक वस्तुमें इस प्रकारका परिणमन अन्य परिणमन करती हुई वस्तुके स्पर्शके कारण होता है, अतः ऐसे परिणमनको स्वपरप्रत्यय कहना गलत नहीं है। जीवों और पुद्गलोंमें तो यथासंभव बद्धता (एक दूसरेके साथ मिश्रण) की स्थिति पायी जाती है और दोनोंके इस मिश्रणसे जीवोंमें तथा पुद्गलोंमें परिणमन होना जैन संस्कृतिमें स्पष्ट माना गया है।

जीवपरिणामहेदुं कम्मत्तं पुग्गला परिणमंति।
पुग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो वि परिणमइ ॥८०॥
-समयसार

अर्थ-जीवके परिणमनका सहयोग पाकर पुद्गल कर्मरूप परिणत होते हैं और पुद्गल कर्मका सहयोग पाकर जीव भी परिणमनको प्राप्त होते हैं।

अतः जीवों और पुद्गलोंके ऐसे परिणमन भी स्वपरप्रत्यय ही माने गये हैं।

धर्मद्रव्य जीवों और पुद्गलोंके गमनमें अवलम्बन होता है, अधर्म द्रव्य जीवों और पुद्गलोंकी अवस्थिति ( ठहरने ) में अवलम्बन होता है, आकाश द्रव्य समस्त वस्तुजातको अपने अन्दर समाये हुए है, सभी काल द्रव्य अपनेसे सम्बद्ध वस्तुओंकी सत्ताको और उनमें अपने-अपने प्रतिनियत कारणों द्वारा होनेवाले परिणमनोंको समय, आवली, घड़ी, घंटा, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्ष आदिमें बद्ध करके विभाजित करते रहते हैं, सभी जीव अपने-अपने स्वभावानुसार स्व और पर वस्तुओंके दृष्टा और ज्ञाता बने हुए हैं और पुद्गल द्रव्य परस्पर एक-दूसरे पुद्गल या पुद्गलोंके साथ तथा यथायोग्य जीवोंके साथ मिलते और बिछुड़ते रहते हैं और इस तरह एक दूसरेके परिणमनमें सहायक होते रहते हैं। इस तरह उपकार्योपकारकभावकी अपेक्षासे भी उक्त समस्त वस्तुओंमें सतत परिणमन होता रहता है। और चूँकि यह परिणमन एक वस्तुमें उक्त प्रकारसे अन्य वस्तुके सहयोग पर ही हुआ करता है, अतः जैन संस्कृतिमें ऐसे परिणमनको भी स्वपरप्रत्यय परिणमन नाम दिया गया है।

इन सब तथा इनसे अतिरिक्त भी दूसरे सभी परके सहयोगसे होनेवाले वस्तु परिणमनोंमेंसे बहुतसे परिणमन तो ऐसे होते हैं जिनके होनेमें अन्य वस्तुका सहयोग प्राकृतिक ढंगसे प्राप्त रहता है। जैसे सभी वस्तुयें आकाशमें प्रति समय अवगाहित हो रही हैं-यहाँ पर वस्तुओंको अपने अवगाहमें आकाशका सहयोग प्राकृतिक ढंगसे ही प्राप्त है। अतः समस्त वस्तुओंका प्रतिसमय अवगाहनरूप यह परिणमन सामान्य रूपसे नियतक्रमको लेकर ही हो रहा है। जीवों और पुद्गलोंको गमन करनेमें धर्म द्रव्यका सहयोग और ठहरनेमें अधर्म द्रव्यका सहयोग यद्यपि प्राकृतिक ढंगसे प्राप्त रहता है परन्तु वे जब तक गमन करते रहते हैं तब तक गमनमें सामान्य नियतक्रम चलता है और जब वे ठहरते हैं तो गमनका नियतक्रम समाप्त होकर अवस्थितिका नियतक्रम चालू हो जाता है। विशेषापेक्षया गति और स्थितिमें अपना-अपना अनियतक्रम भी चलता रहता है। इसी तरह आकाशके आधारपर जीवों और पुद्गलोंके अवगाहनमें विशेषापेक्षया अनियत क्रम चलता रहता है। इसी प्रकार जीवों और पुद्गलोंकी गति या अवस्थितिमें एक दूसरेकी अपेक्षा भी क्रमभंग संभव है और इसी प्रकार सभी वस्तुओंकी सत्ताको तथा उनमें अपने-अपने प्रतिनियत कारणों द्वारा होनेवाले परिणमनोंको समय आदिकी वृत्तिके रूपमें विभाजित करनेमें कालका सहयोग प्राकृतिक ढंगसे ही प्रकट रहता है। इसके अलावा भी खानमें मिट्टी पड़ी हुई है और उसमें अनायास मिलनेवाले निमित्तोंके आधार पर प्रतिसमय समान और असमान परिणमन होता रहता है और इनके भी अलावा उसी मिट्टीको कुम्हार अपने घर ले आता है और वह कुम्हार उसे घट निर्माणके योग्य तैयार कर उससे दण्ड, चक्र, चीवर आदिके सहयोगसे घटका निर्माण कर देता है। इस तरह जो पर्यायोंका निर्माण होता है उसमें नियतक्रमपना और अनियतक्रमपना दोनों प्रकारकी स्थिति यथायोग्य प्रकारसे जैन संस्कृतिमें मान्य की गयी है। जैसे वस्तुओंकी सत्ता अनादि कालसे अनन्त काल तक रहनेवाली है, इसलिये यदि कालके त्रैकालिक समयोंके आधार पर प्रत्येक वस्तुकी सत्ताको विभाजित किया जाय तो जैसे कालके समय नियत हैं वैसे ही प्रत्येक वस्तुकी त्रैकालिक सत्ता भी नियत है। प्रत्येक वस्तुमें जहाँ तक समान रूपसे होनेवाले परिणमनोंका संवन्ध है तो उन सब परिणमनोंको भी नियत माननेमें कोई आपत्ति नहीं आती है। असमान परिणमनोंमें भी कहीं कहीं नियतक्रम मानना आवश्यक है। एक परमाणु एक ही समयमें चौदह राजू गमन कर जाता है, फिर भी वह लोकाकाशके क्रमवर्ती एक-एक प्रदेशको नियतक्रमसे स्पर्श करता हुआ ही जाता है। गमनरूप क्रिया करनेमें यही हाल प्रत्येक जीवका और प्रत्येक पुद्गलका है। परन्तु यह नियम नहीं बनाया जा सकता है कि गमनरूप पर्यायसे बदल कर स्थितिरूप पर्याय वस्तुकी नहीं हो सकती है, क्योंकि देखनेमें आता है कि गमन करते-करते वस्तु अवस्थित भी हो जाती है अथवा सीधा गमन करते-करते वस्तु उलटा गमन भी करने लगती है। इसलिये गमनके चालू रहनेमें जो क्रम नियत था वह क्रम वस्तुके अवस्थित होनेमें अथवा उलटा गमन करनेमें अनियत हो जाता है। प्राणीकी आयुमें वृद्धि एक-एक समयके आधार पर क्रमसे ही हुआ करती है, प्राणीके शरीरका उत्सेध भी क्रमसे बढ़ता हुआ दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार जितनी भी स्वपरप्रत्यय पर्यायें प्रत्येक वस्तुमें सम्भव हैं उनमें यथासंभव नियतक्रम और अनियतक्रम मानना असंगत नहीं है।

आपने अपने द्वितीय दौरके पत्रकमें हमारी प्रतिशंकाके निम्नलिखित विषयों पर विचार किया है-

१-स्वमिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी तीन गाथायें तथा तत्संबन्धी अन्य सामग्री।

२-अकालमें दिव्यध्वनि।

३-निर्जरा तथा मुक्तिका अनियत समय।

४-अनियत गुण-पर्याय।

५-क्रम-अक्रम पर्याय।

६-द्रव्य कर्मकी अनियत पर्याय।

७-निमित्त-उपादान कारण।

इन विषयोंपर आपने जो विचार प्रगट किये हैं उन पर सामान्यरूपसे तो हमने विचार कर ही लिया है। अब जो विशेष बातें विचारके लिये रह गयी हैं उन पर विचार किया जाता है।

विषय नं० १ पर विचार करते हुए आपने ‘एवं जो णिच्छयदो’ गाथाके विषयमें लिखा है कि- 'इस गाथामें भिन्न टाईपमें दिये गये पद ध्यान देने योग्य हैं। ‘णिच्छयदो’का अर्थ निश्चयसे (यथार्थमें) है। इससे विदित होता है कि पूर्वोक्त दो गाथाओंमें जिस तत्त्वका प्रतिपादन किया गया है वह यथार्थ है ।’ आगे आपने स्पष्ट किया है कि शुद्ध सम्यग्दृष्टि कौन है ? और क्यों है ? तथा मिथ्यादृष्टि कौन है ? और क्यों है ?

इस विषयमें हमारा कहना है कि श्रुतज्ञानी सम्यग्दृष्टि केवलज्ञानके विषयकी अपेक्षा उस तत्त्वको यथार्थ मानता है जिसको पूर्वोक्त दो गाथाओंमें प्रतिपादित किया गया है और श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षा कार्यकारण भाव पद्धतिको भी यथार्थ मानता है । इतना अवश्य है कि केवलज्ञानके विषयकी अपेक्षा तो वह आस्थावान् होता है और श्रुतज्ञानके विषयके अनुसार अपनी प्रवृत्ति बनाता है । इसका विस्तृत विवेचन हम पूर्वमें कर चुके हैं तथा केवलज्ञानविषयक और श्रुतज्ञानविषयक उपर्युक्त दोनों मान्यताओंमें परस्पर समन्वय भी पूर्वमें विस्तारसे कर चुके हैं ।

उसी ‘णिच्छयदो’ पदका एक दूसरा अभिप्राय भी आपने निकाला है कि ‘यह कथन निश्चय ( यथार्थ ) नयकी ( उपादानकी ) प्रधानतासे किया गया है । इससे पर्यायान्तरसे यह भी ज्ञात हो जाता है कि आगममें जहाँ भी अकालमृत्यु आदिका निर्देश किया गया है, वहाँ वह व्यवहार नयकी ( उपचरित नयकी ) अपेक्षा ही किया गया है, निश्चय नयकी अपेक्षा नहीं ।’

इस विषयमें हमारा कहना यह है कि वास्तवमें देखा जाय तो जितना मरण है चाहे वह अकाल मरण हो अथवा चाहे कालमरण हो, दोनों ही व्यवहाररूप हैं, अतः दोनों ही व्यवहारनयके विषय हैं । कारण कि आत्मा तो स्वभावतः अमर ही जैन संस्कृतिमें माना गया है, इसलिये कालमरणको आप जो निश्चय नयका विषय मान लेना चाहते हैं वह गलत है । साथ ही व्यवहार नयको जो आपने उपचरित नय मान लिया है वह भी गलत है, क्योंकि आप उपचरित शब्दका अर्थ कल्पित, असद्भूत, मिथ्या या अभावात्मक स्वीकार करते हैं जब कि आगमके अनुसार व्यवहार भी अपने ढंगसे वास्तविक, सद्भूत, सत्य और सद्भावात्मक होता है । इसका स्पष्ट विवरण आप प्रश्न नं० १७ के तृतीय दौरके हमारे प्रपत्रमे देखियेगा । इसी प्रकार प्रश्न सं० ११ के तृतीय दौरके हमारे प्रपत्रमें भी देखनेको मिलेगा ।

संक्षेपमें निश्चयनय और व्यवहारनयके लक्षण निम्न प्रकार हैं-

वस्तुके अंश या धर्मभूत निश्चयरूप अर्थका प्रतिपादक शब्द या ज्ञापक ज्ञान निश्चय नय कहलाता है और वस्तुके अंश या धर्मभूत व्यवहाररूप अर्थका प्रतिपादक शब्द या ज्ञापक ज्ञान व्यवहारनय कहलाता है । तात्पर्य यह है कि निश्चय और व्यवहार यथास्थान नाना प्रकारके परस्पर विरोधी द्वयात्मक वस्तुके धर्म या वस्त्वंश ही माने गये हैं और व्यवहारनय तथा निश्चयनय उन युगल धर्मोंमेंसे एक एक धर्मके प्रतिपादक शब्द रूप या ज्ञापक ज्ञान रूप हैं ।

आगे आपने लिखा है कि-‘इन गाथाओंके आशयको ध्यानमें न रखकर जो यह कहा जाता है कि जो कोई व्यक्ति अपना मरण टालनेके लिये किसी देवी देवताकी आराधना द्वारा प्रयास करे तो उसको समझानेके लिये स्वामी कार्तिकेयने इन गाथाओं द्वारा यह अभिव्यक्त किया है कि मरण कालको इन्द्र या देव यहाँ तक कि जिनेन्द्र भी नहीं टाल सकते । सो उन गाथाओंपरसे ऐसा आशय फलित करना उचित नहीं है ।’ आदि ।

इस विषयमें भी हमारा कहना यह है कि प्रकरणके अनुसार तो हमने अपनी प्रथम प्रतिशंकामें जो कुछ लिखा है वह ठीक है, फिर भी आप इसे नहीं मानना चाहते हैं तो न मानें, लेकिन आप जो इससे एकान्त रूपसे ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं’ या ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होने पर ही होते हैं’ यह तत्त्व फलित करना चाहते हैं वह तो कदापि फलित नहीं होता है । यही कारण है कि आगममें लोकको कार्यसिद्धिके लिए कर्तव्य करनेका उपदेश दिया गया और मुक्ति पानेके लिये धर्म पथपर चलनेका उपदेश दिया गया है ।

\७. समयसारकी आचार्य अमृतचन्द्र कृत टीकामें आगमकी एक गाथा उद्धृत की गयी है जो निम्न प्रकार है-

जइ जिणमयं पवज्जह ता मा ववहारणिच्छये मुअह ।
एक्केण विणा छिज्जइ तित्थं अण्णेण उण तच्चं ।
-समयसार गाथा १२ की टीका

अर्थ-यदि जिन मतका प्रवर्तन करना हो तो व्यवहार और निश्चय दोनों नयोंको छोड़ो मत, क्योंकि निश्चयके त्यागसे वस्तुका स्वतःसिद्ध स्वरूप नष्ट हो जायगा तथा व्यवहारके त्यागसे मोक्षमार्ग समाप्त हो जायगा ।

लोकमें देखा भी जाता है कि कोई भी व्यक्ति कार्यसिद्धिके लिये कार्यकारणभावपद्धतिको ही अपनाता है । आप वस्तुके परिणमनको नियतक्रमसे मान रहे हैं, फिर भी कार्यसिद्धिके लिये कर्यकारणपद्धतिका ही अवलंबन लेकर चलते हैं तो इसे क्या कहा जाय ? हम तो यही कह सकते हैं कि आप भी हमारी ही तरह वस्तुपरिणमनके एकान्त नियतक्रमके पक्षमे नहीं है । यदि आप कहें कि निश्चयसे नियतक्रम है व्यवहारसे तो अनियत क्रम ही है, तो व्यवहारको तो आप कल्पित, असद्भूत, मिथ्या आदि शब्दोंका वाच्य मानते हैं, लेकिन कार्यसिद्धिके लिये आप जो कार्यकारणपद्धतिका अवलंबन लेकर चलते हैं वह तो कल्पित नहीं, असद्भूत नहीं, मिथ्या नहीं । इतने पर भी कार्यकारणपद्धतिके अवलम्बनपर होनेवाली अपनी प्रवृत्तिको यदि व्यवहारनयका विषय माननेको तैयार हैं तो फिर व्यवहार भी कल्पित, असद्भूत या मिथ्या नहीं रह जाता है । इसपर आपको गम्भीरताके साथ विचार करना होगा । विस्तारसे विवेचन हम पूर्वमें कर ही चुके हैं । उसपर भी आप विचार करनेका कष्ट करें ।

यहाँपर विशेष बात यह भी विचारणीय है कि आपने अपने मतके समर्थनमें स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा ३१९ का भी प्रमाण उद्धृत किया है । इससे मालूम पड़ता है कि आप उपकार और अपकारकी मर्यादाको मानते हैं और उसका कारण भी आप क्रमशः शुभ और अशुभ कर्मको स्वीकार करते हैं, लेकिन इससे तो आपके नियतक्रमरूप सिद्धान्तका ही विघात हो जाता है । इसको भी आप समझनेका प्रयत्न करें ।

आपने अपने नियतक्रमरूप सिद्धान्तके समर्थनमें स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी ‘कालादिलद्धिजुत्ता’ इत्यादि २१९ वीं गाथाको भी प्रमाणरूपसे उद्धृत किया है, परन्तु वह भी नियतक्रमके विरुद्ध कार्यकारणभावपद्धतिका ही समर्थन करती है । कारण कि उस गाथामें जो ‘कालादिलद्धिजुत्ता’ पद पड़ा हुआ है वह भी कार्यसिद्धिके लिये निमित्तसामग्रीके साथ कार्यकारणभावपद्धतिका ही समर्थक है । इसका विस्तारसे विवेचन टीकाके आधारपर पूर्वमें किया है ।

यद्यपि आपका कहना उस गाथाके आधारपर यह है कि गाथामें जो ‘परिणममाणा हि सयं’ पद आया है वह आपके पक्ष-नियतक्रमका समर्थक है, लेकिन इसमें भी आप भूल कर रहे हैं । कारण कि ‘सयं’ पदका जो अर्थ आप कर रहे हैं उस अर्थका ‘कालादिलद्धिजुत्ता’ पदके अर्थके साथ विरोध आता है। आप ‘सयं’ शब्दका यही तो अर्थ करते हैं कि ‘पदार्थ स्वयं अर्थात् अपने आप परिणमन करते हैं’ परन्तु जब पदार्थ अपने आप परिणमन करते हैं तो फिर ‘कालादिलद्धिजुत्ता’ पदकी स्थिति गाथामें सयुक्तिक नहीं रह जाती है, क्योंकि वह पद तो परिणमनमें कारणभूत निमित्त सामग्रीका ही स्थापन करता है। इस तरह हमारा कहना यह है कि गाथामें पठित ‘सयं’ पदका ‘अपने आप’ अर्थात् ‘बिना किसी दूसरे पदार्थकी सहायताके’ ऐसा अर्थ न करके ऐसा अर्थ करना चाहिए कि निमित्त सामग्रीसापेक्ष जो भी पदार्थमें परिणमन होता है उसे उसका (पदार्थका) अपना ही परिणमन जानना चाहिये याने खुद पदार्थ ही परिणमन करता है, परिणमनमें सहायक निमित्त सामग्री का कोई गुण-धर्म उसमें आ जाता हो सो बात नहीं है। लेकिन निमित्तसामग्री उस पदार्थको उसका अपना परिणमन करनेमें सहायक तो होती ही है। इस बातको बतलानेवाला ही गाथामें ‘कालादिलद्धिजुत्ता’ पद है। पदार्थके परिणमनके सिलसिलेमें ‘सयं’ पदका व्याख्यान हमने प्रश्न नं० १ के तृतीय दौरके पत्रकमें विस्तारसे किया है, अतः वहाँ देखनेका कष्ट करें।

भो विद्वांसः! हम लोगोंमेंसे कौन कहता है कि उपादानके अनुसार कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती है। तो फिर क्यों गलत आरोप आप हमारे ऊपर करते हैं? आपने जो आचार्य अकलंकदेव और विद्यानन्द स्वामीके ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ की मिसाल दी है उसे हम भी शिरोधार्य किये हुए हैं, परन्तु हमारा आपसे निवेदन यह है कि दूसरोंके ऊपर गलत आरोप करके पाठकोंको भ्रममें डालनेका प्रयत्न न कीजिये। अपनी स्थितिके विषयमें सोचिये कि आप कहाँ क्या गलती कर रहे हैं?

हमारा पक्ष तो यह है कि और जैसा कि हम पूर्वमें स्पष्ट भी कर चुके हैं कि आत्माका स्वतःसिद्ध स्वभाव परिणमन करना है सो प्रतिक्षण वह परिणमन करे-इसका निषेध यदि हमने कहीं किया हो तो बताइये, इसमें बुराई नहीं है, यदि हमने ऐसी गलती की हो तो उसे हम स्वीकार करनेके लिए तैयार हैं। परन्तु हम आपसे पूछते हैं कि आत्माका क्रोधरूप परिणमन करना, मानरूप परिणमन करना, मायारूप परिणमन करना या लोभरूप परिणमन करना भी क्या स्वतःसिद्ध स्वभाव है? हमारा ख्याल है कि न तो आगममें कहीं ऐसा लिखा है और न आप भी इसे स्वीकार करेंगे कि ‘क्रोधादिरूप परिणमन करना आत्माका स्वतः स्वभाव है।’ आत्माका स्वतःसिद्ध स्वभाव तो मात्र परिणमन करना है। अब जो परिणमनमें क्रोधादि रूपता आती है वह क्रोधादि कर्मोंके उदयसे हो आती है। जैसे ज्ञानका स्वतःसिद्ध स्वभाव पदार्थोंको जाननेका है, लेकिन ज्ञानका उपयोगाकार परिणमन किस पदार्थरूप होता है? यह व्यवस्था तो उस पदार्थके ही अधीन है। इसी तरह दर्पणका स्वतःसिद्ध स्वभाव अपनेमें पदार्थोंका प्रतिबिम्ब लानेका है, लेकिन किसका प्रतिबिम्ब उसमें पड़ रहा है यह व्यवस्था तो उस उस पदार्थके अधीन ही है। तो, महानुभावो! हमारा कहना यही है कि स्वतःसिद्ध परिणमन स्वभाववाली आत्माके परिणमनमें जो क्रोधादिरूपता आती है उसका निमित्तकारण क्रोधादिरूप कर्म ही है। देखिये जिन अकलंकदेव और विद्यानन्द स्वामीने ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ वाक्य लिखा है और जिसके प्रति आपकी तीव्र आस्था जान पड़ती है इस वाक्यके साथ उन्हीं आचार्योंके निम्न वाक्योंको भी पढ़ जाइये-

(१) तदसामर्थ्यमखण्डयदकिंचित्करं किं सहकारिकारणं स्यात्।
-अकलंकदेवकी अष्टशती-अष्टसहस्री पृष्ठ १०५

इसका अर्थ यह है कि सहकारीकारण यदि उपादानकी असामर्थ्यका खण्डन नहीं करता है तो वह अकिंचित्कर सिद्ध होता है, ऐसी हालतमें फिर क्या उसे सहकारीकारण कहा जा सकता है?

(२) क्रमभुवोः पर्याययोरेकद्रव्यप्रत्यासत्तेरुपादानोपादेयत्वस्य वचनात्। न चैवंविधः कार्यकारणभावः सिद्धान्तविरुद्धः। सहकारिकारणे कार्यस्य कथं तत्स्यादेकद्रव्यप्रत्यासत्तेरभावादिति चेत् कालप्रत्यासत्तिविशे-
षात् तत्सिद्धिः। यदनन्तरं हि यदवश्यं भवति तत्तस्य सहकारिकारणमितरत्कार्यमिति प्रतीतम्……… तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे कार्यकारणभावो द्विष्ठः सम्बन्धः संयोगसमवायादिवत्प्रतीतिसिद्धत्वाद् पारमार्थिक एव, न पुनः कल्पनारोपितः सर्वथाप्यनवद्यत्वात्।
-आचार्य विद्यानन्दस्वामीका तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० १५१

अर्थ-क्रमसे होनेवाली पर्यायोंके मध्य एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप उपादानोपादेयभावका कथन किया गया है। और इस प्रकारका कार्यकारणभाव सिद्धान्तविरुद्ध नहीं है। सहकारी कारणके साथ कार्यका वह कार्यकारणभाव कैसे होगा? कारण कि सहकारिकारणकी कार्यके साथ एक द्रव्यप्रत्यासत्तिका अभाव पाया जाता है। यदि ऐसा प्रश्न किया जाय तो इसका उत्तर यह है कि कालप्रत्यासत्तिविशेषके आधार पर सहकारी कारणके साथ कार्यकारणभाव सिद्ध हो जाता है।…………इस प्रकार व्यवहारनयका आश्रयण करने पर दोमें विद्यमान संवन्ध रूप कार्यकारणभाव संयोग सम्बन्धकी तरह प्रतीतसिद्ध होनेसे पारमार्थिक हो है कल्पनारोपित नहीं है, कारण कि उक्त प्रकारसे वह सर्वथा निर्दोष हैं।

श्रीमदकलंकदेव और आचार्य विद्यानन्दके और भी प्रमाण देखिये-

यदि हि सर्वस्य कालो हेतुरिष्टः स्यात् बाह्याभ्यन्तरकारणनियमस्य दृष्टस्येष्टस्य वा विरोध स्यात् ॥१।३॥
-तत्त्वार्थराजवार्तिक

अर्थ-यदि सब कार्योंका कारण कालको माना जाय तो प्रत्यक्ष और अनुमानसे सिद्ध बाह्य और आभ्यन्तर कारणोंका जो कार्योंके साथ नियम पाया जाता है उसका इसके साथ विरोध होगा।

प्रधानं हि कारणं मोहक्षयो नामादिनिर्जरणशक्तेर्नायोगकेवलिगुणस्थानोपांत्यान्त्यसमयं सहकारिणमन्तरेण तामुपजनयितुमलं सत्यपि केवले ततः प्राक् तदनुपतेः।
-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृष्ठ ७१

अर्थ-नाम, गोत्र, वेदनीय और आयु कर्मकी निर्जरण शक्तिका प्रधान कारण मोहका क्षय ही है, लेकिन वह (मोहक्षय) अयोगकेवली गुणस्थानके उपान्त्य और अन्त्य समयरूप सहकारी कारणके विना उस नामादि कर्म निर्जरण शक्तिको उत्पन्न करनेमें समर्थ नहीं हैं। कारण कि केवलज्ञानके उत्पन्न हो जाने पर भी उक्त अयोगकेवली गुणस्थानके उपान्त्य और अन्त्य समयकी प्राप्तिके पूर्व उसकी उत्पत्ति नहीं होती है।

इसका तात्पर्य यह है कि उक्त अयोगकेवली गुणस्थानमें नियत क्रमसे नामादि चारों अघातिकर्मोंके क्रमस्थितिको प्राप्त निषेकोंकी प्रतिसमय उदयानुसार सविपाक निर्जरा होती हुई उस उपान्त्य और अन्त्य समयमें पूर्णक्षय होता है, इसलिये यहाँ पर उपान्त्य और अन्त्य समयको नामादि कर्मोंके उस क्षयका सहकारी कारण माना गया है।

अब जब आप एकान्ततः नियतिवादको ही महत्त्व देते हैं तो अकलंकदेव और विद्यानन्द स्वामीके सहकारी कारणोके समर्थक वचनोंका उक्त दोनों आचार्योंके उक्त ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ वचनके साथ कैसे समन्वय करेंगे? यह जाननेके लिये हम आशान्वित रहेंगे। उपादानप्रधानपरक और निमित्तप्रधानपरक दोनों तरह के कार्यकारणभावका समन्वय हम तो पूर्वमें कर ही चुके हैं जिसे आप देखेंगे ही।

हमें विश्वास है कि यदि आप हमारे प्रकृत प्रश्न पर अब तक हुए विवेचन पर ध्यान देंगे तो निश्चित ही आप अपने ‘यदि उपादानके इस लक्षणको जिसे किसी भी आचार्यने अनेक तर्क देकर सिद्ध किया है, यथार्थ नहीं माना जाता है’ यहाँसे लेकर ‘क्योंकि जब कि यह स्वीकार किया जाता है कि कार्य तो बाह्य निमित्तोंके अनुसार होता है ऐसी अवस्थामें अमुक प्रकारके परिणामोंके होने पर अमुक प्रकारका बन्ध होता है यह जो आगममें व्यवस्था की गई है वह सबकी सब छिन्न-भिन्न हो जाती है।’ यहाँ तकके वक्तव्यको आप न केवल सहर्ष लौटा लेंगे बल्कि आपकी अपनी एकान्त नियतवादकी मान्यताको त्याग कर सत्य मार्गको भी आप अपना लेवेंगे।

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ (भाग ३/४)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ २१६ से २३५

↑ सूची


सिद्धोंके कर्मबन्ध क्यों नहीं

फिर आपने जो अपने लेखमें यह बात लिखी है-

‘सिद्धोंको जिनमें वैभाविक शक्ति इस अवस्थामें विद्यमान है और लोकमें सर्वत्र बाह्य निमित्तकी भी विद्यमानता है, तब उन्हें संसारी बनानेसे कौन रोक सकता है ?’

आपकी इस शंकाका समाधान यह है कि जीवको संसारी बनानेवाला निमित्त कारण द्रव्य कर्म हैं जो सिद्धोंमें नहीं है। लोकमें यद्यपि कार्मणवर्गणाएँ भरी हुई हैं तथापि वे वर्गणायें, द्रव्यकर्म न होनेसे, जीवको संसारी बनानेकी निमित्त नहीं हो सकतीं।

इस पर यदि ऐसी आशंका की जावे कि सिद्धोंके द्रव्य कर्म क्यों नहीं है ? तो उसका समाधान यह है कि द्रव्य कर्मोंका आत्यन्तिक क्षय होनेसे ही सिद्ध होते हैं और नवीन द्रव्यकर्म-बंधके कारण रागादिका अभाव होनेसे नवीन द्रव्यकर्मका बन्ध भी नहीं होता, इसलिये सिद्धोंके द्रव्यकर्म नहीं है। कहा भी है-

बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः।
-त० सू० १०।२

अर्थ-बन्ध-हेतुओंके अभाव और निर्जरासे सब कर्मोंका आत्यन्तिक क्षय होना ही मोक्ष है।

अध्यात्म-वेत्ता यह बात भले प्रकार जानते हैं कि सिद्धोंको विकारी करनेवाला द्रव्यकर्मरूपी निमित्त लोकमें नहीं है, फिर भी यह कहना कि लोकमें निमित्त कारण भरे हुए हैं, असंगत है। प्रत्युत उपादानमात्रसे ही कार्यकी उत्पत्ति माननेवाले आपके माने हुए सिद्ध जब वैभाविक शक्तियुक्त हैं तब उनको अपने उपादान द्वारा ही संसारी बन जानेका कौन निराकरण कर सकेगा ! तथा आप भी अपनी उपादान शक्तिके द्वारा अभी सिद्ध क्यों नहीं बन जाते।

इस सम्बन्धमें श्री अमृतचन्द्रके निम्न वाक्य ध्यान देने योग्य हैं-

सक्रिया बहिरंगसाधनेन सहभूता जीवाः। जीवानां सक्रियत्वस्य बहिरंगसाधने कर्मनोकर्मोपचयरूपाः पुद्गला इति ते पुद्गलकरणाः। तदभावान्निःक्रियत्वं सिद्धानाम्। पुद्गलानां सक्रियत्वस्य बहिरंगसाधनं परिणामनिर्वर्तकः काल इति ते कालकरणाः। न च कर्मादीनामिव कालस्याभावः। ततो न सिद्धानामिव निष्क्रियत्वं पुद्गलानामिति।
-पञ्चास्तिकाय गाथा ९८ टीका

अर्थ-बहिरंग साधनके साथ रहनेवाला जीव सक्रिय है। जीवोंके सक्रियपनेका बहिरंग साधन कर्म-नोकर्म संचयरूप पुद्गल है, इसलिये जीव पुद्गलकरण माने हैं। उस ( पुद्गल करण ) के अभावके कारण सिद्धोंके निष्क्रियपना है। पुद्गलोंके सक्रियपनेका बहिरंग साधन परिणामनिष्पादक काल हैं, इसलिये पुद्गल कालकरणवाले हैं। जिस प्रकार कर्म-नोकर्मरूप पुद्गलोंका अभाव होता है उस प्रकार कालका अभाव नहीं होता। इसलिये जिस प्रकार सिद्धोंके निष्क्रियपना होता है उस प्रकार पुद्गलोंके निष्क्रयपना नहीं होता।

इसी प्रकार निमित्त कारणको बाह्य कारण कहते हैं। अंतरंग कारणको उपादान कारण कहते हैं। अंतरंग और बहिरंग दोनों ही कारणोंसे कार्य होता है। पौद्गलिक कार्मणवर्गणाओंके द्रव्य कर्म बन्धरूप अवस्था होनेमें अंतरंग ( उपादान ) कारण तो पुद्गल वर्गणा है और बहिरंग ( निमित्त ) कारण जीवके रागादि परिणाम हैं। अर्थात् शुभ या अशुभरूप जैसे जीवके भाव होंगे वैसे ही कार्मणवर्गणा शुभ या अशुभ द्रव्यकर्मरूप बन्ध अवस्थाको प्राप्त हो जावेंगी। इस प्रकार निमित्तके अनुसार कार्य होना आपने भी स्वीकार किया है। यही बात हमारे द्वारा कही गई थी, किन्तु उस पर आपत्ति उठाई जाकर यह लिखना कि ‘नरकायुके बन्ध योग्य जीव संक्लेश परिणाम करे, किन्तु बाह्य निमित्त देव, गुरु, शास्त्रका सानिध्य आदि देवगतिमें जाने योग्य हो तो उसे नरकायुका बन्ध न होकर देवायुका ही बन्ध होगा’ युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि कार्मणवर्गणाओंके देवायुरूप बन्ध होनेमें या नारकायुरूप बन्ध होनेमें जीवके विशुद्ध या संक्लेशरूप परिणाम बाह्य ( निमित्त ) कारण हैं, देव, गुरु, शास्त्रका सानिध्य कारण नहीं है। यह बात कर्मसिद्धान्तके विशेषज्ञोंसे ओझल नहीं है। देव-गुरु-शास्त्रका सानिध्य आदि बाह्य नो-कर्म तो भाव-कर्मके लिये आश्रयभूत हैं, नो-कर्मका भाव-कर्मके साथ अविनाभावी सम्बन्ध नहीं है। भावकर्मका द्रव्यकर्मके बन्धके साथ तथा द्रव्यकर्मके उदयका भावकर्मके साथ अविनाभावी सम्बन्ध है।

आगे आपने लिखा है कि-‘प्रत्येक द्रव्यकी संयोगकालमें होनेवाली पर्याय बाह्य निमित्तसापेक्ष निश्चय उपादानसे होती है यह तो है, पर साथमें इसके प्रत्येक कार्यके प्रति उपादानकी नियामकता ही स्वीकार की गयी है। इसलिए जब कार्यक्षम निश्चय उपादान उपस्थित होता है तब निमित्त भी उसीके अनुसार मिलते हैं यह भी नियम है।’

इसपर हमारा कहना यह है कि चूँकि वस्तुको जैन संस्कृतिमें स्वतःसिद्ध परिणमन स्वभाववाली स्वीकार किया गया है, इसलिए परिणमन होनेमें तो उपादानकी नियामकता रहा करती है, किन्तु उस परिणमनमें जो विशेषता या विलक्षणता आती है उसका नियामक तो निमित्त ही होता है। जैसे हमने पूर्वमें बतलाया है कि आत्माकी क्रोध पर्यायके अनन्तर क्षणमें जो मान, माया या लोभरूप विलक्षण पर्याय उत्पन्न होती हैं इसमें परिणमनका उपादान कारण तो आत्मा स्वयं है। कारण कि वह स्वतःसिद्ध परिणमनशील है, परन्तु उसमें जो क्रोधरूपताके बजाय विलक्षण मानरूपता, मायारूपता या लोभरूपता उत्पन्न हुई उसका निमित्त कारण मानादि उस उस कषायरूप द्रव्यकर्मके उदयको माना गया है। इसके अलावा यह भी सोचनेकी बात है कि स्वपर-प्रत्यय परिणमनमें उपादान जो कार्यक्षम निश्चयउपादानका रूप धारण करता है तो वह भी निमित्त कारणकी सहायतासे ही करता है। जैसे आत्माके परिणमनमें कार्याव्यवहित पूर्वपर्यायमें जो क्रोधरूपता पायी जाती है वह भी क्रोध कषायरूप द्रव्यकर्मके उदयरूप निमित्त कारणसे ही उत्पन्न हुई है। इसी प्रकार निष्पन्न क्षणवर्ती घटरूप पर्यायके अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायके अनन्तर क्षणमें जो घटरूप विलक्षण पर्याय उत्पन्न हुई उसका निमित्तकारण कुम्हारका तदनुकूल व्यापार ही तो है तथा उस निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती घट पर्यायके अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती मिट्टीकी पर्यायमें जो विलक्षणता पायी जाती है वह कुम्हारके तदनुकूल व्यापारके निमित्तसे ही उत्पन्न हुई है। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक वस्तुमें जितने भी क्रमसे प्रवर्तमान स्वपरप्रत्यय परिणमन होते हैं वे चाहे कार्यक्षम निश्चय उपादानरूप हों अथवा चाहे उसके उत्तर क्षणवर्ती कार्यरूप हों उनमें जिस विल-क्षणताके दर्शन होते हैं वह तदनुकूल निमित्तकारणके सहयोगकी बजहसे ही उत्पन्न हुई मानना चाहिये। आपने लिखा ‘निमित्त भी उसीके अनुसार मिलते हैं’, तो इसका अभिप्राय यही तो हुआ कि कार्यक्षम निश्चय उपादान अपने द्वारा होनेवाली कार्योत्पत्तिके लिये अनुकूल निमित्तोंका समागम भी आप ही प्राप्त कर लेता है, लेकिन इस विषयमें हम कह सकते हैं कि जब वह निश्चय उपादान स्वयं कार्य-क्षम है तो उसे फिर निमित्तोंके सहयोगकी आवश्यकता ही क्यों होती है ? और यदि आवश्यकता है तो फिर उन निमित्तोंकी प्राप्ति वह कार्यक्षम उपादान स्वयं कर लेता है-यह असंभव बात है, इसलिये यदि यह माना जाय कि प्रत्येक वस्तुके जब अनादि कालसे लेकर अनन्तकाल तकके परिणमन निश्चित हैं तो कार्यके प्रति उपादानभूत वस्तुका जब जैसा परिणमन होगा तब निमित्तभूत वस्तुकी अपनी अनादि क्रमसे प्रवर्तमान परिणति भी तदनुकूल ही होगी अन्यथा नहीं होगी, तो ऐसा माननेपर आपके प्रति हम कई बार कह चुके हैं कि फिर क्यों आप कार्य करनेका संकल्प मनमें करते हैं ? क्यों मस्तिष्कके सहारेपर कार्यकारणभावकी निमित्तभूत और उपादानभूत वस्तुओंके साथ संगति बिठलाते हैं तथा फिर क्यों अपनी श्रम शक्तिके आधारपर तदनुकूल व्यापार करते हैं। यदि कहा जाय कि यह सब कुछ अनादि कालीन नियतक्रमसे प्रवर्तमान परिणमन धाराके अनुसार ही हो रहा है तो फिर इसे यदि एकान्त नियतिवाद न कहा जाय तो एकान्त नियतिवाद अन्य क्या होगा ? जिसे जैन संस्कृतिके आगम ग्रन्थोंमें मिथ्यात्व कहा गया है।

हमें प्रसन्नता है कि आपने प्रत्येक द्रव्यकी संयोग कालमें उत्पन्न होनेवाली पर्यायोंको बाह्य निमित्त सापेक्ष उपादानसे उत्पन्न होनेवाली मान लिया है, परन्तु दुःख भी इस बातका है कि उस बाह्य निमित्तका उस पर्यायोत्पत्तिमें क्या उपयोग है ? इसे आप स्पष्ट नहीं कर सके हैं।

आपने लिखा है कि ‘नियममें अनेकान्त लागू नहीं होता। अनेकान्तकी अपनी मर्यादा है, उसे ध्यानमें रखकर ही उसे लागू करना चाहिये। अन्यथा द्रव्यमें ( सामान्यकी अपेक्षा ) जो नित्यता और पर्यायकी अपेक्षा जो अनित्यता स्वीकार की गयी है वह अनेकान्त नहीं बनेगा। तब तो यह भी माननेके लिये बाध्य होना पड़ेगा कि द्रव्य (सामान्य) स्वयं अपनी अपेक्षा ही कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है।’

इस विषयमें हमारा निवेदन यह है कि भो मनीषिणः ! प्रकृतमें जिसको आपने नियम कहा है उसे आप स्थापित तो कर लीजिये फिर उसके बारेमें एकान्त-अनेकान्तकी संभावना और असंभावनाका विचार कीजिये। सो ‘जब कार्यक्षम निश्चय उपादान उपस्थित होता है तब निमित्त भी उसीके अनुसार हो मिलते हैं’ इसकी स्थापना ही हमारे पूर्व विवेचनके अनुसार जब नहीं हो सकती है तब उसके बारेमें एकान्त-अनेकान्तकी चर्चा ही व्यर्थ है।

आपने लिखा कि ‘अनेकान्तकी अपनी मर्यादा है’, परन्तु क्या मर्यादा अनेकान्तकी है ? यह तो आपने स्पष्ट ही नहीं किया है। हमारी समझसे तो अनेकान्तको मर्यादा यही है जो आचार्य अमृतचन्द्रने अपनी समयसार टीका आत्मख्यातिके स्याद्वादाधिकारमें उसका ( अनेकान्तका ) स्वरूप कथनके आधारपर बतलाई है। वह स्वरूप कथन निम्न प्रकार है-

एकवस्तुवस्तुत्वनिष्पादकपरस्परविरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनं अनेकान्तः।

अर्थ-एक वस्तुके वस्तुत्वकी स्थापना करनेवाली परस्पर विरोधी दो शक्तियोंका प्रकाशन ही अनेकान्त है। ऐसा अनेकान्त द्रव्यमें सामान्यकी अपेक्षा नित्यता और पर्यायकी अपेक्षा अनित्यताकी मान्यतामें घटित होता ही है तथा उसमें यह दूषण भी प्रसक्त नहीं होता कि ‘द्रव्य ( सामान्य ) स्वयं अपनी अपेक्षा ही कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है।’

आपने लिखा है 'अकाम निर्जरा और तप द्वारा होनेवाली निर्जराका शास्त्रमें विधान है–इसमें सन्देह नहीं । पर कर्मशास्त्रके अभ्यासीसे यह बात छिपी हुई नहीं है कि ऐसी निर्जरा किन कर्मोंकी कैसी योग्यताके होने पर कैसी पद्धतिसे होती है ? इसके आगे अपनी इच्छानुसार कर्मोंके आगमविरुद्ध कुछ नियम बनाकर आपने लिखे हैं। उनमें पाया जानेवाला आगमका वह विरोध आगम प्रमाणसहित आगे दिखलाया जायगा। सर्व-प्रथम तो यह बात है कि जीवके सम्यग्दर्शन, संयम, तप, श्रेणी, मोक्ष आदिका कोई नियत काल नहीं है। जीवके इन परिणामों द्वारा होनेवाले कर्मोंका अपकर्षण, उत्कर्षण, स्थितिघात, अनुभागघात, संक्रमण और अविपाकनिर्जराका काल कैसे नियत हो सकता है ?

राजवार्तिक अध्याय १ सूत्र ३ में निम्न प्रकार कहा है-

भव्यस्य कालेन निःश्रेयसोपपत्तेः अधिगमसम्यक्त्वाभावः ॥७॥ यदि अवधृतमोक्षकालात् प्रागधिगमसम्यक्त्वबलात् मोक्षः स्यात् स्यादधिगमसम्यग्दर्शनस्य साफल्यम्। न चादोऽस्ति। अतः कालेन योऽस्य मोक्षोऽसौ, स निसर्गजसम्यक्त्वादेव सिद्ध इति।

कालानियमाच्च निर्जरायाः ॥९॥ यतो न भव्यानां कृत्स्नकर्मनिर्जरापूर्वकमोक्षकालस्य नियमोऽस्ति। केचिद् भव्याः संख्येयेन कालेन सेत्स्यन्ति, केचिदसंख्येयेन, केचिदनंतेन, अपरे अनन्तानंतेनापि न सेत्स्यन्तीति। ततश्च न युक्तम् ‘भव्यस्य कालेन निःश्रेयसोपपत्तेः’ इति।

चोदनानुपपत्तेश्च ॥१०॥ सर्वस्येयं चोदना नोपपद्यते। ज्ञानात् क्रियाया द्वयात् त्रितयाच्च मोक्षमाचक्षाणस्य सर्वस्य नेदं युक्तम्-‘भव्यस्य कालेन मोक्षः’ इति। यदि हि सर्वस्य कालो हेतुरिष्टः स्यात्, बाह्याभ्यन्तरकारणनियमस्य दृष्टस्येष्टस्य वा विरोधः स्यात्।

अर्थ–प्रश्न-भव्यके कालके नियमकरि ही मोक्षकी प्राप्ति होय है याते अधिगमज सम्यग्दर्शनका अभाव है।

टीकार्थ-प्रश्न-जो मोक्षका काल नियमरूप है। ताते पहिले अधिगमसम्यक्त्वके बलते मोक्ष कार्यकी उत्पत्ति होय तो अधिगम सम्यग्दर्शनके फलपना प्राप्त होय सो है नहीं। या कारणते जाकी जिस काल नियम करि मोक्ष है सो निसर्गज सम्यग्दर्शनके कारणते ही सिद्ध है। याते अधिगम सम्यग्दर्शनका मानना युक्त नहीं है।

समाधान-‘भव्यके नियमित काल करि ही मोक्षकी प्राप्ति है’ ऐसा कहना भी अनवधारणरूप है। जाते कर्मकी निर्जराको काल नियमरूप नाही हैं याते भव्यनिके समस्त कर्मनिकी निर्जरापूर्वक मोक्षकी प्राप्तिमें कालका नियम नाहीं सम्भवे है। कोई भव्य है ते संख्यात काल करि मोक्ष प्राप्त होयंगे। अर केई असंख्यात काल करि अर केई अनन्तकाल करि सिद्ध होयेंगे। बहुरि कोई अनन्तानन्त काल करिके भी सिद्ध नहीं होयेंगे। ताते ‘नियमिन काल ही करि भव्यके मोक्षकी उत्पत्ति है’ ऐसा कहना युक्त नहीं ऐसा जानना। आगे याही अर्थका समर्थन करे हैं-

वार्तिकार्थ-बहुरि नियमित काल मात्र ही करि मोच कार्यकी उत्पत्ति होय तो सर्व स्याद्वादीनिके ज्ञान यम नियमादिक उपदेशकी प्रवृत्तिका अभाव आवेगा। याते मोक्ष कार्यके प्रति केवल काल ही को असाधारण कारण मानना युक्त नाहीं है।

टीकार्थ-केई स्याद्वादी हैं तो ज्ञान ते मोक्ष कार्यकी उत्पत्ति माने हैं, केई क्रियाते ही मोक्ष कार्यकी उत्पत्ति माने हैं, केई ज्ञान क्रिया दोऊनि ते मोक्ष कहे हैं। केई यम नियम धारणा तीन ते मोक्ष कहे हैं। या प्रकार सर्व स्याद्वादीनिके या उपदेशकी प्रवृत्तिका अभाव आवे। तातें नियमित काल करि मोक्ष है यह कहना युक्त नाहीं। निश्चयकरि जो सर्व कार्य प्रति काल इष्ट होय तो प्रत्यक्षके विषयस्वरूप अथवा अनुमानके विषय-स्वरूप बाह्य आभ्यन्तर कारणके विरोध आवे। कार्य मात्रका आत्मलाभ है सो बाह्य तथा आभ्यन्तर कारणके निकट होते होय है यह नियम प्रत्यक्ष विषय करि बहुरि अनुमान विषय करि श्रद्धहै ताका विरोध होयगा। ताते मोक्ष कार्य प्रति काल ही को कारण कहना यह नियम नाहीं सम्भवे है।

-श्री पं० पन्नालालजी न्यायदिवाकरकृत तत्त्वार्थराजवार्तिककी हिन्दी टीका

अकामनिर्जरा या तपके द्वारा अकालमें भी निर्जरा होती है। इस तथ्यको नियतिके ढाँचेमें ढालनेके लिए आपके द्वारा स्वइच्छानुसार आगम विरुद्ध ये दो नियम बनाये गये हैं-१ जिस कालमें जिन कर्मोंकी जितने परिमाणमें जिन परिणामोंको निमित्तकर उत्कर्षित अपकर्षित संक्रमित और उदीरित होनेकी योग्यता होती है, उस कालमें उन कर्मोंका उतने परिमाणमें उन परिणामोंको निमित्तकर उत्कर्षण अपकर्षण संक्रमण और उदीरणा होती है ऐसा नियम है। २-बंधके कालमें जो स्थितिबंध और अनुभागबंध होता है, सो उस कालमें ही उन कर्मोंमें ऐसी योग्यता स्थापित हो जाती है, जिससे नियतकाल आने पर नियत परिणामों तथा बाह्य नोकर्मोंको निमित्त कर उन उन कर्मोंका अपकर्षणादिरूप परिणमन होता है।

किसी भी आगममें ऐसे नियमोंका उल्लेख नहीं है। इसी कारण इनके समर्थनमें कोई भी आगम प्रमाण नहीं दिया गया है। इस बातको छिपानेके लिये भ्रमोत्पादक निम्न शब्द लिखे गये हैं ‘कर्म-शास्त्रके अभ्यासीसे यह बात छिपी हुई नहीं है’ तथा ‘यह बात कर्मशास्त्रियोंको सुविदित है’ किन्तु यह सुविदित है कि आपके द्वारा बनाये गये उपरोक्त दोनों नियम आगमविरुद्ध हैं।

आपके उपर्युक्त नियमोंका खण्डन श्री धवल जयधवल आदि सिद्धान्त ग्रन्थोंसे भले प्रकार हो रहा है। बन्ध कालके समय या उसके पश्चात् ऐसा कोई एकान्त नियम नहीं बनता कि अमुक कालमें अमुक कर्म-प्रदेशोंका ही उत्कर्षण होगा, अमुक प्रदेशोंका अपकर्षण होगा, अमुक प्रदेशोंकी उदीरणा होगी। अमुक प्रदेशोंका संक्रमण होगा, अमुक समयमें अमुक प्रकृतिका उदय होगा, अमुक समयमें अमुक प्रकृतिका बंध होगा। कुछ कर्म ध्रुव उदयी हैं, कुछ कर्म अध्रुव उदयी हैं, कुछ कर्मोंका ध्रुवबंध होता है, कुछ कर्मोंका अध्रुव बंध होता है।

घादितिमिच्छकसाया भयतेजगुरुदुगणिमिणवण्णचओ।
सत्तेचालधुवाणं चदुधा सेसाणयं तु दुधा॥१२४॥
अवरो भिण्णमुहुत्तो तित्थाहाराण सव्वआऊणं।
समयो छावट्ठीणं बंधो तम्हा दुधा सेसा॥१२६॥
-गोम्मटसार कर्मकाण्ड

अर्थात् ४७ प्रकृतियोंका ध्रुव बंध होता है। शेष ७३ प्रकृतियोंमेंसे तीर्थंकर, आहारकद्विक, चार आयु इन सात प्रकृतियोंका जघन्य बंध काल अंतर्मुहूर्त है और ६६ प्रकृतियोंका एक समय है।

जयधवल पु० ९ पृ ४-६ के निम्न प्रकरणसे अपकर्षण आदि सम्बन्धी आपकी मान्यताका खण्डन हो रहा है-

सूत्र-पढमफड्ढयं ण ओकड्डिज्जदि। टीका-कुदो ? तत्थाइच्छावणा-णिक्खेवाणमदंसणादो।

अर्थ-प्रथम स्पर्धक अपकर्षित नहीं होता, क्योंकि वहाँ पर अतिस्थापना और निक्षेप नहीं देखे जाते।

सूत्र-विदियफड्ढयं ण ओकड्डिज्जदि। टीका-तत्थ वि अइच्छावणा-णिक्खेवाभावस्स समाणत्तादो।

अर्थ-द्वितीय स्पर्धक अपकर्षित नहीं होता, क्योंकि वहाँ पर भी अतिस्थापना और निक्षेपका अभाव पहलेके समान पाया जाता है।

सूत्र-एवमणंताणि फड्ढयाणि जहण्णिया अइच्छवणा, तत्तिययाणि फड्ढयाणिण ओकड्डिज्जंति।

अर्थ-इस प्रकार अनन्त स्पर्धक जो कि जघन्य अतिस्थापनाप्रमाण है उतने स्पर्धक अपकर्षित नहीं होते।

सूत्र-अण्णाणि अणंताणि फड्ढयाणि जहण्णणिक्खेवमेत्ताणि च ण ओकड्डिज्जंति। टीका-आदीदो प्पहुडि जहण्णाइच्छावणामेत्तफड्ढयाणमुवरिमफडुयं ताव ण ओकड्डिज्जदि, तस्साइच्छावणसंभवे णिक्खेवस्स विसायादंसणादो। किं कारणं? णिक्खेवविसयासंभवादो। एत्तो उवरि ओकड्डणाए पडिसेहो णत्थि त्ति पदुप्पायणट्ठमिदमाह-

अर्थ-जघन्य निक्षेप प्रमाण अन्य अनन्त स्पर्धक भी अपकर्षित नहीं होते। प्रारम्भसे लेकर जघन्य अतिस्थापना प्रमाण स्पर्धकोंसे आगेका स्पर्धक अपकर्षित नहीं होता, क्योंकि उसकी अतिस्थापना सम्भव होनेपर भी निक्षेपविषयक स्पर्धक नही देखे जाते। उससे अनन्तर उपरिम स्पर्धक भी अपकर्षित नहीं होता। इस प्रकार जघन्य निक्षेपप्रमाण अनन्त स्पर्धक अपकर्षित नहीं होता। इसका क्या कारण? क्योंकि निक्षेपविषयक स्पर्धकोंका अभाव है। अब इससे ऊपर अपकर्षणका निषेध नहीं है, इस बातका कथन करनेके लिये आगेका सूत्र कहते हैं-

सूत्र-जहण्णओ णिक्खेवो जहण्णिया अइच्छावणा च तेत्तियमेत्ताणि फड्ढयाणि आदीदो अधिच्छिदूण तदित्थफड्ढयमोकड्डिज्जइ। टीका-अइच्छावणणिक्खेवाणमेत्थ संपुण्णत्तदंसणादो।…

अर्थ-प्रारम्भसे लेकर जघन्य निक्षेप और जघन्य अतिस्थापना प्रमाण जितने स्पर्धक हैं उतने स्पर्धकोंको उल्लंघकर वहाँ जो स्पर्धक है वह अपकर्षित होता है, क्योंकि यहाँ पर अतिस्थापना और निक्षेप पूरे देखे जाते हैं।

सूत्र-तेण परं सव्वाणि फड्ढयाणि ओकड्डिज्जंति।

अर्थ-उससे आगे सब स्पर्धक अकर्षित हो सकते हैं।

ऊपरके प्रमाणसे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक स्पर्धकमें अपकर्षित होनेकी योग्यता है। किन्तु स्वगतयोग्यता होते हुये भी अतिस्थापना और निक्षेपके अथवा अकेले निक्षेपके अभावके कारण पहले अनन्ते स्पर्धकोंकी अपकर्षणरूपसे प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। अतः आपके इस सिद्धान्तका स्पष्टता खण्डन हो जाता है कि ‘उपादान ही नियामक है, जब उस योग्यताको लिये हुये उपादान होता है तो उसके अनुकूल अन्य सर्व कारण अवश्य मिल ही जाते हैं, ऐसा नहीं हो सकता कि उस योग्यताको लिये हुये उपादान हो किन्तु अन्य कारण न मिलें और कार्य होनेसे रुक जाय।’ क्योंकि यहाँ उपादानमें अपकर्षण होनेकी योग्यता विद्यमान है, किन्तु अभावरूप अन्य कारणके हेतुसे वह कार्यरूप प्रवृत्त नहीं हो सकता है, यदि योग्यता न होती तो आचार्य यही कहते कि इतने स्पर्धकोंमें योग्यता नहीं है। अतः वह अपकर्षित नहीं हो सकते हैं। किन्तु आचार्योंने अतिस्थापना और निक्षेपका अभाव इसका कारण बतलाया है, योग्यताका अभाव कारण नहीं बतलाया है।

इसी तरह आपके इस दूसरे नियमका भी खण्डन हो जाता है कि ‘वंधके समय जिस कर्ममें जिस समय जितने प्रमाणमें जिन भावोंको निमित्त करके अपकर्षण आदि होनेकी योग्यता पड़ गई है वह उस समय उतने ही प्रमाणमें उन्हीं भावोंको निमित्त करके अपकर्षण आदि रूप परिणमन करेगा ही।’ क्योंकि यहाँ आचार्य सब ही स्पर्धकोंमें समान योग्यता वतला रहे हैं। इसी कारण कहा है कि आगेके सब स्पर्धक अपकर्षित हो सकते हैं। यह नहीं कहा है कि सब स्पर्धक अपकर्षित होंगे ही, और वास्तवमें सर्व स्पर्धक अपकर्षित होते भी नहीं हैं, किन्तु यही कहा कि हो सकते हैं अर्थात् उनमें अपकर्षित होनेमें कोई वाधा नहीं है। आगे इसी पुस्तकके पत्र ९ पर कहा है कि अन्तिम स्पर्धकसे अनन्त स्पर्धक नीचे आकर जो स्पर्धक स्थित हैं उन सबका उत्कर्षण हो सकता है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि बीचके अनन्त स्पर्धक ऐसे भी हैं जिनके अपकर्षण तथा उत्कर्षण दोनों रूपसे प्रवृत्ति होनेकी योग्यता भी है और कोई वाधा ( निषेध ) भी नहीं है। जब दोनोंकी योग्यता है और दोनोंकी बाधाका अभाव है तो आपके नियमानुसार यह निश्चय ही नहीं हो सकता है कि अपकर्षण हो या उत्कर्षण हो। किन्तु सैद्धान्तिक दृष्टिसे इसका स्पष्ट निर्णय हो सकता है कि जब जैसा निमित मिलेगा तब वैसा परिणमन हो जायगा। इस प्रकार आपके दोनों नियम आगम विरुद्ध ही सिद्ध होते हैं।

उदीरणादिसम्बन्धी नियमोंके लिये आपने एक यह हेतु दिया हैं कि ‘उपरोक्त नियम वगैर उपशम, निधत्ति, निकाचितकरण नहीं वन सकते हैं, इनमें गड़वड़ी आ जायगी।’

यह बात सत्य है कि वंधके समय कुछ प्रदेशोंका उपशम, निधत्ति, निकाचितरूप वंध होना सम्भव है। किन्तु कारणकलाप पाकर यह उपशम, निधत्ति, निकाचितवंध टूट भी जाता है। जैसा कि धवल पु० ६ पृ० ४२७-२८ पर कहा है-

कधं जिणबिंबदंसणं पढमसम्मत्तुप्पत्तीए कारणं? जिणबिंबदंसणेण णिघत्तणिकाचिदस्स वि मिच्छत्तादिकम्मकलावस्स खयदंसणादो।

अर्थ-इस प्रकार है-

शंका-जिनबिम्बका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पतिका कारण किस प्रकार होता है ?

समाधान-जिनबिम्बके दर्शनसे निधत्त और निकाचितरूप भी मिथ्यात्वादि कर्मकलापका क्षय देखा जाता है, जिससे जिनबिम्बका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका कारण होता है।

उपशम, निधत्ति और निकाचितका स्वमुख ही उदय होता है ऐसा भी नियम नहीं है, क्योंकि उनकी स्थिति पूर्ण होने पर यदि उनके उदयके अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र, काल न हो, तो जाते जाते वे भी अपने रूपसे फल न देकर अन्य सजातीय प्रकृतिरूपसे फल देनेको बाध्य हो सकते हैं। इसी तथ्य को पं० फूलचन्दजी ने स्वयं तत्त्वार्थसूत्र पृ० १५७ (वर्णीग्रन्थमालासे प्रकाशित) पर स्वीकार किया है।

इस प्रकार उपशम, निधत्त और निकाचितरूप बंध प्रदेशोंके विषयमें भी कोई एकान्त नियम नहीं बन सकता, क्योंकि कारण कलापोंके मिलने पर निधत्त, निकाचितबंध टूट जाता है और उन कर्मप्रदेशोंका भी उत्कर्षण, अपकर्षण, उदीरणा, संक्रमण आदि होने लगता है।

जिन कर्मप्रदेशोंमें उपशम, निधत या निकाचित बंध नहीं होता है उनके लिये मात्र इतना ही नियम है कि वे कर्मप्रदेश अपने बंध-समयसे एक आवली तक अर्थात् बंधावली या अचलावली कालमें उदीदणा आदिके योग्य नहीं होते हैं। उसके पश्चात् अपकर्षण आदिके योग्य हो जाते हैं।

श्री जयधवल पु० ८ पृ० २५६ पर बंधावलीके पश्चात् अपकर्षण तथा उत्कर्षणका विधान कहा है। श्री धवल पु० १५ पृ० १०४ पर बंधावली पश्चात् कर्मोंकी उदीरणा कही है। श्री जयधवल पु० ६ पृ० २९९ पर बंधावलीके पश्चात् संक्रमण होना कहा है। इस प्रकार बंध कालसे एक आवली पश्चात् ही कर्मोंमें उदीरणा, अपकर्षण, उत्कर्षण, संक्रमण अदि होने लगते हैं। कालकृत नियम कोई नहीं रहता। अमुक घटी, मुहूर्त, दिवस आदिमें ही निश्चितरूपसे अपकर्षण आदि होंगे, अन्य घटी, मुहूर्त आदिमें नहीं होंगे अथवा इतने काल पश्चात् अपकर्षण आदि होंगे उससे पूर्व नहीं ऐसा कालकृत कोई नियम नहीं रहता।

अमुक समयमें अमुक कर्मका अपकर्षण, उत्कर्षण, संक्रमण अवश्य होगा यदि ऐसा कोई नियम होता तो बजाय बंधावलीमें अपकर्षणादिकी अयोग्यता बतलानेके यह ही कहा जाता कि बंधकालमें जिन कर्मप्रदेशोंमें जिस कालमें उदीरणा आदि होनेका नियम बन गया है, उन प्रदेशोंमें उसी कालमें अवश्य उदीरणा आदि होगी, उस कालसे पूर्व या पश्चात् वे कर्मप्रदेश उदीरणा आदिके अयोग्य हैं। किन्तु ऐसा किसी भी आगममें नहीं कहा है, धवल व जयधवल आदिमें तो बंधावलीका नियम दिया है। गोम्मटसार कर्मकाण्ड गाथा २७८ में भी यह कहा है कि जिस समय जिस प्रकृतिका उदय होता है उस समय उसको उदीरणा भी होती है, किन्तु कहीं पर कुछ अपवाद भी है।

श्री जयधवल पु० ८ पृ० २५६ पर बतलाया गया है कि बंधावलीके अनन्तर ही कोई जीव अपकर्षण द्वारा अवाधाकालमें भी निषेक रचना करके उसके अनन्तर समयमें उत्कर्षण कर सकता है।

इससे सिद्ध है कि बंधकालमें कर्मप्रदेशोंके उत्कर्षणादि सम्बन्धी कोई नियम नहीं बनता है, किन्तु बाह्य और अंतरंग निमित्तोंके अनुसार उत्कर्षण, अपकर्षण संक्रमण, उदीरणादि होते रहते हैं। उदीरणादिका कोई नियत काल नहीं है।

उद्वेलनाका उदाहरण देते हुए आपके द्वारा दूसरा हेतु यह दिया गया है कि ‘उदीरणादि किस क्रमसे होती है और कितने कालमें होती है, कर्मशास्त्रकी यह सब व्यवस्था बिगड़ जायेगी।’

यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि सम्यक्त्व प्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका उद्वेलना-संक्रमण मिथ्यात्व गुणस्थानमें होता है। मिथ्यात्व गुणस्थानमें सबसे जघन्य काल रहकर जिसने सम्यग्दर्शनको प्राप्त कर लिया है उसके उद्वेलना-संक्रमण नहीं होता है। यदि अधिक कालतक मिथ्यात्व गुणस्थानमें ठहर जाय और उद्वेलना-संक्रमण प्रारम्भ भी हो जाय, किन्तु सम्यग्दर्शन प्राप्त होनेपर उद्वेलना-संक्रमण रुक जाता है और मिथ्यात्व व मिश्र प्रकृतिके कर्मप्रदेशोंका सम्यक्त्व प्रकृतिरूप संक्रमण होने लगता है। सम्यग्दर्शन व मिथ्यात्वकी प्राप्तिका कोई नियत काल नहीं है, फिर उद्वेलना-संक्रमणका काल नियत कैसे हो सकता है।

मिथ्यात्व गुणस्थानमें मिथ्यात्व प्रकृतिकी उदीरणा होती है और क्षयोपशम सम्यक्त्व होनेपर मिथ्यात्व प्रकृतिकी उदीरणा रुक जाती है और सम्यक्त्व प्रकृतिकी उदीरणा होने लगती है। इस प्रकार सम्यक्त्व व मिथ्यात्व प्रकृतियोंकी उदीरणाका भी कोई नियत काल नहीं है।

गुणसंक्रमण व सर्वसंक्रमणका भी किसी जीवके लिये कालका कोई नियम नहीं है। जो अनादि मिथ्यादृष्टि जीव उपशम सम्यग्दर्शन उत्पन्न कर क्षयोपशम सम्यग्दर्शनके पश्चात् क्षायिक सम्यग्दृष्टि हो जाता है उसके सम्यक्त्व प्रकृतिका गुणसंक्रमण व सर्वसंक्रमण नहीं होता है।

उपशमश्रेणी अनिवृत्तिकरण गुणस्थानरर दो जीवोंने एक साथ आरोहण किया, अनिवृत्तिकरणमें एक कालवर्ती सब जीवोंके परिणाम समान होते हैं, अतः इन दोनों जीवोंके परिणाम भी समान चल रहे थे, किन्तु अनिवृत्तिकरणके अन्तिम समयमें एककी मृत्यु हो जाने पर चौथे गुणस्थानमें चला जाता है और दूसरा जीव सूक्ष्म-सांपराय दसवें गुणस्थानमें पहुँच जाता है इस प्रकार पूर्व क्षणवर्ती एक ही परिणामसे उत्तर क्षणमें दो प्रकारकी उत्तर पर्याय उत्पन्न हो जाती है।

जयधवल पुस्तक ६ धवल पु० ४ आदि सिद्धान्त ग्रन्थोंके आधारपर यह लिखा गया है। कर्मनिर्जरा सविपाक और अविपाकके भेदसे दो प्रकारकी है। सविपाक निर्जरा तो सभी संसारी जीवोंके होती है, किन्तु अविपाक निर्जरा प्रयत्नपूर्वक सम्यक् तपके द्वारा होती है।

सयमेव कम्मगलणं इच्छारहियाण होइ सत्ताणं।
सविपाकणिज्जरा सा अविपक्कउवायखवणादो ॥१५८॥
-नयचक्रसंग्रह पृ० ६३, माणिकचन्द ग्रंथमाला

अर्थात्-जीवोंके विना इच्छाके जो कर्म गलन होता है वह सविपाक निर्जरा है। उपायपूर्वक जो कर्मोंका क्षय होता है वह अविपाक निर्जरा है।

तपके लिये कोई काल नियत नहीं है, अतः अविपाक निर्जराके लिये भी कोई काल नियत नहीं है।

करणानुयोगसम्बन्धी विषयोंका विचार

इसके आगे जो हेतु दिये गये हैं उनका उपरोक्त दोनों नियम अथवा नियति अपर नाम क्रमबद्ध पर्यायके सिद्ध करनेसे कोई सम्बन्ध ही नहीं है अर्थात् प्रकृत विषयसे उनका कोई सम्बन्ध ही नहीं है। न मालूम वे यहाँ इस प्रकरणमें क्यों लिखे गये हैं? इनसे तो कुछ ऐसा सिद्ध करनेका आशय प्रतीत होता है कि सर्व कार्य मात्र उपादानसे ही होते हैं, निमित्त तो अकिंचित्कर है। यदि ऐसा है तो यह हेतु निमित्त सम्बन्धी प्रश्नके उत्तरमें लिखे जाने चाहिये थे। अप्रासंगिक होते हुये भी उनका स्पष्टीकरण किया जाता है।

हेतु नं० ३ व ४ :-एक ही परिणाम या योग निमित्तभूत होते हुये, भिन्न-भिन्न प्रकृतियोंमें भिन्न स्थिति, अनुभाग तथा प्रदेशबन्धका भेद कौन करता है। इस प्रकार प्रश्न करके छोड़ दिये गये हैं। ये किस प्रकार हेतु हैं, स्पष्ट नहीं किया गया है।

इन दोनों प्रश्नोंसे यह आशय प्रतीत होता है कि एक ही निमित्त कारण होनेसे एक ही कार्य होना चाहिये था, भिन्न-भिन्न नहीं। किन्तु ऐसा कोई नियम नहीं है कि एक कारणसे एक ही कार्य हो सकता है, भिन्न नहीं। एक ही कारणसे भिन्न भी कार्य हो सकते हैं। जैसे एक घड़ेपर एक लाठी मारी। लाठी लगने रूप एक ही कारण होने पर भी भिन्न-भिन्न आकारके तथा भिन्न-भिन्न प्रमाण ( पैमायश )के कपालोंका उपपाद हो जाता है। एक ही अग्निके निमित्तसे ईंधनके जलनेका, भात आदि पचने तथा प्रकाश होने रूप भिन्न कार्य होते हैं।

कज्जणाणत्तादो कारण-णाणत्तमणुमाणिज्जदि इदि एदमवि ण घडदे, एयादो मोग्गरादो बहुकोडिकवालोवलंभा ।-धवल पु० १ पृ० २१९।

अर्थ-इस प्रकार है-

शंका-अनेक प्रकारके कार्य होनेसे उनके साधनभूत अनेक प्रकारके कारणोंका अनुमान किया जाता है?

समाधान-यह कहना भी नहीं बनता है, क्योंकि एक मुद्गरसे अनेक प्रकारके कपालरूप कार्यकी उपलब्धि होती है।

दूसरी बात यह है कि अन्य सहकारी कारणोंसे भी जीवके एक ही परिणाम व योगसे भिन्न-भिन्न प्रकृतियोंमें स्थिति अनुभाग बंधमें भेद हो जाता है। इसके लिये आगम प्रमाण निम्न प्रकार है-

कधमेकसंकिलेसादो असंखेज्जलोगमेत्तअणुभागछट्ठाणाणं बंधो जुज्जदे ? ण एस दोसो, एक्कसंकिलेसादो असंखेज्जलोगमेत्तअणुभागबंधज्झवसाणट्ठाणसहकारिकारणाणं भेदेण सहकारिकारणमेत्तअणुभागट्ठाणाणं बंधाविरोहादो ।
-धवल पु० १२ पृ० ३८०

अर्थ इस प्रकार है-

शंका-संकलेशसे असंख्यात लोकप्रमाण अनुभागसम्बन्धी छह स्थानोंका बन्ध कैसे बन सकता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि एक संक्लेशसे असंख्यात लोकप्रमाण छह स्थानोंसे सहित अनुभागबन्धाध्यवसानोंके सहकारी कारणोंके भेदसे सहकारी कारणोंके बराबर अनुभागबंधस्थान होनेमें कोई विरोध नहीं आता।

णाणावरणीएण सह जदि सेसछकम्मेहि उक्कस्सट्ठिदी पबद्धा तो णाणवरणीएण सह सेसछकम्माणि वि ट्ठिदिं पडुच्च उक्कस्साणि चेव होंति। जदि पुण विसेसपच्चएहि सेसकम्माणि विगलाणि होंति तो णाणावरणट्ठिदीए उक्कस्सीए संतीए सेसकम्मट्ठिदी अणुक्कसा होदि।
-धवल पु० १२ पृ० ४५१

अर्थ-ज्ञानवरणीयके साथ यदि शेष छह कर्मोंकी उत्कृष्ट स्थिति बाँधी गई है तो ज्ञानवरणीयके साथ शेष छह कर्म भी स्थितिकी अपेक्षा उत्कृष्ट ही होते हैं। परन्तु यदि विशेष प्रत्ययोंसे शेष कर्म विकल होते हैं तो ज्ञानवरणीयकी स्थितिके उत्कृष्ट होनेपर भी शेष कर्मोंकी स्थिति अनुत्कृष्ट होती है।

तीसरी बात यह है कि कर्म-प्रकृति विशेषके कारण भी वन्धमें विभिन्नता हो जाती है।

हेतु नं० ५ भी प्रश्न रूपमें ही है। यह नहीं बतलाया कि उससे क्या सिद्ध करना अभिप्रेत है ? प्रश्न हैः-‘किस समयमें विस्रसोपचयमेंसे किन कर्मवर्गणाओंका कितने परिमाणमें बंध होगा, यह भेद भी कौन करता है ? आत्मा तो मात्र परिणाम करता है, परन्तु उस समय वन्ध योग्य कर्मवर्गणाओंका ही वन्ध होता है, अन्यका नहीं, ऐसा फर्क क्यों पड़ता है ?’

यह कहना कि विस्रसोपचयमेंसे कुछ कर्मवर्गणायें वन्ध योग्य होती हैं तथा कुछ नहीं-युक्त नहीं है। क्योंकि कर्मवर्गणाका लक्षण ही यह है कि वह द्रव्य कर्मरूप परिणमन करनेके योग्य है। द्रव्यकर्मरूप परिणमन करनेका नाम ही वन्ध है। जैसे ऊपर कह आये हैं श्री वीरसेन स्वामीने श्री धवल पु. १२ पृ० २७६-७७ पर यह ही उत्तर दिया कि कर्मस्कन्धोंमें समान शक्ति होते हुए भी, जीवमें इतनी शक्ति नहीं है जो सर्वकर्मवर्गणाओंको एक समयमें कर्मरूप परिणमा सके। यह उत्तर नहीं दिया कि जिन कर्मवर्गणाओंमें योग्यता है वही कर्मरूप परिणमती हैं, शेष योग्यता नहीं होनेके कारण नहीं परिणमती हैं। प्रत्युत सबमें समान शक्ति ( योग्यता ) मानी गई है।

श्री धवल पु० १२ पृ० २७६-२७७ पर दिये गये निम्न शंका-समाधानसे विषय स्पष्ट हो जाता है-

पाणादिवादो जदि णाणावरणीयबंधस्स पच्चओ होज्ज तो तिहुवणे ठिदकम्मइयखंधा णाणावरणीयपच्चएण अक्कमेण किण्ण परिणमंते, कम्मजोगत्तं पडि विसेसाभावादो ? ण, तिहुवणब्भंतर कम्मइखंधेहि देसविसयपच्चासत्तीए अभावादो।

अर्थ-शंका यदि प्राणातिपात ज्ञानावरणीयके बन्धका कारण हैं, तो तीनों लोकोंमें स्थित कार्मणस्कन्ध ज्ञानावरणीय पर्याय स्वरूपसे एक साथ क्यों नहीं परिणत होते हैं ? क्योंकि उनमें कर्मयोग्यताकी अपेक्षा समानता है ?

समाधान-नहीं क्योंकि, तीनों लोकोंके भीतर स्थित कार्मणस्कन्धोंमें देशविषयक प्रत्यासत्तिका अभाव है ।

नोट-यह बात ध्यान देने योग्य है कि सर्व कार्मणस्कन्धोंमें कर्मयोग्यताकी अपेक्षा समानता कही गई है । समाधानमें इसको अस्वीकार नहीं किया गया, क्योंकि यह उत्तर नहीं दिया गया है कि जिनमें योग्यता है वही बँध गई और शेष नहीं बँधी है ।

जदि एयक्खेत्तोगाढा कम्मइयखंधा पाणादिवादादो कम्मपज्जाएण परिणमंति तो सव्वलोगगयजीवाणं पाणादिवादपच्चएण सव्वे कम्मइयखंधा अक्कमेण णाणावरणीयपज्जाएण परिणदा होंति । ण च एवं, विदियादिसमएसु कम्मइयखंधाभावेण सव्वजीवाणं णाणावरणीयबंधस्स अभावप्पसंगादो । ण च एवं, सव्वजीवाणं णिव्वाणगमणप्पसंगादो ? एत्थ परिहारो वुच्चदे-पच्चासत्तीए एगोमाहणविसयाए संतीए वि ण सव्वे कम्मइयक्खंधा णाणावरणीयसरूवेण एगसमएण परिणमंति, पत्तं दज्झं दहमाणदहणम्मि व जीवम्मि तहाविहसत्तीए अभावादो ।

अर्थ-शंका-यदि एक क्षेत्रावगाहरूप हुये कार्मणस्कंध प्राणातिपातके निमित्तसे कर्म पर्यायरूप परिणमते हैं तो समस्त लोकमें स्थित जीवोंके प्राणातिपात प्रत्ययके द्वारा सभी कार्मण स्कन्ध एक साथ ज्ञानावरणीय रूप पर्यायसे परिणत हो जाने चाहिये । परन्तु ऐसा हो नहीं सकता, क्योंकि वैसा होनेपर द्वितीयादि-समयोंमें कार्मणस्कन्धोंका अभाव हो जानेसे सब जीवोंके ज्ञानावरणीयका बन्ध न हो सकनेका प्रसंग आता है । किन्तु ऐसा सम्भव नहीं है, क्योंकि इस प्रकारसे समस्त जीवोंके मुक्तिका प्रसंग अनिवार्य है ।

समाधान-उपर्युक्त शंकाका परिहार किया जाता है-एक अवगाहनाविषयक प्रत्यासत्तिके होनेपर भी कार्मण स्कंध एक समयमें ज्ञानावरणीय स्वरूपसे नहीं परिणमते हैं, क्योंकि प्राप्त ईन्धन आदि दाह्य वस्तुको जलानेवाली अग्निके समान जीवोंमें उस प्रकारकी शक्ति नहीं है ।

जीवमें एक समयमें अभव्योंसे अनन्तगुणे तथा सिद्धोंसे अनन्तवें भागप्रमाण परमाणु बाँधनेको शक्ति है । उसमें योगके निमित्तसे यह भेद आता है कि कितने परिमाणमें कर्मवर्गणायें किसी एक समयमें बँधेंगी, जिस समय जिन वर्गणाओंसे निमित-नैमित्तिक सम्बन्ध होता है; उस समय वही वर्गणायें बँध जाती हैं । जैसे आहार वर्गणा, वचनवर्गणा एवं मनोवर्गणा तीनों वर्गणायें प्रत्येक समयमें आती हैं, किन्तु जीवके प्रदेशोंके परिस्पन्दका जिस समय इन तीनोंमेंसे जिस वर्गणासे निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध हो जाता है उस समय वह ही योग कहलाता है ।

उपरोक्त करणानुयोगका सर्व विषय छद्मस्थके ज्ञानगम्य नहीं है । इसका आधार मात्र आगम प्रमाण है जो युक्तियों व तर्कका विषय नहीं है । श्री धवल पु० १४ पृ. १५१ पर कहा है कि आगम तर्कका विषय नहीं है तथा पृ० ३५६ पर लिखा है कि युक्तिके द्वारा सूत्र बाधित नहीं किया जा सकता है । जो प्रश्न यहाँ उठाये गये हैं उन सबका समाधान श्री धवल, जयधवल आदि कर्म-ग्रन्थोंमें उपस्थित है । निमित्त कारणकी मुख्यतासे ही यह सर्व व्यवस्था, विशेषता या भेद बतलाये हैं । आश्चर्य इस बातका है कि फिर भी उन्हीं ग्रन्थोंके टीकाकार ही उक्त प्रश्नोंको उठाकर उन प्रमाणोंके विरुद्ध यह सिद्ध करना चाहते हैं कि यह सब व्यवस्था, विशेपता या भेद एकान्ततः मात्र उपादानकी योग्यताके कारण ही होते हैं। इस एकान्त मिथ्यावाद-को सिद्ध करनेके लिये यह भी मान लिया गया है कि ऐसी भी कर्मवर्गणायें है जो बंध योग्य नहीं है अर्थात् द्रव्य कर्म रूप परिणमन करनें योग्य नहीं है। जो किसी भी प्रकार आगम सम्मत नहीं हो सकता है । ०

छठेका उत्तर आगे दिया गया है।

आगे आपने लिखा है कि ‘निमित्तकी निमित्तता कार्यके समयमें मानी गयी है।’ इतना लिखनेके बाद आपने उपादानके कार्यरूप परिणत होते समय निमित्तमें होनेवाले व्यापारके विषयमें तीन आपत्तियाँ उपस्थित की हैं। वे निम्न प्रकार हैं.-

पहली आपत्ति आपने यह उपस्थित की है कि ‘उपादानके कार्यरूप परिणत होते समय निमित्तका व्यापार यदि उसकी अपनी परिणतिके लिये होता है तो फिर उसने उक्त उपादानकी कार्य परिणतिमें क्या किया ?’

दूसरी आपत्ति आपने यह उपस्थित की है कि ‘उपादानके कार्यरूप परिणत होते समय निमित्तका व्यापार यदि उपादानकी परिणतिके लिये होता है तो फिर उपादानमें उपादानके व्यापारकी तरह निमित्तका भी व्यापार दिखना चाहिये, साथ ही निमित्तका व्यापार निमित्तमें नहीं दिखना चाहिये।’

तीसरी आपत्ति आपने यह उपस्थित की है कि ‘उपादानकी कार्यरूप परिणति होते समय निमित्तका व्यापार यदि उसकी अपनी परिणति तथा उपादानकी परिणति दोनोंके लिये होता है तो फिर इस तरह निमित्तमें एक साथ दो तरहके व्यापार मानना अनिवार्य हो जायगा जो कि जिनागमके विरुद्ध है।’

इन आपत्तियोंका निराकरण आपने जो किया है वह निम्न प्रकार है :-

‘अतएव ऐसा मानना ही उचित है कि उपादानके कार्यके प्रति दूसरे एक या एकसे अधिक जिन द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें निमित्त-व्यवहार होता है वे सब कार्य तो अपना-अपना ही करते हैं। कोई किसी का कार्य नहीं करता, परन्तु उन सब द्रव्योंके उस उस कालमें उस उसरूप परिणमनकी द्रव्य-पर्यायात्मक उपादान योग्यता सहज ही होती है और उनका वैसा ही परिणमन भी होता है, मात्र इन दोनोंकी इस बाह्य व्याप्तिको देखकर ही उनमें निमित्तनैमित्तिकसम्बन्ध स्वीकार किया गया है ऐसा मानना आगमानुकूल है।’

इस विषयमें आगमकी दृष्टि यह है कि उपादानकी कार्यके साथ एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणता होती है अर्थात् उपादान ही कार्यरूप परिणत हुआ करता है। लेकिन जिसे लोकमें या आगममें निमित्त कहा गया है वह यद्यपि उस उपादानभूत अन्य वस्तुके कार्यरूप परिणत नहीं होता, फिर भी जब तक निमित्त अपना तदनुकूल व्यापार नहीं करता है तब तक उस उपादानकी वह विवक्षित कार्यरूप परिणति नहीं होती है ऐसा लोकमें देखा भी जाता है और आगममें प्रतिपादित भी किया गया है, अतः इस प्रकार अन्वयव्यतिरिकके आधार पर उस उपादानभूत वस्तुकी कार्यपरिणतिके साथ उस निमित्तभूत वस्तुकी कालप्रत्यासत्तिरूप कारणता सिद्ध हो जाती है। अर्थात् जिस क्षणमें निमित्तका उपादानभूत वस्तुकी कार्य-परिणतिके अनुकूल व्यापार होता है उस क्षणमें ही उपादान विवक्षित कार्यरूप परिणत होता है और उस निमित्तभूत वस्तुका उस उपादानभूत वस्तुके विवक्षित कार्यके अनुकूल जब तक व्यापार नहीं होता है या व्यापार बीच ही में रुक जाता है तो उसकी विवच्चित कार्यरूप परिणति या तो होती नहीं, अथवा या फिर बीचमें बन्द हो जाती है।

काल प्रत्यासत्तिका अर्थ यह है कि जिस कालमें निमित्त अपना व्यापार करता है उसी कालमें उपादान अपने कार्यरूप परिणत होता है और निमित्तकी उस कार्यके साथ अन्वय-व्यतिरेकव्याप्ति इस तरह सिद्ध होती है कि निमित्तका कार्योत्पत्तिके अनुकूल व्यापार होने पर ही कार्य होता है तथा निमित्तका कार्योत्पत्तिके अनुकूल व्यापार न होने पर कार्य नहीं होता है। इसी तरह निमित्तकी कार्योत्पत्तिके साथ बहिर्व्याप्ति पायी जाती है-इसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि निमित्तके कार्योत्पत्तिके अनुकूल व्यापार होने पर ही कार्योत्पत्ति होती है, परन्तु निमित्त स्वयं कार्यरूप परिणत नहीं होता है अथवा निमित्तके गुण-धर्म कार्यमें नहीं प्रविष्ट होते हैं।

इसमें संदेह नहीं कि निमित्तका कार्योत्पत्तिके अनुकूल जो भी व्यापार होता है उसके अतिरिक्त कोई अन्य व्यापार उसके साथ उस समय निमित्तका नहीं होता है अर्थात् एक समयमें एक ही व्यापार उसका होता है, परन्तु वही एक व्यापार स्वयं अपनेमें होनेवाले परिणमनका उपादान होता है और अन्य वस्तुके उसके साथ प्रतिनियत परिणमनमें वही निमित्त (सहायक) होता है। इस तरह निमित्तमें अपना और परका कार्य करनेके लिये दो व्यापार एक साथ होते हैं ऐसी मान्यता हमारी नहीं है। हमारी मान्यता तो यह है कि वही एक व्यापार अपने कार्यका उपादान होता है और परके कार्यका वही निमित्त होता है। इसी तरह कार्य एक होकर भी अपने उपादान कारणकी अपेक्षा उपादेय होता है और अपने निमित्त कारणकी अपेक्षा वही नैमित्तिक भी होता है। इस विवेचनसे यह बात स्पष्ट है कि आपने जो तीन आपत्तियाँ निमित्तोंको कार्यमें प्रयोजनभूत ( सार्थक या उपयोगी ) माननेमें उपस्थित की हैं वे नहीं आती हैं। जिनागममें यही तत्त्व प्रतिफलित किया गया है। हमारा विश्वास है कि आपका वह भय इस स्पष्टीकरणसे दूर हो जायगा जिसके कारण आप निमित्तोंको अकिंचित्कर माननेके लिये तैयार हुए हैं।

आपने लिखा है कि सब द्रव्योंके उस कालमें उस उस रूप परिणमनेकी द्रव्यपर्यायात्मक उपादान योग्यता सहज ही होती है आदि’

आपके ऐसा लिखनेसे ऐसा मालूम पड़ता है कि सभी प्रकारके निमित्तोंको आप एक ही आसन पर विठला देना चाहते है, लेकिन हम कहते हैं कि आप इस तरह प्रत्यक्ष, तर्क और आगमका अपलाप कर रहे हैं, क्योंकि आगममें प्रेरक और उदासीन दो प्रकारके निमित्त बतलाये गये हैं। जो वस्तुको उसकी अपनी कार्यपरिणतिमें प्रेरणा दें वे प्रेरक निमित्त कहलाते हैं। जैसे स्वर्णका आभूषण बननेमें स्वर्णकार और हथोड़ी आदि प्रेरक निमित्त कहे जाते हैं तथा जो वस्तुको उसकी अपनी कार्य परिणतिमें प्रेरणा न देते हुए भी निमित्त हों वे उदासीन निमित्त कहलाते हैं। जैसे आकाश, धर्म, अधर्म और काल ये तो सामान्य उदासीन निमित्त हैं तथा जल मछलीके लिए विशेष उदासीन निमित्त है, रेलकी पटरी रेलगाड़ीके लिए विशेष उदासीन निमित्त है, छाया पथिकके लिए विशेष उदासीन निमित्त है-आदि। रेलगाड़ीके गमनमें ऐंजन व ड्राइवर भी प्रेरक निमित्त ही होते हैं।

आगे आपने लिखा है-‘शब्द विवक्षित वाक्योंका रूप लेकर सीमित अर्थका ही प्रतिपादन करते हैं आदि।’ और फिर इसके अन्तमें आपने लिखा है कि ‘प्रकृतमें ३२१-३२२ गाथायें निश्चय नयकी मुख्यतासे लिखी गयी हैं। वह इसीसे स्पष्ट है कि उससे अगली गाथासे ‘एवं जो णिच्छयदो’ यह पाठ दिया गया है, हम इस गाथामें पठित ‘णिच्छयदो’ पदको गौण कर दें और उनका अपने विकल्पके अनुसार अर्थ करें यह उचित नहीं है।’

इसपर हमारा कहना यह है कि अर्थ करनेकी यह पद्धति है कि जहाँपर निश्चय नयकी मुख्यतासे कथन हो वहाँपर व्यवहार नयका कथन उसके प्रतिपक्षीपनेके रूपमें स्वीकार होता है। लेकिन आपके कथनानुसार यदि यह निश्चयनयका कथन है तो भी आपको इसका प्रतिपक्षी व्यवहार नयका कथन तो स्वीकार करना ही चाहिये, परन्तु जब आप व्यवहार नयके विषयको उपचरित, कल्पनारोपित, सद्भूत, मिथ्या आदि रूप मानते हैं तो फिर कैसे माना जाय कि आप व्यवहार नयके कथनको भी स्वीकार करते हैं।

हम कई जगह कह चुके हैं कि निश्चय और व्यवहार ये दोनों वस्तुमें विद्यमान सदात्मक अंश या धर्म ही हैं, उपचरित, कल्पित या असदात्मक नहीं हैं। इनमेंसे व्यवहार धर्मसापेक्ष निश्चय धर्मका प्रतिपादक शब्द और ज्ञापक ज्ञान निश्चय नय है और निश्चय धर्मसापेक्ष व्यवहार धर्मका प्रतिपादक शब्द और ज्ञापक ज्ञान व्यवहारनय है।

इस तरह आप वस्तुके वास्तविक वस्त्वंशरूप व्यवहाररूप धर्मको और उसके प्रतिपादक व ज्ञापक वास्तविक व्यवहार नयोंको स्वीकार तो कर लीजिए ताकि यह समझमें आ जाय कि आप निश्चय धर्म और निश्चय नयके साथ-साथ व्यवहार धर्म और व्यवहार नयको भी वास्तविक स्वीकार करते हैं। तभी तो निश्चय नयमें अंशरूप नयात्मकता और उसमें व्यवहारनय सापेक्षता सिद्ध होगी, अन्यथा उसमें नयात्मकता तो आनेसे रही और उसमें प्रमाणात्मकता इसलिए नहीं आ सकती है कि वस्तु निश्चय मात्र ही नहीं है, क्योंकि वह व्यवहारात्मक भी है, अतः आपकी मान्यता प्रमाणाभासमें ही गर्भित हो जायगी।

एक बात और है आप स्वामिकार्तिकेयानुपेक्षा की ३२१ व ३२२ वीं गाथाओंसे प्रतिपादित विषयको निश्चय नयका विषय मानते हैं, क्योंकि आप कहते हैं कि ३२३ वीं गाथामें ‘णिच्छयदो’ पदका पाठ है, लेकिन यह ख्याल कीजिए कि यह ‘णिच्छयदो’ पद निश्चय नयका वाचक नहीं है, किन्तु असंशयित भाव या आस्तिक्यभाव, अथवा ज्ञानकी निर्णयात्मक स्थितिका ही बोधक है। इस पर आपको विचार करना चाहिये।

आगे आपने अपने अभीष्ट अर्थको संपुष्ट करनेके लिये पद्म-पुराणका ‘यत्प्राप्तव्यं’ इत्यादि पद्य, पं० भैया भगवतीदासजीका ‘जो जो देखी वीतराग ने’ इत्यादि पद्य और स्वयंभूस्तोत्रका ‘अलंध्यशक्तिः’ इत्यादि पद्य इन सबका उद्धरण दिया है। चूँकि इनके विषयमें पहले हम विस्तारसे प्रकाश डाल चुके हैं, अतः यहाँ इनके विषयमें कुछ नहीं लिखा जा रहा है। इतना ध्यान अवश्य ही आपको दिला देना चाहते हैं कि ‘अलंध्यशक्तिः’ पदसे भवितव्यताको अटल शक्ति (जिसकी शक्तिको कभी टाला नहीं जा सकता है) मानकर आप उससे जो अपनी अभिलषित पुष्टि करना चाहते हैं वह इस तरह हो नहीं सकती है। कारण ‘अलंध्यशक्तिः’ पदका शक्तिको लाँघकर यानी शक्तिका अतिक्रमण करके-ऐसा अर्थ करके स्वामी समन्तभद्र उस पद्यसे इतना ही भाव प्रदर्शित करना चाहते हैं कि प्राणी अशक्त है, असमर्थ है, इसलिये वह कोई कार्य भवितव्यता (होनहार) की शक्तिका अतिक्रमण करके कदापि नहीं कर सकता है। ‘अलंध्यशक्तिः’ पदका अटलशक्ति अर्थ जैन संस्कृतिकी मान्यताके बिलकुल विपरीत है, इसलिये स्वामी समन्तभद्र जैसे तार्किक-शिरोमणि द्वारा जैन संस्कृतिके विरुद्ध भी कथन किया जा सकता है यह असंभव बात है।

आगे आपने लिखा है कि-पूर्वबद्ध आयुकर्ममें जितना स्थितिबन्ध होता है उसमें भोगकालमें उत्कर्षण तो संभव नहीं, निषेक स्थिति अपकर्षण हो सकता है। इस नियमको ध्यानमें रखकर जिन जीवोंमें यह निषेक स्थिति आकर्षण नहीं होता उन जीवोंका वह आयु कर्म इस नियमका अपवाद है-यह दिखलानेके लिये तत्त्वार्थसूत्रके अध्याय २. सूत्र ५३ में नियम वचन आया है। उस परसे बहुतसे बन्धु यह फलित करते हैं कि यह व्यवहार कथन न होकर निश्चय कथन हैं आदि ।’

आपके इस कथनसे हमें ऐसा मालूम पड़ता है कि आप कालमरण और जिसे अकलंक आदि आचार्यों के प्रमाणोंके आधारपर हम अकालमरण कहते हैं उसे भी निश्चय नयका विषय मानते हैं और इसके आधार पर आप हमारे ऊपर आक्षेप करते हैं कि ‘तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ सूत्र ५३ में जो नियम वचन आया है इस परसे बहुतसे बन्धु यह फलित करते हैं कि यह व्यवहार कथन न होकर निश्चय कथन है।’

वास्तवमें कालमरण और अकालमरणका जितना भी कथन आगममें पाया जाता हैं वह सब व्यवहार कथन ही है, क्योंकि निश्चय नयसे आत्मा अपने आपमें अमर ही है। हमें आश्चर्य होता है कि आप कालमरणको और अकालमरणको भी कालमरणकी ही संज्ञा देकर इसे भी निश्चय नयका ही विषय मानते हैं और फिर अपनी मान्यताकी पुष्टिके लिये यह कहते हैं कि तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ के ५३ वें सूत्रका कथन तथा अकलंकदेव आदि आचार्योंका इस विषयसम्बन्धी कथन व्यवहारनयका कथन है।

आपके इस विवेचनसे हम यह समझे हैं कि आप उसे निश्चयनयका कथन मानते है जिसका वाच्य या ज्ञेय सत्यार्थ हो और उसे व्यवहार नयका कथन मानते हैं जिसका वाच्य या ज्ञेय सत्यार्थ न हो। परन्तु निश्चय नय और व्यवहार नयकी ये परिभाषायें आगमकी परिभाषायें नहीं हैं। आगमकी परिभाषामें तो ये हैं कि जिस कथन या ज्ञानका विषय वस्तुका निश्चयांश या निश्चयरूप धर्म होता है वह तो निश्चय नय कहलाता है और जिस कथन या ज्ञानका विषय वस्तुका व्यवहारांश या व्यवहार रूप धर्म होता है वह व्यवहार नय कहलाता है।

तात्पर्य यह है और जैसा कि इस तत्त्वचर्चाके प्रसंगमें कई स्थानोंपर आपको देखनेके लिये मिलेगा कि प्रत्येक वस्तुमें परस्पर विरोधी दो अंश या धर्म-युगलके रूपमें अनन्त अंश या धर्मयुगल पाये जाते हैं। इनमेंसे प्रश्न नं० १७ के तृतीय दौरके हमारे प्रपत्रमें कतिपय वैसे अंश या धर्मयुगलोंका कथन आपको देखनेके लिये मिलेगा। प्रत्येक वस्तुके इन अंश या धर्म-युगलोंमेंसे प्रत्येक अंश या धर्म-युगलका एक भाग निश्चय रूप अंश या धर्मका है और दूसरा भाग व्यवहार रूप अंश या धर्मका है। इस तरह वस्तु परस्पर विरोधी दो अंशों या धर्मोंका समुदाय या आधार सिद्ध होती है। जैसे वस्तु सद्रूप है और असद्रूप भी है, वस्तु नित्यरूप है और अनित्यरूप भी है, वस्तु अभेदरूप है और भेदरूप भी है, वस्तु एकरूप है और अनेकरूप भी है, वस्तु तद्रूप है और अतद्रूप भी है, वस्तु द्रव्यरूप है और पर्यायरूप भी है, वस्तु गुणरूप है और पर्यायरूप भी है, वस्तु कार्यरूप है और कारणरूप भी है, वस्तु उपादानरूप है और निमित्तरूप भी है इत्यादि परस्परविरोधी वस्तुके दो अंश या धर्मोंको पकड़कर उनके युगल बनाते जाइये तथा इन अंश या धर्म-युगलोंमेंसे प्रत्येक अंश या धर्मयुगलके पूर्व पूर्वके भागको शब्दरूप निश्चय नयका प्रतिपाद्य और ज्ञानरूप निश्चय नयका ज्ञाप्य तथा उन्हीं अंश या धर्म-युगलोंमेंसे प्रत्येक अंश या धर्म-युगलके उत्तरके भागको शब्दरूप व्यवहार नयका प्रतिपाद्य औरज्ञानरूप व्यवहार नयका ज्ञाप्य समझते जाईये ।

इस विवेचनसे यह सिद्ध होता है कि निश्चय नयकी तरह व्यवहार नयका भी वाच्य या ज्ञेय वस्तुमें अपने अपने रूपमें विद्यमान अंश या धर्म ही होता है। ऐसी स्थितिमें यह कैसे कह सकते हैं कि निश्चय नय उसे कहते हैं जिसका वाच्य या ज्ञेय सत्यार्थ हो और व्यवहार नय उसे कहते हैं जिसका वाच्य या ज्ञेय सत्यार्थ न हो।

जहाँ तक हम आपकी दृष्टिको समझ सके हैं-यह है कि आपने जो निश्चय नय और व्यवहार नयकी परिभाषायें निश्चित की हैं उनके आधारपर ही आप व्यवहार नयको असत्यार्थ, असद्भुत, अवास्तविक, उपचरित, आरोपित, कल्पित, मिथ्या आदि रूप मान लेते हैं, क्योंकि आपकी दृष्टिसे व्यवहार नयका प्रतिपाद्य या ज्ञाप्य कोई विषय सत्यार्थ नहीं रहता है और इससे विपरीत निश्चय नयको सत्यार्थ, सद्भूत, वास्तविक, अनुपचरित, अनारोपित, अकल्पित, सत्य आदि रूप मान लेते हैं, क्योंकि आपकी दृष्टिसे निश्चय नयका प्रतिपाद्य या ज्ञाप्य विषय सत्यार्थ रहता है। परन्तु हम आपसे पूछ सकते हैं कि यदि द्रव्य वास्तविक है तो क्या पर्याय वास्तविक नहीं है। ध्रौव्य वास्तविक है तो क्या उत्पाद और व्यय वास्तविक नहीं हैं? गुण वास्तविक है तो क्या उसकी पर्याय वास्तविक नहीं है, नित्यता वास्तविक है तो क्या अनित्यता वास्तविक नहीं है, इत्यादि। तात्पर्य यह है कि ये सभी वास्तविक हैं, लेकिन एक निश्चयरूप है और दूसरा व्यवहार रूप। चूँकि दोनों ही अंश या धर्म एक ही वस्तुके अंश या धर्म जैन संस्कृतिमें माने गये हैं, इसलिये प्रत्येक वस्तुको वहाँ पर (जैन संस्कृतिमें) अनेकान्तात्मक माना गया है।

अब प्रश्न उठता है कि जब उक्त प्रकारके एक-एक अंश या धर्म युगलमें विद्यमान दोनों अंश या धर्म वास्तविक होते हुए परस्पर विरोधी हैं तो एक वस्तुमें उनका रहना कैसे संभव है? तो इसका उत्तर जैन संस्कृतिमें स्याद्वादके सिद्धान्तको अपनाकर दिया गया है अर्थात् प्रत्येक वस्तुमें परस्पर विरोधी दोनों वास्तविक अंशों या धर्मोंकी स्थितिकी भिन्न-भिन्न अपेक्षायें है। यानी यद्यपि दोनों धर्म परस्पर विरोधी हैं फिर भी इस आधारपर वे एक ही वस्तुमें एक साथ रहते हैं कि उनके रहनेमें अपेक्षा भेद पाया जाता है अर्थात् जिस अपेक्षासे वस्तु नित्य है उस अपेक्षासे वस्तु अनित्य नहीं है, किन्तु द्रव्यरूपमें वस्तु नित्य है तो पर्यायरूपमें वही वस्तु अनित्य है। अब यदि द्रव्य भी वास्तविक है और उसकी पर्याय भी वास्तविक है तो फिर वस्तुमें पायी जानेवाली नित्यताकी तरह उसमें पायी जानेवाली अनित्यता भी वास्तविक ही सिद्ध होती है-उपचरित, कल्पित, आरोपित, मिथ्या, असद्भूत आदि रूपमें उसे नहीं माना जा सकता है। इसी प्रकारकी व्यवस्था उपादान और निमित्त कारणोंके विषयमें भी जानना चाहिये अर्थात् उपादान कार्यका निश्चय कारण है याने कार्यका आश्रय वही है और निमित्त व्यवहार कारण है याने उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें उपादानका वह सहायकमात्र है, आश्रय कारण नहीं है। क्योंकि जब एक वस्तुके गुण-धर्म दूसरी वस्तुमें प्रविष्ट नहीं होते तो वह आश्रय कारण कैसे हो सकता है? लेकिन यदि निमित्त कार्यका आश्रय नहीं है तो इसका अर्थ यह भी नहीं कि वह कार्यमें उपादानका सहयोगी या सहायक भी नहीं है, क्योंकि कार्यरूप परिणतिमें उपादानको उसकी ( निमित्तकी ) सहायता तो अपेक्षित रहती ही है यह बात अनुभव सिद्ध है, प्रत्यक्ष सिद्ध है, अनुमान सिद्ध है और आगमप्रसिद्ध भी है। अब आप ही बतलाइये कि इस स्थितिमें निमित्तको अकिंचित्कर कैसे कहा जा सकता है? इस तरह वस्तु अपने कार्यकी उपादान होते हुए भी अन्य वस्तुके कार्यकी निमित भी अन्वयव्यतिरेकके आधारपर हुआ करती है; परन्तु यहाँ पर यह बात ध्यानमें रखनेकी है कि वह वस्तु अपने जिस व्यापारसे अपने कार्यकी उपादान है उसी व्यापारसे अन्य वस्तुके कार्यकी वह निमित्त ( सहायक ) है। इसलिये वस्तुमें द्विक्रियाओंके एक साथ रहनेकी जो आपत्ति दी जाती है वह नहीं जाती है।

हमारी आपसे प्रार्थना है कि उपर्युक्त तथ्यको पहिचानिये और अब आगमका सही अर्थ करने लग जाइये। इससे न केवल हमारा आपका विवाद समाप्त हो जायगा बल्कि हम और आप मिलकर भोले संसारी प्राणियोंको ऐसा प्रकाश-पुंज दे सकेंगे जिससे उनका कल्याणमार्ग प्रशस्त होगा।

आगे आपने लिखा है कि ‘यह तो आगमके अभ्यासी भलीभाँति जानते हैं कि मृत्युको प्राप्त हुआ जीव प्रथम, द्वितीय और तृतीय समयमें तथा अधिक-से-अधिक चौथे समयमें उत्तरभवको अवश्य धारण कर लेता है’ आदि ।

इस विषयमें हमारा कहना है कि आगमाभ्यासी व्यक्ति तो यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि बद्धायुष्क जीवका अकाल मरण नहीं होता, क्योंकि उसका आबाधा काल निश्चित हो चुका है ।

परभविआउए बद्धे पच्छा भुंजमाणाउस्स कदलीघादो णत्थि ।
-धवल पु० १० पृ० २३७

अर्थ-परभवसंबंधी आयुके बँधनेके पश्चात् भुज्यमान आयुका कदलीघात नहीं होता ।

तथा च जैसे नियत समयपर मरनेवाला. अवद्धायुष्क जीव मरणसे अन्तर्मुहूर्त पहले आगामी आयुका बन्ध करता है और तदनुसार वह १-२-३-४ समयमें आयुके उदयानुसार यथास्थानमें जन्म ग्रहण कर लेता है उसी प्रकार अकाल मरण यानी उदीरणा मरण करनेवाला जीव भी उदीरणाके पश्चात् मरनेसे अन्तर्मुहूर्त पहले आगामी आयुका बन्ध करके उसके अनुसार वह भी १-२-३-४ समयमें आयुके उदयानुसार यथास्थान जन्म ग्रहण किया करता है । यह आगमानुसार जमी हुई व्यवस्था है ।

आपने आगे इसमें लिखा है कि ‘अकालमरण स्वीकार करनेसे अकालजन्म भी स्वीकार करना होगा ।’ सो आपकी यह बात भी गलत है, कारण कि आगममें अकालमरण तो बतलाया गया है, परन्तु अकाल जन्मका विवेचन कहीं पर भी आगममें नहीं पाया जाता है । इसका कारण भी यह है कि भुज्यमान आयुकी उदीरणा हो सकती है, अतः आगममें अकाल मरणका कथन किया गया है, परन्तु बंध हुए बिना मरण होता नहीं और पूर्वबद्ध आयुके अनुसार ही जन्म होता है, अतः अकाल जन्मका प्रश्न ही पैदा नहीं होता और यही कारण है कि आगममें अकाल जन्मका कथन नहीं किया गया है ।

आगे यह भी आपने लिखा है कि ‘आनुपूर्वी कर्म, गति कर्म आदि तो जड़ हैं ये जानते नहीं कि ऐसी अनिश्चित अवस्थाके रहते हुए कहाँ इस जीवको ले जाया जाय ? आदि ।’

इसका उत्तर यह है कि काल मरण और अकाल मरणवाले जीवके आगामी आयुका उदय एक समान होता है तो जिस प्रकार काल मरण करनेवाले जीव आनुपूर्वी कर्म, गति कर्म आदि जड़ कर्मके सहारेसे यथास्थान पहुँच जाते हैं उसी प्रकारकी व्यवस्था अकाल मरण करनेवाले जीवोंके विषयमें भी जानना चाहिये । कृपया आगमका निम्न वचन देखिये-

अप्पा पंगुह अणुहरइ अप्पु ण जाइ ण एइ ।
भुवणत्तयहँ वि मज्झि जिय विहि आणइ विहि णेइ ॥१-६६॥
-परमात्मप्रकाश

अर्थ-यह आत्मा पंगु-के समान है, अपने आप न कहीं जाता है और न आता है । तीनों लोकमें इस जीवको कर्म ही ले आता है और कर्म ही ले जाता है ।

वास्तविक बात यह है कि अकालमरणके प्रकरणमें आपके प्रपत्रमें विचारणीय बातें निम्नलिखित हैं-

१-आप नियतिवादी हैं, इसलिये आपकी दृष्टिमें कालमरण और अकालमरणमें कोई अन्तर नहीं है अर्थात् अकालमरणका भी कालमरणके समान समय नियत है ।

२-यद्यपि आगममें अकालमरणका विवेचन पाया जाता है, परन्तु वह विवेचन व्यवहारनयसे ही किया गया है।

३-आपकी दृष्टिमें हम अकालमरणको निश्चय पक्ष स्वीकार करते हैं।

इन तीन बातोंमेंसे तीसरी बातके विषयमें तो हम पहले ही कह चुके हैं कि हम न तो कालमरणको निश्चय पक्ष मानते हैं और न अकालमरणको ही निश्चय पक्ष मानते हैं, किन्तु हमारी दृष्टिमें कालमरण और अकालमरण दोनों ही व्यवहार पक्ष हैं।

दूसरी बातके विषयमें हम इस ढंगसे विचार करेंगे कि आप भी अकालमरणको व्यवहार पक्ष स्वीकार करते हैं और हम भी अकालमरणको व्यवहार पक्ष मानते हैं तब हमारे आपके मध्य अन्तर किस बातका है ?

जहाँ तक हमने इस विषयके आपके अभिप्रायको समझनेका प्रयत्न किया है तो ऐसा मालूम पड़ता है कि आप व्यवहार नयके पक्षको असत्यार्थ मानते हैं जो कि उचित नहीं है, क्योंकि आगमकी दृष्टिमें व्यवहार पक्ष अपने ढंगसे उतना ही सत्यार्थ है जितना कि अपने ढंगसे निश्चय पक्ष सत्यार्थ है। आगमके निश्चय पक्ष और व्यवहार पक्षके सत्यार्थपनेकी स्वीकृतिरूप अभिप्रायको ध्यानमें रख कर ही हमने कालमरण और अकालमरण दोनोंको व्यवहार पक्ष स्वीकार किया है। आप स्पष्ट नहीं कर सके कि आप अकालमरणको भी कालमरण मान कर कालमरण और अकालमरण दोनोंको किस आधार पर निश्चय पक्ष मान लेते हैं। कारण कि आत्मा जब अमर है तो आत्माकी अमरता ही निश्चय पक्ष मानने योग्य है। इस तरह अकालमरणके समान कालमरणको भी व्यवहार पक्ष ही मानना चाहिये।

एक बात और विचारणीय है कि व्यवहार नयके प्रतिपाद्य विषयको आप अयथार्थ मानते हैं क्योंकि आपके मतसे व्यवहार नय वही है जिसका प्रतिपाद्य विषय सत्यार्थ नहीं होता-मिथ्या या कल्पित ही होता है तो इस विषयमें हमारा कहना यह है कि फिर आगममें व्यवहार नयके कथनकी आवश्यकता ही क्यों समझी गयी ? कारण कि जिसका प्रतिपाद्य विषय ही कल्पित हो वह नय कैसा ?

दूसरी भी बात यह विचारणीय है कि निश्चय नय भी तो कालमरणको व्यवहार रूपसे प्रतिपादित करता है। जिस प्रकार कि केवलज्ञान पदार्थोंको व्यवहाररूपसे जानता है अर्थात् जिस प्रकार केवलज्ञान द्वारा पदार्थोंको जानना व्यवहार है उसी प्रकार निश्चय नय द्वारा अकालमरणको प्रतिपादित करना भी तो व्यवहार ही माना जायगा। ऐसी स्थितिमें निश्चय नय और निश्चय नयका विषय ये दोनों भी अयथार्थ ही सिद्ध होंगे। इस तरह सम्पूर्ण तत्त्व ही अनिर्वचनीय हो जायगा और इसका अन्तिम परिणाम सर्वशून्यतापत्ति ही होगा, जिसे संभव है आप भी स्वीकार करनेके लिये तैयार नहीं होंगे । इसलिये जब निश्चय नयके विषयको आप सत्यार्थ मान लेते हैं तो फिर व्यवहार नयके विषयको भी आपके लिये सत्यार्थ ही मानना होगा। इस प्रकार व्यवहार नय अथवा व्यवहार नयके विषयको आपका मिथ्या या कल्पित आदि कहना असंगत ही है।

कुछ भी हो, हम तो आगमके प्रति श्रद्धावान् हैं, अतः इस प्रेरणासे अकालमरणके संबन्धमें निर्णयके लिये उपयोगी होनेके कारण तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ के सूत्र ५३ की तत्त्वार्थराजवार्तिक टीका और उसका श्री पं० पन्नालाल जी न्यायदिवाकर द्वारा किया गया हिन्दी अर्थ दोनों ही यहां दिये जा रहे हैं-

वार्तिक :-अप्राप्तकालस्य मरणानुपलब्धेरपवर्तनाभाव इति चेत्, न, दृष्टत्वादाम्रफलादिवत्।१०।

अर्थ :-प्रश्न-आयुबंधमें जितनी स्थिति पड़ी है ताका अंतिम समय आये विना मरणकी अनुपलब्धि है। जातें काल आये बिना तो मृत्यु होय नांही, तातें आयुके अपवर्तनका करना नांही सम्भवे है।

समाधान :-ऐसा कहना ठीक नाहीं है। जातें आम्रफलादिककी ज्यों अप्राप्त काल वस्तुका उदीरणा करि परिणमन देखिये हैं। जैसे आमका फल पालमें दियें शीघ्र पके है, तैसे कारणके वशतें जैसी स्थितिकों लिये आयु बांध्या था ताकी उदीरणा करि अपर्वतन होय पहिले ही मरण हो जाय है।

टीका-यथा अवधारितपाककालात् प्राक् सोपायोपक्रमे सत्याम्रफलादीनां दृष्टः पाकस्तथा परिच्छिन्नमरणकालात् प्रागुदीरणाप्रत्यय आयुषो भवत्यपवर्तः।

उत्तर-जैसे आम्रके पकनेका नियमरूप काल है, तातें पहले उपाय ज्ञानकरि क्रियाका आरंभ होते संते आम्रफलादिककें पकना देखिये, तैसें ही आयुबन्धके अनुसार नियमित मरणकालतें पहले उदीरणाके बलतें आयुकर्मका अपवर्तन कहिये घटना होय है ऐसा जानना।

वार्तिक-आयुर्वेदसामर्थ्याच्च ॥११॥

अर्थ-बहुरि आयुर्वेद कहिये अष्टांग चिकित्सा कहिये रोगके दूर करनेमें उपयोगी क्रिया ताका प्ररूपक वैथक शास्त्र ताकी सामर्थ्यतें अर्थात् कथनतें तथा अनुभवतें आयुका अपवर्तन सिद्ध होय है।

टीका-यथाष्टांगायुर्वेदविद् भिषक् प्रयोगे अतिनिपुणो यथाकालवाताद्युदयात् प्राक् वमनविरेचनादिना अनुदीर्णमेव श्लेष्मादि निराकरोति अकालमृत्युव्युदासार्थं रसायनं चोपदिशति, अन्यथा रसायनोपदेशस्य वैयर्थ्यम्। न चादोऽस्ति। अत आयुर्वेदसामर्थ्यादस्त्यकालमृत्युः।

अर्थः-जैसे अष्टांग आयुर्वेद कहिये वैद्यशास्त्र ताके जाननेमें चतुर वैद्य चिकित्सामें अतिनिपुण वायु आदि रोगका काल आये विना ही पहिले वमन विरेचन आदि प्रयोग करि, नहीं उदीरणाको प्राप्त भये जे श्लेष्मादिक, तिनका निराकरण करै है। बहुरि अकालमरणके अभावके अर्थ रसायनके सेवनका उपदेश करे है, प्रयोग करे है। ऐसा न होय तो वैद्यक शास्त्रके व्यर्थपना ठहरे। सो वैद्यकशास्त्र मिथ्या हैं नांही यातें वैद्यक शास्त्रके उपदेशकी सामर्थ्यतें अकालमृत्यु है ऐसा सिद्ध होय है।

वार्तिक-दुःखप्रतीकारार्थं इति चेत् न, उभयथा दर्शनात् ॥१२॥

अर्थ-प्रश्न-शिष्य बहुरि कहे है जो रोगतें दुःख होय ता दुःखके दूर करनेके अर्थ वैद्यक शास्त्रका प्रयोग है, अकाल मृत्युके अर्थ नांही।

सामाधान-ताकों कहिये ऐसा कहना भी ठीक नांही, जातें वैद्यकशास्त्रका प्रयोग दोऊ प्रकार कर देखिये है। तातें दुःख होय ताका भी प्रतीकार करैं हैं। बहुरि दुःख नांही होय, तहाँ अकालमरण न होनेके अर्थ भी प्रयोग करे हैं।

टीका-स्यान्मतम्-दुःखप्रतीकारोऽर्थ आयुर्वेदस्येति? तन्न, किं कारणम्? उभयथा दर्शनात्। उत्पन्नानुत्पन्नवेदनयोर्हि चिकित्सादर्शनात्।

अर्थ-प्रश्न-दुःखके दूर करनेके अर्थ वैद्यकका प्रयोग है?

समाधान-ताकों कहिये ऐसा नांही, क्योंकि जातें दोय प्रकार करि प्रयोग देखिये है। तहाँ वेदना जनित दुःख होय ताके दूर करने अर्थ भी चिकित्सा देखिये। अर वेदनाके अनुदयमें भी अकालमृत्युके दूर करने अर्थ चिकित्सा देखिये है। तातें अपमृत्यु सिद्ध होय है।

वार्तिक-कृतप्रणाशप्रसंग इति चेत्, न, दत्त्वैव फलं निवृत्तेः ॥१३॥

अर्थ-प्रश्न-बहुरि शिष्य कहे हैं जो आयु होते ही मरण होय तो तहां कर्मका फल दिये बिना ही नाशका प्रसंग आवे है। ऐसे, क्रिया जो कर्म ताका फल दिये बिना ही नाशका प्रसंग होय है। तहाँ कृतप्रणाश और अकृताम्यागम दोष आवे है ?

समाधान-ऐसा कहना भी ठीक नांही है; आयु कर्म भी जीवन्मात्र फल देकर ही उदीरणा करि निवृत्ति होय है।

टीका-स्यान्मतम्-यद्यकालमृत्युरस्ति कृतप्रणाशः प्रसज्येत इति, तन्न, किं कारणम्? दत्त्वैव फलं निवृत्तेः, नाकृतस्य कर्मणः फलमुपभुज्यते, न च कृतकर्मफलविनाशः, अनिर्मोक्षप्रसंगात्, दानादिक्रियारम्भाभावप्रसंगाच्च। किन्तु कृतं कर्मफलं दत्त्वैव निवर्तते विततार्द्रपटशोषवत् अयथाकालनिर्वृत्तः पाक इत्ययं विशेषः।

अर्थ-प्रश्न-शिष्य कहे हैं जो मरणका काल विना आये मृत्यु होय तो किये कर्मका फल दिये विना ही कर्मके नाशका प्रसंग प्राप्त होय है ?

समाधान-ऐसा कहना ठीक नांही है, जातें कर्म है सो फल देकरि के ही निर्जरे हैं। तातें बिना किये कर्मका तो फल नांही भोगवे है। यातें तो अकृताम्यागम दोष नांही होय है। बहुरि किये कर्मका फल दिये विना नाश नांही होय है। यातें कृतप्रणाश नामा दोष नांही आवे है। भावार्थ-यहाँ कोई कहे जो आयुकर्मकी उदीरणारूप क्षय है कारण जाको ऐसे अकालमरणको प्रतीकार कैसे संभवे? ताकों कहिये जो असाता वेदनीय कर्मके उदय करि उत्पन्न भया जो दुःख ताका प्रतीकार कैसे होय है। तहां असाता वेदनीय कर्मका उदयरूप अंतरंग कारण होते अर बाह्य वातादिक विकारके कारणतें प्रतिकूल वेदनारूप दुःख होय है ताके दूर करनेके अर्थ औषधादिकका प्रयोग कीजिये, तब दुःख मिट जाय है। तैसें ही आयु कर्मका उदय अंतरंगका कारण होतें, बाह्य जीवितव्यके कारण शुद्ध पथ्य आहारादिक तिनका विच्छेद होतें तथा दिनमें सोवना, विषयमें अधिक प्रवर्तना, मादक वस्तुका सेवन करना, प्रकृति विरुद्ध भोजनका करना, विशेष व्यायाम करना आदि कारणतें आयु की उदीरणा हो जाय, तब मरण हो जाय है। अर पथ्य आहारादिक बाह्य सामग्रीका अनुकूल मर्यादारूप संयोगकी प्राप्ति होते उदीरणा न होय है, जीवतव्य रहे है, तब अकालमरण न होय है ऐसा जाना। बहुरि अकृत कर्मके फलकों यह आत्मा भोगे तो या जीवके मोक्षके अभावका प्रसंग आवे। जातें बिना किये कर्मके फलका उपभोगपणां मोक्ष आत्माके ठहरे तहां मोंक्षका अभाव होय। बहुरि किये कर्म फल दिये बिना ही नाश होय तो दान, व्रत, संयम, पूजन, भजन, अध्ययन, आचरण आदि क्रियाका आरम्भ मिथ्या ठहरे। तातें क्रिया कर्म कर्ताके अर्थ फल जो है ताहि देकर ही निर्जरे है। जैसे जलकरि आला वस्त्र चौड़ा करि तापमें सुखावे तो शीघ्र सूखे, तैसें आयु कर्म निमित्तके बलतें उदीरणा होय निर्जर जाय। ऐसे फलका विशेष है ऐसा जाननां।

उपरोक्त आगम प्रमाणसे करतलरेखावत् यह स्पष्ट हो जाता है कि पर्यायोंका कोई नियत काल नहीं होता है। पर्यायोंका होना या न होना कारणों पर निर्भर करता है। जैसे यदि कुपथ्यादि या अतिविषय सेवन आदि कारण मिलते हैं तो आयुकी उदीरणा होकर अकालमरण हो जाता है। यदि उन कारणोंको हटा दिया जाय और पथ्य आदि कारण मिलाये जायें तो आयुकी उदीरणा तथा अकाल मरण रुक जाय है।

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ (भाग ४/४)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ २३६ से २४९

↑ सूची


स्व-काल

आपने क्रमबद्धपर्यायके समर्थनमें अनेक बार ‘स्वकाल’ शब्दका प्रयोग किया है। वह ‘स्वकाल’ क्या वस्तु है, इस विषय पर यहाँ प्रकाश डालना आवश्यक है।

‘स्व-काल’ शब्द दो प्रकारसे विचारणीय हैं-१-स्वचतुष्टयकी अपेक्षा स्वकाल, २-द्रव्योंके परिणमनमें निमित्त कारणभूत काल द्रव्य । इनमेंसे जब स्वचतुष्टयरूप स्वकालका विचार किया जाता है तब द्रव्यके प्रतिक्षणमें होनेवाले परिणमनोंका क्रम ही स्वकाल शब्दका वाच्य है। परिणमन रूप कार्य भी विना कारणोंके नहीं हो सकता, क्योंकि ‘नैकं स्वस्मात् प्रजायते’ यानी कोई भी कार्य विना कारणके (स्वयं) उत्पन्न नहीं होता। इस नियमके अनुसार वह परिणमन भी कारण व्यापारपर निर्भर (अधीन) है। चूँकि कारण व्यापार यथायोग्य नियत क्रमसे भी होता है और अनियतक्रमसे भी होता है तब स्वकालके बल पर क्रमबद्ध पर्यायका सिद्धान्त बनाना निराधार है।

२-यदि परिणमनमें निमित्तभूत काल द्रव्यको स्वकाल माना जावे तो वह कालद्रव्य उदासीन कारण होनेसे द्रव्योंके अपने-अपने अक्रमिक या क्रमिक निमित्त कारणोंके अनुसार होनेवाले क्रमिक तथा अक्रमिक दोनों प्रकारके परिणमनमें समान रूपसे सहायक होता है। अतः वह काल भी नियतक्रमका नियामक नहीं है।

श्री कुन्दकुन्दाचार्यप्रणीत प्रवचनसारकी टीकाके अन्तमें श्री अमृतचन्द्र सूरिने ४७ नय भंगों द्वारा वस्तुका विवेचन किया है। उसमेंसे ३०वें तथा ३१वें नयभंगका विवेचन यों है-

कालनयेन निदाघदिवसानुसारि पच्यमानसहकारफलवत्समयायत्तसिद्धिः ॥३०॥ अकालनयेन कृत्रिमोष्मपाच्यमानसहकारफलवत्समयानायत्तसिद्धिः ॥३१॥

अर्थ-काल नयकी अपेक्षा यथासमय परिणमन होता है। जैसे आमका फल ग्रीष्म ऋतुके दिनोंके अनुसार पेड़पर यथासमय पक जाता है ॥३०॥ अकाल नयकी अपेक्षा असमयमें परिणमन होता है। जैसे कृत्रिम भुस आदिकी गर्मी देकर कच्चे आमको समयसे पहले पका लिया जाता है।

इन दोनों काल तथा अकाल नयोंका विधान करके श्री अमृतचन्दसूरि पर्यायके एकान्त क्रमनियत कालका स्पष्ट निराकरण कर रहे हैं।

इसी प्रकार श्री अमृतचन्दसूरिने २६-२७ वें नय भंगमें नियति तथा अनियति नयका भी विधान किया है-

नियतिनयेन नियमितौष्ण्यवह्निवन्नियतस्वभावभासि ॥२६॥
अनियतिनयेन नियत्यनियमितौष्ण्यपानीयवदनियतस्वभावभासि ॥२७॥

इसका तात्पर्य है जो कारणनिरपेक्ष है वह नियति है। जैसे अग्निमेंउष्णता और जो कारणसापेक्ष है वह अनियति है। जैसे जलमें उष्णता।

इसी प्रकार एकान्तवादका खण्डन करते हुए सूरिजीने इस प्रकरणमें स्वभाव-अस्वभाव, पुरुषार्थ-दैव आदि नयोंका भी विधान किया है। इसपर यदि गम्भीर विचार किया जाय तो एकान्तवादका परित्याग हो जायगा।

स्वकाल शब्दके समान आपने काललब्धि शब्दका प्रयोग भी क्रमबद्ध पर्यायका एकान्त सिद्ध करनेके लिए अनेक बार किया है। वह काललब्धि क्या वस्तु है इस विषयको श्री पं० टोडरमलजीके शब्दों द्वारा मोक्षमार्गप्रकाशकमें अवलोकन कीजिये-

काललब्धि वा होनहार तौ किछू वस्तु नाहीं, जिस कालविषै कार्य बने सोई काललब्धि और जो कार्य भया सोई होनहार ।
-पृ० ४५६ सस्ती ग्रन्थमाला दिल्ली

स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी ‘कालाइलद्धिजुत्ता’ इत्यादि गाथा २१९ को आचार्य शुभचन्द्रकृत टीकामें ‘रत्नत्रयादिकाललब्धिं’ पदसे काललब्धि शब्दका अर्थ रत्नत्रय आदि रूप ही ग्रहण किया गया है, अतः कालकी मुख्यतासे कार्यकी उत्पत्तिका कथन करना अयुक्त है ।

श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्रीने भी तत्त्वार्थसूत्रकी टीकामें ८ वें पृष्ठपर इसी अभिप्रायको पुष्ट करते हुए लिखा है-

एक ऐसी मान्यता है कि प्रत्येक कार्यका काल नियत है उसी समय वह कार्य होता है, अन्य कालमें नहीं । ऐसा जो मानते हैं वे कालके सिवा अन्य निमित्तोंको नहीं मानते । पर विचार करनेपर ज्ञात होता है कि उनका मानना युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि कार्यकी उत्पत्तिमें जैसे काल एक निमित्त है वैसे अन्य भी निमित्त हैं । अतः कार्यकी उत्पत्तिमें केवल कालको प्रधान कारण मानना उचित नहीं है ।

इसी पुस्तकमें पृष्ठ ४०० पर श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री लिखते हैं-

कभी नियतकालके पहले कर्म अपना कार्य करता है तो कभी नियत कालसे बहुत समय बाद उसका फल देखा जाता है ।

इस तरह काललब्धिका आश्रय लेकर भी क्रमवद्धपर्यायका एकान्त सिद्धान्त प्रमाणित नहीं होता ।

दिव्यध्वनिका अनियत समय

तीर्थङ्करकी दिव्यध्वनि खिरनेका नियत काल प्रातः, मध्याह्न, सन्ध्या तथा अर्द्धरात्रि है । किन्तु गणधरको किसी अन्य समयमें कोई शंका होनेपर तथा चक्रवर्तीके आ जानेपर अनियत कालमें भी दिव्यध्वनि खिरने लगती है । इसके प्रमाणमें हमने जयधवल पुस्तक १ पृष्ठ १२६ के वाक्य उल्लिखित किये थे, जिसमें ‘इयरकालेसु’ (नियत समयके अतिरिक्त अनियत कालोंमें) स्पष्ट शब्द आया है ।

इसके उत्तरमें आपने दिव्यध्वनिके उस अनियत कालको ‘नियत काल’ बनानेकी चेष्टा की है, किन्तु वह युक्ति-युक्त नहीं है, क्योंकि न तो गणधरको शंका उत्पन्न होनेका कोई समय नियत है और न समवशरणमें चक्रवर्तीके यथेच्छ आनेका ही समय निश्चित है । इस प्रकार जब इतर कालमें दिव्यध्वनि खिरनेके ये दोनों निमित्त कारण अनियत हैं तो उनके निमित्तसे खिरनेवाली दिव्यध्वनिका समय नियत कैसे बन सकता है ? यदि आप इसको काललब्धि या स्वकाल मानते हैं तो यह अनियत कालरूप ही होगो । इसका अभिप्राय यही होता है कि दिव्यध्वनिका काल नियत भी है और अनियत भी है । आपको भ्रामक शब्दों द्वारा अनियत कालको नियतकाल नहीं सिद्ध करना चाहिये ।

इसी प्रसंगमें भगवान् महावीर स्वामीकी दिव्यध्वनि ६६ दिन तक गणधरके अभावमें न खिरनेका जो आपने उल्लेख किया है उससे केवलज्ञान सम्पन्न उपादान कारणसे गणधर रूप निमित्तके अभावमें दिव्यध्वनि कार्यका न होना प्रमाणित होता है । तथा च-इस घटनासे आपकी इस मान्यताका भी खण्डन होता है कि ‘उपादान कारणके होनेपर निमित्त कारण उपस्थित हो ही जाता है ।’

क्षयोपशमज्ञानी इन्द्रको जब परिस्थिति समझमें आई-भगवान् महावीरकी दिव्यध्वनि गणधररूप निमित्तके विना नहीं हो रही-तब इन्द्रको प्रयत्न करके निमित्त (इन्द्रभूति गौतम) समवशरणमें लाना पड़ा और कारण सामग्रीके पूर्ण हो जानेपर दिव्यध्वनिरूप कार्य हुआ, यही काललब्धि है। इस काललब्धिके विषयमें हम पीछे अनेक प्रमाण देकर स्पष्ट कह चुके हैं कि कार्यकी उत्पत्तिमें सामग्रीकी पूर्णता ही काललब्धि है। इसके लिये हमने पूर्वमें स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी आचार्य शुभचन्द्रकी टीकाका प्रमाण दिया ही है और काललब्धिके विषयमें श्री पं० फूलचन्द्र जीकी भी क्या दृष्टि है? इस बातको भी वहींपर बतलाया है।

कर्मनिर्जरा और मुक्तिका अनियत काल

‘पर्याय अक्रमिक भी होती है।’ इस बातको सिद्ध करनेके लिये हमने श्री अकलंक देव विरचित तत्त्वार्थराजवार्तिक अध्याय १ सूत्र ३ पृष्ठ २४ पर लिखित वार्तिक ‘कालानियमाच्च निर्जरायाः ॥३॥ का प्रमाण दिया था। आपने उसका कुछ भी उत्तर न देकर श्लोकवार्तिक पृष्ठ ७० पर लिखे एक अन्य विषयकी चर्चा लिख डाली है जिसका कि उक्त राजवार्तिकके उल्लिखित वार्तिकसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है।

तथाच-आपके द्वारा उपस्थित किये गये श्लोकवार्तिकके उल्लेखमें भी सामग्री द्वारा कार्य-उत्पत्तिका समर्थन मिलता है जिसमें प्रतिबन्धक कारणोंका अभाव तथा सहकारी कारणोंके सद्भाव होनेपर उपादान कारणका कार्यरूप परिणत होना प्रमाणित होता है, क्योंकि मोहनीय कर्मके क्षय हो जाने पर भी अन्तर्मुहूर्तमें जब तक ज्ञानके प्रतिबन्धक ज्ञानावरण कर्मका क्षय नहीं हो जाता तथा उसके सहायक कारण अनन्तवीर्यके प्रतिबन्धक अन्तरायका क्षय नहीं हो जाता तब तक केवलज्ञान और अनन्त बलका आविर्भाव नहीं होता।

एवं मोक्षमार्गका प्रारम्भ करनेवाले सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिका समय भी अनिश्चित है जो व्यक्ति जब प्रयत्न करता है और जब उसके योग्य कारणसामग्री मिल जाती है तब अनियत समयमें सम्यग्दर्शन होता है। इस तरह निर्जरा तथा मुक्तिका समय अनियत है।

तात्पर्य यह है कि-

कालादिसामग्रीको हि मोहक्षयस्तद्रूपाविर्भावहेतुः न केवलः, तथा प्रतीतेः।

तथा-

क्षीणकषायप्रथमसमये तदाविर्भावप्रसक्तिरपि न वाच्या, कालविशेषस्य सहकारिणोऽपेक्षणीयस्य तदा विरहात्।

तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृष्ठ ७१ के ये वचन हैं। इन्हें ही आपने कार्यके स्वकालकी पुष्टिमें पुष्ट प्रमाण माने हैं।

इनके विषयमें पूर्वमें बहुत कुछ लिखा जा चुका है अर्थात् स्वकाल या काललब्धि केवल वह काल नहीं, जिसमें कार्य उत्पन्न होता है, किन्तु वह कारणसामग्री है जिससे कार्य उत्पन्न होता है। अतः यहाँ केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि ये सब कथन कर्मक्षपणप्रक्रियाकी ही सूचना देनेवाला है। कारण कि काल स्वयं तो उदासीन कारण है तथा आत्माका जो उत्तरोत्तर क्रमिक विकास होता है वह तत्तत्कर्म क्षपणपूर्वक ही होता है। ‘कालादिसामग्रीकः’ और ‘कालविशेषस्य सहकारिणः’ इन दोनों वचनों पर आपको तर्कके आधार पर विचार करना चाहिये, संस्कारवशात् अर्थ कर देनेसे तत्त्व फलित नहीं हो सकता है। यहाँ पर अदालतका केस जीतनेका प्रश्न नहीं है, तत्त्वार्थको फलित करनेका ही प्रश्न है। फिर सहकारी शब्द स्व से अतिरिक्त परका ही बोध करानेवाला है, इसलिये इससे तो निमित्त कारणकी सार्थकता ही सिद्ध होती है।

कर्मका अनियत परिपाक

अनियत पर्याय सिद्ध करनेके लिये हमने अपने पत्रकमें कर्म-परिपाकके अनियत होनेका प्रमाण दिया था, आपने उसका कुछ उत्तर नहीं दिया और यह लिखकर उसे टाल दिया कि ‘यह एक ऐसा गम्भीर प्रश्न है जिस पर इस समय लिखना उचित न होगा ।’ प्रतीत होता है कि यह बात आपके लक्ष्यकी पोषक न होनेसे आपने ऐसा लिखकर टाल दिया है । अतः हमारा पूर्वोक्त प्रमाण अनियत पर्यायका समर्थन करता है ।

श्री पं० फूलचन्द्रजी शास्त्री तत्त्वार्थसूत्र टीकाके पृष्ठ १५७ पर लिखते हैं-

नरकमें तेतीस सागरकी आयु भोगते हुए वहाँके अशुभ निमित्तोंकी प्रवलताके कारण सत्तामें स्थित समस्त शुभकर्म अशुभरूपसे परिणमन करते रहते हैं । और देवगतिमें इसके विपरीत अशुभ कर्म शुभ रूपसे परिणमन करते रहते हैं ।

निधत्ति और निकाचित रूप कर्मोंकी स्थिति पूरी हो जानेपर यदि उनके उदयके अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र और काल न हो तो जाते-जाते वे भी अपने रूपसे फल न देकर अन्य सजातीय प्रकृतिरूपसे फल देनेके लिए वाध्य हो जाते हैं ।

इस तरह कर्मोंका परिपाक (फल देना) नियत नहीं है, अनियत है । तत्त्वार्थ सूत्रकी टीकामें १२९ वें पृष्ठपर भी श्री पं० फूलचन्द्रजीने लिखा है-

किसी मनुष्यने तिर्यञ्चायुका पूर्व कोटि वर्ष प्रमाण स्थितिबन्ध किया । अब यदि उसे स्थितिघातके अनुकूल सामग्री जिस पर्यायमें आयुका बन्ध किया है उसी पर्यायमें ही मिल जाती है तो उसी पर्यायमें वह आयु कर्मका स्थितिघात कर सकता है और यदि जिस पर्यायमें आयुको भोग रहा है उसमें स्थितिघातके अनुकूल सामग्री मिलती है तो उस पर्यायमें आयु-कर्मका स्थितिघात कर सकता है । स्थितिघात करनेसे आयु कम हो जाती है ।

इस प्रकार आपके कथनके अनुसार भी वाँधे हुए निश्चित स्थितिवाले कर्मकी दशा अनियत पर्यायवाली हो जाती है । इस तरह आयुकी उदीरणावाले मरणको आगममें अकालमरण या उदीरणा मरण कहा गया है ।

हमने अपने द्वितीय प्रपत्रमें जयधवला प्रथम पुस्तक पृष्ठ २८९ के ‘पागभावस्स विणासो वि दव्व-काल-भवावेक्खाए जायदे’ देकर यह वतलाया था कि प्रागभावका विनाश द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावकी अपेक्षा रखता है । इसका अर्थ यह है कि जैसा द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव प्रागभावके विनाशके अनुकूल होगा वैसा ही उसका विनाश होगा । जैसे मिट्टीमें घट, सकोरा आदिका प्रागभाव मौजूद है, अव यदि घटोत्पत्तिके अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव प्राप्त होगा तो प्रागभावका विनाश एक प्रकारका होगा और यदि सकोराकी उत्पत्तिके अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव प्राप्त होगा तो प्रागभावका विनाश उससे भिन्न प्रकारका होगा । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव न मिले यह तो मौका कभी नहीं आयगा । कारण कि खानमें पड़ी हुई मिट्टीमें भी विस्रसा मिलते हुए कारणोंके सहयोगसे परिणमन प्रतिसमय होता ही रहता है । परन्तु कभी किसी प्रकारका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव प्राप्त हो और कभी किसी प्रकारका द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव प्राप्त हो, कभी विस्रसा ( अनायास ) मिले तो कभी प्रायोगिक यानी पुरुषकृत प्रयत्नसे प्राप्त हो जैसा कि मिट्टीके दृष्टान्तसे स्पष्ट है, तो यह असंगत भी नहीं है । इसलिए उक्त जयधवलाका उक्त वचन हमारे पक्षका समर्थन ही करता है ।

इसी प्रसंगमें आप लिखते हैं कि ‘ऐसा मान लेनेपर कि कर्मका उदय होनेपर भी उदयके विरुद्ध साधन मिलनेसे उन कर्मोंका फल नहीं मिलता’ तो इसपर हमारा कहना है कि यह आशय आपने हमारे कौनसे वाक्यका ले लिया है यह हमारी समझमें नहीं आया और फिर उसे आपने गम्भीर प्रश्न बना दिया, फिर अन्तमें यह भी संकेत कर दिया कि ‘विशेष प्रसङ्ग आनेपर अवश्य ही विचार करेंगे’ आदि आपकी ये सब बातें हमें व्यर्थ दिखाई देती हैं।

आगे आप लिखते हैं कि ‘अतएव उपादान निश्चय पक्ष होनेसे और निमित्त व्यवहार पक्ष होनेसे यही मानना चाहिये कि दोनोंका मेल होनेपर कार्य होता है।’

यह तो ठीक है कि आपने उपादान निश्चय पक्ष और निमित्त व्यवहार पक्ष इन दोनोंके मेलसे कार्यकी उत्पत्ति स्वीकार कर ली। हम भी तो यही कहते हैं, परन्तु फिर आप निमित्तको अकिंचित्कर किस लिये कहते हैं? क्योंकि आपके उक्त कथनसे निमित्तकी सार्थकता ही सिद्ध होती है। यदि आप कहें निमित्त व्यवहार पक्ष होनेसे ही अकिंचित्कर रहता है तो फिर आपका यह लिखना असंगत है कि ‘निमित्त और उपादान दोनोंके मेलसे कार्य उत्पन्न होता है।’

आप कहते हैं कि ‘निश्चय उपादानके प्राप्त होनेपर यतः उस समय जो अन्य द्रव्यकी पर्याय उसका निमित्त है वह अपने परिणमनके लिये उसी समय निश्चय उपादान भी है’ आदि। इस विषयमें तथा निश्चय और व्यवहारके विषयमें हम पूर्वमें बहुत कुछ लिख चुके है वहाँ आप देखनेका कष्ट करें।

आपने लिखा है कि ‘कार्यकी उत्पत्तिमें उपादान और निमित्त इन दोका कारण रूपसे उल्लेख किया गया है इसका तात्पर्य यह नहीं कि उपादान हो और निमित्त न हो इसलिए कार्य नहीं होता-ऐसा अर्थ करना संगत नहीं है’ आदि।

आपने कार्यकी उत्पत्तिमें आवश्यकतानुसार उपादान और निमित्त दोनोंको कारण मान लिया इससे हमारे आपके मध्य अभीतक आपकी ‘कार्य तो केवल अपने उपादानसे ही होता है निमित्त वहाँपर अकिंचित्कर ही रहा करते हैं’ इस मान्यताको लेकर जो विवाद था वह समाप्त हो जाता है। आप इसके पहले भी यह बात कह चुके हैं कि ‘उपादान निश्चय पक्ष होनेसे और निमित्त व्यवहार पक्ष होनेसे यही मानना चाहिये कि दोनोंका मेल होनेपर कार्य होता है।’ परन्तु आपका यह लिखना कि ‘इसका तात्पर्य यह नहीं कि उपादान हो और निमित्त न हो इसलिए कार्य नहीं होगा ऐसा अर्थ करना संगत नहीं है’ आगमके अभिप्रायके अनुसार सही नहीं है।

आगमका अभिप्राय यह है कि कोई भी स्वपरप्रत्यय कार्य उपादान और निमित्त दोनों प्रकारके कारणोंके मेलसे होता है। इसका अर्थ यह है कि उपादान कार्यरूप परिणत होता है और निमित्त उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें उसकी (उपादानकी) सहायता करता है। आगमका अभिप्राय यह भी है कि उपादानमें स्वप्रत्यय कार्यकी तरह स्वपरप्रत्यय कार्य भी प्रति समय होता रहता है। कारण कि उपादानका तो परिणमन करनेका स्वभाव स्वतःसिद्ध है और निमित्तोंका योग उसे (उपादानको) प्रतिसमय मिलनेमें कोई बाधा आगममें नहीं बतलायी गयी है तथा प्रत्यक्ष और अनुमानसे भी आगमकी इसी बातका समर्थन होता है। यहाँ तक तो हमारे ख्यालसे हमारे और आपके मध्य कोई विवाद नहीं, परन्तु उपादानकी उसकी अपनी कार्यरूप परिणतिमें निमित्तका क्या सहयोग मिलता है? इस प्रश्नके समाधानकी खोज यदि आगममें की जाय तो मालूम होगा कि उपादानकी कार्य परिणतिमें लोकको जो विलक्षणता दिखाई देने लगती है वह विलक्षणता उपादानमें निमित्तके सहयोगसे ही आती है। जैसे पूर्वमें हम कह आये हैं कि परिणमन करना मात्र आत्माका स्वतःसिद्ध स्वभाव है। क्रोध, मान, माया, लोभ आदि रूपसे परिणमन करना आत्माका स्वतःसिद्ध स्वभाव नहीं है, अतः आत्माके परिणमनमें जो क्रोधादिरूपता देखी जाती है वह यद्यपि आत्माकी परिणतिमें ही उत्पन्न होती है, परन्तु यदि क्रोधकर्म निमित्त उपस्थित होगा तो आत्माके उस परिणमनमें क्रोधरूपता आयगी और यदि मानादि कर्मोंमेंसे किसी एकका निमित्त उपस्थित होगा तो आत्माके उस परिणमनमें मानादि कर्मोंके अनुसार ही मानरूपता, मायारूपता या लोभरूपता आयगी। इसी प्रकारकी व्यवस्था प्रत्येक वस्तुके सभी स्वपरप्रत्यय परिणमनोंके विषयमें समझना चाहिये।

इस तरह यह बात निश्चित हो जाती है कि परिणमन करनेका स्वतःसिद्ध स्वभाव तो वस्तुका अपना ही स्वभाव है और जिस वस्तुका जो प्रतिनियत स्वभाव होता है उसका परिणमन भी उसके अपने उस प्रतिनियत स्वभावके दायरेमें ही होता है, किसी भी वस्तुका कोई भी परिणमन उस वस्तुके अपने प्रतिनियत स्वभावके बाहर कभी भी नहीं होता है। किन्तु प्रत्येक वस्तुका कोई भी परिणमन या तो स्वप्रत्यय होगा या फिर स्वपरप्रत्यय होगा। यदि वह परिणमन स्वप्रत्यय है तब तो वह नियतक्रमसे ही प्रतिसमय होगा। इसे आपका पक्ष और हमारा पक्ष दोनों ही स्वीकार करते हैं। विवाद हमारे आपके मध्य केवल स्वपरप्रत्यय परिणमनके नियतक्रमके विषयमें है। यानी आपका कहना है कि वस्तुका स्वपरप्रत्यय परिणमन भी नियतक्रमसे ही होता है जब कि आगमका कहना है कि वस्तुका स्वपरप्रत्यय परिणमन नियतक्रमसे भी होता है और अनियतक्रमसे भी होता है। और इसका कारण आगममें यह स्वीकार किया गया है कि निमित्तोंका समागम नियत नहीं है। निमित्तोंका समागम दो प्रकारसे प्राप्त होता है। एक तो विस्रसा (अनायास या प्राकृतिक तरीकेसे) और दूसरा प्रायोगिक अर्थात् पुरुषकृत प्रयत्नसे। दोनों ही प्रकारसे निमित्तोंका समागम नियतक्रमसे और अनियतक्रमसे देखनेमें आता है, आगम भी इसका विरोधी नहीं है। इस प्रकारसे कार्य भी नियतक्रम और अनियतक्रम दोनों ही प्रकारके हुआ करते हैं। इस विषय पर काफी लिखा जा चुका है तथा छठवें आदि प्रश्नोंमें आगे भी लिखा जायगा, अतः विस्तारसे यहाँ पर लिखना हम जरूरी नहीं समझते हैं।

निमित्तका अभाव होने पर कार्य रुक भी जाता है। प्रत्यक्ष देखा जाता है-मोटर चली जा रही है, पैट्रोल समाप्त हो गया, मोटर रुक जाती है। कार्यकारणभावका ज्ञाता पैट्रोल डालकर मोटरको पुनः चालू कर अभीष्ट स्थानको पहुँच जाता है। यह विचार करनेवाला कि मोटर अपने उपादानसे चल रही थी, अपने उपादानसे रुकी है। जब चलनेका नियत काल आयगा, पैट्रोल अपने आप हाजिर हो जावेगा। इस प्रकार विचार कर पैट्रोल नहीं डालता वह अपने अभीष्ट स्थान तक नहीं पहुँच सकता। आगममें भी कहा है कि उपादानमें शक्ति होते हुए भी निमित्तके अभावमें कार्य रुक जाता है।

मुक्तस्य तु पुनः स्वभावगतिलोपहेत्वभावादूर्ध्वंगत्युपरमोऽनुपपन्न इति ? उच्यते, लोकान्तान्नोर्ध्वंगतिर्मुक्तस्य। कुतः ? धर्मास्तिकायाभावात् ॥८॥ गत्युपग्रहकारणभूतो धर्मास्तिकायो नोपर्यस्तीत्यलोके गमनाभावः।
-रा० वा० पृ० ६४६ ज्ञानपीठ

शंका-मुक्त जीवके तो स्वभावगतिको रोकनेवाले कारणोंका अभाव है फिर लोकसे ऊपर मुक्त जीवोंकी गति क्यों नहीं होती ?

समाधान-लोकाकाशसे आगे गति-उपग्रहमें कारणभूत धर्मास्तिकायका अभाव है, इसलिये मुक्त जीवोंकी ऊर्ध्वगति लोकसे आगे नहीं होती। अर्थात् मुक्त जीवोंकी ऊर्ध्वगमनकी शक्ति होते हुए भी निमित्तके अभावके कारण लोकके अन्तमें पहुँचकर आगे गति रुक जाती है।

अनुभव तथा प्रत्यक्ष ज्ञान और अनुमान ज्ञान भी यह बतलाता है कि यदि कार्यके अनुकूल प्रयत्न किया जायगा तो कार्य सम्पन्न अवश्य होगा। इस तरह कार्योंकी सम्पन्नता देखी भी जाती है। इसलिये जब जीवोंका पुरुषार्थ भी कार्योत्पत्तिका साधक होता है तो उन्हें अपने जीवनोपयोगी इहलोक और परलोक-सम्बन्धी तथा मोक्षसम्बन्धी कार्योंकी सम्पन्नताको ध्यानमें रखते हुए उनके अनुकूल यथायोग्य अन्तरंग और बहिरंग प्रतिनियत कारणोंको जुटानेके लिये पुरुषार्थ करनेका उपदेश आगममें दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि जो कार्योत्पत्तिको लक्ष्यमें रखकर तदनुकूल निमित्तोंकी उठाधरी करता है वह सर्वज्ञताका विरोधी है, लेकिन इतनी बात अवश्य है कि यदि सर्वज्ञताके लोपके भयसे अथवा सर्वज्ञताकी आड़ लेकर कोई कार्योत्पत्तिके अनुकूल साधनोंके जुटानेमें पुरुषार्थहीन बननेकी चेष्टा करता है, वह अवश्य ही मिथ्यादृष्टि हो जाता है। सर्वज्ञके प्रति आस्था रखिये, उसके ज्ञान पर तथा वाणी पर भी आस्था रखिये, परन्तु उससे अपने कार्योंको सम्पन्न करनेकी प्रेरणा लीजिये, अपने इहलोक और परलोकको सुधारनेका प्रयत्न कीजिये, मोक्षप्राप्तिके लिये पुरुषार्थ कीजिये।

यह तो निश्चित है कि प्रत्येक व्यक्तिका प्रतिसमय संकल्प और प्रवृत्तियोंके आधार पर पुरुषार्थ होता ही रहता है, वह तो तब तक नहीं रुक सकता जब तक केवल दृष्टा और ज्ञाताकी अवस्थाको व्यक्ति नहीं प्राप्त हो जायगा। अतः तब तक उसे अपने अनुकूल कार्योंकी सम्पन्नताके लिये अन्तरंग और वहिरंग साधनोंको जुटाना चाहिये। ऐसे साधन नहीं जुटायगा तो ऐसे साधन जुटेंगे जिनसे उसके इहलोक और परलोकमें विगाड़ पैदा होगा। जैन संस्कृतिकी यह मान्यता गलत नहीं है कि ‘जैसा करोगे वैसा भरोगे।’ प्रसन्नता की बात है कि आप भी इस बातको स्वीकार करते हैं कि जीवको अपनो सम्हाल करनेके लिये पुरुषार्थ करना चाहिये। परन्तु अपनी सम्हाल करनेका क्या यही पुरुषार्थ है? कि प्रत्येक प्राणी अपनेको ज्ञाता और दृष्टा मानने लग जाय और क्या इतने मानने मात्रसे वह ज्ञाता दृष्टा वन जायगा ? यह ठीक है कि जानना और देखना मात्र ही आत्माका स्वभाव है, परन्तु इसको कौन नहीं मानता है? प्रश्न तो ज्ञाता-दृष्टा मात्र वन जानेका है। इसके लिये प्राणियोंको पुरुषार्थका उपदेश दिया गया है, जिससे वे ज्ञाता-दृष्टामात्र स्थितिको प्राप्त हो सकें। लेकिन इसका सही उपाय यही है कि इसके अनुकूल जो भी अन्तरंग और वहिरंग कारण हैं या हो सकते हैं उन्हें समझा जाय, उन्हें अपनाया जाय और उनका ही उपदेश प्राणियोंको दिया जाय। बहुत लिखा गया है, सम्पूर्ण प्रश्नोंमें हमारा यही लक्ष्य रहा है और यही प्रयत्न रहा है।

आपने उपादान और निमित्तकी जो व्याप्ति बतलायी है वह गलत है। उपादान और निमित्तकी जो व्याप्ति आगममें बतलायी है वह इस प्रकार नहीं है कि जिस समय जो कार्य होना होगा उस समय उसके अनुकूल निमित्त मिलेंगे ही, किन्तु निमित्त और उपादानको व्याप्ति जो आगममें बतलायी है वह इस प्रकार है कि निमित्तके अनुकूल उपादानका समागम होगा तो कार्य अवश्य होगा और उपादानके अनुकूल निमित्तका समागम होगा तो भी कार्य अवश्य होगा। आप यह भी कहते हैं कि उपादानकी तैयारी होगी तो निमित्त अवश्य मिलेंगे, परन्तु यह भी तो ख्याल कीजिये कि उपादानकी तैयारी भी तो आवश्यकतानुसार तदनुकूल निमित्तोंके सहयोग पर ही होती है। इस बातको अच्छी तरह स्पष्ट किया जा चुका है और आगे दूसरे प्रश्नोंमें भी स्पष्ट किया जायगा।

आपने अपने पक्षकी पुष्टिके लिए जो ‘यदप्यभिहितं-शक्तादशक्ताद् वा तस्याः प्रादुर्भाव’ इत्यादि। ‘तत्र शक्तादेवास्याः प्रादुर्भावः।’ इत्यादि प्रमेयकमलमार्तण्डका उद्धरण दिया है, उसमें आपने स्वयं शक्तका अर्थ समर्थ तथा अशक्तका अर्थ असमर्थ किया है। उसके विषयमें आगमके आधार पर हम इतना ही कह देना चाहते हैं कि उपादानमें जो सामर्थ्य आती है वह केवल इतनी नहीं है कि वह कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायमें पहुँच जावे। किन्तु इसके साथ कारक सामग्रीकी पूर्णता व प्रतिबन्धकाभाव भी उसमें सम्मिलित है । इसका अर्थ यह है कि कार्याव्यवहित पूर्वक्षणमें वस्तुके पहुँच जाने पर उसके उत्तर क्षणमें जो कार्य होगा वह कार्य पूर्व पर्यायमें पड़ी हुई अनेक सामर्थ्योंमें से किसी एक रूपका होगा, जिसके अनुकूल समर्थ कारण सामग्री होगी। अर्थात् हम जो चाहें सो हो जायगी यह तो कोई नहीं मानता है, परन्तु उस कार्यकी नियामक केवल वह पूर्व पर्याय ही नहीं है, किन्तु उसके साथ उस समय जो निमित्त सामग्री ही उपस्थित होगी वह भी उसकी नियामक होगी। इसके साथ ही प्रतिबन्धक कारणोंका अभाव भी उसका नियामक होगा। इस तरह कार्यजनक सम्पूर्ण सामग्रीकी प्राप्ति हो जाना व प्रतिबन्धक कारणोंका अभाव हो जाना ही उसकी समर्थता है। इस विषयमें भी हम पूर्वमें बहुत विस्तारसे लिख चुके हैं।

आपने अपने द्वितीय दौरके प्रपत्रमें ७ नं० पर लिखा है कि ‘उपादानके कार्य और निमित्तकी समव्याप्ति है, इस व्यवस्थाके रहते हुए तथा उपादानका अनन्तर पूर्व पर्याय विशिष्ट द्रव्यको उपादान कहते हैं यह सुनिश्चित लक्षणके होने पर भी यह लिखना कि कार्यके प्रति जब जब जैसे अनुकूल निमित्त मिलते हैं तब कार्य होता है युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता आदि।’

हमारी तरफसे इन सब बातोंके विषयमें बहुत कुछ विस्तारके साथ लिखा जा चुका है। दूसरे प्रश्नोंमें भी लिखा जायगा, अतः अब तो हमारा आपसे कुछ और लिखनेके बजाय इतना निवेदन करना ही पर्याप्त होगा कि आप उसे ध्यानसे पढ़िये, गंभीरताके साथ मनन कीजिये और निष्कषायभावसे निष्कर्ष निकालनेका प्रयत्न कीजिये।

हम इतना अवश्य पुनः स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्याय विशिष्ट वस्तुमें सिर्फ एक नियत योग्यता ही नहीं पायी जाती है, किन्तु उस वस्तुमें उस समय भी नाना योग्यताऐं अनन्तर उत्तर क्षणमें कार्यरूपसे परिणत होनेके लिये तैयार बैठी रहती हैं इस बातको ध्यानमें रखकर ही आगममें यह बतलाया गया है कि वह योग्यता ही कार्यरूपसे विकसित होगी जिसके अनुकूल कारण सामग्रीकी पूर्णता विद्यमान होगी व प्रतिबन्धक कारणोंका अभाव भी विद्यमान होगा। कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्याय विशिष्ट वस्तुमें अनन्तर उत्तर क्षणमें कौनसा कार्य उत्पन्न होगा? यह प्रश्न तभी उठ सकता है जब कि उक्त प्रकारकी वस्तुमें उत्तर क्षणकी कार्योत्पत्तिके अनुकूल नाना योग्यताऐं रह रही हों और आगममें इस प्रश्नका समाधान करनेके लिये कारण सामग्रीकी पूर्णता व प्रतिबन्धककारणोंके अभावको जो कार्योत्पत्तिका नियामक बतलाया गया है इसीसे यह बात सिद्ध होती है कि कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्याय विशिष्ट वस्तुमें अनन्तर उत्तरक्षणमें नाना कार्योंके उत्पन्न होनेकी सम्भावना है ऐसी संभावना उसी हालतमें हो सकती है जब कि उस वस्तुमें उस समय नाना योग्यताऐं विद्यमान हों।

यह बात हम पूर्वमें ही लिख चुके हैं कि वस्तु स्वतःसिद्ध परिणमन स्वभाववाली होनेके कारण उसमें प्रति समय उत्पाद-व्यय होता रहता है, परन्तु वस्तुमें ऊपर लिखे प्रकार नाना योग्यताओंमेंसे किस योग्यताके अनुसार कार्यकी उत्पत्ति हो केवल इसकी नियामक निमित्त सामग्री हुआ करती है, कार्योत्पत्तिका सर्वथा निषेध तो हमने किया नहीं है और न कार्योत्पत्तिका सर्वथा निषेध हो ही सकता है, क्योंकि कोई न कोई निमित्त सामग्रीकी प्रत्येक समय प्राप्ति रहती ही है। इसलिये आपका यह लिखना ठीक नहीं है कि ‘यदि निमित्ताधीन कार्यकी व्यवस्था होती तो द्रव्यको जो उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य स्वभाववाला माना गया है वह नहीं बन सकता।’ और इसीलिये आपका ‘क्या ऐसा है कि किसी द्रव्यको किसी समय अनुकूल निमित्त नहीं मिले इसलिये उस समय उसने अपना कार्य नहीं किया’ इत्यादि यह लिखना भी ठीक नहीं है।

निमित्त तथा उपादानके निरुक्त्यर्थ पर ध्यान देनेसे भी निमित्तोंकी सार्थकता ही सिद्ध होती है। जैसे ‘उप’ उपसर्ग पूर्वक आदानार्थक ‘अ’ उपसर्ग विशिष्ट ‘दा’ धातुसे ‘उपादीयते अनेन’ इस विग्रहके आधार पर कर्ताके अर्थमें ल्युट् प्रत्यय होकर उपादान शब्द बनता है। इसका अर्थ यह होता है कि जो वस्तु परिणमनको स्वीकार करे या ग्रहण करे अथवा जिसमें परिणमन हो वह उपादान कहलाता है। इसी प्रकार ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक स्नेहार्थक ‘मिद्’ धातुसे कर्त्तके अर्थमें ही ‘निमेद्यति’ इस विग्रहके आधार पर ‘क्त’ प्रत्यय होकर निमित्त शब्द बनता है। इसका अर्थ यह होता है कि जो परिणमन करनेवाली वस्तुको उसके उस परिणमनमें मित्र या तेलके समान स्नेहन करे अर्थात् सहायता करे वह निमित्त कहलाता है।

यहाँ पर हमने मित्र और तेलकी समानता निमित्तमें प्रदर्शित की है, उसका कारण यह है कि स्नेह अर्थ तेलका होता है, ‘मिद्’ धातु भी स्नेहार्थक है। तेलसे जिस प्रकार शरीर आदिमें चिक्कणता आ जाती है उसी प्रकार निमित्तसे उपादानमें बलाधानरूप चिक्कणता आ जाती है। इस प्रकार ‘मिद्’ धातुसे ही मित्र शब्द भी बनता है, तो जिस प्रकार मित्र किसीका हर एक अवस्थामें मददगार रहता है उसी प्रकार निमित्त भी उपादानका कार्योत्पत्तिमें मददगार ही रहा करता है। उपादान और निमित्तका यहाँ पर जो निरुक्त्यर्थ किया है उस पर छठवें आदि प्रश्नों पर विचार करते हुए भी ध्यान रखनेकी कृपा करें।

हमने यह जो निमित्त और उपादानका लक्षण बतलाया है इससे भी निमित्तकी कार्यके प्रति सार्थकता ही सिद्ध होती है और चूंकि निमित्तोंकी नियतक्रमता तथा अनियतक्रमता प्रत्यक्ष सिद्ध है, अनुमान सिद्ध है और आगमसे प्रसिद्ध भी है, अतः वस्तुकी कार्यरूप परिणतिमें नियतक्रमता और अनियतक्रमता दोनों बातें आगममें स्वीकार की गयी हैं। ऐसी स्थितिमें आपका यह लिखना कि ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं’ या ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं’ गलत ही है।

आपने उपचरित और अनुपचरित कारणों पर विचार करते हुए पं० प्रवर बनारसीदासजी का एक पद्य उद्धृत किया है-

पदस्वभाव पूरव उदै निहचै उद्यम काल।
पच्छपात मिथ्यात पथ सरवंगी शिवचाल ॥ ४२ ॥

इसका अर्थ आपने यह किया है कि ‘पदार्थ का स्वभाव, पूर्वका उदय (निमित्त), निश्चय (उपादान), उद्यम (पुरुषार्थ) और काल ये पाँच कारण हैं। इनके समवायमें कार्यकी उत्पत्ति होती है। इनमें से किसी एकका पक्षपात करना मिथ्यात्व अर्थात् संसारका मार्ग है और सबके सद्भावमें कार्यको स्वीकार करना मोक्षमार्ग है।’

आगे आप लिखते हैं-‘गोम्मटसार कर्मकाण्डमें काल, ईश्वर (निमित्त), आत्मा, नियति और स्वभाव इन पाँच एकान्तोंका निर्देश किया गया है वह इसी अभिप्रायसे किया गया है।’

अब देखना यह है कि श्री पं० बनारसीदास जी के कथनानुसार आपकी दृष्टिमें पदार्थका स्वभाव, पूर्वका उदय, निश्चय, उद्यम और काल ये पाँच मिलकर कार्य उत्पन्न करते हैं और गोम्मटसार कर्मकाण्डके कथनानुसार आपकी दृष्टिमें काल, ईश्वर, आत्मा, नियति और स्वभाव ये पाँच मिलकर कार्य उत्पन्न करते हैं।

श्री पं० बनारसीदासजीके पद्यमें आपने पूर्वके उदयका अर्थ निमित्त किया है, निश्चयका अर्थ उपादान किया है और उद्यमका अर्थ पुरुषार्थ किया है। इसी प्रकार गोम्मटसारमें ईश्वरका अर्थ निमित्त किया है। इस तरह यदि दोनोंका समन्वय किया जाय तो आपकी दृष्टिसे वह निम्न प्रकार होगा-

गोम्मटसार कर्मकाण्ड - श्री पं० बनारसीदासजीका पद्य
काल - काल
(ईश्वर) निमित्त - निमित्त (पूर्वका उदय)
आत्मा - पुरुषार्थ (उद्यम)
नियति - उपादान (निश्चय)
स्वभाव - स्वभाव

इस तरह आपका आशय यदि आत्मासे पुरुषार्थका और नियतिसे उपादानका हो तो दोनोंका समन्वय समानरूपसे हो सकता है।

परन्तु जब आप ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं’ या ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं’ इन सिद्धान्तोंके माननेवाले हैं तो कार्योत्पत्तिमें फिर इन पाँचके समवायकी आपकी दृष्टिमें क्या आवश्यकता है? और उक्त पाँचोंका समवाय कार्योत्पत्तिमें आपकी दृष्टिमें यदि उपयोगी है 'यानी कार्योत्पत्तिके लिए अनिवार्यरूपसे आवश्यक है तो फिर ‘सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं’ या 'सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं आपको इन मान्यताओंकी क्या स्थिति रह जाती है? इन विकल्पोंके आधारपर पूर्वमें हम काफी विस्तारके साथ विवेचन कर चुके हैं, कृपया उसपर गहराईके साथ विचार करें। आपने उपर्युक्त पाँच कारणोंका जो विवेचन किया है उसमें आपने यह स्पष्ट नहीं किया कि इन सबको आप उपचरित कारण मानते हैं या सभीको अनुपचरित कारण मानते हैं? अथवा कुछको उपचरित और कुछको अनुपचरित स्वीकार करते हैं-ये सभी बातें आपको स्पष्ट करनी थीं, परन्तु नहीं की। इनके विषयमें जितना कुछ विवेचन आपने किया उससे यह स्पष्ट नहीं होता है कि आप क्या कहना चाहते हैं? क्या कह रहे हैं? और क्यों कह रहे हैं? यदि आगे इन बातों पर आप विवेचन करें तो कृपया इन सब मुद्दोंको स्पष्ट करते हुए विवेचन करें ताकि गोरखधन्धा जैसी स्थिति समाप्त हो और आपका पक्ष हमें ठीक ठीक तरहसे उपर्युक्त पाँच कारणोंके विषयमें समझमें आवे। कृपया इनके बारेमें निश्चय नय और व्यवहार नय तथा इन नयोंके विषयभूत निश्चय और व्यवहारके विषयमें आपकी दृष्टि क्या है? यह भी स्पष्ट करें।

इन्हीं पाँच कारणोंके विवेचनके सिलसिलेमें आपने लिखा है कि ‘प्रत्येक द्रव्यका प्रत्येक कार्य उक्त पाँचोंके समवायकी अपेक्षा क्रम नियत होता है, अनियतक्रमसे नहीं होता ऐसे अनेकान्तको स्वीकार करना ही मोक्षमार्ग है।’

आपके इस कथनको पढ़कर हमें आश्चर्य तो हुआ ही, साथमें दुःख भी हुआ कि अनेकान्तकी जो परिभाषा इसमें आपने बतलायो है उसके बतलानेमें थोड़ा भी संकोच आपको नहीं हुआ । जैन संस्कृतिके योग्यतम विद्वान होते हुए भी क्या वास्तवमें अनेकान्तका ऐसा ही स्वरूप आपने समझ रक्खा है ? या फिर केवल अपनी मतपुष्टिके लिये जानबूझकर ऐसा लिख गये हैं । कृपया इसे भी स्पष्ट कीजिये कि ‘प्रत्येक द्रव्यका प्रत्येक कार्य उक्त पाँचोंके समवायकी अपेक्षा नियतक्रमसे होता है, अनियतक्रमसे नहीं होता’ इसमें अनेकान्त कैसे हो गया ? कारण कि अनेकान्तकी जो परिभाषा समयसारकी आत्मख्याति टीकाके आधार पर हम पूर्वमें बतला आये हैं उससे इसका मेल नहीं बैठता है । समयसारकी टीका आत्मख्यातिके अनुसार एक ही वस्तुमें उसके वस्तुत्वका प्रतिपादन करनेवाला परस्पर विरोधी शक्ति द्वयका प्रकाशन ही अनेकान्त माना गया है तो जिस प्रकारका अनेकान्त यहाँ पर प्रतिपादित किया है उसमें अनेकान्तका समयसारकी आत्मख्याति टीकावाला लक्षण घटित कैसे होता है ? कृपया विचार तो कीजिये ।

तात्पर्य यह है कि जैन संस्कृतिमें विधिरूप और निषेधरूप दो परस्पर विरोधी धर्म वस्तुके स्वीकार किये गये हैं । अब आप ही बतलाइये कि उपर्युक्त पाँच समवायोंमें तथा नियतक्रमसे होता है और अनियतक्रमसे नहीं होता इसमें कौनसे परस्पर विरोधी दो धर्मोंका वस्तुमें सद्भाव सिद्ध होता है । यहाँ तो प्रकारान्तरसे एक ही धर्मका अस्तित्व वस्तुमें सिद्ध होता है तो इसमें अनेकान्तता कैसे आ गयी ? यह बात आपको सोचना है । आपके लिखे अनुसार तो अनेकान्त बोगस सिद्धान्त मालूम देने लगता है जब कि वह अपने ढंग का महत्त्वपूर्ण अद्वितीय सिद्धान्त है ।

गोम्मटसार कर्मकाण्डमें काल, ईश्वर, आत्मा, नियति और स्वभावके विवेचनमें ईश्वरका अर्थ निमित्त कौन आधार पर आपने किया, इसी प्रकार श्री पं० बनारसीदासजीके पद्यमें ‘पूरब उदय’ इसका अर्थ निमित्त किस आधार पर आपने किया यह विचारणीय है । यह भी विचारणीय है कि ‘पूरब उदय’ शब्दको, जब कि यह कथन आत्माके विषयमें ही किया गया मालूम होता है तो आपने वस्तु सामान्यके कार्यकारणभावका अंग कैसे मान लिया ? स्वयं बनारसीदासजीने नंबर ४५ के पद्यमें इसका संकेत दिया है । वह पद्य निम्न प्रकार है-

निहचै अभेद अंग, उदै गुणको तरंग, उद्यमकी रीति लिये उद्धता सकती है ।
परजाई रूपकौ प्रवान सूच्छम सुभाव, कालकी सी ढाल परिणाम चक्रगति है ॥
याही भाँति आत्मद्रव्यके अनेक अंग, एक माने एकको न माने सो कुमति है ।
टेक डारि एकमें अनेक खोजे सो सुबुद्धि खोजी जीवें वादी मरै सांची कहवति है ॥४५॥

उक्त ४२वें पद्यमें बतलायी गयी पाँचों बातोंका क्या अर्थ है और उनका संबंध किससे किस रूपमें है यह बात इस पद्यसे अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती है । उक्त ४२वां पद्य कार्यकारणभावका प्रतिपादक नहीं है यह बात भी इस ४५ वें पद्यसे ज्ञात होती है ।

इसी प्रकार गोम्मटसार कर्मकाण्डमें क्रियावादी मिथ्यादृष्टियोंकी गणना करते हुए आचार्य श्री नेमिचन्द्रने काल, ईश्वर, आत्मा, नियति और स्वभाव इनमेंसे एक एक आधारसे कार्योत्पत्ति माननेवाले मिथ्यादृष्टियोंका कथन किया है. इस पर आपके द्वारा वह सिद्धान्त स्थिर किया मालूम देता है कि यदि ईश्वर आदि पाँचमेंसे एक एकसे कार्योत्पत्ति माननेवाले मिथ्यादृष्टि हैं तो इनके समवायसे कार्योत्पत्ति माननेका सिद्धान्त सही है । यही कारण है कि आप स्वभाव आदि पाँचके समवायको कार्योत्पत्तिमें कारण मान लेते हैं। और चूँकि जैन संस्कृतिमें ईश्वरको कर्ता नहीं माना गया है, अतः ईश्वरका अर्थ आप निमित्त कर लेते हैं और जब आप श्री पं० बनारसीदासजीके पद्यके साथ गोम्मटसारमें कहे गये स्वभाव आदि पाँचका समन्वय करते हैं तो और भी परिवर्तन इनके अर्थमें आपको करना अनिवार्य हो जाता है। फिर एक बात और विचारणीय हो जाती है कि कर्मकाण्डमें तो काल, ईश्वर, आत्मा, नियति और स्वभावके आगे अलगसे पौरुषवाद, दैववाद, संयोगवाद तथा लोकवाद आदिका कथन करते हुए नेमिचन्द्राचार्यने अन्तमें-

जावदिया वयणवहा तावदिया चेव होंति णयवादा।
जावदिया णयवादा तावदिया चेव होंति परसमया ॥८९४॥

अर्थ-जितने वचनके मार्ग हैं उतने ही नयवाद हैं और जितने नयवाद हैं उतने ही परसमय हैं।

आपने गोम्मटसार कर्मकाण्डमें आये हुए काल, ईश्वर, आत्मा, नियति और स्वभावका जो अर्थ किया है उनके विरुद्ध ही कालादिका अर्थ गोम्मटसार कर्मकाण्डमें किया गया है। कृपया गोम्मटसारके अर्थोंको आचार्य श्री नेमिचन्द्रके शब्दोंमें ही पढ़िये-

कालो सव्वं जणयदि कालो सव्वं विणस्सदे भूदं।
जागति हि सुत्तेसु वि ण सक्कदे वंचिदुं कालो ॥८७९४॥

अर्थ-काल ही सबको उत्पन्न करता है और काल ही सबका विनाश करता है। सोते हुयेको काल ही जगाता है इस तरह कालको ठगनेमें कौन समर्थ है?

अण्णाणी हु अणीसो अप्पा तस्स य सुहं च दुक्खं च।
सग्गं णिरयं गमणं सव्वं ईसरकयं होदि ॥८८०॥

अर्थ-आत्मा ज्ञान रहित है, अनाथ है अर्थात् कुछ भी करनेमें असमर्थ है, उस आत्माके सुख-दुःख, स्वर्ग तथा नरकमें गमन इत्यदि सब ईश्वर द्वारा किया हुआ ही होता है।

एक्को चेव महप्पा पुरिसो देवा य सव्ववावी य।
सव्वंगणिगूढो वि य सचेयणो णिग्गुणो परमो ॥८८१॥

अर्थ-संसारमें एक ही महान् आत्मा है, वही पुरुष है, वही देव है, वही सर्व व्यापी है, सर्वांगपने अगम्य है, सचेतन है, निर्गुण है और उत्कृष्ट है।

जत्तु जदा जेण जहा जस्स य णियमेण होदि तत्तु तदा।
तेण तहा तस्स हवे इदि वादो णियदिवादो दु ॥८८२॥

अर्थ-जो भी जब जिससे जैसे और जिसके नियमसे होता है वह तब उससे उसी प्रकार उसके होता है-इस तरह की मान्यताको नियतिवाद कहा जाता है।

को करइ कंटयाणं तिक्खत्तं मियविहंगमादीणं।
विविहत्तं तु सहावो इदि सव्वेवि य सहाओ त्ति ॥८८३॥

अर्थ-काँटोंको तीक्ष्ण कौन करता है, मृगादि पशुओं और पक्षी आदिके विविध भेदोंको कौन निर्मित करता है, इसका उत्तर एक ही है कि यह सब स्वभावसे ही होता है।

अब आप देखेंगे कि आपके अभिप्रायका समर्थन इन गाथाओंसे कदापि नहीं होता है। कृपया गंभीरता पूर्वक विचार करें।

‘जावदिया वयणवहा’ इत्यादि गाथा द्वारा परसमयोंकी जो गणना कर दी है इससे तो यह सिद्ध होता है कि आपके द्वारा केवल स्वभाव आदि पाँचके समवायमें कार्योत्पत्तिके प्रति कारणताको सीमित किया जाना युक्तिसंगत नहीं है ।

इस विवेचनका सार यह है कि गोम्मटसार कर्मकाण्डके कथनमें आचार्य श्री नेमिचन्दकी दृष्टि यह नहीं रही है कि ईश्वर आदि एक एकके आश्रयसे कार्योत्पत्ति माननेवाले मिथ्यादृष्टि हैं और इनके समवायसे कार्योत्पत्ति माननेवाले सम्यग्दृष्टि हैं । उनकी दृष्टि तो इस कथनमें सिर्फ इतनी है कि कौन पर समयवादी किस आधार पर कार्योत्पत्ति मानता है ? और उसकी वह मान्यता सही है या गलत है । एक बात और है कि यदि आचार्य श्री नेमिचन्दकी दृष्टि ईश्वर आदि पाँचके समवायसे कार्योत्पत्ति स्वीकार करनेकी होती तो वे अपने उक्त कथनमें ईश्वरवाद या आत्मवादको किसी भी प्रकार स्थान नहीं दे सकते थे, क्योंकि जैन संस्कृतिमें न तो ईश्वरको कार्योत्पत्तिमें कर्ता स्वीकार किया गया है और न समस्त कार्योंमें आत्माको ही कारण माना गया है ।

इस तरह हम देखते हैं कि स्वभाव आदि पाँचको कार्योत्पत्तिमें स्थान देने और उसका समर्थन आगमसे करनेमें आपको कितनी खींचातानी करनी पड़ी है और फिर भी आप अपने उद्देश्यमें असफल ही रहे हैं ।

यदि कार्यकारण व्यवस्थामें स्वभाव, पुरुषार्थ, काल, नियति और निमित्तका अर्थ निम्न प्रकार करें तो इनकी भी उपयोगिता हो सकती है, किन्तु पं० बनारसीदास जी के दोहेसे अथवा गोम्मटसार कर्मकाण्डसे इनका संबंध जोड़ना उचित नहीं है । इनमें से स्वभावका अर्थ वस्तुकी स्वतःसिद्ध परिणमन शक्ति लेना चाहिये, क्योंकि यदि वस्तुको स्वतःसिद्ध परिणमन स्वभाववाली नहीं माना जायगा तो फिर कोई भी अन्य वस्तु उसमें परिणमन करानेमें सर्वदा असमर्थ ही रहेगी । इसी प्रकार नियतिके विषयमें यह निर्णय करना चाहिये कि प्रत्येक वस्तुका परिणमन इस रूपसे नियत होता है कि प्रत्येक वस्तुसे सभी वस्तुओंमें होनेवाले सभी परिणमन उत्पन्न नहीं होते हैं, प्रत्येक वस्तुके परिणमनोंकी मर्यादा नियत है अर्थात् अमुक वस्तुमें अमुक-अमुक प्रकारका ही परिणमन होगा और अमुक प्रकारका परिणमन कदापि नहीं होगा । कालके विषयमें यह है कि जब भी कार्योत्पत्ति होगी तो वह क्रमसे ही होगी । कारण कि एक ही वस्तुमें एक ही आधार पर एक साथ दो पर्यायें कभी उत्पन्न नहीं होती हैं । पुरुषार्थ शब्द कार्योत्पत्तिमें आत्माके प्रयत्न करनेका सूचक है और निमित्तसे उस-उस कार्यके अपने अपने उपादानसे अतिरिक्त सहयोगियोंका अर्थ बोध होता है । इस तरह कार्योत्पत्तिमें इन पाँचकी आवश्यकताका मूल्य है, लेकिन जितने स्वप्रत्यय परिणमन होते हैं उनकी उत्पत्तिमें तो स्वभाव, नियति और काल (क्रम) इन तीनकी ही आवश्यकता रहती है और स्वपरप्रत्यय परिणमनोंमेंसे किन्हीं-किन्हीं स्वपरप्रत्यय परिणमनोंमें तो स्वभाव, नियति, काल, (क्रम) और निमित्त (सहयोगी) इन चारकी तथा किन्हीं-किन्हीं स्वपर प्रत्यय परिणमनोंमें स्वभाव, नियति, काल (क्रम), निमित्त (सहयोगी) और पुरुषार्थ ( आत्मप्रयत्न ) इन पाँचोंकी भी आवश्यकता रहती है । आशा है आप कार्यकारणभावके इस सम्पूर्ण विवेचन पर गम्भीरताके साथ विचार करेंगे ।

इस प्रकार आपके द्वितीय दौरके प्रपत्र पर हमने विस्तारसे सर्वांगीण विचार किया है । यद्यपि इससे लेखका कलेवर अवश्य बढ़ गया है, परन्तु जब दोनों पक्षोंके सामने सत्यार्थ तत्त्वको फलित करनेका ही लक्ष्य है तो लेखका कलेवर बढ़ जाना अखरनेवाली बात नहीं है ।

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मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका ५

मूल प्रश्न ५-द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं या अनियत क्रमसे भी ?

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग १/८)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ २४९ से २६४

↑ सूची


प्रतिशंका ३ का समाधान

प्रथम उत्तरमें इस प्रश्नका समाधान हमने दो प्रकारसे किया है-एक तो केवलज्ञानकी अपेक्षा और दूसरे आगममें स्वीकृत उपादानके सुनिश्चित लक्षणकी अपेक्षा। इन दोनों अपेक्षाओंसे समाधान करते हुए यह सिद्ध कर आये है कि द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं। साथ ही इसे आलम्बन बनाकर प्रतिशंका २ में विरोधस्वरूप जो प्रमाण और तर्क उपस्थित किये गये हैं उनका भी सांगोपांग विचार उसके उत्तरमें कर आये हैं। तत्काल प्रतिशंका ३ के आधारसे विचार करते हैं-

\१. अपर पक्ष द्वारा प्रत्येक कार्यका स्वकालमे होना स्वीकार

इसका प्रारंभ करते हुए अपर पक्षने सर्व प्रथम हमारे द्वारा प्रथम और द्वितीय उत्तरमें उल्लिखित जिन पाँच आगमप्रमाणोंके आधारसे यह स्वीकार कर लिया है कि ‘प्रत्येक कार्य स्वकालमें ही होता है’ इसकी हमें प्रसन्नता है। हमें विश्वास है कि समग्र जैन परम्परा इसमें प्रसन्नताका अनुभव करेगी, क्योंकि ‘प्रत्येक कार्य स्वकालमें ही होता है’ यह तथ्य एक ऐसी वास्तविकता है जो जैनधर्म और वस्तुव्यवस्थाका प्राण है। इसे अस्वीकार करनेपर न तो केवलज्ञानकी सर्वज्ञता ही सिद्ध होती है और न ही वस्तुव्यवस्थाके अनुरूप कार्य-कारणपरम्परा ही सुघटित हो सकती है। अपर पक्षने प्रतिशंका ३ में जिन शब्दों द्वारा स्वकालमें कार्यका होना स्वीकार किया है वे शब्द इस प्रकार हैं-

'यह हम मानते हैं कि जिनेन्द्रदेवको केवलज्ञानके द्वारा प्रत्येक कार्यके उत्पन्न होनेका समय मालूम है। कारण कि केवलज्ञानमें विश्वके सम्पूर्ण पदार्थोंकी त्रिकालवर्ती समस्त पर्यायोंका केवलज्ञानी जीवोंको युगपत् ज्ञान करानेकी सामर्थ्य जैनसंस्कृति द्वारा स्वीकार की गई है। उसी आधार पर यह बात भी हम मानते हैं कि प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति उसी कालमें होती है जिस कालमें उसकी उस उत्पत्तिका होना केवलज्ञानी जीवके केवलज्ञानमें प्रतिभासित हो रहा है।

\२. केवलज्ञान ज्ञापक है कारक नहीं

साथ ही उक्त तथ्यकी स्वीकृतिके बाद अपर पक्षकी ओरसे जो यह भाव व्यक्त किया गया है कि-

‘परन्तु किसी भी कार्यकी उत्पत्ति जिस कालमें होती है उस कालमें वह इस आधार पर नहीं होती है कि उस कालमें उस कार्यकी उस उपत्तिका होना केवलज्ञानीके ज्ञानमें प्रतिभासित हो रहा है, क्योंकि वस्तुकी जिस कालमें जैसी अवस्था हो उस अवस्थाको जानना मात्र केवलज्ञानका कार्य है, उस कार्यका होना केवलज्ञानका कार्य नहीं है।’

सो यह कथन भी आगम परम्पराके अनुरूप होनेसे स्वीकार करने योग्य है, किन्तु अपर पक्षके इस कथनमें इतना हम और जोड़ देना चाहेंगे कि-‘जिस प्रकार जिस कालमें जो कार्य होता है उसे केवलज्ञान यथावत् जानता है उसी प्रकार उसकी कारक सामग्रीको भी वह जानता है।’ केवलज्ञान किसी कार्यका कारक न होकर ज्ञापकमात्र है इसमें किसीको विवाद नहीं। अपर पक्षने केवलज्ञान ज्ञापक है इस अभिप्रायकी पुष्टिमें 'जैनतत्त्वमीमांसा’के केवलज्ञान स्वभाव मीमांसा प्रकरणका उल्लेख उपस्थित किया है सो उस उल्लेखसे भी इसी अभिप्रायकी पुष्टि होती है। अस्तु,

\३. कारकसाकल्यमें पाँचका समवाय स्वीकृत है

आगे प्रतिशंका ३ में हमारे पिछले उत्तरोंके आधारपर जो यह भाव व्यक्त किया गया है कि हम केवल स्वकालके प्राप्त होनेपर ही सभी कार्योंकी उत्पत्ति मानते हैं सो हमारे उन उत्तरोंसे ऐसा निष्कर्ष फलित करना ठीक नहीं है, क्योंकि मूल प्रश्नमें ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं या अनियतक्रमसे भी ?’ यह पृच्छा की गई थी और उसीके उत्तरस्वरूप पिछलेउत्तरों द्वारा असंदिग्धरूपसे यह सिद्ध किया गया है कि ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत (निश्चित) क्रमसे ही होती हैं, अनियत (अनिश्चित) क्रमसे त्रिकालमें नहीं होतीं।’ अतएव प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति अपने अपने स्वकालके प्राप्त होनेपर होती हुई भी कारकसाकल्यसे ही होती है ऐसा यहाँ समझना चाहिए। हमने कार्योत्पत्तिका कारण केवल स्वकालको न तो कहीं लिखा है और न है भी। जिस प्रकार अन्य उपादान-निमित्त सामग्री कार्योत्पत्तिमें स्वीकार की गई है उसी प्रकार उसमें स्वकालको भी उस (सामग्री) का अभिन्न अंग होनेसे स्थान मिला हुआ है, इतना ही हमारा कहना है। जैनतत्त्वमीमांसा पृ० ६५-६६ में इसका स्पष्ट रूपसे विवेचन किया गया है जो प्रकृतमें उपयोगी होनेसे यहाँ उद्धृत किया जाता है-

'साधारण नियम यह है कि प्रत्येक कार्यकी उत्पत्तिमें ये पाँच कारण नियमसे होते हैं-स्वभाव, पुरुषार्थ, काल, नियति और कर्म ( परपदार्थकी अवस्था )। यहाँ पर स्वभावसे द्रव्यकी स्वशक्ति या नित्य उपादान लिया गया है, पुरुषार्थसे उसका बल-वीर्य लिया गया है, कालसे स्वकालका ग्रहण किया है, नियतिसे समर्थ उपादान या निश्चयकी मुख्यता दिखलाई गई है और कर्मसे निमित्तका ग्रहण किया है। इन्हीं पाँच कारणोंको सूचित करते हुए पण्डितप्रवर बनारसीदास जी नाटकसमयसार सर्वविशुद्धिज्ञानाधिकारमें कहते हैं-

पदसुभाव पूरव उदै निहचै उद्यम काल । पच्छपात मिथ्यात पथ सरवंगी शिवचाल॥

गोम्मटसार कर्मकाण्डमें पाँच प्रकारके एकान्तवादियोंका कथन आता है। उसका आशय इतना ही है कि जो उनमेंसे किसी एकसे कार्यकी उत्पत्ति मानता है वह मिथ्यादृष्टि है और जो कार्यकी उत्पत्तिमें इन पाँचोंके समवायको स्वीकार करता है वह सम्यग्दृष्टि है। पण्डितप्रवर बनारसीदासजीने उक्त पदद्वारा इसी तथ्यकी पुष्टि की है। अष्टसहस्री पृ० २५७ में भट्टाकलंकदेवने एक श्लोक दिया है। उसका भी यही आशय है।

श्लोक इस प्रकार है-

तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायश्च तादृशः।
सहायास्तादृशाः सन्ति यादृशी भवितव्यता॥

जिस जीवकी जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है उसकी वैसी ही बुद्धि हो जाती है। वह प्रयत्न भी उसी प्रकारका करने लगता है और उसके सहायक भी उसीके अनुसार मिल जाते हैं। इस श्लोकमें भवितव्यताको मुख्यता दी गई है। भवितव्यता क्या है ? जीवकी समर्थ उपादान शक्तिका नाम ही तो भवितव्यता है। भवितव्यताकी व्युत्पत्ति है-भवितुं योग्यं भवितव्यं तस्य भावः भवितव्यता। जो होने योग्य हो उसे भवितव्य कहते हैं और उसका भाव भवितव्यता कहलाती है। जिसे हम योग्यता कहते हैं उसीका दूसरा नाम भवितव्यता है। द्रव्यकी समर्थ उपादान शक्ति कार्यरूपसे परिणत होनेके योग्य होती है इसलिये समर्थ उपादन शक्ति, भवितव्यता और योग्यता ये तीनों एक ही अर्थको सूचित करते हैं। कहीं-कहीं अनादि या नित्य उपादानको भी भवितव्यता या योग्यता शब्द द्वारा अभिहित किया गया है सो प्रकरणके अनुसार उसका उक्त अर्थ करनेमें भी कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि भवितव्यतासे उक्त दोनों अर्थ सूचित होते हैं। उक्त श्लोकमें भवितव्यताको प्रमुखता दी गई है और साथमें व्यवसाय-पुरुषार्थ तथा अन्य सहायक सामग्रीका भी सूचन किया है सो इस कथन द्वारा उक्त पाँचों कारणोंका समवाय होने पर कार्यकी सिद्धि होती है यही सूचित होता है, क्योंकि स्वकाल उपादानकी विशेषता होनेसे भवितव्यतामें गर्भित है ही।’

कारकसाकल्यके होने पर कार्य होता है इस तथ्यकी पुष्टि करनेवाला यह जैनतत्त्वमीमांसाका उल्लेख है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि हम यह कभी भी स्वीकार नहीं करते कि केवल स्वकालसे कार्यकी उत्पत्ति होती है। हाँ स्वकालको कारण रूपसे स्वीकार करनेमें अपर पक्ष अवश्य ही हीला-हवाला करता आ रहा है, जैसा कि उसका यह अभिप्राय प्रतिशंका २ से स्पष्ट ज्ञात होता है। अब उसकी ओरसे स्वकालको भी एक कारणके रूपमें प्रतिशंका ३में स्वीकार कर लिया गया है जो इष्ट है।

यहाँ पर हम यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अपर पक्षने प्रतिशंका ३ में स्वामिकार्तिकेयके ‘जं जस्स’ इत्यादि कारिकाओंका तथा भैया भगवतीदासके ‘जो जो देखी’ इत्यादि दोहेका जो आशय व्यक्त किया है वह हमारे उक्त कथनके अनुरूप होनेसे हमें मान्य है। इससे हमें आशा है कि उसकी ओरसे प्रतिशंका २ में ‘जं जस्स’ इत्यादि कारिकाओंका जो विपरीत आशय व्यक्त किया गया है उससे वह विरत हो जायगा।

\४. अलंघ्यशक्ति पदका वास्तविक अर्थ

इसी प्रसंगमें यह स्पष्ट कर देना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि अपर पक्षने ‘अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं’ इत्यादि श्लोकमें पठित ‘अलंघ्यशक्तिः’ पदका अर्थ करते हुए जो कुछ भी लिखा है वह पढ़नेमें सुहावना लगते हुए भी विचारणीय है। बात यह है कि-प्रत्येक कार्यके प्रति प्रति समय कारकसाकल्यका सहज योग जैनदर्शनमें स्वीकार किया गया है, इसलिये यह तो प्रश्न ही नहीं उठता कि अन्तरंग-बहिरंग सामग्री किसीके आधीन होकर कार्यके प्रति कारण होती है। जिसे भवितव्यता कहते हैं वह उस सामग्रीसे सर्वथा भिन्न हो ऐसा नहीं है। अपर पक्ष वस्तुमें विद्यमान कार्योत्पत्तिकी आधारभूत स्वतःसिद्ध योग्यतारूपसे जिस भविव्यताका उल्लेख करता है वह सामान्यरूपसे द्रव्यशक्तिके सिवाय और क्या हो सकती है अर्थात् उसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं हो सकती। किन्तु ऐसी द्रव्यशक्ति जब भिन्न-भिन्न पर्यायशक्तिसे युक्त होकर पृथक्-पृथक् समर्थ या निश्चय उपादान संज्ञाको प्राप्त होती है तब बहिरंग सामग्रीको निमित्तकर नियमसे विवक्षित कार्यको उत्पन्न करती है। कार्यकारणपरंपराका प्रवाह प्रत्येक समयमें अनादिकालसे इसी क्रमसे चला आ रहा है और अनंतकाल तक चलता रहेगा। यहाँ न तो कारण कार्यके आधीन है और न कार्य कारणके आधीन है। यह वस्तु स्वभाव है कि ‘ऐसा होने पर ऐसा होता है।’ इसीको जैनदर्शनमें कारण-कार्य परम्पराके रूपमें स्वीकार किया गया है, क्योंकि किसीको किसीके आधीन माननेपर वस्तुका स्वतःसिद्ध स्वरूप विघटित हो जाता है, जो युक्त नहीं है, अतएव ‘अलंघ्यशक्तिः’ पदको लक्ष्यमें रखकर भट्टाकलंकदेवके उल्लेखानुसार जो यह अर्थ किया जाता है कि जैसी भवितव्यता होती है अर्थात् जब जैसी पर्यायशक्ति युक्त द्रव्यशक्ति होती है उस कालमें उसीके अनुरूप कार्य करनेका विकल्प होता है, व्यवसाय भी उसीके अनुरूप होता है और निमित्त भी वैसे ही मिलते हैं। सो जहाँ ऐसा अर्थ करना संगत है वहाँ उक्त पदको ध्यानमें रखकर ‘अलंघ्यशक्तिः’ इत्यादि पदके अनुसार यह अर्थ करना भी संगत है कि हेतुद्वयसे जो कार्य उत्पन्न होता है वह इस बात का सूचक है कि वह कार्य द्रव्यस्वभावको लांघकर कभी भी नहीं हो सकता। कार्यमें उसकी मर्यादाका उल्लंघन होना त्रिकालमें अशक्य है यह अटल सिद्धान्त है। दोनों अर्थ अपनेमें स्पष्ट हैं और अपनी अपनी जगह ठीक हैं।

अपर पक्षने जहाँ ‘भवितव्यता’ पदके अर्थका स्पष्टीकरण किया है वहाँ वह यदि इसके साथ यह स्पष्ट कर देता कि इस पद द्वारा वह किसको ग्रहण कर रहा है-द्रव्यशक्तिको या पर्यायशक्तिको या दोनोंको तो बहुत संभव था कि उसे भाषा प्रयोगकी जटिलतामें प्रवेश किये बिना ‘अलंघ्यशक्तिः’ इत्यादि पदके अर्थको स्पष्ट करनेमें सुगमता जाती। अस्तु, इससे प्रकृतमें उक्त पदका अर्थ जो अभिप्रेत है उसका सहज ज्ञान हो जायगा।

\५. प्रत्येक कार्यमें अन्तरंग-बहिरंग सामग्रीकी स्वीकृति

प्रत्येक समयमें जो भी कार्य होता है उसमें बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रताका होना अनिवार्य है। इसमें स्वकाल, भवितव्यता आदि सबका परिग्रह हो जाता है। किसी कारणकी प्रधानता और अप्रधानता विवक्षामें होती है, कार्यमें नहीं। कार्यके प्रति तो जिसकी जिस रूपमें ( उपचरित या अनुपचरित रूपमें ) कारणता है उसका वहाँ उस रूपमें होना अनिवार्य है। तभी कार्यके प्रति अन्तरंग-बहिरंग कारणोंकी समग्रता मानी जा सकती है। अतएव हमारा सिद्धान्त बतलाकर अपर पक्षने जो यह लिखा है कि-

‘चूँकि आपका सिद्धान्त कार्योत्पत्तिके स्वकालको अर्थात् जिस कालमें उत्पन्न होता है उस कालको प्रधान कारण माननेका है अर्थात् आप कहना चाहते हैं कि कार्योत्पत्तिका काल आ जाने पर ही कार्योत्पत्ति हुआ करती है।’ सो अपर पक्षका यह कहना ठीक प्रतीत नहीं होता, क्योंकि कथनके समय प्रयोजन विशेषको ध्यानमें रखकर किसी कार्यमें भले ही किसी एक कारणको मुख्यता और दूसरे कारणोंको गौणता प्रदान की जाय, परन्तु कार्यके प्रति जितने भी कारण हैं उन सबका अपने-अपने रूपमें होना आवश्यक है। वस्तुतः अपर पक्षकी ओर से मूल प्रश्न जिस प्रकारका उपस्थित किया गया था उसीको ध्यानमें रखकर पूर्वमें उस प्रश्नका उत्तर दिया गया और इस कारण स्वकालके विवेचनकी मुख्यता हो गई यह बात दूसरी है। अतएव अपर पक्षके द्वारा हमारा सिद्धान्त बतलाकर न तो कार्यके प्रति स्वकालकी मुख्यताका लिखा जाना ही ठीक है और न ही अपना सिद्धान्त बतलाकर यह लिखना ही ठीक है कि-

‘और हमारा सिद्धान्त कालको तो कार्योत्पत्तिमें प्रधानता नहीं देता है, किन्तु यदि कार्य केवल अन्तरंग हेतु-उपादान कारणसे उत्पन्न होनेवाला हो तो वहाँ अन्तरंग हेतुको ही प्रधानता देता है और कार्य यदि अन्तरंग और बहिरंग ( उपादान और निमित्त ) दोनों कारणोंसे उत्पन्न होनेवाला हो तो वहाँ उपादान और निमित्त दोनोंको ही प्रधानता देता है। अर्थात् कार्योत्पत्ति तो अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही होती है लेकिन जिस कालमें वह होती है वही उसका स्वकाल कहलाने लगता है।’

क्योंकि जैसा कि हम पूर्वमें लिख आये हैं कि किसी भी कार्यके प्रति किसी भी कारणकी प्रधानता और अप्रधानता नहीं हुआ करती। प्रत्येक कार्यके प्रति काल भी एक कारण है, अतएव जिस प्रकार उसके प्रति अन्य निमित्तोंकी यथायोग्य कारणता मानी गई है उसी प्रकार कालको भी कारण मानना आगम संगत है। ‘किसी कालमें कोई कार्य हुआ’ मात्र इतना अर्थ यहाँ विवक्षित नहीं है, किन्तु प्रत्येक कार्यमें व्यवहारसे बलाधायक रूपसे कालकी हेतुकर्तृता आगममें स्वीकार की गई है। यतः प्रत्येक द्रव्य पर्यायरूपसे ही निमित्त होता है अतएव कालको भी इसी रूपमें निमित्त मानना चाहिये और ऐसी अवस्थामें अपने-अपने समयमें होनेवाले कार्योंका उस-उस कालके साथ योग बनता जाता है और इस प्रकार सभी द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें अपने-अपने कालमें नियत क्रमसे ही होती हैं यह सिद्ध हो जाता है।

इस प्रकार उक्त तथ्यके सिद्ध हो जाने पर यहाँ इस बातका विचार करना है कि क्या कोई ऐसे भी कार्य हैं जो मात्र अंतरंग (उपादान) कारणसे उत्पन्न होते हैं, क्योंकि अपर पक्षका पूर्वमें जो उल्लेख उपस्थित कर आये हैं उसमें स्पष्ट शब्दों द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि जो कार्य केवल अंतरंग हेतु-उपादानकारणसे उत्पन्न होते हैं उनमें केवल अंतरंग हेतुकी प्रधानता है, इसलिए प्रकृतमें इस बातका सांगोपांग विचार करना आवश्यक हो जानेसे इसपर विशेष प्रकाश डाला जाता है-

\६. निश्चयनयसे कर्ता-कर्मकी व्यवस्था

यह तो सुविदित सत्य है कि जैनदर्शनमें छह द्रव्य स्वीकार किये गये हैं-जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, काल और आकाश। इन छहों द्रव्योंमें समानरूपसे घटित हो ऐसे लक्षणको स्वीकार करते हुए सब द्रव्योंका लक्षण ‘सत्’ किया है-‘सद् द्रव्यलक्षणम्’ ( त० सू०, अ ५ सू० २९ )। सत् किसे कहा जाय इसका स्पष्टीकरण करते हुए बतलाया है कि जो स्वभावसे उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यरूप हैं वह सत् है-‘उत्पाद-व्यय-ध्रौव्ययुक्तं सत्’ ( त० सू०, अ० ५ सू० ३० )। दूसरे शब्दोंमें इसी बातको स्पष्ट करते हुए लिखा है कि जो गुण-पर्यायवाला है वह द्रव्य है-‘गुण-पर्ययवद् द्रव्यम्’ ( त० सू०, अ ५ सू० ३८ )। इस प्रकार प्रत्येक द्रव्य जहाँ स्वभावसे ध्रौव्य है वहाँ वह उत्पाद-व्ययस्वभाववाला भी है यह सिद्ध होता है।

इस प्रकार उक्त लक्षणवाले सब द्रव्योंके सिद्ध हो जानेपर उनके उत्पाद और व्ययको लक्ष्यमें रखकर लिखा है कि प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें अपने ध्रौव्य स्वभावको लिये हुए स्वभावसे उत्पाद-व्यय पर्यायरूपसे परिणमता है। पर्यायरूपसे उसका उत्पाद-व्ययरूपसे परिणमना यह उसका स्वतःसिद्ध स्वरूप है, इसलिए कार्य-कारणकी दृष्टिसे विचार करने पर अपनी प्रत्येक पर्यायका वह स्वयं कर्ता है और वह स्वयं कर्म है। न तो अन्य कोई उसका कर्ता है और न अन्य कोई उसका कर्म है। यह निश्चयपक्ष है। आगममें इसीकी ‘भूतार्थ’ संज्ञा है। ‘भूतार्थ’ पदका अर्थ करते हुए मूलाचारके पञ्चाचाराधिकारकी गाथा ६ की टीकामें लिखा है-

भूदत्थेण-भूतश्चासावर्थश्च भूतार्थस्तेन। यद्यप्ययं भूतशब्दः पिशाच-जीव-सत्य-पृथिव्याद्यनेकार्थे वर्तते तथाप्यत्र सत्यवाची परिगृह्यते। तथार्थशब्दो यद्यपि पदार्थ-प्रयोजन-स्वरूपाद्यर्थे वर्तते तथापि स्वरूपार्थे वर्तमानः परिगृहीतः, अन्यार्थवाचकेन प्रयोजनाभावात्। भूतार्थेन सत्यरूपेण याथात्म्येन।

भूतार्थरूपसे-भूत जो अर्थ भूतार्थ, उस रूपसे । यद्यपि यह ‘भूत’ शब्द पिशाच, जीव, सत्य और पृथ्वी आदि अनेक अर्थोंमें विद्यमान है तथापि यहाँ पर ‘सत्यवाची’ भूत शब्दका ग्रहण किया है । तथा ‘अर्थ’ शब्द यद्यपि पदार्थ, प्रयोजन, और स्वरूप आदि अनेक अर्थोंमें विद्यमान है तथापि ‘स्वरूप’ अर्थमें लिया गया है, क्योंकि अन्य अर्थके वाचक उक्त शब्दोंका प्रकृतमें योजन नहीं है । भूतार्थसे अर्थात् सत्यस्वरूपसे अर्थात् यथार्थरूपसे ।

इस प्रकार मूलाचारके उक्त विवेचनसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि निश्चयनयसे की गई कर्ता-कर्मकी प्ररूपणा सत्यस्वरूप अर्थात् यथार्थ है । इसी प्रकार निश्चयनयसे की गई करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरणकी प्ररूपणाको भी यथार्थ ही जानना चाहिए ।

ऐसी प्ररूपणामें जब अभेदकी विवक्षा रहती है तब वह द्रव्यार्थिकरूप निश्चयनयकी प्ररूपणा कहलाती है और जब कर्ता-कर्मरूपसे भेदकी विवक्षा होती है तब उसीको पर्यायार्थिक निश्चयनयकी प्ररूपणा कहते हैं । यतः यह प्ररूपणा एक द्रव्यके आश्रयसे होनेवाली परमार्थरूप प्ररूपणा है अतः भेद विवक्षामें कर्मकी अपेक्षा कर्ता और कर्ताकी अपेक्षा कर्म ऐसा व्यवहार करने पर यही सद्भूतव्यवहारकी प्ररूपणा कहलाती है ।

भगवान् कुन्दकुन्दने समयसारमें एक द्रव्यके आश्रयसे कर्ता-कर्मकी सिद्धि करते हुए लिखा है-

ण कुदोचि वि उप्पण्णो जम्हा कज्जं ण तेण सो आदा ।
उप्पादेदि ण किंचि वि कारणमवि तेण ण सो होइ ॥३१०॥
कम्मं पडुच्च कत्ता कत्तारं तह पडुच्च कम्माणि ।
उप्पज्जंति य णियमा सिद्धी दु ण दीसए अण्णा ॥३११॥

इन दोनों गाथाओंकी अर्थप्ररूपणा करते हुए पण्डितप्रवर जयचन्दजी लिखते हैं-

जिस कारण वह आत्मा किसीसे भी नहीं उत्पन्न हुआ है इससे किसीका किया हुआ कार्य नहीं है और किसी अन्यको भी उत्पन्न नहीं करता इसलिए वह किसीका कारण भी नहीं है, क्योंकि कर्मको आश्रय कर तो कर्ता होता है और कर्ताको आश्रय कर कर्म उत्पन्न होते हैं ऐसा नियम है, अन्य तरह कर्ता-कर्मकी सिद्धि नहीं देखी जाती ॥३१०-३११॥

इन गाथाओंके भावार्थमें वे लिखते हैं-

सब द्रव्योंके परिणाम जुदे-जुदे हैं । अपने-अपने परिणामोंके सब कर्ता हैं । वे उनके कर्ता हैं, वे परिणाम उनके कर्म हैं । निश्चयकर किसीका किसीसे भी कर्ता-कर्मसम्बन्ध नहीं है । इस कारण जीव अपने परिणामोंका कर्ता है, अपना परिणाम कर्म है । इसी तरह अजीव अपने परिणामोंका कर्ता है, अपना परिणाम कर्म है । इस तरह जीव अन्यके परिणामोंका अकर्ता है ।

इस प्रकार प्रत्येक द्रव्यमें जो निश्चयसे परमार्थभूत कर्ता, कर्म आदिकी व्यवस्था है वह अपने-अपने स्वरूपको लिये हुए स्वतःसिद्ध है, क्योंकि किसी एक धर्मी या धर्म, कर्ता या कर्म आदिका स्वरूप परस्परकी अपेक्षासे हो ऐसा नहीं है । यदि वह स्वतःसिद्ध न माना जाय तो उनमें धर्मकी अपेक्षा धर्मी और धर्मीकी अपेक्षा धर्म या कर्ताकी अपेक्षा कर्म या कर्मकी अपेक्षा कर्ता आदि रूप व्यवहार नहीं बन सकता है । अतः इनके स्वरूपको स्वतःसिद्ध स्वीकार करके ही इनके व्यवहारको परस्पर सापेक्ष जानना चाहिए । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य विद्यानन्दि अष्टसहस्री पृ० २३३ में लिखते हैं-

न हि कर्तृस्वरूपं कर्मापेक्षं कर्मस्वरूपं वा कर्त्रपेक्षम्, उभयासत्त्वप्रसंगात् नापि कर्तृत्वव्यवहारः कर्मत्वव्यवहारो वा परस्परानपेक्ष्यः, कर्तृत्वस्य कर्मनिश्चयावसेयत्वात्, कर्मत्वस्यापि कर्तृप्रतिपत्तिसमधिगम्यमानत्वात् ।

कर्ताका स्वरूप कर्मसापेक्ष नहीं है। इसी प्रकार कर्मका स्वरूप कर्तासापेक्ष नहीं है, क्योंकि ऐसा होनेपर दोनोंके अभावका प्रसंग आता है। परन्तु कर्तृत्वव्यवहार और कर्मत्वव्यवहार परस्पर निरपेक्ष भी नहीं है, क्योंकि कमंके निश्चय पूर्वक कर्तृत्वका ज्ञान होता है और कर्ताके ज्ञान पूर्वक कर्मत्वका ज्ञान होता है।

इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर आचार्य विद्यानन्दिने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० ५ सू० १६ में यह वचन लिखा है-

कथमपि तन्निश्चयनयात्सर्वस्य विस्रसोत्पादव्ययध्रौव्यव्यवस्थितेः ।

कैसे भी उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यको स्वीकार करनेवाले निश्चयनयकी अपेक्षा सभी द्रव्योंमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यकी विस्रसा अवस्थिति है।

आचार्य अमृतचन्द्रने समयसार गाथा ८६ की टीकामें कर्ता, कर्म और क्रियाके यथार्थ स्वरूपपर जो प्रकाश डाला है वह इसी दृष्टिसे ही। वे लिखते हैं-

यः परिणमति स कर्ता यः परिणामो भवेत्तु तत्कर्म।
या परिणतिः क्रिया सा त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया ॥५१॥

जो परिणमता है वह कर्ता है, जो परिणाम है वह कर्म है और जो परिणति है वह क्रिया है। ये तीनों ही वस्तुपनेसे भिन्न नहीं हैं ॥५१॥

यह निश्चयसे कर्ता कर्मकी व्यवस्था है।

\७. दो प्रश्न और उनका समाधान

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जानेपर कि कर्ता और कर्म ये स्वरूपसे स्वतःसिद्ध होने पर भी इनका व्यवहार परस्पर सापेक्ष होता है, प्रकृतमें यह विचार करना है कि दो द्रव्योंके आश्रयसे जो कर्ता और कर्मकी प्ररूपणा आगममें की गई है वह भी क्या उक्त प्रकारसे निश्चय और सद्भूतव्यवहार संज्ञाको प्राप्त होती है या उसे स्वीकार करनेका कोई अन्य प्रयोजन है। साथ ही दो द्रव्योंके आश्रयसे उक्त प्रकारकी प्ररूपणा जो आगममें उपलब्ध होती है वह किन-किन द्रव्योंपर किस-किस प्रकार लागू होती है इसका भी प्रकृतमें विचार करना है, क्योंकि अपर पक्ष सब द्रव्योंके षट्स्थानपतित हानि-वृद्धि कार्यमें दो द्रव्योंके आश्रयसे कर्ता, कर्मकी व्यवस्थाको स्वीकार न कर मात्र एक द्रव्यके आश्रयसे ही उसे स्वीकार करता है। ये दो प्रश्न हैं जिनपर यहाँ क्रमशः सांगोपांग विचार किया जाता है-

\१. जैसा कि हम पूर्वमें कई प्रमाण देकर स्पष्ट कर आये हैं उनसे विदित होता है कि प्रत्येक द्रव्यमें कर्ता-कर्म आदि धर्म स्वरूपसे स्वतःसिद्ध हैं। जिस प्रकार जीव द्रव्यमें ये स्वरूपसे स्वतःसिद्ध हैं उसी प्रकार पुद्गलादि द्रव्योंमें भी जानना चाहिए। दो द्रव्योंकी तो बात छोड़िये, एक ही द्रव्यमें इन धर्मोंका स्वरूप एक-दूसरेकी अपेक्षासे सिद्ध होता है इसे आगम स्वीकार नहीं करता। इसी कारण इन धर्मोंको आचार्य अमृतचन्द्रने वस्तुपनेसे अभिन्न कहा है।

\२. फिर भी एक ही वस्तुमें कर्ताधर्मके स्वीकार करने पर किसका कर्ता यह जिज्ञासा होती है और इसी प्रकार उसी वस्तुमें कर्मधर्मको स्वीकार करने पर किसका कर्म यह जिज्ञासा होती है, इसलिये आगममें इनका व्यवहार परस्पर सापेक्ष बतलाया गया है।

\३. वस्तुस्थिति यह है कि ये कर्ता आदि धर्म प्रत्येक वस्तुमें एकाश्रयवृत्ति होनेके कारण तथा धर्मी और धर्मकी एक सत्ता होनेके कारण पृथक्-पृथक् उपलब्ध नहीं होते, इसलिये तो अभेद है और संज्ञा, लक्षण तथा प्रयोजन आदिकी अपेक्षा भेद है। यहाँ अभेद विवक्षामें ‘यः करोति स कर्ता’ इस प्रकार जीवादि-द्रव्य अपने कार्योंके स्वयं कर्तारूपसे प्रसिद्धिको प्राप्त होते हैं और भेद विवक्षामें ‘येन क्रियते तत्करणम्’ इस प्रकार अपने-अपने सब कार्योंका करणधर्म भेदरूपसे प्रसिद्धिको प्राप्त होता है। इसी प्रकार अन्य धर्मोंके सम्बन्धमें भी यथायोग्य उनका स्वरूप घटित कर लेना चाहिए ।

\४. यह सब कथन परकी अपेक्षा लगाये विना वस्तु स्वरूपका उद्घाटन करनेवाला होनेसे अभेद विवक्षामें द्रव्यार्थिक निश्चयसंज्ञाको और भेद विवक्षामें उस-उस धर्मकी अपेक्षा पर्यायार्थिक निश्चयसंज्ञाको प्राप्त होता है। यतः द्रव्यार्थिक निश्चयकी दृष्टिमें पर्यायार्थिक निश्चय भी व्यवहार है, इसलिए यह व्यवहार सद्भूत होनेसे सद्भूत व्यवहार संज्ञाको प्राप्त होता है।

\५. यह वस्तुस्थिति है। इसके प्रकाशमें अब दो द्रव्योंके आश्रयसे जो कर्ता आदिकी व्यवस्था आगममें उपलब्ध होती है उसका विचार करते है। यह तो सुविदित सत्य हैं कि ‘आत्माश्रितो निश्चयनयः’ ( समय० गा० २७२ टी० ) निश्चयनय आत्माके ( स्वके ) आश्रित हैं इस नियमके अनुसार आगममें जो दो द्रव्योंके आश्रयसे कर्ता आदिकी व्यवस्थाका विधान उपलब्ध होता है वह न तो द्रव्यार्थिकरूप निश्चयनयकी अपेक्षा ही परमार्थभूत माना जा सकता है और न ही पर्यायार्थिक निश्चयनयकी अपेक्षा ही परमार्थभूत माना जा सकता है। इस प्रकार जब कि दो द्रव्योंके आश्रयसे आगममें प्रतिपादित कर्ता आदिकी व्यवस्था उक्त दोनों प्रकारसे निश्चय या भूतार्थ संज्ञाको प्राप्त न होनेके कारण अपरमार्थभूत सिद्ध होती है ऐसी अवस्थामें आगममें उसकी स्वीकृतिका प्रयोजन कोई दूसरा होना चाहिए।

\६. बात यह है कि प्रत्येक द्रव्य विस्रसा उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यस्वभाव होनेपर भी उसके प्रत्येक समयके परिणमनमें अपनी-अपनी मर्यादाके भीतर जो भेद परिलक्षित होता हैं वह अपने-अपने निश्चय उपादानगत योग्यताके अनुरूप स्वयंकृत होकर भी व्यवहारसे अन्य द्रव्यकी जो पर्याय उस परिणामके अनुकूल होती है उसके सद्भावमें उत्पन्न होता है, इसलिए व्यवहारसे अन्य द्रव्यके जिस परिणामके सद्भावमें वह परिणाम उत्पन्न होता है उसमें कर्ता आदि रूपसे निमित्त व्यवहार किया जाता है। इसके लिए एक शास्त्रीय उदाहरण देना यहाँ पर्याप्त होगा। यथा-एक द्व्यणुक है, जिसमें ऐसे दो परमाणु लीजिये जिनमें एक परमाणु दो स्निग्ध या दो रूक्षगुणवाला है और दूसरा परमाणु चार स्निग्ध या चार रूक्ष गुणवाला है। यतः दो गुणवाले परमाणुके लिए उक्त ४ गुणवाला परमाणु व्यवहारसे परिणमनके अनुकूल है, इसलिए उसका सम्पर्क करके उक्त दो गुणवाला परमाणु परिणमनके अनुरूप अपनी उपादानगत योग्यताके कारण उक्त दूसरे परमाणुके अनुरूप परिणमनकर बन्धको प्राप्त हो जाता है। यहाँ उक्त दो गुणवाले परमाणुका उक्त चार गुणवाले परमाणुके अनुरूप परिणमन स्वयंकृत है। उसे उक्त चार गुणवाले परमाणुने उत्पन्न नही कियाहै। फिर भी उसके सद्भावमें अपने बन्धरूप परिणामवश इस कार्यको उसने किया है, इसलिये उस परिणामका निश्चयकर्ता वह दो गुणवाला परमाणु होनेपर भी उस परिणामका व्यवहारकर्ता चार गुणवाला परमाणु कहा जाता है। इसी तथ्यको आचार्य गृद्धपिच्छने तत्त्वार्थसूत्र अ० ५ के ‘बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च ॥३७॥’ इस सूत्र द्वारा व्यक्त किया है।

यहाँ उक्त दो गुणवाले परमाणुकी उक्त चार गुणवाले परमाणुके साथ कालप्रत्यासत्ति है, इसलिए इस सूत्रमें उक्त बातको ध्यानमें रखकर चार गुणवालेको दो गुणवाले परमाणुको परिणमानेवाला कहा गया हैं। वस्तुतः देखा जाय तो जिस प्रकार दो गुणवाले परमाणुने उस समय अपना परिणाम उत्पन्न किया है उसी प्रकार चार गुणवाले परमाणुने भी उसी समय अपना परिणाम उत्पन्न किया है, उस समय दोनों अपना-अपना कार्य कर रहे हैं। यद्यपि चार गुणवाला परमाणु उस समय दो गुणवाले परमाणुको नहीं परिणमा रहा है अर्थात् चार गुणवाला परमाणु उस समय अपने व्यापारको छोड़कर दो गुणवाले परमाणुके व्यापारमें क्रियाशील नहीं हुआ है, फिर भी लोकमें उक्त प्रकारका व्यवहार होता अवश्य है सो ऐसे व्यवहारका कारण जिसकी काल प्रत्यासत्ति होनेपर यह परिणाम हुआ हैं उसका ज्ञान करानामात्र है। आचार्य कुन्दकुन्दने समयसारके बन्धाधिकारमें ‘जह फलहमणी सुद्धो’ इत्यादि रूपसे २७८ व २७९ संख्याक गाथाएँ लिखकर इसी तथ्यका ज्ञान कराया है और आचार्य अमृतचन्द्रने भी उन दोनों गाथाओंकी टीकामें ‘न जातु रागादि-’ इत्यादि कलश लिखकर इसी तथ्यको स्पष्ट किया है। यह एक शास्त्रीय उदाहरण है। लोकमें इस प्रकारके जितने भी कार्य होते हैं उन सबके विषयमें यह नियम जान लेना चाहिए।

\७. अन्य एक या एकसे अधिक जिन द्रव्योंका उससे भिन्न दूसरे द्रव्यके जिस कार्यके अनुकूल व्यापार होता है वह व्यवहार हेतु कहा जाता है। इस तथ्यको आचार्य अमृतचन्द्रने श्री समयसार गाथा ८४ की टीकामें ‘बहिर्व्याप्य-व्यापकभावेन कलशसम्भवानुकूलं व्यापारं कुर्वाणः’ इन शब्दों द्वारा स्वीकार किया है। इस वाक्यमें आया हुआ ‘अनुकूलम्’ शब्द उक्त आशयकी सूचना स्पष्ट रूपसे कर रहा है। इससे तीन बातोंका स्पष्ट ज्ञान होता है-

एक तो इस बातका ज्ञान होता है कि जिस प्रकार प्रत्येक कार्यकी अपने समर्थ ( निश्चय ) उपादान-रूप कर्ताके साथ नियमसे अन्तर्व्याप्ति होती है उसी प्रकार उसकी जिनमें व्यवहारी जन कर्ता आदि व्यवहार करते हैं ऐसी दूसरे एक या एकसे अधिक द्रव्योंकी पर्यायोंके साथ नियमसे बाह्य व्याप्ति होती है। इन दोनोंका एक कालमें होनेका नियम होनेसे इनमें कालप्रत्यासत्ति होती है और इसलिए ऐसा योग इनमें विस्रसा या प्रयोगसे सहज ही बनता रहता है।

दूसरे इस बातका भी ज्ञान होता है कि जिसमें निमित्त व्यवहार किया जाता है ऐसे दूसरे एक या एकसे अधिक द्रव्योंका वह व्यापार प्रत्येक समयके विवक्षित कार्यसे पृथक् ही होता है। निमित्त संज्ञाको प्राप्त होनेवाले वे पदार्थ प्रत्येक समयके उस विवक्षित कार्यमें व्यापार नहीं करते यह उक्त कथनका आशय है।

तीसरे इस बातका भी ज्ञान होता हैं कि उपादान कर्ताके अपने कार्यके प्रति व्यापारवान् होनेपर जिनमें निमित्त व्यवहार किया जाता है ऐसे एक या एकसे अधिक द्रव्योंका उस-उस समय होनेवाला वह व्यापार व्यवहारसे अनुकूल ही होता है। दूसरे शब्दोंमें यदि इसी बातको प्रकट किया जाय तो इससे यह अनुमान होता है कि इस समय इस कार्यका यही समर्थ उपादानकर्ता है।

\८. इस प्रकार सब द्रव्योंके प्रत्येक समयके कार्यके अनुकूल प्रत्येक समयमें उपादान और निमित्तका सहज योग बनता रहता है और सब द्रव्योंका प्रत्येक समयमें यथासम्भव विभाव या स्वभावरूप कार्य भी होता रहता है। अर्थात् संसार दशामें जीवका और बद्ध दशामें पुद्गलका विभावरूप कार्य होता है और स्वभाव दशामें जीवका, परमाणुदशामें पुद्गलका तथा धर्म, अधर्म, आकाश और कालका सर्वदा स्वभावरूप कार्य होता रहता है। आगममें अनेक स्थलों पर कहीं उपादानकी अपेक्षा और कहीं निमित्तोंकी अपेक्षा जो यह वचन दृष्टिगोचर होता है कि ‘सर्वत्र कारणानुविधायि कार्यं भवति’ सो उसका कारण यही है कि जिस समय जो भी कार्य होता है उसमें निश्चयसे उपादानकी और व्यवहारसे निमित्तोंकी अनुकूलता दृष्टिगोचर होती है। यही कारण है कि अन्य द्रव्यकी जो पर्याय व्यवहारसे कार्यके अनुकूल होती है उसमें निमित्त व्यवहार किया जाता है। 'तात्पर्य यह है कि जिसमें निमित्त व्यवहार किया जाता है वह व्यवहारसे कार्यके अनुकूल होता है और कार्य व्यवहारसे उसके अनुरूप होता है।

\९. अब प्रश्न यह है कि जिनमें निमित्त व्यवहार किया जाता है उनका प्रायः व्यवहारसे कार्योंके अनुकूल और कार्योंका व्यवहारसे उनके अनुरूप होना आवश्यक है तो निष्क्रिय धर्मादि द्रव्य तथा क्रियावान् जलादि पदार्थ जीव-पुद्गलोंके गमनादिमें निमित्त कैसे हो सकेंगे? यह प्रश्न आचार्योंके समक्ष था। उन्होंने द्वादशांग वाणीको लक्ष्यमें रख कर इस प्रश्नका जो समाधान किया है उसके प्रकाशमें सर्वार्थसिद्धि अ० ५ सू० ७ के इस वचनको हृदयंगम कीजिए-

ननु यदि निष्क्रियाणि धर्मादीनि, जीव-पुद्गलानां गत्यादिहेतुत्वं नोपपद्यते। जलादीनि हि क्रियावन्ति मत्स्यादीनां गत्यादिनिमित्तानि दृष्टानीति। नैष दोषः, बलाधाननिमित्तत्वाच्चक्षुर्वत्। यथा रूपोपलब्धौ चक्षुर्निमित्तमिति न व्याक्षिप्तमनस्कस्यापि भवति।

शंका-यदि धर्मादिक द्रव्य निष्क्रिय हैं तो इनकी जीव-पुद्गलोंकी गति आदिमें हेतुता नहीं बनती, क्योंकि जलादिक क्रियावान् होकर ही मछली आदिकी गति आदिमें निमित्त देखे गये हैं?

समाधान-यह दोष नहीं है, क्योंकि चक्षुके समान ये बलाधानमें निमित्तमात्र हैं। जैसे रूपके जाननेमें चक्षु निमित्त है, फिर भी व्याक्षिप्त मनवालेके रूपके जाननेमें वह निमित्त नहीं होता वैसे ही प्रकृतमें जानना चाहिए।

यह आगम वचन है। इससे और पूर्वोक्त कथनसे हमें जिनमें निमित्त व्यवहार किया जाता है उनकी कार्योंके प्रति व्यवहारहेतुता दो प्रकारसे ज्ञात होती है-एक तो बलाधानमें हेतु होनेरूपसे और दूसरे कार्योंके अनुकूल परिणमनरूपसे। लोकमें जिन्हें उदासीन निमित्त कहते हैं उनकी प्रथम प्रकारमें परिगणना होती है और जिन्हें प्रेरक, निर्वर्तक या प्रयोजक निमित्त कहते हैं उनकी दूसरे प्रकारमें परिगणना होती है।

यहाँ इतना विशेष जान लेना चाहिए कि पर वस्तु स्वभावसे निमित्त नहीं है। किन्तु जिस कार्यमें जो जिस प्रकारसे व्यवहारहेतु होता है उस अपेक्षा उसमें उस प्रकारसे निमित्तव्यवहार किया जाता है। आगममें इसका स्वतन्त्ररूपसे विचार किया है। तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सू० २२ में परिणाम क्या है इसका स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है-

द्रव्यस्य स्वजात्यपरित्यागेन प्रयोग-विस्रसालक्षणः विकारः परिणामः ।१०। द्रव्यस्य चेतनस्याचेतनस्य वा द्रव्यजातिमजहतः पर्यायार्थिकनयार्पणात् प्राधान्यं बिभ्रता केनचित् पर्यायेण प्रादुर्भावः पूर्वपर्यायनिवृत्तिपूर्वको विकारः प्रयोग-विस्रसालक्षणः परिणाम इति प्रतिपत्तव्यः। तत्र प्रयोगः पुद्गलविकारः, तदनपेक्षा विक्रिया विस्रसा। तत्र परिणामो द्विविधः-अनादिरादिमांश्च। अनादिर्लोकसंस्थानमन्दराकारादिः। आदिमान् प्रयोगजो वैस्रसिकश्च। तत्र चेतनस्य द्रव्यस्यौपशमिकादिर्भावः कर्मोपशमाद्यपेक्षोऽपौरुषयत्वात् वैस्रसिक इत्युच्यते। ज्ञान-शील-भावनादिलक्षणः आचार्यादिपुरुषप्रयोगनिमित्तत्वात् प्रयो-
गजः । अचेतनमृदादेः घटसंस्थानादिपरिणामः कुलालादिपुरुषप्रयोगनिमित्तत्वात् प्रयोगजः । इन्द्रधनुरादिनानापरिणामो वैस्रसिकः । तथा धर्मादेरपि परिणामो योज्यः ।

द्रव्यका अपनी जातिका परित्याग किये विना प्रयोग और विस्रसालक्षण विकार परिणाम है ॥१०॥ द्रव्यार्थिकनयकी विवक्षा न होनेसे तिर्यग्भूत अपनी द्रव्यजातिको न छोड़ते हुए चेतन-अचेतन द्रव्यका पर्यायार्थिकनयकी मुख्यतासे प्रधानताको प्राप्त किसी एक पर्यायरूपसे उत्पन्न होना अर्थात् पूर्व पर्यायकी निवृत्तिपूर्वक प्रयोग-विस्रसालक्षण विकारका होना परिणाम है ऐसा जानना चाहिए । वहाँ प्रयोगका अर्थ पुद्गलविकार है । उसकी अपेक्षा किये विना विक्रिया विस्रसा है । प्रकृतमें परिणाम दो प्रकारका है-अनादि और सादि । लोकसंस्थान और मन्दराकारादि अनादि परिणाम है । सादि परिणाम प्रायोगिक और वैस्रसिकके भेदसे दो प्रकारका है । उनमेंसे चेतनके कर्मोंके उपशमादि सापेक्ष होनेवाले औपशमकादिक भाव अपौरुषेय होनेसे वैस्रसिक कहे जाते हैं । ज्ञान, शील, भावनादि आचार्यादि पुरुषके प्रयोगके निमित्तसे होनेके कारण प्रयोगज हैं । अचेतन मिट्टी आदिका घटसंस्थान आदि परिणाम कुम्हार आदि पुरुषप्रयोगके निमित्तसे होनेके कारण प्रयोगज हैं । इन्द्रधनुष आदि नाना परिणाम वैस्रसिक हैं। उसी प्रकार धर्मादि द्रव्योंका परिणाम भी जान लेना चाहिए ।

यह तत्त्वार्थवार्तिकका वचन है । तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके इसी सूत्रमें भी परिणामके इन्हीं सब भेद-प्रभेदोंका विशेष व्याख्यान किया है । उक्त उल्लेखमें यद्यपि ‘प्रयोग’ का अर्थ ‘पुद्गल विकार’ किया है । किन्तु इसका दूसरा अर्थ पुरुषका प्रयत्न भी है, जैसा कि उसी उल्लेखमें की गई आगेकी व्याख्यासे ज्ञात होता है । इस अभिप्रायको भट्टाकलंकदेवने इसी अध्यायके २४ वें सूत्रकी व्याख्यामें और भी स्पष्ट कर दिया है । इन उल्लेखोंमें सब प्रकारके परिणामों (कार्यों) का विचार किया गया है । उनमेंसे जीवों और पुद्गलोंके सादि परिणामोंका विचार करते हुए जो कुछ लिखा है उससे ये तथ्य फलित होते हैं-

(अ) जीवके औपशमिक आदि भाव सादि वैस्रसिक परिणाम हैं ।

(आ) दान, शील, व्रतग्रहण और भावना आदि जीवके प्रयोगज परिणाम हैं ।

(इ) कर्मोंके उपशम आदि, द्वयणुक स्कन्ध आदि तथा मेघगर्जन, उल्कापात, इन्द्रधनुष आदि पुद्गलके सादि वैस्रसिक परिणाम हैं ।

(ई) घटनिर्माण आदि, यन्त्रादिकी गति आदि, भूखनन, जतु-काष्ठबन्ध आदि पुद्गलके सादि प्रयोगज परिणाम हैं ।

इससे यह स्पष्ट विदित होता है कि लोकमें जितने भी कार्य होते हैं उनके होनेमें व्यवहारसे कहीं पुरुषका प्रयत्न और कहीं अन्य सामग्री निमित्त अवश्य होती है । आगममें आकाशकी अवगाहना और कालद्रव्यका प्रति समयका समयपरिणाम ये दो कार्य ऐसे अवश्य बतलाये हैं जिनके होनेमें व्यवहारसे अन्य किसीको निमित्तरूपसे नहीं स्वीकार किया गया है । 'देखो तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सू० १२, तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० ५ सू० २२ । इनके सिवाय आगममें ऐसा अन्य एक भी कार्य नहीं स्वीकार किया गया है जिसके होनेमें व्यवहारसे बहिरंग हेतु न स्वीकार किया गया हो । अपर पक्ष उक्त दो कार्योंमें केवल अन्तरंग हेतुओंका निर्देश करता तब तो कोई बात नहीं थी । परन्तु उसकी ओरसे इनका उक्त प्रकारसे होनेका तो कहीं उल्लेख तक नहीं किया गया, मात्र वह अनन्त अगुरुलघुगुणों ( अविभागप्रतिच्छेदों ) की षट्गुणी हानि-वृद्धिको अवश्य ही केवल स्वप्रत्यय माननेका आग्रह स्थान-स्थान पर करता है जो सर्वथा आगमके विपरीत है । इसका विशेष विचार तो हम ११ वें प्रश्नका अन्तिम उत्तर लिखते समय ही करेंगे । यहाँ मात्र इतना निर्देश कर देना पर्याप्त है कि जिन्हें अपर पक्ष अगुरुलघु नामक अनन्त गुण मान रहा है वे वास्तवमें गुण न होकर अविभागप्रतिच्छेद ही हैं । तभी तो आगममें उनकी हानि-वृद्धि स्वीकार की गई है । कोई भी गुण त्रैकालिक यावत् द्रव्यभावी होता है, इसलिए उसकी हानि-वृद्धि सम्भव नहीं । हानि और वृद्धि पर्यायोंमें ही होती है, गुणोंकी अपेक्षासे नहीं, क्योंकि गुणोंकी वृद्धि मानने पर नये गुणोंकी उत्पत्ति और उनकी हानि मानने पर उनके नाशका प्रसंग उपस्थित होता है । यदि अपर पक्ष कहे कि कुछ पुराने गुणोंका नाश होता है और कुछ नये गुण उत्पन्न होते हैं सो यह कहना बनता नहीं, क्योंकि उत्पाद-व्यय पर्यायका होता है गुणोंका या द्रव्य ( सामान्य ) का नहीं । अतएव आगममें जहाँ भी सामान्यसे अनन्त अगुरुलघुगुणोंकी हानि-वृद्धि स्वप्रत्यय बतलाई है वहाँ मात्र स्वभावपर्यायके कथनकी मुख्यता होनेसे ही वैसा प्रतिपादन किया गया है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।

इस प्रकार इस प्रकरणके प्रारम्भमें हमने जिन दो प्रश्नोंका उल्लेख किया था उनका यह सम्यक् समाधान है । इस समाधानसे यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि दो द्रव्योंके आश्रयसे जो कर्ता-कर्मकी प्ररूपणा आगममें उपलब्ध होती है वह असद्भूत व्यवहारनयकी मुख्यतासे ही की गई है । वह प्ररूपणा उपचरित होनेसे निश्चय तथा सद्भूत व्यवहार संज्ञाको प्राप्त नहीं हो सकती । साथ ही इस समाधानसे यह भी ज्ञात हो जाता है कि दो द्रव्योंके आश्रयसे की गई वह प्ररूपणा किन किन द्रव्योंपर किस किस प्रकार लागू होती है । इसके सिवाय इस समाधानसे हम यह भी जान लेते हैं कि आगममें जहाँ भी अनन्त अगुरुलघु गुणोंकी षट्गुणी हानि-वृद्धिरूप स्वप्रत्यय पर्यायका निर्देश किया है वहाँ वह स्वभावपर्यायका स्वरूपनिर्देश करनेकी दृष्टिसे ही किया है । इसका यह अर्थ नहीं कि उसके होनेमें व्यवहारसे कालद्रव्यकी भी निमित्तता नहीं है ।

\८. समस्याओंका मुख्य हेतु अज्ञान भाव, श्रुतज्ञान नहीं

इतने विवेचनके बाद अब हम मुख्यरूपसे इस बातपर आते हैं कि अपर पक्ष यद्यपि केवलज्ञानकी अपेक्षा सब कार्योंका स्वकालमें होना नियत मानता है और श्रुतज्ञानी जीवोंको वैसी श्रद्धा करनेकी सूचना भी करता है । फिर भी वह श्रुतज्ञानी जीवोंकी समस्त समस्याओंका हल उसमें न देखकर कार्य-कारणपरम्पराको उससे भिन्न मानना चाहता है सो उस पक्षकी ऐसी मान्यता कहाँ तक ठीक है यही यहाँ पर विचार करना है । विचार करने पर तो यद्यपि उस पक्षका यह कथन परस्पर विरुद्धताको लिए हुए ही प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें प्रथम विसंगति तो यह है कि अपर पक्ष केवलज्ञानके विषयको भिन्न मानता है और कार्य-कारणकी दृष्टिसे श्रुतज्ञानके विषयको उससे सर्वथा भिन्न मानता है । तथा दूसरी विसंगति यह आती है कि अपर पक्ष सम्यक् श्रद्धा तो केवलज्ञानके विषयके अनुसार करनेको कहता है और सम्यक् श्रद्धा विहीन श्रुतज्ञानके द्वारा कार्य-करणकी स्थापना करके उसे फिर भी प्रामाणिक मानता है और साथ ही केवलज्ञानके अनुसार प्रवृत्त हुई द्वादशांग वाणीस्वरूप आगमसे उसका समर्थन करनेका उपक्रम भी करता है । है तो यह सब कल्पित विचारसरणी, फिर भी उस पक्षकी ओरसे जो कुछ लिखा गया है उस पर सांगोपांग विचार तो करना ही है । अपने पक्षके समर्थनमें उस पक्षका कहना है-

‘जैन संस्कृतिके आगम ग्रन्थोंमें कार्योत्पत्तिके विषयमें श्रुतज्ञानी जीवोंके लिये दो प्रकारसे विवेचना की गई है-एक तो केवलज्ञानकी अपेक्षा श्रद्धा दृष्टिसे और दूसरी श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षा कर्तव्यदृष्टिसे । ‘जं जस्स जम्मि देसे’ इत्यादि आगम वाक्योंमें पहली दृष्टिकी उपलब्धि होती है । इसके अलावा कार्यके स्वप्रत्यय स्व-परप्रत्यय भेद करके कार्य-कारणभाव पद्धतिका जो जैन संस्कृतिके आगम ग्रन्थोंमें विस्तारसे विवेचन पाया जाता है वह सब श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षा कर्तव्यकी दृष्टिसे ही किया गया है।

यह सब विवेचन श्रुतज्ञानी जीवोंके लिए क्यों किया गया हैं ? इसका कारण यह है कि श्रुतज्ञानी जीव केवलज्ञानी जीवोंकी अपेक्षा बिल्कुल भिन्न दशामें विद्यमान रह रहे हैं अर्थात् केवलज्ञानी जीव जहाँ कृत्यकृत्य हैं वहाँ श्रुतज्ञानियोंके सामने हमेशा कृत्यों ( कार्यों ) के करनेकी समस्या खड़ी ही रहती है, जहाँ केवलज्ञानी जीव प्रत्येक वस्तुके और उनके प्रत्येक क्षणमें होनेवाले व्यापारोंके केवल ज्ञाता दृष्टा मात्र बनकर रह रहे हैं वहाँ कार्योत्पत्तिके लिए श्रुतज्ञानी जीवोंको अपनी मौजूदा हालतोंमें अनुभवमें आनेवाली जोड़-तोड़ बिठलानेकी आवश्यकता है। अतः श्रुतज्ञानियोंके लिये कार्योत्पत्तिकी कार्य-कारणभाव पद्धतिको अपनानेके सिवाय कोई चारा ही नहीं रह जाता है।

इसका फलितार्थ यह हुआ कि यदि केवलज्ञानके विषयकी अपेक्षासे विचार किया जाय तो केवलज्ञानमें सभी कार्य अपने प्रतिनियत कारणोंसे स्वकालमें होते हुए झलक रहे हैं और श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षासे विचार किया जाय तो सभी कार्य स्वप्रत्यय और स्व-परप्रत्यय होनेके कारण यथा-योग्य केवल उपादान कारणसे अथवा उपादान-निमित्तरूप दोनों कारणोंसे ही उत्पन्न होते हुए अनुभवमें आरहे हैं । चूकि श्रुतज्ञानी जीवको केवलज्ञानका विषय केवल आस्थाका है, अतः उस पर केवल आस्था रखनेका ही उसे आदेश दिया गया है और केवल ऐसी आस्था रखना श्रुतज्ञानी जीवोंके लिए उपयोगी नहीं हो सकती है। अतः उनके लिए कार्य-कारणभाव पद्धतिको अपनानेका भी उपदेश दिया गया है । इसलिये जिसने कार्योत्पत्तिके लिये कार्य-कारणभाव पद्धतिके मार्गको समाप्त करनेका प्रयत्न किया वह नियतिवादी एकान्त मिथ्यादृष्टि ही हो जायगा अतः केवलज्ञानीने जैसा देखा है वैसा ही कार्य होगा उसपर श्रद्धा करना प्रत्येक श्रुतज्ञानी जीवका कर्तव्य है, कारण कि इस तरहकी श्रद्धा करनेसे अपने पुरुषार्थ द्वारा होनेवाली कार्यकी सफलतासे उसके अन्तःकरणमें अहंकार पैदा नहीं होगा और असफलता मिलनेपर कभी दुख पैदा नहीं होगा। अपनी उक्त प्रकारकी श्रद्धाके आधार पर यदि वह श्रुतज्ञानी जीव पुरुषार्थहीन और कृतघ्न होकर पथभ्रष्ट हो गया तो फिर इस मिथ्यात्वके प्रभावसे उसका अनन्त संसारमें परिभ्रमण होनेके सिवाय और क्या हो सकता है? इस प्रकार श्रुतज्ञानकी अपेक्षा प्रत्येक वस्तुकी कोई पर्यायें तो नियतक्रमसे ही होती हैं और प्रत्येक वस्तुकी कोई पर्यायें अनियत क्रमसे भी होती हैं । इस तरह द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही हैं, अनियतक्रमसे नहीं आपका यह सिद्धान्त आगमसम्मत नहीं है। आप यह तो कह नहीं सक्ते कि श्रुतज्ञान प्रमाण नहीं है, अतः आपके सिद्धान्त पर हमारे लिये विचार करना आवश्यक हो गया।’

यह अपर पक्षके प्रकृत प्रतिशंका सम्बन्धी कथनका कुछ अंश है। इसमें उस पक्षके पूरे वक्तव्यका सार आजाता है। किन्तु यह सब कथन स्वयंमें कितना भ्रामक है इसे समझनेके लिये हमें ‘केवलज्ञानके अनुरूप ही श्रुतज्ञानका विषय होता है या अन्य प्रकारका’ यह सर्वप्रथम जानना होगा। केवलज्ञान और श्रुतज्ञानके विषयका निर्देश करते हुए स्वामी समन्तभद्र आप्तमीमांसामें लिखते हैं-

स्याद्वाद-केवलज्ञाने सर्वतत्त्वप्रकाशने।
भेदः साक्षादसाक्षाच्च ह्यवस्त्वन्यतमं भवेत् ॥१०५॥

स्याद्वाद ( श्रुतज्ञान ) और केवलज्ञान सब तत्त्वोंका प्रकाशन करनेवाले हैं। उनमें साक्षात् और असाक्षात्का ही भेद है। जो इन दोनोंका विषय नहीं है वह अवस्तु है ॥१०५॥

पूर्वोक्त कारिका द्वारा प्रतिपादित तत्त्वको स्पष्ट करते हुए आचार्य विद्यानन्दि उक्त कारिकाकी व्याख्याके प्रसंगसे अष्टसहस्रीमें लिखते हैं-

यथैव हि आगमः परस्मै जीवादितत्त्वमशेषं प्रतिपादयति तथा केवल्यपि, न विशेषः, साक्षादसाक्षाच्च तत्त्वपरिच्छित्तिनिबन्धनत्वात् तद्भेदस्य ।

जिस प्रकार आगम दूसरेके लिये अशेष जीवादि तत्त्वका प्रतिपादन करता है उसी प्रकार केवली भी, इस दृष्टिसे इन दोनोंमें कोई भेद नहीं है । यदि भेद है तो साक्षात् जानने और असाक्षात् जाननेका भेद है, क्योंकि यह भेद तत्त्वपरिच्छित्तिहेतुक है ।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुये आचार्य नेमिचन्द्र गोम्मटसार जीवकाण्डमें लिखते हैं-

सुद-केवलं च णाणं दोण्णि वि सरिसाणि होंति बोहादो ।
सुदणाणं तु परोक्खं पच्चक्खं केवलं णाणं ॥ ३६९ ॥

ज्ञानकी अपेक्षा अर्थात् जाननेकी अपेक्षा श्रुतज्ञान और केवलज्ञान दोनों ही सदृश हैं । परन्तु दोनोंमें अन्तर यही है कि श्रुतज्ञान परोक्ष है और केवलज्ञान प्रत्यक्ष है ॥ ३६९ ॥

श्रुतज्ञान संशय आदि दोषोंसे रहित होकर अनेकान्त स्वरूप सब पदार्थोंको प्रकाशित करता है इस तथ्यको स्पष्ट करते हुए स्वामी कार्तिकेय द्वादशानुप्रेक्षामें लिखते हैं-

सव्वं पि अणेयंतं परोक्खरूवेण जं पयासेदि ।
तं सुयणाणं भण्णदि संसयपहुदीहिं परिचत्तं ॥ २६२ ॥

इस प्रकार आगमके उक्त उल्लेखोंसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि जो केवलज्ञानका विषय है वही श्रुतज्ञानका भी विषय है । विषयकी अपेक्षा इन दोनों ज्ञानोंमें कोई भेद नहीं है । यदि भेद है भी तो प्रत्यक्ष और परोक्षरूपसे जाननेकी अपेक्षा ही इन दोनों में भेद है अर्थात् कार्यकारणभाव पद्धतिके जो नियम केवलज्ञानमें झलके हैं उन्हीं नियमोंको श्रुतज्ञानी उसी प्रकारसे अपने ज्ञानद्वारा जानता है । इसी प्रकार सभी कार्य केवलज्ञानमें नियत-क्रमसे होते हुए ही झलके हैं । अतः श्रुतज्ञानी भी सभी कार्योंको नियत क्रमसे होता हुआ ही आगमके बलसे जानता है । कारण यह है कि केवली भगवानके ज्ञानमें छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय, उनके गुण-पर्याय, जीवादि नौ पदार्थ और कार्य-कारणभाव जिस रूपमें प्रतिभासित हुए, दिव्यध्वनिद्वारा उनका उसी रूपमें कथन हुआ, जिस रूपमें कथन हुआ, उनको गणधर देवोंने अपने सम्यक् श्रुतज्ञानके बलसे उसी रूपमें ग्रहण किया, जिसरूपमें गणधरदेवोंने उनको ग्रहण किया, उनको उसी रूपमें द्वादशांग श्रुतमें निबद्ध किया और जिस रूपमें वे द्वादशांग श्रुतमें निबद्ध हुये, आरातीय आचार्योंने उनका उसी रूपमें प्ररूपण किया । जिस प्रकार क्षीरसागरका जल घटमें भर लिया जाता है, अतएव वह क्षीरसागरका ही जल ठहरता है उसी प्रकार आरातीय आचार्यों द्वारा रचित शास्त्र अर्थरूपसे वे ही हैं, इसलिए वे केवलज्ञान ओर उनकी दिव्यध्वनिके समान ही प्रमाण हैं ।

  • सर्वार्थसिद्धि अ० १ सूत्र २० के आधार से

अब विचार कीजिए कि जब केवलज्ञानमें यह भाषित हुआ है कि सब द्रव्य अनादिकालसे प्रत्येक समयमें अपने प्रतिनियत उपादानसे अन्य द्रव्योंकी प्रतिनियत पर्यायोंको निमित्तकर प्रतिनियत कार्योंको ही जन्म देते हैं तो क्या श्रुतज्ञान केवलज्ञानके इस विषयसे विपरीत निर्णय करेगा और यदि विपरीत निर्णय करेगा तो क्या उसे सम्यक् श्रुतज्ञान कहा जा सकेगा ? अर्थात् नहीं कहा जा सकेगा । अपर पक्षने जब यह स्वीकार कर लिया है कि ‘केवलज्ञानमें सभी कार्य अपने प्रतिनियत कारणोंसे स्वकालमें उत्पन्न होते हुए झलक रहे हैं’ और वह पक्ष उसके अनुसार दूसरोंको ऐसी श्रद्धा करनेकी प्रेरणा भी करता है । ऐसी अवस्थामें सम्यक् श्रुतज्ञानमें उक्त प्रकारका ही निर्णय होना चाहिए कि दूसरे रूपमें इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे । अपर पक्ष केवलज्ञानके अनुसार पदार्थ व्यवस्था और कार्य-कारण परंपराको स्वीकार करके भी श्रुतज्ञानके विषयको उससे अन्य प्रकारसे मानना चाहता है इसका हमें आश्चर्य है । स्वामी कार्तिकेयने ‘जं जस्स जम्मि देसे’ इत्यादि (३२१-३२२) दो गाथायें लिखकर जो ‘एवं जो णिच्छयदो’ (३२३) गाथा लिखी है उसमें पठित ‘जाणदि’ पद ध्यान देने योग्य है । इस पद द्वारा यही प्रतिपादित किया गया है कि केवली जिनने सब जीवोंका जिस कालमें जिस विधिसे जैसा जन्म अथवा मरण जाना है वह उसी प्रकार होगा, अन्य प्रकार नहीं होगा ऐसा जो श्रुतज्ञानी जीव अपने श्रुतज्ञानसे निश्चय पूर्वक जानता है वह शुद्ध सम्यग्दृष्टि है । तथा जो इससे विपरीत कल्पना करता है वह सम्यग्दृष्टि नहीं हैं । अब विचार कीजिए कि स्वामी कार्तिकेयका यह लिखना क्या केवल श्रद्धाके लिये है या जाननेके लिए भी है । एक ओर तो सभी आचार्य यह लिखते हैं कि केवलज्ञान और श्रुतज्ञानमें विषयकी अपेक्षा कोई भेद नहीं है और दूसरी ओर अपर पक्ष कहता है कि विषयकी अपेक्षा इन दोनों ज्ञानोंमें बड़ा भेद है तो बतलाइये कि आगम वचनोंका श्रद्धान किया जाय या आप सब अपर पक्षके वचनोंका । हमारी नम्र रायमें आगमकी ऐसी उपेक्षा कर उससे अपने अभिमतकी पुष्टि करना उचित नहीं है ।

अपर पक्ष संसारी जीवोंके सामने उपस्थित अनेक समस्याओंका उल्लेख करता है सो इस बातको हम भी अच्छी तरह जानते हैं कि संसारी जीवोंके सामने अनेक समस्यायें हैं । उनके सामने जीवन मरणकी समस्या है, सांसारिक सुख-दुःखकी समस्या है, कुटुम्बकी और अपनी आजीविकाकी समस्या है, किस कालमें किस उपादानसे किसको निमित्तकर क्या कार्य होगा इसकी अजानकारी या मिथ्या जानकारी वश जोड़-तोड़ बिठलाते रहनेकी भी समस्या है, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा वैयक्तिक और भी अनेक प्रकारकी समस्याएँ हैं इसमें सन्देह नहीं । पर उन सबका कारण क्या है इस ओर भी अपर पक्षका सम्यक् प्रकारसे क्या कभी ध्यान गया ? वास्तवमें देखा जाय तो इसका कारण केवल राग, द्वेष और मोह ही तो हैं; श्रुतज्ञान नहीं । श्रुतज्ञानको पराधीन बतलाकर व्यर्थमें लांछित मत कीजिए । जब तक यह जीव रागी, द्वेषी और मोही होकर प्रवर्त्तता है तब तक इस संसारी जीवके लिए ये समस्याएँ वस्तुतः समस्याएँ बनी रहेंगी । चाहे हम हों या अन्य कोई, समस्याएँ व्यक्तिका पीछा नहीं करतीं, क्योंकि उनकी जननी राग, द्वेष और मोह भाव ही तो हैं । जब तक राग, द्वेष और मोहके कारण यह प्राणी आकुलित बना रहेगा तब तक वह मृग-मरीचिकाके समान उनमें भटकता ही रहेगा इसमें संदेह नहीं । आचार्य अमृतचन्द्र समयसारकलशमें कहते हैं-

आसंसारत एव धावति परं कुर्वेऽहमित्युच्चकैर्दुर्वारं ननु मोहिनामिह महाहंकाररूपं तमः ।
तद्भूतार्थपरिग्रहेण विलयं यद्येकवारं व्रजेत्तत्किं ज्ञानघनस्य बन्धनमहो भूयो भवेदात्मनः ॥५५॥

इस जगतमें ‘परद्रव्य को मैं करता हूँ’ ऐसा अत्यन्त दुर्निवारके परद्रव्य कर्तृत्वका महा अहंकाररूप अज्ञानान्धकार मोही जीवोंके अनादि संसारसे चला आ रहा है । आचार्य कहते हैं कि अहो ! भूतार्थ नयको ग्रहण करनेसे यदि वह एक बार भी नाशको प्राप्त हो तो ज्ञानघन आत्माको पुनः बन्धन कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता ।।५५।। यह आगम वचन है। इसमें संसारी जीवोंके समक्ष जो भी समस्याऐं खड़ी रहती हैं उन सबका मूल निदान करके उनका परमार्थरूप सम्यक् समाधान प्रस्तुत किया गया है। अतएव श्रुतज्ञानके आधार पर केवलज्ञानके विषयसे भिन्न यह निष्कर्ष निकालना तो ठीक नहीं है कि ‘श्रुतज्ञानकी अपेक्षा प्रत्येक वस्तुकी कोई पर्यायें तो नियत क्रमसे ही होती हैं और प्रत्येक वस्तुकी कोई पर्यायें अनियत क्रमसे भी होती हैं’ और इस आधार पर हमारे ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं, अनियत क्रमसे नहीं’ इस सिद्धान्तको आगम विरुद्ध ठहराना भी ठीक नहीं है। वस्तुतः किसी भी द्रव्यमें यदि कोई कार्य हमें अनियत क्रमसे होता हुआ प्रतिभासित होता है तो ऐसे प्रतिभासको मोहका ही साम्राज्य समझना चाहिए। मोही जीव ही अंतरंग प्रतिनियत उपादानका विचार किये विना और प्रतिनियत बाह्य सामग्रीको लक्ष्यमें लिये विना केवल अपनी कल्पनाओंवश बाह्य साधनोंके आधार पर किसी भी कार्यके कभी भी होनेकी सोचता है और अंतरंग-बहिरंग प्रतिनियत सामग्रीके अभावमें सोची गई तरकीबके अनुसार उस कार्यके न होने पर जो वास्तवमें उस कार्यके हेतु नहीं थे ऐसे दूसरे केवल बाह्य साधनोंको ही दोषी ठहराता है, ज्ञानी जीव नहीं। स्पष्ट है कि जो केवलज्ञानका विषय है वही श्रुतज्ञानका भी विषय है। अतएव केवली जिन अपने समस्त विषयोंको जिस प्रकार प्रत्यक्ष रूपसे जानते हैं उसीप्रकार श्रुतज्ञानी जीव भी आगमके बलसे उक्त प्रकार निर्णयकर उनको उसी रूपमें जानते हैं। यदि कोई श्रुतज्ञान इससे भिन्न प्रकारसे जानता है तो उसे सम्यक् श्रुतज्ञान नहीं कहा जा सकता। उसकी मिथ्या श्रुतज्ञानमें ही परिगणना होगी।

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग २/८)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ २६४ से २७९

↑ सूची


\९. सर्वज्ञवचनका श्रद्धानी पुरुषार्थहीन नहीं होता

अब रहा अपर पक्षका यह कथन कि ‘उक्त प्रकारकी श्रद्धाके आधार पर यदि वह श्रुतज्ञानी जीव पुरुषार्थहीन और पथभ्रष्ट हो गया तो फिर इस मिथ्यात्वके प्रभावसे उसका अनन्त संसारमें परिभ्रमण होनेके सिवाय और क्या हो सकता है ?’ सो पता नहीं कि अपर पक्षने ऐसा मिथ्या विधान करनेका साहस कैसे किया ? यदि अपर पक्ष यह लिखता कि ‘जो जीव सर्वज्ञके उक्त प्रकारके कथनकी श्रद्धा छोड़कर पुरुषार्थहीन और कृतघ्न हो जाता है वह मिथ्यात्वके कारण अनन्त संसारका भागी होता है’ तब तो बात दूसरी होती। किन्तु यहाँ तो अपर पक्ष उक्त प्रकारकी श्रद्धाके आधार पर ही इस जीवको पुरुषार्थहीन और कृतघ्नी बनाकर मिथ्यादृष्टि और अनन्तसंसारी घोषित कर रहा है सो उसकी ऐसी घोषणाको विपरीत मान्यताका फल ही कहना चाहिए।

वस्तुतः मूल प्रश्नके अनुसार तो प्रकृतमें विचार इस बातका होना था कि 'द्रव्योंकी सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं या अनियत क्रमसे भी’, चूंकि अपर पक्ष शंकाकार पक्ष है, इसलिये उसकी ओरसे हमारे द्वारा प्रथम और द्वितीय उत्तरमें ‘सभी कार्य नियत क्रमसे ही होते हैं’ इसके समर्थनमें जो कुछ तर्क और आगम प्रमाण उपस्थित किये गये थे वे कैसे ठीक नहीं हैं यह शंकारूपमें प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। परन्तु अपनी प्रतिशंकाके प्रारम्भमें यह सब कुछ न कर उसकी ओरसे यहाँ कुछ ऐसी बातोंका विधान किया गया है जिनका आगम और आगमानुसार तर्कोंसे कोई सम्बन्ध नहीं। क्या कोई वीतराग मार्गका सच्चा श्रद्धानी यह मान सकता है कि जो कोई सर्वज्ञदेवके वचनों पर श्रद्धा करता है वह पुरुषार्थहीन और कृतघ्न हो जाता है। यदि विचारकर देखा जाय तो ऐसा जीव जो कि सर्वज्ञदेवके वचनों पर श्रद्धान करता है अनन्त-पुरुषार्थी होगा, क्योंकि अनन्त-पुरुषार्थको प्रकट किये बिना किसी भी जीवको सर्वज्ञदेवके वचनों पर श्रद्धा हो ही नहीं सकती। हाँ जो जीव उक्त प्रकारकी श्रद्धाका त्याग कर देगा वह अवश्य ही पुरुषार्थहीन और कृतज्ञ हो जायगा। सर्वज्ञदेवके वचनोंपर श्रद्धा करनेवाला जीव कार्यकारणभावमें स्वीकृत उपादान और बाह्य निमित्तके लक्षण जाने या न जाने पर वह यह अवश्य जानता है कि ‘जिस कालमें जिस विधिसे जिस वस्तुका जो होना होगा वही होगा’ उसमें फेर-फार इन्द्र और चक्रवर्तीकी बात तो छोड़िये स्वयं तीर्थंकर भी नहीं कर सकते। वस्तुतः देखा जाय तो इस कथनमें कार्य-कारणभावके सभी सिद्धान्त निहित हो जाते हैं। यह दृष्टिकी बात है कि श्रुतज्ञानी जीव कब किस कार्यको किस रूपमें देखता-परखता है। अनन्त आकुलताओंसे बचनेका तो यह मार्ग है ही, सम्यक् आत्मपुरुषार्थको जागृत कर अपने स्वरूपमें स्थित होनेका भी यही मार्ग है, क्योंकि आकुलता ही दुःख की खान है और निराकुलता सुखकी जननी है। इसलिए प्रकृतमें ऐसा निर्णय करना चाहिए कि जिसने सर्वज्ञके वचनोंमें यथार्थ श्रद्धा की उसने उनके स्वरूपको जान लिया और जिसने उनके स्वरूपको जान लिया उसने अपने आत्माके स्वरूपको जान लिया और जिसने अपने आत्माके स्वरूपको जान लिया उसे अपने यथार्थ कर्तव्यका भान हो गया। ( देखो प्रवचनसार गाथा ८० )।

वीतराग सर्वज्ञने सम्यक् श्रद्धानुसारी चारित्र (कर्तव्य) को ही सच्चा चारित्र कहा है, इसलिए जैनधर्मके आगम ग्रन्थोंकी प्ररूपणामें अपर पक्षके द्वारा ऐसा भेदका किया जाना उचित नहीं है कि ‘कार्योत्पत्तिके विषयमें श्रुतज्ञानी जीवोंके लिए दो प्रकारकी विवेचना की गई है-एक तो केवलज्ञानके विषयकी अपेक्षा श्रद्धादृष्टिसे और दूसरी श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षा कर्तव्यदृष्टिसे।’ मालूम पड़ता है कि आगमग्रन्थोंकी प्ररूपणामें ऐसे विभागकी दृष्टि बनानेसे ही अपर पक्षके सामने जटिलता उपस्थित हुई है और इसीलिए वह उपादानके स्वरूपकी ओर ध्यान दिये बिना केवल बाह्य सामग्रीके बलपर कार्य-कारणभावकी स्थापना करना चाहता है। एक ओर तो वह कार्य-कारणभावकी प्ररूपणाको केवलज्ञानके विषयसे बहिर्भूत करता है और दूसरी ओर वह अनन्त अगुरुलघु गुणोंकी षड्गुणी हानि-वृद्धिमें बाह्य द्रव्यकी निमित्तताका निषेध कर इसे अनुभवगम्य बतलाता है, जब कि आचार्योंने अनन्त अगुरुलघु गुणोंकी स्वीकृति ही आगमप्रमाणसे मानी है। यदि अपर पक्ष केवलज्ञानके विषयसे भिन्न श्रुतज्ञानका विषय क्या है ? क्या जो मात्र पाँच इन्द्रियों द्वारा दृष्टिगोचर होता है वह श्रुतज्ञानका विषय है या और कुछ इसका स्पष्टीकरण करनेके बाद अपने पक्षको उपस्थित करता तो अधिक उपयुक्त होता। इस प्रकार पूर्वोक्त विवेचन पर दृष्टिपात करनेसे यह स्पष्टरूपसे ज्ञात हो जाता है कि श्रुतज्ञानी जीवोंके सामने जो भी सांसारिक समस्याएँ है उनका एकमात्र हल केवलज्ञानके विषयके अनुसार श्रद्धा कर तदनुसार प्रवृत्ति करना ही है, अन्य दूसरे सब उपाय झूठे हैं। कार्य-कारणभावकी समस्याका सम्यक् समाधान प्राप्त करनेका भी यही उपाय है, क्योंकि जिनागममें वस्तुस्वरूपके विवेचनके प्रसंगसे कार्य-कारणभावका स्पष्ट निर्देश किया ही है।

\१०. क्रमबद्ध या नियतक्रम पदका अर्थ

अब उक्त प्रतिशंकाके उस भाग पर विचार करते हैं जिसमें ‘क्रमबद्ध’ पदका अर्थ करके अपर पक्ष द्वारा श्रुतज्ञानकी दृष्टिसे वस्तुकी द्रव्यपर्यायों और गुणपर्यायोंके नियतपने और अनियतपनेकी स्थापना की गई है। ‘क्रमबद्ध’ पदका अर्थ करते हुए अपर पक्षने जो यह लिखा है कि ‘सामान्यतः क्रम शब्दका प्रयोग कालिकसम्बन्धके आधार पर हुआ करता है।’ सो इस सम्बन्धमें इतना ही लिखना है कि ‘क्रम’ शब्दका प्रयोग दैशिक क्रम, कालिक क्रम और गणनाक्रम आदि अनेक अर्थोंमें होता है। इतना अवश्य है कि प्रकृतमें एक द्रव्य या एक गुणसम्बन्धी पर्यायें विवक्षित होनेसे यहाँ कालिक क्रम ही लिया गया है। किन्तु पर्यायें एकके बाद एक होती हुई वे अपने-अपने स्वकालके अनुसार नियत क्रमसे ही होती हैं या उनका अपना-अपना कोई स्वकाल न होनेसे वे अनियत क्रमसे भी होती हैं इस बातका यहाँ विचार करना है। अपर पक्ष केवलज्ञानकी अपेक्षा तो उनका अपने-अपने स्वकालमें नियतक्रमसे होना मानकर भी श्रुतज्ञानकी अपेक्षा उनका नियत और अनियत दोनों प्रकारसे होना मानना चाहता है। इस तरह वह केवलज्ञानके विषयसे श्रुतज्ञानके विषयमें भेद करके अपने अभिमतकी सिद्धि करना चाहता है। यहाँ अपर पक्षने कुछ पर्यायोंमें श्रुतज्ञानकी अपेक्षा अनियत क्रम और नियत क्रमकी कल्पना कर उनके कुछ उदाहरण देकर लिखा है-

‘जैसे जीवकी क्रोध पर्यायके बाद क्रोध, मान, माया और लोभरूप पर्यायोंमेंसे यथासम्भव कोई भी एक पर्याय हो सकती है। इसीप्रकार मानादि पर्यायके बाद भी उक्त चारों पर्यायोंमेंसे कोई भी एक पर्याय हो सकती है नियत कोई एक पर्याय नहीं। इसी प्रकारकी व्यवस्था यथासम्भव मनुष्य, तिर्यञ्च, देव और नारक पर्यायोंके बारेमें भी समझना चाहिए। इन सब पर्यायोंमें एकके बाद एकरूप क्रम तो रहता है परन्तु नियत क्रम नहीं रहता। इतनी बात अवश्य है कि मुक्तिरूप पर्याय केवल मनुष्य पर्यायके बाद ही हुआ करती है और नारक तथा देवपर्यायके बाद सिर्फ तिर्यञ्च अथवा मनुष्य पर्याय ही हुआ करती है और किसी-किसी नारक पर्यायसे सिर्फ तिर्यञ्च पर्याय तथा किसी-किसी देव पर्यायसे केवल मनुष्य पर्याय ही हुआ करती है। कोई मनुष्य पर्याय भी ऐसी होती है जिसके बाद केवल मनुष्य या देव पर्याय और कोई-कोई मनुष्य पर्यायसे केवल देवपर्याय ही सम्भव होती है। तिर्यञ्च पर्यायके बाद भी आगम समस्त अपने ढंगकी ऐसी ही व्यवस्था है। इस तरह नियतक्रम और केवल क्रम ( अनियत-क्रम ) पर्यायोंमें यथायोग्य समझना चाहिए।’ इत्यादि।

श्रुतज्ञानकी अपेक्षा पर्यायोंमें नियतक्रम और अनियतक्रम किस प्रकार है इस बातसे सम्बन्ध रखनेवाला यह अपर पक्षका कथन है। अपर पक्षने इस कथनमें एक स्थल पर ‘आगम सम्मत अपने ढंगकी ऐसी ही व्यवस्था है।’ यह उल्लेख भी किया है। इससे इतना तो सुनिश्चित ज्ञात होता है कि अपर पक्ष आगमसम्मत व्यवस्थाके अनुसार ही यह सब लिख रहा है और आगमकी रचना सर्वज्ञ वीतरागकी दिव्यध्वनिके अनुसार ही हुई है। ऐसी अवस्थामें पर्यायोंसम्बन्धी इस व्यवस्थाको केवलज्ञानके विषयके अनुसार मानना ही उचित होगा। और इस तथ्यको तो अपर पक्षने ही स्वीकार किया है कि केवलज्ञानमें सब पर्यायें नियत-क्रमसे होती हुई ही झलकती हैं, अनियतक्रमसे होती हुई नहीं। ऐसी अवस्थामें आगमके अनुसार प्रवृत्त हुए श्रुतज्ञानमें भी उन सब पर्यायोंका एकमात्र नियतक्रमसे होना अपर पक्षको निश्छल भावसे स्वीकार कर लेना चाहिए। श्रुतज्ञानमें यदि नियतक्रमसे कब कौन पर्यायें उत्पन्न होंगी यह पर्यायोंके परोक्ष होनेके कारण ज्ञात नहीं हो पाता तो इतने मात्रसे उनका अनियत क्रमसे होना स्वीकार नहीं किया जा सकता।

वस्तुतः अपर पक्षने जिस ढंगसे पर्यायोंके नियतक्रम और अनियतक्रमसे होनेके विषयमें अपनी प्रतिशंका प्रस्तुत की है वह ढंग मूल प्रश्नको स्पर्श नहीं करता, क्योंकि क्रोध, मान, माया या लोभ या नारकादि चारों पर्यायें किस क्रमसे हों तो नियतक्रम समझा जाय और उस क्रमसे न हों तो अनियतक्रम समझा जाय ऐसी व्यवस्था आगममें नहीं की गई है। अतएव अपर पक्षने पर्यायोंके नियतक्रम और अनियत-क्रमके विषयमें जो भाष्य किया है वह प्रकृतमें लागू नहीं होता। प्रकृतमें प्रश्न ही दूसरा है जिसे दृष्टि ओझल करके अपर पक्ष जिस किसी प्रकार श्रुतज्ञानके नाम पर अपने कथित अभिप्रायकी पुष्टि करना चाहता है। क्रोधके बाद दूसरे क्षणमें अपने प्रतिनियत उपादानके अनुसार अन्य द्रव्यकी पर्यायको निमित्तकर क्रोधादि चारोंमेंसे एक कोई भी हो इसमें बाधा नहीं है। यहाँ देखना तो यह है कि जब क्रोधके बाद अपने प्रति नियत उपादानके अनुसार जो पुनः क्रोध होता है तब उसके स्थानमें क्रोध न होकर बाह्य सामग्रीके बल पर मानादि तीनमेंसे क्या अन्य कोई हो सकता है ? इस सम्बन्धमें आगमके अनुसार हमारा कहना तो यह है कि क्रोधके बाद पुनः क्रोध होता है तब वह अपने प्रतिनियत उपादानके अनुसार स्वकालमें ही होता है, बाह्य सामग्रीके बलसे उसमें फेर-बदल नहीं ही सकता। अतीत कालकी सभी पर्यायें प्रत्येक समयके अपने-अपने प्रतिनियत उपादानके अनुसार इसी नियतक्रमसे होती आई हैं और भविष्यमें भी प्रत्येक समयके अपने-अपने प्रतिनियत उपादानके अनुसार इसी नियतक्रमसे होतीं रहेंगी। प्रत्येक द्रव्यमें अतीत, अनागत और वर्तमान सभी पर्यायें प्रत्येक समयमें अपने-अपने प्रतिनियत उपादानके अनुसार अपने-अपने कालमें पांच समवाययुक्त कारक साकल्यके साथ नियतक्रमसे ही हुईं हैं, होगीं और होती हैं। प्रत्येक द्रव्य तीनों कालोंकी पर्यायोंका पिण्ड हैं यह वचन आगममें इसी आधार पर कहा गया है। गोम्मटसार जीवकाण्डमें लिखा है-

एयदवियम्मि जे अत्थपज्जया वियणपज्जया चावि।
तीदाणागदभूदा तावदियं तं हवदि दव्वं ॥ ५८२ ॥

एक द्रव्यमें त्रिकालसम्बन्धी जितनी अर्थ पर्याय और व्यञ्जन पर्याय हैं उतना ही द्रव्य है ॥५८२॥

द्रव्यका यह लक्षण तभी बनता है जब जितने कालके समय हैं पर्याय दृष्टिसे तत्प्रमाण प्रत्येक द्रव्यके स्वरूपको स्वतःसिद्ध स्वीकार कर लिया जाय और इस आधार पर जिस प्रकार लोकाकाशके एक-एक प्रदेशपर आधार-आधेयभाव (निमित्त-नैमित्तिकभाव)से एक-एक कालाणु अवस्थित है उसी प्रकार कालके एक-एक विवक्षित समयके साथ पर्यायदृष्टिसे प्रत्येक द्रव्यका निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध स्वीकार करना उचित ही है। केवलज्ञान तो ऐसे नियतक्रमको प्रत्यक्षरूपसे जानता ही है, श्रुतज्ञानी भी आगमके बलसे ऐसा ही निश्चय करता है। यही कारण है कि कार्य-कारणभावमें कालको भी स्थान मिला हुआ है। प्रत्येक कार्यके प्रति प्रतिनियत कारणरूपसे जिन पांचका समवाय निश्चित है उसका निर्देश इसी प्रत्युत्तरमें हम पहले कर ही आये हैं। अणुरूपसे काल द्रव्यको पृथक्-पृथक् क्यों माना गया है इसका निर्देश करते हुए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ३९९ का यह कथन दृष्टव्य है-

नानाद्रव्यं कालः, प्रत्याकाशप्रदेशं युगपद् व्यवहारकालभेदान्यथानुपपत्तेः। तत्र दिवसादिभेदतः पुनः क्रियाविशेषभेदान्नैमित्तिकानां लौकिकानां च सुप्रसिद्ध एव। स च व्यवहारकालभेदो गौणः परैरभ्युपगम्यमानो मुख्यकालद्रव्यमन्तरेण नोपपद्यते। यथा मुख्यसत्त्वमन्तरेण क्वचिदुपचरितसत्त्वमिति प्रतिलोकाकाशप्रदेशं कालद्रव्यभेदसिद्धिः, तत्साधनस्यानवद्यत्वात्, अन्यथानुपपन्नत्वसिद्धेः।

काल द्रव्य नाना है, अन्यथा आकाशके प्रत्येक प्रदेशके प्रति व्यवहार कालका भेद नहीं बन सकता है। उसमें दिवसादिके भेदसे तथा क्रियाविशेषके भेदसे नैमित्तिक और लौकिक जनोंमें व्यवहार कालका भेद प्रसिद्ध ही है। और दूसरोंके द्वारा स्वीकार किया गया वह व्यवहार कालका भेद गौण है जो कि मुख्य काल द्रव्यके विना नहीं बन सकता। जिस प्रकार मुख्य सत्त्वके बिना कहीं पर उपचरित सत्त्व नहीं बनता, इसलिये लोकाकाशके प्रत्येक प्रदेशपर काल द्रव्यके भेदकी सिद्धि होती है। अन्यथा व्यवहार काल नहीं बन सकता, इससे निश्चय कालकी सिद्धि निर्दोष है।

यह उल्लेख स्वयंमें बहुत स्पष्ट है। इससे यह अच्छी तरह ज्ञात होता है कि कालके विवक्षित समयको निमित्त कर जो पर्याय उत्पन्न होती है उसका वही स्वकाल है। उस समय वह उत्पन्न न हो या उ[से] टालकर उत्पन्न हो यह नहीं हो सकता। इस प्रकार मणियोंकी मालाके समान प्रत्येक द्रव्य या प्रत्येक गुणकी तीनों कालसम्बन्धी पर्यायोंके मणि सूत्रके समान प्रत्येक द्रव्य या प्रत्येक गुणमें नियतक्रमसे गुम्फित हैं। जिस प्रकार सूत्रमें गुम्फित मणियोंको अपने-अपने स्थानसे च्युत नहीं किया जा सकता उसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य या प्रत्येक गुणमें गुम्फित तीनों कालसम्बन्धी पर्यायोंको उस-उसकाल समयसे अलग नहीं किया जा सकता। कोई इसे माने या न माने, प्रत्येक वस्तु तो स्वरूपसे स्वतःसिद्ध ऐसी ही है। इसमें अन्य किसीका दखल नहीं। इस लिए प्रत्येक द्रव्य या गुणकी सभी पर्यायें अपने-अपने कालमें नियतक्रमसे ही होतीं हैं ऐसा यहाँ निश्चय करना चाहिए (देखो प्रवचनसार गाथा ९९ की अमृतचन्द्र आचार्यकृत संस्कृत टीका।)

इस प्रकार उक्त विवेचनसे प्रकृतमें क्रमबद्ध या नियतक्रम पदका क्या अर्थ इष्ट है उसका स्पष्ट ज्ञान हो जाता है।

\११.स्वामी कार्तिकेयानुपेक्षा की गा. ३२३ की संस्कृत टीका

अब हम प्रकृत प्रतिशंकाके उस भाग पर विचार करेंगे जिसमें स्वामी कार्तिकेयानुपेक्षाकी गाथा ३२३ की संस्कृत टीकामें उद्‌धृत ‘त्रैकाल्यं द्रव्यषट्कं’ इत्यादि प्रसिद्ध पदके आधारपर अपर पक्षने अपना मन्तव्य प्रकट किया है। इस संबन्धमें अपर पक्षका वक्तव्य हैं कि-

‘उस टीकामें उद्‌धृत ‘त्रैकाल्यं द्रव्यषट्कं’ इत्यादि पद प्रकृत विषयकी मर्यादाके बाहर होते हुए भी आपने उसका उपयोग अपने पक्षकी पुष्टिके लिए करनेका प्रयत्न किया है जो मालूम पड़ता है कि प्रकृत प्रश्नके महत्त्वको पाठकोंकी दृष्टिमें कम करनेके उद्देश्यसे ही आपने किया है।’

सो अपर पक्षका यह वक्तव्य हमें बड़ा ही उपहासास्पद प्रतीत हुआ, क्योंकि उक्त पद एक तो संस्कृत टीकामें जहाँ जैसा निबद्ध था, हमने उस टीकाके साथ वैसा ही उद्‌धृत कर दिया है और संस्कृत टीकाके अर्थके साथ उसका भी अर्थ लिख दिया है। हमने उक्त पदके आधार पर जब किसी प्रकारकी टीका-टिप्पणी ही नहीं की ऐसी अवस्थामें हमने उसका उपयोग अपने पक्षकी पुष्टिके लिये किया है या हम पाठकोंकी दृष्टिमें प्रकृत प्रश्नका महत्त्व घटाना चाहते हैं, अपर पक्षकी ओरसे ऐसा लिखा जाना मात्र पक्षपात पूर्ण दृष्टिका सूचक प्रतीत होता है।

दूसरे प्रकृतमें उक्त पदका उपयोग ही नहीं है यह लिखना न केवल हमें लांछित करता है, अपि तु संस्कृत टीकाकारको भी लांछित करनेवाला है। टीकाकारने उसे उद्‌धृत किया और बुद्धिपूर्वक उसे उद्‌धृत किया, क्योंकि स्वामी कार्तिकेयकी ‘एवं जो णिच्छयदो’ इत्यादि ३२३ संख्याक गाथाके द्वितीय चरणके अन्तमें ‘दव्वाणि सव्वपज्जाए’ पाठ पठित है। इसलिये इस पाठके आधारपर वे द्रव्य और सब पर्यायें कौन हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिये ही टीकाकारने ‘त्रैकाल्यं द्रव्यषट्कं’ इत्यादि पद उद्‌धृत किया है। इसलिये प्रकृतमें उक्त पदका उद्‌धृत किया जाना न केवल उपयोगी है, किन्तु आवश्यक भी है। इससे यह भली-भाँति ज्ञात हो जाता है कि तीन काल,छह द्रव्य,नव पदार्थ, छह कायिक जीव, छह लेश्या, पाँच अस्तिकाय तथा व्रत, समिति, गति, ज्ञान और चारित्रके भेद आदि जो भी सब द्रव्य और सब पर्यायें जिनागममें कहे गये हैं वे सब नियत और क्रमनियत ही होते हैं। द्रव्य नियत होते हैं और पर्यायें क्रमनियत ही होती हैं, क्योंकि नियतरूप द्रव्यके साथ पर्यायोंका बननेवाला क्रम क्रमनियत ही होगा। अन्यथा द्रव्य, गुण और पर्यायोंकी एक सत्ता नहीं बन सकती। वस्तुतः अपर पक्षको उक्त श्लोकका संस्कृत टीकामें उद्‌धृत किया जाना खटका, इसलिए उसकी ओरसे उक्त श्लोकको आलम्बन कर गलत ढंगसे यह टीका-टिप्पणी की गई है।

\१२. सम्यक् श्रद्धानुसारी ज्ञान ही सम्यक् श्रुतज्ञान है।

इस टीका-टिप्पणीके बाद अपर पक्षने विस्तारके साथ यह दिखलानेका पुनः प्रयत्न किया है कि क्या नियत है और क्या अनियत है और अन्तमें आप्तमीमांसाकी कारिका १०५ ‘स्याद्वाद-केवलज्ञाने’ उद्धृत करनेके पूर्व यह वक्तव्य निबद्ध किया है-

‘यदि कार्यके स्वदेश और स्वकालका अभिप्राय जैसा कि स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा ३२१ और गाथा ३२२ में प्रगट किया गया है वैसा गृहीत किया जावे तो वह भी इस प्रकारसे सही होगा कि केवलज्ञानमें सभी कार्य प्रतिनियत कारणोंसे स्वकालमें उत्पन्न होते हुए झलक रहे हैं, लेकिन केवलज्ञानमें यदि कार्य ऐसा झलक रहा है तो श्रुतज्ञानमें भी केवलज्ञानकी तरह ही कार्य झलकना चाहिए-यह अभिप्राय उन गाथाओंका नहीं है, कारण कि केवलज्ञानी और श्रुतज्ञानियोंका ज्ञानभेद और अवस्थाभेद पूर्वमें बतलाया जा चुका है, अतः स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा ३२३ द्वारा श्रुतज्ञानीको केवलज्ञानके विषयके प्रति मात्र श्रद्धा करनेका उपदेश देते हुये ऐसे श्रद्धावान व्यक्तिको सम्यग्दृष्टि प्रतिपादित किया है।’

यह अपर पक्षका प्रकृत विषयमें उपसंहारात्मक वक्तव्य है। आचार्य समन्तभद्रने तो ‘स्याद्वाद-केवलज्ञाने’ इत्यादि १०५ संख्याक कारिका द्वारा केवलज्ञान और श्रुतज्ञानमें यथावस्थित पदार्थोंको मात्र प्रत्यक्ष और परोक्षरूपसे जाननेकी अपेक्षा भेद बतलाया है-सब द्रव्यों और उनकी पर्यायोंको केवलज्ञान प्रत्यक्षरूपसे जैसा जानता है, श्रुतज्ञान उनको परोक्षरूपसे वैसा ही जानता है। केवलज्ञान एक ही ज्ञेयको किसी दूसरे प्रकारसे जाने और श्रुतज्ञान उसी ज्ञेयको किसी दूसरे प्रकारसे जाने ऐसा भेद इन ज्ञानोंमें नहीं है और न उक्त कारिकाका यह आशय ही है। आचार्य विद्यानन्दिने भी इसकी टीका अष्टसहस्रीमें ‘साक्षादसाक्षाच्च तत्परिच्छित्तिनिबन्धनत्वात् तद्भेदस्य’ इस वचन द्वारा यही प्रगट किया है कि केवलज्ञानमें जो पदार्थ जिस रूपमें प्रत्यक्षरूपसे झलकते हैं, श्रुतज्ञानमें वे ही पदार्थ उसी रूपमें आगमके बलसे परोक्ष रूपमें झलकते हैं। फिर नहीं मालूम कि अपर पक्ष इन दोनों ज्ञानोंमें अन्य किस प्रकारसे अपने कल्पित भेदको प्रसिद्ध करना चाहता है। अपर पक्ष द्वारा ऐसा लिखा जाना तो पूरे जिनागमका अपलाप करनेके समान है। इसका न केवल हमें आश्चर्य है, किन्तु समस्त जैनपरम्परा इसमें आश्चर्यका अनुभव करेगी। अब तक तो पूरी जैन परम्परा यह जानती और श्रद्धान करती आई कि सब पदार्थ केवलज्ञानमें जैसे झलके हैं वैसा प्रत्येक जैनको आगमानुसार श्रद्धान करना चाहिए और जानना भी वैसा ही चाहिये। प्रवचनसारमें साधुको ‘आगमचक्षु’ (गाथा २३४) इसी अभिप्रायसे कहा है। और साधु श्रुत-संयमधर ही होते हैं, इसलिए श्रुतके आधारसे साधु जैसा उपदेश दें श्रावकोंको भी वैसा ही मानना चाहिए और श्रद्धान करना चाहिए। किन्तु अब अपर पक्ष अपने नये विचारोंको जैन परंपरामें प्रस्थापित करनेके अभिप्रायसे केवलज्ञान और श्रुतज्ञानके विषयमें भेद बतलाकर ऐसा मत प्रकट करनेका साहस करता है कि केवलज्ञानमें जिस प्रकार सब कार्य क्रम नियतरूपसे झलकते हैं उस प्रकार श्रुतज्ञानमें सब कार्य क्रमनियतरूपसे नहीं झलकते, इसलिए श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षा कुछ कार्य क्रम-नियत हैं और कुछ कार्य क्रम-अनियत हैं।

अपर पक्षके इस कथनके आधारपर विचार यह करना है कि यदि किसी श्रुतज्ञानमें सब कार्य अपने प्रतिनियत कारणोंसे स्वकालमें नियतक्रमसे होते हुए नहीं झलकते हैं तो यह किसका दोष है-केवलज्ञानका या आगमका या उस श्रुतज्ञानका? केवलज्ञानका तो यह दोष माना नहीं जा सकता, क्योंकि यह तो अपर पक्षने ही स्वीकार कर लिया है कि-‘केवलज्ञानमें सभी कार्य प्रतिनियत कारणोंसे स्वकालमें उत्पन्न होते हुए झलक रहे हैं।’ आगमका भी यह दोष नहीं माना जा सकता है, क्योंकि जैन परम्परामें आगम उसीको स्वीकार किया गया है जिसकी रचना केवलज्ञानी वीतराग जिनकी द्वादशांग वाणीके अनुसार हुई है । इसलिऐं ऐसे आगममें वही बात प्रतिपादित की गई होगी जो केवलज्ञानमें झलकी होगी । केवलज्ञानमें कुछ दूसरी बात झलकी हो और आगममें कोई दूसरी बात लिपिबद्ध की गई हो यह त्रिकालमें नहीं हो सकता । ऐसा मानना और लिखना तो पूरे जिनागमको ही अप्रमाण ठहराना है । आशा है अपर पक्ष इस तथ्य पर गम्भीरता पूर्वक तो विचार करेगा ही । साथ ही वह अपने कल्पित अभिमतकी पुष्टिमें जो आगम वाक्योंका विपर्यास कर रहा है उससे विरत होनेकी भी चेष्टा करेगा ।

अब रह गया तीसरा विकल्प सो इसका अपर पक्षको ही निश्चय करना है कि जो श्रुतज्ञान केवलज्ञानमें झलकनेवाले विषयको आगमानुसार उसी रूपमें न जानकर उससे विपरीतताको लिये हुए जानता है उसे सम्यक् श्रुतज्ञान कैसे कहा जा सकता है, वह तो मिथ्या श्रुतज्ञान ही ठहरेगा ।

इसलिए सिद्ध हुआ कि यदि मिथ्या श्रुतज्ञानकी अपेक्षा अपर पक्ष सभी कार्योंका नियतक्रम और अनियतक्रमसे होना सिद्ध करना चाहता है तो भले करे, उसकी इच्छा । परन्तु उस पक्षका यह प्रयास आगमानुसारी सम्यक् श्रुतज्ञानके अनुसार किया गया उपक्रम तो नहीं माना जा सकता, क्योंकि आगमानुसारी सम्यक् श्रद्धापूर्वक जो श्रुतज्ञान होता है, आगममें उसे ही सम्यक् श्रुतज्ञानके रूपमें स्वीकार किया गया है ।

इस प्रकार इस विवेचनके प्रकाशमें जब हम उन बातों पर विचार करते हैं जिनके द्वारा विविध उदाहरण उपस्थित कर कुछ कार्योंको क्रमनियत और कुछ कार्योंको क्रमअनियत सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है तो स्पष्ट ज्ञात होता है कि वह सब कथन सम्यक् श्रुतज्ञान या केवलज्ञानके विषयके अनुसार प्रतिपादन करनेवाले परमागमकी प्रतिष्ठा करनेके अभिप्रायसे नहीं किया गया है किन्तु केवल बाह्य इन्द्रियज्ञान और मानसिक कल्पनाओंको पुष्टिमें उसका विपरीत ढंगसे उपयोग किया गया है । अपर पक्षके उक्त कथनमें निहित अभिप्रायके पीछे न तो परमागमका ही बल है और न ही केवलज्ञानके अनुसार पदार्थ व्यवस्थाके सम्बन्धमें हुई श्रद्धाका ही बल है । अतएव सम्यक् श्रद्धानुसारी ज्ञान ही सम्यक् श्रुतज्ञान है, क्योंकि दीपक और प्रकाशके समान सम्यग्दर्शन कारण हैं और सम्यग्ज्ञान कार्य है । ( देखो पुरुषार्थसिद्ध्युपाय श्लोक ३४) ऐसा समझ कर यही निर्णय करना चाहिए कि सब पदार्थ केवलज्ञानमें जिस प्रकार झलकते हैं श्रुतज्ञानमें भी वे सब पदार्थ आगमके बलसे उसी प्रकार झलकते है । इसमें अवस्था भेद और ज्ञानभेद बाधक नहीं है ।

\१२. प्रकृत प्रतिशंकाके कतिपय कथनोंका खुलासा

अब इसी बातको उक्त वक्तव्यके कतिपय कथनोंके माध्यमसे थोड़ा आगम और तर्ककी कसौटीपर कस कर देख लेना चाहते हैं ।

: १ :

अपर पक्षकी ओरसे उपस्थित की गई प्रतिशंकामें एक बात मुक्त जीवोंके अवस्थानको लक्ष्यमें रख कर लिखी गई है । उस पक्षका कहना है कि-

‘मुक्त जीवोंका लोकके अग्रभागमें अवस्थान स्वभावतः नहीं है, क्योंकि उनका स्वभाव तो ऊर्ध्वगमन करनेका ही है, परन्तु गमन करने के लिए उन्हें चूंकि धर्मद्रव्यका अवलम्बन आगे प्राप्त नहीं है अतः लोकके अग्रभागमें ही उनका अवस्थान हो जाता है।’

यह अपर पक्षका वक्तव्य है। यहाँ सर्व प्रथम विचार यह करना है कि जो भी कार्य होता है वह स्वभावकी परिधिमें होकर भी समर्थ उपादानके अनुसार स्वकालमें अन्य द्रव्यको निमित्त कर होता है या उपादानके विना केवल स्वभावके अनुसार अन्य द्रव्यको निमित्त कर होता है? द्वितीय पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं है, क्योंकि आगममें कहीं भी उपादानके विना केवल स्वभावसे अन्य द्रव्यको निमित्तकर कार्यकी उत्पत्ति स्वीकार नहीं की गई है। रह गया प्रथम पक्ष सो उसे स्वीकार करने पर तो यही मानना उचित है कि मुक्त जीवोंका उपादान ही लोकान्त तक गमन करनेका होता है, इसलिए उनकी लोकान्त तक ही ऊर्ध्वगति होती है और लोकान्तमें स्थित होनेका उपादान होनेसे वहाँ वे स्थित हो जाते हैं। इस गति और स्थितिमें वाह्य द्रव्योंका आलम्बन भी तदनुकूल होता है, इसलिए जैसे उनकी स्वभाव उर्ध्वगति होती है उसी प्रकार लोकान्तमें स्वभाव स्थिति भी होती है। मुक्त जीवोंकी ये दोनों गति और स्थिति स्वभावरूप ही हैं। यदि मुक्त जीवोंका लोकान्तमें अवस्थान स्वभावतः नहीं माना जाता है तो वहाँ उस विभावरूप स्थितिका विभावरूप उपादान और उनके अनुकूल निमित्त भी स्वीकार करना होगा। किन्तु इसका स्वीकार किया जाना न तो आगम संगत है और न ही तर्क संगत है। उदाहरणार्थ एक पुद्गल परमाणुको लीजिए। इसमें लोकान्तप्रापिणी द्रव्ययोग्यताके रहते हुए भी अपने उपादानके अनुसार उसकी एक प्रदेश, दो प्रदेश आदि तक ही स्वभावगति होती है और अपने उपादानके अनुसार वह नियत प्रदेशतक गमनकर स्वभाव स्थिति कर लेता है। श्री तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सू० १७ में लिखा है-

जीव-पुद्गलानां स्वयमेव गतिपरिणामिनां तदुपग्रहकारणत्वेनानुमीयमानो धर्मास्तिकायः। तेषामेव स्वत एव स्थितिमास्कन्दतां बाह्योपग्रहकारणत्वेनानुमीयमानोऽधर्मास्तिकायः।

स्वयं गति करनेवाले जीव और पुद्गलोंकी गतिमें उपग्रहकारणरूपसे अनुमान किया गया धर्मास्तिकाय है तथा स्वयं ही स्थितिको धारण करनेवाले उन्हींकी स्थितिमें वाह्य उपग्रह कारणरूपसे अनुमान किया गया अधर्मास्तिकाय है।

इसमें स्पष्ट शब्दोंमें यह स्वीकार किया गया है कि जीव और पुद्गल स्वयं गति करते हैं और स्वयं स्थित होते हैं । अव यदि अपर पक्षके कथनानुसार सिद्ध जीवोंका लोकाग्रमें अवस्थान स्वभावतः न माना जाय तो उनका वहाँ अवस्थित होना स्वयं ही स्थित होना कैसे कहलायेगा। धर्म द्रव्य तो गतिका निमित्त है, इसलिए यह कार्य उसका तो माना नहीं जा सकता और अधर्म द्रव्य उदासीन निमित्त है, इसलिए ठहरने रूप क्रियाका कर्ता उसे भी नहीं माना जा सकता। और ऐसा माना नहीं जा सकता, कि सिद्ध जीव लोकाग्र भागमें स्थित नहीं होते, क्योंकि ऐसा माननेमें आगमसे विरोध आता है। अतः प्रकृतमें यही मानना उचित है कि सिद्ध जीवोंकी गति और स्थिति अपने उपादानके अनुसार स्वभावसे होती है। उनके मुख्य कर्ता सिद्ध जीव ही हैं, धर्म-अधर्म द्रव्य नहीं। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सू० १७ में लिखा है-

उपकारो बलाधानं अवलम्बनं इत्यनर्थान्तरम्। तेन धर्माधर्मयोः गतिस्थितिनिर्वर्तने प्रधानकर्तृत्वमपोदितं भवति।

उपकार, बलाधान और अवलम्बन ये एकार्थवाची शब्द हैं। इससे धर्म और अधर्म द्रव्यका गति और स्थितिके करनेमें प्रधान कर्तापनका निरसन हो जाता है।

आगममें एक प्रश्न उठाया गया है कि आलोकाकाशमें कालद्रव्यका अभाव होनेसे वहाँ उसकी उत्पाद-व्यय रूप पर्यायका बाह्य कारण क्या है ? इस प्रश्नका समाधान करते हुए वहाँ बतलाया है कि लोकाकाश और अलोकाकाश यह प्रयोजन विशेषसे किया गया विभाग है, वस्तुतः स्वयं आकाशमें ऐसा भेद नहीं है, इसलिए सर्वत्र आकाशकी उत्पाद-व्ययरूप पर्यायमें कालद्रव्यकी निमित्तता बन जाती है। इसी न्यायसे यदि सिद्ध जीव लोकाग्रको लांघकर ऊर्ध्वगति कर जावें, मात्र अधोभागके कुछ आत्मप्रदेश लोकाकाशकी ऊर्ध्व सतहको स्पर्श किये रहें तो उनकी उस गतिमें धर्मद्रव्यकी निमित्तता बन जानेसे कोई बाधा नहीं आती। फिर ऐसा क्यों नहीं होता ? किन्तु ऐसा होता नहीं यह तो आगमसे ही स्पष्ट है। इससे विदित होता है कि सिद्ध जीवोंकी लोकके अग्रभाग तक गति और वहाँ स्थिति तत्त्वतः अपने उपादानके अनुसार ही होती है, धर्म और अधर्म द्रव्य तो उनकी गति और स्थितिमें निमित्तमात्र हैं।

इस प्रकार पूर्वोक्त समग्र विवेचनपर दृष्टिपात करनेसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि जिस प्रकार सिद्ध जीवोंकी विभावके कारणभूत उपादान और बाह्य सामग्रीके अभावमें स्वभावगति होती है उसी प्रकार विभावके कारणभूत उपादान और बाह्य सामग्रीके अभावमें उनकी स्वभाव स्थिति भी होती है। और यह बात असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि सिद्धोंकी ऊर्ध्वगति स्वाभाविकी होती है इसे सब आचार्योंने एक स्वरसे स्वीकार किया है।

मुक्तस्योर्ध्वगतिरेका स्वाभाविकीत्यत्रोक्तम्।-पंचास्तिकाय गा० ७३ टीका।

तथा स्थितिका अन्तर्भाव परिणाममें होनेसे वह स्वाभाविकी है ही। तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सू० २२में ‘स्थितिर्हि परिणामेऽन्तर्भवति’ ऐसा कहा भी है। अतः अपर पक्षका न तो यह लिखना ही ठीक है कि ‘सिद्ध जीवोंका लोकके अग्रभागमें अवस्थान स्वभावतः नहीं है और न यह लिखना ही ठीक है कि ‘केवल धर्मास्तिकायके अभावमें सिद्ध जीव लोकाग्रसे आगे गमन नहीं करते।’ लोकाग्रसे आगे सिद्ध जीव गमन नहीं करते यह नयवचन है जो गतिके मुख्यकर्ता निश्चय उपादानका सूचन करता है। इसलिए ‘धर्मास्तिकायाभावात् ( त० सू०, अ० १० सू० ८ ) इस वचनको व्यवहारनयका वचन मानकर व्याख्यान करना उचित है।

सिद्ध जीवोंका ऊर्ध्वगमन होता है यह भी नयवचन है जो इस बातको सूचित करता है कि मुक्त जीवोंका ऊपरको ही गमन होता है, दिगन्तर गमन नहीं होता ऐसा स्वभाव है, ऊर्ध्वगमन करते ही रहना ऐसा उनका स्वभाव नहीं है। तत्त्वार्थवार्तिक अ० १० सू० ८ में इस तथ्यको ध्यानमें रखकर लिखा भी है-

मुक्तस्योर्ध्वमेव गमनं न दिगन्तरगमनमित्ययं स्वभावः, नोर्ध्वगमनमेवेति।

यदि स्वभावकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो स्वभावसे ही सब द्रव्य लोकमें अवस्थित हैं, अन्यके कारण नहीं। और इसी कारण ‘यत्र षड्द्रव्याणि लोक्यन्ते स लोकः’ जहाँ छह द्रव्य देखे जाते हैं वह लोक है यह कथन किया गया है।

: २ ः

अपर पक्षने दूसरी जिस बातका उल्लेख किया है वह द्रव्ययोग्यतासे सम्बन्ध रखती है। केवलज्ञानमें जो अपरिमित सामर्थ्य ( योग्यता)का आगममें वर्णन आता है, या सर्वार्थसिद्धिके देवोंमें सातवें नरक तक गमन करनेकी सामर्थ्यका वर्णन आता है, या देवेन्द्रका जम्बूद्वीपको पलटनेरूप सामर्थ्यका वर्णन आता है, या कुम्हारमें निमित्तपनेकी अपेक्षा विविध प्रकारके मिट्टीके घट आदि बनानेकी सामर्थ्यका वर्णन आता है, या मिट्टीमें छोटे-बड़े अनेक घटादि कार्यरूप परिणमनेकी सामर्थ्यका वर्णन आता है, या अध्यापक और शिष्यमें क्रमसे निमित्त-उपादानकी अपेक्षा अनेक शास्त्रोंके पढ़ाने-पढ़नेरूप सामर्थ्यका वर्णन आता है सो यह सब कथन द्रव्यार्थिक दृष्टिसे किया गया है या पर्यायार्थिक दृष्टिसे इस तथ्य पर यदि अपर पक्षका ध्यान जाता तो उसने जिस अभिप्रायकी पुष्टिमें वह सब वक्तव्य लिखा है उसके लिखनेका प्रयोजन ही नहीं रहता। प्रश्न तो यह है कि प्रत्येक समयमें जो कार्य होता है वह कैसे होता है ? क्या जो द्रव्य-पर्यायशक्तियुक्त मिट्टी घट-रूप परिणम रही है वह उसी समय गाय आदि खिलौनारूप परिणम सकती है ? द्रव्यदृष्टिसे तो प्रत्येक द्रव्यमें जितनी त्रैकालिक पर्यायें सम्भव हैं वे सब योग्यतारूपमें विद्यमान हैं। परन्तु प्रत्येक समयमें जो एक-एक पर्याय होती है उसका कारण क्या ? आचार्योंने तो इसका अन्तरंग ( वास्तविक ) कारण पर्यायशक्तियुक्त द्रव्यको बतलाया है। जिस समय जिसका जैसा पर्यायशक्ति युक्त द्रव्य उपादान होता है उसीके अनुसार उससे दूसरे समयमें कार्य होता है और दूसरे समयमें जैसा पर्यायशक्ति युक्त द्रव्य पदार्थ उपादान होता है उसके अनुसार उसके तीसरे समयमें कार्य होता है। इसी प्रकार सब समयोंकी अपेक्षा सब द्रव्योंमें कार्यकारणभावको जान लेना चाहिए । स्पष्ट है कि प्रकृतमें द्रव्य-योग्यताओंका उल्लेख कर किन्हीं कार्योंको नियत ( निश्चित ) और किन्हींको अनियत ( अनिश्चित ) सिद्ध करना ठीक नहीं है।

: ३ :

अपर पक्षने नियत ( निश्चित ) योग्यतारूपसे तीसरी जिस बातका उल्लेख किया है वह पर्याय-शक्तियुक्त द्रव्ययोग्यतासे सम्बन्ध रखती है। मिट्टी तभी मिट्टी कहलाती है जब वह पुद्गलकी विवक्षित पर्यायरूपसे परिणमती है, इसलिये इसकी कालक्रमसे पर्यायशक्तियुक्त द्रव्ययोग्यताएँ भी सीमित हैं । वस्त्र वानस्पतिक पर्याययुक्त पुद्गलसे बनता है, मिट्टी पर्याययुक्त पुद्गलसे नहीं। इसलिये यह उदाहरण ही इस तथ्यकी पुष्टि करता है कि विवक्षित पर्यायशक्तियुक्त द्रव्य ही विवक्षित कार्यको जन्म देता है। उससे बाह्य सामग्रीके बल पर अन्य कार्य त्रिकालमें नहीं हो सकता यह सुतराम् सिद्ध हो जाता है। यदि इसी नियत ( निश्चित ) योग्यतायुक्त मिट्टीको उदाहरण बनाकर अपर पक्ष कार्य-कारणभावको लक्ष्यमें ले तो सभी कार्य अपने-अपने प्रतिनियत उपादानके अनुसार नियत समयमें ही होते हैं यह सिद्धान्त उसकी समझमें आनेमें देर न लगे।

: ४ :

अपर पक्षने चौथी बात यह लिखी है कि ‘प्रत्येक वस्तुकी त्रैकालिक पर्यायें उत्पत्तिके लिहाजसे उतनी ही संख्यामें मानी जा सकती हैं जितने त्रिकालके समय निश्चित हैं। परन्तु इससे वस्तुकी पर्यायोंके उत्पन्न होनेकी योग्यताएँ निश्चित नहीं की जा सकती हैं।’ साथ ही अपने इस अभिप्रायकी पुष्टिमें अपर पक्षने पुनः केवलज्ञानको उदाहरणरूपमें उपस्थित किया है सो इस सम्बन्धमें भी यही निवेदन है कि प्रत्येक द्रव्यमें पर्यायशक्तियुक्त द्रव्य कार्यकारी माना गया है, अतएव आगममें उसीकी उपादान संज्ञा है। यतः आगममें प्रत्येक द्रव्यकी सब पर्यायें कालके सब समयोंके बराबर होती हैं, न कम होती हैं और न अधिक होती हैं। इसलिये सब द्रव्योंमें उतनी ही पर्यायें होती हैं और उतने ही उनके उपादान होते हैं। योग्यताकी दृष्टिसे द्रव्यशक्तियाँ चाहे जितनी मानी जाँय, परन्तु उससे कार्योंकी पूर्वोक्त व्यवस्थामें कोई अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि जो वर्तमानमें पर्याय शक्ति है वह स्वयं द्रव्यशक्तिके साथ उपादान बनकर अगले समयके कार्यका नियमन करती है । यही क्रम सब द्रव्योंकी सब पर्यायोंमें जान लेना चाहिए । इस विषयकी पुष्टिमें अष्टसहस्री पृष्ठ २२६का यह वचन द्रष्टव्य है-

न द्रव्यं केवलमर्थक्रियानिमित्तं क्रमयौगपद्यविरोधात् केवलपर्यायवत् । पर्यायो वा न केवलोऽर्थक्रियाहेतुः, तत एव केवल द्रव्यवत् ।

केवल द्रव्य अर्थक्रियाका हेतु नहीं है, क्योंकि क्रमयौगपद्यका विरोध है, केवल पर्यायके समान । अथवा केवल पर्याय अर्थक्रियाका हेतु नहीं है, उसी कारणसे, केवल द्रव्यके समान ।

अतएव अनेक द्रव्यशक्तियोंके आधार पर उपादानको अपने-अपने कार्यके प्रति अनिश्चित सिद्ध करना उचित नहीं है । स्पष्ट है कि द्रव्यशक्तियाँ कितनी ही क्यों न हों, किन्तु एक कालमें वे सब कार्योत्पत्तिके सन्मुख न होकर जो पर्यायशक्ति जिस कार्यका उपादान होती है उसी कार्यके अनुकूल द्रव्यशक्ति कार्यके सन्मुख होती है ।

: ५ :

आगे अपर पक्षने कार्य-कारण परम्पराके अनुसार पहले तो उपादानके अनुसार कार्यका होना स्वीकार कर लिया है । परन्तु इससे अपने पक्षकी हानि होती हुई देखकर यह भी लिख दिया है कि-

‘यहाँ पर वस्तुकी जिस पर्यायके अनन्तर जिस पर्यायका होना सम्भव हो इस वाक्यमें ‘सम्भव हो’ के स्थानमें ‘नियत हो’ यह प्रयोग इसलिए नहीं किया गया है कि कार्यके अनन्तर पूर्ववर्ती उस पर्यायके अनन्तर विवक्षित पर्याय ही उत्पन्न होगी यह नियम नहीं बनाया जा सकता है । कारण कि उस पर्यायके अनन्तर उपादानगत योग्यताके आधारपर भिन्न-भिन्न निमित्तोंका योग मिलनेपर विविध प्रकारकी पर्यायोंमेंसे कोई एक पर्यायका होना सम्भव है, केवल किसी एक नियत पर्यायका होना ही सम्भव नहीं है ।’ आदि ।

सो इस सम्बन्धमें पृच्छा यह है कि आगममें जो उपादानका लक्षण किया है वह सम्भावनाको ध्यानमें रखकर किया है या कार्यका नियमन करनेकी दृष्टिसे किया है ? आचार्य समन्तभद्र तो ‘यद्यसत्सर्वथा कार्यं’’ (४२) आप्तमीमांसाकी इत्यादि कारिका द्वारा उपादानको कार्यका नियामक बतला रहे हैं और अपर पक्ष उसे सम्भावनामें मान रहा है सो यह क्या बात है ? मालूम पड़ता है कि अपने द्वारा माने हुए जिस श्रुतज्ञानके द्वारा कार्य-कारण भावकी व्यवस्था की जानेकी अपर पक्षने पूर्वमें प्रतिज्ञा की है उसीको आधार बनाकर अपर पक्षके द्वारा यह सब लिखा जारहा है, आगमानुसारी सम्यक् श्रुतज्ञानके आधारपर नहीं । आगममें जहाँ-जहाँ उपादानका सुनिश्चित लक्षण लिपिबद्ध हुआ है वहाँ-वहाँ या अन्यत्र कहीं भी आगममें ऐसा एक भी वाक्य दृष्टिगोचर नहीं हो सका जिससे इस बातकी पुष्टि हो कि उपादानका सुनिश्चित लक्षण सम्भावनाकी दृष्टिसे लिखा जारहा है । उपादानके लक्षणमें द्रव्यके पूर्व दो विशेषण दिये हैं प्रथम विशेषण तो है ‘पर्याययुक्त’ पद, और कैसो पर्याययुक्त द्रव्य होना चाहिए इसका विशेष स्पष्टीकरण करनेके लिए कहा है कि ‘जो द्रव्य अनन्तर पूर्वपर्याययुक्त होता है’ वही अपने अगले समयके कार्यका उपादान होता है, अन्य नहीं । इससे स्पष्ट विदित होता है कि उपादानका यह लक्षण सम्भावनाकी दृष्टिसे न लिखा जाकर उपादानके अन्तरंग स्वरूपपर प्रकाश डालनेके अभिप्रायसे ही लिखा गया है । यह उपादानका आत्मभूत लक्षण है । आगममें जिन-जिन वस्तुओंके जो-जो आत्मभूत लक्षण लिखे गये हैं वे सब उन-उन वस्तुओंके वास्तविक स्वरूपपर प्रकाश डालनेके अभिप्रायसे ही लिखे गये हैं । उपादानके इस लक्षणको भी उसी प्रकारका समझना चाहिए ।

आगममें जिसकी प्रागभाव संज्ञा है उसीकी उपादान संज्ञा है, ये दोनों विधि-निषेध मुखसे एक ही अर्थको सूचित करते हैं। यतः प्रागभाव किसी नियत कार्यका ही माना जा सकता है इससे भी यह सिद्ध होता है कि उपादानका उक्त लक्षण नियत कार्यकी दृष्टिसे ही आगममें स्वीकार किया गया है। यदि पर्यायशक्तिको अगले कार्यका उपादान न मानकर केवल अनेक द्रव्यशक्तियोंको ही उपादान रूपसे स्वीकार किया जाता है तो कार्योत्पत्तिके समय अनन्तर पूर्व पर्यायका प्रध्वंसाभाव नहीं बनेगा, क्योंकि विवक्षित कार्यके प्रति अनन्तर पूर्व पर्याय तो कार्यकारी हुई नहीं, केवल कोई एक द्रव्यशक्ति ही कार्यकारी हुई, ऐसी अवस्थामें अनन्तर पूर्व पर्याय कार्यके कालमें तद्वस्थ ही बनी रहेगी। उसका प्रध्वंसाभाव नहीं होगा और इस प्रकार केवल द्रव्यशक्तिसे कार्यकी उत्पत्ति मानने पर प्रत्येक कार्यके कालमें अतीत सब पर्यायोंके स्वीकार करनेका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। यह तो बड़ी भारी आपत्ति उपस्थित होती ही है इसके साथ और भी अनेक आपत्तियाँ उपस्थित होती हैं जिनका विशेष विचार प्रसंगानुसार प्रतिशंका छहके उत्तरमें करेंगे। मात्र यहाँ इस बातका उल्लेख कर देना आवश्यक समझते हैं कि यदि अपर पक्षके कथनानुसार उपादानमें अनेक योग्यताएँ मानकर निमित्तोंके अनुसार कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो जिसमें निमित्त व्यवहार किया जाता है उसमें भी अनेक योग्यताएँ होनेसे एक तो कार्यकी उत्पत्ति ही नहीं बन सकेगी, क्योंकि जैसे उपादानमें अनेक योग्यताएँ होनेसे कौन योग्यता कार्यरूपसे परिणत हो यह निश्चित नहीं किया जा सकता उसी प्रकार सहकारी सामग्रीमें भी अनेक योग्यताएँ होनेसे कौन योग्यता उस कार्यके लिए निमित्त हो यह भी निश्चित नहीं हो सकेगा। और ऐसी अवस्थामें किसी भी द्रव्यसे कोई भी कार्य नहीं उत्पन्न हो सकेगा। और कार्यके न उत्पन्न हो सकनेसे द्रव्य अपरिणामी हो जायगा। और इस प्रकार अन्तमें सब द्रव्योंका अभाव ही मानना पड़ेगा। यतः किसी भी द्रव्यका अभाव न हो, अतः नियत उपादानसे ही नियत कार्यकी उत्पत्ति मान लेना यही कार्य-कारणभावकी सम्यक् व्यवस्था है। साथही उसका नियत निमित्त भी मानना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक कार्यके प्रति इन दोनोंका सुगेल (मैत्री) है। वस्तुस्वभाव ही ऐसा है कि प्रत्येक कार्यके प्रति आभ्यन्तर और बाह्य उपाधिकी समग्रता बनती रहती है। कहीं यह समग्रता विस्रसा बनती है और कहीं पुरुषप्रयत्नसापेक्ष बनती है। कार्यकारणकी परम्परामें क्रमानुपातीरूपसे दोनोंका यह योग बनता रहता है इतना सुनिश्चित है।

हमें इस बातका अत्यन्त खेद है कि अपर पक्षने भगवान् समन्तभद्रकी आप्तमीमांसाकी कारिकाएँ १०५ और १०१ अपने गलत अभिप्रायकी पुष्टिमें उपस्थित कीं। कहाँ तो समन्तभद्र स्वामी उन कारिकाओं द्वारा आगमानुसारी श्रुतज्ञानको केवलज्ञानके समान बतलाकर दोनोंके मध्य प्रत्यक्ष और परोक्षका भेद होते हुए भी दोनोंका विषय एक बतला रहे हैं और कहाँ अपर पक्ष अपने सम्यक् श्रद्धा विहीन श्रुतज्ञानकी पुष्टिमें उनका उपयोग करना चाहता है। इसे आगमका दुरुपयोग करनेके सिवाय और क्या कहा जा सकता है। यदि कारिका १०१ में केवलज्ञानके सिवाय शेष चारों ज्ञानोंको क्रमभावी कहा भी है तो वह दूसरे अभिप्रायसे ही कहा है। फिर मालूम नहीं कि अपर पक्षने उक्त कारिकामें आये हुए ‘क्रमभावि’ पदसे अपने अभिप्रायकी पुष्टि करनेका कैसे साहस किया। अथवा क्रम शब्दके साथ सर्वत्र आया हुआ ‘अक्रम’ शब्द युगपत्वाची है, इसलिए भी अपर पक्षके अभिमतकी सिद्धि नहीं होती। विशेष विचार आगे करने वाले हैं ही।

\१४. आगमपठित क्रम-अक्रम पदका सही अर्थ

आगे अपर पक्षने धवला पुस्तक १३ पृ० ३४६ से ‘सइं भयवं’ इत्यादि मूल सूत्र उद्धृत कर धवला टीकामें आये हुए अनुभागका लक्षण लिख कर उसमें पठित ‘कमाकमेहि’ पदसे अपने अभिप्रायके अनुसार नियतक्रमता ( निश्चितक्रमता ) और अनियतक्रमता (अनिश्चितक्रमता) रूप अर्थ फलित करनेकी चेष्टा की है। सो अपर पक्ष द्वारा उक्त कथनसे यह अर्थ फलित करना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ पर आया हुआ ‘अक्रम’ शब्द ‘युगपत्’ अर्थका वाची है, ‘अनियतक्रमता’ अर्थका वाची नहीं। जैनदर्शनके ग्रन्थोंमें यह पद ‘क्रमाक्रमाभ्याम्’ या ‘क्रमयौगपद्याभ्याम्’ इस रूपमें अनेक स्थलों पर आता है और वहाँ पर ‘क्रम’ पदसे क्रमानुपाती पर्यायोंका तथा ‘अक्रम’ पदसे एक साथ होनेवाली पर्यायोंका ग्रहण हुआ है इस बातको प्रत्येक दशनशास्त्रका अभ्यासी अच्छी तरहसे जानता है। प्रकृतमें ‘अक्रम’ पदका अर्थ ही ‘न क्रम-अक्रम अर्थात् युगपत्’ होता है। ऐसी अवस्थामें अपर पक्षने ‘अक्रम’ पदका अर्थ ‘अनियतक्रमता’ कैसे कर लिया इसका हमें आश्चर्य है। अनगारधर्मामृत अ० २ पृष्ठ १०२ में ‘जीवे नित्येऽर्थसिद्धिः’ इत्यादि श्लोकमें ‘क्रमादक्रमाद्वा’ इस पाठके साथ ‘क्रम’ और ‘अक्रम’ ये शब्द आये हैं। वहाँ इनका अर्थ करते हुए लिखा है-

क्रमात् कालक्रमेण देशक्रमेण च। न केवलम्, अक्रमाद्वा अक्रमेण च यौगपद्येन,

पर्यायें क्रमवृत्त भी होती हैं और युगपत्वृत्त भी। इसका स्पष्टीकरण करते हुए तत्त्वार्थवार्तिक अ० ४ सू० ४२ पृ० २५६ का यह वचन अवलोकन करने योग्य है-

स च पर्यायो युगपद्वृत्तः क्रमवृत्तो वा। सहवृत्तो जीवस्य पर्यायः अविरोधात् सहावस्थायी सहवृत्तेः गतीन्द्रियकाययोगवेदकषायज्ञानसंयमादिः। क्रमवर्ती तु क्रोधादि-देवादि-बाल्याद्यवस्था-लक्षणः।

और वह पर्याय युगपत् भी होती है और क्रमवर्ती भी होती है। अविरोधसे एक साथ होनेवाली जीवकी पर्याय एक साथ होनेके कारण गति, इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान और संयम आदि सहावस्थायी पर्याय है तथा क्रोधादि, देवादि और बाल्यादि अवस्थालक्षण क्रमवर्ती पर्याय है।

भट्टाकलंकदेव जैनदर्शनके प्रभावक आचार्य हो गये हैं। उन्होंने अपने लघीस्त्रयमें भी क्रम और अक्रम शब्दोंका प्रयोग क्रम और युगपत्के अर्थमें किया है। वे लिखते हैं-

अर्थक्रिया न युज्येत नित्य-क्षणिकपक्षयोः।
क्रमाक्रमाभ्यां भावानां सा लक्षणतया मता।

सर्वथा नित्य पक्ष और सर्वथा क्षणिक पक्षमें क्रम और यौगपद्यरूपसे अर्थक्रिया नहीं बन सकती, किन्तु वह (अर्थक्रिया) पदार्थोंकी लक्षणरूपसे स्वीकार की गई है।

प्रकृत कारिकामें आये हुए क्रम और अक्रम पदका उक्त अर्थ हमने ही किया हो यह बात नहीं है। उक्त कारिकाके टीकाकार आचार्य प्रभाचन्द्र और अभयचन्द्रने भी इन पदोंका यही अर्थ किया है।

आचार्य विद्यानन्दिने अपने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० ५, सूत्र ३८ में सहानेकान्त और क्रमानेकान्त का उल्लेख कर दो ही प्रकारके अनेकान्त बतलाये हैं। वे लिखते हैं-

गुणवद्द्रव्यमित्युक्तं सहानेकान्तसिद्धये।
तथा पर्यायवद्द्रव्यं क्रमानेकान्तवित्तये ॥२॥

गुणवाला द्रव्य है यह सहानेकान्तकी सिद्धिके लिए कहा है और पर्यायवाला द्रव्य है यह क्रमानेकान्तकी जानकारीके लिए कहा है ॥२॥

इससे स्पष्ट विदित होता है कि सभी पर्यायें अपने नियत क्रमको लिए हुए स्वकालमें ही होती हैं । इसलिए धवलाके उक्त कथनमें आये हुए ‘कमाकमेहि’ पदका अर्थ नियतक्रम और अनियतक्रम न होकर क्रम और युगपत् ही होता है । अतएव उक्त पदके आधारसे प्रकृतमें यही अर्थ करना उचित है कि केवली भगवान्का ज्ञान सूत्र पठित सब बातोंके ज्ञानके साथ-साथ द्रव्योंके क्रमसे और युगपत् होनेवाले सभी परिणमनोंको भी जानता है । अतः अपर पक्षके द्वारा धवलाके उक्त पदके आधारसे यह अर्थ फलित किया जाना उचित नहीं है कि-

नियतक्रमता और अनियतक्रमता ये दोनों वस्तु-परिणमनके ही धर्म हैं और वे अपने प्रतिनियत कारणोंसे ही उनमें सम्पन्न होते हैं । और चूंकि पदार्थको जैसी स्थिति हो वैसी ही केवलज्ञानीके ज्ञानमें झलकती है अतः वस्तु परिणमनमें पाये जानेवाले नियतक्रमता और अनियतक्रमतारूप दोनों धर्म केवलज्ञानके भी विषय होते हैं ।’ आदि ।

क्योंकि अपर पक्ष द्वारा अपनी कल्पनाके आधार पर धवलामें आये हुए उक्त पदका नियतक्रमता और अनियतक्रमता रूप अर्थ करने पर न तो केवलज्ञानकी ही सिद्धि होती है और न ही पदार्थव्यवस्था बन सकती है । साथ ही अपर पक्ष द्वारा पूर्वमें स्वीकृत केवलज्ञानके स्वरूप और उसके विषयके साथ जो विरोध आता है वह भी एक विचारणीय महत्त्वपूर्ण प्रश्न है । अतएव सभी आचार्योंने क्रम और अक्रम पदका जो क्रमनियत और युगपत् अर्थ किया है वही यहाँ लेना चाहिए । इससे सभी व्यवस्था सुघटित बन जाती है ।

इसके बाद पूर्वोक्त पूरे कथनका पिष्टपेषण करते हुए अपर पक्षने अन्तमें जो यह लिखा है कि-

‘इस प्रकार कार्यसिद्धिके लिए कार्य-कारणभावको समझिए, पुरुषार्थ कीजिए, आवश्यकतानुसार निमित्तोंको भी जुटाइए लेकिन इसमें अहंकारी मत बनिए, अधीरता मत दिखाइए, असफलतासे दुखी मत हूजिए, विवेकी, गम्भीर और स्थिरबुद्धि बनकर अपनी दृढ़ श्रद्धाके साथ कर्तव्य पथपर डट जाइए, डट जावें तो फिर डटे रहिए, उस कर्तव्यपथसे च्युत नहीं हूजिए-यही सम्यकका चिह्न है, इसीमें आस्तिक्य भाव झलकता है, इसीमें अनेकान्तवादका प्रकाशपुंज आपको मिलेगा और निर्वेदभाव, अनाशक्तिभावकी छाया इसीमें प्राप्त होगी ।’

सो एक ओर जब अपर पक्षके पिछले कथनके विरुद्ध अतएव अटपटे इस कथनको पढ़ते हैं और दूसरी ओर ऐसा लिखनेवाले अपर पक्षके उस सिद्धान्तपर दृष्टिपात करते हैं जिसमें यह कहा गया है कि उपादानमें अनेक योग्यताऐं हैं । उनमेंसे कौन योग्यता कार्यरूप परिणमे यह निमित्तोंके आधीन है ।’ तो हम दंग रह जाते हैं । कहाँ एक ओर तो स्वावलम्बनकी मुख्यतासे लिखे गये उक्त वचन और कहाँ दूसरी ओर कार्य-कारणमें पराधीनता स्वीकार करानेवाले दूसरे वचन । मालूम पड़ता है कि स्वालम्बन क्या वस्तु है और परावलम्बन क्या वस्तु है इनके सम्यक् स्वरूपकी ओर ध्यान न देनेके कारण ही अपर पक्षने यह परस्पर विरुद्ध कथन किया है, गीतामें आये हुए ‘कर्मण्येव अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ इस वचनकी उक्त वचनोंको कापी कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी । गीता भी तो यही कहती है कि फल अर्थात् कार्यमें तुम्हारा कोई अधिकार नही, वह ईश्वरके आधीन है । अपर पक्षका भी यही कहना है कि किस उपादानसे क्या कार्य हो यह उपादानके आधीन नहीं, यह सब निमित्तके आधीन है । इस प्रकार जब कि गीता और अपर पक्ष दोनोंके अभिप्रायसे कार्य निमित्तोंके आधीन हो गया तो विचार कीजिए कि कर्ममें उपादानका अधिकार कहाँ रह गया । अपर पक्षके कथनानुसार उपादानका कार्य है कि वह प्रत्येक समयमें मात्र उपस्थित रहे । निमित्तको उसमें जैसी रचना करना होगी, करेगा । उपादान इसमें ननु न च नहीं कर सकता । ऐसी अवस्थामें इसका विचार अपर पक्ष ही करे कि उसकी ओरसे जो ‘पुरुषार्थ कीजिए, आवश्यकतानुसार निमित्तोंको भी जुटाईए’ इत्यादि रूपसे प्रेरणाप्रद वचन लिखे गये हैं उनका क्या प्रयोजन रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता । हम नियतिवादी रूपसे इसलिये लांछित किये जाते हैं, क्योंकि हम प्रत्येक कार्यके नियत उपादानको स्वीकार करनेके साथ उसकी बाह्य सामग्रीको भी नियतरूपसे स्वीकार करते हैं और अपर पक्ष अपनेको नियतिवादी इसलिए नहीं स्वीकार करना चाहता, क्योंकि प्रत्येक कार्यकी बाह्य उपाधिको नियत मानकर भी उसके उपादानको नियत माननेमें उसे नियतवादकी गन्ध आती है ।

वस्तुतः जिस प्रकार केवल नियतिवादको माननेवाले एकान्ती हैं, अतएव वे अनेकान्तवादके प्रकाशपुंजसे बंचित रहते हैं उसी प्रकार बाह्य उपाधिके आधारसे उपादानमें कार्यकी व्यवस्था बनानेवाले भी अनेकान्तके सम्यक् स्वरूपके ज्ञाता नहीं माने जा सकते । प्रत्येक कार्यके प्रति बाह्य उपाधि तो नियत हो और जो उपादान उस कार्यका निश्चय कर्ता है वह नियत न हो यह कैसा अनेकान्त है ? उसे तो अनेकान्तका उपहास ही कहना चाहिए । जब कि प्रत्येक द्रव्य अपनी एक पर्यायका व्यय और दूसरी पर्यायका उत्पाद अपने अन्तरंग बलसे ही करता है । बाह्य उपाधिका कार्य तो मात्र उसका ज्ञान करा देने तक ही सीमित है । ऐसी अवस्थामें वह कार्य अपने आप हो जाता है यह कैसे कहा जा सकता है ? अर्थात् नहीं कहा जा सकता है । अत एव प्रकृतमें क्रम और अक्रम पदका अर्थ जो अपर पक्षने नियतक्रमता और अनियतक्रमता किया है वह ठीक न होकर उन शब्दोंका क्रमसे क्रमभावी और युगपद्भावी अर्थ करना ही ठीक है आगमका भी यही अभिप्राय है ।

\१५. निमित्तवादी पुरुषार्थी नहीं हो सकता

हम देखते हैं कि लोकमें जड़-चेतन अनन्त पदार्थ हैं और वे प्रत्येक समयमें अपना-अपना कार्य करते हैं, क्योंकि अर्थक्रिया पदार्थका लक्षण है । उनमेंसे किन्हीं कार्योंमें पुरुषका प्रयत्न निमित्त है और किन्हींमें नहीं । सब कार्य पुरुषके प्रयत्नको ही निमित्तकर होते हैं यह जैनदर्शन न होकर ईश्वरवादियोंका दर्शन है । औरकी बात तो छोड़िये, कर्मोंका जो उपशमादि कार्य होता है वह भी पुरुष प्रयत्न निरपेक्ष विस्रसा होता है । ऐसी अवस्थामें जिन कार्योंके होनेमें पुरुषके प्रयत्नकी निमित्तता नहीं है उन कार्योंका क्या अपने आप होना कहा जायगा ? यदि अपर पक्ष कहे कि-नहीं, तो फिर सर्वत्र यही मानकर चलना चाहिए कि जिस पदार्थमें जिस समय जो कार्य होता है उसमें उस समय उस कार्यके अनुरूप बल होता ही है । इसलिए अपर पक्षका यह कहना तो उचित नहीं है कि जब जो होना होगा वह होगा ऐसा माननेसे हम पुरुषार्थहीन हो जायेंगे । यदि विचारकर देखा जाय तो यही ज्ञात होता है कि जब तक यह संसारी प्राणी परसे कार्यसिद्धिका स्वप्न देखता रहेगा तब तक न तो उसका सम्यक् पुरुषार्थ ही जागृत होगा और न ही वह आत्मकार्यमें सावधान होकर मोक्षमार्गका पथिक ही बन सकेगा । परसे कार्य होता है इस मान्यताका फल ही तो संसार है, अतएव ऐसी मान्यताके त्यागके लिए जो पुरुषार्थ होगा वही सच्चा पुरुषार्थ है और वही मोक्ष का द्वार है ।

‘खूब पुरुषार्थ कीजिये’ ऐसा लिखनेवाले अपर पक्षसे हम पूछते हैं कि क्या पुरुषार्थ करना आपके हाथमें है ? एक ओर यह लिखना कि निमित्तोंके अनुसार कार्य होता है और दूसरी ओर यह लिखना कि ‘खूब पुरुषार्थ कीजिये’ इनमेंसे किसे सच्चा माना जाय ? जरा विचार तो कीजिए कि पुरुषार्थ करना किसके हाथमें रहा । अपर पक्षके मतानुसार संसारी प्राणीके हाथमें, या निमित्तोंके हाथमें ।

इसी प्रकार यह लिखना कि ‘आवश्यकतानुसार निमित्तोंको जुटाईये’ कल्पनामात्र हैं। जब कि अपर पक्षको अपने उपादानकी ही खबर नहीं है तो किस कार्यका कौन निमित्त है इसकी खबर उसे कहाँसे हो गई ? और फिर कोई भी प्राणी निमित्तोंको जुटानेवाला कौन ? आवश्यकतानुसार निमित्तोंको जुटानेका कार्य तो निमित्तोंको ही करना होगा। संसारी प्राणी तो चाहता है कि ‘किसी कार्यके होने पर मैं अहंकारी न बनूँ, अधीरता न दिखलाऊँ, कार्यमें असफल होनेपर दुखी न होऊँ, विवेकी गंभीर और स्थिरबुद्धि बना रहूँ, कभी भी कर्तव्य पथसे च्युत न होऊँ, कर्तव्य पथपर डट गया तो डटा रहूँ, उससे हटूँ न।’ पर यह सब हो कैसे ? क्या यह सब कर सकना या ऐसा विचार करना स्वयं उसके हाथमें है ? एक ओर प्रत्येक कार्य निमित्तोंके अनुसार होता है ऐसी प्रसिद्धि करना और दूसरी ओर उक्त प्रकारके उपदेशका आडम्बर रचना हमें तो पूर्वापर विरुद्ध ही प्रतीत होता है, अतएव अपर पक्षद्वारा कल्पित कार्य-कारणके इस आगम-विरुद्ध मार्गको छोड़कर यही निश्चय करना चाहिए कि भगवानके ज्ञानमें जिस समय जिन प्रतिनियत कारणोंसे जिस कार्यकी उत्पत्ति झलकी है उस समय वही कार्य उसी प्रकार होगा, सम्यक् श्रुतज्ञानी ऐसा ही निश्चय करता है, क्योंकि केवलज्ञानीने जैसा जाना है श्रुतज्ञानी श्रुतके बलसे वैसा ही निर्णय करता है। कारण कि ऐसे निर्णयपूर्वक आत्मप्राप्तिमें प्रवृत्त होना ही सच्चा पुरुषार्थ है।

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ३/८)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ २७९ से २९४

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\१६. श्रद्धा और कर्तव्यका समन्वय

अब रही सम्यक् श्रद्धा और तदनुसार कर्तव्यके समन्वय की बात सो जिसके सम्यग्ज्ञानके साथ भीतरसे यह श्रद्धा हो गई है कि 'जिसका जिस कालमें जिस नियत सामग्रीके बलसे जैसा होना वीतरागने देखा है उसका उस कालमें उस नियत सामग्रीके बलसे वैसा ही होगा, अन्य प्रकारसे नहीं होगा। वह जब लोकमें जिसे अनहोनी कहते हैं उसे अनहोनी मानता ही नहीं तब अनिच्छित कार्यके होनेपर अधीर हो नहीं सकता और यदि अधीर होता है तो समझना चाहिए कि उसके कर्तव्य और श्रद्धामें अन्तर है। वस्तुतः जिसने इस अन्तरको पाट लिया वही विवेकी है और जो इस अन्तरके झूलेमें झूलता रहा वही अविवेकी है। किसीको अविवेकी कहना और बात है पर अविवेकीकी अविवेकपूर्वक की गई विवक्षित कार्यके प्रति बाह्य उठा-धरीको सम्यक् श्रुतज्ञान निरूपित करनेके लिए उपादानके नियत लक्षणमें परिवर्तनका साहसकर प्रत्येक कार्यकी प्रसिद्धि निमित्तोंके अनुसार मानना और बात है। यह श्रद्धा और कर्तव्यका समन्वय न होकर सम्यक्-श्रुतका परिहासमात्र है। हमने उपलब्ध जिनागमका यथासम्भव पर्यालोचन करनेका असकृत् प्रयत्न किया है। किन्तु हमें इस आशयका एक भी वचन कहीं ढूंढ़े नहीं मिला कि 'जिसमें एक कालमें एक साथ अनेक कार्योंके करनेकी योग्यता होती है उसकी समर्थ उपादान संज्ञा है ऐसा कहा गया है। अष्टशती, अष्टसहस्री, तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक और स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा आदि अनेक ग्रन्थोंमें समर्थ उपादानके स्वरूप पर सम्यक् प्रकाश डाला गया है पर उन सब ग्रन्थोंमें अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यको ही समर्थ उपादान कहा है। इसके सिवाय अपर पक्षद्वारा स्वीकृत समर्थ उपादानका लक्षण आगममें कहीं भी बतलाया हो ऐसा हमारे देखनेमें नहीं आया और न ही अपर पक्षने अपने तथाकथित लक्षणकी पुष्टिमें कोई आगम प्रमाण ही दिया। स्पष्ट है कि जिसे अपर पक्ष श्रद्धा और कर्तव्यका समन्वय घोषित करता है वह मात्र कल्पनाओंपर आधारित होनेसे सच्चा समन्वय नहीं है।

अब यहाँ आत्माका सच्चा हित किसमें है और उसकी प्राप्ति कैसे होती है इसका विचार करते हैं। आगममें सब जीवोंको दो भागोंमें विभक्त किया गया है-संसारी और मुक्त। जो अपने अज्ञानादिवश चतुर्गतिमें परिभ्रमण करते रहते हैं उन्हें संसारी कहते हैं और जिन्होंने संसारके कारणोंमें हेय बुद्धि कर उनके त्यागपूर्वक निराकुललक्षण अतीन्द्रिय सुखके निधान आत्माको अपने पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त कर लिया है वे मुक्त जीव हैं। अतएव जो संसारके कारण हैं वे स्वयं दुःखरूप और दुःखके कारण हैं ऐसा जान, उनमें हेय बुद्धि कर उनसे निवृत्त होना तथा सम्यग्दर्शनादि जो स्वयं सुखरूप और सुखके कारण हैं उनमें उपादेय बुद्धि कर उनमें प्रवृत्त होना यह संसारी जीवका प्रधान कर्तव्य है। पण्डितप्रवर दौलतरामजी छहढालाकी तीसरी ढालके प्रारम्भमें लिखते हैं-

आतमको हित है सुख सो सुख आकुलता विन कहिए।
आकुलता शिवमांहि न तातैं शिवमग लाग्यो चहिए॥

इस प्रकार जो जीव संसार और संसारके कारणोंको अहितकारी जानकर उनमें हेयबुद्धिपूर्वक उनसे निवृत्त होता है और मोक्ष तथा मोक्षके कारणोंको हितकारी जानकर उनमें उपादेय बुद्धिपूर्वक प्रवृत्त होता है वही परम अतीन्द्रिय निराकुललक्षण अव्याबाधस्वरूप आत्मसुखका अनन्त काल तक भोक्ता होता है।

किन्तु इसकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय आत्मस्वभावका अवलम्बन करना ही है। आचार्य कुन्दकुन्द समयसारमें लिखते हैं-

सुद्धं तु वियाणंतो सुद्धं चेवप्पयं लहइ जीवो।
जाणंतो दु असुद्धं असुद्धमेवप्पयं लहइ ॥१८६॥

शुद्ध ( परद्रव्य-परभावोंसे भिन्न ) आत्माको जानता हुआ जीव शुद्ध ही आत्माको पाता है और अशुद्ध आत्माको जानता हुआ जीव अशुद्ध आत्माको ही पाता है ॥१८६॥

इसकी टीका करते हुए आचार्य जयसेन लिखते हैं-

जो भावकर्म, द्रव्यकर्म और नोकर्मसे रहित अनन्त ज्ञानादि गुणस्वरूप शुद्ध आत्माको निर्विकार शुद्धात्मानुभूतिलक्षण भेदज्ञानके द्वारा अनुभवता है वह ज्ञानी जीव है। उक्त जीव उक्त गुणविशिष्ट जैसे आत्माको ध्याता है वैसे ही आत्माको प्राप्त करता है, क्योंकि उपादानके अनुसार ही कार्य होता है ऐसा नियम है। किन्तु इसके विपरीत जो मोह, राग और द्वेषभावपरिणत आत्माको अनुभवता है वह नर, नारक आदिरूप अशुद्ध आत्माको ही प्राप्त करता है। ( मूल टीकाके आधारसे )

अतएव कैसे भी आत्मपुरुषार्थको जागृत कर अपने धारावाही ज्ञानके द्वारा जो निश्चल शुद्ध आत्माको प्राप्त कर तिष्ठता है वह परपरिणतिके निरोधस्वरूप उदयको प्राप्त हुए क्रीड़ावनस्थानीय शुद्ध आत्माको ही प्राप्त करता है।

यह निराकुल सुखलक्षण वीतराग विज्ञानघन आत्माको प्राप्त करनेके अनुरूप सम्यक् पुरुषार्थ है। संसारी जीवने अपना प्रधान कर्तव्य समझ कर अन्य सब किया, किन्तु आजतक एकमात्र यह कार्य नहीं किया। जिसे प्रमुखरूपसे इसका भान हो गया है वह संसारकी प्रयोजक अन्य सब समस्याओंको हेय जान उनसे विरत होनेके अनुरूप पुरुषार्थको ही अपना यथार्थ कर्तव्य मानता है। श्रद्धा और कर्तव्यका यह यथार्थ समन्वय है। उसके लिए ‘सब कार्य अपने-अपने स्वकालके प्राप्त होने पर ही होते हैं’ यह निर्णय आत्महितके कार्यमें बाधक न होकर साधक ही है, क्योंकि विवेकपूर्वक जिसने ऐसा निर्णय किया है वह परके कर्तृत्वके अहंकारसे मुक्त हो आत्मकार्यमें सावधान हुए बिना रह नहीं सकता। ऐसा ही इनका योग है क्योंकि जिसने ‘सब कार्य अपने-अपने नियत कालमें होते हैं’ ऐसा निर्णय नहीं किया वह परके कर्तृत्वके अहंकारसे मुक्त नहीं हो सकता और जो परके कर्तृत्वके अहंकारसे मुक्त नहीं हो सकता वह परके आश्रयसे होनेवाले विविध प्रकारके संकल्प-विकल्पोंसे मुक्त नहीं हो सकता और जो परके आश्रयसे होनेवाले विविध प्रकारके संकल्प-विकल्पोंसे मुक्त नहीं हो सकता उसका स्वभावसन्मुख हो आत्मकार्यमें सावधान होना ऐसे ही असम्भव है जैसे बालुसे तेल उत्पन्न करना असम्भव है। अतएव जो पुरुषार्थहीनताका आरोप कर सम्यक् नियतिके सिद्धान्तको अवहेलना करता है वह परके कर्तृत्वकी भावनासे आकुलित चित्तवाला होकर यथार्थमें अपने आत्माका ही छेद करता है ऐसा यहाँ समझना चाहिए । स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यक्तिका श्रद्धानुसारी ही कर्तव्य होना चाहिए । वास्तवमें यही इन दोनोंका समन्वय है। इसके विपरीत अन्य प्रकार (परस्पर विरुद्ध मार्ग)से इन दोनोंके समन्वयकी बात सोचना केवलज्ञान, आगम और आगमानुसारी श्रद्धा व ज्ञान इन सबका अपलाप करना है।

\१७. एकान्त नियति और सम्यक् नियतिमें अन्तर

अब हम इस बात पर दृष्टिपात करें कि केवलज्ञानमें नियत कार्य और नियत कारणरूपसे जो पदार्थ झलक रहे हैं उनको जो उसी प्रकार श्रद्धा करते हैं और उसे दृष्टिपथमें रख कर तदनुसार अपने कर्तव्यका निर्णय करते हैं वे क्या एकान्त नियतिवादी हो जाते हैं। एकान्त नियतिवादका क्या तात्पर्य है इसका स्पष्टरूपसे विवेचन गोम्मटसार कर्मकाण्ड गा० ८८२, प्राकृत पंचसंग्रह पृष्ठ ५५७ और अमितिगति पंचसंग्रह गाथा ३१२ में किया है। इन तीनों ग्रन्थोंमें इस सम्बन्धमें जो विवेचन उपलब्ध होता है वह समान होनेसे यहाँ मात्र गोम्मटसार कर्मकण्डकी उक्त गाथा दी जाती है। वहाँ एकान्त नियतिवादका निर्देश करते हुए लिखा है-

जत्तु जदा जेण जहा जस्स य णियमेण होदि तत्तु तदा।
तेण तदा तस्स हवे इदि वादो णियदिवादो दु ॥८८२॥

जो जिस समय जिससे जिस प्रकार जिसके नियमसे होता है वह उस समय उससे उस प्रकार उसके होता है ऐसा कथन एकान्त नियतिवाद है ॥८८२॥

यह एकान्त नियतिवादका स्वरूप है। बाह्य दृष्टिवालोंको स्वा० का० अ० के 'जं जस्स जम्मि देसे’ द्वारा तथा पद्मपुराणके ‘यत्प्राप्तव्यं यदा’ इत्यादि श्लोक द्वारा भी लगभग यही बात कही गई ज्ञात होती है। केवलज्ञानमें झलकनेवाले विषयकी अपेक्षा विचार करने पर भी लगभग यही ज्ञात होता है कि जिस कालमें जिससे जिसका जो होना है वही होगा, अन्य प्रकार नहीं होगा। इस प्रकार इन सब कथनोंमें बाह्य दृष्टिवालोंको एकरूपता प्रतीत होती है, परन्तु इन सब कथनोंमें एकान्त नियतिवादके स्वरूपको बतलानेवाले गोम्मटसार कर्मकाण्डके उक्त कथनसे जो मौलिक अन्तर है, उसे हमें समझना है। यदि हम शास्त्र (परमागम) के विवेचक बनना चाहते हैं तो हमें भीतर घुस कर उसके रहस्यको भी समझना होगा। अतएव इस अन्तरको स्पष्ट करनेके अभिप्रायसे तत्काल हम गोम्मटसार कर्मकाण्डके उसी प्रकरणको लेते हैं जिसमें एकान्त नियतिवादका निर्देश किया गया है। उसे दृष्टिपथमें लेने पर विदित होता है कि वहाँ पर केवल एकान्त नियतिवादका ही निर्देश नहीं किया गया है, किन्तु उसके साथ वहाँ एकान्त कालवाद, एकान्त ईश्वरवाद (निमित्तवाद), एकान्त आत्मवाद और एकान्त स्वभाववादका भी निर्देश किया गया है। एकान्त कालवादका निर्देश करते हुए वहाँ बतलाया है-

कालो सव्वं जणयदि कालो सव्वं विणस्सदे भूदं।
जागत्ति हि सुत्तेसु वि ण सक्कदे वंचिदुं कालो ॥८७९॥

काल ही सबको उत्पन्न करता है और काल ही सबका नाश करता है, सोते हुए प्राणियोंमें काल ही जागता है। ऐसे कालको ठगनेके लिए कौन समर्थ हो सकता है, इस प्रकार मात्र कालसे सब कार्योंको उत्पत्ति-नाश मानना यह एकान्त कालवाद है ॥८७९॥

एकान्त ईश्वरवाद ( निमित्तवाद ) का निर्देश करते हुए वहाँ बतलाया है-

अण्णाणी हु अणीसो अप्पा तस्स य सुहं च दुक्खं च ।
सग्गं णिरयं गमणं सव्वं ईसरकयं होदि ॥८८०॥

आत्मा अज्ञानी है, अनीश हैं। उसके सुख-दुख, स्वर्ग-नरकगमन सब ईश्वरकृत हैं ऐसा वाद एकान्त ईश्वर (निमित्त) वाद है ॥८८०॥

एकान्त आत्मवादका निर्देश करते हुए वहाँ बतलाया हैं-

एक्को चेव महप्पा पुरिसो देवो य सव्ववावी य ।
सव्वंगणिगूढो वि य सचेयणो णिग्गुणो परमो ॥८८१॥

एक ही महात्मा है, वही पुरुष है, वही देव है और सर्वव्यापी है, सर्वांगपने अगम्य है, सचेतन है, निर्गुण है और उत्कृष्ट है। ऐसे आत्मासे सबकी उत्पत्ति मानना एकान्त आत्मवाद है ॥८८१॥

एकान्त नियतिवादका निर्देश पूर्वमें ही कर आये हैं। एकान्त स्वभाववादका निर्देश करते हुए वहाँ बतलाया है-

को करइ कंटयाणं तिक्खत्तं मिय-विहंगमादीणं ।
विविहत्तं तु सहाओ इदि सव्वं पि य सहाओ त्ति ॥८८३॥

काटोंमें तीक्ष्णपना कौन करता है ? मृग और पक्षी आदिमें विविधपना कौन करता है ? इस सबका कारण स्वभाव है। इस प्रकार स्वभावसे सबकी उत्पत्ति मानना एकान्त स्वभाववाद है ॥८८३॥

ये पाँच एकान्तवाद हैं। यहाँ आत्मवादका तात्पर्य पुरुषार्थवादसे है। क्रियावादी अर्थात् पूर्वोक्त पाँचमें-से एक-एक कारणसे कार्यकी उत्पत्ति माननेवाले कोई स्वतः, कोई परतः, कोई नित्यपने और कोई अनित्यपने इन कालादि पाँचमेंसे केवल एक एकके द्वारा नौ पदार्थों सम्बन्धी कार्यकी उत्पत्ति मानते हैं, इसलिए ये १८० प्रकारके एकान्त क्रियावादी मिथ्यादृष्टि माने गये हैं। प्रकृतमें एकान्त नियतिवादका इसी अर्थमें उल्लेख हुआ है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि एकान्त नियतिवादी वह है जो न तो कालको कारण मानता है, न निमित्तको स्वीकार करता है, न पुरुषार्थको कारण मानता है और न ही स्वभावको कारण मानता है। मात्र नियतिको सर्वस्व मान कर कार्यकी उत्पत्ति मानता है। उसके मतमें कार्यके लिए नियति ही सब कुछ है, अन्य कालादि कुछ नहीं। यह नियतिवादका अर्थ है। पूर्वमें हमने एकान्त क्रियावादियोंके जो १८० भेद गिनाये हैं उनमें एकान्त नियतिवादियोंके ३६ भेद परिगणित किये गये हैं। वे कोई स्वतः, कोई परतः, कोई नित्यपने और कोई अनित्यपने मात्र नियतिसे नौ पदार्थों सम्बन्धी कार्यकी उत्पत्ति मानते हैं। इसलिए ये ३६ प्रकारके नियतिवादी एकान्ती होनेसे मिथ्यादृष्टि हैं। सिद्धान्त चक्रवर्ती आचार्य नेमिचन्द्र आदिने इसी अर्थमें एकान्त नियतिवादका निर्देश किया है।

किन्तु जैनदर्शन ऐसे एकान्त नियतिवादको स्वीकार नहीं करता। वह प्रत्येक कार्यमें नियतिको कारणरूपसे स्वीकार करके भी स्वभाव, पुरुषार्थ और काल आदिके साथ ही उसे स्वीकार करता है। इसलिए जैनदर्शनके द्वारा स्वीकार की गई कार्य कारणपरम्परामें अन्य कारणोंके समान नियतिको स्थान होने पर भी एकान्त नियतिवादका प्रसंग उपस्थित नहीं होता। यह मिथ्या नियति और सम्यक् नियतिमें फरक है। स्वामी कार्तिकेयने अपनी द्वादशानुप्रेक्षामें केवलज्ञानके जाननेकी अपेक्षा और आचार्य रविषेणने पद्मपुराणमें सम्यक् नियतिकी मुख्यतासे जो वर्णन किया है वह नय दृष्टिसे वर्णन होनेके कारण प्रमाणभूत है। यदि विचार कर देखा जाय तो इन आचार्योंने अपने कथनमें देश और काल आदि कारणोंका भी उल्लेख किया है इसलिये उसे केवल नियतिवादका कथन कहना उपयुक्त न होगा। प्राकृत पंचसंग्रह आदिमें एकान्त नियतिवादका जो वर्णन आया है वह उक्त कथनोंसे सर्वथा भिन्न प्रकारका है, क्योंकि उसमें कालादिको न स्वीकार कर मात्र नियतिको ही स्वीकार किया गया है। जैसा कि नियतिवादियोंके पूर्वोक्त ३६ भंगोंसे भली प्रकार विदित होता है, इसलिए वह वर्णन एकान्त आग्रहका सूचक होनेसे अप्रमाणभूत है । यही सम्यक् नियति और मिथ्यानियति इन दोनोंके विवेचनोंमें अन्तर है। अपर पक्ष यदि भविष्यमें इस अन्तरको हृदयसे स्वीकार करले तो वह पक्ष यह लिखनेका साहस कभी नहीं करेगा कि ‘श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षा कोई कार्य नियतक्रमसे होता है और कोई कार्य अनियत क्रमसे होता है।’

हम तो यह समझनेके लिए हैरान हैं कि वह अपने इस वक्तव्य द्वारा क्या कहना चाहता है? (१) क्या वह अपने इस वक्तव्य द्वारा यह कहना चाहता है कि जिस कार्यका जिन हेतुओंसे जिस कालमें होना केवलज्ञानमें झलका है वह कार्य उन हेतुओंसे केवल उस कालमें न होकर अन्य कालमें भी हो सकता है? (२) या क्या वह अपने उस वक्तव्य द्वारा यह कहना चाहता है कि जिस कार्यका जिन हेतुओंसे जिस कालमें होना केवलज्ञानमें झलका है वह कार्य उन हेतुओंसे होता तो उसी कालमें है परन्तु उस कार्यका उस कालमें होना मात्र नियतिपर अवलम्बित न होकर नियति सहित सब कारणोंसे होता है? (३) या क्या वह अपने उस वक्तव्य द्वारा यह कहना चाहता है कि जिस कार्यका जिन हेतुओंसे जिस कालमें होना केवलज्ञानमें झलका है उसका हम अल्पज्ञानियोंको पता न होनेके कारण श्रद्धा तो वैसी ही रखनी चाहिए, किन्तु किन हेतुओंसे किस कालमें कौन कार्य होनेवाला है यह भले प्रकार ज्ञात न होनेके कारण अपनी दृष्टिमें काल, नियति और स्वभाव आदिको मुख्य न कर पुरुषार्थकी ओर विशेष ध्यान देना चाहिए? किन्तु अपर पक्षने इन तीन विकल्पोंमेंसे किसे मुख्यकर अपनी प्रतिशंका प्रस्तुत की है इसका उसकी ओरसे कोई सम्यक् स्पष्टीकरण न होनेके कारण यहाँ उन विकल्पोंके आधारसे विचार किया जाता है-

(१) प्रथम विकल्पमें जो यह कहा गया है कि जिस कार्यका जिन हेतुओंसे जिस कालमें होना केवलज्ञानमें झलका है वह कार्य उन हेतुओंसे केवल उस कालमें न होकर अन्य कालमें भी हो सकता है? सो यह कथन केवलज्ञानको न स्वीकार करनेवाला होनेके कारण स्वयं अपनेमें अप्रमाण है, क्योंकि कोई कार्य केवलज्ञानमें प्रतिनियत कालमें प्रतिनियत हेतुओंसे उत्पन्न होता हुआ झलके और श्रुतज्ञानकी अपेक्षा वह उस कालमें न हो यह कैसे हो सकता है? अर्थात् त्रिकालमें नहीं हो सकता। अतएव प्रथम विकल्प स्वयं अपनेमें मिथ्या होनेके कारण उसके आधारसे प्रकृतमें किसी कार्यको क्रम-नियत और किसी कार्यको क्रम-अनियत नहीं ठहराया जा सकता।

(२) दूसरे विकल्पमें जो यह कहा गया है कि जिस कार्यका जिन हेतुओंसे जिस कालमें होना केवलज्ञानमें झलका है वह कार्य उन हेतुओंसे उस कालमें होता हुआ नियति सहित अपने सब कारणोंसे होता है सो इस विकल्पके स्वीकार करने पर तो यही सिद्ध होता है कि सभी कार्य क्रम-नियत होते हैं। ऐसा एक भी कार्य नहीं हो सकता जो अपने नियत क्रमको छोड़कर उत्पन्न हो जाय। अतएव इस आधारपर एक मात्र यही स्वीकार करना चाहिए कि सब कार्य अपने-अपने कालमें होकर भी अपने-अपने प्रतिनियत हेतुओंसे ही होते हैं। साथ ही उस-उस कालमें उन-उन कार्योंके अपने-अपने प्रतिनियत हेतु ही उपस्थित रहते हैं और उनसे उस-उस कालमें प्रतिनियत कार्य ही होते हैं, अन्य कार्य नहीं उत्पन्न होते।

(३) तीसरा विकल्प दूसरे विकल्पसे कुछ भिन्न नहीं है। मात्र इसमें पुरुषार्थकी मुख्यता कही गई है। सो यह उचित ही है। किन्तु समग्र जिनागमका तात्पर्य वीतरागता है और उसे प्राप्त करनेका उपाय है आत्मकार्यमें सावधान होना। इसीलिए परमागममें स्वभावसन्मुख होकर उसे प्राप्त करनेका प्रमुखतासे उपदेश दिया गया है।

यहाँ पर कोई प्रश्न करता है कि जब कि आप काललब्धि और भवितव्यकी बात करते हो तब उसमें पुरुषार्थकी बात कहाँ रहती है ? समाधान यह है कि परमागममें एक कार्य अनेक कारणसाध्य बतलाया है, सो जहाँ मोक्षका उपाय बनता है वहाँ तो सभी कारण मिलते हैं और जहाँ मोक्षका उपाय नहीं बनता है वहाँ उसके सभी कारण नहीं मिलते हैं। यहाँ जो काललब्धि और भवितव्य कही है सो जिस समय विवक्षित कार्य होता है वही उसकी काललब्धि है और उस कार्यका होना ही भवितव्य है। तथा जो कर्मका उपशमादिक है वह पुद्गल कर्मकी अवस्थाविशेष है। उसका आत्मा कर्ता-हर्ता नहीं। तथा पुरुषार्थपूर्वक जो उद्यम किया जाता है सो वह आत्माका कार्य है, इसलिए आत्माको पुरुषार्थपूर्वक उद्यम करनेका उपदेश दिया जाता है।

नियम यह है कि जिस कारणसे कार्यसिद्धि नियमसे होती है उस रूप यदि यह आत्मा उद्यम करता है तो अन्य कारण मिलते ही हैं और कार्यकी सिद्धि भी होती है। सो परमागममें जो मोक्षका उपाय कहा है उससे मोक्षकी प्राप्ति नियमसे होती है, इसलिए जो जीव पुरुषार्थपूर्वक जिनेश्वरके उपदेशके अनुसार मोक्षका उपाय करते हैं उनके उसके अनुरूप काललब्धि और भवितव्य दोनों हैं। साथ ही वहाँ कर्मका उपशमादिक भी है, तभी तो यह जीव ऐसा उपाय करता है। इसलिए जो पुरुषार्थ पूर्वक मोक्षका उपाय करते हैं उन्हें बाह्याभ्यन्तर सब कारणोंकी युगपत् प्राप्ति होती है ऐसा निश्चय करना ही यहाँ उपादेय है। साथ ही उन्हें मोक्षकी प्राप्ति भी नियमसे होती है।

किन्तु जो जीव पुरुषार्थपूर्वक मोक्षका उपाय नहीं करते हैं उनके उसकी काललब्धि और भवितव्य भी नहीं है। साथ ही उनके कर्मका उपशमादिक भी नहीं हुआ है। यही कारण है कि वे मोक्षके उपायमें सन्नद्ध नहीं हो पाते। इसलिए जो पुरुषार्थपूर्वक मोक्षका उपाय नहीं करते हैं उन्हें मोक्षके कोई कारण नहीं मिलते और मोक्षकी प्राप्ति भी नहीं होती।

यहाँ कोई कहता है कि उपदेश तो सब सुनते हैं। उनमेंसे कोई मोक्षका उपाय कर पाते और कोई नहीं कर पाते सो इसका क्या कारण है ? समाधान यह है कि जो उपदेश सुनकर पुरुषार्थ करते हैं वे तो मोक्षका उपाय कर सकते हैं और जो पुरुषार्थ नहीं करते हैं वे मोक्षका उपाय नहीं कर पाते। उपदेश तो शिक्षामात्र है। फल जैसा पुरुषार्थ करता है वैसा मिलता है।

यहाँ पुनः प्रश्न होता है कि जो द्रव्यलिंगी मुनि मोक्षके लिए गृहस्थपना छोड़ कर तपश्चरणादि करते हैं सो यहाँ पुरुषार्थ तो किया परन्तु कार्य सिद्ध न हुआ, इसलिए पुरुषार्थ करना भी कार्यकारी नहीं है ? समाधान यह है कि अन्यथा पुरुषार्थ करनेमें तो इष्ट फलकी सिद्धि होती नहीं। तपश्चरणादि व्यवहार साधनमें अनुरागी होकर प्रवर्तनेका फल तो जिनागममें शुभबन्ध कहा है और यह जीव इससे मोक्ष चाहता है सो इससे मोक्षकी सिद्धि कैसे हो सकती है । यहतो भ्रममात्र है ।

यदि कोई कहे कि भ्रमका भी तो कारण कर्म ही है, यह जीव पुरुषार्थ कैसे कर सकता है ? समाधान यह है कि यथार्थ उपदेशको ग्रहण कर निर्णय करने पर भ्रम दूर हो जाता है। सो यह जीव ऐसा पुरुषार्थ नहीं करता है, इसलिए भ्रम बना रहता है। निर्णय करनेका पुरुषार्थ करे तो भ्रमका बाह्य कारण जो मोहकर्म है उसका भी उपशमादिक हो जाता है। और तब भ्रम भी दूर हो जाता है। क्योंकि निर्णय करनेवालेके परिणामोंमें विशुद्धता होनेसे मोह कर्मका स्थिति अनुभाग स्वयमेव घट जाता है।

यहाँ पुनः प्रश्न होता है कि यह जीव निर्णय करनेमें भी उपयोगको नहीं लगाता है सो उसका कारण भी तो कर्म है? समाधान यह है कि एकेन्द्रियादिकके तो विचार करनेकी शक्ति नहीं है, उनके बाह्य कारण तो कर्म है। परन्तु इस जीवके तो ज्ञानावरणादिकका क्षयोयशम होनेसे निर्णय करनेकी शक्ति प्रगट हुई है, इसलिए जहाँ उपयोगको लगायगा उसका निर्णय हो सकता है। परन्तु यह अन्यका निर्णय करनेमें उपयोग लगाता है, यहाँ नहीं लगता है, सो यह तो इसीका दोप है, इसमें कर्मका कुछ प्रयोजन नहीं है।

यहाँ कोई कहता है कि सम्यक्त्व और चारित्रका तो घातक मोह है। उसका अभाव हुए विना मोक्षका उपाय कैसे बन सकता है? समाधान यह है कि तत्त्वनिर्णय करनेमें उपयोगको नहीं लगाना यह तो इसीका दोप है। यदि पुरुषार्थपूर्वक तत्त्वनिर्णय करनेमें उपयोगको लगाता है तो स्वयमेव मोहका अभाव होनेपर सम्यक्त्वादिरूप मोक्षके उपायका पुरुषार्थ बन जाता है। इसलिए मुख्यरूपसे तो तत्त्वनिर्णय करनेमें उपयोगको लगानेका पुरुषार्थ करना चाहिए। उपदेश भी दिया जाता है सो इसी पुरुषार्थके करानेके लिए दिया जाता है।

-मोक्षमार्गप्रकाशकके आधारसे

इस प्रकार प्रकृत प्रश्नपर विचार करनेपर यही ज्ञात होता है कि जिस प्रकार केवलज्ञान उनका ज्ञाता-दृष्टा है उसी प्रकार श्रुतज्ञान भी आगमानुसार उनका ज्ञाता-दृष्टा है। वस्तु-स्वभाव और तदनुसार कार्य-कारणपरम्परामें केवलज्ञानके समान श्रुतज्ञानका अन्य प्रयोजन नहीं है। तटस्थभावसे वे दोनों ज्ञाता-दृष्टामात्र हैं। अतएव प्रत्येक कार्य स्वभाव आदि पाँचके समवायमें होता है ऐसा यहाँ निर्णय करना चाहिए क्योंकि जो प्रत्येक कार्यमें सम्यक् नियतिको स्वीकार करता है वह पाँचोंको युगपत् स्वीकार करता है। किसी भी कार्यके प्रति इनमेंसे किसी एककी स्वीकृतिमें जहाँ एकान्तका आग्रह है वहाँ इन सबकी स्वीकृतिमें अनेकान्तका प्रकाशपुंज दृष्टिगोचर होता है। जैनदर्शनके अनुसार कार्य-कारणभावमें अनुपचरित-उपचरितरूपसे ऐसे ही अनेकान्तको स्थान मिला हुआ है। इस प्रकार एकान्तनियति और सम्यक् नियतिमें क्या अन्तर है इसका सांगोपांग विचार किया।

\१८. उपादान विचार

हम अनेक स्थानोंपर उपादानका ‘अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यको उपादान कहते हैं’ यह लक्षण लिख आये हैं और अपने इस कथनकी पुष्टिमें अष्टसहस्री टिप्पण, प्रमेयकमलमार्तण्ड और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक आदिके प्रमाण भी उपस्थित कर आये हैं, किन्तु अपर पक्ष समझता है कि हमने इस लक्षणका उपयोग अपने गलत अभिप्रायकी पुष्टिमें किया है। उसने अपने इस अभिप्रायके समर्थनमें स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षामें आये हुए उपादानके लक्षणको उद्धृतकर उसका जो अर्थ किया है वह यहाँ दिया जाता है-

पुव्वपरिणामजुत्तं कारणभावेण वट्टदे दव्वं।
उत्तरपरिणामजुदं तं च्चिय कज्जं हवे णियमा ॥ २२२ व २३० ॥

द्रव्य अपने पूर्ण परिणामकी अवस्थामें कारणरूपसे रहता है और जब वह उत्तर परिणामसे, युक्त हो जाता है तब वह नियमसे कार्यरूप हो जाता है ॥ २२२ व २३० ॥

यह अपर पक्षद्वारा किया गया उक्त गाथाका अर्थ है। इसका सही अर्थ इस प्रकार है-

अनन्तर पूर्व परिणामसे युक्त द्रव्य नियमसे कारण रूपसे वर्तता है और अनन्तर उत्तर परिणामसे युक्त वही द्रव्य नियमसे कार्य होता है ॥ २२२ व २३० ॥

इसके संस्कृत टीकाकारने भी वही अर्थ किया है जिसे हमने पूर्वमें दिया है। प्रकृतमें उपयोगी टीकाका वह अंश इस प्रकार है-

द्रव्यं जीवादिवस्तु पूर्वपरिणामयुक्तं पूर्वपर्यायाविष्टं कारणभावेन उपादानकारत्वेन वर्त्तते।

अब हम इन दोनों अर्थोंमें अन्तर क्या है इसपर सर्वप्रथम विचार करते हैं-

गाथाके पूर्वार्द्धका अन्वय इस प्रकार होता हैं-पुव्वपरिणामजुत्तं दव्वं कारणभावेण वट्टदे । इसका शब्दार्थ है-पूर्व परिणामसे युक्तद्रव्य कारण भावसे वर्तता है।

हमने गाथाके पूर्वार्द्धका यही अर्थ किया है। मात्र गाथाके उत्तरार्धमें पठित ‘उत्तर’ पदको ध्यानमें रखकर तथा इसकी अगली गाथामें आये हुए कार्यकारणभावके निरूपणको भी लक्ष्यमें रखकर और अन्यत्र प्ररूपित उपादानके लक्षणको भी ध्यानमें रखकर गाथाके अर्थके प्रारंभमें ‘अनन्तरपद’ और जोड़ा है! यहाँ गाथाका ‘पुव्वपरिणामजुत्तं’ पद ‘दव्वं’ पदका विशेषण है। कैसा द्रव्य उपादानसंज्ञाको प्राप्त होता है ऐसी जिज्ञासा होनेपर गाथामें स्पष्टरूपसे बतलाया गया है कि पूर्व (अनन्तर पूर्व) पर्यायसे युक्त द्रव्य उपादान संज्ञाको प्राप्त होता है। यह निश्चय उपादानका स्वरूप है।

किन्तु अपर पक्षकी यह अर्थ इसलिए इष्ट नहीं है, क्योंकि उपादानके उक्त प्रकारके अर्थपरक लक्षणको स्वीकार करनेपर उसके सामने सभी कार्योंको क्रमनियत माननेका प्रसंग उपस्थित होता है, इसलिए उस पक्षकी ओरसे इस गाथाके पूर्वार्धके अर्थको बदलकर उसका इच्छानुसार पूर्वोक्त प्रकारसे कल्पित अर्थ किया गया है, गाथाके पूर्वार्धका प्रथम चरण है-‘पुव्वपरिणामजुत्तं।’ इसका सीधा अर्थ है-‘पूर्व परिणामसे युक्त।’ किन्तु इसके स्थानमें अपर पक्षने इसका अर्थ किया है-‘अपने पूर्व परिणामकी अवस्थामें।’

यह है अपर पक्षको ओरसे किये गये अर्थ परिवर्तनका एक प्रकार। अन्यत्र भी अपर पक्षने जो मूल वाक्योंके अर्थ बदले हैं वे भी यथास्थान देखनेको मिलेंगे।

स्वामी कार्तिकेयने उक्त गाथा दो बार निबद्ध की है। प्रथम बार इस गाथाको निबद्ध करनेके बाद इसका स्पष्टीकरण करते हुए वे लिखते हैं-

कारण-कज्जविसेसा तीसु वि कालेसु हुंति वत्थूणं।
एक्केक्कम्मि य समए पुव्वुत्तरभावमासिज्ज ॥ २२३ ॥

वस्तुओंके पूर्व और उत्तर परिणामोंको लेकर तीनों ही कालोंके प्रत्येक समयमें कारण-कार्यभाव होता है ॥ २२३ ॥

इस वचनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अनन्तर पूर्व पर्याय युक्त द्रव्यका नाम ही उपादानकारण है। अतः अपर पक्षने पूर्व पर्यायकी अवस्थामें जो मात्र द्रव्यको उपादान कारण कहा है, उसका वह कहना ठीक नहीं है।

यद्यपि यहाँ यह कहा जा सकता है कि गाथा २२२ में तो पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यको ही उपादानकारण कहा है, इसलिए पूर्व पर्याय’ पदसे केपल ‘अनन्तर पूर्व पर्यायको’ ही ग्रहण नहीं करना चाहिए । अपर पक्षने अपनी प्रतिशंका ३ में इस वातको ध्यानमें रखकर ऐसा निर्देश किया भी है । सो इसका समाधान यह है कि कोई भी द्रव्य एक समयमें एक ही पर्यायसे युक्त होता है, इसलिए कार्य होनेके पूर्व जिस पर्यायसे युक्त द्रव्य उपलब्ध होता है उसी पर्यायसे युक्त द्रव्य वास्तवमें उत्तर पर्याय युक्त द्रव्यका कारण हो सकता है, अन्य नहीं । यद्यपि आगममें स्थूल पर्यायोंकी अपेक्षा भी कारण-कार्यका कथन उपलब्ध होता है पर वह व्यवहार (उपचार) कथन है । निश्चय कथन तो यही है कि अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्य उपादान कारण है और अनन्तर उत्तर पर्याययुक्त द्रव्य कार्य है । इस प्रकार प्रत्येक समयमें उस उस पर्यायसे युक्त द्रव्य कारण भी है और कार्य भी है । अनन्तर पूर्व पर्यायकी अपेक्षा विचार करने पर कार्य है और अनन्तर उत्तर पर्यायकी अपेक्षा विचार करनेपर कारण है । हमें प्रसन्नता है कि अपर पक्षने उपादानके इस लक्षणको प्रारम्भमें किसी न किसी रूपमें स्वीकार कर लिया है । साथ ही उस पक्षकी ओरसे इस लक्षण-परक गाथाके पूर्वार्धका जो अर्थ किया गया है उस पर भी वह स्थिर न रह सका और उपादानके इस लक्षण परक गाथाके पूर्वार्धका जो अर्थ संस्कृत टीकाकारने तथा हमने किया है उसे भी अपने व्याख्यानके प्रसंगसे स्वीकार कर लिया हैं ।

\१९. कार्यका नियामक उपादान कारण होता है

अब उस पक्षको विवाद कहाँ है इस बात पर दृष्टिपात करते हैं । उस पक्षका कहना है कि उपादान कारणसे जो कार्य होता है वह क्या हो इसकी नियामक निमित्तसामग्री है, उपादान कारण नहीं । अपने इस अभिप्रायकी पुष्टिमें उसका कहना है-

‘परन्तु वह एक उत्तर पर्याय किस रूपमें होगी ? इसकी नियामक आगमके अनुसार निमित्त सामग्री है । जैसे चनेको खप्परमें डालकर अग्निके जरिये भूना भी जा सकता है और वटलोईमें उबलते हुए पानीमें डालकर उसी चनेको उसी अग्निके द्वारा पकाया भी जा सकता है । लेकिन आप ऐसा माननेके लिएतैयार नहीं हैं । आपकी मान्यता तो इस विषयमें मात्र इतनी ही है कि पूर्व पर्यायके वाद एक नियत ही उत्तर पर्याय होगी । परन्तु इस पर हमारा कहना यह है कि आपकी मान्यतामें पूर्व पर्यायके बाद एक नियत उत्तर पर्यायके होनेका नियामक कौन होगा ? यदि कहा जाय कि गाथामें भी ‘णियमा’ पद पड़ा हुआ है उससे ही सिद्ध होता है कि पूर्व पर्याय ही उत्तर पर्यायकी नियामक हो जाती है, क्योंकि वह ‘णियमा’ पद उस पूर्व पर्यायके अनन्तर दो आदि पर्यायोंमेंसे एक पर्याय होगी इसका त्रिरोधक हो है तो इसपर भी हमारा कहना यह है कि गाथामें पठित ‘णियमा’ पद किसी एक निश्चित पर्यायकी सूचना देनेके लिए नहीं है । उससे तो केवल इतनी ही बात जानी जा सकती है कि पूर्व पर्याय विशिष्ट द्रव्य कारण कहलाती है और उत्तर पर्याय विशिष्ट वस्तु नियमसे कार्य कहलाती है, फिर भले ही उत्तर पर्याय किसी रूपमें क्यों न हो । इस तरह पूर्व पर्यायके बाद जो भी उत्तर पर्याय होगी वह नियमसे उस पूर्व पर्यायका कार्य होगी ।’

यह अपर पक्षके वक्तव्यका कुछ अंश है । आगे अपने इस वक्तव्यकी पुष्टिमें उसकी ओरसे जो कहा गया है उसका कुछ आवश्यक अंश इस प्रकार है-

'इस प्रकार यह बात अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती है कि कार्यसे अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायमें उपादान कारणभूत वस्तुके विद्यमान रहते हुए भी यदि विवक्षित कार्यके अनुकूल अन्य कारणोंकी अविकलता

(पूर्णता) विद्यमान नहीं होगी तो उस समय वहाँपर उस उपादानसे विवक्षित कार्यकी उत्पत्ति कदापि नहीं होगी फिर तो जिस कार्यके अनुकूल अन्य कारणोंकी पूर्णता वहाँ विद्यमान होगी उसके अनुसार ही, कार्य निष्पन्न होगा। यदि आप कहें कि होगा तो वही जो केवलज्ञानमें झलका होगा। तो इस पर हमारा कहना यह है कि बेचारे श्रुतज्ञानीको क्या मालूम कि केवलज्ञानीके ज्ञानमें क्या झलका है। इसलिए जो कुछ होता है उसकी दृष्टिमें कार्य-कारणभावके आधार पर ही होता है कार्योत्पत्तिके विषयमें इससे अधिक वह सोच ही तो नहीं सकता है।’

आगे अपने विषयको और भी स्पष्ट करते हुए अपर पक्षने लिखा है-

‘इसलिए यह बात तो ठीक है कि पूर्वकी क्रोधरूप पर्याय विशिष्ट जीव आगे अव्यवहित उत्तर-क्षणमें उत्पन्न होनेवाली अपनी पर्यायका उपादान कारण है परन्तु श्रुतज्ञानीकी दृष्टिमें यह नियम नहीं बन सकता है कि उत्तर क्षणमें उस पूर्वकी क्रोध पर्याय विशिष्ट जीवके क्रोधरूप, मानरूप, मायारूप और लोभरूप पर्यायोंमेंसे अमुक पर्याय ही होना चाहिए अर्थात् चूँकि वस्तु परिणमनस्वभाववाली होती है अतः क्रोधरूप पूर्व पर्याय विशिष्ट उस जीवका उत्तर क्षणमें परिणमन तो अवश्यंभावी है, परन्तु क्रोधरूप, मानरूप, मायारूप और लोभरूप परिणमनोंमेंसे कौनसा परिणमन होगा यह बात अन्य अनुकूल बाह्य सामग्रीपर ही निर्भर है। याने जीवकी पूर्व पर्यायमें क्रोधरूपता है वह क्रोधरूपता जीवके अपने स्वतःसिद्ध स्वभावरूपसे नहीं है। अपने स्वतःसिद्ध स्वभावरूपसे तो केवल पर्यायरूपता ही है, क्योंकि जीवका उसका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव केवल परिणमनशीलता ही है क्रोधादि रूप परिणमनशीलता उसका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव नहीं है, इसलिए यह मानना पड़ता है कि जीवकी अपनी पर्यायमें जो क्रोधादिरूपता पाई जाती है वह क्रोधादिरूपता पौद्गलिक क्रोधादि कर्मोंसे उदयके निमित्तसे ही पाई जाती है।’

ये अपर पक्षकी ओर निमित्तके अनुसार कार्य होता है इस आशयको स्पष्ट करनेके अभिप्रायसे अपनी प्रतिशंका ३ में जो वक्तव्य लिपिबद्ध किया गया है उसके कुछ अंश हैं। आगे इनके आधारसे विचार करते हैं-

: १ :

इन उल्लेखोंमेंसे सर्व प्रथम ‘कार्यका नियामक कौन’ यह विचारणीय है। अपर पक्षका कहना है कि कार्यकी नियामक निमित्त सामग्री होती है, उपादान नहीं। और हमारा कहना है कि कार्यका नियामक होता तो उपादान कारण ही है। मात्र प्रत्येक उपादानसे कार्य होते समय अन्य जो बाह्य सामग्री उसके होनेमें निमित्त होती है उससे हम यह जानते हैं कि इस समय इस उपादानसे इस सामग्रीको निमित्त कर यह कार्य हुआ है। जैसे-उड़दके जलयुक्त बटलोईमें अग्नि संयोगको निमित्तकर पकने पर बहुतसे उड़द जल्दी पक जाते हैं, बहुतसे उड़द कुछ देरमें पकते हैं और कुछ उड़द ऐसे भी होते हैं जो पकते ही नहीं। साथ ही कुछ उड़द ऐसे भी होते हैं जो बटलोईमें डालते समय जमीन पर गिर जाते हैं। उनमेंसे कुछ उड़द तो ऐसे होते हैं जिन्हें उठाकर बटलोईमें डाल दिया जाता है और कुछ उड़द ऐसे भी होते हैं जो जमीन पर ही पड़े रह जाते हैं। ऐसा क्यों होता है ? पकानेवाला तो उन सबको पकाना चाहता है। उनमेंसे कोई गिर न जाये और सब पक जाएँ इसके लिये वह पूरा ध्यान भी रखता है। फिर भी यह विचित्रता होती है। अग्निके संयोगमें भी किसी प्रकारका पक्षपात नहीं किया जाता है। अग्निका संयोग होनेपर सब उड़द नीचे-ऊपर होते हुए खुद-बुद, खुद-बुद चुरने भी लगते हैं। फिर भी उनके चुरनेमें विचित्रता देखी जाती है। सो क्यों ? इससे स्पष्ट विदित होता है कि बाह्य संयोग लाख हो पर कार्य होता है उपादानके अनुसार ही। अपर पक्ष द्वारा माने हुए श्रुतज्ञानी जीवको आन्तर उपादानशक्तिका भान नहीं, इसलिये वह अपनी मिथ्या कल्पनावश भले ही यह मानता रहे कि कार्यकी नियामक निमित्त सामग्री होती है। किन्तु जैसा कि पूर्वोक्त उदाहरणसे स्पष्ट है, वस्तुतः कार्यका नियामक उपादान कारण ही होता है, निमित्त सामग्री नहीं। व्यवहार नयसे निमित्त सामग्रीको नियामक कहना दूसरी बात है।

अब प्रकृत विषयकी पुष्टिमें दूसरा उदाहरण लीजिए-कुछ चरम-शरीरी समवसरणमें जाते हैं। वे सब तद्भव मोक्षगामी हैं। उनके लिये समवसरण आदिका योग प्राप्त है और हैं वे सब बालब्रह्मचारी। समवसरणमें ऐसी कोई प्रतिबन्धक बाह्य सामग्री भी नहीं है जिसके कारण यह कहा जाय कि वे मुनिधर्म स्वीकार करनेमें असमर्थ हैं। ऐसी उत्तम बाह्य अनुकूलता उन्हें मिली हुई है। फिर भी वे सब एक साथ मुनिधर्म स्वीकार नहीं करते। सो क्यों? ऐसा क्यों होता है कि उनमेंसे कोई सम्यग्दृष्टि बनता है, कोई देशव्रती बनता है और कोई महाव्रती। ऐसा क्यों होता है? मोक्ष जानेकी योग्यता सबमें है। वे सब तद्भव मोक्षगामी भी हैं। सबको साक्षात् जिनदेवका सानिध्य, उपदेश लाभ आदि अनुकूल सब बाह्य सामग्री भी मिली हुई है, प्रतिकूल सामग्री कुछ भी नहीं है। फिर भी उनमें यह भेद दृष्टिगोचर होता है। सो क्यों? इससे विदित होता है कि जिसका जिस कालमें जैसा उपादान होता है, कार्य उसीके अनुसार होता है। बाह्य-सामग्री तो उसमें धर्मादि द्रव्योंके समान निमित्तमात्र है। यही कारण है कि आचार्य पूज्यपादने अपने इष्टोपदेशमें अन्य सब बाह्य-सामग्रीको गति आदिमें धर्मादि द्रव्योंके समान निमित्तमात्र स्वीकार किया है।

यहाँपर अपर पक्षकी ओरसे यह कहा जाना ठीक नहीं है कि जिसके जैसे कर्मका उदय, उपशम, क्षयोपशम या क्षय होता है, कार्य उसके अनुसार होता है, उपादानके अनुसार नहीं, क्योंकि अपर पक्षके मतानुसार कर्मका उदयादि भी तो जब अपने उपादानपर निर्भर नहीं है। वह भी जब निमित्त सामग्रीके अनुसार होता है तो ऐसी अवस्थामें समवसरणादि बाह्य-सामग्रीके मिलनेपर सबके एकसा कर्मका उदयादि क्यों नहीं हो जाता? उन जीवोंके कर्मके उदयादिमें अन्तर क्यों बना रहता है। क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि प्रत्येक द्रव्यका प्रत्येक समयमें जो परिणमन होता है वह अपने-अपने उपादानके अनुसार होकर भी स्वयं ही होता है। हाँ, इतना अवश्य ही होता है कि जब प्रत्येक उपादान अपने-अपने कार्यके सन्मुख होता है तब व्यवहारसे उसके अनुकूल बाह्य सामग्री विस्रसा या प्रयोगसे मिलती ही है। इनका ऐसा ही योग है। यही कारण है कि तथ्यका विवेचन करते समय सभी आचार्योंने एक स्वरसे यह स्वीकार किया है कि ‘कार्यमें बाह्य सामग्री तो व्यवहारसे निमित्तमात्र है’ इसी बातको स्पष्ट करते हुए आचार्य विद्यानन्दि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० ५, सूत्र २० में लिखते हैं-

अत्रोपग्रहवचनं सद्वेद्यादिकर्मणां सुखाद्युत्पत्तौ निमित्तमात्रत्वेनानुग्राहकत्वप्रतिपत्त्यर्थम्, परिणामकारणं जीवः सुखादीनां, तस्यैव तथ्यपरिणामात्।

सातावेदनीय आदि कर्म सुखादिककी उत्पत्तिमें निमित्तमात्र होनेसे अनुग्राहक हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिये सूत्रमें उपग्रह वचन दिया है। वास्तवमें सुखादिकरूप परिणामका कारण जीव है, क्योंकि उसीके सुखादिकरूप परिणाम होता है।

उपादान कारण ही समर्थ कारण है। वह अन्त्य क्षणको प्राप्त होकर सम्पूर्ण इस संज्ञाको प्राप्त होता है इस बातका निर्देश करते हुए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७० में लिखा है-

विवक्षितस्वकार्यकरणेऽन्त्यक्षणप्राप्तत्वं हि सम्पूर्णम्।

विवक्षित अपना कार्य करनेमें अन्त्य क्षणको प्राप्त होना ही उपादानकी परिपूर्णता है।

इसलिये उपादानके वास्तविक स्वरूपपर विशेष प्रकाश डालते हुए अष्टसहस्री पृ० २१० में लिखते हैं-

तन्तुद्रव्यं हि प्राच्यापटाकारपरित्यागेन तन्तुत्वापरित्यागेन चापूर्वपटाकारतया परिणमदुपलभ्यते पटाकारस्तु पूर्वाकारात् व्यतिरिक्त इति सिद्धं, सर्वथा त्यक्तरूपस्यापूर्वरूपवर्तिन एवोपादानत्वायोगादपरित्यक्तात्मपूर्वरूपवर्तिवत् तथा प्रतीतेः, द्रव्यभावप्रत्ययोत्पत्तिनिबन्धनत्वादुपादानोपदेयभावस्य। भावप्रत्यासत्तिमात्रात्तद्भावे समानाकाराणामखिलार्थानां तत्प्रसङ्गात्, कालप्रत्यासत्तेस्तद्भावे पूर्वोत्तरसमनन्तरक्षणवर्तिनामशेषार्थानां तत्प्रसक्तेः, देशप्रत्यासत्तेस्तद्भावे समानदेशानामशेषतस्तद्भावापत्तेः, सद्द्रव्यत्वादिसाधारणद्रव्यप्रत्यासत्तेरपि तद्भावानियमात्। असाधारणद्रव्यप्रत्यासत्तिः पूर्वाकारभावविशेषप्रत्यासत्तिरेव च निबन्धनमुपादानत्वस्य स्वोपादेयं परिणामं प्रति निश्चीयते।

तन्तुद्रव्य पहलेके अपटाकारका त्यागकर और तन्तुत्व सामान्यका त्याग न कर अपूर्व पटाकार रूपसे परिणमन करता हुआ उपलब्ध होता है। इससे पटाकार पहलेके आकारसे भिन्न ही है यह सिद्ध होता है, क्योंकि सर्वथा त्यक्त रूप होकर अपूर्व रूपवर्ति ही उपादान नहीं हो सकता। जैसे कि अपने पूर्वरूपको छोड़े बिना उपादान नहीं होता, क्योंकि वैसी प्रतीति नहीं होती। कारण कि जिसमें द्रव्य और भावकी प्रत्यासत्ति है उसीमें उपादान-उपादेय भाव बन सकता है ऐसा नियम है। भावप्रत्यासत्ति मात्रसे उपादान-उपादेय भावके स्वीकार करने पर सामान आकारवाले समस्त पदार्थोंमें उपादान-उपादेय भावका प्रसंग आता है, काल प्रत्यासत्ति मात्रसे उपादान-उपादेय भावके स्वीकार करने पर पूर्वोत्तर समनन्तर क्षणवर्ती समस्त पदार्थोंमें उपादान-उपादेय भावका प्रसंग आता है, देश प्रत्यासत्तिमात्रसे उपादान-उपादेय भावके स्वीकार करनेपर समान देशवाले समस्त पदार्थोंमें पूरी तरहसे उपादान-उपादेय भावकी आपत्ति प्राप्त होती है। सत्त्व, द्रव्यत्व आदिरूप साधारण द्रव्य प्रत्यासत्तिके कारण भी उपादान-उपादेय भावका नियम नहीं बन सकता। अतएव असाधारण द्रव्य प्रत्यासत्ति और पूर्वाकारभाव-विशेषरूप भाव प्रत्यासत्ति ही अपने उपादेयरूप परिणामके प्रति उपादानपनेका हेतु है ऐसा निश्चय होता है।

यह आगमवचन है। इसमें उपादानका यथार्थ स्वरूप क्या है इस बातको चारों ओरसे बाँध कर बतलाया गया है। इसमें यह स्पष्ट रूपसे स्वीकार किया गया है कि कार्य द्रव्यके साथ जिसकी असाधारण द्रव्यप्रत्यासत्ति और पूर्वाकार भावविशेषरूप भावप्रत्यासत्ति उपलब्ध होती है वही उस कार्यका उपादान हो सकता है। यहाँ पर असाधारण द्रव्यप्रत्यासत्तिसे तात्पर्य जीवादि प्रत्येक द्रव्यसे है। जिस द्रव्यका जो कार्य है वह उसीमें होता है यह उक्त कथनका भाव है। तथा पूर्वाकार भावविशेषरूप भावप्रत्यासत्तिसे तात्पर्य कार्यके अनन्तर पूर्ववर्ती भावविशेषसे है। द्रव्यमें सत्त्व, द्रव्यत्व, आदि अन्य सामान्य शक्तियाँ भले ही रहा करें पर मात्र ये सामान्य शक्तियाँ उपादान-उपादेय भावके लिए कारण नहीं हैं। इस प्रकार प्रत्येक उपादान अपने उपादेयका नियमसे नियामक होता है इस बातको ध्यानमें रखकर स्वामी समन्तभद्रने आप्तमीमांसा कारिका ४२ में ‘मोपादाननियामो भूत्’ यह वचन कहा है। इस विषयकी विशेष जानकारीके लिए अष्टशती समन्वित अष्टसहस्री पृ० १८९-१९० का पाठ विशेष रूपसे द्रष्टव्य है। इस विषयका उपसंहार करते हुए भट्टाकलंकदेव और आचार्य विद्यानन्दि अपनी अष्टशती और अष्टसहस्री पृ० १९० में लिखते हैं-

कथञ्चिदाहितविशेषतन्तूनां पटस्वभावप्रतिलम्भोपलम्भात् तदन्यतरविधि-प्रतिषेधनियमनिमित्ताल्यतात् । प्रतीतेरलमपलापेन । न हि तन्तुतद्विशेषयोरन्यतरस्य विधौ निषेधे च नियमनिमित्तमस्ति । न हि तन्तव एवातानादिविशेषनिरपेक्षाः पटस्वभावं प्रतिलभमानाः समुपलभ्यन्ते, येन तन्तुमात्रस्यैव विधिन्नियमो विशेषप्रतिषेध नियमो वा स्यात् । नापि तन्तुनिरपेक्षो विशेष एव पटस्वभावं स्वीकुर्वन्नुपलभ्यते, यतो विशेषविधिनियमस्तन्तुप्रतिषेधनियमो वावतिष्ठेत । न चोपलब्ध्यनुपलब्धी मुक्त्वान्यन्निमित्तं तद्विधिप्रतिषेधयोर्नियमेऽस्ति येन तदत्ययेऽपि तदुभयप्रतीतेरपलापः शोभेत ।

कथंचित् आतान-वितानरूपसे अवस्थित विशेष तन्तुओंमें पटस्वभावकी प्राप्ति उपलब्ध होती है, क्योंकि तदन्यतर विधिनियम और तदन्यतर प्रतिषेधनियमरूप निमित्तका अभाव है । इसलिए प्रतीतिके अपलापसे क्या लाभ । तन्तु और उनके विशेष (पर्याय) इनमेंसे किसी एककी विधि और दूसरेके निषेधमें नियम निमित्तता नहीं बनती । आतानादि विशेष निरपेक्ष केवल तन्तु ही पटस्वभावको प्राप्त करते हुए नहीं उपलब्ध होते हैं, जिससे कि एक वस्तुमें तन्तुसामान्यका ही विधिनियम अथवा आतानादि विशेषका प्रतिषेध नियम बने । इसी प्रकार तन्तु निरपेक्ष आतानादि विशेष ही पटस्वभावको स्वीकार करता हुआ नहीं उपलब्ध होता है जिससे कि एक वस्तुमें विशेष विधिनियम अथवा तन्तु प्रतिषेध नियम बने । और उपलब्धि तथा अनुपलब्धिको छोड़कर तन्तु सामान्य और तन्तु विशेषके विधि तथा प्रतिषेधके नियममें अन्य कोई निमित्त नहीं है, जिससे कि उनके अभावमें भी उन दोनोंकी प्रतीतिका अपलाप शोभाको प्राप्त होवे ।

यह आगम प्रमाण है । इससे यह बात बहुत अच्छी तरह सिद्ध हो जाती है कि प्रत्येक कार्यमें उसका उपादान कारण ही नियामक होता है, जो निश्चय कथन होनेसे परमार्थरूप है । निमित्त सामग्रीको नियामक मानना व्यवहार कथन है । परन्तु श्रुतज्ञानी जीव अपने अल्पज्ञानके कारण प्रत्येक समयके कार्यका कौन उपादान और कौन निमित्त है इसका ठीक निर्णय नही कर सकते । इसलिए वे प्रायः व्यवहारका अवलम्बन लेकर प्रवृत्ति करते हैं । विवक्षित कार्यके अनुकूल प्रयोगसे या विस्रसा बाह्य सामग्रीके मिलने पर भी जो विवक्षित कार्य नहीं होता और निराश होना पड़ता है, उसका कारण भी यही है, किन्तु आगममें कार्यकारण भावकी व्यवहार कथनीका उल्लेख होनेके साथ निश्चय कथन और उसके नियम भी दिये गये हैं । इसलिये उन नियमोंको दृष्टिमें रखकर यथार्थमें प्रत्येक कार्यका नियामक उपादान कारणको ही समझना चाहिए । और इसी कारण बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा २१ में उपादानके समान कार्य होता है इसका निर्देश करते हुए ‘उपादानकारणसदृशं कार्यं भवति’ यह वचन कहा गया है । आचार्य जयसेनने समयसार गाथा ३७२ की टीकामें भी इसी तथ्यको स्पष्ट करनेके अभिप्रायसे यह कथन किया है-

तस्मात्कारणान्मृत्तिकादिसर्वद्रव्याणि कर्तृणि घटादिरूपेण जायमानानि स्वकीयोपादानकारणेन मृत्तिकादिरूपेण जायन्ते न च कुम्भकारादिबहिरंगनिमित्तरूपेण । कस्मात् इति चेत् ? उपादानकरणसदृशं कार्यं भवतीति यस्मात् ।

किस कारणसे मिट्टी आदि सभी द्रव्य कर्ता होकर घटादि रूपसे उत्पन्न होते हुए अपने उपादान कारण मिट्टी आदि रूपसे उत्पन्न होते हैं, कुम्हार आदि बहिरंग निमित्तरूपसे नहीं, क्योंकि कार्य उपादान कारणके सदृश होता है ।

अतएव अपर पक्षने जो चने आदि पदार्थोंके उदाहरण देकर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि कार्योंकी नियामक निमित्त सामग्री होती है । सो पूर्वोक्त प्रमाणोंको ध्यानमें लेकर विचार करने पर विदित होता है कि वे उदाहरण केवल कल्पनाके आधार पर दिये गये हैं, कार्य-कारणभावके निश्चित नियमोंके आधार पर नहीं । वस्तुतः उपादान कारणगत योग्यता ही प्रत्येक कार्यकी नियामक है इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० २३७ में कहा है-

तत्रापि हि कारणं कार्येणानुपक्रियमाणं यावत् प्रतिनियतं कार्यमुत्पादयति तावत्सर्वं कस्मान्नोत्पादयतीति चोद्ये योग्यतैव शरणम् ।

उसमें भी कारण कार्यसे उपक्रियमाण न होता हुआ जैसे प्रतिनियत कार्यको उत्पन्न करता है वैसे वह सब कार्योंको क्यों नहीं उत्पन्न करता ऐसा प्रश्न होने पर आचार्य उत्तर देते हुए कहते हैं कि योग्यता ही शरण है ।

इसी तथ्यको और भी स्पष्ट रूपसे समझने के लिये स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा २१७ का यह टीका वचन पर्याप्त होगा-

स कालः संक्रमविधानेन स्वगुणैः नान्यद्द्रव्ये परिणमति, न च परद्रव्यगुणान् स्वस्मिन् परिणामयति, नापि हेतुकर्तृत्वेनान्यद्द्रव्यमन्यगुणैः सह परिणामयति । किं तर्हि ? विविधपरिणामिकानां द्रव्याणां परिणमनस्य स्वयमुदासीननिमित्तं भवति । यथा कालद्रव्यं तथा सर्वद्रव्यमपि ।-स्वा० का० अ० गा० २१७ टीका

वह काल संक्रम विधिसे अपने गुणोंके द्वारा अन्य द्रव्यमें परिणमित नहीं होता और न परद्रव्यके गुणोंको अपनेमें परिणमाता है तथा हेतुकर्ता होकर अन्य द्रव्यको अन्य गुणोंके साथ नहीं परिणमाता है । तो क्या है ? विविध प्रकारसे परिणमनेवाले द्रव्योंके परिणमनका स्वयं उदासीन निमित्त है । जिसप्रकार काल द्रव्य है उसी प्रकार सभी द्रव्य हैं ।

इस उल्लेखमें ‘यथा कालद्रव्यं तथा सर्वद्रव्यमपि’ यह वचन विशेष रूपसे ध्यान देने योग्य है । इससे यह बात अच्छी तरहसे समझमें आ जाती है कि निमित्तपनेकी अपेक्षा सभी द्रव्योंकी स्थिति काल द्रव्यके समान है । कोई भी द्रव्य किसी अन्य द्रव्यके कार्यमें व्यापृत नहीं होता । निमित्त कारणके जो उदासीन निमित्त और प्रेरक निमित्त ऐसे भेद किये गये हैं उन भेदोंका कारण अन्य है, जिसका निर्देश हम पहले उदाहरण देकर कर आये हैं । अतएव निष्कर्षरूपमें यही समझना चाहिए कि वास्तवमें प्रत्येक कार्यकी नियामक निमित्त सामग्री न होकर उस-उस कार्यका उपादान कारण ही होता है, किन्तु जिस प्रकार प्रत्येक कार्यके साथ प्रत्येक उपादान कारणकी अन्तर्व्याप्ति उपलब्ध होती है उसी प्रकार प्रत्येक कार्यकी उस-उस कार्यसम्बन्धी निमित्त सामग्रीके साथ बाह्य व्याप्ति भी पाई जाती है । इसलिए निश्चयनयसे उपादान कारण कार्यका नियामक है और असद्भूत व्यवहारनयसे निमित्त सामग्री कार्यकी नियामक है ऐसा सिद्धान्त स्थिर होता है ।

\२०. परिणमन क्रिया और परिणाम दो नहीं

अपनी प्रतिशंकामें अपर पक्षने एक यह बात भी लिखी है कि ‘जीवका उसका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव केवल परिणमनशीलता ही है क्रोधादिरूप परिणमनशीलता उसका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव नहीं है, इसलिए यह मानना पड़ता है कि जीवकी अपनी पर्यायमें जो क्रोधादिरूपता पाई जाती है वह क्रोधादिरूपता पौद्गलिक कर्मोंके उदयके निमित्तसे ही पाई जाती है ।’ सो सर्वप्रथम तो प्रकृतमें यह देखना है कि यहाँपर उपादानरूप जीवका ग्रहण अपर पक्षने किया है या सामान्य जीवका । सामान्य जीवका ग्रहण तो प्रकृतमें हो नहीं सकता, क्योंकि अनन्तरपूर्व उस-उस पर्याय युक्त द्रव्य ही कार्यकारी माना गया है, केवल सामान्य द्रव्य नहीं। अतएव जब वह अशुद्ध पर्यायका उपादान होता है तब वह परके लक्ष्यसे अपनेमें अशुद्ध कार्यको ही जन्म देता है और जब वह शुद्ध पर्यायका उपादान होता है तब वह स्वके लक्ष्यसे स्वभाव (शुद्ध) पर्यायको ही जन्म देता है। जीव द्रव्यका ऐसा ही स्वभाव है। प्रत्येक द्रव्यका केवल परिणमनशीलता स्वभाव स्वतःसिद्ध स्वभाव न होकर जिस समय जिस द्रव्यमें जो कार्य उत्पन्न होता है उसे उत्पन्न करना यह उसका स्वतःसिद्ध स्वभाव है। एक सत्ता और एकाश्रयवृत्ति होनेसे परिणमनशीलता परिणामसे भिन्न नहीं है। यदि परिणमनशीलता मात्र जीव द्रव्यका स्वतःसिद्ध स्वभाव माना जाता है और क्रोधादिरूपता परकृत मानी जाती है तो अरिहन्तों और सिद्धोंमें भी केवलज्ञानादि और सुखादिरूपता परकृत ही माननी पड़ेगी, क्योंकि अपर पक्षके मतानुसार केवल परिणमनशीलता ही उसका स्वतःसिद्ध स्वभाव है। जिस समय जो परिणाम उत्पन्न होता है उसे उत्पन्न करना तो उसका स्वतःसिद्ध स्वभाव है नहीं। ऐसी अवस्थामें क्रोधादिरूपताके समान केवलज्ञानादि और सुखादिरूपता भी परकृत ही ठहरेंगे। किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि परिणामी, परिणाम और परिणाम क्रिया ये तीनों वस्तुरूपसे एक ही हैं, तीन नहीं। और एक द्रव्य अपने किलेको तोड़कर पर द्रव्यके किलेका भेदनकर प्रवेश कर सकता नहीं, अतः निश्चयसे जीव द्रव्य स्वयं परकी अपेक्षा किये विना अपने क्रोधादिरूप परिणामको उत्पन्न करता है ऐसा यहाँ समझना चाहिए। आचार्य कुन्दकुन्दने इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर यह वचन कहा है-

जीवस्स दु कम्मेण य सह परिणामा हु होंति रागादि।
एवं जीवो कम्मं च दो वि रागादिमावण्णा ॥१३७॥
एकस्स दु परिणामो जायदि जीवस्स रागमादीहिं।
ता कम्मोदयहेदूहि विणा जीवस्स परिणामो ॥१३८॥

जो कर्मके साथ जीवके रागादिरूप परिणाम होते हैं तो इस प्रकार जीव और कर्म दोनों रागादि भावको प्राप्त हुए। और यदि अकेले जीवके रागादि परिणाम होते हैं तो कर्मोदयरूप हेतुओंके बिना ही वह रागादि जीवका परिणाम है ॥१३७-१३८॥

इससे स्पष्ट है कि कर्मोदय आदिको रागादिकी उत्पत्तिमें असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा निमित्तरूपसे तो स्वीकार किये गये हैं, किन्तु वे रागादि परिणाम जीवके होनेसे कर्मोदयादिरूप बाह्य हेतुओंके बिना ही जीवके होते हैं। उपादान बनकर स्वयं जीव उन्हें उत्पन्न करता है। केवल परिणमनशीलता ही जीवका स्वतःसिद्ध स्वभाव नहीं है, किन्तु परके लक्ष्यसे रागादिको उत्पन्न करना यह भी उसका स्वतःसिद्ध स्वभाव है। जब शुद्ध या अशुद्ध जिस प्रकारका यह जीव अपनेको अनुभवता है तब उस प्रकारकी शुद्ध या अशुद्ध पर्यायको वह जन्म देता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। यदि अपनेको शुद्ध अनुभवता है तो शुद्ध पर्यायकी उत्पत्तिमें कर्मोदयादि निमित्त न होकर केवल कालादि द्रव्य निमित्त होते हैं और जब परके लक्ष्यसे अपनेको रागादिरूप अनुभवता है तब रागादिकी उत्पत्तिमें कर्मोदयादि निमित्त होते हैं यह यहाँ निष्कर्ष जानना चाहिए। ऐसी ही प्रत्येक कार्यकी उत्पत्तिमें उपादानके साथ बाह्य सामग्रीकी निमित्त होकर व्याप्ति है। कार्य-कारणकी परम्परामें अन्य जितने प्रकारके विचार हैं वे सब कल्पनामात्र हैं।

\२१. ‘णियमा’ पदकी सार्थकता

पूर्वोक्त उल्लेखोंमेंसे स्वा० का० अनु० की ‘पुव्वपरिणामजुत्त’ इत्यादि गाथामें पठित ‘णियमा’ पदके सम्बन्धमें यह विचार करना है कि वह पद उक्त गाथामें क्यों निबद्ध किया गया है? अपर पक्षने इस पदकी केवल कार्यके साथ योजना करके यह अर्थ किया है कि पूर्वपर्याय विशिष्ट द्रव्य कारण कहलाती है और उत्तर पर्यायविशिष्ट वस्तु नियमसे कार्य कहलाती है। सो इस सम्बन्धमें इतना ही संकेत करना पर्याप्त है कि पूर्व पर्याय युक्त द्रव्य कारण तो कहलावे, परन्तु वह अपनेसे जायमान कार्यका नियामक न हो इसे कौन बुद्धिमान् स्वीकार करेगा। अर्थात् ऐसी अटपटी बातको कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति स्वीकार नहीं कर सकता। उपादान कारणका यह लक्षण सभी शास्त्रकारोंने स्वीकार किया है और इसीके आधारसे उससे जायमान कार्यकी व्यवस्था भी की है। यह उपादान कारणका उपचरित लक्षण न होकर निश्चय ( यथार्थ ) लक्षण है। जिसकी पुष्टिमें हम प्रकरण ‘१६ कार्यका नियामक उपादान कारण होता है’ इस शीर्षकके अन्तर्गत अनेक आगम प्रमाण दे आये हैं, किन्तु अपर पक्ष उसे कार्यका नियामक न मानकर उसे उपचरित कारण ठहराना चाहता है। अनुपचरित उपादान कारणका लक्षण क्या है इसे वह आगमसे बतला देता तो अति उत्तम होता। हम तो अभी तक उपलब्ध समस्त आगमका आलोडन करके यही जान सके हैं कि आगममें जिसका जो लक्षण किया गया है वह अव्याप्ति, अतिव्याप्ति और असम्भव दोषोंसे रहित ही किया गया है। यही कारण है कि स्वामी कार्तिकेयने उपादान कारण और कार्यके लक्षणोंमेंसे इन्हीं तीन दोषोंका परिहार करनेके लिये उपादान-कारण और कार्यके लक्षणपरक उक्त गाथाके अन्तमें ‘णियमा’ पदकी योजना की है, जिसकी पुष्टि उसी ग्रन्थकी गाथा २२३ से भले प्रकार हो जाती है। २२३ संख्याक गाथाका उल्लेख हम पूर्वमें ही कर आये हैं। ये दोनों गाथाएँ परस्परमें एक दूसरेकी पूरक हैं। अतएव उक्त गाथाके अन्तमें पठित ‘णियमा’ पदका अर्थ यह करना ही उचित है कि ‘पूर्व पर्यायसे युक्त द्रव्य नियमसे उपादान कारण है और उत्तर पर्यायसे युक्त वही द्रव्य नियमसे कार्य है।’ इतना अवश्य है कि तीनों काल सम्बन्धी सभी उपादानों और उनसे होनेवाले सभी कार्योंमें उक्त लक्षणकी प्रत्येक समयमें व्याप्ति बनती जानेके कारण सामान्य रूपसे ये उपादान कारण और उपादेय रूप कार्यके लक्षण कहे गये हैं। किन्तु विवक्षित उपादान और उससे जायमान विवक्षित कार्यके लक्षणोंकी अपेक्षा यदि विचार किया जाता है तो वहाँ पर विवक्षित पदकी योजना करके विवक्षित उपादान और उससे जायमान विवक्षित कार्यकी अपेक्षा यह कहा जायगा कि विवक्षित पर्याय युक्त द्रव्य विवक्षित कार्यका उपादान कारण है और उससे जायमान उत्तर पर्याय युक्त द्रव्य उसका विवक्षित कार्य है। इसी प्रकार जहाँ पर प्रत्येक गुणकी अपेक्षा कार्य-कारणभावका विचार करना हो वहाँ पर ‘द्रव्य’ पदके स्थानमें ‘गुण’ पदकी योजना कर लेनी चाहिए। इस प्रकार इतने विवेचनसे यह अच्छी तरह सिद्ध हो जाता है कि कि विवक्षित उपादानसे अन्य कोई कार्य उत्पन्न न होकर विवक्षित कार्य ही उत्पन्न होता है।

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ४/८)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ २९४ से ३०९

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\२२. निमित्तविचार

पूर्वोक्त उल्लेखोंके आधारसे एक यह बात भी विचारणीय है कि प्रत्येक समयमें अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यरूप उपादानके अपने कार्यके सन्मुख होने पर उसकी निमित्तभूत बाह्य सामग्री अविकलरूपसे पाई जाती है या नहीं? अपर पक्षका कहना है कि ‘कार्यके अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायमें उपादान कारणभूत वस्तुके विद्यमान रहते हुए भी यदि विवक्षित कार्यके अनुकूल अन्य कारणोंकी अविकलता (पूर्णता) विद्यमान नहीं होगी तो उस समय वहाँ पर उस उपादानसे विवक्षित कार्यकी उत्पत्ति कदापि नहीं होगी।’ सो अपर पक्षका यह वक्तव्य स्वयं अपनेमें भ्रामक है, क्योंकि विवक्षा प्राणीके चित्तमें होती है। यदि वह किसी दूसरे कार्यके उपादानसे अपने विवक्षित कार्यकी सिद्धि करना चाहे और बाह्य सामग्रीके आधारपर यह कहे कि ‘यहाँ बाह्य सामग्रीकी कमी है, इसलिये विवक्षित कार्य नहीं हुआ’ उचित नहीं है। क्योंकि जिस कार्यका वह उपादान है उससे जायमान कार्यके अनुकूल ही बाह्य सामग्रीकी अविकलता वहाँ पर रहेगी। विवक्षित कार्यके अनुकूल न तो वह उपादान ही है और न ही वहाँ पर बाह्य सामग्रोकी अविकलता भी है। उपादान किसी दूसरे कार्यका हो और उससे अपनी इच्छानुसार किसी दूसरे कार्यकी उत्पत्ति हो जाय यह त्रिकालमें सम्भव नहीं है । बाह्य-आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता कार्यके अनुकूल ही होती है, विवक्षाके अनुकूल नहीं।

अपर पक्षका यह कहना कि ‘कार्य-कारणका विचार वस्तु व्यवस्थाके आधारपर होना चाहिए, बीचमें केवलज्ञानको लाकर खड़ा न किया जाय।’ हम इस बातको हृदयसे स्वीकार करते हैं, इसलिए हमने अपने पिछले उत्तरोंमें आगममें स्वीकृत उपादान कारणके सुनिश्चित लक्षणको ध्यानमें रखकर इसका विशेष विचार किया है। किन्तु मालूम पड़ता है कि अपर पक्ष अपने उक्त कथनपर टिका रहनेके लिये राजी नहीं है, इसलिए ही वह कार्य-कारणका विचार केवलज्ञान और तदनुसारी आगम तथा श्रद्धाको तिलांजलि देकर श्रुतज्ञानके आधारसे करनेके लिये प्रस्तुत हुआ है और मजा यह कि यह श्रुतज्ञान कौन-सा? आगमानुसारी नहीं, किन्तु पाँच इन्द्रियों और मनसे जैसा समझमें आया तदनुसारी। उसकी पुष्टिमें उसने जो आगम उपस्थित किया है वह अपने चित्तको बहलानामात्र है। प्रकृतमें अपर पक्षसे हम निवेदन करना चाहते हैं कि बेचारे श्रुनज्ञानीको केवलज्ञानीके ज्ञानमें जो कुछ झलका है उसकी खबर हो या न हो, इससे क्या? तदनुसारी ऐसा आगम तो उस (श्रुतज्ञानी) के सामने उपस्थित है ही जिसमें कार्य-कारणभावके निश्चित नियमोंका उल्लेख है, इसलिये उस आधारसे तो श्रुतज्ञानी यह निर्णय कर सकता है कि जिस समय जिस कार्यका जो उपादान होगा उस समय उससे वही कार्य होगा, अन्य नहीं। साथ ही उस उपादानके अपने अनुरूप कार्यको जन्म देनेके सन्मुख होनेपर कार्यके अनुकूल बाह्य-सामग्री भी अवश्य रहेगी। श्रुतज्ञानीका कार्य आगमानुसारी कार्य-कारणभावके नियमोंके अनुसार उसका निर्णय करना है, न कि अपने अभिप्रायकी पुष्टिके लिए कार्य-कारणभावके निश्चित नियमोंमें अर्थ विपर्यास कर अपने अभिप्रायको सिद्ध करना। आशा है अपर पक्षका इस तथ्यपूर्ण वक्तव्यकी ओर विशेष ध्यान जायगा।

\२३. उपादान कारण ही कार्यका नियामक है

पूर्वोक्त उल्लेखोंके आधारसे एक यह बात भी विचारणीय है कि यदि क्रोध पर्याययुक्त कोई जीव अनन्तर उत्तर समयमें क्रोधादि चारोंमेंसे किसी एकको उत्पन्न करता है तो उसका वह उपादान अनन्तर उत्तर समयमें जिस एकको उत्पन्न करता है उसके अनुकूल होता है या बाह्य-सामग्रीके बलपर चारोंमेंसे किसीको भी उत्पन्न करे इस रूपमें होता है, क्योंकि अपर पक्ष इस सम्बन्धमें ऐसा मानकर चल रहा है कि उपादान तो चारोंका होता है, परन्तु बाह्य-सामग्रीके अनुसार किसी एककी उत्पत्ति होती है। यह अपर पक्षके कथनका सार है। समाधान यह है कि बात ऐसी नहीं है जैसी कि अपर पक्ष समझ रहा है। किन्तु अनन्तर उत्तर समयमें क्रोधादि चारोंमेंसे जो पर्याय उत्पन्न होगी, उपादान उसीके अनुकूल होगा तथा कर्म और नोकर्म रूप निमित्त भी उसीके अनुकूल होंगे। कारण कि कर्मशास्त्रके नियमानुसार क्रोधादि चारों द्रव्यकर्मोंकी सत्ता होनेपर भी एक समयमें एकके उदयका विधान ईसी आधारपर किया गया है कि जिस कषायका उपादान अपने विवक्षित कार्यके सन्मुख होता है, उदय भी उसी कषाय द्रव्यकर्मका होता है। ऐसा ही दोनोंका योग है। अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्य उपादान कारण होता है इस लक्षणको तो अपर पक्षने स्वीकार किया ही है। और इस बातके स्वीकार कर लेनेपर यह भी निश्चित हो जाता है कि उपादान कारण कार्यके एक समय पूर्व होता है, क्योंकि कर्मशास्त्रकी उदयादि व्यवस्थापर दृष्टिपात करनेपर यह सुनिश्चित रूपसे ज्ञात होता है कि जिस बाह्य-सामग्रीमें निमित्त व्यवहार होता है वह कार्यके उत्पन्न होते समय ही होती है। सो क्यों ? कर्म-शास्त्र इस प्रश्नका उत्तर देता है और समर्पक उत्तर देता है। उसमें सप्रतिपक्ष प्रकृतियोंके उदयको ध्यानमें रखकर बतलाया है कि उनमेंसे किसी एकका उदय नोकर्म रूप बाह्य-सामग्रीके अनुसार न होकर उपादानके अनुसार होता हैं, क्योंकि जिसका अनन्तर समयमें उदय होनेवाला हो वह तो उपादानके कालमें उदयावलिमें तदवस्थ रहतीं है, मात्र शेष प्रकृतियोंका उसमें स्तिबुकसंक्रमण हो जाता है और इस प्रकार उपादान तथा कर्मोदयकी कार्यके प्रति एकरूपता बनी रहती है। क्या कर्म-शास्त्रकी इस व्यवस्थासे यह ज्ञान नहीं हो जाता है कि उपादान अनेक कार्योंका न होकर नियमसे किसी एक कार्यका ही होता है और जिस कार्यका वह उपादान होता है नियमसे उसी कार्यको उत्पन्न करता है। साथ ही निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य-सामग्रो भी उसी कार्यके अनुकूल उपस्थित रहती है। कार्य-कारणभावको समग्ररूपसे प्रसिद्ध करनेवाली यह कर्म-शास्त्रकी व्यवस्था है, कुछ मानसिक कल्पना नहीं। हमें आशा है कि अपर पक्ष इन तथ्योंपर ध्यान देकर अपने विचारोंमें सुधार करेगा और वह अपनी इस मान्यताको छोड़ देगा कि 'जीवका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव केवल परिणमनशीलता है, क्रोधादिरूप परिणमन-शीलता उसका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव नहीं। कारण कि स्वभावदशामें जिस प्रकार विवक्षित सम्यक्त्वादि पर्यायरूप परिणमनशीलता उसका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव है उसी प्रकार विभावदशामें विवक्षित क्रोधादिरूप परिणमनशीलता भी उसका अपना स्वतःसिद्ध स्वभाव है। जीव या पुद्गल किसी भी द्रव्यके परिणमनमें विभाव-रूपता परके द्वारा की गई नहीं होती यह एकान्त नियम है। ( इसके लिये देखिए श्लोकवार्तिक अध्याय ५ सू० १६ पृ० ४१० ) इतना अवश्य है कि चाहे स्वभाव पर्याय युक्त जीव उपादान हो या विभाव पर्याययुक्त। किन्तु उपादानभूत जीव यदि परके लक्ष्यसे परिणमता है तो नियमसे विभाव पर्यायकी उत्पत्ति होती है और उपादानभूत वही जीव यदि स्वभावके लक्ष्यसे परिणमता है तो नियमसे स्वभाव पर्यायकी उत्पत्ति होती है। कार्यकालमें परपदार्थका निमित्त होना और बात है और स्व या परको लक्ष्य कर प्रवर्तना और बात है । जिनागममें इसी तथ्यको ध्यानमें रख कर उपदेश ग्रहण करनेके योग्य प्रत्येक पात्र जीवको बाह्य सामग्रीकी उठाधरीके विकल्पसे बचते हुए स्वभावको लक्ष्यमें लेनेका उपदेश दिया गया है। आचार्य अमृतचन्द्र इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर समयसार कलशमें लिखते हैं-

सर्वत्राध्यवसानमेवमखिलं त्याज्यं यदुक्तं जिनैः
तन्मन्ये व्यवहार एव निखिलोऽप्यन्याश्रयस्त्याजितः।
सम्यङ् निश्चयमेकमेव तदमी निष्कम्पमाक्रम्य किं
शुद्धज्ञानघने महिम्नि न निजे बध्नन्ति सन्तो धृतिम् ॥१७३॥

सभी वस्तुओंमें जो अध्यवसान है उन सभीको जिनेन्द्रदेवने छोड़ने योग्य कहा है सो आचार्य कहते हैं कि हम ऐसा मानते हैं कि भगवान्ने परके आश्रयसे प्रवर्तनेवाला सभी व्यवहार छुड़ाया है। इसलिए आचार्य उपदेश करते हुए कहते हैं कि जो सत्पुरुष हैं वे सम्यक् प्रकार एक निश्चयको ही जिस तरह हो सके उस तरह निश्चित अंगीकार करके शुद्ध ज्ञानघनस्वरूप अपनी महिमामें स्थिरता क्यों नहीं धारण करते ॥१७३॥

आगे समयसार गाथा २७२ की टीका लिखते हुए आचार्य अमृतचन्द्रने ‘आत्माश्रितो निश्चयनयः, पराश्रितो व्यवहारनयः’ इस प्रकार जो निश्चयनय और व्यवहारनयका लक्षण किया है सो उसका भी यही तात्पर्य है। इस विवेचन द्वारा वे यह सूचित कर रहे हैं कि ज्ञायकस्वरूप आत्माको लक्ष्य कर जो विकल्प होता है वह सविकल्प-निश्चयनय है और पर अर्थात् ऐन्द्रियिक सुख-दुख आदिमें निमित्त होनेवाली बाह्य सामग्रीको लक्ष्यकर ‘यह सुख देनेवाली सामग्री है, यह दुख देनेवाली सामग्री है आदिरूप’ जो विकल्प होता है वह व्यवहारनय है। तो ऐसा अध्यवसानरूप व्यवहारनय निश्चयनयका अवलम्बन लेकर त्यागने योग्य है, क्योंकि ऐसे विकल्पके छूटने पर बाह्य सामग्री नियमसे छूट जाती है। सो क्यों? जब कि अपर पक्षके कथनानुसार परिणमनशीलतामात्र उपादानका कार्य है। किसरूप परिणमन हो यह उसका कार्य न होकर बाह्य सामग्रीके आधीन है तो फिर उस बाह्य सामग्रीमें ‘यह सामग्री सुखकर है और यह सामग्री दुखकर है’ आदिरूप अध्यवसानको छोड़नेका उपदेश तीर्थंकरों, गणधरों और आचार्योंने क्यों दिया? और ऐसे अध्यवसान विकल्पको मिथ्या क्यों बतलाया। यदि श्रुतज्ञानो जीव यह जानता है कि ‘मेरा सुख-दुख आदि संसाररूप कार्य और सम्यक्त्वादिरूप मोक्षकार्य कर्म और नोकर्मके आधीन है, इसका कर्ता मैं स्वयं नहीं। मैं उपादान कारण इसलिए कहलाता हूँ कि वे मुझमें मात्र होते हैं। होगा वही, जैसा कर्मोंका उदयादि और बाह्य सामग्री मिलेगी। यदि संसार कार्यका मैं कर्ता होता तो मैं उसे टालनेके उपक्रममें लगता। पर मैं क्या कर सकता हूँ, कर्म और नोकर्म तो इसे मुझमें किये ही जा रहे हैं। क्योंकि एक कालमें कार्य होनेके अनुरूप मुझमें अनेक शक्तियाँ हैं, उनमेंसे कौन शक्ति कार्यरूप परिणमे यह तो बाह्य सामग्रीके आधीन है। इसलिए बाह्य सामग्री ही मुझमें यथार्थ कर्ता है, मैं तो वास्तविक कर्ता हूँ नहीं।’ तो अपर पक्षके कथनानुसार उसका ऐसा जानना यथार्थ ही ठहरता है। तब तो आचार्य कुन्दकुन्दने समयसार गाथा २४७ आदिमें तथा आचार्य अमृतचन्द्रने पूर्वोक्त कलशमें या तत्सम अन्य कलशों व टीकामें उस श्रुतज्ञानीके ऐसे विचारोंको अध्यवसान कह कर जो मिथ्या ठहराया है वह सब कथन अयुक्त ही ठहरता है। फिर तो अपर पक्षके मन्तव्यानुसार यही कहना और मानना युक्त होगा कि जीवमें राग-द्वेष, सुख-दुख, नारक-तिर्यञ्च आदि रूप संसार कार्य तथा सम्यक्त्व, केवलज्ञान आदिरूप मुक्तिकार्य जो भी होता है वह सब कर्मों और बाह्य सामग्रीके अनुसार ही होता है। जीव तो जैसे स्वतन्त्र रूपसे राग-द्वेष आदिरूप संसार कार्यको नहीं कर सकता वैसे ही वह सम्यक्त्वादिरूप मुक्तिकार्यको भी नहीं कर सकता, क्योंकि उसका स्वतःसिद्ध स्वभाव तो मात्र परिणमनक्रिया ही है। वह परिणमनक्रिया किसरूप हो यह सब तो कर्मों और बाह्य सामग्रीके आधीन है। उसे उत्पन्न करना उसका स्वभाव नहीं।

संभव है कि अपर पक्ष यहाँ पर यह तर्क उपस्थित करे कि स्वभावदशामें जैसे परिणमनशीलता जीवका स्वभाव है उसी प्रकार सम्यक्त्वादिको उत्पन्न करना भी उसका स्वभाव है। किन्तु विभाव दशामें मात्र परिणमनशीलता ही उसका स्वभाव है, उसमें राग-द्वेषादिको उत्पन्न करना उसका स्वभाव नहीं। ये तो निमित्तके बलसे उत्पन्न होते हैं। तो उसपर हमारा कहना यह है कि जिस प्रकार अपर पक्षके मतसे जीवकी विभाव दशामें राग-द्वेषादि निमित्तके बलसे उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार अपर पक्षको यह भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसकी विभाव दशामें परिणमन क्रिया भी निमित्तोंके बलसे उत्पन्न होती है। वह जीवका अपना कार्य नहीं, क्योंकि परिणमन क्रिया राग-द्वेषादिरूप परिणामसे अभिन्न होनेके कारण यदि राग-द्वेषादिरूप परिणामका वास्तविक कर्ता अन्य द्रव्यको माना जाता है तो उससे अभिन्न परिणामक्रियाका कर्ता भी दूसरा द्रव्य ही ठहरेगा। और ऐसी अवस्थामें विभावदशामें जीवद्रव्य स्वयं कूटस्थ हो जायगा और अन्तमें उसका अभाव ही मानना पड़ेगा।

यदि अपर पक्षको ‘विभावदशामें जीव द्रव्य स्वयं कूटस्थ है’ ऐसा मानना इष्ट न हो तो उसे आगमके अनुसार अन्तःकरणसे यही स्वीकार कर लेना चाहिए कि जिस प्रकार स्वभावदशामें परिणाम और परिणमनक्रिया दोनों अभिन्न होनेसे उनका वास्तविक कर्ता स्वयं जीव है उस प्रकार विभावदशामें भी वे दोनों अभिन्न होनेके कारण उनका भी वास्तविक कर्ता स्वयं जीव ही है, दूसरा पदार्थ नहीं। यही कारण है कि आचार्य कुन्दकुन्द और आचार्य अमृतचन्द्रने समयसार गाथा ८४ और उसकी टीकामें ‘आत्मा अनेक प्रकारके पुद्गल कर्मको करता है और उसे भोगता है’ इसे लोगोंका अनादिरूढ़ लौकिक व्यवहार बतलाकर गाथा ८५ और उसकी टीका द्वारा उक्त प्रकारके व्यवहारको दोषयुक्त घोषित किया है। उक्त दोनों आचार्य समयसार गाथा १०६ और उसकी टीकामें यह व्यवहार दोषयुक्त होनेसे उपचरित क्यों है इसका स्पष्टीकरण करते हुए लिखते हैं-

जोधेहि कदे जुद्धे राएण कदं ति जंपदे लोगो ।
ववहारेण तह कदं णाणावरणादि जीवेण ॥१०६॥

जिस प्रकार योद्धाओंके द्वारा युद्ध किये जाने पर राजाने युद्ध किया ऐसा लोक (व्यवहारसे) कहते हैं उसी प्रकार जीवने ज्ञानावरणादि कर्मको किया ऐसा व्यवहारसे कहा जाता है ॥१०६॥

यह व्यवहार वास्तविक न होकर उपचरित ही है इसका स्पष्टीकरण इस टीका वचनसे हो जाता है-

यथा युद्धपरिणामेन स्वयं परिणममानैः योधैः कृते युद्धे युद्धपरिणामेन स्वयमपरिणममानस्य राज्ञो राज्ञा किल कृतं युद्धमित्युपचारो न परमार्थः। तथा ज्ञानावरणादि-कर्मपरिणामेन पुद्गलद्रव्येण कृते ज्ञानावरणादिकर्मणि ज्ञानावरणादिकर्मपरिणामेन स्वयमपरिणममानस्यात्मनः किलात्मना कृतं ज्ञानावरणादि कर्मेत्युपचारो न परमार्थः ॥१०६॥

जैसे युद्ध परिणामरूपसे स्वयं परिणमते हुए योद्धाओंके द्वारा युद्ध किये जाने पर युद्ध परिणामसे स्वयं नहीं परिणमनेवाले राजामें ‘राजाने युद्ध किया’ यह उपचार होता है जो परमार्थभूत नहीं है। वैसे ही ज्ञानावरणादि कर्मपरिणामरूपसे स्वयं परिणमते हुए पुद्गल द्रव्यके द्वारा ज्ञानावरणादि कर्म किये जानेपर ज्ञानावरणादि कर्मपरिणामरूपसे स्वयं नहीं परिणमते हुए आत्मामें ‘आत्माने ज्ञानावरणादि कर्म किये’ यह उपचार होता है जो परमार्थभूत नहीं है ॥१०६॥

इस प्रकार उक्त उल्लेखसे जहाँ यह बात स्पष्टरूपसे विदित हो जाती है कि जिस द्रव्यमें जो परिणाम होता है उसे वह द्रव्य स्वयं स्वतंत्ररूपसे कर्ता बनकर (स्वतंत्रः कर्ता १।२।१२५ जैनेन्द्रमहावृत्ति पृ० ४१) करता है। परिणामक्रिया जिस परिणामरूप होती है उस परिणामको कोई दूसरा पदार्थ करे और परिणामक्रियाका कर्ता वह स्वयं बने ऐसा न तो है ही और न ही उक्त उल्लेखसे ज्ञात होता है।

जैनेन्द्रमहावृत्तिके उक्त सूत्रकी टीका करते हुए आचार्य अभयनन्दि लिखते हैं-

स्वतंत्र आत्मप्रधानः। क्रियासिद्धौ स्वतन्त्रो योऽर्थस्तत् कारकं कर्तृसंज्ञं भवति ।

स्वतन्त्र आत्मप्रधान। क्रियाकी सिद्धिमें जो अर्थ स्वतन्त्र है वह कारक कर्तृसंज्ञक होता है।

जैनेन्द्रमहावृत्तिके इस उल्लेखसे भी यही ज्ञात होता है कि प्रत्येक द्रव्य परनिरपेक्ष होकर ही प्रत्येक समयमें अपना कार्य करता है।

इसपर यद्यपि वह शंका की जा सकती है कि कर्ता दो प्रकारके होते हैं-एक निश्चय कर्ता और दूसरा व्यवहार कर्ता। निश्चय कर्ता तो स्वयं वह द्रव्य होता है जिसमें कार्य होता है और व्यवहार कर्ता दूसरा द्रव्य होता है । इन दोनोंकी सम्मिलित क्रियाद्वारा ही प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति होती है, इसलिए जिस प्रकार निश्चय कर्ता यद्यपि कर्ता होता है उसी प्रकार व्यवहार कर्ताको कारयिताके रूपमें यथार्थ कर्ता ही मानना चाहिए । एकको परमार्थभूत माना जाय और दूसरेको अपरमार्थभूत माना जाय यह कथन युक्तियुक्त नहीं है । आचार्य कुन्दकुन्दके समक्ष भी यह प्रश्न उपस्थित था । वे इस प्रश्नका समाधान करते हुए स्वयं क्या लिखते हैं यह उन्हींके शब्दोंमें पढ़िये-

उप्पादेदि करेदि य बंधदि परिणामएदि गिह्नदि य ।
आदा पुग्गलदव्वं ववहारणयस्स वत्तव्वं ॥१०७॥

आत्मा पुद्गल द्रव्यको उत्पन्न करता है, करता है, बाँधता है, परिणमाता है और ग्रहण करता है यह व्यवहारनयका वक्तव्य है ॥१०७॥

इसकी टीका करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

अयं खल्वात्मा न गृह्णाति न परिणमयति नोत्पादयति न करोति न बध्नाति व्याप्यव्यापकभावाभावात् प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च पुद्गलद्रव्यात्मकं कर्म । यत्तु व्याप्यव्यापकभावाभावेऽपि प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च पुद्गलद्रव्यात्मकं कर्म गृह्णाति परिणमयत्युत्पादयति करोति बध्नाति चात्मेति विकल्पः स किलोपचारः ॥१०७॥

जैसे यह आत्मा प्राप्य, विकार्य और निर्वर्त्य पुद्गल द्रव्यस्वरूप कर्मको नियमसे न ग्रहण करता है, न परिणमाता है, न उत्पन्न करता है, न करता है और न बाँधता है; क्योंकि उन दोनोंमें व्याप्य-व्यापक भावका अभाव है । तो भी व्याप्य-व्यापकभावका अभाव होनेपर भी जो यह विकल्प होता है कि आत्मा प्राप्य, विकार्य और निर्वर्त्य पुद्गल द्रव्यात्मक कर्मको ग्रहण करता है, परिणमाता है, उत्पन्न करता है, करता है और बाँधता है वह नियमसे उपचार है ॥१०७॥

यह आगमवचन है । इससे यह स्पष्टरूपसे ज्ञात होता है कि श्रुतज्ञानी जीवको भी यह विकल्प होता है कि कर्मने जीवमें राग-द्वेषादि कार्य किया वह ( विकल्प ) मात्र उपचाररूप ही है । इसका तात्पर्य यह है कि जीवके राग-द्वेषकी उत्पत्तिमें कर्म और नोकर्म व्यवहारसे निमित्तमात्र हैं, इसलिए निमित्त हुए पर द्रव्यको देखकर यह विकल्प होता है और उस विकल्पके अनुसार कहनेमें भी ऐसा ही आता है कि कर्म जीवको संसारी बनाता है, सुख देता है, दुख देता है आदि । किन्तु यह सब कथनमात्र है । आगममें एक द्रव्य दूसरे द्रव्यका कार्य करता है इत्यादि रूपसे जितना भी कथन उपलब्ध होता है वह सब व्यवहारनयकी मुख्यतासे ही किया गया है, इसलिए उसे परमार्थभूत न मानकर यह समझना ही परमार्थभूत है कि प्रत्येक द्रव्यमें त्रैकालिक जितने भी परिणाम कार्य होते हैं उन सबका प्रत्येक द्रव्य स्वयं कर्ता है और वे सब कार्य प्रत्येक द्रव्यके कर्म हैं । ‘सिद्धी दु ण दीसए अण्णा’ ( समयसार गाथा ३११)- दूसरे प्रकारसे कर्ता-कर्मकी सिद्धि नहीं दिखलाई देती । अतएव उपादान कर्ता यथार्थ कर्ता है और निमित्त कर्ता उपचरित कर्ता है यह तथ्य फलित होता है ।

इसी बातको स्पष्ट करते हुए प्रवचनसार गाथा २१ की टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

तथात्मा चात्मपरिणामकर्तृत्वाद् द्रव्यकर्मकर्ताप्युपचारात् ।

तथा आत्मा अपने परिणामका कर्ता होनेसे द्रव्यकर्मका कर्ता उपचारसे है ।

निष्कर्ष रूपमें उक्त पूरे विवेचनका प्रकृतमें सार यह समझना चाहिये कि परिणाम और परिणमन क्रिया परिणामीसे अभिन्न होनेके कारण विवक्षित उपादान हो विवक्षित परिणामका यथार्थ कर्ता होता है। अतएव प्रकृतमें यह मानना युक्तिसंगत नहीं है कि ‘उपादान अनेक योग्यताओंवाला होता है, इसलिए उपादानमें विद्यमान जिस योग्यताके अनुकूल निमित्त सामग्री मिलती है, कार्य वही होता है।’ किन्तु इसके स्थानमें यही मानना उचित है कि विवक्षित पर्याय-शक्तियुक्त द्रव्यशक्ति उपादान होकर विवक्षित कार्यको उत्पन्न करती है और उसमें व्यवहार नयसे निमित्त होनेवाली बाह्य सामग्री भी तदनुकूल रहती है। कारण-जातिके भेदके समान शक्तिभेद भी होना चाहिए तभी कार्यभेद बन सकता है इस तथ्यको स्पष्ट करते हुए प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० १० में कहा है-

यथा च कारणजातिभेदमन्तरेण कार्यभेदो नोत्पद्यते तथा तच्छक्तिभेदमन्तरेण ।

जिस प्रकार कारणजातिके भेदके विना कार्यभेद नहीं बनता उसी प्रकार कार्यरूप होनेवाली शक्ति-भेदके बिना कार्यभेद नहीं बनता ।

इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि प्रत्येक द्रव्यमें प्रति समय जो कार्यभेद दृष्टिगोचर होता है उसका मुख्य कारण उपादानभेद ही है। जैनदर्शनमें कारकसाकल्यको या इन्द्रियवृत्ति आदिको या सन्निकर्षविशेषको प्रमाण न मान कर जो ज्ञानको प्रमाण माना है सो उसका कारण भी यही है। इसी बातको स्पष्ट करते हुए प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० १५ में कहा है-

अस्याः स्वार्थग्रहणशक्तिलक्षणभावेन्द्रियस्वभावायाः यदसन्निधाने कारकान्तरसन्निधानेऽपि यन्नोत्पद्यते तत्तत्कारणकम् ।

स्वार्थग्रहण शक्तिलक्षण भावेन्द्रियस्वभाव जिस योग्यताके असन्निधानमें कारकान्तरके सन्निधान होने पर भी जो नहीं उत्पन्न होता है वह तत्तत्कारणक जानना चाहिए ।

जिस प्रकार जैनदर्शनमें कारकसाकल्य आदिको उपचारसे प्रमाण मान कर भी वास्तवरूपमें प्रमाण ज्ञानको ही स्वीकार किया है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए ।

इसलिए प्रकृतमें निष्कर्षरूपमें यही समझना चाहिए कि-

अत्ता कुणदि सहावं तत्थ गदा पोग्गला सहावेहिं ।
गच्छन्ति कम्मभावं अण्णोण्णावगाहमवगाढा ॥६५॥-पंचास्तिकाय ।

आत्मा अपने भाव ( रागादि भाव ) को करता है, तब वहाँ रहनेवाले पुद्गल अपने भावोंसे, जीवमें अन्योन्य अवगाहरूपसे प्रविष्ट हुए कर्मभावको प्राप्त होते हैं ॥६५॥

इस प्रकार इस विवेचनसे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि उपादान कारण ही वास्तवमें अपने कार्यका नियामक है, बाह्य सामग्री नहीं ।

\२४. दो आगम प्रमाणोंका यथार्थ तात्पर्य

अपर पक्षने इसी प्रसंगसे दो आगमप्रमाण उपस्थित किये हैं। प्रथम प्रमाण स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी २२२ वीं गाथाकी संस्कृत टीकाका वाक्यांश है और दूसरा प्रमाण अष्टसहस्री पृ० १०५ में आया हुआ अष्टशतीका वाक्यांश है। किन्तु इन दोनों प्रमाणोंसे अपर पक्षके अभिप्रायकी पुष्टि कैसे नहीं होती यह बात यहाँ विचारणीय है, जिसका क्रमसे विचार किया जाता है-

उक्त गाथाकी संस्कृत टीकाका वह वचन इस प्रकार है-

····तदेव द्रव्यं पूर्वपर्यायाविष्टं कारणभूतं मणिमन्त्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यं कारणान्तरावैकल्येन उत्तरक्षणे कार्यं निष्पादयत्येव ।

मणि-मन्त्रादिकसे अप्रतिबद्ध सामर्थ्यवाला पूर्व पर्यायाविष्ट कारणभूत वही द्रव्य कारणान्तरोंकी अविकलता होनेके कारण उत्तर क्षणमें कार्यको उत्पन्न करता ही है ।

यह उक्त वचनका शब्दार्थ है । मालूम नहीं कि इस परसे अपर पक्षने यह कैसे फलित कर लिया कि अनन्तर पूर्व पर्यायाविष्ट द्रव्यरूप विवक्षित उपादानके अपने विवक्षित कार्यके सन्मुख होने पर मणि-मन्त्रादिक प्रतिबन्धक कारणोंकी उपस्थिति और कारणान्तरोंकी विकलता सम्भव है । जब कि आ० शुभचन्द्रने ‘मणिमन्त्रादिना अप्रतिबद्धसामर्थ्यं’ इस पदको ‘तदेव द्रव्यं’ इत्यादि पदका विशेषणरूपसे प्रयुक्त कर तथा ‘कारणान्तरावैकल्येन’ पद द्वारा कारणान्तरोंकी अविकलता (पूर्णता) को स्पष्ट शब्दोंमें सूचित कर अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यरूप उपादानको अपने कार्यका नियमसे उत्पादक कहा है । पूरे वाक्यके अन्तमें आया हुआ ‘एव’ पद यही सूचित करता है कि उक्त प्रकारका उपादान अपने कार्यको नियमसे उत्पन्न करता है और जब वह अपने कार्यको उत्पन्न करता है तब प्रतिबन्धक सामग्रीके अभावके साथ कारणान्तरोंकी अविकलता नियमसे होती है ।

उपादान कारणमें कार्यको उत्पन्न करनेकी शक्तिका होना यह उपादान कारणगत योग्यता है और कार्यका उससे जायमान होना यह कार्य (उपादेय) गत योग्यता है, इससे उसका प्रतिनियम होता है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७८ में कहा है-

योग्यता हि कारणस्य कार्योत्पादनशक्तिः, कार्यस्य च कारणजन्यत्वशक्तिस्तस्याः प्रतिनियमः ।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए वहाँ बतलाया है-

शालिबीजांकुरयोश्च भिन्नकालत्वाविशेषेऽपि शालिबीजस्यैव शाल्यंकुरजनने शक्तिर्न यवबीजस्य, तस्य यवांकुरजनने न शालिबीजस्येति ।

शालिबीज और शालि-अंकुरके भिन्न कालवर्ती ( पूर्वोत्तर क्षणवर्ती ) होने पर भी शालिबीजमें ही शालि-अंकुरको उत्पन्न करनेकी शक्ति है, यवबीजमें नहीं । और इसी प्रकार यवबीजमें यव-अंकुरको उत्पन्न करनेकी शक्ति है, शालिबीजमें नहीं ।

इससे इस बातका सम्यक् रीतिसे ज्ञान हो जाता है कि प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें अपने नियत कार्यका ही उपादान कारण है और उससे नियत कार्यको ही जन्म मिलता है । अन्यथा ‘शालिबीज’ और ‘यवबीज’ इस प्रकार पर्यायाविष्ट द्रव्यको उदाहरणरूपमें स्वीकार कर उपादान-उपादेयभावका आचार्य खुलासा नहीं करते ।

अब प्रश्न यह है कि जब विशिष्ट पर्याययुक्त द्रव्य विशिष्ट कार्यको उत्पन्न करता है तब व्यवहारसे उसके अनुकूल बाह्य सामग्रीकी समग्रता रहती है या नहीं ? प्रमेयकमलमार्तण्ड अ० २ सू० १ पृ० २६८ में इस प्रश्नका समाधान इन शब्दोंमें किया है-

यद्यदाविकलकारणं तत्तदा भवत्येव, यथाऽन्त्यक्षणप्राप्तायाः सामग्रीतोऽङ्कुरः, अविकलकारणं चाशेषं कार्यम् ।

जो कार्य अविकल कारणवाला होता है वह तब होता ही है, जैसे अन्त्यक्षण प्राप्त सामग्रीसे अंकुर और अविकल कारणवाले समस्त कार्य होते हैं।

इससे स्पष्ट है कि प्रतिसमयमें सब द्रव्योंका प्रत्येक उपादान अविकल कारणवाला होकर उत्तर क्षणमें अपने सुनिश्चित कार्यको नियमसे जन्म देता है। उक्त उल्लेखमें आया हुआ ‘अन्त्यक्षणप्राप्त’ पद ध्यान देने योग्य है, जो सामग्रीका विशेषण होकर उपादानके उस लक्षणकी पुष्टि करता है जिसके द्वारा अनन्तर पूर्व पर्याय-युक्त द्रव्यको उपादान कहा गया है। अतएव स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी संस्कृत टीकाके आधारसे यही निर्णय करना चाहिए कि अनन्तर पूर्वपर्याययुक्त द्रव्यको सभी शास्त्रकारोंने जो उपादान कहा है वह इसी अपेक्षासे ही कहा है कि प्रत्येक द्रव्यके प्रत्येक समयमें उपादानकी भूमिकामें आते रहनेपर उस-उस उपादानसे उत्पन्न होनेवाले प्रतिनियत कार्यके अनुकूल बाह्य-सामग्रीकी समग्रता रहती ही है। वहाँ न तो कारणान्तरोंकी विकलता होती है और न ही प्रतिबन्धक कारण उपस्थित रहते हैं।

(२) अपर पक्षने अपनी प्रतिशंकाको स्थापित करते हुए अष्टसहस्री पृ० १०५ से लेकर अष्टशतीका जो वचन उद्धृत किया है वह मीमांसकोंद्वारा माने गये वर्णात्मक शब्दोंकी नित्यता और व्यापकताके खण्डनके प्रसङ्गमें आया है। मीमांसा-दर्शन वर्णात्मक शब्दोंका प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव न मानकर भी तात्वादिके द्वारा उनकी अभिव्यक्ति स्वीकार करता है। उस दर्शनका कहना है कि पुरुषव्यापारके पूर्व और बादमें भी शब्दोंके अखंडित स्वभाव होनेपर भी उनका सुनना पुरुषव्यापारसापेक्ष होनेसे वे कभी सुनाई पड़ते हैं और कभी सुनाई नहीं पड़ते। इसपर चर्चा करते हुए मीमांसकोंसे यह पूछा गया कि वे शब्द अपने विषयकी संवित्ति करनेमें समर्थ हैं या असमर्थ? यदि समर्थ हैं तो कारणान्तरोंकी अपेक्षाका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता और यदि असमर्थ हैं तो सहकारी इन्द्रिय-मनोभिव्यञ्जकलक्षण व्यापार उनकी असामर्थ्यका खण्डन करता है या नहीं? इस प्रकार आचार्य विद्यानन्दिने इन दो प्रश्नोंको उपस्थित कर भट्टाकलंकदेवकी अष्टशतीका यह वचन दिया है जिसको अपर पक्षने अपने अभिमतकी पुष्टिमें समझकर प्रकृतमें उसे उद्धृत किया है। वह वचन इस प्रकार है-

तदसामर्थ्यमखण्डयदकिञ्चित्करं किं सहकारिकारणं स्यात्।

उस ( शब्द ) की असामर्थ्यका खण्डन नहीं करता हुआ अकिञ्चित्कर क्या सहकारी कारण हो सकता है?

यह अष्टशतीके उक्त वचनकी पृष्ठभूमि है। इसके प्रकाशमें जब हम जैनदर्शनकी अपेक्षा विचार करते हैं तो हमें मीमांसादर्शनसे जैनदर्शनमें अनेक विशेषताएँ ज्ञात होती हैं-

(१) मीमांसादर्शन शब्दको सर्वथा नित्य मानता है किन्तु जैनदर्शन उसे पुद्गल द्रव्यकी व्यञ्जन पर्याय स्वीकार करता है। इतना ही नहीं, जैनदर्शनने प्रत्येक द्रव्यको सर्वथा नित्य और सर्वथा अनित्य स्वीकार न करके कथंचित् नित्यानित्य स्वीकार किया है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए अष्टसहस्री पृ० २२६ में लिखा है-

द्रव्यस्य पर्यायस्य वा सर्वथैकस्वभावस्य क्रमयौगपद्यादर्शनात्, अनेकपर्यायात्मन एव द्रव्यस्य तदुपलम्भात्।

सर्वथा एक स्वभाववाले द्रव्य या पर्यायमें क्रम-यौगपद्य नहीं देखा जाता, क्योंकि अनेक पर्यायस्वरूप द्रव्यमें ही उसकी उपलब्धि होती है। अष्टसहस्रीके इस उल्लेखसे जहाँ इस बातका पता लगता है कि जिस प्रकार मीमांसादर्शन शब्दको सर्वथा नित्य मानता है उस प्रकार जैनदर्शनने किसी भी पदार्थको सर्वथा नित्य स्वीकार नहीं किया है। वहाँ इस बातका भी पता लगता है कि पदार्थको सर्वथा नित्य या सर्वथा अनित्य स्वीकार करनेपर भी क्रमसे और युगपत् अर्थक्रियाका विरोध आता है, नित्यानित्य स्वीकार करनेपर नहीं।

(२) मीमांसादर्शन शब्दको सर्वथा सदात्मक मानता है, किन्तु जैनदर्शन किसी पदार्थको सर्वथा सत्स्वरूप न मानकर कथंचित् सदसत्स्वरूप स्वीकार करता है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए भट्टाकलंकदेव अष्टशती ( अष्टसहस्री पृ० १४० ) में लिखते हैं-

सप्तभंगीविधौ स्याद्वादे विधि-प्रतिषेधाभ्यां समारूढं वस्तु सदसदात्मकमर्थक्रियाकारि, कथंचित्सित एव सामग्रीसन्निपातिनः स्वभावातिशयोत्पत्तेः, सुवर्णस्येव केयूरादिसंस्थानं।

सप्तभंगी विधिरूप स्याद्वादमें विधि-प्रतिषेध उभयरूप वस्तु सदसदात्मक होकर अर्थक्रियाकारी है, क्योंकि सामग्री प्राप्त कथंचित् सत्में ही स्वर्णमें केयूरादि संस्थानके समान स्वभावातिशय ( पर्याय ) की उत्पत्ति होती है।

(३) मीमांसादर्शन शब्दको सर्वथा नित्य और व्यापक मान कर भी उसकी अभिव्यक्ति ताल्वादि सहकारी सामग्रीसे स्वीकार करता है। जब कि जैनदर्शन प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति अपने उपादानसे ही स्वीकार करता है, क्योंकि जैनदर्शन उपादान कारणसे कार्यको सर्वथा भिन्न न मानकर उपादान-उपादेयकी एक सत्ता स्वीकार करता है। इस तथ्यका स्पष्टीकरण आप्तमीमांसा कारिका ७१ और ७२ तथा उनकी अष्टसहस्री टीकामें विशदरूपसे किया है।

इस प्रकार मीमांसादर्शनमें स्वीकृत शब्दकी क्या व्यवस्था है और जैनदर्शनमें स्वीकृत प्रत्येक पदार्थकी क्या व्यवस्था है इसका यह अतिसंक्षिप्त स्पष्टीकरण है। इसे दृष्टिपथमें लेनेपर यह ज्ञात होनेमें देर नहीं लगती कि भट्टाकलंकदेवने मीमांसादर्शनमें स्वीकृत शब्दकी उक्त प्रकारकी असामर्थ्यका उद्भावन कर और उस असामर्थ्यका सहकारी कारणों द्वारा खण्डन स्वीकार न करने पर मीमांसकोंके ऊपर सहकारी कारणोंकी अकिंचित्करता दोषका आपादन क्यों किया है? क्या जिस प्रकार मीमांसादर्शनने शब्दोंकी सर्वथा नित्यतामें बाधा न आते हुए केवल सहकारी कारणोंसे ध्वनिकी अभिव्यक्ति स्वीकार की है उस प्रकार क्या जैनदर्शन उपादान कारणको सर्वथा नित्य मानता है, जिससे कि उसमें कार्यकी असामर्थ्यको स्वीकार करके सहकारी कारणोंके व्यापार द्वारा उस ( असामर्थ्य ) का खण्डन स्वीकार किया जाय। स्पष्ट है कि मीमांसादर्शनमें स्वीकृत शब्दके स्वरूपको ध्यानमें रखकर भट्टाकलंकदेवने उसके सामने आपत्ति उपस्थित करते हुए उक्त प्रकारके दोषका आपादन किया है जो जैनदर्शनमें स्वीकृत कार्यकारणपरंपरापर अणुमात्र भी लागू नहीं होता, क्योंकि जैनदर्शनके अनुसार प्रत्येक उपादान ऐसी सामर्थ्यवाला स्वीकार किया गया है जिसे वह उत्पन्न करता है और साथ ही जैनदर्शन प्रत्येक द्रव्यको ध्रुवस्वभाव मानकर भी परिणमनशील स्वीकार करता है, अतएव इस दर्शनके अनुसार उपादानमें जब कि कार्यको असामर्थ्य नहीं स्वीकार की गई है ऐसी अवस्थामें सहकारी कारणों द्वारा उस ( असामर्थ्य ) के खण्डनका प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। अतः भट्टाकलंकदेवके द्वारा अष्टशतीमें कहे गये उक्त वचनको ध्यानमें रखकर अपर पक्षद्वारा यह फलित किया जाना उचित नहीं है कि-

‘इस विवेचनसे यह बात भी अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है कि सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होने पर ही होते हैं इस मान्यताके आधार पर आप जो निमित्तोंको अकिंचित्कर मान लेना चाहते हैं वह असंगत है ।’

किन्तु इसके स्थानमें अपर पक्षको पूर्वोक्त प्रमाणोंको ध्यानमें रखकर यही स्वीकार कर लेना चाहिए कि ‘स्वयं प्रत्येक उपादान विवक्षित शक्तिसम्पन्न और परिणामस्वभावी होनेके कारण अपने बलसे अपने-अपने कालमें व्यवहारनयसे बाह्य सामग्रीको निमित्तकर विवक्षित कार्यको जन्म देता है ।’

इसी प्रकार अपर पक्षने स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा २१९ और उसकी संस्कृत टीकाको प्रमाण रूपमें उपस्थितकर अपने प्रतिशंकारूप वक्तव्यके बलपर जो यह निष्कर्ष निकालनेका प्रयत्न किया है कि ‘प्रत्येक उपादान अनेक योग्यतासम्पन्न होता है, अतः कालादि बाह्य सामग्री जब जैसी मिलती है उसके आधारसे उनमेंसे कोई एक योग्यता कार्यरूपसे परिणमन करती है ।’ सो अपर पक्षका ऐसा कथन करना भी आगमसम्मत नहीं है, क्योंकि जैसा कि हम पूर्वमें अष्टसहस्री पृ० १५० का उल्लेख उपस्थित कर आये हैं उससे यह स्पष्ट विदित होता है कि जैसा कार्य होता है उसरूप परिणमनशक्ति लक्षणवाली प्रतिविशिष्ट अन्तःसामग्री ही व्यवहार नयसे बाह्य सामग्रीको निमित्तकर कार्यरूपसे परिणमन करती है । आचार्य विद्यानन्दिने इस वचनमें यह बात स्पष्टरूपसे स्वीकार की है कि प्रत्येक उपादान प्रतिविशिष्ट अन्तःसामग्री सम्पन्न होता है और साथ ही उसरूप परिणमन स्वभाववाला भी होता है, इसीलिए ही वह अपने-अपने कार्य कालमें अपने-अपने कार्यको जन्म देता है । मालूम पड़ता है कि अपर पक्षने स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाके समग्र कथनपर ध्यान नहीं दिया है । तभी वह पक्ष प्रत्येक उपादानको कार्यकारणरूप अनेक शक्तिसम्पन्न मानकर उससे बाह्य सामग्रीके बलपर किसी एक कार्यकी उत्पत्ति माननेका साहस कर रहा है । किन्तु आगमका यह अभिप्राय नहीं है । इसकी पुष्टि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० १५१ के उसी वचनसे हो जाती है जिसका उल्लेख अपर पक्षने अपनी प्रतिशंकामें किया है । उसमें कहा है-

क्रमभुवोः पर्याययोरेकद्रव्यप्रत्यासत्तेरुपादानोपादेयत्वस्य वचनात् ।

क्रमसे होनेवाली दो पर्यायों ( पूर्वोत्तर पर्यायों ) में एक द्रव्यकी प्रत्यासत्ति होनेसे ( अर्थात् एक द्रव्यका अन्वय होनेसे ) उपादान-उपादेयभाव स्वीकार किया गया है ।

इसमें अनन्तरपूर्व और अनन्तर उत्तर दो पर्यायोंमें एक द्रव्यका अन्वय होनेसे उपादान-उपादेयभाव स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार किया गया है । इससे स्पष्ट विदित होता है कि उपादान उसीकी संज्ञा है जिस रूप कार्य होता है । मालूम पड़ता है कि अपर पक्षको उक्त उल्लेखमें ‘द्रव्यप्रत्यासत्तेः’ पदको देखकर यह भ्रम हो गया है कि द्रव्यप्रत्यासत्तिका नाम उपादान है और इस भ्रमके कारण ही उसने यह कल्पना कर ली है कि ‘उपादान अनेक योग्यतावाला होता है, इसलिए बाह्य सामग्रीके अनुसार ही उसमें कार्य होता है ।’ हमें आशा है कि वह अपनी इस मान्यताको बदलकर आगमके अनुसार इस तथ्यको स्वीकार कर लेगा कि ‘जैसा कार्य होता है आगममें वैसी कए योग्यतावाला ही उपादान स्वीकार किया गया है ।’ तभी तो आचार्य प्रभाचन्द्रने प्रमेयकमलमार्तण्ड अध्याय दो सू० ७, पृ० २३७ में यह वचन कहा है-

तत्रापि हि कारणं कार्येऽनुपक्रियमाणं यावत् प्रतिनियतं कार्यमुत्पादयति तावत्सर्वं कस्मान्नोत्पादयतीति चोद्ये योग्यतैव शरणम् ।

कार्य कारणका तो उपकार करता नहीं, फिर भी वह जैसे प्रतिनियत कार्यको उत्पन्न करता है वैसे सब कार्योंको क्यों उत्पन्न नहीं करता ऐसा प्रश्न होनेपर उसका उत्तर देते हुए आचार्य कहते हैं कि योग्यता ही शरण है । यह आगम वचन है। यह अन्यके कार्यमें व्यवहारसे निमित्त होनेवाली बाह्य-सामग्री तथा उपादान कारण दोनोंपर लागू होता है। जैसे-अपर पक्ष उपादान कारणको अनेक योग्यतावाला मानता है वैसे ही उसे व्यवहारसे निमित्त होनेवाली बाह्य-सामग्रीको भी अनेक योग्यतावाला स्वीकार करना पड़ेगा और ऐसी अवस्थामें उसके सामने ‘नियत योग्यतासम्पन्न उपादान कार्यको जन्म देता है और व्यवहारसे तदनुकूल योग्यतासम्पन्न बाह्य-सामग्री उसमें निमित्त होती है।’ इसे स्वीकार किये बिना चारा नहीं रहता। अपर पक्षने चालू प्रतिशंकामें कालप्रत्यासत्तिके रूपमें बाह्य-सामग्रीकी कारणता स्वीकार की है सो वह कालप्रत्यासत्ति क्या वस्तु है इसकी ओर यदि उसका ध्यान जाय तो उसके सामने इसे स्वीकार किये बिना अन्य गति नहीं होगी कि प्रत्येक उपादानका जो अपने कार्यका काल है उस कालमें वह सामग्री जो उसमें निमित्त व्यवहारको प्राप्त होती है नियमसे उपस्थित रहती है। आचार्य अमृतचन्द्रदेवने प्रवचनसार गा० ११३ की टीकामें इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर यह वचन कहा है-

पर्याया हि पर्यायभूताया आत्मव्यतिरेकव्यक्तेः काल एव सत्त्वात्ततोऽन्यकालेषु भवन्त्यसन्त एव।

पर्यायें पर्यायभूत स्वव्यतिरेक व्यक्तिके कालमें ही सत् ( विद्यमान ) होनेसे उससे अन्य कालोंमें असत् ( अविद्यमान ) ही हैं।

इसी तथ्यका समर्थन करते हुए पञ्चास्तिकाय गाथा २१ की टीकामें वे कहते हैं-

यदा तु द्रव्यगुणत्वेन पर्यायमुख्यत्वेन विवक्ष्यते तदा प्रादुर्भवति विनश्यति, सत्पर्यायजातमतिवाहितस्वकालमुच्छिनत्ति, असदुपस्थितस्वकालमुत्पादयति चेति।

किन्तु जब द्रव्यकी गौणता और पर्यायकी मुख्यतासे जीव विवक्षित होता है तब वह उपजता है और विनशता है, जिसका स्वकाल बीत गया है ऐसे सत् ( विद्यमान ) पर्यायसमूहको नष्ट करता है और जिसका स्वकाल उपस्थित हुआ है ऐसे असत् ( अविद्यमान ) पर्यायसमूहको उत्पन्न करता है।

पंचास्तिकायका यह वचन केवल जीव द्रव्यकी कुछ पर्यायोंके लिए नहीं आया है। किन्तु यावद् द्रव्यभावी सभी पर्यायोंके लिए आया है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि एक जीव द्रव्य ही नहीं, किन्तु सभी द्रव्योंकी सभी पर्यायोंका उत्पाद अपने-अपने कालमें ही होता है। आगममें सर्वत्र कार्यमात्रके प्रति जो काललब्धिका विशेषरूपसे उल्लेख दृष्टिगोचर होता है सो उसका कारण यही है। इसके लिए देखो स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा १८८, २१९ और २४४ तथा अन्य आगम साहित्य। सब कार्य स्वकालमें होते हैं इसका क्या तात्पर्य है इसे स्पष्ट करते हुए आचार्य विद्यानन्दि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ९० में लिखते हैं-

न हि स्वाभाविकं निःश्रेयसम्, तत्त्वज्ञानादिकतदुपायानर्थकत्वापत्तेः। नापि स्वकाले स्वयमुत्पत्तिः तस्य युक्ता, तत एव। केचित् संख्यातेन कालेन सेत्स्यन्ति भव्याः, केचिदसंख्यातेन, केचिदनन्तेन। केचिदनन्तानन्तेनापि न सेत्स्यन्तीत्यागमान्निश्रेयसस्य स्वकाले स्वयमुत्पत्तिरिति चेत्? न, आगमस्यैवंपरत्वाभावात्। सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रमात्मीभावे सति संख्यातादिना कालेन सेत्स्यन्तीत्येवमर्थतया तस्य निश्चितत्वात्। दर्शनमोहोपशमादिजन्यत्वाच्च न दर्शनं स्वकालेनैव जन्यते यतः स्वाभाविकं स्यात्।

निःश्रेयस स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि ऐसी अवस्थामें इसके उपायभूत तत्त्वज्ञानादिके अनर्थकपनेका प्रसंग आता है। स्वकालमें स्वयं उत्पत्ति भी उसकी योग्य नहीं है, उसी कारणसे।

शंका-कोई भव्य जीव संख्यात कालद्वारा, कोई असंख्यात कालद्वारा और कोई अनन्त कालद्वारा मोक्ष जायेंगे । किन्तु कोई जीव अनन्तानन्त कालद्वारा भी मोक्ष नही जायेंगे ऐसा आगम होनेसे विदित होता है कि निःश्रेयसकी स्वकालमें स्वयं उत्पत्ति होती है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि आगमका यह आशय नहीं है । कारण कि सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रकी स्वरूपलब्धि होनेपर संख्यातादि कालके द्वारा मोक्ष जायेंगे इस अर्थमें वह आगम निश्चित है । दर्शनमोहके उपशमादिजन्य होनेसे सम्यग्दर्शन मात्र स्वकालजन्य नहीं है, जिससे कि वह स्वाभाविक होवे ।

यह आगमवचन है । तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ३ में भी इसी रूपमें उक्त तथ्यका स्पष्टीकरण उपलब्ध होता है । सो इन सब प्रमाणोंसे यही ज्ञात होता है कि प्रत्येक कार्य स्वकालमें होकर भी कारणसामग्रीसे जायमान होता है । इसलिए सभी कार्योंकी प्रतिनियत कालमें प्रतिनियत सामग्रीसे उत्पत्ति मानना ही योग्य है । स्पष्ट है कि अपर पक्षने स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा २१९ में पठित ‘णाणासत्तीहिं संजुदा’ पदका अर्थ जो अनेक योग्यताओंवाला एक उपादान किया है वह ठीक नहीं है । उस गाथामें ‘अत्था’ पद बहुवचन है और ‘वे सब नानाशक्तिवाले होते हैं ।’ इतना ही कहा गया है । उसमें उपादानकी तो कहीं चरचा भी नहीं की गई है । संस्कृत टीकाकारने भी इसकी चरचा नहीं की है । उसमें तो सामान्यरूपसे इतना ही कहा गया है कि ‘कालादिलब्धिसे युक्त और नाना शक्तियोंसे संयुक्त पदार्थ स्वयं परिणमन करते हुए किसीके द्वारा रोके नहीं जा सकते ।’ फिर नहीं मालूम कि अपर पक्षने ‘उपादान अनेक शक्तिवाला होता है’ यह अर्थ उसमेंसे कैसे फलित कर लिया । इसका हमें ही क्या सभीको आश्चर्य होगा । अतएव प्रकृतमें ऐसा ही समझना चाहिए कि प्रत्येक समयमें प्रत्येक उपादान अपने प्रतिनियत कार्यको उत्पन्न करता है और बाह्य सामग्री उसमें व्यवहार हेतु होती है । स्वामी कार्तिकेयकी उक्त गाथाका एक मात्र यही तात्पर्य है, दूसरा नहीं । उक्त गाथाकी संस्कृत टीकामें भव्यत्वशक्तिसे युक्त जीव ही रत्नत्रयको प्राप्त करते हैं या ओदनशक्तिसे युक्त चावल ही ओदन बनता है इत्यादि कथन भी इसी तथ्यको सिद्ध करनेके लिए किया गया है कि जिस कालमें जिस प्रकारका कार्य होता है उसका उपादानकारण उस प्रकारकी शक्तिसे युक्त होकर उस कालमें उस प्रकारके कार्यको करता है । बाह्य सामग्रीके बलसे कार्य होता है इस प्रकारका कथन तो मूल गाथामें किया ही नहीं है, संस्कृत टीकामें भी इस आशयका वचन उपलब्ध नहीं होता ।

\२५. अनन्तर पूर्वोत्तर दो पर्यायोंमें ही हेतु-फलभाव होता है

अपर पक्षने अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यको उपादान कारण स्वीकार करके भी अपनी इस मान्यताकी पुष्टिके लिए कि ‘यदि विवक्षित कार्यकी प्रतिबन्धक सामग्री हो या कारणान्तरोंकी विकलता हो तो उससे विवक्षित कार्य न होकर अन्य वह कार्य होगा जिसके कारणोंकी वहाँ समग्रता रहेगी’ यह लिखकर प्रत्येक उपादानको अनेक शक्तिवाला स्वीकार कर लिया है और इस प्रकार अनन्तर पूर्व पर्यायमें उपादानताका निषेध कर मात्र द्रव्यप्रत्यासत्तिमें उपादान कारणता स्वीकार करली है । किन्तु प्रत्येक कार्यमें द्रव्यप्रत्यासत्ति है इसका निर्णय कैसे हो इसके लिए उसने बाह्य सामग्रीकी कालप्रत्यासत्तिको स्वीकार कर लिया है । बाह्य सामग्रीके साथ कार्यकी कालप्रत्यासत्ति है इसका निर्णय कैसे हो इसके लिए 'जिसके बाद जो कार्य होता है वह उसका कारण है, इसे कालप्रत्यासत्तिका नियामक मान लिया है । इस प्रकार अपर पक्षके पूरे कथन पर दृष्टिपात करनेसे विदित तो यही होता है कि द्रव्यमें अपने सब कार्योंको करनेकी शक्तियाँ सदा विद्यमान हैं किन्तु जब जैसी कार्यके अनुकूल बाह्य सामग्री मिलती है तब वह कार्य होता है । अपर पक्षने अपनी प्रकृत प्रतिशंकामें अपने अभिप्रायकी पुष्टिमें जो पाँच तर्कणाएँ प्रस्तुत की हैं उनका भी यही अभिप्राय है । प्रत्येक द्रव्यमें अतीत, वर्तमान और भविष्यरूप जितने भी कार्य हुए, होते हैं और होंगे वे सब शक्तियाँ सदा विद्यमान हैं इस तथ्यको तो अपर पक्ष अस्वीकार कर नहीं सकता, क्योंकि प्रत्येक द्रव्य त्रैकालिक पर्यायोंका समुच्चय है इसे आगम ही स्वीकार करता है । आप्तमीमांसामें कहा भी है-

नयोपनयैकान्तानां त्रिकालानां समुच्चयः ।
अविभ्राड्भावसम्बन्धो द्रव्यमेकमनेकधा ॥१०७॥

नय और उपनयोंके विषयभूत त्रैकालिक पर्यायोंके अपृथक् भावलक्षण सम्बन्धरूप समुदायका नाम द्रव्य है, जो एक और अनेक प्रकारका है ॥१०७॥

इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक द्रव्यमें त्रैकालिक पर्यायें शक्तिरूपमें सदा विद्यमान रहती हैं । अतएव जब कि अपर पक्ष कार्यके अनन्तर पूर्व पर्यायको उपादान कारणरूपसे स्वीकार नहीं करता, ऐसी अवस्थामें सूक्ष्मरूपसे प्रत्येक द्रव्य अनन्तर पूर्व पर्यायकी अ थामें आने पर ही उपादान कारण होता है ऐसा लिखना तो उसका बहानामात्र है । फिर तो उसे यही स्वीकार करना चाहिए कि वास्तवमें द्रव्य सदा उपादान कारण है । किन्तु जब जिस कार्यके अनुकूल बाह्य सामग्री अविकलरूपसे मिलती है तब उसके अनुरू र कार्य होता है । चाहे विवक्षित कार्य हो या अविवक्षित कार्य ही क्यों न हो, होगा वह बाह्य सामग्रीके आधार पर ही । इस प्रकार अपर पक्षके पूरे कथनका आलोडन करनेपर एकमात्र यही तथ्य फलित होता है कि प्रत्येक द्रव्यका जो भी कार्य होता है वह बाह्य सामग्रीके द्वारा ही होता है । प्रत्येक द्रव्यमें अपने सब कार्योंकी योग्यता है इतना ही मात्र उपादानकारणका अर्थ है ।

किन्तु यह सब कथन कैसे असंगत है, आगे इस बातका विचार करते हैं-

(१) प्रकृत विषयको समझनेके लिए सर्व प्रथम तो यह देखना है कि केवल द्रव्यप्रत्यासत्तिमें ही उपादान कारणता है या उसके साथ पर्यायप्रत्यासत्तिका होना आवश्यक है । अनन्तर पर्वोत्तर पर्यायोंमें ही हेतु-फलभाव देखा जाता है, व्यवहित पूर्वोत्तर पर्यायोंमें नहीं इस तथ्यका निर्देश करते हुए श्री लघु अनन्तवीर्य प्रमेयरत्नमाला अ० ३ सू० ५७ में लिखते हैं-

अनन्तरयोरेव पूर्वोत्तरक्षणयोर्हेतु-फलभावस्य दृष्टत्वात्, व्यवहितयोस्तदघटनात् ।

इस उल्लेखमें अव्यवहित पूर्वोत्तर दो पर्यायोंमें उपादान-उपादेयभाव स्वीकार किया गया है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य विद्यानन्दि अष्टसहस्री पृ० १०१ में लिखते हैं-

तत्र ऋजुसूत्रनयार्पणात्तावदुपादेयक्षण एवोपादानस्य प्रध्वंसः ।

वहाँ ऋजुसूत्रनयकी मुख्यतासे तो उपादेयरूप पर्याय ही उपादानका प्रध्वंस है ।

इस प्रकार इस कथनसे भी यही प्रमाणित होता है कि अव्यवहित पूर्व पर्याय उपादान है और अव्यवहित उत्तर पर्याय उपादेय है ।

यह हम मानते हैं कि आगममें द्रव्यप्रत्यासत्तिका भी उपादान कारणरूपसे निर्देश किया गया है सो उसका तात्पर्य यह है कि ये अव्यवहित पूर्वोत्तर पर्याय एक ही द्रव्यकी होनी चाहिए, तभी उनमें उपादान-उपादेयभाव बन सकता है । इस प्रकार आगमके बलसे यह सिद्ध हुआ कि असाधारण द्रव्यप्रत्यासत्ति और अव्यवहित पूर्व पर्यायप्रत्यासत्ति ये दोनों मिल कर ही उपादानकारण कहलाते हैं । अतएव अपर पक्षने जो केवल द्रव्यप्रत्यासत्तिको उगादान कारण स्वीकार किया है वह ठीक नहीं है ।

(२) अपर पक्षने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० १५१ के-

यदनन्तरं हि यदवश्यं भवति तत्तस्य सहकारिकारणमितरत्कार्यमिति प्रतीतम् ।

सम्भवतः इस वचनको देखकर यह मत बनाया है कि सहकारी सामग्री ही कार्यकी नियामक होती है । किन्तु जब बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता प्रत्येक कार्यमें होती है । ऐसी अवस्थामें केवल व्यवहार हेतुके बल पर कार्यका उसे नियामक मानना उचित नहीं है । वस्तुतः कार्यका नियामक उपादान-कारण ही होता है, क्योंकि उसका परिणाम ही उपादेय है । इस बातको स्पष्ट करते हुए अष्टसहस्री पृ० १०१ में लिखा है-

यद्भावे एव यस्यात्मलाभस्तदुपादानमितरदुपादेयमिति चेत् ? तर्हि प्रागभावे कारणात्मनि पूर्वक्षणवर्तिनि सति प्रध्वंसस्य कार्यात्मनः स्वरूपलाभोपपत्तेरुपादानोपादेयभावोऽस्तु ।

जिसके होने पर ही जिसका आत्मलाभ होता है वह उपादान है और दूसरा उपादेय है, यदि इसे स्वीकार करते हो तो पूर्व क्षणवर्ती कारणस्वरूप प्रागभावके होने पर कार्यस्वरूपप्रध्वंसका स्वरूपलाभ बनता है, इसलिए उनमें उपादान-उपादेयभाव रहे ।

आगममें यह उपादान-उपादेयभावकी व्यवस्था है, निमित्त-नैमित्तिकभावकी व्यवस्था उससे जुड़ी हुई है, क्योंकि जो उपादेय है वही बाह्य सामग्रीको अपेक्षा नैमित्तिक व्यवहारपदवीको प्राप्त है और जो बाह्य सामग्री है वही उपादानकी अपेक्षा बाह्य व्याप्तिवश निमित्त संज्ञाको प्राप्त होती है । जहाँ प्रतिबंधक सामग्री या कारणान्तरोंकी विकलता अपर पक्षने स्वीकार की है वहाँ वह विवक्षित कार्यकी अपेक्षा ही उसे स्वीकार कर रहा है । उस समय वहाँ होनेवाले कार्यकी अपेक्षा नहीं । सो विवक्षा तो मनमें होती है । विवक्षाके अनुसार कोई कार्य होना ही चाहिए ऐसा कोई नियम नहीं है । कार्य तो अपने उपादानके अनुसार उसकी नियत बाह्य सामग्रीको निमित्तकर वस्तुमें होता है । अतएव विवक्षित कार्यकी अपेक्षा यदि वहाँ पर प्रतिबन्धक सामग्री या कारणान्तरोंकी विकलता या दोनों हैं तो इससे क्या ? क्या इससे कार्य-कारणपरंपराके अनुसार उस समय होनेवाले कार्यके ऊपर किसी प्रकारकी आँच आना सम्भव है अर्थात् त्रिकालमें आना संभव नहीं है । जिसे अपर पक्ष विवक्षित कार्यकी अपेक्षा प्रतिबन्धक सामग्री या कारणान्तरों की विकलता लिखा रहा है, बहुत सम्भव है कि उस समय होनेवाले कार्यकी अपेक्षा वह उसकी व्यवहारनयसे सहायक बाह्य सामग्री हो ।

आगममें उपादान कारणका तीन प्रकारसे विचार किया है-पर्यायविशेषकी अपेक्षा, द्रव्य (सामान्य) की अपेक्षा और अनन्तर पूर्वपर्याय युक्त द्रव्यकी अपेक्षा । पर्यायकी अपेक्षा विचार करते हुए कार्यकी अव्यवहित पूर्व पर्यायको उपादान कहा है, द्रव्यकी अपेक्षा विचार करते हुए मृदादि द्रव्यको उपादान कहा है और द्रव्य-पर्यायात्मक वस्तुकी अपेक्षा विचार करते हुए कार्यके अव्यवहित पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यको उपादान कहा है । इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि प्रत्येक उपादान अनेक योग्यताओंवाला न होकर नियत पर्यायशक्ति युक्त द्रव्य ही होता है । अतएव उससे तदनन्तर समयमें प्रतिनियत कार्यको ही जन्म मिलता है और जब वह प्रतिनियत कार्यकी उत्पत्तिके सन्मुख होता है तो प्रतिनियत पर्याययुक्त बाह्य सामग्री ही उसमें निमित्त होती है, इसलिए अपर पक्षने अपनी प्रतिशंकामें क, ख आदि विभाग द्वारा जिन पाँच निष्कर्षोंका निर्देश किया है उन्हें कल्पनामात्र ही जानना चाहिए, क्योंकि कार्यकी उत्पत्ति विवक्षामें नहीं हुआ करती, उसकी उत्पत्ति तो वस्तुमें होती है । अतः प्रतिनियत कार्यके प्रतिनियत उपादानको गौणकर और विवक्षामें आये हुए कार्यको मुख्यकर कुछ भी तर्कणाऐं क्यों न की जाऐं, उनसे क्या ? वे सब तर्कणाऐं प्रतिनियत उपादानकी कसौटी पर कसने पर सब व्यर्थ ठहर जाती हैं ।

जैसा कि अपर पक्षने क, ख आदि विभागों द्वारा अपने पक्षको उपस्थित करते हुए हमारे मतके रूपमें यह संकेत किया है कि ‘हम स्वकालको उपादान कारण मानते हैं’ सो अपर पक्षका ऐसा लिखना कल्पनामात्र है, क्योंकि हमने स्वकालको कहीं भी क्षणिक उपादान नहीं लिखा है । हाँ यदि स्वकालका अर्थ उस-उस द्रव्यकी पर्याय लिया जाता है तो उसे उपादानरूपसे स्वीकार करनेमें कोई आपत्ति भी नहीं है, क्योंकि ऋजुसूत्र नयकी अपेक्षा अनन्तर पूर्व पर्यायको ही उपादान कहा है । प्रमाण दृष्टिसे अवश्य ही अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्य उपादान ठहरेगा । ये उपादानके निश्चय-परमार्थभूत लक्षण हैं । व्यवहारनयसे अवश्य ही निश्चय उपादानसे पूर्व वही द्रव्य व्यवहार उपादान कहलाता है और ऐसे उपादानको विवक्षितकर यदि अपर पक्ष क, ख आदि विभाग द्वारा निष्कर्षरूपमें अपनी तर्कणाऐं प्रस्तुत करता है तो उनसे हमें कुछ भी लेना देना नहीं है, क्योंकि आचार्योंने भी व्यवहार उपादानकी अपेक्षा कार्यके अनियमका विधान अनेक स्थलोंपर किया है । किन्तु परमार्थभूत उपादान पर ये तर्कणाऐं लागू नहीं होतीं । वहाँ तो एक मात्र यही कहा जाएगा कि प्रतिनियत जिस कार्यका वह उपादान है अपने स्वकालमें वह उसीको जन्म देगा । इसके लिए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६८ का-

तत एवोपादानस्य लाभे नोत्तरस्य नियतो लाभः

आदि आगम वचन और पृ० ७१ का-

द्वयादिसिद्धक्षणैः सहायोगिकेवलिचरमसमयर्वातनो

इत्यादि आगम वचन पढ़ लीजिए । उससे सब स्थिति स्पष्ट हो जायगी ।

इन उल्लेखोंसे साफ जाहिर होता है कि व्यवहारसे उपादान संज्ञाको प्राप्त वस्तुके रहनेपर बाह्य-सामग्रीकी अनुकूलता और प्रतिकूलताकी अपेक्षा चाहे जितनी तर्कणाऐं प्रस्तुत की जा सकती हैं । न्यायके ग्रन्थोंमें उपादान कारणगत सामर्थ्यकी प्रतिबंधक सामग्री और कारणान्तरोंकी विकलताका निर्देश इसी आधारपर किया गया है, निश्चय उपादानको ध्यानमें रखकर नहीं । यह परीक्षामुख अध्याय ३ सूत्र ६० की टीका प्रमेयकमलमार्तण्डसे स्पष्ट ज्ञात होता है । यदि अपर पक्ष निश्चय उपादानको व्यवहार उपादानकी पंक्तिसे पृथक् रखकर व्यवहार उपादानकी अपेक्षा अपनी प्रतिशंका प्रस्तुत करता तो हम भी ‘ओम्’ लिखकर व्यवहार नयसे उसे स्वीकार कर लेते । किन्तु उसकी ओरसे तो निश्चय उपादानको ही असमर्थ उपादान बनानेका अश्लाघ्य प्रयत्न किया जा रहा है जो अवश्य ही चिन्ताका विषय है । इस प्रसंगमें अपने पूर्वोक्त समग्र कथनकी पुनरावृत्ति करते हुए अपर पक्षने जो हमें उपदेश देनेका प्रयत्न किया है सो इस सम्बन्धमें हम उससे इतना ही निवेदन कर देना पर्याप्त समझते हैं कि उस पक्षका पुरुषार्थके नामपर अपने उपादानको भूलकर बाह्य-सामग्रीकी कार्य-कारिताके समर्थनमें इतना अधिक उलझ जाना उचित नहीं है । कारण कि उसके इस आचरणके फलस्वरूप स्वावलंबनके मूर्तरूप सच्चे मोक्षमार्गकी गतिके रुद्ध हो जानेकी अधिक सम्भावना है । -देखो प्रवचनसार गाथा १६ की सूरिकृत टीकाका अन्तिम भाग ।

इस प्रकार स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी २२२ वीं गाथाकी संस्कृत टीकाका तथा अष्टसहस्री पृ० १०५ के ‘तदसामर्थ्य’-इत्यादि वचनका और इनके उल्लेखके साथ प्रस्तुत प्रतिशंकामें उपस्थित की गई अन्य सामग्रीका सप्रमाण विचार किया ।

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ५/८)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ३१० से ३२५

↑ सूची


\२६. आगमिक अन्य दो प्रमाणोंका यथार्थ तात्पर्य

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० १ पृ० ७७ के अपने पक्षका समर्थन करनेवाले जानकर दो प्रमाण उपस्थित किये हैं। प्रथम प्रमाण है-

कारणस्याप्रतिबन्धस्य स्वकार्यजनकत्वप्रतीतेः ।

प्रतिबन्धरहित कारण ही अपने कार्यका जनक प्रतीत होता है।

सो प्रकृतमें देखना यह है कि आचार्य विद्यानन्दिने यह कथन निश्चय उपादानको लक्ष्यमें रखकर किया है या व्यवहार उपादानको लक्ष्यमें रखकर किया है। आगे इसी बातका विचार करते हैं-

कोई जिज्ञासु शंका करता है कि जब सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञानका कारण है तो क्षायिक सम्यग्दर्शन केवलज्ञानको क्यों उत्पन्न नहीं करता ? इसी प्रश्नका समाधान करते हुए आचार्य विद्यानन्दिने निष्कर्षरूपमें उक्त वचन कहा है। क्षायिक सम्यग्दर्शन चौथेसे लेकर सातवें तक किसी एक गुणस्थानमें उत्पन्न होता है और केवलज्ञानकी उत्पत्ति तेरहवें गुणस्थानके प्रथम समयमें होती है। इससे स्पष्ट है कि जब यह जीव १२वें गुणस्थानके अन्तिम समयको प्राप्त होता है तभी वह केवलज्ञानकी उत्पत्तिकी अपेक्षा निश्चय उपादान कारण बनता है, उसके पूर्व नहीं। अतः इसके पूर्व यदि ‘क्षायिक सम्यग्दर्शन, प्रतिबन्धक कारणोंके कारण केवलज्ञानको उत्पन्न करनेमें असमर्थ है।’ यह उत्तर दिया जाता है तो वह युक्तियुक्त है। यहाँपर आचार्य महाराजने प्रतिबन्धक कारणोंसे केवल ज्ञानावरणादि बाह्य-सामग्रीको ग्रहण नहीं किया है। किन्तु उसके साथ उस आत्माको भी ग्रहण किया है जो स्वयं बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समयको प्राप्त होनेके पूर्व केवलज्ञानको उत्पन्न करनेमें असमर्थ है। ‘प्रतिबन्धक कारण’ यह सामान्य निर्देश है। अतः जहाँ इससे केवलज्ञानकार्यके असमर्थ उपादानका ग्रहण होता है वहाँ ऐसी बाह्य-सामग्रीका भी ग्रहण होता है जिसकी बाह्य-व्याप्ति केवलज्ञानकी उत्पत्तिके साथ न होकर उसके पूर्ववर्ती क्षायोपशमिक ज्ञानादिरूप अन्य कार्योंके साथ है। अतः इस उल्लेखद्वारा यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि निश्चय उपादानके अपने कार्यके सन्मुख होनेपर यदि उसकी प्रतिबन्धक सामग्री उपस्थित हो जाय तो जिसका वह समर्थ उपादान कारण है वह कार्य न होकर अन्य कार्य होता है। स्पष्ट है कि यह उल्लेख तो अपर पक्षके अभिमतकी पुष्टिमें सहायक नहीं हो सकता।

दूसरा उल्लेख है-

स्वसामग्र्या विना कार्यं न हि जातुचिदीक्ष्यते ।

अपनी सामग्रीके बिना कभी भी कोई कार्य नहीं देखा जाता।

यह इस उल्लेखका अर्थ है सो इसे तो कोई भी तत्त्वज्ञ स्वीकार करेगा, क्योंकि बाह्य और आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें कार्य होता है यह एकान्त नियम है। किन्तु प्रकृतमें विचार तो यह चल रहा है कि प्रत्येक कार्यकी निश्चय व्यवहारसे उत्पादक आभ्यन्तर और बाह्य सामग्रीकी समग्रता कब होती है ? इसीके उत्तरस्वरूप हमने आगमप्रमाणके बलपर यह सिद्ध कर दिखाया है कि निश्चय उपादानके कार्यके सन्मुख होनेपर उसकी उत्पत्तिमें बाह्य सामग्रीकी समग्रता रहती ही है। इसी बातको ध्यानमें रखकर तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७० में यह वचन कहा है।

विवक्षितस्वकार्यकारणेऽन्त्यक्षणप्राप्तत्वं हि सम्पूर्णं। तच्च न केवलात्प्रागस्ति चारित्रस्य। ततोऽप्यू-

ध्वंसघातिप्रतिध्वंसिकरणोपेतरूपतया सम्पूर्णस्य तस्योदयात् । न च 'यथाख्या पूर्णं चारित्रमिति प्रवचनस्यैवं बाधास्ति, तस्य क्षायिकत्वेन तत्र पूर्णत्वाभिधानात् । आदि ।

विवक्षित अपने कार्यके करनेमें अन्त समयको प्राप्तपनेका नाम ही सम्पूर्ण है । किन्तु वह सम्पूर्णता केवलज्ञानके पूर्व चारित्रमें नहीं है । उसके बाद भी अघातिकर्मोंको प्रध्वंस करनेरूपसे सम्पूर्ण चरित्रका उदय होता है । और इससे ‘यथाख्यात पूर्ण चारित्र है’ इस प्रवचनमें कोई बाधा भी नहीं आती, क्योंकि उसे क्षायिकपनेकी अपेक्षा वहाँ पर पूर्ण कहा है । आदि ।

इससे स्पष्ट है कि अपर पक्षने जो ‘स्वसामग्र्या विना’ इत्यादि दूसरा उल्लेख अपने पक्षका समर्थक जानकर प्रकृतमें उपस्थित किया है सो उससे भी अपर पक्षका समर्थन न होकर हमारे पक्षका ही समर्थन होता है । आशा है कि अपर पक्ष इस दूसरे उल्लेखको भी अपने आगमविरुद्ध अनिश्चित विचारोंको पुष्टिमें न समझकर उससे इष्टार्थको समझनेकी ही चेष्टा करेगा ।

\२७. टीकांशका पुनः खुलासा

हम पहले स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा २३० में आये हुए ‘णियमा’ पदका क्या तात्पर्य है इसका स्पष्टीकरण कर ही आये हैं । इसी प्रकार गाथा २२२ की टीकामें ‘मणिमन्त्रादिना’ इत्यादि वाक्यांशका भी खुलासा कर आये हैं । परन्तु इन दोनोंकी चरचा अपर पक्षने पुनः की है । सो प्रकृतमें इतना ही स्पष्टीकरण पर्याप्त है कि गाथा २३० में ‘णियमा’ पद भी निश्चय उपादान और उसके कार्यका नियम करनेके लिए आया है । तथा टीकाका उक्त वाक्यांश भी नियम करनेके लिए आया है । वह नियम इस प्रकार है कि तीनों कालोंके समयप्रमाण जितने भी निश्चय उपादान हैं वे सब अपने-अपने समयमें अपने-अपने कार्यके लिए व्यापारवान् होने पर मणि-मन्त्रादिकसे अप्रतिबद्ध सामर्थ्यवाले होते हैं और उनसे जायमान प्रत्येक कार्यमें कारणान्तरोंकी अविकलता भी रहती है । आशय यह है कि अन्त्यक्षण प्राप्त बाह्य-आभ्यन्तर सामग्री सम्पूर्ण ही होती है, न्यूनाधिक नहीं । और इस प्रकार उससे उत्पन्न होनेवाले कार्यमें कोई बाधा नहीं आती ।

यह ठीक है कि टीकाके इस वाक्यांशद्वारा सामान्यतया बाह्य सामग्री पर प्रकाश डाला गया है । पर इस द्वारा यही तो बतलाया गया है कि जब उपादान अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्य होता है तब कार्यकी बाह्य सामग्री भी परिपूर्ण होती है । ऐसी बाह्य सामग्री नहीं होती जिसे व्यवहारनयसे निश्चय उपादानकी सामर्थ्यको रोकनेवाला माना जा सके या निश्चय उपादानसे जायमान कार्यमें बाह्य सामग्रीकी विकलताकी कल्पना भी की जा सके । अन्यथा ‘मणिमन्त्रादिना’ पदके पूर्व ‘यदि’ पद अवश्य दिया गया होता । स्पष्ट है कि गाथा २३० में आया हुआ ‘णियमा’ पद और उक्त टीकांश भी अपर पक्षके अभिमतका अणुमात्र भी समर्थन नहीं करता ।

\२८. अन्य दो प्रमाण तथा उनका खुलासा

आगे अपर पक्षने हमारे द्वारा पिछले उत्तरोंमें दिये गये तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० १०१ और पृ० ७१ के दो प्रमाण उपस्थित कर यह तो स्वीकार कर लिया है कि वे समर्थ उपादानका ज्ञान करानेके लिए आये हैं । किन्तु वह साथमें निश्चय उपादानके समर्थ उपादान और असमर्थ उपादान ऐसे दो भेद करके अपनी कल्पित मान्यताको दुहरानेके प्रयत्नमें ही लगा हुआ है । उक्त दोनों प्रमाणोंमेंसे प्रथम प्रमाण द्वारा तो स्पष्ट शब्दोंमें निश्चय उपादानका जो लक्षण आगममें सर्वत्र आता है, न केवल उसका समर्थन किया गया है, अपितु उसमें मात्र ऐसी योग्यता मानी गई है जो एक मात्र मोक्षरूप कार्यकी ही उत्पादक है और साथ ही इसे निश्चय उपादान कहा गया है । समर्थ उपादानके स्वरूपपर प्रकाश डालनेवाला इससे और अच्छा उदाहरण नहीं हो सकता ।

तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकका दूसरा प्रमाण भी उसी तथ्यकी पुष्टि करता है । इसमें अयोगकेवलीके अन्तिम समय स्थित रत्नत्रयविशिष्ट आत्मा प्रथम समयमें होनेवाली सिद्ध पर्यायको ही क्यों उत्पन्न करता है, द्वितीयादि समयमें होनेवाली सिद्ध पर्यायको क्यों नहीं उत्पन्न कर सकता इसे अग्नि और धूमका उदाहरण देकर सुस्पष्ट शब्दोंमें समझाया गया है । इस उदाहरणमें भी यही बतलाया गया है कि अग्नि प्रथम धूमक्षणको ही उत्पन्न करती है, द्वितीयादि धूमक्षणको नहीं अतएव वह उसका समर्थ उपादान कारण है और साथ ही यह भी सूचना की है कि यदि उपादानको अपने कार्यको उत्पन्न करनेवाला नहीं स्वीकार किया जाता है तो बेचारी कार्य-कारणताकी व्यवस्था ही नहीं बन सकती । इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि अन्त्यक्षण प्राप्त प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें समर्थ उपादान ही होता है और वह अनेक योग्यताओंवाला न होकर एक मात्र ऐसी योग्यतावाला होता है जिससे उसी कार्यको जन्म मिलता है जिस प्रकारकी योग्यता उस उपादानमें होती है ।

इस प्रकार इन दोनों उद्धरणोंसे एकमात्र यही सिद्ध होता है कि सभी द्रव्योंकी सभी पर्यायें नियत-क्रमसे ही होती हैं । आगममें उपादान कारणका जो लक्षण दिया है उसे सभी आचार्योंने एक स्वरसे स्वीकार किया है । वह लक्षण कहीं पर समर्थ उपादान कारणको सूचित करता है और कहीं पर असमर्थ उपादान कारणको भी सूचित करता है, आगममें इस आशयका निर्देश कहीं पर अभी तक हमारे देखनेमें नहीं आया है और न ही अपर पक्षकी ओरसे ऐसा एक भी पुष्ट आगम प्रमाण उपस्थित किया गया है जिससे यह ज्ञात किया जा सके कि इसे समर्थ उपादान कारणका लक्षण नहीं समझना चाहिए । शास्त्रीय चर्चा शास्त्रीय प्रमाणोंके आधार पर ही सफल हो सकती है । हम तो आशा करते थे कि अपर पक्ष अपने अभिमतकी पुष्टिमें कोई प्रबल शास्त्रीय प्रमाण उपस्थित करेगा । किन्तु उसकी ओरसे अभी तक ऐसा एक भी प्रमाण उपस्थित नहीं किया जा सका इसका हमें आश्चर्य है । अतएव उक्त दोनों प्रमाणोंको हमारे आशयकी पुष्टिमें समर्थ प्रमाण ही समझना चाहिए । स्वामी कार्तिकेयकी एक-एक गाथा इस आशयकी स्पष्ट शब्दोंमें घोषणा करती है । तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकका भी यही अभिप्राय है और यदि अष्टसहस्रीको दृष्टिपथमें लिया जाय तो उसमें भी कार्य-कारणभावकी व्यवस्था उपादानके उक्त लक्षणके आधार पर ही की गई है ।

\२९. अन्य दो उल्लेखोंका स्पष्टीकरण

आगे अपर पक्षने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७९ का एक उद्धरण उपस्थित किया है । उस उद्धरणमें बतलाया तो यही गया है कि जब तक कोई भी द्रव्य किसी भी कार्यकी अनन्तर पूर्व पर्यायकी भूमिकामें नहीं आ जाता तब तक वह उस कार्यका समर्थ उपादान कारण नहीं हो सकता । यद्यपि इस उल्लेखमें कालादि सहकारी साधनोंकी भी चर्चा की गई है और यह बतलाया गया है कि यथाख्यातचारित्र सहकारी विशेषसे अपेक्षित होकर ही मुक्तिको उत्पन्न करनेमें समर्थ होता है सो प्रकृतमें यही विचार करना है कि क्षायिकचारित्र केवलज्ञानके पूर्व मुक्तिकी उत्पत्तिके लिए समर्थ उपादान है या इसके समर्थ उपादान होनेमें स्वयंकी कुछ कमी है ? दूसरा यह विचार करना है कि वह कालादि सामग्री क्या वस्तु है जिसके बिना केवल मोहक्षय मुक्तिको उत्पन्न करनेमें असमर्थ है ? ये दो प्रश्न हैं जिनका यहाँ क्रमसे विचार करना है-

(१) उपादान-उपादेयका विचार करते हुए आचार्य विद्यानन्दि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६८ में लिखते हैं-

दर्शनपरिणामपरिणतो ह्यात्मा दर्शनं । तदुपादानं विशिष्टज्ञानपरिणामस्य निष्पत्तेः, पर्यायमात्रस्य निरन्वयस्य जीवादिद्रव्यमात्रस्य च सर्वथोपादानत्वायोगात् कूर्मरोमादिवत् । तत्र नश्यत्येव दर्शनपरिणामे विशिष्टज्ञानात्मतयात्मा परिणमते, विशिष्टज्ञानासहचरितेन रूपेण दर्शनस्य विनाशात्तत्सहचरितेन रूपेणोत्पादात् । अन्यथा विशिष्टज्ञानसहचरितरूपतयोत्पत्तिविरोधात् पूर्ववत् । तथा दर्शनज्ञानपरिणतो जीवो दर्शनज्ञाने, ते चारित्रस्योपादानम्, पर्यायविशेषात्मकस्य द्रव्यस्योपादानत्वप्रतीतेः घटपरिणमनसमर्थपर्यायात्मकमृद्द्रव्यस्य घटोपादानत्ववत् । तत्र नश्यतोरेव दर्शनज्ञानपरिणामयोरात्मा चारित्रपरिणाममियर्ति, चारित्रासहचरितेन रूपेण तयोर्विनाशाच्चारित्रसहचरितेनोत्पादात् । अन्यथा पूर्ववच्चारित्रासहचरितरूपत्वप्रसंगात् । इति कथंचित्पूर्वरूपविनाशस्योत्तरपरिणामोत्पत्त्यविशिष्टत्वात् सत्यमुपादानोपमर्दनेनोपादेयस्य भवनं । न चैवं सकृद्दर्शनादित्रयस्य सम्भवो विरुद्ध्यते, चारित्रकाले दर्शनज्ञानयोः सर्वथा विनाशाभावात् । एतेन सकृद्दर्शनज्ञानद्वयसम्भवोऽपि क्वचिन्न विरुध्यते इत्युक्तं वेदितव्यम्, विशिष्टज्ञानकार्यस्य दर्शनस्य सर्वथा विनाशानुपपत्तेः, कार्यकालमप्राप्नवतः कारणत्वविरोधात् प्रलीनतमवत्, ततः कार्योत्पत्तेरयोगाद्गत्यन्तरासम्भवात् ।

निश्चयसे दर्शनपरिणाम परिणत आत्मा दर्शन है । वह उपादान है, क्योंकि उससे विशिष्ट ज्ञान परिणामकी उत्पत्ति होती है । निरन्वय पर्यायमात्र और जीवादि द्रव्यमात्रको सर्वथा उपादान होनेका अयोग है, कूर्मादिरोमके समान । वहाँ दर्शनपरिणामके नाश होने पर ही आत्मा विशिष्ट ज्ञानरूपसे परिणमता है, क्योंकि विशिष्ट ज्ञानसे असहचरितरूपसे दर्शनका नाश होता है तथा उससे सहचरितरूपसे उसका उत्पाद होता है, अन्यथा पहलेके समान विशिष्ट ज्ञान सहचरितरूपसे उसकी उत्पत्तिका विरोध है । तथा दर्शन-ज्ञानसे परिणत जीव ज्ञान-दर्शन हैं । वे चारित्रके उपादान हैं, क्योंकि पर्यायविशेषस्वरूप द्रव्यमें उपादानत्वकी प्रतीति है, घटपरिणमनमें समर्थ पर्यायात्मक मिट्टी द्रव्यके घटोपादानके समान । वहाँ दर्शन-ज्ञान परिणामके नाश होने पर ही आत्मा चारित्र परिणामको प्राप्त होता है, क्योंकि वहाँ चारित्र असहचरितरूपसे उनका विनाश होता है और चारित्र सहचरितरूपसे उनका उत्पाद होता हैं । अन्यथा पहलेके समान चारित्र असहचरितरूपताका प्रसंग आता है । इस प्रकार कथंचित्पूर्वरूपका विनाश उत्तर परिणामकी उत्पत्तिसे अभिन्न होनेके कारण उपादानके उपमर्दनसे उपादेय उत्पन्न होता है यह सत्य है और इस प्रकार एक साथ दर्शनादित्रयकी उत्पत्ति विरोधको प्राप्त नहीं होती, क्योंकि चारित्रके कालमें दर्शन-ज्ञानके सर्वथा विनाशका अभाव है । इससे एक साथ दर्शन-ज्ञानकी उत्पत्ति भी कहीं पर विरोधको प्राप्त नहीं होती यह कहा गया जान लेना चाहिए, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान है कार्य जिसका ऐसे दर्शनका विनाश नहीं बन सकता । जो कार्यकालको नहीं प्राप्त होता उसमें कारणत्वका विरोध है, अत्यन्त पहले नष्ट हुएके समान, क्योंकि उससे कार्यकी उत्पत्तिका अयोग है, अन्य कोई गति नहीं ।

उपादान-उपादेय भावके ऊपर सर्वाङ्गरूपसे विशेष प्रकाश डालनेवाला यह उल्लेख है । इससे विदित होता है कि-(१) केवल द्रव्य (सामान्य) उपादान नहीं होता, (२) केवल पर्याय उपादान नहीं होता । (३) पर्याय युक्त द्रव्यके उपादान होनेपर भी कार्यका अव्यवहित पूर्व-पर्याययुक्त द्रव्य ही अपने नियत कार्यका उपादान होता है । यह समर्थ उपादानका लक्षण है यह भी इससे स्पष्ट हो जाता है । इसके समर्थनमें आचार्य श्रीने घटरूप परिणामके परिणमनमें समर्थ मिट्टी द्रव्यको घटका उपादान सुस्पष्ट शब्दोंमें सूचित किया है, अतः इससे हम यह भी जान लेते हैं कि प्रत्येक उपादान अनेक योग्यतावाला न होकर प्रतिनियत कार्यकी प्रतिनियत योग्यतावाला ही होता है ।

यह उक्त उल्लेखका आशय है। इसके प्रकाशमें जब हम अपर पक्षके द्वारा प्रस्तुत किये गये पूर्वोक्त उल्लेखपर दृष्टिपात करते हैं तो विदित होता है कि वह उल्लेख 'व्यवहार उपादान कार्यकारी नहीं, किन्तु उसके स्थानमें निश्चय उपादान ही कार्यकारी हैं’ इस तथ्यके समर्थनमें ही आया है।

अपर पक्षका यह लिखना कि ‘सयोगकेवली गुणस्थानके रत्नत्रय और अयोगकेवली गुणस्थानके चरम समयमें विद्यमान रत्नत्रयके स्वरूपमें कोई अन्तर नहीं है’ हमें ऐकान्तिक प्रतीत हुआ। अपर पक्षका यह ऐसा ही लिखना है कि जैसे कोई लिखे कि ‘स्थासरूप मिट्टीमें और कुशूलरूप मिट्टीमें कोई अन्तर नहीं है।’ यदि अपर पक्ष स्थासरूप मिट्टी और कुशूलरूप मिट्टीमें पर्यायभेद मानकर उनमें अन्तर स्वीकार करता है तो प्रकृतमें भी उसे सयोगकेवलीके रत्नत्रयसे अयोगकेवलीके चरम समयमें विद्यमान रत्नत्रयमें पर्यायदृष्टिसे अन्तरको स्वीकार कर निश्चयसे उसे ही सिद्ध पर्यायका उपादान स्वीकार कर लेनेमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

आगममें व्यवहारनयकी मुख्यतासे भी कार्य-कारणका विवेचन उपलब्ध होता है और निश्चयकी की मुख्यतासे भी। उसमें व्यवहारनयसे जो विवेचन किया गया है उसका प्रयोजन सामान्य उपादानका ज्ञान करानामात्र है। ऐसे उपादानको अनेक योग्यतावाला कहनेमें भी आपत्ति नहीं। किन्तु जो निश्चय उपादानका विवेचन है वह ऐसे उपादानको ही सूचित करता है जो प्रतिनियत योग्यतावाला होकर प्रतिनियत कार्यको ही जन्म देता है। स्पष्ट है कि इस उल्लेखसे अपर पक्ष अपने अभिमतकी सिद्धि नहीं कर सकता।

अब रह गया दूसरा प्रश्न जिसमें कालादिसामग्रीके विषयमें सूचना की गई है। अपर पक्षका सम्भवतः यह ख्याल है कि अयोगकेवलीके अन्तिम समयके पूर्व ही रत्नत्रय मोक्ष पर्यायको उत्पन्न करनेमें समर्थ है। मात्र कालादि बाह्य सामग्रीके अभावमें ही वह मोक्षकार्यको उत्पन्न करनेमें असमर्थ हो रहा है। अपने इस पक्षके समर्थनमें उसकी ओरसे तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७० का ‘कालादिसामग्रीको हि’ इत्यादि उल्लेख उपस्थित किया गया है। सो प्रकृतमें वह कालादि सहकारी सामग्री क्या वस्तु है इसका यहाँ विस्तारके साथ विचार करना है। आचार्य विद्यानन्दिने सहकारी सामग्रीमें कालविशेषको स्वीकार करके भी अन्तरंग शक्तिविशेषको भी स्वीकार किया है। वे तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६५ में लिखते हैं-

दंडकपाटप्रतरलोकपूरणक्रियानुमेयोऽपकर्षणपरप्रकृतिसंक्रमणहेतुर्वा भगवतः स्वपरिणामविशेषः शक्तिविशेषः। सोऽन्तरंगः सहकारी निःश्रेयसोत्पत्तौ रत्नत्रयस्य, तदभावे नामाद्यघातिकर्मत्रयस्य निर्जरानुपपत्तेः निःश्रेयसानुत्पत्तेः। आयुषस्तु यथाकालमनुभवादेव निर्जरा, न पुनरुपक्रमात्तस्यानपवर्त्यत्वात्। तदपेक्षं क्षायिकरत्नत्रयं सयोगकेवलिनः प्रथमसमये मुक्तिं न संपादयत्येव, तदा तत्सहकारिणोऽसत्त्वात्।

दंड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण क्रियासे अनुमान होता है कि भगवानका स्वपरिणामविशेषरूप शक्तिविशेष अपकर्षण और परप्रकृति संक्रमणका निमित्त है। वह मोक्षकी उत्पत्तिमें रत्नत्रयका अन्तरंग सहकारी कारण है, क्योंकि उसके अभावमें नामादि तीन अघातिया कर्मोंकी निर्जरा नहीं बन सकती और मोक्षकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। आयुकर्मकी तो यथाकाल अनुभवसे ही निर्जरा होती है, उपक्रमसे नहीं; क्योंकि वह अनपवर्त्य है। इसलिए अन्तरंग सहकारी परिणामविशेषकी अपेचा रखनेवाला क्षायिक रत्नत्रय सयोगकेवलीके प्रथम समयमें मुक्तिको नहीं ही उत्पन्न करता है, क्योंकि उस समय उसके सहकारी कारणका अभाव है।

आचार्य विद्यानन्दिका यह उल्लेख अपनेमें बहुत ही स्पष्ट है। अपर पक्षने अपने कथनमें जहाँ कालविशेषरूप सहकारी सामग्रीका उल्लेखकर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि केवल बाह्य सामग्रीके अभावमें केवलोका क्षायिक रत्नत्रय मुक्तिको उत्पन्न करनेमें असमर्थ है वहाँ इस उल्लेखसे यह सिद्ध होता है कि केवलीके क्षायिक रत्नत्रयमें अन्तरंग सहकारी कारणरूप परिणामविशेषका अभाव होनेसे वह मुक्तिको उत्पन्न करनेमें असमर्थ है। इसलिए इस कथनसे यह सिद्ध हो जाता है कि विशिष्ट पर्याय शक्तियुक्त द्रव्य ही अपने कार्यको करनेमें समर्थ है और साथ ही इससे यह भी सिद्ध होता है कि जब प्रत्येक द्रव्य विशिष्ट शक्तियुक्त होता है तब उसके अनुकूल बाह्य सामग्री मिलती ही है। इस प्रकार प्रत्येक द्रव्यमें प्रत्येक समयमें विशिष्ट बाह्याभ्यन्तर सामग्रीका योग मिलता जाता है और उससे प्रत्येक समयमें विशिष्ट कार्यकी उत्पत्ति होती जाती है।

अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें जो उल्लेख उपस्थित किये हैं उसमें आया हुआ ‘कालविशेष’ पद कालविशेषको तो सूचित करता ही है। साथ ही प्रत्येक द्रव्यकी पर्यायविशेषको भी सूचित करता है, क्योंकि आगममें कालका अर्थ केवल समय ही न करके प्रत्येक द्रव्यकी पर्यायके अर्थमें भी उसका उल्लेख हुआ है। इसके लिए धवला पुस्तक ४ पृ० ३१७ का यह वचन अवलोकनीय है-

दव्वकालजणिदपरिणामो णोआगमभावकालो भण्णदि। पोग्गलादिपरिणामस्स कधं कालववएसो? ण एस दोसो, कज्जे कारणोवयारणिबंधणत्तादो।

द्रव्यकालसे उत्पन्न हुआ परिणाम नोआगमभावकाल कहा जाता है।

शंका-पुद्गलादि द्रव्योंके परिणामकी काल संज्ञा कैसे है?

समाधान-यह कोई दोष नहीं हैं, क्योंकि कार्यमें कारणोपचारनिमित्तक यह संज्ञा है।

प्रत्येक द्रव्यके स्वद्रव्यादिचतुष्टयमें पठित ‘स्वकाल’ शब्द भी प्रत्येक द्रव्यको प्रत्येक पर्यायको सूचित करता है इस तथ्यसे अपर पक्ष अनभिज्ञ हो ऐसी बात नहीं है। सो इससे भी यही सूचित होता है कि प्रकृत उल्लेखमें आया हुआ कालविशेष पद जहाँ बाह्य सामग्रीकी अपेक्षा कालविशेषरूप निमित्तको सूचित करता है वहाँ जीवद्रव्यकी मुक्ति प्राप्तिकी उपादानकारणरूप पर्यायविशेषको भी सूचित करता है।

इस प्रकार पूर्वोक्त आगम प्रमाणोंके प्रकाशमें विचार करने पर यह अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है कि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकका ‘कालादिसामग्रीको हि’ इत्यादि वचन भी व्यवहार उपादानको ध्यानमें रख कर ही लिखा गया है, निश्चय उपादानको ध्यानमें रखकर नहीं। अतएव ‘सब द्रव्योंका प्रत्येक समयका निश्चय उपादान अपने-अपने कार्यकालमें अपने कार्यको नियमसे उत्पन्न करता है और व्यवहारसे उसके अनुकूल विस्रसा या प्रायोगिक बाह्य सामग्री प्रत्येक समयमें नियमसे उपस्थित रहती है।’ एकमात्र इस आगमको निर्विवादरूपसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

\३०. अनवस्था दोषका परिहार

अब प्रतिशंकाके उस भाग पर विचार करते हैं जिसमें ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि वचनको ध्यानमें रख कर जो अनवस्थादोष दिया गया है। अपर पक्षका कहना है कि-

‘जिस प्रकार विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिके लिए भवितव्यताको निमित्तोंका सहयोग अपेक्षित है उसी प्रकार उन निमित्तोंकी प्राप्तिरूप कार्यकी उत्पत्तिके लिए भी अन्य निमित्तोंके सहयोगकी अपेक्षा उसे (भवितव्यताको) नियमसे होगी और फिर उन निमित्तोंकी प्राप्ति भी भवितव्यताको अन्य निमित्तोंके सहयोगसे ही हो सकेगी । इस प्रकार यह प्रक्रिया अनवस्थाकी जनक होनेके कारण कार्योत्पत्तिके विषयमें स्वीकार करनेके अयोग्य है ।’

सो मालूम पड़ता है कि अपर पक्ष स्वयंके द्वारा मानी गई कार्यकारणकी प्रक्रियामें आनेवाले अनवस्था दोषसे बचनेके अभिप्रायसे ही ऐसा लिख रहा है । वस्तुतः यह दोष भवितव्यताको मुख्य मान कर कार्यकी उत्पत्ति स्वीकार करने पर नहीं उपस्थित होता, क्योंकि अपनी अपनी भवितव्यानुसार सभी कार्य अपने अपने कालमें हो रहे हैं और उनका पूर्वोत्तर पर्यायोंकी अपेक्षा परस्पर उपादान-उपोदयभाव तथा अन्वय-व्यतिरेकके नियमानुसार प्राप्त बाह्य सामग्रीके साथ निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध सहज ही बनता जाता है । कार्य-कारणकी इस प्रक्रियामें कोई किसीके आधीन होकर प्रवृत्ति करता है यह प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता । हाँ अपर पक्ष प्रत्येक उपादानको अनेक योग्यतावाला मानकर कार्य-कारणपरम्पराको अनवस्था दोषसे मुक्त नहीं रख सकता, क्योंकि जिस बाह्य सामग्रीको वह कार्यक्षम मानता है वह भी अलग-अलग अनेक योग्यता सम्पन्न होनेसे उनमेंसे किस कार्यके लिए कौन योग्यता निमित्त हो यह उससे भिन्न बाह्य सामग्री पर अवलम्बित रहेगा और तद्भिन्न वह बाह्य सामग्री भी अलग-अलग अनेक योग्यता सम्पन्न होनेसे उनमेंसे भी किसकी कौन योग्यता निमित्त हो यह अन्य बाह्य सामग्री पर अवलम्बित रहेगा । और इस प्रकार सर्वत्र कार्य-कारण परंपरामें अनवस्था दोष आनेके कारण या चक्रक और इतरेतराश्रय दोष आनेके कारण किसी भी बाह्य-आभ्यन्तर सामग्रीसे किसी भी कार्यका उत्पन्न होना अशक्य हो जानेके कारण सभी द्रव्य अर्थक्रियासे शून्य होकर अपरिणामी हो जावेंगे । और अन्तमें उनका अभाव होकर जगत् द्रव्यशून्य हो जायगा । भट्टाकलंकदेव इस तथ्यको जानते थे । तभी तो उन्होंने पिछले पुण्य-पाप और प्रत्येक जीवमें विद्यमान पौरुषरूप परिणमनेकी सामर्थ्यको लक्ष्यमें रखकर पौरुषकी उत्पत्तिका निर्देश करते हुए ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि वचन कहा है । स्वामी समन्तभद्र भी इस तथ्यसे भलीभाँति परिचित थे और यही कारण है कि उन्होंने भी कार्य-कारणके हार्दको जानकर अपने आप्तमीमांसामें ‘दैवादेवार्थसिद्धिः’ (का० ८८) इत्यादि कारिका कही है ।

\३१. बाह्य सामग्रीमें अकिंचित्करपनेका खुलासा

बाह्य सामग्री अन्य द्रव्यके कार्यमें निमित्त होकर भी अकिंचित्कर है इसका यह तात्पर्य है कि एक द्रव्य और उसके गुण पर्यायोंका दूसरे द्रव्य और उसके गुण-पर्यायोंमें अत्यन्ताभाव है । प्रत्येक द्रव्य अपनी-अपनी प्रतिनियत सत्ताके भीतर ही कार्यशील है । कोई भी द्रव्य अपनी प्रतिनियत सत्ताको छोड़कर अन्य द्रव्यकी प्रतिनियत सत्तामें प्रवेश नहीं कर सकता । इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर आचार्य समन्तभद्रने अपनी आप्तमीमांसामें यह वचन कहा है-

सदेव सर्वं को नेच्छेत् स्वरूपादिचतुष्टयात् ।
असदेव विपर्यासान्न चेन्न व्यवतिष्ठते ॥१५॥

स्वरूपादिचतुष्टयकी अपेक्षा सभी पदार्थ सत् ही हैं इसे कौन स्वीकार नहीं करेगा, तथा पररूपादिचतुष्टयकी अपेक्षा सभी पदार्थ असत् ही हैं इसे भी कौन स्वीकार नहीं करेगा । यदि ऐसा न होवे तो प्रत्येक प्रतिनियत पदार्थकी व्यवस्था ही नहीं बन सकती ॥१५॥

आचार्य विद्यानन्दि भी इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए दूसरे शब्दोंमें लिखते हैं-

स्वपररूपोपादानापोहनव्यवस्थापाद्यत्वाद्वस्तुनि वस्तुत्वस्य ।

अपने स्वरूपके उपादान और परके स्वरूपके अपोहनकी व्यवस्था करना ही वस्तुका वस्तुत्व है।

यही कारण है कि अपने गुण-पर्यायों द्वारा एक द्रव्यका दूसरे द्रव्यमें व्यापार होना त्रिकालमें असंभव है, इसलिए तो वाह्य सामग्रीको परं द्रव्यके कार्यमें व्यवहारसे निमित्तरूपसे स्वीकार करके भी वह कर्ता आदिपनेकी दृष्टिसे परद्रव्यका कार्य करनेमें अकिंचित्कर ही है। फिर भी एक द्रव्यके कार्यमें दूसरे द्रव्यकी विवक्षित पर्यायको जो व्यवहारसे निमित्त संज्ञा प्राप्त है उसका कारण उस कार्यके प्रति उसकी व्यवहारनयसे अनुकूलता ही समझनी चाहिये। व्यवहारनयकी अपेक्षा यह अनुकूलता दो प्रकारसे प्राप्त होती है-एक तो बलाधान हेतुरूपसे और दूसरे अनुकूल क्रिया परिणामरूपसे। विशेष खुलासा पूर्वमें कर ही आये हैं। अतः अपर पक्षने प्रकृतमें इस प्रसंगको लेकर जो नाना आपत्तियाँ उपस्थित की हैं वे हमारे कथन पर लागू नहीं होतीं।

\३२. नयोंके विषयका स्पष्टीकरण

प्रकृतमें अपर पक्षने व्यवहारनयके विषयको आरोपित स्वीकार करने पर जो आपत्ति उपस्थित की है वह भी हमारे कथनपर लागू नहीं होती, क्योंकि सब ज्ञान हैं और उनके निश्चय-व्यवहाररूप सब विषय हैं। जीवकी संसार- मुक्त अवस्था है और संसारके बाह्यआभ्यन्तररूप उपचरित-अनुपचरित सब हेतु हैं। इसलिए न तो किसीका अभाव है और न असत् युक्तियोंसे उनका अभाव ही किया जा सकता है। जो जिस रूपमें हैं वे सम्यग्ज्ञान द्वारा उसीरूपमें जाने जाते हैं। बाह्य द्रव्यमें निमित्तता किस रूपमें स्वीकृत है यह भी वह जानता है, असद्भूतव्यवहारनय जैसा कहता है, वस्तु वैसी नहीं है यह भी वह जानता है। जैसे असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा किसीको ‘कमलनयन’ कहते हैं, परन्तु जिसका नाम कमलनयन है वह द्रव्य, गुण और पर्याय इन तीनों रूपसे कमलनयन नहीं है। इसलिए सम्यग्ज्ञानी पुरुष यह जानते हैं कि इसे असद्भूत-व्यवहारनयसे ‘कमलनयन’ कहा जा रहा है, वह परमार्थरूपमें कमलनयन नहीं है। धवला पु० १ पृ० ७४ में नामके दश भेद करके ‘नोगौण्य पद’ का खुलासा करते हुए आचार्य वीरसेन लिखते हैं-

नोगौण्यपदं नाम गुणनिरपेक्षमनन्वर्थमिति यावत् । तद्यथा-चन्द्रस्वामी सूर्यस्वामी इन्द्रगोप इत्यादीनि नामानि।

जिन संज्ञाओंमें गुणोंकी अपेक्षा न हो, अर्थात् जो असार्थक नाम हैं उन्हें नोगौण्य पद नाम कहते हैं। जैसे-चन्द्रस्वामी, सूर्यस्वामी, इन्द्रगोप इत्यादि नाम।

सर्वार्थसिद्धि अध्याय १ सू० ५ में इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य पूज्यपाद लिखते हैं-

अतद्गुणे वस्तुनि संव्यवहारार्थं पुरुषकारान्नियुज्यमानं संज्ञाकर्म नाम।

अतद्गुण वस्तुमें व्यवहारके लिये अपनी इच्छासे की गई संज्ञाको नाम कहते हैं।

यह वस्तुस्थिति है जिसे सभी आचार्योंने मुक्तकण्ठसे स्वीकार किया है, अतएव सम्यग्ज्ञानमें ऐसा स्वीकार करने पर व्यवहारका लोप हो जायगा, अपर पक्षका ऐसा कहना सर्वथा असंगत है। वस्तुस्थिति क्या है और व्यवहार क्या है इतना दिखलाना मात्र निश्चयनय-व्यवहारनयका प्रयोजन है। हमें विश्वास है कि अपर पक्ष इस प्रकार वस्तुस्थितिको समझकर आगममें जहाँ जिस दृष्टिसे प्रतिपादन किया गया है उसे हृदयंगम करेगा। अपनी प्रतिशंकाको उपस्थित करते हुए अपर पक्षने जो अन्य प्रतिशंकाओंमें इस विषयके विशेष विवेचनकी सूचना की है या उनपर दृष्टि डालनेका संकेत किया है सो उन प्रतिशंकाओंका उत्तर लिखते समय वे दृष्टिपथमें आई हैं या आवेंगी ही । वहीं उनपर विशेष विचार किया है या करेंगे।

\३३. समयसारकी ८० वीं गाथाका वास्तविक अर्थ

अपर पक्षने इसी प्रसंगमें सभी वस्तुओंमें परस्पर निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध कैसे बन रहा है और इस आधारसे कहाँ किस प्रकार निश्चित क्रम और अनिश्चित क्रम है इसका अपनी कल्पनाके आधार पर विवेचन करते हुए समयसार गाथा ८० को उपस्थितकर उसके अर्थको बदलनेका भी प्रयास किया है। समयसारकी गाथा है-

जीवपरिणामहेदुं कम्मत्तं पुग्गला परिणमंति।
पुग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो वि परिणमदि ॥८०॥

इस गाथाका सही अर्थ है-

जीवके परिणामोंको निमित्तकर पुद्गल कर्मरूपसे परिणमते हैं और पुद्गल कर्मोंको निमित्तकर जीव भी उसी प्रकार परिणमता है ॥८०॥

इस गाथाकी संस्कृत टीका लिखते हुए आचार्य अमृतचन्द्र कहते हैं-

यतो जीवपरिणामं निमित्तीकृत्य पुद्गलाः कर्मत्वेन परिणमन्ति, पुद्गलकर्म निमित्तीकृत्य जीवोऽपि परिणमति।

इस टीकाका अर्थ वही है जो हमने पूर्वमें किया है। किन्तु अपर पक्षने अपने अभिप्रायको सिद्धि करनेके लिये उक्त गाथाका यह अर्थ किया है-

‘जीवके परिणमनका सहयोग पाकर पुद्गल कर्मरूप परिणत होते हैं और पुद्गलकर्मका सहयोग पाकर जीव भी परिणमनको प्राप्त होते हैं। अतः जीवों और पुद्गलोंके ऐसे परिणमन भी स्व-परप्रत्यय माने गये हैं।’

गाथाके पूर्वार्द्धमें ‘परिणमंति’ और उत्तरार्द्धमें ‘परिणमदि’ पाठ है। आचार्य अमृतचन्द्रने अपनी टीकामें इन क्रियापदोंको इसी रूपमें रखा है। इनका शब्दार्थ हम पूर्वमें दे ही आये हैं। किन्तु अपर पक्षने इन क्रियापदोंका ‘परिणमते हैं’ या ‘परिणमता है’ यह अर्थ न करके इसके स्थानमें क्रमशः ‘परिणत होते हैं’ या ‘परिणमनको प्राप्त होते हैं’ यह अर्थ किया है। यों तो साधारण दृष्टिसे उक्त क्रियापदोंसे व्यक्त होनेवाले अर्थमें और अपर पक्ष द्वारा इन क्रियापदोंके किये गये अर्थमें सामान्य मनुष्यको अन्तर नहीं प्रतीत होगा। किन्तु अपर पक्षने उक्त क्रियापदों द्वारा स्पष्टरूपसे व्यक्त होनेवाला कर्तृपरक अर्थ न करके दूसरा अर्थ सकारण किया है।

बात यह है कि निश्चय और व्यवहारके भेदसे षट्कारक दो प्रकारके आगममें वर्णित हैं। उनमेंसे निश्चय षट्कारक यथार्थ हैं और व्यवहार षट्कारक उपचरित हैं, अर्थात् व्यवहार षट्कारक एक द्रव्यके वास्तविक कर्ता आदि धर्मोंको दूसरे द्रव्य पर आरोपित कर कहे गये हैं। उपचारका प्रयोजन किस द्रव्यकी किस द्रव्यके साथ बाह्य व्याप्ति किस रूपमें है इस द्वारा निश्चय षट्कारकका ज्ञान करानामात्र है। इसके लिए पञ्चास्तिकाय गाथा ५७ से लेकर ६५ तककी गाथाएँ और उनकी आचार्य अमृतचन्द्र कृत टीका अवलोकनीय है। जिनवचन क्या है इसका सम्यक् प्रकारसे विवेचन करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द वहीं पर लिखते हैं-

कुव्वं सगं सहावं अत्ता कत्ता सगस्स भावस्स।
ण हि पोग्गलकम्माणं इदि जिणवयणं मुणेयव्वं ॥६१॥

अपने स्वभाव (पर्याय) को करता हुआ आत्मा अपने भावका कर्ता है, पुद्गलकर्मोंका नहीं, यह जिनवचन जानना चाहिए ॥६१॥

यह उक्त गाथाका अर्थ है । इसी शास्त्रकी गाथा ६२ की संस्कृत टीकामें आचार्य अमृतचन्द्रने कर्म और जीव दोनोंकी अपेक्षा निश्चय षट्कारकका स्पष्ट शब्दोंमें विवेचन किया है । तथा व्यवहार षट्कारक परमार्थभूत क्यों नहीं हैं इसका कर्ताकारककी मुख्यतासे एक वाक्य द्वारा निषेध कर दिया है । वे लिखते हैं-

अतः कर्मणः कर्तुर्नास्ति जीवः कर्ता, जीवस्य कर्तुर्नास्ति कर्म कर्तृ निश्चयेनेति ।

इसलिए निश्चयसे कर्मरूप कर्ताका जीव कर्ता नहीं है तथा जीवरूप कर्ताका कर्म कर्ता नहीं है ।

यहाँ पर यह प्रश्न होता है कि निश्चयसे जीव या कर्म एक दूसरेके कर्ता भले ही न बनें । व्यवहारनयसे तो जीव कर्मका और कर्म जीवका कर्ता है ही और इन दोनोंमें व्यवहारसे रहनेवाला कर्तृत्व धर्म यथार्थ होनेसे इसे उपचरित कहना उचित नहीं है ? आचार्य अमृतचन्द्रने इसी शास्त्रकी गाथा २७ की टीकामें व्यवहारसे जीव कर्मका कर्ता है इस विषयका विशदरूपसे विवेचन किया ही है, इसलिए उसे एकान्तसे अपरमार्थभूत कहना उचित नहीं है । यह एक प्रश्न है । समाधान यह है कि स्वयं आचार्य कुन्दकुन्दने इसी शास्त्रकी गाथा ५८ में इस प्रश्नको उपस्थित कर गाथा ६० में उसका समाधान किया है । वे गाथा ५८ में कहते हैं-

कम्मेण विणा उदयं जीवस्स ण विज्जदे उवसमं वा ।
खइयं खओवसमियं तम्हा भावं कम्मकयं ॥५८॥

कर्मके विना जीवके उदय, उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम नहीं होता, इसलिए भाव (जीवभाव) कर्मकृत हैं ॥५८॥

किन्तु यह कथन यथार्थ क्यों नहीं है इसका विचार करते हुए वे गाथा ६० में लिखते हैं-

भावो कम्मणिमित्तो कम्मं पुण भावकारणं भवदि ।
ण दु तेसिं खलु कत्ता ण विणा भूदा दु कत्तारं ॥६०॥

जीवभावका कर्म निमित्त है और कर्मका जीव निमित्त है, परन्तु एक दूसरेके वास्तविक कर्ता नहीं हैं और वे कर्ताके विना होते हैं ऐसा भी नहीं है ॥६०॥

यहाँपर आचार्य कुन्दकुन्द जीव कर्मका और कर्म जीवका कर्ता है इस व्यवहारका निषेध करते हैं तथा जीव अपने जीवभावका और कर्म अपने कर्मपरिणामका कर्ता है इस निश्चयकी स्थापना करते हैं । सो क्यों ? जिस प्रकार आचार्य महाराज व्यवहार पक्षको उपस्थित कर उसका निषेध करते हुए इसी शास्त्रकी गाथा ५९ में-

ण कुणदि अत्ता किंचि वि मुत्ता अण्णं सगं सहावं ।

और समयसार गाथा २९ में-

‘तं णिच्छए ण जुज्जादि’-

लिखते हैं उस प्रकार उन्होंने पहले निश्चय पक्षको उपस्थित कर क्या कहीं उसका निषेध करते हुए लिखा है कि ‘तं ववहारे ण जुज्जदि ।’ वे व्यवहार नयको प्रतिषेध्य और निश्चयनयको प्रतिषेधक ( समयसार गाथा २७२ में ) क्यों लिखते हैं ? इसका कोई कारण तो होना चाहिए ? अपर पक्षने इस तथ्यका क्या कभी विचार किया है ? यदि वह इसका समीचीन रीतिसे विचार करे तो उसे निश्चयरूप अर्थ सत्यार्थ है और असद्भूत व्यवहाररूप अर्थ उपचरित होनेसे असत्यार्थ है इसे समझनेमें देर न लगे । हाँ, यदि वह निश्चयार्थके समान असद्भूत व्यवहारार्थको परमार्थभूत सिद्ध करनेको ही अपना चरम लक्ष्य मानता हो तो बात दूसरी है ।

दो द्रव्योंके आश्रयसे सभी आचार्योंने सर्वत्र जो यह सरणि अपनाई है सो उसका मूल कारण एक तो यह है कि प्रत्येक द्रव्यका गुण-धर्म दूसरे द्रव्यमें पाया नहीं जाता और दूसरा कारण यह है कि प्रत्येक द्रव्यका गुण-धर्म प्रतिसमय अपने व्यापारमें ही उपयुक्त रहता है, इसलिए यदि हम जीवभावको कर्म परिणाममें या कर्मके उदयको जीवभावमें निमित्तमात्र होता हुआ देखकर यह व्यवहार करते हैं कि जीवने कर्मको किया या कर्मने जीवको किया तो वह वास्तविक न होकर अपरमार्थभूत ही सिद्ध होता है, क्योंकि जीवमें जीवभावका कर्तृत्व धर्म तो है, परन्तु ज्ञानावरणादि कर्मोंका कर्तृत्व-धर्म नहीं है और इसी प्रकार ज्ञानावरणादि कर्मोंमें अपना कर्तृत्व धर्म तो है परन्तु जीवभावका कर्तृत्व धर्म नहीं है । यही कारण है कि व्यवहारनयसे एक द्रव्यको जो दूसरे द्रव्यका कर्ता आदि कहा जाता है वह वास्तविक न होनेसे उपचरित, आरोपित, असत्यार्थ या अपरमार्थभूत कहा जाता है । दूसरोंको चिढ़ानेके लिये हम इन शब्दोंका प्रयोग करते हों ऐसा नहीं है । किसीको चिढ़ानेका उपक्रम करना यह मोक्षमार्गकी प्रक्रियाके विरुद्ध है । यह तो वस्तुस्वरूपका विश्लेषणमात्र है जो युक्तियुक्त होनेसे प्रयोजन वश किया जाता है ।

इतने विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अपर पक्षने समयसार गाथा ८० का जो अर्थ किया है वह केवल व्यवहार कथनको परमार्थभूत ठहरानेके अभिप्रायसे ही किया है ।

साथ ही उस पक्षकी ओरसे इसी प्रसंगमें जो ‘आकाश द्रव्य समस्त वस्तुजातको अपने अन्दर समाये हुए है’ इत्यादि कथन किया है वह भी इसी अभिप्रायसे किया है जो युक्तियुक्त नहीं है । आचार्य पूज्यपाद तो सर्वार्थसिद्धि अध्याय ५ सू० १२ में यह कहें कि ‘धर्मादिक द्रव्योंका आकाश अधिकरण है यह व्यवहारनय से कहा जाता है ।’ और अपर पक्ष उसके स्थानमें यह लिखे कि ‘आकाश द्रव्य समस्त वस्तुजातको अपने अन्दर समाये हुए है ।’ सो यह सब क्या है ? क्या यह जिनागमके विरुद्ध कथन नहीं है ।

इसी प्रकार आचार्य कुन्दकुन्द तो पञ्चास्तिकाय गाथा २४,२५ व १०० में यह कहें कि ‘निमिष, काष्ठा, कला, नाली, दिन-रात, महीना, अयन और संवत्सर आदिरूप व्यवहारकाल जीव और पुद्गलोंके परिणमनसे जाना जाता है’ और इसके स्थानमें अपर पक्ष यह लिखे कि ‘सभी कालद्रव्य अपनेसे सम्बद्ध वस्तुओंकी सत्ताको और उसमें अपने-अपने प्रतिनियत कारणों द्वारा होनेवाले परिणमनोंको समय, आवली, घड़ी, घंटा, दिन, सप्ताह, पक्ष, माह और वर्ष आदिमें बद्ध करके विभाजित करते रहते हैं ।’ सो यह क्या है ? क्या यही जैन संस्कृति है ? इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अपर पक्षने यह या इसी प्रकारका अन्य जितना भी कथन यहाँ पर किया है वह सबका सब इसी प्रकारके अनेक भ्रमोंको लिए हुए है । हमें इसका आश्चर्य नहीं कि उसकी ओरसे इस प्रकारका भ्रमपूर्ण कथन किया गया है । आश्चर्य इस बातका है कि वह इसे जैन संस्कृति घोषित करनेका साहस भी करता है । अस्तु, स्पष्ट है कि उसकी ओरसे व्यवहारनयसे कहे गये निमित्त-नैमित्तिक भावको लेकर अपनी प्रतिशंकामें जो कुछ भी विवेचन किया गया है उसे मात्र भ्रमोत्पादक ही जानना चाहिए ।

आगे अपर पक्षने अपनी प्रतिशंका २ जिन विषयोंको लेकर स्थापित की थी और जिनका सप्रमाण समाधान हम अपने दूसरी बार लिखे गये उत्तरके समय कर आये हैं उन्हीं विषयोंके क्रमसे हमारे द्वारा दिये गये उत्तरको आधार बनाकर जो पुनः प्रतिशंका उपस्थित की गई है उसका विचार उसी क्रमसे करते हैं-

विचारणीय मुख्य विषय ये हैं-१. स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी तीन गाथायें तथा तत्सम्बंधी अन्य सामग्री । २. अकालमें दिव्यध्वनि । ३. निर्जरा तथा मुक्तिका अनियत समय । ४. अनियत गुणपर्याय । ५. क्रम-अक्रमपर्याय । ६. द्रव्यकर्मकी अनियतपर्याय और ७. निमित्त-उपादान कारण ।

इन विषयोंपर अपर पक्षने जो सामान्यरूपसे प्रतिशंकाका कलेवर निर्मित किया है उसका ऊहापोह तो हम कर ही आये हैं । आगे इनके आधारसे जो अपर पक्षका कहना है उस पर विचार करते हैं-

\३४. स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी ३ गाथायें आदि

अपर पक्षने ‘एवं जो णिच्छयदो’ गाथाके जिन पदोंको हमने भिन्न टाईपमें दिया है उस सम्बन्धी हमारे स्पष्टीकरणको उद्धृत कर शुद्ध सम्यग्दृष्टिका खुलासा करते हुए जो पुनः यह लिखा है कि-‘श्रुतज्ञानी सम्यग्दृष्टि केवलज्ञानके विषयकी अपेक्षा उस तत्त्वको यथार्थ मानता है जिसको पूर्वोक्त दो गाथाओंमें प्रतिपादित किया गया है और श्रुतज्ञानके विषयकी अपेक्षा कार्य-कारणभाव पद्धतिको भी यथार्थ मानता है ।’ सो यहाँ यह देखना है कि जिसे अपर पक्ष मात्र श्रुतज्ञानका विषय बतला रहा है वह क्या केवलज्ञानके विषयके बाहर है ? वह कार्य-कारणपद्धति क्या वस्तु है जिसे केवलज्ञान नहीं जानता ? उपादान-उपादेयभावका ही दूसरा नाम कार्य-कारणभाव है जो यथार्थ है । सो यदि उसे केवलज्ञानके विषयके बाहर माना जाता है और इसलिए दिव्यध्वनि द्वारा उसका प्रतिपादन नहीं हुआ है तो उसे स्वीकार करनेवाला जीव सम्यग्दृष्टि और तदनुसार यथार्थ श्रुतज्ञानी कैसे हो सकता है ? वह तो केवल अतत्त्वश्रद्धान और मिथ्याज्ञान ही होगा, अतएव केवलज्ञानके विषयके अनुसार जैसी श्रद्धा हो, सम्यक् श्रुतज्ञानी जीव उसीके अनुसार कार्य-कारणभाव पद्धतिको यथार्थ मानता है, अन्यको नहीं ऐसा यहाँ समझना चाहिये ।

हम ‘णिच्छयदो’ पदको ध्यानमें रखकर यह लिख आये हैं कि निश्चय ( उपादान ) की प्रधानतासे विचार करने पर ज्ञात होता है कि आगममें अकालमृत्यु आदिका निर्देश व्यवहारनय (उपचारनय) की अपेक्षा किया गया है, निश्चयनयकी अपेक्षा नहीं । सो हमारे इस कथन पर अपर पक्षका कहना है कि-‘जितना भी मरण है चाहे वह अकालमरण हो या कालमरण दोनों व्यवहाररूप हैं ।’ सो उस पक्षका ऐसा लिखना ठीक नहीं है, क्योंकि ‘कालमरण’ जीवकी व्ययरूप पर्याय होनेसे पर्यायार्थिक निश्चयनयकी अपेक्षा यथार्थ ही है । हाँ, इसमें बाह्य सामग्रीकी अपेक्षा जो नञार्थकी योजना की गई है वह परसापेक्ष कथन होनेसे अवश्य ही उपचरित है । यही कारण है कि अकालमरणको हमने इस अपेक्षासे व्यवहार (उपचरित) लिखा है ।

अपर पक्षका यह लिखना भी सिद्धान्तविरुद्ध है कि ‘आत्मा स्वभावतः अमर है’ क्योंकि द्रव्यार्थिक दृष्टिसे जैसे आत्मा अमर है वैसे ही पर्यायार्थिक दृष्टिसे वह उत्पाद-व्यय स्वभाववाला भी है । यह दोनों कथन परमार्थभूत हैं । शुद्ध निश्चयनयकी विषयभूत वही वस्तु अंश भेद करने पर सद्भूत व्यवहारनयका भी विषय हो जाती है ।

हमने असद्भूतव्यवहारको उपचरित अवश्य लिखा है और है भी वह उपचरित ही । पर सद्भूत व्यवहारको हमने कहीं भी सर्वथा उपचरित नहीं लिखा, क्योंकि अखण्ड वस्तुमें गुण-पर्यायका सद्भाव वास्तविक है । स्पष्ट है कि हमने अपने पिछले उत्तरमें अकालमृत्युको व्यवहारनयकी अपेक्षा जो उपचरित लिखा है वह आगमसम्मत होनेसे यथार्थ ही लिखा है ।

आगे अपर पक्षने निश्चयनय और व्यवहारनयके जो लक्षण लिखे हैं उनका विशेष विचार हम प्रतिशंका ६ के उत्तरमें करनेवाले हैं, अतः यहाँ हम उनके खण्डनमें न पड़कर इतना ही लिख देना पर्याप्त समझते हैं कि आगममें इन नयोंके इस प्रकारके लक्षण कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होते। इसलिए वे यथार्थ नहीं हैं। हाँ, प्रकृतमें अपर पक्षका अपने कथनका यह आशय हो कि जिस वस्तुका जो गुण-धर्म है उसको उसीका जो नय कहे या जाने वह निश्चयनय है और जो बाह्य सामग्रीके संयोगको देखकर निमित्तादिवश अन्य वस्तुके गुण धर्मको अन्यका कहे या जाने वह व्यवहारनय है तो हमें कोई आपत्ति नहीं है।

आगे अपर पक्षने अपनी बातको रखनेका प्रयास करते हुए अन्तमें ‘सभी कार्य स्वकालमें होते हैं’ इसका विरोध करनेके अभिप्रायसे जो कार्य-कारण पद्धतिको अपनानेकी बात लिखी है सो यह केवल उस पक्षका आग्रहमात्र है, क्योंकि सभी कार्योंका स्वकालमें होना स्वीकार करनेमात्रसे कार्य-कारण पद्धतिके अपनानेमें आगमसे कोई विरोध नहीं आता। हाँ, इससे अपनी अनियन्त्रित वृत्ति ( राग-द्वेष-मोह परिणति ) को निरुद्ध करनेका अवसर अवश्य ही मिलता है। लोकमें जितने भी पदार्थ हैं चाहे वे अशुद्धदशामें हों या शुद्धदशामें उन सभीके कार्य ( उत्पादन-व्यय ) तो कार्य-कारणपद्धतिसे ही हो रहे हैं और होते रहेंगे। अपर पक्ष जब यह मानता ही है कि ‘कुछ कार्य नियत क्रमसे भी होते हैं’ और ऐसा स्वीकार करने पर भी जब कार्य-कारण पद्धतिमें विरोध उपस्थित नहीं होता, ऐसी अवस्थामें सभी कार्योंका नियतक्रमसे होना स्वीकार कर लेने पर कार्य-कारणपद्धतिमें विरोध कैसे उपस्थित हो जाता है इसका वह स्वयं निर्णय करे।

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने समयसार आत्मख्याति टीकासे ‘जइ जिणमयं पवज्जह’ इत्यादि गाथा उद्धृत की है सो वह गाथा निश्चयनय और सद्भूतव्यवहारनयके प्रतिपादनके प्रसंगसे आई है। परन्तु अपर पक्षकी ओरसे वह गाथा किस प्रयोजनसे उपस्थित की गई है इसका विशेष खुलासा उसकी ओरसे न किया जानेके कारण हम यहाँ पर उसके सम्बन्धमें विशेष व्याख्यान करना उचित नहीं समझते।

स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी २१९ वीं गाथा और उसके विषयको स्वीकार करनेसे सभी कार्योंके नियत क्रमसे होनेका खण्डन कैसे हो जाता है यह बुद्धिके बाहर है। जब कि सभी कार्योंके साथ अपने-अपने उपादानकी अन्तर्व्याप्ति और निमित्त संज्ञाको प्राप्त होनेवाली बाह्य सामग्रीके साथ बाह्य व्याप्तिको स्वीकार कर इन दोनोंका आगममें सुमेल बतलाया गया है और इसीलिए आगममें उपचारसे उपकार-अपकारको कर्मकृत कहा गया है। ऐसी अवस्थामें आगमका जो प्रतिपादन है उसे समझकर ही वस्तुका निर्णय करना चाहिये यही मार्ग है। तथ्य यह है कि यह जीव स्वयं अपने शुभ-अशुभ परिणामोंका कर्ता है और वही उनके फलका भोक्ता है। शुभ-अशुभ भावोंको निमित्तकर जो कर्म बंधते हैं वे तो उन भावोंके होनेमें निमित्तमात्र हैं। यही बात उस गाथा द्वारा निष्कर्ष रूपसे सूचित की गई है।

स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी २१९ वीं गाथामें दो बातें स्पष्टरूपसे कही गई हैं-१. प्रत्येक द्रव्य उपादान होकर स्वयं परिणमन करता है, २. और जब वह कार्यरूप परिणमता है तब कालादि सामग्री उसमें निमित्त होती है। इस प्रकार इस गाथा द्वारा नियत क्रमका ही समर्थन होता है, अनिश्चित क्रमका नहीं। कार्य-कारणभावमें मुख्यरूपसे उपादानका और उपचाररूपसे निमित्त कहलानेवाली बाह्य सामग्रीका ग्रहण है यह नहीं भूलना चाहिये। जब कि प्रत्येक कार्यका प्रत्येक समयमें उपादानकारण सुनिश्चित है तो उससे जायमान कार्यके अनुकूल बाह्य सामग्रीका होना भी सुनिश्चित है यह भाव ही इस गाथा द्वारा सूचित किया गया है। प्रत्येक द्रव्य स्वयं कर्ता होकर परिणमता है और व्यवहारसे तदनुकूल बाह्य सामग्री उसमें निमित्त होती है यह व्यवस्था ही जैनदर्शनने कार्य-कारणभावमें स्वीकार की है। विशेष खुलासा पहले ही कर आये हैं।

अपर पक्षका यह लिखना कि 'उक्त गाथामें पठित ‘सयं’ पदके अर्थके साथ ‘कालादिलद्धिजुत्ता’ पदके अर्थका उस अवस्थामें विरोध आता है यदि उस गाथाके आधारसे ‘नियतक्रम’ पक्षका समर्थन किया जाता है, कारण कि यदि ‘सयं’ पदका अर्थ ‘अपने आप’ अर्थात् ‘बिना किसी दूसरे पदार्थकी सहायताके’ ऐसा किया जाता है तो बाह्य सामग्रीको कारणरूपसे स्वीकार करना निष्फल हो जाता है, इसलिये इसका ऐसा अर्थ करना चाहिए कि ‘निमित्त सामग्री सापेक्ष जो भी पदार्थमें परिणमन होता है उसे उसका (पदार्थका) अपना ही परिणमन जानना चाहिये ।’

यह अपर पक्षके वक्तव्यका सार है । सो इस सम्बन्धमें पूछना यह है कि प्रत्येक पदार्थमें परिणमनको करता कौन है-बाह्य सामग्री या उपादान या दोनों ? यदि बाह्य सामग्री करती है तो वह उससे भिन्न रहकर करती है या अभिन्न रहकर करती है ? यदि कहो कि भिन्न रहकर करती है तो बाह्य सामग्रीका कर्तृत्व तो उस (परिणमन)से भिन्न रहा, फिर बाह्य सामग्रीसे भिन्न उपादानमें परिणमन हो कैसे जाता है ? अर्थात् नहीं हो सकता । यदि कहो कि अभिन्न रहकर करती है तो दो या दोसे अधिक द्रव्योंमें एकता प्राप्त होती है जो युक्त नहीं है । दूसरे बाह्य सामग्रीसे उपादानमें परिणमन मानने पर पुरुषार्थकी कथा करना व्यर्थ हो जाता है और द्रव्यके उत्पाद-व्यय स्वभावकी हानिका प्रसंग उपस्थित होता है यह अलग। इसलिए बाह्य सामग्री उपादानमें परिणमन करती है यह कहना तो बनता नहीं ।

यदि कहो कि उपादान और बाह्य सामग्री दोनों मिलकर उपादानमें परिणमन करते हैं तो यह कहना भी नहीं बनता, क्योंकि दोनोंके एक हुए बिना दोनों एक क्रियाके कर्ता नहीं हो सकते और दो द्रव्य मिलकर एक होते नहीं, इसलिए दोनों मिलकर एक परिणमनके कर्ता होते हैं यह कहना भी तर्कसंगत नहीं है ।

यदि कहो कि 'बाह्य सामग्रीके सानिध्यमें प्रत्येक उपादान कारण अपना कार्य करता हैं इसे ही हम 'दोनों मिलकर एक परिणामके कर्ता होते हैं । ऐसा कहते हैं तो स्पष्ट हो गया कि प्रत्येक उपादान स्वयं अपना कार्य करता है और बाह्य सामग्री उसमें यथायोग्य व्यवहारसे निमित्त होती है । अर्थात् स्वभाव-परिणमनमें बलाधानरूपसे व्यवहारहेतु होती है और विभाव परिणमनमें कार्यके अनुकूल व्यापार द्वारा व्यवहार हेतु होती है । हो रहा है सब क्रमानुपाती ही । इसलिए आगममें ऐसे स्थल पर ‘स्वयं’ पदका अर्थ अपने आप ,अपने मेंया अपने द्वारा आदि ही किया गया है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।

यहाँ हमें ‘भो विद्वांसः’ इस पद द्वारा सम्बोधित कर जो यह लिखा है कि ‘हम लोगोंमें से कौन कहता है कि उपादानके अनुसार कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती है । तो फिर क्यों गलत आरोप आप हमारे ऊपर करते हैं ।’ आदि, सो निवेदन यह है कि एक ओर अपर पक्ष यह लिखे कि प्रत्येक उपादान अनेक योग्यतावाला होता है । किस समय कौन परिणमन हो यह निमित्तों पर अवलम्बित है । परिणमन करना मात्र उपादानका कार्य है, उसमें जो परिणाम होता है वह निमित्तोंके अनुसार ही होता है और दूसरी ओर यह लिखे कि ‘हम लोगोंमें से कौन कहता है कि उपादानके अनुसार कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती है ।’ सो हमें तो यह सब कथन परस्पर विरुद्ध अतएव विडम्बनापूर्ण हो मालूम पड़ता है । शास्त्रोंमें उपादानका लक्षण ‘द्रव्यशक्तिका नाम उपादान है’ ऐसा जब कि कहीं किया ही नहीं है ऐसी अवस्थामें अपर पक्ष अपनी प्रतिशंकाओंमें उपादानको मात्र द्रव्यशक्तिरूप मानकर क्यों व्याख्यान कर रहा है और शास्त्रोंमें जो उपादान का वास्तविक लक्षण किया है उसे क्यों दृष्टिओझल कर रहा है ! क्या इसका हो अर्थ यह मानना होता है कि प्रत्येक कार्य उपादानके अनुसार होता है इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे । भट्टाकलंकदेवने जो ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ वचन लिखा है उसे अपर पक्ष श्रद्धाकी दृष्टिसे देखता है सो यह उचित ही है । किन्तु उन्हीं आचार्योंने जो द्रव्यशक्तिके साथ पर्यायशक्तिको स्वीकार कर उपादान कारणकी व्यवस्था की है उसे भी अपर पक्षको हृदयसे स्वीकार कर लेना चाहिए। और जब वह उपादानके इस लक्षणको अन्तःकरणपूर्वक स्वीकार कर लेगा तब वह प्रत्येक समयमें जो कार्य होता है उसका उपादान मात्र उसीरूप होता है यह भी स्वीकार कर लेगा। फिर वह यह लिखना छोड़ देगा कि उपादान मात्र द्रव्यशक्तिरूप होनेके कारण अनेक योग्यतावाला होता है, इसलिए जब जैसे निमित्त मिलते हैं, कार्य उनके अनुसार होता है। इतना ही नहीं, फिर वह यह भी लिखना छोड़ देगा कि श्रुतज्ञानके अनुसार कुछ कार्य निश्चित क्रमसे होते हैं और कुछ कार्य अनिश्चित क्रमसे भी होते हैं।

इसी प्रसंगमें ज्ञानको लक्ष्यकर अपर पक्षने यह वाक्य भी लिखा है कि ‘जैसे ज्ञानका स्वतःसिद्ध स्वभाव पदार्थको जाननेका है, लेकिन ज्ञानका उपयोगाकार परिणमन किस पदार्थरूप होता है ? यह व्यवस्था तो उस पदार्थके ही आधीन है।’ सो हमें यह वाक्य पढ़कर आश्चर्य ही नहीं खेद भी हुआ। एक ओर तो सब तथ्यों पर दृष्टिपात करते हुये आचार्य यह घोषणा करें कि परिच्छेद्य (ज्ञेय) होनेसे अन्धकारके समान अर्थ और आलोक ज्ञानकी उत्पत्तिके हेतु नहीं, इसलिए जैसे दीपक घट आदि पदार्थोंसे उत्पन्न न होकर भी उनका प्रकाशक है वैसे ही अर्थ और आलोकसे उपयोगाकार ज्ञान उत्पन्न न होकर भी उनका प्रकाशक (ज्ञापक) है (परीक्षामुख अ० २ सू० ६,८ व ९)। और दूसरी ओर अपर पक्ष ज्ञानके उपयोगाकार परिणमनको पदार्थोंके अधीन बतलावे यह खेदकी बात है। शायद अपने आशयको स्पष्ट करते हुए अपर पक्ष कहे कि ज्ञानका परिणमन तो स्वतःसिद्ध है। वह परिणाम जो विवक्षित उपयोगरूप होता है, ज्ञेयके आधीन है तो इसका मतलब यह हुआ कि जो अतीत और अनागत कार्य विनष्ट और अनुत्पन्न हैं उन्हें केवलज्ञान जान ही नहीं सकेगा, क्योंकि अतीत कालकी अपेक्षा जिस-जिस कालमें जो जो कार्य हुए न तो वर्तमानमें उस उस रूपमें उस उस कालका ही सत्त्व है और न ही उन-उन कार्योंका भी। इसी प्रकार भविष्यकी अपेक्षा भी जान लेना चाहिए, और जो कार्य या काल अपने रूपमें वर्तमानमें हैं नहीं उन्हें केवलज्ञान कैसे जानेगा अर्थात् नहीं जान सकेगा। एक केवलज्ञान ही क्या अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान पर भी यही बात लागू होती है। और यदि बारीकीसे विचार किया जाय तो मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके लिये भी यही कहा जायगा। अतएव ‘ज्ञेयके आधीन होकर ज्ञानका उपयोगाकार परिणमन होता है’ यह कहना युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता।

यह तो एक बात हुई। दूसरी बात यह है कि प्रत्येक वस्तु सामान्य-विशेषात्मक मानी गई है। ऐसी अवस्थामें प्रत्येक समयमें उससे अभिन्न जो परिणाम होता है वह सामान्य-विशेषात्मक ही होता है या मात्र सामान्यात्मक ही ? अपर पक्ष उस परिणमनको मात्र सामान्यात्मक तो कह नहीं सकता, क्योंकि मात्र सामान्यात्मक वस्तुका सर्वथा अभाव है। परिशेषन्यायसे वह परिणमन सामान्य-विशेषात्मक ही मानना पड़ेगा। स्पष्ट है कि जिस प्रकार परिणमन करना प्रत्येक वस्तुका स्वतःसिद्ध स्वभाव है उसी प्रकार अपर पक्षको यह भी स्वीकार कर लेना चाहिये कि परके लक्ष्यसे विभावरूप परिणमन करना और स्वके लक्ष्यसे स्वभावरूप परिणमन करना भी उसका स्वतःसिद्ध स्वभाव है। आचार्य अकलंकदेवने इसी बातको ध्यानमें रखकर ही ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ यह वचन कहा है। यहाँ ‘उत्तरीभवनात्’ पद ध्यान देने योग्य है। केवल परिणमन करे इतना ही उपादानका कार्य नहीं है किन्तु उपादानके उत्तर क्षणमें जो कार्य होनेवाला है उस रूप परिणमन करे यह भी उपादानका ही कार्य है।

तीसरी बात यह है कि यदि प्रत्येक द्रव्यका परिणमन करना मात्र उसका स्वतःसिद्ध स्वभाव माना जाय और वह परिणमन किस रूप हो यह बाह्य सामग्री पर अवलम्बित माना जाय तो केवली जिनके सुख गुणके प्रत्येक समयके परिणमनमें अनन्त सुखरूपता नहीं बन सकती। इत्यादि दोष प्राप्त न हों, इसलिए यही मानना उचित है कि प्रत्येक द्रव्य स्वयं उस-उस रूपसे परिणमता है, बाह्य सामग्री तो उसमें निमित्तमात्र है। यहाँ अपर पक्षने क्रोधपर्यायको प्रमुखरूपसे उदाहरण-रूपमें उपस्थित किया है सो उसके विषयमें भी इसी न्यायसे निर्णय कर लेना चाहिये।

इस प्रकार अपर पक्षने स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी तीन गाथाओं तथा उनके सम्बन्धसे अन्य जिन विषयोंकी चर्चा की है उनके सम्बन्धमें सांगोपांगरूपसे तथ्यार्थका निर्देश किया।

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ६/८)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ३२५ से ३४५

↑ सूची


\३५. प्रतिशंका ३ में उपस्थित ४ प्रमाणोंका स्पष्टीकरण

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने अपने अभिमतकी पुष्टिके अभिप्रायसे जो ४ प्रमाण उपस्थित किये हैं उनमेंसे प्रथम उल्लेख भट्टाकलंकदेवने किस आशयसे किया है इसका हम पूर्वमें ही विस्तारके साथ स्पष्टीकरण कर आये हैं। वहाँ यह स्पष्ट बतला आये हैं कि मीमांसादर्शन शब्दको उपादानरूपसे स्वीकार न करके भी उससे सर्वथा भिन्न ध्वनिकार्यकी उत्पत्ति सहकारी कारणोंसे मानता है, इसलिए जैसे उसके लिए यह कहा जा सकता है कि नित्य शब्दकी असामर्थ्यका खण्डन न करता हुआ सहकारी कारण अकिंचित्कर क्यों नहीं हो जायगा उस प्रकार जैनदर्शनके ऊपर यह बात लागू नहीं होती। अतएव प्रथम प्रमाणसे तो अपर पक्षके मतका समर्थन होता नहीं।

दूसरे प्रमाणमें आचार्य विद्यानन्दिने कार्यके साथ सहकारी सामग्रीकी मात्र कालप्रत्यासत्ति स्वीकार की है, जिससे यह स्पष्ट विदित होता है कि विवक्षित उपादानके विवक्षित कार्यरूप परिणमनके समय विवक्षित बाह्य सामग्रीकी कालप्रत्यासत्ति नियमसे होती ही है, क्योंकि इन दोनोंके एक कालमें होनेका नियम है यही यहाँ कालप्रत्यासत्तिका मथितार्थ है। आचार्य विद्यानन्दिने व्यवहारनयकी अपेक्षा द्विष्ठ कार्यकारण भावको जो परमार्थभूत कहकर कल्पनारोपितपनेका निषेध किया है सो वह कालप्रत्यासत्तिको ध्यानमें रखकर ही किया है, क्योंकि इन दोनोंका एक कालमें होना कल्पनारोपित नहीं है। किन्तु अपर पक्षको मात्र इतना स्वीकार करनेमें संतोष कहाँ है। वह तो जीवके क्रोधरूप कार्यमें जो क्रोधरूप विशेषता आती है उसे सहकारी कारणका कार्य मानने पर तुला हुआ है। आचार्य विद्यानन्दिने इस उद्धरणके प्रारम्भमें जो महत्त्वपूर्ण सूचना की है उसे तो वह दृष्टि ओझल ही कर देना चाहता है। आचार्य श्री तो कहते हैं कि एक द्रव्य प्रत्यासत्ति होनेसे नियत क्रमसे होनेवाली अव्यवहित पूर्व और उत्तर दो पर्यायोंमें उपादान-उपादेयभाव सिद्धान्तविरुद्ध नहीं है। किन्तु आश्चर्य है कि अपर पक्ष इस कथनकी ओर ध्यान ही नहीं देना चाहता और अपने माने हुए श्रुतज्ञानकी अपेक्षा कुछ पर्यायोंको निश्चितक्रमरूप और कुछ पर्यायोंको अनिश्चित क्रम-रूप माननेमें ही अपनी आगमनिष्ठा समझता है जब कि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके पृष्ठ १५१ के उक्त उल्लेखमें ही आचार्य विद्यानन्दिने

क्रमभुवोः पर्याययोः एक द्रव्यप्रत्यासत्तेरुपादानोपादेयत्वस्य वचनात्।

यह पद देकर सभी पर्यायोंकी नियतक्रमता स्वीकार कर ली है। स्पष्ट है कि पिछले उल्लेखके समान इस उल्लेखसे भी अपर पक्षके अभिमतकी पुष्टि न होकर हमारे ही अभिमतकी पुष्टि होती है।

अपर पक्षने तीसरा उल्लेख तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ३ का उपस्थित किया है सो उस द्वारा तो मात्र यह बतलाया गया है कि केवल काल ही मोक्षका हेतु नहीं है। किन्तु बाह्य-आभ्यन्तर अन्य सामग्री भी यथायोग्य उसकी हेतु है। सो इस उल्लेखसे कालकी हेतुताका खण्डन न होकर उसका समर्थन ही होता है। यही कारण है कि लोकमें जायमान सभी कार्योंका कालको भी एक व्यवहार हेतु माना गया है। प्रत्येक कार्य स्वकालमें नियत है.इसका समर्थन करते हुए आचार्य प्रभाचन्द्र प्रमेयकमलमार्तण्ड अ० २ सू० १२ पृ० २६१ में लिखते है-

स्वकालनियतसत्त्वरूपतयैव तस्य ग्रहणात् ।

स्वकालमें नियत सत्त्वरूपसे ही उसका ग्रहण होता है ।

इस उल्लेखमें यह स्पष्टरूपसे बतलाया गया है कि प्रत्येक कार्य स्वकालमें नियत सत्त्वरूप है । इसलिए यह तीसरा उल्लेख भी अपर पक्षके अभिमतकी पुष्टि नहीं करता । किन्तु इससे हमारे इस अभिप्रायकी ही पुष्टि होती है कि 'सभी कार्य अपने-अपने कालमें नियतक्रमसे ही होते हैं ।

अपर पक्षने चौथा उल्लेख तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७१ का उपस्थित किया है । सो इस उल्लेखसे भी यही सिद्ध होता है कि जब यह जीव अयोगकेवली गुणस्थानके उपान्त्य और अन्त्य समयमें विद्यमान होता है तब उन समयोंको निमित्तकर नामादि तीन कर्मोंकी निर्जरा होती है । ऐसा ही इनका योग है । इससे यह कहाँ सिद्ध होता है कि आत्मा सहकारी कारण बनकर चाहे जब इन ३ कर्मोंकी निर्जरा कर देता है । अपर पक्षको तो सहकारी कारणोंके बलपर कार्योंका अपने निश्चित समयको छोड़कर अनिश्चित समयमें होना सिद्ध करना है । सो यह उल्लेख भी अपर पक्षके अभिमतको पुष्टि न कर हमारे इस आशयका ही समर्थन करता है कि सभी कार्य स्वकालमें बाह्य-आभ्यन्तर सामग्रीको प्राप्त कर होते हैं । आचार्य जिनसेन हरिवंशपुराण सर्ग ७ में लिखते हैं-

निमित्तमान्तरं तत्र योग्यता वस्तुनि स्थिता ।
बहिर्निश्चयकालस्तु निश्चितस्तत्त्वदर्शिभिः ॥६॥

वस्तुमें स्थित द्रव्य-पर्याय योग्यता कार्यमें आभ्यन्तर निमित्त है और निश्चयकाल बाह्य निमित्त है ऐसा तत्त्वदर्शियोंने निश्चित किया है ॥६॥

एकान्त नियतवादका गोम्मटसार कर्मकाण्ड आदि आर्ष ग्रन्थोंमें क्या अर्थ किया है इसका स्पष्टीकरण हम पहले ही कर आये हैं । मालूम पड़ता है कि अपर पक्ष उसपर भीतरसे दृष्टिपात नहीं करना चाहता और जिस प्रकार इतरधर्मी जैनियोंको नास्तिक कहकर जनतामें बदनाम करते हैं उसी प्रकार अपर पक्षने भी हमें एकान्त नियतिवादी कहकर आम जनतामें बदनाम करनेका मार्ग ढूँढ़ निकाला है । भट्टाकलंकदेव और आचार्य विद्यानन्दिके ‘उपदानस्य उत्तरीभवनात्’ वचनकी प्रत्येक कार्यके प्रति बाह्य-सामग्रीकी निमित्तता स्वीकार करनेपर भी संगति कैसे बैठती है इसका उन्होंने स्वयं अपने द्वारा रचित शास्त्रोंमें स्पष्टीकरण किया है । भट्टाकलंकदेव तत्त्वार्थवार्तिक अ० ६ सू० १ में लिखते हैं-

वीर्यान्तराय-ज्ञानावरण-क्षय-क्षयोपशमापेक्षेण आत्मनात्मपरिणामः पुद्गलेन च स्वपरिणामः व्यत्ययेन च निश्चय-व्यवहारनयापेक्षया क्रियत इति कर्म ।

वीर्यान्तराय और ज्ञानावरणके क्षय और क्षयोपशमकी अपेक्षा रखनेवाले अर्थात् इन कर्मोंके क्षय और क्षयोपशमसे युक्त आत्माके द्वारा निश्चयनयसे आत्मपरिणाम और पुद्गलके द्वारा पुद्गलपरिणाम तथा व्यवहारनयसे आत्माके द्वारा पुद्गलपरिणाम और पुद्गलके द्वारा आत्मपरिणाम किया जाता है इसलिए ये कर्म है ।

इस उल्लेख द्वारा आचार्य महाराज स्पष्ट शब्दोंमें बतला रहे हैं कि आत्मा और पुद्गल प्रत्येकका कार्य एक-एक है, किन्तु जब आत्माश्रित निश्चयनयकी विवक्षा होती है तब जिस द्रव्यने स्वयं यथार्थ कर्ता होकर अपनी परिणमन क्रियाद्वारा उसे किया है उसका वह कार्य कहा जायगा और जब पराश्रित व्यवहारनयकी विवक्षा होती है तब जिसने यथार्थमें उसे किया तो नहीं है, मात्र उसके होनेमें व्यवहारसे अनुकूल रहा, इसलिए उसका भी कार्य कहा जायगा। इस प्रकार प्रत्येक कार्यमें सर्वत्र निश्चय-व्यवहार हेतुओंकी युति होनेसे ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ वचनकी सर्वत्र संगति बैठती जाती है। इसके सिवाय केवलज्ञानके विषय और तदनुसारी श्रद्धामूलक श्रुतज्ञानके विना स्वरूपसे अप्रामाणिक अन्य किसी श्रुतज्ञानके द्वारा समन्वयकी बात करना मिथ्या ही है।

स्पष्ट है कि अपर पक्षने जिन चार प्रमाणोंके आधारसे अपने अभिमत की पुष्टि करनी चाही है वे अपर पक्षके अभिमतकी पुष्टि न कर हमारे ही अभिमतकी पुष्टि करते हैं, इसलिए हम अपने पिछले उत्तरमें जो कुछ भी लिपिवद्ध कर आये हैं वह आगमानुसारी होनेसे प्रमाणभूत ही है ऐसा अपर पक्षको यहाँ निर्णय करना चाहिए।

\३६. प्रतिशंका ३ में उपस्थित कतिपय तर्कोंका सप्रमाण खण्डन

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने हमारे पिछले उत्तरको ध्यानमें रखकर हमारे जिस वाक्यांशको उद्धृत किया है उसे पूरे सन्दर्भके साथ हम यहाँ दे देना चाहते हैं, क्योंकि अपर पक्षने उसके पूरे सन्दर्भको छोड़कर उसे उपस्थित किया है। पूरे सन्दर्भ सहित वह वाक्यांश इस प्रकार है-

'प्रत्येक पदार्थमें प्रत्येक समयमें जो द्रव्य-पर्यायात्मक शक्ति होती है जिसे कि आचार्योंने यथार्थ ( निश्चय ) उपादान कहा है उसके अनुसार ही कार्यकी उत्पत्ति होती है। तभी तो आचार्य अकलंकदेव और विद्यानन्दि जैसे समर्थ आचार्य ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्" यह कहनेमें समर्थ हुए। यदि उपादानके इस लक्षणको, जिसे कि सभी आचार्योंने अनेक तर्क देकर सिद्ध किया है, यथार्थ नहीं माना जाता है और यह स्वीकार किया जाता है कि जब जैसा वाह्य निमित्त मिलता है तब उसके अनुसार कार्य होता है तो सिद्धोंको जिनमें वैभाविक शक्ति इस अवस्थामें भी विद्यमान है और लोकमें सर्वत्र बाह्य निमित्तोंकी भी विद्यमानता है तब उन्हें संसारी बनानेसे कौन रोक सकेगा।’

यह हमारे वक्तव्यका वह अंश है जिस द्वारा हमने बाह्य सामग्रीके आधार पर कार्योत्पत्ति स्वीकार करने पर सिद्धोंके संसारी बनानेरूप जो अतिप्रसंग दोषका आपादन किया है वह युक्त ही है, क्योंकि अपर पक्ष जब किसी कार्यका प्रतिनियत उपादान माननेके लिए तैयार ही नहीं और बाह्य सामग्रीके बल पर प्रत्येक कार्यकी व्यवस्था बनाता है तो ऐसी अवस्थामें सिद्धोंके पुनः संसारी बन जानेकी आपत्ति उपस्थित होती है यह स्पष्ट ही है। किन्तु इस दोषको टालनेके लिए अपर पक्षका कहना है कि ‘सिद्धोंके कर्मोंका संयोग और रागादि परिणाम नहीं पाये जाते, इसलिए सिद्धोंका संसारी होना संभव नहीं है।’ किन्तु उनका ऐसा लिखना इसलिए ठीक नहीं है, क्योंकि जब अपर पक्ष आगममें स्वीकृत निश्चय उपादानके लक्षणको ही स्वीकार नहीं करता और वाह्य सामग्रीके बलपर किसी भी कार्यकी उत्पत्ति स्वीकार करता है तो उसे यह भी स्वीकार कर लेना चाहिये कि सिद्धोंमें द्रव्यशक्तिरूप उपादान योग्यता है ही, अतएव उसे निमित्तकर कर्मोंका संयोग हो जाने पर सिद्धोंको संसारी बनना ही पड़ेगा। अध्यात्मवेत्ता प्रतिनियत सामग्रीसे प्रतिनियत कार्यकी उत्पत्ति होती है इसे अच्छी तरह जानते हैं। संसार और मोक्षकी व्यवस्था इसी आधार पर चल रही है इसे भी वे अच्छी तरह जानते हैं, किन्तु वे यह नहीं जानते कि उपादान अनेक योग्यतावाला होता है, उनमेंसे कौन योग्यता कार्यरूप परिणमे यह बाह्य सामग्री पर अवलम्बित है और न ही उन्होंने ऐसी कोई व्यवस्था आगममें ही देखी है। अतएव इस बातका निर्णय तो अपर पक्षको ही करना है कि-यदि हम उपादानको अनेक योग्यतावाला माननेके साथ बाह्य सामग्रीके बलपर कार्यकी उत्पत्तिको मानते रहे तो सिद्धोंको संसारी बनानेरूप अतिप्रसंगसे हमें कौन बचा सकेगा। इस प्रसंगमें अपर पक्षकी ओरसे जो आगम प्रमाण उपस्थित किये गये हैं उनकी सार्थकता तभी है जब आगम व्यवस्थाको पूर्णरूपसे स्वीकार कर लिया जाय। हमारी ओरसे जहाँ भी निमित्तोंके अनुसार कार्य होना लिखा गया है वहाँ प्रतिनियत कार्यके प्रतिनियत उपादान और प्रतिनियत बाह्य सामग्रीको ध्यानमें रखकर ही लिखा गया है, क्योंकि इन दोनोंकी समव्याप्ति है, इसलिए निश्चय नयकी अपेक्षा यह कथन किया जाता है कि कार्य उपादानके अनुसार होता है और व्यवहारनयसे यह कहा जाता है कि कार्य बाह्य सामग्रीके अनुसार होता है।

यहाँ अपर पक्षकी ओरसे हमारे इस कथनको ध्यानमें रखकर कि ‘प्रत्येक द्रव्यकी संयोगकालमें होनेवाली पर्याय बाह्य निमित्तसापेक्ष निश्चय उपादानसे होती है’ पुनः अपनी इस मान्यताको दोहराया है कि ‘उपादानका कार्य केवल परिणमन करना है। उस परिणमनमें जो क्रोधादिरूपता परिलक्षित होती है वह कर्मोदय आदिरूप निमित्त कारणोंसे ही उत्पन्न होती है।’ यद्यपि हम उनकी इस मान्यताका विचार पूर्वमें सांगोपांग कर आये हैं, फिर भी यहाँ पर इतना संकेत कर देना आवश्यक समझते हैं कि परिणाम, परिणामी और परिणमन क्रिया ये तीनों एक सत्ताक वस्तु होनेके कारण उपादान ही स्वयं अपनी शक्तिसे क्रोधादिरूप परिणामको उत्पन्न करता है, बाह्य सामग्री तो उसमें निमित्तमात्र है। इस विषयको स्पष्ट करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द प्रवचनसारमें लिखते हैं-

परिणमदि जेण दव्वं तक्कालं तम्मय त्ति पण्णत्तं।
तम्हा धम्मपरिणदो आदा धम्मो मुणेदव्वो ॥८॥

जिस समय जिस स्वभावसे द्रव्य परिणमन करता है उस समय उसमय है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है इसलिए धर्मपरिणत आत्माको धर्म समझना चाहिए ॥८॥

इसकी संस्कृत टीका करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

यत्खलु द्रव्यं यस्मिन्काले येन भावेन परिणमति तत् तस्मिन्काले किलौष्ण्यपरिणतायःपिण्डवत्तन्मयं भवति। ततोऽयमात्मा धर्मेण परिणतो धर्म एव भवतीति सिद्धमात्मनश्चारित्रत्वम् ॥८॥

वास्तवमें जो द्रव्य जिस समय जिस भावरूपसे परिणमन करता है, वह द्रव्य उस समय उष्णतारूपसे परिणमित लोहेके गोलेकी भाँति उसमय है; इसलिए यह आत्मा धर्मरूप परिणमित होनेसे धर्म ही है। इस प्रकार आत्माकी चारित्रता सिद्ध हुई ॥८॥

यहाँ गाथामें ‘परिणमति जेण’ और टीकामें ‘येन भावेन परिणमति’ पद ध्यान देने योग्य है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें स्वतन्त्र कर्ता होकर जो भी परिणमन करता है वह क्रोधादिमेंसे किसी एक भावरूप ही परिणमन करता है। अन्यथा उसका परिणमन करना ही नहीं बन सकता। अतएव प्रकृतमें अपर पक्षको यही निर्णय करना चाहिए कि जिस समय जिस द्रव्यमें जिस परिणमनकी उत्पत्ति होती है, उस समय उस परिणमनकी योग्यतावाला ही उस द्रव्यका उपादान होता है। फिर भी निमित्तरूपसे जो बाह्य-सामग्रीकी स्वीकृति है वह केवल निश्चय उपादानके साथ बाह्य-सामग्रीके कालप्रत्यासत्तिरूप अविनाभावको ध्यानमें रखकर ही की गई है। प्रयोजनका विचार हम पूर्वमें ही कर आये हैं।

आगे अपर पक्षने हमारे इस कथनको ध्यानमें रखकर कि ‘निमित्त भी उसीके अनुसार मिलते हैं’ जो यह भाष्य किया है कि ‘इसका अभिप्राय यही तो हुआ कि कार्यक्षम निश्चय उपादान अपने द्वारा होनेवाली कार्योत्पत्तिके लिए अनुकूल निमित्तोंका समागम भी आप ही प्राप्त कर लेता है।’ सो इस सम्बन्धमें इतना ही लिखना है कि प्रत्येक कार्यमें ऐसा योग सहज स्वीकार किया गया है और उसीके अनुसार कार्य होता है।

आगे अपर पक्षका कहना है कि ‘यदि प्रत्येक समयका परिणमन सुनिश्चित क्रमसे होता है तो फिर क्यों आप कार्य करनेका संकल्प मनमें करते हैं ? क्यों मस्तिष्कके सहारेपर कार्य-कारणभावकी निमित्तभूत और उपादानभूत वस्तुओंके साथ संगति बिठलाते हैं तथा फिर क्यों अपनी श्रमशक्तिके आधारपर तदनुकूल व्यापार करते हैं।’ सो इस सम्बन्धमें निवेदन यह है कि संकल्प करना भी एक प्रतिनियत कार्य है, जो बाह्य-आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें होता है। इसी प्रकार अन्य जिन बातोंका उल्लेख यहाँपर अपर पक्षने किया है वे सब कार्य ही तो हैं जो राग-द्वेषरूप वृत्तिके परिणाम हैं। जबतक इस जीवके राग-द्वेषमय परिणति होती रहेगी और आत्मा उनमें उपयुक्त होता रहेगा तब तक यह संकल्प-विकल्पात्मक प्रवृत्ति इस जीवके नियमसे होगी। अतएव क्रमानुपातीरूपसे इसे स्वीकार करनेपर एकान्त नियतिवादका प्रसंग उपस्थित न होकर अनेकान्तस्वरूप सुप्रभातका दर्शन ही यहाँ होता है ऐसा यहाँ निर्णय करना चाहिए। एकान्त नियतिवाद क्या वस्तु है इसका निर्देश हम पूर्वमें विस्तारके साथ कर आये हैं।

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने बाह्य निमित्तोंकी सार्थकताका प्रश्न उपस्थित किया है और लिखा है कि ‘इसे आप स्पष्ट नहीं कर पाये हैं।’ सो इस सम्बन्धमें हमारा कहना यह है कि बाह्य-सामग्री दूसरे द्रव्यके कार्यमें व्यापारवान् हो इसका नाम उसकी सार्थकता नहीं है, किन्तु इसकी सार्थकता इसीमें ही है कि उस कार्यके साथ उसकी कालप्रत्यासत्ति है, जिसे आपने मुक्तकण्ठसे स्वीकार कर लिया है।

अनेकान्तका जो स्वरूप आचार्य अमृतचन्द्रने समयसारकी टीकामें लिपिबद्ध किया है वह एक द्रव्यमें रहनेवाले परस्पर विरोधी दो-दो धर्मयुगलोंको लक्ष्यमें रखकर ही लिपिबद्ध किया है। इससे उसकी मर्यादा सुस्पष्ट हो जाती है। किन्तु अपर पक्ष प्रत्येक कार्यका यथार्थ कारण धर्म उपादानमें भी रहता है और निमित्तभूत बाह्य-सामग्रीमें भी रहता है इस अर्थमें अनेकान्तको चरितार्थ करना चाहता है जो युक्त नहीं है, क्योंकि एक कार्यका यथार्थ कारण धर्म उसी द्रव्यमें रहता है जिसका वह कार्य है, अन्य द्रव्यमें नहीं। अन्यथा वे दोनों द्रव्य एक हो जायेंगे। इसीलिए हमने अपने पिछले उत्तरमें यह लिखा है कि ‘अनेकान्तकी अपनी मर्यादा है।’

कर्मशास्त्रके अभ्यासी होनेके नाते हमें अकामनिर्जरा और तप द्वारा होनेवाली निर्जराका आगममें जो सुस्पष्ट निर्देश है उसका सम्यक् प्रकारसे परिज्ञान है, तभी तो हमारा यह कहना है कि जिस कालमें जिस कर्मकी जिस प्रकारकी निर्जरा होती है वह अपनी-अपनी योग्यतानुसार ही होती है। ऐसा नहीं हो सकता कि किन्हीं कर्मपरमाणुओंकी उस कालमें निर्जरा होनेकी निश्चय उपादानयोग्यता न हो और बाह्य सामग्री उपस्थित होकर उसे कर दे। जो भी कार्य होता है वह बाह्य-आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें क्रमानुपाती रूपसे ही होता है, सबका कालनियम है। तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ३ में जो ‘भव्यस्य’ कालेन’ इत्यादि वचन आया है सो उसका भी यही आशय है कि सभी कार्य अपने-अपने कालमें अपनो-अपनी प्रतिनियत सामग्रीको प्राप्त कर होते हैं। अन्य सामग्रीके अभावमें केवल कालके ही बलसे सभो कार्य होते हों ऐसा काल-नियम नहीं है। न्यायदिवाकर पण्डित पन्नालालजीने भी अपनी हिन्दी टीकामें तत्त्वार्थवार्तिकके उक्त उल्लेखका यही अर्थ किया है। वे लिखते हैं-‘ताते मोक्ष कार्य प्रति काल ही को कारण कहना यह नियम’ नाहीं संभवे है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक कार्य स्वकालमें होकर भी बाह्य-आभ्यन्तर प्रतिनियत सामग्रीके सन्निधानमें होता है। इसका सप्रमाण विशेष स्पष्टीकरण हम पूर्वमें ही कर आये हैं।

\३७. कर्मशास्त्रके अनुसार भी सब कार्य क्रमनियत ही होते हैं

आगे अपर पक्षने अकामनिर्जरा या तप द्वारा 'अकालमें भी निर्जराके समर्थनमें आगम प्रमाण देकर हमारे द्वारा अपने पिछले उत्तर २में निर्दिष्ट दो नियमोंके विरोधमें जो विचार उपस्थित किये हैं उनपर सांगोपांग विचार करते हैं। वे नियम ये हैं-

\१. जिस कालमें जिन कर्मोंकी जितने परिमाणमें जिन परिणामोंको निमित्त कर उत्कर्षित, अपकर्षित, संक्रमित और उदीरित होनेकी योग्यता होती है, उस कालमें उन कर्मोंका उतने परिमाणमें उन परिणामोंको निमित्त कर उत्कर्षण, अपकर्षण, संक्रमण, और उदीरणा होती है ऐसा नियम है।

\२. बन्धके कालमें जो स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध होता है, सो उस कालमें ही उनमें ऐसी योग्यता स्थापित हो जाती है, जिससे नियत काल आने पर नियत परिणामों तथा बाह्य नोकर्मोंको निमित्त कर उन कर्मोंका उत्कर्षणादिरूप परिणमन होता है।

ये दो नियम हैं। इनमेंसे प्रथम नियम सब कार्य बाह्याभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें होते हैं इस सिद्धान्तके आधारसे लिपिबद्ध किया गया है। स्वामी कार्तिकेयने ‘जं जस्स जम्मि’ इत्यादि तीन गाथाएँ तथा आचार्य रविषेणने पद्मपुराणमें ‘यत्प्राप्तव्यं यदा’ इत्यादि श्लोक इसी सिद्धान्तके आधार पर लिपिबद्ध किये हैं। इसी सिद्धान्तको ध्यानमें रख कर भट्टाकलंकदेवने ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि श्लोक उल्लिखित किया है। यह सिद्धान्त और उसके आधार पर बने अन्य नियम अकाट्य हैं। कुछ बाह्य जनोंकी कल्पनाओं द्वारा उनका खण्डन नहीं किया जा सकता।

दूसरा नियम आगममें प्रतिपादित १० करणोंके स्वरूपको लक्ष्यमें रख कर लिपिबद्ध किया गया है। उन १० करणोंका निर्देश करते हुए आचार्य नेमिचन्द्र गोम्मटसार कर्मकाण्डमें लिखते हैं-

बंधुक्कट्टकरणं संकममोकट्टुदरीणा सत्तं।
उदयुवसामणिधत्ती णिकाचणा होदि पडिपयडी ॥४३७॥

बन्ध, उत्कर्षण, संक्रमण, अपकर्षण, उदीरणा, सत्त्व, उदय, उपशम, निधत्ति और निकाचना ये दस करण प्रत्येक प्रकृतिके होते हैं ॥४३७॥

इनमेंसे जीवप्रदेशों और कर्मवर्गणाओंके परस्पर अवगाहरूप सम्बन्ध विशेषको बन्ध कहते हैं। स्थिति और अनुभागके बढ़नेको उत्कर्षण कहते हैं। एक प्रकृतिके चारों प्रकारसे अन्य सजातीय प्रकृतिरूप परिणमनेको संक्रमण कहते हैं। स्थिति और अनुभागके घटनेको अपकर्षण कहते हैं। अन्यत्र स्थित कर्मका उदयमें देनेको उदीरणा कहते हैं। कर्मरूपसे रहनेको सत्त्व कहते हैं। फलकाल प्राप्त कर्मको उदय कहते हैं। उपशमकरण आदिके स्वरूपका विधान करते हुए धवला पुस्तक १६ पृ० ५१६ व ५१७ में लिखा है-

जं पदेसग्गं णिधत्तीकयं उदये दादुंणो सक्कं, अण्णपयडिं संकामिदुं पि णो सक्कं, ओकड्डिदुं णो सक्कं, एवंविहस्स पदेसग्गस्स णिधत्तमिदि सण्णा।

जं पदेसग्गं ओकड्डिदुं णो सक्कं, उक्कड्डिदुं णो सक्कं, अण्णपयडिं संकामिदुं णो सक्कं, उदए दादुं णो सक्कं, तं पदेसग्गं णिकाचिदं णाम।

उवसंत-णिधत्त-णिकाचिदाणं सण्णियासो। तं जहा-अप्पसत्थउवसामणाए जमुवसंतं पदेसग्गं ण तं णिधत्तं ण तं णिकाचिदं वा। जं णिधत्तं ण तं उवसंतं णिकाचिदं वा। जं णिकाचिदं ण तं उवसंतं णिधत्तं वा।

जो प्रदेशाग्र निधत्तीकृत है-उदयमें देनेके लिए शक्य नहीं है, अन्य प्रकृतिमें संक्रान्त करनेके लिए भी शक्य नहीं है, किन्तु अपकर्षण व उत्कर्षण करनेके लिए शक्य है ऐसे प्रदेशाग्रकी निधत्त संज्ञा है।

जो प्रदेशाग्र अपकर्षण करनेके लिए शक्य नहीं है, उत्कर्षण करनेके लिए शक्य नहीं है, अन्य प्रकृतिमें संक्रमित करनेके लिए शक्य नहीं है तथा उदयमें देनेके लिए भी शक्य नहीं है उस प्रदेशाग्रकी निकाचित संज्ञा है।

उपशान्त, निधत्त और निकाचितका सन्निकर्ष। यथा-अप्रशस्त उपशामना द्वारा जो प्रदेशाग्र उपशान्त है वह न निधत्त और न निकाचित ही है। जो प्रदेशाग्र निधत्त है वह न उपशान्त और न निकाचित हो है। जो प्रदेशाग्र निकाचित है वह न उपशान्त है और न निधत्त ही है।

यह दस करणोंका संक्षिप्त स्वरूप है। हम समझते हैं कि जो कर्मशास्त्रके सचमुचमें अभ्यासी होंगे वे उक्त कथनसे यह भली भाँति समझ जावेंगे कि अपने-अपने सत्त्वकालमें जिस कर्मका जिसरूप परिणमन होना होता है उस कर्ममें वैसी योग्यता बन्धकालमें ही प्राप्त हो जाती है। इस विषयको और भी स्पष्टरूपसे समझनेके लिए धवला पु० १६ पृ० ५१७ में निर्दिष्ट इस अल्पबहुत्व पर दृष्टिपात कीजिए-

एदेसिमप्पाबहुअं। तं जहा-जिस्से वा तिस्से वा एक्किस्से पयडीए अधापवत्तसंकमो थोवो। उवसंतपदेसक्कममसंखेज्जगुणं। णिधत्तमसंखेज्जगुणं। णिकाचिदमसंखेज्जगुणं।

इनका अल्पबहुत्व। यथा-जिस किसी भी एक प्रकृतिका अधःप्रवृत्तसंक्रम स्तोक है। उससे उपशान्त प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे निधत्त प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है तथा उससे निकाचित प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है।

इस अल्पबहुत्वमें विधि-निषेधमुखसे कितने कर्म संक्रम, उदीरणा, उत्कर्षण और अपकर्षणके योग्य तथा अयोग्य होते हैं इसका स्पष्ट निर्देश किया गया है। अतएव जिस कालमें जो कर्म उत्कर्षण आदिके योग्य होता है उस कालमें अन्य सामग्रीको निमित्त कर उसीका उत्कर्षण आदि होता है, प्रत्येक कर्मशास्त्रके अभ्यासीको ऐसा ही यहाँ निर्णय करना चाहिए। एक कर्मका उत्कर्षणादि ही क्या, संसारका प्रत्येक कार्य अन्य बाह्य सामग्रीको निमित्तकर अपने-अपने कालमें हो रहा है। यदि हमारा आपका श्रुतज्ञान इसके लिए साक्षीभूत नहीं है तो न सही, आगम तो इसके लिए साक्षी है। हरिवंशपुराण सर्ग ७७में इस तथ्यको स्पष्ट करते हुए लिखा है-

दिव्येन दह्यमानायां दहनेन तदा पुरि ।
नूनं क्वापि गता देवा दुर्वारा भवितव्यता ।।६१।।

उस समय दिव्य अग्निसे पुरीके जलते समय देव नियमसे कहीं चले गये ? भवितव्यता दुर्निवार है ॥ ६१ ॥

हमें आशा है कि अपर पक्ष समस्त आगमको ध्यानमें रखकर वस्तुका निर्णय करेगा ।

आगे अपर पक्षने ध्रुवोदयी, अध्रुवोदयी, ध्रुव बन्धरूप और अध्रुव बन्धरूप प्रकृतियोंका संकेतमात्र करके गोम्मटसार कर्मकाण्ड गाथा १२४ व १२६ को उद्धृत कर उन प्रकृतियोंका संकेत किया है जिनमेंसे कुछका ध्रुवबन्ध होता है और कुछका नहीं । सो मालूम नहीं कि यहाँ यह खुलासा किस प्रयोजनसे किया गया है । संभवतः इसलिये कि कुछ प्रमाण देना चाहिए और कुछ लिखना चाहिए । ध्रुव बन्धवाली या ध्रुव उदयवाली वा अन्य कोई प्रकृति क्यों न हो ? यहाँ विचार तो यह चला है कि सत्तामें स्थित जो भी कर्म है उसमें उत्कर्षणादि किन नियमोंके आधार पर होता है ? और इसी प्रश्नका पूर्वमें समुचित रीतिसे समाधान किया गया है । अतएव प्रकृतमें गो० क०की पूर्वोक्त जो दो गाथाएँ अपर पक्षने उद्धृत की हैं वे प्रकृतमें उपयोगी नहीं ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।

आगे अपर पक्षने जयधवला पु० ९ पृ० ४-६के कुछ प्रमाण उद्धृत कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि इससे हमारी अपकर्षण आदि सम्बन्धी मान्यताका खण्डन हो जाता है । यहाँ अपर पक्षने जो प्रमाण उद्धृत किये हैं उनमें यह बतलाया गया है कि प्रथम स्पर्धक अपकर्षित नहीं होता, क्योंकि वहाँ पर अतिस्थापना और निक्षेप नहीं देखे जाते । इसी प्रकार द्वितीय स्पर्धकसे लेकर जघन्य अतिस्थापना और जघन्य निक्षेप प्रमाण स्पर्धक अपकर्षित नहीं होते हैं । इसके आगे अन्य स्पर्धकोंके अपकर्षित होनेमें कोई बाधा नहीं । यह आगम वचन है । इसपरसे निष्कर्षको फलित करते हुए अपर पक्षने लिखा है-

‘ऊपरके प्रमाणसे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक स्पर्धकमें अपकर्षित होनेकी योग्यता है । किन्तु स्वगत योग्यता होते हुए भी अतिस्थापना और निक्षेपके अथवा अकेले निक्षेपके अभावके कारण पहले अनन्त स्पर्धकोंकी अपकर्षणरूप प्रवृत्ति नहीं हो सकती है । अतः आपके इस सिद्धान्तका स्पष्टतया खण्डन हो जाता है कि उपादान ही नियामक है, जब उस योग्यताको लिए हुए उपादान होता है तो उसके अनुकूल अन्य सर्व कारण अवश्य मिल ही जाते हैं, ऐसा नहीं हो सकता कि उस योग्यताको लिये हुए उपादान हो, किन्तु अन्य कारण न मिलें और कार्य होनेसे रुक जाय क्योंकि यहाँ उपादानमें अपकर्षण होनेकी योग्यता विद्यमान है किन्तु अभावरूप अन्य कारणके हेतुसे वह कार्यरूप प्रवृत्त नहीं हो सकता है । यदि योग्यता न होती तो आचार्य यही कहते कि इतने स्पर्धकोंमें योग्यता नहीं है, अतः यह अपकर्षित नहीं हो सकते हैं । किन्तु आचार्योंने अतिस्थापना और निक्षेपका अभाव इसका कारण बतलाया है, योग्यताका अभाव इसका कारण नहीं बतलाया है ।’

यह अपर पक्षका वक्तव्य है । इसे पढ़नेपर ऐसा मालूम देता है कि अपर पक्ष अपने पक्षके समर्थनमें उत्कर्षणके और अपकर्षणके लक्षणको ही भूल गया है । स्थिति और अनुभागके घटनेका नाम अपकर्षण है इसे अपर पक्ष न भूले यह हमारा निवेदन है । प्रकृतमें अपर पक्षने जो प्रमाण उपस्थित किया है वह अनुभाग-अपकर्षणसम्बन्धी है ।

साधारण नियम है कि जिस कर्मके जिस अनुभागमें अपकर्षण होता है वह अपनेसे लगे हुए नीचेके अनन्त स्पर्धक अनुभागरूप न परिणम कर उससे नीचेके अनुभागरूप परिणमता है। यहाँ जिसरूप नहीं परिणमा उसकी अतिस्थापना संज्ञा है और जिस रूप परिणमा उसकी निक्षेप संज्ञा है। यह परिणमन अपनेमें हुआ है। अपनी एक पर्याय-अपकर्षण संज्ञावाली है और उसका व्यय होकर जो पर्याय उत्पन्न हुई उसकी निक्षेप संज्ञा है और इन दोनोंके बीचमें जो अन्तराल रहा उसकी अतिस्थापना संज्ञा है। यहाँ अतिस्थापना और निक्षेप निमित्त नहीं हैं, निमित्त तो जीवके संक्लेश अथवा विशुद्धिरूप परिणाम हैं। अतएव अपर पक्षने कर्मशास्त्रके इस सूक्ष्म रहस्यको हृदयंगम न करके जो समर्थ उपादानकी नियमाकताके खण्डनका प्रयास किया हैं उसके बिना प्रयोजनके किये गये इस परिश्रमके लिए हम उसे क्या कहे ?

संक्रम अनुयोगद्वारमें संक्रमका निक्षेप करते हुए क्षेत्रसंक्रमके निरूपणके प्रसंगसे बतलाया है कि एक क्षेत्रका क्षेत्रान्तरको प्राप्त होनेका नाम क्षेत्रसंक्रम है। इसपर शंका हुई कि क्षेत्र क्रिया रहित है, इसलिए उसका संक्रम कैसे संभव है ? इसका समाधान करते हुए वीरसेन स्वामी लिखते हैं कि आधेयमें आधारका उपचार करके सक्रिय जीव और पुद्गलोंमें क्षेत्र संज्ञा संभव होनेसे उनका संक्रम बन जाता है और क्षेत्रका संक्रम व्यवहार अप्रसिद्ध भी नहीं है। क्योंकि ‘ऊर्ध्वलोक संक्रान्त हुआ’ ऐसा व्यवहार पाया जाता है। धवला पु० १६ पृ० ३३९ का वह वचन इस प्रकार है-

एगक्खेत्तस्स खेत्तंतरगमणं खेत्तसंकमो णाम। किरियाविरहिदस्स खेत्तस्स कधं संकमो ? ण, जीव-पोग्गलाणं सक्किरियाणं आधेये आधारोवयारेण लद्धे खेत्तववएसाणं संकमुवलंभादो। ण च खेत्तस्स संकमववहारो अप्पसिद्धो, उड्ढलोगो संकंतो त्ति ववहारुवलंभादो।

यह क्षेत्रसंक्रमका उदाहरण है। अनुभागसंक्रममें इस दृष्टिसे विचार करनेपर यह सुस्पष्ट होनेमें देर नहीं लगती कि स्थितिसंक्रम और अनुभागसंक्रम इन दोनोंमें अतिस्थापना और निक्षेप ये दोनों कोई पृथक्भूत पदार्थ नहीं हैं, केवल सुस्पष्टरूपसे स्थितिसंक्रम और अनुभागसंक्रमका ज्ञान करानेके लिए इनका पृथग्भूत कर्ममें व्यवहार अवश्य किया जाता है। अतएव अतिस्थापना और निक्षेप इन दोनों द्वारा निमित्तभूत वस्तुका कथन न होकर उपादानभूत वस्तुकी अवस्थाविशेषका ही कथन किया गया है।

अब रही प्रथम आदि स्पर्धकरूप अनुभागके संक्रम न होनेकी बात सो इस सम्बन्धमें अपर पक्षका जो यह कहना है कि ‘प्रथम आदि स्पर्धकोंमें अपकर्षित होनेकी योग्यता तो है, किन्तु अभावरूप अन्य कारणके हेतुसे वह कार्यरूप प्रवृत्त नहीं हो सकती है।’ सो उस पक्षका यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि सबसे जघन्य अनुभागस्पर्धककी ही प्रथम स्पर्धक संज्ञा है। जितने भी कर्म हैं चाहे वे घाती हों या अघाती उन सबमें अपनी-अपनी मर्यादाके भीतर जो जघन्य अनुभाग स्पर्धक होता है उसे ही आदि स्पर्धक या प्रथम स्पर्धक कहते हैं। ऐसी अवस्थामें जब कि इससे कम अनुभाग स्पर्धक और कर्म हो ही नहीं सकता तो फिर अपर पक्षने जो यह अर्थ फलित किया है कि ‘प्रथम आदि स्पर्धकोंमें संक्रमित होनेकी योग्यता तो है’ सो यह अर्थ उसने किस आधारसे फलित किया इसका उसे स्वयं विचार करना चाहिए। यह तो अपकर्षणका सामान्य नियम है कि ऊपरकी उसी स्थिति या अनुभागका अपकर्षण हो सकता है जिससे नीचे उतनी स्थिति और अनुभाग पाया जाय जिसे अतिस्थापना और निक्षेप बनाया जा सके। यहाँ प्रथमादि अनंत स्पर्धकोंका अपकर्षणके इस नियममें अन्तर्भाव नहीं होता, इसलिए उनमें अपकर्षित होनेकी द्रव्य-पर्याय उभयरूप उपादान योग्यता नहीं है। उसीको आचार्य महाराजने जयधवलामें दूसरे शब्दों द्वारा व्यक्त किया है। स्पष्ट हैं कि अपर पक्षने जयधवलाके उक्त उल्लेखको ध्यानमें रखकर जो विधान किया है वह समीचीन नहीं हैं।

आगे अपर पक्षने यह तो स्वीकार कर लिया है कि ‘बन्धके समय कुछ प्रदेशोंका उपशम, निधत्ति और निकाचितरूप बन्ध होना संभव है। किन्तु वह बन्ध कारणकलाप पाकर टूट जाता है’ अपने इस अभिप्रायके समर्थनमें अपर पक्षने जो धवला पु० ६ पृ० ४२७-२८ का उद्धरण उपस्थित किया है उस पर भी यहाँ सांगोपांग विचार कर लेना इष्ट प्रतीत होता है।

उपशम, निधत्ति और निकाचितके विषयमें विशेष नियम यह है कि जो जीव उपशम सम्यक्त्वको प्राप्त करते समय अनिवृत्तिकरणमें प्रवेश करता है उसके दर्शनमोहनीयकर्म अनुपशान्त, अनिधत्त और अनिकाचित हो जाता है। जो जीव अनंतानुबन्धीकी विसंयोजना करता है उसके अनिवृत्तिकरणमें प्रवेश करने पर अनन्तानुबन्धीचतुष्क अनुपशान्त, अनिधत्त और अनिकाचित हो जाता है। तथा जो जीव चारित्र मोहनीयकी उपशमना और क्षपणा करता है उसके अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें प्रवेश करने पर सभी कर्म अनुपशान्त, अनिधत्त और अनिकाचित हो जाते हैं। देखो धवला पृ० १६ पृ० ५१६-५१७।

इसी बातको स्पष्ट करते हुए गोम्मटसार कर्मकाण्डमें लिखा है-

उदये संकमसुदये चउसु वि दादुं कमेण णोसक्कं।
उवसंतं च णिधत्तिं णिकाचिदं तं अपुव्वो त्ति ॥४५०॥

जो कर्म उदयावलिमें नहीं दिया जा सकता उसकी उपशान्त संज्ञा है, जो कर्म संक्रम और उदयावलिमें नहीं दिया जा सकता उसकी निधत्ति संज्ञा है तथा जो कर्म उदयावलिमें न दिया जा सके, जिसका संक्रम, उत्कर्षण और अपकर्षण भी न हो सके उसकी निकाचित संज्ञा है। ये तीनों अपूर्वकरण तक होते हैं, आगे इनकी व्युच्छित्ति है।

उपशम, निधत्ति और निकाचित इन तीनके विषयमें कर्मशास्त्रका यह अकाट्य नियम है, इसमें अपवाद नहीं। अतएव इसके प्रकाशमें जब हम धवला पु० ६ पृ० ४२७-२८ के वचन पर विचार करते हैं तो उससे यही तथ्य फलित होता है कि स्वभावदृष्टिसे जिनदेवका जो स्वरूप है वही आत्माका स्वरूप है ऐसा निर्णय करके जो आसन्न भव्य जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेके प्रसंगसे जिनविम्बका अवलोकन करते समय अन्तरङ्गमें स्वभावसन्मुख होकर अधःकरण और अपूर्वकरण परिणामोंको उलंघन कर अनिवृत्तिकरणमें प्रवेश करता है उसका निधत्ति और निकाचितरूप मिथ्यात्वादि कर्मकलाप अनिधत्त और अनिकाचित हो जाता है। यह धवलाके उक्त कथनका तात्पर्य है। धवलाका वह कथन सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके प्रकरणसे ही सम्बन्ध रखता है, इसलिए आचार्य वीरसेनने उक्त कथन द्वारा उसी नियमका सूचन किया है जिसका प्रकृतमें हमने स्पष्टीकरण किया है। इसपरसे यदि अपर पक्ष यह तथ्य फलित करना चाहे कि बाह्यमें चाहे जैसी भूमिका रहने पर केवल बाह्य निमित्तोंके बलसे उपशान्त, निधत्ति और निकाचितरूप कर्म अनुपशान्त, अनिधत्त और अनिकाचित हो जाते होंगे, सो अपर पक्षका ऐसा विचार करना आगम सम्मत नहीं है। आगममें सब व्यवस्थाऐं सुनिश्चित हैं। उन्हींके आधारसे सब कार्य होते हैं।

उपशान्त, निधत्ति और निकाचित कर्मका स्वमुखसे ही उदय होता है ऐसा कर्मशास्त्रका नियम भी नहीं है। हमने अपने पूर्व वक्तव्यमें ऐसा विधान भी नहीं किया है, इसलिए इस प्रश्नको यहाँ उपस्थित कर उसकी चर्चा करना बेमतलब है।

‘जो कर्म उपशम, निधत्ति और निकाचितरूप नहीं है वे बन्धावलिके वाद उदीरणा आदिके योग्य होते हैं’ यह अपर पक्षने स्वीकार कर लिया यह प्रसन्नताकी वात है । किन्तु किस कर्मकी कब उदीरणा हो, कब उत्कर्षण, अपकर्षण या संक्रमण हो यह केवल द्रव्ययोग्यतासे सम्बन्ध रखनेवाली वात न होकर द्रव्य-पर्याय दोनों प्रकारकी योग्यतासे सम्बन्ध रखती है। आशय यह है कि जब प्रत्येक कर्म समर्थ उपादान होकर उदीरणा आदिके सन्मुख होता है तभी वाह्य सामग्रीको निमित्तकर उसकी उदीरणा, उत्कर्षण आदि होते हैं।

कर्मशास्त्रमें बन्धावलिके वाद उत्कर्षण आदि होना संभव है यह जो विधान किया है वह यथार्थ है, परन्तु काल भी एक निमित्त है, इसलिए कोई भी काल किसी भी कार्यके लिए निमित्त हो जाय ऐसा आगमका नियम नहीं है। किन्तु निश्चित कार्यके लिए निश्चित काल ही निमित्त होता है ऐसा कालनियम अवश्य है। निश्चित कालके साथ निश्चित अन्य बाह्य सामग्री भी प्रत्येक कार्यमें निमित्त होती है, इसलिए आचार्योंने केवल कालसे ही सब कार्य होते हैं इसका निषेध अवश्य किया है। पर निश्चित काल निमित्त न हो और कार्य हो जाय ऐसा नहीं है। देखो, अप्रशस्त उपशम आदिरूप कर्मको जो उदीरणा आदिके अयोग्य बतलाया है सो उसे भी प्रतिनियत काल तक ही ऐसा जानना चाहिए। इससे प्रतिनियत काल ही प्रतिनियत कार्यके लिए हेतु होता है ऐसा यहाँ समझना चाहिए। इसी बातको स्पष्ट करते हुए जयधवला पु० ७, पृ० २४७ में लिखा है-

एत्थ चोदओ भणदि-उदयावलियबाहिरे वि ओकड्डुणादो ज्झीणट्ठिदियमप्पसत्थउवसामणा-णिधत्ती-करण-णिकाचणाकरणेहिं अत्थि चेव जाव दंसण-चरित्तमोहक्खवगुवसामयअपुव्वकरणचरिमसमओ त्ति तदो किं वुच्चदे उदयावलियबाहिरट्ठिदिट्ठिदपदेसग्गमोकड्डुणादो अज्झीणट्ठिदियमिदि? एत्थ परिहारो वुच्चदे-जिस्से ट्ठिदीए पदेसग्गस्स ओकड्डुणा अच्चंतं ण संभवइ सा ट्ठिदी ओकड्डुणादो झीणा वुच्चइ, तिस्से अच्चंताभावेण पडिग्गहियत्तादो। ण च णिकाचिदपरमाणूणमेवंविहो णियमो अत्थि, अपुव्वकरणचरिमसमयादो उवरि तेसिमोकड्डणादिपाओग्गभावेण पडिणिययकालपडिबद्धाए ओकड्डणादीणमणागमण-पइज्जाए अणुवलंभादो।

शंका-यहाँ पर शंकाकार कहता है कि उदयावलिके बाहिर भी अप्रशस्त उपशामना, निधत्तीकरण और निकाचनाकरणके सम्बन्धसे ऐसे कर्मपरमाणु बच रहते हैं जो अपकर्षणके अयोग्य हैं और उनकी यह अयोग्यता दर्शनमोहनीय या चारित्रमोहनीयकी क्षपणा या उपशमना करनेवाले जीवके अपूर्वकरणके अन्तिम समय तक बनी रहती है, तब फिर यह क्यों कहा जाता है कि उदयावलिके बाहिरकी स्थितियोंमें स्थित कर्मपरमाणु अपकर्षणके योग्य हैं?

समाधान-जिस स्थितिके कर्मपरमाणुओंकी अपकर्षणा विलकुल ही सम्भव नहीं, केवल वही स्थिति यहाँ अपकर्षणाके अयोग्य कही गई है, क्योंकि यहाँ ऐसे कर्मपरमाणुओंकी अपकर्षणाका निषेध किया है जो किसी भी हालतमें सम्भव नहीं है। किन्तु निकाचित आदि अवस्थाको प्राप्त हुए कर्मपरमाणुओंका ऐसा नियम तो है नहीं, क्योंकि वे कर्मपरमाणु अपूर्वकरणके अन्तिम समयके बाद अनिवृत्तिकरणमें अपकर्षणा आदिके योग्य हो जाते हैं। और तब फिर उनकी अपकर्षणा आदिको नहीं प्राप्त होनेकी जो प्रतिनियत काल तककी प्रतिज्ञा है वह भी नहीं रहती।

इस उल्लेखसे यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि सत्तामें स्थित किस कर्मकी किस समय, घटी, घंटा या मुहूर्तबाद उदीरणा आदि होनेका नियम है उस कर्मकी उस कालमें नियमसे उदीरणा आदि होती है । उदयावलिके भीतर स्थित कर्म अपकर्षणादिकके सर्वथा अयोग्य हैं, इसलिए वहाँ उसका सर्वथ. निषेध किया है । किन्तु उदयावलिके बाद स्थित जितने भी कर्म हैं उनमेंसे सबकी उदीरणा आदिका एक कालनियम न होनेके कारण साथ ही सबकी एक-सी व्यवस्था न होनेके कारण उनका अलग-अलग निर्देश किया है । इसके लिए जयधवला पु० ७ में झीणाझीणचूलिका अनुयोगद्वार द्रष्टव्य है ।

यहाँ अपर पक्षने उद्वेलना आदिकी चरचा करते हुए यह बतलानेका प्रयत्न किया है कि ‘ये उद्वेलना आदि अनियमसे होते हैं ।’ किन्तु अपर पक्ष यह भूल जाता है कि कर्मशास्त्रमें जिसके लिए जो नियम निर्दिष्ट किये गये हैं उन नियमोंको उल्लंघन कर न उदीरणा होती है, न उद्वेलनासंक्रम होता है और न हो गुणसंक्रम या दूसरा कार्य ही होता है । यदि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना मिथ्यात्व गुणस्थानमें होनेका नियम है तो क्या बाह्य सामग्रीके बल पर वह अन्य गुणस्थानमें की जा सकती है ? यदि नहीं तो फिर यह सिद्धान्त स्वीकार कर लेनेमें क्या आपत्ति है कि प्रत्येक कार्य अपने-अपने समर्थ उपादानके अनुसार बाह्य सामग्रीको निमित्त कर स्वकालमें ही होता है । कर्मके जिस कार्यका जो स्थान और योग्यता नियत है उसके प्राप्त होने पर ही वह कार्य होता है यही तो नियति है और नियति किस वस्तुका नाम है ।

मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही मिथ्यात्वकी उदीरणा होती है और वेदकसम्यक्त्वके होनेपर ही सम्यक्त्वकी उदीरणा होती है । यही तो नियम है और नियम क्या वस्तु है । वही उनकी उदीरणाका स्वकाल है । फिर नहीं मालूम कि अपर पक्ष इनकी उदीरणाका नियत काल होने पर भी उसका निषेध किस आधार पर करनेका साहस करता है ।

यदि क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि जीवके क्षायिक सम्यक्त्वको उत्पन्न करते समय सम्यक्त्व प्रकृतिका गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम नहीं होता है तो गुणसंक्रम और सर्वसंक्रमके स्वकालमें होनेका निषेध कैसे हो गया । यह कोई तर्क है कि ‘क्षायिक सम्यक्त्वको उत्पन्न करते समय यदि सम्यक्त्व प्रकृतिका गुणसंक्रम या सर्वसंक्रम नहीं होता तो इनका कालनियम ही नहीं बनता ।’ सम्यक्त्व प्रकृतिके गुणसंक्रम, और सर्वसंक्रम उद्वेलनाके समय बनते हैं, क्षायिक सम्यक्त्वकी प्राप्तिके समय नहीं बनते ऐसी इस कर्मकी व्यवस्था है । और इसीके अनुसार इनके होनेका पृथक्-पृथक् जीवोंकी अपेक्षा पृथक्-पृथक कालनियम है ।

उपशमश्रेणि अनिवृत्तिकरण गुणस्थानपर एक साथ आरोहण करनेवाले दो जीवोंमेंसे अनन्तर समयमें एक मरकर चतुर्थ गुणस्थानको प्राप्त होता है और दूसरा सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानको प्राप्त होता है सो इन दोनोंका एक उपादान है यह अपर पक्षने किस आधारसे निर्णय किया ? यदि इसका वह स्पष्टीकरण कर देता तो तत्त्वमीमांसा करनेमें सुगमता जाती । मालूम पड़ता है कि अपर पक्षने केवल अनिवृत्तिकरणरूप परिणामको ही उपादानकारण समझ लिया है । उन दोनोंकी भवस्थिति जो जुदी-जुदी है उसे उसने लक्ष्यमें ही नहीं लिया है । कैसी भवस्थितिके साथ कैसा अनिवृत्तिकरण परिणाम होने पर उत्तर क्षणमें किस गुणस्थानरूप क्या परिणाम होता है ऐसा नियम है । उसी नियमके अनुसार एक उपशम अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवाला जीव मर कर अपने समर्थ उपादानके अनुसार चतुर्थ गुणस्थानको प्राप्त होता है और दूसरा सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानको प्राप्त होता है । यह है अपने-अपने उपादानगत विशेषताका फल । आशा है अपर पक्ष इस ओर ध्यान देकर अपने विचारोंमें सुधार अवश्य कर लेगा । जब प्रत्येक जीवका मोक्ष जानेका कालनियम है और इसी नियमके आधार पर ६०८ जीवोंका ६ माह ८ समयमें मोक्ष जानेका निर्देश किया है, इसलिए प्रत्येक जीवको तपके लिए अलग-अलग कालनियम बन जाता है और उसके बन जानेसे निर्जराका भी नियम बन जाता है। किसी भी चरमशरीरीका मोक्ष जानेका तो कालनियम हो और व्रतग्रहण, तपश्चरण आदिका कालनियम न हो यह नहीं हो सकता, अतएव सभी कार्य बाह्य-आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रतामें स्वकालमें ही होते हैं ऐसा यहाँ निश्चय करना चाहिए।

\३८. करणानुयोगसम्बन्धी विषयों पर उपस्थित आपत्तियोंका समाधान

अपर पक्षने प्रतिशंका २ में अकामनिर्जरा तथा उत्कर्षण, संक्रमण आदिके विषयमें चरचा स्वयं चलकर की है और इसीकारण उत्तर २ में इन सब विषयों पर हमें विचार करना पड़ा है। किन्तु अब अपर पक्षकी शिकायत है कि इन सब विषयोंकी चरचा निमित्तसम्बन्धी प्रश्नके उत्तरमें करनी थी। यहाँ यह सब चरचा क्यों की गई ? इस पर हमारा उत्तर स्पष्ट है कि यदि शंकाकार पक्ष प्रत्येक प्रश्नकी मर्यादाको ध्यानमें रख कर अपनी शंका प्रस्तुत करता तो हमारी ओरसे उस मर्यादाका अवश्य ही पालन किया जाता। अस्तु,

हमने अपने पिछले उत्तरमें जो हेतु नं० ३ व ४ दिये हैं। उन परसे अपर पक्षने जो यह तात्पर्य फलित किया है कि एक ही निमित्तकारण होनेसे ‘एक ही कार्य होना चाहिए था, भिन्न-भिन्न नहीं।’ सो अपर पक्षने यह ठीक आशय लिया है। यही तो हमारा कहना है कि यदि बाह्य सामग्री निमित्त बन कर दूसरे द्रव्यके कार्यमें व्यापार करती है तो उससे एक कालमें एक ही कार्य होना चाहिए, क्योंकि कोई भी वस्तु एक कालमें एक ही क्रिया कर सकती है, एक वस्तु एक कालमें अनेक क्रिया करे यह तो जिनागम नहीं है।

अपर पक्षने लिखा है कि एक लाठीके प्रयोगसे भिन्न-भिन्न आकारवाले कपालोंकी उत्पत्ति देखी जाती है और इसकी पुष्टिमें धवला पु० १ पृ० २१९ का प्रमाण दिया है। सो एक तो यह प्रमाण ही यह सिद्ध करता है कि प्रत्येक कार्य अपने-अपने उपादानके अनुसार ही होता है, बाह्य सामग्री तो उसमें निमित्त मात्र है। दूसरे अपर पक्षने प्रमाणरूपमें धवला पु० १ पृ० २१९ का जितना अंश उद्धृत किया है वह केवल भ्रममें डालनेके अभिप्रायसे ही उसने उद्धृत किया है। अन्यथा वह उसके आगेके अंशको अवश्य ही उपस्थित करता। वह आगेका अंश इस प्रकार है-

तत्थ वि होदु णाम मोग्गरो एओ, ण तस्स सत्तीणमेयत्तं। तदो एयक्खप्परुप्पत्तिपसंगादो इदि चे तो क्खहि एत्थ वि भवदु णाम ट्ठिदिकंडयघाद-अणुभागकंडयघाद-ट्ठिदिबंधोसरण-गुणसंकम-गुणसेढी-ट्ठिदि-अणुभागबंधपरिणामाणं णाणत्तं। तो वि एगसमयसंठियणाणाजीवाणं सरिसा चेव, अण्णहा अणियट्टिविसेसणाणुववत्तीदो।

शंका-वहाँपर मुद्गर एक भले ही रहा जावे, परन्तु उसकी शक्तियोंमें एकपना नहीं बन सकता है। यदि मुद्गरकी शक्तियोंमें एकपना मान लिया जावे तो उससे एक कपालरूप कार्यकी ही उत्पत्ति होगी ?

समाधान-यदि ऐसा है तो यहाँपर भी स्थितिकाण्डकघात, अनुभागकाण्डकघात, स्थितिबन्धापसरण, गुणसंक्रमण, गुणश्रेणिनिर्जरा, स्थितिबन्ध और अनुभागबन्धरूप परिणामोंमें नानापना रहा आवे। तो भी एक समयमें स्थित नाना जीवोंके परिणाम सदृश ही होते हैं, अन्यथा अनिवृत्ति यह विशेषण नहीं बन सकता।

यह ऐसा प्रमाण है जो प्रतिनियत कार्यके प्रतिनियत उपादान और उसकी निमित्तभूत प्रतिनियत बाह्य-सामग्रीको सूचित करता है। देखिए, सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानके अन्तिम समयमें परिणाम एक है पर वहाँ होनेवाले ज्ञानावरणादि कर्मोंके स्थितिबन्ध और अनुभागबन्धमें कितनी विलक्षणता देखी जाती है। क्या इससे सर्वत्र यह अनुमान नहीं किया जा सकता कि सभी कार्योंकी बाह्याभ्यन्तर सामग्री प्रतिनियत है। यद्यपि ऐसा है फिर भी प्रत्येक उपादानसे जो भी कार्य होता है वह बाह्य-कारणनिरपेक्ष ही होता है। जयधवला पु० ७ पृ० ११७ में इस विषयको स्पष्ट करते हुए लिखा भी है-

बज्झकारणणिरवेक्खो वत्थुपरिणामो।

प्रत्येक वस्तुका परिणमन बाह्यकारण निरपेक्ष होता है। अतएव अनेक कार्योंकी निमित्तभूत बाह्य सामग्री चाहे एक हो या अनेक, कार्य बाह्य सामग्रीसे निरपेक्ष होकर उपादानके अनुसार ही होता है ऐसा यहाँ समझना चाहिए। इतना अवश्य है कि बाह्य-सामग्री उपादानगत विशेषताकी सूचक होनेसे प्रत्येक कार्यकी उत्पत्तिमें व्यवहारसे कारणरूपसे उसका भी निर्देश किया जाता है। अपर पक्षने धवला पु० १२ पृ० ३८० व ४५१ का सहकारीकारणके भेदसे कार्यभेदका जो प्रमाण उपस्थित किया है वह इसी आशयको सूचित करता है। बाह्य-सामग्रीको उपचरित हेतु, व्यवहार हेतु, उपकरणमात्र, निमित्तमात्र आदि कहनेका भी यही कारण है। जब कि प्रत्येक पर्याय स्वकालमें स्वयं सत् है ऐसी अवस्थामें उसकी उत्पत्ति परसे मानना कथमपि सम्भव नहीं है। बाह्य-सामग्री तो भट्टाकलंकदेवके शब्दोंमें (तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० २) उपकरणमात्र है। इसका तात्पर्य ही यह है कि प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें अपनी-अपनी शक्तिसे ही उस उस पर्यायरूपसे उत्पन्न होता है। अन्यके द्वारा अन्यकी उत्पत्ति होती है यह तो कथनमात्र है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए हरिवंशपुराण सर्ग ४४ में कहा है-

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्राम्यति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते ॥१२॥

आत्मा स्वयं कर्म करता है, स्वयं उसके फलको भोगता है, स्वयं संसारमें भ्रमता है और स्वयं उससे मुक्त होता है ॥१२॥

यह सम्यक् जैनदर्शन है। इस आधारसे जितनी भी कार्य-कारणव्यवस्था परमागममें उपदिष्ट है वह यथार्थ है। अतएव इस आधारसे कार्य-कारणभावका निर्णय करना प्रत्येक श्रुतज्ञानी जीवका कर्तव्य है।

अपर पक्षने विस्रसोपचयका प्रश्न उपस्थित कर ‘समर्थ उपादान या निश्चय उपादानकी अपेक्षा प्रत्येक समयमें कुछ विस्रसोपचय बन्धके योग्य होते हैं और कुछ बन्धके योग्य नहीं होते,’ हमारे इस अभिप्रायका खण्डन करते हुए लिखा है कि ‘कर्मवर्गणाका लक्षण ही यह है कि वह द्रव्यकर्मरूप परिणमनके योग्य है। द्रव्यकर्मरूप परिणमन करनेका नाम ही बन्ध है। जैसे ऊपर कह आये हैं श्री वीरसेन स्वामीने भी धवल पु० १२ पृ० २७६-७७ पर यह ही उत्तर दिया कि कर्मस्कन्धोंमें समान शक्ति होते हुए भी, जीवमें इतनी शक्ति नहीं है जो सर्व कर्मवर्गणाओंको एक समयमें कर्मरूप परिणमा सके। यह उत्तर नहीं दिया कि जिन कर्मवर्गणाओंमें योग्यता है वही कर्मरूप परिणमती हैं, शेष योग्यता नहीं होनेके कारण नहीं परिणमती हैं। प्रत्युत सबमें समान शक्ति मानी गई है।’

आगे अपने इस अभिप्रायको पुष्ट करनेके लिए अपर पक्षने धवला पु० १२ पृ० २७६-७७ का वह प्रमाण उपस्थित कर अन्तमें पूर्वोक्त अभिप्रायकी पुष्टिमें एक नोट भी लगाया है। तथा आगे इसी विषयके समर्थनमें और प्रमाण भी उपस्थित किया है।

इस प्रकार इस पूरे कथनके आधार पर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि जिस द्रव्यमें जो जो कीर्य होता है वह तो उसके लिए सदा ही उपादान है, मात्र जब जैसे निमित्त मिलते हैं उनके अनुसार कार्य होता है । यदि सब विस्रसोपचय एक साथ कर्मरूप नहीं परिणमते तो इसका कारण वे विस्रसोपचय स्वयं नहीं हैं । यदि इसका कोई मुख्य कारण है तो जीवमें सबको एक साथ कर्मरूप परिणमा सकनेकी शक्तिका अभाव ही है । अपर पक्षकी दृष्टिसे यदि इसी बातको और फैलाकर कहा जाय तो यह कहा जा सकता है कि जितने भी भव्य जीव हैं उन सबमें मुक्त होनेकी सदा ही द्रव्य-पर्याय योग्यता है । यदि उन्हें एक साथ मुक्ति नहीं मिलती तो इसका कारण वे भव्य जीव स्वयं नहीं हैं । यदि इसका कोई कारण है तो निमित्तोंमें सबको एक साथ मुक्ति न दिला सकनेकी शक्तिका अभाव ही है ।

यह अपर पक्षके उक्त वक्तव्यका अभिप्राय है । किन्तु अपर पक्षका यह कथन निश्चय पक्षका किस प्रकार अपलाप करनेवाला है आगे इसपर सांगोपांग प्रकाश डालते हैं-

यहाँ सर्व प्रथम तो यह देखना है कि धवला पु० १२ का वह प्रकरण कर्मबन्धका किस नयसे कौन निमित्त है इसका ज्ञान करानेके लिए लिखा गया है या किस कर्मबन्धका कौन समर्थ या निश्चय उपादान है इसका ज्ञान करानेके लिए लिखा गया है ? पूरे प्रकरणपर दृष्टिपात करनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्मबन्धका किस नयसे कौन निमित्त है, मात्र इसका ज्ञान करानेके लिए ही वह प्रकरण लिखा गया है । धवला टीकामें भी उसी आशयको स्पष्ट किया गया है । किस कर्मबन्धका कौन समर्थ या निश्चय उपादान है इसका तो वहाँ विचार ही नहीं किया गया है ।

खुलासा इस प्रकार है-नैगम, संग्रह और व्यवहार ये तीनों द्रव्यार्थिकनयके भेद हैं । और द्रव्यार्थिकनय पर्याय योग्यताको गौणकर मात्र द्रव्य योग्यताके आधारसे विचार करता है । प्राणातिपात, मृषावाद आदिको जो कर्मबन्धका बाह्य हेतु कहा है वह द्रव्यार्थिकनयकी अपेक्षा कहा है । आचार्य वीरसेनने इसके समर्थनमें पूर्वोक्त जितने तर्क दिये हैं वे सब द्रव्यार्थिकनयकी मुख्यतासे ही दिये हैं । उदाहरणार्थ सहकारी कारण और कार्यके मध्य कालप्रत्यासत्ति स्वीकार की गई है । इसे अपर पक्ष पहले ही स्वीकार कर आया है । किन्तु जब यहाँ यह प्रश्न उपस्थित किया गया कि तीन लोकमें अवस्थित कर्मवर्गणाएँ एक साथ ज्ञानावरणादिरूप क्यों नहीं परिणम जातीं तो आचार्य वीरसेन द्रव्यार्थिकनयसे इसका समाधान करते हुए लिखते हैं कि देशविषयप्रत्यासत्तिका अभाव होनेसे वे एक साथ ज्ञानावरणादिरूप नहीं परिणमतीं । आगे यह प्रश्न होनेपर कि एक अवगाहनाविषयक प्रत्यासत्तिके रहते हुए भी सभी कार्मणस्कन्ध ज्ञानावरणादिरूप क्यों नहीं परिणम जाते ? आचार्य वीरसेनने कालप्रत्यासत्तिका अभाव है यह उत्तर न देकर जीवमें एक साथ उस प्रकारके परिणमानेकी शक्तिका अभाव है यह जो उत्तर दिया है सो यह उत्तर भी पर्यायार्थिकनयको गौण करके ही दिया है । जब कि वस्तुस्थिति यह है कि प्रत्येक समयमें पृथक्-पृथक् ज्ञानावरणादि कर्मरूप परिणमनके सन्मुख हुई कर्मवर्गणाऐं ही जीवके योग और कषायको निमित्तकर ज्ञानावरणादिरूप परिणमती हैं ।

ये प्राणातिपात आदि द्रव्यार्थिकनयसे कारण कहे गये हैं इसकी पुष्टि पूरे स्पष्टीकरणके साथ स्वयं आचार्य पुष्पदन्त और भूतबलिने तथा आचार्य वीरसेनने की है । इसके लिये देखो धवला पु० १२ पृ० २८८ आदि । आचार्य वीरसेन लिखते हैं-

ण पाणादिवाद-मुसावादादत्तादाण-मेहुण-परिग्गह-रादिभोयणपच्चए णाणावरणीयं बज्झदि, तेण विणा कि अप्पमत्तसंजदादिसु बंधुवलंभादो । ण कोह-माण-माया-लोभेहि बज्झइ, कम्मोदइल्लाणं तेसि-
मुदयविरहिदद्धाए तब्बंधुवलंभादो। ण णिदाणब्भक्खाण-कलह-पेसुण्ण-रइ-अरइ-उवहि-णियदि-माण-माय-मोस-मिच्छाणाण-मिच्छदंसणेहि, तेहि विणा वि सुहुमसांपराइयसंजदेसु तब्बंधुवलंभादो। यद्यस्मिन् सत्येव भवति नासति तत्तस्य कारणमिति न्यायात्। तम्हा णाणावरणीयवेयणा जोग-कसाएहि चेव होदि त्ति सिद्धं।

प्राणातिपात, मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन, परिग्रह और रात्रिभोजन प्रत्ययोंसे ज्ञानावरणीयकर्मका बन्ध नहीं होता है, क्योंकि उनके बिना भी अप्रमत्तसंयतादिकोंमें उसका बन्ध उपलब्ध होता है। क्रोध, मान, माया और लोभसे भी उसका बन्ध नहीं होता, क्योंकि कर्मके उदयसे युक्त उनके उदयरहित कालमें भी उसका बन्ध उपलब्ध होता है! निदान, अभ्याख्यान, कलह, पैशून्य, रति, अरति, उपधि, निकृति, मान, मेय, मोष, मिथ्याज्ञान और मिथ्यादर्शनसे भी उसका बन्ध नहीं होता, क्योंकि उनके बिना भी सूक्ष्मसाम्परायिक संयतोंमें उसका बन्ध उपलब्ध होता है। जो जिसके होनेपर ही होता है और जिसके नहीं होनेपर नहीं होता है वह उसका कारण है ऐसा न्याय है। इसलिए ज्ञानावरणीयवेदना योग और कषायसे होती है यह सिद्ध हुआ।

इससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि द्रव्यार्थिकनयसे मात्र सामान्य कारणका ज्ञान होता है। किन्तु प्रत्येक समयमें जो भी कार्य होता है वह पर्याय विशेषरूप बाह्याभ्यन्तर उभय सामग्रीके सद्भावमें ही होता है, अन्यथा नहीं होता। यह नियम व्यवहारनयसे जहाँ बाह्य सामग्रीपर लागू होता है वहाँ निश्चयनयसे निश्चय उपादानरूप आभ्यन्तर सामग्रीपर भी लागू होता है। इन दोनोंका योग प्रत्येक समयमें मिलता है और तदनुरूप कार्य भी प्रत्येक समयमें होता है।

संक्षेपमें तात्पर्य यह है कि प्रकृतमें द्रव्यार्थिकनयका जितना भी कथन है वह मात्र इतना ज्ञान कराता है कि प्राणातिपात आदि कारण होकर भी इनके सद्भावमें ही बन्ध कार्य होता है, अन्यथा नहीं होता ऐसा नियम नहीं है। हाँ पर्यायार्थिकनयसे योग और कषाय नियमसे कार्यवाले होते हैं। किन्तु है यह सब असद्भूतव्यवहार नयका ही कथन इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए धवला पु० ६ पृ० ११ में लिखा है-

मुह्यत इति मोहनीयम्। एवं संते जीवस्स मोहणीयत्तं पसज्जदि त्ति णासंकणिज्जं, जीवादो अभिण्णम्हि’ पोग्गलदव्वे कम्मसण्णिदे उवयारेण कत्तारत्तमारोविय तथा उत्तीदो ।

जिसके द्वारा मोहा जाय वह मोहनीय है।

शंका-ऐसा होनेपर जीवको मोहनीयपना प्राप्त होता है?

समाधान-ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जीवसे अभिन्न अर्थात् एक क्षेत्रावगाहरूपसे स्थित तथा कर्म संज्ञावाले पुद्गल द्रव्यमें उपचारसे कर्तृत्वका आरोप करके उस प्रकारका कथन किया गया है।

अतएव प्रत्येक कार्यका यथार्थ हेतु समर्थ या निश्चय उपादान ही है। व्यवहारसे कालप्रत्यासत्ति होनेके कारण जिसके साथ बाह्य व्याप्ति उपलब्ध होती है उसे भी हेतु, प्रत्यय या निमित्त कहा जाता है। उक्त सन्दर्भ द्वारा आचार्य वीरसेनने यही अभिप्राय व्यक्त किया है।

आगे अपर पक्षने एक समयमें योगको निमित्त कर कितने प्रमाणमें कर्मवर्गणाऐं या आहारादि वर्गणाऐं बँधती हैं यह जो चर्चा की है सो यह भी प्रत्येक कार्यके प्रतिनियत निमित्तको ही सूचित करती है। जैसे प्रत्येक कार्यका प्रतिनियत उपादान होता है वैसे ही प्रतिनियत बाह्य-सामग्रीरूप निमित्त भी होता है। यही सनातन सत्य कार्य-कारणव्यवस्था है। अपर पक्ष इसे ही तो स्वीकार करनेसे हिचकिचाता है। यदि वह इसे स्वीकार कर लेता है तो बहुत-कुछ विवाद समाप्त हो जाता है।

धवला या जयधवलामें जो यह लिखा है कि ‘आगम तर्कका विषय नहीं है’ वह यथार्थ लिखा है। अतएव यह अपर पक्षको ही विचार करना है कि श्रुतज्ञानियोंकी दृष्टिसे जो वह तर्काश्रित प्ररूपणा करके अपने अभिप्रायकी पुष्टि करना चाहता है वह कहाँतक ठीक है। प्रत्येक कार्यकी अपने उपादानके साथ आभ्यन्तर व्याप्ति होती है और बाह्य-सामग्रीरूप निमित्तके साथ बाह्य-व्याप्ति होती है। यह कार्य-कारणभावकी अकाट्य व्यवस्था है। व्याप्तिका अर्थ ही यह है कि जिसके होनेपर जो हो और जिसके अभावमें जो न हो। यह नियम ही प्रतिनियत कार्यकी प्रतिनियत बाह्याभ्यन्तर सामग्रीको सूचित करता है। किन्तु अपर पक्ष प्रमाण तो आगमका उपस्थित करता है और कहता है अपनी बात। हम उससे पूछते हैं कि यह किस आगममें लिखा है कि अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यरूप उपादान अनेक योग्यताओंवाला होता है, उनमेंसे जिस योग्यताके अनुरूप बाह्य सामग्री मिलती है, कार्य उसके अनुरूप होता है। क्या यह स्वकल्पित कल्पना नहीं है? इसका अपर पक्ष ही विचार करे। यदि उसे सचमुचमें आगमको स्वीकार करना इष्ट है तो उसे यह भीतरसे स्वीकार कर लेना चाहिए कि प्रत्येक कार्यकी बाह्य और आभ्यन्तर उपाधि सुनिश्चित है। इसलिए प्रत्येक द्रव्यका प्रत्येक समयमें अपने-अपने उपादानके अनुसार बाह्य सामग्रीको निमित्त कर सुनिश्चित कार्य ही होता है। धवला आदि ग्रन्थोंके टीकाकार इस नियमको उन ग्रन्थोंके आधारसे बराबर समझते हैं। उन्हें कहीं कोई भ्रम नहीं है। वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि आगममें निश्चयनय और व्यवहारनय दोनों नयोंकी मुख्यतासे कथन उपलब्ध होता है। जहाँ बाह्य-निमित्त प्रधान कथन है वह व्यवहारनयका कथन है और जहाँ उपादानप्रधान कथन है वह निश्चयनयका कथन है। प्रत्येक कार्यकी अपने निश्चय उपादानके साथ आभ्यन्तर व्याप्ति है और उसमें निमित्त होनेवाली बाह्य सामग्रीके साथ बाह्य व्याप्ति है, इसलिए चाहे आभ्यन्तर व्याप्तिको लक्ष्यमें रखकर कथन किया जाय या चाहे बाह्य व्याप्तिको लक्ष्यमें रखकर कथन किया जाय, दोनोंका तात्पर्य एक ही होगा। उदाहरणार्थ आठ कर्मोंके अभावके साथ मुक्तिकी बाह्य व्याप्ति है और रत्नत्रयकी समग्रतारूपसे परिणत आत्माके साथ मुक्तिकी आभ्यन्तर व्याप्ति है, इसलिए ‘आठ कर्मोंके अभावसे मुक्ति प्राप्त होती है’ चाहे यह कहो या चाहे ‘रत्नत्रयकी समग्रतारूपसे परिणत आत्मा मुक्तिको उत्पन्न करता है’ यह कहो, दोनों कथनोंसे एक ही अर्थका ज्ञान होता है। इसलिए आगममें प्रयोजनानुसार दोनों प्रकारसे निरूपण किया गया है। इस विषयको स्पष्टरूपसे समझनेके लिए प्रवचनसार गाथा १८९ की आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीका द्रष्टव्य है-

रागपरिणाम एवात्मनः कर्म, स एव पुण्य-पापद्वैतम्। रागपरिणामस्यैवात्मा कर्ता, तस्यैवोपादाता हाता चेत्येष शुद्धद्रव्यनिरूपणात्मको निश्चयनयः। यस्तु पुद्गलपरिणाम आत्मनः कर्म, स एव पुण्य-पापद्वैतम्। पुद्गलपरिणामस्यात्मा कर्ता तस्योपादाता हाता चेति सोऽशुद्धद्रव्यनिरूपणात्मको व्यवहारनयः।

राग परिणाम ही आत्माका कर्म है, वही पुण्य-पाप द्वैत है। आत्मा रागपरिणामका ही कर्ता है, उसीको ग्रहण करनेवाला है और उसीको त्याग करनेवाला है। यह शुद्ध द्रव्यका निरूपणस्वरूप निश्चयनय है। किन्तु जो पुद्गल परिणाम आत्माका कर्म है, वही पुण्य-पाप द्वैत है। आत्मा पुद्गल परिणामका कर्ता है, उसीको ग्रहण करनेवाला और त्यागनेवाला है। यह अशुद्ध द्रव्यका निरूपणस्वरूप व्यवहारनय है। प्रवचनसार टीकाका यह ऐसा वचन है जिससे दोनों प्रकारकी कथनी पर सम्यक् प्रकाश पड़ता है। यहाँ पर शुद्ध शब्दका प्रयोग एक द्रव्याश्रित परिणामकी विवक्षासे किया गया है और अशुद्ध शब्दका प्रयोग अन्य द्रव्यके परिणामको अन्य द्रव्यमें लगानेके अभिप्रायसे किया गया है। इससे यह बात सहज ही समझमें आ जाती है कि एक द्रव्याश्रित जितना भी कर्ता-कर्म आदिका कथन है वह यथार्थ है और एक द्रव्यको दूसरे द्रव्यके कार्यका कर्ता आदि बनाकर जितना भी कथन किया जाता है वह असद्भूतव्यवहाररूप होनेसे उपचरित है।

अपर पक्षका कहना है कि जीवमें एक समयमें जितने कर्मपरमाणु बाँधनेकी शक्ति है उतने कर्मपरमाणु एक समयमें जीव बाँधता है। वैसे कर्मपरमाणुओंमें तो सभीमें एक साथ बँधनेकी योग्यता है। यदि वे एक साथ नहीं बँधते हैं तो उसका कारण वे स्वयं न होकर जीवका हीनशक्ति होना है यह अपर पक्षका कथन है। किन्तु वस्तुस्थिति क्या है इसके लिए पञ्चास्तिकायका यह वचन अवलोकनीय है-

अत्ता कुणदि सभावं तत्थ गदा पोग्गला सभावेहिं।
गच्छंति कम्मभावं अण्णोण्णावगाहमवगाढा ॥६५॥

आत्मा अपने भावको करता है, तथा वहाँ रहनेवाले पुद्गल अपने भावोंसे अन्योन्यावगाह-अवगाढ़ होकर कर्मभावको प्राप्त होते हैं ॥६५॥

इस वचनसे जहाँ उपादान-उपादेयभावकी यथार्थ व्यवस्था क्या है इसका ज्ञान होता है वहाँ उसके साथ निमित्त-नैमित्तिकभावकी क्या व्यवस्था है इसकी भी सम्यक् जानकारी मिल जाती है। अपर पक्ष बाह्य-सामग्रीमात्रको निमित्तरूपसे स्वीकार न कर जिस प्रकार प्रतिनियत पर्यायकी अपेक्षा उसे निमित्तरूपसे स्वीकार करता है उसी प्रकार वह मात्र द्रव्यप्रत्यासत्तिको उपादानरूपसे स्वीकार न कर यदि प्रतिनियत पर्यायकी अपेक्षा उसे उपादानरूपसे स्वीकार कर ले तो अपने पिछले उत्तरमें हमने जिन बातोंका निर्देश किया है वे सब उसे यथार्थ प्रतीत होने लगें। गलती कहाँ हो रही है इस ओर उसे ध्यान देना है।

हमारी छठी बातकी चरचा करते हुए अपर पक्षने लिखा है कि ‘उपादानकी कार्यके साथ एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणता होती है।’ आदि। सो अपर पक्षका यह लिखना ही भ्रमोत्पादक है, क्योंकि-

\१. अनन्तर पूर्वोत्तर दो क्षणोंमें ही हेतु-फलभाव देखा जाता है। व्यवहित पूर्वोत्तर दो क्षणोंमें हेतु-फलभाव नहीं बनता।-प्रमेयरत्नमाला ३, ५७।

\२. परस्परमें अव्यवहित अग्नि-धूमादिकमें ही तदुत्पत्ति बनती है, व्यवहित कालवालेमें नहीं, क्योंकि ऐसा होनेपर अतिप्रसंग दोष आता है।-प्रमेयकमलमार्तण्ड ३, ६१।

\३. परिणमन शक्तिलक्षण प्रतिविशिष्ट अन्तःसामग्री ही उपादान होती है।-अष्टसहस्री पृ० १५०।

\४. पर्यायविशेषात्मक द्रव्यमें ही उपादानता प्रतीत होती है, घटपरिणमनमें समर्थ पर्यायस्वरूप मिट्टी द्रव्यमें घटकी उपादानताके समान।-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६९।

इससे स्पष्ट है कि एक द्रव्य प्रत्यासत्तिके आधारपर अव्यवहित पूर्वोत्तर दो क्षणों ( पर्यायों ) में ही उपादान-उपादेयभाव आगममें स्वीकार किया गया है, केवल द्रव्यप्रत्यासत्तिमें उपादान कारणता आगममें स्वीकार नहीं की गई है, अतएव समनन्तर पूर्वपर्यायमें कारणताके बन जानेसे उससे समनन्तर नियत उत्तर पर्यायकी उत्पत्ति अवश्य होगी और उसमें व्यवहारसे निमित्त होनेवाली बाह्य सामग्रीका योग भी अवश्य मिलेगा। ऐसा नहीं हो सकता कि उपादानके अपने कार्यके सम्मुख होनेपर बाह्य सामग्रीका योग न मिलनेसे कार्य रुका रहे या जिस कार्यका वह उपादान है, उससे वह कार्य न होकर बाह्य सामग्रीके बलपर अन्य कार्य हो जाय। ‘विवक्षित उपादानसे विवक्षित कार्य न होकर अन्य कार्य भी हो सकता है’ ऐसा न तो आगममें ही स्वीकार किया गया है और न लोकमें ही देखा जाता है। अतएव हम अपने पिछले उत्तरके समय छठी बातमें जो कुछ तथ्य प्ररूपित कर आये हैं वह यथार्थ है।

आगे अपर पक्षने कालप्रत्यासत्तिका बाह्य सामग्रीके आधार पर जो अर्थ किया है वह भी भ्रमोत्पादक है, क्योंकि जिस समय एक कार्यकी बाह्य सामग्रीके साथ बाह्य व्याप्ति होती है उसी समय उसकी अपने उपादानके साथ आभ्यन्तर व्याप्ति होती है। इसलिये व्यवहारसे जिस प्रकार उस कार्यका बाह्य सामग्रीके साथ अन्वय-व्यतिरेक बन जानेसे वह सामग्री व्यवहारसे उस कार्यकी निमित्त कहलाती है और निष्पन्न हुई पर्याय उस सामग्रीकी नैमित्तिक कहलाती है, उसी प्रकार निश्चयसे उस कार्यका अपनी उपादानभूत प्रतिविशिष्ट अन्तःसामग्रीके साथ अन्वय-व्यतिरेक बन जानेसे निश्चयसे वह प्रतिविशिष्ट अंतःसामग्री उसकी उपादान होती है और निष्पन्न हुई वह पर्याय उसका उपादेय होती है। कालप्रत्यासत्तिका यह सम्यक् अर्थ है। आगममें कालप्रत्यासत्तिके ये दोनों अर्थ स्वीकार किये गये हैं। ( उपादान-उपादेयभावकी दृष्टिसे देखो अष्टसहस्री पृ० १११ तथा निमित्त-नैमित्तिकभावकी दृष्टिसे देखो श्लोकवार्तिक पृ० १५१ )।

हमें इस बातकी प्रसन्नता है कि अपर पक्षने ‘एक द्रव्यका एक कालमें एक ही व्यापार होता है’ इस तथ्यको स्वीकार कर यह स्पष्ट शब्दोंमें मान लिया है कि ‘जो भी व्यापार होता है वह अपने उपादानकी अपेक्षा उपादेय है और अन्य वस्तुके परिणमनमें वही निमित्त है।’ अब देखना यह है कि वह एक व्यापार उपादान और निमित्त दो संज्ञाओं को कैसे धारण करता है ? क्या एक द्रव्यके उस व्यापारकी ये दोनों संज्ञाएँ वास्तविक हैं ? दोनों संज्ञाएँ एक कालमें वास्तविक तो हो नहीं सकतीं, क्योंकि उत्तर समयमें होनेवाले कार्य की अपेक्षा उसे उपादान कहा जावे यह तो बुद्धिसंगत प्रतीत होता है। किन्तु अन्य द्रव्यके कार्यकी अपेक्षा इसे वास्तवमें निमित्त कहा जाय यह बुद्धिसंगत प्रतीत नहीं होता। इससे स्पष्ट है कि इन दोनों संज्ञाओंमें उपादान यह संज्ञा अनुपचरित अर्थात् वास्तविक है और निमित्त यह संज्ञा पराश्रित होनेसे वास्तविक नहीं है। केवल दूसरेका साक्षी ( सूचक ) होनेसे यह संज्ञा रख दी गई है। इसीका नाम असद्भूतव्यवहार है। अतएव हमने अपने पिछले उत्तरमें अन्य वस्तुकी अपेक्षा निमित्त व्यवहारको वास्तविक माननेपर जो तीन आपत्तियाँ उपस्थित की हैं वे तब तक बराबर बनी रहती हैं जब तक अपर पक्ष निमित्तव्यवहारको असद्भूत नहीं स्वीकार कर लेता।

आगे हमने जो यह लिखा है कि सब द्रव्योंके उस-उस कालमें उस-उसरूप परिणमनेकी द्रव्य-पर्यायात्मक योग्यता सहज ही होती है आदि। सो हमारे ऐसा लिखने पर अपर पक्षको बड़ी आपत्ति है। वह नहीं चाहता कि सभी प्रकारके निमित्तोंको एक आसन पर बिठलाया जाय। वह इसमें आगम बाधा देखता है। किन्तु इस बातका विचार तो अपर पक्षको ही करना है कि प्रत्येक उपादानको अनेक योग्यता-वाला माननेपर उसके मतसे प्रेरक निमित्त और उदासीन निमित्त ये दो भेद बन कैसे सकते हैं ? क्योंकि वह पक्ष जब प्रत्येक उपादानको अनेक योग्यतावाला मानता है। उनमेंसे कौन योग्यता कार्यरूप परिणमे यह बाह्य सामग्री पर अवलम्बित है, ऐसी अवस्थामें सभी निमित्तोंको प्रेरक मानना पड़ता है। निमित्तोंके उदासीन निमित्त और प्रेरक निमित्त ये भेद बन ही नहीं सकते। किन्तु आगममें केवल द्रव्ययोग्यताको उपादान नहीं स्वीकार किया है। पर्याय उसका विशेषण है। अतएव प्रत्येक उपादानके अपने नियत कार्यको जन्म देते समय जो बाह्य सामग्री व्यवहारसे आश्रय निमित्त होती है उसकी उदासीन निमित्त संज्ञा है और जो बाह्य सामग्री व्यवहारसे कर्ता निमित्त या करण निमित्त होती है उसकी प्रेरक, प्रयोजक या निर्वर्तक निमित्त संज्ञा है । अतएव बाह्य सामग्रीमें प्रेरक निमित्त व उदासीन निमित्त ये दो भेद आगमके अनुसार तो बन जाते हैं, परन्तु अपर पक्षकी मान्यतानुसार नहीं बनते ऐसा यहाँ अभिप्राय लेना चाहिए ।

आगे अपर पक्षने हमारे ‘शब्द विवक्षित वाक्योंका रूप लेकर सीमित अर्थका ही प्रतिपादन करते हैं ।’ इत्यादि कथनके आधारसे जो यह लिखा है कि ‘जहाँ पर निश्चय नयकी मुख्यतासे कथन हो वहाँ पर व्यवहारनयका कथन उसके प्रतिपक्षीपनेके रूपमें स्वीकार होता है । लेकिन आपके मतानुसार यदि यह निश्चयनयका कथन है तो भी आपको इसका प्रतिपक्षी व्यवहारनयका कथन तो स्वीकार करना ही चाहिए । परन्तु जब आप व्यवहारनयके विषयको उपचरित, कल्पनारोपित, असद्भूत, मिथ्या आदिरूप मानते हैं तो फिर कैसे माना जाय कि आप व्यवहारनयके कथनको भी स्वीकार करते हैं ।’

इस पर हमारा कहना यह है कि सद्भूतव्यवहारनयका विषय तो सद्भूत ही होता है । किन्तु असद्भूत व्यवहारनयका विषय असद्भूत या उपचरित ही होता है । ऐसे स्थल पर निश्चयका अर्थ अनुपचरित है और उसके प्रतिपक्षी व्यवहारका अर्थ उपचरित है और इस प्रकार निश्चय-व्यवहारकी युति बन जाती है । असद्भूत व्यवहारका अर्थ असद्भूत या उपचरित है इसके लिए आलापपद्धतिका यह कथन दृष्टि-पथमें लेने योग्य है-

अन्यत्र प्रसिद्धस्य धर्मस्यान्यत्र समारोपणमसद्भूतव्यवहारः असद्भूतव्यवहार एवोपचारः ।

दूसरेमें प्रसिद्ध धर्मका दूसरेमें समारोप करना असद्भूत व्यवहार है । असद्भूत व्यवहार ही उपचार है ।

आचार्य कुन्दकुन्दने समयसार गाथा १०५ में इसी अर्थमें उपचार शब्दका प्रयोग किया है । उन्होंने गाथा १०६ में योद्धाओंका और राजाका जो उदाहरण दिया है वह भी इसी अर्थकी पुष्टि करता है । युद्ध योद्धा करते हैं और लोक ‘राजाने युद्ध किया’ यह कहते हैं । यह है लौकिक परिपाटी । इसीलिए हम उक्त आगम और तथ्यको ध्यानमें रखकर असद्भूत व्यवहारके कथनको उपचरित कहते हैं । अपर पक्ष अपने मनसे कहीं कुछ भी लिख आया हो । किन्तु उसके लिखनेमात्रसे निमित्त व्यवहार सद्भूत या वस्तुका वास्तविक धर्म सिद्ध नहीं हो जायगा । जो असद्भूत है वह असद्भूत ही रहेगा । निश्चयनयमें अंशरूप नयात्मकता अपनेमें विद्यमान कर्ता आदि धर्मोंको गौणकर धर्मीकी अपेक्षा है, परद्रव्यमें आरोपित कर्ता आदि धर्मोंकी अपेक्षा नहीं । किसी भी वस्तुमें जो भी धर्म सद्भूत होता है वह परनिरपेक्ष ही होता है । अपनेमें विद्यमान अन्य धर्मोंको गौणकर विवक्षित अंश धर्मको ग्रहण करना यह नयका कार्य है । अतएव निश्चयनयमें अंशरूप नयात्मकता रहते हुए भी असद्भूत व्यवहार निरपेक्षता ही सिद्ध होती है । हाँ, असद्भूत व्यवहार तभी व्यवहार कहलानेके योग्य है जब वह अपने निश्चयका ज्ञान करानेमें समर्थ हो । अतएव असद्भूत व्यवहारको यथार्थके आसनपर विठलाना किसी भी अवस्थामें उचित नहीं है ।

आगे अपर पक्षने पुनः स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षाकी ३२३ वीं गाथाकी चरचा उठाकर ‘णिच्छयदो’ पदका अपना अर्थ सूचित किया है । सो इसका संस्कृत टीकाकारने ‘निश्चयतः-परमार्थतः’ अर्थ किया है । वही हमने लिया है । घूम फिरकर अपर पक्ष भी उसी अर्थको सूचित कर रहा है । केवल कुछ लिखना चाहिए, इसलिए लिखा है । ऐसा ही पद्मपुराणके ‘यत्प्राप्तव्यम्’ इत्यादि श्लोकके विषयमें तथा भैया भगवतीदासजीके ‘जो जो देखी’ इत्यादि दोहेके विषयमें तथा स्वामी समन्तभद्रके ‘अलंघ्यशक्तिः’ इत्यादि श्लोकके विषयमें जानना चाहिए । इसकी विस्तृत चरचा पूर्वमें की जा चुकी है ।

आगे आयुकर्मकी चरचाके प्रसंगसे अपर पक्षने लिखा है कि ‘वास्तवमें कालमरण और अकालमरणका जितना भी कथन आगममें पाया जाता है वह सब व्यवहार कथन ही है, क्योंकि निश्चयनयसे आत्मा अपने-आपमें अमर ही है। हमें आश्चर्य होता है कि आप कालमरणको और अकालमरणको भी कालमरणकी ही संज्ञा देकर इसे भी निश्चयनयका ही विषय मानते हैं और फिर अपनी मान्यताकी पुष्टिके लिए यह कहते हैं कि तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ के ५३ वें सूत्रका कथन तथा अकलंकदेव आदि आचार्योंका इस विषयसम्बन्धी कथन व्यवहारनयका कथन है।’

यह अपर पक्ष द्वारा हमारे कथनपर टिप्पणी है। अपर पक्षने यहाँपर अपनी टिप्पणीमें जिस निश्चयनयका उल्लेख किया है वह परम पारिणामिक-भावको ग्रहण करनेवाला निश्चयनय है। पर उससे यहाँ प्रयोजन नहीं है। यहाँ निश्चयनयका अर्थ आत्माश्रितपना लिया है और व्यवहारनयका अर्थ पराश्रितपना लिया है। जब हम आयु कर्मकी अपेक्षा निषेक स्थितिके न घटनेरूप मरणको कालमरण और निषेक-स्थितिके घटनेरूप मरणको अकालमरण कहते हैं तो ये दोनों ही कथन पराश्रित होनेसे व्यवहारनयकी कक्षामें आ जाते हैं। किन्तु जब हम स्वाश्रित उपादानकी अपेक्षा पूर्व पर्यायके व्ययको मरण कहते हैं तो यहाँ कालमरण और अकालमरण ऐसे भेद न रहकर एकमात्र स्वकालमरण हो उसे कहा जा सकता है, इसलिए स्वाश्रित होनेसे यह निश्चयनयकी कक्षामें आता है। यही भाव हमने अपने पिछले उत्तरमें दिखलाकर वहाँ यह सूचित किया है जिसे अपर पक्षने अपनी प्रतिशंकामें उद्धृत किया है। आशा है अपर पक्ष इष्टार्थको ग्रहण कर अपनी शंकाका निरसन कर लेगा।

हमारे उक्त कथनसे अपर पक्षका यह समझना ठीक है कि निश्चयकथन यथार्थ है और व्यवहार कथन उपचरित है, क्योंकि आयुकर्मकी उदय या उदीरणाक्रमसे हानिका होना यथार्थमें जीवका मरण नहीं है। जीवका यथार्थ मरण तो मनुष्यादि एक पर्यायका विनाश ही है। अपर पक्षने पूर्वमें या यहाँ निश्चयनय या व्यवहारनयकी जो परिभाषा दी है वह उसकी कल्पनामात्र है। वस्तुतः एक वस्तुके गुण-धर्मको उसीका कहना निश्चयनय है और अन्य वस्तुके गुण-धर्मको अन्यका कहना यह असद्भूत व्यवहारनय है। आगममें इन नयोंकी यही परिभाषाएँ की गई हैं। कुछ दिग्दर्शन पूर्वमें कराया ही है। अपर पक्षने जिन धर्मयुगलोंकी प्रतिशंका १७ में चरचा की होगी उनका तो वहीं विचार करेंगे। यहाँ अपर पक्षने जिन सत्-असत्, नित्य-अनित्य, तत्-अतत्, एक-अनेकरूप धर्मयुगलोंका निर्देश किया है वे एक द्रव्याश्रित होनेसे सद्भूत हैं इसमें सन्देह नहीं। परन्तु इन धर्मयुगलोंके अन्तमें जो यह लिखा है कि ‘वस्तु उपादानरूप भी है और निमित्तरूप भी है।’ सो यह कथन कल्पनामात्र है, क्योंकि एक वस्तुमें वस्तुतः एक ही कारणधर्म रह सकता है। जैसे एक वस्तुमें अपना भी ‘सत्’ धर्म रहे और अन्य वस्तुका भी ‘सत्’ धर्म रहे यह नहीं बन सकता उसी प्रकार एक वस्तुमें अपने कार्यका भी ‘कारणधर्म’ रहे और दूसरी वस्तुके कार्यका भी ‘कारण धर्म’ रहे यह भी नहीं बन सकता। यदि एक वस्तुमें एक साथ दो कार्योंके दो कारणधर्म स्वीकार किये जाते हैं तो उनमेंसे एक उपचरित ही होगा। दोनों वास्तविक नहीं हो सकते। यतः प्रत्येक द्रव्य अपने स्वचतुष्टयको छोड़कर पर वस्तुके स्वचतुष्टयमें किसी रूपमें नहीं पाया जाता, अतः प्रत्येक वस्तुमें अपने कार्यका कारणधर्म ही रह सकता है, पर वस्तुके कार्यका नहीं। अन्यथा एक द्रव्यके कार्यका कारणधर्म दूसरे द्रव्यमें स्वीकार करनेपर उन दोनोंमें एकता प्राप्त हो जाती है। यदि अपर पक्षको यह दूषण इष्ट न हो तो उसे यह भीतरसे स्वीकार कर लेना चाहिए कि निश्चयसे प्रत्येक द्रव्यके कार्यका कारणधर्म उसी द्रव्यमें रहता है, अन्य द्रव्यमें नहीं।

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ७/८)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ३४६ से ३६८

↑ सूची


आगे अपर पक्षने निश्चयनय और व्यवहारनयकी चरचा करते हुए हमसे पृच्छा की है कि ‘यदि द्रव्य वास्तविक है तो क्या पर्याय वास्तविक नहीं है आदि ।’ सो अपर पक्षको स्मरण रखना चाहिए कि हम यहाँ सद्भूत व्यवहारकी चरचा नहीं कर रहे हैं । निमित्त-नैमित्तिक भावकी चरचा असद्भूत व्यवहारकी कक्षामें आती है तथा गुण-गुणीभेद आदिकी चरचा सद्भूत व्यवहारकी कक्षामें आती है । अतः सद्भूत व्यवहारकी अपेक्षा जो कुछ भी कहा गया है वह वास्तविक है । द्रव्य है, पर्याय है, गुण है, गुणी है । यह सब कुछ वास्तविक है । इसका निषेध नहीं । साथ ही अपर पक्ष पर्याय आदि धर्मोंको जो व्यवहाररूप लिख रहा है वह भी ठीक नहीं, क्योंकि परमभावग्राही निश्चयनयकी दृष्टिमें यदि इन्हें व्यवहाररूप माना भी गया है तो भी ये पर्यायार्थिकरूप निश्चयनयकी दृष्टिमें निश्चय-यथार्थस्वरूप ही हैं, इसीलिए आगममें इन्हें सद्भूतरूपसे स्वीकार किया है ।

यहाँ प्रश्न तो यह है कि आगममें जो निमित्त व्यवहारको असद्भूत कहा है सो इसका तात्पर्य क्या है ? क्या इसका अर्थ यथार्थ लिया जाय या उपचरित ? अपर पक्ष समयसार गाथा १०५ में आये हुए ‘उपचारमात्र’ पदका अर्थ ऐसा घुमाकर कर करता है जिससे उपचार पदमें जो अर्थ गर्भित है वह लुप्त हो जाता है । उपलब्ध पूरे जिनागमका यथासम्भव आलोडन करने पर हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जहाँ एक वस्तुके धर्मको अन्य वस्तुमें आरोपित किया जाता है वहाँ उस व्यवहारको उपचरित कहते हैं । जैसे किसी बालकको अग्नि कहना यह उपचार है । पर इस परसे यदि कोई यह समझे कि अग्निसे जो कार्य होता है वह बालकसे हो जायगा सो उसका ऐसा समझना ठीक नहीं है । इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर अष्टसहस्री पृ० १७४ में लिखा भी है-

न चाग्निर्माणवक इत्युपचारात् पाकादावुपयुज्यते ।

अतएव अपर पक्षने उपादानके समान अन्य द्रव्यमें किये जानेवाले निमित्त व्यवहारको भी जो यथार्थ माननेका आग्रह कर रखा है उसे वह जितने जल्दी त्याग देगा उतना ही अच्छा है । निश्चयसे उपादान प्रत्येक समयमें अपना कार्य परनिरपेक्ष होकर ही करता है । परन्तु उस कार्यमें जिसके साथ उसकी बाह्य व्याप्ति है यह दिखलानेके लिए परसापेक्षताका व्यवहार अवश्य किया जाता है । यदि कहा जाय कि ऐसा व्यवहार न भी किया जाय तो क्या हानि है ? सो इसका समाधान यह है कि प्रत्येक समयके ऐसे व्यवहारसे प्रत्येक समयके निश्चयकी प्रसिद्धि होती है, इसलिए सप्रयोजन होनेसे आगममें उसे स्थान मिला हुआ है । उदाहरणार्थ मिथ्यात्व कर्मका उदय जीवके मिथ्यात्व गुणस्थानकी प्रसिद्धि करता है । इसी प्रकार उसका उपशम सम्यक्त्व गुणकी प्रसिद्धि करता है । इस प्रकार बाह्य सामग्री ऐसी प्रसिद्धिका हेतु होनेसे उपचारसे उसे उस उस कार्यके हेतुरूपसे स्वीकार किया गया है । ऐसा स्याद्वाद ही यहाँ अपेक्षित है, अन्य प्रकारका नहीं । हमें आशा है कि अपर पक्ष इस तथ्यपर अवश्य ध्यान देगा ।

आगे अपर पक्षने बद्धायुष्क और अबद्धायुष्क जीवोंके मरण और उत्तर भवग्रहणकी जो व्यवस्था सूचित की है उसमें एक-दो बातोंका सर्व प्रथम संकेत कर देना इष्ट प्रतीत होता है । प्रथम तो यह कि यह तो अपर पक्षने स्वीकार ही कर लिया है कि आगामी आयुका बन्ध होनेके बाद अकालमरण नहीं होता । इसका अर्थ यह हुआ कि चाहे अनपवर्त्य आयुवाला जीव हो और चाहे अपवर्त्य आयुवाला जीव हो, आगामी भवकी आयुका बन्ध होनेके बाद दोनोंके ही एक-एक स्थितिके क्रमसे अधःस्थितिगलना होकर मरण होता है । मरणके कालमें आयुकर्मकी उदीरणा होकर अकालमरण उक्त दोनों प्रकारके जीवोंमें से किसी भी जीवके नहीं होता । फिर भी अपवर्त्य आयुवाले जीवके जो अकालमरण कहा गया है वह आगामी आयुबन्धके पूर्व ऐसे जीवके निषेकस्थितिउदीरणा हुई थी इस बातको ध्यानमें रखकर ही कहा गया है । वर्तमान मरण-समयको ध्यानमें रखकर नहीं ।

दूसरी यह बात ज्ञातव्य है कि आयुकर्मके उत्तर भेदोंमें संक्रमण करणको छोड़कर नौ करण होते हैं ऐसा आगमका अभिप्राय है । इसी तथ्यको सूचित करते हुए गोम्मटसार कर्मकाण्डमें लिखा है-

संकमकरणूणा णवकरणा होंति सव्वआऊणं ।
सेसाणं दस करणा अपुव्वकरणो त्ति दस करणा ॥४४१ ॥

नरकादि चारों आयुओंके संक्रमण करणके विना ९ करण होते हैं और शेष कर्मोंके १० करण होते हैं । ये दसों करण अपूर्वकरण गुणस्थान तक होते हैं ।

इसका तात्पर्य यह है कि आयुकर्मके किसी भी भेदमें संक्रमण करणकी योग्यता तो सर्वथा नहीं होती । शेष ९ करणोंमें से बन्धके समय जिसका जैसा बन्ध हुआ हो वैसी योग्यता उसमें होती है । उदाहरणार्थ आयुके जिन कर्मपरमाणुओंका निकाचित बन्ध हुआ है उनका उत्कर्षण, अपकर्षण और उदीरणा तीनों नहीं होते, जिनका निधत्तिबन्ध हुआ है उनकी तथा जिनका अप्रशस्त उपशम बन्ध हुआ है उनकी उदीरणा नहीं होती । शेष सत्तामें स्थित कर्मपरमाणुओंका बन्धकालमें उत्कर्षण तथा बन्धकालमें और अन्यदा अपकर्षण और उदीरणा यथायोग्य हो सकती है । ऐसा परिणमन करनेका स्वभाव उनका स्वतः होता है । और जब उनके उस-उस प्रकारके परिणमनका स्वकाल आता है तब उसके अनुरूप बाह्य नोकर्म सामग्री भी मिलती है । तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ सूत्र ५३ की तत्त्वार्थवार्तिक आदि टीकाओंमें इन्हीं नोकर्मोंको लक्ष्यमें रखकर अपवर्त्य आयुवाले जीवोंके मरणको अकालमरण कहा है । यह पराश्रित कथन होनेसे असद्भूत व्यवहारनयका विषय है, इसलिए इसे उपचरित ही जानना चाहिए । यही कारण है कि भगवान् कुन्दकुन्ददेवने समयसारमें कहा है-

आउक्खयेण मरणं जीवाणं जिणवरेहिं पण्णत्तं ।
आउं णं हरेसि तुमं कह ते मरणं कयं तेसिं ॥२४८॥
आउक्खयेण मरणं जीवाणं जिणवरेहिं पण्णत्तं ।
आउं ण हरंति तुहं कह ते मरणं कयं तेहिं ॥२४९॥

जीवोंका मरण आयुकर्मके क्षयसे होता है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है, तूँ पर जीवोंके आयुकर्मको तो हरता नहीं है तो तूने उनका मरण कैसे किया ॥२४८॥ जीवोंका मरण आयुकर्मके क्षयसे होता है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है, पर जीव तेरे आयुकर्मको तो हरते नहीं हैं तो उन्होंने तेरा मरण कैसे किया ॥२४९॥

यहाँ जीवोंका मरण और भुज्यमान आयुका क्षय इन दोनोंकी सम व्याप्ति देखकर आचार्य महाराजने उक्त वचन कहा है । इसका अर्थ यह नहीं कि आयुकर्मका क्षय जीवोंके मरणका मुख्य हेतु है, वह तो निमित्तमात्र है । जिस प्रकार बाह्य सामग्री आयुकर्मकी उदीरणा आदिमें निमित्तमात्र है । निश्चयसे आयुकर्मकी उदय-उदीरणा आदि अपने-अपने कारणसे होती है, बाह्य सामग्रीके कारण नहीं । उसी प्रकार प्रत्येक जीवका जन्म अथवा मरण निश्चयसे अपने-अपने उपादानके अनुसार होता है, आयुकर्म तो उसमें निमित्तमात्र है । फिर भी आचार्य महाराजने नोकर्ममेंसे आसक्ति या इष्टानिष्ट बुद्धि हटानेके लिये बन्ध प्रकरणमें ऐसा कहा है कि इस जीवका मरण आदि आयु आदि कर्मके अनुसार होता है । फिर तूँ ऐसा क्यों विचार करता है कि इसने इसे जिलाया या मारा आदि । इससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि जहाँ भी रक्तक्षय आदिके कारण अकालमरणका निर्देश किया है वहाँ आयु कर्मकी उदीरणा आदिकी निमित्तभूत बाह्य सामग्री क्या है इसका ज्ञान करानेके लिए ही वैसा कथन किया है।

जिसे प्रतिकूल सामग्री कहते हैं उसका संयोग तो अनपवर्त्य आयुवाले अन्तःकृत केवली जीवोंको भी होता है। इनके ऊपर ऐसा घोर उपसर्ग होता है जिसकी सीमा नहीं और अपवर्त्य आयुवाले जीवोंको भी होता है। फिर क्या कारण है कि अन्तःकृत केवलियोंकी आयु अनपवर्त्य ही बनी रहती है और दूसरे जीवोंकी आयुमें अपवर्तन हो जाता है। इसका कारण बाह्य सामग्री तो मानी नहीं जा सकती, अन्तरंग हेतु कोई होना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि जो आयु अपवर्तनके योग्य होती है, स्वकाल आने पर बाह्य सामग्रीको निमित्तकर उसीका अपवर्तन होता है, अन्यका नहीं। इससे यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि निश्चयसे किसी भी जीवका अकालमरण नहीं होता।

हमें प्रसन्नता है कि अपर पक्षने अकालमरणके माननेपर हमारे द्वारा दी गई अकालजन्मकी आपत्तिको स्पष्ट शब्दोंमें अस्वीकार कर दिया है। किन्तु जहाँ उसने यह साहस किया है वहाँ उस पक्षको अकालमरणको उपचरित माननेका साहस और करना चाहिए। तभी उसके द्वारा अकालजन्मका निषेध करना सार्थक होगा, क्योंकि व्यय और उत्पादमें संज्ञा और लक्षण आदिका ही भेद है, वैसे जो व्यय है वही उत्पाद है ऐसा होने पर अकालमरणके समान अपर पक्षको विवश होकर अकालजन्म भी मानना पड़ेगा, क्योंकि क्रम सन्तानपरम्पराके मध्यमें से किसी एकके क्रमको छोड़कर होनेपर उसके आगेकी पूरी सन्तानपरम्परा नियतक्रम रहित हो जाती है, अतएव यदि अपर पक्ष अकालजन्मको माननेमें हानि देखता है तो उसे अकालमरण भी उपचरित मान लेनेमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

आगे अपर पक्षने आनुपूर्वीकर्म और गतिकर्म आदिकी चरचा करते हुए हमारी आपत्तिके निराकरणके अभिप्रायसे लिखा है कि ‘कालमरण और अकालमरणवाले जीवोंके आगामी आयुकर्मका उदय एक समान होता है, इसलिए आनुपूर्वीकर्म और गतिकर्मके सहारे जीव यथास्थान पहुँच जाते हैं’ आदि।

इसपर कहना यह है कि जब कोई भी कार्य क्रमनियत नहीं है ऐसी अवस्थामें अमुक जीवको अमुक स्थान पर उत्पन्न होना है यह व्यवस्था ही कैसे बन सकती है। जीव अकालमें मर कर उत्पन्न होनेके सन्मुख हो और नियत बाह्य सामग्री न हो तो उसका आयुकर्मके अनुसार उत्पन्न होना कैसे बन सकेगा, क्योंकि अपर पक्षके मतसे आयुकर्मका उदय स्वयं उपादान होनेसे अनेक योग्यतावाला है, इसलिए वह अपना कार्य किसरूप करे यह तो बाह्य सामग्री पर अवलम्बित है और बाह्य सामग्री स्वयं उपादान होनेसे अनेक योग्यतावाली है, इसलिए वह अपना कार्य किसरूप करे यह अन्य बाह्य सामग्री पर अवलंबित है।

अतएव आनुपूर्वीकर्म और गतिकर्म आयुकर्मके उदयानुसार जीवको यथास्थान पहुँचा देंगे यह अपर पक्षकी मान्यतानुसार कथमपि नहीं बन सकता। हाँ, यदि अपर पक्ष इस आपत्तिसे बचना चाहता है तो उसे सभी कार्य स्वकालमें अपनी-अपनी प्रतिनियत बाह्याभ्यन्तर सामग्रीको प्राप्त कर होते हैं यही तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए।

अपर पक्षने परमात्मप्रकाशकी गाथा ६६ उपस्थित कर यह सिद्ध करनेकी चेष्टा की है कि आत्मा तो पंगुके समान है, जो कुछ भी होता है कर्मसे ही होता है।

किन्तु यह कथन ही. इस बातको प्रसिद्ध करता है कि यह सब निमित्त होनेवाली बाह्य सामग्रीको लक्ष्यमें रख कर विधान किया गया है। यदि इसे यथार्थ कथन मान लिया जाता है तो आत्मा अपने परिणामका कर्ता न बन सकनेके कारण सांख्यमतमें माने गये पुरुषके समान कूटस्थपनेको प्राप्त हो जाता है। और उपादानके कार्यका बाह्य सामग्री वास्तविक कर्ता हो यह हो नहीं सकता, क्यों कि स्वयं आचार्य जयसेनने समयसार गाथा १९ की टीकाके बाद ‘जं कुणदि भावमादा’ इत्यादि गाथाका उल्लेख कर उसकी टीका करते हुए लिखा है-

ववहारा अनुपचरितासद्भूतव्यवहारनयात् पोग्गलकम्माण पुद्गलद्रव्यकर्मादिनां कत्तारं कर्तेति ।

व्यवहारनयसे अर्थात् अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे आत्मा पुद्गल कर्मोंका अर्थात् पुद्गल द्रव्यकर्मादिका कर्ता है ।

यहाँ पर असद्भूत व्यवहारनयसे जिस प्रकार आत्माको पुद्गल द्रव्यकर्मोंका कर्ता कहा है उसी प्रकार पुद्गल द्रव्यकर्म जीवको तीन लोकमें ले जाते हैं और ले आते हैं, आत्मा तो पंगुके समान है इत्यादि परमात्मप्रकाशके कथनको भी असद्भूतव्यवहारनयका कथन ही समझना चाहिए। और जितना भी असद्भूत व्यवहारनयका कथन होता है वह सब उपचरित ही होता है यह स्पष्ट ही है।

आगे अपर पक्षने विचारणीय जिन तीन बातोंका उल्लेख किया है वे मात्र पुनरुक्तिको ही सूचित करती है, उनमें नई ऐसी कोई भी बात नहीं कही है।

अकालमरण क्यों कहा गया है और कालमरण क्या है इसका हम पूर्वमें ही खुलासा कर आये हैं। जिसे बद्धायुष्ककी अपेक्षा कालमरण अपर पक्षने स्वीकार किया है उसे ही आयुबन्धके पूर्व विषभक्षण आदिको निमित्त कर हुई उदीरणाकी अपेक्षा अकालमरण संज्ञा आगममें दी गई है। इस प्रकार एक ही कार्य एक अपेक्षासे कालमरण और दूसरी अपेक्षासे अकालमरण कहा गया है।

उसमें भी मरणका यह कथन दो प्रकारसे किया जाता है-उपादानकी अपेक्षा और आयुकर्मकी अपेक्षा। उपादानकी अपेक्षा एकमात्र कालमरण ही सिद्ध होता है और यह स्वाश्रित होनेसे निश्चय कथन है। किन्तु जब इसे ही आयुकर्मकी अपेक्षा विवेचित किया जाता है तब वह पराश्रित होनेसे व्यवहार संज्ञाको प्राप्त हो जाता है। उसमें निश्चय कथन यथार्थ है और व्यवहार कथन उपचरित है ऐसा यहाँ विवेक करना चाहिए। आशा है इतने स्पष्टीकरणसे अपर पक्षने यहाँ पर जितना कुछ लिखा है वह अयथार्थ कैसे है यह उसकी समझमें आ जायगा।

अपर पक्ष आगमके प्रति श्रद्धावान् बना रहे यही हमारी भी आकांक्षा है। परन्तु यह श्रद्धा तभी सच्ची श्रद्धा कहलावेगी जब वह निमित्त कथनको उपचरित मान लेगा, क्योंकि निमित्त कथन उपचरित है यह हमारा कहना न होकर आगमका ही कथन है। प्रमाण हम पूर्वमें ही दे आये हैं।

आगे अपर पक्षने तत्त्वार्थवार्तिक अ० २ सू० ५३ का वचन उद्धृत किया है सो यह सच है कि आयुकर्मकी उदीरणा होती है और उसमें विषभक्षण आदि व्यवहार हेतु होता है। भट्टाकलंकदेवने उक्त वचन द्वारा उसी तथ्यकी स्वीकृति दी है। बाह्य सामग्रीकी अपेक्षा कुछ कार्य प्रायोगिक होते हैं और बहुतसे कार्य वैस्रसिक भी होते हैं यही उक्त कथनका अभिप्राय है। समस्त जिनागमसे भी इसका समर्थन होता है। परन्तु जिसे हम बाह्य सामग्रीकी अपेक्षा अकालपाक कहते हैं, अपने उपादानकी अपेक्षा वह अपने कालमें ही हुआ है। भट्टाकलंकदेवने उक्त कथनमें बाह्य सामग्रीकी अपेक्षा ही विचार किया है, इसलिए उसे व्यवहारनयका वचन ही जानना चाहिए। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें एतद्विषयक जो विवेचन उपलब्ध होता है उससे भी यही सिद्ध होता है कि जो आयुकर्मरूप अदृष्ट विशेष बाह्य सामग्रीको निमित्तकर अपवर्तित नहीं होता उसकी अनपवर्त्य आयुसंज्ञा है और इससे अतिरिक्तकी अपवर्त्य आयुसंज्ञा है। चैत्यभक्तिमें ‘द्वौ कुन्देन्दुतुषारहारधवलौ’ इत्यादि वचन आया है। इसमें दो जिनदेवको श्वेतवर्णवाला, दो जिनदेवको नीलवर्णवाला आदि बतलाकर इसे जिनदेवकी स्तुति कहा गया है। यद्यपि यह आगम वचन ही है और परस्पर एक क्षेत्रावगाहरूपसे अवस्थित किस भगवानके किस शरीरका क्या रंग है यह तथ्य इस वचन द्वारा प्रसिद्ध किया गया है। फिर भी इस बातको लेकर आचार्य कुन्दकुन्द समयसारमें लिखते हैं-

तं णिच्छए ण जुज्जदि ण सरीरगुणा हि होंति केवलिणो।
केवलिगुणे थुणदि जो सो तच्चं केवलिं थुणदि ॥२९॥

वह स्तवन निश्चयमें ठीक नहीं है, क्योंकि शरीरके गुण केवली जिनके नहीं है। जो केवलीके गुणोंकी स्तुति करता है वही परमार्थसे केवलीकी स्तुति करता है ॥२९॥

दोनों प्रकारके वचन आगम होने पर भी निश्चयनयके कथन और व्यवहारनयके कथनमें क्या अन्तर है यह इस वचनसे भलीभाँति विदित हो जाता है। इस वचनसे यह हम अच्छी तरहसे जान लेते हैं कि परमागममें निश्चयनयके कथनको क्यों तो यथार्थ कहा गया है और क्यों व्यवहारनयके कथनको उपचरित कहा गया है। यही कारण है कि कर्ता-कर्मका विचार करते हुए आचार्य महाराजने समयसार गाथा ८४ में व्यवहारसे आत्माको पुद्गल कर्मोंका कर्ता और भोक्ता बतलाकर भी गाथा ८५ में उस व्यवहारको सदोष बतलाकर दूसरे शब्दोंमें उसका निषेध कर दिया है। हमें भरोसा है कि अपर पक्ष इन तथ्योंपर ध्यान देकर तत्त्वार्थवार्तिकके उक्त कथनको निमित्त प्रधान कथन होनेके कारण उपचरित स्वीकार कर लेगा।

\३९. स्वकाल विचार

\१. आगे अपर पक्षने स्वकालका विचार करते हुए जो यह लिखा है कि स्वचतुष्टयमें आया हुआ ‘स्वकाल’ शब्द प्रतिक्षणमें होनेवाले परिणमनोंके क्रमरूप है और फिर इस परिणमनरूप कार्यको कारणोंके अधीन बतलाकर जो नियतक्रम और अनियतक्रमके समर्थन करनेका उपक्रम किया है सो यह ठीक नहीं है, क्योंकि उपादान ही उपादेयरूपसे परिणमित होता है, अतएव प्रत्येक द्रव्यका त्रिकालका विषयभूत जितना भी स्वकाल है वह सब क्रमनियत ही होता है। बाह्य सामग्री तो उसमें उपकरणमात्र है। आगममें प्रत्येक द्रव्यके अव्यवहित पूर्वोत्तर दो क्षणोंमें उपादान-उपादेयभाव बतलाया है, अतएव प्रत्येक समयमें जो उपादान होता है, प्रत्येक कार्य उसीके अनुरूप होता है। यह निश्चय कथन है।

\२. व्यवहारनयसे स्वकालका अर्थ प्रत्येक कार्यमें निमित्तभूत काल द्रव्यकी पर्याय करनेपर जितने कालके समय हैं उतने ही प्रत्येक द्रव्यके कार्य हैं, अतएव कालके प्रत्येक समयके साथ अन्य द्रव्योंके एक-एक कार्यका क्रमिक योग अनादि कालके बनता चला आनेके कारण इस अपेक्षासे भी सभी कार्य क्रमनियत ही सिद्ध होते हैं। कालद्रव्य उदासीन कारण है, इसलिए कोई भी कालसमय किसी भी कार्यके लिए निमित्त होता है यह कथन निराधार होनेसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। हम देखते हैं कि आगममें जहाँ भी दृष्टि डालो वहीं ‘काललब्धि’ पदका उल्लेख दृष्टि-गोचर होता है। अनगारधर्मामृत अ० २ श्लोक ४६-४७ में सम्यक्त्वकी सामग्रीविशेषका संकेत करते हुए लिखा है-‘कालादिलब्धिभाक्।’ इसी बातको स्पष्ट करते हुए अष्टसहस्री पृ० २७४ में लिखा है-

केषांचित् प्रतिमुक्तिः स्वकाललब्धौ स्यात्।

सर्वार्थसिद्धि अ० २ सूत्र ३ में लिखा है-

काललब्ध्यादिनिमित्तत्वात् । तत्र काललब्धिस्तावत्-कर्माविष्ट आत्मा भव्यः कालेऽर्धपुद्गलपरिवर्तनाख्येऽवशिष्टे प्रथमसम्यक्त्वग्रहणस्य योग्यो भवति नाधिके इति ।

यहाँ पर काल विशेष्य है और अर्धपुद्गलपरिवर्तन संज्ञा उसका विशेषण है । इससे विदित होता है कि इस जीवके अधिकसे अधिक अर्धपुद्गल परिवर्तन जिसका नाम है ऐसे कालके संसारमें शेष रहने पर प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणकी योग्यता होती है, इससे अधिक कालके शेष रहने पर नहीं ।

प्रश्न यह है कि इससे अधिक कालके शेष रहने पर यह जीव प्रथम सम्यक्त्वके योग्य क्यों नहीं होता ? आचार्य विद्यानन्दिके सामने भी यह प्रश्न था । तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६१ में इसका समाधान करते हुए वे लिखते हैं-

प्रत्यासन्नमुक्तीनामेव भव्यानां दर्शनमोहप्रतिपक्षः सम्पद्यते नान्येषाम्, कदाचित्कारणासन्निधानात् ।

जिन भव्य जीवोंकी मुक्ति सन्निकट है उन्हें ही दर्शनमोहका प्रतिपक्ष सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है, अन्यको नहीं; क्योंकि किसी कारणका सन्निधान कभी हो, किसी कारणका सन्निधान कभी हो ऐसा नहीं है ।

अपने इसी कथनका उपसंहार करते हुए वे वहीं पुनः लिखते हैं-

इति युक्तिमानासन्नभव्यादिविभागः सद्दर्शनादिशक्त्यात्मकत्वेऽपि सर्वसंसारिणाम् ।

इस प्रकार सब संसारी जीवोंके सम्यग्दर्शनादिरूप शक्तिके होने पर भी आसन्नभव्यादिका विभाग युक्तियुक्त है ।

आशय यह है कि प्रत्येक कार्यका काल प्रतिनियत है । उसी कालमें बाह्याभ्यन्तर सामग्रीका योग हो कर वह कार्य होता है, अन्य कालमें नहीं । इस प्रकार काल द्रव्यके समयोंके आधार पर भी यही सिद्ध होता है कि सभी कार्य नियतक्रमसे ही होते हैं ।

\३. आगे अपर पक्षने प्रवचनसारमें प्रतिपादित कालनय और अकालनयकी चरचा करते हुए अन्तमें लिखा है कि ‘इन दोनों काल तथा अकाल नयोंका विधान करके श्री अमृतचन्द्र सूरि पर्यायके एकान्त क्रमनियत कालका स्पष्ट निराकरण कर रहे हैं ।’

अपर पक्षने यहाँ इन दोनों नय वचनोंका उल्लेख कर जो पर्यायोंके क्रमनियतपनेका निषेध किया है वह ठीक नहीं है, क्योंकि ये दोनों नयवचन हैं, जो सप्रतिपक्ष होनेसे मात्र अपनी अपनी विवक्षाको सूचित करते हैं । इसका अर्थ ही यह है कि उन दोनोंका कथन एक ही कालमें लागू पड़ता है ।

पहले क्रमांक १६-१७ में सामान्य नय और विशेष नय कह आये हैं । सामान्य नयकी अपेक्षा आत्मद्रव्यको व्यापक और विशेषनयकी अपेक्षा उसे अव्यापक बतलाया है । सो इस परसे यदि कोई यह अर्थ करे कि कभी आत्मद्रव्य व्यापक है और कभी अव्यापक है तो उसका जैसे यह अर्थ करना ठीक नहीं होगा उसी प्रकार उक्त दोनों नयवचनोंके आधारपर अपर पक्षका यह अर्थ फलित करना भी ठीक नहीं है कि श्री अमृतचन्द्रसूरि उक्त कथन द्वारा पर्यायके एकान्त क्रमनियत कालका निराकरण कर रहे हैं ।

विचार कर देखा जाय तो कालनयमें कालकी विवक्षा है और अकालनयमें कालको गौणकर अन्य हेतुओंकी विवक्षा है। जहाँ अन्य हेतुओंको गौणकर कालकी प्रधानतासे कार्यको दृष्टिपथमें लिया जाता है वहाँ वह कालनयका विषय होता है और जहाँ कालको गौणकर अन्य विस्रसा या प्रयोगसे प्राप्त हेतुओंको प्रधानतासे कार्यको दृष्टिपथमें लिया जाता है वहाँ वह अकालनयका विषय होता है। इस प्रकार एक ही कार्य कालनयका भी विषय है और अकालनयका भी। यदि ऐसा न माना जाय तो इन्हें नय वचन कहना संगत न होगा। स्पष्ट है कि आचार्य अमृतचन्द्रके उक्त कथनसे कोई पर्याय क्रमनियत होती है और कोई पर्याय क्रम अनियत होती है यह त्रिकालमें सिद्ध नहीं होता। प्रत्युत इससे यही सिद्ध होता है कि सभी कार्य क्रमनियत होकर भी वे विवक्षाभेदसे काल और अकाल इन दोनों नयोंके विषय हैं।

\४. आगे अपर पक्षने प्रवचनसारमें प्रतिपादित नियतिनय और अनियतिनयकी भी चरचा की है और साथ ही स्वभावनय, अस्वभावनय आदि नयोंका भी उल्लेख किया है सो इस सब कथन परसे अपर पक्ष क्या फलित करना चाहता है इसका स्पष्ट संकेत न होनेसे हम यहाँ इन सबकी विशेष चरचा नहीं करेंगे। एकान्तका परिग्रह यदि अपर पक्षको इष्ट हो तो भले ही रहा आवे। हमने न तो एकान्तका परिग्रह ही किया है और न ही एकान्त जैन शासनमें स्वीकृत ही है। हाँ यदि अपर पक्ष एक द्रव्यके कार्यका कारणधर्म दूसरे द्रव्यमें परमार्थसे रहता है इसे स्वीकार कर और इस प्रकार दो द्रव्योंमें एकता स्थापित कर इसे अनेकान्त संज्ञा देनेमें ही चरितार्थता मानता है तो भले ही माने, परन्तु जैन शासन तो एक द्रव्यके स्वचतुष्टयमें अन्य द्रव्यके स्वचतुष्टयकी नास्ति ही घोषित करता है। और इस प्रकार एक द्रव्य के कार्यका कारण धर्म दूसरे द्रव्यमें परमार्थसे नहीं ही रहता है यही सिद्ध होता है।

\५. आगे अपर पक्षने पण्डितप्रवर टोडरमलजी रचित मोक्षमार्ग प्रकाशकके एक कथनकी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है सो जहाँ पण्डितजीने काललब्धि और होनहारके स्वतंत्र वस्तु होनेका निषेध किया है वहाँ वे क्या हैं इसका भी विधान किया है। कालद्रव्यकी विवक्षित पर्यायके साथ अन्य द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंका जो सहज योग प्रतिक्षण बनता है उसीका नाम काललब्धि है। इसके सिवाय वह अन्य कुछ नहीं है। पण्डितजीने यही बात काललब्धिके विषयमें कही है। होनहार भवितव्यताका पर्यायवाची है। इसे सभी आचार्योंने एक स्वरसे स्वीकार किया है। सो किसकी किस कालमें क्या भवितव्यता या होनहार है इसका ज्ञान उस कालमें उससे होनेवाले कार्यसे ही होता है। पण्डित जी ने ‘जो कार्य भया सोई होनहार’ इन शब्दों द्वारा इसी तथ्यका ज्ञान कराया है। अतएव पण्डितजीके कथनसे भी यही सिद्ध होता है कि प्रत्येक कार्य स्वकालमें ही होता है।

\६. आगे अपर पक्षने स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी गाथा २१९ में आये हुए कालादि लब्धिका अर्थ मात्र रत्नत्रय बतला कर जो कालकी मुख्यताका निषेध किया है वह ठीक नहीं, क्योंकि व्यवहारनयसे कालादि लब्धिका अर्थ जहाँ काल, द्रव्य, क्षेत्र, भव और भाव आदि सामग्रीकी प्राप्ति होती है वहाँ निश्चयनयसे काल शब्द अपनी विवक्षित पर्यायको भी सूचित करता है। अतएव नयविवक्षासे किसी भी अर्थ के ग्रहण करनेमें कोई बाधा नहीं आती। तथापि अपर पक्षने उक्त गाथाकी टीकाका जो एकान्तरूप आशय लिया है वह क्यों ठीक नहीं इसके लिए हम वह टीकावचन ही यहाँ दे देना इष्ट समझते हैं-

कालादिलब्धियुक्ताः कालद्रव्यक्षेत्रभवभावादिसामग्रीप्राप्ताः। पुनरपि कीदृक्षास्ते अर्थाः ? नानाशक्तिभिः अनेकसमर्थताभिः नानाप्रकारस्वभावयुक्ताभिः संयुक्ताः। यथा जीवाः भव्यत्वादिशक्तियुक्ताः रत्नत्रयादिकाललब्धिं प्राप्य निर्वान्ति।

कालादि लब्धिसे युक्त अर्थात् काल, द्रव्य, क्षेत्र, भव और भावादिरूप सामग्रीको प्राप्त हुए वे अर्थ ? फिर भी कैसे हैं वे पदार्थ ? नाना शक्तियोंसे अर्थात् नाना प्रकारके स्वभावोंसे युक्त अनेक समर्थताओंसे संयुक्त हैं। यथा-जीव भव्यत्वादि शक्तियोंसे संयुक्त होकर रत्नत्रय आदिरूप काललब्धिको प्राप्त कर मुक्त होते हैं।

स्पष्ट है कि उक्त टीकावचनसे भी प्रत्येक कार्यके स्वकालका निषेध नहीं किया जा सकता।

\७. आगे अपर पक्षने पं० फूलचन्द्र शास्त्रीद्वारा लिखित तत्त्वार्थसूत्रके दो वचन उद्धृत कर अपने पक्षके समर्थन करनेका जो प्रयत्न किया है वह ठीक नहीं, क्योंकि प्रथम वचन द्वारा एकान्तसे कालकी व्यवहार हेतुताका निषेध किया गया है। तभी तो उक्त वचनमें निष्कर्षको सूचित करते हुए अन्तमें यह लिखा है-

‘कार्यकी उत्पत्तिमें जैसे काल एक निमित्त है वैसे अन्य भी निमित्त हैं। अतः कार्यकी उत्पत्तिमें केवल कालको प्रधान कारण मानना उचित नहीं है।’

यद्यपि उक्त वचनके प्रारम्भका वाक्य कुछ भ्रमको उत्पन्न करता है, इसमें सन्देह नहीं। परन्तु उसका व्याख्यान नाना जीवोंकी अपेक्षा करने पर आगमसे उसकी सुसंगति बैठ जाती है। वस्तुतः वह वचन तत्त्वार्थवार्तिकके ‘कालानियमाच्च’ का व्याख्यानमात्र है। परन्तु तत्त्वार्थवार्तिकमें जिस प्रकार वह वचन नाना जीवोंकी अपेक्षा लिखा गया है वैसा विशद स्पष्टीकरण तत्त्वार्थसूत्रके उक्त वचनमें अवश्य किया जाना चाहिए था। अपर पक्षने इस ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया, इसलिए इतना खुलासा करनेका हमें अवसर मिल सका इसके लिए हम अपर पक्षको धन्यवाद देते हैं।

तत्त्वार्थसूत्रका दूसरा वचन मात्र कर्मकी उत्कर्षणादि अवस्थाओंको ध्यानमें रखकर लिखा गया है, जो व्यवहारनय वचन होनेसे युक्तियुक्त है।

अतएव पं० फूलचन्द्र द्वारा रचित तत्त्वार्थसूत्रसे भी यही सिद्ध होता है कि सभी कार्य स्वकालमें ही होते हैं। पं० फूलचन्द्र शास्त्रीने कार्यके प्रति निमित्तभूत बाह्य सामग्रीकी मर्यादा क्या है इसका विस्तृतरूपसे विचार तत्त्वार्थसूत्र अ० ५ सू० ३० की टीकामें किया है। यह टीका वी० नि० सं० २४७६ के पूर्व लिखी गई थी। तभी उसमें यह स्पष्ट कर दिया गया था कि प्रत्येक कार्यके प्रति निमित्तकी क्या मर्यादा है। इसमें उदासीन निमित्त और प्रेरक निमित्तका क्या तात्पर्य है यह भी स्पष्ट किया गया है। आशा है अपर पक्ष उसका अवलोकन कर वस्तुस्थिति क्या है उसे समझनेका अवश्य ही प्रयत्न करेगा।

इस प्रकार काललब्धिके आधारसे भी यही सिद्ध होता है कि सभी कार्य नियतक्रमसे ही होते हैं।

\४०. दिव्यध्वनि आदि सभी कार्य नियतक्रमसे ही होते हैं

अपर पक्षने पुनः दिव्यध्वनिका प्रश्न उठाकर उस द्वारा सभी कार्य नियतक्रमसे ही होते हैं इसका खंण्डन करनेका प्रयत्न किया है जो युक्ति-युक्त नहीं है । इसकी पुष्टिमें पिछले उत्तरमें हम जयधवला पु० १ पृ० ७६ का प्रमाण उपस्थित कर आये हैं। धवला पु० ९ पृ० १२०-१२१ में भी यही बात कही गई है। इन दोनों वचनोंमें दो बातोंका स्पष्ट निर्देश दृष्टिगोचर होता है। यथा-

\१. प्रश्न यह है कि जिस समय भगवान्को केवलज्ञान हुआ उसी समय देवेन्द्रने गणधरको क्यों उपस्थित नहीं कर दिया? इसका समाधान आचार्यने यह लिख कर नहीं किया कि इन्द्र क्षयोपशमज्ञानी था, इसलिए उस समय उसके ख्यालमें यह बात नहीं आई। किन्तु उक्त प्रश्नका समाधान यह लिख कर किया है कि काललब्धिके अभावमें उस समय इन्द्रमें ऐसी सामर्थ्य ही नहीं थी कि वह भगवान्‌के केवलज्ञानके होनेके समय ही गौतम गणधरको लाकर उपस्थित कर देता। इससे इस बातका स्पष्टरूपसे निर्णय हो जाता है कि प्रत्येक कार्य अपने नियत समयमें ही होता है, आगे-पीछे नहीं।

\२. दूसरा प्रश्न यह है कि जिस तीर्थंकरके पादमूलमें जिसने दीक्षा ली है उसे निमित्तकर ही उनकी दिव्यध्वनि क्यों खिरती है? इसका समाधान करते हुए आचार्य लिखते हैं कि ऐसा स्वभाव ही है और स्वभाव दूसरोंके द्वारा प्रश्नके योग्य नहीं होता।

उक्त शंका-समाधानमें ये दो प्रश्न और उनके दो उत्तर अर्थगर्भ हैं । इनसे प्रथम तो यह सिद्ध होता है कि प्रत्येक कार्यके लिए निमित्त-नैमित्तिकयोग अपनी-अपनी काललब्धिके अनुसार सहज ही मिलता है। दूसरे यह सिद्ध होता है कि प्रत्येक कार्यका निमित्त सुनिश्चित है और वह काललब्धिके अनुसार ही विस्रसा या प्रयोगसे उपस्थित होता है। प्रयोगसे भी यदि बाह्य सामग्रीका योग मिलता है तो वह काललब्धिके अनुसार ही मिलता है, आगे-पीछे नहीं। तीसरे इससे यह भी सिद्ध होता है कि केवलज्ञान होनेपर तत्क्षण जो दिव्यध्वनि नहीं खिरी वह स्वभावसे ही नहीं खिरी। गणेन्द्रके नहीं मिलनेसे दिव्यध्वनि नहीं खिरी यह तो व्यवहार कथनमात्र है जो मात्र बाह्य सामग्रीके योगको सूचित करता है। निश्चय कथन तो यही है कि जिस कालमें जो कार्य होना होता है उसी कालमें वह होता है ऐसा वस्तु परिणमनरूप स्वभाव है। अनन्तरपूर्व पर्याययुक्त द्रव्यको उपादान कहते हैं इस नियमके अनुसार जिस समय दिव्यध्वनि खिरी उसके पूर्व समयमें ही भाषावर्गणाऐं उसका समर्थ उपादान हुईं। केवलज्ञान कोई दिव्यध्वनिका उपादान नहीं है। वह तो गणेन्द्रके समान निमित्तमात्र है, अतएव केवलज्ञान होनेपर दिव्यध्वनि खिरनी ही चाहिए ऐसा नियम नहीं बन सकता यह बात भी इससे सिद्ध होती है। इस प्रकार केवलज्ञानके होनेपर भी गणधरका न मिलना और दिव्यध्वनिका न खिरना ही यह सिद्ध करता है कि जब दिव्यध्वनिके खिरनेका स्वकाल आया तब गणधरके योगपूर्वक केवलज्ञान उसके खिरनेमें निमित्त हुआ। यहाँ अपर पक्षने शेष जिन बातोंका उल्लेख किया है उनका समुचित उत्तर पूर्वमें दिया ही गया है, अतएव उन विषयोंकी यहाँ पुनः चरचा नहीं की गई है।

\४१. कर्मनिर्जरा और मुक्तिका काल नियत है, अनियत नहीं

अपर पक्षने कर्मनिर्जराका काल नियत नहीं इस अभिप्रायकी पुष्टिमें तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ३ का ‘कालानियमाच्च निर्जरायाः’ वार्तिक उपस्थित किया है। किन्तु यह वार्तिक नाना जीवोंकी अपेक्षा निर्जराके कालके अनियमका विधान करता है। अर्थात् किसी जीवकी संख्यात कालमें कर्मनिर्जरा होकर मुक्ति होती है और किसी जीवकी असंख्यात कालमें कर्मनिर्जरा होकर मुक्ति होती है आदि। एक जीवकी अपेक्षा यह कर्म-निर्जराके कालके अनियमका विधान नहीं करता। इस अपेक्षासे तो जिसकी कर्मनिर्जरा आदिका जो काल नियत है उस कालमें ही कर्मनिर्जरा आदि होकर उसे मुक्तिलाभ होता है यही सिद्ध होता है। ६ माह ८ समयमें छहसौ आठ जीव मुक्तिलाभ करते हैं यह नियम इसी आधार पर किया गया है। धवला पु० १४ पृ. १४३ में आचार्य वीरसेन लिखते हैं-

सव्वकालमदीदद्धा सव्वजीवरासीए अणंतिमभागो, अण्णहा संसारिजीवाणमभावप्पसंगादो । सव्वकालमदीदकालस्स सिद्धा असंखेज्जदिभागो चेव, छम्मासमंतरिय णिव्वुइगमणणियमादो।

सर्वदा अतीत काल सब जीवराशिके अनन्तवें भागप्रमाण रहता है, अन्यथा सब जीवोंके अभाव होनेका प्रसंग आता है ।

सिद्ध जीव सर्वदा अतीत कालके असंख्यातवें भागप्रमाण ही होते हैं, क्योंकि छह महीनेके अन्तरसे मोक्ष जानेका नियम है ।

इससे विदित होता है कि कितने कालमें कितने जीव सम्यक्त्वको प्राप्त करते हैं और कितने जीव कितने कालमें मुक्तिलाभ करते हैं यह सुनिश्चित नियम है । अतएव जिसका सम्यग्दर्शन प्राप्त करनेका जो समय है उसी समय वह सम्यग्दर्शनको प्राप्त करता है और जिसका मोक्ष जानेका जो समय है उसी समय वह मुक्तिलाभ करता है । गति-आगतिसम्बन्धी सब जीवोंकी पूरी व्यवस्था अपने-अपने उपादानके अनुसार सुनिश्चित है । उसीके अनुसार प्रत्येक कार्य होता है । इस विषयकी पुष्टिमें विशेष प्रमाण हम पहले दे आये हैं ।

अपर पक्षने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके हमारे द्वारा उपस्थित किये गये प्रमाणके विरोधमें लिखा है कि 'उक्त प्रमाणोंसे यही प्रमाणित होता है कि ‘सहकारी कारणोंके सद्भाव होने पर उपादान कारण कार्यरूप परिणत होता है ।’ सो अपर पक्षके इस कथनसे ऐसा प्रतीत होता है कि उपादान कारण तो सदा विद्यमान है, मात्र सहकारी सामग्रीका जब योग मिलता है तब कार्य होता है । किन्तु यह बात नहीं है, क्योंकि केवलज्ञानका उपादान कारण बारहवें गुणस्थानमें अन्तिम समयवर्ती जीव है, प्रथम समयवर्ती जीव नहीं । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७० में लिखा है-

क्षीणेऽपि मोहनीयाख्ये कर्मणि प्रथमक्षणे ।
यथा क्षीणकषायस्य शक्तिरन्त्यक्षणे मता ॥ ८९ ॥
ज्ञानावृत्यादिकर्माणि हन्तुं तद्वदयोगिनः ।
पर्यन्तक्षण एव स्याच्छेषकर्मक्षयेऽप्यसौ ॥ ९० ॥

मोहनीय कर्मके प्रथम क्षणमें क्षीण हो जाने पर भी जिस प्रकार क्षीणकषायके अन्त्य क्षणमें ज्ञानावरणादिके नाश करनेकी शक्ति मानी गई है उसी प्रकार अयोगी जिनके अन्त्य क्षणमें शेष कर्मोंके क्षयकी शक्ति मानी गयी है ।

इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक आत्मा केवलज्ञानकी उत्पत्तिका उपादान कारण बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समयमें ही होता है, प्रथम समयमें नहीं ।

हम पिछले उत्तरमें तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७१ का ‘निश्चयनयाश्रयणे तु’ इत्यादि वचन उद्धृत कर आये हैं । इस वचनमें मोक्षका समर्थ उपादानकारण अयोगिकेवलीके अन्तिम समयमें स्थित जीवको बतलाया गया है । अपर पक्षने भी प्रतिशंका ३ में उसे उसरूपमें स्वीकार कर लिया है । अतएव जिस प्रकार अपर पक्षने अन्तिम समयवर्ती अयोगीकेवली जीवको मोक्षका समर्थ उपादान कारण स्वीकार कर लिया है जो आगम-सम्मत है उसी प्रकार अन्तिम समयवर्ती क्षीणकषाय जीवको केवलज्ञानका समर्थ उपादान कारण उसे स्वीकार कर लेना चाहिए ।

अभिप्राय यह है कि बारहवें गुणस्थानका अन्तिम समयवर्ती जीव जहाँ केवलज्ञानकी उत्पत्तिका समर्थ उपादान कारण है वहीं वह ज्ञानावरणादि कर्मोंके क्षयका प्रतिनियत निमित्त है । यह तो जीवकी अपेक्षा विचार है। कर्मोंकी अपेक्षा विचार करने पर जहाँ बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समयमें स्थित ज्ञानावरणादि कर्म तेरहवें गुणस्थानके प्रथम समयमें अपनी अकर्म पर्यायके उपादान कारण हैं वहीं उनकी कर्म-पर्यायका व्यय केवलज्ञानकी उत्पत्तिमें हेतु है। इस प्रकार इससे यही सिद्ध होता है कि लोकमें जितने भी कार्य हुए, होते हैं और होंगे उन सबकी बाह्याभ्यन्तर सामग्री सुनिश्चित है। प्रत्येक समयमें वैसा योग मिलता है और वही कार्य होता है। आचार्य कहीं उपादानकी अपेक्षा उसका निर्देश करते हैं और कहीं बाह्य सामग्रीकी अपेक्षा उसका निर्देश करते हैं। दोनों कथनोंका फलितार्थ एक ही है। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें इन दोनों शैलियोंको अपनाकर विवेचन किया गया है। उदाहरणार्थ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ५८ में समस्त कर्मोंके क्षयको मोक्षका कारण कहा है और पृ० ७१ में अयोगकेवलीके अन्तिम समयवर्ती रत्नत्रयको मोक्षका कारण कहा है, सो ये दोनों ही कथन अपने-अपने स्थानमें युक्तियुक्त हैं। व्यवहारनयकी अपेक्षा विचार करने पर प्रथम कथन युक्तियुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि समस्त कर्मोंके क्षयके साथ मोक्षकी काल-प्रत्यासत्ति है, इसलिए व्यवहारनयसे यह कहा गया है कि समस्त कर्मोंके क्षयसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। तथा निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करने पर दूसरा कथन परमार्थभूत प्रतीत होता है, क्योंकि अयोगकेवलीके अन्तिम समयमें रत्नत्रय परिणत आत्मा ही मोक्ष पर्यायको उत्पन्न करता है, समस्त कर्मोंका क्षय नहीं।

स्पष्ट है कि कर्मनिर्जरा और मोक्ष अपने-अपने नियत कालमें ही होते हैं इसकी पुष्टिमें पिछले उत्तरोंमें हम जो कुछ भी लिख आये हैं वह यथार्थ है।

अपर पक्ष एक ओर तो हमें ‘कालादिसामग्रीकः’ और ‘कालविशेषस्य सहकारिणः’ इत्यादि उल्लेखोंपर विचार करनेकी प्रेरणा करता है और दूसरी ओर कालको उदासीन कारण बतलाकर यह अभिप्राय व्यक्त करनेसे भी नहीं चूकता कि कोई भी काल किसी भी कार्यके लिए निमित्त है, अमुक काल ही अमुक कार्यके लिए निमित्त होता है ऐसा नहीं है। इसीको कहते हैं अपनी धारणाके अनुसार आगमका अर्थ करना।

आपने अदालतकी बात लिखी पर हमें तो अदालत जानेका अभ्यास नहीं है, इसलिये अदालतमें केस कैसे जीता जाता है यह सब हम नहीं जानते, उसकी रुचि भी नहीं है। हमारे सामने तो आगमके पत्र खुले हैं जिनके आधारपर हमें निर्णय करना है। उनमें अपर पक्ष जिसे प्रेरकसामग्री कहता है उसके समान काल विशेषपर भी उतना ही बल दिया गया है। यथा-

न च तेन विरुध्येत त्रैविध्यं मोक्षवर्त्मनः।
विशिष्टकालयुक्तस्य तत्त्रयस्यैव शक्तितः॥४६॥
-तत्त्वार्थश्लोक० पृ० ६५

इस कारण मोक्षमार्ग तीन प्रकारका है यह विरोधको प्राप्त नहीं होता, क्योंकि विशिष्ट कालसे युक्त तीनरूप उसमें ही मोक्ष प्राप्त करनेकी सामर्थ्य है॥४६॥

क्षीणकषायप्रथमसमये तदाविर्भावप्रसक्तिरपि न वाच्या, कालविशेषस्य सहकारिणोऽपेक्षणीयस्य तदा विरहात्।-तत्त्वार्थश्लोक० पृ० ७१।

क्षीणकषायके प्रथम समयमें उसके आविर्भावका प्रसंग आता है यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि उस समय अपेक्षीय सहकारी कालविशेषका अभाव है।

विद्वान् पाठक देखेंगे कि इन उल्लेखोंमें अमुक कार्य अमुक कालमें ही होता है इस तथ्यपर कितना अधिक बल दिया है। हमें आशा है कि अपर पक्ष वस्तुस्थितिका विचार कर अपने विचारोंमें अवश्य ही परिवर्तन करेगा।

यह सच है कि काललब्धि पदद्वारा केवल कालका ही ग्रहण नहीं किया है, किन्तु अन्य सामग्रीका भी ग्रहण किया है। पर इतनेमात्रसे प्रतिनियत कार्यके प्रतिनियत कालका निषेध नहीं हो जाता। बाह्य सामग्री, जिस कार्यके साथ उसकी व्याप्ति है, उसकी सूचक है और इस मायनेमें उसे निमित्तरूपसे स्वीकार करनेमें सार्थकता भी है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने व्यापार द्वारा अपनेसे सर्वथा भिन्न अन्य द्रव्यके कार्यको उत्पन्न करती है। इस दृष्टिसे यदि उसे निमित्त कहा जाता है तो उसमें निमित्तपनेका व्यवहार उपचरित या आरोपित ही होगा। तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सूत्र २० में अन्तरीक्ष, भौम, अंग, स्वर, स्वप्न, लक्षण, व्यञ्जन और छिन्न इन आठ महानिमित्तोंका निर्देश किया है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि जहाँ भी अन्य सामग्रीमें 'निमित्त’शब्दका व्यवहार हुआ है वह मुख्यके सूचनके अर्थमें ही हुआ है। इसी अर्थमें अन्य सामग्रीमें निमित्त व्यवहारकी सार्थकता है ऐसा यहाँ समझना चाहिए।

\४२. कर्मोंका परिपाक प्रतिनियत ही होता है

अपर पक्षने शिकायत करते हुए लिखा है कि ‘अनियत पर्याय सिद्ध करनेके लिए हमने अपने पत्रकमें कर्मपरिपाकके अनियत होनेका प्रमाण दिया था, आपने उसका कुछ उत्तर नहीं दिया और यह लिख कर उसे टाल दिया कि यह एक ऐसा गम्भीर प्रश्न है जिसपर इस समय लिखना उचित न होगा। प्रतीत होता है कि यह बात आपके लक्ष्यकी पोषक न होनेसे आपने ऐसा लिखकर टाल दिया है। अतः हमारा पूर्वोक्त प्रमाण अनियत पर्यायका समर्थन करता है।’

यह अपर पक्षका वक्तव्य है। हमने अपने पिछले उत्तरमें लिखा था-‘रही कर्मादिकके संक्रम आदिकी बात सो ऐसा मान लेने पर कि कर्मका उदय होने पर भी उदयके विरुद्ध साधन मिलनेसे उन कर्मोंका फल नहीं मिलता यह एक ऐसा गम्भीर प्रश्न है जिस पर इस समय लिखना उचित न होगा।’

यह हमारा वक्तव्य है। अब देखना यह है कि हमने यह वक्तव्य अपर पक्षके किस कथनको ध्यानमें रख कर लिपिबद्ध किया था। आगे प्रतिशंका २ से उसे यहाँ उद्धृत किया जाता है-

‘अर्हन्त भगवान्के असाता वेदनीयकर्मका उदय सातारूपसे हुआ करता है। नरकमें सातावेदनीयका उदय (फल) असातावेदनीयके रूपमें होता है। देवगतिमें दुःखदायक साधन न होनेसे असातावेदनीयका उदय दुःखदायक नहीं होता।’

अपर पक्षने इस कथन द्वारा यह बतलानेका प्रयत्न किया है कि कर्मका उदय तो हो पर उसके अनुकूल बाह्य सामग्री न हो तो जीवको उसका फल नहीं भोगना पड़ता या उसके विपरीत फलकी प्राप्ति होती है। अपने इस कथनकी पुष्टिमें अपर पक्षने सातावेदनीय और असातावेदनीयके उदयको उदाहरणरूपमें उपस्थित किया है।

अपर पक्षके इस कथनसे हम यह तो नहीं समझ सके कि वह अपने इस विचारके अन्तर्गत सब कर्मोंके उदयको सम्मिलित करता है या केवल सातावेदनीय और असातावेदनीयके उदय तक ही इसे सीमित रखता है। यदि उस पक्षका उक्त कथनके आधार पर यही विचार हो कि किसी भी कर्मका उदय क्यों न हो वह तभी अपना फल दे सकता है जब उसके अनुकूल बाह्य सामग्री हो। बाह्य सामग्रीके अभावमें या तो जीवको उसका फल नहीं भोगना पड़ता या फिर जैसी बाह्य सामग्री हो वैसा उसका फल मिलता है। तब तो यही मानना पड़ेगा कि यदि किसी जीवको गुस्सा उत्पन्न होता है तो यह नहीं माना जा सकता कि उसके क्रोध कषायका ही उदय है, मानादि कषायका उदय नहीं हैं। या जो मनुष्य पर्यायमें है उसके मनुष्य गतिका ही उदय है तिर्यञ्चादि गतिका उदय नहीं है, क्योंकि अपर पक्षके मतानुसार कार्य तो बाह्य सामग्रीके अनुसार होता है, कर्मके उदयानुसार तो होता नहीं।

यदि यह दोष प्राप्त न हो इस भयसे अपर पक्षका कहना यह हो कि यह नियम सब कर्मोंके उदयके लिए नहीं है। कुछ कर्मोंके उदयके लिए तो उक्त नियम है और कुछ कर्मोंके उदयके लिए यही नियम है कि जैसा कर्मोंका उदय होता है वैसी बाह्य सामग्री मिलती ही है। तो इस पर हमारा कहना यह है कि वे कौन कर्म हैं जिन पर उक्त नियम लागू होता है और उनसे भिन्न दूसरे कौन कर्म हैं जिन पर उक्त नियम लागू नहीं होता इसका आगमसे स्पष्टीकरण करना था। आगममें तो मात्र केवली जिनको लक्ष्य कर यह लिखा है कि उनका असातोदय सातरूपसे परिणाम जाता है। किन्तु आगममें इस प्रकारके निर्देशका कारण है।

\१. प्रथम तो इसका कारण यह है कि उनके मोहनीय कर्मका सर्वथा अभाव हो गया है, और मोहनीय कर्मके अभावमें वेदनीय कर्म सुख-दुःखरूप अपना कार्य करनेमें अक्षम है। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर गोम्मटसार कर्मकाण्डमें कहा भी है-

घादिं व वेयणीयं मोहस्स बलेण घाददे जीवं।
इदि घादीणं मज्झे मोहस्सादिम्हि पढिदं तु ॥१९॥

वेदनीयकर्म मोहनीयके बलसे घातिया कर्मोंके समान जीवको घातता है, इसलिए घातिया कर्मोंके मध्यमें और मोहनीय कर्मके आदिमें उसका पाठ रखा है ॥१९॥

\२. दूसरा इसका मुख्य कारण यह है कि क्षपकश्रेणीके प्रत्येक समयमें पाप प्रकृतियोंका अनुभाग अनन्तगुणा हीन होता हुआ सयोगकेवलीके असातावेदनीयका अनुभाग वहाँ बँधनेवाले सातावेदनीयके अनुभागसे भी अनन्तगुणा हीन रह जाता है और चूँकि वहाँ ईर्यापथ आस्रव होनेके कारण सातावेदनीयका प्रत्येक समयमें उदय है, अतः अनन्तगुणे अनुभागवाले सातावेदनीयके उदयमें अनन्तगुणे हीन अनुभागवाले असातावेदनीयका उदय अन्तर्निहित हो जाता है, इसलिए यह कहा है कि असाताका उदय सातारूप परिणम जाता है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए गोम्मटसार कर्मकाण्डमें लिखा भी है-

समयट्ठिदिगो बंधो सादस्सुदयप्पिगो जदो तस्स।
तेण असादस्सुदओ सादसरूवेण परिणमदि ॥२७४॥

जिस कारण केवली जिनके सातावेदनीयका बन्ध उदयस्वरूप एक समय स्थितिवाला होता है इस कारण असातावेदनीयका उदय सातारूपसे परिणम जाता है ॥२७४॥

यहाँ यह कहना युक्त नहीं कि कषायका अभाव होनेसे वहाँ सातावेदनीयमें अनुभाग सम्भव नहीं, क्योंकि कषायके सद्भावमें जितना अनुभागबन्ध होता है उतना वहाँ सम्भव न होनेसे उसका निषेध किया है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि वहाँ सातावेदनीयमें अनुभाग होता ही नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर उसकी सातावेदनीय यह संज्ञा ही नहीं बन सकती। अतएव प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि केवली जिनके जो सातावेदनीयका बन्ध होता है वह वहाँ सत्तामें स्थित असाताके अनुभागसे अनन्तगुणे अनुभागको लिये हुए ही होता है।

हम पूर्वमें केवली जिनके साता-असातावेदनीयको निमित्तकर इन्द्रियजन्य सुख-दुख नहीं पाया जाता इसका उल्लेख कर आये हैं। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए गोम्मटसारमें लिखा भी है-

णट्ठा य राय-दोसा इंदियणाणं च केवलिम्हि जदो।
तेण दु सादासादजसुह-दुक्खं णत्थि इंदियजं ॥२७३॥

जिस कारण केवली जिनके राग-द्वेष और इन्द्रियज्ञानं नष्ट हो गये हैं इस कारण उनके साता-असाता-जन्य सुख-दुख और इन्द्रियजन्य ज्ञान नहीं पाये जाते ॥२७३॥

इस प्रकार आगम इस बातको तो स्वीकार करता है कि केवली जिनके असातोदय सातारूपसे परिणम जाता है, पर यह बात आगममें कहीं भी नहीं बतलाई है कि ‘नरकमें सातावेदनीयका उदय ( फल ) असातावेदनीयके रूपमें होता है’ और न ही यह बात ही बतलाई है कि ‘देवगतिमें दुःखदायक साधन न होनेसे असातावेदनीयका उदय दुःखदायक नहीं होता।’ मालूम नहीं, अपर पक्षने अपने मनसे ऐसी असत्कल्पना करके उसे कैसे लिपिबद्ध किया। बाह्य-साधन स्वयं न तो दुखरूप ही होते हैं और न सुखरूप ही। कब कौन दुखमें निमित्त हो और कब कौन सुखमें यह सब भिन्न-भिन्न जीवोंकी भिन्न-भिन्न परिस्थितिपर निर्भर करता है। महापुराण पर्व ६ में ललितांगदेव और उसकी प्रिय वल्लभा स्वयंप्रभाकी कथा आई है। उसमें बतलाया है कि ललितांगदेवकी जब छः माह आयु शेष रही तब उसकी माला म्लान हो गई, कल्पवृक्ष काँपने लगे, शरीरकी कांति क्षीण हो गई आदि। इससे वह बहुत दुखी हुआ, देखो ( श्लोक १ से ८ तक )। आगे वहीं उसकी देवीकी चर्चा करते हुए लिखा है कि ललितांग देवके स्वर्गसे च्युत होनेपर वह स्वयंप्रभादेवी उसके वियोगसे चकवाके विना चकवीकी तरह बहुत ही खेद-खिन्न हुई आदि ( देखो श्लोक ५० से ५२ तक )।

इससे स्पष्ट है कि जिस प्रकार देवोंमें इन्द्रियजन्य सुख है उसी प्रकार दुख भी है। नरकोंमें भी ऐसा ही समझना चाहिये। तत्त्वार्थवार्तिक अध्याय ३ सूत्र ३ में जो यह कहा गया है कि नारकी जीव नित्य अशुभतर लेश्या, अशुभतर परिणाम, अशुभतर देह, अशुभतर वेदना और अशुभतर विक्रियावाले होते हैं सो वहाँ आये हुए ‘नित्य’ शब्दका अर्थ करते हुए आचार्य अकलंकदेवने यही बतलाया है कि उनके आभीक्ष्ण्य (बहुधा) अशुभतर लेश्या आदि पाये जाते हैं। उदाहरणमें नित्य (बहुधा) हँसनेवाले देवदत्तको उपस्थित करते हुए लिखा है कि जिस प्रकार देवदत्त नित्य हँसता है अर्थात् कारण मिलने पर हँसता है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिये।

इससे सिद्ध होता है कि संसारी जीवोंमें कर्मोदयके साथ जीवकी परिणतिकी बाह्य व्याप्ति है। तभी तो आचार्य कुंदकुंदने समयसार बन्धाधिकारमें यह लिखा है-

जो अप्पणा दु मण्णदि दुक्खिद-सुहिदे करेमि सत्ते त्ति।
सो मूढो अण्णाणी णाणी एत्तो दु विवरीदो ॥२५३॥

जो यह मानता है कि अपने द्वारा मैं दूसरे जीवोंको दुखी सुखी करता हूँ वह मूढ़ अज्ञानी है। किन्तु जो इससे विपरीत है वह ज्ञानी है ॥२५३॥

भगवान् आचार्यने इस वचन द्वारा बाह्य द्रव्य, क्षेत्र और कालादि दूसरेमें सुख-दुखको उत्पन्न करते हैं इस बातका निषेध किया है। अपने सुख-दुखकी अपने कर्मके साथ बाह्य व्याप्ति क्यों है इसका स्पष्टीकरण आचार्य कुन्दकुन्दने समयसार गाथा २५४,२५५ और २५६ में विशदरूपसे किया है। उनकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

सुख-दुःखे हि तावज्जीवानां स्वकर्मोदयेनैव, तदभावे तयोर्भवितुमशक्यत्वात् । स्वकर्म च नान्येनान्यस्य दातुं शक्यम्, तस्य स्वपरिणामेनैवोपार्ज्यमाणत्वात् । ततो न कथञ्चनापि अन्योन्यस्य ‘सुख-दुःखे कुर्यात् । अतः सुखित-दुःखितान् करोमि सुखित-दुःखितः क्रिये चेत्यध्यवसायो ध्रुवमज्ञानम् ।

प्रथम तो जीवोंको सुख-दुःख वास्तवमें अपने कर्मोदयसे ही होता है, क्योंकि अपने कर्मोदयके अभावमें सुख-दुःख होना अशक्य है । और अपना कर्म दूसरेके द्वारा दूसरेको नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वह अपने परिणामसे ही उपार्जित होता है, इसलिए किसी भी प्रकारसे एक दूसरेको सुख-दुःख नहीं कर सकता । इसलिए यह अध्यवसाय निश्चित अज्ञान है कि 'मैं पर जीवोंको सुखी-दुःखी करता हूँ और पर जीव मुझे सुखी-दुःखी करते हैं ।

इस टीकामें ‘स्वपरिणामेनैवोपार्ज्यमाणत्वात्’ पद ध्यान देने योग्य है । इससे स्वाश्रितपनेका ज्ञान कराते हुए यह सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि ‘जीव जैसा करता है वैसा भोगता है ।’ सुख-दुःखादिकी अपने-अपने कर्मोदयके साथ व्याप्तिका जो विधान आचार्यने किया है उसका हार्द क्या है यह उक्त शब्दों द्वारा सुस्पष्ट ज्ञात हो जाता है ।

यहाँ यह शंका करना उचित नहीं है कि जब कि अपने परिणामोंके अनुसार जीव कर्मोंका उपार्जन करता है और उपार्जित कर्मके अनुसार फल भोगता है ऐसी अवस्थामें उसके संसारका उच्छेद कभी भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि जभी इस जीवका कर्म और कर्मफलमें अरुचि होनेके साथ ज्ञानस्वभाव आत्माके प्रति आदर उत्पन्न होता है तभी इसके नये कर्मका बन्ध नहीं होता और सत्तामें स्थित पुराने कर्मकी क्रमशः निर्जरा होकर यह मुक्तिका पात्र बनता है ।

इस प्रकार इतने विवेचनसे यह भली-भाँति सिद्ध हो जाता है कि ‘नरकमें न तो सातावेदनीयका उदय (फल) असातावेदनीयके रूपमें होता है’ और न ही यह कहा जा सकता है कि ‘देवोंमें दुःखदायक साधन न होनेसे असातावेदनीयका उदय दुःखदायक नहीं होता ।’

हमने अपने पिछले उत्तरमें अपर पक्षकी उक्त मान्यता पर विशेष विचार केवल इस अभिप्रायसे नहीं किया था कि वह हमारे संक्षिप्त उत्तरमें निहित तथ्यकी ओर ध्यान देकर अपने विचारोंमें परिवर्तन कर लेगा । किन्तु इसे वह हमारे द्वारा टालना समझकर अपने आगमविरुद्ध अभिमतकी पुष्टिमें ही इतिकर्तव्यता समझता है, इसलिए यहाँ इतना लिखना पड़ा है । वस्तुतः अपर पक्षकी ओरसे ऐसा लिखा जाना कि ‘नरकमें सातावेदनीयका उदय ( फल ) असातावेदनीयके रूपमें होता है । देवगतिमें दुख-दायक साधन न होनेसे असातावेदनीयका उदय दुःखदायक नहीं है ।’ एक ऐसा गंभीर प्रश्न है जिससे पूरी कार्य-कारण-परम्परा पर तो पानी फिरता ही है । साथ ही किस कर्मके उदयमें क्या कार्य होगा ऐसा नियम न रहनेसे पूरी कार्मिक व्यवस्था ही गड़बड़ा जाती है ।

अपर पक्षने जयधवला पु० १ पृ० २८९ से ‘पागभावस्स विणासो’ इत्यादि वचन उद्धृत कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न तो किया कि ‘जैसा द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव प्रागभावके विनाशके अनुकूल होगा वैसा ही उसका विनाश होगा ।’ आदि । परन्तु उसने इस बातका थोड़ा भी विचार नहीं किया कि जिस प्रकार उसके मतानुसार कर्मोदयसे वही कार्य होता है जिसके अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि होते हैं । किन्तु ‘स यथा नाम’ ( त० सू० अ० ८ सूत्र २१ ) सूत्रके अनुसार जो उस कर्मकी अनुभागशक्ति है उसके अनुसार कार्य नहीं होता, तो उसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य, क्षेत्र, काल आदिसे भी वही कार्य होगा जिसके अनुकूल अन्य द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि होगें । इस प्रकार प्रत्येक द्रव्य, क्षेत्र, काल आदिको अपना अपना कार्य करनेके लिये अन्य-अन्य द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि अपेक्षित होनेसे किसी भी कार्यकी उत्पत्ति ही नहीं बन सकेगी। ऐसी अवस्थामें उक्त उल्लेखसे अपर पक्ष जो अपने अभिमतकी सिद्धि करना चाहता है वह न होकर यही सिद्ध होता है कि जो जिस कार्यका प्रागभाव होता है-उसके विनाशसे वही कार्य होता है और बाह्य सामग्री भी उसके अनुकूल मिलती है।

यहाँ पं० फूलचन्द्र शास्त्री द्वारा लिखित तत्त्वार्थसूत्रके जिन तीन उल्लेखोंको अपर पक्षने अपने पक्षकी पुष्टिमें उपस्थित किया है उनमेसे प्रथम उल्लेख द्वारा तो यही सिद्ध होता है कि प्रत्येक द्रव्य अपना कार्य स्वयं करता है, उसमें अन्य बाह्य सामग्री निमित्त होती हैं । वाक्य रचना पर ध्यान दीजिये। उसमें यद्यपि व्यवहार नयकी कथनी पर बल दिया गया है पर निश्चयनयकी कथनीको भुलाया नहीं गया है।

दूसरे उल्लेखमें निधित्त और निकाचित कर्म स्वमुखसे भी उदयमें आते हैं और पर मुखसे भी उदयमें आते हैं मात्र इतना सूचित किया गया है। कर्मोंका परिपाक अनियत है यह इससे कहाँ सिद्ध होता है। प्रत्युत इससे तो यही सिद्ध होता है कि जिसका जैसा उपादान होता है उसके अनुसार ही उसका कार्य होता है। हाँ यदि आगम ग्रन्थोंमें यह लिखा होता कि ऐसे कर्मोंका स्वमुखसे ही उदय होता है और फिर बाह्य सामग्रीके बलसे उनका पर मुखसे भी उदय बतलाया गया होता तो अपर पक्षका यह कहना उचित प्रतीत होता कि इससे कर्मोंका अनियत परिपाक सिद्ध होता है। किन्तु ऐसी बात नहीं है। अतः इस उल्लेखसे भी अपर पक्षके अभिमतकी पुष्टि नहीं होती ऐसा यहाँ समझना चाहिये।

तीसरे उल्लेखमें आये हुए ‘अनुकूल सामग्री’ पद पर ध्यान दीजिए। इसमें बाह्याभ्यन्तर दोनों प्रकारकी सामग्रीका अन्तर्भाव हो जाता है। जिस प्रकार अकर्मरूप कर्मवर्गणाऐं अपने उपादानके अनुसार कर्मरूप परिणम जाती हैं उसी प्रकार विवक्षित कर्मरूप परिणमी कर्मप्रकृतियाँ अपने-अपने उपादानके अनुसार अन्यरूप परिणाम जाती हैं यह सब उनमें विद्यमान उपादान योग्यता पर निर्भर करता है। इसमें अनियतपनेका तो प्रश्न ही नहीं उठता। जब कि प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें परिणमन करता है तो वह प्रत्येक समयमें अन्य-अन्य होने ही वाला है। इससे अनियतपना कहाँ सिद्ध होता है। किन कर्मोंमें सदृश और विसदृश दोनों प्रकारका परिणमन अपने-अपने उपादानके अनुसार होता है इसी बातको संक्रमण आदि द्वारा सूचित किया गया है। अतएव तत्त्वार्थसूत्रके उक्त उल्लेख भी अपर पक्षके अभिमतकी सिद्धिमें सहायक नहीं हैं।

हमने अपने पिछले उत्तरमें लिखा था-'ऐसा मान लेने पर कि कर्मका उदय होने पर भी उदयके विरुद्ध साधन मिलनेसे’ आदि । इस पर अपर पक्षकी जिज्ञासा है कि यह आशय हमने उसके कौनसे वाक्यका ले लिया है? समाधान यह है कि अपर पक्षने अपनी पिछली प्रतिशंकामें लिखा था-‘नरकमें सातावेदनीयका उदय (फल) असातावेदनीयके रूपमें होता है। देवगतिमें दुखदायक साधन न होनेसे असातावेदनीयका उदय दुखदायक नहीं होता।’

हम समझते हैं कि अपने द्वारा पिछली प्रतिशंकामें लिखे गये उक्त वाक्योंको पढ़कर अपर पक्षकी समझमें यह बात आ जायगी कि पिछले उत्तरमें इन वाक्योंको ध्यानमें रखकर हम जो कुछ भी लिख आये हैं वह फिजूल न होकर प्रदीपशिखाके समान मार्गदर्शक है।

अपर पक्ष यदि यही मानता है कि उपादान निश्चय पक्ष और निमित्त व्यवहार पक्षका मेल होने पर कार्य होता है तो फिर वह उपादान अनेक योग्यतावाला होता है इत्यादि असत्कल्पनाऐं करके उपादानको अनुपादान बनानेकी क्यों चेष्टा करता है। तब तो उसे भीतरसे यही स्वीकार कर लेना चाहिए कि प्रत्येक समयमें प्रत्येक द्रव्य अपने प्रतिनियत कार्यका प्रतिनियत उपादान है, अतएव प्रत्येक समयमें वह अन्य प्रतिनियत बाह्य सामग्रीको निमित्त कर प्रतिनियत कार्यको ही उत्पन्न करता है।

बाह्य सामग्री स्वयं अन्य द्रव्यके कार्यका यथार्थ कारण तो है नहीं, पर बाह्य व्याप्तिके आधार पर उसमें निमित्त या कर्ता आदि व्यवहार होता है, जो असद्भूत है, इसीलिए ही हम उसे अन्य द्रव्यके कार्यकी अपेक्षा अकिंचित्कर कहते हैं और यह कहना हमारा ही हो यह बात नहीं है, शास्त्रकारोंने भी इसे असद्भूत अपर नाम उपचरित कहा ही है। प्रमाण पूर्वमें ही दे आये हैं। हमने यहाँ पर जो ‘दोनोंका मेल होने पर कार्य होता है।’ यह लिखा है सो उसका आशय अन्तर्व्याप्ति और बाह्य व्याप्तिको दिखलाना भर है, क्योंकि ऐसा ही द्रव्यगत स्वभाव है कि कार्यमें बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता होती है। आभ्यन्तर उपाधि कार्यका आत्मभूत विशेषण है और बाह्य उपाधि अनात्मभूत विशेषण है। उपाधि विशेषणका दूसरा नाम है इस तथ्यको स्पष्ट करते हुए युक्त्यनुशासनकी टीका पृ० ६५ में लिखा है-

उपाधिर्विशेषणं स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावाः परद्रव्यक्षेत्रकालभावाश्च····।

उपाधिका अर्थ विशेषण है जो स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावरूप तथा पर द्रव्य, परक्षेत्र, पर काल और पर भावरूप होती है।

इसी तथ्यको और भी स्पष्ट शब्दोंमें सूचित करते हुए अष्टसहस्री पृ० १५० में लिखा है-

यथा कार्यं बहिरन्तः स्यादुपाधिभिरनन्तविशेषणैर्विशिष्टं सर्वथा निरंशवस्तुनि सकलविशेषणाव्यवस्थितेः।

जैसे कार्य बाह्य और आभ्यन्तर उपाधियों अर्थात् अनन्त विशेषणोंसे युक्त होता है, क्योंकि सर्वथा निरंश वस्तुमें सकल विशेषणोंकी व्यवस्था नहीं बन सकती।

जिस प्रकार किसी राजाके राज्यका संचालन करते समय आभ्यन्तर उपाधि आज्ञा, ऐश्वर्य आदि और बाह्य उपाधि छत्र, चमर, सिंहासन आदि दोनों देखे जाते हैं। उनमें राज्यका संचालन छत्र, चमर और सिंहासन आदि नहीं करते। वास्तवमें राजाकी योग्यतासे ही राज्यका संचालन होता है, फिर भी राज्यके संचालनमें व्यवहारसे छत्र, चमर और सिंहासन आदिको स्थान मिला हुआ है। यह एक दृष्टान्त है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए। आभ्यन्तर उपाधि द्रव्यका आत्मभूत धर्म है, इसलिए कार्यके प्रति उसे ही निश्चय साधन कहा है। बाह्य उपाधि द्रव्यका आत्मभूत धर्म नहीं है, फिर भी कार्यके साथ उसकी बाह्य व्याप्ति नियमसे होती है, इसलिए उसे उपचरित हेतु कहा है। इससे हमारे कथनका आशय क्या है यह अपर पक्षकी समझमें अच्छी तरहसे आ जायगा ऐसी आशा है।

यदि हमने दोनोंको कारण स्वीकार कर लिया या आगममें दोनोंको कारण कहा है तो इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों यथार्थ कारण हो गये। जो उपचरित होगा वह उपचरित ही रहेगा और जो अनुपचरित है वह अनुपचरित ही रहेगा। यदि किसी बालकको अग्नि कह दिया तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह बालक यथार्थमें अग्नि हो गया। अग्नि अग्नि है और बालक बालक है। अग्नि बालक नहीं और बालक अग्नि नहीं। फिर भी तेज आदि धर्मको देख कर जिस प्रकार बालकमें अग्निका व्यवहार किया जाता है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए । उपादान कारण जैसे स्वयं परिणम कर कार्यको उत्पन्न करता है उस प्रकार बाह्य सामग्री स्वयं परिणमकर उस कार्यको उत्पन्न नहीं करती। फिर भी बाह्य सामग्रीके अमुक प्रकारके परिणामके कालमें ही उपादानका अमुक प्रकारका परिणाम होता है, इसलिए बाह्य सामग्रीमें भी कारण या निमित्त धर्मका उपचार किया गया है। और यही कारण है कि उपचरितपनेकी विवक्षा किये बिना हमने बाह्य सामग्रीको भी कार्यके प्रति निमित्त कहा है।

स्पष्ट है कि हमारे और अपर पक्षके मध्य जो विचारभेद है वह बना हुआ ही है। वह तब तक समाप्त नहीं हो सकता जब तक कि अपर पक्ष बाह्य सामग्रीमें निमित्त व्यवहारको उपचरित नहीं स्वीकार कर लेता।

आगे अपर पक्षने अपनी मान्यतानुसार पुनः स्व-परप्रत्यय और स्वप्रत्यय कार्योंका प्रसंग उपस्थित कर अपनी पुरानी मान्यताओंको दुहरानेका प्रयत्न किया है। और जिन उदाहरणोंको जिस शैलीमें पहले लिपिबद्ध किया था वे उदाहरण उसी शैलीमें पुनः यहाँ लिपिबद्ध कर दिये गये हैं। किन्तु उन सबका विस्तारसे विचार हम पूर्वमें कर ही आये हैं अतः अपर पक्षके इस सब कथनको पुनरुक्त समझकर यहाँ विशेष विचार करना उचित नहीं समझते। तथ्य रूपमें इतना अवश्य निर्देश कर देते हैं कि-

\१. लोकमें ऐसा एक भी कार्य नहीं होता जिसका मात्र निश्चय हेतु हो और व्यवहार हेतु न हो।

\२. निश्चय उपादानके अपने कार्यके सन्मुख होने पर उसके अनुकूल बाह्य सामग्रीका योग अवश्य मिलता है।

\३. किसी भी द्रव्यकी कार्यमाला किसी समय रुकती नहीं । जहाँ तेलके अभावमें मोटर रुकी ऐसा इन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वक मानससे प्रतीत होता है वहाँ मोटरकी उपादान शक्ति रुकनेकी थी, अतः तेलका अभाव उसमें हेतु हुआ ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि आगममें समर्थ या निश्चय उपादानका लक्षण करते हुए अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यको ही उपादान कहा है। यदि किसीके इन्द्रियप्रत्यक्षसे उस समय मोटरमें यह समर्थ उपादानता ज्ञात नहीं होती तो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मोटरका उपादान तो चलनेका था पर तेल नहीं होनेसे नहीं चल सकी। प्रत्युत बाह्य सामग्री सूचक होनेसे तेलके अभावसे यही सूचित होता है कि उस समय मोटरका उपादान चलनेका न होकर स्थिर रहनेका था, इसलिए वह स्थिर हो गई और उसमें तेलका अभाव हेतु हो गया।

आचार्योंने एक यह नियम बना दिया कि बाह्य-आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें कार्य होता है (स्वयंभूस्तोत्र श्लोक ६०)। दूसरा यह नियम बना दिया कि उपादानके कालमें ही सहकारी सामग्री होती है (त०श्लोकवार्तिक पृ. ५५) । तथा तीसरा यह नियम बना दिया कि विवक्षित अपने कार्यके करनेमें अन्त्य क्षण प्राप्तपनेका नाम ही सम्पूर्ण है (तत्त्वार्थश्लोकवा० पृ० ७०)। इससे हम जानते हैं कि यदि कोई मात्र इतना मानता है कि मात्र तेलके अभावमें मोटर नहीं चल रही है तो वह वास्तवमें कार्य-कारण परम्पराका ज्ञाता नहीं माना जा सकता, क्योंकि तेलके रहने पर भी और चालककी उसे चलानेकी इच्छा होने पर भी कभी कभी मोटर नहीं चलती। इससे सिद्ध है कि जिस समय जैसी आभ्यन्तर उपाधि होती है उस समय उसीके अनुकूल बाह्य सामग्रीका योग होकर वह कार्य होता है। कार्य-कारणपरम्पराका यह अव्यभिचारी नियम है।

अपर पक्षने तत्त्वार्थवार्तिक पृ. ६४६ का उद्धरण उपस्थित कर पुनः यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया हैं कि सिद्ध जीवकी लोकाग्रसे आगे गति मात्र धर्मद्रव्यके न होनेसे नहीं होती। साथ ही और भी अनेक प्रकारकी बातें लिखकर प्रतिशंकाके कलेवरको बढ़ाया है।

हम पहले इस सम्बन्धमें पर्याप्त लिख आये हैं, क्योंकि अपर पक्षने इन सब विषयोंकी पूर्वमें विस्तारसे चर्चा की है। अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें यहाँ तत्त्वार्थवार्तिकका जो उद्धरण उपस्थित किया है उसके पूर्वके ‘स्यान्मतं’ इत्यादि कथन पर यदि वह दृष्टि डाल लेता तो वहीं उसे अपनी शंकाका समाधान मिल जाता। आचार्यदेव लिखते हैं -

प्रश्न-सिद्ध शिलापर पहुँचनेके बाद चूँकि मुक्त जीवका ऊर्ध्वगमन नहीं होता अतः उष्ण स्वभावके अभावमें अग्निके अभावकी तरह मुक्त जीवका भी अभाव हो जाना चाहिए ?

उत्तर-मुक्त जीवका ऊर्ध्व ही गमन होता है तिरछा आदि गमन नहीं होता यह स्वभाव है, न कि ऊर्ध्वगमन करते ही रहना। जैसे अग्नि कभी ऊर्ध्व ज्वलन नहीं करती तब भी अग्नि बनी रहती है उसी तरह मुक्त जीवका भी लक्ष्य प्राप्तिके बाद ऊर्ध्वगमन न होने पर भी अभाव नहीं होता।
-तत्त्वार्थवार्तिक पृ० ८०४

इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि मुक्त जीवका उपादान ही लोकाग्रतक गमन करनेका होनेसे वहींतक उसका गमन होता है। फिर भी व्यवहार हेतुका ज्ञान करानेके लिए आचार्यने उक्त वचन लिखा, जिसे आधार बनाकर अपर पक्षने अपनी प्रतिशंकाका कलेवर पुष्ट किया है। आचार्य कहींपर व्यवहार हेतुकी मुख्यतासे कथन करते हैं और कहींपर निश्चय हेतुकी मुख्यतासे। किन्तु ऐसे कथनको नयवचन ही समझना चाहिए। तत्त्वार्थसूत्रके १०वें अध्यायमें ‘धर्मास्तिकायाभावात्’ सूत्र व्यवहार हेतुकी मुख्यतासे ही लिखा गया है। इसलिए जो महानुभाव उस परसे यह अर्थ फलित करते हैं कि उपादानके रहते हुए भी निमित्तके न होनेसे कार्य नहीं हुआ वे वस्तुतः कार्यकारणपरम्पराके ज्ञाता नहीं माने जा सकते।

अपर पक्ष पुरुषार्थ करनेका निर्देश तो करता है, परन्तु स्वावलम्बनको तिलांजलि देकर परावलम्बनको ही कार्य-कारणपरम्पराका मुख्य अंग बनानेका प्रयत्न करते हुए उस पक्षकी ओरसे ऐसा लिखा जाना कि ‘सर्वज्ञके प्रति आस्था रखिए, उनके ज्ञान तथा वाणीपर भी आस्था रखिए’ आदि, केवल पाठकोंको भ्रममें रखनामात्र प्रतीत होता है। स्वामी समन्तभद्र तो स्वयंभूस्तोत्रमें यह लिखते हैं -

यद्वस्तु बाह्यं गुण-दोषसूतेः निमित्तमाभ्यन्तरमूलहेतोः।
अध्यात्मवृत्तस्य तदंगभूतमभ्यन्तरं केवलमप्यलं ते ॥५९॥

अभ्यन्तर अर्थात् उपादान है मूल हेतु जिसका ऐसे गुण-दोषकी उत्पत्तिका जो बाह्य पदार्थ निमित्त है वह मोक्षमार्गपर आरूढ़ हुए व्यक्तिके लिए गौण है, क्योंकि हे जिन ! आपके मतमें केवल अभ्यन्तर हेतु ही कार्यसिद्धिके लिए पर्याप्त है ॥५९॥

और अपर पक्ष यह कहता है कि प्रत्येक उपादान अनेक योग्यताओंवाला होता है, इसलिए कार्य निमित्तके अनुसार होता है। अब विचार कीजिए कि जो इस प्रकारको कथनी द्वारा उपादानको अनुपादान बनाकर उसके कार्यको निमित्तोंकी मर्जीपर छोड़ देता है उसके द्वारा पुरुषार्थकी बात करना सर्वथा असंगत ही प्रतीत होती है। स्पष्ट है कि अपर पक्षका कार्य-कारणपरम्परासम्बन्धी समग्र कथन आगम विरुद्ध होनेसे ग्राह्य नहीं हो सकता।

अपर पक्षका कहना है कि 'जब तक ज्ञाता-दृष्टा नहीं बन जाते तब तक अन्तरंग-बहिरंग साधनोंको जुटाना चाहिए। सो प्रकृतमें अपर पक्षको यही तो समझना है कि जब तक जुटानेका विकल्प है तभी तक इस जीवकी ज्ञाता-दृष्टा स्वभावरूप परिणति न होकर रागरूप परिणति होती है और जिस क्षण यह जीव स्वभावसन्मुख हो अन्तरंग-बहिरंग साधनोंके जुटानेके विकल्पसे मुक्त हो जाता है उसी क्षण यह जीव अबुद्धिपूर्वक रागके सद्भावमें भी ज्ञाता-दृष्टा बन जाता है। स्वभावसे तो यह जीव ज्ञाता-दृष्टा है ही। परिणितमें भी इसे ज्ञात-दृष्टा बनना है। किन्तु एक ओर तो जुटानेके विकल्पको उपादेय मानता रहे और दूसरी ओर मुखसे यह कहता रहे कि मैं ज्ञाता-दृष्टा बननेके मार्गपर चल रहा हूँ-इसे मोक्षमार्गका उपहास ही कहा जायगा। यदि यथार्थमें ज्ञाता-दृष्टा बननेका अन्तरंगसे भाव हुआ है तो सर्व प्रथम ज्ञाता-दृष्टा स्वभावके प्रति आदरवान् होकर ऐसे मार्गका अभ्यास करना चाहिए जिससे यह जीव जुटानेके विकल्पसे मुक्त होकर परिणतिमें भी ज्ञाता-दृष्टा बन सके। आचार्य अमृतचन्द्र समयसारकी टीकामें उस मार्गका निर्देश करते हुए लिखते हैं-

अयि कथमपि मृत्वा तत्त्वकौतूहली सन्
अनुभव भवमूर्तेः पार्श्ववर्ती मुहूर्तम्।
पृथगथ विलसन्तं स्वं समालोक्य येन
त्यजसि झगिति मूर्त्या साकमेकत्वमोहम् ॥ २३ ॥

हे भाई। तू किसी प्रकार महत् कष्टसे अथवा मरकर भी तत्त्वका कौतूहली होकर इस शरीरादि मूर्त द्रव्यका एक मुहूर्त ( दो घड़ी ) पड़ौसी बनकर आत्मानुभव कर कि जिससे सर्व पर द्रव्योंसे भिन्न विलसते हुए अपने आत्माको देखकर इस शरीरादि मूर्तिक पुद्गल द्रव्यके साथ एकत्वके मोहको शीघ्र ही छोड़ देगा ॥ २३ ॥

यह स्वरूपको प्राप्त करनेका मार्ग है, अन्य सब रागके विकल्पोंका ताना-बाना है।

हमने अपने पिछले उत्तरमें उपादान और निमित्तकी विषम व्याप्तिका निषेधकर लिखा था कि प्रत्येक समयमें उपादान और निमित्तकी प्रत्येक कार्यके प्रति अन्तरंग और बहिरंग व्याप्ति बनती रहती है जिससे कि प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें उत्पाद-व्ययरूप अपने-अपने कार्यको करता रहता है। किन्तु अपर पक्ष इसे माननेके लिए तैयार नहीं है। उस पक्षका कहना है कि ‘निमित्तके अनुकूल उपादानका समागम होगा तो कार्य अवश्य होगा और उपादानके अनुकूल निमित्तका समागम होगा तो भी कार्य अवश्य होगा।’

इसपर पृच्छा यह है कि मान लो किसी समय निमित्तके अनुकूल उपादानका समागम नहीं हुआ तो कार्य होगा या नहीं ? और इसी प्रकार किसी समय उपादानके अनुकूल निमित्तका समागम नहीं हुआ तो भी कार्य होगा या नहीं ?

अपर पक्ष यह तो कह नहीं सकता कि उस समय वह द्रव्य अपना कार्य ही नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा मानने पर वह द्रव्य अपरिणामी हो जायगा। किन्तु जैन शासनमें किसी भी द्रव्यको अपरिणामी माना नहीं गया है। द्रव्यका लक्षण ही यह है-‘उत्पाद-व्यय-ध्रौव्ययुक्तं सत्। सद्द्रव्यलक्षणम्।’ त० सू० अ० ५ सू० ३० व २९।

अतएव अपर पक्षको प्रकृतमें यही स्वीकार कर लेना चाहिए कि प्रत्येक समयमें प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने कार्यका समर्थ उपादान है और प्रत्येक समयमें उसके अनुकूल प्रयोगसे या विस्रसा बाह्य सामग्री भी मिलती रहती है। परीक्षामुख या दर्शन-न्यायके अन्य जिन ग्रन्थोंमें प्रतिबन्धक कारणोंके अभाव और कारणान्तरोंकी अविकलताका निर्देश किया है वह कैसी स्थितिमें कारण कार्यका अनुमापक होता है यह बतलानेके लिए किया है। जिस समय किसीके ज्ञानमें प्रतिबन्धक कारण प्रतिभासित हो रहे हैं या कारणान्तरोंकी विकलता ज्ञात हो रही है उस समय भी अपने उपादानके अनुसार उस द्रव्यने अपना कार्य किया है और जिसे दूसरा व्यक्ति प्रतिबन्धक कारण मान रहा है या कारणान्तरोंकी विकलता समझ रहा है, सम्भव है वह सब बाह्य सामग्री उस समय होनेवाले कार्यमें बाह्य हेतु हो रही हो। ज्ञानमें जो प्रतिबन्धक कारणोंका सद्भाव या कारणान्तरोंकी विकलता झलक रही है वह मनमें सोचे गये कार्यकी अपेक्षा प्रतीत हो रहो है। किन्तु किसी द्रव्यने यह ठेका नहीं लिया कि दूसरे व्यक्तिकी विवक्षाके अनुसार उस समय उस कार्यका उसे उपादान होना ही चाहिए। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि जो द्रव्य जिस समय जिस कार्यको करता है उस समय वह उसका उपादान नियमसे होकर ही उसे करता है और उस कार्यके अनुकूल बाह्य सामग्री उस समय नियमसे मिलती है।

आगे अपर पक्षने अपनी प्रतिशंकामें उपस्थित किये गये तर्कोंपर हमें गम्भीरतापूर्वक विचार करनेको सलाह देनेके बाद अपनी कल्पित उस मान्यताको पुनः दुहराया है जिसमें अपर पक्षने समर्थ या निश्चय उपादानको अनेक योग्यतावाला प्रसिद्ध करके प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति बाह्य सामग्रीके आधारपर स्वीकार की है। किन्तु अपर पक्षकी यह मान्यता असमीचीन कैसे है इसका आगमसे अच्छी तरह खुलासा हो जाता है। आगममें एक द्रव्यकी अव्यवहित पूर्वोत्तर दो पर्यायोंमें कारण-कार्यभाव स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार किया है।

यथा-अनन्तरयोरेव पूर्वोत्तरक्षणयोर्हेतुफलभावस्य दृष्टत्वात्, व्यवहितयोस्तदघटनात्। -प्रमेयरत्नमाला अ० ३ सू० ५७।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक समर्थ उपादान अनेक योग्यतावाला न होकर प्रतिनियत योग्यतावाला ही होता है।

परीक्षामुख अध्याय तीनमें अविनाभावका लक्षण लिखते हुए बतलाया है-

सह-क्रमभावनियमोऽविनाभावः ॥१२॥

सहभाव नियम और क्रमभाव नियमको अविनाभाव कहते हैं ॥१२॥

आगे क्रमभाव नियमको दिखलाते हुए वहाँ लिखा है-

पूर्वोत्तरचारिणोः कार्य-कारणयोश्च क्रमभावः ॥१४॥

पूर्वचर और उत्तरचरमें तथा कार्य और कारणमें क्रमभाव नियम होता है।

इससे विदित होता है कि कारण और कार्यमें क्रमभाव नियमरूप अविनाभाव है। और इसी आधार-पर ‘यदनन्तरं ‘यद्भवति तत्तस्य कारणम्’-जिसके अनन्तर जो होता है वह उसका कारण है-यह वचन सर्वत्र उपलब्ध होता है।

इस प्रकार पूर्वोक्त विवेचनसे इन तथ्योंपर स्पष्ट प्रकाश पड़ता है-

\१. उपादान कारण और कार्यमें क्रमभाव अविनाभाव नियम है।

\२. उपादान कारण समनन्तर पूर्व पर्यायरूप होता है और कार्य समनन्तर उत्तर पर्यायरूप होता है।

\३. प्रमेयरत्नमालाके पूर्वोक्त उल्लेख द्वारा पर्यायमें उपादानकारणता स्वीकार करनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक उपादान कारण जिस कार्यको जन्म देता है उसी योग्यताकी अपेक्षा ही वह उपादान कारण कहलाता है।

\४. उक्त कथनकी पुष्टि इससे भी होती है कि जिस प्रकार द्रव्यदृष्टिसे बाह्य सामग्री अनेक योग्यतावाली होकर भी प्रतिनियत पर्यायरूपसे ही वह अन्य द्रव्यके कार्यमें निमित्त होती है। उसी प्रकार अन्तः-सामग्री द्रव्यदृष्टिसे अनेक योग्यतावाली होकर भी प्रतिनियत पर्यायरूपसे ही वह अपने कार्यकी उत्पत्तिमें उपादान कारण होती है।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती वस्तु उत्तर क्षणमें प्रतिनियत कार्यको ही उत्पन्न करती है। उस समय उसमें अनेक कार्योंको उत्पन्न करनेकी क्षमता ही नहीं होती। उसे आगममें निश्चय ( यथार्थ ) कर्ता इसीलिए ही स्वीकार किया गया है। परसापेक्ष कार्य होता है यह व्यवहारनयका वक्तव्य है, निश्चयनयसे तो प्रत्येक कार्य परनिरपेक्ष ही होता है, इसलिए जिस समय जो द्रव्य जिसरूप परिणमता है वह यथार्थमें अन्तःसामग्रीके बलपर ही परिणमता है। अतएव प्रकृतमें यही स्वीकार करना चाहिये कि जिस प्रकार प्रत्येक द्रव्य स्वतःसिद्ध परिणमन स्वभाववाला होता है उसी प्रकार वह किस समय किस परिणामको उत्पन्न करे यह भी उसके स्वभावमें दाखिल है, क्योंकि कर्ता, कर्म और क्रिया ये तीनों वस्तुपनेकी अपेक्षा अभिन्न हैं। उत्पादका अर्थ केवल परिणमन ही नहीं है। किन्तु उसमें परिणाम और परिणमन क्रिया दोनोंका अन्तर्भाव हो जाता है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए सर्वार्थसिद्धि अ० ५ सू० ३० में कहा है-

चेतनास्याचेतनस्य वा द्रव्यस्य स्वां जातिमजहत उभयनिमित्तवशात् भावन्तरावाप्तिरुत्पादनमुत्पादः मृत्पिण्डस्य घटपर्यायवत्।

अपनी जातिको न छोड़ते हुए चेतन और अचेतन द्रव्यका उभय निमित्तके वशसे भावान्तरको प्राप्त करनेका नाम उत्पाद है, जैसे मिट्टीके पिण्डकी घट पर्याय।

तत्त्वार्थवार्तिकमें इसी प्रसंगसे उत्पादका यही अर्थ किया है।

तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें इसी प्रसंगसे उत्पादका लक्षण निबद्ध करते हुए लिखा है-

स्वजात्यपरित्यागेन भावान्तरावाप्तिरुत्पादः।

अपनी जातिका त्याग किये बिना भावान्तरकी अवाप्तिका नाम उत्पाद है।

इस प्रकार पूर्वोक्त प्रमाणोंसे विदित होता है कि उत्पादमें केवल परिणमन क्रियाका ग्रहण न होकर जिस समय जिस परिणामरूप द्रव्य परिणमता है वह परिणाम भी गृहीत है।

अतएव अपर पक्षका यह कहना तो बनता नहीं कि प्रत्येक वस्तु मात्र स्वतःसिद्ध परिणमन स्वभाववाली है, उसमें किस समय क्या परिणाम उत्पन्न हो यह बाह्य सामग्रीपर अवलम्बित है।

यह हम पहले ही लिख आये हैं कि प्रत्येक द्रव्यका प्रतिविशिष्ट अन्तःसामग्री अन्तःविशेषण है और प्रतिविशिष्ट बाह्य-सामग्री बाह्य-विशेषण है, इसलिए जिस समय अन्तः-बाह्य जैसी सामग्रीका योग होता है ( जो प्रति समय नियमसे होता ही है ) उसके अनुरूप परिणामको उत्पन्न करना यह प्रत्येक द्रव्यका स्वतःसिद्ध स्वभाव है। इसके लिए अष्टसहस्री पृ० १५० पर दृष्टिपात कीजिए। प्रमाण पूर्वमें ही लिपिबद्ध कर आये हैं। वस्तुतः यह इसका कारण है और यह इसका कार्य है यह व्यवहार नयका ही वक्तव्य है। पर्यायार्थिक नयसे तो जो पर्याय जिस कालमें उत्पन्न होती है वही उसका कार्य है और वही उसका कारण है। देखो तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ३३। यथा-

शंका ५, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ८/८)

पुस्तक १, मुद्रित पृष्ठ ३६८ से ३७५

↑ सूची


पर्याय एवार्थः कार्यमस्य न द्रव्यम्, अतीतानागतयोः विनष्टानुत्पन्नत्वेन व्यवहाराभावात्। स एवैकः कार्यकारणव्यपदेशभगिति पर्यायार्थिकः।

पर्याय ही अर्थ अर्थात् प्रयोजन है जिसका, द्रव्य नहीं, क्योंकि अतीत और अनागत पर्यायें विनष्ट और अनुत्पन्न होनेसे उनका व्यवहार नहीं बनता। वही एक पर्याय कार्य-कारण व्यपदेशको प्राप्त है ऐसा जिसका मत है वह पर्यायर्थिक नय है।

अतएव अपर पक्षको अपने मतका आग्रह छोड़कर प्रकृतमें यही निर्णय करना चाहिए कि प्रत्येक समयमें प्रत्येक द्रव्य उपादान होकर अपने प्रतिनियत कार्यको ही करता है और प्रतिनियत बाह्य सामग्री उसमें नियमसे निमित्त होती है। इसमें किसी समय भी खण्ड पड़ना सम्भव नहीं।

यहाँ पर अपर पक्षने उपादान और निमित्त शब्दका निरुक्त्यर्थ लिखकर अपने अभिप्रायकी पुष्टि करनी चाही है। किन्तु आगममें निमित्त शब्द कारणके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। यथा-उभयनिमित्तवशात्। सर्वार्थसिद्धि अ० ५ सू० ३०। इस वचन द्वारा जैसे बाह्य सामग्रीमें निमित्त शब्दका प्रयोग हुआ है उसी प्रकार प्रतिविशिष्ट अन्त.सामग्रीके अर्थमें भी शब्दका प्रयोग हुआ है। इसी प्रकार श्लोकवार्तिक अ० ५ सू० ७ में भी ‘निमित्त’ शब्द दोनों प्रकारकी सामग्रीके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। यथा-उभयनिमित्तापेक्षः (पृ० ३६७), उभयनिमित्तापेक्षत्वात् (पृ० ३९८)। अतएव केवल निरुक्तिके बल पर बाह्य सामग्रीमें किये गये निमित्त व्यवहारको यथार्थ कारणके रूपमें ग्रहण करना उचित नहीं है। प्रकृतमें अपर पक्षको विचार इस बातका करना चाहिए कि आगममें जो उपादानको निमित्त कहा है वह किस अपेक्षासे कहा है और बाह्य सामग्रीमें जो निमित्त व्यवहार किया है वह किस अपेक्षासे किया है। तत्त्वनिर्णयका यह यथार्थ मार्ग है। यदि अपर पक्ष इस मार्गसे तत्त्वका निर्णय करे तो उसे बाह्य सामग्रीमें किये गये निमित्त व्यवहारको उपचरित या असद्भूत माननेमें आपत्ति ही न हो। फिर भी यदि अपर पक्ष ‘निमित्त’ शब्दके निरुक्त्यर्थके आधारसे ही प्रकृत विषयको ग्रहण करना चाहता है तो उसे इसके लिए उपादान पर ही दृष्टिपात करना चाहिए। वह प्रत्येक वस्तुके प्रत्येक परिणमनका मित्र या तेलके समान वास्तवमें स्नेहन करता ही है और उसके साथ एक कालप्रत्यासत्ति होनेसे बाह्य सामग्री भी उपचारसे उस संज्ञाको धारण करती है। इससे प्रत्येक कार्यमें उपादानका क्या स्थान है और बाह्य सामग्रीका क्या स्थान है इसका निर्णय हो जाता है। फिर भी यदि अपर पक्ष असद्भूत व्यवहारनयसे बाह्य सामग्रीको कार्यके प्रति मददगार, सहकारी या उपकारी आदि कहना चाहता है तो इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि आगममें भी इसी अभिप्रायसे बाह्य सामग्रीको उक्त शब्दों द्वारा प्रतिपादित किया ही है।

आगे अपर पक्षने पण्डितप्रवर बनारसीदासजीके ‘पदस्वभाव’ इत्यादि दोहेको उद्धृत कर और उसके विषयका गोम्मटसार कर्मकाण्डमें प्रतिपादित (काल आदि) विषयके साथ मिलान करते हुए अन्तमें लिखा है कि ‘परन्तु जब आप द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं या सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं’ इन सिद्धान्तोंके माननेवाले हैं तो कार्योत्पत्तिमें फिर इन पाँचके समवायकी आपकी दृष्टिमें क्या आवश्यकता है ? आदि।

समाधान यह है कि ‘यदनन्तरं यद्भवति’ सिद्धान्तके अनुसार इन पाँचका प्रत्येक समयमें युगपत् योग होता है और ऐसा योग होनेपर अनन्तर समयमें अपने उपादानके अनुरूप कार्य भी होता है, इसलिए इन पाँचमें कारणता स्वीकार की गई है। उदाहरणार्थ जब कुशूल पर्याययुक्त मिट्टीसे घट पर्यायकी उत्पत्ति होती है तब उसमें मिट्टीका अन्वय रहता ही है, परन्तु मिट्टी जब भी घट बनेगी अपनी कुशूल पर्यायके बाद ही बनेगी। इससे पुरवा, रकाबी आदि अन्य अन्य पर्यायोंकी उत्पत्ति त्रिकालमें नहीं हो सकती, इसलिए कुशूल पर्यायमें घटकी कारणता स्वीकार की गई है। कुशूलसे घट पर्यायकी उत्पत्ति होते समय मिट्टी स्वयं परिवर्तित होकर घट बनेगी, इसलिए वीर्य या पुरुषार्थमें कारणता स्वीकार की गई है। मिट्टी कुशूल पर्यायसे घट पर्यायको उत्पन्न करते समय प्रतिनियत क्रियायुक्त कुम्भकार आदिको निमित्तकर ही घट पर्यायको उत्पन्न करती है, इसलिए प्रतिनियत क्रियायुक्त कुम्भकारादिमें कारणता स्वीकार की गई है। तथा मिट्टीसे घट पर्यायकी उत्पत्ति अपने प्रतिनियत कालमें ही होगी, इसलिए प्रतिनियत कालमें कारणता स्वीकार की गई है। इस प्रकार उक्त पाँचके समवायमें प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति होती है, इसलिए उक्त पाँचोंमें कारणता स्वीकार की गई है। जैसे अपर पक्ष यह मानता है कि अपने स्वभावके अनुरूप ही उपादान होता है वैसे इसे यह भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि प्रतिनियत कार्यके लिए इन पाँचका योग प्रतिनियत कालमें ही होता है, अन्यथा कोई भी द्रव्य परिणामस्वभावी नहीं बन सकता।

महापुराण पर्व ९ में वर्णित वज्रजंघ आर्यकी कथासे इस विषय पर स्पष्ट प्रकाश पड़ता है। वज्रजंघ आर्यको दो चारणऋद्धिधारी मुनियोंको आता हुआ देखकर जातिस्मरण होता है और वह स्नेहसे प्लावित चित्त होकर पूँछता है। ज्येष्ठ मुनि संबोधित कर उसे समझाते हुए अन्तमें कहते हैं कि हे आर्य! इस समय सम्यक्त्वको ग्रहण कर, उसके ग्रहण करनेका ही यह काल है, क्योंकि काललब्धिके विना इस संसारमें जीवोंको सम्यग्दर्शनकी उत्पत्ति नहीं होती है ॥११५॥ देशनालब्धि और काललब्धि आदि बहिरंग कारण सम्पदा तथा करणलब्धिरूप अन्तरंग कारणसामग्रीके होनेपर भव्य आत्मा विशुद्ध सम्यग्दृष्टि होता है ॥११६॥

यह महापुराणका उल्लेख है। इसमें ‘भव्यात्मा’ पद द्वारा स्वभावको सूचित किया गया है, ‘करणलब्धि’ पद द्वारा निश्चय या समर्थ उपादानको सूचित किया गया है। यह सम्यग्दर्शनके ग्रहण करनेका ही काल है और ‘काललब्धि’ पदों द्वारा प्रतिनियत कालको सूचित किया गया है। ‘देशनालब्धि’ पद द्वारा अन्य बाह्य सामग्रीको सूचित किया गया है। तथा ‘गृहाण’ पद द्वारा पुरुषार्थको सूचित किया गया है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति स्वभाव आदि पाँचोंका समवाय होनेपर ही होती है और यतः प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें अपना-अपना कार्य करता ही है, अतः प्रत्येक समयमें पाँचोंका समवाय होता रहता है यह भी इससे सिद्ध होता है। महापुरण पर्व ९ का उक्त उल्लेख इस प्रकार है-

तद् गृहाणाद्य सम्यक्त्वं तल्लाभे काल एव ते।
काललब्ध्या विना नार्य! तदुत्पत्तिरिहाङ्गिनाम् ॥११५॥ देशना-काललब्ध्यादिबाह्यकारणसम्पदि ।
अन्तःकरणसामग्र्यां भव्यात्मा स्यात् विशुद्धकृत् [ दृक् ] ॥११६॥

हमें भरोसा है कि उक्त विवेचनसे अपर पक्षके समझमें यह बात अच्छी तरहसे आ जायगी कि ‘पाँचोंके समवायमें प्रत्येक कार्य होता है’ इस सिद्धान्तका ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियतक्रमसे ही होती हैं’ इस सिद्धान्तके साथ तथा ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर ही होते हैं’ इस सिद्धान्तके साथ किसी प्रकारका विरोध न होकर अविरोध ही है। जहाँ ‘सभी कार्य स्वकालके प्राप्त होनेपर होते हैं’ यह कहा जाता है वहाँ अन्य चार कारणोंकी गौणता होकर कार्यकालकी मुख्यता रहती है और जहाँ ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं’ यह कहा जाता है वहाँ अन्य कारणोंकी गौणता होकर समर्थ या निश्चय उपादानकी मुख्यता रहती है। अथवा ‘प्रत्येक समयमें प्रतिनियत पाँचोंका समवाय नियमसे होता है और तदनुसार प्रत्येक समयमें प्रतिनियत कार्यकी ही उत्पत्ति होती है’ इस व्यवस्थाके अनुसार भी यह कहा जाता है कि ‘द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं।’ अपर पक्षको यह दृष्टिपथमें लेना चाहिए कि जिस प्रकार पंक्तिबद्ध किसी सेनाके सैनिक चलते समय क्रमभंग किये विना अपने पग उठाते और धरते हैं, अतएव उनके पग नियत क्रमसे ही उठाये जाते और रखे जाते हैं उसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य अनादि कालसे नियत क्रमसे ही परिवर्तन करता हुआ आ रहा है। कहीं किसी द्रव्यके कभी किसी परिवर्तनमें किसी प्रकारका क्रमभंग नहीं हुआ, अतः उनका प्रत्येक समयमें प्रतिनियत ही योग मिलता है और उससे प्रतिनियत ही कार्य होता है। अनादिकालसे अब तक एक द्रव्यके जितने परिणाम हुए उतने ही दूसरे द्रव्यके हुए। ऐसी अवस्थामें सभी कार्य क्रम नियत ही होते हैं, अन्य प्रकारसे नहीं हो सकते ऐसा निर्णय यहाँ करना चाहिये।

अपर पक्ष यदि इस कार्य-कारणभावकी प्रतिनियत व्यवस्थाको गोरखधन्धा समझता है तो इसमें हमें कोई आश्चर्य नहीं दिखलाई देता, क्योंकि वह सभी तथ्योंका निर्णय अपने श्रुतज्ञानके द्वारा ही करना चाहता है। प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० २३७ में आचार्य प्रभाचन्द्र तो यह लिखते हैं-

तत्रापि हि कारणं कार्येणानुपक्रियमाणं यावत् प्रतिनियतं कार्यमुत्पादयति तावत्सर्वं कस्मान्नोत्पादयतीति चोद्ये योग्यतैव शरणम्।

उसमें भी कार्य कारणका उपकार तो करता नहीं, अतः वह प्रतिनियत कार्यको उत्पन्न करता है तो सबको क्यों नहीं उत्पन्न करता है ऐसा प्रश्न होनेपर उत्तरस्वरूप आचार्य कहते हैं कि योग्यता ही शरण है।

इसीप्रकार आचार्य समन्तभद्रने अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं (स्व० स्तो०) इत्यादि कारिकाद्वारा प्रत्येक कार्यके प्रति प्रतिनियत भवितव्यताको ही स्वीकार किया है।

और अपर पक्ष इन सब तथ्योंका उल्लंघनकर तथा अपने श्रुतज्ञानके बलपर प्रत्येक उपादानको अनेक योग्यतावाला बतलाकर बाह्य सामग्रीमें समर्थ यथार्थ कारणता स्वीकार करता हुआ भी उसे गोरखधन्धा नहीं समझता इसका हमें आश्चर्य है।

उपचरित कारण कौन और अनुपचरित कारण कौन ? इस प्रश्नका समाधान यह है कि बाह्य सामग्री अपनेसे भिन्न अन्य द्रव्यके कार्यका वास्तविक कारण तो नहीं, फिर भी उसमें कारणता स्वीकार की गई है, इसलिए तो उसे उपचरित कारण समझना चाहिए और अन्तरंग सामग्री स्वयं कारण होकर अपनेसे अभिन्न कार्यको उत्पन्न करती है, इसलिए उसे अनुपचरित कारण जानना चाहिए। हमें आशा है कि अपर पक्ष इस आधारपर स्वभाव आदि पाँचमेंसे कौन उपचरित कारण है और कौन अनुपचरित कारण है इसका निर्णय कर लेगा।

निश्चयनय और व्यवहारनय तथा इनके विषयका स्पष्ट खुलासा प्रतिशंका ६ में आगे करनेवाले ही हैं। फिर भी समयसार गाथा २७२ की आत्मख्याति टीकाके आधारपर प्रकृतमें इतना स्पष्टीकरण कर देना पर्याप्त है कि निश्चयनय स्वके आश्रित है और असद्भूत व्यवहारनय परके आश्रित है। तथा निश्चयनयके विषयमें भेद विवक्षा होनेपर वही ( विकल्प ) सद्भूत व्यवहारनय हो जाता है । असद्भूत व्यवहारनयका विषय उपचरित क्यों है और निश्चयनयका विषय अनुपचरित क्यों है यह उक्त विवेचनसे अपर पक्षकी समझमें अच्छी तरहसे आ जायगा ।

हमने अपने पिछले विवेचनमें यह लिखा था कि ‘प्रत्येक कार्य उक्त पाँचोंके समवायकी अपेक्षा क्रम नियत होता है, अनियत क्रमसे नहीं होता । ऐसे अनेकान्तको स्वीकार करना ही मोक्षमार्ग है ।’ किन्तु अपर पक्षने इसपर टिप्पणी करते हुए हमारा ध्यान समयसारकी आत्मख्याति टीकामें निर्दिष्ट अनेकान्तके लक्षणकी ओर आकृष्ट किया है और साथ ही हमारे द्वारा निर्दिष्ट की गई उक्त व्यवस्था पर आश्चर्य और दुःख भी प्रगट किया है ।

इस सम्बन्धमें निवेदन यह है कि उक्त कथनमें हमने जो कुछ लिखा है वह जिनागमको लक्ष्यमें रख कर ही लिखा है । इस प्रसंगमें हमें अपर पक्षने जैन संस्कृतिका योग्यतम विद्वान् सूचित किया है, उसके लिए तो हम उस पक्षके आभारी हैं । किन्तु साथ ही यह भी संकेत कर देना चाहते हैं कि यदि अपर पक्षका पूरे जिनागम पर ध्यान गया होता तो उसे हमारे उक्त कथन पर न तो आश्चर्य ही होता और न ही दुःख प्रकट करनेका उसे अवसर आता, क्योंकि जिनागममें जहाँ (अनेकान्तको वस्तुका स्वरूप स्वीकार करते हुए) एक ही वस्तुमें उसके वस्तुत्वका प्रकाशन करनेवाला परस्पर विरोधी शक्तिद्वयका प्रकाशन अनेकान्त स्वीकार किया गया है वहाँ दूसरे प्रकारके विरोधके परिहारमें भी इस शब्दका प्रयोग हुआ है । इसके लिए तत्त्वार्थ-वार्तिक अ० १ सू० ५ पर दृष्टिपात कीजिए-

शंकाकार विरोध होनेसे नामादि चारका अभाव करता है। उसका कहना है कि एक शब्दार्थके नामादि चार विरुद्ध हैं । यथा-जो नाम है वह नाम ही है, स्थापना नहीं हो सकता । यदि स्थापनाको नाम कहते हो तो वह नाम नहीं होगा । यदि कहो कि तो वह स्थापना रहा आवे तो शंकाकार कहता है कि वह स्थापना नहीं हो सकता, क्योंकि वह नाम है । अतएव नामार्थ विरोध होनेसे स्थापना नहीं हो सकता ?

यह एक शंका है । भट्टाकलंकदेवने इस शंकाका कई प्रकारसे समाधान किया है । उनमेंसे एक समाधान अनेकान्तका आश्रय लेकर किया गया है । उनका वह समग्र वचन इस प्रकार है-

अनेकान्ताच्च ॥२२॥ नैतदेकान्तेन प्रतिजानीमहे-नामैव स्थापना भवतीति न वा, स्थापना वा नाम भवति नेति च । कथम् ?

मनुष्यब्राह्मणवत् ॥२३॥ यथा ब्राह्मणः स्यान्मनुष्यो ब्राह्मणस्य मनुष्यजात्यात्मकत्वात् । मनुष्यस्तु ब्राह्मणः स्यान्न वा, मनुष्यस्य ब्राह्मणजात्यादिपर्यायात्मकत्वादर्शनात् । तथा स्थापना स्यान्नाम, अकृतनाम्नः स्थापनानुपपत्तेः, नाम तु स्थापना स्यान्न वा, उभयथा दर्शनात् ।

और अनेकान्त है ॥२२॥ यह हम एकान्तसे नहीं स्वीकार करते कि नाम ही स्थापना है अथवा नहीं है, अथवा स्थापना नाम है या नहीं है । कैसे ?

मनुष्य-ब्राह्मणके समान ॥२३॥ जिस प्रकार ब्राह्मण कथंचित् मनुष्य जातिस्वरूप होता है । परन्तु मनुष्य ब्राह्मण है, नहीं भी है; क्योंकि मनुष्य ब्राह्मण जाति आदि पर्यायस्वरूप नहीं भी देखा जाता है । वैसे ही स्थापना कथंचित् नाम है, क्योंकि अकृत नामवालेकी स्थापना नहीं बन सकती । परन्तु नाम स्थापना है और नहीं भी है, क्योंकि दोनों प्रकारसे व्यवहार देखा जाता है ।

यह तो अपर पक्ष भी स्वीकार करेगा कि नाम और स्थापना ये दोनों व्यवहार हैं, वस्तुस्वरूप नहीं। फिर भी एक वस्तुमें इन दोनोंके आश्रयसे होनेवाले व्यवहारमें आनेवाले विरोधका परिहार जैसे अनेकान्तका अवलम्बन लेकर किया गया है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिये। तात्पर्य यह है कि जहाँ निश्चयनयकी अपेक्षा स्वभाव, समर्थ उपादान और पुरुषार्थका समवाय है वहाँ निश्चयनयके विषयका अविनाभावी प्रतिनियत-काल और वह बाह्य सामग्री भी है जिसमें निमित्त व्यवहार किया जाता है, अतएव इस अपेक्षासे हमारा यह कहना सर्वथा योग्य है कि ‘प्रत्येक कार्य उक्त पाँचोंके समवायकी अपेक्षा क्रमनियत होता है, अनियत क्रमसे नहीं होता ऐसे अनेकान्तको स्वीकार करना ही मोक्षमार्ग है।’ इसी तथ्यको पण्डितप्रवर बनारसीदासजीने इन शब्दोंमें स्वीकार किया है-

पदस्वभाव पूरव-उदय निहचे उद्यम काल।
पच्छपात मिथ्यातपथ सरवंगी शिवचाल॥

प्रत्येक द्रव्यमें ऐसी स्वाभाविक योग्यता है कि किसके बाद वह किसरूप परिणमे। उसमें ऐसी योग्यता नहीं है कि वह अपने एक परिणामके बाद दूसरे समयमें परणमनेरूप अनेक योग्यतावाली होकर सर्वथा भिन्न पर वस्तु द्वारा उनमेंसे किसी एकरूप परिणमे। इस प्रकार प्रत्येक द्रव्यमें क्रमनियत अपनी योग्यता और तद्रूप परिणामकी अपेक्षा अस्ति है और परके द्वारा अनेक योग्यताओंमेंसे किसी एकरूप परिणमे इसकी सर्वथा नास्ति है। इस प्रकार वस्तुनिष्ठ अनेकान्त भी प्रत्येक द्रव्यमें घटित हो जाता है। अतएव अपर पक्षने जो हमारे उक्त कथनको ध्यानमें रखकर विरोध प्रदर्शित किया है वह उचित नहीं है ऐसा मथितार्थ भी प्रकृतमें जानना चाहिए। आशा है कि उक्त कथनसे प्रत्येक वस्तुमें अनेकान्तता कैसे घटित होती है यह अच्छी तरहसे समझमें आ जायगा।

पण्डितप्रवर बनारसीदासजीने आत्माको ध्यानमें रखकर यद्यपि ‘पदस्वभाव’ इत्यादि पद लिखा है, परन्तु लोकमें जितने भी कार्य होते हैं उन सबमें स्वभाव, निमित्तभूत बाह्य-सामग्री, निश्चय या समर्थ उपादान, अपनी-अपनी सामर्थ्य और प्रतिनियत काल इन पाँचका समवाय आगममें बतलाया है, तदनुसार प्रतीतिमें भी आता है। एकमात्र इसी आधारपर हमने उक्त दोहेमें प्रतिपादित विषयको वस्तु-सामान्यके कार्य-कारणभावका अंग बनाकर कथन किया है। यदि अपर पक्ष उक्त दोहेके विषयको सर्वत्र लागू नहीं करना चाहता तो न करे। परन्तु इस तथ्यको तो उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा कि प्रत्येक कार्य इन पाँचके समवायमें होता है।

एक बात तो यह हुई। दूसरी बात यह है कि गोम्मटसार कर्मकाण्डमें काल, ईश्वर आदि एकान्तोंका कथन क्रियावादियोंके प्रसंगसे आया है तथा ईश्वर निमित्तभूत बाह्य-सामग्रीका प्रतिनिधि है और आत्मा पदद्वारा द्रव्यकी स्वशक्तिका भान होता है। यही कारण है कि हमने अपने कथनमें उक्त प्रकारसे संगति बिठलाई है जो कार्य-कारणभावको देखते हुए उचित ही है।

अपर पक्षने ‘निहचे अभेद अंग’ इत्यादि पदको उद्धृत कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि यहाँ कार्य-कारणभावका प्रसंग नहीं है किन्तु ऐसी बात नहीं है। यदि अपर पक्ष उक्त पद्यके अर्थपर सूक्ष्मतासे ध्यान दे तो उसमें उसे कार्य-कारणभावके दर्शन हो जावेंगे। ‘उदै गुनकी तरंग’ पदद्वारा कर्मोदयमें होनेवाली ज्ञानादि गुणोंकी पर्यायोंकी सूचना मिलती है तथा ‘कालकी सी ढाल परिनाम चक्रगति है।’ पद द्वारा जो जीवके परिणामोंकी चक्रगति चल रही है उसमें प्रतिनियत काल निमित्त है यह ज्ञान हुए बिना नहीं रहता। स्पष्ट है कि ‘पदस्वभाव’ इत्यादि पद्यद्वारा ‘इस जीवमें मोक्षमार्गकी प्रसिद्धि कैसे होती है’ इसी तथ्यकी पुष्टि की गई है।

हमें प्रसन्नता है कि अपर पक्षने गोम्मटसार कर्मकाण्डमें प्रतिपादित पौरुषवाद, दैववाद, संयोगवाद और लोकवाद इन चार एकान्तोंकी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया। किन्तु सिद्धान्तचक्रवर्ती आचार्य नेमिचन्द्रने जिन ३६३ मतोंका कथन किया है उनसे बहिर्भूत होकर भी ये एकान्त क्रियावादियोंके ही मत हैं। हम समझते हैं कि इस तथ्यको स्वीकार करनेमें अपर पक्षको कोई विवाद न होगा। ऐसी अवस्थामें यदि हमने ईश्वर और आत्माको उपलक्षण मानकर ईश्वरके स्थानमें निमित्तभूत बाह्य-सामग्री और आत्माके स्थानपर पुरुषार्थका निर्देश किया है तो यह उचित ही किया है। इससे बाह्य-सामग्रीके बलपर कार्यकी उत्पत्ति माननेवाले और पुरुषार्थके बलपर प्रतिनियत समयसे आगे-पीछे कार्यकी उत्पत्ति माननेवाले एकान्तवादियोंका निरसन हो जाता है।

अपर पक्षने गोम्मटसार कर्मकाण्डके अनुसार एकान्त कालवाद आदिका निर्देश करनेके बाद जो यह अभिप्राय व्यक्त किया है कि ‘आपके अभिप्रायका समर्थन इन गाथाओंसे कदापि नहीं होता।’ सो इस सम्बन्धमें विशेष न लिखकर मात्र इतना संकेत कर देना पर्याप्त है कि गोम्मटसार कर्मकाण्डके उक्त कथनका क्या अभिप्राय है इसकी विस्तृत चरचा हम स्वयं इसी उत्तरमें पहले कर आये हैं। उससे यह बात अपर पक्षकी समझमें अच्छी तरहसे आ गई होगी कि गोम्मटसार कर्मकाण्डके उक्त उल्लेखका वही आशय जो हमने लिया है।

सब कार्योंके जितने कारण हैं उन सबका वर्गीकरण द्वारा स्वभाव आदि पाँचमें समावेश हो जाता है, इसलिए ‘जावदिया वयणवहा’ इस गाथा द्वारा परसमयोंका निर्देश होनेपर भी सब कार्योंके सब कारणोंको पाँच प्रकारका माननेमें कोई बाधा नहीं आती। जिसका इन पाँचमें समावेश नहीं हो सकता ऐसे कारणका निर्देश अपर पक्षने किया भी नहीं है। अतएव प्रत्येक कार्यके कारण पाँच ही प्रकारके हैं ऐसा यहाँ समझना चाहिए।

जब कि जैनदर्शन यह स्वीकार करता है कि ‘जितने वचनपथ हैं उतने नयवाद हैं और जितने नयवाद हैं उतने परसमय हैं और साथ ही जब कि वह यह भी स्वीकार करता है कि पर समयोंके वचन ‘सर्वथा’ वचनसे युक्त होनेके कारण नियमसे मिथ्या हैं और ‘कथंचित्’ वचनसे युक्त होनेके कारण जैनोंके वचन समीचीन है।’ ऐसी अवस्थामें इससे यही फलित होता है कि गोम्मटसार कर्मकाण्डके कथनमें आचार्यश्री नेमिचन्द्रकी यही दृष्टि रही है कि काल आदि एक एकके आश्रयसे कार्योंकी उत्पत्ति माननेवाले मिथ्यादृष्टि हैं और स्वभाव, प्रतिनियत बाह्य सामग्री, निश्चय उपादान, पुरुषार्थ (बल) तथा प्रतिनियत कालके समवायसे कार्योंकी उत्पत्ति माननेवाले सम्यग्दृष्टि हैं। विशेष स्पष्टीकरण हम पूर्वमें ही कर आये हैं।

१८० प्रकारके क्रियावादियोंमें यद्यपि आचार्य नेमिचन्द्रने ईश्वरवाद और आत्मवादको भी प्रमुखता दी है यह सच है। किन्तु इन दर्शनोंका प्राबल्य देखकर ही इन्हें प्रमुखता दी गई है। पर जैनदर्शनके अनुसार ईश्वरवादका अर्थ निमित्तवाद और आत्मवादका अर्थ पुरुषार्थवाद करनेपर पूरी संगति बैठ जाती है। अन्यथा उनका यह कथन नहीं बनता कि ‘जितने परसमयके वचन हैं वे ‘सर्वथा’ पदसे युक्त होनेके कारण मिथ्या हैं और जैनोंके वचन ‘कथंचित्’ पदसे युक्त होनेके कारण समीचीन हैं।’ उनका गोम्मटसार कर्मकाण्डका वह वचन इस प्रकार है-

परसमयाणं वयणं मिच्छं खलु होइ सव्वहा वयणा।
जेणाणं पुण वयणं सम्मं खु कहंचिवयणादो ॥८९५॥

अर्थ पूर्वमें ही दिया है।

इससे खींचातानी नहीं की गई है, किन्तु आगमका आशय ही स्पष्ट किया गया है यह स्पष्ट हो जाता है।

आगे अपर पक्षने स्वभाव, निमित्तभूत बाह्य सामग्री, नियति (निश्चय उपादान), पुरुषार्थ और प्रतिनियत काल इन पाँचको स्वीकार करके भी उनका सम्बन्ध ‘पदस्वभाव’ इत्यादि दोहे और गोम्मटसार कर्मकाण्डके उक्त कथनसे नहीं जोड़ना चाहा सो यह अपर पक्षकी मर्जी है कि वह इन पाँचके साथ उनका सम्बन्ध जोड़े या न जोड़े, परन्तु हमें इसमें कोई प्रत्यवाय (विरुद्धता) नहीं दिखलाई देता। विशेष खुलासा पूर्वमें ही किया है।

आगे अपर पक्षने स्वभाव आदि पाँचको कारणरूपसे स्वीकार करके भी उनका जो अर्थ किया है वह क्यों ठीक नहीं है इसे समझनेके लिए पं० श्री कैलाशचन्द्र जी शास्त्री वाराणसीके इस कथन पर दृष्टिपात कीजिए। यह कथन उन्होंने वीर सं० २४८६ में श्री परम श्रुतप्रभावक श्रीमद् राजचन्द्र जैन शास्त्रमालासे प्रकाशित स्वामिकार्तिकेयानुप्रेचा की ३२१-३२२ गाथाओं पर लिखे गये भावार्थके रूपमें लिपिवद्ध किया है, जो इस प्रकार है-

'सम्यग्दृष्टि यह जानता है कि प्रत्येक पर्यायका द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव नियत है। जिस समय जिस क्षेत्रमें जिस वस्तुकी जो पर्याय होनेवाली है वही होती है उसे कोई नहीं टाल सकता। सर्वज्ञदेव सब द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अवस्थाओंको जानते हैं। किन्तु उनके जान लेनेसे प्रत्येक पर्यायका द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव नियत नहीं हुआ, बल्कि नियत होनेसे ही उन्होंने उन्हें उस रूपमें जाना है। जैसे, सर्वज्ञदेवने हमें बतलाया है कि प्रत्येक द्रव्यमें प्रति समय पूर्व पर्याय नष्ट होती है और उत्तर पर्याय उत्पन्न होती है। अतः पूर्व पर्याय उत्तर पर्यायका उपादान कारण है और उत्तर पर्याय पूर्व पर्यायका कार्य है। इसलिये पूर्व पर्यायसे जो चाहे उत्तर पर्याय उत्पन्न नहीं हो सकती, किन्तु नियत उत्तर पर्याय ही उत्पन्न होती है। यदि ऐसा न माना जायेगा तो मिट्टीके पिण्डमें स्थास कोस पर्यायके बिना भी घट पर्याय बन जायेगी। अतः यह मानना पड़ता है कि प्रत्येक पर्यायका द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव नियत है। कुछ लोग इसे नियतिवाद समझ कर उसके भयसे प्रत्येक पर्यायका द्रव्य, क्षेत्र और भाव तो नियत मानते हैं किन्तु कालको नियत नहीं मानते। उनका कहना है कि पर्यायका द्रव्य, क्षेत्र और भाव तो नियत है किन्तु काल नियत नहीं है; कालको नियत माननेसे पौरूष व्यर्थ हो जायेगा। किन्तु उनका उक्त कथन सिद्धान्त विरुद्ध है; क्योंकि द्रव्य, क्षेत्र और भाव नियत होते हुए काल अनियत नहीं हो सकता। यदि कालको अनियत माना जायेगा तो काललब्धि कोई चीज ही नहीं रहेगी। फिर तो संसार परिभ्रमणका काल अर्धपुद्गल परावर्तनसे अधिक शेष रहने पर भी सम्यक्त्व प्राप्त हो जायेगा और बिना उस कालको पूरा किये ही मुक्ति हो जायगी। किन्तु यह सब बातें आगमविरुद्ध हैं। अतः कालको भी मानना ही पड़ता है। रही पौरुषकी व्यर्थताकी आशंका, सो समयसे पहले किसी कामको पूरा कर लेनेसे ही पौरुषकी सार्थकता नहीं होती। किन्तु समय पर कामका हो जाना ही पौरुषकी सार्थकताका सूचक है। उदाहरणके लिये, किसान योग्य समय पर गेहूँ बोता है और खूब श्रमपूर्वक खेती करता है। तभी समय पर पक कर गेहूँ तैयार होता है। तो क्या किसानका पौरुष व्यर्थ कहलायेगा? यदि वह पौरुष न करता तो समय पर उसकी खेती पककर तैयार न होती, अतः कालकी नियततामें पौरुषके

व्यर्थ होनेकी आशंका निर्मूल है । अतः जिस समय जिस द्रव्यकी जो पर्याय होती है वह अवश्य होगी। ऐसा जानकर सम्यग्दृष्टि सम्पत्तिमें हर्ष और विपत्तिमें विषाद नहीं करता, और न सम्पत्तिकी प्राप्ति तथा विपत्तिको दूर करनेके लिये देवी-देवताओंके आगे गिड़गिड़ाता फिरता है ॥३२१-३२२॥

यह श्री पं० कैलाशचन्द जीके शब्दोंमें आगमका सार है।

इस प्रकार अपर पक्षके तृतीय दौरकी प्रतिशंका पर विस्तारके साथ विचार करने पर यही सिद्ध होता है कि द्रव्योंमें होनेवाली सभी पर्यायें नियत क्रमसे ही होती हैं, अनियत क्रमसे त्रिकालमें नहीं होतीं ।