प्रकृति-समुत्कीर्तन अधिकार (1) (गाथा 1 से 43)
पणमिय सिरसा णेमिं, गुणरयणविभूसणं महावीरं ।
सम्मत्त-रयण-णिलयं, पयडि-समुक्कित्तणं वोच्छं ॥1॥
सरलार्थ: टीकाकारों ने प्रस्तुत गाथा के अनेकों अर्थ किए हैं। हम यहाँ उनमें से मात्र ४ प्रमुख अर्थ देखते हैं - १.नेमिनाथ भगवान् को नमस्कार-परक : गुणरूपी रत्नों से विभूषित, महान् वीर अथवा महान् लक्ष्मी को देनेवाले, सम्यक्त्वरूपी रत्नों के स्थानभूत नेमिनाथ भगवान् को शिर झुकाकर नमस्कार करके प्रकृति समुत्कीर्तन को कहूँगा।
२.भगवान् महावीर स्वामी को नमस्कार-परक : नेमि/धर्म-चक्र की धुरी स्वरूप, गुणरूपी रत्नों से विभूषित, सम्यक्त्वरूपी रत्नों के स्थान महावीर भगवान् को शिर झुकाकर नमस्कार करके प्रकृति समुत्कीर्तन को कहूँगा।
३.२४ तीर्थंकर भगवान् को नमस्कार-परक : नेमि/धर्म-चक्र की धुरी स्वरूप, गुणरूपी रत्नों से विभूषित, महान्, सम्यक्त्वरूपी रत्नों के स्थान २४ तीर्थंकर भगवान् को शिर झुकाकर नमस्कार कर प्रकृति समुत्कीर्तन को कहूँगा।
४.जिनवाणी को नमस्कार-परक : (पंचम-काल में) धर्मरूपी चक्र की धुरी स्वरूप, स्याद्वाद आदि गुणरूपी रत्नों से विभूषित, महान् विशिष्ट अनन्त चतुष्टयरूपी लक्ष्मी को देनेवाली/प्रगट करने का मार्ग/उपाय बतानेवाली, सम्यक्त्वरूपी रत्नों की स्थान, प्रकृति/वस्तु के स्वभाव का भली-भाँति उत्कृष्ट रूप से कथन करनेवाली जिनवाणी को नमस्कार करके प्रकृति/कर्म का समुत्कीर्तन करूँगा।
इसप्रकार विशेषण-विशेष्य में परिवर्तन से इस गाथा के विविध अर्थ फलित होते हैं।
पयडी सील सहावो, जीवंगाणं अणाइसंबंधो ।
कणयोवले मलं वा, ताणत्थित्तं सयं सिद्धं ॥2॥
सरलार्थ: प्रकृति, शील और स्वभाव, एकार्थवाची/पर्यायवाची हैं। जैसे - सुवर्ण-पाषाण में किट्ट-कालिमा अनादि से मिली हुई है; उसीप्रकार जीव और शरीर/कर्म का अनादि से संबंध है। (इस स्थिति में भी) उन दोनों का अस्तित्व स्वयं से सिद्ध है।
देहोदयेण सहिओ, जीवो आहरदि कम्म-णोकम्मं ।
पडिसमयं सव्वंगं, तत्तायस-पिंडओव्व जलं ॥3॥
सरलार्थ: जैसे तपे हुए लोहे के गोले को जल में डालने पर वह प्रति-समय सब ओर से जल ग्रहण करता है; उसीप्रकार शरीर नामक नाम-कर्म के उदय से सहित (योगवान) जीव प्रति-समय सब ओर से कर्म-नोकर्म को ग्रहण करता है (ज्ञानावरणादि रूप होने-योग्य कार्मण-वर्गणाओं का ग्रहण, कर्म का ग्रहण है तथा औदारिक आदि शरीररूप होने-योग्य आहार-वर्गणाओं का ग्रहण, नोकर्म का ग्रहण है।)
सिद्धाणंतिम-भागं अभव्व-सिद्धादणंत-गुणमेव ।
समयपबद्धं बंधदि, जोग-वसादो दु विसरित्थं ॥4॥
सरलार्थ: इस जीव के साथ (अनंतानंत-प्रमाण अक्षय-अनन्त) सिद्ध-राशि के अनंतवें भाग, (जघन्य युक्तानन्त-प्रमाण सक्षय-अनन्त) अभव्य-राशि से अनन्त गुणे समय-प्रबद्ध बँधते हैं; परन्तु मन, वचन, काय-योग की हीनाधिकता से हीनाधिक परमाणु भी बँध जाते हैं।
जीरदि समयपबद्धं, पओगदो णेगसमयबद्धं वा ।
गुण-हाणीण-दिवड्ढं, समयपबद्धं हवे सत्तं ॥5॥
सरलार्थ: इस अनादि-कालीन संसार में स्थित जीव के प्रति-समय समय-प्रबद्ध प्रमाण (सिद्ध-राशि के अनंतवें भाग, अभव्य-राशि से अनंतगुणे प्रमाण) कर्म निर्जरित होते हैं/खिर जाते हैं; अथवा कभी-कभी प्रयोग से/तपश्चरणादि विशिष्ट परिणामों का निमित्त पाकर अनेक समय-प्रबद्ध प्रमाण भी खिर जाते हैं; तथा गुणाकार क्रम से हीन-हीन होनेवाली गुण-हानि के काल से डेड़ गुणे अर्थात् डेड़ गुण-हानि आयाम से गुणित समय-प्रबद्ध सत्ता में रहते हैं।
कम्मत्तणेण एक्कं, दव्वं भावोत्ति होदि दुविहं तु ।
पोग्गल-पिंडो दव्वं, तस्सत्ती भाव-कम्मं तु ॥6॥
सरलार्थ: कर्म, कर्मत्व की अपेक्षा एक है अर्थात् कर्म, मात्र कर्म है, उसमें कोई भेद नहीं है। द्रव्यकर्म और भावकर्म की अपेक्षा वास्तव में उसके दो भेद भी हो जाते हैं। ज्ञानावरणादि कर्मरूप से परिणमित कार्मण-वर्गणामय पुद्गलों का समूह, द्रव्यकर्म है तथा वास्तव में उसकी फल देने की शक्ति, भावकर्म है।
तं पुण अट्ठविहं वा, अडदालसयं असंखलोगं वा ।
ताणं पुण घादित्ति अघादित्ति य होंति सण्णाओ ॥7॥
सरलार्थ: पुन: वे (द्रव्य और भावरूप कर्म) आठ प्रकार के, एक सौ अड़तालीस प्रकार के तथा असंख्यात लोक-प्रमाण भेदवाले हैं। इनके भी घाति और अघाति नामवाले दो भेद हैं।
णाणस्स दंसणस्स य, आवरणं वेयणीय-मोहणियं ।
आउग-णामं गोदंतराय-मिदि अट्ठ-पयडीओ ॥8॥
सरलार्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्क, नाम, गोत्र और अंतराय - ये आठ प्रकृतिआँ हैं।
आवरण-मोह-विग्घं, घादी जीव-गुण-घादणत्तादो ।
आउग-णामं गोदं, वेयणियं तह अघादित्ति ॥9॥
सरलार्थ: जीव के गुणों का घात करने में निमित्त होने से ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अंतराय - ये चार घाति कर्म हैं तथा आयुष्क, नाम, गोत्र और वेदनीय - ये चार अघाति कर्म हैं।
घाति कर्म केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनन्तवीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग - इन नौ क्षायिक गुणों/भावों के; मति-श्रुत-अवधि-मन:पर्यय ज्ञान, कुमति-कुश्रुत-कुअवधिज्ञान, चक्षु-अचक्षु-अवधिदर्शन, क्षायोपशमिक दान-लाभ-भोग-उपभोग-वीर्य, क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक चारित्र, संयमासंयम - इन अठारह क्षायोपशमिक गुणों/भावों के और औपशमिक सम्यक्त्व-चारित्र - इन दो औपशमिक गुणों/भावों के घात में निमित्त होते हैं।
केवलणाणं दंसण-मणंतविरियं च खयिय-सम्मं च ।
खयिय-गुणे मदियादी, खओवसमिए य घादी दु ॥10॥
सरलार्थ: घाति कर्म केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनन्तवीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग - इन नौ क्षायिक गुणों/भावों के; मति-श्रुत-अवधि-मन:पर्यय ज्ञान, कुमति-कुश्रुत-कुअवधिज्ञान,चक्षु-अचक्षु-अवधिदर्शन, क्षायोपशमिक दान-लाभ-भोग-उपभोग-वीर्य, क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक चारित्र, संयमासंयम - इन अठारह क्षायोपशमिक गुणों/भावों के और औपशमिक सम्यक्त्व-चारित्र - इन दो औपशमिक गुणों/भावों के घात में निमित्त होते हैं।
कम्म-कय-मोह-बड्ढिय, संसारम्हि य अणादि-जुत्तम्हि ।
जीवस्स अवट्ठाणं, करेदि आऊ हलिव्व णरं ॥11॥
सरलार्थ: जैसे काठ का खोड़ा मनुष्य को अपने में बाँधकर रखता है; उसीप्रकार कर्म-कृत मोह से बड़े हुए अनादि-कालीन संसार में आयुष्क कर्म, जीव का अवस्थान करता है; अर्थात् आयुष्क कर्म के उदय में यह जीव, शरीर में अवस्थित रहता है, शरीर से निकल नहीं पाता है।
गदि-आदि-जीवभेदं, देहादी-पोग्गलाण भेदं च ।
गदियंतर-परिणमनं करेदि णामं अणेयविहं ॥12॥
सरलार्थ: गति आदि संसारी जीव (की दशाओं) के भेद को, शरीर आदि पुद्गलों के भेद को और एक गति से दूसरी गतिरूप परिणमन को इत्यादि अनेक प्रकार के कार्यों को नामकर्म करता है।
संताणकमेणागय-जीवायरणस्स गोदमिदि सण्णा ।
उच्चं णीचं चरणं, उच्चं णीचं हवे गोदं ॥13॥
सरलार्थ: संतान क्रम से आए जीव के आचरण को गोत्र कहते हैं। उच्च आचरण, उच्च गोत्र है; नीच आचरण, नीच गोत्र है। (इसमें निमित्त होनेवाला कर्म, गोत्र-कर्म है।)
अक्खाणं अणुभवणं, वेयणियं सुहसरूवयं सादं ।
दुक्ख-सरूव-मसादं, तं वेदयदीदि वेदणियं ॥14॥
सरलार्थ: पंचेंद्रिय विषयों का अनुभवन, वेदनीय है। सुख-स्वरूप/आकुलता की कुछ हीनतारूप वेदन, साता-वेदनीय तथा दु:ख-स्वरूप/आकुलतारूप वेदन, असाता-वेदनीय कहलाता है। (इनमें निमित्त बननेवाला कर्म, वेदनीय-कर्म है।)
अत्थं देक्खिय जाणदि, पच्छा सद्दहदि सत्तभंगीहिं ।
इदि दंसणं च णाणं, सम्मत्तं होंति जीव गुणा ॥15॥
सरलार्थ: छद्मस्थ जीव, पदार्थ को देखकर जानता है। तत्पश्चात् सप्तभंगी के माध्यम से पदार्थ का निर्णयकर, उसका श्रद्धान करता है - इसप्रकार दर्शन, ज्ञान और सम्यक्त्व जीव के गुण हैं।
अब्भरहिदादु पुव्वं, णाणं तत्तो हि दंसणं होदि ।
सम्मत्तमदो विरियं, जीवाजीव-गदमिदि चरिमे ॥16॥
सरलार्थ: (यद्यपि छद्मस्थों को ज्ञान, दर्शन पूर्वक होता है; तथापि) पूज्य होने के कारण ज्ञान को सर्व-प्रथम रखा है। तदुपरांत वास्तव में दर्शन है। तत्पश्चात् सम्यक्त्व है तथा जीव-अजीवगत/जीव-अजीव सभी में सामान्यरूप से विद्यमान होने के कारण वीर्य को अंत में रखा; इस अपेक्षा से तत्संबंधी कर्मों का क्रम ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अंतरायरूप में सुनिश्चित हुआ।
घादीवि अघादिं वा, णिस्सेसं घादणे असक्कादो ।
णामतियणिमित्तादो, विग्घं पडिदं अघादिचरिमम्हि ॥17॥
सरलार्थ: अंतराय कर्म घाति होने पर भी अघाति कर्मों के समान जीव के गुणों को पूर्णतया घातने में समर्थ नहीं होने के कारण तथा नाम, गोत्र और वेदनीय - इन तीन कर्मों के निमित्त से अपना कार्य करता होने के कारण, उसे अघाति कर्मों के अंत में पढ़ा/रखा गया है।
आउबलेण अवट्ठिदि, भवस्स इदि णाममाउपुव्वं तु ।
भवमस्सिय-णीचुच्चं, इदि गोदं णाम-पुव्वं तु ॥18॥
सरलार्थ: आयुष्क के बल से/आयुष्क कर्म के उदय से भव की/असमान-जातीयरूप (मनुष्यादि) द्रव्य-पर्याय की/शरीर की अवस्थिति रहती है; अत: नामकर्म को आयु पूर्वक/आयुष्क के बाद में रखा गया है। भव का/असमान जातीय द्रव्य-पर्याय का/शरीर का आश्रय लेकर नीच-उच्च प्रवृत्ति होने के कारण गोत्र को नाम पूर्वक/नामकर्म के बाद रखा गया है।
घादिंव वेयणीयं, मोहस्स बलेण घाददे जीवं ।
इदि घादीणं मज्झे, मोहस्सादिम्हि पढिदं तु ॥19॥
सरलार्थ: वेदनीय कर्म (अघाति होने पर भी) मोह के बल से घाति के समान जीव (के गुणों) को घातने में निमित्त होने के कारण, उसे घाति के मध्य में मोहनीय के पूर्व पढ़ा गया है।
णाणस्स दंसणस्स य, आवरणं वेयणीय-मोहणियं ।
आउग-णामं गोदंतरायमिदि पढिद-मिदि सिद्धं ॥20॥
सरलार्थ: (यद्यपि छद्मस्थों को ज्ञान, दर्शन पूर्वक होता है; तथापि) पूज्य होने के कारण ज्ञान को सर्व-प्रथम रखा है। तदुपरांत वास्तव में दर्शन है। तत्पश्चात् सम्यक्त्व है तथा जीव-अजीवगत/जीव-अजीव सभी में सामान्यरूप से विद्यमान होने के कारण वीर्य को अंत में रखा; इस अपेक्षा से तत्संबंधी कर्मों का क्रम ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अंतरायरूप में सुनिश्चित हुआ।
अंतराय कर्म घाति होने पर भी अघाति कर्मों के समान जीव के गुणों को पूर्णतया घातने में समर्थ नहीं होने के कारण तथा नाम, गोत्र और वेदनीय - इन तीन कर्मों के निमित्त से अपना कार्य करता होने के कारण, उसे अघाति कर्मों के अंत में पढ़ा/रखा गया है।
आयुष्क के बल से/आयुष्क कर्म के उदय से भव की/असमान-जातीयरूप (मनुष्यादि) द्रव्य-पर्याय की/शरीर की अवस्थिति रहती है; अत: नामकर्म को आयु पूर्वक/आयुष्क के बाद में रखा गया है। भव का/असमान जातीय द्रव्य-पर्याय का/शरीर का आश्रय लेकर नीच-उच्च प्रवृत्ति होने के कारण गोत्र को नाम पूर्वक/नामकर्म के बाद रखा गया है।
वेदनीय कर्म (अघाति होने पर भी) मोह के बल से घाति के समान जीव (के गुणों) को घातने में निमित्त होने के कारण, उसे घाति के मध्य में मोहनीय के पूर्व पढ़ा गया है।
इसप्रकार ज्ञान का आवरण/ज्ञानावरण, दर्शन का आवरण/दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्क, नाम, गोत्र और अंतराय - यह (आठवीं गाथा में) पढ़ा गया आठ-कर्मों का क्रम सिद्ध हुआ।
पडपडिहारसिमज्जा-हलिचित्तकुलालभंडयारीणं ।
जह एदेसिं भावा, तहवि य कम्मा मुणेयव्वा ॥21॥
सरलार्थ: वस्त्र, द्वारपाल, शहद-लपेटी तलवार, शराब, काठ का खोड़ा, चित्रकार, कुंभकार और भंडारी/खजांची - इनके जैसे भाव/कार्य हैं; उसीप्रकार क्रमश: कर्मों के कार्य जानना चाहिए।
पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण ते-णउदी ।
ते उत्तरं सयं वा, दुग-पणगं उत्तरा होंति ॥22॥
सरलार्थ: (ज्ञानावरण आदि मूल आठ कर्मों की) क्रम से पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, तेरानबै अथवा एक सौ तीन, दो और पाँच उत्तर-प्रकृतिआँ हैं।
थीणुदयेणुट्ठविदे, सोवदि कम्मं करेदि जप्पदि य ।
णिद्दाणिद्दुदयेण य, ण दिट्ठिमुग्घादिदुं सक्को ॥23॥
सरलार्थ: स्त्यानगृद्धि (नामक दर्शनावरण) के उदय से उठाए/जगाए जाने पर भी सोता है; सोते-सोते ही कुछ कार्य करता है और बोलता है/बड़बड़ाता है तथा निद्रानिद्रा (नामक दर्शनावरण) के उदय से नेत्र खोलने के लिए भी समर्थ नहीं हो पाता है।
पयलापयलुदयेण य, बहेदि लाला चलंति अंगाइं ।
णिद्दुदये गच्छंतो, ठाइ पुणो बइसइ पडेई ॥24॥
सरलार्थ: प्रचलाप्रचला (नामक दर्शनावरण) के उदय से लार बहती है, (हाथ-पैर आदि) अंग चलते/हिलते रहते हैं। निद्रा (नामक दर्शनावरण) के उदय में गमन करता/चलता हुआ भी खड़ा हो जाता है, फिर बैठ जाता है, गिर पड़ता है/लेट जाता है।
पयलुदयेण य जीवो, ईसुम्मीलिय सुवेइ सुत्तोवि ।
ईसं ईसं जाणदि, मुहुं मुहुं सोवदे मंदं ॥25॥
सरलार्थ: प्रचला (नामक दर्शनावरण) के उदय से जीव कुछ-कुछ सोता है, सोता हुआ भी कुछ-कुछ जानता है तथा बारंबार मंद-मंद सोता है।
जंतेण कोद्दवं वा, पढमुवसमसम्मभावजंतेण ।
मिच्छं दव्वं तु तिधा, असंखगुणहीणदव्वकमा ॥26॥
सरलार्थ: चक्की से दले हुए कोदों के समान, प्रथमोपशम-सम्यक्त्व भावरूपी यंत्र/चक्की द्वारा दले जाने पर मिथ्यात्वरूपी कर्म-द्रव्य असंख्यात-गुणा हीन द्रव्य क्रम से तीन भागों में विभक्त हो जाता है।
तेजाकम्मेहिं तिए, तेजा कम्मेण कम्मणा कम्मं ।
कय-संजोगे चदु-चदु चदु-दुगमेक्कं च पयडीओ ॥27॥
सरलार्थ: औदारिक, वैक्रियिक और आहारक - इन तीन शरीरों का तैजस और कार्मण के साथ; तैजस का कार्मण के साथ और कार्मण का कार्मण के साथ संयोग करने पर क्रमश: चार, चार, चार, दो और एक प्रकृतिआँ - इसप्रकार शरीर संबंधी १५ प्रकृतिआँ हो जाती हैं।
णलया बाहू य तहा, णियंबपुट्ठी उरो य सीसो य ।
अट्ठेव दु अंगाइं, देहे सेसा उवंगाइं ॥28॥
सरलार्थ: दो पैर, दो हाथ, नितम्ब, पीठ, हृदय और शिर - ये आठ अंग, शरीर में हैं; शेष उपांग हैं।
सेवट्टेण य गम्मइ, आदीदो चदुसु कप्पजुगलोत्ति ।
तत्तो दुजुगल-जुगले, खीलिय-णारायणद्धोत्ति ॥29॥
सरलार्थ: असंप्राप्ता-सृपाटिका संहननवाला प्रारंभ से/भवनवासी से चार कल्प-युगल/आठवें कापिष्ठ स्वर्ग पर्यंत जन्म ले सकता है। उससे आगे दो युगल/बारहवें सहस्रार स्वर्ग पर्यंत कीलित संहननवाला और उससे भी आगे दो युगल/सोलहवें अच्युत स्वर्ग पर्यंत अर्धनाराच संहननवाला जन्म ले सकता है।
णव-गेविज्जाणुद्दिस-णुत्तरवासीसु जांति ते णियमा ।
तिदुगेगे संघडणे, णारायण-मादिगे कमसो ॥30॥
सरलार्थ: उससे आगे नव ग्रैवेयिक, नव अनुदिश और पाँच अनुत्तरों में क्रमश: नाराच आदि तीन, दो और एक संहननवाले ही नियम से जन्म ले सकते हैं।
सण्णी छस्संहडणो, वज्जदि मेघं तदो परं चापि ।
सेवट्टादी रहिदो, पण पण चदुरेग-संहडणो ॥31॥
सरलार्थ: छहों संहननों में से किसी भी संहननवाला संज्ञी जीव, मेघा नामक तीसरी नरक पृथ्वी पर्यंत जन्म ले सकता है। इससे आगे सृपाटिका संहनन से रहित/पाँच संहननवाला जीव, पाँचवीं नरक पृथ्वी पर्यंत; चार संहननवाला, छठवें नरक पर्यंत और एक संहननवाला, सातवीं नरक पृथ्वी पर्यंत जन्म ले सकता है।
अंतिम-तिय-संहडणस्सुदओ पुण कम्मभूमि-महिलाणं ।
आदिम-तिग-संहडणं णत्थित्ति जिणेहिं णिद्दिट्ठं ॥32॥
सरलार्थ: कर्मभूमि-महिलाओं के अंतिम तीन संहनन का उदय होता है, प्रारम्भिक तीन संहननों का उनके उदय नहीं होता है - ऐसा जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है।
मूलुण्हपहा अग्गी, आदावो होदि उण्हसहियपहा ।
आइच्चे तेरिच्छे, उण्हूणपहा हु उज्जोओ ॥33॥
सरलार्थ: जिसके मूल और प्रभा दोनों उष्ण होते हैं, वह अग्नि है। जिसकी केवल प्रभा ही उष्ण हो, वह आतप है; यह सूर्य के विमान में उत्पन्न हुए बादर पर्याप्त पृथ्वी-कायिक जीवों के शरीर हैं। जिसकी प्रभा भी उष्णता-रहित हो, वह उद्योत है।
देहे अविणाभावी, बंधण-संघाद इदि अबंधुदया ।
वण्ण - चउक्केऽभिण्णे, गहिदे चत्तारि बंधुदये ॥34॥
सरलार्थ: शरीर के साथ अविनाभावी होने के कारण बंधन और संघात को बंध और उदय में ग्रहण नहीं करते हैं तथा वर्ण-चतुष्क की बीस प्रकृतिओं को अभिन्नरूप में ग्रहण करने पर बंध और उदय में मात्र चार ही गिनते हैं।
पंच णव दोण्णि छब्बीसमवि य चउरो कमेण सत्तट्ठी ।
दोण्णि य पंच य भणिया, एदाओ बंध-पयडीओ ॥35॥
सरलार्थ: पाँच, नौ, दो, छब्बीस, चार, षड्षठ, दो और पाँच - ये क्रमश: बंध-योग्य प्रकृतिआँ कही हैं।
पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण सत्तट्ठी ।
दोण्णि य पंच य भणिया, एदाओ उदय-पयडीओ ॥36॥
सरलार्थ: पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, षड्षठ, दो और पाँच - ये क्रमश: उदय-योग्य प्रकृतिआँ हैं।
भेदे छा-दाल-सयं, इदरे बंधे हवंति वीस-सयं ।
भेदे सव्वे उदये, वा-वीस-सयं अभेदम्हि ॥37॥
सरलार्थ: बंध में भेद की अपेक्षा एक सौ छ्यालीस और अभेद की अपेक्षा एक सौ बीस हैं। उदय में भेद की अपेक्षा सभी और अभेद की अपेक्षा एक सौ बाईस हैं।
पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण ते-णउदी ।
दोण्णि य पंच य भणिया, एदाओ सत्त-पयडीओ ॥38॥
सरलार्थ: पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, तेरानबै, दो और पाँच - ये क्रमश: सत्त्व-योग्य प्रकृतिआँ कही हैं।
केवल-णाणावरणं, दंसण-छक्कं कसाय-वारसयं ।
मिच्छं च सव्वघादी, सम्मामिच्छं अबंधम्हि ॥39॥
सरलार्थ: केवलज्ञानावरण; केवलदर्शनावरण, स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, निद्रा और प्रचला - ये दर्शनषट्क; अनन्तानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण संबंधी क्रोध-मान-माया-लोभ - ये बारह कषायें; मिथ्यात्व और बंध-रहित, सत्त्व तथा उदय में सम्यग्मिथ्यात्व - ये २१ प्रकृतिआँ, सर्वघाति हैं।
णाणावरण-चउक्कं, ति-दंसणं सम्मगं च संजलणं ।
णव णोकसाय-विग्घं, छब्बीसा देस-घादीओ ॥40॥
सरलार्थ: मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मन:पर्ययज्ञानावरण - ये ज्ञानावरण-चतुष्क; चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण - ये तीन दर्शन; सम्यक्त्व-प्रकृति, क्रोध-मान-माया-लोभरूप संज्वलन कषाय; हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद रूप नौ नो कषाय; दानांतराय, लाभान्तराय, भोगांतराय, उपभोगान्तराय, वीर्यान्तरायरूप पाँच विघ्न/अंतराय - ये २६ प्रकृतिआँ देशघाति हैं।
सादं तिण्णेवाऊ, उच्चं णर-सुर-दुगं च पंचिंदी ।
देहा बंधण-संघा-दंगोवंगाइं वण्ण-चओ ॥41॥
सरलार्थ: साता-वेदनीय; मनुष्य, तिर्यंच और देव - ये तीन आयुष्क; उच्च-गोत्र, मनुष्य-गति, मनुष्य-गत्यानुपूर्वी, देव-गति, देव-गत्यानुपूर्वी, पंचेंद्रिय-जाति, औदारिक आदि पाँच शरीर, पाँच बंधन, पाँच संघात, औदारिक आदि तीन अंगोपांग; वर्ण, गंध, रस, स्पर्शमय वर्ण चतुष्क; समचतुरस्र-संस्थान, वज्रवृषभनाराच-संहनन, उपघात-रहित अगुरुलघु-षट्क/अगुरुलघु, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास; प्रशस्त-विहायोगति; त्रसादि बारह/त्रस, बादर, पर्याप्ति, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर - ये अड़षठ प्रकृतिआँ भेद-विवक्षा में तथा ब्यालीस प्रकृतिआँ अभेद-विवक्षा में पुण्य-प्रकृतिआँ हैं।
घाति अर्थात् ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ, मोहनीय की अट्ठाईस, अंतराय की पाँच - कुल सेंतालीस; नीच-गोत्र, असाता-वेदनीय, नरक-आयुष्क, नरक-गति, नरक-गत्यानुपूर्वी, तिर्यंच-गति, तिर्यंच-गत्यानुपूर्वी; एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रियरूप चार जाति; न्यग्रोध परिमंडल, स्वाति, कुब्जक, वामन और हुण्डक - ये पाँच संस्थान; वज्रनाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलक और असंप्राप्तासृपाटिका - ये पाँच संहनन; वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, उपघात, अप्रशस्त-विहायोगति; स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्ति, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयशस्कीर्तिरूप स्थावर दशक - ये अप्रशस्त-प्रकृतिआँ हैं। ये बंध में भेद की अपेक्षा अण्ठानबै तथा अभेद की अपेक्षा ब्यासी हैं। उदय में भेद की अपेक्षा सौ तथा अभेद की अपेक्षा चौरासी हैं।
समचउर-बज्ज-रिसहं, उवघादूणगुरु-छक्क सग्गमणं ।
तसबार-सट्ठसट्ठी, बादाल-मभेददो सत्था ॥42॥
सरलार्थ: साता-वेदनीय; मनुष्य, तिर्यंच और देव - ये तीन आयुष्क; उच्च-गोत्र, मनुष्य-गति, मनुष्य-गत्यानुपूर्वी, देव-गति, देव-गत्यानुपूर्वी, पंचेंद्रिय-जाति, औदारिक आदि पाँच शरीर, पाँच बंधन, पाँच संघात, औदारिक आदि तीन अंगोपांग; वर्ण, गंध, रस, स्पर्शमय वर्ण चतुष्क; समचतुरस्र-संस्थान, वज्रवृषभनाराच-संहनन, उपघात-रहित अगुरुलघु-षट्क/अगुरुलघु, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास; प्रशस्त-विहायोगति; त्रसादि बारह/त्रस, बादर, पर्याप्ति, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर - ये अड़षठ प्रकृतियाँ भेद-विवक्षा में तथा ब्यालीस प्रकृतियाँ अभेद-विवक्षा में पुण्य-प्रकृतियाँ हैं।
घादी-णीच-मसादं, णिरयाऊ णिरय-तिरिय-दुग-जादी ।
संठाण-संहदीणं, चदु-पण-पणगं च वण्ण-चओ ॥43॥
सरलार्थ: घाति अर्थात् ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ, मोहनीय की अट्ठाईस, अंतराय की पाँच - कुल सेंतालीस; नीच-गोत्र, असाता-वेदनीय, नरक-आयुष्क, नरक-गति, नरक-गत्यानुपूर्वी, तिर्यंच-गति, तिर्यंच-गत्यानुपूर्वी; एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रियरूप चार जाति; न्यग्रोध परिमंडल, स्वाति, कुब्जक, वामन और हुण्डक - ये पाँच संस्थान; वज्रनाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलक और असंप्राप्तासृपाटिका - ये पाँच संहनन; वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, उपघात, अप्रशस्त-विहायोगति; स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्ति, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशस्कीर्तिरूप स्थावर दशक - ये अप्रशस्त-प्रकृतिआँ हैं। ये बंध में भेद की अपेक्षा अण्ठानबै तथा अभेद की अपेक्षा ब्यासी हैं। उदय में भेद की अपेक्षा सौ तथा अभेद की अपेक्षा चौरासी हैं।