दीपावली वीतरागता का पर्व है | Dipavali Vitaragata Ka Parv Hai

दीपावली वीतरागता का पर्व है

-डॉ. वीरसागर जैन

प्रतिवर्ष दीपावली का पर्व आता है, मगर हम उसे सारी दुनिया के अन्धप्रवाह में बहते हुए अज्ञानतापूर्वक मनाकर यूँ ही अलविदा कर देते हैं। उससे आगे असली दीपावली मनाने के बारे में तनिक सोचते तक नहीं हैं, जबकि परमार्थ से दीपावली वीतरागता का पर्व है।

स्व-पर भेदविज्ञान के द्वारा सम्यग्ज्ञानी बनकर केवलज्ञानी बन जाना ही वास्तविक दीपावली मनाना है। सम्यग्ज्ञान ही सच्चा दीप है और सम्यग्ज्ञान ही सच्ची लक्ष्मी हैं, क्योंकि सम्यग्ज्ञान ही हमें वास्तविक प्रकाश और वैभव प्रदान करता है, इसलिए सम्यग्ज्ञान की उपासना करना ही वास्तविक दीपावली मनाना है।

बाहर की दीपावली को ही सब कुछ समझना, बाहर के फुलझड़ी पटाखों एवं मिठाइयों में ही संतुष्ट वे होना बहिरात्मा का काम है । अंतरात्मा कभी बाहर की दीपावली में नहीं उलझता। वह तो अपने अंतर में इस प्रकार की असली दीपावली मनाता है-

अब के ऐसी दीवाली मनाऊँ, कबहूं फेर न दुखड़ा पाऊँ ॥ टेक ॥
आन कुदेव कुरीति छांड के, श्री महावीर चितारूं।
राग-द्वेष का मैल जलाकर, उज्ज्वल ज्योति जगाऊँ ।।
अपनी मुक्ति-तिया हरषाऊँ…।।1।।

निज अनुभूति महालक्ष्मी का, वास हृदय करवाऊँ ।
निज गुण ‘लाभ-दोष’ टोटे का, लेखा ठीक लगाऊं।।
जासों फेर न टोटा पाऊं …।।2।।

ज्ञान रतन के दीप में, तप का तेल पवित्र भराऊँ ।
अनुभव ज्योति जगा के मिथ्या, अंधकार विनसाऊं।।
जासौं शिव की गैल निहारूँ …।।3।।

अष्ट करम का फोड़ पटाखा, विजयी जिन कहलाऊं।
शुद्ध-बुद्ध सुखकन्द मनोहर, शील स्वभाव लखाऊँ ॥
जासौं शिवगौरी बिलसाऊं… ।।14।।

तात्पर्य यह है कि ज्ञानी जीव दीपावली को वीतरागता का ही महापर्व मानते हैं और उसमें वीतरागता का पोषण करते हुए इस प्रकार मनाते हैं कि पुनः संसार-भ्रमण के दुःख न भोगने पड़ें। वे कुदेवादि की आराधना रूप सर्व कुरीतियों का त्याग करके श्री महावीर जिनेन्द्र का स्मरण करते हैं और राग-द्वेष की मलिनता को जलाकर वीतरागता की ऐसी उज्ज्वल ज्योति जलाते हैं कि मुक्तिरूपी लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती है।

ज्ञानी जीव आत्मानुभूति को ही मोक्षलक्ष्मी मानते हैं और आज के दिन उसी को अपने हृदय में विराजमान करते हैं। वे अपने लाभ-हानि का सारा लेखा-जोखा भी अपने भले-बुरे परिणामों के आधार पर ही लगाते हैं, ताकि पुनः कभी जीवन में टोटा/घाटा न हो। जो लोग अपने परिणामों का लेखा-जोखा नहीं लगाते, केवल दुकान, व्यापार के बहीखातों का ही हिसाब लगाते रहते हैं, वे जीवन में बहुत घाटे में रहते हैं। वे दीपावली को सही रूप में नहीं मनाते, क्योंकि परमार्थ से दीपावली वीतरागता का पर्व है।

ज्ञानी जीव आज के दिन अपने ज्ञानरूपी रत्नदीप में संयम तपादि का तेल भरते हैं और फिर आत्मानुभूति की ऐसी दैदीप्यमान ज्योति जलाते हैं कि अनादिकालीन सम्पूर्ण मिथ्या अंधकार दूर भाग जाता है और सम्पूर्ण मोक्षमार्ग स्पष्ट दिखाई दे जाता है।

इसके बाद ये ज्ञानी जीव अष्टकर्मों का पटाखा फोड़कर विजयी जिन हो जाते हैं और फिर अपने शुद्ध-बुद्ध सुखकन्द मनोहर आत्मस्वभाव में लीन होकर सिद्धशिला में विराजमान होते हैं। वहां वे जन्म-जरा-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर अनंतकाल तक सुख भोगते हैं।

इस प्रकार यह अत्यन्त स्पष्ट है कि परमार्थ से दीपावली वीतरागता का ही पर्व है और ज्ञानी जीव उसे उसी प्रकार वीतरागता की अधिकाधिक आराधना करते हुए मनाते हैं। इस युग के अन्तिम तीर्थंकर देवाधिदेव 1008 श्री महावीर स्वामी ने दीपावली के महापर्व को इसी प्रकार अष्टकर्म का पटाखा फोड़कर मनाया था। उनके परम शिष्य गौतमस्वामी ने भी दीपावली के पर्व को केवलज्ञानरूपी महादीपक प्रज्वलित करके मनाया था।

यदि हम भी वास्तविक सुख-शांति चाहते हैं तो हमें भी इसी प्रकार दीपावली मनाना चाहिए तथा दीपावली को वीतरागता का महापर्व मानकर यथाशक्ति वीतरागता की ही उपासना करनी चाहिए।