गोम्मटसार कर्मकाण्ड गाथा एवं सरलार्थ (आचार्य नेमिचन्द्र) | Gommatsar Karmakand Gatha Evam Saralarth (Acharya Nemichandra)

गोम्मटसार कर्मकाण्ड गाथा एवं सरलार्थ

आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती

गोम्मटसार कर्मकाण्ड की प्राकृत मूल गाथाएँ 1 से 357 (प्रकृति समुत्कीर्तन अधिकार 1 से 86, बन्धोदयसत्त्व अधिकार 87 से 357), हर गाथा के नीचे उसका सरलार्थ, भाग नीचे अलग उत्तरों में। सरलार्थ दोनों संलग्न पुस्तकों में हर गाथा के बाद छपे “सरलार्थ” से ज्यों का त्यों लिया है; पद्यानुवाद, शब्दश: अर्थ, अन्वय और विवेचन नहीं लिए, वे पुस्तक में हैं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल गाथाएँ (छपाई की टिप्पणियों सहित): गोम्मटसार कर्मकाण्ड मूल गाथा (आचार्य नेमिचन्द्र) | Gommatsar Karmakand Mool Gatha (Acharya Nemichandra)

अनुक्रमणिका

स्रोत: Gomatsar karmkand (prakriti samutkirtan).pdf

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प्रकृति-समुत्कीर्तन अधिकार (1) (गाथा 1 से 43)

पणमिय सिरसा णेमिं, गुणरयणविभूसणं महावीरं ।
सम्मत्त-रयण-णिलयं, पयडि-समुक्कित्तणं वोच्छं ॥1॥

सरलार्थ: टीकाकारों ने प्रस्तुत गाथा के अनेकों अर्थ किए हैं। हम यहाँ उनमें से मात्र ४ प्रमुख अर्थ देखते हैं - १.नेमिनाथ भगवान् को नमस्कार-परक : गुणरूपी रत्नों से विभूषित, महान् वीर अथवा महान् लक्ष्मी को देनेवाले, सम्यक्त्वरूपी रत्नों के स्थानभूत नेमिनाथ भगवान् को शिर झुकाकर नमस्कार करके प्रकृति समुत्कीर्तन को कहूँगा।
२.भगवान् महावीर स्वामी को नमस्कार-परक : नेमि/धर्म-चक्र की धुरी स्वरूप, गुणरूपी रत्नों से विभूषित, सम्यक्त्वरूपी रत्नों के स्थान महावीर भगवान् को शिर झुकाकर नमस्कार करके प्रकृति समुत्कीर्तन को कहूँगा।
३.२४ तीर्थंकर भगवान् को नमस्कार-परक : नेमि/धर्म-चक्र की धुरी स्वरूप, गुणरूपी रत्नों से विभूषित, महान्, सम्यक्त्वरूपी रत्नों के स्थान २४ तीर्थंकर भगवान् को शिर झुकाकर नमस्कार कर प्रकृति समुत्कीर्तन को कहूँगा।
४.जिनवाणी को नमस्कार-परक : (पंचम-काल में) धर्मरूपी चक्र की धुरी स्वरूप, स्याद्वाद आदि गुणरूपी रत्नों से विभूषित, महान् विशिष्ट अनन्त चतुष्टयरूपी लक्ष्मी को देनेवाली/प्रगट करने का मार्ग/उपाय बतानेवाली, सम्यक्त्वरूपी रत्नों की स्थान, प्रकृति/वस्तु के स्वभाव का भली-भाँति उत्कृष्ट रूप से कथन करनेवाली जिनवाणी को नमस्कार करके प्रकृति/कर्म का समुत्कीर्तन करूँगा।
इसप्रकार विशेषण-विशेष्य में परिवर्तन से इस गाथा के विविध अर्थ फलित होते हैं।


पयडी सील सहावो, जीवंगाणं अणाइसंबंधो ।
कणयोवले मलं वा, ताणत्थित्तं सयं सिद्धं ॥2॥

सरलार्थ: प्रकृति, शील और स्वभाव, एकार्थवाची/पर्यायवाची हैं। जैसे - सुवर्ण-पाषाण में किट्ट-कालिमा अनादि से मिली हुई है; उसीप्रकार जीव और शरीर/कर्म का अनादि से संबंध है। (इस स्थिति में भी) उन दोनों का अस्तित्व स्वयं से सिद्ध है।


देहोदयेण सहिओ, जीवो आहरदि कम्म-णोकम्मं ।
पडिसमयं सव्वंगं, तत्तायस-पिंडओव्व जलं ॥3॥

सरलार्थ: जैसे तपे हुए लोहे के गोले को जल में डालने पर वह प्रति-समय सब ओर से जल ग्रहण करता है; उसीप्रकार शरीर नामक नाम-कर्म के उदय से सहित (योगवान) जीव प्रति-समय सब ओर से कर्म-नोकर्म को ग्रहण करता है (ज्ञानावरणादि रूप होने-योग्य कार्मण-वर्गणाओं का ग्रहण, कर्म का ग्रहण है तथा औदारिक आदि शरीररूप होने-योग्य आहार-वर्गणाओं का ग्रहण, नोकर्म का ग्रहण है।)


सिद्धाणंतिम-भागं अभव्व-सिद्धादणंत-गुणमेव ।
समयपबद्धं बंधदि, जोग-वसादो दु विसरित्थं ॥4॥

सरलार्थ: इस जीव के साथ (अनंतानंत-प्रमाण अक्षय-अनन्त) सिद्ध-राशि के अनंतवें भाग, (जघन्य युक्तानन्त-प्रमाण सक्षय-अनन्त) अभव्य-राशि से अनन्त गुणे समय-प्रबद्ध बँधते हैं; परन्तु मन, वचन, काय-योग की हीनाधिकता से हीनाधिक परमाणु भी बँध जाते हैं।


जीरदि समयपबद्धं, पओगदो णेगसमयबद्धं वा ।
गुण-हाणीण-दिवड्ढं, समयपबद्धं हवे सत्तं ॥5॥

सरलार्थ: इस अनादि-कालीन संसार में स्थित जीव के प्रति-समय समय-प्रबद्ध प्रमाण (सिद्ध-राशि के अनंतवें भाग, अभव्य-राशि से अनंतगुणे प्रमाण) कर्म निर्जरित होते हैं/खिर जाते हैं; अथवा कभी-कभी प्रयोग से/तपश्चरणादि विशिष्ट परिणामों का निमित्त पाकर अनेक समय-प्रबद्ध प्रमाण भी खिर जाते हैं; तथा गुणाकार क्रम से हीन-हीन होनेवाली गुण-हानि के काल से डेड़ गुणे अर्थात् डेड़ गुण-हानि आयाम से गुणित समय-प्रबद्ध सत्ता में रहते हैं।


कम्मत्तणेण एक्कं, दव्वं भावोत्ति होदि दुविहं तु ।
पोग्गल-पिंडो दव्वं, तस्सत्ती भाव-कम्मं तु ॥6॥

सरलार्थ: कर्म, कर्मत्व की अपेक्षा एक है अर्थात् कर्म, मात्र कर्म है, उसमें कोई भेद नहीं है। द्रव्यकर्म और भावकर्म की अपेक्षा वास्तव में उसके दो भेद भी हो जाते हैं। ज्ञानावरणादि कर्मरूप से परिणमित कार्मण-वर्गणामय पुद्गलों का समूह, द्रव्यकर्म है तथा वास्तव में उसकी फल देने की शक्ति, भावकर्म है।


तं पुण अट्ठविहं वा, अडदालसयं असंखलोगं वा ।
ताणं पुण घादित्ति अघादित्ति य होंति सण्णाओ ॥7॥

सरलार्थ: पुन: वे (द्रव्य और भावरूप कर्म) आठ प्रकार के, एक सौ अड़तालीस प्रकार के तथा असंख्यात लोक-प्रमाण भेदवाले हैं। इनके भी घाति और अघाति नामवाले दो भेद हैं।


णाणस्स दंसणस्स य, आवरणं वेयणीय-मोहणियं ।
आउग-णामं गोदंतराय-मिदि अट्ठ-पयडीओ ॥8॥

सरलार्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्क, नाम, गोत्र और अंतराय - ये आठ प्रकृतिआँ हैं।


आवरण-मोह-विग्घं, घादी जीव-गुण-घादणत्तादो ।
आउग-णामं गोदं, वेयणियं तह अघादित्ति ॥9॥

सरलार्थ: जीव के गुणों का घात करने में निमित्त होने से ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अंतराय - ये चार घाति कर्म हैं तथा आयुष्क, नाम, गोत्र और वेदनीय - ये चार अघाति कर्म हैं।

घाति कर्म केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनन्तवीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग - इन नौ क्षायिक गुणों/भावों के; मति-श्रुत-अवधि-मन:पर्यय ज्ञान, कुमति-कुश्रुत-कुअवधिज्ञान, चक्षु-अचक्षु-अवधिदर्शन, क्षायोपशमिक दान-लाभ-भोग-उपभोग-वीर्य, क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक चारित्र, संयमासंयम - इन अठारह क्षायोपशमिक गुणों/भावों के और औपशमिक सम्यक्त्व-चारित्र - इन दो औपशमिक गुणों/भावों के घात में निमित्त होते हैं।


केवलणाणं दंसण-मणंतविरियं च खयिय-सम्मं च ।
खयिय-गुणे मदियादी, खओवसमिए य घादी दु ॥10॥

सरलार्थ: घाति कर्म केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनन्तवीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग - इन नौ क्षायिक गुणों/भावों के; मति-श्रुत-अवधि-मन:पर्यय ज्ञान, कुमति-कुश्रुत-कुअवधिज्ञान,चक्षु-अचक्षु-अवधिदर्शन, क्षायोपशमिक दान-लाभ-भोग-उपभोग-वीर्य, क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक चारित्र, संयमासंयम - इन अठारह क्षायोपशमिक गुणों/भावों के और औपशमिक सम्यक्त्व-चारित्र - इन दो औपशमिक गुणों/भावों के घात में निमित्त होते हैं।


कम्म-कय-मोह-बड्ढिय, संसारम्हि य अणादि-जुत्तम्हि ।
जीवस्स अवट्ठाणं, करेदि आऊ हलिव्व णरं ॥11॥

सरलार्थ: जैसे काठ का खोड़ा मनुष्य को अपने में बाँधकर रखता है; उसीप्रकार कर्म-कृत मोह से बड़े हुए अनादि-कालीन संसार में आयुष्क कर्म, जीव का अवस्थान करता है; अर्थात् आयुष्क कर्म के उदय में यह जीव, शरीर में अवस्थित रहता है, शरीर से निकल नहीं पाता है।


गदि-आदि-जीवभेदं, देहादी-पोग्गलाण भेदं च ।
गदियंतर-परिणमनं करेदि णामं अणेयविहं ॥12॥

सरलार्थ: गति आदि संसारी जीव (की दशाओं) के भेद को, शरीर आदि पुद्गलों के भेद को और एक गति से दूसरी गतिरूप परिणमन को इत्यादि अनेक प्रकार के कार्यों को नामकर्म करता है।


संताणकमेणागय-जीवायरणस्स गोदमिदि सण्णा ।
उच्चं णीचं चरणं, उच्चं णीचं हवे गोदं ॥13॥

सरलार्थ: संतान क्रम से आए जीव के आचरण को गोत्र कहते हैं। उच्च आचरण, उच्च गोत्र है; नीच आचरण, नीच गोत्र है। (इसमें निमित्त होनेवाला कर्म, गोत्र-कर्म है।)


अक्खाणं अणुभवणं, वेयणियं सुहसरूवयं सादं ।
दुक्ख-सरूव-मसादं, तं वेदयदीदि वेदणियं ॥14॥

सरलार्थ: पंचेंद्रिय विषयों का अनुभवन, वेदनीय है। सुख-स्वरूप/आकुलता की कुछ हीनतारूप वेदन, साता-वेदनीय तथा दु:ख-स्वरूप/आकुलतारूप वेदन, असाता-वेदनीय कहलाता है। (इनमें निमित्त बननेवाला कर्म, वेदनीय-कर्म है।)


अत्थं देक्खिय जाणदि, पच्छा सद्दहदि सत्तभंगीहिं ।
इदि दंसणं च णाणं, सम्मत्तं होंति जीव गुणा ॥15॥

सरलार्थ: छद्मस्थ जीव, पदार्थ को देखकर जानता है। तत्पश्चात् सप्तभंगी के माध्यम से पदार्थ का निर्णयकर, उसका श्रद्धान करता है - इसप्रकार दर्शन, ज्ञान और सम्यक्त्व जीव के गुण हैं।


अब्भरहिदादु पुव्वं, णाणं तत्तो हि दंसणं होदि ।
सम्मत्तमदो विरियं, जीवाजीव-गदमिदि चरिमे ॥16॥

सरलार्थ: (यद्यपि छद्मस्थों को ज्ञान, दर्शन पूर्वक होता है; तथापि) पूज्य होने के कारण ज्ञान को सर्व-प्रथम रखा है। तदुपरांत वास्तव में दर्शन है। तत्पश्चात् सम्यक्त्व है तथा जीव-अजीवगत/जीव-अजीव सभी में सामान्यरूप से विद्यमान होने के कारण वीर्य को अंत में रखा; इस अपेक्षा से तत्संबंधी कर्मों का क्रम ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अंतरायरूप में सुनिश्चित हुआ।


घादीवि अघादिं वा, णिस्सेसं घादणे असक्कादो ।
णामतियणिमित्तादो, विग्घं पडिदं अघादिचरिमम्हि ॥17॥

सरलार्थ: अंतराय कर्म घाति होने पर भी अघाति कर्मों के समान जीव के गुणों को पूर्णतया घातने में समर्थ नहीं होने के कारण तथा नाम, गोत्र और वेदनीय - इन तीन कर्मों के निमित्त से अपना कार्य करता होने के कारण, उसे अघाति कर्मों के अंत में पढ़ा/रखा गया है।


आउबलेण अवट्ठिदि, भवस्स इदि णाममाउपुव्वं तु ।
भवमस्सिय-णीचुच्चं, इदि गोदं णाम-पुव्वं तु ॥18॥

सरलार्थ: आयुष्क के बल से/आयुष्क कर्म के उदय से भव की/असमान-जातीयरूप (मनुष्यादि) द्रव्य-पर्याय की/शरीर की अवस्थिति रहती है; अत: नामकर्म को आयु पूर्वक/आयुष्क के बाद में रखा गया है। भव का/असमान जातीय द्रव्य-पर्याय का/शरीर का आश्रय लेकर नीच-उच्च प्रवृत्ति होने के कारण गोत्र को नाम पूर्वक/नामकर्म के बाद रखा गया है।


घादिंव वेयणीयं, मोहस्स बलेण घाददे जीवं ।
इदि घादीणं मज्झे, मोहस्सादिम्हि पढिदं तु ॥19॥

सरलार्थ: वेदनीय कर्म (अघाति होने पर भी) मोह के बल से घाति के समान जीव (के गुणों) को घातने में निमित्त होने के कारण, उसे घाति के मध्य में मोहनीय के पूर्व पढ़ा गया है।


णाणस्स दंसणस्स य, आवरणं वेयणीय-मोहणियं ।
आउग-णामं गोदंतरायमिदि पढिद-मिदि सिद्धं ॥20॥

सरलार्थ: (यद्यपि छद्मस्थों को ज्ञान, दर्शन पूर्वक होता है; तथापि) पूज्य होने के कारण ज्ञान को सर्व-प्रथम रखा है। तदुपरांत वास्तव में दर्शन है। तत्पश्चात् सम्यक्त्व है तथा जीव-अजीवगत/जीव-अजीव सभी में सामान्यरूप से विद्यमान होने के कारण वीर्य को अंत में रखा; इस अपेक्षा से तत्संबंधी कर्मों का क्रम ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अंतरायरूप में सुनिश्चित हुआ।

अंतराय कर्म घाति होने पर भी अघाति कर्मों के समान जीव के गुणों को पूर्णतया घातने में समर्थ नहीं होने के कारण तथा नाम, गोत्र और वेदनीय - इन तीन कर्मों के निमित्त से अपना कार्य करता होने के कारण, उसे अघाति कर्मों के अंत में पढ़ा/रखा गया है।

आयुष्क के बल से/आयुष्क कर्म के उदय से भव की/असमान-जातीयरूप (मनुष्यादि) द्रव्य-पर्याय की/शरीर की अवस्थिति रहती है; अत: नामकर्म को आयु पूर्वक/आयुष्क के बाद में रखा गया है। भव का/असमान जातीय द्रव्य-पर्याय का/शरीर का आश्रय लेकर नीच-उच्च प्रवृत्ति होने के कारण गोत्र को नाम पूर्वक/नामकर्म के बाद रखा गया है।

वेदनीय कर्म (अघाति होने पर भी) मोह के बल से घाति के समान जीव (के गुणों) को घातने में निमित्त होने के कारण, उसे घाति के मध्य में मोहनीय के पूर्व पढ़ा गया है।

इसप्रकार ज्ञान का आवरण/ज्ञानावरण, दर्शन का आवरण/दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्क, नाम, गोत्र और अंतराय - यह (आठवीं गाथा में) पढ़ा गया आठ-कर्मों का क्रम सिद्ध हुआ।


पडपडिहारसिमज्जा-हलिचित्तकुलालभंडयारीणं ।
जह एदेसिं भावा, तहवि य कम्मा मुणेयव्वा ॥21॥

सरलार्थ: वस्त्र, द्वारपाल, शहद-लपेटी तलवार, शराब, काठ का खोड़ा, चित्रकार, कुंभकार और भंडारी/खजांची - इनके जैसे भाव/कार्य हैं; उसीप्रकार क्रमश: कर्मों के कार्य जानना चाहिए।


पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण ते-णउदी ।
ते उत्तरं सयं वा, दुग-पणगं उत्तरा होंति ॥22॥

सरलार्थ: (ज्ञानावरण आदि मूल आठ कर्मों की) क्रम से पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, तेरानबै अथवा एक सौ तीन, दो और पाँच उत्तर-प्रकृतिआँ हैं।


थीणुदयेणुट्ठविदे, सोवदि कम्मं करेदि जप्पदि य ।
णिद्दाणिद्दुदयेण य, ण दिट्ठिमुग्घादिदुं सक्को ॥23॥

सरलार्थ: स्त्यानगृद्धि (नामक दर्शनावरण) के उदय से उठाए/जगाए जाने पर भी सोता है; सोते-सोते ही कुछ कार्य करता है और बोलता है/बड़बड़ाता है तथा निद्रानिद्रा (नामक दर्शनावरण) के उदय से नेत्र खोलने के लिए भी समर्थ नहीं हो पाता है।


पयलापयलुदयेण य, बहेदि लाला चलंति अंगाइं ।
णिद्दुदये गच्छंतो, ठाइ पुणो बइसइ पडेई ॥24॥

सरलार्थ: प्रचलाप्रचला (नामक दर्शनावरण) के उदय से लार बहती है, (हाथ-पैर आदि) अंग चलते/हिलते रहते हैं। निद्रा (नामक दर्शनावरण) के उदय में गमन करता/चलता हुआ भी खड़ा हो जाता है, फिर बैठ जाता है, गिर पड़ता है/लेट जाता है।


पयलुदयेण य जीवो, ईसुम्मीलिय सुवेइ सुत्तोवि ।
ईसं ईसं जाणदि, मुहुं मुहुं सोवदे मंदं ॥25॥

सरलार्थ: प्रचला (नामक दर्शनावरण) के उदय से जीव कुछ-कुछ सोता है, सोता हुआ भी कुछ-कुछ जानता है तथा बारंबार मंद-मंद सोता है।


जंतेण कोद्दवं वा, पढमुवसमसम्मभावजंतेण ।
मिच्छं दव्वं तु तिधा, असंखगुणहीणदव्वकमा ॥26॥

सरलार्थ: चक्की से दले हुए कोदों के समान, प्रथमोपशम-सम्यक्त्व भावरूपी यंत्र/चक्की द्वारा दले जाने पर मिथ्यात्वरूपी कर्म-द्रव्य असंख्यात-गुणा हीन द्रव्य क्रम से तीन भागों में विभक्त हो जाता है।


तेजाकम्मेहिं तिए, तेजा कम्मेण कम्मणा कम्मं ।
कय-संजोगे चदु-चदु चदु-दुगमेक्कं च पयडीओ ॥27॥

सरलार्थ: औदारिक, वैक्रियिक और आहारक - इन तीन शरीरों का तैजस और कार्मण के साथ; तैजस का कार्मण के साथ और कार्मण का कार्मण के साथ संयोग करने पर क्रमश: चार, चार, चार, दो और एक प्रकृतिआँ - इसप्रकार शरीर संबंधी १५ प्रकृतिआँ हो जाती हैं।


णलया बाहू य तहा, णियंबपुट्ठी उरो य सीसो य ।
अट्ठेव दु अंगाइं, देहे सेसा उवंगाइं ॥28॥

सरलार्थ: दो पैर, दो हाथ, नितम्ब, पीठ, हृदय और शिर - ये आठ अंग, शरीर में हैं; शेष उपांग हैं।


सेवट्टेण य गम्मइ, आदीदो चदुसु कप्पजुगलोत्ति ।
तत्तो दुजुगल-जुगले, खीलिय-णारायणद्धोत्ति ॥29॥

सरलार्थ: असंप्राप्ता-सृपाटिका संहननवाला प्रारंभ से/भवनवासी से चार कल्प-युगल/आठवें कापिष्ठ स्वर्ग पर्यंत जन्म ले सकता है। उससे आगे दो युगल/बारहवें सहस्रार स्वर्ग पर्यंत कीलित संहननवाला और उससे भी आगे दो युगल/सोलहवें अच्युत स्वर्ग पर्यंत अर्धनाराच संहननवाला जन्म ले सकता है।


णव-गेविज्जाणुद्दिस-णुत्तरवासीसु जांति ते णियमा ।
तिदुगेगे संघडणे, णारायण-मादिगे कमसो ॥30॥

सरलार्थ: उससे आगे नव ग्रैवेयिक, नव अनुदिश और पाँच अनुत्तरों में क्रमश: नाराच आदि तीन, दो और एक संहननवाले ही नियम से जन्म ले सकते हैं।


सण्णी छस्संहडणो, वज्जदि मेघं तदो परं चापि ।
सेवट्टादी रहिदो, पण पण चदुरेग-संहडणो ॥31॥

सरलार्थ: छहों संहननों में से किसी भी संहननवाला संज्ञी जीव, मेघा नामक तीसरी नरक पृथ्वी पर्यंत जन्म ले सकता है। इससे आगे सृपाटिका संहनन से रहित/पाँच संहननवाला जीव, पाँचवीं नरक पृथ्वी पर्यंत; चार संहननवाला, छठवें नरक पर्यंत और एक संहननवाला, सातवीं नरक पृथ्वी पर्यंत जन्म ले सकता है।


अंतिम-तिय-संहडणस्सुदओ पुण कम्मभूमि-महिलाणं ।
आदिम-तिग-संहडणं णत्थित्ति जिणेहिं णिद्दिट्ठं ॥32॥

सरलार्थ: कर्मभूमि-महिलाओं के अंतिम तीन संहनन का उदय होता है, प्रारम्भिक तीन संहननों का उनके उदय नहीं होता है - ऐसा जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है।


मूलुण्हपहा अग्गी, आदावो होदि उण्हसहियपहा ।
आइच्चे तेरिच्छे, उण्हूणपहा हु उज्जोओ ॥33॥

सरलार्थ: जिसके मूल और प्रभा दोनों उष्ण होते हैं, वह अग्नि है। जिसकी केवल प्रभा ही उष्ण हो, वह आतप है; यह सूर्य के विमान में उत्पन्न हुए बादर पर्याप्त पृथ्वी-कायिक जीवों के शरीर हैं। जिसकी प्रभा भी उष्णता-रहित हो, वह उद्योत है।


देहे अविणाभावी, बंधण-संघाद इदि अबंधुदया ।
वण्ण - चउक्केऽभिण्णे, गहिदे चत्तारि बंधुदये ॥34॥

सरलार्थ: शरीर के साथ अविनाभावी होने के कारण बंधन और संघात को बंध और उदय में ग्रहण नहीं करते हैं तथा वर्ण-चतुष्क की बीस प्रकृतिओं को अभिन्नरूप में ग्रहण करने पर बंध और उदय में मात्र चार ही गिनते हैं।


पंच णव दोण्णि छब्बीसमवि य चउरो कमेण सत्तट्ठी ।
दोण्णि य पंच य भणिया, एदाओ बंध-पयडीओ ॥35॥

सरलार्थ: पाँच, नौ, दो, छब्बीस, चार, षड्षठ, दो और पाँच - ये क्रमश: बंध-योग्य प्रकृतिआँ कही हैं।


पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण सत्तट्ठी ।
दोण्णि य पंच य भणिया, एदाओ उदय-पयडीओ ॥36॥

सरलार्थ: पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, षड्षठ, दो और पाँच - ये क्रमश: उदय-योग्य प्रकृतिआँ हैं।


भेदे छा-दाल-सयं, इदरे बंधे हवंति वीस-सयं ।
भेदे सव्वे उदये, वा-वीस-सयं अभेदम्हि ॥37॥

सरलार्थ: बंध में भेद की अपेक्षा एक सौ छ्यालीस और अभेद की अपेक्षा एक सौ बीस हैं। उदय में भेद की अपेक्षा सभी और अभेद की अपेक्षा एक सौ बाईस हैं।


पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण ते-णउदी ।
दोण्णि य पंच य भणिया, एदाओ सत्त-पयडीओ ॥38॥

सरलार्थ: पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, तेरानबै, दो और पाँच - ये क्रमश: सत्त्व-योग्य प्रकृतिआँ कही हैं।


केवल-णाणावरणं, दंसण-छक्कं कसाय-वारसयं ।
मिच्छं च सव्वघादी, सम्मामिच्छं अबंधम्हि ॥39॥

सरलार्थ: केवलज्ञानावरण; केवलदर्शनावरण, स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, निद्रा और प्रचला - ये दर्शनषट्क; अनन्तानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण संबंधी क्रोध-मान-माया-लोभ - ये बारह कषायें; मिथ्यात्व और बंध-रहित, सत्त्व तथा उदय में सम्यग्मिथ्यात्व - ये २१ प्रकृतिआँ, सर्वघाति हैं।


णाणावरण-चउक्कं, ति-दंसणं सम्मगं च संजलणं ।
णव णोकसाय-विग्घं, छब्बीसा देस-घादीओ ॥40॥

सरलार्थ: मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मन:पर्ययज्ञानावरण - ये ज्ञानावरण-चतुष्क; चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण - ये तीन दर्शन; सम्यक्त्व-प्रकृति, क्रोध-मान-माया-लोभरूप संज्वलन कषाय; हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद रूप नौ नो कषाय; दानांतराय, लाभान्तराय, भोगांतराय, उपभोगान्तराय, वीर्यान्तरायरूप पाँच विघ्न/अंतराय - ये २६ प्रकृतिआँ देशघाति हैं।


सादं तिण्णेवाऊ, उच्चं णर-सुर-दुगं च पंचिंदी ।
देहा बंधण-संघा-दंगोवंगाइं वण्ण-चओ ॥41॥

सरलार्थ: साता-वेदनीय; मनुष्य, तिर्यंच और देव - ये तीन आयुष्क; उच्च-गोत्र, मनुष्य-गति, मनुष्य-गत्यानुपूर्वी, देव-गति, देव-गत्यानुपूर्वी, पंचेंद्रिय-जाति, औदारिक आदि पाँच शरीर, पाँच बंधन, पाँच संघात, औदारिक आदि तीन अंगोपांग; वर्ण, गंध, रस, स्पर्शमय वर्ण चतुष्क; समचतुरस्र-संस्थान, वज्रवृषभनाराच-संहनन, उपघात-रहित अगुरुलघु-षट्क/अगुरुलघु, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास; प्रशस्त-विहायोगति; त्रसादि बारह/त्रस, बादर, पर्याप्ति, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर - ये अड़षठ प्रकृतिआँ भेद-विवक्षा में तथा ब्यालीस प्रकृतिआँ अभेद-विवक्षा में पुण्य-प्रकृतिआँ हैं।
घाति अर्थात् ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ, मोहनीय की अट्ठाईस, अंतराय की पाँच - कुल सेंतालीस; नीच-गोत्र, असाता-वेदनीय, नरक-आयुष्क, नरक-गति, नरक-गत्यानुपूर्वी, तिर्यंच-गति, तिर्यंच-गत्यानुपूर्वी; एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रियरूप चार जाति; न्यग्रोध परिमंडल, स्वाति, कुब्जक, वामन और हुण्डक - ये पाँच संस्थान; वज्रनाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलक और असंप्राप्तासृपाटिका - ये पाँच संहनन; वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, उपघात, अप्रशस्त-विहायोगति; स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्ति, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयशस्कीर्तिरूप स्थावर दशक - ये अप्रशस्त-प्रकृतिआँ हैं। ये बंध में भेद की अपेक्षा अण्ठानबै तथा अभेद की अपेक्षा ब्यासी हैं। उदय में भेद की अपेक्षा सौ तथा अभेद की अपेक्षा चौरासी हैं।


समचउर-बज्ज-रिसहं, उवघादूणगुरु-छक्क सग्गमणं ।
तसबार-सट्ठसट्ठी, बादाल-मभेददो सत्था ॥42॥

सरलार्थ: साता-वेदनीय; मनुष्य, तिर्यंच और देव - ये तीन आयुष्क; उच्च-गोत्र, मनुष्य-गति, मनुष्य-गत्यानुपूर्वी, देव-गति, देव-गत्यानुपूर्वी, पंचेंद्रिय-जाति, औदारिक आदि पाँच शरीर, पाँच बंधन, पाँच संघात, औदारिक आदि तीन अंगोपांग; वर्ण, गंध, रस, स्पर्शमय वर्ण चतुष्क; समचतुरस्र-संस्थान, वज्रवृषभनाराच-संहनन, उपघात-रहित अगुरुलघु-षट्क/अगुरुलघु, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास; प्रशस्त-विहायोगति; त्रसादि बारह/त्रस, बादर, पर्याप्ति, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर - ये अड़षठ प्रकृतियाँ भेद-विवक्षा में तथा ब्यालीस प्रकृतियाँ अभेद-विवक्षा में पुण्य-प्रकृतियाँ हैं।


घादी-णीच-मसादं, णिरयाऊ णिरय-तिरिय-दुग-जादी ।
संठाण-संहदीणं, चदु-पण-पणगं च वण्ण-चओ ॥43॥

सरलार्थ: घाति अर्थात् ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ, मोहनीय की अट्ठाईस, अंतराय की पाँच - कुल सेंतालीस; नीच-गोत्र, असाता-वेदनीय, नरक-आयुष्क, नरक-गति, नरक-गत्यानुपूर्वी, तिर्यंच-गति, तिर्यंच-गत्यानुपूर्वी; एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रियरूप चार जाति; न्यग्रोध परिमंडल, स्वाति, कुब्जक, वामन और हुण्डक - ये पाँच संस्थान; वज्रनाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलक और असंप्राप्तासृपाटिका - ये पाँच संहनन; वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, उपघात, अप्रशस्त-विहायोगति; स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्ति, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशस्कीर्तिरूप स्थावर दशक - ये अप्रशस्त-प्रकृतिआँ हैं। ये बंध में भेद की अपेक्षा अण्ठानबै तथा अभेद की अपेक्षा ब्यासी हैं। उदय में भेद की अपेक्षा सौ तथा अभेद की अपेक्षा चौरासी हैं।

प्रकृति-समुत्कीर्तन अधिकार (2) (गाथा 44 से 86)

उवघाद-मसग्गमणं, थावर-दसयं च अप्पसत्था हु ।
बंधुदयं पडि भेदे, अड-णउदि सयं दु-चदु-रसीदिदरे ॥44॥

सरलार्थ: साता-वेदनीय; मनुष्य, तिर्यंच और देव - ये तीन आयुष्क; उच्च-गोत्र, मनुष्य-गति, मनुष्य-गत्यानुपूर्वी, देव-गति, देव-गत्यानुपूर्वी, पंचेंद्रिय-जाति, औदारिक आदि पाँच शरीर, पाँच बंधन, पाँच संघात, औदारिक आदि तीन अंगोपांग; वर्ण, गंध, रस, स्पर्शमय वर्ण चतुष्क; समचतुरस्र-संस्थान, वज्रवृषभनाराच-संहनन, उपघात-रहित अगुरुलघु-षट्क/अगुरुलघु, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास; प्रशस्त-विहायोगति; त्रसादि बारह/त्रस, बादर, पर्याप्ति, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर - ये अड़सठ प्रकृतिआँ भेद-विवक्षा में तथा ब्यालीस प्रकृतिआँ अभेद-विवक्षा में पुण्य-प्रकृतिआँ हैं।

घाति अर्थात् ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ, मोहनीय की अट्ठाईस, अंतराय की पाँच - कुल सेंतालीस; नीच-गोत्र, असाता-वेदनीय, नरक-आयुष्क, नरक-गति, नरक-गत्यानुपूर्वी, तिर्यंच-गति, तिर्यंच-गत्यानुपूर्वी; एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रियरूप चार जाति; न्यग्रोध परिमंडल, स्वाति, कुब्जक, वामन और हुण्डक - ये पाँच संस्थान; वज्रनाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलक और असंप्राप्तासृपाटिका - ये पाँच संहनन; वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, उपघात, अप्रशस्त-विहायोगति; स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्ति, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयशस्कीर्तिरूप स्थावर दशक - ये अप्रशस्त-प्रकृतिआँ हैं। ये बंध में भेद की अपेक्षा अण्ठानबै तथा अभेद की अपेक्षा ब्यासी हैं। उदय में भेद की अपेक्षा सौ तथा अभेद की अपेक्षा चौरासी हैं।


पढमादिया कसाया, सम्मत्तं देससयलचारित्तं ।
जहखादं घादंति य, गुणणामा होंति सेसावि ॥45॥

सरलार्थ: प्रथम आदि कषायें सम्यक्त्व, देश-चारित्र, सकल-चारित्र और यथाख्यात-चारित्र को घातती हैं। शेष कषायें भी अपने-अपने नाम के अनुसार, कार्य करती हैं।


अंतोमुहुत्तपक्खं, छम्मासं संखऽसंखणंतभवं ।
संजलणमादियाणं, वासणकालो दु णियमेण ॥46॥

सरलार्थ: संज्वलन आदि कषायों का वासना-काल, वास्तव में नियम से अंतर्मुहूर्त, पंद्रह दिन, छह माह और संख्यात-असंख्यात-अनंत भव है।


देहादी फासंता, पण्णासा णिमिण-ताव-जुगलं च ।
थिर-सुह-पत्तेय-दुगं, अगुरु-तियं पोग्गल-विवाई ॥47॥

सरलार्थ: शरीर से प्रारंभ कर स्पर्श पर्यंत ५० अर्थात् ५ शरीर, ५ बंधन, ५ संघात, ३ अंगोपांग, ६ संस्थान, ६ संहनन, ५ वर्ण, २ गंध, ५ रस, ८ स्पर्श; निर्माण; आतप-युगल/आतप, उद्योत; स्थिर-शुभ-प्रत्येकद्विक अर्थात् स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, प्रत्येक, साधारण; अगुरुत्रिक/अगुरुलघु, उपघात, परघात - ये (६२ प्रकृतिआँ) पुद्गल-विपाकी हैं।


आऊणि भवविवाई, खेत्तविवाई य आणुपुव्वीओ ।
अट्ठत्तरि अवसेसा, जीव-विवाई मुणेयव्वा ॥48॥

सरलार्थ: चार आयुष्क, भव विपाकी और चार आनुपूर्वी, क्षेत्र-विपाकी हैं। शेष रहीं अठत्तर प्रकृतिआँ, जीव-विपाकी जानना चाहिए।


वेदणिय-गोद-घादी-णेकावण्णं तु णाम-पयडीणं ।
सत्ताबीसं चेदे, अट्ठत्तरि जीव-विवाई ॥49॥

सरलार्थ: वेदनीय-दो, गोत्र-दो, घाति की सैंतालीस - कुल इक्यावन तथा नामकर्म की शेष रहीं सत्ताईस - ये अठत्तर जीव-विपाकी हैं।


तित्थयरं उस्सासं, बादर-पज्जत्त-सुस्सरादेज्जं ।
जसतस-विहाय-सुभगदु, चउगइ पणजाइ सगवीसं ॥50॥

सरलार्थ: तीर्थंकर, उच्छ्वास, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, सुस्वर, दुःस्वर, आदेय, अनादेय, यशस्कीर्ति, अयशस्कीर्ति, त्रस, स्थावर, प्रशस्त-विहायोगति, अप्रशस्त-विहायोगति, सुभग, दुर्भग, चार गति, पाँच जाति - ये सत्ताईस हैं।


गदि जादी उस्सासं, विहायगदि तसतियाण जुगलं च ।
सुभगादि-चउज्जुगलं, तित्थयरं चेदि सगबीसं ॥51॥

सरलार्थ: ४ गति, ५ जाति, उच्छ्वास, प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति, त्रस-बादर-पर्याप्त का युगल, सुभग आदि ४ का युगल और तीर्थंकर - ये २७ हैं।


णामं ठवणा दवियं, भावोत्ति चउव्विहं हवे कम्मं ।
पयडी पावं कम्मं, मलंति सण्णा हु णाममलं ॥52॥

सरलार्थ: नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव के भेद से कर्म चार प्रकार का है। प्रकृति, पाप, कर्म और मल - ये नाम, कर्म संबंधी नाम निक्षेप हैं।


सरिसासरिसे दव्वे, मदिणा जीवट्ठियं खु जं कम्मं ।
तं एदंति पदिट्ठा, ठवणा तं ठावणा-कम्मं ॥53॥

सरलार्थ: किसी समान या असमान द्रव्य में अपनी बुद्धि से ऐसी प्रतिष्ठा करना कि जो वास्तव में जीव के साथ स्थित कर्म हैं, वे ये हैं - यह स्थापना, कर्म संबंधी स्थापना निक्षेप है।


दव्वे कम्मं दुविहं, आगमणोआगमंति तप्पढमं ।
कम्मागमपरिजाणग-जीवो उवजोगपरिहीणो ॥54॥

सरलार्थ: कर्म संबंधी द्रव्य निक्षेप के दो भेद हैं - आगम और नो आगम द्रव्य निक्षेप। कर्म संबंधी आगम का जानकार; परन्तु अभी उपयोग से रहित जीव, कर्म संबंधी आगम द्रव्य निक्षेप है।


जाणगसरीर भवियं, तव्वदिरित्तं तु होदि जं विदियं ।
तत्थ सरीरं तिविहं, तियकालगयं ति दो सुगमा ॥55॥

सरलार्थ: कर्म संबंधी द्रव्य निक्षेप का दूसरा भेद नो आगम, तीन प्रकार का है - ज्ञायक शरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्त। उनमें से ज्ञायक शरीर, तीन काल की अपेक्षा तीन प्रकार का है - भूत, वर्तमान और भविष्य संबंधी ज्ञायक शरीर। इनमें से वर्तमान और भविष्य संबंधी - ये दो ज्ञायक शरीर, सुगम हैं।


भूदं तु चुदं चइदं, चदंति तेधा चुदं सपाकेण ।
पडिदं कदली-घादपरिच्चागे -णूणयं होदि ॥56॥

सरलार्थ: भूत ज्ञायक शरीर, तीन प्रकार का है - च्युत, च्यावित और त्यक्त। कदलीघात और परित्याग से रहित, मात्र स्वपाक से/तत्संबंधी आयुष्क कर्म की समाप्ति से छूटनेवाला शरीर, च्युत शरीर है।


विस-वेयण-रत्तक्खय-भय-सत्थग्गहण-संकिलेसेहिं ।
उस्सासाहाराणं, णिरोहदो छिज्जदे आऊ ॥57॥

सरलार्थ: विष-सेवन, वेदना, रक्त-क्षय, भय, शस्त्र-घात, संक्लेश-परिणाम इत्यादि के द्वारा उच्छ्वास रुक जाने से, भोजन का निरोध हो जाने से इत्यादि द्वारा आयु छिद जाती है।


कदली-घाद-समेदं, चाग-विहीणं तु चइद-मिदि होदि ।
घादेण अघादेण व, पडिदं चागेण चत्ता-मिदि ॥58॥

सरलार्थ: त्याग से रहित, कदली-घात पूर्वक छूटा हुआ, आगम द्रव्य जीव का शरीर, कर्म संबंधी च्यावित भूत ज्ञायक नो आगम द्रव्य निक्षेप है। कदली-घात-सहित या कदली-घात-रहित अवस्था में त्यागपूर्वक छूटा हुआ आगम द्रव्य जीव का शरीर, कर्मसंबंधी त्यक्त भूत ज्ञायक नो आगम द्रव्य निक्षेप है।


भत्त-पइण्णा-इंगिणि-पाउग्ग-विधीहिं चत्त-मिदि तिविहं ।
भत्त-पइण्णा-तिविहा, जहण्ण-मज्झिम-वरा य तहा ॥59॥

सरलार्थ: त्यक्त शरीर के भक्त-प्रतिज्ञा, इंगिनी और प्रायोपगमन-विधि - ये तीन भेद हैं। भक्त-प्रतिज्ञा के भी जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट की अपेक्षा तीन भेद हैं।


भत्त-पइण्णाइ-विहि, जहण्ण-मंतोमुहुत्तयं होदि ।
बारस-वरिसा-जेट्ठा, तम्मज्झे होदि मज्झिमया ॥60॥

सरलार्थ: भक्त-प्रतिज्ञा आदि की विधि, जघन्य अंतर्मुहूर्त है, उत्कृष्ट बारह वर्ष की है तथा इन दोनों कालों के मध्य के सभी भेद मध्यम हैं।


अप्पोवयार-वेक्खं, परोवयारू ण-मिंगिणीमरणं ।
सपरोवयार-हीणं, मरणं पाओवगम ण-मिदि ॥61॥

सरलार्थ: अपने हाथ आदि अंगों से किए जाने-योग्य उपकार से सहित तथा अन्य-कृत उपकार से रहित हो शरीर का छूटना, इंगिनी-मरण है। स्व और पर - दोनों द्वारा किए गए उपकार से रहित हो शरीर का छूटना, प्रायोपगमन-मरण है।


भवियंति भवियकाले, कम्मागमजाणगो स जो जीवो ।
जाणुग-सरीर-भवियं, एवं होदित्ति णिद्दिट्ठं ॥62॥

सरलार्थ: जो जीव आगे भविष्य-काल में कर्म संबंधी आगम का जानकार होगा, वह ज्ञायक शरीर भावी द्रव्य निक्षेप है - ऐसा कहा है।


तव्वदिरित्तं दुविहं, कम्मं णोकम्ममिदि तहिं कम्मं ।
कम्म-सरूवेणागय-कम्मं दव्वं हवे णियमा ॥63॥

सरलार्थ: तद्व्यतिरिक्त दो प्रकार का है - कर्म तद्व्यतिरिक्त और नोकर्म तद्व्यतिरिक्त। उनमें से कर्म-स्वरूप से आई हुई कार्मण वर्गणा नियम से कर्म तद्व्यतिरिक्त द्रव्य निक्षेप है;


कम्मद्दव्वादण्णं, दव्वं णोकम्म-दव्वमिदि होदि ।
भावे कम्मं दुविहं, आगम-णोआगमंति हवे ॥64॥

सरलार्थ: तद्व्यतिरिक्त दो प्रकार का है - कर्म तद्व्यतिरिक्त और नोकर्म तद्व्यतिरिक्त। उनमें से कर्म-स्वरूप से आई हुई कार्मण वर्गणा नियम से कर्म तद्व्यतिरिक्त द्रव्य निक्षेप है; तथा कर्म द्रव्य से भिन्न अन्य सभी द्रव्य/पदार्थ, नोकर्म तद्व्यतिरिक्त नो आगम द्रव्य निक्षेप हैं।
कर्म संबंधी भाव निक्षेप दो प्रकार का है - आगम और नो आगम। कर्म संबंधी आगम को जाननेवाले और उस कर्म संबंधी आगम में उपयोग लगानेवाले जीव का नियम से कर्म संबंधी भावागम/आगम भाव निक्षेप नाम है।
कर्म के फल को भोगता हुआ जीव, नो आगम भाव निक्षेप है।
इसप्रकार नियम से सामान्य कर्म चार प्रकार का है।


कम्मागम-परिजाणग-जीवो कम्मागमम्हि उवजुत्तो ।
भावागम-कम्मोत्ति य, तस्स य सण्णा हवे णियमा ॥65॥

सरलार्थ: तद्व्यतिरिक्त दो प्रकार का है - कर्म तद्व्यतिरिक्त और नोकर्म तद्व्यतिरिक्त। उनमें से कर्म-स्वरूप से आई हुई कार्मण वर्गणा नियम से कर्म तद्व्यतिरिक्त द्रव्य निक्षेप है; तथा कर्म द्रव्य से भिन्न अन्य सभी द्रव्य/पदार्थ, नोकर्म तद्व्यतिरिक्त नो आगम द्रव्य निक्षेप हैं।

कर्म संबंधी भाव निक्षेप दो प्रकार का है - आगम और नो आगम। कर्म संबंधी आगम को जाननेवाले और उस कर्म संबंधी आगम में उपयोग लगानेवाले जीव का नियम से कर्म संबंधी भावागम/आगम भाव निक्षेप नाम है।

कर्म के फल को भोगता हुआ जीव, नो आगम भाव निक्षेप है।

इसप्रकार नियम से सामान्य कर्म चार प्रकार का है।


णोआगमभावो पुण, कम्म-फलं भुंजमाणगो जीवो ।
इदि सामण्णं कम्मं, चउव्विहं होदि णियमेण ॥66॥

सरलार्थ: तद्व्यतिरिक्त दो प्रकार का है - कर्म तद्व्यतिरिक्त और नोकर्म तद्व्यतिरिक्त। उनमें से कर्म-स्वरूप से आई हुई कार्मण वर्गणा नियम से कर्म तद्व्यतिरिक्त द्रव्य निक्षेप है; तथा कर्म द्रव्य से भिन्न अन्य सभी द्रव्य/पदार्थ, नोकर्म तद्व्यतिरिक्त नो आगम द्रव्य निक्षेप हैं।
कर्म संबंधी भाव निक्षेप दो प्रकार का है - आगम और नो आगम। कर्म संबंधी आगम को जाननेवाले और उस कर्म संबंधी आगम में उपयोग लगानेवाले जीव का नियम से कर्म संबंधी भावागम/आगम भाव निक्षेप नाम है।
कर्म के फल को भोगता हुआ जीव, नो आगम भाव निक्षेप है।
इसप्रकार नियम से सामान्य कर्म चार प्रकार का है।


मूलुत्तरपयडीणं, णामादी एवमेव णवरिं तु ।
सगणामेण य णामं, ठवणा दवियं हवे भावो ॥67॥

सरलार्थ: मूल और उत्तर प्रकृतियों के नाम आदि इसीप्रकार हैं। विशेषता मात्र इतनी है कि इनमें अपने-अपने नाम के अनुसार नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव निक्षेप हैं।


मूलुत्तरपयडीणं, णामादि चउव्विहं हवे सुगमं ।
वज्जित्ता णोकम्मं, णोआगमभावकम्मं च ॥68॥

सरलार्थ: नोकर्म और नो आगम भावकर्म को छोड़कर, मूल और उत्तर प्रकृतियों के शेष सभी नाम आदि चारों प्रकार के निक्षेप सरल हैं।


पड-पडिहारसि-मज्जा, आहारं देह-उच्च-णीचंगं ।
भंडारी मूलाणं, णोकम्मं दविय-कम्मं तु ॥69॥

सरलार्थ: वस्त्र आदि, द्वारपाल आदि, तलवार आदि, मदिरा आदि, भोजन आदि, शरीर आदि, शरीर की उच्च-नीच प्रवृत्ति आदि और भंडारी आदि क्रमश: मूल-प्रकृतियों के नोकर्म द्रव्य कर्म हैं।


पडविसयपहुदि दव्वं, मदिसुदबाघादकरणसंजुत्तं ।
मदि-सुद-बोहाणं पुण, णोकम्मं दविय-कम्मं तु ॥70॥

सरलार्थ: मति और श्रुत ज्ञान में बाधा डालने की योग्यतावाले, इंद्रियों को ढकने/बंद कर देनेवाले पंचेंद्रिय विषय, मति-श्रुत ज्ञान के नोकर्म द्रव्यकर्म हैं।


ओहिमणपज्जवाणं, पडिघादणिमित्तसंकिलेसयरं ।
जं बज्झट्ठं तं खलु, णोकम्मं केवले णत्थि ॥71॥

सरलार्थ: अवधि और मन:पर्यय ज्ञान को बाधित करने में निमित्त होनेवाले संक्लेश परिणामों को उत्पन्न करने में कारण बननेवाले बाह्य पदार्थ, अवधि-मन:पर्यय ज्ञान के नोकर्म हैं। केवलज्ञान में नोकर्म नहीं है।


पंचण्हं णिद्दाणं, माहिस-दहि-पहुदि होदि णोकम्मं ।
वाघाद-कर-पडादी, चक्खु-अचक्खूण णोकम्मं ॥72॥

सरलार्थ: पाँचों निद्राओं के नोकर्म भैंस के दूध के दही आदि पदार्थ हैं। चक्षु-अचक्षु दर्शनावरण के नोकर्म इन संबंधी दर्शनों में बाधा डालनेवाले वस्त्र आदि पदार्थ हैं।


ओही-केवल-दंसण णोकम्मं ताण णाण-भंगो व ।
सादेदर - णोकम्मं, इट्ठाणिट्ठण्ण - पाणादि ॥73॥

सरलार्थ: अवधि और केवल दर्शनावरण के नोकर्म उन संबंधी ज्ञानावरण के नोकर्मों के समान हैं। साता-वेदनीय और असाता-वेदनीय कर्म के नोकर्म इष्ट-अनिष्ट भोजन-पान आदि पदार्थ हैं।


आयदणाणायदणं, सम्मे मिच्छे य होदि णोकम्मं ।
उभयं सम्मा-मिच्छे, णो-कम्मं होदि णियमेण ॥74॥

सरलार्थ: सम्यक्त्व और मिथ्यात्व के नोकर्म क्रमश: आयतन और अनायतन हैं। सम्यग्मिथ्यात्व के नोकर्म, आयतन-अनायतन दोनों ही नियम से हैं।


अण-णो-कम्मं मिच्छत्तायदणादी हु होदि सेसाणं ।
सग-सग-जोग्गं सत्थं, सहाय-पहुदी हवे णियमा ॥75॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व संबंधी आयतन, अनंतानुबंधी के नोकर्म हैं। शेष अप्रत्याख्यानावरण आदि के नोकर्म, वास्तव में देशचारित्र आदि के घात में सहायक शास्त्र आदि नियम से होते हैं।


थी-पुं-संढ-सरीरं, ताणं णो-कम्म दव्व-कम्मं तु ।
बेलंवको सुपुत्तो, हस्स-रदीणं च णो-कम्मं ॥76॥

सरलार्थ: स्त्री, पुरुष और नपुंसकरूप शरीर ही उन-उनके नोकर्म हैं। विदूषक आदि हास्य के, सुपुत्र आदि रति के नोकर्म द्रव्यकर्म हैं।


इट्ठाणिट्ठविजोग-जोगं अरदिस्स मुदसुपुत्तादी ।
सोगस्स य सिंहादि-णिंदिद-दव्वं च भय-जुगले ॥77॥

सरलार्थ: इष्ट का वियोग, अनिष्ट का संयोग, अरति के नोकर्म हैं। मृत सुपुत्र आदि, शोक के; शेर आदि, भय के और निंदित द्रव्य आदि, जुगुप्सा के नोकर्म हैं।


णिरयायुस्स अणिट्ठाहारो सेसाणमिट्ठमण्णादी ।
गदि-णोकम्मं दव्वं, चउग्गदीणं हवे खेत्तं ॥78॥

सरलार्थ: नरक आयुष्क के नोकर्म, अनिष्ट आहार आदि हैं तथा शेष तीन आयुष्क के नोकर्म, इष्ट आहार आदि हैं।
गति नामकर्म का नोकर्म-द्रव्य, चार गति का क्षेत्र है।


णिरयादीण गदीणं, णिरयादी खेत्तयं हवे णियमा ।
जाईए णोकम्मं, दव्विंदियपोग्गलं होदि ॥79॥

सरलार्थ: नरक आदि गतियों के नोकर्म नियम से नरक आदि क्षेत्र हैं। जाति के नोकर्म द्रव्येंद्रिय रूप पुद्गल हैं।


एइंदिय-मादीणं, सग-सग-दव्विंदियाणि णोकम्मं ।
देहस्स य णोकम्मं, देहुदयज-देहखंधाणि ॥80॥

सरलार्थ: एकेंद्रिय आदि के नोकर्म अपनी-अपनी द्रव्येंद्रियाँ हैं। शरीर के नोकर्म, शरीर नामक नामकर्म के उदय से उत्पन्न शरीररूप स्कंध हैं।


ओरालिय-वेगुव्विय-आहारय-तेज-कम्म-णोकम्मं ।
ताणुदयज-चउ-देहा, कम्मे विस्संचयं णियमा ॥81॥

सरलार्थ: औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस शरीर नामक नामकर्म के नोकर्म, उन-उन संबंधी कर्म के उदय में उत्पन्न, चार शरीर हैं। कार्मण शरीर नामक नामकर्म के नोकर्म, नियम से विश्रसोपचय हैं।


बंधण-पहुदि-समण्णिय-सेसाणं देहमेव णोकम्मं ।
णवरि विसेसं जाणे, सगखेत्तं आणुपुव्वीणं ॥82॥

सरलार्थ: बंधन नामक नामकर्म से लेकर शेष रहीं (पुद्गल-विपाकी ५७ प्रकृतियों का) तथा शेष (जीव-विपाकी १८ प्रकृतियों) को मिलाकर सभी का (५७+१८=७५ प्रकृतियों का) शरीर ही नोकर्म है; परन्तु विशेषता इतनी जानना कि आनुपूर्वी का नोकर्म, उसका अपना क्षेत्र है।


थिर-जुम्मस्स थिराथिर-रस-रुहिरादीणि सुह-जुगस्स सुहं ।
असुहं देहावयवं, सर-परिणद-पोग्गलाणि सरे ॥83॥

सरलार्थ: स्थिर-युगल के नोकर्म, क्रमश: स्थिर-अस्थिर रस, रुधिर आदि हैं; शुभ-युगल के शरीर संबंधी शुभ-अशुभ अवयव तथा स्वर-युगल के स्वर रूप से परिणत पुद्गल, नोकर्म तद्व्यतिरिक्त नो आगम द्रव्य निक्षेप हैं।


उच्चस्सुच्चं देहं, णीचं णीचस्स होदि णोकम्मं ।
दाणादि-चउक्काणं, विग्घग-णग-पुरिस-पहुदी हु ॥84॥

सरलार्थ: उच्च-गोत्र का, उच्च-शरीर और नीच-गोत्र का, नीच-शरीर, नोकर्म है। दान आदि चार अंतराय के नोकर्म, वास्तव में विघ्न करने वाले पर्वत, पुरुष आदि हैं।


विरियस्स य णोकम्मं, रुक्खाहारादि बलहरं दव्वं ।
इदि उत्तर-पयडीणं, णोकम्मं दव्वकम्मं तु ॥85॥

सरलार्थ: वीर्य का नोकर्म, रूक्ष-आहार आदि, बल को नष्ट करनेवाला द्रव्य है। इसप्रकार उत्तर-प्रकृतियों के नोकर्म द्रव्यकर्म हैं।


णोआगमभावो पुण, सगसगकम्मफलसंजुदो जीवो ।
पोग्गलविवाइयाणं णत्थि खु णो आगमोभावो ॥86॥

सरलार्थ: अपने-अपने कर्म-फल से संयुक्त जीव, नो आगमभाव कहलाता है। वास्तव में पुद्गल विपाकी प्रकृतियों के नो आगमभाव नहीं होते हैं।

बंधोदयसत्त्व अधिकार: बंधाधिकार: मंगलाचरण, प्रकृति बंध (गाथा 87 से 126)

णमिऊण णेमिचंदं असहायपरक्कमं महावीरं ।
बंधुदयसत्तजुत्तं ओघादेसे थवं वोच्छं ॥87॥

सरलार्थ: विशेषण-विशेष्य के स्थान-परिवर्तन से इस गाथा के नमस्कार परक विविध अर्थ फलित होते हैं; जिनमें से कुछ इसप्रकार हैं - १. नेमिनाथ भगवान् को नमस्कार परक : असहाय पराक्रम वाले/अन्य की सहायता से निरपेक्ष/पूर्ण सामर्थ्य सम्पन्न पराक्रम/स्वरूप स्थिरतामय, महान् वीर नेमिचंद्र/नेमिनाथ भगवान् को नमस्कार कर बन्ध, उदय और सत्ता से सहित/के प्रतिपादक स्तव को ओघ और आदेश में कहूँगा।
२. महावीर भगवान् को नमस्कार परक : वर्तमान में धर्मचक्र की धुरी स्वरूप/धर्मतीर्थ के प्रवर्तक, चन्द्रमा के समान आल्हाददायक, असहाय पराक्रम वाले भगवान् महावीर को नमस्कार कर…।
३. चौबीस तीर्थंकरों को नमस्कार परक : धर्मतीर्थ के प्रवर्तक, चन्द्रमा के समान आल्हाददायक, असहाय पराक्रम वाले, महान् चौबीस तीर्थंकरों को नमस्कार कर…।
४. चंद्रप्रभ भगवान् को नमस्कार परक : धर्मतीर्थ के प्रवर्तक, असहाय पराक्रम सम्पन्न, महान् वीर या महान् विशिष्ट अंतरंग-बहिरंग लक्ष्मी को देने वाले/उसे प्रगट करने का उपाय बताने वाले, चंद्रप्रभ भगवान् को नमस्कार कर…।
५. जिनवाणी को नमस्कार परक : (पंचमकाल में) धर्मरूपी चक्र की धुरी स्वरूप, चन्द्रमा के समान आल्हाददायक, महान् विशिष्ट अंतरंग-बहिरंग लक्ष्मी को प्रगट करने का उपाय बताने वाली, असहाय/पर से पूर्ण निरपेक्ष अभी स्वयं से ही प्रमाणित; परा=उत्कृष्ट, क्रम=ज्ञान/केवलज्ञान की अनुसारिणी; बन्ध, उदय, सत्त्व की प्रतिपादक स्तव/जिनवाणी को नमस्कार कर बन्ध, उदय, सत्त्व के प्रतिपादक स्तव को गुणस्थान और मार्गणास्थान में कहूँगा।
इसीप्रकार से और भी अनेक अर्थ इस गाथा के किए जा सकते हैं।


सयलंगेक्कंगेक्कंगहियार सवित्थरं ससंखेवं ।
वण्णणसत्थं थय थुइ, धम्मकहा होइ णियमेण ॥88॥

सरलार्थ: इस गाथा में तीन सांकेतिक पदों का स्वरूप बताया गया है। वे इसप्रकार हैं - १. स्तव : जिन शास्त्रों में किसी भी एक विषय संबंधी सम्पूर्ण भेद-प्रभेदों का विस्तार पूर्वक और संक्षेप से सर्वांगीण वर्णन किया जाता है, वे स्तव कहलाते हैं।
२. स्तुति : जिन शास्त्रों में किसी भी एक विषय संबंधी एक अंग के भेद-प्रभेदों का विस्तार पूर्वक और संक्षेप से वर्णन किया जाता है, उन्हें स्तुति कहते हैं।
३. धर्म कथा : जिन शास्त्रों में किसी भी एक विषय संबंधी एक अंग के एक अधिकार का विस्तारपूर्वक और संक्षेप से वर्णन किया जाता है, उन्हें धर्म कथा कहते हैं।
यहाँ बन्ध, उदय, सत्तारूप कर्म का विस्तारपूर्वक और संक्षेप में सर्वांगीण वर्णन किया जा रहा है; अत: यह स्तव रूप शास्त्र है।


पयडिट्ठिदि-अणुभागप्पदेसबंधोत्ति चदुविहो बंधो ।
उक्कस्समणुक्कस्सं, जहण्णमजहण्णगंति पुधं ॥89॥

सरलार्थ: प्रकृतिबंध, स्थितिबंध, अनुभागबंध और प्रदेशबंध - इसप्रकार बंध के ४ भेद हैं। इनमें से प्रत्येक के उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य - ये ४-४ भेद होते हैं।
इन उत्कृष्ट आदि के भी सादि, अनादि, ध्रुव और अध्रुव बंध - ये भेद हैं; जिन्हें यथायोग्य अनेक जीवों की अपेक्षा और एक जीव की अपेक्षा गुणस्थान और मार्गणास्थान में घटित कर लेना चाहिए।
गुणस्थान के अनुसार जिस गुणस्थानवर्ती जीव के जिन कर्मों संबंधी स्थिति, अनुभाग और प्रदेश का उत्कृष्ट बंध होता है, उन्हीं कर्मों संबंधी स्थिति आदि का सादि आदि चारों प्रकार का अनुत्कृष्ट बंध होता है। अजघन्य में भी इसीप्रकार समझ लेना चाहिए।


सादि अणादी धुव अद्धुवो य बंधो दु जेट्ठमादीसु ।
णाणेगं जीवं पडि, ओघादेसे जहाजोग्गं ॥90॥

सरलार्थ: इन उत्कृष्ट आदि के भी सादि, अनादि, ध्रुव और अध्रुव बंध - ये भेद हैं; जिन्हें यथायोग्य अनेक जीवों की अपेक्षा और एक जीव की अपेक्षा गुणस्थान और मार्गणास्थान में घटित कर लेना चाहिए।


ठिदि अणुभागपदेसा, गुणपडिवण्णेसु जेसिमुक्कस्सा ।
तेसिमणुक्कस्सो चउव्विहोऽजहण्णेवि एमेव ॥91॥

सरलार्थ: गुणस्थान के अनुसार जिस गुणस्थानवर्ती जीव के जिन कर्मों संबंधी स्थिति, अनुभाग और प्रदेश का उत्कृष्ट बंध होता है, उन्हीं कर्मों संबंधी स्थिति आदि का सादि आदि चारों प्रकार का अनुत्कृष्ट बंध होता है। अजघन्य में भी इसीप्रकार समझ लेना चाहिए।


सम्मेव तित्थबंधो, आहारदुगं पमादरहिदेसु ।
मिस्सूणे आउस्स य मिच्छादिसु सेस बंधो दु ॥92॥

सरलार्थ: तीर्थंकर प्रकृति का बंध सम्यक्त्व में ही होता है, आहारक शरीर और आहारक अंगोपांग रूप आहारक द्विक प्रकृतिओं का बंध प्रमाद से रहित अप्रमत्त संयत नामक सातवें गुणस्थान से लेकर अपूर्वकरण नामक आठवें गुणस्थान तक ही होता है। आयुष्क कर्म प्रकृति का बंध मिश्र/मिश्र नामक तीसरे सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान और निर्वृत्त्यपर्याप्तक रूप मिश्र दशा में नहीं होता है। इन ७ प्रकृतिओं को छोड़कर शेष रहीं प्रकृतिओं का बंध मिथ्यात्व आदि गुणस्थानों में होता है।


पढमुवसमिये सम्मे, सेसतिये अविरदादि चत्तारि ।
तित्थयरबंधपारंभया णरा केवलि-दुगंते ॥93॥

सरलार्थ: प्रथमोपशम सम्यक्त्व में और शेष तीन क्षायोपशमिक, द्वितीयोपशम, क्षायिक सम्यक्त्व में से किसी भी एक सम्यक्त्व में अविरत सम्यक्त्व आदि चार/अविरत सम्यक्त्व, देशविरत, प्रमत्तविरत और अप्रमत्तविरत - इन चार गुणस्थानों में से कहीं भी मनुष्य पुरुष केवली द्विक/केवली या श्रुतकेवली में से किन्हीं के भी पादमूल में तीर्थंकर कर्म प्रकृति के बंध का प्रारम्भ करता है।


सोलस पणबीस णभं, दस चउ छक्केक्क बंध वोच्छिण्णा ।
दुग तीस चदुरपुव्वे पण सोलस जोगिणो एक्को ॥94॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व नामक पहले गुणस्थान से लेकर सयोग केवली नामक तेरहवें गुणस्थान पर्यंत क्रमशः सोलह, पच्चीस, शून्य, दश, चार, छह, एक; अपूर्वकरण में दो, तीस और चार - कुल छत्तीस; पाँच, सोलह और सयोग केवली के एक प्रकृति की बंध-व्युच्छित्ति होती है।


मिच्छत्त-हुंड-संढाऽसंपत्तेयक्ख-थावरादावं ।
सुहुमतियं वियलिंदिय-णिरयदुणिरयाउगं मिच्छे ॥95॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व गुणस्थान में मिथ्यात्व, हुण्डक संस्थान, नपुंसकवेद, असम्प्राप्ता सृपाटिका संहनन, एकेंद्रिय, स्थावर, आताप; सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारणमय सूक्ष्मत्रिक; दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रियमय विकलेंद्रिय; नरकगति, नरक गत्यानुपूर्वीमय नरकद्विक और नरक आयुष्क - इन सोलह प्रकृतियों की बंध से व्युच्छित्ति होती है।


बिदियगुणे अणथीणति, दुभगतिसंठाणसंहदिचउक्कं ।
दुग्गमणित्थीणीचं, तिरिय-दुगुज्जोव-तिरियाऊ ॥96॥

सरलार्थ: सासादन सम्यक्त्व नामक दूसरे गुणस्थान में अनन्तानुबंधी क्रोध-मान-माया-लोभ; स्त्यानगृद्धि, निद्रा-निद्रा, प्रचला-प्रचलामय स्त्यानत्रिक; दुर्भग, दुःस्वर, अनादेयमय दुर्भगत्रिक; न्यग्रोध परिमंडल, स्वाति, कुब्जक, वामनमय संस्थान चतुष्क; बज्रनाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलितमय संहनन चतुष्क; अप्रशस्त विहायोगति, स्त्रीवेद, नीच गोत्र; तिर्यंच गति, तिर्यंच गत्यानुपूर्वीमय तिर्यंचद्विक; उद्योत और तिर्यंच आयुष्क - इन पच्चीस प्रकृतियों की बंध से व्युच्छित्ति होती है।


अयदे बिदियकसाया, बज्जं ओरालमणुदुमणुवाऊ ।
देसे तदिय-कसाया, णियमेणिह बंध वोच्छिण्णा ॥97॥

सरलार्थ: अविरत सम्यक्त्व नामक चौथे गुणस्थान में अप्रत्याख्यानावरण क्रोध-मान-माया-लोभमय द्वितीय कषाय, बज्रवृषभनाराच संहनन; औदारिक शरीर, औदारिक अंगोपांगमय औदारिकद्विक; मनुष्य गति, मनुष्य गत्यानुपूर्वीमय मनुष्यद्विक और मनुष्य आयुष्क - इन दश की तथा देश-संयत नामक पाँचवें गुणस्थान में प्रत्याख्यानावरण क्रोध-मान-माया-लोभमय तृतीय कषाय - इन चार की बंध से व्युच्छित्ति होती है।


छट्ठे अथिरं असुहं, असादमजसं च अरदिसोगं च ।
अपमत्ते देवाऊणिट्ठवणं चेव अत्थित्ति ॥98॥

सरलार्थ: प्रमत्त-संयत नामक छठवें गुणस्थान में अस्थिर, अशुभ, असातावेदनीय, अयशस्कीर्ति, अरति और शोक - इन छह प्रकृतियों की तथा अप्रमत्त-संयत नामक सातवें गुणस्थान में देव आयुष्क - इस एक प्रकृति की बंध से व्युच्छित्ति होती है।


मरणूणम्हि णियट्टी पढमे णिद्दा तहेव पयला य ।
छट्ठे भागे तित्थं णिमिणं सग्गमण-पंचिंदी ॥99॥

सरलार्थ: अपूर्वकरण नामक आठवें गुणस्थान के मरण से रहित पहले भाग में निद्रा और प्रचला की; छठवें भाग में तीर्थंकर, निर्माण, प्रशस्त विहायोगति, पंचेंद्रिय जाति; तैजस, कार्मणमय तैजसद्विक; आहारक शरीर, आहारक अंगोपांगमय आहारकद्विक, समचतुरस्र संस्थान; देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांगमय सुरचतुष्क; वर्ण, गंध, रस, स्पर्शमय वर्ण चतुष्क; अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वासमय अगुरुचतुष्क; त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेयमय त्रस-नवक की तथा अन्तिम भाग में हास्य, रति, भय और जुगुप्सा की - इसप्रकार इसमें २+३०+४=३६ प्रकृतियों की बंध से व्युच्छित्ति होती है।


तेजदुहारदुसमचउ-सुरवण्णागुरुचउक्क-तसणवयं ।
चरमे हस्सं च रदी, भयं जुगुच्छा य बंधवोच्छिण्णा ॥100॥

सरलार्थ: अपूर्वकरण नामक आठवें गुणस्थान के मरण से रहित पहले भाग में निद्रा और प्रचला की; छठवें भाग में तीर्थंकर, निर्माण, प्रशस्त विहायोगति, पंचेंद्रिय जाति; तैजस, कार्मणमय तैजसद्विक; आहारक शरीर, आहारक अंगोपांगमय आहारकद्विक, समचतुरस्र संस्थान; देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांगमय सुरचतुष्क; वर्ण, गंध, रस, स्पर्शमय वर्ण चतुष्क; अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वासमय अगुरुचतुष्क; त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेयमय त्रस-नवक की तथा अन्तिम भाग में हास्य, रति, भय और जुगुप्सा की - इसप्रकार इसमें २+३०+४=३६ प्रकृतियों की बंध से व्युच्छित्ति होती है।


पुरिसं चदुसंजलणं, कमेण अणियट्टि पंचभागेसु ।
पढमं विग्घं दंसण-चउजसउच्चं च सुहुमंते ॥101॥

सरलार्थ: अनिवृत्तिकरण नामक नवमें गुणस्थान के पाँच भागों में से एक-एक में क्रमश: पुरुषवेद, संज्वलन क्रोध-मान-माया-लोभ - इन पाँच की बंध से व्युच्छित्ति होती है। सूक्ष्मसाम्पराय नामक दशवें गुणस्थान के अन्त में पहले ज्ञानावरण कर्म की मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मन:पर्ययज्ञानावरण, केवलज्ञानावरणमय ५; अन्तराय की दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय, वीर्यान्तरायमय ५; दर्शनावरण की चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण, केवलदर्शनावरणमय दर्शनचतुष्क; यशस्कीर्ति, उच्चगोत्र - इन सोलह प्रकृतियों की बंध से व्युच्छित्ति होती है।


उवसंतखीणमोहे, जोगिम्हि य समयियट्ठिदी सादं ।
णायव्वो पयडीणं, बंधस्संतो अणंतो य ॥102॥

सरलार्थ: उपशान्त-मोह, क्षीण-मोह और सयोग-केवली नामक क्रमश: ११वें, १२वें और १३वें गुणस्थान में सातावेदनीय का एक समय की स्थिति वाला बंध होता है। १३वें के अंत में उसकी बंध से व्युच्छिति हो जाती है - इसप्रकार कर्म प्रकृतियों के बंध का अन्त, अनन्त/बंध और अबंध जानना चाहिए।


सत्तरसेकग्गसयं, चउसत्तत्तरि सगट्ठि ते बट्ठी ।
बंधा णबट्ठवण्णा, दुबीससत्तारसेकोघे ॥103॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व नामक पहले गुणस्थान से लेकर सयोग-केवली नामक १३वें गुणस्थान पर्यंत क्रमशः ११७, १०१, ७४, ७७, ६७, ६३, ५९, ५८, २२, १७, १, १, १ प्रकृतियों का बंध होता है।


तिय उणबीसं छत्तिय तालं तेवण्ण सत्तवण्णं च ।
इगिदुगसट्ठी बिरहिय, सय तिय उणबीस सहिय बीससयं ॥104॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व नामक पहले गुणस्थान से लेकर अयोग-केवली नामक १४वें गुणस्थान पर्यंत क्रमशः ३, १९, ४६, ४३, ५३, ५७, ६१, ६२, ९८, १०३, ११९, ११९, ११९, १२० कर्म प्रकृतियों का अबंध रहता है।


ओघे वा आदेसे, णारयमिच्छम्हि चारि वोच्छिण्णा ।
उवरिम बारस सुरचउ, सुराउ आहारयमबंधा ॥105॥

सरलार्थ: अधिकांशतया गुणस्थान के समान ही मार्गणास्थानों में बंध-त्रिभंगी है। नरकगति के मिथ्यात्व गुणस्थान में प्रारम्भिक मिथ्यात्व, हुण्डक संस्थान, नपुंसकवेद और असम्प्राप्ता-सृपाटिका संहनन - इन ४ की ही बंध-व्युच्छित्ति है। शेष रहीं एकेंद्रिय आदि १२ तथा देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांगमय सुरचतुष्क; देव आयुष्क, आहारक शरीर और आहारक अंगोपांग - ये १९ प्रकृतिआँ अबंध-योग्य हैं।

धर्मा नामक पहली पृथ्वी के नरकों में तीर्थंकर प्रकृति का बंध है। वंशा और मेघा के नरकों में मात्र पर्याप्तक दशा में ही इसका बंध है। छठवीं पृथ्वी के नरकों तक ही मनुष्य आयुष्क बँधती है। अन्तिम सातवीं के नरकों में मात्र मिथ्यात्व में ही तिर्यंच आयुष्क का बंध होता है।

सातवीं पृथ्वी के नरकों में मिश्र और अविरत सम्यक्त्व गुणस्थान में उच्च गोत्र, मनुष्यगति, मनुष्य गत्यानुपूर्वी का बंध होता है।

वहाँ मिथ्यात्व और सासादन सम्यक्त्व नामक गुणस्थान में मनुष्यगति मनुष्य गत्यानुपूर्वी, उच्च गोत्र का बंध नहीं है।


धम्मे तित्थं बंधदि, वंसामेघाण पुण्णगो चेव ।
छट्ठोत्ति य मणुवाऊ, चरिमे मिच्छेव तिरियाऊ ॥106॥

सरलार्थ: धर्मा नामक पहली पृथ्वी के नरकों में तीर्थंकर प्रकृति का बंध है। वंशा और मेघा के नरकों में मात्र पर्याप्तक दशा में ही इसका बंध है। छठवीं पृथ्वी के नरकों तक ही मनुष्य आयुष्क बँधती है। अन्तिम सातवीं के नरकों में मात्र मिथ्यात्व में ही तिर्यंच आयुष्क का बंध होता है।


मिस्साविरदे उच्चं, मणुवदुगं सत्तमे हवे बंधो ।
मिच्छा-सासण-सम्मा, मणुवदुगुच्चं ण बंधंति ॥107॥

सरलार्थ: सातवीं पृथ्वी के नरकों में मिश्र और अविरत सम्यक्त्व गुणस्थान में उच्च गोत्र, मनुष्यगति, मनुष्य गत्यानुपूर्वी का बंध होता है।
वहाँ मिथ्यात्व और सासादन सम्यक्त्व नामक गुणस्थान में मनुष्यगति मनुष्य गत्यानुपूर्वी, उच्च गोत्र का बंध नहीं है।


तिरिये ओघो तित्थाहारूणो अविरदे छिदी चउरो ।
उवरिमछण्हं च छिदी, सासणसम्मे हवे णियमा ॥108॥

सरलार्थ: तिर्यंच गति में अधिकांशतया गुणस्थान के समान ही बंध-त्रिभंगी समझना चाहिए; परन्तु उसमें कुछ विशेषता भी है; जो इसप्रकार है - इनमें तीर्थंकर और आहारकद्विक का बंध नहीं है तथा अविरत सम्यक्त्व में ४ की ही व्युच्छित्ति है; शेष रहीं ६ की व्युच्छित्ति नियम से सासादन सम्यक्त्व में ही हो जाती है।


सामण्णतिरियपंचिंदिय-पुण्णग-जोणिणीसु एमेव ।
सुरणिरयाउ अपुण्णे, वेगुव्वियछक्कमवि णत्थि ॥109॥

सरलार्थ: सामान्य तिर्यंच, पंचेंद्रिय, पर्याप्तक और योनि वाले स्त्रीवेदी तिर्यंचों में तो इसीप्रकार है; परन्तु अपर्याप्तक तिर्यंचों के देव आयुष्क, नरक आयुष्क और वैक्रियिक षट्क का भी बंध नहीं है।


तिरियेव णरे णवरि हु, तित्थाहारं च अत्थि एमेव ।
सामण्ण पुण्ण-मणुसिणि, णरे अपुण्णे अपुण्णेव ॥110॥

सरलार्थ: सामान्यतया तिर्यंच गति के समान मनुष्य गति में बंध-त्रिभंगी समझ लेना चाहिए। विशेष इतना है कि यहाँ वास्तव में तीर्थंकर और आहारकद्विक हैं। इसीप्रकार सामान्य मनुष्य, पर्याप्तक मनुष्य और स्त्रीवेदी मनुष्यनी की बंध-त्रिभंगी सामान्य आदि तिर्यंचों के समान तथा अपर्याप्तक मनुष्यों की अपर्याप्तक तिर्यंचों के समान जानना चाहिए।


णिरयेव होदि देवे, आईसाणोत्ति सत्त वाम छिदी ।
सोलस चेव अबंधा, भवणतिए णत्थि तित्थयरं ॥111॥

सरलार्थ: नारकिओं के समान देवों में बंध-त्रिभंगी है। विशेष यह है कि दूसरे ईशान स्वर्ग पर्यंत मिथ्यात्व दशा में ७ की व्युच्छित्ति है। शेष ९ और देवगति आदि ७ - कुल १६ प्रकृतिआँ यहाँ बंध-योग्य नहीं हैं। भवनत्रिक में तीर्थंकर प्रकृति भी बंध-योग्य नहीं है।


कप्पित्थीसु ण तित्थं, सदर सहस्सारगोत्ति तिरियदुगं ।
तिरियाऊ उज्जोवो, अत्थि तदो णत्थि सदरचऊ ॥112॥

सरलार्थ: कल्पवासी स्त्रिओं में भी तीर्थंकर प्रकृति नहीं है। शतार-सहस्रार पर्यंत ही तिर्यंच द्विक, तिर्यंच आयुष्क और उद्योत - ये प्रकृतिआँ हैं। उनसे आगे ये शतार चतुष्क नहीं हैं।


पुण्णिदरं विगिविगले, तत्थुप्पण्णो हु सासणो देहे ।
पज्जत्तिं णवि पावदि, इदि णर-तिरियाउगं णत्थि ॥113॥

सरलार्थ: लब्ध्यपर्याप्तक के समान एकेंद्रिय और विकलेंद्रिय में बंध आदि की व्यवस्था है। यहाँ के मिथ्यात्व और सासादन - इन दो गुणस्थानों में से सासादन में उत्पन्न हुआ जीव शरीर पर्याप्ति पूर्ण नहीं कर पाता है; अत: इसमें मनुष्य और तिर्यंच आयुष्क भी नहीं है।


पंचेंदियेसु ओघं, एयक्खे वा वणप्फदीयंते ।
मणुवदुगं मणुवाऊ उच्चं ण हि तेउ-वाउम्हि ॥114॥

सरलार्थ: पंचेंद्रिय में बंध-त्रिभंगी सामान्य गुणस्थान के समान है। कायमार्गणा में पृथ्वीकायिक से लेकर वनस्पतिकायिक पर्यंत की बंध-त्रिभंगी एकेंद्रिय के समान है; परन्तु तैजसकायिक और वायुकायिक में वास्तव में मनुष्य गति, मनुष्य गत्यानुपूर्वी, मनुष्य आयुष्क और उच्च गोत्र - इन ४ का बंध नहीं है।


ण हि सासणो अपुण्णे, साहारण सुहुमगे य तेउदुगे ।
ओघं तस मण-वयणे, ओराले मणुवगइभंगे ॥115॥

सरलार्थ: वास्तव में सासादन सम्यक्त्व लब्ध्यपर्याप्तक, साधारण, सूक्ष्म, तैजसकायिक और वायुकायिक में नहीं है। त्रसकायिकों में बंध-त्रिभंगी सामान्य गुणस्थान के समान है। योगमार्गणा के अन्तर्गत मनोयोग और वचनयोग की बंध-त्रिभंगी भी सामान्य गुणस्थान के समान है। औदारिक काययोग में यह सभी मनुष्यगति के समान है।


ओराले वा मिस्से, ण हि सुरणिरयाउहारणिरयदुगं ।
मिच्छदुगे देवचओ, तित्थं ण हि अविरदे अत्थि ॥116॥

सरलार्थ: औदारिक मिश्र में औदारिक के समान बंध है; परन्तु देव आयुष्क, नरकायुष्क, आहारकद्विक, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी - इन 6 का बंध मिश्र में नहीं है। मिथ्यात्व और सासादन में देव गति, देव गत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, तीर्थंकर - इन पाँच का बंध नहीं है; अविरत सम्यक्त्व में ये हैं।


पण्णारसमनुतीसं, मिच्छदुगे अविरदे छिदी चउरो ।
उवरिम पणसट्ठी वि य, एक्कं सादं सजोगिम्हि ॥117॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व में १५ और सासादन में २९ की बंध से व्युच्छित्ति है। अविरत सम्यक्त्व में इसकी ही ४ और ऊपर की ६५ - इसप्रकार ६९ की बंध-व्युच्छित्ति है। सयोग केवली में एक साता वेदनीय की बंध से व्युच्छित्ति है।


देवे वा वेगुव्वे, मिस्से णरतिरियआउगं णत्थि ।
छट्ठगुणं वाहारे, तम्मिस्से णत्थि देवाऊ ॥118॥

सरलार्थ: वैक्रियिक में देवगति के समान है। वैक्रियिक मिश्र में मनुष्यायुष्क और तिर्यंचायुष्क का बंध नहीं है। आहारक में छठवें गुणस्थान के समान है। आहारक मिश्र में देवायुष्क का बंध नहीं है।


कम्मे उराल मिस्सं, वा णाउदुगं पि णव छिदी अयदे ।
वेदादाहारोत्ति य, सगुणट्ठाणाणमोघं तु ॥119॥

सरलार्थ: कार्मण में औदारिक मिश्र के समान है; परन्तु यहाँ दोनों आयुओं का भी बंध नहीं है; अतः चौथे में ९ व्युच्छिन्न-योग्य हैं।


णवरि य सव्वुवसम्मे, णरसुरआऊणि णत्थि णियमेण ।
मिच्छस्संतिम णवयं, बारं णहि तेउपम्मेसु ॥120॥

सरलार्थ: वेद मार्गणा से लेकर आहारक मार्गणा पर्यन्त सामान्य से अपने-अपने गुणस्थान के अनुसार बंध-त्रिभंगी है और विशेष यह है कि सभी/दोनों औपशमिक सम्यक्त्व में नियम से मनुष्यायुष्क, देवायुष्क नहीं है। तेजो/पीत लेश्या के मिथ्यात्व में बंध से व्युच्छिन्न होने-योग्य १६ में से अंत की ९ नहीं हैं तथा पद्म लेश्या में अन्त की १२ नहीं हैं।


सुक्के सदरचउक्कं, वामंतिमबारसं च णव अत्थि ।
कम्मेव अणाहारे, बंधस्संतो अणंतो य ॥121॥

सरलार्थ: शुक्ललेश्या में शतार चतुष्क और पद्म के समान मिथ्यात्व वाली अन्तिम १२ नहीं हैं। अनाहारक मार्गणा में कार्मण काययोग के समान बंध-व्युच्छित्ति, बंध और अबंध जानना चाहिए।


सादि अणादी धुव अद्धुवो य बंधो दु कम्मछक्कस्स ।
तदियो सादियसेसो, अणादि धुवसेसगो आऊ ॥122॥

सरलार्थ: ज्ञानावरण आदि छह कर्मों के वास्तव में सादि, अनादि, ध्रुव और अध्रुव - ये चारों भेद हैं। तीसरे वेदनीय कर्म के सादि को छोड़कर शेष तीन भेद हैं। आयुष्क कर्म के अनादि और ध्रुव को छोड़कर शेष २ भेद हैं।


सादी अबंधबंधे, सेढिअणारूढगे अणादी हु ।
अभव्वसिद्धम्हि धुवो, भवसिद्धे अद्धुवो बंधो ॥123॥

सरलार्थ: एक बार बंध रुक जाने के बाद पुन: बंध प्रारम्भ हो जाना, सादि है; श्रेणी का आरोहण करने से पहले का बंध अनादि है। वास्तव में अभव्यसिद्धों में बंध ध्रुव है और भव्य सिद्ध में अध्रुव बंध है।


घादितिमिच्छक्साया, भयतेजगुरुदुगणिमिणवण्णचओ ।
सत्तेतालधुवाणं, चदुधा सेसाणयं तु दुधा ॥124॥

सरलार्थ: ज्ञानावरण ५, दर्शनावरण ९, अन्तराय ५ - इन तीन घाति की १९; मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, तैजस, कार्मण, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श - इन ४७ ध्रुवबंधी प्रकृतिओं के सादि आदि चारों भेद होते हैं तथा वास्तव में शेष रहीं ७३ प्रकृतिओं के सादि और अध्रुव - ये दो भेद ही हैं।


सेसे तित्थाहारं, परघादचउक्क सव्व आऊणि ।
अप्पडिवक्खा सेसा, सप्पडिवक्खा हु बासट्ठी ॥125॥

सरलार्थ: शेष रहीं ७३ में तीर्थंकर, आहारकद्विक, परघातचतुष्क और सभी आयु - ये ११ प्रकृतिआँ अप्रतिपक्ष हैं, शेष रहीं ६२ प्रकृतिआँ सप्रतिपक्ष हैं। तीर्थंकर, आहारकद्विक और चारों आयुओं का जघन्य बंध भिन्नमुहूर्त पर्यन्त होता है; शेष ६६ प्रकृतिओं का जघन्य बंध एक समय होता है, इसलिए उन शेष के दो भेद हो जाते हैं।


अवरो भिण्णमुहुत्तो, तित्थाहाराण सव्व आऊणं ।
समओ छावट्ठीणं, बंधो तम्हा दुधा सेसा ॥126॥

सरलार्थ: तीर्थंकर, आहारकद्विक और चारों आयुओं का जघन्य बंध भिन्नमुहूर्त पर्यन्त होता है; शेष ६६ प्रकृतिओं का जघन्य बंध एक समय होता है, इसलिए उन शेष के दो भेद हो जाते हैं।

बंधोदयसत्त्व अधिकार: बंधाधिकार: स्थिति बंध (गाथा 127 से 162)

तीसं कोडाकोडी, तिघादितदियेसु बीस णामदुगे ।
सत्तरिमोहे सुद्धं, उवही आउस्स तेतीसं ॥127॥

सरलार्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय - इन ३ घाति में तथा तीसरे क्रम पर आए वेदनीय में तीस कोड़ाकोड़ी सागर; नाम-गोत्र - इन नाम द्विक में बीस कोड़ाकोड़ी सागर; मोहनीय में सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर और आयुष्क का मात्र तेतीस सागर उत्कृष्ट स्थितिबंध है।


दुक्खति-घादीणोघं, सादिच्छीमणुदुगे तदद्धं तु ।
सत्तरि दंसणमोहे, चरित्तमोहे य चत्तालं ॥128॥

सरलार्थ: असाता वेदनीय, तीन घाति का सामान्यवत्/३० कोड़ाकोड़ी सागर; वास्तव में साता वेदनीय, स्त्रीवेद, मनुष्यगति और मनुष्यगत्यानुपूर्वी में उससे आधा/१५ कोड़ाकोड़ी सागर है। दर्शनमोहनीय में सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर और चारित्र मोहनीय में चालीस कोड़ाकोड़ी सागर उत्कृष्ट स्थितिबंध है।


संठाणसंहदीणं, चरिमस्सोघं दुहीणमादित्ति ।
अट्ठरसकोडकोडी, वियलाणं सुहुमतिण्हं च ॥129॥

सरलार्थ: अंतिम संस्थान/हुण्डक और अंतिम संहनन/असम्प्राप्ता-सृपाटिका संहनन की सामान्यवत्/२० कोड़ाकोड़ी सागर है। इसके बाद प्रारम्भ पर्यन्त दो-दो कम होते जाते हैं/वामन और कीलक में १८ कोड़ाकोड़ी सागर, कुब्जक और अर्धनाराच में १६ कोड़ाकोड़ी सागर, स्वाति और नाराच में १४ कोड़ाकोड़ी सागर, न्यग्रोध परिमण्डल और बज्रनाराच में १२ कोड़ाकोड़ी सागर, समचतुरस्र और बज्रवृषभनाराच में १० कोड़ाकोड़ी सागर उत्कृष्ट स्थितिबंध है। दो इंद्रिय, तीनेंद्रिय, चारेंद्रिय, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण का उत्कृष्ट स्थितिबंध १८ कोड़ाकोड़ी सागर है।


अरदीसोगेसंढे, तिरिक्खभयणिरयतेजुरालदुगे ।
वेगुव्वादावदुगे, णीचे तसवण्ण-अगुरुति चउक्के ॥130॥

सरलार्थ: अरति, शोक, नपुंसक, तिर्यंच गति, तिर्यंच गत्यानुपूर्वी, भय, जुगुप्सा, नरक गति, नरक गत्यानुपूर्वी, तैजस, कार्मण, औदारिक शरीर, औदारिक अंगोपांग, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, आताप, उद्योत, नीच गोत्र, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, एकेंद्रिय, पंचेंद्रिय, स्थावर, निर्माण, अप्रशस्त विहायोगति, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशस्कीर्ति - इन नाम वाली ४१ प्रकृतिओं की उत्कृष्ट स्थिति २० कोड़ाकोड़ी सागर है।


इगिपंचिंदिय थावर णिमिणासग्गमण अथिर छक्काणं ।
बीसं कोडाकोडी-सागर-णामाणमुक्किस्सं ॥131॥

सरलार्थ: अरति, शोक, नपुंसक, तिर्यंच गति, तिर्यंच गत्यानुपूर्वी, भय, जुगुप्सा, नरक गति, नरक गत्यानुपूर्वी, तैजस, कार्मण, औदारिक शरीर, औदारिक अंगोपांग, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, आताप, उद्योत, नीच गोत्र, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, एकेंद्रिय, पंचेंद्रिय, स्थावर, निर्माण, अप्रशस्त विहायोगति, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशस्कीर्ति - इन नाम वाली ४१ प्रकृतिओं की उत्कृष्ट स्थिति २० कोड़ाकोड़ी सागर है।


हस्सरदिउच्चपुरिसे, थिरछक्के सत्थगमणदेवदुगे ।
तस्सद्धमंतकोडाकोडी आहारतित्थयरे ॥132॥

सरलार्थ: हास्य, रति, उच्च गोत्र, पुरुषवेद, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, प्रशस्तविहायोगति, देव गति, देव गत्यानुपूर्वी - इनमें उसका आधा/१० कोड़ाकोड़ी सागर उत्कृष्ट स्थितिबंध है। आहारक शरीर, आहारक अंगोपांग, तीर्थंकर - इनमें अन्त:कोड़ाकोड़ी सागर है।


सुरणिरयाऊणोघं, णरतिरियाऊण तिण्णि पल्लाणि ।
उक्कस्सट्ठिदिबंधो, सण्णीपज्जगे जोगे ॥133॥

सरलार्थ: देवायुष्क और नरकायुष्क का सामान्यवत्/३३ सागर है। मनुष्यायुष्क और तिर्यंचायुष्क का तीन पल्य है। यह उत्कृष्ट स्थितिबंध संज्ञी पर्याप्तक दशा वाले विशिष्ट योग्यता सम्पन्न जीव में होता है।


सव्वट्ठिदीणमुक्कस्सओ दु उक्कस्ससंकिलेसेण ।
विवरीदेण जहण्णो, आउगतियवज्जियाणं तु ॥134॥

सरलार्थ: तिर्यंच, मनुष्य और देवायुष्क को छोड़कर वास्तव में शेष सभी का उत्कृष्ट स्थितिबंध उत्कृष्ट संक्लेशभावों से होता है और जघन्य इससे विपरीत विशुद्धभावों से होता है।


सव्वुक्कस्सठिदीणं, मिच्छादिट्ठी दु बंधगो भणिदो ।
आहारं तित्थयरं, देवाउं वा विमोत्तूण ॥135॥

सरलार्थ: आहारकद्विक, तीर्थंकर और देवायु को छोड़कर शेष सभी की उत्कृष्ट स्थिति बाँधनेवाला मिथ्यादृष्टि कहा गया है।


देवाउगं पमत्तो, आहारयमप्पमत्तविरदो दु ।
तित्थयरं च मणुस्सो, अविरदसम्मो समज्जेदि ॥136॥

सरलार्थ: देवायुष्क को प्रमत्तसंयत, वास्तव में आहारकद्विक को अप्रमत्तसंयत और तीर्थंकर की उत्कृष्ट स्थिति को अविरत सम्यग्दृष्टि मनुष्य बाँधता है।


णरतिरिया सेसाउं वेगुव्वियछक्क वियल सुहुमतियं ।
सुरणिरया ओरालिय तिरियदुगुज्जोवसंपत्तं ॥137॥

सरलार्थ: शेष रहीं नरक, तिर्यंच, मनुष्य आयुष्क; वैक्रियिक षट्क, विकलत्रय, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण - इन १५ प्रकृतिओं को मनुष्य और तिर्यंच बाँधता है। औदारिक-द्विक, तिर्यंच-द्विक, उद्योत, असम्प्राप्ता-सृपाटिका संहनन - इन ६ को देव और नारकी बाँधते हैं।


देवा पुण एइंदिय आदावं थावरं च सेसाणं ।
उक्कस्ससंकिलिट्ठा, चदुगदिया ईसिमज्झिमया ॥138॥

सरलार्थ: एकेंद्रिय, आताप और स्थावर - इन ३ को देव बाँधता है तथा शेष रहीं ९२ को उत्कृष्ट संक्लेश या ईषत् मध्यम संक्लेश भाव-सम्पन्न चारों गतिओं वाले बाँधते हैं।


बारस य वेयणीये, णामागोदे य अट्ठ य मुहुत्ता ।
भिण्णमुहुत्तं तु ठिदी, जहण्णयं सेसपंचण्हं ॥139॥

सरलार्थ: वेदनीय में १२ मुहूर्त, नाम और गोत्र में आठ मुहूर्त तथा शेष रहीं पाँच में भिन्नमुहूर्त जघन्यस्थिति है।


लोहस्स सुहुमसत्तरसाणं ओघं दुगेक-दल-मासं ।
कोहतिये पुरिसस्स य, अट्ठ य वस्सा जहण्णठिदी ॥140॥

सरलार्थ: लोभ की और सूक्ष्म साम्पराय में बँधनेवाली १७ की सामान्यवत् है; क्रोध की २ माह, मान की १ माह, माया की आधा माह/१५ दिन और पुरुषवेद की आठ वर्ष जघन्यस्थिति है।


तित्थाहाराणंतो कोडाकोडी जहण्णठिदिबंधो ।
खवगे सगसगबंधच्छेदणकाले हवे णियमा ॥141॥

सरलार्थ: तीर्थंकर और आहारक द्विक का जघन्य स्थिति बंध अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर नियम से क्षपक श्रेणी में अपनी-अपनी बंध-व्युच्छित्ति के समय होता है।


भिन्नमुहुत्तो णर-तिरियाऊणं वासदस सहस्साणि ।
सुरणिरयआउगाणं, जहण्णओ होदि ठिदिबंधो ॥142॥

सरलार्थ: मनुष्य आयुष्क और तिर्यंच आयुष्क का भिन्न मुहूर्त तथा देव आयुष्क और नरक आयुष्क का दश हजार वर्ष जघन्य स्थिति बंध है।


सेसाणं पज्जत्तो, बादरएइंदियो विसुद्धो य ।
बंधदि सव्वजहण्णं सगसग उक्कस्सपडिभागे ॥143॥

सरलार्थ: शेष रहीं ९१ में से वैक्रियिक षट्क और मिथ्यात्व को छोड़कर शेष ८४ का अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थिति के प्रतिभाग में सबसे कम स्थिति को पर्याप्तक बादर एकेंद्रिय विशुद्ध भाव धारक बाँधता है।


एयं पणकदि पण्णं, सयं सहस्सं च मिच्छवरबंधो ।
इगिविगलाणं अवरं, पल्लासंखूणसंखूणं ॥144॥

सरलार्थ: एकेंद्रिय में एक सागर; विकलों के/दो इंद्रिय में पाँच का वर्ग/२५ सागर, तीनेंद्रिय में ५० सागर, चारेंद्रिय में १०० सागर और असैनी पंचेंद्रिय में एक हजार सागर मिथ्यात्व का उत्कृष्ट स्थिति बंध है तथा उसकी उत्कृष्ट स्थिति में से पल्य का असंख्यातवाँ भाग कम कर देने पर शेष रही जघन्य स्थिति एकेंद्रिय में मिथ्यात्व की है और उसकी उत्कृष्ट स्थिति में से पल्य का संख्यातवाँ भाग कम कर देने पर शेष रही जघन्य स्थिति विकलचतुष्क में मिथ्यात्व की है।


जदि सत्तरिस्स एत्तियमेत्तं किं होदि तीसियादीणं ।
इदि संपाते सेसाणं इगिविगलेसु उभयठिदि ॥145॥

सरलार्थ: यदि ७० कोड़ाकोड़ी सागर पर इतनी उत्कृष्ट या जघन्य स्थिति एकेंद्रिय


सण्णि असण्णि चउक्के, एगे अंतोमुहुत्तमाबाहा ।
जेट्ठे संखेज्जगुणा, आवलिसंखं असंखभागहियं ॥146॥

सरलार्थ: संज्ञी, असंज्ञी चतुष्क और एकेंद्रिय में जघन्य आबाधा अन्तर्मुहूर्त है। इन तीनों में उत्कृष्ट आबाधा क्रमशः अपनी जघन्य में संख्यात गुणी अधिक, आवली के संख्यातवें भाग अधिक और आवली के असंख्यातवें भाग अधिक है।


जेट्ठाबाहोवट्टियजेट्ठं आबाहकंडयं तेण ।
आबाह-वियप्प-हदेणेगूणेणूण जेट्ठमवरठिदी ॥147॥

सरलार्थ: उत्कृष्ट स्थिति में उत्कृष्ट आबाधा का भाग देने पर आबाधा-काण्डक प्राप्त होता है। उस आबाधा-काण्डक के साथ आबाधा के भेदों को गुणा करके प्राप्त गुणनफल में से एक कम करके प्राप्त राशि को उत्कृष्ट स्थिति में से कम करने पर/घटाने पर उस कर्म की जघन्य स्थिति ज्ञात हो जाती है।


बासूप बासूअ वरट्ठिदीओ, सूबाअ सूबाप जहण्णकालो ।
बीबीवरो बीविजहण्णकालो, सेसाणमेवं वयणीयमेदं ॥148॥

सरलार्थ: बादर पर्याप्तक की उत्कृष्ट स्थिति, सूक्ष्म पर्याप्तक की उत्कृष्ट स्थिति, बादर अपर्याप्तक की उत्कृष्ट स्थिति, सूक्ष्म अपर्याप्तक की उत्कृष्ट स्थिति, सूक्ष्म अपर्याप्तक की जघन्यस्थिति, बादर अपर्याप्तक की जघन्य स्थिति, सूक्ष्म पर्याप्तक की जघन्य स्थिति, बादर पर्याप्तक की जघन्य स्थिति; दो इंद्रिय पर्याप्तक और अपर्याप्तक की उत्कृष्ट स्थिति, दो इंद्रिय पर्याप्तक और अपर्याप्तक की जघन्य स्थिति - इसीप्रकार तीन इंद्रिय आदि शेष जीवों का भी कथन करना चाहिए।


मज्झे थोव-सलागा, हेट्ठा उवरिं च संखगुणिदकमा ।
सव्वजुदी संखगुणा, हेट्ठुवरिं संखगुणमसण्णित्ति ॥149॥

सरलार्थ: असंज्ञी पर्यन्त के जीवों की स्थिति के मध्य में थोड़ी शलाकाएँ हैं। क्रम से नीचे और ऊपर की संख्यात गुणी हैं। सभी मिलकर भी संख्यातगुणी हैं तथा नीचे से ऊपर तक भी संख्यात गुणी हैं।


सण्णिस्स हु हेट्ठादो, ठिदिठाणं संखगुणिदमुवरुवरिं ।
ठिदिआयामोवि तहा, सगठिदिठाणं व आबाहा ॥150॥

सरलार्थ: एकेंद्रिय में एक सागर; विकलों के/दो इंद्रिय में पाँच का वर्ग/२५ सागर, तीनेंद्रिय में ५० सागर, चारेंद्रिय में १०० सागर और असैनी पंचेंद्रिय में एक हजार सागर मिथ्यात्व का उत्कृष्ट स्थिति बंध है तथा उसकी उत्कृष्ट स्थिति में से पल्य का असंख्यातवाँ भाग कम कर देने पर शेष रही जघन्य स्थिति एकेंद्रिय में मिथ्यात्व की है और उसकी उत्कृष्ट स्थिति में से पल्य का संख्यातवाँ भाग कम कर देने पर शेष रही जघन्य स्थिति विकलचतुष्क में मिथ्यात्व की है।
यदि ७० कोड़ाकोड़ी सागर पर इतनी उत्कृष्ट या जघन्य स्थिति एकेंद्रिय


सत्तरसपंचतित्थाहाराणं सुहुमबादरापुव्वो ।
छव्वेगुव्वमसण्णी, जहण्णमाऊण सण्णी वा ॥151॥

सरलार्थ: १७ प्रकृतिओं का सूक्ष्म साम्पराय में, पाँच का अनिवृत्तिकरण में, तीर्थंकर-आहारक द्विक का अपूर्वकरण में, वैक्रियिक षट्क का असंज्ञी के और चारों आयुष्क का संज्ञी-असंज्ञी - दोनों के जघन्य स्थितिबंध है।


अजहण्णट्ठिदि बंधो, चउव्विहो सत्तमूलपयडीणं ।
सेसतिए दुवियप्पो, आउ चउक्केवि दुवियप्पो ॥152॥

सरलार्थ: सात मूल प्रकृतियों का अजघन्य स्थिति बंध चारों प्रकार का है; शेष तीन में दो भेद हैं। आयुष्क के चारों भेदों में ही दो भेद हैं।


संजलणसुहुमचोद्दसघादीणं चदुविधो दु अजहण्णो ।
सेसतिया पुण दुविहा, सेसाणं चदुविधा दु अजहण्णो ॥153॥

सरलार्थ: संज्वलन और घातिकर्म की सूक्ष्म साम्पराय में व्युच्छिन्न होने वाली चौदह का अजघन्य वास्तव में चारों प्रकार का है और शेष तीन के दो-दो प्रकार हैं। शेष रहीं के चारों प्रकारों में ही दो-दो प्रकार हैं।


सव्वाओ दु ठिदीओ, सुहासुहाणं पि होंति असुहाओ ।
माणुसतिरिक्खदेवाउगं च मोत्तूण सेसाणं ॥154॥

सरलार्थ: मनुष्य आयुष्क, तिर्यंच आयुष्क और देव आयुष्क को छोड़कर शेष शुभ-अशुभ की सभी स्थितिआँ वास्तव में अशुभ हैं।


कम्मसरूवेणागय-दव्वं ण य एदि उदयरूवेण ।
रूवेणुदीरणस्स व, आबाहा जाव ताव हवे ॥155॥

सरलार्थ: कर्मस्वरूप से आया द्रव्य जबतक उदयरूप से या उदीरणारूप से नहीं आता है, तबतक आबाधा है।


उदयं पडि सत्तण्हं, आबाहा कोडकोडि उवहीणं ।
वाससयं तप्पडिभागेण य सेसट्ठिदीणं च ॥156॥

सरलार्थ: उदय की अपेक्षा सात कर्मों के संबंध में एक कोड़ाकोड़ी सागर पर सौ वर्ष की आबाधा है। शेष स्थितिओं की आबाधा इसी के प्रतिभाग द्वारा/त्रैराशिक पद्धति से ज्ञात कर लेना चाहिए।


अंतो कोडाकोडिट्ठिदिस्स अंतोमुहुत्तमाबाहा ।
संखेज्जगुण-विहीणं, सव्वजहण्णट्ठिदिस्स हवे ॥157॥

सरलार्थ: अंत:कोड़ाकोड़ी सागर स्थिति की आबाधा अन्तर्मुहूर्त है। सभी जघन्य स्थितिओं की आबाधा उससे संख्यात गुणी कम है।


पुव्वाणं कोडितिभागादासंख्येय-अद्धवोत्ति हवे ।
आउस्स य आबाहा, णट्ठिदि-पडिभागमाउस्स ॥158॥

सरलार्थ: आयुष्क की आबाधा एक कोटी पूर्व के तीसरे भाग से लेकर असंक्षेप अद्धा पर्यन्त है। इसकी आबाधा स्थिति के प्रतिभागानुसार नहीं होती है।


आवलियं आबाहा, उदीरणमासिज्ज सत्तकम्माणं ।
परभविय आउगस्स य, उदीरणा णत्थि णियमेण ॥159॥

सरलार्थ: उदीरणा की अपेक्षा सात कर्मों की आबाधा एक आवली मात्र है। पर भव संबंधी आयुष्क की नियम से उदीरणा नहीं है।


आबाहूणियकम्मट्ठिदी णिसेगो दु सत्तकम्माणं ।
आउस्स णिसेगो पुण, सगट्ठिदी होदि णियमेण ॥160॥

सरलार्थ: (संलग्न पीडीएफ में पृष्ठ 120-121 नहीं हैं, इसलिए इस गाथा का सरलार्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


आबाहं बोलाविय, पढमणिसेगम्मि देय बहुगं तु ।
तत्तो विसेसहीणं, बिदियस्सादिम णिसेओत्ति ॥161॥

सरलार्थ: (संलग्न पीडीएफ में पृष्ठ 120-121 नहीं हैं, इसलिए इस गाथा का सरलार्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


बिदिये बिदियणिसेगे, हाणी पुव्विल्लहाणि अद्धं तु ।
एवं गुणहाणिं पडि, हाणी अद्धद्धयं होदि ॥162॥

सरलार्थ: (संलग्न पीडीएफ में पृष्ठ 120-121 नहीं हैं, इसलिए इस गाथा का सरलार्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)

बंधोदयसत्त्व अधिकार: बंधाधिकार: अनुभाग बंध (गाथा 163 से 184)

सुहपयडीण विसोही, तिव्वो असुहाण संकिलेसेण ।
विवरीदेण जहण्णो, अणुभागो सव्वपयडीणं ॥163॥

सरलार्थ: शुभ प्रकृतिओं का विशुद्धि से और अशुभ का संक्लेश से तीव्र अनुभाग बंध होता है। इससे विपरीत भावों द्वारा सभी प्रकृतिओं का जघन्य अनुभाग बंध होता है।


बादालं तु पसत्था, विसोहिगुणमुक्कडस्स तिव्वाओ ।
बासीदि अप्पसत्था, मिच्छुक्कडसंकिलिट्ठस्स ॥164॥

सरलार्थ: ४२ प्रशस्त प्रकृतिओं का तीव्र अनुभाग बंध विशुद्धि गुण की उत्कृष्टता वाले जीव के और ८२ अप्रशस्त प्रकृतिओं का तीव्र अनुभाग बंध मिथ्यात्व सहित उत्कृष्ट संक्लेश भाववाले जीव के होता है।


आदाओ उज्जोओ, मणुवतिरिक्खाउगं पसत्थासु ।
मिच्छस्स होंति तिव्वा, सम्माइट्ठिस्स सेसाओ ॥165॥

सरलार्थ: प्रशस्त प्रकृतिओं में से आताप, उद्योत, मनुष्यायुष्क और तिर्यंचायुष्क का तीव्र अनुभाग बंध मिथ्यात्वी के होता है तथा शेष रहीं ३८ का सम्यग्दृष्टि के होता है।


मणुओरालदुबज्जं, विसुद्धसुरणिरय अविरदे तिव्वा ।
देवाउ अप्पमत्ते खवगे अवसेसबत्तीसा ॥166॥

सरलार्थ: इन ३८ में से मनुष्यद्विक, औदारिकद्विक और बज्रवृषभनाराच संहनन का तीव्र बंध विशुद्धता सम्पन्न देव-नारकी को अविरत सम्यक्त्व नामक चौथे गुणस्थान में, देवायुष्क का अप्रमत्त में उत्कृष्ट अनुभाग बंध होता है। शेष रहीं ३२ का उत्कृष्ट अनुभाग बंध क्षपक श्रेणी में होता है।


उवघादहीणतीसे, अपुव्वकरणस्स उच्चजससादे ।
संमेलिदे हवंति हु खवगस्सवसेसबत्तीसा ॥167॥

सरलार्थ: अपूर्वकरण के छठवें भाग में व्युच्छिन्न होनेवाली ३० में से उपघात को कम कर शेष २९ में उच्चगोत्र, यशस्कीर्ति, साता वेदनीय मिलाने पर क्षपक की अवशेष ३२ प्रकृतियाँ हो जाती हैं।


मिच्छस्संतिमणवयं, णरतिरियाऊणि वामणरतिरिये ।
ए-इंदिय आदावं, थावरणामं च सुरमिच्छे ॥168॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व गुणस्थान में व्युच्छिन्न होनेवाली १६ में से अन्तिम ९, मनुष्यायुष्क और तिर्यंचायुष्क - इन ११ का उत्कृष्ट अनुभाग बंध मिथ्यादृष्टि मनुष्य और तिर्यंच में होता है। एकेंद्रिय, आताप और स्थावर नामक प्रकृतिओं का तीव्र अनुभाग बंध देव की मिथ्यात्व दशा में होता है।


उज्जोवो तमतमगे, सुरणारयमिच्छगे असंपत्तं ।
तिरियदुगं सेसा पुण, चदुगदिमिच्छे किलिट्ठे य ॥169॥

सरलार्थ: उद्योत का सातवीं नरक पृथ्वी में; असम्प्राप्ता सृपाटिका, तिर्यंचद्विक का सुर-नारकी के मिथ्यात्व में तथा शेष रहीं ६८ प्रकृतियों का तीव्र अनुभाग बंध चारों गति के मिथ्यात्व में संक्लेश परिणामों से होता है।


वण्णचउक्कमसत्थं, उवघादो खवगघादि पणबीसं ।
तीसाणमवरबंधो, सगसगबोच्छेदठाणम्हि ॥170॥

सरलार्थ: अप्रशस्त वर्णचतुष्क, उपघात; क्षपकश्रेणी में विद्यमान घाति कर्म की २५/ज्ञानावरण ५, दर्शनावरण ६, अन्तराय ५; हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, पुरुषवेद, संज्वलनचतुष्क - ये मोहनीय ९ - इन ३० प्रकृतिओं का जघन्य अनुभाग बंध अपनी-अपनी बंध-व्युच्छित्ति संबंधी गुणस्थान में होता है।


अणथीणतियं मिच्छं, मिच्छे अयदे हु बिदियकोधादी ।
देसे तदियकसाया, संजमगुणपच्छिदे सोलं ॥171॥

सरलार्थ: अनन्तानुबंधी चतुष्क, स्त्यानगृद्धि त्रिक, मिथ्यात्व - इन ८ प्रकृतिओं को संयमरूपी गुण में स्थित होनेवाला मिथ्यात्व नामक पहले गुणस्थान में; वास्तव में दूसरे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादि को संयमगुण में स्थित होनेवाला अविरत सम्यक्त्व नामक चौथे गुणस्थान में तथा तीसरी प्रत्याख्यानावरण कषाय को संयमगुण में स्थित होनेवाला देशसंयम नामक पाँचवें गुणस्थान में - इसप्रकार इन सोलह प्रकृतिओं को संयम-प्राप्ति के सम्मुख हुआ जीव बाँधता है।


आहारमप्पमत्ते, पमत्तसुद्धे य अरदिसोगाणं ।
णरतिरिये सुहमतियं, वियलं वेगुव्वछक्काओ ॥172॥

सरलार्थ: आहारक द्विक को अप्रमत्त में; अरति और शोक को प्रमत्त संयत में; सूक्ष्मत्रिक, विकलत्रय, वैक्रियिक षट्क और चारों आयुष्कों को मनुष्य और तिर्यंच बाँधता है।


सुरणिरये उज्जोवोरालदुगं तमतमम्हि तिरियदुगं ।
णीचं च तिगदिमज्झिमपरिणामे थावरेयक्खं ॥173॥

सरलार्थ: उद्योत और औदारिक द्विक देव और नरक में; तिर्यंच द्विक और नीच गोत्र को तमस्तमक नामक सातवीं पृथ्वी के नरक में; स्थावर और एकेंद्रिय को तीन गतिवाले मध्यम परिणाम में बाँधते हैं।


सोहम्मोत्ति य तावं, तित्थयरं अविरदे मणुस्सम्हि ।
चदुगदिवाम-किलिट्ठे, पण्णरस दुवे विसोहीये ॥174॥

सरलार्थ: आतप को सौधर्म-ऐशान पर्यन्त देव में, तीर्थंकर को मनुष्य अविरत सम्यक्त्व में; आगे बताई जानेवाली १५ को चारों गतिवाले मिथ्यात्वी संक्लेश में तथा २ को चारों गतिवाले मिथ्यात्वी विशुद्धि में बाँधते हैं।


परघाददुगं तेजदु, तसवण्णचउक्कणिमिणपंचिंदी ।
अगुरुलहुं च किलिट्ठे, इत्थिणउंसं विसोहीये ॥175॥

सरलार्थ: परघातद्विक, तैजसद्विक, त्रस चतुष्क, वर्ण चतुष्क, निर्माण, पंचेंद्रिय और अगुरुलघु - इन १५ को संक्लेश में तथा स्त्रीवेद और नपुसंकवेद - इन दो को विशुद्धि में बाँधता है।


सम्मो वा मिच्छो वा, अट्ठ अपरियत्तमज्झिमो य जदि ।
परियत्तमाणमज्झिममिच्छाइट्ठी दु तेबीसं ॥176॥

सरलार्थ: यदि अपरिवर्तनीय मध्यम भाव हों तो सम्यक्त्वी या मिथ्यात्वी कोई


थिरसुहजससाददुगं, उभये मिच्छेव उच्चसंठाणं ।
संहदिगमणं णरसुरसुभगादेज्जाण जुम्मं च ॥177॥

सरलार्थ: यदि अपरिवर्तनीय मध्यम भाव हों तो सम्यक्त्वी या मिथ्यात्वी कोई


घादीणं अजहण्णोऽणुक्कस्सो वेयणीयणामाणं ।
अजहण्णमणुक्कस्सो, गोदे चदुधा दुधा सेसा ॥178॥

सरलार्थ: घाति का अजघन्य, वेदनीय और नाम का अनुत्कृष्ट तथा गोत्र में अजघन्य और अनुत्कृष्ट - ये चारों प्रकार के हैं; शेष सभी दो प्रकार के हैं।


सत्थाणं धुवियाणमणुक्कस्समसत्थगाणधुवियाणं ।
अजहण्णं च य चदुधा, सेसा सेसाणयं च दुधा ॥179॥

सरलार्थ: ध्रुवबंधी प्रशस्त संबंधी अनुत्कृष्ट और ध्रुवबंधी अप्रशस्त संबंधी अजघन्य भेद के चारों प्रकार हैं तथा शेष के और शेष रहीं अध्रुवबंधी के दो प्रकार हैं।


सत्ती य लतादारूअट्ठी सेलोवमाहु घादीणं ।
दारु अणंतिमभागोत्ति देसघादी तदो सव्वं ॥180॥

सरलार्थ: घाति कर्मों की शक्ति लता, देवदारू लकड़ी, हड्डी और पत्थर के समान कही गई है। उनमें से देवदारू के अनन्तवें भाग पर्यन्त देशघाति हैं; उससे आगे सभी सर्वघाति हैं।


देसोत्ति हवे सम्मं, तत्तो दारूअणंतिमे मिस्सं ।
सेसा अणंतभागा, अट्ठिसिलाफड्ढया मिच्छे ॥181॥

सरलार्थ: (दर्शनमोहनीय में) देशघाति पर्यन्त स्पर्धक सम्यक् प्रकृतिरूप हैं, उससे आगे देवदारु के अनन्तवें भागरूप स्पर्धक मिश्रमय हैं, शेष रहे अनन्त भाग तथा हड्डी और पत्थररूप स्पर्धक मिथ्यात्व में हैं।


आवरण-देस-घादंतराय-संजलण-पुरिस-सत्तरसं ।
चदुविधभावपरिणदा, तिविधा भावा हु सेसाणं ॥182॥

सरलार्थ: आवरण/ज्ञानावरण-दर्शनावरण की देशघाति, अन्तराय, संज्वलन और पुरुषवेद - ये १७ चारों प्रकार के भावरूप परिणमित हैं; शेष के वास्तव में तीन प्रकार के भाव हैं।


अवसेसा पयडीओ, अघादिया घादियाण पडिभागा ।
ता एव पुण्णपावा, सेसा पावा मुणेयव्वा ॥183॥

सरलार्थ: शेष रहीं अघाति प्रकृतिआँ घाति के प्रतिभाग समान हैं; वे ही पुण्य-पापरूप हैं; शेष पापरूप मानना चाहिए।


गुडखंडसक्करामियसरिसा सत्था हु णिंबकंजीरा ।
विसहालाहलसरिसाऽसत्था हु अघादिपडिभागा ॥184॥

सरलार्थ: प्रशस्तरूप अघाति का प्रतिभाग वास्तव में गुड़, खाण्ड, शक्कर और अमृत के समान है तथा अप्रशस्तरूप अघाति का प्रतिभाग वास्तव में नीम, कांजीर, विष और हालाहल के समान है।

बंधोदयसत्त्व अधिकार: बंधाधिकार: प्रदेश बंध (1) (गाथा 185 से 222)

एयक्खेत्तोगाढं, सव्वपदेसेहिं कम्मणो जोग्गं ।
बंधदि सगहेदूहिं य, अणादियं सादियं उभयं ॥185॥

सरलार्थ: एक क्षेत्र में रहनेवाले अनादिक, सादिक और उभय कर्म के योग्य (पुद्गल) अपने कारणों से सभी प्रदेशों के साथ बँधते हैं।


एयसरीरोगाहियमेयक्खेत्तं अणेयखेत्तं तु ।
अवसेसलोयखेत्तं, खेत्तणुसारिट्ठियं रूवी ॥186॥

सरलार्थ: एक शरीर से रोका गया एक क्षेत्र है, इसके अतिरिक्त शेष रहा लोकक्षेत्र वास्तव में अनेक क्षेत्र है; क्षेत्र के अनुसार ही उनमें स्थित पुद्गल हैं।


एयाणेयक्खेत्तट्ठियरूविअणंतिमं हवे जोग्गं ।
अवसेसं तु अजोग्गं, सादि अणादी हवे तत्थ ॥187॥

सरलार्थ: एक क्षेत्र-अनेक क्षेत्र में स्थित पुद्गलों के अनन्तवें भाग कर्म-योग्य हैं और वास्तव में शेष/अनन्तभाग अयोग्य हैं; उनमें सादि, अनादि हैं।


जेट्ठे समयपबद्धे, अतीदकाले हदेण सव्वेण ।
जीवेण हदे सव्वं, सादी होदित्ति णिद्दिट्ठं ॥188॥

सरलार्थ: उत्कृष्ट समयप्रबद्ध में अतीत/बीते हुए काल के समयों का गुणा करें। प्राप्त गुणनफल में समस्त जीवराशि का गुणा करने से प्राप्त गुणनफल राशि प्रमाण सम्पूर्ण सादिद्रव्य है - ऐसा कहा गया है।


सगसगखेत्तगयस्स य, अणंतिमं जोग्गदव्वगयसादी ।
सेसं अजोग्गसंगयसादी होदित्ति णिद्दिट्ठं ॥189॥

सरलार्थ: अपने-अपने एक और अनेक क्षेत्र में स्थित पुद्गल द्रव्य का अनन्तवाँ भाग योग्य द्रव्य संबंधी सादि है तथा शेष अयोग्य द्रव्य संबंधी सादि है - ऐसा कहा गया है।


सगसगसादिविहीणे, जोग्गाजोग्गे य होदि णियमेण ।
जोग्गाजोग्गाणं पुण, अणादि-दव्वाण-परिमाणं ॥190॥

सरलार्थ: अपने-अपने योग्य और अयोग्य द्रव्य संबंधी सादि द्रव्य से रहित शेष नियम से योग्य और अयोग्य अनादि द्रव्य का प्रमाण है।


सयलरसरूवगंधेहिं परिणदं चरमचदुहिं फासेहिं ।
सिद्धादोऽभव्वादोऽणंतिमभागं गुणं दव्वं ॥191॥

सरलार्थ: सभी रसों, सभी रूपों, सभी गन्धों और अन्त के चार/शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष स्पर्शों से परिणमित द्रव्य सिद्धराशि के अनन्तवें भाग या अभव्य राशि से अनन्त गुणे हैं।


आउगभागो थोवो णामागोदे समो तदो अहियो ।
घादितियेवि य तत्तो, मोहे तत्तो तदो तदिये ॥192॥

सरलार्थ: उसमें आयुष्क का भाग कम है। उससे अधिक और परस्पर में समान नाम और गोत्र में है। उससे अधिक और परस्पर में समान तीन घाति/ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय में है। उससे भी अधिक मोहनीय में और उससे भी अधिक तीसरे/वेदनीय में है।


सुहदुक्खणिमित्तादो, बहुणिज्जरगोत्ति वेयणीयस्स ।
सव्वेहिंतो बहुगं, दव्वं होदित्ति णिद्दिट्ठं ॥193॥

सरलार्थ: सुख-दुःख में निमित्त होने से बहुत निर्जरा होती है; अतः वेदनीय का सबसे अधिक द्रव्य है - ऐसा कहा है।


सेसाणं पयडीणं, ठिदिपडिभागेण होदि दव्वं तु ।
आवलि असंखभागो, पडिभागो होदि णियमेण ॥194॥

सरलार्थ: शेष प्रकृतिओं का द्रव्य वास्तव में प्रतिभाग से है। वह प्रतिभाग नियम से आवलि का असंख्यातवाँ भाग है।


बहुभागे समभागो, अट्ठण्हं होदि एक्कभागम्हि ।
उत्तकमो तत्थवि बहुभागो बहुगस्स देओ दु ॥195॥

सरलार्थ: बहुभाग में आठों का समभाग है। एक भाग में कहे गए क्रम से भाग देने पर अन्य का द्रव्य प्राप्त होता जाता है। उसमें भी वास्तव में बहुत वाले को बहुभाग दिया जाता है।


उत्तरपयडीसु पुणो मोहावरणा हवंति हीणकमा ।
अहियकमा पुण णामाविग्घा य ण भंजणं सेसे ॥196॥

सरलार्थ: मोहनीय, ज्ञानावरण और दर्शनावरण की उत्तरप्रकृतिओं में प्रदेशों का विभाजन हीन क्रमवाला है; नाम और अन्तराय कर्म की उत्तर प्रकृतिओं में वह अधिक क्रमवाला है तथा शेष रहे वेदनीय, गोत्र और आयुष्क में विभाजन नहीं होता है।


सव्वावरणं दव्वं, अणंतभागो दु मूलपयडीणं ।
सेसा अणंतभागा, देसावरणं हवे दव्वं ॥197॥

सरलार्थ: मूल प्रकृतिओं के द्रव्य में से वास्तव में अनन्तवाँ भाग सर्वघाति द्रव्य का है तथा शेष अनन्तभाग देशघाति का द्रव्य है।


देसावरणण्णोण्णब्भत्थं तु अणंतसंखमेत्तं खु ।
सव्वावरणधणट्ठं पडिभागो होदि घादीणं ॥198॥

सरलार्थ: सर्वघाति का धन प्राप्त करने के लिए घाति का प्रतिभाग वास्तव में


सव्वावरणं दव्वं, विभंजणिज्जं तु उभयपयडीसु ।
देसावरणं दव्वं, देसावरणेसु णेविदरे ॥199॥

सरलार्थ: दोनों प्रकार की प्रकृतियों में सर्वघाति का द्रव्य विभक्त होता है; परन्तु देशघाति का द्रव्य देशघाति में ही विभक्त होता है, अन्य सर्वघाति में नहीं।


बहुभागे समभागो, बंधाणं होदि एक्कभागम्हि ।
उत्तकमो तत्थवि बहुभागो बहुगस्स देओ दु ॥200॥

सरलार्थ: बहुभाग में एकसाथ बँधनेवाली सभी का समान भाग होता है। एक भाग में कहे गए क्रमानुसार विभाजन है। उसमें भी वास्तव में बहुतवाले को बहुत भाग दिया जाता है।


घादि तियाणं सगसगसव्वावरणीय सव्वदव्वं तु ।
उत्त कमेण य देयं, विवरीयं णामविग्घाणं ॥201॥

सरलार्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण और मोहनीय - इन तीन घाति को अपने-अपने सर्वघाति का सम्पूर्ण द्रव्य कहे गए क्रम से देय है और वास्तव में नाम कर्म और अन्तराय की उत्तरप्रकृतियों का कहे गए क्रम से विपरीत देय है।


मोहे मिच्छत्तादी सत्तरसण्हं तु दिज्जदे हीणं ।
संजलणाणं भागेव होदि पणणोकसायाणं ॥202॥

सरलार्थ: मोहनीय में मिथ्यात्व, अनन्तानुबंधी, संज्वलन, प्रत्याख्यानावरण और अप्रत्याख्यानावरण संबंधी लोभ, माया, क्रोध, मान - इन १७ प्रकृतियों को हीन क्रम से द्रव्य दिया जाता है तथा पाँच नोकषायों का संज्वलन के भाग के समान है।


संजलणभागबहुभागद्धं अकसायसंगयं दव्वं ।
इगिभागसहियबहुभागद्धं संजलणपडिबद्धं ॥203॥

सरलार्थ: संज्वलन भाग के बहुभाग का आधा नोकषाय संबंधी द्रव्य है। एकभाग सहित बहुभाग का आधा संज्वलन से प्रतिबद्ध द्रव्य है।


तण्णोकसायभागो, सबंधपणणोकसायपयडीसु ।
हीणकमो होदि तहा, देसे देसावरणदव्वं ॥204॥

सरलार्थ: वह नोकषाय का भाग सबंध/एकसाथ बँधनेवाली पाँच नो कषाय प्रकृतिओं में हीन क्रम से होता है तथा देशघाति में देशघाति का द्रव्य है।


पुंबंधऽद्धा अंतोमुहुत्त इत्थिम्हि हस्सजुगले य ।
अरदिदुगे संखगुणा, णपुंसकऽद्धा विसेसहिया ॥205॥

सरलार्थ: पुरुषवेद का सतत बँधते रहने का समय अन्तर्मुहूर्त है। स्त्री वेद में, हास्य और रति में तथा अरति और शोक में क्रमश: संख्यातगुणा-संख्यातगुणा अधिक है। नपुंसकवेद का समय इससे विशेष अधिक है।


पणविग्घे विवरीयं सबंधपिंडिदरणामठाणेवि ।
पिंडं दव्वं च पुणो, सबंधसगपिंडपयडीसु ॥206॥

सरलार्थ: पाँच अन्तराय में विपरीत क्रम से देय है, सबंध/एकसाथ बँधनेवाली पिण्ड और अपिण्ड नामकर्म के स्थानों में भी विपरीत क्रम से देय है तथा सबंध अपनी पिण्ड प्रकृतियों में पिण्ड द्रव्य होता है।


छण्हंपि अणुक्कस्सो, पदेसबंधो दु चदुवियप्पो दु ।
सेसतिये दुवियप्पो, मोहाऊणं च दुवियप्पो ॥207॥

सरलार्थ: मोहनीय और आयुष्क को छोड़कर शेष छहों का अनुत्कृष्ट प्रदेशबंध वास्तव में चारों प्रकार का है; शेष तीन में वास्तव में दो भेद हैं और मोहनीय-आयुष्क में भी दो-दो भेद हैं।


तीसण्हमणुक्कस्सो, उत्तरपयडीसु चउविहो बंधो ।
सेसतिये दुवियप्पो, सेसचउक्के वि दुवियप्पो ॥208॥

सरलार्थ: उत्तर प्रकृतिओं में तीस का अनुत्कृष्ट बंध चारों प्रकार का है; शेष तीन में दो भेद हैं। शेष रही ९० के चारों में ही दो-दो भेद हैं।


णाणंतरायदसयं, दंसणछक्कं च मोहचोद्दसयं ।
तीसण्हमणुक्कस्सो, पदेसबंधो चदुवियप्पो ॥209॥

सरलार्थ: ज्ञानावरण की पाँच, अन्तराय की पाँच, दर्शनावरण की छह और मोहनीय की चौदह - इन तीस का अनुत्कृष्ट प्रदेशबंध चारों प्रकार का है।


उक्कडजोगो सण्णी, पज्जत्तो पयडिबंधमप्पदरो ।
कुणदि पदेसुक्कस्सं, जहण्णये जाण विवरीयं ॥210॥

सरलार्थ: संज्ञी, पर्याप्तक, अल्पतर/सबसे कम प्रकृति बंध करने वाला उत्कृष्ट योगधारी उत्कृष्ट प्रदेशबंध करता है; इससे विपरीत स्थिति में जघन्य प्रदेश बंध जानना।


आउक्कस्स पदेसं, छक्कं मोहस्स णव दु ठाणाणि ।
सेसाण तणुकसाओ, बंधदि उक्कस्सजोगेण ॥211॥

सरलार्थ: उत्कृष्ट योग से आयुष्क का प्रदेश बंध छठवें के बाद सातवें में, वास्तव


सत्तर सुहुमसरागे, पंचऽणियट्टिम्हि देसगे तदियं ।
अयदे बिदियकसायं होदि हु उक्कस्सदव्वं तु ॥212॥

सरलार्थ: सूक्ष्मसाम्पराय में ज्ञानावरण ५, दर्शनावरण ४, अन्तराय ५, यशस्कीर्ति, उच्चगोत्र, सातावेदनीय - इन १७ प्रकृतियों का; अनिवृत्तिकरण में पाँच का, देशसंयम में तीसरी/प्रत्याख्यानावरण, चौथे अविरत सम्यक्त्व में दूसरी/अप्रत्याख्यानावरण कषाय का वास्तव में उत्कृष्ट द्रव्य बँधता है।


छण्णोकसायणिद्दापयलातित्थं च सम्मगो य जदी ।
सम्मो वामो तेरं, णर-सुर-आऊ असादं तु ॥213॥

सरलार्थ: छह नोकषाय, निद्रा, प्रचला और तीर्थंकर का उत्कृष्ट प्रदेश बंध सम्यग्दृष्टि को है; मनुष्य आयुष्क, देव आयुष्क, असाता, देवचतुष्क, बज्रवृषभनाराच संहनन, समचतुरस्र संस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर, आदेय - इन १३ प्रकृतियों का वास्तव में सम्यक्त्वी-मिथ्यात्वी - इन दोनों के; आहारक का अप्रमत्त में और शेष का उत्कृष्ट प्रदेश बंध मिथ्यात्वी के होता है।


देवचउक्कं बज्जं, समचउरं सत्थगमणसुभगतियं ।
आहारमप्पमत्तो, सेसपदेसुक्कडो मिच्छो ॥214॥

सरलार्थ: संज्ञी, पर्याप्तक, अल्पतर/सबसे कम प्रकृति बंध करने वाला उत्कृष्ट योगधारी उत्कृष्ट प्रदेशबंध करता है; इससे विपरीत स्थिति में जघन्य प्रदेश बंध जानना।
उत्कृष्ट योग से आयुष्क का प्रदेश बंध छठवें के बाद सातवें में, वास्तव


सुहुमणिगोदअपज्जत्तयस्स पढमे जहण्णये जोगे ।
सत्तण्हं तु जहण्णं, आउगबंधेवि आउस्स ॥215॥

सरलार्थ: सूक्ष्मनिगोद अपर्याप्तक के पहले जघन्य योग में सातों का और वास्तव में आयुष्क बंध के काल में उसका भी जघन्य बंध होता है।


घोडणजोगोऽसण्णी, णिरयदुसुरणिरयआउगजहण्णं ।
अपमत्तो आहारं, अयदो तित्थं च देवचऊ ॥216॥

सरलार्थ: घोटमान योगी असज्ञी को नरकगति, नरकानुपूर्वी, देव-आयुष्क, नरक आयुष्क का; अप्रमत्तसंयत में आहारक का और चौथे में तीर्थंकर, देवगति, देवानुपूर्वी, वैक्रियिक काय, वैक्रियिक अंगोपाग का जघन्य बंध होता है।


चरिमअपुण्णभवत्थो, तिविग्गहे पढमविग्गहम्मि ठिओ ।
सुहुमणिगोदो बंधदि, सेसाणं अवरबंधं तु ॥217॥

सरलार्थ: अंतिम अपर्याप्तक के भव में स्थित तीन विग्रहों में से पहले विग्रह में


जोगट्ठाणा तिविहा, उववादेयंतबड्ढिपरिणामा ।
भेदा एक्केक्कंपि, चोद्दसभेदा पुणो तिविहा ॥218॥

सरलार्थ: उपपाद, एकान्तानुवृद्धि, परिणाम के भेद से योगस्थान तीन प्रकार के हैं; उनमें से प्रत्येक के भी १४-१४ भेद हैं तथा उनमें से भी प्रत्येक के सामान्य, जघन्य और उत्कृष्ट - ये तीन भेद हैं।


उववादजोगठाणा, भवादिसमयट्ठियस्स अवरवरा ।
विग्गह-इजुगइगमणे, जीवसमासे मुणेयव्वा ॥219॥

सरलार्थ: भव के पहले समय में स्थित जीव के उपपाद योगस्थान है; जघन्य उपपाद योगस्थान विग्रह गति से गमन कर भव धारण करते हुए पहले समय में तथा उत्कृष्ट उपपाद योगस्थान ऋजुगति से गमन कर भव धारण करते हुए पहले समय में होता है। ये सभी १४ जीव समास में भी जान लेना चाहिए।


परिणाम-जोगठाणा, सरीरपज्जत्तगादु चरिमोत्ति ।
लद्धि-अपज्जत्ताणं, चरिमतिभागम्हि बोद्धव्वा ॥220॥

सरलार्थ: शरीर पर्याप्ति की पूर्णता के समय से लेकर आयु के अंतिम समय पर्यन्त परिणाम योगस्थान होता है; लब्ध्यपर्याप्तक की आयु के अंतिम त्रिभाग के प्रथम समय से लेकर अंतिम समय पर्यन्त परिणाम योगस्थान जानना।


सगपज्जत्तीपुण्णे, उवरिं सव्वत्थ जोगमुक्कस्सं ।
सव्वत्थ होदि अवरं, लद्धि अपुण्णस्स जेट्ठंपि ॥221॥

सरलार्थ: अपनी पर्याप्ति की पूर्णता से लेकर सर्वत्र आयु के अंतिम समय पर्यन्त उत्कृष्ट और जघन्य योगस्थान होते हैं; लब्ध्यपर्याप्तक के भी अपनी स्थिति में उत्कृष्ट और जघन्य योगस्थान होते हैं।


एयंत-बड्ढिठाणा, उभयट्ठाणाणमंतरे होंति ।
अवरवरट्ठाणाओ, सगकालादिम्हि अंतम्हि ॥222॥

सरलार्थ: उपपाद और परिणाम - इन दोनों योगस्थानों के बीच में एकान्तानुवृद्धि योगस्थान होते हैं; उसमें अपने काल के प्रारम्भ में जघन्य स्थान और अन्त में उत्कृष्ट स्थान है।

बंधोदयसत्त्व अधिकार: बंधाधिकार: प्रदेश बंध (2), बंध के कारण (गाथा 223 से 260)

अविभागपडिच्छेदो, वग्गो पुण वग्गणा य फड्ढयगं ।
गुणहाणी वि य जाणे, ठाणं पडि होदि णियमेण ॥223॥

सरलार्थ: स्थान के प्रति/प्रत्येक स्थान में नियम से अविभाग प्रतिच्छेद, वर्ग, वर्गणा, स्पर्धक और गुणहानि होते हैं - ऐसा जानना चाहिए।


पल्लासंखेज्जदिमा, गुणहाणिसला हवंति इगिठाणे ।
गुणहाणिफड्ढयाओ, असंखभागं तु सेढीये ॥224॥

सरलार्थ: एकस्थान में पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण गुणहानि शलाका होती हैं; वास्तव में गुणहानि में श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण स्पर्धक हैं।


फड्ढयगे एक्केक्के, वग्गणसंखा हु तत्तियालावा ।
एक्केक्कवग्गणाए, असंखपदरा हु वग्गाओ ॥225॥

सरलार्थ: एक-एक/प्रत्येक स्पर्धक में वर्गणाओं की संख्या वास्तव में उतनी ही अर्थात् जगत् श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण है; एक-एक/प्रत्येक वर्गणा में वास्तव में असंख्यात जगत् प्रतर वर्ग हैं।


एक्केक्के पुण वग्गे, असंखलोगा हवंति अविभागा ।
अविभागस्स पमाणं, जहण्ण उड्ढी पदेसाणं ॥226॥

सरलार्थ: एक-एक/प्रत्येक वर्ग में असंख्यात लोक प्रमाण अविभाग प्रतिच्छेद होते हैं; अविभाग प्रतिच्छेद का प्रमाण प्रदेशों की जघन्यवृद्धि है।


इगिठाणफड्ढयाओ, वग्गणसंखा पदेसगुणहाणी ।
सेढि असंखेज्जदिमा, असंख लोगा हु अविभागा ॥227॥

सरलार्थ: एकस्थान में स्पर्धक, वर्गणा की संख्या, प्रदेशों की गुणहानि श्रेणी के असंख्यातवें भाग मात्र है और वास्तव में अविभाग प्रतिच्छेद असंख्यलोक प्रमाण हैं।


सव्वे जीवपदेसे, दिबड्ढगुणहाणिभाजिदे पढमा ।
उवरिं उत्तरहीणं, गुणहाणिं पडि तदद्धकमं ॥228॥

सरलार्थ: जीव के सम्पूर्ण प्रदेशों में डेढ़ गुणहानि का भाग देने पर पहली गुणहानि की पहली वर्गणा प्राप्त होती है; उससे आगे एक-एक चय कम करते जाने से आगे-आगे की वर्गणा प्राप्त होती है। गुणहानि की अपेक्षा वह क्रमशः आधा-आधा होता जाता है।


फड्ढय-संखाहि गुणं, जहण्णवग्गं तु तत्थतत्थादी ।
बिदियादि-वग्गणाणं, वग्गा अविभाग-अहियकमा ॥229॥

सरलार्थ: वहाँ जघन्य वर्ग को स्पर्धक की संख्या से गुणा करने पर उस गुणहानि की पहली वर्गणा प्राप्त होती है। वर्ग में क्रम से एक-एक अविभाग प्रतिच्छेद अधिक करने/बढ़ाने पर दूसरी आदि वर्गणाओं की संख्या होती है।


अंगुल-असंखभाग-प्पमाणमेत्तवर-फड्ढया-वड्ढी ।
अंतरछक्कं मुच्चा, अवरट्ठाणादु उक्कस्सं ॥230॥

सरलार्थ: जघन्यस्थान से उत्कृष्ट स्थान पर्यन्त छह अन्तरों को छोड़कर अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण मात्र जघन्य स्पर्धकों की वृद्धि है।


सरिसायामेणुवरिं, सेढि-असंखेज्जभागठाणाणि ।
चडिदेक्केक्कमपुव्वं, फड्ढयमिह जायदे चयदो ॥231॥

सरलार्थ: समान आयाम से ऊपर के स्थान श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। यहाँ चय से चढ़ते हुए एक-एक अपूर्व स्पर्धक उत्पन्न होता है।


एदेसिं ठाणाणं, जीवसमासाण अवरवरविसयं ।
चउरासीदिपदेहिं, अप्पाबहुगं परूवेमो ॥232॥

सरलार्थ: चौदह जीवसमासों संबंधी जघन्य और उत्कृष्ट की अपेक्षा इन योगस्थानों के अल्पबहुत्व का ८४ पदों द्वारा (मैं नेमिचंद्राचार्य) प्ररूपण करता हूँ।


सुहुमगलद्धिजहण्णं, तण्णिव्वत्तीजहण्णयं तत्तो ।
लद्धि अपुण्णुक्कस्सं, बादर लद्धिस्स अवरमदो ॥233॥

सरलार्थ: सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव का जघन्य उपपाद योगस्थान सबसे कम है। उससे सूक्ष्म निगोद निर्वृत्त्यपर्याप्तक जीव का जघन्य उपपाद स्थान पल्य के असंख्यातवें भाग गुणा है। उससे अधिक सूक्ष्म लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट उपपाद स्थान और उससे अधिक बादर लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य उपपाद योगस्थान मानना चाहिए।


णिव्वत्ति सुहुमजेट्ठं, बादरणिव्वत्तियस्स अवरं तु ।
बादरलद्धिस्स वरं, बीइंदियलद्धिग जहण्णं ॥234॥

सरलार्थ: उससे अधिक सूक्ष्म निर्वृत्त्यपर्याप्तक जीव का उत्कृष्ट उपपाद स्थान है। उससे अधिक बादर निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य योगस्थान है। उससे बादर लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट योग अधिक है तथा उससे अधिक दो इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य उपपाद योगस्थान है।


बादरणिव्वत्तिवरं, णिव्वत्ति-बिइंदियस्स अवरमदो ।
एवं बितिबितितिचतिच, चउविमणो होदि चउविमणो ॥235॥

सरलार्थ: उससे अधिक बादर एकेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट उपपाद, उससे अधिक दो इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य उपपाद योगस्थान है। इसीप्रकार दो इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, तीन इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य, दो इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, तीन इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य तीन इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, चार इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य, तीन इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, चार इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य, चार इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, असंज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य, चार इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, असंज्ञी पंचेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य उपपाद योगस्थान क्रमश: अधिक-अधिक होता है।


तह य असण्णीसण्णी, असण्णिसण्णिस्स सण्णिउववादं ।
सुहुमेइंदियलद्धिगअवरं एयंतबड्ढिस्स ॥236॥

सरलार्थ: उससे क्रमश: अधिक-अधिक असंज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, संज्ञी लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य, असंज्ञी पंचेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, संज्ञी निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य, संज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट उपपाद योगस्थान पल्य के असंख्यातवें भाग गुणा है। उससे अधिक गुणा सूक्ष्म एकेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य एकान्तानुवृद्धि योगस्थान है।


सण्णिस्सुववादवरं, णिव्वत्तिगदस्स सुहुमजीवस्स ।
एयंतबड्ढि अवरं, लद्धिदरे थूलथूले य ॥237॥

सरलार्थ: उससे अधिक संज्ञी पंचेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट उपपाद योगस्थान है। उससे क्रमश: अधिक-अधिक सूक्ष्म एकेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य एकान्तानुवृद्धि, बादर एकेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य एकान्तानुवृद्धि, बादर एकेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य एकान्तानुवृद्धि योगस्थान पल्य के असंख्यातवें भाग गुणा है।


तह सुहुमसुहुमजेट्ठं तो बादर-बादरे वरं होदि ।
अंतरमवरं लद्धिगसुहुमिदर-वरंपि परिणामे ॥238॥

सरलार्थ: उससे पल्य के असंख्यातवें भाग गुणे अधिक-अधिक क्रमशः सूक्ष्म


अंतरमुवरीवि पुणो, तत्पुण्णाणं च उवरि अंतरियं ।
एयंत-बड्ढिठाणा, तहपणलद्धिस्स अवरवरा ॥239॥

सरलार्थ: चौदह जीवसमासों संबंधी जघन्य और उत्कृष्ट की अपेक्षा इन योगस्थानों के अल्पबहुत्व का ८४ पदों द्वारा (मैं नेमिचंद्राचार्य) प्ररूपण करता हूँ।

सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव का जघन्य उपपाद योगस्थान सबसे कम है। उससे सूक्ष्म निगोद निर्वृत्त्यपर्याप्तक जीव का जघन्य उपपाद स्थान पल्य के असंख्यातवें भाग गुणा है। उससे अधिक सूक्ष्म लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट उपपाद स्थान और उससे अधिक बादर लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य उपपाद योगस्थान मानना चाहिए।

उससे अधिक सूक्ष्म निर्वृत्त्यपर्याप्तक जीव का उत्कृष्ट उपपाद स्थान है। उससे अधिक बादर निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य योगस्थान है। उससे बादर लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट योग अधिक है तथा उससे अधिक दो इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य उपपाद योगस्थान है।

उससे अधिक बादर एकेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट उपपाद, उससे अधिक दो इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य उपपाद योगस्थान है। इसीप्रकार दो इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, तीन इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य, दो इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, तीन इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य तीन इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, चार इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य, तीन इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, चार इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य, चार इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, असंज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य, चार इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, असंज्ञी पंचेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य उपपाद योगस्थान क्रमशः अधिक-अधिक होता है।

उससे क्रमशः अधिक-अधिक असंज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, संज्ञी लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य, असंज्ञी पंचेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट, संज्ञी निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य, संज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट उपपाद योगस्थान पल्य के असंख्यातवें भाग गुणा है। उससे अधिक गुणा सूक्ष्म एकेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य एकान्तानुवृद्धि योगस्थान है।

उससे अधिक संज्ञी पंचेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का उत्कृष्ट उपपाद योगस्थान है। उससे क्रमशः अधिक-अधिक सूक्ष्म एकेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य एकान्तानुवृद्धि, बादर एकेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक का जघन्य एकान्तानुवृद्धि, बादर एकेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक का जघन्य एकान्तानुवृद्धि योगस्थान पल्य के असंख्यातवें भाग गुणा है।

उससे पल्य के असंख्यातवें भाग गुणे अधिक-अधिक क्रमशः सूक्ष्म


लद्धीणिव्वत्तीणं, परिणामेयंतबड्ढिठाणाओ ।
परिणामट्ठाणाओ, अंतर अंतरिय उवरुवरिं ॥240॥

सरलार्थ: इसके बाद जगतश्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण स्थानों वाला चौथा अन्तर है। तदनन्तर पल्य के असंख्यातवें भाग गुणे अधिक-अधिक क्रमशः दो इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जघन्य, दो इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक उत्कृष्ट, तीन इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जघन्य, तीन इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक उत्कृष्ट, चार इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जघन्य, चार इंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक उत्कृष्ट, असंज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जघन्य, असंज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक उत्कृष्ट, संज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जघन्य, संज्ञी पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक उत्कृष्ट परिणाम योगस्थान हैं।

इसके बाद जगतश्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण स्थानों वाला पाँचवाँ अन्तर है। तत्पश्चात् पल्य के असंख्यातवें भाग गुणे अधिक-अधिक क्रमशः दो इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट, तीन इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट, चार इंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट, असंज्ञी पंचेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट, संज्ञी पंचेंद्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट एकान्तानुवृद्धि योगस्थान हैं।

इसके बाद जगतश्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण स्थानों वाला छठवाँ अन्तर है। तदुपरान्त पल्य के असंख्यातवें भाग गुणे अधिक-अधिक क्रमशः दो इंद्रिय पर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट, तीन इंद्रिय पर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट, चार इंद्रिय पर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट, असंज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट, संज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्तक जघन्य-उत्कृष्ट परिणाम योगस्थान हैं।


एदेसिं ठाणाओ, पल्लासंखेज्जभागगुणिदकमा ।
हेट्ठिमगुणहाणिसला, अण्णोण्णब्भत्थमेत्तं तु ॥241॥

सरलार्थ: ये स्थान क्रमश: पल्य के असंख्यातवें भाग गुणे अधिक-अधिक हैं। इनमें जघन्य से उत्कृष्ट योगस्थानों के बीच की अधस्तन गुणहानि नामक शलाकाएँ असंख्यात कम पल्य की वर्गशलाका प्रमाण हैं। इसे ही अन्योन्याभ्यस्तराशि की गुणकार शलाका कहते हैं।


अवरुक्कस्सेण हवे, उववादेयंतबड्ढिठाणाणं ।
एक्कसमयं हवे पुण, इदरेसिं जाव अट्ठोत्ति ॥242॥

सरलार्थ: उपपाद और एकान्तानुवृद्धि योगस्थानों का जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है तथा अन्य परिणाम योगस्थान का दो समय से लेकर आठ समय पर्यन्त निरन्तर प्रवर्तने का काल है।


अट्ठसमयस्स थोवा, उभयदिसासुवि असंखसंगुणिदा ।
चउसमयोत्ति तहे व य, उवरिं तिदुसमय-जोग्गाओ ॥243॥

सरलार्थ: आठ समय वाले सबसे कम हैं। सात समय से लेकर चार समय पर्यन्त प्रवर्तने वाले ऊपर-नीचे दोनों ओर के स्थान असंख्यातगुणे हैं और उसीप्रकार तीन समय और दो समय वाले ऊपर की ओर रहते हैं।


मज्झे जीवा बहुगा, उभयत्थ विसेसहीण-कम-जुत्ता ।
हेट्ठिमगुण-हाणिसलादुवरि-सलागा विसेसऽहिया ॥244॥

सरलार्थ: मध्य में जीव बहुत हैं, ऊपर-नीचे दोनों ओर विशेष हीन क्रम से सहित हैं। नीचे की गुणहानि शलाका से ऊपर की वही विशेष अधिक है।


दव्वतियं हेट्ठुवरिमदलवारा दुगुणमुभयमण्णोण्णं ।
जीवजवे चोद्दससयबाबीसं होदि बत्तीसं ॥245॥

सरलार्थ: क्रमश: द्रव्य आदि तीन का प्रमाण अर्थात् द्रव्य का चौदह सौ बाईस, स्थिति का बत्तीस और गुणहानि आयाम का चार है। नीचे की नाना गुणहानि का प्रमाण तीन और ऊपर की नाना गुणहानि का प्रमाण पाँच है। दोनों गुणहानि का प्रमाण आठ है। उससे नीचे और ऊपर दोनों की अन्योन्य अभ्यस्त राशि का प्रमाण आठ और बत्तीस है।
वास्तव में द्रव्य को कुछ कम तीन गुणहानि से विभाजित करने पर यवमध्य की संख्या एक सौ अट्ठाईस ज्ञात हो जाती है।


चत्तारि तिण्णि कमसो, पण अड अट्ठं तदो य बत्तीसं ।
किंचूणतिगुण-हाणिविभजिदे दव्वे दु जवमज्झं ॥246॥

सरलार्थ: क्रमश: द्रव्य आदि तीन का प्रमाण अर्थात् द्रव्य का चौदह सौ बाईस, स्थिति का बत्तीस और गुणहानि आयाम का चार है। नीचे की नाना गुणहानि का प्रमाण तीन और ऊपर की नाना गुणहानि का प्रमाण पाँच है। दोनों गुणहानि का प्रमाण आठ है। उससे नीचे और ऊपर दोनों की अन्योन्य अभ्यस्त राशि का प्रमाण आठ और बत्तीस है।
वास्तव में द्रव्य को कुछ कम तीन गुणहानि से विभाजित करने पर यवमध्य की संख्या एक सौ अट्ठाईस ज्ञात हो जाती है।


पुण्णतसजोगठाणं छेदाऽसंखस्सऽसंखबहुभागे ।
दलमिगिभागं च दलं दव्वदुगं उभयदलवारा ॥247॥

सरलार्थ: द्रव्यद्विक/द्रव्य और स्थिति का प्रमाण क्रमश: पर्याप्त त्रसजीव राशि के प्रमाण तथा पर्याप्त त्रस संबंधी परिणाम योगस्थानों के प्रमाण है। पल्य के अर्धच्छेदों के असंख्यातवें भाग प्रमाण नाना गुणहानिओं में असंख्यात का भाग देने से असंख्यात बहुभाग प्राप्त होता है। उसका आधा नीचे की गुणहानि का और शेष रहा आधा तथा शेष असंख्यातवाँ एकभाग मिलकर नाना गुणहानि का प्रमाण है।


णाणागुण-हाणिसला, छेदासंखेज्ज-भाग-मेत्ताओ ।
गुणहाणीणद्धाणं, सव्वत्थवि होदि सरिसं तु ॥248॥

सरलार्थ: नाना गुणहानिओं की संख्या पल्य के अर्धच्छेदों के असंख्यातवें भाग मात्र है। वास्तव में पूर्वोक्त स्थिति के प्रमाण में नाना गुणहानि का भाग देने से उसका आयाम/काल ज्ञात हो जाता है। यह सर्वत्र ही समान होता है।


अण्णोण्णगुणिद-रासी, पल्लासंखेज्जभाग-मेत्तं तु ।
हेट्ठिमरासीदो पुण, उवरिल्लमसंखसंगुणिदं ॥249॥

सरलार्थ: अन्योन्य अभ्यस्त राशि वास्तव में पल्य के असंख्यातवें भाग मात्र है; परन्तु नीचे की राशि से ऊपर की राशि असंख्यातगुणी है।


इगिठाणफड्ढयाओ, समयपबद्धं च जोगबड्ढी य ।
समयपबद्धचयट्ठं एदे हु पमाणफलइच्छा ॥250॥

सरलार्थ: समयप्रबद्ध का चय/बढ़ने का प्रमाण लाने के लिए वास्तव में ये दो इंद्रिय पर्याप्तक के पहले जघन्य परिणाम योगस्थान का स्पर्धक प्रमाणराशि, समयप्रबद्ध फलराशि और योगों की वृद्धि इच्छाराशि है।


बीइंदियपज्जत्तजहण्णट्ठाणादु सण्णिपुण्णस्स ।
उक्कस्सट्ठाणोत्ति य, जोगट्ठाणा कमे उड्ढा ॥251॥

सरलार्थ: दो इंद्रिय पर्याप्तक के जघन्य परिणाम योगस्थान से लेकर संज्ञी पर्याप्तक के उत्कृष्ट परिणाम योगस्थान पर्यन्त क्रम से बढ़ते हुए योगस्थान हैं।


सेढियसंखेज्जदिमा, तस्स जहण्णस्स फड्ढया होंति ।
अंगुलअसंखभागा, ठाणं पडि फड्ढया उड्ढा ॥252॥

सरलार्थ: उस जघन्य योगस्थान में श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण स्पर्धक होते हैं, प्रत्येक स्थान के प्रति सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण स्पर्धक बढ़ जाते हैं।


धुवबड्ढीबड्ढंतो, दुगुणं दुगुणं कमेण जायंते ।
चरिमे पल्लच्छेदाऽसंखेज्जदिमो गुणो होदि ॥253॥

सरलार्थ: ध्रुव/एक समान वृद्धि से बढ़ते हुए वे क्रम से दुगुने-दुगुने होते जाते हैं, अन्त में पल्य के अर्धच्छेदों के असंख्यातवें भाग गुणा होता है।


आदी अन्ते सुद्धे बड्ढिहिदे रूवसंजुदे ठाणा ।
सेढिअसंखेज्जदिमा, जोगट्ठाणा णिरंतरगा ॥254॥

सरलार्थ: पहले जघन्यस्थान को अंतिम उत्कृष्ट स्थान में से घटाने पर प्राप्त प्रमाण में वृद्धि का/सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण अविभागी प्रतिच्छेदों का भाग देकर, प्राप्त भजनफल में एक जोड़ देने से निरंतर योगस्थान की संख्या प्राप्त होती है। ये स्थान श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।


अन्तरगा तदसंखेज्जदिमा सेढी असंखभागा हु ।
सांतरणिरंतराणिवि सव्वाणिवि जोगठाणाणि ॥255॥

सरलार्थ: इनके असंख्यातवें भाग प्रमाण अन्तर वाले योगस्थान हैं। वे वास्तव में श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। उभयरूप योगस्थान सान्तर के असंख्यातवें भाग हैं। सांतर, निरंतर, मिश्र - सभी योगस्थान जगतश्रेणी के असंख्यातवें भाग ही हैं।


सुहुमणिगोद-अपज्जत्तयस्स पढमे जहण्णओ जोगो ।
पज्जत्तसण्णिपंचिंदियस्स उक्कस्सओ होदि ॥256॥

सरलार्थ: सूक्ष्मनिगोद लब्ध्यपर्याप्तक के प्रथम समय में जघन्य उपपाद योगस्थान और संज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्तक के उत्कृष्ट परिणाम योगस्थान हैं।


जोगा पयडिपदेसा, ठिदिअणुभागा कसायदो होंति ।
अपरिणदुच्छिण्णेसु य बंधट्ठिदिकारणं णत्थि ॥257॥

सरलार्थ: योग से प्रकृति और प्रदेश तथा कषाय से स्थिति और अनुभागबंध होता है। अपरिणद/उपशान्त मोह में और उच्छिन्न/क्षीण-मोह में बंध की स्थिति का कारण नहीं है।


सेढिअसंखेज्जदिमा, जोगट्ठाणाणि होंति सव्वाणि ।
तेहिं असंखेज्जगुणो, पयडीणं संगहो सव्वो ॥258॥

सरलार्थ: सभी प्रकार के योगस्थान जगत् श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। उनसे असंख्यात गुणा सभी प्रकृतियों का समूह है।


तेहिं असंखेज्जगुणा, ठिदिअवसेसा हवंति पयडीणं ।
ठिदिबंधज्झवसाणट्ठाणा तत्तो असंखगुणा ॥259॥

सरलार्थ: उससे असंख्यातगुणे प्रकृतिओं की स्थिति के भेद हैं। उनसे असंख्यात गुणे स्थितिबंधाध्यवसाय के स्थान हैं।


अणुभागाणं बंधज्झवसाणमसंखलोगगुणिदमदो ।
एत्तो अणंतगुणिदा, कम्मपदेसा मुणेयव्वा ॥260॥

सरलार्थ: उनसे असंख्यात लोकगुणे अनुभाग के बंधाध्यवसाय हैं। इनसे अनन्तगुणे कर्मों के प्रदेश स्वीकार करना चाहिए।

बंधोदयसत्त्व अधिकार: उदयाधिकार (1) (गाथा 261 से 296)

आहारं तु पमत्ते, तित्थं केवलिणि मिस्सयं मिस्से ।
सम्मं वेदगसम्मे, मिच्छदुगयदेव आणुदओ ॥261॥

सरलार्थ: वास्तव में आहारकद्विक का उदय प्रमत्त में, तीर्थंकर का उदय सयोग-अयोग केवली में, मिश्र का उदय मिश्र में, सम्यक् का उदय वेदक सम्यक्त्व में; आनुपूर्वी का उदय मिथ्यात्व, सासादन और चौथे अविरत सम्यक्त्व में ही होता है।

सासादन सम्यग्दृष्टि नरक नहीं जाता है; अत: उसके नरक गत्यानुपूर्वी का उदय नहीं होता है, शेष का उदय मिथ्यात्व से प्रारम्भ हो अपने-अपने अन्त पर्यन्त जानना चाहिए।


णिरयं सासणसम्मो, ण गच्छदित्ति य ण तस्स णिरयाणू ।
मिच्छादिसु सेसुदओ, सगसगचरिमोत्ति णायव्वो ॥262॥

सरलार्थ: सासादन सम्यग्दृष्टि नरक नहीं जाता है; अत: उसके नरक गत्यानुपूर्वी का उदय नहीं होता है, शेष का उदय मिथ्यात्व से प्रारम्भ हो अपने-अपने अन्त पर्यन्त जानना चाहिए।


दस चउरिगि सत्तरसं, अट्ठ य तह पंच चेव चउरो य ।
छच्छक्क एक्क दुगदुग, चोद्दस उगुतीस तेरसुदयविधि ॥263॥

सरलार्थ: अभेद विवक्षा में श्रीयुत यतिवृषभ आचार्य के अनुसार चौदह गुणस्थानों में क्रमश: १०, ४, १, १७, ८, ५, ४, ६, ६, १, २, २, १४, २९ और १३ कर्मप्रकृतियों की उदय-व्युच्छित्ति है।


पण णव इगि सत्तरसं अड पंच य चउर छक्क छच्चेव ।
इगिदुग सोलस तीसं, बारस उदये अजोगंता ॥264॥

सरलार्थ: अभेद विवक्षा में श्रीयुत भूतबली आचार्य के अनुसार चौदह गुणस्थानों में क्रमश: ५, ९, १, १७, ८, ५, ४, ६, ६, १, २, १६, ३० और १२ कर्मप्रकृतियों की उदय-व्युच्छित्ति है।


मिच्छे मिच्छादावं, सुहुमतियं सासणे अणेइंदी ।
थावरवियलं मिस्से, मिस्सं च य उदय वोच्छिण्णा ॥265॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व में मिथ्यात्व, आताप, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण - इन ५ की; सासादन में अनन्तानुबंधी चतुष्क, एकेंद्रिय, स्थावर, विकलत्रय - इन ९ की; मिश्र में १ मिश्रप्रकृति की उदय-व्युच्छित्ति होती है।


अयदे बिदियकसाया, वेगुव्वियछक्क णिरयदेवाऊ ।
मणुयतिरियाणुपुव्वी, दुब्भगणादेज्ज अजसयं ॥266॥

सरलार्थ: चौथे में दूसरी अप्रत्याख्यानावरण, वैक्रियिकषट्क, नरकायुष्क, देवायुष्क, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति - इन १७ की उदय-व्युच्छित्ति होती है।


देसे तदियकसाया, तिरिया उज्जोवणीचतिरियगदी ।
छट्ठे आहारदुगं, थीणतियं उदयवोच्छिण्णा ॥267॥

सरलार्थ: देशसंयत में तीसरी प्रत्याख्यानावरण कषाय, तिर्यंच आयुष्क, उद्योत, नीचगोत्र, तिर्यंचगति - इन ८ की; छठवें गुणस्थान में आहारकद्विक, स्त्यानगृद्धित्रिक - इन ५ प्रकृतियों की उदय से व्युच्छित्ति होती है।


अपमत्ते सम्मत्तं, अंतिमतियसंहदीयऽपुव्वम्हि ।
छच्चेव णोकसाया, अणियट्टीभागभागेसु ॥268॥

सरलार्थ: अप्रमत्त संयत में सम्यक्त्व प्रकृति, अन्त के तीन संहनन - इन ४ की;


वेदतिय कोहमाणं, मायासंजलणमेव सुहुमंते ।
सुहुमो लोहो संते, बज्जं णारायणारायं ॥269॥

सरलार्थ: अनिवृत्तिकरण के सवेद और अवेद भाग में से सवेद भाग में तो पुरुष आदि ३ वेदों की और अवेद भाग में संज्वलन क्रोध, मान, माया - इन ३ की; इसप्रकार कुल ६ की उदय-व्युच्छित्ति है। सूक्ष्मसांपराय के अन्त में सूक्ष्म लोभ की; उपशान्त मोह में बज्रनाराच और नाराच - इन २ की उदय-व्युच्छित्ति है।


खीणकसाय दुचरिमे, णिद्दा पयला य उदयवोच्छिण्णा ।
णाणंतराय-दसयं, दंसणचत्तारि चरिमम्हि ॥270॥

सरलार्थ: क्षीणकषाय के उपान्त्य समय में निद्रा और प्रचला - इन २ की तथा अन्त में ज्ञानावरण ५, अन्तराय ५, दर्शनावरण ४ - इन १४ की; इसप्रकार कुल १६ की उदय-व्युच्छित्ति होती है।


तदियेक्क-बज्जणिमिणं, थिरसुहसरगदिउरालतेजदुगं ।
संठाणं वण्णागुरुचउक्क पत्तेय जोगिम्हि ॥271॥

सरलार्थ: सयोगकेवली में तीसरे वेदनीय की कोई एक, बज्रवृषभनाराच, निर्माण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुस्वर, दुःस्वर, प्रशस्तविहायोगति, अप्रशस्त विहायोगति, औदारिक शरीर, औदारिक अंगोपांग, तैजस, कार्मण, छहों संस्थान; वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रत्येक शरीर - इन ३० की उदय-व्युच्छित्ति है।


तदियेक्कं मणुवगदी, पंचिंदियसुभगतसतिगादेज्जं ।
जसतित्थं मणुवाऊ, उच्चं च अजोगचरिमम्हि ॥272॥

सरलार्थ: अयोगकेवली में तीसरे वेदनीय की शेष रही एक, मनुष्यगति, पंचेंद्रिय, सुभग, त्रस, बादर, पर्याप्त, आदेय, यशस्कीर्ति, तीर्थंकर, मनुष्य आयुष्क, उच्चगोत्र - इन १२ की उदय-व्युच्छित्ति है।


णट्ठा य रायदोसा, इंदियणाणं च केवलिम्हि जदो ।
तेण दु सादासादज सुहदुक्खं णत्थि इंदियजं ॥273॥

सरलार्थ: क्योंकि केवली के राग, द्वेष और इंद्रिय ज्ञान नष्ट हो गए हैं; इसलिए वास्तव में साता और असाता से उत्पन्न, इंद्रियों से उत्पन्न सुख-दुःख उन्हें नहीं हैं।


समयट्ठिदिगो बंधो, सादस्सुदयप्पिगो जदो तस्स ।
तेण असादस्सुदओ, सादसरूवेण परिणमदि ॥274॥

सरलार्थ: क्योंकि उस साता का एक समय की स्थिति वाला बंध उदयात्मक होता है; इसलिए असाता का उदय सातारूप से परिणमित हो जाता है।


एदेण कारणेण दु, सादस्सेव दु णिरंतरो उदओ ।
तेणासादणिमित्ता, परीसहा जिणवरे णत्थि ॥275॥

सरलार्थ: इसकारण वास्तव में उनके सतत साता का ही उदय है; इसलिए वास्तव में जिनेन्द्र भगवान् में असातानिमित्तक परिषह नहीं हैं।


सत्तरसेक्कारखचदुसहियसयं सगिगिसीदि छदुसदरी ।
छावट्ठि-सट्ठि-णवसगवण्णास दुदालबारुदया ॥276॥

सरलार्थ: १४ गुणस्थानों में क्रमश: ११७, १११, १००, १०४, ८७, ८१, ७६, ७२, ६६, ६०, ५९, ५७, ४२ और १२ प्रकृतियों का उदय होता है।
१४ गुणस्थानों में क्रमश: ५, ११, २२, १८, ३५, ४१, ४६, ५०, ५६, ६२, ६३, ६५, ८० और ११० कर्म प्रकृतियों का अनुदय है।


पंचेक्कारस-बाबीसट्ठारसपंच-तीस-इगिछादालं ।
पण्णं छप्पण्णं बितिपणसट्ठि असीदि दुगुणपणवण्णं ॥277॥

सरलार्थ: १४ गुणस्थानों में क्रमश: ११७, १११, १००, १०४, ८७, ८१, ७६, ७२, ६६, ६०, ५९, ५७, ४२ और १२ प्रकृतियों का उदय होता है।
१४ गुणस्थानों में क्रमश: ५, ११, २२, १८, ३५, ४१, ४६, ५०, ५६, ६२, ६३, ६५, ८० और ११० कर्म प्रकृतियों का अनुदय है।


उदयस्सुदीरणस्स य, सामित्तादो ण विज्जदि विसेसो ।
मोत्तूण तिण्णिठाणं, पमत्त जोगी अजोगी य ॥278॥

सरलार्थ: प्रमत्तसंयत, सयोगकेवली और अयोगकेवली - इन तीन गुणस्थानों को छोड़कर शेष में उदय और उदीरणा के स्वामीपने की अपेक्षा अन्तर नहीं है।


तीसं बारस उदयुच्छेदं केवलिणमेकदं किच्चा ।
सादमसादं च तहिं, मणुवाउगमवणिदं किच्चा ॥279॥

सरलार्थ: केवलिओं के उदय-व्युच्छित्ति वाली ३० और १२ - इन दोनों को मिलाकर; उनमें से साता, असाता और मनुष्य आयुष्क को कम करना।


अवणिदतिप्पयडीणं, पमत्तविरदे उदीरणा होदि ।
णत्थित्ति अजोगिजिणे, उदीरणा उदयपयडीणं ॥280॥

सरलार्थ: कम की गई इन ३ प्रकृतिओं की उदीरणा प्रमत्तविरत में होती है। शेष ३९ प्रकृतिओं की उदीरणा सयोगकेवली के होती है। अयोगी जिन में उदय-प्रकृतिओं की उदीरणा नहीं है।


पण णव इगि सत्तरसं, अट्ठट्ठ य चदुर छक्क छच्चेव ।
इगि दुग सोलुगदालं, उदीरणा होंति जोगंता ॥281॥

सरलार्थ: गुणस्थानों में सयोगी पर्यन्त उदीरणा की व्युच्छित्ति क्रमश: ५, ९, १, १७, ८, ८, ४, ६, ६, १, २, १६, ३९ प्रकृतियों की होती है।


सत्तरसेक्कारखचदुसहियसयं सगिगिसीदि तियसदरी ।
णवतिण्णिसट्ठि सगछक्कवण्ण चउवण्णमुगुदालं ॥282॥

सरलार्थ: प्रमत्तसंयत, सयोगकेवली और अयोगकेवली - इन तीन गुणस्थानों को छोड़कर शेष में उदय और उदीरणा के स्वामीपने की अपेक्षा


पंचेक्कारसबाबीसट्ठारस पंचतीस इगिणवदालं ।
तेवण्णेक्कुणसट्ठी, पणछक्कड सट्ठि तेसीदि ॥283॥

सरलार्थ: प्रमत्तसंयत, सयोगकेवली और अयोगकेवली - इन तीन गुणस्थानों को छोड़कर शेष में उदय और उदीरणा के स्वामीपने की अपेक्षा


गदियादिसु जोग्गाणं, पयडिप्पहुदीणमोघसिद्धाणं ।
सामित्तं णेदव्वं, कमसो उदयं समासेज्ज ॥284॥

सरलार्थ: गुणस्थानों में बताया गया यथायोग्य प्रकृति आदि का स्वामित्व उदय की अपेक्षा गति आदि में घटित करना चाहिए।


गदिआणु आउउदओ, सपदे भूपुण्णबादरे ताओ ।
उच्चुदओ णरदेवे, थीणतिगुदओ णरे तिरिये ॥285॥

सरलार्थ: एक समान गति, आनुपूर्वी, आयुष्क का उदय एक साथ होता है। आताप का उदय पृथ्वीकायिक बादर पर्याप्तक में, उच्च गोत्र का उदय मनुष्य और देव में, स्त्यानगृद्धित्रिक का उदय मनुष्य और तिर्यंच में होता है।


संखाउगणरतिरिए, इंदियपज्जत्तगादु थीणतियं ।
जोग्गमुदेदुं वज्जिय, आहार-विगुव्वणुट्ठवगे ॥286॥

सरलार्थ: आहारक और वैक्रियिक ऋद्धि के उत्थापक को छोड़कर संख्यात वर्ष की आयुवाले मनुष्य-तिर्यंच में इंद्रियपर्याप्ति की पूर्णता होने पर स्त्यानगृद्धि त्रिक उदय के योग्य है।


अयदापुण्णे ण हि थी, संढोवि य धम्मणारयं मुच्चा ।
थीसंढयदे कमसो णाणुचऊ चरिमतिण्णाणू ॥287॥

सरलार्थ: धर्मा नामक पहली पृथ्वी के नरकों को छोड़कर चौथे अविरत सम्यक्त्व मय अपर्याप्तक दशा में स्त्री और नपुंसक वेद का उदय नहीं है। क्रमशः स्त्री वेद युक्त चौथे में चारों आनुपूर्वी का और नपुंसक वेद सहित इसमें अन्तिम तीन आनुपूर्वी का उदय नहीं होता है।


इगिविगल थावरचऊ, तिरिए अपुण्णो णरेवि संघडणं ।
ओरालदु-णरतिरिए, वेगुव्वदु-देवणेरयिए ॥288॥

सरलार्थ: एकेंद्रिय, विकलत्रय, स्थावर चतुष्क का तिर्यंच में; अपर्याप्तक का तिर्यंच और मनुष्य में ही; संहनन और औदारिकद्विक का मनुष्य और तिर्यंच में; वैक्रियिकद्विक का देव और नारकी में उदय होता है।


तेउतिगूणतिरिक्खे सुज्जोवो बादरेसु पुण्णेसु ।
सेसाणं पयडीणं ओघं वा होदि उदओ दु ॥289॥

सरलार्थ: तैजस त्रिक को छोड़कर बादर पर्याप्तक तिर्यंचों में उद्योत प्रकृति का उदय होता है। शेष प्रकृतिओं का उदय वास्तव में गुणस्थान के समान है।


थीणतिथी-पुरिसूणा, घादी णिरयाउणीचवेयणियं ।
णामे सगवचिठाणं, णिरयाणू णारयेसुदया ॥290॥

सरलार्थ: स्त्यानगृद्धित्रिक, स्त्रीवेद और पुरुषवेद - इन पाँच प्रकृतिओं को कमकर शेष ४२ घाति की; नरकायुष्क, नीचगोत्र, वेदनीय, अपनी वचन पर्याप्ति के स्थान में उदयवाली नामकर्म की २९, नरकगत्यानुपूर्वी - ये ७६ प्रकृतिआँ नरकगति में उदय-योग्य हैं।


वेगुव्वतेजथिर-सुहदुग-दुग्गदिहुंडणिमिण-पंचिंदी ।
णिरयगदि-दुब्भगागुरु-तसवण्णचऊ य वचिठाणं ॥291॥

सरलार्थ: वैक्रियिकद्विक, तैजसद्विक, स्थिरद्विक, शुभद्विक, अप्रशस्त विहायोगति, हुण्डक, निर्माण, पंचेंद्रिय, नरकगति, दुर्भग चतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, त्रस चतुष्क और वर्ण चतुष्क - ये २९ प्रकृतिआँ वचन पर्याप्ति के स्थान पर उदयरूप हैं।


मिच्छमणंतं मिस्सं, मिच्छादितिए कमा छिदी अयदे ।
बिदिय-कसाया-दुब्भगणादेज्ज-दुगाउणिरय-चऊ ॥292॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानों में क्रमश: मिथ्यात्व, अनन्तानुबंधी, मिश्र की व्युच्छित्ति होती है। चौथे में दूसरी अप्रत्याख्यानावरण कषाय, दुर्भगद्विक, अनादेयद्विक, नरकायुष्क, नरकचतुष्क - इन १३ की उदय-व्युच्छित्ति है।


बिदियादिसु छसु पुढविसु, एवं णवरि य असंजदट्ठाणे ।
णत्थि णिरयाणुपुव्वी, तिस्से मिच्छेव वोच्छेदो ॥293॥

सरलार्थ: दूसरी आदि शेष सभी छहों पृथ्विओं में इसीप्रकार की व्यवस्था है। यहाँ विशेष मात्र इतना है कि असंयत नामक चौथे गुणस्थान में नरकगत्या-


तिरिये ओघो सुरणरणिरयाऊ-उच्च-मणुदुहार-दुगं ।
वेगुव्वछक्कतित्थं, णत्थि हु एमेव सामण्णे ॥294॥

सरलार्थ: तिर्यंचगति में ओघ/गुणस्थान के समान ही उदय-त्रिभंगी है। विशेष यह है कि यहाँ देवायुष्क, मनुष्यायुष्क, नरकायुष्क, उच्चगोत्र, मनुष्यद्विक, आहारकद्विक, वैक्रियिकषट्क, तीर्थंकर - ये १५ प्रकृतिआँ नहीं हैं। वास्तव में इसीप्रकार सामान्य तिर्यंच में है।


थावरदुगसाहारणताविगिविगलूण ताणि पंचक्खे ।
इत्थिअपज्जत्तूणा ते पुण्णे उदयपयडीओ ॥295॥

सरलार्थ: स्थावरद्विक, साधारण, आतप, एकेंद्रिय, विकलत्रय को कमकर शेष पंचेंद्रिय तिर्यंचों में उदय-योग्य हैं। स्त्रीवेद और अपर्याप्तक को कमकर शेष वे पर्याप्तक की उदय-प्रकृतिआँ हैं।


पुंसंढूणित्थिजुदा, जोणिणिये अविरदे ण तिरियाणू ।
पुण्णिदरे थी थीणति, परघाददु, पुण्णउज्जोवं ॥296॥

सरलार्थ: उनमें से पुरुषवेद और नपुंसकवेद को कमकर, स्त्रीवेद मिलाने पर स्त्रीवेदी तिर्यंच की उदय-प्रकृतिआँ हैं। इनके अविरत गुणस्थान में तिर्यंचगत्यानुपूर्वी का उदय नहीं है। अपर्याप्तक तिर्यंच में स्त्री वेद, स्त्यानगृद्धि-

बंधोदयसत्त्व अधिकार: उदयाधिकार (2) (गाथा 297 से 332)

सुरगदिदु-जसादेज्जं, आदीसंठाण-संहदीपणगं ।
सुभगं सम्मं मिस्सं, हीणा तेऽपुण्ण-संढजुदा ॥297॥

सरलार्थ: तिर्यंचगति में ओघ/गुणस्थान के समान ही उदय-त्रिभंगी है। विशेष यह है कि यहाँ देवायुष्क, मनुष्यायुष्क, नरकायुष्क, उच्चगोत्र, मनुष्यद्विक, आहारकद्विक, वैक्रियिकषट्क, तीर्थंकर - ये १५ प्रकृतिआँ नहीं हैं। वास्तव में इसीप्रकार सामान्य तिर्यंच में है।
स्थावरद्विक, साधारण, आताप, एकेंद्रिय, विकलत्रय को कमकर शेष पंचेंद्रिय तिर्यंचों में उदय-योग्य हैं। स्त्रीवेद और अपर्याप्तक को कमकर शेष वे पर्याप्तक की उदय-प्रकृतिआँ हैं।
उनमें से पुरुषवेद और नपुंसकवेद को कमकर, स्त्रीवेद मिलाने पर स्त्रीवेदी तिर्यंच की उदय-प्रकृतिआँ हैं। इनके अविरत गुणस्थान में तिर्यंचगत्यानुपूर्वी का उदय नहीं है। अपर्याप्तक तिर्यंच में स्त्री वेद, स्त्यानगृद्धि-


मणुवे ओघो थावर-तिरियादावदुग-एयवियलिंदी ।
साहरणिदराउतियं, वेगुव्वियछक्क परिहीणो ॥298॥

सरलार्थ: स्थावरद्विक, तिर्यंचद्विक, आतापद्विक, एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय, साधारण, शेष तीन आयुष्क, वैक्रियिक षट्क को कमकर शेष सब मनुष्य में सामान्य के समान है।


मिच्छमपुण्णं छेदो, अणमिस्सं मिच्छगादितिसु अयदे ।
बिदियकसायणराणू, दुब्भगणादेज्ज अज्जसयं ॥299॥

सरलार्थ: यहाँ मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानों में क्रमश: मिथ्यात्व, अपर्याप्त; अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ; मिश्र की उदय व्युच्छित्ति है। चौथे में दूसरी कषाय, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति की व्युच्छित्ति है।


देसे तदियकसाया, णीचं एमेव मणुस-सामण्णे ।
पज्जत्ते वि य इत्थी वेदापज्जत्तपरिहीणो ॥300॥

सरलार्थ: पाँचवें में तीसरी कषाय और नीच गोत्र की उदय-व्युच्छित्ति है। आगे गुणस्थानवत् ही है। स्त्रीवेद और अपर्याप्त को कम कर पर्याप्त में भी मनुष्य सामान्य के समान है।


मणुसिणि एत्थीसहिदा, तित्थयराहारपुरिससंढूणा ।
पुण्णिदरेव अपुण्णे सगाणुगदिआउगं णेयं ॥301॥

सरलार्थ: मनुष्यिनी में स्त्रीवेद से सहित तथा तीर्थंकर, आहारकद्विक, पुरुषवेद, नपुंसकवेद से रहित है। अपनी/मनुष्य आनुपूर्वी, गति, आयुष्क सहित अपर्याप्त में शेष अपर्याप्त तिर्यंचों के समान जानना चाहिए।


मणुसोघं वा भोगे, दुब्भगचउणीचसंढथीणतियं ।
दुग्गदितित्थमपुण्णं, संहदिसंठाणचरिमपणं ॥302॥

सरलार्थ: भोगभूमि मनुष्य में दुर्भग चतुष्क, नीचगोत्र, नपुंसक वेद, स्त्यानगृद्धित्रिक, अप्रशस्तविहायोगति, तीर्थंकर, अपर्याप्त, अंतिम ५ संहनन, अंतिम ५ संस्थान, आहारकद्विक को कम कर शेष मनुष्य सामान्य के समान है।


हारदुहीणा एवं, तिरिये मणुदुच्चगोदमणुवाउं ।
अवणिय पक्खिव णीचं, तिरियदु तिरियाउ उज्जोवं ॥303॥

सरलार्थ: भोगभूमि तिर्यंच में मनुष्यद्विक, उच्चगोत्र, मनुष्य आयुष्क को कम कर नीच गोत्र, तिर्यंचद्विक, तिर्यंच-आयुष्क, उद्योत को मिलाकर शेष मनुष्यों के समान है।


भोगं व सुरे णरचउणराउबज्जूण सुरचउसुराउं ।
खिवदेवे णेवित्थी, इत्थिम्मि ण पुरुसवेदो य ॥304॥

सरलार्थ: नरचतुष्क, नरआयुष्क, बज्रवृषभनाराच कम हो; देव गति, देव-गत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, देव आयुष्क मिल जाने से देव में भोगभूमिज मनुष्य के समान उदय-त्रिभंगी है। यहाँ देव में स्त्रीवेद का और देवी में पुरुषवेद का उदय नहीं होने से उदय-योग्य ७६ हैं।


अविरदठाणं एक्कं, अणुद्दिसादिसु सुरोघमेव हवे ।
भवणति-कप्पित्थीणं असंजदे णत्थि देवाणू ॥305॥

सरलार्थ: अनुदिश आदि में देव-सामान्य सम ही व्यवस्था है; परन्तु यहाँ गुणस्थान मात्र एक अविरत सम्यक्त्व ही है। भवनत्रिक, कल्पवासिनी देविओं के चौथे गुणस्थान में देवगत्यानुपूर्वी नहीं है।


तिरियअपुण्णं वेगे, परघादचउक्कपुण्णसाहरणं ।
एइंदिय-जसथीणति-थावरजुगलं च मिलिदव्वं ॥306॥

सरलार्थ: परघात चतुष्क, पर्याप्तक, साधारण, एकेंद्रिय, यशस्कीर्ति, स्त्यानगृद्धित्रिक, स्थावर युगल मिलकर और अंगोपांग, त्रस, सृपाटिका संहनन, पंचेंद्रिय कम होकर शेष एकेंद्रिय में तिर्यंच अपर्याप्तक के समान है। इसीप्रकार यहाँ स्थावर युगल, साधारण, एकेंद्रिय, आतप कम हो; त्रस, अप्रशस्त विहायोगति, दुःस्वर, अंगोपांग, अपनी-अपनी जाति, सृपाटिका संहनन मिलकर विकलेंद्रिय में उदय-योग्य हैं। साधारण, एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय, आतप, स्थावरद्विक कम हो पंचेंद्रिय में शेष सामान्य सम है।


रिणमंगोवंग-तसं, संहदि-पंचक्खमेवमिह वियले ।
अवणिय थावरजुगलं, साहरणेयक्खमादावं ॥307॥

सरलार्थ: परघात चतुष्क, पर्याप्तक, साधारण, एकेंद्रिय, यशस्कीर्ति, स्त्यानगृद्धित्रिक, स्थावर युगल मिलकर और अंगोपांग, त्रस, सृपाटिका संहनन, पंचेंद्रिय कम होकर शेष एकेंद्रिय में तिर्यंच अपर्याप्तक के समान है। इसीप्रकार यहाँ स्थावर युगल, साधारण, एकेंद्रिय, आतप कम हो; त्रस, अप्रशस्त विहायोगति, दु:स्वर, अंगोपांग, अपनी-अपनी जाति, सृपाटिका संहनन मिलकर विकलेंद्रिय में उदय-योग्य हैं। साधारण, एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय, आतप, स्थावरद्विक कम हो पंचेंद्रिय में शेष सामान्य सम है।


खिव तस-दुग्गदि-दुस्सरमंगोवंगं सजादिसेवट्टं ।
ओघं सयले साहरणिगि-विगलादावथावर दुगूणं ॥308॥

सरलार्थ: परघात चतुष्क, पर्याप्तक, साधारण, एकेंद्रिय, यशस्कीर्ति, स्त्यानगृद्धित्रिक, स्थावर युगल मिलकर और अंगोपांग, त्रस, सृपाटिका संहनन, पंचेंद्रिय कम होकर शेष एकेंद्रिय में तिर्यंच अपर्याप्तक के समान है। इसीप्रकार यहाँ स्थावर युगल, साधारण, एकेंद्रिय, आतप कम हो; त्रस, अप्रशस्त विहायोगति, दुःस्वर, अंगोपांग, अपनी-अपनी जाति, सृपाटिका संहनन मिलकर विकलेंद्रिय में उदय-योग्य हैं। साधारण, एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय, आतप, स्थावरद्विक कम हो पंचेंद्रिय में शेष सामान्य सम है।


एयं वा पणकाये, ण हि साहारणमिणं च आदावं ।
दुसु तद्दुगमुज्जोवं, कमेण चरिमम्हि आदावं ॥309॥

सरलार्थ: पाँच स्थावरकायिकों में से क्रमश: साधारण, आतप, दोनों में उन दोनों के साथ उद्योत और अंतिम में आतप नहीं है; शेष उदय एकेंद्रिय के समान है। त्रस में स्थावरद्विक, साधारण, एकेंद्रिय, आतप नहीं हैं; शेष सामान्य, सामान्य के समान है।


ओघं तसे ण, थावरदुगसाहरणेयतावमथ ओघं
मणवयणसत्तगे ण हि, ताविगिविगलं च थावराणुचओ ॥310॥

सरलार्थ: त्रस में स्थावरद्विक, साधारण, एकेंद्रिय, आताप नहीं हैं; शेष सामान्य, सामान्य के समान है।


अणुभयवचिवियलजुदा, ओघमुराले ण हारदेवाऊ ।
वेगुव्वछक्कणरतिरियाणु अपज्जत्तणिरयाऊ ॥311॥

सरलार्थ: अनुभयवचन में विकलत्रय मिलने से ११२ हैं। औदारिक में आहारकद्विक, देवायुष्क, वैक्रियिक षट्क, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, अपर्याप्त, नरक आयुष्क नहीं हैं; शेष सामान्य के समान है।


तम्मिस्से पुण्णजुदा, ण मिस्सथीणतियसरविहायदुगं ।
परघादचओ अयदे, णादेज्जदु दुब्भगं ण संढिच्छी ॥312॥

सरलार्थ: औदारिक मिश्र में पर्याप्त मिल जाती है तथा मिश्र, स्त्यानगृद्धित्रिक, स्वरद्विक, विहायोगतिद्विक, परघात, आताप, उद्योत, उच्छ्वास नहीं हैं। चौथे में अनादेयद्विक, दुर्भग, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद नहीं हैं।


साणे तेसिं छेदो, वामे चत्तारि चोद्दसा साणे ।
चउदालं वोच्छेदो, अयदे जोगिम्हि छत्तीसं ॥313॥

सरलार्थ: उनकी व्युच्छित्ति सासादन में हो जाती है। पहले में ४, सासादन में १४, चौथे में ४४, सयोगकेवली में ३६ की व्युच्छित्ति है।


देवोघं वेगुव्वे, ण सुराणू पक्खिवेज्ज णिरयाऊ ।
णिरयगदिहुंडसंढं, दुग्गदि-दुब्भगचओ णीचं ॥314॥

सरलार्थ: वैक्रियिक में देवगत्यानुपूर्वी नहीं है तथा नरकायुष्क, नरकगति, हुण्डक संस्थान, नपुंसकवेद, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भगचतुष्क और नीचगोत्र को मिलाकर देव सामान्य के समान है।


वेगुव्वं वा मिस्से, ण मिस्स परघादसरविहायदुगं ।
साणे ण हुंडसंढं, दुब्भगणादेज्जअज्जसयं ॥315॥

सरलार्थ: वैक्रियिक मिश्र में मिश्र, परघातद्विक, स्वरद्विक, विहायोगतिद्विक नहीं है। सासादन में हुण्डक संस्थान, नपुंसकवेद, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति, नरकगति, नरकायुष्क, नीचगोत्र नहीं है। यहाँ स्त्रीवेद कम हो जाता है। वे चौथे में मिल जाती हैं। शेष वैक्रियिक के समान है।


णिरयगदिआउणीचं, ते खित्तयदेऽवणिज्ज थीवेदं ।
छट्ठगुणं वाहारे, ण थीणतियसंढ-थीवेदं ॥316॥

सरलार्थ: सासादन में हुण्डक संस्थान, नपुंसकवेद, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति, नरकगति, नरकायुष्क, नीचगोत्र नहीं है। यहाँ स्त्रीवेद कम हो जाता है। वे चौथे में मिल जाती हैं। शेष वैक्रियिक के समान है। आहारक में स्त्यानगृद्धित्रिक, नपुंसक, स्त्रीवेद, अप्रशस्त विहायोगति, दुःस्वर, संहनन, औदारिकद्विक, अन्त के ५ संस्थान नहीं हैं; शेष छठवें गुणस्थान के समान है।


दुग्गदिदुस्सरसंहदि, ओरालदुचरिमपंचसंठाणं ।
ते तम्मिस्से सुस्सर, परघाददुसत्थगदि-हीणा ॥317॥

सरलार्थ: आहारक में स्त्यानगृद्धित्रिक, नपुंसक, स्त्रीवेद, अप्रशस्त विहायोगति, दुःस्वर, संहनन, औदारिकद्विक, अन्त के ५ संस्थान नहीं हैं; शेष छठवें गुणस्थान के समान है। आहारक मिश्र में सुस्वर, परघात २, प्रशस्तविहायोगति भी कम हो जाती हैं।


ओघं कम्मे सरगदि-पत्तेयाहारुरालदुग-मिस्सं ।
उवघादपणविगुव्वदुथीणतिसंठाणसंहदी णत्थि ॥318॥

सरलार्थ: कार्मण में स्वरद्विक, विहायोगतिद्विक, प्रत्येकद्विक, आहारकद्विक, औदारिकद्विक, मिश्र, उपघात आदि ५, वैक्रियिकद्विक, स्त्यानगृद्धित्रिक,


साणे थीवेदछिदी, णिरयदुणिरयाउगं ण तियदसयं ।
इगिवण्णं पणवीसं, मिच्छादिसु चउसु वोच्छेदो ॥319॥

सरलार्थ: चार मनोयोग और तीन वचनयोग - इन ७ में आताप, एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण और आनुपूर्वी चतुष्क नहीं हैं; अतः उदय योग्य १०९ हैं।

अनुभयवचन में विकलत्रय मिलने से ११२ हैं। औदारिक में आहारक-द्विक, देवायुष्क, वैक्रियिक षट्क, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, अपर्याप्त, नरक आयुष्क नहीं हैं; शेष सामान्य के समान है।

औदारिक मिश्र में पर्याप्त मिल जाती है तथा मिश्र, स्त्यानगृद्धित्रिक, स्वरद्विक, विहायोगतिद्विक, परघात, आताप, उद्योत, उच्छ्वास नहीं हैं। चौथे में अनादेयद्विक, दुर्भग, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद नहीं हैं। उनकी व्युच्छित्ति सासादन में हो जाती है। पहले में ४, सासादन में १४, चौथे में ४४, सयोगकेवली में ३६ की व्युच्छित्ति है।

वैक्रियिक में देवगत्यानुपूर्वी नहीं है तथा नरकायुष्क, नरकगति, हुण्डक संस्थान, नपुंसकवेद, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भगचतुष्क और नीचगोत्र को मिलाकर देव सामान्य के समान है।

वैक्रियिक मिश्र में मिश्र, परघातद्विक, स्वरद्विक, विहायोगतिद्विक नहीं है। सासादन में हुण्डक संस्थान, नपुंसकवेद, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति, नरकगति, नरकायुष्क, नीचगोत्र नहीं है। यहाँ स्त्रीवेद कम हो जाता है। वे चौथे में मिल जाती हैं। शेष वैक्रियिक के समान है। आहारक में स्त्यानगृद्धित्रिक, नपुंसक, स्त्रीवेद, अप्रशस्त विहायोगति, दुःस्वर, संहनन, औदारिकद्विक, अन्त के ५ संस्थान नहीं हैं; शेष छठवें गुणस्थान के समान है। आहारक मिश्र में सुस्वर, परघात २, प्रशस्तविहायोगति भी कम हो जाती हैं।

कार्मण में स्वरद्विक, विहायोगतिद्विक, प्रत्येकद्विक, आहारकद्विक, औदारिकद्विक, मिश्र, उपघात आदि ५, वैक्रियिकद्विक, स्त्यानगृद्धित्रिक,


मूलौघं पुंवेदे, थावरचउ-णिरयजुगल-तित्थयरं ।
इगिविगलं थीसंढं, तावं णिरयाउगं णत्थि ॥320॥

सरलार्थ: पुरुषवेद में स्थावर चतुष्क, नरकद्विक, तीर्थंकर, एकेंद्रिय, विकलत्रय, स्त्री, षंढ, आताप, नरकायुष्क नहीं है; शेष सामान्य मूलवत् है।


इत्थीवेदे वि तहा, हारदु पुरिसूणमित्थिसंजुत्तं ।
ओघं संढे ण हि सुरहारदु-थी पुंसुराउ-तित्थयरं ॥321॥

सरलार्थ: स्त्रीवेद में भी आहारकद्विक, पुरुषवेद कम हो और स्त्रीवेद मिलकर शेष उसीप्रकार है। नपुंसकवेद में भी वास्तव में देवद्विक, आहारकद्विक, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, देवायुष्क, तीर्थंकर नहीं है; शेष सामान्यवत् है।


तित्थयरमाणमायालोहचउक्कूणमोघमिह कोहे ।
अणरहिदे विगिविगलं, तावऽणकोहाणुथावरचउक्कं ॥322॥

सरलार्थ: यहाँ कषाय मार्गणा में तीर्थंकर, चारों मान, चारों माया, चारों लोभ कम हैं; शेष सामान्य के समान है। अनन्तानुबंधी रहित क्रोध में एकेंद्रिय, विकलत्रय, आताप, अनन्तानुबंधी क्रोध, आनुपूर्वी चतुष्क, स्थावर चतुष्क नहीं हैं।
मान आदि तीनों कषायों में इसीप्रकार है।


एवं माणादितिए, मदिसुदअण्णाणगे दु सगुणोघं ।
वेभंगेवि ण ताविगिविगलिंदी थावराणुचऊ ॥323॥

सरलार्थ: मान आदि तीनों कषायों में इसीप्रकार है।


सण्णाणपंचयादी, दंसणमग्गणपदोत्ति सगुणोघं ।
मणपज्जवपरिहारे, णवरि ण संढित्थि-हार-दुगं ॥324॥

सरलार्थ: पाँच सम्यग्ज्ञान से प्रारंभ कर दर्शन मार्गणास्थान पर्यन्त अपने-अपने गुणस्थान के समान सामान्य है। विशेष इतना है कि मन:पर्ययज्ञान और परिहार विशुद्धि संयम में नपुंसक वेद, स्त्रीवेद और आहारकद्विक नहीं है।


चक्खुम्मि ण साहारणताविगिबितिजाइ थावरं सुहुमं ।
किण्हदुगे सगुणोघं, मिच्छे णिरयाणुवोच्छेदो ॥325॥

सरलार्थ: चक्षुदर्शन में साधारण, आताप, एकेंद्रिय जाति, दो इंद्रिय जाति, तीनेंद्रिय जाति, स्थावर, सूक्ष्म नहीं है। कृष्ण और नील लेश्या में अपने-अपने गुणस्थान के समान सामान्य है। यहाँ मिथ्यात्व में नरकानुपूर्वी की व्युच्छित्ति है।


साणे सुराउसुरगदिदेवतिरिक्खाणु वोछिदी एवं ।
काओदे अयदगुणे, णिरयतिरिक्खाणुवोछेदो ॥326॥

सरलार्थ: दूसरे गुणस्थान में देवायुष्क, देवगति, देव गत्यानुपूर्वी, तिर्यंच गत्यानुपूर्वी की व्युच्छित्ति है। कापोत में भी इसीप्रकार है; परन्तु यहाँ चौथे गुणस्थान में नरक गत्यानुपूर्वी, तिर्यंच गत्यानुपूर्वी की व्युच्छित्ति है।


तेउतिये सगुणोघं, णादाविगिविगलथावरचउक्कं ।
णिरयदुतदाउतिरियाणुगं णराणू ण मिच्छदुगे ॥327॥

सरलार्थ: तेज, पद्म, शुक्ल लेश्या में आतप, एकेंद्रिय, विकलत्रय, स्थावरचतुष्क, नरकद्विक, नरकायुष्क, तिर्यंच गत्यानुपूर्वी नहीं है; शेष अपने-अपने गुणस्थान के समान सामान्य है। यहाँ मिथ्यात्व और सासादन में मनुष्य गत्यानुपूर्वी नहीं है।


भव्विदरुवसमवेदगखइये सगुणोघमुवसमे खयिये ।
ण हि सम्ममुवसमे पुण, णादि-तियाणू य हारदुगं ॥328॥

सरलार्थ: भव्य, अभव्य, औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक सम्यक्त्व में अपने-अपने गुणस्थान के समान उदय-त्रिभंगी है। औपशमिक और क्षायिक सम्यक्त्व में सम्यक् प्रकृति का उदय नहीं है। औपशमिक सम्यक्त्व में प्रारम्भिक तीन आनुपूर्वी और आहारकद्विक का उदय नहीं है।


खाइयसम्मो देसो, णर एव जदो तहिं ण तिरियाऊ ।
उज्जोवं तिरियगदी, तेसिं अयदम्हि वोच्छेदो ॥329॥

सरलार्थ: क्योंकि क्षायिक सम्यक्त्व में देशसंयम मनुष्य में ही है; अत: इसमें तिर्यंचायुष्क, उद्योत, तिर्यंचगति नहीं है। उनकी व्युच्छित्ति चौथे गुणस्थान में हो जाती है।


सेसाणं सगुणोघं, सण्णिस्सवि णत्थि ताव साहरणं ।
थावर सुहुमिगिविगलं, असण्णिणोवि य ण मणुदुच्चं ॥330॥

सरलार्थ: शेष सभी अपने-अपने गुणस्थान के अनुसार सामान्य हैं। संज्ञी के भी आतप, साधारण, स्थावर, सूक्ष्म, एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय, तीर्थंकर नहीं हैं। असंज्ञी के भी मनुष्यद्विक, उच्चगोत्र, वैक्रियिकषट्क, पाँच संहनन, पाँच संस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभगत्रिक, आयुष्कत्रिक नहीं हैं।


वेगुव्व छ पण संहदि संठाण सुगमण सुभगआउतियं ।
आहारे सगुणोघं, णवरि ण सव्वाणुपुव्वीओ ॥331॥

सरलार्थ: असंज्ञी के भी मनुष्यद्विक, उच्चगोत्र, वैक्रियिकषट्क, पाँच संहनन, पाँच संस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभगत्रिक, आयुष्कत्रिक नहीं हैं। आहारक में अपने-अपने गुणस्थान के अनुसार सामान्य है। विशेष यह है कि यहाँ सभी आनुपूर्वी नहीं हैं।


कम्मे व अणाहारे, पयडीणं उदयमेवमादेसे ।
कहियमिणं बलमाहवचंदच्चिय णेमिचंदेण ॥332॥

सरलार्थ: अनाहारक में कार्मण के समान रचना है।

इसप्रकार मार्गणाओं में यह प्रकृतिओं का उदय बलभद्र और नारायण से पूजित तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान् ने अथवा बलदेव और माधवचंद्र त्रैविद्यदेव से पूजित श्रीयुत नेमिचन्द्राचार्य ने कहा है।

बंधोदयसत्त्व अधिकार: सत्त्वाधिकार, अन्त्य मंगलाचरण (गाथा 333 से 357)

तित्थाहाराजुगवं, सव्वं तित्थं ण मिच्छगादितिए ।
तस्सत्त-कम्मियाणं, तग्गुणठाणं ण संभवदि ॥333॥

सरलार्थ: मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानों में से पहले में तीर्थंकर और आहारकद्विक एक साथ, दूसरे में तीनों तथा तीसरे में तीर्थंकर का सत्त्व नहीं है। उन कर्मों का सत्त्व उन गुणस्थानों में सम्भव नहीं है।


चत्तारिवि-खेत्ताइं, आउगबंधेण होइ सम्मत्तं ।
अणुवद-महव्वदाइं, ण लहइ देवाउगं मोत्तुं ॥334॥

सरलार्थ: चारों ही क्षेत्रों के आयुष्क का बंध हो जाने पर भी सम्यक्त्व हो सकता है। देवायुष्क को छोड़कर अणुव्रत-महाव्रत प्राप्त नहीं होते हैं।


णिरयतिरिक्खसुराउग सत्ते ण हि देससयलवदखवगा ।
अयद चउक्कं तु अणं, अणियट्टीकरण-चरिमम्हि ॥335॥

सरलार्थ: नरक आयुष्क का सत्त्व होने पर देशव्रत, तिर्यंच आयुष्क का सत्त्व होने पर महाव्रत और देव आयुष्क का सत्त्व होने पर क्षपक श्रेणी का आरोहण नहीं होता है। चौथे से सातवें गुणस्थान के अन्तर्गत अनिवृत्तिकरण के अन्त में अनन्तानुबंधी क्रोधादि का एक साथ विसंयोजन हो पुनः अनिवृत्तिकरण का बहुभाग व्यतीत हो क्रमशः मिथ्यात्व, मिश्र और फिर सम्यक् प्रकृति का क्षय होता है।


जुगवं संजोगित्ता, पुणोवि अणियट्टिकरणबहुभागं ।
बोलिय कमसो मिच्छं, मिस्सं सम्मं खवेदि कमे ॥336॥

सरलार्थ: चौथे से सातवें गुणस्थान के अन्तर्गत अनिवृत्तिकरण के अन्त में अनन्तानुबंधी क्रोधादि का एक साथ विसंयोजन हो पुन: अनिवृत्तिकरण का बहुभाग व्यतीत हो क्रमश: मिथ्यात्व, मिश्र और फिर सम्यक् प्रकृति का क्षय होता है।


सोलट्ठेक्किगिछक्कं, चदुसेक्कं बादरे अदो एक्कं ।
खीणेसोलसऽजोगे, बायत्तरि तेरुवत्तंते ॥337॥

सरलार्थ: बादर नामक नवमें गुणस्थान में १६, ८, १, १, ६ आगे चारों भागों में १-१, उससे आगे सूक्ष्मसांपराय में १, क्षीणमोह में १६, अयोगी के उपान्त्य समय में ७२ और अन्त समय में १३ की सत्ता से व्युच्छित्ति है।


णिरयतिरिक्खदु वियलं, थीणतिगुज्जोवतावएइंदी ।
साहरण सुहुमथावर, सोलं मज्झिमकसायट्ठं ॥338॥

सरलार्थ: बादर में नरकद्विक, तिर्यंचद्विक, विकलत्रिक, स्त्यानगृद्धित्रिक, उद्योत, आताप, एकेंद्रिय, साधारण, सूक्ष्म, स्थावर - ये १६; मध्यम कषायें ८; नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, छह नो कषाय, पुरुषवेद; संज्वलन क्रोध, मान, माया; सूक्ष्म साम्पराय में लोभ, बारहवें में उदय के समान १६ प्रकृतिआँ सत्त्व से व्युच्छिन्न होती हैं।


संढित्थि छक्कसाया, पुरिसो कोहो य माण मायं च ।
थूले सुहुमे लोहो, उदयं वा होदि खीणम्हि ॥339॥

सरलार्थ: बादर में नरकद्विक, तिर्यंचद्विक, विकलत्रिक, स्त्यानगृद्धित्रिक, उद्योत, आताप, एकेंद्रिय, साधारण, सूक्ष्म, स्थावर - ये १६; मध्यम कषायें ८; नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, छह नो कषाय, पुरुषवेद; संज्वलन क्रोध, मान, माया; सूक्ष्म साम्पराय में लोभ, बारहवें में उदय के समान १६ प्रकृतिआँ सत्त्व से व्युच्छिन्न होती हैं।


देहादीफस्संता, थिरसुहसरसुरविहायदुग-दुभगं ।
णिमिणाजसऽणादेज्जं, पत्तेयापुण्ण अगुरुचऊ ॥340॥

सरलार्थ: अयोग केवली के उपान्त्य समय में शरीर से लेकर स्पर्श पर्यन्त ५०, स्थिरद्विक, शुभद्विक, स्वरद्विक, देवगतिद्विक, विहायोगतिद्विक, दुर्भग, निर्माण, अयशस्कीर्ति, अनादेय, प्रत्येक, अपर्याप्त, अगुरुलघु चतुष्क, तीसरे वेदनीय की अनुदय, नीचगोत्र - इन ७२ की सत्त्व से व्युच्छित्ति है तथा उदयसंबंधी १२ और मनुष्यगत्यानुपूर्वी - इन १३ की अन्तिम समय में सत्त्व से व्युच्छित्ति है।


अणुदयतदियं णीचमजोगिदुचरिमम्मि सत्तवोच्छिण्णा ।
उदयगबारणराणू, तेरस चरिमम्मि वोच्छिण्णा ॥341॥

सरलार्थ: अयोग केवली के उपान्त्य समय में शरीर से लेकर स्पर्श पर्यन्त ५०, स्थिरद्विक, शुभद्विक, स्वरद्विक, देवगतिद्विक, विहायोगतिद्विक, दुर्भग, निर्माण, अयशस्कीर्ति, अनादेय, प्रत्येक, अपर्याप्त, अगुरुलघु चतुष्क, तीसरे वेदनीय की अनुदय, नीचगोत्र - इन ७२ की सत्त्व से व्युच्छित्ति है तथा उदयसंबंधी १२ और मनुष्यगत्यानुपूर्वी - इन १३ की अन्तिम समय में सत्त्व से व्युच्छित्ति है।


णभतिगिणभइगि दो दो, दस दस सोलट्ठगादिहीणेसु ।
सत्ता हवंति एवं, असहायपरक्कमुद्दिट्ठं ॥342॥

सरलार्थ: मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानों में क्रमशः ०, ३, १, ०, १, २. २, १०, १०, १६, ८ इत्यादि कम करने पर सत्त्व-योग्य प्रकृतिआँ हैं - ऐसा असहाय पराक्रमधारी भगवान् ने कहा है।


खवणं वा उवसमणे, णवरि य संजलणपुरिसमज्झम्हि ।
मज्झिम दो दो कोहादीया कमसोवसंता हु ॥343॥

सरलार्थ: उपशमन में क्षपण के समान ही है; परन्तु विशेष इतना है कि पुरुषवेद और संज्वलन के मध्य में मध्य की दो-दो क्रोधादि कषायों का क्रमश: उपशम है।


णिरयादिसु पयडिट्ठिदि-अणुभागपदेसभेदभिण्णस्स ।
सत्तस्स य सामित्तं, णेदव्वमिदो जहाजोग्गं ॥344॥

सरलार्थ: इससे आगे नरक आदि गतिओं में प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश भेद से भिन्न सत्ता का स्वामित्व यथायोग्य घटित करना चाहिए।


तिरिए ण तित्थसत्तं; णिरयादिसु तिय चउक्क चउ तिण्णि ।
आऊणि होंति सत्ता, सेसं ओघादु जाणेज्जो ॥345॥

सरलार्थ: तिर्यंच में तीर्थंकर का सत्त्व नहीं है। नरक आदि में क्रमश: तीन आयुष्क, चार आयुष्क, चार आयुष्क और तीन आयुष्क की सत्ता हो सकती है। शेष सामान्य के समान जानना चाहिए।


ओघं वा णेरइये ण सुराऊ तित्थमत्थि तदियोत्ति ।
छट्ठित्ति मणुस्साऊ तिरिए ओघं ण तित्थयरं ॥346॥

सरलार्थ: नरक में रचना ओघ के समान है। विशेष यह है कि यहाँ देवायुष्क की सत्ता नहीं है, तीसरे नरक पर्यंत तीर्थंकर की सत्ता है, छठवें नरक पर्यंत मनुष्यायुष्क की सत्ता है। तिर्यंच में तीर्थंकर का सत्त्व नहीं है, शेष सामान्य है।


एवं पंचतिरिक्खे, पुण्णिदरे णत्थि णिरयदेवाऊ ।
ओघं मणुसतियेसु वि अपुण्णगे पुण अपुण्णेव ॥347॥

सरलार्थ: पाँचों तिर्यंचों में इसीप्रकार है। लब्ध्यपर्याप्तक में नरक और देवायुष्क नहीं है। तीनों प्रकार के मनुष्यों में भी सामान्य के समान है, अपर्याप्तक में अपर्याप्तक के समान है।


ओघं देवे ण हि णिरयाऊ सारोत्ति होदि तिरियाऊ ।
भवणतिय-कप्पवासिय-इत्थीसु ण तित्थयरसत्तं ॥348॥

सरलार्थ: देव में सामान्य के समान है। विशेष यह है कि यहाँ नरकायुष्क नहीं है, सहस्रार पर्यन्त तिर्यंचायुष्क है; भवनत्रिक में, कल्पवासी स्त्रिओं में तीर्थंकर की सत्ता नहीं है।


ओघं पंचक्ख-तसे, सेसिंदियकायगे अपुण्णं वा ।
तेउ-दुगे ण णराऊ सव्वत्थुव्वेल्लणावि हवे ॥349॥

सरलार्थ: पंचेंद्रिय और त्रस काय में सामान्यवत् सत्त्व-त्रिभंगी है। शेष इंद्रियों और कायों में वह अपर्याप्तकवत् है। तेजद्विक में मनुष्यायुष्क नहीं है। सभी में उद्वेलना भी हो सकती है।


हारदु सम्मं मिस्सं, सुरदुगणारयचउक्कमणुकमसो ।
उच्चागोदं मणुदुगमुव्वेल्लिज्जंति जीवेहिं ॥350॥

सरलार्थ: जीवों द्वारा अनुक्रम से आहारकद्विक, सम्यक्, मिश्र, देवद्विक, नारक चतुष्क, उच्चगोत्र और मनुष्यद्विक उद्वेलित होती हैं।


चदुगदिमिच्छे चउरो, इगिविगले छप्पि तिण्णि तेउदुगे ।
सिय अत्थि णत्थि सत्तं, सपदे उप्पण्णठाणेवि ॥351॥

सरलार्थ: अपने स्थान में तथा उत्पन्न स्थान में भी चारों गति के मिथ्यादृष्टि में ४, एकेंद्रिय और विकलेंद्रिय में ६, तेजद्विक में ३ की सत्ता कथंचित् है, कथंचित् नहीं है।


पुण्णेकारसजोगे, साहारयमिस्सगे वि सगुणोघं ।
वेगुव्वियमिस्सेवि य, णवरि ण माणुसतिरिक्खाऊ ॥352॥

सरलार्थ: आहारक मिश्र योग से सहित ११ पूर्ण योगों में अपने-अपने गुणस्थान के समान सामान्य रचना है। वैक्रियिक मिश्र में भी शेष रचना सामान्य सम है; विशेष इतना है कि इसमें मनुष्यायुष्क, तिर्यंचायुष्क का सत्त्व नहीं है।


ओरालमिस्सजोगे, ओघं सुरणिरयआउगं णत्थि ।
तम्मिस्स वामगे ण हि, तित्थं कम्मे वि सगुणोघं ॥353॥

सरलार्थ: औदारिक मिश्र में सामान्य सम होने पर भी विशेष यह है कि उसमें देवायुष्क, नरकायुष्क का सत्त्व नहीं है तथा औदारिक मिश्र मिथ्यात्व में तीर्थंकर का सत्त्व नहीं है। कार्मण काय योग में भी अपने गुणस्थानानुसार सामान्य सम रचना है।


वेदादाहारोत्ति य, सगुणोघं णवरि संढ थी-खवगे ।
किण्हदुगसुहतिलेस्सियवामेवि ण तित्थयरसत्तं ॥354॥

सरलार्थ: वेद मार्गणा से लेकर आहारक मार्गणा पर्यन्त अपने-अपने गुणस्थान के अनुसार सामान्य-सम रचना है। विशेष यह है कि नपुंसक वेदी क्षपक में, स्त्रीवेदी क्षपक में; कृष्णद्विक और तीन शुभ लेश्याओं के मिथ्यात्व गुणस्थान में तीर्थंकर का सत्त्व नहीं है।


अभव्वसिद्धे णत्थि हु, सत्तं तित्थयरसम्ममिस्साणं ।
आहारचउक्कस्सवि, असण्णिजीवे ण तित्थयरं ॥355॥

सरलार्थ: वेद मार्गणा से लेकर आहारक मार्गणा पर्यन्त अपने-अपने गुणस्थान के अनुसार सामान्य-सम रचना है। विशेष यह है कि नपुंसक वेदी क्षपक में, स्त्रीवेदी क्षपक में; कृष्णद्विक और तीन शुभ लेश्याओं के मिथ्यात्व गुणस्थान में तीर्थंकर का सत्त्व नहीं है।


कम्मेवाणाहारे, पयडीणं सत्तमेव आदेसे ।
कहियमिणं बलमाहवचंदच्चिय-णेमिचंदेण ॥356॥

सरलार्थ: वेद मार्गणा से लेकर आहारक मार्गणा पर्यन्त अपने-अपने गुणस्थान के अनुसार सामान्य-सम रचना है। विशेष यह है कि नपुंसक वेदी क्षपक में, स्त्रीवेदी क्षपक में; कृष्णद्विक और तीन शुभ लेश्याओं के मिथ्यात्व गुणस्थान में तीर्थंकर का सत्त्व नहीं है।


सो मे तिहुवणमहियो, सिद्धो बुद्धो णिरंजणो णिच्चो ।
दिसदु वरणाणलाहं, बुहजणपरिपत्थणं परमसुद्धं ॥357॥

सरलार्थ: तीनों लोकों द्वारा पूजित, सिद्ध, बुद्ध, निरंजन, नित्य वे भगवान् बुधजनों से प्रार्थित, परमशुद्ध, उत्कृष्ट ज्ञान का लाभ मुझे दें।