वारसाणुवेक्खा (बारस अणुवेक्खा / द्वादशानुप्रेक्षा) मूल गाथा
आचार्य कुन्दकुन्द देव
बारह अनुप्रेक्षाओं की प्राकृत मूल गाथाएँ 1 से 91, क्रम से। मंगलाचरण, बारह अनुप्रेक्षाएँ और उपसंहार, ग्रंथ के विभाग अनुसार इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ हैं। पाठ संलग्न गाथा पाठ के अनुसार है; जहाँ छपाई की भूल लगी, वहाँ पाठ नहीं बदला, उस भाग के नीचे टिप्पणी दी।
अन्वयार्थ सहित पूर्ण ग्रंथ: बारसणुपेक्खा
आचार्य कुन्दकुन्द के अन्य मूल ग्रंथ: समयसार · प्रवचनसार · नियमसार · पंचास्तिकाय · अष्टपाहुड
स्रोत: वारसाणुवेक्खा_गाथा_पाठ.pdf
वारसाणुवेक्खा_गाथा_पाठ.pdf (337 KB)
मंगलाचरण (गाथा 1 से 2)
णमिऊण सव्वसिद्धे, झाणुत्तमखविददीहसंसारे।
दस दस दो दो य जिणे, दस-दो अणुपेहणं वोच्छे।।1।।
अद्धुव-मसरणमेयत्त-मण्ण-संसार-लोग-मसुचित्तं।
आसव-संवर-णिज्जर-धम्मं बोहिं च चिंतेज्जो।।2।।
1. अनित्यानुप्रेक्षा (गाथा 3 से 7)
वर भवण-जाण-वाहण-सयणासण-देव-मणुवरायाणं।
मादु-पिदु-सजण-भिच्चा-संबंधिणो य पिदिवियाणिच्चा।।3।।
सामग्गिंदियरूवं, आरोग्गं जोव्वणं बलं तेजं।
सोहग्गं लावण्णं, सुरधणुमिव सस्सयं ण हवे।।4।।
जलबुब्बुद-सक्कधणु-खणरुचि-घणसोहमिव थिरं ण हवे।
अहमिंदट्ठाणाइं, बलदेवप्पहुदि पज्जाया।।5।।
जीवणिबद्धं देहं, खीरोदयमिव विणस्सदे सिग्घं।
भोगोपभोगकारण-दव्वं णिच्चं कहं होदि।।6।।
परमट्ठेण दु आदा, देवासुर-मणुवराय-विभवेहिं।
वदिरित्तो सो अप्पा, सस्सदमिदि चिंतए णिच्चं।।7।।
2. अशरणानुप्रेक्षा (गाथा 8 से 13)
मणि-मंतोसह-रक्खा, हय-गय-रहओ य सयलविज्जा य।
जीवाणं ण हि सरणं, तिसु लोए मरणसमयम्हि।।8।।
सग्गो हवे हि दुग्गं, भिच्चा देवा य पहरणं वज्जं।
अइरावणो गइंदो, इंदस्स ण विज्जदे सरणं।।9।।
णवणिहि-चउदहरयणं, हय-मत्तगइंद-चाउरंगबलं।
चक्केसस्स ण सरणं, पेच्छंतो कद्दिये काले।।10।।
जाइ-जरा-मरण-रुजा-भयदो रक्खेदि अप्पणो अप्पा।
तम्हा आदा सरणं, बंधोदयसत्तकम्मवदिरित्तो।।11।।
अरुहा सिद्धाइरिया, उवझाया साहु पंचपरमेट्ठी।
ते वि हु चेट्ठदि आदे, तम्हा आदा हु मे सरणं।।12।।
सम्मत्तं सण्णाणं, सच्चारित्तं च सत्तवो चेव।
चउरो चेट्ठदि आदे, तम्हा आदा हु मे सरणं।।13।।
3. एकत्वानुप्रेक्षा (गाथा 14 से 20)
एक्को करेदि कम्मं, एक्को हिंडदि य दीहसंसारे।
एक्को जायदि मरदि य, तस्स फलं भुंजदे एक्को।।14।।
एक्को करेदि पावं, विसयणिमित्तेण तिव्वलोहेण।
णिरयतिरियेसु जीवो, तस्स फलं भुंजदे एक्को।।15।।
एक्को करेदि पुण्णं, धम्मणिमित्तेण पत्तदाणेण।
मणुवदेवेसु जीवो, तस्स फलं भुंजदे एक्को।।16।।
उत्तमपत्तं भणियं, सम्मत्तगुणेण संजुदो साहू।
सम्मादिट्ठी सावय, मज्झिमपत्तो त्ति विण्णेओ।।17।।
णिद्दिट्ठो जिणसमये, अविरदसम्मो जहण्णपत्तो त्ति।
सम्मत्तरयणरहिओ, अपत्तमिदि संपरिक्खेज्जो।।18।।
एक्को खवेदि कम्मं, अइविसमं जोण्हकहिय-मग्गेण।
मोक्खसुहं उक्किट्ठं, एक्को अणुहवइ सुद्धप्पा।।19।।
एक्कोहं णिम्ममो सुद्धो, णाणदंसणलक्खणो।
सुद्धेयत्तमुपादेयं, एवं चिंतेइ संजदो।।20।।
4. अन्यत्वानुप्रेक्षा (गाथा 21 से 23)
मादा-पिदर-सहोदर-पुत्त-कलत्तादिबंधुसंदोहो।
जीवस्स ण संबंधो, णियकज्जवसेण वट्टंति।।21।।
अण्णो अण्णं सोयदि, मदोत्ति मम णाहगो त्ति मण्णंतो।
अप्पाणं ण हु सोयदि, संसारमहण्णवे बुड्डं।।22।।
अण्णं इमं सरीरादिगं पि जं होज्ज बाहिरं दव्वं।
णाणं दंसणमादा, एवं चिंतेहि अण्णत्तं।।23।।
5. संसारानुप्रेक्षा (गाथा 24 से 37)
पंचविहे संसारे, जाइ-जरा-मरण-रोग-भयपउरे।
जिणमग्गमपेच्छंतो, जीवो परिभमदि चिरकालं।।24।।
सव्वे वि पोग्गला खलु, एगे भुत्तुज्झिया हु जीवेण।
असयं अणंतखुत्तो, पोग्गल-परियट्टसंसारे।।25।।
सव्वम्हि लोयखेत्ते, कमसो तं णत्थि जं ण उप्पण्णं।
ओग्गाहणेण बहुसो, परिभमिदो खेत्तसंसारे।।26।।
अवसप्पिणि-उस्सप्पिणि-समयावलियासु णिरवसेसासु।
जादो मुदो य बहुसो, परिभमिदो कालसंसारे।।27।।
णिरयाउजहण्णादिसु, जाव दु उवरिल्लया दु गेवेज्जा।
मिच्छत्तसंसिदेण दु, बहुसो वि भवट्ठिदि भमिदो।।28।।
सव्वे पयडिट्ठिदिओ, अणुभागपदेसबंधठाणाणि।
जीवो मिच्छत्तवसा, भमिदो पुण भावसंसारे।।29।।
पुत्तकलत्तणिमित्तं, अत्थं अज्जयदि पावबुद्धीए।
परिहरदि दयादाणं, सो जीवो भमदि संसारे।।30।।
मम पुत्तो मम भज्जा, मम धण-धण्णो त्ति तिव्वकंखाए।
चइऊण धम्मबुद्धिं, पच्छा परिपडदि दीहसंसारे।।31।।
मिच्छोदयेण जीवो, णिंदंतो जोण्हभासियं धम्मं।
कुधम्म-कुलिंग-कुतित्थं, मण्णंतो भमदि संसारे।।32।।
हंतूण जीवरासिं, महुमंसं सेविऊण सुरपाणं।
परदव्व-परकलत्तं, गहिऊण य भमदि संसारे।।33।।
जदणेण कुणइ पावं, विसयणिमित्तं हि अहणिसं जीवो।
मोहंधयारसहिओ, तेण दु परिपडदि संसारे।।34।।
संजोगविप्पजोगं, लाहालाहं सुहं य दुक्खं य।
संसारे भूदाणं, होदि हु माणं तहावमाणं य।।35।।
कम्मणिमित्तं जीवो, हिंडदि संसारघोरकंतारे।
जीवस्स ण संसारो, णिच्छयणयेण कम्मणिम्मुक्को।।36।।
संसारमदिक्कंतो, जीवोवादेयमिदि विचिंतेज्जो।
संसारदुहक्कंतो, जीवो सो हेयमिदि विचिंतेज्जो।।37।।
टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): गाथा 34 में “जदणेण” छपा है; t/5799 में “जत्तेण” पाठ है।
6. लोकानुप्रेक्षा (गाथा 38 से 42)
जीवादिपयट्ठाणं, समवाओ सो णिरुच्चए लोगो।
तिविहो हवेइ लोगो, अह-मज्झिम-उड्ढभेएण।।38।।
णिरया हवंति हेट्ठा, मज्झे दीवंबुरासयो संखा।
सग्गो तिसट्ठिभेओ, एत्तो उड्ढं हवे मोक्खो।।39।।
इगतीस-सत्त-चत्तारि-दोण्णि-एक्केक्क-छक्क-चदुकप्पे।
तित्तिय-एक्केक्केंदय, णामा उडुआदि-तेसट्ठी।।40।।
णिच्चिदर-धादु सत्त य, तरु-दस वियलिंदिएसु छच्चेव।
सुर-णिरय-तिरियचउरो, चोद्दस मणुए सदसहस्सा।।41।।
असुहेण णिरय-तिरियं, सुहउवजोगेण दिविजणरसोक्खं।
सुद्धेण लहइ सिद्धिं, एवं लोगं विचिंतेज्जो।।42।।
7. अशुचित्वानुप्रेक्षा (गाथा 43 से 46)
अट्ठीहिं पडिबद्धं, मंसविलित्तं तएण ओच्छण्णं।
किमिसंकुलेहिं भरियमचोक्खं-देहं सयाकालं।।43।।
दुग्गंधं बीभच्छं, कलिमलभरिदं अचेयणं मुत्तं।
सडणप्पडणसहावं, देहं इदि चिंतये णिच्चं।।44।।
रस-रुहिर-मंस-मेदट्ठी-मज्जसंकुलं मुत्त-पूय-किमिबहुलं
दुग्गंधमसुचि चम्ममयमणिच्चमचेयणं पडणं।।45।।
देहादो वदिरित्तो, कम्मविरहिओ अणंतसुहणिलओ।
चोक्खो हवेइ अप्पा, इदि णिच्चं भावणा कुज्जा।।46।।
8. आस्रवानुप्रेक्षा (गाथा 47 से 60)
मिच्छत्तं अविरमणं, कसाय-जोगा य आसवा होंति।
पण-पण-चउ-तियभेदा, सम्मं परिकित्तिदा समए।।47।।
एयंत-विणय-विवरिय-संसयमण्णाणमिदि हवे पंच।
अविरमणं हिंसादी, पंचविहो हवइ णियमेण।।48।।
कोहो माणो माया, लोहो वि य चउविहं कसायं खु।
मणवचकायेण पुणो, जोगो तिवियप्पमिदि जाणे।।49।।
असुहेदरभेदेण दु, एक्केक्कं वण्णिदं हवे दुविहं।
आहारादीसण्णा, असुहमणं इदि विजाणेहि।।50।।
किण्हादि तिण्णि लेस्सा, करणजसोक्खेसु गिद्धिपरिणामो।
ईसा-विसादभावो, असुहमणं त्ति य जिणा बेंति।।51।।
रागो दोसो मोहो, हस्सादी णोकसायपरिणामो।
थूलो वा सुहुमो वा, असुहमणो त्ति य जिणा बेंति।।52।।
भत्तित्थि-राय-चोरकहाओ वयणं वियाण असुहं ति।
बंधण-छेदण-मारण-किरिया सा असुहकायेत्ति।।53।।
मोत्तूण असुहभावं, पुव्वुत्तं णिरवसेसदो दव्वं।
वद-समिदि-सील-संजम, परिणामं सुहमणं जाणे।।54।।
संसारछेदकारण-वयणं सुहवयणमिदि जिणुद्दिट्ठं।
जिणदेवादिसु पूजा, सुहकायं त्ति य हवे चेट्ठा।।55।।
जम्मसमुद्दे बहुदोसवीचिए दुक्खजलचराकिण्णे।
जीवस्स परिब्भमणं, कम्मासवकारणं होदि।।56।।
कम्मासवेण जीवो, बूडदि संसारसायरे घोरे।
जं णाणवसं किरिया, मोक्खणिमित्तं परंपरया।।57।।
आसवहेदू जीवो, जम्म-समुद्दे णिमज्जदे खिप्पं।
आसवकिरिया तम्हा, मोक्खणिमित्तं ण चिंतेज्जो।।58।।
पारंपज्जाएण दु, आसवकिरियाए णत्थि णिव्वाणं।
संसारगमणकारणमिदि णिंदं आसवो जाणे।।59।।
पुव्वुत्तासवभेया, णिच्छयणयएण णत्थि जीवस्स।
उहयासवणिम्मुक्कं, अप्पाणं चिंतए णिच्चं।।60।।
टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): गाथा 49 में “चउविहं” छपा है; “चउव्विहं” होना चाहिए (t/5799 में भी “चउव्विहं”)।
9. संवरानुप्रेक्षा (गाथा 61 से 65)
चल-मलिणमगाढं चिय, वज्जिय सम्मत्तदिढकवाडेण।
मिच्छत्तासवदारणिरोहो होदि त्ति जिणेहिं णिद्दिट्ठं।।61।।
पंचमहव्वयमणसा, अविरमणणिरोहणं हवे णियमा।
कोहादि आसवाणं, दाराणि कसायरहिय-पलगेहिं।।62।।
सुहजोगेसु पवित्ती, संवरणं कुणदि असुहजोगस्स।
सुहजोगस्स णिरोहो, सुद्धुवजोगेण संभवदि।।63।।
सुद्धुवजोगेण पुणो, धम्मं सुक्कं य होदि जीवस्स।
तम्हा संवरहेदू, झाणो त्ति विचिंतए णिच्चं।।64।।
जीवस्स ण संवरणं, परमट्ठणयेण सुद्धभावेण।
संवरभावविमुक्कं, अप्पाणं चिंतए णिच्चं।।65।।
टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): गाथा 62 में “पलगेहिं” छपा है; “पल्लगेहिं” होना चाहिए (t/5799 में भी “पल्लगेहिं”)।
10. निर्जरानुप्रेक्षा (गाथा 66 से 67)
बंधप्पदेसगलणं, णिज्जरणं इदि जिणेहिं पण्णत्तं।
जेण हवे संवरणं, तेण दु णिज्जरणमिदि जाणे।।66।।
सा पुण दुविहा णेया, सकालपक्का तवेण कयमाणा।
चदुगदियाणं पढमा, वयजुत्ताणं हवे विदिया।।67।।
11. धर्मानुप्रेक्षा (गाथा 68 से 82)
एयारस-दसभेयं, धम्मं सम्मत्तपुव्वयं भणियं।
सागारणगाराणं, उत्तमसुहसंपजुत्तेहिं।।68।।
दंसण-वय-सामाइय-पोसह-सच्चित्त-रायभत्ते य।
बम्हारंभ-परिग्गह-अणुमणमुद्दिट्ठ-देसविरदेदे।।69।।
उत्तमखम-मद्दवज्जव-सच्च-सउच्चं च संजमं चेव।
तव-चाग-मकिंचण्हं, बम्हं इदि दसविहं होदि।।70।।
कोहुप्पत्तिणिमित्तं, बहिरंगं जदि हवेदि संजोगो।
ण कुणदि किंचि वि कोहं, तस्स खमा होदि धम्मो त्ति।।71।।
कुल-रूव-जादि-बुद्धिसु, तव-सुदसीलेसु गारवं किंचि।
जो ण वि कुव्वदि समणो, मद्दवधम्मं हवे तस्स।।72।।
मोत्तूण कुडिलभावं, णिम्मलहिदएण चरदि जो समणो।
अज्जवधम्मं तइयो, तस्स दु संभवदि णियमेण।।73।।
पर-संतावयकारण-वयणं मोत्तूण सपरहिदवयणं।
जो वददि भिक्खु तुरियो, तस्स दु धम्मो हवे सच्चं।।74।।
कंखाभावणिवित्तिं, किच्चा वेरग्गभावणाजुत्तो।
जो वट्टदि परममुणी, तस्स दु धम्मो हवे सोच्चं।।75।।
वद-समिदिपालणाए, दंडच्चाएण इंदियजएण।
परिणममाणस्स पुणो, संजमधम्मो हवे णियमा।।76।।
विसय-कसायविणिग्गह-भावं काऊण झाणसज्झाए।
जो भावइ अप्पाणं, तस्स तवं होदि णियमेण।।77।।
णिव्वेगतियं भावइ, मोहं चइऊण सव्वदव्वेसु।
जो तस्स हवे चागो, इदि भणिदं जिणवरिंदेहिं।।78।।
होऊण य णिस्संगो, णियभावं णिग्गहित्तु सुह-दुहदं।
णिद्दंदेण दु वट्टदि, अणयारो तस्स अकिंचण्हं।।79।।
सव्वंगं पेच्छंतो, इत्थीणं तासु मुयदि रदिभावं।
सो बम्हचेरभावं, सुक्कदि खलु दुद्धरं धरदि।।80।।
सावयधम्मं चत्ता, जदिधम्मे जो पवट्टए जीवो।
सो चेव जादि मोक्खं, धम्मं इदि चिंतए णिच्चं।।81।।
णिच्छयणयेण जीवो, सागारणगारधम्मदो भिण्णो।
मज्झत्थभावणाए, सुद्धप्पं चिंतए णिच्चं।।82।।
12. बोधि अनुप्रेक्षा (गाथा 83 से 86)
उप्पज्जदि सण्णाणं, जेण उवाएण तस्सुवायस्स।
चिंता हवेइ बोही, अच्चंतं दुल्लहं होदि।।83।।
कम्मुदयजपज्जाया, हेयं खाओवसमियणाणं खु।
सगदव्वमुवादेयं, णिच्छित्ति होदि सण्णाणं।।84।।
मूलुत्तरपयडीओ, मिच्छादि असंखलोगपरिमाणा।
परदव्वं सगदव्वं, अप्पा इदि णिच्छयणयेण।।85।।
एवं जायदि णाणं, हेयमुवादेय णिच्छये णत्थि।
चिंतेज्जइ मुणि बोहिं, संसारविरमणट्ठे य।।86।।
उपसंहार (गाथा 87 से 91)
वारस अणुवेक्खाओ, पच्चक्खाणं तहेव पडिकमणं।
आलोयणं समाहिं, तम्हा भावेज्ज अणुवेक्खं।।87।।
रत्तिदिवं पडिकमणं, पच्चक्खाणं समाहिं सामइयं।
आलोयणं पकुव्वदि, जदि विज्जदि अप्पणो सत्ती।।88।।
मोक्खगया जे पुरिसा, अणाइकालेण वारसणुवेक्खं।
परिभाविऊण सम्मं, पणमामि पुणो पुणो तेसिं।।89।।
किं पलविएण बहुणा, जे सिद्धा णरवरा गए काले।
सिज्झिहहिं जे वि भविया, तं जाणह तस्स माहप्पं।।90।।
इदि णिच्छयववहारं, जं भणियं कुंदकुंदमुणिणाहे।
जो भावइ सुद्धमणो, सो पावइ परमणिव्वाणं।।91।।
ग्रंथ की टिप्पणी: गाथा 91 के बाद ग्रंथ में “(क्षेपक)” लिखा है।
खोज: Barasanuvekkha Mul Gatha