जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा, शंका-समाधान १ से १७ | Jaipur (Khaniya) Tattvacharcha

शंका ६, प्रथम दौर: शंका ६ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ३७७

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प्रथम दौर

: १ :

शंका ६

उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें निमित्त कारण सहायक होता है या नहीं ?

समाधान १

प्रकृतमें निमित्तकारण और सहायक इन दोनोंका अभिप्राय एक ही है । इसलिये उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें अन्य द्रव्यकी विविक्षित पर्याय सहायक होती है यह कहने पर उसका तात्पर्य यही है कि उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें अन्य द्रव्यकी विविक्षित पर्याय निमित्त कारण होती है । परन्तु यहाँ पर यह स्पष्टरूपसे समझना चाहिये कि उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें अन्य द्रव्यकी विविक्षित पर्यायको आगममें जो निमित्त कारणरूपसे स्वीकार किया है सो यह वहाँ पर व्यवहारनयकी अपेक्षा ही स्वीकार किया है, निश्चयनयकी ( पर्यायार्थिक निश्चयनयकी ) अपेक्षा नहीं । इसी अभिप्रायको विस्तारके साथ विवेचन द्वारा स्पष्ट करते हुए अन्तमें निष्कर्षरूपमें श्री तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें इन शब्दोंमें स्वीकार किया है-

कथमपि तन्निश्चयनयात् सर्वस्य विस्रसोत्पादव्ययध्रौव्यव्यवस्थितेः । व्यवहारनयादेव उत्पादादीनां सहेतुकत्वप्रतीतेः ।
-अ० ५, सू० १६, पृ० ४१०

किसी भी प्रकार सब द्रव्योंके उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यकी व्यवस्था निश्चयनयसे विस्रसा है, व्यवहार नयसे ही उत्पादादिक सहेतुक प्रतीत होते हैं ।

यहाँ पर ‘सहेतुकत्वप्रतीतेः’ पदमें ‘प्रतीतेः’ पद ध्यान देने योग्य है ।

शंका ६, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ३७८ से ३८३

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका ६

उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें निमित्तकारण सहायक होता है या नहीं ?

प्रतिशंका २

विचारणीय तत्त्व यह है कि क्या उपादानकी कार्यरूप परणतिमें निमित्त कारण सहायक होता है या नहीं अर्थात् कार्यकी उत्पत्ति सामग्रीसे अर्थात् उपादान और निमित्त कारणोंसे होती है या केवल उपादान कारणसे । कहीं-कहीं जैनाचार्योंने अन्तरंग कारण और बहिरंग कारणका भी उल्लेख किया है । अन्तरंग कारणसे तात्पर्य कार्ययोग्य द्रव्यशक्तिसे है तथा बहिरंगसे मतलब बलाधानमें सहायकसे है । इन्हींको उपादान और निमित्त कारण भी कहते हैं । जब-जब शक्ति व्यक्ति रूपमें आती है तब-तब निमित्तकी सहायतासे ही आती है । जैसे जब-जब हम देखते हैं अर्थात् हमारी लब्धिरूप चेतना उपयोगरूप होती है तब यह कार्य नेत्रेन्द्रियकी सहायतासे ही होता है । यदि इसकी मनो-वैज्ञानिक व्याख्या करें तो कहना होगा कि किसी भी वस्तुको देखते समय उस वस्तुका उल्टा फोटू हमारी पुतली ( रेवटीना ) पर पड़ता है और इसमें जो हलन-चलन होता है उससे हमारी सुसुप्त चेतना जागती है और उस पदार्थको जानती है । यहाँ दो प्रकारके परिणमन होते हैं-एक भौतिक और दूसरे मानसिक ( आत्मिक ) । पुतली पर अक्स उसका भौतिक परिणमन है और उसके बादका अनुकम्पन और जानना मानसिक ( आत्मिक ) परिणमन है । यदि भौतिक परिणमन न होवे तो तीन कालमें भी आत्मिक परिणमन अर्थात् चेतना लब्धिसे उपयोगरूपमें नहीं आवेगी । इस ही को बलाधानमें निमित्त कहते हैं । महर्षि पूज्यपादने उपयोगका लक्षण निम्न प्रकार लिखा है-

उभयनिमित्तवशादुत्पद्यमानश्चैतन्यानुविधायी परिणाम उपयोगः ।
-सर्वा० सि० २-८

महर्षि अकलंकने भी लिखा है-

बाह्याभ्यन्तरहेतुद्वयसन्निधाने यथासम्भवमुपलब्धचैतन्यानुविधायी परिणाम उपयोगः ।
-तत्त्वार्थरा० २-८

इसी प्रकार क्रियाका लक्षण करते हुए महर्षि अकलंकने लिखा है-

उभयनिमित्तापेक्षः पर्यायविशेषो द्रव्यस्य देशान्तरप्राप्तिहेतुः क्रिया ।
अभ्यन्तरं क्रियापरिणामशक्तियुक्तं द्रव्यं । बाह्यं च नोदनाभिघाताद्यपेक्ष्योत्पद्यमानः पर्यायविशेषः द्रव्यस्य देशान्तरप्राप्तिहेतुः क्रियेत्युपदिश्यते ।
-तत्त्वा० वा० ५-७

इस विवेचनसे स्पष्ट है कि पदार्थमें क्रियाकी शक्ति है और वह रहेगी, किन्तु पदार्थ क्रिया तब ही करेगा जब बहिरंग कारण मिलेंगे, जब तक बहिरंग कारण नहीं मिलेंगे वह क्रिया नहीं कर सकता, अर्थात् उसकी शक्ति व्यक्तिरूपमें नहीं आ सकती, जिसके द्वारा शक्ति व्यक्तिरूपमें आती है या जिसके विना शक्ति व्यक्तिरूपमें नहीं आ सकती वही बहिरंग कारण या निमित्त कारण है या वही वलाधान निमित्त है ।

यह ठीक है कि लोहा ही धड़ीके पुर्जोंकी शक्ल धारण करता है । यह भी ठीक है कि लकड़ी या लोहा ही विविध प्रकारके फर्नीचरके रूपमें परिणत होते हैं । यह भी ठीक है कि मेटीरियल्से ही मकानका निर्माण होता है । यह भी ठीक है कि विविध प्रकारके रसायनिक पदार्थोंमें ही विभिन्न प्रकारके अणुबम आदि बनते हैं, किन्तु ये वस्तुएँ जिन मनुष्यों या कलाकारोंके द्वारा विभिन्न रूपको धारण करती हैं, यदि वे न होवें तो वैसा नहीं हो सकता, मनुष्य या कलाकार ही उनको उन उन रूपोंमें लानेमें सहायक होते हैं यही उनका वलाधान निमित्तत्व है । कलाकारका अर्थ ही यह है कि वह उसको सुन्दर रूप देवे । यह कार्य मनुष्यसे और केवल मनुष्यसे ही सम्भव है । जहाँ तक मेटीरियलकी बात है वह तो सुन्दर और भद्दी दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंमें समानरूपसे रहता है । घड़ियोंके मूल्योंमें तरतमता लोहेकी बात नहीं है, किन्तु मुख्यता निर्माता कलाकारकी है ।

प्राचीन नाट्य साहित्यकार भरतमुनिने अपने नाट्यशास्त्रमें रसका लक्षण करते हुए लिखा है कि-

विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः ।

इससे स्पष्ट है कि मानव हृदयमें विभिन्न प्रकारके रसोंकी उत्पत्ति ही बहिरंग साधनोंकी देन है । यदि कभी सिनेमा देखनेवालेसे पूछा जाय कि खेल कैसा था तब वह जो उत्तर देगा वह विचारणीय है । इसी प्रकार आत्मीय जनकी मृत कायाका देखना, बाजारोंमें घूमते हुए सुन्दर सुन्दर पदार्थोंको देखना आदि व्यावहारिक बातें हैं जिनपर गंभीर विचारकी जरूररत है । क्या सिनेमामें जो कुछ भी सुनने या देखनेमें आता है वह व्यर्थ है या वही देखनेवालेके हृदयोंको प्रफुल्लित करनेमें सहायक होता है ? आत्मीय जनकी मृत कायाको देखना व्यर्थ है और जो शोक हुआ है या शोकके उत्पन्न करनेमें वह सहायक है ? यही वात बाजारू चीजोंके सम्बन्धमें चिन्तनीय है ।

जैन तत्त्वज्ञानका विद्यार्थी यदि ज्ञान और ज्ञेयके रूप पर तथा विषय ओर कषायके रूप पर विचार करेगा तब उसको मालूम होगा कि यह पर पदार्थ ही केवल जो ज्ञेय न रह कर विषय बन जाता है और आत्मामें कषाय उत्पन्न करा देता है, ऐसी स्थितिमें भी आश्चर्य है कि हमारे आध्यात्मिक महापुरुषोंका ध्यान इसकी तरफ नहीं जा रहा है ।

इस विषयमें महर्षि समन्तभद्र, अकलंक ओर विद्यानन्दकी मान्यताऐं मनन करने योग्य हैं-

दोषावरणयोर्हानिर्निश्शेषास्त्यतिशायनात् ।
क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो बहिरन्तर्मलक्षयः ॥४॥

इस कारिकाके द्वारा स्वामी समन्तभद्र कहते हैं कि किसी आत्मामें दोष ( अज्ञानादि विभावभाव ) तथा आवरण ( पुदगल कर्म ) दोनोंका अभाव ( ध्वंस ) रूपसे पाया जाता है, क्योंकि उनके हानिक्रममें अतिशय ( उत्तरोत्तर अधिक ) हानि पाई जाती है । जो गुणस्थानोंके क्रमसे मिलती है । जैसे सुवर्णमें अग्निके तीव्र पाकद्वारा कीट व कालिमा अधिक अधिक जलती है तो वह सोना पूर्ण शुद्ध हो जाता है ।

कारिकाकी व्याख्या लिखते हुए शंकाकी गई है कि आवरणसे भिन्न दोष और क्या वस्तु है ? दोषको आवरण ही मान लिया जावे तो क्या हानि है ? तब अकलंकदेव उसका समाधान करते हुए लिखते हैं-

वचनसामर्थ्यादज्ञानादिर्दोषः स्वपरपरिणामहेतुः ।
-अष्टशती पृ० ५१

कारिकामें आचार्यने ‘दोषावरणयोः’ ऐसा द्विवचन दिया है, जिससे आवरण पौद्गलिक कर्मसे भिन्न ही अज्ञानादि विभाव दोष पद वाच्य हैं जो कि स्वजीवके परिणाम तथा पर-पुद्गलके परिणामरूप दोनों परिणामसे जन्य हैं ।

इसी भावको विशद करते हुए श्री विद्यानन्द स्वामी लिखते हैं-

न हि दोष एव आवरणमिति प्रतिपादने कारिकायां दोषावरणयोरिति द्विवचनं समर्थम् । ततस्तत् सामर्थ्यात् आवरणात्पौद्गलिकज्ञानावरणादिकर्मणो भिन्न एवाज्ञानादिदोषोऽभ्यूहते, तद्धेतुः पुनरावरणं कर्म जीवस्य पूर्वस्वपरिणामश्च ।

अर्थ-दोष ही आवरण है ऐसा अभिप्राय कारिकामें दिये हुए विवेचनसे नहीं हो सकता । इसलिये आवरण पुद्गल कर्मसे भिन्न जीवगत कुज्ञानादि विभाव ही दोष मानना चाहिये । तथा उसके हेतु आवरण कर्म जो पर कारण जीवसे भिन्न है तथा जीवका पूर्व परिणाम भी जनक है यह स्वकारण है ।

उपरोक्त भाष्यमें अकलंकदेवने स्वयं निमित्त कारण ज्ञानावरणादि पुद्गल कर्मको निमित्त कारण पर शब्दसे तथा स्व शब्दसे पूर्व पर्यायविशिष्ट जीवको उपादान कारणरूपसे उल्लेख किया है। यही अभिप्राय विद्यानन्दने स्वरचित अष्टसहस्रीमें ‘तद्धेतुः पुनरावरणं कर्म पूर्वस्वपरिणामश्च’ इस वाक्यसे विशद किया है ।

महर्षि कुन्दकुन्दने भी इसी बातका समर्थन समयसारमें किया है-

जीवपरिणामहेदुं कम्मत्तं पुग्गला परिणमंति ।
पुग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो वि परिणमइ ॥८०॥

अर्थात्-पुद्गल जीवके परिणामके निमित्तसे कर्मरूपमें परिणमित्त होते हैं, तथा जीव भी पुद्गल कर्मके निमित्तसे परिणमन करता है ।

इसी बातका विस्तृत विवेचन स्वयं महर्षि कुन्दकुन्दने ही आगे चलकर किया है-

सम्मत्तपडिणिबद्धं मिच्छत्तं जिणवरेहि परिकहियं ।
तस्सोदयेण जीवो मिच्छादिट्ठि त्ति णायव्वो ॥१६१॥
णाणस्स पडिणिबद्धं अण्णाणं जिणवरेहि परिकहियं ।
तस्सोदयेण जीवो अण्णाणी होदि णायव्वो ॥१६२॥
चारित्तपडिणिबद्धं कसायं जिणवेरहि परिकहियं ।
तस्सोदयेण जीवो अचरित्तो होदि णायव्वो ॥१६३॥

अर्थात् सम्यक्त्वको रोकनेवाला मिथ्यात्व है ऐसा जिनवरोंने कहा है, उसके उदयसे जीव मिथ्यादृष्टि होता है ऐसा जानना चाहिये । ज्ञानको रोकनेवाला अज्ञान है ऐसा जिनवरोंने कहा है उसके उदयसे जीव अज्ञानी होता है ऐसा जानना चाहिये । चारित्रको रोकनेवाला कषाय है ऐसा जिनवरने कहा है उसके उदयसे जीव अचारित्रवान् होता है ऐसा जानना चाहिये ।

मिथ्यात्व, अज्ञान और कषाय ये तीनों पौद्गलिक हैं । यदि इनको पौद्गलिक न माना जायेगा तो फिर कार्यकारणभाव नहीं बन सकेगा । आचार्य अमृतचन्द्र सूरिने भी इसी बातको स्वीकार किया है-

सम्यक्त्वस्य मोक्षहेतोः स्वभावस्य प्रतिवन्धकं किल मिथ्यात्वम्; तत्तु स्वयं कर्मैव । तदुदयादेव ज्ञानस्य मिथ्यादृष्टित्वम् । ज्ञानस्य मोक्षहेतोः स्वभावस्य प्रतिवन्धकमज्ञानत्वम्, तत्तु स्वयं कर्मैव । तदुदयादेव ज्ञानस्याज्ञानत्वम् । चारित्रस्य मोक्षहेतोः स्वभावस्य प्रतिवन्धकः किल कषायः, तत्तु स्वयं कर्मैव । तदुदयादेव ज्ञानस्याचारित्रत्वम् । अतः स्वयं मोक्षहेतुतिरोधायिभावत्वात्कर्म प्रतिषिद्धम् ।
-समयसार टीका पृ० २४६

इसी प्रकार समयसारकी वन्ध अधिकारकी गाथा २७८-२७९ भी इस विषयमें मनन करनेयोग्य है-

जह फलिहमणी सुद्धो ण सयं परिणमइ रायमाईहिं ।
रंगिज्जदि अण्णेहिं दु सो रत्तादीहिं दव्वेहिं ॥२७८॥
एवं णाणी सुद्धो ण सयं परिणमइ रायमाईहिं ।
राइज्जदि अण्णेहिं दु सो रागादीहिं दोसेहिं ॥२७९॥

अर्थात्-जैसे स्फटिक मणि शुद्ध होनेसे रागादिकरूपसे ( ललाई आदि रूपसे ) अपने आप परिणमता नहीं है, परन्तु अन्य रक्तादि द्रव्योंसे वह रक्त ( लाल ) आदि किया जाता है। इसी प्रकार ज्ञानी अर्थात् आत्मा शुद्ध होनेसे रागादिरूप अपने आप परिणमता नहीं है, परन्तु अन्य रागादि दोषोंसे वह रागी आदि किया जाता है ॥२७८-२७९॥

यदि अभ्युपगम सिद्धान्तसे श्री पं० फूलचन्द्रजीकी बातको मान लिया जाय कि कार्य केवल उपादानसे ही होता है और निमित्त केवल उपस्थित ही रहता है तब भी विचारणीय यह हो जाता है कि वह निमित्त कैसे बन गया । उपस्थित तो उस समय उसी तरह अन्य पदार्थ भी हैं और फिर यही निमित्त हैं और वे पदार्थ निमित्त नहीं हैं इसमें क्या नियामक है ।

\१. श्री पं० फूलचन्द्रजी कुछ भी कहें, किन्तु उनको उसके समर्थनमें प्रमाण तो उपस्थित करना ही होगा । यदि उनकी ऐसी ही मान्यता है कि निमित्त कारण केवल उपस्थित ही रहता है और उपादानको उपादेयरूप होनेमें या शक्तिको व्यक्तिरूप होनेमें कुछ व्यापार नहीं करता, ऐसी स्थितिमें उनकी मान्यता एक विवादस्थ बात हो जाती है । और इसके समर्थनमें प्रमाण उपस्थित करना ही चाहिये ।

\२. दूसरी बात यह है कि ऐसी परिस्थितिमें अर्थान्त् उपादान और निमित्तकी परम्पराओंको परस्परमें असम्वन्धित मानने पर वन्धादि तत्त्वोंकी व्यवस्था भी नहीं बन सकेगी । आचार्य श्री अमृतचन्द्र सूरिने भी ऐसा ही स्वीकार किया है-

तथान्तर्दृष्ट्या ज्ञायको भावो जीवो,जीवस्य विकारहेतुरजीवः ।
-समयसार गा० १३
स्वयमेकस्य पुण्य-पापास्रव-संवर-निर्जरा-वन्ध-मोक्षानुपपत्तेः ।
-समयसार गा० १३

अर्थात् भीतरी दृष्टिसे देखा जाये तो ज्ञायक भाव जीव तत्त्व है, जीवके विकारका हेतु अजीव पुद्गल है ।

क्योंकि अकेले जीव तत्त्वके पुण्य-पापादि, आस्रवरूपता, संवरपना, निर्जरा और बन्ध व मोक्ष नहीं हो सकते ।

\३. तीसरी बात यह है कि असंख्यातप्रदेशी जीवमें शरीर परिमाणके छोटे बड़े होनेसे आकारमें छोटा-बड़ापन माना है। यदि जीवको शरीरके प्रभावसे रहित माना जायगा तब यह बात भी नहीं बन सकेगी। और इस प्रकार आगमका विरोध होगा।

\४. चौथी बात यह है कि इस प्रकार कर्मफलकी व्यवस्था भी समाप्त हो जायेगी। यदि विभावसे कर्मबन्ध और कर्मोदयसे विभाव नहीं मानेंगे तो कर्मफलकी व्यवस्था नहीं बन सकेगी। जिस विभावको हम कर्म कहते हैं वह तो निमित्तमात्र है तथा कर्मबन्ध केवल उसके उपादान कर्मपरमाणुओंका कार्य है। इसी प्रकार जब कर्मोदय होता है वह भी निमित्त है और उस समय आत्मामें होनेवाला विभाव केवल उपादानका ही कार्य है, तब यह कैसे कहा जा सकता है कि अमुक-अमुक कर्मका अमुक फल है। यह तो परस्पर सम्बन्ध व्यवस्थामें ही सम्भव हो सकता है।

\५. पाँचवीं बात यह है कि केवल उपस्थित रहनेवाले निमित्त कारण तथा व्यापार करनेवाले निमित्त कारणमें परस्परमें विरोध भी है। निमित्तकारण यदि व्यापार करता है या प्रेरक है तब तो केवल उपस्थितिमूलक नहीं माना जा सकता। यदि निमित्तकारण उपस्थितिमूलक है तो उसको प्रेरक या व्यापारमूलक नहीं माना जा सकता है। जहाँ तक निमित्तकारणकी प्रेरकताका सम्बन्ध है उसकी विस्तारसे चर्चा की जा चुकी है। और उसके समर्थनमें अनेक महर्षियोंके प्रमाण दिये जा चुके हैं। ऐसी स्थितिमें केवल उपस्थितिमूलक कारण माननेकी कल्पनाको भी स्थान नहीं रह जाता। श्री पं० फूलचन्द्रजीने भी अपनी जैन तत्त्वमीमांसामें इसको स्वीकार किया है। इससे विदित होता है कि लोकमें धर्मादि द्रव्योंसे विलक्षण प्रेरक निमित्त कारण भी होते हैं। सर्वार्थसिद्धिका वह उल्लेख इस प्रकार है-

तुल्यवलत्वात्तयोर्गति-स्थितिप्रतिवन्ध इति चेत् ? न, अप्रेरकत्वात् । -तत्त्वा० अ० ५, सू० १७

द्रव्य वचन पौद्गलिक क्यों है इसका समाधान करते हुए बतलाया गया है कि ‘भाववचनरूप सामर्थ्यसे युक्त क्रियावान् आत्माके द्वारा प्रेर्यमाण पुद्गल द्रव्यवचनरूपसे परिणमन करते हैं, इसलिये द्रव्यवचन पौद्गलिक हैं।’ इस उल्लेखमें स्पष्टरूपसे प्रेरक निमित्तताको स्वीकार किया गया है। इससे भी प्रेरक निमित्तकी सिद्धि होती है। उल्लेख इस प्रकार है-

तत्सामर्थ्योपेतेन क्रियावतात्मना प्रेर्यमाणाः पुद्गला वाक्त्वेन विपरिणमन्त इति द्रव्यवागपि पौद्गलिकी।
-त० सू० अ० ५, सू० १९

तत्त्वार्थवार्तिकमें भी यह विवेचन इसी प्रकार किया है। इसके लिये देखो अध्याय ५, सू० १७ और १९।

इसी प्रकार पंचास्तिकायकी ( गा० ८५ व ८८ जयसेनीया टीका ) संस्कृत टीका और बृहद्द्रव्यसंग्रहमें ( गा० १७ व २२ सं० टी० ) भी ऐसे उल्लेख मिलते हैं जो उक्त कथनकी पुष्टिके लिये पर्याप्त हैं।

उपर्युक्त विवेचनसे स्पष्ट है कि अन्तरंग कारण या उपादान कारण या द्रव्यकी शक्ति कार्यरूप या व्यक्तिरूप निमित्तकारणके व्यापारके बिना नहीं हो सकती। और इसीलिये आचार्योंने निमित्त कारणको बलाधान निमित्त स्वीकार किया है। ऐसी स्थितिमें यह कहना कि कार्यकी उत्पत्ति केवल उपादान कारणसे ही होती है या निमित्त कारण केवल उपस्थित ही रहता है, शास्त्रीय मान्यताके विपरीत है। इसी चर्चाको यदि दार्शनिकरूपमें लिखा जाय तो यों लिखना चाहिये-

\१. केवल उपादान कारणसे ही कार्य होता है यह मिथ्या है, क्योंकि इसके समर्थनमें शास्त्रीय प्रमाणोंका अभाव है।

\२. कार्यके समय केवल उपस्थितिमात्रसे कोई निमित्त कारण हो सकता है यह मिथ्या है, क्योंकि इसके समर्थनमें शास्त्रीय प्रमाणोंका अभाव है।

\३. कार्यकी उत्पत्ति सामग्रीसे ही अर्थात् उपादान और निमित्त कारणसे ही होती है, यह समीचीन है, क्योंकि शास्त्र इसका समर्थन करते हैं।

शंका ६, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ३८३ से ३८७

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मूलशंका ६

उपादनकी कार्यरूप परिणतिमें निमित्त कारण सहायक हैं या नहीं ?

प्रतिशंका २ का समाधान

समाधान-इस शंकाके उत्तरमें यह बतलाया गया था कि जब उपादान कार्यरूपसे परिणत होता है तब उसके अनुकूल विवक्षित द्रव्यकी पर्याय निमित्त होती है। इसकी पुष्टिमें श्लोकवार्तिकका पुष्ट प्रमाण उपस्थित किया गया था, जिसमें बतलाया गया था कि ‘निश्चयनयसे देखा जाए तो प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति विस्रसा होती है और व्यवहार नयसे विचार करने पर उत्पादादिक सहेतुक प्रतीत होते हैं।’

किन्तु इस आगम प्रमाणको ध्यानमें न रख कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है कि कार्यकी उत्पत्ति निमित्तसे होती है। उपादन जो कार्यका मूल हेतु ( मुख्य हेतु-निश्चय हेतु ) है उसको गौण कर दिया गया है।

आगममें प्रमाण दृष्टिसे विचार करते हुए सर्वत्र कार्यकी उत्पत्ति उभय निमित्तसे बतलाई गई है। आगममें ऐसा एक भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होता जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि उपादान ( निश्चय ) हेतुके अभावमें केवल निमित्तके बलसे कार्यकी उत्पत्ति हो जाती है। पता नहीं, जब जैसे निमित्त मिलते है तब वैसा कार्य होता है, ऐसे कथनमें निमित्तकी प्रधानतासे कार्यकी उत्पत्ति मानने पर उपादानका क्या अर्थ किया जाता है। कार्य उपत्तिमें केवल इतना मान लेना ही पर्याप्त नहीं है कि गेहुँसे ही गेहुँके अंकुर आदिकी उत्पत्ति होती है। प्रश्न यह है कि अपनी विवक्षित उपादानकी भूमिकाको प्राप्त हुए बिना केवल निमित्तके बलसे ही कोई गेहुं अंकुरादिरूपसे परिणत हो जाता हैं या जब गेहुं अपनी विवक्षित उपादानकी भूमिकाको प्राप्त होता है तभी वह गेहुँके अंकुरादिरूपसे परिणत होता है। आचार्योंने तो यह स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार किया है कि जब कोई भी द्रव्य अपने विवक्षित कार्यके सन्मुख होता है तभी अनुकूल अन्य द्रव्योंकी पर्यायें उसकी उत्पत्तिमें निमित्तमात्र होती हैं। निष्क्रिय द्रव्योंमें क्रियाके बिना, और सक्रिय द्रव्योंमें क्रियाके माध्यम बिना जो द्रव्य अपनी पर्यायों द्वारा निमित्त होती है वहां तो इस तथ्यको स्वीकार ही किया गया है, किन्तु जो द्रव्य अपनी पर्यायों द्वारा क्रियाके माध्यमसे निमित्त होती हैं वहाँ भी इस तथ्यको स्वीकार किया गया है। श्री राजवार्तिकजीमें कहा है-

यथा मृदः स्वयमन्तर्घटभवनपरिणामाभिमुख्ये दण्ड-चक्र-पौरुषेयप्रयत्नादि निमित्तमात्रं भवति।
यतः सत्स्वपि दण्डादिनिमित्तेषु शर्करादिप्रचितो मृत्पिण्डः स्वयमन्तर्घटभवनपरिणामनिरुत्सुत्वान्न घटीभवति, अतो मृत्पिण्ड एव बाह्यदण्डादिनिमित्तसापेक्ष अभ्यन्तरपरिणामसान्निध्याद् घटो भवति न दण्डादयः इति दण्डादीनां निमित्तमात्रत्वम् ।

अर्थ-जैसे मिट्टीके स्वयं भीतरसे घटके होने रूप परिणामके सन्मुख होनेपर दण्ड, चक्र और पौरुषेय प्रयत्न आदि निमित्तमात्र होते हैं, क्योंकि दण्डादि निमित्तोंके रहने पर भी वालुकाबहुल मिट्टीका पिण्ड स्वयं भीतरसे घटके होनेरूप परिणाम ( पर्याय ) से निरुत्सुक होनेके (घट पर्याय रूप परिणमनके सन्मुख न होनेके ) कारण घट नहीं होता, अतः बाह्यमें दण्डादि निमित्त सापेक्ष मिट्टीका पिण्ड ही भीतर घट होनेरूप परिणामका सानिध्य होनेसे घट होता है, दण्डादि घट नहीं होते, इसलिए दण्डादि निमित्तमात्र हैं ।

यह प्रेरक निमित्तोंकी निमित्तताका स्पष्टीकरण है । इस उल्लेखमें बहुत ही समर्थ शब्दों द्वारा यह स्पष्ट कर दिया है कि न तो सब प्रकारकी मिट्टी ही घटका उपादान है और न ही पिण्ड, स्थास, कोश और कुसुलादि पर्यायोंकी अवस्थारूपसे परिणत मिट्टी घटका उपादान है, किन्तु जो मिट्टी अनन्तर समयमें घट पर्यायरूपसे परिणत होनेवाली है मात्र वही मिट्टी घटपर्यायका उपादान है । यही तथ्य राजवार्तिकके उक्त उल्लेख द्वारा स्पष्ट किया गया है। मिट्टीकी ऐसी अवस्थाके प्राप्त होने पर वह नियमसे घटका उपादान बनती है । यही कारण है कि तत्त्वार्थवार्तिकके उक्त उल्लेख द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया है कि जब मिट्टी घट पर्यायके परिणमनके सन्मुख होती है तब दण्ड, चक्र और पौरुषेय प्रयत्नकी निमित्तता स्वीकृत की गई है, अन्य कालमें वे निमित्त नहीं स्वीकार किए गये हैं ।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए प्रमेयकमलमार्तण्डमें लिखा है-

किं ग्राहकप्रमाणाभावाच्छक्तेरभावः अतीन्द्रियत्वाद्वा ? तत्राद्यः पक्षोऽयुक्तः, कार्यान्यथानुपपत्तिजनितानुमानस्यैव तद्ग्राहकत्वात् । ननु सामग्र्यधीनोत्पत्तिकत्वात् कार्याणां कथं तदन्यथानुपपत्तिः यतोऽनुमानात्तत्सिद्धिः स्यात् इत्यसमीचीनम् , यतो नास्माभिः सामग्र्याः कार्यकारित्वं प्रतिषिध्यते । किन्तु प्रतिनियताया सामग्र्या. प्रतिनियतकार्यकारित्वं अतीन्द्रियशक्तिसद्भावमन्तरेणासम्भाव्यमित्यसावप्यभ्युपगन्तव्या ।
-प्रमेयकमलमार्तण्ड २,२, पृ० १९७

अर्थ-क्या ग्राहक प्रमाणका अभाव होनेसे शक्तिका अभाव है या अतीन्द्रियपना होनेसे ? इसमेंसे प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि कार्योंकी उत्पत्ति अन्यथा नहीं हो सकती इस हेतुसे जनित अनुमान ही उसका ( कार्यकारिणी शक्तिका ) ग्राहक है ।

शंका-कार्योंकी उत्पत्ति सामग्रीके अधीन होनेसे शक्तिके अभावमें जो कार्योंकी उत्पत्तिका अभाव स्वीकार किया है वह कैसे बन सकता है, जिससे कि अनुमान द्वारा शक्तिकी सिद्धि की जा सके ?

समाधान-यह ठीक नहीं है, क्योंकि हम सामग्रीके कार्यकारीपनेका निषेध नहीं करते, किन्तु अतीन्द्रिय शक्तिके सद्भावके बिना प्रतिनियत सामग्रीसे प्रतिनियत कार्यकी उत्पत्ति असम्भव है, इसलिए अतीन्द्रिय शक्तिको भी स्वीकार करना चाहिए ।

यहाँ प्रश्न होता है कि वह अतीन्द्रिय शक्ति क्या है जिसके सद्भावमें ही कार्योंकी उत्पत्ति होती है ? इस प्रश्नका समाधान करते हुए वहाँ पुनः लिखा है-

यच्चोच्यते-शक्तिर्नित्याऽनित्या वेत्यादि । तत्र किमयं द्रव्यशक्तौ पर्याये वा प्रश्नः स्यात्, भावानां द्रव्य-पर्यायशक्त्यात्मकत्वात् । तत्र द्रव्यशक्तिर्नित्यैव, अनादिनिधनस्वभावत्वाद् द्रव्यस्य । पर्यायशक्तिस्त्वनित्यैव, सादिपर्यवसानत्वात् पर्यायाणाम् । न च शक्तेर्नित्यत्वे सहकारिकारणानपेक्षयैवार्थस्य कार्यकारित्वानुषंगः, द्रव्यशक्तेः केवलायाः कार्यकारित्वानभ्युपगमात् । पर्यायशक्तिसमन्विता हि द्रव्यशक्तिः कार्यकारिणी, विशिष्टपर्यायपरिणतस्यैव द्रव्यस्य कार्यकारित्वप्रतीतेः । तत्परिणतिश्चास्य सहकारिकारणापेक्षया इति पर्यायशक्तेस्तदैव भावान्न सर्वदा कार्योत्पत्तिप्रसंगः सहकारिकारणापेक्षावैयर्थ्यं वा ।
-प्रमेयकमलमार्तण्ड २,१ पृ० १८७

और जो यह कहा जाता है कि शक्ति नित्य है कि अनित्य है इत्यादि । सो वहाँ क्या यह द्रव्यशक्ति या पर्यायशक्तिके विषयमें प्रश्न है, क्योंकि पदार्थ द्रव्य-पर्याय शक्तिस्वरूप होते हैं । उनमेंसे द्रव्यशक्ति नित्य ही है, क्योंकि द्रव्य अनादिनिधन स्वभाववाला होता है । पर्यायशक्ति तो अनित्य ही है, क्योंकि पर्याय सादिसान्त होती हैं । यदि कहा जाए कि शक्ति नित्य है, इसलिए सहकारी कारणोंकी अपेक्षा किये बिना ही कार्यकारीपनेका प्रसंग आ जाएगा सो ऐसा नहीं है, क्योंकि केवल द्रव्यशक्तिका कार्यकारीपना नहीं स्वीकार किया गया है । किन्तु पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्ति कार्य करनेमें समर्थ होती है, क्योंकि विशिष्ट पर्यायसे परिणत द्रव्यका ही कार्यकारीपना प्रतीत होता है और उसकी परिणति सहकारी कारणसापेक्ष होती है, क्योंकि पर्यायशक्ति तभी होती है, इसलिए न तो सर्वदा कार्यकी उत्पत्तिका प्रसंग आता है और न ही सहकारी कारणोंकी अपेक्षाकी व्यर्थता प्राप्त होती है ।

इस प्रकार यह ज्ञात हो जाने पर कि सहकारी कारणसापेक्ष विशिष्ट पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्ति ही कार्यकारिणी मानी गई है, केवल उदासीन या प्रेरक निमित्तोंके बलपर मात्र द्रव्यशक्तिसे ही द्रव्यमें कार्य नहीं होता ! यदि द्रव्यशक्तिको बाह्य निमित्तोंके बलसे कार्यकारी मान लिया जाए तो चनेसे भी गेहूँकी उत्पत्ति होने लगे, क्योंकि गेहूँ स्वयं द्रव्य नहीं है, किन्तु वह पुद्गलद्रव्यकी एक पर्याय है, अतएव गेहूँ पर्याय विशिष्ट पुद्गलद्रव्य बाह्य कारणसापेक्ष गेहूँके अंकुरादि कार्यरूपसे परिणत होता है । यदि विशिष्ट पर्यायरहित द्रव्य सामान्यसे निमित्तोंके बल पर गेहूँ अंकुरादि पर्यायोंकी उत्पत्ति मान ली जाए तो जो पुद्गल चनारूप हैं वे पुद्गल होनेसे उनसे भी गेहूँरूप पर्यायकी उत्पत्ति होने लगेगी, इसलिए जो विविध लौकिक प्रमाण देकर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया जाता है कि जब जैसे प्रबल निमित्त मिलते हैं तब द्रव्यको निमित्तोंके अनुसार परिणमना ही पड़ता है सो यह कथन आगमानुकूल न होनेसे संगत नहीं प्रतीत होता । वास्तवमें मुख्य विवाद उपादानका है, उसका जो समीचीन अर्थ शास्त्रोंमें दिया है उस पर सम्यक् दृष्टिपात न करनेसे ही यह विवाद बना हुआ है । यदि आगमानुसार विशिष्ट पर्यायशक्तियुक्त द्रव्यशक्तिको अन्तरंग कारण अर्थात् उपादान कारण स्वीकार कर कार्य-कारणकी व्यवस्था की जाए तो कोई विवाद हो न रह जाए, क्योंकि यथार्थमें जब-जब विवक्षित कार्यके योग्य विशिष्ट पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्ति होती है तब-तब उस कार्यके अनुकूल निमित्त मिलते ही हैं । कार्यमें उपादानकारण मुख्य है, इसलिए उपादानकारणका स्वकाल प्राप्त होने पर कार्यके अनुकूल निमित्त मिलते ही हैं ऐसा नियम है और ऐसा है नहीं कि निश्चय उपादान हो और निमित्त न मिलें । इसी बातको असद्भूत व्यवहार नयकी अपेक्षा यों कहा जाता है कि जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है ।

निमित्त कारणको कार्यकारी कहना असद्भूत व्यवहारनयका विषय है यह हमारा ही कहना हो ऐसा नहीं है, किन्तु आगममें इसे इसी रूपमें स्वीकार किया गया है । यथा-

अनुपचरितासद्भूतव्यवहारेण ज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मणां आदिशब्देनौदारिकवैक्रियिकाहारकशरीरत्रयाहारादिषट्पर्याप्तियोग्यपुद्गलपिण्डरूपनोकर्मणां तथैवोपचरितासद्भूतव्यवहारेण बहिर्विषयघट-पटादीनां च कर्ता भवति ।
-बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ८ टीका

अर्थ-यह जीव अनुपचरित असद्भूत व्यवहारकी अपेक्षा ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मोंका, आदि शब्दसे औदारिक, वैक्रियिक और आहारकरूप तीन शरीर और आहार आदि छह पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गल पिण्डरूप नोकर्मोंका तथा उपचरित असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा बाह्य विषय घट-पट आदिका कर्ता होता है।

कार्य-कारणपरम्पराकी यह सम्यक् व्यवस्था होने पर भी यह संसारी प्राणी अपने विकल्पोंके अनुसार नाना प्रकारकी तर्कणाएं किया करता है और उन्हें ही प्रमाण मान कर कार्यकारणपरम्पराकी व्यवस्था बनाता है। प्रकृतमें यह तो कहा नहीं जाता कि प्रत्येक द्रव्यकी जो विभावपर्याय होती है वह निमित्तके अभावमें होती है। जब प्रत्येक द्रव्य सद्रूप है और उसको उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यस्वभाववाला माना गया है ऐसी अवस्थामें उसके उत्पाद-व्ययको अन्य द्रव्यके कर्तृत्व पर छोड़ दिया जाए और यह मान लिया जाए कि अन्य द्रव्य जब चाहे उसमें किसी भी कार्यको उत्पन्न कर सकता है उसके स्वतन्त्र सत्स्वभावपर आघात है। ऐसी स्थितिमें हमें तो यह कार्य-कारणकी विडम्बनापूर्ण व्यवस्था आगमके प्रतिकूल ही प्रतीत होती है। आचार्योंने प्रत्येक कार्यमें अपने उपादानके साथ मात्र आभ्यन्तर व्याप्ति और निमित्तोंके साथ बाह्य व्याप्ति स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार की है। इसलिए पूर्वोक्त प्रमाणोंके आधारसे ऐसा ही निर्णय करना चाहिए कि द्रव्य अन्वयी होनेसे जो नित्य है उसी प्रकार व्यतिरेकस्वभाववाला होनेसे प्रत्येक समयमें वह उत्पाद-व्ययस्वभाववाला भी है। अतएव प्रत्येक समयमें वह कार्यका उपादान भी है और कार्य भी है। पिछली पर्यायकी अपेक्षा जहाँ वह कार्य है अगली पर्यायके लिए वहाँ वह उपादान भी है और इस प्रकार सन्तानक्रमकी अपेक्षा प्रत्येक समयमें उसे ( कार्य-कारणकी अपेक्षा ) उभयरूप प्राप्त होनेके कारण निमित्त भी प्रत्येक समयमें उसी क्रमसे मिलते रहते हैं। कहीं उनकी प्राप्तिमें पुरुषका योग और रागभाव निमित्त पड़ता है और कहीं वे विस्रसा मिलते हैं। पर उस समयमें नियत उपादानके अनुसार होनेवाले नियत कार्योंके नियत निमित्त मिलते अवश्य हैं। इसलिए विविध लौकिक उदाहरणोंको उपस्थितकर जो अपनी चित्तवृत्तिके अनुसार कार्य-कारणपरम्पराको बिठानेका प्रयत्न किया जाता है वह युक्ति-युक्त नहीं है और न आगमसंगत है। इसी तथ्यको लक्ष्यमें रखकर आचार्य अमृतचन्द्र समयसारकलशमें कहते हैं-

आसंसारत एव धावति परं कुर्वेऽहमित्युच्चकैः
दुर्वारं ननु मोहिनामिह महाहंकाररूपं तमः ।
तद्भूतार्थपरिग्रहेण विलयं यद्येकवारं व्रजे-
त्तत्किं ज्ञानघनस्य बन्धनमहो भूयो भवेदात्मनः ॥५५॥

अर्थ-इस जगतमें मोही जीवोंका ‘परद्रव्यको मैं करता हूँ’ ऐसा पर द्रव्यके कर्तृत्वके महा अहंकाररूप दुर्निवार अज्ञान अन्धकार अनादि संसारसे चला आ रहा है। आचार्य कहते हैं कि अहो! परमार्थ नयका अर्थात् शुद्ध द्रव्यार्थिक अभेदनयका ग्रहण करनेसे यदि वह ( मोह ) एक बार भी नाशको प्राप्त हो तो ज्ञानघन आत्माको पुनः बन्धन कैसे हो सकता है।
-पृ० १५६, कलश ५५

आगमके अनुसार कार्य-कारणपरम्पराकी यह निश्चित स्थिति है। स्वामी समन्तभद्रने आप्तमीमांसामें और भट्टाकलंकदेव तथा आचार्य विद्यानन्दीने उसकी अष्टशती तथा अष्टसहस्री टीकामें ‘दोषावरणयोर्हानिः’ इत्यादि कथन उक्त तथ्यको ही ध्यानमें रखकर किया है, क्योंकि उक्त आचार्योंने ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ इत्यादि कथन उक्त कार्यकारणपरम्पराको ध्यानमें रखकर ही किया है। भगवान् कुन्दकुन्दने भी ‘जीव-परिणामहेदुं’ इत्यादि कथन द्वारा इसी कार्य-कारणपरम्पराको सूचित किया है। ‘असंख्यातप्रदेशी जीवको जब जैसा शरीर मिलता है तब उसे उसरूप परिणमना पड़ता है’ ऐसा जो कथन किया जाता है सो यहाँ भी उपादान और निमित्तोंकी उक्त प्रकारसे कार्य-कारणपरम्पराको स्वीकार कर लेने पर ही सम्यक् व्यवस्था बनती है, क्योंकि उपादानरूप जीवमें स्वयं परिणमनकी योग्यता है अतः शरीरको निमित्त कर स्वयं संकोच-विस्ताररूप परिणमता है। इस प्रकार उपादान ( निश्चय ) और निमित्तों ( व्यवहार )का सुमेल होनेसे लोकमें जब जितने कार्य होते हैं उनकी पूर्वोक्त प्रकारसे सम्यक् व्यवस्था बन जाती है। भट्टाकलंकदेवने अपनी अष्टशतीमें ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि कारिका ली है सो वह भी इसी अभिप्रायसे ली है। पूरी कारिका इस प्रकार है-

तादृशी जायते बुद्धिः व्यवसायश्च तादृशः
सहायाः तादृशाः सन्ति यादृशी भवितव्यता ॥

जैसी होनहार होती है उसके अनुसार बुद्धि हो जाती है, पुरुषार्थ भी वैसा होने लगता है और सहायक कारण ( निमित्त कारण ) भी वैसे मिल जाते हैं।

शंका ६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ (भाग १/२)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ३८७ से ४०७

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तृतीय दौर

शंका ६

प्रश्न यह था-‘उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें निमित्तकारण सहायक होता है या नहीं ?’

प्रतिशंका ३

इस प्रश्न का उत्तर लिखते हुए आपने निष्कर्षके रूपमें अपना मत प्रथम उत्तर पत्रकमें निम्न प्रकार प्रगट किया था-

‘उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें अन्य द्रव्यकी विवक्षित पर्याय निमित्तकारण होती है, परन्तु यहाँ पर यह स्पष्ट रूपसे समझना चाहिये कि उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें अन्य द्रव्यकी विवक्षित पर्यायको आगममें जो निमित्तकरणरूपसे स्वीकार किया है सो वह वहाँ पर व्यवहारनयकी अपेक्षा ही स्वीकार किया है निश्चय-नयकी (पर्यायार्थिक निश्चनयकी) अपेक्षा नहीं।’

आपने जिस प्रक्रियाके साथ यह उत्तर लिखा था वह प्रक्रिया भी यद्यपि चर्चनीय थी, परन्तु हमने अपनी प्रतिशंका२में आवश्यक न होनेके कारण उस प्रक्रियापर विचार न करते हुए प्रकृत विषयको लेकर केवल प्रकृतोपयोगी रूपसे ही आपके उत्तर पर विचार किया था तथा अब यह प्रतिशंका भी उसी दृष्टिकोणको अपनाकर लिखी जा रही है।

आपने अपने प्रथम उत्तरमें यह तो स्वीकार कर लिया है कि विवक्षित वस्तुसे विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिमें विवक्षित अन्य वस्तु अपनी विवक्षित पर्यायके साथ निमित्तकारण होती है परन्तु इसके स्पष्टीकरणके रूपमें

आगे आपने जो यह लिखा है कि-‘इस प्रकारकी निमित्तकारणता व्यवहारनयसे ही स्वीकार की जा सकती है निश्चयनयसे नहीं’-सो इस लेखसे सहमति प्रगट करते हुए भी आपसे हमारा कहना है कि व्यवहारनयसे निमित्तकारणताका जो आप ‘कल्पनारोपित निमित्तकारणता’ अर्थ कर लेते हैं यह अर्थ हमारे और आपके मध्य विवादका विषय बन जाता है।

आगे आपने अपने मतकी पुष्टिमें तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकका निम्नलिखित कथन भी उद्धृत किया है-

कथमपि तन्निश्चयनयात् सर्वस्य विस्रसोत्पादव्ययध्रौव्यव्यवस्थितेः । व्यवहारनयादेवोत्पादादीनां सहेतुकत्वप्रतीतेः” । -अ० ५ सू० १६ पृ० ४१०

इसका जो अर्थ आपने किया है वह निम्न प्रकार है-

‘किसी प्रकार सब द्रव्योंके उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यकी व्यवस्था निश्चनयसे विस्रसा है, व्यवहारनयसे ही उत्पादिक सहेतुक प्रतित होते हैं।’

यद्यपि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके उक्त कथनसे भी हम पूर्णतः सहमत हैं, परन्तु इसमें ‘निश्चय’ शब्दका अर्थ ‘वास्तविक’ और ‘व्यवहार’ शब्दका अर्थ उपचार ( कल्पनारोपित ) करके आप जब उक्त कथनके आधार पर निमित्तको अकिंचित्कर सिद्ध करना चाहते हैं तो आपके इस अभिप्रायसे हम कदापि सहमत नहीं हो सकते हैं। कारण कि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके उक्त कथनमें भी पठित ‘व्यवहार’ शब्दका अर्थ ‘कल्पनारोपित’ करना निराधार है। आगे इसी विषय पर विचार किया जा रहा है।

व्यवहार और निश्चय ये दोनों ही पृथक्-पृथक् स्थल पर प्रकरणानुसार परस्पर सापेक्ष विविध अर्थ युगलोंके बोधक शब्द हैं, इसलिये भिन्न-भिन्न स्थलपर प्रयुक्त किये गये इन शब्दोंसे प्रकरणके अनुसार परस्पर सापेक्ष भिन्न-भिन्न अर्थ युगल ही ग्रहण करना चाहिये। व्यवहार और निश्चय इन दोनों शब्दोंके विविध अर्थयुगलों और प्रत्येक अर्थयुगलकी परस्पर सापेक्षताके विषयमें हमारा दृष्टिकोण आपको प्रश्न नं० १७ की प्रतिशंका ३ में देखनेको मिलेगा। अतः कृपया वहाँ देखनेका कष्ट कीजियेगा।

व्यवहारनय और निश्चयनयके विषयमें हमारा कहना यह है कि ये दोनों ही नय वचनात्मक और ज्ञानात्मक दोनों प्रकारके हुआ करते हैं । उनमेंसे निश्चयरूप अर्थसापेक्ष व्यवहाररूप अर्थका प्रतिपादक वचन व्यवहारनय और व्यवहाररूप अर्थसापेक्ष निश्चयरूप अर्थका प्रतिपादक वचन निश्चयनय कहलाने योग्य है। इसी प्रकार निश्चयरूप अर्थसापेक्ष व्यवहाररूप अर्थका ज्ञापक ज्ञान व्यवहारनय और व्यवहाररूप अर्थसापेक्ष निश्चयरूप अर्थका ज्ञापक ज्ञान निश्चयनय कहलाने योग्य है। पहले दोनों वचननयके और दूसरे दोनों ज्ञाननयके भेद जानना चाहिये।

व्यवहाररूप अर्थ और निश्चयरूप अर्थ ये दोनों ही अपने आपमें पूर्ण अर्थ नहीं हैं। यदि इन दोनोंमें से प्रत्येकको पूर्ण अर्थ मान लिया जायगा तो इन दोनोंकी परस्पर सापेक्षता ही भंग हो जायगी, इसलिये ये दोनों ही पदार्थके अंश ही सिद्ध होते हैं, क्योंकि नय विकलादेश होनेसे वस्तुके एक अंशको ही ग्रहण करता है। इस प्रकार इनको विषय करनेवाले वचनों और ज्ञानोंको भी क्रमशः परार्थप्रमाणरूप श्रुत और स्वार्थप्रमाणरूप श्रुतके भेदरूपसे जैन आगममें स्वीकार किया गया है। अर्थात् जैनागममें पदार्थके परस्पर-सापेक्ष अंशभूत व्यवहार और निश्चयके प्रतिपादक वचनोंको परार्थ प्रमाणरूप श्रुतमें और पदार्थके परस्पर सापेक्ष अंशभूत व्यवहार और निश्चयके ज्ञापक ज्ञानोंको स्वार्थ प्रमाणरूप श्रुतमें अन्तर्भूत किया गया है।

स्वार्थ प्रमाणरूप श्रुतमें भी मति आदि स्वार्थप्रमाणोंकी तरह अंशांशिभाव नहीं बन सकता है, क्योंकि स्वार्थप्रमाण हमेशा ज्ञानरूप ही होता है और ज्ञान अखण्ड आत्माका अखण्ड गुण होनेके कारण अपने आपमें अखण्ड ही सिद्ध होता है, इसलिये मति आदि स्वार्थ प्रमाणोंकी तरह स्वार्थप्रमाणरूप श्रुतज्ञानमें भी यद्यपि व्यवहारनय और निश्चयनयका भेद सम्भव नहीं दिखाई देता है। परन्तु जब स्वार्थप्रमाणरूप श्रुतज्ञानकी उत्पत्ति शब्द श्रवणपूर्वक ही हुआ करती है और शब्दव्यवहार तथा निश्चयरूप पदार्थधर्मोंका परस्पर सापेक्षताके साथ पृथक्-पृथक् प्रतिपादन करनेमें समर्थ हैं तो निश्चयरूप अर्थसापेक्ष व्यवहाररूप अर्थके प्रतिपादक शब्दका श्रवण करनेके अनन्तर श्रोताको जो पदार्थका ज्ञान होता है उसे व्यवहारनय तथा व्यवहाररूप अर्थसापेक्ष निश्चयरूप अर्थके प्रतिपादक शब्दका श्रवण करनेके अनन्तर श्रोताको जो पदार्थज्ञान होता है उसे निश्चयनय कहना असंगत नहीं है।

इतने विवेचनके साथ हमारा कहना यह है कि प्रकृतमें कार्यकारणभावका प्रकरण होनेके कारण निश्चय शब्दका अर्थ उपादानोपादेय भाव और व्यवहार शब्दका अर्थ निमित्तनैमित्तिकभाव ही ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार निश्चय और व्यवहार शब्दोंका प्रकरणके लिये उपयोगी अपना अपना अर्थ निश्चित हो जाने पर तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके अ० ५ सू० १६ पृष्ठ ४१० के उल्लिखित कथनका जो अनुभव, तर्क और आगमसम्मत अर्थ हो सकता है वह निम्न प्रकार है :-

सब द्रव्योंके उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यकी व्यवस्था निश्चयनयसे अर्थात् उपादानोपादेयभावकी अपेक्षा विस्रसा ( स्वभावसे ) है, व्यवहारनयसे ही अर्थात् निमित्तनैमित्तिकभावकी अपेक्षा ही वे उत्पादादिक सहेतुक प्रतीत होते हैं।

यहाँ पर ‘उत्पादादिक निश्चयनयके अर्थात् उपादानोपादेयभावकी अपेक्षा विस्रसा हैं’ इस वाक्यका आशय यह है कि जो उत्पादादिक वस्तुके स्वपरप्रत्यय परिणमन होनेके कारण अपनी उत्पत्तिमें अन्य अनुकूल वस्तुके सहयोगकी स्वभावतः अपेक्षा रखते हैं वे इस तरह उस अन्य वस्तुके सहयोगसे उत्पन्न होते हुए भी वस्तुके अपने स्वभावके दायरेमें ही हुआ करते हैं, कारण कि एक वस्तुके गुण-धर्म अपने-अपने वस्तुत्वकी रक्षाके लिये प्रत्येक वस्तुमें पाये जानेवाले स्वभावकी प्रतिनियतताके कारण कभी भी अन्य वस्तुमें प्रविष्ट नहीं होते हैं। यही कारण है कि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें आचार्य विद्यानन्दीने सहकारी कारणकी कारणताको कालप्रत्यासत्तिके रूपमें ही प्रतिपादित किया है, द्रव्य प्रत्यासत्तिके रूपमें नहीं। अर्थात् जिस प्रकार उपादानभूत वस्तुके गुण-धर्मोंका कार्यमें स्वभावतः प्रवेश होनेके कारण उस उपादानभूत वस्तुमें कार्यके प्रति द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणताका सद्भाव स्वीकार किया गया है उस प्रकार निमित्तभूत वस्तुके गुण-धर्मोंका कार्यमें प्रवेश सर्वदा असम्भव रहनेके कारण उस निमित्तभूत वस्तुमें कार्यके प्रति द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणताको अस्वीकृत करते हुए आचार्य विद्यानन्दीने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें कालसापेक्ष अन्वय-व्यतिरेकके आधार पर कालप्रत्यासत्तिरूप कारणताको ही स्वीकार किया है।

तात्पर्य यह है कि कार्यकारणभावके प्रकरणमें दो प्रकारकी कारणताका विवेचन आगम ग्रन्थोंमें पाया जाता है-एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप और दूसरी कालप्रत्यासत्तिरूप। इनमेंसे जो वस्तु स्वयं कार्यरूप परिणत होती है अर्थात् कार्यके प्रति उपादानकारण होती है उसमें कार्यके प्रति द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणता पायी जाती है, क्योंकि वहाँ पर कारणरूप धर्म और कार्यरूप धर्म दोनों ही एक द्रव्यके आश्रयसे रहनेवाले धर्म हैं तथा जो वस्तु स्वयं कार्यरूप परिणत न होकर कार्यरूप परिणत होनेवाली अन्य वस्तुको कार्यरूपसे परिणत होनेमें सहायक होती है अर्थात् निमित्त कारण होती है उसमें कार्यके प्रति द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणताका तो अभाव ही पाया जाता है, क्योंकि वहाँ पर कार्यरूप धर्म तो अन्य वस्तुमें रहा करता है और कारणरूप धर्म अन्य वस्तुमें हो रहा करता है। तब ऐसी स्थितिमें उन कार्यभूत और कारणभूत दोनों वस्तुओंमें कालप्रत्यासत्तिके आधार पर ही कार्यकारणभाव स्वीकार किया जा सकता है, द्रव्याप्रत्यासत्तिके रूपमें नहीं। अर्थात् ‘जिसके अनन्तर जो अवश्य ही उत्पन्न होता है और जिसके अभावमें जो अवश्य ही उत्पन्न नहीं होता है’ ऐसा कालप्रत्यासत्तिरूप कारणताका लक्षण ही वहाँ घटित होता है। तात्पर्य यह है कि द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणता उपादानभूत वस्तुमें ही पायी जाती है, अतः वहाँ पर कार्यके साथ कार्यकारणभाव उपादानोपादेयभावके रूपमें पाया जाता है और कालप्रत्यासत्तिरूप कारणता निमित्तभूत वस्तुमें रहा करती है, अतः वहाँ पर कार्यके साथ कार्यकारणभाव निमित्तनैमित्तिमभावके रूपमें ही पाया जाता है। इन दोनों प्रकारकी कारणताओं अथवा दोनों प्रकारके कार्यकारणभावोंका कथन जैसा कि हम ऊपर कह आये हैं-आचार्य विद्यानन्दीने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें निम्न वचनों द्वारा किया है :-

क्रमभुवोः पर्याययोरेकद्रव्यप्रत्यासत्तेरुपादानोपादेयत्ववचनात्। न चैवंविधः कार्यकारणभावः सिद्धांतविरुद्धः। सहकारिकारणेन कार्यस्य कथं तत् स्यात्, एकद्रव्यप्रत्यासत्तेरभावादिति चेत्, कालप्रत्यासत्तिविशेषात्तत्सिद्धिः। यदनन्तरं हि यदवश्यं भवति तत्तस्य सहकारिकारणमितरत्कार्यमिति प्रतीतम्।
-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृष्ठ १५१

अर्थ-‘क्रमसे उत्पन्न होनेवाली पर्यायोंमें एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप उपादानोपादेयभावका कथन किया गया है और इस प्रकारका उपादानोपादेयभावरूप यह कार्यकारणभाव सिद्धान्तविरुद्ध नहीं है। परन्तु यह कार्यकारणभाव सहकारीकारणके साथ किस प्रकार हो सकता है? क्योंकि यहाँ पर एकद्रव्यप्रत्यासत्तिका अभाव ही पाया जाता है, यदि यह प्रश्न किया जाय तो कहना चाहिये कि सहकारीकारणके साथ एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणता नहीं स्वीकार की गयी है, किन्तु कालप्रत्यासत्तिविशेषरूप कारणता ही वहाँ पर स्वीकार की गयी हैं जिसका आशय यह है कि जिसके अनन्तर जो अवश्य ही होता है वह उसका कारण होता है और उससे अन्य कार्य होता है’-क्योंकि ऐसा ही प्रतीत होता है।

इस प्रकार कार्यमें चूँकि निमित्तभूत वस्तुके गुण-धर्मोंका समावेश कभी न होकर उपादानभूत वस्तुके गुण-धर्मोंका ही नियमसे समावेश होता है, अतः उत्पादादिक निश्चयनयसे अर्थात् उपादानोपादेयभावकी अपेक्षा विस्रसा हैं-ऐसा कहना उपयुक्त ही है।

इसी प्रकार व्यवहारनयसे ही उत्पादादिक सहेतुक प्रतीत होते हैं इसका आशय भी उक्त कथनके अनुसार निमित्तभूत वस्तुके गुण-धर्मोंका कार्यमें समावेश असंभव रहते हुए भी कार्यकी उत्पत्ति निमित्तके अभावमें नहीं हो सकनेके कारण यही होता है कि निमित्तनैमित्तिक भावकी अपेक्षा उत्पादादिक सहेतुक अर्थात् निमित्तकारणकी सहायतासे ही हुआ करते हैं । आगममें कार्यकारणभावको लेकर जितना वचन व्यवहार पाया जाता है अथवा लोकमें जितना वचनव्यवहार किया जाता है वह सब उपर्युक्त विवेचनके अनुसार ही किया गया है या किया जाता है। जैसे शिष्य पढ़ता है अथवा मिट्टी घटरूप परिणत होती है इन प्रयोगोंमें एकद्रव्यप्रत्यासत्तिरूप उपादानोपादेयभावपर लक्ष्य रक्खा गया है या रक्खा जाता है तथा अध्यापक पढ़ाता है अथवा कुम्हार मिट्टीको घटरूप परिणमाता है इन प्रयोगोंमें कालप्रत्यासत्तिरूप निमित्तनैमित्तकभावपर लक्ष्य रक्खा गया है या रक्खा जाता है।

इस तरह तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक के अ० ५ सूत्र १६ पृ० ४१० में निवद्ध उक्त कथनका जो अर्थ हमने ऊपर किया है उसमें और आपके द्वारा किये गये उल्लिखित अर्थमें अन्तर स्पष्ट दिखाई देने लगता है अर्थात् जहाँ आपके द्वारा प्रमाणका अभाव रहते हुए भी व्यवहारका अर्थ उपचार करके निमित्तनैमित्तिकभावको कल्पनारोपित सिद्ध करनेकी चेष्टा की गयी है वहाँ हमारे द्वारा व्यवहारका अर्थ प्रमाणसिद्ध निमित्तनैमित्तिकभाव ही माना गया है, जिसे ऐसी हालतमें वास्तविक माननेके सिवाय कोई चारा ही नहीं रह जाता है, क्योंकि तत्र निमित्तनैमित्तिकभावको कल्पनारोपित सिद्ध करनेके लिये व्यवहार शब्दके अलावा कोई दूसरा शब्द ही उक्त कथनमें नहीं मिलता है । इस प्रकार आचार्य विद्यानन्दीकी दृष्टिमें निमित्तनैमित्तिकभाव कल्पनारोपित सिद्ध न होकर वास्तविक ही सिद्ध होता है । यही कारण है कि आचार्य विद्यानन्दीने निमित्तकारणकी वास्तविताको तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके पृष्ठ १५१ पर ऊपर निर्दिष्ट कथनके आगे स्पष्ट शब्दोंमें प्रतिपादित कर दिया है । वे शब्द निम्न प्रकार है ।-

तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे कार्यकारणभावो द्विष्ठः संबंधः संयोग-समवायादिवत् प्रतीतिसिद्धत्वात् पारमार्थिक एव न पुनः कल्पनारोपितः, सर्वथाप्यनवद्यत्वात् ॥

अर्थ-इस प्रकार व्यवहारनयका आश्रय लेनेसे कार्यकारणभाव दो पदार्थोंमें विद्यमान कालप्रत्यासत्तिरूप ही होता है और वह संयोग-समवाय आदिकी तरह प्रतीतिसिद्ध होनेसे पारमार्थिक ही होता है, कल्पनारोपित नहीं, कारण कि यह सर्वथा निर्दोष है ।

अब आपको ही विचार करना है कि जब आचार्य विद्यानन्दी स्वयं ‘तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे’ इत्यादि वचन द्वारा दो पदार्थोंमें विद्यमान कालप्रत्यासत्तिरूप निमित्तनैमित्तिकभावको वास्तविक स्वीकर कर रहे हैं तो इसको ध्यानमें रखकर ही उनके पूर्वोक्त दूसरे वचन ‘कथमपि तन्निश्चयनयात्’ इत्यादिका अर्थ करना होगा । ऐसी हालतमें उक्त निमित्तनैमित्तिकभावको कल्पनारोपित बतलानेवाला आपके द्वारा किया गया अर्थ संगत न होकर उसे वास्तविक कहनेवाला हमारे द्वारा किया गया अर्थ ही संगत होगा ।

आचार्य विद्यानन्दीने पृष्ठ १५१ पर ही तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें आगे १४, १५ और १६ संख्याक वार्तिकोंका व्याख्यान करते हुए निम्नलिखित कथन किया है :-

ततः सकलकर्मविप्रमोक्षो मुक्तिरुरीकर्त्तव्या । सा वन्धपूर्विकेति तात्त्विको बन्धोऽभ्युपगन्तव्यः, तयोः ससाधनत्वात् अन्यथा कादाचित्कत्वायोगात् । साधनं तात्त्विकमभ्युपगंतव्यं न पुनरविद्याविलासमात्रमिति ।

अर्थ-इसलिये संपूर्ण कर्मोंके विनाशको ही मुक्ति मानना चाहिये । वह मुक्ति चूँकि बन्धपूर्वक ही सिद्ध होती है, अतः बन्धको भी तात्त्विक मानना चाहिये, क्योंकि मुक्ति और बन्ध दोनोंको ही साधनोंसे निष्पन्न हुआ स्वीकार किया गया है और क्योंकि मुक्ति तथा बन्ध दोनोंका साधनोंसे निष्पन्न होना न माननेपर उनमें अनादिनिधनताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा, अतः साधनोंको भी तात्त्विक ही मानना चाहिये, केवल अविद्याका विलासमात्र अर्थात् कल्पनारोपितमात्र नहीं समझना चाहिये ।

इस कथनके द्वारा आचार्य विद्यानन्दीने बन्ध, मुक्ति और इन दोनोंके बाह्य-साधनोंकी वास्तविकताका ही प्रतिपादन किया है । इनके अतिरिक्त हमने अपनी प्रथम प्रतिशंकामें अन्य बहुतसे आगमप्रमाणों एवं युक्तियों द्वारा निमित्तकारणकी वास्तविकताका समर्थन तथा कल्पनारोपितताका खण्डन विस्तारसे किया है जिससे यह सिद्ध होता है कि निमित्तकारण भी उपादानकारणकी तरह वास्तविक ही होता है, कल्पनारोपित नहीं। लेकिन यह बात दूसरी है कि उपादान कारणकी वास्तविकताको उपादानरूपसे अर्थात् एकद्रव्यप्रत्यासत्तिके रूपमें आश्रयरूपसे और निमित्तकारणकी वास्तविकताको निमित्तरूपसे अर्थात् पूर्वोक्त कालप्रत्यासत्तिविशेषके रूपमें सहायकरूपसे ही जानना चाहिये।

इतना स्पष्टीकरण करनेके अनन्तर अब हम आपके दूसरे उत्तर पत्र पर विचार करना प्रारम्भ करते हुए सर्वप्रथम यह बतला देना चाहते हैं कि आपने अपने द्वितीय उत्तर पत्रमें प्रथम उत्तर पत्रके आधार पर कार्यकारणभावके सिलसिलेमें यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया है कि ‘जब उपादान कार्यरूप परिणत होता है तब उसके अनुकूल विवक्षित अन्य द्रव्यकी पर्याय निमित्त होती है।’ और इसका आप यह आशय ले लेना चाहते हैं कि उपादानकी कार्यरूप परिणति तो केवल उसके अपने ही बल पर हो जाया करती है। वहाँ पर निमित्तका रंचमात्र भी सहयोग अपेक्षित नहीं रहा करता है, लेकिन चूँकि निमित्त वहाँ पर हाजिर रहा करता है, अतः ऐसा बोल दिया जाता है कि उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें अन्य द्रव्यकी विवक्षित पर्याय निमित्तकारण होती है। आगे आपने अपने इस सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके ऊपर उद्धृत प्रमाण-जिसे आपने प्रथम उत्तर पत्रमें निर्दिष्ट किया था-का उल्लेख करते हुए अपने उक्त सिद्धान्तकी पुष्टिमें उसे पुष्ट प्रमाण प्रतिपादित किया है, लेकिन जैसा कि हम ऊपर लिख चुके हैं कि तत्त्वार्थश्लोकवार्त्तिकके ‘कथमपि तन्निश्चयनयात्’ इत्यादि कथनमें प्रकरणके अनुसार कौनसे नयार्थ विवक्षित हैं-इस पर आपका ध्यान नहीं पहुँच सकनेके कारण ही आप उससे अपना मनचाहा (उपादानकी कार्यपरिणतिमें निमित्तको अकिंचित्कर बतलानेवाला) अभिप्राय पुष्ट करनेका असफल दावा कर रहे हैं । तत्त्वार्थश्लोकवार्त्तिकके उक्त कथनमें कौनसे नयार्थ गृहीत किये गये हैं? इसका जो स्पष्टीकरण हम ऊपर कर चुके हैं-हमारा आपसे अनुरोध है कि उस पर आप तत्त्वजिज्ञासु बनकर गहरी दृष्टि डालनेका प्रयत्न कीजिये? इस तरह हमें विश्वास है कि उक्त कथनसे आप न केवल अपनी गलत अभिप्रायपुष्टिका दावा छोड़ देंगे बल्कि कार्यकारणभावके सिलसिलेमें निमित्तनैमित्तिकभावको अवास्तविक, उपचरित या कल्पनारोपित माननेके अपने सिद्धान्तको परिवर्तित करनेके लिये भी सहर्ष तैयार हो जावेंगे।

आपने अपने प्रथम उत्तर पत्रमें श्लोकवार्तिकके उक्त वचनसे अपना मनचाहा उक्त गलत अभिप्राय पुष्ट करनेमें एक बात और लिखी है कि 'यहाँ पर 'सहेतुकत्वप्रतीतेः पदमें ‘प्रतीतेः’ पद ध्यान देने योग्य है।

मालूम पड़ता है कि आप प्रतीति शब्दके प्रयोगके आधार पर ही तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके उक्त वचनसे यह निष्कर्ष निकाल लेना चाहते हैं कि उत्पादादिक अपनी उत्पत्तिमें सहेतुक अर्थात् बाह्य साधन-सापेक्ष वास्तवमें तो नहीं होते है अर्थात् वे उत्पादादिक होते तो अपने स्वभावसे हो हैं फिर भी व्यवहारसे (उपचारसे) सहेतुक जैसे मालूम पड़ते हैं।

इस विषयमें हमारा कहना यह है कि अपना उपर्युक्त एक गलत अभिप्राय बना लेनेके अनन्तर उसकी पुष्टिके लिये यह दूसरी गलती आप करने जा रहे हैं। कारण कि श्लोकवार्तिकके ही उल्लिखित अन्य प्रमाणोंसे जब आपका उक्त अभिप्राय गलत सिद्ध हो जाता है तो ऐसी हालतमें ‘सहेतुकत्वप्रतीतेः’ पदमें पठित ‘प्रतीतेः’ पदसे आप अपने उक्त अभिप्रायकी पुष्टि कदापि नहीं कर सकते हैं। दूसरी बात यह है कि प्रतीति शब्दका प्रसिद्धार्थ ‘ज्ञानकी निर्णयात्मक स्थिति’ ही होता है, इसलिये उसका ‘प्रतीत्याभास’ अर्थ आपने कैसे कर लिया? इसका स्पष्टीकरण आपको अवश्य करना था जो आपने नहीं किया है। तीसरी बात यह है कि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकका जो ‘क्रमभुवोः पर्याययोः’ इत्यादि उद्धरण हमने ऊपर दिया है उसके अन्तमें-

यदनन्तरं हि यदवश्यं भवति तत्तस्य सहकारिकारणमितरत्कार्यमिति प्रतीतम् ।

यह वाक्य पाया जाता है, इसी प्रकार आगे ‘तदेवं व्यवहारनयसमाश्रयणे’ इत्यादि वाक्यमें भी ‘प्रतीतिसिद्धत्वात् पारमार्थिक एव’ यह पद पाया जाता है। इन दोनों स्थलोंमें क्रमशः पठित प्रतीत और प्रतीति शब्दोंका अर्थ आपको भी प्रकरणानुसार निर्विवादरूपसे ‘ज्ञानकी निर्णयात्मक स्थिति’ स्वीकार करना अनिवार्य है, अतः ऐसी हालतमें ‘सहेतुकत्वप्रतीतेः’ पदमें पठित ‘प्रतीतेः’ पदका अर्थ विरुद्ध हेतुके अभावमें ज्ञानकी निर्णयात्मक स्थिति करना ही संगत होगा, प्रतीत्याभास नहीं।

आगे आपने अपने द्वितीय उत्तर पत्रमें कार्यके प्रति निमित्तभूत वस्तुकी वास्तविक कारणताकी आलोचना करते हुए यह भी लिखा है कि ‘आगममें प्रमाणदृष्टिसे विचार करते हुए सर्वत्र कार्यकी उत्पत्ति उभय निमित्तसे बतलायी है। आगममें ऐसा एक भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होता जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि उपादान ( निश्चय ) हेतुके अभावमें केवल निमित्तके बलसे कार्यकी उत्पत्ति हो जाती है। पता नहीं, जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है-ऐसे कथनमें निमित्तकी प्रधानतासे कार्यकी उत्पत्ति मान लेने पर उपादानका क्या अर्थ किया जाता है।’

इस विषयमें सर्वप्रथम हमारा कहना यह है कि आगममें प्रमाणकी दृष्टिसे विचार करते हुए सर्वत्र कार्यकी उत्पत्ति उभयनिमित्तसे बतलायी है। आगममें ऐसा एक भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होता जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि वास्तविक निमित्त ( व्यवहार ) हेतुके अभावमें केवल उपादानके बलसे प्रत्येक वस्तुमें आगम द्वारा स्वीकृत स्वपरसापेक्ष कार्यकी उत्पत्ति हो जाती है फिर हमारी समझमें यह बात नहीं आरही है कि आप निमित्तको कार्यकी उत्पत्तिमें कल्पनारोपित कारण मानकर अकिंचित्कर क्यों और किस आधार पर मान रहे हैं ? और यदि आप कार्यकी उत्पत्तिमें निमित्तको उपादानके सहयोगी रूपमें स्थान देना स्वीकार कर लेते हैं तो कार्यकारणभावके विषयमें विवादकी समाप्ति ही समझिये।

हमें इस बात पर भी आश्चर्य हो रहा है कि उपादान हेतुके अभावमें केवल निमित्तके बलसे कार्यकी उत्पत्तिको जब हम नहीं स्वीकार करते हैं तो इस गलत मान्यताको हमारे पक्षके ऊपर आप बलात् क्यों थोप रहे हैं ? क्योंकि हमारी स्पष्ट घोषणा है और वह आपको मालूम भी है कि हमारी आगमसम्मत मान्यताके अनुसार उपादान शक्ति न हो तो निमित्त केवल अपने ही बलसे कार्य सम्पन्न नहीं कर सकता है अर्थात् स्पष्ट मत यही है कि किसी भी वस्तुमें कार्यकी उत्पत्ति उसमें स्वभावतः पायी जानेवाली उपादान शक्तिका सद्भाव ही हो सकती है, निमित्तभूत वस्तु तो उस कार्यकी उत्पत्तिमें सहायक रूपसे ही उपयोगी होती है, जिसका मतलब यह निकलता है कि वस्तुके कार्यमें उपादान शक्तिका सद्भाव रहते हुए भी जबतक निमित्त सामग्रीका सहयोग उसे प्राप्त नहीं होगा तबतक उससे स्वपरसापेक्ष परिणतिका होना असम्भव ही रहेगा और इसका भी मतलब यह निकलता है कि प्रत्येक वस्तुमें स्वभावरूपसे प्रतिनियत नाना उपादान शक्तियाँ एक साथ पायी जाती हैं, परन्तु उस वस्तुको उसकी जिस उपादान शक्तिके अनुकूल सहयोग प्रदान करनेवाली निमित्त सामग्री जब प्राप्त होगी उस निमित्त सामग्रीके सहयोगके आधारपर ही वह वस्तु उस समय अपनेमें विद्यमान उस उपादानशक्तिके अनुसार परिणमन करेगी। जैसे खानकी मिट्टीमें घड़ा, सकोरा आदि विविध निर्माणके अनुकूल प्रतिनियत उपादान शक्तियाँ स्वभावतः एक साथ विद्यमान हैं। ये सभी उपादान शक्तियाँ तबतक लुप्त पड़ी रहती हैं जबतक कि किसी भी उपादान शक्तिके विकासके अनुकूल सहयोग देनेवाली निमित्त सामग्रीकी प्राप्ति उसे नहीं हो जाती है अर्थात् वह मिट्टी घड़ा, सकोरा आदिके निर्माण योग्य अपनी उपादान शक्तियोंके सद्भावमें भी केवल अनुकूल निमित्त सामग्रीके अभावके कारण ही घड़ा या सकोरा आदि रूपसे परिणत नहीं हो पाती है । इसलिये जब कुम्हार अपनी इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और श्रमशक्तिके आधारपर खानसे उस मिट्टीको लाकर और दण्ड, चक्र आदि आवश्यक अन्य निमित्त सामग्रीका सहयोग लेकर अपने पुरुषार्थ द्वारा उस मिट्टीको घड़ा या सकोरा आदि जिस निर्माणके अनुकूल अनुप्राणित करता है उस समय उस मिट्टीसे उसकी अपनी योग्यतानुसार उस कार्यकी उत्पत्ति हो जाती है ।

इसके अतिरिक्त हम, आप और दूसरे सभी लोग विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिके लिये उक्त कार्यके अनुकूल योग्यता रखनेवाली उपादानभूत वस्तुकी संप्राप्ति हो जानेपर भी प्रतिदिन और प्रतिक्षण तदनुकूल निमित्त सामग्रीके जुटानेमें परिश्रम किया करते हैं । क्या आपने कभी यह सोचा है या आप सोचनेके लिये तैयार हैं कि जब उपादान विवक्षित कार्यरूप परिणत होनेके लिये अपनी तैयारी कर लेगा तब वह कार्य अपने आप हो जायगा अथवा उस कार्यके अनुकूल निमित्त सामग्री नियमसे उपस्थित रहेगी या स्वयमेव प्राप्त हो जायगी और तब अपनी इस मान्यताके अनुसार ही आप क्या विवक्षित कार्यके करनेमें अथवा तदनुकूल निमित्त सामग्रीके जुटानेमें पुरुषार्थ करना छोड़ सकते हैं ? या फिर अपने इस अनुभवको सही मानते हैं कि किसी विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिका आप पहले अपने अन्तःकरणमें संकल्प करते हैं फिर अपनी ज्ञानशक्ति और श्रमशक्तिके अनुसार उस कार्यको सम्पन्न करनेके लिये तदनुकूल सामग्रीका सहयोग लेकर पुरुषार्थ करते हैं ? यह बात अपने उक्त विविध पहलुओंके साथ विचारके लिये आपके सामने उपस्थित है ।

इतना ही नहीं, एक प्रश्न और आपसे हम पूछते हैं कि यदि आप कार्योत्पत्तिके विषयमें अपने उक्त सिद्धान्तकी सत्यतापर आस्था रखते हैं तो कार्य और उसकी साधनसामग्रीके विषयमें जो संकल्प, विकल्प और पुरुषार्थ आप किया करते हैं उन सबसे विरत होकर आप क्या अकर्मण्यताके साथ चुप होकर बैठनेके लिये तैयार हैं ? और यदि आप ऐसा करनेके लिये तैयार भी हो जावें तो क्या आपको विश्वास है कि आपका विवक्षित कार्य स्वतः ही समय आनेपर सम्पन्न हो जायगा ? तथा आपको यह भी क्या विश्वास है कि आप इस तरहकी प्रवृत्ति करनेपर लोकमें हँसीके पात्र नहीं होंगे ? यद्यपि आप कह सकते हैं कि लोक तो अज्ञानी हैं, तो यह बात हम भी मान सकते हैं कि उसके हँसनेकी आप चिन्ता नहीं करेंगे, परन्तु कम-से-कम कार्य-सम्पन्नता कैसे हो सकती है ? और वह होती है या नहीं, इत्यादि बातों पर तो आपको उस समय भी विचार करना ही होगा ।

‘उपादानके बलपर ही कार्य निष्पन्न होता है, निमित्त तो वहाँपर अकिंचित्कर ही रहा करता है’-अपनी इस मान्यताकी पुष्टि करते हुए आगे आपका लिखना यह है कि ‘कार्यकी उत्पत्तिमें केवल इतना मान लेना ही पर्याप्त नहीं है कि गेहूँसे ही गेहूँके अंकुर आदिकी उत्पत्ति होती है । प्रश्न यह है कि अपनी विवक्षित उपादानकी भूमिकाको प्राप्त हुए बिना केवल निमित्तके बलसे ही कोई गेहूँ अँकुरादि रूपसे परिणत होता है ।’

यद्यपि आपका यह लिखना सही है कि गेहूँसे ही गेहूँकी उत्पत्ति होती है-केवल ऐसा मान लेना कार्योत्पत्तिके लिये पर्याप्त नहीं है और यह बात भी सही है कि उपादानकी विवक्षित भूमिकाको प्राप्त हो जानेपर ही गेहूँकी अंकुर रूपसे उत्पत्ति हो सकती है, परन्तु आपके इस कथनमें हम अनुभव, तर्क और आगम प्रमाणके आधारपर इतना और जोड़ देना चाहते हैं कि विवक्षित उपादानभूत वस्तुको विवक्षित कार्यकी उत्पत्तिके लिये उसकी योग्यतानुसार विवक्षित भूमिका तक पहुँचना निमित्तोंके सहयोगपर ही आवश्यकता-नुसार निर्भर है-इस अनुभवपूर्ण स्थितिके आधार पर इस विषयमें हमारा दृष्टिकोण यह है और लोकमें प्रसिद्ध भी यह है कि कोई किसान बीजके लिये गेहूँकी आवश्यकता होनेपर उसकी खरीदी करनेके लिये बाजारमें जाता है और वह यह देखकर या समझकर कि अमुक गेहूँ अंकुररूपसे उत्पन्न होनेमें समर्थ है, उस गेहूँकी खरीदी कर लेता है । फिर वह किसान आगे कभी यह नहीं सोचता है कि खरीदा हुआ वह गेहूँ अंकुरादि रूपसे परिणत होनेकी अपनेमें विद्यमान योग्यताके अलावा किसी अन्य विलक्षण योग्यताको निश्चित समयपर अपने आप ग्रहण करके उपादानकी भूमिकामें पदार्पण करेगा और तब उससे अंकुरकी उत्पत्ति हो जायगी । उसके सामने तो जब उसने गेहूँको अंकुररूपसे उत्पन्न होनेके योग्य समझकर बाजारसे खरीद किया, तबसे केवल इतना ही संकल्प और विकल्प रहा करता है कि अंकुररूपसे उत्पन्न होनेके लिये यथायोग्य बाह्य साधन-सामग्रीके सहयोगसे उस गेहूँको अपने पुरुषार्थद्वारा उचित समयपर खेतमें बो दिया जावे । इस प्रकारके संकल्प और विकल्पके साथ एक ओर तो वह किसान उस गेहूँको खेतमें बोनेकी जितनी व्यवस्थायें आवश्यक हों उन्हें यथायोग्य तरीकों द्वारा सम्पन्न करता है तथा दूसरी ओर वह इस बातको भी ध्यानमें रखता है कि कहीं ऐसा न हो कि गेहूँ खर्च हो जावे या चोरी चला जावे अथवा ऐसी जगहपर न रक्खा जावे जहाँपर रखनेसे वह गेहूँ घुनकर या सड़कर अंकुररूपसे उत्पन्न होनेकी अपनी योग्यतासे वंचित हो जावे ।

किसानकी संकल्प, विकल्प और पुरुषार्थकी यह प्रक्रिया तबतक चालू रहती है ,जब तक उस गेहूँको यथावसर वह खेतमें बो नहीं देता है । इसके बाद भी गेहूँके अंकुररूपसे परिणमित होनेकी समस्या उसके सामने बनी ही रहती है, अतः वह उस समय भी गेहूँके अंकुरोत्पत्तिके अनुकूल पानी आदि प्राकृतिक और अप्राकृतिक साधनोंकी आवश्यकता या अनावश्यकताके विकल्पोंमें तबतक पड़ा रहता है जबतक कि उस गेहूँका परिणमन अंकुररूपसे नहीं हो जाता है ।

अब गेहूँसे अंकुरोत्पत्ति होनेके अनुकूल गेहूँकी प्रक्रियापर भी विचार कीजिये और गेहूँकी इस प्रक्रियापर जब विचार किया जाता है तो मालूम पड़ता है कि एक तरफ तो गेहूँसे अंकुरोत्पत्ति होनेके संकल्पपूर्वक किसान यथासंभव और यथायोग्य अपना तदनुकूल व्यापार चालू रखता है तथा दूसरी ओर किसानके उस व्यापारके सहयोगसे गेहूँमें भी यथासंभव विविध प्रकारकी परिणतियाँ सिलसिलेवार चालू हो जाती हैं जिन्हें गेहूँसे अंकुरोत्पत्तिके होनेमें उत्तरोत्तर क्रमसे आविर्भूत होनेवाली योग्यतायें भी कहा जा सकता है अर्थात् बाजारसे खरीदनेके बाद किसान उस गेहूँको सुरक्षाके लिहाजसे उचित समझकर जिस स्थानपर रखनेका पुरुषार्थ करता है गेहूँदेवताका किसानकी मर्जीके मुताबिक वहीं आसन जम जाता है । इसके अनन्तर किसान जब अनुकूल अवसर देखकर उस गेहूँको बोनेके लिये खेतपर ले जाना उपयुक्त समझता है या ले जानेका संकल्प करता है तो यथासम्भव जो भी साधन उस गेहूँको खेतपर ले जानेके लिए उस किसानको उस अवसर पर सुलभ रहते हैं, उन साधनों द्वारा एक ओर तो वह किसान उस गेहूँको खेतपर ले जानेरूप अपना पुरुषार्थ करता है और दूसरी ओर उस किसानके यथायोग्य अनुकूल उस पुरुषार्थके सहारेसे गेहूँदेवता भी खेतपर पहुँच जाते हैं । इस प्रक्रियामें भी किसान यदि गेहूँकी सुरक्षाके उपयुक्त साधन नहीं जुटाता है या नहीं जुटा पाता है तो उस सब गेहूँमेंसे कुछ दाने तो मार्गमें ही गिर जाते हैं कुछ दानोंको नौकर आदि भी चुरा लेता है, इस तरह कभी होते होते जितना गेहूँ शेष रह जाता है उसे वह किसान यथासम्भव प्राप्त ट्रेक्टर या हल आदि साधनों द्वारा बोनेरूप पुरुषार्थ स्वयं करता है या नौकर आदिसे बोनेरूप पुरुषार्थ करवाता है और तब उस किसान या उसके उस नौकरके पुरुषार्थके सहयोगसे वे गेहूँदेवता खेतके अन्दर समा जाते हैं ।

इस तरह गेहूँकी बुवाई हो जानेपर गेहूँके कोई-कोई दाने अपने अन्दर अंकुररूपसे उत्पन्न होनेको स्वाभाविक योग्यताका अभाव होनेसे तथा कोई-कोई दाने उक्त प्रकारकी योग्यताका अपने अन्दर सद्भाव रखते हुए भी बाह्य जलादि साधनोंके अनुकूल सहयोगका अभाव होनेसे अंकुररूपसे उत्पन्न होनेकी अवस्थासे वंचित रह जाते हैं, शेष उक्त प्रकारकी योग्यता सम्पन्न गेहूँ यथायोग्य बाह्य साधनोंकी मिली हुई अनुकूल सहायताके अनुसार अर्थात् कोई-कोई दाने तो अपने अन्दर पायी जानेवाली उक्त स्वाभाविक योग्यताकी समानता और असमानताके आधारपर तथा कोई-कोई दानें बाह्य साधनोंकी सहायताकी समानता और असमानताके आधारपर समान तथा असमानरूपसे अंकुर बनकर प्रगट हो जाते हैं । इस प्रकार आपके प्रश्नका उत्तर यह है कि गेहूँ अंकुरोपत्ति पर्यन्त उत्तरोत्तर किसानके व्यापारका सहयोग पाकर अपनी परिणतियाँ करता ही अन्तमें अंकुर बन जाता है । स्पष्टीकरणके रूपमें यहाँपर इस दृष्टान्तमें विचारना यह है कि गेहूँमें अंकुरोत्पत्तिकी विद्यमान योग्यता तो उसकी स्वाभाविक निजी सम्पत्ति थी, उसे किसानने उस गेहूँमें उत्पन्न नहीं किया और न उसके अभावमें केवल किसानके अनुकूल पुरुषार्थ द्वारा ही वह गेहूँ अंकुर बना, किन्तु गेहूँमें विद्यमान उक्त प्रकारकी योग्यताके सद्भावमें बाह्य साधन सामग्रीके सहयोगसे अपनी ऊपर बतलायी गयी पूर्व-पूर्व अवस्थाओंमेंसे गुजरता हुआ ही वह गेहूँ अंकुर बन सका । इतना ही नहीं, अंकुर बननेसे पूर्व और दूसरे प्रकारकी बहुत-सी या बहुत प्रकारकी योग्यताएँ उस गेहूँमें थीं जो अनुकूल बाह्य साधन सामग्रीके अभावमें विकसित अर्थात् कार्यरूपसे परिणत होनेसे रह गयीं या अपने-आप उनका उस गेहूँमें से खात्मा हो गया । जैसे उस सभी गेहूँमें पिसकर रोटी बननेकी भी योग्यता थी, उसमें घुनने या सड़ने आदिकी भी योग्यताएँ थीं जो अनुकूल बाह्य साधन सामग्रीका सहयोग अप्राप्त रहनेके कारण या तो विकसित होनेसे रह गयीं अथवा उनका यथायोग्यरूपसे खात्मा हो गया और गेहूँमें बहुतसे दानें भिन्न-भिन्न रूपमें प्राप्त बाह्य साधन सामग्रीकी सहायताके अनुरूप या तो पिस गये, मार्गमें गिर गये, घुन गये या सड़ गये; इस तरह वे दाने अंकुररूपसे उत्पन्न होनेसे वंचित रह गये । गेहूँके जिन दानोंकी अंकुररूप पर्याय बनी वह क्रमसे बनी तथा उसके बननेमें किसानको सिलसिलेवार कितना और कितने प्रकारका पुरुषार्थ करना पड़ा, यह सब प्रकट है । जैसे किसान गेहूँको बाजारसे खरीदकर घर ले गया, उसने उसकी घुनने, सड़ने अथवा पिसने आदिसे रक्षा की, खेतपर उसे ले गया और अन्तमें बोनेका भी पुरुषार्थ किया तब गेहूँकी बुवाई हो सकी और तब बादमें वह अंकुरके रूपको धारण कर सका । इस अनुभवमें उतरनेवाली कार्यकारणभावकी पद्धतिकी अपेक्षा करके आपके द्वारा इस प्रकारका प्रतिपादन किया जाना कि-गेहूँ अपने विवक्षित उपादानकी भूमिकाको अपने आप प्राप्त करता हुआ ही अंकुरादिरूप परिणत होता है-बिल्कुल निराधार है ।

इस विषयमें आगम प्रमाण भी देखिए-

स्वपरप्रत्ययोत्पादविगमपर्यायैः द्रूयन्ते, द्रवन्ति वा तानीति द्रव्याणि·······द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव-लक्षणो बाह्यः प्रत्ययः परप्रत्ययः, तस्मिन् सत्यपि स्वयमतत्परिणामोऽर्थो न पर्यायान्तरमास्कन्दतीति तत्समर्थः स्वश्च प्रत्ययः, तावुभौ संभूय भावनां उत्पादविगमयोः हेतू भवतः, नान्यतरापाये कुशूलस्थमाषपच्यमानोदकस्थघोटकमाषवत् ।-राजवार्तिक अध्याय ५ सूत्र २

इसका भाव यह है कि स्व ( उपादान ) और पर कारण ( निमित्तभूत अन्य पदार्थ ) द्वारा होनेवाली उत्पाद-व्ययरूप पर्यायोंसे जो बहता है या उन पर्यायोंको जो बहाता है उसे द्रव्य कहते हैं······द्रव्य क्षेत्र काल भावरूप बाह्य कारण परप्रत्यय है, उसके होते हुए भी स्वयं उस रूपसे अपरिणमनशील पदार्थ पर्यायान्तरको नहीं प्राप्त होता है । उस पर्यायान्तर रूपसे परिणत होनेमें समर्थ स्वप्रत्यय है । वे दोनों ( स्व और पर ) प्रत्यय यानी उपादान और निमित्तकारण मिलकर पदार्थोंके उत्पाद और व्ययके हेतु होते हैं। उन दोनों कारणोंमेंसे किसी एक भी कारणके अभावमें उस पर्यायरूप उत्पाद-व्यय नहीं होते हैं। जिस प्रकार कि कोठीमें रक्खा उड़द जलादि बाह्य निमित्त सामग्रीके अभावमें नहीं पकता है और इसी तरह उबलते हुए पानीमें पड़ा हुआ घोटक ( कोडरू ) उड़द ( पकनेकी उपादान शक्तिके अभावमें ) नहीं पकता है।

इस प्रकरणमें एक अन्य दृष्टान्त घड़ेका भी ले लीजिए-खानमें बहुत-सी ऐसी मिट्टी पड़ी हुई है, जिसमें आगमके अविरोधपूर्वक हमारे दृष्टिकोणके अनुसार घड़ा, सकोरा आदि विविध प्रकारके निर्माणकी अनेक योग्यताऐं एक साथ ही विद्यमान हैं, कुम्हार भी हमारे समान ही अपना दृष्टिकोण रखते हुए खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीमेंसे अपनी आवश्यकताके अनुसार कुछ मिट्टी बिना किसी भेदभावके घर ले आता है। इसके बाद उसके मनमें कभी यह कल्पना नहीं होती कि इस लायी हुई मिट्टीमेंसे अमुक मिट्टीसे तो घड़ा ही बनेगा और अमुक मिट्टीसे सकोरा ही बनेगा, वह तो इस प्रकारके विकल्पोंसे रहित होकर ही उस सम्पूर्ण मिट्टीको घड़ा, सकोरा आदि विविध प्रकारके आवश्यक एवं संभव सभी कार्योंके निर्माण योग्य समानरूपसे तैयार करता है और तैयार हो जाने पर वह कुम्हार अपनी आवश्यकता या आकांक्षाके अनुसार उस मिट्टीसे बिना किसी भेदभावके घड़ा, सकोरा आदि विविध प्रकारके कार्योंका निर्माण कभी भी अपनी सुविधानुसार कर डालता है। उसे ऐसा विकल्प भी कभी नहीं होता कि उस तैयार की गयी मिट्टीसे घड़ेका या सकोरा आदिका निर्माण जब होना होगा तब हो ही जायगा।

यह ठीक है कि मिट्टीमें घड़ा, सकोरा आदि बननेकी यदि योग्यता होगी तो ही उससे घड़ा, सकोरा आदि बनेंगे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जिस मिट्टीमें घड़ा बननेकी योग्यता है उसमें सकोरा आदि बननेकी योग्यताका अभाव रहेगा। योग्यताऐं तो उस मिट्टीमें यथासंभव सभी प्रकारकी रहेंगी, लेकिन कार्य वही होगा जिसके लिये वह कुम्हार आवश्यकताके अनुसार अपनी आकांक्षा, ज्ञान और श्रमशक्तिके आधार पर अपना व्यापार चालू करेगा।

यह भी ठीक है कि यदि कुम्हार घड़ेके लिये अपना व्यापार चालू करता है तो घड़ा बननेसे पहले उस मिट्टीकी उस कुम्हारके व्यापारका अनुकूल सहयोग पाकर क्रमसे पिण्ड, स्थास, कोश और कुशूल पर्यायें अवश्य होंगी, यह कभी नहीं होगा कि पिण्डादि उक्त पर्यायोंके अभावमें ही अथवा इन पर्यायोंकी उत्पत्ति परिवर्तित क्रमसे होकर भी मिट्टी घड़ा बन जायगी। इस तरह इस अनुभवगम्य बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिये कि यदि कुम्हार खानमें पड़ी हुई मिट्टीको अपने घर लानेरूप अपना व्यापार नहीं करेगा, तदनन्तर उसको घट निर्माणके अनुकूल तैयार नहीं करेगा और इसके भी अनन्तर वह उसको क्रमसे होनेवाली पिण्ड, स्थास, कोश, कुशूल तथा घटरूप पर्यायोंके विकासमें अपने पुरुषार्थका अनुकूलरूपसे योगदान नहीं करेगा तो वह मिट्टी त्रिकालमें घड़ा नहीं बन सकेगी।

हमारी समझमें यह बात बिल्कुल नहीं आ रही है कि प्रत्यक्षदृष्ट, तर्कसंगत और आगमप्रसिद्ध एवं आपके द्वारा स्वयं प्रयुक्त की जानेवाली कार्यकारणभावकी हमारे द्वारा प्रतिपादित उक्त व्यवस्थाकी उपेक्षा करके प्रत्यक्षविरुद्ध, तर्कविरुद्ध, आगमविरुद्ध तथा अपनी स्वयंकी प्रवृत्तियोंके विरुद्ध कार्यकारणभावके प्रतिपादनमें आप क्यों संलग्न हो रहे हैं ?

हमारे द्वारा प्रतिपादित कार्यकारणभावकी उक्त व्यवस्थाको प्रत्यक्षदृष्ट और आपके द्वारा प्रतिपादित कार्यकारणभावकी व्यवस्थाको प्रत्यक्षविरुद्ध इसलिये हम कह सकते हैं कि घड़ेका निर्माण कार्य कुम्हारके व्यापार-पूर्वक मिट्टीमें होता हुआ देखा जाता है । हमारे द्वारा प्रतिपादित वह व्यवस्था तर्कसंगत और आपके द्वारा प्रतिपादित वह व्यवस्था तर्कविरुद्ध भी इसलिये है कि जब तक कुम्हारका व्यापार घड़ेके निर्माणके अनुरूप होता जाता है तब तक तो घड़ेका निर्माण कार्य भी होता ही जाता है लेकिन यदि कुम्हार अपने इस व्यापारको बन्द कर देता है तो घड़ेका निर्माण कार्य भी उसी क्षण बन्द हो जाता है-इस तरह घटनिर्माणके साथ कुम्हारके व्यापारका अन्वय-व्यतिरेक निर्णीत होता है । हमारे द्वारा प्रतिपादित और आपके द्वारा प्रतिपादित कार्यकारणभाव व्यवस्थाकी क्रमशः आगमप्रसिद्धता और आगमविरुद्धताके विषयमें भी यह बात कही जा सकती है कि हम ऊपर जो प्रमाण आगमके दे आये हैं उनसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कार्यकारणव्यवस्थामें जितनी उपयोगिता उपादान कारणकी है उतनी ही उपयोगिता निमित्तकारणकी भी है, इसलिए जिस प्रकार उपादानोपादेयभाव वास्तविक है उसी प्रकार निमित्तनैमित्तिकभाव भी वास्तविक है । उपचरित अर्थात् कल्पनारोपित या अकिंचित्कर नहीं है । इसलिये हमारे द्वारा प्रतिपादित कार्यकारणभाव-व्यवस्था आगम प्रतिपादित है-ऐसा प्रत्यक्ष है ।

यद्यपि आपने भी अपने द्वारा मान्य कार्यकारणव्यवस्थाके समर्थनमें आगमके प्रमाण दिये हैं, परन्तु हमें दुःखके साथ कहना पड़ता है कि उनका अर्थ भ्रमवश अथवा जानबूझकर आप गलत ही कर रहे हैं, जैसा कि हमने स्थान-स्थान पर सिद्ध किया है, सिद्ध करते जा रहे हैं और सिद्ध करते जावेंगे । इसलिये हमें कहना पड़ता है कि निमित्तनैमित्तिकभावकी कल्पनारोपितताकी सिद्धिके लिये आगममें एक भी प्रमाण उपलब्ध न होनेके कारण आपके द्वारा प्रतिपादित कार्यकारणभावव्यवस्था आगमविरुद्ध भी है । इसी प्रकार आपके द्वारा प्रतिपादित कार्यकारणभावकी व्यवस्था आपकी स्वयंकी प्रवृत्तियोंके भी विरुद्ध है-ऐसा हमें तो कमसे कम दिख ही रहा है, आपको स्वयं भी इसी तरहका भान होता है या नहीं, यह आप जानें, परन्तु हमारे द्वारा प्रतिपादित आगमव्यवस्था हमारी, आपकी और लोकमात्रकी प्रवृत्तियोंसे अविरुद्ध ही है ऐसा हम जानते हैं ।

आगे आपने राजवार्तिकके कथनका प्रमाण देकर यह सिद्ध करनेका प्रयास किया है कि ‘जब कोई भी द्रव्य अपने विवक्षित कार्यके सन्मुख होता है तभी अनुकूल अन्य द्रव्योंकी पर्यायें उसकी उत्पत्तिमें निमित्तमात्र होती हैं ।’ राजवार्तिकका वह कथन निम्न प्रकार है-

यथा मृदः स्वयमन्तर्घटभवनपरिणामाभिमुख्ये दण्ड-चक्र-पौरुषेयप्रयत्नादि निमित्तमात्रं भवति, यतः सत्स्वपि दण्डादिनिमित्तेषु शंकरादिप्रचितो मृत्पिण्डः स्वयमन्तर्घटभवनपरिणामनिरुत्सुकत्वान्न घटीभवति, अतः मृत्पिण्ड एव बाह्यदण्डादिनिमित्तसापेक्ष आभ्यन्तरपरिणामसानिध्याद् घटो भवति न दण्डादय इति दण्डादि निमित्तमात्रं भवति ।-अ० १ सू० २०

इसका जो हिन्दी अनुवाद आपने किया है उसका विरोध न करते हुए भी हमें कहना पड़ता है कि राजवार्तिकका यह कथन आपके एकान्त पक्षका समर्थन करनेमें विल्कुल असमर्थ है ।

आपका पक्ष जिसे आपने स्वयं ही अपने शब्दोंमें निबद्ध किया है-यह है कि ‘न तो सब प्रकारको मिट्टी ही घटका उपादान है और न ही पिण्ड, स्थास, कोश और कुशूलादि पर्यायोंकी अवस्थारूपसे परिणत मिट्टी घटका उपादान है, किन्तु जो मिट्टी अनन्तर समयमें घट पर्यायरूपसे परिणत होनेवाली है मात्र वही मिट्टी घटका उपादान है ।’ आगे आपने लिखा है कि ‘मिट्टीकी ऐसी अवस्थाके प्राप्त होने पर वह नियमसे घटका उपादान बनती है ।’

इस कथनके आधार पर कार्यकारणभावके विषयमें आपका यह सिद्धान्त फलित होता है कि कार्योत्पत्तिक्षणसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्याय विशिष्ट वस्तु ही कार्यके प्रति उपादान होती है और जो वस्तु इस तरह उपादान बन जाती है उससे नियमसे कार्य उत्पन्न हो जाता है। इसी प्रकार उस समय जो अनुकूल वस्तुएँ वहाँ पर हाजिर रहती हैं उनमें निमित्तताका व्यवहार तो होता है, परन्तु कार्यकी उत्पत्तिमें सहायक वस्तुका अभाव अथवा कार्योत्पत्तिमें बाधा पहुँचानेवाली किसी भी वस्तुका सद्भाव उस समय वहाँ पर पाया जाना असंभव ही समझना चाहिये।

आपके इस मन्तव्यके विषयमें सर्व प्रथम तो हम यही सिद्ध करना चाहते हैं कि आपके द्वारा कार्यकारणभावव्यवस्थाके रूपमें ऊपर जो अपना अभिप्राय प्रगट किया गया है उसका समर्थन राजवार्तिकके उपर्युक्त कथनसे नहीं होता है, क्योंकि राजवार्तिकके उल्लिखित कथनसे तो केवल इतनी ही बात सिद्ध होती है कि यदि मिट्टीमें घटरूपसे परिणमन करनेकी योग्यता हो तो दण्ड, चक्र और कुम्हारका पुरुषार्थ आदि घट निर्माणमें मिट्टीके वास्तविक रूपमें सहायकमात्र हो सकते हैं और यदि मिट्टीमें घटरूपसे परिणत होनेकी योग्यता विद्यमान न हो तो निश्चित है कि दण्ड, चक्र और कुम्हारका पुरुषार्थ आदि उस मिट्टीको घट नहीं बना सकते हैं अर्थात् उक्त दण्ड, चक्र आदि मिट्टीमें घट निर्माणकी योग्यताको कदापि उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। दूसरी बात राजवार्तिकके उक्त कथनसे यह सिद्ध होती है कि दण्डादि स्वयं कभी घटरूप परिणत नहीं होते हैं। इतना अवश्य है कि यदि दण्डादि अनुकूल निमित्त सामग्रीका सहयोग मिल जावे तो मिट्टी ही उनकी सहायतासे घटरूप परिणत होती है। इसका भी आशय यह है कि यदि मिट्टीके लिये उसके घटरूप परिणमनमें सहायता प्राप्त नहीं होगी तो मिट्टी अपने अन्दर योग्यता रखते हुए भी कदापि घटरूप परिणत नहीं हो सकेगी।

इस प्रकार राजवार्तिकके उपर्युक्त कथनसे यह निष्कर्ष कदापि नहीं निकाला जा सकता है कि मिट्टी जब घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें पहुँच जाती है तभी वह घटका उपादान बनती है और न यह निष्कर्ष ही निकाला जा सकता है कि उससे पहले जब तक वह खानमें पड़ी रहती है या कुम्हार उसे अपने घरपर ले आता है अथवा वही मिट्टी जब घट-निर्माणके अनुकूल उत्तरोत्तर पिण्ड, स्थास, कोश और कुशूल आदि अवस्थाओंको भी प्राप्त होती जाती है तो इन सब अवस्थाओंमेंसे किसी भी अवस्थामें वह मिट्टी घटका उपादान नहीं मानी जा सकती है। इसी प्रकार राजवार्तिकके उक्त कथनसे वह भी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है-कि मिट्टी जब घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें पहुँच जाती है तो उससे घटोत्पत्तिरूप कार्य नियमसे ही हो जाता है।

यदि कहा जाय कि राजवार्तिकके उक्त कथनमें ‘यथा मृदः स्वयमन्तर्घटभवनपरिणामाभिमुख्ये’ यहाँपर ‘आभिमुख्य’ शब्द पड़ा हुआ है तथा आगे इसी कथनमें ‘शर्करादिप्रचितो मृत्पिण्डः स्वयमन्तर्घटभवनपरिणामनिरुत्सुकत्वात्’ यहाँपर ‘निरुत्सुकत्व’ शब्द पड़ा हुआ है। ये दोनों ही शब्द इस बातका संकेत दे रहे हैं कि ‘वस्तुकी जिस पर्यायके अनन्तर कार्य नियमसे निष्पन्न हो जावे उसे ही उपादान कारण कहना चाहिये और इस तरह ऐसा उपादानकारण घटकी सम्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायके अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्याय ही हो सकती है, क्योंकि यह पर्याय ही ऐसी पर्याय है जिसके अनन्तर समयमें कार्योत्पत्ति होनेमें न तो कोई कमी रह जायगी और न किसी प्रकारकी बाधा खड़ी होनेकी संभावना भी वहाँ रह जायगी, अतः उस अवसरपर कार्योत्पत्ति नियमसे होगी। इसके अतिरिक्त मिट्टीकी कोई भी पर्याय घट-कार्यके प्रति उपादान नहीं कही जा सकती है। कारण कि उन पर्यायोंमें दूसरी पर्यायोंका व्यवधान कार्योत्पत्तिके लिये पड़ जाता है और जब कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायको ही उपादान संज्ञा प्राप्त होती है तो फिर कोई कारण नहीं कि उससे कार्य उत्पन्न न हो, क्योंकि अन्यथा उसकी उपादान संज्ञा ही व्यर्थ हो जायगी, इसलिये उस पर्यायके अनन्तर नियमसे कार्यकी उत्पत्ति होती है यह मानना उचित है। दूसरी बात यह है कि यदि उस समय भी किसी सबबसे कार्योत्पत्ति रुक सकती है तो वस्तुके परिणामी स्वभावकी जैन संस्कृतिकी मान्यता ही समाप्त हो जायगी।’

आपका यदि यह अभिप्राय है तो इस विषयमें हमारा कहना यह है कि राजवार्तिकके उक्त कथनमें पठित ‘आभिमुख्य’ शब्द सामान्य रूपसे घट-निर्माणकी योग्यताके सद्भावका ही सूचक है। इसी तरह उसमें ‘निरुत्सुकत्व’ शब्द भी सामान्यरूपसे घट-निर्माणकी योग्यताके अभावका ही सूचक है। यही कारण है कि घटोत्पत्ति होनेकी योग्यताके अभावमें कार्योत्पत्तिके अभावकी सिद्धिके लिये राजवार्तिकके उक्त कथनमें ‘शर्करादिप्रचितो मृत्पिडः’ पद द्वारा बालुका मिश्रित मिट्टीका उदाहरण श्रीमदकलंकदेवने दिया है। यदि उनकी दृष्टिमें यह बात होती कि उपादानकारणता तो केवल उत्तर क्षणवर्ती कार्यरूप पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें ही होती है और उससे कार्य भी नियमसे हो जाता है तो फिर उन्हें (श्रीमदकलंकदेवको) घट-निर्माणकी योग्यतारहित बालुकामिश्रित मिट्टीका उदाहरण न देकर कार्योत्पत्तिसे सान्तरपूर्ववर्ती द्वितीयादि क्षणोंकी पर्यायोंमें कथंचित् रहनेवाली घट-निर्माणकी योग्यतासंपन्न मिट्टीका ही उदाहरण देना चाहिये था, लेकिन चूँकि श्रीमदकलंकदेवने बालुकामिश्रित मिट्टीका ही उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसमें कि घट-निर्माणकी योग्यताका सर्वथा ही अभाव पाया जाता है तो इससे यही मानना होगा कि राजवार्तिकके उक्त कथनमें जो ‘आभिमुख्य’ शब्द पड़ा हुआ है उसका अर्थ घट-निर्माणकी सामान्य योग्यताका सद्भाव ही सही है। इसी प्रकार उसी कथनमें पड़े हुए ‘निरुत्सुकत्व’ शब्दका अर्थ घट-निर्माणकी सामान्य योग्यताका अभाव ही सही है। इस प्रकार जैसे आप उत्तर क्षणवर्ती कार्यरूप पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें कार्यकी उपादानता स्वीकार करते हैं उसी प्रकार खानमें पड़ी अथवा खानसे कुम्हार द्वारा घर लायी गयी मिट्टीमें तथा कुम्हारके व्यापारका सहयोग पाकर निर्मित हुए मिट्टीके पिण्ड, स्थास, कोश और कुशूलादिमें भी उपादानताका सद्भाव सिद्ध हो जाता है और यह बात तो हम पहले भी कह चुके हैं कि यदि मिट्टीमें खानकी अवस्थासे लेकर कुशूलपर्यन्त या इससे भी और आगे-जहाँतक कार्यकारणभावकी कल्पना की जा सके-की अवस्थाओंमें यदि घट-निर्माणकी उपादानकारणता नहीं रहती है तो फिर कुम्हारका घट-निर्माणके उद्देश्यसे मिट्टीका खानसे घर लाना तथा उसके पिण्ड, स्थास, कोश और कुशूलादि पर्यायोंके निर्माणके अनुकूल व्यापार करना यह सब मूर्खताका ही कार्य समझा जायगा।

तात्पर्य यह है कि मिट्टीकी इन सब अवस्थाओंके निर्माणमें कुम्हार जो व्यापार करता है वह सब उससे ( मिट्टीसे ) घट-निर्माणको लक्ष्यमें रखकर बुद्धिपूर्वक ही करता है और प्रत्यक्षमें देखा भी जाता है कि खानसे कुम्हारके द्वारा लायी गयी मिट्टी ही पहले पिण्डका रूप धारण करती है, पिण्ड स्थासका रूप धारण करता है, स्थास कोशका रूप धारण करता है और कोश कुशूलका रूप धारण करते हुए अन्तमें उसका वह कुशूलरूप ही कुम्हार चक्र आदिकी सहायतासे घड़ेके रूपमें परिणत हो जाया करता है, इसलिये क्षणिक पर्यायोंके रूपमें घट-निर्माणरूप कार्यका विभाजन करके यदि घट-निर्माणकी अन्तिम पर्यायमें अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायको घटका उपादान कहा जा सकता है तो उसी घट-निर्माणको यदि पिण्ड, स्थास, कोश कुशूल और घटरूप स्थूल पर्यायोंमें विभाजित किया जाय तो उस हालतमें घटरूप स्थूल पर्यायसे अव्यवहित पूर्वमें रहनेवाली स्थूल कुशूल पर्यायको घटका उपादान माननेमें कुछ आपत्ति नहीं आती है। इसी प्रकार घट-निर्माणको यदि पिण्ड, स्थास, कोश, कुशूल और घटरूप पर्यायोंमें विभाजित न करके इन सब पर्यायोंको ही केवल अखण्ड एक घट-निर्माण कार्य मान लिया जाय तो उस हालतमें मिट्टीकी ही तो घटरूप पर्याय बनती है, अतः तब मिट्टीको भी घटका उपादान कहना असंगत नहीं है।

जिस प्रकार काल द्रव्यकी क्षणवर्ती पर्याय समय कहलाती है और घड़ी, घण्टा, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास, वर्ष आदि भी कालकी यथासम्भव संख्यात और असंख्यात समयरूप पर्यायोंके अखण्ड पिण्डस्वरूप ही तो माने जा सकते हैं। इस तरह जैसे समयके बाद समय, इसके अनन्तर दिनके बाद दिन, इसके अनन्तर सप्ताहके बाद सप्ताह, इसके अनन्तर पक्षके बाद पक्ष, इसके अनन्तर मासके बाद मास और इसके भी अनन्तर वर्षके बाद वर्ष आदिका व्यवहार कालमें किया जाता है और वह सब समयके समान ही वास्तविक कहलाता है वैसे ही मिट्टीकी यथासम्भव असंख्यात क्षणिक पर्यायोंके समूहरूप पिण्ड पर्यायके निर्माणके बाद असंख्यात क्षणिक पर्यायोंके समूहरूप स्थास पर्यायका निर्माण, इस स्थास पर्यायके निर्माणके बाद असंख्यात क्षणिक पर्यायोंके समूहरूप कोश पर्यायका निर्माण, इस कोश पर्यायके निर्माणके बाद असंख्यात क्षणिक पर्यायोंके समूहरूप कुशूल पर्यायका निर्माण और इस कुशूल पर्यायके निर्माणके बाद असंख्यात क्षणिक पर्यायोंके समूहरूप घट पर्यायका निर्माण स्वीकार करके घट पर्यायकी अव्यवहित पूर्व पर्यायरूप कुशूलको घट पर्यायका उपादान, कुशूल पर्यायकी अव्यवहित पूर्व पर्यायरूप कोशको कुशूल पर्यायका उपादान, कोशकी अव्यवहित पूर्व पर्यायरूप स्थासको कोष पर्यायका उपादान, स्थासकी अव्यवहित पूर्व पर्यायरूप पिण्डको स्थास पर्यायका उपादान तथा पिण्डकी अव्यवहित पूर्व पर्यायरूप मिट्टीको पिण्ड पर्यायका उपादान मानना असंगत नहीं है। क्या आप क्षणिक पर्यायको ग्रहण करनेवाले ऋजुसूत्र नयको और उस पर्यायके आश्रयभूत कालकी पर्यायरूप क्षणको वास्तविक माननेको तैयार हैं? यदि हाँ, तो हमें प्रसन्नता होगी, और क्या क्षणिक पर्यायोंके उत्तरोत्तर वृद्धिगत समूहोंको ग्रहण करनेवाले व्यवहार, संग्रह तथा नैगम नयोंको तथा क्षणिक पर्यायोंके इन समूहोंके आश्रयभूत कालके घड़ी, घण्टा, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्ष आदि भेदोंको आप अवास्तविक ही मान लेना चाहते हैं? यदि हाँ, तो समय और समयके समूहोंमें तथा क्षणिक पर्यायों और इन पर्यायोंके समूहोंमें वास्तविकता और अवास्तविकताका यह वैषम्य कैसा? और यदि समय और तदाश्रित वस्तुकी क्षणिक पर्यायको भी व्यवहारनयका विषय होनेके कारण अवास्तविक अर्थात् उपचरित या कल्पनारोपित ही मान लेना चाहते हैं तो फिर आपके मतसे क्षणिक पर्यायोंके आधारपर उपादानोपादेयभावकी वास्तविकता कैसे संगत हो सकती है? इन सब बातोंपर आप निर्द्वन्द मस्तिष्कसे विचार कीजिए। इसी प्रकार व्यवहारनयको विषयभूत यदि क्षणिक पर्यायों और उनके आश्रयभूत कालके अखण्ड क्षणोंको आप वास्तविक ही मानते हैं तो व्यवहारको फिर अवास्तविक, उपचरित या कल्पनारोपित कैसे माना जा सकता है? इसपर भी ध्यान दीजिए।

एक बात और भी विचारणीय है कि मतिज्ञान और श्रुतज्ञान, क्षायोपशमिक होनेके कारण किसी भी वस्तुकी समयवर्ती अखण्ड पर्यायको ग्रहण करनेमें सर्वथा असमर्थ ही रहा करते हैं। इन ज्ञानोंका विषय वस्तुकी कमसे-कम अन्तर्मुहूर्तवर्ती पर्यायोंका समूह ही एक पर्यायके रूपमें होता है, इस प्रकार इन ज्ञानोंकी अपेक्षा मिट्टी, पिण्ड, स्थास, कोश, कुशूल और घटमें उपादानोपादेयव्यवस्था असंगत नहीं मानी जा सकती है।

केवलज्ञान वस्तुकी समयवर्ती पर्यायको विभक्त करके जानता है ऐसा आप मानते हैं। लेकिन यहाँपर यह प्रश्न तो आपके सामने खड़ा ही हुआ है कि व्यवहाररूप होनेके कारण वह पर्याय आपके मतसे अवास्तविक, उपचरित एवं कल्पनारोपित अतएव अवस्तुभूत है, इसलिए वह पर्याय आकाशकुसुम तथा खरविषाणके समान, केवलज्ञानका विषय कैसे हो सकती है ? और जब क्षणिक पर्यायको केवलज्ञानी जानता है तो उसकी अवास्तविकता समाप्त हो जानेके कारण व्यवहारविषयक आपका सिद्धान्त स्वयं खण्डित हो जाता है । फिर विचार तो कीजिये कि मिट्टी अपने-आप उपस्थित होनेवाले बाह्य कारणोंके सहयोगसे भी यदि प्रतिसमय अपना रूप बदलती है और उस मिट्टीकी उसरूप बदलाहटमें मति-श्रुतज्ञानियोंके लिए आगे चलकर जो विलक्षणताका भान होने लगता है-विलक्षणताका वह भान-उस रूप बदलाहटके कार्यकारणभावको खोजनेके लिए उनको ( मति-श्रुतज्ञानियोंको ) प्रेरित करता है । यहाँ पर रूप बदलाहटमें आनेवाली विलक्षणताका एक अनुभवपूर्ण उदाहरण यह दिया जा सकता है कि कोई एकदम जो क्रोधसे लोभादि कषायरूप व्यापार करने लगता है इसका कारण तो खोजना चाहिए कि परिवर्तनमें यह विलक्षणता एकदम कैसे आ गयी ? इसी तरह जीवकी मिथ्यात्व पर्यायसे एकदम सम्यक्त्व पर्याय कैसे हो गयी ? विचार करनेसे ज्ञात होता है कि ये सभी विलक्षणताएँ निमित्त कारणोंसे होती हैं । इस तरह यह तो हुई क्षणिक पर्यायोंकी बात, लेकिन जब हम स्थूल विलक्षणताओंपर विचार करते हैं तो मालूम पड़ता है कि वह मिट्टी जो समान और असमान पर्यायोंके रूपमें प्रति समय बदलती चली आ रही है वह यकायक पिण्डरूप स्थूल विलक्षणताको अपने-आप उन क्षणिक पर्यायोंके चालू परिवर्तनके बलपर कैसे प्राप्त हो जाती है ? केवल इतना कह देनेसे तो काम नहीं चल सकता है कि मिट्टीकी पिण्डरूप इस विलक्षण बदलाहटको इस रूपमें केवली भगवानने देखा है और जब कि हम इस विलक्षण बदलाहटको कुम्हारके व्यापार आदि साधनों द्वारा होती हुई देख रहे हैं तथा तर्कसे और आगमसे उसकी पुष्टि भी पा रहे हैं तो ऐसी स्थितिमें केवल इस प्रकारका प्रतिपादान करना कि मिट्टीकी अमुक समयपर पिण्डरूप पर्याय होना नियत था, केवली भगवानने पहलेसे ही ऐसा देख रक्खा है, उससे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्याय ही उसमें उपादान कारण है तथा इस प्रकारका प्रतिपादन करना कि निमित्त कारणकी उसमें कुछ उपयोगिता नहीं है आदि कहाँतक बुद्धिगम्य हो सकता है यह आप जानें ।

इस प्रकार राजवार्तिकका ‘यथा मृदः’ इत्यादि कथन न केवल आपकी कार्यकारणभाव व्यवस्था सम्बन्धी मान्यताकी पुष्टि नहीं करता है, बल्कि मति-श्रुतज्ञानियोंके अनुभव, प्रत्यक्ष और तर्कसे तथा आगमके अन्य प्रमाणोंसे-जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है-उसका ( आपकी कार्यकारणव्यवस्था सम्बन्धी मान्यताका ) खण्डन होता है ।

थोड़ा इस तरफ भी विचार कीजिये कि अव्यवहित उत्तर क्षणवर्ती पर्यायके प्रति अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायविशिष्ट वस्तुको जब आप उपादान कारण माननेके लिए तैयार हैं और यह भी मानते ही हैं कि उस अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायसे उस अव्यवहित उत्तर क्षणवर्ती पर्यायकी उत्पत्ति नियमसे होती ही है तो कार्यकारणभावकी यह व्यवस्था तो पूर्व-पूर्वकी अनेक क्षणिक पर्यायोंके समूहरूप कुशूल, कोश, स्थास, पिण्ड और कुम्हार द्वारा खानसे लायी हुई अथवा अन्तमें खानमें पड़ी हुई मिट्टी तककी एकके पूर्व एकके रूपमें विभाजित सभी क्षणिक पर्यायोंमें भी लागू होगी । ऐसी स्थितिमें खानकी मिट्टीमें अथवा खानसे कुम्हार द्वारा लायी गयी मिट्टीमें तथा पिण्ड, स्थास, कोश और कुशूलरूप मिट्टीकी अवस्थामें घटके अनुरूप नियमित कारणताका निषेध कैसे किया जा सकता है ? अर्थात् घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती कार्यरूप पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्याय यदि आपके मतमें नियमसे घटको उत्पन्न करनेवाली है तो उक्त कार्यरूप इस पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती इस कारणरूप पर्यायको इससे भी अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्याय नियमसे ही उत्पन्न करेगी, इस तरह कार्यकारणभावकी यह पूर्व परंपरा नियमितपनेके आधारपर ही कुशूल, कोश, स्थास, पिण्ड और अन्तमें खानकी मिट्टीतक पहुँच जायगी । इस प्रकार आपको मान्य ‘उपादान कारण वही है जिससे नियमसे कार्य उत्पन्न हो जावे’ उपादान-कारणका यह लक्षण जिस प्रकार आपके मतसे घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें घटित होता है उसी प्रकार घट-कार्यकी अनुकूलताको प्राप्त मिट्टीकी उक्त सभी पर्यायोंमें भी आपके मतसे घटित हो जाता है। इस तरह आपके मतानुसार भी मिट्टीकी सामान्यरूप अवस्थाको तथा घट-निर्माणके उद्देश्यसे कुम्हार द्वारा निर्मित पिण्डादिरूप अवस्थाओंको घट-कार्यके प्रति उपादान कारण मान लेनेमें कोई वाधा नहीं रह जाती है। इतना ही नहीं, घट-निर्माणको योग्यताको प्राप्त मिट्टीकी आदि अवस्थाको प्राप्त परमाणुरूप द्रव्योंमें अनादि कालसे ही यह व्यवस्था आपके मतानुसार स्वीकार करनी होगी, लेकिन इससे जो अव्यवस्था पैदा होगी, वह यह कि प्रत्येक परमाणुरूप द्रव्यमें परिणमनकी ही योग्यता तथा उनका परिणमन एक ही रूप स्वीकार करना होगा जो कि जैनदर्शनकी व्यवस्था तथा आगमके स्पष्ट विरुद्ध पड़ता है ।

पंचास्तिकाय गाथा ७८ की आचार्य अमृतचन्द्रकी टीकामें लिखा है-

पृथिव्यप्तेजोवायुरूपस्य धातुचतुष्कस्य एक एव परमाणुः कारणम् ।

अर्थ-पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों धातुओंका एक ही परमाणु कारण होता है ।

गाथामें इस वातको स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार किया गया है। इस तरह आपकी मान्यतामें आगमका विरोध स्पष्ट है।

इस अव्यवस्थाको नहीं होने देनेका यही एक उपाय है कि आप अपने द्वारा मान्य सदोष कार्यकारण-भाव व्यवस्थाको वदलकर हमारे द्वारा स्वीकृत आगमसम्मत व्यवस्थाको स्वीकार कर लें।

यदि कहा जाय कि जिस प्रकार घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायका उससे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायके साथ कार्यकारणभावका नियम बनता है वैसा नियम उस अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायसे पूर्वकी पर्यायोंके साथ घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायका नहीं बन सकता है तो इसपर हम आपसे पूछना चाहेंगे कि जब आपके मतसे क्रमनियमित पर्यायोंके मध्य अव्यवहित पूर्वोत्तर क्षणवर्ती पर्यायोंमें नियमित कार्यकारणभाव विद्यमान है तो आपके इस मतमें यह कदापि नहीं कहा जा सकता है कि जैसा कार्यकारण-भावका नियम घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायका उससे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायके साथ बनता है वैसा उससे पूर्ववर्ती पर्यायोंके साथ नहीं बन सकता है ।

यदि फिर भी कहा जाय कि कार्यरूप पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें ऐसी सामर्थ्य प्रगट हो जाती है कि उससे अनन्तर क्षणमें ही कार्य उत्पन्न हो जाता है ।

तो इसपर भी यह प्रश्न उठ सकता है कि यह सामर्थ्य क्या है ? और इसकी उत्पत्तिका कारण भी क्या है ? यदि आप इसके उत्तरमें यह कहें कि कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें स्वभावरूपसे पाया जाने-वाला कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्तीपना ही वह सामर्थ्य है जो अनन्तर समयमें नियमसे कार्यको पैदा कर देती है, तो यह मान्यता इसलिए गलत है कि कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें जो कार्याव्यवहित पूर्व क्षण-वर्तित्वरूप धर्म पाया जाता है वह स्वभावसे उत्पन्न हुआ नहीं है, किन्तु वह तो कार्यसापेक्ष धर्म है, अतः जब तक कार्य निष्पन्न नहीं हो जाता तब तक उस अव्यवहित पूर्व पर्यायमें कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्तित्व रूप धर्मका व्यवहार हो हो नहीं सकता है, इसलिए यदि कहा जाय कि कार्योत्पत्तिकी स्वाभाविक अतीन्द्रिय योग्यता ही सामर्थ्य शब्दका वाच्य है तो फिर हमारा कहना है कि इस प्रकारकी सामर्थ्य तो मिट्टीकी कुशूल, कोश, स्थास, पिण्डरूप पर्यायोंमें तथा इनके भी पहलेकी सामान्य मिट्टीरूप अवस्थामें भी पायी जाती है, इसलिए घट कार्यके प्रति इन सबको उपादान कारण मानना असंगत नहीं है।

अब यदि आप हमसे यह प्रश्न करें कि यदि सामान्य मिट्टी जो खानमें पड़ी हुई है अथवा जिसे कुम्हार अपने घरपर ले आया है उस मिट्टीमें तथा उसकी आगामी पिण्डादि अवस्थाओंमें यदि घट कार्यकी सामर्थ्य मान ली जाती है तो फिर इन सब अवस्थाओंमें भी मिट्टीसे सीधा घट बन जाना चाहिए।

तो इस प्रश्नका उत्तर यह है कि मिट्टीमें घट निर्माणकी योग्यता यद्यपि स्वभावसे ही है, परन्तु परमाणुओंका जो मिट्टीरूप परिणमन हुआ है वह केवल स्वभावसे न होकर किसी मिट्टीरूप स्कन्धके साथ मिश्रण होनेपर ही हुआ है अर्थात् जैन संस्कृतिकी मान्यताके अनुसार जिस प्रकार पुद्गल कर्म-नोकर्मके साथ विद्यमान मिश्रणके कारण आत्माकी संसाररूप मिश्रित अवस्था अनादिकालसे मानी गयी है उसी प्रकार जैन संस्कृतिमें पुद्गल द्रव्यको भी अनादिकालसे अणु और स्कन्ध इन दो भेदरूप स्वीकार किया गया है। इस प्रकार मिट्टीरूप स्कन्धकी स्थिति अनादिसिद्ध होती है। परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि वह स्कन्ध नाना द्रव्योंके परस्पर मिश्रणसे ही बना हुआ है, अतएव मिट्टीमें पाया जानेवाला मृत्तिकात्व धर्म मिट्टीकी अपेक्षा स्वाभाविक होते हुए भी नाना द्रव्योंके मिश्रणसे उत्पन्न होनेके कारण कार्यधर्म ही कहा जायगा। उस अनादिकालीन मिट्टीरूप स्कन्धमें अन्य पुद्गल परमाणु भी जो आकरके मिल जाते हैं उनमें वह मृत्तिकात्व धर्म उत्पन्न हो जाता है तथा जो परमाणु उस मिट्टीमेंसे निकल जाते हैं उनका तब वह पूर्वमें सम्मिलित होनेसे उत्पन्न हुआ मृत्तिकात्व धर्म नष्ट हो जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि किसी भी स्कन्धरूपताके आधारपर पैदा होनेवाली पर्यायका रूप परमाणु द्रव्यमें स्वतःसिद्धरूपसे नहीं पाया जाता है। यह बात दूसरी है कि उसमें इस जातिकी स्वतःसिद्ध योग्यता पायी जाती है कि यदि दूसरे अणु द्रव्यों या स्कन्ध द्रव्योंके साथ किसी अणु द्रव्यका मिश्रण हो जाता है तो वह अणु उसरूप परिणाम जाता है। इससे यह बात भी सिद्ध हो जाती है कि अणुरूप द्रव्यमें तो घटरूप कार्यकी उपादानता नहीं मानी जा सकती है, केवल मिट्टीरूप स्कन्धमें ही घटकी उपादानताका अस्तित्व सम्भव दिखाई देता है। प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि घटकी उपादानताको प्राप्त यह मिट्टी अपने-आप तो अवश्य घटरूप परिणत नहीं होती है और कुम्हार द्वारा दण्ड, चक्र आदिकी सहायतासे घटानुकूल व्यापार करनेपर पिण्ड, स्थास, कोश, कुशुल आदिके क्रमसे अथवा इनकी क्षणिक पर्यायोंके क्रमसे अवश्य घटरूप परिणत हो जाती है। इस तरह इस अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर यह निश्चित हो जाता है कि घट कार्यके प्रति अपनी स्वाभाविक योग्यताके अनुसार उपादानताको प्राप्त मिट्टी कुम्हार आदि अनुकूल निमित्तोंके सहयोगसे ही उत्पन्न होनेवाली उक्त क्रमिक पर्यायोंके बिना घटरूप परिणत नहीं हो सकती है। इसके साथ ही यह भी देखनेमें आता है कि यदि मिट्टी अच्छी नहीं है तो चतुर कुम्हार उससे अच्छा सुन्दर घड़ा नहीं बना सकता है और मिट्टी अच्छी भी हो लेकिन यदि कुम्हार चतुर न हो अथवा उसके सहायक दण्ड, चक्र आदिमें कुछ गड़बड़ी हो तो भी घड़ा सुन्दर नहीं बन सकता है। अलावा इसके यह भी देखनेमें आता है कि घड़ा बनाते हुए कुम्हारके सामने कोई बाधा आ जाती है और तब उसे यदि अपना घड़ा बनानेरूप व्यापार बन्द कर देना पड़ता है तो उसके साथ उस घड़ेका बनना भी बन्द हो जाता है और कदाचित् यह भी देखनेमें आता है कि कोई दूसरा व्यक्ति आकर दण्डका प्रहार उस बनते हुए घड़ेपर कर देता है तो बनते-बनते भी घड़ा फूट जाता है फिर चाहे घट निर्माणकी अन्तिम क्षणवर्ती कार्यरूप पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्याय ही वह क्यों न हो।

ऐसा भी देखनेमें आता है कि घटका उत्पत्तिक्रम चालू रहते हुए बीचकी किसी भी अवस्थामें किसी भी क्षण वह घट फूट भी जाता है, इसी प्रकार ऐसा भी देखनेमें आता है कि घटका निर्माण कार्य समाप्त हो जानेके बाद भी वह किसी भी क्षण फूट जाता है। अब आप जो यह मानते हैं कि घटकी संपन्न अन्तिम पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायसे नियमसे घटकी उत्पत्ति होती है तो इसका आशय यह हुआ कि आपकी मान्यताके अनुसार घटोत्पत्तिका कार्य चालू रहते हुए यदि कदाचित् किसी अवस्थामें उसका विनाश भी होना हो तो वह विनाश घटकी संपन्न अन्तिम पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायसे भी अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्याय तक ही हो सकेगा। इसी प्रकार घटका निर्माण कार्य समाप्त हो जानेके अनन्तर भी आपकी मान्यताके अनुसार घटके विनाशकी बराबर संभावना बनी रह सकती है, लेकिन घटका निर्माण कार्य चालू रहते हुए जब घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्याय उपस्थित हो जायगी तो आपकी इस मान्यताके अनुसार कि ‘घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायसे नियमसे घटकी उत्पत्ति होती है’ उसके विनाशकी कतई संभावना नहीं रहेगी। लेकिन यह मान्यता आगमका स्पष्ट प्रमाण न होनेसे स्वीकार नहीं की जा सकती है। और यदि आप समझते हैं कि उसका विनाश तो घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें भी हो सकता है तो फिर इस तरह तो आपकी यह मान्यता समाप्त ही हो जायगी कि ‘घटकी निष्पन्न अन्तिम क्षणवर्ती पर्यायसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायके अनन्तर नियमसे घटकी उत्पत्ति होती है।’ सबसे अधिक विचारणीय बात तो यह है कि खानमें पड़ी हुई मिट्टीसे लेकर घट निर्माणकी अन्तिम क्षणवर्ती पर्याय तककी प्रत्येक पर्यायकी अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायसे जब उस पर्यायकी उत्पत्ति नियमसे होने पर नियम आप मानते हैं तो किसी भी पर्यायकी अवस्थामें दण्डप्रहार आदिके द्वारा घटका विनाश नहीं होना चाहिये, लेकिन विनाश की संभावनाका अनुभव तो प्रत्येक व्यक्तिके लिये प्रत्येक वस्तुके प्रत्येक कार्यकी प्रत्येक अवस्थामें प्रत्येक क्षण होता ही रहता है।

आपकी जो यह मान्यता है कि कार्यसे अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें वस्तुके पहुँच जाने पर नियमसे कार्यकी उत्पत्ति होगी, अन्यथा जैन संस्कृतिकी वस्तुके परिणमन स्वभावकी मान्यता ही समाप्त हो जायगी’ सो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि हमारे आगमसम्मत सिद्धान्तके अनुसार जिस वस्तुमें होनेवाले जिस कार्यके अनुकूल निमित्त जब जहाँ होंगे तब तहाँ उन निमित्तोंके सहयोगसे उस वस्तुमें उस वस्तुकी उपादान शक्तिके अनुसार वह कार्य अवश्य ही होगा। इसका मतलब यह है कि वस्तुका परिणमन तो प्राकृतिक ढंगसे हमेशा होता ही रहता है, वह कभी बन्द नहीं होता। परन्तु उसमें विवक्षित परिणमन या तो उपादान शक्तिके अभावमें अथवा अनुकूल निमित्त सामग्रीके सहयोगके अभावमें और अथवा बाधक सामग्रीके सद्भावमें अवश्य नहीं होता। तात्पर्य यह है कि उस समय उस वस्तुमें होनेवाले स्वप्रत्यय परिणमनका तो कोई विरोध करता ही नहीं है और न विरोध करना ही चाहिये, साथ ही उस समय विवक्षित परिणमनके अनुकूल अथवा प्रतिकूल जैसे निमित्तोंका सहयोग उस वस्तुको प्राप्त होता है उसके आधार पर वह वस्तु अपनी उपादान शक्तिके अनुसार अपने स्व-परप्रत्यय परिणमन करती ही है।

आगे आपने अपने इस मन्तव्यकी पुष्टिमें कि 'जब मिट्टी घट पर्यायके परिणमनके सन्मुख होती है तब दण्ड, चक्र और पौरुषेय प्रयत्नकी निमित्तता स्वीकृत की गयी है, अन्य कालमें वे निमित्त नहीं होते’ प्रमेयकमल-मार्तण्डका भी प्रमाण उपस्थित किया है जो निम्न प्रकार है :-

किं ग्राहकप्रमाणाभावाच्छक्तेरभावः अतीन्द्रियत्वाद् वा ? तत्राद्यः पक्षोऽयुक्तः कार्योत्पत्त्यन्यथानुप-
पत्तिजनितानुमानस्यैव तद्ग्राहकत्वात् । ननु साऽग्र्यधीनोत्पत्तिकत्वात् कार्याणां कथं तदन्यथानुपपत्तिः यतोऽनुमानात्तत्सिद्धिः स्यात् इत्यसमीचीनं यतो नास्माभिः सामग्र्याः कार्यकारित्वं प्रतिषिध्यते किन्तु प्रतिनियतायाः सामग्र्याः प्रतिनियतकार्यकारित्वं अतीन्द्रियशक्तिसद्भावमन्तरेणासंभाव्यमित्यसावभ्युपगंतव्या ।
-प्रमेयकमल-मार्तण्ड २,२ पृ० १९७

इस उद्धरणसे और इसका जो हिन्दी अर्थ आपने किया है उससे हमारा कोई विरोध नहीं है। इस उद्धरणके आगे एक दूसरा उद्धरण भी प्रमेयकमलमार्तण्डका ही आपने दिया है जो निम्न प्रकार है-

यच्चोच्यते-शक्तिर्नित्या अनित्या वेत्यादि । तत्र किमयं द्रव्यशक्तौ पर्यायशक्तौ वा प्रश्नः स्यात्, भावानां द्रव्यपर्यायशक्त्यात्मकत्वात् । तत्र द्रव्यशक्तिर्नित्यैव, अनादिनिधनस्वभावत्वाद् द्रव्यस्य । पर्यायशक्तिस्त्वनित्यैव, सादिपर्यवसानत्वात् पर्यायाणाम् । न च शक्तेर्नित्यत्वे सहकारिकारणानपेक्षयैवार्थस्य कार्यकारित्वानुषंगः, द्रव्यशक्तेः केवलायाः कार्यकारित्वानभ्युपगमात् । पर्यायशक्तिसमन्विता हि द्रव्यशक्तिः कार्यकारिणी, विशिष्टपर्यायपरिणतस्यैव द्रव्यस्य कार्यकारित्वप्रतीतेः । तत्परिणतिश्चास्य सहकारिकारणापेक्षया इति पर्यायशक्तेस्तदैव भावान्न सर्वदा कार्योत्पत्तिप्रसंगः सहकारिकारणापेक्षावैयर्थ्यं वा ।
-प्रमेय० २,२, पृष्ठ २०७

इसका भी जो हिन्दी अर्थ आपने किया है उससे और इस उद्धरणसे भी हमारा कोई विरोध नहीं है । चूँकि दोनों उद्धरणोंका हिन्दी अर्थ आपने किया है, अतः यहाँ पर नहीं लिखा जा रहा है । उसे आपके द्वितीय उत्तरमें ही देख लेना चाहिये ।

अब यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि जब हमारे और आपके मध्य प्रमेयकमलमार्तण्डके उल्लिखित दोनों उद्धरणोंकी प्रमाणताको स्वीकार करनेमें विवाद नहीं है तथा उन दोनों ही उद्धरणोंका जो हिन्दी अर्थ आपने किया है उनसे भी हमें विरोध नहीं है तो फिर विवादका आधार क्या है ?

इस प्रश्नका उत्तर यह है कि आपने उक्त दोनों उद्धरणोंका हिन्दी अर्थ ठीक करके भी उसका अभिप्राय ग्रहण करनेमें गलती कर दी है ।

उक्त दोनों उद्धरणोंमेंसे प्रथम उद्धरणका अभिप्राय यह है कि यद्यपि प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति साधन सामग्रीकी अधीनतामें ही हुआ करती है, परन्तु प्रत्येक प्रकारकी सामग्रीसे प्रत्येक प्रकारका कार्य उत्पन्न न होकर सामग्रीविशेषसे कार्यविशेषके उत्पन्न होनेका जो नियम लोकमें देखा जाता है इसके आधार पर ही अतीन्द्रिय शक्तिको स्वीकार करना आवश्यक हो जाता है। तात्पर्य यह है कि घटकी उत्पत्ति मिट्टीसे ही होती है, पटके साधनभूत तंतुओंसे कदापि घटकी उत्पत्ति नहीं होती । इसी प्रकार मिट्टीसे घटके उत्पन्न होनेमें कुम्हारका व्यापार ही अपेक्षित होता है जुलाहेका व्यापार अपेक्षित नहीं होता यह जो नियम लोकमें देखा जाता है यह नियम उपादान और निमित्तभूत वस्तुओंमें अपने-अपने ढंगकी अतीन्द्रिय शक्तिको स्वीकार किये विना नहीं बन सकता है, अतः उपादानभूत वस्तुमें कार्य विशेषरूपसे परिणत होनेकी और निमित्तभूत वस्तुमें उस उपादानभूत वस्तुको उसको उस कार्यरूप परिणतिमें सहयोग देनेकी अपने-अपने ढंगकी पृथक्-पृथक् अतीन्द्रिय शक्तिका सद्भाव स्वीकार करना आवश्यक है।

इसी प्रकार दूसरे उद्धरणका अभिप्राय यह है कि प्रतिनियत कार्यके प्रति प्रतिनियत वस्तु ही उपादान कारण होती है । जैसे घटरूप कार्यके प्रति मिट्टी ही उपादान कारण होती है यह तो ठीक है । परन्तु स्थूल पर्यायोंके विभाजनकी अपेक्षा वह मिट्टी जब तक कुशूलरूप पर्यायको प्राप्त नहीं हो जाती है तब तक अथवा क्षणिक पर्यायोंके विभाजनकी अपेक्षा वह मिट्टी जब तक कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्यायरूपताको नहीं प्राप्त हो जाती है तब तक घट कार्यरूपसे परिणत नहीं हो सकती है। इस प्रकार मिट्टीमें पाया जानेवाला मृत्तिकात्वरूप वस्तु-धर्म उसकी ( मिट्टीकी ) घटरूप पर्यायकी उत्पत्तिमें यद्यपि कारण होता है परन्तु जब तक यह मृत्तिकात्वरूप वस्तु-धर्म कुशूल पर्यायरूपतासे अथवा कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूपतासे समन्वित नहीं हो जाता तब तक वह मिट्टी घट-कार्यरूपसे परिणत नहीं हो सकती है। चूँकि मिट्टीकी कुशूल पर्यायरूपता अथवा कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूपता निमित्तोंके सहयोगकी अपेक्षा रखती है, अतः मिट्टीको जिस समय अनुकूल निमित्तोंका सहयोग प्राप्त हो जाता है उस समयमें ही वह मिट्टी कुशलरूपता अथवा कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूपताको प्राप्त होती है इस तरह कार्यमें न तो सर्वदा उत्पत्तिका प्रसंग उपस्थित हो सकता है और न सहकारी कारणकी व्यर्थता ही सिद्ध होती है।

शंका ६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ (भाग २/२)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ४०७ से ४२९

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अब आप अपने गृहीत अभिप्रायके साथ दोनों उद्धरणोंके ऊपर लिखित अभिप्रायोंका मिलान करेंगे तो आपको अभिप्रायके ग्रहण करनेमें अपनी गलतीका पता सहज ही में लग जायगा।

आपने जो अभिप्राय ग्रहण किया है और जिसे हम ऊपर उद्धृत कर आये हैं-यह है कि ‘मिट्टी घट-पर्यायके परिणमनके सन्मुख होती है तब दण्ड, चक्र, और पौरुषेय प्रयत्नकी निमित्तता स्वीकृत की गयी है, अन्य कालमें वे निमित्त नहीं स्वीकार किये गये हैं।’

मालूम पड़ता है कि उक्त उद्धरणोंका यह अभिप्राय आपने दूसरे उद्धरणमें पठित ‘तदैव’ पदके आधारपर ही ग्रहण किया है, परन्तु आपको मालूम होना चाहिये कि उस उद्धरणमें ‘तदैव’ पदका अभिप्राय यही है कि ‘मिट्टीको जिस समय निमित्तोंका सहयोग प्राप्त होता है उस समयमें ही वह मिट्टी कुशूल पर्यायरूपता अथवा कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूपताको प्राप्त होती है।’

इस प्रकार हमारे द्वारा और आपके द्वारा गृहीत दोनों पर्यायोंमें जमीन-आसमानका अन्तर देखनेके लिये मिलता है, क्योंकि जहाँ आपके अभिप्रायके आधारपर निमित्तकी कार्यके प्रति व्यर्थता सिद्ध होती है वहाँ हमारे अभिप्रायके आधारपर निमित्तकी कार्यके प्रति सार्थकता ही सिद्ध होती है। अर्थात् आपका अभिप्राय जहाँ यह बतलाता है कि जब उपादान कार्यरूप परिणत होनेके लिये तैयार रहता है तब निमित्त हाजिर रहता है वहाँ हमारा अभिप्राय यह बतलाता है कि जब निमित्तोंका सहयोग उपादानकी कार्योत्पत्तिके लिये प्राप्त होता है उस समयमें ही कार्यकी उत्पत्ति होती है। जैसे साइकलको आप चलाइये, उसपर बैठ जाइये और उसे चलाते जाइये, साइकल चलती जायगी और आपको भी वह अभिलषित स्थानपर पहुँचा देगी।

आपने जो यह लिखा है कि दण्ड, चक्र आदिमें निमित्तता उसी समय स्वीकार की गई है जब मिट्टी घट-पर्यायके परिणमनके सन्मुख होती है, अन्य कालमें वे निमित्त नहीं स्वीकार किये गये हैं। इस विषयमें हमारा कहना यह है कि कुम्हार, दण्ड, चक्र आदिमें घटके प्रति निमित्त कारणताका अस्तित्व उपादानभूत वस्तुकी तरह नित्यशक्तिके रूपमें तो पहले भी पाया जाता है, क्योंकि कार्योत्पत्तिके लिये उपादानभूत वस्तुके संग्रहकी तरह निमित्तभूत वस्तुका भी लोकमें संग्रह किया जाता है। यह बात दूसरी है कि उपादान और निमित्त दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंका उपयोग कार्योत्पत्तिके अवसर पर ही हुआ करता है, इसलिये आपका वैसा लिखना भी गलत है।

बड़े खेदकी बात है कि आपने अपने पक्षके समर्थनमें जहाँ-जहाँ और जितने आगमके उद्धरण दिये हैं उनमें सर्वत्र इसी प्रकारकी गलतियाँ आपने की हैं। हमारी आपसे विनय है कि आगमके वचनोंका अभिप्राय बिल्कुल स्वाभाविक ढंगसे आगमके दूसरे वचनोंके साथ समन्वयात्मक पद्धतिको अपनाते हुए प्रकरण आदिको लक्ष्यमें रखकर वाक्यविन्यास, पदोंकी सार्थकता, ग्रन्थकर्ताकी विषय-मर्मज्ञता साहित्यिक ढंग और भाषा-पांडित्य आदि उपयोगी बातोंको लक्ष्यमें रखकर ही ग्रहण कीजिये, अन्यथा इस तरहकी प्रवृत्तिका परिणाम जैन-संस्कृतिके लिये आगे चलकर बड़ा भयानक होगा जिसके लिये यदि जीवित रहे तो हम और आप सभी पछतावेंगे। अस्तु।

आगे आपने लिखा है कि ‘सहकारी कारण सापेक्ष विशिष्ट पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्ति ही कार्यकारिणी मानी गयी है, केवल उदासीन या प्रेरक निमित्तोंके बलपर मात्र द्रव्यशक्तिसे ही द्रव्यमें कार्य नहीं होता’ यह तो आपने ठीक लिखा है परन्तु इसके आगे आपने जो यह लिखा है कि ‘यदि द्रव्यशक्तिको बाह्य-निमित्तोंके बलसे कार्यकारी मान लिया जाये तो चनेसे भी गेहूँकी उत्पत्ति होने लगे।’

इस विषयमें हमें यह कहना है कि पर्याय-शक्तिकी अपेक्षारहित केवल द्रव्यशक्तिको निमित्तोंके बलपर हम भी कार्यकारी नहीं मानते हैं, किन्तु हम आपके समान ऐसा भी नहीं मानते कि कार्य निमित्तकी अपेक्षारहित केवल विशिष्ट पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्तिमात्रसे ही उत्पन्न हो जाया करता है तथा ऐसा भी नहीं मानते कि सहकारी कारणकी सापेक्षताका अर्थ केवल इतना ही होता है कि सहकारी कारणकी उपस्थिति वहाँपर नियमसे रहा ही करती है, उसका वहाँपर कभी अभाव नहीं होता। हम तो ऐसा मानते हैं कि एक तो उस पर्यायशक्तिकी उत्पत्ति सहकारी कारणोंके सहयोगसे ही होती है, दूसरे पूर्व पर्यायशक्ति विशिष्ट द्रव्यशक्ति निमित्तोंका वास्तविक सहयोग मिलनेपर ही उत्तर पर्यायरूप कार्यको उत्पन्न करती है और फिर उस उत्तर पर्यायशक्ति विशिष्ट द्रव्यशक्ति भी यदि निमित्तोंका अनुकूल सहयोग मिल जावे तो उस उत्तर पर्यायसे भी उत्तर पर्यायको उत्पन्न कर देती है तथा यदि अनुकूल निमित्तोंका सहयोग प्राप्त नहीं होता तो वर्तमान पर्याय-शक्तिसे विशिष्ट द्रव्यशक्ति उस पर्यायसे उत्तर क्षणवर्ती विवक्षित पर्यायको उत्पन्न करनेमें सर्वथा ही असमर्थ रहेगी? फिर तो उससे उसी कार्यकी उत्पत्ति होगी जिसके अनुकूल उस समय निमित्त उपस्थित होंगे । इसलिये आपने जो प्रकृतमें चनेसे गेहूँकी उत्पत्तिके प्रसक्त होनेकी आपत्ति हमारे सामने उपस्थित की है उस आपत्तिका हमारे सामने उपस्थित करना कुछ अर्थ नहीं रखता है, क्योंकि अन्य अनेक शक्तियोंके रहते हुए भी चनेमें गेहूँके उत्पन्न करनेकी शक्ति नहीं है।

आगे आपने ‘यदि द्रव्यशक्तिको बाह्य-निमित्तोंके बलसे कार्यकारी मान लिया जाये तो चनेसे भी गेहूँकी उत्पत्ति होने लगे’ इस आपत्तिके उपस्थित करनेमें जो यह हेतु दिया है कि ‘क्योंकि गेहूँ स्वयं द्रव्य नहीं है किन्तु पुद्गल द्रव्यकी एक पर्याय है, अतएव गेहूँ पर्याय विशिष्ट पुद्गल द्रव्य बाह्य-कारणसापेक्ष गेहूँके अंकुरादि कार्यरूपसे परिणत होता है। यदि विशिष्ट पर्यायरहित द्रव्य सामान्यसे निमित्तोंके बलपर गेहूँकी अंकुरादि पर्यायोंकी उत्पत्ति मान ली जाये तो जो पुद्गल चनारूप हैं वे पुद्गल होनेसे उनसे भी गेहूँरूप पर्यायोंकी उत्पत्ति होने लगेगी।’

इसमें हमारा कहना यह है कि आपने गेहूँ पर्यायविशिष्ट पुद्गल द्रव्यको बाह्य-कारणसापेक्ष होनेपर ही गेहूँके अंकुरादि कार्यरूपसे परिणत होना लिखा है, सो यह यदि आपने बुद्धिभ्रमसे न लिखकर बुद्धिपूर्वक ही लिखा है तो इससे तो कार्यके प्रति निमित्त कारणकी सार्थकताका ही समर्थन होता है। इस तरह आपके द्वारा स्वीकृत कार्यके प्रति निमित्त कारणताकी अकिंचित्करताका आपहीके द्वारा खण्डन हो जाता है, क्योंकि हम भी तो यही कहते हैं कि गेहूँसे जो गेहूँकी अंकुरादिरूपसे पर्याय बनती है वह बाह्य निमित्तोंका सहयोग मिलनेपर ही बनती है। अर्थात् यदि बाह्य-निमित्तोंके सहयोगके अभावमें ही गेहूँसे उक्त अंकुरादिरूप पर्यायकी उत्पत्ति स्वीकार की जाती है तो फिर कोठीमें रक्खे हुए गेहूँसे भी निमित्तकी सहायताके बिना उक्त अंकुरादिरूप पर्यायकी उत्पत्ति होने लगेगी। तात्पर्य यह है कि कोठीमें रक्खे हुए गेहूँमें हमारे समान आपने भी गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिकी योग्यता (उपादान शक्ति) को उक्त लेखद्वारा स्वीकार कर लिया है, क्योंकि उक्त लेखमें आपने यही तो लिखा है कि गेहूँ पर्याय विशिष्ट पुद्गल द्रव्य बाह्य कारण सापेक्ष गेहूँके अंकुर आदि कार्यरूप परिणत होता है। अब यदि कोठीमें रक्खे हुए उस गेहूँसे गेहूँका अंकुर उत्पन्न नहीं हो रहा है तो इसका कारण सिर्फ बाह्य-निमित्तोंके सहयोगका अभाव ही हो सकता है, अन्य कोई नहीं। इस प्रकार कार्यके प्रति जब निमित्त कारणकी आप ही सार्थकता सिद्ध कर देते हैं तो वह जैसे अकिंचित्कर नहीं रह जाता है वैसे ही वह कल्पनारोपित भी नहीं रहता है। हमारा प्रयास आपसे इतनी ही बात स्वीकृत करानेका है।

वैसे आपके इस मन्तव्यसे हम सहमत नहीं हो सकते हैं कि ‘पुद्गलरूप द्रव्यशक्ति ही गेहूँरूप पर्याय विशिष्ट होकर गेहूँरूप पर्यायको उत्पन्न करती है-ऐसा कार्यकारणभाव यहाँपर स्वीकार किया गया है’ किन्तु गेहूँ नामका पुद्गल द्रव्य अनुकूल निमित्तके सहयोगसे गेहूँरूप अंकुरोत्पत्तिके योग्य विशिष्ट पर्यायको प्राप्त होनेपर अनुकूल निमित्त सहयोगसे ही गेहूँरूप अंकुरोत्पत्ति अपनेमें कर लेता है ऐसा ही कार्यकारणभाव यहाँपर ग्रहण करना उचित है। अतः इस रूपसे भी चनेसे गेहूँकी उत्पत्तिके प्रसक्त होनेकी आपत्ति उपस्थित नहीं होती है।

यह जो आपने कहा है कि ‘गेहूँ स्वयं द्रव्य नहीं है, किन्तु पुद्गल द्रव्यकी एक पर्याय है’ सो इसके विषयमें भी हमारा कहना यह है कि गेहूँ एक पुद्ल द्रव्यकी पर्याय नहीं है, किन्तु अनेक पुद्गल द्रव्य मिश्रित होकर एक गेहूँरूप स्कन्ध पर्यायरूपताको प्राप्त हुए हैं, इसलिए जिस तरह आत्मा कर्म-नोकर्मरूप पुद्गलोंके साथ मिश्रित होकर दोनोंका एक पिण्ड बना हुआ है उसी प्रकार नाना अणुरूप पुद्गल द्रव्योंका भी परस्पर मिश्रण होकर एक गेहूँरूप पिण्ड बन गया है। आगममें यद्यपि पुद्गल स्कन्धोंको पुद्गल द्रव्यकी पर्याय भी कहा गया है परन्तु इसका आशय इतना ही है कि नाना अणुरूप द्रव्योंने मिलकर अपनी एक स्कन्ध पर्यायरूप स्थिति बना ली है। यदि आप गेहूँ आदि स्कन्धोंको पुद्गल द्रव्यकी पर्याय स्वीकार करते हैं तो यह हमारे लिए तो अनिष्ट नहीं है। परन्तु ऐसा माननेपर आपके सामने बन्धरूप संयोगकी वास्तविक स्थिति स्वीकार करनेका प्रसंग उपस्थित हो जायगा, लेकिन श्री पं० फूलचन्दजी जैनने अपनी जैनतत्त्वमीमांसा पुस्तकमें संयोगको अवास्तविक ही स्वीकार किया है वह कथन निम्न प्रकार है-

‘जीवकी संसार और मुक्त अवस्था है और वह वास्तविक है-इसमें सन्देह नहीं। पर इस आधारसे कर्म और आत्माके संश्लेष सम्बन्धको वास्तविक मानना उचित नहीं है। जीवका संसार उसकी पर्यायमें ही है और मुक्ति भी उसीकी पर्यायमें है। ये वास्तविक हैं और कर्म तथा आत्माका संश्लेष सम्बन्ध उपचरित है। स्वयं संश्लेष सम्बन्ध यह शब्द ही जीव और कर्मके पृथक्-पृथक् होनेका ख्यापन करता है।’ -जैनतत्त्वमीमांसा विषयप्रवेश प्रकरण पृष्ठ १८

यहाँपर उन्होंने (पं० फूलचन्दजीने) संश्लेष सम्बन्धको उपचरित माना है और उपचरित शब्दका अर्थ आप सब कल्पनारोपित ही करते हैं।

अब उक्त कथनके अनुसार कार्यकारणभावका वास्तविक आधार क्या है? इसपर थोड़ा विचार कर लेना आवश्यक जान पड़ता है।

मिट्टी घटका कारण है-इस वाक्यका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि मिट्टीरूप पर्यायशक्ति विशिष्ट पुद्गलरूप द्रव्यशक्ति घटका कारण है, किन्तु उक्त वाक्यका यही अर्थ समझना चाहिये कि स्थूल पर्यायोंकी अपेक्षा घटरूप कार्याव्यवहित पूर्ववर्ती कुशूल पर्यायशक्तिसे विशिष्ट तथा क्षणिक पर्यायोंकी अपेक्षा घटरूप कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायशक्तिसे विशिष्ट मिट्टीरूप द्रव्यशक्ति घटका कारण है। इसी प्रकार गेहूँ गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिमें कारण है-इस वाक्यका यह अर्थ नहीं समझना चाहिये कि गेहूँरूप पर्यायशक्ति विशिष्ट पुद्गलरूप द्रव्यशक्ति गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिमें कारण है, किन्तु उक्त वाक्यका यही अर्थ समझना चाहिये कि स्थूल पर्यायोंकी अपेक्षा गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्याव्यवहित पूर्ववर्ती खेतमें वपनरूप पर्यायशक्ति-विशिष्ट तथा क्षणिक पर्यायोंकी अपेक्षा गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायशक्ति विशिष्ट गेहूँरूप द्रव्यशक्ति ही गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिमें कारण है।

इसका कारण यह है कि घटरूप कार्यके उत्पन्न होनेमें मिट्टी पुद्गलद्रव्यकी पर्यायरूपसे कारण नहीं बन रही है, किन्तु स्वयं एक पौद्गलिक द्रव्यरूपसे ही बन रही है। इसी प्रकार गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्यके उत्पन्न होनेमें गेहूँ भी पुद्गल द्रव्यकी पर्यायरूपसे कारण नहीं बन रहा है, किन्तु स्वयं एक पौद्गलिक द्रव्यरूप से ही कारण बन रहा है। इस तरह घटकी उत्पत्तिमें मिट्टीमें विद्यमान पुद्गलत्व नामका द्रव्यांश द्रव्यशक्ति रूपसे कारण न होकर उस मिट्टीमें ही विद्यमान मृत्तिकात्व नामका द्रव्यांश ही द्रव्यशक्तिरूपसे कारण होता है और तब स्थूल पर्यायोंकी अपेक्षा मिट्टीका घटरूप कार्याव्यवहित पूर्ववर्ती कुशूलरूप पर्यायांश तथा क्षणिक पर्यायोंकी अपेक्षा उस मिट्टीका ही घटरूप कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूप पर्यायांश पर्यायशक्तिरूपसे कारण होता है। इसी प्रकार गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिमें गेहूँमें विद्यमान पुद्गलत्व नामका द्रव्यांश द्रव्यशक्तिरूपसे कारण न होकर उस गेहूँमें ही विद्यमान गेहूँपना (गोधूमत्व धर्म) नामका द्रव्यांश ही द्रव्यशक्तिरूपसे कारण होता है और तब स्थूल पर्यायोंकी अपेक्षा गेहूँका गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्याव्यवहित पूर्ववर्ती खेतमें वपन रूप पर्यायांश तथा क्षणिक पर्यायोंकी अपेक्षा उस गेहूँका ही गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूप पर्यायांश पर्यायशक्तिरूपसे कारण होता है।

उपर्युक्त कथनसे जब यह बात सिद्ध हो जाती है कि हमारे मतानुसार घड़ेकी उत्पत्ति मिट्टीसे ही होती है और गेहूँके अंकुरकी उत्पत्ति गेहूँसे ही होती है तो चनेसे गेहूँके अंकुरकी उत्पत्तिकी प्रसक्ति होनेकी जो आपत्ति आपने हमारे समक्ष उपस्थित की है उसका निरसन अपने आप ही हो जाता है। इस प्रकार जो कार्यकारणभावकी व्यवस्था जैन संस्कृतिके अनुसार आगम प्रमाणोंके आधारपर बनती है उसका रूप निम्न तरहसे समझना चाहिए-

चूँकि मिट्टी आदि स्कन्धोंकी स्थिति परम्पराके रूपमें अनादिकालसे ही चली आ रही है और इसी तरह अनन्तकाल तक चली जानेवाली है और जब मिट्टी आदि स्कन्ध उल्लिखित कथनके आधारपर द्रव्य ही सिद्ध होते हैं तो उनमें रहनेवाले मृत्तिकात्व आदि द्रव्यांश भी नित्य ही सिद्ध होते हैं। मृत्तिकासे घटकी उत्पत्तिमें यह मृत्तिकात्व धर्म ही मिट्टीमें पायी जानेवाली नित्य उपादान शक्ति है। यह उपादान शक्ति खानमें पड़ी हुई मिट्टीमें भी पायी जाती है, लेकिन चूँकि खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीसे खानमें पड़े-पड़े अपनेआप घटका बनना असम्भव है, अतः उक्त उपादान शक्तिकी जाँच करके कुम्हार खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीको घड़ा बनानेके उद्देश्यसे अपने घर ले आता है और यहींसे फिर कुम्हारके व्यापारके सहयोगसे उस मिट्टीकी घट निर्माणके अनुकूल स्थूल पर्यायोंको अपेक्षा उत्तरोत्तर विकासरूप पिण्ड, स्थास, कोश और कुशूल आदि अवस्थाऐं तथा क्षणिक पर्यायोंको अपेक्षा एक-एक क्षणकी एक-एक पर्यायके रूपमें उत्तरोत्तर विकासरूप अवस्थाऐं चालू हो जाती हैं। ये सब पिण्डादिरूप स्थूल अवस्थाऐं या क्षण-क्षणकी सूक्ष्म अवस्थाऐं एकके बाद एकके क्रमसे कुम्हारके क्रमिक व्यापारके अनुसार ही हुआ करती हैं, अतः इन्हें घटको उत्पत्तिके अनुकूल उस मिट्टीको घटकी अनित्य उपादान शक्तिके रूपसे ही आगममें स्वीकार किया गया है। प्रमेयकमलमार्तण्डके ‘यच्चोच्यते’ इत्यादि कथनका अभिप्राय यही है।

इस प्रकार घट निर्माणकी स्वाभाविक योग्यताको धारण करनेवाली खानकी मिट्टीमें घट निर्माणके उद्देश्यसे किये जानेवाले कुम्हारके दण्डादिसापेक्ष व्यापारके सहयोगसे घट निर्माणके अनुकूल पिण्डादि नाना क्षणवर्ती स्थूल पर्यायों अथवा क्षण-क्षणमें पर्याय मान सूक्ष्म पर्यायोंका उत्तरोत्तर विकासके रूपमें उत्तर पर्यायका उत्पाद तथा पूर्व पर्यायका विनाश होता हुआ अन्तमें घटका निर्माण हो जाता है और तब उस घटनिर्माण की समाप्तिके साथ ही कुम्हार अपना भी व्यापार समाप्त कर देता है। यही प्रक्रिया गेहूँसे गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिके विषयमें तथा सभी कार्योंके विषयमें भी लागू होती है।

तात्पर्य यह है कि मिट्टीसे घटके निर्माणमें कुशल कुम्हार सर्वप्रथम खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीमें घट रूपसे परिणत होनेकी जिस योग्यताकी जाँच कर लेता है उस योग्यताका नाम ही मिट्टीमें विद्यमान घट निर्माणके लिये नित्य उपादान शक्ति है, क्योंकि यह स्वभावतः उस मिट्टीमें पायी जाती है। कुम्हार इस योग्यताको उसमें पैदा नहीं करता है, इसीको अभिमुखता, सन्मुखता, उत्सुकता आदि शब्दोंसे आगममें पुकारा गया है। खानमें पड़ी मिट्टीमें उक्त प्रकारकी योग्यता जाँच करनेके अनन्तर उस मिट्टीको घर लाकर कुम्हार उसमें स्वाभाविकरूपसे विद्यमान उस योग्यताके आधार पर दण्ड, चक्र आदि आवश्यक अनुकूल सामग्रीकी सहायतासे अपने व्यापार द्वारा उस मिट्टीसे निम्न क्रमपूर्वक घटका निर्माण कर देता है-

कुम्हारका वह व्यापार पहले तो उस मिट्टीको खानसे घर लानेरूप ही होता है, फिर वह उसे घट निर्माणके अनुकूल तैयार करनेमें अपना व्यापार करता है। इसके अनन्तर उस कुम्हारके व्यापारसे ही वह मिट्टी पिण्ड बन जाती है और फिर उसी कुम्हारके व्यापारके सहारेसे ही वह मिट्टी क्रमसे स्थास, कोश और कुशूल बनकर अन्तमें घट बन जाती है। इस प्रक्रियामें कुम्हारके व्यापारका सहयोग पाकर उस मिट्टीमें क्रमशः पिण्ड, स्थास, कोश, कुशूल और घटरूपसे उत्तरोत्तर जो परिवर्तन होते हैं मिट्टीमें होनेवाले इन परिवर्तनोंमेंसे पूर्व-पूर्वके परिवर्तनको आगे-आगेके परिवर्तनके लिये योग्यता, अभिमुखता, सन्मुखता या उत्सुकता आदि नामोंसे पुकारी जानेवाली अनित्य उपादान शक्तिके रूपमें आगमद्वारा प्रतिपादित किया गया है। पूर्वका परिवर्तन हो जानेपर ही उत्तरका परिवर्तन होता है, अतः पूर्व परिवर्तनको उत्तर परिवर्तनके लिये उपादान कहा गया है और चूँकि ये सब परिवर्तन दण्डादि अनुकूल निमित्तोंके सहयोगसे होनेवाले कुम्हारके व्यापारके सहारे पर ही हुआ करते हैं तथा इनमें पूर्व परिवर्तनका रूप ही कुम्हारके व्यापार द्वारा बदलकर उत्तर परिवर्तनका रूप विकसित होता है, अतः इन्हें अनित्य माना गया है।

इसका मतलब यह हुआ कि खानमें पड़ी हुई मिट्टीमें जो मृत्तिकात्व धर्म पाया जाता है वह उसका निजी स्वभाव है और चूँकि उसके आधार पर ही घट निर्माणकी भूमिका प्रारम्भ होती है एवं घटका निर्माण हो जाने पर भी उसका नाश नहीं होता है, अतः उसे घट निर्माणकी नित्य उपादान शक्तिमें अन्तर्भूत करना चाहिये तथा इसके अनन्तर कुम्हारके व्यापारके सहारे पर क्रमसे जो जो परिवर्तन उस मिट्टीमें होते जाते हैं वे सब परिवर्तन पूर्व पूर्व परिवर्तनके कार्य और उत्तर उत्तर परिवर्तनके लिये कारण हैं, अतः इन्हें घट निर्माणकी अनित्य उपादान शक्तिमें अन्तर्भूत करना चाहिए। किन्तु यहाँ पर इतना विशेष समझना चाहिये कि इन सब परिवर्तनोंमें अन्तिम परिवर्तन घट निर्माणकी सम्पन्नताको ही माना गया है। कारण कि कुम्हारके व्यापारका अन्तिम लक्ष्य वही रहता है, अतः उसका अन्तर्भाव केवल कार्योंमें ही होता है, कारणोंमें नहीं। यही कारण है कि उसकी निष्पन्नताके साथ ही कुम्हार अपना व्यापार भी बन्द कर देता है।

इन सब परिवर्तनोंको यहाँ पर जैसा पिण्ड, स्थास, कोश, कुशूल और घटरूप स्थूल परिवर्तनोंमें विभक्त किया गया है वैसा ही चाहो तो एक एक क्षणवर्ती परिवर्तनोंके रूपमें भी उन्हें विभक्त कर सकते हो, क्योंकि प्रश्न इस बातका नहीं है कि इन सब परिवर्तनोंका विभाजन पिण्डादि स्थूल पर्यायोंके रूपमें किया जाय अथवा क्षणिक पर्यायोंके रूपमें किया जाय? किन्तु प्रश्न यह है कि ये सब परिवर्तन एकके बाद एक करके अपने आप होते चले जाते हैं या जैसे जैसे कुम्हारका व्यापार आगे होता जाता है वैसे वैसे ये परिवर्तन भी आगे बढ़ते जाते हैं?

उक्त प्रश्नका जो समाधान अनुभव, तर्क और आगमप्रमाणोंके आधार पर हमने अपनी प्रतिशंका में किया है वह यह है कि उक्त सभी परिवर्तन कुम्हारके व्यापारके सहारे पर ही हुआ करते हैं, अपने आप नहीं। अतः उपादानगत योग्यताको लक्ष्यमें रखते हुए जब जैसे निमित्त मिलते हैं वैसा ही परिणमन वस्तुकी अपनी योग्यताके अनुसार हुआ करता है-यह मान्यता गलत नहीं है। इतना ही नहीं, कार्यके प्रति उभय कारणोंको जो आगममें स्वीकृति की गयी है उसकी सार्थकता भी इसी ढंगसे हो सकती है, अन्यथा नहीं। यह सब पूर्वमें स्पष्ट किया जा चुका है।

आपका कहना है कि ‘मुख्य विवाद उपादानका है, क्योंकि उपादानकी कार्योत्पत्तिके लिये तैयारी हो जानेपर निमित्त मिलते ही हैं।’ लेकिन हमारा कहना-जैसा कि ऊपर सिद्ध किया जा चुका है-यह है कि कार्योत्पत्तिके लिये उपादानकी तैयारी निमित्तोंके बलपर ही हुआ करती है।

यद्यपि केवल स्व-प्रत्ययताके आधारपर होनेवाली कार्य-विधिकी परंपरा धारा-प्रवाहरूपसे अनादि कालसे चली आ रही है और अनन्त कालतक वह चलती ही जायगी। षड्गुण हानि-वृद्धिरूपसे परिणमनकी परंपराका अन्तर्भाव इसी कार्य-विधिमें होता है। इसी प्रकार स्वपरप्रत्ययताके आधारपर होनेवाली कार्य-विधिकी बहुत-सी परंपरा भी ऐसी हो रही है जो अनादि कालसे धाराप्रवाहरूपसे चली आ रही है और अनन्त कालतक चलती ही जायगी। जैसे परिणमनशील वस्तुओंके निमित्तसे आकाश, धर्म, अधर्म तथा काल द्रव्योंके स्वभावोंमें जो परिणमन होता रहता है वह इसी कोटिमें आता है, क्योंकि वह स्वपरप्रत्यय होता हुआ अनादि कालसे धाराप्रवाहरूपसे चलता आ रहा है और अनन्त कालतक इसी रूपमें चलता ही जायगा। लोकके सामने समस्या इन दोनों प्रकारके परिणमनोंकी नहीं है, परन्तु स्वपरप्रत्ययताके आधारपर ही होनेवाली घटादि कार्यविधिकी परंपरा ऐसी नहीं है जो अनादि कालसे अनन्त कालतक धाराप्रवाहरूपसे चलने वाली हो, क्योंकि घटादि कार्यविधिकी परंपरा लोकमें और ही देखनेमें आती है। जैसे खानमें मिट्टी अनादिकालसे पड़ी हुई चली आ रही है और यह निर्विवाद है कि अनादि कालसे अबतक खानमें पड़े रहते हुए उससे घटरूप पर्यायका निर्माण स्वतः अथवा स्व और परके सहयोगसे न तो हुआ, न कभी होनेवाला है। इसके विपरीत यह बात अवश्य देखनेमें आती है कि खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीमेंसे कुछ मिट्टीको कुम्हार अपनी आवश्यकता और आकांक्षाके आधारपर बनानेके उद्देश्यसे यथावसर अपने घर लाता है और जब वह कुम्हार घट-कार्यके निर्माणके लिये सहायतारूप अपना व्यापार देता है तब उस मिट्टीसे घट-कार्यका निर्माण भी होता हुआ देखा जाता है। घटका यह निर्माणरूप कार्य कुम्हारके व्यापारके सहारेपर होता हुआ तबतक चलता रहता है जबतक या तो घट-कार्यका निर्माण सम्पन्न नहीं हो जाता अथवा कुम्हारके व्यापारके सहारेपर ही तबतक होता हुआ देखनेमें आता है जबतक कि चालू निर्माण कार्यके मध्यमें दण्ड आदिके प्रहारसे वह फूट नहीं जाता है। निर्माण-कार्यके समाप्त हो जानेपर अथवा बीच ही में उसके नष्ट हो जानेपर उसमें दूसरे ही प्रकारकी कार्य-विधिकी परंम्परा दूसरे निमित्तोंके सहयोगसे उसकी अपनी योग्यताके अनुसार चालू हो जाती है। यही कारण है कि इस प्रकार कार्यविधिकी परंपरामें परिवर्तन हो जानेके सबबसे पुरानी और जीर्ण-शीर्ण वस्तुऐं भी नवीनताका रूप लेकर सामने आती रहती है। अब यदि निमित्तका उपयोग इस कार्यविधिमें न माना जाय, केवल उपादानके अपने बलपर ही उसे स्वीकार कर लिया जाय तो ऐसी हालतमें उसमें कार्यसे कार्यान्तरका विभाग करना असंभव हो जायगा तथा कोई पुरानी वस्तु कभी और किसी भी हालतमें नवीनताको प्राप्त नहीं हो सकेगी।

आगे आपका कहना है कि ‘ऐसा है नहीं कि निश्चय उपादान हो और निमित्त न मिलें’ फिर आगे आप कहते हैं कि ‘इसी बातको असद्‌भूतव्यवहारनयकी अपेक्षा यों कहा जाता है कि जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है।’

अपने इस कथनसे आप यह निष्कर्ष निकाल लेना चाहते हैं कि यद्यपि उपादान स्वयं अपनी सामर्थ्यके आधारपर ही कार्य निष्पन्न कर लेता है, उसे अपनी कार्यनिष्पत्तिमें निमित्तोंका सहयोग लेनेकी आवश्यकता नहीं रहा करती है। परन्तु निश्चय उपादानके रहते हुए चूँकि वहाँपर निमित्त नियमसे उपस्थित रहा करते हैं, अतः वस्तुस्थिति वैसी न रहते हुए भी केवल बोलनेमें ऐसा आता है कि जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है।

विचार करनेपर मालूम पड़ता है कि निमित्तकी अकिंचित्करता और कल्पनारोपितताको सिद्ध करनेके लिये आपका यह प्रयास बिल्कुल व्यर्थ है। आगे इसी बातको स्पष्ट किया जा रहा है-

स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप कार्योंमें स्व अर्थात् उपादानके साथ साथ पर अर्थात् निमित्तके सहयोगकी आवश्यकता रहा करती है-इस बातको पूर्वमें अत्यन्त स्पष्टताके साथ बतला दिया गया है तथा इस विषयके समर्थनमें राजवार्तिकका निम्नलिखित प्रमाण भी देखने योग्य है जिसमें कार्यके प्रति निमित्तपनेके आधारपर धर्म और अधर्म द्रव्योंकी सिद्धि की गयी है-

कार्यस्यानेकोपकरणसाध्यत्वात् तत्सिद्धेः ॥३१॥ इह लोके कार्यमनेकोपकरणसाध्यं दृष्टं, यथा मृत्पिण्डो घटकार्यपरिणामप्राप्तिं प्रति गृहीताभ्यन्तरसामर्थ्यः बाह्यकुलाल-दण्ड-चक्र-सूत्रोदक-कालाकाशाद्यनेकोपकरणापेक्षः घटपर्यायेणाविर्भवति, नैक एव मृत्पिण्डः कुलालादिबाह्यसाधनसन्निधानेन बिना घटात्मना-विर्भवितुं समर्थः, तथा पतत्त्रिप्रभृति द्रव्यं गतिस्थितिपरणामप्राप्तिं प्रत्यभिमुखं नान्तरेण बाह्यानेककारणसन्निधिं गतिं स्थितिं चावाप्तुमलमिति तदुपग्रहकारणधर्माधर्मास्तिकायसिद्धिः।
-अध्याय ५ सूत्र १७ वार्तिक ३१

अर्थ-कार्यकी सिद्धि अनेक उपकरणों (कारणों) से होनेके कारण धर्म तथा अधर्म दोनों द्रव्योंका अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। लोकमें भी यही बात देखनेमें आती है-जैसे जिस मिट्टीके पिण्डमें घटकार्य-परिणमनके योग्य स्वाभाविक सामर्थ्य विद्यमान है वह बाह्य कुम्हार, दण्ड, चक्र, सूत, जल, काल और आकाशादि अनेक कारणोंकी सहायतासे ही घटरूप परिणत होता है। केवल मिट्टीका पिण्ड अकेला कुम्हार आदि बाह्य साधनोंके सहयोगके बिना घटरूपसे परिणत होनेमें समर्थ नहीं होता है! वैसे ही पक्षी आदि द्रव्य गति और स्थितिरूप परिणमनकी अपनेमें योग्यता रखते हुए भी बाह्य अनेक कारणोंके सहयोगके बिना गति और स्थितिरूप परिणमनको प्राप्त नहीं हो सकते हैं, इसलिये इनके सहायक कारणोंके रूपमें धर्म और अधर्म द्रव्योंका अस्तित्व सिद्ध हो जाता है।

राजवार्तिकके इस उद्धरणसे यह बात अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती है कि ‘निमित्तोंका समागम उपादानकी कार्यरूपसे परिणत होनेकी तैयारी हो जानेपर हो ही जाता है’-ऐसा नियम नहीं वनाया जा सकता है, किन्तु यह तथा आगमके और दूसरे प्रमाण यही बात बतलाते हैं कि उपादानको जब निमित्तोंका सहयोग प्राप्त होगा तभी उपादानकी नित्य द्रव्यशक्ति विशिष्ट वस्तुकी जिस पर्यायशक्तिविष्टिताको आप तैयारी शब्दसे ग्रहण करना चाहते हैं वह तैयारी होगी और तभी कार्य हो सकेगा।

आप कहते हैं कि उपादानसे कार्योत्पत्तिके अवसरपर निमित्त उपस्थित तो अवश्य रहते हैं परन्तु उनका सहयोग उपादानसे होनेवाली कार्योत्पत्तिमें बिल्कुल नहीं होता है और इसीलिये आप कहते हैं कि 'उक्त अवसरपर रहनेवाली निमित्तोंकी नियमित उपस्थितिको असद्भूतव्यवहारनयकी अपेक्षासे यों कहा जाता है कि ‘जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है।’

इस कथनसे हम आपके अभिप्रायको यों समझे हैं कि आपकी दृष्टिमें असद्भूत व्यवहारनय वह कहलाता है जिसका प्रतिपाद्य अथवा ज्ञाप्य विषय या तो बिल्कुल न हो और यदि हो तो वह असद्भूत अर्थात् असत्य हो।

परन्तु यह बात निश्चित ही जानना चाहिये कि ऐसा एक भी नय जैनागममें नहीं बतलाया गया है जिसका प्रतिपाद्य या ज्ञाप्य विषय या तो बिल्कुल नहीं है और यदि है भी तो वह असद्भूत अर्थात् असत्य ही है, क्योंकि यदि किसी नयका कोई विषय ही निर्धारित नहीं है तो वह नय कैसा? और यदि उसका कोई विषय निर्धारित है तो उसे अवस्तुभूत या असत्य कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि यदि अवस्तुभूत पदार्थको भी नयका विषय माना जायगा तो उस हालतमें आकाशके फूल तथा गधेके सींग भी नयका विषय होने लगेंगे। इसलिये असद्भूत व्यवहारनयके विषयको भी वास्तविक ही स्वीकार करना होगा। अतः विचारणीय बात यह है कि ऐसा कौन-सा वास्तविक पदार्थ है जो असद्भूतव्यवहारनयका विषय होता है।

यह बात पूर्वमें ही स्पष्ट की जा चुकी है कि प्रकृत प्रकरण कार्यकारणभावका है और चूँकि स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप कार्यमें दो तरहसे कार्यकारणभाव पाया जाता है-एक तो स्वप्रत्ययताको लेकर उपादानोपादेयभावके आधारपर और दूसरा परप्रत्ययताको लेकर निमित्तनैमित्तिकभावके आधारपर। इस प्रकार स्वपर प्रत्ययपरिणमनरूप कार्य जहाँ उपादानोपादेयभावकी विवक्षासे उपादानभूत वस्तुके आश्रयसे उत्पन्न होनेके कारण उपादेय है वहाँपर वह निमित्तनैमित्तिकभावकी विवक्षासे निमित्तभूत वस्तुके सहयोगसे उत्पन्न होनेके कारण नैमित्तिक भी है। अतः स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप उस कार्यमें उपादानकी अपेक्षा उपादेयभाव तथा निमित्तकी अपेक्षा नैमित्तिकभाव ऐसे दो धर्म देखनेको मिल जाते हैं। इनमेंसे उपादेयभाव उसमें उपादानभूत वस्तुके आश्रित होनेके कारण जहाँ निश्चयरूप है वहाँ नैमित्तिकभाव उसमें निमित्तभूत-वस्तुके आश्रित न होनेके साथ-साथ उसकी सहायतासे उत्पन्न होनेके कारण व्यवहाररूप है। इस प्रकार स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप कार्यमें निश्चय और व्यवहार दोनों धर्मोंका समावेश होनेके कारण वह स्वपरप्रत्यय परिणमन कथंचित् अर्थात् अपने उक्त निश्चय स्वरूपकी अपेक्षा वचन तथा ज्ञानरूप निश्चयनयका विषय होता है और वही स्वपर-प्रत्यय परिणमन कथंचित् अर्थात् अपने उक्त व्यवहारस्वरूपकी अपेक्षा वचन तथा ज्ञानरूप व्यवहारनयका विषय होता है ।

यह बात भी हम पूर्वमें बतला चुके हैं कि निश्चयरूप अर्थ और व्यवहाररूप अर्थ ये दोनों ही पदार्थके अंश हैं यही कारण है कि ये दोनों अंश क्रमशः निश्चय और व्यवहार दोनों नयोंके परस्पर सापेक्ष होकर ही विषय होते हैं अर्थात् जहाँ वस्तुके निश्चयरूप अर्थांशका प्रतिपादन वचनरूप निश्चयनय द्वारा किया जाता है वहाँपर वचनरूप व्यवहारनयद्वारा प्रतिपादित व्यवहाररूप अर्थांशका नियमसे आक्षेप होता है । इसी प्रकार जहाँ वस्तुके व्यवहाररूप अर्थांशका प्रतिपादन वचनरूप व्यवहारनयद्वारा किया जाता है वहाँपर वचनरूप निश्चयनयद्वारा प्रतिपादित निश्चयरूप अर्थांशका नियमसे आक्षेप होता है । यही प्रक्रिया ज्ञानरूप निश्चय और व्यवहार नयोंद्वारा ज्ञाप्य निश्चय और व्यवहाररूप अर्थांशोंका ज्ञान करनेके विषयमें भी लागू कर लेना चाहिये ।

यदि एक अर्थांशके प्रतिपादन अथवा ज्ञानके साथ दूसरे अर्थांशका प्रतिपादन अथवा ज्ञान न हो तो ऐसी हालतमें सिर्फ एकका प्रतिपादक वचननय अथवा ज्ञापक ज्ञाननय दोनों ही गलत हो जावेंगे । यहाँपर स्पष्टीकरणके लिये यह दृष्टान्त दिया जा सकता है कि-वस्तुकी नित्यताका प्रतिपादन द्रव्यत्वरूपसे निश्चयनयात्मक वचनद्वारा तथा उसका ज्ञान भी द्रव्यत्वरूपसे निश्चय नयात्मक ज्ञानद्वारा यदि होता है तो इन्हें तभी सत्य माना जा सकता है जब कि पर्यायरूपसे उसकी अनित्यताका व्यवहारनयात्मक वचनद्वारा होनेवाला प्रतिपादन और व्यवहारनयात्मक ज्ञानद्वारा होनेवाला ज्ञान भी हमारे लक्ष्यमें हो । इसी प्रकार वस्तुकी अनित्यताका प्रतिपादन पर्यायरूपसे व्यवहारनयात्मक वचनद्वारा तथा उसका ज्ञान भी पर्यायरूपसे व्यवहारनयात्मक ज्ञानद्वारा यदि होता है तो इन्हें भी तभी सत्य माना जा सकता है जब कि द्रव्यत्वरूपसे उसकी नित्यताका निश्चयनयात्मक वचनद्वारा होनेवाला प्रतिपादन और निश्चयनयात्मक ज्ञानद्वारा होनेवाला ज्ञान भी हमारे लक्ष्यमें हो । ऐसा न होकर यदि अनित्यतासे निरपेक्ष केवल नित्यताका या नित्यतासे निरपेक्ष केवल अनित्यताका प्रतिपादन किसी वचनद्वारा हो रहा हो, इसी तरह अनित्यतासे निरपेक्ष केवल नित्यताका या नित्यतासे निरपेक्ष केवल अनित्यताका ज्ञान किसी ज्ञानद्वारा हो रहा हो तो इस प्रकारके वचन तथा ज्ञान दोनों ही नयात्मक नहीं रहेंगे, क्योंकि इनके विषयभूत नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों ही पदार्थके अंशके रूपमें नहीं किन्तु पूर्ण पदार्थके रूपमें ही वचनद्वारा प्रतिपादित होंगे और ज्ञानद्वारा ज्ञात होंगे । तब ऐसी हालतमें यदि उस नित्यतामें अभेदात्मकरूपसे अनित्यताका अथवा उस अनित्यतामें अभेदात्मकरूपसे ही नित्यताका अंश यदि समाया हुआ होगा तो उनके प्रतिपादक वचनों तथा उनके ज्ञापक ज्ञानोंको नयकोटिमें अन्तर्भूत न करके प्रमाणकोटिमें ही अन्तर्भूत करना होगा और यदि वस्तुमें नित्यताके द्वारा अनित्यताका अथवा अनित्यताके द्वारा नित्यताका सर्वथा लोप किया जा रहा होगा तो उस हालतमें उनके प्रतिपादक वचनों तथा ज्ञापक ज्ञानोंको प्रमाणाभासोंकी कोटिमें पटक देना होगा, क्योंकि पदार्थ न तो सर्वथा नित्य ही है और न सर्वथा अनित्य ही है ।

इसका तात्पर्य यह है कि जब वस्तु जैन-मान्यताके अनुसार कथंचित् अर्थात् निश्चय ( द्रव्यत्व ) रूपसे नित्य मानी गयी है तो इसका आशय यह भी है कि वह कथंचित् अर्थात् व्यवहार ( पर्याय ) रूपसे अनित्य भी है। इसी प्रकार जब वस्तु जैन-मान्यताके अनुसार कथंचित् अर्थात् व्यवहार ( पर्याय ) रूपसे अनित्य मानी गयी है तो इसका आशय यह भी है कि वह कथंचित् अर्थात् निश्चय ( द्रव्यत्व ) रूपसे नित्य भी है। इस प्रकार जैन मान्यताके अनुसार जब निश्चयनय वस्तुकी नित्यताको विषय करता है तो उसी समय व्यवहारनयसे वस्तुकी अनित्यता भी गृहीत होना चाहिये तथा जब व्यवहारनय वस्तुकी अनित्यताको विषय करता है तो उसी समय निश्चयनयसे वस्तुकी नित्यता भी गृहीत होना चाहिये। यदि ऐसा नहीं होता है तो सम्पूर्ण नयव्यवस्था ही गड़बड़ा जायगी।

प्रकृतमें इस विवेचनका उपयोग यह है कि यदि आप व्यवहारनयकी अपेक्षासे इस कथनको सही मान लेते हैं कि ‘जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है’ तो इसका आशय यही होता है कि आप निमित्तको कार्यके प्रति सहायक रूपसे वास्तविक कारण मानते हैं और जब आपकी दृष्टिमें भी निमित्तकारणकी वास्तविकता सिद्ध हो जाती है तो फिर आपका यह कथन गलत सिद्ध होता है कि ‘जब-जब विवक्षित कार्यके योग्य पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्ति होती है तब-तब उस कार्यके अनुकूल निमित्त मिलते ही हैं।’ फिर तो आपको यही स्वीकार करना होगा कि द्रव्यशक्ति विशिष्ट वस्तु अपनेमें निमित्तोंके सहयोगसे उत्पन्न पर्यायशक्तिसे युक्त होती हुई आगेकी पर्यायशक्तिको निमित्तोंके सहयोगसे ही अपनेमें उत्पन्न करती है और जहाँपर पहुँचनेके बाद जिस विवक्षित पर्यायशक्ति उत्पत्तिके अनुकूल निमित्त नहीं मिल पाते हैं या विरोधी निमित्तोंका सहयोग मिल जाता है तो उस विवक्षित कार्यकी उत्पत्ति वहाँपर न होकर जैसे निमित्तोंका योग मिलता है उसके अनुसार ही उस वस्तुकी पर्यायशक्तिका उस समय विकास होता है, क्योंकि वस्तुमें एक साथ अनेक पर्यायोंके विकासकी शक्तियाँ स्वाभाविकरूपसे विद्यमान रहा करती हैं जिनका विकास अपने-अपने अनुकूल निमित्त-कारणोंके आधारपर हुआ करता है।

इसलिये जिस प्रकार स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप कार्यमें उपादानोपादेयकी विवक्षासे उपादानभूत वस्तुके आश्रयसे उत्पन्न होनेके कारण अपने ढंगकी वास्तविकताको लिये हुए उपादेयतारूप धर्म विद्यमान रहता है उसी प्रकार निमित्तनैमित्तिकभावकी विवक्षासे निमित्तभूत वस्तुके सहयोगसे उत्पन्न होनेके कारण अपने ढंगकी वास्तविकताको लिये हुए नैमित्तिकतारूप धर्म भी विद्यमान रहता है।

यदि आप हमसे कहें कि स्वपरप्रत्ययरूप परिणमनमें पाया जानेवाला नैमित्तिकतारूप धर्म वास्तविक है तो फिर उसे असद्भूत व्यवहारनयका विषय नहीं कहना चाहिये, क्योंकि आगममें व्यवहारको भी जब सद्भूत और असद्भूत ऐसे दो भेदोंमें विभक्त किया गया है तो इसका फलितार्थ यही हो सकता है कि सद्भूत व्यवहारको भले ही वास्तविकताकी कोटिमें रख लिया जावे परन्तु असद्भूतव्यवहारको तो वास्तविकताकी कोटिमें रखना असंगत ही है। कारण कि ‘असद्भूतव्यवहार’ पदमें पठित ‘असद्भूत’ शब्द ही उसकी अवास्तविकताको बतला रहा है।

इसके विषयमें हमारा कहना यह है कि स्वपरप्रत्यय परिणमनमें निमित्त कारणकी उपयोगिताको तो विस्तारसे सिद्ध किया जा चुका है अब केवल एक ही बात स्पष्ट करनेके लिये रह जाती है कि जब निमित्तकारण वास्तविक है तो उसे असद्भूत व्यवहारकी कोटिमें क्यों रख दिया गया है ?

इसका भी स्पष्टीकरण इस प्रकारसे करना चाहिये कि आगममें सत्ताको वस्तुका निज धर्म या स्वभाव अंगीकार किया गया है, इसलिये सद्भूत धर्म वही हो सकता है जो वस्तुका निज धर्म हो। इसके अनुसार कार्यकारणभावके प्रकरणमें वस्तुके परिणमनमें पाया जानेवाला उपादेयतारूप धर्म चूँकि वस्तुके अपने अन्दर ही उत्पन्न होता है अतः उसे तो सद्भूत ही कहना होगा और वस्तुके उसी परिणमनमें पाया जानेवाला नैमित्तिकतारूप धर्म वस्तुके अपने अन्दर उत्पन्न होकर भी सहायक अन्य वस्तुके सहारे पर ही वस्तुमें उत्पन्न होता है, अतः आगन्तुक होनेके कारण उसे असद्भूत कहना अयुक्त नहीं है।

एक बात और है कि यदि असद्भूत व्यवहारनयका विषय अवास्तविक अर्थात् कल्पनारोपित होकर अभावात्मक ही है तो फिर उसके (असद्भूत व्यवहारनयके) उपचरित असद्भूत व्यवहारनय और अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनय ऐसे दो भेद करना असंगत ही हो जायगा। कारण कि अभावात्मक वस्तुमें उपचरित और अनुपचरितका भेद होना असंभव ही है।

बृहद्द्रव्यसंग्रहमें असद्भूतव्यवहारनयके उक्त अनुपचरित असद्भूतव्यवहारनय और उपचरित असद्भूतव्यवहारनय दो भेद मानकर उनके अलग अलग उदाहरण देनेका आशय यही है कि बृहद्द्रव्यसंग्रहके कर्ता की दृष्टिमें असद्भूतव्यवहारनयका विषय असद्भूत व्यवहार अभावात्मक वस्तु न होकर भावात्मक वस्तु ही है। दोनोंका अन्तर भी बिल्कुल स्पष्ट मालूम पड़ रहा है अर्थात् जीवमें पाया जानेवाला ज्ञानावरणादि आठ कर्मों तथा औदारिक आदि शरीरोंका कर्तृत्व अनुपचरित असद्भूत व्यवहार है और उसमें ( जीवमें ) पाया जानेवाला घट-पटादि पदार्थोंका कर्तृत्व उपचरित असद्भूत व्यवहार है। इस भेदका कारण यह है कि ज्ञानावरणादि कर्मों और औदारिक आदि शरीरोंका निर्माण जीव अपनेसे अपृथक् रूपमें ही किया करता है तथा घट-पटादिका निर्माण वह अपनेसे पृथक् रूपमें किया करता है।

यदि कहा जाय कि तत्त्वार्थसूत्रके सूत्र ‘सद्द्रव्यलक्षणम्’ (अ० ५ सू २९) के अनुसार सत्त्व वस्तुका निज स्वरूप होते हुए भी उसे तत्त्वार्थसूत्रके सूत्र ‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्’ ( अ० ५ सूत्र ३० ) के अनुसार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य स्वभाववाला स्वीकार किया गया है। इसका फलितार्थ यह है कि वस्तुमें परिणमन स्वभावसे ही हुआ करता है। उसमें निमित्तकारणके सहयोगकी आवश्यकताको स्वीकार करना अयुक्त ही है।

तो इस विषयमें हमारा कहना यह है कि ‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्’ इस सूत्रके अनुसार वस्तु परिणमनस्वभावाली है-यह तो ठीक है, परन्तु वह परिणमन स्वप्रत्ययके समान स्वपरप्रत्यय भी होता है इसका निषेध तो उक्त सूत्रसे होता नहीं है। यही कारण है कि वस्तुके स्वपरप्रत्यय परिणमनोंको सत्ता आगममें स्वीकार की गयी है तथा जैन-तत्त्वमीमांसामें श्री पं० फूलचन्द्रजीने और प्रश्न नं० ११ में आपने भी वस्तुके स्वपरप्रत्यय परिणमनोंको स्वीकार किया है। अतः आपके द्वारा अपने प्रत्युत्तरमें यह लिखा जाना कि-

‘जब प्रत्येक द्रव्य सद्रूप है और उसको उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य स्वभाववाला माना गया है तो ऐसी अवस्थामें उसके उत्पाद-व्ययको अन्य द्रव्यके कर्तृत्व पर छोड़ दिया जाय और यह मान लिया जाय कि अन्य द्रव्य जब चाहें उसमें किसी भी कार्यको उत्पन्न कर सकता है तो यह उसके स्वतंत्र सत् स्वभावपर आघात ही है।’-असंगत ही है। आपको परिणमनकी स्वपरप्रत्ययता भले ही विडम्बना प्रतीत होती हो, परन्तु यह व्यवस्था आगमके साथ-साथ प्रत्यक्षके और तर्कके भी प्रतिकूल नहीं है। यह बात पूर्वमें विस्तारपूर्वक सिद्ध की जा चुकी है।

आचार्योंने जो प्रत्येक कार्यमें अपने उपादानके साथ अन्तर्व्याप्ति और निमित्तोंके साथ बहिर्व्याप्ति स्वीकार की है उसका आशय यही है कि उपादान चूँकि कार्यरूप परिणत होता है, अतः उसके साथ कार्यकी अभिन्नता होनेके कारण वहाँ अन्तरंग व्याप्ति बतलायी गयी है और निमित्त चूँकि कार्यरूप परिणत नहीं होता, वह तो केवल कार्योत्पत्तिमें सहयोगी होता है इसलिये उसके साथ कार्यकी पृथक्ता बनी रहनेके कारण वहाँ बहिर्व्याप्ति स्वीकार की गयी है। पूर्वमें हम बतला भी चुके हैं कि उपादानकी कार्यके साथ एकद्रव्य-प्रत्यासत्तिरूप कारणता पायी जाती है, इसलिये वहाँ अन्तर्व्याप्ति आगममें स्वीकार की गयी है और निमित्तकी कार्यके साथ कालप्रत्यासत्तिरूप कारणता पायी जाती है इसलिये वहाँ बहिर्व्याप्ति आगममें स्वीकार की गयी है । अन्तर्व्याप्ति उपादानकी कार्यके साथ तन्मयताकी सूचना देती हैं, लेकिन बहिर्व्याप्ति निमित्तकी कार्यके साथ यद्यपि तन्मयताका निषेध करती है तो भी अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर उसके संयोगको कार्योत्पत्तिके लिये जब आवश्यक बतलाया गया है तो यही एक कारण है कि आचार्योंको निमित्तकी कार्यके साथ बहिर्व्याप्ति स्वीकार करनी पड़ी है। आप यही भी सोचिये कि उपादानकी महत्ता कार्यके प्रति तबतक रहा करती है जबतक कार्य विद्यमान रहता है, लेकिन निमित्तकी महत्ता तभीतक रहा करती है जबतक कार्य उत्पन्न नहीं हो जाता। कार्यके उत्पन्न हो जानेपर फिर निमित्तकी कुछ महत्ता नहीं रह जाती है। यही कारण है कि लोकमें उपादानका महत्त्व इस दृष्टिसे आँका जाता है कि कार्य कहाँतक स्थायी रह सकता हैं। लेकिन निमित्तका महत्त्व तबतक लोकमें आँका जाता है जबतक कार्य सुन्दरताके साथ उत्पन्न नहीं हो जाता। इस विवेचनसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ‘अन्तर्व्याप्तिके आधारपर कार्यका उपादान ही केवल वास्तविक कारण है, बहिर्व्याप्तिके आधारपर कार्यका निमित्त वास्तविक कारण नहीं है-ऐसी मान्यता भ्रमपूर्ण ही है।’

आगे आपने लिखा है कि ‘द्रव्य अन्वयी होनेके कारण जैसा नित्य है उसी प्रकार व्यतिरेकी स्वभाववाला होनेसे प्रत्येक समयमें वह उत्पाद-व्ययस्वभाववाला भी है, अतएव प्रत्येक समयमें वह कार्यका उपादान भी है और कार्य भी है। पिछली पर्यायकी अपेक्षा जहाँ वह कार्य है अगली पर्यायके लिये वहाँ वह उपादान भी है।’

सो ऐसा माननेमें हमारा कोई विरोध नहीं, हम भी ऐसा ही मानते हैं और वस्तुके स्वप्रत्यय परिणमनोंमें तो यही प्रक्रिया चालू रहती है, परन्तु वस्तुके जिन परिणमनोंमें जब विलक्षणताकी उद्भूति हो जाती है तब उन परिणमनोंमें उस विलक्षणताके आधार पर परिणमनोंका स्वतंत्र क्रम ही चालू हो जाता है। ऐसी वह विलक्षणता उनमें स्वतः नहीं होती है, वह तो तद्नुकूल निमित्तोंके सहारे पर ही हुआ करती है। जैसे खानमें पड़ी हुई मिट्टीका प्रतिक्षण परिणमन हो रहा है और फिर वही मिट्टी कुम्हारके घर पर कुम्हारके तदनुकूल प्रयत्न करने पर आ जाती है तो यह जो क्षेत्र परिवर्तन इस मिट्टीका हुआ वह क्या खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीकी क्षणिक पर्यायोंके क्रमसे हुआ ? तथा उस मिट्टीका आगे चलकर कुम्हारके प्रयत्नसे ही जो पिण्ड बन गया और इसके भी आगे कुम्हारके ही प्रयत्नसे उस मिट्टीकी स्थास, कोश और कुशूलके क्रमसे घटपर्याय बनी अथवा कुम्हारने अपनी इच्छासे उसकी घटपर्याय न बनाकर सकोरा आदि दूसरी नाना प्रकारकी पर्यायें बना दीं और या किसीने आकर अपने दण्ड प्रहारसे विवक्षित पर्यायको नष्टकर दूसरी पर्यायमें उस मिट्टीको पहुँचा दिया तो ये सब विलक्षण विलक्षण पर्यायें क्या मिट्टीकी क्षणिक क्रमिक पर्यायोंके आधार पर ही बन गयीं अथवा उस पर्यायके अनुकूल निमित्तोंकी सहायतासे ही ये पर्यायें उत्पन्न हुईं। इन सब बातों पर पूर्वमें विस्तारसे प्रकाश डालकर हम प्रत्यक्ष, तर्क और आगमप्रमाणोंके आधार पर विस्तारपूर्वक यह भी बतला आये हैं कि मिट्टीमें विद्यमान घटरूप परिणमनकी योग्यताके आधार पर होते हुए भी यह सब करामात निमित्तोंकी है, इसलिये आपका यह लिखना ही कि-‘संतानक्रमकी अपेक्षा प्रत्येक समयमें उसे ( वस्तुको ) उभयरूप ( कार्य और कारणरूप ) होनेके कारण निमित्त भी प्रत्येक समयमें उसी क्रमसे मिलते रहते हैं’ केवल सम्यक् मान्यता नहीं है। इसे सम्यक् मान्यता तो तब कहा जा सकता है जब कि जो निमित्त मिलते हैं उन्हें, जैसा कि आपने स्वयं स्वीकार कर लिया है, चाहे वे पुरुषके योग और रागभावसे प्राप्त हों अथवा चाहे विस्रसा प्राप्त हों, कार्योत्पत्तिमें उपयोगी स्वीकार कर लिया जावे, क्योंकि यदि कार्योत्पत्तिमें उनके उपयोगको स्वीकार नहीं किया जाता तो आपकी इस मान्यताका भी फिर कोई अर्थ नहीं रह जाता कि ‘उस समयमें नियत उपादानके अनुसार होनेवाले नियत कार्योंके नियत निमित्त मिलते अवश्य हैं।’ क्योंकि क्यों मिलते हैं? किस लिये मिलते हैं? या पुरुष उनके मिलानेका क्यों प्रयत्न करता है? इत्यादि समस्याऐं तो आपके सामने आपकी इस मान्यताको-कि उपादानसे ही कार्य उत्पन्न हो जाता है निमित्त तो वहाँ पर अकिञ्चित्कर ही बना रहता है-खण्डित करनेके लिये तैयार खड़ी हैं।

आगे आप फिर लिखते हैं कि ‘विविध लौकिक उदाहरणोंको उपस्थित कर जो अपनी चित्तवृत्तिके अनुसार कार्य-कारणपरंपराको बिठानेका प्रयत्न किया जाता है वह युक्तियुक्त नहीं है और न आगम-संगत है।’

इसके विषयमें हमारा कहना है कि उदाहरण लौकिक हों चाहें आगमिक हों, उनके विषयमें देखना तो यह हैं कि वे उदाहरण, अनुभव, तर्क तथा आगमप्रमाणोंके विरुद्ध तो नहीं है ? यदि वे उदाहरण आपकी दृष्टिसे अनुभव, तर्क तथा आगम प्रमाणोंके विरुद्ध हैं तो उनकी इस प्रमाण विरुद्धताको दिखलाना आपका कर्त्तव्य था जब कि हम अनुभव, तर्क और आगमप्रमाणोंसे उन उदाहरणोंकी संगति पूर्वमें बतला चुके हैं।

आपने चित्तवृत्तिके अनुसार कार्यकारणपरंपराको बिठानेमें असंगति बतलानेके लिये भी आचार्य अमृतचन्दके समयसारकलशका ‘आसंसारत एव धावति’-इत्यादि ५५ वां पद्य प्रमाण रूपसे उपस्थित किया है।

इसके विषयमें भी हमारा कहना यह है कि इससे निमित्तोंके साथ कार्यके वास्तविक कार्यकारणभावका निषेध नहीं होता है और न इस तरहके कार्यकारणभावके निषेध करनेकी आचार्य महाराजकी दृष्टि ही है। इस पद्यसे तो वे केवल इस बातका ही निषेध करना चाहते हैं कि लोकमें अधिकांश ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है कि प्राणी मोहकर्मके उदयके वशीभूत होकर अपने निमित्तसे होनेवाले कार्योंमें अपने अन्दर अहंकारका विकल्प पैदा करता रहता है जो मोहभाव होनेके कारण बन्धका कारण है, अतएव त्याज्य है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अपने निमित्तसे होनेवाले कार्योंमें अपनी निमित्तताका भान होना असत्य है। यदि अपने निमित्तसे होनेवाले कार्योंमें अपनी निमित्तताका ज्ञान भी असत्य हो जाय तो फिर मनुष्य किसी कार्यके करनेमें प्रवृत्त भी कैसे होगा? कुम्हारको यदि समझमें आ जाय कि घड़ेका निर्माण खानमें पड़ी हुई मिट्टीसे अपनी क्रमवर्ती क्षणिक पर्यायोंके आधार पर स्वतः समय आने पर हो जायगा तो फिर उसमें तदनुकूल पुरुषार्थ करनेकी भावना ही जाग्रत क्यों होगी? इसी प्रकार एक शिक्षकको यदि यह समझमें आ जावे कि छात्र अपनी क्रमवर्ती क्षणिक पर्यायोंके आधार पर स्वतः ही समय आने पर पढ़ लेगा तो फिर उसे तदनुकूल पुरुषार्थ करनेकी भावना क्यों जाग्रत होगी? इस सब कथनका रहस्य यह है कि निमित्तोंके सहारे पर कार्य निष्पन्न होता है वह सिद्धान्त ठीक है, इसका जिसे ज्ञान होता है वह भी ठीक है और इस ज्ञानके अनुसार जो कार्योत्पत्तिके लिये तदनुकूल पुरुषार्थ करता है वह भी ठीक है। परन्तु कार्योत्पत्तिके लिये उपयोगी अपनी निमित्तताके आधार पर यदि कोई मनुष्य उक्त विषयमें अहंकारी बन जाता है तो आचार्य अमृतचन्द्रने उक्त कलश पद्य द्वारा यह दर्शाया है कि ऐसा अहंकार करना बुरा है और वह कर्मबन्धका कारण है। विवेकी सम्यग्दृष्टि पुरुष कार्यके प्रति अपना-निमित्तरूप वास्तविक ज्ञान और व्यापार करते हुए

४२० जयपुर (खानियां) तत्त्वचर्चा

भी वे कभी अहंकारी नहीं बनते हैं। किन्तु दूसरोंद्वारा किये गये उपकारके प्रति हमेशा कृतज्ञ ही रहा करते हैं। आचार्य विद्यानन्दीने अपने ग्रन्थ आप्तपरीक्षाका आदिमें मंगलाचरण करते हुए यही लिखा है कि ‘न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरंति’ अर्थात् साधु ( सम्यग्दृष्टि ) पुरुष अन्य द्वारा कृत उपकारको कभी नहीं भूलते हैं। इसे पंचास्तिकाय (रायचन्द्रग्रन्थमाला पृष्ठ ५ पर) श्रीजयसेनाचार्यने भी उद्धृत किया है।

आगे आप लिखते हैं कि स्वामी समन्तभद्रने आप्तमीमांसामें और भट्टाकलंकदेव तथा आचार्य विद्यानन्दीने अष्टशती और अष्टसहस्रीमें ‘दोषावरणयोर्हानिः’ इत्यादि कथन उक्त ( कार्य केवल उपादान कारणसे ही निष्पन्न हो जाया करता है निमित्त तो वहाँ केवल अपनी हाजिरी दिया करते हैं ) तथ्यको ध्यानमें रखकर ही किया है, क्योंकि उक्त आचार्योंने ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ इत्यादि कथन उक्त कार्य-कारणपरंपराको ध्यानमें रखकर ही किया है।

आपके इस लेखमें आपके द्वारा यह माना जाना कि ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ यह कथन उक्त आचार्योंका है सो तो ठीक है, क्योंकि उपादान ही उत्तर पर्यायरूप परिणत होता है। परन्तु वह उत्तर पर्याय निमित्तसापेक्ष उत्पन्न नहीं होती है, ऐसा निर्णय तो उक्त वाक्यसे नहीं किया जा सकता है। और जब ‘दोषावरणयोर्हानिः’ इत्यादि कारिकाकी टीका अष्टसहस्रीमें भी श्री स्वामी विद्यानन्दीने निमित्तोंकी उपयोगिताको स्पष्टरूपसे स्वीकार किया है तो ‘कार्य केवल उपादानके बल पर ही उत्पन्न हो जाता है’ इसकी सिद्धिके लिये ‘दोषावरणयोर्हानिः’ इत्यादि इस कारिकाका और इसकी टीका अष्टशती तथा अष्टसहस्रीका प्रमाणरूपसे आपके द्वारा उपस्थित किया जाना गलत ही है। अष्टसहस्रीका वह कथन निम्न प्रकार हैं-

वचनसामर्थ्यादज्ञानादिर्दोषः स्वपरणामहेतुः (अष्टशती)। न हि दोष एव आवरणमिति प्रतिपादने कारिकाया दोषावरणयोरिति द्विवचनमसमर्थम्। ततस्तत्सामर्थ्यादावरणात् पौद्गलिकज्ञानावरणादिकर्मणो भिन्नस्वभावस्वाज्ञानादिर्दोषोऽभ्यूह्यते। तद्धेतुः पुनरावरणं कर्म जीवस्य पूर्वस्वपरिणामश्च। स्वपरिणामहेतुकः स्वाज्ञानादिरित्ययुक्तं, तस्य कादाचित्कत्वविरोधाज्जीवत्वादिवत्। परपरिणामहेतुक एवेत्यपि न व्यवतिष्ठते, मुक्तात्मनोऽपि तत्प्रसंगात्। सर्वस्य कार्यस्योपादानसहकारिसामग्रीजन्यतयोपगमात्तथा प्रतीतेश्च। तथा च दोषो जीवस्य स्वपरपरिणाम-हेतुकः, कार्यत्वात् माषपाकवत्।

अर्थ-आचार्य समन्तभद्रने कारिकामें ‘दोषावरणयोः’ ऐसा द्विवचन पदका प्रयोग किया है, इसलिये आवरणरूप पौद्गलिक ज्ञानावरणादि कर्मोंसे भिन्न ही अज्ञानादि दोषोंको जानना चाहिए। उन अज्ञानादि दोषोंकी उत्पत्तिका हेतु आवरण कर्म तथा जीवके अपने पूर्व परिणामको जानना चाहिये। अज्ञानादि दोष केवल जीवके स्वपरिणामनिमितक ही हैं-ऐसी मान्यता ठीक नहीं है, क्योंकि इस तरहसे तो उन अज्ञानादि दोषोंमें जीवत्वस्वभावकी तरह अनादिनिधनताकी प्रशक्ति हो जायगी। इसलिये यदि परपरिणाम निमितक ही अज्ञानादि दोषोंको माना जाय, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस तरहसे मुक्त आत्माओंमें भी अज्ञानादि दोषोंकी आपत्तिका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। दूसरी बात यह है कि सम्पूर्ण कार्योंकी उत्पति उपादान और सहकारी कारण सामाग्रीसे ही देखी जाती है तथा प्रतीति भी ऐसी ही होती है, इसलिये जीवमें जो अज्ञानादि दोष उत्पन्न होते हैं वे स्व अर्थात् उपादान और पर अर्थात् सहकारी दोनों कारणोंके बल पर ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे कार्य हैं जिस तरहकी कार्य होनेकी वजहसे उड़दका पाक उपादान और निमित्त उभय कारणोंके बलपर होता हुआ देखा जाता है।

उड़दका दृष्टान्त ऊपर भी राजवार्तिकके एक उद्धरणमें दिया गया है। भगवान् कुन्दकुन्दने जीवपरिणामहेदु’’ इत्यादि कथन द्वारा उपादान और निमित्त इस प्रकार दोनों कारणोंके बलसे कार्योत्पत्तिको स्वीकार किया है, अतः उनके उस कथनसे आपके पक्षकी पुष्टि होना असंभव ही है। ‘असंख्यातप्रदेशी जीवको जब जैसा शरीर मिलता है तब उसे उस रूप परिणमना पड़ता है’ आगमके इस कथनको स्वीकार करते हुए आपने आगे जो यह लिखा है कि ‘यहाँ भी उपादान और निमित्तों-की उक्त प्रकारसे कार्यकारणपरंपराको स्वीकार कर लेने पर ही सम्यक् व्यवस्था बनती है।’ इस कथनके समर्थनमें जो हेतुरूप कथन आपने अपने उत्तरमें किया है कि ‘क्योंकि उपादानरूप जीवमें स्वयं परिणमनकी योग्यता है, अतः वह शरीरको निमित्तकर स्वयं संकोच-विस्ताररूप परिणमता है।’ इसमें जीवके संकोच-विस्तार रूप परिणमनको उसकी अपनी तदनुकूल योग्यताके आधार पर स्वीकार करके भी उसमें आप यदि अन्वय तथा व्यतिरकके आधार पर शरीरकी सहकारिताको भी स्वीकार कर लेते हैं तो हमारे तथा आपके मध्य कार्य-कारणभावको लेकर कोई विवाद ही नहीं रह जाता है, परन्तु दुःख इस बातका है कि आगे अन्तमें आपने ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका उल्लेख करके अपनी गलत मान्यताको ही पुष्ट करनेका प्रयत्न किया है। और जब आप इस पद्यको भट्टाकलंकदेवसे समर्थित कहते हैं तो हमारे आश्चर्यका फिर कोई ठिकाना ही नहीं रह जाता है। इन्हीं बातोंको हम आगे स्पष्ट कर रहे हैं। वह पद्य पूरा निम्न प्रकार है :-

तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायश्च तादृशः ।
सहायास्तादृशाः सन्ति यादृशी भवितव्यता ॥

आपने इसका जो अर्थ किया है वह निम्न प्रकार हैः-

जैसी होनहार होती है उसके अनुसार बुद्धि हो जाती है, पुरुषार्थ भी वैसा होने लगता है और सहायक कारण (निमित्तकारण) भी वैसे मिल जाते हैं।

स्वामी समन्तभद्रने जो आप्तमीमांसा लिखी है उसमें उन्होंने तत्त्वव्यवस्थाको अनेकान्त और स्याद्-वादको दृष्टिमें रखकर ही स्थापित किया है। इस आप्त-मीमांसाके अष्टम परिच्छेदमें स्वामी समन्तभद्रने ८८ ८९, ९०, और ९१ वीं कारिकाओं द्वारा दैव और पुरुषार्थ दोनोंसे मिलकर अर्थसिद्धि हुआ करती है इस सिद्धान्तका विवेचन किया है।

प्रथम कारिकामें उन्होंने केवल दैवमात्रसे अर्थसिद्धि माननेवालोंके विषयमें जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि पुरुषार्थके बिना केवल दैवमात्रसे यदि अर्थसिद्धि स्वीकार की जाय तो दैवकी उत्पत्तिमें जो पुण्य और पापरूप आचरण ( पुरुषार्थ ) को कारण माना जाता है उसकी संगति किस प्रकार होगी ? यदि कहा जाय कि दैवकी उत्पत्ति उससे पूर्ववर्ती दैवसे मान लेनेपर पुरुषार्थसे दैवकी उत्पत्तिकी असंगतिका प्रश्न ही उपस्थित नहीं होगा तो इस तरह दैवसे दैवान्तरकी उत्पत्ति परंपरा चालू रहनेके कारण मोक्षके अभावका ही प्रसंग उपस्थित हो जायगा तथा पुण्यरूप, पापरूप और धर्मरूप जीवका पुरुषार्थ निरर्थक ही हो जायगा।

द्वितीय कारिकामें उन्होंने केवल पुरुषार्थमात्रसे अर्थसिद्धि माननेवालोंके विषयमें जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि दैवके बिना केवल पुरुषार्थमात्रसे यदि अर्थसिद्धि स्वीकार की जाय तो पुरुषार्थकी उत्पत्तिमें जो दैवको कारण माना जाता है उसकी संगति किस प्रकार होगी ? यदि कहा जाय कि पुरुषार्थकी उत्पत्तिको भी पुरुषार्थसे मान लेनेपर दैवसे पुरुषार्थकी उत्पत्तिकी असंगतिका प्रश्न ही उपस्थित नहीं होगा तो इस तरहसे फिर सभी प्राणियोंमें पुरुषार्थकी समान सार्थकताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा जो कि अयुक्त होगा। कारण कि अनेक प्राणियों द्वारा समान पुरुषार्थ करने पर भी जो फल वैषम्य देखा जाता है वह दैवको अर्थसिद्धिमें कारण माने बिना संगत नहीं हो सकता है।

तृतीय कारिकामें उन्होंने दैव और पुरुषार्थ दोनोंसे ही पृथक् पृथक् अर्थसिद्धि माननेवालोंके विषयमें जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि किसी अर्थसिद्धिमें दैवको और किसी अर्थसिद्धिमें पुरुषार्थको कारण माननेकी संगति स्याद्वाद सिद्धान्तको स्वीकार किये बिना संभव नहीं हो सकती है, अतः जो लोग स्याद्वाद सिद्धान्तके विरोधी हैं उनके मतसे किसी अर्थसिद्धिमें दैवको और किसी अर्थसिद्धिमें पुरुषार्थको कारण माना जाना संगत नहीं हो सकता है।

इसी तृतीय कारिकामें आगे उन्होंने दैव और पुरुषार्थ दोनों ही में युगपत् अर्थसिद्धिकी साधनता रहने के कारण अवक्तव्यताके ऐकान्तिक सिद्धान्त स्वीकार करनेवालोंके विषयमें जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि अवक्तव्यताके इस सिद्धान्तको अवक्तव्य शब्दसे प्रतिपादन करने पर स्ववचनविरोधरूप दोषका प्रसंग उपस्थित होता है।

इसके बाद अन्तमें चतुर्थ कारिका द्वारा उन्होंने दैव और पुरुषार्थ दोनोंकी पृथक् पृथक् रूपसे वक्तव्यता और अपृथक्रूपसे अवक्तव्यताके आधार पर सप्तभंगीका प्रदर्शन करते हुए जैन संस्कृति द्वारा मान्य परस्परसापेक्ष दैव और पुरुषार्थ उभयमें अर्थसिद्धिकी समान बलवाली साधनताका निष्ठापन किया है।

अष्टसहस्रीमें आप्तमीमांसाकी ८८ वीं कारिकाकी व्याख्या करते हुए अन्तमें आचार्य विद्यानन्दीने मोक्षकी सिद्धिको भी दैव और पुरुषार्थ दोनोंके सहयोगसे ही प्रतिपादित किया है। वह कथन निम्न प्रकार हैः-

मोक्षस्यापि परमपुण्यातिशयचारित्रविशेषात्मकपौरुषाभ्यामेव संभवात्’

अर्थ……परम पुण्यका अतिशय तथा चारित्र विशेषरूप पुरुषार्थ दोनोंके सहयोगसे मुक्तिकी भी प्राप्ति हुआ करती है।

इस प्रकार स्वामी समन्तभद्रद्वारा प्रस्थापित तथा श्रीमद् भट्टाकलंकदेव और आचार्य विद्यानन्दी द्वारा दृढ़ताके साथ समर्थित जैन संस्कृतिमें मान्य अर्थसिद्धिकी उक्त दैव और पुरुषार्थ उभयनिष्ठ साधनताके प्रकाशमें श्रीमद् भट्टाकलंकदेवने आप्तमीमांसाकी कारिका ८९ की टीका करते हुए अष्टशतीमें ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि उल्लिखित पद्य उद्धृत किया है और भट्टाकलंकदेवके अभिप्रायको न समझकर उन्हीं का बल पाकर श्री पं० फूलचन्द्रजोने अपनी जैन-तत्त्वमीमांसा पुस्तकमें तथा आपने अपने प्रत्युत्तरमें कार्यकी सिद्धि केवल समर्थ उपादानसे ही हो जाया करती हैं, निमित्त वहाँ पर अकिंचित्कर ही रहा करते हैं इस सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये उक्त पद्य उद्धृत किया है।

इस पदको लेकर हमें यहाँ पर इन बातोंका विचार करना है कि यह पद्य जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध क्यों है और यदि विरुद्ध है तो फिर श्रीमदकलंकदेवने इसका उद्धरण अपने ग्रन्थ अष्टशतीमें किस आशयसे दिया है तथा जैन संस्कृतिमें मान्य कारण-व्यवस्थाके साथ उसका मेल बैठता है तो किस तरह बैठता है? इतना ही नहीं, इसके साथ हमें इस बातका भी विचार-करना है कि इसकी सहायतासे श्री पं० फूलचन्द्रजी और आप कारण व्यवस्था सम्बन्धी अपने पक्षकी पुष्टि करनेमें कहां तक सफल हो सके हैं।

यह तो निश्चित है कि ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि रूपमें ग्रथित उक्त पथ आपके द्वारा प्रतिपादित उल्लिखित अर्थके आधार पर प्राणियोंकी अर्थसिद्धिके विषयमें जैन संस्कृतिद्वारा मान्य दैव और पुरुषार्थकी सम्मिलित कारणताका प्रतिरोध ही करता है। कारण कि उक्त पद्यके उक्त अर्थसे यही ध्वनित होता है कि प्राणियोंकी अर्थसिद्धि केवल भवितव्यताके अधीन है और यदि उस अर्थसिद्धिमें प्राणियोंकी बुद्धि, व्यवसाय एवं अन्य सहायक कारणोंकी अपेक्षा होती भी हो तो वे बुद्धि, व्यवसाय आदि सभी कारण भी उक्त पद्यके उक्त अर्थके अनुसार भवितव्यताकी अधीनतामें ही प्राप्त हुआ करते हैं।

चूंकि उक्त व्यवस्था जैन संस्कृतिमें मान्य नहीं है, किन्तु जैन संस्कृतिकी मान्यताके अनुसार प्राणियोंके प्रत्येक अर्थकी सिद्धिमें दैव और पुरुषार्थ दोनों ही परस्परके सहयोगी बन कर समानरूपसे कारण हुआ करते है, अतः उक्त पद्यकी जैन संस्कृतिकी मान्यताके साथ विरोधकी स्थिति निर्विवाद हो जाती है। इससे यह बात भी अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती है कि जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध होनेके कारण इस पद्यको आपके द्वारा अपने पक्षकी पुष्टिमें प्रमाणरूपसे उपस्थित किया जाना अनुचित ही है।

श्रीमदकलंकदेवने उक्त पद्यका उद्धरण जो आप्तमीमांसाकी ८९ वीं कारिकाकी अष्टशतीमें दिया है उसमें उनका आशय इससे साक्षाद् अपने पक्षकी पुष्टिका न होकर केवल पुरुषार्थसे अर्थसिद्धि माननेवाले दर्शनके खण्डन करनेमात्रका ही है। यही कारण है कि उक्त पद्यको उन्होंने जैन संस्कृतिका अंग न मानकर केवल लोकोक्तिके रूपमें ही स्वीकार किया है। यह बात उनके (श्रीमदकलंकदेवके) द्वारा उक्त पद्यके पाठके अनन्तर पठित ‘इति प्रसिद्धेः’ वाक्यांश द्वारा ज्ञात हो जाती है!

तात्पर्य यह है कि श्रीमदकलंकदेव उन लोगोंसे जो दैवकी उपेक्षा करके केवल पौरुषमात्रसे प्राणियोंकी अर्थसिद्धि मानते हैं-यह कहना चाहते हैं कि एक ओर तो तुम दैवके बिना केवल पुरुषार्थसे ही अर्थकी सिद्धि मान लेते हो और दूसरी ओर यह भी कहते हो कि अर्थसिद्धिमें कारणभूत बुद्धि व्यवसायादिकी उत्पत्ति या संप्राप्ति भवितव्यतासे ही हुआ करती है।

इस प्रकार बुद्धि-व्यवसायादिकी उत्पत्ति अथवा संप्राप्तिमें दैवकी कारणता प्राप्त हो जानेसे परस्पर विरोधी मान्यताओंको प्रश्रय प्राप्त हो जानेके कारण केवल पुरुषार्थसे ही अर्थसिद्धि हो जाती है यह मान्यता खण्डित हो जाती है।

एक बात और है कि उक्त पद्यका जो अर्थ आपने किया है वह स्वयं ही एक तरहसे आपकी इस मान्यताका विरोधी है कि ‘कार्य केवल भवितव्यता (समर्थ उपादान) से ही निष्पन्न हो जाया करते हैं, निमित्त उसमें अकिंचित्कर ही रहा करते हैं।’ क्योंकि उक्त पद्यार्थ हमें इस बातका संकेत देता है कि कोई भी कार्य भवितव्यता (उपादान शक्ति)के साथ साथ बुद्धि, व्यवसाय आदि कारणोंका सहयोग प्राप्त हो जानेपर ही निष्पन्न होता है। केवल इतनी विशेषता उससे अवश्य प्रगट होती है कि बुद्धि, व्यवसाय आदि सभी दूसरे कारण भवितव्यके अनुसार ही प्राप्त हुआ करते हैं। लेकिन इस तरहसे उसे बुद्धि, व्यवसाय आदिमें कारणताका निषेधक नहीं कहा जा सकता है।

यदि कहा जाय कि उक्त पद्य जब उक्त प्रकारसे भवितव्यताके साथ साथ बुद्धि व्यवसाय आदिको भी कार्यके प्रति कारण बतला रहा है तो फिर उसे जैन संस्कृतिमें मान्य कारण व्यवस्थाका विरोधी कहना ही गलत है। तो इस विषयमें हमारा कहना यह है कि पद्यमें कार्यके प्रति भवितव्यताके साथ साथ कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिका उल्लेख किया गया है, उनकी उत्पत्ति अथवा संप्राप्तिको उसी भवितव्यताकी दया पर छोड़ दिया गया है जो इस कार्यकी जननी है। बस, यही उसमें असंगति है और इस लिये वह जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध है, क्योंकि जिस भवितव्यतासे कार्यकी उत्पत्ति होती है उसी भवितव्यतासे उस कार्यमें कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिकी उत्पत्ति अथवा संम्प्राप्तिको जैन संस्कृतिमें मान्य नहीं कहा गया है। कारण कि कार्यकी उत्पत्ति जिस भवितव्यतासे होती है उसी भवितव्यतासे कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिकी उत्पत्ति अथवा संप्राप्तिकी स्वीकृतिका कोई अर्थ हीं नहीं रह जाता है अर्थात् जब वह भवितव्यता ही कार्योत्पत्तिके साथ साथ उसमें कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिको भी जुटा देती है तो फिर अकेली भवितव्यता ही कार्यको उत्पन्न कर सकती है, अतः उसकी उत्पत्तिके लिये बुद्धि, व्यवसाय आदि साधनोंकी आवश्यकता नहीं रहना चाहिए।

यदि आप कहें कि इसीलिये ही कार्यकी उत्पत्ति आपके मतमें केवल उपादानसे स्वीकार की गयी है। तो इसपर हमारा कहना यह है कि उक्त पद्य भी जब भवितव्यताके साथ बुद्धि, व्यवसाय आदिकी उपयोगिताको कार्यसिद्धिमें स्वीकार कर रहा है तो इस पद्यको कार्य-कारणभावकी आपके लिये मान्य व्यवस्थाका समर्थक कैसे कहा जा सकता है ?

श्री पं० फूलचन्द्रजीने तो जैन तत्त्वमीमांसाके उपादान-निमित्तमीमांसा प्रकरणमें पृष्ठ ६७ पर पंडितप्रवर टोड़रमलजीके मोक्षमार्गप्रकाशक अधिकार ३ पृष्ठ ८१ का उद्धरण देकर यह सिद्ध करनेका प्रयास किया है कि ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यमें प्रतिपादित कारणव्यवस्थाको जैन संस्कृतिमें भी इसी ढंगसे स्वीकार किया गया है, क्योंकि पं० प्रवर टोडरमलजीने भी अपने कथनमें कार्यके प्रति कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिको भवितव्यताकी अधीनता पर ही छोड़ दिया है। उनका वह कथन निम्न प्रकार हैः-

जो इनकी सिद्धि होय तो कषाय उपशमनतें दुःख दूर होइ जाइ सुखी होइ। परन्तु इनकी सिद्धि इनके किये उपायनके आधीन नाहीं, भवितव्यके आधीन है। जातें अनेक उपाय करते देखिये है अर सिद्धि न हो है। बहुरि उपाय बनना भी अपने आधीन नहीं, भवितव्यके आधीन है। जातें अनेक उपाय करना विचारै और एक भी उपाय न होता देखिये है। बहुरि काकतालीयन्याय करि भवितव्य ऐसी ही होय जैसा आपका प्रयोजन होइ तैसा ही उपाय होइ अर तातैं कार्यकी सिद्धि भी होइ जाइ तो तिस कार्य सम्बन्धी कोई कषायका उपशम होइ।

पं० फूलचन्द्रजीने पंडितप्रवर टोडरमलजीके इस कथनके विषयमें अपना मंतव्य भी वहीं पर लिख दिया है कि ‘यह पं० प्रवर टोडरमलजीका कथन है-मालूम पड़ता है कि उन्होंने ( पं० प्रवर टोडरमलजीने ) ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि इस श्लोकको ध्यानमें रखकर ही यह कथन किया है, इसलिये इसे उक्त अर्थके समर्थनमें ही जानना चाहिये।’

इस विषयमें हमारा कहना यह है कि पं० फूलचन्द्रजी पं० प्रवर टोडरमलजीके उल्लिखित कथनसे जो उक्त अर्थ फलित कर रहे हैं वह ठीक नहीं है, क्योंकि हम बतला आये हैं कि जैन संस्कृतिमें केवल भवितव्यसे कार्य-सिद्धि न मानकर भवितव्य और पुरुषार्थ दोनोंके परस्पर सहयोगसे ही कार्यसिद्धि मानी गयी है। इसलिये जैन संस्कृतिके इस सिद्धान्तको ध्यानमें रखकर ही पं० प्रवर टोडरमलजीके कथनका आशय निकालना चाहिये।

पुनश्च इसी मोक्षमार्गप्रकाशकमें पं० टोडरमलजीने भवितव्यता और पुरूषार्थका दूसरे ढंगसे निम्न प्रलार कथन किया है-

काललब्धि या होनहार तो किछु वस्तु नाहीं। जिस काल विषैं कार्य बनै सोई काललब्धि और जो कार्य भया सोइ होनहार। बहुरि जो कर्मका उपशमादिक है सो पुद्गलकी शक्ति है। ताका आत्मा कर्ता-हर्ता नाहीं। बहुरि पुरुषार्थ उद्यम करिए है सो यहु आत्मका कार्य है। तातै आत्माको पुरुषार्थ करि उद्यम करनेका उपदेश दीजिए है। तहाँ यह आत्मा जिस कारणते कार्यसिद्धि अवश्य होय, तिस

कारणरूप उद्यम करै, तहाँ तो अन्य कारण मिलें ही मिलें, अर कार्यकी सिद्धि ही होय। बहुरि जिस कारण से कार्यसिद्धि होय अथवा नाहीं भी होय, तिस कारणरूप उद्यम करे, तहाँ अन्य कारण मिले तो कार्य सिद्ध होय, न मिले तो सिद्ध न होय। सो जिनमत विषें जो मोक्षका उपाय कहा है, सो इसते मोक्ष होय ही होय। तातें जो जीव पुरुषार्थ करि जिनेश्वरके उपदेश अनुसार मोक्षका उपाय करे है ताके काललब्धि वा होनहार भी भया और कर्मका उपशमादि भया है, तो यहु ऐसा उपाय करे है तातै जो पुरुषार्थ करि मोक्षका उपाय करे है ताके सर्व कारण मिले ऐसा निश्चय करना अर वाके अवश्य मोक्षकी प्राप्ति हो है।

श्री पं० फूलचन्द्रजीने मोक्षमार्गप्रकाशकके जो वाक्य उद्धृत किये हैं उनका अर्थ उपरोक्त वाक्योंको ध्यानमें रखकर करना चाहिये।

यह भी बात है कि पं० प्रवर टोडरमलजीके उक्त कथनसे यह तो प्रगट होता नहीं कि कार्यकी सिद्धि केवल भवितव्यसे ही हो जाती है, उसमें पुरुषार्थ अपेक्षित नहीं रहता है। वे तो अपने उक्त कथनसे इतनी ही बात कहना चाहते हैं कि कितने ही उपाय करते जाओ, यदि भवितव्य अनुकूल नहीं है तो कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है। लेकिन यह निष्कर्ष तो कदापि नहीं निकाला जा सकता है कि यदि भवितव्य अनुकूल है तो विना पुरुषार्थके ही अर्थकी सिद्धि हो सकती है।

जैसे मिट्टीमें पट बननेकी योग्यता नहीं है तो जुलाहा आदि निमित्त सामग्रीका कितना ही योग क्यों न मिलाया जावे, उस मिट्टीसे पटका निर्माण असंभव ही रहेगा, लेकिन इससे यह निष्कर्ष कदापि नहीं निकाला जा सकता है कि मिट्टीमें घटनिर्माणकी योग्यता विद्यमान है तो कदाचित् कुम्भकार आदि निमित्त सामग्रीके सहयोगके बिना ही घटका निर्माण हो जायगा। सत्य बात तो यह है कि एक ओर तो मिट्टीमें घटनिर्माणकी योग्यताके अभावमें जुलाहा आदि निमित्त सामग्रीका सहयोग मिट्टीसे पटनिर्माणमें सर्वदा असमर्थ ही रहेगा और दूसरी ओर उस मिट्टीसे घटका निर्माण भी तभी संभव होगा जब कि उसे कुम्भकार आदि निमित्त सामग्रीका अनुकूल सहयोग प्राप्त होगा और जब कुम्भकार आदि निमित्त सामग्रीका अनुकूल सहयोग प्राप्त नहीं होगा तब अन्य प्रकारकी अनुकूल निमित्त सामग्रीका सहयोग मिलनेके सबब तदनुकूल अन्य प्रकारके कार्योंकी निष्पत्ति होते हुए भी उस मिट्टीसे घटका निर्माण कदापि संभव नहीं होगा।

पं० प्रवर टोडरमलजीके उक्त कथनका यह भी अभिप्राय नहीं है कि अमुक मिट्टीसे चूंकि घटका निर्माण होना है, अतः उसकी प्रेरणासे कुम्भकार तदनुकूल व्यापार करता है, क्योंकि यह बात अनुभवके विरुद्ध है। लोकमें कोई भी व्यक्ति किसी भी कार्यके करते समय यह अनुभव नहीं करता है कि अमुक वस्तुसे चूंकि अमुक कार्य निष्पन्न होना है, इसलिये मेरा व्यापार तदनुकूल हो रहा है। वह तो कार्योत्पत्तिके अवसर पर केवल इतना ही जानता है कि अमुक वस्तुसे चूंकि अमुक कार्य सम्पन्न हो सकता है और तब इस आधारपर वह प्रयोजनवश तदनुकूल व्यापार करने लगता है और यही कारण है कि वस्तुगत कार्य योग्यताका कदाचित् ठीक ठीक ज्ञान न हो सकनेके कारण अथवा स्वगत कार्य कर्तृत्वकी अकुशलताके कारण या दूसरी सहकारी सामग्रीके ठीक ठीक अनुकूलता न होने अथवा बाधक सामग्रीके उपस्थित हो जाने पर अनेकों बार व्यक्तिके हाथमें असफलता ही रह जाया करती है।

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि भवितव्यता हो और तदनुकूल उपाय किये जावें तो विवक्षित कार्य की सिद्धि नियमसे होगी तथा भवितव्यता हो लेकिन उपाय न किये जावें या प्रतिकूल उपाय किये जावें तो कार्यकी सिद्धि नहीं होगी । इसी तरह कार्यकी सिद्धिके लिये उपाय तो किये जावें लेकिन तदनुकूल भवितव्यता नहीं है तो भी कार्यकी सिद्धि नहीं होगी । अलावा इसके यह भी विकल्प संभव है कि भवितव्यता हो, तदनुकूल उपाय भी किये जावें, लेकिन साथमें बाधक सामग्री भी वहाँ पर विद्यमान हो तो भी कार्यकी सिद्धि नहीं होगी ।

इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पंडित फूलचन्द्रजी पं० प्रवर टोडरमलजीके कथनसे जो ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका समर्थन कर लेना चाहते हैं वह ठीक नहीं है । यद्यपि पं० प्रवर टोडरमलजीने अपने उल्लिखित कथनमें यह अवश्य लिखा है कि-

‘बहुरि उपाय बनना भी अपने आधीन नाहीं भवितव्यके आधीन है’ परन्तु इससे भी पं० फूलचन्द्रजीके इस अभिप्रायका समर्थन नहीं होता है कि ‘जो भवितव्यता कार्यकी जनक है वही भवितव्यता उस कार्यमें कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिकी भी जनक है ।’

हमारे इस कथनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है कि पं० टोडरमलीके कथनमें सामान्यतया चेतनरूप और अचेतनरूप सभी तरहके कार्योंकी उपादान शक्तिको नहीं ग्रहण किया गया है, इसलिये ऐसी भवितव्यता जीवके पारिणामिक भावरूप भव्यत्व या अभव्यत्व हो सकते हैं अथवा कर्मके यथासंभव उदय, उपशम, क्षयोपशम अथवा क्षयसे प्राप्त कार्यसिद्धिके अनुकूल जीवकी योग्यता हो सकती है ।

अब यहाँ पर ध्यान इस बात पर देना है कि मान लीजिये-किसी व्यक्तिमें धनी बननेकी योग्यता है लेकिन केवल योग्यताका सद्भाव होनेमात्रसे तो वह व्यक्ति धनी नहीं बन जायेगा । यही कारण है कि ऐसी मान्यता जैन संस्कृतिकी नहीं है, अतः जैन संस्कृतिकी मान्वताके अनुसार उस व्यक्तिको धनी बननेके लिये अपनी बुद्धिका तद्नुकूल उपयोग करना होगा, पुरुषार्थ भी उसी जातिका करना होगा और उसमें तदनुकूल अन्य सहकारी कारण भी अपेक्षित होंगे ।

यह जो कहा जाता है कि उस व्यक्तिमें पायी जानेवाली धनी बननेकी योग्यता ही ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यके आशयके अनुसार बुद्धि, पुरुषार्थ तथा अन्य सहकारी साधन-सामग्रीको संगृहीत कर लेगी तो यह कथन अनुभवविरुद्ध होनेके कारण जैन संस्कृतिके विरुद्ध है-यह बात हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं । इतना होने पर भी हम यह मानते हैं कि जैन संस्कृतिके अनुसार भी व्यक्तिमें बुद्धिका उद्भव तदनुकूल ज्ञानावरणके क्षयोपशमरूप योग्यता ( भवितव्यता ) का ही कार्य है और यही बात पुरुषार्थके विषयमें भी कही जा सकती है कि वह भी तदनुकूल कर्मके क्षयोपशमरूप भवितव्यताका ही कार्य है । इस लिये पं० प्रवर टोडरमलजीने जो यह लिखा है कि ‘उपाय बनना अपने आधीन नाहीं, भवितव्यके आधीन है’-वह न तो असंगत है और न जैन संस्कृतिके ही विरुद्ध है । कारण कि प्राणियोंकी अर्थसिद्धिमें जो भी बुद्धि, व्यवसाय (पुरुषार्थ) आदि उपाय अपेक्षित रहते हैं वे सब उपाय अपने अपने अनुकूल ज्ञानावरण आदिके क्षयोपशम आदि रूप भवितव्यताके ही कार्य हुआ करते हैं ।

इस प्रकार यदि यही दृष्टि यदि ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका अर्थ करनेमें अपना ली जावे तो फिर इसके साथ भी जैन संस्कृतिमें मान्य कारणव्यवस्थाका कोई विरोध नहीं रह जाता है ।

अन्तमें थोड़ा इस बात पर भी विचार करना चाहिये कि यदि बुद्धि, व्यवसाय आदि सभी कारण कलापकी जननी या संग्राहिका वही भवितव्यता है जो कार्यको जननी होती है तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा कार्य करनेका संकल्प भी उसी भवितव्यताके अनुकूल ही होना चाहिये । हमारी बुद्धि पर, हमारे पुरुषार्थ पर और अन्य सहकारी साधन सामग्री पर तो उस भवितव्यताका आधिपत्य हो, केवल हमारे संकल्प पर उसका आधिपत्य न हो यह बात बहुत अटपटी मालूम पड़ती है। इस तरह मनुष्य चाहता तो कुछ है और हो कुछ जाता है यह स्थिति कदापि उत्पन्न नहीं होना चाहिये।

एक और भी अर्थ ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका होता है वह यह है कि-जिस कार्यके अनुकूल वस्तुमें उपादान शक्ति हुआ करती है समझदार व्यक्ति उस वस्तुसे उसी कार्यको सम्पन्न करनेकी बुद्धि ( भावना ) किया करता है और वह पुरुषार्थ ( व्यवसाय ) भी तदनुकूल ही किया करता है तथा वह वहाँ पर तदनुकूल ही अन्य सहायक साधन सामग्रीको जुटाता है।

इस तरह उक्त पद्यका यदि यह अर्थ स्वीकार कर लिया जाय तो भी इसके साथ जैन संस्कृतिकी कारण व्यवस्थाका विरोध नहीं रह जाता है, लेकिन यह बात तो निश्चित समझना चाहिये कि ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका कोई भी अर्थ क्यों न कर लिया जाय यदि वह अर्थ जैन संस्कृतिकी मान्यताके अनुकूल होगा तो उससे आपके ‘भवितव्यतासे ही कार्यकी सिद्धि हो जाया करती है निमित्त वहाँ पर अकिंचित्कर ही रहा करते हैं’ इस मतकी पुष्टि नहीं होगी और जैसा अर्थ आपने उक्त पद्यका किया है यदि उसे ही पद्यका सही अर्थ माना जाय तो जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध होनेके कारण उसका आपके द्वारा प्रमाणरूपसे उपयोग करना अनुचित माना जायगा।

कुछ विचारणीय बातें

जिस प्रकार स्त्री अपने गर्भाशयमें गर्भधारण करके संतान उत्पन्न करती है, परन्तु उस गर्भके धारण करनेके लिये पुरुषका निमित्त उसको अनिवार्य आवश्यक होता है। सती, विधवा और अवन्ध्या स्त्री इस कारण सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकती, क्योंकि उसको पुरुषका निमित्त नहीं मिलता।

उपादानके अन्दर अनन्त शक्तियाँ विद्यमान हैं और जब जिस शक्तिके विकासके योग्य निमित्त मिल जाते हैं तब वह शक्ति विकासको प्राप्त हो जाती है। रसोइया परांतमें गेहूँका आटा माढ़ कर रक्खे हुए है। भोजन करनेवालेकी इच्छानुसार वह उसी आटेमेंसे कभी रोटी बनाता है, कभी पुड़ी बनाता है और कभी परायठा बनाता है। रसोइया इन सब चीजोंको बराबर आवश्यकतानुसार बदल-बदल कर बनाता चला जाता है। भोजन करनेवाले भोजन भी करते जाते हैं। उक्त रोटी, पुड़ी और परायठेके निमित्त यथायोग्य अलग-अलग भी हैं और एक भी हैं। यहाँ पर विचारणीय बात नाना शक्तियोंकी है कि जितना गेहूँ पीसा गया वह एक ही चक्कीसे पीसा गया और उस सम्पूर्ण आटेमें पिसे हुए गेहूँके प्रत्येक दानेका अंश समा गया और उस सभी आटेको पानी डालकर माढ़ दिया गया। इस तरह गेहूँके प्रत्येक दानेका अंश रोटीमें पहुँचा, पुड़ीमें पहुँचा और परायठेमें भी पहुंचा, इससे सिद्ध हुआ कि गेहूँके प्रत्येक दानेमें रोटी बननेकी शक्ति थी, पुड़ी बननेकी शक्ति थी, और परायठा बननेकी शक्ति थी। विकास उसकी उस शक्तिका हुआ जिसके विकासके लिये रसोइयाकी इच्छाशक्ति, बुद्धिशक्ति और श्रमशक्तिका योग प्राप्त हुआ।

आप लोगोंको तत्त्वचर्चामें आये प्रश्नोंका उत्तर लिखना है वह न तो केवल आत्माके द्वारा लिखा जा सकता है, क्योंकि आत्मा स्वयं अशरीरी है। उसके हाथ, पैर, आँख, अंग-उपांग नहीं है। इसी तरह प्रश्नोंका उत्तर लिखनेके लिये जहाँ आपको हाथ, आँख आदि शरीरके अवयवोंकी आवश्यकता है वहाँ उनके साथ प्रकाश; लेखनी, स्याही, कागज आदि बाह्य साधनोंकी भी आवश्यकता है। इनमेंसे आवश्यक किसी एक साधनकी क़मी रह जाय तो प्रश्नोंका उत्तर नहीं लिखा जा सकेगा। इसके सिवाय विघ्न करनेवाले प्रतिबन्धक कारणोंका अभाव भी मिलना चाहिये, रात्रिमें लिखते समय बिजली फैल हो जावे, दीपक बुझ जावे, शरीरमें भयानक वेदना उत्पन्न हो जावे तो प्रश्नोंका उत्तर लिखना असंभव हो जायगा।

मनुष्य जब पैदल चलता है तो उसकी गति धीमी होती है, जब वह तांगे पर सवार होकर यात्रा करता है तब वह अपने लक्ष्य पर जल्दी पहुँच जाता है, जब वह साइकलसे जाता है तो तांगेकी अपेक्षा और भी शीघ्र अपने लक्ष्य पर पहुंच जाता है। दूरवर्ती नगरमें पहुँचनेके लिये वह रेलगाड़ीसे जाता है तब और शीघ्र पहुँच जाता है। यदि और भी शीघ्र पहुँचनेकी इच्छा होती है तो वह मोटर द्वारा सफर करता है और अत्यन्त शीघ्र पहुँचनेके लिये हवाई जहाजका भी उपयोग करता है। स्वर्गीय सम्राट् पंचमजार्ज सन् १९१२ में इंगलैंडसे दिल्ली आये थे तब हवाई जहाज नहीं थे, अतः समुद्री जहाजमें बैठ कर आये थे और एक मास में भारत पहुँचे थे। अभी २-३ वर्ष पहले जब उनकी पौत्री साम्राज्ञी एलजावेथ भारत आयीं तब वे एक ही दिनमें हवाई जहाज़ द्वारा इंगलैण्डसे भारत पहुँच गयी थीं। कुछ समय बाद जब अतिस्वन ( सुपर सोनिक ) विमान चालू हो जायँगे तब लन्दनसे दिल्लीकी यात्रा ४-५ घंटे की रह जायगी। आज अमेरिका और रूस में चंद्रमा पर पहुंचनेकी होड़ लगी हुई है। उपादान अपने विकासमें निमित्तोंके कितने अधीन है इसका पता उपर्युक्त उदाहरणोंसे सहज ही में लग जाता है।

मुद्गरादिव्यापारानन्तरं कार्योत्पादवत् कारणविनाशस्यापि प्रतीतेः, विनष्टो घट उत्पन्नानि कपालानीति व्यवहारद्वयसद्भावात्-अष्टसहस्री पृष्ठ २०० कारिका ५३

अर्थ-मुद्गर आदिके व्यापारके अनन्तर घटका विनाश और कपालोंका उत्पाद होता हुआ देखा जाता है।

यहाँ पर इतना आशय लेना है कि मुद्गरकी घटके विनाश और कपालोंके उत्पादमें निमित्तता स्वीकार की गयी है। आगे अष्टसहस्री पृष्ठ २०० पर ही लिखा है :-

तस्मादयं विनाशहेतुर्भावमभावीकरोतीति न पुनरकिंचित्करः।

अर्थ-इसलिये घटविनाशका हेतुभूत मुद्गर भावात्मक पदार्थको अभावात्मक बना देता है तो इसे अकिंचित्कर कैसे कहा जा सकता है ?

इस कथनसे निमित्तकारणकी अकिंचित्करताका स्पष्ट खण्डन हो जाता है। इससे सम्बन्ध रखनेवाला बहुतसा विवेचन और आगमप्रमाण प्रश्न संख्या १, ५, ८, १०, ११, और १७ में भी मिलेंगे। अतः कृपया वहाँ पर देखनेका कष्ट कीजियेगा।

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मंगलं भगवान वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका ६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग १/४)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ४२९ से ४४५

↑ सूची


शंका ६

मूल प्रश्न ६-उपादानकी कार्यरूप परिणतिमें निमित कारण सहायक होता है या नहीं ?

प्रतिशंका ३ का समाधान

इस प्रश्नका पहली वार उत्तर देते हुए हमने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ. ५ सू० १६ पृ० ४१० के आधारसे यह स्पष्ट कर दिया था कि 'निश्चय नयसे प्रत्येक द्रव्यके उत्पादादिक विस्रसा होकर भी व्यवहार नयसे ही वे सहेतुक प्रतीत होते हैं। इस पर प्रतिशंका २ उपस्थित करते हुए अपर पक्षने कार्यमें योग्य द्रव्य-शक्तिको अन्तरंग कारण और बलाधानमें सहायकको बहिरंग कारण बतलाकर लिखा था कि-‘जब जब शक्ति व्यक्तिरूपसे आती है तब तब निमित्तकी सहायतासे ही आती है।’ इसी सिलसिलेमें अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण उपस्थित करते हुए सिद्धान्तविरुद्ध अनेक बातें लिखकर और कुछ आगमप्रमाण उपस्थित कर उसके बाद लिखा था कि 'पदार्थमें क्रियाकी शक्ति है और वह रहेगी, किन्तु पदार्थ क्रिया तभी करेगा जब बहिरंग कारण मिलेंगे। जब तक बहिरंग कारण नहीं मिलेंगे वह क्रिया नहीं कर सकता, अर्थात् उसकी शक्ति व्यक्तिरूपमें नहीं आ सकती, जिसके 'द्वारा शक्ति व्यक्ति रूपमें आती है या जिसके बिना शक्ति व्यक्ति रूपमें नहीं आ सकती वही बहिरंग कारण या निमित्त कारण है या वही बलाधान निमित्त है।

आगे अपर पक्षने परमतमें प्रसिद्ध भरत मुनिके नाट्य-शास्त्रमें लिखे गये रसके लक्षणको प्रमाण रूपमें उपस्थित कर यह भी लिखा था कि ‘इससे स्पष्ट है कि मानव हृदयमें विभिन्न प्रकारके रसोंकी उत्पत्ति ही बहिरंग साधनोंकी देन है।’ आदि।

इस प्रकार अपर पक्षने अपनी उक्त प्रतिशंकामें यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया था कि जब भी कार्यके योग्य द्रव्यशक्ति कार्यरूप होती है तब वह बहिरंग साधनोंके द्वारा ही कार्यरूप परिणमती है, अन्यथा नहीं। अपर पक्षने इस प्रतिशंका द्वारा अपने पक्षके समर्थनमें वैदिक धर्मानुयायी भरतमुनिका एक ऐसा भी प्रमाण आगमरूपमें उपस्थित किया है जिसे आगम नहीं माना जा सकता। मालूम पड़ता है कि अपर पक्ष इस सीमाको माननेके लिये भी तैयार नहीं है कि इष्ट विषयकी पुष्टिमें मूल परम्पराके अनुरूप आचार्यों द्वारा निबद्ध किये गये शास्त्रोंके ही प्रमाण दिये जाँय । यही कारण है कि कहीं उसकी ओरसे लौकिक प्रमाण देकर अपने विषयकी पुष्टि करनेका प्रयत्न किया गया है और कहीं उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण बतलाकर अपने विषयको पुष्ट किया है। हम नहीं कह सकते कि अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनके लिये यह मार्ग क्यों अपनाया है, जब कि आगमसे प्रत्येक विषयका समुचित उत्तर प्राप्त किया जा सकता है।

हम अपना द्वितीय उत्तर लिखते समय इन सब बातोंमें तो नहीं गये। मात्र आगम प्रमाणोंके आधार से पुनः यह सिद्ध किया कि उपादान केवल द्रव्यशक्ति न होकर अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यका नाम उपादान है। वह किसीके द्वारा परिणमाया न जा कर स्वयं अपने कार्यको करता है और जब वह अपने कार्यको करता है तब अन्य बाह्य सामग्री उसमें निमित्त होती है। उस उत्तरमें हमने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आगममें बाह्य सामग्रीको निमित्त और कार्यकारी व्यवहार नयकी अपेक्षा बतलाया गया है । और अंतमें भट्टाकलंकदेवके द्वारा प्रतिपादित ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि कारिका उपस्थित कर यह सिद्ध कर दिया है कि भवितव्यताके अनुसार बुद्धि होती है, वैसा ही प्रयत्न होता है और सहायक भी उसीके अनुरूप मिलते हैं ।

किन्तु जान पड़ता है कि अपर पक्ष आगमिक कार्य-कारणपद्धतिमें अपने पक्षका समर्थन नहीं समझता । उस पक्षका यह दृष्टिकोण पांचवें प्रश्न पर उपस्थित की गई प्रतिशंका ३ से बिलकुल स्पष्ट हो जाता है । वहां उस पक्षने केवलज्ञानकी अपेक्षा आगम प्रतिपादित हमारे अभिप्रायको स्वीकार करके भी श्रुतज्ञानकी अपेक्षा विवादको नया मोड़ देते हुए लिखा है कि ‘भगवान्‌के ज्ञानमें जिस कालमें जिस वस्तुका जैसा परिणमन झलका है वह उसी प्रकार होगा । प्रत्येक सम्यग्दृष्टिकी ऐसी ही श्रद्धा होती है । इसलिए केवलज्ञानके विषयके अनुसार तो सभी कार्य नियत क्रमसे ही होते हैं और सम्यग्दृष्टि जीव श्रद्धा भी ऐसी ही रखता है । किन्तु श्रुतज्ञानीके इतने मात्रसे सब समस्याऐं हल नहीं हो जातीं, इसलिए श्रुतज्ञानके विषयके अनुसार कुछ कार्य नियत क्रमसे भी होते हैं और कुछ कार्य अनियत क्रमसे भी होते हैं ऐसा अनेकान्त ही ठीक है ।’

अपर पक्ष द्वारा पाँचवें प्रश्नपर प्रतिशंका ३ जिस आधारपर उपस्थित की गई है उसका यह सार है । इससे अपर पक्षका ऐसा कहना मालूम पड़ता है कि अपर पक्ष प्रत्येक वस्तुको अनेकान्तस्वरूप मात्र अपने माने हुए श्रुतज्ञानकी अपेक्षा ही मानना चाहता है, केवलज्ञानकी अपेक्षा नहीं । दूसरी बात यह भी मालूम होती है कि सभी द्रव्योंके सभी कार्य होते तो नियत क्रमसे ही हैं। यही कारण है केवलज्ञान उनको उसी रूपमें जानता है । परन्तु अपर पक्षके श्रुतज्ञानमें वे उस रूपमें नहीं झलकते । मात्र इसीलिए कुछ कार्य नियत-क्रमसे होते हुए प्रतीत होते हैं और कुछ कार्य अनियतक्रमसे होते हुए प्रतीत होते हैं । उक्त वक्तव्यमें अपर-पक्षने कौनसा श्रुतज्ञान लिया है-लौकिक श्रुतज्ञान या सम्यक् श्रद्धानुसारी सम्यक् श्रुतज्ञान ? इसका उसकी ओरसे उक्त प्रतिशंकामें यद्यपि कोई स्पष्टीकरण नहीं किया गया है । किन्तु सम्यक् श्रद्धा विहीन जो श्रुतज्ञान होगा वह लौकिक ही होगा यह स्पष्ट है ।

जहाँ तक प्रकृत प्रतिशंकासे सम्बन्ध है सो उसमें भी अपर पक्षका वही दृष्टिकोण कार्य कर रहा है । इसे उपस्थित करते हुए अपर पक्षने पहले तो ‘निमित्तकारणता व्यवहारनयसे है’ इसे स्वीकार कर लिया है, किन्तु यहाँ व्यवहार शब्दका वाच्य क्या है इसमें उसे विवाद है । हम अपने पिछले उत्तरमें बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा ८ का उद्धरण देकर प्रकृतमें व्यवहारका अर्थ असद्भूत व्यवहार है यह आगम प्रमाणके साथ बतला आये हैं, परन्तु अपर पक्ष यह कहकर कि हम व्यवहारका अर्थ कल्पनारोपित करते हैं, मुख्य विषयसे विचारकोंकी दृष्टि हटाना चाहता है ।

\१. व्यवहारनय और उसका विषय

जैसा कि यहाँ की गई सूचनासे ज्ञात होता है, अपर पक्षने व्यवहार और निश्चय इन दोनों शब्दोंका पृथक् पृथक् स्थल पर प्रकरणानुसार क्या अर्थ इष्ट है इसका विचार प्रश्न १७ की प्रतिशंका ३में किया है सो इस विषयपर तो विशेष विचार हम वहीं करेंगे । मात्र प्रकृतमें प्रकरणानुसार उसकी ओरसे इस प्रतिशंकामें जो व्यवहारनय और निश्चयनयके लक्षण स्वीकार किए गए हैं वे यथार्थ न होकर कल्पनारोपित कैसे हैं इसका यहाँ सर्व-प्रथम विचार अवश्य कर लेना चाहते हैं । इससे प्रकृतमें व्यवहाररूप अर्थ और निश्चय रूप अर्थ क्या होना चाहिए इसका भी यथार्थ बोध हो जायेगा । अपर पक्षने व्यवहारनय और निश्चयनयका लक्षण करते हुए लिखा है- निश्चयरूप अर्थसापेक्ष व्यवहाररूप अर्थका प्रतिपादक वचन व्यवहारनय और व्यवहाररूप अर्थसापेक्ष निश्चयरूप अर्थका प्रतिपादक वचन निश्चनय कहलाने योग्य है। इसी प्रकार निश्चयरूप अर्थसापेक्ष व्यवहाररूप धर्मका ज्ञापक ज्ञान व्यवहारनय और व्यवहाररूप अर्थसापेक्ष निश्चयरूप अर्थका ज्ञापक ज्ञान निश्चयनय कहलाने योग्य है। पहिले दोनों वचननयके और दूसरे दोनों ज्ञाननयके भेद जानना चाहिए।’

यह अपर पक्षद्वारा उपस्थित किये गये व्यवहारनय और निश्चयनयके लक्षण हैं। किन्तु इन लक्षणोंकी पुष्टिमें कोई आगमप्रमाण अपर पक्षने नहीं दिया है। इनका सांगोपांग विचार करते हुए सर्वप्रथम हम आचार्योंने व्यवहारपदका क्या अर्थ स्वीकार किया है इस बात पर दृष्टिपात करते हैं। आलापपद्धतिमें व्यवहारपदका अर्थ करते हुए लिखा है-

अन्यत्र प्रसिद्धस्य धर्मस्यान्यत्र समारोपणमसद्भूतव्यवहारः। असद्भूतव्यवहार एवोपचारः, उपचारादप्युपचारं यः करोति स उपचरितासद्भूतव्यवहारः। गुणिगुणिनोः पर्याय-पर्यायिणोः स्वभावस्वभाविनोः कारण-कारकिणोर्भेदः सद्भूव्यवहारस्यार्थः। द्रव्ये द्रव्योपचारः पर्याये पर्यायोपचारः गुणे गुणोपचारः, द्रव्ये गुणोपचारः, द्रव्ये पर्यायोपचारः गुणे द्रव्योपचारः गुणे पयार्योपचारः पर्याये द्रव्योपचारः पर्याये गुणोपचार इति नवविधोऽसद्भूतव्यवहारस्यार्थो द्रष्टव्यः।

अर्थ-अन्यत्र प्रसिद्ध धर्मका अन्यत्र आरोप करना असद्भूतव्यवहार है। असद्भूत व्यवहारका नाम ही उपचार है। उपचारके बाद भी उपचारको जो करता है वह उपचरितासद्भूतव्यवहार है। गुण-गुणीका पर्याय-पर्यायीका, स्वभाव-स्वभाववान्का और कारक-कारकवान्का भेद सद्भूतव्यहारका अर्थ है। द्रव्यमें द्रव्यका उपचार, पर्यायमें पर्यायका उपचार, गुणमें गुणका उपचार, द्रव्यमें गुणका उपचार, द्रव्यमें पर्यायका उपचार, गुणमें द्रव्यका उपचार, गुणमें पर्यायका उपचार, पर्यायमें द्रव्यका उपचार और पर्यायमें गुणका उपचार इस तरह नौ प्रकारका असद्भूतव्यवहारका अर्थ जानना चाहिए।

यह आलापपद्धतिका वचन है। इसमें असद्भूतव्यवहाररूप अर्थ उपचरित असद्भूतव्यवहाररूप अर्थ और सद्भूतव्यवहाररूप अर्थ क्या है इसका स्पष्ट शब्दोंमें निर्देश किया गया है और साथमें यह भी बतला दिया गया है कि असद्भूतव्यवहारका नाम ही उपचार है। यहाँ सद्भूतव्यवहाररूप अर्थसे प्रयोजन नहीं है। इसलिए असद्भूतव्यवहाररूप अर्थको आगमप्रमाणके साथ स्पष्ट करते हैं-

घृतकुम्भाभिधानेऽपि कुम्भो घृतमयो न चेत्।
जीवो वर्णादिमज्जीवजल्पनेऽपि न तन्मयः ॥४०॥

घीका घड़ा कहने पर भी घड़ा घीमय नहीं है, उसी प्रकार जीव वर्णादिमान् है ऐसा कहने पर भी जीव वर्णादिमान् नहीं है।

यहाँ घड़ेमें घी रखा है, अतएव घीका संयोग देखकर व्यवहारी जन उसे घीका घड़ा कहते हैं, यह असद्भूत व्यवहारका उदाहरण है। यदि कोई अज्ञानी जीव इतने मात्रसे घड़ेको मिट्टीका न समझकर उसे यथार्थरूपमें घीका ही समझने लगे तो उसकी ऐसी समझको मिथ्या ही कहा जायेगा।

घड़े तो बहुत प्रकारके होते हैं और उनमें नाना वस्तुऐं भरी रहती हैं। अतएव लोकमें अन्य वस्तुओंसे भरे हुए घड़ोंका वारण करनेके लिए विवक्षित वस्तुके आलंबनसे इस प्रकारका व्यवहार किया जाता है। जो व्यवहार उपचरित होनेपर भी सप्रयोजन होनेके कारण लोकमें ग्राह्य माना जाता है और लौकिक जनोंको परमार्थका ज्ञान करानेके लिए आगममें भी इसे स्वीकार किया गया है। स्पष्ट है कि यदि ऐसे व्यवहारसे निश्चयका ज्ञान हो तो ही इस प्रकारका व्यवहार करना उपयोगी है। इसी बातको स्पष्ट करते हुए अनगारधर्मामृत अध्याय एकमें कहा है-

कर्त्राद्या वस्तुनो भिन्ना येन निश्चयसिद्धये।
साध्यन्ते व्यवहारोऽसौ निश्चयस्तदभेददृक् ॥१०२॥

जिससे निश्चयकी प्रसिद्धिके लिए वस्तुसे भिन्न कर्ता आदिक जाने जाते हैं वह व्यवहार है और उन कर्ता आदिककी वस्तुसे अभिन्न प्रतिपत्तिका नाम निश्चय है ॥१०२॥

यह आगमप्रमाण है। इसमें स्पष्ट बतलाया गया है कि जिससे निश्चयकी सिद्धि हो उसीका नाम व्यवहार है और इसी लिए उपचरित होने पर भी आगममें वह स्वीकार किया गया है। इस तथ्यको ध्यानमें रखकर जब हम निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धके ऊपर दृष्टिपात करते हैं तो हमें इस बातके समझनेमें देर नहीं लगती कि उपादान कारणसे भिन्न अन्य वस्तुमें किया गया निमित्त व्यवहार असद्भूत होनेके कारण उपचरित क्यों माना गया है। यहाँ जिस वस्तुमें निमित्त व्यवहार किया गया है वह अन्य द्रव्यके विवक्षित कार्यका यथार्थ कारण तो नहीं है फिर भी उसकी उस कार्यके उपादानकारणके साथ.कालप्रत्यासत्तिरूप बाह्य व्याप्ति अवश्य है और इसी कारण उपादानमें रहनेवाला जो कारण धर्म, उसकी सिद्धि इसके द्वारा हो जाती है, इसीलिए इस बाह्य वस्तुमें भी निमित्त अर्थात् कारण धर्मका उपचार कर लिया जाता है। यही उपचार असद्भूत व्यवहारका अर्थ है और जो ज्ञान ऐसे अर्थको जानता है उस ज्ञानको अद्भूत व्यवहारनय कहते हैं। यह असद्भूत व्यवहारनयका तात्पर्य है।

यह तो प्रथम उपचार हुआ। अब यदि उपादानभूत वस्तुमें रहनेवाले कर्ता आदि धर्मोंका निमित्तरूपसे स्वीकृत अन्य वस्तुमें आरोप किया जाता है तो ऐसा एक उपचारके बाद भी पुनः उसी वस्तुमें किया गया उपचाररूप अर्थ उपचरित असद्भूत व्यवहारनयका विषय होगा। आचार्य कुन्दकुन्दने सामान्यतया समयसार गाथा १०५ में इसी उपचरित असद्भूत व्यवहारका निर्देश किया है, किन्तु यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि जीवका और कर्मोंका निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्धरूपसे पहलेसे ही संश्लेष सम्बन्ध चला आ रहा है, इसलिए जीवके राग-द्वेष आदि परिणामोंको निमित्तकर जो कर्मबन्ध होता है वहाँ जीवके परिणामोंमें कर्मोंको करनेरूप कर्ताधर्मका उपचार ही मुख्य है। अतएव जीवने कर्मोंको किया ऐसा कहना अनुपचरित असद्भूतव्यवहार ही होगा। समयसार गाथा १०५ में इसी अभिप्रायकी मुख्यतासे उपचार शब्दका प्रयोग हुआ है।

तात्पर्य यह है कि जहाँ पर संश्लेष सम्बन्ध नहीं है वहाँ तो एक वस्तुके कर्ता आदि धर्मका दूसरी वस्तुमें आरोप करनेका नाम उपचरित असद्भूतव्यवहार है और जहाँ पर निमित्त-नैमित्तिकभावसे परस्पर संश्लेषसम्बन्ध है वहाँ पर एक वस्तुके कर्ता आदि धर्मका दूसरी वस्तुमें आरोप करनेका नाम अनुपचरित असद्भूतव्यवहार है। उक्त अर्थको स्पष्ट करते हुए बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा आठमें लिखा है-

मनोवचनकायव्यापारक्रियारहितनिजशुद्धात्मतत्त्वभावनाशून्यः सन्ननुपचरितासद्भूतव्यवहारेण ज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मणामादिशब्देनौदारिकवैक्रियिकाहारकत्रयाहारादिषट्पर्याप्तियोग्यपुद्गलपिण्डरूपनोकर्मणां तथैवोपचरितासद्भूतव्यवहारेण बहिर्विषयघटपटादीनां च कर्ता भवति।

मन वचन और कायके व्यापारसे होनेवाली क्रियासे रहित ऐसा जो निज शुद्धात्मतत्त्व उसकी भावनासे रहित हुआ यह जीव अनुपचरित असद्भूत व्यवहारकी अपेक्षा ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मोंका आदि शब्दसे औदारिक, वैक्रियिक और आहारक तीन शरीर और आहार आदि छह पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गल पिण्डरूप नोकर्मोंका तथा उपचरित असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा बाह्य विषय घट-पट आदिका कर्ता होता है ।

यहाँ प्रश्न यह है कि जिसमें किसी दूसरी वस्तु या उसके गुण-धर्मका उपचार किया जाता है उसमें तदनुरूप कोई न कोई धर्म अवश्य होना चाहिए, अन्यथा उस वस्तुमें किसी दूसरी वस्तुका या उसके गुण-धर्मका उपचार करना नहीं बन सकता ? उदाहरणार्थ उसी बालकमें सिंहका उपचार करके उसे सिंह कहा जा सकता है जिस बालकमें सिंहके समान किसी अंशमें क्रौर्य और शौर्य आदि गुण देखे जाते हैं ? सो इसका समाधान यह है कि जिस वस्तुमें निमित्त व्यवहार किया जाता है या निमित्त मानकर कर्ता आदि व्यवहार किया जाता है उस वस्तुमें स्वयं उपादान होकर किये गये अपने कार्यकी अपेक्षा यथार्थ कारण धर्म भी पाया जाता है और यथार्थ कर्ता आदि धर्म भी पाये जाते हैं, इसलिए उसमें अन्य वस्तुके कार्यकी अपेक्षा कारण धर्म और कर्ता आदि धर्मोंका उपचार करनेमें कोई बाधा नहीं आती । यह वस्तुस्थिति है, इसको ध्यानमें रखकर ही प्रकृतमें व्यवहारका क्या अर्थ है इसका निर्णय करना चाहिए । जिसका विशेष विचार हमने पूर्वमें किया ही है । -तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ५ वार्तिक २७

\२. सम्यक् निश्चयनय और उसका विषय

यह तो सम्यक् व्यवहाररूप अर्थ और उसे ग्रहण करनेवाले सम्यक् नयका खुलासा है । अब प्रकृतमें निश्चयरूप अर्थ और उसको ग्रहण करनेवाले नयका खुलासा करते हैं-

प्रत्येक वस्तु उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यस्वभाव होनेके कारण जैसे स्वभावसे ध्रौव्य है वैसे ही स्वभावसे उत्पाद-व्ययस्वभाववाली भी है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आप्तमीमांसामें स्वामी समन्तभद्र लिखते हैं-

न सामान्यात्मनोदेति न व्येति व्यक्तमन्वयात् ।
व्येत्युदेति विशेषात्ते सहैकत्रोदयादि सत् ॥५७॥

हे भगवन् ! आपके मतमें सत् अपने सामान्य स्वभावकी अपेक्षा न तो उत्पन्न होता है और न अन्वय धर्मकी अपेक्षा व्ययको ही प्राप्त होता है। फिर भी उसका उत्पाद और व्यय होता है सो यह पर्यायकी अपेक्षा ही जानना चाहिए, इसलिए सत् एक ही वस्तुमें उत्पादादि तीनरूप है यह सिद्ध होता है ।

इस प्रकार प्रत्येक वस्तुके स्वभावसे ध्रौव्य होकर भी उत्पाद-व्ययरूप सिद्ध होने पर यहाँ यह विचार करना है कि वह उत्पाद-व्यय स्वयंकृत है या परकृत है या उभयकृत है ? परकृत तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि दोनोंकी एक सत्ता नहीं है । भिन्न सत्ता होकर भी उससे दूसरी वस्तुमें परिणमनरूप कार्य मानने पर परस्पर विरोध आता है, क्योंकि भिन्न सत्ता होनेके कारण उससे भिन्न पर सत्तामें कार्यका किया जाना नहीं बन सकता और अपनेसे भिन्न पर सत्तामें कार्य करना स्वीकार करनेपर दोनोंकी भिन्न सत्ता नहीं बन सकती । यही कारण है कि आचार्योंने सर्वत्र निश्चयसे एक द्रव्य या उसके गुणधर्मको दूसरे द्रव्य या उसके गुणधर्मके कार्यका वास्तविक कर्ता स्वीकार नहीं किया है । दूसरे द्रव्यका वह उत्पाद-व्यय उभयकृत भी नहीं हो सकता, क्योंकि कोई भी कार्य जब परकृत नहीं सिद्ध होता, ऐसी अवस्थामें वह उभयकृत तो सिद्ध हो ही नहीं सकता । अतएव परमार्थसे प्रत्येक कार्य स्वयंकृत ही होता है ऐसा यहाँ निश्चय करना चाहिये । इस प्रकार प्रत्येक कार्यके स्वयंकृत सिद्ध होनेपर उसमें अपने-अपने कार्योंकी अपेक्षा वास्तविक कारणधर्म और कर्ता आदि धर्मोंकी भी सिद्धि हो जाती है । प्रत्येक द्रव्यमें कर्ता आदि धर्म वास्तविक है इसका स्पष्टीकरण करते हुए सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० १ में लिखा है :-

पश्यति दृश्यतेऽनेन दृष्टिमात्रं वा दर्शनम् । जानाति ज्ञायतेऽनेन ज्ञातिमात्रं वा ज्ञानम् । चरति चर्यतेऽनेन चरणमात्रं वा चारित्रम् । नन्वेवं स एव कर्ता स एव करणमित्यायातम्, तच्च विरुद्धम् ? सत्यम्, स्वपरिणाम-परिणामिनोर्भेदविवक्षायां तथाभिधानात् । यथा ग्निर्दहतीन्धनं दाहपरिणामेन । उक्तः कर्त्रादिसाधनभावः पर्याय-पर्यायिणोरेकानेकत्वं प्रत्यनेकान्तोपपत्तौ स्वातन्त्र्य-पारतन्त्र्यविवक्षोपपत्तेरेकस्मिन्नप्यर्थे न विरुध्यते, अग्नौ दहनादिक्रियायाः कर्त्रादिसाधनभाववत् ।

जो देखता है, जिसके द्वारा देखा जाता है या देखनामात्र दर्शन है । जो जानता है, जिसके द्वारा जाना जाता है या जाननामात्र ज्ञान है तथा जो आचरण करता है जिसके द्वारा आचरण किया जाता है या आचरण करनामात्र चारित्र है ।

शंका-इस प्रकार वही कर्ता और वही करण यह प्राप्त हुआ और वह विरुद्ध है ?

समाधान-सत्य है । स्वपरिणाम और परिणामीकी भेदविवक्षामें वैसा कथन किया गया है । जैसे अग्नि दाहपरिणामके द्वारा ईंधनको जलाती है ।

पर्याय और पर्यायीमें एकत्व और अनेकत्वके प्रति अनेकान्त होनेपर स्वातन्त्र्य और पारतन्त्र्यकी विवक्षा की जानेसे एक ही अर्थमें कहा गया कर्ता आदि साधनभाव विरोधको प्राप्त नहीं होता । जैसे अग्निमें दहनादि क्रियाकी अपेक्षा कर्तादि साधनभाव बन जाता है ।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए प्रवचनसार गाथा १६ में कहा है :-

तह सो लद्धसहावो सव्वण्हू सव्वलोगपदिमहिदो ।
भूदो सयमेवादा हवदि सयंभू त्ति णिद्दिट्ठो ॥१६॥

इस प्रकार वह आत्मा स्वभावको प्राप्त सर्वज्ञ और सर्व लोकके अधिपतियोंद्वारा पूजित स्वयमेव होता हुआ स्वयंभू है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है ॥१६॥

यद्यपि इस गाथामें मात्र एक निश्चय कर्ताका निर्देश है ऐसा प्रतीत होता है, परन्तु गाथामें आया हुआ ‘स्वयमेव’ पद निश्चयरूप छहों कारकोंको सूचित करता है । यही कारण है कि आचार्य अमृतचन्द्र और आचार्य जयसेनने अपनी-अपनी टीकामें निश्चयरूप छहों कारकोंका निर्देश किया है । अपनी-अपनी टीकाके अन्तमें उक्त दोनों आचार्य क्रमशः लिखते हैं :-

\१. अतो न निश्चयतः परेण सहात्मनः कारकत्वसम्बन्धोऽस्ति, यतः शुद्धात्मस्वभावलाभाय सामग्रीमार्गणव्यग्रतया परतन्त्रैर्भूयते ।

\१. इसलिए निश्चयसे परके साथ आत्माका कारकरूप सम्बन्ध नहीं है, जिससे कि शुद्धात्मस्वभावकी प्राप्तिके लिए सामग्री ढूँढ़नेकी व्यग्रतासे जीव परतन्त्र होते हैं ।

\२. इत्यभेदषट्कारकीरूपेण स्वतः एव परिणममाणः सन्नयमात्मा परमात्मस्वभावकेवलज्ञानोत्पत्ति-प्रस्तावे यतो भिन्नकारकं नापेक्षते ततः स्वयंभूर्भवतीति भावार्थः ।

\२. इस प्रकार अभेद षट्कारकरूपसे स्वतः ही परिणमन करता हुआ यह आत्मा परमात्मस्वभाव केवलज्ञानकी उत्पत्तिके प्रस्तावमें यतः भिन्न कारककी अपेक्षा नहीं करता, अतः स्वयंभू होता है । उक्त दोनों आचार्योंके उक्त उल्लेखोंसे जहाँ यह ज्ञात होता है कि निश्चयसे एक द्रव्यका दूसरे द्रव्यके साथ किसी प्रकारका कारक सम्बन्ध नहीं है वहाँ यह भी ज्ञात होता है कि प्रत्येक द्रव्यमें स्वभाव पर्यायकी उत्पत्ति कारकान्तर निरपेक्ष एकमात्र निश्चय षट्कारकोंके आलम्बनसे ही होती है। इससे यह भी फलित हो जाता है कि जहाँपर इस जीवके विकल्पमें परकी अपेक्षा होती है वहाँपर रागादि विभाव-पर्यायकी उत्पत्ति होती है।

साथ ही तथ्यरूपमें यहाँ इतना और समझ लेना चाहिए कि प्रत्येक द्रव्य और उनके गुण तथा पर्यायोंका स्वरूप परस्पर सापेक्ष न होकर स्वतःसिद्ध होता है। मात्र इनका व्यवहार ही परस्पर सापेक्ष किया जाता है। यदि इनके स्वरूपको परस्पर सापेक्ष माना जाय तो इनमेंसे एकका भी अस्तित्व नहीं बन सकता। यहाँ जिस तथ्यका निर्देश द्रव्य, गुण और पर्यायको लक्ष्यमें रखकर किया है वही तथ्य कर्तृत्वादि धर्मोंके विषयमें भी जान लेना चाहिए।

यद्यपि पर्यायें स्वकालके सिवाय अन्य कालमें कथंचित् असत् होती हैं, इसलिए पर्यायार्थिक नयसे उनमें परस्पर व्यतिरेक दिखलानेके अभिप्रायवश उनकी उत्पत्तिमें कारकोंका व्यापार स्वीकार किया गया है यह ठीक है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि अपने-अपने कालमें उनका वह स्वरूप किसी अन्यसे जायमान हुआ है, क्योंकि उत्पादादि त्रिरूपमयता यह प्रत्येक द्रव्यका स्वतःसिद्ध स्वरूप है, अन्यथा वह द्रव्यका स्वरूप नहीं बन सकता।

इस प्रकार वस्तुके स्वरूप और उसमें रहनेवाले कर्ता आदि धर्मोंकी अपेक्षा विचार करनेपर प्रत्येक वस्तुका स्वरूप और कर्ता आदि धर्म निश्चयरूप प्रमाणित होते हैं और उनको जाननेवाला ज्ञान निश्चय नय संज्ञाको प्राप्त होता है। निश्चयनयके कथनमें अभेदकी मुख्यता है इतना यहाँ विशेष समझना चाहिए।

इस प्रकार निश्चय और व्यवहाररूप अर्थ क्या है, तथा उन्हें ग्रहण करनेवाले नयोंका स्वरूप क्या है इस बातका प्रकृतमें हमने जो प्रमाण सहित विवेचन किया है, उसी विषयको स्पष्ट करते हुए पंडितप्रवर टोड़रमलजी अपने मोक्षमार्गप्रकाशकमें लिखते हैं-

तहाँ जिन आगम विषै निश्चय-व्यवहाररूप वर्णन है। तिन विषै यथार्थका नाम निश्चय है, उपचारका नाम व्यवहार है।
-अधिकार ७ पृष्ठ २८७

व्यवहार अभूतार्थ है। सत्य स्वरूपकौ न निरूपै है। किसी अपेक्षा उपचारकरि अन्यथा निरूपै है। बहुरि शुद्धनय जो निश्चय है सो भूतार्थ है, जैसा वस्तुका स्वरूप है तैसा निरूपै है।
-अधिकार ७ पृष्ठ ३६९

एक ही द्रव्यके भावकौ तिस स्वरूप ही निरूपण करना सो निश्चयनय है। उपचारकरि तिस द्रव्यके भावकौ अन्य द्रव्यके भावस्वरूप निरूपण करना सो व्यवहार है।
-अधिकार ७ पृष्ठ ३६९

\३. निश्चयनयमें व्यवहाररूप अर्थको सापेक्षताका निषेध

इस प्रकार निश्चयनय, व्यवहारनय और उनके विषयोंका प्रकृतमें उपयोगी निरूपण करके तत्काल उनकी परस्पर सापेक्षता एवं निरपेक्षताके विषयमें विचार करते हैं । आप्तमीमांसा कारिका १०८ में प्रत्येक वस्तुको अनेकान्त स्वरूप न मानकर सर्वथा सद्रूप या सर्वथा असद्रूप, सर्वथा नित्य या सर्वथा अनित्य आदि माननेपर उनको ग्रहण करनेवाला नयज्ञान मिथ्या कैसे है और कथञ्चित्रूप उन धर्मों द्वारा वस्तुको ग्रहण करनेवाला नयज्ञान समीचीन कैसे है इसका विचार किया गया है। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक वस्तु परस्पर विरुद्ध अनेक धर्मवाली होनेपर भी जो नय दूसरे धर्मकी अपेक्षा किये बिना मात्र एक धर्मस्वरूप वस्तुको स्वीकार करता है वह नय मिथ्यानय माना गया है। और जो नय इतर धर्मसापेक्ष एक धर्म द्वारा वस्तुको ग्रहण करता है वह सम्यक् नय माना गया है। यह वस्तुस्थिति है। इसके प्रकाशमें प्रकृतमें विचार करनेपर विदित होता है कि प्रत्येक वस्तुमें जो कर्ता आदि अनेक कारक धर्म हैं वे वस्तुसे द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा अभिन्न हैं, क्योंकि जो द्रव्यकी सत्ता है वही उन धर्मोंकी सत्ता है। अतएव अभेदरूपसे वस्तुको ग्रहण करनेवाला जो नय है वह निश्चयनय है। तथा संज्ञा, प्रयोजन और लक्षण आदिकी अपेक्षा भेद उपजाकर इन धर्मों द्वारा वस्तुको ग्रहण करनेवाला जो नय है वह सद्भूत व्यवहारनय है। इस प्रकार एक ही वस्तुमें कथञ्चित् अभेद तथा कथञ्चित् भेदकी विवक्षा होनेपर इन नयोंकी प्रवृत्ति होती है इसलिए ये दोनों ही नय सम्यक् नय हैं।

अब रहा असद्भूत व्यवहारनय सो उसका विषय मात्र उपचार है जो परको आलम्बनकर होता है, इसलिए उसकी अपेक्षा उक्त दोनों नयोंमें सापेक्षता किसी भी अवस्थामें नहीं बन सकती। यदि अपर पक्षने समयसारकी रचनाशैली पर थोड़ा भी ध्यान दिया होता तो उसने अपनी इसी प्रश्नकी प्रतिशंका ३ में जो निश्चयनय और व्यवहारनयके लक्षण स्वीकार किये हैं उन्हें वह भूलकर भी स्वीकार न करता। इसके लिए समयसार गाथा ८४ और ८५ पर दृष्टिपात कीजिए। समयसार गाथा ८४ में पहले आत्माको व्यवहारनयसे पुद्गल कर्मोंका कर्ता और भोक्ता बतलाया गया है, किन्तु यह व्यवहार असद्भूत है, क्योंकि अज्ञानियोंका अनादि संसारसे ऐसा प्रसिद्ध व्यवहार है; इसलिए गाथा ८५ में दूषण देते हुए निश्चयनयका अवलम्बन लेकर उसका निषेध किया गया है। इसी प्रकार गाथा ९८ में व्यवहारनयसे घट, पट, रथ आदि द्रव्य तथा नाना प्रकारकी इन्द्रियाँ, कर्म और नोकर्म इत्यादि कार्योंका कर्ता आत्माको बतलाकर गाथा ९९ में दूषण देते हुए उस असद्भूत व्यवहारका निषेध किया गया है। यद्यपि गाथा १०० में अज्ञानी आत्माके योग और उपयोगको घट, पट आदि कार्योंका उपचरित असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा निमित्तकर्ता कहकर इसी बातको दृढ़ किया है, क्योंकि उसी गाथाकी टीकामें ऐसा लिखा है कि ‘तथापि न परद्रव्यात्मककर्मकर्ता स्यात्।’ उसका तात्पर्य यह है कि अज्ञानी अपनेको पर द्रव्यकी पर्यायका निमित्तकर्ता मानता है। परन्तु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। एक द्रव्य दूसरे द्रव्यके कर्मका यथार्थ कर्ता क्यों नहीं है एतद्विषयक सिद्धान्तका उद्घाटन करते हुए गाथा १०३ में आचार्य लिखते हैं-

जो जम्हि गुणे दव्वे सो अण्णम्हि दु ण संकमदि दव्वे।
सो अण्णमसंकंतो कह तं परिणामए दव्वं ॥ १०३ ॥

जो द्रव्य अपने जिस द्रव्य स्वभावमें तथा गुणमें वर्तता है वह अन्य द्रव्यमें तथा गुणमें संक्रमित नहीं होता। इस प्रकार अन्यमें संक्रमित नहीं होता हुआ वह उस अन्य द्रव्यको कैसे परिणमा सकता है अर्थात् कभी नहीं परिणमा सकता ॥ १०३ ॥

एक द्रव्य दूसरे द्रव्यको क्यों नहीं परिणमा सकता इसके कारणका निर्देश करते हुए इसी गाथाकी टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र कहते हैं कि प्रत्येक वस्तुस्थितिकी सीमा अचलित है, उसका भेदना अशक्य है। अतएव प्रत्येक वस्तु अपनी-अपनी सीमामें ही वर्तती है। कोई भी वस्तु अपनी-अपनी सीमाका उल्लंघनकर अन्य वस्तुमें प्रवेश नहीं कर सकता, इसलिए एक द्रव्य दूसरे द्रव्यको परिणमाता है यह कथनमात्र है जो व्यवहार नयकी भाषाका अवलम्बन लेकर बोला जाता है। इसी बातको स्पष्ट करते हुए स्वयं आचार्य महाराज गाथा १०७ में लिखते हैं-

उप्पादेदि करेदि य बंधदि परिणामएदि गिण्हदि य।
आदा पुग्गलदव्वं ववहारणयस्स वत्तव्वं ॥ १०७ ॥

आत्मा पुद्गल द्रव्यके परिणामको उत्पन्न करता है, करता है, बाँधता है, परिणमाता है तथा ग्रहण करता है ऐसा व्यवहारनय ( असद्भूत व्यवहार नय)का वचन है ॥ १०७ ॥

यहाँ ऐसा समझना चाहिए कि एक द्रव्यकी पर्यायका दूसरा द्रव्य उत्पादक है इस प्रकार यहाँ किया गया यह उत्पादादिरूप व्यवहार उपचार कैसे है इसे राजा प्रजाका दृष्टान्त देकर गाथा १०८ तथा उसकी टीकामें ऐसा लिखा है कि ‘तथापि न परद्रव्यात्मककर्मकर्ता स्यात्’ तथापि पर द्रव्यात्मक कर्मका कर्ता नहीं है। सो उसका तात्पर्य यह है कि अज्ञानी जीव अपनेको पर द्रव्यकी पर्यायका निमित्तकर्ता मानता है, किन्तु वस्तुस्थिति यह नहीं है।

इस प्रकार उक्त कथनसे यह फलित हुआ कि अपर पक्षने जो यह लिखा है कि ‘व्यवहाररूप अर्थ सापेक्ष निश्चयरूप अर्थको जाननेवाला ज्ञान निश्चयनय है।’ सो उसका ऐसा लिखना यथार्थ नहीं है, किन्तु जो ज्ञान एक ही द्रव्यके भावको उसीका जानता है और उपचाररूप अर्थका निषेध करता है वह निश्चयनय है, क्योंकि प्रत्येक वस्तुका वस्तुत्व ही ऐसा होता है कि जो अपने स्वरूपका उपादान करता है और अन्यका अपोहन करता है। यदि प्रत्येक वस्तुमें इस प्रकारकी व्यवस्था करनेका गुण न हो तो उस वस्तुका वस्तुत्व ही नहीं बन सकता। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर युक्त्यनुशासन श्लोक ४२की टीकामें आचार्य विद्यानन्दि लिखते हैं-

स्वपररूपोपादानापोहनव्यवस्थापाद्यत्वाद्वस्तुनो वस्तुत्वस्य।

स्वरूपके उपादान और पररूपके अपोहनकी व्यवस्था करना ही वस्तुका वस्तुत्व है।

प्रत्येक द्रव्य भावाभावात्मक माना गया है। यह प्रत्येक वस्तुका स्वरूप है। यह उभयरूपता वस्तुमें है इसकी सिद्धि करनेके लिए ही यह कहा गया है कि प्रत्येक द्रव्य स्वचतुष्टयकी अपेक्षा भावरूप है और परचतुष्टयकी अपेक्षा अभावरूप है। इसका यदि कोई यह अर्थ करे कि स्वचतुष्टयकी अपेक्षा वस्तुका स्वरूप भावरूप है और परचतुष्टयकी अपेक्षा उसका स्वरूप अभावरूप है तो उसका ऐसा अर्थ करना संगत नहीं है, क्योंकि कोई भी धर्म किसी भी वस्तुमें स्वरूपसे स्वतःसिद्ध होता है। हाँ, अपेक्षा विशेषका आलम्बन लेकर उन धर्मोंकी सिद्धि करना दूसरी बात है। आचार्य भट्टाकलंकदेव अष्टसहस्री पृष्ठ १९५में लिखते हैं-

अन्यस्य कैवल्यमितरस्य वैकल्यं, स्वभावपरभावाभ्यां भावाभावव्यवस्थितेर्भावस्य।

किसी एकका अकेला होना उसमें दूसरेकी विकलता ( रहितपना ) है, क्योंकि प्रत्येक पदार्थ स्वभाव और परभावकी अपेक्षा भावाभावरूप व्यवस्थित है।

इससे स्पष्ट है कि निश्चय कथन स्वरूपनिष्ठ व्यवस्था करनेवाला होनेके कारण जहाँ अपने स्वरूपका प्रतिपादन करता है वहाँ वह अपनेसे भिन्न अन्यका निषेध भी करता है। भगवान् कुन्दकुन्दने समयसार गाथा २७२ में इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर निश्चयनयको प्रतिषेधक और व्यवहारनयको प्रतिषेध्य बतलाया है। यद्यपि वहाँ उनके कथनमें इससे भी आगे जाकर मर्मकी बात कही गई है, किन्तु उस कथनमें यह भाव पूरी तरहसे निहित है, क्योंकि उस गाथा द्वारा जितना भी पराश्रित व्यवहार है उस सबका निषेध किया गया है, इसलिए यह सिद्धान्त स्थिर हुआ कि निश्चयनय व्यवहाररूप अर्थकी अपेक्षा किए बिना स्वतंत्र रूपसे अपने ही अर्थका कथन करता है।

परन्तु उक्त प्रकारके व्यवहार नयके विषयमें स्थिति इससे कुछ भिन्न प्रकारकी है, क्योंकि जैसा कि हम पण्डितप्रवर आशाधरजीके अनगारधर्मामृतका ‘कर्त्राद्या वस्तुनो भिन्नाः’ इत्यादि श्लोकको उद्धृत कर आये हैं उससे यह बात बहुत ही अच्छी तरहसे ज्ञात हो जाती है कि जो व्यवहार निश्चयका ज्ञान कराता है वह व्यवहार ही आगममें स्वीकार किया गया है। अतएव व्यवहारनय उपचरित अर्थको ग्रहण करनेवाला होनेके कारण वह अनुपचरित अर्थकी प्रसिद्धि करता हुआ ही सार्थक है। अन्यथा वह मिथ्यानय ही ठहरेगा, क्योंकि कोई भी नय व्यवहारसे भी तब तक सन्नय कहलानेका अधिकारी नहीं है जब तक वह परमार्थभूत अर्थकी प्रसिद्धि नहीं करता। यहाँ पर उपादान कारण और उसमें रहनेवाले कर्ता आदि धर्म ये परमार्थभूत अर्थ हैं और इनकी प्रसिद्धिका कारण होनेसे कालप्रत्यासत्तिवश बाह्य द्रव्यमें आरोपित किया गया निमित्त धर्म और कर्ता आदि धर्म ये अपरमार्थभूत अर्थ हैं। यतः ये कालप्रत्यासत्ति होनेसे परमार्थभूत अर्थकी प्रसिद्धि करते हैं, इसलिए इन्हें ग्रहण करनेवाला नय व्यवहारसे सम्यक् नय माना गया है।

इस प्रकार प्रकृतमें अपने प्रतिषेधक स्वभावके कारण व्यवहाररूप अर्थका निषेध करता हुआ ही निश्चयनय क्यों तो मात्र निश्चयरूप अर्थको ग्रहण करता है और प्रतिषेध्य स्वभाव होकर भी व्यवहारनय क्यों व्यवहारमें प्रयोजनीय माना गया है इसका यहाँ सांगोपांग विचार किया। इससे अपर पक्षके उस कथन का सुतरां निरास हो जाता है जिसका निर्देश हम पूर्वमें कर आये हैं। अर्थात् प्रकृतमें व्यवहारनय और निश्चयनयके जिन लक्षणों आदिका निर्देश अपर पक्षने किया है वे स्वमतिकल्पित होनेसे ठीक नहीं हैं यह पूर्वोक्त कथनसे सुस्पष्ट हो जाता है।

\४. द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणताका निषेध

अपर पक्षने अपनी इसी प्रतिशंकामें उपादानमें द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणताका विधान करते हुए लिखा है-

‘तात्पर्य यह है कि कार्यकारणभावके प्रकरणमें दो प्रकारकी कारणताका विवेचन आगम ग्रन्थोंमें पाया जाता है-एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप और दूसरी कालप्रत्यासत्तिरूप। इनमेंसे जो वस्तु स्वयं कार्यरूप परिणत होती है अर्थात् कार्यके प्रति उपादान कारण होती है उसमें कार्यके प्रति द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणता पाई जाती है, क्योंकि वहाँ पर कारणरूप धर्म और कार्यरूप धर्म दोनों ही एक द्रव्यके आश्रयसे रहनेवाले धर्म हैं।’

यह द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणताके विषयमें अपर पक्षका वक्तव्य है। अपर पक्षने इसी एक ही क्या समस्त प्रतिशंकाओंकी इमारत मात्र इसी एक मान्यता पर खड़ी की है। अपनी इसके पूर्वकी प्रतिशंकामें भी उसकी ओरसे द्रव्यशक्तिरूप उपादान कारणका निर्देश किया गया था। किन्तु वह सब कथन आगमविरुद्ध अतएव काल्पनिक कैसे है इसका विचार हम प्रतिशंका २ के उत्तरके समय ही कर आये हैं। फिर भी अपर पक्ष अपनी उसी मान्यताको दुहरानेमें ही प्रयत्नशील है इसका हमें आश्चर्य है। किन्तु उस पक्षकी इस एकान्त मान्यता पर पुनः सांगोपांग विचार करना आवश्यक समझकर यहाँ विचार किया जाता है।

जैन दर्शनमें प्रत्येक वस्तुको सामान्य-विशेषात्मक स्वीकार किया गया है, क्योंकि जो वस्तु केवल सामान्यात्मक होगी या केवल विशेषरूप उसमें अर्थक्रियाका बनना असम्भव है। यही कारण है कि सभी आचार्योंने प्रमाणदृष्टिसे केवल द्रव्यप्रत्यासत्तिको उपादान कारण न मानकर अनन्तर पूर्व पर्याय युक्त द्रव्यको उपादान कारण स्वीकार किया है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६९ में लिखा है-

पर्यायविशेषात्मकस्य द्रव्यस्योपादानत्वप्रतीतेः, घटपरिणमनसमर्थपर्यायात्मकमृद्द्रव्यस्य घटोपादानत्ववत् ।

पर्यायविशेषात्मक द्रव्यमें ही उपादानता प्रतीत होती है, घट परिणमनमें समर्थ पर्यायात्मक मिट्टी द्रव्यमें घटकी उपादानताके समान ।

यह आगमवचन है। इसमें द्रव्य-प्रत्यासत्तिके समान पर्यायप्रत्यासत्तिमें भी उपादान कारणता स्वीकार की गई है, केवल द्रव्यप्रत्यासत्तिमें नहीं। फिर नहीं मालूम कि अपर पक्ष केवल द्रव्यप्रत्यासत्तिमें ही उपादान कारणता कैसे स्वीकार करता है, यदि उस पक्षका कहना हो कि जिस समय विवक्षित कार्य होता है, द्रव्यप्रत्यासत्ति तो उसी समयकी ली गई हैं, पर्यायप्रत्यासत्तिके लिए ऐसा कोई नियम नहीं है। इस पर हमारा कहना यह है कि प्रत्यासत्तिका अर्थ ही जब ‘अति संनिकट होना’ है ऐसी अवस्थामें पर्यायप्रत्यासत्तिका अर्थ ही विवक्षित कार्यकी अनन्तर पूर्व पर्याय ही होगा, अन्य नहीं। और यही कारण है कि आगममें सर्वत्र अनन्तरपूर्व पर्याय युक्त द्रव्यको ही उपादान कारण कहा है। इस विषयका विशेष विचार अष्टसहस्री पृष्ठ २१० में विस्तारके साथ किया है। वहाँ लिखा है-

असाधारणद्रव्यप्रत्यासत्तिः पूर्वाकारभावविशेषप्रत्यासत्तिरेव च निबन्धनमुपादानत्वस्य स्वोपादेयं परिणामं प्रति निश्चीयते ।

असाधारण द्रव्यप्रत्यासत्ति और पूर्वाकार भावविशेषप्रत्यासत्ति ही उपादानपनेका कारण होकर अपने उपादेय परिणामके प्रति निश्चित होती है।

आगे इसी विषयको स्पष्ट करनेके अभिप्रायसे आचार्य विद्यानन्दने उक्त सिद्धान्तके समर्थनमें ‘तदुक्तं’ लिखकर दो श्लोक उद्धृत किये हैं। जो इस प्रकार हैं-

त्यक्तात्यक्तात्मरूपं यत्पूर्वापूर्वेण वर्तते ।
कालत्रयेऽपि तद् द्रव्यमुपादनमिति स्मृतम् ॥

जो द्रव्य तीनों कालोंमें अपने रूपको छोड़ता हुआ और नहीं छोड़ता हुआ पूर्वरूपसे ओर अपूर्वरूपसे वर्त रहा है वह उपादान कारण है ऐसा जानना चाहिए।

यहाँ पर द्रव्यको उपादान कहा गया है। उसके विशेषणोंपर ध्यान देनेसे विदित होता है कि द्रव्यका न तो केवल सामान्य अंश उपादान होता है और न केवल विशेष अंश उपादान होता है। किन्तु सामान्य-विशेषात्मक द्रव्य ही उपादान होता है। द्रव्यके केवल सामान्य अंशको और केवल विशेष अंशको उपादान माननेमें जो आपत्तियाँ आती हैं उनका निर्देश स्वयं आचार्य विद्यानन्दने एक दूसरा श्लोक उद्धृत करके कर दिया है। वह श्लोक इस प्रकार है-

यत् स्वरूपं त्यजत्येव यन्न त्यजति सर्वथा ।
तन्नोपादानमर्थस्य क्षणिकं शाश्वतं यथा ॥

जो अपने स्वरूपको छोड़ता ही है वह ( पर्याय ) और जो अपने स्वरूपको सर्वथा नहीं छोड़ता वह ( सामान्य ) अर्थ ( कार्य ) का उपादान नहीं होता। जैसे क्षणिक और शाश्वत।

यद्यपि सर्वथा क्षणिक और सर्वथा शाश्वत कोई पदार्थ नहीं है। परन्तु जो लोग पदार्थको सर्वथा क्षणिक मानते हैं उनके यहाँ जैसे सर्वथा क्षणिक पदार्थ कार्यका उपादान नहीं हो सकता और जो लोग पदार्थको सर्वथा शाश्वत् मानते हैं उनके यहाँ जैसे सर्वथा शाश्वत् पदार्थ कार्यका उपादान नहीं हो सकता उसी प्रकार द्रव्यका केवल सामान्य अंश कार्यका उपादान नहीं होता और न केवल विशेष अंश कार्यका उपादान होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

इस प्रकार पूर्वोक्त समग्र कथनपर दृष्टिपात करनेसे विदित होता है कि केवल द्रव्यप्रत्यासत्ति और केवल पर्यायप्रत्यासत्ति उपादान कारणरूपसे स्वीकृत न होकर द्रव्य-पर्यायप्रत्यासत्तिको ही उपादानकारण आचार्योंने स्वीकार किया है। हम अपने पिछले उत्तरोंमें प्रमेयकमलमार्त्तण्ड पृष्ठ २०० से ‘यच्चोच्यते-शक्तिर्नित्याऽनित्या वेत्यादि।’ इत्यादि वचन उद्धृत कर यह सिद्ध कर आये हैं तथापि अपर पक्षने पुनः उसी प्रश्नको उठाया है, इसलिए यहाँपर इस विषयका पुनः विचार किया गया है।

हम यह मानते हैं कि आगम ग्रन्थोंमें स्वतः परिणामसमर्थ द्रव्यको अनुग्रहाकांक्षी लिखा है और इस अपेक्षाको ध्यानमें रखकर व्यवहारनयसे सापेक्षताका भी उल्लेख किया गया है। निश्चय नयसे विचार करनेपर तो विदित होता है कि प्रत्येक द्रव्य स्वयं परिणामस्वभाव है और परनिरपेक्ष होकर परिणमता है। इससे यह निश्चय हो जाता है कि प्रत्येक द्रव्यमें प्रत्येक समयका कार्य होता है तो स्वयं उसीके द्वारा ही होता है किन्तु जब वह कार्य होता है तब अन्य बाह्य जिस सामग्रीके साथ उसकी बाह्य व्याप्तिका नियम है उसमें असद्भूत व्यवहारनयसे कारण और कर्ता आदि धर्मोंका उपचार किया जाता है। इस उपचारका जो प्रयोजन है उसका निर्देश हम पूर्वमें कई बार कर आये हैं। प्रतीक्षा कोई किसीकी नहीं करता, अन्तरंग-बहिरंग सामग्रीका विस्रसा या प्रयोगसे सहज ही योग मिलता रहता है। ऐसी ही परसापेक्षता जैनदर्शनमें स्वीकार की गई है। अधीनतारूप परसापेक्षता जैनदर्शनमें स्वीकृत नहीं है, क्योंकि अधीनतारूप परसापेक्षताके स्वीकार करनेपर वस्तुव्यवस्था ही नहीं बन सकती।

एक बात और है। और वह यह है कि जैन-शास्त्रोंमें अनेक स्थलोंपर व्यवहारनयकी मुख्यतासे यह भी कथन उपलब्ध होता है कि बाह्य सामग्रीके अभावमें अकेला उपादानकारण अपना कार्य करनेमें समर्थ नहीं है। जैसे तत्त्वार्थवार्तिक अध्याय ५ सूत्र १७ में व्याख्या करते हुए यह लिखा है-

नैक एव मृत्पिण्डः कुलालादिबाह्यसाधनसन्निधानेन विना घटात्मनाविर्भवितुं समर्थः।

सो यह कथन निश्चय उपादानकी अपेक्षा न होकर व्यवहार उपादानको लक्ष्यमें रखकर ही किया गया है, क्योंकि उक्त उल्लेखमें दो बार उपादान कारणका निर्देश किया गया है। प्रथम बार तो मृत्पिण्डः घटकार्यपरिणामप्राप्तिं प्रति गृहीताभ्यन्तरसामर्थ्यः’ इन शब्दों द्वारा किया गया है और दूसरी बार ‘मृत्पिण्डः’ मात्र इतना ही कहा गया है। इससे स्पष्ट है कि प्रथम बार निश्चय उपादानको सूचित कर यह बतलाया गया है कि विवक्षित कार्यके निश्चय उपादानके होने पर बाह्य सामग्री होती ही है तथा व्यवहार उपादानके कालमें विवक्षित कार्यकी बाह्य-आभ्यंतर सामग्री नियमसे नहीं होती। अतः प्रत्येक कार्यमें बाह्याभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रता नियमसे होती है यह सिद्ध होता है। परमागममें जीव-पुद्गलोंकी गति-स्थितिके निमित्तरूपसे धर्म और अधर्मद्रव्यको स्वीकार करनेका यही कारण है। इसके विशेष खुलासाके लिए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृष्ठ ६८ का यह कथन अवलोकनीय है।

तत एवोपादानस्य लाभे नोत्तरस्य नियतो लाभः, कारणानामवश्यं कार्यवत्त्वाभावात्। समर्थस्य कार्यवत्त्वमेवेति चेन्न, तस्येहाविवक्षितत्वात्। तद्विवक्षायां तु पूर्वस्य लाभे नोत्तरं भजनीयमुच्यते, स्वय-
मविरोधात् । इति दर्शनादीनां विरुद्धधर्माध्यासाविशेषेप्युपादानोपादेयभावादुत्तरं पूर्वास्तितानियतं, न तु पूर्वमुत्तरास्तित्वगमकम् ।

इसलिए ही उपादानकी प्राप्तिसे उत्तरकी प्राप्ति नियत नहीं है, क्योंकि कारण नियमसे कार्यवाले नहीं होते।

शंका-समर्थ कारण कार्यवाला होता ही है ?

समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उसकी यहाँ पर विवक्षा नहीं है। उसकी विवक्षा होने पर तो पूर्वकी प्राप्ति होने पर उत्तर भजनीय नहीं कहा जाता, क्योंकि स्वयं अविरोध है। इस प्रकार दर्शनादिकके विरुद्ध धर्माध्यानकी अविशेषता होने पर भी उपादान-उपादेयभाव होनेसे उत्तर पूर्वके अस्तित्व पर नियत है, परन्तु पूर्व उत्तरके अस्तित्वका गमक नहीं है।

यह आगमवचन है। इसमें जहाँ व्यवहार उपादानकी चर्चा की है वहाँ निश्चय उपादानका भी निर्देश किया है। अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यका नाम ही निश्चय उपादान है। ऐसी अवस्थामें पहुँचनेके पूर्व जहाँ वह विवक्षित उपादेयका गमक नहीं होता वहाँ ऐसी अवस्थामें पहुँचने पर वह अपने उपादेयका नियमसे नियामक होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। उपादेय तो अपने उपादानका गमक होता ही है, उपादान भी अपने उपादेयका नियामक होता है ऐसा अभिप्राय यहाँ समझना चाहिए। यही कारण है कि आचार्य विद्यानन्दिने अपने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६४ में उभयावधारणका निर्देश करते हुए यह वचन कहा है-

निश्चयनयात् तूभयावधारणमपीष्टमेव, अनन्तरसमयनिर्वाणजननसमर्थानामेव सद्दर्शनादीनां मोक्षमार्गत्वोपपत्तेः परेषां अनुकूलमार्गताव्यवस्थानात् । एतेन मोक्षस्यैव मार्गो मोक्षस्य मार्ग एवेत्युभयावधारणमिष्टं प्रत्यायनीयम् ।

निश्चयनयसे तो उभयतः अवधारण करना इष्ट ही है, क्योंकि अनन्तर समयमें निर्वाणको उत्पन्न करनेमें समर्थ ही सम्यग्दर्शनादिकके मोक्षमार्गपनेकी उत्पत्ति होनेसे दूसरोंके अनुकूल मार्गपनेकी व्यवस्था होती है। इससे मोक्षका ही मार्ग है या मोक्षका मार्ग ही है इस प्रकार उभयतः अवधारण करना इष्ट है ऐसा निश्चय करना चाहिए।

इस कथनसे चार बातोंका स्पष्ट ज्ञान हो जाता है-

\१. अनन्तर पूर्व पर्याय युक्त द्रव्य नियमसे अपने कार्यका नियामक होता है और उससे जायमान कार्य उसका नियमसे गमक होता है। यह निश्चय उपादान-उपादेयकी व्यवस्था है।

\२. इसके पूर्व वह उस कार्यका व्यवहार उपादान कहलाता है। यह विवक्षित कार्यका नियामक नहीं होता, क्योंकि व्यवहारनयसे ऐसा कहा जाता है। जैसे मिट्टीको घटका उपादान कहना यह व्यवहारनयका वक्तव्य है। परन्तु उस मिट्टीसे, जिसे हमने घटका उपादान कहा है, घट बनेगा ही ऐसा निश्चय नहीं। यह द्रव्यशक्तिको लक्ष्यमें रखकर कहा गया है, घटकी अनन्तर पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यको लक्ष्यमें रख कर नहीं।

\३. निश्चय उपादानके अपने कार्यके सन्मुख होने पर कार्यकालमें तदनुकूल बाह्य सामग्रीका विस्रसा या प्रयोगसे योग मिलता ही है।

\४. व्यवहार उपादान कुछ विवक्षित कार्यका निश्चय उपादान नहीं होता, इसलिए वह प्रत्येक समयमें जिस जिस कार्यका निश्चय उपादान होता जाता है उस उस कार्यको करता है और उस उस समयमें बाह्य सामग्री भी उस उस कार्यके अनुकूल मिलती है। और इस प्रकार क्रमसे उसके विवक्षित कार्यकी अपेक्षा निश्चय उपादानकी भूमिकामें आने पर वह नियमसे विवक्षित कार्यको जन्म देता है तथा प्रयोगसे या विस्रसा उसके अनुकूल बाह्य सामग्री भी उस कार्यके समय उपस्थित रहती है।

ये कार्य-कारणभावके अकाट्य नियम हैं जिनका आगममें यत्र-तत्र विस्तारके साथ निर्देश किया गया है। इसके लिए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७१ का ‘न हि द्व्यादिसिद्धक्षणैः’ इत्यादि कथन अवलोकन करने योग्य है। इस कथनमें व्यवहार उपादान और निश्चय उपादान इन दोनोंका सुस्पष्ट शब्दोंमें विवेचन किया गया है। यदि अपर पक्ष इस कथनके आधारसे पूरे जिनागमका परामर्श करनेका अनुग्रह करे तो उसे वस्तुस्थितिको समझनेमें कठिनाई न जाय।

इस प्रकार इतने विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उपादान कारणको केवल द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप न स्वीकार कर असाधारण द्रव्यप्रत्यासत्ति और अनन्तर पूर्व पर्यायरूप प्रतिविशिष्ट भावप्रत्यासत्ति इन दोनोंके समवायको ही उपादान कारणरूपसे स्वीकार किया है। यह निश्चय उपादानका स्वरूप है, अन्य नहीं। पूरे जिनागमका भी यही अभिप्राय है।

\५. बाह्य सामग्री दूसरेके कार्यका यथार्थ कारण नहीं

अपर पक्षने अपनी प्रतिशंकामें यह भी लिखा है कि ‘क्या जो वस्तु स्वयं कार्यरूप परिणत न होकर कार्यरूप परिणत होनेवाली अन्य वस्तुको कार्यरूपसे परिणत होनेमें सहायक होती है अर्थात् निमित्तकारण होती है उसमें कार्यके प्रति द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणताका तो अभाव ही पाया जाता है, क्योंकि वहाँ पर कार्यरूप धर्म तो अन्य वस्तुमें रहा करता है और कारणरूप धर्म अन्य वस्तुमें ही रहा करता है। तब ऐसी स्थितिमें उन कार्यभूत और कारणभूत दोनों वस्तुओंमें कालप्रत्यासत्तिके आधार पर ही कार्यकारणभाव स्वीकार किया जा सकता है, द्रव्यप्रत्यासत्तिके रूपमें नहीं। अर्थात् जिसके अनन्तर जो अवश्य ही उत्पन्न होता है और जिसके अभावमें जो अवश्य ही उत्पन्न नहीं होता है ऐसा कालप्रत्यासत्तिरूप कारणताका लक्षण ही वहाँ पर घटित होता है।’ आदि।

यह अपर पक्षका वक्तव्य है। इसमें जो यह स्वीकार किया गया है कि एक द्रव्यके कार्यका कारण धर्म सहकारी सामग्रीमें ही रहा करता है सो यही यहाँ पर मुख्यरूपसे विचारणीय है। आचार्य विद्यानन्दिने बाह्य सामग्रीको कारण व्यवहारनयसे कहा है। वे तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० ५ सू० १६ पृ० ४०९ में लिखते हैं-

धर्मादयः पुनराधेयास्तथाप्रतीतेः व्यवहारनयाश्रयणादिति ।

परन्तु धर्मादिक द्रव्य आधेय हैं, क्योंकि व्यवहारनयसे वैसी प्रतीति होती है।

एक द्रव्य दूसरे द्रव्यका स्वामी व्यवहारनयसे है इस बातका निर्देश करते हुए तत्त्वार्थवार्त्तिक अध्याय १ सूत्र ७ में लिखा है-

व्यवहारनयवशात् सर्वेषाम्। ७। जीवादीनां सर्वेषां पदार्थानां व्यवहारनयवशाज्जीवः स्वामी।

व्यवहारनयसे सबका स्वामी है ॥७॥ जीवादि सब पदार्थोंका व्यवहारनयसे जीव स्वामी है।

आगे उसी सूत्रकी व्याख्यामें व्यवहारनयसे साधनका निर्देश करते हुए लिखा है-

औपशमिकादिभावसाधनश्च व्यवहारतः ।९। व्यवहारनयवशात् औपशमिकादिभावसाधनश्चेति व्यपदिश्यते । च शब्देन शुक्रशोणिताहारादिसाधनश्च ।

व्यवहारनयसे औपशमिक आदि भावसाधनवाला जीव है ।६। व्यवहारनयसे औपशमिक आदि भावसाधनवाला जीव कहा जाता है । वार्तिकमें पठित ‘च’ शब्दसे शुक्र शोणित और आहारादि साधनवाला जीव है ऐसा यहाँ जानना चाहिए ।

इस प्रकार जहाँ-उहाँ आगममें अन्य द्रव्यको निमित्त, हेतु, आलम्बन, प्रत्यय, उदासीनकारण और प्रेरककारण कहा है वहाँ सर्वत्र यह कथन व्यवहारनय अर्थात् असद्भूत व्यवहारनय या उपचारितासद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षासे ही किया गया है ऐसा यहाँ जानना चाहिए । इसका विशेष खुलासा हम इसी उत्तरमें पहले कर आये हैं । इसलिए एक-द्रव्यके कार्यका कारण धर्म दूसरे द्रव्यमें यथार्थरूपमें रहता हो यह तो कभी भी संभव नहीं है । आचार्य विद्यानन्दिने कार्यके साथ जो सहकारी कारणोंकी कालप्रत्यासत्ति स्वीकार की है सो उसका आशय इतना ही है कि जिस बाह्य-सामग्रीमें प्रयोजन-विशेषको ध्यानमें रखकर कारण व्यवहार किया जाता है उसका उस कार्यके साथ एक कालमें होनेका नियम है । जैसे जब जीवके क्रोध परिणाम होता है उस समय क्रोध नामक द्रव्यकर्मका उदय नियमसे होता है । यही यहाँपर कालप्रत्यासत्ति जाननी चाहिये । ऐसी कालप्रत्यासत्ति सब द्रव्योंके सब कार्योंमें उस-उस कार्यकी बाह्य-सामग्रीके साथ नियमसे पाई जाती है । इसमें कहीं किसी प्रकारका व्यत्यय नहीं पड़ता और इसीलिए हरिवंशपुराण सर्ग २५ में यह वचन उपलब्ध होता है-

अभ्यन्तरस्य सानिध्ये हेतोः परिणतेर्वशात् ।
बाह्यो हेतुर्निमित्तं हि जगतोऽभ्युदये क्षये ॥६१॥

परिणतिके वशसे अभ्यन्तर हेतुकी निकटता होनेपर जगत्के अभ्युदय और क्षयमें बाह्य हेतु निमित्तमात्र है ।

यह वस्तुस्थिति है । यदि बाह्य-सामग्रीमें अन्य द्रव्यके कार्यकी कारणता यथार्थ मानी जाती है तो उन दोनोंकी दो सत्ता न होकर एक सत्ता मानना अनिवार्य हो जावेगा, क्योंकि कोई द्रव्य और उसका गुण-धर्म अपनी सत्ताको छोड़कर दूसरे द्रव्य और उसके गुण-धर्मकी सत्तारूप त्रिकालमें नहीं होता, क्योंकि उन दोनोंका परस्परमें अत्यन्ताभाव है । इसी तथ्यको लक्ष्यमें रखकर आचार्य कुन्दकुन्दने व्यवहारनयसे घट-पट आदिका कर्ता आत्माको स्वीकार करके भी यह कथन समीचीन क्यों नहीं है इसका निर्देश करते हुए समयसार गाथा ९९ में लिखा है-

जदि सो परदव्वाणि य करिज्ज णियमेण तम्मओ होज्ज ।
जम्हा ण तम्मओ तेण सो ण तेसिं हवदि कत्ता ॥९९॥

यदि वह आत्मा पर द्रव्योंको करे तो नियमसे वह परद्रव्योंके साथ तन्मय हो जाय । अतः तन्मय नहीं होता, इसलिए वह उनका कर्ता नहीं होता ।

अपर पक्ष यहाँपर यह कह सकता है कि परद्रव्य दूसरे द्रव्यके कार्यका उपादान कर्ता भले ही न हो, निमित्तकर्ता तो होता ही है । सो यहाँपर प्रश्न यह है कि जिसे अपर पक्ष निमित्तकर्ताके रूपमें वास्तविक मानता है उसकी वह क्रिया स्वयं अपनेमें होती है या अपनी सत्ताको छोड़कर जिसका वह निमित्तकर्ता कहलाता है उसमें होती है । अपनी सत्ताको छोड़कर कोई भी द्रव्य अन्य द्रव्यकी सत्तामें प्रवेश करके उसके कार्यकी क्रियाको कर सकता है यह कथन तो अपर पक्षको भी मान्य नहीं होगा। अतएव यही सिद्धान्त स्थिर होता है कि एकमात्र कालप्रत्यासत्तिको दृष्टिमें रखकर ही बाह्य-सामग्रीमें कारणताका उपचार किया गया है। अतएव बाह्य-सामग्रीमें जो निमित्त कारणता स्वीकार की गई है उसे वास्तविक न मानकर उपचरित ही मानना चाहिये।

जैसे कृत्तिकानक्षत्रका उदय अन्तर्मुहूर्त्तबाद शकटनक्षत्रके उदयका नियमसे ज्ञापक है, क्योंकि इन दोनोंके उदयमें ऐसा नियम पाया जाता है कि कृत्तिकानक्षत्रका उदय होनेपर अन्तर्मुहूर्त्तबाद नियमसे शकटनक्षत्रका उदय होगा वैसे ही विवक्षित कार्यके होनेमें जो सामग्री व्यवहारसे निमित्त होती है उन दोनोंके एक कालमें होनेका नियम है। इसीका नाम कार्यकी कारणके साथ बाह्य व्याप्ति है और इसे ही कार्यके प्रति कारणकी अनुकूलता व समग्रता कहते हैं। अतएव बाह्य सामग्री दूसरे द्रव्यके कार्यका यथार्थ कारण न होनेपर भी वह उसका उपचरित कारण कहा गया है और इसी आधारपर उसका कार्यके साथ अन्वय-व्यतिरेक भी बन जाता है, तब व्यवहारनयसे यह कहनेमें आता है कि उपादानकारण हो और बाह्य-सामग्री न हो तो कार्य नहीं होता। यहाँपर उपादान कारणका अर्थ व्यवहार उपादानकारण लेना चाहिए, निश्चय उपादान कारण नहीं। इस विषयका विशेष खुलासा हमने शंका पाँचके तृतीय उत्तरमें विस्तारसे किया है, इसलिए उसे वहाँसे जान लेना चाहिए। यहाँ शकट और कृत्तिकानक्षत्रका उदाहरण कार्यकारणभावकी दृष्टिसे नहीं दिया है, केवल क्रमका ज्ञान करानेके अभिप्रायसे दिया है।

\६. तत्त्वार्थश्लोकवार्त्तिकके उल्लेखका तात्पर्य

अपर पक्षने तत्त्वार्थश्लोकवार्त्तिक पृष्ठ १५१ का एक उल्लेख उपस्थित कर हमारे कथनकी अप्रामाणिकता घोषित करते हुए अपने कथनको बड़ी संजीदगीके साथ प्रामाणिक घोषित करनेका प्रयत्न किया है, किन्तु उस पक्षने जिस उद्धरणको उपस्थित कर अपनी कल्पनाको प्रामाणिक घोषित किया है, उसी उद्धरणके बाद आये हुए इस वाक्यपर यदि वह दृष्टिपात करता तो सम्भव था कि वह अपने विचारोंको परिवर्तित करनके लिए प्रस्तुत हो जाता। आचार्य विद्यानन्दिने द्विष्ठ कार्यकारणभावको व्यवहारनयसे यद्यपि पारमार्थिक बताकर कल्पनारोपितपनेका निषेध किया है, परन्तु वहींपर वे संग्रहनय और ऋजुसूत्रनयकी अपेक्षा उसे कल्पनामात्र भी प्रसिद्ध कर रहे हैं। सो क्यों ? क्या दोका सम्बन्ध वास्तविक नहीं है जिससे संग्रहनय और ऋजुसूत्रनय उसे कल्पनामात्र बतलाकर उसका निषेध करते हैं। स्पष्ट है कि व्यवहारनयका अर्थ ही प्रकृतमें असद्भूत व्यवहारनय है और असद्भूतव्यवहारको आचार्योंने उपचार कहा ही है। इसके लिए आलापपद्धतिका प्रमाण हम पूर्वमें ही दे आये हैं। इससे सिद्ध हुआ कि बाह्य-सामग्रीको अन्य द्रव्यके कार्यका निमित्त कहना उपचार है और उस कार्यको बाह्य-सामग्रीका नैमित्तिक कहना यह भी उपचार है। इसप्रकार निमित्त-नैमित्तिक भावके उपचरित सिद्ध होनेपर उपादान-उपादेय भाव ही वास्तविक ठहरता है, निमित्त-नैमित्तिकभाव नहीं। फिर भी आचार्य विद्यानन्दिने जो द्विष्ठ कार्यकारणभावको कल्पनारोपितपनेका निषेध करके पारमार्थिक कहा है सो उसका कारण अन्य है। बात यह है कि किसीका किसीमें उपचार धर्मविशेषको देखकर ही किया जाता है। जैसा कि हम तत्त्वार्थवार्तिक अध्याय १ सूत्र ५ का उल्लेख दे करके बतला आये हैं कि जिस बालकमें सिंहके समान अंशतः क्रौर्य और शौर्य आदि गुण पाये जाते हैं उसीमें ही सिंहका उपचार कर ‘माणवकोऽयं सिंहः-यह बालक सिंह है’ यह कहा जाता है। उसी प्रकार जिस बाह्य-सामग्रीमें निमित्त व्यवहार किया जाता है उसमें भी उपादानके समान अपने कार्यके कर्ता आदि कारण धर्मोंको देखकर और उपादानके कार्यके साथ उसकी अन्वय-व्यतिरेकरूप वाह्य व्याप्तिको देखकर यह व्यवहार किया जाता है कि यह सामग्री इस कार्यका कारण है। यहाँपर बाह्य-सामग्रीमें जो कारणताका व्यवहार किया गया है वह तो उपचरित ही है इसमें सन्देह नहीं, किन्तु उसमें अपने उपादेयभूत कार्यकी जो कारणता पाई जाती है वह वास्तविक है और इसी प्रकार जिस कार्यकी वह बाह्य-सामग्री निमित्त कारण कही गई है वह कार्य भी अपने उपादानकी अपेक्षा वास्तविक ही है, कल्पनारोपित नहीं। चूँकि व्यवहार नय इन्हीं दोनोंको दूसरे रूपमें स्वीकार करता है, इसलिए यहाँपर आचार्य विद्यानन्दिने द्विष्ठ सम्बन्धरूप कार्यकारणभावको व्यवहारसे कल्पनारोपित न कहकर वास्तविक कहा है। आचार्य विद्यानन्दिने ऐसे कार्यकारणभावको संग्रहनय और ऋजुसूत्रनयकी अपेक्षा जिन शब्दोंमें कल्पनामात्र बतलाया है उनके वे शब्द इस प्रकार हैं-

संग्रहर्जुसूत्रनयाश्रयणे तु न कस्यचित्कश्चित्सम्बन्धोऽन्यत्र कल्पनामात्रात् इति सर्वमविरुद्धं।

आशय यह है कि प्रत्येक उपादान-उपादेयके साथ प्रत्येक निमित्त-नैमित्तिककी एक तो कालप्रत्यासत्ति है जो कल्पनारोपित न होकर यथार्थ है।

दूसरे जिसमें निमित्तव्यवहार किया गया है उसमें अपने क्रियमाण कार्यकी अपेक्षा कारण, कर्ता आदि धर्म पाये जाते हैं और जिसमें नैमित्तिक व्यवहार किया गया है उसमें अपने उपादानकारणकी अपेक्षा कर्म-धर्म पाया जाता है। ये भी कल्पनारोपित न होकर वास्तविक हैं।

तीसरे जिस बाह्य-सामग्रीमें निमित्तकर्ता या निमित्तकारण धर्मका आरोप किया जाता है उसके सदृश प्रायः उपादेय-कार्य होता है जो कल्पनारोपित न होकर वास्तविक है। यही कारण है कि आचार्य विद्यानन्दिने व्यवहारनयकी अपेक्षा भी द्विष्ठ कार्यकारणभावको कल्पनारोपित न लिखकर वास्तविक लिखा है।

पर इसका अर्थ यह नहीं कि बाह्य सामग्रीमें किये गये निमित्त व्यवहारको और इसी प्रकार उपादानके कार्यरूप उपादेयमें किये गये नैमित्तिक व्यवहारको वास्तविक मान लिया जाय। अतएव तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके उक्त उल्लेखमें जो अर्थ निहित है, उसे ध्यानमें रखकर ही यहाँ पर उसका अर्थ करना चाहिए। इस प्रकार तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके उक्त उल्लेखका क्या अभिप्राय है इसका यहाँ खुलासा किया।

शंका ६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग २/४)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ४४५ से ४६१

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\७. उपचार पदके अर्थका स्पष्टीकरण

यहाँ पर अपर पक्षने उपचारका अर्थ निमित्त-नैमित्तिकभाव किया है और इस प्रकार निमित्त-नैमित्तिकभावको यथार्थ मानकर हमें सलाह दी है कि हम भी उनकी इस मान्यताको स्वीकार कर लें, किन्तु जब हम आगममें कहाँ किस अर्थमें उपचार पदका प्रयोग हुआ है इस पर सम्यक् रूपसे दृष्टिपात करते हैं तो हमें कहना पड़ता है कि अपर पक्षकी हमें दी गई यह सलाह उचित नहीं है। इसके लिए हम अपर पक्षके सामने कुछ ऐसे प्रमाण रख देना चाहते हैं जिससे उसे इस बातके समझनेमें सहायता मिले कि जहाँ एक वस्तुके गुण-धर्मका दूसरी वस्तुमें आरोप किया जाता है वहाँ उपचारपदकी प्रवृत्ति होती है। इसके लिए कुछ प्रमाणोंपर दृष्टिपात कीजिए-

\१. अतएव न मुख्याः स्वस्य प्रदेशा इति चेन्न, मुख्यकार्यकारणदर्शनात्। तेषामुपचरितत्वे तदयोगात्। न ह्युपचरितोऽग्निः पाकादावुपयुज्यमानो दृष्टस्तस्य मुख्यत्वप्रसंगात्।
-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ४०३

\२. ततः कालमा स्वतो वृत्तिरेवोपचारतो वर्तना, वृत्तिवर्तकयोर्विभागाभावान्मुख्यवर्तनानुपपत्तेः।
-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ४१४

\३. भूतादिव्यवहारोऽतः कालः स्यादुपचारतः ।
-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ४१९

\४. द्रव्येष्वपि गुणास्तदुपचरिता एव भवन्तु विशेषाभावादित्ययुक्तं, क्वचिन्मुख्यगुणाभावे तदुपचारायोगात् ।
-तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ४४०

\५. अज्ञानरूपस्यापि प्रदीपादेः स्वपरपरिच्छित्तौ साधकतमत्वोपलम्भात्तेन तस्याऽव्याप्तिरित्यप्ययुक्तम्, तस्योपचारात्तत्र साधकतमत्वव्यवहारात् ।
-प्रमेयकमलमार्त्तण्ड पृ० ८

\१. शंका-अतएव स्व के प्रदेश मुख्य नहीं हैं ?

समाधान-नहीं, क्योंकि मुख्य कार्य-कारण देखा जाता है। उनके उपचरित होने पर कार्य-कारण भाव नहीं बन सकता। उपचरित अग्नि पाकादिकके उपयोगमें आती हुई नहीं देखी जाती, अन्यथा उसे मुख्य अग्निपनेका प्रसंग प्राप्त होता है।

\२. इसलिए काल परमाणु स्वतः वृत्ति होनेके कारण उपचारसे वर्तना है, क्योंकि वृत्ति और वर्तकमें विभागका अभाव होनेसे मुख्य वर्तना नहीं बन सकती।

\३. अतः भूतादि व्यवहार उपचारसे काल है।

\४. शंका-द्रव्योंमें भी जो गुण हैं वे उपचरित ही रहे आवें, क्योंकि कोई विशेषता नहीं है ?

समाधान-यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि कहीं मुख्य गुणोंका अभाव होनेपर उनका उपचार नहीं बन सकता।

\५. शंका-यद्यपि दीपक अज्ञानरूप है तो भी उसकी स्व-पर परिच्छितिमें साधकतमपनेकी उपलब्धि होनेसे उसके साथ उसकी अव्याप्ति प्राप्त होती है ?

समाधान-यह कहना अयुक्त है, क्योंकि उपचारसे उसमें साधकतमपनेका व्यवहार किया गया है।

ये आगमके कुछ प्रमाण हैं। जिनमें यह स्पष्ट रूपसे बतलाया गया है कि जो वास्तविक न होकर भी प्रयोजनादिको ध्यानमें रखकर दूसरी वस्तुके गुण-धर्मके नामपर व्यवहार पदवीको प्राप्त होता है उसकी आगममें उपचार संज्ञा रखी गई है। अतः आगममें असद्भूतव्यवहार और उपचार इन दोनों पदोंका एक ही अर्थ है। इनमें अर्थभेद नहीं है, इसलिए आचार्य अमृतचन्द्रने सययसार गाथा ५६ की टीकामें व्यवहार नयका व्याख्यान करते हुए ‘इह हि…परभावं परस्य विदधाति।’ इन शब्दों द्वारा व्यवहारनयके विषयमें स्पष्टीकरण किया है। पंडितप्रवर जयचन्दजीने व्यवहारनय उसको कहा है जो दूसरेके भावोंको दूसरोंके कहता है। उक्त गाथाकी टीकामें उनके शब्द हैं-

यहाँपर व्यवहारनय, पर्यायाश्रित होनेसे पुद्गलके संयोगवश अनादिकालसे प्रसिद्ध जिसकी बन्ध पर्याय है ऐसे जीवके कसूमके लाल रंगसे रंगे हुए सफेद वस्त्रकी तरह औपा-

धिक वर्णादि भावोंको आलम्बनकर प्रवर्तती है, इसलिए वह व्यवहारनय दूसरेके भावोंको दूसरोंके कहती है।’

इस प्रकार आगममें उपचार पदका क्या अर्थ लिया गया है, इसका यहाँ स्पष्टीकरण किया। हमें आशा है कि अपर पक्षने जो उपचारका अर्थ निमित्त-नैमित्तिक भाव किया है उसके स्थानमें वह ‘अन्य वस्तुके गुणधर्मको दूसरी वस्तुमें आरोपित करना इसका नाम उपचार है’ इसको ही उपचार पदका अर्थ स्वीकार करेगा। और इस प्रकार वह ‘जो नय अन्य वस्तुके गुण-धर्मको अन्य वस्तुके कहता है या ग्रहण करता है वह व्यवहार असद्भूत व्यवहार नय है’ इस अभिप्रायको भी स्वीकार करेगा।

\८. बन्ध-मोक्ष व्यवस्था

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने आचार्य विद्यानन्दिके तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमें आये हुए १४, १५ और १६ संख्याक वार्तिकोंके आधारपर चर्चा करते हुए ‘ततः सकलकर्मविप्रमोक्षो’ इत्यादि उल्लेख उपस्थितकर जो बन्ध-मोक्षादि व्यवस्थाको वास्तविक माननेकी सूचना की है सो इस सम्बन्धमें निवेदन यह है कि आगममें द्रव्य और भावके भेदसे बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन सबको दो दो प्रकारका बतलाया है। उनमेंसे भावबन्ध, भावसंवर, भावनिर्जरा और भावमोक्ष ये चारों स्वयं जीवकी अवस्था होनेसे या उस पर्याय विशिष्ट स्वयं जीव होनेसे ये स्वयं जीव ही हैं, ऐसा मानना यथार्थ ही है। इसका न तो हमने कहीं निषेध किया है और न निषेध किया ही जा सकता है। सम्भव है कि अपर पक्ष भी इस वस्तुस्थितिको स्वीकार करेगा। इतना अवश्य है कि जीवके राग-द्वेष आदि भावोंको निमित्तकर जो कार्मण वर्गणाओंमें कर्मरूप परिणाम होता है उसे आगममें द्रव्यबन्ध कहा है। इसी प्रकार द्रव्यसंवर, द्रव्यनिर्जरा और द्रव्यमोक्षका स्वरूप जान लेना चाहिए। सो इन्हें आगममें जहाँ जिस रूपमें निर्दिष्ट किया है उनको उस रूपमें जानना ही यथार्थ जानना है, किन्तु इसके स्थानमें यदि कोई श्रुतज्ञानी जीव जीवके राग-द्वेष आदि परिणामोंमें रुकनेको वास्तविक बन्ध न समझकर कार्मण वर्गणाओंके राग-द्वेष आदि परिणामोंको निमित्तकर हुए ज्ञानावरणादि कर्म परिणामको जीवका वास्तविक बन्ध समझनेकी चेष्टा करे तो उसे सच्चा श्रुतज्ञानी नहीं कहा जा सकता। अतएव प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धको उपचरित स्वीकार करनेसे बन्ध-मोक्षकी व्यवस्थामें बाधा आना सम्भव नहीं है, किन्तु इसके स्थानमें यदि निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धको वास्तविक मान लिया जाय तो अवश्य ही बन्ध-मोक्षकी व्यवस्था भंग हो जायगी, क्योंकि वैसी अवस्थामें दो या दोसे अधिक द्रव्योंका संयोग वास्तविक सिद्ध हो जानेपर वे सब द्रव्य मिलकर एक हो जावेंगे। इसलिए नानात्वकी व्यवस्था न बन सकनेसे किसका बन्ध और किसका मोक्ष? यह सब व्यवस्था गड़बड़ा जावेगी। अतएव यदि अपर पक्ष आगमोक्त बन्ध-मोक्षकी व्यवस्थाको स्वीकार करना चाहता है तो उसे निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धको भी आगमके अनुसार उपचरित स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य विद्यानन्दि द्विष्ठ कार्य-कारणभावको निश्चयनयसे परमार्थभूत नहीं निर्दिष्ट कर रहे हैं। किन्तु वे व्यवहारनयसे ही उसे परमार्थभूत कह रहे हैं। सो आगममें जैसे नामसत्य, स्थापनासत्य, जनपदसत्य, सम्मतिसत्य आदिका निर्देश किया गया है और उस रूपमें इन्हें माननेमें बाधा भी नहीं आती है। यदि कोई सम्यग्ज्ञानी जीव उस रूपमें उन नामादि व्यवहारोंको जानकर कथन करता है तो उसका वह जानना या कथन करना मिथ्या नहीं माना जाता है। ऐसी अवस्थामें अपर पक्ष ही बतलावे कि जो सम्यग्ज्ञानी जीव निमित्त-नैमित्तिक व्यवहारको उपचरितरूपसे स्वीकार करता है उसका वैसा स्वीकार करना मिथ्या कैसे माना जायेगा ? अतएव प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि आगममें जिस वस्तुको जिस रूपमें स्वीकार किया गया है उसको उसी रूपमें ग्रहण करना यही सच्चा सम्यग्ज्ञान है और अन्यथा रूपसे ग्रहण करना यही मिथ्याज्ञान है ।

आचार्य विद्यानन्दिने उक्त वार्तिकोंद्वारा क्षणिकैकान्त और नित्यैकान्तका निरास कर बन्ध-मोक्ष व्यवस्था कैसे बनती है और व्यवहारनयसे साध्य-साधनभावका क्या स्थान है इसका सम्यक्प्रकारसे विचार किया है सो इसे समझकर ही उसका निर्णय करना यही प्रत्येक सम्यग्ज्ञानी जीवका कर्तव्य है । इस विषयको स्पष्टरूपसे समझनेके लिए तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सूत्र २ का यह वचन पर्याप्त होगा-

स्व-परनिमित्तत्वादुत्पादस्येति चेत् ? न, उपकरणमात्रत्वात् ।११। स्यादेदत् स्व-परनिमित्त उत्पादो दृष्टः । यथा घटस्योत्पादो मृन्निमित्तो दण्डादिनिमित्तश्च । तस्मात्तस्यापि मोक्षकारणत्वमुत्पद्यते इति ? तन्न, किं कारणम् ? उपकरणमात्रत्वात् । उपकरणमात्रं हि बाह्यसाधनम् । किञ्च-

आत्मपरिणामादेव तद्रसघातात् ।१२। यदिदं दर्शनमोहाख्यं कर्म तदात्मगुणघाति, कुतश्चिदात्मपरिणामादेवोपक्षीणशक्तिकं सम्यक्त्वाख्यां लभते । अतो न तदात्मपरिणामस्य प्रधानं कारणम्, आत्मैव स्वशक्त्या दर्शनपर्यायेणोत्पद्यत इति तस्यैव मोक्षकारणत्वं युक्तम् ।

प्रश्न-उत्पाद स्व-परनिमित्तक होता है ?

उत्तर-नहीं, क्योंकि बाह्यसाधन उपकरणमात्र है ॥११॥

यदि कोई कहे कि उत्पाद स्व-परनिमित्तक देखा गया है । जैसे घटका उत्पाद मिट्टीनिमित्तक और दण्डादिनिमित्तक होता है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शनका उत्पाद आत्मानिमित्तक और सम्यक्त्व पुद्गलनिमित्तक होता है । इसलिए सम्यक्त्व पुद्गलमें भी मोक्षकी कारणता बन जाती है, उसका ऐसा कहना ठीक नहीं है सम्यक्त्व पुद्गल उपकरणमात्र है । बाह्य-साधन नियमसे उपकरणमात्र है ।

आत्माके परिणामसे ही उसके रसका घात होता है ॥१२॥

जो यह दर्शनमोह नामका कर्म है वह आत्माके गुणका घाती है । अतएव किसी आत्म-परिणामको ही निमित्तकर उपक्षीण शक्तिवाला होकर वह सम्यक्त्व इस संज्ञाको प्राप्त होता है । इसलिए वह आत्माके परिणामका प्रधान हेतु नहीं है । आत्मा ही अपनी शक्तिसे दर्शनपर्यायरूपसे उत्पन्न होता है, इसलिए उसीके मोक्षकी कारणता युक्त है ।

इस प्रकार इस विवेचनसे स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक द्रव्य स्वयं अपनी शक्तिके बलसे उपादान होकर प्रत्येक समयमें अपनी नई पर्यायको उत्पन्न करता है और पुरानी पर्यायका ध्वंस करता है । हमने अपने प्रथम उत्तरमें तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके जिस उद्धरणका उल्लेखकर यह सिद्ध किया है कि निश्चयनयसे प्रत्येक द्रव्य स्वयं उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यस्वभाववाला होनेसे उसमें उत्पाद-व्ययकी व्यवस्था विस्रसा ही बनती है । और व्यवहारनयसे ही उसका उत्पाद-व्यय सहेतुक प्रतीत होता है, सो हमारा यह कथन तत्त्वार्थवार्तिकके उक्त उल्लेखको दृष्टिमें रखते हुए साधु ही प्रतीत होता है । हम तो अपर पक्षसे ही यह आशा लगाये हुए हैं कि वह भी प्रत्येक उपादानको अनेक योग्यतावाला न स्वीकार करके मात्र प्रतिनियत योग्यतावाला स्वीकार करके ही प्रतिनियत कार्यकी व्यवस्थाको मान्य करते हुए निमित्त-नैमित्तिक व्यवहारको उपचरित स्वीकारकर लेगा आचार्य विद्यानन्दि अपनी अष्टसहस्री पृष्ठ ११२ में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यकी स्वाभावान्तर निरपेक्षरूपसे जो व्यवस्था कर रहे हैं उस पर भी थोड़ा दृष्टिपात कीजिए। इससे वस्तुस्थितिको हृदयङ्गम करनेमें विशेष सहायता मिलेगी।

स्वयमुत्पित्सोरपि स्वभावान्तरापेक्षणे विनश्वरस्यापि तदपेक्षणप्रसङ्गात्। एतेन स्थास्नोः स्वभावान्तरानपेक्षणमुक्तं, विस्रसा परिणामिनः कारणान्तरानपेक्षोत्पादादित्रयव्यवस्थानात्तद्विशेषे एव हेतुव्यापारोपगमात्।

यदि स्वयं उत्पन्न होनेवाला पदार्थ स्वभावान्तरकी अपेक्षा करे तो विनाश होनेवालेको भी स्वभावान्तरकी अपेक्षा करनेका प्रसङ्ग उपस्थित होता है। इस कथनसे स्थानशील पदार्थ स्वभावान्तरकी अपेक्षा नहीं करता यह कह दिया गया है, क्योंकि विस्रसा परिणमन करनेवाले पदार्थोंमें कारणान्तर निरपेक्ष होकर उत्पादादित्रयकी व्यवस्था है। उनके विशेषमें ही हेतुका व्यापार स्वीकार किया गया है।

यह स्वामी विद्यानन्दिका वचन है। इससे हम यह बात अच्छी तरहसे जान लेते हैं कि प्रत्येक उत्पादमें जो बाह्य और आभ्यन्तर हेतुकी स्वीकृति है उसका अभिप्राय क्या है। उत्पाद स्वभावसे उत्पाद है, वह कथञ्चित् व्यय और ध्रौव्यरूप भी है। व्यय स्वभावसे व्यय है, वह कथञ्चित् उत्पाद और ध्रौव्य स्वरूप भी है। ध्रौव्य स्वरूपसे ध्रौव्य है, वह कथञ्चित् उत्पाद और व्यय स्वरूप भी है। उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यकी यह व्यवस्था स्वभावतः परनिरपेक्ष होकर स्वतःसिद्ध है। फिर भी जो हेतुका व्यापार स्वीकार किया गया है वह केवल एक पर्यायसे दूसरी पर्यायमें व्यतिरेक दिखलानेके लिए ही स्वीकार किया गया है। कथन थोड़ा सूक्ष्म और वस्तुस्पर्शी है। हमें भरोसा है कि अपर पक्ष इसके हार्दको हृदयङ्गम करेगा। इससे अपर पक्षको यह भी समझनेमें सहायता मिलेगी कि-‘येन कारणेन यत्कार्यं जायते तेनैव तत्कार्यं, न तु कारणान्तरेण।’-जिस कारणसे अर्थात् उपादान कारणसे बाह्य सामग्रीको निमित्तकर जो कार्य उत्पन्न होता है उस कारणसे ही अर्थात् उपादान कारणसे ही बाह्य सामग्रीको निमित्तकर वह कार्य उत्पन्न होता है। कारणान्तरसे नहीं। अष्ट० स० टि० १४ पृ० ११२।

हमने अपने दूसरे उत्तरको लिखते हुए तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके एक उद्धरणमें आये हुए ‘सहेतुकत्व प्रतीतेः’ पदमें पठित ‘प्रतीतेः’ पदकी ओर अपर पक्षका ध्यान आकृष्ट किया था। किन्तु अपर पक्षने उसके अभिप्रायको ग्रहण न कर उस पर टिप्पणी करना ही उचित समझा है। हम आशा करते हैं कि वह पुनः उस ओर ध्यान देनेकी कृपा करेगा। इसके हार्दको समझनेके लिए हम समयसार गाथा ९८ की आत्मख्याति टीकामें आये हुए ‘प्रतिभाति’ पद की ओर अपर पक्षका पुनः ध्यान आकृष्ट करते हैं। इसकी टीकामें कहा गया है कि यह जीव अपने विकल्प और हस्तादि क्रियारूप व्यापार द्वारा घट आदि पर द्रव्य स्वरूप बाह्य कर्मको करता हुआ प्रतिभासित होता है, इसलिए यह उसका व्यामोह ही है।

स्पष्ट है कि परद्रव्यके किसी भी कार्यमें बाह्य सामग्री निश्चयकी प्रतीतिका हेतु होनेसे व्यवहार कारणरूपसे ही स्वीकार की गई है। यही पूरे जिनागमका सार है। इससे बन्ध-मोक्षव्यवस्था जिनागममें किस रूपमें स्वीकार की गई है इसका स्पष्टीकरण हो जाता है।

\९. जगतका प्रत्येक परिणमन क्रमानुपाती है

अपर पक्षने हमारे पिछले इस कथनपर टिप्पणी की है, जिसमें हमने बतलाया था कि अपर पक्षकी मान्यता ऐसी प्रतीत होती है कि ‘जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है।’ हमारा यह वक्तव्य अपर पक्षको बहुत खला है। और इसलिए उसपर उसने अपनो तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। किन्तु इससे हमारे उस कथनकी सार्थकतामें अणुमात्र भी फरक प्रतीत नहीं होता, क्योंकि जब अपर पक्ष प्रत्येक उपादानको अनेक योग्यतावाला मानकर निमित्तोंके बलसे कार्यकी उत्पत्ति होनेका विधान करता है ऐसी अवस्थामें एक तो उसे वही मानना होगा कि जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है, क्योंकि उपादान अनेक योग्यतावाला होनेसे उससे क्या कार्य उत्पन्न हो इसमें उसका वस्तुतः कुछ भी कर्त्तव्य नहीं रह जाता। कार्यरूपमें जो कुछ भी फल सामने आता है उसे निमित्तका ही परिणाम समझना चाहिए। यदि अपर पक्ष कहे कि ‘उपादान भले ही अनेक योग्यतावाला रहा आवे, परन्तु प्रत्येक कार्यका निमित्त सुनिश्चित है, इसीलिए उसके बलसे प्रत्येक समयमें सुनिश्चित कार्यकी ही उत्पत्ति होती है’ इसलिए 'जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है, जो यह आरोप हमारे (अपर पक्षके) ऊपर किया जाता है वह ठीक नहीं है। सो अपर पक्षका उक्त दोषसे बचनेके लिए यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकार प्रत्येक समयके कार्यके सुनिश्चित निमित्तोंके स्वीकारकर लेने पर निमित्तोंके आधारपर एकान्त नियतिको माननेका प्रसङ्ग उपस्थित होता है। जिस दोषसे वह अपनेको बचा नहीं सकता। वह पक्ष आगमके बलका नाम लेकर घोषणा चाहे जो करे, लेखनी उसकी है। किन्तु जबतक वह प्रतिनियत कार्यके प्रतिनियत उपादानको नहीं स्वीकार कर लेता, तबतक वह अपनेको उक्त दोषोंसे नहीं बचा सकता। स्वपरसापेक्ष कार्य होता है, इस कथनमें जैसे कार्य सुनिश्चित है, वैसे ही उसकी सामग्री भी सुनिश्चित मान लेनी चाहिए। यह वस्तु स्वभाव है कि प्रत्येक कार्यमें बाह्य और आभ्यन्तर सुनिश्चित सामग्रीकी समग्रता रहती ही है।

अपर पक्षने पुनः मिट्टीको उदाहरण रूपमें उपस्थितकर उससे जायमान कार्योंकी मीमांसा की है। वह बाह्य सामग्रीके व्यापारको तो प्रत्यक्ष देखता है, इसलिए उस आधारपर कार्यकी व्यवस्था करना चाहता है। किन्तु कौन मिट्टी किस कालमें किस प्रकारके परिणमनकी योग्यतावाली है इसे अपने इन्द्रिय प्रत्यक्षसे नहीं जानता। इसलिए उसमें नाना तर्कणाऐं लगाता है।

यह तो सुनिश्चित है कि इस जगतका परिणमन अनादिकालसे होता हुआ चला आ रहा है। एक द्रव्यमें अबतक जितने भी परिणमन हुए हैं उतने ही परिणमन अन्य सब द्रव्योंमें भी हुए हैं। इस दृष्टिसे यदि विचार किया जाय तो न तो किसी द्रव्यमें कम परिणमन हुए हैं और न अधिक ही। और इस प्रकार प्रत्येक द्रव्यके अब तक जितने परिणमन हुए हैं उतने बार ही उन परिणमनोंकी निमित्तभूत बाह्य आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रता भी मिली है। इसमें भी न न्यूनता हुई है और न अधिकता ही। यह जगतके परिणमनका क्रम है। भविष्यमें भी यह क्रम इसी प्रकार चालू रहेगा। उसमें भी न कमी होगी और न अधिकता ही। इस प्रकार जब हम इस क्रमको दृष्टिपथमें रखकर विचार करने लगते हैं तो यह स्पष्ट होनेमें देरी नहीं लगती कि वर्तमान समयमें जिस किसी भी द्रव्यका जो उपादान-उपादेय योग ओर निमित्त-नैमित्तिक योग चल रहा है वह पूर्वोक्त विधिसे क्रमानुपाती ही है। हाँ, यदि यह होता कि कोई द्रव्य कभी परिणमन करे और कभी न करे तो अवश्य ही कार्य-कारण आदिकी सब व्यवस्थामें अनियतपनेका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता, किन्तु ऐसा तो है नहीं, क्योंकि सभी पदार्थ नियतक्रमसे ही परिणमन करते हुए चले आरहे हैं, अतएव प्रत्येक समयमें प्रत्येक कार्यको सुनिश्चित निमित्त नैमित्तिक व्यवस्थाके समान उपादान-उपादेय व्यवस्था भी सुनिश्चित ही प्राप्त होती है। आगममें निमित्त-नैमित्तिक दृष्टिसे इसका विचार तो बहुत ही कम किया है। मात्र उपादान-उपादेय दृष्टिसे इसका विचार विशेषरूपसे किया गया है। प्रत्येक द्रव्यका प्रत्येक परिणमन कैसे क्रमानुपाती है इसका निर्देश करते हुए अष्टसहस्री पृ० १०० में लिखा है-

ऋजुसूत्रनयार्पणाद्धि प्रागभावस्तावत्कार्यस्योपादानपरिणाम एव पूर्वोऽनन्तरात्मा। न च तस्मिन् पूर्वानादिपरिणामसन्ततौ कार्यसद्भावप्रसंगः, प्रागभावविनाशस्य कार्यरूपतोपगमात्। ‘कार्योत्पादः क्षयो हेतोः’ इति वक्ष्यमाणत्वात्। प्रागभावतत्प्रागभावादेस्तु पूर्व-पूर्वपरिणामस्य सन्तत्यानादेर्विवक्षितकार्य-रूपत्वाभावात्। न च तत्रास्येतरेतराभावः परिकल्प्यते, येन तत्पक्षोपक्षिप्तदूषणावतारः स्यात्। नाप्येवं प्रागभावस्यानादित्वविरोधः, प्रागभाव-तत्प्रागभावादेः प्रागभावसन्तानस्यानादित्वोपगमात्। न चात्र सन्तानिभ्यस्तत्त्वान्यत्वपक्षयोः सन्तानो दूषणार्हः, पूर्व-पूर्वप्रागभावात्मकभावक्षणानामेवापरामृष्टभेदानां सन्तानत्वाभिप्रायात्। सन्तानिक्षणापेक्षया तु प्रागभावस्यानादित्वाभावेऽपि न दोषः, तथा ऋजुसूत्रनयस्येष्टत्वात्। तथास्मिन् पक्षे पूर्वपर्यायाः सर्वेऽप्यनादिसन्ततयो घटस्य प्रागभाव इति वचनेऽपि न प्रागनन्तर-पर्यायनिवृत्ताविव तत्पूर्वपर्यायनिवृत्तावपि घटस्योत्पत्तिप्रसंगः, येन तस्यानादित्वं पूर्वपर्यायनिवृत्तिसन्ततेरप्य-नादित्वादापद्यते, घटात्पूर्वक्षणानामशेषाणामपि तत्प्रागभावरूपाणामभावे घटोत्पत्यभ्युपगमात्। प्रागनन्तर-क्षणानिवृत्तौ तदन्यतमक्षणानिवृताविव सकलतत्प्रागभावनिवृत्त्यसिद्धेर्घटोत्पत्तिप्रसंगाभावात्। आदि।

ऋजुसूत्र नयकी अपेक्षा तो प्रागभाव कार्यका पूर्व अनन्तर परिणामस्वरूप उपादान ही है। और उसके प्रागभाव होने पर उससे पूर्व अनादि परिणाम सन्ततिमें कार्यके सद्भावका प्रसंग आता है सो भी बात नहीं है, क्योंकि प्रागभावका विनाश कार्यरूपता है ऐसा स्वीकार किया है। ‘कार्यका उत्पाद ही व्यय है, एक हेतुक होने से’ ऐसा आगे कहेंगे भी। प्रागभाव, उसका प्रागभाव इस प्रकार पूर्व-पूर्व परिणाम सन्ततिके अनादि होनेसे उसमें विवक्षित कार्यरूपताका अभाव है। उसमें इतरेतराभावकी कल्पना करना ठीक नहीं, जिससे कि उसके पक्षमें दिये गये दूषणोंका अवतार होवे। और इस प्रकार प्रागभावको अनादि होनेका भी विरोध नहीं है, क्योंकि प्रागभाव, उसका प्रागभाव आदि इस प्रकार प्रागभावकी सन्तानका अनादिपना स्वीकार किया है। और यहाँ पर सन्तानियोंसे सन्तान भिन्न है कि अभिन्न है इस प्रकार दो पक्ष उपस्थित होनेपर सन्तान दूषणके योग्य भी नहीं है, क्योंकि भेदोंको न स्पर्श करते हुए पूर्व-पूर्व प्रागभावस्वरूप भावक्षणोंमें ही सन्तानपनेका अभिप्राय है । सन्तानी चणकी अपेक्षासे तो प्रागभावके अनादिपनेके अभावमें भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऋजुसूत्रनयकी अपेक्षा वैसा इष्ट है। तथा इस पक्षमें अनादि सन्ततिरूप सभी पूर्व पर्याय घटका प्रागभाव है ऐसा वचन होनेपर भी जिस प्रकार प्राक् अनन्तर पर्यायकी निवृत्ति होने पर घटकी उत्पत्ति होती है उस प्रकार उससे पूर्व पर्यायोंकी निवृत्ति होनेपर भी घटकी उत्पत्तिका प्रसंग नहीं उपस्थित होता, जिससे कि पूर्व पर्यायोंको निवृत्तिरूप सन्ततिके अनादि होनेसे घटको भी अनादिता प्राप्त हो जाय, क्योंकि घटसे उसके प्रागभावरूप जितने भी पूर्व क्षण हैं उन सभीके अभाव होनेपर घटकी उत्पत्ति स्वीकार की है, कारण कि जिस प्रकार उनमेंसे किसी एक क्षणकी निवृत्ति नहीं हुई तो उस (घट)के समस्त प्रागभावोंकी निवृत्ति सिद्ध नहीं होती उसी प्रकार प्राक् अनन्तर क्षणकी निवृत्ति नहीं होने पर घटकी उत्पत्तिका प्रसंग नहीं उपस्थित होता।

यह पूरे कार्य-कारणभाव पर प्रकाश डालनेवाला अष्टसहस्रीका वचन है। इस द्वारा यह स्पष्ट बतलाया गया है कि मिट्टी द्रव्यकी पर्यायसन्ततिमें घटकी उत्पत्तिका जो स्वकाल है उसी कालमें घटकी उत्पत्ति होती है, अन्य कालमें नहीं। यदि कोई प्रजापति घटोत्पत्तिके अनुकूल क्रिया करते हुए रुक जाता है तो उसका वह रुकना अकस्मात् न समझ कर अपनी पर्याय सन्ततिमें क्रमानुपाती ही समझना चाहिए। और उस समयसे मिट्टीके पिण्डमें घटोत्पत्तिके अनुरूप परिणाम न होकर अन्य परिणाम होता है सो उसे भी उक्त आगमः प्रमाणके प्रकाशमें क्रमानुपाती ही समझना चाहिए । यह वस्तुव्यवस्था है, किन्तु इसे न स्वीकार कर अपर-पक्ष अपनी मानसिक कल्पनाओंके आधार पर जो नाना विकल्प करता है सो यह उसका वस्तुव्यवस्थामें हस्तक्षेप ही कहा जायगा । किसी भी द्रव्यका कोई भी कार्य परके ऊपर अवलम्बित नहीं है । आचार्य अकलंकदेवके शब्दोंमें बाह्य सामग्री तो उपकरणमात्र है । यदि एक समयमें अनेक उपादानशक्तियाँ आगममें स्वीकार की गई होतीं और जिसके अनुरूप परका सहयोग मिलता उसका विकास आगम स्वीकार करता तो भले ही परके सहयोगके अभावमें उपादान शक्तियाँ लुप्त पड़ी रहतीं और वे परके सहयोगकी प्रतीक्षा करती रहतीं, किन्तु आगममें तो जितना कार्य होता है मात्र उतना ही निश्चय उपादानकारण स्वीकार किया गया है, अतएव उपादान शक्तियोंके न तो लुप्त पड़े रहनेका प्रश्न उपस्थित होता है और न ही उनके परकी प्रतीक्षा करते रहनेका ही प्रश्न उपस्थित होता है । कोई मिट्टी यदि घड़ा नहीं बनती तो उसके घड़ारूप परिणमनेका स्वकाल नहीं आया, इसलिए वह घड़ा नहीं बनती, परके कारण नहीं, क्योंकि घटोत्पत्तिमें पर तो निमित्तमात्र है । मिट्टीको लानेवाला कुम्भकार कौन ? उसकी क्रियावती शक्तिका विपाक काल आने पर ही उसका स्थानान्तरण होता है, उसमें पर तो उपकरणमात्र हैं । सर्वार्थसिद्धिके देवोंमें क्रियावती शक्ति भी है, वैसा कर्मोदय भी है, फिर भी उनका सातवें नरक तक गमन नहीं होता । क्यों ? क्योंकि उनके क्रियावती शक्तिका वैसा विपाक त्रिकालमें नहीं है । जिसे अपर पक्ष पुरुषार्थ कहता है वह प्रकृतमें प्राणीकी इहचेष्टाको छोड़कर और क्या वस्तु है इसका वह स्वयं विचार करे । सो क्या उसके सब कार्य इहचेष्टा पर निर्भर हैं ? यदि नहीं तो वह अन्य द्रव्यके कार्यमें हस्तक्षेपके विकल्पमें ही कार्य-कारणभावकी प्रतिष्ठाका स्वप्न क्यों देखता है ? किसीके भी बलका प्रयोग अपनेमें होता है, परमें नहीं ।

यह तो हमारी. आपकी और हमारे-आपके समान दूसरे जनोंकी समझ भर है कि हम सब किसी भी वस्तुका योग मिलने पर उसमें सम्भव द्रव्यशक्तियोंको लक्ष्यमें रख कर उसे विवक्षित कार्यका निश्चय उपादान मान लेते हैं । पर क्या, हमारे माननेमात्रसे वह विवक्षित कार्यका निश्चय उपादान हो जाता है । यदि ऐसा होने लगे तो किसीको भी निराश न होना पड़े ।

यह सुनिश्चित सत्य है कि जब निश्चय उपादान अपने कार्यके सन्मुख होता है तो कार्य होता ही है । प्रत्येक द्रव्यका प्रत्येक समयमें इसी सिद्धान्तके आधार पर कार्य होता आ रहा है, हो रहा है और होता रहेगा । जब अनिवृत्तिकरणके अन्तिम समयमें मिथ्यादृष्टि जीव पहुँचता है तो वह नियमसे अगले समयमें सम्यग्दर्शनको उत्पन्न करता है । वही जीव यदि सम्यक्त्व और संयमके अनुरूप अधःकरणादि परिणाम कर अनिवृत्तिकरणके अन्तमें पहुँचता है तो नियमसे अगले समयमें सम्यक्त्व और अप्रमत्तभावको उत्पन्न करता है । यह प्रत्येक वस्तुका स्वभाव है कि जब वह निश्चय उपादानकी भूमिकामें आता है तो अगले समयमें अपने अनुरूप कार्यको नियमसे उत्पन्न करता है । और क्रमानुपाती नियमके अनुसार अन्य बाह्य सामग्री उसमें निमित्त होती है । ऐसी अनादि वस्तुव्यवस्था है । हमारे संकल्प-विकल्प हमारे अज्ञानका फल है । उसके रहते हुए संकल्प-विकल्प ही तो होंगे, अपर पक्ष सम्भवतः इसे भूल जाता है । यह राग-द्वेषरूप परिणतिका फल है जो अज्ञानकी भूमिकामें नियमसे होती है, इसलिए सब द्रव्योंमें प्रत्येक समयमें होनेवाले कार्योंकी कसौटी व्यक्तिके संकल्प-विकल्पको बनानेका प्रयत्न न करें इतना ही हमारा आपसे निवेदन है । प्रत्येक कार्य अन्तः बहिः सामग्रीके सद्भावमें होता है यह हम पहले ही लिख आये हैं, इसलिए ‘समय आने पर विवक्षित कार्य स्वतः सम्पन्न हो जायगा’ यह लिखना उचित नहीं है । प्रत्येक मनुष्य कार्य-सम्पन्नताके विषयमें प्रत्येक कार्यके होनेके जो प्राकृतिक नियम हैं उनको ध्यानमें रख कर ही विचार करता है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उसके विचार करने पर और बाह्य उठाधरी करने पर जिस कार्यके विषयमें उसने विचार किया है वह कार्य हो ही जाता है, क्योंकि जो भी कार्य होता है वह बाह्याभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें ही होता है। विकल्प और योग ये उस व्यक्तिके कार्य हैं। सो वे भी अपनी बाह्याभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें होते हैं। कभी भी कोई विकल्प और कोई योगक्रिया हो जाय ऐसा नहीं है। वे भी क्रमानुपाती ही होते हैं। उपादान स्वयं वह वस्तु है जो परिणमन करके अपने कार्यको उत्पन्न करता है। उसमें बाह्य सामग्री प्रवेश करके क्रिया करनेमें असमर्थ है, अतएव निश्चयसे बाह्य सामग्री पर द्रव्यका कार्य करनेमें अकिंचित्कर ही है। कार्यके साथ उसका अन्वय-व्यतिरेक दिखलानेके लिए ही उसे व्यवहारसे पर द्रव्यके कार्यका करनेवाला स्वीकार किया है यह बात दूसरी है।

अपर पक्षने गेहूँको उदाहरण बनाकर कार्य-कारणपरम्पराकी जिस प्रक्रियाका निर्देश किया है वह प्रत्येक कार्यमें बाह्य और आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रताको ही सूचित करता है। कार्यमें बाह्य सामग्रीकी समग्रता नहीं होती यह तो हमारा कहना है नहीं। हम ही क्या, आगम ही जब इस बातको सूचित करता है कि प्रत्येक कार्यमें बाह्य-आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रता होती है। ऐसी अवस्थामें जो प्रत्येक कार्यमें उभय सामग्रीकी समग्रताका निर्देश किया है उसका आशय क्या है, विचार इस बातका होना चाहिए, किन्तु अपर पक्ष इस मूल बातको भूलकर या तो स्वयं दूसरी बातोंको सिद्ध करनेमें उलझ जाता है या फिर हमें मुख्य प्रश्नको अनिर्णीत रखनेके अभिप्रायसे दूसरी बातोंमें उलझा देना चाहता है। सो उसकी इस पद्धतिको श्लाघ्य नहीं कहा जा सकता। आगममें बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारकी सामग्रीमें कारणताका निर्देश किया गया है यह सच है। परन्तु वहाँ किसमें किस प्रकारकी कारणताका निर्देश किया गया है इस बातपर दृष्टिपात करनेसे विदित होता है कि बाह्य सामग्रीमें जो कारणताका निर्देश किया गया है वह केवल कार्यके साथ उसकी अन्वय-व्यतिरेकरूप बाह्य व्याप्तिको दिखलाकर उसके द्वारा जिसके साथ उस (कार्य) की आभ्यन्तर व्याप्ति है उसका ज्ञान करानेके लिए ही किया गया है और ‘यदनन्तरं यद्भवति तत्तत्सहकारिकारणम्’ यह वचन भी इसी अभिप्रायसे लिखा गया है। जब कि आगमका यह वचन है कि कोई भी द्रव्य एक साथ दो क्रियाएँ नहीं कर सकता और साथ ही जब कि आगमका यह भी वचन है कि प्रत्येक द्रव्य अपने स्वचतुष्टयको छोड़कर अन्य द्रव्यके स्वचतुष्टयरूप नहीं परिणमता। ऐसी अवस्थामें एक द्रव्य दूसरे द्रव्यके कार्यका कारण है या कर्ता, करण और अधिकरण आदि है यह कथन उपचरित ही तो ठहरेगा। इसे वास्तविक कैसे कहा जा सकता है इसका अपर पक्ष स्वयं ही विचार करे।

एक ओर तो अपर पक्ष इस तथ्यको स्वीकार कर लेता है कि ‘गेंहूँ अंकुरका तभी उपादान है जब वह गेंहूँरूप अंकुरको उत्पन्न करनेके सन्मुख होता है’ और दूसरी ओर वह यह भी लिखनेसे नहीं चूकता कि ‘कोई-कोई दाने उक्त प्रकारकी योग्यताका अपने अन्दर सद्भाव रखते हुए भी बाह्य जलादि साधनोंके अनुकूल सहयोगका अभाव होनेसे अंकुररूपसे उत्पन्न होनेकी अवस्थासे वंचित रह जाते हैं।’ आदि। सो अपर पक्षका ऐसा परस्पर विरुद्ध कथन इस बातको सूचित करता है कि अपर पक्ष वस्तुतः आगममें प्रतिपादित निश्चय उपादानके लक्षणको स्वीकार नहीं करना चाहता। यह बात अपर पक्ष अच्छी तरहसे जानता है कि आगममें केवल योग्यताको ही उपादान कारणरूपसे न स्वीकार कर कार्यकी अव्यवहित पूर्व पर्याय युक्त द्रव्यको उपादान कारणरूपसे स्वीकार किया गया है। अतएव केवल योग्यताके आधारपर जो भी आपत्तियाँ अपर पक्ष उपस्थित करता है वे सब प्रकृत विचारणामें दोषाधायक नहीं मानी जा सकतीं। हाँ, अपर पक्ष यदि कोई ऐसा आगम प्रमाण उपस्थित कर सके जिससे यह सिद्ध हो कि जिस कार्यका जो उपादान कारण है उसके उस कार्यके सन्मुख होनेपर भी बाह्य सामग्रीके अभावमें वह कार्य नहीं हुआ तब तो यह माना जा सकता है कि उस उपादानमें उस कार्यके करनेकी योग्यता भी थी और वह उपादान अपने कार्यको करनेके लिए उद्यत भी था पर बाह्य सामग्रीका अभाव होनेसे वह कार्य नहीं हुआ । अन्यथा अपर पक्ष अपनी कल्पनाओंका चाहे जैसा ताना बाना बुनता रहे, उससे कार्य-कारणकी जो आगमिक परम्परा निर्दिष्ट की गई है उसपर आँच आनेवाली नहीं ।

अपर पक्षने तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सू०२ के कुछ प्रमाण दिये हैं जिनके द्वारा उत्पाद-व्ययको सिद्धि स्व-परप्रत्ययकी गई है । सो वे प्रमाण हमें ही क्या सबको मान्य होंगे । उनकी प्रमाणिकताका न तो हमने कहीं निषेध ही किया है और न निषेध किया ही जा सकता है, क्योंकि वहाँ निश्चय पक्षके साथ व्यवहार पक्षका स्वीकार करनेकी विवक्षावश उक्त प्रकारसे निर्देश किया गया है । जैसे अनुभवमें आता है, तर्कसे भी सिद्ध होता है और आगम भी कहता है कि प्रत्येक कार्य बाह्य और आभ्यन्तर सामग्रीकी समग्रतामें होता है वैसे ही यह भी अनुभवमें आता है, तर्कसे भी सिद्ध होता है और आगम तो कहता ही है कि प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें अपनी अपनी क्रिया स्वतन्त्ररूपसे करता है, अपनी अपनी क्रियाके करनेमें कोई किसीके आधीन नहीं । व्याकरण शास्त्रमें ‘स्वतन्त्रः कर्ता’ यह वचन भी इसी अभिप्रायसे लिखा गया है । जैनदर्शनका तो यह हार्द है ही । अन्यथा मोक्षविधि नहीं बन सकती । इसी प्रकार यह भी अनुभवमें आता है, तर्कसे भी सिद्ध होता है और जिनागम कहता ही है कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप न तो परिणमता है और न दूसरे द्रव्यको परिणमाता है । ऐसी अवस्थामें अपर पक्ष ही यह निर्णय करे कि इन दोनोंमें किसे परमार्थभूत माना जाय दोनों-मिलकर एक-कार्य करते हैं इसे या प्रत्येक,द्रव्य अपना कार्य स्वयं करता है इसे । अरिहन्त होनेके पूर्व बारहवें गुणस्थानमें क्षीणकषाय जीवके शरीरमें अवस्थित सब निगोदिया और त्रस जीवोंका अभाव हो जाता है, इसके पहले नहीं । सो अपर पक्षके मतानुसार उन जीवोंके अभावका प्रेरक निमित्त कर्ता क्षीणकषाय जीवको ही मानना पड़ेगा, क्योंकि जीवके क्षीणकषाय होनेपर ही उनका अभाव होता है, अन्यथा नहीं । ऐसा नियम भी है कि ‘यदनन्तरं यद्भवति तत्तत्सहकारिकारणम्’ इसीप्रकार साधुके ईर्यापथ पूर्वक गमन करते हुए उनके पगको निमित्तकर जीव-वध होनेपर भी यही आपत्ति प्राप्त होती है । इतना ही क्यों, अरिहन्तोंके अरिहन्त अवस्थाकी प्राप्तिका सहकारी करण सात धातुओंसे रहित शरीर आदिको भी मानना पड़ेगा । जो जीव अन्तःकृतकेवली होते हैं सो उनके लिए भी यही कहा जायगा कि उपसर्गादिकके कारण वे केवली हुए हैं, क्योंकि अपर पक्षके मतानुसार उपादान तो अनेक योग्यतावाला होता है । इनमेंसे कौन योग्यता कार्यरूपसे परिणत हो यह बाह्य सामग्री पर ही अवलम्बित है यही नियम सिद्ध होनेके लिए भी लागू होगा । यहाँ अपर पक्ष यह तो कह नहीं सकता कि कहींपर उपादान एक योग्यतावाला होता है और कहीं पर अनेक योग्यतावाला होता है, क्योंकि नियम नियम है । वह कहींके लिए एक हो और कहींके लिए दूसरा ऐसा नहीं हो सकता । मिट्टीसे घट बननेके लिए या गेंहूँसे अंकुर उगनेके लिए कार्य-कारणके जो नियम अपर पक्ष मानता है वे ही नियम उसे सब कार्योंमें स्वीकार करने होंगे ।

अपर पक्ष कुम्हारके व्यापारपूर्वक मिट्टीमें घटको उत्पन्न हुआ देखकर यदि मिट्टीको घटका स्वयं कर्ता नहीं स्वीकार करना चाहता तो उसे गमन करते हुए साधुके गमनरूप व्यापारपूर्वक किसी जन्तुके मरणका कर्ता स्वयं उस जन्तुको नहीं मानना होगा, जैसे घटकी उत्पत्ति कुम्भकारके व्यापारपूर्वक प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है उसी प्रकार जन्तुका मरण साधुके गमनरूप व्यापारपूर्वक दृष्टिगोचर हुआ है । अतएव जिस प्रकार घटका कर्ता कुम्भकार माना जाता है उसी प्रकार जीववधको करनेवाला साधु ही माना जाना चाहिए, क्योंकि दोनों जगह न्याय समान है। और यह कहा नहीं जा सकता कि साधुके पगसे जीवका वध हो नहीं सकता। क्योंकि जो वात प्रत्यक्ष देखनेमें आती है उसका अपलाप करना सम्भव नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षको अप्रमाण नहीं माना जा सकता यह अपर पक्षका कथन है।

यदि अपर पक्ष कहे कि साधुके चित्तमें जीववधका अभिप्राय न होनेके कारण वह जीववधका करनेवाला नहीं माना जा सकता तो उसके इस कथनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि अभिप्रायमें करनेका विकल्प होनेके कारण ही कुम्हारको घटका कर्ता कहा गया है। वस्तुतः एक द्रव्य दूसरे द्रव्यका कर्ता नहीं होता। सो ठीक ही है। आचार्य अमृतचन्द्रने समयसार गाथा १४४ की टीकामें लिखा भी है-

विकल्पकः परं कर्ता विकल्पः कर्म केवलम्।
न जातु कर्तृकर्मत्वं सविकल्पस्य नश्यति ॥९५॥

विकल्प करनेवाला ही केवल कर्ता है और विकल्प ही केवल कर्म है, (अन्य कोई कर्ता-कम नहीं है।) जो जीव विकल्पसहित है उसका कर्ताकर्मपना कभी नष्ट नहीं होता।

यह आगमवचन है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि संसारी जीवके पर द्रव्यमें कार्य करनेका विकल्प केवल रागके कारण होता है। वह उसका वास्तविक कर्ता नहीं हो सकता और यही कारण है कि आगममें सर्वत्र वाह्य सामग्रीमें कारण व्यवहारको उपचरित ही कहा गया है। और इसीलिए एक द्रव्यका दूसरे द्रव्यके साथ निश्चयसे कर्तृ-कर्मभावका निषेध किया गया है। इसी तथ्यको सरल शब्दोंमें व्यक्त करते हुए आचार्य जयसेन समयसार गाथा ७६ की टीकामें लिखते हैं-

तत एतदायाति पुद्गलकर्म जानतो जीवस्य पुद्गलेन सह निश्चयेन कर्तृकर्मभावो नास्तीति।

इससे यह सिद्ध हुआ कि पुद्गलकर्मको जाननेवाले जीवका पुद्गलके साथ निश्चयसे कर्ता-कर्मसम्बन्ध नहीं है।

अतएव उन्हीं जयसेन आचार्यके समयसार गाथा ८२ की टीकामें आये हुए वचनोंके अनुसार यही सिद्ध होता है कि प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्ररूपसे अपने कार्यका कर्ता है। वाह्य सामग्री तो उसमें निमित्तमात्र है। आचार्य श्रीका वह वचन इस प्रकार है।

यथा यद्यपि समीरो निमित्तं भवति तथापि निश्चयनयेन पारावार एव कल्लोलान् करोति परिणमति च।

यथा-यद्यपि समीर निमित्त है तो भी निश्चयनयसे समुद्र ही कल्लोलोंको करता है और कल्लोलरूप परिणमता है।

आचार्य विद्यानन्दिने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ५५ में

‘नापि सहकारिकारणमुपादानसमयसमकालत्वाभावात्।’

यह वचन लिखकर यह प्रसिद्ध किया है कि प्रत्येक उपादानके कालमें ही उसके परिणमनके सम्मुख होनेपर उसकी सहकारी सामग्री होती है। इसलिए यही सिद्ध होता है कि प्रत्येक कार्यकी अपने नियत उपादानके साथ अर्न्तप्राप्ति और नियत बाह्य सामग्रीके साथ बाह्य व्याप्ति होनेके कारण जगतका प्रत्येक परिणमन क्रमानुपाती ही होता है। तभी तो आचार्य विद्यानन्दिका तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ७६ में प्रतिपादित यह वचन मुमुक्षु जनोंके हृदयमें श्रद्धाका विषय बना हुआ है-

प्रत्यासन्नमुक्तीनामेव भव्यानां दर्शनमोहप्रतिपक्षः सम्पद्यते नान्येषाम्, कदाचित्कारणासन्निधानात् ।

आसन्न भव्य जीवोंको ही दर्शनमोहका प्रतिपक्षभूत सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है, अन्य जीवोंको नहीं, क्योंकि नियत कालको छोड़कर अन्य कालमें कारणोंका मिलना सम्भव नहीं है ।

\१०. परिणामाभिमुख्य पदका अर्थ

इसी प्रसङ्गमें अपर पक्षने तत्त्वार्थवार्तिकका ‘यथा मृदः स्वयमन्तर्घटभवनपरिणामाभिमुख्ये’ इत्यादि वचनमें आये हुए ‘परिणामाभिमुख्य’ पदका अर्थ करते हुए लिखा है कि-

‘यदि मिट्टीमें घटरूपसे परिणमन करनेकी योग्यता हो तो दण्ड, चक्र और कुम्भारका पुरुषार्थ आदि घट निर्माणमें मिट्टीके वास्तविक रूपमें सहायकमात्र हो सकते हैं और यदि मिट्टीमें घटरूपसे परिणमन होनेकी योग्यता विद्यमान न हो तो निश्चित है कि दण्ड, चक्र और कुम्भारका पुरुषार्थ आदि उस मिट्टीको घट नहीं बना सकते हैं अर्थात् उक्त दण्ड, चक्र आदि मिट्टीमें घट निर्माणकी योग्यताको कदापि उत्पन्न नहीं कर सकते हैं ।’ आदि,

आगे इसी विषयको स्पष्ट करते हुए अपर पक्षने लिखा है कि-राजवार्तिकके उक्त कथनमें पठित ‘आभिमुख्य’ शब्द सामान्य रूपसे घट निर्माणकी योग्यताके सद्भावका ही सूचक है । इसी तरह उसमें पठित ‘निरुत्सुकत्व’ शब्द भी सामान्यरूपसे घट निर्माणकी योग्यताके अभावका ही सूचक है । यही कारण है कि घटोत्पत्ति होनेकी योग्यताके अभावमें कार्योत्पत्तिके अभावकी सिद्धिके लिए राजवार्तिकके उक्त कथनमें ‘शर्करादिप्रचितो मृत्पिण्डः’ पद द्वारा बालुका मिश्रत मिट्टीका उदाहरण श्रीमदकलंकदेवने दिया है । यदि उनकी दृष्टिमें यह बात होती कि उपादानकारणता तो केवल उत्तरक्षणवर्ती कार्यरूप पर्यायसे अव्यवहितपूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें ही होती है और उससे कार्य भी नियमसे हो जाता है तो फिर उन्हें (श्रीमदकलंकदेवको) घट निर्माणकी योग्यता रहित बालुकामिश्रित मिट्टीका उदाहरण न देकर कार्योत्पत्तिसे सान्तरपूर्ववर्ती द्वितीयादि क्षणोंकी पर्यायोंमें कथंचित् रहनेवाली घटनिर्माणकी योग्यतासम्पन्न मिट्टीका ही उदाहरण देना चाहिए था । लेकिन चूंकि श्रीमदकलंकदेवने बालुकामिश्रित मिट्टीका ही उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसमें कि घट निर्माणकी योग्यताका सर्वथा ही अभाव पाया जाता है । सो इससे यही मानना होगा कि राजवार्तिक के उक्त कथनमें जो ‘आभिमुख्य’ शब्द पड़ा है उसका अर्थ घट निर्माणकी सामान्य योग्यताका सद्भाव ही सही है । इसी प्रकार उसी कथनमें पड़े हुए ‘निरुत्सुकत्व’ शब्दका अर्थ घट निर्माणकी सामान्य योग्यताका अभाव ही सही है ।’ आदि

ये अपर पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई प्रतिशंकाके दो अंश हैं । इनमें अपर पक्षने ‘परिणामाभिमुख्य’ पदका अर्थ योग्यता किया है जबकि इस पदका अर्थ परिणाम अर्थात् पर्यायकी सन्मुखता होता है । इस पदके पूर्व ‘अन्तः घटभवन’ पद भी आया हुआ है जिसका अर्थ ‘भीतरसे घटके होने रूप’ होता है । इससे स्पष्ट विदित होता है कि आचार्य भट्टाकलंकदेवने उक्त पदका अर्थ भीतरसे घट पर्यायकी सन्मुखता किया है । पता नहीं कि अपर पक्षने ‘परिणामाभिमुख्य’ पदका अर्थ योग्यता कैसे किया है । इस सम्बन्धमें अपर पक्षका कहना है कि यदि भट्टाकलंकदेवको ‘परिणामाभिमुख्य’ पदका अर्थ पर्यायकी सन्मुखता इष्ट होता तो वे तत्त्वार्थवार्तिकके उक्त कथनमें ‘शर्करादिप्रचितो मृत्पिण्ड,’ उदाहरण उपस्थित न कर घटसे पूर्ववर्ती सान्तरपर्यायोंका निर्देश करते, किन्तु अपर पक्ष यहाँ इस बातको भूल जाता है कि भट्टाकलंकदेवने यह उल्लेख ही बाह्य सामग्रीमें निमित्तमात्रताको सूचित करनेके लिए लिपिबद्ध किया है । घटकी जो पूर्ववर्ती सान्तर पर्यायें हैं उनके होनेमें कुम्भकार आदिकी निमित्तता तो है ही और वे घटके प्रागभावरूप हैं। अतएव आचार्य महाराज कुम्भकारादिमें निमित्तमात्रताको सिद्ध करनेके लिए अन्योन्याभावको ध्यानमें रखकर उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। बालुकाबहुल मिट्टीका पिण्ड यद्यपि द्रव्यदृष्टिसे घटरूप होनेकी योग्यता रखता है, क्योंकि जैसा दूसरा मिट्टीका पिण्ड है वैसा ही यह भी मिट्टीका पिण्ड है, परन्तु बालुकाबहुल मिट्टीके पिण्डमें घट होनेकी पर्यायरूप योग्यता नहीं है और यही कारण है कि भट्टाकलंकदेवने बाह्य सामग्रीमें स्पष्टरूपसे निमित्तमात्रताको सूचित करनेके लिए बालुकाबहुल मिट्टीके पिण्डको उदाहरण बनाया है। वे इस उदाहरण-द्वारा यह सिद्ध कर रहे हैं कि यदि उपादानगत योग्यताके रहने पर केवल बाह्य सामग्रीके बलसे घटादि कार्यों की उत्पत्ति मानी जाय तो बालुकाबहुल मिट्टीमें भी बाह्य सामग्रीके बलसे घटकी उत्पत्ति हो जानी चाहिए। किन्तु ऐसा नहीं होता। इससे स्पष्ट विदित होता है कि प्रत्येक कार्यमें बाह्य सामग्री निमित्तमात्र है। स्पष्ट है कि इस उल्लेख द्वारा आचार्य महाराज यही सूचित कर रहे हैं कि जब प्रत्येक द्रव्य किसी विवक्षित कार्यको अनन्तर पूर्व पर्यायकी भूमिकामें आता है तभी वह उस कार्यका उपादान बनता है। व्यवहारनयसे बाह्य सामग्रीमें कारणता स्वीकार की जाय यह दूसरी बात है, परन्तु निश्चयनयसे तो स्वयं मिट्टी भीतरसे घट भवनके सन्मुख होकर घटरूपसे परिणमती है। यदि पर्यायार्थिक निश्चयनयसे विचार किया जाय तो स्वयं घट अपने अवयवोंसे निष्पन्न होता है, अन्य किसीसे नहीं यह सुनिश्चित है। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर भट्टाकलंकदेव तत्त्वार्थवार्तिक अध्याय १ सूत्र ३३ में ऋजुसूत्रनयकी अपेक्षा विवेचन करते हुए लिखते हैं-

कुम्भपर्यायसमये च स्वावयवेभ्यः एव निर्वृत्तेः।

और घट पर्यायके समयमें घट अपने अवयवोंसे ही निवृत्त होता है।

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने उपादानकारणका विचार करते हुए जो अन्तमें मिट्टीको घटका उपादान-कारण बतलाया है और साथ ही कालको उदाहरणरूपमें प्रस्तुत करके जो घड़ी, घंटा, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्ष आदिको वास्तविक सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है सो इस सम्बन्धमें निवेदन यह है कि आगममें व्यवहार कथन और निश्चय कथन इस तरह दोनों प्रकारसे विवेचन दृष्टिगोचर होता है। उनमेंसे जो निश्चय कथन है वह यथार्थ है और जो व्यवहार कथन है वह उपचरित है। मिट्टीको घटका उपादान कहा जाय। इतना ही क्यों ? यदि कोई पुद्गलको घटका उपादान कहना चाहता है तो इसमें हमें आपत्ति नहीं। किन्तु जब उपचरित और अनुपचरितकी दृष्टिसे विचार किया जाता है तब निश्चयसे घटके अव्यवहित पूर्वपर्याय युक्त मिट्टी ही घटका उपादान कारण होगी, अन्य नहीं। हाँ, यदि व्यवहारनयका अवलम्बन लेकर योग्यताको दृष्टिसे विचार किया जाता है तो मिट्टी तो घटका उपादान कहलायेगी ही और वह मिट्टी भी घटका उपादान कहलायेगी जो बालुकाबहुल है। इतना ही क्यों, वे सब पुद्गल घटके उपादान कहलायेंगे जो घटकी योग्यता-से सम्पन्न हैं।

यही बात कालके विषयमें भी जान लेनी चाहिए। समय यह कालकी पर्याय है। जैसे जीवकी एक समयकी पर्याय क्रोध या क्षमारूप होती है वैसे ही समय भी कालकी एक पर्याय है। यह वास्तविक है, किन्तु उसके बाद जो निमिष, घड़ी, घंटा, दिन, सप्ताह और पक्ष आदिका व्यवहार होता है वह उपचरित है। यह इसीसे स्पष्ट है कि भारतीय परम्परामें कोई पक्ष १४ दिनका होता है और कोई पक्ष १६ दिनका भी। इसी प्रकार लगभग ढाई वर्ष निकल जानेके बाद अधिकमास आता है और कभी-कभी क्षयमास भी आता है। पश्चिमीय सभ्यतामें प्रत्येक चौथे वर्षका फरवरी २९ दिनका होता है। अब राष्ट्रीय पञ्चाङ्गकी व्यवस्था बनी है। उसके अनुसार कालगणनाकी कोई सरल पद्धति सोची गई है। सो ये सब स्वयं वास्तविक तो नहीं हैं, मात्र लोकव्यवहारके लिए इन सबको स्वीकृति मिली हुई है। इसीका नाम उपचरित है। अपर पक्ष यदि इन सब तथ्योंपर दृष्टिपात करनेकी कृपा करे तो उसे विवाद करनेका अवसर ही न मिले। एक समय पर्यायका व्यय होने पर दूसरी समय पर्यायका उत्पाद होता है और दूसरी समय पर्यायके व्ययके बाद तीसरी समयपर्यायका उत्पाद होता है। प्रथम समयमें कालकी जो समयपर्याय होती है वह दूसरे समयमें नहीं रहती और दूसरे समय की तीसरे समयमें नहीं रहती। प्रत्येक समयकी ये समय पर्यायें यथार्थ हैं। मात्र प्रत्येक समयका ज्ञान करानेके लिए पंचास्तिकाय गाथा २५ की आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीकामें यह कहा गया है कि-'परमाणुप्रचलनायत्तः समयः-परमाणुके गमनके आश्रित समय है सो इसका अर्थ यह नहीं कि वह परमाणुके गमनके आधीन होकर उत्पन्न होता है। इसका तात्पर्य इतना ही है कि एक परमाणुको एक प्रदेश परसे दूसरे प्रदेश पर मन्दगतिसे जानेमें जितना काल लगता है, एक समयका उतना परिमाण है और इसी आधार पर इसे व्यवहारकाल कहा है। जो कालकी एक पर्याय होनेसे सद्भूतव्यवहाररूप ही है। किन्तु दो समयसे लेकर अन्य जितनी कालकी गणना है वह काल द्रव्यमें वर्तमान अर्थात् पर्यायरूपसे सद्भूत न होने पर भी लोकमें व्यवहार पदवीको प्राप्त है, इसलिए वह असद्भूतव्यवहार ही है।

अपर पक्षने क्षायोपशमिक मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका प्रश्न उठाकर यह लिखा है कि ‘वस्तुकी समयवर्ती अखंड पर्यायको ग्रहण करनेमें सर्वथा असमर्थ ही रहा करते हैं। इन ज्ञानोंका विषय वस्तुकी कमसे कम अन्तर्मुहूर्तवर्ती पर्यायोंका समूह ही एक पर्यायके रूपमें होता है इस प्रकार इन ज्ञानोंकी अपेक्षा मिट्टी, पिण्ड, स्थास, कोश, कुशूल और घटमें उपादानोपादेय व्यवस्था असंगत नहीं मानी जा सकती है।’ सो इस सम्बन्ध में यही निवेदन है कि यह जो अन्तर्मुहूर्तवर्ती नाना पर्यायोंका समूह कहा गया है वह क्या एक समयमें होता है या उत्पाद व्ययके क्रमसे अन्तर्मुहूर्त तक नाना पर्याय होकर अन्तमें हम पर्यायोंका समूह ऐसा व्यवहार करते हैं, इसलिए यह व्यवहार तो असद्भूत ही है। हाँ, केवलज्ञान प्रत्येक वस्तुकी जो समयवर्ती एक-एक पर्यायको पृथक्-पृथक् रूपसे जानता है सो वहाँ पर प्रत्येक पर्याय पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा निश्चयरूप होकर भी परम पारिणामिक भावको ग्रहण करनेवाले निश्चयनयकी अपेक्षा सद्भूत व्यवहाररूप कही गई है। क्या इसे हमने कहीं अवास्तविक, उपचरित एवं कल्पनारोपित अतएव अवस्तुभूत कहा है या लिखा है, जिससे कि यह आकाशकुसुम या खरविषाणके समान अवस्तु होकर केवलज्ञानका विषय न बन सके। केवलज्ञानमें जो जिस कालमें जिस रूपमें अवस्थित हैं, रहे हैं, या रहेंगे वे सब पदार्थ युगपत् झलकते हैं। वे यह अच्छी तरहसे जानते हैं कि इतने परमाणु अपने परिणमन द्वारा परणमते हुए स्कंध पदवीको प्राप्त हुए हैं। केवलज्ञानकी महिमा क्षायोपशमिक ज्ञानोंकी अपेक्षा बहुत बड़ी है। यह आगमानुसारी हमारा मत है कि जिस प्रकार द्रव्य स्वयं सत् हैं, गुण भी स्वयं सत् हैं उसी प्रकार प्रत्येक समयमें होनेवाली पर्यायें भी स्वयं सत् हैं। यदि अपर पक्ष स्वयं इस बातका विचार करे कि हम किसको सद्भूत मानते हैं और किसको असद्भूत तो उसकी ओरसे ऐसा आरोपात्मक कथन न होता। प्रत्येक द्रव्य स्वयं अपनेमें, अपने लिये, अपने द्वारा, अपने बलसे अपनी पूर्व पर्यायसे निवृत्त होकर उत्तर पर्यायको जन्म देता है। मतिज्ञानी और श्रुतज्ञानी जीवोंको यदि प्रत्येक समयकी इन पर्यायोंका ज्ञान नहीं होता है तो इतने मात्रसे उनका असद्भाव नहीं माना जा सकता। यदि उन्हें अन्तर्मुहूर्त अन्तर्मुहूर्त बाद पर्यायोंकी विलक्षणताका ज्ञान होता है तो इतने मात्रसे प्रत्येक अन्तर्मुहूर्तके भीतर प्रत्येक समयकी पर्यायमें जो विलक्षणता आती है वह कार्यकारणपद्धतिसे आनेके कारण वे उनके सद्भावको अस्वीकार नहीं कर सकते। किन्तु वे श्रुतके बलसे यही निर्णय करते हैं कि यह हमारे ज्ञानका दोष है कि हम प्रत्येक सययमें होनेवाली पर्याय एवं उसके कारणकलापको नहीं जान पाते। प्रत्येक श्रुतज्ञानी जीव आगम और लोक सम्मत पद्धतिसे यह जानकर कि किस उपादानसे कैसा बाह्य संयोग मिलने पर क्या कार्य होता है उसके उपक्रममें लगता अवश्य है। परन्तु उस कालमें उस उपादानभूत वस्तुसे वही कार्य होगा, यह नहीं कहा जा सकता। यहाँ उपादान शब्दका प्रयोग व्यवहार नयसे किया गया है। हमें दुख है कि अपर पक्ष स्वभावरूप और विभावरूप सभी पर्यायोंकी उत्पत्ति केवल निमित्तकारणोंसे माननेकी चेष्टा करता है। तभी तो उसकी ओरसे स्वभाव पर्यायरूप सम्यक्त्वकी उत्पत्ति निमित्त कारणोंसे होती हुई लिखी गई है। परन्तु चाहे स्वभावपर्याय हो या विभावपर्याय उसकी उत्पत्ति स्वयं अपनेसे ही होती है, उसमें बाह्य सामग्री निमित्त हो यह दूसरी बात है। हम नहीं कहते कि केवली भगवानने देखा है मात्र इसीलिए मिट्टीमें उससे विलक्षण पिण्ड पर्यायकी उत्पत्ति हुई है। वह तो मात्र ज्ञाता-दृष्टा है। उसमें स्वयं जो प्रत्येक समयमें पर्याय होती है उसे भी वह जानता और देखता है और अन्य द्रव्योंमें जो प्रत्येक समयमें पर्यायें होती हैं उन्हें भी वह मात्र जानता और देखता है। जब यह अकाट्य नियम है कि मिट्टी कब किसको निमित्तकर पिण्डरूप पर्याय बनेगी, तब वह उसी समय अपनी सुनिश्चित बाह्य सामग्रीको निमित्तकर पिण्डरूप बनती है। यही आगमसम्मत पद्धति है। भारतवर्षमें अनेक लौकिक दर्शन प्रसिद्ध हैं। उनमेंसे कोई (बौद्ध) असत्से सत्की उत्पत्ति मानते हैं, कोई (ब्रह्मवादी) एक सत्से मिथ्या जगतकी उत्पत्ति मानते हैं, कोई (न्याय-वैशेषिक) सत्से उसमें असत् कार्यकी उत्पत्ति मानते हैं, और कोई (सांख्य) सत्से सत् कार्यकी उत्पत्ति मानते हैं। इस प्रकार एकान्तका आग्रह करनेवाले ये विविध मान्यतावाले दर्शन हैं। किन्तु इन सबने इस तथ्यको एक स्वरसे स्वीकार किया है कि अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पदार्थ उपादान या समवायी कारण कहलाता है। इसलिए प्रकृतमें जो तत्त्वार्थवार्तिकका ‘यथा मृदः’ इत्यादि वचन अपर पक्षने उद्धृत किया है सो उसका वही आशय समझना चाहिए जो हमारा अभिप्राय है, क्योंकि स्वयं आचार्य अकलंकदेव इसी ग्रन्थके अध्याय १ सूत्र २ में सम्यग्दर्शनकी चर्चा करते हुए लिखते हैं-

स्वपरनिमित उत्पादो दृष्टो यथा घटस्योत्पादो मृन्निमित्तो दण्डादिनिमित्तश्च, तथा सम्यग्दर्शनोत्पाद आत्मनिमित्तः सम्यक्त्वपुद्गलनिमित्तश्च, तस्मात्तस्यापि मोक्षकारणत्वमुपपद्यते इति ? तन्न, किं कारणं ? उपकरणमात्रत्वात्। उपकरणमात्रं बाह्यसाधनम्।

स्व-परनिमित्तक उत्पाद देखा गया है, जैसे घटका उत्पाद मिट्टीनिमित्तक और दण्डादिनिमित्तक होता है उसी प्रकार सम्यग्दर्शनका उत्पाद आत्मनिमित्तक और सम्यक्त्व पुद्गलनिमित्तक होता है। इस लिए उसमें भी मोक्षकारणता बन जाती है ? यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि सम्यक्त्व पुद्गल उपकरणमात्र है। बाह्य साधन नियमसे उपकरणमात्र है।

यह आचार्यवचन है जो उसी आशयकी पुष्टि करता है जिसका निर्देश उन्होंने ‘यथा मृदः’ इत्यादि वचनमें किया है।

\११. उपादानका सुनिश्चित लक्षण यथार्थ है

अब हम प्रतिशंकाके उस अंशपर विचार करते हैं जिसमें अपर पक्षने उपादानके सुनिश्चित लक्षणको सदोष बतलानेके अभिप्रायसे प्रतिशंकाको मूर्त्तरूप दिया है। अव्यवहित पूर्व पर्याययुक्त द्रव्यका नाम उपादान है इस लक्षणका सभी आचार्योंने निर्देश किया है, किन्तु इस लक्षणके आधारसे अव्यवहित पूर्व-पूर्व पर्यायमें उपादानता बनती जानेसे अपर पक्ष उसे सदोष मानता है। उसका कहना है कि ‘जो मिट्टी परमाणुओंसे बनी है उन परमाणुओंमें एकरूपता स्वीकार करनेसे आगमविरोध उपस्थित हो जायेगा।’ किन्तु ऐसा स्वीकार करने पर भी आगमविरोध नहीं आता, क्योंकि आगममें प्रागभावका प्रागभाव इस प्रकार प्रागभाव अनादि सान्त स्वीकार किया है । पूरा उद्धरण पहले ही दे आये हैं । अतएव उसे यहाँ नहीं दे रहे हैं । किन्तु अपर पक्षने उपादानकी अपेक्षा इस प्रश्नको यहाँ उपस्थित किया है, इसलिए आवश्यक समझकर उसका आशयमात्र यहाँ दे रहे हैं । उसमें बतलाया है कि-

कार्यके पूर्व अनन्तर परिणामस्वरूप उपादानको ही प्रागभाव कहते हैं। ऐसा प्रश्न होनेपर कि अनन्तर पूर्व परिणाम स्वरूप उपादानको प्रागभाव मान लेनेसे उसके पूर्व कार्यके सद्भावका प्रसंग उपस्थित होता है। समाधान करते हुए आचार्य लिखते हैं कि प्रागभावका विनाश ही कार्य है। अतएव उसके पहिले कार्यका सद्भाव नहीं स्वीकार किया है। तो उसके पहले उस कार्यकी अपेक्षा क्या स्थिति रहती है इस प्रश्नका समाधान करते हुए आचार्य लिखते हैं कि प्रागभाव, उसका प्रागभाव इस प्रकार पूर्व-पूर्व परिणाम सन्ततिके अनादि होनेसे उसमें विवक्षित कार्यरूपताका अभाव ही है। अन्तमें निष्कर्षको फलित करते हुए आचार्य लिखते हैं कि इन सब प्रागभावोंकी सन्ततिमें से जब तक अन्तिम प्रागभावका अभाव नहीं हो जाता तबतक विवक्षित कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती। इससे स्पष्ट है कि अन्तिम प्रागभावका अभाव होने पर ही विवक्षित कार्य होता है।

सम्भवतः कोई यह शंका करे कि ऐसा माननेपर प्रत्येक परमाणुको भूतादि चतुष्टयरूप कैसे स्वीकार किया गया है सो उस प्रश्नका समाधान यह है कि यह प्रागभाव सन्तति अनादि होनेसे बहुत बड़ी है, अतएव उसके मध्यमें कभी किसी परमाणुको जलस्वरूप बननेका, कभी उसी परमाणुको वायुरूप बननेका और कभी उसी परमाणुको अग्निरूप बननेका भी अवसर आना सम्भव है, इसको कौन वारण कर सकता है । इससे न तो उसकी प्रागभाव सन्ततिमें ही बाधा आती है और न ही वर्त्तमानमें जो उसका पृथ्वीरूप दिखलाई देता है इसमें ही बाधा आती है । परमाणुकी क्रमसे होनेवाली पर्यायोंमें ये सब अवस्थायें सम्भव हैं । अथवा वर्त्तमान कालके पूर्व उक्त चारों प्रकारकी अवस्थाओंमेंसे किसी परमाणुकी मात्र पृथ्वीरूप, किसी परमाणुकी मात्र पृथ्वी और जलरूप, किसी परमाणुकी मात्र पृथ्वी, जल और अग्निरूप तथा किसी परमाणुकी पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुरूप अवस्थायें होना भी सम्भव है । कोई एक नियम नहीं । जिसकी जब जैसी उपादान योग्यताएँ रही होगीं तब उनका अतीत कालमें वैसा परिणमन हुआ होगा । जो परिणमन हुआ होगा वह नियतक्रमसे ही हुआ होगा । अल्पज्ञानी जीव अनादि कालसे लेकर अबतक किसका क्या परिणमन हुआ होगा इसे भले ही न जान सके, परन्तु इतनेमात्रसे उस परमाणुके नियतक्रमसे होनेवाले परिणमनमें कोई बाधा उपस्थित नहीं होती । अतएव अपर पक्षकी ओरसे पंचास्तिकाय गाथा ७८ की आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीकाको आधार बनाकर जो उपादानके उक्त लक्षणको सदोष बतलाया गया है वह ठीक नहीं है । आचार्य महाराज अपनी उक्त टीकामें परमाणुकी परिणमनसम्बन्धी इस विचित्रताका निर्देश करते हुए स्वयं लिखते हैं-

ततः पृथिव्यप्तेजोवायुरूपस्य धातुचतुष्कस्यैक एव परमाणुः कारणं परिणामवशात् । विचित्रो हि परमाणोः परिणामगुणः क्वचित्कस्यचित् गुणस्य व्यक्ताव्यक्तत्वेन विचित्रां परिणतिमादधाति ।

इसलिए पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुरूप चार धातुओंका परिणामके कारण एक ही परमाणु कारण है, क्योंकि परमाणुका विचित्र परिणामगुण कहीं किसी गुणकी व्यक्ताव्यक्तता द्वारा विचित्र परिणतिको धारण करता है ।

यह वही आगम प्रमाण है जिसे अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनमें समझकर निर्दिष्ट किया है । किन्तु जैसा कि हम पूर्वमें बतला आये हैं उससे एक परमाणुके कालभेदसे पृथ्वी आदि अनेक अवस्थारूप परिणमन करने पर भी उपादानके अव्यवहित पूर्व पर्याय युक्त द्रव्यरूप लक्षणके स्वीकार करनेमें कोई बाधा नहीं उपस्थित होती ।

अपर पक्षकी ओरसे यहाँपर अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें उपादानकारणतारूप सामर्थ्यको लेकर जो यह पृच्छा की गई है कि ‘उक्त पर्यायमें उक्त प्रकारकी सामर्थ्यके उत्पन्न होनेका कारण क्या है’ और फिर उसे कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्तित्वरूप धर्म बतलाकर यह लिखा है कि ‘वह तो कार्य सापेक्ष धर्म है, अतः जब तक कार्य निष्पन्न नहीं हो जाता तब तक उस अव्यवहित पूर्व पर्यायमें कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्तित्वरूप धर्म हो नहीं सकता है, इसलिए यदि कहा जाय कि कार्योत्पत्तिकी स्वाभाविक अतीन्द्रिय योग्यता ही सामर्थ्य शब्दका वाच्य है तो फिर हमारा कहना है कि इस प्रकारकी सामर्थ्य तो मिट्टीको कुशूल, कोश, स्थास, पिण्डरूप पर्यायोंमें तथा इनके भी पहलेकी सामान्य मिट्टीरूप अवस्थामें भी पायी जाती है, इसलिए घट कार्यके प्रति इन सबको उपादान कारण मानना असंगत नहीं है ।’ आदि ।

सो इस प्रश्नका समाधान यह है कि ऋजुसूत्रनयकी अपेक्षा अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें उपादानकारणतारूप स्वरूप स्वतःसिद्ध है । यह इसका कार्य है और यह इसका उपादान कारण है ऐसा व्यवहार मात्र परस्परसापेक्ष है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य समन्तभद्र अपनी आप्तमीमांसामें लिखते हैं-

धर्म-धर्म्यविनाभावः सिद्धयत्यन्योन्यवीक्षया ।
न स्वरूपं स्वतो ह्येतत् कारक-ज्ञापकांगवत् ॥७५॥

धर्म और धर्मीका अविनाभाव परस्पर सापेक्षरूपसे सिद्ध होता है, स्वरूप नहीं, क्योंकि वह कारकांग और ज्ञापकांगके समान नियमसे स्वतःसिद्ध है ॥७५॥

इस प्रकार अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायमें उपादान कारणतारूप स्वरूपके स्वतःसिद्ध हो जाने पर उससे पूर्व-पूर्ववर्ती पर्यायोंमें वह कारणरूप धर्म आगममें किस रूपमें स्वीकार किया गया है इसका विचार करना है । आगममें इसका विचार करते हुए बतलाया है कि अव्यवहित पूर्वक्षणवर्ती पर्याय युक्त द्रव्य निश्चय उपादानकारण है। समर्थ उपादान कारण इसीका दूसरा नाम है। तथा इससे पूर्व-पूर्ववर्ती पर्याय युक्त द्रव्य व्यवहार उपादानकारण है। असमर्थ उपादान कारण इसका दूसरा नाम है। इसकी पुष्टि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृष्ठ ७१ के ‘न हि द्वयादिसिद्धक्षणैः’ इत्यादि वचनसे भली प्रकार हो जाती है। इसमें व्यवहार उपादानका स्वरूप बतलाते हुए उसे असमर्थ उपादान कारण कहा गया है और निश्चय उपादानका स्वरूप बतलाते हुए उसे समर्थ उपादान कारण कहा गया है । आचार्य महाराज इसी उल्लेख द्वारा इस बातको स्पष्टरूपसे सूचन करते हैं कि जो समर्थ उपादान कारण होता है वह नियमसे अपने कार्यको जन्म देता है । किन्तु जो असमर्थ उपादान कारण होता है उससे समर्थ उपादानजन्य कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । अतएव इस कथनसे यह सिद्ध हो जाता है कि जिस प्रकारकी उपादानता अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्याययुक्त द्रव्यमें होती है उस प्रकारकी उपादानता इसके पूर्व उस द्रव्यमें कभी भी सम्भव नहीं है । इसलिए सभी आचार्योंने निश्चय उपादान कारणका एक मात्र यही लक्षण स्वीकार किया है जो युक्तियुक्त है ।

शंका ६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ३/४)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ४६१ से ४८१

↑ सूची


\१२. परमाणुमें योग्यता आदिका विचार

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने दो या दो से अधिक परमाणुओंके संयोगसे बनी हुई स्कन्धरूप पर्यायकी चर्चा करते हुए लिखा है कि ‘वह स्कन्ध नाना द्रव्योंके परस्पर मिश्रणसे ही बना हुआ है । अतएव मिट्टीमें पाया जानेवाला मृतिकात्व धर्म मिट्टीकी अपेक्षा स्वाभाविक होते हुए भी नाना द्रव्योंके मिश्रणसे उत्पन्न होनेके कारण कार्य ही कहा जायेगा ।’

यह अपर पक्षके वक्तव्यका अंश है । इसमें अपर पक्षने मृतिकात्व धर्म मिट्टीकी अपेक्षा स्वाभाविक बतलाकर भी उसे नाना द्रव्योंके मिश्रणसे उत्पन्न होनेके कारण एक मात्र कार्यधर्म कहा है, किन्तु अपर पक्षका यह कथन आगमविरुद्ध होनेसे भ्रामक ही है, क्योंकि प्रत्येक परमाणुमें यदि स्कन्ध योग्यता और मिट्टीरूप परिणमनेकी योग्यता स्वाभाविक न मानी जाय और केवल उसे संयोग जन्य माना जाय तो कोई भी परमाणु अपनी स्वाभाविक योग्यताके अभावमें स्कन्धरूप या मिट्टीरूप त्रिकालमें नहीं परिणम सकता ।

तत्त्वार्थवार्तिक अध्याय ५ सूत्र १ में यह प्रश्न उठाया गया है कि परमाणु पूरण-गलन स्वभाववाला न होनेके कारण उसे पुद्गल नहीं कहा जा सकता । आचार्य अकलंकदेवने इस प्रश्नका समाधान करते हुए लिखा है कि-पहले या भविष्यमें वह पूरण-गलनरूप पर्यायको प्राप्त हुआ था या होगा, इसलिए शक्तिकी अपेक्षा परमाणुको पुद्गल कहनेमें कोई बाधा नहीं आती । वह उल्लेख इस प्रकार है-

अथवा गुण उपचारकल्पनम् पूरणगलनयोः भावित्वात् भूतत्वाच्च शक्त्यपेक्षया परमाणुपु पुद्गलत्वोपचारः ।

यह तो परमाणु को पुद्गल क्यों कहा गया इसका विचार है । आगे इस बातका विचार करना है कि परमाणुमें मिट्टीरूप शक्ति होनेके कारण मिट्टीमें मिट्टीरूप धर्म पाया जाता है या केवल नाना पुद्गलोंके मिश्रणसे उसमें वह धर्म उत्पन्न होता है । आचार्य अमृतचन्द्र पंचास्तिकायकी टीकामें शब्दकी अपेक्षा इसका विचार करते हुए लिखते हैं -

एवमयमुक्तगुणवृत्तिः परमाणुः शब्दस्कंधपरिणतिशक्तिस्वभावात् शब्दकारणम् ।

ऐसा यह उक्त गुणवाला परमाणु शब्द स्कन्धरूपसे परिणत होनेकी शक्तिरूप स्वभाववाला होनेसे शब्दका कारण है ।

इससे स्पष्ट विदित होता है कि जिस प्रकार परमाणु शब्दरूप परिणमनकी शक्तिसे युक्त होता है उसी प्रकार इससे यह भी सिद्ध होता है कि वह मिट्टीरूप परिणमनकी शक्तिसे भी युक्त होता है । अतएव मिट्टीमें पाया जानेवाला मृतिकात्व धर्म नाना स्कन्धोंके परस्पर मिश्रणसे ही उत्पन्न होता है ऐसे एकान्तको न स्वीकार करके उसे शक्तिकी अपेक्षा नित्य ही मानना चाहिए । साथ ही उसे जो एकान्तसे कार्यधर्म कहा गया है वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि कोई भी द्रव्य किसी अवस्थामें न तो केवल कार्य ही स्वीकार किया गया है और न केवल कारण ही । अपने पूर्व पर्यायकी अपेक्षा जो कार्य होता है, अपनी उत्तर पर्यायकी अपेक्षा वह कारण भी होता है ।

इस दृष्टिसे विचार करने पर यह भी विदित हो जाता है कि पुद्गलोंकी स्कन्ध अवस्थामें जो जो पर्यायें उत्पन्न होती हैं वे सब शक्तिरूपसे परमाणुमें विद्यमान हैं । यह प्रत्येक परमाणुका स्वतःसिद्ध स्वरूप है । अपर पक्षके वक्तव्यके पढ़नेसे विदित होता है कि वह प्रत्येक परमाणुमें ऐसी योग्यता तो मानता है कि एक परमाणु दूसरे परमाणु या स्कन्धके साथ संयोगको प्राप्त होकर उसरूप परिणम जाता है । किन्तु जिस जातिके स्कन्ध रूप वह परमाणु परिणमा उस प्रकारकी शक्ति वह परमाणुमें स्वीकार नहीं करता इसका हमें आश्चर्य है । परमाणुमें घटरूप कार्यकी व्यवहार उपादानताका भी निषेध वह इसी अभिप्रायसे करता है । जो शक्ति मूल द्रव्यमें न हो वह उसके उत्तर कार्योंमें उत्पन्न हो जाय, यह सम्भव तो नहीं है, परन्तु अपर पक्ष अपनी कल्पना में इसे मूर्तरूप देनेके लिए अवश्य ही सन्नद्ध है । जहाँ बाह्य दृष्टिवालेको प्रत्यक्षमें ऐसा भासित होता है कि मिट्टी अपने आप घटरूप नहीं परिणम रही है वहाँ भेद दृष्टिवालेको यह भासित होता है कि कुम्हारकी क्रिया कुम्हारमें हो रही है और मिट्टीकी क्रिया मिट्टीमें हो रही है। यदि मिट्टीकी क्रियामें कुम्हारकी क्रिया निमित्त है तो कुम्हारकी उस समय होनेवाली क्रिया में मिट्टी भी निमित्त है। अपर पक्ष कह सकता है कि कुम्हार अपनी हस्तादि क्रियाको मिट्टीके अभावमें भी कर सकता है, इसलिए कुम्हार स्वयं अपनी क्रिया कर रहा है, मिट्टी उसमें निमित्त नहीं है। किन्तु बात ऐसी तो नहीं है, क्योंकि जैसी क्रिया मिट्टीके संयोगमें उसकी होती है वैसी अन्य कालमें दिखलाई नहीं देती। फिर भी यदि विचारके लिए इसे स्वीकार कर लिया जाय तो प्रश्न यह उपस्थित होता है कि उसका बाह्य कारण कौन ? यदि केवल कर्मोदयको उसका बाह्य कारण माना जाता है तो कर्मोदय भी एक कार्य है उसके बाह्य कारणका भी अनुसंधान करना होगा। किन्तु वहाँ अन्य कोई कारण तो दिखलाई देता नहीं सिवाय मिट्टीके, इसलिए यही मानना होगा कि उस समय मिट्टीमें जो क्रिया हो रही है उसे निमित्तकर कर्मोदय हुआ और कर्मोदयको निमित्तकर कुम्भकारकी बाह्य क्रिया हुई और अन्तमें कुम्भकारको निमित्तकर मिट्टीमें क्रिया हुई। इस प्रकार परस्पराश्रयता प्राप्त होनेसे अंतमें यही मानना उचित है कि प्रत्येक द्रव्य अपनी क्रियाका स्वयं कर्ता है। अन्य द्रव्य तो उसमें निमित्तमात्र है। इसप्रकार प्रत्येक कार्यके साथ बाह्याभ्यन्तर सामग्रीका अन्वय-व्यतिरेक बन जानेके कारण कार्य-कारण परम्परा सुव्यवस्थित बन जाती है।

यह हम मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति योग्य उपादान और योग्य बाह्य सामग्रीके संयोगका विकल्प करता है, कदाचित् योगक्रिया भी उसके तदनुकूल होती है। परन्तु इन दोनोंके करने पर भी जैसी वह चाहता है वैसी बाह्याभ्यन्तर सामग्री विवक्षित कार्यके लिए मिलती ही है ऐसा कोई नियम नहीं। कदाचित् मिलती है और कदाचित् नहीं भी मिलती है। यदि मिल भी गई तो जैसा वह चाहता है वैसा कार्य होता है इसका भी कोई नियम नहीं। कदाचित् होता है और कदाचित् नहीं भी होता है। सो क्यों? इसके उत्तरकी यदि छानबीन की जाय तो अन्तमें यही स्वीकार करना पड़ता है कि जिस वस्तुका जिस कालमें जिसको निमित्त कर, जो परिणमन होना होगा, वह अवश्य होगा। जिसे हम करनेवाला कहते हैं और करानेवाला कहते हैं वह तो अपने अपने विकल्प और योयक्रियाका ही धनी है। यदि अपर पक्ष इस निर्णय पर पहुँच जाय तो प्रकृतमें उसने घट कार्यको विवक्षितकर जितने भी विकल्प प्रस्तुत किये हैं उनकी निस्सारता समझनेमें उसे देर न लगे।

अपर पक्ष आगमसम्मत कार्यकारणभावको ठीक न समझकर अपने द्वारा कल्पित किये गये कार्य-कारणभावके सिद्धान्तको आगमसम्मत बतलाता अवश्य है, परन्तु प्रत्येक निश्चय उपादानमें अनेक योग्यताऐं होती हैं उसमेसे जिस योग्यताके अनुकूल बाह्य सामग्री प्राप्त होती है या मिलायी जाती है उसके अनुसार उस समय कार्य होता है। न तो यह सिद्धान्त हमें कहीं आगममें दृष्टिगोचर हुआ और न ही यह सिद्धान्त हीं आगममें दृष्टिगोचर हुआ कि-यदि अव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायके उपस्थित होने पर कारणान्तरोंकी विकलता हो या बाधक सामग्री उपस्थित हो या दोनों उपस्थित हों तो कार्य नहीं होगा। हमने आगमकी बहुत छान-बीन की, किन्तु हमें यह सिद्धान्त भी दृष्टिगोचर न हो सका कि-प्रत्येक द्रव्यमें ऐसे भी परिणमन होते हैं जो स्वप्रत्यय ही होते हैं, उनमें कालादि द्रव्योंकी भी निमित्तता नहीं है। अपर पक्ष इन सब सिद्धान्तोंको आगम सम्मत मानता है। किन्तु इनकी पुष्टिमें अभी तक वह कोई विधायक आगम उपस्थित करनेमें असमर्थ रहा। जहाँ स्वप्रत्ययकी प्रधानतासे विचार किया गया है उसे एकान्तसे उस पक्षने स्वप्रत्यय स्वीकार कर लिया और जहाँ अन्य प्रकारसे विचार किया गया है वहाँ उसे उस प्रकारसे स्वीकार कर लिया। यह उसके विचार करनेकी पद्धति है। पूरे जिनागममें एकरूपता उपस्थित हो इसकी ओर 'उसका ध्यान ही नहीं है। वह प्रमेयकमलमार्तण्डके ‘किं ग्राहकप्रमाणाभावात्’ तथा ‘यच्चोच्यते’ इन दोनों प्रमाणोंको स्वीकार हो सकता है, किन्तु उन प्रमाणों द्वारा जो तथ्य प्रगट किये गये हैं उन्हें निष्कर्षरूपमें स्वीकार नहीं करना चाहता। जब यह नियम है कि प्रत्येक कार्यमें बाह्याभ्यन्तर सामग्रीकी सम्यग्रता होती ही है, उसमें अपवाद नहीं। ऐसी अवस्थामें प्रत्येक कार्यके सम्मुख द्रव्यके होने पर 'यदि बाह्य सामग्री न हो या बाधक कारण उपस्थित हो जायें इत्यादि प्रश्नोंको अवकाश ही कहाँ रहता। आचार्योंने इन बातोंकी चर्चा की अवश्य है, पर वह बुद्धिद्वारा सुनिश्चित किया गया कारण ही कार्यके अनुमान ज्ञानमें हेतु हो सकता है इस बातको ध्यानमें रखकर ही की है। उक्त दोनों प्रमाणोंमें तो उक्त बातोंकी चर्चा ही नहीं है। जब प्रत्येक कार्य विशिष्ट पर्याययुक्त विशिष्ट द्रव्यके होने पर अपनी प्रतिनियत बाह्य-सामग्रीको निमित्तकर होता है तो आगममें कोई दूसरी बात कही गई है और लोकमें कोई दूसरी बात देखी जाती है ऐसा न होकर वस्तुस्थिति यह है कि प्रतिनियत कालमें ही प्रतिनियत कार्य होता है। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके द्वितीय उद्धरणमें यही तथ्य प्रकाशमें लाया गया है। आचार्य विद्यानन्दी अष्टसहस्री पृष्ठ १११ में लिखते हैं-

तथा कारणकार्यपरिणामयोः कालप्रत्यासत्तेरसत्त्वेऽनभिमतकालयोरिवाभिमतकालयोरपि कार्यकारणभावासत्त्वादुभयोर्निरुपाख्यतापत्तिः।

उसी प्रकार कारण परिणाम और कार्य परिणाममें कालप्रत्यासत्तिके नहीं होनेपर जैसे अनभिमत कालभावी दो पर्यायोंमें कार्यकारणभावका अभाव है उसी प्रकार अभिमत कालभावी दो पर्यायोंमें भी कार्य-कारणभावका अभाव होनेसे दोनोंका अभाव प्राप्त होता है।

इससे स्पष्ट है कि जिस प्रकार अपर पक्ष जब निमित्त मिलते हैं तब कार्य होता है यह लिखकर विवक्षित कालमें ही विवक्षित कार्य होता है इसका निषेध करता है वैसा आगमका अभिप्राय नहीं है। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके द्वितीय उद्धरणमें ‘तदैव’ पद इसी तथ्यको सूचित करता है, क्योंकि उपादानके अपने कार्यरूप व्यापारके समय बाह्य सामग्रीका योग रहनेका एकान्त नियम रहनेके कारण उक्त उल्लेखमें उक्त पद्धतिसे उस तथ्यको प्रकाशमें लाया गया है।

हमने उन दोनों उद्धरणोंका जो आशय है वही लिया है। हम अच्छी तरहसे जानते हैं कि हमारे और आपके अभिप्रायमें जमीन आसमानका अन्तर है। जहाँ हमारा यह अभिप्राय है कि प्रत्येक समयमें प्रत्येक द्रव्य समर्थ उपादान कारण होकर अपने प्रतिनियत कार्यको नियमसे जन्म देता है और उसके होनेमें प्रतिनियत बाह्य सामग्रीका योग नियमसे मिलता है वहाँ आपका यह अभिप्राय है कि प्रत्येक उपादान अनेक योग्यताओंवाला होता है, इसलिए उसे जैसी बाह्य सामग्रीका सानिध्य मिलता है वैसा कार्य होता है। उस उपादानसे कौन कार्य हो यह बाह्य सामग्रीपर अवलम्बित है। घुमा फिराकर अनेक प्रकारसे आप अपने अभिप्रायको लिपिवद्ध कर रहे हैं पर उन सबका आशय पूर्वोक्त ही है। अपने आशयके अनुरूप उसकी पुष्टिमें स्पष्ट प्रमाण न मिल सकनेके कारण ही अपर पक्षको यह प्रयास करना पड़ रहा है। इस प्रकार हमारे और आपके कथनमें जो भेद है वह स्पष्ट है।

आगे अपर पक्षने हमें लक्ष्यकर लिखा है कि ‘दण्ड, चक्र, आदिमें निमित्तता उसी समय स्वीकार की गई है जब मिट्टी घट पर्यायके परिणमनके सन्मुख होती है, अन्यकालमें वे निमित्त नहीं स्वीकार किए गये हैं। इस विषयमें हमारा कहना यह है कि कुम्हार, दण्ड, चक्र आदिमें घटके प्रति निमित्त कारणताका अस्तित्व उपादानताभूत वस्तुकी तरह नित्य शक्तिके रूपसे तो पहले ही पाया जाता है, क्योंकि कार्योत्पत्तिके लिए उपादानभूत वस्तुके संग्रहकी तरह निमित्तभूत वस्तुका भी लोकमें संग्रह किया जाता है ।’ किन्तु अपर पक्षका यह लिखना कल्पनामात्र है, क्योंकि कुम्हार सदा कुम्हार नहीं बना रहता, इसी प्रकार दण्डादिक वस्तुएँ भी सदा ही उस पर्यायरूपसे नहीं रहती हैं । उपादान-उपादेयभाव एक द्रव्यमें स्वीकार किया गया है, इसलिए उसमें द्रव्यार्थिक नयसे पहले भी उपादानता शक्तिरूपमें स्वीकार की गई है, किन्तु यह स्थिति बाह्य सामग्रीकी नहीं है। यही कारण है कि तत्त्वार्थवार्तिक अध्याय १ सूत्र ३३में जब कुम्हार शिविका आदि पर्यायों-के होनेमें निमित्त हो रहा है तब उसे कुम्हार कहनेका निषेध करते हुए लिखा है-

कुम्भकाराभावः शिविकादिपर्यायकरणे तदभिधानाभावात् । कुम्भपर्यायसमये च स्वावयवेभ्य एव निर्वृत्तेः ।

कुम्भकारका अभाव है, क्योंकि शिविका आदि पर्यायोंके करते समय उसे कुम्हार शब्दसे नहीं कहा जा सकता । और कुम्भपर्यायके समयमें अपने अवयवोंसे ही वह ( कुंभ ) निर्वृत्त हुआ है ।

इससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी वस्तुमें अन्य द्रव्यके कार्य करनेरूप निमित्त कारणता नामका धर्म नित्य शक्तिरूपसे नहीं पाया जाता। यह केवल व्यवहारमात्र है। यदि अपर पक्ष घटनिर्माणके पहले भी कुम्हार शब्दका प्रयोग करना चाहता है तो भले करे, हम भी ऐसा प्रयोग करते हैं। परन्तु वह लोकपरिपाटीमात्र है । जयधवला पुस्तक ७ पृष्ठ ३१३ में इसी आशयको स्पष्ट करते हुए लिखा भी है-

पाचओ भुंजइ त्ति णिव्वावारावत्थाए वि किरियाणिमित्तववएसुवलंभादो ।

जैसे पाचक (रसोइया) भोजन करता है, यहाँ पाचनक्रियाके अभावमें भी क्रियानिमित्तक पाचक शब्द उपलब्ध होता है ।

हमें आशा है कि अपर पक्ष उक्त उल्लेखोंके प्रकाशमें बाह्य वस्तुमें निमित्त व्यवहारको यथार्थ न मानकर उसे उपचरित स्वीकार कर लेगा ।

यहाँ अपर पक्षने बड़ी संजीदगीके साथ खेद व्यक्त करते हुए जो यह लिखा है कि 'आगमके वचनोंका अभिप्राय बिल्कुल स्वाभाविक ढंगसे आगमके दूसरे वचनोंके साथ समन्वयात्मक पद्धतिको अपनाते हुए प्रकरण आदिको लक्ष्यमें रखकर वाक्यविन्यास, पदोंकी सार्थकता, ग्रन्थकर्ताकी विषयमर्मज्ञता, साहित्यिक ढंग और भाषापाण्डित्य आदि उपयोगी बातोंको लक्ष्यमें रखकर ही ग्रहण कीजिए, अन्यथा इस तरहकी प्रवृत्तिका परिणाम जैन संस्कृतिके लिये आगे चलकर बड़ा भयानक होगा जिसके लिए यदि जीवित रहे तो हम और आप सभी पछतावेंगे ।

किन्तु इन शब्दोंमें तो नहीं, सुस्पष्ट और मधुर शब्दोंमें इस विषयमें हम अपर पक्षसे यह निवेदन कर देना चाहते हैं कि आवेशमें न आकर वह अपने शब्दों पर स्वयं ध्यान दे । यदि उसके मनमें सचमुचमें समन्वयकी भावना है तो उसे निश्चय और व्यवहारके जो लक्षण आगममें स्वीकार किये गये हैं उन्हें ध्यानमें रखकर प्रतिनियत कार्यका प्रतिनियत उपादान स्वीकार करके कार्य-कारणभावकी संगति विठला लेनी चाहिए, इससे उत्तम और दूसरा समन्वयका मार्ग क्या हो सकता है । यह आगमानुमोदित मार्ग है । केवलज्ञानके विषयसे श्रुतज्ञानके विषयको भिन्न बतलाकर लौकिक मान्यताओंको आगमरूपसे स्वीकार करानेका अभिप्राय रखना यह कोई समन्वयका मार्ग नहीं है ।

आगे अपर पक्षने हमारे कथनको स्वीकार करते हुए अन्तमें जो यह लिखा है कि ‘किन्तु हम आपके समान ऐसा भी नहीं मानते कि कार्य निमित्तकी अपेक्षा रहित केवल विशिष्ट पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्ति मात्रसे ही उत्पन्न हो जाया करता है तथा ऐसा भी नहीं मानते कि सहकारी कारणकी सापेक्षताका अर्थ केवल इतना ही होता है कि सहकारी कारणकी उपस्थिति वहाँ पर नियमसे रहा करती है, उसका वहाँ कभी अभाव नहीं होता। हम तो ऐसा मानते हैं कि एक ता उस पर्यायशक्तिकी उत्पत्ति सहकारी कारणोंके सहयोगसे ही होती है, दूसरे पूर्व पर्यायशक्ति विशिष्ट द्रव्यशक्ति निमित्तोंका वास्तविक सहयोग मिलने पर ही उत्तर पर्यायरूप कार्यको उत्पन्न करती है और फिर उस उत्तर पर्यायशक्तिविशिष्ट द्रव्यशक्ति भी यदि निमित्तोंका अनुकूल सहयोग मिल जावे तो उस उत्तर पर्यायसे भी उत्तर पर्यायको उत्पन्न कर देती है तथा यदि अनुकूल निमित्तोंका सहयोग प्राप्त नहीं होता तो वर्तमान पर्यायशक्तिसे विशिष्ट द्रव्यशक्ति उस पर्यायसे उत्तर क्षणवर्ती विवक्षित पर्यायको उत्पन्न करनेमें सर्वदा ही असमर्थ रहेगी। फिर तो उससे उसी कार्यकी उत्पत्ति होगी जिसके अनुकूल उस समय निमित्त उपस्थित होंगे।’ आदि।

वह अपर पक्षका कार्य-कारणभावके विषयमें वक्तव्य है। बौद्धदर्शन विधिकी सिद्धिमें स्वभावहेतु और कार्यहेतु इन दोको ही स्वीकार करता है, कारणहेतुको गमक नहीं मानता। उसका कहना है कि कारणका कार्यके साथ अविनाभाव न होनेके कारण वह उसकी सिद्धिका हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि जितने भी कारण होते हैं वे नियमसे कार्यवाले होते ही हैं ऐसा कोई नियम नहीं है। जिसकी सामर्थ्य अप्रतिबद्ध है ऐसा कारण तो कार्यका नियमसे गमक होगा ऐसा कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि सामर्थ्य अतीन्द्रिय होती है, इसलिए उससे किस कार्यको जन्म मिलेगा इसका ज्ञान करना अशक्य है। यह बौद्धदर्शनका वक्तव्य है। इसीके उत्तरस्वरूप आचार्य माणिक्यनन्दिने अपने परीक्षामुख अ० ३ में ‘रसादेकसामग्र्यनुमानेन’ इत्यादि ५६ संख्याक सूत्र लिपिबद्ध कर यह कहा है कि ऐसा कारणरूप हेतु अपने कार्यका गमक होता ही है जो अप्रतिबद्ध सामर्थ्यवाला हो तथा कारणान्तरोंकी विकलतासे रहित हो। इसकी टीका करते हुए लघु अनन्तवीर्य लिखते हैं-

न ह्यनुकूलमात्रमन्त्यक्षणप्राप्तं वा कारणं लिङ्गमिष्यते येन मणिमन्त्रादिना सामर्थ्यप्रतिबन्धात्कारणान्तरवैकल्येन वा कार्यव्यभिचारित्वं स्यात्, द्वितीयक्षणे कार्यप्रत्यक्षीकरणे नानुमानानर्थक्यं वा; कार्याविनाभावितया निश्चितस्य विशिष्टकारणस्य छत्रादेर्लिंगत्वेनांगीकरणात्। यत्र सामर्थ्याप्रतिबन्धः कारणान्तरावैकल्यं निश्चीयते तस्यैव लिंगत्वं नान्यस्येति नोक्तदोषः।

हम अनुकूलमात्र (लक्षणवाले) कारणको या अन्त्यक्षणप्राप्त (लक्षणवाले) कारणको लिंग अर्थात् साध्यकी सिद्धिमें हेतु नहीं कहते जिससे कि मणि-मन्त्रादिकके द्वारा सामर्थ्यका प्रतिबन्ध होनेसे अथवा कारणान्तरोंकी विकलता होनेसे वह (विवक्षित) हेतु कार्य (विवक्षित कार्य) के साथ व्यभिचारीपनेको प्राप्त हो अथवा द्वितीय क्षणमें कार्यके प्रत्यक्ष करनेसे अनुमानकी व्यर्थता हो, क्योंकि हमने कार्यके साथ अविनाभावरूपसे निश्चित विशिष्ट कारणरूप छत्रादिकको लिंगरूपसे ( अनुमानज्ञानमें हेतुरूपसे ) स्वीकार किया है। जिसमें सामर्थ्यका अप्रतिबन्ध और कारणान्तरोंका अवैकल्य निर्णीत होता है उसीके लिंगपना (अनुमानज्ञानमें हेतुपना) है, अन्यके नहीं, इसलिए प्रकृतमें उक्त दोषका प्रसंग नहीं प्राप्त होता।

लोकमें और आगममें प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणोंके साथ अनुमानज्ञान भी प्रमाणरूपसे स्वीकार किया गया है। इसमें जिस वस्तुका ज्ञान किया जाता है वह परोक्ष होती है और जिसको हेतु बना कर ज्ञान किया जाता है वह वस्तु इन्द्रियप्रत्यक्ष होती है। ऐसी स्थितिमें यदि हमें इस मिट्टीसे अगले समयमें क्या कार्य होगा इसका ज्ञान करना है तो हमें सर्व प्रथम साधनभूत बाह्याभ्यन्तर सामग्रीके ऊपर दृष्टिपात करना होगा, इसके बिना इस उपादानसे अगले समयमें क्या कार्य होगा यह अनुमान नहीं कर सकते । इसी तथ्यको आचार्यने उक्त टीकावचन द्वारा स्पष्ट किया है । बाह्य सामग्री द्वारा परोक्षभूत कार्यका निर्णय करनेके लिए उनका कहना है कि वहाँ पर एक तो वही बाह्य सामग्री होनी चाहिए जिससे परोक्षभूत निश्चित कार्यकी सूचना मिले, उससे विरुद्ध कार्यको सूचित करनेवाली बाह्य सामग्री वहाँ पर नहीं होनी चाहिए । दूसरे वहाँ पर उपस्थित बाह्य सामग्रीसे परोक्षभूत जिस कार्यकी सूचना मिलती हो उसमें कमी नहीं होनी चाहिए । इस प्रकार तो कारणको हेतु बना परोक्षभूत कार्यका अनुमान करनेवाला व्यक्ति सम्यक् प्रकारसे बाह्य सामग्रीका विचार करले । और इसी प्रकार वह जिस आभ्यन्तर सामग्रीको परोक्षभूत कार्यकी अन्त्यक्षणप्राप्त आभ्यन्तर सामग्री समझ रहा है उसका भी विचार कर ले । यहाँ ऐसा न हो कि है तो वह अन्य कार्यकी अन्त्यक्षणप्राप्त सामग्री और अपनी बुद्धिसे वह समझ बैठा है उससे भिन्न दूसरे कार्यकी अन्त्यक्षणप्राप्त सामग्री । इस प्रकार बाह्य-आभ्यन्तर सामग्रीके आधार पर परोक्षभूत कार्यका अनुमान करनेवाला व्यक्ति यदि परोक्षभूत कार्यकी अविनाभूत बाह्याभ्यन्तर सामग्रीको ठीक तरहसे जान सका तो निश्चित समझिए कि ऐसी सामग्रीको हेतु बनाकर परोक्षभूत तदनुरूप जिस कार्यका अनुमान किया जायगा वह यथार्थ ही ठहरेगा ।

यहाँ ऐसा समझना चाहिए कि प्रत्येक कार्यकी बाह्याभ्यन्तर सामग्री सुनिश्चित है । वह प्रत्येक समयमें युगपत् प्राप्त होती रहती है, उसके प्राप्त होनेमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती । यही कारण है कि प्रत्येक समयमें अपनी-अपनी बाह्याभ्यन्तर सामग्रीके अनुरूप कार्यकी उत्पत्ति होती रहती है । बाह्याभ्यन्तर सामग्रीको हेतु बनाकर परोक्षभूत कार्यका अनुमान करते समय वहाँ पर उपस्थित हुई सब प्रकारकी सामग्रीके आधार पर निर्णय करनेकी दिशामें प्रयत्न करना अन्य बात है और वहाँ पर उपस्थित हुई सब प्रकारकी सामग्रीमेंसे परोक्षभूत कार्यके साथ अविनाभाव सम्बन्ध रखनेवाली सामग्रीको जानकर उसके आधार पर अगले समयमें नियमसे उत्पन्न होनेवाले कार्यका अनुमान कर लेना अन्य बात है । वस्तुतः उक्त टीकावचनमें कार्य-कारणभावका विचार नहीं किया गया है । वहाँ तो परोक्षभूत कार्यका अनुमान करते समय जिस बाह्याभ्यन्तर सामग्रीको हेतु बनाया जाय उसका विचार कितनी गहराईसे करना चाहिए मात्र इसका विचार किया गया है । तभी तो आचार्यने निष्कर्षरूपमें यह वचन लिखा है-कार्याविनाभावितया निश्चितस्य विशिष्टकारणस्य छत्रादेर्लिंगत्वेनांगीकरणात् । तात्पर्य यह है कि जिस कारणका जिस कार्यके साथ अविनाभाव सम्बन्ध है, यतः उससे उसी कार्यकी उत्पत्ति होगी अतः ऐसा सुनिश्चित कारण ही परोक्षभूत कार्यका अनुमान करानेमें साधन बन सकता है, अन्य नहीं यह उक्त समग्र कथनका तात्पर्य है ।

अपर पक्ष अनुमान प्रकरणकी इस मीमांसाको कार्य-कारणभावकी मीमांसामें कैसे ले गया और उस आधार पर उसने असंगत अनेक तर्कणाएँ उपस्थित कर उसे जटिल कैसे बना दिया इसका हमें आश्चर्य है । कार्य-कारणका विचार करना अन्य बात है और विवक्षित कार्यका अनुमान करते समय किस स्थितिमें कौन कारण हेतु हो सकता है इसे समझना अन्य बात है । इससे कार्य-कारणभावकी नियत श्रृंखलामें कहाँ बाधा उपस्थित होती है इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे । अनुमान करनेकी दृष्टिसे कोई कार्य अपनी विवक्षामें हो और बाह्याभ्यन्तर सामग्री दूसरे कार्यकी उपस्थित हो, फिर भी हम उससे भिन्न किसी दूसरी सामग्रीको देखकर विवक्षित कार्यका अनुमान करें तो हमारा अनुमान ज्ञान ही असत्य सिद्ध होगा, इससे नियत कार्य-कारणपरंपरामें आँच आनेवाली नहीं । स्पष्ट है कि उक्त टीकाको ख्यालमें रख कर यहाँ पर अपर पक्षने कार्य कारणभावके सम्बन्धमें जो कुछ भी लिखा है वह केवल भ्रम उत्पन्न करनेका एक प्रयासमात्र ही है ।

हमने अपने पिछले उत्तरमें लिखा है कि ‘गेंहूँ पर्यायविशिष्ट पुद्गल द्रव्य बाह्यकारण सापेक्ष गेंहूँके अंकुरादि कार्यरूपसे परिणत होता है।’ इस पर अपर पक्षका कहना है कि ‘यह यदि बुद्धिभ्रमसे न लिख कर बुद्धिपूर्वक ही लिखा है तो इससे तो कार्यके प्रति निमित्तकारणकी सार्थकताका ही समर्थन होता है।’ आदि।

किन्तु हम यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमारे उक्त वाक्यके आधारसे अपर पक्षने यहाँ पर जो कुछ भी अभिप्राय व्यक्त किया है वह यथार्थ नहीं है, क्योंकि हमने उक्त वचन मात्र द्रव्ययोग्यताको उपादान माननेवाले अपर पक्षके इस मतका निरसन करनेके अभिप्रायसे ही लिखा है। यदि अपर पक्ष उक्त वचनके आधारसे यह फलित करना चाहता है जैसा कि उसकी ओरसे फलित किया गया है कि गेंहूँ पर्याय विशिष्ट सभी पुद्गल द्रव्य अंकुरसे लेकर आगेके कार्योंके उपादान हैं तो उसके द्वारा उक्त वाक्यके आधारसे ऐसा फलित किया जाना भ्रमपूर्ण है, क्योंकि यहाँ पर ‘अंकुरादि’ पदमें आया हुआ ‘आदि’ पद प्रकारवाची है। इसलिए इससे यह फलित होता है कि जो गेंहूँ जिस समय जिस पर्यायके सन्मुख होता है उस समय वह उसका उपादान होता है, अन्यका नहीं। आगमका भी यही अभिप्राय है और इसी अभिप्रायको ध्यानमें रख कर उक्त वचन लिखा गया है। कोठेमें रखा हुआ गेंहूँ इसलिए अंकुरको उत्पन्न नहीं करता, क्योंकि उस समय वह अंकुरका उपादान न होकर अन्य कार्यका उपादान है। वस्तुतः बाह्य सामग्री अंकुरको उत्पन्न करनेमें अकिंचित्कर है।

अब रही बाह्य कारण सापेक्षताको बात सो इस वचन द्वारा मात्र व्यवहार ( उपचरित ) पक्षको स्वीकार किया गया है। जिस समय गेंहूँ अंकुरको उत्पन्न करता है उस समय उसके बाह्य उपकरण कैसे होते है यह बात उक्त वचन द्वारा स्पष्ट की गई है, क्योंकि बाह्य सामग्री उपकरणमात्र है ऐसा आचार्योंका भी अभिप्राय है। उपकरणमात्रं हि बाह्यसाधनम् (तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० २)। बाह्य सामग्री उपादानकी क्रिया करके उसमें उसके कार्यको उत्पन्न कर देता है ऐसा यदि अपर पक्ष सहायकका अर्थ करता है तो वह आगम, तर्क और अनुभव सबके विरुद्ध है, क्योंकि एक द्रव्य अपनी सत्ताको लाँधकर दूसरे द्रव्यकी सत्तामें प्रवेश करे यह सर्वथा असम्भव है।

अपर पक्षने ‘पुद्गलरूप द्रव्यशक्ति हो गेंहूँरूप पर्याय विशिष्ट होकर गेहूँरूप पर्यायको उत्पन्न करती है।’ इसे हमारी मान्यता बतलाकर उसका खण्डन करते हुए अपने अभिप्रायकी पुष्टि करनी चाही है। किन्तु वह सब कथन पूर्वोक्त कथनके प्रकाशमें सुतरां खण्डित हो जाता है, क्योंकि एक द्रव्यका कार्य दूसरे द्रव्यके सहयोगसे होता है यह उपचार वचन है जो केवल दोनोंकी कालप्रत्यासत्तिको सूचित करता है। तभी तो आचार्य कुन्दकुन्दने व्यवहारनयसे आत्मा पुद्गल कर्मको करता है इस कथनको सदोष बतलाते हुए समयसार गाथा ८५ में उसका निरसन किया है।

हमने अपने पिछले उत्तरमें लिखा है कि ‘गेहूँ पुद्गल द्रव्यकी एक पर्याय है।’ किन्तु अपर पक्षने इसे भी अपनी टीकाका विषय बनाया है। हम उसके उत्तरस्वरूप इतना ही संकेत कर देना चाहते हैं कि गेहूँ एक पुद्गल द्रव्यकी पर्याय है ऐसा न तो हमने लिखा है और न है ही। आगमके अनुसार वस्तुस्थिति यह है कि प्रत्येक पुद्गल परमाणुमें स्कन्धरूप होनेकी योग्यता है, इसलिए वे ‘द्वयधिकादिगुणानां तु’ सिद्धान्तके अनुसार स्कन्धरूप परिणम कर गेंहूँरूप व्यंजनपर्यायपनेको स्वयं प्राप्त होते हैं।

अपर पक्षने यहाँपर किसी बहाने संयोगकी चरचा करते हुए तथा अपनी दृष्टिसे कार्य-कारणभावके वास्तविक आधारको बतलाते हुए अन्तमें यह निष्कर्ष फलित किया है कि ‘घटरूप कार्यके उत्पन्न करनेमें मिट्टी पुद्गल द्रव्यकी पर्यायरूपसे कारण नहीं बन रही है, किन्तु स्वयं एक पौद्गलिक द्रव्यरूपसे ही बन रही हैं’ आदि।

यहाँपर अपर पक्षने अपने उक्त अभिप्रायको ध्यानमें रखकर जो कुछ भी लिखा है वह केवल द्रव्ययोग्यताको उपादान माननेपर आनेवाली आपत्तिका वारण करनेके लिए लिखा है। हमारी तरफसे यह आपत्ति उपस्थित की गई थी कि ‘यदि उपादानका अर्थ द्रव्ययोग्यता करके बाह्य-सामग्रीके बलपर प्रत्येक कार्यकी उत्पत्ति मानी जाती है तो चनासे गेहूँकी उत्पत्ति हो जानी चाहिए।’ स्पष्ट है कि अपर पक्ष अपने प्रस्तुत कथनद्वारा उसी आपत्तिका परिहार करनेकी चेष्टा कर रहा है और अपने इसी अभिप्रायकी पुष्टिके लिए उसके द्वारा मिट्टी आदि स्कन्धोंको अवस्थित मानकर अनादि-अनन्त सिद्ध करके नित्य भी सिद्ध किया गया है। किन्तु अपर पक्षका है यह सब कथन भ्रमोत्पादक ही। कारण कि एक तो मिट्टी आदि पुद्गल स्कन्ध न तो सर्वदा एक समान बने रहते हैं, उनमें प्रति समय अगणित नये परमाणुओंका संघात और पुराने परमाणुओंका भेद होता रहता है। दूसरे उनमें जो मिट्टी आदिरूपसे अन्वय प्रतिभासित होता है उसका मुख्य कारण सदृश परिणाम ही है, अन्वय धर्म नहीं। तीसरे जो स्कन्ध वर्तमानमें मिट्टी आदिरूप है वही स्कन्ध अपने संघात और भेदस्वभावके कारण जलादिरूप भी परिणम जाता है। यह अनुभवमें आता है कि जो गेहूँ वर्त्तमानमें गेहूँरूपसे प्रति समय परिणम रहा है वही मनुष्यादिद्वारा भुक्त होनेके बाद खात बनकर चना आदिरूपसे भी परिणम जाता है, इसलिए मिट्टी आदि स्कन्धको नित्य मानकर उपादानका अर्थ मात्र द्रव्ययोग्यता करके अपने पक्षका समर्थन करना ठीक नहीं है। चाहे परमाणुरूप पुद्गल हों या उनकी स्कन्ध पर्यायरूप मिट्टी आदि, उनसे उत्तरकालमें जो भी कार्य होता है वह असाधारण द्रव्ययोग्यता और प्रतिविशिष्ट पर्याययोग्यता इन दोनोंके योगमें ही होता है और इसी आधारपर उनके प्रत्येक समयके कार्यमें विभाजन होता जाता है। खानमें पड़ी हुई मिट्टी दूसरे समयमें या अन्तर्मुहूर्त आदि कालतक अन्य किसी परिणामरूप हुए विना मात्र घटपर्याय को ही उत्पन्न करे तब तो यह कहना शोभा देता है कि ‘मिट्टी पुद्गल द्रव्यकी पर्यायरूपसे कारण नहीं बन रही है, किन्तु स्वयं एक पौद्गलिक द्रव्यरूपसे ही बन रही है।’ मिट्टी स्वयं पुद्गल द्रव्य नहीं है, किन्तु अनन्त पुद्गल द्रव्योंकी स्कन्धरूप एक पर्याय है, अतः वह प्रतिसमय सदृश परिणामद्वारा प्रतिविशिष्ट पर्याय होकर ही उत्तर कार्यकी उत्पत्तिमें कारण बनती है और यही कारण है कि उससे जायमान उत्तर कार्योंमें मिट्टी व्यवहार गौण होता जाता है। साथ ही जैसे पुद्गलसे जायमान सब कार्योंमें पुद्गलका अन्वय देखा जाता है उस प्रकार मिट्टीसे परिणाम प्रत्ययवश जायमान सब कार्योंमें मिट्टीका अन्वय नहीं देखा जाता। पुद्गल अन्य किसी परिणामको नहीं उत्पन्न करता है, क्योंकि उससे जो भी पर्याय होती है वह पुद्गलरूप ही होती है, किन्तु यह स्थिति मिट्टीकी नहीं है। यही कारण है कि मिट्टी आदिको स्वतन्त्र द्रव्य न स्वीकार कर पुद्गलोंकी मात्र स्कन्धरूप पर्याय स्वीकार किया है। स्पष्ट है कि मिट्टीको जो घटकी उत्पत्तिमें कारण कहा गया है वह प्रत्येक समयके सदृश परिणामवश ही कारण कहा गया है, अन्वय धर्मके कारण नहीं। सदृश परिणाममें अन्वय धर्मका व्यवहार करना यह उपचार है। प्रयोजनवश आचार्योंने भी ऐसे व्यवहारको स्वीकार कर कथन किया है इसमें सन्देह नहीं, परन्तु वहाँपर उनकी दृष्टि इसद्वारा द्रव्यशक्तिका ज्ञान कराना मात्र रही है। उस परसे अपने गलत अभिप्रायको फलित करना उचित नहीं है। स्कन्धोंमें पुद्गल यह व्यवहार है इसे स्पष्ट करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द पंचास्तिकायमें लिखते हैं-

बादर-सुहुमगदाणं खंधाणं पुग्गलो त्ति ववहारो।
ते होंति छप्पयारा तेलोक्कं जेहिं णिप्पण्णं ॥७६॥

बादर और सूक्ष्मरूपसे परिणत स्कन्धोंको पुद्गल कहना यह व्यवहार है। वे छः प्रकारके हैं जिनसे तीन लोक निष्पन्न है ॥७६॥

यह आचार्य वचन है। इससे स्पष्ट है कि पुद्गलोंके पर्यायरूप विवक्षित स्कन्धको पुद्गल कहना यह कथन जब कि व्यवहार है ऐसी अवस्थामें मिट्टीको पौद्गलिक द्रव्य मानकर मिट्टीरूप द्रव्ययोग्यताको घटोत्पत्तिमें कारण कहना व्यवहार कथन तो ठहरेगा ही। यहाँ सर्वप्रथम मिट्टीमें पुद्गलका व्यवहार कर मिट्टीको सर्वथा पुद्गल स्वीकार किया गया है और फिर इस आधारपर मिट्टीमें विद्यमान मृत्तिकात्वरूप पर्यायधर्मको द्रव्ययोग्यतारूपसे नित्य मानकर घटकार्यमें द्रव्ययोग्यताको कारण कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि अपर पक्षका यह समस्त कथन व्यवहार नयकी मुख्यतासे ही किया गया है, अतएव यहाँपर अपर पक्षने जितना भी विवेचन किया है वह सब व्यवहार कथन ही है, यथार्थ कथन नहीं ऐसा जानना चाहिये।

अपर पक्षने यहाँ पर यह भी लिखा है कि ‘खानसे लेकर घट बनने तक मिट्टीकी सब अवस्थाएँ कुम्भकारके व्यापारके अनुसार ही हुआ करती हैं’ किन्तु यहाँ पर प्रश्न यह है कि मिट्टीकी उन अवस्थाओंको उत्पन्न कौन करता है-कुम्भकार या स्वयं मिट्टी ? यदि कुम्भकार मिट्टीकी उन पर्यायोंको उत्पन्न करता है यह कहा जाय तो परिणामीसे परिणाम अभिन्न होनेके कारण मिट्टीकी सब अवस्थाओंमें और कुम्भकारमें अभेद प्राप्त होता है। यदि मिट्टी स्वयं कर्ता होकर अपनी पर्यायोंको उत्पन्न करती है यह कहा जाय तो कुम्भकारके व्यापारके सहयोगसे खानसे लेकर घट बनने तकके मिट्टीके सब कार्य होते हैं इसका क्या तात्पर्य है यह स्पष्ट होना चाहिए। क्या उक्त कथनका यह तात्पर्य है कि कुम्भकारके व्यापारके अभावमें मिट्टीके उक्त कार्य नहीं होते या कुम्भकारके व्यापारके द्वारा मिट्टीके उक्त कार्य होते हैं ये दो प्रश्न हैं ? इनमेंसे प्रथम पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं, क्योंकि कुम्भकारका व्यापार कुम्भकारमें होता है और मिट्टीका व्यापार मिट्टीमें होता है, एकके व्यापारमें दूसरेके व्यापारका सर्वथा अभाव है। इस दृष्टिसे यदि यह कहा जाय कि खानसे लेकर घट बनने तक मिट्टीने जितने भी कार्य किये हैं वे सब निश्चयसे परनिरपेक्ष ही किये हैं तो इसमें कोई अत्युक्ति न होकर यथार्थता ही है। कुम्भकार भले ही मिट्टीमें कार्य करनेका विकल्प करे और अपना योगव्यापार करे। मिट्टीको तो उसकी खबर भी नहीं। वह तो मात्र अपने-अपने कालमें होनेवाले व्यापारमें रत रहती है, क्योंकि प्रत्येक समयमें अपना व्यापार करना यह उसका स्वभाव है। ऐसा नियम है कि कोई किसीके स्वभावको बना नहीं सकता।

यदि कहा जाय कि मिट्टीको भले ही खबर न हो, कुम्भकारको तो खबर है कि मेरे द्वारा अमुक प्रकारका व्यापार करनेपर मिट्टीको अमुक प्रकारसे परिणमना ही पड़ेगा। तो इसपर प्रश्न यह है कि कुम्भकार कभी भी किसी भी प्रकारसे उसे परिणमा सकता है या उसके अमुक प्रकारसे परिणमनेका काल आनेपर वह उसे उस प्रकारसे परिणमाता है ? प्रथम पक्षके स्वीकार करने पर तो सभी द्रव्योंके सभी परिणमन न केवल पराधीन प्राप्त होते हैं, अपि तु उनके परिणमनेका कोई क्रम नियत करना भी कठिन हो जाता है। इतना ही क्यों ? यदि एक द्रव्य दूसरे द्रव्यमें किसी भी समय किसी भी प्रकारके परिणामको उत्पन्न कर सकता है तो वह उस दूसरे द्रव्यको अपनेरूप बना ले अर्थात् जड़को चेतन बना ले ऐसा स्वीकार करनेमें बाधा ही क्या रह जाती है इसका अपर पक्ष विचार करे।

यदि अपर पक्ष कहे कि जड़को चेतन बनाना दूसरी बात है और दूसरे द्रव्यमें किसी भी समय किसी भी प्रकारके परिणामको उत्पन्न कर देना दूसरी बात है। तो इसपर हमारा कहना यह है कि प्रत्येक द्रव्यमें जो पर्याय उत्पन्न होती है वह द्रव्यसे कथंचित् अभिन्न होनेके कारण द्रव्य ही तो है, इसलिए जब कि दूसरा द्रव्य दूसरे द्रव्यमें कभी भी और किसी भी परिणामको उत्पन्न कर सकता है तो उसे नये द्रव्यके उत्पन्न करनेमें कोई बाधा नहीं होनी चाहिए ।

इसपर यदि अपर पक्ष कहे कि जिस द्रव्यमें जिस कालमें जो परिणाम होना होता है उस कालमें वही परिणाम होता है इसमें सन्देह नहीं पर उसे उत्पन्न करती है सहकारी सामग्री ही, क्योंकि वह स्वयं उत्पन्न होनेमें सर्वथा असमर्थ है । तो इसपर हमारा कहना यह है कि वह सहकारी सामग्री दूसरे द्रव्यमें उस परिणामको कैसे उत्पन्न करती है, उसके भीतर घुसकर उसे उत्पन्न करती है या बाहर रहकर ही उसे उत्पन्न कर देती है ? भीतर घुसना तो सम्भव नहीं, क्योंकि एक द्रव्यके स्वचतुष्टयका दूसरे द्रव्यके स्वचतुष्टयमें त्रैकालिक अत्यन्ताभाव है । सहकारी सामग्री बाहर रहकर दूसरे द्रव्यमें कार्य कर देती है यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि सहकारी सामग्री जब कि दूसरे द्रव्यसे सर्वथा पृथक् बनी रहती है तो फिर वह उसमें उसका कार्य कैसे कर सकती है अर्थात् नहीं कर सकती । इसलिए प्रकृतमें अपर पक्षको यही स्वीकार कर लेना चाहिए कि जड़ या चेतन प्रत्येक द्रव्य अपना कार्य करनेमें स्वयं समर्थ है, इसलिए जिस कार्यका जो काल है उस कालमें वही कर्ता बन कर अपनेमें उसे उत्पन्न करता है । अन्यके द्वारा कार्य होता है या अन्य दूसरेको उत्पन्न करता है, ग्रहण करता है, छोड़ता है या परिणमाता है यह सब व्यवहारकथन है । आगममें यह कथन प्रयोजनवश किया गया है और प्रयोजन है इष्टार्थका ज्ञान कराना, क्योंकि जिसे सहकारी सामग्री कहते हैं उसके कार्यके साथ उपादानके कार्यको अन्वय-व्यतिरेकसमधिगम्य बाह्य व्याप्ति है अर्थात् दोनोंके एक कालमें होनेका नियम है, इसलिए इसे कल्पनारोपित नहीं कहा जा सकता । यदि उपचरित कथनको अपर पक्षके मतानुसार कल्पनारोपित अर्थात् चंडूखानेकी गप मान ली जाय तो जगत्‌का समस्त व्यवहार नहीं बन सकेगा । फिर तो श्री जिन मन्दिरमें जा कर देवपूजा करना भी कल्पनारोपित मानना पड़ेगा, क्योंकि प्रतिमामें स्थापना तो अपर पक्षके मतानुसार कल्पनारोपित ठहरी, फिर उसके आलम्बनसे पूजा कैसी ? यदि कोई किसीको पत्र लिखे तो लिख नहीं सकता है, क्योंकि व्यवहारके लिए जो उसका नाम रखा गया है वह तो कल्पनारोपित है । ऐसी अवस्थामें नाम लेकर किसीको पत्र लिखना व्यर्थ ही ठहरेगा । अपर पक्षको उपचरित कथनको कल्पनारोपित लिखते समय थोड़ा जगतके इन समस्त व्यवहारोंका विचार करना चाहिए । इतना तो हम निश्चयपूर्वक लिख सकते हैं कि अपर पक्षने यहाँ पर कुम्भकार और मिट्टीको आलम्बन बनाकर जो कार्य-कारणभावका रूपक उपस्थित किया है वह मात्र एकान्तरूप प्ररूपणा होनेसे कल्पनारोपित अवश्य है । परन्तु जिनागममें निश्चय-व्यवहारका पृथक्करण कर जो प्ररूपणा की गई है वह किसी भी अवस्थामें कल्पनारोपित नहीं है । अतः कोई भी कार्य किसी दूसरेके सहारे पर नहीं होता है ऐसा निश्चय यहाँ करना चाहिए । दूसरेके सहारेका कथन करना मात्र व्यवहार है जो उपचरित होनेसे यथार्थ पदवीको नहीं प्राप्त हो सकता ।

प्रत्येक द्रव्य स्वयं सत् है और द्रव्यका लक्षण है गुण-पर्यायवाला, इसलिए द्रव्यके स्वयं सत् सिद्ध होनेपर गुण और पर्याय भी स्वयं सत् सिद्ध होते हैं । यतः पर्याय व्यतिरेकी स्वभाववाला है, अतः जिस पर्याय का जो स्वकाल है उस कालमें उसे परनिरपेक्ष स्वयं सत् ही जानना चाहिए, अन्यथा द्रव्य और गुणोंका अस्तित्व ही नहीं बन सकता । इसलिए अपर पक्षका यह लिखना कि ‘कार्योत्पत्तिके लिए उपादानकी तैयारी निमित्तोंके बल पर ही हुआ करती है ।’ आगमविरुद्ध ही समझना चाहिए । वस्तुतः कोई किसीकी तैयारी नहीं करता, एक द्रव्यमें जिसके बाद जो होता है उसे उपादानकारण कहते हैं और होनेवालेको कार्य कहते हैं तथा उस कार्यकी जिसके साथ बाह्य व्याप्ति होती है उसे सहकारी कारण कहते हैं और होनेवालेको कार्य कहते हैं । भेद विवक्षामें प्रथम कथन सद्भूत व्यवहारनयका विषय है और दूसरा कथन असद्भूत व्यवहारनयका विषय है ।

अपर पक्षने कार्योंका विभाजन करते हुए उसे तीन प्रकारका बतलाया है-षड्गुणी हानिवृद्धिरूप परिणमनको स्वप्रत्यय परिणमन । इस परिणमनमें अपर पक्ष मात्र निश्चय पक्षको ही स्वीकार करता है, व्यवहार पक्षको नहीं स्वीकार करता, यतः यह एकान्तकथन है, इसलिए इसे आगमसम्मत नहीं माना जा सकता ।

दूसरे प्रकारके कार्योंमें वह धर्मादि चार द्रव्योंके परिणमनोंका अन्तर्भाव करता है । इन्हें वह स्व-पर प्रत्यय परिणमन लिखकर उनका नियत क्रमसे होना मानता है । किन्तु जब कि वह घटादि कार्योंका अनियत क्रमसे होना मानता है और उनकी निमित्तता इन द्रव्योंके परिणमनोंमें स्वीकार करता है तो न तो इनका नियत क्रमसे होना ही बन सकता है और न ही ये परिणमन स्व-परप्रत्यय होनेके कारण स्वभावपर्याय संज्ञाको ही प्राप्त हो सकते हैं, क्योंकि आगममें ‘स्व-परप्रत्यय’ पदमें ‘पर’ शब्द ऐसी निमित्तव्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीके अर्थमें आता है जो विभावपर्यायके होनेमें निमित्त है । अतएव धर्मादि द्रव्योंके परिणमनोंको स्व-परप्रत्यय लिखना आगम परम्पराके विरुद्ध होनेसे इस कथनको भी आगमसम्मत नहीं माना जा सकता ।

तीसरे प्रकारके कार्योंमें वह घटादि कार्योंकी परिगणना करता है । किन्तु ये सब कार्य अपने-अपने कार्यकालमें प्राप्त होनेवाले प्रायोगिक और वैस्रसिक निमित्तोंको प्राप्तकर स्वयं होते रहते हैं । न तो उपादानकारण कार्योंकी प्रागभावरूप अवस्थाको छोड़कर अन्य कालमें बनता है और न ही बाह्य सामग्री भी अन्य कालमें निमित्त व्यवहार पदवीको प्राप्त होती है । इन दोनोंके एक साथ होनेका सहज योग है, इसलिए जिस कालमें घटादिरूप जो कार्य होता है वह अपने-अपने कालका उल्लंघन कभी नहीं करता । ‘व्यतिरेकिणः पर्यायाः’ इस नियमके अनुसार अपनी-अपनी सीमाके भीतर सभी पर्यायोंमें व्यतिरेकीपना आगममें स्वीकार किया गया है । केवल विभावपर्यायोंमें ही व्यतिरेकीपना होता हो ऐसा आगमका अभिप्राय नहीं है । अतएव इन्द्रियगोचर पूर्व पर्यायोंकी अपेक्षा उत्तर पर्यायोंमें यदि कुछ विलक्षणता दृष्टिगोचर होती है तो उसे उस द्रव्यका ही कार्य समझना चाहिए, बाह्य सामग्रीका कार्य नहीं । स्पष्ट है कि प्रकृतमें अपर पक्षने इस सम्बन्धमें जो कुछ भी लिखा है वह आगमका आशय न होनेसे इसे भी आगमसम्मत नहीं माना जा सकता । इस सम्बन्धमें विशेष विचार पूर्वमें किया ही है ।

आगे अपर पक्षने तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सू० १७ वार्तिक ३१ के आधारसे यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि ‘निमित्तोंका समागम उपादानको कार्यरूपसे परिणत होनेकी तैयारी हो जाने पर हो ही जाता है ऐसा नियम नहीं बनाया जा सकता है, किन्तु यह तथा आगमके और दूसरे प्रमाण यही बतलाते हैं कि उपादानको जब निमित्तोंका सहयोग प्राप्त होगा तभी उपादानकी नित्य द्रव्यशक्ति विशिष्ट वस्तुको जिस पर्यायशक्ति विशिष्टताको आप तैयारी शब्दसे ग्रहण करना चाहते हैं वह तैयारी होगी और तभी कार्य हो सकेगा ।’

यह अपर पक्षका वक्तव्य है । इसे ध्यानमें रखकर हम उस प्रमाणकी छानबीन कर लेना चाहते हैं । तत्त्वार्थवार्तिकका उक्त प्रकरण धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्यके अस्तित्वकी सिद्धिका है । प्रत्येक कार्य स्वकालमें होता है इसकी सिद्धिके उपाय दो हैं-अभ्यन्तर साधन और बाह्य साधन । अभ्यन्तर साधन प्रत्येक द्रव्यका स्वलक्षण-आत्मभूत साधन हुआ करता है और बाह्य साधन परलक्षण-अनात्मभूत साधन हुआ करता है । प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक समयमें अपना कार्य करे और उसका आत्मभूत साधन उस समय न हो यह आगमज्ञ किसी भी विवेकीकी समझमें आने योग्य बात नहीं है । जिसे यहाँ पर प्रत्येक द्रव्यमें प्रति समय कार्यका साधनभूत स्वलक्षण कहा है उसका प्रत्येक समयमें होना ही उसकी तैयारी है । इसके सिवा किसी भी विवक्षित कार्यकी अपेक्षा अन्य जितनी तैयारी कही जाती है वह विकल्पका विषय है । यह तो प्रत्येक द्रव्यके स्वलक्षणभूत अन्तरंग साधनकी मीमांसा है । बाह्य साधनके विषयमें यह मीमांसा है कि प्रत्येक द्रव्यके प्रत्येक समयमें अपने-अपने कार्यके सन्मुख होने पर उसका अनात्मभूत लक्षणरूप बाह्य साधन नियमसे होता है । आभ्यन्तर साधन हो और बाह्य साधन न हो यह भी नहीं है, तथा अन्तरंग साधन हो और कार्य न हो यह भी नहीं है । प्रत्येक समयमें अन्तरंग-बहिरंग साधनोंकी युति नियमसे होती है और इनसे जिस कार्यके होनेकी सूचना मिलती है वह कार्य भी नियमसे होता है ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘उपादानकी अपने कार्यके अनुकूल तैयारी होने पर भी यदि निमित्तोंका सहयोग नहीं मिलता तो कार्य नहीं होता ।’ किन्तु उसका यह कथन विवक्षाकी अपेक्षा है या प्रत्येक द्रव्यके प्रत्येक समयमें होनेवाले परिणामकी अपेक्षा है इसका उस पक्षकी ओरसे कोई खुलासा नहीं किया गया है । यदि विवक्षाकी अपेक्षा उक्त कथन है तो यह मान्यताकी बात हुई, इसका प्रत्येक द्रव्यके प्रत्येक समयमें होनेवाले क्रियालक्षण या भावलक्षण परिणामसे कोई सम्बन्ध नहीं है। दूसरा व्यक्ति चाहता है कि इस शक्करका लड्डू बने । इसके लिए वह अपने विकल्पोंके अनुसार उपाय योजना भी करता है, बाह्य परिकर भी उसकी इच्छानुसार प्रवर्तन करता हुआ प्रतीत होता है । किन्तु उस शक्करको यदि किसी कालावधिके मध्य लड्डू रूप नहीं परिणमना है तो उसकी इच्छा उत्पन्न होकर भी विलीन हो जाती है । इच्छा किसी कार्यके होनेमें निमित्त अवश्य है, किन्तु द्रव्यमें होनेवाले परिणामके साथ यदि उसका मेल बैठ जाय तो ही निमित्त है, अन्यथा नहीं । इसलिए विवक्षाके आधार पर यह सोचना कि ‘उपादानकी अपने कार्यके अनुकूल तैयारी होने पर भी यदि निमित्तोंका सहयोग नहीं मिलता तो कार्य नहीं होता ।’ कोरी कल्पना है ।

यदि प्रत्येक द्रव्यमें प्रत्येक समयमें होनेवाले परिणामकी अपेक्षा अपर पक्षका उक्त कथन हो तो उसे आगमका ऐसा प्रमाण उपस्थित करना चाहिए था जो अपर पक्षके उक्त अभिप्रायकी पुष्टिमें सहायक होता । किन्तु आगमकी रचना अपर पक्षके उक्त प्रकारके विकल्पोंकी पुष्टिके लिए नहीं हुई है, वह तो प्रत्येक द्रव्यके स्वरूप उद्घाटन और कार्य-कारणभावके सुनिश्चित लक्षणोंके निरूपणमें चरितार्थ है । यह आगम ही है कि अनन्तर पूर्वोत्तर दो क्षणोंमें ही कारण-कार्यभाव देखा जाता है ( प्रमेयरत्नमाला ३, ५७ ) । यतः प्रत्येक समयमें प्रत्येक द्रव्य अपना कार्य करता ही है, उसे उस समय अपना कार्य करनेके लिए बाह्य-सामग्रीकी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती, क्योंकि उसके अनुकूल बाह्य-सामग्रीका उपस्थित रहना अवश्यंभावी है, इसलिए प्रत्येक द्रव्यमें प्रत्येक समयमें होनेवाले परिणामको ध्यानमें रखकर अपर पक्षका यह सोचना कि ‘उपादानकी अपने कार्यके अनुकूल तैयारी होनेपर भी यदि निमित्तोंका सहयोग नहीं मिलता तो कार्य नहीं होता ।’ कल्पनामात्र है ।

अपर पक्ष तत्त्वार्थवार्तिकके ( अ० ५ सू० १७ वा० ३१ ) उक्त उल्लेखसे जिस आशयको फलित करनेकी कल्पना करता है वह उक्त उल्लेखका अभिप्राय नहीं है । उस द्वारा तो मात्र बाह्य साधनकी पुष्टि की गई है, क्योंकि जब यह आगम है कि प्रत्येक कार्यमें बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता होती है । ऐसी अवस्थामें प्रत्येक कार्यमें आभ्यन्तर साधनके समान बाह्य साधनको स्वीकार करना भी आवश्यक हो जाता है । आचार्य समन्तभद्रने मोक्षमार्गके लिए यद्यपि आभ्यन्तर साधनको पर्याप्त कहा है ( स्वयंभूस्तो० का० ५९ )पर वह उपयोगमें किसका आलम्बन लेना मोक्षमार्गीके लिए अत्यावश्यक है इस अपेक्षासे कहा है। आचार्यने निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीका परिहार वहाँपर भी नहीं किया है। विवक्षामें प्रयोजनवश एकको गौण करना और दूसरेको मुख्य करना अन्य बात है और एकके द्वारा सिद्धि मानकर दूसरेका निषेध करना अन्य बात है। बाह्य दृष्टिवाले मिथ्यादृष्टि जीव सदा बाह्य साधनोंका अवलम्बन लिए रहते है और उनसे लौकिक तथा पारमार्थिक कार्योंकी सिद्धि मानते हैं। आचार्य कहते हैं कि बाह्य आलम्बन तो संसार परिभ्रमणका कारण है, मोक्षमार्गीके लिए वह स्वभावानुकूल आत्मपुरुषार्थ जागृत करनेमें सहायक नहीं। यदि वह यथार्थमें अपने जीवनमें मोक्षमार्ग या मोक्षकी प्रसिद्धि करना चाहता है तो उसे अपने त्रिकाली ज्ञायक स्वभावका अवलम्बन लेना ही पर्याप्त है। उसे बाह्य साधनोंकी उठाधरीके विकल्पसे बचना ही होगा, तभी उसमें मोक्षकार्यकी प्रसिद्धि हो सकती है, अन्यथा नहीं।

इस प्रकार इतने विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्त्वार्थवार्तिकके उक्त उल्लेखके आधारसे अपर पक्षने जो आशय फलित किया है वह अपर पक्षकी कोरी मनकी कल्पना है। जब प्रत्येक कार्यके बाह्य और आभ्यन्तर दो प्रकारके साधन हैं तो प्रत्येक कार्यमें उन्हें स्वीकार करना लाजिमी हो जाता है। यही तत्त्वार्थवार्तिकके उक्त उल्लेखका आशय है। प्रसंगसंगत होनेसे हम यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि षड्गुणी हानि-वृद्धिरूप परिणमन मात्र स्वप्रत्यय होता है यह कथन यद्यपि आगम-विरुद्ध है फिर भी इस आगम-विरुद्ध कथनके उत्थापनके कार्यका साहस जैसे अपर पक्ष कर सकता है और इस प्रकार बाह्य साधन सामग्रीके विना ही वह केवल उपादानके बलसे घोषणा करता हुआ तत्त्वार्थवार्तिकके उक्त उल्लेखका उल्लंघन करता हुआ भी नहीं डरता, सचमुचमें वैसा साहस करना हमारे बूतेके बाहर है। हमें निश्चय पक्षके समान व्यवहार पक्षका पूरा ध्यान है और इसलिए हम निश्चय और व्यवहार पक्षका वही अर्थ करते हैं जो आगमको इष्ट है, कल्पनाके ताना-बाना बुनना हमारा कार्य नहीं।

\१३. असद्भूतव्यवहारनयका स्पष्टीकरण

इसी प्रसंगसे अपर पक्षने असद्भूत व्यवहारनयका भी विचार किया है। उसका कहना है कि ‘नय वही हो सकता है जिसका विषय सद्भूत हो। असद्भूत अर्थको ग्रहण करनेवाला नय ही नहीं हो सकता। यदि नय असद्भूत अर्थको भी विषय करता है तो उसके द्वारा आकाशकुसुम या गधेके सींगका भी ग्रहण होना चाहिए। यतः कोई भी नय आकाशकुसुम या गधेके सींगको नहीं ग्रहण करता अतः प्रत्येक नय सद्भूत अर्थको ही विषय करता है इसे स्वीकार कर लेना चाहिए।’ अपने इस विषयकी पुष्टिमें उस पक्षकी ओरसे द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा द्रव्य कथंचित् नित्य है और पर्यायार्थिकनयकी अपेक्षा द्रव्य कथंचित् अनित्य है यह उदाहरण उपस्थित किया गया है। किन्तु अपर पक्ष इस बातको भूल जाता है कि प्रत्येक द्रव्यमें रहनेवाले नित्यत्व और अनित्यत्व धर्म जहाँ सद्भूत हैं वहाँ दो द्रव्योंके आश्रयसे प्रयोजनवश स्वीकार किये गये निमित्तत्व और नैमित्तिकत्व धर्म सद्भूत नहीं हैं, क्योंकि एक द्रव्यके धर्मको दूसरे द्रव्यमें सत्स्वरूप स्वीकार करनेपर उसमें दूसरे द्रव्यकी सत्ता भी स्वीकार करनी पड़ती है और इस प्रकार दो द्रव्योंमें एकता प्राप्त हो जाती है जिसे स्वीकार करना तर्क, आगम और अनुभवके सर्वथा विरुद्ध है। यही कारण है कि आगम में असद्भूत व्यवहारका लक्षण करते हुए लिखा है कि अन्यत्र प्रसिद्ध धर्मका अन्यत्र समारोप करना असद्भूत व्यवहार है। उपचार भी इसीका दूसरा नाम है। आलापपद्धतिमें ‘असद्भूत व्यवहारनय भिन्न वस्तुको विषय करता है।’ यह लक्षण भी इसी अभिप्रायसे किया गया है। आलाप-पद्धतिके पूर्वोक्त कथनमें और इस कथनमें कोई अन्तर नहीं है, दोनोंका आशय एक ही है । एक द्रव्यके धर्मका दूसरे द्रव्यमें निराधार और निष्प्रयोजन आरोप करना असद्भूत व्यवहारनयाभास है और साधार सप्रयोजन आरोप करना समीचीन नय है । आकाशमें वृक्षके फूलका या गधेके सिरमें गाय आदिके सींगका आरोप करना एक तो निष्प्रयोजन है । दूसरे आकाशमें फूलके सदृश और गधेके सिरमें सींगके सदृश कोई धर्म भी नहीं पाया जाता, इसलिए आकाशमें फूलका और गधेके सिरमें सींगका आरोप करना किसी भी अवस्थामें सम्भव नहीं है । जहाँ यह ठीक है वहाँ घटादि कार्योंमें कुम्भकारादिके नैमित्तिकत्व धर्मका और कुम्भकारादिमें घटादिके निमित्तत्व धर्नका समारोप करना भी ठीक है, क्योंकि एक द्रव्यकी जिस परिणतिके साथ दूसरे द्रव्यकी जिस परिणतिका नियमसे एक साथ होनेका योग है उसकी सूचना उससे हो जाती है । इसीको कालप्रत्यासत्ति कहते हैं । साथ ही प्रत्येक द्रव्यमें अपना-अपना निमित्तत्व ( कारणत्व ) और नैमित्तिकत्व ( कार्यत्व ) धर्म भी पाया जाता है, यही कारण है कि आगममें असद्भूत व्यवहार नयके विषयको उपचरित बतलाया गया है । ये सब तथ्य अपर पक्षके लिए अनवगत हों ऐसी बात नहीं है, फिर नहीं मालूम कि वह क्यों ऐसे मार्गका अनुसरण कर रहा है जिससे आगमके अर्थका विपर्यास होना सम्भव है ।

वृहद्द्रव्यसंग्रहमें असद्भूत व्यवहारनयके उपचरित और अपनुचरित ये दो भेद किये गये है इसमें सन्देह नहीं, पर वहाँ इसके इन दो भेदोंके करनेका कारण क्या है यह भी उस उल्लेखसे स्पष्ट हो जाता है । वहाँ परस्पर अवगाहरूप संश्लेष सम्बन्धको दिखलानेके लिए असद्भूत व्यवहारके पूर्व विशेषणरूपमें अनुपचरित शब्दका प्रयोग हुआ है और जहाँ इस प्रकारका एक क्षेत्रावगाह सम्बन्ध न होते हुए भी प्रयोजनवश कर्ता-कर्म आदि धर्मोंका ( एक दूसरेमें ) समारोप किया गया है वहाँ असद्भूत व्यवहारके पूर्व विशेषणरूपमें उपचरित शब्दका प्रयोग हुआ है । इसी तथ्यको दूसरे रूपमें आलापपद्धतिमें इन शब्दोंमें व्यक्त किया है-

तत्र संश्लेषरहितवस्तुसम्बन्धविषय उपचरितासद्भूतव्यवहारः, यथा देवदत्तस्य धनम्। संश्लेषसहितवस्तुसम्बन्धविषयोऽनुपचरितासद्भूतव्यवहारः, यथा जीवस्य शरीरमिति ।

उनमेंसे संश्लेषरहित वस्तुओंके सम्बन्धको विषय करनेवाला उपचरित असद्भूतव्यवहार है, जैसे देवदत्तका धन । तथा संश्लेषसहित वस्तुओंके सम्बन्धको विषय करनेवाला अनुपचरित असद्भूतव्यवहार है, जैसे जीवका शरीर ।

यहाँ न तो देवदत्तका धनमें रागभावको छोड़कर अन्य कोई मेरापन है और न ही जीवका शरीरमें रागभावको छोड़कर अन्य कोई मेरापन है । जैसे धन पुद्गलद्रव्यका परिणाम है वैसे ही शरीर भी पुद्गल द्रव्यका परिणाम है । जीव तो चेतन द्रव्य है ही, देवदत्त नामवाला जीव भी चेतन द्रव्य है । अतएव इनका पुद्गल द्रव्यस्वरूप धन या शरीरके साथ वास्तविक क्या सम्बन्ध हो सकता है ? अर्थात् कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता। फिर भी देवदत्त धनको और जीव शरीरको मेरा मानता है सो उसका एकमात्र कारण रागभाव ही है । अतएव देवदत्त और जीवका सच्चा संयोग रागभावरूप ही है, धन और शरीररूप नहीं । धन और शरीरका संयोग कहना उपचरित है तथा रागभावरूप संयोग कहना यथार्थ है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए मूलाचार प्रथम भाग गाथा ४८ की टीकामें लिखा है-

अनात्मनीनस्यात्मभावः संयोगः ।

अनात्मीय वस्तुओंमें आत्मभाव होना संयोग है ।

इससे स्पष्ट है कि जीवमें द्रव्यकर्म और शरीरका कर्तृत्व असद्भूत व्यवहाररूप अर्थात् उपचरित ही है, क्योंकि असद्भूत व्यवहार और उपचार इन दोनोंका एक ही आशय है । फिर भी इनमें एक क्षेत्रावगाहरूप संश्लेषका ज्ञान करानेके लिए यहाँपर विशेषणरूपमें अनुपचरित शब्दका प्रयोग हुआ है । किन्तु कुम्भकार और घटमें एक क्षेत्रावगाहरूप भी संश्लेषसम्बन्ध नहीं है, इसलिए कुम्भकारमें घटके कर्तृत्वको उपचरितासद्भूतव्यवहाररूप अर्थात् उपचरितोपचाररूप बतलाया है। बृहद्द्रव्यसंग्रहका आशय स्पष्ट है। समयसार आत्मख्याति गाथा ५६ की टीका, नयचक्रसंग्रह तथा आलापपद्धतिके कथनके प्रकाशमें बृहद्द्रव्यसंग्रहके उक्त उल्लेखको पढ़नेपर अपर पक्षको भी यह आशय स्पष्ट हो जायगा ऐसा हमें विश्वास है। हाँ यदि वह उक्त आगम प्रमाणोंको लक्ष्यमें लिये बिना अपने मनसे बृहद्द्रव्यसंग्रहके उक्त उल्लेखका दूसरा अर्थ करता है जैसा कि उसकी ओरसे प्रस्तुत प्रतिशंकामें किया गया है तो उसका कोई चारा नहीं। हर अवस्थामें हम तो वही अर्थ करेंगे जिसे समग्र आगम एक स्वरसे स्वीकार करता है । आचार्य समन्तभद्र आप्तमीमांसामें लिखते हैं-

सदेव सर्वं को नेच्छेत् स्वरूपादिचतुष्टयात् ।
असदेव विपर्यासान्न चेन्न व्यवतिष्ठते ॥१५॥

ऐसा कौन है जो स्वरूपादि चतुष्टयकी अपेक्षा सभी पदार्थोंको सत्स्वरूप ही नहीं मानता और पररूपादि चतुष्टयकी अपेक्षा असत्स्वरूप ही नहीं मानता, क्योंकि ऐसा स्वीकार नहीं करने पर तत्त्वकी व्यवस्था ही नहीं बन सकती ॥१५॥

इससे स्पष्ट है पृथक्भूत घटका कारणधर्म कुम्भकारमें नास्तिरूप ही है और इसी प्रकार कुम्भकारका कार्यधर्म घटमें नास्तिरूप ही है । निश्चयसे (यथार्थमें) न कुम्भकार घटका कर्ता है और न घट कुम्भकारका कर्म है । समयसार आदि परमागम इसी सत्यका उद्घाटन करता है। धन्य है वह जिनवाणी और धन्य हैं वे महापुरुष जिन्होंने इस परम सत्यका उद्घाटनकर जड़-चेतन प्रत्येक द्रव्यकी स्वतन्त्रता और परिपूर्णताका मार्ग प्रशस्त किया है। यह वस्तुस्थिति है। इसे हृदयसे स्वीकार करके जो व्यवहार पक्षको जाननेके इच्छुक हैं उन्हें व्यवहार पक्षका आशय और प्रयोजन समझनेमें देर नहीं लगती। उपचरित अर्थको कल्पनारोपित कह कर उड़ाना अन्य बात है और अधिकतर लोकव्यवहार उपचरित अर्थके आलम्बनसे चलता है इसे स्वीकार कर वस्तुस्थितिको हृदयंगम कर लेना अन्य बात है ।

अपर पक्षका कहना है कि ‘ज्ञानावरणादि कर्मों और औदारिक आदि शरीरोंका निर्माण जीव अपनेसे अपृथक्‌रूपमें ही किया करता है तथा घट-पटादिका निर्माण वह अपनेसे पृथक्‌रूपमें किया करता है।’ किन्तु अपर पक्षका ऐसा लिखना कैसे असंगत है इसके लिए समयसार कलशके इस वचन पर दृष्टिपात कीजिए-

कर्तृत्वं न स्वभावोऽस्य चितो वेदयितृत्ववत् ।
अज्ञानादेव कर्तायं तदभावादकारकः ॥१९४॥

जैसे पर पदार्थोंका भोगना आत्माका स्वभाव नहीं है उसी प्रकार पर पदार्थोंका निर्माण करना भी आत्माका स्वभाव नहीं है । वह अज्ञानसे ही कर्ता है, अज्ञानका अभाव होनेपर अकर्ता है ॥१९४॥

यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि जब तक यह जीव अज्ञानी है तब तक तो उसे कर्म, नोकर्म और घटादि पदार्थोंका कर्ता ( निर्माण करनेवाला ) मानना चाहिए । समाधान यह है कि अज्ञानसे भी वह द्रव्यकर्मादि पदार्थोंका निर्माण नहीं कर सकता । यहाँ उसे जो कर्ता कहा गया है वह अपने विकल्पोंका ही कर्ता कहा गया है, द्रव्यकर्म, नोकर्म और घटादि पदार्थोंका नहीं। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए समयसार कलशमें लिखा है-

विकल्पकः परं कर्ता विकल्पः कर्म केवलम् ।
न जातु कर्तृ-कर्मत्वं सविकल्पस्य नश्यति ॥९५॥

विकल्प करनेवाला जीव ही केवल कर्ता है और विकल्प ही केवल कर्म ( कार्य ) है। जो जीव विकल्प सहित है उसका कर्ता-कर्मपना कभी नष्ट नहीं होता ॥९५॥

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

योगोपयोगयोस्त्वात्मविकल्पव्यापारयोः कदाचिदज्ञानेन करणादात्मापि कर्तास्तु तथापि न परद्रव्यात्मककर्मकर्ता स्यात् ।

अपने विकल्प और व्यापाररूप योग तथा उपयोग ( रागादिविकारयुक्त चैतन्यपरिणाम ) को कदाचित् अज्ञानसे करनेके कारण उनका आत्मा भी कर्ता रहो तथापि पर द्रव्यस्वरूप कर्म, नोकर्म और घट-पटादि कार्योंका वह त्रिकालमें निर्माण करनेवाला नहीं हो सकता।

इस प्रकार आचार्य वचन तो यह है कि यह जीव द्रव्यकर्म, नोकर्म और घट-पटादि पदार्थोंका त्रिकालमें निर्माण नहीं कर सकता और अपर पक्ष कहता ही नहीं लिखता भी है कि ‘यह जीव अपनेसे अपृथक्‌रूपमें द्रव्यकर्मों और औदारिकादि शरीरोंका तथा पृथक्‌रूपमें घट-पटादिका निर्माण किया करता है।’ ऐसी अवस्थामें सहज ही यह प्रश्न उठता है कि इनमेंसे किसे प्रमाण माना जाय आचार्योंके पूर्वोक्त कथनको या अपर पक्षके कथनको ? पाठक विचार करें।

अपर पक्ष कहेगा कि आचार्योंने उक्त वचनों द्वारा द्रव्यकर्म, नोकर्म और घट-पटादि पदार्थोंका आत्मा निश्चय कर्ता है ऐसा माननेका निषेध किया है, निमित्तकर्ता माननेका नहीं ? समाधान यह है कि आगममें द्रव्यकर्मादिका निमित्तकर्ता अज्ञानसे जो आत्माको कहा है वह किस नयकी अपेक्षा कहा है इस तथ्यका विचार करने पर विदित होता है कि जहाँ जहाँ इस प्रकारका कथन किया गया है वह असद्भूतव्यवहारनयकी अपेक्षा ही किया गया है और असद्भूत व्यवहारका अर्थ है एक द्रव्यके गुण-धर्मको दूसरे द्रव्य पर आरोपित करना। उपचार भी इसीका नाम है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ जहाँ एक द्रव्यको दूसरे द्रव्यका निमित्त कर्ता, प्रेरक कर्ता, परिणमानेवाला आदि शब्दों द्वारा कहा गया है वह मात्र उपचार नयका आश्रय लेकर ही कहा गया है। बृहद्‌द्रव्यसंग्रहके उक्त उल्लेखका भी यही आशय है। अतएव अपर पक्षके इस कथनको कि ‘ज्ञानावरणादि कर्मों और औदारिकादि शरीरोंका निर्माण जीव अपनेसे अपृथक्‌रूपमें ही किया करता है तथा घट-पटादिका निर्माण वह अपनेसे पृथक्‌रूपमें किया करता है।’ यथार्थ न मानकर हमारे इस कथनको कि 'जब प्रत्येक द्रव्य सद्‌रूप है और उसको उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यस्वभाववाला माना गया है तो ऐसी अवस्थामें उसके उत्पाद-व्ययको तत्त्वतः स्वयंकृत मान लेना ही श्रेयस्कर है। फिर भी इसके विरुद्ध उसे अन्य द्रव्यके कर्तृत्व पर छोड़ दिया जाय और यह मान लिया जाय कि अन्य द्रव्य जब चाहे उसमें किसी भी कार्यको उत्पन्न कर सकता हैं तो यह उसके स्वतन्त्र स्वभाव पर आघात ही है।

आगे अपर पक्षने उपादानकी कार्यके साथ अन्तर्व्याप्ति और निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीकी कार्यके साथ बाह्य व्याप्तिकी चरचा करके उपादानकी कार्यके प्रति एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणता स्वीकार की है। किन्तु जब कि अपर पक्ष अपनी प्रतिशंकामें यह स्वीकार करता है कि ‘ज्ञानावरणादि कर्मोंका और औदारिकादि शरीरोंका निर्माण जीव अपनेसे अपृथक् रूपमें हीं किया करता है ।’ ऐसी अवस्थामें उसका यह लिखना कि ‘आचार्योंने···प्रत्येक कार्यमें अपने·······निमित्तोंके साथ बाह्य व्याप्ति स्वीकार की है ।’ कहाँ तक संगत कहा जा सकता है । क्या इस प्रकार परस्पर विरुद्ध कथन करते हुए वह पच स्वयं अपनेको आगमविरुद्ध कथकके रूपमें अनुभव नहीं करता इसका उस पक्षको स्वयं विचार करना चाहिए । साथ ही उसे आगमका ऐसा प्रमाण भी देना था जहाँ उपादानकी अपने कार्यके प्रति एक द्रव्य-प्रत्यासत्तिरूप कारणता बतलाई गई हो । किन्तु न तो ऐसा कोई आगम ही है । और न ऐसा ही है कि कार्यके प्रति उपादानकी अन्तर्व्याप्तिका जैसा अर्थ और निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीका जैसा अर्थ वह पक्ष करता है वह भी आगममें स्वीकार किया गया है । जीव और पुद्गल अपने परलक्षी क्रिया-परिणामके कारण जब परसे सम्पृक्तकी भूमिकामें विद्यमान रहता है तब अपने क्रिया-परिणामके कालमें परका नियमसे क्या क्रिया-परिणाम होता है यह घोषित करना ही बाह्य व्याप्तिरूप अन्वय-व्यतिरेकका प्रयोजन है । यही कारण है कि आचार्योंने प्रत्येक कार्यके प्रति परमें निमित्तताको कालप्रत्यासत्तिके रूपमें स्वीकार किया है । परको प्रत्येक कार्यके प्रति उपकारी, सहायक, निमित्तकर्ता, परिणमानेवाला आदि शब्दोंसे जो कुछ भी कहा गया है वह सब इसी अभिप्रायसे कहा गया है । यदि स्वभावपर्याय और विभावपर्यायमें कोई अन्तर है तो इतना ही कि स्वभावपर्याय परलक्षी परिणमन नहीं है, जब कि विभावपर्याय परलक्षी परिणमन है । इस प्रकार इस विवेचनसे स्पष्ट है कि प्रकृतमें अन्तर्व्याप्ति और बाह्य व्याप्ति आदिकी चरचा करते हुए अपर पक्षने जो कुछ लिखा है वह यथार्थ नहीं है ।

हमने लिखा था कि ‘द्रव्य अन्वयी होनेके कारण जैसा नित्य है उसी प्रकार व्यतिरेकी स्वभाववाला होनेसे प्रत्येक समयमें वह उत्पाद-व्यय स्वभाववाला भी है, अतएव प्रत्येक समयमें वह कार्यका उपादान भी है और कार्य भी । पिछली पर्यायकी अपेक्षा जहाँ वह कार्य है अगली पर्यायके लिए वहाँ वह उपादान भी है ।’

इस पर अपर पक्ष कहता है कि ‘हम भी ऐसा मानते हैं ।’ किन्तु यह बात नहीं है, क्योंकि यदि वह ऐसा मानता होता तो वह पक्ष उपादानमें मात्र एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप कारणताको स्वीकार न कर एक द्रव्य-भावप्रत्यासत्तिरूप कारणताको स्वीकार कर लेता, क्योंकि आचार्योंने भी एक द्रव्य-भावप्रत्यासत्तिरूपताको ही उपादान कारण सर्वत्र स्वीकार किया है । आचार्य विद्यानन्दि तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ६८ पर लिखते हैं-

दर्शनपरिणामपरिणतो ह्यात्मा दर्शनम्, तदुपादानम्, विशिष्टज्ञानपरिणामस्य निष्पत्तेः । पर्यायमात्रस्य निरन्वयस्य जीवादिद्रव्यमात्रस्य च सर्वथोपादानत्वायोगात् कूर्मरोमादिवत् ।

दर्शन परिणामसे परिणत आत्मा नियमसे दर्शन है, वह उपादान है, क्योंकि उससे विशिष्ट ज्ञानपरिणामकी उत्पत्ति होती है । जैसे कूर्मरोमादि असत् होनेसे उपादान नहीं हो सकते उसी प्रकार निरन्वय पर्यायमात्र और जीवादि द्रव्यमात्र किसी भी प्रकार उपादान नहीं हो सकते ।

यह समर्थ उपादानका स्वरूप है । यदि वह इस स्वरूपको हृदयसे स्वीकार कर ले तो ही उसकी ओरसे हमारे पूर्वोक्त कथनका स्वीकार कहा जायगा और ऐसी अवस्थामें उसकी ओरसे यहाँ पर जो कुछ भी कल्पनावश लिखा गया है उसे वह पक्ष स्वयं बदल देगा । तब वह पक्ष इस तथ्यको हृदयसे स्वीकार कर लेगा कि ‘प्रत्येक समयमें प्रत्येक द्रव्यमें न तो केवल एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूपसे उपादानता है और न ही केवल भावप्रत्यासत्तिरूपसे उपादानता है । किन्तु एक द्रव्य-भावप्रत्यासत्तिमें उपादानकारणता होनेसे जिस समय जो द्रव्य उभयरूपसे उपादान बन कर जिस कार्यके सन्मुख होता है उस समय उसमें निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीका सहज योग मिलता ही है ।’

अपर पक्ष पूछता है कि ‘यह जो क्षेत्र परिवर्तन इस मिट्टीका हुआ वह क्या खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीकी क्षणिक पर्यायोंके क्रमसे हुआ ।’ समाधान यह है कि जीव और पुद्गलमें दो प्रकारकी शक्ति आगम स्वीकार करता है-एक क्रियावती शक्ति और दूसरी भाववती शक्ति । यही कारण है कि इन दोनों द्रव्योंमें यथासम्भव दो प्रकारका भाव स्वीकार किया गया है-एक परिस्पन्दात्मक और दूसरा अपरिस्पन्दात्मक । उनमेंसे परिस्पन्दात्मक भावको क्रिया कहते हैं और अपरिस्पन्दात्मक भावको परिणाम कहते हैं । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सू० २२ वार्तिक २१ में लिखा है-

द्रव्यस्य हि भावो द्विविधः-परिस्पन्दात्मकः अपरिस्पन्दात्मकश्च । तत्र परिस्पन्दात्मकः क्रियेत्याख्यायते इतरः परिणामः ।

तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ० ३९८ में भी क्रियाका यही लक्षण करते हुए लिखा है-

द्रव्यस्य हि देशान्तरप्राप्तिहेतुः पर्यायः क्रिया, न सर्वः ।

इस प्रकार भावके दो प्रकारके सिद्ध हो जाने पर यहाँ पर गति और स्थितिका विचार करना है । इसका लक्षण बतलाते हुए सर्वार्थसिद्धि अ० ५ सू० १७ में कहा है-

देशान्तरप्राप्तिहेतुर्गतिः ।

जो देशान्तरकी प्राप्तिमें हेतु है उसका नाम गति है ।

उक्त सूत्रकी व्याख्याके प्रसंगसे तत्त्वार्थवार्तिकमें गतिका लक्षण इस प्रकार किया है-

द्रव्यस्य देशान्तरप्राप्तिहेतुः परिणामो गतिः ।१। द्रव्यस्य बाह्यान्तरहेतुसन्निधाने सति परिणममानस्य देशान्तरप्राप्तिहेतुः परिणामो गतिरित्युच्यते ।

द्रव्यके देशान्तरमें प्राप्तिके हेतुभूत परिणामका नाम गति है ।१। बाह्य और अभ्यन्तर हेतुके सन्निधान होने पर परिणमन करते हुए द्रव्यके देशान्तरमें प्राप्तिके हेतुभूत परिणामको गति कहा जाता है ।

गतिके विषयमें विचार करते हुए हमें क्रियाके स्वरूप पर विस्तारसे दृष्टिपात करना होगा । इस सम्बन्धमें तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अ० ५ सू० २२ में लिखा है-

परिस्पन्दात्मको द्रव्यपर्यायः संप्रतीयते ।
क्रिया देशान्तरप्राप्तिहेतुर्गत्यादिभेदकृत् ॥३९॥

गत्यादि भेदको करनेवाली देशान्तर प्राप्तिमें हेतुभूत जो परिस्पन्दात्मक द्रव्यपर्याय है उसे क्रिया जानना चाहिए ॥३९॥

यह परिस्पन्दात्मक क्रिया जीवों और पुद्गलों दो द्रव्योंमें ही होती है । इसका स्पष्टीकरण करते हुए प्रवचनसारमें लिखा है-

पुद्गलास्तु परिस्पन्दस्वभावत्वात्परिस्पन्देन भिन्नाः संघातेन संहताः पुनर्भेदेनोत्पद्यमानावतिष्ठमानभज्यमानाः क्रियावन्तश्च भवन्ति । तथा जीवा अपि परिस्पन्दस्वभावत्वात्परिस्पन्देन नूतनकर्म-नोकर्म-पुद्गलेभ्यो भिन्नास्तैः सह संघातेन संहताः पुनर्भेदेनोत्पद्यमानावतिष्ठमानभज्यमानाः क्रियावन्तश्च भवन्ति ॥१२९॥

पुद्गल तो क्रियावाले भी होते हैं, क्योंकि परिस्पन्द स्वभाववाले होनेसे परिस्पन्दके द्वारा, पृथक् अवस्थित पुद्गल संघातरूपसे और संघातरूप पुद्गल पुनः भेदरूपसे उत्पन्न होते हैं, ठहरते हैं और नष्ट होते हैं। तथा जीव भी क्रियावाले होते हैं, क्योंकि परिस्पन्द स्वभाववाले होनेसे परिस्पन्दके द्वारा नवीन कर्म और नोकर्मसे भिन्न जीव उनके साथ मिलनेसे तथा उनके साथ मिले हुए जीव पुनः भिन्न होनेसे वे उत्पन्न होते हैं, ठहरते हैं और नष्ट होते हैं ॥१२९॥

इन प्रमाणोंसे ज्ञात होता है कि पुद्गलों और जीवोंकी जो परिस्पन्दलक्षण क्रिया होती है, गति भी उसीका विशेष है। इसलिए यहाँ भी जो प्रति समय परिस्पन्दरूप परिणाम होता है उसका बाह्य हेतु काल है तथा उसके क्षेत्रसे क्षेत्रान्तररूप होनेमें बाह्य हेतु धर्मद्रव्य है।

इस प्रकार उक्त विवेचनसे यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि जीवों और पुद्गलोंमें जो भी क्रियालक्षण परिणाम और भावलक्षण परिणाम होता है वह सब क्षणिक पर्यायोंके क्रमसे ही होता है। इन्हीं दोनों प्रकारके परिणामोंके कारण दो परमाणु मिलकर द्वयणुक बनते हैं। अनन्त परमाणुओंके स्कन्ध बननेका भी यही तरीका है। मिट्टी उसका अपवाद नहीं। अपनी क्रियालक्षण या भावलक्षण पर्याय सन्ततिमें वह जिस समय क्षेत्रान्तरित होनेरूप या पिण्ड, स्थासादि बननेरूप कार्यका उपादान होती है उस समय वह अपने परिणमनेके अनुरूप प्रायोगिक या वैस्रसिक बाह्य निमित्तोंको प्राप्त कर स्वयं परिणमती रहती है।

बुद्धिदोषवश यदि कोई मिट्टी आदिकी प्रति समय होनेवाली इस आन्तरिक क्रियालक्षण और भावलक्षण उपादान योग्यताको न जानकर केवल बाह्य सामग्रीके आधारसे उसमें होनेवाले कार्योंकी सिद्धि करता है तो वह वस्तुतः एकान्तसे व्यवहार पक्षका आग्रही होनेसे कार्य-कारणपरम्पराके प्रति अनभिज्ञ ही कहा जायगा। स्पष्ट है कि मिट्टीका खेतसे कुम्भकारको निमित्त कर क्षेत्रान्तरित होना, जलादिको निमित्त कर पिण्डरूप परिणमना, कुम्भकार, चक्र, चीवरादिको निमित्तकर स्थासादिरूप परिणमते हुए घटरूप बनना या दण्डादिको निमित्त कर अनेक भागोंमें विभक्त होना आदिरूप जिस समय जो भी क्रियालक्षण या भावलक्षण परिणाम होता है वह उस उस समयके उपादानके अनुसार ही होता है और उस उस समय निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्री भी उस उस परिणामके अनुकूल मिलती है। किसी भी द्रव्यमें ऐसा एक भी परिणाम नहीं होता जो प्रतिसमय होनेवाले परिणामक्रमके अन्तर्गत न आता हो। एक द्रव्य दूसरे द्रव्यमें किसी प्रकारकी करामात कर सके ऐसा तो त्रिकालमें सम्भव नहीं है। एक द्रव्य दूसरे द्रव्यमें करामात करता है यह कहना तो अतिदूरकी बात है ऐसी करामात तो एक ही द्रव्य भिन्न समयमें स्थित होकर उससे भिन्न समयके कार्यकी अपेक्षा स्वयं अपनेमें नहीं कर सकता। उत्पादादि त्रिलक्षण वस्तुका ऐसा ही स्वभाव है, उसमें चारा किसका। प्रत्येक उत्पाद-व्ययलक्षण परिणाम अपने-अपने कालमें होता है इसके लिए प्रवचनसार गाथा ९९ की आचार्य अमृतचन्द्रकृत टीका द्रष्टव्य है। वहाँ लिखा है-

तथैव ते परिणामाः स्वावसरे स्वरूप-पूर्वरूपाभ्यामुत्पन्नोच्छन्नत्वात्सर्वत्र परस्परानुस्यूतिसूत्रितैकप्रवाहतयानुत्पन्नप्रलीनत्वाच्च संभूति-संहार-ध्रौव्यात्मकमात्मानं धारयन्ति।

उसी प्रकार वे परिणाम अपने कालमें स्व-रूपसे उत्पन्न और पूर्व-रूपसे विनष्ट होनेके कारण तथा सर्वत्र परस्पर अनुस्यूतिसे सूत्रित एक प्रवाहपनेकी अपेक्षा अनुत्पन्न-अविनष्ट होनेके कारण उत्पत्ति, संहार और ध्रौव्यस्वरूपको धारण करते हैं।

इस उल्लेखमें आया हुआ ‘स्वावसरे’ पद ध्यान देने योग्य है । जब कि द्रव्य-पर्यायात्मक प्रत्येक उपादान अपने प्रतिनियत कार्यका सूचक है और उसकी उत्पत्तिमें प्रतिनियत बाह्यसामग्रीका ही योग मिलता है, ऐसी अवस्थामें प्रत्येक कार्य प्रतिनियत कालमें ही होता है यही उक्त वचनसे सुनिश्चित ज्ञात होता है । आगमसे तो इसमें सन्देह करनेके लिए कोई गुंजाइश रहती नहीं, तर्क और अनुभवसे भी यही सिद्ध होता है । विशेष स्पष्टीकरण पूर्वमें विस्तारसे किया है ।

अपर पक्ष प्रत्येक कार्यके प्रति बाह्य सामग्रीका उपयोग जानना चाहता है सो उसका यह उपयोग तो त्रिकालमें नहीं हो सकता कि वह अपनेसे भिन्न दूसरे द्रव्यके कार्यको स्वयं कर्ता बनकर उत्पन्न करे । हाँ उसका इतना उपयोग अवश्य है कि उससे हमें दूसरे द्रव्यमें उस समय होनेवाले कार्यकी सूचना अवश्य मिल जाती है । इससे हम यह जान सकते हैं कि इस समय इस प्रकारका उपादान होकर इस द्रव्यने अपना यह कार्य किया है । कोई भी अल्पज्ञानी रागी मनुष्य जितने रूपमें इस व्यवस्थाको जानता है उतने रूपमें वह बाह्याभ्यन्तर सामग्रीको विकल्प और योगक्रियारूपसे जुटानेका प्रयत्न अवश्य करता है । बाह्याभ्यन्तर सामग्रीका उसके विकल्प और योगक्रियाके अनुरूप योग मिलना और न मिलना उसके हाथमें नहीं है । इच्छानुसार बाह्याभ्यन्तर सामग्रीका योग मिल गया तो रागवश अपनी सफलता मानता है, अन्यथा खेदखिन्न होता है । वह जानता है कि अमुक कुम्भकार अच्छा घड़ा बनाता है । उसकी प्रार्थनाको कुम्भकार स्वीकार भी कर लेता है । वह वैसी योजना भी करता है, फिर भी उसकी इच्छानुसार घड़ा नहीं बनता या बनता ही नहीं । क्यों ? इसलिए नहीं कि बाह्य सामग्री नहीं थी । बल्कि इसलिए कि मिट्टीकी उस समय घटरूप परिणमनेकी द्रव्य-पर्यायरूप उपादान योग्यता ही नहीं थी । कुम्भकार विचारा या अन्य बाह्यसामग्री उसमें क्या कर सकते थे । इसीको कहते हैं उपादानके कार्यमें निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्यसामग्रीका अकिंचित्करपना । ऐसी अवस्थामें अपर पक्ष ही बतलावे कि अपर पक्षने अपनी कल्पनासे जो समस्याएँ खड़ी की हैं वे हमारे निश्चयनयसे किये गये इस कथनका कि ‘उपादानसे ही कार्य उत्पन्न हो जाता है निमित्त तो वहाँपर अकिंचित्कर ही बना रहता है ।’ खण्डन करती हैं या मण्डन । विचार कर देखा जाय तो अपर पक्षने जो समस्याएँ खड़ी की हैं उनसे हमारे उक्त कथनका मण्डन ही होता है, खण्डन नहीं ।

हमने अपने पिछले उत्तरमें लिखा था कि ‘लौकिक उदाहरणोंको उपस्थित कर अपनी चित्तवृत्तिके अनुसार कार्यकारणपरम्पराको विठलाना उचित नहीं है ।’ तथा इसी प्रसंगमें हमने समयसारकलशका ‘आसंसारत एव धावति’ इत्यादि कलश भी उपस्थित किया था ।

शंका ६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान (भाग ४/४)

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ४८१ से ४९६

↑ सूची


इसपर अपर पक्षका कहना है कि ‘लोकमें अधिकांश ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है कि प्राणी मोहकर्मके उदयके वशीभूत होकर अपने निमित्तसे होनेवाले कार्योंमें अपने अन्दर अहंकारका विकल्प पैदा करता रहता है जो मोहभाव होनेके कारण बन्धका कारण है, अतएव त्याज्य है । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अपने निमित्तसे होनेवाले कार्योंमें अपनी निमित्तताका ज्ञान होना असत्य है । यदि अपने निमित्तसे होनेवाले कार्योंमें अपनी निमित्तताका ज्ञान भी असत्य हो जाय तो फिर मनुष्य किसी कार्यके करनेमें प्रवृत्त भी कैसे होगा ? कुम्हारको यदि समझमें आ जाय कि घड़ेका निर्माण खानमें पड़ी हुई मिट्टीसे अपनी क्रमवर्ती क्षणिक पर्यायोंके आधारपर स्वतः समय आनेपर हो जायगा तो फिर उसमें तदनुकूल पुरुषार्थ करनेकी भावना ही जागृत क्यों होगी?’ आदि ।

समाधान यह है कि किस कार्यमें कौन निमित्त है इसका ज्ञान होना अन्य बात है और उपादानको मात्र द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप स्वीकार करके जब जैसे बाह्य निमित्त मिलते हैं तब उनके अनुसार कार्य होता है ऐसा मानना अन्य बात है। कोई भी समझदार कुम्भकार घटनिर्माणका विकल्प भी करता है तदनुकूल व्यापार भी करता है और इसके लिए घटके योग्य मिट्टीका परिग्रह भी करता है। तदनुकूल आगेके व्यापारमें भी जुटता है पर उसे यह ज्ञान होता है कि यह मिट्टी घटपर्यायसे परिणत होनेवाली होगी तो ही होगी; मैं तो निमित्तमात्र हूँ और घटकार्यमें तब निमित्तमात्र हूँ जब मिट्टी स्वयं घटकार्यके सन्मुख हो। मिट्टीके संग्रहमें निमित्त होते समय, उसे अपने घरतक क्षेत्रान्तरित होनेमें निमित्त होते समय तथा जल और मिट्टीके संयोग आदिमें निमित्त होते समय जो मेरे मनमें घट बनानेका विकल्प है और उस विकल्पको ध्यानमें रखकर जो मैं अपनेको वर्तमानमें घट बनानेका निर्माता कहता हूँ वह केवल भावी नैगमनयकी अपेक्षा असद्भूत व्यवहार वचन ही कहता हूँ। इस प्रकार जिसे भूतार्थका ज्ञान है वही अनेक असत् विकल्पोंसे अपनी रक्षा कर सकता हैं, अन्य नहीं और वह ही अनेक असत् विकल्पोंको निमित्त कर होनेवाले बन्धनसे अपनी रक्षा कर सकता है, अन्य नहीं। मिट्टी ही स्वयं घट बनती है, अन्य नहीं। पर वह किस अवस्थामें घट बनती है इसे विवेकी अच्छी तरह जानते हैं। विवेकी यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि घटपर्यायके सन्मुख हुई मिट्टी ही घटका उपादान हैं, खानमें पड़ी हुई मिट्टी नहीं। यदि कोई कुम्भकार खानमें पड़ी हुई मिट्टीको वर्तमानमें घटका उपादान समझ ले तो अपनी ऐसी खोटी समझके लिए स्वयं पश्चात्ताप करना पड़ेगा या वह निर्णय कर ले कि इसे मेरी इच्छानुसार परिणमना पड़ेगा तो भी उसे कदाचित् पश्चात्ताप करना पड़ेगा।

कोई मूढ़ छात्र अध्यापकके मुखसे पाठ सुने, उनकी सेवा करे, ‘न हि कृतमुपकारं’ इत्यादि वचनका अक्षरशः पालन करे, परन्तु स्वयं अभ्यास न करे तो वह मूढ़ ही बना रहेगा, स्वयं विद्वान् न बन सकेगा। अध्यापक तो तब निमित्तमात्र है जब वह छात्र अपनी मूढ़ताको छोड़ कर स्वयं अभ्यासके सन्मुख होता है। इसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए।

कुम्भकारादि तब निमित्तमात्र हैं जब मिट्टी स्वयं अपने उत्तरोत्तर होनेवाले परिणामों द्वारा स्वयं घट परिणामके सन्मुख होकर घटरूप परिणमती है। अपर पक्षने जितने उदाहरण दिये हैं वे सब लौकिक इसलिए हैं, क्योंकि वह पक्ष अपनी रुचिसे उपादानको एक द्रव्यप्रत्यासत्तिरूप लिखकर उसे आगम सिद्ध करना चाहता है और उसे आधार बनाकर कार्यकारणभावकी व्यवस्था बनाना चाहता है। स्पष्ट है कि अपर पक्षने ‘आ संसारत एव’ इत्यादि कलशके आधार पर जो विचार प्रस्तुत किये हैं वे कार्य-कारणभावकी यथार्थ व्यवस्थाको स्पर्श नहीं करते, अतः त्याज्य हैं। यद्यपि उक्त कलशका आशय अन्तस्तमका उच्छेद करनेवाला होनेसे अतिगूढ़ है, परन्तु यहाँपर हमने प्रकृतमें प्रयोजनीय मात्र इतना आशय लिया है। उसका यथार्थ अर्थ ग्रहण करने पर तो ‘मैं इस कार्यमें निमित्त हूँ’ यह विकल्प भी बन्धका कर्ता होनेसे हेय है। यह जीव भूतार्थके परिग्रहद्वारा स्वयं ज्ञानघन होकर बन्धनसे मुक्त हो जाय तब तो कहना होगा कि इसने आत्मनिधिका ही साक्षात्कार कर लिया। वहाँ इस विकल्पको स्थान कहाँ। अस्तु,

हमने अपने पिछले उत्तरमें ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ का आशय स्पष्ट किया था। अपर पक्षका कहना है कि ‘वह उत्तर पर्याय निमित्तसापेक्ष उत्पन्न नहीं होती ऐसा निर्णय तो उक्त वाक्यसे नहीं किया जा सकता है।’ अपने इसी कथनकी पुष्टिमें अपर पक्षने ‘वचनसामर्थ्यादज्ञानादिर्दोषः’ (अष्ट० पृ० ५१) इत्यादि वचन भी उद्धृत किया है।

यद्यपि अपर पक्षने इस वचनको अपने पक्षमें समझ कर उपस्थित किया है, परन्तु इससे यथार्थ पर प्रकाश पड़नेमें बड़ी सहायता मिलती है इसमें सन्देह नहीं, क्योंकि इसमें एक द्रव्यप्रत्यासत्तिको उपादान न कहकर अपने पूर्व (अनन्तर पूर्व) परिणामको उपादान कहा गया है। यहाँ पर ‘पूर्वस्वपरिणाम’ पदसे जहाँ असाधारण द्रव्यप्रत्यासत्तिका ज्ञान हो जाता है वहाँ समनन्तर पूर्व पर्यायप्रत्यासत्तिका भी ग्रहण हो जाता है। ऐसी अवस्थामें ‘प्रत्येक समयमें उस-उस पर्याय युक्त द्रव्य अगले समयका उपादान होता है और जिसका वह उपादान होता है उससे अगले समयमें उसी कार्यको जन्म देता है तथा कार्यकालमें बाह्य सामग्री भी उसीके अनुकूल मिलती है’ इस तथ्यकी पुष्टि होकर प्रत्येक कार्यका स्वकाल निश्चित हो जाता है। अपर पक्ष यदि इस तथ्यको स्वीकार कर ले तो प्रत्येक कार्यमें निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीका क्या स्थान है इसका निर्णय करनेमें आसानी जाय।

आगममें ‘बाह्य दण्डादिसापेक्ष मिट्टी ही स्वयं’ ऐसा कथन आता है। इस परसे अपर पक्षका ख्याल है कि उपादानको निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीकी तबतक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जबतक वह प्राप्त न हो जाय। किन्तु देखना यह है कि आगममें ‘बाह्य दण्डादिसापेक्ष’ यह या इसी प्रकारके अन्य वचन किस दृष्टिसे लिखे गये हैं। क्या कोई भी वस्तु अपना कार्य करते समय सहकारी मानकर अन्य बाह्य सामग्रीकी प्रतीक्षा करती है या यह नयवचन है ? जो मात्र इस बातको सूचित करता है कि अमुक प्रकारके कार्यमें अमुक प्रकारकी आभ्यन्तर उपाधिके साथ अमुक प्रकारकी बाह्य उपाधि नियमसे होती है। आगम (पंचास्तिकाय गा० १००) में व्यवहारकालको ‘परिणामभव’ कहा है। इसकी व्याख्या करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

तत्र व्यवहारकालो निश्चयकालपर्यायरूपोऽपि जीव-पुद्गलानां परिणामेनावच्छिद्यमानत्वात्तत्परिणामभव इत्युपगीयते। जीव-पुद्गलानां परिणामस्तु बहिरंगनिमित्तभूतद्रव्यकालसद्भावे सति सम्भूतत्वाद् द्रव्यकालसम्भूत इत्यभिधीयते। तत्रेदं तात्पर्यम्-व्यवहारकालो जीव-पुद्गलपरिणामेन निश्चीयते, निश्चयकालस्तु तत्परिणामान्यथानुपपत्त्येति।

वहाँ व्यवहारकाल निश्चय कालकी पर्यायस्वरूप हो कर भी जीवों और पुद्गलोंके परिणामसे ज्ञात होनेके कारण ‘वह जीवों और पुद्गलोंके परिणामसे उत्पन्न होता है’ ऐसा कहा जाता है। तथा जीवों और पुद्गलोंका परिणाम तो बहिरंग निमित्तभूत द्रव्यकालके सद्भावमें उत्पन्न होनेके कारण ‘द्रव्यकालसे उत्पन्न हुआ है’ ऐसा कहा जाता है।

पंचास्तिकाय गाथा २३ की टीकामें आचार्य अमृतचन्द्र इसी विषयको स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-

यस्तु निश्चयकालपर्यायरूपो व्यवहारकालः स जीव-पुद्गलपरिणामेनाभिव्यज्यमानत्वात्तदायत्त एवाभिगम्यत एवेति।

और जो निश्चयकालकी पर्यायरूप व्यवहारकाल है वह जीव-पुद्गलोंके परिणामसे अभिव्यज्यमान होनेके कारण उस (जीव-पुद्गलोंके परिणाम) के अधीन ही है ऐसा ज्ञात होता ही है।

अब देखना यह है कि यहाँ पर जो व्यवहारकालको जीव-पुद्गलोंके परिणामसे उत्पन्न होनेवाला या उनके परिणामके अधीन कहा गया है वह एक समयमात्र व्यवहारकाल कितना है इस बातका ज्ञान करनेके अभिप्रायसे कहा गया है या यथार्थमें व्यवहारकालकी उत्पत्ति जीव-पुद्गलोंके परिणामसे होती है यह जतानेके लिये कहा गया है। दूसरा पक्ष तो ठीक नहीं, क्योंकि स्वयं आचार्यने पूर्वोक्त उल्लेख द्वारा उसका निषेध किया है। प्रथम पक्षके स्वीकार करने पर यही सिद्ध होता है कि किस कार्यके होनेमें कौन बाह्य वस्तु निमित्त व्यवहारको प्राप्त होती है या जिस समय जो भी कार्य होता है उसका ज्ञान बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिके द्वारा होनेके कारण उनके साथ कार्यके अन्वय-व्यतिरेकका ज्ञान करनेके लिए व्यवहारनयसे आगममें ‘उभय-निमित्तसापेक्ष’ या ‘बाह्यदण्डादिनिमित्तसापेक्ष’ इत्यादि कथन किया गया है ।

किसी भी कार्यमें अन्य किसीकी अपेक्षा रहती हो ऐसा तो वस्तुका स्वरूप ही नहीं है, वह तो स्वतःसिद्ध होता है । उदाहरणके लिए सदसत्स्वरूप वस्तुको लीजिए । वस्तुका यह स्वरूप है जो नियमसे परनिरपेक्ष है । फिर भी वस्तुमें अस्तित्व धर्मकी सिद्धि स्वचतुष्टयकी अपेक्षा की जाती है और नास्तित्व धर्मकी सिद्धि पर चतुष्टयकी अपेक्षा की जाती है । इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक वस्तुमें अस्तित्व धर्म स्वचतुष्टयकी अपेक्षा रहता है और नास्तित्व धर्म परचतुष्टयकी अपेक्षा रहता है । यदि ऐसा माना जाय तो सदसत्स्वरूप वस्तु ही नहीं बनेगी । अतः प्रत्येक वस्तुको सदसत्स्वरूप परनिरपेक्ष स्वतःसिद्ध मानना चाहिए । यही कथन परमार्थ सत्य है, अन्य सब व्यवहार है । उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए ।

यही कारण है कि कर्ता, कर्म और क्रिया इन तीनोंमें वस्तुपनेसे अभेद सूचित करके परमागमने इस परमार्थ सत्यका उद्घाटन किया है कि जिस समय वस्तु जिसरूप परिणमती है वह तन्मय होती है । इसे निश्चय कथन कहनेका यही कारण है । किन्तु समयभेदसे किस समय प्रत्येक वस्तु किस रूप परिणमती है इसकी सिद्धिका उपाय क्या यह बतलानेके लिए आगममें बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिके आधारसे उसकी सिद्धि की गई है और यह कहा गया है कि जिस बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिके साथ जिस कार्य द्रव्यका अन्वय-व्यतिरेक मिले उसे उसका कारण कहना चाहिए । और इसी अभिप्रायको ध्यानमें रखकर आगममें यह वचन उपलब्ध होता है कि-‘यदनन्तरं यद्भवति तत्तत्कारणमितरत्कार्यम् ।’ स्पष्ट है कि कार्यकी सिद्धिकी विवक्षामें ‘उभयनिमित्तसापेक्ष’ इत्यादि वचन प्रयोजनान् है, स्वरूपके उद्घाटनमें नहीं । निश्चयनय वचन स्वरूपका उद्घाटन करता है, इसलिए यथार्थ है और व्यवहारनय वचन स्वरूपका उद्घाटन न करके उसका कर्ता परको कहता है, इसलिए उपचरित है । इसमें भेदविवक्षामें सद्भूत व्यवहार वचनका तथा सर्वथा भेदविवक्षामें असद्भूत व्यवहार वचनका दोनोंका परिग्रह हो जाता है । यह सापेक्ष कथनका थोड़ेमें खुलासा है । इसे स्पष्टरूपसे समझनेके लिए अपर पक्ष आप्तमीमांसा कारिका ७५ और उसपर लिखी गई अष्टशती तथा अष्टसहस्री टीका पर दृष्टिपात करेगा ऐसा हमें विश्वास है ।

आचार्य कुन्दकुन्दने ‘जीवपरिणामहेदु’’ यह वचन इसलिए नहीं लिखा है कि जीवके परिणाम कर्मको उत्पन्न करते हैं और कर्म जीवके परिणामोंको उत्पन्न करते हैं । किन्तु किस जीवके परिणामके साथ कर्मकी और किस कर्मपरिणामके साथ जीवपरिणामके होनेकी बाह्य व्याप्ति है, मात्र इसकी सिद्धि इस वचन द्वारा की गई है और तभी यथार्थताका ज्ञान कराते हुए अगली गाथामें यह लिख दिया है कि कर्म जीवपरिणामको उत्पन्न नहीं करता और जीव कर्मपरिणामको उत्पन्न नहीं करता । जो जिसकी सिद्धिका हेतु है उसमें निमित्त व्यवहार करना अन्य बात है और उसे उसका यथार्थ कर्ता मान बैठना अन्य बात है । यह तो महा-मिथ्यात्व है ।

इसी प्रसंगमें अपर पक्षने लिखा है कि-‘असंख्यातप्रदेशी जीवको जब जैसा शरीर मिलता है तब उसे उसरूप परिणमना पड़ता है ।’ और साथ ही इसे आगम कथन बतला कर यह भी लिख दिया है कि ‘इसे हम स्वीकार करते है ।’ इसका हमें आश्चर्य है । वास्तवमें यह हमारा कथन नहीं है । किन्तु अपर पक्षकी उस मान्यताका संक्षिप्त उल्लेख है जिसका निर्देश अपर पक्षने इसी प्रश्नके द्वितीय दौरके समय अपनी प्रति-शंकामें किया है जो इस प्रकार है-‘तीसरी बात यह है कि असंख्यातप्रदेशी जीव शरीर परिमाणके छोटे बड़े होनेसे आकारमें छोटा-बड़ा बन जाता है। यदि जीवको शरीरके प्रभावसे रहित माना जायगा तब यह बात भी नहीं बन सकेगी और इस प्रकार आगमका विरोध होगा।’

अपर पक्षने यहाँ पर अन्य जितना कुछ लिखा है उसमें ऐसी कोई नई बात नहीं जिस पर विशेष ध्यान दिया आय। अन्वय-व्यतिरेकके आधार पर शरीरादि बाह्य सामग्रीका कार्यके प्रति क्या स्थान है इसका विस्तारके साथ खुलासा हमने किया ही है। अपर पक्ष यदि आगमको हृदयंगम करके विवाद समाप्त कर ले तो उसका हम स्वागत ही करेंगे। निमित्त व्यवहारके योग्य पर द्रव्य दूसरे द्रव्यके कार्यमें यत्किंचित् भी सहकारिता करता है ऐसी मान्यता ही मिथ्या है। आगमकी ऐसी ही आज्ञा है कि-

एवं च सति मृत्तिकायाः स्वस्वभावानतिक्रमान्न कुम्भकारः कुम्भस्योत्पादक एव, मृत्तिकैव कुम्भकारस्वभावमस्पृशन्ती स्वस्वभावेन कुम्भभावेनोत्पद्यते।
-समयसार गा० ३७२ आ० अमृतचन्द्रकृत टीका

ऐसा होने पर मिट्टी अपने स्वभावको उल्लंघन नहीं करती, इसलिए कुम्हार घटका उत्पादक ही नहीं है, मिट्टी ही कुम्हारके स्वभावको स्पर्श न करती हुई अपने स्वभाव कुम्भरूपसे उत्पन्न होती है।

यदि अपर पक्ष 'जब कुम्हार घट बनानेका विकल्प कर रहा था तथा उसके अनुकूल व्यापार कर रहा था उस समय मिट्टी स्वयं घटरूप परिणमी इतना ही सहकारिताका अर्थ करता है तो बात दूसरी है। आचार्योंने इसे ही कालप्रत्यासत्ति शब्द द्वारा स्वीकार किया है।

अपर पक्षने ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इस वचनकी पेटभर आलोचना करते हुए इसे जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध घोषित किया है, इसे उस पक्षका अतिसाहस ही कहा जायगा। इस सम्बन्धमें उस पक्षका कहना है कि-‘पद्यमें कार्यके प्रति भवितव्यताके साथ-साथ कारणभूत जिन बुद्धि व्यवसाय आदिका उल्लेख किया गया है उनकी उत्पत्ति अथवा सम्प्राप्तिको उसी भवितव्यताकी दया पर छोड़ दिया गया है जो इस कार्यकी जननी है। बस। यही उसमें असंगति है और इसलिए वह जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध है।’

इस सम्बन्धमें हम अपर पक्षसे अधिक क्या कहें, इतना ही कहना चाहते हैं कि वह पक्ष व्यामोहमें पड़कर यदि ऐसी गैरजिम्मेदारीकी टीका न करता तो यह जैन संस्कृतिकी सबसे बड़ी सेवा होती। इसे जैन परम्पराके आधारस्तम्भ भगवान् अकलंकदेवने एकान्त पुरुषवादका निषेध करनेके प्रसंगसे उद्धृत किया है इसे नहीं भूलना चाहिए। और जब उन जैसे समर्थ आचार्यने इसे उद्धृत किया है तो इसमें सन्देह नहीं कि उन्हें इसमें जैन मान्यताके समग्र बीज दृष्टिगत हुए होंगे। प्रत्येक कार्यके प्रति जितने भी कारण स्वीकार किये गये हैं उनमें भवितव्यता या योग्यता मुख्य है, क्योंकि वह कार्यको उत्पन्न करनेके लिए द्रव्यगत आन्तरिक शक्ति है। इसी तथ्यको स्वामी समन्तभद्रने स्वयंभूस्तोत्रमें इन शब्दोंमें स्वीकार किया है-

अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं हेतुद्वयाविष्कृतकार्यलिंगा।
अनीश्वरो जन्तुरहंक्रियार्तः संहत्य कार्येष्विति साध्ववादीः ॥३३॥

हेतुद्वयसे उत्पन्न हुआ कार्य जिसकी पहिचान है ऐसी यह भवितव्यता अलंघ्यशक्ति है। फिर भी मैं करता हूँ ऐसे अहंकारसे पीड़ित यह प्राणी सब सहकारी कारणोंको मिलाकर भी कार्योंके सम्पन्न करनेमें अनीश्वर-असमर्थ है यह आपने ठीक ही कहा है ॥३३॥

आचार्य समन्तभद्रने इसमें ‘तादृशी जायते’ इस श्लोकके समान 'भवितव्यता’पर ही जोर दिया है। और देखिए-

तत्रापि हि कारणं कार्येणानुपक्रियमाणं यावत् प्रतिनियतं कार्यमुत्पादयति तावत्सर्वं कस्मान्नोत्पादयतीति चोद्ये योग्यतैव शरणम् ।
-प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० २३७

उसमें भी कारण कार्यसे अनुपक्रियमाण होता हुआ जब तक वह प्रतिनियत कार्यको उत्पन्न करता है तब तक सबको उत्पन्न क्यों नहीं करता ऐसा प्रश्न होने पर आचार्य कहते हैं कि योग्यता ही शरण है ।

इसमें भी ‘तादृशी जायते’ इत्यादि श्लोकके समान भवितव्यता पर ही बल दिया गया है। और देखिए-

चतुरंगबलं कालः पुत्रा मित्राणि पौरुषम् ।
कार्यकृत्तावदेवात्र यावद्दैवबलं परम् ॥
दैवे तु विकले काल-पौरुषादिर्निरर्थकः ।
इति यत्कथ्यते विद्भिस्तत्तथ्यमिति नान्यथा ॥

इस लोकमें जब तक दैव ( भवितव्यता ) का उत्कृष्ट बल है तभी तक चतुरंग सेना, काल, पुत्र, मित्र और पौरुष ये कार्यकृत हैं। दैवके अभावमें काल और पौरुष आदि सब निरर्थक हैं ऐसा जो विद्वान् जन कहते हैं वह यथार्थ है, अन्यथा नहीं है ।
-हरिवंशपुराण सर्ग ५२, श्लो० ७१-७२ ।

इसी हरिवंशपुराणमें और देखिए-

दिव्येन दह्यमानायां दहनेन तदा पुरि ।
नूनं क्वापि गता देवा दुर्वारा भवितव्यता ॥

उस समय द्वारिकापुरीके दिव्य अग्निसे जलते समय निश्चयसे देव कहीं भी चले गये। भवितव्यता दुर्निवार है ॥ सर्ग ७७, ६१ ॥

देखिये इसमें भवितव्यताको दुर्निवार कहा गया है। क्या अपर पक्ष यह बतलानेकी कृपा करेगा कि भट्टाकलंकदेवने ‘तादृशी जायते’ इत्यादि श्लोकको उद्धृत कर उस द्वारा हरिवंशपुराणके इस कथनसे अन्य नई क्या बात कही है ? जिससे कि अपर पक्षको वह श्लोक अत्यधिक खटका ! वास्तवमें देखा जाय तो उस श्लोकमें जैन मान्यताका सार भरा हुआ है। उस द्वारा पुरुषार्थ तथा अन्य साधन सामग्रीको अस्वीकार नहीं किया गया है। ये सब भवितव्यताके अनुसार मिलते हैं यही तथ्य उस द्वारा घोषित किया गया है। किन्तु अपर पक्षको यही इष्ट नहीं है, क्योंकि वह केवल बाह्य साधन सामग्रीके बलपर ही कार्यकी उत्पत्तिको स्वीकार कराना चाहता है, इसके लिए उसकी ओरसे उपादानके स्वरूप पर भी प्रबल प्रहार किया गया है। ऐसी अवस्थामें उसके द्वारा भट्टाकलंकदेव जैसे समर्थ आचार्य द्वारा स्वीकृत उक्त श्लोकको यदि जैन संस्कृतिके विरुद्ध घोषित किया जाय तो इसमें अनहोनी ऐसी कोई बात नहीं।

स्वामी समन्तभद्रने अपनी आप्तमीमांसामें ‘दैव’ और ‘पुरुषार्थरूप’ अदृष्ट और दृष्ट सामग्रीके आधारसे अर्थसिद्धिमें अनेकान्तगर्भ स्याद्वाद की स्थापना की इसमें सन्देह नहीं। पर इसका ‘तादृशी जायते’ इत्यादि श्लोकके कथनके साथ विरोध कहाँ है यह हमारी समझमें नहीं आया। यदि आप्तमीमांसाके कथनका उक्त श्लोकके कथनके साथ विरोध है ऐसा माना जाय तो स्वयंभूस्तोत्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड तथा हरिवंशपुराणके जो प्रमाण हम अभी दे आये हैं उनके कथनके साथ भी आप्तमीमांसाके उक्त कथनका विरोध मानना पड़ेगा। क्या अपर पक्ष इसे स्वीकार करेगा? वह इसे स्वीकार करे या न करे। किन्तु उस पक्षके इस आचरणसे जो स्थिति उत्पन्न हो गई है उसका स्पष्टीकरण करना अपना कर्तव्य समझकर यहाँ हमने उसे स्पष्ट किया है।

अपर पक्षकी ओरसे यहाँपर जो ८८, ८९, ९० और ९१ इन चार कारिकाओंका आशय दिया गया है उसमेंसे किसी कारिकाके आशयमें यद्यपि विप्रतिपत्ति हो सकती है पर उसकी हम यहाँ विशेष चरचा नहीं करेंगे। यहाँ इतना अवश्य कह देना चाहते हैं कि अपर पक्षने जो ‘मोक्षस्यापि’ इत्यादि वचनको उद्धृत कर उस द्वारा जो मोक्षकी उभयकारणताका निर्देश किया है सो उस वचनमें वह उभयरूप कारणता उपचरित और अनुपचरित इन दोनों दृष्टियोंको ध्यानमें रखकर ही वर्णित की गई है। ऐसी उभयरूप कारणताका निषेध न तो हमने कहीं किया हो है और न हो सकता है। चाहे अनन्त अगुरुलघु गुणोंका षड्गुणी हानिवृद्धिरूप कार्य हो या अन्य कोई कार्य हो, यह उभयरूप कारणता यथायोग्य सबमें पाई जाती है।

अपर पक्षने ‘तादृशी जायते’ इत्यादि श्लोकपर इन बातोंको आधार बनाकर अपनी प्रतिशंकाका कलेवर पुष्ट किया है-

\१. 'यह पद्य जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध क्यों है?

\२. और यदि विरुद्ध है तो फिर श्री अकलंकदेवने इसका उद्धरण अपने ग्रन्थ अष्टशतीमें किस आशयसे दिया है?

\३. तथा जैन संस्कृतिमें मान्य कारणव्यवस्थाके साथ उसका मेल बैठता है तो किस तरह बैठता है?

\४. इतना ही नहीं, इसके साथ हमें इस बातका भी विचार करना है कि इसकी सहायतासे श्री पं० फूलचन्द्रजी और आप कारणव्यवस्थासम्बन्धी अपने पक्षकी पुष्टि करनेमें कहाँतक सफल हो सके हैं?’

\१. प्रथम प्रश्नकी व्याख्या करते हुए अपर पक्षका कहना है कि ‘उक्त पद्य उसका हमने जो अर्थ किया है उसके आधारपर प्राणियोंकी अर्थसिद्धिके विषयमें जैन संस्कृति द्वारा मान्य दैव और पुरुषार्थकी सम्मिलित कारणताका प्रतिरोध ही करता है।’

समाधान यह है कि उक्त पद्यमें मात्र प्रत्येक कार्यकी बाह्याभ्यन्तर सामग्री किस आधारपर मिलती है इतना ही विचार किया गया है, अतः उससे गौण-मुख्यभावसे अर्थसिद्धिमें दैव और पुरुषार्थको एक साथ स्वीकार करनेमें कोई बाधा नहीं आती, अतः यह जैनदर्शन ( जिसे अपर पक्ष जैन संस्कृति कहता है उस ) का पोषक ही है। इसका अर्थ भी इसी आशयसे किया गया है। स्पष्ट है कि उक्त श्लोकमें जो अर्थ सन्निविष्ट है उसका जैनदर्शनके साथ निर्विवादरूपसे अविरोध ही सिद्ध होता है। अतः उसे प्रमाणरूपमें उपस्थित करना सर्वथा उचित है।

\२. दूसरे प्रश्नकी व्याख्या करते हुए अपर पक्षका कहना है कि ‘उक्त पद्य साक्षात् अपने पक्षकी पुष्टि करता है इस आशयसे भट्टाकलंकदेवने उसे उपस्थित न कर केवल पुरुषार्थसे अर्थसिद्धि माननेवाले दर्शनका खण्डन करनेके अभिप्रायसे उसे उपस्थित किया है।’ समाधान यह है कि एकान्त पुरुषार्थवादके निरसनके लिए आचार्यने उसे प्रमाणरूपमें उपस्थित किया है इसमें सन्देह नहीं। किन्तु वे मात्र उसे लोकोक्ति मानते रहे इस बातका उनके समग्र कथनसे समर्थन नहीं होता। उन्होंने तो उसे मान्य रखा ही । ‘इति प्रसिद्धेः’ लिखकर आचार्य विद्यानन्दिने भी उसकी प्रामाणिकतापर अपनी मुहर लगा दी। यह प्राचीन किसी जैनाचार्यका ही वचन है, लोकोक्ति नहीं यह उसकी रचनासे ही सिद्ध होता है। कार्यका नियामक उपादान ही होता है, बाह्य सामग्री नहीं ऐसा स्वामी समन्तभद्रका भी अभिप्राय है। वह केन्द्र है। उसीके आधारपर कार्य-कारणभावका पूरा चक्र घूमता है।

उक्त श्लोकमें बुद्धि व्यवसायादिकी उत्पत्ति विवक्षित भवितव्यतासे होती है यह नहीं कहा है, बल्कि यह कहा है कि जैसी भवितव्यता होती है वैसी बुद्धि हो जाती है, पुरुषार्थ भी उसीके अनुकूल होता है और बाह्य साधनसामग्री भी उसीके अनुकूल मिलती है । अपर पक्षको उक्त श्लोकमें प्रयुक्त हुए शब्दोंको ध्यानमें रखकर ही उसकी व्याख्या करनी चाहिये। अपनी इच्छानुसार कुछ भी अर्थ करके उसे उक्त श्लोकका अर्थ बतलाना यह विद्वत्सम्मत मार्ग नहीं कहा जा सकता। प्रतिनियत कार्यकी भवितव्यता एक वस्तु है और उसके साथ उस कार्यकी अन्य साधन सामग्री दूसरी वस्तु है। सब अपने अपने प्रतिनियत कारणोंसे उत्पन्न होकर भी उनका प्रतिनियत भवितव्यताके साथ ऐसा सहज योग बनता है जिससे प्रत्येक समयमें प्रतिनियत कार्यकी उत्पत्ति ही हुआ करती है यही उक्त श्लोकका आशय है।

समर्थ उपादान प्रतिनियत कार्यकी अपेक्षा प्रतिनियत पर्याययुक्त द्रव्य है। वह स्वयं कर्ता बनकर तन्मय होकर परिणमता है। बाह्य सामग्रीका व्यापार उससे सर्वथा भिन्न अपनेमें ही हुआ करता है, इसलिए निश्चयनयसे हमारा यह लिखना सर्वथा उचित ही है कि ‘कार्य केवल भवितव्यता (समर्थ उपादान) से ही निष्पन्न हो जाया करते हैं, निमित्त उसमें अकिंचित्कर ही रहा करते हैं।’ जैसे उक्त श्लोक भवितव्यताके साथ बुद्धि आदि अन्य साधन सामग्रीकी सूचना देता है वैसे हमारे द्वारा उल्लिखित उक्त वाक्य भी अन्य साधन सामग्रीकी सूचना स्पष्टतः दे रहा है। पूरे वाक्यपर दृष्टिपात कीजिए। भवितव्यताके सिवाय अन्य सामग्रीमें व्यवहारसे निमित्तता स्वीकार करके ही वह वाक्य लिखा गया है। जैसे वह श्लोक अन्य बाह्य सामग्रीमें व्यवहारसे कारणताका निषेध नहीं करता, वैसे हम भी नहीं कर रहे हैं। हमारा और उक्त श्लोकका आशय एक ही है।

अपर पक्षने भवितव्यताके अनुसार सब साधन सामग्री मिलती है इसकी बड़ी कड़ी आलोचना की है। उसे इस बातसे बड़ा सन्ताप है कि उक्त श्लोकने अन्य समस्त साधन सामग्रीको भवितव्यताकी दयापर छोड़ दिया है। किन्तु अपर पक्षको ध्यान रखना चाहिए कि वस्तुव्यवस्था ही ऐसी है, इसमें न उक्त श्लोकका दोष है और न उसके रचयिताका ही। विवक्षित समयमें यदि किसीकी बुद्धि पढ़नेकी होती है तो प्रश्न होता है कि उसी समय वैसी बुद्धि क्यों हुई ? अपर पक्ष कहेगा कि बाह्य-अभ्यन्तर सामग्रीके कारण । उसपर पुनः प्रश्न होता है कि उसी समय ऐसी बाह्याभ्यन्तर सामग्री क्यों मिली ? अपर पक्ष कहेगा कि प्रयत्न करनेसे। इसपर पुनः प्रश्न होता है कि उसका वैसा प्रयत्न बाह्यान्तर सामग्रीके अनुसार हुआ या इसके विना हो गया? इसपर अपर पक्ष यही तो कहेगा कि उस समय वैसा प्रयत्न स्वयं नहीं हो गया किन्तु बाह्याभ्यन्तर सामग्रीके अनुसार हुआ। इसपर प्रश्न होता है कि उस बाह्याभ्यन्तर सामग्रीमें विवक्षित कार्यकी तथा अन्य साधन सामग्रीके वैसे परिणमनेकी भवितव्यता सम्मिलित है या नहीं ? अपर पक्ष इसका निषेध तो कर नहीं सकता। इसपर अपर पक्ष कहेगा कि भवितव्यताका अर्थ द्रव्यप्रत्यासत्ति है और वह अनेक योग्यता-वाली होती है, इसलिए कौन योग्यता कार्यरूप परिणमे यह अन्य साधनसामग्रीपर अवलम्बित है। इसपर पुनः प्रश्न होता है कि अन्य जितनी साधन सामग्री है वह भी प्रत्येक-प्रत्येक समयमें अनेक योग्यतावाली है, इसलिए उनमेंसे कौन योग्यता कार्यमें सहकारी बने इसे भी तो किसी दूसरी साधनसामग्रीपर अवलम्बित मानना चाहिए ? इसपर अपर पक्ष कहेगा कि अन्य साधनसामग्रीमें तो प्रतिनियत पर्याययोग्यतासे युक्त द्रव्य ही कारण होता है । तो इसपर आगमके अनुसार हमारा कहना है कि जैसे आप प्रतिनियत पर्याययोग्यतासे युक्त द्रव्यको अन्य सामग्रीके रूपमें कारण मानते हो वैसे ही प्रत्येक कार्यमें प्रतिनियत पर्याययोग्यतासे युक्त असाधारण द्रव्यको कारण मानो । इस प्रकार इतने विवेचनसे स्पष्ट है कि उक्त श्लोकमें जो भवितव्यताके अनुसार अन्य साधन सामग्रीका मिलना लिखा है वह यथार्थ ही लिखा है । इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पण्डितप्रवर टोडरमल्लजीने मोक्षमार्गप्रकाशकमें जो कुछ लिखा है उसका आशय वही है जो उक्त श्लोकका है । तथा पं० फूलचन्द्रने भी जैनतत्त्वमीमांसामें उसीका अनुसरण किया है । जैनदर्शनका सार भी यही है । अपर पक्षने जैनसंस्कृति किसे कहा यह तो हम जानते नहीं, वह जाने । परन्तु जिसे वह पक्ष जैनसंस्कृति मानता है उसका अभिप्राय भी कोई दूसरा नहीं हो सकता, अन्यथा उसे जैनसंस्कृति कहना परिहास-मात्र होगा।

अपर पक्षने पण्डितप्रवर टोडरमलजीके एक दूसरे उल्लेखको उपस्थित कर लिखा है कि ‘उन्होंने भवितव्यता और पुरुषार्थका दूसरे ढंगसे अर्थ किया है ।’ किन्तु यह बात नहीं है । जैसा कि अपर पक्षके इस कथनसे स्पष्ट हो जाता है-‘वे तो अपने उक्त कथनसे इतनी ही बात कहना चाहते हैं कि कितने ही उपाय करते जाओ, यदि भवितव्य अनुकूल नहीं है तो कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है ।’

यहाँ अपर पक्षने भवितव्यको कार्यकारी स्वीकार कर लिया इसकी हमें प्रसन्नता है । साथ ही उस पक्षको इतना और स्वीकार कर लेना चाहिए कि इस भवितव्यताका प्रयोग दो अर्थोंमें होता है-एक मात्र द्रव्ययोग्यताके अर्थमें और दूसरे द्रव्य-पर्याययोग्यताके अर्थमें । द्रव्ययोग्यताका नाम ही व्यवहार उपादान है और द्रव्य-पर्याययोग्यताका नाम ही समर्थ या निश्चय उपादान है । मिट्टीमें पट बननेकी द्रव्ययोग्यता तो है, किन्तु उसी अवस्थारूप परिणमते हुए उसमें पर्याययोग्यता नहीं आती, इसलिए जुलाहा मिट्टीसे पट बननेमें व्यवहार हेतु नहीं हो पाता । और यदि उसी मिट्टीमें प्रतिनियत उत्तर कालमें घटरूप होनेकी पर्याययोग्यता आनेवाली है तो वह अपने प्रतिनियत कालमें कुम्भकार आदिको निमित्त कर नियमसे घटरूप स्वयं परिणम जायगी । पण्डितप्रवर टोडरमलजीके उक्त कथनका यही आशय है । पण्डितजीने वह कथन मोक्षमार्गकी दृष्टिसे लिखा है पर प्रतिनियत योग्यताको भुलाया नहीं है । इस परसे यहाँ पर अपर पक्षने जो भी टीका की है वह कैसे व्यर्थ है यह सुतरां ज्ञात हो जाता है । उस पक्षका जितना कुछ भी लिखना है वह मात्र व्यवहार योग्यताको लक्ष्यमें रख कर ही लिखना है अथवा अन्य कार्यके समर्थ उपादानको उससे विरुद्ध अन्य कार्यका कल्पित कर लिखना है । ऐसी अवस्थामें कोई भी बतलावे कि उसके इस कथनको कार्य-कारणभावकी सम्यक् विवेचना कैसे कहा जा सकता है । वह पक्ष उपादानकी अपेक्षा तो व्यवहार उपादानको सामने रखता है या विवक्षित कार्यके विरुद्ध दूसरे कार्यके उपादानको सामने रखता है और फिर बाह्य सामग्रीके आधार पर इच्छानुसार विवेचना करना प्रारम्भ कर देता है । यही उसके विवेचनकी शैली है जो अपरमार्थभूत होनेसे कार्य-कारणभावका सम्यक् निर्णय करनेमें उसके लिए स्वयं बाधक सिद्ध होती है ।

चूंकि भवितव्यता परोक्ष होती है, इसलिए निर्णय करनेमें गलती होती है और इसलिए व्यक्तिका प्रयत्न विवक्षित कार्यकी सिद्धिमें व्यवहार हेतु नहीं बन पाता । इसके विरुद्ध भवतिव्यताके अनुसार जिस समय जो कार्य होना होता है उसमें उसका प्रयत्न व्यवहार हेतु बन जाता है । प्रत्येक व्यक्तिका अनुभव भी यही कहता है । अपर पक्षने यहाँ पर जो टीका की है उससे भी यही सिद्ध होता है, अतएव ‘तादृशी जायते’ इत्यादि श्लोक द्वारा जिस मान्य सिद्धान्तकी घोषणा की गई है और जिसे पण्डितप्रवर टोडरमलजीने अपने मोक्षमार्गप्रकाशकमें अपने शब्दोंमें स्वीकार किया है वही सिद्धान्त परमार्थ सत्यका उद्घाटन करनेवाला है ऐसा यहाँ समझना चाहिए। इसी सिद्धान्तका समर्थन करते हुए पण्डितजी क्या लिखते हैं यह उन्हींके शब्दोंमें पढ़िए-

सो इनकी सिद्धि होय तो कषाय उपशमनेतैं दुःख दूर होइ जाइ सुखी होइ। परन्तु इनकी सिद्धि इनके किये उपायनिके आधीन नाहीं, भवितव्यके आधीन है। जातैं अनेक उपाय करते देखिये है अर सिद्धि न हो है। बहुरि उपाय बनना भी अपने आधीन नाहीं, भवितव्यके आधीन है। जातैं अनेक उपाय करना विचारै और एक भी उपाय न होता देखिए। -पृ० ८१ अ० ३।

इससे पण्डितप्रवर टोडरमलजीके समग्र कथनका क्या आशय है यह अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है। साथ ही इससे अपर पक्षने प्रकृतमें जो टीका की है वह भी व्यर्थ सिद्ध हो जाती है। इतना ही क्यों, उस पक्षने अपने विवेचनके आधारसे जो निष्कर्ष फलित किया है वह भी व्यर्थ सिद्ध हो जाता है, क्योंकि अपर पक्ष समर्थ उपादानके अनुकूल बाह्य सामग्री नहीं मिलती इसकी पुष्टिमें अभी तक एक भी आगमप्रमाण उपस्थित करनेमें सर्वथा असमर्थ रहा।

अपर पक्षने लिखा है कि ‘पं० प्रवर टोडरमलजीके कथनमें सामान्यतया चेतनरूप सभी तरहके कार्योंकी उपादान शक्तिको नहीं ग्रहण किया गया है, इसलिए ऐसी भवितव्यता जीवके पारिणामिक भावरूप भव्यत्व या अभव्यत्व हो सकते हैं अथवा कर्मके यथासम्भव उदय, उपशम, क्षयोपशम अथवा क्षयसे प्राप्त कार्यसिद्धिके अनुकूल जीवकी योग्यता हो सकती है।’ और इस प्रकार अपना यह अभिप्राय व्यक्त किया है कि ‘पं० फूलचन्दजी पं० प्रवर टोडरमलजीके कथनसे जो ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका समर्थन कर लेना चाहते हैं वह ठीक नहीं है।’

किन्तु ऐसी टीका करते हुए क्या अपर पक्ष यह बतला सकता है कि चेतनरूप पदार्थोंके लिए कार्य-कारणभावके नियम अन्य हैं और अचेतनरूप पदार्थोंके लिए कार्य-कारणभावके नियम अन्य है ? अर्थात् नहीं बतला सकता, क्योंकि समर्थ उपादानका सभी शास्त्रकारोंने जो लक्षण किया है वह जीव-अजीव सबकी दृष्टिसे ही किया गया है और इसी प्रकार बाह्य सामग्रीकी अपेक्षा जो व्यवहार हेतुओंके वैस्रसिक और प्रायोगिक ये दो भेद आगममें बतलाये हैं वे जीव-अजीव सभीके कार्योंकी दृष्टिसे ही किये गये हैं। इसके लिए अपर पक्ष श्लोकवार्तिक अ० ५ सू० २२ पर दृष्टिपात करनेकी कृपा करे। इससे स्पष्ट है कि पं० प्रवर टोडरमलजीने जिस भवितव्यताका निर्देश किया है वह सब द्रव्योंके सब कार्यों पर लागू होता है और उस आधारसे हमने ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि श्लोकका जो अर्थ किया है और उस परसे जो निष्कर्ष फलित किया है वह भी यथार्थ है। भवितव्यता जिस कार्यकी हो उसीको जन्म देती है और उसके साथ, व्यवहार हेतुरूप जो सामग्री होती है वह भी, नियमसे मिलती है।

अपर पक्षने लिखा है-‘मान लीजिए-किसी व्यक्तिमें धनी बननेकी योग्यता है, लेकिन केवल योग्यताका सद्भाव होनेमात्रसे तो वह व्यक्ति धनी नहीं बन जायगा।’ आदि। इसका समाधान यह है कि जिस व्यक्तिमें जितने कालमें धनी बननेकी योग्यता होगी वह उतने कालमें नियमसे धनी बन जायगा। उस कालके मध्य अन्त तक उसे वैसी साधन सामग्री भी मिलेगी और उसका तदनुकूल व्यापार भी होगा। जैसे जो तद्भवमोक्षगामी जीव होता है वह मनुष्य पर्यायको समाप्त कर नियमसे मुक्त होता है। तथा जन्मसे लेकर अन्त तक प्रति समय उसे अन्तरंग-बहिरंग सामग्री भी वैसी मिलती जाती है और प्रयत्न भी उसीके अनुरूप होता रहता है । प्रत्येक कार्यके स्वकालका अपना स्थान है, उसमें फेर-फार होना सम्भव नहीं है । अपने विकल्पोंको पुष्ट करनेके लिए वचनोंका प्रयोग किसी भी प्रकारसे भले ही किया जाय, किन्तु वस्तुस्थिति यही है । यह समग्र जैनदर्शनका आशय है । जैन संस्कृति उसके बाहर नहीं है । पं० प्रवर टोडरमलजीके कथनका भी यही आशय है और है यही आशय ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इसका भी । जब कि अपर पक्षके कथनानुसार क्या बुद्धि, क्या व्यवसाय आदि सभी कार्य भवितव्यतानुसार होते हैं तो जैनदर्शनके हार्दको प्रकाशित करनेवाले उस श्लोकने ही अपर पक्षका क्या बिगाड़ा है जिस कारण उसे अपर पक्षका कोपभाजन होना पड़ा है । व्यक्ति जो संकल्प करता है वह उस ( संकल्प ) की भवितव्यतानुसार करता है । वहाँ भी भवितव्यता ही उसकी जननी है । ऐसा तो सूक्ष्मातिसूक्ष्म या स्थूलातिस्थूल ऐसा एक भी कार्य नहीं जो भवितव्यताको उल्लंघन कर होता हो । भवितव्यताका क्या पुरुषार्थ, क्या अन्य कुछ, सब पर आधिपत्य है । पृथक्-पृथक् विचार करने पर प्रत्येक कार्यकी भवितव्यता भिन्न-भिन्न है । पर उन सबमें ऐसा सुमेल है जिससे नियत समय पर प्रत्येक कार्य होता रहता है, विरोधाभास उपस्थित नहीं होता ।

अपर पक्षने ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ का एक यह अर्थ दिया है-'जिस कार्यके अनुकूल वस्तुमें उपादान शक्ति हुआ करती है समझदार व्यक्ति उस वस्तुसे उसी कार्यको सम्पन्न करनेकी बुद्धि ( भावना ) किया करता है और वह पुरुषार्थ ( व्यवसाय ) भी तदनुकूल ही किया करता है, तथा वह वहाँ पर तदनुकूल ही अन्य सहायक साधनसामग्रीको जुटाता है ।

यहाँ पहले तो यह देखना है कि इस वस्तुमें इस कार्यके अनुकूल उपादान शक्ति है इसे वह सयझदार व्यक्ति जानता कैसे है, क्योंकि शक्ति तो परोक्ष है । कदाचित् काकतालीय न्यायसे जैसा उसने विचार किया वैसी ही उत्तर कालमें उसमें द्रव्य-पर्यायरूप उपादान शक्ति हुई और भावनानुसार कार्य हो गया तो बात दूसरी है, अन्यथा उस वस्तुमें उस समझदार व्यक्तिको निमित्त कर जो-जो कार्य हुआ वह सब उस वस्तुमें अवस्थित भवितव्यतानुसार ही कहा जायगा या नहीं ? यदि कहो कि भवितव्यतानुसार ही कहा जायगा तो फिर ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इस श्लोकके तात्पर्यसे विरोध क्यों ? यदि कहो कि उस वस्तुमें जो-जो कार्य हुआ वह उस वस्तुमें अवस्थित भवितव्यतानुसार नहीं कहा जायगा तो फिर यह कहना चाहिए कि चनेसे भी गेहूँ उत्पन्न किया जा सकता है । अब रही सहायक सामग्रीको जुटानेकी बात सो यहाँ भी यही विचार करना हैं कि वह सहायक सामग्री अपनी भवितव्यतानुसार ही परिणमती है कि उस समझदार व्यक्तिके प्रयत्नानुसार ? वह सामग्री अपनी भवितव्यतानुसार परिणमे इसका तो नियम है, समझदार व्यक्तिकी इच्छानुसार परिणमे इसका नियम नहीं है । अतः ‘जुटाना’ यह कहना भी कथनमात्र ही है । अतएव अपर पक्षने उस पद्यका जो उक्त अर्थ किया है वह तर्कसंगत नहीं है और न आगमसंगत ही है ।

उक्त पद्यमें बुद्धि, व्यवसाय और सहायक सामग्रीका उल्लेख हुआ है । इसका आशय इतना ही है कि भवितव्यतानुसार कार्य होनेमें जहाँ ये सब होते हैं वहाँ वे सब कार्यके प्रति व्यवहारसे अनुकूल ही होते हैं । इस पद्यमें समस्त बाह्य सामग्रीका संकलन कर दिया गया है । पर इसका अर्थ यह नहीं कि सभी कार्योंमें व्यक्तिकी बुद्धि और व्यवसाय व्यवहार हेतु हैं ही । जहाँ इनकी व्यवहारहेतुता है वहाँ भवितव्यतानुसार ही है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।

इस प्रकार समग्र कथनपर दृष्टिपात करनेसे यही निश्चित होता है कि निश्चयनयसे सभी कार्य अपने-अपने उपादानके अनुसार ही होते हैं। वही स्वयं कर्ता बनकर इन्हें अपनेसे अभिन्न उत्पन्न करता है । बाह्य सामग्री उसकी उत्पत्तिमें सहायक है यह कथन व्यवहारमात्र है । हमने इस दृष्टिको सामने रखकर ही उक्त पद्यका अर्थ किया है, इसलिए वह तो संगत है ही । यदि दृष्टिको गौण भी कर विचार किया जाय तो उस पद्यके शब्द ही स्वयं इस अर्थको प्रकाशित कर देते हैं, क्योंकि सत्यार्थको ध्यानमें रखकर ही इस पद्यकी रचना हुई है ।

\१४. कुछ विचारणीय बातोंके क्रमशः उत्तर

\१. स्त्रीका रज और पुरुषका वीर्य शरीरका उपादान है और उसे निमित्त कर जीव गर्भमें आता है । इस प्रकार इन दोनोंमें निमित्त-नैमित्तिकता बनती है । अपने-अपने कार्यके प्रत्येक उपादान हैं, एक-दूसरेके लिए निमित्त हैं । माताका गर्भाशय इनके लिए निमित्त है । इस प्रकार गर्भमें भ्रूणकी वृद्धि होती है । अन्तमें वह निसृत होता है, उसमें माताका उचित अवयव निमित्त होता है । माताके द्वारा भुक्त भोजन भी योग्य परिपाकके बाद इसमें यथायोग्य उपादान-निमित्त बनता है । वन्ध्या स्त्रीको पुरुषका निमित्त तो मिलता है, इसे अस्वीकार नहीं करना चाहिये । सन्तानके उत्पन्न न होनेका अन्य कारण है । विधवा स्त्रीमें द्रव्य-पर्याय-योग्यता न होनेसे वह ऐसे कार्यके लिए किसी भी रूपमें निमित्त नहीं बनती । इस सम्बन्धमें अधिक लिखना उचित नहीं है ।

\२. समर्थ उपादान असाधारण द्रव्यप्रत्यासत्ति और प्रतिविशिष्ट पर्यायप्रत्यासत्तिरूप ही होता है । इसलिए उपादानमें अनन्त शक्तियाँ होती हैं यह लिखना ठीक नहीं । इसलिए किसी शक्तिके क्रमसे विकासका प्रश्न ही नहीं उठता ।

भोजनकी सामग्री भवितव्यतानुसार परिणमती है, पुरुषकी इच्छानुसार नहीं । वह तो उसमें निमित्तमात्र है । वह सामग्री सर्वथा एक भी नहीं । उसे एक कहना यह व्यवहार है । अतएव जिसे जिसरूप बनना होता है उसे वैसे बाह्य निमित्तोंका योग मिलता है । जो रसोईया या इच्छा रोटीमें निमित्त है वही रसोइया या इच्छा पुड़ीमें निमित्त नहीं है । इसी प्रकार जो आटा पुड़ी बनता है वही आटा रोटी नहीं बनता । यहाँ तो स्पष्टतः स्कन्धभेद है । अतः सब कार्य अपनी-अपनी भवितव्यतानुसार हो रहे हैं और उसी आधार पर निमित्त-नैमित्तिकयोग मिल रहा है । यदि पुड़ी बननेमें निमित्त होनेवाले रसोइया और उसकी इच्छाको तथा रोटी बननेमें निमित्त होनेवाले रसोइया और उसकी इच्छाको सर्वथा एक मान लिया जाय तो उनको निमित्त कर बनी पुड़ी और रोटीमें भेद नहीं बन सकेगा । और इसी प्रकार पुड़ी और रोटीके आटेको सर्वथा एक मान लिया जाय तो भी पुड़ी और रोटीमें भेद नहीं बन सकेगा । स्पष्ट है कि जिस प्रकार पुड़ी और रोटीका उपादान पृथक्-पृथक् है, इसलिए उनसे पृथक्-पृथक् दो कार्य निष्पन्न हुए हैं । उसी प्रकार उनकी निमित्तभूत बाह्य सामग्री भी पृथक्-पृथक् है । ‘कारणानुविधायि ही कार्यम्’ ऐसा आगमवचन भी है ।

\३. कोई भी कार्य अनेक कारणसाध्य होता है । उसमें उपादान स्वयं कार्यरूप परिणमता है । वह उसका मुख्य-निश्चय कर्ता है और बाह्य सामग्री उसमें मात्र निमित्त है । प्रत्येक उपादान किस अवस्थामें किस रूप परिणमता है इसका नियम है । इसी नियमको ध्यानमें रखकर प्रत्येक कार्यमें बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता स्वीकार की गई है । इच्छा, प्रकाश, कागज और लेखनी इनका परिणाम (पर्याय) अपनेमें होती है, स्याहीमें नहीं । स्याही शब्दरूप आकार बननेमें उपादान है, अन्य सब व्यवहार हेतु हैं । इससे स्पष्ट है कि इच्छा, प्रकाश, कागज और लेखनीने शब्दरूप आकार ग्रहण नहीं किया । स्याहीने स्वयं परिणम कर वह आकार धारण किया । यदि इच्छा आदि स्याहीसे तन्मय हो जावें तो ये उसे परिणमावे, सो होता नहीं, अतः ये स्याही-को परिणमाते भी नहीं । ये स्याहीको शब्दरूप परिणमाते हैं यह उपचार कथन है । वस्तुस्थिति यह है कि स्याही स्वयं स्वकालमें इन इच्छा आदिको निमित्तकर शब्दरूप परिणम जाती है । कोई भी द्रव्य स्वसहाय होकर ही परिणमन करता है, परसे यदि दूसरे द्रव्यका परिणाम मान लिया जाय तो वह किसी भी द्रव्यका स्वभाव नहीं ठहरेगा और स्वभावके अभावमें स्वभाववान्‌का अभाव हो जानेसे द्रव्यके लोपका प्रसंग उपस्थित हो जायगा जो अपर पक्षको भी इष्ट नहीं होगा, अतः निश्चयसे प्रत्येक कार्य स्वसहाय होता है यही निश्चय करना ही श्रेयस्कर है । बिजलीके अभावमें यदि स्याही शब्दरूप नहीं परिणम रही है तो उस समय उसमें शब्दरूप परिणमनकी समर्थ उपादानता न होनेसे ही वह शब्दरूप नहीं परिणम रही है इसे बिजलीका अभाव ही सिद्ध कर देता है। ‘विवक्षितस्वकार्यकरणेऽन्त्यक्षणप्राप्तत्वं हि सम्पूर्णम्’ विवक्षित अपने कार्यके करनेमें अन्त्यक्षणके प्राप्तपनेका नाम ही सम्पूर्ण है । इससे स्पष्ट है कि स्याही जिस समय लिखित शब्दरूप परिणमती है उसके अनन्तर पूर्व समयमें ही वह उसकी समर्थ उपादान है और जो जिसका समर्थ उपादान होता है वह उसे नियमसे उत्पन्न करता है ऐसा एकान्त नियम है-समर्थस्य कारणस्य कार्यवत्त्वमेवेति (त० श्लो० पृ० ६८)। जैसे अयोगिकेवलीके अन्तिम समयमें समग्र रत्नत्रयरूपसे परिणत आत्मा मोक्षकार्यका समर्थ उपादान है, इसलिए वह उसे नियमसे उत्पन्न करता है । और उसकी बाह्य सामग्री भी उसके अनुकूल रहती है उसी प्रकार यहाँ भी ऐसा समझना चाहिए कि जब जब स्याही शब्दरूप परिणामकी समर्थ उपादान बनती है तब तब वह नियमसे कागज पर शब्दरूप परिणमन करती है और बाह्य सामग्री भी तदनुकूल उपस्थित रहती है । यह सहज योग है जिसे कोई टाल नहीं सकता, अन्यथा किसी भी द्रव्यका स्वाश्रित परिणमन ही सिद्ध नहीं किया जा सकता और उसके अभावमें अपने पुरुषार्थ द्वारा मुक्तिकी चर्चा करना ही व्यर्थ हो जायगा । अतएव बिजलीके बुझने पर या शरीरमें भयानक वेदना होने पर यदि स्याहीका परिणमन प्रश्नोंका उत्तर लिखनेरूप नहीं होता तो निश्चयनयसे उस समय स्याही उस कार्यका समर्थ उपादान नहीं है, इसलिए ही वह कार्य नहीं होता यह वस्तुके स्वरूपका उद्घाटन करनेवाला होनेसे यथार्थ कथन है और बिजलीका अभाव होनेसे या शरीरमें भयानक वेदना होनेसे प्रश्नोंका उत्तर लिखना असम्भव हो गया ऐसा कहना उसी अवस्थामें व्यवहार पक्ष माना जा सकता है जब कि वह निश्चय पक्षकी सिद्धि करनेवाला हो, अन्यथा वह वस्तुके स्वरूपको ढकनेवाला होनेसे अयथार्थपनेकी ही शोभा बढ़ावेगा । किसी व्यक्तिके बाह्य चारित्र हो और अन्तरंग चारित्र न हो यह तो है पर अन्तरंग चारित्र हो और बाह्य चारित्र न हो यह नहीं होता । इससे सिद्ध है कि सर्वत्र अपना कार्य समर्थ उपादान ही करता है, बाह्य सामग्री तो निमित्तमात्र है ।

\४. कोई कीटाणु जब मरकर शरीरके एक भागसे दूसरे भागमें ऋजुगतिसे उत्पन्न होता है तो उसे एक समय लगता है, वही कीटाणु उसी शरीरके दूसरे भागमें यदि विग्रहगतिसे उत्पन्न होता है तो उसे दो समय लगते हैं । किन्तु वही कीटाणु यदि मनुष्य होनेके बाद मरकर ऋजुगतिसे सातवें नरकमें जन्म लेता है तो एक समयमें छह राजुकी दूरी पार कर लेता है । और अशरीरी सिद्ध परमेष्ठी उसी एक समयमें सात राजुकी दूरी पार कर लेते हैं । यहाँ न तांगा है, न साइकिल और न है मोटरकार, रेलगाड़ी, हवाई जहाज और अतिस्वन विमान ही । कोई अंतरंग कारण होना चाहिए । जिससे गतिमें यह विचित्रता आती है । परमाणुके विषयमें तो आगममें यहाँ तक लिखा है कि मन्दगतिसे गमन करनेवाला परमाणु एक समयमें आकाशके एक प्रदेशको ही लाँघ पाता है जब कि वही परमाणु तीव्रगतिसे गमन करके एक समयमें लोकाकाशके चौदह राजु क्षेत्रको पार कर जाता है अर्थात् स्पर्श कर लेता है । वहाँ न तो ताँगा है, न मोटरकार है, न रेलगाड़ी है और न ही अतिशीघ्र गमन करनेवाला अन्य वाहन ही है । यहाँ तक कि कर्म और नोकर्मका संयोग भी नहीं है । फिर ऐसा क्यों होता है ? इस पर अपर पक्षने कभी दृष्टिपात किया । अपर पक्ष कहेगा कि धर्म द्रव्य तो है, किन्तु इस पर हमारा कहना यह है कि एक तो वह आश्रय हेतु है, निमित्त कर्ता नहीं । दूसरे अपर पक्ष यह स्वीकार ही नहीं करता कि ये धर्मादिक चार द्रव्य प्रतिविशिष्ट ( प्रतिनियत ) पर्यायरूपसे ही प्रतिविशिष्ट ( प्रति-नियत ) कार्यके लिए आश्रय हेतु होते हैं । ऐसी स्थितिमें अन्य कोई हेतु तो होना चाहिए जिसके कारण परमाणुकी गतिमें यह विचित्रता देखी जाती है । स्पष्ट है कि यहाँ अन्य जो भी कारण है उसीका नाम क्रियावती शक्ति है । उसका जिस समय जैसा परिणमन होता है उसके अनुसार ही प्राणियों और पुद्गलोंकी गति और आगति हुआ करती है । बाह्य साधन तो उपकरणमात्र हैं जो इस तथ्यको सिद्ध करते हैं कि इस समय इस जीव या पुद्गलकी क्रियावती शक्तिका परिणाम किस रूपमें हो रहा है । जैसे कोई मनुष्य बाजारमें भड़कीले कपड़े पहिन कर जाता है तो वे उत्कट रागमें निमित्त होकर भी यह सिद्ध करते हैं कि इस समय इसके कपड़ोंके प्रति उत्कट राग है ।

उसी बाह्य वस्तुमें निमित्त व्यवहार होता है जो निश्चयकी सिद्धि करे यही परमागमका अभिप्राय है । इससे प्रत्येक द्रव्यकी स्वतन्त्रता अक्षुण्ण बनी रहती है और संसारी प्राणीको आगममें जो परतन्त्र बतलाया है उसका क्या अभिप्राय है यह भी समझमें आ जाता है । कर्म और नोकर्म किसीको परतन्त्र नहीं बनाते । परतन्त्र बननेमें अपराधी स्वयं यह जीव ही है । उपयोग परिणामवाला यह जीव जब शुभ या अशुभ जिस भावमें उपयुक्त होता है तब उसने वस्तुतः शुभ या अशुभ भावकी ही परतन्त्रता स्वीकार की है, कर्म और नोकर्मकी नहीं । किन्तु ऐसा नियम है कि शुभ या अशुभभाव परलक्षी परिणाम हैं, इसलिए जिसके लक्ष्यसे ये परिणाम उत्पन्न होते हैं व्यवहारसे उनकी अपेक्षा यह जीव परतन्त्र कहा जाता है । जैसे किसी मनुष्यकी अपनी स्त्रीमें अधिक आसक्ति देखकर अपर पक्ष उस मनुष्यको ही यह उपदेश देगा कि तुम्हें स्त्रीविषयक आसक्ति छोड़नी चाहिए । यदि यह मान लिया जाय कि स्त्री उसे परतन्त्र बनाती है तो उस मनुष्यको उपदेश देनेसे लाभ ही क्या ? तब तो स्त्रीको ऐसा उपदेश दिया जाना चाहिए कि तूँ इस मनुष्यको परतन्त्र क्यों बनाती है, इसे परतन्त्र बनाना छोड़ दे । इससे स्पष्ट है कि परमें राग करे या न करे इसमें प्रत्येक प्राणीको स्वतंत्रता है । यदि परको लक्ष्य कर राग करता है तो परतंत्र होता है, अन्यथा नहीं । अब विचार कीजिए कि रागका कर्तृत्व जीवमें रहा कि कर्म और नोकर्ममें । राग कर्मस्वभाववाला है और उसका फल सुख-दुख है, इसलिए ये भी कर्मस्वभाववाले हैं । इसमें नोकर्मका भी अन्तर्भाव हो जाता है । जब यह जीव उन रूपसे चेतता है तब यह कर्मचेतना और कर्मफलचेतनाका कर्ता होता है । यह कर्तृत्व स्वयं उसने अपने अज्ञानसे स्वीकार किया है, कर्म और नोकर्मने बलात् स्वीकार नहीं कराया है । ऐसी परिणतिमें वे तभी निमित्त हैं जब वह इसरूप स्वयं परिणमता है, अन्यथा नहीं । इससे सिद्ध है कि जिस समय जैसी क्रियावती शक्तिका परिणमन होता है उस समय स्वयं कर्ता होकर यह जीव उस प्रकारकी गति करता है, तांगा, सायकिल, मोटरकार, हवाई जहाज या अतिस्वन विमान तो निमित्तमात्र हैं ।

अपर पक्षने यहाँ पर अष्टसहस्री पृ० २०० का उल्लेख अपने पक्षके समर्थनकी दृष्टिसे उपस्थित किया है । किन्तु वह पक्ष इस उल्लेखके प्रकाशमें अष्टसहस्री कारिका १० पृ० ९७ के इस उल्लेख पर भी दृष्टिपात करनेकी कृपा करे-

कार्यात्प्रागनन्तरपर्यायस्तस्य प्रागभावः । तस्यैव प्रध्वंसः कार्यं घटादिः ।

कार्यसे अनन्तर पूर्व पर्याय उसका प्रागभाव है तथा उसीका प्रध्वंस घटादि कार्य हैं ।

यहाँ जो प्रागभावका लक्षण किया है वही समर्थ उपादानका भी लक्षण है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए वहीं पृ० १०० में लिखा है-

ऋजुसूत्रनयार्पणाद्धि प्रागभावस्तावत्कार्यस्योपादानपरिणाम एव पूर्वोऽनन्तरात्मा। न च तस्मिन् पूर्वानादिपरिणामसन्ततौ कार्यसद्भावप्रसंगः, प्रागभावविनाशस्य कार्यरूपतोपगमात्।

ऋजुसूत्र नयकी अपेक्षा तो पूर्व अनन्तररूप कार्यका उपादान-परिणाम ही प्रागभाव है। और उसके ऐसा होने पर पूर्व अनादि परिणाम सन्ततिमें कार्यके सद्भावका प्रसंग हो जायगा सो भी बात नहीं है, क्योंकि प्रागभावका विनाश ही कार्यरूप स्वीकार किया है।

यह आगम वचन है जो स्वाश्रित कथन होनेसे यथार्थ पदवीको प्राप्त है। अपर पक्षने जो उद्धरण उपस्थित किया है वह पराश्रित कथन होनेसे व्यवहार पदवीको प्राप्त है। इन दोनों कथनोंको एक साथ मिलाकर अवलोकन करने पर अपने आप यह फलित हो जाता है कि निश्चय-समर्थ उपादानके कालमें ही उसका व्यवहार हेतु हुआ करता है। इन दोनोंके प्रत्येक समयमें होनेका ऐसा सहज योग हुआ करता है। जहाँ यह सहज योग प्रायोगिक होता है वहाँ मात्र यह प्राणी ऐसा विकल्प करता है कि मैंने इन साधनोंको जुटाया। यही उसके विचारकी अपार्थता है। यदि वह इसका त्याग कर दे तो उसे ऐसा भास होनेमें देर न लगे कि अपने परिणामस्वभावके कारण इनका यह परिणाम हुआ है, मैं तो उसमें निमित्तमात्र हूँ।

अपर पक्षने इसी आगमके पृ० २०० का ‘तस्मादयं’ इत्यादि उद्धरण उपस्थित किया है। उसमें विनाशका हेतु अकिंचित्कर है इस बातका निषेध किया गया है। यह तो अवलोकन करनेसे ही विदित हो जाता है कि यह प्रकरण बौद्धदर्शनके ‘विनाश निर्हेतुक होता है’ इस एकान्त मतका खण्डन करनेके अभिप्रायसे लिखा गया है। उसका कहना है कि प्रत्येक क्षण विनश्वरशील होनेसे स्वयं नष्ट हो जाता है, इसलिए उसे सहेतुक मानना उचित नहीं है। किन्तु उसका उत्पाद स्वयं नहीं होता, उसकी उत्पत्ति कारणान्तरोंसे होती है। इसके लिए उस दर्शनने चार प्रत्यय ( कारण ) स्वीकार किये हैं-समनन्तर प्रत्यय जो उत्तर क्षणकी उत्पत्तिके कालमें असत् है, इसलिए वह दर्शन असत् से सत्की उत्पत्ति मानता है। किन्तु पूर्व क्षणके विनाश होने पर उत्तर क्षणकी नियमसे उत्पत्ति होती है, इसलिए उस दर्शनने उसे कारणरूपसे स्वीकार किया है। इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि उस दर्शनमें वस्तुतः उपादानरूप कोई पदार्थ नहीं है। फिर प्रत्येक क्षणका उत्पाद होता कैसे है ? जैसे प्रत्येक क्षणका विनाश होना उसका स्वभाव है वैसे उत्पाद होना उसका स्वभाव तो है नहीं, अतः उसकी उत्पत्ति सहेतुक होनी चाहिए। यही कारण है कि उस दर्शनने समनन्तर प्रत्ययके समान उत्पादके अन्य तीन कारण और स्वीकार किये हैं। वे हैं-आलम्बनप्रत्यय, सहकारीप्रत्यय और अधिपतिप्रत्यय। इस आधार पर उस दर्शनका कहना है कि जैसे उत्पाद सहेतुक होता है वैसे विनाश सहेतुक नहीं होता। अपने इस अभिप्रायको स्पष्ट करते हुए वह कहता है कि हेतु ( मुद्गरादिके व्यापार ) से कारण क्षण ( समनन्तर प्रत्यय )का कुछ नहीं होता, वह स्वयं ही नष्ट होता है। इस पर आचार्यका कहना है कि कारणसे कार्यका भी कुछ नहीं होता, वह भी स्वयं ही उत्पन्न होता है ऐसा स्वीकार कर लेना चाहिए और ऐसी अवस्थामें जैसे आप ( बौद्ध ) विनाशको निर्हेतुक मानते हो उसी प्रकार उत्पादको भी निर्हेतुक स्वीकार कर लेना चाहिए। यतः बौद्धदर्शन उत्पादको निर्हेतुक माननेके लिये तैयार नहीं, इसलिए इस परसे आचार्यने उसे यह स्वीकार करनेके लिये बाध्य किया है कि ‘तस्मादयं विनाशहेतुर्भावमभावीकरोतीति न पुनरकिंचित्करः।’-इसलिए यह विनाशका हेतु भावको अभावरूप करता है तो यह अकिंचित्कर कैसे हो सकता है ?

यह उस कथनका आशय है जिसे यहाँ अपर पक्षने अपने अभिप्रायकी पुष्टिमें उपस्थित किया है । बोद्धदर्शन प्रत्येक क्षणकी उत्पत्ति परसे मानता है और उसका विनाश निर्हेतुक मानता है, इसलिए यहाँ उत्पत्तिके समान विनाशको भी परसे सहेतुक सिद्ध किया गया है । किन्तु यह स्थिति जैनदर्शनकी नहीं है, क्योंकि यह दर्शन प्रत्येक द्रव्यको न केवल उत्पादरूप स्वीकार करता है, न केवल व्ययरूप स्वीकार करता है और न केवल ध्रौव्यरूप ही स्वीकार करता है । किन्तु ये तीनों वस्तुके अंश हैं और प्रत्येक द्रव्य इन तीन रूप है, अतः जहाँ यह ध्रौव्यस्वभाव सिद्ध होती है वहाँ वह उत्पाद-व्ययस्वभाव भी सिद्ध होती है, अतः निश्चयसे उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यकी व्यवस्था विस्रसा है, इस दर्शनमें यही मानना ही परमार्थ सत्य है । अन्य सब व्यवहार है ।

शंका ७, प्रथम दौर: शंका ७ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ४९७ से ४९९

↑ सूची


प्रथम दौर

: १ ः

नमः श्री वीतरागाय

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका ७

केवली भगवान्की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे ? यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?

समाधान १

आगममें निश्चय व्यवहार नयसे केवली भगवान्के केवलज्ञानके स्वरूपका निर्देश करते हुए श्री नियमसारजीमें लिखा है-

जाणदि पस्सदि सव्वं ववहारणयेण केवली भगवं।
केवलणाणी जाणदि पस्सदि णियमेण अप्पाणं ॥१५९॥

अर्थ-व्यवहार नयसे केवली भगवान् सबको जानते और देखते हैं, निश्चय नयसे केवलज्ञानी आत्माको जानता और देखता है ॥ १५९ ॥

इसपर यह शंका होती है कि जब कि आगममें केवली जिनका तीन लोक और त्रिकालवर्ती द्रव्य-गुण-पर्यायात्मक सब पदार्थोंका जानना व्यवहारसे माना गया है, निश्चयसे तो वे मात्र अपनी आत्माको ही जानते हैं। ऐसी अवस्थामें केवली जिनकी सर्वज्ञता असद्भूत ही ठहरती है। अतएव मात्र यही कहना उपयुक्त होगा कि वस्तुतः सर्वज्ञ अपनी आत्माके सिवाय अन्य किसीको नहीं जानते ? यह एक शंका है जिसपर यहाँ संक्षेपमें विचार करना है। प्रश्न यह है कि केवली जिनकी सर्वज्ञता पराश्रित है या स्वाश्रित ? यदि वह मात्र पराश्रित है तो उसे असद्भूत ही माननी होगी। और यदि वह स्वाश्रित भी है तो यहाँ यह देखना होगा कि श्री नियमसारजीकी उक्त गाथामें जो यह कहा है कि केवली जिन निश्चयसे अपनी आत्माको जानते हैं उसका क्या तात्पर्य है ?

यह तो सुनिश्चित सत्य है कि जो धर्म लोकमें पाया जाता है उसीका एक द्रव्यके आश्रयसे दूसरे द्रव्यपर आरोप किया जा सकता है। जिस धर्मका सर्वथा अभाव होता है उसका किसी पर आरोप करना भी नहीं बनता। उदाहरणार्थ लोकमें वन्ध्यासुत या आकाशकुसुम नहीं पाये जाते, अतः उनका किसी पर आरोप भी नहीं किया जा सकता। अतएव सर्वज्ञता नामका धर्म कहींपर होना चाहिये तभी उसका परकी अपेक्षा आरोप करना संगत ठहरता है अन्यथा यह व्यवहार ही नहीं बन सकता कि केवली जिन सबको जानते हैं। इसलिये प्रकृतमें यह तो मानना ही होगा कि सर्वज्ञता नामका धर्म कहीं न कहीं अवश्य रहता है । इस प्रकार जब हम इस धर्मके अस्तित्वके विषयमें विचार करते हैं तो मालूम होता है कि नियमसारमें निश्चयसे जिसे आत्मज्ञता कहा है उसमें सर्वज्ञता नामका धर्म समाया हुआ ही है । केवली जिनमें जो सर्वज्ञता है उसे मात्र परके आश्रयसे स्वीकार करनेपर तो वह असद्भूत ही ठहरती है, इसमें संदेह नहीं । किन्तु प्रकृतमें ऐसा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक आत्मामें एक सर्वज्ञत्व नामकी शक्ति है जिसके आश्रयसे केवली जिनमें सर्वज्ञता स्वाश्रित स्वीकार की गई है । तात्पर्य यह है कि केवली जिन स्वभावसे तो सर्वज्ञ हैं ही इसमें संदेह नहीं । फिर भी यदि सकल ज्ञेयोंकी अपेक्षा कथन किया जाता है तो भी व्यवहारसे उनमें वह घटित होती है यह नियमसारकी उक्त गाथाका तात्पर्य है ।

श्री समयसारजीके परिशिष्टमें सर्वज्ञत्व और सर्वदर्शित्व शक्तियोंके सद्भावको स्वीकार करते हुए आचार्य श्री अमृतचन्द्र लिखते हैं-

विश्वविश्वसामान्यभावपरिणतात्मदर्शनमयी सर्वदर्शित्वशक्तिः । विश्वविश्वविशेषभावपरिणतात्मज्ञानमयी सर्वज्ञत्वशक्तिः ।

अर्थ-समस्त विश्वके सामान्यभावको देखनेरूपसे परिणत आत्मदर्शनमयी सर्वदर्शित्व शक्ति है । तथा समस्त विश्वके विशेष भावोंको जाननेरूपसे परिणत आत्मज्ञानमयी सर्वज्ञत्व शक्ति है ।

इस प्रकार उक्त कथनसे यह सिद्ध होगया कि केवली जिनमें जो सर्वज्ञता स्वीकार की गई है वह जिस प्रकार परकी अपेक्षा घटित होती है उसी प्रकार वह स्वभावकी अपेक्षा भी बन जाती है उसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है । यही कारण है कि परमात्मप्रकाशकी टीकामें उसका विचार करते हुए उसे अनेक प्रमाणोंके माध्यमसे केवली जिनमें स्वीकार किया गया है । परमात्मप्रकाशकी टीकाका वह कथन इस प्रकार है-

आत्मा कर्मविवर्जितः सन् केवलज्ञानेन करणभूतेन येन कारणेन लोकालोकं मनुते जानाति हे जीव सर्वगत उच्यते तेन कारणेन । तथाहि-अयमात्मा व्यवहारेण केवलज्ञानेन लोकालोकं जानाति, देहमध्ये स्थितोऽपि निश्चयनयेन स्वात्मानं जानाति, तेन कारणेन व्यवहारनयेन ज्ञानापेक्षया रूपविषये दृष्टिवत् सर्वगतो भवति न च प्रदेशापेक्षयेति । कश्चिदाह-यदि व्यवहारेण लोकालोकं जानाति तर्हि व्यवहारनयेन सर्वज्ञत्वं, न च निश्चयनयेनेति । परिहारमाह-यथा स्वकीयमात्मानं तन्मयत्वेन जानाति तथा परद्रव्यं तन्मयत्वेन न जानाति, तेन कारणेन व्यवहारो भण्यते न च परिज्ञानाभावात् । यदि पुनर्निश्चयेन स्वद्रव्यवत् तन्मयो भूत्वा परद्रव्यं जानाति तर्हि परकीयसुख-दुःख-राग-द्वेषपरिज्ञातो सुखी दुःखी रागी द्वेषी च स्यादिति महद् दूषणं प्राप्नोतीति । अत्र येनैव ज्ञानेन व्यापको भण्यते तदेवोपादेयस्यानन्तसुखस्याभिन्नत्वादुपादेयमित्यभिप्रायः ॥४२॥

अर्थ-हे जीव आत्मा कर्मोंसे मुक्त होकर करणभूत केवलज्ञानके द्वारा जिस कारणसे लोकालोकको जानते हैं इस कारण वे सर्वगत कहे जाते हैं । यथा-यह आत्मा व्यवहारसे केवलज्ञानके द्वारा लोकालोकको जानता है तथा देहमें स्थित होकर भी निश्चयनयसे अपने आत्माको जानता है, इस कारण व्यवहारनयसे ज्ञानकी अपेक्षा रूपविषयमें दृष्टिके समान सर्वगत हैं, प्रदेशोंकी अपेक्षा नहीं । कोई कहता है कि यदि व्यवहारसे लोकालोकको जानता है तो व्यवहारसे सर्वज्ञता बनी, निश्चयनयसे नहीं ? आगे इस शंकाका समाधान करते हैं-केवली जिन जिस प्रकार अपने आत्माको तन्मय होकर जानते हैं उस प्रकार पर द्रव्यको तन्मय होकर नहीं जानते, इस कारण व्यववहार कहा जाता है, परिज्ञानका अभाव होनेसे व्यवहार नहीं कहा गया है । यदि निश्चयनयसे स्वद्रव्यको जाननेके समान तन्मय होकर परद्रव्यको जानें तो परकीय सुख-दुःख, राग-द्वेषके परिज्ञान होनेपर वे सुखी-दुखी, रागी-द्वेषी हो जाँय यह महान् दूषण प्राप्त होता है। यहाँपर एकमात्र जिस ज्ञानकी अपेक्षा केवली जिनको व्यापक कहते हैं मात्र वही ज्ञान उपादेयभूत अनन्तसुखसे अभिन्न होनेके कारण उपादेय है यह अभिप्राय है।

शंका ७, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ४९९ से ५००

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका ७

प्रश्न यह था-

केवली भगवान्‌की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे? यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ?

प्रतिशंका २

इसके उत्तरमें आपने नियमसार गाथा १५९ के अनुसार बतलाया है कि केवली भगवान् सब पदार्थोंको व्यवहारनयसे जानते हैं, अतः इनकी यह सर्वज्ञता असद्भूत है ऐसा आपने प्रतिपादित किया है और असद्भूत शब्दका अर्थ आपने ‘आरोपित’ किया है।,

फिर आप लिखते हैं कि चूँकि लोकमें जो धर्म पाया जावे उसीका आरोप दूसरे द्रव्य पर होता है, इसलिये आपने पूर्वोक्त गाथा १५९ में निश्चयनयसे प्रतिपादित आत्मज्ञतामें सर्वज्ञताका सद्भाव स्वीकार किया है।

इस प्रकार आप केवली भगवान्‌में सर्वज्ञताको आत्मज्ञताकी अपेक्षा वास्तविक मानकर उसी सर्वज्ञताको उन्हीं केवली भगवान्‌में सकल ज्ञेयोंकी अपेक्षा आरोपित कर लेते हैं, आपके इस कथनमें दो बातें विचारणीय हो जाती हैं-

(१) आत्मज्ञताकी अपेक्षा सर्वज्ञताका क्या रूप है?

(२) उन्हीं केवली भगवान्‌में सकल ज्ञेयोंकी अपेक्षासे आरोपित सर्वज्ञता आपने स्वीकृत की है उसकी संगति किस प्रकार हो सकती है?

ये दो प्रश्न हमारे खड़े ही रहते हैं।

पुनश्च आपने जो निश्चयसे सर्वज्ञता स्थापित करनेके लिये श्री अमृतचन्द्र सूरिके प्रमाणका उल्लेख करते हुए समयसारके अनुसार जीवमें सर्वदर्शित्व और सर्वज्ञत्व नामकी दो शक्तियाँ स्वीकृत की हैं जो स्वाश्रित होनेसे निश्चयनयकी अपेक्षा आत्माकी सर्वज्ञताकी घोषणा करती हैं। यह और दूसरा नियमसारके मतका आपने उल्लेख किया है। इस प्रकारके निरूपणसे हमें अध्यात्मवादियोंके दो मत प्राप्त हो जाते हैं। एक तो नियमसार ग्रन्थकी मूल गाथा और उसकी व्याख्या करनेवाले श्री पद्मप्रभमलधारी देवकी मान्यताके अनुसार सर्वज्ञता आरोपित होनेसे आरोपित सर्वज्ञतता समर्थित होती है और दूसरे श्री अमृतचन्द्र सूरिके व्याख्याना-नुसार निश्चयनयसे स्वाश्रित सर्वज्ञता समर्थित होती है, इसका समन्वय करनेके लिये जो आपने आत्मज्ञतामें सर्वज्ञताका अन्तर्भाव करते हुए आत्मज्ञमें व्यवहारनयके विषयभूत सर्वज्ञताका आरोप बतलाया है वह हमें युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता है ।

विशेष विचार यह भी उत्पन्न होता है कि जब वास्तविक सर्वज्ञताका समर्थन करनेके लिये श्री अमृतचन्द्र सूरिने स्वाश्रित दो शक्तियाँ निरूपित की हैं जिन्हें चेतनानुगामी पर्याय शक्तियाँ कहा जा सकता है और उनके द्वारा सत्य सर्वज्ञताका साधन किया है । उसीके अनुसार अन्य चेतन व जड़ पदार्थोंमें जो कि कार्य-कारणभावके रूपमें प्राप्त होते हैं उनमें भी ऐसी ही जन्यत्व या जनकत्वादिरूप शक्तियाँ यदि मानी जावें तो वे भी स्वाश्रित पर्याय शक्तियाँ क्यों नहीं मानी जा सकेंगी, क्योंकि अनन्त धर्मात्मक वस्तुमें ‘अनन्तशक्तित्वाद् भावानाम्’ इस सिद्धान्तके अनुसार उनके माननेमें कोई विरोध नहीं रह जाता ।

इस प्रकार आप उपस्थित समस्याओंके विषयमें ठीक-ठीक प्रकाश डालेंगे ।

शंका ७, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५०० से ५०२

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मूलशंका-केवली भगवान्की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे ? यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?

प्रतिशंका २ का समाधान

इस प्रश्नके उत्तरमें नियमसार तथा अन्य प्रमाणोंके प्रकाशमें निश्चय-व्यवहारसे केवली जिनमें सर्वज्ञता और आत्मज्ञताकी स्थिति क्या है यह स्पष्ट किया गया था । फिर भी प्रतिशंका २ द्वारा उसी प्रश्नको पुनः विवादका विषय बनाकर दो अन्य प्रश्न उपस्थित किये गये हैं । वे इस प्रकार हैं-

(१) आत्मज्ञताकी अपेक्षा सर्वज्ञताका क्या रूप है ?

(२) उन्हीं केवली भगवानमें सकल ज्ञेयोंकी अपेक्षासे आरोपित सर्वज्ञता आपने स्वीकृत की है उसकी संगति किस प्रकार हो सकती है ?

ये दो प्रश्न हैं । इनका समाधान इस प्रकार है-

(१) पदार्थ तीन प्रकारके हैं-शब्दरूप, अर्थरूप और ज्ञानरूप । उदाहरणार्थ ‘घट’ यह शब्द घट शब्दरूप पदार्थ है । जलधारण करनेमें समर्थ ‘घट’ अर्थरूप घट पदार्थ है और ‘घटाकार ज्ञान’ घट ज्ञानरूप घट पदार्थ है । इस प्रकार घट पदार्थके समान सर्व पदार्थ भी तीन प्रकारके हैं । सर्व प्रथम निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करनेपर जबआत्मज्ञ केवली जिन केवलज्ञानके द्वारा ज्ञेयरूपसे अपने आत्माको जानते हैं तब दर्पणके समान ज्ञेयाकाररूप परिणमन स्वभावसे युक्त और तद्रूप परिणत अपनी ज्ञानपर्यायको भी अपनेसे अभिन्न रूपसे जानते हैं, इसलिए वे केवली जिन आत्मज्ञ होनेके साथ-साथ स्वरूपसे सर्वज्ञ हैं । यही स्वाश्रित सर्वज्ञता है । इस प्रकार विश्लेषण करनेपर यह स्पष्ट रूपसे प्रतिभासित होता है कि जो आत्मज्ञता है वही सर्वज्ञता है । निश्चयनयकी अपेक्षा आत्मज्ञ कहो या ( स्वाश्रित ) सर्वज्ञ कहो दोनोंका अर्थ एक है ।

इसी आशयको ध्यानमें रखकर श्री अमितगति आचार्यने सामायिकपाठमें कहा है-

विलोक्यमाने सति यत्र विश्वं विलोक्यते स्पष्टमिदं विविक्तं ।

आत्माके अवलोकन करनेपर जिसमें ( आत्मामें ) वह समस्त विश्व पृथक्-पृथक् स्पष्टरूपसे प्रतिभासित होता है।

प्रकृतमें उपयोगी श्री प्रवचनसारजीका यह उल्लेख द्रष्टव्य हैं-

अथैकस्य ज्ञायकभावस्य समस्तज्ञेयभावस्वभावत्वात् प्रोत्कीर्णलिखित-निखात-कीलिति-मज्जित-समावर्तित-प्रतिबिम्बितवत्तत्र क्रमप्रवृत्तानन्तभूतभवद्भाविविचित्रपर्यायप्राग्भारमगाधस्वभावं गम्भीरं समस्तमपि द्रव्यजातमेकक्षण एव प्रत्यक्षयन्तं····।
-गा० २००-टीका

अथः-अब, एक ज्ञायक भावका समस्त ज्ञेयोंको जाननेका स्वभाव होनेसे क्रमशः प्रवर्तमान, अनन्त, भूत-वर्तमान-भावी विचित्र पर्याय समूहवाले, अगाधस्वभाव और गम्भीर समस्त द्रव्यमात्रको-मानो वे द्रव्य ज्ञायकमें उत्कीर्ण हो गये हों, चित्रित हो गये हों, भीतर घुस गये हों, कीलित हो गये हों, डूब गये हों, समा गये हों, प्रतिबिम्बित हुए हों, इस प्रकार- एक क्षणमें ही जो (शुद्धात्मा) प्रत्यक्ष करता है········।

प्रतिशंकाके प्रारम्भमें हमारे मतके रूपमें जो यह लिखा गया है कि ‘केवली भगवान् सब पदार्थोंको व्यवहारनयसे जानते हैं, अतः उनकी यह सर्वज्ञता असद्भूत है ऐसा आपने प्रतिपादन किया है और असद्भूत शब्दका अर्थ आरोपित किया है’ सो इस सम्बन्धमें वक्तव्य यह है कि हमने स्वयं शंका प्रस्तुत करते हुए शंकाके रूपमें यह लिखा है कि ‘यदि वह मात्र पराश्रित है तो उसे असद्भूत मानना पड़ेगा।’ जब कि हमने उसे (सर्वज्ञताको) स्वाश्रित सिद्ध किया है तब ऐसी स्थितिमें सर्वज्ञमें सर्वज्ञता सद्भूत ही है, उसे असद्भूत किसी भी प्रकार नहीं माना जा सकता। ऐसा ही आगम है और यही हमारा अभिप्राय है।

(२) इस प्रकार स्वरूपसे सर्वज्ञताके सम्यक् प्रकारसे घटित हो जानेपर जिस समय त्रिलोक और त्रिकालवर्ति बाह्यमें अवस्थित समस्त ज्ञेयोंकी अपेक्षा उन्हें सर्वज्ञ कहा जाता है तब उनमें यह सर्वज्ञता परकी अपेक्षा आरोपित की जानेके कारण उपचरित सद्भूत व्यवहारसे सर्वज्ञता कहलाती है। जिसप्रकार दीपक स्वरूपसे प्रकाशक धर्मके कारण प्रकाशक है घटादि पदार्थोंके कारण नहीं है उसी प्रकार केवली जिन स्वरूपसे सर्वज्ञ हैं पर पदार्थोंके कारण नहीं यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

इस प्रकार प्रतिशंकामें उल्लिखित दो प्रश्नोंका सम्यक् निर्णय करनेके बाद प्रतिशंकामें अध्यात्मवादियोंके जो फलित रूपमें दो मतोंका उल्लेख किया गया है उसका आशय हमारी समझमें नहीं आया, क्योंकि अमृतचन्द्र सूरिका कोई स्वतन्त्र मत हो और नियमसारका स्वतन्त्र, ऐसा नहीं है। हमें तो यह पढ़कर बहुत आश्चर्य हुआ। वस्तुतः ज्ञानके लिए आगममें प्रायः सर्वत्र दर्पणका दृष्टान्त दिया गया है और उस द्वारा यह ज्ञान कराया गया है कि जिस प्रकार दर्पणमें प्रतिबिम्बित करनेकी शक्ति स्वभावसे है उसी प्रकार ज्ञानका ज्ञेयाकाररूप परिणमन करना उसका अपना स्वभाव है। किन्तु जब इसका परकी अपेक्षा प्रतिपादन किया जाता है। जैसे यह कहना कि दर्पणमें पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब दूसरेके कारण पड़ा है तब वह व्यवहार कहलाता है। इसी प्रकार ज्ञानका ज्ञेयाकार परिणमन करना उसका अपना स्वभाव है। किन्तु जब यह कहा जाता है कि ज्ञानका ज्ञेयाकार परिणमन ज्ञेयोंके कारण हुआ है तब वह व्यवहार कहलाता है, क्योंकि ऐसे कथनमें वस्तुकी स्वभावभूत योग्यताको गौणकर उसका पराश्रित कथन किया गया है, इसलिए वह व्यवहार है । अध्यात्मके स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाला जितना भी आगम साहित्य उपलब्ध होता है उसमें तो एकरूपता ही है । किन्तु यह भी निर्णीत है कि चारों अनुयोगोंके आगम साहित्यमें एकरूपता है । यहाँ यह निवेदन है कि जहाँ ठीक तरहसे आशय समझमें न आवे वहाँ आगमके आशयको स्पष्ट समझनेका प्रयत्न होना चाहिए । प्रमाणभूत आगमको मतके रूपमें प्रस्तुत करना उपयोगी नहीं है ।

अब रही जन्य-जनकत्व शक्तिकी बात सो प्रत्येक द्रव्यमें स्वाश्रित जन्यत्व और जनकत्व शक्तियाँ हैं । छह निश्चय कारकोंमें निश्चय कर्ता-कर्म शक्तिका उल्लेख हुआ है वह इसी अभिप्रायसे हुआ है । इतना अवश्य है कि विवक्षित द्रव्यकी जन्य-जनकत्वशक्ति उसीमें पाई जाती है तथा अन्य द्रव्योंकी भी अपने अपनेमें पाई जाती है । एक द्रव्यमें जन्यशक्ति हो और उसको जनकशक्ति किसी दूसरे द्रव्यमें हो ऐसी व्यवस्था वस्तुस्वरूपके प्रतिकूल है ऐसा आगमका अभिप्राय है ।

शंका ७, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५०२ से ५१०

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका ७

मूल प्रश्न-‘केवली भगवान्‌की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे ? यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?’

प्रतिशंका ३

इसका उत्तर तथा प्रत्युत्तर देते हुए आपने इस प्रकार कहा है-

\१. जाणदि पस्सदि सव्वं ववहारणयेण केवली भयवं।
केवलणाणी जाणदि पस्सदि णियमेण अप्पाणं ॥१५९॥

अर्थ-व्यवहारनयसे केवली भगवान् सबको जानते हैं और देखते हैं, निश्चयनयसे केवलज्ञानी नियमसे आत्माको जानते और देखते हैं ।

\२. सर्वज्ञता नामका एक धर्म है जो कहींपर होना चाहिए तभी परकी अपेक्षा आरोप करना ठहरता है ।

\३. आत्मज्ञतामें सर्वज्ञताका धर्म समाया हुआ है ।

\४. केवली जिनमें जो सर्वज्ञता है उसे मात्र परके आश्रयसे स्वीकार करने पर तो वह असद्भूत ही ठहरती है इसमें संदेह नहीं ।

\५. श्री समयसारके परिशिष्टमें सर्वज्ञत्व और सर्वदर्शित्व शक्तिको स्वीकार किया है जिससे स्वभावकी अपेक्षा सर्वज्ञता बन जाती है ।

\६. परमात्मप्रकाशकी टीकाको उद्धृत करके लिखा है 'केवली जिन जिस प्रकार अपनी आत्माको तन्मय होकर जानते हैं उस प्रकार पर-द्रव्यको तन्मय होकर नहीं जानते। इस कारण व्यवहार कहा जाता है, पर-ज्ञानका अभाव होनेसे व्यवहार नहीं कहा गया है।

\७. श्री अमितगति आचार्यके सामायिकपाठका श्लोक तथा प्रवचनसार गाथा २०० की टीका उद्धृत करते हुए कहा है कि 'एक ज्ञायकभावका समस्त ज्ञेयोंको जाननेका स्वभाव होनेसे समस्त द्रव्यमात्रको एक क्षणमें प्रत्यक्ष करता है, मानों वे द्रव्य ज्ञायकमें उत्कीर्ण हो गये हों, चित्रित हो गये हों, भीतर घुस गये हों इत्यादि।

\८. स्वरूपसे सर्वज्ञता घटित हो जानेपर जिस समय समस्त ज्ञेयोंकी अपेक्षा उन्हें सर्वज्ञ कहा जाता है तब उनमें यह सर्वज्ञता परकी अपेक्षा आरोपितकी जानेके कारण उपचरित सद्भूत व्यवहार से सर्वज्ञता कहलाती है।

\९. जिस प्रकार दर्पणमें प्रतिबिम्बित करनेकी योग्यता स्वभावसे है उसी प्रकार ज्ञानका ज्ञेयाकार-रूप परिणमन करना उसका स्वभाव है।

\१०. ज्ञानका ज्ञेयाकार परिणमन ज्ञेयोंके कारण हुआ है तब वह व्यवहार कहलाता है, क्योंकि ऐसे कथनमें वस्तुकी स्वभावभूत योग्यताको गौणकर उसका पराश्रित कथन किया गया है।

अब इन दश विषयोंके सम्बन्धमें विचार किया जाता है-

१-आपने स्वयं सोलहवें प्रश्नके उत्तरमें लिखा है-

'यह तो निर्विवाद सत्य है कि ज्ञायकभाव स्वपरप्रकाशक है। स्वप्रकाशककी अपेक्षासे आत्मज्ञ और परप्रकाशककी अपेक्षा सर्वज्ञ है। ज्ञायक कहनेसे ही ज्ञेयोंकी ध्वनि आ जाती है। आत्माको ज्ञायक कहना सद्भूत व्यवहार है और परज्ञेयोंकी अपेक्षा ज्ञायक कहना यह उपचरित सद्भूत व्यवहार है।

‘सर्वज्ञ’ शब्द दो शब्दोंसे मिलकर बना है (१) सर्व और (२) ज्ञ। ‘सर्व’ का अर्थ समस्त और ‘ज्ञ’ का अर्थ जाननेवाला है। इस तरह सर्वं जानातीति सर्वज्ञः इस व्युत्पत्तिके अनुसार सबको जाननेवाला सर्वज्ञ है। सर्वज्ञ शब्द स्वयं परसापेक्षका द्योतक है परनिरपेक्षका द्योतक नहीं है। इसीलिये श्री कुन्दकुन्द भगवानने नियमसार गाथा १५९ में कहा है कि ‘व्यवहारनयसे केवली भगवान् सबको जानते और देखते हैं। निश्चयनयकी अपेक्षा केवलज्ञानी नियमसे आत्माको जानते और देखते हैं।’ निश्चयनयकी अपेक्षा केवलज्ञानी परको नहीं जानते······गाथामें पड़े हुए नियम शब्दसे यह स्पष्ट कर दिया है।

२-चार घातिया कर्मोंका क्षय हो जानेसे आत्मामें क्षायिकज्ञान अर्थात् केवलज्ञान प्रकट हो जाता है। उस क्षायिक ज्ञानमें निश्चयनयसे ‘आत्मज्ञ’ नामका धर्म है और व्यवहारनयसे ‘सर्वज्ञ’ नामका धर्म है। इस प्रकार सर्वज्ञ नामका धर्म अवश्य है किन्तु यह धर्म, परसापेक्ष है, जैसे घटका ज्ञान, पटका ज्ञान आदि। व्यवहारनयकी अपेक्षासे केवली जिनमें सर्वज्ञता नामका धर्म वास्तविक है अतः केवलीमें सर्वज्ञताके आरोप अर्थात् मिथ्या कल्पनाकी कोई आवश्यकता नहीं है। समयसार गाथा ३६२ की टीकामें श्री जयसेनाचार्यने कहा भी है-

ननु सौगतोऽपि ब्रूते-व्यवहारेण सर्वज्ञः तस्य किमिति दूषणं दीयते भवद्भिरिति ? तत्र परिहार-माहसौगतादिमते यथा निश्चयापेक्षया व्यवहारो मृषा तथा व्यवहाररूपेण व्यवहारो न सत्य इति। जैनमते पुनः व्यवहारनयो यद्यपि निश्चयापेक्षया मृषा तथापि व्यवहाररूपेण सत्य इति।

अर्थ-प्रश्न-बौद्ध भी तो व्यवहारसे सर्वज्ञ कहते हैं, उनको दूषण क्यों दिया जाता है ?

समाधान-बौद्धमतमें जिस प्रकार निश्चयकी अपेक्षा व्यवहार झूठ है उसी प्रकार व्यवहाररूपसे व्यवहार सत्य नहीं है, किन्तु जैन मतमें व्यवहारनय यद्यपि निश्चयकी अपेक्षा झूठ है तथापि व्यवहाररूपसे सत्य है ।

इसलिये सर्वज्ञत्व धर्म आत्मामें व्यवहारनयसे होने पर भी सत्य है, आरोपित अर्थात् मिथ्या कल्पना नहीं है । किसी एक वस्तुके धर्मको किसी नियमित अपेक्षाके आधार पर दूसरी वस्तुमें कहना आरोपित कहलाता है, किन्तु उसी वस्तुके धर्मको उसी वस्तुमें कहना आरोपित नहीं कहा जा सकता है । जब सर्वज्ञता शक्ति आत्माकी है तब उसका आत्मामें कथन करना आरोपित कैसे कहला सकता है ? उस शक्तिका स्वरूप ही जब परको जानना है तब परकी अपेक्षा तो उसमें आवेगी ही । परको जाननेका नाम ही परज्ञता है । यहाँ पर हमारा प्रश्न सर्वज्ञत्व शक्तिकी अपेक्षासे नहीं है क्योंकि वह तो निगोदिया जीवमें भी है। किन्तु सर्वज्ञतारूप उस परिणतिसे है, वह परिणति सर्व पर वस्तुके आश्रयसे ही मानी जा सकती है । अतएव पर (सर्वज्ञेय) आश्रित होनेसे व्यवहारनयका विषय हो जाता है । जैसे जीवमें विभावरूप परिणमन करनेकी अनादि पारिणामिक शक्ति है । यह शक्ति कर्मोंसे उत्पन्न नहीं हुई, क्योंकि निमित्तकारण शक्ति उत्पन्न नहीं कर सकते । इस शक्तिका विभावरूप परिणमन बाह्य निमित्त पाकर ही होता है । आपके सिद्धान्तानुसार यदि विभाव परिणमनको इस शक्तिकी अपेक्षासे देखा जाय तो यह भी स्वाश्रित होनेसे निश्चियका विषय बन जायगा । किन्तु ऐसा है नहीं । क्योंकि समयसार गाथा ५६ में ‘रागादि विभावको जीवके हैं’ ऐसा व्यवहारनयसे कहा है ।

३-केवली जिनमें आत्मज्ञता और सर्वज्ञता ये दोनों धर्म भिन्न भिन्न नयोंकी अपेक्षासे हैं अर्थात् आत्मज्ञता निश्चयनयकी अपेक्षासे है और सर्वज्ञता व्यवहारनयकी अपेक्षासे है अथवा आत्मज्ञता स्वअपेक्षासे है और सर्वज्ञता पर अपेक्षासे है । अतः आत्मज्ञतामें सर्वज्ञता धर्म नहीं समा सकता है, किन्तु ये दोनों धर्म दो नयोंकी अपेक्षासे भिन्न भिन्न होते हुए भी केवली जिनमें एक साथ रह सकते हैं ।

४-सर्वज्ञता यद्यपि पर-सापेक्ष है तथापि वह असद्भूत नहीं है, किन्तु यथार्थ है । जो धर्म पर-सापेक्ष है उसे परसापेक्ष कहना तो सत्य है, वह असद्भूत कैसे हो सकता है ? परसापेक्ष होनेसे असद्भूत व्यवहार नयका विषय होते हुए भी असत्यार्थ नहीं है । असद्भूत व्यवहारनयका लक्षण इस प्रकार है-

भिन्नवस्तुविषयोऽसद्भूतव्यवहारः ।-आलापपद्धति

अर्थ-जो भिन्न वस्तुको विषय करे वह असद्भूत व्यवहारनय है ।

निश्चयनयका विषय दो भिन्न वस्तु नहीं है, अतः निश्चयनयकी अपेक्षा सर्वज्ञता नहीं है । किसी भी आगममें निश्चयनयकी अपेक्षा सर्वज्ञता स्वीकृत नहीं की गई है । समयसार गाथा २७२ की टीकामें भी श्री अमृतसूरिने कहा है-

आत्माश्रितो निश्चयनयः पराश्रितो व्यवहारनयः ।

अर्थ-निश्चय नय आत्मा (स्व) के आश्रित है और व्यवहार नय परके आश्रित है ।

जयधवल पुस्तक १ पृष्ठ २३ पर कहा है-

आत्मार्थव्यतिरिक्तसहायनिरपेक्षत्वाद् वा केवलमसहायम् ।

अर्थ-केवलज्ञान आत्मा और पदार्थ (ज्ञेय) से अतिरिक्त किसी इन्द्रियादिककी सहायताकी अपेक्षा नहीं रखता है, इसलिये वह केवल-असहाय है । अर्थात् केवलज्ञान आत्मा और पदार्थकी अपेक्षा रखता है ।

इस तरह चूँकि सर्वज्ञतामें पदार्थविषयताकी अपेक्षा है, अतः वह पराश्रित होनेसे व्यवहारनयसे है । इसी कारण प्रवचनसारमें श्री कुन्दकुन्द भगवान्‌ने कहा-‘णाणं णेयपमाणमुद्दिट्ठं’ अर्थात् ज्ञान ज्ञेयप्रमाण कहा गया है । यद्यपि निश्चयसे उसमें अनन्तानन्त लोकालोकको जाननेकी शक्ति है । (राजवार्तिक १ । २९) अर्थात् ऐसे अनंतानंत लोकालोक हों तो उन्हें भी जान सकता है, किन्तु सर्वज्ञताकी अपेक्षा व्यवहारनयकी दृष्टिमें वह ज्ञान, ज्ञेय प्रमाण है ।

५-समयसार परिशिष्टमें आत्माकी ४८ शक्तियोंका कथन है । उनमेंसे कुछ शक्तियाँ परापेक्षित भी हैं । जैसे परकी अपेचा रखनेवाली अकार्यकारणत्व शक्ति व अकर्तृत्व शक्ति, क्योंकि, अन्यसे न करने योग्य और अन्यका कारण नहीं ऐसी अकार्यकारण शक्ति है और ज्ञातापने मात्रसे भिन्न परिणामके करनेका अभावस्वरूप अकर्तृत्व नामकी शवति है । इसी प्रकार सर्व पर ज्ञेयोंकी अपेक्षा रखनेवाली सर्वदर्शित्व व सर्वज्ञत्व नामकी शक्तियाँ हैं । सर्वदर्शित्व और सर्वज्ञत्वमें जो ‘सर्व’ शब्द है वह स्वयं ही सर्व पर पदार्थोंकी अपेक्षाका द्योतक है ।

श्री कुन्दकुन्द भगवानने समयसारमें स्वभावसे सर्वज्ञता मानते हुए भी सर्वज्ञताको व्यवहार नयका ही विषय कहा है-

जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होइ ।
तह जाणओ दु ण परस्स जाणओ जाणओ सो दु ॥३५६॥
एवं तु णिच्छयणयस्स भासियं णाण-दंसण-चरित्ते ।
सुणु ववहारणयस्स य वत्तव्वं से समासेण ॥३६०॥
जह परदव्वं सेडिदि हु सेडिया अप्पणो सहावेण ।
तह परदव्वं जाणइ णाया वि सएण भावेण ॥३६१॥
एवं ववहारस्स दु विणिच्छओ णाणा-दंसण-चरिते ॥३६५॥

अर्थ-जैसे सेटिका ( कली, खड़िया मिट्टी ) तो परकी नहीं है, सेटिका तो स्वयं सेटिका है, उसी प्रकार आत्मा पर द्रव्यका ज्ञायक नहीं है, ज्ञायक तो ज्ञायक ही है । इस प्रकार ज्ञान दर्शन चारित्रमें निश्चयनयका कथन है । संक्षेपसे व्यवहारनयका कथन सुनो । जैसे सेटिका अपने स्वभावसे परद्रव्य दीवाल आदिको सफेद करती है, उसी प्रकार ज्ञाता भी अपने स्वभावसे परद्रव्यको जानता है । इस प्रकार ज्ञान दर्शन चारित्रके विषयमें व्यवहारनयका निर्णय कहा ।

गाथाकी व्याख्यामें श्री अमृतचन्द्र सूरिने स्पष्ट लिखा है-

तथा तेन श्वेतमृत्तिकादृष्टान्तेन परद्रव्यं घटादिकं ज्ञेयं वस्तु व्यवहारेण जानाति ।

अर्थ-खड़ियाके दृष्टान्तसे आत्मा पर द्रव्य घट आदि ज्ञेय वस्तुको व्यवहारनयसे जानता है ।

‘स्वभावसे पर द्रव्यको जानना भी व्यवहार नयका विषय है’ ऐसा श्री कुन्दकुन्द भगवान्‌ने उपर्युक्त गाथाओंमें तथा नियमसार गाथा १५९में स्पष्ट कहा है । भगवान् कुन्दकुन्दके वाक्योंका विरोध करते हुए आप सर्वज्ञताको निश्चयनयसे कहनेका क्यों प्रयत्न कर रहे हैं ? क्या आप ऐसा इसलिये कहते हैं कि व्यवहारनयको सत्यार्थ मानना आपको इष्ट नहीं है ? जिसको कि श्री अमृतचन्द सूरिने अपनी व्याख्यामें परमार्थ स्वीकार किया है ।

६-परमात्मप्रकाशकी टीकाको उद्धृत करते हुए जो आपने यह लिखा है कि ‘केवली जिन जिस प्रकार अपनी आत्माको तन्मय होकर जानते हैं उस प्रकार पर द्रव्यको तन्मय होकर नहीं जानते, इस कारण व्यवहार है, परज्ञानका अभाव होनेसे व्यवहार नहीं कहा गया ।’ इससे भी सर्वज्ञता निश्चयनयका विषय नहीं ठहरता । पर पदार्थके साथ ज्ञानका तादात्म्य सम्बन्ध नहीं है । अपितु ज्ञेय-ज्ञायकसम्बन्ध है, अतः दो द्रव्योंके सम्बन्ध होनेसे वह व्यवहार नयका ही विषय ठहरता है । इस प्रकार आपके प्रमाणके द्वारा ही आपका मत खण्डित हो जाता है अर्थात् श्री परमात्मप्रकाशसे भी सर्वज्ञता निश्चयनयका विषय सिद्ध नहीं होती, किन्तु व्यवहार नयका ही विषय सिद्ध होती है ।

७-श्री अमितगति आचार्यके सामायिकपाठ तथा प्रवचनसार गाथा २०० की टीकाको उद्धृत करते हुए आपने जो लिखा है कि ‘एक ज्ञायकभावका समस्त ज्ञेयोंको जाननेका स्वभाव होनेसे सर्वज्ञ समस्त द्रव्यमात्रको एक क्षणमें प्रत्यक्ष करता है, मानो वे द्रव्य ज्ञायकमें उत्कीर्ण हो गये हों, चित्रित हो गये हों, भीतर घुस गये हों इत्यादि ।’ संभवतः इन वाक्यों द्वारा आप यह कहना चाहते हैं कि दर्पणकी तरह ज्ञान भी ज्ञेयाकाररूप परिणम जाता है, सो आपका यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि दर्पण मूर्तिक है जिसकी स्वच्छता मूर्तिक द्रव्यके आकार व वर्णरूप परिणम जाती है, किन्तु आत्मा तो अमूर्तिक है । वह मूर्तिकपदार्थोंके आकाररूप कैसे परिणम सकता है ? ज्ञान ज्ञेयोंको जानता है यह बतलानेके लिये दर्पणका दृष्टान्त मात्र दिया गया है । ज्ञान ज्ञेयाकाररूप नहीं परिणमता है इसका युक्ति सहित स्पष्ट उल्लेख प्रमेयकमलमार्तण्डमें किया गया है जो इस प्रकार है-

विषयाकारधारित्वं च बुद्धेरनुपपन्नम्, मूर्तस्यामूर्ते प्रतिबिम्बासंभवात् । तथाहि न विषयाकारधारिणी बुद्धिरमूर्तत्वादाकाशवत्, यत्तु विषयाकारधारि तन्मूर्तं यथा दर्पणादि ।

अर्थ-ज्ञानको विषयाकार धारण करनेवाला मानना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि घट पट आदि ज्ञेयभूत मूर्त पदार्थका अमूर्तिक ज्ञानमें प्रतिबिम्ब होना असम्भव है । ज्ञान ज्ञेयाकारको धारण करनेवाला नहीं है, क्योंकि वह अमूर्त है जैसे आकाश । जो जो ज्ञेयाकार (ज्ञेयोंके प्रतिबिम्ब) को धारण करनेवाला होता है वह मूर्त होता है जैसे दर्पण जलादि । ज्ञान अमूर्त है, क्योंकि अमूर्त आत्माका गुण है । जिसप्रकार आकाशमें किसी वस्तुका प्रतिविम्ब नहीं बनता, क्योंकि वह स्वभावसे अमूर्त है, उसी प्रकार आत्मा भी अमूर्त है, अतः उसमें भी पर पदार्थोंके आकारका प्रतिविम्ब नहीं पड़ता ।

ऐसी ही विवेचना मूलाराधना और प्रमेयरत्नमालामें भी है ।

यद्यपि ज्ञानको साकार कहा है परन्तु वहाँ आकारका अर्थ प्रतिबिम्ब न होकर अर्थविकल्प लिया है । कहा भी है-कम्मकत्तागारो आगारो तेण आगारेण सह वट्टमाणो उवजोगो सागारो त्ति ।

-जयधवल पृ० ३३८

अर्थात् कर्म-कर्तृत्वको आकार कहते हैं और उस आकारसे सहित उपयोग साकार उपयोग कहलाता है ।

यहाँ प्रमेयरत्नमालाके ‘ज्ञानविषयभूतं वस्तु कर्मेत्यमिधीयते’ इस उल्लेखके अनुसार कर्मका अर्थ ज्ञेय लेना चाहिए, उसका विकल्प ज्ञानमें आता है, अतः ज्ञानको साकार कहते हैं । यदि कहीं पर ज्ञानमें ज्ञेयोंके प्रतिविम्ब अथवा ज्ञानकी ज्ञेयाकार परिणति कही गई है तो उसका वहाँ इतना ही प्रयोजन है कि जिस प्रकार प्रतिबिम्ब ज्यों का ज्यों पड़ता है उसी प्रकार ज्ञान ज्ञेयोंको ज्योंका त्यों यथार्थ जानता है । इस जाननेका नाम ही ज्ञेयाकार परिणति है । यदि यह मान लिया जावे कि ज्ञानमें ज्ञेयोंके प्रतिबिम्ब पड़ने पर ही ज्ञान ज्ञेयों को जानता है तो ज्ञान रस गन्ध, स्पर्शको तथा अमूर्तिक पदार्थोंको नहीं जान सकेगा, क्योंकि इनका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है और न ज्ञान रसादिरूप परिणम सकता है । प्रतिबिम्ब या छाया तो पुद्गल द्रव्यकी पर्याय है, ज्ञानकी नहीं । अतः अमितगति सामायिकपाठ तथा प्रवचनसार गाथा २०० की टीकासे भी यह सिद्ध नहीं होता कि केवली जिन निश्चयनयकी अपेक्षा सर्वज्ञ हैं ।

आपने पदार्थ तीन प्रकारके लिखे-१ शब्दरूप २ अर्थरूप ३ ज्ञानरूप । इनमेंसे शब्दरूप पदार्थ ‘घट’ शब्द, और ज्ञानरूप पदार्थ जैसे घटको जाननारूप घटज्ञान, ये दोनों पदार्थ पराश्रित होनेसे व्यवहारके विषय हैं । जैसे घटमें जलधारण हो सकता है वैसे घट शब्द या घटज्ञानमें जलधारण नहीं हो सकता । अन्न से पेट भर सकता है-भूख मिट सकती है, किन्तु अन्न शब्दसे या अन्नके ज्ञानमात्रसे पेट नहीं भर सकता, अतः शब्द व ज्ञानको पदार्थ व्यवहारसे कहा गया है ।

८-आपने कहा है ‘स्वरूपसे सर्वज्ञता घटित हो जानेपर जिस समय समस्त ज्ञेयोंकी अपेक्षा उन्हें सर्वज्ञ कहा जाता है तब उनमें यह सर्वज्ञता परकी अपेक्षा आरोपितकी जानेके कारण उपचरित सद्भूत व्यवहारसे सर्वज्ञता कहलाती है ।’

यहाँ विचारणीय बात यह है कि जब केवली जिन सर्वज्ञ हैं तो उनमें वही धर्म आरोपित नहीं हो सकता, अतः आपका उपर्युक्त कथन आपके द्वारा ही बाधित हो रहा है । फिर स्वरूपसे सर्वज्ञता घटित भी नहीं होती, आत्मज्ञता ही घटित होती है । परपदार्थों और ज्ञानमें परस्पर ज्ञेयज्ञायक सम्बन्ध है । यद्यपि ज्ञान ज्ञेयोंको अपने स्वभावसे जानता है तथापि ज्ञेयोंके साथ ज्ञायकका सम्बन्ध व्यवहारनयसे ही है । समयसार पृष्ठ ४४८ पर गाथा ३६१ की टीकामें श्री अमृतचन्द्र आचार्यने कहा भी है-

चेतयितापि ज्ञानगुणनिर्भरस्वभावः स्वयं पुद्गलादिपरद्रव्यस्वभावेनापरिणममानः पुद्गलादिपरद्रव्यं चात्मस्वभावेनापरिणमयन् पुद्गलादिपरद्रव्यनिमित्तकेनात्मनो ज्ञानगुणनिर्भरस्वभावस्य परिणामेनोत्पद्यमानः पुद्गलादिपरद्रव्यं चेतयितृनिमित्तकेनात्मनः स्वभावस्य परिणामेनोत्पद्यमानमात्मनः स्वभावेन जानातीति व्यवह्रियते ।

अर्थ-ज्ञानगुणसे परिपूर्ण स्वभाववाला चेतयिता भी स्वयं पुद्गलादि पर द्रव्यके स्वभावरूप परिणमित न होता हुआ और पुद्गलादि परद्रव्योंको अपने स्वभावरूप परिणमित न करता हुआ पुद्गलादि परद्रव्य जिसमें निमित्त हैं ऐसे अपने ज्ञानगुणसे परिपूर्ण स्वभावके द्वारा उत्पन्न होते हुए पुद्गलादि परद्रव्योंको अपने स्वभावसे जानता है ऐसा व्यवहार किया जाता है ।

आलापपद्धतिमें श्री देवसेनाचार्यने कहा-

स्वभावस्याप्यन्यत्रोपचारादुपचरितस्वभावः । स द्वेधा-कर्मज-स्वाभाविकभेदात् । यथा जीवस्य मूर्तत्वमचेतनत्वं यथा सिद्धानां परज्ञता परदर्शकत्वं च ।

अर्थ -स्वभावका अन्यत्र उपचार सो उपचरित स्वभाव है । वह उपचरित स्वभाव, कर्मजनित और स्वभाविकके भेदसे दो प्रकारका है, जैसे जीवके मूर्तपना तथा अचेतनपना स्वभाव हैं, यह कर्मजनित उपचरित है । और सिद्धोंके परको जानना (सर्वज्ञता) और परको देखना (सर्वदर्शिता) यह स्वाभाविक उपचरित है ।

इस प्रकार श्री देवसेनाचार्यने भी सर्वज्ञताको उपचरितनयसे ही बतलाया है । यदि उपचरितनयको न माना जावे और अनुपचरितनयका एकान्त पक्ष ग्रहण किया जाय तो परज्ञता ( सर्वज्ञता ) से विरोध आ जायगा । इस ही को आलापपद्धतिमें इन शब्दों द्वारा कहा है-

उपचरितैकान्तपक्षेऽपि नात्मज्ञता संभवति नियमितपक्षत्वात् । तथात्मनोऽनुपचरितपक्षेऽपि परज्ञता-दीनां विरोधः स्यात् ।

अर्थ-उपचरित एकान्त पक्षमें नियमित पक्ष होनेसे आत्माके आत्मज्ञता सम्भव नहीं होती है । उसी प्रकार अनुपचरित एकान्त पक्षमें भी आत्माके परज्ञता (सर्वज्ञता) का विरोध हो जायगा ।

प्रवचनसार गाथा ३२ की टीकामें जयसेनाचार्यने कहा है-

व्यवहारनयेन पश्यति समन्ततः सर्वद्रव्यक्षेत्रकालभावैर्जानाति च सर्वं निरवशेषम् ।

अर्थ-व्यवहारनयसे वे भगवान् समस्तको सर्व द्रव्य क्षेत्र काल भावोंके द्वारा देखते तथा जानते हैं ।

इसी प्रकार गाथा ३८ की टीकामें भी यही कहा है-

परद्रव्यपर्यायं तु व्यवहारेण परिच्छिनत्ति ।

अर्थ-व्यवहारसे परद्रव्य और पर्यायोंको जानते हैं ।

जाणगभावो जाणदि अप्पाणं जाण णिच्छयणयेण ।
परद्व्वं ववहारा मइसुइओहिमणकेवलाधारं ॥३३९॥
-नयचक्रसंग्रह पृ० ११९ माणिकचन्द्रग्रंथमाला

अर्थ-ज्ञायक भाव मति श्रुत अवधि मनपर्यय केवलज्ञानके आधारसे निश्चयनयकी अपेक्षा आत्माको जानता है और परद्रव्यको व्यवहारनयसे जानता है ।

उपर्युक्त आगम प्रमाणोंसे यह सिद्ध है कि केवली जिनमें सर्वज्ञता व्यवहारनयसे है, निश्चयनयसे नहीं है । ज्ञानगुणकी अपेक्षा आत्मा ज्ञायक है । निश्चयनयसे आत्मा ज्ञानगुणके द्वारा स्वरूपको अर्थात् स्वको जानता है और व्यवहारनयसे आत्मा उस ही ज्ञानगुण स्वभावके द्वारा परद्रव्यों अर्थात् सर्व ज्ञेयोंको जानता है । स्वमें परका अत्यन्ताभाव है और परमें स्वका अत्यन्ताभाव है । ‘स्व’ पररूप नहीं परिणमता और ‘पर’ स्वरूप (आत्मरूप) नहीं परिणमता ।

९-इसका कथन ऊपर नं० ३ में किया जा चुका है ।

१०-आपने लिखा है कि ‘ज्ञानका ज्ञेयाकार परिणमन ज्ञेयोंके कारण हुआ है तब वह व्यवहार कहलाता है, क्योंकि ऐसे कथनमें वस्तुकी स्वभावभूत योग्यताको गौणकर उसका पराश्रित कथन किया गया है ।’ सो आपका ऐसा कहना ठीक नहीं हैं, क्योंकि ज्ञान ज्ञेयाकाररूप परिणमन नहीं करता । जैसा कि नं० ७ के विचारमें ऊपर कहा जा चुका है । ज्ञेयोंके जाननेको ही ज्ञानका ज्ञेयाकाररूप परिणमन कहा जाता है । रस गन्ध शीत उष्ण हलका भारी नरम कठोर आदि मूर्तिक गुण तथा धर्मादि अमूर्तिक द्रव्योंके गुणोंका कोई आकार न होनेसे उन ज्ञेयोंके आकाररूप ज्ञान नहीं परिणमता, किन्तु जानता है, क्योंकि जानना ज्ञानका स्वभाव है । ज्ञान अपने स्वभावसे सर्व ज्ञेयोंको जानता है इस कथनमें स्वभाव गौण नहीं है तथापि ज्ञेय परद्रव्य हैं, अतः यह कथन व्यवहारनयकी अपेक्षासे है । ज्ञान ज्ञेयोंको अपने स्वभावसे जानता अवश्य है, किन्तु आत्माके प्रदेश या ज्ञानके अविभागप्रतिच्छेद ज्ञेयोंके आकाररूप नहीं परिणमन करते । ऐसा ही श्री कुन्दकुन्द स्वामीने प्रवचनसारमें कहा है-

णाणी णाणसहावो अत्था णेयप्पगा हि णाणिस्स ।
रूवाणि व चक्खूणं णेवाण्णोण्णेसु वट्टंति ॥२८॥

अर्थ-आत्मा ज्ञानस्वभाव है और पदार्थ आत्माके ज्ञेयस्वरूप है, जैसे कि रूप नेत्रोंका ज्ञेय स्वरूप होता है, परन्तु वे एक दूसरेमें नहीं वर्तते ।

इस प्रकार व्यवहारनयसे सर्वज्ञता सिद्ध हो जानेपर वह सत्यार्थ है, क्योंकि प्रत्येक नय अपने विषयका ज्ञान करानेमें सत्य है, असत्य नहीं है । कहा भी है-

ण च ववहारणओ चप्पलओ, तत्तो ववहाराणुसारिसिस्साणं पउत्तिदंसणादो । जो बहुजीवाणुग्गह-कारी ववहारणओ सो चेव समस्सिदव्वो त्ति मणेणावहारिय गोदमथेरेण मंगलं तत्थ कयं ।
-जयधवल पु० १ पृष्ठ ८

अर्थ-यदि कहा जाय कि व्यवहारनय असत्य है सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उससे व्यवहारका अनुसरण करनेवाले शिष्योंकी प्रवृत्ति देखी जाती है, जो व्यवहारनय बहुत जीवोंका अनुग्रह करनेवाला है उसीका आश्रय करना चाहिये ऐसा मनमें निश्चय करके गौतम स्थविरने चौबीस अनुयोगद्वारोंके आदिमें मंगल किया है ।

यहाँ सन्मतितर्ककी निम्नांकित गाथा दृष्टव्य है-

णिययवयणिज्जसच्चा सव्वणया परवियालणे मोहा ।
ते उण दिट्ठसमओ विभयइ सच्चे व अलिए वा ॥१२८॥

अर्थ-ये सभी नय अपने अपने विषयके कथन करनेमें समीचीन हैं और दूसरे नयोंके निराकरण करनेमें मूढ़ है । अनेकान्तके ज्ञाता पुरुष यह नय सच्चा है और यह नय झूठा है इस प्रकारका विभाग नहीं करते ।

यही गाथा जयधवला पुस्तक १ पृष्ठ २५७ पर निम्नांकित वाक्योंके साथ उद्धृत की गई है-

न चैकान्तेन नया मिथ्यादृष्टय एव, परपक्षानिराकरिष्णूनां सपक्ष ( स्वपक्ष ) सत्त्वावधारणे व्यापृतानां स्यात्सम्यग्दृष्टित्वदर्शनात् ।

अर्थ-नय एकान्तसे मिथ्यादृष्टि ही हैं ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि जो नय परपक्षका निराकरण नहीं करते हुए ही अपने पक्षके अस्तित्वका निश्चय करनेमें व्यापार करते हैं उनमें कथंचित् समीचीनता पायी जाती है ।

उक्त गाथाका विशेषार्थ लिखते हुए श्री पं० फूलचन्द्रजीने लिखा है-

‘हर एक नयकी मर्यादा अपने अपने विषयके प्रतिपादन करनेतक सीमित है । इस मर्यादामें जबतक वे नय रहते हैं तबतक वे सच्चे हैं और इस मर्यादाको भंग करके जब वे नय अपने प्रतिपक्षी नयके कथनका निराकरण करने लगते हैं-तब वे मिथ्या हो जाते हैं । इसलिये हर एक नयकी मर्यादाको जाननेवाला और उनका समन्वय करनेवाला अनेकान्तज्ञ पुरुष दोनों नयोंके विषयको जानता हुआ एक नय सत्य ही है और दूसरा नय असत्य ही है ऐसा विभाग नहीं करता । किन्तु किसी एक नयका विषय उस नयके प्रतिपक्षी दूसरें नयके विषयके साथ ही सच्चा है ऐसा निश्चय करता है ।

नोट-निश्चयनय और व्यवहारनयका स्वरूप समझनेके लिये अन्य प्रश्नों पर भी दृष्टि डालिये ।

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

शंका ७

मूल प्रश्न ७-केवली भगवान्‌की सर्वज्ञता निश्चयसे है या व्यवहारसे। यदि व्यवहारसे है तो वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?

शंका ७, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५१० से ५१८

↑ सूची


प्रतिशंका ३ का समाधान

केवली जिन निश्चयसे आत्मज्ञ हैं और व्यवहारसे सर्वज्ञ हैं इसका स्पष्टीकरण प्रथम और द्वितीय उत्तरमें करते हुए पिछली प्रतिशंकामें उठाये गये दो प्रश्नोंका सम्यक् प्रकारसे विचार पिछले उत्तरमें कर आये हैं।

तत्काल प्रस्तुत प्रतिशंकाके आधारसे विचार करना है। इसमें १० मुद्दे उपस्थित कर उनके आधारसे प्रतिशंकाको स्वरूप प्रदान किया गया है।

\१. प्रथम मुद्दा उपस्थित करते हुए १६वें प्रश्नके उत्तरमें हमारे द्वारा दिये गये वक्तव्यका अंश बतला कर ये वचन उपस्थित किये गये हैं-

‘यह तो निर्विवाद सत्य है कि ज्ञायकभाव स्व-परप्रकाशक है। स्व-प्रकाशककी अपेक्षासे आत्मज्ञ और परप्रकाशककी अपेक्षा सर्वज्ञ है। ज्ञायक कहनेसे ही ज्ञेयोंकी ध्वनि आ जाती है। आत्माको ज्ञायक कहना सद्भूत व्यवहार है और पर ज्ञेयोंकी अपेक्षा ज्ञायक कहना यह उपचरित सद्भूत व्यवहार है।

अब हमारे उस कथनको पढ़िए जिसे बदलकर अपर पक्षने उक्त रूप प्रदान किया है-

‘अब यह देखना है कि जो यहाँ आत्माको ज्ञायकरूप कहा है सो वह परकी अपेक्षा ज्ञायक कहा है कि स्वरूपसे ज्ञायक है। यदि एकान्तसे यह माना जाता है कि वह परकी अपेक्षा ज्ञायक है तो ज्ञायकभाव आत्माका स्वरूप सिद्ध न होनेसे ज्ञायकस्वरूप आत्माका सर्वथा अभाव प्राप्त होता है। यह तो है कि ज्ञायकभाव स्व-परप्रकाशक होनेसे परको जानता अवश्य है। पर वह परकी अपेक्षा मात्र ज्ञायक न होनेसे स्वरूपसे ज्ञायक है। फिर भी उसे ज्ञायक कहनेसे उसमें ज्ञेयकी ध्वनि आ जाती है, इसलिए उसपर ज्ञेयकी विवक्षा लागू पड़ जानेसे उसे उपचरित कहा है। इस प्रकार आत्माको ज्ञायक कहना यह सद्भूत व्यवहार है और उसे ज्ञेयकी अपेक्षा ज्ञायक ऐसा कहना यह उपचरित है। इस प्रकार जब ज्ञेयकी अपेक्षा ऐसा कहा जाता है कि आत्मा ज्ञायक है तब वह उपचरित सद्भूतव्यवहारनयका विषय होता है।’

इस प्रकार ये दो रूप (एक हमारे वक्तव्यका मूल रूप और दूसरा अपर पक्षद्वारा उसका अपनी प्रस्तुत प्रतिशंकामें परिवर्तन करके हमारा वक्तव्य बतलाकर उपस्थित किया गया रूप) सामने हैं।

अपर पक्षने हमारे मूल वक्तव्यको परिवर्तितकर क्यों उपस्थित किया इसका कारण है। बात यह है कि उसे निश्चयनय और व्यवहारनय परस्पर सापेक्ष होते हैं यह बतलाना इष्ट है। किन्तु हमारे उक्त वक्तव्यसे उस पक्षके इस अभिप्रायकी पुष्टि नहीं होती। और साथ ही वह पक्ष यह भी बतलाना चाहता है कि ऐसा हम (उत्तर पक्ष) भी मानते हैं। यही कारण है कि उस पक्षने हमारे उक्त कथनको बदलकर उसे उक्त रूप प्रदान कर दिया। इससे उस पक्षके दो अभिप्राय सिद्ध हो गये-एक तो उस वक्तव्यद्वारा उसे जो कहना था वह कह दिया और दूसरे वह उस पक्षका कहना न कहलाकर हमारा (उत्तर पक्ष) का कहना कहलाने लगा।

हम उसके द्वारा किये गये ऐसे प्रयास पर विशेष टीका-टिप्पणी तो नहीं करेंगे। किन्तु उस पक्ष द्वारा ऐसा गलत मार्ग अपनाया जाना ठीक नहीं इतना अवश्य कहेंगे।

उस पक्षने अपने इस अभिप्रायको सिद्ध करनेके लिए ‘सर्वज्ञ’ शब्दकी व्युत्पत्तिका भी सहारा लिया है। उसका कहना है कि ‘सर्वज्ञ शब्द स्वयं परसापेक्षका द्योतक है परनिरपेक्षका द्योतक नहीं है। इसीलिए श्री कुन्दकुन्द भगवान्ने नियमसार गाथा १५९ में कहा है कि व्यवहारनयसे केवली भगवान् सबको जानते और देखते हैं। निश्चयनयकी अपेक्षा केवलज्ञानी नियमसे आत्माको जानते और देखते हैं। निश्चयनयकी अपेक्षा केवलज्ञानी परको नहीं जानते······गाथामें पड़े हुए नियम शब्दसे यह स्पष्ट कर दिया है।’

किन्तु अपर पक्षका यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि सकल द्रव्यों और उनकी पर्यायोंका साक्षात् करना ( प्रत्यक्ष जानना ) यह केवलज्ञान या केवलज्ञानीका स्वरूप है। अष्टसहस्री पृ० १३२ में लिखा है-

सकलप्रत्यक्षस्य सर्वद्रव्य-पर्यायसाक्षात्करणं स्वरूपम्।

सब द्रव्यों और उनकी सब पर्यायोंका साक्षात् करना यह सकल प्रत्यक्षका स्वरूप है।

भगवान् कुन्दकुन्दने ‘आत्मज्ञ’ शब्द द्वारा इसी स्वरूपका कथन किया है, क्योंकि केवलज्ञानी (आत्मा) का प्रत्येक समयमें इसी प्रकार जानने-देखनेरूप दूसरेकी (प्रमेयोंकी) अपेक्षा किये बिना स्वयं परिणमन होता है। अतएव केवली जिन निश्चयनयसे आत्मा (स्व) को जानते देखते हैं यह सिद्ध हुआ। यहाँपर ‘अप्पाणं’ पद स्व-प्रकाशक स्वरूपका सूचक है यतः केवलज्ञानी अपने स्वरूपको जानता-देखता है अतः स्व-परस्वरूप सकल प्रमेयोंको स्वयं जानता देखता है। यह निश्चयनयके कथनका तात्पर्य सिद्ध होता है। तीन लोक और त्रिकालवर्ती जितने प्रमेय हैं उनको जानने-देखनेरूप केवलज्ञान और केवलदर्शनका स्वयं परिणमन होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है।

यह निश्चयनयका वक्तव्य है। अब व्यवहारनयके वक्तव्यपर विचार कीजिए। इसे तो अपर पक्षको भी स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रत्येक वस्तुका स्वरूप स्वतःसिद्ध होता है। यदि प्रत्येक वस्तुके स्वरूपकी सिद्धि भी परसापेक्ष मानी जाय तो दोनों नहीं बनेंगे, अर्थात् दोनोंका अभाव हो जायगा। यतः दोनोंका अभाव मानना अपर पक्षको भी इष्ट नहीं होगा, अतः प्रत्येक वस्तुके स्वरूपको स्वतःसिद्ध मान लेना ही श्रेयस्कर है। इस प्रकार प्रमाण और प्रमेयका स्वरूप स्वतःसिद्ध होनेपर भी उनका व्यवहार परस्पर सापेक्ष होता है, क्योंकि प्रमाणके निश्चयपूर्वक प्रमेयका निश्चय होता है और प्रमेयके निश्चयपूर्वक प्रमाणका निश्चय होता है, अतएव परसापेक्ष ऐसे व्यवहारको ध्यानमें रखकर जब कथन किया जाता है तब यह कहा जाता है कि व्यवहारनयसे केवली जिन सबको जानते-देखते हैं।

दोनों नयोंके कथनका आशय एक ही है। यदि इनके कथनमें अन्तर है तो इतना ही कि निश्चयनय स्वरूपकी अपेक्षा जिस बातको कहता है, व्यवहारनय परसापेक्ष होकर उसी बातको कहता है, इसलिए निश्चयनयका कथन यथार्थ है, क्योंकि परनिरपेक्ष जो वस्तुका स्वरूप है वही उसके द्वारा कहा गया है। किन्तु व्यवहारनयका कथन उपचरित है, क्योंकि परसापेक्ष वस्तुका स्वरूप तो नहीं है, लेकिन परसापेक्षरूपसे उसकी सिद्धि की गई है।

अतएव अपर पक्षका न तो ‘स्वप्रकाशककी अपेक्षासे आत्मज्ञ और परप्रकाशक की अपेक्षा सर्वज्ञ है ।’ यही कहना आगमानुकूल है और न ‘सर्वज्ञ शब्द स्वयं परसापेक्षका द्योतक है परनिरपेक्षका द्योतक नहीं है ।’ इत्यादि लिखना ही आगमानुकूल है ।

हमारा यह लिखना यथार्थ क्यों है इसके लिए आप्तमीमांसा कारिका ७३ और ७५ पर तथा उनकी अष्टसहस्री टीकापर दृष्टिपात कीजिए ।

\२. अपर पक्षने अपने दूसरे मुद्देमें भी अपने प्रथम मुद्देके कथनको ही दुहराया है कोई नई बात नहीं कही है । अपर पक्षका कहना है कि ‘उस क्षायिक ज्ञानमें निश्चयनयसे आत्मज्ञ नामका धर्म है और व्यवहारनयसे सर्वज्ञ नामका धर्म है। इस प्रकार सर्वज्ञ नामका धर्म अवश्य है किन्तु यह धर्म परसापेक्ष है जैसे घटका ज्ञान, पटका ज्ञान आदि । व्यवहारनयकी अपेक्षासे केवली जिनमें सर्वज्ञता नामका धर्म वास्तविक है अतः केवलीमें सर्वज्ञताके आरोप अर्थात् मिथ्या कल्पनाकी कोई आवश्यकता नहीं है ।’ आदि ।

यह अपर पक्षके वक्तव्यका कुछ अंश है । इसपर विचार करनेके पहले व्यवहारनयके मुख्य दो भेदोंके स्वरूपपर दृष्टिपात कर लेना आवश्यक है। व्यवहारनयके मुख्य भेद दो हैं-असद्भूतव्यवहारनय और सद्भूत-व्यवहारनय । अन्यत्र प्रसिद्ध धर्मका अन्यत्र समारोप करना यह असद्भूत व्यवहारनय है । तथा गुण-गुणी, पर्याय-पर्यायी आदिका भेद दिखलाना सद्भूत व्यवहार है ।

-आलापपद्धति

स्व-परको जानना ज्ञानका स्वरूप है । यहाँ अन्यत्र प्रसिद्ध धर्मका अन्यत्र आरोप नहीं किया गया है, इसलिए तो यह असद्भूत व्यवहारनयका विषय नहीं है । तथा यहाँ स्वरूप कथन किया जा रहा है, कुछ गुण-गुणी आदिका भेद नहीं दिखलाया जा रहा है, इसलिए यह सद्भूत व्यवहारनयका भी विषय नहीं है । ऐसी अवस्थामें वह तीसरा कौनसा व्यवहारनय है जिसकी अपेक्षा अपर पक्ष क्षायिक ज्ञानमें सर्वज्ञ नामका धर्म स्वीकार करता है और फिर सर्वज्ञमें वह धर्म अस्तिरूप होकर भी उसे परसापेक्ष बतलाता है। किसी वस्तुका कोई धर्म उसका स्वरूप हो और फिर उसे परसापेक्ष कहा जाय यह बड़ी विचित्र कल्पना है।

अपर पक्षने अपने अभिप्रायकी पुष्टिमें ‘घटका ज्ञान, पटका ज्ञान’ यह उदाहरण उपस्थित किया है। किन्तु घटज्ञानके कालमें स्व-परको जाननेरूप जो परिणाम हुआ वह ज्ञानका स्वरूप है और स्वतःसिद्ध है । वह घटके रहने पर भी होता है और घटके न रहने पर भी होता है, अन्यथा केवलज्ञान तथा स्मृत्यादि ज्ञानोंकी व्यवस्था ही नहीं बन सकेगी । इतना अवश्य है कि घट-पटमें और ज्ञानमें जो ज्ञाप्य-ज्ञापक व्यवहार होता है वह परस्परकी अपेक्षासे ही सिद्ध होता है । यही कारण है कि हमने भेद विवक्षामें आत्माको ज्ञायक कहना इसे सद्भूत व्यवहारनयका विषय बतलाकर ज्ञेयकी अपेक्षा उसे ज्ञायक कहना इसे उपचरित बतलाया है ।

अपर पक्षने समयसार गा० ३६२ की जयसेनाचार्यकृत टीकाके ‘ननु सौगतोऽपि’ इत्यादि अंशको उपस्थित कर लिखा है कि ‘सर्वज्ञत्व धर्म आत्मामें व्यवहारनयसे होने पर भी सत्य है, आरोपित अर्थात् मिथ्या कल्पना नहीं है ।’ सो इस सम्बन्धमें इतना ही कहना है कि सर्वज्ञता यह केवलज्ञानका स्वरूप है । अपर पक्ष जिस व्यवहारनयसे उसे केवलज्ञानका धर्म बतलाता है वह व्यवहारनय उस पक्षकी अपनी कल्पनामात्र है । इसका तो यह अर्थ हुआ कि वह पक्ष सर्वज्ञताको कल्पनामें सत्य मानता है, वास्तवमें सत्य नहीं मानता । यदि वह पक्ष सर्वज्ञताको वास्तवमें सत्य मानता है तो वह ऐसा क्यों लिखता है कि सर्वज्ञत्व धर्म आत्मामें व्यवहारनयसे है । तब तो उस पक्षकी ओरसे हमारे ही समान यही लिखा जाना चाहिए कि आत्मामें सर्वज्ञत्व धर्म यथार्थमें है। सर्वज्ञता यथार्थ कैसे है और सर्वज्ञतामें आत्मज्ञता तथा आत्मज्ञतामें सर्वज्ञता कैसे अन्तर्निहित है इसका स्पष्टीकरण हम पिछले उत्तरोंमें विशेषरूपसे कर आये हैं।

अपर पक्षने लिखा है कि ‘जब सर्वज्ञता शक्ति आत्माकी है तब उसका आत्मामें कथन करना आरोपित कैसे कहला सकता है? उस शक्तिका स्वरूप ही जब परको जानना है तब परकी अपेक्षा तो उसमें आवेगी ही। परको जाननेका नाम ही परज्ञता है।’

समाधान यह है कि सर्वज्ञत्व शक्ति आत्माकी है। उसे आरोपित न तो हमने लिखा ही है और न वह आरोपित है ही। उस शक्तिका स्वरूप केवल परको जाननेका न होकर सबको जाननेका है। यदि जिनदेव उसद्वारा केवल परको जानें तो उस शक्तिमें परज्ञता बने। किन्तु उसद्वारा वे सबको जानते हैं, इसलिए वह सर्वज्ञतारूप ही सिद्ध होती है।

अपर पक्षका कहना है कि यहाँपर हमारा प्रश्न सर्वज्ञत्वशक्तिकी अपेक्षासे नहीं है, क्योंकि वह तो निगोदिया जीवमें भी है। किन्तु सर्वज्ञतारूप उस परिणतिसे है, वह परिणति सर्व पर वस्तुके आश्रयसे ही मानी जा सकती है। अतएव पर (सर्व ज्ञेय) आश्रित होनेसे व्यवहारनयका विषय हो जाता है।’ आदि।

समाधान यह है कि निगोदिया आदि सब जीवोंमें जो सर्वज्ञत्व शक्ति है उसकी परिणति ही तो सर्वज्ञता है। यह परिणति स्व-परप्रत्यय न होकर स्वप्रत्यय होती है, जो अपने परिणामस्वभावके कारण प्रत्येक समयमें त्रिकालवर्ती और त्रिलोकवर्ती समस्त पदार्थोंको युगपत् जाननेमें समर्थ है। अतएव सर्व पर वस्तुके आश्रयसे इसे स्वीकार करना तो आगमविरुद्ध है ही। किसी भी ज्ञान परिणतिको ज्ञेयके आश्रयसे मानना आगमविरुद्ध है। परीक्षामुख अ० २ सू० ६ में कहा भी है-अर्थ और आलोक ज्ञानकी उत्पत्तिके कारण नहीं हैं, क्योंकि वे परिच्छेद्य हैं। जैसे कि अन्धकार। अतएव हम जो यह भाव व्यक्त कर आये हैं कि ‘आत्माको ज्ञायक कहनेसे उसमें ज्ञेयकी ध्वनि आ जाती है, इसलिए उसपर ज्ञेयकी विवक्षा लागू पड़ जाती है यही उपचार है’ वह यथार्थ है। यहाँ इतना और समझना चाहिए कि सर्वज्ञताका विषय स्व-परज्ञेयरूप समस्त द्रव्यजात है, केवल पर पदार्थ नहीं। अपर पक्ष यदि यह जानले कि जिसे निश्चय दृष्टिमें (स्वरूपरमणताकी दृष्टिमें) आत्मज्ञ कहा है उसे ही परसापेक्ष विवक्षामें सर्वज्ञ कहा है तो नियमसारकी उक्त गाथाका क्या तात्पर्य है यह हृदयंगम करनेमें आसानी जाय।

समयसारमें पर्यायार्थिकनयके विषयको गौणकर विवेचन किया गया है, क्योंकि वहाँ रागादिभावोंसे भिन्न आत्माकी प्रतीति कराना मुख्य है। इसलिए ही वहाँ गाथा ५६ में रागादिको व्यवहारनयसे जीवका बतलाया गया है, किन्तु जब रागादिरूप परिणमना यह जीवका ही अपराध है, कर्मका नहीं यह ज्ञान कराना मुख्य हुआ तब इसका ज्ञान करानेके लिए कर्ता-कर्म अधिकारमें निश्चयसे उनका कर्ता जीवको ही कहा गया है। गा० १०२। सर्वत्र विवक्षा देखनी चाहिए।

अतएव अपर पक्षने समयसार गाथा ५६ को ध्यानमें रखकर जो यह लिखा है कि ‘आपके सिद्धान्तानुसार यदि विभाव परिणमनको इस शक्तिकी अपेक्षासे देखा जाय तो यह भी स्वाश्रित होनेसे निश्चयनयका विषय बन जायगा। किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि समयसार गाथा ५६ में रागादि विभावको जीवके हैं ऐसा व्यवहारनयसे कहा है।’ सो उस पक्षका ऐसा लिखना ठीक नहीं है।

३-६. तीसरे मुद्देमें पिछले कथनको ही दुहराया गया है। अपर पक्ष आत्मज्ञता और सर्वज्ञता ऐसे दो धर्म मानता है। किन्तु इस सम्बन्धमें विशद विवेचन पहले ही कर आये हैं, उससे स्पष्ट हो जायगा कि आत्मज्ञ और सर्वज्ञके कथनमें विवक्षाभेद ही है, अन्य कोई भेद नहीं । अतएव प्रकृतमें आत्मज्ञ और सर्वज्ञ इन दोनोंका एक ही तात्पर्य है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।

\४. किसी भी वस्तुमें कोई भी धर्म परसापेक्ष नहीं होता । हाँ धर्म धर्मी आदिका व्यवहार अवश्य ही परस्परसापेक्ष होता है । यहाँ पर अपर पक्षने असद्भूत व्यवहारका लक्षण आलापपद्धतिसे दिया है । उसका आशय और उसी आलापपद्धतिके ‘अन्यत्र प्रसिद्धस्य धर्मस्य’ इत्यादि कथनका आशय एक ही है । आगे समयसार गा० २७२ की आत्मख्याति टीकाके आधारसे निश्चयनय और व्यवहारनयका लक्षण दिया है । किन्तु प्रकृतमें इन सबके आधारसे चरचा करनेका कोई प्रयोजन नहीं है ।

अपर पक्षने जयधवला पु० १ पृ० २३ के आधारसे यह सिद्ध करना चाहा है कि ‘केवलज्ञान आत्मा और पदार्थकी अपेक्षा रखता है ।’

समाधान यह है कि ज्ञान ज्ञेयके कारण है या ज्ञेय ज्ञानके कारण हैं ऐसा नहीं है, क्योंकि जैसे अभेद विवक्षामें निश्चयनयसे और भेद विवक्षामें उपचरित सद्भूत व्यवहारनयसे जीव और ज्ञानमें परस्पर कार्य-कारण भाव बन जाता है वैसे अन्यत्र ज्ञेय और ज्ञानमें उपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे भी कार्यकारणभाव नहीं बनता । इन दोनोंपर यदि कोई व्यवहार लागू पड़ता है तो ज्ञाप्य-ज्ञापक व्यवहार ही लागू पड़ता है, अतएव जयधवला पु० १ पृ० २३ के उक्त उद्धरणका यह अर्थ करना चाहिए कि केवलज्ञान आत्मसहाय होकर उत्पन्न होता है और परसहाय (परसापेक्ष) होकर उसमें ज्ञापक व्यवहार होता है । इसके सिवा इसका अन्य अर्थ फलित करना आगमानुकूल नहीं है । पर्यायार्थिकनयसे देखा जाय तो केवलज्ञान स्वकालमें स्वयं उत्पन्न होता है, वह अन्य किसीकी अपेक्षा नहीं रखता । हाँ, आत्मा और केवलज्ञानमें धर्म-धर्मी व्यवहार अवश्य ही परस्पर सापेक्ष होता है । इस अपेक्षासे उक्त उद्धरणका यह अर्थ होगा कि केवलज्ञानमें धर्म व्यवहार आत्मसापेक्ष होता है । आचार्य संक्षेपमें वस्तुका निर्देश करते हैं । उसका आशय क्या यह नयविवक्षासे ही समझा जा सकता है ।

अपर पक्षने लिखा है कि ‘इस तरह चूँकि सर्वज्ञतामें पदार्थविषयताकी अपेक्षा है, अतः वह पराश्रित होनेसे व्यवहारनयसे है ।’ आदि ।

समाधान यह है कि सर्वज्ञतामें पदार्थविषयताकी अपेक्षा नहीं होती । सर्वज्ञता और विषयभूत पदार्थोंमें ज्ञाप्य-ज्ञापक व्यवहार अवश्य किया जाता है । प्रवचनसार गाथा २३ में ‘णाणं णेयपमाणमुद्दिट्ठं’ इस वचन-द्वारा प्रत्येक समयमें केवलज्ञान परिणाम किसरूप होता है इसका स्वरूपनिर्देश किया गया है । उस केवलज्ञान परिणामके होनेमें ज्ञेयकी अपेक्षा बनी रहती है यह नहीं कहा गया है । जैसे प्रत्येक समयमें ज्ञेय स्वयं हैं । वह केवलज्ञानके कारण वैसा नहीं है । उसी प्रकार प्रत्येक समयमें केवलज्ञानपरिणाम भी स्वयं है । वह ज्ञेयके कारण वैसा नहीं है । जब कि अपर पक्षने तत्त्वार्थवार्तिक १ । २९ के आधारसे केवलज्ञानमें अनन्तानन्त लोकालोकको जाननेकी शक्ति निश्चयनयसे स्वीकार करली है तो परिणामीसे केवलज्ञान परिणाम अभिन्न होनेके कारण जिस कालमें आत्मा जिसरूप परिणमता है वह तन्मय होकर ही परिणमता है इस नियमके अनुसार सर्वज्ञता आत्मामें निश्चयसे है अर्थात् उस कालमें वह उसका स्वरूप है ऐसा मान लेनेमें अपर पक्ष क्यों हिचकिचाता है। अपर पक्ष सर्वज्ञताको एक ओर तो स्वरूप भी मानता है और दूसरी ओर उसे व्यवहार-नयसे बतलाता है इसे क्या कहा जाय ? हम तो इसे तत्त्वकी विडम्बना ही कह सकते हैं ।

\५. समयसार परिशिष्टमें ४८ तो नहीं ४७ शक्तियोंका निर्देश अवश्य है । उनमेंसे अपर पक्षने अकार्य-कारणत्व शक्ति और अकर्तृत्व शक्तिको परापेक्ष बतलाया है। इसी प्रकार सर्वदर्शित्व और सर्वज्ञत्व शक्तियोंको भी परापेक्ष लिखा है। किन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि जिस शक्तिका जैसा परिणाम (स्वरूप) होता है उसका ही वहाँ निर्देश किया गया है। किसीकी सिद्धिमें परकी अपेक्षा लगाना अन्य बात है। यह व्यवहार है जो यथार्थका ज्ञान करा देता है। पर किसीका स्वरूप परापेक्ष नहीं हुआ करता इसका विशेष विचार पहले ही कर आये हैं।

समयसार गाथा ३५६ और ३६० आदिमें जो निश्चयनय और व्यवहारनयके कथनका निर्देश है उसका आशय इतना ही है कि आत्मा निश्चयसे ज्ञायक है। प्रत्येक समयमें उसमें जो लोकालोकको जानने-देखनेरूप परिणाम होता है वह स्वभावसे होता है, परकी अपेक्षा करके नहीं होता। जैसे भित्ती है, इसलिए सेटिका सफेदरूप परिणम रही है ऐसा नहीं है, किन्तु वह स्वभावसे ही प्रत्येक समयमें भित्तीकी अपेक्षा किये बिना सफेदरूप परिणमती रहती है। उसी प्रकार समस्त ज्ञेय हैं, इसलिए लोकालोकको जानने-देखनेरूप ज्ञान-दर्शन परिणाम होता है ऐसा नहीं है, किन्तु आत्मा प्रत्येक समयमें समस्त ज्ञेयोंकी अपेक्षा किये बिना स्वभावसे ही सकल ज्ञेयोंको जानने-देखनेरूप परिणमता है। यह निश्चयनयका वक्तव्य है। फिर भी ज्ञाप्य-ज्ञापक व्यवहारको ध्यानमें रखकर परसापेक्ष कथन किया जाता है। इसलिए व्यवहारनयसे सर्वज्ञता है ऐसा एकान्त न करके आत्मज्ञता और सर्वज्ञता ये कथनके दो पहलू हैं ऐसा समझना चाहिए। समयसारकी उक्त गाथाओंका तथा उसकी टीकाका यही आशय है।

जो घटादिको जाननेरूप स्वयं ज्ञानपरिणाम हुआ उसीको आचार्य अमृतचन्द्रने घटादिको व्यवहारसे जानना कहा है। वह घटादिको जाननेरूप ज्ञानपरिणाम स्वभावसे हुआ है, घटादिके कारण नहीं हुआ है। फिर भी ज्ञाप्य-ज्ञापकव्यवहार परस्पर सापेक्ष होता है, इसीको व्यवहारसे घटादिका जानना कहते हैं।

व्यवहारनय और उसका विषय क्या है इसका भेदों सहित निर्देश आलापपद्धति और नयचक्रादिसंग्रह आदि ग्रन्थोंमें सुस्पष्ट किया है, उससे आगममें उसे किस रूपमें स्वीकार किया गया है और निश्चयनयसे उसमें क्या भेद है यह स्पष्ट हो जायगा।

\६. अपर पक्षने परमात्मप्रकाश टीकाका जो आशय लिया है उस सम्बन्धमें इतना लिखना ही पर्याप्त है कि सर्वज्ञता केवलज्ञानका परनिरपेक्ष स्वरूप है वह ज्ञेयोंसे नहीं आई है। अतएव हमारे ‘केवली जिन जिस-प्रकार अपने आत्माको तन्मय होकर जानते हैं उस प्रकार पर द्रव्यको तन्मय होकर नहीं जानते।’ इस वाक्यका यह अर्थ हुआ कि केवलीका तन्मय होकर जो ज्ञानपरिणाम हुआ उसमें स्व-परका जानना आगया। अतएव सर्वज्ञताको यदि हम आत्मज्ञतासे भिन्न नहीं कहते तो यथार्थ ही कहते हैं। अपर पक्ष एक ज्ञानपरिणामको दो कहता है। एक ज्ञानपरिणामको आत्मज्ञ कहकर उसे निश्चयनयका विषय बतलाता है, और दूसरेको सर्वज्ञ कहकर उसे व्यवहारनयका विषय बतलाता है इसका हमें आश्चर्य है, क्योंकि वे दो नहीं हैं, विवक्षाभेदसे कथन दो हैं इसे अपर पक्ष स्वीकार ही नहीं करना चाहता और व्यवहारनयके विषयको परमार्थ सिद्ध करनेके फेरमें पड़कर सर्वज्ञताको ही एकान्तसे व्यवहारनयका विषय बना देना चाहता है। किन्तु किसी भी वस्तुमें कोई भी धर्म परसापेक्ष नहीं होता। अतएव परमात्मप्रकाशकी टीकाके आधारसे हम जो कुछ लिख आये हैं वह यथार्थ लिख आये हैं। उसमें ज्ञानस्वरूपका निर्देश करनेके साथ ज्ञानपरिणाम परसे न उत्पन्न होकर भी उसमें परके जाननेरूप व्यवहार कैसे होता है यह स्पष्ट किया गया है।

\७. अपर पक्षने सामायिकपाठ और प्रवचनसार गाथा २०० की टीकाके आधारसे हमारे कथनका ‘सम्भवतः’ पद लिखकर जो आशय फलित करना चाहा है वह फलित न किया जाता तो ठीक होता, क्योंकि ज्ञान ज्ञेयाकार परिणमता है ऐसा जब हम मानते ही नहीं तब सम्भावनामें उसकी चरचा करना ही व्यर्थ है। फिर भी ज्ञान परिणामको समझानेके लिए ज्ञानको साकार कहा ही जाता है-साकारं ज्ञानम्। किन्तु समझदार उसका वही आशय लेता है जो अभिप्रेत होता है। इसका कोई भी समझदार यह आशय नहीं लेता कि ज्ञेयको जानते समय ज्ञान घटाकार हो जाता है। तदुत्पत्ति, तदाकार और तदध्यवसाय ज्ञान होता है यह सिद्धान्त बौद्धोंका है, जैनोंका नहीं। जब अपर पक्ष सर्वज्ञताको परसापेक्ष यथार्थ मानता है तब अवश्य ही यह शंका होती है कि क्या यह पक्ष ज्ञेयोंसे ज्ञानकी उत्पत्ति मानना चाहता है जिसका कि आचार्योंने दर्शनशास्त्रके ग्रन्थोंमें दृढ़तासे खण्डन किया है।

अपर पक्षने पदार्थके तीन भेदोंमेंसे ‘घट’ शब्द और ‘घटज्ञान’ इन दोनोंको पराश्रित माना है जो ठीक नहीं, क्योंकि घट शब्दरूप परिणत शब्दवर्गणाएँ घट शब्दरूप स्वरूपसे हैं, घट पदार्थके कारण नहीं। इन दोनोंमें वाच्य-वाचक व्यवहार अवश्य ही परस्पर सापेक्ष होता है। इसी प्रकार ज्ञानका घटज्ञानरूप परिणाम स्वतःसिद्ध है, घटपदार्थके कारण ज्ञानका वैसा परिणाम नहीं हुआ है। हाँ, घटज्ञान और घटमें ज्ञाप्य-ज्ञापकव्यवहार अवश्य ही परस्पर सापेक्ष है। अपर पक्षका कहना है कि·····‘घटशब्द या घटज्ञानमें जलधारण नहीं हो सकता।·······अतः शब्द व ज्ञानको पदार्थ व्यवहारसे कहा गया है।’ समाधान यह है कि घट शब्द और घटज्ञानकी स्वतन्त्र सत्ता है या नहीं ? यदि अपर पक्ष कहे कि उनकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है तो फिर उन्हें आकाशकुसुमके समान असत्स्वरूप ही मानना पड़ेगा। अपर पक्ष उन्हें आकाशकुसुमके समान असत्स्वरूप तो मानेगा ही नहीं, इसलिए वह कहेगा कि उनकी ऐसे ही स्वतन्त्र सत्ता है जैसे घट पदार्थकी तो फिर उन्हें घटपदार्थके समान परमार्थस्वरूप मान लेनेमें अपर पक्षको कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि वे घटपदार्थका कार्य नहीं कर सकते तो न कर सकें, उनका जो भी कार्य है उसे तो वे करते ही हैं। इसलिए वे घटपदार्थके समान परमार्थस्वरूप ही हैं ऐसा यहाँ समझना चाहिए। अन्यथा घटपदार्थको भी घटशब्द और घटज्ञानका कार्य न कर सकनेके कारण व्यवहारसे पदार्थ स्वीकार करना पड़ेगा और इस प्रकार कोई भी पदार्थ परमार्थस्वरूप नहीं सिद्ध होगा। किन्तु यह ठीक नहीं, इसलिए लोकमें जितने भी पदार्थ हैं वे सभीके सभी स्वरूपसे परमार्थस्वरूप हैं ऐसा समझना चाहिए।

\८. हमने जो यह लिखा है कि ‘स्वरूपसे सर्वज्ञता घटित हो जाने पर जिस समय समस्त ज्ञेयोंकी अपेक्षा उन्हें सर्वज्ञ कहा जाता है तब उनमें यह सर्वज्ञता परकी अपेक्षा आरोपित की जानेके कारण उपचरित सद्भूतव्यवहारसे सर्वज्ञता कहलाती है।’ इसका आशय यह है कि वे स्वरूपसे सर्वज्ञ हैं, क्योंकि सकल पदार्थ साक्षात्करणरूपसे परिणमना यह केवलीका स्वरूप है। किन्तु व्यवहार पराश्रित होता है, इस वचनके अनुसार जब इस सर्वज्ञताको ज्ञेयोंकी अपेक्षा कहा जाता है तब वह कथन व्यवहार हो जाता है ! केवलीका जो स्वरूप है वह परकी अपेक्षा कहा गया यही कथन व्यवहार है, सर्वज्ञता स्वयं व्यवहार नहीं है। परकी अपेक्षा लगाकर कथन करना व्यवहार है। ज्ञेय स्वरूपसे ज्ञेय हैं, ज्ञायक स्वरूपसे ज्ञायक है। मात्र इनका व्यवहार परस्पर सापेक्ष है, इसलिए ज्ञेयज्ञायक सम्बन्ध व्यवहारसे कहा गया है। परमार्थसे इनमें कोई सम्बन्ध नहीं है। अपर पक्षने समयसार गाथा ३६१ की टीकाका जो उद्धरण दिया है उसीसे व्यवहार क्या है यह स्पष्ट हो जाता है। अपर पक्ष सर्वज्ञताको ही व्यवहारनयसे कहना चाहता है जो केवली जिनका स्वरूप है और यथार्थ है। जब कि परकी अपेक्षा लगा कर उसका कथन करना यह व्यवहार है। उक्त टीकामें यही भाव व्यक्त किया गया है। अपर पक्षने जो आलापपद्धतिका उद्धरण दिया है उसमें परज्ञता और परदर्शिताको स्वाभाविक उपचरित बतलाया है। इसका अर्थ यही हुआ कि सर्वज्ञता और सर्व-दर्शिता सिद्धोंका स्वभाव है, किन्तु जब उसे परकी अपेक्षा लगाकर कहा जाता है तब वह व्यवहार हो जाता है।

आत्मज्ञता और परज्ञता दो धर्म नहीं, विवक्षाभेदसे दो कथन हैं। स्वकी अपेक्षा जो आत्मज्ञता कहलाती है उसे ही परकी अपेक्षा परज्ञता कहते हैं। ऐसा निर्णय करने पर ही एकान्तका परिहार हो सकता है। अन्यथा आलापपद्धतिमें जिस एकान्तका निर्देश किया है उस दोषसे वह पक्ष अपनेको बचा नहीं सकता। हमें विश्वास है कि इतने स्पष्टीकरणके बाद अपर पक्ष अपने इस कथनको लौटा लेगा कि ‘उस क्षायिक ज्ञानमें निश्चयनयसे आत्मज्ञ नामका धर्म है और व्यवहार नयसे सर्वज्ञनामका धर्म है। इस प्रकार सर्वज्ञ नामका धर्म अवश्य है किन्तु वह परसापेक्ष है।’ आदि। यदि वह पक्ष इस कथनको लौटा ले और यह स्वीकार कर ले कि जिसे स्वकी अपेक्षा आत्मज्ञ कहते हैं वही परकी अपेक्षा परज्ञ कहलाता है तो निश्चय-व्यवहारनयके कथनकी सुसंगति बैठ जाय और एकान्तका परिहार होकर केवली जिनमें सर्वज्ञता यथार्थ सिद्ध हो जाय।

अपर पक्षने यहाँ प्रवचनसार गाथा.३२ तथा ३८ और नयचक्रादिसंग्रह पृ०११९ के जो उद्धरण दिये हैं वे सब परसापेक्ष कथनको ही व्यवहार नयका विषय सिद्ध कर रहे हैं, सर्वज्ञता व्यवहारनयसे है यह नहीं बतला रहे हैं।

यहाँ पर अपर पक्षने जो यह लिखा है कि ‘स्वमें परका और परमें स्वका अत्यन्ताभाव है।’ इसे पढ़कर हमें प्रसन्नता हुई। यह अकाट्य नियम है जो ज्ञेय-ज्ञायकभाव और कार्य-कारणभाव सबपर लागू होता है। इसका आशय यह है कि ज्ञेय ज्ञानको उत्पन्न करता नहीं, फिर भी ज्ञेयकी अपेक्षा किये विना ज्ञानका ऐसा परिणाम होता है जिसमें ज्ञेय ज्ञात हो जाते हैं। इसी प्रकार कुम्भकार मिट्टीमें कुछ भी व्यापार करता नहीं, फिर भी कुम्भकारके व्यापारकी अपेक्षा किये विना मिट्टी स्वयं ऐसा परिणाम करती है कि घट बन जाता है। जिसने इस निश्चय पक्षको ठीक तरहसे समझा है वही एकका दूसरेमें अत्यन्ताभावको समझ सकता है और तभी व्यवहार पक्ष क्या है यह भी ध्यानमें आता है।

\१०. हमने लिखा था कि ‘ज्ञानका ज्ञेयाकार परिणमन ज्ञेयोंके कारण हुआ है तब वह व्यवहार कहलाता है, क्योंकि ऐसे कथनमें वस्तुकी स्वभावभूत योग्यताको गौणकर उसका पराश्रित कथन किया गया है।’

इस वचनमें यद्यपि टीका लायक कोई बात तो नहीं है। फिर भी अपर पक्षने सर्व प्रथम ‘ज्ञेयाकार परिणमन’ इस पदको अपनी शंकाका विषय बनाया है। जब कि अपर पक्ष यह जानता है कि आगममें ज्ञेयको जाननेके अर्थमें ऐसा प्रयोग होता है। यथा-अथवा चैतन्यशक्तेर्द्वावाकारौ-ज्ञानाकारो ज्ञेयाकारश्च। तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ६। एवमात्माऽर्थाश्चान्योन्यवृत्तिमन्तरेणापि विश्वज्ञेयाकारग्रहणसमर्पणप्रवणाः। प्रवचनसार गा० २८ सूरकृति टीका।

इतनेपर भी जब कि इसकी चरचा नं० ७ में की जा चुकी थी तो पुनः इस चरचाको उठाना कहाँ तक उपयुक्त है इसका वह स्वयं विचार करे।

हमने लिखा है कि ‘ज्ञानका ज्ञेयाकार परिणमन ज्ञेयोंके कारण हुआ है तब वह व्यवहार कथन है।’ आदि। सो यह उचित ही लिखा है, क्योंकि ज्ञेयोंके कारण आत्माज्ञेयोंको जानता है ऐसी जो धारणा बनी हुई है उसका परिहार करना इसका मुख्य प्रयोजन है। ज्ञानमें सब ज्ञात होते हैं यह व्यवहार नहीं है, यह तो ज्ञानपरिणामका स्वरूपाख्यान है। जबतक इसमें परकी अपेक्षा नहीं लगाई जायगी तबतक इसे व्यवहार कथन मानना उचित नहीं है। भगवान् सबको जानते हैं, इसलिए उन्हें सर्वगत कहना एक तो यह व्यवहार है और दूसरे ज्ञानमें सर्व पदार्थ ज्ञात होते हैं, इसलिए सकल ज्ञेयोंको तद्गत कहना एक यह व्यवहार है। व्यवहार पराश्रित होता है, इसलिए जबतक पराश्रितपना नहीं दिखलाया जायगा तबतक कोई भी कथन व्यवहार कथन नहीं बनेगा। स्पष्ट है कि सर्वज्ञता केवलज्ञानीका स्वरूप है वह पराश्रित नहीं वर्तता, अतएव वह आत्मज्ञतारूप ही है, क्योंकि केवलीका प्रत्येक समयमें जो ज्ञानपरिणाम होता है वह अपनेमें अपने द्वारा ही होता है। परन्तु जब उसे अन्य ज्ञेय सापेक्ष कहा जाता है तब उसका आशय होता है-केवली जिन व्यवहारनयसे सबको जानते देखते हैं।

इस पूरी प्रतिशंकाको पढ़नेसे हम तो केवल यह आशय समझे हैं कि जैसे बने वैसे व्यवहारनयको परमार्थरूप सिद्ध किया जाय। तभी तो अपर पक्षने क्षायिक ज्ञानमें आत्मज्ञ और सर्वज्ञ नामके दो धर्म स्वीकार किये और सर्वज्ञ धर्मका अस्तित्व परसापेक्ष बतलाकर सर्वज्ञताको व्यवहारनयका विषय बतलाया। ये दो धर्म क्षायिक ज्ञानमें हैं और उनमेंसे सर्वज्ञ नामका धर्म व्यवहारनयसे है इसे सिद्ध करनेके लिए उन्हें आगमप्रमाण देनेकी भी आवश्यकता नहीं ज्ञात हुई। यदि कोई पूछे कि अपर पक्षने ऐसा क्यों किया तो उसका उत्तर है कि जैसे बने वैसे व्यवहारनयको परमार्थरूप सिद्ध किया जाय। किन्तु व्यवहारनयका कोई विषय ही नहीं है, वह केवल कल्पनामात्र है ऐसा तो हमारी ओरसे कहा ही नहीं गया और न ऐसा है ही। ऐसी अवस्थामें उसकी पुष्टिमें पुनः पुनः ‘ण च ववहारणओ चप्पलओ’ आदि प्रमाणोंको देनेकी अपर पक्षको आवश्यकता ही क्यों हुई इसका निर्णय वह स्वयं करे।

इस प्रकार प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि प्रत्येक आत्मामें जो सर्वज्ञत्व नामकी शक्ति है उसकी अपेक्षा केवलीमें सर्वज्ञता स्वाश्रित है और स्वाश्रितपनेकी अपेक्षा इसीको आत्मज्ञता कहते हैं। इसलिए केवली जिन निश्चयनयसे आत्मज्ञ हैं यह सिद्ध होता है और जब इसीका परसापेक्ष कथन किया जाता है तब ‘पराश्रितो व्यवहारः’ इस नियमके अनुसार यह सिद्ध होता है कि केवली जिन व्यवहारनयसे सबको जानते-देखते हैं।

शंका ८, प्रथम दौर: शंका ८ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५१९ से ५२०

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प्रथम दौर

: १ :

शंका ८

दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवलीआत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं । यदि है तो कौन सम्बन्ध है ? वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवानकी आत्माके सम्बन्धसे ?

समाधान १

उत्तर-दिव्यध्वनिके स्वरूपका निर्णय करते समय सर्व प्रथम विचारणीय यह है कि उसकी उत्पत्ति कैसे होती है ? इसका स्पष्ट निर्देश करते हुए प्रवचनसारमें कहा है-

ठाणणिसेज्जविहारा धम्मुवदेसो य णियदयो तेसिं ।
अरहंताणं काले मायाचारो व्व इत्थीणं ॥४४॥

अर्थ-उन अरिहन्त भगवन्तोंके उस समय खड़े रहना, बैठना, विहार और धर्मोपदेश स्त्रियोंके मायाचारके समान स्वाभाविक ही होता है ॥४४॥

इसकी टीका करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

यथा हि महिलानां प्रयत्नमन्तरेणापि तथाविधयोग्यतासद्भावात् स्वभावभूत एव मायोपगुण्ठनावगुण्ठितो व्यवहारः प्रवर्तते तथा हि केवलिनां प्रयत्नमन्तरेणापि तथाविधयोग्यतासद्भावात् स्थानमासनं विहरणं धर्मदेशना च स्वभावभूता एव प्रवर्तन्ते । अपि चाविरुद्धमेतदम्भोधरदृष्टान्तात् । यथा खल्वम्भोधराकारपरिणतानां पुद्गलानां गमनमवस्थानं गर्जनमम्बुवर्षं च पुरुषप्रयत्नमन्तरेणापि दृश्यन्ते तथा केवलिनां स्थानादयोऽबुद्धिपूर्विका एव दृश्यन्ते, अतोऽमी स्थानादयो मोहोदयपूर्वकत्वाभावात् क्रियाविशेषा अपि केवलिनां क्रियाफलभूतबन्धसाधनानि न भवन्ति ॥४४॥

अर्थ-जैसे स्त्रियोंके प्रयत्नके बिना भी उस प्रकारकी योग्यताका सद्भाव होनेसे स्वभावभूत ही मायाके ढक्कनसे ढका हुआ व्यवहार प्रवर्तता है उसी प्रकार केवली भगवानके बिना ही प्रयत्नके उस प्रकारकी योग्यताका सद्भाव होनेसे खड़े रहना, बैठना, विहार और धर्मदेशना स्वभावभूत ही प्रवर्तते हैं और यह बादलके दृष्टान्तसे अविरुद्ध है । जैसे बादलके आकाररूपसे परिणत हुए पुद्गलोंका गमन स्थिरता गर्जन और जलवृष्टि पुरुष प्रयत्नके बिना भी देखी जाती है उसी प्रकार केवली भववानका खड़े रहना आदि अबुद्धिपूर्वक ही देखा जाता है । इसलिये यह स्थानादिक मोहोदयपूर्वक न होनेसे क्रियाविशेष होनेपर भी केवली भगवानके क्रियाफलभूत बन्धके साधन नहीं होते ॥४४॥

तात्पर्य यह है कि केवली जिनके मोहका अभाव होनेके कारण इच्छाका अभाव है और इच्छाका अभाव होनेसे बुद्धिपूर्वक प्रयत्नका भी अभाव है । फिर भी चार अघाति कर्मोंके उदयका सद्भाव होनेसे उनके स्थान, आसन और विहाररूप काययोनसम्बन्धी क्रियाऐं तथा निश्चय-व्यवहारके धर्मोपदेशको लिए हुए दिव्यध्वनिरूप वचनयोगसम्बन्धी क्रिया सहज ही होती है। अतएव दिव्यध्वनिका तीर्थंकर प्रकृति आदिके उदयके साथ असद्भूत व्यवहार नयकी अपेक्षा निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध मुख्यतासे वहाँ पर स्वीकार किया गया है। कारण कि तीर्थंकर प्रकृति आदिका उदय स्वतन्त्र द्रव्यकी अवस्था है और दिव्यध्वनि स्वतन्त्र द्रव्यकी अवस्था है। और दो या दो से अधिक द्रव्यों और उनकी पर्यायोंमें जो सम्बन्ध होता है वह असद्भूत ही होता है।

अब रही दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकता और अप्रामाणिकताकी बात सो व्यवहार निश्चयमोक्षमार्ग छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय, नौ पदार्थ और सात तत्त्व आदिके यथार्थ निरूपणकी उसकी सहज योग्यता होनेसे उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है। परन्तु व्यवहार नयकी अपेक्षा विचार करने पर वह पराश्रित कही जाती है। उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है इस तथ्यको स्पष्ट करते हुए आचार्य श्री अमृतचन्द्र समयसार गाथा ४१५ की टीकामें कहते हैं-

यः खलु समयसारभूतस्य भगवतः परमात्मनोऽस्य विश्वप्रकाशकत्वेन विश्वसमयस्य प्रतिपादनात् स्वयं शब्दब्रह्मायमाणं शास्त्रमिदम्।

तात्पर्य यह है कि यह शास्त्र विश्वका प्रकाशक होनेसे विश्व समयस्वरूप समयसारभूत भगवान् आत्माका प्रतिपादन करता है, इसलिये जो स्वयं शब्दब्रह्मके समान है।

इसी तथ्यको वे पुनः इन शब्दोंमें स्वीकार करते हैं-

स्वशक्तिसंसूचितवस्तुतत्त्वैर्व्याख्या कृतेयं समयस्य शब्दैः।
स्वरूपगुप्तस्य न किञ्चिदस्ति कर्तव्यमेवामृतचन्द्रसूरेः ॥२७८॥

अर्थ-जिसने अपनी शक्तिसे वस्तुतत्त्वको भली भाँति कहा है ऐसे शब्दोंने इस समयकी व्याख्या की है, स्वरूपगुप्त अमृतचन्द्र सूरिका कुछ भी कर्तव्य नहीं है ॥२७८॥

शंका ८, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५२० से ५२३

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द्वितीय दौर

: २ :

शंका ८

प्रश्न यह था-दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं? यदि है तो कौन सम्बन्ध है? वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्की आत्माके सम्बन्धसे?

प्रतिशंका २

उक्त प्रश्नके निम्नलिखित खण्ड हैं-

(१) दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं? (२) दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्माके साथ कौन सम्बन्ध है ?

(३) दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवलीके साथ सम्बन्ध सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?

(४) दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ?

(५) दिव्यध्वनि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्‌की आत्माके सम्बन्धसे ?

इनमें खण्ड नं० १, २ और ३ का आपने उत्तर नहीं दिया। अन्य खण्डोंका उत्तर देते हुए यद्यपि आपने दिव्यध्वनिको प्रमाण माना है लेकिन उसे स्वाश्रित प्रमाण माना है। यह संभव नहीं है, क्योंकि शब्द जड़ पुद्‌गलकी पर्याय होनेसे न तो प्रमाणरूप हो सकते हैं और न अप्रमाणरूप ही। शब्दोंकी प्रामाणिकता और अप्रामाणिकता वक्ताके ही आश्रित हुआ करती है। जैसा कि धवल पुस्तक १ पृष्ठ ७२ पर कहा गया है-

वक्तृप्रामाण्याद्वचनप्रामाण्यम्।

अर्थ-वचनोंकी प्रमाणता वक्ताकी प्रमाणतासे होती है।

समन्तभद्र स्वामीने 'रत्नकरण्डश्रावकाचारमें शास्त्रका लक्षण करते समय उसकी प्रामाणिकता सिद्ध करनेके लिये सर्वप्रथम उसे 'आप्तोपज्ञ’होना बतलाया है। इसी प्रकार आचार्य माणिक्यनन्दीने भी आगमका लक्षण करते समय उसे ‘आप्तवचनादिनिबन्धन’ होना प्रकट किया है।

आप्तोपज्ञमनुल्लङ्घ्यमदृष्टेष्टविरोधकम्।
तत्त्वोपदेशकृत्सार्वं शास्त्रं कापथघट्टनम्॥ ९॥
-रत्नकरण्डश्रावकाचार

आप्तवचनादिनिबन्धनमर्थज्ञानमागमः।
-परीक्षामुख अ० २, सू० ९४

समन्तभद्रस्वामीने देवागमस्तोत्रकी ७८वीं कारिकामें आगमसाधित वस्तुका लक्षण लिखते हुए उसके वक्ताको आप्त होना आवश्यक माना है। कारिका इस प्रकार है-

वक्तर्यनाप्ते यद्धेतोः साध्यं तद्धेतुसाधितम्।
आप्ते वक्तरि तद्वाक्यात्साध्यमागमसाधितम्॥७८॥

अर्थ-वक्ताके अनाप्त होने पर जो वस्तु हेतुसे साध्य है वह हेतुसाधित है और वक्ताके आप्त होने पर उसके वचनसे जो साध्य है वह आगमसाधित है।

इसी देवागमस्तोत्रकी ६वीं कारिकामें भगवान् महावीरकी निर्दोषता प्रमाणित करनेके लिये समन्तभद्र स्वामीने युक्ति और शास्त्रसे अविरोधी वक्तृत्वको हेतुरूपसे उपस्थित किया है। कारिका यह है-

स त्वमेवासि निर्दोषो युक्तिशास्त्राविरोधिवाक्।
अविरोधो यदिष्टं ते प्रसिद्धेन न बाध्यते॥६॥

अर्थ-हे भगवन्! आप निर्दोष हैं, क्योंकि आपके वचन युक्ति और शास्त्रसे अविरोधी हैं। आपके वचन युक्ति और शास्त्रसे अविरोधी इसलिये हैं कि आपका शासन प्रमाणसे बाधित नहीं है।

आपने निमित्त कारणकी उपेक्षाकर दिव्यध्वनिको मात्र स्वभावसिद्ध सूचित किया है वह विचारणीय है, क्योंकि आगममें उसे केवलीका कार्य स्वीकृत किया है। इसके लिए धवल पुस्तक १ पृष्ठ ३६८ पर वीरसेनाचार्यके निम्नाङ्कित वचन द्रष्टव्य हैं-

तत्र मनसोऽभावे तत्कार्यस्य वचसोऽपि न सत्त्वम् ? इति चेत् न, तस्य ज्ञानकार्यत्वात् ।

अर्थ-यहाँ कोई प्रश्न करता है कि जब केवलीके मनका अभाव है तब उसके कार्यरूप वचनका सद्भाव कैसे माना जा सकता है ? यह प्रश्न ठीक नहीं है, क्योंकि वचन ज्ञानका कार्य है ।

रत्नकरण्डश्रावकाचारमें श्री स्वामी समन्तभद्रने भी यही बात कही है-

अनात्मार्थं विना रागैः शास्ता शास्ति सतो हितम् ॥ ८ ॥ ( पूर्वार्ध )

अर्थ-केवलज्ञानी आप्त वीतराग होता हुआ भी आत्मप्रयोजनके बिना भव्यप्राणियोंके हितका उपदेश देता है ।

इस कथनसे यह अभिप्राय निकलता है कि दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकता वस्तुतः केवलज्ञान अथवा केवलज्ञानीके आश्रित है, स्वाश्रित नहीं ।

आपने वचनवर्गणाकी स्वाश्रित प्रमाणता सिद्ध करनेके लिये जो समयसारकी अन्तिम ४१५ गाथाकी श्री अमृतचन्द्रसूरिकृत टीकाके वाक्यांश तथा अन्तिम कलश पद्यको उपस्थित किया है उससे वचनवर्गणाकी स्वाश्रित प्रमाणता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि एक तो उपर्युक्त प्रमाणोंके अनुसार जैनागममें वचनकी स्वाश्रित प्रमाणता नहीं स्वीकृत की गई है । दूसरी बात यह है कि अन्तिम कलशसे श्री अमृतचन्द्रसूरिने समयसारकी टीका समाप्त करते हुए अपनी लघुता प्रकट की है व अपनी टीकामें समयसारका माहात्म्य प्रकट किया है, सिद्धान्तका प्रतिपादन नहीं किया है ? श्री अमृतचन्द्रसूरिने स्वरचित पुरुषार्थसिद्धयुपाय तथा तत्त्वार्थसार आदिमें भी इसी पद्धतिको अपनाया है ।

आपने जो तीर्थंकर प्रकृतिके उदय और दिव्यध्वनिका असद्भूतव्यवहार नयसे निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध प्रतिपादित किया है वह संगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि दिव्यध्वनि सामान्य केवलीकी भी खिरती है तथा हमारा प्रश्न भी सामान्य रूपसे केवलज्ञान व केवलज्ञानी आत्माके साथ दिव्यध्वनिके सम्बन्धविषयक है ।

आपने धर्मदेशना (दिव्यध्वनि)को प्रवचनसार गाथा ४४ के आधारपर जो केवलीका स्वभावभूत प्रवर्तन बतलाया है वह दिव्यध्वनिकी स्वाश्रित प्रमाणताका विघातक है, क्योंकि उस गाथा तथा उसकी अमृतचन्द्रसूरिकृत टीकासे दिव्यध्वनि केवली भगवान्‌की ही क्रिया सिद्ध होती है । इस गाथामें स्वभावभूतका अर्थ बिना इच्छासे है । इस बातकी पुष्टि श्री समन्तभद्राचार्य विरचित स्वयंभूस्तोत्रके निम्न लिखित पद्यसे भी होती है-

काय-वाक्य-मनसां प्रवृत्तयो नाभवंस्तव मुनेश्चिकीर्षया ॥ ७५ ॥

अर्थ-हे भगवन् ! आपकी मन, वचन और कायकी प्रवृत्तियाँ बिना इच्छाके ही हुआ करती हैं ।

इस तरह आपका कथन प्रमाणसंगत नहीं कहा जा सकता है ।

अन्तमें हमारा निवेदन है कि आप हमारे उल्लिखित प्रश्नके तीन खण्डोंका उत्तर अवश्य देंगे ।

‘दो या दो से अधिक द्रव्यों और उनकी पर्यायोंमें जो सम्बन्ध है वह असद्भूत ही होता है’ यह आपने लिखा है, इसमें असद्भूत पदसे आपका आशय क्या झूठसे है या अन्य किसी अर्थ से ? इसका भी अवश्य स्पष्टीकरण करेंगे ।

शंका ८

मूल प्रश्न-दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवलीकी आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं ? यदि है तो कौन सम्बन्ध है ? वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्की आत्माके सम्बन्धसे ?

शंका ८, द्वितीय दौर: प्रतिशंका २ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५२३ से ५२६

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प्रतिशंका २ का समाधान

इसके उत्तरस्वरूप आचार्यवर्य कुन्दकुन्द और अमृतचन्द्रसूरिके आगमप्रमाण देकर मीमांसा की गई थी। साथ ही उस आधारसे यह बतलाया गया था कि उनकी दिव्यध्वनि स्वाभाविक होती है। प्रवचनसारकी ४४ नं० की गाथामें ‘णियदयो’ शब्द आया है, उसका अर्थ आचार्य अमृतचन्द्रने ‘स्वाभाविक’ किया है। आचार्य कुन्दकुन्दने तो स्त्रियोंकी मायाके समान उसे स्वाभाविकी बतलाया है। साथ ही अमृतचन्द्रसूरिने अपनी टीकामें मेघका दृष्टान्त देकर यहाँ ‘स्वाभाविक’ पदका क्या अर्थ है यह और भी स्पष्ट कर दिया है। लोकमें पुरुष प्रयत्नके बिना अन्य जितने कार्य होते हैं उनको जिनागममें ‘विस्रसा’ कार्य स्वीकार किया गया है।-देखो समयसार गाथा ४०६, सर्वार्थसिद्धि अ० ५ सू० २४।

यह तो सुविदित सत्य है कि केवली भगवान्के राग द्वेष और मोहका सर्वथा अभाव हो जानेके कारण परम वीतराग निश्चयचारित्र प्रगट हुआ है। इसलिये इच्छाके अभावमें प्रयत्नके विना ही उनके धर्मोपदेश आदिकी क्रिया होती है। इतना स्पष्टीकरण करनेके बाद भी इस सम्बन्धमें मूल प्रश्नके खण्ड पाड़कर पुनः विशेष जाननेकी जिज्ञासा की गई है। प्रतिशंकाके अनुसार उक्त प्रश्नके विभाग इस प्रकार हैं-

\१. दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्माके साथ कोई सम्बन्ध है या नहीं ?

\२. दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्माके साथ कौन सम्बन्ध है ?

\३. दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवलीके साथ सम्बन्ध सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?

\४. दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ?

\५. दिव्यध्वनि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्की आत्माके सम्बन्धसे ?

यहाँ इन शंकाओंका समाधान करनेके पूर्व प्रकृतमें उपयोगी कतिपय आवश्यक सिद्धान्तोंका प्रतिपादन कर देना आवश्यक प्रतीत होता है।

(अ) आत्मा व्याप्य-व्यापक भावसे तन्मयताका प्रसंग आनेके कारण पर द्रव्योंकी पर्यायोंका कर्ता नहीं है।

(आ) सामान्य आत्मा निमित्त-नैमित्तिकभावसे परद्रव्योंकी पर्यायोंका कर्ता नहीं है। अन्यथा नित्य निमित्तकर्तृत्वका प्रसंग आता है।

(इ) अज्ञानी जीवके योग और उपयोग (रागभाव) पर द्रव्योंकी पर्यायोंके निमित्तकर्ता हैं।

(ई) आत्मा अज्ञानभावसे योग और उपयोगका कर्ता है। तथापि पर द्रव्योंकी पर्यायोंका कर्ता कदाचित् भी नहीं है।

(उ) आत्मा ज्ञानभावसे परद्रव्योंकी पर्यायोंका निमित्तकर्ता भी नहीं है।

ये मूल सिद्धान्त हैं जिनका श्री समयसारजीकी ९९ और १०० नं० की गाथा और उनकी टीकामें स्पष्टीकरण किया है। इसलिये प्रतिशंकारूपसे उपस्थित किये गये पूर्वोक्त प्रश्नोंपर विचार करते समय इन सिद्धान्तोंको ध्यानमें लेनेकी अत्यन्त आवश्यकता है। साथ ही यह नियम भी है कि अरिहन्त जिनकी दिव्यध्वनि के समय ओष्ठ, तालु आदिका व्यापार भी नहीं होता। कहा भी है-

यत्सर्वात्महितं न वर्णसहितं न स्पन्दितोष्ठोदयं
नो वांछाकलितं न दोषमलिनं नोच्छ्वासरुद्धक्रमम् । शान्त्यमर्षं विषैः समं पशुगणैराकर्णितं कर्णिभिः
तन्नः सर्वविदो विनष्टविपदः पायादपूर्वं वचः॥

इस श्लोकमें आये हुये ‘न वर्णसहितं न स्पन्दितोष्ठोदयं’ ये दोनों पद ध्यान देने योग्य हैं। इनका तात्पर्य यह है कि दिव्यध्वनि अ, आ आदि स्वरवर्णों तथा क, ख आदि व्यंजनवर्णोंसे रहित होती है और दिव्यध्वनिके समय ओठ आदिका व्यापार भी नहीं होता। इसके साथ एक बात और है और वह यह कि उनकी औदयिकी क्रियाको प्रवचनसारजीमें क्षायिकी बतलाया है। स्पष्टीकरण करते हुए प्रवचनसार गाथा ४५ में कहा है-

पुण्णफला अरहंता तेसिं किरिया पुणो हि ओदइया।
मोहादीहिं विरहिया तम्हा सा खाइग त्ति मदा॥४५॥

अरहन्त भगवान पुण्यफलवाले हैं और उनकी क्रिया औदयिकी है, मोहादिसे रहित हैं, इसलिये वह क्षायिकी मानी गई है॥४५॥

अर्हन्तः खलु सकलसम्यक्परिपक्वपुण्यकल्पपादपफला एव भवन्ति। क्रिया तु तेषां या काचन सा सर्वापि तदुदयानुभावसंभावितात्मसंभूतिया किलौदयिक्येव। अथैवंभूतापि सा समस्तमहामोहमूर्धाभिषिक्तस्कन्धावारस्यात्यन्तक्षये संभूतत्वान्मोहरागद्वेषरूपाणामुपरंजकानामभावाच्चैतन्यविकारकारणतामनासादयन्ती नित्यमौदयिकी कार्यभूतस्य बन्धस्याकारणभूततया कार्यभूतस्य मोक्षस्य कारणभूततया च क्षायिक्येव कथं हि नाम नानुमन्येत। अथानुमन्येत चेत्तर्हि कर्मविपाकोऽपि न तेषां स्वभावविघाताय॥४५॥

अर्थ-अरहन्त भगवान् जिनके वास्तवमें पुण्यरूपी कल्पवृक्षके समस्त फल भलीभांति परिपक्व हुए हैं ऐसे ही हैं और उनकी जो भी क्रिया है वह सब उस (पुण्य) के उदयके प्रभावसे उत्पन्न होनेके कारण औदयिकी हो है। किन्तु ऐसी होने पर भी वह सदा औदयिकी क्रिया महामोह राजाकी समस्त सेनाके सर्वथा क्षयसे उत्पन्न होती है, इसलिये मोह, राग, द्वेषरूपी उपरंजकोंका अभाव होनेसे चैतन्यके विकारका कारण नहीं होती, इसलिये कार्यभूत बन्धकी अकारभूततासे और कार्यभूत मोक्षकी कारणभततासे क्षायिकी ही क्यों न माननी चाहिये ? (अवश्य माननी चाहिये।) और जब क्षायिकी ही माने तब कर्मविपाक (कर्मोदय) भी उनके (अरहन्तोंके) स्वभाव विघातका कारण नहीं होता। (यह निश्चित होता है)॥४५॥

इस प्रकार इन प्रमाणोंके प्रकाशमें ज्ञानीके ज्ञान-भावकी दृष्टिसे विचार करनेपर विदित होता है कि ज्ञानी मात्र ज्ञानभावका कर्ता है, वह परभावका निमित्तकर्ता भी नहीं है। श्री समयसारकलशमें कहा है-

ज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ताः सर्वे भावाः भवन्ति हि।
सर्वेऽप्यज्ञाननिर्वृत्ता भवन्त्यज्ञानिनस्तु ते॥६७॥

अर्थ-ज्ञानीके समस्त भाव ज्ञानसे रचित होते हैं और अज्ञानीके समस्त भाव अज्ञानसे रचित होते हैं ॥६७॥

स्पष्ट है कि अरिहन्त भट्टारक केवली जिनके केवलज्ञानकी दृष्टिसे विचार करने पर तो यही विदित होता है कि केवलज्ञानमें जिस प्रकार अन्य अनन्त पदार्थ ज्ञेयरूपसे प्रतिविम्बित होते हैं उसी प्रकार दिव्यध्वनिरूपसे परिणत होनेवाली भाषावर्गणाऐं भी प्रतिविम्बित होती हैं। इसलिये केवलज्ञानकी दिव्यध्वनिके प्रवर्तनमें वही स्थिति रहती है जो अन्य पदार्थोंके परिणमनमें रहती है अर्थात् केवलीका उपयोग दिव्यध्वनिके प्रवर्तनके लिये उपयुक्त होता हो ऐसा नहीं है। इसी प्रकार दिव्यध्वनिके लिये शरीरकी क्रिया द्वारा वाचनिक प्रवृत्ति होना भी सम्भव नहीं है। फिर भी दिव्यध्वनिका प्रवर्तन तो होता ही है और अरिहन्त भट्टारकके तीर्थंकरप्रकृतिके उदयके साथ चार अघाति कर्मोंका उदय तथा योगप्रवृत्ति भी पाई जाती है। अतः इस दृष्टिसे विचार करने पर यही निर्णीत होता है कि-

(१-२) केवली जिनके साथ दिव्यध्वनिका योग अपेक्षासे निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है ऐसा प्रवचनसार गाथा ४५ की टीकामें लिखा है।

(३) केवली और दिव्यध्वनि भिन्न-भिन्न चेतन और जड़ द्रव्य हैं, इसलिये उनका जो व्यवहारसे निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध दिखलाया गया है वह उपचरित सत्य है।

(४) केवलीके सत्य और अनुभय ये दो वचनयोग होते हैं इसी प्रकार दिव्यध्वनि भी सत्य और अनुभयरूप होती है, क्योंकि उसके द्वारा सत्यार्थ और अनुभयरूप अर्थका प्रकाशन होता है।

(५) दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकता और स्वाश्रितताको ठीक तरहसे जाननेके लिये जयधवला पुस्तक १का यह प्रमाण पर्याप्त है। वहाँ कहा है-

शब्दो अर्थस्य निःसम्बन्धस्य कथं वाचक इति चेत् ? प्रमाणमर्थस्य निःसम्बन्धस्य कथं ग्राहकमिति समानमेतत्। प्रमाणार्थयोर्जन्य-जनकलक्षणः प्रतिबन्धोऽस्तीति चेत् न, वस्तुसामर्थ्यस्यन्यतः समुत्पत्ति-विरोधात् ।

अत्रोपयोगी श्लोक :-

स्वतः सर्वप्रमाणानां प्रमाणमिति गृह्यताम्।
न हि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तुं मन्येन पार्यते ॥९२॥

प्रमाणार्थयोः स्वभावत एव ग्राह्यग्राहकभावश्चेत्, तर्हि शब्दार्थयोः स्वभावत एव वाच्यवाचकभावः किमिति नेष्यते, अविशेषात् ? यदि स्वभावतो वाच्यवाचकभावः किमिति पुरुषव्यापारमपेक्षते चेत् ? प्रमाणेन स्वभावतोऽर्थसम्बन्धेन किमितीन्द्रियमालोको वा अपेक्ष्यत इतिसमानमेतत्। शब्दार्थसम्बन्धः कृत्रिमत्वाद्वा पुरुषव्यापारमपेक्षते।
-जयधवला पु० ६, पृ० २३९।

शंका-शब्दका अर्थके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है तो वह अर्थका वाचक कैसे हो सकता है ?

समाधान-प्रमाणका अर्थके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है तो वह अर्थका ग्राहक कैसे हो सकता है यह भी समान है। अर्थात् प्रमाण और अर्थका कोई सम्बन्ध न होने पर भी जैसे वह अर्थका ग्रहण कर लेता है वैसे ही शब्दका अर्थके साथ कोई सम्बन्ध न रहनेपर भी शब्द अर्थका वाचक हो जाय, इसमें क्या आपत्ति है।

शंका-प्रमाण और अर्थमें जन्य-जनकलक्षण सम्बन्ध पाया जाता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि वस्तुकी शक्तिकी अन्यसे उत्पत्ति माननेमें विरोध आता है । यहाँ इस विषयमें उपयोगी श्लोक देते हैं-

सब प्रमाणोंमें स्वतः प्रमाणता स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि जो शक्ति पदार्थमें स्वतः विद्यमान नहीं है वह अन्यके द्वारा नहीं की जा सकती है ॥९२॥

यदि प्रमाण और अर्थमें स्वभावसे ही ग्राह्यग्राहकभावसम्बन्ध स्वीकार किया जाता है तो शब्द और अर्थमें स्वभावसे ही वाच्य-वाचकभावसम्बन्ध क्यों नहीं मान लिया जाता है, क्योंकि जो आक्षेप और समाधान शब्द और अर्थके सम्बन्धके विषयमें किये जाते हैं वे सब प्रमाण और अर्थके सम्बन्धके विषयमें भी लागू होते हैं, दोनोंमें कोई विशेषता नहीं है ।

शंका-शब्द और अर्थमें यदि स्वभावसे ही वाच्य-वाचकभाव सम्बन्ध है तो फिर वह पुरुषव्यापारकी अपेक्षा क्यों करता है ?

समाधान-प्रमाण यदि स्वभावसे ही अर्थसे सम्बद्ध है तो फिर वह इन्द्रिय-व्यापार या आलोककी अपेक्षा क्यों करता है ? इस प्रकार शब्द और प्रमाण दोनोंमें शंका और समाधान समान हैं । फिर भी यदि प्रमाणको स्वभावसे ही पदार्थोंका ग्रहण करनेवाला माना जाता है तो शब्दको भी स्वभावसे ही अर्थका वाचक मानना चाहिये ।

अथवा शब्द और पदार्थका सम्बन्ध कृत्रिम है, इसलिये वह पुरुषके व्यापारकी अपेक्षा रखता है-

इस प्रकार जयधवलाके इस उल्लेखसे निश्चित होता है कि वास्तवमें दिव्यध्वनिकी प्रमाणता स्वाश्रित है, क्योंकि यदि उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित नहीं मानी जाती है तो वह अन्यसे उत्पन्न नहीं की जा सकती । फिर भी असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा विचार करने पर जैसा कि हम पूर्वमें लिख आये हैं वह तीर्थंकर आदि प्रकृतियोंके उदयके निमित्तसे होनेसे पराश्रित भी कही गई है । यहाँ पर तीर्थंकर प्रकृतिके साथ आदि पदका उल्लेख अन्य केवलियोंको लक्ष्यमें रखकर किया गया है । तथा योगकी अपेक्षा सर्वज्ञदेवकी भी उसमें निमित्तता है ।

श्री अमृतचन्द्रसूरिने समयसारके अन्तमें शब्दागमके स्वरूपको बतानेवाले जो वचन लिखे हैं उसमें केवल अपनी लघुता ही नहीं दिखलाई है, किन्तु शब्दकी स्वाश्रित प्रमाणताको मुख्यकर ही वह वचन लिखा गया है । जैसा कि जयधवलाके पूर्वोक्त प्रमाणसे स्पष्ट है । इसी प्रकार ‘आप्तोपज्ञ’ ‘आप्तवचनादिनिबन्धनं’ ‘आप्ते वक्तरि’ ‘युक्तिशास्त्राविरोधिवाक्’ शब्दोंका प्रयोग पूर्वोक्त अभिप्रायसे ही किया गया है । इसी प्रकार समयसार गाथा ४१५की टीकामें शब्दब्रह्मकी स्वतः प्रमाणता एक सिद्धान्तके रूपमें प्रतिपादित है, न कि लघुताप्रकाशनके रूपमें ।

शंका ८, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५२७ से ५३४

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तृतीय दौर

: ३ :

शंका ८

दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवलीकी आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं ? यदि है तो कौन सम्बन्ध है ? वह सत्यार्थ या असत्यार्थ ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्की आत्माके सम्बन्धसे ?

प्रतिशंका ३

इस प्रश्नके प्रथम उत्तरमें आपने दिव्यध्वनिकी उत्पत्तिके विषयमें बहुत कुछ विवेचन किया जब कि दिव्यध्वनिकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें प्रश्न नहीं था । उसके पश्चात् दिव्यध्वनिकी स्वाश्रित प्रामाणिकता बतलाकर अपना उत्तर समाप्त कर दिया । दिव्यध्वनिका केवलज्ञान या केवलीकी आत्मासे सम्बन्धविषयक प्रश्नोंको आपने छुआ तक नहीं । चुनाचें हमने अपने प्रत्युत्तरमें मूल प्रश्नके निम्न पाँच खण्ड करके आपसे पुनः उन प्रथम तीन खण्डोंके उत्तर देनेको जोर दिया जिनको आपने अपने प्रथम उत्तरमें ओझल कर दिया था और दिव्यध्वनि जड़ होनेके कारण उसकी स्वाश्रित प्रामाणिकताका मण्डन करते हुए आर्षग्रन्थोंके प्रमाणों द्वारा यह सिद्ध किया था कि दिव्यध्वनिके वक्ता केवलज्ञानी हैं और वक्ताकी प्रमाणतासे वचनोंकी प्रमाणता होती है तथा दिव्यध्वनि केवलज्ञानका कार्य है ।

मूल प्रश्नके खण्ड

१-दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवलीको आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं ?

२-दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवली आत्माके साथ कौन सम्बन्ध है ?

३-दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवलीके साथ सम्बन्ध सत्यार्थ है या असत्यार्थ ?

४-दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ।

५-दिव्यध्वनि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवानकी आत्माके सम्बन्धसे ?

आपने अपने द्वितीय उत्तरमें भी प्रश्नके प्रथम तीन खण्डोंका जो उत्तर दिया है उसमें केवली जिन और दिव्यध्वनिके सम्बन्धको गोलमाल शब्दोंमें बतलानेका तो प्रयत्न किया गया है, किन्तु केवलज्ञान व केवलीकी आत्माका दिव्यध्वनिसे क्या सम्बन्ध है इस विषयमें एक भी शब्द नहीं लिखा । इससे ज्ञात होता है कि आप प्रश्नके प्रथम तीन खण्डोंका उत्तर देना नहीं चाहते, क्योंकि इनका यथार्थ उत्तर देनेमें आपकी मान्यता खण्डित हो जाती है । आपने हमारे इन आर्षग्रन्थोंके प्रमाणोंमेंसे कुछ प्रमाणोंको तो सर्वथा ओझल कर दिया । हमने नाना आर्षग्रन्थोंके प्रमाण देकर यह सिद्ध किया था कि दिव्यध्वनिकी प्रमाणता वक्ताकी प्रमाणतासे है और केवलज्ञानका कार्य है, अतः दिव्यध्वनिमें पराश्रित प्रमाणता है । मात्र चार प्रमाणोंके एक दो शब्दोंको लिखकर मात्र यह लिखा है-‘इसी प्रकार ‘आप्तोपज्ञ’ ‘आप्तवचनादिनिबंधनं’ ‘आप्ते वक्तरि’ युक्तिशास्त्राविरोधवाक्’का प्रयोग पूर्वोक्त प्रकारसे ही किया गया है ।’ इन चार प्रमाणोंका इन गोलमाल शब्दों द्वारा मात्र उल्लेख किया गया है, उत्तर कुछ नहीं दिया गया । इस प्रकार प्रश्नके खण्ड नं० ४ व ५ के विषयमें भी हमारे प्रमाणोंका उत्तर न देकर अपनी पूर्व मान्यताको ही पकड़े रहे । प्रथम उत्तरमें आपने लिखा था ‘दो या दोसे अधिक द्रव्यों और उनकी पर्यायोंमें जो सम्बन्ध होता है वह असद्भूत ही होता है ।’ हमने पूछा था कि 'असद्भूत’से आपका क्या आशय है ? किन्तु आपने इस विषयमें एक अक्षर भी नहीं लिखा ।

आपने अपने द्वितीय उत्तरमें आगमविरुद्ध तथा अपनी मान्यताके विरुद्ध दो द्रव्यों तथा उनकी पर्यायोंमें परस्पर कर्ता-कर्मके कुछ सिद्धान्त लिख दिये हैं जो कि अप्रासंगिक है, क्योंकि कर्ता-कर्मसम्बन्धी मूल प्रश्न ही नहीं है । आपने प्रश्न नं० १ के प्रथम उत्तरमें यद्यपि निमित्तकर्ताको स्वीकार करनेसे इन्कार कर दिया, किन्तु द्वितीय उत्तरमें हेतुकर्ता अर्थात् निमितकर्ताको स्वीकार कर लिया है । सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थके आधारपर कालद्रव्यको भी हेतुकर्ता स्वीकार किया है । इतना ही नहीं, आपने प्रथम तथा द्वितीय उत्तरमें निम्न शब्दोंके द्वारा जीवको जड़ द्रव्यका कर्ता स्वीकार कर लिया है। फिर भी आप इस प्रश्नके उत्तरमें हेतुकर्ताको स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इस प्रश्नके प्रथम उत्तरमें आपने लिखा है-‘इसकी टीका करते हुए आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं ।’ ‘आचार्य श्री अमृतचन्द्र जी समयसार गाथा ४१५ की टीकामें कहते हैं’ इस वाक्यमें कर्ता तो आचार्य अमृतचन्द्र हैं जो चेतन पदार्थ और कर्म जड़रूप वाक्य हैं जो कि उनके द्वारा लिखे गये हैं और जिनको आपने प्रमाणस्वरूप उद्धृत किया। आपने जो यह लिखा है-‘आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं या कहते हैं’ मात्र इसलिये लिखा है कि आपके द्वारा उद्‌धृत किये गये वाक्योंमें श्री अमृतचन्द्र आचार्यकी प्रमाणतासे प्रमाणता आ जावे, अन्यथा आपको इन पदोंके लिखनेकी कोई आवश्यकता न थी । इसी प्रकार आपने द्वितीय उत्तरमें निम्न पदोंका प्रयोग किया है-‘आचार्यवर्य कुन्दकुन्द और अमृतचन्द्रसूरिके आगमप्रमाण देकर मीमांसा की गई थी । उसका अर्थ आचार्य अमृतचन्द्रने स्वाभाविक किया है । आचार्य कुन्दकुन्दने तो स्त्रियोंको मायाके समान बतलाया है । साथ ही अमृतचन्द्रसूरिने अपनी टीकामें मेघका दृष्टान्त देकर यहाँ स्वाभाविक पदका क्या अर्थ है यह और भी स्पष्ट कर दिया है ।’ ‘प्रयत्नके बिना ही उनके धर्मोपदेश आदिकी क्रिया होती है ।’ ‘कहा भी है ।’ ‘श्री अमृतचन्द्रसूरिने समयसारके अन्तमें शब्दागमके स्वरूपको बतानेवाले जो वचन लिखे हैं ।’ इन सब वाक्योंमें शब्द पद वाक्य जड़रूप पदार्थोंका कर्ता चेतनद्रव्य आचार्य महाराज हैं । इस प्रकार चेतनद्रव्य और जड़ पदार्थमें कर्ता-कर्मसम्बन्ध आपके वचनों ही द्वारा सिद्ध हो जाता है ।

श्री कुन्दकुन्द भगवान्ने समयसारकी प्रथम गाथामें ‘वोच्छामि समयपाहुडमिणमो सुयकेवली-भणियं’ इन वाक्यों द्वारा यह स्पष्ट कर दिया है कि इस समयप्राभृतके मूल कर्ता अर्थात् कहनेवाले श्री केवली तथा श्रुत-केवली हैं और उत्तर ग्रन्थकर्ता मैं (कुन्दकुन्द आचार्य) हूँ ।

गाथा ५ में ‘दाएहं अप्पणो सविहवेण’ इन शब्दों द्वारा यह बतलाया गया है कि ‘आत्माके विभव द्वारा दिखलाता हूँ ।’ श्री अमृतचन्द्राचार्यने ‘आत्मविभव’ पदका इस प्रकार विवेचन किया है-'इस लोकमें प्रगट समस्त वस्तुओंको प्रकाश करनेवाला और स्यात्पदसे चिह्नित जो शब्दब्रह्म (अरहंतका परमागम) उसकी उपासना करि जिस विभवका जन्म हुआ है । समस्त विपक्ष (अन्यवादियोंकर ग्रहण की गई सर्वथा एकान्तरूप नयपक्ष) उनके निराकरणमें समर्थ जो अतिनिस्तुष निर्बाधयुक्ति उसके अवलंबनसे जिस विभवका जन्म है, निर्मल विज्ञान जो आत्मा उसमें अन्तर्निमग्न परम गुरु सर्वज्ञदेव अपर गुरु गणधरादिकसे लेकर हमारे गुरुपर्यन्त उनकर प्रसादरूपसे दिया गया जो शुद्धात्मतत्त्वका अनुग्रहपूर्वक उपदेश तथा पूर्वाचार्योंके अनुसार उपदेश उससे जिस विभवका जन्म है, निरन्तर क्षरता आस्वादमें आया और सुन्दर जो आनन्द उससे मिला हुआ जो प्रचुरसंवेदनस्वरूप स्वसंवेदन उस कर जिसका जन्म है ऐसा जिस तिस प्रकारसे मेरे ज्ञानका विभव है उस समस्त विभवसे दिखलाता हूँ। इस प्रकारके ज्ञानके द्वारा श्री कुन्दकुन्द भगवानने इस समयसार ग्रन्थकी रचना की है, इसीलिये यह समयसार ग्रन्थ शब्दब्रह्म है, इसीलिये यह समयसार ग्रन्थ प्रामाणिक है। अक्षरों, शब्दों या वाक्योंके स्वयं मिल जानेसे यदि इस ग्रन्थकी रचना हुई होती तो या मात्र काययोगसे (जो कि विचारी पर्याय है) ज्ञान बिना इस समयसार ग्रन्थकी रचना हुई होती तो यह ग्रन्थ प्रमाणकोटिको प्राप्त न होता, इसीलिये अर्थात् ग्रन्थकी प्रमाणता सिद्ध करनेके लिये श्री अमृतचन्द्राचार्यने टीकामें स्पष्ट कर दिया कि इस ग्रन्थकी रचना श्री कुन्दकुन्द भगवान्ने अपने ज्ञानके द्वारा की है।

श्री कुन्दकुन्द भगवान्ने भी प्रथम गाथामें यह स्पष्ट कर दिया कि मैं अपनी तरफसे कुछ नहीं कहता। किन्तु मैं भी वह ही कहूँगा जो केवली या श्रुतकेवलीने कहा है।

इसी प्रकार गाथा ४५, ४६, ७० आदि गाथाओंमें भी ‘जिणा विंति, वण्णिदो जिणवरेहिं, भणिदो खलु सव्वदरसीहिं’ इत्यादि पदोंके द्वारा यह बतलाया गया है कि यह जो कुछ भी मैं (कुन्दकुन्द आचार्य) कह रहा हूँ वह जिनेन्द्र भगवानने कहा है।

इसी प्रकार प्रवचनसार गाथा ४२, ८६, ८७, ८८, आदि तथा अन्य ग्रन्थोंमें भी कहा है।

फिर इस कथनके विरुद्ध अर्थात् श्री कुन्दकुन्द आचार्यके (मैं समयसारको कहता हूँ। केवल श्रुतकेवलीने कहा है, जिनेन्द्रने कहा है।) इन वाक्योंके विरुद्ध तथा अपने (प्रथम गाथाकी टीकामें ‘परिभाषण करूँगा’ तथा गाथा पांचकी टीकामें ‘ज्ञानविभवसे दिखलाता हूँ’) इन वाक्योंके विरुद्ध टीकाके अन्तमें यह कैसे लिखते कि इस ग्रन्थ या टीकाकी स्वयं रचना हो गई।

समयसार गाथा ४१५ की टीकामें इस समयसारकी महिमा बतलानेके लिये तथा पदार्थ और शब्दका वाच्य-वाचकसम्बन्ध दिखलानेके लिये यह लिखा है-‘कैसा यह शास्त्र ? समयसारभूत भगवान् परमात्माके प्रकाशनेवाला होनेसे जिसको विश्व-समय कहते हैं उसके प्रकाशसे आप स्वयं शब्दब्रह्म सरीखा है।’ -समयसार रायचन्द ग्रंथमाला पृ० ५४१।

कलश २७८ में मात्र अपनी निरभिमानता दिखलानेके लिये यह कहा है कि ‘इस टीकामें मेरा कुछ भी कर्तव्य नहीं हैं।’ श्री पं० जयचन्दजीने भी इस कलश २१८ के भावार्थमें कहा-‘ऐसा कहनेसे उद्धृतपनेका त्याग पाता है।’ इन सब उल्लेखोंको देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं-

जब हम जैन सिद्धान्तसम्मत पद और वाक्यके लक्षणोंको देखते हैं तो पुरुषप्रयत्नके बिना वे बनते ही नहीं हैं तब अमृतचन्द सूरि महाराजके गम्भीर और सुललित पद वाक्य भी उनके ज्ञान प्रकर्षके बिना कैसे बन सकते हैं जिनसे कि परम ब्रह्म-तत्त्व प्रतिपादक इस अध्यात्मशास्त्रकी रचना हुई है। अतः उनका वह उल्लेख मात्र अपना लाघव बतलानेके लिये है।

श्री अमृतचन्द्र आचार्य स्वयं कलश ३ में कहते हैं कि जो इस समयसारकी व्याख्या (कथनी) से मेरी अनुभूति-अनुभवनरूप परिणति उसकी परम विशुद्धि समस्त रागादि विभाव परिणति रहित उत्कृष्ट निर्मलता हो। यह मेरी परिणति ऐसी है कि परपरिणतिका कारण जो मोह नाम कर्म उसका अनुभाव उदयरूप विपाक उससे जो अनुभाव्य-रागादिक परिणामोंकी व्याप्ति है उस कर निरंतर कल्माषित मैली है। और मैं ऐसा कि द्रव्यदृष्टिकर तो मैं शुद्ध चैतन्यमात्र मूर्ति हूँ।-समयसार रायचन्द ग्रन्थमाला पृ० ४-५।

दिव्यध्वनिकी स्वाश्रित प्रमाणताके लिये जो जयधवल पु० १ पृ० २३९ के वाक्य उद्धृत किये गये हैं उनमें तो दिव्यध्वनि या केवलीका नाममात्रको भी कथन नहीं है। उसमें तो मात्र प्रमाण और पदार्थका ज्ञेय-ज्ञायकसम्बन्ध तथा शब्द और पदार्थोंमें वाच्य-वाचकसंबंध दिखलाया गया है। इसके साथ यह स्पष्ट कर दिया है कि 'शब्द और पदार्थकी अर्थप्रतिपादकता कृत्रिम है, इसलिये वह पुरुषके व्यापारकी अपेक्षा रखती है। अर्थात् शब्द ऐसा नहीं कहते कि हमारा यह अर्थ है या नहीं है, किन्तु पुरुषोंके द्वारा ही शब्दोंका अर्थ संकेत किया जाता है। इसीलिये लौकिक या आगम शब्दोंकी सहज योग्यता पुरुषोंके द्वारा संकेतके आधीन ही पदार्थका प्रकाशक मानना चाहिये, बिना संकेतके शब्द पदार्थका प्रतिपादक नहीं होता।-प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० ४३१। व्याख्याताके विना वेद स्वयं अपने विषयका प्रतिपादक नहीं है, इसलिए उसका वाच्यवाचकभाव व्याख्याताके आधीन हैं। -धवल पु० १ पृ० १९६।

जब शब्दोंके द्वारा पदार्थोंकी प्रकाशकता ही पुरुषव्यापारकी अपेक्षा रखता है तो उनमें स्वाश्रित प्रामाणिकता कैसे हो सकती है, अर्थात् शब्दोंमें स्वाश्रित प्रामाणिकता नहीं है। इस प्रकार आपका दिव्यध्वनिको स्वाश्रित प्रमाण कहना आगमविरुद्ध है। उसमें केवलज्ञानकी प्रमाणतासे ही प्रमाणता आई है, क्योंकि वक्ताकी प्रमाणतासे वचनोंमें प्रमाणता आती है ऐसा न्याय है।
-धवल पु० १ पृ० १९६, जयधवल पु० १ पृ० ८८।

असत्य वचन दो कारणोंसे बोला जाता है। प्रथम तो राग द्वेषके कारण असत्य बोला जाता है, क्योंकि जिससे राग है उसको लाभ पहुँचानेके कारण असत्य भाषण हो सकता है। अथवा जिससे द्वेष है उसको हानि पहुँचानेके लिये असत्य वचनोंका प्रयोग होता है। दूसरे अज्ञानताके वश असत्य वचन बोला जा सकता है, किन्तु केवली भगवान्‌के ये दोनों कारण नहीं हैं, अतः उनके दिव्यध्वनिरूप वचन प्रमाण हैं। कहा भी है-

रागाद् वा द्वेषाद् वा मोहाद् वा वाक्यमुच्यते अनृतम्।
यस्य तु नैते दोषास्तस्यानृतकारणं नास्ति॥
आगमो ह्याप्तवचनमाप्तो दोषक्षयं विदुः।
त्यक्तदोषोऽनृतं वाक्यं न ब्रूयाद् हेत्वसम्भवात्॥
-धवल पु० ३ पृ० १२

अर्थ-राग, द्वेष अथवा मोहसे असत्य वचन बोला जाता है, परन्तु जिसके ये रागादि दोष नहीं रहते उसके असत्य वचन बोलनेका कोई कारण भी नहीं पाया जाता। आप्तवचनोंको आगम जानना चाहिये। जिसने जन्म-जरादि अठारह दोषोंका नाश कर दिया है उसे आप्त जानना चाहिये। इस प्रकार जो त्यक्त दोष होता है वह असत्य वचन नहीं बोलता है, क्योंकि उसके असत्य वचन बोलनेका कोई कारण ही संभव नहीं।

रागादिका अभाव भी भगवान् महावीरमें असत्य भाषणके अभावको प्रकट करता है, क्योंकि कारणके अभावमें कार्यके अस्तित्वका विरोध है। और असत्य भाषणका अभाव भी आगमकी प्रमाणताका ज्ञापक है। -धवल पु० ९ पृ १०८। बीज पदोंका जो प्ररूपक है वह अर्थकर्ता कहलाता है । न्थकी प्रमाणताको बतलानेके लिये कर्ताकी प्ररूपणा की जाती है। -धवल पु० ९ पृ० १२७।

दिव्यध्वनिमें मात्र योग ही कारण नहीं है, किन्तु केवलज्ञान भी निमितकारण है । इसीलिये दिव्यध्वनिरूप वचन केवलज्ञानका कार्य है ‘तस्य ज्ञानकार्यत्वात्’ । -धवल पु० १ पृ० ३६८।

केवलज्ञानके निमित्तसे उत्पन्न हुए पद और वाक्य प्रमाण हैं। -जयधवल पु० १ पृ० ४४

श्री वर्द्धमान भट्टारक द्वारा उपदिष्ट होनेसे द्रव्यआगम ( दिव्यध्वनि ) प्रमाण है। -जयधवल पु० १ पृ० ७२ व ८३।

जिनेन्द्र भगवान्के मुखसे निकला हुआ वचन अप्रमाण नहीं हो सकता।-जयधवल पु० ५ पृ० ३४०।

जिनेन्द्रदेव अन्यथावादी नहीं होते। -जयधवल पु० ७ पृ० १२७।

असत्य बोलनेके कारणोंसे रहित जिनेन्द्रके मुखकमलसे निकले हुए ये वचन हैं, इसलिये इन्हें अप्रमाण नहीं माना जा सकता। -धवल पु० ३ पृ० २६।

जिसने सम्पूर्ण भावकर्म और घातिया द्रव्यकर्मको दूरकर देनेसे सम्पूर्ण वस्तुविषयक ज्ञानको प्राप्त कर लिया है वही आगमका व्याख्याता हो सकता है। -धवल पु० १ पृ० १६६ ।

जो केवलज्ञानपूर्वक उत्पन्न हुआ है, प्रायः अतीन्द्रिय पदार्थोंको विषय करनेवाला है, अचिन्त्यस्वभावी और युक्तिके विषयसे परे है उसका नाम आगम है । -धवल पु ६ पृ० १५१।

‘सर्वज्ञ-वचनं तावदागमः’ सर्वज्ञके वचन आगम है । -समयसार गाथा ४४ टीका।

समणमुहुग्गदमट्ठं चतुग्गदिणिवारणं सणिव्वाणं।
एसो पणमिय सिरसा समयमियं सुणह वोच्छमि ॥२॥ -पंचास्तिकाय

अर्थ-यह मैं कुन्दकुन्द आचार्य इस पंचास्तिकायरूप सयसारको कहूँगा । इसको तुम सुनो। श्रमण कहिये सर्वज्ञ वीतरागदेवके मुखसे उत्पन्न हुए पदार्थसमूह सहित वचन तिनको मस्तकसे प्रणाम करके कहूँगा, क्योंकि सर्वज्ञके वचन ही प्रमाणभूत है । इस कारण इनके ही आगमको नमस्कार करना योग्य है। और इनका ही कथन योग्य है। वह आगम चार गतियोंका निवारण करनेवाला है तथा मोक्षफल करि सहित है।

सुत्तं जिणोवदिट्ठं पोग्गलदव्वप्पगेहिं वयणेहिं । -प्रवचनसार गाथा ३४

अर्थ-पुद्गलद्रव्यस्वरूप वचनोंसे जो जिन भगवान्का उपदेश किया हुआ है वह द्रव्यश्रुत है।

जो आत्मा क्षुधा तृषा आदि-अठारह दोषोंसे रहित है वह ही आप्त कहलाता है तथा उसी आप्तके वचन प्रमाण हैं। -वसुनन्दिश्रावकाचार गाथा ८०९ ।

साक्षात् विश्वतत्त्वज्ञाताके विना साक्षात् निर्बाध मोक्षमार्गका प्रणयन नहीं बन सकता। -आप्तपरीक्षा पृ० २६१

आप्तवचनादिनिबन्धनमर्थज्ञानमागमः ३,९४॥-परीक्षामुख

अर्थ-आप्तके वचन आदिसे होनेवाले अर्थज्ञानको आगम कहते हैं।

वक्ताकी प्रमाणतासे वचनमें प्रमाणता आती है। इस न्यायके अनुसार अप्रमाणभूत पुरुषोंके द्वारा व्याख्यान किया गया आगम अप्रमाणताको कैसे प्राप्त नहीं होगा? अवश्य प्राप्त होगा।-धवल पु० १ पृ० १९६

यदि मात्र योगको ही वचनोंकी प्रामाणिकताका कारण माना जाये तो रागी द्वेषी पुरुषके वचनोंको भी प्रमाणताका प्रसंग आजावेगा, किन्तु ऐसा है नहीं ।

रागद्वेषमोहाक्रान्तपुरुषवचनाज्जातमागमाभासम् । ६,५१ -परीक्षामुख

अर्थ-रागी द्वेषी और अज्ञानी मनुष्यके वचनोंसे उत्पन्न हुए आगमको आगमाभास कहते हैं ।

इस प्रकार इन आगमप्रमाणोंसे सिद्ध हो जाता है कि वीतराग सर्वज्ञदेवकी दिव्यध्वनिमें प्रामाणिकता केवलज्ञानके निमित्तसे ही है, क्योंकि उनका केवलज्ञान प्रमाण है ।

समयसार गाथा ९९ और १००का जो तात्पर्य आपने लिखा वह ठीक नहीं हैं । गाथा ९९ तो व्याप्य-व्यापक अपेक्षा कर्ता-कर्मका कथन करती है । गाथा नं० १०० की टीकामें पं० जयचन्दजीने लिखा है-यहाँ तात्पर्य ऐसा है कि द्रव्यदृष्टि कर तो कोई द्रव्य अन्य किसी द्रव्यका कर्ता नहीं है, परन्तु पर्याय-दृष्टिकरि किसी द्रव्यका पर्याय किसी अन्य द्रव्यको निमित्त होता है । इस अपेक्षासे अन्यके परिणाम अन्यके परिणामके निमित्तकर्ता कहे जाते हैं । परन्तु परमार्थसे द्रव्य अपने परिणामका कर्ता है, अन्यके परिणामका अन्य द्रव्य कर्ता नहीं है ऐसा जानना ॥ १०० ॥

आपके पाँच निष्कर्ष अनुसार तो यह चर्चा ही नहीं चल सकती, क्योंकि जो प्रश्न-प्रतिप्रश्न व उत्तर प्रत्युत्तर आदि लिखित रूपसे चल रहे हैं परमार्थसे तो उनका कर्ता पुद्गल द्रव्य है । आपके निष्कर्षके अनुसार व्याप्य-व्यापकभावसे तन्मयताका प्रसंग आनेके कारण कोई भी आत्मा इन लिखित प्रश्नों-उत्तरों तथा प्रतिप्रश्नों-प्रत्युत्तरों आदिका कर्ता नहीं है । आपके निष्कर्षके अनुसार सामान्य आत्मा भी निमित्त-नैमित्तिकभावसे इन प्रश्नोत्तरों प्रतिप्रश्न-प्रत्युत्तररूप पुद्गल द्रव्यपर्यायोंका कर्ता नहीं है, अन्यथा नित्यकर्तृत्वका प्रसंग आ जायेगा। आपके निष्कर्षके अनुसार अज्ञानी जीवके योग और उपयोग पर द्रव्योंकी पर्यायोंके निमित्तकर्ता हैं, किन्तु आप अपनेको अज्ञानी स्वीकार करनेको तैयार नहीं है, अतः आपके योग और उपयोग भी उत्तर-प्रतिउत्तररूप पुद्गल द्रव्यकी पर्यायोंके निमित्तकर्ता भी नहीं है । आपके निष्कर्ष (ई) के अनुसार आत्मा अज्ञानभावसे योग और उपयोगका कर्ता है तथापि पर द्रव्योंकी पर्यायोंका कर्ता कदाचित् भी नहीं है । किन्तु आप अपनेमें अज्ञानभाव स्वीकार करनेको तैयार नहीं हैं, इसलिये आप अपनी पर्यायस्वरूप योग और उपयोगके भी कर्ता नहीं हैं । उत्तर प्रतिउत्तररूप पुद्गल पर द्रव्यकी पर्यायोंके कर्ता तो कदाचित् भी नहीं है। आपके निष्कर्ष (उ) के अनुसार आत्मा अज्ञानभावसे परद्रव्योंकी पर्यायोंका निमित्तकर्ता नहीं है अर्थात् आप इन उत्तर प्रतिउत्तरके निमित्तकर्ता भी नहीं हैं । आपकी उपर्युक्त मान्यता अनुसार जब आपका इन उत्तर प्रतिउत्तरसे कोई सम्बन्ध ही नहीं रहा, मात्र पुद्गलके साथ इन उत्तर-प्रत्युत्तरका सम्बन्ध रह गया तो इन उत्तर-प्रत्युत्तरके आधारसे आपके साथ चर्चा चल नहीं सकती, और पुद्गल जड़ है, उसके साथ चर्चाका कोई प्रसंग ही नहीं । इस प्रकार एक निमित्तकर्ताको स्वीकार न करनेसे सब विप्लव हो जायगा और कोई व्यवस्था ही नहीं रहेगी ।

प्रवचनसार गाथा ४४ व ४५ का जो आपने प्रमाण दिया है उससे तो यह सिद्ध होता है कि अर्हंत भगवान्के रागद्वेष, मोहका अभाव हो गया, अतः उनकी जितनी भी क्रिया हैं वे बिना इच्छाके हैं, कर्मबन्धकी कारण नहीं और पूर्व कर्म उदयमें आकर ज्ञेयको प्राप्त हो जाते हैं । इसमें दिव्यध्वनिकी प्रमाणता या अप्रमाणताका प्रसंग ही नहीं । । समयसार गाथा ६७ का भी कोई सम्बन्ध इस प्रश्नसे नहीं है । केवलज्ञानमें पदार्थ प्रतिबिम्बित नहीं होते, क्योंकि प्रतिबिम्ब या छाया पुद्गल द्रव्यकी पर्याय है ( देखो प्रश्न नं० ७ पर हमारा दूसरा उत्तर ), केवलज्ञान पदार्थोंको जानता अवश्य है । जो श्लोक आपने उद्धृत किया है उसमें तो सर्वज्ञके वचनोंकी 'सर्वात्महिते, 'शान्त्यं, 'विमैः समं पशुगणैराकर्णितं कर्णिभिः, विनष्टपिवदः, ‘पायात् सर्वविदः अपूर्वं वचः’ इन विशेषणों द्वारा स्तुति की है अर्थात् 'सर्व आत्माओंका हित करनेवाली, शान्तिरूप, पशुओंके कानोंके द्वारा सुने जाते हैं, जिससे विपद विनष्ट हो जाती है ऐसे सर्वज्ञ भगवान्के अपूर्व वचन हमारी रक्षा करो। आगे आपने लिखा है कि ‘सव प्रमाणोंमें स्वतः प्रमाणता स्वतः स्वीकार करनी चाहिये।’ किन्तु जिस श्लोकके आधार पर यह लिखा गया है वह श्लोक ज्ञानसे संबंधित है, क्योंकि यह श्लोक ज्ञान-ज्ञेयके प्रकरणमें आया है। इस श्लोकका दिव्यध्वनिसे कोई संबंध नहीं है।

आपने लिखा है ‘यदि दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकता स्वाश्रित नहीं मानी जाती है तो वह अन्यसे उत्पन्न नहीं की जा सकती।’ यदि आप हमारे पूर्व उत्तरमें दिये गये ‘वचनोंकी प्रमाणता वक्ताकी प्रमाणतासे होती है’ इस आर्ष वचनपर ध्यान देते तो आपको यह कठिनाई न पड़ती।

आगे आप लिखते हैं कि ‘असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा विचार करने पर वह तीर्थंकर आदि प्रकृतियोंके उदयके निमित्तसे होनेसे दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकता पराश्रित भी है।’ तीर्थंकर आदि प्रकृतियोंके उदयसे तो समवशरण गंधकुटिकी रचना होती है। किसी भी प्रकृतिके उदयसे तो औदयिक भाव होगा या पर द्रव्यका संयोग होगा, किन्तु प्रामाणिकता तो नहीं आ सकती। यदि कर्मोदयसे प्रामाणिकता होती हो तो सिद्धोंमें जहाँ किसी भी कर्मका उदय नहीं प्रामाणिकताके अभावका प्रसंग आजायेगा। सो आपका यह लिखना ‘तीर्थंकर आदि प्रकृतिके उदयसे दिव्यध्वनिमें प्रमाणता पराश्रित है’ ठीक नहीं है।

आपने लिखा कि ‘योगकी अपेक्षा दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकतामें सर्वज्ञदेवकी भी निमित्तता है’ सो यह सयुक्तिक प्रतिपादन नहीं है, क्योंकि वचनकी प्रामाणिकतामें ज्ञानकी प्रकर्षता ही कारण मानी गई है। अन्यथा अज्ञानी मनुष्यके वचनोंमें भी प्रामाणिकताका प्रसंग आ जायगा, क्योंकि वाग्योग तो उसके भी विद्यमान है। फलतः जब आप योगके माध्यमसे सर्वज्ञदेवको निमित्त माननेके लिये तैयार हो गये हैं तब केवलज्ञानको ही दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकताका कारण स्वीकार करना आगमसंगत है। सर्वार्थसिद्धिमें पूज्यपाद स्वामीने श्रुतकी प्रमाणताको बतलाते हुए वक्ताको ही कारण माना है-

त्रयो वक्तारः-सर्वज्ञस्तीर्थंकरः इतरो वा श्रुतकेवली आरातीयश्चेति। तत्र सर्वज्ञेन परमर्षिणा परमाचिन्त्यकेवलज्ञानविभूतिविशेषेण अर्थत आगम उद्दिष्टः। तस्य प्रत्यक्षदर्शित्वात् प्रक्षीणदोषत्वाच्च प्रामाण्यम्। तस्य साक्षाच्छिष्यैर्बुद्ध्यतिशयर्द्धियुक्तैर्गणधरैः श्रुतकेवलिभिरनुस्मृतग्रन्थरचनमंगपूर्वलक्षणम्। तत्प्रमाणं तत्प्रामाण्यात्। आरातीयैः पुनराचार्यैः कालदोषात्संक्षिप्तायुर्मतिबलशिष्यानुग्रहार्थं दशवैकालिकाद्युपनिबद्धम्। तत्प्रमाणमर्थतस्तदेवेदमिति क्षीरार्णवजलं घटगृहीतमिव।
-सर्वार्थसिद्धि पं० फूलचन्द्रजी द्वारा संपादित संस्करण पृष्ठ १२३

अर्थ-वक्ता तीन प्रकारके हैं-सर्वज्ञ तीर्थंकर या सामान्य केवली तथा श्रुतकेवली और आरातीय। इनमेंसे परम ऋषि सर्वज्ञ उत्कृष्ट और अचिन्त्य केवलज्ञानरूपी विभूतिसे युक्त हैं। इस कारण उन्होंने अर्थरूपसे आगमका उपदेश दिया। ये सर्वज्ञ प्रत्यक्षदर्शी और दोषमुक्त हैं, इसलिये प्रमाण हैं। इनके साक्षात् शिष्य और बुद्धिके अतिशयरूप ऋद्धिसे युक्त गणधर श्रुतकेवलियोंने अर्थरूप आगमका स्मरणकर अंग और पूर्व ग्रन्थोंकी रचना की। सर्वज्ञदेवकी प्रमाणतासे ये भी प्रमाण हैं। तथा आरातीय आचार्योंने कालदोषसे जिनकी आयु, मति और बल घट गया है ऐसे शिष्योंका उपकार करनेके लिये दशवैकालिक आदि ग्रन्थ रचे।

५३४ जयपुर ( खानिया ) तत्त्वचचा

जिस प्रकार क्षीरसागरका जल घटमें भर लिया जाता है उसी प्रकार ये ग्रन्थ भी अर्थरूपसे वे ही हैं, इसलिये प्रमाण हैं।

मङ्गलं भगवान् वीरो मङ्गलं गौतमो गणी।
मङ्गलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मङ्गलम् ॥

शंका ८

मूल प्रश्न ८-दिव्यध्वनिका केवलज्ञान अथवा केवलीकी आत्मासे कोई सम्बन्ध है या नहीं ? यदि है तो कौन सम्बन्ध है ? वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ ? दिव्यध्वनि प्रामाणिक है या अप्रामाणिक ? यदि प्रामाणिक है तो उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है या केवली भगवान्की आत्माके सम्बन्धसे ?

शंका ८, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ का समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५३४ से ५४८

↑ सूची


प्रतिशंका ३ का समाधान

इस मूल प्रश्नका हम आगम और आगमको अनुसरण करनेवाली युक्तिपूर्वक पिछले दो उत्तरोंमें सांगोपांग विचार कर आये हैं। साथ ही प्रतिशंका २ में निर्दिष्ट तथ्यों पर भी विस्तारके साथ प्रकाश डाल आये हैं। हमने अपने पिछले उत्तरोंमें मूल प्रश्नको लक्ष्यमें रखकर जो कुछ लिखा है उसका सार यह है-

(१) केवली जिनकी दिव्यध्वनि निश्चयसे स्वाश्रित प्रमाणरूप है, व्यवहारसे पराश्रित प्रमाणरूप कही गई है।

(२) दिव्यध्वनिके प्रवर्तनमें वचनयोग तथा तीर्थंकर प्रकृतिके उदय आदि निमित्त हैं, इस अपेक्षासे केवली जिनके साथ भी दिव्यध्वनिका निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध बन जाता है।

(३) यतः दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें कर्ता-कर्मसम्बन्ध असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा ही घटित होता है, इसलिए वह परमार्थ सत्य न होकर व्यवहारसे सत्य माना गया है। उपचरित सत्य इसीका दूसरा नाम है।

इस स्पष्टीकरणसे मूल प्रश्नके पांचों उपप्रश्नोंका समाधान हो जाता है। साथ ही आगममें कौन वचन किस नयकी दृष्टिमें रखकर लिखा गया है यह भी सम्यक् प्रकार ज्ञात हो जाता है। फिर भी अपर पक्ष पर द्रव्यकी किसी भी विवक्षित पर्यायमें निमित्तकी अपेक्षा किये गये कर्तृत्व व्यवहारको परमार्थभूत माननेके कारण न तो स्वाश्रित प्रमाणताको स्वीकार करता है, न निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धको उपचरित मानना चाहता है और न ही कार्यके प्रति उपादानकी अन्तर्व्याप्तिके साथ निमित्तोंकी बाह्य व्याप्तिके सुमेलको स्वीकार करना चाहता है। उस पक्षका यदि कोई आग्रह प्रतीत होता है तो एक मात्र यही कि जिस किसी प्रकार कार्यके प्रति निमित्तोंमें परमार्थभूत कर्तृत्व सिद्ध होना चाहिये। इसके लिए यदि आगमसम्मत उपादानके स्वरूपमें फेर-फार करना पड़े तो वह अपने तर्कोंके बल पर उसे भी करनेके लिए तैयार है। इसमें वह आगमकी हानि नहीं मानता। यही कारण है कि उस पक्षकी ओरसे प्रतिशंका ३ में पुनः उन्हीं ५ प्रश्नोंको उपस्थितकर प्रतिशंका २ में निर्दिष्ट तर्कोंकी पुष्टि करनेका प्रयत्न किया गया है। अतः हम प्रतिशंका २ और ३ को लक्ष्यमें रखकर उन्हीं बातोंपर नये सिरेसे आगमप्रमाणके अनुसार प्रकाश डालनेका पुनः प्रयत्न करेंगे।

\१. केवली जिनके साथ दिव्यध्वनिका सम्बन्ध

जब हम केवली भगवान् या केवलज्ञानके साथ दिव्यध्वनिका क्या सम्बन्ध है और वह सत्यार्थ है या असत्यार्थ इस प्रश्न पर विचार करने लगते हैं तब हमें दिव्यध्वनिके उत्पत्ति पक्ष पर भी विचार करना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि दिव्यध्वनि पौद्गलिक भाषा वर्गणाओंकी व्यञ्जन पर्याय है, इसलिए उपादानकी दृष्टिसे भाषा वर्गणाऐं ही दिव्यध्वनिरूप परिणमती हैं। इस प्रकार भाषावर्गणा और दिव्यध्वनि इन दोनोंमें उपादान-उपादेयसम्बन्ध है। निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धका विचार दिव्यध्वनिकी उत्पत्ति पक्षको लक्ष्यमें रखकर ही किया जा सकता है। अपर पक्ष केवली भगवान् और केवलज्ञानके साथ दिव्यध्वनिका क्या सम्बन्ध है यह प्रश्न तो उपस्थित करता है, किन्तु जब इस प्रश्नको ध्यानमें रखकर सम्बन्धको स्पष्ट करनेके अभिप्रायसे दिव्यध्वनिकी उत्पत्तिके ऊपर विचार किया गया तो वह अपनी मान्यताको कमजोर होता हुआ देखकर उसे छिपानेके लिए प्रतिशंका ३ में लिखता है-

‘आपने अपने द्वितीय उत्तरमें आगमविरुद्ध तथा अपनी मान्यताके विरुद्ध दो द्रव्यों तथा उनकी पर्यायोंमें परस्पर कर्ता-कर्मके कुछ सिद्धान्त लिख दिये हैं, जो कि अप्रासंगिक हैं, क्योंकि कर्ता-कर्मसम्बन्धी मूल प्रश्न ही नहीं है।’ इत्यादि।

ऐसा लिखनेके पूर्व अपर पक्षने हमारे उत्तरको गोलमाल बतलाया है सो इसका विचार तो उसे स्वयं करना है कि हमारा उत्तर गोलमाल है या उसका ऐसा लिखना गोलमाल है। एक ओर तो वह ‘शास्ता शास्ति सतो हितम्’ इत्यादि प्रमाण उपस्थित कर जिनदेवका वाणीके साथ कर्ता-कर्मसम्बन्ध बतलानेका उपक्रम करता है और दूसरी ओर तथ्यरूपसे कर्ता-कर्मसम्बन्ध आदि पर प्रकाश डालनेवाले तर्कसंगत प्रमाण उपस्थित किये जाते हैं तो उसकी ओरसे यह कहा जाता है कि प्रकृतमें ‘कर्ता-कर्मसम्बन्धी मूल प्रश्न ही नहीं है।’ यदि यहाँ अपर पक्षका प्रश्न कर्ता-कर्मसम्बन्धी नहीं था और वह उक्त प्रश्न द्वारा कोई दूसरा सम्बन्ध जानना चाहता था तो उसे प्रतिशंका ३ में हमें लक्ष्य कर यह वाक्य नहीं लिखना चाहिए था कि ‘फिर भी आप इस प्रश्नके उत्तरमें हेतुकर्ताको स्वीकार नहीं कर रहे हैं।’ स्पष्ट है कि अपर पक्षके मनमें दिव्यध्वनि कर्म और भगवान् तीर्थंकर हेतुकर्ता (प्रेरककर्ता) यही भाव समाया हुआ है तथा प्रश्न भी इसी आशयसे किया गया होना चाहिए।

साधारणतः हेतुकर्ता शब्द आगममें ३ अर्थोंमें प्रयुक्त हुआ है-

(१) एक तो वर्तनाको कालका लक्षण बतलाकर सर्वार्थसिद्धि आदि आगममेंकालको हेतुकर्ता कहा है। यद्यपि काल उदासीन निमित्त है पर इस अर्थमें भी हेतुकर्ता शब्दका प्रयोग होता है यह इस प्रसंगमें स्पष्ट किया गया है।

(२) दूसरे जो क्रियावान् द्रव्य अपनी क्रिया द्वारा अपर द्रव्यकी क्रियामें निमित्त होते हैं उनके लिए भी पंचास्तिकाय गाथा ८८ आदि आगममें हेतुकर्ता शब्दका प्रयोग हुआ है।

तथा (३) तीसरे जो सजीवधारी प्राणी अपने विकल्प और योग द्वारा पर द्रव्यके कार्यमें निमित्त होते हैं उनके लिए भी हेतुकर्ता शब्दका प्रयोग समयसार गाथा १०० आदि आगममें किया गया है।

इस प्रकार ३ अर्थोंमें हेतुकर्ता शब्दका प्रयोग आगममें दृष्टिगोचर होता है। उनमेंसे किस अर्थमें अपर पक्ष केवली जिनको दिव्यध्वनिके होनेमें हेतुकर्ता स्वीकार करता है इसका स्वयं उसकी ओरसे किसी प्रकारका स्पष्टीकरण नहीं किया गया यह आश्चर्य की बात है। आगममें सब प्रकारके प्रमाण हैं और वे भिन्न-भिन्न अभिप्रायसे लिखे गये हैं, परन्तु उन सबको एक जगह उपस्थित कर देने मात्रसे वस्तुका निर्णय नहीं हो सकता। यहाँ तो यह विचार करना है कि केवलीका दिव्यध्वनिके साथ योगके माध्यमसे सम्बन्ध है या तीर्थंकर प्रकृति आदिके माध्यमसे सम्बन्ध है या केवलज्ञानके माध्यमसे सम्बन्ध है। मूल प्रश्नमें केवलज्ञान अथवा केवलीकी आत्मासे दिव्यध्वनिका कोई सम्बन्ध है? यह प्रश्न पूछा गया है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि अपर पक्ष केवलज्ञान और केवलीकी आत्मा इन दोनोंको एकरूपसे स्वीकार करके उनके साथ दिव्यध्वनिका सम्बन्ध जानना चाहता है। अब यदि प्रकृतमें हेतुकर्ता शब्दका अर्थ विकल्प और योग किया जाता है तो इस प्रकारका हेतुकर्तारूप सम्बन्ध केवलज्ञानके साथ दिव्यध्वनिका नहीं बन सकता, क्योंकि केवलीके योगका सद्भाव होने पर भी विकल्पका सर्वथा अभाव है, इसलिए योग और विकल्परूप निमित्तके अर्थमें यहाँ केवलीको हेतुकर्ता कहना न तो अपर पक्षको ही मान्य होगा और न प्रकृतमें यह अर्थ लिया ही गया है।

कदाचित् कहा जाय कि योगकी अपेक्षा केवलीको दिव्यध्वनिका हेतुकर्ता कहनेमें क्या हानि है सो इस सम्बन्धमें हमारा निवेदन यह है कि आचार्य अमृतचन्द्रने प्रवचनसार गाथा ४५में केवलीके गमन, स्थिति और दिव्यध्वनि आदि क्रियाओंके प्रवर्तनको जो स्वाभाविक कहा है सो वहाँ उनके कहनेका यही अभिप्राय होना चाहिए कि यद्यपि दिव्यध्वनिके प्रवर्तनमें वचनयोगकी प्रमुखरूपसे निमित्तता है फिर भी वचनयोगको विकल्पके अभावमें हेतुकर्ता कहना उचित नहीं है। उसके कई कारण हैं। यथा-

(१) केवली भगवान् केवलज्ञानसे सदा उपयुक्त होते हैं। उनके उपयोगमें जिस प्रकार अन्य समस्त त्रिकाल और त्रिकोकवर्ती ज्ञेय प्रतिभासित होते हैं उसी प्रकार दिव्यध्वनि भी प्रतिभासित होती है। दिव्यध्वनिके प्रवर्तनके लिए वे अलगसे उपयुक्त नहीं होते। अतएव केवलज्ञान दिव्यध्वनिके प्रवर्तनका साक्षात् निमित्त नहीं है । तत्त्वार्थवार्तिक अध्याय ६ सूत्र १ में वचनयोगको क्षयनिमित्तक मानने पर जो आपत्ति आती है उसका विचार करते हुए अन्तमें यही फलित किया है कि चूँकि केवलीकी आत्मा क्रियाशील है, अतएव उनके ३ प्रकारकी वर्गणाओंके आलम्बनकी अपेक्षा प्रदेश परिस्पन्दरूप योग होता है। यह शंका इसलिए उठी कि ज्ञानावरणादि कर्मोंका क्षय अयोगकेवली और सिद्धोंके भी पाया जाता है। ऐसी अवस्थामें यदि क्षयको वचनयोगका प्रमुख निमित्त माना जाता है तो अयोगकेवली और सिद्धोंके भी वचनयोग होना चाहिये। किन्तु उनके वचनयोग नहीं होता, इससे स्पष्ट विदित होता है कि वचनयोगका प्रमुख कारण क्षय नहीं है, किन्तु वचन वर्गणाओंका आलम्बन ही वचनयोगका प्रमुख कारण है। तत्त्वार्थवार्तिकका वह पूरा उल्लेख इस प्रलार है-

यदि क्षयोपशमलब्धिरभ्यन्तरहेतुः, क्षये कथम् ? क्षयेऽपि हि सयोगकेवलिनः त्रिविधो योगः इष्यते। अथ क्षयनिमित्तोऽपि योगः कल्प्यते, अयोगकेवलिनां सिद्धानां च योगः प्राप्नोति ! नैष दोषः, क्रियापरिणामिन आत्मनस्त्रिविधवर्गणालम्बनापेक्षः प्रदेशपरिस्पंदः सयोगकेवलिनो योगविधिर्विधीयते, तदालम्बनाभावात् उत्तरेषां योगविधिर्नास्ति।

यह उल्लेख अपनेमें बहुत स्पष्ट है। इसमें जिस प्रकार योगप्रवृत्तिका प्रमुख कारण ३ प्रकारकी वर्गणाओंके आलम्बनको बतलाया है उसी प्रकार दिव्यध्वनिका प्रमुख कारण भाषावर्गणाओंका आलम्बन ही हो सकता है, अन्य नहीं। यही कारण है कि हमने अपने प्रथम और द्वितीय उत्तरमें योगके ऊपर विशेष जोर दिया था और साथमें यह भी लिखा था कि योगकी अपेक्षा केवली या केवलज्ञानको निमित्त माननेमें कोई हानि नहीं है। दिव्यध्वनिका खिरना केवली जिनके वचनयोग क्रियाको निमित्त कर होता है और वचनयोग वचनवर्गणाओंके अवलंबन पर निर्भर है। ऐसा केवली जिनके साथ दिव्यध्वनिका निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध माना गया है। फिर भी विकल्पके अभावमें वचनयोगको भी हेतुकर्ता कहना उचित नहीं है, क्योंकि वचनयोगको हेतुकर्ता मान लेने पर जब-जब वचनयोग हो तब-तब दिव्यध्वनि होनी ही चाहिए, अन्यथा वचनयोगके साथ दिव्यध्वनिको बाह्य व्याप्ति नहीं बन सकती। स्पष्ट है कि दिव्यध्वनि अपने कालमें होती है और वचनयोग उसका मुख्य निमित्त है, साथ ही भव्य जीवोंका पुण्योदय, तीर्थंकर प्रकृतिका उदय आदि भी दिव्यध्वनिके निमित्त हैं। ऐसा अपूर्व योग जिनदेवके केवलज्ञान विभूतिसे सम्पन्न होने पर ही मिलता है, इसलिए दिव्यध्वनिके होनेमें जिनदेवको भी निमित्त कहा जाता है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि जिनदेव स्वयं अन्य अल्पज्ञोंके समान दिव्यध्वनिको प्रगट करनेके लिए व्यापारवान् होते हैं। श्री गोम्मटसार जीवकाण्डमें लिखा है-

मणसहियाणं वयणं दिट्ठं तप्पुव्वमिदि सजोगम्मि।
उत्तो मणोवयारेणिंदियणाणेण हीणम्हि ॥ २२८ ॥

मनसहित छद्मस्थ जीवोंके वचन मनपूर्वक देखे जाते हैं, इसलिए इन्द्रियज्ञानसे रहित सयोगकेवलीके उपचारसे मन कहा है ॥ २२८ ॥

इस वचनसे स्पष्ट ज्ञात होता है कि केवली जिनके दिव्यध्वनिके लिए दत्तावधान हुए बिना ही अपने कालमें वचनयोग आदिको निमित्त कर दिव्यध्वनि प्रकट होती है। पं० प्रवर दौलतरामजी ‘सकलज्ञेय-ज्ञायक-’ आदि स्तुति द्वारा उक्त तथ्यको स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-

भवि भागनि-वचिजोगे वसाय।
तुम धुनि ह्वै सुनि विभ्रम नसाय ॥

( २ ) दूसरा कारण यह है कि केवली जिनके दो प्रकारका ही वचनयोग होता है-सत्य वचनयोग और अनुभय वचनयोग। इसी प्रकार दिव्यध्वनि भी तदनुसार सत्य और अनुभयके भेदसे दो प्रकारकी होती है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि दिव्यध्वनिका प्रमुख निमित्त योगको ही स्वीकार किया है। यदि केवलज्ञान दिव्यध्वनिका प्रमुख निमित्त होता तो जिस प्रकार केवलज्ञान एकमात्र सत्यरूप स्वीकार किया गया है उसी प्रकार दिव्यध्वनि भी केवलज्ञानके समान एक ही प्रकारकी होती, किन्तु ऐसा नहीं है। इससे ज्ञात होता है कि केवली जिनका वचनयोग ही दिव्यध्वनिके खिरनेमें प्रमुख निमित्त है।

\२. दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकता

मूल प्रश्नमें प्रमुखरूपसे दूसरा चर्चनीय विषय दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकताके विषयमें ऊहापोह करना है। अपर पक्षने अपनी प्रतिशंका २ और प्रतिशंका ३ में दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकता वक्ताकी प्रामाणिकताके आधार पर स्थापित की है। साथ ही शब्दों, पदों और वाक्योंको कृत्रिम बतलाते हुए लिखा है कि ‘शब्द और पदार्थकी अर्थ प्रतिपादकता कृत्रिम हैं, इसलिए वह पुरुषके व्यापारकी अपेक्षा रखती है। अर्थात् शब्द ऐसा नहीं कहते कि हमारा यह अर्थ है या नहीं है, किन्तु पुरुषोंके द्वारा ही शब्दोंका अर्थसंकेत किया जाता है। इसीलिए लौकिक या आगम शब्दोंकी सहज योग्यता पुरुषोंके द्वारा संकेतके आधीन ही पदार्थका प्रकाशक मानना चाहिये, बिना संकेतके शब्द पदार्थका प्रतिपादक नहीं होता। -प्रमेयकमलमार्त्तण्ड पृ० ४३१। व्याख्याताके बिना वेद स्वयं अपने विषयका प्रतिपादक नहीं है, इसलिए उसका वाच्य-वाचकभाव व्याख्याताके आधीन है। -धवल पु० १ पृ० १९६। जब शब्दोंके द्वारा पदार्थोंकी प्रकाशकता ही पुरुष व्यापारकी अपेक्षा रखता है तो उनमें स्वाश्रित प्रामाणिकता कैसे हो सकती है, अर्थात् शब्दोंमें स्वाश्रित प्रामाणिकता नहीं है। इस प्रकार आपका दिव्यध्वनिको स्वाश्रित प्रमाण कहना आगमविरुद्ध है। उसमें केवलज्ञानकी प्रमाणतासे ही प्रमाणता आई है, क्योंकि वक्ताको प्रमाणतासे वचनोंमें प्रमाणता आती है ऐसा न्याय है। -धवल १ पृ० १९६, जयधवल १ पृ० ८८।’

शब्दकी प्रामाणिकता पराश्रित कैसे है इस बातको बतलानेवाला यह अपर पक्षका वक्तव्य है। इस वक्तव्य द्वारा इन बातों पर प्रकाश डाला गया है-

(१) पुरुषके व्यापारकी अपेक्षा रखनेके कारण शब्दोंमें पदार्थोंकी अर्थप्रतिपादकता कृत्रिम है।

(२) शब्दोंके द्वारा पदार्थोंकी प्रकाशकता पुरुषव्यापारकी अपेक्षा रखता है, इसलिए उनमें स्वाश्रित प्रामाणिकता नहीं हो सकती।

(३) दिव्यध्वनिमें केवलज्ञानको प्रमाणतासे प्रमाणता आई है, इसलिए दिव्यध्वनिको स्वाश्रित प्रमाण कहना आगमविरुद्ध है।

(४) लौकिक या आगम शब्दोंकी सहज योग्यता पुरुषोंके द्वारा संकेतके आधीन ही पदार्थका प्रकाशक मानना चाहिये।

अब इन बातों पर क्रमशः विचार करते हैं-

: १ :

आगममें २३ प्रकारकी वर्गणाएँ बतलाई हैं। उनमें भाषा वर्गणाका स्वतंत्ररूपसे उल्लेख किया गया है। तत, वितत आदि रूपसे अनक्षारात्मक या अक्षरात्मक जितने भी शब्द सुननेमें आते हैं उन सब शब्दोंकी उत्पत्ति एकमात्र भाषा वर्गणाओंसे होती है। यह नहीं हो सकता कि कोई भी पुरुष अपने तालु आदिके व्यापार द्वारा ऐसी पुद्गल वर्गणाओंको भी शब्दरूप परिणमा सके जो भाषावर्गणारूप नहीं हैं। पुरुषोंके तालु आदि व्यापारसे भाषावर्गणाओंकी उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु जो भाषावर्गणाएँ स्वयं उपादान होकर शब्दरूप परिणत होती हैं उनमें पुरुषोंके तालु आदिका व्यापार निमित्तमात्र है, क्योंकि बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रतामें कार्यकी उत्पत्ति होती है यह कार्यकारणभावको प्रगट करनेवाला अकाट्य सिद्धान्त है, जो कि भाषा वर्गणाओंके शब्दरूप कार्यके होनेमें भी लागू होता है, क्योंकि कोई भी कार्य इस सिद्धान्तको उलंघन कर होता हो ऐसा नहीं है। ऐसी अवस्थामें जब विवक्षित शब्दोंको उत्पत्ति ही केवल पुरुष व्यापारसे नहीं होती तो उनमें पदार्थोंकी अर्थप्रतिपादकता केवल पुरुषव्यापारसे आती हो यह त्रिकालमें सम्भव नहीं है। जो व्यक्ति निश्चय पक्षका उलङ्घन कर केवल व्यवहार पक्षके एकान्तका ही परिग्रह करता है वही ऐसा कह सकता है कि ‘शब्द और पदार्थकी अर्थप्रतिपादकता कृत्रिम है, इसलिए वह पुरुषके व्यापारकी अपेक्षा रखती है।’ अन्य व्यक्ति नहीं। उपादानरूप शब्दवर्गणाओंमें विवक्षित अर्थप्रतिपादनकी योग्यता न हो और कोई पुरुष अपने व्यापार द्वारा वैसी अर्थप्रतिपादन क्षमता उत्पन्न करदे यह कभी भी नहीं हो सकता। भगवान् पुष्पदन्त भूतबलि शब्दगत इस सहज योग्यताका प्रतिपादन करते हुए धवला पु० १४ पृ० ५५० में लिखते हैं-

सच्चभासाए मोसभासाए सच्चमोसभासाए असच्चमोसभासाए जाणि दव्वाणि घेत्तूण सच्च-भासत्ताए मोसभासत्ताए सच्चमोसभासत्ताए असच्चमोसभासत्ताए परिणामेदूण णिस्सारंति जीवा ताणि भासादव्ववग्गणा णाम ॥७४४॥

सत्यभाषा, मोषभाषा, सत्यमोषभाषा और असत्यमोषभाषाके जिन द्रव्योंको ग्रहणकर सत्यभाषा, मोष-भाषा, सत्यमोषभाषा और असत्यमोषभाषारूपसे परिणमाकर जीव उन्हें निकालते हैं, उन द्रव्योंकी भाषा-द्रव्यवर्गणा संज्ञा है ॥७४४॥

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए वीरसेन आचार्य अपनी धवला टीकामें उक्त सूत्रकी व्याख्याके प्रसंगसे लिखते हैं-

भासादव्ववग्गणा सच्च-मोस-सच्चमोस-असच्चमोसभेदेण चउव्विहा। एवं चउव्विहत्तं कुदो णव्वदे ? चउव्विहभासाकज्जण्णहाणुववत्तीदो। चउव्विहभासाणं पाओग्गाणि जाणि दव्वाणि ताणि घेत्तूण सच्च-मोस-सच्चमोस-असच्चमोसभासाणं सरूवेण तालुवादिवावारेण परिणमाविय जीवा मुहादो णिस्सारेंति ताणि दव्वाणि भासादव्ववग्गणा णाम।

भाषा द्रव्यवर्गणा सत्य, मोष, सत्यमोष और असत्यमोषके भेदसे ४ प्रकारकी है।

शंका-यह ४ प्रकारकी है ऐसा किस प्रमाणसे जाना जाता है ?

समाधान-उसका ४ प्रकारका भाषारूप कार्य अन्यथा बन नहीं सकता है, इससे जाना जाता है कि वह ४ प्रकारकी है।

४ प्रकारकी भाषाके योग्य जो द्रव्य हैं उन्हें ग्रहणकर तालु आदिके व्यापार द्वारा सत्यभाषा, मोषभाषा, सत्यमोषभाषा और असत्यमोषभाषारूपसे परिणमाकर जीव मुखसे निकालते हैं, अतएव उन द्रव्योंकी भाषा-द्रव्यवर्गणा संज्ञा है ॥७४४॥

यह आगमप्रमाण है। इसमें स्पष्ट बतलाया गया है कि जो भाषा सत्यरूप परिणमती है, जो भाषा असत्यरूप परिणमती है, जो भाषा उभयरूप परिणमती है और जो भाषा अनुभयरूप परिणमती है उसका उस उस प्रकारका परिणमन न तो पुरुषके तालु आदिके व्यापारसे उत्पन्न किया जा सकता है और न ही पुरुषकी इच्छा अथवा ज्ञानविशेषसे उत्पन्न किया जा सकता है। किन्तु जिस कालमें सत्यादिरूप जिस प्रकारकी भाषा उत्पन्न होती है उस कालमें वह सत्यादि भाषावर्गणागत अपने-अपने उपादानके अनुसार ही उत्पन्न होती है। मात्र उत्पत्तिके समय यथासम्भव पुरुषका तालु आदिका व्यापार तथा अन्य भव्य जीवोंका पुण्योदय आदि निमित्त अवश्य हैं। इनका अनादिकालसे ऐसा ही निमित्त-नैमित्तिक योग चला आ रहा है। अतएव शब्दोंमें पदार्थोंकी अर्थप्रतिपादकता उनकी सहज योग्यताका सुफल है, अन्य तो उसमें निमित्तमात्र हैं ऐसा यहाँ निश्चय करना चाहिये। इसी तथ्यको ध्यानमें रखते हुए आचार्य माणिक्यनंदिने अपने परीक्षामुख नामक न्यायग्रंथमें लिखा है-

सहजयोग्यतासंकेतवशाद्धि शब्दादयः वस्तुप्रतिपत्तिहेतवः ॥ -अ० ३ सूत्र १०० ॥

सहजयोग्यताके सद्भावमें संकेतके वशसे शब्दादिक वस्तुप्रतिपत्तिके कारण हैं ॥ -अ० ३ सूत्र १००॥

जिस प्रकार ज्ञान और ज्ञेयमें ज्ञापक और ज्ञाप्य शक्ति सहज पाई जाती है, वह किसी पुरुषका कार्य नहीं है, उसी प्रकार अर्थ ( वस्तु ) और शब्दोंमें प्रतिपाद्य और प्रतिपादक शक्ति सहज होती है, वह किसी पुरुषके तालु आदिके व्यापारसे जायमान नहीं है, अतएव शब्दोंमें सहज ही प्रतिपादकता पाई जाती है और उसीसे विवक्षित शब्द द्वारा प्रतिपाद्यभूत विवक्षित पदार्थका प्रतिपादन किया जाता है। शब्दों द्वारा पदार्थोंके प्रतिपादनरूप कार्योंमें यद्यपि पुरुषके तालु आदिका व्यापार अवश्य ही निमित्त है, परन्तु उपादानके अभावमें पुरुषके तालु आदि व्यापार द्वारा अर्थप्रतिपादकतारूप शब्दकार्यकी उत्पत्ति होती हो यह कभी भी संभव नहीं है ऐसा यहाँ समझना चाहिये ।

प्रत्येक शब्द स्वभावसे अपने प्रतिनियत अर्थका ही प्रतिपादन करता है ऐसा नियम है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए अष्टसहस्री पृ० १३६ में लिखा है-

निष्पर्यायं भावाभावाभिधानं नाञ्जसैव विषयीकरोति शब्दशक्तिस्वाभाव्यात्, सर्वस्य पदस्यैकार्थविषयत्वप्रसिद्धेः । सदिति पदस्यासदविषयत्वात् असदिति पदस्य च सदविषयत्वात्, अन्यथा तदन्यतरप्रयोग संशयात् । गौरिति पदस्यापि दिशाद्यनेकार्थविषयतया प्रसिद्धस्य तत्त्वतोऽनेकत्वात् सादृश्योपचारादेव तस्यैकत्वेन व्यवहरणात्, अन्यथा सर्वस्यैकशब्दवाच्यतापत्तेः प्रत्येकमप्यनेकशब्दप्रयोगवैफल्यात् । यथैव हि-शब्दभेदाद् ध्रुवोऽर्थभेदस्तथार्थभेदादपि शब्दभेदः सिद्ध एव, अन्यथा वाच्यवाचकनियमे व्यवहारविलोपात् ।

वचन क्रमके बिना भाव और अभावको नियमसे विषय नहीं करता, क्योंकि इस प्रकारकी शब्दकी शक्ति स्वभावसे है, सभी पद एक अर्थको विषय करनेरूपसे ही प्रसिद्ध हैं । कारण कि सत् इस पदका असत्-अविषय है और असत् इस पदका सत् अविषय है, अन्यथा उनमेंसे किसी एकका प्रयोग करने पर संशय होना अवश्यंभावी है । यद्यपि ‘गो’ यह पद दिशादि अनेक अर्थोंको विषय करनेवाला प्रसिद्ध है, परन्तु वास्तवमें ‘गो’ ये पद अनेक ही हैं, सादृश्यका उपचार करनेसे ही उस पदका एकरूपसे व्यवहार होता है, अन्यथा सभी पदार्थोंको एक शब्दके वाच्य होनेकी आपत्ति आती है । साथ ही प्रत्येक पदार्थके लिए पृथक्-पृथक् एक-एक शब्दका प्रयोग करना निष्फल ठहरता है । जिस प्रकार शब्दभेदके कारण नियमसे अर्थभेद है उसी प्रकार अर्थभेदके कारण शब्दभेद भी है यह सिद्ध होता है । अन्यथा वाच्यवाचकनियम व्यवहारका लोप प्राप्त होता है ।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए वहीं पृ० १३७ में लिखा है-

तथा शब्दस्यापि सकृदेकस्मिन्नेवार्थे प्रतिपादनशक्तिर्न पुनरनेकस्मिन्, संकेतस्य तच्छक्तिव्यपेक्षया तत्र प्रवृत्तेः । सेनावनादिशब्दस्यापि नानेकत्रार्थे प्रवृत्तिः, करितुरगरथपदातिप्रत्यासत्तिविशेषस्यैकस्य सेनाशब्देनाभिधानात् ।

उसी प्रकार शब्दकी भी एक बार एक ही अर्थमें प्रतिपादनशक्ति है, अनेक अर्थमें नहीं, क्योंकि संकेत उस शक्तिकी अपेक्षासे ही उसमें प्रवृत्त होता है । सेना और वन आदि शब्दकी भी अनेक अर्थमें प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि सेना शब्दके द्वारा हाथी घोड़ा, रथ और पदातिसंबंधी एक प्रत्यासत्तिविशेष ही कही जाती है ।

इससे स्पष्ट है कि प्रतिनियत शब्द स्वभावसे ही अपने प्रतिनियत अर्थका प्रतिपादन करता हैं ।

हम अपने दूसरे उत्तरके अंतमें यह स्पष्ट कर आये हैं कि ‘वास्तवमें दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकता स्वाश्रित है, क्योंकि यदि उसकी प्रामाणिकता स्वाश्रित नहीं मानी जाती है तो वह अन्यसे उत्पन्न नहीं की जा सकती । फिर भी असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा विचार करने पर उसे निमित्तोंकी अपेक्षा पराश्रित कहा गया है ।’ किन्तु अपर पक्षको हमारा यह कथन मान्य नहीं है । उसका कहना है कि 'शब्दोंके द्वारा पदार्थोंकी प्रकाशकता पुरुषव्यापारकी अपेक्षा रखता है, इसलिए उनमें स्वाश्रित प्रामाणिकता नहीं हो सकती । यह अपर पक्षके कथनका सार है । इससे ऐसा विदित होता है कि अपर पक्ष शब्दगत सहज योग्यताको स्वीकार नहीं करना चाहता जो कि आगममें प्रतिपादित है । साथ ही इससे यह भी फलित होता है कि जो उपादान जिस कार्यरूप परिणमता है उसमें उस कार्यरूप होनेकी योग्यता ही नहीं होती, मात्र निमित्तोंके व्यापारद्वारा उपादानमें उस प्रकारका कार्य हो जाता है । यदि अपर पक्षका शब्दोंमें स्वाश्रित प्रामाणिकताके निषेध करनेका यही तात्पर्य हो तो कहना होगा कि उपादान नामकी कोई वस्तु ही नहीं है । जहाँ जो कार्य उत्पन्न होता है मात्र निमित्तोंके बलसे होता है । किन्तु आगम ऐसे मन्तव्यको स्वीकार नहीं करता, क्योंकि आगमका अभिप्राय है कि जिस समय जिस तालु आदिके व्यापार आदिको निमित्तकर जो शब्द उत्पन्न होता है उसका यदि उपादान उसरूप हो तभी उस प्रकारके शब्दकी उत्पत्ति हो सकती है और उसीमें पुरुषके तालु आदिका व्यापार आदि निमित्त होता है । आगममें सत्यादिरूप चार प्रकारकी पृथक्-पृथक् वर्गणाओंको स्वीकार करनेका यही तात्पर्य है । यद्यपि अनेक स्थलों पर आगममें वक्ताकी प्रमाणतासे वचनोंकी प्रमाणता स्वीकार की गई है, यह हम भली भाँति जानते हैं । परन्तु उसका इतना ही आशय है कि रागी-द्वेषी आदिरूप यदि वक्ता हो तो वह समीचीन प्रामाखिक भाषाकी उत्पत्तिका निमित्त त्रिकालमें नहीं हो सकता । समीचीन प्रामाणिक भाषाकी उत्पत्तिमें उसी प्रकारका ही निमित्त होगा, अन्य प्रकारका नहीं । अतएव अनेकान्तको प्रमाण माननेवाले महानुभावोंको ऐसा ही निश्चय करना चाहिए कि उपादानकी अपेक्षा शब्दोंमें स्वाश्रित प्रमाणता होती है और निमित्तोंकी अपेक्षा उनमें पराश्रित प्रामाणिकताका व्यवहार किया जाता है ।

: ३ :

‘दिव्यध्वनिमें केवलज्ञानकी प्रमाणतासे प्रमाणता आई है, इसलिए दिव्यध्वनिको स्वाश्रित प्रमाण कहना आगमविरुद्ध है ।’ यह जो अपर पक्षका कथन है उसका समाधान पिछले वक्तव्यसे हो जाता है, क्योंकि जिस उपादानसे जिस प्रकारका कार्य उत्पन्न होता है उसमें उस प्रकारकी योग्यताको स्वीकार किये बिना उस प्रकारका कार्य नहीं हो सकता । निमित्त भी उसी कार्यके अनुकूल होता है । तभी उसमें निमित्तव्यवहारकी सार्थकता है । जैसे कुम्भकी उत्पत्तिके अनुकूल कुम्भकारका व्यापार होता है और कुम्भकारके व्यापारके अनुरूप मिट्टीमें उपादान योग्यता होती है उसी प्रकार प्रकृतमें दिव्यध्वनिकी उत्पत्तिके अनुकूल केवली जिनका वचनयोग व केवलज्ञान आदि होते हैं तथा इनके अनुरूप शब्दवर्गणाओंमें उपादानयोग्यता होती है । इसलिए दिव्यध्वनिकी प्रामाणिकता अपने उपादानकी अपेक्षा स्वाश्रित है और निमित्तकी अपेक्षा वह पराश्रित मानी गई है । अतएव दिव्यध्वनिकी स्वाश्रित प्रमाणताको आगमविरुद्ध कहना आगमकी अवहेलना ही है । यह हम पूर्वमें ही बतला आये हैं कि सत्यभाषाका उपादान सत्यभाषावर्गणा ही होता है और अनुभय भाषाका उपादान अनुभय भाषावर्गणा ही है । अतएव केवली जिनके दिव्यध्वनिके होनेमें सत्य और अनुभय भाषाओंका ही योग मिलता है, इसलिए केवली जिनके वचनयोग आदिको निमित्त कर उसी प्रकारकी दिव्यध्वनि होती है, अन्य प्रकारकी नहीं ।

: ४ :

अपर पक्षका यह भी कहना है कि ‘लौकिक या आगम शब्दोंकी सहज योग्यता पुरुषोंके द्वारा संकेतके आधीन ही पदार्थका प्रकाशक मानना चाहिए ।’ किन्तु उस पक्षके इस कथन पर भी बारीकीसे विचार किया जाता है तो इसमें अणुमात्र भी यथार्थता प्रतीत नहीं होती, क्योंकि एक ओर शब्दोंमें सहज योग्यता स्वीकार की जाए और दूसरी ओर उसे एकान्तसे पुरुषोंके द्वारा संकेतके आधीन मानी जाय यह परस्पर विरुद्ध है । इसे तो शब्दोंकी सहज योग्यताकी विडम्बना ही माननी चाहिए । जब कि पूर्वाचार्योंने सत्यादिके भेदसे भाषा-वर्गणाऐं ही पृथक्-पृथक् मानी हैं। ऐसी अवस्थामें उनसे उत्पन्न हुए शब्दोंमें केवल पुरुषों द्वारा किये गये संकेतके आधीन ही पदार्थोंकी प्रकाशकता बनती हो ऐसा नहीं है। दिव्यध्वनिकी यह विशेषता है कि भाषा-वर्गणाके आधारसे उत्पन्न हुए शब्द वाच्यरूप जिस जिस अर्थके वाचक होते हैं उसी उसी अर्थका वे प्रतिपादन करते हैं। उनका प्रतिपादन पुरुषोंकी इच्छा पर अवलंबित नहीं है। यही कारण है कि आगममें जितने भी शब्दोंका प्रयोग हुआ है वे आर्हत प्रवचनके समान संतानकी अपेक्षा अनादिनिधन माने गये हैं। ऐसा नहीं है कि भगवान् महावीरकी दिव्यध्वनिमें ‘जीव’ शब्दका प्रयोग अन्य अर्थमें हुआ है और भगवान् आदिनाथकी दिव्यध्वनिमें उसका प्रयोग किसी दूसरे अर्थमें हुआ होगा। आगमकी प्रमाणता भी इसी पर निर्भर है, वक्ताओंकी इच्छाओं पर नहीं। इसीका नाम शब्दोंकी सहज योग्यता है। प्रामाणिक वक्ता इसी आधार पर उन उन शब्दोंका प्रयोग करता है। भट्टाकलंकदेव तत्त्वार्थवार्तिक अध्याय ५ सूत्र १ में लिखते हैं-

धर्मादयः संज्ञाः सामयिक्यः ।१६। धर्मादयः संज्ञाः सामयिक्यो द्रष्टव्याः। आर्हते हि प्रवचनेऽनादिनिधने अर्हदादिभिः यथाकालमभिव्यक्तज्ञानदर्शनातिशयप्रकाशैरवद्योतितार्थसारे रूढा एताः संज्ञा ज्ञेयाः।

धर्मादिक संज्ञाएँ सामयिक हैं ।१६। धर्मादिक संज्ञाएँ सामयिक जाननी चाहिए। अर्हन्तादिकके द्वारा उस उस कालमें प्रगट हुए ज्ञान-दर्शनातिशयरूप प्रकाशके द्वारा जिसमें पदार्थसार प्रकाशित किया गया है ऐसे अनादिनिधन आर्हतप्रवचनमें ये धर्म, अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल आदि संज्ञाऐं रूढ़ जाननी चाहिए।

इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० ४२९ में बतलाया है-

शब्दस्यानादिपरम्परातोऽर्थमात्रे प्रसिद्धसम्बन्धत्वात्, तेनागतसम्बन्धस्य घटादिशब्दस्य संकेतकरणात्।

शब्दका अनादि परम्परासे अर्थमात्रमें सम्बन्ध प्रसिद्ध है, इसलिए तत्तत् अर्थके साथ सम्बन्धको जानकर ही घटादि शब्दका प्रयोग किया जाता है।

दूसरे शब्दोंमें इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० ४३१ में बतलाया है-

यत्नतो हि शब्दोऽर्थवत्त्वेतरस्वभावतया परीक्षितोऽर्थं न व्यभिचरति इति।

यत्नपूर्वक अर्थवत्त्व और इतर स्वभावरूपसे परीक्षित हुआ शब्द अर्थके प्रति व्यभिचरित नहीं होता।

अतएव प्रतिशंका ३ में एकान्तसे यह लिखना कि ‘शब्द अपने अर्थको तो कहता नहीं, किस अर्थमें उसका प्रयोग किया जाय यह वक्ताकी इच्छा पर अवलम्बित है’, ठीक नहीं है, क्योंकि जैसा कि पूर्वोक्त प्रमाणोंसे स्पष्ट है, अनादि कालसे उस उस शब्दका प्रयोग जो जो उसका वाच्य है उस उस अर्थमें होता आ रहा है; अतएव एक ओर तो शब्दमें ऐसी उपादान योग्यता होती है कि वह विवक्षित अर्थका ही प्रतिपादन करे और दूसरी ओर प्रामाणिक वक्ता भी कौन शब्द अनादिकालसे किस अर्थका प्रतिपादन करता आ रहा है इस बातको जानकर उसी अर्थमें उस शब्दका प्रयोग करता है। इस प्रकार अनादिकालसे शब्दोंमें जहाँ स्वाश्रित प्रमाणता चली आ रही है वहाँ वह निमित्तोंकी अपेक्षा पराश्रित भी घटित की जाती है।

यद्यपि लोकमें सदृशपनेकी अपेक्षा एक ही शब्दका प्रयोग सम्प्रदायभेदसे भिन्न-भिन्न अर्थमें होता हुआ देखा जाता है, इसलिए अपर पक्षकी ओरसे यह आपत्ति उपस्थित की जा सकती है कि यदि शब्दोंका प्रयोग केवल वक्ताओंकी इच्छा पर अवलम्बित न होता तो सम्प्रदायभेदसे शब्दोंके अर्थमें अन्तर नहीं पड़ना चाहिए था ? समाधान यह है कि ऐसे स्थलों पर गलत शब्दोंके प्रयोगमें उन उन सम्प्रदायवालोंके अज्ञानको प्रमुख कारण मानना चाहिए । अतएव पूर्वोक्त कथनसे यही फलित होता है कि लौकिक और आगमिक शब्दोंकी सहज योग्यता पुरुषोंके द्वारा किये गये संकेतके आधीन न होकर अपने अपने उपादानके अनुसार होती है और इसी आधार पर लोकमें तथा आगममें प्रत्येक शब्द पदार्थका प्रकाशक स्वीकार किया गया है । हम पहले परीक्षामुखका ‘सहजयोग्यता’ इत्यादि सूत्र उद्धृत कर आये हैं सो उस द्वारा भी यही प्रसिद्ध किया गया है कि प्रत्येक शब्दमें उपादानरूपसे जो सहज योग्यता होती है उसके अनुसार होनेवाले संकेतमें वक्ता निमित्त है और इस प्रकार प्रत्येक शब्द अर्थप्रतिपत्तिका हेतु है । विविध भाषाओंके सम्मिलित शब्द-कोषों तथा एक भाषाके एकार्थक नाना शब्दोंको या नानार्थक एक शब्दको बतलानेवाले कोषोंकी सार्थकता भी इसीमें है । स्पष्ट है कि अपने उपादानकी अपेक्षा शब्दोंमें स्वाश्रित प्रमाणता स्वीकार करके ही उनमें निमित्तोंकी अपेक्षा पराश्रित प्रमाणता आगममें स्वीकार की गई है ।

\३. आगमप्रमाणोंका स्पष्टीकरण

इस प्रकार शब्दोंमें प्रामाणिकता किस अपेक्षासे स्वाश्रित सिद्ध होती है और किस अपेक्षासे वह पराश्रित मानी गई है इसका सप्रमाण स्पष्टीकरण करनेके बाद अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थनके लिये आगमके जिन प्रमाणोंको उद्धृत किया है वे कहाँ किस अभिप्रायसे दिये गये हैं इसका स्पष्टीकरण किया जाता है-

: १ :

मीमांसादर्शन प्रत्येक वर्णको सर्वथा नित्य और व्यापक मानकर तथा ताल्वादि व्यापारसे उनकी अभिव्यक्ति स्वीकार करके भी उन्हें कार्यरूपसे अनित्य स्वीकार नहीं करता । प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० ४०१ में मीमांसादर्शनके इस मतका निरास करनेके अभिप्रायसे ही यह कहा गया है कि ‘शब्द ऐसा नहीं कहते कि हमारा यह अर्थ है या नहीं है, किन्तु पुरुषोंके द्वारा ही शब्दोंका अर्थ संकेत किया जाता है !’ अतएव इस उद्धरणको उपस्थित कर एकान्तसे शब्दोंको पुरुषों द्वारा किये गये संकेतोंके आधीन मानना ठीक नहीं है, अन्यथा अतिप्रसंग हो जायगा । फिर तो केवली जिनकी दिव्यध्वनि द्वारा जो अर्थ प्ररूपणा होती है उसे प्रत्येक श्रोता अपने अपने संकेतके अनुसार ही समझेगा, अतएव सबको एकार्थकी प्रतिपत्ति नहीं बन सकेगी । केवली जिनकी वाणीमें आया कि ‘जीव है’ इसे सुनकर एक श्रोता अपने द्वारा कल्पित संकेतके अनुसार समझेगा कि भगवान्‌का उपदेश है कि ‘जीव नहीं है ।’ दूसरा उसीको सुनकर अपने द्वारा कल्पित संकेतके अनुसार समझेगा कि भगवान्‌का उपदेश है कि ‘पुद्गल है ।’ और इस प्रकार वचनोंकी प्रमाणता सिद्ध न होनेसे आगमकी प्रमाणता भी नहीं बनेगी । अतएव प्रकृतमें यही मानना उचित है कि शब्दका अनादि परम्परासे अर्थमात्रमें वाच्यवाचकसम्बन्ध है, अतएव अर्थके साथ अवगत सम्बन्धवाले घटादि शब्दका संकेत किया जाता है । (प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० ४२९)

: २ :

मीमांसक दर्शन सर्वज्ञकी सत्ता स्वीकार नहीं करता, फिर भी वेदार्थकी यथार्थता और उसका यथार्थ प्रतिपादन मान लेता है । इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर सर्वज्ञकी सत्ता स्वीकार करानेके अभिप्रायसे धवला पु० १ पृ० १९६ में निमित्तकी अपेक्षा यह कहा गया है कि ‘वक्ताकी प्रमाणतासे वचनोंमें प्रमाणता आती है ।’ इसलिए इस उल्लेख परसे दिव्यध्वनिकी स्वाश्रित प्रमाणताका निषेध नहीं होता, क्योंकि कार्य-कारण सिद्धान्तके अनुसार जैसा उपादान होता है, निमित्त भी उसीके अनुकूल होते हैं। इसलिए असर्वज्ञवादीको यही कहा जायगा कि ‘वक्ताकी प्रमाणतासे वचनोंमें प्रमाणतासे आती है।’ पर इसे एकान्त मानना ठीक नहीं है, अतएव इस प्रमाणसे भी दिव्यध्वनिकी स्वाश्रित प्रमाणता आगमविरुद्ध घोषित नहीं की जा सकती।

: ३ :

जयधवला पुस्तक १ पृ० ८८ द्वारा पूर्व-पूर्व प्रमाणता स्थापित कर अन्तमें सर्वज्ञकी प्रमाणता स्वीकार की गई है, क्योंकि अल्पज्ञ जनोंके लिए कौन शब्द अपनी सहज योग्यता और तदनुसार अनादि परम्परासे आये हुए संकेतके अनुसार किस अर्थका प्रतिपादन करता है यह सर्वज्ञकी प्रमाणता स्वीकार करनेसे ही ज्ञात हो सकता है। अतएव इस वचनसे भी दिव्यध्वनिकी स्वाश्रित प्रमाणताका निरास नहीं किया जा सकता।

: ४ :

कार्यके प्रति निमित्त और उपादानकी समव्याप्ति होती है और इसे ही कार्यके प्रति बाह्य और आभ्यन्तर उपाधिकी समग्रता कहते हैं। अतएव जैसे उपादानकी अपेक्षा यह कथन किया जाता है कि सत्य-भाषावर्गणारूप उपादानके अभावमें सत्यभाषाकी उत्पत्ति नहीं हो सकती उसी प्रकार (ध० पु० ९ पृ० १०८) निमित्तकी अपेक्षा भी यह कहा जाता है कि ‘रागादिका अभाव भी भगवान् महावीरमें असत्य भाषणके अभावको प्रगट करता है, क्योंकि कारणके अभावमें कार्यके अस्तित्वका विरोध है।’ अतएव इस वचनसे भी दिव्यध्वनिकी स्वाश्रित प्रमाणताका निरास नहीं किया जा सकता। यही बात धवल पु० ३ पृ० १२ व २६, जयधवल पु० १ पृ० ४४, पृ० ७२ व ८२ तथा पु० ७ पृ० १२७ से भी समर्थित होती है।

: ५ :

धवल पुस्तक १ पृ० ३६८ में दिव्यध्वनिको जो ज्ञानका कार्य कहा है सो यह कथन भी निमित्तकी अपेक्षासे ही किया है, क्योंकि केवली जिनके सत्य और अनुभय वचनयोगके होनेका नियम है, अतएव इस अपेक्षासे दिव्यध्वनि केवली जिन तथा केवलज्ञानका भी कार्य कहा जाता है इसमें कोई विरोध नहीं है। राजवार्तिकका प्रमाण उपस्थितकर इस विषयका विशेष विचार पूर्वमें ही कर आये हैं। श्री गोम्मटसार जीवकाण्डका पूर्वोक्त प्रमाण भी उक्त तथ्यके समर्थनके लिए पर्याप्त है।

: ६ :

आगममें अर्थकर्ताके रूपमें तीर्थंकर जिन तथा ग्रन्थकर्ताके रूपमें गणधरदेव और आरातीय आचार्योंको बतलाया है। सर्वार्थ सिद्धि पृ० १२३ में वक्ताके रूपमें सर्वज्ञ तीर्थंकर, सामान्य केवली तथा श्रुतकेवली और आरातीय आचार्योंको बतलाया है। प्रतिशंका ३ में उक्त तथ्यको पुष्ट करनेवाले कुछ आगमप्रमाण भी दिये गये हैं। इसलिए इस विषय पर भी विशद प्रकाश डाल देना आवश्यक है।

(१) जो सम्यग्दृष्टि जीव दुःखित संसारी प्राणियोंको देखकर उनके उद्धारकी भावनासे ओतप्रोत होते हैं उनके ही तीर्थंकर जैसी सातिशय पुण्यप्रकृतिका बंध होता है। अनन्तर जब वे अपने अन्तिम भवमें गुणस्थानक्रमसे ४ घातिया कर्मोंका नाशकर साक्षात् वीतराग सर्वज्ञ पदको प्राप्त करते हैं तब उनके भव्य जीवोंको परम आह्लाद करनेवाली दिव्यध्वनिका प्रवर्तन होता है। यहाँ विचारणीय यह है कि कार्य-कारण परम्पराके अनुसार तीर्थंकर जिनको दिव्यध्वनिके प्रवर्तनमें प्रायोगिक निमित्त कहा जाय या विस्रसा निमित्त माना जाय । सर्वार्थसिद्धि अध्याय ५ सूत्र २४ में २ प्रकारके बन्धका निर्देश करते हुए लिखा है-

बन्धो द्विविधो वैस्रसिकः प्रायोगिकश्च । पुरुषप्रयोगानपेक्षो वैस्रसिकः । तद्यथा-स्निग्धरूक्षत्व-गुणनिमित्तो विद्युदुल्काजलधाराग्नीन्द्रधनुरादिविषयः । पुरुषप्रयोगनिमित्तः प्रायोगिकः अजीवविषयो जीवाजीवविषयश्चेति द्विधा भिन्नः । तत्राजीवविषयो जतुकाष्ठादिलक्षणः । जीवाजीवविषयः कर्मनोकर्मबन्धः ।

बन्धके दो भेद हैं-वैस्रसिक और प्रायोगिक । जिसमें पुरुषका प्रयोग अपेक्षित नहीं है वह वैस्रसिक बन्ध है । जैसे स्निग्ध और रूक्ष गुणके निमित्तसे होनेवाला बिजली, उल्का, मेघ, अग्नि और इन्द्रधनुष आदिका विषयभूत बन्ध वैस्रसिक बन्ध है । और जो बन्ध पुरुषके प्रयोगके निमित्तसे होता है वह प्रायोगिक बन्ध है । इसके दो भेद हैं-अजीवसम्बन्धी और जीवाजीवसम्बन्धी । लाख और लकड़ी आदिका अजीवसम्बन्धी प्रायोगिक बन्ध है । तथा कर्म और नोकर्मका जो जीवसे बन्ध होता है वह जीवाजीवसम्बन्धी प्रायोगिक बन्ध है ।’

सर्वार्थसिद्धिके इस उद्धरणमें यद्यपि बन्धके दो भेदोंका निर्देश किया गया है तथापि इस परसे दो प्रकारके निमित्तोंका सम्यक् ज्ञान होनेमें सहायता मिलती है । वे दो प्रकारके निमित्त हैं-विस्रसा निमित्त और प्रायोगिक निमित्त । जिन कार्योंके होनेमें पुरुषका योग और विकल्प इन दोनोंकी निमित्तता स्वीकार की गई है वे प्रायोगिक कार्य कहलाते हैं । जैसे घटकी उत्पत्तिमें कुम्भकारका विकल्प और योग दोनों निमित्त हैं । इसलिए कुम्भ प्रायोगिक कार्य कहा जायगा । तथा विकल्प और योग प्रायोगिक निमित्त कहलायेंगे । यह तो प्रायोगिक निमित्तोंका विचार है । इनसे भिन्न निमित्तोंको विस्रसा निमित्त कहेंगे । तत्त्वार्थवार्तिक अ० ५ सूत्र २४ में विस्रसा शब्दके अर्थ पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-

विस्रसा विधिविपर्यये निपातः ।८। पौरुषेयपरिणामापेक्षो विधिः, तद्विपर्यये विस्रसाशब्दो निपातो द्रष्टव्यः ।

यहाँ विधिरूप अर्थसे विपर्यय अर्थमें विस्रसा शब्द आया है जो निपातनात् सिद्ध है ।८। प्रकृतमें पौरुषेय परिणामसापेक्ष विधि है, उससे विपरीत अर्थमें विस्रसा शब्द जानना चाहिए । जो विस्रसा शब्द निपातनात् सिद्ध है ।

समयसार गाथा ४०६ की आचार्य जयसेनकृत टीकामें प्रायोगिक और वैस्रसिक शब्दोंके अर्थका स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है-

प्रायोगिकः कर्मसंयोगजनितः । वैस्रसिकः स्वभावजः ।

कर्मके संयोगसे उत्पन्न हुआ गुण प्रायोगिक कहलाता है । तथा स्वभावसे उत्पन्न हुआ गुण वैस्रसिक कहलाता है ।

समयसार गाथा १०० पर दृष्टिपात करने पर जिन योग और विकल्पको उत्पादक हेतु या कर्ता निमित्त कहा गया है उसीकी प्रायोगिक संज्ञा है । और तद् इतर शब्दोंकी वैस्रसिक संज्ञा है । इस दृष्टिसे जब इस बातका विचार किया जाता है कि तीर्थंकर जिन दिव्यध्वनिके प्रवर्तनमें क्या प्रायोगिक निमित्त हैं तो विदित होता है कि उनके रागका सर्वथा अभाव होनेके कारण उन्हें प्रायोगिक निमित्त कहना उपयुक्त न होगा । माना कि उनके कर्मनिमित्तक योगका सद्भाव पाया जाता है और उनके तीर्थंकर प्रकृति तथा शरीरादिक नामकर्मका उदय भी विद्यमान है, परन्तु उनके मनका ( भावमनका ) अभाव होनेके कारण जिस प्रकारकी वचन प्रवृत्ति अन्य अस्मदादि साधारण जीवोंके उपलब्ध होती है उस प्रकारकी वचनप्रवृत्ति उनके नहीं पाई जानेके कारण उन्हें दिव्यध्वनिके प्रवर्तनमें अस्मदादि जनोंके समान हेतुकर्ता कहना उचित न होगा। अतएव यही सिद्ध होता है कि जिस प्रकार कषायके अभावमें केवली जिनके योगकी अपेक्षा शुक्ल लेश्याका उपचार किया गया है या जिस प्रकार मनोपयोगके अभावमें केवली जिनके सूक्ष्मकाययोगके कालमें सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति शुक्लध्यान उपचारसे माना गया है। उसी प्रकार जो योगक्रिया कषायके साथ अनुरंजित होकर प्रायोगिक हेतुकर्ता व्यपदेशको प्राप्त होती थी वही योगक्रिया दिव्यध्वनिके प्रवर्तनमें हेतु है। इस अपेक्षा तीर्थंकर जिनको सर्वत्र आगममें अर्थकर्ता कहा गया है। यतः इस प्रकारकी विशिष्ट योगक्रिया केवलज्ञानके सद्भावमें ही होती है। इस अपेक्षासे दिव्यध्वनि केवलज्ञानका कार्य भी आगममें कहा गया है। आगममें अनेक नयोंकी अपेक्षा अनेक प्रकारसे प्रतिपादन किया गया है। श्रुतधरोंका कर्त्तव्य है कि जहाँ जिस विवक्षासे जो कथन किया गया हो उसे समझकर उसका व्याख्यान करें। इससे पूरे आगममें कैसे एक वाक्यता है, इसे समझनेमें सहायता मिलती है। सामान्य केवलियोंको जहाँ भी कर्ता या व्याख्याता कहा गया है वहाँ उसे इसी न्यायसे जान लेना चाहिए।

(२) आरातीय आचार्योंको ग्रन्थकर्ता या व्याख्याता किस अपेक्षा कहा गया है इसका स्पष्टीकरण यद्यपि पूर्वमें किये गये प्रायोगिक शब्दके स्पष्टीकरणसे हो जाता है तथापि यहाँ इनके विषयमें दो प्रकारसे विचार करना इष्ट है-एक ज्ञानभावकी अपेक्षा और दूसरे रागपरिणतिकी अपेक्षा। ज्ञानभावकी अपेक्षा विचार करने पर जितनी भी स्वभावपरिणति जीवके होती है उसमें पर द्रव्यके कार्यके प्रति अणुमात्र भी निमित्तता घटित नहीं की जा सकती। अतएव इस अपेक्षासे उन्हें ग्रन्थकर्ता या व्याख्याता कहना सम्भव नहीं है। इस अपेक्षासे तो स्वयं शब्दवर्गणाऐं अपने परिणमनरूप शक्तिके कारण शब्द, पद, वाक्यरूप परिणमन करती हुई ग्रन्थविस्तार या प्रवचनविस्तारकी हेतु होती हैं। उसमें ज्ञानीका ज्ञानभाव रंचमात्र भी कारण नहीं है। अन्यथा अयोगकेवली और सिद्धोंको भी वचनप्रवृत्तिमें हेतु माननेका प्रसंग आएगा। यह निश्चयनयका वक्तव्य है। व्यवहारनयकी अपेक्षा विचार करने पर तो जब जब ज्ञानी सविकल्प अवस्थाको प्राप्त होते हैं तब तब उनके चित्तमें भव्य जीवोंको उपदेश देनेका भी विचार आता है और ग्रन्थरचनाकी भी इच्छा जाग्रत होती है। यद्यपि इस अवस्थामें भी वे स्वयं ऐसे रागके प्रति हेयबुद्धि ही रखते हैं उसे उपादेय नहीं मानते, फिर भी रागपूर्वक जो जो कार्य होना चाहिए वह होता अवश्य है। इसलिए इस अपेक्षासे वे उपेक्षा बुद्धिपूर्वक ग्रन्थ रचनाके हेतुकर्ता और व्याख्याता भी कहे गये हैं। आचार्य कुन्दकुन्द प्रभृति महर्षियोंने यदि कहीं ‘वोच्छामि’ आदि शब्दोंका प्रयोग अपने ग्रन्थोंमें किया है तो वह इसी अभिप्रायसे किया है इससे अपर पक्षका जो यह कहना है कि आचार्य अमृतचन्दने समयसारगाथा ४१५ की आत्मख्याति टीका और अन्तिम कलशमें वचनकी स्वाश्रित प्रमाणता न बतलाकर मात्र उक्त उल्लेख द्वारा अपनी लघुता प्रगट की है सो उस पक्षका यह कथन समीचीन नहीं है, क्योंकि यथार्थरूपसे विचार करने पर समयसार और उसकी आत्मख्याति टीकाकी जो रचना हुई है वह शब्दोंकी अपनी तद्रूप परिणमनशक्तिका ही फल है, आचार्य कुन्दकुन्द और आचार्य अमृतचन्द तो उसमें राग और योगकी अपेक्षा निमित्तमात्र हैं।

हमने अपने दूसरे उत्तरमें समयसार गाथा ९९ और १०० के आधारसे जिन पाँच सिद्धान्तोंकी विवेचना की थी उन पर अपर पक्षने जिस टोनमें टीका की है वह उपेक्षणीय ही है। फिर भी यहाँ हम जिन पाँच सिद्धान्तोंका दूसरे उत्तरमें निर्देश कर आये हैं उनका सांगोपांग विचार कर लेना आवश्यक समझते हैं-

(१) समयसार गाथा ९८ में व्यवहारसे जिस कर्तृत्वका विधान किया है वह व्यवहारी जनोंका व्यामोह मात्र क्यों है इसका स्पष्टीकरण गाथा ९९ में करते हुए बतलाया है ‘यदि आत्मा परद्रव्योंको करे तो वह उनके साथ नियमसे तन्मय हो जाए। परन्तु तन्मय नहीं होता इस कारण वह उनका कर्ता नहीं है।’ इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि एक द्रव्यका दूसरे द्रव्यमें यथार्थ कर्तृत्वका सर्वथा अभाव है। इस परसे यह सिद्धान्त फलित हुआ-

‘आत्मा व्याप्य-व्यापकभावसे तन्मयताका प्रसंग आनेके कारण परद्रव्योंकी पर्यायोंका कर्ता नहीं है।’

इस सिद्धान्तमें आत्मा पदसे उपादानरूप आत्माका ग्रहण किया गया है।

यहाँ यह प्रश्न होता है कि निश्चयसे न सही, व्यवहारसे तो एक द्रव्यको दूसरे द्रव्यका कर्ता माननेमें आपत्ति नहीं है। समाधान यह है कि व्यवहारसे निमित्तपनेका ज्ञान करानेके लिए एक द्रव्यको दूसरे द्रव्यकी विवक्षित पर्यायका उपचारसे कर्ता कहा जाता है। इस कार्यका निश्चय कर्ता कौन है यह ज्ञान कराना इसका प्रयोजन है।

(२) गाथा १०० में जीव परद्रव्यकी पर्यायोंका निमित्तनैमित्तिकभावसे भी कर्ता नहीं है, यह प्रतिपादन किया गया है। ऐसा प्रतिपादन करते हुए प्रकृतमें जीवपदसे द्रव्यार्थिकनयका विषयभूत आत्मा लिया गया है, क्योंकि यदि ऐसे जीवको परद्रव्योंकी पर्यायोंका निमित्त-नैमित्तिकभावसे भी कर्ता मान लिया जाय तो इसके सदाकाल एकरूप अवस्थित रहनेके कारण सदा ही निमित्तरूपसे कर्ता बननेका प्रसंग आयगा। किन्तु कोई भी द्रव्यार्थिकनयका विषयभूत द्रव्य परद्रव्यकी पर्यायकी उत्पत्तिमें व्यवहारहेतु नहीं होता ऐसा एकान्त नियम है। अतएव इस परसे यह सिद्धान्त फलित हुआ कि-

सामान्य आत्मा निमित्तनैमित्तिकभावसे परद्रव्योंकी पर्यायोंका कर्ता नहीं है। अन्यथा नित्य निमित्तिकर्तृत्वका प्रसंग आता है।

(३) ज्ञानी जीवके रागादिकका स्वामित्व नहीं है। इसलिए वह रागादिकके स्वामित्वके अभावमें परद्रव्योंकी पर्यायोंका निमित्त कर्ता नहीं बनता। साथ ही वह यह भी जानता है कि प्रत्येक द्रव्यका प्रति समय परिणमन करना उसका स्वभाव है, उसमें फेर-फार करना किसीके आधीन नहीं। अन्य द्रव्य तो उस उस परिणमनमें निमित्तमात्र है। इसलिए इसपरसे यह सिद्धान्त फलित हुआ कि-

अज्ञानी जीवके योग और उपयोग ( विकल्प ) परद्रव्योंकी पर्यायोंके व्यवहारसे निमित्त कर्ता हैं।

( ४ ) ज्ञान भावके साथ अज्ञान भावके होनेका विरोध है। इस परसे यह सिद्धान्त फलित हुआ कि-

आत्मा अज्ञान भावसे योग और उपयोगका कर्ता है, तथापि परद्रव्योंकी पर्यायोंका कर्ता कदाचित् भी नहीं है।

( ५ ) ज्ञानभाव कहो या स्वभाव पर्याय दोनोंका एक ही तात्पर्य है। इस परसे यह सिद्धान्त फलित हुआ कि आत्मा ज्ञानभावसे परद्रव्योंकी पर्यायोंका भी निमित्तकर्ता नहीं है।

ये ५ जिनागमके सारभूत सिद्धान्त हैं। इनके आधारसे हमारा उपहास किया जा सकता है, किन्तु ये अमिट हैं । उपहास करनेमात्रसे इनको अप्रमाण नहीं ठहराया जा सकता। इसमें सन्देह नहीं कि विकल्प और योगका स्वामित्व स्वीकार कर हमारे मनमें चर्चा करनेका यदि उत्साह हुआ होगा तो ऐसी अवस्थामें अपर पक्षके द्वारा हमें अज्ञानी प्रसिद्ध करना सत्यका ही उद्घाटन कहलायगा। और यदि मोक्षमार्गकी प्रसिद्धिके सदभिप्रायवश ज्ञानभावके प्रति आदर रखते हुए चर्चासम्बन्धी यह कार्य हुआ होगा तो अन्यके द्वारा हमें अज्ञानी कहे जाने पर भी, हम अज्ञानी नहीं बन जावेंगे। यह तो अपनी अपनी परिणति है उसे वह स्वयं जान सकता है या विशेष ज्ञानी। विज्ञेषु किमधिकम्।

शंका ९, प्रथम दौर: शंका ९ और उसका समाधान

पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ५४९ से ५५१

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प्रथम दौर

: १ :

शंका १

सांसारिक जीव बद्ध है या मुक्त ? यदि बद्ध है तो किससे बँधा हुआ है और किसीसे बँधा हुआ होनेसे वह परतन्त्र है या नहीं ? यदि वह बद्ध है तो उसके बंधनोंसे छूटनेका उपाय क्या है ?

समाधान १

सांसारिक जीव सद्भूतव्यवहारस्वरूप अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा अपने अज्ञानरूप राग, द्वेष और मोह आदि अशुद्धभावोंसे बद्ध है ।

अयमात्मा सर्व एव तावत्सविकल्प-निर्विकल्पपरिच्छेदात्मकत्वादुपयोगमयः । तत्र यो हि नाम नानाकारान् परिच्छेद्यानर्थानासाद्य मोहं वा रागं वा द्वेषं वा समुपैति स नाम तैः परप्रत्ययैरपि मोह-राग-द्वेषैरुपरक्तात्मस्वभावत्वान्नील-पीत-रक्तोपाश्रयप्रत्ययनील-पीत-रक्तत्वैरुपरक्तस्वभावः स्फटिकमणिरिव स्वयमेक एव तत्भावद्वितीयत्वाद् बन्धो भवति ॥१७४॥
-प्रवचनसार गा० १७५

अर्थ-प्रथम तो यह आत्मा सर्व ही उपयोगमय है, क्योंकि वह सविकल्प और निर्विकल्प प्रतिभासस्वरूप है । उसमें जो आत्मा विविधाकार प्रतिभासित होनेवाले पदार्थोंको प्राप्त करके मोह, राग अथवा द्वेष करता है वह काला, पीला और लाल आश्रय जिनका निमित्त है ऐसे कालेपन, पीलेपन और ललाईके द्वारा उपरक्तस्वभाववाले स्फटिक मणिकी भाँति-पर जिनका निमित्त है ऐसे मोह, राग और द्वेषके द्वारा उपरक्त (विकारी) आत्मस्वभाववाला होनेसे स्वयं अकेला ही बन्धरूप है, क्योंकि मोह, राग, द्वेषादि भाव इसका द्वितीय है ॥१७४॥

असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा ज्ञानावरणादि आठ द्रव्यकर्मों तथा औदारिक शरीरादि नोकर्मके साथ बद्ध है ।

यत्तावदत्र कर्मणां स्निग्धरूक्षत्वस्पर्शविशेषैरेकत्वपरिणामः स केवलपुद्गलबंधः । यस्तु जीवस्यौपाधिकमोह-राग-द्वेषपर्यायैरेकत्वपरिणामः स केवलजीवबन्धः । यः पुनः जीवकर्मपुद्गलयोः परस्परपरिणामनिमित्तमात्रत्वेन विशिष्टतरः परस्परमवगाहः स तदुभयबन्धः ॥१७७॥
-प्रवचनसार गाथा १७७ टीका

अर्थ-प्रथम तो यहाँ, कर्मोंका जो स्निग्धता-रूक्षतारूप स्पर्श विशेषोंके साथ एकत्वपरिणाम है सो केवल पुद्गलबन्ध है; और जीवका औपाधिक मोह, राग, द्वेषरूप पर्यायोंके साथ जो एकत्व परिणाम है सो केवल जीवबंध है; और जीव तथा कर्म पुद्गलके परस्पर परिणामके निमित्तमात्रसे जो विशिष्टतर परस्पर अवगाह है सो उभयबंध है अर्थात् जीव और कर्मपुद्गल एक-दूसरेके परिणाममें निमित्तमात्र होवें ऐसा जो ( विशिष्ट प्रकारका ) उनका एकक्षेत्रावगाह संबंध है सो वह पुद्गलजीवात्मक बंध है । तथा शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा परम पारिणामिक भावस्वरूप शुद्ध जीवके द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्मका अभाव होनेसे वह सकल दोषोंसे विमुक्त है। श्री नियमसारजीकी गाथा ४५ की टीकामें कहा भी है-

शुद्धनिश्चयनयेन शुद्धजीवास्तिकायस्य द्रव्य-भावनोकर्माभावात् सकलदोषनिर्मुक्तः।

अर्थ पूर्वमें दिया ही है।

इस प्रकार सांसारिक जीव किस अपेक्षा बद्ध है और किस अपेक्षासे मुक्त ( अबद्ध ) है, आगमसे इसका सम्यक् निर्णय हो जानेपर वह किससे बँधा हुआ है; और किसीसे बँधा हुआ होनेके कारण वह परतन्त्र किस प्रकार है इसका सम्यक् निर्णय हो जाता है। तात्पर्य यह है कि यदि अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा विचार करते हैं तो वह अज्ञानरूप अपने अशुद्धभावोंसे वास्तवमें बद्ध है। उसे यदि बद्धताका अभाव करना है तो अपनी इसी बद्धताका अभाव करना है। उसका अभाव होनेसे जो असद्भूतव्यवहाररूप बद्धता कही गई है उसका अभाव स्वयमेव नियमसे हो जाता है, क्योंकि अशुद्ध निश्चय और व्यवहारके भावाभावके सहगामी होनेका सर्वत्र यही नियम है।

अतएव संसारी आत्मामें यदि परतन्त्रताकी अपेक्षा विचार किया जाता है तो वह अशुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा अपने अज्ञान भावसे बद्ध होनेके कारण वास्तवमें परतन्त्र है और असद्भूतव्यवहारनयकी अपेक्षा विचार किया जाता है तो उसमें उपचरितरूपसे कर्म और नोकर्मकी अपेक्षा भी परतन्त्रता घटित होती है।

इस प्रकार संसारी आत्मा किस अपेक्षा किस प्रकार बँधा है इसका सम्यक् निर्णय हो जाने पर उसके बंधनोंसे छूटनेके उपाय क्या हैं ? इसका सम्यक् निर्णय करनेमें देर नहीं लगती।

आगममें सर्वत्र यह तो बतलाया है कि यदि संसारी आत्मा अपने बद्ध पर्यायरूप राग, द्वेष और मोह आदि अज्ञान भावोंका अभाव करनेके लिये अंतरंग पुरुषार्थ नहीं करता है और केवल जिसे आगममें उपचारसे व्यवहारधर्म कहा है उसीमें प्रयत्नशील रहता है तो उसके द्रव्यकर्मोंकी निर्जरा न होनेके समान है। इसी आशयको ध्यानमें रखकर श्री छहढालामें जो यह कहा है कि-

कोटि जनम तप तपै ज्ञान बिन कर्म झरें जे।
ज्ञानीके छिनमें त्रिगुप्तितैं सहज टरैं ते॥

वह यथार्थ ही कहा है।

यह कथन केवल पं० प्रवर दौलतरामजीने ही किया हो ऐसा नहीं है, किन्तु प्राचीन परमागममें भी इसका सम्यक् निरूपण हुआ है। आचार्यवर्य अमृतचन्द्र इसी आशयको व्यक्त करते हुए समयसारजीके कलशमें कहते हैं-

रागद्वेषोत्पादकं तत्त्वदृष्ट्या
नान्यद्द्रव्यं वीक्ष्यते किञ्चनापि।
सर्वद्रव्योत्पत्तिरन्तश्चकास्ति
व्यक्तात्यन्तं स्वस्वभावेन यस्मात् ॥२३९॥

अर्थ-तत्त्वदृष्टिसे देखा जाय तो राग-द्वेषको उत्पन्न करनेवाला अन्य द्रव्य किञ्चित् मात्र भी दिखाई नहीं देता, क्योंकि सर्व द्रव्योंकी उत्पत्ति अपने स्वभावसे ही होती हुई अन्तरंगमें अत्यन्त प्रगट प्रकाशित होती है ॥२३९॥

अतएव संसारी आत्माको द्रव्य-भावरूप उभय-बंधनोंसे छूटनेका उपाय करते समय निश्चय-व्यवहार उभयरूप धर्मका आश्रय लेनेकी आवश्यकता है। उसमें भी नियम यह है कि जब यह आत्मा अपने परम निश्चल परमात्मरूप ज्ञायकभावका आश्रय लेकर सम्यक् पुरुषार्थ करता है तब उसके अन्तरंगमें निश्चय रत्नत्रय स्वरूप जितनी जितनी विशुद्धि प्रगट होती जाती है उसीके अनुपातमें उसके बाह्यमें द्रव्यकर्मका अभाव होता हुआ व्यवहार धर्मकी भी प्राप्ति होती जाती है। यह ऐसा विषय नहीं है, जिन्हें करणानुयोग का सम्यग्ज्ञान है, उनकी विवेकशालिनी दृष्टिसे ओझल हो। यही कारण है कि आचार्यवर्य अमृतचन्द्र समयसार कलशमें सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि-

आसंसारात्प्रतिपदममी रागिणो नित्यमत्ताः
सुप्ताः यस्मिन्नपदमपदं तद्धि बुध्यध्वमन्धाः।
एतैतेतः पदमिदमिदं यत्र चैतन्यधातुः
शुद्धः शुद्धः स्वरसभरतः स्थायिभावत्वमेति ॥१३८॥

अर्थ-हे अविवेकी प्राणियो! अनादि संसारसे लेकर पर्याय पर्यायमें ये रागी जीव सदा मत्त वर्तते हुए जिस पदमें सो रहे हैं वह पद (स्थान) अपद है, अपद है (तुम्हारा पद नहीं है) ऐसा तुम अनुभव करो। इस ओर आओ, इस ओर आओ। तुम्हारा पद यह है, तुम्हारा पद यह है जहाँ शुद्ध अतिशय शुद्ध चैतन्यधातु निजरसकी अतिशयताके कारण स्थायिभावत्वको प्राप्त है अर्थात् स्थिर है, अविनाशी है ॥ १३८ ॥