भगवती आराधना गाथा एवं अर्थ
आचार्य शिवार्य
भगवती आराधना की प्राकृत मूल गाथाएँ १ से २१६४, हर गाथा के नीचे उसका हिन्दी अर्थ (पोस्ट की लंबाई की सीमा के कारण आगे का पाठ अगले ७ उत्तरों में, हर भाग अपनी गाथा संख्या के शीर्षक के साथ)। गाथा और अर्थ जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर (जीवराज जैन ग्रंथमाला, हिन्दी विभाग पुष्प ३६, ई. सन् २००४; सम्पादक एवं अनुवादक सिद्धान्ताचार्य पं. कैलाशचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) के संस्करण से ज्यों का त्यों लिए हैं। संस्कृत विजयोदया टीका, हिन्दी टीका, शंका समाधान और टिप्पणियाँ नहीं लीं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा। स्कैन की गई प्रति में मुद्रित पृष्ठ १३६-१३७, ६०० और ७०९ नहीं हैं, इसलिए गाथा १०३-१०४, ११८६-११८७ और १५४७-१५५० यहाँ नहीं हैं; गाथा १७७२ पृष्ठ ७९१-७९२ पर छपी नहीं मिली। कुछ गाथाओं का अलग गाथार्थ संस्करण में नहीं है, वहाँ केवल गाथा दी है।
केवल मूल गाथा: भगवती आराधना मूल गाथा (आचार्य शिवार्य) | Bhagwati Aradhana Mool Gatha (Acharya Shivarya)
पूर्ण ग्रन्थ, विजयोदया टीका एवं हिन्दी टीका सहित: भगवती आराधना (आचार्य शिवार्य), विजयोदया टीका एवं हिंदी टीका सहित | Bhagwati Aradhana (Acharya Shivarya)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/19570
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गाथा १ से ३१८
सिद्धे जयप्पसिद्धे चउव्विहाराहणाफलं पत्ते ।
वंदित्ता अरहंते वोच्छं आराहणं कमसो ॥१॥
अर्थ: ‘जगत्में प्रसिद्ध और चार प्रकारकी आराधनाके फलको प्राप्त सिद्धों और अर्हन्तोंको नमस्कार करके क्रमसे आराधनाको कहूँगा ॥१॥’
उज्जोवणमुज्जवणं णिव्वहणं साहणं च णिच्छरणं ।
दंसणणाणचरित्ततवाणमाराहणा भणिया ॥२॥
अर्थ: सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्त्वके उद्योतन, उद्यवन, निर्वहन, साधन और (णिच्छरणं) निस्तरणको (आराहणा) आराधना कहा है ॥२॥
दुविहा पुण जिणवयणे भणिया आराहणा समासेण ।
सम्मत्तम्मि य पढमा विदिया य हवे चरित्तंमि ॥३॥
अर्थ: जिनागममें संक्षेपसे आराधना दो प्रकारकी कही है। श्रद्धान विषयक प्रथम आराधना है। और दूसरी चारित्रविषयक आराधना है ॥३॥
दंसणमाराहंतेण णाणमाराहियं हवे णियमा ।
णाणं आराहंतेण दंसणं होइ भयणिज्जं ॥४॥
अर्थ: दर्शनकी आराधना करने वालेके द्वारा नियमसे ज्ञानकी आराधना होती है । किन्तु ज्ञानकी आराधना करने वालेके द्वारा दर्शनकी आराधना भजनीय है, होती भी है, नहीं भी होती ॥४॥
सुद्धणया पुण णाणं मिच्छादिट्ठिस्स बेंति अण्णाणं ।
तम्हा मिच्छादिट्ठी णाणस्साराहओ णेव ॥५॥
अर्थ: किन्तु शुद्धनय दृष्टि वाले ज्ञानी जन मिथ्यादृष्टिके ज्ञानको अज्ञान कहते हैं, इसलिए मिथ्यादृष्टि ज्ञानका आराधक नहीं ही होता ॥५॥
संजममाराहंतेण तवो आराहिओ हवे णियमा ।
आराहंतेण तवं चारित्तं होइ भयणिज्जं ॥६॥
अर्थ: संयमकी आराधना करने वालेके द्वारा तप नियमसे आराधित होता है । किन्तु तपकी आराधना करने वालेके द्वारा चारित्र भजनीय होता है ॥६॥
सम्मादिट्ठिस्स वि अविरदस्स ण तवो महागुणो होदि ।
होदि हु हत्थिण्हाणं चुंदच्छुदकम्म तं तस्स ॥७॥
अर्थ: सम्यग्दृष्टी भी जो अविरत है अर्थात् अविरत सम्यग्दृष्टीका तप महान् उपकारी नहीं होता । उसका वह तप हाथीके स्नानकी और मंथनचर्मपालिका मथानीकी रस्सीकी तरह होता है ॥७॥
अहवा चारित्ताराहणाए आराहियं हवइ सव्वं ॥
आराहणाए सेसस्स चारित्ताराहणा भज्जा ॥८॥
अर्थ: अथवा चारित्रकी आराधनामें ज्ञान, दर्शन, तप सब आराधित होता है ।ज्ञान दर्शन और तपमेंसे किसीकी भी आराधनामें चारित्रको आराधना भाज्य होती है ॥८॥
कायव्वमिणमकायव्वयंत्ति णाऊण होइ परिहारो ।
तं चेव हवइ णाणं तं चेव य होइ सम्मत्तं ॥९॥
अर्थ: यह कर्तव्य है और यह अकर्तव्य है इस प्रकार जानकर त्याग होता है। वही चैतन्यज्ञान है और वही सम्यक्त्व है ॥९॥
चरणम्मि तम्मि जो उज्जमो आउंजणा य जो होई ।
सो चेव जिणेहिं तवो भणिदो असढं चरंतस्स ॥१०॥
अर्थ: उस अकर्तव्यके त्यागरूप चारित्रमें जो उद्योग है और उपयोग होता है, उन उद्योग और उपयोगको ही छल कपट त्यागकर करने वालेका जिनेन्द्रदेवने तप कहा है ॥१०॥
णाणस्स दंसणस्स य सारो चरणं हवे जहाखादं ।
चरणस्स तस्स सारो णिव्वाणमणुत्तरं भणियं ॥११॥
अर्थ: ज्ञानका और दर्शनका सार यथाख्यात चारित्र होता है । उस यथाख्यात चारित्रका सार सर्वोत्कृष्ट निर्वाण कहा है ॥११॥
चक्खुस्स दंसणस्स य सारो सप्पादिदोसपरिहरणं ।
चक्खू होइ णिरत्थं दट्ठूण विले पडंतस्स ॥१२॥
अर्थ: चक्षुसे देखनेका सार सर्प आदि दोषोंसे दूर रहना है। देखकर भी आगे वर्तमान साँपके बिलमें गिरनेवाले मनुष्यकी आँख व्यर्थ है ॥१२॥
णिव्वाणस्स य सारो अव्वाबाहं सुहं अणोवमियं ॥
कायव्वा हु तदट्ठं आदहिदगवेसिणा चेट्ठा ॥१३॥
अर्थ: निर्वाणका सार बाधारहित उपमारहित सुख है । अतः आत्महितके खोजीको उस अव्याबाध सुखकी प्राप्तिके लिए चेष्टा करना चाहिए ॥१३॥
जम्हा चरित्तसारो भणिया आराहणा पवयणम्मि ।
सव्वस्स पवयणस्स य सारो आराहणा तम्हा ॥१४॥
अर्थ: क्योंकि प्रवचनमें चारित्रका फल आराधना कहा है । इसलिए समस्त प्रवचनका सार आराधना ही है ॥१४॥
सुचिरमवि णिरदिचारं विहरित्ता णाणदंसणचरित्ते ॥
मरणे विराधयित्ता अणंतसंसारिओ दिट्ठो ॥१५॥
अर्थ: ज्ञान श्रद्धान और चारित्रमें बहुत कालतक भी अतिचार बिना विहार करके मरणकालमें विराधना करके अनन्तभव धारण करनेवाला देखा गया है ॥१५॥
समिदिसु य गुत्तीसु य दंसणणाणे य णिरदिचाराणं ।
आसादणबहुलाणं उक्कस्सं अंतरं होई ॥१६॥
अर्थ: समितियोंमें और गुप्तियोंमें और दर्शन और ज्ञानमें जो अतिचार रहित प्रवृत्ति करते हैं । किन्तु मरणकाल आने पर परीषहके भयसे समिति आदिमें बारम्बार दोष लगाते हुए संक्लेश परिणाम करते हैं उनका अर्धपुद्गल परावर्तन काल प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर होता है । अर्थात् मरते समय रत्नत्रयसे च्युत होकर पुनः उतना काल बीतने पर रत्नत्रय प्राप्त करते हैं ॥१६॥
दिट्ठा अणादिमिच्छादिट्ठी जम्हा खणेण सिद्धा य ॥
आराहया चरित्तस्स तेण आराहणा सारो ॥१७॥
अर्थ: क्योंकि रत्नत्रयके आराधक अनादिमिथ्यादृष्टि क्षणमात्रमें अर्थात् अल्पकालमें द्रव्यकर्म भावकर्मसे रहित सिद्ध देखे गये हैं। इसलिये आराधना सार है ॥१७॥
जदि पवयणस्स सारो मरणे आराहणा हवदि दिट्ठा ।
किंदाइं सेसकाले जदि जददि तवे चरित्ते य ॥१८॥
अर्थ: प्रवचनका अतिशय आयुके अन्तमें आराधना यदि देखी जाती है । तो क्यों इस समय मरणकालसे अन्यकालमें यति तप चारित्र और ज्ञानदर्शनमें यत्न करता है ? ॥१८॥
आराहणाए कज्जे परियम्मं सव्वदा वि कायव्वं ।
परियम्मभाविदस्स हु सुहसज्झाराहणा होइ ॥१९॥
अर्थ: आराधनाके कार्यके लिये परिकर्म सभी कालमें करना चाहिये; क्योंकि परिकर्म करने वालेके ही आराधना सुखपूर्वक साध्य होती है ॥१९॥
जइ रायकुलपसूओ जोग्गं णिच्चमवि कुणइ परियम्मं ।
तो जिदकरणो जुद्धे कम्मसमत्थो भविस्सदि हि ॥२०॥
अर्थ: जैसे राजपुत्र योग्य शस्त्र प्रहारका अभ्यास युद्धकालसे पहले प्रतिदिन भी करता है । पश्चात् शस्त्र प्रहार रूप क्रियाको अपने अधीन करके युद्ध करनेमें समर्थ होता है ॥२०॥
इयसामण्णं साधू वि कुणदि णिच्चमवि जोगपरियम्मं ।
तो जिदकरणो मरणे झाणसमत्थो भविस्सहदि ॥२१॥
अर्थ: इसी प्रकार साधु भी ध्यानका परिकर्म जो (सामण्णं) श्रामण्य है उसे नित्य भी करता है, कि इसके पश्चात् मनको वशमें करके मैं मरते समय ध्यानमें समर्थ होऊँगा ॥२१॥ धर्म और शुक्ल ध्यान करनेमें समर्थ हो सकूं ॥२१॥
जोगाभाविदकरणो सत्तू जेदूण जुद्धरंगम्मि ।
जह सो कुमारमल्लो रज्जवडायं बला हरदि ॥२२॥
अर्थ: जैसे अभ्यासके द्वारा बार-बार लक्ष्यबेध शस्त्रप्रहार आदि क्रियामें दक्ष वह योद्धा राजपुत्र युद्धभूमिमें शत्रुको जीतकर राज्यके ध्वजको बलपूर्वक हरता है ॥२२॥
तह भाविदसामण्णो मिच्छत्तादी रिवू विजेदूण ।
आराहणापडायं हरइ सुसंथाररंगम्मि ॥२३॥
अर्थ: उस राजपुत्रकी ही तरह पूर्वमें समानभावका अभ्यासी साधु मिथ्यात्व आदि शत्रुओंको पूरी तरहसे जीतकर शोभनीय संस्तररूपी रंगभूमिमें आराधनारूपी पताकाको ग्रहण करता है ॥२३॥
पुव्वमभाविदजोग्गो आराधेज्ज मरणे जदि वि कोई ।
खण्णुगदिट्ठंतो सो तं खु पमाणं ण सव्वत्थ ॥२४॥
अर्थ: मरण समयसे पहले ध्यानके परिकरका अभ्यास न करनेवाला यद्यपि कोई मरते समय आराधना करे तो वह स्थाणुदृष्टान्तमात्र है । सर्वत्र (पमाणं ण) प्रमाण नहीं है ॥२४॥
मरणाणि सत्तरस देसिदाणि तित्थंकरेहिं जिणवयणे ॥
तत्थ वि य पंच इह संगहेण मरणाणि वोच्छामि ॥२५॥
अर्थ: जिनागममें तीर्थङ्करोंने मरण सतरह कहे हैं । उन सतरह प्रकारके मरणोंमेंसे भी यहाँ (संगहेण) संक्षेपसे पाँच मरणोंको कहूँगा ॥२५॥
पंडिदपंडिदमरणं पंडिदयं बालपंडिदं चेव ॥
बालमरणं चउत्थं पंचमयं बालबालं च ॥२६॥
अर्थ: पण्डितपण्डितमरण, पण्डितमरण, बाल पण्डितमरण, चौथा बालमरण और पाँचवा बाल बालमरण, ये पाँच मरण हैं।
पंडिदपंडितमरणे खीणकसाया मरंति केवलिणो ।
विरदाविरदा जीवा मरंति तदियेण मरणेण ॥२७॥
अर्थ: पण्डितपण्डितमरणसे क्षीण कषाय और अयोगकेवली मरते हैं। विरताविरत जीव तीसरे मरणसे मरते हैं ॥२७॥
पायोपगमणमरणं भत्तपइण्णा य इंगिणी चेव ।
तिविहं पंडितमरणं साहुस्स जहुत्तचारिस्स ॥२८॥
अर्थ: पादोपगमन मरण भक्तप्रतिज्ञा और इंगिणीमरण इस प्रकार पण्डितमरण तीन प्रकार का है । वह शास्त्रमें कहे अनुसार आचरण करनेवाले साधु के होता है ॥२८॥
अविरदसम्मादिट्ठी मरंति बालमरणे चउत्थम्मि ।
मिच्छादिट्ठी य पुणो पंचमए बालबालम्मि ॥२९॥
अर्थ: अविरत सम्यग्दृष्टि चतुर्थ बालमरणमें मरते हैं । मिथ्यादृष्टि पाँचवें बालबालमरणमें मरते हैं ॥२९॥
तत्थोवसमियसमत्तं खइयं खवोवसमियं वा ।
आराहंतस्स हवे सम्मत्ताराहणा पढमा ॥३०॥
अर्थ: उन सम्यक्त्वोंमें औपशमिक सम्यक्त्व, क्षायिक सम्यक्त्व अथवा क्षायोपशमिक सम्यक्त्वकी आराधना करने वालेके प्रथम सम्यग्दर्शन आराधना होती है ॥३०॥
सम्मादिट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं तु सद्दहइ ॥
सद्दहइ असब्भावं अयाणमाणो गुरुणियोगा ॥३१॥
अर्थ: उपदिष्ट अर्थात् कथित जिनागममें श्रद्धान करता ही है जो जीव वह सम्यग्दृष्टी है । किन्तु नहीं जानते हुए गुरुके नियोगसे असत्य भी अर्थका श्रद्धान करता है ॥३१॥
सुत्तादो तं सम्मं दरसिज्जंतं जदा ण सद्दहदि ॥
सो चेव हवइ मिच्छादिट्ठी जीवो तदो पहुदि ॥३२॥
अर्थ: सूत्रसे प्रथम गुरुके उपदेशसे विपरीत रूपसे ग्रहण किये अर्थको सम्यक् अविपरीत रूपसे अन्य आचार्यके द्वारा दिखलाने पर जब श्रद्धा नहीं करता । वही सम्यग्दृष्टी उस समय से मिथ्यादृष्टि होता है ॥३२॥
सुत्तं गणधरगथिदं तहेव पत्तेयबुद्धकहियं च ॥
सुदकेवलिणा कहियं अभिण्णदसपुव्विगथिदं च ॥३३॥
अर्थ: जो गणधरके द्वारा रचा हुआ हो, प्रत्येक बुद्धके द्वारा कहा हुआ हो, या श्रुतकेवली के द्वारा कहा हुआ हो या अभिन्न दशपूर्वीके द्वारा रचा गया हो वह सूत्र है ॥३३॥
गिहिदत्थो संविग्गो अच्छुवदेसे ण संकणिज्जो हु ।
सो चेव मंदधम्मो अच्छुवदेसम्मि भजणिज्जो ॥३४॥
अर्थ: जिसने सूत्रके अर्थको ग्रहण किया है, संसारसे भयभीत है वह सूत्रोंके उपदेशमें शङ्का करनेके योग्य नहीं ही है। वही गृहीतार्थ मंद चरित्र वाला हो तो सूत्रके व्याख्यानमें भाज्य है ॥३४॥
धम्माधम्मागासाणि पोग्गला कालदव्व जीवे य ।
आणाए सद्दहन्तो समत्ताराहओ भणिदो ॥३५॥
अर्थ: धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य, पुद्गलद्रव्य, कालद्रव्य और जीवद्रव्यकी आज्ञासे श्रद्धान करने वाला सम्यक्त्वका आराधक होता है ॥३५॥
संसारसमावण्णा य छव्विहा सिद्धिमस्सिदा जीवा ।
जीवणिकाया एदे सद्दहिदव्वा हु आणाए ॥३६॥
अर्थ: संसार अवस्थाको प्राप्त छह प्रकारके और सिद्धिको प्राप्त जीव होते है। ये जीव- निकाय आप्त की आज्ञाके बलसे श्रद्धान करनेके योग्य हैं ही ॥३६॥
आसवसंवरणिज्जरबंधो मुक्खो य पुण्णपावं च ॥
तह एव जिणाणाए सद्दहिदव्वा अपरिसेसा ॥३७॥
अर्थ: आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध और मोक्ष और पुण्य, पाप ये सब सातों पदार्थ उसी प्रकार जिनदेवकी आज्ञासे श्रद्धान करने चाहिये ॥३७॥
पदमक्खरं च एक्कं पि जो ण रोचेदि सुत्तणिद्दिट्ठं ॥
सेसं रोचंतो वि हु मिच्छादिट्ठी मुणेयव्वो ॥३८॥
अर्थ: जिसे पूर्वोक्त सूत्रमें कहा एक भी पद और अक्षर नहीं रुचता । शेषमें रुचि होते हुए भी निश्चयसे उसे मिथ्यादृष्टि जानना चाहिये ॥३८॥
मोहोदयेण जीवो उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहदि ॥
सद्दहदि असब्भावं उवइट्ठं अणुवइट्ठं वा ॥३९॥
अर्थ: मोहके उदयसे जीव उपदिष्ट प्रवचनको श्रद्धान नहीं करता। किन्तु उपदिष्ट अथवा अनुपदिष्ट असमीचीन भाव अर्थात् अतत्त्वका श्रद्धान करता है ॥३९॥
मिच्छत्तं वेदंतो जीवो विवरीयदंसणो होदि ॥
ण य धम्मं रोचेदि हु महुरं खु रसं जहा जरिदो ॥४०॥
अर्थ: मिथ्यात्वको वेदन - अनुभवन करने वाला जीव विपरीत श्रद्धावाला होता है । उसे धर्म नहीं रुचता । जैसे ज्वरसे ग्रस्त व्यक्तिको निश्चयसे मधुर रस नहीं रुचता ॥४०॥
सुविहियमिमं पवयणं असद्दहंतेणिमेण जीवेण ॥
बालमरणाणि तीदे मदाणि काले अणंताणि ॥४१॥
अर्थ: अच्छी तरहसे किये गये इस प्रवचनको अश्रद्धान करने वाले जीवने अतीतकालमें अनन्त बालमरण मरे ॥४१॥
णिग्गंथं पव्वयणं इणमेव अणुत्तरं सुपरिसुद्धं ॥
इणमेव मोक्खमग्गोत्ति मदी कायव्विया तम्हा ॥४२॥
अर्थ: इसलिये रत्नत्रयरूप जो प्रवचनका अभिधेय है वही सर्वोत्कृष्ट और पूर्णरूपसे निर्दोष है । वही मोक्षका मार्ग है ऐसी मति करनी चाहिये ॥४२॥
सम्मत्तादीचारा संका कंखा तहेव विदिगिंछा ।
परदिट्ठीण पसंसा अणायदणसेवणा चेव ॥४३॥
अर्थ: शङ्का, आसक्ति, उसी तरह विचिकित्सा या ग्लानि अतत्त्वदृष्टिजनोंकी प्रशंसा और अनायतनोंकी सेवा, ये सम्यक्त्वके अतिचार हैं ॥४३॥
उवगूहणठिदिकरणं वच्छल्लपभावणा गुणा भणिदा ।
सम्मत्तविसोधीए उवगूहणकारया चउरो ॥४४॥
अर्थ: उपगूहन, स्थितिकरण, वात्सल्य, प्रभावना ये चार गुण सम्यक्त्वकी विशुद्धिकी वृद्धि करनेवाले कहे हैं ॥४४॥
अरहंतसिद्धचेइय सुदे य धम्मे य साधुवग्गे य ।
आयरिय उवज्झाए सुपवयणे दंसणे चावि ॥४५॥
अर्थ: अरहन्त, सिद्ध और प्रतिबिम्बोंमें श्रुतमें और धर्ममें और साधुवर्गमें आचार्यमें उपाध्यायमें और सुप्रवचनमें दर्शनमें भी ॥४५॥
भत्ती पूया वण्णजणणं च णासणमवण्णवादस्स ॥
आसादणपरिहारो दंसणविणओ समासेण ॥४६॥
अर्थ: भक्ति, पूजा, वर्णजनन और अवर्णवादका नाश करना तथा आसादनाका दूर करना संक्षेपसे दर्शन विनय है ॥४६॥
एवं दंसणमाराहंतो मरणे असंजदो जदि वि कोवि ॥
सुविसुद्धतिव्वलेस्सो परित्तसंसारिओ होई ॥४७॥
अर्थ: इस प्रकार सम्यग्दर्शनकी आराधना करने वाला मरते समय यद्यपि कोई असंयत होता है किन्तु सुविशुद्ध तीव्र लेश्या वाला अल्प संसारी होता है ॥४७॥
तिविहा समत्ताराहणा य उक्कस्समज्झिमजहण्णा ॥
उक्कस्साए सिज्झदि उक्कस्ससुक्कलेस्साए ॥४८॥
अर्थ: सम्यक्त्वकी आराधना तीन प्रकारकी है । उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य । उत्कृष्ट शुक्ल लेश्या सहित, उत्कृष्ट सम्यक्त्व आराधनामें मोक्ष प्राप्त करता है ॥४८॥
सेसा य हुंति भवा सत्त मज्झिमाए य सुक्कलेस्साए ॥
संखेज्जाऽसंखेज्जा वा सेसा भवा जहण्णाए ॥४९॥
अर्थ: और मध्यम शुक्ल लेश्याके साथ मध्यम सम्यक्त्वाराधनासे सात मनुष्य आदि पर्याय शेष होती है । जघन्य सम्यक्त्वाराधनासे संख्यात अथवा असंख्यात (भव) भव अवशेष रहते हैं ॥४९॥
उक्कस्सा केवलिणो मज्झिमया सेससम्मदिट्ठीणं ।
अविरदसम्मादिट्ठिस्स संकिलिट्ठस्स हु जहण्णा ॥५०॥
अर्थ: उत्कृष्ट आराधना केवलीके होती है । मध्यम आराधना शेष सम्यग्दृष्टियोंके होती है । जघन्य आराधना संक्लेश परिणाम वाले अविरत सम्यग्दृष्टिके होती है ॥५०॥
संखेज्जमसंखेज्जगुणं वा संसारमणुसरित्तूणं ।
दुक्खक्खयं करेंति जे सम्मत्तेणणुमरंति ॥५१॥
अर्थ: जो सम्यक्त्वके साथ मरते हैं वे असंख्यात अथवा असंख्यातगुणे संसारमें भ्रमण करके दुःखका क्षय करते हैं ॥५१॥
लध्दूण य सम्मत्तं मुहुत्तकालमवि जे परिवडंति ।
तेसिमणंताणंता ण भवदि संसारवासद्धा ॥५२॥
अर्थ: जो अन्तर्मुहूर्त मात्र भी सम्यक्त्वको प्राप्त करके सम्यक्त्वसे गिर जाते हैं उनका संसारमें बसनेका काल अनन्तानन्त नहीं होता ॥५२॥
जे पुण सम्मत्ताओ पब्भट्ठा ते पमाददोसेण ।
भामन्ति दु भव्वा वि हु संसारमहण्णवे भीमे ॥५३॥
अर्थ: पुनः जो सम्यक्त्वसे भ्रष्ट हो जाते है । वे प्रमादके दोषसे भव्य होते हुए भी भयंकर संसाररूपी समुद्रमें भ्रमण करते ही हैं ॥५३॥
जो पुण मिच्छादिट्ठी दढचरित्तो अदढचरित्तो वा ॥
कालं करेज्ज ण हु सो कस्स हु आराहओ होदि ॥५४॥
अर्थ: जो पुनः मिथ्यादृष्टि है वह दृढ़ चारित्र वाला अथवा अदृढ़ चारित्र वाला हो और मरण करे तो वह किसीका भी आराधक नहीं ही होता ॥५४॥
तं मिच्छत्तं जमसद्दहणं तच्चाण होइ अत्थाणं।
संसइयमभिग्गहियं अणभिग्गहियं च तं तिविहं ॥५५॥
अर्थ: जो तत्त्वार्थोंका अश्रद्धान है वह मिथ्यात्व है उसके तीन भेद हैं। संशयसे होनेवाला मिथ्यात्व, अभिगृहीत मिथ्यात्व और अनभिगृहीत मिथ्यात्व ॥५५॥
जे वि अहिंसादिगुणा मरणे मिच्छत्तकडुगिदा होंति ॥
ते तस्स कडुगदुद्धियगदं व दुद्धं हवे अफला ॥५६॥
अर्थ: जो भी अहिंसा आदि गुण मरते समय मिथ्यात्वके द्वारा दूषित होते हैं, वे उस दूषित गुण वाले आत्माके कडुवी तूंबीमें रखे गये दूधकी तरह निष्फल होते हैं ॥५६॥
जह भेसजं पि दोसं आवहइ विसेण संजुदं संतं ॥
तह मिच्छत्तविसजुदा गुणा वि दोसावहा होंति ॥५७॥
अर्थ: जैसे औषध भी विषसे सम्बद्ध होने पर दोष करती है। उसी प्रकार मिथ्यात्वरूपी विषसे सम्बद्ध अहिंसा आदि गुण भी दोषकारी होते हैं ॥५७॥
दिवसेण जोयणसयं पि गच्छमाणो सगिच्छिदं देसं ।
अण्णंतो गच्छंतो जह पुरिसो णेव पाउणदि ॥५८॥
अर्थ: जैसे एक दिनमें सौ योजन भी चलनेवाला यदि अन्य मार्गसे जाता है तो वह पुरुष अपने इच्छित देशको नहीं प्राप्त होता ॥५८॥
धणिदं पि संजमंतो मिच्छादिट्ठी तहा ण पावेई ।
इट्ठं णिव्वुदिमग्गं उग्गेण तवेण जुत्तो वि ॥५९॥
अर्थ: उसी प्रकार अत्यन्त भी चारित्रका पालन करनेवाला उग्र तप करते हुए भी मिथ्यादृष्टि इष्ट प्रधान मोक्ष नहीं पाता ॥५९॥
जस्स पुण मिच्छदिट्ठिस्स णत्थि सीलं वदं गुणो चावि ।
सो मरणे अप्पाणं किह ण कुणई दीहसंसारं ॥६०॥
अर्थ: जिस मिथ्यादृष्टिके शील व्रत अथवा ज्ञानादि भी नहीं है वह मरनेपर कैसे अनन्त संसार नहीं करता है ॥६०॥
एक्कं पि अक्खरं जो अरोचमाणो मरेज्ज जिणदिट्ठं ॥
सो वि कुजोणिणिवुड्डो किं पुण सव्वं अरोचंतो ॥६१॥
अर्थ: जिन भगवान्के द्वारा देखा गया एक भी अक्षर जिसे रुचता नहीं है वह मरे तो वह भी कुयोनियोंमें डूबता है, तब जिसे सब ही नहीं रुचता उसके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ॥६१॥
संखेज्जासंखेज्जाणंता वा होंति बालबालम्मि ॥
सेसा भव्वस्स भवा णंताणंता अभव्वस्स ॥६२॥
अर्थ: बाल-बाल मरणसे मरनेपर भव्य जीवके संख्यात, असंख्यात अथवा अनन्त भव शेष होते हैं । अभव्यके अनन्तानन्त भव होते हैं ॥६२॥
पुव्वं ता वण्णेसिं भत्तपइण्णं पसत्थमरणेसु ॥
उस्सण्णं सा चेव हु सेसाणं वण्णणा पच्छा ॥६३॥
अर्थ: प्रशस्त मरणोंमें पहले भक्त प्रत्याख्यानको कहूँगा । क्योंकि वह भक्त प्रत्याख्यान ही बहुतायतसे प्रचलित है । शेष मरणोंका वर्णन पीछे करेंगे ॥६३॥
दुविहं तु भत्तपच्चक्खाणं सविचारमध अविचारं ।
सविचारमणागाढे मरणे सपरक्कमस्स हवे ॥६४॥
अर्थ: भक्त प्रत्याख्यान दो प्रकारका ही है । सविचार और अविचार । सविचार भक्त प्रत्याख्यान सहसा मरणके उपस्थित न होनेपर पराक्रम अर्थात् साहस और बलसे युक्त साधुके होता है ॥६४॥
सविचारभत्तपच्चक्खाणस्सिणमो उवक्कमो होइ ।
तत्थ य सुत्तपदाइं चत्तालं होंति णेयाइं ॥६५॥
अर्थ: सविचार भक्त प्रत्याख्यानका यह उपक्रम अर्थात् प्रारम्भ होता है । और इस भक्त प्रत्याख्यानमें सूत्र और पद चालीस जानने योग्य है ॥६५॥
अरिहे लिंगे सिक्खा विणय समाधी य अणियदविहारे ।
परिणामोवधिजहणा सिदी य तह भावणाओ य ॥६६॥
अर्थ: अर्ह अर्थात् योग्य, लिंग अर्थात् चिह्न, शिक्षा अर्थात् शास्त्राध्ययन विनय और मनका एकाग्र करना, अनियत क्षेत्रमें विहार, परिणाम, परिग्रह त्याग और शुभ परिणामोंकी श्रेणिपर आरोहण तथा अभ्यास ॥६६॥
सल्लेहणा दिसा खामणा य अणुसिट्ठि परगणे चरिया ।
मग्गण सुट्ठिय उवसंपया य पडिछा य पडिलेहा ॥६७॥
अर्थ: सल्लेखना, दिशा, क्षमाग्रहण, शिक्षा ग्रहण, अन्य गणमें प्रवृत्ति, आचार्यकी खोज सुस्थित उपसंपदा, परीक्षा, प्रतिलेखना ॥६७॥
आपुच्छा य पडिच्छणमेगस्सालोयणा य गुणदोसा ।
सेज्जा संथारो वि य णिज्जवग पयासणा हाणी ॥६८॥
अर्थ: पूछना एक क्षपकको स्वीकार करना, और आलोचना, आलोचनाके गुण दोष, शय्या अर्थात् वसति, और संस्तर, निर्यापक, अन्तिम आहारका प्रकाशन क्रमसे आहारका त्याग ॥६८॥
पच्चक्खाणं खामणं खमणं अणुसट्ठिसारणाकवचे ॥
समदाज्झाणे लेस्सा फलं विजहणा य णेयाई ॥६९॥
अर्थ: प्रत्याख्यान, क्षमा ग्रहण, दूसरोंके अपराधको क्षमा करना । शिक्षण, सारणा, कवच, समभाव, लेश्या, आराधनाका फल (य) और (विजहणा) शरीर त्याग ये अधिकार जानना ॥६९॥
वाहिव्व दुप्पसज्झा जरा य सामण्णजोगहाणिकरी ॥
उवसग्गा वा देवियमाणुसतेरिच्छया जस्स ॥७०॥
अर्थ: जिसके दुष्प्रसाध्य व्याधि हो, अथवा श्रामण्यके सम्बन्धकी हानि पहुँचानेवाली वृद्धावस्था हो अथवा देवकृत मनुष्यकृत और तिर्यञ्चकृत उपसर्ग हो वह भक्त प्रत्याख्यान करनेके योग्य है ॥७०॥
अणुलोमा वा सत्तू चारित्तविणासया हवे जस्स ॥
दुब्भिक्खे वा गाढे अडवीए विप्पणट्ठो वा ॥७१॥
अर्थ: अनुकूल बन्धु मित्र शत्रु हो जो चारित्रका विनाश करनेवाले हों । अथवा अनुकूल बन्धु और शत्रु जिसके चारित्रका विनाश करनेवाले हो । भयंकर दुर्भिक्ष हो अथवा भयंकर जंगलमें भटक गया हो तो भक्त प्रत्याख्यानके योग्य होता है ॥७१॥
चक्खुं व दुब्बलं जस्स होज्ज सोदं व दुब्बलं जस्स ॥
जंघाबलपरिहीणो जो ण समत्थो विहरिदुं वा ॥७२॥
अर्थ: जिसकी चक्षु दुर्बल हो अथवा जिसके श्रोत्र दुर्बल हों। जो जंघाबलसे हीन हो (वा) अथवा विहार करनेमें समर्थ न हो ॥७२॥
अण्णम्मि चावि एदारिसंमि आगाढकारणे जादे ॥
अरिहो भत्तपइण्णाए होदि विरदो अविरदो वा ॥७३॥
अर्थ: उक्तकारणके समान अन्य भी प्रबल कारण उपस्थित होनेपर विरत अथवा अविरत भक्तप्रत्याख्यानके योग्य होता है ॥७३॥
उस्सरइ जस्स चिरमवि सुहेण सामण्णमणदिचारं वा ॥
णिज्जावया य सुलहा दुब्भिक्खभयं च जदि णत्थि ॥७४॥
अर्थ: जिसका चारित्र चिरकाल भी बिना किसी क्लेशके अतिचार रहित अच्छी तरह पालित हो रहा है। अथवा समाधिमरण करानेमें सहायक निर्यापक (सुलहा) सुलभ हैं। (च) और (जदि) यदि दुर्भिक्षका भय नहीं है ॥७४॥
तस्स ण कप्पदि भत्तपइण्णं अणुवट्ठिदे भये पुरदो ॥
सो मरणं पच्छिंतो होदि हु सामण्णणिव्विण्णो ॥७५॥
अर्थ: आगे भयके अनुपस्थित होते हुए उसका भक्तप्रत्याख्यान योग्य नहीं है। वह यदि मरणकी प्रार्थना करता है तो मुनिधर्मसे विरक्त ही होता है ॥७५॥
उस्सग्गियलिंगकदस्स लिंगमुस्सग्गियं तयं चेव ॥
अववादियलिंगस्स वि पसत्थमुवसग्गियं लिंगं ॥७६॥
अर्थ: जो औत्सर्गिक लिंगमें स्थित है उसका जो पूर्वगृहीत है वही औत्सर्गिक लिंग होता है। आपवादिक लिंगवालेका भी औत्सर्गिक लिंग होता है यदि उसका पुरुष चिह्न दोष रहित हो ॥७६॥
जस्स वि अव्वभिचारी दोसो तिट्ठाणिगो विहारम्मि ॥
सो वि हु संथारगदो गेण्हेज्जोस्सग्गियं लिंगं ॥७७॥
अर्थ: जिसके भी लिंग और दोनों अण्डकोष इन तीन स्थानोंमें ऐसा दोष है जिसे औषध आदिसे भी दूर नहीं किया जा सकता । वह भी वसतिकामें संस्तरेपर आरूढ़ होनेपर औत्सर्गिक लिंगको अवश्य ग्रहण करे ॥७७॥
आवसधे वा अप्पाउग्गे जो वा महड्ढिओ हिरिमं ॥
मिच्छजणे सजणे वा तस्स होज्ज अववादियं लिंगं ॥७८॥
अर्थ: जो महान सम्पत्तिशाली है अथवा लज्जालु है अथवा जिसके स्वजन बन्धुवर्ग मिथ्यादृष्टि विधर्मी है । उसके लोगोंके आवागमनके कारण अयोग्य निवास स्थानमें आपवादिक लिंग होता है ॥७८॥
अच्चेलक्कं लोचो वोसट्टसरीरदा य पडिलिहणं ॥
एसो हु लिंगकप्पो चदुव्विहो होदि उस्सग्गे ॥७९॥
अर्थ: अचेलता, हाथसे केश उखाड़ना, शरीरसे ममत्व त्याग और प्रतिलेखन यह चार प्रकारका लिंगभेद औत्सर्गिक लिंगमें होता है ॥७९॥
इत्थीवि य जं लिंगं दिट्ठं उस्सग्गियं व इदरं वा ।।
तं तत्थ होदि हु लिंगं परित्तमुवधिं करेंतीए ॥८०॥
अर्थ: स्त्रियोंके भी जो लिंग औत्सर्गिक अथवा अन्य आगममें कहा है । वही लिंग अल्प परिग्रह करती हुईके भक्त प्रत्याख्यानमें होता है ।। ८० ।। है तो पुरुषोंकी तरह वस्त्र त्याग नहीं करती ॥८०॥
जत्तासाधणचिह्नकरणं खु जगपच्चयादठिदिकरणं ।
गिहभावविवेगो वि य लिंगग्गहणे गुणा होंति ॥८१॥
अर्थ: यात्राके साधन चिह्नका करना, जगतकी श्रद्धा, अपनेको स्थिर करना और गृहस्थतासे भिन्नता, ये चार लिंग ग्रहण करनेमें गुण होते हैं ॥८१॥
गंथच्चाओ लाघवमप्पडिलिहणं च गदभयत्तं च ।
संसज्जणपरिहारो परिकम्मविवज्जणा चेव ॥८२॥
अर्थ: परिग्रहत्याग लाघव अप्रतिलेखन और भय रहितपना, सम्मूर्छन जीवोंका बचाव और परिकर्मका त्याग ये गुण लिंगमें होते हैं ॥८२॥
विस्सासकरं रूवं अणादरो विसयदेहसुक्खेसु ।
सव्वत्थ अप्पवसदा परिसह अधिवासणा चेव ॥८३॥
अर्थ: वस्त्र रहित रूप जनतामें विश्वास पैदा करने वाला होता है विषयसे होने वाले शारीरिक सुखमें अनादर भाव होता है । सर्वत्र स्वाधीनता रहती है और परीषहको सहना होता है ॥८३॥
जिणपडिरूवं विरियायारो रागादिदोसपरिहरणं ।
इच्चेवमादिबहुगा अच्चेलक्के गुणा होंति ॥८४॥
अर्थ: यह अचेलता जिन भगवानका प्रतिरूप है । वीर्याचारका प्रवर्तक है । रागादि दोषोंको दूर करती है । इत्यादि बहुतसे गुण अचेलतामें होते हैं ॥८४॥
इय सव्वसमिदकरणो ठाणासणसयणगमणकिरियासु ।
णिगिणं गुत्तिमुवगदो पग्गहिददरं परक्कमदि ॥८५॥
अर्थ: इस प्रकार, नग्नता और गुप्तिको धारण करनेवाला सब इष्ट अनिष्ट विषयोंमें अपनी इन्द्रियोंको रागद्वेषसे रहित करता है। और स्थान, आसन, शयन, गमन आदि क्रियाओंमें प्रग्रहीततर अर्थात् सुदृढ़रूपसे चेष्टा करता है ॥८५॥
अववादियलिंगकदो विसयासत्तिं अगूहमाणो य ।
णिंदणगरहणजुत्तो सुज्झदि उवधिं परिहरंतो ॥८६॥
अर्थ: अपवादलिंगमें स्थित होते हुए भी अपनी शक्तिको न छिपाते हुए और निन्दा गर्हा करते हुए परिग्रहका त्याग करनेपर शुद्ध होता है ॥८६॥
केसा संसज्जंति हु णिप्पडिकारस्स दुपरिहारा य ।
सयणादिसु ते जीवा दिट्ठा आगंतुया य तहा ॥८७॥
अर्थ: प्रतीकार न करनेवालेके केश जूँ आदि सम्मूर्छन जीवोंके आधार होते हैं । और वे सम्मूर्छन जीव शयन आदिमें दुष्परिहार होते हैं । तथा अन्यत्रसे आते हुए भी कीट आदि देखे गये हैं ॥८७॥
जूगाहिं य लिक्खाहिं य बाधिज्जंतस्स संकिलेसो य ।
संघट्टिज्जंति य ते कंडुयणे तेण सो लोचो ॥८८॥
अर्थ: जुंसे और लीखोंसे पीड़ित साधुके संक्लेश उत्पन्न होता है । खुजाने पर वे जूं आदि पीड़ित होते हैं इस कारणसे वह केशलोच किया जाता है ॥८८॥
लोचकदे मुंडत्तं मुंडत्ते होइ णिव्वियारत्तं ।
तो णिव्वियारकरणो पग्गहिददरं परक्कमदि ॥८९॥
अर्थ: लोच करने पर सिर मुण्डा हो जाता है । मुण्डताके होने पर निर्विकारता होती है । उससे विकार रहित क्रियाशील होनेसे प्रगृहीततर चेष्टा करता है ॥८९॥
अप्पा दमिदो लोएण होइ ण सुहे य संगमुवयादि ।
साधीणदा य णिद्दोसदा य देहे य णिम्ममदा ॥९०॥
अर्थ: केशलोचसे आत्मा दमित होता है और सुखमें आसक्त नहीं होता है । और स्वाधीनता निर्दोषता और निर्ममत्व होता है ॥९०॥
आणक्खिदा य लोचेण अप्पणो होदि धम्मसद्धा य ।
उग्गो तवो य लोचो तहेव दुक्खस्स सहणं च ॥९१॥
अर्थ: और केशलोच करनेसे आत्माकी धर्ममें श्रद्धा प्रदर्शित होती है । उसी प्रकार लोच उग्र तप है और दुःखका सहन है ॥९१॥
सिण्हाणब्भंगुव्वट्टणाणि णहकेसमंसुसंठप्पं ।
दंतोट्ठकण्णमुहणासियच्छिभमुहाइंसंठप्पं ॥९२॥
अर्थ: स्नान, तेलमर्दन, उबटन और नख, केश, दाढ़ी-मूँछोंका संस्कार छोड़ देते हैं । दाँत, ओष्ठ, कान, मुख, नाक, भौं आदिका संस्कार छोड़ देते हैं ॥९२॥
वज्जेदि बंभचारी गंधं मल्लं च धूववासं वा ।
संवाहणपरिमद्दणपिणिद्धणादीणि य विमुत्ती ॥९३॥
अर्थ: ब्रह्मचारी निर्ग्रन्थ गन्ध, माल्य और धूप और मुखवास संवाहन, परिमर्दन और पिणिद्धण आदिको छोड़ देता है ॥९३॥
जल्लविलित्तो देहो लुक्खो लोयकदवियडबीभत्थो ।
जो रूढणक्खलोमो सा गुत्ती बंभचेरस्स ॥९४॥
अर्थ: जल्लसे लिप्त, रूक्ष, लोच करनेसे विकृत और बीभत्स, बढ़े हुए नख और रोमोंसे युक्त जो शरीर होता है, ब्रह्मचर्यकी वह गुप्ति है ॥९४॥
इरियादाणणिखेवे विवेगठाणे णिसीयणे सयणे ।
उव्वत्तणपरिवत्तण पसारणाउंटणामरसे ॥९५॥
अर्थ: गमनमें, ग्रहणमें, रखनेमें मल त्यागमें स्थानमें बैठनेमें शयनमें ऊपरको मुखा करके सोनेमें करवट लेनेमें हाथ पैर फैलानेमें संकोचनमें और स्पर्शनमें पीछीसे परिमार्जन करना चाहिये ॥९५॥
पडिलेहणेण पडिलेहिज्जइ चिण्हं च होइ सगपक्खे ।
विस्सासियं च लिंगं संजदपडिरूवदा चेव ॥९६॥
अर्थ: उक्त क्रिया करते समय पीछेके द्वारा प्रतिलेखना करना चाहिये, इस प्रकार पूर्व गाथासे सम्बन्ध है । अपनी प्रतिज्ञामें पीछी चिह्न होती है । और प्रतिलेखना रूप लिंग मनुष्योंको विश्वास करानेवाला है । और प्राचीन मुनियोंका प्रतिबिम्ब रूप है ॥९६॥
रयसेयाणमगहणं मद्दव सुकुमालदा लहुत्तं च ।
जत्थेदे पंच गुणा तं पडिलिहणं पसंसंति ॥९७॥
अर्थ: धूलि और पसीनेको पकड़ती न हो, कोमल स्पर्शवाली हो, सुकुमार हो, और हल्की हो । जिसमें ये पाँच गुण होते हैं उस प्रतिलेखनाकी प्रशंसा करते हैं ॥९७॥
णिउणं विउलं सुद्धं णिकाचिदमणुत्तरं च सव्वहिदं ।
जिणवयणं कलुसहरं अहो य रत्ती य पढिदव्वं ॥९८॥
अर्थ: निपुण विपुल, शुद्ध, अर्थसे पूर्ण, सर्वोत्कृष्ट और सब प्राणियोंका हित करनेवाला द्रव्यकर्म भाव कर्मरूपी मलका नाशक जिनवचन रात-दिन पढ़ना चाहिये ॥९८॥
अदहिदपइण्णा भावसंवरो णवणवो या संवेगो ॥
णिक्कंपदा तवो भावणा य परदेसिगत्तं च ॥९९॥
अर्थ: आत्महितका ज्ञान होता है। भाव संवर होता है। नवीन-नवीन संवेग होता है रत्नत्रयमें निश्चलता होती है। स्वाध्याय तप होता है और भावना होती है। और दूसरोंको उपदेश करनेकी क्षमता होती है ॥९९॥
णाणेण सव्वभावा जीवाजीवासवादिया तधिगा ।
णज्जदि इह परलोए अहिदं च तहा हियं चेव ॥१००॥
अर्थ: ज्ञानके द्वारा जीव अजीव आस्रव आदि सब पदार्थ तथ्यभूत जाने जाते हैं। उसी प्रकारसे इस लोक और परलोकमें अहित और हित जाना जाता है ॥१००॥
आदहिदमयाणंतो मुज्झदि मूढो समादियदि कम्मं ।
कम्मणिमित्तं जीवो परीदि भवसायरमणंतं ॥१०१॥
अर्थ: आत्माके हितको न जाननेवाला मोहित होता है । मोहित हुआ कर्मको ग्रहण करता है । और कर्मका निमित्त पाकर जीव (अणतं) अनन्त भवसागरमें भ्रमण करता है ॥१०१॥
जाणंतस्सादहिदं अहिदणियत्ती य हिदपवत्ती य ।
होदि य तो से तम्हा आदहिदं आगमेदव्वं ॥१०२॥
अर्थ: आत्महितको जाननेवालेके अहितसे निवृत्ति और हितमें प्रवृत्ति होती है । हिताहितके ज्ञानके पश्चात् उसका हिताहित भी जानता ही है । इसलिए (आदहिदं) आत्महितको आगमसे सीखना चाहिए ॥१०२॥
आयापायविदण्हू दंसणणाणतवसंजमे ठिच्चा ।
विहरदि विसुज्झमाणो जावज्जीवं दु णिक्कंपो ॥१०५॥
अर्थ: वृद्धि और हानिके क्रमको जानने वाला श्रद्धान, ज्ञान, तप और संयममें स्थित होकर शुद्धिको प्राप्त होता हुआ जीवन पर्यन्त विहार करता है वह निश्चल ही है ॥१०५॥
बारसविहम्मि य तवे सब्भंतरबाहिरे कुसलदिट्ठे ।
ण वि अत्थि ण वि य होहिदि सज्झायसमं तवो कम्मं ॥१०६॥
अर्थ: सर्वज्ञके द्वारा उपदिष्ट अभ्यन्तर और बाह्यभेद सहित बारह प्रकारके तपमें स्वाध्यायके समान तपक्रिया नहीं है और न होगी ही ॥१०६॥
जं अण्णाणी कम्मं खवेदि भवसयसहस्सकोडीहिं ।
तं णाणी तिहिं गुत्तो खवेदि अंतोमुहुत्तेण ॥१०७॥
अर्थ: सम्यग्ज्ञानसे रहित अज्ञानी जिस कर्मको लाख करोड़ भवोंमें नष्ट करता है, उस कर्मको सम्यग्ज्ञानी तीन गुप्तियोंसे युक्त हुआ अन्तर्मुहूर्तमात्रमें क्षय करता है ॥१०७॥
छट्ठट्ठमदसमदुवालसेहिं अण्णाणियस्स जा सोही ।
तत्तो बहुगुणदरिया होज्ज हु जिमिदस्स णाणिस्स ॥१०८॥
अर्थ: अज्ञानीके दो, तीन, चार, पाँच आदि उपवास करनेसे जितनी विशुद्धि होती है उससे बहुत गुणी शुद्धि जीमते हुए ज्ञानीके होती है ॥१०८॥
सज्झायभावणाए य भाविदा होंति सव्वगुत्तीओ ।
गुत्तीहिं भाविदाहिं य मरणे आराधओ होदि ॥१०९॥
अर्थ: स्वाध्याय भावनासे सब गुप्तियाँ भावित होती है । और गुप्तियोंकी भावनासे मरते समय रत्नत्रय रूप परिणामोंकी आराधनामें तत्पर होता है ॥१०९॥
आदपरसमुद्धारो आणा वच्छल्लदीवणा भत्ती ।
होदि परदेसगत्ते अव्वोच्छित्ती य तित्थस्स ॥११०॥
अर्थ: अपने और दूसरोंके उद्धारके उद्देशसे जो स्वाध्यायमें लगता है वह अपने भी कर्मोंको काटता है और उसमें उपयुक्त दूसरोंके भी कर्मोंको काटता है । सर्वज्ञ भगवानकी जो आज्ञा है कि कल्याणके इच्छुक जिन शासनके प्रेमीको नियमसे धर्मोपदेश करना चाहिये, उसका भी पालन होता है । दूसरोंको उपदेश करने पर वात्सल्य और प्रभावना होती है । जिन वचनके अभ्याससे जिन वचनमें भक्ति प्रदर्शित होती है । दूसरोंको उपदेश करनेपर मोक्षमार्ग अथवा श्रुतरूप तीर्थकी अव्युच्छित्ती - परम्पराका अविनाश होता है । श्रुत भी रत्नत्रयके कथनमें संलग्न होनेसे तीर्थ है । अतः स्वाध्याय पूर्वक परोपदेश करनेसे श्रुत और मोक्षमार्गका विच्छेद नहीं होता । वे सदा प्रवर्तित रहते हैं ॥११०॥
विणओ पुण पंचविहो णिद्दिट्ठो णाणदंसणचरित्ते ।
तवविणओ य चउत्थो चरिमो उवयारिओ विणओ ॥१११॥
अर्थ: जिनवचनके अभ्यासके पश्चात् विनय पाँच प्रकारकी कही है । ज्ञानविनय दर्शनविनय चारित्रविनय और चतुर्थ तपविनय और अन्तिम उपचार विनय है ॥१११॥
काले विणये उवधाणे बहुमाणे तहेव णिण्हवणे ।
वंजण अत्थ तदुभये विणओ णाणम्मि अट्ठविहो ॥११२॥
अर्थ: काल, विनय, उपधान, बहुमान, तथा निह्नव, व्यंजनशुद्धि, अर्थशुद्धि, उभयशुद्धि ये ज्ञानके विषयमें आठ प्रकारकी विनय है ॥११२॥
उवगूहणादिया पुव्वुत्ता तह भत्तियादिया य गुणा ।
संकादिवज्जणं पि णेओ सम्मत्तविणओ सो ॥११३॥
अर्थ: पूर्वोक्त उपगूहण या उपबृंहण आदि तथा भक्ति आदि गुण, शंका आदिका त्याग यह सम्यक्त्वविनय जानो ॥११३॥
इंदियकसायपणिधाणं पि य गुत्तीओ चेव समिदीओ ।
एसो चरित्तविणओ समासदो होइ णायव्वो ॥११४॥
अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूपसे आत्माकी परिणति न होना, और गुप्तियाँ और समितियाँ, यह संक्षेपसे चारित्र विनय ज्ञातव्य है ॥११४॥
पणिधाणं पि य दुविहं इंदिय णोइंदियं च बोधव्वं ।
सद्दादि इंदियं पुण कोधाईयं भवे इदरं ॥११५॥
अर्थ: प्रणिधानके भी दो भेद हैं इन्द्रिय और नोइन्द्रिय । शब्द आदि इन्द्रिय और क्रोधादिक नोइन्द्रिय प्रणिधान है ऐसा जानना ॥११५॥
सद्दरसरूवगंधे फासे य मणोहरे य इयरे य ।
जं रागदोसगमणं पंचविहं होदि पणिधाणं ॥११६॥
अर्थ: मनोहर और अमनोहर शब्द, रस, रूप गन्ध और स्पर्शमें जो राग द्वेष होता है वह पाँच प्रकारका इन्द्रिय प्रणिधान होता है ॥११६॥
णोइंदियपणिधाणं कोधो माणो तधेव माया य ।
लोभो य णोकसाया मणपणिधाणं तु तं वज्जे ॥११७॥
अर्थ: नो इन्द्रिय प्रणिधान क्रोध मान तथा माया लोभ और नोकषाय है । ये तो मन प्रणिधान छोड़ना चाहिये२ ॥११७॥
उत्तरगुणउज्जमणे सम्मं अधिआसणं च सद्धाए ।
आवासयाणमुचिदाण अपरिहाणी अणुस्सेओ ॥११८॥
अर्थ: उत्तर गुण अर्थात् संयममें उद्यम सम्यक् रीतिसे भूख प्यास आदिको सहन करना, तपमें अनुराग पहले कहे गये छह आवश्यकोंकी न्यूनता न होना आधिक्य न होना ॥११८॥
भत्ती तवोधिगंमि य तवम्मि य अहीलणा य सेसाणं ।
एसो तवम्मि विणओ जहुत्तचारिस्स साधुस्स ॥११९॥
अर्थ: जो तपमें अधिक है उनमें और तपमें भक्ति और जो अपनेसे तपमें हीन हैं उनका अपरिभव यह श्रुतके अनुसार आचरण करने वाले साधुकी तप विनय है ॥११९॥
काइयवाइयमाणसिओत्ति तिविधो हु पंचमो विणओ ।
सो पुण सव्वो दुविहो पच्चक्खो चेव पारोक्खो ॥१२०॥
अर्थ: पाँचवीं उपचार विनय तीन प्रकारकी है कायिक, वाचनिक और मानसिक । और वह तीनों प्रकारकी विनय दो प्रकारकी है प्रत्यक्ष विनय और परोक्ष विनय ॥१२०॥
अब्भुट्ठाणं किदियम्मं णवसणं अंजली य मुंडाणं ।
पच्चुग्गच्छणमेत्तो पच्छिद अणुसाधणं चेव ॥१२१॥
णीचं ठाणं णीचं गमणं णीचं च आसणं सयणं ।
आसणदाणं उवगरणदाणमोगासदाणं च ॥१२२॥
अर्थ: नीचा स्थान, नीचा गमन, नीच आसन, नीचे सोना, आसनदान, उपकरणदान और अवकाशदान ये उपचार विनयके प्रकार हैं ॥१२२॥
पडिरूवकायसंफासणदा पडिरूवकालकिरिया य ।
पेसणकरणं संथारकरणमुवकरणपडिलिहणं ॥१२३॥
अर्थ: गुरु आदिके शरीरके अनुकूल स्पर्शन, बालपने आदि अवस्थाके अनुरूप वैयावृत्य करना, और गुरु आदिकी आज्ञाका पालन करना, तृण आदिका संथरा करना, उपकरणोंकी प्रतिलेखना करना ॥१२३॥
इच्चेवमादि विणओ उवयारो कीरदे सरीरेण ।
एसो काइयविणओ जहारिहो साहुवग्गम्मि ॥१२४॥
अर्थ: इस प्रकारको आदि लेकर उपचार विनय शरीरके द्वारा साधुवर्गमें यथा योग्य की जाती है । यह कायिक विनय है ॥१२४॥
पूयावयणं हिदभासणं च मिदभासणं च महुरं च ।
सुत्ताणुवीचिवयणं अणिट्ठुरमकक्कसं वयणं ॥१२५॥
अर्थ: पूजा पूर्वक वचन, हितकारी भाषण, मित भाषण, मधुर भाषण, सूत्रानुसार वचन, अनिष्ठुर और अकर्कश वचन वचनविनय है ॥१२५॥
उ[?]संतवयणमगिह[?]वयणमकिरियमहीलणं वयणं ।
एसो वाइयविणओ जहारिहो होदि कादव्वो ॥१२६॥
अर्थ: उपशान्त वचन, जो वचन गृहस्थों के योग्य नहीं हैं, कृषि आदि आरम्भ से शून्य वचन, दूसरों की अवज्ञा न करने वाला वचन बोलना यह यथा योग्य वाचिकविनय करने योग्य होती है ॥१२६॥
पापविसोत्तिग परिणामवज्जणं पियहिदे य परिणामो ।
णायव्वो संखेवेण एसो माणस्सिओ विणओ ॥१२७॥
अर्थ: पापको लाने वाले परिणामोंको न करना, जो गुरुको प्रिय और हितकर हो उसीमें परिणाम लगाना, यह संक्षेपसे मानसिक विनय जानना ॥१२७॥
इय एसो पच्चक्खो विणओ पारोक्खिओ वि जं गुरुणो ।
विरहम्मि विवट्टिज्जइ आणाणिद्देसचरियाए ॥१२८॥
अर्थ: इस प्रकार यह प्रत्यक्ष विनय है, परोक्ष विनय भी वह है जो गुरुके अभावमें उनकी आज्ञा निर्देशका आचरण करनेमें की जाती है ॥१२८॥
राइणिय अराइणीएसु अज्जासु चेव गिहिवग्गे ।
विणओ जाहरिहो सो कायव्वो अप्पमत्तेण ॥१२९॥
अर्थ: रत्नत्रयमें जो अपनेसे उत्कृष्ट हैं, रत्नत्रयमें जो अपनेसे हीन है उनमें, आर्यिकाओंमें और गृहस्थवर्गमें वह विनय जो जिस योग्य हो, प्रमाद रहित होकर करना ही चाहिये ॥१२९॥
विणएण विप्पहूणस्स हवदि सिक्खा णिरत्थिया सव्वा ।
विणओ सिक्खाए फलं विणयफलं सव्वकल्लाणं ॥१३०॥
अर्थ: विनयसे रहित साधुकी सब शिक्षा निष्फल होती है। शिक्षाका फल विनय है। विनयका फल सब कल्याण है ॥१३०॥
विणओ मोक्खद्दारं विणयादो संजमो तवो णाणं ।
विणएणाराहिज्जइ आयरिओ सव्वसंघो य ॥१३१॥
अर्थ: विनय मोक्षका द्वार है। विनयसे संयम, तप और ज्ञानकी प्राप्ति होती है। विनयसे आचार्य और सर्व संघ अपने वशमें किया जाता है ॥१३१॥
आयारजीदकप्पगुणदीवणा अत्तसोधि णिज्झंझा ।
अज्जव मद्दव लाघव भत्ती पल्हादकरणं च ॥१३२॥
अर्थ: आचारके क्रम तथा कल्प्य गुणोंका प्रकाशन, आत्मशुद्धि, वैमनस्यका अभाव, आर्जव, मार्दव, लघुता, भक्ति और अपने और दूसरोंको प्रसन्न करना, ये विनय के गुण है ॥१३२॥
कित्ती मेत्ती माणस्स भंजणं गुरुजणे य बहुमाणो ।
तित्थयराणं आणा गुणाणुमोदो य विणयगुणा ॥१३३॥
अर्थ: कीर्ति, मित्रता, मानका विनाश, गुरुजनोंका बहुमान, और तीर्थङ्करोंकी आज्ञाका पालन और गुणोंकी अनुमोदना ये विनयमें गुण हैं, ॥१३३॥
चित्तं समाहिदं जस्स होज्ज वज्जिदविसोत्तियं वसियं ।
सो वहदि णिरदिचारं सामण्णधुरं अपरिसंतो ॥१३४॥
अर्थ: जिसका चित्त अशुभ परिणामोंके प्रवाहसे रहित और वशवर्ती होता है वह चित्त समाहित होता है । वह समाहित चित्त बिना थके निरतिचार चारित्रके भारको धारण करता है ॥१३४॥
चालणिगयं व उदयं सामण्णं गलइ अणिहुदमणस्स ।
कायेण य वायाए जदि वि जधुत्तं चरदि भिक्खू ॥१३५॥
अर्थ: जिसका चित्त चंचल है उसका समान भाव चालनीमें रखे पानीकी तरह गल जाता है। यद्यपि वह भिक्षु कायसे और वचनसे शास्त्रमें कहे अनुसार आचरण करता है ॥१३५॥
वादुब्भामो व मणो परिधावइ अट्ठिदं तह समंता ।
सिग्घं च जाइ दूरंपि मणो परमाणुदव्वं वा ॥१३६॥
अर्थ: बड़े जोरसे चलने वाली हवाकी तरह मन उसीकी तरह चहुँ ओर अस्थिर रूपसे दौड़ता है। और परमाणु द्रव्यकी तरह मन दूरवर्ती भी वस्तुके पास शीघ्र जाता है ॥१३६॥
अंधलयबहिरमूओ व्व मणो लहुमेव विप्पणासेइ ।
दुक्खो य पडिणियत्तेदुं जो गिरिसरिदसोदं वा ॥१३७॥
अर्थ: मन अन्धे बहरे और गूँगेके समान है शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। और पहाड़ी नदीके प्रवाहकी तरह लौटाना अशक्य है ॥१३७॥
तत्तो दुक्खे पंथे पाडेदुं दुट्ठओ जहा अस्सो ।
बीलणमच्छोव्व मणो णिग्घेत्तुं दुक्करो धणिदं ॥१३८॥
अर्थ: अयोग्य विषयसे हटानेसे मन दुष्कर मार्गमें गिराता है । जैसे दुष्ट घोड़ा गिराता है । अति चिकने मच्छकी तरह पकड़ने में अत्यन्त दुष्कर है ॥१३८॥
जस्स य कदेण जीवा संसारमणंतयं परिभमंति ।
भीमासुहगदिबहुलं दुक्खसहस्साणि पावंता ॥१३९॥
अर्थ: जिस मनकी चेष्टासे जीव हजारों दुःख भोगते हुए भयंकर अशुभ गतियोंसे भरे हुए अनन्त संसारमें भ्रमण करते हैं ॥१३९॥
जम्हि य वारिदमेत्ते सव्वे संसारकारया दोसा ।
णासंति रागदोसादिया हु सज्जो मणुस्सस्स ॥१४०॥
अर्थ: जिस मनके निवारण करने मात्रसे मनुष्यके सब संसारके कारक राग द्वेष आदि दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥१४०॥
इय दुट्ठयं मणं जो वारेदि पडिट्ठवेदि य अकंपं ।
सुहसंकप्पपयारं च कुणदि सज्झायसण्णिहिदं ॥१४१॥
अर्थ: उक्त प्रकारसे जो दुष्ट मनको रागादिसे निवारण करता है, और निश्चलरूपसे श्रद्धानरूप परिणामादिमें स्थापित करता है । तथा शुभसंकल्पोंमें मनको प्रवृत्त करता है और स्वाध्यायमें मनको लगाता है उसके सामण्ण-समताभाव होता है ॥१४१॥
जो विय विणिप्पडंतं मणं णियत्तेदि सह विचारेण ।
णिग्गहदी य मणं जो करेदि अदिलज्जियं च मणं ॥१४२॥
अर्थ: जो भी रत्नत्रयसे च्युत होकर विचित्र रागादिमें जानेवाले मनको विचारोंके साथ हटाता है, और जो मनको निन्दा गर्हाके द्वारा निगृहीत करता है - उसकी निन्दा करता है, और मनको अति लज्जित करता है उसके सामण्ण होता है ॥१४२॥
दासं व मणं अवसं सवसं जो कुणदि तस्स सामण्णं ।
होदि समाहिदमविसोत्तियं च जिणसासणाणुगदं ॥१४३॥
अर्थ: वशमें रहनेवाले दासकी तरह वशमें न रहनेवाले मनको जो अपने वशमें करता है, उसके एकमात्र शुद्ध चिद्रूपका अवलम्बन करनेवाला पाप परिणामोंसे निवृत्त और जिन शासनका अनुगामी श्रामण्य होता है ॥१४३॥
दंसणसोधी ठिदिकरणभावणा अदिसयत्तकुसलत्तं ।
खेत्तपरिमग्गणावि य अणियदवासे गुणा होंति ॥१४४॥
अर्थ: दर्शन विशुद्धि, स्थितिकरण, भावना, अतिशय अर्थोंमें निपुणता और क्षेत्रका अन्वेषण ये अनियत स्थानमें बसनेमें गुण होते हैं ॥१४४॥
जम्मणअभिणिक्खवणे णाणुप्पत्ती य तित्थचिण्हणिसिहीओ ।
पासंतस्स जिणाणं सुविसुद्धं दंसणं होदि ॥१४५॥
अर्थ: जिनदेवोंके जन्मस्थान, दीक्षास्थान, केवलज्ञानकी उत्पत्तिका स्थान और समवसरणके चिह्न मानस्तम्भका स्थान निषीधिका स्थान देखनेवालेके सम्यक्रूपसे निर्मल सम्यग्दर्शन होता है ॥१४५॥
संविग्गं संविग्गाणं जणयदि सुविहिदो सुविहिदाणं ।
जुत्तो आउत्ताणं विसुद्धलेस्सो सुलेस्साणं ॥१४६॥
अर्थ: सम्यक् आचार और अनशन आदि तपसे युक्त विशुद्ध लेश्यावाले मुनियोंका अनियत-वास सम्यक् आचारवाले, योगके धारी, सम्यक् लेश्यावाले और संसारसे भीत साधुओंमें संसारसे भय उत्पन्न करता है ॥१४६॥
पियधम्मवज्जभीरू सुत्तत्थविसारदो असढभावो ।
संवेगाविदि य परं साधू णियदं विहरमाणो ॥१४७॥
अर्थ: जो उत्तम क्षमा आदि धर्मका पालक है और पापसे डरता है, सूत्र और उसके अर्थमें निपुण है, शठतासे रहित है ऐसा सदा देशान्तरमें विहार करनेवाला साधु दूसरोंमें विराग उत्पन्न करता है ॥१४७॥
संविग्गदरे पासिय पियधम्मदरे अवज्जभीरुदरे ।
सयमवि पियथिरधम्मो साधू विहरंतओ होदि ॥१४८॥
अर्थ: संविग्नतर प्रिय धर्मतर और अवद्य भीरुतर साधुको देखकर विहार करनेवाला साधु स्वयं भी प्रिय स्थिर धर्मतर, संविग्नतर और अवद्य भीरुतर होता है ॥१४८॥
चरिया छुहा य तण्हा सीदं उण्हं च भाविदं होदि ।
सेज्जा वि अपडिबद्धा विहरणेणाधिआसिया होदि ॥१४९॥
अर्थ: अनेक देशोंमें विहार करनेसे, चर्या भूख, प्यास शीत और उष्णका दुःख संक्लेश-रहित भावसे सहना होता है। बसति भी ममत्वसे रहित सहनेमें आती है ॥१४९॥
णाणादेसे कुसलो णाणादेसे गदाण सत्थाणं ।
अभिलाव अत्थकुसलो होदि य देसप्पवेसेण ॥१५०॥
अर्थ: देशान्तरमें जानेसे अनेक देशोंके सम्बन्धमें कुशल हो जाता है। अनेक देशोंमें पाये जानेवाले शास्त्रोंके शब्दार्थके विषयमें कुशल होता है ॥१५०॥
सुत्तत्थथिरीकरणं अदिसयिदत्थाण होदि उवलद्धी ।
आयरियदंसणेण दु तम्हा सेविज्ज आयरियं ॥१५१॥
अर्थ: आचार्योंके दर्शनसे ही सूत्र और अर्थका स्थिरीकरण और अतिशयित अर्थोंकी उपलब्धि होती है। इसलिये आचार्यकी सेवा करनी चाहिए ॥१५१॥
णिक्खवणपवेसादिसु आयरियाणं बहुप्पयाराणं ।
सामाचारी कुसलो य होदि गणसंपवेसेण ॥१५२॥
अर्थ: बहुत प्रकारके आचार्योंके गणमें प्रवेश करनेसे वसति और दाताके घरसे निकलने और प्रवेश करने आदिमें जो उनका सम्यक् आचरण है उसमें प्रवीण होता है ॥१५२॥
कंठगदेहिं वि पाणेहिं साहुणा आगमो हु कादव्वो ।
सुत्तस्स य अत्थस्स य सामाचारी जध तहेव ॥१५३॥
अर्थ: प्राणोंके कण्ठमें आ जानेपर भी साधुको आगमका अभ्यास अवश्य करना चाहिए। जैसे वह सूत्रका और अर्थका और समाचारीका अभ्यास करता है उसी प्रकार उसे आगमका अभ्यास करना चाहिए ॥१५३॥
संजदजणस्स य जम्हि फासुविहारो य सुलभवुत्ती य ।
तं खेत्तं विहरंतो णाहिदि सल्लेहणाजोग्गं ॥१५४॥
अर्थ: जिस क्षेत्रमें संयमीजनका प्रासुक विहार और सुलभ आहार हो, वह क्षेत्र देशान्तरमें भ्रमण करनेवाला सल्लेखनाके योग्य जानता है ॥१५४॥
वसधीसु य उवधीसु य गामे णयरे गणे य सण्णिजणे ।
सव्वत्थ अपडिबद्धो समासदो अणियदविहारो ॥१५५॥
अर्थ: वसतियोंमें और उपकरणोंमें ग्राममें नगरमें संघमें और श्रावकजनमें सर्वत्र यह मेरा है इस प्रकारके संकल्पसे रहित साधु संक्षेपसे अनियत विहारी होता है ॥१५५॥
अणुपालिदो य दीहो परियाओ वायणा य मे दिण्णा ।
णिप्पादिदा य सिस्सा सेयं खलु अप्पणो कादुं ॥१५६॥
अर्थ: दीर्घकाल तक ज्ञान दर्शन चारित्र और तप रूप पर्यायका मैंने शास्त्रानुसार पालन किया । और मैंने वाचना भी दी और शिष्योंको तैयार किया । अब निश्चयसे अपना कल्याण करना उचित है ॥१५६॥
किण्णु अधालंदविधी भत्तपइण्णेंगिणी य परिहारो ।
पादोवगमणजिणकप्पियं च विहरामि पडिवण्णो ॥१५७॥
अर्थ: क्या अथालन्द विधि, भक्त प्रतिज्ञा, इंगिनीमरण, परिहार विशुद्धि चारित्र, पादोपगमन अथवा जिनकल्पको धारण करके मैं विहार करूँ ॥१५७॥
एवं विचारयित्ता सदिमाहप्पे य आउगे असदि ।
अणिगूहिदबलविरिओ कुणदि मदिं भत्तवोसरणे ॥१५८॥
अर्थ: उक्त प्रकारसे विचार करके स्मृतिका माहात्म्य होनेपर और आयुके अल्प होने पर अपने बल और वीर्यको न छिपाता हुआ मुनि भक्त प्रत्याख्यानमें मति करता है ॥१५८॥
पुव्वुत्ताणण्णदरे सल्लेहणकारणे समुप्पण्णे ।
तह चेव करिज्ज मदिं भत्तपइण्णाए णिच्छयदो ॥१५९॥
अर्थ: पहले कहे गये कारणोंमें से किसी एक सल्लेखनाके कारणके उपस्थित होने पर उसी प्रकार निश्चयसे भक्त प्रत्याख्यानमें मति करे ॥१५९॥
जाव य सुदी ण णस्सदि जाव य जोगा ण मे पराहीणा ।
जाव य सड्ढा जायदि इंदियजोगा अपरिहीणा ॥१६०॥
अर्थ: जब तक स्मृति नष्ट नहीं होती, जब तक मेरे आतापन आदि योग पराधीन नहीं होते, जब तक श्रद्धा रहती है, इन्द्रियोंका अपने विषयोंसे सम्बन्ध हीन नहीं होता ॥१६०॥
जाव य खेमसुभिक्खं आयरिया जाव णिज्जवणजोग्गा ।
अत्थि ति गारवरहिदा णाणचरणदंसणविसुद्धा ॥१६१॥
अर्थ: जब तक क्षेम और सुभिक्ष है, जब तक आचार्य निर्यापकत्वके योग्य तीन गारवोंसे रहित निर्मल ज्ञान चारित्र और दर्शनवाले हैं ॥१६१॥
ताव खमं मे कादुं सरीरणिक्खेवणं विदुपसत्थं ।
समयपडायाहरणं भत्तपइण्णं णियमजण्णं ॥१६२॥
अर्थ: तब तक मुझे शरीरका त्याग, विद्वानोंसे स्तुत, आगममें कही गई आराधना रूपी पताकाका ग्रहण, व्रत यज्ञ तथा भक्त प्रत्याख्यान करना युक्त है ॥१६२॥
एवं सदिपरिणामो जस्स दढो होदि णिच्छिदमदिस्स ।
तिव्वाए वेदणाए वोच्छिज्जदि जीविदासा से ॥१६३॥
अर्थ: ऊपर कहा स्मृति परिणाम ‘मैं शरीरत्याग करूँगा ही’ ऐसा निश्चय करनेवालेके दृढ़ होता है। उसके तीव्र वेदना होनेपर जीवनकी आशा नष्ट हो जाती है ॥१६३॥
संजमसाधणमेत्तं उवधिं मोत्तूण सेसयं उवधिं ।
पजहदि विसुद्धलेस्सो साधू मुत्तिं गवेसंतो ॥१६४॥
अर्थ: मुक्तिको खोजनेवाला विशुद्ध लेश्यासे युक्त साधु संयमके साधनमात्र परिग्रहको छोड़कर शेष परिग्रहको प्रकर्ष अर्थात् मन-वचन-कायसे त्याग देता है ॥१६४॥
अप्पपरियम्म उवधिं बहुपरियम्मं च दोवि वज्जेइ ।
सेज्जा संथारादी उस्सग्गपदं गवेसंतो ॥१६५॥
अर्थ: परिग्रहत्याग पदका अन्वेषण करनेवाला साधु अल्पपरिकर्मवाले और बहुत परिकर्मवाले दोनों ही प्रकारके परिग्रहोंको जिनमें वसति संस्तर आदि भी हैं, मन-वचन-कायसे त्याग देता है ॥१६५॥
पंचविहं जे सुद्धिं अपाविदूण मरणमुवणमन्ति ।
पंचविहं च विवेगं ते खु समाधिं ण पावेन्ति ॥१६६॥
अर्थ: जो पाँच प्रकारकी शुद्धियोंको और पांच प्रकारके विवेकको प्राप्त किये बिना मरणको प्राप्त होते हैं, वे समाधिको नहीं ही प्राप्त होते हैं ॥१६६॥
पंचविहं जे सुद्धिं पत्ता णिखिलेण णिच्छिदमदीया ।
पंचविहं च विवेगं ते हु समाधिं परमुवेंति ॥१६७॥
अर्थ: पूर्णरूपसे निश्चित मति वाले जो पाँच प्रकारकी शुद्धिको और पाँच प्रकारके विवेक को प्राप्त हुए हैं, वे निश्चयसे परम समाधिको प्राप्त होते हैं ॥१६७॥
आलोयणाए सेज्जासंथारुवहीण भत्तपाणस्स ।
वेज्जावच्चकराण य सुद्धी खलु पंचहा होइ ॥१६८॥
अर्थ: आलोचना की शुद्धि, शय्याकी, संस्तरकी और परिग्रहकी शुद्धि, भक्तपानकी शुद्धि और वैयावृत्य करने वालोंकी शुद्धि, निश्चयसे शुद्धि पाँच प्रकारकी होती है ॥१६८॥
अहवा दंसणणाणचरित्तसुद्धी य विणयसुद्धी य ।
आवासयसुद्धी वि य पंच वियप्पा हवदि सुद्धी ॥१६९॥
अर्थ: अथवा दर्शन शुद्धि, ज्ञान शुद्धि, चारित्र शुद्धि, विनय शुद्धि और आवश्यक शुद्धि इस प्रकार शुद्धिके पाँच भेद होते हैं ॥१६९॥
इंदियकसायउवधीण भत्तपाणस्स चावि देहस्स ।
एस विवेगो भणिदो पंचविधो दव्वभावगदो ॥१७०॥
अर्थ: इन्द्रिय विवेक, कषाय विवेक, उपधिविवेक, भक्तपान विवेक और देहका विवेक इस प्रकार यह विवेक पांच प्रकारका पूर्वागम में कहा है । तथा यह पांच प्रकारका विवेक द्रव्य और भावके भेदसे दो प्रकार है ॥१७०॥
अहवा सरीरसेज्जा संथारुवहीण भत्तपाणस्स ।
वेज्जावच्चकराण य होइ विवेगो तहा चेव ॥१७१॥
अर्थ: अथवा शरीर विवेक, वसति विवेक, संस्तर विवेक, उपधि विवेक, भक्तपान विवेक, और वैयावृत्य करने वालोंका विवेक, द्रव्य और भाव रूप होता है ॥१७१॥
सव्वत्थ दव्वपज्जयममत्तसंगविजढो पणिहिदप्पा ।
णिप्पणयपेमरागो उवेज्ज सव्वत्थ समभावं ॥१७२॥
अर्थ: सर्व देशमें प्रतिनिहित आत्मा द्रव्य और पर्यायोंमें ममतारूपी परिग्रहसे रहित, प्रणय, प्रेम और रागसे रहित सर्वत्र समभावको प्राप्त होता है ॥१७२॥
जा उवरि उवरि गुणपडिवत्ती सा भावदो सिदी होदि ।
दव्वसिदी णिस्सेणी सोवाणं आरुहंतस्स ॥१७३॥
अर्थ: जो ऊपर-ऊपर गुणोंकी प्रतिपत्ति है वह भावसे श्रिति है। ऊपर चढ़ने वाले के नसैनी सीढ़ी आदि द्रव्य श्रिति है ॥१७३॥
सल्लेहणं करेंतो सव्वं सुहसीलयं पयहिदूण ।
भावसिदिमारुहित्ता विहरेज्ज सरीरणिव्वण्णो ॥१७४॥
अर्थ: सल्लेखना करता हुआ शरीरसे विरक्त साधु सब सुखशीलताको मन वचन कायसे त्यागकर भावश्रिति पर आरोहण करके विहार करे ॥१७४॥
दव्वसिदिं भावसिदिं अणुओगवियाणया विजाणंता ।
ण हु उड्ढगमणकज्जे हेट्ठिल्लपदं पसंसंति ॥१७५॥
अर्थ: द्रव्यश्रितिके भावश्रितिके स्वरूपको विशेष रूपसे जानने वाले तथा आचारांगके ज्ञाता ऊर्ध्वगमन रूप कार्यमें नीचे पैर रखना प्रशंसनीय नहीं ही मानते ॥१७५॥
गणिणा सह संलाओ कज्जं पइ सेसएहिं साहूहिं ।
मोणं से मिच्छजणे भज्जं सण्णीसु सजणे य ॥१७६॥
अर्थ: शुभ परिणामोंकी श्रेणि पर आरूढ़ साधुको आचार्यके ही साथ वार्तालाप करना चाहिये । कार्य हो तो शेष साधुओंसे वार्तालाप करे । मिथ्यादृष्टिजनोंमें मौन रहे । शान्त परिणामी मिथ्यादृष्टियोंमें और अपने ज्ञातिजनोंमें मौन करे, न भी करे ॥१७६॥
सिदिमारुहित्तु कारणपरिभुत्तं उवधिमणुवधिं सेज्जं ।
परिकम्मादिउवहदं वज्जित्ता विहरदि विदण्हू ॥१७७॥
अर्थ: क्रमका ज्ञाता मुनि शुभ परिणामों की श्रेणिपर चढ़कर किसी कारणवश व्यवहार में आई परिग्रहको और ईषत् उपधिरूप वसतिको तथा जो लीपने-पोतने अयोग्य है, उसे त्याग कर तपश्चरण करता है ॥१७७॥
तो पच्छिमंमि काले वीरपुरिससेवियं परमघोरं ।
भत्तं परिजाणंतो उवेदि अब्भुज्जदविहारं ॥१७८॥
अर्थ: उस श्रितिके अन्तिम समयमें वीर पुरुषोंके द्वारा आचरित अतिकठिन आहारको त्याग देनेका इच्छुक वह मुनि सम्यग्दर्शन आदि परिणामोंकी अभिमुखतामें तत्पर विहारको प्राप्त होता है । अर्थात् रत्नत्रयकी मुख्यताको लिये हुए आचरण करता है ॥१७८॥
इत्तिरियं सव्वगणं विधिणा वित्तिरिय अणुदिसाए दु ।
जहिदूण संकिलेसं भावेइ असंकिलेसेण ॥१७९॥
अर्थ: तत्काल गुरुके पश्चात् जो संघका पालन करता है उसे, विधिपूर्वक समस्त संघको सौंपकर संक्लेशको छोड़कर असंक्लेशसे आत्माको भाता है ॥१७९॥
जावंतु केइ संगा उदीरया होति रागदोसाणं ।
ते वज्जितो जिणदि हु रागं दोसं च णिस्सङ्गो ॥१८०॥
अर्थ: जितना कोई परिग्रह रागद्वेषकी उदीरणा करने वाला होता है, उसे छोड़ता हुआ निस्संग होकर राग और द्वेष को निश्चयसे जीतता है ॥१८०॥
कन्दप्पदेवखिब्भिस अभिओगा आसुरी य सम्मोहा ।
एसा हु सङ्किलिट्ठा पञ्चविहा भावणा भणिदा ॥१८१॥
अर्थ: कन्दर्पदेवगति, किल्बिषदेवगति, आभियोग्यदेवगति, असुरदेवगति और सम्मोहदेवगतिके कारण भूत आत्म परिणाम यह निश्चयसे पाँच प्रकारकी संक्लिष्ट भावना कही है ॥१८१॥
कंदप्पकुक्कुआइय चलसीलो णिच्चहासणकहोय ।
विब्भाविंतो य परं कंदप्पं भावणं कुणइ ॥१८२॥
अर्थ: कन्दर्प कौत्कुच्य आदिसे चलशील, और सदा हास्य कथा करनेमें तत्पर, दूसरेको वेस्मयमें डालने वाला कन्दर्प भावनाको करता है ॥१८२॥
णाणस्स केवलीणं धम्मस्साइरिय सव्वसाहूणं ।
माइय अवण्णवादी खिब्भिसियं भावणं कुणइ ॥१८३॥
अर्थ: जो ज्ञानके, केवलियोंके, धर्मके, आचार्यों और सर्व साधुओंके विषयमें मायाचार करता है, झूठा दोष लगाता है वह किल्विषक भावनाको करता है ॥१८३॥
मंताभिओगकोदुगभूदीयम्मं पउंजदे जो हु ।
इड्ढिरससादहेदुं अभिओगं-भावणं कुणइ ॥१८४॥
अर्थ: जो द्रव्यलाभ, मिष्टरस और सुखके लिए मंत्राभियोग - भूत आदि बुलाना, कौतुक - अकालमें वर्षा आदि दिखलाना और बच्चोंकी रक्षाके लिये भभूत देना आदि करता है वह अभियोग्य भावना करता है ॥१८४॥
अणुबद्धरोसविग्गहसंसत्ततवो णिमित्तपडिसेवी ।
णिक्किवणिराणुतावी आसुरियं भावणं कुणदि ॥१८५॥
अर्थ: अनुबद्ध क्रोध और कलहसे जिसका तप संयुक्त है, ज्योतिष आदिसे आजीविका करता है, निर्दय है, दूसरेको कष्ट देकर भी पश्चात्ताप नहीं करता वह आसुरी भावनाको करता है ॥१८५॥
उम्मग्गदेसणो मग्गदूसणो मग्गविप्पडिवणी य ।
मोहेण य मोहिंतो संमोहं भावणं कुणइ ॥१८६॥
अर्थ: जो मिथ्यात्व या असंयमका उपदेश देता है, मार्गको दूषण लगानेवाला है और रत्नत्रयका विरोधी है, अज्ञानसे मूढ़ है वह सम्मोह भावनाको करता है ॥१८६॥ उस मार्गको दूषण लगाना । यथा - ज्ञानसे ही मोक्ष होता है, दर्शन और चारित्रसे क्या लाभ । अथवा चारित्र ही मोक्षका उपाय है, ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है । ऐसा कहनेवाला मार्गका दूषक होता है । अथवा मार्गका ज्ञान करानेवाला श्रुतमार्ग है उसका जो दूषक है - मिथ्या व्याख्यान करता है । ‘मग्गविप्पडिवण्णी’ - रत्नत्रयात्मक मार्गमें विप्रतिपन्न है । यह मुक्तिका मार्ग नहीं है ऐसा मानकर उसके विरुद्ध आचरण करता है और मोह अर्थात् संशय विपर्ययरूप अज्ञानसे मोहित है । वह तीव्रकामी और रागी नीच देवोंमें उत्पन्न होता है ॥१८६॥
एदाहिं भावणाहिं य विराधओ देवदुग्गदिं लहइ ।
तत्तो चुदो समाणो भमिहिदि भवसागरमणंतं ॥१८७॥
अर्थ: रत्नत्रयसे च्युत हुआ व्यक्ति इन भावनाओंसे देवोंमें जो दुष्टगति है उसे प्राप्त करता है । उस देवदुर्गतिसे च्युत होकर अन्तरहित संसार समुद्रमें भ्रमण करता है ॥१८७॥
एदाओ पंच वि वज्जिय इणमो छट्ठीए विहरदे धीरो ।
पंचसमिदो तिगुत्तो णिस्संगो सव्वसंगेसु ॥१८८॥
अर्थ: इन पाँचों ही भावनाओंको त्याग कर यह धीर यति छठी भावनामें प्रवृत्त होता है । जो पाँच समितियोंको पालता है, तीन गुप्तियोंसे सुशोभित है और सब परिग्रहोंमें आसक्ति रहित है । अर्थात् छठी भावनामें प्रवृत्त होनेके योग्य ऐसा यति ही होता है ॥१८८॥
तवभावणा य सुदसत्तभावणेगत्तभावणा चेव ।
धिदिबलविभावणाविय असंकिलिद्ठावि पंचविहा ॥१८९॥
अर्थ: असंक्लिष्ट अर्थात् संक्लेशरहित भावना भी पाँच प्रकारकी है - तप भावना, श्रुतभावना, सत्त्व भावना, एकत्वभावना और धृतिबल भावना ॥१८९॥
तवभावणाए पंचेंदियाणि दंताणि तस्स वसमेंति ।
इंदियजोगायरिओ समाधिकरणाणि सो कुणइ ॥१९०॥
अर्थ: गा० द्रव्य और भावरूप तपकी भावनासे पाँचों इन्द्रियाँ दमित होकर उस तप भावनावालेके वशमें हो जाती हैं । इन्द्रियोंको शिक्षा देनेवाला वह आचार्य रत्नत्रयका समाधान करनेवाली क्रियाएँ करता है ॥१९०॥
इंदियसुहसाउलओ घोरपरीसहपराजियपरस्सो ।
अकदपरियम्म कीवो मुज्झदि आराहणाकाले ॥१९१॥
अर्थ: जो इन्द्रिय सुखके स्वादमें आसक्त है, भूख आदिकी दुःसह परीषहोंसे हारकर रत्नत्रयसे विमुख हुआ है, जिसने परिकर्म-आराधनाके योग्य तप नहीं किया है वह दीन आराधना के कालमें विचित्त हो जाता है उसका मन इधर-उधर भटकता है ॥१९१॥
जोग्गमकारिज्जंतो अस्सो सुहलालिओ चिरं कालं ।
रणभूमीए वाहिज्जमाणओ जह ण कज्जयरो ॥१९२॥
अर्थ: जैसे जिस घोड़ेको शब्दके संकेत पर चलने, भ्रमण, लंघन आदिकी शिक्षा नहीं दी गई है और चिरकाल तक सुखपूर्वक लालन पालन किया गया है वह घोड़ा युद्धभूमिमें सवारीके लिये ले जाया गया कार्य नहीं करता वैसे ही यति भी जानना ॥१९२॥
पुव्वमकारिदजोगो समाधिकामो तहा मरणकाले ।
ण भवदि परीसहसहो विसयसुहे मुच्छिदो जीवो ॥१९३॥
अर्थ: जिसने पूर्व कालमें तप नहीं किया और विषय सुखमें आसक्त रहा वह जीव मरते समय समाधिकी कामना करता हुआ उस प्रकार परीषहको सहन करनेवाला नहीं होता ॥१९३॥
जोग्गं कारिज्जंतो अस्सो दुहभाविदो चिरं कालं ।
रणभूमीए वाहिज्जमाणओ कुणदि जह कज्जं ॥१९४॥
अर्थ: जैसे योग्य शिक्षाको प्राप्त अश्व चिरकाल तक दुःखसे भावित हुआ, अर्थात् कष्ट सहनेका अभ्यासी युद्धभूमिमें सवारीमें ले जाने पर कार्य करता है ॥१९४॥
पुव्वं कारिदजोगो समाधिकामो तहा मरणकाले ।
होदि हु परीसहसहो विसयसुहपरम्मुहो जीवो ॥१९५॥
अर्थ: उसी प्रकार पूर्वमें तप करनेवाला विषय सुखसे विमुख जीव मरते समय समाधिका इच्छुक हुआ निश्चयसे परीषहको सहनेवाला होता है ॥१९५॥
सुदभावणाए णाणं दंसणतवसंजमं च परिणवइ ।
तो उवओगपइण्णा सुहमच्चविदो समाणेइ ॥१९६॥
अर्थ: श्रुतभावनासे सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, तप और संयमरूप परिणमन करता है। ज्ञान भावनासे उपयोगकी प्रतिज्ञाको सुखपूर्वक अचलित होता हुआ समाप्त करता है ॥१९६॥
जदणाए जोगपरिभाविदस्स जिणवयणमणुगदमणस्स ।
सदिलोवं कादुं जे ण चयंति परीसहा ताहे ॥१९७॥
अर्थ: तब यत्नसे अपनेको तपसे भावित करनेवालेके तथा जिनागमके अनुगत चित्तवालेके स्मृतिका लोप करनेमें परीषह समर्थ नहीं होती ॥१९७॥
देवेहिं भीसिदो वि हु कयावराधो व भीमरूवेहिं ।
तो सत्तभावणाए वहइ भरं णिब्भओ सयलं ॥१९८॥
अर्थ: देवोंके द्वारा पीड़ित किया गया भी अथवा भयंकर जीवोंके द्वारा सताया गया यति सत्त्वभावनाके द्वारा दुःख सहन करनेसे निडर होकर संयमके समस्त भारको वहन करता है ॥१९८॥
बहुसो वि जुद्धभावणाय ण भडो हु मुज्झदि रणम्मि ।
तह सत्तभावणाए ण मुज्झदि मुणी वि उवसग्गे ॥१९९॥
अर्थ: अनेक प्रकारकी भी युद्ध सम्बन्धी भावनासे जैसे योद्धा युद्धमें नहीं ही मोहित होता अर्थात् युद्धसे नहीं डरता । वैसे ही मुनि भी सत्त्वभावनासे उपसर्ग आनेपर मोहित नहीं होता ॥१९९॥
खणणुत्तावणवालणवीयणविच्छेयणावरोहत्तं ।
चिंतिय दुह अदीहं मुज्झदि णो सत्तभाविदो दुक्खे ॥२००॥
अर्थ: खोदना, जलना, बहना, छेदना, रोपनाको विचारकर सत्त्वभावनायुक्त मुनि दुःखमें अल्पकालीन दुःखसे मोहित नहीं होता अर्थात् नहीं डरता ॥२००॥
बालमरणाणि साहू सुचिंतिदूणप्पणो अणंताणि ।
मरणे समुट्ठिए विहि मुज्झइ णो सत्तभावणाणिरदो ॥२०१॥
अर्थ: सत्त्वभावनामें लीन साधु अपने अनन्त बालमरणोंको सम्यकरूपसे विचारकर मरणके उपस्थित होनेपर भी मोहित नहीं होता ॥२०१॥
एयत्तभावणाए ण कामभोगे गणे सरीरे वा ।
सज्जइ वेरग्गमणो फासेदि अणुत्तरं धम्मं ॥२०२॥
अर्थ: एकत्व भावनासे कामभोगमें, संघमें अथवा शरीरमें आसक्ति नहीं करता । वैराग्यमें मन रमाये हुए सर्वोत्कृष्ट चारित्रको अपनाता है ॥२०२॥
भयणीए विधम्मिज्जंतीए एयत्तभावणाए जहा ।
जिणकप्पिदो ण मूढो खवओ वि ण मुज्झइ तधेव ॥२०३॥
अर्थ: जैसे अयोग्य आचरण करनेवाली अपनी बहनमें जिनकल्पको धारण करनेवाला नागदत्त नामक मुनि एकत्व भावनासे मोहको प्राप्त नहीं हुआ । वैसे ही क्षपक भी मोहको प्राप्त नहीं होता ॥२०३॥
कसिणा परीसहचमू अब्भुट्ठइ जइ वि सोवसग्गा वि ।
दुद्धरपहकरवेगा भयजणणी अप्पसत्ताणं ॥२०४॥
अर्थ: दुःखदायी संकटके वेग सहित, अल्प शक्तिवालोंको भय पैदा करनेवाली भूख आदि बाईस परीषहोंकी समस्त सेना जिसके साथमें चार प्रकारके उपसर्ग भी हैं, यदि सन्मुख खड़ी हो ॥२०४॥
धिदिधणिदबद्धकच्छो जोधेइ अणाइलो तमच्चाई ।
धिदिभावणाए सूरो संपुण्णमणोरहो होई ॥२०५॥
अर्थ: धैर्यके साथ दृढ़तापूर्वक कमरको बाँधनेवाला शूर बिना किसी घबराहटके धृति भावनासे उस सेनासे अत्यन्त युद्ध करता है । फलस्वरूप उसका मनोरथ सम्पूर्ण होता है ॥२०५॥
एयाए भावणाए चिरकालं हि विहरेज्ज सुद्धाए ।
काऊण अत्तसुद्धिं दंसणणाणे चरित्ते य ॥२०६॥
अर्थ: इस शुद्ध पाँच प्रकारकी भावनासे आत्माकी शुद्धि करके सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रयमें चिरकालतक विहार करना चाहिए ॥२०६॥
एवं भावेमाणो भिक्खू सल्लेहणं उवक्कमइ ।
णाणाविहेण तवसा बज्झेणब्भंतरेण तहा ॥२०७॥
अर्थ: उक्त प्रकारसे भावना भानेवाला भिक्षु नाना प्रकारके बाह्य और अभ्यन्तर तपसे सल्लेखनाको प्रारम्भ करता है ॥२०७॥
सल्लेहणा य दुविहा अब्भंतरिया य बाहिरा चेव ।
अब्भंतरा कसायेसु बाहिरा होदि हु सरीरे ॥२०८॥
अर्थ: सल्लेखनाके दो भेद हैं अभ्यन्तर और बाह्य । अभ्यन्तर सल्लेखना क्रोध आदि कषायकी होती है, बाह्य सल्लेखना शरीरके विषयमें होती है ॥२०८॥
सव्वे रसे पणीदे णिज्जूहित्ता दु पत्तलुक्खेण ।
अण्णदरेणुवधाणेण सल्लिहइ य अप्पयं कमसो ॥२०९॥
अर्थ: बलको बढ़ानेवाले सब रसोंको त्यागकर प्राप्त हुए रूखे आहारसे कोई एक नियम विशेष लेकर अपने शरीरको क्रमसे कृश करता है ॥२०९॥
अणसण अवमोयरियं चाओ य रसाण वुत्तिपरिसंखा ।
कायकिलेसो सेज्जा य विवित्ता बाहिरतवो सो ॥२१०॥
अर्थ: अनशन, अवमौदर्य, रसोंका त्याग वृत्तिपरिसंख्यान, कायक्लेश और विविक्त शय्या ये बाह्य तप हैं ॥२१०॥
अद्धाणसणं सव्वाणसणं दुविहं तु अणसणं भणियं ।
विहरंतस्स य अद्धाणसणं इदरं च चरिमंते ॥२११॥
अर्थ: अद्धानशन और सर्वानशन इस प्रकार अनशन दो ही प्रकारका कहा है । ग्रहण और प्रतिसेवनाकालमें वर्तमानके अद्धानशन होता है और मरण समय में सर्वानशन होता है ॥२११॥
होइ चउत्थं छट्ठट्ठमाइ छम्मासखवणपरियंतो ।
अद्धाणसणविभागो एसो इच्छाणुपुव्वीए ॥२१२॥
अर्थ: चतुर्थ षष्ठ आदिसे छह मासके उपवास पर्यन्त यह अद्धानशनके भेद होते हैं । ये मुनिगण अपनी इच्छाके अनुसार करते हैं ॥२१२॥
बत्तीसं किर कवला आहारो कुक्खिपूरणो होइ ।
पुरिसस्स महिलियाए अट्ठावीसं हवे कवला ॥२१३॥
अर्थ: बत्तीस ग्रास प्रमाण आहार पुरुषके पेटको पूरा भरनेवाला होता है । स्त्रियोंके कुक्षिपूरक आहारका परिमाण अट्ठाइस ग्रास होता है ॥२१३॥
एगुत्तरसेढीए जावय कवलो वि होदि परिहीणो ।
ऊमोदरियतवो सो अद्धकवलमेव सिच्छं च ॥२१४॥
अर्थ: पुरुष और स्त्रीके उक्त आहारमेंसे एक दो आदि ग्रासकी हानिके क्रमसे जब तक एक ग्रास मात्र भी शेष होता है वह अवमौदर्य तप है । जब तक अर्धग्रास ही अवशिष्ट रहे या एक सिक्थ शेष रहे तब तक भी अवमौदर्य तप है ॥२१४॥
चत्तारि महावियडीओ होंति णवणीदमज्जमंसमहू ।
कंखापसंगदप्पाऽसंजमकारीओ एदाओ ॥२१५॥
अर्थ: चार महाविकृतियाँ होती हैं, मक्खन, मद्य, मांस और मधु । ये गृद्धि, प्रसंग, दर्प, और असंयमको करते हैं ॥२१५॥
आणाभिकंखिणावज्जभीरुणा तवसमाधिकामेण ।
ताओ जावज्जीवं णिज्जूढाओ पुरा चेव ॥२१६॥
अर्थ: सर्वज्ञकी आज्ञाके प्रति आदरवान, पाप भीरु और तपमें एकाग्रताके अभिलाषीने वे महाविकृतियाँ सल्लेखनाके समयसे पूर्व ही जीवन पर्यन्तके लिये ( णिज्जूढाओ ) त्याग दी है ॥२१६॥
खीरदधिसप्पितेल्लगुडाण पत्तेगदो व सव्वेसिं ।
णिज्जूहणमोगाहिम पणकुसणलोणमादीणं ॥२१७॥
अर्थ: दूध, दही, घी, तेल, गुड़का और घृत पूर, पुवे, पत्रशाक, सूप और लवण आदिका सबका अथवा एक-एकका त्याग रस परित्याग है । अर्थात् सल्लेखना कालमें दूध आदि सबका या इनमेंसे यथायोग्य दो तीन चारका त्याग रस परित्याग है ॥२१७॥
अरसं च अण्णवेलाकदं च सुद्धोदणं च लुक्खं च ।
आयंबिलमायामोदणं च विगडोदणं चेव ॥२१८॥
अर्थ: स्वाद रहित अन्य समयमें बनाया गया अर्थात् ठण्डा भोजन, और शुद्ध भात जिसमें कोई अन्य शाक वगैरह न मिला हो, और रूखा भोजन जिसमें घी आदि न हो, आचाम्ल अर्थात् कांजी मिश्रित भात, थोड़ा जल और बहुत चावल वाला भात, और बहुत अधिकपका भात ॥२१८॥
इच्चेवमादि विविहो णायव्वो हवदि रसपरिच्चाओ ।
एस तवो भजिदव्वो विसेसदो सल्लिहंतेण ॥२१९॥
अर्थ: इत्यादि अनेक प्रकारका रस परित्याग सबको जानने योग्य है । शरीर सल्लेखना करने वालेको यह रस परित्याग नामक तप विशेष रूपसे सेवन करना चाहिये ॥२१९॥
गत्तापच्चागदं उज्जुवीहि गोमुत्तियं च पेलवियं ।
सम्बूकावट्टंपि पदंगवीधी य गोयरिया ॥२२०॥
अर्थ: और भ्रमण करते हुए भिक्षा मिली तो ग्रहण करूँगा अन्यथा नहीं । ‘पदंगवीधी’ - पक्षियोंकी पंक्ति जैसे भ्रमण करती है उस तरह भ्रमण करते हुए यदि भिक्षा मिली तो मैं ग्रहण करूँगा । गोयरिया’ - गोचरी भिक्षाके अनुसार भ्रमण करते हुए भिक्षा मिलेगी तो ग्रहण करूँगा । इस प्रकारके संकल्प करनेको वृत्ति परिसंख्यान कहते हैं २२०॥
पाडयणियंसणभिक्खा परिमाणं दत्तिघासपरिमाणं ।
पिंडेसणा य पाणेसणा य जागूय पुग्गलया ॥२२१॥
अर्थ: ‘पाडयनिगंसण’ - इसी ही फाटकमें प्रवेश करके मिली हुई भिक्षाको ग्रहण करूँगा, अन्य फाटकमें नहीं । एक ही फाटकमें प्रवेश करूँगा या दो में ही प्रवेश करूँगा । 'अमुक घरसे लगी हुई भूमिमें प्रवेश करूँगा, घरमें नहीं जाऊँगा ? इस प्रकारको प्रतिज्ञाको णियंसण कहते हैं । ऐसा कोई कहते हैं । दूसरोंका कहना है कि पाटकी भूमिमें ही प्रवेश करूँगा, पाटके घरोंमें प्रवेश नहीं करूँगा इस प्रकारके संकल्पको ‘पाटकाणियंसण’ कहते हैं । ‘भिक्षा परिमाण’ - एक ही भिक्षा या दो ही भिक्षा ग्रहण करूँगा, अधिक नहीं । ‘दत्तिघास परिमाण’ - एक के ही द्वारा देने पर या दो के ही द्वारा देनेपर भिक्षा ग्रहण करूँगा । अथवा दाताके द्वारा लाई गई भिक्षामेंसे भी इतने ही ग्रास ग्रहण करूँगा ऐसा परिमाण करना । ‘पिंडेसणा’ - पिण्ड रूप भोजन ही ग्रहण करूँगा । ‘पाणेसणा’ - जो बहुत द्रव होनेसे पीने योग्य होगा वही ग्रहण करूँगा । ‘जागूय’ यवागू ही ग्रहण करूँगा । ‘पुग्गलया’ - चना मसूर आदि धान्य ही ग्रहण करूँगा ॥२२१॥
संसिट्ठ फलिह परिखा पुप्फोवहिदं व सुद्धगोवहिदं ।
लेवडमलेवडं पाणायं च णिस्सित्थगं ससित्थं ॥२२२॥
अर्थ: ‘संसिट्ठ’ - जो शाक कुल्माष आदि व्यंजनसे मिला हुआ हो । ‘फलिह’ - जिसके चारो ओर शाक रखा हो और बीचमें भात हो । ‘परिखा’ - चारो ओर व्यंजन हो बीचमें अन्न रखा हो । ‘पुप्फोवहिद’ - व्यंजनोके मध्यमें पुष्पावलीके समान चावल रखे हो । ‘सुद्धगोवहिद’ - शुद्ध अर्थात् बिना कुछ मिलाये अन्नसे ‘उपहित’ अर्थात् मिले हुए शाक व्यंजन आदि । ‘लेवड’ जिससे हाथ लिप जाये । ‘अलेवड’ जो हाथसे न लिप्त हो । सिक्थ सहित पेय और सिक्थ रहित पेय । ऐसा भोजन मिलेगा तो ग्रहण करूँगा ऐसा संकल्प करता है ॥२२२॥
पत्तस्स दायगस्स य अवग्गहो बहुविहो ससत्तीए ।
इच्चेवमादिविविहा णादव्वा वुत्तिपरिसंखा ॥२२३॥
अर्थ: ‘पत्तस्स’ - इसी प्रकार सोने, चाँदी, कांसी या मिट्टीके पात्रसे ही लाया गया भोजन ग्रहण करूँगा । ‘दायगस्स’ - स्त्रीसे ही, उसमें भी बालिकासे या युवतीसे या वृद्धासे अथवा अलंकार सहित स्त्री या अलंकार रहित स्त्रीसे या ब्राह्मणीसे या राजपुत्रीसे दिया गया आहार ही ग्रहण करूँगा । इस तरह बहुत प्रकार के अभिग्रह अपनी शक्तिके अनुसार होते हैं । ये सब विविध वृत्ति परिसंख्यान जानना चाहिये ॥२२३॥
अणुसूरी पडिसूरी य उड्ढसूरी य तिरियसूरी य ।
उब्भागेण य गमणं पडिआगमणं च गंतूणं ॥२२४॥
अर्थ: ‘अणुसूरि’ - जिस दिन कड़ी धूप हो सूरजको पीछे करके पूरब दिशासे पश्चिम दिशाकी ओर जाना । ‘पडिसूरि’ - पश्चिम दिशासे सूरजकी ओर मुख करके गमन करना । ‘उड्ढसूरी’ - सूरजके ऊपर आ जाने पर गमन करना, ‘तिरियसूरी’ - सूरजको एक ओर रखते हुए गमन करना । ‘उब्भागेण गमण’ - जिस ग्राममें मुनि ठहरे हों उस ग्रामसे दूसरे गाँवमें भिक्षाके लिये जाना । ‘गंतूण पडिआगमण’ - जाकर लौट आना ये सब काय क्लेश तप है ॥२२४॥
साधारणं सवीचारं सणिरुद्धं तहेव वोसट्टं ।
समपादमेगपादं गिद्धोलीणं च ठाणाणि ॥२२५॥
अर्थ: ‘साधारण’ - चिकने स्तम्भ आदिका आश्रय लेकर खड़े होना । सवीचार - पूर्व स्थानसे दूसरे स्थान पर जाकर कुछ काल तक खड़े रहना । ‘सणिरुद्ध’ - अपने स्थान पर ही निश्चल स्थित होना । ‘वोसट्ट’ - कायोत्सर्ग करना । समपाद - दोनों पैर बराबर करके खड़े होना । ‘एगपाद’ - एक ही पैर से खड़े होना । ‘गिद्धोलीण’ - जैसे गिद्ध उड़ते समय अपने दोनों पंख फैलाता है उस तरह दोनों हाथ फैलाकर खड़े होना ॥२२५॥
समपलियंकणिसेज्जा समपदगोदोहिया य उक्कुडिया ।
मगरमुह हत्थिसुण्डी गोणिसेज्जद्धपलियङ्का ॥२२६॥
अर्थ: ‘समपलियंकणिसेज्जा’ - सम्यक् पर्यंकासनसे बैठना । ‘समपद’ - जांघे और कटि भागको सम करके बैठना । ‘गोदोहिगा’ गौ दूहते समय जैसा आसन होता है वैसे आसनसे बैठना । ‘उक्कुडिया’ - ऊपरको संकुचित आसनसे बैठना अर्थात् दोनों पैरोंको जोड़ भूमिको न छूते हुए बैठना । ‘मगरमुह’ - मगरके मुखकी तरह पैर करके बैठना । 'हत्थिसुंडी - हाथीके सूँड फैलानेकी तरह एक पैर फैलाकर बैठना । दूसरों का कहना है कि हाथ फैलाकर बैठना हत्थिसूँडी है । ‘गोणिसेज्ज’ दोनों जंघाओंको संकोच कर गायकी तरह बैठना । और अर्धपर्यंकासन । ये सब कायक्लेश के आसन हैं ॥२२६॥
वीरासणं च दण्डायउड्ढसाई य लगडसाई य ।
उत्ताणो मच्छिय एगपाससाई य मडयसाई य ॥२२७॥
अर्थ: दोनों जंघाओंको दूर रखकर आसन वीरासन है । आगे शयनके भेद करते हैं - दण्डेके समान शरीरको लम्बा करके सोना । खड़े होकर सोना । इसे ऊर्ध्वशायी कहते हैं । ‘लगण साई’ - शरीरको संकुचित करके सोना । उत्ताण - ऊपरको मुख करके सोना । ओमच्छिय-मस्तक नीचे करके सोना अर्थात् नीचे मुख करके सोना । एक करवटसे सोना । मडयसाइ - मृतककी तरह निश्चेष्ट सोना ॥२२७॥
अब्भावगाससयणं अणिट्ठुवणा अकंडुगं चेव ।
तणफलयसिलाभूमी सेज्जा तह केसलोचो य ॥२२८॥
अर्थ: ‘अब्भवगास सयणं’ - बाहर खुले आकाशमें सोना । ‘अणिट्ठिवणगं’ - थूकना नहीं । अकंडूतगं - खुजाना नहीं । तथा तृण, काठका पटिया, शिला, या भूमिपर सोना और केसलोच ॥२२८॥
अब्भुट्ठणं च रादो अण्हाणमदंतघोवणं चेव ।
कायकिलेसो एसो सीदुण्हादावणादी य ॥२२९॥
अर्थ: रातमें शयन नहीं करना अर्थात् जागना । स्नान नहीं करना । दांतोको नहीं धोना, उनकी सफाई नहीं करना । और शीतकालमें तथा गर्मीमें आतपन योग करना इत्यादि यह कायक्लेश है ॥२२९॥
जत्थ ण विसोत्तिग अत्थि दु सद्दरसरूवगन्धफासेहिं ।
सज्झायज्झाणवाघादो वा वसधी विवित्ता सा ॥२३०॥
अर्थ: जिस वसतिमें मनोज्ञ या अमनोज्ञ शब्द, रस, रूप गन्ध और स्पर्शके द्वारा अशुभ परिणाम नहीं होते । अथवा स्वाध्याय और ध्यानमें व्याघात नहीं होता वह विविक्त वसति है ॥२३०॥
वियडाए अवियडाए समविसमाए बहिं च अन्तो वा ।
इत्थिणउंसयपसुवज्जिदाए सीदाए उसिणाए ॥२३१॥
अर्थ: वह वसति खुले द्वार वाली हो अथवा बन्द द्वार वाली हो । उसकी भूमि सम हो अथवा ऊँची नीची हो । वह बाहरके भागमें हो अथवा अन्दरके भागमें हो । स्त्री नपुंसक और पशुओंसे रहित हो ठंडी हो या गर्म हो ॥२३१॥
उग्गमउप्पादणएसणाविसुद्धाए अकिरियाए दु ।
वसति असंसत्ताए णिप्पाहुडियाए सेज्जाए ॥२३२॥
अर्थ: गा० उद्गम, उत्पादन और एषणा दोषोंसे रहित, दुःप्रमार्जन, आदि संस्कारसे रहित, जीवोंकी उत्पत्तिसे रहित, शय्यारहित वसतिकामें अन्दर या बाहरमें विविक्त शयनासन तपके धारी मुनि निवास करते हैं ॥२३२॥
सुण्णघरगिरिगुहारुक्खमूलआगंतुगारदेवकुले ।
अकदप्पब्भारारामघरादीणि य विवित्ताइं ॥२३३॥
कलहो बोलो झंझा वामोहो संकरो ममत्ति च ।
ज्झाणाज्झयणविघादो णत्थि विवित्ताए वसधीए ॥२३४॥
अर्थ: विविक्त वसतिमें कलह, शब्द बहुलता, संक्लेश, चित्तका व्यामोह, अयोग्य असंयमियोंके साथ सम्बन्ध, यह मेरी है ऐसा भाव, तथा ध्यान और अध्ययनमें व्याघात नहीं है ॥२३४॥
इय सल्लीणमुवगदो सुहप्पवत्तेहिं तत्थ जोएहिं ।
पंचसमिदो तिगुत्तो आदट्ठपरायणो होदि ॥२३५॥
अर्थ: इस प्रकार विविक्त वसतिमें निवास करनेसे विना क्लेशके सुखसे होनेवाले तप अथवा ध्यानके द्वारा बाह्यतपमें एकात्मताको प्राप्त यति पाँच समितियोंसे युक्त हुआ अशुभ मन वचनकायका निरोध करके आत्माके कार्यमें तत्पर होता है ॥२३५॥
जं णिज्जरेदि कम्मं असंवुडो सुमहदावि कालेण ।
तं संवुडो तवस्सी खवेदि अंतोमुहुत्तेण ॥२३६॥
अर्थ: असंवृत्त अर्थात् अशुभयोगका निरोध न करनेवाला यति महान् कालके द्वारा भी जिस कर्मकी बाह्य तपके द्वारा निर्जरा नहीं करता उस कर्मको संवृत् अर्थात् गुप्ति, समिति, धर्म अनुप्रेक्षा और परीषहजयको करनेवाला तपस्वी अति स्वल्पकालमें क्षय करता है ॥२३६॥
एवमवलायमाणो भावेमाणो तवेण एदेण ।
दोसेणिग्घादंतो पग्गहिददरं परक्कमदि ॥२३७॥
अर्थ: उक्तक्रमसे इस तपसे अपनेको तत्पर करता हुआ दुर्धरतपसे न डरकर रत्नत्रयको दूषित करनेवाले अशुभ परिणामोंको घातता है और अत्यन्त मुक्तिके मार्गमें चेष्टा करता है ॥२३७॥
सो णाम बाहिरतवो जेण मणो दुक्कडं ण उट्ठेदि ।
जेण य सड्ढा जायदि जेण य जोगा ण हायंति ॥२३८॥
अर्थ: उसीका नाम बाह्य तप है, जिस तपके करनेसे मन पापकी ओर नहीं जाता और जिस तपके करनेसे अभ्यन्तर तपमें श्रद्धा उत्पन्न हो और जिसके करनेसे पूर्वमें गृहीत योग-व्रत विशेष हीन नहीं होते । इस प्रकारका तप करना चाहिए ॥२३८॥
बाहिरतवेण होदि हु सव्वा सुहसीलदा परिच्चत्ता ।
सल्लिहिदं च सरीरं ठविदो अप्पा य संवेगे ॥२३९॥
अर्थ: बाह्य तपसे सब सुख शीलता छूट जाती है । क्योंकि सुख शीलता रागको उत्पन्न करती है । राग-रागको बढ़ाता है और कर्मबन्धके कारण दोषोंको लाता है । बन्ध-कर्मकी स्थितिमें हेतु है । इस तरह बाह्य तपसे अनर्थ करनेवाली यह सुखशीलता नष्ट होती है । शरीर दुःखका कारण है । उसको छोड़नेका उपाय है शरीरको कृश करना । बाह्य तपसे शरीर कृश होता है और स्वयं आत्मा संसारसे भीरुतामें स्थापित होती है ।
दंताणि इंदियाणि य समाधिजोगा य फासिदा होंति ।
अणिगूहिदवीरियओ जीविदतण्हा य वोच्छिण्णा ॥२४०॥
अर्थ: इन्द्रियाँ दान्त होती हैं । अनशन, अवमौदर्य और वृत्ति परिसंख्यान तप करनेसे जिह्वा दान्त होती है । विविक्त शय्यासन तपसे शेष इन्द्रियाँ दान्त होती हैं । जहाँ इन्द्रियोंको प्रिय लगनेवाले विषय नहीं हैं ऐसी बसतिमें रहनेसे इन्द्रियोंका निग्रह होता है । रत्नत्रयमें एकाग्रताको समाधि कहते हैं । समाधिमें योग अर्थात् सम्बन्ध स्पष्ट होते हैं । भोजन आदिका त्याग करनेसे विषयोंसे राग नहीं रहता । जो विषयरागसे सताया हुआ है वह रत्नत्रयमें नहीं लगता । रत्न- भयमें न लगनेसे व्याकुल होकर अशुभ परिणामोंमें ही लगता है। अपनी शक्तिको छिपाता नहीं [?] और वीर्याचारमें प्रवृत्त होता है। जीवनकी जो तृष्णा है वह भी नष्ट हो जाती है। जिसे जीने[?] तृष्णा है वह भोजनादिकका त्याग करना नहीं चाहता। जीवनकी तृष्णावाला जो कुछ भी असंय[?] आदि करके प्राणधारण करनेमें ही तत्पर रहता है, रत्नत्रयमें नहीं लगता ॥२४०॥
दुक्खं च भाविदं होदि अप्पडिबद्धो य देहरससुक्खे ।
मुसमूरिया कसाया विसएसु अणायरो होदि ॥२४१॥
अर्थ: दुःखका सहन होता है। बिना किसी संक्लेशके दुःख सहनेसे कर्मोंकी निर्ज[?] होती है। और क्रमसे होनेवाली निर्जरा समस्त कर्मोंके विनाशका उपाय है इसलिए दुःखभाव[?] उपयोगी है। दूसरे, बार-बार दुःखकी भावना करने वाला ध्यानमें निश्चल होता है। शरीर, र[?] और सुखमें अप्रतिबद्ध - अनासक्त होता है। इन तीनोंमें आसक्ति समाधिमें विघ्न करती है। अ[?] उसका निरास होता है। कषायोंका मर्दन होता है।
कदजोगदाददमणं आहारणिरासदा अगिद्धी य ।
लाभालाभे समदा तितिक्खणं बंभचेरस्स ॥२४२॥
अर्थ: ‘कद जोगदा’ - बाह्य तपसे मरणकालमें जो सर्व आहारका त्याग करना होता है उसका अभ्यास होता है । ‘आत्मदमण’ - आहार और सुखमें जो अनुराग है उसका प्रशमन होनेसे आत्माका दमन होता है । ‘आहारणिरासदा’ - प्रतिदिन आहार सम्बन्धी आशाके त्यागके अभ्यास-से आहारके विषयमें निराशा सम्पन्न होती है । अभिप्राय यह है कि समस्त आहारका त्याग करनेके कालमें भी आहार सम्बन्धी इच्छाका विनाश सुकर होता है । ‘अगिद्धीय’ - और आहारमें लंपटता नहीं रहती । जिसकी आहारमें गृद्धि है वह आहार पाकर उसे छोड़ नहीं सकता । ‘लाभालाभे समदा’ - लाभ और अलाभमें समता रहती है । आहारका लाभ होने पर हर्ष नहीं करता और अलाभमें क्रोध नहीं करता । जो स्वयं भी प्राप्त आहारको छोड़ देता है वह दूसरोंके न देने पर अपना मन खराब कैसे कर सकता है । ‘तितिक्खणं बंभचेरस्स’ - ब्रह्मचर्यको धारण करता है । रसीले आहारके त्यागसे नवीन वीर्यसंचय नहीं होता और अनशनसे संचितवीर्य क्षय होता है तब स्त्रीमें अनुराग नहीं होता । तथा जिन पुरुषोंमें वीर्यहीनता होती है उनके प्रति स्त्रियोंकी विमुखता प्रसिद्ध ही है ॥२४२॥
णिद्दाजओ य दढझाणदा विमुत्ती य दप्पणिग्घादो ।
सज्झायजोगणिव्विग्घदा य सुहदुक्खसमदा य ॥२४३॥
अर्थ: ‘णिद्दाजओय’ - निद्राजय होता है। जो प्रतिदिन भोजन करता है, रसीले आहार के सेवनमें तत्पर रहता है, बहुत भोजन करता है, उसे वायुके प्रकोपसे रहित, सुखकारक स्पर्शवाले उपद्रवहीन देशमें सोने पर गहरी नींद आती है, जिसके अधीन होकर वह चेतनाहीन जैसा हो जाता है और अशुभ परिणामोंके प्रवाहमें गिर जाता है। वह रत्नत्रयमें नहीं लगता। उस निद्राका जय होता है। ‘दढझाणदा’ दृढ़ ध्यान होता है। जिस यतिको दुःख सहनेका अभ्यास नहीं होता, वह दुःख पड़ने पर ध्यानसे विचलित हो जाता है। किन्तु तपका अभ्यासी भूख आदि परीषह आने पर सहता है। ‘विमुत्तीय’ विमुक्ति अर्थात् विशिष्ट त्याग करता है क्योंकि जो अनशन आदिमें तत्पर रहता है वह तो शरीर ही को छोड़ देता है और शरीर ही को छोड़ना कठिन होता है। ‘दप्पणिघादो’ - असंयमको करने वाला जो दर्प है उसका भी पूरी तरहसे घात होता है। ‘सज्झायजोगणिव्विग्घदाय’ - वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेशके साथ जो सम्बन्ध है उसमें कोई विघ्न नहीं होता। आहारके लिए भ्रमण करने वाला साधु कैसे स्वाध्याय कर सकता है। बहुत भोजन करने वाला तो ऊपरको मुख करके सोता है बैठ भी नहीं सकता। रसीला आहार खाने वाला आहारकी ऊष्मासे इधर-उधर करवटे बदलता है। जो बहुजन संकुल बसतिमें रहता है वह दूसरोंकी बातें सुनकर उनके साथ बातचीत करता है, स्वाध्याय नहीं करता। किन्तु एकान्त स्थानमें रहने वाला व्याकुलता रहित होकर स्वाध्याय करता है। ‘सुहदुक्खसमदाय’ - सुखसे हर्षित होना और दुःखसे दुःखी होना राग-द्वेष है। उनके बिना सुख-दुःख का अनुभव सुख-दुःख समता है। सुखके साधनभूत भोजन और रसोंको जो त्यागता है वह सुखमें रागको त्यागता है। भूख प्यासका कष्ट होने पर संक्लेश न होनेसे उसे दुःखमें द्वेष नहीं होता।
आदा कुलं गणो पवयणं च सोभाविदं हवदि सव्वं ।
अलसत्तणं च विजडं कम्मं च विणिद्धुयं होदि ॥२४४॥
बहुगाणं संवेगो जायदि सोमत्तणं च मिच्छाणं ।
मग्गो य दीविदो भगवदो य अणुपालिया आणा ॥२४५॥
देहस्स लाघव संवेगो जायदि सोमत्तणं च मिच्छाणं ।
जवणाहारो संतोसदा य जइसंभवेण गुणा ॥२४६॥
एवंउग्गमउप्पादणेसणासुद्धभत्तपाणेण ।
मिदलहुयविरसलुक्खेण य तवमेदं कुणदि णिच्चं ॥२४७॥
अर्थ: कहे अनुसार उद्गम, उत्पादन और एषणा दोषसे रहित भोजन और पानसे और परिमित, लघु, रसरहित और रूक्ष भोजन पानसे यह बाह्य तप नित्य यदि करता है। इसका भाव है कि इस प्रकारका शुद्ध आहार खाकर तप करना चाहिए। अशुद्ध आहार करके नहीं ॥२४७॥
उल्लीणोल्लीणेहिं य अहवा एक्कंतवड्ढमाणेहिं ।
सल्लिहइ मुणी देहं आहारविधिं पयणुगिंतो ॥२४८॥
अर्थ: वर्द्धमान या हीयमान अनशन आदि तपोंसे अथवा सर्वथा वर्द्धमान तपोंके द्वारा आहारकी विधिको अल्प करता हुआ मुनि शरीरको कृश करता है ॥२४८॥ करनेसे अवमौदर्यकी वृद्धि होती है । एक रसका, फिर दो रसका, फिर तीन रसका, इत्यादि क्रमसे त्याग करनेसे रसपरित्यागकी वृद्धि होती है । मैं एक पाटकमें या सात घरमें या तीन घरमें प्रवेश करूँगा । अथवा भिक्षाके ग्रासोंका परिमाण कम करनेसे वृत्तिपरिसंख्यान तपकी वृद्धि होती है । दिनमें आतापन योग करके रात्रिमें प्रतिमा योग धारण करने आदिसे कायक्लेशकी वृद्धि होती है । इस प्रकार करनेसे महान् श्रम होनेपर क्रमसे अनशन आदिमें कमी करता है । या फिर बढ़ाता ही जाता है और आहारको कम करके मुनि शरीरको कृश करता है ॥२४८॥
अणुपुव्वेणाहारं संवट्टंतो य सल्लिहइ देहं ।
दिवसुग्गहिएण तवेण चावि सल्लेहणं कुणइ ॥२४९॥
अर्थ: क्रमसे आहारको कम करते हुए शरीरको कृश करता है । और एक एक दिन ग्रहण किये तपसे, एक दिन अनशन, एक दिन वृत्तिपरिसंख्यान इस प्रकार सल्लेखनाको करता है ॥२४९॥
विविहाहिं एसणाहिं य अवग्गहेहिं विविहेहिं उग्गेहिं ।
संजममविराहिंतो जहाबलं सल्लिहइ देहं ॥२५०॥
अर्थ: नाना प्रकारके रस रहित भोजन, अल्प भोजन, सूखा भोजन, आचाम्ल भोजन आदिसे और नाना प्रकारके उग्र नियमोंसे दोनों प्रकारके संयमोंको नष्ट न करता हुआ यति अपने बलके अनुसार देहको कृश करता है ॥२५०॥
सदि आउगे सदि बले जाओ विविधाओ भिक्खुपडिमाओ ।
ताओ वि ण बाधंते जहाबलं सल्लिहंतस्स ॥२५१॥
सल्लेहणा सरीरे तवोगुणविधी अणेगहा भणिदा ।
आयंबिलं महेसी तत्थ दु उक्कस्सयं विंति ॥२५२॥
अर्थ: शरीरकी सल्लेखनाके निमित्त अनेक प्रकार तप नामक गुणके विकल्प पूर्व गाथाओं के द्वारा कहे हैं। उनमेंसे महर्षि आचाम्लको ही उत्कृष्ट कहते हैं ॥२५२॥
छट्ठट्ठमदसमदुवालसेहिं भत्तेहिं विदियअट्ठेहिं ।
मिदलहुगं आहारं करेदि आयंबिलं बहुसो ॥२५३॥
अर्थ: उत्कृष्ट दो दिन, तीन दिन, चार दिन और पाँच दिनके उपवासके बाद अधिकतर परिमित और लघु आहार आचाम्लको करते हैं ॥२५३॥
उक्कस्सएण भत्तपइण्णाकालो जिणेहिं णिद्दिट्ठो ।
कालम्मि संपहुत्ते बारसवरिसाणि पुण्णाणि ॥२५४॥
अर्थ: यदि आयुका काल अधिक शेष हो तो जिन भगवान्ने उत्कृष्टसे भक्त प्रत्याख्यानका काल पूर्ण बारह वर्ष कहा है ॥२५४॥
जोगेहिं विचित्तेहिं दु खवेइ संवच्छराणि चत्तारि ।
वियडी णिज्जूहित्ता चत्तारि पुणो वि सोसेदि ॥२५५॥
अर्थ: नाना प्रकारके कायक्लेशोंके द्वारा चार वर्ष बिताता है । दूध आदि रसोंको त्यागकर फिर भी चार वर्ष तक शरीरको सुखाता है ॥२५५॥
आयंबिलणिव्वियडीहिं दोण्णि आयबिलेण एक्कं च ।
अद्ध णादिविगट्ठेहिं अदो अद्धं विगट्ठेहिं ॥२५६॥
अर्थ: आचाम्ल और निर्विकृतिके द्वारा दो वर्ष बिताता है। आचाम्लके द्वारा एक वर्ष बिताता है। मध्यम तपके द्वारा शेष वर्षके छह माह और उत्कृष्ट तपके द्वारा शेष छह मास बिताता है ॥२५६॥
भत्तं खेत्तं कालं धादुं च पडुच्च तह तवं कुज्जा ।
वादो पित्तो सिंभो व जहा खोभं ण उवयंति ॥२५७॥
अर्थ: आहार, क्षेत्र, काल अपनी शारीरिक प्रकृतिको विचार कर इस प्रकार तप करना चाहिये जिस प्रकार वात पित्त और कफ क्षोभको प्राप्त न हों ॥२५७॥
एवं सरीरसल्लेहणाविहिं बहुविहा व फासेंतो ।
अज्झवसाणविसुद्धिं खणमवि खवओ ण मुंचेज्ज ॥२५८॥
अर्थ: उक्त क्रमसे नाना प्रकारकी शरीर सल्लेखनाकी विधिको करते हुए भी परिणामों को विशुद्धिको क्षपक एक क्षणके लिये भी न छोड़े ॥२५८॥
अज्झवसाणविसुद्धीए वज्जिदा जे तवं विगट्ठंपि ।
कुव्वंति बहिल्लेस्सा ण होइ सा केवला सुद्धी ॥२५९॥
अर्थ: परिणामोंकी विशुद्धिको छोड़कर जो उत्कृष्ट भी तप करते हैं उनकी चित्तवृत्ति पूजा सत्कार आदिमें ही लगी होती है । उनके अशुभ कर्मके आस्रवसे रहित शुद्धि नहीं होती । अर्थात् दोषोंसे मिली हुई शुद्धि होती है ॥२५९॥
अविगट्ठं पि तवं जो करेइ सुविसुद्धसुक्कलेस्साओ ।
अज्झवसाणविसुद्धो सो पावदि केवलं सुद्धिं ॥२६०॥
अर्थ: जो अतिविशुद्ध शुक्ललेश्यासे युक्त और विशुद्ध परिणामवाला अनुत्कृष्ट भी तप करता है वह केवल शुद्धिको पाता है । यह गाथाका अर्थ है ॥२६०॥
अज्झवसाणविसुद्धी कसायकलुसीकदस्स णत्थित्ति ।
अज्झवसाणविसुद्धी कसायसल्लेहणा भणिदा ॥२६१॥
अर्थ: जिसका चित्त कषायसे दूषित है उसके परिणाम विशुद्धि नहीं होती । इसलिये परिणाम विशुद्धिको कषाय सल्लेखना कहा है ॥२६१॥
कोधं खमाए माणं च मद्दवेणाज्जवेण मायं च ।
संतोसेण य लोहं जिणदु खु चत्तारि वि कसाए ॥२६२॥
अर्थ: टी० - क्रोधको क्षमासे, मानको मार्दवसे माया को आर्जवसे और लोभको सन्तोषसे, इस प्रकार चारों ही कषायोंको जीतो ॥२६२॥
कोहस्स य माणस्स य मायालोभाण सो ण एदि वसं ।
जो ताण कसायाणं उप्पत्तिं चेव वज्जेइ ॥२६३॥
अर्थ: टी० - जो उन कषायोंकी उत्पत्तिको ही रोक देता है वह मुनि क्रोध, मान, माया, लोभके वशमें नहीं होता ॥२६३॥
तं वत्थुं मोत्तव्वं जं पडि उप्पज्जदे कसायग्गी ।
तं वत्थुमल्लिएज्जो जत्थोवसमो कसायाणं ॥२६४॥
अर्थ: उस वस्तुको छोड़ देना चाहिए जिसको लेकर कषायरूपी आग उत्पन्न होती है। और उस वस्तुको अपनाना चाहिए जिसके अपनानेसे कषायोंका उपशम हो ॥२६४॥
जइ कहवि कसायग्गी समुट्ठिदो होज्ज विज्झवेदव्वो ।
रागदोसुप्पत्ती विज्झादि हु परिहरंतस्स ॥२६५॥
अर्थ: यदि थोड़ी भी कसायरूप आग उठती हो तो उसे बुझा दे। जो कषायको दूर करता है उसके राग-द्वेषकी उत्पत्ति शान्त हो जाती है ॥२६५॥
जावंति केइ संगा उदीरया होंति रागदोसाणं ।
ते वज्जंतो जिणदि हु रागं दोसं च णिस्संगो ॥२६६॥
अर्थ: जितने भी परिग्रह रागद्वेषको उत्पन्न करते हैं, उन परिग्रहोंको छोड़नेवाला अपरि- ग्रही साधु राग और द्वेषको निश्चयसे जीतता है ॥२६६॥
पडिचोदणासहणवायखुभिदपडिवयणइं[?]द्धो ।
चंडो हु कसायग्गी सहसा संपज्जलेज्जाहि ॥२६७॥
जलिदो हु कसायग्गी चरित्तसारं डहेज्ज कसिणं पि ।
सम्मत्तं पि विराधिय अणंतसंसारियं कुज्जा ॥२६८॥
अर्थ: जलती हुई कषायरूप आग समस्त चारित्र नामक सारको जला देती है । सम्यक्त्वको भी नष्ट करके अनन्त संसारके परिभ्रमणमें लगा देती है ॥२६८॥
तम्हा हु कसायग्गी पावं उप्पज्जमाणयं चेव ।
इच्छामिच्छादुक्कडवंदणसलिलेण विज्झाहि ॥२६९॥
तह चेव णोकसाया सल्लिहियव्वा परेणुवसमेण ।
सण्णाओ गारवाणि य तह लेस्साओ य असुहाओ ॥२७०॥
अर्थ: इसी तरह उत्कृष्ट उपशमभावके द्वारा नोकषाय, संज्ञा, गारव और अशुभ लेश्याओंका घटाना चाहिए। हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसक वेद इन्हें नोकषाय कहते हैं। आहार, भय, मैथुन और परिग्रहकी चाहका नाम संज्ञा है। ऋद्धिकी तीव्र अभिलाषा, रस और सुखकी चाहको गारव कहते हैं ॥२७०॥
परिवड्ढिदोवधाणो विगडसिराण्हारुपासुलिकडाहो ।
सल्लिहिदतणुसरीरो अज्झप्परदो हवदि णिच्चं ॥२७१॥
अर्थ: जो प्रतिदिन अपने नियमोंको बढ़ाता है, जिसकी बड़ी और छोटी सिरायें, दोनों ओरकी हड्डियाँ और नेत्रोंकी हड्डियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं - शरीरको सम्यक्रूपसे कृश करनेवाला वह यति नित्य आत्मामें लीन रहता है ॥२७१॥
एवं कदपरियम्मो सब्भंतरबाहिरम्मि सल्लिहणे ।
संसारमोक्खबुद्धी सव्वुवरिल्लं तवं कुणदि ॥२७२॥
अर्थ: उक्त क्रमके अनुसार अभ्यास करनेवाला अभ्यन्तर सल्लेखना सहित बाह्य सल्लेखना करनेपर संसारके त्यागका दृढ़ निश्चय करके सब तपोंसे उत्कृष्ट तप करता है ॥२७२॥
वोढुं गिलादि देहं पच्चोढव्वमिणसुचिभारोत्ति ।
तो दुक्खभारभीदो कदपरियम्मो गणमुवेदि ॥२७३॥
अर्थ: यह अपवित्र और भाररूप शरीर त्यागने योग्य है ऐसा निश्चय करके जो शरीरको धारण करनेसे ग्लानि करता है उसे शरीरके धारण करनेमें कोई हर्ष नहीं होता । पीछे दुःखके घर इस शरीरसे डरकर समाधिमरणकी तैयारी करता हुआ अपने शिष्योंके पास जाता है । दूसरे आचार्य ‘वोढुं गिलामि देहं’ ऐसा पाठ पढ़ते हैं वे उसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं - मुझे शरीर धारण करनेमें कोई रुचि नहीं है यह अशुचि और भारभूत शरीर छोड़ने योग्य है ऐसा मैंने निश्चय किया है ॥२७३॥
सल्लेहणं करेंतो जदि आयरिओ हवेज्ज तो तेण ।
ताए वि अवत्थाए चिंतेदव्वं गणस्स हियं ॥२७४॥
अर्थ: सल्लेखना करनेवाले दो प्रकारके होते हैं - एक आचार्य, दूसरे साधु । यदि आचार्य हो तो उसे उस अवस्थामें भी गणका हित विचारना चाहिए । अर्थात् आचार्य यदि सल्लेखना धारण करनेका निश्चय करे तो उसे अपने संघके सम्बन्धमें भी विचार करना चाहिए कि उसकी क्या व्यवस्था की जाये ॥२७४॥
कालं संभावित्ता सव्वगणमणुदिसं च वाहरिय ।
सोमतिहिकरणणक्खत्तविलग्गे मंगलोगासे ॥२७५॥
अर्थ: अपनी आयुकी स्थिति विचारकर समस्त संघको और बालाचार्यको बुलाकर शुभ दिन, शुभकरण, शुभनक्षत्र और शुभलग्नमें तथा शुभ देशमें ॥२७५॥
गच्छाणुपालणत्थं आहोइय अत्तगुणसमं भिक्खू ।
तो तम्मि गणविसग्गं अप्पकहाए कुणदि धीरो ॥२७६॥
अर्थ: गच्छका अनुपालन करनेके लिए गुणोंसे अपने समान भिक्षुका विचार करके पश्चात् वह धीर आचार्य थोड़ीसी बातचीत पूर्वक उस पर गणका त्याग करता है ॥२७६॥
अव्वोच्छित्तिणिमित्तं सव्वगुणसमोयरं तयं णच्चा ।
अणुजाणेदि दिसं सो एस दिसा वोत्ति बोधित्ता ॥२७७॥
अर्थ: ज्ञानदर्शन चारित्रात्मक धर्मतीर्थकी व्युच्छित्ति न हो, इसलिए उसे सब गुणोंसे युक्त जानकर यह तुम्हारा आचार्य है ऐसा शिष्योंको समझाकर आप इस गणका पालन करें ऐसा उस नवीन आचार्यको अनुज्ञा करते हैं ॥२७७॥
आमंतेऊण गणिं गच्छम्मि य तं गणिं ठवेदूण ।
तिविहेण खमावेदि हु स बालउड्ढाउलं गच्छं ॥२७८॥
अर्थ: आचार्यको बुलाकर गणके मध्यमें उस अपने द्वारा स्वीकृत गणीको स्थापित करके और स्वयं अलग होकर बाल और वृद्ध मुनियोंसे भरे उस गणसे वह पुराने आचार्य मन वचन कायसे क्षमा माँगते हैं ॥२७८॥
जं दीहकालसंवासदाए ममकारणेहरागेण ।
कडुगपरुसं च भणिया तमहं सव्वं खमावेमि ॥२७९॥
अर्थ: दीर्घकाल तक साथ रहनेसे उत्पन्न हुए ममता, स्नेह, द्वेष और रागसे जो कटुक और कठोर वचन कहे गये आपसे मैं उन सबकी क्षमा माँगता हूँ ॥२७९॥
वंदिय णिसुडिय पडिदो तादारं सव्ववच्छलं तादिं ।
धम्मायरियं णिययं खामेदि गणो वि तिविहेण ॥२८०॥
अर्थ: वन्दना करके, पृथ्वीपर पाँचों अंगोंको स्थापित करके अर्थात् पञ्चांग नमस्कार करके संसारके दुःखोंसे रक्षा करने वाले सबको प्रिय अपने दश प्रकारके उत्तम क्षमादिरूप धर्ममें स्वयं प्रवृत्त और दूसरोंको प्रवृत्त करने वाले आचार्यसे गण भी मन वचन कायसे क्षमा माँगता है ॥२८०॥
संवेगजणियहासो सुत्तत्थविसारदो सुदरहस्सो ।
आदट्ठचिंतओ वि हु चिंतेदि गणं जिणाणाए ॥२८१॥
अर्थ: संसारसे डरनेके कारण जिसे हर्ष प्रकट हुआ है अर्थात् इस परिग्रहका त्याग करने पर अभ्यन्तर रागादि अपने निमित्तका विनाश होनेसे चले जायेंगे क्योंकि बाह्य परिग्रह रागादिके उत्पत्तिमें निमित्त हैं अतः निमित्तके न रहनेसे नैमित्तिक रागादि भी नहीं रहेंगे । और रागादिके न रहनेसे रागादिके कारण बन्धने वाले कर्म नष्ट हो जायेंगे । उनके नष्ट होने पर चार गतियोंमें भ्रमण नष्ट हो जायेगा, इसलिए जिसे हर्ष उत्पन्न हुआ है. और जिन भगवान्के द्वारा कहे गये सूत्र और उसके अर्थमें जो निपुण है, जिसने प्रायश्चित्त शास्त्र सुना है वह आचार्य अपने प्रयोजनकी चिन्ता करते हुए भी जिन भगवान्की आज्ञासे गणकी चिन्ता करता है । अर्थात् यद्यपि आचार्य संल्लेखना धारण करनेके लिए अपना गण त्यागकर दूसरे गणमें जानेके लिए तत्पर है फिर भी गणकी चिन्ता करके उसे उपदेश देते हैं ॥२८१॥
णिद्धमहुरगंभीरं गाहुगपल्हादणिज्जपत्थं च ।
अणुसिट्ठिं देइ तहिं गणाहिवइणो गणस्स वि य ॥२८२॥
अर्थ: उस पूर्वोक्त शुभ तिथि आदिसे युक्त काल और देशमें गणाधिपति और गणको भी स्नेह सहित, माधुर्यसे युक्त, सारवान होनेसे गम्भीर सुखसे समझमें आने वाली, चित्तको आनन्द दायक और हितकारी शिक्षा देते हैं ॥२८२॥
वड्ढंतओ विहारो दंसणणाणचरणेसु कायव्वो ।
कप्पाकप्पठिदाणं सव्वेसिमणागदे मग्गे ॥२८३॥
अर्थ: सब प्रवृत्ति और निवृत्ति में स्थित मुनियों और गृहस्थोंको मुक्तिके मार्गमें सम्यग्दर्शन सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्रमें वर्धमान विहार उत्तरोत्तर उन्नत अनुष्ठान करना चाहिए । यति धर्म प्रमत्त संयत आदि गुणस्थानोंकी अपेक्षा अनेक प्रकार है । प्रवृत्ति रूप गृहस्थ धर्म भी दर्शन, व्रत सामायिकके भेदसे अनेक प्रकार है । उस सबका ग्रहण यहाँ ‘सब’ शब्दसे किया है । यह चारों प्रकारके संघको लक्ष्य करके आचार्य उपदेश देते हैं ॥२८३॥
संखित्ता वि य पवहे जह वच्चइ वित्थरेण वड्ढंती ।
उदधिंतेण वरणदी तह सीलगुणेहिं वड्ढाहि ॥२८४॥
अर्थ: उत्पत्ति स्थानमें छोटी सी भी उत्तम नदी जैसे विस्तारके साथ बढ़ती हुई समुद्र तक जाती है उसी प्रकार तुम शील और गुणोंसे बढ़ो ॥२८४॥
मज्जाररसिदसरिसोवमं तुमं मा हु काहिसि विहारं ।
मा णासेहिसि दोण्णि वि अप्पाणं चेव गच्छं च ॥२८५॥
अर्थ: तुम बिलावके शब्दके समान आचरण मत करना । बिलावका शब्द पहले जोरका होता है फिर क्रमसे मन्द हो जाता है उसी तरह रत्नत्रयकी भावनाको पहले बड़े उत्साहसे करके पीछे धीरे-धीरे मन्द मत करना । और इस तरह अपना और संघ दोनोंका विनाश न करना । प्रारम्भमें ही कठोर तपकी भावनामें लगकर आप और गणको भी उसीमें लगाकर दुश्चर होनेसे विनाशको प्राप्त होंगे ॥२८५॥
जो सघरं पि पलित्तं णेच्छदि विज्झविदुमलसदोसेण ।
किह सो सद्दहिदव्वो परघरदाहं पसामेदुं ॥२८६॥
अर्थ: जो जलते हुए अपने घरको भी आलस्यवश बचाना नहीं चाहता । उसपर कैसे विश्वास किया जा सकता है कि वह दूसरेके जलते घरको बचायेगा ॥२८६॥
वज्जेहि चयणकप्पं सगपरपक्खे तहा विरोधं च ।
वादं असमाहिकरं विसग्गिभूदे कसाए य ॥२८७॥
अर्थ: ज्ञान दर्शन और चारित्रके विषयमें अतिचारोंको दूर करो । जो वाचना और स्वाध्यायका काल नहीं है उसमें क्षेत्र शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, और भाव शुद्धिके बिना वाचना आदि करना, निह्नव, ग्रन्थ और अर्थकी अशुद्धि, आदरका अभाव इत्यादि ज्ञान विषयक अतिचार हैं । शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, मिथ्यादृष्टिकी प्रशंसा और संस्तव ये सम्यग्दर्शनके अतिचार हैं । समितिकी भावना न होना चारित्रका अतीचार है । ये सब ‘च्यवनकल्प’ कहे जाते हैं । धार्मिकों और मिथ्यादृष्टियोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिए । चित्तकी शान्तिको भंग करने वाला वाद भी नहीं करना चाहिए । वाद करने वाला जिस प्रकार अपनी जय और दूसरेकी पराजय हो यही प्रयत्न करता है तत्त्वका समाधान नहीं करता। क्रोधादि कषाय अपनी और दूसरेकी मृत्युमें कारण होती हैं इसलिए वे विषरूप हैं और हृदयको जलाती हैं इसलिए आगके समान हैं। उन्हें छोड़ना चाहिए। कहा भी है - ये कषायें तीन लोकमें मल्लके समान हैं। कुल और शीलके शत्रु हैं। वे ऐसे मल हैं जिनको दूर करना सबसे कठिन है। ये कषायें तपस्वियोंकी हानि करने वाली और उनके यशको हरने वाली हैं तथा प्राणियोंके दुर्भाग्यको करने वाली हैं। ‘वे कषायें केवल परलोकको ही नष्ट नहीं करतीं, किन्तु इस लोकको भी हीन करती हैं। ये केवल धर्ममें ही विघ्न नहीं डालतीं किन्तु अर्थ और काम की भी घातक हैं’ ॥२८७॥
णाणम्मि दंसणम्मि य चरणम्मि य तीसु समयसारेसु ।
ण चएदि जो ठवेदुं गणमप्पाणं गणधरो सो ॥२८८॥
णाणम्मि दंसणम्मि य चरणम्मि य तीसु समयसारेसु ।
चाएदि जो ठवेदुं गणमप्पाणं गणधरो सो ॥२८९॥
अर्थ: आगमके सारभूत तीन सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्रमें अपनेको और गणको स्थापित करनेमें जो समर्थ होता है वह गणधर है ॥२८९॥
पिंडं उवहिं सेज्जं अविसोहिय जो हु भुंजमाणो हु ।
मूलट्ठाणं पत्तो मूलोत्ति य समणपेल्लो सो ॥२९०॥
अर्थ: आहार, उपकरण और वसतिका शोधन किये बिना जो उसका सेवन करता है वह साधु मूल स्थान नामक दोषको प्राप्त होता है और वह भ्रष्टश्रमण४ है ॥२९०॥
पिंडं उवहिं सेज्जं उग्गमउप्पादणेसणादीहिं ।
चारित्तरक्खणट्ठं सोधिंतो होदि सुचरित्तो ॥२९१॥
अर्थ: आहार, उपकरण और वसतिका जो उद्गम, उत्पादन और एषणा आदि दोषोंसे चारित्रकी रक्षाके लिए शोधन करता है वह सम्यक् संयमी है। मेरा लोकमें यश होगा कि यह सुसंयमी है अथवा अपने आगमका प्रकाश करनेसे मुझे लाभ होगा ऐसा वह अपने मनमें नहीं सोचता। ऐसा यति ही सम्यक् चारित्र वाला होता है ॥२९१॥
एसा गणधरमेरा आयारत्थाण वण्णिया सुत्ते ।
लोगसुहाणुरदाणं अप्पच्छंदो जहिच्छाए ॥२९२॥
अर्थ: पाँच प्रकारके आचारमें स्थित जो गणी हैं उन गणियोंकी यह गणधर मर्यादा सूत्रमेंकही है। जो लोकके अनुसार चलने वाले सांसारिक सुखके इच्छुक हैं अथवा लोकसुख यानी मिष्टाहारका यथेच्छ भोजन, कोमल शय्या पर शयन, मनोहर घरमें निवास, इनमें जो रत हैं अर्थात् जो स्वेच्छाचारी हैं उनकी गणधर मर्यादा सूत्रमें नहीं कही है ॥२९२॥
सीदावेइ विहारं सुहसीलगुणेहिं जो अबुद्धीओ ।
सो णवरि लिंगधारी संजमसारेण णिस्सारो ॥२९३॥
अर्थ: जो बुद्धिहीन साधु सुखशील गुणोंके कारण रत्नत्रयमें प्रवृत्तिरूप चारित्रमें उदासीन रहता है वह केवल द्रव्यलिंगका धारी है और इन्द्रिय संयम तथा प्राणसंयमसे शून्य है ॥२९३॥
पिंडं उवधिं सेज्जामविसोधिय जो खु भुंजमाणोदु ।
मूलट्ठाणं पत्तो बालोत्तिय णो समणबालो ॥२९४॥
अर्थ: जो उद्गम आदि दोषोंसे सहित आहार, उपकरण अथवा वसतिको स्वीकार करता है उसके न प्राणिसंयम है और न इन्द्रिय संयम है। वह केवल नग्न है। न वह यति है और न गणधर है ॥२९४॥
कुलगामणयररज्जं पयहिय तेसु कुणइ ममत्तिं जो ।
सो णवरि लिंगधारी संजमसारेण णिस्सारो ॥२९५॥
अर्थ: जो कुल, ग्राम, नगर और राज्यको छोड़कर भी उनसे ममत्व करता है कि मेरा कुल है, हमारा गाँव है या नगर है राज्य है, वह भी केवल नग्न है। जो जिससे ममता करता है उसका यदि अच्छा होता तो उसे सन्तोष होता है अन्यथा द्वेष करता है अथवा संक्लेश करता है। इस तरह राग-द्वेष करने पर असंयतोंमें आदरवान होनेसे वह कैसे संयमी हो सकता है ॥२९५॥
अपरिस्साई सम्मं समपासी होहि सव्वकज्जेसु ।
संरक्ख सचक्खुं पि व सबालउड्ढाउलं गच्छं ॥२९६॥
अर्थ: 'हमारा यह गुरु आलोचित दोषोंको दूसरेसे नहीं कहता। ऐसा मानकर शिष्योंके द्वारा प्रकट किये अपराधोंको किसी अन्यसे मत कहो। कार्योंमें समदर्शी ही रहो। और बाल और वृद्ध यतियोंसे भरे गणकी अपनी आँखकी तरह रक्षा करो ॥२९६॥
णिवदिविहूणं खेत्तं णिवदी वा जत्थ दुट्ठओ होज्ज ।
पव्वज्जा च ण लब्भदि संजमघादो व तं वज्जो ॥२९७॥
अर्थ: जिस क्षेत्रमें कोई राजा न हो उस क्षेत्रको त्याग दो। अथवा जिस क्षेत्रका राजा दुष्ट हो उस क्षेत्रको त्याग दो । जिस क्षेत्रमें प्रव्रज्या प्राप्त न हो अर्थात् शिष्य न बनें, अथवा जिस क्षेत्रमें संयमका घात हो उस क्षेत्रको त्याग दो ॥२९७॥
कुणह अपमादमावासएसु संजमतवोवधाणेसु ।
णिस्सारे माणुस्से दुल्लहबोहिं वियाणित्ता ॥२९८॥
अर्थ: मनुष्य जन्म अनित्य और अशुचि होनेसे सार रहित है । उसमें दीक्षा धारण करनेकी बुद्धि होना दुर्लभ है ऐसा जानकर आवश्यकोंमें, जो संयम और तपके आश्रय है, प्रमाद मत करो । यहाँ पूज्य होनेसे संयमको तपसे पहले रखा है क्योंकि संयमके बिना अकेला तप मुक्ति नहीं प्राप्त करा सकता । सामायिक आदिमें प्रवर्तमान मुनिके संयम होता है । असंयमको वह त्यागता है । सावद्य क्रियाकी निवृत्ति होने पर कर्मोंको तपनेसे तप होता है । संयमके बिना तप नहीं होता । अतः आवश्यक कर्म तपके भी आश्रय हैं । इसलिए साधुको उनमें प्रमाद नहीं करना चाहिए ॥२९८॥
समिदा पंचसु समिदीसु सव्वदा जिणवयणमणुगदमदीया ।
तिहिं गारवेहिं रहिदा होह तिगुत्ता य दंडेसु ॥२९९॥
अर्थ: हे मुनिगण ! आप सर्वदा पाँच समितियोंके पालनमें तत्पर रहें । अपनी बुद्धिको जिनागमकी अनुगामिनी बनाओ । तीन गारव मत करो और अशुभ मन वचन कायके विषयमें तीन गुप्तियोंका पालन करो ॥२९९॥
सण्णाउ कसाए वि य अट्टं रुद्दं च परिहरह णिच्चं ।
दुट्ठाणि इंदियाणि य जुत्ता सव्वप्पणो जिणह ॥३००॥
अर्थ: नित्य आहारादि विषयक संज्ञाओंको, कषायोंको और आर्त तथा रौद्रध्यानको दूर करो । तथा ज्ञान और तपसे युक्त होकर अपनी सर्वशक्तिसे दुष्ट इन्द्रियोंको जीतो ॥३००॥
धण्णा हु ते मणुस्सा जे ते विसयाउलम्मि लोयम्मि ।
विहरंति विगदसंगा णिराउला णाणचरणजुदा ॥३०१॥
अर्थ: वे मनुष्य धन्य हैं जो शब्दादि विषयोंसे व्याप्त जगत्में किसी भी स्पर्शादि विषयमें आसक्ति नहीं रखते और निराकुल होकर ज्ञान और चारित्रसे युक्त होते हैं। जो ज्ञान और चारित्रसे युक्त होते हैं उनकी प्रशंसा करनेसे संघका उनके विषयमें आदरभाव उत्पन्न होता है ॥३०१॥
सुस्सूसया गुरूणं चेदियभत्ता य विणयजुत्ता य ।
सज्झाए आउत्ता गुरुपवयणवच्छला होह ॥३०२॥
अर्थ: सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र नामक गुणोंसे महान् होनेसे आचार्य उपाध्याय और साधुको गुरु कहते हैं। उनकी सेवामें तत्पर रहना चाहिए। लाभ आदिकी अपेक्षा न करके उनके गुणोंमें अनुराग करना चाहिए। गुणोंमें अनुराग करनेसे सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि होती है और उनके रत्नत्रयकी अनुमोदना होती है। अनुमोदना पुण्य उपार्जन करनेका सरल उपाय है। चैत्य अर्थात् जिन और सिद्धोंकी कृत्रिम और अकृत्रिम प्रतिबिम्बोंमें भक्ति करना चाहिए। जैसे शत्रुओं और मित्रोंकी प्रतिकृति देखनेसे द्वेष और राग उत्पन्न होता है। यद्यपि वे प्रतिकृतियाँ कोई अपकार या उपकार नहीं करतीं, तथापि उन शत्रुओं और मित्रोंने जो अपकार या उपकार किये होते हैं उनके स्मरणमें उनकी प्रतिकृतियाँ निमित्त होती हैं। उसी तरह यद्यपि प्रतिबिम्बोंमें जिन और सिद्धोंके गुण अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, सम्यक्त्व वीतरागता आदि नहीं होते, तथापि उनके समान होनेसे उनके गुणोंका स्मरण कराती हैं। और वह गुणोंका स्मरण जो अनुरागात्मक होता है, ज्ञान और दर्शनमें लगाता है। और वे ज्ञान और दर्शन महान् संवर और निर्जरा करते हैं। इसलिए उपयोगी चैत्य भक्ति करना चाहिए। कर्ममलको जो विलय करती है वह विनय है। ज्ञान विनय, दर्शन विनय, चारित्र विनय, तपविनय और उपचार विनय, इन पांच प्रकारकी विनयमें संलग्न रहो। शास्त्रमें जो वाचना और स्वाध्याय काल कहा है, उन कालोंमें श्रुतका अध्ययन, और श्रुतका दान भक्तिपूर्वक करके अवग्रह स्वीकार करके, बहुमान करके, निह्नवको दूर करके, अर्थशुद्धि, व्यंजन शुद्धि और अर्थ व्यंजन दोनोंकी शुद्धि करके। इस प्रकार आठ अंगोंके साथ भाया गया श्रुत ज्ञान संवर और निर्जरा करता है। ऐसा नहीं करनेसे ज्ञानावरणका कारण होता है। शङ्का कांक्षा आदिको दूर करना दर्शन विनय है। आपको प्रयत्नपूर्वक शंका आदिको दूर करना चाहिए। ऐसा न करनेसे शंका आदि परिणाम मिथ्यात्वको लाते हैं और दर्शनमोहनीयकर्मके आस्रवमें कारण होते हैं। उससे मिथ्यादर्शनमें निमित्त मिथ्यात्वकर्मके कारण आप जैसे दुःख भीरुजनोंको अनन्त संसारमें परिभ्रमण करना पड़ता है। मनोज्ञ और अमनोज्ञ रूप रस गन्ध स्पर्श और शब्दके मिलनेपर अनन्तकालके अभ्यासवश राग और द्वेष उत्पन्न होते हैं। तथा बाह्य और अभ्यन्तर निमित्तका आश्रय पाकर कषायें उत्पन्न होती हैं। और वे उत्पन्न होकर चारित्रको नष्ट करती हैं। कर्मोंके ग्रहणमें निमित्त क्रियाओंके रोकनेको चारित्र कहते हैं। रागादि कर्मोंको ग्रहणमें निमित्त क्रिया है। अशुभ मन वचन और कायकी क्रिया भी कर्मोंके ग्रहणमें निमित्त होती है। तथा छहकायके जीवसमूहको बाधा न पहुंचाये बिना गमन करना, मिथ्यात्व और असंयममें प्रवर्तक वचन बोलना, साक्षात् या परम्परासे जीवोंको बाधा करनेवाला भोजन करना, बिना देखे और बिना साफ किये वस्तुओंको ग्रहण करना और रखना, बिना देखी और बिना साफ की गई भूमिमें मलमूत्र त्यागना ये सब क्रियाएँ जीवोंको कष्ट पहुंचानेवाली हैं अतः ॥३०२॥
दुस्सहपरीसहेहिं य गामवचीकंटएहिं तिक्खेहिं ।
अभिभूदा वि हु संता मा धम्मधुरं पमुच्चेह ॥३०३॥
अर्थ: दुःसह परीषहोंसे और तीक्ष्ण आक्रोशवचनरूपी काँटोंसे पराभूत होकर भी धर्मकी धुराके भारको मत त्यागो ॥३०३॥
तित्थयरो चदुणाणी सुरमहिदो सिज्झिदव्वयधुवम्मि ।
अणिगूहिदबलविरिओ तवोविधाणम्मि उज्जमदि ॥३०४॥
अर्थ: जिसके द्वारा भव्यजीव संसारको तिरते हैं वह तीर्थ है । कुछ भव्य श्रुत अथवा आलम्बनभूत गणधरोंके द्वारा संसारको तिरते हैं अतः श्रुत और गणधरोंको भी तीर्थ कहते हैं । इन दोनों तीर्थोंको जो करते हैं वे तीर्थंकर हैं । अथवा ‘तिसु तिट्ठदित्ति तित्थं’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार तीर्थ शब्दसे रत्नत्रयरूप मार्ग कहा जाता है । उसके करनेसे तीर्थंकर होता है । वे मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्ययज्ञानके धारी होते हैं । स्वर्गसे गर्भमें आनेपर, जन्माभिषेक और तपकल्याणमें चार प्रकारके देव उनकी पूजा करते हैं । उनको सिद्धिकी प्राप्ति नियमसे होती है फिर भी वे अपने बल और वीर्यको न छिपाकर तपके विधानमें उद्यम करते हैं ॥३०४॥
किं पुण अवसेसाणं दुक्खक्खयकारणाय साहूणं ।
होइ ण उज्जमिदव्वं सपच्चवायम्मि लोयम्मि ॥३०५॥
अर्थ: तब दुःखका विनाश करनेके लिए शेष साधुओंका तो कहना ही क्या है ।
सत्तीए भत्तीए विज्जावच्चुज्जदा सदा होह ।
आणाए णिज्जरित्ति य सबालउड्ढाउले गच्छे ॥३०६॥
अर्थ: बालमुनि और वृद्ध मुनियोंसे भरे हुए गणमें सर्वज्ञकी आज्ञासे सदा अपनी शक्ति और भक्तिसे वैयावृत्य करनेमें तत्पर रहो । सर्वज्ञदेवकी आज्ञा है कि वैयावृत्य करना चाहिये । वैयावृत्य तप है और तपसे निर्जरा होती है ॥३०६॥
सेज्जागासणिसेज्जा उवधी पडिलेहणाउवग्गहिदे ।
आहारोसहवायणविकिंचणुव्वत्तणादीसु ॥३०७॥
अर्थ: सोनेके स्थान, बैठनेके स्थान और उपकरणोंकी प्रतिलेखना करना, योग्य आहार योग्य औषधका देना, स्वाध्याय कराना, अशक्त मुनिके शरीरका मल शोधन करना, एक करवट से दूसरी करवट लिटाना ये उपकार वैयावृत्य हैं ॥३०७॥
अद्धाणतेण सावयरायणदीरोधगासिवे ऊमे ।
वेज्जावच्चं उत्तं संगहसारक्खणोवेदं ॥३०८॥
अर्थ: जो मुनि मार्गके श्रमसे थक गये हैं उनके पैर आदि दबाना, जिन्हें चोरों ने सताया है, जंगली जानवरोंसे, दुष्ट राजासे, नदीको रोकने वालोंसे और मारी रोगसे जो पीड़ित हैं, विद्या आदिसे उनका उपद्रव दूर करना, जो दुर्भिक्षमें फँसे हैं उन्हे सुभिक्ष देशमें लाना, आप न डरें इत्यादि रूप से उन्हें धैर्य देना तथा उनका संरक्षण करना वैयावृत्य कहा है ॥३०८॥
अणिगूहिदबलविरिओ वेज्जावच्चं जिणोवदेसेण ।
जदि ण करेदि समत्थो संतो सो होदि णिद्धम्मो ॥३०९॥
अर्थ: अपने बल और वीर्यको न छिपाने वाला जो मुनि समर्थ होते हुए भी जिन भगवान के द्वारा कहे हुए क्रम के अनुसार यदि वैयावृत्य नहीं करता है तो वह धर्मसे बहिष्कृत होता है यह इस गाथा का अभिप्राय है ॥३०९॥
तित्थयराणाकोवो सुदधम्मविराधणा अणायारो ।
अप्पापरोपवयणं च तेण णिज्जूहिदं होदि ॥३१०॥
अर्थ: वैयावृत्य न करनेसे तीर्थङ्करोंकी आज्ञाका भंग होता है। शास्त्रमें कहे गये धर्मका नाश होता है। आचारका लोप होता है और उस व्यक्तिके द्वारा आत्मा, साधुवर्ग और प्रवचन का परित्याग होता है। तप में उद्योग न करनेसे आत्मा का त्याग होता है। आपत्ति में उपकार न करनेसे मुनिवर्गका त्याग होता है और शास्त्र विहित आचरण न करनेसे आगमका त्याग होता है ॥३१०॥
गुणपरिणामो सद्धा वच्छल्लं भत्तिपत्तलंभो य ।
संधाणं तव पूया अव्वोच्छित्ती समाधी य ॥३११॥
अर्थ: वैयावत्य करनेका पहला गुण है ‘गुण परिणाम’ अर्थात् जो वैयावृत्य करता है उसकी पीड़ित साधुके गुणों में वासना होती है कि मैं भी ऐसा बनूँ । और जिस साधु की वैयावृत्य की जाती है उसकी सम्यक्त्व आदि गुणोंमें विशेष प्रवृत्ति होती है । इसके सिवाय श्रद्धा, वात्सल्य, भक्ति, पात्रका लाभ, सन्धान-अपने में जो गुण पूजा छूट गये हैं उनका पुनः आरोपण, तप, धर्म तीर्थ की परम्परा का विच्छेद न होना तथा समाधि, ये गुण हैं ॥३११॥
आणा संजमसाखिल्लदा य दाणं च अविदिगिंछा य ।
वेज्जावच्चस्स गुणा पभावणा कज्जपुण्णाणि ॥३१२॥
अर्थ: सर्वज्ञ के द्वारा उपदिष्ट वैयावृत्य करनेसे सर्वज्ञकी आज्ञाका पालन होता है । आज्ञा पालनसे आज्ञा संयम होता है । वैयावृत्य करने वालेका उपकार होता है । निर्दोष रत्नत्रय का दान होता है । संयम में सहायता होती है । विचिकित्सा - ग्लानि दूर होती है । धर्म की प्रभावना होती है और कार्यका निर्वाह होता है ॥३१२॥
मोहग्गिणादिमहदा घोरमहावेयणाए फुट्टंतो ।
डज्झदि हु धगधगंतो ससुरासुरमाणुसो लोओ ॥३१३॥
अर्थ: अति महान मोहरूपी आगके द्वारा सुर असुर और मनुष्यों सहित यह वर्तमान लोक धक्-धक् करते हुए जल रहा है । घोर महावेदनासे उसके अंग टूट फूट रहे हैं ॥३१३॥
एदम्मि णवरि मुणिणो णाणजलोवग्गहेण विज्झविदे ।
डाहुम्मुक्का होंति हु दमेण णिव्वेदणा चेव ॥३१४॥
अर्थ: इस लोकके जलने पर भी मुनियों को कोई वेदना नहीं है । क्योंकि ज्ञानरूपी जलके प्रवाहसे - आत्मा और शरीर आदिके भेद ज्ञानरूपी जलके प्रवाहसे मोहरूपी आगके नष्ट हो जाने से तथा रागद्वेषके शान्त हो जानेसे वे दाह से मुक्त हैं। आशय यह है कि सम्यग्ज्ञान रूपी जलके प्रवाहसे अज्ञानरूपी आगके फैलावको समाप्त कर देना और वेदना-रहित होना अर्थात् ज्ञानानन्दमय होना यतियों का गुण है ॥३१४॥
णिग्गहिदिंदियदारा समाहिदा समिदसव्वचेट्ठंगा ।
धण्णा णिरावयक्खा तवसा विधुणंति कम्मरयं ॥३१५॥
अर्थ: इन्द्रियके दो भेद हैं द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय। पुद्गल स्कन्धोंके और उनके आधार भूत आत्म प्रदेशोंके इन्द्रियाकार रचनाको द्रव्येन्द्रिय कहते हैं। और ज्ञानावरणके क्षयोपशम और इन्द्रियसे होने वाले रूपादि विषयक उपयोगको भावेन्द्रिय कहते हैं। इनमेंसे यहाँ उपयोगरूप इन्द्रियका ग्रहण किया है, क्योंकि उसकी सहायतासे मनको प्रिय और अप्रिय लगने वाले विषयों में राग द्वेष होते हैं। पापकर्ममें निमित्त होनेसे यहाँ इन्द्रियद्वार कहा है अतः यह अर्थ होता है जिन्होंने इन्द्रियोंके विषयोंमें होने वाले रागद्वेषका निग्रह कर दिया है। जिनका चित्त रत्नत्रयमें लीन रहता है। जो ईर्याभाषा आदि चेष्टाएँ सम्यक् रूप करते हैं और जो ‘णिरावयक्खा’ है। इसका अर्थ कोई ‘निश्चल’ कहते हैं और कोई निरपेक्ष कहते हैं अर्थात् जो सत्कार और लाभ की अपेक्षा नहीं करते। वे पुण्यशाली मुनि तपसे कर्म रूपी धूलिको नष्ट करते हैं। इस प्रकार इन्द्रियों का निग्रह करना, रत्नत्रयमें एकाग्र होना, निर्दोष चेष्टाएँ करना, सत्कार आदि की अपेक्षा न करना, तप में लीन रहना और कर्म रूपी रजका दूर करना ये यतियोंके गुण इस गाथाके द्वारा कहे हैं ॥३१५॥
इय दढगुणपरिणामो वेज्जावच्चं करेदि साहुस्स ।
वेज्जावच्चेण तदो गुणपरिणामो कदो होदि ॥३१६॥
अर्थ: इस प्रकार ऊपर कहे यतिके गुणोंमें जिसका परिणाम दृढ़ होता है वह साधु की वैयावृत्य करता है। वैयावृत्य करने से गुण परिणाम होता है। आशय यह है कि इस यतिमें ये गुण हैं। यदि मैं इनकी सेवा न करूँगा तो ये गुण नष्ट हो जायेंगे। ऐसा जो चित्तमें विचारता है वह उन गुणोंमें परिणत होता है। और जिसकी सेवा की है उसकी गुणों में परिणति होती है। अर्थात् वैयावृत्य करने वाला स्वयं उन गुणोंसे सुवासित होता है और जिसका वैयावृत्य किया जाता है वह यति अपने गुणोंसे च्युत नहीं होता। अतः अपने और दूसरोंके उपकारके लिए वैयावृत्य कहा है ॥३१६॥
जह जह गुणपरिणामो तह तह आरुहइ धम्मगुणसेढिं ।
वड्ढदि जिणवरमग्गे णवणवसंवेगसड्ढावि ॥३१७॥
अर्थ: जैसे-जैसे गुण परिणाम होता है वैसे वैसे चारित्र रूप गुणोंकी सीढ़ी पर चढ़ता है, और जिनेन्द्रके मार्गमें नई-नई संसार भीरुता और श्रद्धा भी बढ़ती है। यहाँ गुण शब्दसे गुणोंको विषय करने वाला स्मरण ज्ञान कहा गया है। तब यह अर्थ होता है - जैसे-जैसे यतिके गुणोंका स्मरण होता है वैसे-वैसे चारित्र गुण पर आरोहण करता है। जो यतिके गुणोंको भूल जाता है वह उसमें प्रयत्न नहीं करता। उनके गुणोंका स्मरण करनेसे उनमें रुचि पैदा होती है। भव्य जीव गुणोंकी अनुरागी होते हैं। संसारसे भय और श्रद्धा यतिको रत्नत्रयमें दृढ़ करती है। इस गाथासे श्रद्धा गुणका कथन किया ॥३१७॥
सड्ढाए वड्ढियाए वच्छल्लं भावदो उवक्कमदि ।
तो तिव्वधम्मराओ सव्वजगसुहावहो होइ ॥३१८॥
अर्थ: श्रद्धाके बढ़ने पर मुनि मनसे वात्सल्य करते हैं। उससे धर्ममें तीव्र राग होता है। धर्ममें तीव्र राग समस्त जगतमें जो इन्द्रिय जन्य और अतीन्द्रिय सुख है उसे लाता है। अथवा धर्ममें तीव्रराग रखने वाला यति सब सुखको प्राप्त होता है । इस गाथासे वात्सल्यका कथन किया ॥३१८॥