भगवती आराधना गाथा एवं अर्थ (आचार्य शिवार्य) | Bhagwati Aradhana Gatha evam Arth (Acharya Shivarya)

भगवती आराधना गाथा एवं अर्थ

आचार्य शिवार्य

भगवती आराधना की प्राकृत मूल गाथाएँ १ से २१६४, हर गाथा के नीचे उसका हिन्दी अर्थ (पोस्ट की लंबाई की सीमा के कारण आगे का पाठ अगले ७ उत्तरों में, हर भाग अपनी गाथा संख्या के शीर्षक के साथ)। गाथा और अर्थ जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर (जीवराज जैन ग्रंथमाला, हिन्दी विभाग पुष्प ३६, ई. सन् २००४; सम्पादक एवं अनुवादक सिद्धान्ताचार्य पं. कैलाशचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) के संस्करण से ज्यों का त्यों लिए हैं। संस्कृत विजयोदया टीका, हिन्दी टीका, शंका समाधान और टिप्पणियाँ नहीं लीं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा। स्कैन की गई प्रति में मुद्रित पृष्ठ १३६-१३७, ६०० और ७०९ नहीं हैं, इसलिए गाथा १०३-१०४, ११८६-११८७ और १५४७-१५५० यहाँ नहीं हैं; गाथा १७७२ पृष्ठ ७९१-७९२ पर छपी नहीं मिली। कुछ गाथाओं का अलग गाथार्थ संस्करण में नहीं है, वहाँ केवल गाथा दी है।

केवल मूल गाथा: भगवती आराधना मूल गाथा (आचार्य शिवार्य) | Bhagwati Aradhana Mool Gatha (Acharya Shivarya)

पूर्ण ग्रन्थ, विजयोदया टीका एवं हिन्दी टीका सहित: भगवती आराधना (आचार्य शिवार्य), विजयोदया टीका एवं हिंदी टीका सहित | Bhagwati Aradhana (Acharya Shivarya)

स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/19570

Bhagwati_Aradhana_Acharya_Shivarya_Hindi.pdf (२५.९ MB)


गाथा १ से ३१८

सिद्धे जयप्पसिद्धे चउव्विहाराहणाफलं पत्ते ।
वंदित्ता अरहंते वोच्छं आराहणं कमसो ॥१॥

अर्थ: ‘जगत्में प्रसिद्ध और चार प्रकारकी आराधनाके फलको प्राप्त सिद्धों और अर्हन्तोंको नमस्कार करके क्रमसे आराधनाको कहूँगा ॥१॥’


उज्जोवणमुज्जवणं णिव्वहणं साहणं च णिच्छरणं ।
दंसणणाणचरित्ततवाणमाराहणा भणिया ॥२॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्त्वके उद्योतन, उद्यवन, निर्वहन, साधन और (णिच्छरणं) निस्तरणको (आराहणा) आराधना कहा है ॥२॥


दुविहा पुण जिणवयणे भणिया आराहणा समासेण ।
सम्मत्तम्मि य पढमा विदिया य हवे चरित्तंमि ॥३॥

अर्थ: जिनागममें संक्षेपसे आराधना दो प्रकारकी कही है। श्रद्धान विषयक प्रथम आराधना है। और दूसरी चारित्रविषयक आराधना है ॥३॥


दंसणमाराहंतेण णाणमाराहियं हवे णियमा ।
णाणं आराहंतेण दंसणं होइ भयणिज्जं ॥४॥

अर्थ: दर्शनकी आराधना करने वालेके द्वारा नियमसे ज्ञानकी आराधना होती है । किन्तु ज्ञानकी आराधना करने वालेके द्वारा दर्शनकी आराधना भजनीय है, होती भी है, नहीं भी होती ॥४॥


सुद्धणया पुण णाणं मिच्छादिट्ठिस्स बेंति अण्णाणं ।
तम्हा मिच्छादिट्ठी णाणस्साराहओ णेव ॥५॥

अर्थ: किन्तु शुद्धनय दृष्टि वाले ज्ञानी जन मिथ्यादृष्टिके ज्ञानको अज्ञान कहते हैं, इसलिए मिथ्यादृष्टि ज्ञानका आराधक नहीं ही होता ॥५॥


संजममाराहंतेण तवो आराहिओ हवे णियमा ।
आराहंतेण तवं चारित्तं होइ भयणिज्जं ॥६॥

अर्थ: संयमकी आराधना करने वालेके द्वारा तप नियमसे आराधित होता है । किन्तु तपकी आराधना करने वालेके द्वारा चारित्र भजनीय होता है ॥६॥


सम्मादिट्ठिस्स वि अविरदस्स ण तवो महागुणो होदि ।
होदि हु हत्थिण्हाणं चुंदच्छुदकम्म तं तस्स ॥७॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टी भी जो अविरत है अर्थात् अविरत सम्यग्दृष्टीका तप महान् उपकारी नहीं होता । उसका वह तप हाथीके स्नानकी और मंथनचर्मपालिका मथानीकी रस्सीकी तरह होता है ॥७॥


अहवा चारित्ताराहणाए आराहियं हवइ सव्वं ॥
आराहणाए सेसस्स चारित्ताराहणा भज्जा ॥८॥

अर्थ: अथवा चारित्रकी आराधनामें ज्ञान, दर्शन, तप सब आराधित होता है ।ज्ञान दर्शन और तपमेंसे किसीकी भी आराधनामें चारित्रको आराधना भाज्य होती है ॥८॥


कायव्वमिणमकायव्वयंत्ति णाऊण होइ परिहारो ।
तं चेव हवइ णाणं तं चेव य होइ सम्मत्तं ॥९॥

अर्थ: यह कर्तव्य है और यह अकर्तव्य है इस प्रकार जानकर त्याग होता है। वही चैतन्यज्ञान है और वही सम्यक्त्व है ॥९॥


चरणम्मि तम्मि जो उज्जमो आउंजणा य जो होई ।
सो चेव जिणेहिं तवो भणिदो असढं चरंतस्स ॥१०॥

अर्थ: उस अकर्तव्यके त्यागरूप चारित्रमें जो उद्योग है और उपयोग होता है, उन उद्योग और उपयोगको ही छल कपट त्यागकर करने वालेका जिनेन्द्रदेवने तप कहा है ॥१०॥


णाणस्स दंसणस्स य सारो चरणं हवे जहाखादं ।
चरणस्स तस्स सारो णिव्वाणमणुत्तरं भणियं ॥११॥

अर्थ: ज्ञानका और दर्शनका सार यथाख्यात चारित्र होता है । उस यथाख्यात चारित्रका सार सर्वोत्कृष्ट निर्वाण कहा है ॥११॥


चक्खुस्स दंसणस्स य सारो सप्पादिदोसपरिहरणं ।
चक्खू होइ णिरत्थं दट्ठूण विले पडंतस्स ॥१२॥

अर्थ: चक्षुसे देखनेका सार सर्प आदि दोषोंसे दूर रहना है। देखकर भी आगे वर्तमान साँपके बिलमें गिरनेवाले मनुष्यकी आँख व्यर्थ है ॥१२॥


णिव्वाणस्स य सारो अव्वाबाहं सुहं अणोवमियं ॥
कायव्वा हु तदट्ठं आदहिदगवेसिणा चेट्ठा ॥१३॥

अर्थ: निर्वाणका सार बाधारहित उपमारहित सुख है । अतः आत्महितके खोजीको उस अव्याबाध सुखकी प्राप्तिके लिए चेष्टा करना चाहिए ॥१३॥


जम्हा चरित्तसारो भणिया आराहणा पवयणम्मि ।
सव्वस्स पवयणस्स य सारो आराहणा तम्हा ॥१४॥

अर्थ: क्योंकि प्रवचनमें चारित्रका फल आराधना कहा है । इसलिए समस्त प्रवचनका सार आराधना ही है ॥१४॥


सुचिरमवि णिरदिचारं विहरित्ता णाणदंसणचरित्ते ॥
मरणे विराधयित्ता अणंतसंसारिओ दिट्ठो ॥१५॥

अर्थ: ज्ञान श्रद्धान और चारित्रमें बहुत कालतक भी अतिचार बिना विहार करके मरणकालमें विराधना करके अनन्तभव धारण करनेवाला देखा गया है ॥१५॥


समिदिसु य गुत्तीसु य दंसणणाणे य णिरदिचाराणं ।
आसादणबहुलाणं उक्कस्सं अंतरं होई ॥१६॥

अर्थ: समितियोंमें और गुप्तियोंमें और दर्शन और ज्ञानमें जो अतिचार रहित प्रवृत्ति करते हैं । किन्तु मरणकाल आने पर परीषहके भयसे समिति आदिमें बारम्बार दोष लगाते हुए संक्लेश परिणाम करते हैं उनका अर्धपुद्गल परावर्तन काल प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर होता है । अर्थात् मरते समय रत्नत्रयसे च्युत होकर पुनः उतना काल बीतने पर रत्नत्रय प्राप्त करते हैं ॥१६॥


दिट्ठा अणादिमिच्छादिट्ठी जम्हा खणेण सिद्धा य ॥
आराहया चरित्तस्स तेण आराहणा सारो ॥१७॥

अर्थ: क्योंकि रत्नत्रयके आराधक अनादिमिथ्यादृष्टि क्षणमात्रमें अर्थात् अल्पकालमें द्रव्यकर्म भावकर्मसे रहित सिद्ध देखे गये हैं। इसलिये आराधना सार है ॥१७॥


जदि पवयणस्स सारो मरणे आराहणा हवदि दिट्ठा ।
किंदाइं सेसकाले जदि जददि तवे चरित्ते य ॥१८॥

अर्थ: प्रवचनका अतिशय आयुके अन्तमें आराधना यदि देखी जाती है । तो क्यों इस समय मरणकालसे अन्यकालमें यति तप चारित्र और ज्ञानदर्शनमें यत्न करता है ? ॥१८॥


आराहणाए कज्जे परियम्मं सव्वदा वि कायव्वं ।
परियम्मभाविदस्स हु सुहसज्झाराहणा होइ ॥१९॥

अर्थ: आराधनाके कार्यके लिये परिकर्म सभी कालमें करना चाहिये; क्योंकि परिकर्म करने वालेके ही आराधना सुखपूर्वक साध्य होती है ॥१९॥


जइ रायकुलपसूओ जोग्गं णिच्चमवि कुणइ परियम्मं ।
तो जिदकरणो जुद्धे कम्मसमत्थो भविस्सदि हि ॥२०॥

अर्थ: जैसे राजपुत्र योग्य शस्त्र प्रहारका अभ्यास युद्धकालसे पहले प्रतिदिन भी करता है । पश्चात् शस्त्र प्रहार रूप क्रियाको अपने अधीन करके युद्ध करनेमें समर्थ होता है ॥२०॥


इयसामण्णं साधू वि कुणदि णिच्चमवि जोगपरियम्मं ।
तो जिदकरणो मरणे झाणसमत्थो भविस्सहदि ॥२१॥

अर्थ: इसी प्रकार साधु भी ध्यानका परिकर्म जो (सामण्णं) श्रामण्य है उसे नित्य भी करता है, कि इसके पश्चात् मनको वशमें करके मैं मरते समय ध्यानमें समर्थ होऊँगा ॥२१॥ धर्म और शुक्ल ध्यान करनेमें समर्थ हो सकूं ॥२१॥


जोगाभाविदकरणो सत्तू जेदूण जुद्धरंगम्मि ।
जह सो कुमारमल्लो रज्जवडायं बला हरदि ॥२२॥

अर्थ: जैसे अभ्यासके द्वारा बार-बार लक्ष्यबेध शस्त्रप्रहार आदि क्रियामें दक्ष वह योद्धा राजपुत्र युद्धभूमिमें शत्रुको जीतकर राज्यके ध्वजको बलपूर्वक हरता है ॥२२॥


तह भाविदसामण्णो मिच्छत्तादी रिवू विजेदूण ।
आराहणापडायं हरइ सुसंथाररंगम्मि ॥२३॥

अर्थ: उस राजपुत्रकी ही तरह पूर्वमें समानभावका अभ्यासी साधु मिथ्यात्व आदि शत्रुओंको पूरी तरहसे जीतकर शोभनीय संस्तररूपी रंगभूमिमें आराधनारूपी पताकाको ग्रहण करता है ॥२३॥


पुव्वमभाविदजोग्गो आराधेज्ज मरणे जदि वि कोई ।
खण्णुगदिट्ठंतो सो तं खु पमाणं ण सव्वत्थ ॥२४॥

अर्थ: मरण समयसे पहले ध्यानके परिकरका अभ्यास न करनेवाला यद्यपि कोई मरते समय आराधना करे तो वह स्थाणुदृष्टान्तमात्र है । सर्वत्र (पमाणं ण) प्रमाण नहीं है ॥२४॥


मरणाणि सत्तरस देसिदाणि तित्थंकरेहिं जिणवयणे ॥
तत्थ वि य पंच इह संगहेण मरणाणि वोच्छामि ॥२५॥

अर्थ: जिनागममें तीर्थङ्करोंने मरण सतरह कहे हैं । उन सतरह प्रकारके मरणोंमेंसे भी यहाँ (संगहेण) संक्षेपसे पाँच मरणोंको कहूँगा ॥२५॥


पंडिदपंडिदमरणं पंडिदयं बालपंडिदं चेव ॥
बालमरणं चउत्थं पंचमयं बालबालं च ॥२६॥

अर्थ: पण्डितपण्डितमरण, पण्डितमरण, बाल पण्डितमरण, चौथा बालमरण और पाँचवा बाल बालमरण, ये पाँच मरण हैं।


पंडिदपंडितमरणे खीणकसाया मरंति केवलिणो ।
विरदाविरदा जीवा मरंति तदियेण मरणेण ॥२७॥

अर्थ: पण्डितपण्डितमरणसे क्षीण कषाय और अयोगकेवली मरते हैं। विरताविरत जीव तीसरे मरणसे मरते हैं ॥२७॥


पायोपगमणमरणं भत्तपइण्णा य इंगिणी चेव ।
तिविहं पंडितमरणं साहुस्स जहुत्तचारिस्स ॥२८॥

अर्थ: पादोपगमन मरण भक्तप्रतिज्ञा और इंगिणीमरण इस प्रकार पण्डितमरण तीन प्रकार का है । वह शास्त्रमें कहे अनुसार आचरण करनेवाले साधु के होता है ॥२८॥


अविरदसम्मादिट्ठी मरंति बालमरणे चउत्थम्मि ।
मिच्छादिट्ठी य पुणो पंचमए बालबालम्मि ॥२९॥

अर्थ: अविरत सम्यग्दृष्टि चतुर्थ बालमरणमें मरते हैं । मिथ्यादृष्टि पाँचवें बालबालमरणमें मरते हैं ॥२९॥


तत्थोवसमियसमत्तं खइयं खवोवसमियं वा ।
आराहंतस्स हवे सम्मत्ताराहणा पढमा ॥३०॥

अर्थ: उन सम्यक्त्वोंमें औपशमिक सम्यक्त्व, क्षायिक सम्यक्त्व अथवा क्षायोपशमिक सम्यक्त्वकी आराधना करने वालेके प्रथम सम्यग्दर्शन आराधना होती है ॥३०॥


सम्मादिट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं तु सद्दहइ ॥
सद्दहइ असब्भावं अयाणमाणो गुरुणियोगा ॥३१॥

अर्थ: उपदिष्ट अर्थात् कथित जिनागममें श्रद्धान करता ही है जो जीव वह सम्यग्दृष्टी है । किन्तु नहीं जानते हुए गुरुके नियोगसे असत्य भी अर्थका श्रद्धान करता है ॥३१॥


सुत्तादो तं सम्मं दरसिज्जंतं जदा ण सद्दहदि ॥
सो चेव हवइ मिच्छादिट्ठी जीवो तदो पहुदि ॥३२॥

अर्थ: सूत्रसे प्रथम गुरुके उपदेशसे विपरीत रूपसे ग्रहण किये अर्थको सम्यक् अविपरीत रूपसे अन्य आचार्यके द्वारा दिखलाने पर जब श्रद्धा नहीं करता । वही सम्यग्दृष्टी उस समय से मिथ्यादृष्टि होता है ॥३२॥


सुत्तं गणधरगथिदं तहेव पत्तेयबुद्धकहियं च ॥
सुदकेवलिणा कहियं अभिण्णदसपुव्विगथिदं च ॥३३॥

अर्थ: जो गणधरके द्वारा रचा हुआ हो, प्रत्येक बुद्धके द्वारा कहा हुआ हो, या श्रुतकेवली के द्वारा कहा हुआ हो या अभिन्न दशपूर्वीके द्वारा रचा गया हो वह सूत्र है ॥३३॥


गिहिदत्थो संविग्गो अच्छुवदेसे ण संकणिज्जो हु ।
सो चेव मंदधम्मो अच्छुवदेसम्मि भजणिज्जो ॥३४॥

अर्थ: जिसने सूत्रके अर्थको ग्रहण किया है, संसारसे भयभीत है वह सूत्रोंके उपदेशमें शङ्का करनेके योग्य नहीं ही है। वही गृहीतार्थ मंद चरित्र वाला हो तो सूत्रके व्याख्यानमें भाज्य है ॥३४॥


धम्माधम्मागासाणि पोग्गला कालदव्व जीवे य ।
आणाए सद्दहन्तो समत्ताराहओ भणिदो ॥३५॥

अर्थ: धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य, पुद्गलद्रव्य, कालद्रव्य और जीवद्रव्यकी आज्ञासे श्रद्धान करने वाला सम्यक्त्वका आराधक होता है ॥३५॥


संसारसमावण्णा य छव्विहा सिद्धिमस्सिदा जीवा ।
जीवणिकाया एदे सद्दहिदव्वा हु आणाए ॥३६॥

अर्थ: संसार अवस्थाको प्राप्त छह प्रकारके और सिद्धिको प्राप्त जीव होते है। ये जीव- निकाय आप्त की आज्ञाके बलसे श्रद्धान करनेके योग्य हैं ही ॥३६॥


आसवसंवरणिज्जरबंधो मुक्खो य पुण्णपावं च ॥
तह एव जिणाणाए सद्दहिदव्वा अपरिसेसा ॥३७॥

अर्थ: आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध और मोक्ष और पुण्य, पाप ये सब सातों पदार्थ उसी प्रकार जिनदेवकी आज्ञासे श्रद्धान करने चाहिये ॥३७॥


पदमक्खरं च एक्कं पि जो ण रोचेदि सुत्तणिद्दिट्ठं ॥
सेसं रोचंतो वि हु मिच्छादिट्ठी मुणेयव्वो ॥३८॥

अर्थ: जिसे पूर्वोक्त सूत्रमें कहा एक भी पद और अक्षर नहीं रुचता । शेषमें रुचि होते हुए भी निश्चयसे उसे मिथ्यादृष्टि जानना चाहिये ॥३८॥


मोहोदयेण जीवो उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहदि ॥
सद्दहदि असब्भावं उवइट्ठं अणुवइट्ठं वा ॥३९॥

अर्थ: मोहके उदयसे जीव उपदिष्ट प्रवचनको श्रद्धान नहीं करता। किन्तु उपदिष्ट अथवा अनुपदिष्ट असमीचीन भाव अर्थात् अतत्त्वका श्रद्धान करता है ॥३९॥


मिच्छत्तं वेदंतो जीवो विवरीयदंसणो होदि ॥
ण य धम्मं रोचेदि हु महुरं खु रसं जहा जरिदो ॥४०॥

अर्थ: मिथ्यात्वको वेदन - अनुभवन करने वाला जीव विपरीत श्रद्धावाला होता है । उसे धर्म नहीं रुचता । जैसे ज्वरसे ग्रस्त व्यक्तिको निश्चयसे मधुर रस नहीं रुचता ॥४०॥


सुविहियमिमं पवयणं असद्दहंतेणिमेण जीवेण ॥
बालमरणाणि तीदे मदाणि काले अणंताणि ॥४१॥

अर्थ: अच्छी तरहसे किये गये इस प्रवचनको अश्रद्धान करने वाले जीवने अतीतकालमें अनन्त बालमरण मरे ॥४१॥


णिग्गंथं पव्वयणं इणमेव अणुत्तरं सुपरिसुद्धं ॥
इणमेव मोक्खमग्गोत्ति मदी कायव्विया तम्हा ॥४२॥

अर्थ: इसलिये रत्नत्रयरूप जो प्रवचनका अभिधेय है वही सर्वोत्कृष्ट और पूर्णरूपसे निर्दोष है । वही मोक्षका मार्ग है ऐसी मति करनी चाहिये ॥४२॥


सम्मत्तादीचारा संका कंखा तहेव विदिगिंछा ।
परदिट्ठीण पसंसा अणायदणसेवणा चेव ॥४३॥

अर्थ: शङ्का, आसक्ति, उसी तरह विचिकित्सा या ग्लानि अतत्त्वदृष्टिजनोंकी प्रशंसा और अनायतनोंकी सेवा, ये सम्यक्त्वके अतिचार हैं ॥४३॥


उवगूहणठिदिकरणं वच्छल्लपभावणा गुणा भणिदा ।
सम्मत्तविसोधीए उवगूहणकारया चउरो ॥४४॥

अर्थ: उपगूहन, स्थितिकरण, वात्सल्य, प्रभावना ये चार गुण सम्यक्त्वकी विशुद्धिकी वृद्धि करनेवाले कहे हैं ॥४४॥


अरहंतसिद्धचेइय सुदे य धम्मे य साधुवग्गे य ।
आयरिय उवज्झाए सुपवयणे दंसणे चावि ॥४५॥

अर्थ: अरहन्त, सिद्ध और प्रतिबिम्बोंमें श्रुतमें और धर्ममें और साधुवर्गमें आचार्यमें उपाध्यायमें और सुप्रवचनमें दर्शनमें भी ॥४५॥


भत्ती पूया वण्णजणणं च णासणमवण्णवादस्स ॥
आसादणपरिहारो दंसणविणओ समासेण ॥४६॥

अर्थ: भक्ति, पूजा, वर्णजनन और अवर्णवादका नाश करना तथा आसादनाका दूर करना संक्षेपसे दर्शन विनय है ॥४६॥


एवं दंसणमाराहंतो मरणे असंजदो जदि वि कोवि ॥
सुविसुद्धतिव्वलेस्सो परित्तसंसारिओ होई ॥४७॥

अर्थ: इस प्रकार सम्यग्दर्शनकी आराधना करने वाला मरते समय यद्यपि कोई असंयत होता है किन्तु सुविशुद्ध तीव्र लेश्या वाला अल्प संसारी होता है ॥४७॥


तिविहा समत्ताराहणा य उक्कस्समज्झिमजहण्णा ॥
उक्कस्साए सिज्झदि उक्कस्ससुक्कलेस्साए ॥४८॥

अर्थ: सम्यक्त्वकी आराधना तीन प्रकारकी है । उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य । उत्कृष्ट शुक्ल लेश्या सहित, उत्कृष्ट सम्यक्त्व आराधनामें मोक्ष प्राप्त करता है ॥४८॥


सेसा य हुंति भवा सत्त मज्झिमाए य सुक्कलेस्साए ॥
संखेज्जाऽसंखेज्जा वा सेसा भवा जहण्णाए ॥४९॥

अर्थ: और मध्यम शुक्ल लेश्याके साथ मध्यम सम्यक्त्वाराधनासे सात मनुष्य आदि पर्याय शेष होती है । जघन्य सम्यक्त्वाराधनासे संख्यात अथवा असंख्यात (भव) भव अवशेष रहते हैं ॥४९॥


उक्कस्सा केवलिणो मज्झिमया सेससम्मदिट्ठीणं ।
अविरदसम्मादिट्ठिस्स संकिलिट्ठस्स हु जहण्णा ॥५०॥

अर्थ: उत्कृष्ट आराधना केवलीके होती है । मध्यम आराधना शेष सम्यग्दृष्टियोंके होती है । जघन्य आराधना संक्लेश परिणाम वाले अविरत सम्यग्दृष्टिके होती है ॥५०॥


संखेज्जमसंखेज्जगुणं वा संसारमणुसरित्तूणं ।
दुक्खक्खयं करेंति जे सम्मत्तेणणुमरंति ॥५१॥

अर्थ: जो सम्यक्त्वके साथ मरते हैं वे असंख्यात अथवा असंख्यातगुणे संसारमें भ्रमण करके दुःखका क्षय करते हैं ॥५१॥


लध्दूण य सम्मत्तं मुहुत्तकालमवि जे परिवडंति ।
तेसिमणंताणंता ण भवदि संसारवासद्धा ॥५२॥

अर्थ: जो अन्तर्मुहूर्त मात्र भी सम्यक्त्वको प्राप्त करके सम्यक्त्वसे गिर जाते हैं उनका संसारमें बसनेका काल अनन्तानन्त नहीं होता ॥५२॥


जे पुण सम्मत्ताओ पब्भट्ठा ते पमाददोसेण ।
भामन्ति दु भव्वा वि हु संसारमहण्णवे भीमे ॥५३॥

अर्थ: पुनः जो सम्यक्त्वसे भ्रष्ट हो जाते है । वे प्रमादके दोषसे भव्य होते हुए भी भयंकर संसाररूपी समुद्रमें भ्रमण करते ही हैं ॥५३॥


जो पुण मिच्छादिट्ठी दढचरित्तो अदढचरित्तो वा ॥
कालं करेज्ज ण हु सो कस्स हु आराहओ होदि ॥५४॥

अर्थ: जो पुनः मिथ्यादृष्टि है वह दृढ़ चारित्र वाला अथवा अदृढ़ चारित्र वाला हो और मरण करे तो वह किसीका भी आराधक नहीं ही होता ॥५४॥


तं मिच्छत्तं जमसद्दहणं तच्चाण होइ अत्थाणं।
संसइयमभिग्गहियं अणभिग्गहियं च तं तिविहं ॥५५॥

अर्थ: जो तत्त्वार्थोंका अश्रद्धान है वह मिथ्यात्व है उसके तीन भेद हैं। संशयसे होनेवाला मिथ्यात्व, अभिगृहीत मिथ्यात्व और अनभिगृहीत मिथ्यात्व ॥५५॥


जे वि अहिंसादिगुणा मरणे मिच्छत्तकडुगिदा होंति ॥
ते तस्स कडुगदुद्धियगदं व दुद्धं हवे अफला ॥५६॥

अर्थ: जो भी अहिंसा आदि गुण मरते समय मिथ्यात्वके द्वारा दूषित होते हैं, वे उस दूषित गुण वाले आत्माके कडुवी तूंबीमें रखे गये दूधकी तरह निष्फल होते हैं ॥५६॥


जह भेसजं पि दोसं आवहइ विसेण संजुदं संतं ॥
तह मिच्छत्तविसजुदा गुणा वि दोसावहा होंति ॥५७॥

अर्थ: जैसे औषध भी विषसे सम्बद्ध होने पर दोष करती है। उसी प्रकार मिथ्यात्वरूपी विषसे सम्बद्ध अहिंसा आदि गुण भी दोषकारी होते हैं ॥५७॥


दिवसेण जोयणसयं पि गच्छमाणो सगिच्छिदं देसं ।
अण्णंतो गच्छंतो जह पुरिसो णेव पाउणदि ॥५८॥

अर्थ: जैसे एक दिनमें सौ योजन भी चलनेवाला यदि अन्य मार्गसे जाता है तो वह पुरुष अपने इच्छित देशको नहीं प्राप्त होता ॥५८॥


धणिदं पि संजमंतो मिच्छादिट्ठी तहा ण पावेई ।
इट्ठं णिव्वुदिमग्गं उग्गेण तवेण जुत्तो वि ॥५९॥

अर्थ: उसी प्रकार अत्यन्त भी चारित्रका पालन करनेवाला उग्र तप करते हुए भी मिथ्यादृष्टि इष्ट प्रधान मोक्ष नहीं पाता ॥५९॥


जस्स पुण मिच्छदिट्ठिस्स णत्थि सीलं वदं गुणो चावि ।
सो मरणे अप्पाणं किह ण कुणई दीहसंसारं ॥६०॥

अर्थ: जिस मिथ्यादृष्टिके शील व्रत अथवा ज्ञानादि भी नहीं है वह मरनेपर कैसे अनन्त संसार नहीं करता है ॥६०॥


एक्कं पि अक्खरं जो अरोचमाणो मरेज्ज जिणदिट्ठं ॥
सो वि कुजोणिणिवुड्डो किं पुण सव्वं अरोचंतो ॥६१॥

अर्थ: जिन भगवान्के द्वारा देखा गया एक भी अक्षर जिसे रुचता नहीं है वह मरे तो वह भी कुयोनियोंमें डूबता है, तब जिसे सब ही नहीं रुचता उसके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ॥६१॥


संखेज्जासंखेज्जाणंता वा होंति बालबालम्मि ॥
सेसा भव्वस्स भवा णंताणंता अभव्वस्स ॥६२॥

अर्थ: बाल-बाल मरणसे मरनेपर भव्य जीवके संख्यात, असंख्यात अथवा अनन्त भव शेष होते हैं । अभव्यके अनन्तानन्त भव होते हैं ॥६२॥


पुव्वं ता वण्णेसिं भत्तपइण्णं पसत्थमरणेसु ॥
उस्सण्णं सा चेव हु सेसाणं वण्णणा पच्छा ॥६३॥

अर्थ: प्रशस्त मरणोंमें पहले भक्त प्रत्याख्यानको कहूँगा । क्योंकि वह भक्त प्रत्याख्यान ही बहुतायतसे प्रचलित है । शेष मरणोंका वर्णन पीछे करेंगे ॥६३॥


दुविहं तु भत्तपच्चक्खाणं सविचारमध अविचारं ।
सविचारमणागाढे मरणे सपरक्कमस्स हवे ॥६४॥

अर्थ: भक्त प्रत्याख्यान दो प्रकारका ही है । सविचार और अविचार । सविचार भक्त प्रत्याख्यान सहसा मरणके उपस्थित न होनेपर पराक्रम अर्थात् साहस और बलसे युक्त साधुके होता है ॥६४॥


सविचारभत्तपच्चक्खाणस्सिणमो उवक्कमो होइ ।
तत्थ य सुत्तपदाइं चत्तालं होंति णेयाइं ॥६५॥

अर्थ: सविचार भक्त प्रत्याख्यानका यह उपक्रम अर्थात् प्रारम्भ होता है । और इस भक्त प्रत्याख्यानमें सूत्र और पद चालीस जानने योग्य है ॥६५॥


अरिहे लिंगे सिक्खा विणय समाधी य अणियदविहारे ।
परिणामोवधिजहणा सिदी य तह भावणाओ य ॥६६॥

अर्थ: अर्ह अर्थात् योग्य, लिंग अर्थात् चिह्न, शिक्षा अर्थात् शास्त्राध्ययन विनय और मनका एकाग्र करना, अनियत क्षेत्रमें विहार, परिणाम, परिग्रह त्याग और शुभ परिणामोंकी श्रेणिपर आरोहण तथा अभ्यास ॥६६॥


सल्लेहणा दिसा खामणा य अणुसिट्ठि परगणे चरिया ।
मग्गण सुट्ठिय उवसंपया य पडिछा य पडिलेहा ॥६७॥

अर्थ: सल्लेखना, दिशा, क्षमाग्रहण, शिक्षा ग्रहण, अन्य गणमें प्रवृत्ति, आचार्यकी खोज सुस्थित उपसंपदा, परीक्षा, प्रतिलेखना ॥६७॥


आपुच्छा य पडिच्छणमेगस्सालोयणा य गुणदोसा ।
सेज्जा संथारो वि य णिज्जवग पयासणा हाणी ॥६८॥

अर्थ: पूछना एक क्षपकको स्वीकार करना, और आलोचना, आलोचनाके गुण दोष, शय्या अर्थात् वसति, और संस्तर, निर्यापक, अन्तिम आहारका प्रकाशन क्रमसे आहारका त्याग ॥६८॥


पच्चक्खाणं खामणं खमणं अणुसट्ठिसारणाकवचे ॥
समदाज्झाणे लेस्सा फलं विजहणा य णेयाई ॥६९॥

अर्थ: प्रत्याख्यान, क्षमा ग्रहण, दूसरोंके अपराधको क्षमा करना । शिक्षण, सारणा, कवच, समभाव, लेश्या, आराधनाका फल (य) और (विजहणा) शरीर त्याग ये अधिकार जानना ॥६९॥


वाहिव्व दुप्पसज्झा जरा य सामण्णजोगहाणिकरी ॥
उवसग्गा वा देवियमाणुसतेरिच्छया जस्स ॥७०॥

अर्थ: जिसके दुष्प्रसाध्य व्याधि हो, अथवा श्रामण्यके सम्बन्धकी हानि पहुँचानेवाली वृद्धावस्था हो अथवा देवकृत मनुष्यकृत और तिर्यञ्चकृत उपसर्ग हो वह भक्त प्रत्याख्यान करनेके योग्य है ॥७०॥


अणुलोमा वा सत्तू चारित्तविणासया हवे जस्स ॥
दुब्भिक्खे वा गाढे अडवीए विप्पणट्ठो वा ॥७१॥

अर्थ: अनुकूल बन्धु मित्र शत्रु हो जो चारित्रका विनाश करनेवाले हों । अथवा अनुकूल बन्धु और शत्रु जिसके चारित्रका विनाश करनेवाले हो । भयंकर दुर्भिक्ष हो अथवा भयंकर जंगलमें भटक गया हो तो भक्त प्रत्याख्यानके योग्य होता है ॥७१॥


चक्खुं व दुब्बलं जस्स होज्ज सोदं व दुब्बलं जस्स ॥
जंघाबलपरिहीणो जो ण समत्थो विहरिदुं वा ॥७२॥

अर्थ: जिसकी चक्षु दुर्बल हो अथवा जिसके श्रोत्र दुर्बल हों। जो जंघाबलसे हीन हो (वा) अथवा विहार करनेमें समर्थ न हो ॥७२॥


अण्णम्मि चावि एदारिसंमि आगाढकारणे जादे ॥
अरिहो भत्तपइण्णाए होदि विरदो अविरदो वा ॥७३॥

अर्थ: उक्तकारणके समान अन्य भी प्रबल कारण उपस्थित होनेपर विरत अथवा अविरत भक्तप्रत्याख्यानके योग्य होता है ॥७३॥


उस्सरइ जस्स चिरमवि सुहेण सामण्णमणदिचारं वा ॥
णिज्जावया य सुलहा दुब्भिक्खभयं च जदि णत्थि ॥७४॥

अर्थ: जिसका चारित्र चिरकाल भी बिना किसी क्लेशके अतिचार रहित अच्छी तरह पालित हो रहा है। अथवा समाधिमरण करानेमें सहायक निर्यापक (सुलहा) सुलभ हैं। (च) और (जदि) यदि दुर्भिक्षका भय नहीं है ॥७४॥


तस्स ण कप्पदि भत्तपइण्णं अणुवट्ठिदे भये पुरदो ॥
सो मरणं पच्छिंतो होदि हु सामण्णणिव्विण्णो ॥७५॥

अर्थ: आगे भयके अनुपस्थित होते हुए उसका भक्तप्रत्याख्यान योग्य नहीं है। वह यदि मरणकी प्रार्थना करता है तो मुनिधर्मसे विरक्त ही होता है ॥७५॥


उस्सग्गियलिंगकदस्स लिंगमुस्सग्गियं तयं चेव ॥
अववादियलिंगस्स वि पसत्थमुवसग्गियं लिंगं ॥७६॥

अर्थ: जो औत्सर्गिक लिंगमें स्थित है उसका जो पूर्वगृहीत है वही औत्सर्गिक लिंग होता है। आपवादिक लिंगवालेका भी औत्सर्गिक लिंग होता है यदि उसका पुरुष चिह्न दोष रहित हो ॥७६॥


जस्स वि अव्वभिचारी दोसो तिट्ठाणिगो विहारम्मि ॥
सो वि हु संथारगदो गेण्हेज्जोस्सग्गियं लिंगं ॥७७॥

अर्थ: जिसके भी लिंग और दोनों अण्डकोष इन तीन स्थानोंमें ऐसा दोष है जिसे औषध आदिसे भी दूर नहीं किया जा सकता । वह भी वसतिकामें संस्तरेपर आरूढ़ होनेपर औत्सर्गिक लिंगको अवश्य ग्रहण करे ॥७७॥


आवसधे वा अप्पाउग्गे जो वा महड्ढिओ हिरिमं ॥
मिच्छजणे सजणे वा तस्स होज्ज अववादियं लिंगं ॥७८॥

अर्थ: जो महान सम्पत्तिशाली है अथवा लज्जालु है अथवा जिसके स्वजन बन्धुवर्ग मिथ्यादृष्टि विधर्मी है । उसके लोगोंके आवागमनके कारण अयोग्य निवास स्थानमें आपवादिक लिंग होता है ॥७८॥


अच्चेलक्कं लोचो वोसट्टसरीरदा य पडिलिहणं ॥
एसो हु लिंगकप्पो चदुव्विहो होदि उस्सग्गे ॥७९॥

अर्थ: अचेलता, हाथसे केश उखाड़ना, शरीरसे ममत्व त्याग और प्रतिलेखन यह चार प्रकारका लिंगभेद औत्सर्गिक लिंगमें होता है ॥७९॥


इत्थीवि य जं लिंगं दिट्ठं उस्सग्गियं व इदरं वा ।।
तं तत्थ होदि हु लिंगं परित्तमुवधिं करेंतीए ॥८०॥

अर्थ: स्त्रियोंके भी जो लिंग औत्सर्गिक अथवा अन्य आगममें कहा है । वही लिंग अल्प परिग्रह करती हुईके भक्त प्रत्याख्यानमें होता है ।। ८० ।। है तो पुरुषोंकी तरह वस्त्र त्याग नहीं करती ॥८०॥


जत्तासाधणचिह्नकरणं खु जगपच्चयादठिदिकरणं ।
गिहभावविवेगो वि य लिंगग्गहणे गुणा होंति ॥८१॥

अर्थ: यात्राके साधन चिह्नका करना, जगतकी श्रद्धा, अपनेको स्थिर करना और गृहस्थतासे भिन्नता, ये चार लिंग ग्रहण करनेमें गुण होते हैं ॥८१॥


गंथच्चाओ लाघवमप्पडिलिहणं च गदभयत्तं च ।
संसज्जणपरिहारो परिकम्मविवज्जणा चेव ॥८२॥

अर्थ: परिग्रहत्याग लाघव अप्रतिलेखन और भय रहितपना, सम्मूर्छन जीवोंका बचाव और परिकर्मका त्याग ये गुण लिंगमें होते हैं ॥८२॥


विस्सासकरं रूवं अणादरो विसयदेहसुक्खेसु ।
सव्वत्थ अप्पवसदा परिसह अधिवासणा चेव ॥८३॥

अर्थ: वस्त्र रहित रूप जनतामें विश्वास पैदा करने वाला होता है विषयसे होने वाले शारीरिक सुखमें अनादर भाव होता है । सर्वत्र स्वाधीनता रहती है और परीषहको सहना होता है ॥८३॥


जिणपडिरूवं विरियायारो रागादिदोसपरिहरणं ।
इच्चेवमादिबहुगा अच्चेलक्के गुणा होंति ॥८४॥

अर्थ: यह अचेलता जिन भगवानका प्रतिरूप है । वीर्याचारका प्रवर्तक है । रागादि दोषोंको दूर करती है । इत्यादि बहुतसे गुण अचेलतामें होते हैं ॥८४॥


इय सव्वसमिदकरणो ठाणासणसयणगमणकिरियासु ।
णिगिणं गुत्तिमुवगदो पग्गहिददरं परक्कमदि ॥८५॥

अर्थ: इस प्रकार, नग्नता और गुप्तिको धारण करनेवाला सब इष्ट अनिष्ट विषयोंमें अपनी इन्द्रियोंको रागद्वेषसे रहित करता है। और स्थान, आसन, शयन, गमन आदि क्रियाओंमें प्रग्रहीततर अर्थात् सुदृढ़रूपसे चेष्टा करता है ॥८५॥


अववादियलिंगकदो विसयासत्तिं अगूहमाणो य ।
णिंदणगरहणजुत्तो सुज्झदि उवधिं परिहरंतो ॥८६॥

अर्थ: अपवादलिंगमें स्थित होते हुए भी अपनी शक्तिको न छिपाते हुए और निन्दा गर्हा करते हुए परिग्रहका त्याग करनेपर शुद्ध होता है ॥८६॥


केसा संसज्जंति हु णिप्पडिकारस्स दुपरिहारा य ।
सयणादिसु ते जीवा दिट्ठा आगंतुया य तहा ॥८७॥

अर्थ: प्रतीकार न करनेवालेके केश जूँ आदि सम्मूर्छन जीवोंके आधार होते हैं । और वे सम्मूर्छन जीव शयन आदिमें दुष्परिहार होते हैं । तथा अन्यत्रसे आते हुए भी कीट आदि देखे गये हैं ॥८७॥


जूगाहिं य लिक्खाहिं य बाधिज्जंतस्स संकिलेसो य ।
संघट्टिज्जंति य ते कंडुयणे तेण सो लोचो ॥८८॥

अर्थ: जुंसे और लीखोंसे पीड़ित साधुके संक्लेश उत्पन्न होता है । खुजाने पर वे जूं आदि पीड़ित होते हैं इस कारणसे वह केशलोच किया जाता है ॥८८॥


लोचकदे मुंडत्तं मुंडत्ते होइ णिव्वियारत्तं ।
तो णिव्वियारकरणो पग्गहिददरं परक्कमदि ॥८९॥

अर्थ: लोच करने पर सिर मुण्डा हो जाता है । मुण्डताके होने पर निर्विकारता होती है । उससे विकार रहित क्रियाशील होनेसे प्रगृहीततर चेष्टा करता है ॥८९॥


अप्पा दमिदो लोएण होइ ण सुहे य संगमुवयादि ।
साधीणदा य णिद्दोसदा य देहे य णिम्ममदा ॥९०॥

अर्थ: केशलोचसे आत्मा दमित होता है और सुखमें आसक्त नहीं होता है । और स्वाधीनता निर्दोषता और निर्ममत्व होता है ॥९०॥


आणक्खिदा य लोचेण अप्पणो होदि धम्मसद्धा य ।
उग्गो तवो य लोचो तहेव दुक्खस्स सहणं च ॥९१॥

अर्थ: और केशलोच करनेसे आत्माकी धर्ममें श्रद्धा प्रदर्शित होती है । उसी प्रकार लोच उग्र तप है और दुःखका सहन है ॥९१॥


सिण्हाणब्भंगुव्वट्टणाणि णहकेसमंसुसंठप्पं ।
दंतोट्ठकण्णमुहणासियच्छिभमुहाइंसंठप्पं ॥९२॥

अर्थ: स्नान, तेलमर्दन, उबटन और नख, केश, दाढ़ी-मूँछोंका संस्कार छोड़ देते हैं । दाँत, ओष्ठ, कान, मुख, नाक, भौं आदिका संस्कार छोड़ देते हैं ॥९२॥


वज्जेदि बंभचारी गंधं मल्लं च धूववासं वा ।
संवाहणपरिमद्दणपिणिद्धणादीणि य विमुत्ती ॥९३॥

अर्थ: ब्रह्मचारी निर्ग्रन्थ गन्ध, माल्य और धूप और मुखवास संवाहन, परिमर्दन और पिणिद्धण आदिको छोड़ देता है ॥९३॥


जल्लविलित्तो देहो लुक्खो लोयकदवियडबीभत्थो ।
जो रूढणक्खलोमो सा गुत्ती बंभचेरस्स ॥९४॥

अर्थ: जल्लसे लिप्त, रूक्ष, लोच करनेसे विकृत और बीभत्स, बढ़े हुए नख और रोमोंसे युक्त जो शरीर होता है, ब्रह्मचर्यकी वह गुप्ति है ॥९४॥


इरियादाणणिखेवे विवेगठाणे णिसीयणे सयणे ।
उव्वत्तणपरिवत्तण पसारणाउंटणामरसे ॥९५॥

अर्थ: गमनमें, ग्रहणमें, रखनेमें मल त्यागमें स्थानमें बैठनेमें शयनमें ऊपरको मुखा करके सोनेमें करवट लेनेमें हाथ पैर फैलानेमें संकोचनमें और स्पर्शनमें पीछीसे परिमार्जन करना चाहिये ॥९५॥


पडिलेहणेण पडिलेहिज्जइ चिण्हं च होइ सगपक्खे ।
विस्सासियं च लिंगं संजदपडिरूवदा चेव ॥९६॥

अर्थ: उक्त क्रिया करते समय पीछेके द्वारा प्रतिलेखना करना चाहिये, इस प्रकार पूर्व गाथासे सम्बन्ध है । अपनी प्रतिज्ञामें पीछी चिह्न होती है । और प्रतिलेखना रूप लिंग मनुष्योंको विश्वास करानेवाला है । और प्राचीन मुनियोंका प्रतिबिम्ब रूप है ॥९६॥


रयसेयाणमगहणं मद्दव सुकुमालदा लहुत्तं च ।
जत्थेदे पंच गुणा तं पडिलिहणं पसंसंति ॥९७॥

अर्थ: धूलि और पसीनेको पकड़ती न हो, कोमल स्पर्शवाली हो, सुकुमार हो, और हल्की हो । जिसमें ये पाँच गुण होते हैं उस प्रतिलेखनाकी प्रशंसा करते हैं ॥९७॥


णिउणं विउलं सुद्धं णिकाचिदमणुत्तरं च सव्वहिदं ।
जिणवयणं कलुसहरं अहो य रत्ती य पढिदव्वं ॥९८॥

अर्थ: निपुण विपुल, शुद्ध, अर्थसे पूर्ण, सर्वोत्कृष्ट और सब प्राणियोंका हित करनेवाला द्रव्यकर्म भाव कर्मरूपी मलका नाशक जिनवचन रात-दिन पढ़ना चाहिये ॥९८॥


अदहिदपइण्णा भावसंवरो णवणवो या संवेगो ॥
णिक्कंपदा तवो भावणा य परदेसिगत्तं च ॥९९॥

अर्थ: आत्महितका ज्ञान होता है। भाव संवर होता है। नवीन-नवीन संवेग होता है रत्नत्रयमें निश्चलता होती है। स्वाध्याय तप होता है और भावना होती है। और दूसरोंको उपदेश करनेकी क्षमता होती है ॥९९॥


णाणेण सव्वभावा जीवाजीवासवादिया तधिगा ।
णज्जदि इह परलोए अहिदं च तहा हियं चेव ॥१००॥

अर्थ: ज्ञानके द्वारा जीव अजीव आस्रव आदि सब पदार्थ तथ्यभूत जाने जाते हैं। उसी प्रकारसे इस लोक और परलोकमें अहित और हित जाना जाता है ॥१००॥


आदहिदमयाणंतो मुज्झदि मूढो समादियदि कम्मं ।
कम्मणिमित्तं जीवो परीदि भवसायरमणंतं ॥१०१॥

अर्थ: आत्माके हितको न जाननेवाला मोहित होता है । मोहित हुआ कर्मको ग्रहण करता है । और कर्मका निमित्त पाकर जीव (अणतं) अनन्त भवसागरमें भ्रमण करता है ॥१०१॥


जाणंतस्सादहिदं अहिदणियत्ती य हिदपवत्ती य ।
होदि य तो से तम्हा आदहिदं आगमेदव्वं ॥१०२॥

अर्थ: आत्महितको जाननेवालेके अहितसे निवृत्ति और हितमें प्रवृत्ति होती है । हिताहितके ज्ञानके पश्चात् उसका हिताहित भी जानता ही है । इसलिए (आदहिदं) आत्महितको आगमसे सीखना चाहिए ॥१०२॥


आयापायविदण्हू दंसणणाणतवसंजमे ठिच्चा ।
विहरदि विसुज्झमाणो जावज्जीवं दु णिक्कंपो ॥१०५॥

अर्थ: वृद्धि और हानिके क्रमको जानने वाला श्रद्धान, ज्ञान, तप और संयममें स्थित होकर शुद्धिको प्राप्त होता हुआ जीवन पर्यन्त विहार करता है वह निश्चल ही है ॥१०५॥


बारसविहम्मि य तवे सब्भंतरबाहिरे कुसलदिट्ठे ।
ण वि अत्थि ण वि य होहिदि सज्झायसमं तवो कम्मं ॥१०६॥

अर्थ: सर्वज्ञके द्वारा उपदिष्ट अभ्यन्तर और बाह्यभेद सहित बारह प्रकारके तपमें स्वाध्यायके समान तपक्रिया नहीं है और न होगी ही ॥१०६॥


जं अण्णाणी कम्मं खवेदि भवसयसहस्सकोडीहिं ।
तं णाणी तिहिं गुत्तो खवेदि अंतोमुहुत्तेण ॥१०७॥

अर्थ: सम्यग्ज्ञानसे रहित अज्ञानी जिस कर्मको लाख करोड़ भवोंमें नष्ट करता है, उस कर्मको सम्यग्ज्ञानी तीन गुप्तियोंसे युक्त हुआ अन्तर्मुहूर्तमात्रमें क्षय करता है ॥१०७॥


छट्ठट्ठमदसमदुवालसेहिं अण्णाणियस्स जा सोही ।
तत्तो बहुगुणदरिया होज्ज हु जिमिदस्स णाणिस्स ॥१०८॥

अर्थ: अज्ञानीके दो, तीन, चार, पाँच आदि उपवास करनेसे जितनी विशुद्धि होती है उससे बहुत गुणी शुद्धि जीमते हुए ज्ञानीके होती है ॥१०८॥


सज्झायभावणाए य भाविदा होंति सव्वगुत्तीओ ।
गुत्तीहिं भाविदाहिं य मरणे आराधओ होदि ॥१०९॥

अर्थ: स्वाध्याय भावनासे सब गुप्तियाँ भावित होती है । और गुप्तियोंकी भावनासे मरते समय रत्नत्रय रूप परिणामोंकी आराधनामें तत्पर होता है ॥१०९॥


आदपरसमुद्धारो आणा वच्छल्लदीवणा भत्ती ।
होदि परदेसगत्ते अव्वोच्छित्ती य तित्थस्स ॥११०॥

अर्थ: अपने और दूसरोंके उद्धारके उद्देशसे जो स्वाध्यायमें लगता है वह अपने भी कर्मोंको काटता है और उसमें उपयुक्त दूसरोंके भी कर्मोंको काटता है । सर्वज्ञ भगवानकी जो आज्ञा है कि कल्याणके इच्छुक जिन शासनके प्रेमीको नियमसे धर्मोपदेश करना चाहिये, उसका भी पालन होता है । दूसरोंको उपदेश करने पर वात्सल्य और प्रभावना होती है । जिन वचनके अभ्याससे जिन वचनमें भक्ति प्रदर्शित होती है । दूसरोंको उपदेश करनेपर मोक्षमार्ग अथवा श्रुतरूप तीर्थकी अव्युच्छित्ती - परम्पराका अविनाश होता है । श्रुत भी रत्नत्रयके कथनमें संलग्न होनेसे तीर्थ है । अतः स्वाध्याय पूर्वक परोपदेश करनेसे श्रुत और मोक्षमार्गका विच्छेद नहीं होता । वे सदा प्रवर्तित रहते हैं ॥११०॥


विणओ पुण पंचविहो णिद्दिट्ठो णाणदंसणचरित्ते ।
तवविणओ य चउत्थो चरिमो उवयारिओ विणओ ॥१११॥

अर्थ: जिनवचनके अभ्यासके पश्चात् विनय पाँच प्रकारकी कही है । ज्ञानविनय दर्शनविनय चारित्रविनय और चतुर्थ तपविनय और अन्तिम उपचार विनय है ॥१११॥


काले विणये उवधाणे बहुमाणे तहेव णिण्हवणे ।
वंजण अत्थ तदुभये विणओ णाणम्मि अट्ठविहो ॥११२॥

अर्थ: काल, विनय, उपधान, बहुमान, तथा निह्नव, व्यंजनशुद्धि, अर्थशुद्धि, उभयशुद्धि ये ज्ञानके विषयमें आठ प्रकारकी विनय है ॥११२॥


उवगूहणादिया पुव्वुत्ता तह भत्तियादिया य गुणा ।
संकादिवज्जणं पि णेओ सम्मत्तविणओ सो ॥११३॥

अर्थ: पूर्वोक्त उपगूहण या उपबृंहण आदि तथा भक्ति आदि गुण, शंका आदिका त्याग यह सम्यक्त्वविनय जानो ॥११३॥


इंदियकसायपणिधाणं पि य गुत्तीओ चेव समिदीओ ।
एसो चरित्तविणओ समासदो होइ णायव्वो ॥११४॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूपसे आत्माकी परिणति न होना, और गुप्तियाँ और समितियाँ, यह संक्षेपसे चारित्र विनय ज्ञातव्य है ॥११४॥


पणिधाणं पि य दुविहं इंदिय णोइंदियं च बोधव्वं ।
सद्दादि इंदियं पुण कोधाईयं भवे इदरं ॥११५॥

अर्थ: प्रणिधानके भी दो भेद हैं इन्द्रिय और नोइन्द्रिय । शब्द आदि इन्द्रिय और क्रोधादिक नोइन्द्रिय प्रणिधान है ऐसा जानना ॥११५॥


सद्दरसरूवगंधे फासे य मणोहरे य इयरे य ।
जं रागदोसगमणं पंचविहं होदि पणिधाणं ॥११६॥

अर्थ: मनोहर और अमनोहर शब्द, रस, रूप गन्ध और स्पर्शमें जो राग द्वेष होता है वह पाँच प्रकारका इन्द्रिय प्रणिधान होता है ॥११६॥


णोइंदियपणिधाणं कोधो माणो तधेव माया य ।
लोभो य णोकसाया मणपणिधाणं तु तं वज्जे ॥११७॥

अर्थ: नो इन्द्रिय प्रणिधान क्रोध मान तथा माया लोभ और नोकषाय है । ये तो मन प्रणिधान छोड़ना चाहिये२ ॥११७॥


उत्तरगुणउज्जमणे सम्मं अधिआसणं च सद्धाए ।
आवासयाणमुचिदाण अपरिहाणी अणुस्सेओ ॥११८॥

अर्थ: उत्तर गुण अर्थात् संयममें उद्यम सम्यक् रीतिसे भूख प्यास आदिको सहन करना, तपमें अनुराग पहले कहे गये छह आवश्यकोंकी न्यूनता न होना आधिक्य न होना ॥११८॥


भत्ती तवोधिगंमि य तवम्मि य अहीलणा य सेसाणं ।
एसो तवम्मि विणओ जहुत्तचारिस्स साधुस्स ॥११९॥

अर्थ: जो तपमें अधिक है उनमें और तपमें भक्ति और जो अपनेसे तपमें हीन हैं उनका अपरिभव यह श्रुतके अनुसार आचरण करने वाले साधुकी तप विनय है ॥११९॥


काइयवाइयमाणसिओत्ति तिविधो हु पंचमो विणओ ।
सो पुण सव्वो दुविहो पच्चक्खो चेव पारोक्खो ॥१२०॥

अर्थ: पाँचवीं उपचार विनय तीन प्रकारकी है कायिक, वाचनिक और मानसिक । और वह तीनों प्रकारकी विनय दो प्रकारकी है प्रत्यक्ष विनय और परोक्ष विनय ॥१२०॥


अब्भुट्ठाणं किदियम्मं णवसणं अंजली य मुंडाणं ।
पच्चुग्गच्छणमेत्तो पच्छिद अणुसाधणं चेव ॥१२१॥


णीचं ठाणं णीचं गमणं णीचं च आसणं सयणं ।
आसणदाणं उवगरणदाणमोगासदाणं च ॥१२२॥

अर्थ: नीचा स्थान, नीचा गमन, नीच आसन, नीचे सोना, आसनदान, उपकरणदान और अवकाशदान ये उपचार विनयके प्रकार हैं ॥१२२॥


पडिरूवकायसंफासणदा पडिरूवकालकिरिया य ।
पेसणकरणं संथारकरणमुवकरणपडिलिहणं ॥१२३॥

अर्थ: गुरु आदिके शरीरके अनुकूल स्पर्शन, बालपने आदि अवस्थाके अनुरूप वैयावृत्य करना, और गुरु आदिकी आज्ञाका पालन करना, तृण आदिका संथरा करना, उपकरणोंकी प्रतिलेखना करना ॥१२३॥


इच्चेवमादि विणओ उवयारो कीरदे सरीरेण ।
एसो काइयविणओ जहारिहो साहुवग्गम्मि ॥१२४॥

अर्थ: इस प्रकारको आदि लेकर उपचार विनय शरीरके द्वारा साधुवर्गमें यथा योग्य की जाती है । यह कायिक विनय है ॥१२४॥


पूयावयणं हिदभासणं च मिदभासणं च महुरं च ।
सुत्ताणुवीचिवयणं अणिट्ठुरमकक्कसं वयणं ॥१२५॥

अर्थ: पूजा पूर्वक वचन, हितकारी भाषण, मित भाषण, मधुर भाषण, सूत्रानुसार वचन, अनिष्ठुर और अकर्कश वचन वचनविनय है ॥१२५॥


उ[?]संतवयणमगिह[?]वयणमकिरियमहीलणं वयणं ।
एसो वाइयविणओ जहारिहो होदि कादव्वो ॥१२६॥

अर्थ: उपशान्त वचन, जो वचन गृहस्थों के योग्य नहीं हैं, कृषि आदि आरम्भ से शून्य वचन, दूसरों की अवज्ञा न करने वाला वचन बोलना यह यथा योग्य वाचिकविनय करने योग्य होती है ॥१२६॥


पापविसोत्तिग परिणामवज्जणं पियहिदे य परिणामो ।
णायव्वो संखेवेण एसो माणस्सिओ विणओ ॥१२७॥

अर्थ: पापको लाने वाले परिणामोंको न करना, जो गुरुको प्रिय और हितकर हो उसीमें परिणाम लगाना, यह संक्षेपसे मानसिक विनय जानना ॥१२७॥


इय एसो पच्चक्खो विणओ पारोक्खिओ वि जं गुरुणो ।
विरहम्मि विवट्टिज्जइ आणाणिद्देसचरियाए ॥१२८॥

अर्थ: इस प्रकार यह प्रत्यक्ष विनय है, परोक्ष विनय भी वह है जो गुरुके अभावमें उनकी आज्ञा निर्देशका आचरण करनेमें की जाती है ॥१२८॥


राइणिय अराइणीएसु अज्जासु चेव गिहिवग्गे ।
विणओ जाहरिहो सो कायव्वो अप्पमत्तेण ॥१२९॥

अर्थ: रत्नत्रयमें जो अपनेसे उत्कृष्ट हैं, रत्नत्रयमें जो अपनेसे हीन है उनमें, आर्यिकाओंमें और गृहस्थवर्गमें वह विनय जो जिस योग्य हो, प्रमाद रहित होकर करना ही चाहिये ॥१२९॥


विणएण विप्पहूणस्स हवदि सिक्खा णिरत्थिया सव्वा ।
विणओ सिक्खाए फलं विणयफलं सव्वकल्लाणं ॥१३०॥

अर्थ: विनयसे रहित साधुकी सब शिक्षा निष्फल होती है। शिक्षाका फल विनय है। विनयका फल सब कल्याण है ॥१३०॥


विणओ मोक्खद्दारं विणयादो संजमो तवो णाणं ।
विणएणाराहिज्जइ आयरिओ सव्वसंघो य ॥१३१॥

अर्थ: विनय मोक्षका द्वार है। विनयसे संयम, तप और ज्ञानकी प्राप्ति होती है। विनयसे आचार्य और सर्व संघ अपने वशमें किया जाता है ॥१३१॥


आयारजीदकप्पगुणदीवणा अत्तसोधि णिज्झंझा ।
अज्जव मद्दव लाघव भत्ती पल्हादकरणं च ॥१३२॥

अर्थ: आचारके क्रम तथा कल्प्य गुणोंका प्रकाशन, आत्मशुद्धि, वैमनस्यका अभाव, आर्जव, मार्दव, लघुता, भक्ति और अपने और दूसरोंको प्रसन्न करना, ये विनय के गुण है ॥१३२॥


कित्ती मेत्ती माणस्स भंजणं गुरुजणे य बहुमाणो ।
तित्थयराणं आणा गुणाणुमोदो य विणयगुणा ॥१३३॥

अर्थ: कीर्ति, मित्रता, मानका विनाश, गुरुजनोंका बहुमान, और तीर्थङ्करोंकी आज्ञाका पालन और गुणोंकी अनुमोदना ये विनयमें गुण हैं, ॥१३३॥


चित्तं समाहिदं जस्स होज्ज वज्जिदविसोत्तियं वसियं ।
सो वहदि णिरदिचारं सामण्णधुरं अपरिसंतो ॥१३४॥

अर्थ: जिसका चित्त अशुभ परिणामोंके प्रवाहसे रहित और वशवर्ती होता है वह चित्त समाहित होता है । वह समाहित चित्त बिना थके निरतिचार चारित्रके भारको धारण करता है ॥१३४॥


चालणिगयं व उदयं सामण्णं गलइ अणिहुदमणस्स ।
कायेण य वायाए जदि वि जधुत्तं चरदि भिक्खू ॥१३५॥

अर्थ: जिसका चित्त चंचल है उसका समान भाव चालनीमें रखे पानीकी तरह गल जाता है। यद्यपि वह भिक्षु कायसे और वचनसे शास्त्रमें कहे अनुसार आचरण करता है ॥१३५॥


वादुब्भामो व मणो परिधावइ अट्ठिदं तह समंता ।
सिग्घं च जाइ दूरंपि मणो परमाणुदव्वं वा ॥१३६॥

अर्थ: बड़े जोरसे चलने वाली हवाकी तरह मन उसीकी तरह चहुँ ओर अस्थिर रूपसे दौड़ता है। और परमाणु द्रव्यकी तरह मन दूरवर्ती भी वस्तुके पास शीघ्र जाता है ॥१३६॥


अंधलयबहिरमूओ व्व मणो लहुमेव विप्पणासेइ ।
दुक्खो य पडिणियत्तेदुं जो गिरिसरिदसोदं वा ॥१३७॥

अर्थ: मन अन्धे बहरे और गूँगेके समान है शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। और पहाड़ी नदीके प्रवाहकी तरह लौटाना अशक्य है ॥१३७॥


तत्तो दुक्खे पंथे पाडेदुं दुट्ठओ जहा अस्सो ।
बीलणमच्छोव्व मणो णिग्घेत्तुं दुक्करो धणिदं ॥१३८॥

अर्थ: अयोग्य विषयसे हटानेसे मन दुष्कर मार्गमें गिराता है । जैसे दुष्ट घोड़ा गिराता है । अति चिकने मच्छकी तरह पकड़ने में अत्यन्त दुष्कर है ॥१३८॥


जस्स य कदेण जीवा संसारमणंतयं परिभमंति ।
भीमासुहगदिबहुलं दुक्खसहस्साणि पावंता ॥१३९॥

अर्थ: जिस मनकी चेष्टासे जीव हजारों दुःख भोगते हुए भयंकर अशुभ गतियोंसे भरे हुए अनन्त संसारमें भ्रमण करते हैं ॥१३९॥


जम्हि य वारिदमेत्ते सव्वे संसारकारया दोसा ।
णासंति रागदोसादिया हु सज्जो मणुस्सस्स ॥१४०॥

अर्थ: जिस मनके निवारण करने मात्रसे मनुष्यके सब संसारके कारक राग द्वेष आदि दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥१४०॥


इय दुट्ठयं मणं जो वारेदि पडिट्ठवेदि य अकंपं ।
सुहसंकप्पपयारं च कुणदि सज्झायसण्णिहिदं ॥१४१॥

अर्थ: उक्त प्रकारसे जो दुष्ट मनको रागादिसे निवारण करता है, और निश्चलरूपसे श्रद्धानरूप परिणामादिमें स्थापित करता है । तथा शुभसंकल्पोंमें मनको प्रवृत्त करता है और स्वाध्यायमें मनको लगाता है उसके सामण्ण-समताभाव होता है ॥१४१॥


जो विय विणिप्पडंतं मणं णियत्तेदि सह विचारेण ।
णिग्गहदी य मणं जो करेदि अदिलज्जियं च मणं ॥१४२॥

अर्थ: जो भी रत्नत्रयसे च्युत होकर विचित्र रागादिमें जानेवाले मनको विचारोंके साथ हटाता है, और जो मनको निन्दा गर्हाके द्वारा निगृहीत करता है - उसकी निन्दा करता है, और मनको अति लज्जित करता है उसके सामण्ण होता है ॥१४२॥


दासं व मणं अवसं सवसं जो कुणदि तस्स सामण्णं ।
होदि समाहिदमविसोत्तियं च जिणसासणाणुगदं ॥१४३॥

अर्थ: वशमें रहनेवाले दासकी तरह वशमें न रहनेवाले मनको जो अपने वशमें करता है, उसके एकमात्र शुद्ध चिद्रूपका अवलम्बन करनेवाला पाप परिणामोंसे निवृत्त और जिन शासनका अनुगामी श्रामण्य होता है ॥१४३॥


दंसणसोधी ठिदिकरणभावणा अदिसयत्तकुसलत्तं ।
खेत्तपरिमग्गणावि य अणियदवासे गुणा होंति ॥१४४॥

अर्थ: दर्शन विशुद्धि, स्थितिकरण, भावना, अतिशय अर्थोंमें निपुणता और क्षेत्रका अन्वेषण ये अनियत स्थानमें बसनेमें गुण होते हैं ॥१४४॥


जम्मणअभिणिक्खवणे णाणुप्पत्ती य तित्थचिण्हणिसिहीओ ।
पासंतस्स जिणाणं सुविसुद्धं दंसणं होदि ॥१४५॥

अर्थ: जिनदेवोंके जन्मस्थान, दीक्षास्थान, केवलज्ञानकी उत्पत्तिका स्थान और समवसरणके चिह्न मानस्तम्भका स्थान निषीधिका स्थान देखनेवालेके सम्यक्रूपसे निर्मल सम्यग्दर्शन होता है ॥१४५॥


संविग्गं संविग्गाणं जणयदि सुविहिदो सुविहिदाणं ।
जुत्तो आउत्ताणं विसुद्धलेस्सो सुलेस्साणं ॥१४६॥

अर्थ: सम्यक् आचार और अनशन आदि तपसे युक्त विशुद्ध लेश्यावाले मुनियोंका अनियत-वास सम्यक् आचारवाले, योगके धारी, सम्यक् लेश्यावाले और संसारसे भीत साधुओंमें संसारसे भय उत्पन्न करता है ॥१४६॥


पियधम्मवज्जभीरू सुत्तत्थविसारदो असढभावो ।
संवेगाविदि य परं साधू णियदं विहरमाणो ॥१४७॥

अर्थ: जो उत्तम क्षमा आदि धर्मका पालक है और पापसे डरता है, सूत्र और उसके अर्थमें निपुण है, शठतासे रहित है ऐसा सदा देशान्तरमें विहार करनेवाला साधु दूसरोंमें विराग उत्पन्न करता है ॥१४७॥


संविग्गदरे पासिय पियधम्मदरे अवज्जभीरुदरे ।
सयमवि पियथिरधम्मो साधू विहरंतओ होदि ॥१४८॥

अर्थ: संविग्नतर प्रिय धर्मतर और अवद्य भीरुतर साधुको देखकर विहार करनेवाला साधु स्वयं भी प्रिय स्थिर धर्मतर, संविग्नतर और अवद्य भीरुतर होता है ॥१४८॥


चरिया छुहा य तण्हा सीदं उण्हं च भाविदं होदि ।
सेज्जा वि अपडिबद्धा विहरणेणाधिआसिया होदि ॥१४९॥

अर्थ: अनेक देशोंमें विहार करनेसे, चर्या भूख, प्यास शीत और उष्णका दुःख संक्लेश-रहित भावसे सहना होता है। बसति भी ममत्वसे रहित सहनेमें आती है ॥१४९॥


णाणादेसे कुसलो णाणादेसे गदाण सत्थाणं ।
अभिलाव अत्थकुसलो होदि य देसप्पवेसेण ॥१५०॥

अर्थ: देशान्तरमें जानेसे अनेक देशोंके सम्बन्धमें कुशल हो जाता है। अनेक देशोंमें पाये जानेवाले शास्त्रोंके शब्दार्थके विषयमें कुशल होता है ॥१५०॥


सुत्तत्थथिरीकरणं अदिसयिदत्थाण होदि उवलद्धी ।
आयरियदंसणेण दु तम्हा सेविज्ज आयरियं ॥१५१॥

अर्थ: आचार्योंके दर्शनसे ही सूत्र और अर्थका स्थिरीकरण और अतिशयित अर्थोंकी उपलब्धि होती है। इसलिये आचार्यकी सेवा करनी चाहिए ॥१५१॥


णिक्खवणपवेसादिसु आयरियाणं बहुप्पयाराणं ।
सामाचारी कुसलो य होदि गणसंपवेसेण ॥१५२॥

अर्थ: बहुत प्रकारके आचार्योंके गणमें प्रवेश करनेसे वसति और दाताके घरसे निकलने और प्रवेश करने आदिमें जो उनका सम्यक् आचरण है उसमें प्रवीण होता है ॥१५२॥


कंठगदेहिं वि पाणेहिं साहुणा आगमो हु कादव्वो ।
सुत्तस्स य अत्थस्स य सामाचारी जध तहेव ॥१५३॥

अर्थ: प्राणोंके कण्ठमें आ जानेपर भी साधुको आगमका अभ्यास अवश्य करना चाहिए। जैसे वह सूत्रका और अर्थका और समाचारीका अभ्यास करता है उसी प्रकार उसे आगमका अभ्यास करना चाहिए ॥१५३॥


संजदजणस्स य जम्हि फासुविहारो य सुलभवुत्ती य ।
तं खेत्तं विहरंतो णाहिदि सल्लेहणाजोग्गं ॥१५४॥

अर्थ: जिस क्षेत्रमें संयमीजनका प्रासुक विहार और सुलभ आहार हो, वह क्षेत्र देशान्तरमें भ्रमण करनेवाला सल्लेखनाके योग्य जानता है ॥१५४॥


वसधीसु य उवधीसु य गामे णयरे गणे य सण्णिजणे ।
सव्वत्थ अपडिबद्धो समासदो अणियदविहारो ॥१५५॥

अर्थ: वसतियोंमें और उपकरणोंमें ग्राममें नगरमें संघमें और श्रावकजनमें सर्वत्र यह मेरा है इस प्रकारके संकल्पसे रहित साधु संक्षेपसे अनियत विहारी होता है ॥१५५॥


अणुपालिदो य दीहो परियाओ वायणा य मे दिण्णा ।
णिप्पादिदा य सिस्सा सेयं खलु अप्पणो कादुं ॥१५६॥

अर्थ: दीर्घकाल तक ज्ञान दर्शन चारित्र और तप रूप पर्यायका मैंने शास्त्रानुसार पालन किया । और मैंने वाचना भी दी और शिष्योंको तैयार किया । अब निश्चयसे अपना कल्याण करना उचित है ॥१५६॥


किण्णु अधालंदविधी भत्तपइण्णेंगिणी य परिहारो ।
पादोवगमणजिणकप्पियं च विहरामि पडिवण्णो ॥१५७॥

अर्थ: क्या अथालन्द विधि, भक्त प्रतिज्ञा, इंगिनीमरण, परिहार विशुद्धि चारित्र, पादोपगमन अथवा जिनकल्पको धारण करके मैं विहार करूँ ॥१५७॥


एवं विचारयित्ता सदिमाहप्पे य आउगे असदि ।
अणिगूहिदबलविरिओ कुणदि मदिं भत्तवोसरणे ॥१५८॥

अर्थ: उक्त प्रकारसे विचार करके स्मृतिका माहात्म्य होनेपर और आयुके अल्प होने पर अपने बल और वीर्यको न छिपाता हुआ मुनि भक्त प्रत्याख्यानमें मति करता है ॥१५८॥


पुव्वुत्ताणण्णदरे सल्लेहणकारणे समुप्पण्णे ।
तह चेव करिज्ज मदिं भत्तपइण्णाए णिच्छयदो ॥१५९॥

अर्थ: पहले कहे गये कारणोंमें से किसी एक सल्लेखनाके कारणके उपस्थित होने पर उसी प्रकार निश्चयसे भक्त प्रत्याख्यानमें मति करे ॥१५९॥


जाव य सुदी ण णस्सदि जाव य जोगा ण मे पराहीणा ।
जाव य सड्ढा जायदि इंदियजोगा अपरिहीणा ॥१६०॥

अर्थ: जब तक स्मृति नष्ट नहीं होती, जब तक मेरे आतापन आदि योग पराधीन नहीं होते, जब तक श्रद्धा रहती है, इन्द्रियोंका अपने विषयोंसे सम्बन्ध हीन नहीं होता ॥१६०॥


जाव य खेमसुभिक्खं आयरिया जाव णिज्जवणजोग्गा ।
अत्थि ति गारवरहिदा णाणचरणदंसणविसुद्धा ॥१६१॥

अर्थ: जब तक क्षेम और सुभिक्ष है, जब तक आचार्य निर्यापकत्वके योग्य तीन गारवोंसे रहित निर्मल ज्ञान चारित्र और दर्शनवाले हैं ॥१६१॥


ताव खमं मे कादुं सरीरणिक्खेवणं विदुपसत्थं ।
समयपडायाहरणं भत्तपइण्णं णियमजण्णं ॥१६२॥

अर्थ: तब तक मुझे शरीरका त्याग, विद्वानोंसे स्तुत, आगममें कही गई आराधना रूपी पताकाका ग्रहण, व्रत यज्ञ तथा भक्त प्रत्याख्यान करना युक्त है ॥१६२॥


एवं सदिपरिणामो जस्स दढो होदि णिच्छिदमदिस्स ।
तिव्वाए वेदणाए वोच्छिज्जदि जीविदासा से ॥१६३॥

अर्थ: ऊपर कहा स्मृति परिणाम ‘मैं शरीरत्याग करूँगा ही’ ऐसा निश्चय करनेवालेके दृढ़ होता है। उसके तीव्र वेदना होनेपर जीवनकी आशा नष्ट हो जाती है ॥१६३॥


संजमसाधणमेत्तं उवधिं मोत्तूण सेसयं उवधिं ।
पजहदि विसुद्धलेस्सो साधू मुत्तिं गवेसंतो ॥१६४॥

अर्थ: मुक्तिको खोजनेवाला विशुद्ध लेश्यासे युक्त साधु संयमके साधनमात्र परिग्रहको छोड़कर शेष परिग्रहको प्रकर्ष अर्थात् मन-वचन-कायसे त्याग देता है ॥१६४॥


अप्पपरियम्म उवधिं बहुपरियम्मं च दोवि वज्जेइ ।
सेज्जा संथारादी उस्सग्गपदं गवेसंतो ॥१६५॥

अर्थ: परिग्रहत्याग पदका अन्वेषण करनेवाला साधु अल्पपरिकर्मवाले और बहुत परिकर्मवाले दोनों ही प्रकारके परिग्रहोंको जिनमें वसति संस्तर आदि भी हैं, मन-वचन-कायसे त्याग देता है ॥१६५॥


पंचविहं जे सुद्धिं अपाविदूण मरणमुवणमन्ति ।
पंचविहं च विवेगं ते खु समाधिं ण पावेन्ति ॥१६६॥

अर्थ: जो पाँच प्रकारकी शुद्धियोंको और पांच प्रकारके विवेकको प्राप्त किये बिना मरणको प्राप्त होते हैं, वे समाधिको नहीं ही प्राप्त होते हैं ॥१६६॥


पंचविहं जे सुद्धिं पत्ता णिखिलेण णिच्छिदमदीया ।
पंचविहं च विवेगं ते हु समाधिं परमुवेंति ॥१६७॥

अर्थ: पूर्णरूपसे निश्चित मति वाले जो पाँच प्रकारकी शुद्धिको और पाँच प्रकारके विवेक को प्राप्त हुए हैं, वे निश्चयसे परम समाधिको प्राप्त होते हैं ॥१६७॥


आलोयणाए सेज्जासंथारुवहीण भत्तपाणस्स ।
वेज्जावच्चकराण य सुद्धी खलु पंचहा होइ ॥१६८॥

अर्थ: आलोचना की शुद्धि, शय्याकी, संस्तरकी और परिग्रहकी शुद्धि, भक्तपानकी शुद्धि और वैयावृत्य करने वालोंकी शुद्धि, निश्चयसे शुद्धि पाँच प्रकारकी होती है ॥१६८॥


अहवा दंसणणाणचरित्तसुद्धी य विणयसुद्धी य ।
आवासयसुद्धी वि य पंच वियप्पा हवदि सुद्धी ॥१६९॥

अर्थ: अथवा दर्शन शुद्धि, ज्ञान शुद्धि, चारित्र शुद्धि, विनय शुद्धि और आवश्यक शुद्धि इस प्रकार शुद्धिके पाँच भेद होते हैं ॥१६९॥


इंदियकसायउवधीण भत्तपाणस्स चावि देहस्स ।
एस विवेगो भणिदो पंचविधो दव्वभावगदो ॥१७०॥

अर्थ: इन्द्रिय विवेक, कषाय विवेक, उपधिविवेक, भक्तपान विवेक और देहका विवेक इस प्रकार यह विवेक पांच प्रकारका पूर्वागम में कहा है । तथा यह पांच प्रकारका विवेक द्रव्य और भावके भेदसे दो प्रकार है ॥१७०॥


अहवा सरीरसेज्जा संथारुवहीण भत्तपाणस्स ।
वेज्जावच्चकराण य होइ विवेगो तहा चेव ॥१७१॥

अर्थ: अथवा शरीर विवेक, वसति विवेक, संस्तर विवेक, उपधि विवेक, भक्तपान विवेक, और वैयावृत्य करने वालोंका विवेक, द्रव्य और भाव रूप होता है ॥१७१॥


सव्वत्थ दव्वपज्जयममत्तसंगविजढो पणिहिदप्पा ।
णिप्पणयपेमरागो उवेज्ज सव्वत्थ समभावं ॥१७२॥

अर्थ: सर्व देशमें प्रतिनिहित आत्मा द्रव्य और पर्यायोंमें ममतारूपी परिग्रहसे रहित, प्रणय, प्रेम और रागसे रहित सर्वत्र समभावको प्राप्त होता है ॥१७२॥


जा उवरि उवरि गुणपडिवत्ती सा भावदो सिदी होदि ।
दव्वसिदी णिस्सेणी सोवाणं आरुहंतस्स ॥१७३॥

अर्थ: जो ऊपर-ऊपर गुणोंकी प्रतिपत्ति है वह भावसे श्रिति है। ऊपर चढ़ने वाले के नसैनी सीढ़ी आदि द्रव्य श्रिति है ॥१७३॥


सल्लेहणं करेंतो सव्वं सुहसीलयं पयहिदूण ।
भावसिदिमारुहित्ता विहरेज्ज सरीरणिव्वण्णो ॥१७४॥

अर्थ: सल्लेखना करता हुआ शरीरसे विरक्त साधु सब सुखशीलताको मन वचन कायसे त्यागकर भावश्रिति पर आरोहण करके विहार करे ॥१७४॥


दव्वसिदिं भावसिदिं अणुओगवियाणया विजाणंता ।
ण हु उड्ढगमणकज्जे हेट्ठिल्लपदं पसंसंति ॥१७५॥

अर्थ: द्रव्यश्रितिके भावश्रितिके स्वरूपको विशेष रूपसे जानने वाले तथा आचारांगके ज्ञाता ऊर्ध्वगमन रूप कार्यमें नीचे पैर रखना प्रशंसनीय नहीं ही मानते ॥१७५॥


गणिणा सह संलाओ कज्जं पइ सेसएहिं साहूहिं ।
मोणं से मिच्छजणे भज्जं सण्णीसु सजणे य ॥१७६॥

अर्थ: शुभ परिणामोंकी श्रेणि पर आरूढ़ साधुको आचार्यके ही साथ वार्तालाप करना चाहिये । कार्य हो तो शेष साधुओंसे वार्तालाप करे । मिथ्यादृष्टिजनोंमें मौन रहे । शान्त परिणामी मिथ्यादृष्टियोंमें और अपने ज्ञातिजनोंमें मौन करे, न भी करे ॥१७६॥


सिदिमारुहित्तु कारणपरिभुत्तं उवधिमणुवधिं सेज्जं ।
परिकम्मादिउवहदं वज्जित्ता विहरदि विदण्हू ॥१७७॥

अर्थ: क्रमका ज्ञाता मुनि शुभ परिणामों की श्रेणिपर चढ़कर किसी कारणवश व्यवहार में आई परिग्रहको और ईषत् उपधिरूप वसतिको तथा जो लीपने-पोतने अयोग्य है, उसे त्याग कर तपश्चरण करता है ॥१७७॥


तो पच्छिमंमि काले वीरपुरिससेवियं परमघोरं ।
भत्तं परिजाणंतो उवेदि अब्भुज्जदविहारं ॥१७८॥

अर्थ: उस श्रितिके अन्तिम समयमें वीर पुरुषोंके द्वारा आचरित अतिकठिन आहारको त्याग देनेका इच्छुक वह मुनि सम्यग्दर्शन आदि परिणामोंकी अभिमुखतामें तत्पर विहारको प्राप्त होता है । अर्थात् रत्नत्रयकी मुख्यताको लिये हुए आचरण करता है ॥१७८॥


इत्तिरियं सव्वगणं विधिणा वित्तिरिय अणुदिसाए दु ।
जहिदूण संकिलेसं भावेइ असंकिलेसेण ॥१७९॥

अर्थ: तत्काल गुरुके पश्चात् जो संघका पालन करता है उसे, विधिपूर्वक समस्त संघको सौंपकर संक्लेशको छोड़कर असंक्लेशसे आत्माको भाता है ॥१७९॥


जावंतु केइ संगा उदीरया होति रागदोसाणं ।
ते वज्जितो जिणदि हु रागं दोसं च णिस्सङ्गो ॥१८०॥

अर्थ: जितना कोई परिग्रह रागद्वेषकी उदीरणा करने वाला होता है, उसे छोड़ता हुआ निस्संग होकर राग और द्वेष को निश्चयसे जीतता है ॥१८०॥


कन्दप्पदेवखिब्भिस अभिओगा आसुरी य सम्मोहा ।
एसा हु सङ्किलिट्ठा पञ्चविहा भावणा भणिदा ॥१८१॥

अर्थ: कन्दर्पदेवगति, किल्बिषदेवगति, आभियोग्यदेवगति, असुरदेवगति और सम्मोहदेवगतिके कारण भूत आत्म परिणाम यह निश्चयसे पाँच प्रकारकी संक्लिष्ट भावना कही है ॥१८१॥


कंदप्पकुक्कुआइय चलसीलो णिच्चहासणकहोय ।
विब्भाविंतो य परं कंदप्पं भावणं कुणइ ॥१८२॥

अर्थ: कन्दर्प कौत्कुच्य आदिसे चलशील, और सदा हास्य कथा करनेमें तत्पर, दूसरेको वेस्मयमें डालने वाला कन्दर्प भावनाको करता है ॥१८२॥


णाणस्स केवलीणं धम्मस्साइरिय सव्वसाहूणं ।
माइय अवण्णवादी खिब्भिसियं भावणं कुणइ ॥१८३॥

अर्थ: जो ज्ञानके, केवलियोंके, धर्मके, आचार्यों और सर्व साधुओंके विषयमें मायाचार करता है, झूठा दोष लगाता है वह किल्विषक भावनाको करता है ॥१८३॥


मंताभिओगकोदुगभूदीयम्मं पउंजदे जो हु ।
इड्ढिरससादहेदुं अभिओगं-भावणं कुणइ ॥१८४॥

अर्थ: जो द्रव्यलाभ, मिष्टरस और सुखके लिए मंत्राभियोग - भूत आदि बुलाना, कौतुक - अकालमें वर्षा आदि दिखलाना और बच्चोंकी रक्षाके लिये भभूत देना आदि करता है वह अभियोग्य भावना करता है ॥१८४॥


अणुबद्धरोसविग्गहसंसत्ततवो णिमित्तपडिसेवी ।
णिक्किवणिराणुतावी आसुरियं भावणं कुणदि ॥१८५॥

अर्थ: अनुबद्ध क्रोध और कलहसे जिसका तप संयुक्त है, ज्योतिष आदिसे आजीविका करता है, निर्दय है, दूसरेको कष्ट देकर भी पश्चात्ताप नहीं करता वह आसुरी भावनाको करता है ॥१८५॥


उम्मग्गदेसणो मग्गदूसणो मग्गविप्पडिवणी य ।
मोहेण य मोहिंतो संमोहं भावणं कुणइ ॥१८६॥

अर्थ: जो मिथ्यात्व या असंयमका उपदेश देता है, मार्गको दूषण लगानेवाला है और रत्नत्रयका विरोधी है, अज्ञानसे मूढ़ है वह सम्मोह भावनाको करता है ॥१८६॥ उस मार्गको दूषण लगाना । यथा - ज्ञानसे ही मोक्ष होता है, दर्शन और चारित्रसे क्या लाभ । अथवा चारित्र ही मोक्षका उपाय है, ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है । ऐसा कहनेवाला मार्गका दूषक होता है । अथवा मार्गका ज्ञान करानेवाला श्रुतमार्ग है उसका जो दूषक है - मिथ्या व्याख्यान करता है । ‘मग्गविप्पडिवण्णी’ - रत्नत्रयात्मक मार्गमें विप्रतिपन्न है । यह मुक्तिका मार्ग नहीं है ऐसा मानकर उसके विरुद्ध आचरण करता है और मोह अर्थात् संशय विपर्ययरूप अज्ञानसे मोहित है । वह तीव्रकामी और रागी नीच देवोंमें उत्पन्न होता है ॥१८६॥


एदाहिं भावणाहिं य विराधओ देवदुग्गदिं लहइ ।
तत्तो चुदो समाणो भमिहिदि भवसागरमणंतं ॥१८७॥

अर्थ: रत्नत्रयसे च्युत हुआ व्यक्ति इन भावनाओंसे देवोंमें जो दुष्टगति है उसे प्राप्त करता है । उस देवदुर्गतिसे च्युत होकर अन्तरहित संसार समुद्रमें भ्रमण करता है ॥१८७॥


एदाओ पंच वि वज्जिय इणमो छट्ठीए विहरदे धीरो ।
पंचसमिदो तिगुत्तो णिस्संगो सव्वसंगेसु ॥१८८॥

अर्थ: इन पाँचों ही भावनाओंको त्याग कर यह धीर यति छठी भावनामें प्रवृत्त होता है । जो पाँच समितियोंको पालता है, तीन गुप्तियोंसे सुशोभित है और सब परिग्रहोंमें आसक्ति रहित है । अर्थात् छठी भावनामें प्रवृत्त होनेके योग्य ऐसा यति ही होता है ॥१८८॥


तवभावणा य सुदसत्तभावणेगत्तभावणा चेव ।
धिदिबलविभावणाविय असंकिलिद्ठावि पंचविहा ॥१८९॥

अर्थ: असंक्लिष्ट अर्थात् संक्लेशरहित भावना भी पाँच प्रकारकी है - तप भावना, श्रुतभावना, सत्त्व भावना, एकत्वभावना और धृतिबल भावना ॥१८९॥


तवभावणाए पंचेंदियाणि दंताणि तस्स वसमेंति ।
इंदियजोगायरिओ समाधिकरणाणि सो कुणइ ॥१९०॥

अर्थ: गा० द्रव्य और भावरूप तपकी भावनासे पाँचों इन्द्रियाँ दमित होकर उस तप भावनावालेके वशमें हो जाती हैं । इन्द्रियोंको शिक्षा देनेवाला वह आचार्य रत्नत्रयका समाधान करनेवाली क्रियाएँ करता है ॥१९०॥


इंदियसुहसाउलओ घोरपरीसहपराजियपरस्सो ।
अकदपरियम्म कीवो मुज्झदि आराहणाकाले ॥१९१॥

अर्थ: जो इन्द्रिय सुखके स्वादमें आसक्त है, भूख आदिकी दुःसह परीषहोंसे हारकर रत्नत्रयसे विमुख हुआ है, जिसने परिकर्म-आराधनाके योग्य तप नहीं किया है वह दीन आराधना के कालमें विचित्त हो जाता है उसका मन इधर-उधर भटकता है ॥१९१॥


जोग्गमकारिज्जंतो अस्सो सुहलालिओ चिरं कालं ।
रणभूमीए वाहिज्जमाणओ जह ण कज्जयरो ॥१९२॥

अर्थ: जैसे जिस घोड़ेको शब्दके संकेत पर चलने, भ्रमण, लंघन आदिकी शिक्षा नहीं दी गई है और चिरकाल तक सुखपूर्वक लालन पालन किया गया है वह घोड़ा युद्धभूमिमें सवारीके लिये ले जाया गया कार्य नहीं करता वैसे ही यति भी जानना ॥१९२॥


पुव्वमकारिदजोगो समाधिकामो तहा मरणकाले ।
ण भवदि परीसहसहो विसयसुहे मुच्छिदो जीवो ॥१९३॥

अर्थ: जिसने पूर्व कालमें तप नहीं किया और विषय सुखमें आसक्त रहा वह जीव मरते समय समाधिकी कामना करता हुआ उस प्रकार परीषहको सहन करनेवाला नहीं होता ॥१९३॥


जोग्गं कारिज्जंतो अस्सो दुहभाविदो चिरं कालं ।
रणभूमीए वाहिज्जमाणओ कुणदि जह कज्जं ॥१९४॥

अर्थ: जैसे योग्य शिक्षाको प्राप्त अश्व चिरकाल तक दुःखसे भावित हुआ, अर्थात् कष्ट सहनेका अभ्यासी युद्धभूमिमें सवारीमें ले जाने पर कार्य करता है ॥१९४॥


पुव्वं कारिदजोगो समाधिकामो तहा मरणकाले ।
होदि हु परीसहसहो विसयसुहपरम्मुहो जीवो ॥१९५॥

अर्थ: उसी प्रकार पूर्वमें तप करनेवाला विषय सुखसे विमुख जीव मरते समय समाधिका इच्छुक हुआ निश्चयसे परीषहको सहनेवाला होता है ॥१९५॥


सुदभावणाए णाणं दंसणतवसंजमं च परिणवइ ।
तो उवओगपइण्णा सुहमच्चविदो समाणेइ ॥१९६॥

अर्थ: श्रुतभावनासे सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, तप और संयमरूप परिणमन करता है। ज्ञान भावनासे उपयोगकी प्रतिज्ञाको सुखपूर्वक अचलित होता हुआ समाप्त करता है ॥१९६॥


जदणाए जोगपरिभाविदस्स जिणवयणमणुगदमणस्स ।
सदिलोवं कादुं जे ण चयंति परीसहा ताहे ॥१९७॥

अर्थ: तब यत्नसे अपनेको तपसे भावित करनेवालेके तथा जिनागमके अनुगत चित्तवालेके स्मृतिका लोप करनेमें परीषह समर्थ नहीं होती ॥१९७॥


देवेहिं भीसिदो वि हु कयावराधो व भीमरूवेहिं ।
तो सत्तभावणाए वहइ भरं णिब्भओ सयलं ॥१९८॥

अर्थ: देवोंके द्वारा पीड़ित किया गया भी अथवा भयंकर जीवोंके द्वारा सताया गया यति सत्त्वभावनाके द्वारा दुःख सहन करनेसे निडर होकर संयमके समस्त भारको वहन करता है ॥१९८॥


बहुसो वि जुद्धभावणाय ण भडो हु मुज्झदि रणम्मि ।
तह सत्तभावणाए ण मुज्झदि मुणी वि उवसग्गे ॥१९९॥

अर्थ: अनेक प्रकारकी भी युद्ध सम्बन्धी भावनासे जैसे योद्धा युद्धमें नहीं ही मोहित होता अर्थात् युद्धसे नहीं डरता । वैसे ही मुनि भी सत्त्वभावनासे उपसर्ग आनेपर मोहित नहीं होता ॥१९९॥


खणणुत्तावणवालणवीयणविच्छेयणावरोहत्तं ।
चिंतिय दुह अदीहं मुज्झदि णो सत्तभाविदो दुक्खे ॥२००॥

अर्थ: खोदना, जलना, बहना, छेदना, रोपनाको विचारकर सत्त्वभावनायुक्त मुनि दुःखमें अल्पकालीन दुःखसे मोहित नहीं होता अर्थात् नहीं डरता ॥२००॥


बालमरणाणि साहू सुचिंतिदूणप्पणो अणंताणि ।
मरणे समुट्ठिए विहि मुज्झइ णो सत्तभावणाणिरदो ॥२०१॥

अर्थ: सत्त्वभावनामें लीन साधु अपने अनन्त बालमरणोंको सम्यकरूपसे विचारकर मरणके उपस्थित होनेपर भी मोहित नहीं होता ॥२०१॥


एयत्तभावणाए ण कामभोगे गणे सरीरे वा ।
सज्जइ वेरग्गमणो फासेदि अणुत्तरं धम्मं ॥२०२॥

अर्थ: एकत्व भावनासे कामभोगमें, संघमें अथवा शरीरमें आसक्ति नहीं करता । वैराग्यमें मन रमाये हुए सर्वोत्कृष्ट चारित्रको अपनाता है ॥२०२॥


भयणीए विधम्मिज्जंतीए एयत्तभावणाए जहा ।
जिणकप्पिदो ण मूढो खवओ वि ण मुज्झइ तधेव ॥२०३॥

अर्थ: जैसे अयोग्य आचरण करनेवाली अपनी बहनमें जिनकल्पको धारण करनेवाला नागदत्त नामक मुनि एकत्व भावनासे मोहको प्राप्त नहीं हुआ । वैसे ही क्षपक भी मोहको प्राप्त नहीं होता ॥२०३॥


कसिणा परीसहचमू अब्भुट्ठइ जइ वि सोवसग्गा वि ।
दुद्धरपहकरवेगा भयजणणी अप्पसत्ताणं ॥२०४॥

अर्थ: दुःखदायी संकटके वेग सहित, अल्प शक्तिवालोंको भय पैदा करनेवाली भूख आदि बाईस परीषहोंकी समस्त सेना जिसके साथमें चार प्रकारके उपसर्ग भी हैं, यदि सन्मुख खड़ी हो ॥२०४॥


धिदिधणिदबद्धकच्छो जोधेइ अणाइलो तमच्चाई ।
धिदिभावणाए सूरो संपुण्णमणोरहो होई ॥२०५॥

अर्थ: धैर्यके साथ दृढ़तापूर्वक कमरको बाँधनेवाला शूर बिना किसी घबराहटके धृति भावनासे उस सेनासे अत्यन्त युद्ध करता है । फलस्वरूप उसका मनोरथ सम्पूर्ण होता है ॥२०५॥


एयाए भावणाए चिरकालं हि विहरेज्ज सुद्धाए ।
काऊण अत्तसुद्धिं दंसणणाणे चरित्ते य ॥२०६॥

अर्थ: इस शुद्ध पाँच प्रकारकी भावनासे आत्माकी शुद्धि करके सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रयमें चिरकालतक विहार करना चाहिए ॥२०६॥


एवं भावेमाणो भिक्खू सल्लेहणं उवक्कमइ ।
णाणाविहेण तवसा बज्झेणब्भंतरेण तहा ॥२०७॥

अर्थ: उक्त प्रकारसे भावना भानेवाला भिक्षु नाना प्रकारके बाह्य और अभ्यन्तर तपसे सल्लेखनाको प्रारम्भ करता है ॥२०७॥


सल्लेहणा य दुविहा अब्भंतरिया य बाहिरा चेव ।
अब्भंतरा कसायेसु बाहिरा होदि हु सरीरे ॥२०८॥

अर्थ: सल्लेखनाके दो भेद हैं अभ्यन्तर और बाह्य । अभ्यन्तर सल्लेखना क्रोध आदि कषायकी होती है, बाह्य सल्लेखना शरीरके विषयमें होती है ॥२०८॥


सव्वे रसे पणीदे णिज्जूहित्ता दु पत्तलुक्खेण ।
अण्णदरेणुवधाणेण सल्लिहइ य अप्पयं कमसो ॥२०९॥

अर्थ: बलको बढ़ानेवाले सब रसोंको त्यागकर प्राप्त हुए रूखे आहारसे कोई एक नियम विशेष लेकर अपने शरीरको क्रमसे कृश करता है ॥२०९॥


अणसण अवमोयरियं चाओ य रसाण वुत्तिपरिसंखा ।
कायकिलेसो सेज्जा य विवित्ता बाहिरतवो सो ॥२१०॥

अर्थ: अनशन, अवमौदर्य, रसोंका त्याग वृत्तिपरिसंख्यान, कायक्लेश और विविक्त शय्या ये बाह्य तप हैं ॥२१०॥


अद्धाणसणं सव्वाणसणं दुविहं तु अणसणं भणियं ।
विहरंतस्स य अद्धाणसणं इदरं च चरिमंते ॥२११॥

अर्थ: अद्धानशन और सर्वानशन इस प्रकार अनशन दो ही प्रकारका कहा है । ग्रहण और प्रतिसेवनाकालमें वर्तमानके अद्धानशन होता है और मरण समय में सर्वानशन होता है ॥२११॥


होइ चउत्थं छट्ठट्ठमाइ छम्मासखवणपरियंतो ।
अद्धाणसणविभागो एसो इच्छाणुपुव्वीए ॥२१२॥

अर्थ: चतुर्थ षष्ठ आदिसे छह मासके उपवास पर्यन्त यह अद्धानशनके भेद होते हैं । ये मुनिगण अपनी इच्छाके अनुसार करते हैं ॥२१२॥


बत्तीसं किर कवला आहारो कुक्खिपूरणो होइ ।
पुरिसस्स महिलियाए अट्ठावीसं हवे कवला ॥२१३॥

अर्थ: बत्तीस ग्रास प्रमाण आहार पुरुषके पेटको पूरा भरनेवाला होता है । स्त्रियोंके कुक्षिपूरक आहारका परिमाण अट्ठाइस ग्रास होता है ॥२१३॥


एगुत्तरसेढीए जावय कवलो वि होदि परिहीणो ।
ऊमोदरियतवो सो अद्धकवलमेव सिच्छं च ॥२१४॥

अर्थ: पुरुष और स्त्रीके उक्त आहारमेंसे एक दो आदि ग्रासकी हानिके क्रमसे जब तक एक ग्रास मात्र भी शेष होता है वह अवमौदर्य तप है । जब तक अर्धग्रास ही अवशिष्ट रहे या एक सिक्थ शेष रहे तब तक भी अवमौदर्य तप है ॥२१४॥


चत्तारि महावियडीओ होंति णवणीदमज्जमंसमहू ।
कंखापसंगदप्पाऽसंजमकारीओ एदाओ ॥२१५॥

अर्थ: चार महाविकृतियाँ होती हैं, मक्खन, मद्य, मांस और मधु । ये गृद्धि, प्रसंग, दर्प, और असंयमको करते हैं ॥२१५॥


आणाभिकंखिणावज्जभीरुणा तवसमाधिकामेण ।
ताओ जावज्जीवं णिज्जूढाओ पुरा चेव ॥२१६॥

अर्थ: सर्वज्ञकी आज्ञाके प्रति आदरवान, पाप भीरु और तपमें एकाग्रताके अभिलाषीने वे महाविकृतियाँ सल्लेखनाके समयसे पूर्व ही जीवन पर्यन्तके लिये ( णिज्जूढाओ ) त्याग दी है ॥२१६॥


खीरदधिसप्पितेल्लगुडाण पत्तेगदो व सव्वेसिं ।
णिज्जूहणमोगाहिम पणकुसणलोणमादीणं ॥२१७॥

अर्थ: दूध, दही, घी, तेल, गुड़का और घृत पूर, पुवे, पत्रशाक, सूप और लवण आदिका सबका अथवा एक-एकका त्याग रस परित्याग है । अर्थात् सल्लेखना कालमें दूध आदि सबका या इनमेंसे यथायोग्य दो तीन चारका त्याग रस परित्याग है ॥२१७॥


अरसं च अण्णवेलाकदं च सुद्धोदणं च लुक्खं च ।
आयंबिलमायामोदणं च विगडोदणं चेव ॥२१८॥

अर्थ: स्वाद रहित अन्य समयमें बनाया गया अर्थात् ठण्डा भोजन, और शुद्ध भात जिसमें कोई अन्य शाक वगैरह न मिला हो, और रूखा भोजन जिसमें घी आदि न हो, आचाम्ल अर्थात् कांजी मिश्रित भात, थोड़ा जल और बहुत चावल वाला भात, और बहुत अधिकपका भात ॥२१८॥


इच्चेवमादि विविहो णायव्वो हवदि रसपरिच्चाओ ।
एस तवो भजिदव्वो विसेसदो सल्लिहंतेण ॥२१९॥

अर्थ: इत्यादि अनेक प्रकारका रस परित्याग सबको जानने योग्य है । शरीर सल्लेखना करने वालेको यह रस परित्याग नामक तप विशेष रूपसे सेवन करना चाहिये ॥२१९॥


गत्तापच्चागदं उज्जुवीहि गोमुत्तियं च पेलवियं ।
सम्बूकावट्टंपि पदंगवीधी य गोयरिया ॥२२०॥

अर्थ: और भ्रमण करते हुए भिक्षा मिली तो ग्रहण करूँगा अन्यथा नहीं । ‘पदंगवीधी’ - पक्षियोंकी पंक्ति जैसे भ्रमण करती है उस तरह भ्रमण करते हुए यदि भिक्षा मिली तो मैं ग्रहण करूँगा । गोयरिया’ - गोचरी भिक्षाके अनुसार भ्रमण करते हुए भिक्षा मिलेगी तो ग्रहण करूँगा । इस प्रकारके संकल्प करनेको वृत्ति परिसंख्यान कहते हैं २२०॥


पाडयणियंसणभिक्खा परिमाणं दत्तिघासपरिमाणं ।
पिंडेसणा य पाणेसणा य जागूय पुग्गलया ॥२२१॥

अर्थ: ‘पाडयनिगंसण’ - इसी ही फाटकमें प्रवेश करके मिली हुई भिक्षाको ग्रहण करूँगा, अन्य फाटकमें नहीं । एक ही फाटकमें प्रवेश करूँगा या दो में ही प्रवेश करूँगा । 'अमुक घरसे लगी हुई भूमिमें प्रवेश करूँगा, घरमें नहीं जाऊँगा ? इस प्रकारको प्रतिज्ञाको णियंसण कहते हैं । ऐसा कोई कहते हैं । दूसरोंका कहना है कि पाटकी भूमिमें ही प्रवेश करूँगा, पाटके घरोंमें प्रवेश नहीं करूँगा इस प्रकारके संकल्पको ‘पाटकाणियंसण’ कहते हैं । ‘भिक्षा परिमाण’ - एक ही भिक्षा या दो ही भिक्षा ग्रहण करूँगा, अधिक नहीं । ‘दत्तिघास परिमाण’ - एक के ही द्वारा देने पर या दो के ही द्वारा देनेपर भिक्षा ग्रहण करूँगा । अथवा दाताके द्वारा लाई गई भिक्षामेंसे भी इतने ही ग्रास ग्रहण करूँगा ऐसा परिमाण करना । ‘पिंडेसणा’ - पिण्ड रूप भोजन ही ग्रहण करूँगा । ‘पाणेसणा’ - जो बहुत द्रव होनेसे पीने योग्य होगा वही ग्रहण करूँगा । ‘जागूय’ यवागू ही ग्रहण करूँगा । ‘पुग्गलया’ - चना मसूर आदि धान्य ही ग्रहण करूँगा ॥२२१॥


संसिट्ठ फलिह परिखा पुप्फोवहिदं व सुद्धगोवहिदं ।
लेवडमलेवडं पाणायं च णिस्सित्थगं ससित्थं ॥२२२॥

अर्थ: ‘संसिट्ठ’ - जो शाक कुल्माष आदि व्यंजनसे मिला हुआ हो । ‘फलिह’ - जिसके चारो ओर शाक रखा हो और बीचमें भात हो । ‘परिखा’ - चारो ओर व्यंजन हो बीचमें अन्न रखा हो । ‘पुप्फोवहिद’ - व्यंजनोके मध्यमें पुष्पावलीके समान चावल रखे हो । ‘सुद्धगोवहिद’ - शुद्ध अर्थात् बिना कुछ मिलाये अन्नसे ‘उपहित’ अर्थात् मिले हुए शाक व्यंजन आदि । ‘लेवड’ जिससे हाथ लिप जाये । ‘अलेवड’ जो हाथसे न लिप्त हो । सिक्थ सहित पेय और सिक्थ रहित पेय । ऐसा भोजन मिलेगा तो ग्रहण करूँगा ऐसा संकल्प करता है ॥२२२॥


पत्तस्स दायगस्स य अवग्गहो बहुविहो ससत्तीए ।
इच्चेवमादिविविहा णादव्वा वुत्तिपरिसंखा ॥२२३॥

अर्थ: ‘पत्तस्स’ - इसी प्रकार सोने, चाँदी, कांसी या मिट्टीके पात्रसे ही लाया गया भोजन ग्रहण करूँगा । ‘दायगस्स’ - स्त्रीसे ही, उसमें भी बालिकासे या युवतीसे या वृद्धासे अथवा अलंकार सहित स्त्री या अलंकार रहित स्त्रीसे या ब्राह्मणीसे या राजपुत्रीसे दिया गया आहार ही ग्रहण करूँगा । इस तरह बहुत प्रकार के अभिग्रह अपनी शक्तिके अनुसार होते हैं । ये सब विविध वृत्ति परिसंख्यान जानना चाहिये ॥२२३॥


अणुसूरी पडिसूरी य उड्ढसूरी य तिरियसूरी य ।
उब्भागेण य गमणं पडिआगमणं च गंतूणं ॥२२४॥

अर्थ: ‘अणुसूरि’ - जिस दिन कड़ी धूप हो सूरजको पीछे करके पूरब दिशासे पश्चिम दिशाकी ओर जाना । ‘पडिसूरि’ - पश्चिम दिशासे सूरजकी ओर मुख करके गमन करना । ‘उड्ढसूरी’ - सूरजके ऊपर आ जाने पर गमन करना, ‘तिरियसूरी’ - सूरजको एक ओर रखते हुए गमन करना । ‘उब्भागेण गमण’ - जिस ग्राममें मुनि ठहरे हों उस ग्रामसे दूसरे गाँवमें भिक्षाके लिये जाना । ‘गंतूण पडिआगमण’ - जाकर लौट आना ये सब काय क्लेश तप है ॥२२४॥


साधारणं सवीचारं सणिरुद्धं तहेव वोसट्टं ।
समपादमेगपादं गिद्धोलीणं च ठाणाणि ॥२२५॥

अर्थ: ‘साधारण’ - चिकने स्तम्भ आदिका आश्रय लेकर खड़े होना । सवीचार - पूर्व स्थानसे दूसरे स्थान पर जाकर कुछ काल तक खड़े रहना । ‘सणिरुद्ध’ - अपने स्थान पर ही निश्चल स्थित होना । ‘वोसट्ट’ - कायोत्सर्ग करना । समपाद - दोनों पैर बराबर करके खड़े होना । ‘एगपाद’ - एक ही पैर से खड़े होना । ‘गिद्धोलीण’ - जैसे गिद्ध उड़ते समय अपने दोनों पंख फैलाता है उस तरह दोनों हाथ फैलाकर खड़े होना ॥२२५॥


समपलियंकणिसेज्जा समपदगोदोहिया य उक्कुडिया ।
मगरमुह हत्थिसुण्डी गोणिसेज्जद्धपलियङ्का ॥२२६॥

अर्थ: ‘समपलियंकणिसेज्जा’ - सम्यक् पर्यंकासनसे बैठना । ‘समपद’ - जांघे और कटि भागको सम करके बैठना । ‘गोदोहिगा’ गौ दूहते समय जैसा आसन होता है वैसे आसनसे बैठना । ‘उक्कुडिया’ - ऊपरको संकुचित आसनसे बैठना अर्थात् दोनों पैरोंको जोड़ भूमिको न छूते हुए बैठना । ‘मगरमुह’ - मगरके मुखकी तरह पैर करके बैठना । 'हत्थिसुंडी - हाथीके सूँड फैलानेकी तरह एक पैर फैलाकर बैठना । दूसरों का कहना है कि हाथ फैलाकर बैठना हत्थिसूँडी है । ‘गोणिसेज्ज’ दोनों जंघाओंको संकोच कर गायकी तरह बैठना । और अर्धपर्यंकासन । ये सब कायक्लेश के आसन हैं ॥२२६॥


वीरासणं च दण्डायउड्ढसाई य लगडसाई य ।
उत्ताणो मच्छिय एगपाससाई य मडयसाई य ॥२२७॥

अर्थ: दोनों जंघाओंको दूर रखकर आसन वीरासन है । आगे शयनके भेद करते हैं - दण्डेके समान शरीरको लम्बा करके सोना । खड़े होकर सोना । इसे ऊर्ध्वशायी कहते हैं । ‘लगण साई’ - शरीरको संकुचित करके सोना । उत्ताण - ऊपरको मुख करके सोना । ओमच्छिय-मस्तक नीचे करके सोना अर्थात् नीचे मुख करके सोना । एक करवटसे सोना । मडयसाइ - मृतककी तरह निश्चेष्ट सोना ॥२२७॥


अब्भावगाससयणं अणिट्ठुवणा अकंडुगं चेव ।
तणफलयसिलाभूमी सेज्जा तह केसलोचो य ॥२२८॥

अर्थ: ‘अब्भवगास सयणं’ - बाहर खुले आकाशमें सोना । ‘अणिट्ठिवणगं’ - थूकना नहीं । अकंडूतगं - खुजाना नहीं । तथा तृण, काठका पटिया, शिला, या भूमिपर सोना और केसलोच ॥२२८॥


अब्भुट्ठणं च रादो अण्हाणमदंतघोवणं चेव ।
कायकिलेसो एसो सीदुण्हादावणादी य ॥२२९॥

अर्थ: रातमें शयन नहीं करना अर्थात् जागना । स्नान नहीं करना । दांतोको नहीं धोना, उनकी सफाई नहीं करना । और शीतकालमें तथा गर्मीमें आतपन योग करना इत्यादि यह कायक्लेश है ॥२२९॥


जत्थ ण विसोत्तिग अत्थि दु सद्दरसरूवगन्धफासेहिं ।
सज्झायज्झाणवाघादो वा वसधी विवित्ता सा ॥२३०॥

अर्थ: जिस वसतिमें मनोज्ञ या अमनोज्ञ शब्द, रस, रूप गन्ध और स्पर्शके द्वारा अशुभ परिणाम नहीं होते । अथवा स्वाध्याय और ध्यानमें व्याघात नहीं होता वह विविक्त वसति है ॥२३०॥


वियडाए अवियडाए समविसमाए बहिं च अन्तो वा ।
इत्थिणउंसयपसुवज्जिदाए सीदाए उसिणाए ॥२३१॥

अर्थ: वह वसति खुले द्वार वाली हो अथवा बन्द द्वार वाली हो । उसकी भूमि सम हो अथवा ऊँची नीची हो । वह बाहरके भागमें हो अथवा अन्दरके भागमें हो । स्त्री नपुंसक और पशुओंसे रहित हो ठंडी हो या गर्म हो ॥२३१॥


उग्गमउप्पादणएसणाविसुद्धाए अकिरियाए दु ।
वसति असंसत्ताए णिप्पाहुडियाए सेज्जाए ॥२३२॥

अर्थ: गा० उद्गम, उत्पादन और एषणा दोषोंसे रहित, दुःप्रमार्जन, आदि संस्कारसे रहित, जीवोंकी उत्पत्तिसे रहित, शय्यारहित वसतिकामें अन्दर या बाहरमें विविक्त शयनासन तपके धारी मुनि निवास करते हैं ॥२३२॥


सुण्णघरगिरिगुहारुक्खमूलआगंतुगारदेवकुले ।
अकदप्पब्भारारामघरादीणि य विवित्ताइं ॥२३३॥


कलहो बोलो झंझा वामोहो संकरो ममत्ति च ।
ज्झाणाज्झयणविघादो णत्थि विवित्ताए वसधीए ॥२३४॥

अर्थ: विविक्त वसतिमें कलह, शब्द बहुलता, संक्लेश, चित्तका व्यामोह, अयोग्य असंयमियोंके साथ सम्बन्ध, यह मेरी है ऐसा भाव, तथा ध्यान और अध्ययनमें व्याघात नहीं है ॥२३४॥


इय सल्लीणमुवगदो सुहप्पवत्तेहिं तत्थ जोएहिं ।
पंचसमिदो तिगुत्तो आदट्ठपरायणो होदि ॥२३५॥

अर्थ: इस प्रकार विविक्त वसतिमें निवास करनेसे विना क्लेशके सुखसे होनेवाले तप अथवा ध्यानके द्वारा बाह्यतपमें एकात्मताको प्राप्त यति पाँच समितियोंसे युक्त हुआ अशुभ मन वचनकायका निरोध करके आत्माके कार्यमें तत्पर होता है ॥२३५॥


जं णिज्जरेदि कम्मं असंवुडो सुमहदावि कालेण ।
तं संवुडो तवस्सी खवेदि अंतोमुहुत्तेण ॥२३६॥

अर्थ: असंवृत्त अर्थात् अशुभयोगका निरोध न करनेवाला यति महान् कालके द्वारा भी जिस कर्मकी बाह्य तपके द्वारा निर्जरा नहीं करता उस कर्मको संवृत् अर्थात् गुप्ति, समिति, धर्म अनुप्रेक्षा और परीषहजयको करनेवाला तपस्वी अति स्वल्पकालमें क्षय करता है ॥२३६॥


एवमवलायमाणो भावेमाणो तवेण एदेण ।
दोसेणिग्घादंतो पग्गहिददरं परक्कमदि ॥२३७॥

अर्थ: उक्तक्रमसे इस तपसे अपनेको तत्पर करता हुआ दुर्धरतपसे न डरकर रत्नत्रयको दूषित करनेवाले अशुभ परिणामोंको घातता है और अत्यन्त मुक्तिके मार्गमें चेष्टा करता है ॥२३७॥


सो णाम बाहिरतवो जेण मणो दुक्कडं ण उट्ठेदि ।
जेण य सड्ढा जायदि जेण य जोगा ण हायंति ॥२३८॥

अर्थ: उसीका नाम बाह्य तप है, जिस तपके करनेसे मन पापकी ओर नहीं जाता और जिस तपके करनेसे अभ्यन्तर तपमें श्रद्धा उत्पन्न हो और जिसके करनेसे पूर्वमें गृहीत योग-व्रत विशेष हीन नहीं होते । इस प्रकारका तप करना चाहिए ॥२३८॥


बाहिरतवेण होदि हु सव्वा सुहसीलदा परिच्चत्ता ।
सल्लिहिदं च सरीरं ठविदो अप्पा य संवेगे ॥२३९॥

अर्थ: बाह्य तपसे सब सुख शीलता छूट जाती है । क्योंकि सुख शीलता रागको उत्पन्न करती है । राग-रागको बढ़ाता है और कर्मबन्धके कारण दोषोंको लाता है । बन्ध-कर्मकी स्थितिमें हेतु है । इस तरह बाह्य तपसे अनर्थ करनेवाली यह सुखशीलता नष्ट होती है । शरीर दुःखका कारण है । उसको छोड़नेका उपाय है शरीरको कृश करना । बाह्य तपसे शरीर कृश होता है और स्वयं आत्मा संसारसे भीरुतामें स्थापित होती है ।


दंताणि इंदियाणि य समाधिजोगा य फासिदा होंति ।
अणिगूहिदवीरियओ जीविदतण्हा य वोच्छिण्णा ॥२४०॥

अर्थ: इन्द्रियाँ दान्त होती हैं । अनशन, अवमौदर्य और वृत्ति परिसंख्यान तप करनेसे जिह्वा दान्त होती है । विविक्त शय्यासन तपसे शेष इन्द्रियाँ दान्त होती हैं । जहाँ इन्द्रियोंको प्रिय लगनेवाले विषय नहीं हैं ऐसी बसतिमें रहनेसे इन्द्रियोंका निग्रह होता है । रत्नत्रयमें एकाग्रताको समाधि कहते हैं । समाधिमें योग अर्थात् सम्बन्ध स्पष्ट होते हैं । भोजन आदिका त्याग करनेसे विषयोंसे राग नहीं रहता । जो विषयरागसे सताया हुआ है वह रत्नत्रयमें नहीं लगता । रत्न- भयमें न लगनेसे व्याकुल होकर अशुभ परिणामोंमें ही लगता है। अपनी शक्तिको छिपाता नहीं [?] और वीर्याचारमें प्रवृत्त होता है। जीवनकी जो तृष्णा है वह भी नष्ट हो जाती है। जिसे जीने[?] तृष्णा है वह भोजनादिकका त्याग करना नहीं चाहता। जीवनकी तृष्णावाला जो कुछ भी असंय[?] आदि करके प्राणधारण करनेमें ही तत्पर रहता है, रत्नत्रयमें नहीं लगता ॥२४०॥


दुक्खं च भाविदं होदि अप्पडिबद्धो य देहरससुक्खे ।
मुसमूरिया कसाया विसएसु अणायरो होदि ॥२४१॥

अर्थ: दुःखका सहन होता है। बिना किसी संक्लेशके दुःख सहनेसे कर्मोंकी निर्ज[?] होती है। और क्रमसे होनेवाली निर्जरा समस्त कर्मोंके विनाशका उपाय है इसलिए दुःखभाव[?] उपयोगी है। दूसरे, बार-बार दुःखकी भावना करने वाला ध्यानमें निश्चल होता है। शरीर, र[?] और सुखमें अप्रतिबद्ध - अनासक्त होता है। इन तीनोंमें आसक्ति समाधिमें विघ्न करती है। अ[?] उसका निरास होता है। कषायोंका मर्दन होता है।


कदजोगदाददमणं आहारणिरासदा अगिद्धी य ।
लाभालाभे समदा तितिक्खणं बंभचेरस्स ॥२४२॥

अर्थ: ‘कद जोगदा’ - बाह्य तपसे मरणकालमें जो सर्व आहारका त्याग करना होता है उसका अभ्यास होता है । ‘आत्मदमण’ - आहार और सुखमें जो अनुराग है उसका प्रशमन होनेसे आत्माका दमन होता है । ‘आहारणिरासदा’ - प्रतिदिन आहार सम्बन्धी आशाके त्यागके अभ्यास-से आहारके विषयमें निराशा सम्पन्न होती है । अभिप्राय यह है कि समस्त आहारका त्याग करनेके कालमें भी आहार सम्बन्धी इच्छाका विनाश सुकर होता है । ‘अगिद्धीय’ - और आहारमें लंपटता नहीं रहती । जिसकी आहारमें गृद्धि है वह आहार पाकर उसे छोड़ नहीं सकता । ‘लाभालाभे समदा’ - लाभ और अलाभमें समता रहती है । आहारका लाभ होने पर हर्ष नहीं करता और अलाभमें क्रोध नहीं करता । जो स्वयं भी प्राप्त आहारको छोड़ देता है वह दूसरोंके न देने पर अपना मन खराब कैसे कर सकता है । ‘तितिक्खणं बंभचेरस्स’ - ब्रह्मचर्यको धारण करता है । रसीले आहारके त्यागसे नवीन वीर्यसंचय नहीं होता और अनशनसे संचितवीर्य क्षय होता है तब स्त्रीमें अनुराग नहीं होता । तथा जिन पुरुषोंमें वीर्यहीनता होती है उनके प्रति स्त्रियोंकी विमुखता प्रसिद्ध ही है ॥२४२॥


णिद्दाजओ य दढझाणदा विमुत्ती य दप्पणिग्घादो ।
सज्झायजोगणिव्विग्घदा य सुहदुक्खसमदा य ॥२४३॥

अर्थ: ‘णिद्दाजओय’ - निद्राजय होता है। जो प्रतिदिन भोजन करता है, रसीले आहार के सेवनमें तत्पर रहता है, बहुत भोजन करता है, उसे वायुके प्रकोपसे रहित, सुखकारक स्पर्शवाले उपद्रवहीन देशमें सोने पर गहरी नींद आती है, जिसके अधीन होकर वह चेतनाहीन जैसा हो जाता है और अशुभ परिणामोंके प्रवाहमें गिर जाता है। वह रत्नत्रयमें नहीं लगता। उस निद्राका जय होता है। ‘दढझाणदा’ दृढ़ ध्यान होता है। जिस यतिको दुःख सहनेका अभ्यास नहीं होता, वह दुःख पड़ने पर ध्यानसे विचलित हो जाता है। किन्तु तपका अभ्यासी भूख आदि परीषह आने पर सहता है। ‘विमुत्तीय’ विमुक्ति अर्थात् विशिष्ट त्याग करता है क्योंकि जो अनशन आदिमें तत्पर रहता है वह तो शरीर ही को छोड़ देता है और शरीर ही को छोड़ना कठिन होता है। ‘दप्पणिघादो’ - असंयमको करने वाला जो दर्प है उसका भी पूरी तरहसे घात होता है। ‘सज्झायजोगणिव्विग्घदाय’ - वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेशके साथ जो सम्बन्ध है उसमें कोई विघ्न नहीं होता। आहारके लिए भ्रमण करने वाला साधु कैसे स्वाध्याय कर सकता है। बहुत भोजन करने वाला तो ऊपरको मुख करके सोता है बैठ भी नहीं सकता। रसीला आहार खाने वाला आहारकी ऊष्मासे इधर-उधर करवटे बदलता है। जो बहुजन संकुल बसतिमें रहता है वह दूसरोंकी बातें सुनकर उनके साथ बातचीत करता है, स्वाध्याय नहीं करता। किन्तु एकान्त स्थानमें रहने वाला व्याकुलता रहित होकर स्वाध्याय करता है। ‘सुहदुक्खसमदाय’ - सुखसे हर्षित होना और दुःखसे दुःखी होना राग-द्वेष है। उनके बिना सुख-दुःख का अनुभव सुख-दुःख समता है। सुखके साधनभूत भोजन और रसोंको जो त्यागता है वह सुखमें रागको त्यागता है। भूख प्यासका कष्ट होने पर संक्लेश न होनेसे उसे दुःखमें द्वेष नहीं होता।


आदा कुलं गणो पवयणं च सोभाविदं हवदि सव्वं ।
अलसत्तणं च विजडं कम्मं च विणिद्धुयं होदि ॥२४४॥


बहुगाणं संवेगो जायदि सोमत्तणं च मिच्छाणं ।
मग्गो य दीविदो भगवदो य अणुपालिया आणा ॥२४५॥


देहस्स लाघव संवेगो जायदि सोमत्तणं च मिच्छाणं ।
जवणाहारो संतोसदा य जइसंभवेण गुणा ॥२४६॥


एवंउग्गमउप्पादणेसणासुद्धभत्तपाणेण ।
मिदलहुयविरसलुक्खेण य तवमेदं कुणदि णिच्चं ॥२४७॥

अर्थ: कहे अनुसार उद्गम, उत्पादन और एषणा दोषसे रहित भोजन और पानसे और परिमित, लघु, रसरहित और रूक्ष भोजन पानसे यह बाह्य तप नित्य यदि करता है। इसका भाव है कि इस प्रकारका शुद्ध आहार खाकर तप करना चाहिए। अशुद्ध आहार करके नहीं ॥२४७॥


उल्लीणोल्लीणेहिं य अहवा एक्कंतवड्ढमाणेहिं ।
सल्लिहइ मुणी देहं आहारविधिं पयणुगिंतो ॥२४८॥

अर्थ: वर्द्धमान या हीयमान अनशन आदि तपोंसे अथवा सर्वथा वर्द्धमान तपोंके द्वारा आहारकी विधिको अल्प करता हुआ मुनि शरीरको कृश करता है ॥२४८॥ करनेसे अवमौदर्यकी वृद्धि होती है । एक रसका, फिर दो रसका, फिर तीन रसका, इत्यादि क्रमसे त्याग करनेसे रसपरित्यागकी वृद्धि होती है । मैं एक पाटकमें या सात घरमें या तीन घरमें प्रवेश करूँगा । अथवा भिक्षाके ग्रासोंका परिमाण कम करनेसे वृत्तिपरिसंख्यान तपकी वृद्धि होती है । दिनमें आतापन योग करके रात्रिमें प्रतिमा योग धारण करने आदिसे कायक्लेशकी वृद्धि होती है । इस प्रकार करनेसे महान् श्रम होनेपर क्रमसे अनशन आदिमें कमी करता है । या फिर बढ़ाता ही जाता है और आहारको कम करके मुनि शरीरको कृश करता है ॥२४८॥


अणुपुव्वेणाहारं संवट्टंतो य सल्लिहइ देहं ।
दिवसुग्गहिएण तवेण चावि सल्लेहणं कुणइ ॥२४९॥

अर्थ: क्रमसे आहारको कम करते हुए शरीरको कृश करता है । और एक एक दिन ग्रहण किये तपसे, एक दिन अनशन, एक दिन वृत्तिपरिसंख्यान इस प्रकार सल्लेखनाको करता है ॥२४९॥


विविहाहिं एसणाहिं य अवग्गहेहिं विविहेहिं उग्गेहिं ।
संजममविराहिंतो जहाबलं सल्लिहइ देहं ॥२५०॥

अर्थ: नाना प्रकारके रस रहित भोजन, अल्प भोजन, सूखा भोजन, आचाम्ल भोजन आदिसे और नाना प्रकारके उग्र नियमोंसे दोनों प्रकारके संयमोंको नष्ट न करता हुआ यति अपने बलके अनुसार देहको कृश करता है ॥२५०॥


सदि आउगे सदि बले जाओ विविधाओ भिक्खुपडिमाओ ।
ताओ वि ण बाधंते जहाबलं सल्लिहंतस्स ॥२५१॥


सल्लेहणा सरीरे तवोगुणविधी अणेगहा भणिदा ।
आयंबिलं महेसी तत्थ दु उक्कस्सयं विंति ॥२५२॥

अर्थ: शरीरकी सल्लेखनाके निमित्त अनेक प्रकार तप नामक गुणके विकल्प पूर्व गाथाओं के द्वारा कहे हैं। उनमेंसे महर्षि आचाम्लको ही उत्कृष्ट कहते हैं ॥२५२॥


छट्ठट्ठमदसमदुवालसेहिं भत्तेहिं विदियअट्ठेहिं ।
मिदलहुगं आहारं करेदि आयंबिलं बहुसो ॥२५३॥

अर्थ: उत्कृष्ट दो दिन, तीन दिन, चार दिन और पाँच दिनके उपवासके बाद अधिकतर परिमित और लघु आहार आचाम्लको करते हैं ॥२५३॥


उक्कस्सएण भत्तपइण्णाकालो जिणेहिं णिद्दिट्ठो ।
कालम्मि संपहुत्ते बारसवरिसाणि पुण्णाणि ॥२५४॥

अर्थ: यदि आयुका काल अधिक शेष हो तो जिन भगवान्ने उत्कृष्टसे भक्त प्रत्याख्यानका काल पूर्ण बारह वर्ष कहा है ॥२५४॥


जोगेहिं विचित्तेहिं दु खवेइ संवच्छराणि चत्तारि ।
वियडी णिज्जूहित्ता चत्तारि पुणो वि सोसेदि ॥२५५॥

अर्थ: नाना प्रकारके कायक्लेशोंके द्वारा चार वर्ष बिताता है । दूध आदि रसोंको त्यागकर फिर भी चार वर्ष तक शरीरको सुखाता है ॥२५५॥


आयंबिलणिव्वियडीहिं दोण्णि आयबिलेण एक्कं च ।
अद्ध णादिविगट्ठेहिं अदो अद्धं विगट्ठेहिं ॥२५६॥

अर्थ: आचाम्ल और निर्विकृतिके द्वारा दो वर्ष बिताता है। आचाम्लके द्वारा एक वर्ष बिताता है। मध्यम तपके द्वारा शेष वर्षके छह माह और उत्कृष्ट तपके द्वारा शेष छह मास बिताता है ॥२५६॥


भत्तं खेत्तं कालं धादुं च पडुच्च तह तवं कुज्जा ।
वादो पित्तो सिंभो व जहा खोभं ण उवयंति ॥२५७॥

अर्थ: आहार, क्षेत्र, काल अपनी शारीरिक प्रकृतिको विचार कर इस प्रकार तप करना चाहिये जिस प्रकार वात पित्त और कफ क्षोभको प्राप्त न हों ॥२५७॥


एवं सरीरसल्लेहणाविहिं बहुविहा व फासेंतो ।
अज्झवसाणविसुद्धिं खणमवि खवओ ण मुंचेज्ज ॥२५८॥

अर्थ: उक्त क्रमसे नाना प्रकारकी शरीर सल्लेखनाकी विधिको करते हुए भी परिणामों को विशुद्धिको क्षपक एक क्षणके लिये भी न छोड़े ॥२५८॥


अज्झवसाणविसुद्धीए वज्जिदा जे तवं विगट्ठंपि ।
कुव्वंति बहिल्लेस्सा ण होइ सा केवला सुद्धी ॥२५९॥

अर्थ: परिणामोंकी विशुद्धिको छोड़कर जो उत्कृष्ट भी तप करते हैं उनकी चित्तवृत्ति पूजा सत्कार आदिमें ही लगी होती है । उनके अशुभ कर्मके आस्रवसे रहित शुद्धि नहीं होती । अर्थात् दोषोंसे मिली हुई शुद्धि होती है ॥२५९॥


अविगट्ठं पि तवं जो करेइ सुविसुद्धसुक्कलेस्साओ ।
अज्झवसाणविसुद्धो सो पावदि केवलं सुद्धिं ॥२६०॥

अर्थ: जो अतिविशुद्ध शुक्ललेश्यासे युक्त और विशुद्ध परिणामवाला अनुत्कृष्ट भी तप करता है वह केवल शुद्धिको पाता है । यह गाथाका अर्थ है ॥२६०॥


अज्झवसाणविसुद्धी कसायकलुसीकदस्स णत्थित्ति ।
अज्झवसाणविसुद्धी कसायसल्लेहणा भणिदा ॥२६१॥

अर्थ: जिसका चित्त कषायसे दूषित है उसके परिणाम विशुद्धि नहीं होती । इसलिये परिणाम विशुद्धिको कषाय सल्लेखना कहा है ॥२६१॥


कोधं खमाए माणं च मद्दवेणाज्जवेण मायं च ।
संतोसेण य लोहं जिणदु खु चत्तारि वि कसाए ॥२६२॥

अर्थ: टी० - क्रोधको क्षमासे, मानको मार्दवसे माया को आर्जवसे और लोभको सन्तोषसे, इस प्रकार चारों ही कषायोंको जीतो ॥२६२॥


कोहस्स य माणस्स य मायालोभाण सो ण एदि वसं ।
जो ताण कसायाणं उप्पत्तिं चेव वज्जेइ ॥२६३॥

अर्थ: टी० - जो उन कषायोंकी उत्पत्तिको ही रोक देता है वह मुनि क्रोध, मान, माया, लोभके वशमें नहीं होता ॥२६३॥


तं वत्थुं मोत्तव्वं जं पडि उप्पज्जदे कसायग्गी ।
तं वत्थुमल्लिएज्जो जत्थोवसमो कसायाणं ॥२६४॥

अर्थ: उस वस्तुको छोड़ देना चाहिए जिसको लेकर कषायरूपी आग उत्पन्न होती है। और उस वस्तुको अपनाना चाहिए जिसके अपनानेसे कषायोंका उपशम हो ॥२६४॥


जइ कहवि कसायग्गी समुट्ठिदो होज्ज विज्झवेदव्वो ।
रागदोसुप्पत्ती विज्झादि हु परिहरंतस्स ॥२६५॥

अर्थ: यदि थोड़ी भी कसायरूप आग उठती हो तो उसे बुझा दे। जो कषायको दूर करता है उसके राग-द्वेषकी उत्पत्ति शान्त हो जाती है ॥२६५॥


जावंति केइ संगा उदीरया होंति रागदोसाणं ।
ते वज्जंतो जिणदि हु रागं दोसं च णिस्संगो ॥२६६॥

अर्थ: जितने भी परिग्रह रागद्वेषको उत्पन्न करते हैं, उन परिग्रहोंको छोड़नेवाला अपरि- ग्रही साधु राग और द्वेषको निश्चयसे जीतता है ॥२६६॥


पडिचोदणासहणवायखुभिदपडिवयणइं[?]द्धो ।
चंडो हु कसायग्गी सहसा संपज्जलेज्जाहि ॥२६७॥


जलिदो हु कसायग्गी चरित्तसारं डहेज्ज कसिणं पि ।
सम्मत्तं पि विराधिय अणंतसंसारियं कुज्जा ॥२६८॥

अर्थ: जलती हुई कषायरूप आग समस्त चारित्र नामक सारको जला देती है । सम्यक्त्वको भी नष्ट करके अनन्त संसारके परिभ्रमणमें लगा देती है ॥२६८॥


तम्हा हु कसायग्गी पावं उप्पज्जमाणयं चेव ।
इच्छामिच्छादुक्कडवंदणसलिलेण विज्झाहि ॥२६९॥


तह चेव णोकसाया सल्लिहियव्वा परेणुवसमेण ।
सण्णाओ गारवाणि य तह लेस्साओ य असुहाओ ॥२७०॥

अर्थ: इसी तरह उत्कृष्ट उपशमभावके द्वारा नोकषाय, संज्ञा, गारव और अशुभ लेश्याओंका घटाना चाहिए। हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसक वेद इन्हें नोकषाय कहते हैं। आहार, भय, मैथुन और परिग्रहकी चाहका नाम संज्ञा है। ऋद्धिकी तीव्र अभिलाषा, रस और सुखकी चाहको गारव कहते हैं ॥२७०॥


परिवड्ढिदोवधाणो विगडसिराण्हारुपासुलिकडाहो ।
सल्लिहिदतणुसरीरो अज्झप्परदो हवदि णिच्चं ॥२७१॥

अर्थ: जो प्रतिदिन अपने नियमोंको बढ़ाता है, जिसकी बड़ी और छोटी सिरायें, दोनों ओरकी हड्डियाँ और नेत्रोंकी हड्डियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं - शरीरको सम्यक्रूपसे कृश करनेवाला वह यति नित्य आत्मामें लीन रहता है ॥२७१॥


एवं कदपरियम्मो सब्भंतरबाहिरम्मि सल्लिहणे ।
संसारमोक्खबुद्धी सव्वुवरिल्लं तवं कुणदि ॥२७२॥

अर्थ: उक्त क्रमके अनुसार अभ्यास करनेवाला अभ्यन्तर सल्लेखना सहित बाह्य सल्लेखना करनेपर संसारके त्यागका दृढ़ निश्चय करके सब तपोंसे उत्कृष्ट तप करता है ॥२७२॥


वोढुं गिलादि देहं पच्चोढव्वमिणसुचिभारोत्ति ।
तो दुक्खभारभीदो कदपरियम्मो गणमुवेदि ॥२७३॥

अर्थ: यह अपवित्र और भाररूप शरीर त्यागने योग्य है ऐसा निश्चय करके जो शरीरको धारण करनेसे ग्लानि करता है उसे शरीरके धारण करनेमें कोई हर्ष नहीं होता । पीछे दुःखके घर इस शरीरसे डरकर समाधिमरणकी तैयारी करता हुआ अपने शिष्योंके पास जाता है । दूसरे आचार्य ‘वोढुं गिलामि देहं’ ऐसा पाठ पढ़ते हैं वे उसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं - मुझे शरीर धारण करनेमें कोई रुचि नहीं है यह अशुचि और भारभूत शरीर छोड़ने योग्य है ऐसा मैंने निश्चय किया है ॥२७३॥


सल्लेहणं करेंतो जदि आयरिओ हवेज्ज तो तेण ।
ताए वि अवत्थाए चिंतेदव्वं गणस्स हियं ॥२७४॥

अर्थ: सल्लेखना करनेवाले दो प्रकारके होते हैं - एक आचार्य, दूसरे साधु । यदि आचार्य हो तो उसे उस अवस्थामें भी गणका हित विचारना चाहिए । अर्थात् आचार्य यदि सल्लेखना धारण करनेका निश्चय करे तो उसे अपने संघके सम्बन्धमें भी विचार करना चाहिए कि उसकी क्या व्यवस्था की जाये ॥२७४॥


कालं संभावित्ता सव्वगणमणुदिसं च वाहरिय ।
सोमतिहिकरणणक्खत्तविलग्गे मंगलोगासे ॥२७५॥

अर्थ: अपनी आयुकी स्थिति विचारकर समस्त संघको और बालाचार्यको बुलाकर शुभ दिन, शुभकरण, शुभनक्षत्र और शुभलग्नमें तथा शुभ देशमें ॥२७५॥


गच्छाणुपालणत्थं आहोइय अत्तगुणसमं भिक्खू ।
तो तम्मि गणविसग्गं अप्पकहाए कुणदि धीरो ॥२७६॥

अर्थ: गच्छका अनुपालन करनेके लिए गुणोंसे अपने समान भिक्षुका विचार करके पश्चात् वह धीर आचार्य थोड़ीसी बातचीत पूर्वक उस पर गणका त्याग करता है ॥२७६॥


अव्वोच्छित्तिणिमित्तं सव्वगुणसमोयरं तयं णच्चा ।
अणुजाणेदि दिसं सो एस दिसा वोत्ति बोधित्ता ॥२७७॥

अर्थ: ज्ञानदर्शन चारित्रात्मक धर्मतीर्थकी व्युच्छित्ति न हो, इसलिए उसे सब गुणोंसे युक्त जानकर यह तुम्हारा आचार्य है ऐसा शिष्योंको समझाकर आप इस गणका पालन करें ऐसा उस नवीन आचार्यको अनुज्ञा करते हैं ॥२७७॥


आमंतेऊण गणिं गच्छम्मि य तं गणिं ठवेदूण ।
तिविहेण खमावेदि हु स बालउड्ढाउलं गच्छं ॥२७८॥

अर्थ: आचार्यको बुलाकर गणके मध्यमें उस अपने द्वारा स्वीकृत गणीको स्थापित करके और स्वयं अलग होकर बाल और वृद्ध मुनियोंसे भरे उस गणसे वह पुराने आचार्य मन वचन कायसे क्षमा माँगते हैं ॥२७८॥


जं दीहकालसंवासदाए ममकारणेहरागेण ।
कडुगपरुसं च भणिया तमहं सव्वं खमावेमि ॥२७९॥

अर्थ: दीर्घकाल तक साथ रहनेसे उत्पन्न हुए ममता, स्नेह, द्वेष और रागसे जो कटुक और कठोर वचन कहे गये आपसे मैं उन सबकी क्षमा माँगता हूँ ॥२७९॥


वंदिय णिसुडिय पडिदो तादारं सव्ववच्छलं तादिं ।
धम्मायरियं णिययं खामेदि गणो वि तिविहेण ॥२८०॥

अर्थ: वन्दना करके, पृथ्वीपर पाँचों अंगोंको स्थापित करके अर्थात् पञ्चांग नमस्कार करके संसारके दुःखोंसे रक्षा करने वाले सबको प्रिय अपने दश प्रकारके उत्तम क्षमादिरूप धर्ममें स्वयं प्रवृत्त और दूसरोंको प्रवृत्त करने वाले आचार्यसे गण भी मन वचन कायसे क्षमा माँगता है ॥२८०॥


संवेगजणियहासो सुत्तत्थविसारदो सुदरहस्सो ।
आदट्ठचिंतओ वि हु चिंतेदि गणं जिणाणाए ॥२८१॥

अर्थ: संसारसे डरनेके कारण जिसे हर्ष प्रकट हुआ है अर्थात् इस परिग्रहका त्याग करने पर अभ्यन्तर रागादि अपने निमित्तका विनाश होनेसे चले जायेंगे क्योंकि बाह्य परिग्रह रागादिके उत्पत्तिमें निमित्त हैं अतः निमित्तके न रहनेसे नैमित्तिक रागादि भी नहीं रहेंगे । और रागादिके न रहनेसे रागादिके कारण बन्धने वाले कर्म नष्ट हो जायेंगे । उनके नष्ट होने पर चार गतियोंमें भ्रमण नष्ट हो जायेगा, इसलिए जिसे हर्ष उत्पन्न हुआ है. और जिन भगवान्के द्वारा कहे गये सूत्र और उसके अर्थमें जो निपुण है, जिसने प्रायश्चित्त शास्त्र सुना है वह आचार्य अपने प्रयोजनकी चिन्ता करते हुए भी जिन भगवान्की आज्ञासे गणकी चिन्ता करता है । अर्थात् यद्यपि आचार्य संल्लेखना धारण करनेके लिए अपना गण त्यागकर दूसरे गणमें जानेके लिए तत्पर है फिर भी गणकी चिन्ता करके उसे उपदेश देते हैं ॥२८१॥


णिद्धमहुरगंभीरं गाहुगपल्हादणिज्जपत्थं च ।
अणुसिट्ठिं देइ तहिं गणाहिवइणो गणस्स वि य ॥२८२॥

अर्थ: उस पूर्वोक्त शुभ तिथि आदिसे युक्त काल और देशमें गणाधिपति और गणको भी स्नेह सहित, माधुर्यसे युक्त, सारवान होनेसे गम्भीर सुखसे समझमें आने वाली, चित्तको आनन्द दायक और हितकारी शिक्षा देते हैं ॥२८२॥


वड्ढंतओ विहारो दंसणणाणचरणेसु कायव्वो ।
कप्पाकप्पठिदाणं सव्वेसिमणागदे मग्गे ॥२८३॥

अर्थ: सब प्रवृत्ति और निवृत्ति में स्थित मुनियों और गृहस्थोंको मुक्तिके मार्गमें सम्यग्दर्शन सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्रमें वर्धमान विहार उत्तरोत्तर उन्नत अनुष्ठान करना चाहिए । यति धर्म प्रमत्त संयत आदि गुणस्थानोंकी अपेक्षा अनेक प्रकार है । प्रवृत्ति रूप गृहस्थ धर्म भी दर्शन, व्रत सामायिकके भेदसे अनेक प्रकार है । उस सबका ग्रहण यहाँ ‘सब’ शब्दसे किया है । यह चारों प्रकारके संघको लक्ष्य करके आचार्य उपदेश देते हैं ॥२८३॥


संखित्ता वि य पवहे जह वच्चइ वित्थरेण वड्ढंती ।
उदधिंतेण वरणदी तह सीलगुणेहिं वड्ढाहि ॥२८४॥

अर्थ: उत्पत्ति स्थानमें छोटी सी भी उत्तम नदी जैसे विस्तारके साथ बढ़ती हुई समुद्र तक जाती है उसी प्रकार तुम शील और गुणोंसे बढ़ो ॥२८४॥


मज्जाररसिदसरिसोवमं तुमं मा हु काहिसि विहारं ।
मा णासेहिसि दोण्णि वि अप्पाणं चेव गच्छं च ॥२८५॥

अर्थ: तुम बिलावके शब्दके समान आचरण मत करना । बिलावका शब्द पहले जोरका होता है फिर क्रमसे मन्द हो जाता है उसी तरह रत्नत्रयकी भावनाको पहले बड़े उत्साहसे करके पीछे धीरे-धीरे मन्द मत करना । और इस तरह अपना और संघ दोनोंका विनाश न करना । प्रारम्भमें ही कठोर तपकी भावनामें लगकर आप और गणको भी उसीमें लगाकर दुश्चर होनेसे विनाशको प्राप्त होंगे ॥२८५॥


जो सघरं पि पलित्तं णेच्छदि विज्झविदुमलसदोसेण ।
किह सो सद्दहिदव्वो परघरदाहं पसामेदुं ॥२८६॥

अर्थ: जो जलते हुए अपने घरको भी आलस्यवश बचाना नहीं चाहता । उसपर कैसे विश्वास किया जा सकता है कि वह दूसरेके जलते घरको बचायेगा ॥२८६॥


वज्जेहि चयणकप्पं सगपरपक्खे तहा विरोधं च ।
वादं असमाहिकरं विसग्गिभूदे कसाए य ॥२८७॥

अर्थ: ज्ञान दर्शन और चारित्रके विषयमें अतिचारोंको दूर करो । जो वाचना और स्वाध्यायका काल नहीं है उसमें क्षेत्र शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, और भाव शुद्धिके बिना वाचना आदि करना, निह्नव, ग्रन्थ और अर्थकी अशुद्धि, आदरका अभाव इत्यादि ज्ञान विषयक अतिचार हैं । शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, मिथ्यादृष्टिकी प्रशंसा और संस्तव ये सम्यग्दर्शनके अतिचार हैं । समितिकी भावना न होना चारित्रका अतीचार है । ये सब ‘च्यवनकल्प’ कहे जाते हैं । धार्मिकों और मिथ्यादृष्टियोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिए । चित्तकी शान्तिको भंग करने वाला वाद भी नहीं करना चाहिए । वाद करने वाला जिस प्रकार अपनी जय और दूसरेकी पराजय हो यही प्रयत्न करता है तत्त्वका समाधान नहीं करता। क्रोधादि कषाय अपनी और दूसरेकी मृत्युमें कारण होती हैं इसलिए वे विषरूप हैं और हृदयको जलाती हैं इसलिए आगके समान हैं। उन्हें छोड़ना चाहिए। कहा भी है - ये कषायें तीन लोकमें मल्लके समान हैं। कुल और शीलके शत्रु हैं। वे ऐसे मल हैं जिनको दूर करना सबसे कठिन है। ये कषायें तपस्वियोंकी हानि करने वाली और उनके यशको हरने वाली हैं तथा प्राणियोंके दुर्भाग्यको करने वाली हैं। ‘वे कषायें केवल परलोकको ही नष्ट नहीं करतीं, किन्तु इस लोकको भी हीन करती हैं। ये केवल धर्ममें ही विघ्न नहीं डालतीं किन्तु अर्थ और काम की भी घातक हैं’ ॥२८७॥


णाणम्मि दंसणम्मि य चरणम्मि य तीसु समयसारेसु ।
ण चएदि जो ठवेदुं गणमप्पाणं गणधरो सो ॥२८८॥


णाणम्मि दंसणम्मि य चरणम्मि य तीसु समयसारेसु ।
चाएदि जो ठवेदुं गणमप्पाणं गणधरो सो ॥२८९॥

अर्थ: आगमके सारभूत तीन सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्रमें अपनेको और गणको स्थापित करनेमें जो समर्थ होता है वह गणधर है ॥२८९॥


पिंडं उवहिं सेज्जं अविसोहिय जो हु भुंजमाणो हु ।
मूलट्ठाणं पत्तो मूलोत्ति य समणपेल्लो सो ॥२९०॥

अर्थ: आहार, उपकरण और वसतिका शोधन किये बिना जो उसका सेवन करता है वह साधु मूल स्थान नामक दोषको प्राप्त होता है और वह भ्रष्टश्रमण४ है ॥२९०॥


पिंडं उवहिं सेज्जं उग्गमउप्पादणेसणादीहिं ।
चारित्तरक्खणट्ठं सोधिंतो होदि सुचरित्तो ॥२९१॥

अर्थ: आहार, उपकरण और वसतिका जो उद्गम, उत्पादन और एषणा आदि दोषोंसे चारित्रकी रक्षाके लिए शोधन करता है वह सम्यक् संयमी है। मेरा लोकमें यश होगा कि यह सुसंयमी है अथवा अपने आगमका प्रकाश करनेसे मुझे लाभ होगा ऐसा वह अपने मनमें नहीं सोचता। ऐसा यति ही सम्यक् चारित्र वाला होता है ॥२९१॥


एसा गणधरमेरा आयारत्थाण वण्णिया सुत्ते ।
लोगसुहाणुरदाणं अप्पच्छंदो जहिच्छाए ॥२९२॥

अर्थ: पाँच प्रकारके आचारमें स्थित जो गणी हैं उन गणियोंकी यह गणधर मर्यादा सूत्रमेंकही है। जो लोकके अनुसार चलने वाले सांसारिक सुखके इच्छुक हैं अथवा लोकसुख यानी मिष्टाहारका यथेच्छ भोजन, कोमल शय्या पर शयन, मनोहर घरमें निवास, इनमें जो रत हैं अर्थात् जो स्वेच्छाचारी हैं उनकी गणधर मर्यादा सूत्रमें नहीं कही है ॥२९२॥


सीदावेइ विहारं सुहसीलगुणेहिं जो अबुद्धीओ ।
सो णवरि लिंगधारी संजमसारेण णिस्सारो ॥२९३॥

अर्थ: जो बुद्धिहीन साधु सुखशील गुणोंके कारण रत्नत्रयमें प्रवृत्तिरूप चारित्रमें उदासीन रहता है वह केवल द्रव्यलिंगका धारी है और इन्द्रिय संयम तथा प्राणसंयमसे शून्य है ॥२९३॥


पिंडं उवधिं सेज्जामविसोधिय जो खु भुंजमाणोदु ।
मूलट्ठाणं पत्तो बालोत्तिय णो समणबालो ॥२९४॥

अर्थ: जो उद्गम आदि दोषोंसे सहित आहार, उपकरण अथवा वसतिको स्वीकार करता है उसके न प्राणिसंयम है और न इन्द्रिय संयम है। वह केवल नग्न है। न वह यति है और न गणधर है ॥२९४॥


कुलगामणयररज्जं पयहिय तेसु कुणइ ममत्तिं जो ।
सो णवरि लिंगधारी संजमसारेण णिस्सारो ॥२९५॥

अर्थ: जो कुल, ग्राम, नगर और राज्यको छोड़कर भी उनसे ममत्व करता है कि मेरा कुल है, हमारा गाँव है या नगर है राज्य है, वह भी केवल नग्न है। जो जिससे ममता करता है उसका यदि अच्छा होता तो उसे सन्तोष होता है अन्यथा द्वेष करता है अथवा संक्लेश करता है। इस तरह राग-द्वेष करने पर असंयतोंमें आदरवान होनेसे वह कैसे संयमी हो सकता है ॥२९५॥


अपरिस्साई सम्मं समपासी होहि सव्वकज्जेसु ।
संरक्ख सचक्खुं पि व सबालउड्ढाउलं गच्छं ॥२९६॥

अर्थ: 'हमारा यह गुरु आलोचित दोषोंको दूसरेसे नहीं कहता। ऐसा मानकर शिष्योंके द्वारा प्रकट किये अपराधोंको किसी अन्यसे मत कहो। कार्योंमें समदर्शी ही रहो। और बाल और वृद्ध यतियोंसे भरे गणकी अपनी आँखकी तरह रक्षा करो ॥२९६॥


णिवदिविहूणं खेत्तं णिवदी वा जत्थ दुट्ठओ होज्ज ।
पव्वज्जा च ण लब्भदि संजमघादो व तं वज्जो ॥२९७॥

अर्थ: जिस क्षेत्रमें कोई राजा न हो उस क्षेत्रको त्याग दो। अथवा जिस क्षेत्रका राजा दुष्ट हो उस क्षेत्रको त्याग दो । जिस क्षेत्रमें प्रव्रज्या प्राप्त न हो अर्थात् शिष्य न बनें, अथवा जिस क्षेत्रमें संयमका घात हो उस क्षेत्रको त्याग दो ॥२९७॥


कुणह अपमादमावासएसु संजमतवोवधाणेसु ।
णिस्सारे माणुस्से दुल्लहबोहिं वियाणित्ता ॥२९८॥

अर्थ: मनुष्य जन्म अनित्य और अशुचि होनेसे सार रहित है । उसमें दीक्षा धारण करनेकी बुद्धि होना दुर्लभ है ऐसा जानकर आवश्यकोंमें, जो संयम और तपके आश्रय है, प्रमाद मत करो । यहाँ पूज्य होनेसे संयमको तपसे पहले रखा है क्योंकि संयमके बिना अकेला तप मुक्ति नहीं प्राप्त करा सकता । सामायिक आदिमें प्रवर्तमान मुनिके संयम होता है । असंयमको वह त्यागता है । सावद्य क्रियाकी निवृत्ति होने पर कर्मोंको तपनेसे तप होता है । संयमके बिना तप नहीं होता । अतः आवश्यक कर्म तपके भी आश्रय हैं । इसलिए साधुको उनमें प्रमाद नहीं करना चाहिए ॥२९८॥


समिदा पंचसु समिदीसु सव्वदा जिणवयणमणुगदमदीया ।
तिहिं गारवेहिं रहिदा होह तिगुत्ता य दंडेसु ॥२९९॥

अर्थ: हे मुनिगण ! आप सर्वदा पाँच समितियोंके पालनमें तत्पर रहें । अपनी बुद्धिको जिनागमकी अनुगामिनी बनाओ । तीन गारव मत करो और अशुभ मन वचन कायके विषयमें तीन गुप्तियोंका पालन करो ॥२९९॥


सण्णाउ कसाए वि य अट्टं रुद्दं च परिहरह णिच्चं ।
दुट्ठाणि इंदियाणि य जुत्ता सव्वप्पणो जिणह ॥३००॥

अर्थ: नित्य आहारादि विषयक संज्ञाओंको, कषायोंको और आर्त तथा रौद्रध्यानको दूर करो । तथा ज्ञान और तपसे युक्त होकर अपनी सर्वशक्तिसे दुष्ट इन्द्रियोंको जीतो ॥३००॥


धण्णा हु ते मणुस्सा जे ते विसयाउलम्मि लोयम्मि ।
विहरंति विगदसंगा णिराउला णाणचरणजुदा ॥३०१॥

अर्थ: वे मनुष्य धन्य हैं जो शब्दादि विषयोंसे व्याप्त जगत्में किसी भी स्पर्शादि विषयमें आसक्ति नहीं रखते और निराकुल होकर ज्ञान और चारित्रसे युक्त होते हैं। जो ज्ञान और चारित्रसे युक्त होते हैं उनकी प्रशंसा करनेसे संघका उनके विषयमें आदरभाव उत्पन्न होता है ॥३०१॥


सुस्सूसया गुरूणं चेदियभत्ता य विणयजुत्ता य ।
सज्झाए आउत्ता गुरुपवयणवच्छला होह ॥३०२॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र नामक गुणोंसे महान् होनेसे आचार्य उपाध्याय और साधुको गुरु कहते हैं। उनकी सेवामें तत्पर रहना चाहिए। लाभ आदिकी अपेक्षा न करके उनके गुणोंमें अनुराग करना चाहिए। गुणोंमें अनुराग करनेसे सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि होती है और उनके रत्नत्रयकी अनुमोदना होती है। अनुमोदना पुण्य उपार्जन करनेका सरल उपाय है। चैत्य अर्थात् जिन और सिद्धोंकी कृत्रिम और अकृत्रिम प्रतिबिम्बोंमें भक्ति करना चाहिए। जैसे शत्रुओं और मित्रोंकी प्रतिकृति देखनेसे द्वेष और राग उत्पन्न होता है। यद्यपि वे प्रतिकृतियाँ कोई अपकार या उपकार नहीं करतीं, तथापि उन शत्रुओं और मित्रोंने जो अपकार या उपकार किये होते हैं उनके स्मरणमें उनकी प्रतिकृतियाँ निमित्त होती हैं। उसी तरह यद्यपि प्रतिबिम्बोंमें जिन और सिद्धोंके गुण अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, सम्यक्त्व वीतरागता आदि नहीं होते, तथापि उनके समान होनेसे उनके गुणोंका स्मरण कराती हैं। और वह गुणोंका स्मरण जो अनुरागात्मक होता है, ज्ञान और दर्शनमें लगाता है। और वे ज्ञान और दर्शन महान् संवर और निर्जरा करते हैं। इसलिए उपयोगी चैत्य भक्ति करना चाहिए। कर्ममलको जो विलय करती है वह विनय है। ज्ञान विनय, दर्शन विनय, चारित्र विनय, तपविनय और उपचार विनय, इन पांच प्रकारकी विनयमें संलग्न रहो। शास्त्रमें जो वाचना और स्वाध्याय काल कहा है, उन कालोंमें श्रुतका अध्ययन, और श्रुतका दान भक्तिपूर्वक करके अवग्रह स्वीकार करके, बहुमान करके, निह्नवको दूर करके, अर्थशुद्धि, व्यंजन शुद्धि और अर्थ व्यंजन दोनोंकी शुद्धि करके। इस प्रकार आठ अंगोंके साथ भाया गया श्रुत ज्ञान संवर और निर्जरा करता है। ऐसा नहीं करनेसे ज्ञानावरणका कारण होता है। शङ्का कांक्षा आदिको दूर करना दर्शन विनय है। आपको प्रयत्नपूर्वक शंका आदिको दूर करना चाहिए। ऐसा न करनेसे शंका आदि परिणाम मिथ्यात्वको लाते हैं और दर्शनमोहनीयकर्मके आस्रवमें कारण होते हैं। उससे मिथ्यादर्शनमें निमित्त मिथ्यात्वकर्मके कारण आप जैसे दुःख भीरुजनोंको अनन्त संसारमें परिभ्रमण करना पड़ता है। मनोज्ञ और अमनोज्ञ रूप रस गन्ध स्पर्श और शब्दके मिलनेपर अनन्तकालके अभ्यासवश राग और द्वेष उत्पन्न होते हैं। तथा बाह्य और अभ्यन्तर निमित्तका आश्रय पाकर कषायें उत्पन्न होती हैं। और वे उत्पन्न होकर चारित्रको नष्ट करती हैं। कर्मोंके ग्रहणमें निमित्त क्रियाओंके रोकनेको चारित्र कहते हैं। रागादि कर्मोंको ग्रहणमें निमित्त क्रिया है। अशुभ मन वचन और कायकी क्रिया भी कर्मोंके ग्रहणमें निमित्त होती है। तथा छहकायके जीवसमूहको बाधा न पहुंचाये बिना गमन करना, मिथ्यात्व और असंयममें प्रवर्तक वचन बोलना, साक्षात् या परम्परासे जीवोंको बाधा करनेवाला भोजन करना, बिना देखे और बिना साफ किये वस्तुओंको ग्रहण करना और रखना, बिना देखी और बिना साफ की गई भूमिमें मलमूत्र त्यागना ये सब क्रियाएँ जीवोंको कष्ट पहुंचानेवाली हैं अतः ॥३०२॥


दुस्सहपरीसहेहिं य गामवचीकंटएहिं तिक्खेहिं ।
अभिभूदा वि हु संता मा धम्मधुरं पमुच्चेह ॥३०३॥

अर्थ: दुःसह परीषहोंसे और तीक्ष्ण आक्रोशवचनरूपी काँटोंसे पराभूत होकर भी धर्मकी धुराके भारको मत त्यागो ॥३०३॥


तित्थयरो चदुणाणी सुरमहिदो सिज्झिदव्वयधुवम्मि ।
अणिगूहिदबलविरिओ तवोविधाणम्मि उज्जमदि ॥३०४॥

अर्थ: जिसके द्वारा भव्यजीव संसारको तिरते हैं वह तीर्थ है । कुछ भव्य श्रुत अथवा आलम्बनभूत गणधरोंके द्वारा संसारको तिरते हैं अतः श्रुत और गणधरोंको भी तीर्थ कहते हैं । इन दोनों तीर्थोंको जो करते हैं वे तीर्थंकर हैं । अथवा ‘तिसु तिट्ठदित्ति तित्थं’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार तीर्थ शब्दसे रत्नत्रयरूप मार्ग कहा जाता है । उसके करनेसे तीर्थंकर होता है । वे मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्ययज्ञानके धारी होते हैं । स्वर्गसे गर्भमें आनेपर, जन्माभिषेक और तपकल्याणमें चार प्रकारके देव उनकी पूजा करते हैं । उनको सिद्धिकी प्राप्ति नियमसे होती है फिर भी वे अपने बल और वीर्यको न छिपाकर तपके विधानमें उद्यम करते हैं ॥३०४॥


किं पुण अवसेसाणं दुक्खक्खयकारणाय साहूणं ।
होइ ण उज्जमिदव्वं सपच्चवायम्मि लोयम्मि ॥३०५॥

अर्थ: तब दुःखका विनाश करनेके लिए शेष साधुओंका तो कहना ही क्या है ।


सत्तीए भत्तीए विज्जावच्चुज्जदा सदा होह ।
आणाए णिज्जरित्ति य सबालउड्ढाउले गच्छे ॥३०६॥

अर्थ: बालमुनि और वृद्ध मुनियोंसे भरे हुए गणमें सर्वज्ञकी आज्ञासे सदा अपनी शक्ति और भक्तिसे वैयावृत्य करनेमें तत्पर रहो । सर्वज्ञदेवकी आज्ञा है कि वैयावृत्य करना चाहिये । वैयावृत्य तप है और तपसे निर्जरा होती है ॥३०६॥


सेज्जागासणिसेज्जा उवधी पडिलेहणाउवग्गहिदे ।
आहारोसहवायणविकिंचणुव्वत्तणादीसु ॥३०७॥

अर्थ: सोनेके स्थान, बैठनेके स्थान और उपकरणोंकी प्रतिलेखना करना, योग्य आहार योग्य औषधका देना, स्वाध्याय कराना, अशक्त मुनिके शरीरका मल शोधन करना, एक करवट से दूसरी करवट लिटाना ये उपकार वैयावृत्य हैं ॥३०७॥


अद्धाणतेण सावयरायणदीरोधगासिवे ऊमे ।
वेज्जावच्चं उत्तं संगहसारक्खणोवेदं ॥३०८॥

अर्थ: जो मुनि मार्गके श्रमसे थक गये हैं उनके पैर आदि दबाना, जिन्हें चोरों ने सताया है, जंगली जानवरोंसे, दुष्ट राजासे, नदीको रोकने वालोंसे और मारी रोगसे जो पीड़ित हैं, विद्या आदिसे उनका उपद्रव दूर करना, जो दुर्भिक्षमें फँसे हैं उन्हे सुभिक्ष देशमें लाना, आप न डरें इत्यादि रूप से उन्हें धैर्य देना तथा उनका संरक्षण करना वैयावृत्य कहा है ॥३०८॥


अणिगूहिदबलविरिओ वेज्जावच्चं जिणोवदेसेण ।
जदि ण करेदि समत्थो संतो सो होदि णिद्धम्मो ॥३०९॥

अर्थ: अपने बल और वीर्यको न छिपाने वाला जो मुनि समर्थ होते हुए भी जिन भगवान के द्वारा कहे हुए क्रम के अनुसार यदि वैयावृत्य नहीं करता है तो वह धर्मसे बहिष्कृत होता है यह इस गाथा का अभिप्राय है ॥३०९॥


तित्थयराणाकोवो सुदधम्मविराधणा अणायारो ।
अप्पापरोपवयणं च तेण णिज्जूहिदं होदि ॥३१०॥

अर्थ: वैयावृत्य न करनेसे तीर्थङ्करोंकी आज्ञाका भंग होता है। शास्त्रमें कहे गये धर्मका नाश होता है। आचारका लोप होता है और उस व्यक्तिके द्वारा आत्मा, साधुवर्ग और प्रवचन का परित्याग होता है। तप में उद्योग न करनेसे आत्मा का त्याग होता है। आपत्ति में उपकार न करनेसे मुनिवर्गका त्याग होता है और शास्त्र विहित आचरण न करनेसे आगमका त्याग होता है ॥३१०॥


गुणपरिणामो सद्धा वच्छल्लं भत्तिपत्तलंभो य ।
संधाणं तव पूया अव्वोच्छित्ती समाधी य ॥३११॥

अर्थ: वैयावत्य करनेका पहला गुण है ‘गुण परिणाम’ अर्थात् जो वैयावृत्य करता है उसकी पीड़ित साधुके गुणों में वासना होती है कि मैं भी ऐसा बनूँ । और जिस साधु की वैयावृत्य की जाती है उसकी सम्यक्त्व आदि गुणोंमें विशेष प्रवृत्ति होती है । इसके सिवाय श्रद्धा, वात्सल्य, भक्ति, पात्रका लाभ, सन्धान-अपने में जो गुण पूजा छूट गये हैं उनका पुनः आरोपण, तप, धर्म तीर्थ की परम्परा का विच्छेद न होना तथा समाधि, ये गुण हैं ॥३११॥


आणा संजमसाखिल्लदा य दाणं च अविदिगिंछा य ।
वेज्जावच्चस्स गुणा पभावणा कज्जपुण्णाणि ॥३१२॥

अर्थ: सर्वज्ञ के द्वारा उपदिष्ट वैयावृत्य करनेसे सर्वज्ञकी आज्ञाका पालन होता है । आज्ञा पालनसे आज्ञा संयम होता है । वैयावृत्य करने वालेका उपकार होता है । निर्दोष रत्नत्रय का दान होता है । संयम में सहायता होती है । विचिकित्सा - ग्लानि दूर होती है । धर्म की प्रभावना होती है और कार्यका निर्वाह होता है ॥३१२॥


मोहग्गिणादिमहदा घोरमहावेयणाए फुट्टंतो ।
डज्झदि हु धगधगंतो ससुरासुरमाणुसो लोओ ॥३१३॥

अर्थ: अति महान मोहरूपी आगके द्वारा सुर असुर और मनुष्यों सहित यह वर्तमान लोक धक्-धक् करते हुए जल रहा है । घोर महावेदनासे उसके अंग टूट फूट रहे हैं ॥३१३॥


एदम्मि णवरि मुणिणो णाणजलोवग्गहेण विज्झविदे ।
डाहुम्मुक्का होंति हु दमेण णिव्वेदणा चेव ॥३१४॥

अर्थ: इस लोकके जलने पर भी मुनियों को कोई वेदना नहीं है । क्योंकि ज्ञानरूपी जलके प्रवाहसे - आत्मा और शरीर आदिके भेद ज्ञानरूपी जलके प्रवाहसे मोहरूपी आगके नष्ट हो जाने से तथा रागद्वेषके शान्त हो जानेसे वे दाह से मुक्त हैं। आशय यह है कि सम्यग्ज्ञान रूपी जलके प्रवाहसे अज्ञानरूपी आगके फैलावको समाप्त कर देना और वेदना-रहित होना अर्थात् ज्ञानानन्दमय होना यतियों का गुण है ॥३१४॥


णिग्गहिदिंदियदारा समाहिदा समिदसव्वचेट्ठंगा ।
धण्णा णिरावयक्खा तवसा विधुणंति कम्मरयं ॥३१५॥

अर्थ: इन्द्रियके दो भेद हैं द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय। पुद्गल स्कन्धोंके और उनके आधार भूत आत्म प्रदेशोंके इन्द्रियाकार रचनाको द्रव्येन्द्रिय कहते हैं। और ज्ञानावरणके क्षयोपशम और इन्द्रियसे होने वाले रूपादि विषयक उपयोगको भावेन्द्रिय कहते हैं। इनमेंसे यहाँ उपयोगरूप इन्द्रियका ग्रहण किया है, क्योंकि उसकी सहायतासे मनको प्रिय और अप्रिय लगने वाले विषयों में राग द्वेष होते हैं। पापकर्ममें निमित्त होनेसे यहाँ इन्द्रियद्वार कहा है अतः यह अर्थ होता है जिन्होंने इन्द्रियोंके विषयोंमें होने वाले रागद्वेषका निग्रह कर दिया है। जिनका चित्त रत्नत्रयमें लीन रहता है। जो ईर्याभाषा आदि चेष्टाएँ सम्यक् रूप करते हैं और जो ‘णिरावयक्खा’ है। इसका अर्थ कोई ‘निश्चल’ कहते हैं और कोई निरपेक्ष कहते हैं अर्थात् जो सत्कार और लाभ की अपेक्षा नहीं करते। वे पुण्यशाली मुनि तपसे कर्म रूपी धूलिको नष्ट करते हैं। इस प्रकार इन्द्रियों का निग्रह करना, रत्नत्रयमें एकाग्र होना, निर्दोष चेष्टाएँ करना, सत्कार आदि की अपेक्षा न करना, तप में लीन रहना और कर्म रूपी रजका दूर करना ये यतियोंके गुण इस गाथाके द्वारा कहे हैं ॥३१५॥


इय दढगुणपरिणामो वेज्जावच्चं करेदि साहुस्स ।
वेज्जावच्चेण तदो गुणपरिणामो कदो होदि ॥३१६॥

अर्थ: इस प्रकार ऊपर कहे यतिके गुणोंमें जिसका परिणाम दृढ़ होता है वह साधु की वैयावृत्य करता है। वैयावृत्य करने से गुण परिणाम होता है। आशय यह है कि इस यतिमें ये गुण हैं। यदि मैं इनकी सेवा न करूँगा तो ये गुण नष्ट हो जायेंगे। ऐसा जो चित्तमें विचारता है वह उन गुणोंमें परिणत होता है। और जिसकी सेवा की है उसकी गुणों में परिणति होती है। अर्थात् वैयावृत्य करने वाला स्वयं उन गुणोंसे सुवासित होता है और जिसका वैयावृत्य किया जाता है वह यति अपने गुणोंसे च्युत नहीं होता। अतः अपने और दूसरोंके उपकारके लिए वैयावृत्य कहा है ॥३१६॥


जह जह गुणपरिणामो तह तह आरुहइ धम्मगुणसेढिं ।
वड्ढदि जिणवरमग्गे णवणवसंवेगसड्ढावि ॥३१७॥

अर्थ: जैसे-जैसे गुण परिणाम होता है वैसे वैसे चारित्र रूप गुणोंकी सीढ़ी पर चढ़ता है, और जिनेन्द्रके मार्गमें नई-नई संसार भीरुता और श्रद्धा भी बढ़ती है। यहाँ गुण शब्दसे गुणोंको विषय करने वाला स्मरण ज्ञान कहा गया है। तब यह अर्थ होता है - जैसे-जैसे यतिके गुणोंका स्मरण होता है वैसे-वैसे चारित्र गुण पर आरोहण करता है। जो यतिके गुणोंको भूल जाता है वह उसमें प्रयत्न नहीं करता। उनके गुणोंका स्मरण करनेसे उनमें रुचि पैदा होती है। भव्य जीव गुणोंकी अनुरागी होते हैं। संसारसे भय और श्रद्धा यतिको रत्नत्रयमें दृढ़ करती है। इस गाथासे श्रद्धा गुणका कथन किया ॥३१७॥


सड्ढाए वड्ढियाए वच्छल्लं भावदो उवक्कमदि ।
तो तिव्वधम्मराओ सव्वजगसुहावहो होइ ॥३१८॥

अर्थ: श्रद्धाके बढ़ने पर मुनि मनसे वात्सल्य करते हैं। उससे धर्ममें तीव्र राग होता है। धर्ममें तीव्र राग समस्त जगतमें जो इन्द्रिय जन्य और अतीन्द्रिय सुख है उसे लाता है। अथवा धर्ममें तीव्रराग रखने वाला यति सब सुखको प्राप्त होता है । इस गाथासे वात्सल्यका कथन किया ॥३१८॥

गाथा ३१९ से ५७४

अरहंतसिद्धभत्ती गुरुभत्ती सव्वसाहुभत्ती य ।
आसेविदा समग्गा विमला वरधम्मभत्ती य ॥३१९॥

अर्थ: इस भवसे पूर्व तीसरे भवमें दर्शन विशुद्धि आदि परिणाम विशेषसे जिसने तीर्थंकरत्व नामक अतिशयशाली कर्मका बन्ध किया है, जो स्वर्गावतरण आदि पांच महाकल्याण का भागी है जो कल्याणक किसी अन्यको प्राप्त नहीं होते, घातिकर्मोंके विनाशसे जिसने त्रिकालवर्ती सब द्रव्योंके स्वरूपको प्रकाशित करनेमें पटु निरतिशय ज्ञान प्राप्त किया है, दर्शन मोह के क्षय से जिन्हें वीतराग सम्यक्त्व की प्राप्ति हुई है, चारित्रमोहके क्षयसे जिसने वीतरागता प्राप्त की है, वीर्यान्तराय कर्मके प्रक्षयसे जिनमें अनन्तवीर्य प्रकट हुआ है, जिनके संसारका अन्त आ गया है उन भव्यजीवोंका उद्धार करनेकी प्रतिज्ञासे जो बद्ध हैं, जो आठ महाप्रातिहार्य और चौंतीस अतिशय विशेषसे युक्त है, वे अर्हन्त है । मिथ्यात्व आदि परिणामोंसे आये आठ कर्मोंके बन्धनसे जो छूट चुके हैं, जो अजर अमर, अव्याबाध गुणसे युक्त है अनुपम अनन्त सुखसे शोभित हैं जिनके सदा प्रज्वलित रहने वाला आवरण रहित ज्ञानमय शरीर है, जो पुरुषाकार है और जिन्होंने परमात्म अवस्थाको पालिया है वे सिद्ध हैं । इन अर्हन्तों और सिद्धोंकी भक्ति अर्हन्त सिद्ध भक्ति है । गुरु शब्दसे यहाँ आचार्य और उपाध्यायका ग्रहण किया है । उनकी भक्ति गुरु भक्ति है । और सर्वसाधुओंकी भक्ति तथा प्रधान धर्म रत्नत्रयमें सम्पूर्ण निर्मल भक्ति । इन अर्हन्त आदि का ऊपर कहा वैयावृत्य करनेसे उनकी भक्ति की गई जानना । रत्नत्रयके धारकोंका उपकार करनेसे उनका आदर ही उनकी भक्ति है । अभिप्राय यह है कि वैयावृत्यसे अर्हन्त आदिमें भक्ति व्यक्त होती है ॥३१९॥


संवेगजणियकरणा णिस्सल्ला मंदरुव्व णिक्कंपा ।
जस्स दढा जिणभत्ती तस्स भयं णत्थि संसारे ॥३२०॥

अर्थ: 'संवेग जणिय करण’में ‘करण’ शब्द क्रिया सामान्यका वाची होने पर भी यहाँ उसका अर्थ उत्पत्तिरूप क्रिया लिया है । अतः संसारके भयसे जो उत्पन्न होती है, मिथ्यात्व माया और निदान नामक शल्योंसे रहित सुमेरुकी तरह निश्चल, ऐसी दृढ़ जिन भक्ति जिसके है उसे संसारसे भय नहीं है । कर्मोंके एक देशको अथवा सब कर्मोंको जीतनेसे यहाँ ‘जिन’ शब्दसे अर्हन्त आदि सभी लिये हैं । 'धर्म भी कर्मोंको निरस्त करता है इसलिये जिन शब्दसे धर्म भी कहा जाता है । किन्तु वह धर्म द्रव्यलाभके उद्देशसे न होकर जिन भक्ति संसारका भय दूर करनेका उपाय है । यह जानकर होना चाहिये । वैनयिक मिथ्यादृष्टिकी भक्ति सबमें होती है उसके निराकरणके लिये निःशल्य कहा है । मेरुकी तरह निश्चल कहनेसे वह भक्ति सर्वकालमें होनी चाहिये ऐसा कहा है । सासादन सम्यग्दृष्टोके अल्पकालीन भक्ति होती है किन्तु वह संसारसे नहीं निकालती ॥३२०॥


पंचमहव्वयगुत्तो णिग्गहिदकसायवेदणो दंतो ।
लब्भदि हु पत्तभूदो णाणासुदरयणणिधिभूदो ॥३२१॥

अर्थ: वैयावृत्य करनेसे, पांच महाव्रतों के द्वारा कर्मोंके आस्रवको रोकने वाला, कषाय वेदनाका निग्रह करने वाला, कषाय आत्माको संतप्त करती है इससे वेदना कहा है, दान्त अर्थात् जिसके राग जन्य दोष शान्त हो गये हैं, वस्तु तत्त्वको जाननेसे वैराग्य भावना होती है और वैराग्य भावनासे राग शान्त होता है इससे दन्त कहा है, तथा जो नाना प्रकारके शास्त्रोंरूपी रत्नोंका निधि है नाना शास्त्रोंका ज्ञाता है, ऐसा पात्र प्राप्त होता है’ अर्थात् वैयावृत्य करने वालेको वैयावृत्यके लिये ऐसे सत्पात्र मुनी प्राप्त होते हैं यह एक महान् लाभ है ॥३२१॥


दंसणणाणे तव संजमे य संधाणदा कदा होइ ।
तो तेण सिद्धिमग्गे ठविदो अप्पा परो चेव ॥३२२॥

अर्थ: किसी निमित्तसे सम्यग्दर्शन आदिमें त्रुटि हो गई हो तो वैयावृत्य करनेसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्तप और सम्यक् चारित्रमें पुनः नियुक्ति हो जाती है। अतः उसी वैयावृत्यकारीके द्वारा स्वयं आत्मा तथा जिसकी वह वैयावृत्य करता है उसको रत्नत्रय में पुनः स्थिति होती है। इससे दोनों का ही लाभ है। इस गाथाके द्वारा ‘संधान’ पदका व्याख्यान किया है ॥३२२॥


वेज्जावच्चकरो पुण अणुत्तरं तवसमाधिमारूढो ।
पप्फोडिंतो विहरदि बहुभवबाधाकरं कम्मं ॥३२३॥

अर्थ: वैयावृत्य करनेवाला मुनि उत्कृष्ट वैयावृत्य नामक तपमें एकाग्र होकर अनेक भवोंमें कष्ट देनेवाले कर्मोंकी निर्जरा करता हुआ विहार करता है ॥३२३॥


जिणसिद्धसाहुधम्मा अणागदातीदवट्टमाणगदा ।
तिविहेण सुद्धमदिणा सव्वे अभिपूइया होंति ॥३२४॥

अर्थ: शुद्धचित्तसे वैयावृत्य करनेवालेके द्वारा भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालके सब तीर्थंकर, सिद्ध, साधु और धर्म मन-वचन-कायसे पूजित होते हैं। तीर्थंकरोंकी आज्ञाका पालन करनेसे सभी तीर्थंकर आदि इसके द्वारा पूजित होते हैं। तथा दस प्रकारके धर्मोंमें एक तपधर्म भी है और वैयावृत्य उसका एक भेद है अतः वैयावृत्यमें आदरभाव रखने तथा वैयावृत्य करनेसे धर्म पूजित होता है ॥३२४॥


आइरियधारणाए संघो सव्वो वि धारिओ होदि ।
संघस्स धारणाए अव्वोच्छित्ती कया होई ॥३२५॥

अर्थ: आचार्यका धारण करनेसे समस्त संघ धारित होता है । क्योंकि आचार्य रत्नत्रय ग्रहण कराते हैं और जो साधु रत्नत्रयको धारण किये होते हैं उन्हें उसमें दृढ़ करते हैं । उत्पन्न हुए अतिचारोंको दूर करते हैं । आचार्यके उपदेशके प्रभावसे ही संघ गुणोंके समूहको धारण करता है अतः आचार्यके धारणसे संघका धारण होता है । आचार्यके बिना संघका धारण सम्भव नहीं है । संघके धारणसे अभ्युदय और मोक्षके सुखका साधन जो धर्म है उस धर्मतीर्थका विच्छेद नहीं होता । उपाध्याय आदि सभी समस्तकर्मोंके विनाशकी साधना करते हैं इसलिए साधु शब्दसे उन सबका ग्रहण होता है ॥३२५॥


साधुस्स धारणाए वि होइ तह चेव धारिओ संघो ।
साधू चेव हि संघो ण हु संघो साहुवदिरित्तो ॥३२६॥

अर्थ: जैसे आचार्यकी धारणासे संघकी धारणा होती है वैसे ही एक साधुकी धारणासे अर्थात् वैयावृत्य करनेसे साधु समुदायकी धारणा होती है ।


गुणपरिणामादीहिं अणुत्तरविहीहिं विहरमाणेण ।
जा सिद्धिसुहसमाधी सा वि य उवगूहिया होदि ॥३२७॥

अर्थ: श्रद्धा, वात्सल्य, भक्ति, पात्रलाभ, सन्धान, तप, पूजा, तीर्थकी अव्युच्छित्ति (अविनाश) इत्यादि गुणोंका उत्कृष्ट क्रमके साथ आचरण करनेवाले मुनिको जो सिद्धि सुखमें एकाग्रता है, वह भी प्राप्त होती है; क्योंकि कार्यमें समाधान हुए बिना कारणमें आदर नहीं होता । यदि चित्तमें घट बनानेकी भावना न हो तो उसके उपायभूत जो दण्ड आदि कारण हैं उनमें मनुष्य प्रवृत्त नहीं होता । यहाँ गुणपरिणाम आदि सिद्धिसुखके उपाय हैं, सिद्धिसुखमें एकाग्रताके बिना वे उपाय नहीं हो सकते । यह अभिप्राय है ॥३२७॥


अणुपालिदा य आणा संजमजोगा य पालिदा होंति ।
णिग्गहियाणि कसायिंदियाणि साखिल्लदा य कदा ॥३२८॥

अर्थ: 'जो वैयावृत्य करता है वह तीर्थंकरोंकी आज्ञाका पालन करता है । इस कथनसे गाथाके ‘आणा’ पदका व्याख्यान किया है । ‘संयमयोगका पालन होता है’ इस कथनसे संयमपदका व्याख्यान किया है क्योंकि आचार्य आदिका संयमके साथ सम्बन्ध है । जो आचार्य आदि व्याधि आदिसे पीड़ित होते हैं और बिना संक्लेशके रोगपरीषहको सहनेमें असमर्थ होते हैं उनकी वैयावृत्य करनेसे संयमकी रक्षा होती है । अथवा ‘संयमयोग’ अर्थात् अनशन आदि तपके भेदोंकी रक्षा होती है । अपने भी और दूसरोंके भी तपकी रक्षा होती है । दूसरोंसे वैयावृत्य कराकर अथवा वैयावृत्य करनेकी अनुमोदना करके स्वास्थ्यको प्राप्तकर अपने तपकी रक्षा करता है तथा दूसरोंकी आपत्तिको दूर करके, उनके स्वास्थ्य लाभ करके शक्ति प्राप्त करनेपर उनके संयमकी रक्षा होती है। दूसरोंकी सहायताका कथन गाथाके उत्तरार्द्धसे करते हैं। उसमें ‘जम्हा’ पदका अध्याहार करके इस प्रकार अर्थ होता है - यतः वैयावृत्य करनेवाला कषाय और इन्द्रियोंके दोष बतलाकर कषाय और इन्द्रियोंका निग्रह करता है, अतः वह दूसरोंको सहायता प्रदान करता है ॥३२८॥


अदिसयदाणं दत्तं णिव्विदिगिंछा दरिसिदा होइ ।
पवयणपभावणा वि य णिव्वूढं संघकज्जं च ॥३२९॥

अर्थ: वैयावृत्य करनेवाला उक्त प्रकारसे दूसरे साधुओंको रत्नत्रयका दान करता है इसलिए वह सातिशयदानका दाता होता है। तथा वैयावृत्यसे सम्यग्दर्शनका निर्विचिकित्सा नामक गुण प्रकाशित होता है। शरीरका मलमूत्र आदि बिना ग्लानिके उठानेसे द्रव्यविचिकित्सा दूर होती है। आगममें कहे हुए धर्मका पालन करनेसे प्रवचनकी प्रभावना भी होती है। और संघका जो करने योग्य कार्य है उसका भी सम्पादन होता है। इस गाथासे ‘कज्जपुण्णाणि’ पदका व्याख्यान किया है ॥३२९॥


गुणपरिणामादीहिं य विज्जावच्चुज्जदो समज्जेदि ।
तित्थयरणामकम्मं तिलोयसंखोभयं पुण्णं ॥३३०॥

अर्थ: वैयावृत्यमें तत्पर साधु गुणपरिणाम आदि कारणोंके द्वारा उस तीर्थङ्कर नामक पुण्यकर्मका बन्ध करता है जो तीनों लोकोंमें हलचल पैदा करता है ॥३३०॥


एदे गुणा महल्ला वेज्जावच्चुज्जदस्स बहुगा य ।
अप्पट्ठिदो हु जायदि सज्झायं चेव कुव्वंतो ॥३३१॥

अर्थ: वैयावृत्यमें तत्पर साधुके बहुतसे महान् गुण होते हैं। जो केवल स्वाध्याय ही करता है वह तो अपने ही प्रयोजनमें लगा रहता है। किन्तु वैयावृत्य करनेवाला अपना और दूसरोंका उपकार करता है। अर्थात् केवल स्वाध्याय करनेवाले साधुसे वैयावृत्य करनेवाला विशिष्ट होता है। स्वाध्याय करनेवाले साधुपर विपत्ति आवे तो उसे वैयावृत्य करनेवालेका ही मुख ताकना होता है ॥३३१॥


वज्जेह अप्पमत्ता अज्जासंसग्गमग्गिविससरिसं ।
अज्जाणुचरो साधू लहदि अकित्तिं खु अचिरेण ॥३३२॥

अर्थ: हे साधुजनो ! आपको प्रमादरहित होकर आग और विषके तुल्य आर्याओंके संसर्गको छोड़ना चाहिए। आर्याके साथ रहनेवाला साधु शीघ्र ही अपयशका भागी होता है। आर्याका संसर्ग चित्तको सन्तापकारी होनेसे आगके समान है और संयमरूपी जीवनका विनाशक होनेसे विषके समान है। साधु आचारवाले मिथ्यादृष्टि असंयमी लोग भी प्रायः पाप और अपयशसे डरते हैं। फिर जो सब कुछ जानते हैं और समस्त त्यागने योग्य पदार्थोंके त्यागमें तत्पर रहते हैं वे साधुजन पाप और अपयशके कामसे क्यों नहीं दूर रहेंगे ? कहा भी है - शरीर नष्ट होनेवाला है उसकी रक्षा सम्भव नहीं है। यशकी रक्षा करने योग्य है जो नष्ट नहीं होता। शरीरके छूट जानेपर मनुष्य यशरूपी शरीरसे जीवित रहता है ॥३३२॥


थेरस्स वि तवसिस्स वि बहुस्सुदस्स वि पमाणभूदस्स ।
अज्जासंसग्गीए जणजंपणयं हवेज्जादि ॥३३३॥

अर्थ: वृद्ध, अनशन आदि तपमें तत्पर तपस्वी, बहुश्रुत और प्रमाण माना जानेवाला भी साधु आर्याजनके संसर्गसे लोकापवादका भागी होता है ॥३३३॥


किं पुण तरुणो अबहुस्सुदो य अणुकिट्ठतवचरित्तो ।
अज्जासंसग्गीए जणजंपणयं ण पावेज्ज ॥३३४॥

अर्थ: तब जो अवस्थामें तरुण है, बहुश्रुत भी नहीं हैं और न जो उत्कृष्ट तपस्वी और चारित्रवान् हैं वे आर्याजनके संसर्गसे लोकापवादके भागी क्यों नहीं होंगे ? ॥३३४॥


जदि वि सयं थिरबुद्धी तहा वि संसग्गिलद्धपसराए ।
अग्गिसमीवे व घदं विलेज्ज चित्तं खु अज्जाए ॥३३५॥

अर्थ: मुनि यद्यपि स्वयं स्थिर चित्तवाला हो फिर भी उसके संसर्गसे चित्तमें उल्लास पाकर आर्याका मन उसी प्रकार द्रवित होता है जैसे आगके समीपमें घी द्रवित होता है ॥३३५॥


सव्वत्थ इत्थिवग्गम्मि अप्पमत्तो सया अवीसत्थो ।
णित्थरदि बंभचेरं तव्विवरीदो ण णित्थरदि ॥३३६॥

अर्थ: तथा केवल आर्याओंका संसर्ग ही त्याज्य नहीं है, बल्कि जो बाला, कन्या, तरुणी, वृद्धा, सुरूप, कुरूप सभी प्रकारके स्त्रीवर्गमें प्रमाद रहित होता है और कभी भी उनका विश्वास नहीं करता वही साधु ब्रह्मचर्यको जीवन पर्यन्त पार लगाता है । जो उससे विपरीत होता है अर्थात् स्त्रियोंके सम्बन्धमें प्रमादी और विश्वासी होता है वह ब्रह्मचर्यको पार नहीं कर पाता ॥३३६॥


सव्वत्तो वि विमुत्तो साहू सव्वत्थ होइ अप्पवसो ।
सो चेव होदि अज्जाओ अणुचरंतो अणप्पवसो ॥३३७॥

अर्थ: जो साधु घर, जमीन आदि समस्त परिग्रहोंसे मुक्त है वह सर्वत्र अपनेको वशमें रखता है । किन्तु वही साधु आर्याका अनुगामी होकर आत्मवशी नहीं रहता ॥३३७॥


खेलपडिदमप्पाणं ण तरदि जह मच्छिया विमोचेदुं ।
अज्जाणुचरो ण तरदि तह अप्पाणं विमोचेदुं ॥३३८॥

अर्थ: जैसे मनुष्यके कफमें फँसी हुई मक्खी उससे अपनेको छुड़ानेमें असमर्थ होती है। वैसे ही आर्यिका अनुगामी साधु उससे अपनेको छुड़ानेमें असमर्थ होता है ॥३३८॥


साधुस्स णत्थि लोए अज्जासरिसी खु बंधणे उवमा ।
चम्मेण सह अवेंतो ण य सरिसो जोणिकसिलेसो ॥३३९॥

अर्थ: साधुका आर्याके साथ सहवास ऐसा बन्धन है जिसकी कोई उपमा नहीं है। चर्मके साथ ही उतरने वाला वज्रलेप भी उसके समान नहीं है ॥३३९॥


अण्णं पि तहा वत्थुं जं जं साधुस्स बंधणं कुणदि ।
तं तं परिहरह तदो होहदि दढसंजदा तुज्झ ॥३४०॥

अर्थ: साधुको केवल आर्याजनोंके संसर्गसे ही दूर नहीं रहना चाहिए किन्तु अन्य भी जो-जो वस्तु साधुको परतन्त्र करती है उस-उस वस्तुको त्यागनेमें तत्पर रहो। उसके त्यागसे तुम्हारा संयम दृढ होगा। बाह्य वस्तुके निमित्तसे होने वाला असंयम उस वस्तुके त्यागसे त्यागा जाता है ॥३४०॥


पासत्थादीपणयं णिच्चं वज्जेह सव्वधा तुम्हे ।
हंदि हु मेलणदोसेण होइ पुरिसस्स तम्मयदा ॥३४१॥

अर्थ: पार्श्वस्थ, अवसन्न, संसक्त, कुशील और मृगचरित्र इन पाँच प्रकारके कुमुनियोंसे तुम सदा दूर रहो। उनसे मेल रखनेसे पुरुष उनके समान पार्श्वस्थ आदि रूप हो जाता है ॥३४१॥


लज्जं तदो विहिंसं णिव्विसंकदं चेव ।
पियधम्मो वि कमेणारुहंतओ तम्मओ होइ ॥३४२॥

अर्थ: पार्श्वस्थ आदिका संसर्ग करनेकी इच्छा रखते हुए भी लज्जा करता है । पश्चात् असंयमके प्रति ग्लानि करता है कि मैं कैसे इस प्रकार व्रत भंग करूँ, यह तो दुरन्त संसारमें गिराने वाला है । पश्चात् चारित्र मोहके उदयसे परवश होकर असंयमका प्रारम्भ करता है । असंयमका प्रारम्भ करके यति आरम्भ परिग्रह आदिमें निःशंक होकर प्रवृत्ति करता है । इस प्रकार धर्मका प्रेमी भी मुनि क्रमसे लज्जा आदि करते हुए पार्श्वस्थ आदि रूप हो जाता है ॥३४२॥


संविग्गस्सवि संसग्गीए पीदी तदो य वीसंभो ।
सदि वीसंभे य रदी होइ रदीए वि तम्मयदा ॥३४३॥

अर्थ: संसारसे भयभीत भी मुनि पार्श्वस्थ आदिके संसर्गसे उनसे प्रीति करने लगता है । प्रीति करनेसे उनके प्रति विश्वासी हो जाता है । उनपर विश्वास करनेसे उनपर अनुरागी हो जाता है और उनमें अनुराग करनेसे पार्श्वस्थादिमय हो जाता है ॥३४३॥


जइ भाविज्जइ गंधेण मट्टिया सुरभिणा व इदरेण ।
किह जोएण ण होज्जो परगुणपरिभाविओ पुरिसो ॥३४४॥

अर्थ: यदि सुगन्ध अथवा दुर्गन्धके संसर्गसे मिट्टी भी सुगन्धित अथवा दुर्गन्धयुक्त हो जाती है तो संसर्गसे पुरुष पार्श्वस्थ आदिके गुणोंसे तन्मय क्यों न होगा ? ॥३४४॥


जो जारिसीय मेत्ती केरइ सो होइ तारिसो चेव ।
वासिज्जइ च्छुरिया सा रिया वि कणयादिसंगेण ॥३४५॥

अर्थ: जो जिस प्रकारकी वस्तुसे मैत्री करता है वह वैसा ही हो जाता है । स्वर्ण आदिके संसर्गसे लोहेकी छुरी भी उसी रूप हो जाती है ॥३४५॥


दुज्जणसंसग्गीए पजहदि णियगं गुणं खु सुजणो वि ।
सीयलभावं उदयं जह पजहदि अग्गिजोएण ॥३४६॥

अर्थ: दुष्टजनके संसर्गसे सज्जन भी अपना गुण छोड़ देता है । जैसे आगके सम्बन्धसे जल अपने शीतल स्वभावको छोड़ देता है । आगके सम्बन्धसे जलकी तरह साधु भी अपना गुण छोड़ देता है । यह स्वाभाविक गुणके त्यागमें दृष्टान्त है ॥३४६॥


सुजणो वि होइ लहुओ दुज्जणसंमेलणाए दोसेण ।
माला वि मोल्लगरुया होदि लहू मडयसंसिट्ठा ॥३४७॥

अर्थ: दुर्जनोंकी गोष्ठीके दोषसे सज्जन भी अपना बड़प्पन खो देता है । फूलोंकी कीमती माला भी मुर्दे पर डालनेसे अपना मूल्य खो देती है ॥३४७॥


दुज्जणसंसग्गीए संकिज्जदि संजदो वि दोसेण ।
पाणागारे दुद्धं पियंतओ बंभणो चेव ॥३४८॥

अर्थ: दुर्जनके संसर्गसे लोग संयमीके भी सदोष होनेकी शंका करते हैं । जैसे मद्यालयमें बैठकर दूध पीने वाले ब्राह्मणके भी मद्यपायी होनेकी शंका करते हैं ॥३४८॥


परदोसगहणलिच्छो परिवादरदो जणो खु उस्सूणं ।
दोसत्थाणं परिहरह तेण जणजंपणोगासं ॥३४९॥

अर्थ: लोग दूसरोंके दोषोंको पकड़नेके इच्छुक होते हैं और परोक्षमें दूसरोंके दोषोंको कहनेमें रस लेते हैं । इसलिए जो दोषोंका स्थान है उससे अत्यन्त दूर रहो क्योंकि; ऐसा न करनेसे लोगोंको अपवाद करनेका अवसर मिल जाता है ॥३४९॥


अदिसंजदो वि दुज्जणकएण दोसेण पाउणइ दोसं ।
जह घूगकए दोसे हंसो य हओ अपावो वि ॥३५०॥

अर्थ: महान् संयमी भी दुर्जनके द्वारा किए गये दोषसे अनर्थका भागी होता है । जैसे उल्लूके द्वारा किए गये दोषके लिए निर्दोष भी हंस मारा गया ॥३५०॥


दुज्जणसंसग्गीए वि भाविदो सुयणमज्झयारम्मि ।
ण रमदि रमदि य दुज्जणमज्झे वेरग्गमवहाय ॥३५१॥

अर्थ: दुर्जनोंकी संगतिसे प्रभावित मनुष्यको सज्जनोंका सत्संग रुचिकर नहीं लगता । वह वैराग्यको त्यागकर दुर्जनोंमें ही रमता है ॥३५१॥


जहदि य णिययं दोसं पि दुज्जणो सुयणवइयरगुणेण ।
जह मेरुमल्लियंतो काओ णिययच्छविं जहदि ॥३५२॥

अर्थ: सज्जनोंकी संगतिके गुणसे दुर्जन अपना दोष भी छोड़ देता है । जैसे सुमेरु पर्वतका आश्रय लेने पर कौवा अपनी असुन्दर छविको छोड़ देता है । इसका भाव यह है कि सज्जनोंकी सत्संगतिसे विद्यमान भी दोष नष्ट हो जाते हैं अतः सज्जनोंका आश्रय लेना चाहिए ॥३५२॥


कुसुममगंधमवि जहा देवयसेसत्ति कीरदे सीसे ।
तह सुयणमज्झवासी वि दुज्जणो पूइओ होइ ॥३५३॥

अर्थ: जैसे सुगन्धसे रहित भी फूल ‘यह देवताका आशीर्वाद है’ ऐसा मानकर सिर पर धारण किया जाता है उसी प्रकार सुजनोंके मध्यमें रहने वाला दुर्जन भी पूजित होता है ॥३५३॥


संविग्गाणं मज्झे अप्पियधम्मो वि कायरो वि णरो ।
उज्जमदि करणचरणे भावणभयमाणलज्जाहिं ॥३५४॥

अर्थ: जिसको धर्मसे प्रेम नहीं है तथा जो दुःखसे डरता है वह मनुष्य भी संसार भीरु यतियोंके मध्यमें रहकर भावना, भय, मान और लज्जासे पापके कार्योंसे निवृत्त होनेका उद्योग करता है ॥३५४॥


संविग्गोवि य संविग्गदरो संवेगमज्झयारम्मि ।
होइ जह गंधजुत्ती पयडिसुरभिदव्वसंजोए ॥३५५॥

अर्थ: जो मनुष्य पहलेसे ही संसारसे विरक्त है वह विरागियोंके मध्यमें रहकर और भी अधिक विरागी हो जाता है । जैसे बनावटी गन्धसे युक्त द्रव्य स्वभावसे ही सुगन्धित द्रव्यकी गन्धके संसर्गसे और भी अधिक सुगन्धित हो जाता है ॥३५५॥


पासत्थसदसहस्सादो वि सुसीलो वरं खु एक्को वि ।
जं संसिदस्स सीलं दंसणणाणचरणाणि वड्ढंति ॥३५६॥

अर्थ: पार्श्वस्थ अर्थात् चारित्रमें क्षुद्र यति लाख भी हों तो उनसे एक भी सुशील यति श्रेष्ठ है जो अपने संगीके शील, दर्शन, ज्ञान और चारित्रको बढ़ाता है । आपको उसीका आश्रय लेना चाहिए । गाथामें आगत ‘पार्श्वस्थ’ शब्द जो चारित्रमें क्षुद्र हैं उन सबके उपलक्षणके लिए है ॥३५६॥


संजदजणावमाणं पि वरं खु दुज्जणकदादु पूजादो ।
सीलविणासं दुज्जणसंसग्गी कुणदि ण दु इदरं ॥३५७॥

अर्थ: संयमीजन मुझ चारित्रहीनका तिरस्कार करते हैं अतः मैं पार्श्वस्थ आदि चारित्रहीन मुनियोंके ही पास रहूँ । ऐसा मनमें विचार नहीं करना चाहिए; क्योंकि दुर्जनके द्वारा की गई पूजासे संयमीजनोंके द्वारा किया गया अपमान श्रेष्ठ है । इसका कारण यह है कि दुर्जनका संसर्ग शीलका नाशक है किन्तु संयमीजनों द्वारा किया गया अपमान शीलका नाशक नहीं है ॥३५७॥


आसयवसेण एवं पुरिसा दोसं गुणं व पावंति ।
तम्हा पसत्थगुणमेव आसयं अल्लिएज्जाह ॥३५८॥

अर्थ: उक्त प्रकारसे अच्छे बुरे आश्रयके कारण पुरुष दोष और गुणको प्राप्त करते हैं । इसलिए प्रशस्त गुणयुक्त आश्रयका ही आश्रय लेना चाहिए ॥३५८॥


पत्थं हिदयाणिट्ठं पि भण्णमाणस्स सगणवासिस्स ।
कडुगं व ओसहं तं महुरविवायं हवइ तस्स ॥३५९॥

अर्थ: अपने गणके वासी साधुको हितकारी किन्तु हृदयको अनिष्ट भी लगनेवाले वचन बोलना चाहिए, क्योंकि वे वचन कडुवी औषधीकी तरह उसके लिए मधुर फलदायक होते हैं । दूसरेको अनिष्टवचन बोलनेसे हमारा अपना क्या प्रयोजन है, क्या वह स्वयं नहीं जानता । ऐसा मान उसकी उपेक्षा नहीं करना चाहिए । परोपकार करना ही चाहिए । जैसे तीर्थंकर शिष्यजनोंके सम्बोधनके लिए ही विहार करते हैं । महत्ता नाम इसीका है कि परोपकार करनेमें तत्पर रहना । कहा भी है - 'अपने ही भरण-पोषणमें लगे रहनेवाले क्षुद्रजन तो हजारों हैं किन्तु परोपकार ही जिसका स्वार्थ है ऐसा पुरुष सज्जनोंमें अग्रणी विरल ही होता है । बड़वानल अपना कभी न भरनेवाला पेट भरनेके लिए समुद्रका जल पीता है । किन्तु मेघ ग्रीष्मसे संतप्त जगत्के सन्तापको दूर करनेके लिए समुद्रका जल पीता है ॥३५९॥


पत्थं हिदयाणिट्ठं पि भण्णमाणं णरेण घेत्तव्वं ।
पेल्लेदूण वि छूढं बालस्स घदं व तं खु हिदं ॥३६०॥

अर्थ: हृदयको अनिष्ट भी वचन गुरुके द्वारा कहे जाने पर मनुष्यको पथ्य रूपसे ग्रहण करना चाहिए । जैसे बच्चेको जबरदस्ती मुँह खोलकर पिलाया गया घी हितकारी होता है उसी तरह वह वचन भी हितकारी होता है ॥३६०॥


अप्पपसंसं परिहरह सदा मा होह जसविणासयरा ।
अप्पाणं थोवंतो तणलहुहो होदि हु जणम्मि ॥३६१॥

अर्थ: अपनी प्रशंसा करना सदाके लिए छोड़ दो । अपने यशको नष्ट मत करो क्योंकि समीचीन गुणोंके कारण फैला हुआ भी आपका यश अपनी प्रशंसा करनेसे नष्ट होता है । जो अपनी प्रशंशा करता है वह सज्जनोंके मध्यमें तृणकी तरह लघु होता है ॥३६१॥


संता वि गुणा कत्थंतयस्स णस्संति कंजिए व सुरा ।
सो चेव हवदि दोसा जं सो थोएदि अप्पाणं ॥३६२॥

अर्थ: ‘मेरेमें ये ये गुण हैं’ ऐसा कहने वालेमें विद्यमान भी गुण उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे कांजीके पीनेसे मदिराका नशा नष्ट हो जाता है । वह जो अपनी प्रशंसा करता है यही उसका दोष है ॥३६२॥


संतो हि गुणा अकहिंतयस्स पुरिसस्स ण वि य णस्संति ।
अकहिंतस्स वि जह गहवइणो जगविस्सुदो तेजो ॥३६३॥

अर्थ: जो पुरुष अपने गुणोंकी प्रशंसा स्वयं नहीं करता उसके विद्यमान गुण नष्ट नहीं होते । यदि वह अपने गुणोंकी प्रशंसा नहीं करता तो उसके गुणोंकी प्रख्याति नहीं होती, ऐसी बात नहीं है । सूर्य अपने गुणोंको स्वयं नहीं कहता । फिर भी उसका प्रताप जगत्में प्रसिद्ध है ॥३६३॥


ण य जायंति असंता गुणा विकत्थंतयस्स पुरिसस्स ।
घंति हु महिलायंतो व पंडवो पंडवो चेव ॥३६४॥

अर्थ: अपने गुणोंकी प्रशंसा करने वाले पुरुषमें अविद्यमान गुण प्रशंसा करनेसे उत्पन्न नहीं होते । स्त्रीकी तरह खूब हाव-भाव करने पर भी नपुंसक नपुंसक ही रहता है, युवति नहीं बन जाता ॥३६४॥


संतं सगुणं कित्तिज्जंतं सुजणो जणम्मि सोदूण ।
लज्जदि किह पुण सयमेव अप्पगुणकित्तणं कुज्जा ॥३६५॥

अर्थ: सज्जन मनुष्योंके बीचमें अपने विद्यमान भी गुणकी प्रशंसा सुनकर लज्जित होता है । तब वह स्वयं ही अपने गुणोंकी प्रशंसा कैसे कर सकता है ॥३६५॥


अविकत्थंतो अगुणो वि होइ सगुणो व सुजणमज्झम्मि ।
सो चेव होदि हु गुणो जं अप्पाणं ण थोएइ ॥३६६॥

अर्थ: अपनी प्रशंसा न करनेवाला स्वयं गुणरहित होते हुए भी सज्जनोंके मध्यमें गुणवान्की तरह होता है । गुणरहितको गुणवान कहना तो परस्पर विरुद्ध है, ऐसी आशंका करनेपर कहते हैं - वह जो अपनी प्रशंसा नहीं करता यही उसका गुण है । भावार्थ यह है कि सम्यग्ज्ञानदर्शन आदि गुणोंका अभाव होनेसे वह गुणरहित है किन्तु अपनी प्रशंसा न करनेके गुणसे गुणवान् है । यदि उसमें गुण हैं तो वे स्वयं कसौटीपर कसे जायेंगे । कस्तूरीकी गन्धके लिए शपथ करना नहीं होता ॥३६६॥


वायाए जं कहणं गुणाण तं णासणं हवे तेसिं ।
होदि हु चरिदेण गुणाणकहणमुब्भासणं तेसिं ॥३६७॥

अर्थ: वचनसे गुणोंको कहना उनका नाश करना है । और आचरणसे गुणोंका कथन उनको प्रकट करना है । अभिप्राय यह है कि जो गुणोंको प्रकट करना चाहता है उसे वचनसे न कहकर गुणोंमें अपनी प्रवृत्तिसे ही गुणोंका प्रकाशन करना चाहिए ॥३६७॥


वायाए अकहेंता सुजणे विकहंतया य चरिदेहिं ।
सगुणे पुरिसाण पुरिसा होंति उवरीव लोगम्मि ॥३६८॥

अर्थ: जो वचनसे न कहकर साधुजनके मध्यमें अपने आचरणसे अपने गुणोंको कहते हैं पुरुष लोकमें सब पुरुषोंसे ऊपर होते है ॥३६८॥


सगुणम्मि जणे सगुणो वि होइ लहुगो णरो विकत्थिंतो ।
सगुणो व अकहिंतो वायाए होंति अगुणेसु ॥३६९॥

अर्थ: गुणवान पुरुषोंमें गुणवान भी मनुष्य यदि अपने गुणोंको कहता है सो लघु होता है । जैसे निर्गुणोंके मध्यमें अपने गुणोंको न कहने वाला गुणवान होता है ॥३६९॥


चरिएहिं कत्थमाणो सगुणं सगुणेसु सोभदे सगुणो ।
वायाए विकहिंतो अगुणो व जणम्मि अगुणम्मि ॥३७०॥

अर्थ: गुणवानोंमें गुणवान मनुष्य अपने गुणको अपने आचरणसे प्रकट करता हुआ ही शोभता है । जैसे निर्गुण मनुष्योंमें निर्गुण मनुष्य वचनसे अपने गुणोंको कहता हुआ शोभित होता है ॥३७०॥


सगणे व परगणे वा परपरिपवादं च मा करेज्जाह ।
अच्चासादणविरदा होह सदा वज्जभीरू य ॥३७१॥

अर्थ: अपने गणमें अथवा दूसरे गणमें दूसरोंकी निन्दा नहीं करना चाहिये । तथा अति आसादनासे विरत रहो और सदा पापसे डरो ॥३७१॥


आयासवेरभयदुक्खसोयलहुगत्तणाणि य करेइ ।
परणिंदा वि हु पावा दोहग्गकरी सुयणवेसा ॥३७२॥

अर्थ: परनिन्दा आयास, वैर, भय, दुःख, शोक और लघुताको करती है पापरूप है, दुर्भाग्यको लाती है और सज्जनोंको अप्रिय है ॥३७२॥


किच्चा परस्स णिंदं जो अप्पाणं ठवेदुमिच्छेज्ज ।
सो इच्छदि आरोग्गं परम्मि कडुओसहे पीए ॥३७३॥

अर्थ: जो परकी निन्दा करके अपनेको गुणी कहलानेकी इच्छा करता है वह दूसरेके द्वारा कडुवी औषधी पीनेपर अपनी नीरोगता चाहता है । अर्थात् जैसे दूसरेके औषधी पीनेपर आप नीरोग नहीं हो सकता । वैसे ही दूसरेकी निन्दा करके कोई स्वयं गुणी नहीं बन सकता ॥३७३॥


दट्ठूण अण्णदोसं सप्पुरिसो लज्जिओ सयं होइ ।
रक्खइ य सयं दोसंव तयं जणजंपणभएण ॥३७४॥

अर्थ: सत्पुरुष दूसरोंके दोष देखकर स्वयं लज्जित होता है । लोकापवादके भयसे वह अपनी तरह दूसरोंके भी दोषोंको छिपाता है ॥३७४॥


अप्पो वि परस्स गुणो सप्पुरिसं पप्प बहुदरो होदि ।
उदए व तेल्लबिंदू किह सो जंपिहिदि परदोसं ॥३७५॥

अर्थ: दूसरेका छोटासा भी गुण सत्पुरुषको पाकर अतिमहान हो जाता है । जैसे तेलकी बूँद पानीमें फैलकर महान हो जाती है । तब वह सत्पुरुष दूसरेके दोषको कैसे कह सकता है ॥३७५॥


एसो सव्वसमासो तह जतह जह हवेज्ज सुजणम्मि ।
तुज्झं गुणेहिं जणिदा सव्वत्थ वि विस्सुदा कित्ती ॥३७६॥

अर्थ: यह समस्त उपदेश का सार है । ऐसा यत्न करो जिससे सज्जनोंमें तुम्हारे गुणोंसे उत्पन्न हुई कीर्ति सर्वत्र फैले ॥३७६॥


एस अखंडियसीलो बहुस्सुदो य अपरोवतावी य ।
चरणगुणसुट्ठिदोत्तिय धण्णस्स खु घोसणा भमदि ॥३७७॥

अर्थ: यह साधु अखण्डित समाधिके धारी हैं, बहुश्रुत हैं, दूसरोंको कष्ट नहीं देते, और चारित्रगुणमें अच्छी तरह स्थित है । पुण्यशालीका यह यश सर्वत्र फैलता है ॥३७७॥


बाढत्ति भाणिदूणं एदं णो मंगलेत्ति य गणो सो ।
गुरुगुणपरिणदभावो आणंदंसुं णिवाडेइ ॥३७८॥

अर्थ: इस प्रकार गुरुका उपदेश सुनकर संघ ‘हमें स्वीकार है’ ऐसा कहकर आपके ये वचन हमारे लिये अत्यन्त मंगल कारक है ऐसा कहता है । तथा गुरुके गुणोंमें मन लगाकर आनन्दके आँसू गिराता है ॥३७८॥


भगवं अणुग्गहो मे जं तु सदेहोव्व पालिदा अम्हे ।
सारणवारणपडिचोदणाओ धण्णा हु पावेंति ॥३७९॥

अर्थ: भगवन् ! आपका हमपर बड़ा अनुग्रह है । आपने अपने शरीरकी तरह हमारा पालन किया है । तथा ‘यह करो’ और ‘यह मत करो’ इत्यादि शिक्षा दी है । भाग्यशाली ही ऐसी शिक्षा प्राप्त करते हैं ॥३७९॥


अम्हे वि खमावेमो जं अण्णाणा पमादरागेहिं ।
पडिलोमिदा य आणा हिदोवदेसं करिंताणं ॥३८०॥

अर्थ: आपकी आज्ञा और हितका उपदेश करनेपर हमने जो अज्ञान प्रमाद और रागवश उसके प्रतिकूल आचरण किया, उसके लिये हम भी आपसे क्षमा माँगते हैं ॥३८०॥


सहिदय सकण्णयाओ कदा सचक्खू य लद्धसिद्धिपहा ।
तुज्झ वियोगेण पुणो णट्ठदिसाओ भविस्सामो ॥३८१॥

अर्थ: आपने हमें हृदय युक्त अर्थात् विचारशील बनाया । हमें सकर्ण बनाया अर्थात् आपके उपदेश सुनकर कानोंका फल प्राप्त किया । आपने हमें आँखें प्रदान कीं अर्थात् हमें शास्त्र स्वाध्यायमें लगाया । तथा आपके प्रसादसे हमने मोक्षका मार्ग प्राप्त किया । अब आपके वियोगसे हम दिशाहीन हो जायेंगे । हमें कोई मार्ग दिखाने वाला नहीं रहेगा ॥३८१॥


सव्वजयजीवहिदए थेरे सव्वजगजीवणाथम्मि ।
पवसंते य मरंते देसा किर सुण्णया होंति ॥३८२॥

अर्थ: समस्त जगत्के जीवोंका हित करने वाले, ज्ञान और तपसे वृद्ध तथा समस्त जगत् के जीवोंके स्वामीके अन्यत्र चले जानेपर अथवा मरणको प्राप्त होनेपर देश शून्य हो जाते हैं ॥३८२॥


सव्वजयजीवहिदए थेरे सव्वजगजीवणाथम्मि ।
पवसंते य मरंते होदि हु देसोंधयारोव्व ॥३८३॥

अर्थ: समस्त जगत्के जीवोंके हितकारी, ज्ञान और तपसे वृद्ध तथा सब जगत्के जीवोंके स्वामीके अन्यत्र चले जाने या मरणको प्राप्त होनेपर देशमें अन्धकार-सा छा जाता है ॥३८३॥


सीलड्ढगुणड्ढेहिं दु बहुस्सुदेहिं अवरोवतावीहिं ।
पवसंते य मरंते देसा ओखंडिया होंति ॥३८४॥

अर्थ: शीलसे सम्पन्न और गुणोंसे समृद्ध, बहुश्रुत तथा दूसरोंको संताप न देने वाले महर्षियोंके प्रवासमें जानेपर या मरणको प्राप्त होनेपर सब देश उजाड़ सा प्रतीत होते हैं ॥३८४॥


सव्वस्स दायगाणं समसुहदुक्खाण णिप्पकंपाणं ।
दुक्खं खु विसहिदुं जे चिरप्पवासो वरगुरूणं ॥३८५॥

अर्थ: जो ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तपका दान करनेमें तत्पर रहते हैं, सुख और दुःख में समभाव रखते हैं तथा परीषहोंसे विचलित नहीं होते उन महान् गुरुओंके वियोगका दुःख सहना अति कठिन है ॥३८५॥


एवं आउच्छित्ता सगणं अब्भुज्जदं पविहरंतो ।
आराधणाणिमित्तं परगणगमणे मइं कुणदि ॥३८६॥

अर्थ: इस प्रकार अपने गण से पूछकर रत्नत्रयमें उत्कृष्ट रूपसे प्रवृत्ति करनेमें तत्पर आचार्य आराधना करनेके लिये दूसरे गणमें जानेका विचार स्थिर करते हैं ॥३८६॥


सगणे आणाकोवो फरुसं कलहपरिदावणादी य ।
णिब्भयसिणेहकलुणिगझाणविग्घो य असमाही ॥३८७॥

अर्थ: अपने गणमें रहनेपर आज्ञाकोप, कठोर वचन, कलह, दुख आदि, निर्भयता, स्नेह, करुणा, ध्यानमें विघ्न और असमाधि ये नौ दोष होते हैं ।


उड्डाहकरा थेरा कालहिया खुड्डया खरा सेहा ।
आणाकोवं गणिणो करेज्ज तो होज्ज असमाही ॥३८८॥

अर्थ: तथा अपने गणमें ही रहे तो किसी भी बातको लेकर वृद्ध मुनि अपयश कर सकते हैं। किसीको शिक्षा देनेपर क्षुद्र अज्ञानी कलह करते हैं। मार्गको नहीं जानने वाले और कठोर स्वभाववाले मुनि आचार्यकी आज्ञा न माने तो आचार्यको कोप उत्पन्न होनेसे समाधि बिगड़ जाती है ॥३८८॥


परगणवासी य पुणो अव्वावारो गणी हवदि तेसु ।
णत्थि य असमाहाणं आणाकोवम्मि वि कदम्मि ॥३८९॥

अर्थ: दूसरे गणमें भी ये वृद्ध मुनि आदि होते ही है, अतः वहाँ भी उनकी असमाधि हो सकती है, इस शंका को दूर करते हैं - जो आचार्य अपना गण त्यागकर दूसरे गणमें रहता है उसे वहाँ शिक्षा आदि देनेका काम नहीं रहता। इससे वहाँ आज्ञा भंगका प्रश्न नहीं रहता। आज्ञा भंग होने पर भी वह मनमें विचारता है कि मैंने इनका कोई उपकार तो किया नहीं, तब ये मेरी आज्ञाका पालन क्यों करेंगे ? अतः आज्ञा भंग होने पर भी असमाधि नहीं होती ॥३८९॥


खुड्डे थेरे सेहे असंवुडे दट्ठूण कुणइ वा परुसं ।
ममिकारेण भणेज्जो भणिज्ज वा तेहिं परुसेण ॥३९०॥

अर्थ: गुणोसे हीन क्षुद्र मुनियों, तपसे वृद्ध स्थविरों और रत्नत्रय रूप मार्गको न जानने वालोंको असंयमरूप प्रवृत्ति करते हुए देखकर ‘ये हमारे शिष्य हैं, संघके हैं’ इस प्रकारके ममत्व भावसे उनके प्रति कठोर वचन कहा जाये अथवा वे क्षुद्र आदि उन्हें कठोर वचन कहें, यह दूसरा दोष है ॥३९०॥


पडिचोदणासहणदाए होज्ज गणिणो वि तेहिं सह कलहो ।
परिदावणादिदोसा य होज्ज गणिणो व तेसिं वा ॥३९१॥

अर्थ: गुरुकी शिक्षाको सहन न करनेसे आचार्यकी भी उन क्षुद्र आदिके साथ कलह हो सकती है। और उससे आचार्यको अथवा उन क्षुद्र आदि मुनियोंको दुःख आदि दोष होते हैं ॥३९१॥


कलहपरिदावणादी दोसे व अमाउले करंतेसु ।
गणिणो हवेज्ज सगणे ममत्तिदोसेण असमाधी ॥३९२॥

अर्थ: वे क्षुद्र आदि गणमें कलह परिताप आदि दोष करें तो उसे देखकर ममत्व भावसे आचार्यको असमाधि हो सकती है ॥३९२॥


रोगादंकादीहिं य सगणे परिदावणादिपत्तेसु ।
गणिणो हवेज्ज दुक्खं असमाही वा सिणेहो वा ॥३९३॥

अर्थ: अपने शिष्य वर्गके छोटी बड़ी व्याधियोंसे पीड़ित होने पर आचार्यको दुःख हो सकता है । अथवा स्नेह पैदा हो सकता है और उससे समाधिकी हानि हो सकती है ॥३९३॥


तण्हादिएसु सहणिज्जेसु वि सगणम्मि णिब्भओ संतो ।
जाएज्ज व सेएज्ज व अकप्पियं किं पि वीसत्थो ॥३९४॥

अर्थ: अपने गणमें रहकर समाधि करने पर प्यास आदि की परीषह सहने योग्य होने पर भी निर्भय होकर और भय तथा लज्जा को त्याग अयोग्य की भी याचना अथवा सेवन कर सकता । जो त्याग दिया है खानपान, उसको भी माँग सकता है या उसका सेवन कर सकता है, क्योंकि वहाँ उसे कोई भय नहीं है सब उसीके शिष्यगण हैं ॥३९४॥


उड्ढे सअंकवड्ढिय बाले अज्जाउ तह अणाहाओ ।
पासंतस्स सिणेहो हवेज्ज अच्चंतियविओगे ॥३९५॥

अर्थ: वृद्ध यतियोंको, जिन्हें बचपनसे अपनी गोदमें बैठाकर पाला है उन बाल यतियोंको, आर्यिकाओंको अनाथ होते देखकर मरते समय सर्वदाके लिए वियोग होने पर स्नेह पैदा हो सकता है ॥३९५॥


खुड्डा य खुड्डियाओ अज्जाओ वि य करेज्ज कोलुणियं ।
तो होज्ज ज्झाणविग्घो असमाधी वा गणधरस्स ॥३९६॥

अर्थ: क्षुल्लक, क्षुल्लिकाएँ अर्थात् बालमुनि और आर्यिका भी गुरुका वियोग होते देख रो पड़ते हैं सो आचार्यके ध्यानमें विघ्न और असमाधि होती है ॥३९६॥


भत्ते वा पाणे वा सुस्सूसाए व सिस्सवग्गम्मि ।
कुव्वंतम्मि पमादं असमाधी होज्ज गणवदिणो ॥३९७॥

अर्थ: खानपान और सेवा टहलमें शिष्यवर्गके प्रमाद करने पर आचार्यकी असमाधि हो सकती है । अर्थात् आचार्यको यह विकल्प पैदा हो सकता है कि हमने इनका उपकार किया और यह हमारी सेवा भी नहीं करते । इससे ध्यानमें विघात होनेसे समाधि बिगड़ सकती है ॥३९७॥


एदे दोसा गणिणो विसेसदो होंति सगणवासिस्स ।
भिक्खुस्स वि तारिसयस्स होंति पाएण ते दोसा ॥३९८॥

अर्थ: ये दोष विशेष रूपसे अपने गणमें रहकर समाधि करनेवाले आचार्यके होते हैं । अन्य भी जो भिक्षु उपाध्याय या प्रवर्तक अपने गणमें रहकर समाधि मरण करते हैं उनके भी प्रायः ये दोष होते हैं ॥३९८॥


एदे सव्वे दोसा ण होंति परगणणिवासिणो गणिणो ।
तम्हा सगणं पयहिय वच्चदि सो परगणं समाधीए ॥३९९॥

अर्थ: ये सब दोष दूसरे गणमें निवास करनेवाले आचार्यके नहीं होते । इसीलिए वह अपना गण छोड़ परगणमें समाधिके लिए जाता है ॥३९९॥


संते सगणे अम्हं रोचेदूणागदो गणमिमोत्ति ।
सव्वादरसत्तीए भत्तीए वट्टइ गणो से ॥४००॥

अर्थ: अपने गणके होते हुए यह हमारे गणमें रुचि रखकर यहाँ आया है ऐसा मानकर दूसरा गण पूर्ण आदरके साथ शक्ति और भक्तिसे उसकी सेवामें लगता है ॥४००॥


गीदत्थो चरणत्थो पच्छेदूणागदस्स खवयस्स ।
सव्वादरेण जु णिज्जवगो होदि आयरिओ ॥४०१॥

अर्थ: उस प्रार्थना पूर्वक आये हुए क्षपकका निर्यापक आचार्य ज्ञानी, चारित्र निष्ठ तथा उस क्षपकके प्रति पूर्ण आदर भावसे युक्त होता है ॥४०१॥


संविग्गवज्जभीरुस्स पादमूलम्मि तस्स विहरंतो ।
जिणवयणसव्वसारस्स होदि आराधओ तादी ॥४०२॥

अर्थ: संसार और पापकर्मसे डरने वाले उस निर्यापक आचार्यके चरणोंमें विहार करता हुआ वह क्षपक यति समस्त जिनागमके सार रूप आराधनाका आराधक होता है ॥४०२॥


पंचच्छसत्तसदाणि जोयणाणं तदो य अहियाणि ।
णिज्जावयमणुण्णादं गवेसदि समाधिकामो दु ॥४०३॥

अर्थ: समाधिका इच्छुक यति पाँच सौ, छह सौ, सात सौ योजन अथवा उससे अधिक जाकर शास्त्रसम्मत निर्यापकको खोजता है ॥४०३॥


एक्कं व दो व तिण्णि य बारसवरिसाणि वा अपरिदंतो ।
णिज्जवयमणुण्णादं गवेसदि समाधिकामो दु ॥४०४॥

अर्थ: समाधिका इच्छुक यति एक अथवा दो अथवा तीन आदि बारह वर्ष पर्यन्त खेद-खिन्न न होता हुआ जिनागम सम्मत निर्यापकको खोजता है ॥४०४॥


गच्छेज्ज एगरादियपडिमा अज्झयणपुच्छणाकुसलो ।
थंडिल्लो संभोगिय अप्पडिबद्धो य सव्वत्थ ॥४०५॥

अर्थ: एक रात्रि प्रतिमामें, अध्ययन में और दूसरेसे प्रश्न करनेमें कुशल वह क्षपक स्थंडिलसंभोगी और सर्वत्र अप्रतिबद्ध होता है ॥४०५॥ होती है ॥४०५॥


आलोयणापरिणदो सम्मं संपत्थिदो गुरुसयासं ।
जदि अंतरा हु अमुहो हवेज्ज आराहओ होज्ज ॥४०६॥

अर्थ: ‘मन वचन कायके विकल्प रूप रत्नत्रयमें लगे अतिचारोंको, आलोचनाके दोषोंको त्यागकर मैं सम्यग् रूपसे गुरुसे निवेदन करूँगा’ ऐसा संकल्प करके जो गुरुके समीप जानेके लिए निकला, वह यदि मार्गमें ही अपनी बोलनेकी शक्ति खो बैठे तो भी वह आराधक होता है ॥४०६॥


आलोचणापरिणदो सम्मं संपच्छिओ गुरुसयासं ।
जदि अंतरम्मि कालं करेज्ज आराहओ होइ ॥४०७॥

अर्थ: मैं गुरुके पास जाकर अपने दोषोंकी सम्यक् आलोचना करूँगा, यह संकल्प करके जो गुरुके पास जानेके लिए निकला है वह यदि मार्गमें ही मर जाय तो भी आराधक है ॥४०७॥


आलोयणापरिणदो सम्मं संपच्छिदो गुरुसयासं ।
जदि आयरिओ अमुहो हवेज्ज आराहओ होइ ॥४०८॥

अर्थ: आलोचना करनेका संकल्प करके जो गुरुके पास जाने के लिए चला है। यदि आचार्य बोलनेमें असमर्थ हों तो भी वह आराधक है ॥४०८॥


आलोयणापरिणदो सम्मं संपच्छिदो गुरुसयासं ।
जदि आयरिओ कालं करेज्ज आराहओ होइ ॥४०९॥

अर्थ: जो गुरुके सन्मुख अपना अपराध निवेदन करनेके लिए गुरुके पास जानेके लिए निकला है, यदि आचार्य मर जायें तो भी वह आराधक है ॥४०९॥


सल्लं उद्धरिदुमणो संवेगुव्वेगतिव्वसड्ढाओ ।
जं जादि सुद्धिहेदुं सो तेणाराहओ होइ ॥४१०॥

अर्थ: किये गये अपराधकी आलोचना न करने पर मायाशल्य होता है। और माया- शल्यके होने पर रत्नत्रयमें शुद्धि नहीं होती । ऐसा मानकर जो शल्यको निकालनेका भाव रखता है । तथा संसारसे भयभीत होनेको संवेग कहते हैं । और शरीरकी अशुचिता, असारता और दुःखदायकताको देखकर तथा इन्द्रियजन्य सुखोंको अतृप्ति करनेवाले तथा तृष्णाको बढ़ानेवाले जानकर उनमें विरक्ति होना उद्वेग है । जिसके संवेग और उद्वेग होते हैं तथा मरणकालमें रत्नत्रयकी तीव्र आराधना और श्रद्धा होती है उसे ‘संवेग-उद्वेग-तीव्र श्रद्धावाला’ कहते हैं । अथवा संवेग और उद्वेग द्वारा जिसकी रत्नत्रयकी आराधनामें तीव्र श्रद्धा होती है वह संवेग उद्वेग तीव्र श्रद्धावाला होता है । ऐसा वह क्षपक शुद्धिके लिए गुरुके पास जाता है इससे वह आराधक होता है ॥४१०॥


आयारजीदकप्पगुणदीवणा अत्तसोधिणिज्झंझा ।
अज्जवमद्दवलाघवतुट्ठीपल्हादणं च गुणा ॥४११॥

अर्थ: निर्यापक आचार्यकी खोजमें जाते हुए क्षपकके गुण कहते हैं - आचार और जीतकल्प (आचार विशेषका प्रतिपादक ग्रन्थ) के गुणोंका प्रकाशन होता है । ये शास्त्र निरतिचार रत्नत्रयको ही बतलाते हैं । उसीके लिए क्षपक निर्यापककी खोज करता है । आत्माकी शुद्धि होती है । संक्लेशका अभाव होता है क्योंकि जो संक्लेश परिणाम वाला होता है वह इस प्रकार दूर गमन नहीं करता । तथा गुरुके पास जाकर अपने दोषोंको प्रकट करनेसे मायाचारका त्याग होता ही है । इसीसे मानका निरास मार्दव भी होता है । शरीरको त्यागनेका भाव होनेसे लाघव होता है । मैं कृतार्थ हूँ इस प्रकार सन्तोष होता है । ‘मैंने अपने और परके उपकारमें समय बिताया । अब आगे अपने ही कार्यमें प्रधान रूपसे उद्यत रहूँगा’ ऐसे विचारसे हृदयमें सुख होता है । इस प्रकार गुरुके पास जानेके गुण हैं ॥४११॥


आएसं एज्जंतं अब्भुट्ठिंति सहसा हु दट्ठूण ।
आणासंगहवच्छल्लदाए चरणे य णादुं जे ॥४१२॥

अर्थ: अतिथिको आता हुआ देखकर यतिगण शीघ्र खड़े हो जाते हैं । जिनागमकी आज्ञाका पालन करनेके लिए, आने वालेको ग्रहण करनेके लिए और वात्सल्य भावके लिए तथा उसका कैसा आचारादि है यह जाननेके लिए वे उठकर खड़े होते हैं । कहीं पर ‘चरणे य णामेदुं’ पाठ है । उसका अर्थ होता है - 'अतिथिके चरणोंमें नमन करनेके लिए खड़े होते हैं । यह यहाँ ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥४१२॥


आगंतुगवच्छव्वा पडिलेहाहिं तु अण्णमण्णेहिं ।
अण्णोण्णचरणकरणं जाणणहेदुं परिक्खंति ॥४१३॥

अर्थ: आने वाला मुनि और उस गणके वासी मुनि प्रतिलेखनाके द्वारा देखकर परस्परमें एक दूसरेके चरण और करणको जाननेके लिए परीक्षा करते हैं । यहाँ चरण शब्दसे समिति और गुप्ति कही है । और करण शब्दसे आवश्यकोंका ग्रहण किया है । आचार्योंके उपदेशमें भेद होनेसे साधुओंका समाचार अनेक प्रकारका है । इससे वह दुरवगम है । उसका जानना कठिन है उसको जाननेके लिए वे परस्परमें परीक्षा करते हैं । अथवा यह हमारे साथ रहनेके योग्य है अथवा नहीं, यह जाननेके लिए परीक्षा करते हैं ॥४१३॥


आवासयठाणादिसु पडिलेहणवयणगहणणिक्खेवे ।
सज्झाए य विहारे भिक्खग्गहणे परिच्छंति ॥४१४॥

अर्थ: आवश्यक स्थान आदिमें, प्रतिलेखन, वचन, ग्रहण, निक्षेप, स्वाध्याय, विहार और भिक्षाग्रहणमें परीक्षा करते हैं ॥४१४॥


आएसस्स तिरत्तं णियमा संघाडओ दु दादव्वो ।
सेज्जा संथारो वि य जइ वि असंभोइओ होइ ॥४१५॥

अर्थ: उस आगन्तुक यतिको नियमसे तीन रात तक साहाय्य देना चाहिए । तथा रहनेको वसति और संस्तर देना चाहिए । यद्यपि अभी उसकी परीक्षा नहीं ली है इससे वह साथमें आचरण करने योग्य नहीं है फिर भी यदि उसका आचार उचित है तो उसे साहाय्य देना चाहिए ॥४१५॥


तेण परं अवियाणिय ण होदि संघाडओ दु दादव्वो ।
सेज्जा संथारो वि य गणिणा अवि जुत्तजोगिस्स ॥४१६॥

अर्थ: तीन दिनके पश्चात् गुरु क्या करे, यह कहते हैं - तीन दिनके पश्चात् उस आचार्यको उस यतिके वचनको सुननेके पश्चात् जो साहाय्य दिया था वह साहाय्य बिना विचारे नहीं देना चाहिए । ‘दु’ शब्दका अर्थ एवकार (ही) है और उसे ‘दादव्वो’ के आगे रखना चाहिए । अतः उसे साहाय्य नहीं ही देना चाहिए, वसति अथवा संस्तर नहीं देना चाहिए । उसका आचार उचित भी हो तो भी उसे परीक्षा किये बिना साहाय्य आदि नहीं देना चाहिए । जब युक्ताचारको भी नहीं देना चाहिए तब अन्यकी तो बात ही क्या है, यह इसका अभिप्राय है ॥४१६॥


उग्गमउप्पादणेसणासु सोधी ण विज्जदे तस्स ।
अणगारमणालोइय दोसं संभुज्जमाणस्स ॥४१७॥

अर्थ: जो यति अपने दोषोंकी आलोचना नहीं करता, तथा जो उद्गम आदि दोषोंसे दूषित आहार, वसति अथवा उपकरणका सेवन करता है, उसके साथ संवास करनेसे उस आचार्यके उद्गम, उत्पादन और एषणा दोषोंका परिहार रूप शुद्धि नहीं होगी । यदि वह आचार्य अन्य मुनियोंको उसके साथ रहनेकी अनुमति देता है तो भी उसकी अनुमोदनाका भागी होता है ॥४१७॥


उव्वादो तद्दिवसं विस्सामित्ता गणिमुवट्ठादि ।
उद्धरिदुमणोसल्लं विदिए तदिए व दिवसम्मि ॥४१८॥

अर्थ: मार्गके श्रमसे थका हुआ वह आगन्तुक मुनि अपने आनेके दिन तो विश्राम लेता है और दूसरे दिन मनमें शल्यकी तरह चुभने वाले दोषोंको दूर करनेके लिये आचार्यके समीप जाता है । गुरुकी मार्गणा अर्थात् खोज पूर्वक की जानेवाली सब क्रियाएँ मार्गणा कही जाती हैं इसलिये यहाँ उनका मार्गणारूपसे कथन किया है ॥४१८॥


आयारवं च आधारवं च ववहारवं पकुव्वीय ।
आयावायविदंसी तहेव उप्पीलगो चेव ॥४१९॥

अर्थ: वह आगन्तुक किन गुणोंसे युक्त आचार्यका आश्रय लेता है, यह कहते हैं - आचारवान्, आधारवान्, व्यवहारवान्, कर्ता, तथा रत्नत्रयके लाभ और विनाश को दिखाने वाला और अवपीडक ॥४१९॥


अपरिस्साई णिव्वावओ य णिज्जावओ पहिदकित्ती ।
णिज्जवणगुणोवेदो एरिसओ होदि आयरिओ ॥४२०॥

अर्थ: अपरिस्रावी, निर्वापक, निर्यापक, प्रसिद्ध कीर्तिशाली और निर्यापन गुणसे युक्त ऐसा आचार्य होता है ॥४२०॥


आयारं पंचविहं चरदि चरावेदि जो णिरदिचारं ।
उवदिसदि य आयारं एसो आयारवं णाम ॥४२१॥

अर्थ: पाँच प्रकारके आचारका जो अतिचार लगाये बिना पालन करता है तथा दूसरों को पाँच प्रकारके आचारके निरतिचार पालनमें लगाता है, और आचारका उपदेश देता है यह आचारवान् नामक गुण है ॥४२१॥


दसविहठिदिकप्पे वा हवेज्ज जो सुट्ठिदो सयायरिओ ।
आयारवं खु एसो पवयणमादासु आउत्तो ॥४२२॥

अर्थ: जो आचार्य सदा दस प्रकारके स्थितिकल्पमें सम्यक् रूपसे स्थित है वह आचार- वान् है । वह आचार्य प्रवचनकी माता समिति और गुप्तियोंमें तत्पर रहता है ॥४२२॥


आचेलक्कुद्देसियसेज्जाहररायपिंडकिरियम्मे ।
वदजेट्ठपडिक्कमणे मासं पज्जोसवणकप्पो ॥४२३॥

अर्थ: आचेलक्य, औद्देशिकका त्याग, शय्या गृहका त्याग, राजपिण्डका त्याग, कृतिकर्म, व्रत, ज्येष्ठता, प्रतिक्रमण, मास और पर्युषणा ये दस कल्प हैं ॥४२३॥


एदेसु दससु णिच्चं समाहिदो णिच्चवज्जभीरू य ।
खवयस्स विसुद्धं सो जधुत्तचरियं उवविधेदि ॥४२४॥

अर्थ: इन दस कल्पोंमें जो सदा समाधान युक्त रहता है और नित्य पापसे डरता है वह आचार्य क्षपक ऊपर कहे विशुद्ध आचरणको पालन कराता है ॥४२४॥


पंचविधे आयारे समुज्जदो सव्वसमिदचेट्ठाओ ।
सो उज्जमेदि खवयं पंचविधे सुट्ठु आयारे ॥४२५॥

अर्थ: जो आचार्य पाँच प्रकारके आचारमें तत्पर रहता है और जिसकी सब चेष्टाएँ सम्यग्रूपसे होती हैं वह क्षपकसे पाँच प्रकारके आचारमें उद्योग कराता है ॥४२५॥


सेज्जोवधिसंथारं भत्तं पाणं च चयणकप्पगदो ।
उवकप्पिज्ज असुद्धं पडिचरए वा असंविग्गे ॥४२६॥

अर्थ: ज्ञानाचार आदिसे थोड़ा सा च्युत हुआ आचार्य उद्गम आदि दोषोंसे दूषित अशुद्ध वसति, उपकरण, संस्तर और भक्तपानकी व्यवस्था करेगा । तथा ऐसे परिचारक मुनियोंको नियुक्त करेगा जिन्हें यह भय नहीं है कि इस प्रकारका असंयम करने पर महान् कर्मबन्ध होगा और उससे हमारा संसार बढ़ेगा जो अनेक आपत्तियोंका मूल है ॥४२६॥


सल्लेहणं पयासेज्ज गंधं मल्लं च समणुजाणिज्जा ।
अप्पाउग्गं व कधं करिज्ज सइरं व जंपिज्ज ॥४२७॥

अर्थ: तथा वह क्षपककी सल्लेखनाको लोगों पर प्रकाशित कर देगा । सुगंध माला आदि सेवनकी अनुमति दे देगा । क्षपकके अशुभ परिणाम करने वाली अयोग्य कथा वार्ता करेगा । और यह उचित है या नहीं यह विचार किये बिना क्षपकके आगे स्वच्छन्दता पूर्वक बात करेगा ॥४२७॥


ण करेज्ज सारणं वारणं च खवयस्स चयणकप्पगदो ।
उद्देज्ज वा महल्लं खवयस्स वि किंचणारंभं ॥४२८॥

अर्थ: गा० तथा स्वयं आचार च्युत आचार्य क्षपकके रत्नत्रयसे डिगने पर रत्नत्रयमें प्रवृत्ति और रत्नत्रयसे च्युत होनेका निषेध नहीं करेगा। तथा क्षपकसे कोई महान् आरम्भ पूजा, विमान-यात्रा, पट्टकशाला आदि करायेगा ॥४२८॥


आयारत्थो पुण से दोसे सव्वे वि ते विवज्जेदि ।
तम्हा आयारत्थो णिज्जवओ होदि आयरिओ ॥४२९॥

अर्थ: किन्तु आचारवान् आचार्य इन सब दोषोंको नहीं करता। इसलिए जो गुणोंमें प्रवृत्ति करता है और दोषोंसे दूर रहता है ऐसा आचारवान् आचार्य ही निर्यापक होता है, दूसरा नहीं। इस प्रकार आचारवत्वका कथन किया ॥४२९॥


चोद्दसदसणवपुव्वी महामदी सायरोव्व गंभीरो ।
कप्पववहारधारी होदि हु आधारवं णाम ॥४३०॥

अर्थ: जो चौदह पूर्व, दस पूर्व अथवा नौ पूर्वका धारी हो, महाबुद्धिशाली हो, सागर की तरह गम्भीर हो, कल्प व्यवहार अर्थात् प्रायश्चित्त शास्त्रका ज्ञाता हो वह ज्ञानी आधारवान् होता है। वह समझाता है कि मन वचन कायके विकल्प रूप ये परिणाम अशुभ हैं, शुभ परिणाम पुण्यकर्मके आस्रवके कारण हैं और शुद्ध परिणाम शुभ और अशुभ कर्मोके संवरमें कारण हैं। तथा वह रात दिन श्रुतका उपदेश करते हुए शुभ और शुद्ध परिणामोंमें क्षपकको लगाता है। इसलिए वह दर्शन, चारित्र और तपका आधारवाला होनेसे आधारवान होता है। ज्ञान आधार है और जो ज्ञानवान् है वह आधारवान् है ॥४३०॥


णासेज्ज अगीदत्थो चउरंगं तस्स लोगसारंगं ।
णट्ठम्मि य चउरंगे ण उ सुलहं होइ चउरंगं ॥४३१॥

अर्थ: जिसने सूत्रके अर्थको ग्रहण नहीं किया है ऐसा आचार्य उस क्षपकके चतुरंगको नष्ट कर देता है । ज्ञान दर्शन चारित्र तप ये चार अंग जिस मोक्षमार्गके होते हैं वह चतुरंग है । लोकमें जो सारभूत निर्वाण है उसका चतुरंग - मोक्षमार्ग उपकारक है । वह नष्ट कर देता है । शायद कोई कहे कि यदि चतुरंग नष्ट हुआ तो पुनः प्राप्त हो जायेगा ? इस शंकाका निरास करते हैं - इस जन्ममें चतुरंग मोक्षमार्गके नष्ट होने पर चतुरंग सुलभ नहीं है - सुखसे नहीं मिलता । क्योंकि जो चतुरंगको नष्ट कर देता है वह मिथ्यात्व रूप परिणत होकर कुयोनिमें चला जाता है । तब वह कैसे चतुरंगको प्राप्त कर सकता है यह उक्त कथनका अभिप्राय है ॥४३१॥


संसारसायरम्मि य अणंतबहुतिव्वदुक्खसलिलम्मि ।
संसरमाणो दुक्खेण लहदि जीवो मणुस्सत्तं ॥४३२॥

अर्थ: जिसमें अनन्त अत्यन्त तीव्र दुःखरूप जल भरा है उस संसार सागरमें भ्रमण करते हुए जीव बड़े कष्टसे मनुष्य भव प्राप्त करता है ॥४३२॥


तह चेव देसकुलजाइरूवमारोग्गमाउगं बुद्धिं ।
सवणं गहणं सद्धा य संजमो दुल्लहो लोए ॥४३३॥

अर्थ: उस संसारमें देश, कुल, जाति, रूप, आरोग्य, आयु, बुद्धि, धर्मका सुनना, उसे ग्रहण करना, उस पर श्रद्धा होना तथा संयम ये सब दुर्लभ हैं ॥४३३॥


एवमवि दुल्लहपरंपरेण लद्धूण संजमं खवओ ।
ण लहिज्ज सुदी संवेगकरी अबहुसुयसयासे ॥४३४॥

अर्थ: इस प्रकार परम्परा रूपसे दुर्लभ संयमको पाकर क्षपक अल्पज्ञानी आचार्यके पासमें वैराग्य करने वाली देशना नहीं प्राप्त करता ॥४३४॥


सम्मं सुदिमलहंतो दीहद्धं मुत्तिमुवगमित्ता वि ।
प[?]डइ मरणकाले अकदाधारस्स पासम्मि ॥४३५॥

अर्थ: सम्यक् उपदेश प्राप्त न करनेसे चिरकाल तक असंयमके त्यागपूर्वक संयमको धारण करके आधारवत्त्व गुणसे रहित आचार्यके पासमें मरते समय संयमसे गिर जाता है ॥४३५॥


सक्का वंसी छेत्तुं तत्तो उक्कड्ढिओ पुणो दुक्खं ।
इय संजमस्स वि मणो विसएसुक्कड्ढिदुं दुक्खं ॥४३६॥

अर्थ: जैसे छोटेसे बाँसको छेदना शक्य है । किन्तु बाँसोंके झाड़मेंसे खींचकर निकालना बहुत कठिन है । इसी तरह संयमीका भी मन विषयोंसे हटाना अल्प ज्ञानी गुरुके लिए कठिन है । आशय यह है कि यद्यपि क्षपकने रागद्वेषको जीतनेकी प्रतिज्ञा की तथापि शरीरकी सल्लेखना करनेपर जब भूख प्यासकी परीषह सताती है तो वह श्रुतज्ञानमें उपयोग लगाये बिना अल्पज्ञ आचार्यके पासमें राग-द्वेषमें पड़कर चारित्रका आराधक नहीं रहता ॥४३६॥


आहारमओ जीवो आहारेण य विराधिदो संतो ।
अट्टदुहट्टो जीवो ण रमदि णाणे चरित्ते य ॥४३७॥

अर्थ: यह जीव आहारमय है, अन्न ही इसका प्राण है । आहारके न मिलनेपर आर्त और रौद्रध्यानसे पीड़ित होकर ज्ञान और चारित्रमें मन नहीं लगाता ॥४३७॥


सुदिपाणयेण अणुसट्ठिभोयणेण य पुणो उवग्गहिदो ।
तण्हाछुहाकिलंतो वि होदि झाणे अवखित्तो ॥४३८॥

अर्थ: किन्तु ज्ञानी आचार्यके द्वारा श्रुतका पान करानेसे और योग्य शिक्षारूप भोजनसे उपकृत होनेपर भूख प्याससे पीड़ित होते हुए भी ध्यानमें स्थिर होता है ॥४३८॥


पढमेण व दोवेण व बाहिज्जंतस्स तस्स खवयस्स ।
ण कुणदि उवदेसादि समाधिकरणं अगीदत्थो ॥४३९॥

अर्थ: भूख और प्याससे पीड़ित उस क्षपकको अल्पज्ञानी आचार्य समाधिके साधन उपदेश आदि नहीं करता ॥४३९॥


सो तेण विडज्झंतो पप्पं भावस्स भेदमप्पसुदो ।
कलुणं कोलुणियं वा जायणकिविणत्तणं कुणइ ॥४४०॥

अर्थ: वह अल्पज्ञानी क्षपक भूख प्याससे पीड़ित हो शुभभावको छोड़ देता है और ऐसा रुदन करता है कि सुननेवालोंको दया आती है, याचना करता है और दीनता प्रकट करता है ॥४४०॥


उक्कूवेज्ज व सहसा पिएज्ज असमाहिपाणयं चावि ।
गच्छेज्ज व मिच्छत्तं मरेज्ज असमाधिमरणेण ॥४४१॥

अर्थ: अथवा सहसा चिल्लाने लगता है अथवा असमाधिपानक पीता है। स्वयं खड़े होकर अपने दोनों हाथोंसे भोजनके कालमें जो योग्यपान किया जाता है उससे अन्य बिना खड़े हुए असमयमें जो पान किया जाता है उसे असमाधिपानक कहते हैं। तथा यह धर्म कष्टदायक है इससे केवल श्रम ही होता है ऐसे निन्दायुक्त चित्तसे मिथ्यात्वको प्राप्त होता है असमाधिपूर्वक मरणको प्राप्त होता है ॥४४१॥


संथारपदोसं वा णिब्भच्छिज्जंतओ णिगच्छेज्जा ।
कुव्वंते उड्डाहो णिच्छुब्भंते विकिंते वा ॥४४२॥

अर्थ: अथवा वह संस्तरको दोष देता है। रोने चिल्लानेपर उसका तिरस्कार करो तो बाहर भाग जायेगा। उसके रोने चिल्लानेपर, या बाहर निकल जानेपर अथवा संघसे निकाल देनेपर धर्ममें दूषण लगता है। इस प्रकार अज्ञानी आचार्य प्रतीकार न जानता हुआ क्षपकका जीवन नष्ट कर देता है ॥४४२॥


गीदत्थो पुण खवयस्स कुणदि विधिणा समाधिकरणाणि ।
कण्णाहुदीहिं उव-गहिदो य पज्जलइ ज्झाणग्गी ॥४४३॥

अर्थ: किन्तु गृहीतार्थ आचार्य विधिपूर्वक क्षपकका समाधान करनेकी क्रिया करता है । उसके कानोंमें धर्मोपदेशकी आहुति देता है उससे उपगृहीत होकर ध्यानरूपी अग्नि भड़क उठती है ॥४४३॥


खवयस्सिच्छासंपादणेण देहपडिकम्मकरणेण ।
अण्णेहिं वा उवाएहिं सो हु समाहिं कुणइ तस्स ॥४४४॥

अर्थ: वह क्षपककी इच्छा पूर्ति करके - जो वह चाहता है वह देकर - समाधि करता है अर्थात् रत्नत्रयमें उसका मन स्थिर करता है । तथा शारीरिक बाधाका प्रतिकार करके और अन्य उपायोंसे जैसे शान्तिदायक वचन, उपकरणदान और प्राचीन क्षपकोंके दृष्टान्त आदिसे समाधि करता है ॥४४४॥


णिज्जूढं पि य पासिय मा भीही देइ होइ आसासो ।
संधेइ समाधिं पि य वारेइ असंवुडगिरं च ॥४४५॥

अर्थ: निर्यापक अर्थात् सेवा करनेवाले यतियोंने जिस क्षपकको यह कहकर 'कि आप परीषह सहन नहीं करते और आपका चित्त चंचल है हमें आपसे अब कुछ भी प्रयोजन नहीं है, छोड़ दिया है, उसको भी देखकर बहुश्रुत आचार्य ‘मत डरो’ इस प्रकार अभय देते हैं । आश्वासन देते हैं, और रत्नत्रयमें एकाग्रता बनाये रखते हैं । तथा असंयतवचनोंका निवारण करते हैं कि इस महात्माको आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए । इनके समान कठिनतासे छोड़नेके योग्य शरीर और आहारको कौन छोड़नेमें समर्थ है । इस प्रकार प्रोत्साहन देते हैं ॥४४५॥


जाणदि फासुयदव्वं उवकप्पेदुं तहा उदिण्णाणं ।
जाणइ पडिकारं वादपित्तसिंभाण गीदत्थो ॥४४६॥

अर्थ: शास्त्रके अर्थको हृदयंगम करनेवाले आचार्य उदीर्ण हुई भूख प्यासकी वेदनाको नष्ट करनेमें समर्थ प्रासुकद्रव्योंको देना जानते हैं । तथा वात पित्त कफका प्रकोप होनेपर उनका प्रतिकार करना भी जानते हैं ॥४४६॥


अहव सुदिपाणयं से तहेव अणुसिट्ठिभोयणं देइ ।
तण्हाछुहाकिलिंतो वि होदि ज्झाणे अवक्खित्तो ॥४४७॥

अर्थ: अथवा वह आचार्य क्षपकको शास्त्रोपदेशरूपी पेय और अनुशासनरूप भोजन देते हैं । उस पान और भोजनसे भूख और प्याससे पीड़ित भी क्षपक ध्यानमें एकाग्रचित्त होता है ॥४४७॥


संसारसागरम्मि य णंते बहुतिव्वदुक्खसलिलम्मि ।
संसरमाणो जीवो दुक्खेण लहइ मणुस्सत्तं ॥४४८॥

अर्थ: बहुत तीव्र दुःख रूपी जलसे भरे अनन्त संसार रूपी सागरमें संसरण करता हुआ जीव बड़े कष्टसे मनुष्य भव प्राप्त करता है ॥४४८॥


गीदत्थपादमूले होंति गुणा एवमादिया बहुगा ।
ण य होइ संकिलेसो ण चावि उप्पज्जदि विवत्ती ॥४४९॥

अर्थ: गीतार्थ अर्थात् बहुश्रुत आचार्यके पादमूलमें रहनेके ‘गीदत्थो पुण खवगो’ इत्यादि पाँच गाथासूत्रोंमें कहे गये बहुत गुण-लाभ होते हैं । उस क्षपकके परिणामोंमें संक्लेश नहीं होता और न रत्नत्रयको लेकर ही कोई विपत्ति आती है अर्थात् उसके रत्नत्रयका विनाश नहीं होता । अतः आधारवान् आचार्यका आश्रय लेना चाहिए । इस प्रकार आधारवत्त्व गुणका कथन हुआ ॥४४९॥


पंचविहं ववहारं जो जाणइ तच्चदो सवित्थारं ।
बहुसो य दिट्ठकयपट्ठवणो ववहारवं होइ ॥४५०॥

अर्थ: जो पाँच प्रकारके व्यवहार अर्थात् प्रायश्चित्तको तत्त्वरूपसे विस्तारके साथ जानता है तथा जिसने अनेक आचार्योंका प्रायश्चित्त देना देखा है और स्वयं भी दूसरोंको प्रायश्चित्त दिया है वह आचार्य व्यवहारवान् होता है । गाथाके पूर्वार्द्धसे आचार्यका प्रायश्चित्तका ज्ञाता होना दर्शाया है तथा प्रायश्चित्तकर्मका दर्शन और प्रायश्चित्तकर्मका अभ्यास होना कहा है । जो प्रायश्चित्त शास्त्रका ज्ञाता नहीं होता वह अपनी इच्छानुसार कुछ भी प्रायश्चित्त देता है किन्तु उससे दूसरेके दोषकी विशुद्धि नहीं होती । प्रायश्चित्तशास्त्रका ज्ञाता होते हुए भी यदि उसने अन्य आचार्योंको प्रायश्चित्त देते न देखा हो तो प्रायश्चित्त देते समय खेदखिन्न होता है । इसलिए प्रायश्चित्तशास्त्रका ज्ञान, प्रायश्चित्तकर्मका देखना तथा प्रायश्चित्त देनेका अभ्यास ये तीन गुण जिसमें होते हैं उस आचार्यको व्यवहारवान् कहते हैं ॥४५०॥


आगमसुद आणाधारणा य जीवो य हुंति ववहारा ।
एदेसिं सवित्थारा परूवणा सुत्तणिद्दिट्ठा ॥४५१॥

अर्थ: आगम, श्रुत, आज्ञा, धारण और जीत ये पाँच प्रकारका व्यवहार है । इन आगम आदिका विस्तारसे कथन प्राचीन सूत्रोंमें कहा है । प्रायश्चित्त सब जनोंके आगे नहीं कहा जाता, तथा अन्य शास्त्रोंमें उसका कथन है इसलिए यहाँ नहीं कहा । कहा है - ‘समस्त श्रद्धालु पुरुषोंको जिनागम सुनना चाहिए । किन्तु छेदशास्त्रका अर्थ सबको नहीं सुनाना चाहिए’ ॥४५१॥


दव्वं खेत्तं कालं भावं करणपरिणाममुच्छाहं ।
संघदणं परियायं आगमपुरिसं च विण्णाय ॥४५२॥

अर्थ: द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, करण, परिणाम, उत्साह, शरीरबल, प्रव्रज्याकाल, आगम और पुरुषको जानकर प्रायश्चित्त देते हैं ॥४५२॥


मोत्तूण रागदोसे ववहारं पट्ठवेइ सो तस्स ।
ववहारकरणकुसलो जिणवयणविसारदो धीरो ॥४५३॥

अर्थ: प्रायश्चित्त देनेमें कुशल और जिन भगवान्के द्वारा कहे गये आगममें निपुण धीर वह आचार्य रागद्वेषको त्याग अर्थात् मध्यस्थ होकर उसको प्रायश्चित्त देता है ॥४५३॥


ववहारमयाणंतो ववहरणिज्जं च ववहरंतो खु ।
उस्सीयदि भवपंके अयसं कम्मं च आदियदि ॥४५४॥

अर्थ: जो प्रायश्चित्त शास्त्रको ग्रन्थरूपसे, अर्थरूपसे और कर्मरूपसे नहीं जानता, तथा अतिचारके विनाशके इच्छुक मुनिके द्वारा जिसका व्यवहार किया जाता है वह व्यवहरणीय है । आलोचना आदि नौ प्रकारका प्रायश्चित्त, उसे जो देता है वह आचार्य संसाररूपी कीचड़में फँसकर दुःख उठाता है तथा अपयश पाता है । लोग कहते हैं यह तुण्डाचार्य है जो कुछ भी प्रायश्चित्त दे देता है, दूसरेके दोषकी विशुद्धि नहीं करता । संसारसे भीरु साधुओंको व्यर्थ ही कष्ट देता है । तथा उन्मार्गका उपदेश देनेसे और सन्मार्गका नाश करनेसे दर्शनमोहनीय नामक कर्मका बन्ध करता है । अतः अज्ञानीको प्रायश्चित्त नहीं देना चाहिये यह इस गाथाका अभिप्राय है । यह आचार्यों की शिक्षा है । हम आचार्य हैं । हमने जो प्रायश्चित्त दिया है उसे करो, इस प्रकार जो कुछ भी नहीं बोलना चाहिये । प्रायश्चित्त शास्त्रके ज्ञाताओं ही प्रायश्चित्त देनेमें समर्थ होते हैं ॥४५४॥


जह ण करेदि तिगिंछं वाधिस्स तिगिंछओ अणिम्मादो ।
ववहारमयाणंतो ण सोधिकामं वि सुज्झेइ ॥४५५॥

अर्थ: जैसे अनिपुण वैद्य व्याधिकी चिकित्सा नहीं करता, वैसे ही प्रायश्चित्तको न जाननेवाला आचार्य रत्नत्रयकी विशुद्धिके इच्छुकको शुद्ध नहीं करता ॥४५५॥


तम्हा णिव्विसिदव्वं ववहारविदो हु पादमूलम्मि ।
तत्थ हु विज्जा चरणं समाधि सोधी य णियमेण ॥४५६॥

अर्थ: इसलिये क्षपकको प्रायश्चित्तके ज्ञाता आचार्यके पादमूलमें ही ठहरना चाहिये । उनके पादमूलमें रहनेसे ज्ञान, चारित्र, समाधि और शुद्धि निश्चयसे होती है ॥४५६॥


जो णिक्खमणपवेसे सेज्जासंथारउवधिसंभोगे ।
ठाणणिसेज्जागासे अगदूण विकिंचणाहारे ॥४५७॥

अर्थ: जो आचार्य क्षपकके वसतिसे निकलने अथवा उसमें प्रवेश करनेमें, वसति संस्तर और उपकरणके शोधनमें, खड़े होने, बैठने, सोने, शरीरसे मल दूर करनेमें, खानपान लानेमें, इन पण्डितमरण सम्बन्धी चर्यामें समस्त आदर शक्तिसे और उत्कृष्ट भक्तिसे हस्तावलम्बन आदि द्वारा उत्कृष्ट उपकार करते हैं, वह आचार्य प्रकुर्वक होते हैं ॥४५७-४५८॥


अब्भुज्जदचरियाए उवकारमणुत्तरं वि कुव्वंतो ।
सव्वादरसत्तीए वट्टइ परमाए भत्तीए ॥४५८॥

अर्थ: जो आचार्य क्षपकके वसतिसे निकलने अथवा उसमें प्रवेश करनेमें, वसति संस्तर और उपकरणके शोधनमें, खड़े होने, बैठने, सोने, शरीरसे मल दूर करनेमें, खानपान लानेमें, इन पण्डितमरण सम्बन्धी चर्यामें समस्त आदर शक्तिसे और उत्कृष्ट भक्तिसे हस्तावलम्बन आदि द्वारा उत्कृष्ट उपकार करते हैं, वह आचार्य प्रकुर्वक होते हैं ॥४५७-४५८॥ ॥४५८॥


इय अप्पपरिस्सममगणित्ता खवयस्स सव्वपडिचरणे ।
वट्टंतो आयरिओ पकुव्वओ णाम सो होइ ॥४५९॥

अर्थ: इस प्रकार अपने श्रमकी परवाह न करके जो आचार्य क्षपकको सब प्रकारसे सेवा करते हैं वह प्रकारक नामसे कहे जाते हैं ॥४५९॥


खवओ किलामिदंगो पडिचरयगुणेण णिव्वुदिं लहइ ।
तम्हा णिविसिदव्वं खवएण पकुव्वयसयासे ॥४६०॥

अर्थ: यतः रोगसे ग्रस्त क्षपक आचार्यके सेवागुणसे सुख प्राप्त करता है, अतः क्षपकको सेवा करनेवाले आचार्यके समीप ठहरना चाहिये ॥४६०॥


खवयस्स तीरपत्तस्स वि गुरुगा होंति रागदोसा हु ।
तम्हा छुहादिएहिं य खवयस्स विसोत्तिया होइ ॥४६१॥

अर्थ: यद्यपि क्षपक संसार समुद्रके किनारे पहुँच जाता है फिर भी उसे तीव्र रागद्वेष होते हैं । अतः भूख प्यासकी परीषहोंके कारण क्षपकके अशुभ परिणाम होते हैं ॥४६१॥


थोलाइदूण पुव्वं तप्पडिवक्खं पुणो वि आवण्णो ।
खवओ तं तह आलोचेदुं लज्जेज्ज गारविदो ॥४६२॥

अर्थ: क्षपक पूर्वमें प्रतिज्ञा करता है कि दीक्षा लेनेके दिनसे समाधि धारण करनेके दिन तक रत्नत्रयमें जो दोष लगे हैं उन सबको मैं गुरुके सामने निवेदन करूँगा । ऐसी प्रतिज्ञा करके भी जब अपराध निवेदनका समय आता है तो अपना बड़प्पन जानकर क्षपक उस अपराधको जिस प्रकार वह किया गया उसी प्रकारसे कहनेमें लज्जा करता है ॥४६२॥


तो सो हीलणभीरू पूयाकामो ठवेणइत्तो य ।
णिज्जूहणभीरू वि य खवओ वि न दोसमालोचे ॥४६३॥

अर्थ: पश्चात् वह क्षपक डरता है कि मेरे अपराधको जानकर ये सब मेरी अवज्ञा करेंगे । उसकी अभिलाषा अपनी पूजा कराने की है कि मेरी वन्दना करें, मेरे लिए उठकर खड़े होवें । किन्तु अपराध ज्ञात होने पर तो पूजा नहीं करेंगे । वह अपनेको सम्यक् आचारमें स्थापित करना चाहता है । किन्तु अपराधी जानकर यह मुझे त्याग देंगे, इससे डरता भी है । अतः अपने अपराध और शरीरको त्यागनेके लिए तत्पर होते हुए भी वह गुरुसे अपने दोषोंको नहीं कहता ॥४६३॥


तस्स अवायोपायविदंसी खवयस्स ओघपण्णवओ ।
आलोचेंतस्स अणुज्जगस्स दंसेइ गुणदोसे ॥४६४॥

अर्थ: उस अपने दोषोंकी आलोचना न करनेवाले अथवा आलोचना करते हुए भी मायाचार पूर्वक आलोचना करनेवाले क्षपकको आय और उपायको दिखलाने वाले आचार्य आलोचनाके गुण और आलोचना न करनेके दोष सामान्यसे बतलाते हैं कि जो अपना अपराध नहीं कहता उसको यह दोष होता है ॥४६४॥


दुक्खेण लहइ जीवो संसारमहण्णवम्मि सामण्णं ।
तं संजमं खु अबुहो णासेइ ससल्लमरणेण ॥४६५॥

अर्थ: इस संसारका पार पाना बड़ा कठिन है इसलिये चारों गतिमें भ्रमण रूप संसारको महासमुद्रकी उपमा दी है । उसमें भ्रमण करते हुए ‘श्रामण्य’ अर्थात् चारित्रको - संयमको जीव बड़े कष्टसे प्राप्त करता है । अज्ञानी उस समयको सशल्य मरणसे नष्ट कर देता है । यद्यपि मिथ्यात्व, माया और निदानके भेदसे शल्यके अनेक भेद हैं । तथापि यहाँ प्रकरणवश मायाशल्य लिया है । मायाशल्य सहित मरणसे अज्ञानी संयमको नष्ट करता है । शङ्का - यहाँ तो ‘सामण्ण’ शब्दसे समानता की गई है । उसे छोड़कर ‘संयम’ क्यों कहा ? समाधान - इसका अभिप्राय यह है कि द्रव्यमें प्रवृत्ति न करनेमें निमित्त जो श्रामण्य है वही संयम है । लोग कहते ही हैं कि यह पापकार्योंमें प्रवृत्ति करता है अतः श्रमण नहीं है । अतः आत्मामें स्थित भावशल्य दोषकारी है यह कहना उचित ही है ॥४६५॥


जह णाम दव्वसल्ले अणुद्धुदे वेदणुद्दिदो होदि ।
तह भिक्खू वि ससल्लो तिव्वदुहट्टो भयोव्विग्गो ॥४६६॥

अर्थ: जैसे शरीरमें लगे बाण, काँटा आदि द्रव्यशल्यको न निकालनेपर मनुष्य कष्टसे पीड़ित होता है । उसी प्रकार भावशल्यसे युक्त भिक्षु भी तीव्र दुःखित होता है और भयसे विचल होता है कि शल्यको दूर न करनेपर मैं किस गतिमें जाऊँगा । इस प्रकार दृष्टान्तसे अविरोध दिखलाया है ॥४६६॥


कंटकसल्लेण जहा वेधाणी चम्मखीलणाली य ।
रप्फइयजालगत्तागदो य पादो पडदि पच्छा ॥४६७॥

अर्थ: जैसे पैरमें काँटा घुसनेपर पहले पैरमें छिद्र होता है फिर उसमें मांसका अंकुर उग आता है और वह नाड़ीतक पहुंचता है । पीछे उस पैरमें साँपकी बाँबी जैसे दुर्गन्ध युक्त छिद्र हो जाते हैं ॥४६७॥


एवं तु भावसल्लं लज्जा[?]रवभएहिं पडिबद्धं ।
अप्पं पि अणुद्धरियं वदसीलगुणे वि णासेइ ॥४६८॥

अर्थ: इसी प्रकार लज्जा भय और गारवसे प्रतिबद्ध थोड़ा-सा भी भावशल्य यदि दूर न किया जाये तो व्रत शील और गुणोंको नष्ट करता है । लज्जावश साधु अपने अपराधको छिपाता है । या अपराध प्रकट करनेपर गुरुजन क्रुद्ध होंगे, मुझे त्याग देंगे अथवा बड़ा प्रायश्चित्त देंगे इस भयसे दोषको छिपाता है । अथवा मेरी जो महती प्रसिद्धि है कि यह तपस्वी उत्तम संयमी है वह नष्ट हो जायेगी इस भयसे दोषको छिपाता है । यह मायाशल्य है । इसे यदि दूर नहीं किया गया तो क्षपकके व्रत शील गुण नष्ट हो जाते हैं ॥४६८॥


तो भट्ठबोधिलाभो अणंतकालं भवण्णए भीमे ।
जम्मणमरणावत्ते जोणिसहस्साउले भमदि ॥४६९॥

अर्थ: पीछे दीक्षा धारण करके जो बुद्धिलाभ किया था वह नष्ट हो जाता है और चौरासी हजार योनियोंसे भरे, और जन्ममरणरूपी भँवरोंसे युक्त भयंकर भवसमुद्रमें अनन्तकालतक भ्रमण करता है ॥४६९॥


तत्थ य कालमणंतं घोरमहावेदणासु जोणीसु ।
पच्चंतो पच्चंतो दुक्खसहस्साइ पप्पेदि ॥४७०॥

अर्थ: और उस भवसमुद्रमें भयंकर महावेदनावाली योनियोंमें भ्रमण करता हुआ अनन्तकालतक हजारों दुःख भोगता है ॥४७०॥


तं न खमं खु पमादा मुहुत्तमवि अत्थिदुं ससल्लेण ।
आयरियपादमूले उद्धरिदव्वं हवदि सल्लं ॥४७१॥

अर्थ: इसलिए संसारसे भीत यतिको प्रमादवश एक मुहूर्तमात्रके लिए भी शल्यसहित रत्नत्रयके साथ रहना उचित नहीं है । उक्त गुणवाले आचार्यके पादमूलमें उसे अपने शल्यको निकाल देना चाहिए ॥४७१॥


तम्हा जिणवयणरुई जाइजरामरणदुक्खवित्तत्था ।
अज्जवमद्दवसंपण्णा भयलज्जाउ पमोत्तूण ॥४७२॥

अर्थ: अतः जिनागमके श्रद्धालु और जन्म जरा मरणके दुःखसे भीत क्षपकको भय और लज्जाको छोड़ आर्जव और मार्दवसे युक्त होना चाहिए ॥४७२॥


उप्पाडित्ता धीरा मूलमसेसं पुणब्भवलदाए ।
संवेगजणियकरणा तरंति भवसायरमणंतं ॥४७३॥

अर्थ: धीर क्षपक पुनर्जन्मरूपी लताके मूल सम्पूर्ण शल्यको उखाड़कर संसारके भयसे उत्पन्न किये चारित्रको धारण करके अनन्तभवसागरको तिर जाते हैं ॥४७३॥


इय जइ दोसे य गुणे ण गुरू आलोयणाए दंसेइ ।
ण णियत्तइ सो तत्तो खवओ ण गुणे य परिणमइ ॥४७४॥

अर्थ: इस प्रकार यदि गुरु क्षपकको आलोचना अर्थात् अपने अपराधको कहनेके गुण और दोष न बतलावे तो वह क्षपक पूर्वोक्त मायाशल्य दोषसे निवृत्त न हो और निःशल्य नामक गुणसे युक्त न हो ॥४७४॥


तम्हा खवएणाओपायविदंसिस्स पायमूलम्मि ।
अप्पा णिव्विसिदव्वो धुवा हु आराहणा तत्थ ॥४७५॥

अर्थ: यतः आय-उपायके दर्शी आचार्यके पादमूलमें रहनेसे क्षपक दोषसे निवृत्त होता है और गुणसे युक्त होता है । अतः क्षपकको गुणदोष दिखलानेवाले आचार्यके पादमूलमें अपनेको रखना चाहिए । ऐसा करनेसे रत्नत्रयकी आराधना होना निश्चित है ॥४७५॥


आलोचणगुणदोसे कोई सम्मं पि पण्णविज्जंतो ।
तिव्वेहिं गारवादिहिं सम्मं णालोचए खवए ॥४७६॥

अर्थ: कोई क्षपक आलोचनाके गुण और दोषोंको अच्छी तरह समझनेपर भी तीव्र गारव, आदिके कारण सम्यक्रूपसे अपने दोषोंको नहीं कहता । यहाँ आदि पदसे लज्जा, भय और कष्टको सहन न करना लिए गये हैं ॥४७६॥


णिद्धं मधुरं हिदयंगमं च पल्हादणिज्जमेगंते ।
तो पल्हावेदव्वो खवओ सो पण्णवंतेण ॥४७७॥

अर्थ: जो अपना अपराध नहीं कहता उस क्षपकको समझानेवाले आचार्यको एकान्तमें स्नेहसे भरे, कानोंको सुखकर और हृदयमें प्रवेश करनेवाले सुखदायक वचनोंसे शिक्षा देना चाहिए । प्राप्त सन्मार्ग रत्नत्रयके निरतिचार पालनमें सावधान आयुष्मन् ! लज्जा, भय और मान छोड़कर दोषोंको निवेदन करो । गुरुजन माता-पिताके समान होते हैं उनसे कहनेमें लज्जा कैसी ? वे अपने दोषकी तरह दूसरे यतियोंके भी दोष किसीसे नहीं कहते । जो यतिधर्म पर मिथ्या दोषारोपणको नष्ट करनेमें तत्पर रहते हैं वे क्या अपयश फैला सकते हैं ? मोक्षमार्गमें प्रधान सम्यग्दर्शन है और यतिजनमें दूषण लगाना सम्यग्दर्शनका अतिचार है । रत्नत्रयरूपी कमलोंका वन यदि अतिचाररूपी हिमपातसे नष्ट हो तो वह शोभित नहीं होता । परनिन्दासे नीचगोत्र कर्मका आस्रव होता है । जो दूसरोंकी निन्दा करता है वह स्वयं अनेक जन्मोंमें निन्दाका पात्र बनता है । दूसरेके मनको असह्य सन्ताप देनेवालेके असातावेदनीयकर्मका बन्ध होता है । साधुजन भी निन्दा करते हैं कि अपने धर्मपुत्रको यह इस प्रकार अपयशरूप कीचड़से क्यों लिप्त करता है । इस तरह दूसरोंके दोषोंको प्रकट करना अनेक अनर्थोंका मूल है । कौन समझदार उसे करना पसन्द करेगा ॥४७७॥


णिद्धं महुरं हिदयंगमं च पल्हादणिज्जमेगंते ।
कोइ तु पण्णविज्जंतओ वि णालोचए सम्मं ॥४७८॥

अर्थ: स्निग्ध, मधुर, हृदयग्राही और सुखकर वचनोंके द्वारा एकान्तमें समझानेपर भी कोई क्षपक अपने दोषोंको सम्यक्रूपसे नहीं कहता ॥४७८॥


तो उप्पीलेदव्वा खवयस्सोप्पीलएण दोसा से ।
वामेइ मंसमुदरमवि गदं सीहो जह सियालं ॥४७९॥

अर्थ: तब जैसे सिंह स्यारके पेटमें गये मांसको भी उगलवाता है वैसे ही अवपीडक आचार्य उस क्षपकके अन्तरमें छिपे हुए मायाशल्य दोषोंको बाहर निकालता है ॥४७९॥ कहकर अवपीडक आचार्य उसके मुखसे दोष उगलवाते हैं ॥४७९॥


उज्जस्सी तेजस्सी वच्चस्सी पहिदकित्तियायरिओ ।
सीहाणुओ य भणिओ जिणेहिं उप्पीलगो णाम ॥४८०॥

अर्थ: जो ओजस्वी-बलवान्, तेजस्वी-प्रतापवान्, वर्चस्वी-प्रश्नोंका उत्तर देनेमें कुशल, प्रसिद्ध कीर्तिशाली और सिंहके समान आचार्य होते हैं उन्हें जिनभगवान्ने उत्पीड़क नामसे कहा है ॥४८०॥


पिल्लेदूण रडंतं पि जहा बालस्स मुहं विदारित्ता ।
पज्जेइ घदं माया तस्सेव हिदं विचिंतंती ॥४८१॥

अर्थ: जैसे बालकके हितकी चिन्तामें तत्पर माता चिल्लाते हुए भी बालकको पकड़कर उसका मुंह फाड़कर घी पिलाती है ॥४८१॥


तह आयरिओ वि अणुज्जयस्स खवयस्स दोसणीहरणं ।
कुणदि हिदं से पच्छा होहिदि कडु ओसहं वत्ति ॥४८२॥

अर्थ: उसी प्रकार आचार्य भी कुटिल क्षपकके मायाशल्यरूप दोषको निकालते हैं। और वह कडुवी औषधिकी तरह पीछे उस क्षपकके लिए हितकारी होता है ॥४८२॥


जिब्भाए वि लिहंतो ण भद्दओ जत्थ सारणा णत्थि ।
पाएण वि ताडिंतो स भद्दओ जत्थ सारणा अत्थि ॥४८३॥

अर्थ: जो गुरु शिष्यके दोषोंका निवारण नहीं करता, वह जिह्वासे मधुर बोलनेपर भी भद्र नहीं है । और जो गुरु दोषोंका निवारण करता हुआ पैरसे मारता भी है वह भद्र है ॥४८३॥


सुलहा लोए आदट्ठचिंतगा परहिदम्मि मुक्कधुरा ।
आदट्ठं व परट्ठं चिंतंता दुल्लहा लोए ॥४८४॥

अर्थ: अपने काममें तत्पर किन्तु दूसरोंका हित करनेमें आलसी मनुष्य लोकमें बहुत हैं । किन्तु अपने कार्यकी तरह दूसरोंके कार्यकी चिन्ता करनेवाले मनुष्य लोकमें दुर्लभ हैं ॥४८४॥


आदट्ठमेव चिंतेदुमुट्ठिदा जे परट्ठमवि लोगे ।
कडुय फरुसेहिं साहेंति ते हु अदिदुल्लहा लोए ॥४८५॥

अर्थ: जो अपने ही कार्यकी चिन्तामें तत्पर होते हुए दूसरोंके कार्यको भी कठोर और कटुकवचनोंसे साधते हैं वे पुरुष लोकमें अत्यन्त दुर्लभ हैं ॥४८५॥


खवयस्स जइ ण दोसे उग्गालेइ सुहमे व इदरे वा ।
ण णियत्तइ सो तत्तो खवओ ण गुणे य परिणमइ ॥४८६॥

अर्थ: आचार्य यदि क्षपकको पीड़ित न करे तो वह मायाशल्यसे न निकले । और मायाशल्यसे निकले बिना निरतिचार रत्नत्रय गुणमें प्रवृत्त न हो ॥४८६॥ गुणमें लगे विना आराधक कैसे हो सकता है ? आराधनाके लिए गुरुके पास आकर भी यदि गुरु अवपीडक न हो तो उक्त बात नहीं बन सकती है ॥४८६॥


तम्हा गणिणा उप्पीलणेण खवयस्स सव्वदोसा हु ।
ते उग्गालेदव्वा तस्सेव हिदं तया चेव ॥४८७॥

अर्थ: इसलिए उत्पीडक आचार्यको क्षपकके सब दोष उगलवाना चाहिए । क्योंकि क्षपकका हित इसीमें है ॥४८७॥


लोहेण पीदमुदयं व जस्स आलोचिदा अदीचारा ।
ण परिस्सवंति अण्णत्तो सो अप्परिस्सवो होदि ॥४८८॥

अर्थ: जैसे तपाये हुए लोहेके द्वारा पिया गया जल बाहर नहीं जाता वैसे ही जिस आचार्यसे कहे गए दोष अन्य मुनियोंपर प्रकट नहीं होते, वह आचार्य अपरिस्राव गुणसे युक्त होता है ॥४८८॥


दंसणणाणादिचारे वदादिचारे तवादिचारे य ।
देसच्चाए विविधे सव्वच्चाए य आवण्णो ॥४८९॥

अर्थ: किसीके सम्यग्दर्शनमें अतिचार लगा हो, अथवा ज्ञानमें अतिचार लगा हो, या व्रतोंमें अतिचार लगा हो, या तपमें अतिचार लगा हो, यह एकदेशसे अथवा सर्वदेशसे अतिचार लगा हो तो ॥४८९॥


आयरियाणं वीसत्थदाए भिक्खू कहेदि सगदोसे ।
कोई पुण णिद्धम्मो अण्णेसिं कहेदि ते दोसे ॥४९०॥

अर्थ: भिक्षु विश्वासपूर्वक अपने दोषोंको आचार्योंसे कहता है । कोई आचार्य जो जिन भगवान्के द्वारा कहे गये धर्मसे भ्रष्ट होता है, वह भिक्षुके द्वारा आलोचित दोषोंको दूसरोंसे कह देता है कि इसने यह अपराध किया है अर्थात् ऐसे करनेवाला आचार्य जिनधर्मसे बाह्य होता है ॥४९०॥


तेण रहस्सं भिंदंतएण साधू तदो य परिचत्तो ।
अप्पा गणो य संघो मिच्छत्ताराधणा चेव ॥४९१॥

अर्थ: उस आलोचित दोषको प्रकट करनेवाले आचार्यने ऐसा करके उस साधुका ही त्याग कर दिया । क्योंकि उसने अपने चित्तमें यह विचार नहीं किया कि मेरे द्वारा इसके दोष प्रकट कर देनेपर यह लज्जित होकर दुखी होगा, अथवा आत्मघात कर लेगा, अथवा क्रुद्ध होकर रत्नत्रयको ही छोड़ देगा । तथा उस आचार्यने अपनी आत्माका त्याग किया, गणका त्याग किया, संघका त्याग किया । इतना ही नहीं, उसके मिथ्यात्वकी आराधना दोष भी होता है ॥४९१॥


लज्जाए गारवेण व कोई दोसे परस्स कहिदोवि ।
विपरिणामिज्ज उधावेज्ज व १गच्छेज्ज साध मिच्छत्तं ॥४९२॥

अर्थ: निर्यापकाचार्यके द्वारा दूसरेसे साधुके गुप्त दोष कहनेपर कोई क्षपक लज्जावश या मानकी गुरुतावश विपरीत परिणाम कर सकता है । यह मेरा गुरु नहीं है । यदि मैं इसे प्रिय होता तो यह मेरे दोष क्यों कहता । यह गुरु मेरे बाहरमें चलते-फिरते प्राण हैं ऐसा जो मैं सोचता था वह आज नष्ट हो गया, इस प्रकारकी चिन्ता विपरीत परिणाम है । अथवा दोष प्रकट कर देनेसे कुपित होकर रत्नत्रयको छोड़ सकता है ॥४९२॥


कोई रहस्सभेदे कदे पदोसं गदो तमायरियं ।
उद्दावेज्ज व गच्छं भिंदेज्ज व होज्ज पडिणीओ ॥४९३॥

अर्थ: रहस्यभेद करनेपर कोई क्षपक द्वेषी बनकर उस आचार्यको मार सकता है । अथवा गणमें भेद डाल सकता है कि इस स्नेहरहित आचार्यसे क्या लेना देना है ? जैसे इसने मेरा अपराध प्रकट कर दिया उसी प्रकार तुम्हें भी अपराध निवेदन करने पर दोष लगायेगा । ऐसा कहकर अन्य साधुओंको विरोधी बनाकर गणमें भेद डाल सकता है । अथवा विरोधी हो सकता है ॥४९३॥


जह धरिसिदो इमो तह अम्हं पि करिज्ज धरिसणमिमोत्ति ।
सव्वो वि गणो विप्परिणमेज्ज छंडेज्ज वायरियं ॥४९४॥

अर्थ: जैसे इस आचार्यने अमुक साधुका दोष प्रकट किया उसी प्रकार यह हमारा दोष भी प्रकट कर देगा, ऐसा सोचकर समस्त गण गणसे अलग हो सकता है अथवा आचार्यका त्याग कर सकता है ।


तह चेव पवयणं सव्वमेव विप्परिणयं भवे तस्स ।
तो से दिसावहारं करेज्ज णिज्जूहणं चावि ॥४९५॥

अर्थ: जिसमें रत्नत्रय ‘प्रोच्यते’ कहा जाता है वह प्रवचन है इस व्युत्पत्तिके अनुसार प्रवचन शब्दका अर्थ यहाँ संघ है । सभी संघ आचार्यके विरुद्ध हो सकता है और उसके आचार्य पदको छीन सकता है अथवा उसका त्याग कर सकता है ॥४९५॥


जदि धरिसणमेरिसयं करेदि सिस्सस्स चेव आयरिओ ।
धिद्धि अपुट्ठधम्मो समणोत्ति भणेज्ज मिच्छजणो ॥४९६॥

अर्थ: यदि आचार्य अपने शिष्यको ही इस प्रकार दोष प्रकट करके दूषित करते हैं तो इन अपुष्ट धर्मवाले श्रमणोंको धिक्कार है ऐसा मिथ्यादृष्टि लोग कहेंगे ॥४९६॥


इच्चेवमादिदोसा ण होंति गुरुणो रहस्सधारिस्स ।
पुट्ठेव अपुट्ठे वा अपरिस्साइस्स धीरस्स ॥४९७॥

अर्थ: जो आचार्य पूछनेपर अथवा बिना पूछे शिष्यके द्वारा प्रकट किये दोषोंको दूसरोंसे नहीं कहता वह रहस्यको गुप्त रखनेवाला आचार्य अपरिस्रावी होता है और उसे ऊपर कहे दोष जरा भी नहीं छूते ॥४९७॥


संथारभत्तपाणे अमणुण्णे वा चिरं व कीरंते ।
पडिचरगपमादेण य सेहाणमसंवुडगिराहिं ॥४९८॥

अर्थ: संस्तर और भोजनपान क्षपकको मनके अनुकूल न होने पर, अथवा उसमें देरी करने पर अथवा निर्यापकोंके वैयावृत्य करनेमें प्रमाद करने पर अथवा सल्लेखना विधिसे अनजान नये साधुओंके कठोर और प्रतिकूल वचनोंसे क्षपक कुपित हो सकता है अथवा अपनी मर्यादाका उल्लंघन कर सकता है ॥४९८॥


सीदुण्हछुहातण्हाकिलामिदो तिव्ववेदणाए वा ।
कुविदो हवेज्ज खवओ मेरं वा भेत्तुमिच्छेज्ज ॥४९९॥

अर्थ: अथवा शीत, उष्ण, भूख, प्याससे पीड़ित होनेसे अथवा तीव्र वेदनासे क्षपक कुपित हो सकता है और मर्यादाको तोड़नेकी इच्छा करता है ॥४९९॥


णिव्ववएण तदो से चित्तं खवयस्स णिव्ववेदव्वं ।
अक्खोभेण खमाए जुत्तेण पणट्ठमाणेण ॥५००॥

अर्थ: तब विचलित न होनेवाले, क्षमाशील और मानरहित आचार्यको सन्तोष वचन कहते हुए उस कुपित अथवा मर्यादाको तोड़नेके इच्छुक क्षपकके चित्तको शान्त करना चाहिये ॥५००॥


अंगसुदे य बहुविधे णो अंगसुदे य बहुविधविभत्ते ।
रदणकरंडयभूदो खुण्णो अणिओगकरणम्मि ॥५०१॥

अर्थ: श्रुत एक पुरुषके समान है । आचार्य आदि बारह उस श्रुतपुरुषके मुख, पैर आदि अंगोंके स्थानापन्न होनेसे अंग शब्दसे कहे जाते हैं । आचार, सूत्रकृत, स्थान, समवाय, व्याख्याप्रज्ञप्ति इत्यादिके भेदसे वह अंगश्रुत नाना प्रकारका है । नो अंगश्रुत अर्थात् अंगबाह्य भी सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्प्य, महाकल्प्य, पुण्डरीक, महापुण्डरीक इत्यादि विचित्र भेदसे विभक्त हैं । जो आचार्य इन सब श्रुत भेदोंके लिए रत्न रखनेके पिटारेके समान हैं अर्थात् जैसे पिटारेमें रत्न सुरक्षित रहते हैं वैसे ही वह इन श्रुतरूपी रत्नोंका अभ्यास करके उन्हें अपने हृदयमें धारण करता है । तथा जो जो प्रस्तुत विषय है उस उस विषयमें सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्व आदि अनुयोगोंकी योजना करनेमें कुशल होता है वही आचार्य क्षपककी अशान्तिको शमन कर सकता है । इससे आचार्यके ज्ञान माहात्म्यको सूचित किया है ॥५०१॥


वत्ता कत्ता च मुणी विचित्तसुदधारओ विचित्तकहो ।
तह य अपायविदण्हू मइसपण्णो महाभागो ॥५०२॥

अर्थ: तथा वह वक्ता अर्थात् व्याख्यान करनेमें कुशल, विनय और वैयावृत्यका कर्ता और प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोगके भेदसे नाना प्रकारके श्रुतका धारक और विविध प्रकारका निरूपण करनेवाला तथा रत्नत्रयके अतिचारोंका ज्ञाता और स्वाभाविक बुद्धिसे सम्पन्न तथा जितेन्द्रिय महात्मा होता है ।


पगदे णिस्सेसं गाहुगं च आहरणहेदुजुत्तं च ।
अणुसासेदि सुविहिदो कुविदं सण्णिव्ववेमाणो ॥५०३॥

अर्थ: जिस वस्तुका निवेदन करना प्रारम्भ करे तो उसके समस्त हेय उपादेय रूपका बोध दृष्टान्त और युक्तिसे करावे कि इस हेतुसे यह ऐसा ही है। ऐसा आचार्य कुपित हुए क्षपकको सम्यक् रूपसे प्रसन्न करके उसे शिक्षा देता है ॥५०३॥


णिद्धं मधुरं गंभीरं मणप्पसादणकरं सवणकंतं ।
देइ कहं णिव्ववगो सदीसमण्णाहरणहेउं ॥५०४॥

अर्थ: निर्यापक आचार्य प्रियवचनोंकी बहुलतायत होनेसे स्निग्ध, अधिक कठोर अक्षर न होनेसे मधुर, अर्थकी प्रगाढता होनेसे गम्भीर, मनको प्रसन्नता और कानोंको सुख देनेवाली कथा कहते हैं जिससे क्षपकको पहले अभ्यास किये हुए श्रुतके अर्थका स्मरण होता है। यहाँ स्मृतिसे कोई व्याख्याकार मतिका ग्रहण करते हैं क्योंकि तत्त्वार्थसूत्रमें मति, स्मृति संज्ञा, चिन्ता अभिनिबोधको अर्थान्तर कहा है। अतः वे अर्थ करते हैं कि उस कथासे क्षपकमें बुद्धिका आगमन होता है, उसकी बुद्धि जाग्रत हो जाती है ॥५०४॥


जह पक्खुभिदुम्मीए पोदं रदणभरिदं समुद्दम्मि ।
णिज्जवओ धारेदि हु जिदकरणो बुद्धिसंपण्णो ॥५०५॥

अर्थ: जैसे नौका चलानेका अभ्यासी बुद्धिमान् नाविक तरंगोंसे क्षुभित समुद्रमें रत्नोंसे भरे जहाजको धारण करता है ॥५०५॥


तह संजमगुणभरिदं परिस्सहुम्मीहिं खुभिदमाइद्धं ।
णिज्जवओ धारेदि हु महुरेहिं हिदोवदेसेहिं ॥५०६॥

अर्थ: वैसे ही निर्यापक आचार्य संयम और गुणोंसे पूर्ण, किन्तु परीषह रूप लहरोंसे चंचल और तिरछे हुए क्षपकरूप जहाजको मधुर और हितकारी उपदेशोंसे धारण करता है उसका संरक्षण करता है ॥५०६॥


धिदिबलकरमादहिदं महुरं कण्णाहुदिं जदि ण देइ ।
सिद्धिसुहमावहंती चत्ता आराहणा होइ ॥५०७॥

अर्थ: यदि आचार्य स्मृतिकी स्थिरता रूप धैर्यको बल देने वाली और आत्माका हित करनेवाली मधुर वाणी क्षपकके कानोंमें न सुनावे तो मोक्ष सुखको लानेवाली आराधनाको क्षपक छोड़ बैठे ॥५०७॥


इय णिव्ववओ खवयस्स होइ णिज्जावओ सदायरिओ ।
होइ य कित्ती पथिदा एदेहिं गुणेहिं जुत्तस्स ॥५०८॥

अर्थ: इस प्रकार निर्यापकत्व गुणसे युक्त आचार्य क्षपकका निर्यापक होता है। वह उसका उपकारी होता है। इतना कहकर उस निर्यापकाचार्यका भी इसमें स्वार्थ बतलाते हैं कि इन आचारवत्व आदि गुणोंसे युक्त निर्यापकाचार्यकी कीर्ति सब जगह फैलती है ॥५०८॥


इय अट्ठगुणोवेदो कसिणं आराधणं उवविधेदि ।
खवगो वि तं भयवदी उवगूहदि जादसंवेगो ॥५०९॥

अर्थ: इस प्रकार आचारवान् आदि आठ गुणोंसे सहित आचार्य समस्त आराधनाको प्राप्त होता है । क्षपक भी संसारसे विरक्त होकर समस्त बाधाओंको दूर करनेसे माहात्म्यशाली उस भगवती आराधनाका आलिंगन करता है उसे अपनाता है ॥५०९॥


एवं परिमग्गित्ता णिज्जवयगुणेहिं जुत्तमायरियं ।
उवसंपज्जइ विज्जाचरणसमग्गो तगो साहू ॥५१०॥

अर्थ: इस प्रकार ज्ञान और चारित्रसे सम्पूर्ण क्षपक निर्यापकके आचारवत्त्व आदि गुणोंसे युक्त आचार्यको खोजकर उनके निकट जाता है ॥५१०॥


तियरणसव्वावासयपडिपुण्णं किरिय तस्स किरियम्मं ।
विणएणमंजलिकदो वाइयवसभं इमं भणदि ॥५११॥

अर्थ: मन वचन कायसे छह आवश्यकोंको पूर्णरूपसे करके निर्यापकाचार्यकी वन्दना करता है और विनयपूर्वक दोनों हाथोंको जोड़ उनकी अंजली बनाकर उन आचार्य श्रेष्ठसे इस प्रकार कहता है ॥५११॥ ‘मैं सर्व सावद्ययोगको त्यागता हूँ’ ऐसा कहना, कायसे सावद्य क्रियाओंका न करना। मनसे चौबीस तीर्थंकरोंके गुणोंका स्मरण, वचनसे ‘लोगस्सुजोयकरे’ इत्यादि स्तुतिका पढ़ना, कायसे दोनों हाथ मुकुलित करके मस्तकसे लगाना। वंदनीय गुणोंका स्मरण करना मनोवन्दना है। वचनसे उनके गुणोंके माहात्म्यको प्रकट करने वाले वचनोंका उच्चारण करना वचन वन्दना है। प्रदक्षिणा करके नमस्कार करना काय वन्दना है। मनसे किये हुए दोषोंकी निवृत्ति या हा, मैंने बुरा किया’ ऐसा सोचना मनःप्रतिक्रमण है। प्रतिक्रमण सूत्रका पढ़ना वाक् प्रतिक्रमण है। कायसे उन दोषोंका न करना काय प्रतिक्रमण है। मनसे मैं अतिचार आदि नहीं करूँगा ऐसा संकल्प मनःप्रत्याख्यान है। मैं उन्हें नहीं करूँगा ऐसा कहना वचन प्रत्याख्यान है। कायसे नहीं करूँगा ऐसा स्वीकार करना काय प्रत्याख्यान है। मनसे शरीरमें ‘यह मेरा है’ ऐसा भाव न होना मानस कायोत्सर्ग है। वचनसे मैं कायका त्याग करता हूँ ऐसा कहना वचन कायोत्सर्ग है। दोनों हाथोंको लटकाकर और दोनों पैरोंके मध्यमें चार अंगुलका अन्तर रखते हुए निश्चल खड़ा होना कायसे कायोत्सर्ग है। कायके अपायका निरास न करके (?) जब गुरु एकान्त में बैठे हों और प्रसन्न मन हों तब धीरेसे आकर शरीर और भूमिकी प्रतिलेखना करके, गुरुसे न तो दूर और न समीप बैठकर हाथोंकी अंजलि बनाकर निवेदन करे कि भगवन्! कृतिकर्म वन्दना करना चाहता हूँ। इस प्रकार आलोचना करके गुरुकी अनुज्ञा मिलने पर धीरेसे उठकर दोनों हाथ मस्तकसे लगा न बहुत धीरे, न बहुत जल्दीमें सामायिक पाठ पढ़े। शास्त्रके अनुसार विकार रहित निश्चल खड़े होकर कायोत्सर्ग करे। फिर चौबीस तीर्थंकरोंका स्तवन करे। फिर आचार्यमें अनुराग पूर्वक गुरु स्तवन पढ़े। यह कृतिकर्म वन्दना है। वन्दनाके अनन्तर विनयपूर्वक दोनों हाथ जोड़ आचार्यसे इस प्रकार निवेदन करे ॥५११॥


तुज्झेत्थ बारसंगसुदपारया सवणसंघणिज्जवया ।
तुज्झं खु पादमूले सामण्णं उज्जवेज्जामि ॥५१२॥

अर्थ: आप द्वादशांग श्रुत सागरके पारगामी हो । आचार आदि बारह जिसके अंग हैं वह द्वादशांग श्रुत समुद्रके समान है आपने उसे पार कर लिया है । तथा जो श्राम्यन्ति अर्थात् तपस्या करते हैं वे श्रमण हैं । उनका समुदाय श्रमणसंघ है उसके आप निर्यापक हैं । मैं आपके चरणोंमें बैठकर अपने श्रामण्यको उद्योतित करूँगा ॥५१२॥


पव्वज्जादी सव्वं कादूणालोयणं सुपरिसुद्धं ।
दंसणणाणचरित्ते णिस्सल्लो विहरिदुं इच्छे ॥५१३॥

अर्थ: अपनी इच्छा आचार्यके सामने प्रकट करता है - दीक्षा ग्रहण करनेसे लेकर जो दोष किए हैं उनकी दोषरहित आलोचना करके मैं दर्शन, ज्ञान और चारित्रको शल्यरहित होकर पालन करना चाहता हूँ ॥५१३॥


एवं कदे णिसग्गे तेण सुविहिदेण वायओ भणइ ।
अणगार उत्तमट्ठं साधेहि तुमं अविग्घेण ॥५१४॥

अर्थ: इस प्रकार उस उत्तम चरित्र वाले क्षपकके द्वारा अपना भार त्यागने पर वाचक आचार्य कहते हैं - हे द्रव्य और भावरूप अगार (घर) का त्याग करने वाले अनगार ! तुम विना किसी विघ्न बाधाके उत्तम अर्थ रत्नत्रय रूप द्रव्यकी साधना करो ॥५१४॥


धण्णोसि तुमं सुविहिद एरिसओ जस्स णिच्छओ जाओ ।
संसारदुक्खमहणीं घेत्तुं आराहणपडायं ॥५१५॥

अर्थ: हे सुविहित श्रमण ! तुम धन्य हो - पुण्यशाली हो, जो तुमने चार गतियोंमें परिभ्रमण रूप संसारमें जो दुःख हैं, उन दुःखोंको नष्ट करने पर तत्पर आराधना पताकाको ग्रहण करनेका निश्चय किया । रत्नत्रयकी आराधनासे कर्मोंका विनाश होता है । उनका विनाश होनेसे दुःखसे छुटकारा होता है ॥५१५॥


अच्छाहि ताव सुविहिद वीसत्थो मा य होहि उव्वादो ।
पडिचरएहिं समंता इणमट्ठं संपहारेमो ॥५१६॥

अर्थ: हे सुविहित ! विश्वस्त होकर तब तक बैठो । अपना चित्त व्याकुल मत करो । हम वैयावृत्य करने वालोंके साथ इस विषय पर विचार करते हैं ॥५१६॥


तो तस्स उत्तमट्ठे करणुच्छाहं पडिच्छदि विदण्हू ।
खीरोदणदव्वुग्गहदुगुंछणाए समाधीए ॥५१७॥

अर्थ: उसके पश्चात् मार्गको जाननेवाले आचार्य क्षपकके रत्नत्रयकी आराधना करनेमें उत्साहकी परीक्षा करते हैं कि उसके आराधना करनेका उत्साह है या नहीं है । तथा दूध भात आदि द्रव्यको ग्रहण करनेमें इसकी लोलुपता है या ग्लानि है ऐसी परीक्षा करते हैं । यहाँ दूधभात मनोज्ञ आहारका उपलक्षण है । अतः आहारके सम्बन्धमें उसकी परीक्षा करते हैं । यह परीक्षा समाधिके निमित्त की जाती है ॥५१७॥


खवयस्सुवसंपण्णस्स तस्स आराधणा अविक्खेवं ।
दिव्वेण णिमित्तेण य पडिलेहदि अप्पमत्तो सो ॥५१८॥

अर्थ: आराधनाके निमित्तसे अपने पास आये क्षपककी आराधना निर्विघ्न होनेके लिए आचार्य प्रमादरहित होकर दिव्य निमित्तज्ञानके द्वारा परीक्षा करते हैं कि इसकी आराधना निर्विघ्न होगी या नहीं होगी ॥५१८॥


रज्जं खेत्तं अधिवदिगणमप्पाणं च पडिलिहित्ताणं ।
गुणसाघणो पडिच्छदि अप्पडिलेहाए बहुदोसा ॥५१९॥

अर्थ: सम्यक्त्व आदि गुणोंका साधक वह आचार्य राज्य, क्षेत्र, अधिपति, गण, और अपनी शरीरकी परीक्षा करके क्षपकको ग्रहण करता है। अन्यत्र ‘गुणसाधणं’ पाठ मिलता है। उसके अनुसार आचार्य गुणोंकी साधनाके लिए उद्यत साधुको ग्रहण करता है। उक्त परीक्षा न करनेमें बहुत दोष हैं। उन्हें ही कहते हैं - क्षपककी आहार विषयक तृष्णा दूर हुई है या नहीं, ऐसी परीक्षा यदि नहीं की और क्षपक आहारमें तृष्णा रखनेवाला हुआ, तो रात दिन आहार की ही चिन्ता करनेपर कैसे आराधक हो सकता है। भूख प्यासकी परीषहोंको न सहनेसे चिल्ला-चिल्लाकर धर्मको दूषित करेगा। आराधनामें विघ्न आयेगा या नहीं, इसकी परीक्षा न करके यदि उस विघ्नको दूर नहीं किया जाय तो क्षपकका भी कार्य सिद्ध न हो और स्वयं आचार्य लोगोंकी निन्दाका पात्र बने। जो आचार्य राज्य क्षेत्र आदिकी अच्छे बुरेकी परीक्षा करता है वह यदि क्षपक और राज्य आदिका अशुभ देखता है तो उस क्षपकको लेकर अन्य राज्य और अन्य क्षेत्र आदिमें चला जाता है। ऐसा करनेसे वह क्षपकका उपकार करता है। परीक्षा न करनेपर यदि राज्य आदिमें उत्पात हुआ तो क्षपक और आचार्य दोनोंको कष्ट उठाना पड़ता है। यदि गणका या अपना अनिष्ट देखता है तो आचार्य कार्यका प्रारम्भ नहीं करता। अतः बिना परीक्षा किए कार्य करनेवाला आचार्य न क्षपकका उपकार करता है और न अपना उपकार करता है ॥५१९॥


पडिचरए आपुच्छिय तेहिं णिसिट्ठं पडिच्छदे खवयं ।
तेसिमणापुच्छाए असमाधी होज्ज तिण्हंपि ॥५२०॥

अर्थ: आचार्य परिचर्या करनेवाले यतियोंसे पूछता है - यह क्षपक रत्नत्रयकी साधनामें हमारी सहायता चाहता है । साधु समाधि और वैयावृत्य करना तीर्थंकर नामकर्मके बन्धके कारण हैं यह आप जानते ही हैं । अतः कहिये, हमलोग इसपर अनुग्रह करें या न करें ? प्रायः लौकिकजन भी परोपकारी और परोपकारके लिए सदा तत्पर रहनेवाले होते हैं । तब यतिजनोंका तो कहना ही क्या है ? वे तो समस्त निकट भव्यजीवोंको गहरे संसार पंकसे निकालनेमें तत्पर रहते हैं । आगममें भी कहा है - ‘आत्माका हित करना चाहिए । यदि शक्य हो तो परहित भी करना चाहिए ।’ अतः क्या इसके कल्याणका उद्योग करना चाहिए या नहीं । इस प्रकार आचार्यके पूछनेपर यदि वे स्वीकार करते हैं तो आचार्य क्षपकको स्वीकार करते हैं । परिचारक यतियोंसे न पूछनेपर आचार्य, क्षपक और संघ तीनोंको ही संक्लेश होता है । हम लोगोंने इस क्षपकको स्वीकार नहीं किया ऐसा मानकर यतिगण यदि उसकी विनय या वैयावृत्य न करें तो क्षपकको संक्लेश होता है कि ये मेरा कुछ भी नहीं करते । गुरुको भी संक्लेश होता है कि मैंने इसका उपकार करना प्रारम्भ किया किन्तु वे इसमें सहायता नहीं करते । परिचारक यतियोंको भी संक्लेश होता है कि यह कार्य बहुत जनोंके करनेका है किन्तु हमारा गुरु यह नहीं मानता और न हमारे बलाबलकी परीक्षा करता है ॥५२०॥


एगो संथारगदो जवइ सरीरं जिणोवदेसेण ।
एगो सल्लिहदि मुणी उग्गेहिं तवोविहाणेहिं ॥५२१॥

अर्थ: एक मुनि तो संस्तरपर चढ़कर जिनेन्द्रके उपदेशसे शरीरको आराधनामें लगाता है। एक मुनि उग्रतप करके शरीरको कृश करता है ॥५२१॥


तदिओ णाणुण्णादो जजमाणस्स हु हवेज्ज वाघादो ।
पडिदेसु दोसु तीसु य समाधिकरणाणि हायन्ति ॥५२२॥

अर्थ: तीर्थंकरने एक निर्यापक आचार्यके द्वारा अनुग्राह्य तीसरे यतिकी अनुज्ञा नहीं दी है अर्थात् एक आचार्यकी देख-रेखमें एक साथ एक दो ही मुनि सल्लेखना कर सकता है क्योंकि तपरूपी अग्निमें अपने शरीर आहुति देनेवाले मुनिकी समाधिमें विघ्न आता है। इसका कारण यह है कि यदि दो या तीन क्षपक संस्तर पर पड़ जायें तो चित्तको समाधान देनेवाली विनय वैयावृत्य आदिमें कमी आती है ॥५२२॥


तम्हा पडिचरयाणं सम्मदमेयं पडिच्छदे खवयं ।
भणदि य तं आयरियो खवयं गच्छस्स मज्झम्मि ॥५२३॥

अर्थ: अतः आचार्य एक ही क्षपकको स्वीकार करते हैं जो परिचर्या करनेवाले यतियोंको इष्ट होता है। तथा आचार्य गणके मध्यमें क्षपकको शिक्षा देते हैं जिससे गण भी समाधिको जान जाये ॥५२३॥


फासेहि तं चरित्तं सव्वं सुहसीलयं पयहिदूण ।
सव्वं परीसहचमुं अधियासंतो धिदिबलेण ॥५२४॥

अर्थ: हे क्षपक ! तुम धैर्यके बलसे सम्पूर्ण सुखशीलताको त्यागकर सम्पूर्ण परीषहोंकी सेनाको सहन करते हुए चारित्रको धारण करो। सुखशीलतासे चारित्र मन्द होता है क्योंकि सुखशील मुनि भोजन, उपकरण और वसतिका शोधन नहीं करता। जो स्वादिष्ट भोजनका लम्पट होता है न वह भिक्षाका शोधन करता है और न उपकरणका शोधन करता है। तथा सुखशील मुनि उद्गम आदि दोषका परिहार नहीं करता, उसका मन तो मनोज्ञ भोजन और उपकरणमें रहता है। कष्ट न सहकर जिस किसीकी वसतिमें ठहर जाता है ॥५२४॥


सद्दे रूवे गंधे रसे य फासे य णिज्जिणाहि तुमं ।
सव्वेसु कसाएसु य णिग्गहपरमो सदा होइ ॥५२५॥

अर्थ: हे यति ! तुम शब्द, रूप, गन्ध, रस, स्पर्श इन पांच इन्द्रियोंके विषयोंको जीतो ।


हंतूण कसाए इंदियाणि सव्वं च गारवं हंता ।
तो मलिदरागदोसो करेहि आलोयणासुद्धिं ॥५२६॥

अर्थ: तथा सब क्रोधादि कषायोंमें क्षमा आदि भावनाके द्वारा सदा निग्रह करनेमें तत्पर रहो ॥५२६॥


छत्तीसगुणसमण्णागदेण वि अवस्समेव कायव्वा ।
परसक्खिया विसोधी सुट्ठुवि ववहारकुसलेण ॥५२७॥

अर्थ: कषाय और इन्द्रियोंको नष्ट करके तथा ऋद्धि, रस, और सातके भेदसे सम्पूर्ण गारवको नष्ट करके, पश्चात् राग और द्वेषका मर्दन करके आलोचनाकी शुद्धि करो । राग और द्वेष झूठ बोलनेमें कारण होते हैं इसलिए उन्हें छोड़ने योग्य कहा है । रागवश मनुष्य दोषोंको नहीं देखता, और द्वेषवश गुणोंको ग्रहण नहीं करता । इसलिए रागद्वेषको दूर करके कार्य करना चाहिए ॥५२७॥


आयारवमादीया अट्ठगुणा दसविधो य ठिदिकप्पो ।
बारस तव छावासय छत्तीसगुणा मुणेयव्वा ॥५२८॥

अर्थ: छत्तीस गुणोंके धारण और व्यवहारमें कुशल आचार्यको भी अवश्य अन्य मुनिकी साक्षीसे अपने रत्नत्रयकी विशुद्धि - अतिचारोंका शोधन करना होता है । आठ ज्ञानाचार, आठ दर्शनाचार, बारह प्रकारका तप, पाँच समिति, तीन गुप्ति ये छत्तीस गुण हैं ॥५२८॥


सव्वे वि तिण्णसंगा तित्थयरा केवली अणंतजिणा ।
छदुमत्थस्स विसोधिं दिसंति ते वि य सदा गुरुसयासे ॥५२९॥

अर्थ: परिग्रहरूपी अर्थात् कीचड़को लाँघनेवाले सभी तीर्थंकर, स्वर्गसे अवतरण, जन्म और दीक्षा इन तीन कल्याणकोंको प्राप्त करके, केवलज्ञानावरणके क्षयसे समस्त विश्वको जाननेवाले केवलज्ञानी, तथा अनन्तसंसारका कारण होनेसे चारित्रका सर्वघात करनेवाले मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और बारह कषायको अनन्त कहा है। उनको जीतनेसे आचार्य, उपाध्याय और साधु अनन्तजिन कहे जाते हैं। ये सभी सदा गुरुके समीपमें रत्नत्रयकी शुद्धि करनेको कहते हैं। यह शुद्धि छद्मस्थ अवस्थासे सम्बन्ध रखती है ऐसा कोई कहते हैं। अथवा रत्नत्रयके परिणामवाला आत्मा रत्नत्रयकी शुद्धिसे शुद्ध होता है इससे उसे छद्मस्थकी विशुद्धि कहते हैं ॥५२९॥


जह सुकुसलो वि वेज्जो अण्णस्स कहेदि आदुरो रोगं ।
वेज्जस्स तस्स सोच्चा सो वि य पडिकम्ममारभइ ॥५३०॥

अर्थ: जैसे अत्यन्त निपुण भी वैद्य रोगी होनेपर अपना रोग दूसरे वैद्यसे कहता है और उस वैद्यकी चिकित्सा सुनकर वह रोगी वैद्य उसका कहा इलाज प्रारम्भ करता है ॥५३०॥


एवं जाणंतेण वि पायच्छित्तविधिमप्पणो सव्वं ।
कादव्वादपरविसोधणाए परसक्खिगा सोधी ॥५३१॥

अर्थ: इसी प्रकार सम्पूर्ण प्रायश्चित्त विधिको जानते हुए भी मुनिको अपनी उत्कृष्ट विशुद्धिके लिए परकी साक्षीपूर्वक शुद्धि करना चाहिए । क्योंकि अपनी और दूसरेकी साक्षीपूर्वक विशुद्धि उत्कृष्ट मानी जाती है । कहा है - ‘प्रायश्चित्त’ शब्दमें प्रायका अर्थ लोक है और उसका मन चित्त उस चित्तका ग्राहक अथवा उस चित्तको शुद्ध करनेवाले कर्मको प्रायश्चित्त कहा है ॥५३१॥


तम्हा पव्वज्जादी दंसणणाणचरणादिचारो जो ।
तं सव्वं आलोचेहि णिरवसेसं पणिहिदप्पा ॥५३२॥

अर्थ: यतः परकी साक्षीपूर्वक की गई शुद्धि ही प्रधान है अतः दीक्षासे लेकर अबतक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रमें जो अतिचार लगे हैं वे सब निरवशेष सावधान चित्त होकर कहो ।


काइयवाइयमाणसियसेवणं दुप्पओगसंभूय ।
जइ अत्थि अदीचारं तं आलोचेहि णिस्सेसं ॥५३३॥

अर्थ: मनवचन और कायकी प्रवृत्ति करते हुए यदि उनके दुष्प्रयोगसे अतिचार लगा हो तो उसकी पूरी तरहसे आलोचना करो ॥५३३॥


अमुगंमि इदो काले देसे अमुगत्थ अमुगभावेण ।
जं जह णिसेविदं तं जेण य सह सव्वमालोचे ॥५३४॥

अर्थ: इस दिनसे लेकर अमुक कालमें, अमुक देशमें, अमुक भावसे जो दोष, जिसके साथ जिस प्रकारसे किया हो वह सब कहना चाहिए । देशभेद, कालभेद, परिणामभेद, और सहायकके भेदसे दोषोंमें गुरुपना और लघुपना होता है । और दोषोंकी गुरुता और लघुताके अनुसार गुरु या लघु प्रायश्चित्त दिया जाता है । इसलिए क्षपक सब कहता है ॥५३४॥


आलोयणा हु दुविहा ओघेण य होदि पदविभागी य ।
ओघेण मूलपत्तस्स पयविभागी य इदरस्स ॥५३५॥

अर्थ: आलोचना दो प्रकारकी होती है - एक सामान्यसे और दूसरी विशेष से । क्योंकि सामान्य और विशेषका अवलम्बन लेकर ही वचनकी प्रवृत्ति होती है । किस दोषकी सामान्यसे आलोचना होती है और किसकी विशेषसे होती है ? यह कहते हैं - जिसको मूल नामक प्रायश्चित्त दिया जाता है वह सामान्यसे आलोचना करता है और जिसको मूल प्रायश्चित्त नहीं दिया जाता वह विशेष रूपसे आलोचना करता है ॥५३५॥


ओघेणालोचेदि हु अपरिमिदवराधिसव्वघादी वा ।
अज्जोपाए इच्छं सामण्णमहं खु तुच्छोत्ति ॥५३६॥

अर्थ: जो अपरिमित अपराधी है जिसने बहुत अपराध किए हैं या जिसने सब सम्यक्त्व व्रत आदि का घात किया है वह सामान्य आलोचना करता है । मैं आज से मुनि दीक्षा लेना चाहता हूँ । मैं रत्नत्रय से तुच्छ हूँ । यह सामान्य आलोचना का स्वरूप है । आचार्य आदिकी साक्षी पूर्वक शुद्धिमें मायाशल्य दूर होता है । मान कषाय जड़ से उखड़ जाती है । गुरुजनके प्रति आदर भाव व्यक्त होता है । उनके अधीन रह कर व्रताचरण करनेसे मोक्षमार्गकी ख्याति होती है ॥५३६॥


पव्वज्जादी सव्वं कमेण जं जत्थ जेण भावेण ।
पडिसेविदं तहा तं आलोचिंतो पदविभागी ॥५३७॥

अर्थ: दीक्षासे लेकर सब कालमें सब क्षेत्रमें जिस भावसे और जिस क्रमसे जो दोष किया हो उसकी उसी प्रकार आलोचना करना पदविभागी अर्थात् विशेष आलोचना है ॥५३७॥


जह कंटएण विद्धो सव्वंगे वेदणुद्धुदो होदि ।
तम्हि दु समुद्दिदे सो णिस्सल्लो णिव्वुदो होदि ॥५३८॥

अर्थ: जैसे कण्टकसे विधा हुआ सर्वशरीरमें पीड़ासे पीड़ित होता है और उस कण्टकके निकल जानेपर वह दुःखी मनुष्य शल्यसे रहित हो सुखी होता है ॥५३८॥


एवमणुद्धुददोसो माइल्लो तेण दुक्खिदो होइ ।
सो चेव वंददोसो सुविसुद्धो णिव्वुदो होइ ॥५३९॥

अर्थ: उसी प्रकार जो काँटेकी तरह दोषको नहीं निकालता वह मायावी अपने अपराधको न कहने रूप दोषसे दुःखी रहता है। और वही दोषको प्रकट करनेपर विशुद्ध होकर सुखी होता है ॥५३९॥


मिच्छादंसणसल्लं मायासल्लं णिदाणसल्लं च ।
अहवा सल्लं दुविहं दव्वे भावे य बोधव्वं ॥५४०॥

अर्थ: शल्यके तीन भेद हैं - मिथ्यादर्शनशल्य, मायाशल्य और निदानशल्य, अथवा शल्यके दो भेद जानना - द्रव्यशल्य और भावशल्य ॥५४०॥


तिविहं तु भावसल्लं दंसणणाणे चरित्तजोगे य ।
सच्चित्ते य अचित्ते य मिस्सगे वा वि दव्वम्मि ॥५४१॥

अर्थ: भावशल्यके तीन भेद हैं - दर्शनशल्य, ज्ञानशल्य, चारित्रयोगशल्य । शंका आदि दर्शनके शल्य हैं । अकालमें पढ़ना, विनय न करना आदि ज्ञानके शल्य हैं । समिति और गुप्तिमें अनादर चारित्रके शल्य हैं । पहले कहे अनशन आदिके अतिचार अथवा असंयमरूप परिणाम योग अर्थात् तपके शल्य हैं । तपका अन्तर्भाव चारित्रमें होता है इस विवक्षासे यहाँ भावशल्य तीन कहे हैं । द्रव्यशल्य भी तीन हैं - सचित्त, अचित्त और मिश्र । दास आदि सचित्त द्रव्यशल्य हैं । सुवर्ण आदि अचित्त द्रव्यशल्य हैं । गाँव आदि मिश्र द्रव्यशल्य हैं । इन तीनोंको द्रव्यशल्य कहते हैं क्योंकि ये चारित्राचारके शल्यके कारण हैं ॥५४१॥


एगमवि भावसल्लं अणुद्धरित्ताण जो कुणइ कालं ।
लज्जाए गारवेण य ण सो हु आराधओ होदि ॥५४२॥

अर्थ: जो साधु लज्जा अथवा गारवसे एक भी भाव अर्थात् रत्नत्रयके शल्य अर्थात् अतिचारको निकाले बिना मरण करता है, वह मुनि आराधक नहीं है । निरतिचारता ही यतियोंकी आराधना है ॥५४२॥


कल्ले परे व परदो काहं दंसणणाणचरित्तसोधित्ति ।
इय संकप्पमदीया गयं पि कालं ण याणंति ॥५४३॥

अर्थ: कल या परसों मैं दर्शन, ज्ञान और चारित्रकी शुद्धि करूँगा ! ऐसा संकल्प करनेवाले बीतते हुए आयुकालको नहीं जानते। इसीसे उनका मरण शल्य सहित होता है। इसीसे कहा है - ‘जैसे ही मायाशल्य उत्पन्न हो, उत्पन्न होते ही उसे आनुपूर्वीक्रमसे नष्ट कर देना चाहिए।’ व्याधि, शत्रु और कर्मकी यदि उपेक्षा की जाये तो उनकी जड़ जम जाती है फिर सुखपूर्वक उनका विनाश नहीं होता। अथवा अपराधकी उपेक्षा करनेवाले साधु दोष लगनेके कालको बहुत दिन बीत जानेपर भूल जाते हैं। जो अतिचार प्रतिदिन होते हैं उनका काल सन्ध्यामें अतिचार लगा था या रातमें या दिनमें, इत्यादि भूल जाते हैं। पीछे आलोचना करते समय गुरुके पूछनेपर नहीं कह पाते क्योंकि बहुत काल बीतनेसे भूल जाते हैं। अथवा बीते अतीचारके कालको और ‘अपि’ शब्दसे अतिचारके हेतु क्षेत्र और भावको नहीं जानते, उन्हें उनका स्मरण नहीं होता। ऐसी किन्हींकी व्याख्या है ॥५४३॥


रागद्दोसाभिहदा ससल्लमरणं मरंति जे मूढा ।
ते दुक्खसल्लबहुले भमंति संसारकांतारे ॥५४४॥

अर्थ: राग और द्वेषसे पीड़ित जो मूढ़ मुनि शल्यसहित मरते हैं वे दुःखरूपी शल्योंसे भरे संसाररूपी बनमें भटकते हैं । शल्यकी तरह दुर्द्धर होनेसे दुःखोंको शल्य कहा है ॥५४४॥


तिविहं पि भावसल्लं समुद्धरित्ताण जो कुणदि कालं ।
पव्वज्जादी सव्वं स होइ आराधओ मरणे ॥५४५॥

अर्थ: जो दीक्षा लेनेके दिनसे लेकर तीन प्रकारके सब भावशल्यको निकालकर मरण करते हैं वे मरते समय दर्शन आदिके आराधक होते हैं ॥५४५॥


जे गारवेहिं रहिदा णिस्सल्ला दंसणे चरित्ते य ।
विहरंति मुत्तसंगा खवंति ते सव्वदुक्खाणि ॥५४६॥

अर्थ: जो तीन प्रकारके गारव और तीन प्रकारके शल्योंसे रहित हो ममत्वभावको त्याग दर्शन ज्ञान और चारित्रमें विहार करते हैं वे सब दुःखोंका क्षय करते हैं ॥५४६॥


तं एवं जाणंतो महंतयं लाभयं सुविहिदाणं ।
दंसणचरित्तसुद्धो णिस्सल्लो विहर तो धीर ॥५४७॥

अर्थ: हे धीर ! निरतिचार रत्नत्रयका पालन करनेवाले संयमियोंके ऊपर कहे महान् लाभको जानते हुए तुम दर्शन और चारित्रकी शुद्धि करके शल्यरहित होकर मोक्षमार्गमें प्रवर्तन करो । दर्शन और चारित्रकी शुद्धि ज्ञान और दर्शनकी शुद्धिके बिना नहीं होती । इसलिए दर्शन और चारित्रकी शुद्धिसे दर्शन ज्ञान चारित्र तीनोंकी शुद्धि कही है ॥५४७॥


तम्हा सतूलमूलं अविछूढमविप्पुदं अणुव्विग्गो ।
णिम्मोहियमणिगूढं सम्मं आलोचए सव्वं ॥५४८॥

अर्थ: यतः शल्यसहित मरणमें दोष है और निःशल्य मरणमें दुःखके कारण कर्मोंका अभाव होनेसे समस्त दुःखोंसे छुटकारा होता है । इसलिए दुःखसे निवृत्तिके लिए दीक्षाके दिनसे लेकर आज तक जो अतिचार लगे हैं वे सब बिना भूल किये, धीरे-धीरे, बिना किसी भय और मोहके सम्यक्रूपसे प्रकट करो ॥५४८॥


जह बालो जंपंतो कज्जमकज्जं व उज्जुअं भणइ ।
तह आलोचेदव्वं मायामोसं च मोत्तूण ॥५४९॥

अर्थ: जैसे बालक बोलते हुए कार्य हो या अकार्य हो, सरलभावसे ही कहता है कुछ छिपाता नहीं है। वैसे ही साधुको भी मनोगत कुटिलता और वचनगत झूठको त्यागकर अपना अपराध कहना चाहिए ॥५४९॥


दंसणणाणचरित्ते कादूणालोचणं सुपरिसुद्धं ।
णिस्सल्लो कदसुद्धी कमेण सल्लेहणं कुणसु ॥५५०॥

अर्थ: अतः दर्शन ज्ञान और चारित्रसम्बन्धी अपने अपराधोंको कहकर, मायाशल्यसे रहित होकर, गुरुके द्वारा कहा गया प्रायश्चित्त करके क्रमसे सल्लेखना करो ॥५५०॥


तो सो एवं भणिओ अब्भुज्जदमरणणिच्छिदमदीओ ।
सव्वंगजादहासो पीदीए पुलइदसरीरो ॥५५१॥

अर्थ: इस प्रकार गुरुके द्वारा शिक्षित किया गया वह क्षपक समाधिमरण करनेका निश्चय करता है। उसके सब अंगोंमें हर्षकी लहर दौड़ती है और प्रीतिसे शरीर रोमांचित हो जाता है ॥५५१॥


पाचीणोदीचिमुहो चेदियहुत्तो व कुणदि एगंते ।
आलोयणपत्तीयं काउस्सग्गं अणाबाधे ॥५५२॥

अर्थ: वह पूरब, उत्तर या जिनबिम्बकी ओर मुख करके जनरहित एकान्त प्रदेशमें जहाँ किसी प्रकारकी बाधाकी सम्भावना नहीं है ऐसे जनरहित एकान्तमें स्थानमें आलोचनाके निमित्त कायोत्सर्ग करता है। यतः कायोत्सर्गसे खड़े होनेपर गुरुसे कहनेके लिए दोषोंका स्मरण होता है अतः कायोत्सर्ग आलोचनाका कारण है । बहुतसे लोगोंके मध्यमें चित्त एकाग्र नहीं होता तथा रास्तेमें खड़े होकर कायोत्सर्ग करनेसे दूसरोंके कार्यमें बाधा आती है । ऐसा मानकर कायोत्सर्गका स्थान एकान्त और मार्गरहित कहा है ॥५५२॥


एवं खु वोसरित्ता देहे वि उवेदि णिम्ममत्तं सो ।
णिम्ममदा णिस्संगो णिस्सल्लो जाइ एयत्तं ॥५५३॥

अर्थ: इस प्रकार आलोचनाके लिए एकान्त स्थानमें पूरबके सन्मुख अथवा उत्तरके सन्मुख अथवा जिनबिम्बके सन्मुख होकर ‘मैं शरीरका त्याग करता हूँ’ इस प्रकार वचनसे त्याग करके ‘यह शरीर मेरा नहीं है’ इस प्रकार मनसे त्याग करता है । अतः वचन और मनके भेदसे त्यागके दो भेद होते हैं । इस प्रकारसे शरीर ममत्व त्यागकर निर्ममत्वको प्राप्त होता है और निर्ममत्वको प्राप्त होनेसे बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रहसे रहित होता है । परिग्रह रहित होनेसे ही निःशल्य होकर एकत्वभावनाको प्राप्त होता है ।


तो एयत्तमुवगदो सरेदि सव्वे कदे सगे दोसे ।
आयरियपादमूले उप्पाडिस्सामि सल्लत्ति ॥५५४॥

अर्थ: एकत्व भावनामय होकर प्रायश्चित्तका आचरण करनेमें खिन्न नहीं होता । कर्मके उदयके निमित्तसे होनेवाली मायाको छोड़नेमें तत्पर होता है । मैं शुद्धस्वरूप हूँ । मेरी यह माया अशुद्धि है ऐसा मानता है । अतः यह सम्यग्दर्शनका अतिचार है । मैं आचार्यके पादमूलमें अपने दोषोंको जड़मूलसे दूर करूँगा, इस भावनासे अपने द्वारा किये गये सब दोषोंको स्मरण करता है ॥५५४॥


इय उजुभावमुपगदो सव्वे दोसे सरित्तु तिक्खुत्तो ।
लेस्साहिं विसुज्झंतो उवेदि सल्लं समुद्धरिदुं ॥५५५॥

अर्थ: इस प्रकार सरलभावको प्राप्त हुआ क्षपक सम्पूर्ण दोषोंको तीन बार स्मरण करके लेश्याओंसे विशुद्ध होता हुआ शल्योंको दूर करनेके लिए आचार्यके पास जाता है ॥५५५॥


आलोयणादिया पुण होइ पसत्थे य सुद्धभावस्स ।
पुव्वण्हे अवरण्हे व सोमतिहिरिक्खवेलाए ॥५५६॥

अर्थ: आलोचना प्रतिक्रमण आदि क्रिया विशुद्ध परिणामवाले क्षपकके प्रशस्त क्षेत्रमें पूर्वाह्ण अथवा अपराह्णकालमें शुभदिन, शुभनक्षत्र और शुभवेलामें होती है। यहाँ प्रशस्त क्षेत्रसे क्षेत्रशुद्धि कही है। विशुद्धपरिणामसे भावशुद्धि कही है तथा शुभदिन आदिसे कालशुद्धि कही है ॥५५६॥


णिप्पत्तकंटइल्लं विज्जुहदं सुक्खरुक्खकडुदड्ढं ।
सुण्णघररुद्ददेउलपत्थररासिट्टियापुंजं ॥५५७॥

अर्थ: जहाँ वृक्ष पत्ररहित हों, कण्टक भरे हों, वज्रपात हुआ हो, सूखे वृक्ष हों, कटुक रसवाले हों, दावानलसे जल गये हों तथा शून्य घर, रुद्रदेवका मन्दिर, पत्थरों और ईंटोंका ढेर हो ॥५५७॥


तणपत्तकट्ठछारिय असुइ सुसाणं च भग्गपडिदं वा ।
रुद्दाणं खुद्दाणं अधिउत्ताणं च ठाणाणि ॥५५८॥

अर्थ: तृण, पत्र और काष्ठसे भरा स्थान, स्मशान, जहाँ टूटे पात्र और खण्डहर हों, चामुण्डा आदि रौद्र देवताओंका स्थान, नीचजनोंका स्थान ॥५५८॥


अण्णं व एवमादी य अप्पसत्थं हवेज्ज जं ठाणं ।
आलोचणं ण पडिच्छदि तत्थ गणी से अविग्घत्थं ॥५५९॥

अर्थ: अन्य भी जो इस प्रकारके अप्रशस्त स्थान हों, वहाँ आचार्य उस क्षपककी निर्विघ्नताके लिए आलोचना नहीं कराते, क्योंकि इन स्थानोंमें आलोचना करनेपर प्रारब्ध कार्यकी सिद्धि नहीं होती ऐसा वे मानते हैं ॥५५९॥


अरहंतसिद्धसागरपउमसरं खीरपुप्फफलभरियं ।
उज्जाणभवणतोरणपासादं णागजक्खघरं ॥५६०॥

अर्थ: यहाँ अरहंत और सिद्ध शब्दसे अर्हन्तों और सिद्धोंके साहचर्यसे युक्त अथवा अर्हन्त और सिद्धोंकी प्रतिमाके साहचर्यसे युक्त स्थान लिया गया है । सागर आदि शब्दसे सागर आदिके समीपका स्थान लिया गया है । क्षीर, पुष्प और फलोंसे भरे वृक्षोंके समीप होनेसे स्थानको ‘क्षीर पुष्पफल भरित’ कहा है । अतः अरहंतका मन्दिर, सिद्धोंका मन्दिर, समुद्रके समीप, कमलोंके सरोवरके समीप, या जहाँ दूध वाले वृक्ष हों, पुष्पफलोंसे भरे वृक्ष हों, उद्यानमें स्थित भवन हो, तोरण, प्रासाद, नागों और यक्षोंके स्थान ॥५६०॥


अण्णं च एवमादिय सुपसत्थं हवइ जं ठाणं ।
आलोयणं पडिच्छदि तत्थ गणी से अविग्घत्थं ॥५६१॥

अर्थ: अन्य भी जो सुन्दर स्थान हों वहाँ आचार्य क्षपककी निर्विघ्न समाधिके लिए आलोचना स्वीकार करते हैं ॥५६१॥


पाचीणोदीचिमुहो आयदणमुहो व सुहणिसण्णो हु ।
आलोयणं पडिच्छदि एक्को एक्कस्स विरहम्मि ॥५६२॥

अर्थ: पूरबकी ओर अथवा उत्तरकी ओर अथवा जिनमन्दिरकी ओर मुख करके सुखपूर्वक बैठकर आचार्य एकान्त स्थानमें अकेले ही एक ही क्षपककी आलोचना सुनते हैं ।


काऊण य किरियम्मं पडिलेहणमंजलीकरणसुद्धो ।
आलोएदि सुविहिदो सव्वे दोसे पमोत्तूण ॥५६३॥

अर्थ: सुविहित अर्थात् सुचारित्र सम्पन्न क्षपक दक्षिण पार्श्वमें पीछीके साथ हाथोंकी अंजलिको मस्तकसे लगाकर मन वचन कायकी शुद्धि पूर्वक प्रथम गुरुकी वन्दना करके सब दोषोंको त्याग आलोचना करता है ॥५६३॥


आकंपिय अणुमाणिय जं दिट्ठं बादरं च सुहुमं च ।
छण्णं सद्दाउलयं बहुजण अव्वत्त तस्सेवी ॥५६४॥

अर्थ: १. आकम्पित - अपने पर गुरुकी कृपा प्राप्त करके आलोचना करना । २. अनुमानित - उपायसे गुरुका अभिप्राय जानकर आलोचना करना । ३. दूसरोंने जो दोष देखा उसकी आलोचना करना । ४. बादर - स्थूल अतिचारकी आलोचना करना । ५. सूक्ष्म अतिचारकी आलोचना करना । ६. छन्न - कोई न देखे इस प्रकार आलोचना करना । ७. शब्दाकुलित - शब्दोंकी भरमार होते समय आलोचना करना । ८. बहुजन शब्द सामान्य वाची होते हुए भी यहाँ गुरुजनोंकी बहुलतामें लिया गया है । गुरुसे आलोचना करनेका प्रकरण होनेसे बहुतसे गुरुओंसे आलोचना करना बहुजन है । ९. अव्यक्तसे आलोचना करना । १०. तत्सेवी - जो अपने समान दोषोंका भागी है उससे आलोचना करना । इसका व्याख्यान आगे करेंगे ॥५६४॥


भत्तेण व पाणेण व उवकरणेण किरियकम्मकरणेण ।
अणुकंपेऊण गणिं करेइ आलोयणं कोइ ॥५६५॥

अर्थ: स्वयं भिक्षालब्धिसे युक्त होनेके कारण प्रवर्तक होकर आचार्यकी उद्गम आदि दोषोंसे रहित प्रासुक भक्तसे अथवा पानसे अथवा कमंडलु पीछी आदि उपकरणसे अथवा कृतिकर्म वन्दनासे वैयावृत्य करके अपने पर आचार्यकी कृपा उत्पन्न करके कोई साधु अपना अपराध कहता है ॥५६५॥


आलोइदं असेसं होहिदि काहिदि अणुग्गहं ममेत्ति ।
इय आलोचंतस्स हु पढमो आलोयणादोसो ॥५६६॥

अर्थ: भोजन आदिके दानके द्वारा उपकार करनेसे मुझपर प्रसन्न होकर गुरु महान् प्रायश्चित्त नहीं देंगे, बल्कि थोड़ा ही देंगे । अतः महान् प्रायश्चित्तका भय न होनेसे मैं स्थूल और सूक्ष्म सब अतिचार कहूँगा । इस प्रकार मनमें विचार कर आलोचना करने वालेके अविनय नामक प्रथम आलोचना दोष होता है । जो कुछ प्राप्त करके गुरु प्रसन्न होंगे और वे लघु प्रायश्चित्त देंगे ऐसा अपनी बुद्धिसे असत् दोषका अध्यारोपण करना मानसिक अविनय है । अन्य टीकाकार कहते हैं - आलोचना और दोष आलोचना दोष है । अशुभ अभिप्रायपूर्वक आलोचना दोष है ॥५६६॥


केदूण विसं पुरिसो पिएज्ज जह कोइ जीविदत्थीओ ।
मण्णंतो हिदमहिदं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी ॥५६७॥

अर्थ: जैसे कोई जीनेका अभिलाषी पुरुष विष खरीद कर पीता है वह अहित करके विषपानको हित मानता है । वैसा ही यह माया शल्यको निकालकर शुद्धिका अभिलाषी साधु है । यद्यपि यहाँ शल्य शब्द सामान्य शल्यका वाची है फिर भी यहाँ मायाशल्यका वाचक लिया है । उसका उद्धरण अर्थात् अपने किये अपराधको कहना । शल्यका उद्धरण ही शुद्धि कहा जाता है क्योंकि वह ज्ञान दर्शन और चारित्र तपकी निर्मलतामें कारण है । जीनेके अभिलाषीने हितबुद्धिसे ग्रहण किया खरीदे हुए विषका पान उपमान है । उसीके समान यह आलोचना है । भक्त पान आदि देकर या वन्दनाके द्वारा गुरुको खरीदकर अपनी बुद्धिसे की गई आलोचना शुद्धि नहीं करती जैसे विषपान जीवन नहीं देता । खरीदकर प्राप्त करना और दुष्टता उपमान और उपमेयका साधारण धर्म है । उपमान उपमेय और उन दोषोंमें पाये जाने वाले साधारण धर्मको लेकर सर्वत्र उपमान उपमेय व्यवहार होता है । जैसे ‘चन्द्रमुखी कन्या’ आदिमें चन्द्र उपमान है मुख उपमेय है । और गोलपना तथा सब लोगोंके मनको प्रिय होना दोनोंका साधारण धर्म है ॥५६७॥


वण्णरसगंधजुत्तं किंपाकफलं जहा दुहविवागं ।
पच्छा णिच्छयकडुयं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी ॥५६८॥

अर्थ: किंपाक नामक वृक्षका फल वर्णरसगन्धसे युक्त होनेपर भी जैसे परिणाममें दुःख देता है । वृक्षका फल वर्ण आदिसे शून्य नहीं होता अतः उसका रूपादिमान होना सिद्ध है । फिर भी जो उसे वर्णादियुक्त कहा है वह विशिष्टरूप रसगन्ध आदिका सूचक है । अतः यह अर्थ होता है - किंपाक वृक्षका फल नेत्रोंको अत्यन्त प्रियरूपवाला होता है । मधुररससे युक्त होता है और नाकको सुखदायक होता है । परन्तु सेवन करनेपर दुःखकारी होता है उसे खानेसे मृत्यु हो जाती है । अतः सेवन करनेके पश्चात् निश्चयसे कटुक होता है । यह आलोचना शुद्धि भी उसीके समान है। यहाँ किंपाकफलका सेवन उपमान है। आलोचना उपमेय है। परिणाममें दुःख होना दोनोंका साधारण धर्म है ॥५६८॥


किमिरागकंबलस्स व सोधी जदुरागवत्थसोधीव ।
अवि सा हवेज्ज किहइ ण इमा सल्लुद्धरणसोधी ॥५६९॥

अर्थ: कीड़ोंके द्वारा खाये गये आहारके रंगमें रंगे धागोंसे बने कम्बलको कृमिराग कम्बल कहते हैं। उसकी विशुद्धिकी तरह, जैसे पीला-नीला-लाल आदिमेंसे कोई एकवर्ण सफेद नहीं होता उसकी तरह कृमिराग कम्बलकी विशुद्धि नहीं होती। अथवा लाखके रंगमें रंगे वस्त्रकी शुद्धि बहुत प्रयत्न करनेपर भी नहीं होती। उसी तरह मायाशल्ययुक्त आलोचनासे भी शुद्धि नहीं होती। अथवा कृमिराग कम्बलकी शुद्धि और लाखके रंगमें रंगे वस्त्रकी शुद्धि हो भी जावे किन्तु यह मायाशल्यके निकलनेरूप शुद्धि नहीं होती ॥५६९॥


धीरपुरिसचिण्णाइं पवददि अदिधम्मिओ व सव्वाइं ।
धण्णा ते भगवंता कुव्वंति तवं विकट्ठं जे ॥५७०॥

अर्थ: आलोचना करनेवाला मुनि अत्यन्त धार्मिककी तरह कहता है - धीर पुरुषोंके द्वारा आचरित उत्कृष्ट तपको जो करते हैं वे धन्य हैं, माहात्म्यशाली हैं ॥५७०॥


थामापहारपासत्थदाए सुहसीलदाए देहेसु ।
वददि णिहीणो हु अहं जं ण समत्थो अणसणस्स ॥५७१॥

अर्थ: अपनी शक्तिको छिपाने, पार्श्वस्थ मुनि होने तथा शरीरमें सुखशील होनेसे वह कहता है - मैं तो एक जघन्य प्राणी हूँ, उपवास करनेमें असमर्थ हूँ ॥५७१॥


जाणह य मज्झ थामं अंगाणं दुब्बलदा अणारोगं ।
णेव समत्थोमि अहं तवं विकट्ठं पि कादुं जे ॥५७२॥

अर्थ: आप मेरे बलको जानते ही हैं । यह भी जानते हैं कि मेरी उदराग्नि दुर्बल है, मैं रोगी हूँ । अतः मैं उत्कृष्ट तप करनेमें असमर्थ हूँ ॥५७२॥


आलोचेमि य सव्वं जइ मे पच्छा अणुग्गहं कुणह ।
तुज्झ सिरीए इच्छं सोधी जह णिच्छरेज्जामि ॥५७३॥

अर्थ: मैं समस्त अतिचारोंकी आलोचना करूँ यदि आप उन्हें सुनकर मुझपर कृपा करें अर्थात् लघु प्रायश्चित्त दें । मैं आपकी कृपासे शुद्ध होना चाहता हूँ और शुद्ध होकर अपना निस्तार करूँगा ॥५७३॥


अणुमाणेदूण गुरुं एवं आलोचणं तदो पच्छा ।
कुणइ ससल्लं सो से विदिओ आलोयणा दोसो ॥५७४॥

अर्थ: प्रार्थना करनेपर लघु प्रायश्चित्त देकर गुरु मेरेपर अनुग्रह करेंगे, ऐसा अनुमानसे जानकर पीछे वह शल्यसहित आलोचना करता है । यह दूसरा आलोचना दोष है ॥५७४॥

गाथा ५७५ से ८२५

गुणकारि ओत्ति भुंजइ जहा सुहत्थी अपच्छमाहारं ।
पच्छा विवायकडुगं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी ॥५७५॥

अर्थ: जैसे सुखका इच्छुक पुरुष अपथ्य भोजनको अपनी बुद्धिसे गुणकारी मानकर खाता है तथापि भोजन करनेके पश्चात् उसका परिपाक दुःखदायी होता है । उसीके समान यह अनुमानित दोषसहित शल्यको दूर करके शुद्धि करनेवाला है । अर्थात् अनुमानसे गुरुके अभिप्रायको जानकर हितबुद्धिसे की गई भी आलोचना अनर्थकारी होती है । संकल्पसे वस्तुका अन्यथाभाव नहीं होता । संकल्पमात्रसे अपथ्य आहार पथ्य नहीं हो सकता ॥५७५॥


जं होदि अण्णदिट्ठं तं आलोचेदि गुरुसयासम्मि ।
अदिट्ठं गूहंतो माइल्लो होदि णायव्वो ॥५७६॥

अर्थ: जो अपराध दूसरे ने देख लिया है, गुरुके पासमें उसकी आलोचना करता है । और जो अपराध दूसरोंने नहीं देखा है उसे छिपाता है । वह मायावी है ऐसा जानना ॥५७६॥


दिट्ठं व अदिट्ठं वा जदि ण कहेइ परमेण विणएण ।
आयरियपायमूले तदिओ आलोयणादोसो ॥५७७॥

अर्थ: दूसरेके द्वारा देखे गये अथवा न देखे गये, अपराधको यदि आचार्यके पादमूलमें अत्यन्त विनयपूर्वक नहीं कहता तो यह तीसरा आलोचना दोष है ॥५७७॥


जह वालुयाए अवडो पूरदि उक्कीरमाणओ चेव ।
तह कम्मादाणकरी इमा हु सल्लुद्धरणसुद्धी ॥५७८॥

अर्थ: जैसे रेतके मध्यमें गढ़ा खोदने पर वह गढ़ा खोदते खोदते ही रेतसे भर जाता है, उसी प्रकार यह आलोचना शुद्धि कर्मोंको लाने वाली है इससे नवीन कर्मोंका बन्ध होता है। आशय यह है कि मायाशल्यके दूर करनेके लिए साधु आलोचना करता हुआ भी अन्य मायासे अपनेको आच्छादित करता है। जैसे गढ़ा बनानेके लिए उसमेंसे रेत निकाली जाती है किन्तु उसमें और रेत भर जाती है ॥५७८॥


बादरमालोचेंतो जत्तो जत्तो वदाओ पडिभग्गो ।
सुहुमं पच्छादेंतो जिणवयणपरंमुहो होइ ॥५७९॥

अर्थ: जिन-जिन व्रतोंमें जो दोष लगे हों उनमेंसे जो साधु स्थूल दोषोंकी तो आलोचना करता है और सूक्ष्म दोषोंको छिपाता है वह साधु जिनागमसे विमुख होता है ॥५७९॥


सुहुमं व बादरं वा जइ ण कहेज्ज विणएण सुगुरूणं ।
आलोचणाए दोसो एसो हु चउत्थओ होदि ॥५८०॥

अर्थ: यदि साधु विनयपूर्वक सुगुरुसे सूक्ष्म अथवा बादर दोषको नहीं कहता तो यह आलोचनाका चतुर्थ दोष है ॥५८०॥


जह कंसियभिंगारो अंतो णीलमइलो बहिं चोक्खो ।
अंतो ससल्लदोसा तधिमा सल्लुद्धरणसोधी ॥५८१॥

अर्थ: जैसे काँसेका बना भृंगार अन्दरसे नीला और मलिन होता है तथा बाहरसे स्वच्छ होता है वैसे ही यह आलोचना शुद्धि मायाशल्य दोषसे युक्त होती है ॥५८१॥


चंकमणे य ट्ठाणे णिसेज्जउवट्टणे य सयणे य ।
उल्लाभाससरक्खे य गब्भिणी बालवत्थाए ॥५८२॥

अर्थ: साधु गुरुसे निवेदन करता है - ओससे भीगे हुए मार्गसे ईर्यासमितिकी ओर ध्यान न रखते हुए मैं चला था। उस समय मेरा चित्त व्याकुल था। या प्रतिलेखना किए बिना में बैठा, या सोया या खड़ा हुआ । या जलादिसे मैंने शरीरको छुआ । या सचित्त धूलिसे सहित स्थानमें मैं खड़ा हुआ या बैठा या सोया । अथवा आठ आदि मासका गर्भ धारण करने वाली या जिसे प्रसव किए एक माह भी नहीं बीता था ऐसी स्त्रीसे मैंने आहार ग्रहण किया ॥५८२॥


इय जो दोसं लहुगं समालोचेदि गूहदे थूलं ।
भयमयमायाहिदओ जिणवयणपरंमुहो होदि ॥५८३॥

अर्थ: इस प्रकार जो अपने सूक्ष्म दोषको कहता है और भय, मद, माया सहित चित्त होनेसे स्थूल दोषको छिपाता है । यदि मैं महान् दोष कहता हूँ तो गुरु मुझे महान् प्रायश्चित्त देंगे या मुझे त्याग देंगे यह भय है । मेरा चारित्र निरतिचार है ऐसा गर्व करके स्थूल दोषोंको नहीं कहता । कोई स्वभावसे ही मायावी होनेसे अपने दोषोंको नहीं कहता । ऐसा करने वाला साधु जिनागमसे विमुख होता है ॥५८३॥


सुहुमं व बादरं वा जइ ण कहेज्ज विणएण स गुरूणं ।
आलायणाए दोसो पंचमओ गुरुसयासे से ॥५८४॥

अर्थ: यदि साधु विनयपूर्वक गुरुके सामने सूक्ष्म अथवा स्थूल दोषको नहीं कहता तो यह आलोचनाका पाँचवां दोष है क्योंकि उसने जिनागममें कहा मायाशल्यका त्याग नहीं किया ॥५८४॥


रसपीदयं व कडयं अहवा कवडुक्कडं जहा कडयं ।
अहवा जदुपूरिदयं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी ॥५८५॥

अर्थ: जैसे सोनेके रसके लेपसे लोहेका कड़ा बाहरसे पीला दिखाई देता है । अथवा जैसे सोनेके पतले पत्रसे ढका लोहेका कड़ा अन्दरसे निःसार होता है । अथवा लाखसे भरा कड़ा जैसा होता है उन्हींके समान यह आलोचना शुद्धि है । यहाँ तीन दृष्टान्तोंके द्वारा सूक्ष्म दोषकी आलोचनाकी निन्दा की गई है । जैसे सोनेके रससे लिप्त कड़ा ऊपरसे पीला होता है उसी प्रकार अल्प शुद्धि होती है यह प्रथम दृष्टान्तका भाव है । गुरुतर पापको ढांकने मात्रको प्रकट करनेके लिए दूसरा दृष्टान्त है । भारी लोहा वगैरह वस्तु निस्सार होती है, बाहरमें उसे सोनेके पत्रसे जैसे ढाक देते हैं उसी प्रकार वह सूक्ष्म अपराधोंको कहता है । ऐसा वह यह विश्वास उत्पन्न करनेके लिए करता है कि गुरु समझें कि यह मुनि पापसे इतना भयभीत है कि सूक्ष्म पापको भी नहीं छिपाता तब बड़ा पाप कैसे कर सकता है ? तीसरे दृष्टान्तके द्वारा इसे अन्तःसार रहित कहा है ॥५८५॥


जदि मूलगुणे उत्तरगुणे य कस्सइ विराहणा होज्ज ।
पढमे विदिए तदिए चउत्थए पंचमे च वदे ॥५८६॥

अर्थ: यदि किसीके मूलगुण चारित्र अथवा उत्तर गुण अनशन आदि तपमें या अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और परिग्रह त्याग व्रतमें अतिचार लग जाये ॥५८६॥


को तस्स दिज्जइ तवो केण उवाएण वा हवदि सुद्धो ।
इय पच्छण्णं पुच्छदि पायच्छित्तं करिस्सत्ति ॥५८७॥

अर्थ: तो उसे कौन सा तप दिया जाता है ? वह किस उपायसे शुद्ध होता है ? ऐसा प्रच्छन्न रूपसे पूछता है । अर्थात् अपनेको लक्ष करके कि मुझसे यह अपराध हुआ है उसका क्या प्रायश्चित्त है ऐसा नहीं पूछता । किन्तु यह जानकर प्रायश्चित्त करूँगा इस भावसे पूछता है ॥५८७॥


इय पच्छण्णं पुच्छिय साधू जो कुणइ अप्पणो सुद्धिं ।
तो सो जिणेहिं वुत्तो छट्ठो आलोयणा दोसो ॥५८८॥

अर्थ: इस प्रकार प्रच्छन्नरूपसे पूछकर जो साधु अपनी शुद्धि करता है उसको छठा आलोचना दोष होता है ऐसा जिनदेवने कहा है ॥५८८॥


धादो हवेज्ज अण्णो जदि अण्णम्मि जिमिदम्मि संतम्मि ।
तो परववदेसकदा सोधी अण्णं विसोधेज्ज ॥५८९॥

अर्थ: यदि अन्यके भोजन करनेपर अन्यको तृप्ति हो तो दूसरेके नामसे की गई विशुद्धि उससे अन्यकी शुद्धि कर सकती है ॥५८९॥


तवसंजमम्मि अण्णेण कदे जदि सुग्गदिं लहदि अण्णो ।
तो परववदेसकदा सोधी सोधिज्ज अण्णंपि ॥५९०॥

अर्थ: अन्यके द्वारा तपसंयम करनेपर यदि अन्य व्यक्ति सुगतिको प्राप्त हो सकता हो तो दूसरेके नामसे किया गया प्रायश्चित्त भी दूसरेको शुद्ध कर सकता है ॥५९०॥


मयतण्हादो उदयं इच्छइ चंदपरिवेसणा कूरं ।
जो सो इच्छइ सोधी अकहंतो अप्पणो दोसे ॥५९१॥

अर्थ: जो अपने दोषोंको न कहकर गुरुसे शुद्धि चाहता है वह मरीचिकासे जल और चन्द्रके परिवेशसे भोजन प्राप्त करना चाहता है । अर्थात् जैसे मरीचिकासे जल और चन्द्रके परिवेससे भोजन नहीं प्राप्त होता उसी तरह अपने दोषोंको कहे विना शुद्धि नहीं होती । इस तरह निष्फलताकी समानता होनेसे दोनोंमें दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकभाव है ॥५९१॥


पक्खियचाउम्मासियसंवच्छरिएसु सोधिकालेसु ।
बहुजणसद्दाउलए कहेदि दोसे जहिच्छाए ॥५९२॥

अर्थ: पाक्षिक, चातुर्मासिक और वार्षिक प्रायश्चित्तके समय जब सब मुनिगण अपने-अपने दोष निवेदन करते हैं और इस तरह बहुतसे मनुष्योंके शब्दोंका कोलाहल होता है उस समय जो मुनि अपनी इच्छानुसार दोषको कहता है ॥५९२॥


इय अव्वत्तं जइ सावेंतो दोसे कहेइ सगुरूणं ।
आलोचणाए दोसो सत्तमओ सो गुरुसयासे ॥५९३॥

अर्थ: यदि अपने गुरुओंको स्पष्टरूपसे सुनाई न दे इस प्रकार दोषोंको कहता है तो गुरुके निकट शब्दाकुल नामक सातवें आलोचना दोषका भागी होता है ॥५९३॥


अरहट्टघडीसरिसी अहवा चुंदच्छुदोवमा होइ ।
भिण्णघडसरिच्छा वा इमा हु सल्लुद्धरणसोधी ॥५९४॥

अर्थ: जैसे रहटमें लगी हुई पानी भरनेकी घटिकाएँ भरकर भी रीति होती जाती हैं उसी प्रकार वह आलोचना करनेवाला मुनि है। वह अपने मुखसे अपराध प्रकट करनेके लिए प्रवृत्त हुआ भी अप्रवृत्त ही है क्योंकि गुरुने उसे नहीं सुना। अथवा वह मन्थन चर्मपालिकाके समान है। जैसे मथानी डोरीसे छूटते हुए भी डोरीसे बँधती जाती है उसी प्रकार उसकी आलोचनावाणी गुरुरूपी गर्तसे छूटकर भी मायाशल्यसे सहित होनेसे कर्मसे बद्ध करती है। अथवा फूटे घटके समान है। जैसे फूटा घड़ा घटका कार्य जलधारण अथवा जल आदिका लाना करनेमें असमर्थ होता है। उसी प्रकार यह आलोचना निर्जरारूप कार्यको नहीं करती। यह इन दृष्टान्तोंमें और दार्ष्टान्तमें समानता है। यह शब्दाकुलित नामक सातवाँ आलोचना दोष है ॥५९४॥


आयरियपादमूले हु उवगदो वंदिऊण तिविहेण ।
कोई आलोचेज्ज हु सव्वे दोसे जहावत्ते ॥५९५॥

अर्थ: कोई साधु आचार्यके पादमूलमें जाकर, मनवचनकायकी शुद्धिपूर्वक वन्दना करके मनवचनकाय और कृतकारित अनुमोदनाके भेदरूप सब स्थूल और सूक्ष्म दोषोंको कहता है ॥५९५॥


तो दंसणचरणाधारएहिं सुत्तत्थमुव्वहंतेहिं ।
पवयणकुसलेहिं जहारिहं तवो तेहिं से दिण्णो ॥५९६॥

अर्थ: आलोचनाके पश्चात् सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्रके धारण करनेमें तत्पर, सूत्रोंके अर्थको वहन करनेवाले और प्रवचन कुशल आचार्योंने उसे अपराधके अनुरूप तप दिया । यहाँ तपका ग्रहण प्रायश्चित्तके उपलक्षणके लिए है अतः आचार्योंने उसे प्रायश्चित्त दिया ।


णवमम्मि य जं पुव्वे भणिदं कप्पे तहेव ववहारो ।
अंगेसु सेसएसु य पइण्णए चावि तं दिण्णं ॥५९७॥

अर्थ: प्रत्याख्यान नामक नवम पूर्वमें तथा कल्प और व्यवहार नामक अंग बाह्यमें, तथा शेष अंगों और प्रकीर्णकोंमें जो प्रायश्चित्तका कथन है तदनुसार ही आचार्यने उसे प्रायश्चित्त दिया ॥५९७॥


तेसिं असद्दहंतो आइरियाणं पुणो वि अण्णाणं ।
अह पुच्छइ सो आलोयणाए दोसो हु अट्ठमओ ॥५९८॥

अर्थ: किन्तु वह साधु उन आचार्योंके वचनोंपर श्रद्धान न करके फिर भी यदि अन्य आचार्योंसे पूछता है तो यह आलोचनाका आठवाँ दोष है ॥५९८॥


पगुणो वणो ससल्लं जध पच्छा आदुरं ण तावेदि ।
बहुवेदणाहिं बहुसो तधिमा सल्लुद्धरणसोधी ॥५९९॥

अर्थ: ऊपरसे अच्छा हुआ किन्तु भीतरमें कील सहित घाव पीछे बढ़कर क्या बहुत कष्ट नहीं देता ? देता ही है । उक्त आलोचना भी उसी घावकी तरह है । यद्यपि यह आलोचना माया और असत्यको त्यागकर की जानेसे अति सुन्दर है, दोष रहित है । तथापि गुरुके द्वारा दिए गये प्रायश्चित्तके प्रति अश्रद्धान रूपी शल्यसे युक्त होनेसे दुःखदायी है । यह बहुजन नामक दोष है ॥५९९॥


आगमदो वा बालो परियाएण व हवेज्ज जो बालो ।
तस्स सगं दुच्चरियं आलोचेदूण बालमदी ॥६००॥

अर्थ: जो मुनि आगम अर्थात् ज्ञानसे बालक है अथवा जो चारित्रसे बालक है अर्थात् जिसे शास्त्रज्ञान भी नहीं है और चारित्र भी जिसका हीन है उसके सन्मुख जो अज्ञानी अपने दोषकी आलोचना करता है ॥६००॥


आलोचिदं असेसं सव्वं एदं मएत्ति जाणादि ।
बालस्सालोचेंतो णवमो आलोचणा दोसो ॥६०१॥

अर्थ: और मैंने अपने मन वचन काय तथा कृत कारित अनुमोदनासे किए सब दोष कह दिये, ऐसा जानता है । इस प्रकार ज्ञान बालक और चारित्र बालक मुनिसे दोषोंका निवेदन करना नौवाँ आलोचना दोष है । इसे अव्यक्त दोष कहते हैं ॥६०१॥


कूडहिरण्णं जह णिच्छएण दुज्जणकदा जहा मेत्ती ।
पच्छा होदि अपत्थं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी ॥६०२॥

अर्थ: जैसे नकली सोनेको धन समझकर ग्रहण करे तो पीछेसे वह निश्चय ही अहितकर होता है क्योंकि उससे यदि कुछ इच्छित वस्तु खरीदना चाहें तो नहीं खरीद सकते । इसी प्रकार बालमुनिके सन्मुख की गई आलोचना भी अनुरूप प्रायश्चित्तकी प्राप्तिका उपाय न होनेसे नकली सोनेके ही समान अहितकारी है । क्योंकि ज्ञानसे बालमुनि परमार्थके योग्य प्रायश्चित्त देनेमें समर्थ नहीं होता। अथवा जैसे दुर्जनसे की गई मित्रता हितकर नहीं होती, दुःखदायक होती है उसी प्रकार प्राणिसंयम और इन्द्रियसंयमसे रहित चारित्र बालमुनिके सन्मुख की गई भी आलोचना प्रायश्चित्तका लाभ न होनेसे अनेक अनर्थोंको लानेवाली है ॥६०२॥


पासत्थो पासत्थस्स अणुगदो दुक्कडं परिकहेइ ।
एसो वि मज्झसरिसो सव्वत्थवि दोससंचइओ ॥६०३॥

अर्थ: पार्श्वस्थमुनि पार्श्वस्थमुनिके पास जाकर अपने दोषोंको कहता है। वह जानता है कि यह भी मेरे समान है। सब व्रतोंमें दोषोंसे भरा है ॥६०३॥


जाणइ य मज्झ एसो सुहसीलत्तं च सव्वदोसे य ।
तो एस मे ण दाहिदि पायच्छित्तं महल्लत्ति ॥६०४॥

अर्थ: यह मेरी सुखशीलताको जानता है कि मैं दुःख सहन नहीं कर सकता। मेरे सब व्रतोंके दोषोंको भी यह जानता है। अतः यह मुझे बड़ा प्रायश्चित्त नहीं देगा। यह मानकर वह उससे अपने दोष कहता है ॥६०४॥


आलोचिदं असेसं सव्वं एदं मएत्ति जाणादि ।
सो पवयणपडिकुद्धो दसमो आलोचणा दोसो ॥६०५॥

अर्थ: यह पार्श्वस्थमुनि मेरे द्वारा कहे सब दोषोंको जानता है ऐसा मानकर उससे प्रायश्चित लेना आगमसे निषिद्ध है। और यह आलोचनाका दसवाँ दोष है ॥६०५॥


जह कोइ लोहिदकयं वत्थं धोवेज्ज लोहिदेणेव ।
ण य तं होदि विसुद्धं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी ॥६०६॥

अर्थ: जैसे कोई रुधिरसे सने हुए वस्त्रको रुधिरसे ही धोता है तो वह विशुद्ध नहीं होता।


पवयणणिण्हवयाणं जह दुक्कडपावयं करेंताणं ।
सिद्धिगमणमइदूरं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी ॥६०७॥

अर्थ: जैसे जिन भगवान्के वचनोंका लोप करनेवाले और दुष्कर पाप करनेवालोंका मुक्तिगमन अति दुष्कर है उसी प्रकार पार्श्वस्थ मुनिसे दोषोंको कहनेवालोंकी शुद्धि अति दुष्कर है । यह तत्सेवी नामक दसवें दोषका कथन हुआ ॥६०७॥


सो दस वि तदो दोसे भयमायामोसमाणलज्जाओ ।
णिज्जूहिय संसुद्धो करेदि आलोयणं विधिणा ॥६०८॥

अर्थ: सदोष आलोचनासे शुद्धि नहीं होती, इसलिए निर्यापकाचार्यके पादमूलमें उपस्थित क्षपक दसों दोषोंको तथा भय, माया, असत्यवचन, मान और लज्जाको त्यागकर सम्यक्प्रकारसे शुद्ध होकर विधिपूर्वक आलोचना करता है ॥६०८॥


णट्टचलवलियगिहिभासमूगदद्दुरसरं च मोत्तूण ।
आलोचेदि विणीदो सम्मं गुरुणो अहिमुहत्थो ॥६०९॥

अर्थ: हाथका नचाना, भौं मटकाना, शरीरको मोड़ना, गृहस्थकी तरह बोलना, गूंगेकी तरह संकेत करना और घर्घर स्वरको त्याग कर, दोनों हाथोंकी अंजली बनाकर, सिर नवाकर गुरुके सामने उनकी बायीं ओर एक हाथ दूर गवासनसे बैठकर, न अति जल्दीमें और न अति रुकरुक कर स्पष्ट आलोचना करता है ॥६०९॥


पुढविदगागणिपवणे य बीयपत्तेयणंतकाए य ।
बिगतिगचदुपंचिंदियसत्तारंभे अणेयविहे ॥६१०॥

अर्थ: पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, प्रत्येककायिक वनस्पति, साधारणकायिक वनस्पति, दो इन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पञ्चेन्द्रिय जीवसम्बन्धी अनेक प्रकारके आरम्भ की आलोचना करता है । मिट्टी, पत्थर, शर्करा, रेत, नमक इत्यादिका खोदना, हलसे जोतना, जलाना, कूटना, तोड़ना आदि पृथिवी सम्बन्धी आरम्भ हैं । जल, बर्फ, ओस, तुषार आदि पानीके भेदोंका पीना, स्नान, अवगाहन, तैरना, हाथ पैर या शरीरसे मर्दन करना आदि जलसम्बन्धी आरम्भ हैं । आग, ज्वाला, दीपक, उल्मुक इत्यादि आगके ऊपर पानी, पत्थर, मिट्टी, अथवा रेत फेंकना या पत्थर लकड़ी आदिसे आगको पीटना आगसम्बन्धी आरम्भ है । झंझा और माण्डलिक आदि वायुको ताड़के पत्रसे, सूपसे, लकड़ी आदिसे रोकना, या पंखे आदिसे हवा करना, वायुके सन्मुख गमन करना ये सब वायुकायसम्बन्धी आरम्भ हैं । बीज, प्रत्येक काय और अनन्तकाय वृक्ष, लता, बेल, झाड़ी, तृण, पुष्पफल आदिको जलाना, छेदना, मसलना, तोड़ना, छूना, खाना आदि वनस्पतिकाय सम्बन्धी आरम्भ हैं । दो इन्द्रिय आदि जीवोंको मारना, छेदना, पीटना, बांधना, रोकना आदि दो इन्द्रिय आदि सम्बन्धी आरम्भ हैं । ये सब आरम्भ मुझसे हुए हैं ॥६१०॥


पिंडोवधिसेज्जाए गिहिमत्तणिसेज्जवाकुसे लिंगे ।
तेणिक्कराइभत्ते मेहूणपरिग्गहे मोसे ॥६११॥

अर्थ: भोजन, उपकरण और वसतिमें उद्गम, उत्पादन और एषणासम्बन्धी अतिचार होते हैं । गृहस्थोंके पात्र घट, झारी, सकोरा आदिमें किसी वस्तुका निक्षेपण करना अथवा उनके द्वारा किसी वस्तुका ग्रहण चारित्रसम्बन्धी अतिचार हैं क्योंकि उन पात्रोंकी प्रति-


णाणे दंसणतववीरिये य मणवयणकायजोगेहिं ।
कदकारिदेणुमोदे आदपरपओगकरणे य ॥६१२॥

अर्थ: सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, तप और वीर्यके सम्बन्धमें मन वचन कायकी क्रियाके द्वारा अतिचार हुए हैं - मनसे सम्यग्ज्ञानकी अवज्ञा करना, इस ज्ञानसे क्या लाभ है, तप और चारित्र ही फलदायक है । उन्हें ही करना चाहिए । अथवा सम्यग्ज्ञानको यह मिथ्याज्ञान है, ऐसा दूषण लगाना । अथवा मनसे वचनसे कायसे अपनी अरुचि प्रकट करना । अथवा मुखको विरूपतासे या सिर हिलाकर ‘यह ऐसा नहीं है’ यह प्रकट करना सम्यग्ज्ञानके अतिचार हैं । सम्यग्दर्शनमें शंका कांक्षा आदि अतिचार कहे हैं । तपमें असंयम अतिचार है । वीर्यमें अपनी शक्तिको छिपाना अतीचार है । वह सब अतिचार कृत कारित अनुमोदनाके भेदसे तीन प्रकार है । तथा स्वयं ही करना कराना अनुमोदना करना और परके द्वारा करना, कराना, अनुमोदना करना इस तरह कृत कारित अनुमोदनाके भी दो प्रकार हैं ॥६१२॥


अद्धाण रोहगे जणवए य रादो दिवा सिवे ऊमे ।
दप्पादिसमावण्णे उद्धरदि कमं अभिंदंतो ॥६१३॥

अर्थ: देशसे बाहर जानेके जितने मार्ग हैं, शत्रुसेनाके द्वारा उन सबके बन्द कर देनेपर साधु निकल नहीं पाता । उस समय परवश होकर साधुको भिक्षाचर्या करनेमें जो संक्लेश हुआ हो, अथवा अपने द्वारा अयोग्य पदार्थका सेवन हुआ है उसे भी गुरुसे कहता है । रातमें यह अतिचार हुआ, दिनमें यह अतिचार हुआ, यह भी कहता है । अथवा संघमें भारी रोगका उपद्रव होनेपर विद्या या मंत्रके द्वारा उसे रोकनेमें यह अतिचार लगा, यह भी कहता है । महान् दुर्भिक्ष पड़नेपर अवमौदर्य तपको भंग करके स्वयंने जो सेवन किया हो, अथवा दूसरे साधुओंको अमुक प्रकारसे अयोग्य भिक्षाके ग्रहण करनेमें प्रवृत्त किया हो, वह भी कहता है । दर्प, प्रमाद, अनाभोग, आपात, आर्तता, तित्तिणिदा, शंकित, सहसा, भय, प्रदोष, मीमांसा, अज्ञान, स्नेह, गारव, अनात्मवशता, आलस्य, उपधि, स्वप्नान्त, पलिकुंचन, और स्वयंशुद्धि ये बीस दर्पादि कहे हैं । इनका विवरण - इनमेंसे दर्पके अनेक प्रकार हैं - १. खेलकूदमें संघर्ष, व्यायाम, इन्द्रजाल, रसायन सेवन, हास्य, गीत, शृङ्गार, दौड़ना, तैरना आदिको लेकर घमंड करना । २. प्रमादके पांच भेद हैं - विकथा, कषाय, इन्द्रियोंके विषयमें आसक्ति, निद्रा और प्रणय (स्नेह) । अथवा संक्लिष्ट हस्तकर्म, कुशीलानुवृत्ति, बाह्यशास्त्रोंकी रचना करना, काव्यरचना और समितियोंमें उपयोग न लगाना ये पांच प्रमाद हैं । छेदना, भेदना, पीसना, अभिघात, बींधना, खोदना, बांधना, फाड़ना, धोना, रंगना, वेष्ठित करना, गूंथना, पूरना, समुदाय करना, लीपना, फेंकना, चित्रकारी करना ये सब संक्लिष्ट हस्तकर्म हैं । स्त्री पुरुषके लक्षण जिसमें बतलाये हों ऐसा शास्त्र, निमित्तशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, छन्दशास्त्र, अर्थशास्त्र, वैद्यकशास्त्र तथा लौकिक और वैदिकशास्त्र बाह्यशास्त्र हैं -


इय पयविभागियाए व ओघियाए व सल्लमुद्धरिय ।
सव्वगुणसोधिकंखी गुरूवएसं समायरइ ॥६१४॥

अर्थ: इस प्रकार विशेष आलोचना अथवा सामान्य आलोचनाके द्वारा मायाशल्यको दूर करके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और तप इस सब गुणोंकी शुद्धिका इच्छुक क्षपक गुरुके द्वारा कहे प्रायश्चित्तको रोष, दीनता और अश्रद्धाको त्यागकर स्वीकार करता है ॥६१४॥


कदपावो वि मणुस्सो आलोयणणिंदओ गुरुसयासे ।
होदि अचिरेण लहुओ उरुहियभारोव्व भारवहो ॥६१५॥

अर्थ: ‘कृतपाप’ अर्थात् अशुभकर्मका संचय करनेवाला भी मनुष्य । अथवा पाप अर्थात् अशुभकर्मके कारणभूत असंयम आदिको यहाँ पापशब्दसे कहा है । तब यह अर्थ होता है - असंयम आदि करनेवाला भी मनुष्य गुरुके समीप आलोचना और निन्दा करके शीघ्र ही हलका हो जाता है जैसे बोझको उतारनेपर बोझा ढोनेवाला हलका हो जाता है ॥६१५॥


सुबहुस्सुदा वि संता जे मूढा सीलसंजमगुणेसु ।
ण उवेंति भावसुद्धिं ते दुक्खणिहेलणा होंति ॥६१६॥

अर्थ: जो मूढ़ मुनि बहुत अच्छे बहुश्रुत विद्वान् होकर भी क्षमा आदि धर्ममें, संयममें, व्रतोंमें, ज्ञान दर्शन और तप गुणोंमें भावशुद्धि नहीं रखते वे दुःखोंसे पीड़ित होते हैं ॥६१६॥


आलोयणं सुणित्ता तिक्खुत्तो भिक्खुणो उवायेण ।
जदि उज्जुगोत्ति णिज्जइ जहाकदं पट्ठवेदव्वं ॥६१७॥

अर्थ: आलोचना सुनकर गुरु भिक्षुसे तीन बार उपायसे पूछते हैं - तुम्हारा अपराध क्या है मैं भूल गया या मैंने सुना नहीं । इत्यादि उपायसे गुरु तीन बार पूछते हैं । यदि ‘वचन’ कहनेके ढंगसे और आचरणसे जानते हैं कि यह सरल हृदय है तो जिस प्रकार किया पापशुद्ध हो उस प्रकार प्रायश्चित्त देना चाहिए । जो सरल हृदय नहीं होता उसके भावशुद्धि नहीं होती । इसलिए व्यवहार कुशल आचार्य उसे प्रायश्चित्त नहीं देते । भावशुद्धिके बिना पाप दूर नहीं होता । इसलिए उसके रत्नत्रय निरतिचार नहीं होते ॥६१७॥


आदुरसल्ले मोसे मालागररायकज्ज तिक्खुत्तो ।
आलोयणाए वक्काए उज्जुगाए य आहरणे ॥६१८॥

अर्थ: वैद्य रोगीसे तीन बार पूछता है - तुमने क्या खाया था, क्या किया था, रोगकी क्या दशा है ? शरीरमें लगे घावकी भी तीन बार परीक्षा की जाती है कि घाव भरा या नहीं ? चोरी होनेपर तीन बार पूछा जाता है कि क्या-क्या चोरीमें गया है, कैसे चोरी हुई है ? मालाकारसे भी तीन बार पूछा जाता है कि तेरी मालाका क्या मूल्य है । राजाने जिसे कार्य करनेकी आज्ञा दी है वह तीन बार पूछता है कि क्या इस प्रकार करूँ ? इसी प्रकार आलोचनाकी परीक्षा भी तीन बार की जाती है । अपना अपराध पुनः कहो ? ये सरल और वक्र आलोचनाके सम्बन्धमें पाँच दृष्टान्त हैं । यदि तीनों बार भी एकरूपसे ही कहता है तो सरल आलोचना है । यदि अन्य अन्यरूपसे कहता है तो वक्र आलोचना है ऐसा समझना चाहिए ॥६१८॥


पडिसेवणातिचारे जदि णो जंपदि जधाकमं सव्वे ।
ण करेंति तदो सुद्धिं आगमववहारिणो तस्स ॥६१९॥

अर्थ: द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावके भेदसे प्रतिसेवनाके चार भेद हैं । द्रव्यप्रतिसेवनाके तीन प्रकार हैं क्योंकि सचित्त, अचित्त और मिश्रके भेदसे द्रव्यके तीन प्रकार हैं । चित्त ज्ञानको कहते हैं । कहा जाता है - जगत् तत्त्व चित्तमात्र है अर्थात् ज्ञानमात्र है । ज्ञान आत्मासे कथञ्चित् अभिन्न होता है अथवा आत्मामें रहता है इसलिए उसे चित्त शब्दसे कहते हैं । जो चित्त अर्थात् आत्माके साथ रहता है वह सचित्त है । अर्थात् जीवके शरीररूपसे स्थित पुद्गलद्रव्य सचित्त है । और जिस पुद्गलमें चित्त अर्थात् आत्मा नहीं है वह अचित्त है । सचित्त और अचित्त पुद्गलोंका समूह मिश्र है । जीवके द्वारा ग्रहण किये गये अर्थात् जिनमें जीव वर्तमान है उन पृथिवी, जल, आग, वायु और वनस्पतिको सचित्त कहते हैं । जीवके द्वारा त्यागे हुए शरीरको अचित्त कहते हैं । इन सचित्त अचित्तको लेकर क्षेत्र प्रतिसेवना, काल प्रतिसेवना और भाव प्रतिसेवना लगा लेना चाहिए । इन प्रतिसेवनाके निमित्तसे हुए सब सूक्ष्म और स्थूल दोषोंको यथाक्रम यदि नहीं कहता तो आगमके अनुसार व्यवहार करने वाले आचार्य उसकी शुद्धि नहीं करते । आगममें कहा है - ‘जो पुरुष सरल भावसे अपने दोष कहते हैं वे प्रायश्चित्त द्वारा विशुद्धि करने योग्य होते हैं । और जिनके विषयमें शंका हो वे प्रायश्चित्त देनेके योग्य नहीं हैं ।’ अतः सब अतिचारोंको कहने वालेके ही सरलता होती है । उसीको प्रायश्चित्त देना चाहिए ॥६१९॥


पडिसेवणादिचारे जदि आजंपदि जहाकमं सव्वे ।
कुव्वंति तद्दो सोधिं आगमववहारिणो तस्स ॥६२०॥

अर्थ: प्रतिसेवना सम्बन्धी सब अतिचारोंको क्रमानुसार यदि कहता है तो आगमके अनुसार व्यवहार करने वाले आचार्य उसकी शुद्धि करते हैं ॥६२०॥


सम्मं खवएणालोचिदम्मि छेदसुदजाणगो गणी सो ।
तो आगममीमंसं करेदि सुत्ते य अत्थे य ॥६२१॥

अर्थ: क्षपकके द्वारा सम्यक् आलोचना करने पर छेद सूत्र अर्थात् प्रायश्चित्त शास्त्रका ज्ञाता आचार्य सूत्र और उसके अर्थको लेकर आगमका विचार करता है कि यह सूत्र है और इसका यह अर्थ है । इस प्रकारके अपराधका यह प्रायश्चित्त इस सूत्रमें कहा है, ऐसा पहले विचार करता है ॥६२१॥


पडिसेवादो हाणी वड्ढी वा होइ पावकम्मस्स ।
परिणामेण दु जीवस्स तत्थ तिव्वा व मंदा वा ॥६२२॥

अर्थ: प्रतिसेवना अर्थात् असंयम आदिका सेवन करनेसे उत्पन्न हुए पापकर्मकी पीछे हुए शुभ या अशुभ परिणामोंसे तीव्र हानि अथवा तीव्र वृद्धि, मन्द हानि अथवा मन्द वृद्धि होती है । अर्थात् असंयम सेवन करते समय जैसे तीव्र अशुभ परिणामसे तीव्र पाप बन्ध और मन्द अशुभ परिणामसे मन्द पापबन्ध हुआ था वैसे ही आलोचनाके पश्चात् तीव्र शुभ परिणाम होनेसे पापकी तीव्र हानि और मन्द शुभ परिणाम होनेसें पापकी मन्द हानि होती है इसका विचार भी आचार्य करते हैं ॥६२२॥


सावज्जसंकिलिट्ठो गालेइ गुणे णवं च आदियदि ।
पुव्वकदं च दढं सो दुग्गदिभवबंधणं कुणदि ॥६२३॥

अर्थ: सावद्य संक्लेश दो प्रकारका है । एक वह जो अवद्य अर्थात् पापके साथ होता है । दूसरा संक्लेश है चित्तकी बाधा । वह सावद्य रूप नहीं होता । जैसे मेरा ज्ञान निर्मल क्यों नहीं होता ? या मेरे सम्पूर्ण चारित्र क्यों नहीं है ? मेरा शरीर क्यों इतना दुर्बल है कि तपोयोगको सहन नहीं करता ? इत्यादि संक्लेश चित्त बाधारूप है। उससे अलग करनेके लिए सावद्य विशेषण देकर ‘सावद्य संक्लिष्ट’ कहा है। यह सावद्य संक्लेश सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र गुणोंका नाश करता है। नवीन कर्मका बन्ध करता है। पूर्व संचित कर्मोंको दृढ़ करता है। क्योंकि स्थिति बन्ध कषाययुक्त परिणामके निमित्तसे होता है। नाना प्रकारके हजारों वेदनाओंसे व्याप्त नारक आदि दुर्गतियोंके भयको बढ़ाता है। अशुभ कर्मको स्थिर करता है ॥६२३॥


पडिसेवित्ता कोई पच्छत्तावेण डज्झमाणमणो ।
संवेगजणिदकरणो देसं घाएज्ज सव्वं वा ॥६२४॥

अर्थ: कोई असंयम आदिका सेवन करके भी पश्चात्तापके द्वारा अपने चित्तको जलाता है अर्थात् उसे अपने कर्म पर पश्चात्ताप होता है और वह संसारसे भयभीत होकर संयमका पालन करता है । तब वह अपने द्वारा संचित नवीन कर्म पुद्गल स्कन्धोंके एक देशकी निर्जरा करता है अथवा समस्त कर्म पुद्गल स्कन्धका घात करता है । यदि परिणाम मध्यम या मन्द होते हैं तब एक देशकी निर्जरा करता है । और तीव्र होते हैं तो समस्तका घात करता है ॥६२४॥


तो णच्चा सुत्तविदू णालियधमगो व तस्स परिणामं ।
जावदिएण विसुज्झदि तावदियं देदि जिदकरणो ॥६२५॥

अर्थ: अतः प्रायश्चित्त शास्त्रका ज्ञाता और प्रायश्चित्त देनेकी क्रियासे परिचित आचार्य उस अपराधी भिक्षुके परिणामोंको जानकर जितने प्रायश्चित्तसे उसकी विशुद्धि हो उतना ही थोड़ा या बहुत प्रायश्चित्त देते हैं । जैसे सुवर्णकार आगका बलाबल जानकर तदनुसार उसे धौंकनी से धौंकता है । उसी प्रकार आचार्य भी उसका अपराध थोड़ा या बहुत है यह जानकर प्रायश्चित्त देते हैं । दूसरेके परिणाम आचार्य कैसे जानते हैं ? इसका उत्तर है कि साथ रहनेसे यह ज्ञात हो जाता है कि यह तीव्र क्रोधी या तीव्र मानी है। अथवा उसीसे पूछनेसे कि दोष करते समय आपके परिणाम कैसे थे, ज्ञात हो जाता है ॥६२५॥


आउव्वेदसमत्ती तिगिंछिदे मदिविसारदो वेज्जो ।
रोगादंकाभिहदं जह णिरुजं आदुरं कुणइ ॥६२६॥

अर्थ: अथवा जैसे समस्त आयुर्वेदका ज्ञाता और चिकित्सामें निपुण बुद्धि वाला वैद्य महती अथवा अल्प व्याधिसे पीड़ित रोगीको नीरोग करता है ॥६२६॥


एवं पवयणसारसुयपारगो सो चरित्तसोधीए ।
पायच्छित्तविदण्हू कुणइ विसुद्धं तयं खवयं ॥६२७॥

अर्थ: उसी प्रकार प्रवचनके सारभूत श्रुतका पारगामी और प्रायश्चित्तके क्रमका ज्ञाता आचार्य चारित्रकी शुद्धिके द्वारा उस क्षपकको विशुद्ध करता है ॥६२७॥


एदारिसंमि थेरे असदि गणत्थे तहा उवज्झाए ।
होदि पवत्ती थेरो गणधरवसहो य जदणाए ॥६२८॥

अर्थ: उक्त गुणवाले आचार्यके तथा उपाध्यायके संघमें न होने पर सावधानता पूर्वक प्रवृत्ति करने वाला प्रवर्तक अथवा स्थविर अथवा बालाचार्य निर्यापक होता है। जो अल्प शास्त्रज्ञ होते हुए भी सर्व संघकी मर्यादा चर्याको जानता है उसे प्रवर्तक कहते हैं। जिसे दीक्षा लिए बहुत काल बीत गया है तथा जो मार्गको जानता है उसे स्थविर कहते हैं ॥६२८॥


सो कदसामाचारी सोज्झं कट्टु विधिणा गुरुसयासे ।
विहरदि सुविसुद्धप्पा अब्भुज्जदचरणगुणकंखी ॥६२९॥

अर्थ: वह क्षपक सामाचारी करके विधिपूर्वक प्रायश्चित्त द्वारा अपने दोषोंकी विशुद्धि करता है । और अच्छी तरहसे आत्माको विशुद्ध करके स्वीकृत चारित्रमें गुणोंकी इच्छा करता हुआ गुरुके पासमें साधना करता है ॥६२९॥


एवं वासारत्ते फासेदूण विविधं तवोकम्मं ।
संथारं पडिवज्जदि हेमंते सुहविहारम्मि ॥६३०॥

अर्थ: इस प्रकार वर्षाकालमें नाना प्रकारके तप करके सुख विहार वाले हेमन्त ऋतुमें संस्तरका आश्रय लेता है । हेमन्त ऋतुमें अनशन आदि करने पर महान् परिश्रम नहीं होता, सुखपूर्वक हो जाता है इसलिए उसे सुखविहार कहा है ॥६३०॥


सव्वपरियाइयस्स य पडिक्कमित्तु गुरुणो णिओगेण ।
सव्वं समारुहित्ता गुणसंभारं पविहरिज्जा ॥६३१॥

अर्थ: समस्त ज्ञान दर्शन और चारित्रके अतिचारोंसे शुद्ध होकर, गुरुके उपदेशसे समस्त गुणोंके समूहको धारण करके क्षपकको समाधि मरणमें लगना चाहिए ॥६३१॥


गंधव्वणट्टजट्टस्सचक्कजंतग्गिकम्मफरुसे य ।
णत्तियरजया पाडहियडोंबणडरायमग्गो य ॥६३२॥

अर्थ: गायनशाला, नृत्यशाला, गजशाला, अश्वशाला, कुम्भकारशाला, यन्त्रशाला, शंख हाथी दांत आदिका काम करने वालोंका स्थान, कोलिक, धोबी, बाजा बजाने वाले, डोम, नट और राजमार्गके समीपका स्थान ॥६३२॥


चारणकोट्टगकल्लालकरकचे पुप्फदयसमीपे य ।
एवंविधवसधीए होज्ज समाधीए वाघादो ॥६३३॥

अर्थ: चारणशाला, पत्थरका काम करनेवालोंका स्थान, कलालोंका स्थान, आरासे चीरने वालोंका स्थान, पुष्पवाटिका, मालाकारका स्थान, जलाशयके समीपका स्थान वसतिके योग्य नहीं है। ऐसी वसतिकामें रहनेसे समाधिका व्याघात होता है। इन्द्रियोंके विषय मनोज्ञ शब्द रूप आदिके सम्बन्धसे तथा शब्दोंकी बहुलता - होहल्लेसे ध्यानमें विघ्न होता है। इसलिए ऊपर कही वसतिकाओंका निषेध किया है ॥६३३॥


पंचिंदियप्पयारो मणसंखोभकरणो जहिं णत्थि ।
चिट्ठदि तहिं तिगुत्तो ज्झाणेण सुहप्पवत्तेण ॥६३४॥

अर्थ: जहाँ मनको संक्षोभ करने वाला पाँचों इन्द्रियोंका अपने विषयोंमें उत्सुकतापूर्वक गमन संभव नहीं है उस वसतिकामें साधु क्षपक मन वचन कायको गुप्त करके, सुखपूर्वक ध्यान करता हुआ निवास करता है ॥६३४॥


उग्गमउप्पादणएसणाविसुद्धाए अकिरियाए हु ।
वसइ असंसत्ताए णिप्पाहुडियाए सेज्जाए ॥६३५॥

अर्थ: जो वसति उद्गम उत्पादन और एषणा दोषसे रहित होती है, अपने उद्देशसे जिसमें लिपाई पुताई आदि नहीं कराई गई है जिसमें उसी वसतिकामें रहने वाले तथा बाहरसे आने वाले प्राणी आकर वास नहीं करते, तथा जो संस्कार रहित वसति है उसमें साधु निवास करते हैं ॥६३५॥


सुहणिक्खवणपवेसणघणाओ अवियडअणंधयाराओ ।
दो तिण्णि वि वसधीओ घेत्तव्वाओ विसालाओ ॥६३६॥

अर्थ: जिसमें बिना कष्टके सुखपूर्वक प्रवेश और निर्गमन होता हो, जिसका द्वार खुला न हो तथा जिसमें अन्धकार न हो । ऐसी दो अथवा तीन विशालवसतिका ग्रहण करनी चाहिए । जघन्यसे दो वसति लेना चाहिए । एकमें क्षपक रहता है । दूसरीमें अन्य यति और धर्म सुननेके लिए आये बाहरके आदमी रहते हैं । [यदि तीन ग्रहण करते हैं तो एकमें क्षपक, एकमें अन्य यति और एकमें धर्मोपदेश होता है] यदि वसतिका द्वार खुला हो तो शीतवायु आदिके प्रवेशसे हाडचाममात्र शेष रहे क्षपकको दुःसह दुःख होता है । खुले स्थानमें वह मलमूत्रका त्याग भी कैसे करेगा ? अन्धेरी वसतिमें असंयम होगा - जीवजन्तु दृष्टिगोचर नहीं होंगे । सुखपूर्वक आना जाना सम्भव न होनेसे अपनी भी विराधना होती है और संयम की भी विराधना होती है ॥६३६॥


घणकुड्डे सकवाडे गामबहिं बालवुड्ढगणजोग्गे ।
उज्जाणघरे गिरिकंदरे गुहाए व सुण्णहरे ॥६३७॥

अर्थ: जिसकी दीवार मजबूत हो, कपाट सहित हो, गाँवके बाहर ऐसे प्रदेशमें हो जहाँ बच्चे बूढ़े और चार प्रकारका संघ जा सकता हो, ऐसी वसतिमें, उद्यानघरमें, गुफामें अथवा शून्यघरमें क्षपकका संथरा होता है ॥६३७॥


आगंतुघरादीसु वि कडएहिं य चिलिमिलीहिं कायव्वो ।
खवयस्सोच्छागारो धम्मसवणमंडवादी य ॥६३८॥

अर्थ: सेनाके पड़ावके साथ आये हुए व्यापारियोंके द्वारा बनाये गये घरोंमें और आदि शब्दसे इस प्रकारके श्रमणोंके योग्य उद्यानगृह आदिमें क्षपकका सन्थरा करना चाहिए। उक्त प्रकारकी वसतियोंके न मिलनेपर क्षपकके रहनेके लिए बाँसके पत्तोंसे आच्छादित और प्रकाशके लिए झोरी सहित घर बना देना चाहिए। तथा धर्म सुननेके लिए मण्डप आदि भी बना देना चाहिए। इससे बहुत असंयममें निमित्त वसतिका त्याग और संयममें साधन वसतिका निर्माण कहा ॥६३८॥


पुढवीसिलामओ वा फलयमओ तणमओ य संथारो ।
होदि समाधिणिमित्तं उत्तरसिर अह व पुव्वसिरो ॥६३९॥

अर्थ: इस प्रकारकी वसतिमें इस प्रकारका संस्तर होना चाहिए, यह कहते है - समाधिके निमित्त संथरा पृथिवीमय, या शिलामय या फलकमय - लकड़ीका, अथवा तृणोंका होता है। उसका सिर उत्तर की ओर अथवा पूरब की ओर होना चाहिए; क्योंकि लोकमें मांगलिककार्योंमें पूरब दिशा अच्छी मानी जाती है उसीमें सूर्यका उदय होता है। अथवा उत्तर दिशामें विदेह क्षेत्रमें स्थित तीर्थंकरोंके प्रति भक्ति प्रदर्शित करनेके उद्देशसे उत्तरदिशा भी शुभ मानी जाती है ॥६३९॥


अघसे समे असुसिरे अहिसुयअबिले य अप्पपाणे य ।
असिणिद्धे घणगुत्ते उज्जोवे भूमिसंथारो ॥६४०॥

अर्थ: जो भूमि कठोर हो, ऊँची नीची न हो, सम हो, छिद्र रहित हो, चींटी आदिसे रहित हो, जन्तुरहित हो, क्षपकके शरीरके बराबर प्रमाणवाली हो, गीली न हो, मजबूत और गुप्त हो, प्रकाशसहित हो वही भूमि संस्तररूप होती है ।


विद्धत्थो य अफुडिदो णिक्कंपो सव्वदो असंसत्तो ।
समपट्ठो उज्जोवे सिलामओ होदि संथारो ॥६४१॥

अर्थ: शिलामय संस्तर आगसे, कूटनेसे अथवा घिसनेसे प्रासुक हुआ हो, टूटा-फूटा न हो, निश्चल हो, सब ओरसे जीवरहित हो, अर्थात् पत्थरमें रहनेवाले खटमल आदिसे रहित हो । समतल हो, ऊँचा-नीचा न हो । प्रकाशयुक्त हो । ऐसा शिलामय संस्तर होता है ॥६४१॥


भूमिसमरुंदलहुओ अकुक्कुचोकंग अप्पमाणो य ।
अच्छिद्दो य अफुडिदो लण्हो वि य फलयसंथारो ॥६४२॥

अर्थ: फलकसंस्तर सब ओरसे भूमिसे लगा हो, विस्तीर्ण हो, हलका हो, उठाने लाने ले जानेमें सुकर हो, अचल हो - शब्द न करता हो, एकरूप हो, जन्तुरहित हो, छिद्ररहित हो, टूटा-फूटा न हो, चिकना हो । ऐसा फलक संस्तर होता है ॥६४२॥


णिस्संधी य अपोल्लो णिरुवहदो समधिवास्सणिज्जंतु ।
सुहपडिलेहो मउओ तणसंथारो हवे चरिमो ॥६४३॥

अर्थ: तृणसंस्तर गाँठरहित तृणोंसे बना हो, तृणोंके मध्यमें छिद्र न हों, टूटे तृण न लगे हों, मृदुस्पर्शवाला हो, जन्तुरहित हो, सुखपूर्वक शुद्धि करनेके योग्य हो, और कोमल हो । ऐसा अन्तिम तृणसंस्तर होता है ॥६४३॥


जुत्तो पमाणरइओ उभयकालपडिलेहणासुद्धो ।
विधिविहिदो संथारो आरोहव्वो तिगुत्तेण ॥६४४॥

अर्थ: इस प्रकार संस्तर योग्य हो, प्रमाणयुक्त हो - न बहुत छोटा हो और न बहुत बड़ा हो, दोनों समय अर्थात् सूर्योदय और सूर्यास्तके समय प्रतिलेखना द्वारा शुद्ध किया गया हो, और शास्त्रमें निर्दिष्ट क्रमके अनुसार बनाया गया हो । ऐसे संस्तर पर अशुभ मन वचन कायका निरोध करके क्षपकको आरोहण करना चाहिए ॥६४४॥


णिसिदित्ता अप्पाणं सव्वगुण[?]ण्णिदम्मि णिज्ज[?]ए ।
संथारम्मि णिसण्णो विहरदि सल्लेहणाविधिणा ॥६४५॥

अर्थ: सर्वगुणोंसे सम्पन्न निर्यापकाचार्य पर अपनेको समर्पित करके क्षपक संस्तर पर आरोहण करता है और सल्लेखनाकी विधिसे विचरता है। सल्लेखनाके दो प्रकार हैं - बाह्य और अभ्यन्तर । अथवा द्रव्य सल्लेखना और भावसल्लेखना । आहारको त्यागकर शरीरकी सल्ले- खना करता है । और सम्यग्दर्शन आदि भावनासे मिथ्यात्व आदि परिणामोंको कृश करता है । इस प्रकार वसति और संस्तरका कथन किया ॥६४५॥


पियधम्मा दढधम्मा संविग्गा वज्जभीरुणो धीरा ।
छंदण्हू पच्चइया पच्चक्खाणम्मि य विदण्हू ॥६४६॥

अर्थ: जिन्हें धर्म प्रिय है, जो धर्ममें स्थिर हैं, संसारसे भीरु हैं, पापसे डरते हैं, धैर्यवान् हैं, अभिप्रायको जानते हैं, विश्वासके योग्य हैं, प्रत्याख्यानके क्रमको जानते हैं, ऐसे यति निर्यापक होते हैं ॥६४६॥ को गुरु क्षपककी परिचर्यामें नियुक्त नहीं करते । किन्तु जो विश्वस्त होते हैं उन्हें ही नियुक्त करते हैं ॥६४६॥


कप्पाकप्पे कुसला समाधिकरणुज्जुदा सुदरहस्सा ।
गीदत्था भयवंतो अडदालीसं तु णिज्जवया ॥६४७॥

अर्थ: जो यह योग्य है और यह अयोग्य है इस प्रकार भोजन और पानकी परीक्षामें कुशल होते हैं, क्षपकके चित्तका समाधान करनेमें तत्पर रहते हैं, जिन्होंने प्रायश्चित्त ग्रन्थोंको सुना है, जो सूत्रके अर्थको हृदयसे स्वीकार किये हैं, अपने और दूसरोंके उद्धार करनेके माहात्म्यसे शोभित हैं । ऐसे अड़तालीस निर्यापक यति होते हैं ॥६४७॥


आमासणपरिमासणचंकमणसयण-णिसीदणे ठाणे ।
उव्वत्तणपरियत्तणपसारणा-उंटणादीसु ॥६४८॥

अर्थ: क्षपकके शरीरके एकदेशके स्पर्शन करनेको आमर्शन कहते हैं । और समस्त शरीरका हस्तसे स्पर्शन करनेको परिमर्शन कहते हैं । इधर-उधर जानेको चंक्रमण कहते हैं । अर्थात् परिचारक मुनि क्षपकके शरीरको अपने हाथसे सहलाते हैं, दबाते हैं । चलने फिरनेमें सहायता करते हैं । सोने, बैठने, उठनेमें सहायता करते हैं । उद्वर्तन अर्थात् एक करवटसे दूसरी करवट लिवाते हैं । हाथ पैर फैलानेमें संकोचनेमें सहायता करते हैं ॥६४८॥


संजदकमेण खवयस्स देहकिरियासु णिच्चमाउत्ता ।
चदुरो समाधिकामा ओलग्गंता पडिचरंति ॥६४९॥

अर्थ: चार परिचारक यति मुनिमार्गके अनुसार क्षपककी ऊपर कही शारीरिक क्रियाओंमें प्रतिदिन लगे रहते हैं । वे क्षपककी समाधिकी कामना करते हुए उपासनापूर्वक परिचर्या करते हैं ॥६४९॥


भत्तित्थिरायजणवदकंदप्पत्थणडणट्टियकहाओ ।
वज्जित्ता विकहाओ अज्झप्पविराधणकरीओ ॥६५०॥

अर्थ: जो भोगा या सेवन किया जाता है वह भक्त है अर्थात् चार प्रकारका आहार। आहारकी कथा, स्त्रीकी कथा, राजाकी कथा, देशोंकी कथा। रागके उद्रेकसे हँसीसे मिश्रित अशिष्ट वचन बोलना कन्दर्प है। उसकी कथा, नटोंकी और नाचनेवालियोंकी कथा विकथा हैं। ये अध्यात्मकी विराधना करती हैं। जो आत्मासे सम्बद्ध हो उसे आध्यात्मिक कहते हैं। आत्मतत्त्वके यथार्थ कथनको अध्यात्म कहते हैं। ये कथाएँ उसका विघात करती हैं ॥६५०॥


अक्खलिदममिलिदमव्वाइद्धमणुच्चमविलंबिदममंदं ।
कंतममिच्छामेलिदमणत्थहीणं अपुणरुत्तं ॥६५१॥

अर्थ: वे मुनि अस्खलित धर्मकथा कहते हैं। कुछका कुछ शब्द बोलना शब्दस्खलन है। विपरीत अर्थ करना अर्थस्खलन है। इस स्खलनसे रहित कथा कहते हैं। एक बातको दुहराते नहीं। सन्देहमें डालनेवाला कथन नहीं करते। प्रत्यक्ष आदिसे अविरुद्ध कथन करते हैं। बहुत जोरसे नहीं बोलते। न बहुत रुक-रुककर बोलते हैं। बहुत मन्द आवाजसे भी नहीं बोलते। कानोंको प्रिय वचन बोलते हैं। मिथ्यात्वकी बात नहीं करते। ऐसी बात नहीं कहते जिसका कुछ अर्थ ही न हो। जो बात कही हो उसे ही पुनः कहना पुनरुक्त है। वे पुनरुक्त कथन नहीं करते ॥६५१॥


णिद्धं मधुरं हिदयंगमं च पल्हादणिज्ज पत्थं च ।
चत्तारि जणा धम्मं कहंति णिच्चं विचित्तकहा ॥६५२॥

अर्थ: नाना कथाओंमें कुशल वे चार परिचारक यति प्रिय, मधुर अर्थात् ललितपद और वर्णवाली, श्रोताके हृदयमें प्रवेश करनेवाली सुखदायक हितकारी कथा निरन्तर कहते हैं ॥६५२॥


खवयस्स कहेदव्वा दु सा कहा जं सुणित्तु सो खवओ ।
जहिदविसोत्तिगभावो गच्छदि संवेगणिव्वेगं ॥६५३॥

अर्थ: क्षपकको किस प्रकारकी कथा कहनी चाहिए, यह कहते हैं - क्षपकको ऐसी कथा कहनी चाहिए जिसे सुनकर वह अशुभ परिणामोंको छोड़े और संसारसे तथा शरीरसे विरक्त होवे ॥६५३॥


आक्खेवणी य संवेगणी य णिव्वेयणी य खवयस्स ।
पाओग्गा होंति कहा ण कहा विक्खेवणी जोग्गा ॥६५४॥

अर्थ: चार प्रकारकी कथाएँ होती हैं - आक्षेपणी, विक्षेपणी, संवेजनी और निर्वेजनी । इनमेंसे कौन योग्य है और कौन अयोग्य है ? इसका उत्तर देते हैं - आक्षेपणी, विक्षेपणी और निर्वेजनी कथा क्षपकके सुनने और कहनेके योग्य है किन्तु विक्षेपणी कथा योग्य नहीं है ॥६५४॥


आक्खेवणी कहा सा विज्जाचरणमुवदिस्सदे जत्थ ।
ससमयपरसमयगदा कथा दु विक्खेवणी णाम ॥६५५॥

अर्थ: जिसमें ज्ञान और चारित्रका उपदेश हो उसे आक्षेपणी कथा कहते हैं । यथा, मति आदि ज्ञान इस प्रकारके होते हैं अथवा सामायिक आदि चारित्रोंका ऐसा स्वरूप है । जिस कथामें स्वसमय और परसमयकी चर्चा होती है वह विक्षेपणी है । वस्तु सर्वथा नित्य है, या सर्वथा क्षणिक है, अथवा एक ही है या अनेक ही है, अथवा सत् ही है या असत् ही है, अथवा विज्ञानमात्र ही है या शून्य ही है, इत्यादि परसमयको पूर्वपक्ष बनाकर प्रत्यक्ष अनुमान और आगमसे उसमें विरोध दर्शाकर वस्तुको कथंचित् नित्य, कथंचित् अनित्य, कथंचित् एक, कथंचित् अनेक इत्यादि स्वसमयका कथन करना विक्षेपणी कथा है ॥६५५॥


संवेयणी पुण कहा णाणचरित्ततववीरियइड्ढिगदा ।
णिव्वेयणी पुण कहा सरीरभोगे भवोघे य ॥६५६॥

अर्थ: ज्ञान चारित्र और तपोभावनासे उत्पन्न शक्तिसम्पदाका निरूपण करनेवाली कथा संवेजनी है । शरीर भोग और भवसन्ततिकी ओरसे विमुख करनेवाली कथा निर्वेजनी है । जैसे, शरीर अशुचि है क्योंकि वह रस आदि सात धातुओंसे बना है, रज और वीर्य उसके बीज हैं । अशुचि आहारसे वह बढ़ता है और अशुचि स्थानसे निकलता है । शरीर केवल अपवित्र ही नहीं है वह निस्सार भी है; क्योंकि प्राणियोंका शरीर स्वभावसे अनित्य है ऐसा शरीरके विषयमें सुना जाता है । तथा स्त्री, वस्त्र, गन्ध, माला, भोजन आदि दुर्लभ भोग किसी तरह प्राप्त होनेपर भी तृप्ति नहीं देते । उनके प्राप्त न होनेपर अथवा प्राप्त होकर नष्ट होनेपर महान् शोक होता है । तथा देव और मनुष्यभव भी दुर्लभ हैं, दुखसे भरे हैं, सुख अल्प है । इस प्रकारका कथन निर्वेजनी कथा है ॥६५६॥


विक्खेवणी अणुरदस्स आउगं जदि हवेज्ज पक्खीणं ।
होज्ज असमाधिमरणं अप्पागमियस्स खवगस्स ॥६५७॥

अर्थ: विक्षेपणी कथामें अनुरक्तदशामें यदि क्षपककी आयु समाप्त हो जाये तो अल्प- ज्ञानी क्षपकका असमाधिपूर्वक मरण होगा; क्योंकि विक्षेपणीमें दूषण देनेके लिए पहले परमतका कथन होता है। अल्पज्ञानी क्षपक उसे तत्त्व समझ बैठे तो मिथ्याज्ञान और मिथ्या श्रद्धान होनेसे रत्नत्रयकी एकाग्रता नहीं रहती ॥६५७॥


आगममाहप्पगओ विकहा विक्खेवणी अपाउग्गा ।
अब्भुज्जदम्मि मरणे तस्स वि एदं अणायदणं ॥६५८॥

अर्थ: बहुश्रुत भी क्षपकके लिए विक्षेपणी कथा उपयोगी नहीं है; क्योंकि मरणके समय रत्नत्रयकी आराधनामें तत्पर रहना होता है । अतः उसके लिए भी यह कथा अनायतन है वह उसका आधार नहीं है ॥६५८॥


अब्भुज्जदंमि मरणे संथारत्थस्स चरमवेलाए ।
तिविहं पि कहंति कहं तिदंडपरिमोडया तम्हा ॥६५९॥

अर्थ: जब संस्तरपर स्थित क्षपकका अन्तकाल होता है और मरण निकट होता है तब अशुभ मनवचनकायको निर्मूल करनेवाले साधु संवेजनी, निर्वेजनी और आक्षेपणी इन तीन ही कथाओंको कहते हैं । अतः विक्षेपणी कथा अनायतनरूप है ॥६५९॥


जुत्तस्स तवधुराए अब्भुज्जदमरणवेणुसीसंमि ।
तह ते कहेंति धीरा जह सो आराहओ होदि ॥६६०॥

अर्थ: जो तपका भार उठाये हुए है अर्थात् तपस्यामें लीन है और निकटवर्ती मरणरूपी बाँसके अग्रभागपर खड़ा है उस क्षपकको वे धीर परिचारक ऐसा उपदेश देते हैं जिसमें वह रत्नत्रयका आराधक होता है । अर्थात् क्षपककी स्थिति उस नटके समान है जो सिरपर बोझ उठाये बाँसके अग्रभागपर अपनी कलाका प्रदर्शन करता है अतः परिचारक ऐसा ही प्रयत्न करते हैं जिससे वह सफल हो ॥६६०॥


चत्तारि जणा भत्तं उवकप्पेंति अगिलाए पाओग्गं ।
छंदियमवगददोसं अमाइणो लद्धिसंपण्णा ॥६६१॥

अर्थ: चार परिचारक यति उस क्षपकके लिए उसको इष्ट खान-पान बिना ग्लानिके लाते हैं । उन्हें ऐसा संक्लेश नहीं होता कि कबतक हम इसके लिए लावें । तथा खान-पान उद्गम आदि दोषोंसे रहित होता है । और वात पित्त कफको उत्पन्न करनेवाला नहीं होता । क्षपक भी लिप्सावश आहार पसन्द नहीं करता । किन्तु भूख और प्यास परीषहको शान्त करनेमें समर्थ खान-पानकी इच्छा करता है । जो यति आहार लाते हैं वे मायावी नहीं होते, अयोग्य आहारको योग्य नहीं कहते । मायावी अयोग्यको योग्य कह सकता है । तथा वे मोह और अन्तरायकर्मोंका क्षयोपशम होनेसे भिक्षालब्धिसे युक्त होते हैं । उन्हें भिक्षा अवश्य मिल जाती है । अलब्धिमान् मुनि भिक्षा न मिलनेपर खाली हाथ लौटकर क्षपकको कष्ट पहुँचाता है ॥६६१॥


चत्तारि जणा पाणयमुवकप्पंति अगिलाए पाओग्गं ।
छंदियमवगददोसं अमाइणो लद्धिसंपण्णा ॥६६२॥

अर्थ: चार परिचारक मुनि क्षपकके लिए बिना ग्लानिके उद्गम आदि दोषोंसे रहित, वात पित्त कफको पैदा न करनेवाला तथा क्षपककी प्यास परिषहको शान्त करनेवाला पानक लाते हैं । वे लानेवाले यति मायारहित और भिक्षालब्धिसे सम्पन्न होते हैं । आचार्यकी अनुज्ञासे स्वयं अपनेको उपस्थित करनेवाले दो-दो परिचारक भोजन और पान अलग-अलग लाते हैं ॥६६२॥


चत्तारि जणा रक्खन्ति दवियमुवकप्पियं तयं तेहिं ।
अगिलाए अप्पमत्ता खवयस्स समाधिमिच्छंति ॥६६३॥

अर्थ: चार यति उन यतियोंके द्वारा लाये गये खान-पानकी बिना किसी प्रकारकी ग्लानिके प्रमादरहित होकर रक्षा करते हैं कि उसमें त्रसादि न गिरे अथवा कोई उसमें त्रसादि जन्तु न गिरा दे । वे सब क्षपककी समाधिके इच्छुक होते हैं कि उसकी समाधि निर्विघ्न पूर्ण हो ॥६६३॥


काइयमादी सव्वं चत्तारि पदिट्ठवन्ति खवयस्स ।
पडिलेहंति य उवधोकाले सेज्जुवधिसंथारं ॥६६४॥

अर्थ: चार मुनि क्षपकके सब मलमूत्र उठानेका कार्य करते हैं । और सूर्यके उदय तथा अस्त होनेके समय वसति, उपकरण और संथरेकी प्रतिलेखना करते हैं ॥६६४॥


खवगस्स घरदुवारं सारक्खंति जदणाए दु चत्तारि ।
चत्तारि समोसरणदुवारं रक्खंति जदणाए ॥६६५॥

अर्थ: चार यति सावधानतापूर्वक क्षपकके घरके द्वारकी रक्षा करते हैं । ऐसा वे असंयमी जनों और शिक्षकोंको अन्दर प्रवेश करनेसे रोकनेके लिए करते हैं । चार मुनि सावधानतापूर्वक समवसरण द्वार अर्थात् धर्मोपदेश करनेके घरके द्वारकी रक्षा करते हैं ॥६६५॥


जिदणिद्दा तल्लिच्छा रादो जग्गंति तह य चत्तारि ।
चत्तारि गवेसंति खु खेत्ते देसप्पवत्तीओ ॥६६६॥

अर्थ: निद्राको जीत लेनेवाले और निद्राको जीतनेके इच्छुक चार यति रातमें क्षपकके पास जागते हैं । और चार मुनि अपने रहनेके क्षेत्रमें देशकी अच्छी बुरी प्रवृत्तियोंकी परीक्षा करते हैं । अर्थात् जिस क्षेत्रमें क्षपक समाधि मरण करता है उस देशके अच्छे बुरे समाचारोंकी खबर रखकर उनकी परीक्षा करते हैं कि समाधिमें कोई बाधा आनेका तो खतरा नहीं है ॥६६६॥


वाहिं असद्दवडियं कहंति चउरो चदुव्विधकहाओ ।
ससमयपरसमयविदू परिसाए समोसदाए दु ॥६६७॥

अर्थ: क्षपकके आवासके बाहर स्वसिद्धान्त और परसिद्धान्तके ज्ञाता चार यति क्रमसे एक एक करके सभामें धर्म सुननेके लिए आये हुए श्रोताओंको पूर्ववर्णित चार कथाएँ इस प्रकार कहते हैं कि दूरवर्ती मनुष्य उनका शब्द न सुन सके । अर्थात् क्षपकको सुनाई न दे इतने धीरेसे बोलते हैं । उससे क्षपकको किसी प्रकारकी बाधा नहीं होती ॥६६७॥


वादी चत्तारि जणा सीहाणुग तह अणेयसत्थविदू ।
धम्मकहयाण रक्खाहेदुं विहरंति परिसाए ॥६६८॥

अर्थ: अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता और वाद करनेमें कुशल चार मुनि धर्मकथा करनेवालोंकी रक्षाके लिए सभामें सिंहके समान विचरते हैं । अर्थात् धर्मकथामें कोई विवादी विवाद खड़ा कर दे तो वाद करनेमें कुशल मुनि उसका उत्तर देनेके लिए तत्पर रहते हैं ॥[?]६८॥


एवं महाणुभावा पग्गहिदाए समाधिजदणाए ।
तं णिज्जवंति खवयं अडयालीसं हिं णिज्जवया ॥६६९॥

अर्थ: इस प्रकार माहात्म्यशाली अड़तालीस निर्यापक यति क्षपककी समाधिमें उत्कृष्ट प्रयत्नशील रहते हुए उस क्षपकको संसार समुद्रसे निकलनेके लिए प्रेरित करते हैं ॥६६९॥


जो जारिसओ कालो भरदेरवदेसु होइ वासेसु ।
ते तारिसया तदिया चोद्दालीसं पि णिज्जवया ॥६७०॥

अर्थ: पाँच भरत और पाँच ऐरावत क्षेत्रोंमें जब जैसा काल हो तब उसी कालके अनुकूल गुणवाले चवालीस निर्यापक स्थापित करना चाहिए ॥६७०॥


एवं चदुरो चदुरो परिहावेदव्वगा य जदणाए ।
कालम्मि संकिलिट्ठंमि जाव चत्तारि साधेंति ॥६७१॥

अर्थ: इस प्रकार ज्यों-ज्यों काल खराब होता जाये त्यों-त्यों देशकालके अनुसार सावधानतापूर्वक चार-चार निर्यापक कम करते जाना चाहिए । अन्तमें चार निर्यापक ही समाधिमरणको सम्पन्न करते हैं । अधिक काल खराब होनेपर कमसे कम दो निर्यापक भी होते हैं । किन्तु जिनागममें किसी भी अवस्थामें एक निर्यापक नहीं कहा ॥६७१-६७२॥


णिज्जावया य दोण्णि वि होंति जहण्णेण कालसंसयणा ।
एक्को णिज्जावयओ ण होइ कइया वि जिणसुत्ते ॥६७२॥

अर्थ: इस प्रकार ज्यों-ज्यों काल खराब होता जाये त्यों-त्यों देशकालके अनुसार साव-धानतापूर्वक चार-चार निर्यापक कम करते जाना चाहिए । अन्तमें चार निर्यापक ही समाधि-मरणको सम्पन्न करते हैं । अधिक काल खराब होनेपर कमसे कम दो निर्यापक भी होते हैं । किन्तु जिनागममें किसी भी अवस्थामें एक निर्यापक नहीं कहा ॥६७१-६७२॥ ॥६७२॥


एगो जइ णिज्जवओ अप्पा चत्तो परो पवयणं च ।
वसणमसमाधिमरणं उड्डाहो दुग्गदी चावि ॥६७३॥

अर्थ: यदि एक निर्यापक होता है तो निर्यापकके द्वारा आत्माका भी त्याग होता है, क्षपकका भी त्याग होता है और प्रवचनका भी त्याग होता है । तथा दुःख उठाना होता है । क्षपकका असमाधिपूर्वक मरण होता है, धर्ममें दूषण लगता है और दुर्गति होती है ॥६७३॥


खवगपडिजग्गणाए भिक्खगहणादिमकुणमाणेण ।
अप्पा चत्तो तव्विवरीदो खवगो हवदि चत्तो ॥६७४॥

अर्थ: क्षपकका कार्य करते रहनेसे निर्यापक भिक्षाग्रहण, निद्रा और मलमूत्रका त्याग नहीं कर सकता । अतः वह आत्माका त्याग करता है क्योंकि भोजन न करने से निद्रा नहीं आती । और शारीरिक मल न त्यागनेसे निर्यापकको कष्ट होता है । यदि निर्यापक भिक्षाके लिए भ्रमण करता है तथा सोता है और शरीरमल त्यागने जाता है तो क्षपकका त्याग करता है ॥६७४॥


खवयस्स अप्पणो वा चाए चत्तो हु होइ जइधम्मो ।
णाणस्स य वुच्छेदो पवयणचाओ कओ होदि ॥६७५॥

अर्थ: अपना अथवा क्षपकका त्याग करनेपर यतिधर्मका त्याग होता है । अर्थात् यतिका धर्म वैयावृत्य करना है । क्षपकको छोड़कर जानेपर उसका त्याग होता है । न जानेपर यतिधर्ममें आवश्यक प्रधान हैं उनका त्याग होता है । ज्ञानका भी व्युच्छेद होता है क्योंकि निर्यापकके साथ वह भी मर जाता है । और ऐसा होनेसे प्रवचनका त्याग होता है । यहाँ प्रवचन शब्दसे आगम कहा है । विद्वान् तो विरल ही होते हैं । अकेला निर्यापक उपवास आदिसे अतिखिन्न होकर यदि मर जाये तो कौन शास्त्रोंका उपदेश देगा और कौन शास्त्रोंको याद रखेगा । अतः प्रवचनका त्याग होता है ॥६७५॥


चायम्मि कीरमाणे वसणं खवयस्स अप्पणो चावि ।
खवयस्स अप्पणो वा चायम्मि हवेज्ज असमाधि ॥६७६॥

अर्थ: क्षपकको त्यागने पर क्षपकको दुःख होता है क्योंकि उसका कोई प्रतिकार नहीं है । और भोजनादि त्यागनेसे निर्यापकको दुःख है । तथा क्षपकको त्यागने पर क्षपकका असमाधि- मरण होता है क्योंकि उसके समीपमें कोई चित्तको समाधान देने वाला नहीं है । अथवा निर्यापक की असमाधि होती है क्योंकि वह भोजन आदिके त्यागसे उत्पन्न दुःखसे व्याकुल होता है ॥६७६॥


सेवेज्ज वा अकप्पं कुज्जा वा जायणाइ उड्डाहं ।
तण्हाछुधादिभग्गो खवओ सुण्णम्मि णिज्जवहे ॥६७७॥

अर्थ: यदि एक निर्यापक आहारादिके लिए गया तो उसके अभावमें क्षपक अयोग्य सेवन करेगा अर्थात् बैठकर भोजनादि करेगा । अथवा मिथ्यादृष्टियोंके पास जाकर याचना करेगा कि मैं भूख वा प्याससे पीड़ित हूँ । मुझे खानेको वा पीनेको दो ॥६७७॥


असमाधिणा व कालं करिज्ज सो सुण्णगम्मि णिज्जवगे ।
गच्छेज्ज तत्तो खवओ दुग्गदिमसमाधिकरणेण ॥६७८॥

अर्थ: समीपमें निर्यापक न होने पर क्षपक समाधिके बिना मरण कर सकता है । और उस असमाधिमरणसे अशुभ ध्यानवश दुर्गतिमें जा सकता है ॥६७८॥


सल्लेहणं सुणित्ता जुत्ताचारेण णिज्जवेज्जंतं ।
सव्वेहिं वि गंतव्वं जदीहिं इदरत्थ भयणिज्जं ॥६७९॥

अर्थ: युक्त आचार वाले आचार्यके द्वारा क्षपककी सल्लेखना हो रही है यह सुनकर सब यतियोंको वहाँ जाना चाहिए । किन्तु यदि निर्यापक आचार्य मन्द चारित्र वाला हो तो यति चाहें तो जा सकते हैं, न चाहें तो न जायें ॥६७९॥


सल्लेहणाए मूलं जो वच्चइ तिव्वभत्तिरायेण ।
भोत्तूण य देवसुहं सो पावइ उत्तमं ठाणं ॥६८०॥

अर्थ: जो यति तीव्र भक्तिरागसे सल्लेखनाके स्थान पर जाते हैं वे देवगतिका सुख भोग कर उत्तम स्थान मोक्षको प्राप्त करते हैं ॥६८०॥


एगम्मि भवग्गहणे समाधिमरणेण जो मदो जीवो ।
ण हु सो हिंडदि बहुसो सत्तट्ठभवे पमोत्तूण ॥६८१॥

अर्थ: जो जीव एक भवमें समाधिमरण पूर्वक करता है वह सात आठ भवसे अधिक काल तक संसारमें परिभ्रमण नहीं करता ॥६८१॥


सोदूण उत्तमट्ठस्स साधणं तिव्वभत्तिसंजुत्तो ।
जदि णोवयादि का उत्तमट्ठमरणम्मि से भत्ती ॥६८२॥

अर्थ: उत्तमार्थ-समाधिका साधन कोई मुनि करता है ऐसा सुनकर भी जो तीव्र भक्तिसे युक्त होकर यदि नहीं जाता तो उसकी समाधिमरणमें क्या भक्ति हो सकती है ? ॥६८२॥


जस्स पुण उत्तमट्ठमरणम्मि भत्ती ण विज्जदे तस्स ।
किह उत्तमट्ठमरणं संपज्जदि मरणकालम्मि ॥६८३॥

अर्थ: जिसकी समाधिमरणमें भक्ति नहीं है उसका मरते समय समाधिपूर्वक मरण नहीं होता ॥६८३॥


सद्दवदीणं पासं अल्लियदु असंवुडाण दादव्वं ।
तेसिं असंवुडगिराहिं होज्ज खवयस्स असमाधी ॥६८४॥

अर्थ: वचन गुप्ति और वचन समितिसे रहित जो हल्ला-गुल्ला करने वाले लोग हैं उन्हें क्षपकके समीप नहीं जाने देना चाहिए । यदि जावें तो वहीं तक जावें जहाँसे उनके वचन क्षपकको सुनाई न देवें । ऐसे असंवृत जनोंका क्षपकके समीप जानेका निषेध करनेका प्रयोजन यह है कि उनके मर्यादा रहित वचनोंको सुनकर क्षपककी समाधिमें बाधा हो सकती है, क्योंकि कम-जोर व्यक्ति ऐसे वैसे वचन सुनकर क्रुद्ध हो सकता है अथवा संक्लेशरूप परिणाम कर सकता है ॥६८४॥


भत्तादीणं तत्ती गीदत्थेहिं वि ण तत्थ कादव्वा ।
आलोयणा वि हु पसत्थमेव कादव्विया तत्थ ॥६८५॥

अर्थ: आगमके अर्थके ज्ञाता यतियोंको भी क्षपकके पासमें भोजन आदिकी कथा नहीं करनी चाहिए और आलोचना सम्बन्धी अतिचारोंकी भी चर्चा नहीं करनी चाहिए। यदि करना ही हो तो बहुतसे युक्त आचार वाले आचार्योंके रहते हुए प्रच्छन्न रूपसे ही करना चाहिए जिससे क्षपक उसे न सुन सके ॥६८५॥


पच्चक्खाणपडिक्कमणुवदेसणिओगतिविहवोसरणे ।
पट्ठवणापुच्छाए उवसंपण्णो पमाणं से ॥६८६॥

अर्थ: प्रत्याख्यान, प्रतिक्रमण, उपदेश, नियोग - आज्ञादान, जलके सिवाय तीन प्रकारके आहारका त्याग, प्रायश्चित्त, आदि सब प्रथम स्वीकार किये आचार्यके पास ही करना चाहिए, क्योंकि जिसे उस क्षपकने अपना निर्यापक बनाया है वही उसके लिए प्रमाण होता है। किन्तु वह निर्यापकाचार्य ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो उसकी अनुज्ञासे अन्य भी प्रमाण होता है ॥६८६॥


तेल्लकसायादीहिं य बहुसो गंडूसया दु घेत्तव्वा ।
जिब्भाकण्णाण बलं होहिदि तुंडं च से विसदं ॥६८७॥

अर्थ: तेल और कसैले आदिसे क्षपकको बहुत बार कुल्ले करना चाहिए। इससे जीभ और कानोंको बल मिलता है और मुख साफ होता है ॥६८७॥


दव्वपयासमकिच्चा जइ कीरइ तस्स तिविहवोसरणं ।
कह्मिवि भत्तविसेसंमि उस्सुगो होज्ज सो खवओ ॥६८८॥

अर्थ: आहारका प्रकाशन अर्थात् क्षपकके सामने विविध भोजनोंको उपस्थित न करके यदि तीन प्रकारके आहारका त्याग कराया जाता है तो क्षपक किसी भी भोजन विशेषमें उत्सुक बना रह सकता है । और आहारमें उत्सुकता चित्तको व्याकुल करती है ॥६८८॥


तम्हा तिविहं वोसरिहिदित्ति उक्कस्सयाणि दव्वाणि ।
सोसित्ता संविरलिय चरिमाहारं पयासेज्ज ॥६८९॥

अर्थ: अतः उत्तम-उत्तम भोजन पात्रोंमें अलग-अलग उसके सामने रखकर जब वह सन्तुष्ट हो जाये तो अन्तिम आहार उपस्थित करे । ऐसा करनेसे क्षपक तीनों प्रकारके आहारको छोड़ देगा ॥६८९॥


पासित्तु कोइ तादी तीरं पत्तस्सिमेहिं किं मेत्ति ।
वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो होदि ॥६९०॥

अर्थ: कोई यति दिखाये गये आहारोंको देखकर ‘मरणको प्राप्त मुझे इन मनोज्ञ आहारोंसे क्या प्रयोजन’ ऐसा विचार भोगोंसे विरक्त होकर संसारके भयको त्यागनेमें प्रमुख होता है ॥६९०॥


आसादित्ता कोई तीरं पत्तस्सिमेहिं किं मेत्ति ।
वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो होदि ॥६९१॥

अर्थ: कोई क्षपक भोजनका स्वाद मात्र लेकर ‘मरणको प्राप्त’ मुझे इस मनोज्ञ भोजनसे क्या, ऐसा विचार विरक्त हो, संसारके भयको त्यागनेमें तत्पर होता है ॥६९१॥


देसं भोच्चा हा हा तीरं पत्तस्सिमेहिं किं मेत्ति ।
वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो होदि ॥६९२॥

अर्थ: कोई क्षपक थोड़ा सा खाकर ‘मरणको प्राप्त मुझे इस मनोज्ञ आहारसे क्या’ ऐसा विचार विरक्त हो संसारके भयको त्यागनेमें तत्पर होता है ॥६९२॥


सव्वं भोच्चा धिद्धी तीरं पत्तस्सिमेहिं किं मेत्ति ।
वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो होइ ॥६९३॥

अर्थ: कोई सब आहारको भोगकर ‘मुझे बार-बार धिक्कार है । मरणको प्राप्त मुझे इस मनोज्ञ आहारसे क्या प्रयोजन’ इस प्रकार विरक्त हो संसारके भयसे मुक्त होनेमें तत्पर होता है । बार-बार मनोज्ञ विषयोंका सेवन यदि चलता रहे तो उससे जीवमें उसकी अभिलाषा बनी रहती है । और वह अनुराग कर्म पुद्गलोंके ग्रहणमें कारण होता है और उससे प्राणिगण संसार समुद्रमें पड़े रहते हैं । यह स्पष्ट करनेके लिए ये तीन गाथा कही है ॥६९३॥


कोई तमादइत्ता मणुण्णरसवेदणाए संविद्धो ।
तं चेवणुबंधेज्ज हु सव्वं देसं च गिद्धीए ॥६९४॥

अर्थ: कोई क्षपक उस दिखाये आहारको खाकर मनोज्ञ रसके स्वादसे मूर्च्छित होकर तृष्णावश उस खाये आहारमें से सबको अथवा किसी एक वस्तुको ही खानेकी इच्छा करता है ॥६९४॥


तत्थ अवाओवायं दंसेदि विसेसदो उवदिसंतो ।
उद्धरिदु मणोसल्लं सुहुमं सण्णिव्ववेमाणो ॥६९५॥

अर्थ: इस प्रकार आहारमें आसक्ति होने पर आचार्य उस क्षपकके मनसे सूक्ष्म शल्यको निकालनेके लिए इन्द्रिय संयमका विनाश और असंयमकी प्राप्ति बतलाते हुए विशेषरूपसे उपदेश देते हैं और इस तरह उसे सम्यक् रूपसे शान्त करते हैं ॥६९५॥


सोच्चा सल्लमणत्थं उद्धरदि असेसमप्पमादेण ।
वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो खवओ ॥६९६॥

अर्थ: वैराग्यका उपदेश सुनकर वैराग्यको प्राप्त हुआ क्षपक प्रमाद छोड़कर समस्त अनर्थकारी शल्यको निकाल देता है और संवेगमें तत्पर होता है ॥६९६॥


अणुसज्जमाणए पुण समाधिकामस्स सव्वमुवहरिय ।
एक्केक्कं हावेंतो ठवेदि पोराणमाहारे ॥६९७॥

अर्थ: आहारकी अभिलाषामें दोष दिखानेपर भी यदि क्षपक आहारमें अनुरागी रहता है तो आचार्य समाधिमरणके इच्छुक क्षपकको सब आहार दिखलाकर एक-एक आहार छुड़ाते हुए उसे अपने पूर्व आहार पर ले आते हैं ॥६९७॥


अणुपुव्वेण य ठविदो संवट्टेदूण सव्वमाहारं ।
पाणयपरिक्कमेण दु पच्छा भावेदि अप्पाणं ॥६९८॥

अर्थ: आचार्यके द्वारा पूर्व आहारपर स्थापित होनेके पश्चात् क्षपक क्रमसे अशन खाद्य स्वाद्य सब आहारोंका त्याग करके पीछे अपनेको पानक आहारमें लगाता है ॥६९८॥


सत्थं बहलं लेवडमलेवडं च ससित्थयमसित्थं ।
छव्विहपाणयमेयं पाणयपरिकम्मपाओग्गं ॥६९९॥

अर्थ: पानकके छह भेद हैं - एक भेद स्वच्छ है । जैसे गर्मजल सौवीरक । इमली आदि फलोंके रसको बहल कहते हैं । यह दूसरा भेद है । दही आदि लेवड है जो हाथसे लिप्त हो जाता है । यह तीसरा भेद है । जो हाथसे लिप्त न हो वह चौथा भेद अलेवड है । सिक्थ सहित पेय पाँचवाँ भेद है और सिक्थरहित पेय छठा भेद है । ये छह प्रकारका पानक पानक परिकर्मके योग्य है ॥६९९॥


आयंबिलेण सिंभं खीयदि पित्तं च उवसमं जादि ।
वादस्स रक्खणट्ठं एत्थ पयत्तं खु कादव्वं ॥७००॥

अर्थ: आचाम्लसे कफका क्षय होता है, पित्त शान्त होता है और वातसे रक्षा होती है । इसलिए आचाम्लके सेवनका प्रयत्न करना चाहिए ॥७००॥


तो पाणएण परिभाविदस्स उदरमलसोधणिच्छाए ।
मधुरं पज्जेदव्वो मंदं व विरेयणं खवओ ॥७०१॥

अर्थ: पानकका सेवन करनेवाले क्षपकको पेटके मलकी शुद्धिके लिए मांडकी तरह मधुर विरेचन पिलाना चाहिए ॥७०१॥


आणाहवत्तियादीहिं वा वि कादव्वमुदरसोधणयं ।
वेदणमुप्पादेज्ज हु करिसं अत्थंतयं उदरे ॥७०२॥

अर्थ: अनुवासन और गुदाद्वारमें बत्ती आदि चढ़ाकर पेटके मलकी शुद्धि करना चाहिए ।


जावज्जीवं सव्वाहारं तिविहं च वोसरिहिदित्ति ।
णिज्जवओ आयरिओ संघस्स णिवेदणं कुज्जा ॥७०३॥

अर्थ: निर्यापकाचार्य संघसे निवेदन करते हैं कि अब यह क्षपक जीवनपर्यन्तके लिए अशन, खाद्य और स्वाद्य तीनों प्रकारके सब आहारका त्याग करता है ॥७०३॥


खामेदि तुम्ह खवओत्ति कुंचओ तस्स चेव खवगस्स ।
दावेदव्वो णेदूण सव्वसंघस्स वसधीसु ॥७०४॥

अर्थ: तथा यह क्षपक आप सबसे क्षमा माँगता है । इसके प्रमाणके लिए आचार्य उस क्षपककी पिच्छिका लेकर सर्वसंघकी वसतियोंमें दिखलाते हैं । अर्थात् क्षपक सबके पास क्षमा माँगने स्वयं नहीं जा सकता, इसलिए उसकी पीछी सर्वत्र ले जाकर दिखलाते हैं कि वह आप सबसे क्षमा माँगता है ॥७०४॥


आराधणपत्तीयं खवयस्स य णिरुवसग्गपत्तीयं ।
काओसग्गो संघेण होइ सव्वेण कादव्वो ॥७०५॥

अर्थ: क्षपककी रत्नत्रयकी आराधनापूर्ण हो और उसमें कोई विघ्न न आवे, इसके लिए सर्वसंघको कायोत्सर्ग करना चाहिए ॥७०५॥


खवयं पच्चक्खावेदि तदो सव्वं च चदुविधाहारं ।
संघसमवायमज्झे सागारं गुरुणिओगेण ॥७०६॥

अर्थ: उसके पश्चात् निर्यापकाचार्य संघके समुदायके मध्यमें चारों प्रकारके आहारका सविकल्पक त्याग करता है और क्षपक गुरुकी आज्ञासे ऐसा करता है ॥७०६॥


अहवा समाधिहेदुं कायव्वो पाणयस्स आहारो ।
तो पाणयंपि पच्छा वोसरिदव्वं जहाकाले ॥७०७॥

अर्थ: अथवा समाधि अर्थात् चित्तकी एकाग्रताके लिए पानकको छोड़कर शेष सब आहारका त्याग करता है और अत्यन्त शक्तिहीन होनेपर पानकका भी त्याग करता है ॥७०७॥


जं पाणयपरियम्मम्मि पाणयं छव्विहं समक्खादं ।
तं से ताहे कप्पदि तिविहाहारस्स वोसरणे ॥७०८॥

अर्थ: पानकके प्रकरणमें जो छह प्रकारका पानक कहा है, तीन प्रकारके आहारका त्याग करनेपर वह उस क्षपकके योग्य होता है ॥७०८॥


तो आयरियउवज्झायसिस्ससाधम्मिगे कुलगणे य ।
जो होज्ज कसाओ से तं सव्वं तिविहेण खामेदि ॥७०९॥

अर्थ: आहार त्याग करनेके पश्चात् आचार्य, उपाध्याय, शिष्य, साधर्मी, कुल और गणके सम्बन्धमें क्षपकके अन्दर जो क्रोध, मान, माया या लोभ कषाय होती है उसे सबको वह मनवचनकायसे निकाल देता है ॥७०९॥


अब्भहियजादहासो मत्थम्मि कदंजली कदपणामो ।
खामेइ सव्वसंघं संवेगं संजणेमाणो ॥७१०॥

अर्थ: मुमुक्षुका जो कर्तव्य है वह सब मैंने किया, इस विचारसे उस क्षपकके चित्तमें अत्यन्त प्रसन्नता होती है और धर्मानुरागको प्रकट करते हुए दोनों हाथोंकी अंजलि मस्तकसे लगाकर प्रणामपूर्वक समस्त मुनिसंघसे वह क्षमा माँगता है ॥७१०॥


मणवयणकायजोगेहिं पुरा कदकारिदे अणुमदे वा ।
सव्वे अवराधपदे एस खमावेमि णिस्सल्लो ॥७११॥

अर्थ: कि मनवचनकाय और कृतकारित अनुमोदनासे पूर्वमें किये गये सब अपराधोंकी मैं निःशल्य होकर क्षमा माँगता हूँ ॥७११॥


अम्मापिदुसरिसो मे खमदु खु जगसीयलो जगाधारो ।
अहमवि खमामि सुद्धो गुणसंघायस्स संघस्स ॥७१२॥

अर्थ: गुणोंका समूहरूप यह संघ समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाला है, निकट भव्यजीवोंका आधार है। वह संघ मुझे माता-पिताके समान क्षमा प्रदान करे। मैं भी क्रोधादि दोषोंसे शुद्ध होकर किये हुए अपराधको मनसे निकाल देता हूँ ॥७१२॥


संघो गुणसंघाओ संघो य विमोचओ य कम्माणं ।
दंसणणाणचरित्ते संघायंतो हवे संघो ॥७१३॥

अर्थ: गुणोंके समूहका नाम संघ है। यह संघ कर्मोंसे छुड़ाता है। सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रके मेलसे संघ होता है ॥७१३॥


इय खामिय वेरग्गं अणुत्तरं तवसमाधिमारूढो ।
पप्फोडिंतो विहरदि बहुभवबाधाकरं कम्मं ॥७१४॥

अर्थ: इस प्रकार सर्वसंघको क्षमा प्रदान करके उत्कृष्ट वैराग्यको धारणकर, तप और समाधिमें लीन हुआ क्षपक भवभवमें कष्ट देनेवाले कर्मोंकी निर्जरा करता है ॥७१४॥


वट्टंति अपरिदंता दिवा य रादो य सव्वपरियम्मे ।
पडिचरया गणहरया कम्मरयं णिज्जरेमाणा ॥७१५॥

अर्थ: धार्मिकोंका संरक्षण करनेवाले निर्यापक मुनिगण रात दिन बिना थके उस क्षपककी समस्त परिचर्यामें लगे रहते हैं। और इस प्रकार कर्मोंकी निर्जरा करते हैं ॥७१५॥


जं बद्धमसंखेज्जाहिं रयं भवसदसहस्सकोडीहिं ।
सम्मत्तुप्पत्तीए खवेइ तं एयसमयेण ॥७१६॥

अर्थ: असंख्यात लक्षकोटिभवोंमें जो कर्मरज बाँधा है उसे सम्यक्त्वकी उत्पत्ति होनेपर एक समयमें ही जीव नष्ट कर देता है ॥७१६॥


एयसमएण विधुणदि उवउत्तो बहुभवज्जियं कम्मं ।
अण्णयरम्मि य जोग्गे पच्चक्खाणे विसेसेण ॥७१७॥

अर्थ: जिस किसी तपमें लीन हुआ आत्मा अनेकभवोंमें संचितकर्मोंको अल्पसमयमें ही निर्जीर्ण कर देता है । और जो जीवनपर्यन्त चारों प्रकारके आहारका त्याग करता है वह विशेषरूपसे कर्मोंकी निर्जरा करता है ॥७१७॥


एवं पडिक्कमणाए काउसग्गे य विणयसज्झाए ।
अणुपेहासु य जुत्तो संथारगओ धुणदि कम्मं ॥७१८॥

अर्थ: इस प्रकार संस्तरपर आरूढ क्षपक प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग, विनय, स्वाध्याय और बारह भावनाओंमें लगनेपर कर्मोंकी निर्जरा करता है ॥७१८॥


णिज्जवया आयरिया संथारत्थस्स दिंति अणुसिट्ठिं ।
संवेगं णिव्वेगं जणंतयं कण्णजावं से ॥७१९॥

अर्थ: निर्यापक आचार्य संस्तरपर आरूढ़ क्षपकको श्रुतज्ञानके अनुसार उसके कानमें शिक्षा देते हैं । वह शिक्षा संसारसे भय और वैराग्यको उत्पन्न करती है ॥७१९॥


णिस्सल्लो कदसुद्धी विज्जावच्चकरवसधिसंथारं ।
उवधिं च सोधइत्ता सल्लेहण भो कुण इदाणिं ॥७२०॥

अर्थ: हे क्षपक ! निःशल्य होकर, रत्नत्रयको निर्मल करके तथा वैयावृत्य करनेवाले, वसति संस्तर और पीछी आदि उपधिका शोधन करके अब सल्लेखना करो ॥७२०॥ वह वैयावृत्य करनेवाला है । हे क्षपक ! वैयावृत्य करनेवाला, वसति, संस्तर और पीछी आदिका शोधन करके तुम सल्लेखना करो । इसका अभिप्राय यह है क्षपक यह देखे कि वैयावृत्य करनेवाले मुनि संयम और असंयमके भेदको जानते हैं या नहीं ? वे मनवचनकायसे असंयमका परिहार करते हैं या नहीं ? यह परीक्षा करके अयोग्य वैयावृत्य करनेवालोंको हटा दें और योग्य वैयावृत्य करनेवालोंको स्वीकार करें । पूर्वाह्ण और अपराह्णमें वसति, संस्तर और उपकरणोंकी शुद्धि करो ऐसी आज्ञा देनेपर उनकी शुद्धि मानी जाती है । इनकी शुद्धिपूर्वक तुम समाधि करो । अब तुम्हारा मरणसमय निकट है । ऐसा क्षपकके कानमें कहते हैं ॥७२०॥


मिच्छत्तस्स य वमणं सम्मत्ते भावणा परा भत्ती ।
भावणमोक्काररदिं णाणुवजुत्ता सदा कुणसु ॥७२१॥

अर्थ: मिथ्यात्वका त्याग करो । तत्त्वश्रद्धानकी भावना करो । अर्हन्त आदिमें उत्कृष्ट भक्ति करो । भावनमस्कारमें मन लगाओ । नमस्कारके दो भेद हैं - द्रव्यनमस्कार और भावनमस्कार । जिनदेवको नमस्कार हो इत्यादि शब्दोंका उच्चारण करना, मस्तक झुकाना, दोनों हाथ जोड़ना, ये सब द्रव्यनमस्कार हैं और नमस्कार करने योग्य अर्हन्त आदिके गुणोंमें अनुराग होना भावनमस्कार है । उस भावनमस्कारमें मन लगाओ और सदा श्रुतज्ञानमें उपयोग लगाओ ॥७२१॥


पंचमहव्वयरक्खा कोहचउक्कस्स णिग्गहं परमं ।
दुद्दंतिंदियविजयं दुविहतवे उज्जमं कुणसु ॥७२२॥

अर्थ: पाँच महाव्रतोंकी रक्षा करो । क्रोध आदि चार कषायोंका उत्कृष्ट निग्रह करो । दुर्दान्त इन्द्रियोंको जीतो और दो प्रकारके तपमें उद्योग करो ॥७२२॥


संसारमूलहेदुं मिच्छत्तं सव्वधा विवज्जेहि ।
बुद्धी गुणण्णिदं पि हु मिच्छत्तं मोहिदं कुणदि ॥७२३॥

अर्थ: मिथ्यात्व संसारका मूल कारण है उसका मनवचनकायसे त्याग करो; क्योंकि मिथ्यात्व गुणयुक्त बुद्धिको भी मूढ़ बना देता है ॥७२३॥


मयतण्हियाओ उदयत्ति मया मण्णंति जह सतण्हयगा ।
तह य णरा वि असद्भूदं सद्भूतं ति मण्णंति मोहेण ॥७२४॥

अर्थ: सूर्यकी किरणें पृथ्वीकी ऊष्मासे मिलकर जलका भ्रम उत्पन्न करती हैं उसे मृग- तृष्णा कहते हैं। जैसे प्याससे पीड़ित मृग उसे पानी जानते हैं वैसे ही मनुष्य भी दर्शनमोहके कारण अतत्त्वको भी तत्त्व जानता है ॥७२४॥


परिहर तं मिच्छत्तं सम्मत्ताराहणाए दढचित्तो ।
होदि णमोक्कारम्मि य णाणे वदभावणासु थिया ॥७२५॥

अर्थ: अतः हे क्षपक, सम्यक्त्वकी आराधनाके द्वारा उस मिथ्यात्वको दूर कर । ऐसा करनेसे पंचपमेष्ठीके नमस्कारमें ज्ञान और व्रतोंकी भावनामें चित्त दृढ़ होता है ॥७२५॥


मिच्छत्तमोहणादो धत्तूरयमोहणं वरं होदि ।
वड्ढेदि जम्ममरणं दंसणमोहो दु ण दु इदरं ॥७२६॥

अर्थ: मिथ्यात्वके उदयसे उत्पन्न हुए मोहसे धतूरेके सेवनसे उत्पन्न हुआ मोह (मूर्छा) उत्तम है; क्योंकि दर्शन मोहसे उत्पन्न हुआ मोह नाना योनियोंमें जन्ममरणको बढ़ाता है किन्तु धतूरेके सेवनसे उत्पन्न हुआ मोह जन्ममरणकी परम्पराको नहीं बढ़ाता । अतः कुछ दिनोंके लिए मोह उत्पन्न करने वाले धतूरेके मदसे अनन्त कालके लिए विपरीत बुद्धि उत्पन्न करनेमें समर्थ मिथ्यात्वका मोह अत्यन्त बुरा है । अतः जन्ममरणकी परम्परासे भीत आपको मिथ्यात्वका त्याग करना चाहिए ॥७२६॥


जीवो अणादिकालं पवत्तमिच्छत्तभाविदो संतो ।
ण रमिज्ज हु सम्मत्ते एत्थ पयत्तं खु कादव्वं ॥७२७॥

अर्थ: यह जीव अनादि कालसे चले आते हुए मिथ्यात्वसे भावित होता आया है इससे सम्यक्त्वमें वह नहीं रमता । इसलिए सम्यक्त्वमें प्रयत्न करना ही चाहिए । अनन्त कालमें अच्छी तरह भाया गया मिथ्यात्व बड़े कष्टसे छूटता है । जैसे सर्प रोकने पर भी अपने चिर परिचित बिलमें बलपूर्वक घुस जाता है । अतः सम्यक्त्वमें दृढ़ता कर्तव्य है ॥७२७॥


अग्गिविसकिण्हसप्पादियाणि दोसं ण तं करेज्जण्हू ।
जं कुणदि महादोसं तिव्वं जीवस्स मिच्छत्तं ॥७२८॥

अर्थ: आग, विष, काला सर्प आदि जीवका उतना दोष नहीं करते जैसा महादोष तीव्र मिथ्यात्व करता है ॥७२८॥


अग्गिविसकिण्हसप्पादियाणि दोसं करंति एयभवे ।
मिच्छत्तं पुण दोसं करेदि भवकोडिकोडीसु ॥७२९॥

अर्थ: आग आदि तो एक भवमें ही दुःख देते हैं । किन्तु मिथ्यात्व करोड़ो भवोंमें दुःख देता है ॥७२९॥


मिच्छत्तसल्लविद्धा तिव्वाओ वेदणाओ वेदंति ।
विसलित्तकंडविद्धा जह पुरिसा णिप्पडीयारा ॥७३०॥

अर्थ: मिथ्यात्व नामक शल्यसे बींधे गये जीव तीव्र वेदना भोगते हैं । जैसे विषैले बाणसे छेदे गये मनुष्योंका कोई प्रतीकार नहीं होता । अर्थात् वे अवश्य मर जाते हैं ॥७३०॥


अच्छीणि संघसिरिणो मिच्छत्तणिकाचणेण पडिदाइं ।
कालगदो वि य संतो जादो सो दीहसंसारे ॥७३१॥

अर्थ: संघश्री नामक राजमन्त्रीकी आँखें तीव्र मिथ्यात्वके कारण फूट गईं और वह मर कर भी दीर्घ संसारी हुआ ॥७३१॥


कडुगम्मि अणिव्वलिदम्मि दुद्धिए कडुगमेव जह खीरं ।
होदि णिहिदं तु णिव्वलियम्मि य मधुरं सुगंधं च ॥७३२॥

अर्थ: जैसे अशुद्ध कडुवी तुम्बीमें रखा दूध कटुक ही होता है और शुद्ध तुम्बीमें रखा दूध मीठा तथा सुगन्धित होता है ॥७३२॥


तह मिच्छत्तकडुगिदे जीवे तवणाणचरणविरियाणि ।
णासंति वंतमिच्छत्तम्मि य सफलाणि जायंति ॥७३३॥

अर्थ: वैसे ही मिथ्यात्वसे दूषित जीवमें तप, ज्ञान, चारित्र, वीर्य, ये सब नष्ट हो जाते हैं क्योंकि सम्यक् रूप नहीं होते । समीचीन तप, ज्ञान, चारित्र और वीर्य मुक्तिके उपाय हैं, केवल तप आदि मात्र मुक्तिका उपाय नहीं है । और समीचीन तप आदि श्रद्धाके बलसे ही होते हैं, श्रद्धाके अभावमें नहीं होते । अतः मिथ्यात्वको दूर कर देने वाले जीवमें तप आदि सफल होते हैं । तपका फल सांसारिक सुख अथवा मोक्षका सुख है । इस प्रकार मिथ्यात्वके वमनका कथन किया ॥७३३॥


मा कासि तं पमादं सम्मत्ते सव्वदुक्खणासयरे ।
सम्मत्तं खु पदिट्ठा णाणचरणवीरियतवाणं ॥७३४॥

अर्थ: सब दुःखोंको जड़मूलसे उखाड़नेमें तत्पर सम्यक्त्वके विषयमें आप प्रमाद न करें । 'सम्यक्त्व ही सब दुःखोंका नाश करने वाला कैसे है ? ज्ञान आदि भी तो सब दुःखोंको दूर करनेमें निमित्त हैं ? ऐसा कोई कहे तो आचार्य कहते हैं - ज्ञान, चारित्र, वीर्याचार और तपका आधार तत्त्वका श्रद्धान ही है ।


णगरस्स जह दुवारं मुहस्स चक्खू तरुस्स जह मूलं ।
तह जाण सुसम्मत्तं णाणचरणवीरियतवाणं ॥७३५॥

अर्थ: जैसे नगरमें प्रवेश करनेका उपाय उसका द्वार होता है वैसे ही ज्ञान, चारित्र, वीर्य और तपका द्वार सम्यक्त्व है । यदि जीव सम्यक्त्व रूपसे परिणत होता है तो वह ज्ञानादिमें प्रवेश कर सकता है । सम्यक्त्वके बिना ज्ञानादिमें प्रवेश सम्भव नहीं है । सम्यक्त्वके बिना जीव सातिशय अवधि ज्ञान आदि, यथाख्यात चारित्र अथवा बहुत निर्जरामें निमित्त तपको प्राप्त नहीं कर सकता । तथा जैसे नेत्र मुखको शोभा प्रदान करते हैं वैसे ही सम्यक्त्वसे ज्ञानादि शोभित होते हैं । तथा जैसे जड़ वृक्षकी स्थितिमें कारण है वैसे ही सम्यक्त्व ज्ञानादिकी स्थितिमें निमित्त है ॥७३५॥


भावाणुरागपेमाणुरागमज्जाणुरागरत्तो व्वा ।
धम्माणुरागरत्तो य होहि जिणसासणे णिच्चं ॥७३६॥

अर्थ: इस जगत्में लोग परपदार्थोंमें अनुराग रूप हैं, स्नेही जनोंमें प्रेमानुरागी हैं । कोई भव्यानुरागी है । किन्तु तुम जिनशासनमें रहकर सदा धर्मानुरागी रहो ॥७३६॥


दंसणभट्ठो भट्ठो दंसणभट्ठस्स णत्थि णिव्वाणं ।
सिज्झन्ति चरियभट्ठा दंसणभट्ठा ण सिज्झंति ॥७३७॥

अर्थ: जो सम्यग्दर्शनसे भ्रष्ट है वह भ्रष्ट है क्योंकि सम्यग्दर्शनसे भ्रष्टका अनन्तानन्त कालमें भी निर्वाण नहीं होता । जो चारित्रसे भ्रष्ट है किन्तु सम्यग्दर्शनसे भ्रष्ट नहीं है उसका कुछ कालमें निर्वाण होगा । परन्तु जिसके सम्यग्दर्शन नहीं है उसका निर्वाण अनन्त कालमें भी नहीं होगा ॥७३७॥


दंसणभट्ठो भट्ठो ण हु भट्ठो होइ चरणभट्ठो हु ।
दंसणममुयत्तस्स हु परिवडणं णत्थि संसारे ॥७३८॥

अर्थ: जो सम्यग्दर्शनसे भ्रष्ट है वह अत्यन्त भ्रष्ट है । किन्तु चारित्रसे भ्रष्ट होने पर भी सम्यग्दर्शनसे भ्रष्ट नहीं है वह भ्रष्ट नहीं है । सम्यग्दर्शनसे भ्रष्ट जैसा होता है चारित्रसे भ्रष्ट वैसा नहीं होता । चारित्रसे भ्रष्ट होकर भी जो सम्यग्दर्शनको नहीं त्यागता उसका संसारमें पतन नहीं होता । शंका - असंयमके निमित्तसे उपार्जित पाप कर्मके होनेसे उसका संसार रहता ही है । आप कैसे कहते हैं कि उसका संसारमें पतन नहीं होता ? समाधान - हमारे कथनका अभिप्राय यह है कि उसका चारों गतियोंमें भ्रमण नहीं होता । यद्यपि संसार रहता है किन्तु स्वल्प रहता है अतः ‘नहीं रहता’ ऐसा कहनेमें आता है जैसे स्वल्प धन वालेको निर्धन कहा जाता है । किन्तु जो सम्यग्दर्शन पाकर उससे भ्रष्ट हो जाता है उसका संसार अर्धपुद्गल परावर्तन प्रमाण रहनेसे महान् संसार होता है । अतः चारित्र भ्रष्टसे दर्शन भ्रष्ट अति निकृष्ट होता है ॥७३८॥


सुद्धे सम्मत्ते अविरदो वि अज्जेदि तित्थयरणामं ।
जादो दु सेणिगो आगमेसिं अरुहो अविरदो वि ॥७३९॥

अर्थ: एकाकी सम्यग्दर्शनका माहात्म्य कहते हैं - अप्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभके उदयसे हिंसा आदिकी निवृत्ति रूप परिणामोंसे रहित अविरत भी शंका आदि अतिचारोंसे रहित शुद्ध सम्यक्त्वके होने पर तीर्थंकर पदके कारणभूत कर्मका उपार्जन करता है। शंका - विनय सम्पन्नता आदि भी तीर्थंकर नाम कर्मके आस्रवमें कारण होते हैं तब उनसे सम्यग्दर्शनकी क्या विशेषता हुई ? समाधान - सम्यग्दर्शनके होने पर ही विनय सम्पन्नता आदि तीर्थंकर नाम कर्मके कारण होते हैं, उसके अभावमें कारण नहीं होते। देखो, असंयमी भी श्रेणिक भविष्यमें तीर्थंकर हुआ। शङ्का - श्रेणिक तीर्थंकर होगा, भविष्यकालमें, अभी वह हुआ नहीं है, फिर उसे ‘हुआ’ क्यों कहा ? समाधान - श्रेणिकका अर्हन्तपना आगे होगा, अभी हुआ नहीं है इसलिए ‘भविष्यमें हुआ’ ऐसा कहा है ॥७३९॥


कल्लाणपरंपरयं लहंति जीवा विसुद्धसम्मत्ता ।
सम्मद्दंसणरयणं णग्घदि ससुरासुरो लोओ ॥७४०॥

अर्थ: विशुद्ध सम्यग्दृष्टी जीव इन्द्रपद, चक्रवर्तिपद, अहमिन्द्रपद, तीर्थंकरपद आदि कल्याणपरम्पराको प्राप्त करते हैं । मूल्यके रूपमें समस्तलोक देनेपर भी सम्यक्त्वरत्न प्राप्त नहीं होता ॥७४०॥


सम्मत्तस्स य लंभे तेलोक्कस्स य हवेज्ज जो लंभो ।
सम्मद्दंसणलंभो वरं खु तेलोक्कलंभादो ॥७४१॥

अर्थ: सम्यक्त्वकी प्राप्तिके बदलेमें यदि तीनों लोक प्राप्त होते हों तो त्रैलोक्यकी प्राप्तिसे सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति श्रेष्ठ है ॥७४१॥


लद्धूण वि तेलोक्कं परिवडदि हु परिमिदेण कालेण ।
लद्धूण य सम्मत्तं अक्खयसोक्खं हवदि मोक्खं ॥७४२॥

अर्थ: तीनों लोक प्राप्त करके भी कुछ काल बीतनेपर वे छूट जाते हैं । किन्तु सम्यक्त्वको प्राप्त करके अविनाशी सुखवाला मोक्ष प्राप्त होता है ॥७४२॥


अरहंतसिद्धचेदियपवयणआयरियसव्वसाहूसु ।
तिव्वं करेहि भत्ती णिव्विदिगिंछेण भावेण ॥७४३॥

अर्थ: हे क्षपक ! ग्लानिरहित भावसे अर्हन्त, सिद्ध, उनके प्रतिबिम्ब, प्रवचन, आचार्य और सर्वसाधुओंमें तीव्र भक्ति करो ॥७४३॥


संवेगजणिदकरणा णिस्सल्ला मंदरोव्व णिक्कंपा ।
जस्स दढा जिणभत्ती तस्स भयं णत्थि संसारे ॥७४४॥

अर्थ: संसारके भयसे उत्पन्न हुई, मिथ्यात्व माया और निदान शल्योंसे रहित तथा सुमेरुकी तरह निश्चल दृढ़ जिनभक्ति जिसकी है उसे संसारका भय नहीं है ॥७४४॥


एया वि सा समत्था जिणभत्ती दुग्गइं णिवारेदि ।
पुण्णाणि य पूरेदुं आसिद्धिपरंपरसुहाणं ॥७४५॥

अर्थ: एक ही जिनभक्ति दुर्गतिका निवारण करनेमें, पुण्यकर्मोंको पूर्ण करनेमें और मोक्षपर्यन्त सुखोंकी परम्पराको देनेमें समर्थ है ॥७४५॥


तह सिद्धचेदिए पवयणे य आइरियसव्वसाधूसु ।
भत्ती होदि समत्था संसारुच्छेदणे तिव्वा ॥७४६॥

अर्थ: तथा सिद्ध, परमेष्ठी; उनके प्रतिबिम्ब, प्रवचन, आचार्य और सर्वसाधुओंमें तीव्रभक्ति संसारका विनाश करनेमें समर्थ है ॥७४६॥


विज्जा वि भत्तिवंतस्स सिद्धिमुवयादि होदि सफला य ।
किह पुण णिव्वुदिबीजं सिज्झहिदि अभत्तिमंतस्स ॥७४७॥

अर्थ: विद्या भी भक्तिमानकी ही सिद्ध और सफल होती है । तब जो अर्हन्त आदिमें भक्ति नहीं रखता उसके मोक्षका बीज रत्नत्रय कैसे सिद्ध-प्राप्त हो सकता है ? ॥७४७॥


तेसिं आराधणणायगाण ण करिज्ज जो णरो भत्ति ।
धत्तिं पि संजमंतो सालिं सो ऊसरे ववदि ॥७४८॥

अर्थ: दर्शन आदि आराधनाओंके नायक अर्हन्त आदिकी जो मनुष्य भक्ति नहीं करता वह संयममें अत्यन्त तत्पर होते हुए भी धान्यको ऊसर भूमिमें बोता है ॥७४८॥


बीएण विणा सस्सं इच्छदि सो वासमब्भएण विणा ।
आराधणमिच्छन्तो आराधणभत्तिमकरंतो ॥७४९॥

अर्थ: आराधनाके नायकोंकी भक्ति न करके जो आराधना अर्थात् रत्नत्रयकी सिद्धि चाहता है वह बीजके बिना धान्य चाहता है और बादलोंके बिना वर्षा चाहता है ॥७४९॥


विधिणा कदस्स सस्सस्स जहा णिप्पादयं हवदि वासं ।
तह अरहादिगभत्ती णाणचरणदंसणतवाणं ॥७५०॥

अर्थ: जिससे कार्य किये जाते हैं उसे विधि कहते हैं अतः विधिका अर्थ होता है - कारणोंका समूह । उस विधिसे बोये गये धान्यको वर्षा जैसे उत्पन्न करती है उसी प्रकार अर्हन्त आदिकी भक्ति ज्ञान, दर्शन, चारित्र, और तपकी उत्पादक होती है ॥७५०॥


वंदणभत्तीमित्तेण मिहिलाहिओ य पउमरहो ।
देविंदपाडिहेरं पत्तो जादो गणधरो य ॥७५१॥

अर्थ: तीर्थंकरकी वन्दनाके अनुरागमात्रसे मिथिला नगरका स्वामी पद्मरथ देवेन्द्रके द्वारा पूजित हुआ और वासुपूज्य तीर्थंकरका गणधर हुआ ॥७५१॥


आराधणापुरस्सरमणण्णहिदओ विसुद्धलेस्साओ ।
संसारस्स खयकरं मा मोचीओ णमोक्कारं ॥७५२॥

अर्थ: नमस्कार मन्त्र आराधनाका अग्रेसर है, नमस्कारमन्त्रपूर्वक ही आराधना की जाती है । पाँच परावर्तनरूप संसारका क्षय करनेवाला है । सब ओरसे मनको हटाकर विशुद्ध लेश्यापूर्वक नमस्कार मन्त्रकी आराधना कर । इसे छोड़ना नहीं ॥७५२॥


मणसा गुणपरिणामो वाचा गुणभासणं च पंचण्हं ।
काएण संपणामो एस पयत्थो णमोक्कारो ॥७५३॥

अर्थ: अरहन्त आदि पाँचोंका मनसे गुणानुस्मरण, वचनसे गुणानुवाद और कायसे नमस्कार यह नमस्कार पदका अर्थ है ॥७५३


अरहंतणमोक्कारो एक्को वि हविज्ज जो मरणकाले ।
सो जिणवयणे दिट्ठो संसारुच्छेदणसमत्थो ॥७५४॥

अर्थ: मरते समय यदि एक बार भी अर्हन्तोंको नमस्कार किया तो उसे जिनागममें संसारका उच्छेद करनेमें समर्थ कहा है ॥७५४॥


जो भावनमोक्कारेण विणा सम्मत्तणाणचरणतवा ।
ण हु ते होंति समत्था संसारुच्छेदणं कादुं ॥७५५॥

अर्थ: भाव नमस्कारके विना जो सम्यक्त्व ज्ञान और चारित्र होते हैं वे संसारका उच्छेद करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥७५५॥


चदुरंगाए सेणाए णायगो जह पवत्तओ होदि ।
तह भावणमोक्कारो मरणे तवणाणचरणाणं ॥७५६॥

अर्थ: जैसे चतुरंग सेनाका नायक प्रवर्तक होता है वैसे ही मरते समय भाव नमस्कार - क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक वीर्य गुण वाले अर्हन्त हैं’ इस प्रकार श्रद्धान रूप भाव नमस्कार सम्यग्दर्शन रूप होनेसे समीचीन ज्ञान, तप और चारित्रका प्रवर्तक होता है । आप्तके गुणोंके श्रद्धानके विना शब्दरूप श्रुतके प्रामाण्यकी व्यवस्था नहीं की जा सकती; क्योंकि वक्ताके प्रामाण्यके विना वचनोंका प्रामाण्य सिद्ध नहीं होता । अतीन्द्रिय विषयोंका ज्ञान अयथार्थ है और ‘यह’ आदि ज्ञान यथार्थ है, ऐसा विवेक हम लोग नहीं कर सकते । यतः अर्थके यथार्थ स्वरूपको जानने वाले और राग द्वेषसे रहित आप्तका वचन यथार्थ ज्ञानको ही उत्पन्न करता है, अयथार्थ ज्ञानको नहीं. इस प्रकारके सच्चे ज्ञानीका सम्यग्ज्ञान पूर्वक सम्यक् चारित्र और सम्यक् तप विद्यमान कर्मोंको दूर करनेमें निमित्त होता है, अन्यथा नहीं होता । इसलिए भाव नमस्कार ज्ञान चारित्र और तपका प्रवर्तक होनेसे प्रधान है और संसारका उच्छेद करने वाला कहाता है ॥७५६॥


आराधणापडायं गेण्हंतस्स हु करो णमोक्कारो ।
मल्लस्स जयपडायं जह हत्थो घेत्तुकामस्स ॥७५७॥

अर्थ: जैसे विजय पताकाको ग्रहण करनेके अभिलाषी मल्लके लिए हाथ है। हाथसे ही वह जय पताका ग्रहण करता है। वैसे ही आराधना पताका (ध्वजा) को ग्रहण करनेके इच्छुक आराधकका हाथ भाव नमस्कार है। भाव नमस्कार पूर्वक ही वह आराधनामें सफलता पाता है ॥७५७॥


अण्णाणी वि य गोवो आराधित्ता मदो णमोक्कारं ।
चंपाए सेट्ठिकुले जादो पत्तो य सामण्णं ॥७५८॥

अर्थ: सुभग नामका ग्वाला अज्ञानी था, उसे अर्हन्तके गुणोंका ज्ञान नहीं था। वह द्रव्यनमस्कारकी आराधना करके अर्थात् मुखसे णमोकार मन्त्रका जप करते हुए मरा और चम्पा नगरीमें एक श्रेष्ठीके वंशमें उत्पन्न हुआ। तथा मुनि पदको धारण कर मुक्त हुआ। इस प्रकार द्रव्यनमस्कारसे भी विपुल फलकी प्राप्ति होती है। तब भावनमस्कारका तो कहना ही क्या है। इस प्रकार भावनमस्कारका कथन समाप्त हुआ ॥७५८॥


णाणोवओगरहिदेण ण सक्को चित्तणिग्गहो काउं ।
णाणं अंकुसभूदं मत्तस्स हु चित्तहत्थिस्स ॥७५९॥

अर्थ: ज्ञानोपयोगसे रहित मनुष्य अपने चित्तका निग्रह नहीं कर सकता ।


विज्जा जहा पिसायं सुट्ठु पउत्ता करेदि पुरिसवसं ।
णाणं हिदयपिसायं सुट्ठु पउत्ता करेदि पुरिसवसं ॥७६०॥

अर्थ: जैसे सम्यक् रीतिसे साधी गई विद्या पिशाचको पुरुषके वशमें कर देती है । वैसे ही सम्यक् रूपसे आराधित ज्ञान हृदय रूपी पिशाचको वशमें करता है । अयोग्य काम करनेसे चित्त पिशाचके समान है । बार-बार प्रयुक्त सम्यग्ज्ञान चेतनाको शुभ अथवा शुद्ध परिणाममें प्रवृत्त करता है ॥७६०॥


उवसमइ किण्हसप्पो जह मंतेण विधिणा पउत्तेण ।
तह हिदयकिण्हसप्पो सुट्ठुवजुत्तेण णाणेण ॥७६१॥

अर्थ: जैसे विधिपूर्वक प्रयोग किये गये मंत्रसे कृष्ण सर्प शान्त हो जाता है । वैसे ही अच्छी तरहसे भावित ज्ञानसे हृदयरूपी कृष्ण सर्प शान्त हो जाता है । प्रथम गाथा (७५९) से ज्ञानको अशुभका निग्रह करनेमें हेतु कहा । दूसरी गाथासे ज्ञान भावनाके द्वारा चित्त अपने वशमें होता है यह कहा । इस गाथासे ज्ञान भावनाके द्वारा अशुभ परिणामोंकी शान्ति होती है यह कहा ॥७६१॥


आरण्णवो वि मत्तो हत्थी णियमिज्जदे वरत्ताए ।
जह तह णियमिज्जदि सो णाणवरत्ताए मणहत्थी ॥७६२॥

अर्थ: जैसे चमड़ेके कोड़ेसे जंगली भी मस्त हाथी वशमें किया जाता है । वैसे ही ज्ञान रूपी चर्मदण्डसे मन रूपी हाथी वशमें किया जाता है । प्राणियोंका अहितकारी तथा दुर्निवार होनेसे मनको हाथीकी तरह कहा है । ज्ञान अशुभ प्रवाहको रोकता है यह इस गाथासे कहा है ॥७६२॥


जह मक्कडओ खणमवि मज्झत्थो अत्थिदुं ण सक्केइ ।
तह खणमवि मज्झत्थो विसएहिं विणा ण होइ मणो ॥७६३॥

अर्थ: जैसे बन्दर एक क्षण भी निर्विकार होकर ठहर नहीं सकता, वैसे ही मन एक क्षण भी विषयोंके विना नहीं रहता । यहाँ विषय शब्दसे शब्द आदिके निमित्तसे होने वाले रागादिको लिया है क्योंकि वे विषयोंसे उत्पन्न होते हैं । इसलिए ऐसा अर्थ होता है कि रागद्वेषके विना मन मध्यस्थ नहीं होता है । अर्थात् ज्ञान भावनाके अभावमें रागद्वेषमें प्रवृत्ति करना ही मनका व्यापार है । इस गाथासे कहा है कि ज्ञान मनको मध्यस्थ करता है । निकटवर्ती प्रिय और अप्रिय विषयोंमें रागद्वेष करनेसे मन मध्यस्थ नहीं होता ॥७६३॥


तम्हा सो उड्डहणो मणमक्कडओ जिणोवएसेण ।
रामेदव्वो णियदं तो सो दोसं ण काहिदि से ॥७६४॥

अर्थ: इसलिये इधर-उधर कूदने वाले मनरूपी बन्दरको जिनागममें सदा लगाना चाहिए। जिनागममें लगे रहनेसे वह मनरूपी बन्दर उस ज्ञानाभ्यास करने वालेमें रागद्वेष उत्पन्न नहीं कर सकेगा ॥७६४॥


तम्हा णाणुवओगो खवयस्स विसेसदो सदा भणिदो ।
जह विंधणोवओगो चंदयवेज्झं करंतस्स ॥७६५॥

अर्थ: यतः ज्ञानाभ्यास करने पर मनरूपी बन्दर अशुभ परिणामरूप दोष उत्पन्न नहीं करता । इसलिये क्षपकके लिये सदा ज्ञानोपयोग विशेष रूप१से कहा है । जैसे चन्द्रक यंत्रका वेध करने वालेके लिये सदा बींधनेका अभ्यास विशेष रूपसे कहा है ॥७६५॥


णाणपदीओ पज्जलइ जस्स हियए विसुद्धलेस्सस्स ।
जिणदिट्ठमोक्खमग्गे पणासणभयं ण तस्सत्थि ॥७६६॥

अर्थ: जिस विशुद्ध लेश्या वालेके हृदयमें ज्ञानरूपी दीपक जलता है उसको जिन भगवान्के द्वारा कहे गये आगममें प्रवृत्त रहते हुए ‘मैं संसारकी भँवरमें गिरकर नष्ट होऊँगा’, ऐसा भय नहीं रहता ॥७६६॥


णाणुज्जोवो जोवो णाणुज्जोवस्स णत्थि पडिघादो ।
दीवेइ खेत्तमप्पं सूरो णाणं जगमसेसं ॥७६७॥

अर्थ: ज्ञानरूप प्रकाश ही यथार्थ प्रकाश है; क्योंकि ज्ञानरूपी प्रकाशमें रहनेवालेका पतन नहीं होता । सूर्य तो अल्पक्षेत्रको ही प्रकाशित करता है किन्तु ज्ञान समस्त जगत्को प्रकाशित करता है । आशय यह है समस्त वस्तुओंमें व्याप्त ज्ञानके समान अन्य प्रकाश नहीं है ॥७६७॥


णाणं पयासओ सोधओ तवो संजमो य गुत्तियरो ।
तिण्हंपि समाओगे मोक्खो जिणसासणे दिट्ठो ॥७६८॥

अर्थ: ज्ञान संसार, संसारके कारण, मोक्ष और मोक्षके कारणोंको प्रकाशित करता है । तप निर्जराका कारण है । संयम गुप्तिकारक है । इन तीनोंके मिलनेपर जिनागममें मोक्ष कहा है ॥७६८॥


णाणं करणविहूणं लिंगग्गहणं च दंसणविहूणं ।
संजमहीणो य तवो जो कुणदि णिरत्थयं कुणदि ॥७६९॥

अर्थ: आचरणहीन ज्ञान, श्रद्धानके बिना मुनि दीक्षाका ग्रहण और संयमके बिना तप जो करता है वह सब निरर्थक करता है ॥७६९॥


णाणुज्जोएण विणा जो इच्छदि मोक्खमग्गमुवगंतुं ।
गंतुं कडिल्लमिच्छदि अंधलओ अंधयारम्मि ॥७७०॥

अर्थ: ज्ञानरूप प्रकाशके बिना मोक्षमार्गको जो प्राप्त करना चाहता है, यहाँ चारित्र और तपको मोक्षमार्ग कहा है अतः जो ज्ञानके बिना चारित्र और तपको प्राप्त करना चाहता है वह अन्धा अन्धकारमें दुर्गपर जाना चाहता है । जैसे प्रकाशके अभावमें वृक्ष, तृण, झाड़ी आदिसे भरे प्रदेशमें जाना अति कठिन है वैसे ही जीवोंसे भरे प्रदेशमें हिंसा आदिका बचाव कठिन है ॥७७०॥


जइदा खंडसिलोगेण जमो मरणादु फेडिदो राया ।
पत्तो य सुसामण्णं किं पुण जिणउत्तसुत्तेण ॥७७१॥

अर्थ: यदि श्लोकके एक खण्डके पाठसे राजा यम मृत्युसे बचा और शोभनीय मुनिपदको प्राप्त हुआ तो जिनभगवान्के द्वारा प्रतिपादित सूत्रकी स्वाध्यायसे प्राप्त होनेवाले फलमें क्या आश्चर्य है। इस विषयमें हरिषेणकृत बृहत् कथाकोशमें यममुनि की कथा है। कहा भी है - जीवनके अर्थी अज्ञानी अन्धेके द्वारा कहे गये अनर्गलवचनको सुनकर राजाने हँसीमें उसे ग्रहण किया और वह उसकी आपत्ति दूर करनेमें निमित्त हुआ तो सर्वज्ञके वचनका अभ्यास किस इच्छित वस्तुको नहीं देता ? अर्थात् सब देता है ॥७७१॥


दढसुप्पो सूलहदो पंचणमोक्कारमेत्त सुदणाणे ।
उवजुत्तो कालगदो देवो जादो महड्ढओ ॥७७२॥

अर्थ: दृढसूर्प नामक चोरको सूली पर चढ़ाया गया तो वह पंच नमस्कार मन्त्र-मात्र श्रुतज्ञानमें उपयोग लगाकर मरा अर्थात् पंच नमस्कार मंत्र का पाठ करते हुए मरा और मरकर महान् ऋद्धिका धारी देव हुआ ॥७७२॥


ण य तम्मि देसयाले सव्वो बारसविधो सुदक्खंधो ।
सक्को अणुचिंतेदुं बलिणा वि समत्थचित्तेण ॥७७३॥

अर्थ: मरते समय बलवान भी सामर्थ्यसम्पन्न मनुष्य समस्त द्वादशांग श्रुत स्कन्धका अनुचिन्तन नहीं कर सकता । बहुत शास्त्रोंका ज्ञाता भी समस्त श्रुतका ध्यान मरते समय नहीं कर सकता । किन्तु किसी एक का ही ध्यान सम्भव है । कहा भी है - एक विषयमें चिन्ताके निरोध को ध्यान कहते हैं ॥७७३॥


एक्कम्मि वि जम्मि पदे संवेगं वीदरायमग्गम्मि ।
गच्छदि णरो अभिक्खं तं मरणंते ण मोत्तव्वं ॥७७४॥

अर्थ: अतः जिस एक भी पदमें मन लगानेसे मनुष्यमें रत्नत्रयके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है उस पदको बार-बार विचारना चाहिये और मरते समय भी नहीं छोड़ना चाहिये ॥७७४॥


परिहर छज्जीवणिकायवहं मणवयणकायजोगेहिं ।
जावज्जीवं कदकारिदाणुमोदेहिं उवजुत्तो ॥७७५॥

अर्थ: मन वचन काय और उनमें से प्रत्येकके कृत कारित और अनुमत भेदोंके साथ छह कायके जीवों की हिंसा जीवन पर्यन्त मत करो । क्योंकि सब जीवोंकी सब प्रकारकी हिंसाका त्याग अहिंसा महाव्रत है सभी भवोंमें इसका पालन करना आवश्यक है । इससे अहिंसाव्रतकी महत्ता सूचित की है । ‘छह जीव निकाय’ पदसे जीव निकायोंके सब जीवोंका ग्रहण किया है । मन वचन काय और कृत कारित, अनुमोदनासे हिंसाके भेदोंका ग्रहण किया है अर्थात् हिंसा नौ प्रकार से होती है, ‘यावज्जीवन’ पदसे मनुष्यका सम्पूर्ण जीवन काल ग्रहण किया है । ‘उपयुक्त’ पदसे समितियों में सावधान चित्त व्यक्तिका ग्रहण किया है । जो व्यक्ति सावद्य कार्यों के परिहारमें दत्त-चित्त है वही जीवन पर्यन्त छह काय के सब जीवोंकी मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदना से हिंसा नहीं करता ॥७७५॥


जह ते ण पियं दुक्खं तहेव तेसिंपि जाण जीवाणं ।
एवं णच्चा अप्पोवमिवो जीवेसु होदि सदा ॥७७६॥

अर्थ: जैसे तुझे दुःख प्रिय नहीं है वैसे ही उन जीवोंको भी दुःख प्रिय नहीं है । ऐसा जानकर अपनी ही तरह सदा जीवोंमें व्यवहार करो अर्थात् किसी को दुःख मत दो ॥७७६॥


तण्हाछुहादिपरिदाविदो वि जीवाण घादणं किच्चा ।
पडियारं कादुं जे मा तं चिंतेसु लभसु सदिं ॥७७७॥

अर्थ: भूख, प्यास, रोग, शीत अथवा आतपसे पीड़ित होने पर भी जीवोंका घात करके प्यास आदिका प्रतीकार करनेका विचार मत करो । मैं कपूरके चूर्णसे सुवासित तथा बर्फसे शीतल जलका पान करूँ ? अथवा अति सुगन्धित कमलकी रजसे व्याप्त गहरे तालाबमें घुसकर मदोन्मत्त हाथी की तरह डुबकियाँ लूँ । मस्तक, सिर और विशाल छाती पर यदि ओलोंकी वर्षा हो तो उत्तम हो । अथवा यदि कमल बालू और कोमल पल्लवों आदिकी शय्या मिले तो मैं जीवित रह सकूँ । रात दिन प्यास सताती है । सूर्यकी किरणोंके समूह को दूर करके पंखेकी शीतल वायु से मेरी सब थकान आप दूर करें । बर्फ गिरे । शीतल पवन बहे । सुगन्धित घीमें अंगार पर पके पुओं को खाऊँगा । अथवा सम्यक् रूपसे उबाले गये और शक्कर मिलाये तथा सुखकर उष्णता को लिये दूधको पीऊँ । खैरकी लकड़ीकी धक् धक् करती हुई आग जलाओ, मेरे अंग ठंडसे ठिठुर रहे हैं । इस प्रकारका प्रतिकार मनमें नहीं लाना चाहिये । यह उक्त कथनका आशय है । महान् असाता वेदनीय रूप वज्रपात होने पर उसका क्या प्रतीकार हो सकता है ? उसका उपशमन काल आने पर ही बाह्य द्रव्योंके द्वारा प्रतीकार संभव है. ऐसा मनमें विचार होना चाहिये ॥७७७॥


रदिअरदिहरिसभयउस्सुगत्तदीणत्तणादिजुत्तो वि ।
भोगपरिभोगहेदुं मा हु विचिंतेहि जीववहं ॥७७८॥

अर्थ: शब्द आदि विषयोंमें प्रीतिको रति कहते हैं । अप्रिय विषयोंके प्राप्त होनेपर उनसे विमुख होनेको अरति कहते हैं । हास्यकर्मके उदयके निमित्तसे जो भाव होता है उसे हर्ष कहते हैं । इन रति, अरति, हर्ष, भय, उत्सुकता, दीनता आदि भावोंसे युक्त होने पर भी अपने भोग अथवा उपभोगके लिये मनमें जीव हिंसाका विचार मत करो ॥७७८॥


महुकरिसमज्जियमहुं व संजमं थोवथोवसंगलियं ।
तेलोक्कसव्वसारं णो वा पूरेहि मा जहसु ॥७७९॥

अर्थ: मधु-मक्खियाँ जिस प्रकार थोड़ा-थोड़ा करके मधुका संचय करती हैं उसी प्रकार थोड़ा-थोड़ा करके संचित किया गया संयम तीनों लोकोंमें जो सातिशय स्थान मान ऐश्वर्य अथवा सुख है उस सबका कारण होनेसे सारभूत है । उसे यदि पूर्ण नहीं कर सकते तो उसका त्याग तो मत करो ॥७७९॥


दुक्खेण लभदि माणुस्सजादिमदि[?]दंसणचरित्तं ।
दुक्खज्जियसामण्णं मा जहसु तणं व अगणंतो ॥७८०॥

अर्थ: लाख प्रयत्न करनेपर भी जैसे चक्रके आरे तुम्बीके विना नहीं ठहरते और आरोंके विना नेमि नहीं ठहरती, वैसे ही अहिंसाके विना सब शील नहीं ठहरते । उसीकी रक्षाके लिए शील है जैसे धान्यकी रक्षाके लिए बाड़ होती है ॥७८६-७८७॥


तेलोक्कजीविदादो वरेहि एक्कदरयंत्ति देवेहिं ।
भणिदो को तेलोक्कं वरिज्ज संजीविदं मुच्चा ॥७८१॥

अर्थ: तीनों लोक और जीवनमेंसे एकको स्वीकार करो ? ऐसा देवोंके द्वारा कहे जानेपर कौन प्राणी अपना जीवन त्यागकर तीनों लोकोंको ग्रहण करेगा ? अतः इस प्रकार सब प्राणियोंके जीवनका मूल्य तीनों लोक है अतः जीवका घात करनेवालोंको तीनों लोकोंका घात करनेके समान दोष होता है ।


जं एवं तेलोक्कं णग्घदि सव्वस्स जीविदं तम्हा ।
जीविदघादो जीवस्स होदि तेलोक्कघादसमो ॥७८२॥

अर्थ: तीनों लोक और जीवनमेंसे एकको स्वीकार करो ? ऐसा देवोंके द्वारा कहे जानेपर कौन प्राणी अपना जीवन त्यागकर तीनों लोकोंको ग्रहण करेगा ? अतः इस प्रकार सब प्राणियोंके जीवनका मूल्य तीनों लोक है अतः जीवका घात करनेवालोंको तीनों लोकोंका घात करनेके समान दोष होता है । शङ्का - जीवितपना जीवको छोड़कर अन्यत्र नहीं रहता अतः ‘जीवस्स’ यह वचन व्यर्थ है ? समाधान - गाथामें आये जीवस्सका सम्बन्ध आगेके कथनसे है - जीवके घातकको तीनों लोकोंके घातके समान दोष होता है ॥७८१-७८२॥ ॥७८२॥


णत्थि अणुदो अप्पं आयासादो अणूणयं णत्थि ।
जह जह जाण महल्लं ण वयमहिंसासमं अत्थि ॥७८३॥

अर्थ: जैसे अणुसे छोटा कोई अन्य द्रव्य नहीं है और आकाशसे बड़ा कोई नहीं है वैसे ही अहिंसासे महान् कोई अन्य व्रत नहीं है ॥७८३॥


जह पव्वदेसु मेरू उच्चावो होइ सव्वलोयम्मि ।
तह जाणसु उच्चायं सीलेसु वदेसु य अहिंसा ॥७८४॥

अर्थ: जैसे सब लोकमें मेरु सब पर्वतोंसे ऊँचा है वैसे ही शीलों और व्रतोंमें अहिंसा सबसे ऊँची है ॥७८४॥


सव्वो हि जहायासे लोगो भूमीए सव्वदीउदधी ।
तह जाण अहिंसाए वदगुणसीलाणि तिट्ठंति ॥७८५॥

अर्थ: जैसे ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और मध्यलोकके भेदसे सब लोक आकाशके आधार हैं और सब द्वीप और समुद्र भूमिके आधार हैं वैसे ही व्रत गुण और शील अहिंसाके आधार रहते हैं ॥७८५॥


कुव्वंतस्स वि जत्तं तुंबेण विणा ण ठंति जह अरया ।
अरएहिं विणा य जहा णट्ठं णेमी दु चक्कस्स ॥७८६॥

अर्थ: लाख प्रयत्न करनेपर भी जैसे चक्केके आरे तुम्बीके विना नहीं ठहरते और आरोंके विना नेमि नहीं ठहरती, वैसे ही अहिंसाके विना सब शील नहीं ठहरते । उसीकी रक्षाके लिए शील है जैसे धान्यकी रक्षाके लिए बाड़ होती है ॥७८६-७८७॥ ॥७८६॥


तह जाण अहिंसाए विणा ण सीलाणि ठंति सव्वाणि ।
तिस्सेव रक्खणट्ठं सीलाणि वदीव सस्सस्स ॥७८७॥

अर्थ: लाख प्रयत्न करनेपर भी जैसे चक्केके आरे तुम्बीके विना नहीं ठहरते और आरोंके विना नेमि नहीं ठहरती, वैसे ही अहिंसाके विना सब शील नहीं ठहरते । उसीकी रक्षाके लिए शील है जैसे धान्यकी रक्षाके लिए बाड़ होती है ॥७८६-७८७॥ ॥७८७॥


सीलं वदं गुणो वा णाणं णिस्संगदा सुहच्चाओ ।
जीवे हिंसंतस्स हु सव्वे वि णिरत्थया होंति ॥७८८॥

अर्थ: जीवोंकी हिंसा करनेवालेके शील, व्रत, गुण, ज्ञान, निःसंगता और विषय सुखका त्याग ये सभी ही निरर्थक होते हैं ॥७८८॥


सव्वेसिमासमाणं हिदयं गब्भो व सव्वसत्थाणं ।
सव्वेसिं वदगुणाणं पिंडो सारो अहिंसा हु ॥७८९॥

अर्थ: सब आश्रमोंका हृदय, सब शास्त्रोंका गर्भ और सब व्रतों और गुणोंका पिण्डीभूत सार अहिंसा ही है ॥७८९॥


जम्हा असच्चवयणादिएहिं दुक्खं परस्स होदित्ति ।
तप्परिहारो तम्हा सव्वे वि गुणा अहिंसाए ॥७९०॥

अर्थ: यतः असत्य बोलनेसे, विना दी हुई वस्तुके ग्रहणसे, मैथुनसे, और परिग्रहसे दूसरोंको दुःख होता है । इसलिए उन सबका त्याग किया जाता है । अतः वे सब सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह अहिंसाके ही गुण हैं ॥७९०॥


गोबंभणित्थिवधमेत्तणियत्ती जदि हवे परमधम्मो ।
परमो धम्मो किह सो ण होइ जा सव्वभूददया ॥७९१॥

अर्थ: यदि गौ, ब्राह्मण और स्त्रियोंके वधमात्रसे निवृत्ति उत्कृष्ट धर्म है तो सब प्राणियोंपर दया परमधर्म क्यों नहीं है ? ॥७९१॥


सव्वे वि य संबंधा पत्ता सव्वेण सव्वजीवेहिं ।
तो मारंतो जीवो संबंधी चेव मारेइ ॥७९२॥

अर्थ: सब जीवोंके साथ सब जीवोंके सब प्रकारके सम्बन्ध पूर्वभवोंमें रहे हैं । अतः उनको मारनेवाला अपने सम्बन्धीको ही मारता है और सम्बन्धीको मारना लोकमें अत्यन्त निन्दित माना जाता है ॥७९२॥


जीववहो अप्पवहो जीवदया होइ अप्पणो हु दया ।
विसकंटओव्व हिंसा परिहरियव्वा तदो होदि ॥७९३॥

अर्थ: जीवोंका घात अपना ही घात है । और जीवोंपर की गई दया अपनेपर ही की गई दया है । जो एक बार एक जीवका घात करता है वह स्वयं अनेक जन्मोंमें मारा जाता है । और जो एक जीवपर दया करता है वह स्वयं अनेक जन्मोंमें दूसरे जीवोंके द्वारा रक्षा किया जाता है । इसलिए दुःखसे डरनेवाले मनुष्यको विषैले काँटेकी तरह हिंसासे बचना चाहिए ॥७९३॥


मारणसीलो कुणदि हु जीवाणं रक्खसुव्व उव्वेगं ।
संबंधिणो वि ण य विस्संभं मारिंतए जंति ॥७९४॥

अर्थ: जो दूसरोंका घात करनेमें तत्पर होता है उससे प्राणी वैसे ही डरते हैं जैसे राक्षससे । उस हिंसकका विश्वास सम्बन्धीजन भी नहीं करते ॥७९४॥


वधबंधरोधधणहरणजादणाओ य वेरमिह चेव ।
णिव्विसयमभोजित्तं जीवे मारंतगो लभदि ॥७९५॥

अर्थ: मारनेवाला इसी जन्ममें वध, बन्ध, मारण, धनहरण, अनेक यातनाएँ, वैर, देश निष्कासन तथा क्रोधमें आकर ब्राह्मण आदिकी हत्या करनेपर जातिबहिष्कारका दण्ड पाता है ॥७९५॥


रुट्ठो परं वधित्ता सयंपि कालेण मरइ जंतेण ।
हदघादयाण णत्थि विसेसो मुत्तूण तं कालं ॥७९६॥

अर्थ: क्रोधी मनुष्य दूसरेको मारकर समय आनेपर स्वयं भी मर जाता है। अतः मरने- वाले और मारनेवालेमें कालके सिवाय अन्य भेद नहीं है। पहले वह जिसे मारता है वह मरता है और पीछे स्वयं भी मरता है ॥७९६॥


अप्पाउगरोगिदयाविरूवदाविगलदा अबलदा य ।
दुम्मेहवण्णरसगंधदा य से होइ परलोए ॥७९७॥

अर्थ: हिंसक परलोक अर्थात् जन्मान्तरमें अल्पायु, रोगी, कुरूप, विकलेन्द्रिय, दुर्बल, मूर्ख, बुरेरूप, बुरेरस और दुर्गन्धयुक्त होता है ॥७९७॥


मारेदि एगमवि जो जीवं सो बहुसु जम्मकोडीसु ।
अवसो मारिज्जंतो मरदि विधाणेहिं बहुएहिं ॥७९८॥

अर्थ: जो एक भी जीवको मारता है वह करोड़ों जन्मोंमें परवश होकर अनेक प्रकारसे मारा जाकर मरता है ॥७९८॥


जावइयाइं दुक्खाइं होंति लोयम्मि चदुगदिगदाइं ।
सव्वाणि ताणि हिंसाफलाणि जीवस्स जाणाहि ॥७९९॥

अर्थ: इस लोकमें चारों गतियोंमें जितने दुःख होते हैं वे सब उस जीवको हिंसाके फल जानो ॥७९९॥


हिंसादो अविरमणं वहपरिणामो य होइ हिंसा हु ।
तम्हा पमत्तजोगो पाणव्ववरोवओ णिच्चं ॥८००॥

अर्थ: हिंसासे विरत न होना हिंसा है। अर्थात् ‘मैं प्राणीके प्राणोंका घात नहीं करूँगा’ ऐसा संकल्प न करना हिंसा है। अथवा ‘मैं मारूं’ ऐसा परिणाम हिंसा है। इसलिए प्रमादीपना नित्य प्राणोंका घातक है।


पादोसिय अधिकरणिय कायिय परिदावणादिवादाए ।
एदे पंचपओगा किरियाओ होंति हिंसाओ ॥८०१॥

अर्थ: ‘पादोसिय’ शब्दसे इष्ट स्त्री, धन हरने आदिके निमित्तसे होनेवाला कोप प्रद्वेष कहलाता है। प्रद्वेष ही प्राद्वेषिक है जैसे विनय ही वैनयिक है। हिंसाके उपकरणको अधिकरण कहते हैं। हिंसाके उपकरणोंका लेन-देन अधिकरणिकी क्रिया है। दुष्टतापूर्वक हलन-चलन कायिकी क्रिया है। परितापका अर्थ दुःख है। दुःखकी उत्पत्तिमें निमित्त क्रिया पारितापिकी है। आयु इन्द्रिय और बल प्राणोंका वियोग करनेवाली क्रिया प्राणातिपातिकी है। पाँच प्रकारकी प्रयोग हिंसासे सम्बन्ध रखनेवाली क्रियाएँ हैं ॥८०१॥


तिहिं चदुहिं पंचहिं वा कमेण हिंसा समप्पदि हु ताहिं ।
बंधो वि सिया सरिसो जइ सरिसो काइयपदोसो ॥८०२॥

अर्थ: मन वचन काय इन तीनसे, क्रोध मान माया लोभ इन चारसे और स्पर्शन आदि पाँच इन्द्रियोंसे क्रमसे हिंसा होती है। मनसे द्वेष करना, वचनसे मैं द्वेषयुक्त हूँ ऐसा कहना वचनद्वेष है। शरीरसे मुखको विकृत आदि करना कायद्वेष है। मनसे हिंसाके उपकरण स्वीकार करना, वचनसे मैं शस्त्र ग्रहण करता हूँ ऐसा कहना, कायसे हाथ आदि भांजना ये अधिकरणके तीन भेद हैं। मनसे विचारना ‘मैं मारनेके लिए उठूँ’ वचनसे कहना मैं मारनेके लिए उठता हूँ। और कायसे हलन-चलन ये तीन कायिकी क्रिया है। मनमें चिन्ता करना ‘मैं दुःख दूँ’ यह मानसिक पारिताधिकी क्रिया है। आपको दुःख दूँ ऐसा कहना वाचनिक पारितापिकी क्रिया है। हाथ आदिके द्वारा ताड़न करनेसे दुःख देना कायिक पारितापिकी क्रिया है। मैं प्राणोंका वियोग करूँ ऐसा चिन्तन करना मानसिक प्राणातिपात है। मैं घात करता हूँ ऐसा कहना वाचनिक प्राणातिपात है। शरीरसे व्यापार करना कायिक प्राणातिपात है। यह किसीमें क्रोधके निमित्तसे, किसीमें मानके निमित्तसे, किसीमें मायाके निमित्तसे और किसीमें लोभके निमित्तसे होता है। क्रोध आदिके वशमें होकर शस्त्र ग्रहण करना क्रोधादि निमित्तसे होने वाला काय परिस्पन्द है। क्रोध आदिके निमित्तसे दूसरोंको दुःख देना अथवा प्राणोंका घात करना क्रोध आदिसे होता है। अथवा स्पर्शन आदि इन्द्रियोंके निमित्तसे प्रद्वेष होता है। इन्द्रिय सुखके लिए फल, पत्र, फूल आदि तोड़नेके लिए उसके साधन ग्रहण किये जाते हैं। इन्द्रिय सुखके लिए ही विषयोंको स्वीकार किया जाता है, शरीरसे हलन-चलन किया जाता है, गाढ़ आलिंगन तथा नख द्वारा नोचना आदिसे दूसरोंको संताप दिया जाता है। अथवा मांस आदिके लिये प्राणीके प्राणोंका घात किया जाता है। इस प्रकार प्राद्वेषिकी क्रिया, आधिकरिणिकी क्रिया, कायिकी क्रिया, पारितापिकी क्रिया और प्राणातिपातिकी क्रिया मन वचन काय, क्रोध मान माया लोभ और स्पर्शन रसन घ्राण, चक्षु श्रोत्रसे होती हैं। शङ्का - इन क्रियाओंसे होने वाला कर्मबन्ध समान होता है या हीनाधिक होता है? समाधान - यदि कायिकी क्रिया और प्रद्वेष समान होता है तो समान कर्मबन्ध होता है। क्योंकि कारणमें समानता होनेसे कार्य बन्धमें भी समानता होती है, अन्यथा समानता नहीं होती। तीव्र मध्य या मन्दरूप परिणामोंसे तीव्र मध्य या मन्द बन्ध होता है ॥८०२॥


बीस पल तिण्णि मोदय पण्णरह पला तहेव चत्तारि ।
बारह पलिया पंच दु तेसिं पि समो हवे बंधो ॥८०३॥


जीवगदमजीवगदं समासदो होदि दुविहमधिकरणं ।
अट्ठुत्तरसयभेदं पढमं विदियं चदुब्भेदं ॥८०४॥

अर्थ: अधिकरणके दो भेद हैं - जीवगत और अजीवगत । जीवगतका अर्थ है जीवपर्याय । केवल जीवद्रव्य हिंसामें सहायक नहीं होता किन्तु जीवकी पर्याय होती है । हिंसा आदिसे युक्त जीवका परिणाम हिंसाका अभ्यन्तर कारण होता है । इसी तरह अजीवगतसे अजीवपर्याय लेना चाहिए; क्योंकि अजीवद्रव्य तो सदा रहनेसे सदा कार्यकारी रहता है अतः कार्य सदा होता रहेगा । किन्तु पर्याय तो अपने कारणोंके होने पर ही होती है अतः कदाचित् होती है । जब सहकारी कारण होते हैं तभी अपना कार्य करते हैं, अन्य कालमें नहीं करते । अतः कार्य सदा न होकर कदाचित् होता है । इस तरह संक्षेपसे अधिकरणके दो भेद हैं । उनमेंसे प्रथम जीवाधिकरणके एक सौ आठ भेद हैं और दूसरे अजीवाधिकरणके चार भेद हैं ॥८०४॥


संरंभसमारंभारंभं जोगेहिं तह कसाएहिं ।
कदकारिदाणुमोदेहिं तहा गुणिदा पढमभेदा ॥८०५॥

अर्थ: प्राणोंके घात आदिमें प्रमाद युक्त व्यक्ति जो प्रयत्न करता है वह संरंभ है । साध्य हिंसा आदि क्रियाके साधनोंको एकत्र करना समारंभ है । हिंसा आदिके उपकरणोंका संचय हो जाने पर हिंसाका आरम्भ करना आरम्भ है । योग शब्दसे मन वचन और कायका व्यापार लिया गया है । इन संरंभ, समारम्भ, आरम्भको, योग, कषाय और कृत कारित अनुमोदनासे गुणा करने पर जीवाधिकरणके भेद होते हैं । चेतन जीवका व्यापार प्रयत्नपूर्वक होता है इसलिए प्रथम संरम्भ कहा है । प्रयत्न करनेपर भी उपायोंके बिना कार्यसिद्धि नहीं होती, अतः संरम्भके पश्चात् समारम्भ कहा है । साधनोंके एकत्र होनेपर कार्य प्रारम्भ होता है । अतः समारम्भके पश्चात् आरम्भको रखा है । जीवके द्वारा स्वतन्त्रता पूर्वक जो किया जाता है वह कृत है । जो दूसरेके द्वारा सिद्ध होता है वह कारित है । न स्वयं करता है न कराता है किन्तु जो करता है उसे स्वीकार करता है वह अनुमत है । इनमेंसे संरम्भके भेद कहते हैं - क्रोधके निमित्तसे स्वतन्त्रता पूर्वक हिंसा विषयक प्रयत्न करना क्रोध कृत काय संरम्भ है । इसी तरह मान कृत काय संरम्भ, मायाकृत काय संरम्भ, लोभकृत काय संरम्भ, क्रोध कारित काय संरम्भ, मान कारित काय संरम्भ, माया कारित काय संरम्भ, लोभ कारित काय संरम्भ । क्रोधानुमत काय संरम्भ, मानानुमत काय संरम्भ, मायानुमत काय संरभ, लोभानुमत काय संरम्भ इस तरह बारह प्रकारका संरम्भ है । क्रोधकृत काय समारम्भ, मानकृत काय समारम्भ, मायाकृत काय समारम्भ, लोभ कृत काय समारम्भ । क्रोध कारित काय समारम्भ, मान कारित काय समारम्भ, माया कारित काय समारम्भ, लोभ कारित काय समारम्भ । क्रोधानुमत काय समारम्भ, मानानुमत काय समारम्भ, मायानुमत काय समारम्भ, लोभानुमत काय समारम्भ । इस तरह बारह प्रकारका समारम्भ है । क्रोधकृत काय आरम्भ, मानकृत काय आरम्भ, मायाकृत काय आरम्भ, लोभकृत काय आरम्भ, क्रोध कारित काय आरम्भ, मान कारित काय आरम्भ, माया कारित काय आरम्भ, लोभ कारित काय आरम्भ, क्रोधानुमत काय आरम्भ, मानानुमत काय आरम्भ, मायानुमत काय आरम्भ, लोभानुमत काय आरम्भ । इस प्रकार आरम्भ भी बारह प्रकारका है । ये मिलकर कायारम्भके छत्तीस भेद होते हैं । छत्तीस ही भेद वचन सम्बन्धी आरम्भके और छत्तीस ही भेद मन सम्बन्धी आरम्भके होते हैं । ये सब मिलकर जीवाधिकरण सम्बन्धी आस्रवके एक सौ आठ भेद होते हैं ॥८०५॥


संरंभो संकप्पो परिदावकदो हवे समारंभो ।
आरंभो उद्दवओ सव्वणयाणं विसुद्धाणं ॥८०६॥

अर्थ: संकल्पको संरम्भ कहते हैं । संताप देनेको समारम्भ कहते हैं और आरम्भ सब विशुद्ध व्रतोंका घातक है ॥८०६॥


णिक्खेवो णिव्वत्ति तहा य संजोयणा णिसग्गो य ।
कमसो चदु दुग दुग तिय भेदा होंति हु विदियस्स ॥८०७॥

अर्थ: अजीवाधिकरणके चार भेद हैं - निक्षेप, निर्वतना, संयोजना और निसर्ग। क्रमानुसार निक्षेपके चार भेद हैं। निर्वर्तनाके दो भेद हैं। संयोजनाके दो भेद है और निसर्गके तीन भेद हैं ॥८०७॥


सहसाणाभोगिय दुप्पमज्जिद अपच्चवेक्खणिक्खेवो ।
देहो य दुप्पउत्तो तहोवकरणं च णिव्वत्ति ॥८०८॥

अर्थ: निक्षेपके चार भेद हैं - सहसानिक्षेपाधिकरण, अनाभोगनिक्षेपाधिकरण, दुःप्रमृष्टनिक्षेपाधिकरण और अप्रत्यवेक्षित निक्षेपाधिकरण। रखनेको निक्षेप कहते हैं। उपकरण, पुस्तक आदि, शरीर अथवा शरीरके मल भयसे अथवा किसी अन्य कारणान्तरसे सहसा शीघ्र रखनेसे त्यागनेसे छहकायके जीवोंकी बाधाके आधार हो जाते है। यह सहसानिक्षेपाधिकरण है। जल्दी नहीं होनेपर भी ‘पृथ्वी आदिपर जन्तु है या नहीं’ यह देखे बिना ही उपकरण आदिको रखना अनाभोगनिक्षेपाधिकरण है। उपकरण आदिको असावधानतासे या दुष्टतासे साफ करके रखना अथवा जिस स्थानपर उन्हें रखना है उस स्थानकी दुष्टतासे सफाई करना, जिससे जीवोंको कष्ट पहुंचे, दुष्प्रमृष्ट निक्षेपाधिकरण है। स्थानकी सफाई करनेके पश्चात् वहाँ जीव है या नहीं यह देखे बिना उपकरणादि रखना अप्रत्यवेक्षित निक्षेपाधिकरण है। दुष्प्रयुक्त शरीर - शरीरकी असावधानतापूर्वक प्रवृत्ति हिंसाका कारण होती है उसे निर्वर्तनाधिकरण कहते हैं। छिद्रवाले उपकरण जो जीवोंको बाधा पहुँचाते हैं उनकी निर्वर्तना - रचना करना भी निर्वर्तनाधिकरण है । जैसे कांजी आदि रखनेके ऐसे सछिद्रपात्र बनाना जिसमें प्रविष्ट जीव मर जाते हैं ।


संजोयणमुवकरणाणं च तहा पाणभोयणाणं च ।
दुट्ठणिसिट्ठा मणवचिकाया भेदा णिसग्गस्स ॥८०९॥

अर्थ: पिच्छी आदि उपकरणोंको परस्परमें मिलाना । जैसे शीतस्पर्शवाली पुस्तक अथवा कमंडलु आदिको धूपसे तप्त पीछीसे साफ करना उपकरण संयोजना है । एक जलमें दूसरा जल मिलाना, एक भोजनमें दूसरा भोजन मिलाना अथवा भोजनमें पेय मिलाना आदि भक्तपान संयोजना है । यहाँ इतना विशेष जानना कि जिस पेय या भोजनमें सम्मूर्च्छन जीव होते हैं उसे ही हिंसाका अधिकरण स्वीकार किया है, सबको नहीं । दुष्टतापूर्वक मन वचन कायकी प्रवृत्तिको निसर्गाधिकरण कहते हैं ॥८०९॥


जं जीवणिकायवहेण विणा इंदियकयं सुहं णत्थि ।
तम्हि सुहे णिस्संगो तम्हा सो रक्खदि अहिंसा ॥८१०॥

अर्थ: यतः छहकायके जीवोंकी हिंसाके बिना इन्द्रियजन्य सुख नहीं होता । विचित्र प्रकारके स्त्री, वस्त्र, गन्ध, माला आदिका सेवन जीवोंको पीड़ा करनेवाला होता है क्योंकि बहुत आरम्भसे उसकी प्राप्ति होती है । अतः जो इन्द्रियजन्य सुखमें आसक्त नहीं है वही अहिंसा की रक्षा करता है । जो इन्द्रिय सुखका अभिलाषी है वह नहीं रक्षा करता । अतः आचार्य कहते हैं कि इन्द्रियसुखका आदर मत करो ॥८१०॥


जीवो कसायबहुलो संतो जीवाण घायणं कुणइ ।
सो जीववहं परिहरइ सया जो णिज्जियकसाओ ॥८११॥

अर्थ: जो जीव कषायकी अधिकता रखता है वह जीवोंका घात करता है । और जो कषायोंको जीत लेता है वह सदा जीवोंकी हिंसासे दूर रहता है । अतः प्रमाद हिंसाका कारण है । अहिंसाव्रतके अभिलाषीको प्रमादको त्यागना चाहिए ॥८११॥


आदाणे णिक्खेवे वोसरणे ठाणगमणसयणेसु ।
सव्वत्थ अप्पमत्तो दयावरो होइ हु अहिंसो ॥८१२॥

अर्थ: उपकरणोंको ग्रहण करनेमें, रखनेमें, उठने बैठने, चलने और शयनमें जो दयालु सर्वत्र यत्नाचारपूर्वक प्रवृत्ति करता है वह अहिंसक होता है ॥८१२॥


काएसु णिरारंभे फासुगभोजिम्मि णाणरइयम्मि ।
मणवयणकायगुत्तिम्मि होइ सयला अहिंसा हु ॥८१३॥

अर्थ: गा० जो आरम्भका त्यागी है, प्रासुक भोजन करता है, ज्ञानभावनामें मनको लगाता है और तीन गुप्तियोंका धारी है वही सम्पूर्ण अहिंसाका पालक है यह उक्त गाथासूत्रका अर्थ है ॥८१३॥


आरंभे जीववहो अप्पासुगसेवणे य अणुमोदो ।
आरंभादीसु मणो णाणरदीए विणा चरइ ॥८१४॥

अर्थ: पृथिवी आदिके विषयमें जो खोदना आदि व्यापार किया जाता है उसे आरम्भ कहते हैं । उसके करने पर पृथिवी आदिमें रहने वाले जीवोंका घात होता है । उद्गम आदि दोषोंसे युक्त आहार ग्रहण करने पर जीव समूहके वधकी अनुमोदना होती है, ज्ञानमें लीनता न होने पर आरम्भ और कषायमें मनकी प्रवृत्ति होती है ॥८१४॥


तम्हा इहपरलोए दुक्खाणि सदा अणिच्छमाणेण ।
उवओगो कायव्वो जीवदयाए सदा मुणिणो ॥८१५॥

अर्थ: अतः इस लोक और परलोकमें दुःखको नहीं चाहने वाले मुनिजनोंको सदा जीव दयामें उपयोग लगाना चाहिए और उसके लिए आरम्भ त्यागना चाहिए, प्रासुक भोजन करना चाहिए और ज्ञानमें मन लगाना चाहिए। आचार्य क्षपकको यह उपदेश करते हैं ॥८१५॥


पाणो वि पाडिहेरं पत्तो छूढो वि सुंसुमारहदे ।
एगेण एक्कदिवसक्कदेण हिंसावदगुणेण ॥८१६॥

अर्थ: यमपाल चण्डाल भी एक चतुर्दशीके दिन किसीको फाँसी न देनेके एक अहिंसाव्रतके गुणसे मगरमच्छोंसे भरे तालाबमें फेंक दिए जाने पर प्रातिहार्यको प्राप्त हुआ - देवोंने उसकी पूजा की ॥८१६॥


परिहर असंतवयणं सव्वं पि चदुव्विधं पयत्तेण ।
धत्तं पि संजमिंतो भासादोसेण लिप्पदि हु ॥८१७॥

अर्थ: असत् अर्थात् अशोभन वचन मत बोलो। जो वचन कर्मबन्धमें निमित्त होता है उसे अशोभन कहते हैं। कहा है - असत् वचन बोलना असत्य है।


पढमं असंतवयणं संभूदत्थस्स होदि पडिसेहो ।
णत्थि णरस्स अकाले मच्चुत्ति जधेवमादीयं ॥८१८॥

अर्थ: चार भेदोंमें सद्भूत अर्थका निषेध करना प्रथम असत्य वचन है । जैसे मनुष्यकी अकालमें मृत्यु नहीं होती इत्यादि वचन । आयुके स्थिति कालको काल कहते हैं । उस कालसे अन्य कालको अकाल कहते हैं । उसमें मरण नहीं होता । ऐसा कहना सद्भूतका निषेध रूप असत्य वचन है ।


अहवा सयबुद्धीए पडिसेधे खेत्तकालभावेहिं ।
अविचारिय णत्थि इह घडोत्ति तह एवमादीयं ॥८१९॥

अर्थ: अथवा क्षेत्रकालभावसे अभावका विचार न करके - घट यहाँ नहीं है, इस समय नहीं है, या सफेद अथवा कृष्णरूप नहीं है, ऐसा न विचारकर अपनी बुद्धिसे घटका सर्वथा अभाव कहना असत्य वचन है ॥८१९॥


जं असभूदुब्भावणमेदं बिदियं असंतवयणं तु ।
अत्थि सुराणमकाले मच्चुत्ति जहेवमादीयं ॥८२०॥

अर्थ: जो नहीं है उसे ‘है’ कहना दूसरा असत्यवचन है । जैसे देवोंके अकालमें मरण होता है ऐसा कहना । किन्तु देवोंमें अकालमरण नहीं होता । अतः यह असत्का उद्भावन करनेसे असत्यवचन है ॥८२०॥


अहवा जं उब्भावेदि असंतं खेत्तकालभावेहिं ।
अविचारिय अत्थि इह घडोत्ति जह एवमादीयं ॥८२१॥

अर्थ: अथवा जो वचन क्षेत्र काल भावकी अपेक्षा असत् घटका विचार न करके ‘घट है’ ऐसा कहता है वह असत्यवचन है ॥८२१॥


तदियं असंतवयणं संतं जं कुणदि अण्णजादीगं ।
अविचारित्ता गोणं अस्सोत्ति जहेवमादीयं ॥८२२॥

अर्थ: एक जातिकी वस्तुको अन्य जातिकी कहना तीसरा असत्य वचन है । जैसे बिना विचारे बैलको घोड़ा कहना ॥८२२॥


जं वा गरहिदवयणं जं वा सावज्जसंजुदं वयणं ।
जं वा अप्पियवयणं असच्चवयणं चउत्थं च ॥८२३॥

अर्थ: जो गर्हित वचन है, सावद्ययुक्त वचन है, अप्रिय वचन है वह चतुर्थ असत्य वचन है ॥८२३॥


कक्कस्सवयणं णिट्ठुरवयणं पेसुण्णहासवयणं च ।
जं किंचि विप्पलावं गरहिदवयणं समासेण ॥८२४॥

अर्थ: कर्कश वचन अर्थात् घमण्डयुक्त वचन, निष्ठुर वचन, दूसरेके दोषोंका सूचन करनेवाले वचन, हास्यवचन और जो कुछ भी बकवाद करना, ये सब संक्षेपमें गर्हित वचन हैं ॥८२४॥


जत्तो पाणवधादी दोसा जायंति सावज्जवयणं च ।
अविचारित्ता थेणं थेणत्ति जहेवमादीयं ॥८२५॥

अर्थ: जिस वचनसे प्राणोंका घात आदि दोष उत्पन्न होते हैं वह सावद्यवचन है। जैसे पृथ्वी खोदो। नांदका पानी भैंसने पी लिया उसे पानीसे भरो। फूल चुनो आदि। अथवा ऐसा कहनेमें दोष है या नहीं, यह विचार न करके चोरको चोर कहना सावद्य वचन है ॥८२५॥

गाथा ८२६ से ११५७

परुसं कडुयं वयणं वेरं कलहं च जं भयं कुणइ ।
उत्तासणं च हीलणमप्पियवयणं समासेण ॥८२६॥

अर्थ: कठोर वचन, कटुक वचन, जिस वचनसे वैर, कलह और भय पैदा हो, अति त्रास देनेवाले वचन, तिरस्कार सूचक वचन ये संक्षेपमें अप्रियवचन हैं ॥८२६॥


हासभयलोहकोहप्पदोसादीहिं तु मे पयत्तेण ।
एवं असंतवयणं परिहरिदव्वं विसेसेण ॥८२७॥

अर्थ: हास्य, भय, लोभ, क्रोध और द्वेष आदि कारणोंसे बोले जानेवाले असत्य वचनोंको हे क्षपक, तुम्हें प्रयत्नपूर्वक विशेष रूपसे नहीं बोलना चाहिए ॥८२७॥


तव्विवरीदं सच्चं कज्जे काले मिदं सविसए य ।
भत्तादिकहारहियं भणाहि तं चेव य सुणाहि ॥८२८॥

अर्थ: हे क्षपक, ज्ञान चारित्र आदिकी शिक्षारूप कार्यमें, असंयमका त्याग कराने या दूसरेको सन्मार्गमें स्थापित करनेके कार्यमें, आवश्यक आदिके कालसे भिन्नकालमें, और ज्ञानके विषयमें असत्यवचनसे विपरीत सत्यवचन बोलो । तथा भक्तकथा, स्त्रीकथा, चोरकथा और राजकथासे रहित वचन बोलो - इन कथाओंकी चर्चा मत करो । तथा इसी प्रकारके सत्य वचनोंको सुनो । अमुक-वक्ता अयोग्य बात नहीं बोलता अतः यह सत्यव्रतका पालक है ऐसी आशा मत करो । दूसरेके द्वारा कहे असत्यवचनको जो सुनता है उसका मन बुरा होता है और मनके बुरे होनेसे महान् कर्मबन्ध होता है ॥८२८॥


[?]लचंदणससिमुत्ताचंदमणी तह णरस्स णिव्वाणं ।
ण करंति कुणइ जह अत्थज्जुयं हिदमधुरमिदवयणं ॥८२९॥

अर्थ: अर्थसे भरे हितकारी परिमित मधुर वचन इस जीवको जैसा सुख देते हैं वैसा सुख जल, चन्दन, चन्द्रमा, मोती और चन्द्रकान्तमणि भी नहीं देते ॥८२९॥


अण्णस्स अप्पणो वा वि धम्मिए विद्दवंतए कज्जे ।
जं पि अपुच्छिज्जंतो अण्णेहिं य पुच्छिओ जंप ॥८३०॥

अर्थ: अपना या दूसरोंका धार्मिक कार्य नष्ट होता हो तो विना पूछे भी बोलना चाहिए । किन्तु यदि कार्य नष्ट न होता हो तो पूछनेपर ही बोलो, विना उनके द्वारा पूछे जानेपर मत बोलो ॥८३०॥


सच्चं वदंति रिसओ रिसीहिं विहिदाउ सव्व विज्जाओ ।
मिच्छस्स वि सिज्झंति य विज्जाओ सच्चवादिस्स ॥८३१॥

अर्थ: ऋषिगण सत्य बोलते है । ऋषियोंने ही सब विद्याओंका विधान किया है । सत्यवादी यदि म्लेच्छ भी हो तो उसे विद्याएँ सिद्ध होती हैं ॥८३१॥


ण डहदि अग्गी सच्चेण णरं जलं च तं ण बुड्डेइ ।
सच्चबलियं खु पुरिसं ण वहदि तिक्खा गिरिणदी वि ॥८३२॥

अर्थ: सत्यवादी मनुष्यको आग नहीं जलाती । पानी उसे नहीं डुबाता । जिसके पास सत्यका बल है उसे तीव्र वेगवाली नदी भी नहीं बहाती ॥८३२॥


सच्चेण देवदाओ णवंति पुरिसस्स ठंति य वसम्मि ।
सच्चेण य गहगहिदं मोएइ करेंति रक्खं च ॥८३३॥

अर्थ: सत्यसे देवता नमस्कार करते हैं । सत्यसे देवता पुरुषके वशमें होते हैं । सत्यसे पिशाच पकड़ा हुआ मनुष्य भी छूट जाता है और उसकी रक्षा देव करते हैं ॥८३३॥


माया व होइ विस्ससणिज्जो पुज्जो गुरुव्व लोगस्स ।
पुरिसो हु सच्चवाई होदि हु सणियल्लओ व पिओ ॥८३४॥

अर्थ: सत्यवादी माताके समान विश्वासयोग्य, गुरुके समान पूज्य, और बन्धुके समान लोकप्रिय होता है ॥८३४॥


सच्चं अवगददोसं वुत्तूण जणस्स मज्झयारम्मि ।
पीदिं पावदि परमं जसं च जगविस्सुदं लहइ ॥८३५॥

अर्थ: जनसमुदायके बीच में दोषरहित सत्यवचन बोलनेसे मनुष्य जनताका प्रेम तथा जगत्में प्रसिद्ध उत्कृष्ट यश पाता है ॥८३५॥


सच्चम्मि तवो सच्चम्मि संजमो तह वसे सया वि गुणा ।
सच्चं णिबंधणं हि य गुणाणमुदधीव मच्छाणं ॥८३६॥

अर्थ: तप, संयम तथा अन्यगुण सत्यके आधार हैं। जैसे समुद्र मगरमच्छोंका कारण है उसमें मगरमच्छ पैदा होते और रहते हैं वैसे ही सत्य गुणोंका कारण है ॥८३६॥


सच्चेण जगे होदि पमाणं अण्णो गुणो जदि वि से णत्थि ।
अदिसंजदो य मोसेण होदि पुरिसेसु तणलहुओ ॥८३७॥

अर्थ: यदि मनुष्यमें अन्य गुण न हों तब भी वह एक सत्यके कारण जगमें प्रमाण माना जाता है। अति संयमी भी मनुष्य यदि असत्य बोलता है तो सज्जनोंके मध्यमें तृणसे तुच्छ होता है ॥८३७॥


होदु सिहंडी व जडी मुंडी वा णग्गओ व चीरधरो ।
जदि भणदि अलियवयणं विलंबणा तस्स सा सव्वा ॥८३८॥

अर्थ: भले ही मनुष्य शिखाधारी हो, जटाधारी हो, सिर मुड़ाए हो, नंगा रहता हो या चीवर धारण किये हो, यदि वह झूठ बोलता है तो यह सब उसकी विडम्बनामात्र है ॥८३८॥


जह परमण्णस्स विसं विणासयं जह व जोव्वणस्स जरा ।
तह जाण अहिंसादी गुणाण य विणासयमसच्चं ॥८३९॥

अर्थ: जैसे विष उत्तमोत्तम भोजनका विनाशक है, बुढ़ापा यौवनका विनाशक है वैसे ही असत्य वचन अहिंसा आदि गुणोंका विनाशक है ॥८३९॥


मादाए वि वेसो पुरिसो अलिएण होइ एक्केण ।
किं पुण अवसेसाणं ण होइ अलिएण सत्तु व्व ॥८४०॥

अर्थ: एक असत्य वचनसे मनुष्य माताका भी विश्वास-भाजन नहीं रहता । तब असत्य बोलनेसे शेषजनोंको वह शत्रुके समान क्यों नहीं प्रतीत होगा ॥८४०॥


अलियं स किं पि भणियं घादं कुणदि बहुगाण सच्चाणं ।
अदिसंकिदो य सयमवि होदि अलियभासणो पुरिसो ॥८४१॥

अर्थ: एक बार भी बोला गया झूठ बहुत बार बोले गये सत्यवचनोंका घात कर देता है । लोग उसके सत्यकथनको भी झूठ मानने लगते हैं । झूठ बोलनेवाला मनुष्य स्वयं भी अतिभीत रहता है ॥८४१॥


अप्पच्चओ अकित्ती संभारदिकलहवेरभयसोगा ।
वधबंधभेय धणणासा वि य मोसम्मि सण्णिहिदा ॥८४२॥

अर्थ: असत्य भाषणमें अविश्वास, अपयश, संक्लेश, अरति, कलह, बैर, भय, शोक, वध, बन्ध, कुटुम्बमें फूट, धनका नाश इत्यादि दोष पाये जाते हैं ॥८४२॥


पापस्सासवदारं असच्चवयणं भणंति हु जिणिंदा ।
हिदएण अपावो वि हु मोसेण गदो वसू णिरयं ॥८४३॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेव असत्यको पापास्रवका द्वार कहते हैं, उससे पापका आगमन होता है । राजा वसु हृदयसे पापी नहीं था फिर भी झूठ बोलनेसे नरकमें गया । इसकी कथा कथाकोशमें है ॥८४३॥


परलोगम्मि वि दोसा ते चेव हवंति अलियवादिस्स ।
मोसादीए दोसे जत्तेण वि परिहरंतस्स ॥८४४॥

अर्थ: असत्य, चोरी, कुशील और परिग्रहरूप दोषोंका प्रयत्नपूर्वक त्याग करनेवाले भी असत्यवादीके परलोकमें भी अविश्वास आदि दोष होते हैं । अर्थात् असत्यवादी मरकर भी इन दोषोंका भागी होता है ॥८४४॥


इहलोइय परलोइय दोसा जे होंति अलियवयणस्स ।
कक्कसवदणादीण वि दोसा ते चेव णादव्वा ॥८४५॥

अर्थ: इस लोक और परलोकमें असत्यवादी जिन दोषोंका पात्र होता है, कर्कश आदि वचन बोलनेवाला भी उन्हीं दोषोंका पात्र होता है ॥८४५॥


एदेसिं दोसाणं मुक्को होदि अलिआदिवचिदोसे ।
परिहरमाणो साधू तव्विवरीदे य लभदि गुणे ॥८४६॥

अर्थ: जो साधु असत्य भाषण आदि दोषोंको दूर कर देता है वह ऊपर कहे दोषोंसे मुक्त होता है - उसमें वे दोष नहीं होते । तथा उन दोषोंसे विपरीत विश्वास, यश, असंक्लेश, रति, कलहका अभाव, निर्भयता आदि गुणोंका भाजन होता है ॥८४६॥


मा कुणसु तुमं बुद्धिं बहुमप्पं वा परादियं घेत्तुं ।
दंतंतरसोधणयं कलिंदमेत्तं पि अविदिण्णं ॥८४७॥

अर्थ: हे क्षपक ! तुम पराई बहुत या अल्प वस्तुको भी ग्रहण करनेकी भावना मत करो । दाँतका मल शोधनेके लिए एक तिनका भी बिना दिया मत ग्रहण करो ॥८४७॥


जह मक्कडओ धादो वि फलं दट्ठूण लोहिदं तस्स ।
दूरत्थस्स वि डेवदि जइ वि घित्तूण छंडेदि ॥८४८॥

अर्थ: जैसे बन्दर पेट भरा होनेपर भी लाल पके फलको देखकर दूरसे ही फल ग्रहण करनेके लिए कूदता है, यद्यपि वह उसे फिर छोड़ देता है ॥८४८॥


एवं जं जं पस्सदि दव्वं अहिलसदि पाविदुं तं तं ।
सव्वजगेण वि जीवो लोभाइट्ठो न तिप्पेदि ॥८४९॥

अर्थ: वैसे ही मनुष्य जो जो वस्तु देखता है उस उसको प्राप्त करनेकी इच्छा करता है । लोभसे घिरा मनुष्य समस्त जगत्को पाकर भी सन्तुष्ट नहीं होता ॥८४९॥


जह मारुओ पवड्ढइ खणेण वित्थरइ अब्भयं च जहा ।
जीवस्स तहा लोभो मंदो वि खणेण वित्थरइ ॥८५०॥

अर्थ: जैसे मन्द वायु बढ़कर क्षणभरमें फैल जाती है या मेघ बढ़ते-बढ़ते आकाशमें फैल जाते हैं । वैसे ही जीवका थोड़ा-सा भी लोभ क्षणभरमें बढ़ जाता है ॥८५०॥


लोभे पवड्ढिदे पुण कज्जाकज्जं णरो ण चिंतेदि ।
तो अप्पणो वि मरणं अगणिंतो साहसं कुणइ ॥८५१॥

अर्थ: लोभ बढ़नेपर मनुष्य ‘यह करना योग्य है और यह योग्य नहीं है’ इस प्रकार मनमें कार्य और अकार्यका विचार नहीं करता। युक्त अयुक्तका विचार न करनेसे अपनी मृत्युकी परवाह न करके चोरी करता है - ताले तोडकर घरोंमें प्रवेश करता है, जेल जाता है। इस प्रकार चोरीमें लगा मनुष्य मृत्युका कठोर भय उपस्थित होते हुए भी उसकी अवहेलना करता है ॥८५१॥


सव्वो उवहिदवुद्धी पुरिसो अत्थे हिदे य सव्वो वि ।
सत्तिप्पहारविद्धो व होदि हिययंमि अदिदुहिदो ॥८५२॥

अर्थ: सभी मनुष्य धनासक्त हैं - उनका मन धनमें लगा रहता है। अतः धन चुरानेपर सभी जन हृदयमें शक्ति नामक अस्त्रसे आघात होनेकी तरह अत्यन्त दुःखी होते हैं ॥८५२॥


अत्थम्मि हिदे पुरिसो उम्मत्तो विगयचेयणो होदि ।
मरदि व हक्कारकिदो अत्थो जीवं खु पुरिसस्स ॥८५३॥

अर्थ: दूसरेके द्वारा अपना धन हरे जानेपर मनुष्य पागल हो जाता है, उसकी चेतना नष्ट हो जाती है। यहाँ चेतना शब्द चेतनाके भेद ज्ञानपर्यायमें प्रयुक्त हुआ है अतः उसका ज्ञान नष्ट हो जाता है ऐसा अर्थ लेना चाहिए, क्योंकि चेतनाका तो विनाश होता नहीं। तथा हाहाकार करके मर जाता है। ठीक ही कहा है - धन मनुष्यका प्राण है ॥८५३॥


अडईगिरिदरिसागरजुद्धाणि अडंति अत्थलोभादो ।
पियबंधु चेवि जीवं पि णरा पयहंति धणहेदुं ॥८५४॥

अर्थ: धनके लोभसे मनुष्य जंगल, पर्वत, गुफा और समुद्रमें भटकता है, युद्ध करता है। धनके लिए मनुष्य प्रियजनोंका और अपने जीवनका भी त्याग करता है। सारांश यह है कि मनुष्यको धन सबसे प्रिय है उसके लिए वह सबको छोड़ देता है ॥८५४॥


अत्थे संतम्मि सुहं जीवदि सकलत्तपुत्तसंबंधी ।
अत्थं हरमाणेण य हिदं हवदि जीविदं तेसिं ॥८५५॥

अर्थ: धनके होनेपर मनुष्य स्त्री पुत्र और बन्धु बान्धवोंके साथ सुखपूर्वक जीवन यापन करता है। धनके हरे जानेपर उन स्त्री आदिका जीवन ही हर लिया जाता है ॥८५५॥


चोरस्स णत्थि हियए दया य लज्जा दमो व विस्सासो ।
चोरस्स अत्थहेदुं णत्थि अकादव्वयं किं पि ॥८५६॥

अर्थ: चोरके हृदयमें दया, लज्जा, साहस और विश्वास नहीं होते। चोर धनके लिए कुछ भी कर सकता है उसके लिए न करने योग्य कुछ भी नहीं है ॥८५६॥


लोगम्मि अत्थि पक्खो अवरद्धंतस्स अण्णमवराधं ।
णीयल्लया वि पक्खे ण होंति चोरिक्कसीलस्स ॥८५७॥

अर्थ: हिंसा आदि अन्य अपराध करनेवालेके पक्षमें तो लोग रहते है किन्तु चोरी करनेवालेके पक्षमें बन्धु बान्धव भी नहीं होते ॥८५७॥


अण्णं अवरज्झंतस्स दिंति णियये घरम्मि ओगासं ।
माया वि य ओगासं ण देइ चोरिक्कसीलस्स ॥८५८॥

अर्थ: अन्य अपराध करनेवालेको लोग अपने घरमें आश्रय देते हैं। किन्तु चोरी करनेवालेको माता भी आश्रय नहीं देती ॥८५८॥


परदव्वहरणमेदं आसवदारं खु बेंति पावस्स ।
सोगरियवाहपरदारिएहिं चोरो हु पापदरो ॥८५९॥

अर्थ: यह परद्रव्यका हरण पापके आनेका द्वार कहा जाता है। मृग पशु पक्षियोंका घात करनेवाले और परस्त्रीगमनके प्रेमीजनोंसे चोर अधिक पापी होता है ॥८५९॥


सयणं मित्तं आसयमल्लीणं पि य महल्लए दोसे ।
पाडेदि चोरियाए अयसे दुक्खम्मि य महल्ले ॥८६०॥

अर्थ: चोरीका व्यसन बन्धु, मित्र, अपने आश्रित, और निकटमें रहनेवालोंको भी वध, बन्ध, धनका हरना आदि दोषोंमें डाल देता है वे भी ऐसे बुरे काम करने लगते हैं। तथा वे महान् अपयश और दुःखके भागी होते हैं ॥८६०॥


बंधवधजादणाओ छायाघादपरिभवभयं सोयं ।
पावदि चोरो सयमवि मरणं सव्वस्सहरणं वा ॥८६१॥

अर्थ: चोर स्वयं भी बन्ध, वध, कष्ट, तिरस्कार, भय, शोक, मरण और सर्वस्व हरणका भागी होता है ॥८६१॥


णिच्चं दिया य रत्तिं च संकमाणो ण णिद्दमुवलभदि ।
तेण तओ समंता उव्विग्गमओ य पिच्छंतो ॥८६२॥

अर्थ: चोर दिन रात पकड़े जानेकी आशंकासे सोता नहीं है और भयभीत हिरनकी तरह चारों ओर देखा करता है ॥८६२॥


उंदुरकदंपि सद्दं सुच्चा परिवेवमाणसव्वंगो ।
सहसा समुच्छिदभओ उव्विग्गो धावदि खलंतो ॥८६३॥

अर्थ: चूहेके द्वारा भी किये शब्दको सुनकर उसका सर्वांग थरथर काँपने लगता है, एकदम भयसे भीत हो, घबराकर दौड़ता है और पद-पदपर गिरता उठता है ॥८६३॥


घत्तिं पि संजमंतो घेत्तूण किलिंचमेत्तमविदिण्णं ।
होदि हु तणं व लहुओ अप्पच्चइओ य चोरो व्व ॥८६४॥

अर्थ: महान् संयमका धारी साधु भी बिना दिया तृणमात्र भी ग्रहण करके अविश्वसनीय चोरकी तरह तिनकेके समान लघु हो जाता है ॥८६४॥


परलोगम्मि य चोरो करेदि णिरयम्मि अप्पणो वसदिं ।
तिव्वाओ वेदणाओ अणुभवहिदि तत्थ सुचिरंपि ॥८६५॥

अर्थ: चोर मरकर भी नरकमें वास करता है और वहाँ चिरकालतक तीव्र कष्ट भोगता है ॥८६५॥


तिरियगदीए वि तहा चोरो पाउणदि तिव्वदुक्खाणि ।
पाएण णीयजोणीसु चेव संसरइ सुचिरंपि ॥८६६॥

अर्थ: तथा चोर तिर्यञ्चगतिमें भी तीव्र दुःख पाता है । वह प्रायः चिरकालतक नीच योनियोंमें ही जन्ममरण करता है ॥८६६॥


माणुसभवे वि अत्था हिदा व अहिदा व तस्स णस्संति ।
ण य से धणमुवचीयदि सयं च ओल्हुदि धणादो ॥८६७॥

अर्थ: मनुष्यभवमें भी उसका धन किसीके द्वारा हरा जाकर अथवा बिना हरे नष्ट हो जाता है । वह धनका संचय नहीं कर पाता । धनका संचय हुआ भी तो वह स्वयं उस धनसे वंचित हो जाता है ॥८६७॥


परदव्वहरणबुद्धी सिरिभूदी णयरमज्झयारम्मि ।
होदूण हदो पहदो पत्तो सो दीहसंसारं ॥८६८॥

अर्थ: परद्रव्यको हरनेमें आसक्त श्रीभूतिनामक ब्राह्मण नगरके मध्यमें मारा गया और मरकर दीर्घसंसारी हुआ इसकी कथा कथाकोशमें है ॥८६८॥


एदे सव्वे दोसा ण होंति परदव्वहरणविरदस्स ।
तव्विवरीदा य गुणा होंति सदा दत्तभोइस्स ॥८६९॥

अर्थ: जो परद्रव्य हरनेका त्यागी होता है उसे ये सब दोष नहीं होते । तथा जो दत्त- वस्तुका ही उपभोग करता है उसमें उक्त दोषोंसे विपरीत गुण सदा होते हैं ॥८६९॥


देविंदरायगहवइदेवदसाहम्मि उग्गहं तम्हा ।
उग्गहविहिणा दिण्णं गेण्हसु सामण्णसाहणयं ॥८७०॥

अर्थ: हे क्षपक ! देवेन्द्र, राजा, गृहपति, देवता और साधर्मी साधुओंके द्वारा विधिपूर्वक दी गई परिग्रहको, जो ज्ञान और संयमकी साधक हो, ग्रहण कर ॥८७०॥


रक्खाहि बंभचेरं अब्बंभं दसविधं तु वज्जित्ता ।
णिच्चं पि अप्पमत्तो पंचविधे इत्थिवेरग्गे ॥८७१॥

अर्थ: हे क्षपक ! दस प्रकारके अब्रह्मको त्याग कर ब्रह्मचर्यकी रक्षा कर । और पांच प्रकार के स्त्री वैराग्यमें सदा सावधान रह ॥८७१॥


जीवो बंभा जीवम्मि चेव चरिया हविज्ज जा जदिणो ।
तं जाण बंभचरं विमुक्कपरदेहतत्तिस्स ॥८७२॥

अर्थ: ब्रह्म शब्दसे जीव कहा जाता है। अथवा ‘बृह्’ धातुसे ब्रह्म शब्द बना है उसका अर्थ होता है बढ़ना। ज्ञान दर्शन आदि रूपसे बढ़नेको ब्रह्म कहते हैं। अथवा जब सयोग केवली जिन लोकपूरण समुद्घात करते हैं तो उनके आत्म प्रदेश लोकाकाश प्रमाण बढ़कर फैल जाते हैं। इस प्रकारसे जो बढ़ता है वह ब्रह्म जीव है उस ब्रह्ममें ही चर्या ब्रह्मचर्य है। पराये शरीर सम्बन्धी व्यापारसे अर्थात् स्त्री रमणादिसे विरत मुनि अनन्त पर्यायात्मक जीव स्वरूप का ही अवलोकन करते हुए जो उसीमें रमण करता है वह ब्रह्मचर्य है ॥८७२॥


इत्थिविसयाभिलासो वत्थिविमोक्खो य पणिदरससेवा ।
संसत्तदव्वसेवा तदिंदियालोयणं चेव ॥८७३॥

अर्थ: स्त्री सम्बन्धी जो इन्द्रियोंके विषय हैं - उनका रूप, उनके अधरका रस, उनके मुखकी सुगन्ध, उनका मनोहर गायन, हास, मधुर वचन और कोमल स्पर्श, उनकी अभिलाषा करना अब्रह्मका प्रथम भेद है। आत्माके स्वरूपको जानकर उसीमें लीन होना ब्रह्मचर्य है। उसको वहन करनेसे आत्मा ब्रह्म है। उससे अन्य स्त्रीके शरीर सम्बन्धी जो रूप रसादि हैं उन्हें यहाँ अब्रह्म शब्दसे कहा है। उसमें चर्या अर्थात् अभिलाषा रूप परिणति अब्रह्मचर्य है। लिंगमें हुए विकारको दूर न करना दूसरा अब्रह्मका भेद है। इन्द्रियमद कारक आहार करना तीसरा भेद है। स्त्रियोंसे सम्बद्ध शय्या आदिका सेवन चतुर्थ भेद है। स्त्रियोंके शरीरके स्पर्शकी ही तरह उनके शरीरसे सम्बद्ध वस्तुओंका स्पर्श भी कामी जनोंको रागकारक होता है। स्त्रियोंके उत्तम अंगोंका अवलोकन पाँचवाँ भेद है ॥८७३॥


सक्कारो संकारो अदीदसुमरणमणागदभिलासे ।
इट्ठविसयसेवा वि य अब्बंभं दसविहं एदं ॥८७४॥

अर्थ: स्त्रियोंका सम्मान करना छठा भेद है। वस्त्र माला आदिसे उन्हें आभूषित करना सातवाँ भेद है । अतीत कालमें की गई रति क्रीडाका स्मरण करना आठवाँ भेद है । भविष्य कालमें मैं उनके साथ इस प्रकार क्रीड़ा करूँगा इस प्रकार अनागत रतिमें अभिलाषा नौवाँ भेद है । इष्ट विषयोंका सेवन दसवाँ भेद है । इस प्रकार अब्रह्मके ये दस भेद हैं ॥८७४॥


एवं विसग्गिभूदं अब्बंभं दसविहंपि णादव्वं ।
आवादे मधुरमिव होदि विवागे य कडुयदरं ॥८७५॥

अर्थ: इस प्रकार विष और आगके समान अब्रह्मके दस भेद जानना । यह प्रारम्भमें मधुर प्रतीत होता है किन्तु परिणाममें अत्यन्त कटु होता है ॥८७५॥


कामकदा इत्थिकदा दोसा असुचित्तवुड्ढसेवा य ।
संसग्गदोसा वि य करंति इत्थीसु वेरग्गं ॥८७६॥

अर्थ: काम विकारसे उत्पन्न हुए दोष, स्त्रियोंके द्वारा किये गये दोष, शरीरकी अशुचिता, वृद्ध जनोंकी सेवा, स्त्रीके संसर्गसे उत्पन्न हुए दोष, इनके चिन्तनसे स्त्रियोंमें वैराग्य उत्पन्न होता है ॥८७६॥


जावइया किर दोसा इहपरलोए दुहावहा होंति ।
सव्वे वि आवहदि ते मेहुणसण्णा मणुस्सस्स ॥८७७॥

अर्थ: इस लोक और परलोकमें दुःखदायी जितने भी दोष हैं मनुष्यकी मैथुन संज्ञामें वे सब दोष वर्तमान हैं ॥८७७॥


सोयदि विलवदि परितप्पदी य कामादुरो विसीयदि य ।
रत्तिंदिया य णिद्दं ण लहदि पज्झादि विमणो य ॥८७८॥

अर्थ: कामसे पीड़ित मनुष्य शोक करता है, विलाप करता है, परिताप करता है, विषाद करता है, रात दिन नहीं सोता । इष्ट स्त्री आदिका स्मरण करता है और अन्यमनस्क होकर धर्म कर्म भी भूल जाता है ॥८७८॥


सयणे जणे य सयणासणे य गामे घरे व रण्णे वा ।
कामपिसायग्गहिदो ण रमदि य तह भोयणादीसु ॥८७९॥

अर्थ: कामरूपी पिशाचके द्वारा पकड़े गये मनुष्यका मन स्वजनमें, अन्य मनुष्योंमें, शयनमें, आसनमें, ग्राममें, घरमें, वनमें और भोजन आदिमें नहीं रमता ॥८७९॥


कामादुरस्स गच्छदि खणो वि संवच्छरो व पुरिसस्स ।
सीदंति य अंगाइं होदि अ उक्कंठिओ पुरिसो ॥८८०॥

अर्थ: कामसे पीड़ित मनुष्यका एक क्षण भी एक वर्षकी तरह बीतता है । उसके सब अंग वेदनाकारक होते हैं । और वह उत्कण्ठित होता है उसका मन उसीमें लगा रहता है खान-पानमें नहीं लगता । वह उसे रुचता नहीं ॥८८०॥


पाणिदलधरिदगंडो बहुसो चिंतेदि किं पि दीणमुहो ।
सीदे वि णिवाइज्जइ वेवदि य अकारणे अंगं ॥८८१॥

अर्थ: वह अपनी हथेलीपर गाल रखकर दीनमुखसे बहुत-सी व्यर्थ चिन्ता किया करता है । शीतकालमें भी पसीनेसे भींग जाता है । बिना कारण ही उसके अंग कांपते हैं ॥८८१॥


कामुम्मत्तो संतो अंतो डज्झदि य कामचिंताए ।
पीदो व कलकलो सो रदग्गिजाले जलंतम्मि ॥८८२॥

अर्थ: कामसे उन्मत्त पुरुष अन्तरंगमें कामकी चिन्तासे जला करता है। जैसे आगसे तपा ताम्बेका द्रव पीकर मनुष्य अन्तरंगमें जलता है वैसे ही वह इच्छित स्त्रीके न मिलनेपर अन्तरंगमें जलती हुई अरतिरूप आगकी ज्वालामें जलता है ॥८८२॥


कामादुरो णरो पुण कामिज्जंते जणे हु अलहंतो ।
घत्तदि मरिदुं बहुधा मरुप्पवादादिकरणेहिं ॥८८३॥

अर्थ: कामसे पीड़ित मनुष्य अपनी इच्छित स्त्रीके न मिलनेपर प्रायः पर्वतसे गिरकर या समुद्रमें डूबकर या वृक्षकी शाखासे लटककर अथवा आगमें कूदकर मरनेकी चेष्टा करता है ॥८८३॥


संकप्पंडयजादेण रागदोसचलजमलजीहेण ।
विसयबिलवासिणा रदिमुहेण चिंतादिरोसेण ॥८८४॥

अर्थ: कामरूप सर्प मानसिक संकल्परूप अण्डेसे उत्पन्न होता है। उसके रागद्वेषरूप दो जिह्वाएँ होती हैं जो सदा चला करती हैं। विषयरूपी बिलमें उसका निवास है। रति उसका मुख है। चिन्तारूप अतिरोष है। लज्जा उसकी कांचली है उसे वह छोड़ देता है। मद उसकी दाढ़ है। अनेक प्रकारके दुःख उसका जहर हैं। ऐसे कामरूप सर्पसे डँसा हुआ मनुष्य नाशको प्राप्त होता है ॥८८४-८८५॥


कामभुजगेण दट्ठा लज्जाणिम्मोगदप्पदाढेण ।
णासंति णरा अवसा अणेयदुक्खावहविसेण ॥८८५॥

अर्थ: कामरूप सर्प मानसिक संकल्परूप अण्डेसे उत्पन्न होता है। उसके रागद्वेषरूप दो जिह्वाएँ होती हैं जो सदा चला करती हैं। विषयरूपी बिलमें उसका निवास है। रति उसका मुख है। चिन्तारूप अतिरोष है। लज्जा उसकी कांचली है उसे वह छोड़ देता है। मद उसकी दाढ़ है। अनेक प्रकारके दुःख उसका जहर हैं। ऐसे कामरूप सर्पसे डँसा हुआ मनुष्य नाशको प्राप्त होता है ॥८८४ - ८८५॥ ॥८८५॥


आसीविसेण अवरुद्धस्स वि वेगा हवंति सत्तेव ।
दस होंति पुणो वेगा कामभुअंगावरुद्धस्स ॥८८६॥

अर्थ: सब सर्पोंमें प्रमुख आशीविष सर्प होता है। उसके द्वारा डसे मनुष्यके तो सात ही वेग होते हैं। किन्तु कामरूपी सर्पके द्वारा डसे मनुष्यके दस वेग होते हैं ॥८८६॥


पढमे सोयदि वेगे दट्ठुं तं इच्छदे विदियवेगे ।
णिस्ससदि तदियवेगे आरोहदि जरो चउत्थम्मि ॥८८७॥

अर्थ: कामके प्रथम वेगमें सोचता है जिसको देखा या सुना उसके बारेमें चिन्ता करता है । दूसरे वेगमें उसे देखनेकी इच्छा करता है । तीसरे वेगमें दीर्घ निश्वास लेता है । चतुर्थ वेगमें शरीरमें ज्वर चढ़ जाता है ॥८८७॥


डज्झदि पंचमवेगे अंगं छट्ठे ण रोचदे भत्तं ।
मुच्छिज्जदि सत्तमए उम्मत्तो होइ अट्ठमए ॥८८८॥

अर्थ: पाँचवें वेगमें अंग जलने लगते हैं । छठे वेगमें भोजन नहीं रुचता । सातवें वेगमें मूर्छित हो जाता है । आठवें वेगमें उन्मत्त हो जाता है ॥८८८॥


णवमे ण किंचि जाणदि दसमे पाणेहिं मुच्चदि मदंधो ।
संकप्पवसेण पुणो वेगा तिव्वा व मंदा वा ॥८८९॥

अर्थ: नौवें वेगमें अपनेको भी नहीं जानता । दसवें वेगमें मर जाता है । इस प्रकार कामान्ध पुरुषके संकल्पवश तीव्र या मन्द वेग होते हैं ॥८८९॥


जेट्ठामूले जोण्हे सूरो विमले णहम्मि मज्झण्हे ।
ण डहदि तह जह पुरिसं डहदि विवड्ढंतओ कामो ॥८९०॥

अर्थ: ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षमें मध्याह्नकालमें आकाशके निर्मल रहते हुए सूर्य वैसा नहीं जलाता जैसा पुरुषको प्रज्वलित काम जलाता है ॥८९०॥


सूरग्गी डहदि दिवा रत्तिं च दिया य डहइ कामग्गी ।
सूरस्स अत्थि उच्छागारो कामग्गिणो णत्थि ॥८९१॥

अर्थ: सूर्य अग्नि तो केवल दिनको ही जलाती है किन्तु कामाग्नि रात दिन जलाती है । सूर्यके तापसे बचनेके उपाय तो छाता आदि हैं किन्तु कामाग्निका कोई उपाय नहीं है ॥८९१॥


विज्झायदि सूरग्गी जलादिएहिं ण तहा दु कामग्गी ।
सूरग्गी डहइ तयं अब्भंतरबाहिरं इदरो ॥८९२॥

अर्थ: सूर्यसे उत्पन्न हुआ ताप तो जल आदिसे शान्त हो जाता है किन्तु कामाग्नि जलादिसे शान्त नहीं होती । सूर्यकी गर्मी तो चर्मको ही जलाती है किन्तु कामाग्नि शरीर और आत्मा दोनोंको जलाती है ॥८९२॥


जादिकुलं संवासं धम्मं णियबंधवम्मि अगणित्ता ।
कुणदि अकज्जं पुरिसो मेहुणसण्णापसंमूढो ॥८९३॥

अर्थ: मैथुन संज्ञासे मूढ़ हुआ मनुष्य मातृवंश, पितृवंश, साथमें रहनेवाले मित्रादि, धर्म, और बन्धु बान्धवोंकी भी परवाह न करके अकार्य करता है ॥८९३॥


कामपिसायग्गहिदो हिदमहिदं वा ण अप्पणो मुणदि ।
होइ पिसायग्गहिदो व सदा पुरिसो अणप्पवसो ॥८९४॥

अर्थ: कामरूपी पिशाचके द्वारा पकड़ा गया मनुष्य अपने हित अहितको नहीं जानता । पिशाचके द्वारा पकड़े गये मनुष्यकी तरह अपने वशमें नहीं रहता ॥८९४॥


णीचो व णरो बहुगं पि कदं कुलपुत्तओ वि ण गणेदि ।
कामुम्मत्तो लज्जालुओ वि तह होदि णिल्लज्जो ॥८९५॥

अर्थ: जैसे नीच मनुष्य किये गये उपकारको भुला देता है वैसे ही कुलीन वंशका भी व्यक्ति कामसे उन्मत्त होकर पूर्वमें लज्जावान होते हुए निर्लज्ज हो जाता है ॥८९५॥


कामी सुसंजदाण वि रूसदि चोरो व जग्गमाणाणं ।
पिच्छदि कामग्घत्थो हिदं भणंते वि सत्तू व ॥८९६॥

अर्थ: जैसे चोर जागते हुए व्यक्तियोंपर रोष करता है वैसे ही कामी संयमीजनोंपर रोष करता है । तथा कामी हितकारी बात कहनेवालेको शत्रुके समान देखता है ॥८९६॥


आयरियउवज्झाए कुलगणसंघस्स होदि पडिणीओ ।
कामकलिला हु घत्थो धम्मियभावं पयहिदूणं ॥८९७॥

अर्थ: कामरूपी कलिकालसे ग्रस्त मनुष्य धार्मिक भावको त्याग आचार्य, उपाध्याय, कुल - गुरुका शिष्य समुदाय, गण - गुरुके धर्मबन्धुओंका शिष्य समुदाय और चतुर्विध संघका विरोधी बन जाता है ॥८९७॥


कामग्घत्थो पुरिसो तिलोयसारं जहदि सुदलाभं ।
तेलोक्कपूइदं पि य माहप्पं जहदि विसयंधो । ८९८॥ ॥८९८॥

अर्थ: कामसे ग्रस्त मनुष्य तीनों लोकोंके सारभूत श्रुतज्ञानके लाभको भी छोड़ देता है । वह विषयान्ध होकर तीनों लोकोंसे पूजित माहात्म्यको भी छोड़ देता है अर्थात् उसे शास्त्र स्वाध्यायमें रस नहीं रहता और कामके पीछे अपना महत्त्व भी भुला देता है ॥८९८॥


तह विसयामिसघत्थो तणं व तवचरणदंसणं जहइ ।
विसयामिसगिद्धस्स हु णत्थि अकायव्वयं किंचि ॥८९९॥

अर्थ: तथा विषयरूपी मांसमें आसक्त होकर तप चारित्र और सम्यग्दर्शनको तिनकेकी तरह त्याग देता है । ठीक ही है विषयरूपी मांसके लोभीके लिए कुछ भी अकार्य नहीं है, वह सब कुछ अनर्थ कर सकता है ॥८९९॥


अरहंतसिद्ध आयरिय उवज्झाय साहु सव्ववग्गाणं ।
कुणदि अवण्णं णिच्चं कामुम्मत्तो विगयवेसो ॥९००॥

अर्थ: कामसे उन्मत्त साधु साधुरूपको त्यागकर अर्हन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सब साधुजनोंका अवर्णवाद करता है, उनपर मिथ्या दोषारोपण करता है ॥९००॥


अयसमणत्थं दुःखं इहलोए दुग्गदी य परलोए ।
संसारं पि अणंतं ण मुणदि विसयामिसे गिद्धो ॥९०१॥

अर्थ: विषयरूपी मांसका लोभी मनुष्य अनर्थकारी अपयश, इस लोकके दुःख, परलोकमें दुर्गति और भविष्यमें संसारकी अनन्तताको नहीं जानता । अर्थात् वह इस बातको भुला देता है कि विषयासक्तिका फल संसारमें अपयश, इस लोकमें कष्ट, परलोकमें दुर्गति है तथा संसारका अन्त होना दुष्कर है ॥९०१॥


णिच्चं पि विसयहेदुं सेवदि उच्चो वि विसयलुद्धमदी ।
बहुगं पि य अवमाणं विसयंधो सहइ माणीवि ॥९०२॥

अर्थ: विषयोंका लोभी मनुष्य कुलीन और बुद्धिमान् होते हुए भी विषय सेवनके लिए ज्ञान और कुल आदिसे अत्यन्तहीन की भी सेवा करता है। वह विषयान्ध धनी पुरुषोंके द्वारा किये गये महान् तिरस्कारको भी सहन करता है ॥९०२॥


णीचं पि कुणदि कम्मं कुलपुत्तदुगुंछियं विगदमाणो ।
वारत्तओ वि कम्मं अकासि जह लंघियाहेदुं ॥९०३॥

अर्थ: वह अपना सन्मान खोकर कुलीन पुरुषोंके द्वारा निन्दित उच्छिष्ट भोजन आदि नीचकर्म करता है। जैसे वारत्रक नामक कुलीन यतिने नर्तकीके लिए अत्यन्त निन्दित काम किया ॥९०३॥


सूरो तिक्खो मुक्खो वि होइ वसिओ जणस्स सधणस्स ।
विसयामिसम्मि गिद्धो माणं रोसं च मोत्तूणं ॥९०४॥

अर्थ: विषयरूपी मांसका लोभी मनुष्य अभिमान और रोष त्यागकर सूरवीर, असहनशील और प्रमुख होते हुए भी धनी मनुष्यके वशमें हो जाता है ॥९०४॥


माणी वि असरिसस्स वि चडुयम्मं कुणदि णिच्चमविलज्जो ।
मादापिदरे दासं वायाए परस्स कामेंतो ॥९०५॥

अर्थ: अभिमानी भी निर्लज्ज होकर अपनेसे नीच पुरुषका नित्य चाटुकर्म - पैर दबाना आदि करता है। अपने माता पिताको उसका दास दासी कहता है और कहता है कि मैं तुम्हारे घरमें दास बनकर रहूँगा ॥९०५॥


वयणपडिवत्तिकुसलत्तणं पि णासइ णरस्स कामिस्स ।
सत्थप्पहुव्व तिक्खा वि मदी मंदा तहा हवदि ॥९०६॥

अर्थ: कामी मनुष्यकी वचन कुशलता और समझदारी नष्ट हो जाती है । शास्त्रमें प्रविष्ट अति तीक्ष्ण भी बुद्धि मन्द हो जाती है ॥९०६॥


होदि सचक्खू वि अचक्खु व बधिरो वा वि होइ सुणमाणो ।
दुट्ठकरेणुपसत्तो वणहत्थी चेव संमूढो ॥९०७॥

अर्थ: दुष्ट हथनीमें आसक्त जंगली हाथीकी तरह मूढ़ कामी पुरुष नेत्रवाला होकर भी अन्धा होता है क्योंकि उसे समीपकी वस्तु भी नहीं दिखाई देती । तथा कानवाला होकर भी बहरा होता है ॥९०७॥


सलिलणिवुडोव्व णरो वुज्झंतो विगयचेयणो होदि ।
दक्खो वि होइ मंदो विसयपिसाओवहदचित्तो ॥९०८॥

अर्थ: जैसे जलमें डूबा और प्रवाहमें बहता मनुष्य चेतनारहित होता है । वैसे ही जिसका चित्त विषयरूपी पिशाचके द्वारा गृहीत है वह मनुष्य सब कार्योंमें प्रवीण होते हुए भी मन्द होता है । यहाँ विषयोंको पिशाच कहा है क्योंकि रूपादि विषय चित्तको मोहमें डाल देते हैं इसलिए वे पिशाचके समान हैं ॥९०८॥


बारसवासाणि वि संवसित्तु कामादुरो ण णासीय ।
पादंगुट्ठमसंतं गणियाए गोरसंदीवो ॥९०९॥

अर्थ: गोरसंदीप नामक कामपीड़ित मनुष्य बारह वर्ष तक गणिकाके साथ रहकर भी यह नहीं जान सका कि गणिकाके पैर में अँगूठा नहीं है ॥९०९॥


सीदं उण्हं तण्हं खुहं च दुस्सेज्ज भत्त पंथसमं ।
सुकुमारो वि य कामी सहइ वहइ भारमवि गरुयं ॥९१०॥

अर्थ: सुकुमार भी कामी पुरुष सर्दी, गर्मी, प्यास, भूख, खोटी शय्या, खराब भोजन, मार्गमें चलनेका श्रम सहता है और भारी बोझा ढोता है ॥९१०॥


गायदि णच्चदि धावदि कसइ ववदि लवदि तह मलेइ णरो ।
तुण्णेइ वुणइ जाचइ कुलम्मि जादो वि विसयवसो ॥९११॥

अर्थ: उच्चकुलमें जन्मा भी मनुष्य विषयासक्त होकर गाता है, नाचता है, दौड़ता है, खेत जोतता है, अन्न बोता है, खेती काटता है, अनाज निकालता है, कपड़े सीता है, बुनता है ? यह सब काम विषय परवश होकर अपने और अपनी पत्नीके भरणपोषणके लिए करता है ॥९११॥


सेवदि णियादि रक्खदि गोमहिसिमजावियं हयं हत्थिं ।
ववहरदि कुणदि सिप्पं सिणेहपासेण दढबद्धो ॥९१२॥

अर्थ: स्त्रीके स्नेहजालमें दृढ़तापूर्वक बंधा मनुष्य राजा आदिकी सेवा करता है, धानके खेतमें लगी घासको उपाड़ता है । गाय, भैंस, बकरी, भेड़े, घोड़ा, हाथी आदि पालता है । व्यापार करता है । शिल्पकर्म-चित्रकला आदि करता है ॥९१२॥


वेढेइ विसयहेदुं कलत्तपासेहिं दुव्विमोएहिं ।
कोसेण कोसियारुव्व दुम्मदी णिच्च अप्पाणं ॥९१३॥

अर्थ: जैसे रेशमका कीड़ा अपने ही मुखमेंसे तार निकालकर उससे अपनेको बाँधता है । वैसे ही दुर्बुद्धि मनुष्य विषयोंके लिए स्त्रीरूप पाशके द्वारा, जिसका छूटना अशक्य है, नित्य अपनेको बाँधता है ॥९१३॥


रागो दोसो मोहो कसायपेसुण्ण संकिलेसो य ।
ईसा हिंसा मोसा सूया तेणिक्क कलहो य ॥९१४॥

अर्थ: राग, द्वेष, मोह, कषाय, पैशुन्य - दूसरेके दोष कहना, संक्लेश, ईर्ष्या, हिंसा, झूठ, असूया - दूसरेके गुणोंको न सहना, चोरी, कलह, वृथा बकवाद, तिरस्कार, ठगना, पीठ पीछे बुराई करना, शत्रु, रोग, शोक, धननाश इत्यादि सब दुःखदायी दोष विषयासक्त व्यक्तिमें सुलभ होते हैं ॥९१४-९१५॥


जंपणपरिभवणियडिपरिवादरिपूरोगसोगधणणासो ।
विसयाउलम्मि सुलहा सव्वे दुक्खावहा दोसा ॥९१५॥

अर्थ: राग, द्वेष, मोह, कषाय, पैशुन्य - दूसरेके दोष कहना, संक्लेश, ईर्ष्या, हिंसा, झूठ, असूया - दूसरेके गुणोंको न सहना, चोरी, कलह, वृथा बकवाद, तिरस्कार, ठगना, पीठ पीछे बुराई करना, शत्रु, रोग, शोक, धननाश इत्यादि सब दुःखदायी दोष विषयासक्त व्यक्तिमें सुलभ होते हैं ॥९१४ - ९१५॥ ॥९१५॥


अवि य वहो जीवाणं मेहुणसेवाए होइ बहुगाणं ।
तिलणालीए तत्ता सलायवेसो व जोणीए ॥९१६॥

अर्थ: जैसे तिलोंसे भरी नलिकामें तपाये हुए लोहेकी सलाईके प्रवेशसे तिलोंका घात होता है वैसे ही मैथुन सेवनसे योनिमें स्थित बहुतसे जीवोंका घात होता है ॥९१६॥


कामुम्मत्तो महिलं गम्मागम्मं पुणो अविण्णाय ।
सुलहं दुलहं इच्छियमणिच्छियं चावि पत्थेदि ॥९१७॥

अर्थ: कामसे उन्मत्त पुरुष यह स्त्री भोगने योग्य है या अयोग्य है, सुलभ है या दुर्लभ है, मुझे चाहती है या नहीं चाहती, इत्यादि जाने बिना उसकी याचना करता है ॥९१७॥


दट्ठूण परकलत्तं किहिदा पत्थेइ णिग्घिणो जीवो ।
ण य तत्थ किं पि सुक्खं पावदि पावं च अज्जेदि ॥९१८ ॥९१८॥

अर्थ: पर स्त्रीको देखकर कामान्ध पुरुष लज्जा त्याग कैसे प्रार्थना करता है कि यह मेरी होवे : उसमें उसे कुछ भी सुख नहीं उल्टे, पापका ही उपार्जन करता है ॥९१८॥


आहट्टिदूण चिरमवि परस्स महिलं लभित्तु दुक्खेण ।
उप्पित्थमवीसत्थं अणिव्वुदं तारिसं चेव ॥९१९॥

अर्थ: चिरकाल तक अभिलाषा करनेपर कदाचित् बड़े कष्टसे परस्त्रीका लाभ भी हो जाये तो उसके मिलनेसे पूर्व वह जैसा व्याकुल, अविश्वस्त और अतृप्त रहता है मिलनेपर भी वैसा ही रहता है ॥९१९॥


कहमवि-तमंधयारे संपत्तो जत्थ तत्थ वा देसे ।
किं पावदि रइसुक्खं भीदो तुरिदो वि उल्लावो ॥९२०॥

अर्थ: किसी प्रकार दूसरोंको धोखा देकर अन्धकारमें किसी शून्य घरमें या जंगलमें उसे पाकर भी क्या रति सुख पाता है वह कामी । प्रकाशमें कोमल शय्यापर मनकी व्याकुलताके अभावमें उस नारीके इच्छित अंगोंको देखते हुए सुख होता है, अन्यथा नहीं होता । किन्तु राजपुरुषोंसे अथवा उस नारीके सम्बन्धियोंसे भयके होते हुए कि मुझे कोई देखे नहीं, कोई बांधे नहीं, कि पर पत्नीके साथ निवास करता है, ऐसी स्थितिमें भाषण करनेकी भी जल्दी रहती है, रमण करनेकी तो बात ही क्या ? तब क्या सुख मिल सकता है ? ॥९२०॥


परमहिलं सेवंतो वेरं वधबंधकलहधणनासं ।
पावदि रायकुलादो तिस्से णीयल्लयादो वा ॥९२१॥

अर्थ: परस्त्रीका सेवन करने वालेके सब वैरी होते हैं । वह राजाके पुरुषोंसे अथवा उस स्त्रीके सम्बन्धियोंसे वध, बन्धन, कलह और धन नाशका कष्ट पाता है ॥९२१॥


जदि दा जणेइ मेहुणसेवा प्पवंस दारम्मि ।
अदितिव्वं कह पावं ण हुज्ज परदारसेविस्स ॥९२२॥

अर्थ: यदि अपनी पत्नीमें भी मैथुन सेवनसे पाप कर्मका बन्ध होता है तो परस्त्री सेवीको अति तीव्र पापका बन्ध क्यों नहीं होगा; क्योंकि उसमें चोरी और अब्रह्म सेवन दो दोष हैं ॥९२२॥


मादा धूदा भज्जा भगिणीसु परेण विप्पयम्मि कदे ।
जह दुक्खमप्पणो होइ तहा अण्णस्स वि णरस्स ॥९२३॥

अर्थ: अपनी माता, पुत्री और बहिनके प्रति यदि कोई अप्रिय व्यवहार करे तो जैसे हमें दुःख होता है वैसे ही दूसरोंकी माता आदिके विषयमें असद् व्यवहार करने पर दूसरों को भी दुःख होता है ॥९२३॥


एवं परजणदुक्खे णिरवेक्खो दुक्खबीयमज्जेदि ।
णीयं गोदं इत्थीणउंसवेदं च अदितिव्वं ॥९२४॥

अर्थ: इस प्रकार दूसरोंके दुःखका ध्यान न रखनेवाला परस्त्रीगामी पुरुष दुःखके बीज नीचगोत्र, स्त्रीवेद और नपुंसक वेदका अति तीव्र बन्ध करता है ॥९२४॥


जमणिच्छंती महिलं अवसं परिभुंजदे जहिच्छाए ।
तह य किलिस्सइ जं सो तं से परदारगमणफलं ॥९२५॥

अर्थ: इस जन्ममें जो स्त्री परवश होकर ऐसे पुरुषके द्वारा, जिसे वह नहीं चाहती, यथेच्छ भोगी जाती और कष्ट पाती है यह उसके पूर्वजन्ममें किये गये पर स्त्री-गमनका फल है ॥९२५॥


महिलावेसविलंबी जं णीचं कुणइ कम्मयं पुरिसो ।
तह वि ण पूरइ इच्छा तं से परदारगमणफलं ॥९२६॥

अर्थ: स्त्रीका वेश धारण करनेवाला जो पुरुष (नपुंसक) नीच कर्म करता है, और यहाँ वहाँ काम क्रीड़ा करके भी सन्तुष्ट नहीं होता, उसका यह नपुंसकपना परस्त्रीगमनका फल है ॥९२६॥


भज्जा भगिणी मादा सुदा य बहुएसु भवसयसहस्सेसु ।
अयसायासकरीओ होंति विसीला य णिच्चं से ॥९२७॥

अर्थ: परस्त्रीगामीकी भार्या, बहन, माता, पुत्री, लाखों जन्मोंमें अपयश और दुःख देनेवाली सदा व्यभिचारिणी होती हैं ॥९२७॥


होइ सयं पि विसीलो पुरिसो अदिदुब्भगो परभवेसु ।
पावइ वधबंधादि कलहं णिच्चं अदोसो वि ॥९२८॥

अर्थ: परस्त्रीगामी स्वयं भी परभवोंमें (आगामी जन्मोंमें) दुराचारी और अभागा होता है और विना अपराधके भी कलहपूर्वक नित्य वध, बन्ध आदिका कष्ट उठाता है ॥९२८॥


इहलोए वि महल्लं दोसं कामस्स वसगदो पत्तो ।
कालगदो वि य पच्छा कडारपिंगो गदो णिरयं ॥९२९॥

अर्थ: कामके वशीभूत होकर कडारपिंग इसी जन्ममें महान् दोषका भागी हुआ । पीछे मरकर नरकमें गया ॥९२९॥


एदे सव्वे दोसा ण होंति पुरिसस्स बंभचारिस्स ।
तव्विवरीया य गुणा हवंति बहुगा विरागिस्स ॥९३०॥

अर्थ: ब्रह्मचारी पुरुषके ये सब दोष नहीं होते । प्रत्युत विरागीके इन दोषोंसे विपरीत बहुतसे गुण होते हैं ॥९३०॥


कामग्गिणा धगधगंतेण य डज्झंतयं जगं सव्वं ।
पिच्छइ पिच्छयभूदो सीदीभूदो विगदरागो ॥९३१॥

अर्थ: विरागी मुक्तात्माकी तरह प्रज्वलित कामाग्निसे जलते हुए सब जगत्को एक प्रेक्षकके रूपमें देखता है । अर्थात् वह केवल द्रष्टा ही रहता है उसके कष्टसे स्वयं पीड़ित नहीं होता ॥९३१॥


महिला कुलं सवासं पदिं सुदं मादरं च पिदरं च ।
विसयंधा अगणंती दुक्खसमुद्दम्मि पाडेइ ॥९३२॥

अर्थ: विषयसे अन्धी हुई स्त्री किसीकी परवाह न करके अपने कुलको, साथमें रहने वाले पति, पुत्र, माता और पिताको दुःखके समुद्रमें गिरा देती है ॥९३२॥


माणुण्णयस्स पुरिसद्दुमस्स णीचो वि आरुहदि सीसं ।
महिलाणिस्सेणीए णिस्सेणीए व्व दीहद्दुमं ॥९३३॥

अर्थ: जैसे नसैनीके द्वारा छोटा आदमी भी ऊँचे वृक्ष पर चढ़ जाता है वैसे ही महिला रूपी नसैनीके द्वारा नीच पुरुष भी मानसे उन्नत पुरुष रूपी वृक्षके सिर पर चढ़ जाता है अर्थात् स्त्रीके कारण नीच पुरुषके द्वारा गर्वोन्नत मनुष्यका भी सिर नीचा हो जाता है ॥९३३॥


पव्वदमित्ता माणा पुंसाणं होंदि कुलबलधणेहिं ।
बलिएहिं वि अक्खोहा गिरीव लोगप्पयासा य ॥९३४॥

अर्थ: कुल बल और धनसे पुरुषोंका अहंकार सुमेरुपर्वतके समान जगत्में विख्यात है । उसे बलवान भी नहीं हिला सकते ॥९३४॥


ते तारिसया माणा ओमच्छिज्जंति दुट्ठमहिलाहिं ।
जह अंकुसेण णिस्साइज्ज हत्थी अदिबलो वि ॥९३५॥

अर्थ: किन्तु इस प्रकारके अहंकार भी दुष्ट स्त्रियोंके द्वारा नष्ट कर दिये जाते हैं । जैसे अंकुशसे अति बलवान हाथी भी बैठा दिया जाता है ॥९३५॥


आसीय महाजुद्धाइं इत्थिहेदुं जणम्मि बहुगाणि ।
भयजणणाणि जणाणं भारहरामायणादीणि ॥९३६॥

अर्थ: स्त्रीके कारण इस जगत्में भारत रामायण आदिमें वर्णित अनेक महायुद्ध हुए जो लोगोंके लिये भयकारक थे ॥९३६॥


महिलासु णत्थि वीसंभपणयपरिचयकदण्णदा णेहो ।
लहुमेव परगयमणा ताओ सकुलंपि जहंति ॥९३७॥

अर्थ: स्त्रियोंमें विश्वास, स्नेह, परिचय, कृतज्ञता नहीं है । वे पर पुरुषपर आसक्त होनेपर शीघ्र ही अपने कुलको अथवा कुलीन भी पतिको छोड़ देती हैं ॥९३७॥


पुरिसस्स दु वीसंभं करेदि महिला बहुप्पयारेहिं ।
महिला वीसंभेदुं बहुप्पयारेहिं वि ण सक्का ॥९३८॥

अर्थ: स्त्री अनेक प्रकारोंसे पुरुषमें विश्वास उत्पन्न करती हैं किन्तु पुरुष अनेक उपायोंसे भी स्त्रीमें विश्वास उत्पन्न करनेमें समर्थ नहीं होता ॥९३८॥


अदिलहुयगे वि दोसे कदम्मि सुकदस्सहस्समगणंती ।
पइ अप्पाणं च कुलं धणं च णासंति महिलाओ ॥९३९॥

अर्थ: थोड़ा-सा भी अपराध होनेपर स्त्री सैकड़ों उपकारोंको भुलाकर अपना, पतिका, कुलका और धनका नाश कर देती है ॥९३९॥


आसीविसो व्व कुविदा ताओ दूरेण णिहुदपावाओ ।
रुट्ठो चंडो राया व ताओ कुव्वंति कुलघादं ॥९४०॥

अर्थ: क्रुद्ध सर्पकी तरह उन स्त्रियोंको दूरसे ही त्यागना चाहिए । रुष्ट प्रचण्ड राजाकी तरह वे कुलका नाश कर देती हैं ॥९४०॥


अकदम्मि वि अवराधे ताओ वीसत्थमिच्छमाणीओ ।
कुव्वंति वहं पदिणो सुदस्स ससुरस्स पिदुणो वा ॥९४१॥

अर्थ: वे स्वच्छन्द प्रवृत्तिकी इच्छासे बिना किसी अपराधके पति, पुत्र, श्वसुर अथवा पिताका घात कर देती हैं ॥९४१॥


सक्कारं उवकारं गुणं व सुहलालणं च णेहो वा ।
मधुरवयणं च महिला परगदहिदया ण चिंतेइ ॥९४२॥

अर्थ: परपुरुषमें जिसका चित्त लग जाता है वह स्त्री अपने पतिके, सन्मान, उपकार, कुल, रूप, यौवन आदि गुण, स्नेह, सुखपूर्वक लालन-पालन और मधुर वचनोंका भी विचार नहीं करती ॥९४२॥


साकेदपुराधिवदी देवरदी रज्जसुक्खपब्भट्ठो ।
पंगुलहेदुं छूडो णदीए रत्ताए देवीए ॥९४३॥

अर्थ: अयोध्या नगरीका स्वामी देवरति राज्य सुखसे वञ्चित हो गया उसकी रक्ता नामकी रानीने गान-विद्यामें प्रवीण एक लगड़े व्यक्तिपर आसक्त होकर अपने पतिको नदीमें फेंक दिया ॥९४३॥


ईसालुयाए गोववदीए गामकूडधूयिया चेव ।
छिण्णं पहदो सीसं भल्लेण पासे सीहबलो ॥९४४॥

अर्थ: ईर्ष्यालु कोपवतीने ग्रामकूटकी पुत्रीका सिर काट दिया और सिंहबलकी कोखमें भाला भोंक दिया ॥९४४॥


वीरमदीए सूलगदचोरदट्ठोट्ठिगाए वाणियओ ।
पहदो दत्तो य तहा छिण्णो ओट्ठोत्ति आलविदो ॥९४५॥

अर्थ: वीरमती एक चोरसे फँसी थी । उसे सूली दी गई तो वह उससे मिलने गई । चोरने कहा - अपने मुखका पान दो । इस बहाने चोरने उसका ओठ काट लिया । उसने कहा कि मेरे पति दत्तने मेरा ओठ काट लिया ॥९४५॥


वग्घविसचोरअग्गीजलमत्तगयकण्हसप्पसत्तूसु ।
सो वीसंभं गच्छदि वीसंभदि जो महिलियासु ॥९४६॥

अर्थ: जो स्त्रियोंका विश्वास करता है वह व्याघ्र, विष, चोर, आग, पानी, मत्त हाथी, कृष्ण सर्प, और शत्रुका विश्वास करता है अर्थात् स्त्रीपर विश्वास ऐसा ही भयानक है जैसा इनपर विश्वास करना भयानक है ॥९४६॥


वग्घादीया एदे दोसो ण णरस्स तह करेज्जण्हु ।
जं कुणइ महादोसं दुट्ठा महिला मणुस्सस्स ॥९४७॥

अर्थ: पूर्वगाथामें कहे गये व्याघ्र आदि मनुष्यका उतना अहित नहीं करते, जितना महान् अहित दुष्ट स्त्री करती है ॥९४७॥


पाउसकालणदीवोव्व ताओ णिच्चंपि कलुसहिदयाओ ।
धणहरणकदमदीओ चोरोव्व सकज्जगुरुयाओ ॥९४८॥

अर्थ: वर्षाकालकी नदियोंकी तरह स्त्रियोंका हृदय भी नित्य कलुषित रहता है। स्त्रियोंके पक्षमें हृदय शब्दका अर्थ चित्त है और नदियोंके पक्षमें अभ्यन्तर है। राग, द्वेष, मोह, ईर्ष्या, परनिन्दा अथवा मायाचारसे स्त्रियोंका चित्त सदा कलुषित रहता है। चोरकी तरह वे भी अपना कार्य करनेमें तत्पर रहती है और उनकी बुद्धि मनुष्यका धन हरनेमें रहती है। चोर भी यही विचारते रहते हैं कि कैसे हम इनका धन हरण करें। स्त्रियाँ भी मीठे वचनोंसे अथवा रतिक्रीड़ामें अनुकूल बनकर पुरुषका द्रव्य हरनेमें तत्पर रहती है ॥९४८॥


रोगो दारिद्दं वा जरा व ण उवेइ जाव पुरिसस्स ।
ताव पिओ होदि णरो कुलपुत्तीए वि महिलाए ॥९४९॥

अर्थ: कुलीन महिलाएँ प्रायः पतिको ही देवता मानकर अपने प्रियको छोड़ देती हैं। किन्तु कुलीन नारियोंका भी मनुष्य तभी तक प्रिय रहता है जब तक उसे रोग या दारिद्र्य, बुढ़ापा नहीं सताता ॥९४९॥


जुण्णो व दरिद्दो वा रोगी सो चेव होइ से वेसो ।
णिप्पीलिओव्व उच्छू मालाव मिलाय गदगंधा ॥९५०॥

अर्थ: युवावस्थामें, धनी अवस्थामें अथवा नीरोग अवस्थामें जो मनुष्य स्त्रियोंको प्रिय होता है वही मनुष्य वृद्ध, दरिद्र अथवा रोगी होने पर रस निकाली हुई ईखकी तरह अथवा गन्ध रहित मलिन मालाकी तरह अप्रिय होता है। अर्थात् रस निकाली हुई ईख और शोभा रहित गन्धहीन माला जैसे अप्रिय होती है वैसे ही यौवन धन और शक्ति पुरुष की विशेषताएँ हैं, उनके न रहने पर उसे स्त्रियाँ पसन्द नहीं करतीं ॥९५०॥


महिला पुरिसमवण्णाए चेव वंचइ णियडिकवडेहिं ।
महिला पुण पुरिसकदं जाणइ कवडं अवण्णाए ॥९५१॥

अर्थ: स्त्री पुरुषको छल कपटके द्वारा अनायास ही ठग लेती है, पुरुष स्त्रियोंके छल कपटको जान भी नहीं पाता। किन्तु पुरुषके द्वारा किये गये कपटको स्त्री तुरन्त जान लेती है उसे उसके लिये कुछ भी कष्ट उठाना नहीं होता ॥९५१॥


जह जह मण्णेइ णरो तह तह परिभवइ तं णरं महिला ।
जह जह कामेइ णरो तह तह पुरिसं विमाणेइ ॥९५२॥

अर्थ: जैसे जैसे पुरुष स्त्रीका आदर करता है वैसे वैसे स्त्री उसका निरादर करती है। जैसे जैसे मनुष्य उसकी कामना करता है वैसे वैसे वह पुरुषकी अवज्ञा करती है ॥९५२॥


मत्तो गउव्व णिच्चं पि ताउ मदविंभलाओ महिलाओ ।
दासेव सगे पुरिसे किं पि य ण गणंति महिलाओ ॥९५३॥

अर्थ: मत्त हाथीकी तरह स्त्रियाँ मदसे उन्मत्त रहती हैं। वे अपने दासमें और पतिमें कुछ भी अन्तर नहीं करतीं। यह मेरा मान्य कुलीन पति है और यह दासीका पुत्र नीच है, मैं इसकी स्वामिनी हूँ यह भेद नहीं करती ॥९५३॥


अणिहुदपरगदहिदया ताओ वग्घीव दुट्ठहिदयाओ ।
पुरिसस्स ताव सत्तू व सदा पावं विचिंतंति ॥९५४॥

अर्थ: उनका चित्त निरन्तर पर पुरुषमें रहता है। तथा व्याघ्रोकी तरह उनका हृदय दुष्ट होता है। जैसे व्याघ्री कोई अपकार न करने पर भी दूसरेको मारनेका ही विचार रखती है उसी तरह ये स्त्रियाँ भी होती हैं। वे शत्रुके समान सदा पुरुषके अशुभका ही चिन्तन करती हैं। जैसे किसीका कोई शत्रु सदा चित्तमें सोचता रहता है - इसका धन नष्ट हो जाये, इस पर विपत्तियाँ आयें, वैसे ही स्त्रियाँ भी सदा बुरा विचारा करती हैं ॥९५४॥


संझाव णरेसु सदा ताओ हुंति खणमेत्तरागाओ ।
वादोव्व महिलियाण हिदयं अदिचंचलं णिच्चं ॥९५५॥

अर्थ: सन्ध्याकी तरह स्त्रियोंका राग भी अल्प काल रहता है। जैसे सन्ध्याकी लालिमा विनाशीक है वैसी ही स्त्रियोंका अनुराग भी विनाशीक है। इससे अस्थिर रागता नामक दोष प्रकट किया है। तथा महिलाओंका हृदय वायु की तरह सदा अति चंचल होता है ॥९५५॥


जावइयाइं तणाइं वीचीओ वालिगाव रोमाइं ।
लोए हवेज्ज तत्तो महिलाचिंताइं बहुगाइं ॥९५६॥

अर्थ: लोकमें जितने तृण हैं, (समुद्रमें) जितनी लहरें हैं, बालुके जितने कण हैं तथा जितने रोम हैं, उनसे भी अधिक स्त्रियोंके मनोविकल्प हैं ॥९५६॥


आगास भूमि उदधी जल मेरू वाउणो वि परिमाणं ।
मादुं सक्का ण पुणो सक्का इत्थीण चित्ताइं ॥९५७॥

अर्थ: आकाशकी भूमि, समुद्रके जल, सुमेरु और वायुका भी परिमाण मापना शक्य है किन्तु स्त्रियोंके चित्तका मापना शक्य नहीं है ॥९५७॥


चिट्ठंति जहा ण चिरं विज्जुज्जलबुब्बुदो व उक्का वा ।
तह ण चिरं महिलाए एक्के पुरिसे हवदि पीदी ॥९५८॥

अर्थ: जैसे बिजली, पानीका बुलबुला और उल्का बहुत समय तक नहीं रहते, वैसे ही स्त्रियोंकी प्रीति एक पुरुषमें बहुत समय तक नहीं रहती ॥९५८॥


परमाणू वि कहंचिवि आगच्छेज्ज गहणं मणुस्सस्स ।
ण य सक्का घेत्तुं जे चित्तं महिलाए अदिसण्हं ॥९५९॥

अर्थ: परमाणु भी किसी प्रकार मनुष्यकी पकड़में आ सकता है। किन्तु स्त्रियोंका चित्त पकड़में आना शक्य नहीं है वह परमाणुसे भी अति सूक्ष्म है ॥९५९॥


कुविदो व किण्हसप्पो दुट्ठो सीहो गओ मदगलो वा ।
सक्का हवेज्ज घेत्तुं ण य चित्तं दुट्ठमहिलाए ॥९६०॥

अर्थ: क्रुद्ध कृष्ण सर्प, दुष्ट सिंह, मदोन्मत्त हाथीको पकड़ना शक्य हो सकता है किन्तु दुष्ट स्त्रीके चित्तको पकड़ पाना शक्य नहीं है ॥९६०॥


सक्कं हविज्ज दट्ठुं विज्जुज्जोएण रूवमच्छिम्मि ।
ण य महिलाए चित्तं सक्का अदिचंचलं णादुं ॥९६१॥

अर्थ: बिजलीके प्रकाशमें नेत्रमें स्थित रूपको देखना शक्य है किन्तु स्त्रियोंके अति चंचल चित्तको जान लेना शक्य नहीं है ॥९६१॥


अणुवत्तणाए गुणवयणेहिं य चित्तं हरंति पुरिसस्स ।
मादा व जाव ताओ रत्तं पुरिसं ण याणंति ॥९६२॥

अर्थ: जब तक वे पुरुषको अपनेमें अनुरक्त नहीं जानतीं तब तक वे पुरुषके अनुकूल वर्तन- के द्वारा तथा प्रशंसा परक वचनोंके द्वारा पुरुषके मनको उसी प्रकार आकृष्ट करती हैं जैसे माता बालकके मनको आकृष्ट करती है ॥९६२॥


अलिएहिं हसियवयणेहिं अलियरुयणेहिं अलियसवहेहिं ।
पुरिसस्स चलं चित्तं हरंति कवडाओ महिलाओ ॥९६३॥

अर्थ: बनावटी हास्य वचनोंसे, बनावटी रुदनसे, झूंठी शपथोंसे कपटी स्त्रियाँ पुरुषके चंचल चित्तको हरती हैं ॥९६३॥


महिला पुरिसं वयणेहिं हरदि पहणदि य पावहिदएण ।
वयणे अमयं चिट्ठदि हियए य विसं महिलियाए ॥९६४॥

अर्थ: स्त्री वचनोंके द्वारा पुरुषको आकृष्ट करती है और पापपूर्ण हृदयसे उसका घात करती है। स्त्रीके वचनोंमें अमृत भरा रहता है और हृदयमें विष भरा होता है ॥९६४॥


तो जाणिऊण रत्तं पुरिसं चम्मट्ठिमंसपरिसेसं ।
उद्दाहंति वधंति य बडिसामिसलग्गमच्छं व ॥९६५॥

अर्थ: जब वे जानती हैं कि हमारेमें अनुरक्त पुरुषके पास चाम हड्डी और मांस ही शेष है तो उसे वंशीमें लगे मांसके लोभसे फँसे मत्स्यकी तरह संताप देकर मार डालती हैं ॥९६५॥


उदए पवेज्ज हि सिला अग्गी ण डहिज्ज सीयलो होज्ज ।
ण य महिलाण कदाई उज्जुयभावो णरेसु हवे ॥९६६॥

अर्थ: शिला पानीमें तिर सकती है। आग भी न जलाकर शीतल हो सकती है किन्तु स्त्रीका मनुष्यके प्रति कभी भी सरल भाव नहीं होता ॥९६६॥


उज्जुयभावम्मि असत्तयम्मि किध होदि तासु वीसंभो ।
विस्संभम्मि असंते का होज्ज रदो महिलियासु ॥९६७॥

अर्थ: सरल भावके अभावमें कैसे उनमें विश्वास हो सकता है। और विश्वासके अभावमें स्त्रियोंमें प्रेम कैसे हो सकता है ॥९६७॥


गच्छिज्ज समुद्दस्स वि पारं पुरिसो तरित्तु ओघबलो ।
मायाजलमहिलोदधिपारं ण य सक्कदे गंतुं ॥९६८॥

अर्थ: महाबलशाली मनुष्य समुद्रको भी पार करके जा सकता है। किन्तु मायारूपी जलसे भरे स्त्रीरूपी समुद्रको पार नहीं कर सकता ॥९६८॥


रदणाउला सवग्घावगुहा गाहाउला च रम्मणदी ।
मधुरा रमणिज्जावि य सढा य महिला सदोसा य ॥९६९॥

अर्थ: रत्नोंसे भरी किन्तु व्याघ्रके निवाससे युक्त गुफा और मगरमच्छसे भरी सुन्दर नदीकी तरह स्त्री मधुर और रमणीय होते हुए भी कुटिल और सदोष होती है ॥९६९॥


दिट्ठं पि सब्भावं पडिज्जदि णियडिमेव उद्देदि ।
गोधाणुलुक्कमिच्छी करेदि पुरिसस्स कुलजावि ॥९७०॥

अर्थ: दूसरेने स्त्रीमें दोष देखा हो तो भी स्त्री यह स्वीकार नहीं करती कि मेरेमें यह दोष है। प्रत्युत यही कहती है कि मेरा यह दोष नहीं है या मैंने ऐसा नहीं किया है। इस विषयमें दृष्टान्त कहते हैं - जैसे गोह जिस भूमिको पकड़ लेती है, बलपूर्वक छुड़ाने पर भी उसे नहीं छोड़ती। उसी प्रकार स्त्री भी अपने द्वारा गृहीत पदको नहीं छोड़ती। अन्य भी अर्थ टीकाकारोंने किया है - जैसे गोह पुरुषको देखकर उससे अपनेको छिपाती है उसी प्रकार स्त्री भी पुरुषको देखकर अपनेको छिपाती है कि यह मुझे न देख सके। अथवा दूसरेने कोई अच्छा कार्य किया और स्त्रीने उसे देखा भी, फिर भी वह उसे स्वीकार नहीं करती, बल्कि व्यंग रूपसे उसको बुरा ही कहती है ॥९७०॥


पुरिसं वधमुवणेदित्ति होदि बहुगा णिरुत्तिवादम्मि ।
दोसे संघादिदि य होदि य इत्थी मणुस्सस्स ॥९७१॥

अर्थ: स्त्री वाचक शब्दोंकी निरुक्तिके द्वारा भी स्त्रीके दोष प्रकट होते हैं - पुरुषका वध करती है इसलिये उसे वधू कहते हैं। मनुष्यमें दोषोंको एकत्र करती है इसलिये स्त्री कहते हैं ॥९७१॥


तारिसओ णत्थि अरी णरस्स अण्णोत्ति उच्चदे णारी ।
पुरिसं सदा पमत्तं कुणदित्ति य उच्चदे पमदा ॥९७२॥

अर्थ: मनुष्यका ऐसा ‘अरि’ शत्रु दूसरा नहीं है इसलिए उसे नारी कहते हैं । पुरुषको सदा प्रमत्त करती है इसलिये उसे प्रमदा कहते हैं ॥९७२॥


गलए लायदि पुरिसस्स अणत्थं जेण तेण विलया सा ।
जोजेदि णरं दुक्खेण तेण जुवदी य जोसा य ॥९७३॥

अर्थ: पुरुषके गलेमें अनर्थ लाती है । अथवा पुरुषको देखकर विलीन होती है इसलिए विलया कहते हैं । पुरुषको दुःखसे योजित करती है इससे युवती और योषा कहते हैं ॥९७३॥


अबलत्ति होदि जं से ण दढं हिदयम्मि धिदिबलं अत्थि ।
कुम्मरणोपायं जं जणयदि तो उच्चदि हि कुमारी ॥९७४॥

अर्थ: उसके हृदयमें धैर्यरूपी बल नहीं होता अतः वह अबला कही जाती है । कुमरणका उपाय उत्पन्न करनेसे कुमारी कहते हैं ॥९७४॥


आलं जणेदि पुरिसस्स महल्लं जेण तेण महिला सा ।
एयं महिलाणामाणि होंति असुभाणि सव्वाणि ॥९७५॥

अर्थ: पुरुष पर आल - दोषारोप करती है इसलिए महिला कहते हैं । इस प्रकार स्त्रियोंके सब नाम अशुभ होते हैं ॥९७५॥


णिलओ कलीए अलियस्स आलओ अविणयस्स आवासो ।
आयसस्सावसधो महिला मूलं च कलहस्स ॥९७६॥

अर्थ: स्त्री रागद्वेषका घर है । असत्यका आश्रय है । अविनयका आवास है, कष्टका निकेतन है और कलहका मूल है ॥९७६॥


सोगस्स सरी वेरस्स खणी णिवहो वि होइ कोहस्स ।
णिचओ णियडीणं आसवो महिला अकित्तीए ॥९७७॥

अर्थ: शोककी नदी है । वैरकी खान है । क्रोधका पुंज है । मायाचारका ढेर है । अपयशका आश्रय है ॥९७७॥


णासो अत्थस्स खओ देहस्स य दुग्गदीपमग्गो य ।
आवाहो य अणत्थस्स होइ पहवो य दोसाणं ॥९७८॥

अर्थ: धनका नाश करने वाली है । शरीरका क्षय करती है । दुर्गतिका मार्ग है । अनर्थके लिए प्याऊ है और दोषोंका उत्पत्ति स्थान है ॥९७८॥


महिला विग्घो धम्मस्स होदि परिहो य मोक्खमग्गस्स ।
दुक्खाण य उप्पत्ती महिला सुक्खाण य विपत्ती ॥९७९॥

अर्थ: स्त्री धर्ममें विघ्नरूप है । मोक्षमार्गके लिए अर्गला (साकल) है, दुःखोंकी उत्पत्तिका स्थान है और सुखोंके लिए विपत्ति है ॥९७९॥


पासो व बंधिदुं जे छेत्तुं महिला असीव पुरिसस्स ।
सिल्लं व विंधिदुं जे पंकोव णिमज्जिदुं महिला ॥९८०॥

अर्थ: स्त्री पुरुषको बाँधनेके लिए पाशके समान है । मनुष्यको काटनेके लिए तलवारके समान है । बींधनेके लिये भालेके समान है और डूबनेके लिये पंकके समान है ॥९८०॥


सूलो इव भेत्तुं जे होइ पवोदुं तहा गिरिणदी वा ।
पुरिसस्स खुप्पदुं कद्दमोव मच्चुव्व मरिदुं जे ॥९८१॥

अर्थ: स्त्री मनुष्यके भेदनेके लिए शूलके समान है । संसार रूपी समुद्रमें गिरनेके लिए नदीके समान है । खपानेके लिए दलदलके समान है । मारनेको मृत्युके समान है ॥९८१॥


अग्गीवि य डहिदुं जे मदोव पुरिसस्स मुज्झिदुं महिला ।
महिला णिकचिदुं करकचोव कंडुव्व पउलेदुं ॥९८२॥

अर्थ: जलानेको आगके समान है । मदहोश करनेके लिए मदिराके समान है । काटनेके लिए आरेके समान है । पकानेके लिए हलवाईके समान है ॥९८२॥


पाडेदुं परसू वा होदि तह मुग्गरो व ताडेदुं ।
अवहणणं पि य चुण्णेदुं जे महिला मणुस्सस्स ॥९८३॥

अर्थ: विदारण करनेके लिए फरसाके समान है । तोड़नेके लिए मुद्गरके समान है, चूर्ण करनेके लिए लुहारके घनके समान है ॥९८३॥


चंदो हविज्ज उण्हो सीदो सूरो वि थड्डमागासं ।
ण य होज्ज अदोसा भद्दिया वि कुलबालिया महिला ॥९८४॥

अर्थ: कदाचित् चन्द्रमा उष्ण हो जाय, सूर्य शीतल हो जाय, आकाश कठोर हो जाय, किन्तु कुलीन स्त्री भी निर्दोष और भद्र परिणामी नहीं होती ॥९८४॥


एए अण्णेय बहुदोसे महिलाकदे वि चिंतयदो ।
महिलाहिंतो विचित्तं उव्वियदि विसग्गिसरसीहिं ॥९८५॥

अर्थ: स्त्रियोंके इन तथा अन्य बहुतसे दोषोंका विचार करने वाले पुरुषोंका मन विष और आगके समान स्त्रियोंसे विमुख हो जाता है ॥९८५॥


वग्घादीणं दोसे णच्चा परिहरदि ते जहा पुरिसो ।
तह महिलाणं दोसे दट्ठुं महिलाओ परिहरइ ॥९८६॥

अर्थ: जैसे पुरुष व्याघ्र आदिके दोष देखकर व्याघ्र आदिको त्याग देता है उनसे दूर रहता है, वैसे ही स्त्रियोंके दोष देखकर मनुष्य स्त्रियोंसे दूर हो जाता है ॥९८६॥


महिलाणं जे दोसा ते पुरिसाणं पि हुंति णीयाणं ।
तत्तो अहियदरा वा तेसिं बलसत्तिजुत्ताणं ॥९८७॥

अर्थ: स्त्रियोंमें जो दोष होते हैं वे दोष नीच पुरुषोंमें भी होते हैं अथवा मनुष्योंमें जो बल और शक्तिसे युक्त होते हैं उनमें स्त्रियोंसे भी अधिक दोष होते हैं ॥९८७॥


जह सीलरक्खयाणं पुरिसाणं णिंदिदाओ महिलाओ ।
तह सीलरक्खियाणं महिलाणं णिंदिदा पुरिसा ॥९८८॥

अर्थ: जैसे अपने शीलकी रक्षा करने वाले पुरुषोंके लिए स्त्रियाँ निन्दनीय हैं। वैसे ही अपने शीलकी रक्षा करने वाली स्त्रियोंके लिए पुरुष निन्दनीय हैं ॥९८८॥


किं पुण गुणसहिदाओ इत्थीओ अत्थि वित्थडजसाओ ।
णरलोगदेवदाओ देवेहिं वि वंदणिज्जाओ ॥९८९॥

अर्थ: जो गुणसहित स्त्रियाँ हैं, जिनका यश लोकमें फैला हुआ है, तथा जो मनुष्य लोकमें देवता समान हैं और देवोंसे पूजनीय हैं उनकी जितनी प्रशंसा की जाये, कम है ॥९८९॥


तित्थयरचक्कधरवासुदेवबलदेवगणधरवराणं ।
जणणीओ महिलाओ सुरणरवरेहिं महियाओ ॥९९०॥

अर्थ: तीर्थंकर, चक्रवर्ती, वासुदेव, बलदेव और श्रेष्ठ गणधरोंको जन्म देने वाली महिलाएँ श्रेष्ठ देवों और उत्तम पुरुषोंके द्वारा पूजनीय होती है ॥९९०॥


एगपदिव्वइकण्णावयाणि धारिंति कित्ति१ महिलाओ ।
वेधव्वतिव्वदुक्खं आजीवं णिंति काओ वि ॥९९१॥

अर्थ: कितनी ही महिलाएँ एक पतिव्रत और कौमार ब्रह्मचर्य व्रत धारण करती हैं। कितनी ही जीवन पर्यन्त वैधव्यका तीव्र दुःख भोगती हैं ॥९९१॥


सीलवदीवो सुव्वंति महीयले पत्तपाडिहेराओ ।
सावाणुग्गहसमत्थाओ वि य काओवि महिलाओ ॥९९२॥

अर्थ: ऐसी भी कितनी शीलवती स्त्रियाँ सुनी जाती हैं जिन्हें देवोंके द्वारा सन्मान आदि प्राप्त हुआ तथा जो शीलके प्रभावसे शाप देने और अनुग्रह करनेमें समर्थ थीं ॥९९२॥


ओघेण ण वूढाओ जलंतघोरग्गिणा ण दड्ढाओ ।
सप्पेहिं २सावदेहिं य परिहरिदाओव काओ वि ॥९९३॥

अर्थ: कितनी ही शीलवती स्त्रियाँ महानदीके जल प्रवाहमें भी नहीं डूब सकीं और प्रज्वलित घोर आगमें भी नहीं जल सकीं तथा सर्प व्याघ्र आदि भी उनका कुछ नहीं कर सके ॥९९३॥


सव्वगुणसमग्गाणं साहूणं पुरिसपवरसीहाणं ।
चरमाणं जणणित्तं पत्ताओ हवंति काओ वि ॥९९४॥

अर्थ: कितनी ही स्त्रियाँ सर्व गुणोंसे सम्पन्न साधुओं और पुरुषोंमें श्रेष्ठ चरम शरीरी पुरुषोंको जन्म देने वाली माताएँ हुई हैं ॥९९४॥


मोहोदयेण जीवो सव्वो दुस्सीलमइलिदो होदि ।
सो पुण सव्वो महिला पुरिसाणं होइ सामण्णो ॥९९५॥

अर्थ: सब जीव मोहके उदयसे कुशीलसे मलिन होते हैं। और वह मोहका उदय स्त्री-पुरुषोंके समान रूपसे होता है ॥९९५॥


तम्हा सा ३पल्लवणा पउरा महिलाण होदि अधिकिच्चा ।
सीलवदीओ भणिदे दोसे किह णाम पावंति ॥९९६॥

अर्थ: अतः ऊपर जो स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन किया है वह स्त्री सामान्यकी दृष्टिसे किया है। शीलवती स्त्रियोंमें ऊपर कहे दोष कैसे हो सकते हैं ॥९९६॥


देहस्स बीयणिप्पत्तिखेत्तआहारजम्मवुड्ढीओ ।
अवयवणिग्गमअसुई पिच्छसु वाधी य अधुवत्तं ॥९९७॥

अर्थ: हे क्षपक ! ब्रह्मचर्य व्रतकी सिद्धिके लिए मनुष्योंके शरीरके बीज, उत्पत्ति, क्षेत्र, आहार, जन्म, जन्मके पश्चात् होने वाली वृद्धि, अवयव, कान आदि अंगोंसे निकलने वाला मल, अशुचिता, व्याधि और अध्रुवपनको देखो । ऐसा आचार्य कहते हैं ॥९९७॥


देहस्स सुक्कसोणिय असुई परिणामिकारणं जम्हा ।
देहो वि होइ असुई अमेज्झघदपूरओ व तदो ॥९९८॥

अर्थ: मनुष्योंके शरीरका बीज रज और वीर्य है जो अशुचि है । वही परिणामिकारण है । पुरुषका वीर्य और स्त्रीका रज ये दोनों शरीर रूपसे परिणमन करते हैं इसलिए ये दोनों परिणामिकारण हैं । इसीसे शरीर भी अशुचि है जैसे मलसे बना घेवर अशुचि होता है । जिसका परिणामिकारण अशुचि होता है वह अशुचि होता है । जैसे मलिन वस्तुसे बना घेवर । शरीरका परिणामिकारण रज और वीर्य अशुचि हैं इसलिए शरीर अशुचि है । यह इस गाथा सूत्रका अभिप्राय है ॥९९८॥


दट्ठुं वि अमेज्झमिव विहिंसणीयं कुदो पुणो होज्ज ।
ओज्जिग्घिदुमालद्धुं परिभोत्तुं चावि तं बीयं ॥९९९॥

अर्थ: जो विष्ठाकी तरह देखनेमें भी ग्लानिके योग्य है वह रज और वीर्य नामक बीज सूंघने, आलिंगन करने और भोगनेके योग्य कैसे हो सकता है ? रज और वीर्य रूप बीज शरीरका परिणामिकारण है अतः शरीरको बीज मानकर ‘बीज’ शब्दसे शरीरका निर्देश किया है ॥९९९॥


समिदकदो घदपुण्णो सुज्झदि सुद्धत्तणेण समिदस्स ।
असुचिम्मि तम्मि बीए कह देहो सो हवे सुद्धो ॥१०००॥

अर्थ: जैसे ‘समिद’ अर्थात् गेहूँके चूर्णसे बना घेवर शुद्ध होता है क्योंकि उसका परिणामि- कारण गेहूँका चूर्ण शुद्ध है। किन्तु जिसका बीज अशुद्ध है उससे बना शरीर शुद्ध कैसे हो सकता है ॥१०००॥


कललगदं दसरत्तं अच्छदि कलुसीकदं च दसरत्तं ।
थिरभूदं दसरत्तं अच्छदि गब्भम्मि तं बीयं ॥१००१॥

अर्थ: गर्भमें स्थित माताका रज और पिताका वीर्यरूप बीज दस दिनतक कललरूपमें रहता है । फिर दस दिन तक कालिमारूप होता है फिर दस दिन तक स्थिर रहता है ॥१००१॥


तत्तो मासं बुब्बुदभूदं अच्छदि पुणो वि घणभूदं ।
जायदि मासेण तदो मंसप्पेसी य मासेण ॥१००२॥

अर्थ: स्थिर होनेके पश्चात् एक मास तक बुलबुलेकी तरह रहता है । पुनः एक मास तक घनभूत अर्थात् कठोररूप रहता है । फिर एकमासमें मांसके पिण्डरूप होता है ॥१००२॥


मासेण पंच पुलगा तत्तो हुंति हु पुणो वि मासेण ।
अंगाणि उवंगाणि य णरस्स जायंति गब्भम्मि ॥१००३॥

अर्थ: पाँचवें मासमें उस मांसपिण्डमेंसे दो हाथ, दो पैर और सिरके रूपमें पाँच अंकुर उगते हैं । छठे मासमें उस बालकके अंग और उपांग बनते हैं ॥१००३॥


मासम्मि सत्तमे तस्स होदि चम्मणहरोमणिप्पत्ती ।
फंदणमट्ठममासे णवमे दसमे य णिग्गमणं ॥१००४॥

अर्थ: सातवें मासमें उस गर्भस्थ पिण्डपर चर्म, नख और रोम बनते हैं । आठवें मासमें उसमें हलन-चलन होने लगता है । नौवें अथवा दसवे मासमें उसका जन्म होता है ॥१००४॥


सव्वासु अवत्थासु वि कललादीयाणि ताणि सव्वाणि ।
असुईणि अमिज्झाणि य विहिंसणिज्जाणि णिच्चंपि ॥१००५॥

अर्थ: रज और वीर्यकी सब अवस्थाओंमें वे सब कलिल आदि अशुचि और विष्टाकी तरह सदा ग्लानिकारक होते हैं ॥१००५॥


आमासयम्मि पक्कासयस्स उवरिं अमेज्झमज्झम्मि ।
वत्थिपडलपच्छण्णो अच्छइ गब्भे हु णवमासं ॥१००६॥

अर्थ: आमाशयसे नीचे और पक्वाशयसे ऊपर इन दोनों अशुचि स्थानोंके मध्यमें गर्भाशय होता है । उसमें वस्तिपटलसे वेष्टित होकर प्राणी नौमास तक रहता है ॥१००६॥


वमिदा अमेज्झमज्झे मासंपि समक्खमच्छिदो पुरिसो ।
होदि हु विहिंसणिज्जो जदि वि रयणीयल्लओ होज्ज ॥१००७॥

अर्थ: गन्दे वमनके मध्यमें एकमास पर्यन्त प्रत्यक्षरूपसे रहनेवाला पुरुष, यदि अपना इष्टमित्र भी हो तो भी ग्लानिका ही पात्र होता है ॥१००७॥


किह पुण णवदसमासे उसिदो वमिगा अमेज्झमज्झम्मि ।
होज्ज ण विहिंसणिज्जो जदि वि सय णीयल्लओ होज्ज ॥१००८॥

अर्थ: तब माताके द्वारा खाये गये वमनरूप आहारको खाकर गन्दे स्थानमें नौ दस मास रहनेवाला ग्लानिका पात्र क्यों नहीं है, भले ही वह अपना निकट बन्धु हो ॥१००८॥


दंतेहिं चव्विदं वीलणं च सिंभेण मेलिदं संतं ।
मायाहारियमण्णं जुत्तं पित्तेण कडुएण ॥१००९॥

अर्थ: जिस आहारसे उसका शरीर बना उसे कहते हैं - माताके द्वारा खाया हुआ अन्न पहले दाँतोंसे चबाया गया । फिर कफके साथ मिलकर चिकना हुआ फिर कटुक पित्तसे युक्त हुआ ॥१००९॥


वमिगं अमेज्झसरिसं वादविओजिदरसं खलं गब्भे ।
आहारेदि समंता उवरिं थिप्पंतगं णिच्चं ॥१०१०॥

अर्थ: ऐसा होनेपर वह वमनके समान गन्दा होता है । वायुके द्वारा उसका रस भाग अलग हो जाता है और खलभाग अलग । उसमेंसे गिरती हुई बूंदको सर्वांगसे गर्भस्थपिण्ड नित्य ग्रहण करता है । इससे यह ज्ञात होता है कि वह अन्नका रस ग्रहण करता है ॥१०१०॥


तो सत्तमम्मि मासे उप्पलणालसरिसी हवइ णाही ।
तत्तो पभुदि याए वमियं तं आहारेदि णाहीए ॥१०११॥

अर्थ: इसके पश्चात् सातवें मासमें कमलकी नालके समान नाभि होती है। नाभिके बननेके पश्चात् उस वमन किये आहारको नाभिके द्वारा ग्रहण करता है ॥१०११॥


वमियं व अमेज्झं वा आहारिदं स किं पि ससमक्खं ।
होदि हु विहिंसणिज्जो जदि वि य णियल्लओ होज्ज ॥१०१२॥

अर्थ: यदि कोई अपने सामने एक बार भी वमन किये गये आहारको या गन्दे विष्टाको खाता है तो अपना प्रिय बन्धु भी यदि हो तो उससे ग्लानि होती है ॥१०१२॥


किह पुण णवदसमासे आहारेदूण तं णरो वमियं ।
होज्ज ण विहिंसणिज्जो जदि वि य णीयल्लओ होज्ज ॥१०१३॥

अर्थ: तब जो मनुष्य नौ दस महीने उस वमन तुल्य आहारको खाता है वह ग्लानिका पात्र क्यों नहीं होगा, भले ही वह अपना प्रियबन्धु हो ॥१०१३॥


असुचिं अपेच्छणिज्जं दुग्गंधं मुत्तसोणियदुवारं ।
वोत्तुं पि लज्जणिज्जं पोट्टमुहं जम्मभूमी से ॥१०१४॥

अर्थ: उदरका मुख योनि उसका जन्मस्थान है। वहींसे उसका जन्म होता है। वह स्थान अशुचि है, देखने योग्य नहीं है, दुर्गन्धयुक्त है, मूत्र और रक्तके निकलनेका द्वार है। उसका नाम लेनेमें भी लज्जा आती है ॥१०१४॥


जदि दाव विहिंसज्जइ बत्थीए मुहं परस्स आलेद्टुं ।
कह सो विहिंसणिज्जो ण होज्ज सल्लीढपोट्टमुहो ॥१०१५॥

अर्थ: यदि दूसरेके बस्तिमुख - गुदा अथवा योनिको देखनेमें भी ग्लानि होती है तो जो उसका आस्वादन करता है वह ग्लानिका पात्र क्यों नहीं है ॥१०१५॥


बालो विहिंसणिज्जाणि कुणदि तह चेव लज्जणिज्जाणि ।
मेज्झामेज्झं कज्जाकज्जं किंचि[?]अयाणंतो ॥१०१६॥

अर्थ: बालक शुचि अशुचि और कार्य अकार्यको कुछ भी नहीं जानता । तथा निन्दनीय और लज्जाके योग्य कार्य करता है ॥१०१६॥


अण्णस्स अप्पणो वा सिंहाणयखेलमुत्तपुरिसाणि ।
चम्मट्ठिवसापूयादीणि य तुंडे सगे छुभदि ॥१०१७॥

अर्थ: अपना अथवा दूसरेका कफ, मूत्र, विष्ठा, चमड़ा, हड्डी, चर्बी, पीव, आदि अपने मुखमें रख लेता है ॥१०१७॥


जं किं चि खादि जं किं चि कुणदि जं किं चि जंपदि अलज्जो ।
जं किं चि जत्थ तत्थ वि वोसरदि अयाणगो बालो ॥१०१८॥

अर्थ: अनजान बालक जो कुछ भी खा लेता है, जो कुछ भी करता है, निर्लज्ज होकर जो कुछ भी बोलता है । जिस किसी भी पवित्र या अपवित्र स्थानमें टट्टी पेशाब कर देता है ॥१०१८॥


बालत्तणे कदं सव्वमेव जदि णाम संभरेज्ज तदो ।
अप्पाणम्मि वि गच्छे णिव्वेदं किं पुण परंमि ॥१०१९॥

अर्थ: यदि बचपनमें किये गये सब कार्योंको याद किया जाये तो दूसरेकी तो बात ही क्या, अपनेसे ही वैराग्य हो जाय ॥१०१९॥


कुणिमकुडी कुणिमेहिं य भरिदा कुणिमं च सवदि सव्वत्तो ।
ताणं व अमेज्झमयं अमेज्झभरिदं सरीरमिणं ॥१०२०॥

अर्थ: यह शरीर कुथित अर्थात् मलिन वस्तुओंकी कुटी है और मलिन वस्तुओंसे ही भरी है। सब तरफसे महामलिन मल ही उससे बहता रहता है। मलसे भरे पात्रके समान यह शरीर मलसे भरा होनेसे मलमय ही है ॥१०२०॥


अट्ठीणि हुंति तिण्णि दु सदाणि भरिदाणि कुणिममज्जाए ।
सव्वम्मि चेव देहे संधीणि हवंति तावदिया ॥१०२१॥

अर्थ: इस शरीरमें तीन सौ हड्डियाँ हैं जो कुथित मज्जासे भरी हैं। तथा सम्पूर्ण शरीरमें तीन सौ ही सन्धियाँ हैं ॥१०२१॥


ण्हारूण णवसदाइं सिरासदाणि हवंति सत्तेव ।
देहम्मि मंसपेसीण हुंति पंचेव य सदाणि ॥१०२२॥

अर्थ: नौ सौ स्नायु हैं। सिराएँ सात सौ हैं। पाँच सौ मांस पेशियाँ हैं १०२२॥


चत्तारि सिराजालाणि हुंति सोलस य कंडराणि तहा ।
छच्चेव सिराकुच्चा देहे दो मंसरज्जू य ॥१०२३॥

अर्थ: चार शिराजाल हैं। सोलह रक्तसे पूर्ण महाशिराएँ हैं। छह शिराओंके मूल हैं। दो मांस रज्जु हैं एक पीठ और एक पेटके आश्रित हैं ॥१०२३॥


सत्त तयाओ कालेज्जयाणि सत्तेव होंति देहम्मि ।
देहम्मि रोमकोडीण होंति असीदिं सदसहस्सा ॥१०२४॥

अर्थ: सात त्वचाएँ हैं। सात कालेयक-मांसखण्ड हैं। और अस्सी लाख करोड़ रोम हैं ॥१०२४॥


पक्कामयासयत्था य अंतगुंजाओ सोलस हवंति ।
कुणिमस्स आसया सत्त हुंति देहे मणुस्सस्स ॥१०२५॥

अर्थ: पक्वाशय और आमाशयमें सोलह आते हैं। तथा मनुष्यके शरीरमें सात मलस्थान हैं ॥१०२५॥


थूणाओ तिण्णि देहम्मि होंति सत्तुत्तरं च मम्मसदं ।
णव होंति वणमुहाइं णिच्चं कुणिमं सवंताइं ॥१०२६॥

अर्थ: शरीरमें वात पित्त कफ ये तीन थूणाएं हैं। एक सौ सात मर्मस्थान है। नौ व्रण-मुख-मलद्वार हैं जिनसे सदा मल बहता रहता है ॥१०२६॥


देहम्मि मच्छुलिंगं अंजलिमित्तं सयप्पमाणेण ।
अंजलिमित्तो मेदो उज्जोवि य तत्तिओ चेव ॥१०२७॥

अर्थ: तथा अपनी एक अंजुलीप्रमाण मस्तिष्क है। एक अंजुलिप्रमाण मेद है और एक अंगुलिप्रमाण वीर्य है ॥१०२७॥


तिण्णि य वसंजलीओ छच्चेव य अंजलीओ पित्तस्स ।
सिंभो पित्तसमाणो लोहिदमद्धाढगं होदि ॥१०२८॥

अर्थ: तीन अंजुलिप्रमाण वसा - चर्बी है। छह अंजुलिप्रमाण पित्त है। पित्त प्रमाण ही कफ है। रुधिर आधे आढक या बत्तीस पल प्रमाण है ॥१०२८॥


मुत्तं आढयमेत्तं उच्चारस्स य हवंति छप्पच्छा ।
वीसं णहाणि दंता बत्तीसं होंति पगदीए ॥१०२९॥

अर्थ: मूत्र एक आढक प्रमाण है। विष्टा छह प्रस्थ प्रमाण है। स्वाभाविकरूपमें बीस नख और बत्तीस दांत होते हैं ॥१०२९॥


किमिणो व वणो भरिदं सरीरं किमिकुलेहिं बहुगेहिं ।
सव्वं देहं अप्फंदिदूण वादा ठिदा पंच ॥१०३०॥

अर्थ: जैसे घावमें कीड़े भरे रहते हैं वैसे ही शरीर बहुतसे कीड़ोंसे भरा है। समस्त शरीरको घेरे हुए पाँच वायु हैं ॥१०३०॥


एवं सव्वे देहम्मि अवयवा कुणिमपुग्गला चेव ।
एक्कं पि णत्थि अंगं पूयं सुचियं च जं होज्ज ॥१०३१॥

अर्थ: इस प्रकार शरीरके सब अवयव अशुभ पुद्गलरूप ही हैं। एक भी अवयव ऐसा नहीं है जो पवित्र और सुन्दर हो ॥१०३१॥


परिदड्ढसव्वचम्मं पंडुरगत्तं मुयंतवणरसियं ।
सुट्ठु वि दइदं महिलं दट्ठुंपि णरो ण इच्छेज्ज ॥१०३२॥

अर्थ: जिसकी सब चमड़ी जल जानेसे शरीर सफेद वर्णका हो गया है, और उससे पीव बहता है ऐसी नारी अतिप्रिय भी हो तो उसे मनुष्य देखना भी नहीं चाहता ॥१०३२॥


जदि होज्ज मच्छियापत्तसरिसियाए णो थगिदं ।
को णाम कुणिमभरियं सरीरमालद्धुमिच्छेज्ज ॥१०३३॥

अर्थ: यदि शरीर मक्खीके पंखके समान त्वचासे वेष्टित न हो तो मलसे भरे शरीरको कौन छूना पसन्द करेगा ॥१०३३॥


कण्णेसु कण्णगूधो जायदि अच्छीसु चिक्कणंसूणि ।
णासागूधो सिंघाणयं च णासापुडेसु तहा ॥१०३४॥

अर्थ: कानोंसे कानका मल उत्पन्न होता है । आँखोंमें आँखका मल और आँसू रहते हैं । तथा नाकमें नाकका मल और सिंघाड़े रहते हैं ॥१०३४॥


खेलो पित्तो सिंभो वमिया जिब्भामलो य दंतमलो ।
लाला जायदि तुंडम्मिणिच्चं मुत्तपुरिससुक्कमुदरत्थं ॥१०३५॥

अर्थ: मुखमें खखार, पित्त, कफ, वमन, जीभका मल, दन्तमल और लार उत्पन्न होते हैं । और उदरमें मूत्र, विष्टा तथा वीर्य उत्पन्न होते हैं ॥१०३५॥


सेदो जायदि सिलेसो व चिक्कणो सव्वरोमकूवेसु ।
जायंति जूवलिक्खा छप्पदियाओ य सेदेण ॥१०३६॥

अर्थ: शरीरके सब रोमकूपोंसे चमारके सिरेसके समान चिपचिपा पसीना निकलता है । और पसीनेके कारण लीख और जूं उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार शरीरके अवयवोंका कथन हुआ ॥१०३६॥


विट्ठापुण्णो भिण्णो व घडो कुणिमं समंतदो गलइ ।
पूदिगालो किमिणोव वणो पूदिं च वादि सदा ॥१०३७॥

अर्थ: जैसे विष्टासे भरे और फूटे हुए घड़ेसे चारों ओरसे गन्दगी बहती है अथवा जैसे कृमियोंसे भरे घावसे दुर्गन्धयुक्त पीव बहती है वैसे ही शरीरसे निरन्तर मल बहता है ॥१०३७॥


इंगालो धोवंते ण सुज्झदि जहा पयत्तेण ।
सव्वेहिं समुद्देहिम्मि सुज्झदि देहो ण धुव्वंतो ॥१०३८॥

अर्थ: जैसे कोयलेको सब समुद्रके जलसे प्रयत्नपूर्वक धोनेपर भी वह उजला नहीं होता, उसमेंसे कालापन ही निकलता है, वैसे ही शरीरको बहुत जलादिसे धोनेपर भी वह शुद्ध नहीं होता, उसमेंसे मल ही निकलता है ॥१०३८॥


सिण्हाणुब्भंगुव्वट्टणेहिं मुहदंतअच्छिधुवणेहिं ।
णिच्चं पि धोवमाणो वादि सदा पूदियं देहो ॥१०३९॥

अर्थ: स्नान, इत्र फुलेल, उबटन आदिसे तथा मुख दाँत और आँखोंको धोनेसे नित्य ही स्वच्छ करनेपर भी शरीर सदा दुर्गन्ध देता है, वह उसे छोड़ता नहीं ॥१०३९॥


पाहाणधादुअंजणपुढवितयाछल्लिवल्लिमूलेहिं ।
मुहकेसवासगंधोल्लगंधमल्लेहिं धूवेहिं ॥१०४०॥

अर्थ: पाषाण शब्दसे रत्नोंको कहा है । धातुसे जल लिया है । पृथ्वीसे मिट्टीका ग्रहण किया है । त्वचासे मध्यकी त्वचा ली है और छालसे ऊपरकी छाल ली है । अतः रत्न, जल, अंजन, मिट्टी, त्वचा, छाल बेल और जड़से तथा मुखको सुवासित करनेवाले ताम्बूल आदि और केशोंको सुगन्धित करनेवाले गन्धमाला धूप आदिसे परके शरीरकी दुर्गन्ध दूर करके मूढ़-जन मोहित होकर पराये शरीरको भोगते हैं । जैसे मिर्च, हींग आदि मसाले मिलाकर, दुर्गन्धयुक्त मांसको मांसभोजी जन खाते हैं वैसे ही कामीजन स्त्रीके दुर्गन्धयुक्त शरीरको तेल फुलेल आदिसे सुवासित करके भोगते हैं ॥१०४०-१०४१॥


अभिभूददुब्भिगंधं परिभुज्जदि मोहिएहिं परदेहं ।
खज्जति पूइयमं संजुत्तं जह कडुगभंडेण ॥१०४१॥

अर्थ: पाषाण शब्दसे रत्नोंको कहा है। धातुसे जल लिया है। पृथ्वीसे मिट्टीका ग्रहण किया है। त्वचासे मध्यकी त्वचा ली है और छालसे ऊपरकी छाल ली है। अतः रत्न, जल, अंजन, मिट्टी, त्वचा, छाल बेल और जड़से तथा मुखको सुवासित करनेवाले ताम्बूल आदि और केशोंको सुगन्धित करनेवाले गन्धमाला धूप आदिसे परके शरीरकी दुर्गन्ध दूर करके मूढ़जन मोहित होकर पराये शरीरको भोगते हैं। जैसे मिर्च, हींग आदि मसालें मिलाकर, दुर्गन्धयुक्त मांसको मांसभोजी जन खाते हैं वैसे ही कामीजन स्त्रीके दुर्गन्धयुक्त शरीरको तेल फुलेल आदिसे सुवासित करके भोगते हैं ॥१०४०-१०४१॥ ॥१०४१॥


अब्भंगादीहिं विणा सभावदो चेव जदि [?] ।
सोभेज्ज मोरदेहुव्व होज्ज तो णाम से सोभा ॥१०४२॥

अर्थ: जैसे मोरका शरीर स्वभावसे ही सुन्दर होता है वैसे ही यदि सुगन्धयुक्त तेलसे मालिश, उबटन, स्नान, आदिके विना स्वभावसे यह शरीर शोभायुक्त होता तो उसे सुन्दर कहना उचित होता ॥१०४२॥


जदि दा विहिंसदि णरो आलद्धुं पडिदमप्पणो खेलं ।
कधदा णिपिबेज्ज बुधो महिलामुहजायकुणिमजलं ॥१०४३॥

अर्थ: यदि मनुष्य बाहरमें पड़े अपने कफको भी छूनेमें ग्लानि करता है तो ज्ञानीपुरुष युवती स्त्रीके मुखसे उत्पन्न हुई दुर्गन्धयुक्त लारको कैसे पीवेगा ॥१०४३॥


अंतो बहिं च मज्झे व कोइ सारो सरीरगे णत्थि ।
एरंडगो व देहो णिस्सारो सव्वहिं चेव ॥१०४४॥

अर्थ: अन्तरमें, बाहरमें और मध्यमें शरीरमें कुछ भी सार नहीं है । ऐरण्डके वृक्षकी तरह शरीर पूर्णरूपसे निःसार है ॥१०४४॥


चमरीबालं खग्गिविसाणं गयदंतसप्पमणिगादी ।
दिट्ठो सारो ण य अत्थि कोइ सारो मणुयस्सदेहम्मि ॥१०४५॥

अर्थ: चमरी गायकी पूंछके बाल, गैंडे वा हिरनके सींग, हाथीके दाँत, सर्पकी मणि, आदि शब्दसे मयूरके पंख, मृगकी कस्तूरी आदि अवयव तो सारभूत देखे गये हैं अर्थात् इन सबके शरीरोंमें तो कुछ सार है किन्तु मनुष्यके शरीरमें कोई सार नहीं है ॥१०४५॥


छगलं मुत्तं दुद्धं गोणीए रोयणा य गोणस्स ।
सुचिया दिट्ठा ण य अत्थि किंचि सुचि मणुयदेहे ॥१०४६॥

अर्थ: बकरेका मूत्र, गायका दूध, बैलका गोरचन लोकमें पवित्र माने गये हैं परन्तु मनुष्यके शरीरमें किञ्चित् भी शुचिता नहीं है ॥१०४६॥


वाइयपित्तियसिंभियरोगा तण्हा छुहा समादी य ।
णिच्चं तवंति देहं अद्दहिदजलं व जह अग्गी ॥१०४७॥

अर्थ: जैसे आग चूल्हेके ऊपर स्थित पात्रके जलको तपाती है वैसे ही वात पित्त और कफसे उत्पन्न हुए रोग तथा भूख प्यास श्रम आदि शरीरको सदा तपाते हैं दुःख देते हैं ॥१०४७॥


जदिदा रोगा एक्कम्मि चेव अच्छिम्मि होंति छण्णउदी ।
सव्वम्मि दाइं देहे होदव्वं कदिहिं रोगेहिं ॥१०४८॥

अर्थ: यदि एक नेत्रमें ही छियानबे रोग होते हैं तो समस्त शरीरमें कितने रोग होंगे ॥१०४८॥


पीणत्थणिदुवदणा जा पुव्वं णयणदइदिया आसे ।
सा चेव होदि संकुडिदंगी विरसा य परिजुण्णा ॥१०४९॥

अर्थ: इस शरीरका स्वरूप तो देखो । जो स्त्री पूर्व यौवन अवस्थामें पुष्टस्तनवाली, सम्पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली और नेत्रोंको प्रिय थी वही स्त्री वृद्धावस्थामें संकुचित अंगवाली, शृङ्गार हास्य आदि काम रससे रहित अत्यन्त जीर्ण झोपड़ीकी तरह दिखाई देती है ॥१०४९॥


जा सव्वसुंदरंगी सविलासा पढमजोव्वणे कंता ।
सा चेव मदा संती होदि हु विरसा य बीभच्छा ॥१०५०॥

अर्थ: जो स्त्री यौवनके प्रारम्भमें सर्वांगसुन्दर तथा विलाससे पूर्ण थी वही मरनेपर विरस और ग्लानियोग्य दिखाई देती है ॥१०५०॥


मरदि सयं वा पुव्वं सा वा पुव्वं मरिज्ज से कंता ।
जीवंतस्स व सा जीवंती हरिज्ज बलिएहिं ॥१०५१॥

अर्थ: पहले पति मर जाता है अथवा पहले पत्नी मर जाती है । अथवा पतिके जीवित रहते हुए अन्य बलवान् पुरुष उसकी जीवित पत्नीको हरकर ले जाते हैं । इस प्रकार पति-पत्नी-संयोग अनित्य होता है ॥१०५१॥


सा वा हवे विरत्ता महिला अण्णेण सह पलाएज्ज ।
अपलायंती व तगी करिज्ज से वेमणस्साणि ॥१०५२॥

अर्थ: अथवा पत्नी पतिसे विरक्त हो जाती है और विरक्त होकर वह दूसरेके साथ भाग जाती है । न भी भागे तो पतिके चित्तको दुःख देनेवाले कार्य करती है ॥१०५२॥


रूवाणि कट्ठकम्मादियाणि चिट्ठंति सारवेंतस्स ।
धणिदं पि सारवेंतस्स ठादि ण चिरं सरीरमिमं ॥१०५३॥

अर्थ: सार सम्हाल करनेपर काष्ठ, पाषाण, हाथी दाँत आदिमें अंकित किये गये स्त्री पुरुषोंके रूप चिरकाल तक रहते हैं । किन्तु यह शरीर अति सम्हाल करनेपर भी चिरकाल तक नहीं रहता ॥१०५३॥


मेघहिमफेणउक्कासंझाजलबुब्बुदो व मणुयाणं ।
इंदियजोव्वणमदिरूवतेयबलवीरियमणिच्चं ॥१०५४॥

अर्थ: मनुष्योंके इन्द्रियाँ, यौवन, मति, रूप, तेज, बल और वीर्य ये सब मेघ, बर्फ, फेन, उल्का, सन्ध्या और जलके बुलबुलेकी तरह अनित्य हैं ॥१०५४॥


साधुं पडिलाहेदुं गदस्स सुरयस्स अग्गमहिसीए ।
णट्ठं सदीए अंगं कोढेण जहा मुहुत्तेण ॥१०५५॥

अर्थ: राजा सुरत साधुको आहार देने गया । इतनेमें ही उसकी पटरानी सतीका शरीर एक मुहूर्तमें ही कोढ़से नष्ट हो गया ॥१०५५॥


वज्झो य णिज्जमाणो जह पियइ सुरं च खादि तंबोलं ।
कालेण य णिज्जंता विसए सेवंति तह मूढा ॥१०५६॥

अर्थ: जैसे मारनेके लिए कोई किसी पुरुषको ले जाये और वह पुरुष मरनेकी चिन्ता न करके शराब पिये और पान खाये । वैसे ही मूढ़ मनुष्य मृत्युकी चिन्ता न करके विषयोंका सेवन करते हैं ॥१०५६॥


वग्घपरद्धो लग्गो मूले य जहा ससप्पबिलपडिदो ।
पडिदमधुबिंदुचक्खणरदिओ मूलम्मि छिज्जंते ॥१०५७॥

अर्थ: जैसे पीछे लगे व्याघ्रके भयसे भागता हुआ कोई मनुष्य एक ऐसे कूपमें गिरा जिसमें सर्प रहता था । उस कूपकी दीवारमें एक वृक्ष उगा था । उसकी जड़को पकड़कर वह लटक गया । उस जड़को चूहे काट रहे थे । किन्तु उस वृक्षपर मधुमक्खियोंका एक छत्ता लगा था और उसमेंसे मधुकी बूँद टपककर उसके ओठोंमें आती थी । वह संकट भूल उसी मधुबिन्दुके स्वादमें आसक्त था ॥१०५७॥


तह चेव मच्चुवग्घपरद्धो बहुदुक्खसप्पबहुलम्मि ।
संसारबिले पडिदो आसामूलम्मि संलग्गो ॥१०५८॥

अर्थ: उसी मनुष्यकी तरह मृत्युरूपी व्याघ्रसे भीत प्राणी अनेक दुःखरूपी सर्पोंसे भरे संसार कूपमें पड़ा है और आशारूपी जड़को पकड़े हुए है ॥१०५८॥


बहुविग्घमूसएहिं आसामूलम्मि तम्मि छिज्जंते ।
लेहदि तहवि अलज्जो अप्पसुहं विसयमधुबिंदु ॥१०५९॥

अर्थ: किन्तु उस आशारूप जड़को बहुतसे विघ्नरूपी चूहे काट रहे हैं । फिर भी वह निर्लज्ज निर्भय होकर क्षणिक सुखमें निमित्त विषयरूपी मधुकी बूँदके आस्वादमें डूबा हुआ है । यहाँ विषय शब्दसे रूप आदिको कहा है । उसके सामने वर्तमान जो पुद्गल स्कन्धकी कुछ थोड़ी-सी पर्यायें हैं वे ही मधुकी बूँद है । उसीमें वह आसक्त है ॥१०५९॥


बालो अमेज्झलित्तो अमेज्झमज्झम्मि चेव जह रमदि ।
तह रमदि णरो मूढो महिलामेज्झे सयममेज्झो ॥१०६०॥

अर्थ: जैसे मलसे लिप्त बालक मलमें ही रमता है वैसे ही मूढ़ मनुष्य स्वयं अत्यन्त मलिन है और मलिनता भरे स्त्रीके शरीरमें रमण करता है ॥१०६०॥


कुणिमरसकुणिमगंधं सेविता महिलियाए कुणिमकुडी ।
जं होंति सोचयत्ता एदं हासावहं तेसिं ॥१०६१॥

अर्थ: युवतीका शरीर अशुचि रस और दुर्गन्धसे पूर्ण है । ऐसे अशुचि शरीरको सेवन करता हुआ कामी पुरुष अपनेको शुचि-पवित्र मानता है उसकी यह पवित्रता हास्यास्पद है ॥१०६१॥


एवं एदे अत्थे देहे चिंतंतयस्स पुरिसस्स ।
परदेहं परिभोत्तुं इच्छा कह होज्ज सघिणस्स ॥१०६२॥

अर्थ: इस प्रकार शरीरके विषयमें विचार करनेवाले पुरुषको शरीरसे ग्लानि हो जाती है तब उसे स्त्रीके शरीरको भोगनेकी इच्छा कैसे हो सकती है ॥१०६२॥


एदे अत्थे सम्मं दोसं पिच्छंतओ णरो सघिणो ।
ससरीरे वि विरज्जइ किं पुण अण्णस्स देहम्मि ॥१०६३॥

अर्थ: शरीरका बीज, उसकी निष्पत्ति आदिको सम्यक्रूपसे निरीक्षण करनेवाला लज्जाशील मनुष्य अपने शरीरसे भी विरक्त हो जाता है तब अन्यके शरीरमें क्यों विरक्त नहीं होगा ॥१०६३॥


थेरा वा तरुणा वा वुड्ढा सीलेहिं होंति वुड्ढीहिं ।
थेरा वा तरुणा वा तरुणा सीलेहिं तरुणेहिं ॥१०६४॥

अर्थ: अवस्थासे वृद्ध हो अथवा तरुण हो, जिसके शील अर्थात् क्षमा, मार्दव, आर्जव, सन्तोष आदि बढ़े हुए हैं वे वृद्ध हैं। तथा अवस्थासे वृद्ध हों अथवा तरुण हों जिनके शील तरुण हैं - वृद्धिको प्राप्त नहीं हैं वे तरुण हैं। अतः यहाँ जो शीलसे वृद्ध हैं वृद्ध शब्दसे उनका ग्रहण किया है। उनको सेवा वृद्ध सेवा है, यह कथनका अभिप्राय है। गुणोंसे वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करनेमें स्वयं भी मनुष्य गुणोंमें उत्कर्षको प्राप्त होता है ॥१०६४॥


जह जह वयपरिणामो तह तह णस्सदि णरस्स बलरूवं ।
मंदा य हवंदि कामरदिदप्पकीडा य लोभे य ॥१०६५॥

अर्थ: जैसे-जैसे मनुष्यकी युवावस्था, मध्यावस्था बीतती जाती है वैसे-वैसे उसकी कामविषयक रति, मद, लोभ आदि मन्द होते जाते हैं। इसका भाव यह है कि जिसका कामभावरूप परिणाम मन्द होता है उस वृद्धके साथ रहनेसे मनुष्य स्वयं भी मन्द कामभाव आदिसे युक्त होता है ॥१०६५॥


खोभेदि पत्थरो जह दहे पडंतो पसण्णमवि पंकं ।
खोभेइ तहा मोहं पसण्णमवि तरुणसंसग्गी ॥१०६६॥

अर्थ: जैसे तालाबमें गिरकर पत्थर उसकी तलसे बैठी हुई पंकको उभारकर निर्मल जलको मलिन कर देता है, वैसे ही तरुणोंका संसर्ग प्रशान्त पुरुषके भी मोहको उद्रिक्त कर देता है ॥१०६६॥


कलुसीकदंपि उदगं अच्छं जह होइ कदयजोएण ।
कलुसो वि तहा मोहो उवसमदि हु वुड्ढसेवाए ॥१०६७॥

अर्थ: और जैसे कतकफल डालनेसे गदला पानी भी निर्मल हो जाता है वैसे ही वृद्ध पुरुषोंकी सेवासे कलुषित मोह भी शान्त हो जाता है ॥१०६७॥


लीणो वि मट्टियाए उदीरदि जलासयेण जह गंधो ।
लीणो उदीरदि णरे मोहो तरुणासयेण तहा ॥१०६८॥

अर्थ: जैसे मिट्टीमें छिपी हुई गन्ध जलका आश्रय पाकर प्रकट हो जाती है। वैसे ही तरुणोंके संसर्गसे मनुष्यमें छिपा हुआ मोह उदयमें आ जाता है ॥१०६८॥


संतो वि मट्टियाए गंधो लीणो हवदि जलेण विणा ।
जह तह गुट्ठीए विणा णरस्स लीणो हवदि मोहो ॥१०६९॥

अर्थ: और जैसे मिट्टीमें वर्तमान होते हुए भी गन्ध जलके बिना मिट्टीमें ही लीन रहती है। वैसे ही तरुणोंके संसर्गके बिना मनुष्यका मोह उसीमें लीन रहता है, बाहरमें प्रकट नहीं होता ॥१०६९॥


तरुणो वि वुड्ढसीलो होदि णरो वुड्ढसंसिओ अचिरा ।
लज्जासंकामाणावमाणभयधम्मबुद्धीहिं ॥१०७०॥

अर्थ: वृद्ध पुरुषोंके संसर्गसे तरुण भी शीघ्र ही लज्जासे, शंकासे, मानसे, अपमानके भयसे और धर्मबुद्धिसे वृद्धशील हो जाता है ॥१०७०॥


वुड्ढो वि तरुणसीलो होइ णरो तरुणसंसिओ अचिरा ।
वीसंभणिव्विसंको समोहणिज्जो य पयडीए ॥१०७१॥

अर्थ: तथा तरुण पुरुषोंकी संगतिसे वृद्ध पुरुष भी शीघ्र ही विश्वासके कारण निर्भय होनेसे और स्वभावसे ही मोहयुक्त होनेसे तरुणशील तरुणोंके स्वभाववाला हो जाता है ॥१०७१॥


सुंडयसंसग्गीए जह पादुं सुंडओऽभिलसदि सुरं ।
विसए तह पयडीए संमोहो तरुणगोट्ठीए ॥१०७२॥

अर्थ: जैसे मद्य पीनेवालोंके संसर्गसे मद्यपी मद्यपान करनेकी अभिलाषा करने लगता है वैसे ही स्वभावसे ही मोही जीव तरुणोंके संसर्गसे विषयोंकी अभिलाषा करता है ॥१०७२॥


तरुणेहिं सह वसंतो चलिंदिओ चलमणो य वीसत्थो ।
अचिरेण सइरचारी पावदि महिलाकदं दोसं ॥१०७३॥

अर्थ: जो तरुणोंकी संगतिमें रहता है उसकी इन्द्रियाँ चंचल होती हैं, मन चंचल होता है, और पूरा विश्वासी होता है । फलतः शीघ्र ही स्वच्छन्द होकर स्त्रीविषयक दोषोंका भागी होता है ॥१०७३॥


पुरिसस्स अप्पसत्थो भावो तिहिं कारणेहिं संभवइ ।
विरहम्मि अंधयारे कुसीलसेवाए ससमक्खं ॥१०७४॥

अर्थ: एकान्तमें स्त्रीके साथ पुरुषका और पुरुषके साथ स्त्रीका होना, अन्धकारमें तथा स्त्री पुरुषके काम सेवनको प्रत्यक्ष देखनेपर ॥१०७४॥


पासिय सुच्चा व सुरं पिज्जंतं सुंडओ भिलसदि जहा ।
विसए य तह समोहा पासिय सोच्चा व भिलसइ ॥१०७५॥

अर्थ: जैसे मद्यपी किसीको मद्य पीते देखकर अथवा सुनकर मद्यपानकी अभिलाषा करता है । वैसे ही मोही मनुष्य विषयोंको देखकर अथवा सुनकर विषयोंकी अभिलाषा करता है ॥१०७५॥


जादो खु चारुदत्तो गोट्ठीदोसेण तह विणीदो वि ।
गणियासत्तो मज्जासत्तो कुलदूसओ य तहा ॥१०७६॥

अर्थ: विनयवान भी चारुदत्त सेठ संगतिके दोषसे गणिकामें आसक्त हुआ, मद्यपानमें आसक्त हुआ और अपने कुलका दूषक हुआ ॥१०७६॥


तरुणस्स वि वेरग्गं पण्हाविज्जदि णरस्स वुड्ढेहिं ।
पण्हाविज्जइ पाडच्छीवि हु वच्छस्स फरुसेण ॥१०७७॥

अर्थ: ज्ञान, वय और तपसे वृद्ध पुरुषोंकी संगति तरुणपुरुषोंमें भी वैराग्य उत्पन्न करती है जैसे बछड़ेके स्पर्शसे गौके स्तनोंमें दूध उत्पन्न होता है ॥१०७७॥


परिहरइ तरुणगोट्ठी विसं व वुड्ढाउले य आयदणे ।
जो वसइ कुणइ गुरुणिद्देसं सो णिच्छरइ बंभं ॥१०७८॥

अर्थ: जो तरुणोंकी संगतिको विषकी तरह जानकर छोड़ देता है और ज्ञान तप शीलसे वृद्ध पुरुषोंके वासस्थानमें रहता है वह गुरुकी आज्ञाका पालन करता है और ब्रह्मचर्यको पालता है ॥१०७८॥


आलोयणेण हिदयं पचलदि पुरिसस्स [?] ।
पेच्छंतयस्स बहुसो इत्थीथणजहणवदणाणि ॥१०७९॥

अर्थ: युवती स्त्रियोंका मुख, स्तन और स्थूल नितम्बोंको बराबर ताकते रहनेसे चंचल चित्त मनुष्यका हृदय विचलित हो जाता है ॥१०७९॥


लज्जं तदो विहिंसं परिजयमध णिव्विसंकिदं चेव ।
लज्जालुओ कमेणारुहंतओ होदि वीसत्थो ॥१०८०॥

अर्थ: हृदयके विचलित होनेके पश्चात् उसकी लज्जा जाती रहती है । निर्लज्ज होनेके पश्चात् वह उन स्त्रियोंको देखना, उनके समीप जाना, उनसे हँसी ठठोली करना आदिके द्वारा परिचय प्राप्त करता है । पीछे उसका यह भय जाता रहता है कि लोग मुझे इनके साथ देखेंगे । इस तरह लज्जाशील मनुष्य भी क्रमसे कही गई अवस्थाओंको प्राप्त करता हुआ स्त्रियोंके विषयमें विश्वस्त हो जाता है कि यह मुझसे अनुराग करती है और किसीसे यह कहेगी नहीं आदि ॥१०८०॥


वीसत्थदाए पुरिसो वीसंभं महिलियासु उवयादि ।
वीसंभादो पणयो पणयादो रदि हवदि पच्छा ॥१०८१॥

अर्थ: अपने मनमें ऐसा विश्वास होनेसे वह स्त्रियोंमें भी विश्वास करने लगता है और प्रेमसे आसक्ति बढ़ती है ॥१०८१॥


उल्लावसमुल्लावएहिं चा वि अल्लियणपेच्छणेहिं तहा ।
महिलासु सइरचारिस्स मणो अचिरेण खुब्भदि हु ॥१०८२॥

अर्थ: आसक्ति बढ़नेसे परस्परमें वार्तालाप होने लगता है । बार-बार मिलना और परस्पर देखना होता है । इससे स्त्रियोंके सम्बन्धमें स्वेच्छाचारी मनुष्यका चित्त शीघ्र ही विचलित हो जाता है ॥१०८२॥


ठिदिगदिविलासविब्भमसहासचेट्ठिदकडक्खदिट्ठीहिं ।
लीलाजुदिरदिसम्मेलणोवयारेहिं इत्थीणं ॥१०८३॥

अर्थ: तथा स्त्रियोंके खड़े होने, गमन करने नेत्रोंके अनुराग, कटाक्ष क्षेप, हास्य-पूर्ण चेष्टा, शोभा, कान्ति, क्रीड़ा, साथ-साथ चलना, बैठना आदि उपचारोंसे, हास उपहाससे, तथा एकान्तमें विश्वासयुक्त वार्तालापसे पुरुष लज्जा और मर्यादाकी सीमाका उल्लंघन करता है ॥१०८३-१०८४॥


हासोवहासकीडारहस्सवीसत्थजंपिएहिं तहा ।
लज्जामज्जादोणं मेरं पुरिसो अदिक्कमदि ॥१०८४॥

अर्थ: तथा स्त्रियोंके खड़े होने, गमन करने नेत्रोंके अनुराग, कटाक्ष क्षेप, हास्यपूर्ण चेष्टा, शोभा, कान्ति, क्रीड़ा, साथ-साथ चलना, बैठना आदि उपचारोंसे, हास उपहाससे, तथा एकान्तमें विश्वासयुक्त वार्तालापसे पुरुष लज्जा और मर्यादाकी सीमाका उल्लंघन करता है ॥१०८३-१०८४॥ ॥१०८४॥


ठाणगदिपेच्छिदुल्लावादी सव्वेसिमेव इत्थीणं ।
सविलासा चेव सदा पुरिसस्स मणोहरा हुंति ॥१०८५॥

अर्थ: सब ही स्त्रियोंका विलास सहित खड़ा होना, गमन करना, देखना, बोलना आदि सदा पुरुषोंके मनको हरता है ॥१०८५॥


संसग्गीए पुरिसस्स अप्पसारस्स लद्धपसरस्स ।
अग्गिसमीवे व घयं मणो लहुमेव हि विलाइ ॥१०८६॥

अर्थ: निर्बल चित्त और स्वेच्छाचारी मनुष्यका मन स्त्रियोंके संसर्गसे उनके साथ उठने बैठने और आने जानेसे आगके पासमें रखे घी या लाखकी तरह द्रवीभूत हो जाता है ॥१०८६॥


संसग्गीसम्मूढो मेहुणसहिदो मणो हु दुम्मेरो ।
पुव्वावरमगणंतो लंघेज्ज सुसीलपायारं ॥१०८७॥

अर्थ: इस प्रकार स्त्रीके सहवाससे मूढ़-मोहित हुआ मन मैथुन संज्ञासे पीड़ित होकर निर्मर्याद हो जाता है और आगे पीछे न देखते हुए सुन्दर शीलरूपी परिकोटको लाँघ जाता है ॥१०८७॥


इंदियकसयसण्णागारवगुरुया सभावदो सव्वे ।
संसग्गिलद्धपसरस्स ते उदीरंति अचिरेण ॥१०८८॥

अर्थ: स्वभावसे ही सब प्राणी इन्द्रिय, कषाय, आहार भय मैथुन और परिग्रह विषयक संज्ञा तथा ऋद्धिगौरव, रसगौरव और सातगौरवसे युक्त होते हैं। अतः स्त्रीकी संगतिका साहाय्य पाकर वे इन्द्रियादिरूप अशुभ परिणाम तत्काल प्रबल हो उठते हैं ॥१०८८॥


मादं सुदं च भगिणीमेगंते अल्लियंतगस्स मणो ।
खुब्भइ णरस्स सहसा किं पुण सेसासु महिलासु ॥१०८९॥

अर्थ: एकान्तमें माता, पुत्री और बहनको पाकर जब मनुष्यका मन सहसा चंचल हो उठता है तब शेष स्त्रियोंके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ॥१०८९॥


जुण्णं पोच्चलमइलं रोगियबीभस्सदंसणविरूवं ।
मेहुणपडिगं पच्छेदि मणो तिरियं च खु णरस्स ॥१०९०॥

अर्थ: मनुष्यका मन अति वृद्धा, सारहीन, मैली, कुचैली, रोगी, देखनेमें भयानक कुरूप स्त्रीको भी मैथुन करनेके लिए चाहता है। तथा तीव्र कामके आवेशमें पशुओंके साथ भी मनुष्य मैथुन कर्म करता है ॥१०९०॥


दिट्ठाणुभूदसुदविसयाणं अभिलाससुमरणं सव्वं ।
एसा वि होइ महिलासंसग्गी इत्थिविरहम्मि ॥१०९१॥

अर्थ: स्त्रीके अभावमें देखे हुए, भोगे हुए, सुने हुए विषयोंकी अभिलाषा करना, स्मरण करना, ये सब भी स्त्री संसर्ग ही है ॥१०९१॥


थेरो बहुस्सुदो१ वा पच्चईओ तह गणी तवस्सित्ति ।
अचिरेण लभदि दोसं महिलावग्गम्मि वीसत्थो ॥१०९२॥

अर्थ: वृद्ध, बहुश्रुत, सबका विश्वास भाजन, सबके लिए प्राणभूत, गणधर और तपस्वी मनुष्य भी यदि स्त्रियोंके विषयमें विश्वस्त है उनसे संसर्ग रखता है तो वह भी शीघ्र ही अपयशका भागी होता है ॥१०९२॥


किं पुण तरुणा अबहुस्सुदा य सइरा य विगदवेसा य ।
महिलासंसग्गीए णट्ठा अचिरेण होहंति ॥१०९३॥

अर्थ: तब जो तरुण हैं, अल्पज्ञानी हैं, स्वच्छन्द और विकार पैदा करनेवाला वेष रखते हैं वे स्त्रियोंके संसर्गसे शीघ्र ही नष्ट क्यों न होंगे ? अवश्य ही होंगे ॥१०९३॥


सगडो हु जइणिगाए संसग्गीए दु चरणपब्भट्ठो ।
गणियासंसग्गीय य कूवयारो तहा णट्ठो ॥१०९४॥

अर्थ: शकट नामक मुनि जैनिका नामक ब्राह्मणीके संसर्गसे चारित्रसे भ्रष्ट हुए । और कूपार नामक मुनि वेश्याकी संगतिके कारण चारित्रसे भ्रष्ट हुए ॥१०९४॥


रुद्दो परासरो सच्चईय रायरिसि देवपुत्तो य ।
महिलारूवालोई णट्ठा संसत्तदिट्ठीए ॥१०९५॥

अर्थ: रुद्र, पाराशर ऋषि, सात्यकि मुनि, राजर्षि, और देवपुत्र ये स्त्रीके रूपको देखनेमें आसक्त होकर भ्रष्ट हुए ॥१०९५॥


जो महिलासंसग्गी विसंव दट्ठूण परिहरइ णिच्चं ।
णित्थरइ बंभचेरं जावज्जीवं अकंपा सो ॥१०९६॥

अर्थ: जो पुरुष स्त्रीके संसर्गको विषकी तरह देखकर नित्य ही उससे बचता है वह निश्चल होकर जीवनपर्यन्त ब्रह्मचर्यका पालन करता है ॥१०९६॥


सव्वम्मि इत्थिवग्गम्मि अप्पमत्तो सदा अवीसत्थो ।
बंभं निच्छरदि वदं चरित्तमूलं चरणसारं ॥१०९७॥

अर्थ: जो पुरुष सम्पूर्ण स्त्री वर्गमें प्रमाद रहित है और सदा स्त्रियोंका विश्वास नहीं करता। वह ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करता है जो ब्रह्मचर्य व्रत चारित्रका मूल और उसका सार है ॥१०९७॥


किं मे जंपदि किं मे पस्सदि अण्णो कहं च वट्टामि ।
इदि जो सदाणुपेक्खइ सो दढबंभव्वदो होदि ॥१०९८॥

अर्थ: अन्य लोग मेरे सम्बन्धमें क्या कहते हैं ? मुझे किस दृष्टिसे देखते हैं ? मेरी प्रवृत्ति कैसी है ? ऐसा जो सदा विचार करता है उसका ब्रह्मचर्यव्रत दृढ़ होता है ॥१०९८॥


मज्झण्हतिक्खसूरं व इत्थिरूवं ण पासदि चिरं जो ।
खिप्पं पडिसंहरदि दिट्ठिं सो णिच्छरदि बंभं ॥१०९९॥

अर्थ: जो मध्याह्नकालके तीक्ष्ण सूर्यकी तरह स्त्रीके रूपकी ओर देर तक नहीं देखता और शीघ्र ही अपनी दृष्टिको उसकी ओरसे हटा लेता है वह ब्रह्मचर्यका निर्वाह करता है ॥१०९९॥


एवं जो महिलाए सद्दे रूवे तहेव संफासे ।
ण चिरं जस्स सज्जदि दु मणं खु णिच्छरदि सो बंभं ॥११००॥

अर्थ: इस प्रकार स्त्रीके शब्द, रूप और स्पर्शमें जिसका मन चिरकाल तक नहीं ठहरता, वह ब्रह्मचर्यका पालक होता है ॥११००॥


इह परलोए जदि दे मेहुणविस्सुत्तिया हवे जण्हु ।
तो होहि तमुवउत्तो पंचविधे इत्थिवेरग्गे ॥११०१॥

अर्थ: हे क्षपक ! यदि इस लोक और परलोकमें तुम्हारे मैथुन सेवनके परिणाम हों तो पाँच प्रकारके स्त्री वैराग्यमें मनको लगाओ । अर्थात् स्त्रीकृत दोष, मैथुनके दोष, स्त्री- संसर्गके दोष, शरीरकी अशुचिता और वृद्धसेवाका चिन्तन करो। ऐसा करनेसे तुम्हारे अति अशुभ परिणाम नष्ट होंगे ॥११०१॥


उदयम्मि जायवड्ढिय उदएण ण लिप्पदे जहा पउमं ।
तह विसएहिं ण लिप्पदि साहू विसएसु उसिओ वि ॥११०२॥

अर्थ: जैसे जलमें उत्पन्न हुआ और जलमें ही बढ़ा कमल जलसे लिप्त नहीं होता। वैसे ही विषयोंके मध्यमें रहते हुए भी साधु विषयोंसे लिप्त नहीं होता ॥११०२॥


उग्गाहिंतस्सुदधिं अच्छेरमणोल्लणं जह जलेण ।
तह विसयजलमणोमच्छेरं विसयजलहिम्मि ॥११०३॥

अर्थ: जैसे समुद्रका अवगाहन करके भी समुद्रके जलसे शरीरका निर्लिप्त रहना आश्चर्यकारी है। वैसे ही विषयरूपी समुद्रके मध्यमें रहकर विषयरूपी जलसे चित्तका न भींगना आश्चर्यकारी है ॥११०३॥


मायागहणे बहुदोसमावए अलियदुमगणे भीमे ।
असुइतणिल्ले साहू ण विप्पणस्संति इत्थिवणे ॥११०४॥

अर्थ: यह स्त्री रूपी वन मायाचारसे गहन है। जैसे गहन वनमें दूसरोंका प्रवेश करना कठिन होता है वैसे ही मायाको भी जानना कठिन है इसलिए मायाको गहन कहा है। अतः स्त्रीरूपी वनमें माया ही गहनबेल आदि झाड़ियोंका समूह है। वनमें हिंसक जन्तु रहते हैं। स्त्रीरूप वनमें परनिन्दा, चुगली, चंचलता, भीरुता, प्रमत्तपना आदि बहुदोषरूपी हिंसक जन्तुओंका आवास है। वनमें वृक्ष होते हैं जो अनेक शाखा उपशाखाओंसे फैले रहते हैं। स्त्रीरूपी वनमें झूठरूपी वृक्ष अपने भेद प्रभेदोंके साथ रहता है। वनकी तरह स्त्रीरूप वन भी भयंकर है। वनमें घास फूँस रहता है। स्त्री रूपी वनमें अशुचि शरीरके अंग-उपांग ही घास फूँस हैं। ऐसे स्त्रीरूपी वनमें साधु नहीं भटकता ॥११०४॥


सिंगारतरंगाए विलासवेगाए जोव्वणजलाए ।
विहसियफेणाए मुणी णारिणईए ण बुज्झंति ॥११०५॥

अर्थ: स्त्री एक नदीके समान है। उसमें श्रृङ्गाररूप तरंगे हैं। विलासरूप वेग है। यौवनरूप जल है तथा मन्द-मन्द हँसना ही झाग है। ऐसी स्त्रीरूपी नदी मुनिको नहीं वहा सकती ॥११०५॥


ते अदिसूरा जे ते विलाससलिलमदिचवलरदिवेगं ।
जोव्वणणईसु तिण्णा ण य गहिया इत्थिगाहेहिं ॥११०६॥

अर्थ: यह यौवनरूप नदी विलासरूप जलसे पूर्ण है अति चंचल रतिरूप इसका प्रवाह है। जो इस यौवनरूप नदीको पारकर गये और स्त्रीरूपी मगरमच्छोंने जिन्हें नहीं पकड़ा वे इस जगतमें अति शूरवीर हैं अर्थात् जवानीमें भी जिन्हें स्त्रीकी चाहने नहीं घेरा वे ही सच्चे शूरवीर हैं ॥११०६॥


महिलावाहविमुक्का विलासपुंखा कडक्खदिट्ठिसरा ।
जण्ण वधंति सदा विसयवणचरं सो हवइ धण्णो ॥११०७॥

अर्थ: विषयरूपी बनमें विचरण करने वाले जिस पुरुषको स्त्रीरूपी शिकारीके द्वारा छोड़े गये कटाक्षदृष्टिरूपी बाणोंने नहीं बींधा वह धन्य है। इन बाणोंमें लगा पंख स्त्रीका विलास है। विलासके साथ कटाक्ष दृष्टिरूपी बाण स्त्रीरूपी शिकारी विषयरूपी बनमें विचरण करने वालों पर चलाता है। जो उससे बचे रहते हैं वे धन्य हैं ॥११०७॥


विब्वोगतिक्खदंतो विलासखंधो कडक्खदिट्ठिणहो ।
परिहरदि जोव्वणवणे जमित्थिवग्घो [?] धण्णो ॥११०८॥

अर्थ: स्त्री व्याघ्रके समान है भृकुटि विकार उसके तीक्ष्ण दाँत है। विलासरूपी कन्धा है। कटाक्षदृष्टि उसके नख है। यौवनरूपी बनमें विचरण करने वाले जिस पुरुषको यह स्त्रीरूपी व्याघ्र नहीं पकड़ता, वह धन्य है ॥११०८॥


तेल्लोक्काडविडहणो कामग्गी विसयरुक्खपज्जलिओ ।
जोव्वणतणिल्लचारी जं ण डहइ सो हवइ धण्णो ॥११०९॥

अर्थ: तीनों लोकरूपी बनको जलाने वाली और विषयरूपी वृक्षोंसे प्रज्वलित यह काम-रूप आग यौवन रूपी तृणों पर चलने में चतुर जिस मनुष्यको नहीं जलाती वह धन्य है ॥११०९॥


विसयसमुद्दं जोव्वणसलिलं हसियगइपेक्खिदुम्मीयं ।
धण्णा समुत्तरंति हु महिलामयरेहिं अच्छिक्का ॥१११०॥

अर्थ: इस विषयरूप समुद्रमें यौवनरूप जल है, स्त्रीका हँसना चलना देखना उसके लहरें हैं। और स्त्रीरूप मगरमच्छ है जो इन मगरमच्छोंसे अछूते रहकर इस समुद्रको पार करते हैं वे धन्य हैं ॥१११०॥


अब्भंतरबाहिरए सव्वे गंथे तुमं विवज्जेहि ।
कदकारिदाणुमोदेहिं कायमणवयणजोगेहिं ॥११११॥

अर्थ: हे क्षपक ! कृत कारित अनुमोदना और मन वचन कायसे तुम सब अन्तरंग और बहिरंग परिग्रहका त्याग करो ॥११११॥


मिच्छत्तवेदरागा तहेव हासादिया य छद्दोसा ।
चत्तारि तह कसाया चउदस अब्भंतरा गंथा ॥१११२॥

अर्थ: मिथ्यात्व, वेद राग, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा और चार कषाय ये चौदह अन्तरंग परिग्रह हैं ॥१११२॥


बाहिरसंगा खेत्तं वत्थुं धणधण्णकुप्पभंडाणि ।
दुपयचउप्पय जाणाणि चेव सयणासणे य तहा ॥१११३॥

अर्थ: खेती आदिका स्थान क्षेत्र, मकान, सुवर्ण आदि धन, जौ आदि धान्य, कुप्य अर्थात् वस्त्र, भाण्ड शब्दसे हींग मिर्च आदि, द्रुपद शब्दसे दास दासी सेवक आदि, हाथी घोड़े आदि चौपाये, पालकी विमान आदि यान तथा शयन आसन आदि ये दस बाह्य परिग्रह हैं ॥१११३॥


जह कुंडओ ण सक्को सोधेदुं तंदुलस्स सतुसस्स ।
तह जीवस्स ण सक्का मोहमलं संगसत्तस्स ॥१११४॥

अर्थ: जैसे तुष सहित चावलका तुष दूर किये बिना उसका अन्तर्मलका शोधन करना शक्य नहीं है। वैसे ही जो बाह्य परिग्रहरूपी मलसे सम्बद्ध है उसका अभ्यन्तर कर्ममल शोधन करना शक्य नहीं है।


रागो लोभो मोहो सण्णाओ गारवाणि य उदिण्णा ।
तो तइया घेत्तुं जे गंथे बुद्धी णरो कुणइ ॥१११५॥

अर्थ: ‘यह मेरा है’ ऐसे भावको राग कहते हैं। द्रव्यके गुणोंमें आसक्तिको लोभ कहते हैं। परिग्रहकी इच्छाको मोह कहते हैं। मेरे पास कुछ होता तो अच्छा होता, इस प्रकारके मूर्च्छा भावको संज्ञा कहते हैं। परिग्रहविषयक तीव्र अभिलाषाको गारव शब्दसे कहते हैं। ये परिणाम जब उत्पन्न होते हैं तब बाह्य परिग्रहको ग्रहण करनेका मन होता है, उनके अभावमें नहीं होता। अतः जो बाह्य परिग्रह ग्रहण करता है वह नियमसे लोभ आदि रूप अशुभ परिणाम वाला होनेसे कर्मका बन्ध करता है। अतः परिग्रह त्याज्य है ॥१११५॥


चेलादिसव्वसंगच्चाओ पढमो हु होदि ठिदिकप्पो ।
इहपरलोइयदोसे सव्वे आवहदि संगो हु ॥१११६॥

अर्थ: आगममें दस प्रकारका स्थितिकल्प कहा है। उसमें पहला कल्प आचेलक्य है। आचेलक्यका अर्थ केवल वस्त्र मात्रका त्याग नहीं है किन्तु वस्त्र आदि सर्व परिग्रहका त्याग है। यह दस कल्पोंमेंसे पहला स्थितिकल्प है। यतः परिग्रह इस लोक और परलोक सम्बन्धी दोषोंको लाता है अतः जो दोनों लोक सम्बन्धी दोषोंसे बचना चाहता है उसे सब परिग्रह छोड़ना चाहिए। यह इस गाथाका भाव है ॥१११६॥


देसामासियसुत्तं आचेलक्कंति तं खु ठिदिकप्पे ।
लुत्तोत्थ आदिसद्दो जह तालपलंबसुत्तम्मि ॥१११७॥

अर्थ: स्थितिकल्पका कथन करते हुए जो ‘आचेलक्य’ आदि सूत्र कहा है वह देशा- मर्शक है। मुमुक्षुओंको जो नियमसे करना चाहिए उसे स्थित कहते हैं और उसके भेदोंको स्थिति-कल्प कहते हैं। उसमें ‘चेल’ शब्द परिग्रहका उपलक्षण है। अतः आचेलक्य शब्दका अर्थ सर्व परिग्रहका त्याग है। जैसे ‘तालपलंब ण कप्पदि’ इस सूत्रमें ताल शब्द वृक्ष विशेष ताड़का वाचक नहीं है, किन्तु वनस्पतिका एक देश वृक्ष विशेष सब वनस्पतियोंके उपलक्षणके लिये रखा है। कल्पसूत्रमें कहा है - ‘ताल शब्दसे हरित तृण, औषधि, गुच्छा, बेल, लता, वृक्ष इत्यादि वनस्पतियोंका कथन किया है।’ 'ताल शब्द तल धातुसे निष्पन्न हुआ है। तल शब्दका अर्थ ऊँचाई भी है। जो स्कन्ध रूपसे ऊँचा वृक्ष विशेष होता है वह ताल वृक्ष है। तालादिमें आदि शब्दसे वृक्ष फूल पत्ता आदि वनस्पति लेना चाहिए। प्रलम्बके दो प्रकार हैं - मूल प्रलम्ब और अग्रप्रलम्ब। कन्दमूल फल जो भूमिमें रहते हैं वे मूल प्रलम्ब हैं। और अंकुर, प्रवाल, फल, पत्ते अग्रप्रलम्ब हैं। तालके प्रलम्बको ताल प्रलम्ब कहते हैं। इससे वनस्पतिके अंकुर आदिका ग्रहण होता है। अतः जैसे तालप्रलम्बसूत्रमें ताल प्रलम्बसे अन्य वनस्पतियोंका ग्रहण किया है वैसे ही आचेलक्यसे अन्य परिग्रहका भी ग्रहण किया है। अथवा सूत्रमें अचेलत्वादिका आदि शब्द लुप्त हो गया है। जैसे तालप्रलम्ब सूत्रमें ‘तालादि’ शब्दका प्रयोग न करके ‘तालप्रलम्ब’ कहा है। आचेलक्य आदि सूत्रको सूत्रकारने देशामर्शक सूत्ररूपसे बनाया है अर्थात् परिग्रहके एक देश वस्त्रका ग्रहण न करनेका निर्देश करके समस्त परिग्रहका त्याग बतलाया है। किन्तु ताल प्रलम्ब सूत्रमें आदि शब्दका लोप है अतः वह सूत्र देशामर्षक नहीं है ॥१११७॥


ण य होदि संजदो वत्थमित्तचागेण सेससंगेहिं ।
तम्हा आचेलक्कं चाओ सव्वेसि होइ संगाणं ॥१११८॥

अर्थ: केवल वस्त्रमात्रका त्याग करनेसे और शेष परिग्रह रखनेसे साधु नहीं होता । यदि ‘आचेलक्य’ से वस्त्रमात्रका त्याग ही कहा होता तो वस्त्रके सिवाय अन्य परिग्रहको ग्रहण करनेवाला साधु नहीं हो सकता । अतः आचेलक्यका अर्थ सर्वपरिग्रहका त्याग मानना चाहिए । ‘चेल शब्द परिग्रहका उपलक्षण है’ इसके सम्बन्धमें यह युक्ति दी गई है । तथा महाव्रतका कथन करनेवाले सूत्र इस बातके ज्ञापक हैं कि आचेलक्यमें सर्वपरिग्रहका त्याग कहा है ॥१११८॥


संगणिमित्तं मारेइ अलियवयणं च भणइ तेणिक्कं ।
भजदि अपरिमिदमिच्छं सेवदि मेहुणमवि य जीवो ॥१११९॥

अर्थ: परिग्रहके लिए असि मसि कृषि आदि षट्कर्म करके मनुष्य प्राणियोंका घात करता है । पराये द्रव्यको ग्रहण करनेकी इच्छासे उसका घात करता है, झूठ बोलता है, चोरी करता है, अपरिमित तृष्णा रखता है और मैथुन करता है। ऐसा करनेपर अहिंसा आदि व्रत नहीं हो सकते। किन्तु परिग्रहका त्याग करनेपर अहिंसादिव्रत स्थिर रहते हैं ॥१११९॥


सण्णागारवपेसुण्णकलहफरुसाणि णिट्ठुरविवादा ।
संगणिमित्तं ईसासूयासल्लाणि जायंति ॥११२०॥

अर्थ: परिग्रहीके परिग्रह संज्ञा और परिग्रहमें आसक्ति होती। वह दूसरेके दोषोंको इधर-उधर कहता है। परिग्रही पुरुष दूसरेका धन लेनेके लिए दूसरोंके दोष प्रकट करके उसका धन हरता है। कलह करता है। धनके लिए कठोर वचन बोलता है, झगड़ा करता है। ईर्षा और असूया करता है। यह व्यक्ति अमुकको तो देता है मुझे नहीं देता, इस प्रकारके संकल्पको ईर्षा कहते हैं। दूसरेके धनी होनेको न सहना असूया है ॥११२०॥


कोधो माणो माया लोभो हास रइ अरदि भयसोगा ।
संगणिमित्तं जायइ दुगुंच्छ तह रादिभत्तं च ॥११२१॥

अर्थ: दूसरेके द्वारा अपना धन ग्रहण किये जाने पर क्रोध होता है। मैं धनाढ्य हूँ ऐसा गर्व होता है। दूसरा व्यक्ति मेरा धन देखकर उसे ले लेगा, इस भयसे उसे छिपाता है अतः माया होती है। एक कौड़ीका लाभ होने पर एक रुपया आदिका लाभ चाहता है। या धनका लाभ होनेसे लोभ होता है। धनी निर्धनको देखकर हँसता है अतः परिग्रह हास्यका भी कारण है। अपना द्रव्य देखकर उससे अनुराग होता है। अतः परिग्रह रतिका कारण है। द्रव्यका नाश होने पर अरति होती है। उसे दूसरे हर लेंगे यह भय होता है। धन हर लेने पर शोक होता है।


गंथो भयं णराणं सहोदरा एयरत्थजा जं ते ।
अण्णोण्णं मारेदुं अत्थणिमित्तं मदिमकासी ॥११२२॥

अर्थ: परिग्रह मनुष्यमें भय उत्पन्न करता है ।


अत्थणिमित्तमदिभयं जादं चोराणमेक्कमेक्केहिं ।
मज्जे मंसे य विसं संजोइय मारिया जं ते ॥११२३॥

अर्थ: धनके कारण चोरोंको परस्परमें एक दूसरेसे भय उत्पन्न हुआ । और उन्होंने मद्य और मांसमें विष मिलाकर एक दूसरेको मार डाला ॥११२३॥


संगो महाभयं जं विहेडिदो सावगेण संतेण ।
पुत्तेण चेव अत्थे हिदम्मि णिहिदेल्लए साहुं ॥११२४॥

अर्थ: परिग्रह महाभयरूप है क्योंकि जमीनमें गाड़े गये धनको अपना पुत्र ही ले गया और सत्पुरुष श्रावकको भी यह सन्देह हुआ कि मेरे इस पृथ्वीमें गड़े धनको साधु जानता था । सो कहीं इसी साधुने मेरा धन हरा हो । ऐसा सन्देह करके उस श्रावकने साधुपर कथाओंके द्वारा अपना सन्देह प्रकट किया ॥११२४॥


दूओ बंभणि वग्घो लोओ हत्थी य तह य रीयसुयं ।
परिथणरो वि य राया सुवण्णरयणस्स अक्खाणं ॥११२५॥

अर्थ: ये कथाएँ इस प्रकार हैं। पहले श्रावक जिनदत्तने दूत और बन्दरकी कथा कही। फिर साधुने ब्राह्मणी और नेवलेकी कथा कही। फिर श्रावकने व्याघ्र और वैद्यकी कथा कही। तब साधुने बैल और लोगोंकी कही। फिर श्रावकने हाथी और तापसकी कथा कही। तब साधुने राजा और आम्रवनकी कथा कही। फिर श्रावकने पार्थक मनुष्य और शिवनिवृक्षकी कथा कही। तब साधुने राजा और सर्पकी कथा कही। तब श्रावकने एक चोर और सेठकी कथा कही। अन्तमें साधुने मणिपालक और मेतार्यमुनिकी कथा कही ॥११२५ - ११२६॥


वण्णरणउलो विज्जो वसहो तावस तहेव चूदवणं ।
रुक्खसिवण्णीडुंडुह मेदज्ज मुणिस्स अक्खाणं ॥११२६॥

अर्थ: ये कथाएँ इस प्रकार हैं। पहले श्रावक जिनदत्तने दूत और बन्दरकी कथा कही। फिर साधुने ब्राह्मणी और नेवलेकी कथा कही। फिर श्रावकने व्याघ्र और वैद्यकी कथा कही। तब साधुने बैल और लोगोंकी कही। फिर श्रावकने हाथी और तापसकी कथा कही। तब साधुने राजा और आम्रवनकी कथा कही। फिर श्रावकने पार्थक मनुष्य और शिर्यानवृक्षकी कथा कही। तब साधुने राजा और सर्पकी कथा कही। तब श्रावकने एक चोर और सेठकी कथा कही। अन्तमें साधुने मणिपालक और मेतार्यमुनिकी कथा कही ॥११२५-११२६॥ ॥११२६॥


सीदुण्हादववादं वरिसं तण्हा छुहासमं पंथं ।
दुस्सेज्जं दुब्भत्तं सहइ वहइ भारमवि गुरुयं ॥११२७॥

अर्थ: परिग्रहका इच्छुक मनुष्य गर्मी, सर्दी, घाम, वायु, वर्षा, प्यास, भूख, श्रम, मार्ग चलना आदिका दुस्सह कष्ट सहन करता है और अपनी शक्तिसे भी अधिक भार ढोता है ॥११२७॥


गायदि णच्चइ धावइ कसइ ववइ लवदि तह मलेइ णरो ।
तुण्णादि वुणइ याचइ कुलम्मि जादो वि गंथत्थी ॥११२८॥

अर्थ: तथा श्रेष्ठकुलमें जन्म लेकर भी धनके लिए गाता है, नाचता है, दौड़ता है, खेती करता है, बीज बोता है, धान्य काटता है, मालिश करता है, कपड़े सीता है, कपड़े बुनता है, और भीख माँगता है ॥११२८॥


सेवइ णियादि रक्खइ गोमहिसिमजावियं हयं हत्थिं ।
ववहरदि कुणदि सिप्पं अहो य रत्ती य गयणिद्दो ॥११२९॥

अर्थ: रात दिन न सोकर सेवा करता है, घर छोड़कर देशान्तर जाता है। गाय, भैंस, बकरी, भेड़, हाथी, घोड़े पालता है । लेन-देन करता है । शिल्पकर्म करता है ॥११२९॥


आउधवासस्स उरं देइ रणमुहम्मि गंथलोभादो ।
मगरादिभीमसावदबहुलं अदिगच्छदि समुद्दं ॥११३०॥

अर्थ: परिग्रहके लोभसे युद्धभूमिमें अपनी छातीपर आयुधोंकी वर्षा सहता है । मगरमच्छ आदि भयंकर जन्तुओंसे भरे समुद्रमें प्रवेश करता है ॥११३०॥


जदि सो तत्थ मरिज्जो गंथो भोगा य कस्स ते होज्ज ।
महिलाविहिंसणिज्जो लूसिददेहो [?] सो होज्ज ॥११३१॥

अर्थ: यदि कदाचित् धनका लोभी रणमें मर जावे तो परिग्रह और भोग कौन करेगा । यदि न भी मरे और हाथ पैर कट जाये तो भी स्त्रियोंके द्वारा तिरस्कृत होगा ॥११३१॥


गंथणिमित्तमदीदिय गुहाओ भीमाओ तह य अडवीओ ।
गंथणिमित्तं कम्मं कुणइ अकादव्वयंपि णरो ॥११३२॥

अर्थ: परिग्रहके निमित्त भयानक गुफामें प्रवेश करता है, भयानक जंगलमें जाता है । इस प्रकार मनुष्य परिग्रहके लिए नहीं करने योग्य काम भी करता है ॥११३२॥


सूरो तिक्खो मुक्खो वि होइ वसिओ जणस्स सधणस्स ।
माणी वि सहइ गंथणिमित्तं बहुयं पि अवमाणं ॥११३३॥

अर्थ: परिग्रहके निमित्त शूरवीर, असहनशील और मूर्ख पुरुष भी धनी मनुष्यके वशमें होता है और अभिमानी भी बहुत अपमान सहता है ॥११३३॥


गंथणिमित्तं घोरं परितावं पाविदूण कंपिल्ले ।
लल्लक्कं संपत्तो णिरयं पिण्णागगंधो खु ॥११३४॥

अर्थ: परिग्रहके निमित्तसे कंपिला नगरीमें पिण्याकगन्ध नामका लोभी पुरुष घोर दुःख सहकर मरकर लल्लक नामक नरक बिलमें उत्पन्न हुआ ॥११३४॥


एवं चेट्ठंतस्स वि संसइदो चेव गंथलाहो दु ।
ण य संचीयदि गंथो सुइरेणवि मंदभागस्स ॥११३५॥

अर्थ: इस प्रकार नाना चेष्टाएँ करनेपर भी परिग्रहकी प्राप्तिमें सन्देह ही रहता है । क्योंकि अभागे पुरुषको चिरकाल प्रयत्न करनेपर भी धनकी प्राप्ति नहीं होती ॥११३५॥


जदि वि कहंचि वि गंथा संचीएजण्ह तह वि से णत्थि ।
तित्ती गंथेहिं सदा लोभो लाभेण वड्ढदि खु ॥११३६॥

अर्थ: यदि किसी प्रकार धन मिल भी जाये तो उससे सन्तोष नहीं होता; क्योंकि धन-लाभ होनेसे लोभ बढ़ता है ॥११३६॥


जध इंधणेहिं अग्गी लवणसमुद्दो णदीसहस्सेहिं ।
तह जीवस्स ण तित्ती अत्थि तिलोगे वि लद्धम्मि ॥११३७॥

अर्थ: जैसे ईंधनसे आगकी तृप्ति नहीं होती, और हजारों नदियोंके मिलनेसे लवण-समुद्रकी तृप्ति नहीं होती । वैसे ही तीनों लोक मिल जानेपर भी जीवकी परिग्रहसे तृप्ति नहीं होती ॥११३७॥


पडहत्थस्स ण तित्ती आसी य महाधणस्स लुद्धस्स ।
संगेसु मुच्छिदमदी जादो सो दीहसंसारी ॥११३८॥

अर्थ: पटहस्त नामक वणिक्के पास बहुत धन था । किन्तु वह बड़ा लोभी था । उसे सन्तोष नहीं था । अतः परिग्रहमें आसक्त रहते हुए उसका मरण हुआ और वह दीर्घसंसारी हुआ ॥११३८॥


तित्तीए असंतीए हाहाभूदस्स घण्णचित्तस्स ।
किं तत्थ होज्ज सुक्खं सदा वि पंपाए गहिदस्स ॥११३९॥

अर्थ: परिग्रहसे तृप्ति नहीं होनेपर हाय-हाय करनेवाले परिग्रहके लम्पटीको, जो सदा तृष्णासे व्याकुल रहता है, परिग्रहसे क्या सुख हो सकता है ॥११३९॥


हम्मदि मारिज्जदि वा बज्झदि रुंभदि य अणवराधो वि ।
आमिसहेदुं धण्णो खज्जदि पक्खीहिं जह पक्खी ॥११४०॥

अर्थ: जैसे मांसके लिए मांसका लोभी पक्षी दूसरे मांस ले जाते पक्षीको मारता काटता है वैसे ही लोभी धनाढ्य मनुष्य बिना अपराधके ही दूसरोंके द्वारा खाया जाता है, मारा जाता है और पकड़ा जाता है ॥११४०॥


मादुपिदुपुत्तदारेसु वि पुरिसो ण उवयाइ वीसंभं ।
गंथणिमित्तं जग्गइ रक्खंतो सव्वरत्तीए ॥११४१॥

अर्थ: परिग्रहके कारण मनुष्य माता, पिता, पुत्र और पत्नीका भी विश्वास नहीं करता । और रातभर जागकर परिग्रहकी रखवाली करता है ॥११४१॥


सव्वं पि संकमाणो गामे णयरे घरे व रण्णे वा ।
आधारमग्गणपरो अणप्पवसिओ सदा होइ ॥११४२॥

अर्थ: वह सबको शंकाकी दृष्टिसे देखता है कि ये मेरा धन हरनेवाले हैं । और गाँव, नगर, घर अथवा वनमें किसीका आश्रय खोजता फिरता है इस तरह वह सदा पराधीन रहता है ॥११४२॥


गंथपडियाए लुद्धो धीराचरियं विचित्तमावसधं ।
णेच्छदि बहुजणमज्झे वसदि य सागारिगावसए ॥११४३॥

अर्थ: वह परिग्रहका लोभी धीर पुरुषोंके रहने योग्य एकान्त स्थानमें रहना पसन्द नहीं करता । वह बहुत जनसमुदायके मध्य गृहस्थोंके घरमें रहना पसन्द करता है ॥११४३॥


सोदूण किंचि सद्दं सग्गंथो होइ उट्ठिदो सहसा ।
सव्वत्तो पिच्छंतो परिमसइ पलादि मुज्झदि य ॥११४४॥

अर्थ: किंचित् भी शब्द सुनकर परिग्रही एकदम उठकर सब ओर देखता है, अपने धनको टटोलता है और लेकर भागता है अथवा मूर्छित हो जाता है ॥११४४॥


तेणभएणारोहइ तरुं गिरिं उप्पहेण व पलादि ।
पविसदि य दहं दुग्गं जीवाण वहं करेमाणो ॥११४५॥

अर्थ: चोरके भयसे वृक्ष अथवा पहाड़पर चढ़ जाता है । अथवा मार्गसे न जाकर कुमार्गसे जाता है और जीवोंका घात करते हुए तालाब या किलेमें छिप जाता है ॥११४५॥


तह वि य चोरा चारभडा वा गच्छं हरेज्ज अवसस्स ।
गेण्हिज्ज दाइया वा रायाणो वा विलुंपिज्ज ॥११४६॥

अर्थ: इस प्रकार दौड़-धूप करनेपर भी चोर अथवा बलवान् मनुष्य उसे परवश करके उसके द्रव्यको हर लेते हैं । अथवा भाई वगैरह ले लेते हैं या राजा लूट लेता है ॥११४६॥


संगणिमित्तं कुद्धो कलहं रोलं करिज्ज वेरं वा ।
पहणेज्ज व मारेज्ज व मरिज्जेज्ज व तह य हम्मेज्ज ॥११४७॥

अर्थ: परिग्रहके कारण मनुष्य क्रोध करता है, कलह करता है, विवाद करता है, वैर करता है, मारपीट करता है, दूसरोंके द्वारा मारा जाता है, पीटा जाता है, या स्वयं मर जाता है ॥११४७॥


अहवा होइ विणासो गंथस्स जलग्गिमूसयादीहिं ।
णट्ठे गंथे य पुणो तिव्वं पुरिसो लहदि दुक्खं ॥११४८॥

अर्थ: अथवा आगसे, जलसे और मूषकों आदिसे परिग्रहका विनाश हो जाता है तब विनाश होनेपर मनुष्यको तीव्र दुःख होता है ॥११४८॥


सोयइ विलवइ कंदइ णट्ठे गंथम्मि होइ विसण्णो ।
पज्झादि णिवाइज्जइ वेवइ उक्कंठिओ होइ ॥११४९॥

अर्थ: वह शोक करता है, विलाप करता है, चिल्लाता है, खेद-खिन्न होता है। चिन्ता करता है। अन्तरंगमें सन्ताप होनेसे जलादि पीता है, काँपता है, उत्कंठित होता है ॥११४९॥


डज्झदि अंतो पुरिसो अप्पिये णट्ठे सगम्मि गंथम्मि ।
वायावि य अक्खिप्पइ बुद्धी विय होइ से मूढा ॥११५०॥

अर्थ: अपने परिग्रहके नष्ट होनेपर पुरुष अन्दर ही अन्दर जला करता है। उसकी वाणी नष्ट हो जाती है तथा बुद्धि भी मूढ़ हो जाती है ॥११५०॥


उम्मत्तो होइ णरो णट्ठे गंथे गहोवसिट्ठो वा ।
घट्टदि मरुप्पवादादिएहिं बहुधा णरो मरिदुं ॥११५१॥

अर्थ: परिग्रहके नष्ट होनेपर मनुष्य पिशाचसे पकड़े हुए मनुष्यकी तरह उन्मत्त हो जाता है। और प्रायः पर्वत आदिसे गिरकर मरनेकी चेष्टा करता है ॥११५१॥


चेलादीया संगा संसज्जंति विविहेहिं जंतूहिं ।
आगंतुगा वि जंतू हवंति गंथेसु सण्णिहिदा ॥११५२॥

अर्थ: वस्त्रादि परिग्रहमें नाना प्रकार सम्मूर्च्छन जीव उत्पन्न हो जाते हैं। बाहरसे आकर भी जूं, चींटी, खटमल वगैरह बस जाते हैं। धान्यमें कीड़े लग जाते हैं। गुड़ आदि संचय करनेपर उसमें भी जीव पैदा हो जाते हैं ॥११५२॥


आदाणे णिक्खेवे सरेमणे चावि तेसिं गंथाणं ।
उक्कस्सणे वेकसणे फालणपप्फोडणे चेव ॥११५३॥

अर्थ: परिग्रहके ग्रहण करने, रखने, संस्कार करने, बाहर ले जाने, बन्धन खोलने, फाड़ने, झाड़ने, छेदने, बाँधने, ढाँकने, सुखाने, धोने, मलने आदिमें जीवोंका घात आदि होता है ॥११५३-५४॥


छेदणबंधणवेढणआदावणधोव्वणादिकिरियासु ।
संघट्टणपरिदावणहणणादी होदि जीवाणं ॥११५४॥

अर्थ: परिग्रहके ग्रहण करने, रखने, संस्कार करने, बाहर ले जाने, बन्धन खोलने, फाड़ने, झाड़ने, छेदने, बाँधने, ढाँकने, सुखाने, धोने, मलने आदिमें जीवोंका घात आदि होता है ॥११५३-५४॥ ॥११५४॥


जदि वि विकिंचादि जंतू दोसा ते चेव हुंति से लग्गा ।
होदि य विकिंचणे वि हु तज्जोणिविओजणा णिययं ॥११५५॥

अर्थ: यदि वस्त्रादि परिग्रहसे जन्तुओंको अलग किया जाये तब भी वे ही दोष लगते हैं। क्योंकि उन जन्तुओंको दूर करनेपर उनका योनिस्थान छूट जाता है और इससे उनका मरण हो जाता है ॥११५५॥


सच्चित्ता पुण गंथा वधंति जीवे सयं च दुक्खंति ।
पावं च तण्णिमित्तं परिगिण्हंतस्स से होई ॥११५६॥

अर्थ: दासी-दास, गाय-भैंस आदि सचित्त परिग्रह जीवोंका घात करते हैं और स्वयं दुखी होते हैं। तथा उन्हें खेती आदि कामोंमें लगानेपर वे जो पापाचरण करते हैं उसका भागी उनका स्वामी भी होता है ॥११५६॥


इंदियमयं सरीरं गंथं गेण्हदि य देहसुक्खत्थं ।
इंदियसुहाभिलासो गंथग्गहणेण तो सिद्धो ॥११५७॥

अर्थ: शरीर इन्द्रियमय है क्योंकि स्पर्शन आदि पाँच इन्द्रियोंका आधार है। वस्त्र ओढ़ना आदि परिग्रह मनुष्य इन्द्रियजन्य सुखके लिए ही ग्रहण करता है। ऐसा वह हवा धूप आदिके अनिष्ट स्पर्शसे बचनेके लिए करता है। तथा वस्त्र अलंकार आदिसे अपने शरीरको भूषित करके मनुष्य दूसरेमें अभिलाषा उत्पन्न करता है और इस तरह उसके शरीरके संसर्गसे उत्पन्न अनुरागका इच्छुक होकर उसका सेवन करता है अतः परिग्रहको स्वीकार करनेवालेके इन्द्रिय सुखकी अभिलाषा सिद्ध होती है ॥११५७॥

गाथा ११५८ से १४३७

गंथस्स गहणरक्खणसारवणाणि णियदं करेमाणो ।
विक्खित्तमणो ज्झाणं उवेदि कह मुक्कसज्झाओ ॥११५८॥

अर्थ: परिग्रहको ग्रहण, रक्षण और उसके सार सम्हालमें सदा लगा रहनेवाले पुरुषका मन उसीमें व्याकुल रहता है। तब वह स्वाध्याय छूट जानेसे शुभध्यान कैसे कर सकता है। कहनेका अभिप्राय यह है कि जिसका चित्त व्याकुल रहता है वह स्वाध्याय नहीं कर सकता। और स्वाध्यायके अभावमें वस्तुके यथार्थस्वरूपको न जानते हुए ध्येयमें एकनिष्ठ ध्यान कैसे हो सकता है ॥११५८॥


गंथेसु घडिदहिदओ होइ दरिद्दो भवेसु बहुगेसु ।
होदि कुणंतो णिच्चं कम्मं आहारहेदुम्मि ॥११५९॥

अर्थ: जिसका चित्त परिग्रहमें आसक्त होता है वह भव-भवमें दरिद्र होता है। केवल पेट भरनेके लिए उसे पालकी उठाना, जूते बेचना, टट्टी पेशाब साफ करने आदिका नीच काम करना पड़ता है ॥११५९॥


विविहाओ जायणाओ पावदि परभवगदो वि धणहेदुं ।
लुद्धो पंपागहिदो हाहाभूदो किलिस्सदि य ॥११६०॥

अर्थ: परिग्रहमें आसक्त पुरुष पर भवमें भी धनके लिए अनेक कष्ट उठाता है। लोभके वशीभूत हो तृष्णामें पड़कर हाहाकार करता है कि इतना कष्ट उठानेपर भी मुझे धनकी प्राप्ति नहीं होती या प्राप्त हुआ धन भी नष्ट हो गया । और इस प्रकार दुःखी होता है ॥११६०॥


एदेसिं दोसाणं मुंचइ गंथजहणेण सव्वेसिं ।
तव्विवरीया य गुणा लभदि य गंथस्स जहणेण ॥११६१॥

अर्थ: परिग्रहका त्याग करनेसे ये सब दोष नहीं होते । तथा इनके विपरीत गुणोंकी प्राप्ति होती है ॥११६१॥


गंथच्चाओ इंदियणिवारणे अंकुसो व हत्थिस्स ।
णयरस्स खाइया वि य इंदियगुत्ती असंगत्तं ॥११६२॥

अर्थ: ‘इंदियणिवारणे’ में आये इन्द्रिय शब्दका अर्थ उपयोगरूप इन्द्रिय अर्थात् इन्द्रियजन्यज्ञान है । तथा सप्तमी विभक्तिका अर्थ निमित्त है । अतः उसका अर्थ होता है - परिग्रहका त्याग इन्द्रियज्ञानको रोकनेमें निमित्त है जैसे अंकुश हाथीको रोकनेमें निमित्त है । अर्थात् जैसे अंकुश हाथीको उन्मार्गपर जानेसे रोकता है वैसे ही परिग्रहका त्याग इन्द्रियोंको विषयोंमें जानेसे रोकता है । इन्द्रियाँ ही रागद्वेषकी मूल हैं । अथवा जैसे खाई नगरकी रक्षा करती है वैसे ही परिग्रहका त्याग रागकी उत्पत्तिमें निमित्त इन्द्रियोंसे रक्षा करता है ॥११६२॥


सप्पबहुलम्मि रण्णे अमंतविज्जोसहो जहा पुरिसो ।
होइ दढमप्पमत्तो तह णिग्गंथो वि विसएसु ॥११६३॥

अर्थ: जैसे मंत्र, विद्या और औषधीसे रहित पुरुष सर्पोंसे भरे जंगलमें अत्यन्त सावधान रहता है । वैसे ही निर्ग्रन्थ साधु भी जो क्षायिक सम्यग्दर्शन केवलज्ञान और यथाख्यात चारित्ररूप मंत्र विद्या और औषधिसे रहित है अर्थात् जिसे इन सबकी प्राप्ति अभी नहीं हुई है वह रागद्वेषरूप सर्पोंसे भरे विषयरूप वनमें सावधान रहता है ॥११६३॥


रागो हवे मणुण्णे गंथे दोसो य होइ अमणुण्णे ।
गंथच्चाएण पुणो रागद्दोसा हवे चत्ता ॥११६४॥

अर्थ: मनोज्ञ विषयमें राग होता है और अमनोज्ञ विषयमें द्वेष होता है । अतः परिग्रहका त्याग करनेसे राग-द्वेषका त्याग हो जाता है ॥११६४॥


सीदुण्हदंसमसयादियाण दिण्णो परीसहाण उरो ।
सीदादिणिवारणए गंथे णिययं जहंतेण ॥११६५॥

अर्थ: शीत आदिका निवारण करने वाले वस्त्र आदि परिग्रहोंको जो नियमसे त्याग देता है वह शीत, उष्ण, डांस मच्छर आदि परीषहोंको सहनेके लिए अपनी छाती आगे कर देता है ।


जम्हा णिग्गंथो सो वादादवसीददंसमसयाणं ।
सहदि य विविधा बाधा तेण सदेहे अणादरदा ॥११६६॥

अर्थ: यतः परिग्रहका त्यागी निर्ग्रन्थ वायु, धूप, शीत, डांसमच्छर आदिके अनेक कष्टोंको सहता है । उस सहनेसे उसका शरीरमें अनादरभाव प्रकट होता है । और शरीरका आदर न करने वाला समस्त हिंसा आदिका त्याग करता है और अपनी शक्तिको न छिपाकर तपमें प्रयत्न करता है ॥११६६॥


संगपरिमग्गणादी णिस्संगे णत्थि सव्वविक्खेवा ।
ज्झाणज्झेणाणि तओ तस्स अविग्घेण वच्चंति ॥११६७॥

अर्थ: अपनेको इष्ट परिग्रहको खोजनेमें कष्ट होता है । तथा वह मिल भी जाये तो उसके स्वामीको खोजनेमें कष्ट होता है कि वह कहाँ रहता है । स्वामी मिल जाये तो उससे याचना करनी होती है। याचना करने पर मिल जाये तो सन्तोष होता है, न मिले तो मनमें दीनताका भाव रहता है। मिलने पर उसको लाना, उसका संस्कार करना, उसकी रक्षा करना ‘आदि’ शब्दसे लिया है। इस तरह परिग्रहके निमित्त ये सब करना पड़ता है। किन्तु परिग्रहका त्याग करके निर्ग्रन्थ बन जाने पर ये सब परेशानियाँ नहीं होतीं। तब चित्तमें किसी प्रकारकी आकुलता न होनेसे उस निर्ग्रन्थ साधुका ध्यान और स्वाध्याय बिना विघ्नके चलते हैं। अतः इस गाथाके द्वारा कहा है कि सब तपोंमें ध्यान और स्वाध्याय प्रधान हैं और परिग्रहका त्याग उनका उपाय है ॥११६७॥


गंथच्चाएण पुणो भावविसुद्धी वि दाविदा होइ ।
ण हु संगघडिदबुद्धी संगे जहिदुं कुणदि बुद्धी ॥११६८॥

अर्थ: परिग्रहके त्यागसे परिणामोंकी निर्मलता भी प्रकट होती है; क्योंकि जिसकी मति परिग्रहमें आसक्त होती है वह परिग्रहको छोड़नेका विचार नहीं रखता ॥११६८॥


णिस्संगो चेव सदा कसायसल्लेहणं कुणदि भिक्खू ।
संगा हु उदीरेंति कसाय अग्गीव कट्ठाणि ॥११६९॥

अर्थ: जो परिग्रहसे रहित है वही सदा कषाय रूप परिणामोंको कृश करता है परिग्रही नहीं । क्योंकि जैसे लकड़ी डालनेसे आग भड़कती है वैसे ही परिग्रहसे कषाय भड़कती है ॥११६९॥


सव्वत्थ होइ लहुगो रूवं विस्सासियं हवदि तस्स ।
गुरुगो हि संगसत्तो संकिज्जइ चावि सव्वत्थ ॥११७०॥

अर्थ: अपरिग्रही सर्वत्र जाने आनेमें हल्का रहता है । उसका रूप नग्न दिगम्बर विश्वासकारी होता है । और परिग्रही परिग्रहके भारसे भारी होता है । और उसके परिग्रहको देखकर लोग शङ्का करते हैं कि यह अपने वस्त्रोंमें शस्त्र छिपाये हुए है कोई उपद्रव न करे । अथवा यह अपने चीवर आदिमें छिपाकर धन तो नहीं ले जाता ? ॥११७०॥


सव्वत्थ अप्पवसिओ णिस्संगो णिब्भओ य सव्वत्थ ।
होदि य णिप्परियम्मो णिप्पडिकम्मो य सव्वत्थ ॥११७१॥

अर्थ: जो अपरिग्रही होता है वह सर्वत्र गाँव, नगर और वनमें स्वाधीन रहता है । उसे किसीका आश्रय लेना नहीं होता । और वह सर्वत्र निर्भय रहता है । उसे कृषि आदि काम करना नहीं होता । तथा इतना काम पहले कर लिया, इतना करना शेष है, इत्यादि चिन्ता उसे नहीं रहती ॥११७१॥


भारक्कंतो पुरिसो भारं ऊरुहिय णिव्वुदो होइ ।
जह तह पयहिय गंथे णिस्संगो णिव्वुदो होइ ॥११७२॥

अर्थ: जैसे भारसे लदा हुआ मनुष्य भारको उतारकर सुखी होता है वैसे ही परिग्रहको त्यागकर परिग्रहरहित साधु सुखी होता है । सर्वत्र सुखका लक्षण बाधाका अभाव है । लोकमें भी भोजनके द्वारा भूख प्यास चले जाने पर उत्पन्न हुई स्वस्थताको ही सुख माना जाता है ॥११७२॥


तम्हा सव्वे संगे अणागए वट्टमाणए तीदे ।
तं सव्वत्थ णिवारहि करणकारावणाणुमोदेहिं ॥११७३॥

अर्थ: यतः परिग्रह रखने पर इस लोक और परलोकमें बहुतसे दोष होते हैं अतः हे क्षपकः तुम सब अनागत, वर्तमान और अतीत परिग्रहोंको कृतकारित अनुमोदनासे सर्वथा दूर करो ।


जावंति केइ संगा विराधया तिविहकालसंभूदा ।
तेहिं तिविहेण विरदो विमुत्तसंगो जह सरीरं ॥११७४॥

अर्थ: अतः हे क्षपक ! तीनों कालोंका जितना भी परिग्रह रत्नत्रयका विनाशक है उस सबको मन वचन कायसे छोड़कर अपरिग्रही बनो और तब शरीरका त्याग करो ॥११७४॥


एवं कदकरणिज्जो तिकालतिविहेण चेव सव्वत्थ ।
आसं तण्ह संगं छिंद ममत्ति च मुच्छं च ॥११७५॥

अर्थ: इस प्रकार आराधनाके इच्छुकका आहार शरीर आदिका त्याग रूप जो कर्तव्य है वह जिसने कर लिया है ऐसे तुम हे क्षपक ! तीन कालोंके परिग्रहोंमें मन वचन कायसे आशा, तृष्णा, संग, ममत्व और मूर्छाको दूर करो ॥११७५॥


सव्वग्गंथविमुक्को सीदीभूदो पसण्णचित्तो य ।
जं पावइ पीयिसुहं ण चक्कवट्टी वि तं लहइ ॥११७६॥

अर्थ: समस्त बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रहको त्यागकर जो शीतीभूत होता है अर्थात् परिग्रह सम्बन्धी सब प्रकारकी चिन्ताओंसे मुक्त होनेसे अत्यन्त सुखमय होता है तथा प्रसन्नचित्त होता है वह जिस प्रीतिरूप सुखको प्राप्त करता है वह सुख चक्रवर्तीको भी प्राप्त नहीं होता ॥११७६॥


रागविवागसतण्णादिगिद्धि अवितित्ति चक्कवट्टिसुहं ।
णिस्संगणिव्वुइसुहस्स कहं अग्घइ अणंतभागं पि ॥११७७॥

अर्थ: चक्रवर्तीके सुखका फल राग है क्योंकि विषय सुखका सेवन पुरुषको विषयमें अनुरक्त करता है। तथा वह तृष्णाको बढ़ाता है। अत्यन्त गृद्धिको - लम्पटताको उत्पन्न करता है। उसमें तृप्ति नहीं है। अतः चक्रवर्तीका सुख अपरिग्रहीको जो परिग्रहका त्याग करने पर सुख होता है, उसके अनन्तवें भाग भी नहीं है ॥११७७॥


साधेंति जं महत्थं आयरिदाइं च जं महल्लेहिं ।
जं च महल्लाइं सयं महव्वदाइं हवे ताइं ॥११७८॥

अर्थ: यतः ये असंयमके निमित्तसे होने वाले नवीन कर्म समूहका निवारण रूप महान् प्रयोजनको साधते हैं, इसलिए महाव्रत हैं । यतः महान् पुरुषोंके द्वारा इनका आचरण किया जाता है इसलिए महाव्रत हैं । और यतः ये स्वयं महान् हैं - स्थूल और सूक्ष्मके भेद रूप हिंसा आदिका इससे त्याग होता है अतः इन्हें महाव्रत कहते हैं ॥११७८॥


तेसिं चेव वदाणं रक्खट्ठं रादिभोयणणियत्ती ।
अट्ठप्पवयणमादाओ भावणाओ य सव्वाओ ॥११७९॥

अर्थ: उन्हीं अहिंसा आदि व्रतोंकी रक्षाके लिए रात्रि भोजनका त्याग कहा है । यदि मुनि रात्रिमें भिक्षाके लिए भ्रमण करता है तो त्रस और स्थावर जीवोंका घात करता है क्योंकि रात्रिमें उनको देख सकना कठिन है । देनेवालेके आनेका मार्ग, उसके अन्न रखनेका स्थान, अपने उच्छिष्ट भोजनके गिरनेका स्थान, दिया जानेवाला आहार योग्य है अथवा नहीं, ये सब वह कैसे देख सकता है ? दिनमें भी जिनका परिहार कठिन है उन रसज अतिसूक्ष्म जीवोंका परिहार रात्रिमें कैसे कर सकता है । करछुल, अथवा देनेवालीका हाथ अथवा पात्रको देखे बिना कैसे शोधन कर सकता है । इन सबकी सम्यक्रूपसे परीक्षा किये बिना पदविभागी अथवा एषणा समिति आलोचना करनेपर साधुका सत्यव्रत कैसे रह सकता है ? दानका स्वामी सोया हुआ हो और उसके द्वारा न दिये गये आहारको किसी अन्यके हाथसे लेनेपर अदत्तादान - बिना दी हुई वस्तुका ग्रहण कहलायेगा । किसी भाजनमें दिनमें लाकर रखे और रात्रिमें भोजन करे तो अपरिग्रहव्रतका लोप होगा । किन्तु रात्रि भोजनका त्याग करनेसे सब व्रत सम्पूर्ण रहते हैं । आठ प्रवचन माता महाव्रतकी रक्षक हैं । पाँच समितियाँ और तीन गुप्तियाँ ये आठ


तेसिं पंचण्हं पि य अंहयाणमावज्जणं व संका वा ।
आदविवत्ती य हवे रादीभत्तप्पसंगम्मि ॥११८०॥

अर्थ: रात्रिमें आहार करने पर उन हिंसा आदि पांचों पापोंकी प्राप्ति होती है अथवा यह शंका रहती है कि हिंसा आदि पाप हुए तो नहीं ? इसके सिवाय साधुको स्वयं भी ठूंठ, सर्प, कण्टक आदिसे विपत्तिका सामना करना पड़ सकता’ है ॥११८०॥


जा रागादिणियत्ती मणस्स जाणाहि तं मणोगुत्तिं ।
अलियादिणियत्ती वा मोणं वा होइ वचिगुत्ती ॥११८१॥

अर्थ: मनकी जो रागादिसे निवृत्ति है उसे मनोगुप्ति जानो । समितिमें महान् अन्तर है । मौन वचन गुप्ति है ऐसा कहने पर गुप्ति और समितिका भेद स्पष्ट हो जाता है । समिति योग्य वचनमें प्रवृत्ति कराती है । और गुप्ति किसी वचनकी उत्पादक नहीं है ॥११८१॥


कायकिरियाणियत्ती काउस्सग्गो सरीरगे गुत्ती ।
हिंसादिणियत्ती वा सरीरगुत्ती हवदि दिट्ठा ॥११८२॥

अर्थ: काय अर्थात् औदारिक आदि शरीरकी जो क्रिया है उसकी निवृत्ति कायगुप्ति है ।


छेत्तस्स वदी णयरस्स खाइया अहव होइ पायारो ।
तह पावस्स णिरोहे ताओ गुत्तीओ साहुस्स ॥११८३॥

अर्थ: जैसे खेतकी बाड़ और नगरकी खाई अथवा चारदिवारी होती है वैसे ही पापको रोकनेमें साधुकी गुप्तियाँ होती हैं ॥११८३॥


तम्हा तिविहेवि तुमं मणवचिकायप्पओगजोगम्मि ।
होहि सुसमाहिदमदी णिरंतरं ज्झाणसज्झाए ॥११८४॥

अर्थ: इसलिए हे क्षपक ! तुम निरन्तर ध्यान और स्वाध्यायमें लगे रहकर मन वचन काय विषयक तीन प्रकारके प्रकृष्ट योगमें सावधान रहो । क्योंकि ध्यान और स्वाध्यायके बिना गुप्तियाँ नहीं ठहरतीं ॥११८४॥


मग्गुज्जोवपओगालंबणसुद्धीहिं इरियदो मुणिणो ।
सुत्ताणुवीचि भणिदा इरियासमिदी पवयणम्मि ॥११८५॥

अर्थ: मार्गशुद्धि, उद्योतशुद्धि, उपयोगशुद्धि और आलम्बन शुद्धि, इन चार शुद्धियोंके द्वारा सूत्रके अनुसार गमन करते हुए मुनिके प्रवचनमें ईर्यासमिति कही है ।


तव्विवरीदं मोसं तं उभयं जत्थ सच्चमोसं तं ।
तव्विवरीया भासा असच्चमोसा हवे दिट्ठा ॥११८८॥

अर्थ: अतीत और अनागत परिणाम रूप यही द्रव्य है ऐसा मानकर किया गया वचन व्यवहार सत्य है जैसे भात पकाओ या चटाई बुनो । ये दोनों परिणाम वर्तमानमें नहीं हैं क्योंकि चावल पकने पर भात बनेगा और बुनने पर चटाई होगी । फिर भी अनागत परिणामकी अपेक्षा इनका व्यवहार होता है । जिस वचनके द्वारा अहिंसा रूप भाव पाला जाता है वह वचन भाव सत्य है । जैसे देखकर सावधानतापूर्वक प्रवृत्ति करो आदि । पल्योपम, सागरोपम आदिका जो कथन आगममें कहा है वह उपमा सत्य है ॥११८८॥


आमंतणि आणवणी जायणि संपुच्छणी य पण्णवणी ।
पच्चक्खाणी भासा भासा इच्छाणुलोमा य ॥११८९॥

अर्थ: आमन्त्रणी, आणवणी, याचनी, संपुच्छणी, प्रज्ञापनी, प्रत्याख्यानी और इच्छानुलोमा। दूध उत्तम नहीं है ? यदि दूसरा कहे कि माधुर्य आदि प्रशस्त गुणोंकी अपेक्षा तो उत्तम है किन्तु ज्वरको बढ़ानेवाला होनेसे उत्तम नहीं है तो इस प्रकारके वचन न सर्वथा असत्य हैं और न सर्वथा सत्य हैं किन्तु दोनों रूप होनेसे उभयात्मक हैं। यहाँ उभयात्मकसे इन वचनोंको सत्य और असत्यरूप नहीं समझना चाहिए। किन्तु सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं अर्थात् अनुभयरूप समझना चाहिए ॥११८९॥


संसयवयणी य तहा असच्चमोसा य अट्ठमी भासा ।
णवमी अणक्खरगदा असच्चमोसा हवदि णेया ॥११९०॥

अर्थ: आठवीं असत्यमृषा भाषा संशय वचनी है। जैसे यह स्थाणु है या पुरुष। दोनोंमेंसे एकके सद्भाव और दूसरेके अभावकी अपेक्षा यह वचन उभयरूप है। और नौवीं असत्यमृषा भाषा अनक्षरात्मक भाषा है। जैसे अंगुलि चटकाने आदिका शब्द। जिस पुरुषने संकेत ग्रहण किया है उसे तो ध्वनिसे प्रतीति होती है दूसरेको नहीं होती। इस तरह यह वचन उभयरूप है ॥११९०॥


उग्गमउप्पायणएसणाहिं पिंडमुवधि सेज्जं च ।
सोधिंतस्स य मुणिणो विसुज्झए एसणासमिदी ॥११९१॥

अर्थ: उद्गम, उत्पादन और एषणा दोषोंसे रहित भोजन, उपकरण और वसतिको ग्रहण करनेवाले मुनिकी एषणा समिति निर्मल होती है ॥११९१॥


सहसाणाभोगिददुप्पमज्जिय अपच्चवेसणा दोसो ।
परिहरमाणस्स हवे समिदी आदाणणिक्खेवो ॥११९२॥

अर्थ: बिना देखे और बिना प्रमार्जन किये पुस्तक आदिका ग्रहण करना या रखना सहसा नामक प्रथम दोष है । विना देखे प्रमार्जन करके पुस्तक आदिको ग्रहण करना या रखना अनाभोगित नामक दूसरा दोष है । देखकर भी सम्य प्रतिलेखना न करके पुस्तक आदिको ग्रहण करना या रखना दुष्प्रमृष्ट नामक तीसरा दोष है । देखा भी और प्रमार्जन भी किया किन्तु यह शुद्ध है या अशुद्ध, यह नहीं देखा यह चतुर्थ अप्रत्यवेक्षण नामक दोष है । इन चारों दोषोंको जो दूर करता है उसके आदान निक्षेपण समिति होती है ॥११९२॥


एदेण चेव पदिट्ठावणसमिदीवि वण्णिया होदि ।
वोसरणिज्जं दव्वं थंडिल्ले वोसरिंतस्स ॥११९३॥

अर्थ: आदान और निक्षेप विषयक सावधानताका कथन करनेसे प्रतिष्ठापन समितिका कथन हो जाता है । त्यागने योग्य मूत्र विष्टा आदिको जन्तुरहित और छिद्ररहित समभूमिमें त्यागना प्रतिष्ठापन समिति है ॥११९३॥


एदाहिं सदा जुत्तो समिदीहिं जगम्मि विहरमाणो हु ।
हिंसादीहिं ण लिप्पइ जीवणिकायाउले साहू ॥११९४॥

अर्थ: इन पाँच समितियोंका सदा पालन करनेवाला मुनि छ प्रकारके जीवनिकायोंसे भरे हुए लोकमें गमनागमन आदि करता हुआ भी हिंसा आदिसे लिप्त नहीं होता । ‘आदि’ शब्दसे छहकायके जीवोंको कष्ट देना, उनका परस्परमें संघट्टन करना, उनके अंग उपांगोंको छिन्न-भिन्न करना आदि पापोंसे लिप्त नहीं होता । समितियोंमें प्रवृत्ति करते हुए मुनि प्रमादसे रहित होता है । और प्रमत्तयोगसे प्राणोंके घातको हिंसा कहा है । हिंसा आदिसे सहित कर्म हिंसा आदि शब्दसे कहे जाते हैं । क्योंकि कार्यमें कारणशब्दकी प्रवृत्ति अति प्रसिद्ध है । आदान निक्षेपमें निमित्त गुणोंसे युक्त मुनि प्रवृत्ति करते हुए भी हिंसा आदि पापसे लिप्त नहीं होता ॥११९४॥


पउमणिपत्तं व जहा उदयेण ण लिप्पदि सिणेहगुणजुत्तं ।
तह समिदीहिं ण लिप्पइ साधू काएसु इरियंतो ॥११९५॥

अर्थ: जैसे स्नेह गुणसे युक्त कमलपत्र जलसे लिप्त नहीं होता । उसी प्रकार प्राणियोंके शरीरोंके मध्यमेंसे गमनागमन करते हुए भी साधु समितिका पालन करनेसे पापसे लिप्त नहीं होता ॥११९५॥


सरवासे वि पडंते जह दढकवचो ण विज्झदि सरेहिं ।
तह समिदीहिं ण लिप्पइ साधू काएसु इरियंतो ॥११९६॥

अर्थ: जैसे दृढ़ कवचसे युक्त योद्धा युद्धभूमिमें बाणोंकी वर्षा होते हुए भी बाणोंसे नहीं छिदता । उसी प्रकार षट्कायके जीवोंके मध्यमें विचरण करता हुआ भी समितियोंके कारण हिंसा आदिसे लिप्त नहीं होता ॥११९६॥


जत्थेव चरइ बालो परिहारण्हू वि चरइ तत्थेव ।
बज्झदि पुण सो बालो परिहारण्हू वि मुच्चइ सो ॥११९७॥

अर्थ: जीवोंकी हिंसासे बचनेके उपायोंको न जाननेवाला जिस क्षेत्रमें विचरण करता है, जीवोंकी हिंसासे बचनेके उपायोंको जाननेवाला भी उसी क्षेत्रमें विचरण करता है । तथापि वह ज्ञान और चारित्रमें बालकके समान अज्ञ तो पापसे बद्ध होता है किन्तु उपायोंको जाननेवाला पापसे लिप्त नहीं होता बल्कि उससे मुक्त होता है ॥११९७॥


तम्हा चेट्ठिदुकामो जइया तइया भवाहि तं समिदो ।
समिदो हु अण्णमण्णं णादियदि खवेदि पोराणं ॥११९८॥

अर्थ: यतः समितियोंका पालक पापसे लिप्त नहीं होता किन्तु उससे छूटता है और समितिका पालन न करनेवाला महान् कर्मसमूहसे बँधता है अतः जब तुम गमन करना या बोलना चाहो तो समितिमें तत्पर रहो । ऐसा निर्यापकाचार्य क्षपकसे कहते हैं । क्योंकि ईर्या आदिमें सम्यक् प्रवृत्ति करनेवाला नवीन-नवीन कर्मोंका बन्ध नहीं करता और पूर्वमें बँधे कर्मोंकी निर्जरा करता है ॥११९८॥


एदाओ अट्ठपवयणमादाओ णाणदंसणचरित्तं
रक्खंति सदा मुणिणो मादा पुत्तं व पयदाओ ॥११९९॥

अर्थ: जैसे सावधान माता पुत्रकी अनिष्टोंसे रक्षा करके उसका पालन करती है । वैसे ही सम्यक्रूपसे पालित ये आठ प्रवचन मातायें मुनिके सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्रकी रक्षा करती हैं ॥११९९॥


एसणणिक्खेवादाणिरियासमिदी तहा मणोगुत्ती ।
आलोयभोयणं वि य अहिंसाए भावणा होंति ॥१२००॥

अर्थ: टी - एषणा समिति, आदान निक्षेपण समिति, ईर्यासमिति, मनोगुप्ति और आलोक भोजन ये पांच अहिंसाव्रतकी भावना हैं । उनमेंसे एषणा समिति कहते हैं - भिक्षाकाल, बुभुक्षाकाल और अवग्रहकाल ये तीन काल जानना चाहिए । अमुक मासोंमें ग्राम नगर आदिमें अमुक नहीं चाहिये । जो भोजन उद्गम, उत्पादन और एषणा दोषसे दुष्ट है उसे नहीं खाना चाहिये । इस तरह नौ कोटियोंसे शुद्ध आहार ग्रहण करना एषणा समिति है । जो वस्तु जिस स्थानपर रखी जाय और जो वस्तु जिस स्थानसे उठाई जाये वे दोनों प्रतिलेखनाके योग्य हैं या नहीं, यह देखनेके पश्चात् पीछीसे उनको झाड़कर पुनः देखे और तब रखे या ग्रहण करे । यह आदान निक्षेपण समिति है । ईर्यासमिति पहले कही है और मनोगुप्ति भी कही है । अति स्पष्ट प्रकाशमें देखे गये अन्नका भोजन आलोकभोजन है । ये पाँच अहिंसाव्रतकी भावना हैं ॥१२००॥


कोधभयलोभहस्सपदिण्णा अणुवीचिभासणं चेव ।
विदियस्स भावणाओ वदस्स पंचेव ता होंति ॥१२०१॥

अर्थ: क्रोधका त्याग, भयका त्याग, लोभका त्याग, हास्यका त्याग और सूत्रके अनुसार बोलना ये पाँच सत्यव्रतकी भावना हैं । वचनके चार भेद हैं - सत्य, असत्य, सत्य असत्य तथा न सत्य न असत्य । इनमेंसे सत्य और अनुभय वचन बोलने योग्य हैं । शेष दो नहीं बोलने चाहिये । क्रोध आदि झूठ बोलनेमें कारण होते हैं । उनको त्याग देने पर असत्य वचनका त्याग हो जाता है अन्यथा नहीं होता ॥१२०१॥


अणणुण्णादग्गहणं असंगबुद्धी अणुण्णवित्ता वि ।
एदावंतियउग्गहजायणमध उग्गहाणुस्स ॥१२०२॥

अर्थ: ज्ञानोपकरण आदिके स्वामीकी स्वीकृतिके बिना ज्ञानोपकरण आदिको स्वीकार न करना, स्वामीकी स्वीकृति मिलने पर स्वीकार की गई वस्तुमें भी आसक्ति न होना, ‘आपको इतना देना चाहिये’ इस प्रकार जितनेसे प्रयोजन हो उतना ही ग्रहण करना, जितना माँगा है उतना ही ग्रहण करूँगा ऐसी बुद्धि नहीं रखनी चाहिये । जो ग्रहण करने योग्य वस्तुको जानता है कि यह वस्तु ज्ञान और संयममेंसे एककी साधन है इसके बिना मुझे ज्ञान अथवा चारित्रकी सिद्धि नहीं होगी और उसीको ग्रहण करता है, अनुपयोगी वस्तुको ग्रहण नहीं करता । उसीके ये भावना होती है ॥१२०२॥


वज्जणमणणुण्णादगिहप्पवेसस्स गोयरादीसु ।
उग्गहजायणमणुवीचिए तहा भावणा तइए ॥१२०३॥

अर्थ: गोचरी आदिमें गृहस्वामीके द्वारा अनुज्ञा नहीं दिये घरमें प्रवेश न करना अर्थात् इस घरमें प्रवेश करें, अथवा यहाँ ठहरें इस प्रकारसे जहाँ गृहस्वामीकी अनुज्ञा प्राप्त न हो उस देशमें प्रवेश न करे और शास्त्रके अनुसार ग्रहण करने योग्य वस्तुकी याचना करना, ये पाँच अदत्तादानविरमणव्रत की भावना हैं ॥१२०३॥


महिलालोयणपुव्वरदिसरणसंसत्तवसहिविकहाहिं ।
पणिदरसेहिं य विरदी भावणा पंच बंभस्स ॥१२०४॥

अर्थ: स्त्रियोंकी ओर देखना, पूर्वमें भोगे हुए भोगोंका स्मरण, स्त्रियोंसे युक्त वसतिका, शृङ्गारकथा और इन्द्रियोंमें मद और बल पैदा करनेवाले रस, इन सबसे विरत होना ब्रह्मचर्यव्रत की पाँच भावनाएँ हैं ॥१२०४॥


अपडिग्गहस्स मुणिणो सद्दफरिसरसरूवगंधेसु ।
रागद्दोसादीणं परिहारो भावणा हुंति ॥१२०५॥

अर्थ: परिग्रह रहित मुनिका मनोज्ञ शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्धमें राग और द्वेषका त्याग अर्थात् मनोज्ञसे राग और अमनोज्ञसे द्वेष न करना विषयोंके भेदसे पाँच प्रकारकी भावना पाँचवें अपरिग्रह व्रत की हैं ॥१२०५॥


ण करेदि भावणाभाविदो खु पीडं वदाण[?] सव्वेसिं।
साधू पासुत्तो समुहदो व किमिदाणि वेदंतो ॥१२०६॥

अर्थ: भावनाओंसे भावित साधु गहरी नींदमें सोता हुआ भी अथवा मूर्छित हुआ भी सब व्रतोंमें दोष नहीं लगाता । तब जागते हुए की तो बात ही क्या है ॥१२०६॥


एदाहिं भावणाहिं हु तम्हा भावेहिं अप्पमत्तो तं ।
अच्छिद्दाणि अखंडाणि ते भविस्संति हु वदाणि ॥१२०७॥

अर्थ: इसलिये हे क्षपक ! तुम प्रमाद त्यागकर इन भावनाओंसे अपनेको भावित करो । इससे तुम्हारे व्रत निरन्तर बने रहेंगे और सम्पूर्ण होंगे ॥१२०७॥


णिस्सल्लस्सेव पुणो महव्वदाइं हवंति सव्वाइं ।
वदमुवहम्मदि तीहिं दु णिदाणमिच्छत्तमायाहिं ॥१२०८॥

अर्थ: शल्यरहितके ही सब महाव्रत होते हैं। ‘शृणाति’ अर्थात् जो कष्ट देता है वह शल्य है। जैसे शरीर आदिमें घुसनेवाला बाण, काँटा आदि। उनके समान जो अन्तरंगमें घुसा परिणाम प्राणीको कष्ट पहुँचानेमें निमित्त है उसे यहाँ शल्य शब्दसे कहा है। जैसे एषणासमितिका अभाव अहिंसा व्रतका घातक है वैसे ही शल्य किसी एक व्रतका घातक है क्या ? इस आशंकाको दूर करनेके लिये सर्व शब्दका प्रयोग किया है।


तत्थ णिदाणं तिविहं होइ पसत्थापसत्थभोगकदं ।
तिविधं पि तं णिदाणं परिपंथो सिद्धिमग्गस्स ॥१२०९॥

अर्थ: उन शल्योंमें निदान नामक शल्यके तीन भेद हैं - प्रशस्त निदान, अप्रशस्त निदान और भोग निदान । तीनों ही प्रकारका निदान मोक्षके मार्ग रत्नत्रयका विरोधी है ॥१२०९॥


संजमहेदुं पुरिसत्तसत्तबलविरियसंघदणबुद्दी ।
सावअबंधुकुलादीणि णिदाणं होदि हु पसत्थं ॥१२१०॥

अर्थ: संयममें निमित्त होनेसे पुरुषत्व, उत्साह, शरीरगत दृढ़ता, वीर्यान्तरायके क्षयोपशमसे उत्पन्न वीर्यरूप परिणाम, अस्थियोंके बन्धन विशेष रूप वज्रऋषभनाराच संहनन आदि, ये संयम साधन मुझे प्राप्त हों, इस प्रकार चित्तमें विचार होना प्रशस्त निदान है। तथा मेरा जन्म श्रावक कुलमें हो, ऐसे कुलमें हो जो दरिद्र न हो, बन्धु बान्धव परिवार न हो, ऐसी प्रार्थना प्रशस्त निदान है ॥१२१०॥


माणेण जाइकुलरूवमादि आइरियगणधरजिणत्तं ।
सोभग्गाणादेयं पत्थंतो अप्पसत्थं तु ॥१२११॥

अर्थ: मानकषायके वश जाति, कुल, रूप आदि तथा आचार्यपद, गणधरपद, जिनपद, सौभाग्य, आज्ञा और आदेय आदिकी प्राप्तिकी प्रार्थना करना अप्रशस्त निदान है ॥१२११॥


कुद्धो वि अप्पसत्थं मरणे पत्थेइ परवधादीयं ।
जह उग्गसेणघादे कदं णिदाणं वसिट्ठेण ॥१२१२॥

अर्थ: क्रोध कषायके वश होकर भी कोई मरते समय दूसरेका बध करनेकी प्रार्थना करता है । जैसे वशिष्ठ ऋषिने उग्रसेनका घात करनेका निदान किया था ॥१२१२॥


देविगमाणुसभोगे णारिस्सरसिट्ठिसत्थवाहत्तं ।
केसवचक्कधरत्तं पत्थंते होदि भोगकदं ॥१२१३॥

अर्थ: देवों और मनुष्योंमें होनेवाले भोगोंकी अभिलाषा करना तथा भोगोंके लिए नारीपना, ईश्वरपना, श्रेष्ठिपना, सार्थवाहपना, नारायण और सकल चक्रवर्तीपना प्राप्त होनेकी वांछा करना भोगनिदान है ॥१२१३॥


संजमसिहरारूढो घोरतवपरक्कमो तिगुत्तो वि ।
पगरिज्ज जइ णिदाणं सोवि य वड्ढेइ दीहसंसारं ॥१२१४॥

अर्थ: संयम पर्वतके शिखरके समान है क्योंकि जैसे पर्वतका शिखर अचल और दुःखसे चढ़ने योग्य है वैसा संयम भी है । उस संयमपर जो आरूढ है अर्थात् उत्कृष्ट संयमका धारी है, घोर तप करनेमें उत्साही है अर्थात् दुर्धर तप करता है और तीन गुप्तियोंका धारी है, वह भी यदि निदान करता है तो अपना संसार बढ़ाता है, फिर दूसरे निदान करनेवालेका तो कहना ही क्या है ॥१२१४॥


जो अप्पसुक्खहेदुं कुणइ णिदाणमविगणियपरमसुहं ।
सो कागणीए विक्केइ मणिं बहुकोडिसयमोल्लं ॥१२१५॥

अर्थ: जो मुक्तिके उत्कृष्ट सुखका अनादर करके अल्पसुखके लिए निदान करता है वह करोड़ों रुपयोंके मूल्यवाली मणिको एक कौड़ीके बदले बेचता है ॥१२१५॥


सो भिंदइ लोहत्थं णावं भिंदइ मणिं च सुत्तत्थं ।
छारकदे गोसीरं डहदि णिदाणं खु जो कुणदि ॥१२१६॥

अर्थ: जो निदान करता है वह लोहेकी कीलके लिए अनेक वस्तुओंसे भरी नाव को - जो समुद्रमें जा रही है तोड़ता है, भस्मके लिए गोशीर्षचन्दनको जलाता है और धागा प्राप्त करनेके लिए मणिनिर्मित हारको तोड़ता है। इस तरह जो निदान करता है वह थोड़ेसे लाभके लिए बहुत हानि करता है। एक सूपकारने अपनी मूर्खतासे अपनी नाव नष्ट कर डाली थी। इनकी कथाएँ ( कथाकोशोंसे ) जानना ॥१२१६॥


कोढी संतो लद्धूण डहइ उच्छुं रसायणं एसो ।
सो सामण्णं णासेइ भोगहेदुं णिदाणेण ॥१२१७॥

अर्थ: जैसे कोई कोढ़ी मनुष्य अपने रोगके लिए रसायनके समान ईखको पाकर उसे जलाकर नष्ट करता है वैसे ही भोगके लिए निदान करके मूर्ख मुनि सर्व दुःख और व्याधियोंका विनाश करनेमें तत्पर मुनि पदको नष्ट करता है ॥१२१७॥


पुरिसत्तादिणिदाणं पि मोक्खकामा मुणी ण इच्छंति ।
जं पुरिसत्ताइमओ भवो भवमओ य संसारो ॥१२१८॥

अर्थ: मोक्षके अभिलाषी मुनिगण ‘मैं मरकर पुरुष होऊँ’ या मेरे वज्रऋषभनाराच संहनन आदि हो, इस प्रकारका भी निदान नहीं करते। क्योंकि पुरुष आदि पर्याय भवरूप है और भवपर्यायका परिवर्तन स्वरूप होनेसे संसार भवमय है। अर्थात् नाना भवधारण करने रूप ही तो संसार है ॥१२१८॥


दुक्खक्खयकम्मक्खयसमाधिमरणं च बोधिलाभो य ।
एयं पत्थेयव्वं ण पत्थणीयं तओ अण्णं ॥१२१९॥

अर्थ: हमारे शारीरिक, आगन्तुक और स्वाभाविक दुःखोंका नाश हो। तथा उनके कारणभूत कर्मोंका क्षय हो। रत्नत्रयका पालन करते हुए मरण हो और जिनदीक्षाकी ओर अभिमुख करनेवाले ज्ञानका लाभ हो, इतनी ही प्रार्थना करने योग्य है। इनके सिवाय अन्य प्रार्थना करना योग्य नहीं है ॥१२१९॥


पुरिसत्तादीणि पुणो संजमलाभो य होइ परलोए ।
आराधयस्स णियमा तदत्थमकदे णिदाणे वि ॥१२२०॥

अर्थ: जो रत्नत्रयकी आराधना करता है उसे निदान न करने पर भी आगामी जन्ममें पुरुषत्व आदि का तथा संयमका लाभ निश्चय ही होता है ॥१२२०॥


माणस्स भंजणत्थं चिंतेदव्वो सरीरणिव्वेदो ।
दोसा माणस्स तहा तहेव संसारणिव्वेदो ॥१२२१॥

अर्थ: निर्यापकाचार्य क्षपकको शिक्षा देता है कि तुम्हें मानकषायका विनाश करनेके लिए शरीरसे निर्वेदका, मानके दोषों का और संसारसे निर्वेदका चिन्तन करना चाहिये। शरीरके अशुचित्व आदि स्वभावका चिन्तन करनेसे ‘इस शरीरसे क्या लाभ’ इस प्रकार शरीरमें अनादर होता है उसे ही शरीर निर्वेद कहते हैं।


णीचो वि होइ उच्चो उच्चो णीचत्तणं पुण उवेइ ।
जीवाणं खु कुलाइं पधियस्स व विस्समंताणं ॥१२२२॥

अर्थ: स्थान, मान, ऐश्वर्य आदिसे हीन व्यक्तिको नीच कहते हैं। जो स्थान, मान, ऐश्वर्य आदिसे हीन होता है वही नीच हो जाता है। जीवोंके कुल पथिकके विश्राम स्थानकी तरह हैं। जैसे पथिकके विश्राम लेनेका स्थान नियत नहीं है वैसे ही कुल भी नियत नहीं है। तब अनियत कुलका गर्व कैसा ? ‘कुलानि’ पद बहुवचनान्त होनेसे कुलोंकी बहुतायत प्रकट करता है। और कुलोंकी बहुतायतसे कुलोंकी अनित्यता दिखलाई है ॥१२२२॥


उच्चासु व णीचासु व जोणीसु ण तस्स अत्थि जीवस्स ।
वड्ढी वा हाणी वा सव्वत्थ वि तित्तिओ चेव ॥१२२३॥

अर्थ: शंका - जिसमें रहकर जीव अपने शरीरकी रचता है उसे योनि कहते हैं। योनि तो उच्च या नीच होती नहीं। तब ‘उच्चासु व नीचासु’ क्यों कहा ? समाधान - यहाँ योनि शब्दसे कुलको ही कहा है। अतः ऐसा अर्थ होता है - मान्य कुलमें अथवा निन्दनीय कुलमें उत्पन्न हुए जीवकी वृद्धि या हानि नहीं होती। सर्वत्र जीवका परिमाण उतना ही रहता है। ज्ञानादि गुणोंमें अतिशय होनेसे ही उत्कृष्टता होती है। कुलीन भी यदि निन्दित गुण वाला होता है तो दूसरे उसका आदर सम्मान नहीं करते। और अनादरणीय कुलमें उत्पन्न होकर भी यदि गुणी होता है तो दूसरे उसका सन्मान करते हैं। कहा है - संसारमें भ्रमण करते हुए प्राणीका कोई कुल स्थायी नहीं है। वही जीव अपने कर्मके अधीन होकर नीच, उत्तम अथवा मध्यम कुलोंमें जन्म लेता है। वही जीव अपने कर्मके वश होकर राजा और दास, चाण्डाल या ब्राह्मण, दरिद्र वंश वाला या सम्पन्न वंश वाला होता है तथा चोर, आग और दावानलसे पीड़ित तथा माँगने वाला होता है। उच्च कुलोंमें मनुष्योंको जन्म लेनेका गर्व कैसा ? और नीच कुलोंमें जन्म लेने पर घृणा कैसी ? गर्व करना हो तो धर्ममें ही करना चाहिए और घृणा भी पापसे करनी चाहिए ॥१२२३॥


कालमणंतं णीचागोदो होदूण लहइ सगिमुच्चं ।
जोणीमिदरसलागं ताओ वि गदा अणंताओ ॥१२२४॥

अर्थ: यह जीव अनन्तकाल तक नीच गोत्रमें जन्म लेकर एक बार उच्च गोत्रमें जन्म लेता है । इस प्रकार उच्च गोत्रकी शलाका नीच गोत्र है । शलाकासे मतलब है अनन्तकाल नीच गोत्रमें जन्म लेकर एक बार उच्च गोत्रमें जन्म । नीच गोत्रोंके अन्तरालमें प्राप्त उच्च गोत्र भी एक जीवने अनन्त बार प्राप्त किये हैं ॥१२२४॥


बहुसो वि लद्धविजडे को उच्चत्तम्मि विम्भओ णाम ।
बहुसो वि लद्धविजडे णीचत्ते चावि किं दुक्खं ॥१२२५॥

अर्थ: इस प्रकार अनन्त बार प्राप्त करके छोड़े हुए उच्च कुलमें जन्म लेनेका गर्व कैसा ? गर्व तो तब होता जब अभी तक न पानेके बाद प्रथम बार ही इसे प्राप्त किया होता । तथा अनन्त बार प्राप्त करके छोड़े हुए नीच गोत्रमें जन्म लेनेका दुःख कैसा ॥१२२५॥


उच्चत्तणम्मि पीदी संकप्पवसेण होइ जीवस्स ।
णीचत्तणे ण दुक्खं तह होइ कसायबहुलस्स ॥१२२६॥

अर्थ: ‘मैं उच्च कुलमें जन्मा हूं’ ऐसा मनमें संकल्प होनेसे जीवका उच्चकुलमें अत्यन्त अनुराग होता है । इस प्रकारके संकल्पके बिना सामान्य कुलमें जन्म होने पर भी अनुराग नहीं होता । तथा नीच कुलमें जन्म लेना ही दुःखका कारण नहीं है । दुःखका कारण है मान-कषायकी बहुतायत । गाथामें कषाय शब्द सामान्यवाची है तथापि यहां उसका अर्थ मानकषाय लेना चाहिए । मानकषायकी बहुतायत जीवको दुःख देती है, केवल नीच गोत्रमें जन्म ही दुःखका कारण नहीं होता ॥१२२६॥


उच्चत्तणं व जो णीचत्तं पिच्छेज्ज भावदो तस्स ।
उच्चत्तणे व णीचत्तणे वि पीदी ण किं होज्ज ॥१२२७॥

अर्थ: गाथामें आये भाव शब्दके यद्यपि अनेक अर्थ हैं तथापि यहां उसका अर्थ चित्त लिया है । जो मनसे उच्च गोत्रके समान नीच गोत्रको देखता है अर्थात् यह चाण्डाल कुलमें जन्म श्रेष्ठ है ऐसा मानता है । मनमें विचारता है कि जो जिसको प्राप्त है वही उसके लिए उत्तम है । जो प्राप्त नहीं है वह श्रेष्ठ भी हो तो उससे क्या ? ऐसा विचार करते ही उच्च कुलके समान नीच कुलमें भी अनुराग क्यों नहीं होगा ? अवश्य ही होगा ॥१२२७॥


णीचत्तणं व जो उच्चत्तं पेच्छेज्ज भावदो तस्स ।
णीचत्तणेव उच्चत्तणे वि दुक्खं ण किं होज्ज ॥१२२८॥

अर्थ: जो जीव भावसे उच्चपनेको नीचपनेकी तरह देखता है उसको नीचपनेकी तरह उच्चपनामें क्या दुःख नहीं होता ? होता ही है । किसीसे प्रीति या अप्रीति तो संकल्पके अधीन है यह बात समस्त जगत्के अनुभवसे सिद्ध है । क्योंकि संकल्पसे उच्च गोत्र होते हुए भी सुखका भाव और दुःखका अभाव नहीं होता ॥१२२८॥


तम्हा ण उच्चणीचत्तणाइं पीदिं करेंति दुःक्खं वा ।
संकप्पो से पीदीं करेदि दुक्खं च जीवस्स ॥१२२९॥

अर्थ: अतः उच्च कुल या नीच कुल सुख या दुःख नहीं देता । किन्तु जीवका संकल्प सुख या दुःख करता है । संकल्पके होने पर सुख दुःख होता है और संकल्पके अभावमें नहीं होता ॥१२२९॥


कुणदि य माणो णीयागोदं पुरिसं भवेसु बहुएसु ।
पत्ता हु णीचजोणी बहुसो माणेण लच्छिमदी ॥१२३०॥

अर्थ: मानकषाय अर्थात् अहंकार पुरुषको अनेक जन्मोंमें नीच गोत्री बनाता है । देखो, लक्ष्मीमती, मैं सुन्दर हूँ, कुलीन हूँ यौवनवती हूँ इस गर्वके कारण अनेक बार नीच गोत्रमें उत्पन्न हुई ॥१२३०॥


पूयावमाणरूवविरूवं सुभगत्तदुब्भगत्तं च ।
आणाणाणा य तहा विधिणा तेणेव पडिसेज्ज ॥१२३१॥

अर्थ: मानकषायका जैसे निषेध किया है वैसे ही पूजा, अपमान, सौरूप्य, वैरूप्य, सौभाग्य, दुर्भाग्य, आज्ञा अनाज्ञाका भी निषेध जानना । गाथामें आगत रूपशब्द यद्यपि सामान्य-वाची होनेसे सुन्दर और असुन्दर दोनों ही प्रकारके रूपका वाचक है तथापि विरूप शब्दके साथमें प्रयुक्त होनेसे अतिशयरूपको कहता है । अतः उसका अर्थ सौरूप्य और वैरूप्य लिया गया है । सौभाग्यका अर्थ है सबको प्रिय होना और दुर्भाग्यका अर्थ है सबके द्वारा तिरस्कृत होना । जिसने अनेक जन्मोंमें तिरस्कार पाया है वह भी कभी पूजा जाता है । इसी प्रकार अनन्त जन्मोंमें पूजा प्राप्त करनेवाला भी तिरस्कृत होता है । अतः उनमें अनुराग कैसा और तिरस्कार पानेपर दुःख कैसा ? जो बहुत जन्मोंमें पूजा जाता है वह पुनः तिरस्कारको प्राप्त करेगा । पूजा होनेपर आत्मामें वृद्धि नहीं होती और तिरस्कार होनेपर आत्मामें कोई हानि नहीं होती । संकल्पके कारण ही प्रीति और सन्ताप होते हैं केवल पूजा और तिरस्कारसे नहीं होते । कहा भी है - जो मधुर वचनोंके द्वारा अपने निर्मल गुणोंके लिये संस्तुत होता है वही नाना प्रकारके कठोर वचनोंसे निन्दाका पात्र होता है । कैसा आश्चर्य है कि संसाररूपी संकटमें पड़ा हुआ यह प्राणी अनेक प्रकारके कर्मोंके फलको भोगता है । मनुष्योंका स्वामी होकर उनका नीच दास हो जाता है । पवित्र होकर पुनः अपवित्र हो जाता है । जो युवतियोंके प्रिय होते हैं वे ही दुर्भाग्य आनेपर द्वेषके पात्र बनते हैं । जो मनुष्य कभी उत्कृष्ट रत्नभूषणोंसे भूषित देखा गया है वही मनुष्य पुण्यहीन होनेपर दरिद्र देखा जाता है । जो बहुतसे मित्रों और बन्धु-बान्धवोंसे घिरा हुआ होता है, विपत्तिमें पड़नेपर वही एकाकी देखा जाता है ॥१२३१॥


इच्चेवमादि अविचिंतयदो माणो हवेज्ज पुरिसस्स ।
एदे सम्मं अत्थे पसदो णो होइ माणो हु ॥१२३२॥

अर्थ: इत्यादि बातोंका विचार न करनेवाले पुरुषको मान होता है। और जो इन बातोंको सम्यक्रूपसे देखता है उसको मान नहीं होता ॥१२३२॥


जइदा उच्चत्तादिणिदाणं संसारवड्ढणं होदि ।
कह दीहं ण करिस्सदि संसारं परवधणिदाणं ॥१२३३॥

अर्थ: उच्चगोत्र, पुरुषत्व, शरीरकी स्थिरता, अदरिद्रकुलमें जन्म, बन्धु-बान्धव आदि परम्परासे मुक्तिके कारण हैं ऐसा चित्तमें विचारकर इनका निदान करना कि ये मुझे प्राप्त हों, यदि संसारको बढ़ानेवाला है तो दूसरेके वधका चित्तमें निदान करना दीर्घ संसारका कारण क्यों नहीं है ? अवश्य है ॥१२३३॥


आयरियत्तादिणिदाणे वि कदे णत्थि तस्स तम्मि भवे ।
धणिदं पि संजमंतस्स सिज्झणं माणदोसेण ॥१२३४॥

अर्थ: आचार्य पद आदिका निदान करनेपर भी जिस भवमें निदान किया है उस भवमें अत्यन्त संयमका पालन करनेपर भी मानकषायके दोषके कारण उसकी मुक्ति नहीं होती, क्योंकि वह ‘मैं पूज्य होऊँ’ इस संकल्पसे आचार्य आदि होनेकी प्रार्थना करता है। इससे उसका अहंकार प्रकट होता है ॥१२३४॥


भोगा चिंतेदव्वा किंपागफलोवमा कडुविवागा ।
महुरा व भुंजमाणा पच्छा बहुदुक्खभयपउरा ॥१२३५॥

अर्थ: ये भोग किंपाकफलके समान हैं। जैसे किंपाकफल खाते समय मीठा लगता है किन्तु उसका परिणाम अतिकटुक होता है। उसको खानेवाला मर जाता है। उसी प्रकार इन्द्रियोंके भोग भोगनेमें मधुर लगते हैं किन्तु उनका फल अतिकटु होता है पीछेसे जीवको बहुत दुःख और भय भोगना पड़ता है ॥१२३५॥


भोगणिदाणेण य सामण्णं भोगत्थमेव होइ कदं ।
साहालंगा जह अत्थिदो वणे को वि भोगत्थं ॥१२३६॥

अर्थ: मुनिपद धारण करके भोगका निदान करनेसे तो मुनिपद भोगोंके लिए ही धारण किया कहलायेगा। कर्मक्षयके लिये नहीं कहलायेगा। क्योंकि भोगका निदान करनेपर चित्त रागसे व्याकुल रहता है और ऐसा होनेसे नवीन कर्मोंका बन्ध होता है तब उसके मुनिपद कैसा ? जैसे कोई वनमें वृक्षकी शाखामें लगे फलोंको खानेमें लग जाये तो उसके अपने इच्छित स्थानपर पहुँचनेमें विघ्न आ जाता है वैसे ही भोगका निदान करनेवाले श्रमणकी भी दशा होती है ॥१२३६॥


आवडणत्थं जह ओसरणं मेसस्स होइ मेसादो ।
सणिदाणबंभचेरं अब्बंभत्थं तहा होइ ॥१२३७॥

अर्थ: जैसे एक मेढ़ा दूसरे मेढ़ेपर अभिघात करनेके लिये पीछे हटता है वैसे ही भोगोंका निदान करनेवाले यतिका ब्रह्मचर्य भी अब्रह्म अर्थात् मैथुनके लिए ही होता है ॥१२३७॥


जह वाणिया य पणियं लाभत्थं विक्किणंति लोभेण ।
भोगाण पणिदभूदो सणिदाणो होइ तह धम्मो ॥१२३८॥

अर्थ: जैसे व्यापारी लोभवश लाभके लिये अपना माल बेचता है। वैसे ही निदान करनेवाला मुनि भोगोंके लिए धर्मको बेचता है ॥१२३८॥


सपरिग्गहस्स अब्बंभचारिणो अविरदस्स से मणसा ।
काएण सीलवहणं होदि हु णडसमणरूवं व ॥१२३९॥

अर्थ: भोगोंका निदान करनेवालेके अभ्यन्तरमें वेदजनित राग रहता है अतः वह परिग्रही है। तथा वह मनसे मैथुन कर्ममें प्रवृत्त होनेसे अब्रह्मचारी है और मनसे मैथुनसे निवृत्त न होनेसे अविरत है। वह केवल शरीरसे ब्रह्मचर्यव्रत धारण करता है अतः वह नटश्रमण है। जैसे नट श्रमणका वेश धारण करता है वैसे ही उसने भी श्रमणका वेश धारण किया है। भावश्रामण्यके विना केवल शरीरसे मुनि बनना जैसे व्यर्थ है उसी तरह उस मुनिका मुनिपद भी व्यर्थ है ॥१२३९॥


रोगं इच्छेज्ज जहा पडियारसुहस्स कारणे कोई ।
तह अण्णेसदि दुक्खं सणिदाणो भोगतण्हाए ॥१२४०॥

अर्थ: जैसे कोई औषधि सेवनके सुखकी अभिलाषासे रोगी होना चाहता है वैसे ही निदान करनेवाला भोगोंकी तृष्णासे दुःख चाहता है ॥१२४०॥


खंधेण आसणत्थं वहेज्ज गरुगं सिलं जहा कोइ ।
तह भोगत्थं होदि हु संजमवहणं णिदाणेण ॥१२४१॥

अर्थ: मैं इसके ऊपर सुखपूर्वक बैठूंगा, ऐसा मानकर जैसे कोई भारी शिलाको कन्धेपर उठाता है और उसके उठानेके कष्टकी परवाह नहीं करता। वैसे ही इस दुर्धर संयमको धारण करनेसे मुझे भोगोंकी प्राप्ति हो इस निदानके साथ जो संयम धारण करता है उसका संयम धारण भोगोंके लिये है अर्थात् स्वल्पसुखके लिए बहुत दुःख उठाता है ॥१२४१॥


भोगोवभोगसोक्खं जं जं दुक्खं च भोगणासम्मि ।
एदेसु भोगणासे जातं दुक्खं पडिविसिट्ठं ॥१२४२॥

अर्थ: भोग अर्थात् सुस्वादु भोजन पान आदि और उपभोग अर्थात् स्त्री वस्त्र अलंकार आदिसे होनेवाला सुख तथा सुखके साधनमें निमित्त वस्तुका विनाश होनेपर होनेवाला दुःख, इन दोनों सुख और दुःखमेंसे भोगके साधनोंका विनाश होनेपर होनेवाला दुःख बहुत अधिक होता है ॥१२४२॥


देहे छुहादिमहिदे चले य सत्तस्स होज्ज कह सोक्खं ।
दुक्खस्स य पडियारो रहस्सणं चेव सोक्खं खु ॥१२४३॥

अर्थ: यह शरीर भूख, प्यास, शीत, उष्ण तथा रोगोंसे पीड़ित और विनाशशील है । इसमें जो आसक्त है उसे क्या सुख होता है ? वास्तवमें दुःखका प्रतीकार अथवा दुःखको कम करना ही सुख है । अर्थात् दुःखके प्रतीकारको या दुःखकी कमीको ही सुख मान लिया गया है । वास्तवमें सुख नहीं है ॥१२४३॥


सोक्खं अणवेक्खित्ता बाधदि दुक्खमणुगंपि जह पुरिसं ।
तह अणवेक्खिय दुक्खं णत्थि सुहं णाम लोगम्मि ॥१२४४॥

अर्थ: जैसे सुखकी अपेक्षाके विना थोड़ा-सा भी दुःख पुरुषको कष्टदायक होता है वैसे ही लोकमें इन्द्रियजन्य सुख दुःखकी अपेक्षाके विना नहीं है ॥१२४४॥


जह कोडिल्लो अग्गिं तप्पंतो णेव उवसमं लभदि ।
तह भोगे भुंजंतो खणं पि णो उवसमं लभदि ॥१२४५॥

अर्थ: जैसे कुष्ठ रोगसे पीड़ित व्यक्तिका शरीर आगमें जलने पर भी कुष्ठ रोग शान्त नहीं होता; क्योंकि आग कुष्ठ रोगको शान्त नहीं करती, बल्कि बढ़ाती है। और जो जिसको बढ़ाता है वह उसको शान्त नहीं कर सकता। जैसे आग कुष्ठ रोगको शान्त नहीं करती। उसी प्रकार स्त्रीका संगम स्त्री विषयक अभिलाषाको बढ़ाता है। अतः जो भोगोंके भोगनेमें तत्पर है उसका भोगकी अभिलाषा रूप रोग एक क्षणके लिए भी शान्त नहीं होता ॥१२४५॥


कच्छुं कंडुयमाणो सुहाभिमाणं करेदि जह दुक्खे ।
दुक्खे सुहाभिमाणं मेहुण आदीहिं कुणदि तहा ॥१२४६॥

अर्थ: जैसे खाजको नखोंसे खुजाने वाला दुःखको सुख मानता है। उसी प्रकार मैथुनके समय वेगपूर्वक आलिंगन, ओष्ठ काटना, छाती मसलना, तीक्ष्ण नखोंसे शरीर नोंचना, केश खींचना आदिसे होने वाले दुःखको कामी सुख मानता है। कहा भी है - कामी पुरुष पिशाचसे ग्रहीत पुरुषकी तरह नग्न होकर स्त्रीके साथ रमण करता है और श्वास तथा थकानसे पीड़ित होकर शब्द करते हुए श्वास लेता है ॥१२४६॥


घोसादकीं य जह किमि खंतो मधुरित्ति मण्णदि वराओ ।
तह दुक्खं वेदंतो मण्णइ सुक्खं जणो कामी ॥१२४७॥

अर्थ: जैसे बेचारा कीट घोषा नामक लताको खाते हुए उसे मीठी मानता है उसी प्रकार कामी जन दुःखका अनुभव करते हुए उसे सुख मानता है ॥१२४७॥


सुट्ठु वि मग्गिज्जंतो कत्थ वि कयलीए णत्थि जह सारो ।
तह णत्थि सुहं मग्गिज्जंते भोगेसु अप्पं पि ॥१२४८॥

अर्थ: जैसे अच्छी तरह खोजने पर भी केलेके वृक्षमें मूल मध्य या अन्तमें कहीं भी कुछ सार नहीं है वैसे ही खोजने पर भी भोगोंमें कुछ भी सार नहीं है ॥१२४८॥


ण लहदि जह लेहंतो सुक्खल्लयमट्ठियं रसं सुणहो ।
से सगतालुगरुहिरं लेहंतो मण्णए सुखं ॥१२४९॥

अर्थ: जैसे कुत्ता सूखी हड्डीको चबाते हुए रस प्राप्त नहीं करता । किन्तु तीक्ष्ण हड्डीके द्वारा कटे अपने तालुसे झरते हुए रक्तका स्वाद लेते हुए सुख मानता है ॥१२४९॥


महिलादिभोगसेवी ण लहदि किंचिवि सुहं तथा पुरिसो ।
सो मण्णदे वराओ सगकायपरिस्समं सुक्खं ॥१२५०॥

अर्थ: उसी तरह पुरुष स्त्री आदि विषयभोगमें किञ्चित् भी सुख प्राप्त नहीं करता वह बेचारा अपने शरीरके श्रमको ही सुख मानता है ॥१२५०॥


दीसइ जलं व मयतण्हिया हु जह वणमयस्स तिसिदस्स ।
भोगा सुहं व दीसंति तह य रागेण तिसियस्स ॥१२५१॥

अर्थ: जैसे वनमें हरिण आदि जब प्याससे व्याकुल होकर जलकी इच्छा करते हैं तो उन्हें मरीचिका जलके समान प्रतीत होती है किन्तु हरिणके उसे जल मानने पर भी वह जल रूप नहीं होती । उसी प्रकार रागके प्यासेको भोग सुखकी तरह प्रतीत होते हैं ॥१२५१॥


वग्घो सुखेज्ज मदयं अवगासेऊण जह मसाणम्मि ।
तह कुणिमदेहसंफसणेण अबुहा सुहायंति ॥१२५२॥

अर्थ: जैसे श्मशानमें व्याघ्र मुर्देको खाकर सुखी होता है वैसे ही दुर्गन्धित शरीरके आलिंगनमें अज्ञानी सुख मानकर हर्षसे भर जाते हैं ॥१२५२॥


तह अप्पं भोगसुहं जह धावंतस्स अठितवेगस्स ।
गिम्हे उण्हातत्तस्स होज्ज छायासुहं अप्पं ॥१२५३॥

अर्थ: जैसे ग्रीष्म ऋतुमें अत्यन्त वेगसे दौड़ते हुए और मध्यकालके सूर्यकी किरणोंसे संतप्त पुरुषको मार्गमें स्थित एक वृक्षकी छायामें जानेसे थोड़ा-सा सुख होता है वैसे ही भोगमें अति अल्प सुख है ॥१२५३॥


अहवा अप्पं आसाससुहं सरिदाए उप्पियंतस्स ।
भूमिच्छिक्कंगुट्ठस्स उब्भमाणस्स होदि सोत्तेण ॥१२५४॥

अर्थ: अथवा नदीमें डूबते हुए और प्रवाहके द्वारा बहाकर ले जाते हुए मनुष्यको भूमिसे अंगूठेके छू जाने पर जैसा अल्प आश्वास सुख होता है कि मैं तट पर लग जाऊँगा, उसी प्रकार इन्द्रियजन्य सुख अति अल्प होता है ॥१२५४॥


जावंति केइ भोगा पत्ता सव्वे अणंतखुत्ता ते ।
को णाम तत्थ भोगेसु विंभओ लद्धविजडेसु ॥१२५५॥

अर्थ: यदि इन्द्रिय सुख पूर्वमें कभी प्राप्त न हुए होते तो उनकी प्राप्तिमें हर्ष होना उचित था, किन्तु उन सबको तुमने अनन्त बार भोगा है। उन भोगकर छोड़े गये विषयोंमें हर्ष मानना उचित नहीं है। इस प्रकार आचार्य विषयोंके प्रति अनादर भाव उत्पन्न करते हैं - जितने संसारके भोग हैं वे सब तुमने अनन्त बार प्राप्त किये हैं उन प्राप्त करके छोड़े गये विषयोंमें आश्चर्य कैसा ? ॥१२५५॥


जह जह भुंजइ भोगे तह तह भोगेसु वड्ढदे तण्हा ।
अग्गीव इंधणाइं तण्हं दीविंति से भोगा ॥१२५६॥

अर्थ: जैसे जैसे भोगोंको भोगते हो वैसे वैसे भोगोंकी तृष्णा बढ़ती है । जैसे इंधनसे आग प्रज्वलित होती है वैसे ही भोगोंसे तृष्णा बढ़ती है । कहा भी है - यह तृष्णारूपी ज्वाला सदा जलाती है, इष्ट इन्द्रियोंके विषयोंसे इनकी तृप्ति नहीं होती, बल्कि बढ़ती है ॥१२५६॥


जीवस्स णत्थि तित्ती चिरं पि भोएहिं भुंजमाणेहिं ।
तित्तीए विणा चित्तं उव्वूरं उव्वुदं होइ ॥१२५७॥

अर्थ: तीन पल्य तक भोगभूमिमें, तेतीस सागर तक देवोंमें इस तरह चिरकाल तक भोगोंको भोगते हुए भी तृप्ति नहीं होती और तृप्तिके विना चित्त अत्यन्त उत्कण्ठित रहता है ॥१२५७॥


जह इंधणेहि अग्गी जह व समुद्दो णदीसहस्सेहिं ।
तह जीवा ण हु सक्का तिप्पेदुं कामभोगेहिं ॥१२५८॥

अर्थ: जैसे ईंधनसे आगकी तृप्ति नहीं होती । अथवा जैसे हजारों नदियोंसे समुद्रकी तृप्ति नहीं होती, वैसे ही भोगोंसे जीवकी तृप्ति नहीं होती ॥१२५८॥


देविंदचक्कवट्टी य वासुदेवा य भोगभूमीया ।
भोगेहिं ण तिप्पंति हु तिप्पदि भोगेसु किह अण्णो ॥१२५९॥

अर्थ: देवोंके अधिपति इन्द्र, चक्रवर्ती, वासुदेव अर्थात् अर्धचक्री और भोगभूमियाँ जीव भी भोगोंसे तृप्त नहीं होते । तब साधारण मनुष्य कैसे भोगोंसे तृप्त हो सकता है ? अर्थात् इनके लिए भोगोंके अपरिमित साधन सुलभ हैं, तथा इनकी आयु भी बहुत होनेसे चिरकालतक ये जीवित रहते हैं और किसीके अधीन न होनेसे स्वतन्त्र होते हैं । आप सरीखे साधारण मनुष्य तो पेट भरनेमें भी असमर्थ और थोड़ी आयुवाले तथा पराधीन होते हैं । अतः उनकी भोगोंसे तृप्ति होनेकी तो बात ही क्या है ? ॥१२५९॥


संपत्तिविवत्तीसु य अज्जणरक्खणपरिग्गहादीसु ।
भोगत्थं होदि णरो उद्धुयचित्तो य घण्णो य ॥१२६०॥

अर्थ: सम्पत्ति होनेपर मनुष्य अप्राप्त द्रव्यके कमानेमें, एकत्र हुए द्रव्यके रक्षणमें, दूसरेके हाथमें गई सम्पत्तिको उससे लेनेमें और आदि शब्दसे उसे खर्च करनेमें, तथा भोगनेमें व्याकुल रहता है और विपत्तिमें अर्थात् धन आदिका विनाश होनेपर कैसे मैं जीवित रहूँगा ? कैसे पुनः द्रव्य कमाऊँगा इस उत्कण्ठासे व्याकुल रहता है ॥१२६०॥


उद्धुयमणस्स ण सुहं सुहेण य विणा कुदो हवदि पीदी ।
पीदीए विणा ण रदी उद्धुयचित्तस्स घण्णस्स ॥१२६१॥

अर्थ: जिसका चित्त व्याकुल रहता है उसे सुख नहीं होता । सुखके बिना प्रीति नहीं होती । प्रीतिके बिना रति नहीं होती । इस तरह जिसका चित्त व्याकुल रहता है और जो उत्कण्ठारूपी डाकिनीसे ग्रस्त है उसे सुख कैसे हो सकता है और सुखके बिना प्रीति और प्रीतिके बिना रति सम्भव नहीं है ॥१२६१॥


जो पुण इच्छदि रमिदुं अज्झप्पसुहम्मि णिव्वुदिकरम्मि ।
कुणदि रदिं उवसंतो अज्झप्पसमा हु णत्थि रदी ॥१२६२॥

अर्थ: हे क्षपक ! जो तू रमण करना चाहता है तो रागद्वेषका शमन करके परम तृप्तिकारक अध्यात्म सुखमें रति कर । कहनेका अभिप्राय यह है कि इष्ट और अनिष्ट विषयोंके प्राप्त होनेपर ‘यह अच्छा है और यह बुरा है’ इस प्रकारके संकल्पके कारण जो रागद्वेष होते हैं उन्हें त्यागकर तृप्तिकारक अध्यात्म सुखमें रमण कर । यहाँ अध्यात्म शब्दसे आत्मस्वरूप विषयक रति कही है । उसके समान कोई रति नहीं है । क्योंकि भोगसम्बन्धी रति अध्यात्म विषयक रतिके समान नहीं है ॥१२६२॥


अप्पायत्ता अज्झप्परदी भोगरमणं परायत्तं ।
भोगरदीए चइदो होदि ण अज्झप्परमणेण ॥१२६३॥

अर्थ: क्योंकि आत्मस्वरूप विषयक रति अपने अधीन है उसमें परद्रव्यकी अपेक्षा नहीं है । किन्तु भोग रति पराधीन है क्योंकि उसमें परद्रव्यका अवलम्बन लेना होता है । और परद्रव्य कभी-कभी ही किसी किसीको ही थोड़े बहुत प्राप्त होते हैं । इससे स्वाधीन और पराधीन होनेसे दोनोंमें असमानता कही । अन्य प्रकारसे भी दोनोंमें विषमता बतलाते हैं - भोग रतिसे तो मनुष्य वंचित हो जाता है किन्तु अध्यात्म रतिसे नहीं होता क्योंकि आत्म द्रव्य सर्वत्र सर्वदा और सर्वथा उसके पास रहता है ॥१२६३॥


भोगरदीए णासो णियदो विग्घा य होंति अदिबहुगा ।
अज्झप्परदीए सुभाविदाए णासो ण विग्घो वा ॥१२६४॥

अर्थ: भोग रतिका नियमसे विनाश होता है तथा उसमें विघ्न भी बहुत हैं । किन्तु अच्छी रीतिसे भावित अध्यात्म रतिका न विनाश होता है और न उसमें कोई विघ्न आते हैं । इस तरह भोगरति नियमसे नश्वर और बहुत विघ्न वाली है तथा अध्यात्मरति निर्विघ्न और अविनाशी है इसलिए दोनोंमें कोई समानता नहीं है ॥१२६४॥


दुक्खं उप्पादिंता पुरिसा पुरिसस्स होंति जदि सत्तू ।
अदिदुक्खं कुणमाणा भोगा सत्तू किहु ण हुंती ॥१२६५॥

अर्थ: यदि दुःख देने वाले पुरुष पुरुषके शत्रु होते हैं तो अति दुःख देने वाले भोग अर्थात् इन्द्रिय सुख शत्रु क्यों नहीं हैं ? अवश्य हैं । भोग दुःखके कारण क्यों हैं यह विचार करें । स्त्री, वस्त्र, गन्धमाला आदि परद्रव्यके मिलनेसे जो होता है उसे इन्द्रिय सुख कहते हैं । वह स्त्री आदि धनहीनके लिए अत्यन्त दुर्लभ है । अतः धनकी प्राप्तिके लिए कृषि आदि कर्म करना चाहिए । उससे महान् आरम्भ होता है । हिंसा आदिमें प्रवृत्ति करनेमें इसी भव तथा परभवमें दुःख देने वाले कर्मका उपार्जन करता है । और वह कर्म उसे ऐसे संसार समुद्रमें डुबाता है जिसका पार पाना अत्यन्त कठिन है । उस संसार समुद्रमें डूबकर यह जीव कौन दुःख नहीं भोगता ॥१२६५॥


इहइं परलोगे वा सत्तू मित्तत्तणं पुणमुवेंति ।
इहइं परलोगे वा सदावि दुःखावहा भोगा ॥१२६६॥

अर्थ: इस जन्ममें अथवा परजन्ममें शत्रु शत्रुताको छोड़कर मित्र बन जाते हैं । अर्थात् उपकार आदि करनेसे प्रभावित होकर शत्रु मित्र बन जाते हैं वह भी केवल कहनेके लिए नहीं किन्तु खुले दिलसे मित्र बन जाते हैं । किन्तु भोग इस जन्ममें और परजन्ममें सदा ही दुःखदायी होते हैं । इसलिए वे शत्रुसे भी बड़े शत्रु हैं ॥१२६६॥


एगम्मि चेव देहे करेज्ज दुक्खं ण वा करेज्ज अरी ।
भोगा से पुण दुक्खं करंति भवकोडिकोडीसु ॥१२६७॥

अर्थ: शत्रु एक ही भवमें दुःख दे या न भी दे । किन्तु भोग तो अनन्त भवोंमें दुःख देते हैं ॥१२६७॥


मधुमेव पिच्छदि जहा तडिओलंबो ण पिच्छदि पपादं ।
तह सणिदाणो भोगे पिच्छदि ण हु दीहसंसारं ॥१२६८॥

अर्थ: इस प्रकार जैसे कुएँकी दीवारके एक ओर लटका हुआ मनुष्य टपकने वाले मधुकी बूँदोंको ही देखता है किन्तु अपने गिरनेको नहीं देखता । वैसे ही निदान करने वाला भोगोंको तो देखता है किन्तु अपने दीर्घ संसारको नहीं देखता ॥१२६८॥


जालस्स जहा अंते रमंति मच्छा भयं अयाणंता ।
तह संगादिसु जीवा रमंति संसारमगणंता ॥१२६९॥

अर्थ: जैसे मत्स्य भयको न जानते हुए जालके मध्यमें उछलते-कूदते हैं, वैसे ही जीव संसारकी चिन्ता न करके परिग्रह आदिमें आनन्द मानते हैं ॥१२६९॥


दुक्खेण देवमाणुसभोगे लद्धूण चावि परिवडिदो ।
णियदमदीदि कुजोणीं जीवो सघरं पउत्थो वा ॥१२७०॥

अर्थ: जैसे देशान्तरमें गया व्यक्ति सर्वत्र घूमकर अपने घरको ही जाता है वैसे ही बड़े कष्टसे प्राप्त देव और मनुष्य सम्बन्धी भोगोंको भोगकर उन भोगोंके नष्ट हो जाने पर नियमसे कुयोनिमें जाता है ॥१२७०॥


जीवस्स कुजोणिगदस्स तस्स दुक्खाणि वेदयंतस्स ।
किं ते करंति भोगा मदोव वेज्जो मरंतस्स ॥१२७१॥

अर्थ: जैसे मरा हुआ वैद्य मरते हुएकी रक्षा नहीं कर सकता। वैसे ही कुयोनिमें जाकर उस दुःख भोगते हुए जीवका स्त्री वस्त्र आदि भोग क्या कर सकते हैं ? वे उसका किञ्चित् भी दुःख दूर नहीं कर सकते ॥१२७१॥


जह सुत्तबद्धसउणो दूरंपि गदो पुणो व एदि तहिं ।
तह संसारमदीहि हु दूरंपि गदो णिदाणगदो ॥१२७२॥

अर्थ: जैसे लम्बे धागेसे बंधा पक्षी सुदूर जाकर भी पुनः वहीं लौट आता है। वैसे ही परभव सम्बन्धी विषय सुखमें मन लगाने वाला निदानी महान् ऋद्धिसे सम्पन्न स्वर्गादि स्थानोंमें जाकर भी संसारमें ही लौट आता है ॥१२७२॥


दाऊण जहा अत्थं रोधणमुक्को सुहं घरे वसइ ।
पत्ते समए य पुणो रुंभइ तह चेव धारणिओ ॥१२७३॥

अर्थ: जैसे धन देकर कारागारसे मुक्त हुआ कर्जदार सुखपूर्वक घरमें रहता है। किन्तु कर्ज चुकानेका समय आने पर पुनः पकड़कर बन्द कर दिया जाता है ॥१२७३॥


तह सामण्णं किच्चा किलेसमुक्कं सुहं वसइ सग्गे ।
संसारमेव गच्छइ तत्तो य चुदो णिदाणकदो ॥१२७४॥

अर्थ: वैसे ही मुनिपद धारण करके निदान करने वाला स्वर्गमें क्लेश रहित सुखपूर्वक रहता है और वहाँसे च्युत होकर संसारमें ही भ्रमण करता है ॥१२७४॥


संभूदो वि णिदाणेण देवसुक्खं च चक्कहरसुक्खं ।
पत्तो तत्तो य चुदो उववण्णो तिरियवासम्मि ॥१२७५॥

अर्थ: संभूत नामक व्यक्ति निदानके द्वारा देवगतिके सुख और चक्रवर्तीके सुखको प्राप्त हुआ अर्थात् मरकर सौधर्म स्वर्गमें उत्पन्न हुआ और वहाँसे मरकर ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती हुआ। उसके पश्चात् मरकर तिर्यञ्चगति (नरक गति) में उत्पन्न हुआ ॥१२७५॥


णच्चा दुरंतमद्धुयमत्ताणमतप्पयं अविस्सायं ।
भोगसुहं तो तम्हा विरदो मोक्खे मदिं कुज्जा ॥१२७६॥

अर्थ: जो भोगे जाते हैं उन स्त्री आदिको भोग कहते हैं। उनसे होने वाला सुख ऐसा दुःख देता है जिसका अन्त होना दुष्कर है, तथा वह भोग जन्य सुख अनित्य है, अरक्षक है, उससे तृप्ति नहीं होती, अनादि संसारमें उसे जीवने अनेक बार भोगा है। अतः उससे मनको हटाकर समस्त कर्मोंके अपायरूप मोक्षमें मन लगाना चाहिए। अर्थात् चारित्र और तपका पालन करनेसे कर्मक्षय होता है ऐसी मति करना चाहिए । निदान नहीं करना चाहिए ॥१२७६॥


अणिदाणो य मुणिवरो दंसणणाणचरणं विसोधेदि ।
तो सुद्धणाणचरणो तवसा कम्मक्खयं कुणइ ॥१२७७॥

अर्थ: निदान न करने वाले मुनिवर सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र रूप रत्नत्रयको विशुद्ध करते हैं । अर्थात् निदान न करनेसे निरतिचार सम्यग्दर्शन शुद्ध होता है । सम्यग्दर्शनके निर्मल होने पर ज्ञान निर्मल होता है । और निर्मल विशुद्ध ज्ञान पूर्वक चारित्र विशुद्ध होता है । तब विशुद्ध ज्ञान चारित्रसे सम्पन्न मुनि तपके द्वारा सब कर्मोंका क्षय करता है ॥१२७७॥


इच्चेवमेदमविचिंतयदो होज्ज हु णिदाणकरणमदी ।
इच्चेवं पस्संतो ण हु होदि णिदाणकरणमदी ॥१२७८॥

अर्थ: उक्त प्रकारसे जो वस्तुस्वरूपका विचार नहीं करता उसकी मति निदान करनेमें लगती है । और जो उसका विचार करता है उसकी मति निदान करनेमें नहीं लगती ॥१२७८॥


मायासल्लस्सालोयणाधियारम्मि वण्णिदा दोसा ।
मिच्छत्तसल्लदोसा य पुव्वमुववण्णिया सव्वे ॥१२७९॥

अर्थ: आलोचना अधिकारमें मायाशल्यके दोष कह आये हैं । और मिथ्यात्व शल्यके दोष पूर्वमें ही कहे हैं । इस प्रकार हे क्षपक ! तीनों शल्योंके दोष आपसे हमने कहे हैं । अब इन दोषोंको जानकर तुम्हें तीनों शल्योंका त्याग करना चाहिए । इससे आचार्य क्षपकके प्रति ऐसा कहते हैं ॥१२७९॥


पब्भट्ठबोधिलाभा मायासल्लेण आसि पूदिमुही ।
दासी सागरदत्तस्स पुप्फदंता हु विरदा वि ॥१२८०॥

अर्थ: पुष्पदन्ता नामकी आर्यिका आर्यिका होनेपर भी मायाशल्यके कारण दीक्षाके अभिमुख होनेकी बुद्धिके लाभसे भ्रष्ट होकर सागरदत्त वैश्यके घरमें पूतिमुखी नामकी दासी हुई ॥१२८०॥


मिच्छत्तसल्लदोसा पियधम्मो साधुवच्छलो संतो ।
बहुदुक्खे संसारे सुचिरं पडिहिंडिओ मरीची ॥१२८१॥

अर्थ: धर्मप्रेमी और साधुओंके प्रति वात्सल्यभाव रखनेवाला मरीचिकुमार मिथ्यात्वशल्य दोषके कारण बहु दुःखपूर्ण संसारमें भ्रमता हुआ ॥१२८१॥


इय पव्वज्जाभंडिं समिदिबइल्लं तिगुत्तिदिढचक्कं ।
रादिभोयणउद्धं सम्मत्तक्खं सणाणधुरं ॥१२८२॥

अर्थ: इस प्रकार क्षपकसाधुरूपी व्यापारी दीक्षारूपी गाड़ीपर साधुओंके संघके साथ चढ़कर निर्वाणरूपी भांडके लिए सिद्धिपुरीकी ओर प्रस्थान करता है । उस दीक्षारूपी गाड़ीमें समितिरूपी बैल जुड़े हैं, तीन गुप्तिरूपी उसके मजबूत चक्के हैं। रात्रि भोजनसे निवृत्तिरूप दो दीर्घ दण्डे हैं। सम्यक्त्वरूपी अक्ष है समीचीनज्ञानरूपी धुरा है ॥१२८२-८३॥


वदभंडभरिदंमारुहिदसाधुसत्थेण पत्थिदो समयं ।
णिव्वाणभंडहेदुं सिद्धपुरीं साधुवाणियओ ॥१२८३॥


आयरियसत्थवाहेण णिच्चजुत्तेण सारविज्जंतो ।
सो साहुवग्गसत्थो संसारमहाडविं तरइ ॥१२८४॥

अर्थ: आचार्य उस संघके नायक है जो निरन्तर सावधान हैं। उनके द्वारा बार-बार सन्मार्गमें लगाया गया वह आराधक साधु समुदाय संसाररूपी महावनको पार करता है ॥१२८४॥


तो भावणादियंतं रक्खदि तं साधुसत्थमाउत्तं ।
इंदियचोरेहिंतो कसायबहुसावदेहिं च ॥१२८५॥

अर्थ: वह संघपति आचार्य अपने द्वारा भावना आदिमें नियुक्त उस साधु समुदायकी इन्द्रियरूपी चोरोंसे और कषायरूपी अनेक जंगली हिंसक जानवरोंसे रक्षा करता है ॥१२८५॥


विसयाडवीए मज्झे ओहीणो जो पमाददोसेण ।
इंदियचोरा तो से चरित्तभंडं विलुंपंति ॥१२८६॥

अर्थ: स्पर्श, रस, रूप, गन्ध, शब्द आदि विषय अटवीके समान बड़े कष्टसे लांघे जाते हैं इसलिए उन्हें अटवी (घोर वन) की उपमा दी है। उस विषयरूपी अटवीके मध्यमें जो साधु प्रमाद दोषसे जाता है उसके चारित्ररूपी धनको इन्द्रियरूपी चोर चुरा लेते हैं। अर्थात् प्राप्त इष्ट अनिष्ट विषयोंको लेकर इन्द्रिय बुद्धिके अनुसार उत्पन्न हुए रागद्वेष उस प्रमादी मुनिके चारित्रको नष्ट कर देते हैं। किन्तु आचार्य ध्यान और स्वाध्यायमें लगाकर प्रमादोंको दूर करता है इसलिए इन्द्रिय चोर नहीं सताते, यह उक्त कथनका भाव है ॥१२८६॥


अहवा तल्लिच्छाइं कूराइं कसायसावदाइं तं ।
खज्जंति असंजमदाढाहिं संकिलेसादिदंसेहिं ॥१२८७॥

अर्थ: अथवा उस विषयरूपी अटवीमें फँसे हुए लोगोंको खानेके इच्छुक क्रूर कषायरूपी सिंहादि उस आगत साधुको असंयमरूपी दाढ़ोंसे और रागद्वेष मोहरूपी दाँतोंसे खा जाते हैं। कहनेका भाव यह है कि निर्यापकाचार्यके अभावमें क्षपक इन्द्रियों और कषायोंके फन्देमें फँस जाता है ॥१२८७॥


ओसण्णसेवणाओ पडिसेवंतो असंजदो होइ ।
सिद्धियहपच्छिदाओ ओहीणो साधुसत्थादो ॥१२८८॥

अर्थ: जो साधु चारित्र भ्रष्ट साधुओंकी क्रिया करता है वह असंयमी होकर साधुओंके संघसे बाहर हो जाता है और मोक्षमार्गसे दूर हो जाता है ॥१२८८॥


इंदियकसायगुरुगत्तणेण सुहसीलभाविदो समणो ।
करणालसो भवित्ता सेवदि ओसण्णसेवाओ ॥१२८९॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूप तीव्र परिणाम होनेसे सुखपूर्वक समाधिमें लगा साधु तेरह प्रकारकी क्रियाओंमें आलसी होकर चारित्र भ्रष्ट साधुओंकी क्रिया करने लगता है ऐसा साधु अवसन्न कहलाता है ॥१२८९॥


केई गहिदा इंदियचोरेहिं कसायसावदेहिं वा ।
पंथं छंडिय णिज्जंति साधुसत्थस्स पासम्मि ॥१२९०॥

अर्थ: कोई साधु इन्द्रियरूपी चोरों और कषायरूपी हिंसक जीवोंके द्वारा पकड़े जाकर साधु संघके मार्गको छोड़कर साधुओंके पार्श्ववर्ती हो जाते हैं। साधु संघके पार्श्ववर्ती होनेसे इन्हें पासत्थ या पार्श्वस्थ कहते हैं ॥१२९०॥


तो साधुसत्थपंथं छंडिय पासम्मि णिज्जमाणा ते ।
गारवगहिणकुडिल्ले पडिदा पावेंति दुक्खाणि ॥१२९१॥

अर्थ: साधु समूहके मार्गको छोड़कर पार्श्वस्थ मुनिपनेको प्राप्त हुए वे ऋद्धिगौरव, रसगौरव और सातगौरवसे भरे गहन वनमें पड़कर तीव्र दुःख पाते हैं ॥१२९१॥


सल्लविसकंटएहिं विद्धा पडिदा पडंति दुक्खेसु ।
विसकंटयविद्धा वा पडिदा अडवीए एगागी ॥१२९२॥

अर्थ: अथवा जैसे विषैले काँटोंसे बिंधे हुए मनुष्य अटवीमें अकेले पड़े हुए दुःख पाते हैं, वैसे ही मिथ्यात्व माया और निदानशल्यरूपी काँटोंसे बींधे हुए वे पार्श्वस्थ मुनि दुःख पाते हैं ॥१२९२॥


पंथं छंडिय सो जादि साधुसत्थस्स चेव पासाओ ।
जो पडिसेवदि पासत्थसेवणाओ हु णिद्धम्मो ॥१२९३॥

अर्थ: वह पार्श्वस्थ मुनि साधु संघका मार्ग त्यागकर ऐसे मुनिके पास जाता है जो चारित्रसे भ्रष्ट होकर पार्श्वस्थ मुनियोंका आचरण करता है ॥१२९३॥


इंदियकसायगरुयत्तणेण चरणं तणं व पस्संतो ।
णिद्धम्मो हु सवित्ता सेवदि पासत्थसेवाओ ॥१२९४॥

अर्थ: इन्द्रिय, कषाय और विषयोंके कारण रागद्वेषरूप परिणामों और क्रोधादि परिणामोंके तीव्र होनेसे वह चारित्रको तृणके समान मानता है। क्योंकि रागादिरूप अशुभ परिणाम तत्त्वज्ञानके प्रतिबन्धक होते हैं। अतः उसका ज्ञान दूषित होनेसे वह चारित्रको सार- हीन मानता है। इसीसे वह उसमें आदरभाव न रखनेके कारण चारित्रसे च्युत होता है। इसीसे उसे चारित्र भ्रष्ट कहा है। चारित्र भ्रष्ट होकर वह पार्श्वस्थ मुनियोंकी सेवामें लग जाता है। यह पार्श्वस्थ मुनिका कथन है ॥१२९४॥


इंदियचोरपरद्धा कसायसावदभएण वा केई ।
उम्मग्गेण पलायंति साधुसत्थस्स दूरेण ॥१२९५॥

अर्थ: अथवा कोई मुनि इन्द्रियरूपी चोरोंसे पीड़ित होकर कषायरूप हिंसक प्राणियोंके भयसे साधु संघसे दूर होकर उन्मार्गमें चले जाते हैं ॥१२९५॥


तो ते कुसीलपडिसेवणावणे उप्पधेण धावंता ।
सण्णाणदीसु पडिदा किलेससोदेण वुड्ढंति ॥१२९६॥

अर्थ: साधु संघसे दूर होकर वे मुनि कुशील प्रतिसेवनारूप वनमें उन्मार्गसे दौड़ते हुए आहार भय मैथुन परिग्रहरूप संज्ञानदीमें गिरकर कष्टरूपी प्रवाहमें पड़कर डूब जाते हैं ॥१२९६॥


सण्णाणदीसु ऊढा वुड्ढा थाहं कहंपि अलहंता ।
तो ते संसारोदधिमदंति बहुदुक्खभीसम्मि ॥१२९७॥

अर्थ: संज्ञारूप नदीमें डूबनेपर उन्हें कहीं भी ठहरनेका स्थान नहीं मिलता अतः वे बहुत दुःखोंसे भयानक संसार समुद्रमें प्रवेश करते हैं ॥१२९७॥


आसागिरिदुग्गाणि य अदिगम्म तिदंडकक्खडसिलासु ।
ऊलोडिदपब्भट्ठा खुप्पंति अणंतयं कालं ॥१२९८॥

अर्थ: संसार समुद्रमें प्रवेश करनेपर आशारूपी पहाड़ोंको लांघते हुए मन-वचन-कायकी दुष्प्रवृत्तिरूप शिलाओंपर लुढ़कते हुए गिरकर अनन्तकाल बिताते हैं ॥१२९८॥


बहुपावकम्मकरणाडवीसु महदीसु विप्पणट्ठा वा ।
अदिट्ठणिव्वुदिपधा भमंति सुचिरंपि तत्थेव ॥१२९९॥

अर्थ: अनेक प्रकारके अशुभकर्मरूप सुदीर्घ अटवीमें भटकते हुए वे निर्वाणका मार्ग कभी देखा न होनेसे चिरकालतक वहीं भ्रमण करते रहते हैं ॥१२९९॥


दूरेण साधुसत्थं छंडिय सो उप्पधेण खु पलादि ।
सेवदि कुसीलपडिसेवणाओ जो सुत्तदिट्ठाओ ॥१३००॥

अर्थ: वे दूरसे ही साधुसंगको त्यागकर कुमार्गमें दौड़ते हैं। और आगममें कहे कुशील मुनिके दोषोंको करते हैं ॥१३००॥


इंदियकसायगुरुगत्तणेण चरणं तणं व पस्संतो ।
णिद्धंसो भवित्ता सेवदि हु कुसीलसेवाओ ॥१३०१॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूप परिणामोंकी तीव्रताके कारण चारित्रको तृणके समान मानते हैं और निर्लज्ज होकर कुशीलका सेवन करते हैं ॥१३०१॥


सिद्धिपुरमुवल्लीणा वि केइ इंदियकसायचोरेहिं ।
पविलुत्तचरणभंडा उवहदमाणा णिवट्टंति ॥१३०२॥

अर्थ: कोई-कोई मुक्तिपुरीके निकट तक जाकर भी इन्द्रिय और कषायरूपी चोरोंके द्वारा चारित्ररूपी धन चुराये जानेपर संयमका अभिमान त्यागकर उससे लौट आते हैं ॥१३०२॥


तो ते सीलदरिद्दा दुक्खमणंतं सदा वि पावंति ।
बहुपरियणो दरिद्दो पावदि तिव्वं जधा दुक्खं ॥१३०३॥

अर्थ: पश्चात् वे शीलसे दरिद्र मुनि सदा अनन्त दुःख पाते हैं । जैसे बहुत परिवारवाला दरिद्र मनुष्य तीव्र दुःख पाता है ॥१३०३॥


सो होदि साधुसत्थादु णिग्गदो जो भवे जधाछंदो ।
उस्सुत्तमणुवदिट्ठं च जधिच्छाए विकप्पंतो ॥१३०४॥

अर्थ: साधुसंघसे निकलकर जो पूर्वाचार्योंके द्वारा नहीं कहे आगम विरुद्ध मार्गकी अपनी इच्छानुसार कल्पना करता है वह यथाच्छन्द मुनि होता है ॥१३०४॥


जो होदि जधाछंदो तस्स धणिदंपि संजमितस्स ।
णत्थि दु चरणं चरणं खु होदि सम्मत्तसहचारी ॥१३०५॥

अर्थ: जो स्वच्छन्दचारी मुनि होता है वह संयममें अत्यन्त प्रवृत्ति भी करे तो भी उसका चारित्र चारित्र नहीं है क्योंकि सम्यक्त्वके साथ जो चारित्र होता है वही चारित्र होता है । जो स्वच्छन्दचारी होता है वह तो जो उसकी इच्छा होती है तदनुसार आचरण करता है । आगमका अनुसरण नहीं करता, अतः उसके सम्यग्दर्शन नहीं है । और सम्यग्दर्शनके विना सम्यक्चारित्र नहीं होता ॥१३०५॥


इंदियकसायगुरुगत्तणेण सुत्तं पमाणमकरंतो ।
परिमाणेदि जिणुत्ते अत्थे सच्छंददो चेव ॥१३०६॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायोंकी प्रबलताके कारण वह आगमको प्रमाण नहीं मानता । और अपनी इच्छाके अनुसार जिनभगवान्के द्वारा कहे गये अर्थको विपरीतरूपसे ग्रहण करता है ॥१३०६॥


इंदियकसायदोसेहिं अथवा सामण्णजोगपरितंतो ।
जो उव्वायदि सो होदि णियत्तो साधुसत्थादो ॥१३०७॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायोंके दोषसे अथवा सामान्य योगसे विरक्त होकर जो चारित्रसे गिर जाता है वह साधु संगसे अलग हो जाता है ॥१३०७॥


इंदियकसायवसिया केई ठाणाणि ताणि सव्वाणि ।
पाविज्जंते दोसेहिं तेहिं सव्वेहिं संसत्ता ॥१३०८॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायोंके वशमें हुए कोई मुनि उन सब दोषोंमें संसक्त होकर उन सब अशुभ स्थान रूप परिणामोंको प्राप्त होते हैं ॥१३०८॥


इय एदे पंचविधा जिणेहिं सवणा दुगुंच्छिदा सुत्ते ।
इंदियकसायगुरुयत्तणेण णिच्चंपि पडिकुद्धा ॥१३०९॥

अर्थ: इस प्रकार ये पाँच प्रकारके मुनि जिन भगवान्के द्वारा आगममें निन्दनीय कहे हैं । ये इन्द्रिय और कषायोंकी प्रबलता होनेसे नित्य ही जिनागमसे विमुख रहते हैं ॥१३०९॥


दुट्ठा चवला अदिदुज्जया य णिच्चं पि समणुबद्धा य ।
दुक्खावहा य भीमा जीवाणं इंदियकसाया ॥१३१०॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूप परिणाम बड़े दुष्ट हैं क्योंकि ये आत्मामें उपद्रव पैदा करते हैं । अनवस्थित होनेसे चपल हैं । इनको जीतना अति कठिन है क्योंकि जिस जीवके चारित्र- मोहके क्षयोपशमका प्रकर्ष नहीं है वह जीव बड़े कष्टसे इन्हें वशमें कर पाता है। तथा इनका कारण चारित्रमोहका उदय सदा रहता है अतः ये नित्य बने रहते हैं। शङ्का - यदि ये नित्य हैं तो चपल कैसे हैं ? समाधान - नित्य शब्दका प्रयोग ध्रौव्यके अर्थमें नहीं है किन्तु बार-बारके अर्थमें है। और परिणामोंके स्थिर न होनेको चपलता कहते हैं अतः कोई विरोध नहीं है। तथा ये जीवोंको दुःखदायी हैं। इष्ट भोगकी प्राप्ति न होने पर अथवा प्राप्त भोगका विनाश होने पर महान् दुःख होता है यह सभी प्राणियोंको अनुभवसिद्ध है। क्रोधादि कषाय हृदयको संताप पहुंचाती है। अथवा दुःखका कारण जो असातावेदनीय कर्म है उसके बन्धमें निमित्त हैं इसलिए दुःखदायी हैं। जो इन्द्रिय और कषायके वशमें होता है वह जीवोंका घात करता है। जीवोंके दुःख देनेसे असातावेदनीय कर्मका आस्रव होता है। और यतः ये इन्द्रिय तथा कषाय दुःखदायी हैं, अतएव भयंकर हैं ॥१३१०॥


मरुतेल्लंपि पियंतो बत्थो जह वादि पूदियं गंधं ।
तध दिक्खिदो वि इंदियकसायगंधं वहदि कोई ॥१३११॥

अर्थ: जैसे बकरीका बच्चा सुगन्धित तेल भी पिये फिर भी अपनी पूर्व दुर्गन्धको नहीं छोड़ता । उसी प्रकार दीक्षा लेकर भी अर्थात् असंयमको त्यागने पर भी कोई कोई इन्द्रिय और कषाय रूप दुर्गंधको नहीं छोड़ पाते ॥१३११॥


भुंजंतो वि सुभोयणमिच्छदि जध सूयरो समलमेव ।
तध दिक्खिदो वि इंदियकसायमलिणो हवदि कोई ॥१३१२॥

अर्थ: जैसे सुअर सुन्दर स्वादिष्ट आहार खाते हुए भी चिरंतन अभ्यास वश विष्ठा ही खाना पसन्द करता है । उसी प्रकार व्रतोंको ग्रहण करके भी कोई कोई इन्द्रिय और कषायरूप अशुभ परिणाम वाले होते हैं । भव्य जीव भी गुरुके उपदेशसे गृहस्थाश्रमका परित्याग करते समय दुःख- की निवृत्तिका उपाय जानकर इन्द्रिय और कषाय रूप परिणामोंका त्याग करता है किन्तु फिर भी वह उन्हींके चक्रमें पड़ जाता है ॥१३१२॥


वाहभएण पलादो जूहं दट्ठूण वागुरापडिदं ।
सयमेव मओ वागुरमदीदि जह जूहतण्हाए ॥१३१३॥

अर्थ: जैसे व्याधके भयसे भागा हुआ हिरन अपने झुण्डको जालमें फँसा देखकर झुण्डके मोहसे स्वयं भी जालमें फँस जाता है वैसे ही कोई मुनि गृह त्यागनेके बाद स्वयं ही उसमें फँस जाता है ॥१३१३॥


पंजरमुक्को सउणो सुहरं आरामएसु विहरंतो ।
सयमेव पुणो पंजरमदीदि जध णीडतण्हाए ॥१३१४॥

अर्थ: जैसे पींजरेसे मुक्त हुआ पक्षी उद्यानोंमें स्वेच्छापूर्वक विहार करते हुए स्वयं ही अपने आवासके प्रेमवश पींजरेमें चला जाता है ॥१३१४॥


कलभो गएण पंकादुद्धरिदो दुत्तरादु बलिएण ।
सयमेव पुणो पंके जलतण्हाए जह अदीदि ॥१३१५॥

अर्थ: जैसे महती कीचड़में फँसा हाथीका बच्चा बलवान् हाथीके द्वारा निकाला गया । किन्तु पानीकी प्यासवश वह स्वयं ही कीचड़में फँस जाता है ॥१३१५॥


अग्गिपरिक्खित्तादो सउणो रुक्खादु उप्पडित्ताणं ।
सयमेव तं दुमं सो णीडणिमित्तं जध अदीदि ॥१३१६॥

अर्थ: जैसे पक्षी आगसे घिरे वृक्षसे उड़कर स्वयं ही अपने घोंसलेके कारण उस वृक्षपर जा पहुँचता है ॥१३१६॥


लंपिज्जंतो अहिणा पासुत्तो कोइ जग्गमाणेण ।
उट्ठविदो तं घेत्तुं इच्छदि जध कोदुगहलेण ॥१३१७॥

अर्थ: जैसे किसी सोते हुए मनुष्यपरसे सर्प जा रहा है । उसे कोई जागता हुआ मनुष्य उठाता है और वह उठकर कौतूहलवश उस सर्पको पकड़ना चाहता है ॥१३१७॥


सयमेव वंतमसणं णिल्लज्जो णिग्घिणो जधं चेव ।
लोलो किविणो भुंजदि सुणहो जध असणतण्हाए ॥१३१८॥

अर्थ: जैसे कोई निर्लज्ज घिनावना कुत्ता अपने ही वमन किये भोजनको भोजनकी तृष्णावश लोलुपतासे खाता है ॥१३१८॥


एवं केई गिहवासदोसमुक्का वि दिक्खिदा संता ।
इंदियकसायदोसेहि पुणो ते चेव गिण्हंति ॥१३१९॥

अर्थ: वैसे ही गृहवासके दोषोंसे मुक्त कोई दीक्षा स्वीकार करके भी गृहवासके उन्हीं इन्द्रिय और कषायरूप दोषोंको स्वीकार करता है । धारण करके इस प्रकारके गृहवास सम्बन्धी दोषोंसे मुक्त होकर भी पुनः उन्हीं दोषोंको स्वीकार करता है ॥१३१९॥


बंधणमुक्को पुणरेव बंधणं सो अचेयणोदीदि ।
इंदियकसायबंधणमुवेदि जो दिक्खिदो संतो ॥१३२०॥

अर्थ: जो दीक्षित होकर इन्द्रिय और कषायोंके बन्धनमें पड़ता है वह अज्ञानी बन्धनसे मुक्त होकर पुनः बन्धनको प्राप्त होता है ॥१३२०॥


मुक्को वि णरो कलिणा पुणो वि तं चेव मग्गदि कलिं सो ।
जो दिक्खिदो वि इंदियकसायमइयं कलिमुवेदि ॥१३२१॥

अर्थ: जो दीक्षित होकर भी इन्द्रिय कषायमयी कलिको स्वीकार करता है वह मनुष्य कलिकालसे मुक्त होकर भी पुनः उसी कलिको खोजता है.॥१३२१॥


सो णिच्छदि मोत्तुं जे हत्थगयं उम्मुयं सुपज्जलियं ।
सो अक्कमदि कण्हसप्पं छादं वग्घं च परिमसदि ॥१३२२॥

अर्थ: जो साधु दीक्षित होकर भी इन्द्रिय और कषायोंके बन्धनमें पड़ता है वह हाथमें स्थित जलते हुए अलातको छोड़ना नहीं चाहता, वह काले साँपको लाँघता है और भूखे व्याघ्रका स्पर्श करता है ॥१३२२॥


सो कंठोल्लगिदसिलो दहमत्थाहं अदीदि अण्णाणी ।
जो दिक्खिदो वि इंदियकसायवसिगो हवे साधू ॥१३२३॥

अर्थ: जो साधु दीक्षित होकर भी इन्द्रिय और कषायके अधीन होता है वह अज्ञानी अपने गलेमें पत्थर बाँधकर अगाध तालाबमें प्रवेश करता है ॥१३२३॥


इंदियगहोवसिट्ठो उवसिट्ठो ण दु गहेण उवसिट्ठो ।
कुणदि गहो एयभवे दोसं इदरो भवसदेसु ॥१३२४॥

अर्थ: जो इन्द्रियरूपी ग्रहसे पकड़ा हुआ है वही ग्रह पीड़ित है । जो ग्रहसे पकड़ा हुआ है वह ग्रहपीड़ित नहीं है । क्योंकि ग्रह तो एक ही भवमें कष्ट देता है किन्तु इन्द्रियरूपी ग्रह सैकड़ों भवोंमें कष्ट देता है ॥१३२४॥


होदि कसाउम्मत्तो उम्मत्तो तध ण पित्तउम्मत्तो ।
ण कुणदि पित्तुम्मत्तो पावं इदरो जधुम्मत्तो ॥१३२५॥

अर्थ: जो कषायसे उन्मत्त (पागल) है वही उन्मत्त है । जो पित्तसे उन्मत्त है वह उन्मत्त नहीं है । इससे पित्तके द्वारा हुए उन्मादसे कषायके द्वारा हुए उन्मादको निकृष्ट बतलाया है । क्योंकि कषायसे उन्मत्त पुरुष जैसा पाप करता है पित्तसे उन्मत्त वैसा पाप नहीं करता । एक-एक भी क्रोधादि कषाय हिंसा आदिमें प्रवृत्त करता है । कर्मोंके स्थितिबन्धको बढ़ाता है । किन्तु पित्तसे हुआ उन्माद केवल विवेकमूलक ज्ञानका ही तिरस्कार करता है । इसलिए इन दोनोंमें बहुत अन्तर है ॥१३२५॥


इंदियकसायमइओ णरं पिसायं करंति हु पिसाया ।
पावकरणवेलंबं पेच्छणयकरं सुयणमज्झे ॥१३२६॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायमय पिशाच मनुष्यको सुजनोंके मध्यमें देखने योग्य पापक्रियाकी विडम्बनाओंको करनेवाला पिशाच बना देता है ॥१३२६॥


कुलजस्स जसमिच्छंतयस्स णिधणं वरं खु पुरिसस्स ।
ण य दिक्खिदेण इंदियकसायवसिएण जेदुं जे ॥१३२७॥

अर्थ: कुलीन और यशके अभिलाषी पुरुषका मरना श्रेष्ठ है किन्तु दीक्षित होकर इन्द्रिय और कषायके वशमें रहकर जीना श्रेष्ठ नहीं है ॥१३२७॥


जध सण्णद्धो पग्गहिदचावकंडो रधी पलायंतो ।
णिंदिज्जदि तध इंदियकसायवसिगो वि पव्वज्जिदो ॥१३२८॥

अर्थ: जैसे धनुष बाण लेकर युद्धके लिए तैयार रथारोही यदि युद्धसे भागता है तो निन्दाका पात्र होता है । उसी प्रकार दीक्षित साधु यदि इन्द्रिय और कषायके वशमें होता है तो निन्दाका पात्र होता है ॥१३२८॥


जध भिक्खं हिंडंतो मउडादि अलंकिदो गहिदसत्थो ।
णिंदिज्जइ तध इंदियकसायवसिगो वि पव्वज्जिदो ॥१३२९॥

अर्थ: जैसे मुकुट आदिसे सुशोभित और हाथमें शस्त्र लिये हुए कोई भिक्षाके लिए घूमता है तो निन्दाका पात्र होता है । वैसे ही दीक्षित होकर इन्द्रिय और कषायके वशमें होनेवाला भी निन्दाका पात्र होता है ॥१३२९॥


इंदियकसायवसिगो मुंडो णग्गो य जो मलिणगत्तो ।
सो चित्तकम्मसमणोव्व समणरूवो असमणो हु ॥१३३०॥

अर्थ: जो मुण्डित नग्न और मलिन शरीरवाला होकर भी इन्द्रिय और कषायके वशमें होता है वह चित्रमें अंकित श्रमणके समान श्रमणरूपका धारी होनेपर भी श्रमण नहीं है । अर्थात् जैसे चित्रमें अंकित श्रमण वास्तविक श्रमणके समान रूपवाला होनेपर भी श्रमण नहीं है उसी प्रकार श्रमणका वेष धारण करके भी जिसके परिणाम अशुभ हैं वह श्रमण नहीं है ॥१३३०॥ है । जैसे सत्त्वसम्पन्न मनुष्यका शस्त्र और कवच शत्रुका नाश करता है । तथा इन्द्रिय और कषायको न जीतनेपर ज्ञान दोषोंको दूर करनेरूप अतिशयको प्राप्त नहीं करता । जैसे सत्त्वहीन पुरुषका कवच और तलवार चक्र आदि शस्त्र शत्रुको जीतनेरूप अतिशयको नहीं प्राप्त करता ॥१३३०॥


णाणं दोसे णासिदि णरस्स इंदियकसायविजयेण ।
आउहरणं पहरणं जह णासेदि अरिं ससत्तस्स ॥१३३१॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायको जीतनेसे ज्ञान मनुष्यके दोषोंको नष्ट करता है । जैसे सत्त्वशालीका आयुको हरनेवाला शस्त्र शत्रुको नष्ट करता है ॥१३३१॥


णाणंपि कुणदि दोसे णरस्स इंदियकसायदोसेण ।
आहारो वि हु पाणो णरस्स विससंजुदो हरदि ॥१३३२॥

अर्थ: गा० इन्द्रिय और कषायरूप परिणामोंके दोषसे ज्ञान भी मनुष्योंमें दोष उत्पन्न करता है । दूसरेके संसर्गसे उपकारी भी अनुपकारी हो जाता है । जैसे आहार प्राण धारणमें निमित्त है किन्तु विषसे मिला आहार प्राणोंका घातक होता है ॥१३३२॥


णाणं करेदि पुरिसस्स गुणे इंदियकसायविजयेण ।
बलरूववण्णमाऊ करेहि जुत्तो जधाहारो ॥१३३३॥

अर्थ: और इन्द्रिय तथा कषायोंको जीतनेसे ज्ञान पुरुषमें गुण उत्पन्न करता है । जैसे विषसे रहित उत्तम आहार बल, रूप, तेज और आयुको बढ़ाता है ॥१३३३॥


णाणं पि गुणे णासेदि णरस्स इंदियकसायदोसेण ।
अप्पवधाए सत्थं होदि हु कापुरिसहत्थगयं ॥१३३४॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूप परिणामोंके दोषसे ज्ञान भी पुरुषके गुणोंको नष्ट करता है । जैसे कायर पुरुषके हाथमें गया शस्त्र उसके ही बधमें निमित्त होता है ॥१३३४॥


सुबहुस्सुदो वि अवमाणिज्जदि इंदियकसायदोसेण ।
णरमाउधहत्थंपि हु मदयं गिद्धा परिभवंति ॥१३३५॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायोंके दोषसे अच्छे प्रकारसे बहुतसे शास्त्रोंका ज्ञाता भी विद्वान् अपमानका पात्र होता है । जैसे हाथमें अस्त्रके होते हुए भी मरे मनुष्यको गृद्ध खा जाते हैं ॥१३३५॥


इंदियकसायवसगो बहुस्सुदो वि चरणे ण उज्जमदि ।
पक्खीव छिण्णपक्खो ण उप्पडदि इच्छमाणो वि ॥१३३६॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायोंके वशमें हुआ बहुश्रुत भी विद्वान् चारित्रमें उद्योग नहीं करता । जैसे जिसका पर कट गया है ऐसा पक्षी इच्छा करते हुए भी नहीं उड़ सकता ॥१३३६॥


णस्सदि सगं बहुगं पि णाणमिंदियकसायसम्मिस्सं ।
विससम्मिसिददुद्धं णस्सदि जध सक्कराकढिदं ॥१३३७॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायके योगसे बहुत भी ज्ञान स्वयं नष्ट हो जाता है । जैसे शक्करके साथ कढ़ा हुआ दूध विषके मिलनेसे नष्ट हो जाता है अर्थात् अपने स्वभावको छोड़ देता है । यहाँ शक्करके साथ कढ़ाया हुआ कहनेसे मिठासके कारण दूधकी सातिशयता बतलाई है । ऐसा दूध भी विषके मेलसे हानिकर होता है ॥१३३७॥


इंदियकसायदोसमलिणं णाणं वट्टदि हिदे से ।
वट्टदि अण्णस्स हिदे खरेण जह चंदणं ऊढं ॥१३३८॥

अर्थ: जिसका ज्ञान होता है उसीका उपकारी होता है यह बात प्रसिद्ध है किन्तु इन्द्रिय और कषायसे मलिन ज्ञान जिसका होता है उसका उपकार नहीं करता, दूसरोंका उपकार करता है । जैसे गधेपर लदा चन्दन दूसरोंका उपकार करता है ॥१३३८॥


इंदियकसायणिग्गहणिमीलिदस्स हु पयासदि ण णाणं ।
रत्ति चक्खुणिमीलस्स जधा दीवो सुपज्जलिदो ॥१३३९॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायोंका निग्रह करनेमें जो अपना उपयोग नहीं लगाता अर्थात् जो इन्द्रिय और कषायोंसे प्रभावित है, उसका ज्ञान वस्तुस्वरूपका प्रकाशक नहीं होता । जैसे, जिसने आँखे मूँदी हैं उसके लिए तीव्रतासे जलता हुआ दीपक पदार्थोंका प्रकाश नहीं करता ॥१३३९॥


इंदियकसायमइलो बाहिरकरणणिहुदेण वेसेण ।
आवहदि को वि विसए सउणो बादंसगेणेव ॥१३४०॥

अर्थ: जिसका परिणाम इन्द्रिय और कषायसे मलिन होता है ऐसा कोई साधु बाह्य गमन आगमन आदि क्रियाओंके द्वारा अपने वेशको छिपाकर अपने भोगके लिये विषयोंको ग्रहण करता है जैसे निश्चल बैठा पक्षी अपनी चोंचसे अपने शिकारको ग्रहण करता है ॥१३४०॥


घोडगलिंडसमाणस्स तस्स अब्भंतरम्मि कुधिदस्स ।
बाहिरकरणं किं से काहिदि बगणिहुदकरणस्स ॥१३४१॥

अर्थ: जैसे घोड़ेकी लीद ऊपरसे चिकनी और भीतरसे खुरदरी होती है वैसे ही किसीका बाह्य आचरण तो समीचीन होता है किन्तु अभ्यन्तर परिणाम शुद्ध नहीं होते । उसे घोड़ेकी लीदके समान कहा है । जिसके अभ्यन्तर परिणाम शुद्ध नहीं हैं उसकी बाह्यक्रिया अनशन आदि क्या करेगी ? अर्थात् इन्द्रिय और कषायरूप अशुभ परिणामके द्वारा अभ्यन्तर तपोवृत्ति जिसकी नष्ट हो चुकी है वह बाह्य अनशन आदि तप करे भी तो क्या लाभ है । वह तो नदीके तटपर निश्चल बैठे हुए बगुलेकी तरह है ॥१३४१॥


बाहिरकरणविसुद्धी अब्भंतरकरणसोधणत्थाए ।
ण हु कुंडयस्स सोधी सक्का सतुसस्स कादुं जे ॥१३४२॥

अर्थ: अभ्यन्तर क्रिया विनय आदिकी शुद्धिके लिये बाह्यक्रियाकी विशुद्धि कही है । शीघ्र ही बहुतसे कर्मोंकी निर्जरामें समर्थ अभ्यन्तर तपोंकी वृद्धिके लिए बाह्य अनशन आदि तप सुने जाते हैं । इसीलिए उनका बाह्य नाम सार्थक है । जो जिसके लिये होता है वह प्रधान होता है । इसलिए अभ्यन्तर तपकी प्रधानता है । वह अभ्यन्तर तप शुभ और शुद्ध परिणामरूप होता है । उसके बिना बाह्यतप निर्जरामें समर्थ नहीं होता । कहा भी है - ‘भगवन् ! आपने आध्यात्मिक तपकी वृद्धिके लिए अत्यन्त कठोर बाह्यतप किया ।’ ठीक ही है, क्योंकि छिलकेके रहते हुए धान्यकी अन्तः शुद्धि सम्भव नहीं है ॥१३४२॥


अब्भंतरसोधीए सुद्धं णियमेण बाहिरं करणं ।
अब्भंतरदोसेण हु कुणदि णरो बाहिरं दोसं ॥१३४३॥

अर्थ: नियमसे अभ्यन्तर शुद्धिके होनेसे ही बाह्यशुद्धि होती है । इन्द्रियकषाय परिणाम आदि अन्तरंग परिणाम दोषसे ही मनुष्य वचन और कायसम्बन्धी बाह्य दोषोंको करता है ॥१३४३॥


लिंगं च होदि अब्भंतरस्स सोधीए बाहिरा सोधी ।
भिउडीकरणं लिंगं जह अंतोजादकोधस्स ॥१३४४॥

अर्थ: अनशन आदि तपविषयक बाह्यशुद्धि अभ्यन्तर परिणामोंकी विशुद्धिका चिह्न है। जैसे क्रोध उत्पन्न होनेका चिह्न भृकुटी चढ़ाना होता है। इस प्रकार बाह्य और अभ्यन्तरकी अग्नि और धूमकी तरह परस्परमें अविनाभाविता है। अर्थात् जैसे आगके होनेपर ही धूम होता है अतः जहाँ धूम होता है वहाँ आग अवश्य होती है। इसीको अविनाभाविता कहते हैं। धूम लिंग है आग लिंगी है। इसी प्रकार बाह्य कार्यके साथ अभ्यन्तर कारणका लिंग-लिंगी भाव सम्बन्ध जानना ॥१३४४॥


ते चेव इंदियाणं दोसा सव्वे हवंति णादव्वा ।
कामस्स य भोगाण य जे दोसा पुव्वणिदिट्ठा ॥१३४५॥

अर्थ: जो दोष पहले काम और भोगके सम्बन्धमें कहे हैं वे ही सब दोष इन्द्रियोंके सम्बन्धमें जानना ॥१३४५॥


महुलित्तं असिधारं तिक्खं लेहिज्ज जध णरो कोई ।
तध विसयसुहं सेवदि दुहावहं इहहि परलोगे ॥१३४६॥

अर्थ: जैसे कोई मनुष्य जिह्वाके द्वारा मधुसे लिप्त तलवारकी तीक्ष्ण धारको चाटता है वैसे ही मनुष्य विषय सुखका सेवन करता है जो इस जन्ममें और परजन्ममें दुःखदायी है । जैसे मधुलिप्त तलवारकी धारको जिह्वासे चाटनेसे प्रारम्भमें मधुके कारण थोड़ा सुख होता है किन्तु जीभ कट जानेपर बहुत दुःख होता है उसी प्रकार विषय भोगमें भी सुख अल्प है दुःख बहुत है ॥१३४६॥


सद्देण मओ रूवेण पदंगो वणगओ वि फरिसेण ।
मच्छो रसेण भमरो गंधेण य पाविदो दोसं ॥१३४७॥

अर्थ: वनमें हिरण मुखके बाष्पसे टूटनेवाले सरस सुगन्धित तृणोंके अग्रभागोंको खाकर और कोमल वायुके द्वारा शीतल किये गये स्फटिकके समान स्वच्छ जलको पीकर पुष्ट होता है । उसकी गति मनसे भी तीव्र होती है । वह व्याधके मनोहर गीतको सुनकर सुखसे अपनी आँखें मूँद लेता है । और दुष्ट यमराजकी दाढ़के समान तीक्ष्ण विशाल बाणोंके द्वारा छेदा जाकर अत्यन्त प्रिय प्राणोंको त्याग देता है । एक कलिकाके आकार दीपकके रूपसे अनुराग करनेवाला पतंगा दीपककी लौमें जलकर भस्म हो जाता है । वनका हाथी स्त्रीके हृदयकी तरह जिसमें प्रवेश करना कठिन है, जो संसारकी तरह महान् है और विपत्तिकी तरह जिसे लांघना अशक्य है ऐसे महान् वनमें सल्लकीके तरुण वृक्षोंकी शाखा खाता है, रमणीक पहाड़ी नदी और बड़े-बड़े तालाबोंमें स्वेच्छापूर्वक जल पीता है, अवगाहन करता है, डुबकी लगाता है, अनेक अनुकूल हथिनियोंका समूह उसके पीछे चलता है, हथिनीके विशाल जघन भागके स्पर्शनमें अनुरक्त होकर मदमत्त हो, रागकी अधिकतारूपी अन्धकारके पटलसे आँखें बन्द कर लेता है और महान् गर्तमें गिरकर कष्ट भोगता है । युवा पुरुषोंके मनरूपी सरोवरमें विलास करनेवाली स्त्रियोंके लोचनके हावभावका अनुकरण करनेवाला मच्छ थोड़ेसे भोजनकी लोलुपतावश शीघ्र ही विपत्तिमें पड़ जाता है । अनेक प्रकारके सुगन्धित फूलोंके समूहकी रजसे आवेष्ठित भौंरा विषवृक्षके फूलकी गन्धसे प्राण खो देता है । इस प्रकार एक एक इन्द्रियके वश होकर ये कष्ट उठाते हैं ॥१३४७॥


इदि पंचहि पंच हदा सद्दरसफरिसगंधरूवेहिं ।
इक्को कहं ण हम्मदि जो सेवदि पंच पंचेहिं ॥१३४८॥

अर्थ: इस प्रकार शब्द, रस, स्पर्श, गन्ध, रूप इन पाँच विषयोंके द्वारा पाँच जीव अपने प्राण गँवाते हैं । तब जो एक ही पुरुष पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा पाँचों विषयोंका सेवन करता है वह प्राण क्यों न गँवायेगा ॥१३४८॥


सरजूए गंधमित्तो घाणिंदियवसगदो विणीदाए ।
विसपुप्फगंधमग्घाय मदो णिरयं च संपत्तो ॥१३४९॥

अर्थ: अयोध्यापुरीका राजा गन्धमित्र घ्राणेन्द्रियके वशमें होकर सरयू नदीमें विषैले फूलकी गन्धको सूँघकर मरा और नरकमें गया ॥१३४९॥


पाडलिपुत्ते पंचालगीदसद्देण मुच्छिदा संती ।
पासादादो पडिदा णट्ठा गंधव्वदत्ता वि ॥१३५०॥

अर्थ: पाटलीपुत्र नगरमें गंधर्वदत्ता नामक गणिका पंचालके गीतके शब्द सुनकर मूर्छित हो महलसे नीचे गिरकर मर गई ॥१३५०॥


माणुसमंसपसत्तो कंपिल्लवदी तधेव भीमो वि ।
रज्जब्भट्ठो णट्ठो मदो य पच्छा गदो णिरयं ॥१३५१॥

अर्थ: कंपिला नगरीका राजा भीम मनुष्यके मांसका प्रेमी था । वह राज्यसे निकाला जाकर मरकर नरकमें गया ॥१३५१॥


चोरो वि तह सुवेगो महिलारूवम्मि रत्तदिट्ठीओ ।
विद्धो सरेण अच्छीसु मदो णिरयं च संपत्तो ॥१३५२॥

अर्थ: सुवेग नामक चोर युवती स्त्रियोंके रूपको देखनेका अनुरागी था । उसकी आँखमें बाण लगा और वह मरकर नरक गया ॥१३५२॥


फासिंदिएण गोवे सत्ता गिहवदिपिया वि णासक्के ।
मारेदूण सपुत्तं धूयाए मारिदा पच्छा ॥१३५३॥

अर्थ: नासिक नगरमें गृहपति सागरदत्तकी भार्या नागदत्ता स्पर्शन इन्द्रियके कारण अपने ग्वाले पर आसक्त थी । उसने अपने पुत्रको मारा तो उसकी लड़कीने अपनी मांको मार दिया ॥१३५३॥


रोसाइट्ठो णीलो हदप्पभो अरदिअग्गिसंसत्तो ।
सीदे वि णिवाइज्जदि वेवदि य गहोवसिट्ठो व ॥१३५४॥

अर्थ: जो क्रोधसे ग्रस्त होता है उसका रंग नीला पड़ जाता है, कान्ति नष्ट हो जाती है, अरतिरूपी आगसे संतप्त होता है । ठंडमें भी उसे प्यास सताती है और पिशाचसे गृहीतकी तरह क्रोधसे कांपता है ॥१३५४॥


भिउडीतिवलियवयणो उग्गदणिच्चलसुरत्तलुक्खक्खो ।
कोवेण रक्खसो वा णराण भीमो णरो भवदि ॥१३५५॥

अर्थ: भृकुटी चढ़नेसे मस्तक पर तीन रेखाएँ पड़ जाती है, लाल लाल निश्चल आँखें बाहर निकल आती हैं । इस तरह क्रोधसे मनुष्य दूसरे मनुष्योंके लिए राक्षसकी तरह भयानक हो जाता है ॥१३५५॥


जह कोइ तत्तलोहं गहाय रुट्ठो परं हणामित्ति ।
पुव्वदरं सो डज्झदि डहिज्ज व ण वा परो पुरिसो ॥१३५६॥

अर्थ: जैसे कोई पुरुष रुष्ट होकर दूसरेका घात करनेके लिए तपा लोहा उठाता है । ऐसा करनेसे दूसरा उससे जले या न जले, पहले वह स्वयं जलता है ॥१३५६॥


तध रोसेण सयं पुव्वमेव डज्झदि हु कलकलेणेव ।
अण्णस्स पुणो दुक्खं करिज्ज रुट्ठो ण य करिज्ज ॥१३५७॥

अर्थ: उसी प्रकार पिघले हुए लोहेकी तरह क्रोधसे पहले वह स्वयं जलता है । दूसरेको वह दुःखी करे या न करे ॥१३५७॥


णासेदूण कसायं अग्गी णसदि सयं जधा पच्छा ।
णासेदूण तध णरं णिरासवो णस्सदे कोधो ॥१३५८॥

अर्थ: जैसे आग ईंधनको नष्ट करके पीछे स्वयं बुझ जाती है उसी प्रकार क्रोध पहले क्रोधी मनुष्यको नष्ट करके पीछे निराधार होनेसे स्वयं नष्ट हो जाता है ॥१३५८॥


कोधो सत्तुगुणकरो णीयाणं अप्पणो य मण्णुकरो ।
परिभवकरो सवासे रोसो णासेदि णरमवसं ॥१३५९॥

अर्थ: क्रोध शत्रुका जो धर्म है अपकार करना, उसे करता है अथवा क्रोध शत्रुका उपकार करता है क्योंकि उसे क्रोधकी आगमें जलते हुए देखकर शत्रु प्रसन्न होते हैं । वे सदा इस प्रयत्नमें रहते हैं कि कैसे इसे क्रोध उत्पन्न करें । क्रोध अपने और बन्धु बान्धवोंको शोकमें डालता है । अपने ही घरमें अपना तिरस्कार कराता है । परवश मनुष्यका नाश करता है ॥१३५९॥


ण गुणे पेच्छदि अववददि गुणे जंपदि अजंपिदव्वं च ।
रोसेण रुद्दहिदओ णारगसीलो णरो होदि ॥१३६०॥

अर्थ: क्रोधी जिसपर क्रोध करता है उसके गुणोंको नहीं देखता । उसके गुणोंकी भी निन्दा करता है । जो कहने योग्य नहीं है वह भी कहता है इस प्रकार क्रोधसे रौद्र हृदय मनुष्यका स्वभाव नारकी जैसा होता है ॥१३६०॥


जध करिसयस्स धण्णं वरिसेण समज्जिदं खलं पत्तं ।
डहदि फुलिंगो दित्तो तध कोहग्गी समणसारं ॥१३६१॥

अर्थ: जैसे चिनगारी एक वर्षके श्रमसे प्राप्त खलिहानमें आये किसानके धान्यको जला देती है उसी प्रकार क्रोधरूपी आग श्रमणके जीवन भरमें उपार्जित पुण्य धनको जला देती है ॥१३६१॥


जध उग्गविसो उरगो दब्भतणंकुरहदो पकुप्पंतो ।
अचिरेण होदि अविसो तध होदि जदी वि णिस्सारो ॥१३६२॥

अर्थ: जैसे उग्र विषवाले सर्पको घासके एक तिनकेसे मारने पर वह अत्यन्त रोषमें आकर उस तिनके पर अपना विष वमन करके तत्काल विष रहित हो जाता है उसी प्रकार यति भी क्रोध करके अपने रत्नत्रयका विनाश करता है और शीघ्र ही निस्सार हो जाता है ॥१३६२॥


पुरिसो मक्कडसरिसो होदि सरूवो वि रोसहदरूवो ।
होदि य रोसणिमित्तं जम्मसहस्सेसु य दुरूवो ॥१३६३॥

अर्थ: सुन्दर सुरूप पुरुष भी क्रोधसे रूपके नष्ट हो जाने पर बन्दरके समान लाल मुख-वाला विरूप हो जाता है। इस जन्ममें क्रोधके दोष दिखलाकर परलोकमें दिखलाते हैं एक भवमें क्रोध करनेसे हजारों जन्मोंमें कुरूप होता है ॥१३६३॥


सुट्ठु वि पिओ मुहुत्तेण होदि वेसो जणस्स कोधेण ।
पधिदो वि जसो णस्सदि कुद्धस्स अकज्जकरणेण ॥१३६४॥

अर्थ: क्रोध करनेसे अत्यन्त प्रिय व्यक्ति भी मुहूर्त मात्रमें ही द्वेषका पात्र होता है। तथा क्रोधी मनुष्यके अनुचित काम करनेसे उसका फैला हुआ यश भी नष्ट हो जाता है ॥१३६४॥


णीयल्लगो वि रुट्ठो कुणदि अणीयल्ल एव सत्तू वा ।
मारेदि तेहिं मारिज्जदि वा मारेदि अप्पाणं ॥१३६५॥

अर्थ: क्रोधी मनुष्य अपने निकट सम्बन्धियोंको भी असम्बन्धी अथवा शत्रु बना लेता है। उनको मारता है या उनके द्वारा मारा जाता है अथवा स्वयं मर जाता है ॥१३६५॥


पुज्जो वि णरो अवमाणिज्जदि कोवेण तक्खणे चेव ।
जगविस्सुदं वि णस्सदि माहप्पं कोहवसियस्स ॥१३६६॥

अर्थ: पूजनीय मनुष्य भी क्रोध करनेसे तत्काल अपमानित होता है। क्रोधीका जगत्में प्रसिद्ध भी माहात्म्य नष्ट हो जाता है ॥१३६६॥


हिंसं अलियं चोज्जं आचरदि जणस्स रोसदोसेण ।
तो ते सव्वे हिंसालियादि दोसा भवे तस्स ॥१३६७॥

अर्थ: क्रोधके कारण मनुष्य लोगोंकी हिंसा करता है, उनके सम्बन्धमें झूठ बोलता है, चोरी करता है। अतः उसमें हिंसा झूठ आदि सब दोष होते हैं ॥१३६७॥


वारवदीय असेसा दड्ढा दीवायणेण रोसेण ।
बद्धं च तेण पावं दुग्गदिभयबंधणं घोरं ॥१३६८॥

अर्थ: दीपायन मुनिने क्रोधसे समस्त द्वारका नगरी भस्म कर दी। और दुर्गतिमें ले जाने वाले घोर पापका बन्ध किया ॥१३६८॥


कुलरूवाणाबलसुदलाभस्सरयत्थमदितवादीहिं ।
अप्पाणमुण्णमंतो नीचागोदं कुणदि कम्मं ॥१३६९॥

अर्थ: कुल, रूप, आज्ञा, बल, श्रुत, लाभ, ऐश्वर्य, तप तथा अन्य बातोंमें अपनेको बड़ा मानने वाला, उनका अहंकार करनेवाला नीच गोत्र नामक कर्मका बन्ध करता है ॥१३६९॥


दट्ठूण अप्पणादो हीणे मुक्खाउ विंति माणकलिं ।
दट्ठूण अप्पणादो अधिए माणं णयंति बुधा ॥१३७०॥

अर्थ: अपनेसे हीन व्यक्तियोंको देखकर मूर्ख लोग मान करते हैं। किन्तु विद्वान् अपनेसे बड़ोंको देखकर मान दूर करते हैं ॥१३७०॥


माणी विस्सो सव्वस्स होदि कलहभयवेरदुक्खाणि ।
पावदि माणी णियदं इहपरलोए य अवमाणं ॥१३७१॥

अर्थ: मानीसे सब द्वेष करते हैं। वह कलह, भय, वैर और दुःखका पात्र होता है तथा इस लोक और परलोकमें नियमसे अपमानका पात्र होता है ॥१३७१॥


सव्वे वि कोहदोसा माणकसायस्स होदि णादव्वा ।
माणेण चेव मेहुणहिंसालियचोज्जमाचरदि ॥१३७२॥

अर्थ: पहले जो क्रोधके दोष कहे हैं वे सब दोष मानकषायके भी जानना। मानसे मनुष्य हिंसा, असत्य बोलना, चोरी और मैथुनमें प्रवृत्ति करता है ॥१३७२॥


सयणस्स जणस्स पिओ णरो अमाणी सदा हवदि लोए ।
णाणं जसं च अत्थं लभदि सकज्जं च साहेदि ॥१३७३॥

अर्थ: मान रहित व्यक्ति जगत्में स्वजन और परजन सदा सबका प्रिय होता है। वह ज्ञान, यश और धन प्राप्त करता है तथा अन्य भी अपने कार्यको सिद्ध करता है ॥१३७३॥


ण य परिहायदि कोई अत्थे मउगत्तणे पउत्तम्मि ।
इह य परत्त य लब्भदि विणएण हु सव्वकल्लाणं ॥१३७४॥

अर्थ: मार्दव युक्त व्यवहार करने पर कोई धनहानि नहीं होती जिससे धनहानिके भयसे मनुष्य मान करे। विनयसे इस जन्ममें और जन्मान्तरमें सर्व कल्याण प्राप्त होते हैं ॥१३७४॥


सट्ठि साहस्सीओ पुत्ता सगरस्स रायसीहस्स ।
अदिबलवेगा संता णट्ठा माणस्स दोसेण ॥१३७५॥

अर्थ: सगर चक्रवर्तीके साठ हजार पुत्र महाबलशाली होते हुए भी मान दोषके कारण मृत्युको प्राप्त हुए ॥१३७५॥


जध कोडिसमिद्धो वि ससल्लो ण लभदि सरीरणिव्वाणं ।
मायासल्लेण तहा ण णिव्वुदिं तवसमिद्धो वि ॥१३७६॥

अर्थ: जैसे एक कोटी धनका स्वामी होने पर भी यदि शरीरमें कीलकाँटा घुसा हो तो शारीरिक सुख नहीं मिलता । उसी प्रकार तपसे समृद्ध होने पर भी यदि अन्तरमें मायारूपी शल्य घुसा है तो मोक्ष लाभ नहीं हो सकता ॥१३७६॥


होदि य वेस्सो अप्पच्चइदो तध अवमदो य सुजणस्स ।
होदि अचिरेण सत्तू णीयाणवि णियडिदोसेण ॥१३७७॥

अर्थ: माया दोषसे मनुष्य सबके द्वेषका पात्र होता है, उसका कोई विश्वास नहीं करता । सुजन भी उसका अपमान करते हैं । वह शीघ्र ही अपने बन्धु-बान्धवोंका भी शत्रु बन जाता है ॥१३७७॥


पावइ दोसं मायाए मइल्लं लहु सगावराधेहिं ।
सच्चाण सहस्साणि वि माया एक्का वि णासेदि ॥१३७८॥

अर्थ: अपने द्वारा थोड़ा सा अपराध होने पर भी मायाचारी महान् दोषका भागी बनता है । एक बारका भी मायाचार हजारों सत्योंको नष्ट कर देता है इस प्रकार महादोषका भागी होना और हजार सत्योंका विनाश ये मायाके दोष हैं ॥१३७८॥


मायाए मित्तभेदे कदम्मि इधलोगिगच्छपरिहाणी ।
णासदि मायादोसा विसजुददुद्धं व सामण्णं ॥१३७९॥

अर्थ: मायाचारसे मित्रता नष्ट हो जाती है और उससे इस लोक सम्बन्धी कार्योंका विनाश होता है। तथा मायादोषसे विष मिश्रित दूधकी तरह मुनि धर्म नष्ट हो जाता है। इस प्रकार मित्रत्ता और कार्यका नाश तथा मुनि धर्मकी हानि ये मायाके दोष हैं ॥१३७९॥


माया करेदि णीचागोदं इत्थी णवुंसयं तिरियं ।
मायादोसेण य भवसएसु डभिज्जदे बहुसो ॥१३८०॥

अर्थ: मायासे नीच गोत्र नामक कर्मका बन्ध होता है, जिससे दूसरे जन्ममें नीच कुलमें जन्म होता है। तथा स्त्रीवेद, नपुंसकवेद और तिर्यञ्चगति नाम कर्मका बन्ध करती है। अथवा मायासे स्त्रीपना, नपुंसकपना और तिर्यञ्चपना प्राप्त होता है। मायासे उत्पन्न हुए दोषसे सैकड़ों जन्मोंमें बहुत बार ठगाया जाता है अर्थात् किसीको एक बार ठगनेसे बार-बार ठगा जाता है ॥१३८०॥


कोहो माणो लोहो य जत्थ माया वि तत्थ सण्णिहिदा ।
कोहमदलोहदोसा सव्वे मायाए ते होंति ॥१३८१॥

अर्थ: जहाँ मायाचार है वहाँ क्रोध, मान लोभ भी रहते हैं। क्रोध मान और लोभसे उत्पन्न होने वाले सब दोष मायाचारीमें होते हैं ॥१३८१॥


सस्सो य भरघगामस्स सत्तसंवच्छराणि णिस्सेसो ।
दड्ढो डंभणदोसेण कुंभकारेण रुट्ठेण ॥१३८२॥

अर्थ: मायाचारके दोषसे रुष्ट हुए कुम्भकारने भरत नामक गाँवका धान्य सात वर्ष तक पूर्ण रूपसे जलाया था ॥१३८२॥


लोभेणासाधत्तो पावइ दोसे बहुं कुणदि पावं ।
णीए अप्पाणं वा लोभेण णरो ण विगणेदि ॥१३८३॥

अर्थ: लोभसे मनुष्य ‘यह वस्तु मेरी होगी’ इस आशासे ग्रस्त होकर बहुत दोष करता है; बहुत पाप करता है । लोभसे अपने कुटुम्बियोंकी और अपनी भी चिन्ता नहीं करता । उन्हें भी कष्ट देता है और अपने शरीरको भी कष्ट देता है ॥१३८३॥


लोभो तणे वि जादो जणेदि पावमिदरत्थ किं वच्चं ।
लगिदमउडादिसंगस्स वि हु ण पावं अलोहस्स ॥१३८४॥

अर्थ: तृणसे भी हुआ लोभ पापको उत्पन्न करता है तब सारवान् वस्तुमें हुए लोभका तो कहना ही क्या है ? जो लोभकषायसे रहित है उसके शरीरपर मुकुट आदि परिग्रह होनेपर भी पाप नहीं होता । अर्थात् सारवान् द्रव्यका सम्बन्ध भी लोभके अभावमें बन्धका कारण नहीं है ॥१३८४॥


साकेदपुरे सीमंधरस्स पुत्तो मियद्धओ णाम ।
भद्दयमहिसणिमित्तं जुवराओ केवली जादो ॥१३८५॥

अर्थ: साकेत नगरीमें सीमन्धरका पुत्र मृगध्वज नामक था । वह भद्रक नामक भैंसेके निमित्तसे केवली हुआ ॥१३८५॥


तेलोक्केण वि चित्तस्स णिव्वुदी णत्थि लोभघत्थस्स ।
संतुट्ठो हु अलोभो लभदि दरिद्दो वि णिव्वाणं ॥१३८६॥

अर्थ: जो लोभसे ग्रस्त है उसके चित्तको तीनों लोक प्राप्त करके भी सन्तोष नहीं होता । और जो शरीरकी स्थितिमें कारण किसी भी वस्तुको पाकर सन्तुष्ट रहता है, जिसे वस्तुमें ममत्वभाव नहीं है वह दरिद्र होते हुए भी सुख प्राप्त करता है । अतः चित्तकी शान्ति सन्तोषके अधीन है, द्रव्यके अधीन नहीं है । महान् द्रव्य होते हुए भी जो असन्तुष्ट है उसके हृदयमें महान् दुःख रहता है ॥१३८६॥


सव्वे वि गंथदोसा लोभकसायस्स हुंति णादव्वा ।
लोभेण चेव मेहुणहिंसालियचोज्जमाचरदि ॥१३८७॥

अर्थ: पूर्वमें परिग्रहके जो दोष कहे हैं वे सब दोष लोभकषायवालेके अथवा लोभ नामक कषायके जानना । लोभसे ही मनुष्य हिंसा, झूठ, चोरी और मैथुन करता है । अतः समस्त पापक्रियाओंका प्रथम कारण लोभ है ॥१३८७॥


रामस्स जामदग्गिस्स वच्छं घित्तूण कत्तविरिओ वि ।
णिधणं पत्तो सकुलो ससाहणो लोभदोसेण ॥१३८८॥

अर्थ: जमदग्निके पुत्र परशुरामकी गायोंको ग्रहणकर लेनेके कारण राजा कार्तवीर्य लोभदोषसे समस्त परिवार और सेनाके साथ मृत्युको प्राप्त हुआ । परशुरामने सबको मार डाला ॥१३८८॥


ण हि तं कुणिज्ज सत्तू अग्गी वग्घो व कण्हसप्पो वा ।
जं कुणइ महादोसं णिव्वुदिविग्घं कसायरिवू ॥१३८९॥

अर्थ: शत्रु, आग, व्याघ्र और कृष्ण सर्प भी वह बुराई नहीं करता जो बुराई कषाय-रूपी शत्रु करता है। वह कषायरूप शत्रु मोक्षमें बाधारूप महादोषका कारण है ॥१३८९॥


इंदियकसायदुद्दंतस्सा पाडेंति दोसविसमेसु ।
दुःखावहेसु पुरिसे पसढिलणिव्वेदखलिया हु ॥१३९०॥

अर्थ: इन्द्रिय कषायरूपी घोड़े दुर्दमनीय हैं इनको वशमें करना बहुत कठिन है। वैराग्य-रूपी लगामसे ही ये वशमें होते हैं। किन्तु उस लगामके ढीले होनेपर वे पुरुषको दुःखदायी पाप-रूपी विषम स्थानोंमें गिरा देते हैं ॥१३९०॥


इंदियकसायदुद्दंतस्सा णिव्वेदखणिलिदा संता ।
ज्झाणकसाए भीदा ण दोसविसमेसु पाडेंति ॥१३९१॥

अर्थ: किन्तु इन्द्रिय कषायरूपी दुर्दमनीय घोड़े जब वैराग्यरूपी लगामसे नियमित होते हैं और ध्यानरूपी कोड़ेसे भयभीत रहते हैं तो विषम पापस्थानमें नहीं गिराते ॥१३९१॥


इंदियकसायपण्णगदट्ठा बहुवेदणुद्दिदा पुरिसा ।
पब्भट्ठझाणसुक्खा संजमजीयं पविजहंति ॥१३९२॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूपी सर्पोंसे डसे हुए मनुष्य बहुत कष्टसे पीड़ित होकर, उत्तम-ध्यानरूपी सुखसे भ्रष्ट हो, संयमरूपी जीवनको त्याग देते हैं ॥१३९२॥


ज्झाणागदेहिं इंदियकसायभुजगा विरागमंतेहिं ।
णियमिज्जंता संजमजीयं साहुस्स ण हरंति ॥१३९३॥

अर्थ: किन्तु इन्द्रिय और कषायरूपी सर्प सम्यग्ध्यानरूपी सिद्ध औषधि और वैराग्यरूपी मंत्रोंसे वशमें होनेपर साधुके संयमरूपी जीवनको नहीं हरते ॥१३९३॥


सुसरणपुंखा चिंतावेगा विसयविसलित्तरइधारा ।
मणधणुमुक्का इंदियकंडा विंधेति पुरिसमयं ॥१३९४॥

अर्थ: इन्द्रियाँ बाणके समान पुरुषरूपी हिरनको बींधती है। बाणमें पुंख होते हैं। भोगे हुए भोगोंका स्मरण इनका पुंख है। भोगोंकी चिन्ता इनका वेग है। रति इनकी धारा-गति है जो विषयरूपी विषसे लिप्त है। ये इन्द्रियरूप बाण मनरूपी धनुषके द्वारा छोड़े जाते हैं ॥१३९४॥


धिदिखेडएहिं इंदियकंडे ज्झाणवरसत्तिसंजुत्ता ।
वारंति समणजोहा सुणाणदिट्ठीहिं दट्ठूण ॥१३९५॥

अर्थ: ध्यानरूपी श्रेष्ठ शक्तिसे युक्त श्रमण योद्धा सम्यग्ज्ञानरूप दृष्टिसे देखकर धैर्यरूप फलकके द्वारा इन्द्रियरूप बाणोंका वारण करते हैं ॥१३९५॥


गंथाडवीचरंतं कसायविसकंटया पमायमुहा ।
विद्धंति विसयतिक्खा अधिदिदढोवाणहं पुरिसं ॥१३९६॥

अर्थ: परिग्रहरूपी घोर वनमें कषायरूपी विषैले काँटे फैले हैं। प्रमाद उनका मुख है और विषयोंकी चाहसे वे तीक्ष्ण हैं। धैर्यरूपी दृढ़ जूतेको धारण किये विना जो उस वनमें विचरण करता है, उसे वे काँटे बींध देते हैं ॥१३९६॥


आइद्धधिदिदढोवाणहस्स उवओगदिट्ठिजुत्तस्स ।
ण करिंति किंचि दुक्खं कसायविसकंटया मुणिणो ॥१३९७॥

अर्थ: जिस मुनिने धैर्यरूपी दृढ़ जूता धारण किया है और जो सम्यग्ज्ञानोपयोग दृष्टिसे सम्पन्न है उसको वे कषायरूपी विषैले काँटे कुछ भी दुःख नहीं देते ॥१३९७॥


उड्डहणा अदिचवला अणिग्गहिदकसायमक्कडा पावा ।
गंथफललोलहिदया णासंति हु संजमारामं ॥१३९८॥

अर्थ: ये कषायरूपी बन्दर असंयत हैं, अतिचपल हैं, पापी हैं, इनका हृदय परिग्रहरूपी फलमें आसक्त है । इनका यदि निग्रह नहीं किया तो ये संयमरूपी उद्यानका विनाश कर देते हैं ॥१३९८॥


णिच्चं पि अमज्झत्थे तिकालदोसाणुसरणपरिहत्थे ।
संजमरज्जूहिं जदी बंधंति कसायमक्कडए ॥१३९९॥

अर्थ: ये कषायरूपी बन्दर, निरन्तर चपल हैं, त्रिकालवर्ती दोषोंका अनुसरण करनेमें चतुर हैं । इन्हें संयमी संयमरूपी रस्सीसे बाँधता है ॥१३९९॥


धिदिवम्मिएहिं उवसमसरेहिं साधूहिं णाणसत्थेहिं ।
इंदियकसायसत्तू सक्का जुत्तेहिं जेदुं जे ॥१४००॥

अर्थ: सन्तोषरूपी कवच, उपशमरूपी बाण और ज्ञानरूपी शस्त्रोंसे सहित साधुओंके द्वारा वे इन्द्रिय और कषायरूप शत्रु जीते जा सकते हैं ॥१४००॥


इंदियकसायचोरा सुभावणासंकलाहिं वज्झंति ।
ता ते ण विकुव्वंति चोरा जह संकलाबद्धा ॥१४०१॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूपी चोर शुभध्यानरूप भावोंकी सांकलसे बाँधे जाते हैं । बँधे जानेपर वे सांकलसे बँधे चोरोंकी तरह विकार नहीं करते ॥१४०१॥


इंदियकसायवग्घा संजमणरघादणे अदिपसत्ता ।
वेरग्गलोहदढपंजरेहिं सक्का हु णियमेदुं ॥१४०२॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूपी व्याघ्र संयमरूपी मनुष्यको खानेके बड़े प्रेमी होते हैं । इन्हें वैराग्यरूपी लोहके मजबूत पीजरेमें रोका जा सकता है ॥१४०२॥


इंदियकसायहत्थी वयवारिमहीणिदा उवायेण ।
विणयवरत्ताबद्धा सक्का अवसा वसे कादुं ॥१४०३॥

अर्थ: इन्द्रिय कषायरूपी हाथी यद्यपि स्वच्छन्द है तथापि व्रतरूपी बाड़ेमें ले जाकर विनयरूपी रस्सीसे उपायपूर्वक बाँधे जानेपर वशमें लाये जा सकते हैं ॥१४०३॥


इंदियकसायहत्थी वोलेदुं सीलफलियमिच्छंता ।
धीरेहिं रुंभिदव्वा धिदिजमलारुप्पहारेहिं ॥१४०४॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूप हाथी शीलरूपी अर्गलाको लांघना पसन्द करते हैं। अतः धीर पुरुषोंको उनके दोनों कानोंके पास धैर्यरूपी प्रहार करके रोकना चाहिए ॥१४०४॥


इंदियकसायहत्थी दुस्सीलवणं जदा अहिलसेज्ज ।
णाणंकुसेण तइया सक्का अवसा वसं कादुं ॥१४०५॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायरूप हाथी जब दुःशीलरूपी वनमें प्रवेश करना चाहे तो उसे ज्ञानरूपी अंकुशसे वशमें करना शक्य है ॥१४०५॥


जदि विसयगंधहत्थी अदिणिज्जदि रागदोसमयमत्ता ।
विण्णाणज्झाणजोहस्स वसे णाणंकुसेण विणा ॥१४०६॥

अर्थ: यदि रागद्वेषरूपी मदसे मस्त विषयरूपी गन्धहस्ती ज्ञानांकुशके विना विज्ञान ध्यानरूपी योधाके वशमें नहीं रहता और परिग्रहरूपी वनमें प्रवेश करता है ॥१४०६॥


विसयवणरमणलोला बाला इंदियकसायहत्थी ते ।
पसमे रामेदव्वा तो ते दोसं ण काहिंति ॥१४०७॥

अर्थ: तो इन्द्रिय और कषायरूप बालहस्ती विषयरूपी वनमें क्रीड़ा करनेके प्रेमी होते हैं। उन्हें प्रशमरूपी वनमें अर्थात् आत्मा और शरीरके भेदज्ञानसे प्रकट हुए स्वाभाविक वैराग्यमें रमण कराना चाहिए तब वे दोष नहीं करेंगे ॥१४०७॥


सद्दे रूवे गंधे रसे य फासे सुभे य असुभे य ।
तम्हा रागद्दोसं परिहर तं इंदियजएण ॥१४०८॥

अर्थ: इसलिए हे क्षपक ! इन्द्रियको जीतकर तू शुभ और अशुभ शब्द, रूप, गन्ध, रस और स्पर्शमें रागद्वेष मत कर ॥१४०८॥


जह णीरसं पि कडुयं ओसहं जीविदत्थिओ पिबदि ।
कडुयं पि इंदियजयं णिव्वुइहेदुं तह पिविज्ज ॥१४०९॥

अर्थ: जैसे जीवनका इच्छुक रोगी स्वादरहित कडुवी औषधी पीता है वैसे ही तू मोक्षके लिए कटुक भी इन्द्रियजयका सेवन कर ॥१४०९॥


जे आसि सुभा एण्हिं असुभा ते चेव पुग्गला जादा ।
जे आसि तदा असुभा ते चेव सुभा इमा इण्हिं ॥१४१०॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायके विषयोंमें अच्छा और बुरापना स्थिर नहीं है। जो विषय आज अच्छे लगते हैं कल वे ही बुरे लगते हैं। जो आज बुरे लगते हैं कल वे ही अच्छे लगते हैं। जिन्हें अच्छा मानकर स्वीकार किया वे ही बुरा लगनेपर द्वेषके पात्र होते हैं तो उनमें अनुराग कैसा ? और जो बुरे लगते हैं कल वे ही अच्छे लगनेवाले हैं अतः उनमें द्वेष कैसा ? जो पुद्गल इस समय अच्छे प्रतीत होते हैं वे ही बुरे लगने लगते हैं। जो पहले बुरे प्रतीत होते थे वे ही अब अच्छे प्रतीत होते हैं इसलिए उनमें रागद्वेष करना उचित नहीं है ॥१४१०॥


सव्वे वि य ते भुत्ता चत्ता वि य तह अणंतखुत्तो मे ।
सव्वेसु एत्थ को मज्झ विंभओ भुत्तविजडेसु ॥१४११॥

अर्थ: वे अच्छे बुरे सभी पुद्गल मैंने अनन्तवार भोगे हैं और अनन्तवार त्यागे हैं। उन भोगे और त्यागे हुए सब पुद्गलोंमें मुझे अचरज कैसा ? इस प्रकार हे क्षपक ! तुम्हें विचारना चाहिए ॥१४११॥


रूवं सुभं च असुभं किंचि वि दुक्खं सुहं च ण य कुणदि ।
संकप्पविसेसेण हु सुहं च दुःखं च होइ जए ॥१४१२॥

अर्थ: कोई अच्छा या बुरा रूप सुख या दुःख नहीं करता । जगत्में संकल्पवश ही सुख-दुःख होता है ॥१४१२॥


इह य परत्त य लोए दोसे बहुगे य आवहइ चक्खू ।
इदि अप्पणो गणित्ता णिज्जेदव्वो हवदि चक्खू ॥१४१३॥

अर्थ: इस लोक और परलोकमें ये आँखें बहुत बुराई उत्पन्न करती हैं ऐसा जानकर चक्षु इन्द्रियको जीतना चाहिए ॥१४१३॥


एवं सम्मं सद्दरसगंधफासे विचारयित्ताणं ।
सेसाणि इंदियाणि वि णिज्जेदव्वाणि बुद्धिमदा ॥१४१४॥

अर्थ: इस प्रकार दोनों लोकोंमें अनेक दोष उत्पन्न करने वाली जान अपनी बुद्धिसे विचारकर शब्द, रस, गन्ध और स्पर्शको विषय करने वाली शेष इन्द्रियोंको भी बुद्धिमान् पुरुषको जीतना चाहिए ॥१४१४॥


जदिदा सवदि असंतेण परो तं णत्थि मेत्ति खमिदव्वं ।
अणुकंपा वा कुज्जा पावइ पावं वरावोत्ति ॥१४१५॥

अर्थ: यदि दूसरा व्यक्ति मेरेमें अविद्यमान दोषको कहता है तो वह दोष मुझमें नहीं है अतः उसे क्षमा करना चाहिए; क्योंकि असत् दोषको कहनेसे मेरी क्या हानि हुई ? अथवा निन्दा करने वाले पर दया करना चाहिए - बेचारा झूठ बोलकर अनेक दुःख देने वाला पाप भार एकत्र करता है । मेरे दोषोंसे उसमें दोष उत्पन्न नहीं होते और न मेरे गुणोंसे ही उसका कोई लाभ होता है । प्राणियोंके अपने-अपने गुण दोष नियत हैं । उनसे होने वाला सुख-दुःख भी उन्हें ही होता है । अतः यह व्यर्थ ही कर्मबन्ध करता है ॥१४१५॥


जदि वा सवेज्ज संतेण परो तह वि पुरिसेण खमिदव्वं ।
सो अत्थि मज्झ दोसो ण अलीयं तेण भणिदत्ति ॥१४१६॥

अर्थ: यदि दूसरा मेरेमें विद्यमान दोषको कहता है तब भी क्षमा करना चाहिए क्योंकि वह जिस दोषको कहता है वह मेरेमें है । वह झूठ नहीं कहता । विद्यमान दोषोंको दूसरे यदि न कहें तो वे नष्ट हो जाते हैं, ऐसी बात भी नहीं है ऐसा विचार करना चाहिए ॥१४१६॥


सत्तो वि ण चेव हदो हदो वि ण य मारिदो त्ति य खमेज्ज ।
मारिज्जंतो वि सहेज्ज चेव धम्मो ण णट्ठोत्ति ॥१४१७॥

अर्थ: इसने मुझे अपशब्द ही कहे हैं मारा तो नहीं है, इस प्रकार उसके न मारनेके गुणको चित्तमें स्थापित करके ‘अपशब्द कहनेसे मेरा क्या नष्ट हुआ’ अतः क्षमा करना चाहिए। मारे तो भी सहन करना चाहिए कि इसने विपत्तिको जड़से दूर करनेमें समर्थ और इष्ट सुखको देने वाले मेरे धर्मका नाश नहीं किया ॥१४१७॥


रोसेण महाधम्मो णासिज्ज तणं च अग्गिणा सव्वो ।
पावं च करिज्ज महं बहुगंपि णरेण खमिदव्वं ॥१४१८॥

अर्थ: आगसे तृणकी तरह क्रोधसे दुःखसे उपार्जन किया गया दुर्लभ और दुश्चर मेरा धर्म नष्ट होता है । कहा भी है - यह क्रोधरूपी आग मनुष्योंके धर्मवनको जलाती है । यह क्रोधरूपी आग अज्ञानरूपी काष्ठसे उत्पन्न होती है, अपमानरूपी वायु उसे भड़काती है । कठोर वचनरूपी उसके बड़े स्फुलिंग है । हिंसा उसकी शिखा है और अत्यन्त उग्र वैर उसका धूम है । तथा यह क्रोध मुझे पापका बन्ध कराता है जो अनेक भवोंमें दुःखका बीज है । इसलिये चित्तमें क्षमा धारण करना चाहिए ॥१४१८॥


पुव्वकदमज्झपावं पत्तं परदुःखकरणजादं मे ।
रिणमोक्खो मे जादो अज्जत्ति य होदि खमिदव्वं ॥१४१९॥

अर्थ: पापके आश्रवके द्वारको न जानते हुए मैंने प्रमादवश जो पूर्वमें पापकर्म किया था, जो दूसरोंके दुःखका कारण था, वह आज चला गया । आज मैं उस ऋणसे मुक्त हो गया । ऐसा विचारकर क्रोधको दूर करना चाहिए ॥१४१९॥


पुव्वं सयमुवभुत्तं काले णाएण तेत्तियं दव्वं ।
को धारणीओ धणियस्स दिंतओ दुक्खिओ होज्ज ॥१४२०॥

अर्थ: पूर्व जन्ममें मैंने जिसका अपराध किया था उसके द्वारा इस जन्ममें उस अपराधसे उपार्जित पापकर्मकी उदीरणा किये जाने पर उसको भोगते हुए मुझे दुःख कैसा ? साहूकार से पहले कर्ज लेकर जिस धनको मैंने स्वयं भोगा है, उतना ही धन उस ऋणका अवधिकाल आने पर देते हुए कौन कर्जदार दुःखी होता है ॥१४२०॥


इह य परत्त य लोए दोसे बहुए य आवहदि कोधो ।
इदि अप्पणो गणित्ता परिहरिदव्वो हवइ कोधो ॥१४२१॥

अर्थ: क्रोध इस लोक और परलोकमें बहुत दोषकारक है ऐसा जानकर क्रोधका त्याग करना चाहिए ॥१४२१॥


को इत्थ मज्झ माणो बहुसो णीचत्तणं पि पत्तस्स ।
उच्चत्ते य अणिच्चे उवट्ठिदे चावि णीचत्ते ॥१४२२॥

अर्थ: ज्ञान, कुल, रूप, तप, धन, प्रभुत्व आदिमें मैं ऊँचा भी होऊँ, तो उसका गर्व कैसा, क्योंकि अनेक बार मैं इनमें नीचा भी हो चुका हूँ। उच्चता और नीचता ये दोनों अनित्य हैं ॥१४२२॥


अधिगेसु बहुसु संतेसु ममादो एत्थ को मह माणो ।
को विब्भओ वि बहुसो पत्ते पुव्वम्मि उच्चत्ते ॥१४२३॥

अर्थ: इस लोकमें बहुतसे मुझसे भी ज्ञानादिमें अधिक हैं इनका मुझे अभिमान कैसा ? तथा पूर्व जन्मोंमें मैं यह उच्चता अनेक बार प्राप्त कर चुका हूँ तब इनके प्राप्त होने पर आश्चर्य कैसा ? ॥१४२३॥


जो अवमाणणकरणं दोसं परिहरइ णिच्चमाउत्तो ।
सो णाम होदि माणी ण दु गुणचत्तेण माणेण ॥१४२४॥

अर्थ: जो सदा मन लगाकर अपमान करने रूप दोषका त्याग करता है अर्थात् किसीका अपमान नहीं करता वह मानी होता है । गुण रहित मानसे मानी नहीं होता ॥१४२४॥


इह य परत्तय लोए दोसे बहुगे य आवहदि माणो ।
इदि अप्पणो गणित्ता माणस्स विणिग्गहं कुज्जा ॥१४२५॥

अर्थ: इस लोक और परलोकमें मान बहुत दोषकारी है । ऐसा जानकर अपने मानका निग्रह करना चाहिए ॥१४२५॥


अदिगूहिदा वि दोसा जणेण कालंतरेण णज्जंति ।
मायाए पउत्ताए को इत्थ गुणो हवदि लद्धो ॥१४२६॥

अर्थ: अत्यन्त छिपाकर भी की गई बुराई कालान्तरमें मनुष्योंको ज्ञात हो जाती है । तब मायाचार करनेसे क्या लाभ है । इस प्रकारके चिन्तनसे मायाको दूर करना चाहिए ॥१४२६॥


परिभागम्मि असंते णियडिसहस्सेहिं गूहमाणस्स ।
चंदग्गहोव्व दोसो खणेण सो पायडो होइ ॥१४२७॥

अर्थ: भाग्य प्रतिकूल हो तो हजार छलसे छिपाया हुआ भी काम चन्द्रमाके ग्रहणकी तरह क्षणमात्रमें प्रकट हो जाता है ॥१४२७॥


जणपायडो वि दोसो दोसोत्ति ण घेप्पए सभागस्स ।
जह समलंत्ति ण घिप्पदि समलं पि जए तलायजलं ॥१४२८॥

अर्थ: और भाग्यशालीका लोकमें प्रकट भी दोष दोष नहीं माना जाता । जैसे तालाबका जल मैला हो तब भी लोग उसे मैला नहीं मानते । आशय यह है कि पुण्यशालीको मायासे कोई लाभ नहीं है क्योंकि दोष प्रकट होनेपर भी वह जगत्में मान्य रहता है । मान्यताके विनाशके भयसे ही मनुष्य दोषको छिपाता है ॥१४२८॥


डंभसएहिं बहुगेहिं सुपउत्तेहिं अपडिभोगस्स ।
हत्थं ण एदि अत्थो अण्णादो सपडिभोगादो ॥१४२९॥

अर्थ: अच्छी तरह सैकड़ों छलकपट करनेपर भी पुण्यहीनके हाथमें पुण्यशालीका धन नहीं आता ॥१४२९॥


इह य परत्थ लोए दोसे बहुए य आवहइ माया ।
इदि अप्पणो गणित्ता परिहरिदव्वा हवइ माया ॥१४३०॥

अर्थ: माया इस लोक और परलोकमें बहुतसे दोष लाती है ऐसा जानकर मायाका त्याग करना चाहिए ॥१४३०॥


लोभे कए वि अत्थो ण होइ पुरिसस्स अपडिभोगस्स ।
अकएवि हवदि लोभे अत्थो पडिभोगवंतस्स ॥१४३१॥

अर्थ: लोभ करनेपर भी पुण्यहीन पुरुषके पास धन नहीं होता, और लोभ नहीं करनेपर भी पुण्यशालीके पास धन होता है । अतः धनका लोभ धनलाभमें निमित्त नहीं है किन्तु पुण्य निमित्त है ऐसा विचारकर लोभको त्यागना चाहिए ॥१४३१॥


सव्वे वि जए अत्था परिगहिदा ते अणंतखुत्तो मे ।
अत्थेसु इत्थ को मज्झ विंभओ गहिदविजडेसु ॥१४३२॥

अर्थ: जगत्में जितने पदार्थ हैं वे सब मैंने अनन्तबार प्राप्त किये । उन ग्रहण किये और त्यागे हुए पदार्थोंमें आश्चर्य कैसा ? ॥१४३२॥


इह य परत्तय लोए दोसे बहुए य आवहइ लोभो ।
इदि अप्पणो गणित्ता णिज्जेदव्वो हवदि लोभो ॥१४३३॥

अर्थ: लोभ इस भव और परभवमें बहुतसे दोष पैदा करता है ऐसा जानकर लोभको त्यागना चाहिए ॥१४३३॥


णिद्दं जिणाहि णिच्चं णिद्दा हु णरं अचेयणं कुणइ ।
वट्टिज्ज हु पासुत्तो खवओ सव्वेसु दोसेसु ॥१४३४॥

अर्थ: सदा निद्रापर विजय प्राप्त करो । नहीं जीतनेपर वह क्या बुराई करती है यह कहते हैं - निद्रा मनुष्यको अचेतन करती है । शंका - चेतन मनुष्यकी चैतन्यरहित अवस्था नहीं होती । तब कैसे कहते हैं कि निद्रा अचेतन करती है ? समाधान - यहाँ अचेतन शब्दसे विवेकज्ञानसे रहित होना ही कहा है । इसलिए जो गहरी नींदमें सोया है वह क्षपक योग्य अयोग्यके विवेकज्ञानसे रहित होनेसे हिंसा मैथुन परिग्रह आदि सब दोषोंमें प्रवृत्ति करता है ॥१४३४॥


जदि अधिबाधिज्ज तुमं णिद्दा तो तं करेहि सज्झायं ।
सुहुमत्थे वा चिंतेहि सुणसु संवेगणिव्वेगं ॥१४३५॥

अर्थ: यदि तुम्हें निद्रा सताती है तो स्वाध्याय करो । या सूक्ष्म अर्थोंका विचार करो । अथवा संवेग और निर्वेदको करनेवाली कथा सुनो ॥१४३५॥


पीदी भए य सोगे य तहा णिद्दा ण होइ मणुयाणं ।
एदाणि तुमं तिण्णिवि जागरणत्थं णिसेवेहिं ॥१४३६॥

अर्थ: प्रीति, भय अथवा शोक होनेपर मनुष्योंको निद्रा नहीं आती । अतः तुम निद्राको जीतनेके लिए प्रीति आदिका सेवन करो ॥१४३६॥


भयमागच्छसु संसारादो पीदिं च उत्तमट्ठम्मि ।
सोगं च पुरादुच्चरिदादो णिद्दाविजयहेदुं ॥१४३७॥

अर्थ: निद्राको जीतनेके लिये पाँच प्रकारके परावर्तन रूप संसारसे भय करो । रत्नत्रयकी आराधनामें प्रीति करो और पूर्वमें किये दुराचरणके लिये शोक करो । नरकादि गतियोंमें बार-बार आने जानेसे मैंने शारीरिक, आगन्तुक, मानसिक और स्वाभाविक अनेक प्रकारका दुःख भोगा । वही दुःख आगे भी भोगनेमें आवेंगे, ऐसा मनमें विचार करो । समस्त आपत्तियोंके समूहका विनाश करनेके लिये, स्वर्ग और मोक्षके सुखोंको प्राप्त करनेके लिये, असार शरीरका भार उतारनेके लिये, अनन्त ज्ञान अनन्त दर्शन रूप साम्राज्य लक्ष्मीको आकर्षित करनेके लिये, स्वर्ग और मोक्षके सुखोंको प्राप्त करनेके लिये और कर्मरूपी विष वृक्षको उखाड़नेमें समर्थ इस रत्नत्रय आराधनाको, जिसे पहले अनन्तभवोंमें कभी प्राप्त नहीं किया, करनेके लिये मैं तत्पर हूँ । इस प्रकार प्रीतिकी भावना करो । हिंसा झूठ चोरी अब्रह्म परिग्रह, मिथ्यात्व कषाय और अशुभ मनोयोग अशुभ वचन योग अशुभ काययोगमें, जो नाना प्रकारके कर्मोंके संचयके मूल हैं और चार प्रकारके बन्धमें निमित्त हैं, मैं अभागा निरन्तर लगा रहा, क्योंकि हित अहितके विचारमें मूढ बुद्धि होनेसे तथा सन्मार्गका उपदेश देने वालोंकी प्राप्ति न होनेसे अथवा प्रबल ज्ञानावरणका उदय होनेसे उनके द्वारा कहे गये अर्थ तत्त्वको न जान सकनेसे, या जान लेने पर भी श्रद्धा न करनेसे और चारित्र मोहके उदयसे सन्मार्गमें प्रवृत्ति न करनेसे मैं दुःखके समुद्रमें डूबा हूं । इस प्रकार चित्तके उद्विग्न होनेसे निद्रा चली जाती है ॥१४३७॥

गाथा १४३८ से १७४५

जागरणत्थं इच्चेवमादिकं कुण कमं सदा उत्तो ।
झाणेण विणा वंज्झो कालो हु तुमे ण कायव्वो ॥१४३८॥

अर्थ: निद्राको दूर करनेके लिये इस प्रकारके चिन्तनमें सदा लगे रहो। ध्यानके विना तुम्हें एक क्षण भी नहीं गँवाना चाहिए ॥१४३८॥


संसाराडविणित्थरणमिच्छदो अणपणीय दोसाहिं ।
सोदुं ण खमो अहिमणपणीय सोदुं व सघरम्मि ॥१४३९॥

अर्थ: जैसे घरमें यदि सर्प घुसा हो तो उसे निकाले विना सोना शक्य नहीं है। उसी प्रकार जो संसार रूपी महावनसे निकलना चाहता है वह दोषोंको दूर किये विना सोनेमें समर्थ नहीं होता ॥१४३९॥


को णाम १णिरुव्वेगो लोगे मरणादिअग्गिपज्जलिदे ।
पज्जलिदम्मि व णाणी घरम्मि सोदुं अभिलसिज्ज ॥१४४०॥

अर्थ: जलते हुए घरकी तरह लोकके जन्म, जरा, मरण, व्याधि, शोक, भय, प्रार्थितकी अप्राप्ति और इष्ट वियोग इत्यादि आगसे जलते रहने पर कौन ज्ञानी निर्भय होकर सोना चाहेगा ॥१४४०॥


को णाम णिरुव्वेगो सुविज्ज दोसेसु अणुवसंतेसु ।
गहिदाउहाण बहुयाण मज्झयारेव सत्तूणं ॥१४४१॥

अर्थ: जैसे शस्त्रधारी बहुतसे शत्रुओंके मध्यमें कोई निर्भय होकर नहीं सो सकता, उसी प्रकार संसारको बढ़ानेवाले रागादि दोषोंके उपशान्त हुए विना कौन निर्भय होकर सो सकता है ॥१४४१॥


णिद्दा तमस्स सरिसो अण्णो णत्थि हु तमो मणुस्साणं ।
इदि णच्चा जिणसु तुमं णिद्दा ज्झाणस्स विग्घयरी ॥१४४२॥

अर्थ: निद्रा रूपी अन्धकारके समान मनुष्योंका कोई दूसरा अन्धकार नहीं है । ऐसा जानकर हे क्षपक ! तुम ध्यानमें विघ्न करने वाली निद्राको जीतो ॥१४४२॥


कुण वा णिद्दामोक्खं णिद्दामोक्खस्स भणिदवेलाए ।
जह वा होइ समाही खवणकिलिंतस्स तह कुणह ॥१४४३॥

अर्थ: अथवा यदि निद्राको नहीं जीत सकते हो तो आगममें निद्रा त्यागनेका जो समय रात्रिका तीसरा पहर कहा है उस समय निद्रा त्यागो । अथवा उपवाससे थके हुए आपकी समाधि जिस प्रकार हो उस प्रकार करो ॥१४४३॥


एस उवावो कम्मासवदारणिरोहणो हवे सव्वो ।
पोराणयस्स कम्मस्स पुणो तवसा खओ होइ ॥१४४४॥

अर्थ: नवीन कर्मके आनेके द्वारको रोकनेका यह सब उपाय कहा है । पूर्व संचित कर्मोंका क्षय तपसे होता है । संवर पूर्वक निर्जरा मोक्षका कारण होती है, संवरके बिना निर्जरा मोक्षका कारण नहीं है । इसलिये पहले संवरका कथन किया है ॥१४४४॥


अब्भंतरबाहिरगे तवम्मि सत्तिं सगं अगूहंतो ।
उज्जमसु सुहे देहे अप्पडिबद्धो अणलसो तं ॥१४४५॥

अर्थ: हे क्षपक ! अपनी शक्तिको न छिपाकर अभ्यन्तर और बाह्य तपमें उद्योग करो । सुखमें और शरीरमें आसक्त मत होओ और न आलस्य करो । जो शरीर और सुखमें आदरभाव रखता है वह उनके विरोधी तपमें प्रयत्न नहीं करता । तथा आलसी भी तपमें प्रवृत्ति नहीं करता । इससे सुख और शरीरमें आसक्ति तथा आलस्यको तपके लिये विघ्नकारी कहा है ॥१४४५॥


सुहसीलदाए अलसत्तणेण देहपडिबद्धदाए य ।
जो सत्ती संतीए ण करिज्ज तवं स सत्तिसमं ॥१४४६॥

अर्थ: सुखमें आसक्त होनेसे, आलस्यसे और शरीरमें प्रतिबद्ध होनेसे जो शक्ति होते हुए भी शक्तिके अनुसार तप नहीं करता ॥१४४६॥


तस्स ण भावो सुद्धो तेण पउत्ता तदो हवदि माया ।
ण य होइ धम्मसद्दहा तिव्वा सुहदेहपिक्खाए ॥१४४७॥

अर्थ: उसका परिणाम शुद्ध नहीं है। अतः शक्तिके अनुसार तपमें प्रवृत्ति न करने वाला मायाचारी है। तथा सुख और शरीरमें आसक्ति होनेसे उसको धर्ममें तीव्र श्रद्धा नहीं है ॥१४४७॥


अप्पा य वंचिओ तेण होइ विरियं च गूहियं भवदि ।
सुहसीलदाए जीवो बंधदि हु असादवेदणियं ॥१४४८॥

अर्थ: जो शक्तिके अनुसार तपमें तत्पर नहीं है वह आत्माको ठगता है और अपनी शक्तिको छिपाता है। तथा सुखमें आसक्त होनेसे असातवेदनीयको बाँधता है जो अनेक भवोंमें दुःखदायी है ॥१४४८॥


विरियंतरायमलसत्तणेण बंधदि चरित्तमोहं च ।
देहपडिबद्धदाए साधू सपरिग्गहो होइ ॥१४४९॥

अर्थ: आलसी होनेसे वह वीर्यान्तराय और चारित्र मोहनीय कर्मका बन्ध करता है। तथा शरीरमें आसक्ति रखनेसे वह साधु परिग्रही होता है ॥१४४९॥


मायादोसा मायाए हुंति सव्वे वि पुव्वणिद्दिट्ठा ।
धम्मम्मि १णिप्पिवासस्स होइ सो दुल्लहो धम्मो ॥१४५०॥

अर्थ: तपमें अपनी शक्तिको छिपाने रूप मायाचारमें वे सब दोष होते हैं जो पूर्वमें मायाके दोष कहे हैं। जो धर्ममें अनादर भाव रखता है उसको दूसरे जन्ममें धर्मकी प्राप्ति दुर्लभ होती है ॥१४५०॥


पुव्वुत्ततवगुणाणं चुक्को जं तेण वंचिओ होइ ।
विरियणिगूही बंधदि मायं विरियंतरायं च ॥१४५१॥

अर्थ: पूर्वमें जो तपके द्वारा साध्य संवर निर्जरा इत्यादि उपकार कहे हैं उनसे च्युत होनेसे वह उनसे वंचित होता है। और अपनी शक्तिको छिपानेसे मायाकर्म और वीर्यान्तराय कर्मका बन्ध करता है ॥१४५१॥


तवमकरिंतस्सेदे दोसा अण्णे य होंति संतस्स ।
होंति य गुणा अणेया सत्तीए तवं कुणंतस्स ॥१४५२॥

अर्थ: जो तपमें तत्पर नहीं होता उसको ये दोष तथा अन्य दोष होते हैं और जो शक्तिके अनुसार तप करता है उसमें अनेक गुण होते हैं ॥१४५२॥


इह य परत्त य लोए अदिसयपूयाओ लहइ सुतवेण ।
आवज्जिज्जंति तहा देवा वि सइंदिया तवसा ॥१४५३॥

अर्थ: सम्यक्रूपसे तप करनेसे इस जन्ममें और परजन्ममें सातिशय पूजा प्राप्त होती है। तथा तपसे इन्द्रसहित सब देव भी विनय करते हैं ॥१४५३॥


अप्पो वि तवो बहुगं कल्लाणं फलइ सुप्पओगकदो ।
जह अप्पं वडबीअं फलइ बहुमणेयपारोहं ॥१४५४॥

अर्थ: सम्यक् संयमपूर्वक किया गया थोड़ा भी तप बहुत कल्याणकारी होता है । गाथामें सुप्रयोग शब्दसे ‘जिसके द्वारा सुष्ठुरूप प्रवर्तित होता है’ इस विग्रहके अनुसार संयम लिया गया है । जैसे छोटा-सा भी वटबीज अनेक शाखा प्रशाखासे पूर्ण वटवृक्षरूपसे फलता है उसी प्रकार थोड़ा भी तप बहुत फल देता है । यह इस गाथाके द्वारा कहा है ॥१४५४॥


सुट्ठु कदाण वि सस्सादीणं विग्घा हवंति अदिबहुगा ।
सुट्ठु कदस्स तवस्स पुण णत्थि कोइ वि जए विग्घो ॥१४५५॥

अर्थ: धान्य आदिकी खेती बहुत सावधानतासे परिश्रमपूर्वक करनेपर भी उसमें बहुत विघ्न आते हैं । किन्तु सम्यक्रूपसे किये गये तपके फल देनेमें कोई विघ्न नहीं आता । निर्विघ्न फल देना तपका माहात्म्य है यह इस गाथाके द्वारा कहा है ॥१४५५॥


जणणमरणादिरोगादुरस्स सुतवो वरोसधं होदि ।
रोगादुरस्स अदिविरियमोसधं सुप्पउत्तं वा ॥१४५६॥

अर्थ: जैसे रोगसे पीड़ित पुरुषके लिए यत्नपूर्वक दी गई अति शक्तिशाली औषध होती है । उसी प्रकार जन्ममरण आदि रोगसे पीड़ितको श्रेष्ठ औषध तप है । तप करनेसे जन्ममरणके कारण कर्मोंका विनाश होता है । इससे तपको जन्ममरण आदिका विनाशक कहा है ॥१४५६॥


संसारमहाडाहेण डज्झमाणस्स होइ सीयघरं ।
सुतवोदाहेण जहा सीयघरं डज्झमाणस्स ॥१४५७॥

अर्थ: संसाररूपी महादाहसे जलते हुए प्राणीके लिए तप जलघर है, जैसे सूर्यकी किरणोंसे जलते हुए मनुष्यके लिए धाराघर होता है । तप सांसारिक दुःखोंको निर्मूल करता है, यह इससे सूचित किया है ॥१४५७॥


णीयल्लओ व सुतवेण होइ लोगस्स सुप्पिओ पुरिसो ।
मायाव होइ विस्ससणिज्जो सुतवेण लोगस्स ॥१४५८॥

अर्थ: सम्यक् तप करनेसे पुरुष बन्धुकी तरह लोगोंको प्रिय होता है। इससे यह कहा है कि सम्यक् तपसे मनुष्य सब जगत्का प्रिय होता है। तथा सम्यक् तपसे मनुष्य माताकी तरह लोकका विश्वासभाजन होता है। इससे तपसे सर्वजगत्का विश्वासपात्र होना कहा है ॥१४५८॥


कल्लाणिड्ढिसुहाइं जावदियाइं हवे सुरणराणं ।
जं परमणिव्वुदिसुहं व ताणि सुतवेण लब्भंति ॥१४५९॥

अर्थ: स्वर्गसे अवतरित होना आदि पाँच कल्याणक, चक्रवर्ती और अर्धचक्रियोंकी विभूतियाँ तथा देवों और मनुष्योंके जितने सुख हैं, तथा जो मोक्षका परम सुख है वह सब सम्यक् तपसे प्राप्त होते हैं ॥१४५९॥


कामदुहा वरधेणू णरस्स चिंतामणिव्व होइ तओ ।
तिलओव्व णरस्स तओ माणस्स विहूसणं सुतओ ॥१४६०॥

अर्थ: जो चाहो वह तपसे मिलता है इसलिए सम्यक् तप मनुष्यके लिए कामधेनु और चिन्तामणि रत्नके समान है। तथा मनुष्यके मस्तकपर शोभित होनेवाले तिलक नामक अलंकारके समान है और मानका विशिष्ट भूषण है अर्थात् तपसे सर्वजगत्के द्वारा मान्य पुरुषका मान शोभित होता है ॥१४६०॥


होइ सुतवो य दीओ अण्णाणतमंधयारचारिस्स ।
सव्वावत्थासु तओ वट्टदि य पिदा व पुरिसस्स ॥१४६१॥

अर्थ: अज्ञानरूपी घोर अन्धकारमें विचरण करनेवालेके लिए सम्यक् तप दीपकके समान है। इससे सूचित किया है कि तप जगत्के अज्ञानरूपी अन्धकारको नष्ट करता है। तथा सम्यक् तप सब अवस्थाओंमें पिताकी तरह पुरुषको हितमें लगाता है ॥१४६१॥


विसयमहापंकाउलगड्डाए संकमो तवो होइ ।
होइ य णावा तरिदुं तवो कसायातिचवलणदिं ॥१४६२॥

अर्थ: यह विषय महान् कीचड़से भरे गर्तके समान हैं क्योंकि उससे निकलना बहुत कठिन है । तप उससे निकलनेमें कारण है । तथा तप कषायरूप अति चपल नदीको पार करनेके लिए नौका है ॥१४६२॥


फलिहो व दुग्गदीणं अणेयदुक्खावहाण होइ तवो ।
आमिसतण्हाछेदणसमत्थमुदकं व होइ तवो ॥१४६३॥

अर्थ: अनेक दुःखदायी दुर्गतियोंके लिए तप अर्गलाके समान है । तथा विषयोंकी तृष्णाको नष्ट करनेके लिए जलके समान है । जैसे जलसे प्यास बुझ जाती है वैसे ही तपसे विषयोंकी प्यास बुझ जाती है ॥१४६३॥


मणदेहदुक्खवित्तासिदाण सरणं गदी य होइ तवो ।
होइ य तवो सुतित्थं सव्वासुहदोसमलहरणं ॥१४६४॥

अर्थ: जो मानसिक और शारीरिक दुःखोंसे पीड़ित हैं उनके लिए तप शरण और गति है । तप सर्व अशुभ दोषरूप मलको दूर करनेवाला तीर्थ है ॥१४६४॥


संसारविसमदुग्गे तवो पणट्ठस्स देसओ होदि ।
होइ तवो पच्छयणं भवकंतारम्मि दिग्घम्मि ॥१४६५॥

अर्थ: यह संसार विषम दुर्गके समान है क्योंकि उससे निकलना कठिन है । उस संसाररूपी दुर्गमें जो दिशा भूल गये हैं उनके लिए तप उपदेशक है अर्थात् संसाररूपी विषम दुर्गसे निकलनेका मार्ग बतलाकर उससे निकालता है । तथा सुदीर्घ भवरूपी भयानक वनमें कलेवाके समान सहायक है ॥१४६५॥


रक्खा भएसु सुतवो अब्भुदयाणं च आगरो सुतवो ।
णिस्सेणी होइ तवो अक्खयसोक्खस्स मोक्खस्स ॥१४६६॥

अर्थ: सम्यक् तप भयमें रक्षा करता है, अभ्युदयोंकी खान है और अविनाशी सुखस्वरूप मोक्षमें जानेके लिए नसैनी है ॥१४६६॥


तं णत्थि जं ण लब्भइ तवसा सम्मं कएण पुरिसस्स ।
अग्गीव तणं जलिओ कम्मतणं डहदि य तवग्गी ॥१४६७॥

अर्थ: संसारमें ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो सम्यक्रूपसे किये गये तपके द्वारा न प्राप्त होता हो। जैसे प्रज्वलित आग तृणको जलाती है वैसे ही तपरूपी आग कर्मरूपी तृणोंको जलाती है ॥१४६७॥


सम्मं कदस्स अपरिस्सवस्स ण फलं तवस्स वण्णेदुं ।
कोई अत्थि समत्थो जस्स वि जिब्भासयसहस्सं ॥१४६८॥

अर्थ: सम्यक्रूपसे किये गये और कर्मास्रवसे रहित तपके फलका वर्णन करनेमें जिसके एक हजार जिह्वा हों वह भी समर्थ नहीं है ॥१४६८॥


एवं णादूण तवं महागुणं संजमम्मि ठिच्चाणं ।
तवसा भावेदव्वा अप्पा णिच्चं पि जुत्तेण ॥१४६९॥

अर्थ: इस प्रकार तपको महान् उपकारी जानकर संयममें स्थित संयमीजनोंको नित्य ही उपयोग लगाकर आत्मामें तपकी भावना करनी चाहिए ॥१४६९॥


जह गहिदवेयणो वि य अदयाकज्जे णिउज्जदे भिच्चो ।
तह चेव दमेयव्वो देहो मुणिणा तवगुणेसु ॥१४७०॥

अर्थ: जैसे वेतन लेनेवाले सेवकको कार्यमें नियुक्त करते समय उसपर दया नहीं की जाती। उसी प्रकार मुनिको अपने शरीरको तपरूप गुणमें लगाना चाहिए। अर्थात् जब शरीर को भोजनरूपी वेतन दिया जाता है उसपर दया न करके उसको तपकी साधनामें लगाना चाहिए ॥१४७०॥


इच्चेव समणधम्मो कहिदो मे दसविहो सगुणदोसो ।
एत्थ तुममप्पमत्तो होहि समण्णागदमदीओ ॥१४७१॥

अर्थ: इस प्रकार हे क्षपक ! मैंने गुणदोषोंके विवेचनपूर्वक दस प्रकारके श्रमण धर्मका कथन किया । उसको स्मरण करके तुम दस प्रकारके धर्ममें अप्रमादी होओ । इस प्रकार निर्यापकाचार्यने अपनी शिक्षाकी समाप्ति सूचित की है ॥१४७१॥


तो खवगवयणकमलं गणिरविणो तेहिं वयणरस्सीहिं ।
चित्तप्पसायविमलं पफुल्लिदं पीदिमयरंदं ॥१४७२॥

अर्थ: इस शिक्षाके अनन्तर उस क्षपकका मुखरूपी कमल आचार्यरूपी सूर्यके वचनरूपी किरणोंसे प्रफुल्लित हो जाता है, चित्तके प्रसन्न होनेसे उस मुख कमलकी विरूपता चली जाती है और उसमेंसे प्रीतिरूपी पुष्परस झरने लगता है ॥१४७२॥


वयणकमलेहिं गणिअभिमुहेहिं सा विंभियच्छिवत्तेहिं ।
सोभइ इह सूरोदयम्मि फुल्लं व णलिणिवणं ॥१४७३॥

अर्थ: जैसे सूर्यके उदय होनेपर खिला हुआ कमलोंका वन शोभित होता है उसी प्रकार आचार्यके अभिमुख हुए यतियोंके मुख कमलोंसे, जो आश्चर्ययुक्त नेत्ररूपी पत्रोंसे संयुक्त होते हैं, वह मुनिसभा शोभित होती है ॥१४७३॥


गणिउवएसामयपाणएण पल्हादिदम्मि चित्तम्मि ।
जाओ य णिव्वुदो सो पादूणय पाणयं तिसिओ ॥१४७४॥

अर्थ: आचार्यके उपदेशरूपी अमृतका पान करके चित्तके आह्लादयुक्त होनेपर क्षपक वैसा ही सुखी होता है जैसा प्यासा अमृतमय पानक पीकर होता है ॥१४७४॥


तो सो खवओ तं अणुसट्ठिं सोऊण जादसंवेगो ॥
उट्ठित्ता आयरियं वंदइ विणएण पणदंगो ॥१४७५॥

अर्थ: उसके पश्चात् वह क्षपक आचार्यका उपदेश सुनकर वैराग्यसे भर जाता है और उठकर अंगोंको नम्र करके विनयपूर्वक आचार्यको वन्दना करता है ॥१४७५॥


भंते सम्मं णाणं सिरसा य पडिच्छिदं मए एदं ।
जं जह उत्तं तं तह करेमि विणओ तदो भणइ ॥१४७६॥

अर्थ: और कहता है - भगवन् ! मैंने आपके द्वारा दिया सम्यग्ज्ञान सिर नवाकर स्वीकार किया । आपने जो-जो जिस प्रकार कहा है मैं वैसा ही करूँगा ॥१४७६॥


अप्पा णिच्छरदि जहा परमा तुट्ठी य हवदि जह तुज्झ ।
जह तुज्झ य संघस्स य सफलो य परिस्समो होइ ॥१४७७॥

अर्थ: जिस प्रकारसे मैं संसारसे पार उतरूँ, जिस प्रकारसे आपको परम सन्तोष हो, मेरे कल्याणमें संलग्न आपका और संघका परिश्रम जिस प्रकारसे सफल हो ॥१४७७॥


जह अप्पणो गणस्य य संघस्स य वित्थुदा हवदि कित्ती ।
संघस्स पसायेण य तहहं आराहइस्सामि ॥१४७८॥

अर्थ: जिस प्रकार मेरी और संघकी कीर्ति फैले, मैं संघकी कृपासे उस प्रकार रत्नत्रयकी आराधना करूँगा ॥१४७८॥


वीरपुरिसेहिं जं आयरियं जं च ण तरंति कापुरिसा ।
मणसा वि विचिंतेदुं तमहं आराहणं काहं ॥१४७९॥

अर्थ: वीर पुरुषोंने जिसका आचरण किया है, कायर पुरुष जिसकी मनमें कल्पना भी नहीं कर सकते, मैं ऐसी आराधना करूँगा ॥१४७९॥


एवं तुज्झं उवएसामिदमासाइदत्तु को णाम ।
बीहेज्ज छुहादीणं मरणस्स वि कायरो वि णरो ॥१४८०॥

अर्थ: आपके इस प्रकारके उपदेशामृतको पीकर कौन कायर भी मनुष्य भूख प्यास और मृत्युसे डरेगा ॥१४८०॥


किं जंपिएण बहुणा देवा वि सइंदिया महं विग्घं ।
तुम्हं पादोवग्गहगुणेण कादुं ण अरिहंति ॥१४८१॥

अर्थ: अधिक मैं क्या कहूँ, आपके चरणोंके अनुग्रहसे इन्द्रादि प्रमुख देव भी मेरी आराधनामें विघ्न नहीं कर सकते ॥१४८१॥


किं पुण छुहा व तण्हा परिस्समो वादियादि रोगो वा ।
काहिंति ज्झाणविग्घं इंदियविसया कसाया वा ॥१४८२॥

अर्थ: तब भूख, प्यास, परिश्रम, वातादि जन्य रोग, अथवा इन्द्रियोंके विषय और कषाय ध्यानमें विघ्न कैसे कर सकते हैं ॥१४८२॥


ठाणा [?]लेज्ज मेरू भूमी ओमत्थिया भविस्सिहिदि ।
ण य हं गच्छमि विगदिं तुज्झं पायप्पसाएण ॥१४८३॥

अर्थ: सुमेरु अपने स्थानसे विचलित हो जाये और पृथ्वी उलट जाये किन्तु आपके अनुग्रहसे मैं विकारसे विचलित नहीं होऊँगा ॥१४८३॥


एवं खवओ संथारगओ खवइ विरियं अगूहंतो ।
देदि गणी वि सदा से तह अणुसट्ठिं अपरिदंतो ॥१४८४॥

अर्थ: इस प्रकार क्षपक संस्तर पर आरूढ़ होकर अपनी शक्तिको न छिपाकर पूर्वोपार्जित अशुभ कर्म की निर्जरा करता है और आचार्य भी बिना विरक्त हुए उसे सदा सत् शिक्षा देता है ॥१४८४॥


अकडुगमतिक्खमणंबिलंच अकसायमलवणममधुरं ।
अविरसमदुरभिगंधं अच्छमणुण्हं अणदिसीदं ॥१४८५॥

अर्थ: क्षपकको दिया जानेवाला पानक कटुक, चरपरा, खट्टा, कसैला, नमकवाला, मीठा, स्वादयुक्त और दुर्गन्ध युक्त नहीं होना चाहिये अर्थात् वह न कटुक हो, न चरपरा हो, न खट्टा हो, न कसैला हो, न नमकसे युक्त हो, न मीठा हो, तथा स्वादहीन और दुर्गन्धयुक्त भी न हो। स्वच्छ हो, न गर्म हो और न ठंडा हो ॥१४८५॥


पाणगमसिंभलं परिपूदं खीणस्स तस्स दादव्वं ।
जह वा पच्छं खवयस्स तस्स तह होइ दायव्वं ॥१४८६॥

अर्थ: कफ पैदा करने वाला न हो। कपड़े से छान लिया गया हो। इस प्रकार कमजोर क्षपकको ऐसा पेय देना चाहिये जो उसके लिये पथ्य हो, अर्थात् समाधिमें विघ्न डालने वाला न हो ॥१४८६॥


संथारत्थो खवओ जइया खीणो हवेज्ज तो तइया ।
वोसरिदव्वो पुव्वविधिणेव सोपाणगाहारो ॥१४८७॥

अर्थ: जब संस्तरारूढ़ क्षपक अतिक्षीण हो जाये तब पूर्वविधिसे पानकका त्याग करा देना चाहिये ॥१४८७॥


एवं संथारगदस्स तस्स कम्मोदएण खवयस्स ।
अंगे कत्थइ उट्ठिज्ज वेयणा ज्झाणविग्घयरी ॥१४८८॥

अर्थ: इस प्रकार संस्तरारूढ़ क्षपकके कर्मके उदयसे किसी अंगमें ध्यानमें विघ्न डालने वाली वेदना यदि उत्पन्न हो जाये ॥१४८८॥


बहुगुणसहस्सभरिया जदि णावा जम्मसायरे भीमे ।
भिज्जदि हु रयणभरियाणावा व समुद्दमज्झम्मि ॥१४८९॥

अर्थ: समुद्रके मध्यमें रत्नोंसे भरी नावकी तरह हजारों गुणोंसे भरी यतिरूपी नौका यदि भयंकर संसारसागरमें डूबने लगे ॥१४८९॥


गुणभरिदं जदिणावं दट्ठूण भवोदधिम्मि भिज्जंतं ।
कुणमाणो हु उवेक्खं को अण्णो हुज्ज णिद्धम्मो ॥१४९०॥

अर्थ: गुणोंसे भरी नावको संसार-समुद्रमें डूबते हुए देखकर यदि कोई उपेक्षा करता है तो उससे बड़ा अधार्मिक दूसरा कौन होगा ॥१४९०॥


विज्जावच्चस्स गुणा जे पुव्वं वित्थरेण अक्खादा ।
तेसिं फिडिओ सो होइ जो उविक्खिज्ज तं खवयं ॥१४९१॥

अर्थ: जो क्षपककी उपेक्षा करता है वह पूर्वमें जो वैयावृत्यके गुण विस्तारसे कहे हैं उनसे च्युत होता है ॥१४९१॥


तो तस्स तिगिंछाजाणएण खवयस्स सव्वसत्तीए ।
विज्जादेसेण व से पडिकम्मं होइ कायव्वं ॥१४९२॥

अर्थ: अतः उस क्षपकके रोगकी चिकित्सा जाननेवाले निर्यापकाचार्यको स्वयं अथवा वैद्यके परामर्शसे सर्वशक्तिके साथ इलाज करना चाहिये ॥१४९२॥


णाऊण विकारं वेदणाए तिस्से करेज्ज पडियारं ।
फासुगदव्वेहिं करेज्ज वायकफपित्तपडिघादं ॥१४९३॥

अर्थ: उस क्षपककी वेदनाके विकारको जानकर प्रासुक द्रव्योंसे वात, पित्त और कफको रोकनेवाला प्रतिकार करना चाहिये ॥१४९३॥


वच्छीहिं अवद्दवणतावणेहिं आलेवसीदकिरियाहिं ।
अब्भंगणपरिमद्दण आदीहिं तिगिंछदे खवयं ॥१४९४॥

अर्थ: वस्तिकर्म ( एनिमा ) गर्म लोहेसे दागना, पसीना लाना, लेप लगाना, प्रासुक जलका सेवन कराना, मालिश, अंगमर्दन आदिके द्वारा क्षपककी वेदना दूर करना चाहिये ।१४९४।


एवं पि कीरमाणो परियम्मे वेदणा उवसमो सो ।
खवयस्स पावकम्मोदएण तिव्वेण हु ण होज्ज ॥१४९५॥

अर्थ: इस प्रकार प्रतीकार करने पर भी तीव्र पाप कर्मके उदयसे यदि क्षपककी वेदना शान्त न हो। क्योंकि केवल ‘बाह्य’ द्रव्यके प्रभावसे ही कर्म अपना फल न दें, ऐसी बात नहीं है। वही बाह्य द्रव्य एककी वेदना शान्त करता है दूसरेकी नहीं करता। यह तो अनुभवसिद्ध है ॥१४९५॥


अहवा तण्हादिपरीसहेहिं खवओ हविज्ज अभिभूदो ।
उवसग्गेहिं व खवओ अचेदणो होज्ज अभिभूदो ॥१४९६॥

अर्थ: अथवा क्षपक प्यास आदिकी वेदनासे अभिभूत हो जाय या उपसर्गोंसे पीड़ित होकर मूर्छित हो जाये ॥१४९६॥


तो वेदणावसट्टो वाउलिदो वा परीसहादीहिं ।
खवओ अणप्पवसिओ सो विप्पलवेज्ज जं किं पि ॥१४९७॥

अर्थ: या वेदनासे पीड़ित और परीषह उपसर्गोंसे व्याकुल होकर क्षपक अपने वशमें न रहे और जो कुछ भी बकने लगे ॥१४९७॥


उब्भासेज्ज व गुणसेढीदो उदरणबुद्धिओ खवओ ।
छड्डं दोच्चं पढमं व सिया कुंटिलिदपदमिच्छंतो ॥१४९८॥

अर्थ: अयोग्य वचन कहे, या संयमगुणकी सीढ़ीसे नीचे उतरना चाहे, या निचले स्थानको चाहते हुए रात्रि भोजन या रात्रिमें पानक लेना चाहे या दिनमें असमयमें भोजन करना चाहे ॥१४९८॥


तह मुज्झंतो खवगो सारेदव्वो य सो तओ गणिणा ।
जह सो विसुद्धलेस्सो पच्चागदचेदणो होज्ज ॥१४९९॥

अर्थ: इस प्रकार जब क्षपक मोहमें पड़ जाये तो आचार्यको उसे सब पिछली बातोंका स्मरण कराना चाहिये। जिससे उसके परिणाम विशुद्ध हों और उसका यथार्थ ज्ञान लौट आवे ॥१४९९॥


कोसि तुमं किं णामो कत्थ वससि को व संपही कालो ।
किं कुणसि तुमं कह वा अत्थसि किं णामगो वाहं ॥१५००॥

अर्थ: तुम कौन हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? कहाँ रहते हो ? इस समय दिन है या रात है ? तुम क्या करते हो ? कहाँ बैठे हो ? मेरा क्या नाम है ॥१५००॥


एवं आउच्छित्ता परिक्खहेदुं गणी तयं खवयं ।
सारइ वच्छलयाए तस्स य कवयं करिस्संति ॥१५०१॥

अर्थ: इस प्रकार आचार्य उसकी परीक्षाके लिये कि यह सचेत अवस्थामें है या अचेत अवस्थामें है, वात्सल्य भावसे बार-बार उसे स्मरण कराते हैं। उनकी यह भावना रहती है कि यदि यह सचेत है तो उसके संयमकी रक्षा की जाये ॥१५०१॥


जो पुण एवं ण करिज्ज सारणं तस्स 'वियलचक्खुस्स ।
सो तेण होइ णिद्धंधसेण खवओ परिच्चत्तो ॥१५०२॥

अर्थ: यदि आचार्य उस चलायमान चित्तवाले क्षपकको इस प्रकारसे स्मरण नहीं करावे तो समझना चाहिये उस निर्दयीने उस क्षपकको त्याग दिया है ॥१५०२॥


एवं सारिज्जंतो कोई कम्मुवसमेण लभदि सदिं ।
तह य ण लभिज्ज सदिं कोई कम्मे उदिण्णम्मि ॥१५०३॥

अर्थ: इस प्रकार स्मरण दिलाने पर कोई-कोई क्षपक चारित्र मोह अथवा असातावेदनीय का उपशम होनेसे योग्य अयोग्यके विचारविषयक स्मृतिको प्राप्त होते हैं कि अकालमें खाने पीनेकी इच्छा करना मेरे लिये योग्य नहीं है । जो मैं त्याग कर चुका उसे कालमें भी कैसे ग्रहण करूँ ? आदि । किन्तु कोई नोइन्द्रिय मतिज्ञानावरण कर्मकी उदीरणा होनेपर स्मृति प्राप्त नहीं करते ॥१५०३॥


सदिमलभंतस्स वि कादव्वं पडिकम्ममट्ठियं गणिणा ।
उवदेसो वि सया से अणुलोमो होदि कायव्वो ॥१५०४॥

अर्थ: स्मृतिको जो प्राप्त नहीं होता, उसके प्रति भी आचार्यको निरन्तर प्रतिकार करते रहना चाहिये । तथा उसके अनुकूल उपदेश भी करते रहना चाहिये ॥१५०४॥


चेयंतो पि य कम्मोदयेण कोई परीसहपरद्धो ।
उब्भासेज्ज व उक्कावेज्ज व भिंदेज्ज आउरो पदिण्णं ॥१५०५॥

अर्थ: कोई क्षपक चेतनाको प्राप्त करके भी कर्मके उदयसे परीषहोंसे हारकर यदि अयोग्य वचन बोले, या रुदन करे या अपनी व्रत प्रतिज्ञाको भंग करे तो भी उसके प्रति कटुक वचन बोलना उचित नहीं है, न उसका तिरस्कार करना चाहिये, न उसका हास्य करना चाहिये, न उसे त्रास देना चाहिये और न उसका अनादर करना चाहिये ॥१५०५-१५०६॥


ण हु सो कडुवं फरुसं व भणिदव्वो ण खीसिदव्वो य ।
ण य वित्तासेदव्वो ण य वट्टदि हीलणं कादुं ॥१५०६॥


फरुसवयणादिगेहिं दु माणी विप्फुरिओ तओ संतो ।
उद्दाणमवक्कमणं कुज्जा असमाधिकरणं वा ॥१५०७॥

अर्थ: कठोर वचन आदिसे भड़ककर वह अभिमानी क्षपक संयमसे च्युत हो सकता है या दुर्ध्यानमें लग सकता है अथवा सम्यक्त्वको त्याग सकता है ॥१५०७॥


तस्स पदिण्णामेरं भित्तुं इच्छंतयस्स णिज्जवओ ।
सव्वायरेण कवयं परीसहाणिवारणं कुज्जा ॥१५०८॥

अर्थ: यदि वह अपनी प्रतिज्ञारूपी मर्यादाको तोड़ना चाहे तो निर्यापकाचार्य उसकी रक्षाके लिये ऐसा कवच आदरपूर्वक करे जो परीषहोंका निवारण कर सके ॥१५०८॥


णिद्धं मधुरं पल्हादणिज्ज हिदयंगमं अतुरिदं वा ।
तो सीहावेदव्वो सो खवओ पण्णवंतेण ॥१५०९॥

अर्थ: आचार्यको स्नेहसहित, कानोंको प्रिय, हृदयमें सुख देनेवाले तथा हृदयमें प्रवेश करने वाले वचनोंसे क्षपकको धीरे-धीरे सम्बोधना चाहिये ॥१५०९॥


रोगादंके सुविहिद विउलं वा वेदणं धिदिबलेण ।
तमदीणमसंमूढो जिण पच्चूहे चरित्तस्स ॥१५१०॥

अर्थ: हे सुन्दर आचार वाले ! तुम दीनता और मूढ़ताको त्यागकर चारित्रमें बाधा डालनेवाली छोटी या बड़ी व्याधियोंको, महती वेदनाको धैर्यरूपी बलसे जीतो । राग और कोपका त्याग ही चरित्र है । व्याधिको दूर करनेके उपायोंमें आदर करनेवाले तथा व्याधि और वेदनासे द्वेष करनेवालेका चारित्र नष्ट होता है । अतः तुम्हें चारित्रके विघ्नोंको जीतना चाहिये ॥१५१०॥


सव्वे वि य उवसग्गे परिसहे य तिविहेण णिज्जिणहि तुमं ।
णिज्जिणिय सम्ममेदे होहिसु आराहओ मरणे ॥१५११॥

अर्थ: हे क्षपक ! तुम सब उपसर्गों और परीषहोंको मन वचन कायसे जीतो । उपसर्ग और परीषहोंके जीतनेमें जो दुःख होता है उससे न डरना मनसे जीतना है । यह डरपोक है अतः दया करके उपसर्ग परीषह उसे दुःख नहीं देंगे ऐसी बात नहीं है । द्रव्यादि सहकारी कारणोंके रहने पर असातावेदनीय कर्म उदयमें आता है और उसकी शक्तिको रोकना शक्य नहीं होता तब वह कष्ट देता ही है । धैर्यरूपी बलपूर्वक ऐसी भावना होना मनसे जीतना है । मैं थक गया हूँ, मेरी इस अतिकष्टकर और दुःसह वेदना रूप अवस्थाको देखो, मैं दुःखमें जल रहा हूं, कष्ट ने मुझे मार डाला इत्यादि दीन वचनोंका उच्चारण न करना । मैंने पूर्वमें अनेक बार भूख आदि परीषहों और उपसर्गोंको सहा है । चिल्लाने पर भी ये छोड़ते नहीं हैं । केवल यह बेचारा धैर्य खोकर रोता है ऐसी निन्दा करते हैं । ये मुझे सन्मार्गसे डिगानेमें समर्थ नहीं हैं । इस प्रकारके उदार वचन बोलना वचनसे जीतना है । आंखोंमें और मुखपर दीनताका भाव न होना, मुखपर प्रसन्नताका रहना, विचलित न होना कायसे जीतना है । इस प्रकार इन परीषहों और उपसर्गोंको सम्यक् रूपसे जीतनेपर मरते समय तुम रत्नत्रयरूपसे परिणत हो सकोगे । जिसका चित्त उपसर्ग और परीषहसे व्याकुल रहता है वह आराधक नहीं हो सकता ॥१५११॥


संभर सुविहिय जं ते मज्झम्मि चदुव्विधस्स संघस्स ।
वूढा महापदिण्णा अहयं आराहइस्सामि ॥१५१२॥

अर्थ: हे सुचारित्रसे सम्पन्न क्षपक ! तुमने चतुर्विध संघके मध्यमें जो महती प्रतिज्ञा की थी कि मैं आराधना करूँगा उसे स्मरण करो ॥१५१२॥


को णाम भडो कुलजो माणी थोलाइदूण जणमज्झे ।
जुज्झे पलाइ आवडिदमेत्तओ चेव अरिभीदो ॥१५१३॥

अर्थ: कौन कुलीन स्वाभिमानी शूरवीर मनुष्योंके बीचमें अपनी भुजाओंको ठोककर ‘मैं युद्धमें इस प्रकार शत्रुओंको हराऊंगा’ ऐसी घोषणा करके सामने आये शत्रुसे ही डरकर भागना पसन्द करेगा ॥१५१३॥


थोलाइदूण पुव्वं माणी संतो परीसहादीहिं ।
आवडिदमित्तओ चेव को विसण्णो हवे साहू ॥१५१४॥

अर्थ: उसी प्रकार पूर्वमें भुजाओंको ठोककर कौन स्वाभिमानी साधु परीषह आदिके सन्मुख आते ही खेदखिन्न होगा ॥१५१४॥


आवडिया पडिकूला पुरओ चेव कमंति रणभूमिं ।
अवि य मरिज्ज रणे ते ण य पसरमरीण वड्ढंति ॥१५१५॥

अर्थ: जिन सुभटोंके शत्रु उनके सन्मुख आते हैं वे सुभट शत्रुओंके आनेसे पूर्व ही युद्ध भूमिमें पहुँच जाते हैं। वे युद्धमें मर जायें भले ही किन्तु शत्रुओंका उत्साह नहीं बढ़ने देते ॥१५१५॥


तह आवइपडिकूलदाए साहवो माणिणो सूरा ।
अइतिव्ववेयणाओ सहंति ण य विगडिमुवयंति ॥१५१६॥

अर्थ: उसी प्रकार स्वाभिमानी शूरवीर साधु आपत्तियोंकी प्रतिकूलतामें अति तीव्र कष्ट भोगते हैं किन्तु विकारको प्राप्त नहीं होते । अर्थात् दुर्भाग्यवश उपसर्ग परीषहोंके उपस्थित होनेपर रत्नत्रयकी विराधना नहीं करते ॥१५१६॥


थोलाइयस्स कुलजस्स माणिणो रणमुहे वरं मरणं ।
ण य लज्जणयं काउं जावज्जीवं सुजणमज्झे ॥१५१७॥

अर्थ: भुजा स्फालन करनेवाले कुलीन अभिमानीके लिये युद्धमें सन्मुख मरना श्रेष्ठ है किन्तु सुजनोंके मध्यमें जीवनपर्यन्त लज्जा उठाना श्रेष्ठ नहीं है ॥१५१७॥


समणस्स माणिणो संजदस्स णिधणगमणं पि होइ वरं ।
ण य लज्जणयं कादुं कायरदादीणकिविणत्तं ॥१५१८॥

अर्थ: उसी प्रकार स्वाभिमानी संयमी श्रमणका मर जाना श्रेष्ठ है किन्तु लज्जाजनक कार्य करना श्रेष्ठ नहीं है, कातरता - विपत्तियोंसे घबराना, दीनता कृपणता - कि मैं कुछ भी नहीं कर सकता आदि श्रेष्ठ नहीं है ॥१५१८॥


एयस्स अप्पणो को जीविदहेदुं करिज्ज जंपणयं ।
पुत्तपउत्तादीणं रणे पलादो सुजणलंछं ॥१५१९॥

अर्थ: एक अपने जीवनके लिये युद्धभूमिसे भागकर कौन अपने पुत्र पौत्र आदिके लिये अपवादका कारण बनेगा और अपने परिवारको लांछन लगायेगा ॥१५१९॥


तह अप्पणो कुलस्स य संघस्स य मा हु जीवदत्थी तं ।
कुणसु जणे जंपणयं किविणं कुव्वं सुगणलंछं ॥१५२०॥

अर्थ: उसी प्रकार हे क्षपक ! अपने जीवनके लिये परीषह आदि आनेपर अपनी निर्बलताका परिचय देते हुए अपने कुल और संघको लोकापवादका पात्र मत बनाओ और अपने गणपर लांछन मत लगाओ ॥१५२०॥


गाढप्पहारसंताविदा वि सूरा रणे अरिसमक्खं ।
ण मुहं भंजंति सयं मरंति भिउडीमुहा चेव ॥१५२१॥

अर्थ: युद्धमें शूरवीर पुरुष जोरदार प्रहारसे पीड़ित होनेपर भी शत्रुके सामनेसे अपना मुख नहीं मोड़ते और मुखपर भौं टेढ़ी किये हुए ही मरते हैं ॥१५२१॥


सुट्ठु वि आवइपत्ता ण कायरत्तं करिंति सप्पुरिसा ।
कत्तो पुण दीणत्तं किविणत्तं वा वि काहिंति ॥१५२२॥

अर्थ: उसी प्रकार सत्पुरुष अत्यन्त आपत्ति आनेपर भी कातर नहीं होते । तब वे दीनता या कायरता क्यों दिखायेंगे ? ॥१५२२॥


केई अग्गिमदिगदा समंतओ अग्गिणा वि उज्झंता ।
जलमज्झगदा व णरा अत्थंति अचेदणा चेव ॥१५२३॥

अर्थ: कितने ही सत्पुरुष आगमें प्रवेश करके सब ओरसे आगसे जलनेपर भी जलके मध्यमें प्रविष्ट हुए मनुष्यकी तरह अथवा अचेतनकी तरह रहते हैं ॥१५२३॥


तत्थ वि साहुक्कारं सगअंगुलिचालणेण कुव्वंति ।
केई करंति धीरा उक्किट्ठिं अग्गिमज्झम्मि ॥१५२४॥

अर्थ: तथा आगके मध्यमें भी रहते हुए अपने अंगुलि संचालनके द्वारा साधुकार करते हैं कि कितना अच्छा हुआ कि मेरे अशुभ कर्म क्षय हुए । कितने ही धीर वीर पुरुष आगके मध्यमें रहकर अपना आनन्द प्रकट करते हैं ॥१५२४॥


जदिदा तह अण्णाणी संसारपवड्ढणाए लेस्साए ।
तिव्वाए वेदणाए सुहसाउलया करिंति धिदिं ॥१५२५॥

अर्थ: यदि संसारको बढ़ानेवाली अशुभ लेश्यासे युक्त अज्ञानी पुरुष सांसारिक सुखकी लालसासे तीव्र वेदना होते हुए भी धैर्य धारण करते हैं ॥१५२५॥


किं पुण जदिणा संसारसव्वदुक्खक्खयं करंतेण ।
बहुतिव्वदुक्खरसजाणएण ण धिदी हवदि कुज्जा ॥१५२६॥

अर्थ: तो जो क्षपक साधु संसारके सब दुःखोंका क्षय करना चाहता है और चारों गतियोंके तीव्र दुःखोंका स्वाद जानता है वह धैर्य धारण क्यों न करेगा ॥१५२६॥


असिवे दुब्भिक्खे वा कंतारे भए व आगाढे ।
रोगेहिं व अभिभूदा कुलजा माणं ण विजहंति ॥१५२७॥

अर्थ: भारी रोगमें, दुर्भिक्षमें, भयानक वनमें, अत्यन्त प्रगाढ़ भयमें तथा रोगोंसे ग्रस्त भी कुलीन पुरुष स्वाभिमानको नहीं छोड़ते ॥१५२७॥


ण पियंति सुरं ण य खंति गोमयं ण य पलंडुमादीयं ।
ण य कुव्वंति विकम्मं तहेव अण्णंपि लज्जणयं ॥१५२८॥

अर्थ: वे मदिरा पान नहीं करते । गोमांस नहीं खाते । लहसुन प्याज आदि नहीं खाते । दूसरेका जूठा खाना आदि बुरे काम नहीं करते । इसी प्रकार अन्य भी लज्जास्पद काम नहीं करते ॥१५२८॥


किं पुण कुलगणसंघस्स जसमाणिणो लोयपूजिदा साधू ।
माणं पि जहिय काहंति विकम्मं सुजणलज्जणयं ॥१५२९॥

अर्थ: तब कुल गण और संघके यश सम्पादनका अहंकार करनेवाले लोकपूजित साधु स्वाभिमान त्यागकर साधुजनके लिये लज्जाके योग्य बुरा कर्म करेंगे क्या ? कभी नहीं करेंगे ॥१५२९॥


जो गच्छिज्ज विसादं महल्लमप्पं व आवदिं पत्तो ।
तं पुरिसकादरं विंति धीरपुरिसा हु संढुत्ति ॥१५३०॥

अर्थ: जो छोटी या बड़ी विपत्ति आने पर खिन्न होता है उस कायर पुरुषको धीर पुरुष नपुंसक कहते हैं ॥१५३०॥


मेरुव्व णिप्पकंपा अक्खोभा सागरुव्व गंभीरा ।
धिदिवंतो सप्पुरिसा हुंति महल्लावईए वि ॥१५३१॥

अर्थ: सज्जन पुरुष महती विपत्तिमें भी सुमेरुकी तरह अकम्प, सागरकी तरह गम्भीर और धैर्यशील रहते हैं ॥१५३१॥


केई विमुत्तसंगा आदारोविदभरा अपडिकम्मा ।
गिरिपब्भारमभिगदा बहुसावदसंकडं भीमं ॥१५३२॥

अर्थ: कितने ही साधु समस्त परिग्रहको त्यागकर, अपने आत्मामें आत्माको आरोपित करके, प्रतीकार रहित होकर, बहुतसे व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओंसे भरे भयंकर पर्वतोंके शिखरोंपर जाकर दृढ़ धैर्यको अपनाकर, उत्कृष्ट चारित्रपूर्वक श्रुतज्ञानकी सहायतासे सिंहादिके मुँहमें जाकर भी उत्तमार्थ रत्नत्रयकी साधना करते हैं ॥१५३२-३३॥


धिदिधणियबद्धकच्छा अणुत्तरविहारिणो सुदसहाया ।
साहिंति उत्तमट्ठं सावददाढंतरगदा वि ॥१५३३॥

अर्थ: कितने ही साधु समस्त परिग्रहको त्यागकर, अपने आत्मामें आत्माको आरोपित करके, प्रतीकार रहित होकर, बहुतसे व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओंसे भरे भयंकर पर्वतोंके शिखरोंपर जाकर दृढ़ धैर्यको अपनाकर, उत्कृष्ट चारित्रपूर्वक श्रुतज्ञानकी सहायतासे सिंहादिके मुँहमें जाकर भी उत्तमार्थ रत्नत्रयकी साधना करते हैं ॥१५३२-३३॥ ॥१५३३॥


भल्लंकिए तिरत्तं खज्जंतो घोरवेदणट्टो वि ।
आराधणं पवण्णो ज्झाणेणावंतिसुकुमालो ॥१५३४॥

अर्थ: अवन्ती अर्थात् उज्जैनी नगरीमें सुकुमार मुनि तीन रात तक शृगालीके द्वारा खाये जानेपर घोर वेदनासे पीड़ित होते हुए भी शुभध्यानके द्वारा रत्नत्रयकी आराधनाको प्राप्त हुए ॥१५३४॥


पोग्गिलगिरिम्मि य सुकोसलो वि सिद्धत्थदइय भयवंतो ।
वग्घीए वि खज्जंतो पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं ॥१५३५॥

अर्थ: पुद्गल या मुद्गल नामक पर्वतपर सिद्धार्थ राजाके प्रिय पुत्र भगवान् सुकौशल मुनि अपनी पूर्व जन्मकी माता व्याघ्रीके द्वारा खाये जानेपर उत्तमार्थको प्राप्त हुए ॥१५३५॥


भूमीए समं कीलाकोडिददेहो वि अल्लचम्मं व ।
भयवं पि गयकुमारो पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं ॥१५३६॥

अर्थ: पृथ्वीके साथ गीले चमड़ेकी तरह शरीरमें कीलें ठोककर एकमेक कर देनेपर भी भगवान् गजकुमार मुनि उत्तमार्थको प्राप्त हुए ॥१५३६॥


कच्छुजरखाससोसो भत्तेच्छअच्छिकुच्छिदुक्खाणि ।
अधियासयाणि सम्मं सणक्कुमारेण वाससयं ॥१५३७॥

अर्थ: सनत्कुमार मुनि ने सौ वर्षों तक खाज, ज्वर, खांसी, सूखापन, तीव्र उदराग्नि, नेत्रपीड़ा, उदरपीड़ा आदिके दुःख बिना संक्लेशके धैर्यपूर्वक सहन किये ॥१५३७॥


णावाए णिव्वुडाए गंगामज्झे अमुज्झमाणमदी ।
आराधणं पवण्णो कालगओ एणियापुत्तो ॥१५३८॥

अर्थ: गंगाके मध्यमें नाव डूबनेपर एणिक पुत्र नामके मुनि मोहरहित होकर मरणको प्राप्त हुए और आराधनाके धारक हुए ॥१५३८॥


ओमोदरिए घोराए भद्दबाहू असंकिलिट्ठमदी ।
घोराए विगिंच्छाए पडिवण्णो उत्तमं ठाणं ॥१५३९॥

अर्थ: घोर अवमोदर्य तपके धारी भद्रबाहु मुनि घोर भूखसे पीड़ित होनेपर भी संक्लेश रूप परिणाम न करके उत्तमार्थको प्राप्त हुए ॥१५३९॥


कोसंबीललियघडा बूढा णइपूरएण जलमज्झे ।
आराधणं पवण्णा पाओवगदा अमूढमदी ॥१५४०॥

अर्थ: कौशाम्बी नगरीमें सुखपूर्वक पाले गये इन्द्रदत्त आदि बत्तीस श्रेष्ठि पुत्र जलके मध्यमें यमुना नदीके प्रवाहके द्वारा प्रायोपगमन संन्यास पूर्वक मरणको प्राप्त हुए । उन्होंने मोह रहित होकर आराधनाको प्राप्त किया ॥१५४०॥


चंपाए मासखमणं करित्तु गंगातडम्मि तण्हाए ।
घोराए धम्मघोसो पडिवण्णो उत्तमं ठाणं ॥१५४१॥

अर्थ: चम्पा नगरीमें एक मासका उपवास करते हुए धर्मघोष नामक मुनि गंगाके तटपर तीव्र प्याससे पीड़ित होकर उत्तमार्थको प्राप्त हुए ॥१५४१॥


सीदेण पुव्ववइरियदेवेण विकुव्विएण घोरेण ।
संतत्तो सिरिदत्तो पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं ॥१५४२॥

अर्थ: पूर्वभवके बैरी देवके द्वारा विक्रिया पूर्वक किये गये शीत से पीड़ित होकर श्रीदत्त मुनि उत्तमार्थको प्राप्त हुए ॥१५४२॥


उण्हं वादं उण्हं सिलादलं आदवं च अदिउण्हं ।
सहिदूण उसहसेणो पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं ॥१५४३॥

अर्थ: गर्म वायु, गर्म शिलातल और अत्यन्त गर्म आतापको सहन करके वृषभसेन उत्तमार्थको प्राप्त हुए ॥१५४३॥


रोहेडयम्मि सत्तीए हओ कोंचेण अग्गिदइदो वि ।
तं वेयणमधियासिय पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं ॥१५४४॥

अर्थ: रोहतक नगरमें क्रौंच नामक राजाके द्वारा शक्ति नामक शस्त्र विशेषसे मारा गया अग्नि राजाका पुत्र उसकी वेदनाको सहकर उत्तमार्थको प्राप्त हुआ ॥१५४४॥


काइंदि अभयघोसो वि चंडवेगेण छिण्णसव्वंगो ।
तं वेयणमधियासिय पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं ॥१५४५॥

अर्थ: काकन्दी नगरीमें चण्डवेगके द्वारा सब अंगोंके छेद डालनेपर अभयघोष मुनि उसकी वेदनाको सहकर उत्तमार्थको प्राप्त हुए ॥१५४५॥


दंसेहिं य मसएहिं य खज्जंतो वेदणं परं घोरं ।
विज्जुच्चरोऽधियासिय पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं ॥१५४६॥

अर्थ: डांस मच्छरोंके द्वारा खाये जानेपर विद्युच्चर मुनि अत्यन्त घोर वेदनाको सहन करके उत्तमार्थको प्राप्त हुए ॥१५४६॥


गोट्ठे पाओवगदो सुबंधुणा गोव्वरे पलिविदम्मि ।
उज्झंतो चाणक्को पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं ॥१५५१॥

अर्थ: चाणक्य मुनि गोकुलमें प्रायोपगमन संन्यासमें स्थित थे । सुबन्धु नामक मंत्रीने कण्डोंके ढेरमें आग लगा दी । उसमें जलकर चाणक्य मुनि उत्तम अर्थको प्राप्त हुए ॥१५५१॥


वसदीए पलविदाए रिट्ठामच्चेण उसहसेणो वि ।
अराधणं पवण्णो सह परिसाए कुणालम्मि ॥१५५२॥

अर्थ: कुणालपुरीमें रिष्ट नामक मंत्रीके द्वारा वसतिकामें आग लगानेपर वृषभसेन मुनि अपने शिष्य परिवारके साथ आराधनाको प्राप्त हुए ॥१५५२॥


जदिदा एवं एदे अणगारा तिव्ववेदणट्टा वि ।
एयागी अपडियम्मा पडिवण्णा उत्तमं अट्ठं ॥१५५३॥

अर्थ: इस प्रकार यदि ये मुनि अकेले प्रतीकार किये बिना तीव्र वेदनासे पीड़ित होकर उत्तमार्थको प्राप्त हुए ॥१५५३॥


किं पुण अणयारसहायगेण कीरयंत पडिकम्मो ।
संघे ओलग्गंते आराधेदुं ण सक्केज्ज ॥१५५४॥

अर्थ: तो तुम्हारी सहायताके लिये तो मुनि समुदाय है वह तुम्हारे कष्टका इलाज करता है, तुम्हारे साथ उपासना करता है तब तुम आराधना क्यों नहीं कर सकते ॥१५५४॥


जिणवयणममिदभूदं महुरं कण्णाहुदिं सुणंतेण ।
सक्का हु संघमज्झे साहेदुं उत्तमं अट्ठं ॥१५५५॥

अर्थ: अमृतके समान मधुर जिन-वचन तुम्हारे कानोंमें जाता है । उसे सुनते हुए संघके मध्यमें तुम्हारे लिये आराधना करना सरल है ॥१५५५॥


णिरयतिरिक्खगदीसु य माणुसदेवत्तणे य संतेण ।
जं पत्तं इह दुक्खं तं अणुचिंतेहि तच्चित्तो ॥१५५६॥

अर्थ: नरकगति, तिर्यञ्चगतिमें और मनुष्य पर्याय तथा देवपर्यायमें रहते हुए तुमने जो दुःख सुख भोगा, उसमें मन लगाकर उसका विचार करो ॥१५५६॥


णिरएसु वेदणाओ अणोवमाओ असादबहुलाओ ।
कायणिमित्तं पत्तो अणंतखुत्तो य बहुविधाओ ॥१५५७॥

अर्थ: इस शरीरके निमित्त किये गये असंयमसे उपार्जित कर्मके निमित्तसे तुमने नरकोंमें अनन्तबार नाना प्रकारकी तीव्र वेदना असातावेदनीय कर्मके तीव्र उदयमें भोगी हैं । इस प्रकारकी वेदना जगत्में दूसरी नहीं है । उसका मूल कारण यह शरीर है । उसीके निमित्तसे होनेवाले असंयमके कारण असातावेदनीयका तीव्रबन्ध होकर वह नरकमें प्रचुरतासे उदयमें आता रहता है । अतः कारणकी बहुलता होनेसे वेदना रूप कार्य निरन्तर हुआ करता है ॥१५५७॥


जदि कोइ मेरुमत्तं लोहुण्डं पक्खिविज्ज णिरयम्मि ।
उण्हे भूमिमपत्तो णिमिसेण विलिज्ज सो तत्थ ॥१५५८॥

अर्थ: यदि कोई देव या दानव मेरुके समान लोहेके पिण्डको उष्ण नरकमें फेंके तो वह लोहपिण्ड वहाँकी भूमिको प्राप्त होनेसे ही पहले मार्गमें ही नरकबिलोंकी उष्णतासे पिघल जाये ॥१५५८॥


तह चेव य तद्देहो पज्जलिदो सीयणिरयपक्खित्तो ।
सीदे भूमिमपत्तो णिमिसेण सडिज्ज लोहुण्डं ॥१५५९॥

अर्थ: उसी प्रकार उस पिघले हुए मेरु प्रमाण लोहपिण्डको यदि शीत नरकमें फेंका जाये तो भूमिको प्राप्त होनेसे पहले ही वह वहाँके शीतसे जमकर खण्ड-खण्ड हो जाय ॥१५५९॥


होदि य णरये तिव्वा सभावदो चेव वेदणा देहे ।
चुण्णीकदस्स वा मुच्छिदस्स खारेण सित्तस्स ॥१५६०॥

अर्थ: जैसे किसी मूर्छारहित मनुष्यके शरीरको कुचलकर उसे खारे तप्त तेलसे सींचनेपर जैसी वेदना होती है वैसी ही तीव्र वेदना नरकमें नारकीके शरीरमें स्वभावसे ही होती है॥१५६०॥


णिरयकडयम्मि पत्तो जं दुक्खं लोहकंटएहिं तुमं ।
णेरइहिं य तत्तो पडिओ जं पाविओ दुक्खं ॥१५६१॥

अर्थ: नरकरूपी स्कन्धावारमें अथवा गढ़ेमें नारकियोंके द्वारा लोहेके अत्यन्त नुकीले काँटोंपर घसीटे जानेसे तुमने जो दुःख भोगा उसका विचार करो ॥१५६१॥


जं कूडसामलीए दुक्खं पत्तोसि जं च सूलम्मि ।
असिपत्तवणम्मि य जं जं च कयं गिद्धकंकेहिं ॥१५६२॥

अर्थ: विक्रियासे रचे गये तीक्ष्ण शाल्मली वृक्षोंपर, जो ऐसे काँटोंसे घिरे होते हैं जिनमेंसे कुछ काँटोंका मुख ऊपरकी ओर और कुछका नीचेकी ओर होता है, नारकियोंके भयसे डरकर चढ़ते हुए तुमने जो दुःख भोगा। सूलीके अग्र भागपर चढ़ाये जानेपर तुमने जो दुःख भोगा । जिस वनमें तलवारकी धारके समान पत्ते होते हैं उसे असिपत्र वन कहते हैं । गर्मीसे पीड़ित नारकी असिपत्र वनमें जाते हैं जो अनेक असुर कुमार देवोंकी विक्रियाके द्वारा निर्मित विचित्र आयुध रूप पत्तोंसे युक्त होते हैं और उन आयुध रूप पत्तोंके गिरनेपर उनका सर्वांग छिद जाता है । तथा गृद्ध और कङ्क पक्षि अपनी वज्रमय चोंचोंसे उन्हें नोचते हैं तीक्ष्ण आरेके समान पंखोंसे प्रहार करते हैं । अत्यन्त तीक्ष्ण कठोर चरणरूपी अंकुशोंसे मारते हैं । इन सबका जो दुःख तुमने भोगा ॥१५६२॥


सामसवलेहिं दोसं बइतरणीए य पाविओ जं सि ।
पत्तो कयंववालुयमइगम्ममसायमतितिव्वं ॥१५६३॥

अर्थ: श्याम शवल नामक असुर कुमारोंके द्वारा वैतरणी नदीमें तुमने जो दण्ड भोगा । जब नारकी प्याससे व्याकुल होकर जलकी खोजमें होते हैं और उनकी आँखें दीन तथा कण्ठ और तालु सूख जाता है तो उन्हें वैतरणी नदी दिखलाई जाती है । वह रंगीन तरंगोंसे व्याप्त और अगाध नीले जलसे भरी होती है, विषय सुख सेवनकी तरह तृष्णाकी परम्पराको बढ़ाने वाली होती है, संसारकी तरह उसे पार करना कठिन होता है, आशाकी तरह विशाल होती है, कर्मपुद्गलोंके स्कन्धोंके समूहकी तरह अनेक विपत्तियाँ लानेवाली होती है । उसको देखकर दूरसे ही उनकी उत्कण्ठा बढ़ जाती है । अब हम जी गये, ऐसा मानते हुए दौड़कर नदीमें प्रवेश करते हैं । प्रवेश करते ही हाथोंकी अंजलि बनाकर पिघले हुए तामेके समान उसके जलको पीते हैं । वह जल कठोर वचनकी तरह हृदयको जलानेवाला होता है । ‘अरे हम ठगाये गये’ ऐसी करुण चीत्कार करते हुए उनके सिर और हाथ पैरोंको अत्यन्त कठोर वायुसे प्रेरित लहरें, जो तलवारकी धारके समान होती हैं, काट देती हैं । तब कालकूट विषके समान अत्यन्त खारा गर्म जल उनके घावोंमें जाता है । उससे जलते हुए वे तत्काल तटकी ओर जाते हैं । उनके कटे हाथ पैर तत्काल जुड़ जाते हैं। उनकी गर्दनोंमें भारी शिलाएँ वज्रमयी सांकलसे बाँध देते हैं जिनको खोलना अति कठिन होता है और उन्हें पुनः उसी वैतरणीमें डाल देते हैं। उसमें गिराये जानेपर वे डूबते उतराते हैं। असुर कुमारोंकी विक्रियासे बनाये गये महामच्छोंके प्रहारसे उनके मस्तक छिन्न-भिन्न होकर गिर जाते हैं। पुनः वे तट पर जाते हैं और उन्हें पुनः निश्चल बांध देते हैं। तब उन निश्चल स्थित नारकियोंको लक्ष करके लाखों तीक्ष्ण बाणोंसे बींध देते हैं। पुनः कदम्बके फूलोंके आकार वाली बालूमें, जिसमें बालिकाके चित्तकी तरह प्रवेश करना कठिन है और जो वज्रमयदलसे शोभित है तथा खैरकी लकड़ीके अंगारोंके कण समूहकी तरह गर्म है, उसमें बल-पूर्वक चलाये जानेपर तुमने जो दुःख पाया है उसका विचार करो ॥१५६३॥


जं णीलमंडवे तत्तलोहपडिमाउले तुमे पत्तं ।
जं पाइओसि खारं कडुयं तत्तं कलयलं च ॥१५६४॥

अर्थ: काललोहसे निर्मित मण्डपमें तपाये हुए लोहेसे बनी प्रतिमारूपी युवतियोंसे बल-पूर्वक आलिंगन कराये जानेपर तुमने जो दुःख पाया उसका विचार करो। तथा खारा कड़ुआ तपा हुआ कलकल पिलाये जानेपर जो दुःख पाया उसका चिन्तन करो ॥१५६४॥


जं खाविओसि अवसो लोहंगारे य पज्जलंते तं ।
कंदुसु जं सि रद्धो जं सि कवल्लीए तलिओ सि ॥१५६५॥

अर्थ: बलपूर्वक यंत्रके द्वारा तुम्हारा मुंह फाड़कर जो तुम्हें जलते हुए लोहेके अंगार खिलाये गये और भट्टीमें मांडकी तरह पकाया गया तथा कड़ाहीमें तला गया ॥१५६५॥


कुट्टाकुट्टिं चुण्णाचुण्णि मुग्गरमुसुंढिहत्थेहिं ।
जं वि सखंडाखंडिं कओ तुमं जणसमूहेण ॥१५६६॥

अर्थ: अनेक बार हाथमें मुद्गर लेकर तुम्हें कूटा गया, मूसलोंसे जनसमूहने तुम्हें चूर्ण कर डाला । उसका मनमें विचार करो ।


जं अवउद्दो उप्पाडिदाणि अच्छीणि णिरयवासम्मि ।
अवसस्स उक्खया जं सतूलमूलाय ते जिब्भा ॥१५६७॥

अर्थ: नरकमें सिरके पिछले भागसे तेरी आँखें निकाली गई । और पराधीनतावश तेरी पूरी जिह्वा जड़मूलसे उखाड़ी गई ॥१५६७॥


कुंभीपाएसु तुमं उक्कढिओ जं चिरं पि वं सोल्लं ।
जं सुट्ठिउव्व णिरयम्मि पउलिदो पावकम्मेहिं ॥१५६८॥

अर्थ: पापी नारकियोंके द्वारा नरकमें तुम चिरकाल तक कुम्भीपाकमें औटाये गये । तथा सूलमें पिरोये मांसकी तरह अंगारोंपर पकाये गये ॥१५६८॥


जं भज्जिदोसि भज्जिदगंपि व जं गालिओसि रसयं व ।
जं कप्पिओसि वल्लूरयं व चुण्णं व चुण्णकदो ॥१५६९॥

अर्थ: तुम भाजीकी तरह भूंजे गये हो। गुड़के रसकी तरह छाने गये हो। मांसके टुकड़ोंकी तरह काटे गये हो और चूर्णकी तरह चूर्ण किये गये हो ॥१५६९॥


चक्केहिं करकचेहिं य जं सि णिकत्तो विकत्तिओ जं च ।
परसूहिं फाडिओ ताडिओ य जं तं मुसुंढीहिं ॥१५७०॥

अर्थ: चक्रके द्वारा छेदे गये हो। आरेके द्वारा चीरे गये हो। परसुके द्वारा फाड़े गये हो। और मुसुंढी अस्त्र विशेषसे पीटे गये हो ॥१५७०॥


पासेहिं जं च गाढं बद्धो भिण्णो य जं सि दुघणेहिं ।
जं खारकद्दमे खुप्पिओ सि ओमच्छिओ अवसो ॥१५७१॥

अर्थ: पाशके द्वारा मजबूतीसे बांधे गये हो। घनोंके द्वारा छिन्न-भिन्न किये गये हो। पराधीन होकर खारी कीचड़में नीचेको मस्तक करके गाड़े गये हो ॥१५७१॥


जं छोडिओसि जं मोडिओसि जं फाडिओसि मलिदोसि ।
जं लोढिदोसि सिंघाडएसु तिक्खेसु वेएण ॥१५७२॥

अर्थ: जो विदारे गये हो। मोड़े गये हो, फाड़े गये हो, पैरोंसे मले गये हो, तथा वेगसे तीक्ष्ण लोहमयी सिंघाड़ोंपर घसीटे गये हो ॥१५७२॥


विच्छिण्णंगोवंगो खारं सिंचित्तु वीजिदो जं सि ।
सत्तीहिं वि मुक्कीहिं य अदयाए खुंचिओ जं सि ॥१५७३॥

अर्थ: अंग उपांगके विच्छिन्न होनेपर खारे जल आदिसे सींचे गये। फिर पंखासे हुवा की गई जिससे वेदना बढ़े । फिर शक्ति नामक अस्त्रसे और लोहेके दण्डेसे जिसके आगे कांटे लगे हों, निर्दयतापूर्वक खींचे गये ॥१५७३॥


पगलंतरुधिरधारो पलंबचम्मो पभिन्नपोट्टसिरो ।
पउलिदहिदओ जं फुडिदच्छो पडिचूरियंगो य ॥१५७४॥

अर्थ: रुधिरकी धार बह रही है, चमड़ा लटक रहा है, उदर और सिर फट गया है, हृदय दुःखसे संतप्त है, आँखें फूट गई हैं । समस्त शरीर छिन्न-भिन्न है ॥१५७४॥


जं चडवडिंतकरचरणंगो पत्तो सि वेदणं तिव्वं ।
णिरए अणंतखुत्तो तं अणुचिंतेहिं णिस्सेसं ॥१५७५॥

अर्थ: हाथ पैर कांपते हैं । ऐसी दशामें तुमने नरकमें जो अनन्त बार तीव्र कष्ट भोगा उस सबका क्रमसे चिन्तन करो ॥१५७५॥


तिरियगदिं अणुपत्तो भीममहावेदणाउलमपारं ।
जम्मणमरणरहट्टं अणंतखुत्तो परिगदो जं ॥१५७६॥

अर्थ: नरकसे निकलकर तुम तिर्यञ्चगतिमें आये । यह जन्म मरणरूपी घटीयंत्र (रहट) भयानक महावेदनाओंसे भरा है, इसका पार नहीं है । इसे तुमने अनन्तवार प्राप्त किया है । तिर्यञ्च पृथिवी, जल, तेज, वायु, वनस्पति और त्रसके भेदसे अनेक प्रकारके हैं ॥१५७६॥


ताडणतासणबंधणवाहणलंछणविहेडणं दमणं ।
कण्णच्छेदणणासावेहणणिल्लंछणं चेव ॥१५७७॥

अर्थ: लाठी आदिसे मारना, डराना, रस्सी आदिसे बांधना, बोझा लादकर देशान्तरमें ले जाना, गर्म लोहेसे दागना, पीड़ा देना, दमन करना, अण्डकोषोंको दबा देना। अंगोंको छेदना, भेदना, जलाना, दबाना, रोग आदि होनेपर रक्त निकालना, भूख प्यासकी बाधा, भक्षण, मर्दन, मलना, कान आदिको काटना, शीत उष्ण इत्यादि दुःख तिर्यञ्च गतिमें तुमने सहे हैं ॥१५७७-७८॥


छेदणभेदणडहणं णिपीलणं गालणं छुहातण्हा ।
भक्खणमद्दणमलणं विकत्तणं सीदउण्हं च ॥१५७८॥

अर्थ: प्रिय जनके वियोगका दुःख, अप्रियजनोंके साथमें रहनेका दुःख, जिनका नाम सुनकर भी सिरमें दर्द होता है, जिनके देखने मात्रसे आँखें लाल हो जाती हैं उन्हें अप्रिय कहते हैं। उनके साथमें रहनेका दुःख, वैमनस्यका दुःख और इच्छित वस्तुके न मिलनेका दुःख, राजा आदिकी नौकरी करनेपर अशिष्ट और कटुक वचनोंका दुःख, धिक्कार, तिरस्कार, अपमान और डांटनेका दुःख तुमने सहा है ॥१५८४-८५॥


जं अत्ताणो णिप्पडियम्मो बहुवेदणुद्दिओ पडिओ ।
बहुएहिं मदो दिवसेहिं चडयडंतो अणाहो तं ॥१५७९॥

अर्थ: जहाँ कोई रक्षक नहीं, कोई प्रतीकार नहीं, बहुत कष्टसे पीड़ित होकर गिरे और अनाथ दशामें तड़फड़ाते हुए तुम बहुत दिनोंमें मरे ॥१५७९॥


रोगा विविहा बाधाओ तह य णिच्चं भयं च सव्वत्तो ।
तिव्वाओ वेदणाओ धाडणपादाभिघादाओ ॥१५८०॥

अर्थ: तिर्यञ्चगतिमें नाना प्रकारके रोग, नाना प्रकारकी बाधाएं, सदा सब ओरसे भय, तीव्र वेदनाएँ, पैरसे मारना आदि कष्ट है ॥१५८०॥


सुविहिय अदीदकाले अणंतकायं तुमे अदिगदेण ।
जम्मणमरणमणंतं अणंतखुत्तो समणुभूदं ॥१५८१॥

अर्थ: हे चारित्रसे सम्पन्न क्षपक ! अतीतकालमें तुमने अनन्तकायमें जन्म लेकर अनन्त बार अनन्त जन्म मरणोंको भोगा ॥१५८१॥


इच्चेवमादिदुक्खं अणंतखुत्तो तिरिक्खजोणीए ।
जं पत्तोसि अदीदे काले चिंतेहि तं सव्वं ॥१५८२॥

अर्थ: तिर्यञ्चयोनिमें तुमने अतीतकालमें अनन्तवार जो इस प्रकारके दुःख भोगे हैं उन सबका विचार करो ॥१५८२॥


देवत्तमाणुसत्ते जं ते जाएण सकयकम्मवसा ।
दुक्खाणि किलेसा वि य अणंतखुत्तो समणुभूदं ॥१५८३॥

अर्थ: अपने किये हुए कर्मके वशीभूत होकर तुमने देवपर्याय और मनुष्य पर्यायमें जन्म लिया और वहाँ भी अनन्तवार दुःख और क्लेशोंको भोगा ॥१५८३॥


पियविप्पओगदुक्खं अप्पियसंवासजाददुक्खं च ।
जं वेमणस्सदुक्खं जं दुक्खं पच्छिदालाभे ॥१५८४॥

अर्थ: राजा आदिसे दण्डित होना, सिर मुण्डा करा देना, पीटा जाना, तिरस्कारपूर्वक दोष लगाया जाना, चोरी होना, राजा आदिके द्वारा धनका हरण, स्त्रियोंको दोष लगाना, घरमें आग लगाना, बाढ़ वगैरहसे संपत्तिका नष्ट होना, डण्डे कोड़े लाठी आदिसे पीटा जाना, मुट्ठीका प्रहार होना, कांटोंके ऊपर लिटाकर घोर मर्दन करना, कड़ाहीमें डालकर पकाना, मस्तकपर आग जलाना, आहारका रोक देना इत्यादि दुःख तुमने मनुष्यगतिमें सहे हैं ॥१५८७-८८॥


परभिच्चदाए जं ते असब्भवयणेहिं कडुगफरुसेहिं ।
णिब्भत्थणावमाणणतज्जणदुक्खाइं पत्ताइं ॥१५८५॥

अर्थ: हाथीके पैरसे दबाया जाना, सांकल, चमड़ेकी रस्सी या साधारण रस्सीसे बांधा जाना, दोनों हाथ पीछे करके बांधना, गर्दनमें रस्सी डालकर वृक्षसे लटकाना, गड्ढेमें डालकर उसे पूर देना । कान, ओष्ठ और नाक काटना, दांत तोड़ना, आंखें निकाल लेना, जीभ उखाड़ लेना, इत्यादि दुःख तुमने भोगे हैं ॥१५८९-९०॥


दीणत्तरोसचिंतासोगामरिसग्गिपउलिदमणो जं ।
पत्तो घोरं दुक्खं माणुसजोणीए संतेण ॥१५८६॥

अर्थ: दीनता, रोष, चिन्ता, शोक और क्रोधरूप आगसे मनके संतप्त होनेपर तुमने मनुष्ययोनिमें रहते हुए घोर दुःख पाया है ॥१५८६॥


दंडणमुंडणताडणधरिसणपरिमोससंकिलेसा य ।
धणहरणदारधरिसणघरदाहजलादिधणणासं ॥१५८७॥

अर्थ: आग, विष, शत्रु, सर्प आदि तथा सिंह, शस्त्रके प्रहारसे घात, शीत, उष्ण, डांस मच्छर, भूख प्यास, इनसे तुमने मनुष्यभवमें जो शारीरिक और मानसिक दुःख पाया है, हे धीर ! उस सबका विचार करो ॥१५९१-१५९२॥


दंडकसालट्ठिसदाणि डंगुराकंटमद्दणं घोरं ।
कुंभीपाको मच्छयपलीवणं भत्तवुच्छेदो ॥१५८८॥

अर्थ: राजा आदिसे दण्डित होना, सिर मुण्डा करा देना, पीटा जाना, तिरस्कारपूर्वक दोष लगाया जाना, चोरी होना, राजा आदिके द्वारा धनका हरण, स्त्रियोंको दोष लगाना, घरमें आग लगाना, बाढ़ वगैरहसे संपत्तिका नष्ट होना, डण्डे कोड़े लाठी आदिसे पीटा जाना, मुट्ठीका प्रहार होना, कांटोंके ऊपर लिटाकर घोर मर्दन करना, कड़ाहीमें डालकर पकाना, मस्तकपर आग जलाना, आहारका रोक देना इत्यादि दुःख तुमने मनुष्यगतिमें सहे हैं ॥१५८७ - ८८॥ ॥१५८८॥


दमणं च हत्थिपादस्स णिगलअंदूवरत्तरज्जूहिं ।
बंधणमाकोडणयं ओलंबणणिहणणं चेव ॥१५८९॥

अर्थ: हाथीके पैरसे दबाया जाना, सांकल, चमड़ेकी रस्सी या साधारण रस्सीसे बांधा जाना, दोनों हाथ पीछे करके बांधना, गर्दनमें रस्सी डालकर वृक्षसे लटकाना, गड्ढेमें डालकर उसे पूर देना। कान, ओष्ठ और नाक काटना, दांत तोड़ना, आंखें निकाल लेना, जीभ उखाड़ लेना, इत्यादि दुःख तुमने भोगे हैं ॥१५८९ - ९०॥ ॥१५८९॥


कण्णोट्ठसीसणासाछेदणदंताण भंजणं चेव ।
उप्पाडणं च अच्छीणं तहा जिब्भायणीहरणं ॥१५९०॥

अर्थ: हाथीके पैरसे दबाया जाना, सांकल, चमड़ेकी रस्सी या साधारण रस्सीसे बांधा जाना, दोनों हाथ पीछे करके बांधना, गर्दनमें रस्सी डालकर वृक्षसे लटकाना, गड्ढेमें डालकर उसे पूर देना। कान, ओष्ठ और नाक काटना, दांत तोड़ना, आंखें निकाल लेना, जीभ उखाड़ लेना, इत्यादि दुःख तुमने भोगे हैं ॥१५८९ - ९०॥ ॥१५९०॥


अग्गिविससत्तुसप्पादिवालसत्थाभिघादघादेहिं ।
सीदुण्हरोगदंसमसएहिं तण्हाछुहादीहिं ॥१५९१॥

अर्थ: आग, विष, शत्रु, सर्प आदि तथा सिंह, शस्त्रके प्रहारसे घात, शीत, उष्ण, डांस मच्छर, भूख प्यास, इनसे तुमने मनुष्यभवमें जो शारीरिक और मानसिक दुःख पाया है, हे धीर! उस सबका विचार करो ॥१५९१ - १५९२॥ ॥१५९१॥


जं दुक्खं संपत्तो अणंतखुत्तो मणे सरीरे य ।
माणुसभवे वि तं सव्वमेव चिंतेहि तं धीर ! ॥१५९२॥

अर्थ: आग, विष, शत्रु, सर्प आदि तथा सिंह, शस्त्रके प्रहारसे घात, शीत, उष्ण, डांस मच्छर, भूख प्यास, इनसे तुमने मनुष्यभवमें जो शारीरिक और मानसिक दुःख पाया है, हे धीर! उस सबका विचार करो ॥१५९१ - १५९२॥ ॥१५९२॥


सारीरादो दुक्खादु होइ देवेसु माणसं तिव्वं ।
दुक्खं दुस्सहमवसस्स परेण अभिजुज्जमाणस्स ॥१५९३॥

अर्थ: जब देवगतिमें अभियोग्य जातिका देव होकर वह परवश होकर इन्द्रादिके द्वारा वाहन बनाया जाता है तब उसे शारीरिक दुःखसे तीव्र मानसिक दुःख होता है जो असह्य होता है ॥१५९३॥


देवो माणी संतो पासिय देवे महद्ढिए अण्णे ।
जं दुक्खं संपत्तो घोरं भग्गेण माणेण ॥१५९४॥

अर्थ: अभिमानी देव हुआ तो अन्य महर्द्धिक देवोंको देखकर मानका भंग होनेसे जो घोर दुःख हुआ उसका विचार करो ॥१५९४॥


दिव्वे भोगे अच्छरसाओ अवसस्स सग्गवासं च ।
पजहंतगस्स जं ते दुक्खं जादं चयणकाले ॥१५९५॥

अर्थ: परवश होकर दिव्य भोग, देवांगनाएँ और स्वर्गवास त्यागनेपर स्वर्गसे च्युत होते समय जो दुःख हुआ उसका स्मरण करो ॥१५९५॥


जं गब्भवासकुणिमं कुणिमाहारं छुहादिदुक्खं च ।
चिंतंतगस्स यं सुचिसुहिदस्स दुक्खं चयणकाले ॥१५९६॥

अर्थ: पवित्र और सुखी देव स्वर्गसे च्युत होते समय विचारता है कि मुझे अब दुर्गन्धयुक्त गर्भमें जाना होगा । वहाँ दुर्गन्धित भोजन होगा । भूख प्यासकी बाधा होगी । ऐसा विचार करते समय जो दुःख होता है उसका चिन्तन करो ॥१५९६॥


एवं एदं सव्वं दुक्खं चदुगदिगदं च जं पत्तो ।
तत्तो अणंतभागो होज्ज ण वा दुक्खमिमगं ते ॥१५९७॥

अर्थ: इस प्रकार चारों गतियोंमें तुमने जो यह सब दुःख भोगा है उसके अनन्तवें भाग दुःख इस मनुष्य जन्ममें हो न भी हो ॥१५९७॥


संखेज्जमसंखेज्जं कालं ताइं अविस्समंतेण ।
दुक्खाइं सोढाइं किं पुण अदिअप्पकालमिमं ॥१५९८॥

अर्थ: तुमने संख्यात वा असंख्यात काल पर्यन्त बिना विश्राम लिये ये दुःख सहे हैं। तब अति अल्पकालके लिये यह थोड़ासा दुःख क्यों नहीं सहते हो ॥१५९८॥


जदि तारिसाओ तुम्हे सोढाओ वेदणाओ अवसेण ।
धम्मोत्ति इमा सवसेण कहं सोढुं ण तीरेज्ज ॥१५९९॥

अर्थ: यदि तुमने परवश होकर उक्त प्रकारकी वेदनाएँ सही हैं तो इस समय इस वेदनाको धर्म मानकर स्वयं अपनी इच्छासे क्यों नहीं सहते ।


तण्हा अणंतखुत्तो संसारे तारिसी तुम आसी ।
जं पसमेदुं सव्वोदधीणमुदगं ण तीरेज्ज ॥१६००॥

अर्थ: हे क्षपक ! संसारमें तुम्हें ऐसी प्यासकी वेदना अनन्त बार हुई है जिसको शान्त करनेके लिये सब समुद्रोंका जल भी समर्थ नहीं है ॥१६००॥


आसी अणंतखुत्तो संसारे ते छुधावि तारिसिया ।
जं पसमेदुं सव्वो पुग्गलकाओ ण तीरेज्ज ॥१६०१॥

अर्थ: संसारमें तुम्हें ऐसी भूखकी वेदना अनन्त बार हुई है जिसको शान्त करनेके लिये समस्त पुद्गल काय भी समर्थ नहीं है ॥१६०१॥


जदि तारिसया तण्हा छुधा य अवसेण ते तदा सोढा ।
धम्मोत्ति इमा सवसेण कधं सोढुं ण तीरेज्ज ॥१६०२॥

अर्थ: यदि तुमने परवश होकर वैसी भूख प्यासकी घोर वेदनाको सहा है तो अब धर्म मानकर इस वेदनाको स्वेच्छापूर्वक क्यों नहीं सहते ॥१६०२॥


सुदपाणएण अणुसट्ठिभोयणेण य पुणोवगहिएण ।
ज्झाणोसहेण तिव्वा वि वेदणा तीरदे सहिदुं ॥१६०३॥

अर्थ: तीन प्रकारकी धर्मकथाको कानोंके द्वारा पीकर, तथा गुरुकी शिक्षारूपी भोजन करके और शुभध्यानरूपी औषधको ग्रहण करके तीव्र भी वेदनाको सहा जा सकता है ॥१६०३॥


भीदो व अभीदो वा णिप्पडियम्मो व सपडियम्मो वा ।
मुच्चइ ण वेदणाए जीवो कम्मे उदिण्णम्मि ॥१६०४॥

अर्थ: असातावेदनीय कर्मकी उदीरणा होनेपर डरो या न डरो, प्रतीकार करो या न करो, जीव वेदनासे छुटकारा नहीं पाता ॥१६०४॥


पुरिसस्स पावकम्मोदएण ण करंति वेदणोवसमं ।
सुट्ठु पउत्ताणि वि ओसधाणि अदिवीरियाणी वि ॥१६०५॥

अर्थ: जब पुरुषके पापकर्मका उदय होता है तो अच्छी तरहसे प्रयुक्त और अतिशक्तिशाली भी औषधियाँ वेदनाको शान्त नहीं करतीं ॥१६०५॥


रायादिकुडुंबीणं अदयाए असंजमं करंताणं ।
धण्णंतरी वि कादुं ण समत्थो वेदणोवसमं ॥१६०६॥

अर्थ: राजा आदि कुटुम्बी जिनके पास अनेक प्रकारकी धन-सम्पदा और सेवा करनेवाले दास-दासियोंकी प्रचुरता होती है, किन्तु जो दयाहीन होकर असंयमी जीवन बिताते हैं, उनकी वेदनाको शान्त करनेके लिये धन्वन्तरि भी समर्थ नहीं है। धन्वन्तरिपदसे वैद्यरूपी सम्पदाको सूचित किया है। अर्थात् धन्वन्तरि जैसा वैद्य भी उनकी वेदनाको दूर नहीं कर सकता ॥१६०६॥


किं पुण जीवणिकाये दयंतया जादणेण लद्धेहिं ।
फासुगदव्वेहिं करेंति साहुणो वेदणोवसमं ॥१६०७॥

अर्थ: तब जीवमात्रपर दया करनेवाले याचनासे प्राप्त प्रासुक द्रव्योंसे साधुकी वेदनाका उपशम कहाँ तक कर सकते हैं ? अर्थात् परिचारक साधु जहाँ तक शक्य होता है व्याधिको शान्त करनेका प्रयत्न करते हैं क्योंकि उनके पास परिचारक रूप सम्पदा - दासदासी तो है नहीं और यतिगण छह कायके जीवोंको बाधा न पहुँचे इसके लिये सदा तत्पर रहते हैं तथा अपने संयमके विनाशसे भी भयभीत रहते हैं। साथ ‘याचनासे प्राप्त’ कहनेसे उनके पास धनसम्पदाका भी अभाव कहा है ॥१६०७॥


मोक्खाभिलासिणो संजदस्स णिधणगमणं पि होदि वरं ।
ण य वेदणामित्तं अप्पासुगसेवणं कादुं ॥१६०८॥

अर्थ: समस्त कर्मबन्धनके विनाशरूप मोक्षके अभिलाषी संयमीका मरण होना भी श्रेष्ठ है। किन्तु वेदनाकी शान्तिके लिये अप्रासुक अयोग्य द्रव्यका सेवन करना श्रेष्ठ नहीं है ॥१६०८॥


णिधणगमणं एयभवे णासो पुणो पुरिल्लजम्मेसु ।
णासं असंजमो पुण कुणइ भवसएसु बहुगेसु ॥१६०९॥

अर्थ: मरण होना तो एक भवका ही विनाश है भावि जन्मोंका नाश नहीं है किन्तु असंयम तो सैकड़ों जन्मोंको नष्ट कर देता है। जो संयमी रत्नत्रयकी भावनामें तत्पर रहते हैं वेदना उनका पीछा नहीं करती। क्योंकि रत्नत्रयकी भावना असाताके उदयको मन्द करती है। और असंयम असातावेदनीयके अनुभागको बढ़ाता है। कहा भी है दुःख, शोक, पश्चात्ताप, रुदन, वध और हृदयको व्याकुल करनेवाला रुदन स्वयं करनेसे, दूसरोंमें करनेसे या दोनोंमें करनेसे असातावेदनीयका आस्रव होता है ॥१६०९॥


ण करेंति णिव्वुइं इच्छया वि देवा सइंदिया सव्वे ।
पुरिसस्स पावकम्मे अणक्कमगो उदिण्णम्मि ॥१६१०॥

अर्थ: पुरुषके पापकर्मके अनुक्रमसे उदय आनेपर इन्द्रसहित सब देव इच्छा करनेपर भी सुखी नहीं कर सकते ॥१६१०॥


किह पुण अण्णो काहिदि उदिण्णकम्मस्स णिव्वुदिं पुरिसो ।
हत्थीहिं अतीरंतं भंतुं भंजिहिदि किह ससओ ॥१६११॥

अर्थ: तब असातावेदनीय कर्मका उदय आनेपर अन्य साधारण पुरुष क्या कर सकते हैं? जिसे महाबलशाली हाथी भी तोड़नेमें असमर्थ है क्या उसे बेचारा कमजोर खरगोश तोड़ सकता है ॥१६११॥


ते अप्पणो वि देवा कम्मोदयपच्चयं मरणदुक्खं ।
वारेदुं ण समत्था धणिदं पि विकुव्वमाणा वि ॥१६१२॥

अर्थ: वे देव कर्मके उदयके कारण होनेवाले अपने भी मरणके दुःखको दूर करनेमें समर्थ नहीं है यद्यपि वे दिव्यशक्तिसे सम्पन्न होनेसे अनेक प्रकारकी विक्रिया करनेमें समर्थ होते हैं ॥१६१२॥


उज्झंति जत्थ हत्थी महाबलपरक्कमा महाकाया ।
सुत्ते तम्मि वहंते ससया ऊढेल्लया चेव ॥१६१३॥

अर्थ: जिस प्रवाहमें महाबली, महापराक्रमी और विशाल शरीरवाले हाथी बह जाते हैं उस प्रवाहमें बेचारे खरगोश स्वयं ही बह जाते हैं ॥१६१३॥


किह पुण अण्णो मुच्चहिदि सगेण उदयागदेण कम्मेण ।
तेलोक्केण वि कम्मं अवारणिज्जं खु समुवेदं ॥१६१४॥

अर्थ: जब देव भी अपने उदयागत कर्मको टालनेमें असमर्थ है तब अन्य साधारण प्राणी अपने उदयागत कर्मसे कैसे छूट सकता है ? उदयागत कर्मको तीनों लोक भी नहीं टाल सकते ॥१६१४॥


कह ठाइ सुक्कपत्तं वाएण पडंतयम्मि मेरुम्मि ।
देवे वि य विहेडयदो कम्मस्स तुमम्मि का गण्णा ॥१६१५॥

अर्थ: जिस वायुसे मेरुपर्वतका पतन हो सकता है उसके सामने सूखा पत्ता कैसे ठहर सकता है ? इसी प्रकार जो कर्म अणिमा आदि आठ गुणोंसे सम्पन्न देवोंकी भी दुर्गति कर देता है उसके सामने तुम्हारे जैसे मरणोन्मुख मनुष्यकी क्या गिनती है ॥१६१५॥


कम्माइं बलियाइं बलिओ कम्मादु णत्थि कोवि जगे ।
सव्वबलाइं कम्मं मलेदि हत्थीव णलिणिवणं ॥१६१६॥

अर्थ: कर्म बड़े बलवान हैं । जगत्में कर्मसे बलवान कोई नहीं है । जैसे हाथी कमलोंके वनको रौंद डालता है । वैसे ही कर्म बन्धु, ज्ञान, द्रव्य, शरीर और परिवार आदि सब बलोंको नष्ट कर देता है । कर्मके सामने ये सब बल क्षीण हो जाते हैं ॥१६१६॥


इच्चेवं कम्मुदओ अवारणिज्जोत्ति सुट्ठु णाऊण ।
मा दुक्खायसु मणसा कम्मम्मि सगे उदिण्णम्मि ॥१६१७॥

अर्थ: इस प्रकार कर्मका उदय अनिवार्य है उसे रोका नहीं जा सकता इस बातको अच्छी तरहसे जानकर अपने कर्मका उदय आनेपर मनमें दुःख मत करो ॥१६१७॥


पडिकूविदे विसण्णे रडिदे दुक्खाइदे किलिट्ठे वा ।
ण य वेदणोवसामदि णेव विसेसो हवदि तिस्से ॥१६१८॥

अर्थ: रोनेपर, विषाद करनेपर, चिल्लानेपर अथवा दुःख और संक्लेश करनेपर वेदना शान्त नहीं होती और उसमें कोई विशेषता भी नहीं आती ॥१६१८॥


अण्णो वि को वि ण गुणोत्थ संकिलेसेण होइ खवयस्स ।
अट्टं सुसंकिलेसो ज्झाणं तिरियाउगणिमित्तं ॥१६१९॥

अर्थ: शोक आदि संक्लेश करनेसे क्षपकका कोई अन्य लाभ भी नहीं है । बुद्धिमान पुरुष उसी कार्यको करना प्रारम्भ करते हैं जिससे कोई लाभ होता है । संक्लेशसे मुमुक्षुका जरा भी लाभ नहीं है । बल्कि इष्ट वियोग नामक आर्तध्यान संक्लेश परिणामरूप होनेसे तिर्यञ्चायुके बन्धका कारण है अतः थोड़ेसे दुःखसे डरनेवाले आपको तुम्हारा संक्लेश ऐसी तिर्यञ्चगतिरूपी भँवरमें डाल देगा जिससे निकलना बहुत कठिन है ॥१६१९॥


हदमाकासं मुट्ठीहिं होइ तह कंडिदा तुसा होंति ।
सिगदाओ पीलिदाओ घुसिलिदमुदयं च होइ जहा ॥१६२०॥

अर्थ: जैसे मुट्ठियोंसे आकाशको मारना, चावलके लिये उसके छिलकोंको कूटना, तेलके लिये कोल्हूमें रेत पेलना, और घीके लिये जलको मथना निरर्थक है उसी प्रकार वेदनासे पीड़ित व्यक्तिका संक्लेश करना निरर्थक है । संक्लेश करनेसे वेदना दूर नहीं होती है अतः निरर्थक होनेसे दृष्टान्त और दार्ष्टान्तमें समानता है ॥१६२०॥


पुव्वं सयमुवभुत्तं काले णाएण तेत्तियं दव्वं ।
को धारणिओ धणिदस्स देंतओ दुक्खिओ होज्ज ॥१६२१॥

अर्थ: जैसे कोई कर्जदार साहूकारसे ऋण लेकर स्वयं उसका उपभोग करता है । और ऋण चुकानेका समय आनेपर उतना ही द्रव्य देते हुए उसे दुःख नहीं होता । उसी प्रकार पूर्वमें स्वयं बांधे हुए पापकर्मका फल भोगनेवाले ज्ञानीको दुःख कैसा ? अतः पूर्वमें बांधे गये कर्मका उदयकाल आनेपर कौन ज्ञानी दुःखी होता है ॥१६२१-२२॥


तह चेव सयं पुव्वं कदस्स कम्मस्स पाककालम्मि ।
णायागयम्मि को णाम दुक्खिओ होज्ज जाणंतो ॥१६२२॥

अर्थ: जैसे कोई कर्जदार साहूकारसे ऋण लेकर स्वयं उसका उपभोग करता है। और ऋण चुकानेका समय आनेपर उतना ही द्रव्य देते हुए उसे दुःख नहीं होता। उसी प्रकार पूर्वमें स्वयं बांधे हुए पापकर्मका फल भोगनेवाले ज्ञानीको दुःख कैसा ? अतः पूर्वमें बांधे गये कर्मका उदयकाल आनेपर कौन ज्ञानी दुःखी होता है ॥१६२१-२२॥ ॥१६२२॥


इय पुव्वकदं इणमज्ज महं कम्माणुगत्ति णाऊण ।
रिणमुक्खणं च दुक्खं पेच्छसु मा दुक्खिओ होहि ॥१६२३॥

अर्थ: यह दुःख मेरे पूर्वमें किये गये कर्मोंका ही फल है ऐसा जानकर दुःखको ऋण मुक्तिके समान देखो । दुःखी मत होओ ॥१६२३॥


पुव्वकदमज्झ कम्मं फलिदं दोसो ण इत्थ अण्णस्स ।
इदि अप्पणो पओगं णच्चा मा दुक्खिदो होहि ॥१६२४॥

अर्थ: यह मेरे पूर्वकृत कर्मोंका फल है । इसमें किसी दूसरेका दोष नहीं है । अतः इसे अपना ही प्रयोग जानकर दुःखी मत होओ ॥१६२४॥


जदिदा अभूदपुव्वं अण्णेसिं दुक्खमप्पणो चेव ।
जादं हविज्ज तो णाय होज्ज दुक्खाइदुं जुत्तं ॥१६२५॥

अर्थ: हे क्षपक ! यदि यह दुःख दूसरोंको पहिले कभी नहीं हुआ और तुमको ही हुआ होता तो दुःख करना युक्त था ॥१६२५॥


सव्वेसिं सामण्णं अवस्सदायव्वयं करं काले ।
णाएण य को दाऊण णरो दुक्खादि विलवदि वा ॥१६२६॥

अर्थ: कर्मोंके विनाशका समय आनेपर सभी भव्य जीवोंको मुनिपद अवश्य धारण करना होता है । इसलिये इसे ‘कर’ कहा है । इस करको न्यायपूर्वक देकर कौन मनुष्य दुःखी होता है या विलाप करता है ॥१६२६॥


सव्वेसिं सामण्णं करभूदमवस्सभाविकम्मफलं ।
इण मज्ज मेत्ति णच्चा लभसु सदिं तं धिदिं कुणसु ॥१६२७॥

अर्थ: सभी मोक्षमार्गियोंके लिये यह श्रामण्य अवश्य भाविकर्मफल होनेसे करके समान देय है अर्थात् सभीको मुनिपद धारण करना होता है । आज यह श्रामण्य मेरे लिये करके समान देय है ऐसा जानकर अपने स्वरूपका स्मरण करो और धैर्य धारण करो ॥१६२७॥


अरहंतसिद्धकेवलि अविउत्ता सव्वसंघसक्खिस्स ।
पच्चक्खाणस्स कदस्स भंजणादो वरं मरणं ॥१६२८॥

अर्थ: अरहन्त, सिद्ध, केवली, उस स्थानके वासी देवता और सर्व संघको साक्षी बनाकर ग्रहण किये त्यागको तोड़नेसे मरण श्रेष्ठ है ॥१६२८॥


आसादिदा तओ होंति तेण ते अप्पमाणकरणेण ।
राया विव सक्खिकदो विसंवदंतेण कज्जम्मि ॥१६२९॥

अर्थ: जैसे राजाको साक्षी बनाकर किये गये कार्यमें विसंवाद करनेवाला पुरुष राजाकी अवज्ञा करनेका दोषी होता है । वैसे ही अरहन्त आदि पंचपरमेष्ठीकी साक्षीपूर्वक स्वीकार किये गये त्यागको तोड़नेवाला मुनि अरहन्त आदिको भी प्रमाण न माननेसे उनकी अवज्ञा करनेका दोषी होता है ॥१६२९॥


जइ दे कदा पमाणं अरहंतादी हवेज्ज खवएण ।
तस्सक्खिदं कयं सो पच्चक्खाणं ण भंजिज्ज ॥१६३०॥

अर्थ: यदि हे क्षपक ! तुम अरहंत आदिको प्रमाण मानते हो तो तुम्हें उनकी साक्षिपूर्वक किये गये त्यागको भंग नहीं करना चाहिये ॥[?]६३०॥


सक्खिकदरायहीलणमावहइ णरस्स जह महादोसं ।
तह जिणवरादिआसादणा वि दोसं महं कुणदि ॥१६३१॥

अर्थ: जैसे राजाको साक्षी बनाकर उनकी अवज्ञा करना मनुष्यको महादोषका भागी बनाता है वैसे ही अर्हन्त आदिकी आसादना भी महादोषको करनेवाली है ॥१६३१॥


तित्थयरपवयणसुदे आइरिए गणहरे महड्ढीए ।
एदे आसादंतो पावइ पारंचियं ठाणं ॥१६३२॥

अर्थ: तीर्थङ्कर, रत्नत्रय, आगम, आचार्य और महान् ऋद्धिधारियोंकी आसादना करने वाला पारंचिक नामक प्रायश्चित्तका भागी होता है ॥१६३२॥


सक्खीकयरायासादणे हु दोसं करे हु एवमवे ।
भवकोडीसु य दोसं जिणादि आसादणं कुणइ ॥१६३३॥

अर्थ: साक्षी बनाये गये राजाकी आसादना करनेपर तो एक ही भवमें दोषका भागी होता है । किन्तु अरहन्त आदिकी आसादना करनेपर करोड़ों भवोंमें दोषका भागी होता है । अतः साक्षी बनाये गये राजाकी अवज्ञाके दोषसे अर्हन्त आदिकी अवज्ञासे होनेवाला दोष महान होता है ॥१६३३॥


मोक्खाभिलासिणो संजदस्स णिधणगमणं पि होइ वरं ।
पच्चक्खाणं भंजंतस्स ण वरमरहदादिसक्खिकदा ॥१६३४॥


णिधणगमणमेयभवे णासो ण पुणो पुरिल्लजम्मेसु ।
णासं वयभंगो पुण कुणइ भवसएसु बहुएसु ॥१६३५॥


ण तहा दोसं पावइ पच्चक्खाणमकरित् कालगदो ।
जह भंजणा हु पावदि पच्चक्खाणं महादोसं ॥१६३६॥

अर्थ: बिना त्याग ग्रहण किये मरनेपर इतना दोष नहीं होता जितना महादोष त्याग लेकर उसका भंग करनेपर होता है ॥१६३६॥


आहारत्थं हिंसइ भणइ असच्चं करेइ तेणिक्कं ।
रूसइ लुब्भइ मायं करेइ परिगिण्हदि य संगे ॥१६३७॥

अर्थ: आहारके लिये मनुष्य छहकायके जीवोंका घात करता है । असत्य बोलता है, चोरी करता है । आहार न मिलनेपर क्रोध करता है । मिलनेपर उसका लोभ करता है । मायाचार करता है । घर पत्नी आदि परिग्रह स्वीकार करता है ॥१६३७॥


होइ णरो णिल्लज्जो पयहइ तवणाणदंसणचरित्तं ।
आमिसकलिणा ठइओ छायं मइलेइ य कुलस्स ॥१६३८॥

अर्थ: आहारके लिये मनुष्य निर्लज्ज होता है क्योंकि दूसरोंसे माँगता है । अपना तप, ज्ञान, दर्शन और चारित्र तक त्याग देता है । आहाररूपी कलिके द्वारा ग्रस्त होकर अपने कुल की छायाको मलिन करता है दूसरोंका झूठा भोजन खाता है ॥१६३८॥


णासदि बुद्धी जिब्भावसस्स मंदा वि होदि तिक्खा वि ।
जोणियसिलेसलग्गो व होइ पुरिसो अणप्पवसो ॥१६३९॥

अर्थ: जो जिह्वाके वशीभूत है उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है क्योंकि भोजनका लम्पटी होनेसे वह भक्ष्य अभक्ष्यका विचार नहीं करता । यदि उसकी बुद्धि तीक्ष्ण होती है तो वह मन्द हो जाती है क्योंकि रसोंमें रागरूपी मलसे लिप्त होनेसे बुद्धि भक्ष्य वस्तुके यथार्थ स्वरूपको नहीं देख पाती । तथा आहारका लम्पटी मनुष्य विषय सेवन करते हुए मनुष्यकी तरह अपने वशमें नहीं रहता ॥१६३९॥


धीरत्तणमाहप्पं कदण्णदं विणयधम्मसद्धाओ ।
पयहइ कुणइ अणत्थं गललग्गो मच्छओ चेव ॥१६४०॥

अर्थ: वह धीरता, माहात्म्य, कृतज्ञता, विनय और धर्मश्रद्धाको भी आहारके पीछे छोड़ देता है और गलेमें फँसी मछलीकी तरह अनर्थ करता है ॥१६४०॥


आहारत्थं पुरिसो माणी कुलजादि पहियकित्ती वि ।
भुंजंति अभोज्जाए कुणइ कम्मं अकिच्चं खु ॥१६४१॥

अर्थ: मानी, कुलीन और प्रख्यातकीर्ति वाला भी आहारके लिये अभक्ष्यका भक्षण करता है और न करने योग्य कर्म करता है ॥१६४१॥


आहारत्थं मज्जारिसुंसुमारी अही मणुस्सी वि ।
दुब्भिक्खादिसु खायंति पुत्तभंडाणि दइयाणि ॥१६४२॥

अर्थ: भूखसे पीड़ित होनेपर बिल्ली, मच्छ, सर्पिणि और दुर्भिक्ष आदिमें मनुष्य भी अपने प्रिय पुत्रोंको खा जाते हैं ॥१६४२॥


इहपरलोइयदुक्खाणि आवहंते णरस्स जे दोसा ।
ते दोसे कुणइ णरो सव्वे आहारगिद्धीए ॥१६४३॥

अर्थ: मनुष्यके जो दोष इस लोक और परलोकमें दुःखदायी हैं वे सब दोष मनुष्य आहारकी लम्पटताके कारण ही करता है ॥१६४३॥


अवधिट्ठाणं णिरयं मच्छा आहारहेदु गच्छंति ।
तत्थेवाहारभिलासेण गदो सालिसिच्छो वि ॥१६४४॥

अर्थ: महामत्स्य आहारके ही कारण सातवें नरकमें मरकर जाता है और उसी महामत्स्यके कानमें रहनेवाला सालिसिक्थ मत्स्य भी आहारके संकल्पसे मरकर सातवें नरक जाता है ॥१६४४॥


चक्कधरो वि सुभूमो फलरसगिद्धीए वंचिओ संतो ।
णट्ठो समुद्दमज्झे सपरिजणो तो गओ णिरयं ॥१६४५॥

अर्थ: सुभौम नामक चक्रवर्ती भी एक देवके द्वारा लाये गये फलके रसकी लम्पटताके कारण ठगा जाकर परिवारके साथ समुद्रमें डूब गया और मरकर नरकमें गया ॥१६४५॥


आहारत्थं काऊण पावकम्माणि तं परिगओ सि ।
संसारमणादीयं दुक्खसहस्साणि पावंतो ॥१६४६॥

अर्थ: हे क्षपक ! पूर्वजन्मोंमें आहारके ही लिये पाप कर्म करके तुम हजारों दुःख भोगते हुए अनादि संसारमें प्रविष्ट हुए ॥१६४६॥


पुणरवि तहेव संसारं किं भमिदुमिच्छसि अणंतं ।
जं णाम ण वोच्छिज्जइ अज्जवि आहारसण्णा ते ॥१६४७॥

अर्थ: अब क्या पुनः अनन्त संसारमें भ्रमण करनेकी इच्छा है जो अभी भी तुम्हारी आहार संज्ञा नष्ट नहीं होती ॥१६४७॥


जीवस्स णत्थि तित्ती चिरंपि भुंजंतस्य आहारं ।
तित्तीए विणा चित्तं उव्वूरं उव्वुदं होइ ॥१६४८॥

अर्थ: चिरकाल तक आहार खाकर भी जीवकी तृप्ति नहीं होती। और तृप्तिके बिना चित्त अत्यन्त व्याकुल रहता है ॥१६४८॥


जह इंधणेहिं अग्गी जह य समुद्दो णदीसहस्सेहिं ।
आहारेण ण सक्को तह तिप्पेदुं इमो जीवो ॥१६४९॥

अर्थ: जैसे ईंधनसे आगकी और हजारों नदियोंसे समुद्रकी तृप्ति नहीं होती वैसे ही यह जीव आहारसे तृप्त नहीं हो सकता ॥१६४९॥


देविंदचक्कवट्टी य वासुदेवा य भोगभूमा य ।
आहारेण ण तित्ता तिप्पदी कह भोयण अण्णो ॥१६५०॥

अर्थ: देवेन्द्रोंके लाभान्तरायके क्षयोपशमका प्रकर्ष होनेसे अपने शरीरके तेजके निमित्तसे आहार प्राप्त होता है । भोजनकी इच्छा होते ही कण्ठसे अमृत झरता है । चक्रवर्तीके भी तीन सौ साठ रसोइयां होते हैं और वे सब मिलकर एक वर्षका आहार एक दिनमें बनाते हैं । अर्धचक्रवर्तीकी भी ऐसी स्थिति है । भोगभूमिके जीवोंको भोजनांग जातिके कल्पवृक्षोंसे यथेच्छ आहार प्राप्त होता है । फिर भी इन सबकी तृप्ति नहीं होती । तब साधारण मनुष्य भोजन से कैसे तृप्त हो सकता है ॥१६५०॥


उद्धुदमणस्स ण रदी विणा रदीए कुदो हवदि पीदी ।
पीदीए विणा ण सुहं उद्धुदचित्तस्स घण्णस्स ॥१६५१॥

अर्थ: यह आहार उत्तम है । इससे भी यह आहार उत्तम है इस प्रकारसे जिसका चित्त चंचल रहता है उसके चित्तमें अनुराग नहीं होता । अनुरागके बिना प्रीति नहीं होती । और प्रीतिके बिना सुख नहीं होता । इस प्रकार विभिन्न आहारोंके लम्पटी चंचलचित्त मनुष्यको आहारसे सुख नहीं होता ॥१६५१॥


सव्वाहारविधाणेहिं तुमे ते सव्वपुग्गला बहुसो ।
आहारिदा अदीदे काले तित्तिं च सि ण पत्तो ॥१६५२॥

अर्थ: हे क्षपक ! अतीतकालमें तुमने अन्न, पान, खाद्य और लेह्यके भेदसे चार प्रकारका आहार करके सब पुद्गलोंको बहुत बार खाया है फिर भी तुम्हारी तृप्ति नहीं हुई ॥१६५२॥


किं पुण कंठप्पाणो आहारेदूण अज्जमाहारं ।
लभिहिसि तित्तिं पाऊणुदधिं हिमलेहणेणेव ॥१६५३॥

अर्थ: अब तो तुम्हारे प्राण कण्ठगत है अर्थात् तुम्हारी मृत्यु निकट है। जैसे समुद्रको पीकर जो तृप्त नहीं हुआ वह ओसको चाटनेसे तृप्त नहीं हो सकता। उसी प्रकार जब तुम समस्त पुद्गलोंको खाकर भी तृप्त नहीं हुए तब मरते समय आज भोजनसे कैसे तृप्त हो सकते हो ॥१६५३॥


को एत्थ विभओ दे बहुसो आहारभुत्तपुव्वम्मि ।
जुंज्जेज्ज हु अभिलासो अभुत्तपुव्वम्मि आहारे ॥१६५४॥

अर्थ: जो आहार तुमने पहले अनेक बार खाया है उसमें तुम्हारी उत्सुकता कैसी? जो आहार पहले कभी नहीं खाया है उसमें अभिलाषा होना तो उचित है। किन्तु जिसे तुम अनेक बार भोग चुके हो उसमें अभिलाषा होना ही आश्चर्यकारी है ॥१६५४॥


आवादमेत्तसोक्खो आहारणो हु सुखमत्थ बहु अत्थि ।
दुःखं चेवत्थ बहुं आहट्टंतस्स गिद्धीए ॥१६५५॥

अर्थ: आहारमें बहुल सुख नहीं है केवल जिह्वाके अग्रभागमें रखनेमात्र ही सुख है। किन्तु इच्छित आहारकी लिप्सासे जो दुःख होता है वह दुःख ही बहुल है ॥१६५५॥


जिब्भामूलं बोलेइ वेगदो वरहओव्व आहारो ।
तत्थेव रसं जाणइ ण य परदो ण वि य से पुरदो ॥१६५६॥

अर्थ: जैसे उत्तम घोड़ा बड़ा तेज दौड़ता है वैसे ही आहार भी जिह्वाके मूलको बड़े वेगसे पार करता है अर्थात् जिह्वापर ग्रास आते ही वह झट पेटमें चला जाता है। बस जिह्वापर रहते हुए ही जीवको आहारके स्वादकी प्रतीति होती है, न पहले होती है और न बादमें । अर्थात् जब आहार जीभपर नहीं आया और जब आकर गलेमें उतरा तब स्वादकी अनुभूति नहीं होती ॥१६५६॥


अच्छिणिमिसेणमेत्तो आहारसुहस्स सो हवइ कालो ।
गिद्धीए गिलइ वेगं गिद्धीए विणा ण होइ सुहं ॥१६५७॥

अर्थ: इस प्रकार आहारसे होनेवाले सुखका काल एक बार पलकें बन्द करके खोलनेमें जितना समय लगता है उतना ही है अर्थात् क्षणमात्र है । आहारकी गृद्धि होनेसे आहार वेगसे निगला जाता है और गृद्धिके बिना सुख नहीं होता ॥१६५७॥


दुक्खं गिद्धीघत्थस्साहट्टंतस्स होइ बहुगं च ।
चिरमाहट्टियदुग्गयचेडस्स व अण्णगिद्धीए ॥१६५८॥

अर्थ: जो आहारविषयक लम्पटताके साथ आहारकी आकांक्षा करता है उसे बहुत दुःख उठाना पड़ता है । जैसे अन्नकी गृद्धिसे चिरकालसे व्याकुल दरिद्र दासको कष्ट होता है वैसा ही कष्ट आहारकी लम्पटतावालेको होता है ॥१६५८॥


को णाम अप्पसुक्खस्स कारणं महसुहस्स चुक्केज्ज ।
चुक्कइ हु संकिलिसेण मुणी सग्गापवग्गाणं ॥१६५९॥

अर्थ: कौन बुद्धिमान पुरुष थोड़ेसे सुखके लिये बहुत सुखसे वंचित होना चाहेगा । अर्थात् इस अन्तिम अवस्थामें आहारमें आसक्त होनेसे तुम बहुत सुखसे वंचित हो जाओगे । मुनि संक्लेश परिणाम करनेसे स्वर्ग और मोक्षके सुखसे वंचित हो जाता है - उसे स्वर्ग या मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती ॥१६५९॥


महुलित्तं असिधारं लेहइ भुंजइ य सो सविसमण्णं ।
जो मरणदेसयाले पच्छेज्ज अकप्पियाहारं ॥१६६०॥

अर्थ: जो क्षपक मरते समय अयोग्य आहारकी प्रार्थना करता है वह मधुसे लिप्त तलवारकी धारको चाटता है और विष सहित अन्नको खाता है । अर्थात् जैसे मधुसे लिप्त तलवारकी धारको चाटनेसे तत्काल सुख होता है किन्तु जीभ कट जाती है वैसे ही मरते समय यदि अर्हन्त आदिकी साक्षीपूर्वक त्यागे हुए आहारकी अभिलाषा करता है और उसे खाता है तो तत्काल उसे अपनी इच्छापूर्ति होनेसे सुख प्रतीत होगा। किन्तु उसकी सब आराधना गल जायेगी ॥१६६०॥


असिधारं व विसं वा दोसं पुरिसस्स कुणइ एयभवे ।
कुणइ दु मुणिणो दोसं अकप्पसेवा भवसएसु ॥१६६१॥

अर्थ: शहदसे लिप्त तलवार और विषमिश्रित अन्न तो पुरुषका एक भवमें ही अनर्थ करते हैं। किन्तु मुनिका अयोग्य आहारका सेवन सैकड़ों भवोंमें अनर्थकारी होता है ॥१६६१॥


जावंत किंचि दुक्खं सारीरं माणसं च संसारे ।
पत्तो अणतखुत्तं कायस्स ममत्तिदोसेण ॥१६६२॥

अर्थ: हे क्षपक ! इस संसारमें तुमने जो कुछ भी शारीरिक और मानसिक दुःख अनन्त बार भोगा है वह सब शरीरमें ममतारूप दोषके कारण ही भोगा है । ॥१६६२॥


इण्हिं पि जदि ममत्तिं कुणसि सरीरे तहेव ताणि तुमं ।
दुक्खाणि संसरंतो पाविहसि अणतयं कालं ॥१६६३॥

अर्थ: इस समय भी यदि तुम शरीरमें ममता करते हो तो उसी प्रकार चारों गतियोंमें भ्रमण करते हुए अनन्त कालतक दुःख भोगोगे ॥१६६३॥


णत्थि भयं मरणसमं जम्मणसमयं ण विज्जदे दुःखं ।
जम्मणमरणादंकं छिण्ण ममत्तिं सरीरादो ॥१६६४॥

अर्थ: मरणके समान भय नहीं है और जन्मके समान दुःख नहीं है। तथा जन्म मरण रोगका कारण शरीरसे ममत्व है उसको तुम दूर करो ॥१६६४॥


अण्णं इमं सरीरं अण्णो जीवोत्ति णिच्छिदमदीओ ।
दुक्खभयकिलेसयारी मा हु ममत्तिं कुण सरीरे ॥१६६५॥

अर्थ: यह शरीर भिन्न है और जीव भिन्न है ऐसा निश्चय करके दुःख भय और क्लेशको करनेवाली ममता शरीरमें मत कर अर्थात् शरीरसे ममत्वको त्याग, वही सब दुःखोंका मूल है ॥१६६५॥


सव्वं अधियासंतो उवसग्गविधिं परीसहविधिं च ।
णिस्संगदाए सल्लिह असंकिलेसेण तं मोहं ॥१६६६॥

अर्थ: सब उपसर्गोंके प्रकारोंको और सब परीषहके प्रकारोंको सहन करते हुए तुम निःसंगत्वभावनासे संक्लेश परिणामोंके बिना मोहको कृश करो ॥१६६६॥


ण वि कारणं तणादोसंथारो ण वि य संघसमवाओ ।
साधुस्स संकिलेसंतस्स य मरणावसाणम्मि ॥१६६७॥

अर्थ: यदि मरते समय साधुके परिणाम संक्लेशरूप होते हैं तो तृण आदिका संथरा या वैयावृत्य करनेवाले साधुका समघट सल्लेखनाका कारण नहीं हो सकता । अर्थात् तृणादिके संथरा और वैयावृत्य करनेवाले साधु तो सल्लेखनाके बाह्य कारण हैं अन्तरंग कारण तो क्षपकका आर्त रौद्र रहित परिणाम ही है । उसके अभावमें केवल बाह्य कारणोंसे सल्लेखना नहीं हो सकती ॥१६६७॥


जह वाणियगा सागरजलम्मि णावाहिं रयणपुण्णाहिं ।
पट्टणमासण्णा वि हु पमादमूढा वि वज्जंति ॥१६६८॥

अर्थ: जैसे वणिक् रत्नोंसे भरी नावोंके साथ नगरके समीप तक आकर भी प्रमादवश मूढ होकर सागरके जलमें डूब जाते हैं ॥१६६८॥


सल्लेहणा विसुद्धा केई तह चेव विविहसंगेहिं ।
संथारे विहरंता वि संकिलिट्ठा विवज्जंति ॥१६६९॥

अर्थ: उसी प्रकार पहले विशुद्ध भावसे शरीरकी सल्लेखना करनेवाले भी कुछ क्षपक रागद्वेषादि भावरूप विविध परिग्रहोंके साथ संथरेपर आरूढ होते हुए भी संक्लेश परिणामों के कारण विनाशको प्राप्त होते हैं । अर्थात् प्रथम तो उनकी सल्लेखना ठीक रहती है । पीछे संक्लेश परिणाम होनेसे संथरेपर रहते हुए भी सल्लेखनासे भ्रष्ट हो जाते हैं ॥१६६९॥


सल्लेहणापरिस्समामेमं कयं दुक्करं च सामण्णं ।
मा अप्पसोक्खहेदुं तिलोगसारं वि णासेह ॥१६७०॥

अर्थ: हे क्षपक ! अनशन आदि तपके द्वारा तथा तीन प्रकारके आहार और जीवन पर्यन्तके लिये पानका त्याग करके शरीरको कृश करनेमें तुमने जो परिश्रम किया है और यह अत्यन्त कठिन मुनिपद धारण किया है और इन सबसे तुम्हें जो स्वर्ग और मोक्षका सातिशय सुख मिलनेवाला है, इन सबको आहार सेवनसे होनेवाले थोड़ेसे सुखके लिये नष्ट मत करो ॥१६७०॥


धीरपुरिसपण्णत्तं सप्पुरिसणिसेवियं उवणमित्ता ।
धण्णा णिरावयक्खा संथारगया णिसज्जंति ॥१६७१॥

अर्थ: उपसर्ग और परीषहोंके आनेपर भी जो विचलित नहीं होते उन धीर पुरुषोंके द्वारा कहे गये और श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा सेवित इस मार्गको अपनाकर पुण्यशाली क्षपक, त्याग और ग्रहणसे निरपेक्ष होकर संस्तरपर आरूढ़ होकर विशुद्ध होते हैं ॥१६७१॥


तम्हा कलेवरकुडी पव्वोढव्वत्ति णिम्ममो दुक्खं ।
कम्मफलमुवेक्खंतो विसहसु णिव्वेदणो चेव ॥१६७२॥

अर्थ: अतः यह शरीररूपी कुटिया त्यागने योग्य है ऐसा मानकर शरीरसे ममत्व मत करो । तथा कर्मफलकी उपेक्षा करते हुए दुःखको इस प्रकार सहो मानो दुःख है ही नहीं ॥१६७२॥


इय पण्णविज्जमाणो सो पुव्वं जायसंकिलेसादो ।
विणियत्तंतो दुक्खं पस्सइ परदेहदुक्खं वा ॥१६७३॥

अर्थ: इस प्रकार उपदेश द्वारा समझानेपर वह क्षपक पूर्वमें हुए संक्लेशरूप परिणामोंसे अपनेको हटाकर अपने दुःख इस प्रकार देखता है, मानो वह दुःख उसके शरीरमें नहीं है किन्तु किसी दूसरेके शरीरमें है ॥१६७३॥


रायादिमहड्ढीयागमणपओगेण चा वि माणिस्स ।
माणजणणेण कवयं कायव्वं तस्स खवयस्स ॥१६७४॥

अर्थ: महान् ऐश्वर्यशाली राजा आदिको उस क्षपकके पास लाकर भी उस अभिमानीको मानदान देकर उसका कवच ( रक्षाका उपाय ) करना चाहिये । उन्हें देख वह विचारता है कि मेरी सहनशीलताको देखनेके लिये ये बड़े-बड़े ऐश्वर्यशाली आये हुए हैं । इनके सामने भले ही मेरे प्राण जायें तो चले जायें । तथापि मैं अपनी मनस्विताको नहीं छोडूंगा । इस प्रकार वह मानप्रेमी दुःख सहता है किन्तु व्रतभंग नहीं करता ॥१६७४॥


इच्चेवमाइकवचं भणिदं उस्सग्गियं जिणमदम्मि ।
अववादियं च कवयं आगाढे होइ कादव्वं ॥१६७५॥

अर्थ: इस प्रकार जिनमतमें कवचका औत्सर्गिक अर्थात् सामान्य स्वरूप कहा है । मृत्यु निकट होनेपर आपवादिक अर्थात् विशेषरूप भी कवच करना चाहिये ॥१६७५॥


जह कवचेण अभिज्जेण कवचिओ रणमुहम्मि सत्तूणं ।
जायइ अलंघणिज्जो कम्मसमत्थो य जिणदि य ते ॥१६७६॥

अर्थ: जैसे अभेद्य कवचके द्वारा सुरक्षित योद्धा युद्धभूमिमें शत्रुओंके वशमें नहीं आता । तथा शत्रुपर प्रहार करनेमें समर्थ होता है और इस प्रकार शत्रुओंको जीत लेता है ॥१६७६॥


एवं खवओ कवचेण कवचिओ तह परीसहरिऊणं ।
जायइ अलंघणिज्जो ज्झाणसमत्थो य जिणदि य ते ॥१६७७॥

अर्थ: उसी प्रकार कवचसे सुरक्षित क्षपक परीषह आदिके वशमें नहीं आता । तथा ध्यान करनेमें समर्थ होता है और उन परीषहरूपी शत्रुओंको जीत लेता है ॥१६७७॥


एवं अधियासेंतो सम्मं खवओ परीसहे एदे ।
सव्वत्थ अपडिबद्धो उवेदि सव्वत्थ समभावं ॥१६७८॥

अर्थ: इस प्रकार इन तत्काल उपस्थित हुई परीषहोंको सम्यक् रूपसे सहन करता हुआ क्षपक सर्वत्र शरीर, वसति, संघ और परिचर्या करनेवालोंमें अप्रतिबद्ध होता है - ये मेरे हैं मैं इनका हूँ ऐसा संकल्प नहीं करता । तथा सर्वत्र जीवन मरण आदिमें समभावको - रागद्वेषसे रहितताको प्राप्त होता है ॥१६७८॥


सव्वेसु दव्वपज्जयविधीसु णिच्चं ममत्तिदो विजडो ।
णिप्पणयदोसमोहो उवेदि सव्वत्थ समभावं ॥१६७९॥

अर्थ: द्रव्य और पर्यायके समस्त भेदोंमें नित्य ममता दोषको त्याग स्नेह रहित, दोष रहित और मोहरहित होकर सर्वत्र समभावको प्राप्त होता है अर्थात् समस्त द्रव्यों और पर्यायोंमें ‘ये मेरे सुखके साधन हैं’ इस प्रकारका ममत्व भाव नहीं रखता । किन्तु सबमें समभाव रखता है । न किसीसे प्रीति करता है और न किसीसे द्वेष करता है ॥१६७९॥


संजोगविप्पओगेसु जहदि इट्ठेसु वा अणिट्ठेसु ।
रदि अरदि उस्सुगत्तं हरिसं दीणत्तणं च तहा ॥१६८०॥

अर्थ: कवचसे उपकृत हुआ क्षपक संयोगमें रति, वियोगमें अरति, इष्ट वस्तुमें उत्कण्ठा, इष्ट वस्तुके संयोगमें रति तथा हर्ष और इष्ट वस्तुके वियोगमें अरति तथा दीनता नहीं करता ॥१६८०॥


मित्ते सुयणादीसु य सिस्से साधम्मिए कुले चावि ।
रागं वा दोसं वा पुव्वं जायंपि सो जहइ ॥१६८१॥

अर्थ: अथवा कवचसे उपगृहीत वह क्षपक मित्रोंमें, बन्धुबान्धवोंमें, शिष्योंमें साधर्मी जनोंमें और कुलमें, पूर्वमें उत्पन्न हुए रागद्वेषको छोड़ देता है अर्थात् समाधि स्वीकार करनेसे पूर्वमें या दीक्षा ग्रहण करनेसे पूर्वमें जो रागद्वेष उत्पन्न हुआ है उसे दूर करता है साथ ही आगे भी रागद्वेष नहीं करता ॥१६८१॥


भोगेसु देवमाणुस्सगेसु ण करेइ पत्थणं खवओ ।
मग्गो विराधणाए भणिओ विसयाभिलासोत्ति ॥१६८२॥

अर्थ: तथा ऊपर कहे गये कवचसे उपग्रहीत क्षपक यह जानकर कि विषयोंकी अभिलाषा मोक्षमार्गकी विराधनाका मूल है, देव और मनुष्य सम्बन्धी भोगोंकी प्रार्थना नहीं करता ॥१६८२॥


इट्ठेसु अणिट्ठेसु य सद्दफरिसरसरूवगंधेसु ।
इहपरलोए जीविदमरणे माणावमाणे च ॥१६८३॥

अर्थ: कवचसे उपगृहीत होनेसे क्षपक इष्ट अनिष्ट शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्धमें, इस लोक और परलोकमें, जीवन और मरणमें, मान और अपमानमें सर्वत्र इष्ट अनिष्ट विकल्पसे मुक्त और रागद्वेषसे रहित होता है । क्योंकि क्षपकके रागद्वेष उत्तमार्थ अर्थात् रत्नत्रय, सम्यक् ध्यान और समाधिमरणको नष्ट कर देते हैं ॥१६८३-१६८४॥


सव्वत्थ णिव्विसेसो होदि तदो रागरोसरहिदप्पा ।
खवयस्स रागदोसा हु उत्तमट्ठं विणासंति ॥१६८४॥

अर्थ: कवचसे उपगृहीत होनेसे क्षपक इष्ट अनिष्ट शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्धमें, इस लोक और परलोकमें, जीवन और मरणमें, मान और अपमानमें सर्वत्र इष्ट अनिष्ट विकल्पसे मुक्त और रागद्वेषसे रहित होता है । क्योंकि क्षपकके रागद्वेष उत्तमार्थ अर्थात् रत्नत्रय, सम्यक् ध्यान और समाधिमरणको नष्ट कर देते हैं ॥१६८३ - १६८४॥ ॥१६८४॥


जदि वि य से चरिमंते समुदीरदि मारणंतियमसायं ।
सो तह वि असंमूढो उवेदि सव्वत्थ समभावं ॥१६८५॥

अर्थ: यद्यपि उस क्षपकको अन्तिम समयमें मरण प्राप्त होनेतक दुःख होता है तथापि वह कवचसे उपगृहीत क्षपक शरीरसे भी मोह न रखता हुआ सर्वत्र समभाव धारण करता है ॥१६८५॥


एवं सुभाविदप्पा विहरइ सो जाववीरियं काये ।
उट्ठाणे संवेसणे सयणे वा अपरिदंतो ॥१६८६॥

अर्थ: इस प्रकार निर्यापकाचार्यके द्वारा कहे गये पदार्थ स्वरूपसे अपने चित्तको सम्यक् रूपसे भावित करके वह क्षपक जबतक शरीरमें शक्ति रहती है तबतक बिना थके उठने बैठने और सोनेमें स्वयं प्रवृत्ति करता है ॥१६८६॥


जाहे सरीरचेट्ठा विगदत्थामस्स से यदणुभूदा ।
देहादि वि ओसग्गं सव्वत्तो कुणइ णिरवेक्खो ॥१६८७॥

अर्थ: जब शक्तिहीन होनेपर उसकी शारीरिक चेष्टा मन्द पड़ जाती है तब वह मन वचन कायसे निरपेक्ष होकर शरीरका भी त्याग करता है ॥१६८७॥


सेज्जा संथारं पाणयं च उवधिं तहा सरीरं च ।
विज्जावच्चकरा वि य वोसरइ समत्तमारूढो ॥१६८८॥

अर्थ: सम्पूर्ण रत्नत्रयमें आरूढ हुआ वह क्षपक वसति, तृणादि रूप संस्तर, पानक, पिच्छी, शरीर तथा वैयावृत्य करनेवालोंका भी त्याग कर देता है अर्थात् उन सबसे भी निरपेक्ष हो जाता है ॥१६८८॥


अवहट्टु कायजोगे व विप्पओगे य तत्थ सो सव्वे ।
सुद्धे मणप्पओगे होइ णिरुद्धज्झवसियप्पा ॥१६८९॥

अर्थ: वह सब काययोगों और वचनयोगोंको दूरकर शुद्ध मनोयोगमें स्थिर होता है । क्योंकि वह अपने ज्ञानरूप आत्माको युक्ति और तर्क वितर्कसे निश्चित करके उसे अन्य विषयोंमें जानेसे रोकता है ॥१६८९॥


एवं सव्वत्थेसु वि समभावं उवगओ विसुद्धप्पा ।
मित्ती करुणं मुदिदमुवेक्खं खवओ पुण उवेदि ॥१६९०॥

अर्थ: इस प्रकार सब वस्तुओंमें समताभाव धारण करके वह क्षपक निर्मल चित्त हो जाता है । फिर मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा भावनाको अपनाता है ॥१६९०॥


जीवेसु मित्तचिंता मेत्ती करुणा य होइ अणुकंपा ।
मुदिदा जदिगुणचिंता सुहदुक्खधियासणमुवेक्खा ॥१६९१॥

अर्थ: अनन्तकाल चारों गतियोंमें भ्रमण करते हुए घटीयंत्रकी तरह सभी प्राणियोंने मेरा बहुत उपकार किया है अतः उनमें मित्रताकी भावना होना मैत्री है । असह्य शारीरिक, आगन्तुक, मानसिक और स्वाभाविक दुःखको भोगते हुए प्राणियोंको देखकर, अरे बेचारे मिथ्यादर्शन, अविरति, कषाय और अशुभ योगसे उपार्जित अशुभ कर्मरूप पुद्गल स्कन्धोंके उदयसे उत्पन्न हुई विपदाओंको विवश होकर भोगते हैं । इस प्रकारके भावको करुणा या अनुकंपा कहते हैं । यतियोंके गुणोंके चिन्तनको मुदिता कहते हैं । यतिगण विनयी, रागरहित, भयरहित, मानरहित, रोषरहित और लोभरहित होते हैं इत्यादि चिन्तन मुदिता है । सुखमें राग और दुःखमें द्वेष न करना उपेक्षा है ॥१६९१॥


दंसणणाणचरित्तं तवं च विरियं समाधिजोगं च ।
तिविहेणुवसंपज्जिय सव्वुवरिल्लं कमं कुणइ ॥१६९२॥

अर्थ: दर्शन अर्थात् तत्त्वश्रद्धान, तत्त्वज्ञान और चारित्र अर्थात् वीतरागता, तप अर्थात् भोजनका त्याग, वीर्य अर्थात् अपनी शक्तिको न छिपाना, तथा समाधियोग अर्थात् चित्तकी एकाग्रता, इन सबको मन वचन कायसे प्राप्त करके क्षपक पूर्वके दर्शन आदिसे विशिष्ट दर्शन आदिमें पग धरता है ॥१६९२॥


जिदरागो जिददोसो जिदिंदिओ जिदभओ जिदकसाओ ।
अरदिरदिमोहमहणो ज्झाणोवगओ सदा होहि ॥१६९३॥

अर्थ: जो जितराग, जितद्वेष, जितेन्द्रिय, जितभय, जितकषाय और अरति रति तथा मोहका मथन करता है वह सदा ध्यानमें लीन रहता है ।


धम्मं चदुप्पयारं सुक्कं च चदुव्विधं किलेसहरं ।
संसारदुक्खभीओ दुण्णि वि ज्झाणाणि सो ज्झादि ॥१६९४॥

अर्थ: धर्मध्यान चार प्रकारका है और शुक्ल ध्यान भी चार प्रकारका है । ये ही ध्यान कष्टको हरनेवाले हैं । चतुर्गति परावर्तनरूप संसारमें जो दुःख होते हैं उनसे भीत मुनि धर्म और शुक्लध्यानोंको ध्याता है ॥१६९४॥


ण परीसहेहिं संताविदो वि सो झाइ अट्टरुद्दाणि ।
सुट्ठुवहाणे सुद्धं पि अट्टरुद्दा वि णासंति ॥१६९५॥

अर्थ: यह क्षपक परीषहोंसे पीड़ित होनेपर भी आर्त और रौद्रध्यान नहीं करता । क्योंकि आर्त और रौद्र ध्यान सुष्ठु उपधान अर्थात् संक्लेशरहित परिणामोंसे, विशुद्ध अर्थात् कर्मोंको निर्जीर्ण करनेकी शक्तिसहित भी समीचीन ध्यानको नष्ट कर देते हैं ॥१६९५॥


अट्टे चउप्पयारे रुद्दे य चउव्विधे य जे भेदा ।
ते सव्वे परिजाणदि संथारगदो तओ खवओ ॥१६९६॥

अर्थ: आर्तध्यानके जो चार भेद हैं और रौद्रध्यानके जो चार भेद हैं वे सब सस्तरपर आरूढ़ क्षपक जानता है । जो जिसको त्यागना चाहता है वह उसको यदि यथार्थरूपसे नहीं जानता तो कैसे उसका त्याग कर सकता है । अतः क्षपकको आर्त और रौद्र ध्यानोंका स्वरूप जानना चाहिये । इसलिये उनको भी बतलाते हैं ॥१६९६॥


अमणुण्णसंपओगे इट्ठविओए परिस्सहणिदाणे ।
अट्टं कसायसहियं झाणं भणियं समासेण ॥१६९७॥

अर्थ: अनिष्ट संयोग, इष्टवियोग, परीषह ( वेदना ) और निदान ये संक्षेपमें कषायसहित आर्तध्यानके चार भेद हैं ॥१६९७॥


तेणिक्कमोसहिंसारक्खणेसु तह चेव छव्विहारंभे ।
रुद्दं कसायसहियं झाणं भणियं समासेण ॥१६९८॥

अर्थ: चोरी, झूठ, और हिंसाका रक्षण तथा छह प्रकारके आरम्भको लेकर संक्षेपसे कषाय सहित रौद्रध्यानके चार भेद हैं ॥१६९८॥


अवहट्टु अट्टरुद्दे महाभये सुगदीए पच्चूहे ।
धम्मे सुक्के य सदा होदि समण्णागदमदी सो ॥१६९९॥

अर्थ: सुगतिमें विघ्न डालनेवाले और महान् भयके कारण होनेसे महाभयरूप रौद्र और आर्तध्यानको त्यागकर वह सम्यक् बुद्धिसम्पन्न क्षपक धर्मध्यान और शुक्लध्यानको ध्याता है ॥१६९९॥


इंदियकसायजोगणिरोधं इच्छं च णिज्जरं विउलं ।
चित्तस्स य वसियत्तं मग्गादु अविप्पणासं च ॥१७००॥

अर्थ: इन्द्रिय और कषायोंसे सम्बन्धको रोकने, अत्यधिक निर्जराको चाहने, चित्तको वशमें करने और रत्नत्रयरूप मोक्षमार्गको नष्ट न होने देनेके लिये क्षपक शुभ ध्यान ही करता है ॥१७००॥


किंचिवि दिट्ठिमुपावत्तइत्तु झाणे णिरुद्धदिट्ठीओ ।
अप्पाणंहि सदिं संधित्ता संसारमोक्खट्ठं ॥१७०१॥

अर्थ: बाह्य द्रव्यको देखनेकी ओरसे आँखोंको किञ्चित् हटाकर अर्थात् नाकके अग्र भागपर दृष्टिको स्थिर करके, एक विषयक परोक्षज्ञानमें चैतन्यको रोककर शुद्ध चिद्रूप अपनी आत्मामें स्मृतिका अनुसन्धान करे । गाथामें ‘निरुद्ध दृष्टि’ पद है । यहाँ दृष्टिमें निमित्त चैतन्यमें दृष्टि शब्दका प्रयोग किया है । और स्मृति शब्दसे श्रुतज्ञानके द्वारा जाने गये अर्थका स्मरण लिया है । अर्थात् दृष्टिको नाकके अग्रभागमें स्थापित करके किसी एक परोक्ष वस्तु विषयक ज्ञानमें मनको लगाकर श्रुतसे जाने हुए विषयोंका स्मरण करते हुए आत्मामें लीन हो । यह ध्यान संसारसे छूटनेके लिये किया जाता है ॥१७०१॥


पच्चाहरित्तु विसयेहिं इंदियाइं मणं च तेहिंतो ।
अप्पाणम्मि मणं तं जोगं पणिधाय धारेदि ॥१७०२॥

अर्थ: विषयोंसे इन्द्रियोंको और मनको हटाकर वीर्यान्तरायके क्षयोपशमसे उत्पन्न हुए वीर्य परिणामको स्थापित करके आत्मामें मनको लगाता है । अर्थात् वीर्य परिणामसे अपनी शुद्ध आत्मामें मनको धारण करता है ॥१७०२॥


एयग्गेण मणं रुंभिऊण धम्मं चउव्विहं झादि ।
अणापायविवागं विचयं संठाणविचयं च ॥१७०३॥

अर्थ: एक विषयमें मनको रोककर आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय इन चार प्रकारके धर्मध्यानको ध्याता है ॥१७०३॥


धम्मस्स लक्खणं से अज्जवलहुगत्तमद्दुवदेसा ।
उवदेसणा य सुत्ते णिसग्गजाओ रुचीओ दे ॥१७०४॥

अर्थ: आर्जव, लघुता, मार्दव, उपदेश और जिनागममें स्वाभाविक रुचि ये धर्मध्यानके लक्षण हैं ॥१७०४॥


आलंबणं च वायण पुच्छण परिवट्टणाणुपेहाओ ।
धम्मस्स तेण अविरुद्धाओ सव्वाणुपेहाओ ॥१७०५॥

अर्थ: वाचना, पृच्छना, परिवर्तन और अनुप्रेक्षा ये धर्मध्यानके आलम्बन हैं । तथा सब अनुप्रेक्षा धमध्यानके अविरुद्ध हैं ॥१७०५॥


पंचेव अत्थिकाया छज्जीवणिकाए दव्वमण्णे य ।
आणागेज्झे भावे आणाविचएण विचिणादि ॥१७०६॥

अर्थ: पाँच अस्तिकाय हैं - जीव, पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और आकाश । इन अस्तिकायोंको, तथा पाँच प्रकारके स्थावरकाय और त्रसकाय इन छह जीवनिकायोंको, कालद्रव्यको तथा अन्य कर्मबन्ध मोक्ष आदिको जो सर्वज्ञकी आज्ञासे ही गम्य है, आज्ञाविचय नामक धर्मध्यानके द्वारा विचार करता है । परम दयालु और राग-द्वेषसे रहित सर्वज्ञ देवने जिस रूपमें इन्हें कहा है वे उसी रूप हैं । इस प्रकारके चिन्तनको आज्ञाविचय धर्मध्यान कहते हैं ॥१७०६॥


कल्लाणपावगाणउपाये विचिणादि जिणमदमुवेच्च ।
विचिणादि वा अवाए जीवाण सुभे य असुभे य ॥१७०७॥

अर्थ: तीर्थङ्कर पदको देनेवाले दर्शनविशुद्धि आदिके उपाय निःशंकित आदिका विचार जिनभगवान्के द्वारा कथित उपदेशके अनुसार करता है। अथवा जीवोंके शुभ और अशुभ कर्मविषयक अपायोंका विचार करता है। इसका अभिप्राय यह है कि जीव शुभ और अशुभ कर्मोंसे कैसे छूटे इस प्रकारका सतत चिन्तन अपायविचय है ॥१७०७॥


एयाणेयभवगदं जीवाणं पुण्णपावकम्मफलं ।
उदओदीरणसंकमबंधे मोक्खं च विचिणादि ॥१७०८॥

अर्थ: जीवोंके एक भव या अनेक भव सम्बन्धी पुण्यकर्म और पापकर्मके फलका तथा उदय, उदीरणा, संक्रम, बन्ध और मोक्षका विचार करता है ॥१७०८॥


अह तिरियउड्ढलोए विचिणादि सपज्जए ससंठाणे ।
एत्थेव अणुगदाओ अणुपेहाओ वि विचिणादि ॥१७०९॥

अर्थ: पर्याय अर्थात् भेद सहित तथा वेत्रासन, झल्लरी और मृदंगके समान आकार सहित ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और मध्यलोकका चिन्तन करना संस्थानविचय धर्मध्यान है। इसी संस्थानविचयमें सम्बद्ध अनुप्रेक्षाओंका भी विचार करता है अर्थात् धर्मध्यानमें संसारके अनित्यत्वादि स्वभावका विचार करता है ॥१७०९॥


अद्धुवमसरणमेगत्तमण्णसंसारलोयमसुइत्तं ।
आसवसंवरणिज्जर धम्मं बोधिं च चिंतिज्ज ॥१७१०॥

अर्थ: अध्रुव, अशरण, एकत्व, अन्यत्व, संसार, लोक, अशुचित्व, आस्रव, संवर, निर्जरा, धर्म और बोधि इन बारह अनुप्रेक्षाओंका चिन्तन करना चाहिये ॥१७१०॥


लोगो विलीयदि इमो फेणोव्व सदेवमाणुसतिरिक्खो ।
रिद्धीओ सव्वाओ सुविणयसंदंसणसमाओ ॥१७११॥

अर्थ: देव, मनुष्य और तिर्यञ्चोंके साथ यह लोक जलके फेनके समान विनाशको प्राप्त होता है। इससे तीनों लोकोंको विनाशशील कहा है। सब ऋद्धियाँ भी स्वप्नज्ञानके समान विनाशीक हैं।


विज्जूव चंचलाइं दिट्ठपणट्ठाइं सव्वसोक्खाइं ।
जलबुब्बुदोव्व अधुवाणि हुंति सव्वाणि ठाणाणि ॥१७१२॥

अर्थ: इष्ट रूप आदि पाँच विषयोंके समूहके सम्बन्धसे उत्पन्न तथा मनसे उत्पन्न सब मनुष्यों तिर्यञ्चों और देवोंका सब सुख बिजलीके समान चपल है और देखते-देखते नष्ट होनेवाला है। आशय यह है कि मनुष्य सुखका लम्पटी होनेसे सैकड़ों वज्रपातोंके गिरनेसे होनेवाले कष्टको भी सहता है। किन्तु वे सब सुख जलके भारसे नम्र हुए गम्भीर घोर शब्द करने वाले नीले बादलोंके उदरमें चमकने वाली बिजुलीकी तरह हैं। इस अनित्यता दोषको प्रकट करनेसे सांसारिक सुखसे विमुख होनेका उपाय कहा है। तथा सब स्थान जलके बुलबुलेकी तरह अध्रुव हैं। जिनमें जीव ठहरते हैं उन्हें स्थान कहते हैं। वे स्थान हैं - गाँव, नगर आदि। यह मेरा स्थान है। मैं यहाँ रहता हूँ। ऐसा संकल्प तुम मत करो। वे स्थान अनित्य हैं। उन्हें नित्य समझकर ग्रहण करनेपर यदि वे नष्ट होते हैं तो मनमें बड़ा संक्लेश होता है। अथवा अपने किये विचित्र कर्मके उदयसे प्राणी जिनमें रहते हैं वे स्थान हैं इन्द्रपद, चक्रवर्तीपद, गणधरपद। ये सब स्थान अनित्य हैं ॥१७१२॥


णावागदाव बहुगइपधाविदा हुंति सव्वसंबंधी ।
सव्वेसिंआसया वि अणिच्चा जह अब्भसंघाया ॥१७१३॥

अर्थ: सब सम्बन्धी विचित्र शुभ या अशुभ परिणामोंसे बाँधे गये गति नामकर्मके वशसे प्राप्त मनुष्यगति, देवगति, नारकगति और तिर्यञ्चगति रूप पर्यायको ग्रहण करनेके लिये जानेवाले हैं अतः वे नावपर सवार यात्रियोंके समान हैं। जैसे नावपर सवार यात्री अपने-अपने स्थानपर चले जाते हैं उसी प्रकार हमारे सम्बन्धी अपने-अपने परिणामोंके अनुसार गति नामकर्मका बन्ध करके मरकर अपनी-अपनी गतिमें चले जाते हैं। इससे बन्धुताको अनित्य कहा है। जो जिस गतिमें है वह उसी गतिमें रहे, उसे छोड़े नहीं तो बन्धुपना स्थिर होता है। जिस गतिमें है उसे छोड़ अन्य गतिको ग्रहण करे तो नित्य कैसे हुई। जो पिता पुत्र आदि मरकर दूसरी गतिमें चले गये फिर भी यदि वे अपने बन्धु हैं तो अपने और परायेका भेद ही नहीं रहता। तथा जिन आश्रयोंसे प्राणी जीवित रहते हैं वे आश्रय भी, जैसे स्वामी और सेवक, पत्र, भ्राता आदि ये सब मेघपटलके समान अनित्य हैं ॥१७१३॥


संवासो वि अणिच्चो पहियाणं पिण्डणं व छाहीए ।
पीदी वि अच्छिरागोव्व अणिच्चा सव्वजीवाणं ॥१७१४॥

अर्थ: जैसे नाना दिशाओं और नाना देशोंसे आये हुए और भिन्न-भिन्न स्थानोंको जानेवाले पथिक मार्गके समीपमें स्थित अत्यन्त घने पलाश आदि वृक्षोंके फैले हुए शाखाभारसे सूर्यके तेजको दूर करनेवाले वृक्षोंकी शीतल और घनी छायामें अपना समाज बनाकर बैठते हैं और धूप ढलनेपर अपने-अपने स्थानोंको चले जाते हैं । उन्हींकी तरह मित्र, बन्धु और परिजनोंके साथ सहवास भी अनित्य है । वे भी आयु पूरी होनेपर अपने-अपने स्थानोंको चले जाते हैं ।तथा सब जीवोंकी प्रीति भी अनित्य है । जैसे प्रेमकलहके कारण या धूल पड़ जानेसे प्रिय स्त्रीकी क्रीड़ा करती हुई मछलियोंके उदर भागके समान श्वेत लोचनोंके कोनोंमें ललामी अनित्य है । अप्रिय आचरणरूपी विषकी कनी प्रेमरूपी नेत्रोंको नष्ट कर देती है यह बात सब प्राणियोंके अनुभवसे सिद्ध है अतः प्रीति भी अनित्य है ॥१७१४॥


रत्तिं एगम्मि दुमे सउणाणं पिण्डणं व संजोगो ।
परिवेसोव अणिच्चो इस्सरियाणाधणारोग्गं ॥१७१५॥

अर्थ: जैसे पक्षी सूर्यके अस्त होनेपर हम अमुक वृक्षपर मिलेंगे, ऐसा परस्परमें संकल्प नहीं करते । फिर भी जिस किसी प्रकार कुछ समयके लिये परस्परमें मिल जाते हैं । उसी प्रकार संसारके प्राणी भी समान कालरूप वायुसे प्रेरित होकर एक कुलरूपी वृक्षपर कुछ दिनोंके लिये आ मिलते हैं । तथा ऐश्वर्य, प्रभुता, आज्ञा, धन और आरोग्य भी सूर्यकी परिधिकी तरह अनित्य हैं ॥१७१५॥


इंदियसामग्गी वि अणिच्चा संझाव होइ जीवाणं ।
मज्झण्हं व णराणं जोव्वणमणवट्ठिदं लोए ॥१७१६॥

अर्थ: सन्ध्याकालकी तरह इन्द्रियोंकी सामग्री भी अनित्य है । क्योंकि लोकमें अन्धे और बहरे मनुष्य देखे जाते हैं । तथा मध्याह्न कालकी तरह लोकमें मनुष्योंका यौवन भी अनव- स्थित है। मनुष्य ‘मैं युवा हूं’ इस प्रकारसे अपनी प्रशंसा करता है। यौवनके घमण्डसे ही जानते हुए भी धर्ममें प्रयत्नशील नहीं होता। किन्तु वह यौवन मध्याह्नकालकी तरह अनवस्थित है। इस प्रकार शीघ्र ही जानेवाले यौवनका मनस्वियोंको मद कैसा ? अर्थात् यौवनका मद करना उचित नहीं है ॥१७१६॥


चंदो हीणो व पुणो वड्ढदि एदि य उदू अदीदो वि ।
णदु जोव्वणं णियत्तइ णदीजलमदच्छिदं चेव ॥१७१७॥

अर्थ: प्रतिदिन राहुके मुखरूपी बिलमें प्रवेश करनेसे चन्द्रमा कृष्णपक्षमें घटता है और पुनः शुक्लपक्षमें प्रतिदिन बढ़ता है। तथा हेमन्त, शिशिर, वसन्त आदि ऋतुएँ भी जाकर पुनः लौटती हैं। किन्तु बीता हुआ यौवन उसी भवनमें नहीं लौटता। जैसे नदीमें गया जल फिर वापिस नहीं आता। उसी प्रकार यौवन भी जाकर वापिस नहीं आता। इससे यौवनकी अत्यन्त अनित्यता दिखलाई है ॥१७१७॥


धावदि गिरिणदिसोदं व आउगं सव्वजीवलोगम्मि ।
सुकुमालदा वि हायदि लोगे पुव्वण्हछाही व ॥१७१८॥

अर्थ: सर्व जीवलोकमें आयु पहाड़ी नदीके प्रवाहकी तरह दौड़ती है। सुकुमारता भी पूर्वाह्नकी छायाके समान दौड़ती है। जैसे-जैसे सूर्य ऊपर उठता है वैसे-वैसे शरीरादिकी छाया घटती जाती है। उसी तरह ज्यों-ज्यों आयु बढ़ती है त्यों-त्यों सुकुमारता कम होती है ॥१७१८॥


अवरण्हरुक्खछाही व अहिदं वड्ढदे जरा लोगे ।
रूवं पि णासइ लहुं जलेव लिहिदल्लयं रूवं ॥१७१९॥

अर्थ: जैसे अपराह्न कालमें वृक्षोंकी छाया बढ़ती है वैसे ही लोकमें एक बार आनेपर बुढ़ापा बढ़ता जाता है। यह बुढ़ापा सुन्दरतारूपी कोमल पत्तोंके लिये वनकी आगकी लपटके समान है। सौभाग्यरूपी पुष्पोंके लिये ओलोंकी वर्षाके समान है। तारुण्यरूपी हरिणोंकी पंक्तिके लिये व्याघ्रके समान है। ज्ञानरूपी नेत्रके लिये धूलकी वर्षाके समान है। तपरूपी कमलोंके वनके लिये बर्फ गिरनेके समान है। अर्थात् वृद्धावस्थाके आनेपर सुन्दरता, सुभगता, तारुण्य, ज्ञान और तप सब क्षीण हो जाते हैं। यह वृद्धावस्था दीनताकी माता है, तिरस्कारकी धाय है, मृत्युकी दूती है और भयकी प्रिय सखी है। तथा जलमें लिखे हुए रूपके समान रूप भी शीघ्र नष्ट हो जाता है। यह रूप सुन्दर स्त्रियोंके कटाक्षरूपी सैकड़ों बाणोंके लिये तूणीरके समान है अर्थात् पुरुषके रूपको देखकर स्त्रियाँ उसपर कटाक्षबाण चलाती हैं। चित्तरूपी सूक्ष्मवस्त्रको रंगनेके लिये कुसुम्भके रंगके समान है। प्रीतिरूपी लताका मूल है। सौभाग्यरूपी वृक्षका फल है। पूज्यताका किनारा है। ऐसा रूप भी शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥१७१९॥


तेओ वि इंदधणुतेजसण्णिहो होइ सव्वजीवाणं ।
दिट्ठपणट्ठा बुद्धी वि होइ उक्काव जीवाणं ॥१७२०॥

अर्थ: शरीरका तेज भी इन्द्र धनुषके तेजके समान है। जैसे इन्द्रधनुषकी कान्ति मनुष्योंके नेत्रों और चित्तको आनन्दकारी होती है किन्तु क्षणभरमें नष्ट हो जाती है वही दशा शरीरकी कान्तिकी भी है। जो बुद्धि समस्त वस्तुओंके यथार्थस्वरूपको ढांकनेवाले अज्ञानरूपी अन्धकारके पटलको नष्ट करनेमें अतिशय दक्ष है, विचित्र दुःखरूपी मगरमच्छोंके समूहसे व्याप्त कुमतिरूपी विशाल नदीमें प्रवेश करनेसे रोकनेमें तत्पर है, चारित्ररूपी निधिको प्रकट करनेमें दीपककी बत्तीके समान है, समस्त सम्पदाओंको लानेवाली विद्यातुल्य है और मोक्षगतिरूपी नायिकाकी सखी है, ऐसी बुद्धि भी शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ॥१७२०॥


अदिवडइ बलं खिप्पं रूवं धूलीकदंबरछाए ।
वीचीव अद्धुवं वीरियंपि लोगम्मि जीवाणं ॥१७२१॥

अर्थ: जैसे मार्गमें धूलीसे रचा गया आकार शीघ्र नष्ट हो जाता है वैसे ही जीवोंका बल शीघ्र नष्ट हो जाता है। तथा जीवोंका वीर्य भी प्रचण्ड वायुके अभिघातसे उठी हुई चंचल तरंगमालाके समान अध्रुव है। जीवोंके शरीरकी दृढ़ताको बल और जीवोंके आत्मपरिणामको वीर्य कहते हैं। ये दोनों ही शीघ्र नष्ट होनेवाले हैं ॥१७२१॥


हिमणिचओ वि व गिहसयणासणभंडाणि होंति अधुवाणि ।
जसकित्ती वि अणिच्चा लोए संज्झब्भरागोव्व ॥१७२२॥

अर्थ: घर, शय्या, आसन, भाण्ड ये सब भी बर्फके समूहकी तरह अध्रुव हैं। तथा लोकमें यशकी कीर्ति भी सन्ध्याके समय आकाशकी लालिमाकी तरह अनित्य है ॥१७२२॥


किह दा सत्ता कम्मवसत्ता सारदियमेहसरिसमिणं ।
ण मुणंति जगमणिच्चं मरणभयसमुत्थिया संता ॥१७२३॥

अर्थ: मरणके भयसे युक्त होनेपर भी अपने-अपने कामोंमें लीन प्राणी शरत् कालके मेघके समान इस जगत्को अनित्य क्यों नहीं जानते ॥१७२३॥


णासदि मदी उदिण्णे कम्मे ण य तस्स दीसदि उवाओ ।
अमदंपि विसं सत्थं तणं पि णीया वि हुंति अरी ॥१७२४॥

अर्थ: कर्मका उदय होनेपर बुद्धि नष्ट हो जाती है । बुद्धि दो प्रकारकी होती है एक स्वाभाविक और दूसरी आगमिक । जिसके दोनों प्रकारकी बुद्धि होती है वह अपने हितको जानता है । जिसके वह बुद्धि नहीं होती वह नहीं जानता । कहा भी है - सन्त पुरुष दो प्रकारकी बुद्धि कहते हैं - एक स्वाभाविक, दूसरी आगमसे उत्पन्न हुई । जिस शरीरधारीके ये दोनों बुद्धियां होती हैं वह अपने इष्ट हितको प्राप्त करता है । जिसके दोनों बुद्धियां नहीं हैं वह हितको प्राप्त नहीं कर सकता । जिसके पास स्वाभाविक विशुद्ध बुद्धि तो है किन्तु जिसने शास्त्राभ्यास करके आगमिक बुद्धि प्राप्त नहीं की है वह हितकारी धर्मको उसी प्रकार नहीं देख सकता, जैसे दृष्टिसम्पन्न पुरुष रूपको देखते हुए भी भाषाके बिना उसको कह नहीं सकता । जिसके पास गुरुसे प्राप्त शास्त्र तो है किन्तु उसे समझनेकी स्वाभाविक विशुद्ध बुद्धि नहीं है वह भी श्रुतका फल नहीं प्राप्त कर सकता । जैसे अन्धा पुरुष हाथमें दीपक होते हुए भी उसका फल नहीं पाता । जिसके लोचन मुंदे हैं उसे दर्पणसे क्या लाभ ? जो न दान देता है न भोगता है उसे धनसे क्या लाभ ? जो डरपोक है उसे युद्धमें शस्त्रसे क्या लाभ ? इसी तरह मन्दबुद्धि पुरुषको शास्त्रसे क्या लाभ ? ॥ है । इस प्राणीका अज्ञानभाव महान् गुफाके भीतर भयंकर अन्धकारमें प्रवेश करनेसे, सदा अगाध जलमें डूबे रहनेसे और चिरकाल तक जेलखानेमें पड़े रहनेसे भी अधिक कष्टदायी है । अन्धकारमें प्रवेश जलमें डूबना और जेलखानेमें पड़े रहना तो एक ही भवमें दुःखदायी है किन्तु अज्ञानजन्य दुःख अनन्त भवोंमें दुःखदायी है । श्रुतज्ञान तीसरा विशाल नेत्र है । किन्तु बुद्धिसे रहित प्राणी उसे ग्रहण नहीं कर सकता । उस श्रुतज्ञानके होनेपर अन्धा मनुष्य भी मोक्षरूपी महानगरके कल्याणकारी मार्ग पर जाता है । ज्ञानावरण कर्म इस प्रकारकी अज्ञताको लाता है उसको निवारण करनेमें समर्थ कोई शरण नहीं है । उसके निवारणका कोई उपाय नहीं है । असातावेदनीय कर्मके उदयसे अमृत भी विष हो जाता है । तृण भी शस्त्र हो जाता है और बन्धु-बान्धव भी शत्रु हो जाते हैं ॥१७२४॥


मुक्खस्स वि होदि मदी कम्मोवसमे य दीसदि उवाओ ।
णीया अरी वि सत्थं वि तणं अमयं च होदि विसं ॥१७२५॥

अर्थ: ज्ञानावरणका क्षयोपशम होनेपर क्या होता है, यह कहते हैं - ज्ञानावरणका क्षयोपशम होनेपर मूर्खको भी बुद्धि प्राप्त होती है । पुण्यकर्मका उदय होनेसे कर्मोंके उपशमका उपाय दृष्टिगोचर होता है तथा सातावेदनीयके उदयमें शत्रु भी बन्धु हो जाते हैं, शस्त्र भी तृण हो जाता है और विष भी अमृत हो जाता है ॥१७२५॥


पाओदएण अत्थो हत्थं पत्तो वि णस्सदि णरस्स ।
दूरादो वि सपुण्णस्स एदि अत्थो अयत्तेण ॥१७२६॥

अर्थ: पाप अर्थात् लाभान्तराय कर्मके उदयसे मनुष्यके हाथमें आया भी पदार्थ नष्ट हो जाता है। और पुण्यवानको बिना प्रयत्न किये दूरसे भी पदार्थ प्राप्त होता है ॥१७२६॥


पाओदएण सुट्ठु वि चेट्ठंतो को वि पाउणदि दोसं ।
पुण्णोदएण दुट्ठु वि चेट्ठंतो को वि लहदि गुणं ॥१७२७॥

अर्थ: पाप अर्थात् अयशःकीर्ति नामक कर्मके उदयसे सम्यक् चेष्टा करनेवाला भी दोषका भागी होता है। और पुण्य कर्मके उदयसे न करने योग्य भी काम करनेवाला प्रशंसाका पात्र होता है ॥१७२७॥


पुण्णोदएण कस्सइ गुणे असंते वि होइ जसकित्ती ।
पाओदएण कस्सइ सगुणस्स वि होइ जसघाओ ॥१७२८॥

अर्थ: पुण्यके उदयसे किसीमें गुण न होते भी उसका यश फैलता है। और पापके उदयसे गुणवानका भी अपयश होता है ॥१७२८॥


णिरुवक्कमस्स कम्मस्स फले समुवट्ठिदंमि दुक्खंमि ।
जादिजरामरणरुजाचिंताभयवेदणादीए ॥१७२९॥

अर्थ: जिसका कोई प्रतीकार नहीं है ऐसे कर्मका उदय आनेपर जन्म, जरा, मरण, रोग, चिन्ता, भय, वेदना आदि दुःख भोगने होते हैं ॥१७२९॥


जीवाण णत्थि कोई ताणं सरणं च जो हवेज्ज इधं ।
पायालमदिगदो वि य ण मुच्चदि सकम्मउदयम्मि ॥१७३०॥

अर्थ: ऐसी अवस्थामें जीवका कोई रक्षक नहीं है जिसकी वह शरणमें जाये। अपने कर्मके उदयमें पातालमें प्रवेश करनेपर भी कर्मसे छुटकारा नहीं होता ॥१७३०॥


गिरिकंदरं च अडविं सेलं भूमिं च उदधि लोगंतं ।
अदिगंतूणं वि जीवो ण मुच्चदि उदिण्णकम्मेण ॥१७३१॥

अर्थ: पहाड़की गुफा, अटवी, पर्वत, भूमि, समुद्र, यहाँ तक कि लोकके अन्त तक चले जानेपर भी जीव उदयप्राप्त कर्मसे नहीं छूटता ॥१७३१॥


दुगचदुअणेयपाया परिसप्पादी य जंति भूमीओ ।
मच्छा जलम्मि पक्खी णभम्मि कम्मं तु सव्वत्थ ॥१७३२॥

अर्थ: दोपाये, चौपाये और अनेक पैर वाले सर्प आदि तो भूमिपर ही जाते हैं । मच्छ जलमें जाते हैं । पक्षी आकाशमें जाते हैं किन्तु कर्म सर्वत्र पहुंचता है । उसकी गति सर्वत्र है ॥१७३२॥


रविचंदवादवेउव्वियाणमगमा वि अत्थि हु पदेसा ।
ण पुणो अत्थि पएसो अगमो कम्मस्स होइ इह ॥१७३३॥

अर्थ: लोकमें ऐसे प्रदेश हैं जो सूर्य, चन्द्र, वायु और देवोंके द्वारा अगम्य हैं अर्थात् जहाँ ये नहीं जा सकते । किन्तु ऐसा कोई प्रदेश नहीं है जहाँ कर्मकी गति नहीं है ॥१७३३॥


विज्जोसहमंतबलं बलवीरिय अस्सहत्थिरहजोहा ।
सामादिउवाया वा ण होंति कम्मोदए सरणं ॥१७३४॥

अर्थ: कर्मका उदय होनेपर विद्या, मंत्र, औषध, बल, वीर्य, घोड़े, हाथी, रथ, योद्धा, साम, दाम, दण्ड, भेद आदि उपाय शरण नहीं हैं ॥१७३४॥


जह आइच्चमुदिंतं कोई वारंतओ जगे णत्थि ।
तह कम्ममुदीरंतं कोई वारंतओ जगे णत्थि ॥१७३५॥

अर्थ: जैसे सूर्यको उदयाचलके मस्तकपर आनेको जगत्में कोई नहीं रोक सकता उसी प्रकार सहकारी कारणोंके मिलनेपर उदयमें आये कर्मको जगत्में कोई रोक नहीं सकता ॥१७३५॥


रोगाणं पडिगारा दिट्ठा कम्मस्स णत्थि पडिगारो ।
कम्मं मलेदि हु जगं हत्थीव णिरंकुसो मत्तो ॥१७३६ । ॥१७३६॥

अर्थ: रोगोंका प्रतीकार औषध आदि हैं किन्तु कर्मका कोई प्रतीकार नहीं है। जैसे निरंकुश मत्त हाथी कमलिनीके वनको उजाड़ देता है वैसे ही कर्म समस्त जगत्को मसल देता है ॥१७३६॥


रोगाणं पडिगारो णत्थि य कम्मे णरस्स समुदिण्णे ।
रोगाणं पडिगारो होदि हु कम्मे उवसमंते ॥१७३७॥

अर्थ: असातावेदनीय कर्मका उदय होनेपर रोगोंका प्रतीकार नहीं है। पथ्य औषध आदिसे जो रोगोंका उपशम होता है वह भी कर्मका उपशम होनेपर ही होता है। कर्मका उपशम न होनेपर औषध आदि भी लाभकारी नहीं होती ॥१७३७॥


विज्जाहरा य बलदेववासुदेवा य चक्कवट्टी वा ।
देविंदा व ण सरणं कस्सइ कम्मोदए होंति ॥१७३८॥

अर्थ: कर्मका उदय होनेपर विद्याधर, बलदेव, वासुदेव, चक्रवर्ती अथवा देवेन्द्र जैसे महाबली, महापराक्रमी भी किसीके शरण नहीं होते। वे भी रक्षा नहीं कर सकते ॥१७३८॥


वोल्लेज्ज च कमंतो भूमिं उदधिं तरिज्ज पवमाणो ।
ण पुणो तीरदि कम्मस्स फलमुदिण्णस्स वोलेदुं ॥१७३९॥

अर्थ: चलता हुआ प्राणी भूमिको लाँघ सकता है। तैरता हुआ प्राणी समुद्रको तैर सकता है। किन्तु उदयागत कर्मके फलको उल्लंघन कोई महाबली भी नहीं कर सकता। उसे सबको भोगना पड़ता ही है ॥१७३९॥


सीहतिमिंगिलगहिदस्स मगो मच्छो व णत्थि जह सरणं ।
कम्मोदयम्मि जीवस्स णत्थि सरणं तहा कोई ॥१७४०॥

अर्थ: जैसे कोई सिंह किसी मृगको पकड़ ले तो दूसरा मृग उसकी रक्षा नहीं कर सकता। या तिमिगल नामक महामत्स्य किसी मच्छको पकड़ ले तो दूसरा मच्छ उसको नहीं छुड़ा सकता । उसी प्रकार कर्मका उदय आनेपर जीवका कोई शरण नहीं होता ॥१७४०॥


दंसणणाणचरित्तं तवो य ताणं च होइ सरणं च ।
जीवस्स कम्मणासणहेदुं कम्मे उदिण्णम्मि ॥१७४१॥

अर्थ: जीवके असातावेदनीय आदि कर्मका उदय होनेपर कर्मोंके नाशके कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र और सम्यक् तप ही रक्षक हैं और शरण हैं ॥१७४१॥


पावं करेदि जीवो बंधवहेदुं सरीरहेदुं च ।
णिरयादिसु तस्स फलं एक्को सो चेव वेदेदि ॥१७४२॥

अर्थ: जीव बन्धु-बान्धवोंके निमित्त और शरीरके निमित्त पाप करता है । और बान्धवोंके तथा अपने शरीरके पोषणके लिये जो पापकर्म करता है उसका फल नरकादिमें अकेला ही भोगता है ॥१७४२॥


रोगादिवेदणाओ वेदयमाणस्स णिययकम्मफलं ।
पेच्छंता वि समक्खं किंचिवि ण करंति से णियया ॥१७४३॥

अर्थ: अपने मनोयोग, वचनयोग और काययोगसे संचित कर्मका फल जब यह जीव भोगता है तो प्रत्यक्ष देखते हुए भी उसके बन्धुगण कुछ भी उसका प्रतीकार नहीं करते । इस लोक और परलोकमें जीव अकेला ही भोगता है । उसके कर्मफलका बटवारा करनेमें समर्थ कोई भी नहीं है । यह इसका अभिप्राय है ॥१७४३॥


तह मरइ एक्कओ चेव तस्स ण विदिज्जगो हवइ कोई ।
भोगे भोत्तुं णियया विदिज्जया ण पुण कम्मफलं ॥१७४४॥

अर्थ: जैसे यह जीव अपने कर्मफलको स्वयं ही भोगता है उसी प्रकार अपनी आयु समाप्त होनेपर अकेला ही प्राणोंको त्यागता है । दूसरा कोई भी उसका सहायक नहीं है । अर्थात् उसके मरणका भागीदार बनकर कोई भी उसकी सहायता नहीं करता । यदि एक ही मरता है ऐसा न हो तो एकके साथ बहुतोंको मरण प्राप्त होता है । जो भोगे जाते हैं उन्हें भोग कहते हैं । भोजन, वस्त्र, मुखको सुवासित करनेवाले द्रव्य भोग हैं । भोगोंको भोगनेमें तो अपने बन्धु-बान्धव सहायक होते हैं । किन्तु उसके कर्मों का फल भोगनेमें कोई सहायक नहीं होता ॥१७४४॥


णीया अत्था देहादिया य संगा ण कस्स इह होंति ।
परलोगं अण्णेत्ता जदि वि दइज्जंति ते सुट्ठु ॥१७४५॥

अर्थ: बन्धु-बान्धव, धन और शरीर आदि परिग्रह किसीके नहीं होते । जब यह जीव परलोक जाता है तो उसके साथ नहीं जाते । यद्यपि मनुष्य परिग्रहोंसे बहुत अनुराग रखता है । वह यदि उनको पकड़कर साथ ले जाना चाहे तो भी वे उसके साथ नहीं जाते । जीव अकेला ही जाता है । यह एकत्व भावना है ॥१७४५॥

गाथा १७४६ से २०१९

इहलोगबंधवा ते णियया परस्स होंति लोगस्स ।
तह चेव धणं देहो संगा सयणासणादी य ॥१७४६॥

अर्थ: जो इस जन्ममें बान्धव हैं वे परलोकमें बान्धव नहीं होते । बान्धवोंकी ही तरह धन, शरीर, शयन, आसन आदि परिग्रह भी इसी लोकमें काम आते है परलोकमें नहीं । यदि वे बान्धव और परिग्रह सदा रहनेवाले हों तो उन्हें सहायक कहा जा सकता है । जब वे इसी जन्ममें नष्ट हो जाते हैं तो वे परलोकमें जानेपर साथमें जायेंगे, इसकी आशा कैसी ? ॥१७४६॥


जो पुण धम्मो जीवेण कदो सम्मत्तचरणसुदमइओ ।
सो परलोए जीवस्स होइ गुणकारकसहाओ ॥१७४७॥

अर्थ: जीवने सम्यक्त्वचारित्र ज्ञानरूप अर्थात् रत्नत्रयरूप धर्म किया है जो दुर्गतिमें जानेवाले जीवका धारण करता है उसे शुभ स्थानमें धरता है वह धर्म है इस तरह रत्नत्रयको धर्म कहते हैं । यह धर्म परलोकमें जीवका गुणकारक सहायक होता है । क्योंकि उससे सांसारिक और पारमार्थिक सुख मिलता है । कहा है - वह धर्म हमारी रक्षा करे जो मर्त्यलोक और स्वर्गलोकके भय, शोक और विषादसे रहित विषय सुखको देकर देवेन्द्रों और राजेन्द्रोंसे विशिष्ट रूपसे पूजित तीन लोकोंका स्वामी तीर्थङ्कर पद प्रदान करता है तथा अन्तमें मृत्यु, रोग, जन्म, प्रियवियोग, जरा, व्याधि और शोकसे रहित नित्य उत्कृष्ट और अनुपम सुखवाले मोक्षमें ले जाता है ।


बद्धस्स बंधणेण व ण रागो देहम्मि होइ णाणिस्स ।
विससरिसेसु ण रागो अत्थेसु महाभयेसु तहा ॥१७४८॥

अर्थ: जैसे पुरुष रस्सी सांकल आदिसे बँधा है उसे बन्धन क्रियामें साधकतम रस्सी आदिमें राग नहीं होता क्योंकि वे उसके दुःखमें हेतु हैं, उसी प्रकार जो अपने सुख और दुःखके साधनोंमें भेदको जानता है उसे दुःखके हेतु, असार, अस्थिर अशुचि शरीरमें राग नहीं होता। विद्वान्जन गुणोंके पक्षपाती होते हैं। अतः विषके समान सब अर्थोमें ज्ञानीका राग नहीं होता। आदिको कोई अपना सहायक नहीं मानता । उसी प्रकार शरीर धन वगैरह भी अपकार करनेवाले हैं । इस प्रकार बार-बार अभ्यास करनेसे 'मेरा कोई अन्य सहाय नहीं है । ऐसा सतत चिन्तन चलता है ॥१७४८॥


किहदा जीवो अण्णो अण्णं सोयदि हु दुक्खियं णीयं ।
ण य बहुदुक्खपुरक्कडमप्पाणं सोयदि अबुद्धी ॥१७४९॥

अर्थ: अन्य जीव अपनेसे अन्य सम्बन्धी जनोंको दुःखसे पीड़ित देखकर कैसे शोक करता है ? किन्तु यह अज्ञानी शारीरिक, आगन्तुक, मानसिक और स्वाभाविक अनेक दुःखोंसे घिरे हुए अपने आत्माकी चिन्ता नहीं करता है कि अतीतकालमें मैंने चारों गतियोंमें अनेक प्रकारके असातावेदनीयके उदयसे तथा द्रव्य क्षेत्र काल और भावरूप सहकारी कारणोंके मिलनेसे निरन्तर आपदाएँ भोगीं और वे आपदाएँ पुनः मुझे परेशान करनेके लिये भविष्यमें आयेंगी । सहकारी कारणोंके साथ कारणके रहते हुए कार्य अवश्य उत्पन्न होता है । जो जिसके रहते हुए भी उत्पन्न नहीं होता वह उसका कारण कैसे हो सकता है ? जैसे जौ बोनेपर आमका अंकुर पैदा नहीं होता अतः आमके अंकुरका कारण जौके बीज नहीं हैं । उसी प्रकार असातावेदनीयका उदय होते हुए भी यदि दुःख नहीं होता तो असातावेदनीय दुःखका कारण नहीं हो सकता । किन्तु असातावेदनीयके उदयमें दुःख अवश्य होता है । अतः आत्माके प्रदेशोंमें जो दुःखके कारण उपस्थित हैं उनका विनाश किस उपायसे होगा, ऐसा विचार न करनेसे उसे अबुद्धि कहा है । कहनेका अभिप्राय यह है कि यह अज्ञानी जीव दूसरेके दुःखको अपना ही दुःख मानकर शोक करता है और उसके विनाशका निरन्तर प्रयत्न करता है । और ऐसा करनेसे अपने दुःखको दूर करनेका प्रारम्भ भी नहीं कर पाता । इससे दुःख भोगते-भोगते भ्रमण करता है । दूसरेको दुःखसे बचाना शक्य नहीं है । उसने जो कर्मबन्ध किया है वह उसे फल क्यों नहीं देगा ? दूसरेके शोक करनेसे फल देनेवाले कर्म रुक नहीं जाते । कहा भी है - ‘पूर्वमें मन, वचन, कायसे जो कर्म किये है। सब इन्द्र भी मिलकर उनका निवारण नहीं कर सकते’। इसलिये दूसरेके दुःखको देखकर उसका शोक करना व्यर्थ है। अन्य शब्दसे परके दुःखको अपने दुःखसे भिन्न कहा है। परके आगत दुःखको अपनेसे भिन्न चिन्तन करना अन्यत्वानुप्रेक्षा है। इस प्रकार परके दुःखको अपनेसे भिन्न विचार करता हुआ जानता है कि परके दुःखका विनाश करना शक्य नहीं है इसलिये वह उसका शोक नहीं करता। और अपने दुःखके विनाशमें प्रयत्नशील रहता है। यह आचार्यका अभिप्राय है ॥१७४९॥


संसारम्मि अणंते सगेण कम्मेण हीरमाणाणं ।
को कस्स होइ सयणो सज्जइ मोहा जणम्मि जणो ॥१७५०॥

अर्थ: पंचपरावर्तन रूप संसारके अनन्त होते हुए अपने मिथ्यादर्शन आदि परिणामोंसे उत्पन्न हुए पुद्गल स्कन्धरूप कर्म पर्यायके द्वारा अनेक गतियोंमें भ्रमण करते हुए जीवका कौन किसका स्वजन है ? यह स्वजन है और यह परजन है यह भेद हो सकता था यदि जो जिसका स्वजन है वह उसीका स्वजन सदा रहता और परजन कभी भी स्वजन न होता। किन्तु अपने-अपने कर्मोंके अधीन जीवोंका यह नियम नहीं हो सकता। अतः न कोई मेरा स्वजन है और न कोई परजन है। मिथ्यात्व आदि गुणस्थानोंके भेदसे नाना भेदरूप हुई समस्त जीवराशि मुझसे भिन्न ही है ऐसा जिसने निश्चय किया है उसका किसीमें ही दया और प्रीति और किसीमें निर्दयता और द्वेष यह असामनतारूप व्यवहार नहीं बनता। इसलिये जो राग-द्वेषसे रहित है उसका चारित्र सर्वत्र एकरूप होता है। यह मेरा भाई, पिता, पुत्र, भानेज, दास या स्वामी है इस प्रकार आसक्ति मनुष्य मोहवश करता है। वस्तुतत्त्व तो अन्यतामात्र रूप है उसमें कोई स्वजन नहीं है ॥१७५०॥


सव्वो वि जणो सयणो सव्वस्स वि आसि तीदकालम्मि ।
एंते य तहाकाले होहिदि सजणो जणस्स जणो ॥१७५१॥

अर्थ: अतीतकालमें सब प्राणियोंके समस्त अनन्त जीव स्वजन थे । तथा भविष्यत् कालमें सब प्राणियोंके सब जीव स्वजन होंगे ॥१७५१॥


रत्तिं रत्तिं रुक्खे रुक्खे जह सउणयाण संगमणं ।
जादीए जादीए जणस्स तह संगमो होई ॥१७५२॥

अर्थ: जैसे प्रत्येक रात्रिमें प्रत्येक वृक्षपर पक्षियोंका संगम होता है उसी प्रकार जन्म-जन्ममें मनुष्योंका संगम होता है ॥१७५२॥


पहिया उवासये जह तहिं तहिं अल्लियंति ते य पुणो ।
छंडित्ता जंति णरा तह णीयसमागमा सव्वे ॥१७५३॥

अर्थ: जैसे किसी उपाश्रयमें पथिक विभिन्न ग्राम नगर आदिमें परस्परमें मिलते हैं । पीछे वे सब उस उपाश्रयको छोड़कर अपने-अपने देशको चले जाते हैं । उसी प्रकार सब बन्धु-बान्धवोंका समागम है । इससे बन्धुसमागमको भी अनित्य कहा है ॥१७५३॥


भिण्णपयडिम्मि लोए को कस्स सभावदो पिओ होज्ज ।
कज्जं पडि संबंधं वालुयमुट्ठीव जगमिणमो ॥१७५४॥

अर्थ: लोगोंके अलग-अलग स्वभाव होते हैं । ऐसे नाना स्वभाववाले लोकमें कौन किसको स्वभावसे प्रिय हो सकता है । समानशील वालोंमें ही मित्रता होती है । किन्तु सब बन्धु-बान्धव तो समान शीलवाले नहीं होते । तब कैसे वह उनका बन्धु हो सकता है । कार्यको लेकर ही सम्बन्ध होता है । कार्यके न रहनेपर सम्बन्ध नहीं रहता । जैसे रेतका प्रत्येक कण अपना भिन्न स्वभाव रखता है । किसी मिलानेवाले द्रव्यके बिना उनका परस्परमें कोई स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है । पानी आदिके सम्बन्धसे ही वे परस्परमें मिलते हैं । अन्यथा मुट्ठीमें अलग-अलग ही रहते हैं । इसी प्रकार स्वजन भी कार्यवश ही परस्परमें मिलते हैं ॥१७५४॥


माया पोसेइ सुयं आधारो मे भविस्सदि इमोत्ति ।
पोसेदि सुदो मादं गब्भे धरिओ इमाएत्ति ॥१७५५॥

अर्थ: यह मेरा बुढ़ापेमें आधार होगा इस भावनासे माता पुत्रका पालन करती है और पुत्र माताका पालन करता है कि इसने मुझे गर्भमें धारण किया था ॥१७५५॥


होउण अरी वि पुणो मित्तं उवकारकारणा होइ ।
पुत्तो वि खणेण अरी जायदि अवयारकरणेण ॥१७५६॥

अर्थ: शत्रु होकर भी उपकार करनेसे मित्र हो जाता है। अपकार करनेसे पुत्र भी क्षणभरमें शत्रु हो जाता है। अर्थात् यदि पुत्र माता पिताका तिरस्कार करता है उन्हें मारता है तो वह शत्रु ही प्रतीत होता है ॥१७५६॥


तम्हा ण कोइ कस्सइ सयणो व जणो व अत्थि संसारे ।
कज्जं पडि हुंति जगे णीया व अरी व जीवाणं ॥१७५७॥

अर्थ: इसलिये संसारमें कोई किसीका न स्वजन है और न परजन है। उपकार और अपकार रूप कार्यको लेकर ही जीवोंके मित्र या शत्रु बनते हैं ॥१७५७॥


जो जस्स वट्टदि हिदे पुरिसो सो तस्स बंधवो होदि ।
जो जस्स कुणदि अहिदं सो तस्स रिवुत्ति णायव्वो ॥१७५८॥

अर्थ: जो पुरुष जिसका उपकार करता है वह उसका बान्धव होता है । और जो जिसका अहित करता है वह उसका शत्रु होता है । यह मित्र और शत्रुका लक्षण जानना ॥१७५८॥


णीया करंति विग्घं मोक्खब्भुदयावहस्स धम्मस्स ।
कारिंति य अइबहुगं असंजमं तिव्वदुक्खकरं ॥१७५९॥

अर्थ: बन्धुगण दुःख देनेवाले सब कर्मोंका पूर्णरूपसे विनाश और संसारका सातिशय दुःख देनेवाले रत्नत्रयरूप धर्ममें विघ्न करते हैं । और दुःसह नरकादिके दुःखोंको लानेमें तत्पर हिंसा, झूठ, चोरी आदि असंयम कराते हैं । अर्थात् यदि कोई जिनदीक्षा आदि लेकर आत्म-कल्याणमें लगना चाहता है तो परिवारके लोग उसे रोकते हैं तथा अपने पोषणके लिये मनुष्यको बुरे कर्म करनेकी प्रेरणा करते हैं । तो हितसाधनमें विघ्न करनेसे और अहितमें लगानेसे बन्धु शत्रु हैं, यह इससे दिखलाया है । इसका अभिप्राय यह है कि जो अन्य बान्धव आदि रूपसे इष्ट हैं उन्हें भी शत्रु रूपसे विचारना कि ये मेरे मित्र नहीं हैं, शत्रु हैं, अन्यत्वानुप्रेक्षा है ॥१७५९॥


णीया सत्तू पुरिसस्स हुंति जदिधम्मविग्घकरणेण ।
कारेंति य अतिबहुगं असंजमं तिव्वदुःखयरं ॥१७६०॥

अर्थ: पुरुषके यति धर्म स्वीकार करनेमें विघ्न करनेसे बन्धुगण शत्रु होते हैं तथा वे अत्यन्त दुःसह दुःखदायी असंयम कराते हैं इसलिये भी वे शत्रु हैं ॥१७६०॥


पुरिसस्स पुणो साधू उज्जोवं संजणंति जदिधम्मे ।
तध तिव्वदुक्खकरणं असंजमं परिहरावेंति ॥१७६१॥

अर्थ: किन्तु साधु सर्व आरम्भ और सर्व परिग्रहके त्यागरूप मुनिधर्ममें पुरुषको तत्पर करते हैं और तीव्र दुःखदायी असंयमका त्याग कराते हैं ॥१७६१॥


तम्हा णीया पुरिसस्स होंति साहू अणेयसुहहेदु ।
संसारमदीणंता णीया य णरस्स होंति अरी ॥१७६२॥

अर्थ: अतः हितमें लगाने और अहितसे रोकनेके कारण साधुगण बन्धु हैं। वे इन्द्रियजन्य और अतीन्द्रिय सुखके कारण हैं तथा अनेक दुःखोंसे भरे अपार संसारसे पार उतारते हैं। इस गाथाके द्वारा अपनेसे अन्य साधुगणोंका मित्ररूपसे और बन्धुगणोंका शत्रुरूपसे चिन्तन करनेको अन्यत्वानुप्रेक्षा कहा है। ऐसा चिन्तन करनेसे धर्ममें और धर्मका उपदेश करनेवाले साधुगणमें महान् आदर होता है। और सर्व इष्ट सुखको देनेवाले धर्ममें विघ्न करनेवालोंमें और जिसपरसे उतरना दुष्कर है उस चार गतिरूपी घटीयंत्रपर चढ़ाने वालोंमें अत्यन्त अनादर होता है ॥१७६२॥


मिच्छत्तमोहिदमदी संसारमहाडवी तदोदीदि ।
जिणवयणविप्पणट्ठो महाडवीविप्पणट्ठो वा ॥१७६३॥

अर्थ: दर्शनमोहके उदयसे जो वस्तुके यथार्थस्वरूपका अश्रद्धान है उसे मिथ्यात्व कहते हैं। उस मिथ्यात्वके कारण जिसकी मति मोहित है वह मिथ्यात्वसे मोहितमति होनेसे संसाररूपी महा अटवीमें प्रवेश करता है। महाअटवीके समान ही संसारको पार करना कठिन है वह अनेक दुःखोंसे भरा है तथा प्राणीका विनाश करनेवाला है इसलिये संसारको महाटवी कहा है।


बहुतिव्वदुक्खसलिलं अणंतकायप्पवेसपादालं ।
चदुपरिवट्टावत्तं चदुगदिबहुपट्टमणंतं ॥१७६४॥

अर्थ: जिस संसाररूपी महासमुद्रमें तीव्र दुःखरूपी जल भरा है और अनन्त जीवोंके काय अर्थात् शरीरको अनन्तकाय कहते हैं। अनन्तकायमें प्रवेश ही जिस संसार समुद्रमें पाताल हैं। अथवा ‘यह शरीर इसी जीवका है’ ऐसा अन्त अर्थात् निश्चय जहाँ नहीं वह काय अनन्त है क्योंकि एक शरीरमें बहुतसे जीव समानरूपसे रहते हैं। वह अनन्तकाय जिस जीवकी है वह अनन्तकाय है। ‘भाव प्रत्ययके बिना भी निर्देश भावप्रधान होता है’ इस नियमके अनुसार अर्थ होता है अनन्त कायत्वका प्रवेश अनन्तकाय प्रवेश। वही जिसमें पाताल है। तथा द्रव्य क्षेत्र काल और भाव परिवर्तन रूप जिसमें चार भँवर हैं। और चारगतिरूप महान् द्वीप हैं तथा जो अनन्त है ॥१७६४॥


हिंसादिदोसमगरादिसावदं दुविहजीवबहुमच्छं ।
जाइजरामरणोदयमणेयजादीसदुम्मीयं ॥१७६५॥

अर्थ: उस संसाररूपी समुद्रमें हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्म और परिग्रहरूपी मगर आदि क्रूर जन्तु रहते हैं। स्थावर और जंगम जीवरूप बहुतसे मच्छ हैं। जाति अर्थात् नया शरीर धारण करना, जरा अर्थात् वर्तमान शरीरके तेज बल आदिमें कमी होना, मरण अर्थात् शरीरका त्याग। ये जाति जरा और मरण उसके उठान हैं तथा सैकड़ों जातियाँरूपी उसमें तरंगें हैं। एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चौइन्द्रिय और पंचेन्द्रिय ये पाँच जातियाँ हैं। इनमेंसे प्रत्येकके अनेक अवान्तर भेद हैं। जैसे एकेन्द्रिय जातिके पृथिवीकायिक, जलकायिक, तेजस्कायिक, वनस्पतिकायिक आदि अनेक भेद हैं। उनमेंसे भी पृथिवीके छत्तीस भेद हैं। जलके भी वर्षा, हिम, ओले आदि भेद हैं। आगके भी दीपक, अंगार, लपट आदि अनेक भेद हैं। वायुके भी गुंजा, माण्डलिक आदि भेद हैं। वनस्पतिके भी वृक्ष, झाड़ी, बेल, लता, तृण आदि भेद हैं। इसीसे सैकड़ों जातियाँ कही हैं ॥१७६५॥


दुविहपरिणामवादं संसारमहोदधिं परमभीमं ।
अदिगम्म जीवपोदो भमइ चिरं कम्मभण्डभरो ॥१७६६॥

अर्थ: कर्मरूपी भाण्डसे भरा हुआ जीवरूपी जहाज शुभ अशुभ परिणामरूप वायुसे युक्त अतिभयंकर संसार महासागरमें प्रवेश करके चिरकाल तक भ्रमण करता है ॥१७६६॥


एगबिगतिगचउपंचिंदियाण जाओ हवंति जोणीओ ।
सव्वाओ ताओ पत्तो अणंतखुत्तो इमो जीवो ॥१७६७॥

अर्थ: नामकर्मके गतिनामकर्म जातिनामकर्म आदि अनेक भेद हैं। उनमेंसे जाति- नामकर्मके पाँच भेद हैं - एकेन्द्रिय जातिनाम, दोइन्द्रिय जातिनाम, त्रीन्द्रिय जातिनाम, चतुरिन्द्रिय जातिनाम और पञ्चेन्द्रिय जातिनाम। उन जातिनाम कर्मोंके उदयसे एकेन्द्रिय आदि पर्यायमें जन्म लेनेवाले जीव एकेन्द्रिय आदि शब्दसे कहे जाते हैं। उन एकेन्द्रिय आदिकी बादर सूक्ष्म पर्याप्त और अपर्याप्त योनियोंको यहाँ जीवद्रव्यका आश्रय कहा है। तत्त्वार्थ सूत्रके ‘सचित्तशीत- संवृताः’ इत्यादि सूत्रमें जो चौरासी लाख योनियाँ कही हैं, यहाँ उनका ग्रहण नहीं किया है। क्योंकि उसी तत्त्वार्थसूत्रके ‘संसारिणो मुक्ताश्च’ सूत्रकी सर्वार्थसिद्धि टीकामें देव, नारकी, मनुष्य और तिर्यञ्च नामक भवपर्यायके परावर्तनको भवसंसार कहा है। कहा है - ‘इस जीवने नरकगति आदिकी जघन्य स्थितिसे लेकर उपरिम ग्रैवेयक पर्यन्त अनेक भवस्थितियोंको मिथ्यात्वके संसर्गसे भोगा है।’ अतः भवशब्दसे योनियाँ नहीं कही जातीं। जीवकी पर्यायको भव कहते हैं। भवसंसार तीस प्रकारका है - पृथिवीकाय, जलकाय, तेजस्काय, वायुकाय और वनस्पतिकायमेंसे प्रत्येकके बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त और अपर्याप्त चार भेद होनेसे बीस भेद होते हैं। तथा दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय, असंज्ञिपञ्चेन्द्रिय और संज्ञीपञ्चेन्द्रियके पर्याप्तक और अपर्याप्तक भेद होनेसे दसभेद होते हैं। अन्य आचार्य भवपरिवर्तनका स्वरूप इस प्रकार कहते हैं - नरकगतिमें सबसे जघन्य आयु दस हजार वर्षकी है। कोई जीव उस आयुको लेकर नरकमें उत्पन्न हुआ। पुनः परिभ्रमण करके उतनी ही आयुको लेकर नरकमें उत्पन्न हुआ। इस प्रकार दस हजार वर्षोंके जितने समय होते हैं उतनी बार दस हजार वर्षकी आयु लेकर नरकमें उत्पन्न हुआ और मरा। पुनः दस हजार वर्षकी आयुमें एक-एक समय बढ़ाकर नरकमें उत्पन्न होते हुए वहाँकी उत्कृष्ट आयु तेंतीस सागर पूर्ण की। नरककी आयु पूर्ण करनेके पश्चात् तिर्यञ्चगतिमें एक अन्तर्मुहूर्तकी आयु लेकर उत्पन्न हुआ और मरा। नरकगतिमें कहे क्रमानुसार तिर्यञ्चगतिकी उत्कृष्ट आयु तीन पल्य पूर्ण की। तिर्यञ्चगतिके समान मनुष्यगतिकी आयु पूर्ण की और नरकगतिके समान देवगतिकी आयु पूर्ण की। किन्तु इतना विशेष है कि उपरिम ग्रैवेयककी उत्कृष्ट आयु इकतीस सागर पूर्ण होने पर समस्त भवपरिवर्तन हो जाते हैं। ऐसे भवपरिवर्तन इस जीवने अनन्तवार किये हैं ॥१७६७॥


अण्णं गिण्हदि देहं तं पुण मुत्तूण गिण्हदे अण्णं ।
घडिजंतं व य जीवो भमदि इमो दव्वसंसारे ॥१७६८॥

अर्थ: घटीयन्त्रकी तरह जीव अन्य शरीरको छोड़कर अन्य शरीरको ग्रहण करता है । उसे भी छोड़कर अन्य शरीरको ग्रहण करता है । जैसे घटीयन्त्र नया जल ग्रहण करता है उसे निकालकर फिर नया जल ग्रहण करता है । उसी प्रकार यह जीव शरीरोंको ग्रहण करता और छोड़ता हुआ भ्रमण करता है । द्रव्यशब्दसे विचित्र शरीर कहे हैं । आत्माके शरीरोंका परिवर्तन द्रव्यसंसार है । ग्रन्थकारने स्थूलबुद्धि वालोंको लक्ष करके द्रव्यसंसारका यह स्वरूप कहा है, किन्तु द्रव्यपरिवर्तन इस प्रकार लेना । द्रव्यपरिवर्तनके दो भेद हैं - नोकर्म परिवर्तन और कर्म परिवर्तन । उनमेंसे नोकर्म परिवर्तन इस प्रकार है - तीन शरीर और छह पर्याप्तियोंके योग्य जो पुद्गल एक जीवने एक समयमें ग्रहण किये, उनमें जैसा स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण रहा हो और तीव्र, मन्द या मध्यम भावसे वे ग्रहण किये गये हों, दूसरे आदि समयोंमें उन्हें भोगकर छोड़ दिया । उसके पश्चात् अनन्तवार अगृहीतको ग्रहण करके, अनन्तवार मिश्रको ग्रहण करके, मध्यमें गृहीत और अगृहीतको अनन्तवार ग्रहण करके वे ही पुद्गल उसी जीवके उसी प्रकारसे जब नोकर्म रूपको प्राप्त होते हैं, उस सबको नोकर्म परिवर्तन कहते है । अब कर्मद्रव्य परिवर्तन कहते हैं - एक समयमें एक जीवने आठ कर्मरूपसे जो पुद्गल ग्रहण किये और एक समय अधिक एक आवली कालके पश्चात् द्वितीय आदि समयोंमें उन्हें भोगकर छोड़ दिया । नोकर्म परिवर्तनमें कहे क्रमके अनुसार वे ही कर्मपुद्गल उसी जीवके उसी प्रकारसे जब कर्मरूपसे आते हैं उस सबको कर्मद्रव्य परिवर्तन कहते हैं ॥१७६८॥


रंगगदणडो व इमो बहुविहसंठाणवण्णरूवाणि ।
गिण्हदि मुच्चदि य ठिदं जीवो संसारमावण्णो ॥१७६९॥

अर्थ: जैसे रंगभूमिमें प्रविष्ट हुआ नट अनेक रूपोंको धारण करता है उसी प्रकार द्रव्यसंसारमें भ्रमण करता हुआ जीव निरन्तर अनेक आकार, रूप, स्वभाव आदिको ग्रहण करता और छोड़ता है ॥१७६९॥


जत्थ ण जादो ण मदो हवेज्ज जीवो अणंतसो चेव ।
काले तदम्मि इमो ण सो पदेसो जए अत्थि ॥१७७०॥

अर्थ: जगत्में ऐसा कोई प्रदेश नहीं है जहाँ यह जीव अतीत कालमें अनन्तवार जन्मा और मरा न हो ॥१७७०॥


तक्कालतदाकालसमएसु जीवो अणंतसो चेव ।
जादो मदो य सव्वेसु इमो तीदम्मि कालम्मि ॥१७७१॥

अर्थ: यह जीव अतीत कालमें उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी कालके सब समयोंमें अनन्त बार उत्पन्न हुआ और अनन्तबार मरा ॥१७७१॥


अट्ठपदेसे मुत्तूण इमो सेसेसु सगपदेसेसु ।
तत्तमिव अद्धरणं उव्वत्तपरत्तणं कुणदि ॥१७७३॥

अर्थ: लोकके मध्यमें स्थित गौके स्तनके आकार आठ प्रदेशोंको छोड़कर यह जीव अपने शेष प्रदेशोंमें तप्त जलके मध्यमें स्थित चावलोंकी तरह उद्वर्तन परावर्तन किया करता है । अर्थात् जैसे आग पर रखे गर्म जलमें पड़े हुए चावल ऊपर नीचे हुआ करते हैं उसी प्रकार आठ मध्य प्रदेशोंको छोड़कर जीवके शेष प्रदेश चल रहते हैं ॥१७७३॥


लोगागासपएसा असंखगुणिदा हवंति जावदिया ।
तावदियाणि हु अज्झवसाणाणि इमस्स जीवस्स ॥१७७४॥

अर्थ: लोकाकाशके प्रदेशोंको असंख्यातसे गुणा करनेपर जितनी राशि होती है उतने ही इस जीवके अध्यवसाय स्थान होते हैं । इन असंख्यात लोक प्रमाण अध्यवसाय नामक भावोंमें जीवके परावर्तनको भाव संसार कहते हैं ॥१७७४॥


अज्झवसाणठाणंतराणि जीवो विकुव्वइ इमो हु ।
णिच्चं पि जहा सरडो गिण्हदि णाणाविहे वण्णे ॥१७७५॥

अर्थ: जैसे गिरगिट नित्य ही नाना प्रकारके रंग बदलता है वैसे ही यह जीव अध्यवसाय स्थानोंको धारण करता हुआ परिणमन करता है ॥१७७५॥


आगासम्मि वि पक्खी जले वि मच्छा थले वि थलचारी ।
हिंसंति एक्कमेक्कं सव्वत्थ भयं खु संसारे ॥१७७६॥

अर्थ: आकाशमें विचरण करते हुए पक्षियोंको दूसरे पक्षी बाधा देते हैं । जलमें मच्छ बाधा करते हैं । थलमें थलचारी बाधा करते हैं । इस प्रकार सर्वत्र एक दूसरेकी हिंसा करते हैं । अतः संसारमें सर्वत्र भय है ॥१७७६॥


ससगो वाहपरद्धो विलत्ति णाऊण अजगरस्स मुहं ।
सरणत्ति मण्णमाणो मच्चुस्स मुहं जह अदीदि ॥१७७७॥

अर्थ: जैसे खरगोश व्याधसे सताया जानेपर बिल समझकर अजगरके मुखमें प्रवेश करता है । वह उसे अपना शरण मानकर मृत्युके मुखमें प्रवेश करता है ॥१७७७॥


तह अण्णाणी जीवा परिद्धमाणच्छुहादिवाहेहिं ।
अदिगच्छंति महादुहहेदुं संसारसप्पमुहं ॥१७७८॥

अर्थ: उसी प्रकार अज्ञानी जीव भूख प्यास आदि व्याधोंके द्वारा पीड़ित होनेपर महान् दुःखमें निमित्त संसाररूपी सर्पके मुखमें प्रवेश करते हैं ॥१७७८॥


जावदियाइं सुहाइं होंति लोगम्मि सव्वजोणीसु ।
ताइंपि बहुविधाइं अणंतखुत्तो इमो पत्तो ॥१७७९॥

अर्थ: लोकमें सब योनियोंमें जितने प्रकारके सुख होते हैं उन सब अनेक प्रकारके सुखोंको भी इस जीवने अनन्तबार भोगा है ॥१७७९॥


दुक्खं अणंतखुत्तो पावेत्तु सुहंपि पावदि कहिं वि ।
तह वि य अणंतखुत्तो सव्वाणि सुहाणि पत्ताणि ॥१७८०॥

अर्थ: अनन्तबार दुःखोंको प्राप्त करके कदाचित् सुखको भी प्राप्त करता है । तथापि अनन्तबार इस जीवने सब सुखोंको प्राप्त किया है ॥१७८०॥


करणेहिं होदि विगलो बहुसो चित्तवचिसोदणिचेहिं ।
घाणेण य जिब्भाए चिट्ठाबलविरियजोगेहिं ॥१७८१॥

अर्थ: यह जीव बहुत बार मन, वचन, श्रोत्र, नेत्र, घ्राण और जिह्वा इन्द्रिय तथा चेष्टा बल और वीर्यसे हीन विकलेन्द्रिय होता है ।


जच्चंधबहिरमूओ छादो तिसिओ वणे व एयाई ।
भमइ सुचिरंपि जीवो जम्मवणे णट्ठसिद्धिपहो ॥१७८२॥

अर्थ: कभी यह जीव जन्मसे ही अन्धा, बहिरा, गूँगा होता है और भूख तथा प्यास से पीड़ित होकर जैसे कोई मार्ग भूलकर वनमें अकेला भटकता है उसी प्रकार मोक्षमार्गसे भ्रष्ट होकर जन्मरूपी वनमें अकेला भ्रमण करता है । कहा भी है - अपने बुरे आचरणोंसे संचित किये कर्मोंके द्वारा अपना ज्ञान खोकर यह जीव विकलेन्द्रिय होता है तथा कर्मोंसे प्रेरित हो संसाररूपी समुद्रमें गिरकर चिरकाल तक पराधीन हो, आंख बन्द करके भ्रमण करता है । उसका कोई रक्षक नहीं होता । जैसे कोई बहरा, गूँगा अन्धा मूर्ख प्राणी प्याससे व्याकुल हो, मार्ग भूलकर अकेला वनमें भटकता है । उसी प्रकार यह संसारी प्राणी मार्गदर्शकके बिना बार-बार त्रसस्थावर पर्यायको ग्रहण करता और छोड़ता हुआ चिरकाल तक जन्मरूपी वनमें भ्रमण करता है ॥१७८२॥


एइंदियेसु पंचविधेसु वि उत्थाणवीरियविहूणो ।
भमदि अणंतं कालं दुक्खसहस्साणि पावेंतो ॥१७८३॥

अर्थ: पृथिवी, जल, तेज, वायु और वनस्पतिका शरीर धारण करनेवाले पाँच प्रकारके एकेन्द्रियोंमें यह जीव हजारों कष्ट भोगता हुआ अनन्तकाल तक भ्रमण करता है । उसमें इतनी भी शक्ति नहीं होती कि पृथिवी आदि कायोंका त्याग करके त्रसकायकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न कर सके ॥१७८३॥


बहुदुक्खावत्ताए संसारणदीए पावकलुसाए ।
भमइ वरागो जीवो अण्णाणनिमीलिदो सुचिरं ॥१७८४॥

अर्थ: अज्ञानमें पड़ा हुआ यह बेचारा जीव पापरूपी मैले पानीसे भरी और बहुत दुःखरूपी भँवरोंसे युक्त संसाररूपी नदीमें चिरकाल भ्रमण करता है ॥१७८४॥


विसयाभिसारगाढं कुजोणिणेमि सुहदुक्खदढखीलं ।
अण्णाणतुंबधरिदं कसायदढपट्टियाबंधं ॥१७८५॥

अर्थ: यह संसाररूपी चक्र ( पहिया ) विषयोंकी अभिलाषारूपी आरोंसे जकड़ा हुआ है, कुयोनिरूपी नेमि - हाल उसपर चढ़ी हुई है। उसमें सुख दुःखरूपी मजबूत कीलें लगी हैं। अज्ञानरूपी तुम्बपर वह स्थित है, कषायरूपी दृढ़ पट्टियोंसे कसा हुआ है। अनेक हजार जन्मरूपी उसका विशाल मार्ग है। उसपर वह संसार चक्र चलता है। मोहरूपी वेगसे अतिशीघ्र चलता है। ऐसे संसाररूपी चक्रपर सवार होकर यह पराधीन जीव भ्रमण करता है ॥१७८५-८६॥


बहुजम्मसहस्सविसालवत्तणिं मोहवेगमदिचवलं ।
संसारचक्कमारुहिय भमदि जीवो अणप्पवसो ॥१७८६॥

अर्थ: यह संसाररूपी चक्र ( पहिया ) विषयोंकी अभिलाषारूपी आरोंसे जकड़ा हुआ है, कुयोनिरूपी नेमि - हाल उसपर चढ़ी हुई है। उसमें सुख दुःखरूपी मजबूत कीलें लगी हैं। अज्ञानरूपी तुम्बपर वह स्थित है, कषायरूपी दृढ़ पट्टियोंसे कसा हुआ है। अनेक हजार जन्मरूपी उसका विशाल मार्ग है। उसपर वह संसार चक्र चलता है। मोहरूपी वेगसे अतिशीघ्र चलता है। ऐसे संसाररूपी चक्रपर सवार होकर यह पराधीन जीव भ्रमण करता है ॥१७८५-८६॥ ॥१७८६॥


भारं णरो वहंतो कहिंचि विस्समदि ओरुहिय भारं ।
देहभरवाहिणो पुण ण लहंति खणं पि विस्समिदुं ॥१७८७॥

अर्थ: भारवाही मनुष्य तो किसी देश और कालमें अपना भार उतारकर विश्राम कर लेता है। किन्तु शरीरके भारको ढोनेवाले जीव एक क्षणके लिये भी विश्राम नहीं पाते। औदारिक और वैक्रियिक शरीरोंके छूट जानेपर भी कार्मण और तैजस शरीर बराबर बने रहते हैं ॥१७८७॥


कम्माणुभावदुहिदो एवं मोहंधयारगहणम्मि ।
अंधो व दुग्गमग्गे भमदि हु संसारकंतारे ॥१७८८॥

अर्थ: इस प्रकार असातावेदनीय आदि पापकर्मोंके प्रभावसे दुःखी जीव मोहरूपी अन्धकारसे गहन संसाररूपी वनमें उसी प्रकार भ्रमण करता है जैसे अन्धा व्यक्ति दुर्गम मार्गमें भटकता है ॥१७८८॥


दुक्खस्स पडिगरेंतो सुहमिच्छंतो य तह इमो जीवो ।
पाणवधादीदोसे करेइ मोहेण संछण्णो ॥१७८९॥

अर्थ: मोहसे आच्छादित यह जीव दुःखसे बचनेका उपाय करता है और इन्द्रिय सुखकी अभिलाषा रखता है और उसके लिये हिंसा आदि दोषोंको करता है । आशय यह है कि दुःखसे डरता है किन्तु समस्त दुःखोंके विनाशका उपाय नहीं जानता । यद्यपि दुःखोंको दूर करना चाहता है किन्तु हिंसा आदि पापोंमें प्रवृत्त होता है जो दुःखके हेतु हैं । इन्द्रिय सुखका लम्पटी होते हुए उन्हीं हिंसा आदि पापोंमें लगा रहता है जो दुःखके कारण हैं । इसलिये उसका सब काम दुःखका ही मूल होता है ॥१७८९॥


दोसेहिं तेहिं बहुगं कम्मं बंधदि तदो णवं जीवो ।
अध तेण पच्चइ पुणो पविसित्तु व अग्गिमग्गीदो ॥१७९०॥

अर्थ: उन हिंसा आदि दोषोंको करनेसे जीव बहुत-सा नया कर्म बाँधता है । कर्मबन्धके पश्चात् उस कर्मका फल भोगता है । इस प्रकार जैसे कोई एक आगसे निकलकर दूसरी आगमें प्रवेश करके कष्ट उठाता है, वैसे ही पूर्वबद्ध कर्मोंको भोगकर पुनः नवीन कर्मरूपी आगमें जलता है ॥१७९०॥


बंधंतो मुच्चंतो एवं कम्मं पुणो पुणो जीवो ।
सुहकामो बहुदुक्खं संसारमणादियं भमइ ॥१७९१॥

अर्थ: इस प्रकार जीव जो कर्म फल दे लेते हैं उन्हें छोड़ देता है और कर्मोंका फल भोगते समय होनेवाले राग-द्वेष रूप परिणामोंसे नवीन कर्मोंका बन्ध करता है। सुखकी अभिलाषा रखकर बहुत दुःखोंसे भरे अनादि संसारमें भ्रमण करता है ॥१७९१॥


आहिंडयपुरिसस्स व इमस्स णीया तहिं तहिं होंति ।
सव्वे वि इमो पत्तो संबंधे सव्वजीवेहिं ॥१७९२॥

अर्थ: जैसे देशान्तरमें भ्रमण करनेवाले पुरुषको सर्वत्र इष्ट-मित्र मिलते हैं उसी प्रकार इस जीवके भी जहाँ-जहाँ यह जन्म लेता है वहीं-वहीं बन्धु-बान्धव होते हैं। इस तरह इसने सब जीवोंके साथ सब सम्बन्ध प्राप्त किये हैं ॥१७९२॥


माया वि होइ भज्जा भज्जा मायत्तणं पुणमुवेदि ।
इय संसारे सव्वे परियट्टंते हु संबंधा ॥१७९३॥

अर्थ: जो इस जन्म माता है वही दूसरे जन्ममें पत्नी होती है और पत्नी होकर पुनः माता बन जाती है। इस प्रकार संसारमें सब सम्बन्ध परिवर्तनशील हैं ॥१७९३॥


जणणी वसंततिलया भगिणी कमला य आसि भज्जाओ ।
धणदेवस्स य एक्कम्मि भवे संसारवासम्मि ॥१७९४॥

अर्थ: दूसरे भवोंमें सम्बन्ध बदलनेकी तो बात ही क्या है। किन्तु धनदेवकी माता वसन्ततिलका और बहन कमला, ये दोनों उसी भवमें धनदेवकी पत्नी हुई। कहा भी है - यदि एक शरीर धारण करनेपर जीव अनेक अपवादों और दुःखोंको पाता है और उससे मनोवेदना और उग्र पापको बांधता है तब विषय सेवनके द्वारा पापकर्मका उपार्जन करनेवाला कौन पुरुष नाना शरीर धारण करनेपर कैसे दुःख नहीं पाता है अर्थात् अवश्य दुःख पाता है। मदसे मत्त हाथीके द्वारा वेगपूर्वक किया गया प्रहार तथा बलशाली हाथसे छोड़ी गयी तीक्ष्ण तलवार दुःख नहीं देते। उससे भी अधिक दुःख विषय देते हैं। इसलिये तत्त्वज्ञानी जन विषयोंको त्याग देते हैं। इस प्रकार यह लोकधर्म दुःखदायक है ॥१७९४॥


राया वि होइ दासो दासो रायत्तणं पुणमुवेदि ।
इय संसारे परिवट्टंते ठाणाणि सव्वाणि ॥१७९५॥

अर्थ: नीच गोत्रका बन्ध करनेसे राजा मरकर दास होता है और उच्च गोत्रका बन्ध करनेसे दास राजा हो जाता है । इस प्रकार संसारमें सब स्थान परिवर्तनशील हैं ॥१७९५॥


कुलरूवतेयभोगाधिगो वि राया विदेहदेसवदी ।
वच्चघरम्मि सुभोगो जाओ कीडो सकम्मेहिं ॥१७९६॥

अर्थ: विदेह देशका राजा सुभोग कुल, रूप, तेज और भोगमें अधिक होते हुए भी अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर विष्टाघरमें कीट हुआ, कहा भी है - जो देव और मनुष्योंमें प्रधान थे, जिनका शरीर सब ऋद्धियोंसे दीप्तिमान था, जिनका रूप चन्द्रमाकी तरह मनोहर था, वे भी अन्य गतिमें कुल, रूप, धन और प्रतापसे भ्रष्ट होकर दीन होते हैं ॥१७९६॥


होऊण महड्ढीओ देवो सुभवण्णगंधरूवधरो ।
कुणिमम्मि वसदि गब्भे धिगत्थु संसारवासस्स ॥१७९७॥

अर्थ: शुभरूप, शुभगन्ध, और प्रशस्त तेजधारी महती ऋद्धिका धारक देव भी होकर गन्दे गर्भस्थानमें वास करता है ।


इह [?] परलोगे वा सत्तू पुरिसस्स हुंति णीया वि ।
इहइं परत्त वा खाइ पुत्तमंसं णिययमादा ॥१७९८॥

अर्थ: इस लोक अथवा परलोकमें बन्धु भी मनुष्यके शत्रु हो जाते हैं। इस लोक तथा परलोकमें माता भी अपने पुत्रके मांसको खाती है इससे अधिक कष्टकी बात और क्या है ? ॥१७९८॥


होऊण रिऊ बहुदुक्खकारओ बंधवो पुणो होदि ।
इय परिवत्तइ णीयत्तणं च सत्तुत्तणं च जये ॥१७९९॥

अर्थ: बहुत दुःख देनेवाला शत्रु भी पुनः प्रिय बन्धु हो जाता है। इस प्रकार जगत्में बन्धुता और शत्रुता परिवर्तनशील है ॥१७९९॥


विमलाहेदुं वंकेण मारिओ णिययभारियागब्भे ।
जाओ जाओ जादिंमरो सुदिट्ठी सकम्मेहिं ॥१८००॥

अर्थ: सुदृष्टि नामक रत्नपारखी मैथुन करते समय अपनी पत्नी विमलाके निमित्तसे अपने सेवक बंकके द्वारा मारा गया और मरकर अपनी पत्नी विमलाके गर्भसे उत्पन्न हुआ । उत्पन्न होनेपर उसे पूर्वजन्मका स्मरण हो आया ॥१८००॥


होऊण बंभणो सोत्तिओ खु पावं करित्तु माणेण ।
सुणगो व सूगरो वा पाणो वा होइ परलोए ॥१८०१॥

अर्थ: श्रोत्रिय ब्राह्मण होकर यह जीव अपनी जातिका अभिमान करके गुणी जनोंकी निन्दा और अपमानके द्वारा नीच गोत्रका बन्ध करता है और मरकर परलोकमें कुत्ता, सूकर या चण्डाल होता है ॥१८०१॥


दारिद्दं अड्ढत्तं णिंदं च थुदिं च वसणमब्भुदयं ।
पावदि बहुसो जीवो पुरिसित्थिणवुंसयत्तं च ॥१८०२॥

अर्थ: यह जीव लाभान्तरायका उदय होनेसे अनेक बार दरिद्र अवस्था पाता है । लाभान्तरायका क्षयोपशम होनेसे अनेक बार इच्छित धन पाता है । इस प्रकार अनेक बार धनीसे दरिद्र और दरिद्रसे धनी होता है । अयशःकीर्तिका उदय होनेसे चण्डाल, काना, अभागा, मूर्ख, कंजूस आदि निन्दाका पात्र होता है । यशःकीर्तिका उदय होनेसे कुलीन, रूपवान, धनी, पण्डित इत्यादि स्तुतिका पात्र होता है । असातावेदनीयका उदय होनेसे दुःख उठाता है और सातावेदनीयका उदय होनेसे देव और मनुष्य भवका सुख भोगता है । इसी प्रकार अनेक बार स्त्री, पुरुष और नपुंसक होता है ॥१८०२॥


कारी होइ अकारी अप्पडिभोगो जणो हु लोगम्मि ।
कारी वि जणसमक्खं होइ अकारी सपडिभोगो ॥१८०३॥

अर्थ: पुण्यहीन मनुष्य लोकमें दोष नहीं करनेपर भी दोषका भागी होता है । और पुण्यवान अनाचार करके भी लोगोंके सन्मुख दुराचारी सिद्ध नहीं होता ॥१८०३॥


सरिसीए चंदिगाए कालो वेस्सो पिओ जहा जोण्हो ।
सरिसे वि तहाचारे कोई वेस्सो पिओ कोई ॥१८०४॥

अर्थ: जैसे चाँदकी चाँदनीके समान होनेपर भी लोग कृष्णपक्षसे द्वेष करते हैं और शुक्लपक्षसे प्रेम करते हैं । वैसे ही समान आचार होते हुए भी कोई मनुष्य लोगोंको प्रिय होता है और कोई अप्रिय होता है ॥१८०४॥


इय एस लोगधम्मो चिंतिज्जंतो करेइ णिव्वेदं ।
धण्णा ते भयवंता जे मुक्का लोगधम्मादो ॥१८०५॥

अर्थ: इस प्रकार लोकदशाका चिन्तन करनेसे वैराग्य उत्पन्न होता है । वे पुण्यवान यतिजन धन्य हैं जो इस ऊपर कही संसारकी दशासे मुक्त हो गये हैं ॥१८०५॥


विज्जू व चंचलं फेणदुब्बलं वाधिमहियमच्चुहदं ।
णाणी किह पेच्छंतो रमेज्ज दुक्खुद्धुदं लोगं ॥१८०६॥

अर्थ: बिजलीकी तरह चंचल, फेनकी तरह दुर्बल, रोगोंसे ग्रस्त और मृत्युसे पीड़ित इस लोकको देखकर ज्ञानी इसमें कैसे अनुराग कर सकता है ॥१८०६॥


असुहा अत्था कामा य हुंति देहो य सव्वमणुयाणं ।
एओ चेव सुभो णवरि सव्वसोक्खायरो धम्मो ॥१८०७॥

अर्थ: अर्थ, काम और सब मनुष्योंकी देह अशुभ है । एक सब सुखोंकी खान धर्म ही शुभ है । शेष सब अशुभ है ॥१८०७॥


इहलोगियपरलोगियदोसे पुरिसस्स आवहइ णिच्चं ।
अत्थो अणत्थमूलं महाभयं मुत्तिपडिपंथो ॥१८०८॥

अर्थ: धन सब अनर्थोंकी जड़ है। यह पुरुषमें इस लोक और परलोक सम्बन्धी दोष लाता है अर्थात् धन पाकर मनुष्य व्यसनोंमें फँस जाता है और उससे वह इस लोकमें भी निन्दाका पात्र होता है और परलोकमें भी कष्ट उठाता है। मृत्यु आदि महान् भयोंका मूल होनेसे धन महाभय रूप है। और मोक्षमार्गके लिये तो अर्गला है। धनमें मस्त मनुष्य मोक्षकी बात भी सुनना नहीं चाहता ॥१८०८॥


कुणिमकुडिभवा लहुगत्तकारया अप्पकालिया कामा ।
उवधो लोए दुक्खावहा य ण य हुंति ते सुलहा ॥१८०९॥

अर्थ: यह कामभोग अपवित्र अपने और परके शरीरके संयोगसे पैदा होता है। यह मनुष्यको गिराता है, उसे लोगोंकी दृष्टिमें लघु करता है। यह अल्पकालके लिये होता है तथा दोनों ही लोकोंमें दुःखदायी है। तथा सुलभ भी नहीं है ॥१८०९॥


अट्ठिदलिया छिरावक्कवद्धिया मंसमट्टियालित्ता ।
बहुकुणिमभण्डभरिदा विहिंसणिज्जा खु कुणिमकुडी ॥१८१०॥

अर्थ: यह शरीर रूपी कुटी हड्डी रूपी पत्तोंसे बनी है। सिराएँ रूपी वल्कल (छाल) से बाँधी हुई है। मांसरूपी मिट्टीसे लीपी गई है तथा अनेक अपवित्र वस्तुओंसे भरी हुई है। इस तरह यह शरीररूपी कुटिया घृणास्पद है ॥१८१०॥


इंगालो धुव्वंतो ण सुद्धिमुवयादि जह जलादीहिं ।
तह देहो धोव्वंतो ण जाइ सुद्धिं जलादीहिं ॥१८११॥

अर्थ: जैसे कोयलोंको जलादिसे धोनेपर भी वे सफेद नहीं होते। उसी प्रकार जलादिसे धोनेपर भी शरीरकी शुद्धि नहीं होती ॥१८११॥


सलिलादीणि अमेज्झं कुणइ अमेज्झाणि ण दु जलादीणि ।
मेज्झममेज्झं कुव्वंति सयमवि मेज्झाणि संताणि ॥१८१२॥

अर्थ: अपवित्र शरीर जलादिको भी अपवित्र कर देता है। अर्थात् शरीरके सम्बन्धसे निर्मल जल मैला हो जाता है। जल स्वयं मैला नहीं है, स्वयं तो निर्मल ही है किन्तु जल शरीरको पवित्र नहीं बनाता। बल्कि शरीरके संयोगसे जल ही अपवित्र हो जाता है ॥१८१२॥


तारिसयममेज्झमयं सरीरयं किह जलादिजोगेण ।
मेज्झं हवेज्ज मेज्झं ण हु होदि अमेज्झमयघडओ ॥१८१३॥

अर्थ: निर्मलको मलीन करनेवाला अपवित्र शरीर जलादिके सम्बन्धसे कैसे पवित्र हो सकता है। क्या मलसे भरा घड़ा पानीसे धोनेसे पवित्र हो सकता है ॥१८१३॥


णवरि हु धम्मो मेज्झो धम्मत्थस्स वि णमंति देवा वि ।
धम्मेण चेव जादि खु साहू जल्लोसधादीया ॥१८१४॥

अर्थ: किन्तु धर्म पवित्र है क्योंकि रत्नत्रयात्मक धर्ममें स्थितको देव भी नमस्कार करते है । पवित्र धर्मके सम्बन्धसे आत्मा भी पवित्र है । धर्मसे ही साधु भी जल्लौषधी आदि ऋद्धियोंको प्राप्त करते हैं । अर्थात् रत्नत्रयरूप धर्मका साधन करनेसे साधुओंके शरीरका मल भी औषधीरूप हो जाता है ॥१८१४॥


जम्मसमुद्दे बहुदोसवीचिए दुक्खजलयराइण्णे ।
जीवस्स दु परिब्भमणम्मि कारणं आसवो होदि ॥१८१५॥

अर्थ: यह जन्ममरणरूपी समुद्र विविध दोषरूपी लहरोंसे युक्त है तथा दुःखरूपी जलचर जीवोंसे भरा है । इस समुद्रमें परिभ्रमणका कारण आस्रव है ।


संसारसागरे से कम्मजलमसंवुडस्स आसवदि ।
आसवणीए णावाए जह सलिलं उदधिमज्झम्मि ॥१८१६॥

अर्थ: जैसे समुद्रके मध्यमें छेदयुक्त नावमें जल प्रवेश करता है वैसे ही संसाररूपी समुद्रमें जो जीव संवरसे रहित है अर्थात् सम्यक्त्व, संयम, क्षमा, मार्दव, आर्जव, सन्तोष आदि रूप परिणामोंसे रहित है उसके ज्ञानावरण आदि कर्मरूप जलका आस्रव होता है ॥१८१६॥


धूली णेहुत्तुप्पिदगत्ते लग्गा मलो जहा होदि ।
मिच्छत्तादिसिणेहोल्लिदस्स कम्मं तहा होदि ॥१८१७॥

अर्थ: जैसे तेलसे लिप्त शरीरमें लगी हुई धूल मलरूप हो जाती है वैसे ही जो आत्मा मिथ्यात्व, असंयम और कषायपरिणामरूप तेलसे लिप्त होता है उस आत्माके प्रदेशोंमें स्थित कर्मरूप होनेके योग्य पुद्गलस्कन्ध कर्मरूप हो जाते हैं। इसका आशय यह है, मिथ्यात्व आदि रूप आत्माके परिणामोंसे विशिष्ट पुद्गलद्रव्य कर्मरूपसे परिणमन करता है इसलिये कर्मरूप परिणमनमें कारण आत्माके परिणाम ही आस्रव हैं ॥१८१७॥


ओगाढगाढणिचिदो पुग्गलदव्वेहिं सव्वदो लोगो ।
सुहमेहिं बादरेहिं य दिस्सादिस्सेहिं य तहेव ॥१८१८॥

अर्थ: यह लोक सर्वत्र पुद्गल द्रव्योंसे ठसाठस भरा हुआ है । वे पुद्गल सूक्ष्म भी है और बादर भी हैं । चक्षुके द्वारा दिखाई देने योग्य भी हैं और न दिखाई देने योग्य भी हैं ।


मिच्छत्तं अविरमणं कसाय जोगा य आसवा होंति ।
अरहंतवुत्तअत्थेसु विमोहो होइ मिच्छत्तं ॥१८१९॥

अर्थ: मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और योग ये आस्रव हैं । जिन कारणोंसे पुद्गल कर्म-रूप होकर आते हैं उन मिथ्यात्व आदिको आस्रव कहते हैं । उनमेंसे मिथ्यात्वका स्वरूप कहते हैं - अर्हन्त भगवान्के द्वारा कहे गये अनन्त द्रव्य पर्यायात्मक पदार्थोंमें अश्रद्धान करता मिथ्यात्व है ॥१८१९॥


अविरमणं हिंसादी पंच वि दोसा हवंति णायव्वा ।
कोधादीया चत्तारि कसाया रागदोसमया ॥१८२०॥

अर्थ: हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्म और परिग्रह इन पाँच दोषोंको असंयम कहते हैं । कषाययुक्त आत्मपरिणामके योगसे प्राणोंके घातको हिंसा कहते हैं । प्राणि पीड़ाकारक अप्रशस्त वचन बोलनेको असत्य कहते हैं । बिना दी हुई वस्तुके ग्रहणको चोरी कहते हैं । मैथुन कर्मको अब्रह्म कहते हैं और ममत्व भावको परिग्रह कहते हैं । ये सब परिणाम असंयम कहे जाते हैं । इन सबसे निवृत्तिको संयम कहते हैं । और प्रवृत्तिरूप हिंसादि परिणाम असंयम हैं । तथा राग-द्वेषमय चार कषाय हैं । अर्थात् हिंसादिरूप परिणाम असंयम हैं और क्रोधादि कषाय हैं इनमेंसे क्रोध और मान द्वेषरूप हैं और माया, लोभ रागरूप हैं ॥१८२०॥


किहदा राओ रंजेदि णरं कुणिमे वि जाणुगं देहे ।
किहदा दोसो वेसं खणेण णीयंपि कुणइ णरं ॥१८२१॥

अर्थ: यह शरीर अशुचि है । रागके अयोग्य है । यह राग शरीरकी अशुचिताको जाननेवाले अज्ञानीको उसमें अनुरक्त करता है सारवान् वस्तुमें मनुष्यको अनुरक्त नहीं करता । इसमें कोई आश्चर्य नहीं है । आश्चर्य इसमें है कि यह जाननेवालेको भी असार शरीरमें अनुरक्त करता है । तथा द्वेष क्षणमात्रमें बन्धु मनुष्यको भी द्वेषका पात्र बनाता है । इससे द्वेषका माहात्म्य कहते हैं कि जो बन्धु राग करने योग्य हैं उन्हें भी वह द्वेषका पात्र बनाता है ॥१८२१॥


सम्मादिट्ठी वि णरो जेसिं दोसेण कुणइ पावाणि ।
धिद्धेसिं गारविंदियसण्णाभयरागदोसाण ॥१८२२॥

अर्थ: तत्त्वोंके ज्ञान और श्रद्धानसे युक्त मनुष्य भी अर्थात् सम्यग्दृष्टी मनुष्य भी जिनके दोषसे पाप करता है उन गारवोंको, इन्द्रियोंको, संज्ञामदोंको और राग द्वेषको धिक्कार हो ॥१८२२॥


जो अभिलासो विसएसु तेण ण य पावए सुहं पुरिसो ।
पावदि य कम्मबंधं पुरिसो विसयाभिलासेण ॥१८२३॥

अर्थ: विषयोंमें जो अभिलाषा है उसके कारण पुरुष सुख नहीं पाता विषयोंकी चाहके निमित्तसे पुरुष कर्मबन्ध करता है ॥१८२३॥


कोई डहिज्ज जह चंदणं णरो दारुगं च बहुमोल्लं ।
णासेइ मणुस्सभवं पुरिसो तह विसयलोहेण ॥१८२४॥

अर्थ: अन्य प्रकारसे विषयोंकी अभिलाषाकी दुष्टता बतलाते हैं - जैसे कोई मनुष्य राख आदिके लिये बहुमूल्य चन्दनकी लकड़ीको जला देता है। वैसे ही मनुष्य अति तुच्छ विषयोंके लोभसे उस मनुष्य भवको नष्ट कर देता है जिसके द्वारा अतीन्द्रिय अनन्त सुख प्राप्त हो सकता है। कहा भी है - ये विषय इन्द्रियोंके लिये आनन्द उत्पन्न करते हैं तो बहुतसे रस उन विषयोंमें रहते हैं। किन्तु विषसे संस्कार किये गये अन्नकी तरह उनको भोगनेपर अत्यन्त भयंकर परिणाम होता है। जिसका चंचल चित्त विषय सुखमें अत्यासक्त होता है वह विषयोंकी प्राप्तिके लिये अनिष्ट कार्य करके ऐसी पर्यायमें जन्म लेता है जहाँ उसे विषयसुख मिलता ही नहीं। ठीक ही है, पुण्यहीन मनुष्य विषयसुखको नहीं पाता ॥१८२४॥


छड्डिय रयणाणि जहा रयणदीवा हरेज्ज कट्ठाणि ।
माणुसभवे वि छड्डिय धम्मं भोगे भिलसदि तहा ॥१८२५॥

अर्थ: जैसे कोई मनुष्य रत्नद्वीपमें जाकर रत्नोंको छोड़ लकड़ी बीनता है वैसे ही मनुष्यभवमें धर्मको छोड़ भोगोंकी अभिलाषा करता है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे कोई मूर्ख अनेक बहुमूल्य रत्नोंसे भरे तथा अतिदुर्लभ रत्नद्वीपमें जाकर बिना प्रयत्नके ही प्राप्त भी रत्नोंको ग्रहण न करके असार और सुलभ ईंधनको ही सारभूत मानकर ग्रहण करता है, उसी प्रकार जो मनुष्यभव अनेक गुणरूपी रत्नोंकी खान है, जिसका मिलना बहुत कठिन है उसे प्राप्त करके भी अज्ञानी ऐसे विषयसुखकी अभिलाषा करता है जो तृप्ति प्रदान नहीं करता तथा पराधीन है और अल्प काल ही रहता है ॥१८२५॥


गंतूण णंदणवणं अमयं छंडिय विसं जह पियइ ।
माणुसभवे वि छड्डिय धम्मं भोगे भिलसदि तहा ॥१८२६॥

अर्थ: जैसे कोई पुरुष नन्दन वनमें जाकर भी अमृतको छोड़ विष पीता है । वैसे ही मनुष्यभवको पाकर भी मनुष्य धर्मको छोड़ भोगोंकी अभिलाषा करता है ॥१८२६॥


पावपओगा मणवचिकाया कम्मासवं पकुव्वंति ।
भुज्जंतो दुब्भत्तं वणम्मि जह आसवं कुणइ ॥१८२७॥

अर्थ: जिनके द्वारा पापमें प्रवृत्ति की जाती है वे मन, वचन, काय, पुद्गलोंको कर्मरूपसे परिणमाते हैं । जैसे अपथ्य सेवन करनेवाला अपने घावमें पीब पैदा करता है । अर्थात् जैसे अपथ्य सेवन करनेसे घावमें पीब आता है वैसे ही मन, वचन, कायकी प्रवृत्तिसे कर्मोंका आस्रव होता है ॥१८२७॥


अणुकंपासुद्धुवओगो वि य पुण्णस्स आसवदुवारं ।
तं विवरीदं आसवदारं पावस्स कम्मस्स ॥१८२८॥

अर्थ: अनुकम्पा और शुद्ध उपयोग पुण्य कर्मके आस्रवके द्वार हैं। और अनुकम्पा तथा शुद्ध उपयोगसे विपरीत परिणाम पाप कर्मके आस्रवके द्वार हैं ॥१८२८॥


मिच्छत्तासवदारं रुंभइ सम्मत्तदिढकवाडेण ।
हिंसादिदुवाराणि वि दढवदफलहेहिं रुंभंति ॥१८२९॥

अर्थ: मिथ्यात्व अर्थात् तत्त्वके अश्रद्धानरूप आस्रवका द्वार सम्यक्त्व अर्थात् तत्त्वके श्रद्धान रूप दृढ़ कपाटोंके द्वारा रोका जाता है और हिंसा आदि आस्रव द्वारोंको दृढ़ व्रतरूपी अर्गलाओंसे रोका जाता है ॥१८२९॥


उवसमदयादमाउहकरेण रक्खा कसायचोरेहिं ।
सक्का काउं आउहकरेण रक्खाव चोराणं ॥१८३०॥

अर्थ: कषायवेदनीय कर्मके तिरोभाव अर्थात् उदय अवस्थाको प्राप्त न होनेको उपसम कहते हैं । सब प्राणियोंपर दयाभाव होना दया है । कषायोंके दोषोंका विचार करके चित्तका निग्रह करना दम है । ये तीन अस्त्र जिसके पास हैं वह कषायरूप चोरोंसे अपनी रक्षा कर सकता है । जैसे जिसके हाथमें अस्त्र होता है वह चोरोंसे अपनी रक्षा कर सकता है उसी प्रकार कषायके दोषोंको जाननेसे, क्रोध आदिमें निमित्त वस्तुसे बचनेसे और कषायोंके विरोधी क्षमा आदि परिणामोंसे कषायको दूर किया जा सकता है । कहा भी है - सदा क्षमाकी उपासना करके क्रोधको जीतना चाहिये । मार्दवको धारण करके मानको जीतना चाहिये । तथा आर्जवभावसे मायाको जीतना चाहिये और सन्तोषसे लोभको जीतना चाहिये । जिसने कषायोंको जीत लिया उन्होंने क्या नहीं जीता । अर्थात् सबको जीत लिया । क्योंकि सब बन्धनका मूल कषाय है॥१८३०॥


इंदियदुद्दंतस्सा णिग्घिप्पंति दमणाणखलिणेहिं ।
उप्पहगामी णिग्घिप्पंति हु खलिणेहिं जह तुरया ॥१८३१॥

अर्थ: जैसे कुमार्गमें जानेवाले दुष्ट घोड़ोंको कठोर लगामके द्वारा वशमें किया जाता है । वैसे ही दमप्रधान ज्ञानके द्वारा इन्द्रियरूपी दुर्दान्त घोड़ोंको वशमें किया जाता है । यहाँ इन्द्रिय शब्दसे शब्द आदि विषयोंमें प्रवर्तमान इन्द्रिय ज्ञानको कहा है जिसका मूल राग और द्वेष है । उनसे होनेवाले आस्रवोंका निरोध तत्त्वज्ञानकी भावनासे होता है क्योंकि एक आत्मामें एक साथ दो रूप - तत्त्वज्ञान भी और इन्द्रिय विषयोंमें प्रवृत्ति भी नहीं हो सकते ॥१८३१॥


अणिहुदमणसा इंदियसप्पाणि णिगेण्हिदुं ण तीरंति ।
विज्जामंतोसधहीणेण व आसीविसा सप्पा ॥१८३२॥

अर्थ: जैसे जिसके पास विद्या, मंत्र और औषध नहीं है वह सर्पोंको वशमें नहीं कर सकता । उसी प्रकार जिसका मन चंचल है वह इन्द्रियरूपी सर्पोंको वशमें नहीं कर सकता ॥१८३२॥


पावपयोगासवदारणिरोधो अप्पमादफलिगेण ।
कीरइ फलिगेण जहा णावाए जलासवणिरोधो ॥१८३३॥

अर्थ: जैसे लकड़ीके पाटिये से नावमें जलका आना रोका जाता है । वैसे ही अप्रमादरूपी पाटियेसे अशुभ परिणामोंरूपी आस्रव द्वारको रोका जाता है ॥१८३३॥


गुत्तिपरिखाइ हि गुत्तं संजमणयरं ण कम्मरिउसेणा ।
बंधेइ सत्तुसेणा पुरं व परिखादिहिं सुगुत्तं ॥१८३४॥

अर्थ: जैसे शत्रुकी सेना परिखा आदिसे सुरक्षित नगरको नष्ट नहीं कर सकती। वैसे ही कर्मरूपी शत्रुकी सेना गुप्तिरूपी परिखा आदिसे युक्त संयमरूपी नगरको नष्ट नहीं कर सकती ॥१८३४॥


समिदिदिढणावमारुहिय अप्पमत्तो भवोदधिं तरदि ।
छज्जीवणिकायवधादिपावमगरेहिं अच्छित्तो ॥१८३५॥

अर्थ: प्रमादरहित साधु समितिरूपी दृढ़ नावपर आरूढ़ होकर छह कायके जीवोंके घातसे होनेवाले पापरूपी मगरमच्छोंसे अछूता रहकर संसार समुद्रको पार करता है ॥१८३५॥


दारेव दारवालो हिदये सुप्पणिहिदा सदी जस्स ।
दोसा धंसंति ण तं पुरं सुगुत्तं जहा सत्तू ॥१८३६॥

अर्थ: जैसे सुरक्षित नगरका शत्रु ध्वंस नहीं कर सकते, उसी प्रकार द्वारपर खड़े द्वारपालकी तरह जिसके हृदयमें वस्तु तत्त्वोंकी स्मृति बनी रहती है, दोष उसका अनिष्ट नहीं कर सकते ॥१८३६॥


जो हु सदिविप्पहूणो सो दोसरिऊण गेज्झओ होइ ।
अंधलगो व चरंतो अरीणमविदिज्जओ चेव ॥१८३७॥

अर्थ: जैसे शत्रुओंके मध्यमें असहाय अन्धा व्यक्ति शत्रुओंके द्वारा पकड़ा जाता है । वैसे ही जिसे वस्तु तत्त्वोंका सतत स्मरण नहीं रहता, वह दोषरूपी शत्रुओंसे पकड़ा जाता है ॥१८३७॥


अमुयंतो सम्मत्तं परीसहचमुक्करे उदीरंतो ।
णेव सदी मोत्तव्वा एत्थ दु आराधणा भणिया ॥१८३८॥

अर्थ: परीषहोंके समूहसे पीड़ित होते हुए भी साधुको रत्नत्रयको न छोड़ते हुए तत्त्वोंका स्मरण नहीं छोड़ना चाहिये । सदा तत्त्वका स्मरण करते रहना चाहिये । इसीको यहाँ आराधना कहा है ॥१८३८॥


इय सव्वत्थवि संवरसंवुडकम्मासवो भवित्तु मुणी ।
कुव्वंति तवं विविहं सुत्तुत्तं णिज्जराहेदुं ॥१८३९॥

अर्थ: इस प्रकार संवरके उक्त भेदोंके द्वारा मुनि कर्मोंका आस्रव रोककर आगममें कहे अनेक प्रकारके तपोंको करता है जो निर्जराके कारण हैं ॥१८३९॥


तवसा विणा ण मोक्खो संवरमित्तेण होइ कम्मस्स ।
उवभोगादीहिं विणा धणं ण हु खीयदि सुगुत्तं ॥१८४०॥

अर्थ: जैसे सुरक्षित भी धन उपभोग किये बिना नहीं घटता, उसी प्रकार तपके बिना कर्मोंके संवरमात्रसे कर्मोंका क्षय नहीं होता । अतः निर्जराके लिये तप करना चाहिये । पूर्वमें बद्ध कर्मोंके क्रमसे क्षयको निर्जरा कहते हैं ॥१८४०॥


पुव्वकदकम्मसडणं तु णिज्जरा सा पुणो हवे दुविहा ।
पढमा विवागजादा विदिया अविवागजाया य ॥१८४१॥

अर्थ: पूर्वमें बांधे हुए पौद्गलिक कर्मस्कन्धोंके अवयवोंका जीवके प्रदेशोंसे अलग होना निर्जरा है । कहा भी है - 'कर्मोंके एकदेशका क्षय निर्जराका लक्षण है । निर्जराके दो भेद हैं - द्रव्यनिर्जरा और भावनिर्जरा । खाये हुए भोजन पान आदि द्रव्योंके एकदेशका वमन आदिके द्वारा बाहर निकलना द्रव्यनिर्जरा है । और पुद्गलोंका कर्मरूप पर्यायको त्यागना भावनिर्जरा है । भावनिर्जराके भी दो भेद हैं - सविपाक निर्जरा और अविपाक निर्जरा । जो कर्म अपना फल दे चुके हैं उनकी निर्जरा सविपाक निर्जरा है और जिन कर्मोंका विपाक काल नहीं आया है उन्हें तप आदिके द्वारा बलात् उदयमें लाकर खेरना अविपाक निर्जरा है ॥१८४१॥


कालेण उवायेण य पच्चंति जहा वणप्फदिफलाइं ।
तह कालेण तवेण य पच्चंति कदाणि कम्माणि ॥१८४२॥

अर्थ: जैसे वनस्पतियोंके फल अपने समयपर भी पकते हैं और उपाय करनेसे समयसे पहले भी पक जाते हैं, उसी प्रकार पूर्वबद्ध कर्म भी अपनी स्थिति पूरी होनेपर अपना फल देते हैं और तपके द्वारा स्थिति पूरी होनेसे पूर्व ही फल देकर चले जाते हैं ॥१८४२॥


सव्वेसिं उदयमागदस्स कम्मस्स णिज्जरा होइ ।
कम्मस्स तवेण पुणो सव्वस्स वि णिज्जरा होइ ॥१८४३॥

अर्थ: सभी जीवोंके जो तप करते हैं या तप नहीं करते, अथवा सम्यग्दृष्टी हो या मिथ्यादृष्टी हों उन सब जीवोंके उदयावलीमें प्रवेश करके अपना फल देनेवाले कर्मोंकी निर्जरा होती है अर्थात् सविपाक निर्जरा तो सभी जीवोंके सदा हुआ करती है क्योंकि सभी जीव सदा कर्म करते हैं और सदा उनका फल भोगते हैं । इससे सविपाक निर्जरा थोड़े ही कर्मकी होती है यह सूचित होता है । शंका - सब कर्मोंकी निर्जरा क्यों नहीं होती ? समाधान - सब कर्मोंकी स्थिति भिन्न-भिन्न होती है । तथा सबके सहकारी कारण द्रव्य क्षेत्र आदि एक साथ नहीं मिलते अतः सब कर्म एक साथ उदयमें नहीं आते । अतः जिस कर्मका उदय होता है उसीकी निर्जरा होती है । शेषकी निर्जरा नहीं होती । किन्तु तप करनेसे सब कर्मोंकी निर्जरा होती है ॥१८४३॥


ण हु कम्मस्स अवेदिदफलस्स कस्सइ हवेज्ज परिमोक्खो ।
होज्ज व तस्स विणासो तवग्गिणा डज्झमाणस्स ॥१८४४॥

अर्थ: जिस कर्मका फल नहीं भोगा गया है उसका विनाश नहीं होता। अतः कर्म फल देकर जाता है। इससे सविपाक निर्जराका स्वरूप कहा। सविपाक निर्जरा उन्हीं कर्मोंकी होती है जो अपना फल दे चुकते हैं। किन्तु तपकी अग्निमें जलकर ऐसे कर्मोंका भी विनाश होता है जिन्होंने फल नहीं दिया है। इससे जो मत ऐसा मानते हैं कि किया हुआ कर्म बिना फल दिये नहीं जाता, उनका खण्डन होता है ॥१८४४॥


डहिऊण जहा अग्गी विद्धंसदि सुबहुगंपि तणरासी ।
विद्धंसेदि तवग्गी तह कम्मतणं सुबहुगंपि ॥१८४५॥

अर्थ: जैसे आग महान् भी तृणराशिको जलाकर खाक कर देती है। उसी प्रकार तपरूपी आग महान् भी कर्मरूपी तृणोंके ढेरको जलाकर नष्ट कर देती है ॥१८४५॥


कम्मं पि परिणमिज्जइ सिणेहपरिसोसएण सुतवेण ।
तो तं सिणेहमुक्कं कम्मं परिसडदि धूलिव्व ॥१८४६॥

अर्थ: ज्ञान, दर्शन और चारित्रके साथ होनेवाला तप कर्म-पुद्गलोंमें रहनेवाले स्नेह परिणामको सोख लेता है। अतः उससे कर्मोंका अभाव होता है। क्योंकि कर्मोंमें रहनेवाले स्नेहपरिणामका विनाश होनेके पश्चात् स्नेहरहित धूलकी तरह कर्म नष्ट हो जाते हैं। देखा जाता है जो वस्तुएँ चिक्कणता गुणके कारण परस्परमें बँधी होती हैं, उनकी चिक्कणता नष्ट होनेपर वे परस्परमें अलग हो जाती हैं, जैसे जलके संयोगसे धूल बँध जाती है और जलके सूखने पर अलग-अलग हो जाती है। इसी प्रकार कषाय आदि रूप स्नेहके कारण जो कर्मपुद्गल जीवके साथ एकरूप होते हैं, तपके द्वारा कषायके चले जानेपर वे जीवसे पृथक् हो जाते हैं ॥१८४६॥


धादुगदं जह कणयं सुज्झइ धम्मंतमग्गिणा महदा ।
सुज्झइ तवग्गि धंतो तह जीवो कम्मधादुगदो ॥१८४७॥

अर्थ: जैसे सुवर्ण पाषाणको महान् अग्निसे फूंकने पर उसमेंसे सोना अलग हो जाता है। उसी प्रकार तपरूपी आगसे तपानेपर कर्मरूपी धातुसे घिरा हुआ जीव शुद्ध हो जाता है ॥१८४७॥


तवसा चेव ण मोक्खो संवरहीणस्स होइ जिणवयणे ।
ण हु सोत्ते पविसंते किसिणं परिसुस्सदि तलायं ॥१८४८॥

अर्थ: जिनागममें संवरके बिना केवल तपसे ही सब कर्मोंका विनाश नहीं कहा है। क्योंकि यदि तालाबमें जल आता रहता है तो तालाबको पूर्णरूपसे सुखाया नहीं जा सकता ॥१८४८॥


एवं पिणद्धसंवरवम्मो सम्मत्तवाहणारूढो ।
सुदणाणमहाधणुगो झाणादितवोमयसरेहिं ॥१८४९॥

अर्थ: अतः जिसने संवररूप कवच धारण किया है, जो सम्यक्त्वरूपी रथपर सवार है, और श्रुतज्ञानरूपी धनुष लिये हुए है वह संयमरूपी योद्धा संयमरूपी रणभूमिमें ध्यान आदि तपोमय बाणोंके द्वारा समस्त कर्मरूपी शत्रुओंकी सेनाको पराजित करके मोक्षरूपी अनुपम राज्यलक्ष्मीको प्राप्त करता है ॥१८५०॥


संजमरणभूमीए कम्मारिचमू पराजिणिय सव्वं ।
पावदि संजमजोहो अणोवमं मोक्खरज्जसिरिं ॥१८५०॥

अर्थ: अतः जिसने संवररूप कवच धारण किया है, जो सम्यक्त्वरूपी रथपर सवार है, और श्रुतज्ञानरूपी धनुष लिये हुए है वह संयमरूपी योद्धा संयमरूपी रणभूमिमें ध्यान आदि तपोमय बाणोंके द्वारा समस्त कर्मरूपी शत्रुओंकी सेनाको पराजित करके मोक्षरूपी अनुपम राज्य-लक्ष्मीको प्राप्त करता है ॥१८५०॥


जीवो मोक्खपुरक्कडकल्लाणपरंपरस्स जो भागी ।
भावेणुववज्जदि सो धम्मं तं तारिसमुदारं ॥१८५१॥

अर्थ: जो जीव सुदेवत्व सुमानुषत्व आदि कल्याण परम्पराके साथ अन्तमें मोक्षको प्राप्त करता है वही समस्त सुख सम्पादनमें समर्थ महान् धर्मको भावपूर्वक धारण करता है । अर्थात् भावपूर्वक धर्मका पालन करनेसे सांसारिक सुखके साथ मोक्षसुख प्राप्त होता है ॥१८५१॥


धम्मेण होदि पुज्जो विस्ससणिज्जो पिओ जसंसी य ।
सुहसज्झो य णराणं धम्मो मणणिव्वुदिकरो य ॥१८५२॥

अर्थ: धर्मसे मनुष्य पूज्य होता है, सबका विश्वासपात्र होता है, सबका प्रिय और यशस्वी होता है । मनुष्य धर्मको सुखपूर्वक पालन कर सकते हैं । कहा भी है - धर्मकी श्रद्धा करनेपर, धर्मको सुननेपर, धर्मको जानने और धर्मका स्मरण करनेपर फलकी प्राप्ति होती है । तथा धर्मसे मनको शान्ति मिलती है ॥१८५२॥


जावदियाइं कल्लाणाइं माणुस्स-देवलोगे य ।
आवहदि ताण सव्वाणि मोक्खं सोक्खं च वरधम्मो ॥१८५३॥

अर्थ: मनुष्यलोक और देवलोकमें जितने कल्याण हैं उन सबको उत्तमधर्म लाता है और अन्तमें मोक्षसुखको भी लाता है ॥१८५३॥


ते धण्णा जिणधम्मं जिणदिट्ठं सव्वदुक्खणासयरं ।
पडिवण्णा दिढधिदिया विसुद्धमणसा णिरावेक्खा ॥१८५४॥

अर्थ: जिन्होंने जिन भगवान्के द्वारा कहे गये और सब दुःखोंका नाश करनेवाले जिन धर्मको दृढ़ धैर्यके साथ निर्मल मनसे और बिना किसी प्रकारकी अपेक्षाके धारण किया वे पुण्यशाली हैं ॥१८५४॥


विसयाडवीए उम्मग्गविहरिदा सुचिरमिंदियस्सेहिं ।
जिणदिट्ठणिव्वुदिपहं धण्णा ओदरिय गच्छंति ॥१८५५॥

अर्थ: जो विषयरूपी वनमें इन्द्रियरूपी घोड़ोंके द्वारा बलपूर्वक ले जाये जाकर चिरकालसे कुमार्गमें विहार करते हैं और एक दिन उन इन्द्रियरूपी घोड़ेसे उतरकर जिन भगवान्के द्वारा कहे मोक्षमार्गमें चलने लगते हैं वे धन्य हैं ॥१८५५॥


रागेण य दोसेण य जगे रमंतम्मि वीदरायम्मि ।
धम्मम्मि णिरासादम्मि रदी अदिदुल्लहा होइ ॥१८५६॥

अर्थ: जो राग और द्वेषपूर्वक संसारके भोगोंमें फँसे हैं, स्वादरहित वीतराग धर्ममें उनकी रुचि होना अतिदुर्लभ है । कहा भी है–जिनेन्द्रदेवने कुल, रूप, यश, कीर्ति, धन, विद्या, सुख, लक्ष्मी, आरोग्य, इष्टसंयोग, अनिष्ट वियोग, दीर्घ आयु, स्वर्ग, मोक्ष तथा अन्य भी जगत्में प्रशस्त भाव कहे हैं । इस जगत्में उन्हें धर्मके द्वारा प्राप्त करना शक्य है । अतः तुम अपने हितके लिये धर्माचरण करो ॥१८५६॥


सहलं माणुसजम्मं तस्स हवदि जस्स चरणमणवज्जं ।
संसारदुक्खकारयकम्मागमदारसंरोधं ॥१८५७॥

अर्थ: संसारके दुःखोंको करनेमें समर्थ कर्मोंके आनेके द्वारको रोकनेवाला चारित्र जिसका निर्दोष है उसका मनुष्य जन्म सफल है । यहाँ धर्म शब्दसे चारित्र कहा है, इससे यह प्रकट होता है ॥१८५७॥


जह जह णिव्वेदसमं वेरग्गदयादमा पवड्ढंति ।
तह तह अब्भासयरं णिव्वाणं होइ पुरिसस्स ॥१८५८॥

अर्थ: जैसे-जैसे मनुष्यमें वैराग्य, निर्वेद, उपशम, दया और चित्तका निग्रह बढ़ता है वैसे-वैसे मोक्ष निकट आता है ॥१८५८॥


सम्मद्दंसणतुंबं दुवालसंगारयं जिणिंदाणं ।
वयणेमियं जगे जयइ धम्मचक्कं तवोधारं ॥१८५९॥

अर्थ: जिनेन्द्रका धर्मचक्र जगत्में जयशील होता है। सम्यग्दर्शन उसकी नाभि है, द्वादशांग उसके अर हैं, व्रत नेमि है और तप धारा अर्थात् दूसरी नेमि है ॥१८५९॥


दंसणसुदतवचरणमइयम्मि धम्मम्मि दुल्लहा बोही ।
जीवस्स कम्मसत्तस्स संसरंतस्स संसारे ॥१८६०॥

अर्थ: संसारमें भटकते हुए कर्मलिप्त जीवके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् तपश्चरणमयी धर्ममें बोधि अर्थात् रत्नत्रयकी प्राप्ति दुर्लभ है ॥१८६०॥


संसारम्मि अणंते जीवाणं दुल्लहं मणुस्सत्तं ।
जुगसमिलासं जोगो जह लवणजले समुद्दम्मि ॥१८६१॥

अर्थ: जैसे लवणसमुद्रके पूर्व भागमें जुआ और पश्चिम भागमें उसकी लकड़ी डाल देनेपर दोनोंका संयोग दुर्लभ है। उसी प्रकार अनन्त संसारमें मनुष्य भवका पाना दुर्लभ है ॥१८६१॥


असुहपरिणामबहुलत्तणं च लोगस्स अदिमहल्लत्तं ।
जोणिबहुत्तं च कुणदि सुदुल्लहं माणुसं जोणी ॥१८६२॥

अर्थ: मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और प्रमादरूप अशुभ परिणामोंकी बहुतायतके कारण मनुष्य योनि दुर्लभ है । तथा मनुष्य रहित लोक अतिमहान् है इससे भी मनुष्ययोनि दुर्लभ है क्योंकि असंख्यात द्वीप समुद्रों तक तो नरकावास हैं, ऊपर स्वर्गपटल । शेष लोकाकाश भी महान् है । तथा जीवोंकी योनियाँ बहुत हैं । इससे भी मनुष्य योनि दुर्लभ है ॥१८६२॥


देसकुलरूवमारोग्गमाउगं बुद्धिसवणगहणाणि ।
लद्धे वि माणुसत्ते ण हुंति सुलभाणि जीवस्स ॥१८६३॥

अर्थ: जीवके मनुष्य पर्याय प्राप्त करने पर भी देश, कुल, रूप, आरोग्य, आयु, बुद्धि, श्रवण, ग्रहण सुलभ नहीं हैं ॥१८६३॥ परवश मनुष्योंके कारण या यतिगणके आलस्यसे अथवा अपना और दूसरोंका उद्धार करनेमें दक्ष न होनेसे यतिजन भी नहीं आते हैं इससे भी धर्मश्रवणकी दुर्लभता है। कदाचित् पापका उपशम होनेसे यतिजनके पधारनेपर भी विनयपूर्वक प्रश्न करनेपर और प्रशस्त वचन बोलनेवाले गुरुके सन्मुख होनेपर धर्म सुननेको मिलता है इसलिये धर्मश्रवणकी दुर्लभता है। अथवा मुनिगणके वास स्थानपर जाकर भी सोता है स्वयं जो कुछ असार वचन बोलता है या मूर्खोंके वचन सुनता है, विनय पूर्वक बर्ताव नहीं करता। इससे भी धर्म श्रवण दुर्लभ है। धर्म सुननेपर भी श्रुतज्ञानावरणका उदय होनेसे उसको समझना अतिदुर्लभ है। तथा समझनेपर भी उसमें मन लगाना दुष्कर है क्योंकि पहले कभी नहीं सुना था। तथा जीवादि तत्त्व भी सूक्ष्म है। श्रुतज्ञानका क्षयोपशम, मनका लगना, वक्ताका वचन सौष्ठव ये सब दुर्लभ होनेसे धर्मज्ञान दुर्लभ है, धर्मका ज्ञान होनेपर भी ‘जिन भगवान्के द्वारा कहा हुआ स्वर्ग और मोक्षरूप फलको देनेवाला, जीवके सम्यक्त्व, ज्ञान चारित्र तप दान पूजा भावरूप धर्म है’ ऐसा श्रद्धान दुर्लभ है क्योंकि जीवोंके दर्शनमोहका उदय रहता है। उपदेशलब्धि, काललब्धि और करणलब्धि भी सदा नहीं होती, कदाचित् ही होती हैं ॥१८६३॥


लद्धेसु वि तेसु पुणो बोधी जिणसासणम्मि ण हु सुलहा ।
कुपधाकुलो य लोगो जं बलिया रागदोसा य ॥१८६४॥

अर्थ: मनुष्यभव आदिके प्राप्त होनेपर भी ‘बोधि’ अर्थात् जिन दीक्षाकी ओर अभिमुख बुद्धिका होना सुलभ नहीं है क्योंकि जीवोंके संयमको घातनेवाला कर्म प्रबल होता है। तथा यह लोक मिथ्यामतोंसे भरा है। अतः बहुत लोग जिस धर्मका आचरण करते हैं उसे ही प्रमाण मानकर जो कुछ मनमें आता है, करते हैं। रागद्वेषके बलवान होनेसे ज्ञान और श्रद्धानसे युक्त भी मनुष्य सन्मार्गपर नहीं चलता ॥१८६४॥


इय दुल्लहाए बोहीए जो पमाइज्ज कह वि लद्धाए ।
सो उल्लट्टइ दुक्खेण रदणगिरिसिहरमारुहिय ॥१८६५॥

अर्थ: इस प्रकार उक्त क्रमानुसार दीक्षाके अभिमुख दुर्लभ बुद्धि प्राप्त होनेपर भी जो प्रमाद करता है वह प्रमादी सुमेरुके शिखरपर चढ़कर भी उससे गिरता है ॥१८६५॥


फिडिदा संती बोधी ण य सुलहा होइ संसरंतस्स ।
पडिदं समुद्दमज्झे रदणं व तमंधयारम्मि ॥१८६६॥

अर्थ: जैसे अन्धकारमें समुद्रके मध्यमें गिरा रत्न पाना दुर्लभ है वैसे ही एक बार प्राप्त होकर नष्ट हुई दीक्षाभिमुख बुद्धिरूप बोधि संसारमें भ्रमण करनेवाले जीवको प्राप्त होना दुर्लभ है ॥१८६६॥


ते धण्णा जे जिणवरदिट्ठे धम्मम्मि होंति संबुद्धा ।
जे य पवण्णा धम्मं भावेण उवट्ठिदमदीया ॥१८६७॥

अर्थ: जो जिन भगवान्के द्वारा उपदिष्ट धर्ममें प्रबुद्ध होते हैं वे धन्य हैं । तथा जो दीक्षाभिमुख बुद्धिको प्राप्त करके भावपूर्वक धर्मको अपनाते हैं वे तो महाधन्य हैं ॥१८६७॥


इय आलंबणमणुपेहाओ धम्मस्स होंति ज्झाणस्स ।
ज्झायंतो ण वि णस्सदि ज्झाणे आलंबणेहिं मुणी ॥१८६८॥

अर्थ: इस प्रकार अनुप्रेक्षा धर्मध्यानका आलम्बन होती है । ध्यान करनेवाला साधु ध्यानमें निमित्त आलम्बनोंका आश्रय लेनेसे ध्यानसे च्युत नहीं होता । जो जिस वस्तुके स्वरूपमें अपने मनको लगाता है वह उस वस्तुके यथार्थस्वरूपसे च्युत नहीं होता, क्योंकि वह उसे भूलता नहीं है ॥१८६८॥


आलंबणं च वायण पुच्छणपरिवट्टणाणुपेहाओ ।
धम्मस्स तेण अविरुद्धाओ सव्वाणुपेहाओ ॥१८६९॥

अर्थ: वाचना, पृच्छना, परिवर्तना तथा अनुप्रेक्षाएँ नामक स्वाध्याय धर्मध्यानके आलम्बन है। अतः सब अनुप्रेक्षा धर्मध्यानके अनुकूल आलम्बन हैं अर्थात् उनको लेकर धर्मध्यान किया जाता है ॥१८६९॥


आलंबणेहिं भरिदो लोगो झाइदुमणस्स खवयस्स ।
जं जं मणसा पिच्छदि तं तं आलंबणं हवइ ॥१८७०॥

अर्थ: ध्यान करनेके इच्छुक क्षपणके लिये यह लोक आलम्बनोंसे भरा हुआ है। वह मनको जिस ओर लगाता है वही आलम्बन हो जाता है ॥१८७०॥


इच्चेवमदिक्कंतो धम्मज्झाणं जदा हवइ खवओ ।
सुक्कज्झाणं झायदि तत्तो सुविसुद्धलेस्साओ ॥१८७१॥

अर्थ: इस प्रकार ऊपर कहे धर्मध्यानको जब क्षपक पूर्ण कर लेता है तब वह अति विशुद्ध लेश्याके साथ शुक्लध्यानको ध्याता है। क्योंकि परिणामोंकी पंक्ति उत्तरोत्तर निर्मलताको लिये हुए स्थित है अतः वह क्रमसे ही होती है। जिसने पहली सीढ़ीपर पैर नहीं रखा वह दूसरी सीढ़ीपर नहीं चढ़ सकता। अतः धर्मध्यानमें परिपूर्ण हुआ अप्रमत्त संयमी ही शुक्लध्यान करनेमें समर्थ होता है, यह बात इस गाथाके द्वारा कही है ॥१८७१॥


ज्झाणं पुधत्तसवितक्कसवीचारं हवे पढमसुक्कं ।
सवितक्केक्कत्तावीचारं ज्झाणं विदियसुक्कं ॥१८७२॥

अर्थ: पहला शुक्लध्यान पृथक्त्व सवितर्क सविचार नामक है। दूसरा शुक्लध्यान सवितर्क एकत्व अविचार नामक है ॥१८७२॥


सुहुमकिरियं तु तदियं सुक्कज्झाणं जिणेहिं पण्णत्तं ।
बेंति चउत्थं सुक्कं जिणा समुच्छिण्णकिरियं तु ॥१८७३॥

अर्थ: जिन भगवान्ने तीसरा शुक्लध्यान सूक्ष्मक्रिय कहा है और चतुर्थ शुक्ल समुच्छिन्नक्रिय कहा है ॥१८७३॥


दव्वाइं अणेयाइं तीहिं वि जोगेहिं जेण ज्झायंति ।
उवसंतमोहणिज्जा तेण पुधत्तंत्ति तं भणिया ॥१८७४॥

अर्थ: उपशान्त मोहनीय गुणस्थानवाले यतः तीन योगोंके द्वारा अनेक द्रव्योंको बदल बदलकर ध्यान करते हैं इससे इसे पृथक्त्व कहते हैं ॥१८७४॥


जम्हा सुदं वितक्कं जम्हा पुव्वगदअत्थकुसलो य ।
ज्झायदि ज्झाणं एदं सवितक्कं तेण तं झाणं ॥१८७५॥

अर्थ: यतः श्रुतज्ञानको वितर्क कहते है और यतः चौदह पूर्वोंमें आये अर्थमें कुशल अर्थात् चौदह पूर्वोंका ज्ञाता साधु ही इस शुक्लध्यानको ध्याता है इससे इस प्रथम शुक्लध्यानको सवितर्क कहते हैं। अर्थात् चौदह पूर्व श्रुतरूप होनेसे उनमें जो वस्तुविवेचन है उसको भी वितर्क शब्दसे कहते हैं। प्रथम शुक्लध्यानमें उस अर्थश्रुतरूप वितर्कका ध्यान किया जाता है इससे उसे सवितर्क कहते हैं। अथवा श्रुतका कारण होनेसे वितर्क शब्दका अर्थ श्रुत है। ध्यान श्रुतज्ञानकी संज्ञा है उसका कारण श्रुत है। तो अपने कारण श्रुतके साथ रहनेसे उसे सवितर्क कहते हैं॥१८७५॥


अत्थाण वंजणाण य जोगाण य संकमो हु वीचारो ।
तस्स य भावेण तयं सुत्ते उत्तं सवीचारं ॥१८७६॥

अर्थ: तथा अर्थोंके वाचक जो शब्द हैं उनके संक्रम अर्थात् परावर्तनको और योगोंके परिवर्तनको विचार कहते हैं। ‘अत्थाण वंजणाण य’ का अर्थ अर्थोंके और व्यंजनोंके परिवर्तनको वीचार कहते हैं इस प्रकारसे समुच्चयरूप नहीं लेना चाहिये क्योंकि पृथक्त्व शब्दसे अर्थका पृथक्त्व ग्रहण किया है। इस वीचारके होनेसे इस शुक्लध्यानको आगममें सवीचार कहा है। ‘अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः’ इत्यादि परिमित अनेक द्रव्योंका ज्ञान करानेमें समर्थ श्रुतके वचनोंसे उत्पन्न हुआ यह ध्यान भिन्न-भिन्न द्रव्योंका आलम्बन करता है अतः एक ही द्रव्यका आलम्बन करनेवाले एकत्व वितर्क शुक्लध्यानसे भिन्न होता है। तथा पृथक्त्व वितर्क शुक्लध्यान तीनों योगोंकी सहायतासे होता है और एकत्ववितर्क एक ही योगकी सहायतासे होता है। इससे भी वह इससे भिन्न पड़ता है। पृथक्त्ववितर्क शुक्लध्यानका स्वामी उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थानवर्ती होता है और एकत्ववितर्कका स्वामी क्षीणकषाय गुणस्थानवर्ती होता है। इससे भी वह इससे भिन्न है। पृथक्त्ववितर्क वितर्क सहित होता है और तीसरा तथा चतुर्थ शुक्लध्यान वितर्क रहित होते हैं। अतः वह तीसरे और चतुर्थ शुक्लध्यानसे विलक्षण है। अतः पृथक्त्ववितर्क सवीचार नामसे ही अन्य ध्यानोंसे इसकी विलक्षणता प्रकट होती है। इस प्रकार प्रथम शुक्लध्यानका लक्षण कहा है ॥१८७६॥


जेणेगमेव दव्वं जोगेणेगेण अण्णदरगेण ।
खीणकसाओ ज्झायदि तेणेगत्तं तयं भणियं ॥१८७७॥

अर्थ: दूसरे शुक्लध्यानका नाम एकत्ववितर्क है क्योंकि इसमें एक ही योगका अवलम्बन लेकर एक ही द्रव्यका ध्यान किया जाता है । अतः एक द्रव्यका अवलम्बन लेनेसे इसे एकत्व कहते हैं । यह ध्यान किसी एक योगमें स्थित आत्माके ही होता है । इसका स्वामी क्षीण कषाय गुणस्थानवर्ती मुनि होता है ॥१८७७॥


जम्हा सुदं वितक्कं जम्हा पुव्वगदअत्थकुसलो य ।
ज्झायदि ज्झाणं एवं सवितक्कं तेण तं ज्झाणं ॥१८७८॥

अर्थ: यतः श्रुतको वितर्क कहते हैं और यतः चौदह पूर्वगत अर्थमें कुशल मुनि ही इस ध्यानका ध्याता है । इससे दूसरा शुक्लध्यान सवितर्क है । तथा अर्थ, व्यंजन और योगोंके परि- वर्तनको वीचार कहते हैं। उसके न होनेसे दूसरा शुक्लध्यान अवीचार कहा है ॥१८७८-७९॥


अत्थाण वंजणाण य जोगाणं संकमो हु वीचारो ।
तस्स अभावेण तयं झाणं अविचारमिति वुत्तं ॥१८७९॥

अर्थ: यतः श्रुतको वितर्क कहते हैं और यतः चौदह पूर्वगत अर्थमें कुशल मुनि ही इस ध्यानका ध्याता है। इससे दूसरा शुक्लध्यान सवितर्क है। तथा अर्थ, व्यंजन और योगोंके परिवर्तनको वीचार कहते हैं। उसके न होनेसे दूसरा शुक्लध्यान अवीचार कहा है ॥१८७८-७९॥ ॥१८७९॥


अवितक्कमवीचारं सुहुमकिरियसबंधणं तदियसुक्कं ।
सुहमम्मि कायजोगे भणिदं तं सव्वभावगदं ॥१८८०॥

अर्थ: तीसरे शुक्लध्यानका आलम्बन श्रुत नहीं है अथवा वह स्वयं श्रुतज्ञानरूप होता है इसलिये वितर्कसे रहित होता है। पूर्वमें आलम्बन किये हुए अर्थको छोड़कर अर्थान्तरके आलम्बन करनेको वीचार कहते हैं। वह भी इसमें नहीं होता। अतः यह अवीचार है। इसमें श्वासोच्छ्वासादिक्रिया सूक्ष्म हो जाती है। तथा यह सूक्ष्मकाययोगके होनेपर होता है इसलिये इसे सूक्ष्मक्रिय कहते हैं। यह तीसरा शुक्लध्यान त्रिकालवर्ती अनन्त सामान्यविशेषात्मक धर्मोंसे युक्त छह द्रव्योंको एक साथ प्रकाशन करता है अतः सर्वगत है। एक साथ समस्त छह द्रव्योंके समस्त स्वरूपको प्रकाशन करना ही इसका एकमात्र मुख होनेसे ध्यानका लक्षण ‘एकाग्रचिन्ता निरोधः’ इसमें रहता है। एकाग्रचिन्तानिरोधमें चिन्ता शब्द ज्ञान सामान्यका वाचक है। अतः कहीं श्रुतज्ञानको ध्यान कहते हैं, कहीं केवलज्ञानको ध्यान कहते हैं, कहीं श्रुतअज्ञानको ध्यान कहते हैं, कहीं मतिज्ञान या मतिअज्ञानको ध्यान कहते हैं। क्योंकि निश्चलताका ही नाम ध्यान है। अतः ज्ञानकी निश्चलता सब ज्ञानोपयोगोंमें साधारण है। आशय यह है कि ज्ञानकी निश्चलताका ही नाम ध्यान है। अतः ध्यानका यह लक्षण सब निश्चल ज्ञानोपयोगोंमें घटित होता है। केवलीका ध्यान केवल ज्ञान मूलक होता है। अतः वह तो सर्वथा निश्चल ही होता है। इससे सूक्ष्मक्रिय नामक ध्यानमें भी ध्यानका लक्षण घटित होता है ॥१८८०॥


सुहुमम्मि कायजोगे वट्टंतो केवली तदियसुक्कं ।
झायदि णिरुंभिदुं जे सुहुमत्तं कायजोगंपि ॥१८८१॥

अर्थ: अतः सूक्ष्मकाययोगमें स्थित केवली उस सूक्ष्म भी काययोगको रोकनेके लिये तीसरा शुक्लध्यान ध्याता है ॥१८८१॥


अवियक्कमवीचारं अणियट्टिमकिरियं च सीलेसिं ।
ज्झाणं णिरुद्धयोगं अपच्छिमं उत्तमं सुक्कं ॥१८८२॥

अर्थ: यह तीसरा शुक्लध्यान पूर्वोक्त वितर्क और वीचारसे रहित होनेसे अवितर्क और अवीचार होता है । समस्त कर्मोंको नष्ट किये बिना समाप्त नहीं होता इसलिये अनिवर्ति है । इसमें प्राण अपान श्वास उच्छ्वासका प्रचार, समस्त काययोग मनोयोग वचन योगरूप हलन-चलन क्रियाका व्यापार नष्ट हो जाता है । इसलिये यह अक्रिय है । शीलोंके स्वामीको शीलेश कहते हैं । उसके भावको शैलेशीभाव कहते हैं वह है यथाख्यात चारित्र । उसके साथ होनेवाले ध्यानको भी शैलेशी कहा है । उससे सब कर्मोंका आस्रव रुक जाता है अतः उसे निरुद्धयोग कहा है । इसके अनन्तर कोई ध्यान नहीं होता इससे इसे अपश्चिम कहा है । तथा यह परम शुक्लध्यान है ॥१८८२॥


तं पुण णिरुद्धजोगी सरीरतियणासणं करेमाणो ।
सवण्हु अपडिवादी ज्झायदि ज्झाणं चरिमसुक्कं ॥१८८३॥

अर्थ: काययोगका निरोध करके अयोग केवली औदारिक तैजस और कार्मण शरीरों का नाश करता हुआ अन्तिम शुक्ल ध्यानको ध्याता है । सूक्ष्मकाय योग रूप आत्म परिणाम वाला सयोगकेवली तीसरे शुक्ल ध्यानको ध्याता है और अयोगरूप आत्मपरिणाम वाला अयोगकेवली चतुर्थ शुक्ल ध्यानको ध्याता है। यह तीसरे और चतुर्थ शुक्ल ध्यान में भेद है ॥१८८३॥


इय सो खवओ ज्झाणं एयग्गमणो समस्सिदो सम्मं ।
विउलाए णिज्जराए वट्टदि गुणसेढिमारूढो ॥१८८४॥

अर्थ: इस प्रकार वह क्षपक एकाग्रमन से सम्यक् ध्यान को ध्याकर उपशान्त कषाय आदि गुण स्थानों की श्रेणि पर आरूढ़ होकर विपुल कर्म निर्जरा करता है ॥१८८४॥


सुचिरं वि संकिलिट्ठं विहरंतं झाणसंवरविहूणं ।
ज्झाणेण संवुडप्पा जिणदि अंतोमुहुत्तेण ॥१८८५॥

अर्थ: एक अन्तर्मुहूर्त मात्र या एक दिन रात मात्र ध्यान रूप संवरसे युक्त मुनि, कुछ कम एक पूर्व कोटि काल तक ध्यानरूप संवरसे रहित तथा संक्लेशसहित चारित्र का पालन करने वाले साधुसे श्रेष्ठ है ॥१८८५॥


एवं कसायजुद्धंमि हवदि खवयस्स आउधं झाणं ।
ज्झाणविहूणो खवओ रंगेव अणाउधो मल्लो ॥१८८६॥

अर्थ: इस प्रकार कषायोंके साथ युद्ध करनेमें अर्थात् कषायोंका संहार करनेमें ध्यान क्षपकके लिये आयुध होता है। अर्थात् ध्यानके द्वारा कषायोंका विनाश किया जाता है। जैसे बिना अस्त्रके युद्धमें शत्रुका घात करना संभव नहीं है, उसी प्रकार ध्यान हीन क्षपक कषायों को नहीं जीत सकता। इससे ध्यानको कषायोंका विनाश करने वाला कहा है ॥१८८६॥


रणभूमीए कवचं व कसायरणे [?] हवे कवचं ।
जुद्धे व णिरावरणो झाणेण विणा हवे खवओ ॥१८८७॥

अर्थ: जैसे युद्ध भूमिमें कवच होता है वैसे ही कषायोंसे युद्ध करनेमें ध्यान कवचके समान है। इससे कहा है कि ध्यान कषायसे रक्षा करता है। ध्यानके अभावमें दोष कहते हैं। जैसे युद्ध में कवचके बिना योद्धा होता है वैसे ही ध्यान के बिना क्षपक होता है। अर्थात् युद्धमें बिना कवचके योद्धाकी जो स्थिति है वही स्थिति ध्यानके बिना क्षपक की होती है। वह भी उसी की तरह मारा जाता है ॥१८८७॥


ज्झाणं करेइ खवयस्सोवट्ठंभं खु हीणचेट्ठस्स ।
थेरस्स जहा जंतस्स कुणदि जट्ठी उवट्ठंभं ॥१८८८॥

अर्थ: जैसे चलनेमें असमर्थ वृद्ध पुरुषको गमन करते समय लाठी सहायक होती है वैसे ही असमर्थ क्षपकका सहायक ध्यान होता है ॥१८८८॥


मल्लस्स णेहपाणं व कुणइ खवयस्स दढबलं झाणं ।
झाणविहीणो खवओ रंगे व अपोसिओ मल्लो ॥१८८९॥

अर्थ: जैसे दुग्धपान मल्ल पुरुषके बलको दृढ़ करता है वैसे ही ध्यान क्षपककी शक्तिको दृढ़ करता है। जैसे अपुष्ट मल्ल अखाड़ेमें हार जाता है वैसे ही ध्यानसे रहित क्षपक कषायोंसे हार जाता है ॥१८८९॥


वइरं रदणेसु जहा गोसीसं चंदणं व गन्धेसु ।
वेरुलियं व मणीणं तह ज्झाणं होइ खवयस्स ॥१८९०॥

अर्थ: जैसे रत्नोंमें हीरा, सुगन्धित द्रव्योंमें गोशीर्ष चन्दन और मणियोंमें वैडूर्यमणि सारभूत है । वैसे ही क्षपकके दर्शन चारित्र और तपमें ध्यान सारभूत है ॥१८९०॥


झाणं किलेससावदरक्खा रक्खाव सावदभयम्मि ।
झाणं किलेसवसणे मित्तं मित्तंव वसणम्मि ॥१८९१॥

अर्थ: जैसे हिंसक जन्तुओंसे भय होने पर उनसे रक्षा बचाव करती है वैसे ही ध्यान दुःखरूपी हिंसक जन्तुओंसे रक्षा करता है । तथा जैसे संकट में मित्र सहायक होता है वैसे ही दुःखरूपी संकटमें ध्यान सहायक होता है ॥१८९१॥


ज्झाणं कसायवादे गब्भघरं मारुदेव गब्भघरं ।
झाणं कसायउण्हे छाही छाहीव उण्हम्मि ॥१८९२॥

अर्थ: जैसे गर्भगृह वायुसे रक्षा करता है वैसे ही ध्यान कषायरूपी वायुके लिये गर्भगृह है । जैसे घामसे बचनेके लिये छाया है वैसे ही कषायरूपी घामसे बचावके लिये ध्यान छायाके समान है ॥१८९२॥


झाणं कसायडाहे होदि वरदहो दहोव डाहम्मि ।
झाणं कसायसीदे अग्गी अग्गीव सीदम्मि ॥१८९३॥

अर्थ: जैसे दाहके लिये उत्तम सरोवर है वैसे ही कषायरूप दाहके लिये ध्यान उत्तम सरोवर है । जैसे शीतसे बचावके लिये आग है वैसे कषायरूपी शीतसे बचावके लिये ध्यान आग के समान है ॥१८९३॥


झाणं कसायपरचक्कभए बलवाहणड्ढओ राया ।
परचक्कभए बलवाहणड्ढओ होइ जह राया ॥१८९४॥

अर्थ: जैसे सेना और वाहनोंसे समृद्ध राजा शत्रु सेनाके आक्रमणके भयसे रक्षा करता है वैसे ही कषायरूपी शत्रु सेनाका भय दूर करनेके लिये ध्यान बल वाहनसे समृद्ध राजाके समान है ॥१८९४॥


झाणं कसायरोगेसु होदि वेज्जो तिगिंछदे कुसलो ।
रोगेसु जहा वेज्जो पुरिसस्स तिगिंछओ कुसलो ॥१८९५॥

अर्थ: जैसे वैद्य पुरुषके रोगों की चिकित्सामें कुशल होता है वैसे ही ध्यान कषायरूपी रोग की चिकित्सा करनेमें कुशलवैद्य है ॥१८९५॥


झाणं विसयछुहाए होइ य छुहाए अण्णं वा ।
झाणं विसयतिसाए उदयं उदयं व तण्हाए ॥१८९६॥

अर्थ: जैसे अन्न भूखको दूर करता है वैसे ही विषयोंकी भूख दूर करनेके लिये ध्यान अन्नके समान है । तथा जैसे प्यास लगने पर पानी उसे दूर करता है वैसे ही विषयरूपी प्यासके लिये ध्यान पानीके समान है ॥१८९६॥


इय झायंतो खवओ जइया परिहीणवायिओ होइ ।
आराधणाए तइया इमाणि लिंगाणि दंसेई ॥१८९७॥

अर्थ: इस प्रकार ध्यानमें संलग्न क्षपक जब बोलनेमें असमर्थ होता है तब मैं रत्नत्रयमें संलग्न हूँ यह बात आगे कहे चिह्नोंसे प्रकट करता है ॥१८९७॥


हुंकारंजलिभमुहंगुलीहिं अच्छीहिं वीरमुट्ठीहिं ।
सिरचालणेण य तहा सण्णं दावेदि सो खवओ ॥१८९८॥

अर्थ: निर्यापकाचार्यके पूछनेपर कि तुम्हारा चित्त सावधान है, वह क्षपक हुंकारसे, हाथों की अंजुलि द्वारा, या भौं के संचालनसे अथवा पाँचों अँगुलियोंकी मुट्ठी बनाकर या सिर हिलाकर प्रसन्न दृष्टिसे संकेत करता है ॥१८९८॥


तो पडिचरया खवयस्स दिंति आराधणाए उवओगं ।
जाणंति सुदरहस्सा कदसण्णा कायखवएण ॥१८९९॥

अर्थ: तब क्षपकके द्वारा पहलेसे ही संकेत ग्रहण करने वाले और आगमके रहस्यको जानने वाले परिचारक मुनिगण यह जान लेते हैं कि क्षपकका उपयोग आराधनामें है ॥१८९९॥


इय समभावमुवगदो तह ज्झायंतो पसत्थझाणं च ।
लेस्साहिं विसुज्झंतो गुणसेढिं सो समारुहदि ॥१९००॥

अर्थ: इस प्रकार समताभावको प्राप्त वह क्षपक प्रशस्त ध्यान ध्याता है और विशुद्ध लेश्यापूर्वक अर्थात् क्रमसे पीत, पद्म और शुक्ल लेश्यारूप परिणमन करता हुआ गुणश्रेणिपर अर्थात् उपशम या क्षपक श्रेणिपर आरोहण करता है ॥१९००॥


जह बाहिरलेस्साओ किण्हादीओ हवंति पुरिसस्स ।
अब्भंतरलेस्साओ तह किण्हादी य पुरिसस्स ॥१९०१॥

अर्थ: जैसे पुरुषके शरीरमें कृष्ण आदि द्रव्य लेश्या - शरीरका रंग काला गोरा होता है । वैसे ही अभ्यन्तरमें कृष्ण आदि भावलेश्या होती है ॥१९०१॥


किण्हा णीला काओ लेस्साओ तिण्णि अप्पसत्थाओ ।
पजहइ विरायकरणो संवेगमणुत्तरं पत्तो ॥१९०२॥

अर्थ: क्षपक कृष्ण, नील, कापोत, इन तीन अप्रशस्त लेश्याओंको त्यागकर वैराग्य भावनासे युक्त होता है और संसारसे अत्यन्त भयभीत रहता है ॥१९०२॥


तेओ पम्मा सुक्का लेस्साओ तिण्णि वि दु पसत्थाओ ।
पडिवज्जेइ य कमसो संवेगमणुत्तरं पत्तो ॥१९०३॥

अर्थ: तथा पीत, पद्म, शुक्ल, इन तीन प्रशस्त लेश्याओंको क्रमसे स्वीकार करके उत्कृष्ट संवेगभावको धारण करता है ॥१९०३॥


एदेसिं लेस्साणं विसोधणं पडि उवक्कमो इणमो ।
सव्वेसिं संगाणं विवज्जणं सव्वहा होइ ॥१९०४॥

अर्थ: इन लेश्याओंकी विशुद्धिका उपक्रम यह है कि समस्त परिग्रहोंका सर्वथा त्याग होता है अर्थात् परिग्रहके त्यागसे लेश्यामें विशुद्धि आती है ॥१९०४॥


लेस्सासोधी अज्झवसाणविसोधीए होइ जीवस्स ।
अज्झवसाणविसोधी मंदकसायस्स णादव्वा ॥१९०५॥

अर्थ: परिणामोंकी विशुद्धि होनेसे लेश्याकी विशुद्धि होती है । और जिसकी कषाय मन्द है उसके परिणामोंमें विशुद्धि होती है ॥१९०५॥


मंदा हुंति कसाया बाहिरसंगविजडस्स सव्वस्स ।
गिण्हइ कसायबहुलो चेव हु सव्वंपि गंथकलिं ॥१९०६॥

अर्थ: कषायोंकी मन्दता कैसे होती है, यह बतलाते हैं - जो बाह्य परिग्रहका त्याग करता है उसकी कषाय मन्द होती है । जिसकी कषाय तीव्र होती है वही सब परिग्रहरूप पापको स्वीकार करता है ॥१९०६॥


जह इंधणेहिं अग्गी वड्ढइ विज्झाइ इंधणेहिं विणा ।
गंथेहिं तह कसाओ वड्ढइ विज्झाइ तेहिं विणा ॥१९०७॥

अर्थ: जैसे ईंधनसे आग बढ़ती है और ईंधनके अभावमें बुझ जाती है वैसे ही परिग्रहसे कषाय बढ़ती है और परिग्रहके अभावमें मन्द हो जाती है ॥१९०७॥


जह पत्थरो पडंतो खोभेइ दहे पसण्णमवि पंकं ।
खोभेइ पसण्णमवि कसायं जीवस्स तह गंथो ॥१९०८॥

अर्थ: जैसे जलमें पत्थर फेंकनेसे नीचे बैठी हुई कीचड़ ऊपर आ जाती है । वैसे ही परिग्रहसे जीवकी दबी हुई कषाय उदयमें आ जाती है ॥१९०८॥


अब्भंतरसोधीए गंथे णियमेण बाहिरे चयदि ।
अब्भंतरमइलो चेव बाहिरे गेण्हदि हु गंथे ॥१९०९॥

अर्थ: अन्तरंगमें कषायकी मन्दता होनेपर नियमसे बाह्य परिग्रहका त्याग होता है । अभ्यन्तरमें मलिनता होनेपर ही जीव बाह्य परिग्रहोंको ग्रहण करता है ॥१९०९॥


अब्भंतरसोधीए बाहिरसोधी वि होदि णियमेण ।
अब्भंतरदोसेण हु कुणदि णरो बाहिरे दोसे ॥१९१०॥

अर्थ: अभ्यन्तरमें विशुद्धि होनेपर बाह्य विशुद्धि नियमसे होती है । अभ्यन्तरमें दोष होनेसे ही मनुष्य शारीरिक दोष करता है ॥१९१०॥


जध तंडुलस्स कोण्डयसोधी सतुसस्स तीरदि ण कादुं ।
तह जीवस्स ण सक्का लिस्सासोधी ससंगस्स ॥१९११॥

अर्थ: जैसे बाहरमें तुष ( छिलका ) रहते हुए चावलकी अभ्यन्तर शुद्धि संभव नहीं है । वैसे ही परिग्रही जीवके लेश्याकी विशुद्धि संभव नहीं है ॥१९११॥


सुक्काए लेस्साए उक्कस्सं अंसयं परिणमित्ता ।
जो मरदि सो हु णियमा उक्कस्साराधओ होई ॥१९१२॥

अर्थ: जो क्षपक शुक्ललेश्याके उत्कृष्ट अंश रूपसे परिणत होकर मरण करता है वह नियमसे उत्कृष्ट आराधक होता है ॥१९१२॥


खाइयदंसणचरणं खओवसमियं च णाणमिदि मग्गो ।
तं होइ खीणमोहो आराहित्ता य जो हु अरहंतो ॥१९१३॥

अर्थ: क्षायिक सम्यक्त्व, यथाख्यात चारित्र और क्षायोपशमिक ज्ञानकी आराधना करके क्षीणमोह होता है और वह बारहवें गुणस्थानवर्ती क्षीणमोह तदनन्तर अरहंत होता है ॥१९१३॥


जे सेसा सुक्काए दु अंसया जे य पम्मलेस्साए ।
तल्लेस्सापरिणामो दु मज्झिमाराधणा मरणे ॥१९१४॥

अर्थ: शुक्ललेश्याके शेष मध्यम और जघन्य अंश तथा पद्मलेश्याके उत्कृष्ट मध्यम और जघन्य अंश रूपसे परिणत होकर मरण करने वाला क्षपक मध्यम आराधक होता है ॥१९१४॥


तेजाए लेस्साए ये अंसा तेसु जो परिणमित्ता ।
कालं करेइ तस्स हु जहण्णियाराधणा भणिदा ॥१९१५॥

अर्थ: तेजोलेश्याके अंशरूपसे परिणत होकर यदि मरण करता है तो वह जघन्य आराधक होता है ॥१९१५॥


जो जाए परिणिमित्ता लेस्साए संजुदो कुणइ कालं ।
तल्लेसो उववज्जइ तल्लेसे चेव सो सग्गे ॥१९१६॥

अर्थ: जो क्षपक जिस लेश्यारूपसे परिणत होकर मरण करता है वह उसी लेश्यावाले स्वर्गमें उसी लेश्यावाला ही देव होता है ॥१९१६॥


अध तेउपउमसुक्कं अदिच्छिदो णाणदंसणसमग्गो ।
आउक्खया दु सुद्धो गच्छदि सुद्धिं चुयकिलेसो ॥१९१७॥

अर्थ: जो पीत पद्म और शुक्ललेश्याको भी छोड़कर लेश्यारहित अयोग अवस्थाको प्राप्त होता है वह सम्पूर्ण केवलज्ञान और केवल दर्शनसे युक्त होकर आयुका क्षय होनेपर मोक्ष प्राप्त करता है। वह समस्त कर्मलेपके चले जानेसे विशुद्ध होता है तथा समस्त क्लेशोंसे छूट जाता है ॥१९१७॥


एवं सुभाविदप्पा ज्झाणोवगओ पसत्थलेस्साओ ।
आराधणापडायं हरइ अविग्घेण सो खवओ ॥१९१८॥

अर्थ: इस प्रकार वह क्षपक अच्छी तरहसे आत्माकी भावना भाकर प्रशस्त लेश्यापूर्वक ध्यान करके, किसी विघ्न बाधाके बिना आराधना पताकाको धारण करता है ॥१९१८॥


तेलोक्कसव्वसारं चउगइसंसारदुक्खणासयरं ।
आराहणं पवण्णो सो भयवं मुक्खपडिमुल्लं ॥१९१९॥

अर्थ: वह भगवान् तीनों लोकोंमें सारभूत तथा चार गतिरूप संसारके दुःखोंका नाश करनेवाली आराधनाको प्राप्त करता है जो उस मोक्षका प्रतिमूल्य है अर्थात् आराधनारूपी मूल्य प्रदान करके ही मोक्षको खरीदा जा सकता है ॥१९१९॥


एवं जधाक्खादविधिं संपत्ता सुद्धदंसणचरित्ता ।
केई खवंति खवया मोहावरणंतरायाणि ॥१९२०॥

अर्थ: इस प्रकार कोई-कोई चरमशरीरी क्षपक यथाख्यात चारित्रकी विधिके द्वारा शुद्ध सम्यग्दर्शन और चारित्रको प्राप्त करके मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मोंका क्षय करते हैं ॥१९२०॥


केवलकप्पं लोगं संपुण्णं दव्वपज्जयविधीहिं ।
ज्झायंता एयमणा जहंति आराहया देहं ॥१९२१॥

अर्थ: केवलज्ञानके द्वारा जाननेके योग्य सम्पूर्ण लोकको द्रव्य पर्यायोंके भेदोंके साथ एकाग्रमनसे जानते हुए आराधक अपना शरीर छोड़ते हैं ॥१९२१॥


सव्वुक्कस्सं जोगं जुंजंता दंसणे चरित्ते य ।
कम्मरयविप्पमुक्का हवंति आराधया सिद्धा ॥१९२२॥

अर्थ: सबसे उत्कृष्ट अर्थात् क्षायिक सम्यग्दर्शन और क्षायिक सम्यक् चारित्रको प्राप्त करके वे आराधक कर्मरूपी रजसे अर्थात् शेष चार अघाति कर्मोंसे छूटकर सिद्ध हो जाते हैं ॥१९२२॥


इयमुक्कस्सियमाराधणमणुपालित्तु केवली भविया ।
लोगग्गसिहरवासी हवंति सिद्धा धुयकिलेसा ॥१९२३॥

अर्थ: इस प्रकार उत्कृष्ट आराधनाका पालन करके केवलज्ञानी होकर सम्पूर्ण क्लेशोंसे छूट जाते हैं और लोकके शिखर पर विराजमान होते हैं ॥१९२३॥


अह सावसेसकम्मा मलियकसाया पणट्ठमिच्छत्ता ।
हासरइअरइभयसोगदुगुंछावेयणिम्महणा ॥१९२४॥

अर्थ: किन्तु जिनके कर्मबन्धन शेष रहता है वे मिथ्यात्वको नष्ट करके तथा कषायोंका और हास्य रति, अरति, भय, शोक, जुगुप्सा, तीनों वेदोंका मथन करके, पाँच समिति और तीन गुप्तियोंके द्वारा सम्यक् रूपसे संवर करके समस्त परिग्रहसे रहित होकर धीरतापूर्वक, मनमें दीनताका भाव नहीं लाते । मोहरहित होकर सुख और दुःखमें समभाव रखते हैं । मन, वचन, कायको समाहित करके चारित्रमें सम्यक्निष्ठ रहते हैं तथा धर्मध्यान या प्रथम शुक्लध्यानमें उपयोग लगाते हैं ॥१९२४-२६॥


पंचसमिदा तिगुत्ता सुसंवुडा सव्वसंगउम्मुक्का ।
धीरा अदीणमणसा समसुहदुक्खा असंमूढा ॥१९२५॥

अर्थ: किन्तु जिनके कर्मबन्धन शेष रहता है वे मिथ्यात्वको नष्ट करके तथा कषायोंका और हास्य रति, अरति, भय, शोक, जुगुप्सा, तीनों वेदोंका मथन करके, पाँच समिति और तीन गुप्तियोंके द्वारा सम्यक् रूपसे संवर करके समस्त परिग्रहसे रहित होकर धीरतापूर्वक, मनमें दीनताका भाव नहीं लाते । मोहरहित होकर सुख और दुःखमें समभाव रखते हैं । मन, वचन, कायको समाहित करके चारित्रमें सम्यक्निष्ठ रहते हैं तथा धर्मध्यान या प्रथम शुक्लध्यानमें उपयोग लगाते हैं ॥१९२४ - २६॥ ॥१९२५॥


सव्वसमाधाणेण य चरित्तजोगो अधिट्ठिदा सम्मं ।
धम्मे वा उवजुत्ता ज्झाणे तह पढमसुक्के वा ॥१९२६॥

अर्थ: किन्तु जिनके कर्मबन्धन शेष रहता है वे मिथ्यात्वको नष्ट करके तथा कषायोंका और हास्य रति, अरति, भय, शोक, जुगुप्सा, तीनों वेदोंका मथन करके, पाँच समिति और तीन गुप्तियोंके द्वारा सम्यक् रूपसे संवर करके समस्त परिग्रहसे रहित होकर धीरतापूर्वक, मनमें दीनताका भाव नहीं लाते । मोहरहित होकर सुख और दुःखमें समभाव रखते हैं । मन, वचन, कायको समाहित करके चारित्रमें सम्यक्निष्ठ रहते हैं तथा धर्मध्यान या प्रथम शुक्लध्यानमें उपयोग लगाते हैं ॥१९२४ - २६॥ ॥१९२६॥


इय मज्झिममाराधणमणुपालित्ता सरीरपजहित्ता ।
हुंति अणुत्तरवासी देवा सुविसुद्धलेस्सा य ॥१९२७॥

अर्थ: इस प्रकार मध्यम आराधनाका पालन करके शरीर त्याग कर विशुद्ध लेश्याके धारक अनुत्तरवासी देव होते हैं ॥१९२७॥


दंसणणाणचरित्ते उक्किट्ठा उत्तमोपधाणा य ।
इरियावहपडिवण्णा हवंति लवसत्तमा देवा ॥१९२८॥

अर्थ: वे मध्यम आराधनाके पालक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रमें उत्कृष्ट होते हैं। अर्थात् कल्पोपपन्न देवोंमें उत्पन्न कराने वाले रत्नत्रयके आराधकोंसे उत्कृष्ट होते हैं। उनकी तपश्चर्या उत्तम होती है, वे ईर्यापथ आस्रवके धारी होते हैं अर्थात् कषायरहित कायकी क्रियासे होनेवाला शुभास्रव ही उनके होता है। वे मरकर लवसत्तम अर्थात् ग्रैवेयक या अनुदिश विमानवासी देव होते हैं ॥१९२८॥


कप्पोवगा सुरा जं अच्छरसहिया सुहं अणुहवंति ।
तत्तो अणंतगुणिदं सुहं दु लवसत्तमसुराणं ॥१९२९॥

अर्थ: कल्पवासी देव अपनी देवांगनाओंके साथ जिस सुखको भोगते हैं उससे अनन्तगुणा सुख अहमिन्द्रदेव भोगते हैं ॥१९२९॥


णाणम्मि दंसणम्मि य आउत्ता संजमे जहक्खादे ।
वड्ढिदतवोवधाणा अवट्ठियलेस्सा सददमेव ॥१९३०॥

अर्थ: जो क्षपक ज्ञान दर्शन और यथाख्यात चारित्रमें लीन रहते हैं, अपनी तपश्चर्याको निरन्तर बढ़ाते हैं, वे विशुद्ध लेश्यावाले होते हैं ॥१९३०॥


पजहिय सम्मं देहं सददं सव्वगुणवड्ढिदगुणड्ढा ।
देविंदचरमठाणं लहंति आराधया खवया ॥१९३१॥

अर्थ: वे आराधक क्षपक सम्यक् भावना पूर्वक शरीर त्यागकर अनन्तगुणी अणिमा आदि ऋद्धियोंसे सम्पन्न उपरिम स्वर्गमें स्थान प्राप्त करते हैं ॥१९३१॥


सुदभत्तीए विसुद्धा उग्गतवणियमजोगसंसुद्धा ।
लोगंतिया सुरवरा हवंति आराधया धीरा ॥१९३२॥

अर्थ: श्रुतभक्तिसे विशुद्ध, उग्रतप, नियम और आतापन आदि योगसे शुद्ध धीर आराधक लौकान्तिक देव होते हैं ॥१९३२॥


जावदिया रिद्धीओ हवंति इंदियगदाणि य सुहाणि ।
ताइं लहंति ते आगमेसिं भद्दा तधा खवया ॥१९३३॥

अर्थ: जितनी ऋद्धियाँ हैं और जितने भी इन्द्रिय सुख हैं उन सबको भद्रपरिणामी क्षपक आगामी कालमें प्राप्त करते हैं ॥१९३३॥


जे वि हु जहण्णियं तेउलेस्समाराहणं उवणमंति ।
ते वि हु सोधम्माइसु हवंति देवा ण हेट्ठिल्ला ॥१९३४॥

अर्थ: तेजोलेश्यासे युक्त जो क्षपक जघन्य आराधना करते हैं वे भी सौधर्म आदि स्वर्गोंमें देव होते हैं, नीचेके देव नहीं होते । अर्थात् भवनत्रिकमें जन्म नहीं लेते ॥१९३४॥


किं जंपिएण बहुणा जो सारो केवलस्स लोगस्स ।
तं अचिरेण लहंते फासित्ताराहणं णिहिलं ॥१९३५॥

अर्थ: अधिक कहनेसे क्या ? जो समस्त लोकका सारभूत है उस सबको आराधना करनेवाले शीघ्र ही प्राप्त कर लेते हैं ॥१९३५॥


भोगे अणुत्तरे भुंजिऊण तत्तो चुदा सुमाणुस्से ।
इड्ढीमतुलं चइत्ता चरंति जिणदेसियं धम्मं ॥१९३६॥

अर्थ: स्वर्गोंके उत्कृष्ट भोगोंको भोगकर स्वर्गसे च्युत होनेपर मनुष्य भवमें जन्म लेते हैं और वहाँ भी समस्त ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं । फिर उसे त्यागकर जिन भगवान्के द्वारा कहे हुए धर्मका पालन करते हैं ॥१९३६॥


सदिमंतो धिदिमंतो सद्धासंवेगवीरियोवगया ।
जेदा परीसहाण उवसग्गाणं च अभिभविय ॥१९३७॥

अर्थ: वे शास्त्रोंका अनुचिन्तन करते हैं, धैर्यशाली होते हैं, श्रद्धा, संवेग और शक्तिसे युक्त होते हैं। परीषहोंको जीतते हैं और उपसर्गोंको निरस्त करते हैं, उनसे अभिभूत नहीं होते ॥१९३७॥


इय चरणमधक्खादं पडिवण्णा सुद्धदंसणमुवेदा ।
सोधिंति ज्झाणजुत्ता लेस्साओ संकिलिट्ठाओ ॥१९३८॥

अर्थ: इस प्रकार शुद्ध सम्यग्दर्शन पूर्वक यथाख्यात चारित्रको प्राप्त करके ध्यानमें मग्न होकर संक्लेशयुक्त अशुभ लेश्याओंका विनाश करते हैं ॥१९३८॥


सुक्कं लेस्समुवगदा सुक्कज्झाणेण खविदसंसारा ।
उम्मुक्ककम्मकवया उविंति सिद्धिं धुदकिलेसा ॥१९३९॥

अर्थ: शुक्ललेश्यासे सम्पन्न होकर शुक्लध्यानके द्वारा संसारका क्षय करते हैं और कर्मोंके कवचसे मुक्त हो, सब दुःखोंको दूर करके मुक्तिको प्राप्त होते हैं ॥१९३९॥


एवं संथारगदो विसोधइत्ता वि दंसणचरित्तं ।
परिवडदि पुणो कोई झायंतो अट्टरुद्दाणि ॥१९४०॥

अर्थ: इस प्रकार संस्तरपर आरूढ़ होकर और सम्यग्दर्शन तथा सम्यक्चारित्रको निर्मल करके भी कोई-कोई क्षपक कर्मोंकी गुरुता होनेसे आर्तरौद्र ध्यानपूर्वक रत्नत्रय रूप आराधनासे गिर जाता है ॥१९४०॥


झायंतो अणगारो अट्टं रुद्दं च चरिमकालम्मि ।
जो जहइ सयं देहं सो ण लहइ सुग्गदिं खवओ ॥१९४१॥

अर्थ: जो क्षपक साधु मरते समय आर्तरौद्र ध्यानपूर्वक अपने शरीरको छोड़ता है वह सुगति प्राप्त नहीं करता ॥१९४१॥


जदि दा सुभाविदप्पा वि चरिमकालम्मि संकिलेसेण ।
परिवडदि वेदणट्टो खवओ संथारमारूढो ॥१९४२॥

अर्थ: यदि अपनी आत्माकी सम्यक् भावना करने वाले भी संस्तरपर आरूढ़ हो, संक्लेशके कारण मरते समय सन्मार्गसे गिर जाते हैं ॥१९४२॥


किं पुण जे ओसण्णा णिच्चं जे वा वि णिच्चपासत्था ।
जे वा सदा कुसीला संसत्ता वा जहाछंदा ॥१९४३॥

अर्थ: तो जो नित्य अवसन्न, नित्य पार्श्वस्थ, सदा कुशील, संसक्त और स्वच्छन्द साधु हैं उनका कहना ही क्या है ? ॥१९४३॥


गच्छंहि केइ पुरिसा पक्खी इव पंजरंतरणिरुद्धा ।
सारणपंजरचकिदा ओसण्णागा पविहरंति ॥१९४४॥


अविसुद्धभावदोसा कसायवसगा य मंदसंवेगा ।
अच्चासादणसीला मायाबहुला णिदाणकदा ॥१९४५॥

अर्थ: वे क्षपक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्ररूप परिणामोंके जो शंका आदि दोष हैं उन्हें दूर नहीं करते हैं. कषायोंके वशवर्ती होते हैं, उनका संवेगभाव मन्द होता है, गुणोंका और गुणीजनोंका वे अपमान करते हैं, तथा माया और निदानशल्यकी उनमें प्रचुरता होती है ॥१९४५॥


सुहसादा किंमज्झा गुणसायी पावसुत्तपडिसेवी ।
विसयासापडिबद्धा गारवगरुया पमाइल्ला ॥१९४६॥

अर्थ: वे सुखशील होते हैं, मुझे किसीसे क्या, ऐसा मानकर वे संघके सब कार्योंमें अनादरभाव रखते हैं, सम्यग्दर्शन आदि गुणोंमें उनका उत्साह नहीं होता। अपने और दूसरोंके अशुभ परिणामको तथा मिथ्यात्व, असंयम और कषायको बढ़ानेवाला शास्त्र पापसूत्र है। निमित्त शास्त्र, वैद्यक, कौटिल्यशास्त्र ( राजनीति ), स्त्री पुरुषके लक्षण बतलानेवाला कामशास्त्र, धातुवाद ( भौतिकी ), काव्य नाटक, चोरशास्त्र, शस्त्रोंका लक्षण बतलानेवाला शास्त्र, प्रहार करनेकी विद्या, चित्रकला, गांधर्व ( नाच गाना ), गन्धशास्त्र, युक्तिशास्त्र आदि पापशास्त्रोंमें उनका आदर होता है, उसीका वे अध्ययन करते हैं। इष्ट विषयोंकी आशामें लगे रहते हैं, तीन गारवमें आसक्त होते हैं। विकथा आदि पन्द्रह प्रमादोंमें युक्त होते हैं ॥१९४६॥


समिदीसु य गुत्तीसु य अभाविदा सीलसंजमगुणेसु ।
परतत्तीसु य तत्ता अणाहिदा भावसुद्धीए ॥१९४७॥

अर्थ: [?] [?] [?] शील तथा संयमके गुणोंमें भावनासे रहित होते हैं। लौकिक [?] तत्पर [?] [?] [?] शुद्धिमें आदरभाव नहीं होते ॥१९४७॥


गंथअणियत्ततण्हा बहुमोहा सबलसेवणासेवी ।
सद्दरसरूवगंधे फासेसु य मुच्छिदा घडिदा ॥१९४८॥

अर्थ: उनकी परिग्रहकी तृष्णा कभी तृप्त नहीं होती । अज्ञानमें डूबे रहते हैं । गृहस्थोंके आरम्भमें फँसे होते हैं, शब्द, रस, रूप, गन्ध और स्पर्शमें ममत्वभाव रखते हैं ॥१९४८॥


परलोगणिप्पिवासा इहलोये चेव जे सुपडिबद्धा ।
सज्झायादीसु य जे अणुट्ठिदा संकिलिट्ठमदी ॥१९४९॥

अर्थ: परलोककी चिन्ता नहीं करते । इसी लोक सम्बन्धी कार्यों में लगे रहते हैं । स्वाध्याय आदिमें उद्यम नहीं करते । उनकी मति संक्लेशमय होती है ॥१९४९॥


सव्वेसु य मूलुत्तरगुणेसु तह ते सदा अइचरंता ।
ण लहंति खओवसमं चरित्तमोहस्स कम्मस्स ॥१९५०॥

अर्थ: सदा मूलगुणों और उत्तरगुणोंमें अतिचार लगाते हैं । इससे उनके चारित्रमोहका क्षयोपशम नहीं होता ॥१९५०॥


एवं मूढमदीया अवंतदोसा करेंति जे कालं ।
ते देवदुब्भगत्तं मायामोसेण पावंति ॥१९५१॥

अर्थ: इस प्रकार दोषोंको दूर न करनेवाले वे मूढबुद्धि जब मरते हैं तो मायाचारके कारण अभागे देव होते हैं ॥१९५१॥


किंमज्झ णिरुच्छाहा हवंति जे सव्वसंघकज्जेसु ।
ते देवसमिदिबज्झा कप्पंते हुंति सुरमिच्छा ॥१९५२॥

अर्थ: वे मुनि अवस्थामें ‘मुझे इससे क्या’ ऐसा मानकर संघके सब कार्योंमें अनादर भाव रखनेके कारण देवोंकी समितिसे बहिष्कृत सौधर्मादि कल्पोंके अन्तमें बसनेवाले चाण्डाल जातिके देव होते हैं ॥१९५२॥


कंदप्पभावणाए देवा कंदप्पिया मदा होंति ।
खिब्भिसयभावणाए कालगदा होंति खिब्भिसया ॥१९५३॥

अर्थ: कन्दर्प भावनासे मरकर कन्दर्प जातिके देव होते हैं। किल्विषभावनासे मरकर किल्विषक जातिके देव होते हैं ॥१९५३॥


अभिजोगभावणाए कालगदा आभिजोगिया हुंति ।
तह आसुरीए जुत्ता हवंति देवा असुरकाया ॥१९५४। ॥१९५४॥

अर्थ: आभियोग्य भावनासे मरकर आभियोग्य जातिके देव होते हैं। तथा आसुरी भावनासे मरकर असुर जातिके देव होते हैं ॥१९५४॥


सम्मोहणाए कालं करित्तु दुंदुगा सुरा हुंति ।
अण्णंपि देवदुग्गइ उवयंति विराधया मरणे ॥१९५५॥

अर्थ: सम्मोहन भावनासे मरकर दुंदुग जातिके देव होते हैं। अन्य भी विराधना करके मरनेवाले मुनि देवगतिमें हीन देव होते हैं ॥१९५५॥


इय जे विराधयित्ता मरणे असमाधिणा मरेज्जण्ह ।
तं तेसि बालमरणं होइ फलं तस्स पुव्वुत्तं ॥१९५६॥

अर्थ: इस प्रकार जो क्षपक मरते समय रत्नत्रयको नष्ट करके असमाधिपूर्वक मरते हैं उनका वह मरण बालमरण होता है और उस बालमरणका फल पूर्वमें कहा है ॥१९५६॥


जे सम्मत्तं खवया विराधयित्ता पुणो मरेज्जण्हू ।
ते भवणवासिजोदिसभोमेज्जा वा सुरा होंति ॥१९५७॥

अर्थ: जो क्षपक सम्यक्त्वको नष्ट करके मरते है वे मरकर भवनवासी, व्यन्तर या ज्योतिषीदेव होते हैं ॥१९५७॥


दंसणणाणविहूणा तदो चुदा दुक्खवेदणुम्मीए ।
संसारमण्डलगदा भमंति भवसागरे मूढा ॥१९५८॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानसे रहित वे मूढ़देव स्वर्गसे च्युत होकर दुःखकी वेदना-रूपी लहरोंसे भरे संसारसमुद्रमें भ्रमण करते हैं ॥१९५८॥


जो मिच्छत्तं गंतूण किण्हलेस्सादिपरिणदो मरदि ।
तल्लेस्सो सो जायइ जल्लेस्सो कुणदि सो कालं ॥१९५९॥

अर्थ: जो क्षपक मिथ्यादृष्टि होकर कृष्ण आदि लेश्याके साथ मरता है वह जिस लेश्याके साथ मरता है उसी लेश्यावाला होकर जन्म लेता है ॥१९५९॥


एवं कालगदस्स दु सरीरमंतोव्व होज्ज बाहिं वा ।
विज्जावच्चकरा तं सयं विकिंचंति जदणाए ॥१९६०॥

अर्थ: इस प्रकार नगर आदिके मध्यमें या नगरसे बाहर मरणको प्राप्त उस क्षपकके शरीरको वैयावृत्य करनेवाले परिचारक मुनि स्वयं ही सावधानतापूर्वक हटा देते हैं ॥१९६०॥


समणाणं ठिदिकप्पो वासावासे तहेव उडुबंधे ।
पडिलिहिदव्वा णियमा णिसीहिया सव्वसाधूहिं ॥१९६१॥

अर्थ: वर्षा ऋतुके चार मासोंमें एक स्थानपर वास प्रारम्भ करते समय और ऋतुके प्रारम्भमें सब साधुओंको नियमसे निषीधिकाकी प्रतिलेखना करना चाहिये, यह साधुओंका स्थितिकल्प है ॥१९६१॥


एगंता सालोगा णादिविकिट्ठा ण चावि आसण्णा ।
वित्थिण्णा विद्धत्था णिसीहिया दूरमागाढा ॥१९६२॥

अर्थ: निषीधिका एकान्त स्थानमें होना चाहिये जहाँ दूसरे लोग उसे न देख सकते हों । नगर आदिसे न अति दूर और न अति निकट होनी चाहिये । विस्तीर्ण होनी चाहिये । प्रासुक होनी चाहिये तथा अतिदृढ़ होनी चाहिये ॥१९६२॥


अविसुय असुसिर अघसा सउज्जोवा बहुसमा असिणिद्धा ।
णिज्जंतुगा अरहिदा अविला य तहा अणाबाधा ॥१९६३॥

अर्थ: वह चींटियोंसे रहित होनी चाहिये । अन्दर प्रवेश कराने वाले छिद्रोंसे रहित होनी चाहिये । प्रकाशवाली होनी चाहिये । समभूमि होनी चाहिये । गीली नहीं होनी चाहिये, जन्तु रहित होनी चाहिये । तिरछे छिद्रवाली नहीं होनी चाहिये तथा बाधारहित होनी चाहिये ॥१९६३॥


जा अवरदक्खिणाए व दक्खिणाए व अहव अवराए ।
वसधीदो विरइज्जइ णिसीधिया सा पसत्थत्ति ॥१९६४॥

अर्थ: तथा वह निषीधिका क्षपकके स्थानसे पश्चिम-दक्षिण दिशामें या दक्षिण दिशामें या पश्चिम दिशामें हो तो उत्तम होती है ॥१९६४॥


सव्वसमाधी पढमाए दक्खिणाए दु भत्तगो सुलभं ।
अवराए सुविहारो होदि य से उवधिलाभो य ॥१९६५॥

अर्थ: यदि निषीधिका पश्चिम-दक्षिण दिशामें हो तो सर्व संघको समाधिलाभ होता है । यदि दक्षिण दिशामें हो तो संघको आहार लाभ सुलभ होता है । यदि पश्चिम दिशामें हो तो संघका विहार सुखपूर्वक होता है तथा उपकरणोंका लाभ होता है ॥१९६५॥


जदि तेसिं वाघादो दट्ठव्वा पुव्वदक्खिणा होइ ।
अवरुत्तरा य पुव्वा उदीचिपुव्वुत्तरा कमसो ॥१९६६॥

अर्थ: यदि उक्त दिशाओंमें निषीधिका निर्माणमें बाधा हो तो क्रमशः पूर्व दक्षिणमें, पश्चिम-उत्तरमें, पूरबमें या उत्तरमें या पूर्वोत्तरमें होना चाहिये ॥१९६६॥


एदासु फलं कमसो जाणेज्ज तुमंतुमा य कलहो य ।
भेदो य गिलाणं पि य चरिमा पुण कड्ढदे अण्णं ॥१९६७॥

अर्थ: किन्तु पूर्व-दक्षिण दिशामें होनेसे ‘मैं ऐसा हूँ, तुम ऐसे हो’, इत्यादि रूप संघर्ष होता है। पश्चिमोत्तर दिशामें होनेसे कलह होता है। पूर्व दिशामें होनेसे संघमें भेद पड़ता है। उत्तर दिशामें होनेसे व्याधि होती है। पूर्वोत्तर दिशामें होनेसे परस्परमें खींचातानी होती है। यह क्रमसे उक्त दिशाओंमें निषद्या बनानेका फल है ॥१९६७॥


जं वेलं कालगदो भिक्खू तं वेलमेव णीहरणं ।
जग्गणबंधणछेदणविधी अवेलाए कादव्वा ॥१९६८॥

अर्थ: जिस समय साधु मरे उसी समय उसे वहाँसे हटा देना चाहिये। यदि असमयमें मरा हो तो जागरण, बन्धन या छेदन करना चाहिये ॥१९६८॥


बाले वुड्ढे सीसे तवस्सिभीरुगिलाणए दुहिदे ।
आयरिए य विकिंचिय धीरा जग्गंति जिदणिद्दा ॥१९६९॥

अर्थ: बालमुनि, वृद्ध मुनि, शिक्षक मुनि, तपस्वी मुनि, डरपोक मुनि, रोगी मुनि और दुखित हृदय आचार्यों के सिवाय निन्द्रा को जीतनेवाले धीर मुनि जागरण करते हैं ॥१९६९॥


गीदत्था कदकरणा महाबलपरक्कमा महासत्ता ।
बंधंति य छिंदंति य करचरणंगुट्ठयपदेसे ॥१९७०॥

अर्थ: जो मुनि गृहीतार्थ होते हैं, जिन्होंने अनेक बार क्षपकोंका कर्म किया है, महाबल- शाली, महापराक्रमी, महासत्त्वशाली वे मुनि मृतकके हाथ, पैर या अंगूठेको बाँधते या छेदते हैं ॥१९७०॥


जदि वा एस ण कीरेज्ज विधि तो तत्थ देवदा कोई ।
आदाय तं कलेवरमुट्ठिज्ज रमिज्ज बाधेज्ज ॥१९७१॥

अर्थ: यदि यह विधि न की जाये तो कोई मनो-विनोदी देवता मृतकको उठाकर दौड़ सकता है, क्रीडा कर सकता है, बाधा पहुँचा सकता है और उसे देखकर बालक आदि का चित्त चंचल हो सकता है, वे डरकर भाग सकते हैं और उनका मरण भी हो सकता है ॥१९७१॥


उवसयपडिदावण्णं उवण्णगहिदं तु तत्थ उवकरणं ।
सागारियं च दुविहं परिहारियमपरिहारियं च ॥१९७२॥

अर्थ: कुछ उपकरण तो वसतिकासे सम्बद्ध होते हैं। कुछ उपकरण गृहस्थ सम्बन्धी होते हैं। उनमेंसे कुछ त्याज्य होते हैं और कुछ त्यागने योग्य नहीं हैं ॥१९७२॥


जदि विक्खादा भत्तपइण्णा अज्जा व होज्ज कालगदा ।
देउलसागारित्ति व सिवियाकरणं पि तो होज्ज ॥१९७३॥

अर्थ: यदि भक्त प्रतिज्ञा मरण करने वाली विख्यात आर्यिका हो या कोई गृहस्था हो या स्थान की रक्षिका हो तो उसके लिये शिविका बनाना चाहिये ॥१९७३॥


तेण परं संठाविय संथारगदं च तत्थ बंधित्ता ।
उट्ठेतरक्खणट्ठं गामं तत्तो सिरं किच्चा ॥१९७४॥

अर्थ: शिविका बनानेके पश्चात् उसके शवको शिविकामें रखकर संस्तरके साथ उसे बाँध देना चाहिये जिससे वह उठ न सके । उसका सिर गाँवकी ओर रहना चाहिये ॥१९७४॥


पुव्वाभोगिय मग्गेण आसु गच्छंति तं समादाय ।
अट्ठिदमणियत्तंता य पिट्ठदो अणिब्भंता ॥१९७५॥

अर्थ: उस शिविकाको लेकर पहले देखे हुए मार्गसे शीघ्र जाते हैं। न तो मार्गमें रुकते हैं और न पीछेकी ओर देखते हैं ॥१९७५॥


कुसमुट्ठिं घेत्तूण य पुरदो एगेण होइ गंतव्वं ।
अट्ठिदअणियत्तंतेण पिट्ठदो लोयणं मुच्चा ॥१९७६॥

अर्थ: उसके आगे एक मुट्ठीमें कुश लेकर कोई मनुष्य जाना चाहिये। उसको भी न तो मार्ग में रुकना चाहिये और न पीछे देखना चाहिये ॥१९७६॥


तेण कुसमुट्ठिधाराए अव्वोच्छिण्णाए समणिपादाए ।
संथारो कादव्वो सव्वत्थ समो सगिं तत्थ ॥१९७७॥

अर्थ: उस आगे गये पुरुषको पहलेसे देखे गये निषीधिकाके स्थानमें जाकर लगातार मुट्ठीसे एक समान कुश डालते हुए एक संस्तर बनाना चाहिये जो सर्वत्र सम हो ॥१९७७॥


जत्थ ण होज्ज तणाइं चुण्णेहिं वि तत्थ केसरेहिं वा ।
संथरिदव्वा लेहा सव्वत्थ समा अवुच्छिण्णा ॥१९७८॥

अर्थ: जहाँ कुश न मिलते हों वहाँ प्रासुक चावल आदिके चूर्णसे अथवा प्रासुक केसरसे संस्तर बनाना चाहिये जो सर्वत्र सम हो ॥१९७८॥


जदि विसमो संथारो उवरिं मज्झे व होज्ज हेट्ठा वा ।
मरणं गिलाणयं वा गणिवसभजदीण णायव्वा ॥१९७९॥

अर्थ: यदि संस्तर ऊपर मध्यमें या नीचे विषम होता है तो ऊपरमें विषम होनेपर आचार्यका मरण या उन्हें रोग होता है । मध्यमें विषम होनेपर एलाचार्यका मरण या उन्हें रोग होता है । और नीचे पैरके पास विषम होनेपर अन्य साधुओंका मरण या उन्हें रोग होता है ॥१९७९॥


जत्तो दिसाए गामो तत्तो सीसं करित्तु सोवधियं ।
उट्ठंतरक्खणट्ठं वोसरिदव्वं सरीरं तं ॥१९८०॥

अर्थ: जिस दिशामें ग्राम हो, उस ओर सिर करके पीछीके साथ उस शवको रख देना चाहिये । शवके उठनेके भयसे उसका सिर गांवकी ओर किया जाता है ॥१९८०॥


जो वि विराधिय दंसणमंते कालं करित्तु होज्ज सुरो ।
सो वि विबुज्झदि दट्ठूण सदेहं सोवधिं सज्जो ॥१९८१॥

अर्थ: जो सम्यक्त्वकी विराधना करके मरकर देव होता है वह भी पीछीके साथ अपना शरीर (शव) देखकर ही यह जान लेता है कि मैं भी पूर्वभवमें संयमी था ॥१९८१॥


पत्ता भाए रिक्खे जदि कालगदो सिवं तु सव्वेंसिं ।
एक्को दु समे खेत्ते दिवड्ढखेत्ते मरंति दुवे ॥१९८२॥

अर्थ: अल्पनक्षत्रमें यदि क्षपकका मरण होता है तो सबका कल्याण होता है । यदि मध्यम नक्षत्रमें मरण होता है तो शेष साधुओंमेंसे एकका मरण होता है । यदि महानक्षत्रमें मरण होता है तो दो का मरण होता है ॥१९८२॥


सदभिसमरणा अद्दा सादा असलेस्स जिट्ठ अवरवरा ।
रोहिणिविसाहपुणव्वसु त्तिउत्तरा मज्झिमा सेसा ॥१९८३॥

अर्थ: शतभिषा, भरणी, आर्द्रा, स्वाति, आश्लेषा, ज्येष्ठा ये जघन्य नक्षत्र हैं । रोहिणी, विशाखा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तरा भाद्रपद, उत्तराषाढ़ा ये उत्कृष्ट नक्षत्र हैं । शेष नक्षत्र मध्यम है ॥१९८३॥


गणरक्खणत्थं तम्हा तणमयपडिबिंबयं सु कादूण ।
एक्कं तु समे खेत्ते दिवड्ढखेत्ते दुवे देज्ज ॥१९८४॥

अर्थ: इस लिये संघकी रक्षाके अभिप्रायसे तृणोंका पुतला बनाकर यदि मध्यम नक्षत्रमें मरण हुआ है तो उसके साथ एक पुतला देवे । यदि उत्तम नक्षत्रमें मरण हुआ तो उसके साथ दो पुतले देवें ॥१९८४॥


तट्ठाणसावणं चिय तिक्खुत्तो ठविय मडयपासम्मि ।
विदियवियप्पिय भिक्खू कुज्जा तह विदियतदियाणं ॥१९८५॥

अर्थ: मृतकके पासमें उस पुतलेको स्थापित करके तीन बार उच्च स्वरसे घोषणा करे कि मैंने उस दूसरेके स्थानमें यह दूसरा स्थापित किया है । जिसके स्थानमें यह पुतला स्थापित किया है वह चिरकाल तक जीवित रहकर तपस्या करे। यह एक पुतला देनेका विधान है। दो पुतले स्थापित करने पर तीन बार घोषणा करे कि मैंने दूसरा और तीसरा पुतला स्थापित किया है। ये दोनों जिनके बदलेमें स्थापित किये हैं वे दोनों साधु चिरकाल तक जीवित रहकर तप करें ॥१९८५॥


असदि तणे चुण्णेहिं च केसरच्छारिट्ठियादिचुण्णेहिं ।
कादव्वोथ ककारो उवरिं हिट्ठा तकारो से ॥१९८६॥

अर्थ: यदि पुतला बनानेके लिये तृण न हों तो ईंट पत्थर आदिके चूर्णसे अथवा, केशर, क्षार वगैरहसे ऊपर ककार लिखकर उसके नीचे तकार लिखे। इस प्रकार ‘क्त’ अक्षर लिखे ॥१९८६॥


उवगहिदं उवकरणं हवेज्ज जं तत्थ पाडिहरियं तु ।
पडिबोधित्ता सम्मं अप्पेदव्वं तयं तेसिं ॥१९८७॥

अर्थ: मृतककी शय्याके निर्माणके लिये गृहस्थोंसे जो वस्त्र काष्ठ आदि लिया गया हो, उनमेंसे जो लौटा देने योग्य हो उसे पाडिहारिक कहते हैं। उस पाडिहारिकको गृहस्थोंको सम्यक् रीतिसे समझा बुझाकर लौटा देना चाहिये ॥१९८७॥


आराधणपत्तीयं काउसग्गं करेदि तो संघो ।
अधिउत्ताए इच्छागारं खवयस्स वसधीए ॥१९८८॥

अर्थ: हमें भी इसी प्रकार आराधनाकी प्राप्ति हो इस भावनासे संघ एक कायोत्सर्ग करे। तथा क्षपककी वसतिकाकी जो अधिष्ठात्री देवता हो उसके प्रति इच्छाकार करे कि आपकी इच्छासे संघ इस स्थानपर बैठना चाहता है ॥१९८८॥


सगणत्थे कालगदे खमणमसज्झाइयं च तद्दिवसं ।
णज्झाइ परगणत्थे भयणिज्जं खमणकरणंपि ॥१९८९॥

अर्थ: अपने संघके साधुका स्वर्गवास होनेपर उस दिन उपवास करना चाहिये और स्वाध्याय नहीं करना चाहिये । दूसरे संघके साधुका मरण होनेपर स्वाध्याय तो नहीं ही करना चाहिये । उपवास कर भी सकते हैं, नहीं भी करते । अन्य ऐसा पढ़ते हैं कि दूसरे संघके साधुका मरण होनेपर स्वाध्याय करना चाहिये । उपवास कर भी सकते हैं नहीं भी करते ॥१९८९॥


एवं पडिट्ठविता पुणो वि तदियदिवसे उवेक्खंति ।
संघस्स सुहविहारं तस्स गदी चेव णादुं जे ॥१९९०॥

अर्थ: उक्त प्रकारसे क्षपकका शरीर स्थापित करके तीसरे दिन जाकर देखते हैं कि संघका विहार सुखपूर्वक होगा या नहीं । तथा मृतककी गति अच्छी हुई या बुरी ॥१९९०॥


जदि दिवसे संचिट्ठदि तमणालद्धं च अक्खदं मडयं ।
तदिवासाणि सुभिक्खं खेमसिवं तम्हि रज्जम्मि ॥१९९१॥

अर्थ: जितने दिनों तक वह शव गीदड़ आदिसे सुरक्षित रहता है उतने वर्षों तक उस राज्यमें सुभिक्ष और शान्ति रहती है ॥१९९१॥


जं वा दिसमुवणीदं सरीरयं खगचदुप्पदगणेहिं ।
खेमं सिवं सुभिक्खं विहरिज्जो तद्दिसं संघो ॥१९९२॥

अर्थ: अथवा पक्षी और पशुओंके द्वारा वह शरीर जिस दिशामें ले जाया गया हो क्षेम-सुभिक्ष आदि जानकर उसी दिशामें संघको विहार करना चाहिये ॥१९९२॥


जदि तस्स उत्तमंगं दिस्सदि दंता च उवरिगिरिसिहरे ।
कम्ममलविप्पमुक्को सिद्धिं पत्तोत्ति णादव्वो ॥१९९३॥

अर्थ: यदि उसका सिर और दांत पर्वतके शिखरके ऊपर दिखाई दे तो वह मुक्तिको प्राप्त हुआ है, ऐसा जानना चाहिये ॥१९९३॥


वेमाणिओ थलगदो समम्मि जो दिसि य वाणविंतरओ ।
गड्डाए भवणवासी एस गदी से समासेण ॥१९९४॥

अर्थ: यदि मृतकका मस्तक उन्नत भूमिभागमें दिखाई दे तो वह मरकर वैमानिक देव हुआ जानना । यदि सम भूमिभागमें दिखाई दे तो वह ज्योतिष्क देव या व्यन्तर हुआ जानना । यदि गढ़ेमें दिखाई दे तो वह भवनवासी देव हुआ जानना । इस प्रकार यह उसकी गति संक्षेपमें कही है ॥१९९४॥


ते सूरा भयवंतो आइच्चइदूण संघमज्झम्मि ।
आराधणापडाया चउप्पयारा धिदा जेहिं ॥१९९५॥

अर्थ: जिन्होंने संघके मध्यमें प्रतिज्ञा करके चार प्रकारकी आराधना रूप पताकाको ग्रहण किया वे शूरवीर और पूज्य हैं ॥१९९५॥


ते धण्णा ते णाणी लद्धो लाभो य तेहिं सव्वेहिं ।
आराधणा भयवदी पडिवण्णा जेहिं संपुण्णा ॥१९९६॥

अर्थ: जिन्होंने भगवती आराधनाको सम्पूर्ण किया वे पुण्यशाली और ज्ञानी हैं और उन्होंने जो प्राप्त करने योग्य था उसे प्राप्त कर लिया ॥१९९६॥


किं णाम तेहिं लोगे महाणुभावेहिं हुज्ज ण य पत्तं ।
आराधणा भगवदी सयला आराधिदा जेहिं ॥१९९७॥

अर्थ: जिन्होंने सम्पूर्ण भगवती आराधनाका आराधन किया उन महानुभावोंने लोकमें क्या प्राप्त नहीं किया ॥१९९७॥


ते वि य महाणुभावा धण्णा जेहिं च तस्स खवयस्स ।
सव्वादरसत्तीए उवविहिदाराधणा सयला ॥१९९८॥

अर्थ: वे महानुभाव भी धन्य हैं जिन्होंने सम्पूर्ण आदर और शक्तिसे उस क्षपककी आराधना सम्पन्न की ॥१९९८॥


जो उवविधेदि सव्वादरेण आराधणं खु अण्णस्स ।
संपज्जदि णिव्विग्घा सयला आराधणा तस्स ॥१९९९॥

अर्थ: जो निर्यापक सम्पूर्ण आदरके साथ अन्यकी आराधना कराता है - उसकी समस्त आराधना निर्विघ्न पूर्ण होती है ॥१९९९॥


ते वि कदत्था धण्णा य हुंति जे पावकम्ममलहरणे ।
ण्हायंति खवयतित्थे सव्वादरभत्तिसंजुत्ता ॥२०००॥

अर्थ: क्षपक एक तीर्थ है क्योंकि संसारसे पार उतारनेमें निमित्त है । उसमें स्नान करनेसे पापकर्म रूपी मल दूर होता है । अतः जो दर्शक समस्त आदर भक्तिके साथ उस महा- तीर्थमें स्नान करते है वे भी कृतकृत्य होते हैं तथा वे भी सौभाग्यशाली हैं ॥२०००॥


गिरिणदियादिपदेसा तित्थाणि तवोधणेहिं जदि उसिदा ।
तित्थं कधं ण हुज्जो तवगुणरासी सयं खवउ ॥२००१॥

अर्थ: यदि तपस्वियोंके द्वारा सेवित पहाड़ नदी आदि प्रदेश तीर्थ होते हैं तो तपस्यारूप गुणोंकी राशि क्षपक स्वयं तीर्थ क्यों नहीं है ॥२००१॥


पुव्वरिसीणं पडिमाओ वंदमाणस्स होइ जदि पुण्णं ।
खवयस्स वंदओ किह पुण्णं विउलं ण पाविज्ज ॥२००२॥

अर्थ: यदि प्राचीन ऋषियोंकी प्रतिमाओंकी वन्दना करनेवालेको पुण्य होता है तो क्षपक की वन्दना करने वालोंको विपुल पुण्य क्यों नहीं प्राप्त होगा ॥२००२॥


जो ओलग्गदि आराधयं सदा तिव्वभत्तिसंजुत्तो ।
संपज्जदि णिव्विग्घा तस्स वि आराहणा सयला ॥२००३॥

अर्थ: जो तीव्र भक्तिपूर्वक क्षपककी सेवा करता है उसकी भी सम्पूर्ण आराधना सफल होती है ॥२००३॥


सविचारभत्तवोसरणमेवमुववण्णिदं सवित्थारं ।
अविचारभत्तपच्चक्खाणं एत्तो परं वुच्छं ॥२००४॥

अर्थ: इस प्रकार विस्तारसे विचारपूर्वक किये गये भक्तप्रत्याख्यानका कथन किया । आगे अविचार भक्तप्रत्याख्यानका कथन करते हैं ॥२००४॥


तत्थ अविचारभत्तपइण्णा मरणम्मि होइ आगाढे ।
अपरक्कम्मस्स मुणिणो कालम्मि असंपुहुत्तम्मि ॥२००५॥

अर्थ: जब विचार पूर्वक भक्तप्रत्याख्यान करनेका समय न रहे, और सहसा मरण उपस्थित हो जाये तो कुछ करनेमें असमर्थ मुनि अविचार भक्त प्रत्याख्यान स्वीकार करता है ॥२००५॥


तत्थ पढमं णिरुद्धं णिरुद्धतरयं तहा हवे विदियं ।
तदियं परमणिरुद्धं एवं तिविधं अवीचारं ॥२००६॥

अर्थ: अविचार भक्तप्रत्याख्यानके तीन भेद हैं - प्रथम निरुद्ध, दूसरा निरुद्धतर और तीसरा परमनिरुद्ध ॥२००६॥


तस्स णिरुद्धं भणिदं रोगादंकेहिं जो समभिभूदो ।
जंघाबलपरिहीणो परगणगमणम्मि ण समत्थो ॥२००७॥

अर्थ: जो रोगसे ग्रस्त है, पैरोंमें चलनेकी शक्ति न होनेसे दूसरे संघमें जानेमें असमर्थ है उसके निरुद्ध नामक अविचार प्रत्याख्यान होता है ॥२००७॥


जावय बलविरियं से सो विहरदि ताव णिप्पडीयारो ।
पच्छा विहरदि पडिजग्गिज्जंतो तेण सगणेण ॥२००८॥

अर्थ: जबतक उसमें शक्ति रहती है तबतक वह अपने संघमें रहते हुए किसीसे परिचर्या नहीं कराता । पीछे शक्तिहीन होनेपर अपने संघके द्वारा परिचर्या कराता हुआ विहरता है ॥२००८॥


इय सण्णिरुद्धमरणं भणियं अणिहारिमं अवीचारं ।
सो चेव जधाजोग्गं पुव्वुत्तविधी हवदि तस्स ॥२००९॥

अर्थ: पैरोंमें चलनेकी शक्ति न होनेसे तथा रोगसे ग्रस्त होनेके कारण जो अपने ही संघमें निरुद्ध है - रुका है उसके मरणको निरुद्धमरण कहते हैं । इस प्रकार निरुद्धमरणका स्वरूप कहा है । सविचार भक्तप्रत्याख्यानमें जिस प्रकार संघ आदिका त्याग किया जाता है वह इसमें संभव न होनेसे यह मरण परित्यागसे रहित है । और इसमें अनियत विहार आदि विधिका विचार न होनेसे यह अवीचार है । अर्थात् अपने ही संघमें आचार्यके समीपमें दीक्षा लेकर उनसे अपने दोष कहकर अपनी निन्दा और गर्हा करता है, प्रतिक्रमण करता है, प्रायश्चित्त लेता है । और जब तक शक्ति रहती है तब तक दूसरेकी सहायताके बिना अपनी आराधना करता है । जब शक्ति अत्यन्त हीन हो जाती है तब दूसरोंसे सहायता लेकर अपनी आराधनाओंका पालन करता है ॥२००९॥


दुविधं तं पि अणीहारिमं पगासं च अप्पगासं च ।
जणणादं च पगासं इदरं च जणेण अण्णादं ॥२०१०॥

अर्थ: वह अनिहार नामक भक्तप्रत्याख्यान, जिसमें अपना संघ नहीं छोड़ा जाता है, और इसीलिये जिसे स्वगणस्थ भी कहा जाता है, दो प्रकार है - एक प्रकाशरूप और दूसरा अप्रकाशरूप। जो लोगोंके द्वारा ज्ञात होता है वह प्रकाशरूप है और जिसकी लोगोंको खबर नहीं होती, वह अप्रकाशरूप है ॥२०१०॥


खवयस्स चित्तसारं खित्तं कालं पडुच्च सजणं वा ।
अण्णम्मि य तारिसयम्मि कारणे अप्पगासं तु ॥२०११॥

अर्थ: क्षपकके मनोबल, क्षेत्र, काल अथवा स्वजन तथा इस प्रकारके अन्य कारणके होनेपर उन्हें दृष्टिमें रखकर अप्रकट भक्तप्रत्याख्यान होता है। अर्थात् यदि क्षपक भूख प्यास आदिकी परीषह सहनेमें असमर्थ होता है, या, वसति एकान्तमें नहीं होती, या ग्रीष्म आदि ऋतु होती हैं, या परिवारके लोग विघ्न कर सकते हैं तो समाधिको प्रकट नहीं किया जाता ॥२०११॥


वालग्गिवग्घमहिसगयरिंछपडिणीय तेण मिच्छेहिं ।
मुच्छाविसूचियादीहिं होज्ज सज्जो हु वावत्ती ॥२०१२॥

अर्थ: सर्प, आग, व्याघ्र, भैंसा, हाथी, रीछ, शत्रु, चोर, म्लेच्छ, मूर्छा या विसूचिका आदि रोगसे तत्काल यदि मरण उपस्थित हो ॥२०१२॥


जाव ण वाया खिप्पदि बलं च विरियं च जाव कायम्मि ।
तिव्वाए वेदणाए जाव य चित्तं ण विक्खित्तं ॥२०१३॥

अर्थ: तो जब तक बोली बन्द न हो, जब तक शरीरमें बल और शक्ति रहे, और जब तक तीव्र वेदनाके कारण चित्त व्याकुल न हो ॥२०१३॥


णच्चा संवड्ढिज्जंतमाउगं सिग्घमेव तो भिक्खू ।
गणियादीणं सण्णिहिदाणं आलोचए सम्मं ॥२०१४॥

अर्थ: साधु, अपनी आयुको शीघ्र ही समाप्त होती हुई जानकर जो निकटवर्ती आचार्य आदि हों, उनके सन्मुख अपने दोषोंकी सम्यक्रूपसे आलोचना करे। तथा रत्नत्रयकी आराधनामें तत्पर होता हुआ वसति, संस्तर, आहार, उपधि, शरीर और परिचारकोंसे ममत्वका त्याग कर दे। बल और वीर्यके क्षीण होनेसे जिनके प्रदेश अन्य संघमें जानेमें अत्यन्त असमर्थ होते हैं उन्हें निरुद्धतरक कहते हैं ॥२०१४॥


एवं णिरुद्धदरयं विदियं अणिहारिमं अवीचारं ।
सो चेव जधाजोगं पुव्वुत्तविधी हवदि तस्स ॥२०१५॥

अर्थ: इस प्रकार विहार रहित अत्यन्त निरोध रूप अविचार भक्तप्रत्याख्यानके दूसरे भेद निरुद्धतरका कथन किया। पूर्वमें भक्त प्रत्याख्यानकी जो विधि कही है वही विधि यथायोग्य यहाँ भी जानना ॥२०१५॥


वालादिएहिं जइया अक्खित्ता होज्ज भिक्खुणो वाया ।
तइया परमणिरुद्धं भणिदं मरणं अवीचारं ॥२०१६॥

अर्थ: जब पूर्वोक्त सर्प आदिसे डसे जानेके कारण क्षपककी वाणी नष्ट हो जाती है, वह बोल नहीं सकता तब उसके परम निरुद्ध नामक अविचार भक्तप्रत्याख्यान होता है। यहाँ परम शब्दसे वाणीका रुकना कहा है ॥२०१६॥


णच्चा संवड्ढिज्जंतमाउगं सिग्घमेव तो भिक्खू ।
अरहंतसिद्धसाहूण अंतिगं सिग्घमालोचे ॥२०१७॥

अर्थ: तब वह साधु शीघ्र ही अपनी आयुको समाप्त होती हुई जान अर्हन्तों, सिद्धों और साधुजनोंके पासमें तत्काल आलोचना करे ॥२०१७॥


आराधणाविधी जो पुव्वं उववण्णिदो सवित्थारो ।
सो चेव जुज्जमाणो एत्थ विधी होदि णादव्वो ॥२०१८॥

अर्थ: पूर्वमें जो आराधनाकी विधि विस्तार पूर्वक कही है वही यहां भी यथायोग्य जानना ॥२०१८॥


एवं आसुक्कारमरणे वि सिज्झंति केइ धुदकम्मा ।
आराधयित्तु केई देवा वेमाणिया होंति ॥२०१९॥

अर्थ: इस प्रकार सहसा मरण होनेपर भी कोई-कोई मुनि कर्मोंको नाश करके मुक्त होते हैं और कोई आराधना करके वैमानिक देव होते हैं ॥२०१९॥

गाथा २०२० से २१६४

आराधणाए तत्थ दु कालस्स बहुत्तणं ण हु पमाणं ।
बहवो मुहुत्तमत्ता संसारमहण्णवं तिण्णा ॥२०२०॥

अर्थ: थोड़े ही समयमें मोक्ष कैसे हो सकता है ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिये; क्योंकि आराधनामें कालका बहुतपना प्रमाण नहीं है। बहुतसे मुनि एक मुहूर्त मात्रमें आराधना करके संसारसमुद्रको पार कर गये हैं ॥२०२०॥


खणमेत्तेण अणादियमिच्छादिट्ठी वि वद्धणो राया ।
उसहस्स पादमूले संबुज्झित्ता गदो सिद्धिं ॥२०२१॥

अर्थ: अनादि मिथ्यादृष्टि भी वर्द्धन नामका राजा भगवान् ऋषभदेवके पादमूलमें बोध को प्राप्त होकर मोक्षको गया ॥२०२१॥


सोलसतित्थयराणं तित्थुप्पण्णस्स पढमदिवसम्मि ।
सामण्णणाणसिद्धी भिण्णमुहुत्तेण संपण्णा ॥२०२२॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवसे शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्यन्त सोलह तीर्थंकरोंके तीर्थकी उत्पत्ति होनेके प्रथम दिन ही बहुतसे साधु दीक्षा लेकर एक अन्तमुहूर्तमें केवलज्ञानको प्राप्तकर मुक्त हुए ॥२०२२॥


एसा भत्तपइण्णा वाससमासेण वण्णिदा विधिणा ।
इत्तो इंगिणिमरणं वाससमासेण वण्णेसिं ॥२०२३॥

अर्थ: इस भक्तप्रत्याख्यानका विस्तार और संक्षेपसे विधिपूर्वक कथन किया । आगे इंगिनीमरण का विस्तार और संक्षेपसे वर्णन करेंगे ॥२०२३॥


जो भत्तपदिण्णाए उवक्कमो वण्णिदो सवित्थारो ।
सो चेव जधाजोग्गं उवक्कमो इंगिणीए वि ॥२०२४॥

अर्थ: जो भक्त प्रत्याख्यानकी विधि विस्तारसे कही है वही विधि इंगिनीमरणकी यथायोग्य जाननी चाहिये ॥२०२४॥


पव्वज्जाए सुद्धो उवसंपज्जित्तु लिंगकप्पं च ।
पवयणमोगाहित्ता विणयसमाधीए विहरित्ता ॥२०२५॥

अर्थ: जो दीक्षा ग्रहणके योग्य है वह निर्ग्रन्थ लिंग धारण करके श्रुतका अभ्यास करे तथा विनय और समाधिमें विहार करे ॥२०२५॥


णिप्पादित्ता सगणं इंगिणिविधिसाधणाए परिणमिया ।
सिदिमारुहित्तु भाविय अप्पाणं सल्लिहित्ताणं ॥२०२६॥

अर्थ: अपने संघको इंगिणीमरणकी विधिकी साधनामें योग्य करके अपने चित्तमें यह निश्चय करे कि मैं इंगिणीमरणकी साधना करूंगा । फिर शुभ परिणामोंकी श्रेणि पर आरोहण करके तप आदिकी भावना करे और अपने शरीर और कषायोंको कृश करे ॥२०२६॥


परियाइगमालोचिय अणुजाणित्ता दिसं महजणस्स ।
तिविधेण खमावित्ता सबालवुड्ढाउलं गच्छं ॥२०२७॥

अर्थ: रत्नत्रयमें लगे दोषोंकी क्रमसे आलोचना करे और अपने स्थान पर अन्य आचार्यकी स्थापना करके उन्हें सब बतला दे । तथा चतुर्विध वृद्ध मुनियोंसे भरे अपने गच्छको शिक्षा देकर जीवनपर्यन्तके लिये संघसे अलग होनेकी इच्छा करता हुआ प्रसन्न होता है कि मैं कृतार्थ हुआ और इस प्रकार वह सम्पूर्ण गुणोंसे विशिष्ट होकर मुनिसंघसे चला जाता है ॥२०२७-२८॥


अणुसट्ठिं दादूण य जावज्जीवाय विप्पओगच्छी ।
अब्भदिगजादहासो णीदि गणादो गुणसमग्गो ॥२०२८॥

अर्थ: वह कायोत्सर्गसे स्थित होकर अथवा पर्यङ्कासन आदिसे बैठकर अथवा एक पार्श्वसे शयन करते हुए धर्मध्यान करता है। तथा उपसर्गरहित दशामें स्वयं ही अपने शरीरकी परिचर्या - हाथ-पैरोंका संकोचन, फैलाना आदि करता है। स्वयं ही प्रतिष्ठापना समितिपूर्वक शौच आदि करता है॥ यदि देवकृत, मनुष्यकृत या तिर्यञ्चकृत उपसर्ग होता है तो उसका प्रतिकार नहीं करता है और निर्भय होकर उसे सहन करता है॥ क्योंकि उसके आदिके वज्रवृषभनाराच, वज्रनाराच और नाराच नामक तीन शुभ संहननोंमेंसे कोई एक संहनन होता है, समचतुरस्र संस्थान होता है। न भेदने योग्य धैर्यरूपी कवच होता है। वह इन्द्रियों और निद्रा पर विजय प्राप्त करता है। महाबली और शूरवीर होता है॥२०३५ - ३८॥


एवं च णिक्कमित्ता अंतो बाहिं व थंडिले जोगे ।
पुढवीसिलामए वा अप्पाणं णिज्जवे एक्को ॥२०२९॥

अर्थ: इस प्रकार संघसे निकलकर गुफा आदिके अन्दर या बाहर जीवरहित तथा समान रूपसे ऊँचे कठिन भूमिप्रदेशमें पृथ्वीरूप संस्तर पर या शिलामय संस्तर पर एकाकी आश्रय लेता है । अपने शरीरके सिवाय उसका अन्य कोई सहायक नहीं होता ॥२०२९॥


पुव्वुत्ताणि तणाणि य जाचित्ता थंडिलम्मि पुव्वुत्ते ।
जदणाए संथरित्ता उत्तरसिरमधव पुव्वसिरं ॥२०३०॥

अर्थ: वह गाँव या नगरमें जाकर तृणोंकी याचना करता है जो तृण छिद्ररहित, जन्तुरहित, कोमल तथा शरीरकी स्थितिके लिये साधन मात्र और प्रतिलेखनाके योग्य होने चाहियें उन तृणोंको वह उक्त भूमि प्रदेश पर प्रतिलेखनापूर्वक सावधानतासे पृथक्-पृथक् करके फैला देता है । वह भूमिप्रदेश भी प्रकाश सहित, विस्तीर्ण, छिद्ररहित तथा जन्तुरहित होना चाहिये । उसपर संस्तर ऐसा होना चाहिये जिसमें सिर पूर्वदिशा या उत्तर दिशाकी ओर रहे । तब सिरसे लेकर पैर तक शरीरका सावधानीसे परिमार्जन करके पूरब या उत्तरकी ओर मुख करके उस संस्तर पर बैठता है और हाथोंकी अंजली बनाकर मस्तकसे लगाता है तथा विशुद्ध लेश्या पूर्वक अर्हन्त आदिके सामने अपने दोषोंकी आलोचना करके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को पूर्ण रूपसे निर्मल करता है ॥२०३०-२०३२॥


पाचीणाभिमुहो वा उदीचिहुत्तो व तत्थ सो ठिच्चा ।
सीसे कदंजलिपुडो भावेण विसुद्धलेस्सेण ॥२०३१॥


अरहादिअंतियं तो किच्चा आलोचणं सुपरिसुद्धं ।
दंसणणाणचरित्तं परिसारेदूण णिस्सेसं ॥२०३२॥


सव्वं आहारविधिं जावज्जीवाय वोसरित्ताणं ।
वोसरिदूण असेसं अब्भंतरबाहिरे गंथे ॥२०३३॥

अर्थ: समस्त प्रकारके आहारके विकल्पको जीवनपर्यन्तके लिये त्याग देता है तथा समस्त अभ्यन्तर और बाह्य परिग्रहको त्याग देता है ॥२०३३॥


सव्वे विणिज्जिणंतो परीसहे धिदिबलेण संजुत्तो ।
लेस्साए विसुज्झंतो धम्मं ज्झाणं उवणमित्ता ॥२०३४॥

अर्थ: धैर्यके बलसे युक्त वह क्षपक सब परीषहोंको जीतता है और लेश्या विशुद्धिसे सम्पन्न हो, धर्मध्यान करता है ॥२०३४॥


ठिच्चा णिसिदित्ता वा तुवट्टिदूण व सकायपडिचरणं ।
सयमेव णिरुवसग्गे कुणदि विहारम्मि सो भयवं ॥२०३५॥

अर्थ: वह कायोत्सर्गसे स्थित होकर अथवा पर्यङ्कासन आदिसे बैठकर अथवा एक पार्श्वसे शयन करते हुए धर्मध्यान करता है। तथा उपसर्गरहित दशामें स्वयं ही अपने शरीरकी परिचर्या - हाथ-पैरोंका संकोचन, फैलाना आदि करता है। स्वयं ही प्रतिष्ठापना समितिपूर्वक शौच आदि करता है॥ यदि देवकृत, मनुष्यकृत या तिर्यञ्चकृत उपसर्ग होता है तो उसका प्रतिकार नहीं करता है और निर्भय होकर उसे सहन करता है॥ क्योंकि उसके आदिके वज्रवृषभनाराच, वज्रनाराच और नाराच नामक तीन शुभ संहननोंमेंसे कोई एक संहनन होता है, समचतुरस्र संस्थान होता है। न भेदने योग्य धैर्यरूपी कवच होता है। वह इन्द्रियों और निद्रा पर विजय प्राप्त करता है। महाबली और शूरवीर होता है॥२०३५-३८॥ ॥२०३५॥


सयमेव अप्पणो सो करेदि आउंटणादि किरियाओ ।
उच्चारादीणि तथा सयमेव विकिंचिदे विधिणा ॥२०३६॥

अर्थ: वह कायोत्सर्गसे स्थित होकर अथवा पर्यङ्कासन आदिसे बैठकर अथवा एक पार्श्वसे शयन करते हुए धर्मध्यान करता है। तथा उपसर्गरहित दशामें स्वयं ही अपने शरीरकी परिचर्या - हाथ-पैरोंका संकोचन, फैलाना आदि करता है। स्वयं ही प्रतिष्ठापना समितिपूर्वक शौच आदि करता है॥ यदि देवकृत, मनुष्यकृत या तिर्यञ्चकृत उपसर्ग होता है तो उसका प्रतिकार नहीं करता है और निर्भय होकर उसे सहन करता है॥ क्योंकि उसके आदिके वज्रवृषभनाराच, वज्रनाराच और नाराच नामक तीन शुभ संहननोंमेंसे कोई एक संहनन होता है, समचतुरस्र संस्थान होता है। न भेदने योग्य धैर्यरूपी कवच होता है। वह इन्द्रियों और निद्रा पर विजय प्राप्त करता है। महाबली और शूरवीर होता है॥२०३५-३८॥ ॥२०३६॥


जाधे पुण उवसग्गा देवा माणुस्सिया व तेरिच्छा ।
ताधे णिप्पडियम्मो ते अधियासेदि विगदभओ ॥२०३७॥

अर्थ: वह कायोत्सर्गसे स्थित होकर अथवा पर्यङ्कासन आदिसे बैठकर अथवा एक पार्श्वसे शयन करते हुए धर्मध्यान करता है। तथा उपसर्गरहित दशामें स्वयं ही अपने शरीरकी परिचर्या - हाथ-पैरोंका संकोचन, फैलाना आदि करता है। स्वयं ही प्रतिष्ठापना समितिपूर्वक शौच आदि करता है॥ यदि देवकृत, मनुष्यकृत या तिर्यञ्चकृत उपसर्ग होता है तो उसका प्रतिकार नहीं करता है और निर्भय होकर उसे सहन करता है॥ क्योंकि उसके आदिके वज्रवृषभनाराच, वज्रनाराच और नाराच नामक तीन शुभ संहननोंमेंसे कोई एक संहनन होता है, समचतुरस्र संस्थान होता है। न भेदने योग्य धैर्यरूपी कवच होता है। वह इन्द्रियों और निद्रा पर विजय प्राप्त करता है। महाबली और शूरवीर होता है॥२०३५-३८॥ ॥२०३७॥


आदितियसुसंघडणो सुभसंठाणो अभिज्जधिदिकवचो ।
जिदकरणो जिदणिद्दो ओघबलो ओघसूरो य ॥२०३८॥

अर्थ: वह कायोत्सर्गसे स्थित होकर अथवा पर्यङ्कासन आदिसे बैठकर अथवा एक पार्श्वसे शयन करते हुए धर्मध्यान करता है। तथा उपसर्गरहित दशामें स्वयं ही अपने शरीरकी परिचर्या - हाथ-पैरोंका संकोचन, फैलाना आदि करता है। स्वयं ही प्रतिष्ठापना समितिपूर्वक शौच आदि करता है॥ यदि देवकृत, मनुष्यकृत या तिर्यञ्चकृत उपसर्ग होता है तो उसका प्रतिकार नहीं करता है और निर्भय होकर उसे सहन करता है॥ क्योंकि उसके आदिके वज्रवृषभनाराच, वज्रनाराच और नाराच नामक तीन शुभ संहननोंमेंसे कोई एक संहनन होता है, समचतुरस्र संस्थान होता है। न भेदने योग्य धैर्यरूपी कवच होता है। वह इन्द्रियों और निद्रा पर विजय प्राप्त करता है। महाबली और शूरवीर होता है॥२०३५-३८॥ ॥२०३८॥


बीभत्थभीमदरिसणविगुव्विदा भूदरक्खसपिसाया ।
खोभिज्जो जदि वि तयं तधवि ण सो संभमं कुणइ ॥२०३९॥

अर्थ: यदि अत्यन्त भयंकर विक्रियाके द्वारा भूत, राक्षस और पिशाच जातिके व्यन्तरदेव उसे डरावें तो भी वह विचलित नहीं होता ॥२०३९॥


इड्ढिमतुलं विउव्विय किण्णरकिंपुरिसदेवकण्णाओ ।
लोलंति जदिवि तगं तधवि ण सो विम्भयं जाई ॥२०४०॥

अर्थ: किन्नर किंपुरुष जातिके व्यन्तर देवोंकी देवांगनाएँ अतुल ऋद्धिरूप विक्रियाके द्वारा यदि उसे लुभाती हैं तो भी वह उनके लोभमें नहीं आता ॥२०४०॥


सव्वो पोग्गलकाओ दुक्खत्ताए जदि वि तमुवणमेज्ज ।
तधवि य तस्स ण जायदि ज्झाणस्स विसोत्तिया को वि ॥२०४१॥

अर्थ: यदि तीन लोकवर्ती समस्त पुद्गल द्रव्य दुःखरूप परिणत होकर उसे दुःखी करें तब भी वह ध्यानसे विचलित नहीं होता ॥२०४१॥


सव्वो पोग्गलकाओ सोक्खत्ताए जदि वि तमुवणमेज्ज ।
तध वि हु तस्स ण जायदि ज्झाणस्स विसोत्तिया को वि ॥२०४२॥

अर्थ: तथा तीन लोकवर्ती समस्त पुद्गलद्रव्य सुखरूप परिणत होकर उसे सुखी करें तब भी वह ध्यानसे विचलित नहीं होता ॥२०४२॥


सच्चित्ते साहरिदो तत्थ उवेक्खदि वियत्तसव्वंगो ।
उवसग्गे य पसंते जदणाए थंडिलमुवेदि ॥२०४३॥

अर्थ: यदि व्याघ्र आदिके द्वारा वह हरित तृणोंसे भरे हुए प्रदेशमें डाल दिया जाता है तो अपने शरीरका मोहत्याग शान्तभावसे वहीं स्थिर रहता है और उपसर्ग दूर होनेपर सावधानता पूर्वक तृणरहित भूमिप्रदेशमें चला आता है ॥२०४३॥


एवं उवसग्गविधिं परीसहविधिं च सोधिया संतो ।
मणवयणकायगुत्तो सुणिच्छिदो णिज्जिदकसाओ ॥२०४४॥

अर्थ: इस प्रकार उपसर्गों और परीषहोंको सहन करते हुए वह मनोगुप्ति वचनगुप्ति और कायगुप्तिका पालन करता है । तथा स्थिरतापूर्वक कषायोंको जीतता है ॥२०४४॥


इहलोए परलोए जीविदमरणे सुहे य दुक्खे य ।
णिप्पडिबद्धो विरहदि जिददुक्खपरिस्समो धिदिमं ॥२०४५॥

अर्थ: दुःख और परिश्रमपर विजय प्राप्त करने वाला वह धीर वीर क्षपक इस लोक, परलोक, जीवन, मरण, सुख और दुःखमें रागद्वेष रहित होकर विहरता है अर्थात् न जीवन आदिसे राग करता है और मरण आदिसे द्वेष करता है ॥२०४५॥


वायणपरियट्टणपुच्छणाओ मोत्तूण तधय धम्मथुदिं ।
सुत्तत्थपोरिसीसु वि सरेदि सुत्तत्थमेयमणो ॥२०४६॥

अर्थ: स्वाध्यायके पाँच भेदोंमेंसे वाचना, आम्नाय, पृच्छना और धर्मोपदेशको त्यागकर वह अस्वाध्यायकालमें भी एकाग्रमनसे सूत्रके अर्थका ही अनुचिन्तन करता है । अर्थात् सतत अनुप्रेक्षारूप स्वाध्यायमें ही लीन रहता है ॥२०४६॥


एवं अट्ठवि जामे अनुबद्धो तच्च ज्झादि एयमणो ।
जदि आघच्चा णिद्दा हविज्ज सो तत्थ अपदिण्णो ॥२०४७॥

अर्थ: इस प्रकार वह दिन रातके आठों पहरोंमें निद्राको त्यागकर एकाग्र मनसे ध्यान करता है । यदि कभी बलात् निद्रा आ जाती है तो सो लेता है ॥२०४७॥


सज्झायकालपडिलेहणादिकाओ ण संति किरियाओ ।
जम्हा मसाणमज्झे तस्स य झाणं अपडिसिद्धं ॥२०४८॥

अर्थ: अन्य मुनियोंकी तरह न तो उनका स्वाध्यायकाल ही नियत होता है और न उन्हें प्रतिलेखना आदि क्रिया करना ही आवश्यक होता है । उनके लिये स्मशानमें भी ध्यान करना निषिद्ध नहीं है ॥२०४८॥


आवासगं च कुणदे उवधोकालम्मि जं जहिं कमदि ।
उवकरणंपि पडिलिहइ उवधोकालम्मि जदणाए ॥२०४९॥

अर्थ: किन्तु दिन रातमें जब जो आवश्यक करनेका विधान है वह अवश्य करते हैं और सावधानता पूर्वक दोनों कालोंमें अपने उपकरणोंकी प्रतिलेखना भी करते हैं ॥२०४९॥


सहसा चुक्कक्खलिदे णिसीधियादीसु मिच्छकारे सो ।
आसिअणिसीधियाओ णिग्गमणपवेसणे कुणइ ॥२०५०॥

अर्थ: यदि उसमें क्वचित् चूक जाते हैं तो ‘मेरा दोष मिथ्या हो’ ‘मैंने गलत किया’ ऐसा बोलते हैं। तथा बाहर जाने और भीतर प्रवेश करनेपर ‘आसही, निसही’ शब्दोंका उच्चारण भी करते हैं ॥२०५०॥


पादे कंटयमादिं अच्छिम्मि रजादियं जदावेज्ज ।
गच्छदि अधाविधिं सो परणीहरणे य तुण्हिक्को ॥२०५१॥

अर्थ: यदि पैरमें कांटा घुस जाता है या आंखमें धूल आदि चली जाती है तो चुप रहते हैं स्वयं उसे दूर नहीं करते। यदि दूसरा दूर करता है तब भी चुप ही रहते हैं ॥२०५१॥


वेउव्वणमाहारयचारणखीरासवादिलद्धीसु ।
तवसा उप्पण्णासु वि विरागभावेण सेवदि सो ॥२०५२॥

अर्थ: यदि तपके प्रभावसे उन्हें विक्रिया ऋद्धि, आहारक ऋद्धि या चारण ऋद्धि अथवा क्षीरास्रव आदि ऋद्धियाँ प्रकट होती हैं तो विरागी होनेसे उनका किञ्चित् भी सेवन नहीं करते ॥२०५२॥


मोणाभिग्गहणिरदो रोगादंकादिवेदणाहेदुं ।
ण कुणदि पडिकारं सो तहेव तण्हाछुहादीणं ॥२०५३॥

अर्थ: वह मौनका पालन करनेमें लीन रहते है, रोग आदिसे होनेवाले कष्टको दूर करनेका प्रयत्न नहीं करते। इसी प्रकार भूख प्यास आदिका भी प्रतीकार नहीं करते ॥२०५३॥


उवएसो पुण आइरियाणं इंगिणिगदो वि छिण्णकधो ।
देवेहिं माणुसेहिं व पुट्ठो धम्मं कधेदित्ति ॥२०५४॥

अर्थ: अन्य आचार्योंका मत है कि इंगिणीमरण करते हुए भी क्षपक देवों या मनुष्योंके द्वारा पूछे जानेपर थोड़ासा धर्मोपदेश भी करता है किन्तु अधिक नहीं करता ॥२०५४॥


एवमधक्खादविधिं साधित्ता इंगिणीं धुदकिलेसा ।
सिज्झंति केइ केई हवंति देवा विमाणेसु ॥२०५५॥

अर्थ: इस तरह ऊपर कहे अनुसार इंगिणीमरणकी साधना करके कोई तो समस्त क्लेशोंसे छूटकर मुक्त हो जाते हैं और कोई मरकर वैमानिकदेव होते हैं ॥२०५५॥


एदं इंगिणिमरणं वाससमासेण वण्णिदं विधिणा ।
पाओगमरणमित्तो समासदो चेव वण्णेसिं ॥२०५६॥

अर्थ: इस इंगिणीमरणका विस्तार और संक्षेपसे विधिपूर्वक कथन किया । आगे प्रायोपगमनका संक्षेपसे कथन करेंगे ॥२०५६॥


पाओ[?]गमणमर[?] होदि [?] [?] उवक्कमो सव्वो ।
वुत्तो इंगिणिमरणस्सुक्कमो जो सवित्थारो ॥२०५७॥

अर्थ: ऊपर इंगिणीमरणकी जो विस्तारसे विधि कही है वही सब विधि प्रायोपगमन मरणकी होती है ॥२०५७॥


णवरिं तणसंथारो पाओवगदस्स होदि पडिसिद्धो ।
आदपरपओगेण य पडिसिद्धं सव्वपरियम्मं ॥२०५८॥

अर्थ: किन्तु इतना विशेष है कि प्रायोपगमनमें तृणोंके संथरेका - तृणशय्याका निषेध है । क्योंकि उसमें स्वयं अपनेसे और दूसरोंसे भी सब प्रकारका प्रतीकार करना कराना निषिद्ध है ॥२०५८॥ प्रायोपगमनमें अपनी सेवा न स्वयं करता है और न दूसरोंसे कराता है। यही इन तीनोंमें भेद है ॥२०५८॥


सो सल्लेहिददेहो जम्हा पाओवगमणमुवजादि ।
उच्चारादिविकिंचणमवि णत्थि पओगदो तम्हा ॥२०५९॥

अर्थ: यतः जो अपने शरीरको सम्यक्रूपसे कृश करता है अर्थात् अस्थि चर्ममात्र शेष रहता है वही प्रायोपगमन मरण करता है। अतः मल मूत्रके स्वयं या दूसरेके द्वारा त्याग करानेका प्रश्न ही नहीं रहता ॥२०५९॥


पुढवी आऊतेऊवणप्फदितसेसु जदि वि साहरिदो ।
वोसट्ठ चत्तदेहो अधाउगं पालए तत्थ ॥२०६०॥

अर्थ: यदि कोई उन्हें पृथ्वी, जल, तेज, वनस्पति और त्रस आदि जीवनिकायोंमें फेंक देता है तो शरीरसे ममत्व त्यागकर अपनी आयुके समाप्त होने तक वहीं पड़े रहते हैं ॥२०६०॥


मज्जणयगंधपुप्फोवयारपडिचारणे वि कीरंते ।
वोसट्ठचत्तदेहो अधाउगं पालए तधवि ॥२०६१॥

अर्थ: यदि कोई उनका अभिषेक करे या गन्ध पुष्प आदिसे पूजा करे तब भी शरीरसे ममत्व त्यागकर न रोष करते हैं, न प्रसन्न होते हैं और न उसे ऐसा करनेसे रोकते हैं ॥२०६१॥


वोसट्ठचत्तदेहो दु णिक्खिवेज्जो जहिं जधा अंगं ।
जावज्जीवं तु सयं तहिं तमंगं ण चालेदि ॥२०६२॥

अर्थ: शरीरसे ममत्वका त्याग करने वाला वह प्रायोपगमनका धारी क्षपक जिस क्षेत्रमें जिस प्रकारसे शरीरका कोई अंग रखा गया हो, उसको वैसा ही पड़ा रहने देता है, स्वयं अपने अंगको हिलाता डुलाता नहीं है ॥२०६२॥


एवं णिप्पडियम्मं भणंति पाओवगमणमरहंता ।
णियमा अणिहारं तं सिया य णीहारमुवसग्गे ॥२०६३॥

अर्थ: इस प्रकार अरहंतदेव प्रायोपगमनको स्व और परकृत प्रतीकारसे रहित कहते हैं।


उवसग्गेण त्ति साहरिदो सो अण्णत्थ कुणदि जं कालं ।
तम्हा वुत्तं णीहारमदो अण्णं अणीहारं ॥२०६४॥

अर्थ: उपसर्ग अवस्थामें एक स्थानसे उठाकर दूसरे स्थानमें डाल दिये जाने पर यदि वह वहीं मरण करता है तो उसे नीहार कहते हैं, और ऐसा नहीं होनेपर पूर्व स्थानमें ही मरण हो तो वह अनीहार कहाता है ॥२०६४॥


पडिमापडिवण्णा वि हु करंति पाओवगमणमप्पेगे ।
दीहद्धं विहरंता इंगिणिमरणं च अप्पेगे ॥२०६५॥

अर्थ: जिनकी आयुका काल अल्पशेष रहता है वे प्रतिमा योग धारण करके प्रायोपगमन करते है। और कुछ दीर्घकाल तक विहार करते हुए इंगिनीमरण करते है ॥२०६५॥


आगाढे उवसग्गे दुब्भिक्खे सव्वदो वि दुत्तारे ।
कदजोगि समधियासिय कारणजादेहिं वि मरंति ॥२०६६॥

अर्थ: महान् उपसर्ग अथवा भयानक दुर्भिक्ष होनेपर परीषहोंको सहन करनेमें समर्थ मुनि अल्प भी मरणके कारण उपस्थित होनेपर उत्साहपूर्वक मृत्युका आलिंगन करते हैं ॥२०६६॥


कोसलय धम्मसीहो अट्ठं साधेदि गिद्धपुट्ठेण ।
णयरम्मि य कोल्लगिरे चंदसिरिं विप्पजहिदूण ॥२०६७॥

अर्थ: अयोध्या नगरीमें धर्मसिंह नामक राजाने अपनी चन्द्रश्री नामक पत्नीको त्यागकर दीक्षा धारण की । और अपने श्वसुरके भयसे कोल्लगिरि नगरमें हाथीके कलेवरमें प्रवेश करके आराधनाकी साधना की ॥२०६७॥


पाडलिपुत्ते धूदाहेदुं मामगकदम्मि उवसग्गे ।
साधेदि उसभसेणो अट्ठं विक्खाणसं किच्चा ॥२०६८॥

अर्थ: पाटलीपुत्र नगरमें ऋषभसेन नामक श्रेष्ठीने अपनी पत्नीको त्यागकर दीक्षा ली । अपनी पुत्रीके स्नेहवश श्वसुरके द्वारा उपसर्ग किये जानेपर ऋषभसेनने श्वास रोककर साधना की ॥२०६८॥


अहिमारएण णिवदिम्मि मारिदे गहिदसमणलिंगेण ।
उड्डाहपसमणत्थं सत्थग्गहणं अकासि गणी ॥२०६९॥

अर्थ: श्रावस्ती नगरीके राजा जयसेनने बौद्धधर्म त्यागकर जैनधर्म धारण किया था । इससे कुपित होकर अहिमारक नामक बौद्धने उसे उस समय मार डाला जब वह आचार्य यतिवृषभको नमस्कार कर रहा था । तब मुनिने अपना अपवाद दूर करनेके लिये शस्त्रसे अपना घात करते हुए साधना की ॥२०६९॥


सगडालएण वि तधा सत्थग्गहणेण साधिदो अत्थो ।
वररुइपओगहेदुं रुट्ठे णंदे महापउमे ॥२०७०॥

अर्थ: पाटलीपुत्रमें नन्दराजाका मंत्री शकटाल था । उसने महापद्म सूरिसे जिन दीक्षा ग्रहण की । उसके विरोधी वररुचिने राजा महापद्मको रुष्ट करके शकटालको मारनेका प्रयत्न किया तो शकटाल मुनिने पञ्च नमस्कार मंत्रका ध्यान करते हुए छुरीसे अपना पेट फाड़ डाला और इस प्रकार आराधनाकी साधना की ॥२०७०॥


एवं पण्डियमरणं सवियप्पं वण्णिदं सवित्थारं ।
वुच्छामि बालपंडियमरणं एत्तो समासेण ॥२०७१॥

अर्थ: इस प्रकार भेद सहित पण्डितमरणका विस्तारसे कथन किया । आगे संक्षेपसे बाल- पण्डितमरणका कथन करेंगे ॥२०७१॥


देसेक्कदेसविरदो सम्मादिट्ठी मरिज्ज जो जीवो ।
तं होदि बालपंडिदमरणं जिणसासणे दिट्ठं ॥२०७२॥

अर्थ: जो समस्त असंयमका त्याग करनेमें असमर्थ है स्थूल हिंसा, स्थूल झूठ, स्थूल चोरी, स्थूल कुशील और स्थूल परिग्रह आदि पांच पापोंका त्याग करता है उसे देशविरत कहते हैं। और जो देशविरतिके भी एक देशसे विरत होता है अर्थात् अपनी शक्तिके अनुसार हिंसादिका त्याग करता है ऐसा सम्यग्दृष्टि एक देशविरत कहा जाता है। इस प्रकार जो समस्त या एकदेश गृहस्थ धर्मका पालक श्रावक होता है उसके मरणको जिनागममें बालपंडितमरण कहा है ॥२०७२॥


पंच य अणुव्वदाइं सत्तयसिक्खाउ देसजदिधम्मो ।
सव्वेण य देसेण य तेण जुदो होदि देसजदी ॥२०७३॥

अर्थ: पांच अणुव्रत और सात शिक्षाव्रत ये देशसंयमी श्रावकका धर्म है। जो उस सम्पूर्ण श्रावक धर्मका पालक है अथवा अपनी शक्तिके अनुसार उसके एक देशका पालक है वह भी देशसंयमी ही है ॥२०७३॥


पाणवधमुसावादादत्तादाणपरदारगमणेहिं ।
अपरिमिदिच्छादो वि अ अणुव्वयाइं विरमणाइं ॥२०७४॥

अर्थ: हिंसा, असत्य, बिना दी हुई वस्तुका ग्रहण, पर स्त्री गमन और इच्छाका अपरिमाण इनसे विरतिरूप पांच अणुव्रत हैं ॥२०७४॥


जं च दिसावेरमणं अणत्थदंडेहिं जं च वेरमणं ।
देसावगासियं पि य गुणव्वयाइं भवे ताइं ॥२०७५॥

अर्थ: दिग्विरति, अनर्थदण्डविरति, देशावकाशिक ये तीन गुणव्रत हैं ॥२०७५॥


भोगाणं परिसंखा सामाइयमतिहिसंविभागो य ।
पोसहविधि य सव्वो चदुरो सिक्खाउ वुत्ताओ ॥२०७६॥

अर्थ: भोगपरिमाण, सामायिक, अतिथिसंविभाग और प्रोषधोपवास ये चार शिक्षाव्रत कहे हैं ॥२०७६॥


आसुक्कारे मरणे अव्वोच्छिण्णाए जीविदासाए ।
णादीहि वा अमुक्को पच्छिमसल्लेहणमकासी ॥२०७७॥

अर्थ: सहसा मरण उपस्थित होनेपर, जीवनकी आशा रहनेपर, अथवा परिजनोंके द्वारा मुक्त न किये जानेपर अन्तिम सल्लेखना धारण न करके, अपने दोषोंकी आलोचना पूर्वक शल्य रहित होकर अपने घरमें ही संस्तरपर स्थित होकर देशविरत श्रावकके मरणको बालपण्डित मरण कहते हैं ॥२०७७॥


आलोचिदणिस्सल्लो सघरे चेवारुहिदितु संथारं ।
जदि मरदि देसविरदो तं वुत्तं बालपंडिदयं ॥२०७८॥

अर्थ: विधिपूर्वक आलोचना करके, माया मिथ्यात्व और निदान शल्यसे मुक्त होकर अपने घरमें संस्तरपर आरूढ़ होकर यदि श्रावक देशविरत मरता है तो उसे बालपण्डित मरण कहा है ॥२०७८॥


जो भत्तपदिण्णाए उवक्कमो वित्थरेण णिद्दिट्ठो ।
सो चेव बालपंडिदमरणे णेओ जहाजोग्गो ॥२०७९॥

अर्थ: भक्तप्रत्याख्यानमें जो विधि विस्तारसे कही है वही सब विधि बालपण्डितमरणमें यथायोग्य जानना ॥२०७९॥


वेमाणिएसु कप्पोवगेसु णियमेण तस्स उववादो ।
णियमा सिज्झदि उक्कस्सएण वा सत्तमम्मि भवे ॥२०८०॥

अर्थ: वह श्रावक मरकर नियमसे सौधर्मादि कल्पोपपन्न वैमानिक देवोंमें उत्पन्न होता है और नियमसे अधिक से अधिक सात भवोंमें मुक्त होता है ॥२०८०॥


इय बालपंडियं होदि मरणमरहंतसासणे दिट्ठं ।
एत्तो पंडिदपंडिदमरणं वोच्छं समासेण ॥२०८१॥

अर्थ: इस प्रकारके मरणको अरहन्त भगवान्के धर्ममें बालपण्डित कहा है । आगे संक्षेपसे पण्डित पण्डितमरणको कहते हैं ॥२०८१॥


साहू जहुत्तचारी वट्टंतो अप्पमत्तकालम्मि ।
ज्झाणं उवेदि धम्मं पविट्ठुकामो खवगसेढिं ॥२०८२॥

अर्थ: शास्त्रोक्त मार्गसे प्रवृत्ति करता हुआ साधु क्षपक श्रेणिपर आरूढ़ होनेकी इच्छासे अप्रमत्त गुणस्थानमें धर्मध्यान करता है ॥२०८२॥


सुचिए समे विवित्ते देसे णिज्जंतुए अणुण्णाए ।
उज्जुअआयददेहो अचलं बंधेत्तु पलियंकं ॥२०८३॥

अर्थ: पवित्र और जन्तुरहित एकान्त प्रदेशमें, उस स्थानके स्वामीकी आज्ञा प्राप्त करके, समभूमिभागमें शरीरको सीधा रखते हुए पल्यंकासन बांधकर अथवा वीरासन आदि लगाकर, अथवा दोनों पैरोंको समरूपसे रखते हुए खड़े होकर अथवा ऊपरको मुखकर शयन करते हुए या एक करवटसे लेटकर पूर्वमें कही विधिके अनुसार विशुद्ध लेश्यापूर्वक मोहनीय कर्मका क्षय करनेमें तत्पर होता हुआ ध्यान करता है तथा चतुर्दश पूर्वोंका अर्थ श्रवण करनेसे उसकी बुद्धि निर्मल होती है अर्थात् उसके श्रुतज्ञानावरणका प्रबल क्षयोपशम होता है ॥२०८३-२०८५॥


वीरासणमादीयं आसणसमपादमादियं ठाणं ।
सम्मं अधिट्ठिदो वा सिज्जमुत्ताणसयणादि ॥२०८४॥

अर्थ: पवित्र और जन्तुरहित एकान्त प्रदेशमें, उस स्थानके स्वामीकी आज्ञा प्राप्त करके, समभूमिभागमें शरीरको सीधा रखते हुए पर्ल्यकासन बांधकर अथवा वीरासन आदि लगाकर, अथवा दोनों पैरोंको समरूपसे रखते हुए खड़े होकर अथवा ऊपरको मुखकर शयन करते हुए या एक करवटसे लेटकर पूर्वमें कही विधिके अनुसार विशुद्ध लेश्यापूर्वक मोहनीय कर्मका क्षय करनेमें तत्पर होता हुआ ध्यान करता है तथा चतुर्दश पूर्वोका अर्थ श्रवण करनेसे उसकी बुद्धि निर्मल होती है अर्थात् उसके श्रुतज्ञानावरणका प्रबल क्षयोपशम होता है ॥२०८३ - २०८५॥ ॥२०८४॥


पुव्वभणिदेण विधिणा ज्झादि ज्झाणं विसुद्धलेस्साओ ।
पवयणसंभिण्णमदी मोहस्स खयं करेमाणो ॥२०८५॥

अर्थ: पवित्र और जन्तुरहित एकान्त प्रदेशमें, उस स्थानके स्वामीकी आज्ञा प्राप्त करके, समभूमिभागमें शरीरको सीधा रखते हुए पर्ल्यकासन बांधकर अथवा वीरासन आदि लगाकर, अथवा दोनों पैरोंको समरूपसे रखते हुए खड़े होकर अथवा ऊपरको मुखकर शयन करते हुए या एक करवटसे लेटकर पूर्वमें कही विधिके अनुसार विशुद्ध लेश्यापूर्वक मोहनीय कर्मका क्षय करनेमें तत्पर होता हुआ ध्यान करता है तथा चतुर्दश पूर्वोका अर्थ श्रवण करनेसे उसकी बुद्धि निर्मल होती है अर्थात् उसके श्रुतज्ञानावरणका प्रबल क्षयोपशम होता है ॥२०८३ - २०८५॥ ॥२०८५॥


संजोयणाकसाए खवेदि झाणेण तेण सो पढमं ।
मिच्छत्तं सम्मिस्सं कमेण सम्मत्तमवि य तदो ॥२०८६॥

अर्थ: प्रथम ही वह उस ध्यानके द्वारा अनन्तानुबन्धी क्रोध मान माया लोभका क्षय करता है फिर मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृतियोंका क्षय करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर क्षपक श्रेणिके अभिमुख होनेके लिये अप्रमत्त गुणस्थानमें अधः प्रवृत्तकरण करता है ॥२०८६॥


अध खवयसेढिमधिगम्म कुणइ साधू अपुव्वकरणं सो ।
होइ तमपुव्वकरणं कयाइ अप्पत्तपुव्वंति ॥२०८७॥

अर्थ: क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर वह क्षपक श्रेणिपर आरोहण करके प्रथम अपूर्वकरण करता है। उसे अपूर्वकरण इसलिये कहते हैं कि उसने इस प्रकारके परिणाम कभी भी नीचेके गुणस्थानोंमें प्राप्त नहीं किये थे ॥२०८७॥


अणिवित्तिकरणणामं णवमं गुणठाणयं च अधिगम्म ।
णिद्दाणिद्दा पयलापयला तध थीणगिद्धिं च ॥२०८८॥

अर्थ: उसके पश्चात् वह साधु अनिवृत्ति करण नामक नवम गुणस्थानको प्राप्त करके निद्रानिद्रा, प्रचला-प्रचला, स्त्यानगृद्धि, नरकगत्यानुपूर्वी, नरकगति, स्थावर, सूक्ष्म, साधारण, आतप, उद्योत, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रिय जाति, दो इन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रिय जाति, तिर्यग्गति, इन सोलह कर्मप्रकृतियोंका क्षय करके मध्यकी आठ कषाय अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभका क्षय करता है ॥२०८८-२०९०॥


णिरयगदियाणुपुव्विं णिरयगदिं थावरं च सुहुमं च ।
साधारणादवुज्जोवतिरियगदिं आणुपुव्वीए ॥२०८९॥

अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका क्षय होनेके अनन्तर समयमें शुद्ध केवलज्ञान और शुद्ध केवल दर्शन उत्पन्न होता है । वह केवल ज्ञान सब द्रव्योंकी त्रिकालगोचर सब पर्यायोंको जानता है । वस्तुगत विशेषरूपको जानना ही ज्ञानका अतिशय है सामान्यरूपको जानना तो सुगम है । इसीसे केवल ज्ञानको सर्वपर्यायनिबद्ध कहा है । केवलका अर्थ है असहाय । केवल ज्ञान इन्द्रियोंकी सहायतासे रहित है इसीसे उसका नाम केवल है । तथा रागादिमलसे रहित होनेसे शुद्ध है । व्याघातसे रहित है क्योंकि कोई अन्य ज्ञान उसमें बाधा नहीं डाल सकता । निश्चयात्मक होनेसे सन्देह रहित है । श्रुत आदि अन्य सब ज्ञानोंमें प्रधान होनेसे उत्तम है । सब द्रव्य और पर्यायोंमें प्रवर्तमान होनेसे मतिज्ञान आदिकी तरह उसका विषय अल्प नहीं है । तथा एक आत्मामें स्वयं ही होनेसे एक है । सम्पूर्ण आत्मस्वरूप होनेसे सकल है । जैसे मति आदि ज्ञान असम्पूर्ण है उस तरह वह सम्पूर्ण नहीं है । अनन्त प्रमाण वाला होनेसे अनन्त है । अविनाशी है, उसका कभी विनाश नहीं होता । विचित्र द्रव्य पर्यायरूपसे प्रतिभासमान होनेसे चित्रपटकी तरह विचित्र-नानारूप है । उस केवलज्ञानसे वह तीन काल सहित इस समस्त जगतको और सर्व अलोकको एक साथ जानता है ॥२०९७-२०९९॥


इगविगतिगचदुरिंदियणामाइं तध तिरिक्खगदिणामं ।
खवयित्ता मज्झिल्ले खवेदि सो अट्ठवि कसाए ॥२०९०॥


तत्तो णपुंसगित्थीवेदं हासादिछक्कपुंवेदं ।
कोधं माणं मायं लोभं च खवेदि सो कमसो ॥२०९१॥

अर्थ: फिर क्रमसे उसी नवम गुणस्थानमें नपुंसक वेद, स्त्रीवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय जुगुप्सा, पुरुषवेद और संज्वलन, क्रोध मान मायाका क्षय करता है । अन्तमें संज्वलन लोभका क्षय करता है ॥२०९१॥


अध लोभसुहुमकिट्टिं वेदंतो सुहुमसंपरायत्तं ।
पावदि पावदि य तधा तण्णामं संजमं सुद्धं ॥२०९२॥

अर्थ: बादर कृष्टिके पश्चात् सूक्ष्मकृष्टिरूप लोभका वेदना करता हुआ दसवें सूक्ष्मसाम्पराय नामक गुणस्थानको प्राप्त करता है और वहाँ उसी सूक्ष्मसाम्पराय नामक संयमको प्राप्त करता है ॥२०९२॥


तो सो खीणकसाओ जायदि खीणासु लोभकिट्टीसु ।
एयत्तवितक्कावीचारं तो ज्झादि सो ज्झाणं ॥२०९३॥

अर्थ: सूक्ष्म लोभकृष्टिका क्षय होनेपर सूक्ष्म साम्परायके पश्चात् क्षीण कषाय नामक बारहवें गुणस्थानवर्ती होता है । वहां वह एकत्व वितर्क विचार नामक ध्यानको ध्याता है ॥२०९३॥


झाणेण य तेण अवक्खादेण य संजमेण घादेदि ।
सेसा घादिकम्माणि समं अवरंजणाणि तदो ॥२०९४॥

अर्थ: उस ध्यान तथा यथाख्यात चारित्रके द्वारा वह जीवके अन्यथाभावमें कारण शेष घातिकर्मोंका एक साथ क्षय करता है ॥२०९४॥


मत्थयसूचीए जधा हदाए कसिणो हदो भवदि तालो ।
कम्माणि तधा गच्छंति खयं मोहे हदे कसिणे ॥२०९५॥

अर्थ: जैसे ताड़के वृक्षकी मस्तक सूची, ऊपरका शाखाभार टूट जानेपर समस्त ताड़वृक्ष ही नष्ट हो जाता है वैसे ही समस्त मोहनीय कर्मके नष्ट होनेपर कर्म नष्ट हो जाते हैं ॥२०९५॥


णिद्दापचलाय दुवे दुचरिमसमयम्मि तस्स खीयंति ।
सेसाणि घादिकम्माणि चरिमसमयम्मि खीयंति ॥२०९६॥

अर्थ: उस क्षीणकषाय गुणस्थानके उपान्त्य समयमें निद्रा प्रचला नष्ट होती हैं । और शेष घातिकर्म - पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तराय अन्तिम समयमें नष्ट होते हैं ॥२०९६॥


तत्तो णंतरसमए उप्पज्जदि सव्वपज्जयणिबंधं ।
केवलणाणं सुद्धं तध केवलदंसणं चेव ॥२०९७॥

अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका क्षय होनेके अनन्तर समयमें शुद्ध केवलज्ञान और शुद्ध केवल दर्शन उत्पन्न होता है। वह केवल ज्ञान सब द्रव्योंकी त्रिकालगोचर सब पर्यायोंको जानता है। वस्तुगत विशेषरूपको जानना ही ज्ञानका अतिशय है सामान्यरूपको जानना तो सुगम है। इसीसे केवल ज्ञानको सर्वपर्यायनिबद्ध कहा है। केवलका अर्थ है असहाय। केवल ज्ञान इन्द्रियोंकी सहायतासे रहित है इसीसे उसका नाम केवल है। तथा रागादिमलसे रहित होनेसे शुद्ध है। व्याघातसे रहित है क्योंकि कोई अन्य ज्ञान उसमें बाधा नहीं डाल सकता। निश्चयात्मक होनेसे सन्देह रहित है। श्रुत आदि अन्य सब ज्ञानोंमें प्रधान होनेसे उत्तम है। सब द्रव्य और पर्यायोंमें प्रवर्तमान होनेसे मतिज्ञान आदिकी तरह उसका विषय अल्प नहीं है। तथा एक आत्मामें स्वयं ही होनेसे एक है। सम्पूर्ण आत्मस्वरूप होनेसे सकल हैं। जैसे मति आदि ज्ञान असम्पूर्ण है उस तरह वह सम्पूर्ण नहीं है। अनन्त प्रमाण वाला होनेसे अनन्त है। अविनाशी है, उसका कभी विनाश नहीं होता। विचित्र द्रव्य पर्यायरूपसे प्रतिभासमान होनेसे चित्रपटकी तरह विचित्र-नानारूप है। उस केवलज्ञानसे वह तीन काल सहित इस समस्त जगतको और सर्व अलोकको एक साथ जानता है ॥२०९७-२०९९॥ ॥२०९७॥


अव्वाघादमसंदिद्धमुत्तमं सव्वदो असंकुडिदं ।
एयं सयलमणंतं अणियत्तं केवलं णाणं ॥२०९८॥

अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका क्षय होनेके अनन्तर समयमें शुद्ध केवलज्ञान और शुद्ध केवल दर्शन उत्पन्न होता है। वह केवल ज्ञान सब द्रव्योंकी त्रिकालगोचर सब पर्यायोंको जानता है। वस्तुगत विशेषरूपको जानना ही ज्ञानका अतिशय है सामान्यरूपको जानना तो सुगम है। इसीसे केवल ज्ञानको सर्वपर्यायनिबद्ध कहा है। केवलका अर्थ है असहाय। केवल ज्ञान इन्द्रियोंकी सहायतासे रहित है इसीसे उसका नाम केवल है। तथा रागादिमलसे रहित होनेसे शुद्ध है। व्याघातसे रहित है क्योंकि कोई अन्य ज्ञान उसमें बाधा नहीं डाल सकता। निश्चयात्मक होनेसे सन्देह रहित है। श्रुत आदि अन्य सब ज्ञानोंमें प्रधान होनेसे उत्तम है। सब द्रव्य और पर्यायोंमें प्रवर्तमान होनेसे मतिज्ञान आदिकी तरह उसका विषय अल्प नहीं है। तथा एक आत्मामें स्वयं ही होनेसे एक है। सम्पूर्ण आत्मस्वरूप होनेसे सकल हैं। जैसे मति आदि ज्ञान असम्पूर्ण है उस तरह वह सम्पूर्ण नहीं है। अनन्त प्रमाण वाला होनेसे अनन्त है। अविनाशी है, उसका कभी विनाश नहीं होता। विचित्र द्रव्य पर्यायरूपसे प्रतिभासमान होनेसे चित्रपटकी तरह विचित्र-नानारूप है। उस केवलज्ञानसे वह तीन काल सहित इस समस्त जगतको और सर्व अलोकको एक साथ जानता है ॥२०९७-२०९९॥ ॥२०९८॥


चित्तपडं व विचित्तं तिकालसहिदं तदो जगमिणं सो ।
सव्वं जुगवं पस्सदि सव्वमलोगं च सव्वत्तो ॥२०९९॥

अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका क्षय होनेके अनन्तर समयमें शुद्ध केवलज्ञान और शुद्ध केवल दर्शन उत्पन्न होता है। वह केवल ज्ञान सब द्रव्योंकी त्रिकालगोचर सब पर्यायोंको जानता है। वस्तुगत विशेषरूपको जानना ही ज्ञानका अतिशय है सामान्यरूपको जानना तो सुगम है। इसीसे केवल ज्ञानको सर्वपर्यायनिबद्ध कहा है। केवलका अर्थ है असहाय। केवल ज्ञान इन्द्रियोंकी सहायतासे रहित है इसीसे उसका नाम केवल है। तथा रागादिमलसे रहित होनेसे शुद्ध है। व्याघातसे रहित है क्योंकि कोई अन्य ज्ञान उसमें बाधा नहीं डाल सकता। निश्चयात्मक होनेसे सन्देह रहित है। श्रुत आदि अन्य सब ज्ञानोंमें प्रधान होनेसे उत्तम है। सब द्रव्य और पर्यायोंमें प्रवर्तमान होनेसे मतिज्ञान आदिकी तरह उसका विषय अल्प नहीं है। तथा एक आत्मामें स्वयं ही होनेसे एक है। सम्पूर्ण आत्मस्वरूप होनेसे सकल हैं। जैसे मति आदि ज्ञान असम्पूर्ण है उस तरह वह सम्पूर्ण नहीं है। अनन्त प्रमाण वाला होनेसे अनन्त है। अविनाशी है, उसका कभी विनाश नहीं होता। विचित्र द्रव्य पर्यायरूपसे प्रतिभासमान होनेसे चित्रपटकी तरह विचित्र-नानारूप है। उस केवलज्ञानसे वह तीन काल सहित इस समस्त जगतको और सर्व अलोकको एक साथ जानता है ॥२०९७-२०९९॥ ॥२०९९॥


वीरियमणंतरायं होइ अणंतं तधेव तस्स तदा ।
कप्पातीदस्स महामुणिस्स विग्घम्मि खीणम्मि ॥२१००॥

अर्थ: छद्मस्थ अवस्थासे रहित उस महामुनिके अन्तराय कर्मका विनाश होनेपर अन्तराय रहित अनन्तवीर्य होता है । अर्थात् क्षयोपशमिक वीर्यमें तो वीर्यान्तरायका उदय होनेपर विघ्न आ जाता है । किन्तु समस्त वीर्यान्तरायका क्षय होनेपर प्रकट हुए अनन्त वीर्यमें कोई विघ्न नहीं आता ॥२१००॥


तो सो वेदयमाणो विहरइ सेसाणि ताव कम्माणि ।
जावसमत्ती वेदिज्जमाणस्साउगस्स भवे ॥२१०१॥

अर्थ: केवल ज्ञानकी प्राप्तिके अनन्तर जबतक शेष कर्मोंकी तथा अनुभूयमान मनुष्यायुकी समाप्ति नहीं होती तब तक वह केवल ज्ञानी विहार करता है ॥२१०१॥


दंसणणाणसमग्गो विहरदि उच्चावयं तु परियायं ।
जोगणिरोधं पारभदि कम्माणिल्लेवणट्ठाए ॥२१०२॥

अर्थ: क्षायिक ज्ञान और क्षायिक दर्शनसे परिपूर्ण वह केवल ज्ञानी चारित्रको बढ़ाता हुआ उत्कृष्ट कुछ कम एक पूर्वकोटि तक और जघन्य अन्तर्मुहूर्त मात्र काल तक विहार करता है । फिर अघातिकर्मोंको नष्ट करनेके लिये सत्यवचन योग, अनुभयवचन योग, सत्यमनोयोग अनुभय मनोयोग, औदारिक काययोग, औदारिक मिश्र काययोग तथा कार्मण काययोगका निग्रह प्रारम्भ करता है ॥२१०२॥


उक्कस्सएण छम्मासाउगसेसम्मि केवली जादा ।
वच्चंति समुग्घादं सेसा भज्जा समुग्घादे ॥२१०३॥

अर्थ: उत्कर्षसे छह मास आयु शेष रहनेपर जो केवल ज्ञानी होते हैं वे अवश्य समुद्घात - जीवके प्रदेशोंका शरीरसे बाहर दण्ड आदिके आकार रूपसे निकलना - करते हैं । शेष समुद्घात करते भी हैं और नहीं भी करते, उनके लिये कोई नियम नहीं है ॥२१०३॥


जेसिं आउसमाइं णामगोदाइं वेदणीयं च ।
ते अकदसमुग्घादा जिणा उवणमंति सेलेसिं ॥२१०४॥

अर्थ: जिनके नामकर्म, गोत्रकर्म, वेदनीयकर्मकी स्थिति आयुकर्मके समान होती है वे सयोगकेवली जिन समुद्घात किये बिना शैलेशी अवस्थाको प्राप्त होते हैं ॥२१०४॥


जेसिं हवंति विसमाणि णामगोदाउवेदणीयाणि ।
ते दु कदसमुग्घादा जिणा उवणमंति सेलेसिं ॥२१०५॥

अर्थ: किन्तु जिनकी आयुकी स्थिति कम होती है और नामगोत्र और वेदनीय कर्मोंकी स्थिति अधिक होती है वे सयोगकेवली जिन समुद्घात करके ही शैलेशी अवस्थाको प्राप्त होते हैं अर्थात् अयोगकेवली होते हैं ॥२१०५॥


ठिदिसंतकम्मसमकरणत्थं सव्वेसि तेसि कम्माणं ।
अंतोमुहुत्त सेसे जंति समुग्घादमाउम्मि ॥२१०६॥

अर्थ: अन्तमुहूर्त आयु शेष रहनेपर चारों कर्मोंकी स्थिति समान करनेके लिये समुद्घात करते हैं ॥२१०६॥


ओल्लं संतं वत्थं विरल्लिदं जह लहु विणिव्वादि ।
संवेढियं तु ण तधा तधेव कम्मं पि णादव्वं ॥२१०७॥

अर्थ: जैसे गीला वस्त्र फैला देनेपर वह शीघ्र सूख जाता है उतनी शीघ्र इकट्ठा रखा हुआ नहीं सूखता । कर्मोंकी भी वैसी ही दशा जानना । आत्म प्रदेशोंके फैलावसे सम्बद्ध कर्मरजकी स्थिति बिना भोगे घट जाती है ॥२१०७॥


ठिदिबंधस्स सिणेहो हेदू खीयदि य सो समुहदस्स ।
सडदि य खीणसिणेहं सेसं अप्पट्ठिदी होदि ॥२१०८॥

अर्थ: समुद्घात करनेपर स्थितिबन्धका कारण जो स्नेहगुण है वह नष्ट हो जाता है । और स्नेहगुणके क्षीण होनेपर शेष कर्मोंकी स्थिति घट जाती है ॥२१०८॥


चदुहिं समएहिं दंड-कवाड-पदरजगपूरणाणि तदा ।
कमसो करेदि तह चेव णियत्तीदि चदुहिं समएहिं ॥२१०९॥

अर्थ: सयोगकेवली जिन चार समयोंमें दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण समुद्घात करके क्रमसे चार ही समयोंमें उसका संकोच करता है अर्थात् प्रथम समयमें दण्डाकार, दूसरे समयमें कपाटके आकार, तीसरे समयमें प्रतर रूप और चतुर्थ समयमें समस्त लोकमें व्याप्त हो जाते हैं । पांचवें समयमें पुनः प्रतररूप, छठे समयमें कपाटरूप, सातवें समयमें दण्डाकार आठवें समयमें मूल शरीरकार आत्म प्रदेश हो जाते हैं ॥२१०९॥


काउणाउसमाइं णामागोदाणि वेदणीयं च ।
सेलेसिमब्भुवेंतो जोगणिरोधं तदो कुणदि ॥२११०॥

अर्थ: इस प्रकार नाम, गोत्र और वेदनीय कर्मोंकी स्थिति आयुके समान करके मुक्तिकी ओर बढ़नेवाले सयोगकेवली जिन योगोंका निरोध करते हैं ॥२११०॥


बादरवाचिगजोगं बादरकायेण बादरमणं च ।
बादरकायंपि तधा रुंभदि सुहुमेण काएण ॥२१११॥

अर्थ: स्थूल काययोगमें स्थित होकर बादर वचनयोग और बादर मनोयोगको रोकते हैं और सूक्ष्म काययोगमें स्थित होकर स्थूल काययोगको रोकते हैं ॥२१११॥


तध चेव सुहुममणवचिजोगं सुहुमेण कायजोगेण ।
रुंभित्तु जिणो चिट्ठदि सो सुहुमकायजोगेण ॥२११२॥

अर्थ: उसी प्रकार सूक्ष्मकाययोगके द्वारा सूक्ष्म मनोयोग और सूक्ष्म वचनयोगको रोककर सयोगकेवली जिन सूक्ष्म काययोगमें स्थित होते हैं ॥२११२॥


सुहुमाए लेस्साए सुहुमकिरियबंधगो तगो ताधे ।
काइयजोगे सुहुमम्मि सुहुमकिरियं जिणो झादि ॥२११३॥

अर्थ: सूक्ष्म लेश्याके द्वारा सूक्ष्मकाययोगसे वह सातावेदनीय कर्मका बन्ध करता है तथा सूक्ष्मक्रिय नामक तीसरे शुक्लध्यानको ध्याता है ॥२११३॥


सुहुमकिरिएण झाणेण णिरुद्धे सुहुमकायजोगे वि ।
सेलेसी होदि तदो अबंधगो णिच्चलपदेसो ॥२११४॥

अर्थ: उस सूक्ष्मक्रिय नामक शुक्लध्यानके द्वारा सूक्ष्म काययोगका निरोध करके वह शीलोंका स्वामी होता है तथा आत्माके प्रदेशोंके निश्चल हो जानेसे उन्हें कर्मबन्धन नहीं होता, क्योंकि कर्मबन्धके निमित्तोंका अभाव है ॥२११४॥


माणुसगदितज्जादि पज्जत्तादिज्जसुभगजसकित्तिं ।
अण्णदरवेदणीयं तसबादरमुच्चगोदं च ॥२११५॥

अर्थ: उस समय अयोगकेवली होकर वह मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रिय जगति, पर्याप्ति, आदेय, सुभग, यशःकीर्ति, साता या असातावेदनीय, त्रस, बादर, उच्चगोत्र और मनुष्यायु इन ग्यारह कर्म प्रकृतियोंके उदयका भोग करते हैं । और यदि तीर्थंकर होते हैं तो तीर्थंकर सहित बारह प्रकृतियोंका अनुभवन करते हैं ॥२११५-१६॥


मणुसाउगं च वेदेदि अजोगी होदूण चेव तक्कालं ।
तित्थयरणामसहिदो ताओ वेदेदि तित्थयरो ॥२११६॥

अर्थ: इस ध्यानका काल ‘अ इ उ ऋ लृ’ इन पांच मात्राओंके उच्चारणमें जितना काल लगता है उतना है। इतने कालवाले उस अन्तिम ध्यानके द्वारा अयोगकेवली गुणस्थानके उपान्त्य समयमें बिना उदीरणाके सब ७२ कर्म प्रकृतियोंको खपाते हैं, उनका क्षयकर देते हैं, और अन्तिम समयमें तीर्थंकर केवली बारह प्रकृतियोंका क्षय करते हैं तथा सामान्य केवली ग्यारह प्रकृतियोंका क्षय करते हैं ॥२११८-१९॥


देहतियबंधपरिमोक्खत्थं सो केवली अजोगी सो ।
उवयादि समुच्छिण्णकिरियं तु झाणं अपडिवादी ॥२११७॥

अर्थ: उसके पश्चात् अयोगकेवली परम औदारिक, तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंके बन्धनसे छूटनेके लिये समुच्छिन्नक्रिय अप्रतिपाती नामक चतुर्थ शुक्लध्यानको ध्याते हैं इसका दूसरा नाम व्युपरतक्रिया निवर्ती है ॥२११७॥


सो तेण पंचमत्ताकालेण खवेदि चरिमज्झाणेण ।
अणुदिण्णाओ दुचरिमसमये सव्वाओ पयडीओ ॥२११८॥

अर्थ: इस ध्यानका काल ‘अ इ उ ऋ लृ’ इन पांच मात्राओंके उच्चारणमें जितना काल लगता है उतना है । इतने कालवाले उस अन्तिम ध्यानके द्वारा अयोगकेवली गुणस्थानके उपान्त्य समयमें बिना उदीरणाके सब ७२ कर्म प्रकृतियोंको खपाते हैं, उनका क्षयकर देते हैं, और अन्तिम समयमें तीर्थंकर केवली बारह प्रकृतियोंका क्षय करते हैं तथा सामान्य केवली ग्यारह प्रकृतियोंका क्षय करते हैं ॥२११८-१९॥ ॥२११८॥


चरिमसमयम्मि तो सो खवेदि वेदिज्जमाणपयडीओ ।
बारस तित्थयरजिणो एक्कारस सेस सव्वण्हू ॥२११९॥

अर्थ: तीनों लोकोंके मस्तकपर विराजमान वह सिद्ध परमेष्ठी समस्त द्रव्यों और समस्त पर्यायोंसे सम्पूर्ण जगतको जानते देखते हैं । तथा वे मोहरहित भगवान् पर्यायोंसे सहित तीनों कालोंको और समस्त अलोकको जानते हैं ॥२१३४-३५॥


णामक्खएण तेजोसरीरबंधो वि हीयदि तस्स ।
आउक्खएण ओरालियस्स बंधो वि हीयदि से ॥२१२०॥

अर्थ: उनके नामकर्मका क्षय होनेसे तैजस शरीर बन्धका भी क्षय हो जाता है। और आयुकर्मका क्षय होनेसे औदारिक शरीर बन्धका क्षय हो जाता है ॥२१२०॥


तं सो बंधणमुक्को उड्ढं जीवो पओगदो जादि ।
जह एरण्डयबीयं बंधणमुक्कं समुप्पददि ॥२१२१॥

अर्थ: इस प्रकार बन्धनसे मुक्त हुआ वह जीव वेगसे ऊपरको जाता है जैसे बन्धनसे मुक्त हुआ एरण्डका बीज ऊपरको जाता है ॥२१२१॥


संगविजहणेण य लहुदयाए उड्ढं पयादि सो जीवो ।
जध आलाउ अलेओ उप्पददि जले णिबुड्डो वि ॥२१२२॥

अर्थ: समस्त कर्म नोकर्मरूप भारसे मुक्त होनेके कारण हल्का हो जानेसे वह जीव ऊपर को जाता है। जैसे मिट्टीके लेपसे रहित तुम्बी जलमें डूबनेपर भी ऊपर ही आती है ॥२१२२॥


झाणेण य तह अप्पा पओगदो जेण जादि सो उड्ढं ।
वेगेण पूरिदो जह ठाइदुकामो वि य ण ठादि ॥२१२३॥

अर्थ: जैसे वेगसे पूर्ण व्यक्ति ठहरना चाहते हुए भी नहीं ठहर पाता है वैसे ही ध्यानके प्रयोगसे आत्मा ऊपरको जाता है ॥२१२३॥


जह वा अग्गिस्स सिहा सहावदो चेव होहि उड्ढगदी ।
जीवस्स तह सभावो उड्ढगमणमप्पवसियस्स ॥२१२४॥

अर्थ: अथवा जैसे आगकी लपट स्वभावसे ही ऊपरको जाती है वैसे ही कर्मरहित स्वाधीन आत्माका स्वभाव ऊर्ध्वगमन है ॥२१२४॥


तो सो अविग्गहाए गदीए समए अणंतरे चेव ।
पावदि जयस्स सिहरं खित्तं कालेण य फुसंतो ॥२१२५॥

अर्थ: कर्मोंका क्षय होते ही वह मुक्त जीव एक समयवाली मोड़े रहित गतिसे सात राजुप्रमाण आकाशके प्रदेशोंका स्पर्श न करते हुए अर्थात् अत्यन्त तीव्रवेगसे लोकके शिखरपर विराजमान हो जाता है ॥२१२५॥


एवं इहइं पजहिय देहतिगं सिद्धखेत्तमुवगम्म ।
सव्वपरियायमुक्को सिज्झदि जीवो सभावत्थो ॥२१२६॥

अर्थ: इस प्रकार इसी लोकमें तैजस, कार्मण और औदारिक शरीरोंको त्यागकर सब प्रकारके प्रचारसे मुक्त हुआ जीव, सिद्धिक्षेत्रमें जाकर अपने टंकोत्कीर्ण ज्ञायक भाव स्वभावमें स्थित होकर मुक्त हो जाता है ॥२१२६॥


ईसिप्पब्भाराए उवरिं अत्थदि सो जोयणम्मि सीदाए ।
धुवमचलमजरठाणं लोगसिहरमस्सिदो सिद्धो ।॥२१२७॥

अर्थ: उस सिद्धिक्षेत्रके नीचे स्थित आठवीं पृथिवीको कहते हैं - ईषत्प्राग्भार नामकी आठवीं पृथ्वीके कुछ ऊपर एक योजन पर लोकका शिखर स्थित है जो ध्रुव, अचल और अजर है । उसपर सिद्ध जीव तिष्ठता है ॥२१२७॥ कोस विस्तार वाले दो वातवलयोंके ऊपर एक हजार पांच सौ पिचहत्तर धनुष विस्तार वाला तीसरा तनुवातवलय है। उसके पांच सौ पच्चीस धनुष मोटे अन्तिम भाग में सिद्ध भगवान विराजते हैं ॥२१२७॥


धम्माभावेण दु लोगग्गे पडिहम्मदे अलोगेण ।
गदिमुवकुणदि हु धम्मो जीवाणं पोग्गलाणं च॥२१२८॥

अर्थ: धर्मद्रव्य लोकके अग्रभाग तक ही है। अतः मुक्तजीव लोकाग्रसे आगे अलोकमें नहीं जाता, क्योंकि धर्मद्रव्य गति करते हुए जीवों और पुद्गलोंकी गतिमें उपकार करता है ॥२१२८॥


जं जस्स दु संठाणं चरिमसरीरस्स जोगजहणम्मि ।
तं संठाणं तस्स दु जीवघणो होइ सिद्धस्स ॥२१२९॥

अर्थ: मन वचन काययोगोंका त्याग करते समय अयोगी गुणस्थानमें जैसा अन्तिम शरीरका आकार रहता है; उस आकाररूप जीवके प्रदेशोंका, घनरूप सिद्धोंका आकार होता है ॥२१२९॥


दसविधपाणाभावो कम्माभावेण होइ अच्चंतं ।
अच्चंतिगो य सुहदुक्खाभावो विगददेहस्स ॥२१३०॥

अर्थ: सिद्ध भगवानके कर्मोंका अभाव होनेसे दस प्रकारके प्राणोंका सर्वथा अभाव है। तथा शरीरका अभाव होनेसे इन्द्रिय जनित सुखदुःखका अभाव है ॥२१३०॥


जं णत्थि बंधहेदुं देहग्गहणं ण तस्स तेण पुणो ।
कम्मकलुसो हु जीवो कम्मकदं देहमादियदि ॥२१३१॥

अर्थ: मुक्तजीवके कर्मबन्धका कारण नहीं है। अतः वह पुनः शरीर धारण नहीं करता। क्योंकि कर्मों से बद्ध जीव ही कर्मकृत शरीरको धारण करता है ॥२१३१॥


कज्जाभावेण पुणो अच्चंतं णत्थि फंदणं तस्स ।
ण पओगदो वि फंदणमदेहिणो अत्थि सिद्धस्स ॥२१३२॥

अर्थ: सिद्ध जीवोंको कुछ करना शेष न होनेसे उनमें हलन चलनका अत्यन्त अभाव है। और वे शरीर रहित हैं । अतः वायु आदिके प्रयोगसे भी उनमें हलन चलन नहीं होता ॥२१३२॥


कालमणंतमधम्मोपग्गहिदो ठादि गयणमोगाढो ।
सो उवकारो इट्ठो ठिदिसभावो ण जीवाणं ॥२१३३॥

अर्थ: सिद्ध जीव जो अनन्तकाल तक आकाशके प्रदेशोंको अवगाहित करके ठहरा रहता है सो यह अवस्थान रूप उपकार अधर्मास्तिकायका माना गया है; क्योंकि जैसे जीवका स्वभाव चैतन्य आदि है उस प्रकार जीवका स्वभाव स्थिति नहीं है ॥२१३३॥


तेलोक्कमत्थयत्थो तो सो सिद्धो जगं णिरवसेसं ।
सव्वेहिं पज्जएहिं य संपुण्णं सव्वदव्वेहिं ॥२१३४॥

अर्थ: इस लोकमें देवेन्द्र और चक्रवर्ती शब्द रस रूप गन्ध और स्पर्श जन्य जिस उत्तम इन्द्रिय सुखको भोगते हैं, तथा लोकके अग्रभागमें स्थित सिद्ध जिस बाधा रहित सुखको भोगते हैं उसके सामने वह इन्द्रिय सुख उसका अनन्तवाँ भाग भी नहीं है ॥२१४२-४३॥


पस्सदि जाणदि य तहा तिण्णि वि काले सपज्जए सव्वे ।
तह या लोगमसेसं पस्सदि भयवं विगदमोहो ॥२१३५॥

अर्थ: तीनों लोकोंके मस्तकपर विराजमान वह सिद्ध परमेष्ठी समस्त द्रव्यों और समस्त पर्यायोंसे सम्पूर्ण जगतको जानते देखते हैं। तथा वे मोहरहित भगवान् पर्यायोंसे. सहित तीनों कालोंको और समस्त अलोकको जानते हैं ॥२१३४-३५॥ ॥२१३५॥


भावे सगविसयत्थे सूरो जुगवं जहा पयासेइ ।
सव्वं वि तधा जुगवं केवलणाणं पयासेदि ॥२१३६॥

अर्थ: जैसे सूर्य अपने विषयगोचर सब पदार्थोंको एक साथ प्रकाशित करता है वैसे ही केवल ज्ञान सब पदार्थोंको एक साथ प्रकाशित करता है ॥२१३६॥


गदरागदोसमोहो विभओ विमओ णिरुस्सओ विरओ ।
बुधजणपरिगीदगुणो णमंसणिज्जो तिलोगस्स ॥२१३७॥

अर्थ: जिन्होंने रागद्वेष मोहको दूरकर दिया है, जो भय रहित, मदरहित, उत्कण्ठा रहित और कर्मरूप धूलिपटलसे रहित हैं तथा ज्ञानीजन जिनका गुणगान करते हैं वे सिद्ध भगवान तीनों लोकोंके द्वारा वन्दनीय हैं ॥२१३७॥


णिव्वाबइत्तु संसारमहग्गिं परमणिव्वुदिजलेण ।
णिव्वादि सभावत्थो गदजाइजरामरणरोगो ॥२१३८॥

अर्थ: परम निर्वृतिरूप जलसे संसाररूपी महान् अग्निको बुझाकर तथा जन्म-जरा-मरण रोगोंको नष्ट करके अपने स्वरूपमें स्थित मुक्तात्मा निर्वाणको प्राप्त करते हैं ॥२१३८॥


जावं तु किंचि लोए सारीरं माणसं च सुहदुक्खं ।
तं सव्वं णिज्जिण्णं असेसदो तस्स सिद्धस्स ॥२१३९॥

अर्थ: संसारमें जितना भी शारीरिक और मानसिक सुखदुःख है वह सब पूर्णरूपसे उस सिद्ध परमेष्ठीके नष्ट हो चुका है ॥२१३९॥


जं णत्थि सव्वबाधाओ तस्स सव्वं च जाणइ जदो से ।
जं च गदज्झवसाणो परमसुही तेण सो सिद्धो ॥२१४०॥

अर्थ: क्योंकि सिद्ध परमेष्ठीके समस्त बाधाएँ नहीं हैं, और वह समस्त वस्तुओंको जानते हैं तथा अध्यवसान-विकल्पवासनासे रहित हैं । अतः वे परमसुखी हैं ॥२१४०॥


परमिड्ढिपत्ताणं मणुगाणं णत्थि तं सुहं लोए ।
अव्वाबाधमणोवमपरमसुहं तस्स सिद्धस्स ॥२१४१॥

अर्थ: उन सिद्धोंके जो बाधा रहित अनुपम परम सुख है वह सुख इस लोकमें परमऋद्धि चक्रवर्तित्व आदिको प्राप्त मनुष्योंके भी नहीं है ॥२१४१॥


देविंदचक्कवट्टी इंदियसोक्खं च जं अणुहवंति ।
सद्दरसरूवगंधप्फरिसप्पयमुत्तमं लोए ॥२१४२॥

अर्थ: इस लोकमें देवेन्द्र और चक्रवर्ती शब्द रस रूप गन्ध और स्पर्श जन्य जिस उत्तम इन्द्रिय सुखको भोगते हैं, तथा लोकके अग्रभागमें स्थित सिद्ध जिस बाधा रहित सुखको भोगते हैं उसके सामने वह इन्द्रिय सुख उसका अनन्तवाँ भाग भी नहीं है ॥२१४२-४३॥ ॥२१४२॥


अव्वाबाधं च सुहं सिद्धा जं अणुहवंति लोगग्गे ।
तस्स हु अणंतभागो इंदियसोक्खं तयं होज्ज ॥२१४३॥

अर्थ: इस लोकमें देवेन्द्र और चक्रवर्ती शब्द रस रूप गन्ध और स्पर्श जन्य जिस उत्तम इन्द्रिय सुखको भोगते हैं, तथा लोकके अग्रभागमें स्थित सिद्ध जिस बाधा रहित सुखको भोगते हैं उसके सामने वह इन्द्रिय सुख उसका अनन्तवाँ भाग भी नहीं है ॥२१४२-४३॥ ॥२१४३॥


जं सव्वे देवगणा अच्छरसहिया सुहं अणुहवंति ।
तत्तो वि अणंतगुणं अव्वाबाहं सुहं तस्स ॥२१४४॥

अर्थ: अप्सराओंके साथ सब देवगण जिस सुखको भोगते हैं उससे भी अनन्तगुण बाधा रहित सुख सिद्धोंको होता है ॥२१४४॥


तीसु वि कालेसु सुहाणि जाणि माणुसतिरिक्खदेवाणं ।
सव्वाणि ताणि ण समाणि तस्स खणमित्तसोक्खेण ॥२१४५॥

अर्थ: सब मनुष्यों तिर्यञ्चों और देवोंको तीनों कालोंमें जितना सुख होता है वह सब सुख सिद्धोंके एक क्षणमात्रमें होनेवाले सुखके भी बराबर नहीं है ॥२१४५॥


ताणि हु रागविवागाणि दुक्खपुव्वाणि चेव सोक्खाणि ।
ण हु अत्थि रागमवहत्थिदूण किं चि वि सुहं णाम ॥२१४६॥

अर्थ: मनुष्यादिके होनेवाला सुख रागका जनक है और राग दुःखका कारण है अतः इन्द्रियसुख दुःखको लानेवाला है तथा दुःखपूर्वक होता है । अर्थात् पहले दुःख होता है तब वह सुख होता है क्योंकि भूख प्यास आदिका दुःख हुए बिना भोजनादि प्रिय नहीं लगते । रागभावके बिना संसारमें किञ्चित् भी सुख नहीं है ॥२१४६॥


अणुवममभेयमक्खयममलमजरमरुजमभयमभवं च ।
एयंतियमच्चंतियमव्वाबाधं सुहमजेयं ॥२१४७॥

अर्थ: उसके समान या उससे अधिक सुखका अभाव होनेसे अतीन्द्रिय सुख अनुपम है । छद्मस्थ जीवोंके ज्ञानके द्वारा उसका माप करना अशक्य होनेसे अमेय है । उसके विरोधी दुःखका अभाव होनेसे वह अक्षय है - उसका कभी नाश नहीं होता । उसमें रागादिमलका अभाव होनेसे वह अमल है । उसमें जरा रोगका भय न होनेसे वह अजर है । रोगका अभाव होनेसे अरुज है । भयका अभाव होनेसे अभय है । पुनर्भव न होनेसे अभव है । उसके साथमें दुःख न होनेसे ऐकान्तिक है । अनन्तकाल तक रहनेसे आत्यन्तिक है - ऐसा वह अव्याबाधरूप सुख होता है ॥२१४७॥


विसएहिं से ण कज्जं जं णत्थि छुदादियाओ बाधाओ ।
रागादिया य उवभोगहेदुगा णत्थि जं तस्स ॥२१४८॥

अर्थ: सिद्धोंमें शब्दादि विषयोंसे कोई प्रयोजन नहीं है क्योंकि सिद्धोंको भूख प्यास आदि की बाधा नहीं होती तथा विषयोंके उपभोगके कारण राग आदि भी नहीं है ॥२१४८॥


एदेण चेव भणिदो भासणचंकमणचिंतणादीणं ।
चेट्ठाणं सिद्धम्मि अभावो हदसव्वकरणम्मि ॥२१४९॥

अर्थ: इसीसे सब प्रकारकी क्रियाओंसे रहित सिद्धोंमें बोलना, चलना-फिरना तथा विचारना आदि भी नहीं है ॥२१४९॥


इय सो खाइयसम्मत्तसिद्धदाविरियदिट्ठिणाणेहिं ।
अच्चंतिगेहिं जुत्तो अव्वाबाहेण य सुहेण ॥२१५०॥

अर्थ: इस प्रकार वह सिद्ध परमेष्ठी क्षायिक सम्यक्त्व, सिद्धत्व, अनन्तवीर्य, अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन और अव्याबाध सुखसे युक्त होते हैं। ये सब आत्यन्तिक होते हैं, इनका कभी विनाश नहीं होता ॥२१५०॥


अकसायत्तमवेदत्तमकारकदा विदेहदा चेव ।
अचलत्तमलेवत्तं च हुंति अच्चंतियाइं से ॥२१५१॥

अर्थ: क्रोध आदिमें निमित्त पूर्व कर्मोंका विनाश होनेसे और नवीन कर्मोंका अभाव होनेसे सिद्धोंमें आत्यन्तिक अकषायत्व है। इसी प्रकार आत्यन्तिक अवेदत्व है। उनके लिये कोई करने योग्य कार्य शेष न रहनेसे अकारकत्व भी सदा रहता है। पूर्व शरीरका विनाश होनेसे और नवीन शरीरको उत्पन्न करनेवाले कर्मका अभाव होनेसे सिद्धोंमें सदा विदेहता है। अन्य अवस्थाको प्राप्त होनेमें निमित्तका अभाव होनेसे सदा अचल हैं। उनके कर्मके निमित्तसे होनेवाले परिणामोंका अभाव होनेसे तथा पूर्वके कर्मोंका विनाश होनेसे वे सदा लेपरहित होते हैं ॥२१५१॥


जम्मणमरणजलोघं दुक्खसंकिलेससोगवीचीयं ।
इय संसारसमुद्दं तरंति चदुरंगणावाए ॥२१५२॥

अर्थ: जिसमें जन्म मरणरूपी जलका समूह भरा है, दुःख संक्लेश और शोकरूपी लहरें उठा करती हैं; उस संसाररूपी समुद्रको सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र और सम्यक् तपरूपी नावसे पार करते हैं ॥२१५२॥


एवं पण्डिदपण्डिदमरणेण करंति सव्वदुक्खाणं ।
अंतं णिरंतराया णिव्वाणमणुत्तरं पत्ता ॥२१५३॥

अर्थ: इस प्रकार वे क्षपक पण्डितपण्डितमरणसे सब दुःखोंका अन्त करते हैं और बिना बाधाके उत्कृष्ट निर्वाणको प्राप्त करते हैं ॥२१५३॥


एवं आराधित्ता उक्कस्साराहणं चदुक्खंधं ।
कम्मरयविप्पमुक्का तेणेव भवेण सिज्झंति ॥२१५४॥

अर्थ: इस प्रकार सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक् तपरूप चार प्रकारकी उत्कृष्ट आराधनाकी आराधना करके कर्मरूपी धूलिसे छूटकर उसी भवसे मुक्ति प्राप्त करते हैं ॥२१५४॥


आराधयित्तु धीरा मज्झिममाराहणं चदुक्खंधं ।
कम्मरयविप्पमुक्का तदिएण भवेण सिज्झंति ॥२१५५॥

अर्थ: उक्त चार भेदरूप मध्यम आराधनाकी आराधना करके धीर पुरुष कर्मरूपी धूलिसे छूटकर तीसरे भवमें मुक्ति प्राप्त करते हैं ॥२१५५॥


आराधयित्तु धीरा जहण्णमाराहणं चदुक्खंधं ।
कम्मरयविप्पमुक्का सत्तमजम्मेण सिज्झंति ॥२१५६॥

अर्थ: उक्त चार भेदरूप जघन्य आराधनाकी आराधना करके धीर पुरुष कर्मरूपी धूलिसे छूटकर सातवें भवमें मुक्ति प्राप्त करते हैं ॥२१५६॥


एवं एसा आराधणा सभेदा समासदो वुत्ता ।
आराधणाणिबद्धं सव्वंपि हु होदि सुदणाणं ॥२१५७॥

अर्थ: इस प्रकार इस भेदसहित आराधनाका संक्षेपसे कथन किया । इस आराधनामें जो कुछ कहा गया है वह सब श्रुतज्ञान है ॥२१५७॥


आराधणं असेसं वण्णेदुं होज्ज को पुण समत्थो ।
सुदकेवली वि आराधणं असेसं ण वण्णिज्ज ॥२१५८॥

अर्थ: मेरे समान कौन अल्पश्रुतज्ञानी सम्पूर्ण आराधनाका वर्णन करनेमें समर्थ हो सकता है । श्रुतकेवली भी सम्पूर्ण आराधनाको नहीं कह सकते । अर्थात् भगवान सर्वज्ञ ही आराधनाका सर्वस्व वर्णन कर सकते हैं ॥२१५८॥


अज्जजिणणंदिगणि-सव्वगुत्तगणि-अज्जमित्तणंदीणं ।
अवगमिय पादमूले सम्मं सुत्तं च अत्थं च ॥२१५९॥

अर्थ: आर्य जिननन्दिगणि, सर्वगुप्त गणि, और आर्य मित्रनन्दीके पादमूलमें सम्यक्रूपसे श्रुत और उसके अर्थको जानकर पूर्वाचार्यके द्वारा रची गई आराधनाको आधार बनाकर हस्त-पुटमें आहार करनेवाले मुझ शिवाचार्यने अपनी शक्तिसे इस आराधना ग्रन्थको रचा ॥२१५९-६०॥


पुव्वायरियणिबद्धा उवजीवित्ता इमा ससत्तीए ।
आराधणा सिवज्जेण पाणिदलभोइणा रइदा ॥२१६०॥

अर्थ: आर्य जिननन्दिगणि, सर्वगुप्त गणि, और आर्य मित्रनन्दीके पादमूलमें सम्यक्रूपसे श्रुत और उसके अर्थको जानकर पूर्वाचार्यके द्वारा रची गई आराधनाको आधार बनाकर हस्तपुटमें आहार करनेवाले मुझ शिवाचार्यने अपनी शक्तिसे इस आराधना ग्रन्थको रचा ॥२१५९-६०॥ ॥२१६०॥


छदुमत्थदाए एत्थ दु जं बद्धं होज्ज पवयणविरुद्धं ।
सोधेंतु सुगीदत्था पवयणवच्छलदाए दु ॥२१६१॥

अर्थ: छद्मस्थ अर्थात् अल्पज्ञानी होनेसे इसमें जो कुछ आगमके विरुद्ध लिखा गया हो; उसे आगमके अर्थको सम्यक्रूपसे ग्रहण किये हुए ज्ञानीजन सुधारनेकी कृपा करें ॥२१६१॥


आराधणा भगवदी एवं भत्तीए वण्णिदा संती ।
संघस्स सिवज्जस्स य समाधिवरमुत्तमं देउ ॥२१६२॥

अर्थ: इस प्रकार भक्तिपूर्वक वर्णनकी हुई भगवती आराधना सर्वगुप्त गणीके संघको तथा रचयिता शिवार्यको समस्त जनोंसे प्रार्थनीय अव्याबाध सुखरूप सिद्धिको प्रदान करें अर्थात् उसके प्रसादसे हम सबको शुक्लध्यानकी प्राप्ति हो ॥२१६२॥


असुरसुरमणुयकिण्णररविससिकिंपुरिसमहियवरचरणो ।
दिसउ मम बोहिलाहं जिणवरवीरो तिहुवणिंदो ॥२१६३॥

अर्थ: जिनके पूजनीय चरणोंको असुर, सुर, मनुष्य, किन्नर, सूर्य, चन्द्र, और किम्पुरुष जातिके व्यन्तर पूजते हैं वे तीनों लोकोंके स्वामी वीर जिनेन्द्र मुझे बोधिलाभ प्रदान करें ॥२१६३॥


खमदमणियमधराणं धुदरयसुहदुक्खविप्पजुत्ताणं ।
णाणुज्जोदियसल्लेहणम्मि सुणमो जिणवराणं ॥२१६४॥

अर्थ: जिन्होंने स्वयं क्षमा, इन्द्रियदमन और नियमोंको धारण करके कर्ममलको नष्ट किया, तथा सांसारिक सुख दुःखसे रहित हुए और अपने ज्ञानके द्वारा सल्लेखनाको प्रकाशित किया उन जिन देवोंको नमस्कार हो ॥२१६४॥