शंका ६, तृतीय दौर: प्रतिशंका ३ (भाग २/२)
पुस्तक २, मुद्रित पृष्ठ ४०७ से ४२९
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अब आप अपने गृहीत अभिप्रायके साथ दोनों उद्धरणोंके ऊपर लिखित अभिप्रायोंका मिलान करेंगे तो आपको अभिप्रायके ग्रहण करनेमें अपनी गलतीका पता सहज ही में लग जायगा।
आपने जो अभिप्राय ग्रहण किया है और जिसे हम ऊपर उद्धृत कर आये हैं-यह है कि ‘मिट्टी घट-पर्यायके परिणमनके सन्मुख होती है तब दण्ड, चक्र, और पौरुषेय प्रयत्नकी निमित्तता स्वीकृत की गयी है, अन्य कालमें वे निमित्त नहीं स्वीकार किये गये हैं।’
मालूम पड़ता है कि उक्त उद्धरणोंका यह अभिप्राय आपने दूसरे उद्धरणमें पठित ‘तदैव’ पदके आधारपर ही ग्रहण किया है, परन्तु आपको मालूम होना चाहिये कि उस उद्धरणमें ‘तदैव’ पदका अभिप्राय यही है कि ‘मिट्टीको जिस समय निमित्तोंका सहयोग प्राप्त होता है उस समयमें ही वह मिट्टी कुशूल पर्यायरूपता अथवा कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूपताको प्राप्त होती है।’
इस प्रकार हमारे द्वारा और आपके द्वारा गृहीत दोनों पर्यायोंमें जमीन-आसमानका अन्तर देखनेके लिये मिलता है, क्योंकि जहाँ आपके अभिप्रायके आधारपर निमित्तकी कार्यके प्रति व्यर्थता सिद्ध होती है वहाँ हमारे अभिप्रायके आधारपर निमित्तकी कार्यके प्रति सार्थकता ही सिद्ध होती है। अर्थात् आपका अभिप्राय जहाँ यह बतलाता है कि जब उपादान कार्यरूप परिणत होनेके लिये तैयार रहता है तब निमित्त हाजिर रहता है वहाँ हमारा अभिप्राय यह बतलाता है कि जब निमित्तोंका सहयोग उपादानकी कार्योत्पत्तिके लिये प्राप्त होता है उस समयमें ही कार्यकी उत्पत्ति होती है। जैसे साइकलको आप चलाइये, उसपर बैठ जाइये और उसे चलाते जाइये, साइकल चलती जायगी और आपको भी वह अभिलषित स्थानपर पहुँचा देगी।
आपने जो यह लिखा है कि दण्ड, चक्र आदिमें निमित्तता उसी समय स्वीकार की गई है जब मिट्टी घट-पर्यायके परिणमनके सन्मुख होती है, अन्य कालमें वे निमित्त नहीं स्वीकार किये गये हैं। इस विषयमें हमारा कहना यह है कि कुम्हार, दण्ड, चक्र आदिमें घटके प्रति निमित्त कारणताका अस्तित्व उपादानभूत वस्तुकी तरह नित्यशक्तिके रूपमें तो पहले भी पाया जाता है, क्योंकि कार्योत्पत्तिके लिये उपादानभूत वस्तुके संग्रहकी तरह निमित्तभूत वस्तुका भी लोकमें संग्रह किया जाता है। यह बात दूसरी है कि उपादान और निमित्त दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंका उपयोग कार्योत्पत्तिके अवसर पर ही हुआ करता है, इसलिये आपका वैसा लिखना भी गलत है।
बड़े खेदकी बात है कि आपने अपने पक्षके समर्थनमें जहाँ-जहाँ और जितने आगमके उद्धरण दिये हैं उनमें सर्वत्र इसी प्रकारकी गलतियाँ आपने की हैं। हमारी आपसे विनय है कि आगमके वचनोंका अभिप्राय बिल्कुल स्वाभाविक ढंगसे आगमके दूसरे वचनोंके साथ समन्वयात्मक पद्धतिको अपनाते हुए प्रकरण आदिको लक्ष्यमें रखकर वाक्यविन्यास, पदोंकी सार्थकता, ग्रन्थकर्ताकी विषय-मर्मज्ञता साहित्यिक ढंग और भाषा-पांडित्य आदि उपयोगी बातोंको लक्ष्यमें रखकर ही ग्रहण कीजिये, अन्यथा इस तरहकी प्रवृत्तिका परिणाम जैन-संस्कृतिके लिये आगे चलकर बड़ा भयानक होगा जिसके लिये यदि जीवित रहे तो हम और आप सभी पछतावेंगे। अस्तु।
आगे आपने लिखा है कि ‘सहकारी कारण सापेक्ष विशिष्ट पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्ति ही कार्यकारिणी मानी गयी है, केवल उदासीन या प्रेरक निमित्तोंके बलपर मात्र द्रव्यशक्तिसे ही द्रव्यमें कार्य नहीं होता’ यह तो आपने ठीक लिखा है परन्तु इसके आगे आपने जो यह लिखा है कि ‘यदि द्रव्यशक्तिको बाह्य-निमित्तोंके बलसे कार्यकारी मान लिया जाये तो चनेसे भी गेहूँकी उत्पत्ति होने लगे।’
इस विषयमें हमें यह कहना है कि पर्याय-शक्तिकी अपेक्षारहित केवल द्रव्यशक्तिको निमित्तोंके बलपर हम भी कार्यकारी नहीं मानते हैं, किन्तु हम आपके समान ऐसा भी नहीं मानते कि कार्य निमित्तकी अपेक्षारहित केवल विशिष्ट पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्तिमात्रसे ही उत्पन्न हो जाया करता है तथा ऐसा भी नहीं मानते कि सहकारी कारणकी सापेक्षताका अर्थ केवल इतना ही होता है कि सहकारी कारणकी उपस्थिति वहाँपर नियमसे रहा ही करती है, उसका वहाँपर कभी अभाव नहीं होता। हम तो ऐसा मानते हैं कि एक तो उस पर्यायशक्तिकी उत्पत्ति सहकारी कारणोंके सहयोगसे ही होती है, दूसरे पूर्व पर्यायशक्ति विशिष्ट द्रव्यशक्ति निमित्तोंका वास्तविक सहयोग मिलनेपर ही उत्तर पर्यायरूप कार्यको उत्पन्न करती है और फिर उस उत्तर पर्यायशक्ति विशिष्ट द्रव्यशक्ति भी यदि निमित्तोंका अनुकूल सहयोग मिल जावे तो उस उत्तर पर्यायसे भी उत्तर पर्यायको उत्पन्न कर देती है तथा यदि अनुकूल निमित्तोंका सहयोग प्राप्त नहीं होता तो वर्तमान पर्याय-शक्तिसे विशिष्ट द्रव्यशक्ति उस पर्यायसे उत्तर क्षणवर्ती विवक्षित पर्यायको उत्पन्न करनेमें सर्वथा ही असमर्थ रहेगी? फिर तो उससे उसी कार्यकी उत्पत्ति होगी जिसके अनुकूल उस समय निमित्त उपस्थित होंगे । इसलिये आपने जो प्रकृतमें चनेसे गेहूँकी उत्पत्तिके प्रसक्त होनेकी आपत्ति हमारे सामने उपस्थित की है उस आपत्तिका हमारे सामने उपस्थित करना कुछ अर्थ नहीं रखता है, क्योंकि अन्य अनेक शक्तियोंके रहते हुए भी चनेमें गेहूँके उत्पन्न करनेकी शक्ति नहीं है।
आगे आपने ‘यदि द्रव्यशक्तिको बाह्य-निमित्तोंके बलसे कार्यकारी मान लिया जाये तो चनेसे भी गेहूँकी उत्पत्ति होने लगे’ इस आपत्तिके उपस्थित करनेमें जो यह हेतु दिया है कि ‘क्योंकि गेहूँ स्वयं द्रव्य नहीं है किन्तु पुद्गल द्रव्यकी एक पर्याय है, अतएव गेहूँ पर्याय विशिष्ट पुद्गल द्रव्य बाह्य-कारणसापेक्ष गेहूँके अंकुरादि कार्यरूपसे परिणत होता है। यदि विशिष्ट पर्यायरहित द्रव्य सामान्यसे निमित्तोंके बलपर गेहूँकी अंकुरादि पर्यायोंकी उत्पत्ति मान ली जाये तो जो पुद्गल चनारूप हैं वे पुद्गल होनेसे उनसे भी गेहूँरूप पर्यायोंकी उत्पत्ति होने लगेगी।’
इसमें हमारा कहना यह है कि आपने गेहूँ पर्यायविशिष्ट पुद्गल द्रव्यको बाह्य-कारणसापेक्ष होनेपर ही गेहूँके अंकुरादि कार्यरूपसे परिणत होना लिखा है, सो यह यदि आपने बुद्धिभ्रमसे न लिखकर बुद्धिपूर्वक ही लिखा है तो इससे तो कार्यके प्रति निमित्त कारणकी सार्थकताका ही समर्थन होता है। इस तरह आपके द्वारा स्वीकृत कार्यके प्रति निमित्त कारणताकी अकिंचित्करताका आपहीके द्वारा खण्डन हो जाता है, क्योंकि हम भी तो यही कहते हैं कि गेहूँसे जो गेहूँकी अंकुरादिरूपसे पर्याय बनती है वह बाह्य निमित्तोंका सहयोग मिलनेपर ही बनती है। अर्थात् यदि बाह्य-निमित्तोंके सहयोगके अभावमें ही गेहूँसे उक्त अंकुरादिरूप पर्यायकी उत्पत्ति स्वीकार की जाती है तो फिर कोठीमें रक्खे हुए गेहूँसे भी निमित्तकी सहायताके बिना उक्त अंकुरादिरूप पर्यायकी उत्पत्ति होने लगेगी। तात्पर्य यह है कि कोठीमें रक्खे हुए गेहूँमें हमारे समान आपने भी गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिकी योग्यता (उपादान शक्ति) को उक्त लेखद्वारा स्वीकार कर लिया है, क्योंकि उक्त लेखमें आपने यही तो लिखा है कि गेहूँ पर्याय विशिष्ट पुद्गल द्रव्य बाह्य कारण सापेक्ष गेहूँके अंकुर आदि कार्यरूप परिणत होता है। अब यदि कोठीमें रक्खे हुए उस गेहूँसे गेहूँका अंकुर उत्पन्न नहीं हो रहा है तो इसका कारण सिर्फ बाह्य-निमित्तोंके सहयोगका अभाव ही हो सकता है, अन्य कोई नहीं। इस प्रकार कार्यके प्रति जब निमित्त कारणकी आप ही सार्थकता सिद्ध कर देते हैं तो वह जैसे अकिंचित्कर नहीं रह जाता है वैसे ही वह कल्पनारोपित भी नहीं रहता है। हमारा प्रयास आपसे इतनी ही बात स्वीकृत करानेका है।
वैसे आपके इस मन्तव्यसे हम सहमत नहीं हो सकते हैं कि ‘पुद्गलरूप द्रव्यशक्ति ही गेहूँरूप पर्याय विशिष्ट होकर गेहूँरूप पर्यायको उत्पन्न करती है-ऐसा कार्यकारणभाव यहाँपर स्वीकार किया गया है’ किन्तु गेहूँ नामका पुद्गल द्रव्य अनुकूल निमित्तके सहयोगसे गेहूँरूप अंकुरोत्पत्तिके योग्य विशिष्ट पर्यायको प्राप्त होनेपर अनुकूल निमित्त सहयोगसे ही गेहूँरूप अंकुरोत्पत्ति अपनेमें कर लेता है ऐसा ही कार्यकारणभाव यहाँपर ग्रहण करना उचित है। अतः इस रूपसे भी चनेसे गेहूँकी उत्पत्तिके प्रसक्त होनेकी आपत्ति उपस्थित नहीं होती है।
यह जो आपने कहा है कि ‘गेहूँ स्वयं द्रव्य नहीं है, किन्तु पुद्गल द्रव्यकी एक पर्याय है’ सो इसके विषयमें भी हमारा कहना यह है कि गेहूँ एक पुद्ल द्रव्यकी पर्याय नहीं है, किन्तु अनेक पुद्गल द्रव्य मिश्रित होकर एक गेहूँरूप स्कन्ध पर्यायरूपताको प्राप्त हुए हैं, इसलिए जिस तरह आत्मा कर्म-नोकर्मरूप पुद्गलोंके साथ मिश्रित होकर दोनोंका एक पिण्ड बना हुआ है उसी प्रकार नाना अणुरूप पुद्गल द्रव्योंका भी परस्पर मिश्रण होकर एक गेहूँरूप पिण्ड बन गया है। आगममें यद्यपि पुद्गल स्कन्धोंको पुद्गल द्रव्यकी पर्याय भी कहा गया है परन्तु इसका आशय इतना ही है कि नाना अणुरूप द्रव्योंने मिलकर अपनी एक स्कन्ध पर्यायरूप स्थिति बना ली है। यदि आप गेहूँ आदि स्कन्धोंको पुद्गल द्रव्यकी पर्याय स्वीकार करते हैं तो यह हमारे लिए तो अनिष्ट नहीं है। परन्तु ऐसा माननेपर आपके सामने बन्धरूप संयोगकी वास्तविक स्थिति स्वीकार करनेका प्रसंग उपस्थित हो जायगा, लेकिन श्री पं० फूलचन्दजी जैनने अपनी जैनतत्त्वमीमांसा पुस्तकमें संयोगको अवास्तविक ही स्वीकार किया है वह कथन निम्न प्रकार है-
‘जीवकी संसार और मुक्त अवस्था है और वह वास्तविक है-इसमें सन्देह नहीं। पर इस आधारसे कर्म और आत्माके संश्लेष सम्बन्धको वास्तविक मानना उचित नहीं है। जीवका संसार उसकी पर्यायमें ही है और मुक्ति भी उसीकी पर्यायमें है। ये वास्तविक हैं और कर्म तथा आत्माका संश्लेष सम्बन्ध उपचरित है। स्वयं संश्लेष सम्बन्ध यह शब्द ही जीव और कर्मके पृथक्-पृथक् होनेका ख्यापन करता है।’ -जैनतत्त्वमीमांसा विषयप्रवेश प्रकरण पृष्ठ १८
यहाँपर उन्होंने (पं० फूलचन्दजीने) संश्लेष सम्बन्धको उपचरित माना है और उपचरित शब्दका अर्थ आप सब कल्पनारोपित ही करते हैं।
अब उक्त कथनके अनुसार कार्यकारणभावका वास्तविक आधार क्या है? इसपर थोड़ा विचार कर लेना आवश्यक जान पड़ता है।
मिट्टी घटका कारण है-इस वाक्यका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि मिट्टीरूप पर्यायशक्ति विशिष्ट पुद्गलरूप द्रव्यशक्ति घटका कारण है, किन्तु उक्त वाक्यका यही अर्थ समझना चाहिये कि स्थूल पर्यायोंकी अपेक्षा घटरूप कार्याव्यवहित पूर्ववर्ती कुशूल पर्यायशक्तिसे विशिष्ट तथा क्षणिक पर्यायोंकी अपेक्षा घटरूप कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायशक्तिसे विशिष्ट मिट्टीरूप द्रव्यशक्ति घटका कारण है। इसी प्रकार गेहूँ गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिमें कारण है-इस वाक्यका यह अर्थ नहीं समझना चाहिये कि गेहूँरूप पर्यायशक्ति विशिष्ट पुद्गलरूप द्रव्यशक्ति गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिमें कारण है, किन्तु उक्त वाक्यका यही अर्थ समझना चाहिये कि स्थूल पर्यायोंकी अपेक्षा गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्याव्यवहित पूर्ववर्ती खेतमें वपनरूप पर्यायशक्ति-विशिष्ट तथा क्षणिक पर्यायोंकी अपेक्षा गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायशक्ति विशिष्ट गेहूँरूप द्रव्यशक्ति ही गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिमें कारण है।
इसका कारण यह है कि घटरूप कार्यके उत्पन्न होनेमें मिट्टी पुद्गलद्रव्यकी पर्यायरूपसे कारण नहीं बन रही है, किन्तु स्वयं एक पौद्गलिक द्रव्यरूपसे ही बन रही है। इसी प्रकार गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्यके उत्पन्न होनेमें गेहूँ भी पुद्गल द्रव्यकी पर्यायरूपसे कारण नहीं बन रहा है, किन्तु स्वयं एक पौद्गलिक द्रव्यरूप से ही कारण बन रहा है। इस तरह घटकी उत्पत्तिमें मिट्टीमें विद्यमान पुद्गलत्व नामका द्रव्यांश द्रव्यशक्ति रूपसे कारण न होकर उस मिट्टीमें ही विद्यमान मृत्तिकात्व नामका द्रव्यांश ही द्रव्यशक्तिरूपसे कारण होता है और तब स्थूल पर्यायोंकी अपेक्षा मिट्टीका घटरूप कार्याव्यवहित पूर्ववर्ती कुशूलरूप पर्यायांश तथा क्षणिक पर्यायोंकी अपेक्षा उस मिट्टीका ही घटरूप कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूप पर्यायांश पर्यायशक्तिरूपसे कारण होता है। इसी प्रकार गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिमें गेहूँमें विद्यमान पुद्गलत्व नामका द्रव्यांश द्रव्यशक्तिरूपसे कारण न होकर उस गेहूँमें ही विद्यमान गेहूँपना (गोधूमत्व धर्म) नामका द्रव्यांश ही द्रव्यशक्तिरूपसे कारण होता है और तब स्थूल पर्यायोंकी अपेक्षा गेहूँका गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्याव्यवहित पूर्ववर्ती खेतमें वपन रूप पर्यायांश तथा क्षणिक पर्यायोंकी अपेक्षा उस गेहूँका ही गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिरूप कार्याव्यवहित पूर्व क्षणवर्ती पर्यायरूप पर्यायांश पर्यायशक्तिरूपसे कारण होता है।
उपर्युक्त कथनसे जब यह बात सिद्ध हो जाती है कि हमारे मतानुसार घड़ेकी उत्पत्ति मिट्टीसे ही होती है और गेहूँके अंकुरकी उत्पत्ति गेहूँसे ही होती है तो चनेसे गेहूँके अंकुरकी उत्पत्तिकी प्रसक्ति होनेकी जो आपत्ति आपने हमारे समक्ष उपस्थित की है उसका निरसन अपने आप ही हो जाता है। इस प्रकार जो कार्यकारणभावकी व्यवस्था जैन संस्कृतिके अनुसार आगम प्रमाणोंके आधारपर बनती है उसका रूप निम्न तरहसे समझना चाहिए-
चूँकि मिट्टी आदि स्कन्धोंकी स्थिति परम्पराके रूपमें अनादिकालसे ही चली आ रही है और इसी तरह अनन्तकाल तक चली जानेवाली है और जब मिट्टी आदि स्कन्ध उल्लिखित कथनके आधारपर द्रव्य ही सिद्ध होते हैं तो उनमें रहनेवाले मृत्तिकात्व आदि द्रव्यांश भी नित्य ही सिद्ध होते हैं। मृत्तिकासे घटकी उत्पत्तिमें यह मृत्तिकात्व धर्म ही मिट्टीमें पायी जानेवाली नित्य उपादान शक्ति है। यह उपादान शक्ति खानमें पड़ी हुई मिट्टीमें भी पायी जाती है, लेकिन चूँकि खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीसे खानमें पड़े-पड़े अपनेआप घटका बनना असम्भव है, अतः उक्त उपादान शक्तिकी जाँच करके कुम्हार खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीको घड़ा बनानेके उद्देश्यसे अपने घर ले आता है और यहींसे फिर कुम्हारके व्यापारके सहयोगसे उस मिट्टीकी घट निर्माणके अनुकूल स्थूल पर्यायोंको अपेक्षा उत्तरोत्तर विकासरूप पिण्ड, स्थास, कोश और कुशूल आदि अवस्थाऐं तथा क्षणिक पर्यायोंको अपेक्षा एक-एक क्षणकी एक-एक पर्यायके रूपमें उत्तरोत्तर विकासरूप अवस्थाऐं चालू हो जाती हैं। ये सब पिण्डादिरूप स्थूल अवस्थाऐं या क्षण-क्षणकी सूक्ष्म अवस्थाऐं एकके बाद एकके क्रमसे कुम्हारके क्रमिक व्यापारके अनुसार ही हुआ करती हैं, अतः इन्हें घटको उत्पत्तिके अनुकूल उस मिट्टीको घटकी अनित्य उपादान शक्तिके रूपसे ही आगममें स्वीकार किया गया है। प्रमेयकमलमार्तण्डके ‘यच्चोच्यते’ इत्यादि कथनका अभिप्राय यही है।
इस प्रकार घट निर्माणकी स्वाभाविक योग्यताको धारण करनेवाली खानकी मिट्टीमें घट निर्माणके उद्देश्यसे किये जानेवाले कुम्हारके दण्डादिसापेक्ष व्यापारके सहयोगसे घट निर्माणके अनुकूल पिण्डादि नाना क्षणवर्ती स्थूल पर्यायों अथवा क्षण-क्षणमें पर्याय मान सूक्ष्म पर्यायोंका उत्तरोत्तर विकासके रूपमें उत्तर पर्यायका उत्पाद तथा पूर्व पर्यायका विनाश होता हुआ अन्तमें घटका निर्माण हो जाता है और तब उस घटनिर्माण की समाप्तिके साथ ही कुम्हार अपना भी व्यापार समाप्त कर देता है। यही प्रक्रिया गेहूँसे गेहूँकी अंकुरोत्पत्तिके विषयमें तथा सभी कार्योंके विषयमें भी लागू होती है।
तात्पर्य यह है कि मिट्टीसे घटके निर्माणमें कुशल कुम्हार सर्वप्रथम खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीमें घट रूपसे परिणत होनेकी जिस योग्यताकी जाँच कर लेता है उस योग्यताका नाम ही मिट्टीमें विद्यमान घट निर्माणके लिये नित्य उपादान शक्ति है, क्योंकि यह स्वभावतः उस मिट्टीमें पायी जाती है। कुम्हार इस योग्यताको उसमें पैदा नहीं करता है, इसीको अभिमुखता, सन्मुखता, उत्सुकता आदि शब्दोंसे आगममें पुकारा गया है। खानमें पड़ी मिट्टीमें उक्त प्रकारकी योग्यता जाँच करनेके अनन्तर उस मिट्टीको घर लाकर कुम्हार उसमें स्वाभाविकरूपसे विद्यमान उस योग्यताके आधार पर दण्ड, चक्र आदि आवश्यक अनुकूल सामग्रीकी सहायतासे अपने व्यापार द्वारा उस मिट्टीसे निम्न क्रमपूर्वक घटका निर्माण कर देता है-
कुम्हारका वह व्यापार पहले तो उस मिट्टीको खानसे घर लानेरूप ही होता है, फिर वह उसे घट निर्माणके अनुकूल तैयार करनेमें अपना व्यापार करता है। इसके अनन्तर उस कुम्हारके व्यापारसे ही वह मिट्टी पिण्ड बन जाती है और फिर उसी कुम्हारके व्यापारके सहारेसे ही वह मिट्टी क्रमसे स्थास, कोश और कुशूल बनकर अन्तमें घट बन जाती है। इस प्रक्रियामें कुम्हारके व्यापारका सहयोग पाकर उस मिट्टीमें क्रमशः पिण्ड, स्थास, कोश, कुशूल और घटरूपसे उत्तरोत्तर जो परिवर्तन होते हैं मिट्टीमें होनेवाले इन परिवर्तनोंमेंसे पूर्व-पूर्वके परिवर्तनको आगे-आगेके परिवर्तनके लिये योग्यता, अभिमुखता, सन्मुखता या उत्सुकता आदि नामोंसे पुकारी जानेवाली अनित्य उपादान शक्तिके रूपमें आगमद्वारा प्रतिपादित किया गया है। पूर्वका परिवर्तन हो जानेपर ही उत्तरका परिवर्तन होता है, अतः पूर्व परिवर्तनको उत्तर परिवर्तनके लिये उपादान कहा गया है और चूँकि ये सब परिवर्तन दण्डादि अनुकूल निमित्तोंके सहयोगसे होनेवाले कुम्हारके व्यापारके सहारे पर ही हुआ करते हैं तथा इनमें पूर्व परिवर्तनका रूप ही कुम्हारके व्यापार द्वारा बदलकर उत्तर परिवर्तनका रूप विकसित होता है, अतः इन्हें अनित्य माना गया है।
इसका मतलब यह हुआ कि खानमें पड़ी हुई मिट्टीमें जो मृत्तिकात्व धर्म पाया जाता है वह उसका निजी स्वभाव है और चूँकि उसके आधार पर ही घट निर्माणकी भूमिका प्रारम्भ होती है एवं घटका निर्माण हो जाने पर भी उसका नाश नहीं होता है, अतः उसे घट निर्माणकी नित्य उपादान शक्तिमें अन्तर्भूत करना चाहिये तथा इसके अनन्तर कुम्हारके व्यापारके सहारे पर क्रमसे जो जो परिवर्तन उस मिट्टीमें होते जाते हैं वे सब परिवर्तन पूर्व पूर्व परिवर्तनके कार्य और उत्तर उत्तर परिवर्तनके लिये कारण हैं, अतः इन्हें घट निर्माणकी अनित्य उपादान शक्तिमें अन्तर्भूत करना चाहिए। किन्तु यहाँ पर इतना विशेष समझना चाहिये कि इन सब परिवर्तनोंमें अन्तिम परिवर्तन घट निर्माणकी सम्पन्नताको ही माना गया है। कारण कि कुम्हारके व्यापारका अन्तिम लक्ष्य वही रहता है, अतः उसका अन्तर्भाव केवल कार्योंमें ही होता है, कारणोंमें नहीं। यही कारण है कि उसकी निष्पन्नताके साथ ही कुम्हार अपना व्यापार भी बन्द कर देता है।
इन सब परिवर्तनोंको यहाँ पर जैसा पिण्ड, स्थास, कोश, कुशूल और घटरूप स्थूल परिवर्तनोंमें विभक्त किया गया है वैसा ही चाहो तो एक एक क्षणवर्ती परिवर्तनोंके रूपमें भी उन्हें विभक्त कर सकते हो, क्योंकि प्रश्न इस बातका नहीं है कि इन सब परिवर्तनोंका विभाजन पिण्डादि स्थूल पर्यायोंके रूपमें किया जाय अथवा क्षणिक पर्यायोंके रूपमें किया जाय? किन्तु प्रश्न यह है कि ये सब परिवर्तन एकके बाद एक करके अपने आप होते चले जाते हैं या जैसे जैसे कुम्हारका व्यापार आगे होता जाता है वैसे वैसे ये परिवर्तन भी आगे बढ़ते जाते हैं?
उक्त प्रश्नका जो समाधान अनुभव, तर्क और आगमप्रमाणोंके आधार पर हमने अपनी प्रतिशंका में किया है वह यह है कि उक्त सभी परिवर्तन कुम्हारके व्यापारके सहारे पर ही हुआ करते हैं, अपने आप नहीं। अतः उपादानगत योग्यताको लक्ष्यमें रखते हुए जब जैसे निमित्त मिलते हैं वैसा ही परिणमन वस्तुकी अपनी योग्यताके अनुसार हुआ करता है-यह मान्यता गलत नहीं है। इतना ही नहीं, कार्यके प्रति उभय कारणोंको जो आगममें स्वीकृति की गयी है उसकी सार्थकता भी इसी ढंगसे हो सकती है, अन्यथा नहीं। यह सब पूर्वमें स्पष्ट किया जा चुका है।
आपका कहना है कि ‘मुख्य विवाद उपादानका है, क्योंकि उपादानकी कार्योत्पत्तिके लिये तैयारी हो जानेपर निमित्त मिलते ही हैं।’ लेकिन हमारा कहना-जैसा कि ऊपर सिद्ध किया जा चुका है-यह है कि कार्योत्पत्तिके लिये उपादानकी तैयारी निमित्तोंके बलपर ही हुआ करती है।
यद्यपि केवल स्व-प्रत्ययताके आधारपर होनेवाली कार्य-विधिकी परंपरा धारा-प्रवाहरूपसे अनादि कालसे चली आ रही है और अनन्त कालतक वह चलती ही जायगी। षड्गुण हानि-वृद्धिरूपसे परिणमनकी परंपराका अन्तर्भाव इसी कार्य-विधिमें होता है। इसी प्रकार स्वपरप्रत्ययताके आधारपर होनेवाली कार्य-विधिकी बहुत-सी परंपरा भी ऐसी हो रही है जो अनादि कालसे धाराप्रवाहरूपसे चली आ रही है और अनन्त कालतक चलती ही जायगी। जैसे परिणमनशील वस्तुओंके निमित्तसे आकाश, धर्म, अधर्म तथा काल द्रव्योंके स्वभावोंमें जो परिणमन होता रहता है वह इसी कोटिमें आता है, क्योंकि वह स्वपरप्रत्यय होता हुआ अनादि कालसे धाराप्रवाहरूपसे चलता आ रहा है और अनन्त कालतक इसी रूपमें चलता ही जायगा। लोकके सामने समस्या इन दोनों प्रकारके परिणमनोंकी नहीं है, परन्तु स्वपरप्रत्ययताके आधारपर ही होनेवाली घटादि कार्यविधिकी परंपरा ऐसी नहीं है जो अनादि कालसे अनन्त कालतक धाराप्रवाहरूपसे चलने वाली हो, क्योंकि घटादि कार्यविधिकी परंपरा लोकमें और ही देखनेमें आती है। जैसे खानमें मिट्टी अनादिकालसे पड़ी हुई चली आ रही है और यह निर्विवाद है कि अनादि कालसे अबतक खानमें पड़े रहते हुए उससे घटरूप पर्यायका निर्माण स्वतः अथवा स्व और परके सहयोगसे न तो हुआ, न कभी होनेवाला है। इसके विपरीत यह बात अवश्य देखनेमें आती है कि खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीमेंसे कुछ मिट्टीको कुम्हार अपनी आवश्यकता और आकांक्षाके आधारपर बनानेके उद्देश्यसे यथावसर अपने घर लाता है और जब वह कुम्हार घट-कार्यके निर्माणके लिये सहायतारूप अपना व्यापार देता है तब उस मिट्टीसे घट-कार्यका निर्माण भी होता हुआ देखा जाता है। घटका यह निर्माणरूप कार्य कुम्हारके व्यापारके सहारेपर होता हुआ तबतक चलता रहता है जबतक या तो घट-कार्यका निर्माण सम्पन्न नहीं हो जाता अथवा कुम्हारके व्यापारके सहारेपर ही तबतक होता हुआ देखनेमें आता है जबतक कि चालू निर्माण कार्यके मध्यमें दण्ड आदिके प्रहारसे वह फूट नहीं जाता है। निर्माण-कार्यके समाप्त हो जानेपर अथवा बीच ही में उसके नष्ट हो जानेपर उसमें दूसरे ही प्रकारकी कार्य-विधिकी परंम्परा दूसरे निमित्तोंके सहयोगसे उसकी अपनी योग्यताके अनुसार चालू हो जाती है। यही कारण है कि इस प्रकार कार्यविधिकी परंपरामें परिवर्तन हो जानेके सबबसे पुरानी और जीर्ण-शीर्ण वस्तुऐं भी नवीनताका रूप लेकर सामने आती रहती है। अब यदि निमित्तका उपयोग इस कार्यविधिमें न माना जाय, केवल उपादानके अपने बलपर ही उसे स्वीकार कर लिया जाय तो ऐसी हालतमें उसमें कार्यसे कार्यान्तरका विभाग करना असंभव हो जायगा तथा कोई पुरानी वस्तु कभी और किसी भी हालतमें नवीनताको प्राप्त नहीं हो सकेगी।
आगे आपका कहना है कि ‘ऐसा है नहीं कि निश्चय उपादान हो और निमित्त न मिलें’ फिर आगे आप कहते हैं कि ‘इसी बातको असद्भूतव्यवहारनयकी अपेक्षा यों कहा जाता है कि जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है।’
अपने इस कथनसे आप यह निष्कर्ष निकाल लेना चाहते हैं कि यद्यपि उपादान स्वयं अपनी सामर्थ्यके आधारपर ही कार्य निष्पन्न कर लेता है, उसे अपनी कार्यनिष्पत्तिमें निमित्तोंका सहयोग लेनेकी आवश्यकता नहीं रहा करती है। परन्तु निश्चय उपादानके रहते हुए चूँकि वहाँपर निमित्त नियमसे उपस्थित रहा करते हैं, अतः वस्तुस्थिति वैसी न रहते हुए भी केवल बोलनेमें ऐसा आता है कि जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है।
विचार करनेपर मालूम पड़ता है कि निमित्तकी अकिंचित्करता और कल्पनारोपितताको सिद्ध करनेके लिये आपका यह प्रयास बिल्कुल व्यर्थ है। आगे इसी बातको स्पष्ट किया जा रहा है-
स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप कार्योंमें स्व अर्थात् उपादानके साथ साथ पर अर्थात् निमित्तके सहयोगकी आवश्यकता रहा करती है-इस बातको पूर्वमें अत्यन्त स्पष्टताके साथ बतला दिया गया है तथा इस विषयके समर्थनमें राजवार्तिकका निम्नलिखित प्रमाण भी देखने योग्य है जिसमें कार्यके प्रति निमित्तपनेके आधारपर धर्म और अधर्म द्रव्योंकी सिद्धि की गयी है-
कार्यस्यानेकोपकरणसाध्यत्वात् तत्सिद्धेः ॥३१॥ इह लोके कार्यमनेकोपकरणसाध्यं दृष्टं, यथा मृत्पिण्डो घटकार्यपरिणामप्राप्तिं प्रति गृहीताभ्यन्तरसामर्थ्यः बाह्यकुलाल-दण्ड-चक्र-सूत्रोदक-कालाकाशाद्यनेकोपकरणापेक्षः घटपर्यायेणाविर्भवति, नैक एव मृत्पिण्डः कुलालादिबाह्यसाधनसन्निधानेन बिना घटात्मना-विर्भवितुं समर्थः, तथा पतत्त्रिप्रभृति द्रव्यं गतिस्थितिपरणामप्राप्तिं प्रत्यभिमुखं नान्तरेण बाह्यानेककारणसन्निधिं गतिं स्थितिं चावाप्तुमलमिति तदुपग्रहकारणधर्माधर्मास्तिकायसिद्धिः।
-अध्याय ५ सूत्र १७ वार्तिक ३१
अर्थ-कार्यकी सिद्धि अनेक उपकरणों (कारणों) से होनेके कारण धर्म तथा अधर्म दोनों द्रव्योंका अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। लोकमें भी यही बात देखनेमें आती है-जैसे जिस मिट्टीके पिण्डमें घटकार्य-परिणमनके योग्य स्वाभाविक सामर्थ्य विद्यमान है वह बाह्य कुम्हार, दण्ड, चक्र, सूत, जल, काल और आकाशादि अनेक कारणोंकी सहायतासे ही घटरूप परिणत होता है। केवल मिट्टीका पिण्ड अकेला कुम्हार आदि बाह्य साधनोंके सहयोगके बिना घटरूपसे परिणत होनेमें समर्थ नहीं होता है! वैसे ही पक्षी आदि द्रव्य गति और स्थितिरूप परिणमनकी अपनेमें योग्यता रखते हुए भी बाह्य अनेक कारणोंके सहयोगके बिना गति और स्थितिरूप परिणमनको प्राप्त नहीं हो सकते हैं, इसलिये इनके सहायक कारणोंके रूपमें धर्म और अधर्म द्रव्योंका अस्तित्व सिद्ध हो जाता है।
राजवार्तिकके इस उद्धरणसे यह बात अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती है कि ‘निमित्तोंका समागम उपादानकी कार्यरूपसे परिणत होनेकी तैयारी हो जानेपर हो ही जाता है’-ऐसा नियम नहीं वनाया जा सकता है, किन्तु यह तथा आगमके और दूसरे प्रमाण यही बात बतलाते हैं कि उपादानको जब निमित्तोंका सहयोग प्राप्त होगा तभी उपादानकी नित्य द्रव्यशक्ति विशिष्ट वस्तुकी जिस पर्यायशक्तिविष्टिताको आप तैयारी शब्दसे ग्रहण करना चाहते हैं वह तैयारी होगी और तभी कार्य हो सकेगा।
आप कहते हैं कि उपादानसे कार्योत्पत्तिके अवसरपर निमित्त उपस्थित तो अवश्य रहते हैं परन्तु उनका सहयोग उपादानसे होनेवाली कार्योत्पत्तिमें बिल्कुल नहीं होता है और इसीलिये आप कहते हैं कि 'उक्त अवसरपर रहनेवाली निमित्तोंकी नियमित उपस्थितिको असद्भूतव्यवहारनयकी अपेक्षासे यों कहा जाता है कि ‘जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है।’
इस कथनसे हम आपके अभिप्रायको यों समझे हैं कि आपकी दृष्टिमें असद्भूत व्यवहारनय वह कहलाता है जिसका प्रतिपाद्य अथवा ज्ञाप्य विषय या तो बिल्कुल न हो और यदि हो तो वह असद्भूत अर्थात् असत्य हो।
परन्तु यह बात निश्चित ही जानना चाहिये कि ऐसा एक भी नय जैनागममें नहीं बतलाया गया है जिसका प्रतिपाद्य या ज्ञाप्य विषय या तो बिल्कुल नहीं है और यदि है भी तो वह असद्भूत अर्थात् असत्य ही है, क्योंकि यदि किसी नयका कोई विषय ही निर्धारित नहीं है तो वह नय कैसा? और यदि उसका कोई विषय निर्धारित है तो उसे अवस्तुभूत या असत्य कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि यदि अवस्तुभूत पदार्थको भी नयका विषय माना जायगा तो उस हालतमें आकाशके फूल तथा गधेके सींग भी नयका विषय होने लगेंगे। इसलिये असद्भूत व्यवहारनयके विषयको भी वास्तविक ही स्वीकार करना होगा। अतः विचारणीय बात यह है कि ऐसा कौन-सा वास्तविक पदार्थ है जो असद्भूतव्यवहारनयका विषय होता है।
यह बात पूर्वमें ही स्पष्ट की जा चुकी है कि प्रकृत प्रकरण कार्यकारणभावका है और चूँकि स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप कार्यमें दो तरहसे कार्यकारणभाव पाया जाता है-एक तो स्वप्रत्ययताको लेकर उपादानोपादेयभावके आधारपर और दूसरा परप्रत्ययताको लेकर निमित्तनैमित्तिकभावके आधारपर। इस प्रकार स्वपर प्रत्ययपरिणमनरूप कार्य जहाँ उपादानोपादेयभावकी विवक्षासे उपादानभूत वस्तुके आश्रयसे उत्पन्न होनेके कारण उपादेय है वहाँपर वह निमित्तनैमित्तिकभावकी विवक्षासे निमित्तभूत वस्तुके सहयोगसे उत्पन्न होनेके कारण नैमित्तिक भी है। अतः स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप उस कार्यमें उपादानकी अपेक्षा उपादेयभाव तथा निमित्तकी अपेक्षा नैमित्तिकभाव ऐसे दो धर्म देखनेको मिल जाते हैं। इनमेंसे उपादेयभाव उसमें उपादानभूत वस्तुके आश्रित होनेके कारण जहाँ निश्चयरूप है वहाँ नैमित्तिकभाव उसमें निमित्तभूत-वस्तुके आश्रित न होनेके साथ-साथ उसकी सहायतासे उत्पन्न होनेके कारण व्यवहाररूप है। इस प्रकार स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप कार्यमें निश्चय और व्यवहार दोनों धर्मोंका समावेश होनेके कारण वह स्वपरप्रत्यय परिणमन कथंचित् अर्थात् अपने उक्त निश्चय स्वरूपकी अपेक्षा वचन तथा ज्ञानरूप निश्चयनयका विषय होता है और वही स्वपर-प्रत्यय परिणमन कथंचित् अर्थात् अपने उक्त व्यवहारस्वरूपकी अपेक्षा वचन तथा ज्ञानरूप व्यवहारनयका विषय होता है ।
यह बात भी हम पूर्वमें बतला चुके हैं कि निश्चयरूप अर्थ और व्यवहाररूप अर्थ ये दोनों ही पदार्थके अंश हैं यही कारण है कि ये दोनों अंश क्रमशः निश्चय और व्यवहार दोनों नयोंके परस्पर सापेक्ष होकर ही विषय होते हैं अर्थात् जहाँ वस्तुके निश्चयरूप अर्थांशका प्रतिपादन वचनरूप निश्चयनय द्वारा किया जाता है वहाँपर वचनरूप व्यवहारनयद्वारा प्रतिपादित व्यवहाररूप अर्थांशका नियमसे आक्षेप होता है । इसी प्रकार जहाँ वस्तुके व्यवहाररूप अर्थांशका प्रतिपादन वचनरूप व्यवहारनयद्वारा किया जाता है वहाँपर वचनरूप निश्चयनयद्वारा प्रतिपादित निश्चयरूप अर्थांशका नियमसे आक्षेप होता है । यही प्रक्रिया ज्ञानरूप निश्चय और व्यवहार नयोंद्वारा ज्ञाप्य निश्चय और व्यवहाररूप अर्थांशोंका ज्ञान करनेके विषयमें भी लागू कर लेना चाहिये ।
यदि एक अर्थांशके प्रतिपादन अथवा ज्ञानके साथ दूसरे अर्थांशका प्रतिपादन अथवा ज्ञान न हो तो ऐसी हालतमें सिर्फ एकका प्रतिपादक वचननय अथवा ज्ञापक ज्ञाननय दोनों ही गलत हो जावेंगे । यहाँपर स्पष्टीकरणके लिये यह दृष्टान्त दिया जा सकता है कि-वस्तुकी नित्यताका प्रतिपादन द्रव्यत्वरूपसे निश्चयनयात्मक वचनद्वारा तथा उसका ज्ञान भी द्रव्यत्वरूपसे निश्चय नयात्मक ज्ञानद्वारा यदि होता है तो इन्हें तभी सत्य माना जा सकता है जब कि पर्यायरूपसे उसकी अनित्यताका व्यवहारनयात्मक वचनद्वारा होनेवाला प्रतिपादन और व्यवहारनयात्मक ज्ञानद्वारा होनेवाला ज्ञान भी हमारे लक्ष्यमें हो । इसी प्रकार वस्तुकी अनित्यताका प्रतिपादन पर्यायरूपसे व्यवहारनयात्मक वचनद्वारा तथा उसका ज्ञान भी पर्यायरूपसे व्यवहारनयात्मक ज्ञानद्वारा यदि होता है तो इन्हें भी तभी सत्य माना जा सकता है जब कि द्रव्यत्वरूपसे उसकी नित्यताका निश्चयनयात्मक वचनद्वारा होनेवाला प्रतिपादन और निश्चयनयात्मक ज्ञानद्वारा होनेवाला ज्ञान भी हमारे लक्ष्यमें हो । ऐसा न होकर यदि अनित्यतासे निरपेक्ष केवल नित्यताका या नित्यतासे निरपेक्ष केवल अनित्यताका प्रतिपादन किसी वचनद्वारा हो रहा हो, इसी तरह अनित्यतासे निरपेक्ष केवल नित्यताका या नित्यतासे निरपेक्ष केवल अनित्यताका ज्ञान किसी ज्ञानद्वारा हो रहा हो तो इस प्रकारके वचन तथा ज्ञान दोनों ही नयात्मक नहीं रहेंगे, क्योंकि इनके विषयभूत नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों ही पदार्थके अंशके रूपमें नहीं किन्तु पूर्ण पदार्थके रूपमें ही वचनद्वारा प्रतिपादित होंगे और ज्ञानद्वारा ज्ञात होंगे । तब ऐसी हालतमें यदि उस नित्यतामें अभेदात्मकरूपसे अनित्यताका अथवा उस अनित्यतामें अभेदात्मकरूपसे ही नित्यताका अंश यदि समाया हुआ होगा तो उनके प्रतिपादक वचनों तथा उनके ज्ञापक ज्ञानोंको नयकोटिमें अन्तर्भूत न करके प्रमाणकोटिमें ही अन्तर्भूत करना होगा और यदि वस्तुमें नित्यताके द्वारा अनित्यताका अथवा अनित्यताके द्वारा नित्यताका सर्वथा लोप किया जा रहा होगा तो उस हालतमें उनके प्रतिपादक वचनों तथा ज्ञापक ज्ञानोंको प्रमाणाभासोंकी कोटिमें पटक देना होगा, क्योंकि पदार्थ न तो सर्वथा नित्य ही है और न सर्वथा अनित्य ही है ।
इसका तात्पर्य यह है कि जब वस्तु जैन-मान्यताके अनुसार कथंचित् अर्थात् निश्चय ( द्रव्यत्व ) रूपसे नित्य मानी गयी है तो इसका आशय यह भी है कि वह कथंचित् अर्थात् व्यवहार ( पर्याय ) रूपसे अनित्य भी है। इसी प्रकार जब वस्तु जैन-मान्यताके अनुसार कथंचित् अर्थात् व्यवहार ( पर्याय ) रूपसे अनित्य मानी गयी है तो इसका आशय यह भी है कि वह कथंचित् अर्थात् निश्चय ( द्रव्यत्व ) रूपसे नित्य भी है। इस प्रकार जैन मान्यताके अनुसार जब निश्चयनय वस्तुकी नित्यताको विषय करता है तो उसी समय व्यवहारनयसे वस्तुकी अनित्यता भी गृहीत होना चाहिये तथा जब व्यवहारनय वस्तुकी अनित्यताको विषय करता है तो उसी समय निश्चयनयसे वस्तुकी नित्यता भी गृहीत होना चाहिये। यदि ऐसा नहीं होता है तो सम्पूर्ण नयव्यवस्था ही गड़बड़ा जायगी।
प्रकृतमें इस विवेचनका उपयोग यह है कि यदि आप व्यवहारनयकी अपेक्षासे इस कथनको सही मान लेते हैं कि ‘जब जैसे निमित्त मिलते हैं तब वैसा कार्य होता है’ तो इसका आशय यही होता है कि आप निमित्तको कार्यके प्रति सहायक रूपसे वास्तविक कारण मानते हैं और जब आपकी दृष्टिमें भी निमित्तकारणकी वास्तविकता सिद्ध हो जाती है तो फिर आपका यह कथन गलत सिद्ध होता है कि ‘जब-जब विवक्षित कार्यके योग्य पर्यायशक्तिसे युक्त द्रव्यशक्ति होती है तब-तब उस कार्यके अनुकूल निमित्त मिलते ही हैं।’ फिर तो आपको यही स्वीकार करना होगा कि द्रव्यशक्ति विशिष्ट वस्तु अपनेमें निमित्तोंके सहयोगसे उत्पन्न पर्यायशक्तिसे युक्त होती हुई आगेकी पर्यायशक्तिको निमित्तोंके सहयोगसे ही अपनेमें उत्पन्न करती है और जहाँपर पहुँचनेके बाद जिस विवक्षित पर्यायशक्ति उत्पत्तिके अनुकूल निमित्त नहीं मिल पाते हैं या विरोधी निमित्तोंका सहयोग मिल जाता है तो उस विवक्षित कार्यकी उत्पत्ति वहाँपर न होकर जैसे निमित्तोंका योग मिलता है उसके अनुसार ही उस वस्तुकी पर्यायशक्तिका उस समय विकास होता है, क्योंकि वस्तुमें एक साथ अनेक पर्यायोंके विकासकी शक्तियाँ स्वाभाविकरूपसे विद्यमान रहा करती हैं जिनका विकास अपने-अपने अनुकूल निमित्त-कारणोंके आधारपर हुआ करता है।
इसलिये जिस प्रकार स्वपरप्रत्यय परिणमनरूप कार्यमें उपादानोपादेयकी विवक्षासे उपादानभूत वस्तुके आश्रयसे उत्पन्न होनेके कारण अपने ढंगकी वास्तविकताको लिये हुए उपादेयतारूप धर्म विद्यमान रहता है उसी प्रकार निमित्तनैमित्तिकभावकी विवक्षासे निमित्तभूत वस्तुके सहयोगसे उत्पन्न होनेके कारण अपने ढंगकी वास्तविकताको लिये हुए नैमित्तिकतारूप धर्म भी विद्यमान रहता है।
यदि आप हमसे कहें कि स्वपरप्रत्ययरूप परिणमनमें पाया जानेवाला नैमित्तिकतारूप धर्म वास्तविक है तो फिर उसे असद्भूत व्यवहारनयका विषय नहीं कहना चाहिये, क्योंकि आगममें व्यवहारको भी जब सद्भूत और असद्भूत ऐसे दो भेदोंमें विभक्त किया गया है तो इसका फलितार्थ यही हो सकता है कि सद्भूत व्यवहारको भले ही वास्तविकताकी कोटिमें रख लिया जावे परन्तु असद्भूतव्यवहारको तो वास्तविकताकी कोटिमें रखना असंगत ही है। कारण कि ‘असद्भूतव्यवहार’ पदमें पठित ‘असद्भूत’ शब्द ही उसकी अवास्तविकताको बतला रहा है।
इसके विषयमें हमारा कहना यह है कि स्वपरप्रत्यय परिणमनमें निमित्त कारणकी उपयोगिताको तो विस्तारसे सिद्ध किया जा चुका है अब केवल एक ही बात स्पष्ट करनेके लिये रह जाती है कि जब निमित्तकारण वास्तविक है तो उसे असद्भूत व्यवहारकी कोटिमें क्यों रख दिया गया है ?
इसका भी स्पष्टीकरण इस प्रकारसे करना चाहिये कि आगममें सत्ताको वस्तुका निज धर्म या स्वभाव अंगीकार किया गया है, इसलिये सद्भूत धर्म वही हो सकता है जो वस्तुका निज धर्म हो। इसके अनुसार कार्यकारणभावके प्रकरणमें वस्तुके परिणमनमें पाया जानेवाला उपादेयतारूप धर्म चूँकि वस्तुके अपने अन्दर ही उत्पन्न होता है अतः उसे तो सद्भूत ही कहना होगा और वस्तुके उसी परिणमनमें पाया जानेवाला नैमित्तिकतारूप धर्म वस्तुके अपने अन्दर उत्पन्न होकर भी सहायक अन्य वस्तुके सहारे पर ही वस्तुमें उत्पन्न होता है, अतः आगन्तुक होनेके कारण उसे असद्भूत कहना अयुक्त नहीं है।
एक बात और है कि यदि असद्भूत व्यवहारनयका विषय अवास्तविक अर्थात् कल्पनारोपित होकर अभावात्मक ही है तो फिर उसके (असद्भूत व्यवहारनयके) उपचरित असद्भूत व्यवहारनय और अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनय ऐसे दो भेद करना असंगत ही हो जायगा। कारण कि अभावात्मक वस्तुमें उपचरित और अनुपचरितका भेद होना असंभव ही है।
बृहद्द्रव्यसंग्रहमें असद्भूतव्यवहारनयके उक्त अनुपचरित असद्भूतव्यवहारनय और उपचरित असद्भूतव्यवहारनय दो भेद मानकर उनके अलग अलग उदाहरण देनेका आशय यही है कि बृहद्द्रव्यसंग्रहके कर्ता की दृष्टिमें असद्भूतव्यवहारनयका विषय असद्भूत व्यवहार अभावात्मक वस्तु न होकर भावात्मक वस्तु ही है। दोनोंका अन्तर भी बिल्कुल स्पष्ट मालूम पड़ रहा है अर्थात् जीवमें पाया जानेवाला ज्ञानावरणादि आठ कर्मों तथा औदारिक आदि शरीरोंका कर्तृत्व अनुपचरित असद्भूत व्यवहार है और उसमें ( जीवमें ) पाया जानेवाला घट-पटादि पदार्थोंका कर्तृत्व उपचरित असद्भूत व्यवहार है। इस भेदका कारण यह है कि ज्ञानावरणादि कर्मों और औदारिक आदि शरीरोंका निर्माण जीव अपनेसे अपृथक् रूपमें ही किया करता है तथा घट-पटादिका निर्माण वह अपनेसे पृथक् रूपमें किया करता है।
यदि कहा जाय कि तत्त्वार्थसूत्रके सूत्र ‘सद्द्रव्यलक्षणम्’ (अ० ५ सू २९) के अनुसार सत्त्व वस्तुका निज स्वरूप होते हुए भी उसे तत्त्वार्थसूत्रके सूत्र ‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्’ ( अ० ५ सूत्र ३० ) के अनुसार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य स्वभाववाला स्वीकार किया गया है। इसका फलितार्थ यह है कि वस्तुमें परिणमन स्वभावसे ही हुआ करता है। उसमें निमित्तकारणके सहयोगकी आवश्यकताको स्वीकार करना अयुक्त ही है।
तो इस विषयमें हमारा कहना यह है कि ‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्’ इस सूत्रके अनुसार वस्तु परिणमनस्वभावाली है-यह तो ठीक है, परन्तु वह परिणमन स्वप्रत्ययके समान स्वपरप्रत्यय भी होता है इसका निषेध तो उक्त सूत्रसे होता नहीं है। यही कारण है कि वस्तुके स्वपरप्रत्यय परिणमनोंको सत्ता आगममें स्वीकार की गयी है तथा जैन-तत्त्वमीमांसामें श्री पं० फूलचन्द्रजीने और प्रश्न नं० ११ में आपने भी वस्तुके स्वपरप्रत्यय परिणमनोंको स्वीकार किया है। अतः आपके द्वारा अपने प्रत्युत्तरमें यह लिखा जाना कि-
‘जब प्रत्येक द्रव्य सद्रूप है और उसको उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य स्वभाववाला माना गया है तो ऐसी अवस्थामें उसके उत्पाद-व्ययको अन्य द्रव्यके कर्तृत्व पर छोड़ दिया जाय और यह मान लिया जाय कि अन्य द्रव्य जब चाहें उसमें किसी भी कार्यको उत्पन्न कर सकता है तो यह उसके स्वतंत्र सत् स्वभावपर आघात ही है।’-असंगत ही है। आपको परिणमनकी स्वपरप्रत्ययता भले ही विडम्बना प्रतीत होती हो, परन्तु यह व्यवस्था आगमके साथ-साथ प्रत्यक्षके और तर्कके भी प्रतिकूल नहीं है। यह बात पूर्वमें विस्तारपूर्वक सिद्ध की जा चुकी है।
आचार्योंने जो प्रत्येक कार्यमें अपने उपादानके साथ अन्तर्व्याप्ति और निमित्तोंके साथ बहिर्व्याप्ति स्वीकार की है उसका आशय यही है कि उपादान चूँकि कार्यरूप परिणत होता है, अतः उसके साथ कार्यकी अभिन्नता होनेके कारण वहाँ अन्तरंग व्याप्ति बतलायी गयी है और निमित्त चूँकि कार्यरूप परिणत नहीं होता, वह तो केवल कार्योत्पत्तिमें सहयोगी होता है इसलिये उसके साथ कार्यकी पृथक्ता बनी रहनेके कारण वहाँ बहिर्व्याप्ति स्वीकार की गयी है। पूर्वमें हम बतला भी चुके हैं कि उपादानकी कार्यके साथ एकद्रव्य-प्रत्यासत्तिरूप कारणता पायी जाती है, इसलिये वहाँ अन्तर्व्याप्ति आगममें स्वीकार की गयी है और निमित्तकी कार्यके साथ कालप्रत्यासत्तिरूप कारणता पायी जाती है इसलिये वहाँ बहिर्व्याप्ति आगममें स्वीकार की गयी है । अन्तर्व्याप्ति उपादानकी कार्यके साथ तन्मयताकी सूचना देती हैं, लेकिन बहिर्व्याप्ति निमित्तकी कार्यके साथ यद्यपि तन्मयताका निषेध करती है तो भी अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर उसके संयोगको कार्योत्पत्तिके लिये जब आवश्यक बतलाया गया है तो यही एक कारण है कि आचार्योंको निमित्तकी कार्यके साथ बहिर्व्याप्ति स्वीकार करनी पड़ी है। आप यही भी सोचिये कि उपादानकी महत्ता कार्यके प्रति तबतक रहा करती है जबतक कार्य विद्यमान रहता है, लेकिन निमित्तकी महत्ता तभीतक रहा करती है जबतक कार्य उत्पन्न नहीं हो जाता। कार्यके उत्पन्न हो जानेपर फिर निमित्तकी कुछ महत्ता नहीं रह जाती है। यही कारण है कि लोकमें उपादानका महत्त्व इस दृष्टिसे आँका जाता है कि कार्य कहाँतक स्थायी रह सकता हैं। लेकिन निमित्तका महत्त्व तबतक लोकमें आँका जाता है जबतक कार्य सुन्दरताके साथ उत्पन्न नहीं हो जाता। इस विवेचनसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ‘अन्तर्व्याप्तिके आधारपर कार्यका उपादान ही केवल वास्तविक कारण है, बहिर्व्याप्तिके आधारपर कार्यका निमित्त वास्तविक कारण नहीं है-ऐसी मान्यता भ्रमपूर्ण ही है।’
आगे आपने लिखा है कि ‘द्रव्य अन्वयी होनेके कारण जैसा नित्य है उसी प्रकार व्यतिरेकी स्वभाववाला होनेसे प्रत्येक समयमें वह उत्पाद-व्ययस्वभाववाला भी है, अतएव प्रत्येक समयमें वह कार्यका उपादान भी है और कार्य भी है। पिछली पर्यायकी अपेक्षा जहाँ वह कार्य है अगली पर्यायके लिये वहाँ वह उपादान भी है।’
सो ऐसा माननेमें हमारा कोई विरोध नहीं, हम भी ऐसा ही मानते हैं और वस्तुके स्वप्रत्यय परिणमनोंमें तो यही प्रक्रिया चालू रहती है, परन्तु वस्तुके जिन परिणमनोंमें जब विलक्षणताकी उद्भूति हो जाती है तब उन परिणमनोंमें उस विलक्षणताके आधार पर परिणमनोंका स्वतंत्र क्रम ही चालू हो जाता है। ऐसी वह विलक्षणता उनमें स्वतः नहीं होती है, वह तो तद्नुकूल निमित्तोंके सहारे पर ही हुआ करती है। जैसे खानमें पड़ी हुई मिट्टीका प्रतिक्षण परिणमन हो रहा है और फिर वही मिट्टी कुम्हारके घर पर कुम्हारके तदनुकूल प्रयत्न करने पर आ जाती है तो यह जो क्षेत्र परिवर्तन इस मिट्टीका हुआ वह क्या खानमें पड़ी हुई उस मिट्टीकी क्षणिक पर्यायोंके क्रमसे हुआ ? तथा उस मिट्टीका आगे चलकर कुम्हारके प्रयत्नसे ही जो पिण्ड बन गया और इसके भी आगे कुम्हारके ही प्रयत्नसे उस मिट्टीकी स्थास, कोश और कुशूलके क्रमसे घटपर्याय बनी अथवा कुम्हारने अपनी इच्छासे उसकी घटपर्याय न बनाकर सकोरा आदि दूसरी नाना प्रकारकी पर्यायें बना दीं और या किसीने आकर अपने दण्ड प्रहारसे विवक्षित पर्यायको नष्टकर दूसरी पर्यायमें उस मिट्टीको पहुँचा दिया तो ये सब विलक्षण विलक्षण पर्यायें क्या मिट्टीकी क्षणिक क्रमिक पर्यायोंके आधार पर ही बन गयीं अथवा उस पर्यायके अनुकूल निमित्तोंकी सहायतासे ही ये पर्यायें उत्पन्न हुईं। इन सब बातों पर पूर्वमें विस्तारसे प्रकाश डालकर हम प्रत्यक्ष, तर्क और आगमप्रमाणोंके आधार पर विस्तारपूर्वक यह भी बतला आये हैं कि मिट्टीमें विद्यमान घटरूप परिणमनकी योग्यताके आधार पर होते हुए भी यह सब करामात निमित्तोंकी है, इसलिये आपका यह लिखना ही कि-‘संतानक्रमकी अपेक्षा प्रत्येक समयमें उसे ( वस्तुको ) उभयरूप ( कार्य और कारणरूप ) होनेके कारण निमित्त भी प्रत्येक समयमें उसी क्रमसे मिलते रहते हैं’ केवल सम्यक् मान्यता नहीं है। इसे सम्यक् मान्यता तो तब कहा जा सकता है जब कि जो निमित्त मिलते हैं उन्हें, जैसा कि आपने स्वयं स्वीकार कर लिया है, चाहे वे पुरुषके योग और रागभावसे प्राप्त हों अथवा चाहे विस्रसा प्राप्त हों, कार्योत्पत्तिमें उपयोगी स्वीकार कर लिया जावे, क्योंकि यदि कार्योत्पत्तिमें उनके उपयोगको स्वीकार नहीं किया जाता तो आपकी इस मान्यताका भी फिर कोई अर्थ नहीं रह जाता कि ‘उस समयमें नियत उपादानके अनुसार होनेवाले नियत कार्योंके नियत निमित्त मिलते अवश्य हैं।’ क्योंकि क्यों मिलते हैं? किस लिये मिलते हैं? या पुरुष उनके मिलानेका क्यों प्रयत्न करता है? इत्यादि समस्याऐं तो आपके सामने आपकी इस मान्यताको-कि उपादानसे ही कार्य उत्पन्न हो जाता है निमित्त तो वहाँ पर अकिञ्चित्कर ही बना रहता है-खण्डित करनेके लिये तैयार खड़ी हैं।
आगे आप फिर लिखते हैं कि ‘विविध लौकिक उदाहरणोंको उपस्थित कर जो अपनी चित्तवृत्तिके अनुसार कार्य-कारणपरंपराको बिठानेका प्रयत्न किया जाता है वह युक्तियुक्त नहीं है और न आगम-संगत है।’
इसके विषयमें हमारा कहना है कि उदाहरण लौकिक हों चाहें आगमिक हों, उनके विषयमें देखना तो यह हैं कि वे उदाहरण, अनुभव, तर्क तथा आगमप्रमाणोंके विरुद्ध तो नहीं है ? यदि वे उदाहरण आपकी दृष्टिसे अनुभव, तर्क तथा आगम प्रमाणोंके विरुद्ध हैं तो उनकी इस प्रमाण विरुद्धताको दिखलाना आपका कर्त्तव्य था जब कि हम अनुभव, तर्क और आगमप्रमाणोंसे उन उदाहरणोंकी संगति पूर्वमें बतला चुके हैं।
आपने चित्तवृत्तिके अनुसार कार्यकारणपरंपराको बिठानेमें असंगति बतलानेके लिये भी आचार्य अमृतचन्दके समयसारकलशका ‘आसंसारत एव धावति’-इत्यादि ५५ वां पद्य प्रमाण रूपसे उपस्थित किया है।
इसके विषयमें भी हमारा कहना यह है कि इससे निमित्तोंके साथ कार्यके वास्तविक कार्यकारणभावका निषेध नहीं होता है और न इस तरहके कार्यकारणभावके निषेध करनेकी आचार्य महाराजकी दृष्टि ही है। इस पद्यसे तो वे केवल इस बातका ही निषेध करना चाहते हैं कि लोकमें अधिकांश ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है कि प्राणी मोहकर्मके उदयके वशीभूत होकर अपने निमित्तसे होनेवाले कार्योंमें अपने अन्दर अहंकारका विकल्प पैदा करता रहता है जो मोहभाव होनेके कारण बन्धका कारण है, अतएव त्याज्य है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अपने निमित्तसे होनेवाले कार्योंमें अपनी निमित्तताका भान होना असत्य है। यदि अपने निमित्तसे होनेवाले कार्योंमें अपनी निमित्तताका ज्ञान भी असत्य हो जाय तो फिर मनुष्य किसी कार्यके करनेमें प्रवृत्त भी कैसे होगा? कुम्हारको यदि समझमें आ जाय कि घड़ेका निर्माण खानमें पड़ी हुई मिट्टीसे अपनी क्रमवर्ती क्षणिक पर्यायोंके आधार पर स्वतः समय आने पर हो जायगा तो फिर उसमें तदनुकूल पुरुषार्थ करनेकी भावना ही जाग्रत क्यों होगी? इसी प्रकार एक शिक्षकको यदि यह समझमें आ जावे कि छात्र अपनी क्रमवर्ती क्षणिक पर्यायोंके आधार पर स्वतः ही समय आने पर पढ़ लेगा तो फिर उसे तदनुकूल पुरुषार्थ करनेकी भावना क्यों जाग्रत होगी? इस सब कथनका रहस्य यह है कि निमित्तोंके सहारे पर कार्य निष्पन्न होता है वह सिद्धान्त ठीक है, इसका जिसे ज्ञान होता है वह भी ठीक है और इस ज्ञानके अनुसार जो कार्योत्पत्तिके लिये तदनुकूल पुरुषार्थ करता है वह भी ठीक है। परन्तु कार्योत्पत्तिके लिये उपयोगी अपनी निमित्तताके आधार पर यदि कोई मनुष्य उक्त विषयमें अहंकारी बन जाता है तो आचार्य अमृतचन्द्रने उक्त कलश पद्य द्वारा यह दर्शाया है कि ऐसा अहंकार करना बुरा है और वह कर्मबन्धका कारण है। विवेकी सम्यग्दृष्टि पुरुष कार्यके प्रति अपना-निमित्तरूप वास्तविक ज्ञान और व्यापार करते हुए
४२० जयपुर (खानियां) तत्त्वचर्चा
भी वे कभी अहंकारी नहीं बनते हैं। किन्तु दूसरोंद्वारा किये गये उपकारके प्रति हमेशा कृतज्ञ ही रहा करते हैं। आचार्य विद्यानन्दीने अपने ग्रन्थ आप्तपरीक्षाका आदिमें मंगलाचरण करते हुए यही लिखा है कि ‘न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरंति’ अर्थात् साधु ( सम्यग्दृष्टि ) पुरुष अन्य द्वारा कृत उपकारको कभी नहीं भूलते हैं। इसे पंचास्तिकाय (रायचन्द्रग्रन्थमाला पृष्ठ ५ पर) श्रीजयसेनाचार्यने भी उद्धृत किया है।
आगे आप लिखते हैं कि स्वामी समन्तभद्रने आप्तमीमांसामें और भट्टाकलंकदेव तथा आचार्य विद्यानन्दीने अष्टशती और अष्टसहस्रीमें ‘दोषावरणयोर्हानिः’ इत्यादि कथन उक्त ( कार्य केवल उपादान कारणसे ही निष्पन्न हो जाया करता है निमित्त तो वहाँ केवल अपनी हाजिरी दिया करते हैं ) तथ्यको ध्यानमें रखकर ही किया है, क्योंकि उक्त आचार्योंने ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ इत्यादि कथन उक्त कार्य-कारणपरंपराको ध्यानमें रखकर ही किया है।
आपके इस लेखमें आपके द्वारा यह माना जाना कि ‘उपादानस्य उत्तरीभवनात्’ यह कथन उक्त आचार्योंका है सो तो ठीक है, क्योंकि उपादान ही उत्तर पर्यायरूप परिणत होता है। परन्तु वह उत्तर पर्याय निमित्तसापेक्ष उत्पन्न नहीं होती है, ऐसा निर्णय तो उक्त वाक्यसे नहीं किया जा सकता है। और जब ‘दोषावरणयोर्हानिः’ इत्यादि कारिकाकी टीका अष्टसहस्रीमें भी श्री स्वामी विद्यानन्दीने निमित्तोंकी उपयोगिताको स्पष्टरूपसे स्वीकार किया है तो ‘कार्य केवल उपादानके बल पर ही उत्पन्न हो जाता है’ इसकी सिद्धिके लिये ‘दोषावरणयोर्हानिः’ इत्यादि इस कारिकाका और इसकी टीका अष्टशती तथा अष्टसहस्रीका प्रमाणरूपसे आपके द्वारा उपस्थित किया जाना गलत ही है। अष्टसहस्रीका वह कथन निम्न प्रकार हैं-
वचनसामर्थ्यादज्ञानादिर्दोषः स्वपरणामहेतुः (अष्टशती)। न हि दोष एव आवरणमिति प्रतिपादने कारिकाया दोषावरणयोरिति द्विवचनमसमर्थम्। ततस्तत्सामर्थ्यादावरणात् पौद्गलिकज्ञानावरणादिकर्मणो भिन्नस्वभावस्वाज्ञानादिर्दोषोऽभ्यूह्यते। तद्धेतुः पुनरावरणं कर्म जीवस्य पूर्वस्वपरिणामश्च। स्वपरिणामहेतुकः स्वाज्ञानादिरित्ययुक्तं, तस्य कादाचित्कत्वविरोधाज्जीवत्वादिवत्। परपरिणामहेतुक एवेत्यपि न व्यवतिष्ठते, मुक्तात्मनोऽपि तत्प्रसंगात्। सर्वस्य कार्यस्योपादानसहकारिसामग्रीजन्यतयोपगमात्तथा प्रतीतेश्च। तथा च दोषो जीवस्य स्वपरपरिणाम-हेतुकः, कार्यत्वात् माषपाकवत्।
अर्थ-आचार्य समन्तभद्रने कारिकामें ‘दोषावरणयोः’ ऐसा द्विवचन पदका प्रयोग किया है, इसलिये आवरणरूप पौद्गलिक ज्ञानावरणादि कर्मोंसे भिन्न ही अज्ञानादि दोषोंको जानना चाहिए। उन अज्ञानादि दोषोंकी उत्पत्तिका हेतु आवरण कर्म तथा जीवके अपने पूर्व परिणामको जानना चाहिये। अज्ञानादि दोष केवल जीवके स्वपरिणामनिमितक ही हैं-ऐसी मान्यता ठीक नहीं है, क्योंकि इस तरहसे तो उन अज्ञानादि दोषोंमें जीवत्वस्वभावकी तरह अनादिनिधनताकी प्रशक्ति हो जायगी। इसलिये यदि परपरिणाम निमितक ही अज्ञानादि दोषोंको माना जाय, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस तरहसे मुक्त आत्माओंमें भी अज्ञानादि दोषोंकी आपत्तिका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। दूसरी बात यह है कि सम्पूर्ण कार्योंकी उत्पति उपादान और सहकारी कारण सामाग्रीसे ही देखी जाती है तथा प्रतीति भी ऐसी ही होती है, इसलिये जीवमें जो अज्ञानादि दोष उत्पन्न होते हैं वे स्व अर्थात् उपादान और पर अर्थात् सहकारी दोनों कारणोंके बल पर ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे कार्य हैं जिस तरहकी कार्य होनेकी वजहसे उड़दका पाक उपादान और निमित्त उभय कारणोंके बलपर होता हुआ देखा जाता है।
उड़दका दृष्टान्त ऊपर भी राजवार्तिकके एक उद्धरणमें दिया गया है। भगवान् कुन्दकुन्दने जीवपरिणामहेदु’’ इत्यादि कथन द्वारा उपादान और निमित्त इस प्रकार दोनों कारणोंके बलसे कार्योत्पत्तिको स्वीकार किया है, अतः उनके उस कथनसे आपके पक्षकी पुष्टि होना असंभव ही है। ‘असंख्यातप्रदेशी जीवको जब जैसा शरीर मिलता है तब उसे उस रूप परिणमना पड़ता है’ आगमके इस कथनको स्वीकार करते हुए आपने आगे जो यह लिखा है कि ‘यहाँ भी उपादान और निमित्तों-की उक्त प्रकारसे कार्यकारणपरंपराको स्वीकार कर लेने पर ही सम्यक् व्यवस्था बनती है।’ इस कथनके समर्थनमें जो हेतुरूप कथन आपने अपने उत्तरमें किया है कि ‘क्योंकि उपादानरूप जीवमें स्वयं परिणमनकी योग्यता है, अतः वह शरीरको निमित्तकर स्वयं संकोच-विस्ताररूप परिणमता है।’ इसमें जीवके संकोच-विस्तार रूप परिणमनको उसकी अपनी तदनुकूल योग्यताके आधार पर स्वीकार करके भी उसमें आप यदि अन्वय तथा व्यतिरकके आधार पर शरीरकी सहकारिताको भी स्वीकार कर लेते हैं तो हमारे तथा आपके मध्य कार्य-कारणभावको लेकर कोई विवाद ही नहीं रह जाता है, परन्तु दुःख इस बातका है कि आगे अन्तमें आपने ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका उल्लेख करके अपनी गलत मान्यताको ही पुष्ट करनेका प्रयत्न किया है। और जब आप इस पद्यको भट्टाकलंकदेवसे समर्थित कहते हैं तो हमारे आश्चर्यका फिर कोई ठिकाना ही नहीं रह जाता है। इन्हीं बातोंको हम आगे स्पष्ट कर रहे हैं। वह पद्य पूरा निम्न प्रकार है :-
तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायश्च तादृशः ।
सहायास्तादृशाः सन्ति यादृशी भवितव्यता ॥
आपने इसका जो अर्थ किया है वह निम्न प्रकार हैः-
जैसी होनहार होती है उसके अनुसार बुद्धि हो जाती है, पुरुषार्थ भी वैसा होने लगता है और सहायक कारण (निमित्तकारण) भी वैसे मिल जाते हैं।
स्वामी समन्तभद्रने जो आप्तमीमांसा लिखी है उसमें उन्होंने तत्त्वव्यवस्थाको अनेकान्त और स्याद्-वादको दृष्टिमें रखकर ही स्थापित किया है। इस आप्त-मीमांसाके अष्टम परिच्छेदमें स्वामी समन्तभद्रने ८८ ८९, ९०, और ९१ वीं कारिकाओं द्वारा दैव और पुरुषार्थ दोनोंसे मिलकर अर्थसिद्धि हुआ करती है इस सिद्धान्तका विवेचन किया है।
प्रथम कारिकामें उन्होंने केवल दैवमात्रसे अर्थसिद्धि माननेवालोंके विषयमें जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि पुरुषार्थके बिना केवल दैवमात्रसे यदि अर्थसिद्धि स्वीकार की जाय तो दैवकी उत्पत्तिमें जो पुण्य और पापरूप आचरण ( पुरुषार्थ ) को कारण माना जाता है उसकी संगति किस प्रकार होगी ? यदि कहा जाय कि दैवकी उत्पत्ति उससे पूर्ववर्ती दैवसे मान लेनेपर पुरुषार्थसे दैवकी उत्पत्तिकी असंगतिका प्रश्न ही उपस्थित नहीं होगा तो इस तरह दैवसे दैवान्तरकी उत्पत्ति परंपरा चालू रहनेके कारण मोक्षके अभावका ही प्रसंग उपस्थित हो जायगा तथा पुण्यरूप, पापरूप और धर्मरूप जीवका पुरुषार्थ निरर्थक ही हो जायगा।
द्वितीय कारिकामें उन्होंने केवल पुरुषार्थमात्रसे अर्थसिद्धि माननेवालोंके विषयमें जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि दैवके बिना केवल पुरुषार्थमात्रसे यदि अर्थसिद्धि स्वीकार की जाय तो पुरुषार्थकी उत्पत्तिमें जो दैवको कारण माना जाता है उसकी संगति किस प्रकार होगी ? यदि कहा जाय कि पुरुषार्थकी उत्पत्तिको भी पुरुषार्थसे मान लेनेपर दैवसे पुरुषार्थकी उत्पत्तिकी असंगतिका प्रश्न ही उपस्थित नहीं होगा तो इस तरहसे फिर सभी प्राणियोंमें पुरुषार्थकी समान सार्थकताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा जो कि अयुक्त होगा। कारण कि अनेक प्राणियों द्वारा समान पुरुषार्थ करने पर भी जो फल वैषम्य देखा जाता है वह दैवको अर्थसिद्धिमें कारण माने बिना संगत नहीं हो सकता है।
तृतीय कारिकामें उन्होंने दैव और पुरुषार्थ दोनोंसे ही पृथक् पृथक् अर्थसिद्धि माननेवालोंके विषयमें जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि किसी अर्थसिद्धिमें दैवको और किसी अर्थसिद्धिमें पुरुषार्थको कारण माननेकी संगति स्याद्वाद सिद्धान्तको स्वीकार किये बिना संभव नहीं हो सकती है, अतः जो लोग स्याद्वाद सिद्धान्तके विरोधी हैं उनके मतसे किसी अर्थसिद्धिमें दैवको और किसी अर्थसिद्धिमें पुरुषार्थको कारण माना जाना संगत नहीं हो सकता है।
इसी तृतीय कारिकामें आगे उन्होंने दैव और पुरुषार्थ दोनों ही में युगपत् अर्थसिद्धिकी साधनता रहने के कारण अवक्तव्यताके ऐकान्तिक सिद्धान्त स्वीकार करनेवालोंके विषयमें जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि अवक्तव्यताके इस सिद्धान्तको अवक्तव्य शब्दसे प्रतिपादन करने पर स्ववचनविरोधरूप दोषका प्रसंग उपस्थित होता है।
इसके बाद अन्तमें चतुर्थ कारिका द्वारा उन्होंने दैव और पुरुषार्थ दोनोंकी पृथक् पृथक् रूपसे वक्तव्यता और अपृथक्रूपसे अवक्तव्यताके आधार पर सप्तभंगीका प्रदर्शन करते हुए जैन संस्कृति द्वारा मान्य परस्परसापेक्ष दैव और पुरुषार्थ उभयमें अर्थसिद्धिकी समान बलवाली साधनताका निष्ठापन किया है।
अष्टसहस्रीमें आप्तमीमांसाकी ८८ वीं कारिकाकी व्याख्या करते हुए अन्तमें आचार्य विद्यानन्दीने मोक्षकी सिद्धिको भी दैव और पुरुषार्थ दोनोंके सहयोगसे ही प्रतिपादित किया है। वह कथन निम्न प्रकार हैः-
मोक्षस्यापि परमपुण्यातिशयचारित्रविशेषात्मकपौरुषाभ्यामेव संभवात्’
अर्थ……परम पुण्यका अतिशय तथा चारित्र विशेषरूप पुरुषार्थ दोनोंके सहयोगसे मुक्तिकी भी प्राप्ति हुआ करती है।
इस प्रकार स्वामी समन्तभद्रद्वारा प्रस्थापित तथा श्रीमद् भट्टाकलंकदेव और आचार्य विद्यानन्दी द्वारा दृढ़ताके साथ समर्थित जैन संस्कृतिमें मान्य अर्थसिद्धिकी उक्त दैव और पुरुषार्थ उभयनिष्ठ साधनताके प्रकाशमें श्रीमद् भट्टाकलंकदेवने आप्तमीमांसाकी कारिका ८९ की टीका करते हुए अष्टशतीमें ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि उल्लिखित पद्य उद्धृत किया है और भट्टाकलंकदेवके अभिप्रायको न समझकर उन्हीं का बल पाकर श्री पं० फूलचन्द्रजोने अपनी जैन-तत्त्वमीमांसा पुस्तकमें तथा आपने अपने प्रत्युत्तरमें कार्यकी सिद्धि केवल समर्थ उपादानसे ही हो जाया करती हैं, निमित्त वहाँ पर अकिंचित्कर ही रहा करते हैं इस सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये उक्त पद्य उद्धृत किया है।
इस पदको लेकर हमें यहाँ पर इन बातोंका विचार करना है कि यह पद्य जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध क्यों है और यदि विरुद्ध है तो फिर श्रीमदकलंकदेवने इसका उद्धरण अपने ग्रन्थ अष्टशतीमें किस आशयसे दिया है तथा जैन संस्कृतिमें मान्य कारण-व्यवस्थाके साथ उसका मेल बैठता है तो किस तरह बैठता है? इतना ही नहीं, इसके साथ हमें इस बातका भी विचार-करना है कि इसकी सहायतासे श्री पं० फूलचन्द्रजी और आप कारण व्यवस्था सम्बन्धी अपने पक्षकी पुष्टि करनेमें कहां तक सफल हो सके हैं।
यह तो निश्चित है कि ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि रूपमें ग्रथित उक्त पथ आपके द्वारा प्रतिपादित उल्लिखित अर्थके आधार पर प्राणियोंकी अर्थसिद्धिके विषयमें जैन संस्कृतिद्वारा मान्य दैव और पुरुषार्थकी सम्मिलित कारणताका प्रतिरोध ही करता है। कारण कि उक्त पद्यके उक्त अर्थसे यही ध्वनित होता है कि प्राणियोंकी अर्थसिद्धि केवल भवितव्यताके अधीन है और यदि उस अर्थसिद्धिमें प्राणियोंकी बुद्धि, व्यवसाय एवं अन्य सहायक कारणोंकी अपेक्षा होती भी हो तो वे बुद्धि, व्यवसाय आदि सभी कारण भी उक्त पद्यके उक्त अर्थके अनुसार भवितव्यताकी अधीनतामें ही प्राप्त हुआ करते हैं।
चूंकि उक्त व्यवस्था जैन संस्कृतिमें मान्य नहीं है, किन्तु जैन संस्कृतिकी मान्यताके अनुसार प्राणियोंके प्रत्येक अर्थकी सिद्धिमें दैव और पुरुषार्थ दोनों ही परस्परके सहयोगी बन कर समानरूपसे कारण हुआ करते है, अतः उक्त पद्यकी जैन संस्कृतिकी मान्यताके साथ विरोधकी स्थिति निर्विवाद हो जाती है। इससे यह बात भी अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती है कि जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध होनेके कारण इस पद्यको आपके द्वारा अपने पक्षकी पुष्टिमें प्रमाणरूपसे उपस्थित किया जाना अनुचित ही है।
श्रीमदकलंकदेवने उक्त पद्यका उद्धरण जो आप्तमीमांसाकी ८९ वीं कारिकाकी अष्टशतीमें दिया है उसमें उनका आशय इससे साक्षाद् अपने पक्षकी पुष्टिका न होकर केवल पुरुषार्थसे अर्थसिद्धि माननेवाले दर्शनके खण्डन करनेमात्रका ही है। यही कारण है कि उक्त पद्यको उन्होंने जैन संस्कृतिका अंग न मानकर केवल लोकोक्तिके रूपमें ही स्वीकार किया है। यह बात उनके (श्रीमदकलंकदेवके) द्वारा उक्त पद्यके पाठके अनन्तर पठित ‘इति प्रसिद्धेः’ वाक्यांश द्वारा ज्ञात हो जाती है!
तात्पर्य यह है कि श्रीमदकलंकदेव उन लोगोंसे जो दैवकी उपेक्षा करके केवल पौरुषमात्रसे प्राणियोंकी अर्थसिद्धि मानते हैं-यह कहना चाहते हैं कि एक ओर तो तुम दैवके बिना केवल पुरुषार्थसे ही अर्थकी सिद्धि मान लेते हो और दूसरी ओर यह भी कहते हो कि अर्थसिद्धिमें कारणभूत बुद्धि व्यवसायादिकी उत्पत्ति या संप्राप्ति भवितव्यतासे ही हुआ करती है।
इस प्रकार बुद्धि-व्यवसायादिकी उत्पत्ति अथवा संप्राप्तिमें दैवकी कारणता प्राप्त हो जानेसे परस्पर विरोधी मान्यताओंको प्रश्रय प्राप्त हो जानेके कारण केवल पुरुषार्थसे ही अर्थसिद्धि हो जाती है यह मान्यता खण्डित हो जाती है।
एक बात और है कि उक्त पद्यका जो अर्थ आपने किया है वह स्वयं ही एक तरहसे आपकी इस मान्यताका विरोधी है कि ‘कार्य केवल भवितव्यता (समर्थ उपादान) से ही निष्पन्न हो जाया करते हैं, निमित्त उसमें अकिंचित्कर ही रहा करते हैं।’ क्योंकि उक्त पद्यार्थ हमें इस बातका संकेत देता है कि कोई भी कार्य भवितव्यता (उपादान शक्ति)के साथ साथ बुद्धि, व्यवसाय आदि कारणोंका सहयोग प्राप्त हो जानेपर ही निष्पन्न होता है। केवल इतनी विशेषता उससे अवश्य प्रगट होती है कि बुद्धि, व्यवसाय आदि सभी दूसरे कारण भवितव्यके अनुसार ही प्राप्त हुआ करते हैं। लेकिन इस तरहसे उसे बुद्धि, व्यवसाय आदिमें कारणताका निषेधक नहीं कहा जा सकता है।
यदि कहा जाय कि उक्त पद्य जब उक्त प्रकारसे भवितव्यताके साथ साथ बुद्धि व्यवसाय आदिको भी कार्यके प्रति कारण बतला रहा है तो फिर उसे जैन संस्कृतिमें मान्य कारण व्यवस्थाका विरोधी कहना ही गलत है। तो इस विषयमें हमारा कहना यह है कि पद्यमें कार्यके प्रति भवितव्यताके साथ साथ कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिका उल्लेख किया गया है, उनकी उत्पत्ति अथवा संप्राप्तिको उसी भवितव्यताकी दया पर छोड़ दिया गया है जो इस कार्यकी जननी है। बस, यही उसमें असंगति है और इस लिये वह जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध है, क्योंकि जिस भवितव्यतासे कार्यकी उत्पत्ति होती है उसी भवितव्यतासे उस कार्यमें कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिकी उत्पत्ति अथवा संम्प्राप्तिको जैन संस्कृतिमें मान्य नहीं कहा गया है। कारण कि कार्यकी उत्पत्ति जिस भवितव्यतासे होती है उसी भवितव्यतासे कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिकी उत्पत्ति अथवा संप्राप्तिकी स्वीकृतिका कोई अर्थ हीं नहीं रह जाता है अर्थात् जब वह भवितव्यता ही कार्योत्पत्तिके साथ साथ उसमें कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिको भी जुटा देती है तो फिर अकेली भवितव्यता ही कार्यको उत्पन्न कर सकती है, अतः उसकी उत्पत्तिके लिये बुद्धि, व्यवसाय आदि साधनोंकी आवश्यकता नहीं रहना चाहिए।
यदि आप कहें कि इसीलिये ही कार्यकी उत्पत्ति आपके मतमें केवल उपादानसे स्वीकार की गयी है। तो इसपर हमारा कहना यह है कि उक्त पद्य भी जब भवितव्यताके साथ बुद्धि, व्यवसाय आदिकी उपयोगिताको कार्यसिद्धिमें स्वीकार कर रहा है तो इस पद्यको कार्य-कारणभावकी आपके लिये मान्य व्यवस्थाका समर्थक कैसे कहा जा सकता है ?
श्री पं० फूलचन्द्रजीने तो जैन तत्त्वमीमांसाके उपादान-निमित्तमीमांसा प्रकरणमें पृष्ठ ६७ पर पंडितप्रवर टोड़रमलजीके मोक्षमार्गप्रकाशक अधिकार ३ पृष्ठ ८१ का उद्धरण देकर यह सिद्ध करनेका प्रयास किया है कि ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यमें प्रतिपादित कारणव्यवस्थाको जैन संस्कृतिमें भी इसी ढंगसे स्वीकार किया गया है, क्योंकि पं० प्रवर टोडरमलजीने भी अपने कथनमें कार्यके प्रति कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिको भवितव्यताकी अधीनता पर ही छोड़ दिया है। उनका वह कथन निम्न प्रकार हैः-
जो इनकी सिद्धि होय तो कषाय उपशमनतें दुःख दूर होइ जाइ सुखी होइ। परन्तु इनकी सिद्धि इनके किये उपायनके आधीन नाहीं, भवितव्यके आधीन है। जातें अनेक उपाय करते देखिये है अर सिद्धि न हो है। बहुरि उपाय बनना भी अपने आधीन नहीं, भवितव्यके आधीन है। जातें अनेक उपाय करना विचारै और एक भी उपाय न होता देखिये है। बहुरि काकतालीयन्याय करि भवितव्य ऐसी ही होय जैसा आपका प्रयोजन होइ तैसा ही उपाय होइ अर तातैं कार्यकी सिद्धि भी होइ जाइ तो तिस कार्य सम्बन्धी कोई कषायका उपशम होइ।
पं० फूलचन्द्रजीने पंडितप्रवर टोडरमलजीके इस कथनके विषयमें अपना मंतव्य भी वहीं पर लिख दिया है कि ‘यह पं० प्रवर टोडरमलजीका कथन है-मालूम पड़ता है कि उन्होंने ( पं० प्रवर टोडरमलजीने ) ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि इस श्लोकको ध्यानमें रखकर ही यह कथन किया है, इसलिये इसे उक्त अर्थके समर्थनमें ही जानना चाहिये।’
इस विषयमें हमारा कहना यह है कि पं० फूलचन्द्रजी पं० प्रवर टोडरमलजीके उल्लिखित कथनसे जो उक्त अर्थ फलित कर रहे हैं वह ठीक नहीं है, क्योंकि हम बतला आये हैं कि जैन संस्कृतिमें केवल भवितव्यसे कार्य-सिद्धि न मानकर भवितव्य और पुरुषार्थ दोनोंके परस्पर सहयोगसे ही कार्यसिद्धि मानी गयी है। इसलिये जैन संस्कृतिके इस सिद्धान्तको ध्यानमें रखकर ही पं० प्रवर टोडरमलजीके कथनका आशय निकालना चाहिये।
पुनश्च इसी मोक्षमार्गप्रकाशकमें पं० टोडरमलजीने भवितव्यता और पुरूषार्थका दूसरे ढंगसे निम्न प्रलार कथन किया है-
काललब्धि या होनहार तो किछु वस्तु नाहीं। जिस काल विषैं कार्य बनै सोई काललब्धि और जो कार्य भया सोइ होनहार। बहुरि जो कर्मका उपशमादिक है सो पुद्गलकी शक्ति है। ताका आत्मा कर्ता-हर्ता नाहीं। बहुरि पुरुषार्थ उद्यम करिए है सो यहु आत्मका कार्य है। तातै आत्माको पुरुषार्थ करि उद्यम करनेका उपदेश दीजिए है। तहाँ यह आत्मा जिस कारणते कार्यसिद्धि अवश्य होय, तिस
कारणरूप उद्यम करै, तहाँ तो अन्य कारण मिलें ही मिलें, अर कार्यकी सिद्धि ही होय। बहुरि जिस कारण से कार्यसिद्धि होय अथवा नाहीं भी होय, तिस कारणरूप उद्यम करे, तहाँ अन्य कारण मिले तो कार्य सिद्ध होय, न मिले तो सिद्ध न होय। सो जिनमत विषें जो मोक्षका उपाय कहा है, सो इसते मोक्ष होय ही होय। तातें जो जीव पुरुषार्थ करि जिनेश्वरके उपदेश अनुसार मोक्षका उपाय करे है ताके काललब्धि वा होनहार भी भया और कर्मका उपशमादि भया है, तो यहु ऐसा उपाय करे है तातै जो पुरुषार्थ करि मोक्षका उपाय करे है ताके सर्व कारण मिले ऐसा निश्चय करना अर वाके अवश्य मोक्षकी प्राप्ति हो है।
श्री पं० फूलचन्द्रजीने मोक्षमार्गप्रकाशकके जो वाक्य उद्धृत किये हैं उनका अर्थ उपरोक्त वाक्योंको ध्यानमें रखकर करना चाहिये।
यह भी बात है कि पं० प्रवर टोडरमलजीके उक्त कथनसे यह तो प्रगट होता नहीं कि कार्यकी सिद्धि केवल भवितव्यसे ही हो जाती है, उसमें पुरुषार्थ अपेक्षित नहीं रहता है। वे तो अपने उक्त कथनसे इतनी ही बात कहना चाहते हैं कि कितने ही उपाय करते जाओ, यदि भवितव्य अनुकूल नहीं है तो कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है। लेकिन यह निष्कर्ष तो कदापि नहीं निकाला जा सकता है कि यदि भवितव्य अनुकूल है तो विना पुरुषार्थके ही अर्थकी सिद्धि हो सकती है।
जैसे मिट्टीमें पट बननेकी योग्यता नहीं है तो जुलाहा आदि निमित्त सामग्रीका कितना ही योग क्यों न मिलाया जावे, उस मिट्टीसे पटका निर्माण असंभव ही रहेगा, लेकिन इससे यह निष्कर्ष कदापि नहीं निकाला जा सकता है कि मिट्टीमें घटनिर्माणकी योग्यता विद्यमान है तो कदाचित् कुम्भकार आदि निमित्त सामग्रीके सहयोगके बिना ही घटका निर्माण हो जायगा। सत्य बात तो यह है कि एक ओर तो मिट्टीमें घटनिर्माणकी योग्यताके अभावमें जुलाहा आदि निमित्त सामग्रीका सहयोग मिट्टीसे पटनिर्माणमें सर्वदा असमर्थ ही रहेगा और दूसरी ओर उस मिट्टीसे घटका निर्माण भी तभी संभव होगा जब कि उसे कुम्भकार आदि निमित्त सामग्रीका अनुकूल सहयोग प्राप्त होगा और जब कुम्भकार आदि निमित्त सामग्रीका अनुकूल सहयोग प्राप्त नहीं होगा तब अन्य प्रकारकी अनुकूल निमित्त सामग्रीका सहयोग मिलनेके सबब तदनुकूल अन्य प्रकारके कार्योंकी निष्पत्ति होते हुए भी उस मिट्टीसे घटका निर्माण कदापि संभव नहीं होगा।
पं० प्रवर टोडरमलजीके उक्त कथनका यह भी अभिप्राय नहीं है कि अमुक मिट्टीसे चूंकि घटका निर्माण होना है, अतः उसकी प्रेरणासे कुम्भकार तदनुकूल व्यापार करता है, क्योंकि यह बात अनुभवके विरुद्ध है। लोकमें कोई भी व्यक्ति किसी भी कार्यके करते समय यह अनुभव नहीं करता है कि अमुक वस्तुसे चूंकि अमुक कार्य निष्पन्न होना है, इसलिये मेरा व्यापार तदनुकूल हो रहा है। वह तो कार्योत्पत्तिके अवसर पर केवल इतना ही जानता है कि अमुक वस्तुसे चूंकि अमुक कार्य सम्पन्न हो सकता है और तब इस आधारपर वह प्रयोजनवश तदनुकूल व्यापार करने लगता है और यही कारण है कि वस्तुगत कार्य योग्यताका कदाचित् ठीक ठीक ज्ञान न हो सकनेके कारण अथवा स्वगत कार्य कर्तृत्वकी अकुशलताके कारण या दूसरी सहकारी सामग्रीके ठीक ठीक अनुकूलता न होने अथवा बाधक सामग्रीके उपस्थित हो जाने पर अनेकों बार व्यक्तिके हाथमें असफलता ही रह जाया करती है।
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि भवितव्यता हो और तदनुकूल उपाय किये जावें तो विवक्षित कार्य की सिद्धि नियमसे होगी तथा भवितव्यता हो लेकिन उपाय न किये जावें या प्रतिकूल उपाय किये जावें तो कार्यकी सिद्धि नहीं होगी । इसी तरह कार्यकी सिद्धिके लिये उपाय तो किये जावें लेकिन तदनुकूल भवितव्यता नहीं है तो भी कार्यकी सिद्धि नहीं होगी । अलावा इसके यह भी विकल्प संभव है कि भवितव्यता हो, तदनुकूल उपाय भी किये जावें, लेकिन साथमें बाधक सामग्री भी वहाँ पर विद्यमान हो तो भी कार्यकी सिद्धि नहीं होगी ।
इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पंडित फूलचन्द्रजी पं० प्रवर टोडरमलजीके कथनसे जो ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका समर्थन कर लेना चाहते हैं वह ठीक नहीं है । यद्यपि पं० प्रवर टोडरमलजीने अपने उल्लिखित कथनमें यह अवश्य लिखा है कि-
‘बहुरि उपाय बनना भी अपने आधीन नाहीं भवितव्यके आधीन है’ परन्तु इससे भी पं० फूलचन्द्रजीके इस अभिप्रायका समर्थन नहीं होता है कि ‘जो भवितव्यता कार्यकी जनक है वही भवितव्यता उस कार्यमें कारणभूत बुद्धि, व्यवसाय आदिकी भी जनक है ।’
हमारे इस कथनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है कि पं० टोडरमलीके कथनमें सामान्यतया चेतनरूप और अचेतनरूप सभी तरहके कार्योंकी उपादान शक्तिको नहीं ग्रहण किया गया है, इसलिये ऐसी भवितव्यता जीवके पारिणामिक भावरूप भव्यत्व या अभव्यत्व हो सकते हैं अथवा कर्मके यथासंभव उदय, उपशम, क्षयोपशम अथवा क्षयसे प्राप्त कार्यसिद्धिके अनुकूल जीवकी योग्यता हो सकती है ।
अब यहाँ पर ध्यान इस बात पर देना है कि मान लीजिये-किसी व्यक्तिमें धनी बननेकी योग्यता है लेकिन केवल योग्यताका सद्भाव होनेमात्रसे तो वह व्यक्ति धनी नहीं बन जायेगा । यही कारण है कि ऐसी मान्यता जैन संस्कृतिकी नहीं है, अतः जैन संस्कृतिकी मान्वताके अनुसार उस व्यक्तिको धनी बननेके लिये अपनी बुद्धिका तद्नुकूल उपयोग करना होगा, पुरुषार्थ भी उसी जातिका करना होगा और उसमें तदनुकूल अन्य सहकारी कारण भी अपेक्षित होंगे ।
यह जो कहा जाता है कि उस व्यक्तिमें पायी जानेवाली धनी बननेकी योग्यता ही ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यके आशयके अनुसार बुद्धि, पुरुषार्थ तथा अन्य सहकारी साधन-सामग्रीको संगृहीत कर लेगी तो यह कथन अनुभवविरुद्ध होनेके कारण जैन संस्कृतिके विरुद्ध है-यह बात हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं । इतना होने पर भी हम यह मानते हैं कि जैन संस्कृतिके अनुसार भी व्यक्तिमें बुद्धिका उद्भव तदनुकूल ज्ञानावरणके क्षयोपशमरूप योग्यता ( भवितव्यता ) का ही कार्य है और यही बात पुरुषार्थके विषयमें भी कही जा सकती है कि वह भी तदनुकूल कर्मके क्षयोपशमरूप भवितव्यताका ही कार्य है । इस लिये पं० प्रवर टोडरमलजीने जो यह लिखा है कि ‘उपाय बनना अपने आधीन नाहीं, भवितव्यके आधीन है’-वह न तो असंगत है और न जैन संस्कृतिके ही विरुद्ध है । कारण कि प्राणियोंकी अर्थसिद्धिमें जो भी बुद्धि, व्यवसाय (पुरुषार्थ) आदि उपाय अपेक्षित रहते हैं वे सब उपाय अपने अपने अनुकूल ज्ञानावरण आदिके क्षयोपशम आदि रूप भवितव्यताके ही कार्य हुआ करते हैं ।
इस प्रकार यदि यही दृष्टि यदि ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका अर्थ करनेमें अपना ली जावे तो फिर इसके साथ भी जैन संस्कृतिमें मान्य कारणव्यवस्थाका कोई विरोध नहीं रह जाता है ।
अन्तमें थोड़ा इस बात पर भी विचार करना चाहिये कि यदि बुद्धि, व्यवसाय आदि सभी कारण कलापकी जननी या संग्राहिका वही भवितव्यता है जो कार्यको जननी होती है तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा कार्य करनेका संकल्प भी उसी भवितव्यताके अनुकूल ही होना चाहिये । हमारी बुद्धि पर, हमारे पुरुषार्थ पर और अन्य सहकारी साधन सामग्री पर तो उस भवितव्यताका आधिपत्य हो, केवल हमारे संकल्प पर उसका आधिपत्य न हो यह बात बहुत अटपटी मालूम पड़ती है। इस तरह मनुष्य चाहता तो कुछ है और हो कुछ जाता है यह स्थिति कदापि उत्पन्न नहीं होना चाहिये।
एक और भी अर्थ ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका होता है वह यह है कि-जिस कार्यके अनुकूल वस्तुमें उपादान शक्ति हुआ करती है समझदार व्यक्ति उस वस्तुसे उसी कार्यको सम्पन्न करनेकी बुद्धि ( भावना ) किया करता है और वह पुरुषार्थ ( व्यवसाय ) भी तदनुकूल ही किया करता है तथा वह वहाँ पर तदनुकूल ही अन्य सहायक साधन सामग्रीको जुटाता है।
इस तरह उक्त पद्यका यदि यह अर्थ स्वीकार कर लिया जाय तो भी इसके साथ जैन संस्कृतिकी कारण व्यवस्थाका विरोध नहीं रह जाता है, लेकिन यह बात तो निश्चित समझना चाहिये कि ‘तादृशी जायते बुद्धिः’ इत्यादि पद्यका कोई भी अर्थ क्यों न कर लिया जाय यदि वह अर्थ जैन संस्कृतिकी मान्यताके अनुकूल होगा तो उससे आपके ‘भवितव्यतासे ही कार्यकी सिद्धि हो जाया करती है निमित्त वहाँ पर अकिंचित्कर ही रहा करते हैं’ इस मतकी पुष्टि नहीं होगी और जैसा अर्थ आपने उक्त पद्यका किया है यदि उसे ही पद्यका सही अर्थ माना जाय तो जैन संस्कृतिकी मान्यताके विरुद्ध होनेके कारण उसका आपके द्वारा प्रमाणरूपसे उपयोग करना अनुचित माना जायगा।
कुछ विचारणीय बातें
जिस प्रकार स्त्री अपने गर्भाशयमें गर्भधारण करके संतान उत्पन्न करती है, परन्तु उस गर्भके धारण करनेके लिये पुरुषका निमित्त उसको अनिवार्य आवश्यक होता है। सती, विधवा और अवन्ध्या स्त्री इस कारण सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकती, क्योंकि उसको पुरुषका निमित्त नहीं मिलता।
उपादानके अन्दर अनन्त शक्तियाँ विद्यमान हैं और जब जिस शक्तिके विकासके योग्य निमित्त मिल जाते हैं तब वह शक्ति विकासको प्राप्त हो जाती है। रसोइया परांतमें गेहूँका आटा माढ़ कर रक्खे हुए है। भोजन करनेवालेकी इच्छानुसार वह उसी आटेमेंसे कभी रोटी बनाता है, कभी पुड़ी बनाता है और कभी परायठा बनाता है। रसोइया इन सब चीजोंको बराबर आवश्यकतानुसार बदल-बदल कर बनाता चला जाता है। भोजन करनेवाले भोजन भी करते जाते हैं। उक्त रोटी, पुड़ी और परायठेके निमित्त यथायोग्य अलग-अलग भी हैं और एक भी हैं। यहाँ पर विचारणीय बात नाना शक्तियोंकी है कि जितना गेहूँ पीसा गया वह एक ही चक्कीसे पीसा गया और उस सम्पूर्ण आटेमें पिसे हुए गेहूँके प्रत्येक दानेका अंश समा गया और उस सभी आटेको पानी डालकर माढ़ दिया गया। इस तरह गेहूँके प्रत्येक दानेका अंश रोटीमें पहुँचा, पुड़ीमें पहुँचा और परायठेमें भी पहुंचा, इससे सिद्ध हुआ कि गेहूँके प्रत्येक दानेमें रोटी बननेकी शक्ति थी, पुड़ी बननेकी शक्ति थी, और परायठा बननेकी शक्ति थी। विकास उसकी उस शक्तिका हुआ जिसके विकासके लिये रसोइयाकी इच्छाशक्ति, बुद्धिशक्ति और श्रमशक्तिका योग प्राप्त हुआ।
आप लोगोंको तत्त्वचर्चामें आये प्रश्नोंका उत्तर लिखना है वह न तो केवल आत्माके द्वारा लिखा जा सकता है, क्योंकि आत्मा स्वयं अशरीरी है। उसके हाथ, पैर, आँख, अंग-उपांग नहीं है। इसी तरह प्रश्नोंका उत्तर लिखनेके लिये जहाँ आपको हाथ, आँख आदि शरीरके अवयवोंकी आवश्यकता है वहाँ उनके साथ प्रकाश; लेखनी, स्याही, कागज आदि बाह्य साधनोंकी भी आवश्यकता है। इनमेंसे आवश्यक किसी एक साधनकी क़मी रह जाय तो प्रश्नोंका उत्तर नहीं लिखा जा सकेगा। इसके सिवाय विघ्न करनेवाले प्रतिबन्धक कारणोंका अभाव भी मिलना चाहिये, रात्रिमें लिखते समय बिजली फैल हो जावे, दीपक बुझ जावे, शरीरमें भयानक वेदना उत्पन्न हो जावे तो प्रश्नोंका उत्तर लिखना असंभव हो जायगा।
मनुष्य जब पैदल चलता है तो उसकी गति धीमी होती है, जब वह तांगे पर सवार होकर यात्रा करता है तब वह अपने लक्ष्य पर जल्दी पहुँच जाता है, जब वह साइकलसे जाता है तो तांगेकी अपेक्षा और भी शीघ्र अपने लक्ष्य पर पहुंच जाता है। दूरवर्ती नगरमें पहुँचनेके लिये वह रेलगाड़ीसे जाता है तब और शीघ्र पहुँच जाता है। यदि और भी शीघ्र पहुँचनेकी इच्छा होती है तो वह मोटर द्वारा सफर करता है और अत्यन्त शीघ्र पहुँचनेके लिये हवाई जहाजका भी उपयोग करता है। स्वर्गीय सम्राट् पंचमजार्ज सन् १९१२ में इंगलैंडसे दिल्ली आये थे तब हवाई जहाज नहीं थे, अतः समुद्री जहाजमें बैठ कर आये थे और एक मास में भारत पहुँचे थे। अभी २-३ वर्ष पहले जब उनकी पौत्री साम्राज्ञी एलजावेथ भारत आयीं तब वे एक ही दिनमें हवाई जहाज़ द्वारा इंगलैण्डसे भारत पहुँच गयी थीं। कुछ समय बाद जब अतिस्वन ( सुपर सोनिक ) विमान चालू हो जायँगे तब लन्दनसे दिल्लीकी यात्रा ४-५ घंटे की रह जायगी। आज अमेरिका और रूस में चंद्रमा पर पहुंचनेकी होड़ लगी हुई है। उपादान अपने विकासमें निमित्तोंके कितने अधीन है इसका पता उपर्युक्त उदाहरणोंसे सहज ही में लग जाता है।
मुद्गरादिव्यापारानन्तरं कार्योत्पादवत् कारणविनाशस्यापि प्रतीतेः, विनष्टो घट उत्पन्नानि कपालानीति व्यवहारद्वयसद्भावात्-अष्टसहस्री पृष्ठ २०० कारिका ५३
अर्थ-मुद्गर आदिके व्यापारके अनन्तर घटका विनाश और कपालोंका उत्पाद होता हुआ देखा जाता है।
यहाँ पर इतना आशय लेना है कि मुद्गरकी घटके विनाश और कपालोंके उत्पादमें निमित्तता स्वीकार की गयी है। आगे अष्टसहस्री पृष्ठ २०० पर ही लिखा है :-
तस्मादयं विनाशहेतुर्भावमभावीकरोतीति न पुनरकिंचित्करः।
अर्थ-इसलिये घटविनाशका हेतुभूत मुद्गर भावात्मक पदार्थको अभावात्मक बना देता है तो इसे अकिंचित्कर कैसे कहा जा सकता है ?
इस कथनसे निमित्तकारणकी अकिंचित्करताका स्पष्ट खण्डन हो जाता है। इससे सम्बन्ध रखनेवाला बहुतसा विवेचन और आगमप्रमाण प्रश्न संख्या १, ५, ८, १०, ११, और १७ में भी मिलेंगे। अतः कृपया वहाँ पर देखनेका कष्ट कीजियेगा।
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मंगलं भगवान वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥