युक्त्यनुशासन (भाग 2/2)
मद्याङ्गवद्भूत समागमे ज्ञः
शक्त्यन्तर-व्यक्तिरदैव-सृष्टिः ।
इत्यात्म-शिश्नोदर-पुष्टि-तुष्टै -
र्निर्ह्रीभयैर्हा ! मृदवः प्रलब्धाः ॥३५॥
अर्थ: ‘जिस प्रकार मद्याङ्गोंके-मद्यके अङ्गभूत पिष्टोदक, गुड, धातकी आदिके-समागमे (समुदाय) पर मदशक्तिकी उत्पत्ति अथवा आवि- र्भूति होती है उसी तरह भूतोंके-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तत्त्वोंके-समागमपर चैतन्य उत्पन्न अथवा अभिव्यक्त होता है-वह कोई जुदा तत्त्व नहीं है, उन्हींका सुख-दुःख हर्ष-विषाद-विवर्त्तात्मक स्वाभाविक परिणाम विशेष है। और यह सब शक्तिविशेषकी व्यक्ति है, कोई दैव-सृष्टि नहीं है। इस प्रकार यह जिनका-कार्यवादी अविद्धकर्णादि तथा अभिव्यक्तिवादी पुरन्दरादि चार्वाकोंका-सिद्धान्त है उन अपने शिश्न (लिङ्ग) तथा उदरकी पुष्टिमे ही सन्तुष्ट रहनेवाले निर्लज्जों तथा निर्भयोंके द्वारा हा ! कोमलबुद्धि-भोले मनुष्य–ठगे गये हैं ॥’ और पर लाकके भयका हृदयोसे निकालकर तथा लोक-लाजको भी उठाकर उनकी पापमे निरंकुश प्रवृत्ति कराते है, ऐसे लागोका आचार्यमहोदयने जो ‘निर्भय’ और ‘निर्लज्ज’ कहा है वह ठीक ही है । ऐसे लोग विवेक-शून्य होकर स्वय विषयोमे अन्धे हुए दूसरोका भी उन पापोमे फँसाते हैं, उनका अध.-पतन करते है और उसमे आनन्द मनाते है,-जो कि एक बहुत ही निकृष्ट प्रवृत्ति है । यहा भोले जीवोके ठगाये जानेकी बात कहकर आचार्य-महोदयने प्रकारान्तरसे यह भी सूचित किया है कि जो प्रौढ बुद्धिके धारक विचारवान् मनुष्य है वे ऐसे ठग वचनोके द्वारा कभी ठगाये नही जा सकते । वे जानते है कि परमार्थसे जो अनादि-निधन उपयोग-लक्षण चैतन्यस्वरूप आत्मा है वह प्रमाणसे प्रसिद्ध है और पृथिव्यादि भूतोके समागमपर चैतन्यका सर्वथा उत्पन्न अथवा अभिव्यक्त होना व्यवस्थापित नही किया जा सकता । क्योंकि शरीराकार-परिणत पृथिव्यादि भूतोके सगत, अविकल और अनुपहतवीर्य होनेपर भी जिस चैतन्यशक्तिके वे अभिव्यञ्जक कहे जाते हैं उसे या तो पहलेसे सत् कहना होगा या असत् अथवा उभयरूप । इन तीन विकल्पोके सिवाय दूसरी कोई गति नही है । यदि अभिव्यक्त होनेवाली चैतन्यशक्तिको पहलेसे सद्रूप (विद्यमान) माना जायगा ता सर्वदा सद्रूप शक्तिकी ही अभिव्यक्ति सिद्ध होनेसे चैतन्यशक्तिके अनादित्व और अनन्तत्वकी सिद्धि ठहरेगी । और उसके लिये यह अनुमान सुघटित होगा कि–‘चैतन्यशक्ति कथंचित् नित्य है, क्योकि वह सद्रूप और अकारण है ‘जैसे कि पृथिवी आदि भूतसामान्य ।’ इस अनुमानमे ‘सदकारणत्व’ हेतु व्यभिचारादि दोषोसे रहित होनेके कारण समीचीन है और इसलिये चैतन्यशक्तिका अनादि-अनन्त अथवा कथञ्चित् नित्य सिद्ध करनेमे समर्थ है । यदि यह कहा जाय कि पिष्टोदकादि मत्रागोसे अभिव्यक्त होनेवाली मदशक्ति पहलेसे सद्रूप होते हुए भी नित्य नही मानी जाती और इस- लिये उस सत् तथा अकारणरूप मदशक्ति के साथ हेतुका विरोध है, तो यह कहना ठीक नही, क्योकि वह मदशक्ति भी कथञ्चिन्नित्य है और उसका कारण यह है कि चेतनद्रव्यके ही मदशक्तिका स्वभावपना है, सर्वथा अचेतनद्रव्योंमे मदशक्तिका होना असम्भव है, इसीसे द्रव्यमन तथा द्रव्येन्द्रियोके, जो कि अचेतन है, मदशक्ति नही बन सकती-भावमन और भावेन्द्रियोके ही, जो कि चेतनात्मक हैं, मदशक्तिकी सम्भावना है। यदि अचेतन द्रव्य भी मदशक्तिको प्राप्त होवे तो मद्यके भाजनों अथवा शराबकी बोतलोको भी मद अर्थात् नशा होना चाहिये और उनकी भी चेष्टा शराबियो जैसी होनी चाहिये, परन्तु ऐसा नही है । वस्तुतः चेतनद्रव्यमे मदशक्तिकी अभिव्यक्तिका बाह्य कारण मद्यादिक और अन्तरङ्ग कारण मोहनीय कर्मका उदय है-मोहनीयकर्मके उदय-बिना बाह्यमें मद्यादिका संयोग होते हुए भी मदशक्तिकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती । चुनांचे मुक्तात्माओमे दोनों कारणोंका अभाव होनेसे मदशक्तिकी अभिव्यक्ति नही बनती । और इसलिये मदशक्तिक द्वारा उक्त सदकारणत्व, हेतुमें व्यभिचार दोष घटित नहीं हो सकता, वह चैतन्यशक्तिका नित्यत्व सिद्ध करनेमे समर्थ है । चैतन्यशक्तिका नित्यत्व सिद्ध होनेपर परलोकी और परलोकादि सब सुघटित होते है । जो लोग परलोकीको नही मानते उन्हे यह नहीं कहना चाहिए कि ‘पहलेसे सद्रूपमे विद्यमान चैतन्यशक्ति अभिव्यक्त होती है ।’
यदि यह कहा जाय कि अविद्यमान चैतन्यशक्ति अभिव्यक्त होती है तो यह प्रतीतिके विरुद्ध है, क्योकि जो सर्वथा असत् हो ऐसी किसी भी चीजकी अभिव्यक्ति नही देखी जाती । और यदि यह कहा जाय कि कथञ्चित् सद्रूप तथा कथचित् असद्रूप शक्ति ही अभिव्यक्त होती है तो इससे परमतकी-स्याद्वाद शासनकी-सिद्धि होती है, क्योकि स्याद्वादियोको उस चैतन्यशक्तिकी कायाकार-परिणत-पुद्गलोके द्वारा अभिव्यक्ति अभीष्ट है जो द्रव्यदृष्टिसे सद्रूप होते हुए भी पर्यायदृष्टिसे असत् बनी हुई है । और इसलिये सर्वथा चैतन्यकी अभिव्यक्ति प्रमाण-बाधित है, जो उसका जैसे तैसे वचक वचनोके रूपमे प्रतिपादन करते है उन चार्वाकोके द्वारा सुकुमारबुद्धि मनुष्य निःसन्देह ठगाये जाते है ।
दृष्टेऽविशिष्टे जननादि-हेतौ
विशिष्टता का प्रतिसत्त्वमेषाम् ।
स्वभावतः किं न परस्य सिद्धि-
रतावकानामपि हा ! प्रपातः ॥३६॥
अर्थ: ‘जब जननादि हेतु-चैतन्यकी उत्पत्ति तथा अभिव्यक्तिका कारण पृथिवी आदि भूतोका समुदाय-अविशिष्ट देखा जाता है-उसमे कोई विशेषता नही पाई जाती और दैवसृष्टि (भाग्यनिर्माणादि) को अस्वीकार किया जाता है-तब इन (चार्वाकों) के प्राणि प्राणि के प्रति क्या विशेषता बन सकती है ?-कारणमे विशिष्टताके न होनेसे भूतसमागमकी और तज्जन्य अथवा तदभिव्यक्त चैतन्यकी कोई भी विशिष्टता नही बन सकती, तब इस दृश्यमान बुद्ध्यादि चैतन्यके विशेषको किस आधारपर सिद्ध किया जायगा ? कोई भी आधार उसके लिये नही बनता ।’
‘(इसपर) यदि उस विशिष्टताकी सिद्धि स्वभावसे ही मानो जाय तो फिर चारों भूतोंसे भिन्न पाँचवें आत्मतत्त्वकी सिद्धि स्वभावमे क्यों नहीं मानी जाय ?-उसमें क्या बाधा आती है और इसे न मान कर ‘भूतोका कार्य चैतन्य’ माननेसे क्या नतीजा, जो किसी तरह भी सिद्ध नहीं हो सकता ? क्योकि यदि कायाकार-परिणत भूतोंका कार्य होनेसे चैतन्यकी स्वभावसे सिद्धि है तो यह प्रश्न पैदा हाता है कि पृथिवी आदि भूत उस चैतन्यके उपादान कारण है या सहकारी कारण ? यदि उन्हे उपादान कारण माना जाय तो चैतन्यके भूतान्वित होनेका प्रसङ्ग आता है-अर्थात् जिस प्रकार सुवर्णके उपादान होनेपर मुकट, कु डलादिक पर्यायोंमें सुवर्णका अन्वय (वश) चलता है तथा पृथिवी आदिके उपादान होनेपर शरीरमें पृथिवी आदिका अन्वय चलता है उसी प्रकार भूतचतुष्टयके उपादान होने पर चैतन्यमे भूतचतुष्टयका अन्वय चलना चाहिये-उन भूतोका लक्षण उसमे पायाजाना चाहिये । क्योकि उपादान द्रव्य वही कहलाता है जो व्यक्ताऽव्यक्त-आत्मरूप हो, पूर्वाऽपूर्वेके साथ वर्तमान हो और त्रिकालवर्ती जिसका विषय हो १ । परन्तु भूतसमुदाय ऐसा नही देखा जाता कि जा अपने पहले अचेतनाकारका त्याग करके चेतनाकारको ग्रहण करता हुआ भूतोके धारणा-ईरणा-द्रव-उष्णता-लक्षण स्वभावसे अन्वित (युक्त) हो । क्योकि चैतन्य धारणादि भूतस्वभावसे रहित जाननेमे आता है और कोई भी पदार्थ अत्यन्त विजातीय कार्य करता हुआ प्रतीत नही होता । भूतोका धारणादि-स्वभाव और चैतन्य ( जीव ) का ज्ञान-दर्शनापयोग-लक्षण दानो एक दूसरेसे अत्यन्त विलक्षण एव विजातीय हैं । अतः अचेतनात्मक भूतचतुष्टय अत्यन्त विजातीय चैतन्यका उपादान कारण नही बन सकता-दोनोमे उपादानोपादेयभाव सभव ही नही । और यदि भूतचतुष्टयको चैतन्यकी उत्पत्तिमे सहकारी कारण माना जाय ता फिर उपादान कारण कोई ओर बतलाना हागा, क्योकि बिना उपादानके कोई भी कार्य सभव नहीं । जब दूसरा काई उपादान कारण नही और उपादान तथा सहकारी कारणसे भिन्न तीसरा भी कोई कारण ऐसा नही जिससे भूत चतुष्टयको चैतन्यका जनक स्वीकार किया जा सके, तब चैतन्यकी स्वभावसे ही भूतविशेषकी तरह तत्त्वान्तरके रूपमे सिद्धि होती है । इस तत्त्वा- न्तर-सिद्धिको न माननेवाले जो अतावक हैं-दर्शनमोहके उदयसे आकुलित-चित्त हुए आप वीर जिनेन्द्रके मतसे बाह्य हैं-उन (जीविका-मात्र-तन्त्र-विचारकों) का भी हाय ! यह कैसा प्रपतन हुआ है, जो उन्हें संसार समुद्रके आवर्तमे गिराने वाला है !’
स्वच्छन्दवृत्तेर्जगतः स्वभावा-
दुच्चैरनाचार-पथेष्वदोषम् ।
निर्घुष्य दीक्षासममुक्तिमाना-
स्त्वद्दृष्टि-बाह्या बत ! विभ्रमन्ते ॥३७॥
अर्थ: ‘स्वभावसे ही जगतकी स्वच्छन्द-वृत्ति-यथेच्छ प्रवृत्ति-है, इस लिये जगत्के ऊँचे दर्जेके अनाचारमागोंमे-हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील (अब्रह्म) और परिग्रह नामके पाँच महापापोंमें-भी कोई दोष नहीं, ऐसी घोषणा करके-उनके अनुष्ठान-जैसी सदोष प्रवृत्तिको निर्दोष बतलाकर-जो लोग दीक्षाके समकाल ही मुक्तिको मानकर अभिमानी हो रहे हैं-सहजग्राह्य-हृदयमे मन्त्रविशेषारोपणके समय ही मुक्ति हो जाने (मुक्तिका सर्टिफिकेट मिल जाने) का जिन्हें अभिमान है-अथवा दीक्षाका निरास जैसे बने वैसे (दीक्षानुष्ठानका निवारण करनेके लिये ) मुक्तिको जो (मीमांसक) अमान्य कर रहे हैं और मासभक्षण, मद्यपान तथा मैथुनसेवन-जैसे अनाचारके मागोंके विषयमें स्वभावसे ही जगत्की स्वच्छन्द प्रवृत्तिको हेतु बताकर यह घोषणा कर रहे हैं कि उसमे कोई दोष नहीं है१ वे सब (हे वीर जिन !) आपकी दृष्टिसे-बन्ध, मोक्ष और तत्कारण-निश्चयके निबन्धनस्वरूप आपके स्याद्वाददर्शनसे-बाह्य हैं और (सर्वथा एकान्तवादी होनेसे) केवल विभ्रममे पडे हुए हैं-तत्त्वके निश्चयको प्राप्त नही होते-यह बड़े ही खेद अथवा कष्टका विषय है ॥’
प्रवृत्ति-रक्तैः शम-तुष्टि-रिक्तै -
रुपेत्य हिंसाऽभ्युदयाङ्ग-निष्ठा ।
प्रवृत्तितः शान्तिरपि प्ररूढं
तमः परेषां तव सुप्रभातम् ॥३८॥
अर्थ: ‘जो लोग शम और तुष्टिसे रिक्त है-क्रोधादिककी शान्ति और सन्तोष जिनके पास नही फटकते-(और इस लिये) प्रवृत्ति-रक्त हैं-हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील तथा परिग्रहमे कोई प्रकारका नियम अथवा मर्यादा न रखकर उनमे प्रकर्षरूपसे प्रवृत्त अथवा आसक्त है-उन (यज्ञ-वादी मीमासको) के द्वारा, प्रवृत्तिको स्वयं अपनाकर, ‘हिंसा अ+भ्युदय (स्वर्गादिकप्राप्ति) के हेतुकी आधारभूत है’ ऐसी जो मान्यता प्रचलित की गई है वह उनका बहुत बड़ा अन्धकार है-अज्ञानभाव है। इसी तरह (वेदविहित पशुवधादिरूप) प्रवृत्तिसे शान्ति होती है ऐसी जो मान्यताहै वह भी (स्याद्वादमतसे बाह्य) दूसरोंका घोर अन्धकार है-क्योकि प्रवृत्ति रागादिकके उद्रेकरूप अशान्तिकी जननी है न कि अरागादिरूप शान्तिकी । (अतः हे वीरजिन !) आपका मत ही (सकल-अज्ञान-अन्धकारको दूर करनेमे समर्थ होनेसे ) सुप्रभातरूप है, ऐसा सिद्ध होता है ।’
शीर्षोपहारादिभिरात्मदुःखै-
र्देवान् किलाऽऽराध्य सुखाभिगृद्धाः ।
सिद्ध्यन्ति दोषाऽपचयाऽनपेक्षा
युक्तं च तेषां त्वमृषिर्न येषाम् ॥३९॥
अर्थ: ‘जीवात्माके लिये दुःखके निमित्तभूत जो शीर्षोपहारादिक हैं-अपने तथा बकरे आदिके सिरकी बलि चढाना, गुग्गुल धारण करना, मकरको भोजन कराना, पर्वतपरसे गिरना जैसे कृत्य हैं-उनके द्वारा (यक्ष-महेश्वरादि) देवोंकी आराधना करके ठीक वे ही लोग सिद्ध होते हैं- अपनेको सिद्ध समझते तथा घोषित करते है-जो दोषोंके अपचय (विनाश) को अपेक्षा नहीं रखते-सिद्ध होनेके लिये राग-द्वेषादि-विकारोको दूर करनेकी जिन्हें पर्वाह नहीं है-और सुखाभिगृद्ध हैं–काम-सुखादिके लोलुपी हैं।। और यह (सिद्धिकी मान्यतारूप प्ररूढ अन्धकार) उन्हीके युक्त है जिनके हे वीरजिन ! आप ऋषि-गुरु नहीं है ।।-अर्थात् इस प्रकारकी घोर अज्ञानताको लिये हुए अन्धेरगर्दी उन्ही मिथ्यादृष्टियोके यहा चलती है जो आप जैसे वीतदोष-सर्वज्ञ-स्वामीके उपासक नहीं है । (फलतः) जो शुद्धि और शक्तिकी पराकाष्ठाको पहुँचे हुए आप जैसे दैवके उपासक है–आपको अपना गुरु-नेता मानते है-( और इसलिये ) जो हिंसादिकमे विरक्तचित्त है, दया-दम-त्याग-समाधिकी तत्परताको लिये हुए आपके अद्वितीय शासन (मत) को प्राप्त है और नय-प्रमाण द्वारा विनिश्चित परमार्थकी एव यथावस्थित जीवादि-तत्त्वार्थोंकी प्रतिपत्तिमे कुशलमना हैं, उन सम्यग्दृष्टियोके इस प्रकारकी मिथ्या-मान्यतारूप अन्धेरगर्दी ( प्ररूढतमता ) नहीं बनती, क्योकि प्रमादसे अथवा अशक्तिके कारण कही हिंसादिकका आचरण करते हुए भी उसमें उनके मिथ्या-अभिनिवेशरूप पाशके लिये अवकाश नही होता-वे उससे अपनी सिद्धि अथवा आत्मभलाईका होना नही मानते ।’
सामान्य-निष्ठा विविधा विशेषाः
पदं विशेषान्तर-पक्षपाति ।
अन्तर्विशेषान्त-र्वृत्तितोऽन्यत्-
समानभावं नयते विशेषम् ॥४०॥
अर्थ: ‘(७ वीं कारिकामे ‘अभेद-भेदात्मकमर्थतत्त्व’ इस वाक्यके द्वारा यह बतलाया गया है कि वीरशासनमे वस्तुतत्त्वको सामान्य-विशेषात्मक माना गया है, तब यह प्रश्न पैदा होता है कि जो विशेष है वे सामान्यमे निष्ठ ( परिसमाप्त ) है या सामान्य विशेषोमे निष्ठ है अथवा सामान्य और विशेष दोनो परस्परमें निष्ठ है ? इसका उत्तर इतना ही है कि ) जो विविध विशेष हैं वे सब सामान्यनिष्ठ है-अर्थात् एक द्रव्यमे रहने वाले क्रम भावी और सहभावीके भेद-प्रभेदको लिये हुए जो परिस्पन्द और अपरिस्पन्द-रूप नाना प्रकारके पर्याय हैं वे सब एक द्रव्यनिष्ठ होनेसे ऊर्ध्वता-सामान्य मे परिसमाप्त है । और इसलिये विशेषोमें निष्ठ सामान्य नहीं है, क्योकि तब किसी विशेष (पर्याय) के अभाव होनेपर सामान्य (द्रव्य) के भी अभाव का प्रसग आयेगा, जो प्रत्यक्षविरुद्ध है-किसी भी विशेषके नष्ट होनेपर सामान्यका अभाव नहीं होता, उसकी दूसरे विशेषो-पर्यायोमे उपलब्धि देखी जाती है और इससे सामान्यका सर्व-विशेषोमे निष्ठ होना भी बाधित पडता है । फलतः दोनोको निरपेक्षरूपसे परस्परनिष्ठ मानना भी बाधित है, उसमे दोनोका ही अभाव् ठहरता है और वस्तु आकाशकुसुमके समान अवस्तु हो जाती है ।’ ‘(यदि विशेष सामान्यनिष्ठ हैं तो फिर यह शंका उत्पन्न होती है कि वर्णसमूहरूप पद किसे प्राप्त करता है-विशेषको, सामान्यको, उभयको या अनुभयको, अर्थात् इनमेसे किसका बोधक या प्रकाशक होता है ? इसका समाधान यह है कि ) पद जो कि विशेषान्तरका-पक्षपाती होता है-द्रव्य, गुण, कर्म इन तीन प्रकारके विशेषोंमेंसे किसी एकमे प्रवर्तमान हुआ दूसरे विशेषोको भी स्वीकार करता है, अस्वीकार करनेपर किसी एक विशेष मे भी उसकी प्रवृत्ति नहीं बनती-वह विशेषको प्राप्त कराता है अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्ममेसे एक को प्रधानरूपसे प्राप्त कराता है तो दूसरेको गौणरूपसे । साथ ही विशेषान्तरोंके अन्तर्गत उसकी वृत्ति होनेसे दूसरे (जात्यात्मक) विशेषको सामान्यरूपमें भी प्राप्त कराता है-यह सामान्य तिर्यक्सामान्य होता है । इस तरह पद सामान्य और विशेष दोनोको प्राप्त कराता है-एक को प्रधानरूपसे प्रकाशित करता है तो दूसरेको गौणरूपसे । विशेषकी अपेक्षा न रखता हुआ केवल सामान्य और सामान्यकी अपेक्षा न रखता हुआ केवल विशेष दोनो अप्रतीयमान होनेसे अवस्तु है, उन्हे पद प्रकाशित नही करता । फलत. परस्पर निरपेक्ष उभयको और अवस्तुभूत अनुभयको भी पद प्रकाशित नही करता । किन्तु इन सर्वथा सामान्य, सर्वथा विशेष, सर्वथा उभय और सर्वथा अनुभयसे विलक्षण सामान्य-विशेषरूप वस्तुको पद प्रधान और गौणभावसे प्रकाशित करता हुआ यथार्थताको प्राप्त होता है, क्योकि ज्ञाताकी उस पदसे उसी प्रकारकी वस्तुमें प्रवृत्ति और प्राप्ति देखी जाती है, प्रत्यक्षादि प्रमाणोकी तरह ।’
यदेवकारोपहितं पदं तद्-
अस्वार्थतः स्वार्थमवच्छिनत्ति ।
पर्याय-सामान्य-विशेष-सर्व
पदार्थहानिश्च विरोधिवत्स्यात् ॥४१॥
अर्थ: ‘जो पद एवकारसे उपहित है-अवधारणार्थक ‘एव’ नामके निपातसे विशिष्ट है, जैसे ‘जीव एव’ (जीव ही)-वह अस्वार्थसे स्वार्थको ( अजीवत्वसे जीवत्वको ) [ जैसे ] अलग करता है-अस्वार्थ ( अजीवत्व ) का व्यवच्छेदक है-[ वैसे ] सब स्वार्थपर्यायो (सुख-ज्ञानादिक), सब स्वार्थसामान्यो (द्रव्यत्व-चेतनत्वादि) और सब स्वार्थविशेषों ( अभिधानाऽविषयभूत अनन्त अर्थपर्यायो ) सभीको अलग करता है-उन सबका भी व्यवच्छेदक है, अन्यथा उस एक पदसे ही उनका भी बोध होना चाहिये, उनके लिये अलग-अलग पदोका प्रयोग ( जैसे मै सुखी हूँ, ज्ञानी हूँ, द्रव्य हूँ, चेतन हूँ, इत्यादि ) व्यर्थ ठहरता है-और इससे ( उन क्रमभावी धर्मो-पर्यायों, सहभावी धर्मों-सामान्यो तथा अनभिधेय धर्मो-अनन्त अर्थ-पर्यायोका व्यवच्छेद-अभाव-होनेपर ) पदार्थकी ( जीवपदके अभिधेयरूप जीवत्वकी ) भी हानि उसी प्रकार ठहरती है जिस प्रकार कि विरोधी ( अजीवत्व’ ) की हानि होतीहै-क्योकि स्वपर्यायो आदिके अभावमे जीवादि कोई भी अलग वस्तु संभव नही हो सकती ।’
अनुक्त-तुल्यं यदनेवकारं
व्यावृत्त्यभावान्नियम-द्वयेऽपि ।
पर्याय-भावेऽन्यतरप्रयोग-
स्तत्सर्वमन्यच्युतमात्म-हीनम् ॥४२॥
अर्थ: ‘जो पद एवकारसे रहित है वह अनुक्ततुल्य है-न कहे हुएके समान है-क्योंकि उससे ( कर्तृ-क्रिया विषयक ) नियम-द्वयके इष्ट होनेपर भी व्यावृत्तिका अभाव होता है-निश्चयपूर्वक कोई एक बात न कहे जानेसे प्रतिपक्षकी निवृत्ति नही बन सकती-तथा ( व्यावृत्तिका अभाव होने अथवा प्रतिपक्षकी निवृत्ति न हो सकनेसे ) पदोंमें परस्पर पर्यायभाव ठहरता है, पर्यायभावके होनेपर परस्पर प्रतियोगी पदोंमे-से भी चाहे जिस पदका कोई प्रयोग कर सकता है और चाहे जिस पदका प्रयोग होनेपर संपूर्ण अभिधेयभूत वस्तुजात अन्यसे च्युत-प्रतियोगीसे रहित–होजाता है और जो प्रतियोगीसे रहित होता है वह आत्महीन होता है-अपने स्वरूपका प्रतिष्ठापक नही हो सकता । इस तरह भी पदार्थकी हानि ठहरती है ।’ ‘यदि (सत्ताद्वैतवादियो अथवा सर्वथा शून्यवादियोकी मान्यतानुसार सर्वथा अभेदका अवलम्बन लेकर) यह कहा जाय कि पद-अस्ति या नास्ति-(पने प्रतियागो पदके साथ सर्वथा) अभेदी है-और इसलिये एक पदका अभिधेय अपने प्रतियोगी पदके अभिधेयसे च्युत न होनेके कारण वह आत्महीन नही है-तो यह कथन विरोधी है अथवा इससे उस पदका अभिधेय आत्महीन ही नही, किन्तु विरोधी भी होजाता है, क्योकि किसी भी विशेषका-भेदका-तब अस्तित्व बनता ही नही।’
विरोधि चाऽभेद्यविशेष-भावात्-
तद्द्योतनः स्याद्गुणतो निपातः ।
विधाद्य-सन्धिश्च तथाऽङ्गभावा-
दवाच्यता श्रेयस-लोप-हेतुः ॥४३॥
अर्थ: ‘उस विरोधी धर्मका द्योतक ‘स्यात्’ नामका निपात (शब्द) है- जो (स्याद्वादियोके द्वारा प्रयुक्त किया जाता है और) गौणरूपसे उस धर्मका द्योतन करता है-इसीसे दोनो विरोधी-अविरोधी (नास्तित्व-अस्तित्व-जैसे) धर्मोका प्रकाशन-प्रतिपादन होते हुए भी जो विधिका अर्थी है उसकी प्रतिषेधमे प्रवृत्ति नही होती। साथ ही, वह ‘स्यात्’ पद विपक्षभूत धर्मकी सन्धि-संयोजनास्वरूप होता है-उसके रहते दोनो धर्मोमे विरोध नहीं रहता, क्योंकि दोनोमें अङ्गपना है और स्यात्पद उन दोनों अङ्गोंको जोडने वाला है।’ ‘सर्वथा अवक्तव्यता (युक्त नहीं हैं, क्योंकि वह) श्रायस-मोक्ष अथवा आत्महितके लोपकी कारण है-क्योंकि उपेय और उपायके वचन-बिना उनका उपदेश नही बनता, उपदेशके बिना श्रायसके उपाय का-मोक्षमार्गका-अनुष्ठान नही बन सकता और उपाय (मार्ग) का अनुष्ठान न बन सकनेपर उपेयरूप श्रायस (मोक्ष) की उपलब्धि नहीं होती। इस तरह अवक्तव्यता श्रायसके लोपकी हेतु ठहरती है। अतः स्यात्कार-लाञ्छित एवकारसे युक्त पद ही अर्थवान् है ऐसा प्रतिपादन करना चाहिए, यही तात्पर्यात्मक अर्थ है।’
तथा प्रतिज्ञाऽऽशयतोऽप्रयोगः
सामर्थ्यतो वा प्रतिषेधयुक्तिः ।
इति त्वदीया जिननाग ! दृष्टिः
पराऽप्रधृष्या परधर्षिणी च ॥४४॥
अर्थ: ‘(शास्त्रमे और लोकमें ‘स्यात्’ निपातका) जो अप्रयोग है-हरएक पदके साथ स्यात् शब्दका प्रयोग नही पाया जाता-उसका कारण उस प्रकारका-स्यात्पदात्मक - प्रयोग - प्रकारका-प्रतिज्ञाशय है-प्रतिज्ञामे प्रतिपादन करनेवालेका अभिप्राय सन्निहित है।-जैसे शास्त्रमे ‘सम्यग्दर्शन-ज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग.’ इत्यादि वाक्योमे कहीपर भी ‘स्यात्’ या ‘एव’ शब्दका प्रयोग नही है परन्तु शास्त्रकारोके द्वारा अप्रयुक्त होते हुए भी वह जाना जाता है, क्योकि उनके वैसे प्रतिज्ञाशयका सद्भाव है । अथवा (स्याद्वादियोके) प्रतिषेधकी - सर्वथा एकान्तके व्यवच्छेदकी - युक्ति सामर्थ्यसे ही घटित होजाती है-क्योकि ‘स्यात्’ पदका आश्रय लिये बिना कोई भी स्याद्वादी नही बनता और न स्यात्कारके प्रयोग बिना अनेकान्तकी सिद्धि ही घटित होती है, जैसे कि एवकारके प्रयोग बिना सम्यक् एकान्तकी सिद्धि नही होती । अतः स्याद्वादी होना ही इस बातको सूचित करता है कि उसका आशय प्रतिपदके साथ ‘स्यात्’ शब्दके प्रयोगका है, भले ही उसके द्वारा प्रयुक्त हुए प्रतिपदके साथमे ‘स्यात्’ शब्द लगा हुआ न हो, यही उसके पद-प्रयोगकी सामर्थ्य है ।’ (इसके शिवाय, “सदेव सर्व को नेच्छेत् स्वरूपादिचतुष्टयात्” इस प्रकारके वाक्यमे ‘स्यात्’ पदका अप्रयोग है, ऐसा नही समझना चाहिये, क्योकि ‘स्वरूपादि चतुष्टयात्’ इस वचनसे स्यात्कारके अर्थकी उसी प्रकार प्रतिपत्ति होती है जिस प्रकार कि ‘कथञ्चित् सदेवेष्ट’ इस वाक्यमें ‘कथञ्चित्’ वचनसे स्यात्पदका प्रयोग जाना जाता है। इसी प्रकार लोकमे ‘घट आनय’ (घडा लाओ ) इत्यादि वाक्यो मे जो ‘स्यात’ शब्दका अप्रयोग है वह उसी प्रतिज्ञाशयको लेकर सिद्ध है ।) ‘इस तरह हे जिन-नाग ! - जिनोमे श्रेष्ठ श्रीवीर भगवन् ! आपकी (नागदृष्टिसम अनेकान्त) दृष्टि दूसरोके - सर्वथा एकान्तवादियोके द्वारा अप्रधृष्य है - अबाधितविषया है - और साथ ही परधर्षिणी भी है - दूसरे भावैकान्तादि-वादियोंकी दृष्टिकी धर्षणा (तिरस्कृति) करनेवाली है - उनके सर्वथा एकान्तरूपसे मान्य सिद्धान्तोको बाधा पहुँचानेवाली है ।’
विधिर्निषेधोऽनभिलाप्यता च
त्रिरेकशस्त्रिद्विश एक एव ।
त्रयो विकल्पास्तव सप्तधाऽमी
स्याच्छब्द-नेयाः सकलेऽर्थभेदे ॥४५॥
अर्थ: ‘विधि, निषेध और अनभिलाप्यता - स्याद्रूपमेव, स्यान्नास्त्येव, स्यादवक्तव्यमेव - ये एक-एक करके ( पदके ) तीन मूल विकल्प हैं । इनके विपक्षभूत धर्मकी संधि-संयोजनारूपसे द्विसंयोगज विकल्प तीन - स्यादस्ति-नास्त्येव, स्यादस्त्यवक्तव्यमेव, स्यान्नास्त्यवक्तव्यमेव - होते हैं और त्रिसंयोगज विकल्प एक - स्यादस्ति-नास्त्यवक्तव्यमेव - ही होता है । इस तरहसे ये सात विकल्प हे वीर जिन ! सम्पूर्ण अर्थभेदमे - अशेष जीवादिस्तत्त्वार्थ-पर्यायोमे, न कि किसी एक पर्यायमे - आपके यहाँ ( आपके शासनमे ) घटित होते हैं, दूसरोके यहाँ नही - क्योकि “प्रतिपर्याय सप्तभङ्गी” यह आपके शासनका वचन है, दूसरे सर्वथा एकान्तवादियोके शासनमे वह बनता ही नही । और ये सब विकल्प ‘स्यात्’ शब्दके द्वारा नेय हैं - नेतृत्वको प्राप्त हैं - अर्थात् एक विकल्पके साथ स्यात् शब्दका प्रयोग होनेसे शेष छहों विकल्प उसके द्वारा गृहीत होते हैं, उनके पुन. प्रयोगकी जरूरत नहीं रहती, क्योकि स्यात्पदके साथमे रहनेसे उनके अर्थविषयमे विवादका अभाव होता है । जहाँ कहीं विवाद हो वहाँ उनके क्रमश: प्रयोगमे भी कोई दोष नही है, क्योकि एक प्रतिपाद्यके भी सप्त प्रकारकी विप्रतिपत्तियोका सद्भाव होता है - उतने ही सशय उत्पन्न होते हैं, उतनी ही जिज्ञासाओकी उत्पत्ति होती है और उतने ही प्रश्नवचनो ( सवालो ) की प्रवृत्ति होती है । और ‘प्रश्नके वशसे एक वस्तुमे अविरोधरूपसे विधि-निषेधकी जो कल्पना है उसीका नाम सप्तभङ्गी है’ । अत. नाना प्रतिपाद्यजनोकी तरह एक प्रतिपाद्यजनके लिये भी प्रतिपादन करनेवालोका सप्त-विकल्पात्मक वचन विरुद्ध नही ठहरता है ।’
स्यादित्यपि स्याद्गुण-मुख्य-कल्पै-
कान्तो यथोपाधि-विशेष-वीक्ष्यः ।
तत्त्वं त्वनेकान्तमशेषरूपं
द्विधा भवार्थ-व्यवहारवत्त्वात् ॥४६॥
अर्थ: ‘स्यात्’ (शब्द) भी गुण और मुख्य स्वभावोंके द्वारा कल्पित किये हुए एकान्तोंको लिये हुए होता है-नयोंके आदेशसे । अर्थात् शुद्ध द्रव्यार्थिकनयकी प्रधानतासे अस्तित्व एकान्त मुख्य है, शेष नास्तित्वादि-एकान्त गौण हैं, क्योंकि प्रधानभावसे वे विवक्षित नही होते और न उनका निराकरण ही किया जाता है । इसके सिवाय ऐसा अस्तित्व, गधेके सींगकी तरह असम्भव है जो नास्तित्वादि धर्मोंकी अपेक्षा नही रखता । ‘स्यात्’ शब्द प्रधान तथा गौणरूपसे ही उनका द्योतन करता है-जिस पद अथवा धर्मके साथ वह प्रयुक्त होता है उसे प्रधान और शेष पदान्तरो अथवा धर्मोंको गौण बतलाता है, यह उसकी शक्ति है । व्यवहार नयके आदेश ( प्राधान्य ) से नास्तित्वादि-एकान्त मुख्य हैं और अस्तित्व-एकान्त गौण है, क्योंकि प्रधानरूपसे वह तब विवक्षित नही होता और न उसका निराकरण ही किया जाता है, अस्तित्वका सर्वथा निराकरण करनेपर नास्तित्वादि धर्म बनते भी नही, जैसे कछुवेके रोम । नास्तित्वादि धर्मोंके द्वारा अपेक्ष्यमान जो वस्तुका अस्तित्व धर्म है वह ‘स्यात्’ शब्दके द्वारा द्योतन किया जाता है । इस तरह ‘स्यात्’ नामका निपात प्रधान और गौणरूपसे जो कल्पना करता है वह शुद्ध (सापेक्ष) नयके आदेशरूप सम्यक् एकान्तसे करता है, अन्यथा नहीं-क्योंकि वह यथोपाधि-विशेषणानुसार-विशेषका-धर्म-भेद अथवा धर्मान्तरका-द्योतक होता है, जिसका वस्तुमे सद्भाव पाया जाता है ।’ (यहाँपर किसीको यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि जीवादि तत्त्व भी तब प्रधान गौणरूप एकान्तको प्राप्त होजाता है, क्योकि) तत्त्व तो अनेकान्त है-अनेकान्तात्मक है-और वह अनेकान्त भी अनेकान्तरूप है, एकान्तरूप नही, एकान्त तो उसे नयकी अपेक्षासे कहा जाता है, प्रमाणकी अपेक्षासे नही, क्योकि प्रमाण सकलरूप होता है-विकलरूप नही, विकलरूप तत्त्वका एकदेश कहलाता है जो कि नयका विषय है और इसीसे सकलरूप तत्त्व प्रमाणका विषय है। कहा भी है–‘सकलादेशः प्रमाणाधीनः, विकलादेशो नयाधीनः ।’
‘और वह तत्त्व दो प्रकारसे व्यवस्थित है-एक भवार्थवान् होनेसे द्रव्यरूप, जिसे सद्द्रव्य तथा विधि भी कहते हैं, और दूसरा व्यवहारवान् होनेसे पर्यायरूप, जिसे असद्द्रव्य, गुण तथा प्रतिषेध भी कहते है। इनसे भिन्न उसका दूसरा कोई प्रकार नही है, जो कुछ है वह सब इन्हीं दो भेदोंके अन्तर्भूत है।’
न द्रव्य-पर्याय-पृथग्-व्यवस्था
द्वैयात्म्यमेकार्पणया विरुद्धम् ।
धर्मी च धर्मश्च मिथस्त्रिधेमौ
न सर्वथा तेऽभिमतौ विरुद्धौ ॥४७॥
अर्थ: सर्वथा द्रव्यकी (‘द्रव्यमेव’ इस द्रव्यमात्रात्मक एकान्तकी) कोई व्यवस्था नही बनती-क्योंकि सम्पूर्ण पर्यायोंसे रहित द्रव्यमात्रतत्त्व प्रमाणका विषय नहीं है-प्रत्यक्षादि किसी भी प्रमाणसे वह सिद्ध नही होता अथवा जाना नहीं जासकता, न सर्वथा पर्यायकी (‘पर्याय’ एव-एक मात्र पर्याय ही-इस एकान्त सिद्धान्तकी) कोई व्यवस्था बनती है-क्योंकि द्रव्य एकान्तकी तरह द्रव्यसे रहित पर्यायमात्र तत्त्व भी किसी प्रमाणका विषय नहीं है, और न सर्वथा पृथग्भूत-परस्परनिरपेक्ष-द्रव्य-पर्याय (दोनों) की ही कोई व्यवस्था बनती है-क्योंकि उसमे भी प्रमाणाभाव की दृष्टिसे कोई विशेष नही है, वह भी सकल प्रमाणोंके अगोचर है।’
‘(द्रव्यमात्रकी, पर्यायमात्रकी तथा पृथग्भूतद्रव्य-पर्यायमात्रकी व्यवस्था न बन सकनेसे ) यदि सर्वथा द्वयात्मक एक तत्त्व माना जाय तो यह सर्वथा द्वैयात्म्य एककी अर्पणाके साथ विरुद्ध पडता है-सर्वथा एकत्त्वके साथ द्वयात्मकता बनती ही नही-क्योंकि जो द्रव्यकी प्रतीतिका हेतु है और जो पर्यायकी प्रतीतिक़ा निमित्त है वे दोनो यदि परस्परमें भिन्नात्मा हैं तो कैसे तदात्मक एक तत्त्व व्यवस्थित होता है ? नही होता, क्योंकि अभिन्नका भिन्नात्माओंके साथ एकत्वका विरोध है। जब वे दोनो आत्माएँ एकसे अभिन्न हैं तब भी एक ही अवस्थित होता है, क्योकि सर्वथा एकसे अभिन्न उन दोनोके एकत्वकी सिद्धि होती है, न कि द्वैतात्म्य (द्वयात्मकता) की, जो कि एकत्वके विरुद्ध है। कौन ऐसा अमूढ (समझदार) है जो प्रमाणको अङ्गीकार करता हुआ सर्वथा एक वस्तुके दो भिन्न आत्माओंकी अर्पणा–विवक्षा करे ?–मूढके सिवाय दूसरा कोई भी नही कर सकता। अत. द्वयात्मक तत्त्व सर्वथा एकारर्पणाके–एक तत्त्वकी मान्यताके–साथ विरुद्ध ही है, ऐसा मानना चाहिये ।’
‘(किन्तु हे वीर जिन !) आपके मतमें–स्याद्वादशासनमे–ये धर्मी (द्रव्य) और धर्म (पर्याय) दोनों असर्वथारूपसे तीन प्रकार–भिन्न, अभिन्न तथा भिन्नाऽभिन्न–माने गये हैं और (इसलिये) सर्वथा विरुद्ध नहीं हैं।-क्योकि सर्वथारूपसे तीन प्रकार माने जानेपर भी ये प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे विरुद्ध ठहरते हैं और विरुद्धरूपमें आपको अभिमत नहीं हैं। अतः स्यात्पदात्मक वाक्य न तो धर्ममात्रका प्रतिपादन करता है, न धर्मीमात्रका, न धर्म-धर्मी दोनोको सर्वथा अभिन्न प्रतिपादन करता है, न सर्वथा भिन्न और न सर्वथा भिन्नाऽभिन्न । क्योकि ये सब प्रतीतिके विरुद्ध है। और इससे द्रव्य-एकान्तकी, पर्याय-एकान्तकी तथा परस्परनिरपेक्ष पृथग्भूत द्रव्य-पर्याय-एकान्तकी व्यवस्थाके न बन सकनेका समर्थन होता है। द्रव्यादिके सर्वथा एकान्तमें युक्त्यनुशासन घटित नहीं होता ।’
दृष्टाऽऽगमाभ्यामविरुद्धमर्थ-
प्ररूपणं युक्त्यनुशासनं ते ।
प्रतिक्षणं स्थित्युदय-व्ययात्म-
तत्त्व-व्यवस्थं यदिहाऽर्थरूपम् ॥४८॥
अर्थ: ‘प्रत्यक्ष और आगमसे अविरोधरूप-अबाधित-विषयस्वरूप-अर्थका जो अर्थसे प्ररूपण है-अन्यथानुपपत्त्येकलक्षण साधनरूप अर्थसे साध्यरूप अर्थका प्रतिपादन है-उसे युक्त्यनुशासन-युक्ति-वचन-कहते हैं और वही (हे वीर भगवान् !) आपको अभिमत है।’ ‘(यहाँ आपके ही मतानुसार युक्त्यनुशासनका एक उदाहरण दिया जाता है और वह यह है कि) अर्थका रूप प्रतिक्षण (प्रत्येक समय मे) ‘स्थिति (ध्रौव्य) उदय (उत्पाद) और व्यय (नाश) रूप तत्त्व-व्यवस्थाको लिये हुए है, क्योकि वह सत् है।’
नानात्मतामप्रजहत्तदेक-
मेकात्मतामप्रजहच्च नाना ।
अङ्गाङ्गि-भावात्तव वस्तु तद्यत्
क्रमेण वाग्वाच्यमनन्तरूपम् ॥४६॥
अर्थ: ‘( हे वीर जिन ! ) आपके शासनमे जो ( जीवादि ) वस्तु एक है ( सत्वरूप एकत्व-प्रत्यभिज्ञानका विषय होनेसे ) वह ( समीचीन नाना ज्ञानका विषय होनेसे ) नानात्मता ( अनेकरूपता ) का त्याग न करती हुई ही वस्तुतत्त्वको प्राप्त होती है-जो नानात्मताका त्याग करती है वह वस्तु ही नही, जैसे दूसरोके द्वारा परिकल्पित ब्रह्माद्वैत आदि । ( इसी तरह ) जो वस्तु ( अबाधित नानाज्ञानका विषय होनेसे ) नानात्मक प्रसिद्ध है वह एकात्मताको न छोड़ती हुई ही आपके मतमें वस्तुत्वरूपसे अभिमत है-अन्यथा उसके वस्तुत्व नही बनता, जैसे कि दूसरोके द्वारा अभिमत निरन्वय नानाक्षणरूप वस्तु । अतः जीवादिपदार्थ-समूह परस्पर एक दूसरेका त्याग न करनेसे एक-अनेक-स्वभावरूप है, क्योकि वस्तुत्वकी अन्यथा उपपत्ति बनती ही नहीं’ यह युक्त्यनुशासन है । '( इस प्रकारकी वस्तु वचनके द्वारा कैसे कही जा सकती है ? ऐसी शङ्का नही करनी चाहिए, क्योकि ) वस्तु जो अनन्तरूप है वह अङ्ग-अङ्गीभावके कारण-गुण-मुख्यकी विवक्षाको लेकर-क्रमसे वचन-गोचर है-युगपत् नही, युगपत् ( एक साथ ) एक रूपसे और अनेक-रूपसे वस्तु वचनके द्वारा कही ही नही जाती; क्योंकि वैसी वाणीका असंभव है-वचनमें वैसी शक्ति ही नही है । और इस तरह क्रमसे प्रवर्तमान वचन वस्तुरूप-सत्य-होता है उसके असत्यत्वका प्रसङ्ग नही आता, क्योकि उसकी अपने नानात्व और एकत्वविषयमें अङ्ग-अङ्गीभावसे प्रवृत्ति होती है। जैसे ‘स्यादेकमेव वस्तु’ इस वचनके द्वारा प्रधानभावसे एकत्व वाच्य है और गौणरूपसे अनेकत्व, ‘स्यादनेकमेव वस्तु’ इस वचनके द्वारा प्रधानभावसे अनेकत्व और गौणरूपसे एकत्व वाच्य है। इस तरह एकत्व और अनेकत्वके वचनके कैसे असत्यता होसकती है ? नही होसकती है। प्रत्युत इसके, सर्वथा एकत्वके वचन-द्वारा अनेकत्वका निराकरण होता है और अनेकत्वका निराकरण होनेपर उसके अविनाभावी एकत्वके भी निराकरणका प्रसङ्ग उपस्थित होनेसे असत्यत्वकी परिप्राप्ति अभीष्ट ठहरती है, क्योकि वैसी उपलब्धि नही है। और सर्वथा अनेकत्वके वचनद्वारा एकत्वका निराकरण होता है और एकत्वका निराकरण होनेपर उसके अविनाभावी अनेकत्वके भी निराकरणका प्रसग उपस्थित होनेसे सत्यत्वका विरोध होता है। और इसलिये अनन्त धर्मरूप जो वस्तु है उसे अग-अंगी ( अप्रधान-प्रधान ) भावके कारण क्रमसे वाग्वाच्य ( वचनगोचर ) समझना चाहिये ।’
मिथोऽनपेक्षाः पुरुषार्थ-हेतु-
र्नांशा न चांशी पृथगस्ति तेभ्यः ।
परस्परेक्षाः पुरुषार्थ-हेतु-
र्दृष्टा नयास्तद्वदसि-क्रियायाम् ॥५०॥
अर्थ: ‘ ( वस्तुको अनन्तधर्मविशिष्ट मानकर यदि यह कहा जाय कि वे धर्म परस्पर-निरपेक्ष ही हैं और धर्मी उनसे पृथक् ही है तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि ) जो अंश-धर्म अथवा वस्तुके अवयव-परस्पर-निरपेक्ष हैं वे पुरुषार्थके हेतु नहीं हो सकते, क्योकि उस रूपमें उपलभ्यमान नहीं हैं-जो जिस रूपमें उपलभ्यमान नहीं वह उस रूपमे व्यवस्थित भी नहीं होता, जैसे अग्नि शीतताके साथ उपलभ्यमान नहीं है तो वह शीततारूपमें व्यवस्थित भी नहीं होती । परस्परनिरपेक्ष सत्त्वादिक धर्म अथवा अवयव पुरुषार्थहेतुतारूपसे उपलभ्यमान नहीं हैं, अतः पुरुषार्थताहेतुरूपमे व्यवस्थित नही होते । यह युक्त्यनुशासन प्रत्यक्ष और आगमसे अविरुद्ध है ।’ ‘जो अंश-धर्म परस्पर-सापेक्ष हैं वे पुरुषार्थके हेतु हैं, क्योंकि उस रूपमें देखे जाते हैं-जो जिस रूपमें देखे जाते हैं वे उसी रूपमें व्यवस्थित होते हैं, जैसे दहन ( अग्नि ) दहनताके रूपमें देखी जाती है और इसलिये तद्रूपमे व्यवस्थित होती है, परस्परसापेक्ष अंशः स्वभावतः पुरुषार्थहेतुतारूपसे देखे जाते हैं और इसलिये पुरुषार्थहेतुरूपसे व्यवस्थित हैं। यह स्वभावकी उपलब्धि है ।’ ‘( इसी तरह ) अं’शी-धर्मी अथवा अवयवी-अं’शोंसे-धर्मो अथवा अवयवोंसे-पृथक् नहीं है, क्योंकि उसरूपमें उपलभ्यमान नहीं है-जो जिस रूपमें उपलभ्यमान नही वह उसमें नास्तिरूप ही है, जैसे अग्नि शीततारूपसे उपलभ्यमान नही है अतः शीततारूपसे उसका अभाव है । अंशोंसे अंशीका पृथक् होना सर्वदा अनुपलभ्यमान है अतः अंशोंसे पृथक् अंशीका अभाव है । यह स्वभावकी अनुपलब्धि है । इसमे प्रत्यक्षतः कोई विरोध नही है, क्योकि परस्पर विभिन्न पदार्थौं सह्याचल-विन्ध्याचलादि जैसोके अंश-अंशीभावका दर्शन नहीं होता । आगम-विरोध भी इसमें नहीं है, क्योंकि परस्पर विभिन्न अर्थोंके अंश-अंशीभावका प्रतिपादन करनेवाले आगमका अभाव है, और जो आगम परस्पर विभिन्न पदार्थोंके अंश-अंशीभावका प्रतिपादक है वह युक्ति-विरुद्ध होनेसे आगमाभास सिद्ध है ।’ 'अंश-अं’शीकी तरह परस्परसापेक्ष नय-नैगमादिक-भी ( सत्तालक्षणा ) असिक्रियामें पुरुषार्थके हेतु हैं, क्योंकि उस रूपमें देखे जाते हैं-उपलभ्यमान हैं।-इससे स्थितिग्राहक द्रव्यार्थिकनयके भेद नैगम, संग्रह, व्यवहार और प्रतिक्षण उत्पाद-व्ययके ग्राहक पर्यायार्थिकनयके भेद ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ, एवभूत ये सब परस्परमें सापेक्ष होते हुए ही वस्तुका जो साध्य अर्थक्रिया-लक्षणा-पुरुषार्थ है उसके निर्णयके हेतु हैं-अन्यथा नहीं । इस प्रकार प्रत्यक्ष और आगमसे अविरोधरूप जो अर्थका प्ररूपण सद्रूप है वह सब प्रतिक्षण ध्रौव्योत्पाद-व्ययात्मक है, अन्यथा सत्पना बनता ही नहीं । इस प्रकार युक्त्यनुशासनको उदाहृत जानना चाहिये ।’
एकान्त-धर्माऽभिनिवेश-मूला
रागादयोऽहंकृतिजा जनानाम् ।
एकान्त-हानाच्च स यत्तदेव
स्वाभाविकत्वाच्च समं मनस्ते ॥५१॥
अर्थ: ‘( जिन लोगोंका ऐसा ख्याल है कि जीवादि वस्तुका अनेकान्तात्मक-रूपसे निश्चय होनेपर स्वात्माकी तरह परात्मामें भी राग होता है-दोनोमे कथंचित् अभेदके कारण, तथा परात्माकी तरह स्वात्मामे भी द्वेष होता है-दोनोमे कथंचित् भेदके कारण, और राग-द्वेषके कार्य ईर्ष्या, असूया, मद, मायादिक दोष प्रवृत्त होते हैं, जो कि ससारके कारण हैं, सकल विक्षोभके निमित्तभूत है तथा स्वर्गाऽपवर्गके प्रतिबन्धक है । और वे दोष प्रवृत्त होकर मनके समत्वका निराकरण करते हैं-उसे अपनी स्वाभाविक स्थितिमे स्थित न रहने देकर विषम-स्थितिमें पटक देते हैं-, मनके समत्वका निराकरण समाधिको रोकता है, जिससे समाधि हेतुक निर्वाण किसीके नहीं बन सकता । और इसलिये जिनका यह कहना है कि ‘मोक्षके कारण समाधिरूप मनके समत्वकी इच्छा रखनेवालेको चाहिये कि वह जीवादि वस्तुको अनेकान्तात्मक न माने’ वह भी ठीक नहीं है, क्योकि) वे राग द्वेषादिक-जो मनकी समताका निराकरण करते हैं-एकान्तधर्माभिनिवेश-मूलक होते हैं-एकान्त-रूपसे निश्चय किये हुए (नित्यत्वादि) धर्ममें अभिनिवेश-मिथ्याश्रद्धान१ उनका मूलकारण होता है-और (मोही-मिथ्यादृष्टि) जीवोंकी अहंकृतिसे-अहंकार तथा उसके साथी ममकारसे२-वे उत्पन्न होते हैं । अर्थात् उन अहंकार-ममकार भावोसे ही उनकी उत्पत्ति है जो मिथ्यादर्शनरूप मोह-राजाके सहकारी हैं-मन्त्री हैं३, अन्यसे नहीं-दूसरे अहंकार-ममकारके भाव उन्हे जन्म देनेमे असमर्थ हैं । और (सम्यग्दृष्टि-जीवोके ) एकान्तकी हानि से-एकान्तधर्माभिनिवेशरूप मिथ्यादर्शनके अभावसे-वह एकान्ताभिनिवेश उसी अनेकान्तके निश्चयरूप सम्यग्दर्शनत्वको धारण करता है जो आत्माका वास्तविक रूप है, क्योंकि एकान्ताभिनिवेशका जो अभाव है वही उसके विरोधी अनेकान्तके निश्चयरूप सम्यग्दर्शनका सद्भाव है । और चूँकि यह एकान्ताभिनिवेशका अभावरूप सम्यग्दर्शन आत्माका स्वाभाविक रूप है अतः( हे वीर भगवान् ! ) आपके यहाँ-आपके युक्त्यनुशासनमे-( सम्यग्दृष्टिके ) मनका समत्व ठीक घटित होता है । वास्तवमे दर्शनमोहके उदयरूप मूलकारणके होते हुए चारित्रमोहके उदयमे जो रागादिक उत्पन्न होते हैं वे ही जीवोके अस्वाभाविक परिणाम हैं, क्योकि वे औदयिक भाव हैं । और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप जो परिणाम दर्शनमोहके नाश, चारित्रमोहकी उदयहानि और रागादिके अभावसे होते हैं वे आत्मरूप होनेसे जीवोके स्वाभाविक परिणाम है-किन्तु पारिणामिक नही, क्योकि पारिणामिक भाव कर्मोंके उपशमादिकी अपेक्षा नही रखते । ऐसी स्थितिमे असंयत सम्यग्दृष्टिके भी स्वानुरूप मनःसाम्यकी अपेक्षा मनका सम होना बनता है, क्योकि उसके संयमका सर्वथा अभाव नहीं होता । अतः अनेकान्तरूप युक्त्यनुशासन रागादिकका निमित्तकारण नहीं, वह तो मनकी समताका निमित्तभूत है ।
प्रमुच्यते च प्रतिपक्ष-दूषी
जिन ! त्वदीयैः पटुसिंहनादैः ।
एकस्य नानात्मतया ज्ञ-वृत्ते-
स्तौ बन्ध-मोक्षौ स्वमताद्बाह्यौ ॥५२॥
अर्थ: ‘(यदि यह कहा जाय कि अनेकान्तवादीका भी अनेकान्तमें राग और सर्वथा एकान्तमें द्वेष होनेसे उसका मन सम कैसे रह सकता है, जिससे मोक्ष बन सके ? मोक्षके अभावमे बन्धकी कल्पना भी नहीं बनती । अथवा मनका सदा सम रहना माननेपर बन्ध नहीं बनता और बन्धके अभावमे मोक्ष घटित नहीं हो सकता, जो कि बन्धपूर्वक होता है । अतः बन्ध और मोक्ष दोनो ही अनेकान्तवादीके स्वमतसे बाह्य ठहरते हैं-मनकी समता और असमता दोनो ही स्थितियोमे उनकी उपपत्ति नहीं बन सकती-तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि ) जो प्रतिपक्षदूषी है-प्रतिद्वन्द्वीका सर्वथा निराकरण करनेवाला एकान्ताग्रही है-वह तो हे वीर जिन ! आप (अनेकान्तवादी) के एकाऽनेकरूपता जैसे पटुसिंहनादोंसे-निश्चयात्मक एव सिंहगर्जनाकी तरह अबाध्य ऐसे युक्ति शास्त्राविरोधी आगमवाक्योंके प्रयोगद्वारा-प्रमुक्त ही किया जाता है-वस्तुतत्त्वका विवेक कराकर अतत्त्वरूप एकान्ताग्रहसे उसे मुक्ति दिलाई जाती है-क्योंकि प्रत्येक वस्तु नानात्मक है, उसका नानात्मकरूपसे निश्चय ही सर्वथा एकान्तका प्रमोचन है । ऐसी दशामे अनेकान्तवादीका एकान्तवादीके साथ कोई द्वेष नहीं हो सकता, और चूँकि वह प्रतिपक्षका भी स्वीकार करनेवाला होता है इसलिये स्वपक्षमें उसका सर्वथा राग भी नहीं बन सकता । वास्तवमें तत्त्वका निश्चय ही राग नहीं होता । यदि तत्त्वका निश्चय ही राग होवे तो क्षीणमोहीके भी रागका प्रसग आएगा, जोकि असम्भव है, और न अतत्त्वके व्यवच्छेदको ही द्वेष प्रतिपादित किया जा सकता है, जिसके कारण अनेकान्तवादीका मन सम न रहे। अतः अनेकान्तवादीके मनकी समताके निमित्तसे होनेवाले मोक्षका निषेध कैसे किया जा सकता है ? और मनका समत्व सर्वत्र और सदाकाल नहीं बनता, जिससे राग-द्वेषके अभावसे बन्धके अभावका प्रसग आवे, क्योंकि गुणस्थानोंकी अपेक्षासे किसी तरह, कहींपर और किसी समय कुछ पुण्यबन्धकी उपपत्ति पाई जाती है। अतः बन्ध और मोक्ष दोनों अपने (अनेकान्त) मतसे–जोकि अनन्तात्मक तत्त्व विषयको लिये हुए हैं–बाह्य नहीं हैं–उसीमे वस्तुतः उनका सद्भाव है–क्योंकि बन्ध और मोक्ष दोनों ज्ञवृत्ति हैं–अनेकान्तवादियोद्वारा स्वीकृत ज्ञाता आत्मामे ही उनकी प्रवृत्ति है। और इसलिये सांख्योंद्वारा स्वीकृत प्रधान (प्रकृति) के अनेकान्तात्मक होनेपर भी उसमें वे दोनो घटित नही हो सकते, क्योकि प्रधान (प्रकृति) के अज्ञता होती है–वह ज्ञाता नहीं माना गया है।’
आत्मान्तराऽभाव-समानता न
वागास्पदं स्वाऽऽश्रय-भेद-हीना ।
भावस्य सामान्य-विशेषवत्त्वा-
द्वैक्ये तयोरन्यतरन्निरात्म ॥५३॥
अर्थ: ’ (यदि यह कहा जाय कि एकके नानात्मक अर्थके प्रतिपादक शब्द पटुसिंहनाद प्रसिद्ध नही हैं, क्योंकि बौद्धोके अन्याऽपोहरूप जो सामान्य है उसके वागास्पदता-वचनगोचरता-है, और वचनोंके वस्तु-विषयत्वका असम्भव है, तो यह कहना ठीक नही है, क्योकि) आत्मान्तरके अभावरूप–आत्मस्वभावसे भिन्न अन्य-अन्य स्वभावके अपोहरूप–जो समानता (सामान्य) अपने आश्रयरूप भेदोंसे हीन (रहित) है वह वागास्पद–वचनगोचर–नहीं होती, क्योकि वस्तु सामान्य और विशेष दोनो धर्मोंको लिये हुए है।’ ‘( यदि यह कहा जाय कि पदार्थके सामान्य-विशेषवान् होने पर भी सामान्यके ही वागास्पदता यु है, क्योकि विशेष उसीका आत्मा है, और इस तरह दोनोकी एकरूपता मानी जाय, तो ) सामान्य और विशेष दोनोंकी एकरूपता स्वीकार करनेपर एकके निरात्म ( अभाव ) होनेपर दूसरा भी ( अविनाभावी होनेके कारण ) निरात्म ( अभावरूप ) हो जाता है-और इस तरह किसीका भी अस्तित्व नहीं बन सकता, अतः दोनोकी एकता नहीं मानी जानी चाहिए ।’
अमेयमश्लिष्टममेयमेव
भेदेऽपि तद्वृत्त्यपवृत्तिभावात् ।
वृत्तिश्च कृत्स्नांश-विकल्पतो न
मानं च नाऽनन्त-समाश्रयस्य ॥५४॥
अर्थ: ‘( यदि यह कहा जाय कि आत्मान्तराभावरूप-अन्यापोहरूप-सामान्य वागास्पद नहीं है, क्योकि वह अवस्तु है, बल्कि वह सर्वगत सामान्य ही वागास्पद है जो विशेषोसे अश्लिष्ट है-किसी भी प्रकारके भेदको साथमे लिये हुए नहीं है-तो ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योकि ) जो अमेय है-नियत देश, काल और आकारकी दृष्टिसे जिसका कोई अन्दाजा नही लगाया जासकता-और अश्लिष्ट है-किसी भी प्रकार के विशेष ( भेद ) को साथमें लिये हुए नही है-वह (सर्वव्यापी, नित्य, निराकाररूप सत्त्वादि ) सामान्य अमेय-अप्रमेय ही है-किसी भी प्रमाणसे जाना नहीं जासकता । भेदके मानने पर भी-सामान्यको स्वाश्रयभूत द्रव्यादिकोके साथ भेदरूप स्वीकार करने पर भी-सामान्य प्रमेय नहीं होता, क्योंकि उन द्रव्यादिकोंमें उसकी वृत्तिकी अपवृत्ति ( व्यावृत्ति ) का सद्भाव है-सामान्यकी वृत्ति उनमे मानी नहीं गई है, और जब तक सामान्यकी अपने आश्रयभूत द्रव्यादिकोमें वृत्ति नहीं है तब तक दोनोका संयोग, कुण्डीमे बेरोके समान ही होसकता है, क्योंकि सामान्यके अद्रव्यपना है तथा संयोगका अनाश्रयपना है और संयोगके द्रव्याश्रयपना है । ऐसी हालतमे सामान्यकी द्रव्यादिकमे वृत्ति नहीं बन सकती ।’ ‘यदि सामान्यको द्रव्यादिवस्तुके साथ वृत्ति मानी भी जाय तो वह वृत्ति भी न तो सामान्यको कृत्स्न ( निरंश ) विकल्परूप मानकर बनती है और न अशविकल्परूप ।-क्योंकि अशकल्पना-से रहित कृत्स्न विकल्परूप सामान्यकी देश और कालसे भिन्न व्यक्तियोमे युगपद्वृत्ति सिद्ध नहीं की जासकती । उससे अनेक सामान्यकी मान्यताका प्रसग आता है, जो उक्त सिद्धान्तमान्यताके साथ माने नहीं गये है, क्योंकि एक तथा अनंशरूप सामान्यका उन सबके साथ युगपत् योग नहीं बनता । यदि यह कहा जाय कि सामान्य भिन्न देश और कालके व्यक्तियोके साथ युगपत् सम्बन्धवान् है, क्योंकि वह सर्वगत, नित्य और अमूर्त है, जैसे कि आकाश, तो यह अनुमान भी ठीक नहीं है । इससे एक तो साधन इष्टका विघातक हो जाता है अर्थात् जिस प्रकार वह भिन्न देश-कालके व्यक्तियाके साथ सम्बन्धिनपनको सिद्ध करता है उसी प्रकार वह सामान्यके आकाशकी तरह साशपनको भी सिद्ध करता है जोकि इष्ट नहीं है, क्योकि सामान्यको निरंश माना गया है । दूसरे, सामान्यके निरंश होनेपर उसका युगपत् सर्वगत होना उसी प्रकार विरुद्ध पड़ता है जिस प्रकार कि एक परमाणुका युगपत् सर्वगत होना विरुद्ध है, और इससे उक्त हेतु (साधन) असिद्ध है तथा असिद्ध-हेतुके कारण कृत्स्नविकल्परूप ( निरंश ) सामान्यका सर्वगत होना प्रमाणसिद्ध नहीं ठहरता ।’ '(यदि यह कहा जाय कि सत्तारूप महासामान्य तो पूरा सर्वगत सिद्ध ही है, क्योंकि वह सर्वत्र सत्प्रत्ययका हेतु है, तो यह ठीक नहीं है, कारण ? ) जो अनन्त व्यक्तियोंके समाश्रयरूप है उस एक (सत्ता-महासामान्य ) के ग्राहक प्रमाणका अभाव है-क्योंकि अनन्त सद्-व्यक्तियोके ग्रहण विना उसके विषयमे युगपत् सत् इस ज्ञानकी उत्पत्ति असर्वज्ञो ( छद्मस्थो ) के नहीं बन सकती, जिससे सर्वत्र सत्प्रत्ययहेतुत्वकी सिद्धि हो सके । सर्वत्र सत्प्रत्यय- हेतुत्वकी सिद्धि न होनेपर अनन्त समाश्रयी सामान्यका उक्त अनुमान प्रमाण नही हो सकता । और इसलिये यह सिद्ध हुआ कि कृत्स्नविकल्पी सामान्यकी द्रव्यादिकोंमें वृत्ति सामान्यबहुत्वका प्रसङ्ग उपस्थित होनेके कारण नही बन सकती । यदि सामान्यकी अनन्त स्वाश्रयोंमे देशतः युगपद् वृत्ति मानी जाय तो वह भी इसीसे दूषित होजाता है, क्योकि उसका ग्राहक भी कोई प्रमाण नही है । साथ ही सामान्यके सप्रदेशत्वका प्रसङ्ग आता है, जिसे अपने उस सिद्धान्तका विरोध होनेसे जिसमे सामान्यको निरंश माना गया है, स्वीकार नही किया जा सकता । और इसलिये अप्रमेयरूप एक सामान्य किसी भी प्रमाणसे सिद्ध न होनेके कारण अप्रमेय ही है-अप्रामाणिक है ।’
नाना-सदेकात्म-समाश्रयं चेद्-
अन्यत्वमद्विष्ठमनात्मनोः क्व ।
विकल्प-शून्यत्वमवस्तुतश्चेत्
तस्मिन्नमेये क्व खलु प्रमाणम् ॥५५॥
अर्थ: ‘नाना सतों-सत्पदार्थोंका-विविध द्रव्य-गुण-कर्मोंका-एक आत्मा-एक स्वभावरूप व्यक्तित्व, जैसे सदात्मा, द्रव्यात्मा, गुणात्मा अथवा कर्मात्मा-ही जिसका समाश्रय है ऐसा सामान्य यदि (सामान्य-वादियोके द्वारा ) माना जाय और उसे ही प्रमाणका विषय बतलाया जाय-अर्थात् यह कहा जाय कि सत्तासामान्यका समाश्रय एक सदात्मा, द्रव्यत्व-सामान्यका समाश्रय एक द्रव्यात्मा, गुणत्वसामान्यका समाश्रय एक गुणात्मा अथवा कर्मत्व-सामान्यका समाश्रय एक कर्मात्मा जो अपनी क सद्व्यक्ति, द्रव्यव्यक्ति, गुणव्यक्ति अथवा कर्मव्यक्तिके प्रतिभासकालमें प्रमाणसे प्रतीत होता है वही उससे भिन्न द्वितीयादि व्यक्तियोंके प्रतिभास-कालमें भी अभिव्यक्तताको प्राप्त होता है और जिससे उसके एक सत् अथवा एक द्रव्यादि-स्वभावकी प्रतीति होती है, इतने मात्र आश्रयरूप सामान्यके ग्रहणका निमित्त मौजूद है अतः वह प्रमाण है, उसके अप्रमाणता नही है, क्योंकि अप्रमाणता अनन्तस्वभावके समाश्रयरूप सामान्यके घटित होती है-तो ऐसी मान्यतावाले सामान्यवादियोंसे यह प्रश्न होता है कि उनका वह सामान्य अपने व्यक्तियोंसे अन्य ( भिन्न ) है या अनन्य ( अभिन्न ) ? यदि वह एक स्वभावके आश्रयरूप सामान्य अपने व्यक्तियोंसे सर्वथा अन्य ( भिन्न ) है तो (उन व्यक्तियोके प्रागभावकी तरह असदात्मकत्व, अद्रव्यत्व, अगुणत्व अथवा अकर्मत्वका प्रसग आएगा और व्यक्तियोंके असदात्मकत्व, अद्रव्यत्व, अगुणत्व अथवा अकर्मत्व-रूप होनेपर सत्तासामान्य, द्रव्यत्वसामान्य, गुणत्वसामान्य अथवा कर्मत्वसामान्य भी व्यक्तित्वविहीन होनेसे अभावमात्रकी तरह असत् ठहरेगा, और इस तरह-) व्यक्तियों तथा सामान्य दोनोंके ही अनात्मा-अस्तित्वविहीन होनेपर वह अन्यत्वगुण किसमे रहेगा जिसे अद्विष्ठ- एकमे रहने वाला-माना गया है ? किसीमें भी उसका रहना नही बन सकता और इसलिए अपने व्यक्तियोसे सर्वथा अन्यरूप सामान्य व्यवस्थित नहीं होता ।’
( यदि वह सामान्य व्यक्तियोसे सर्वथा अनन्य (अभिन्न ) है तो वह अनन्यत्व भी व्यवस्थित नही होता, क्योकि सामान्यके व्यक्तिमे प्रवेश कर जानेपर व्यक्ति ही रह जाती है-सामान्यकी कोई अलग सत्ता नहीं रहती और सामान्यके अभावमे उस व्यक्तिकी सभावना नही बनती इसलिए वह अनात्मा ठहरती है, व्यक्तिका अनात्मत्व ( अनस्तित्व ) होनेपर सामान्यके भी अनात्मत्वका प्रसग आता है और इस तरह व्यक्ति तथा सामान्य दोनों ही अनात्मा ( अस्तित्व-विहीन ) ठहरते हैं, तब अनन्यत्व-गुणकी योजना किसमे की जाय, जिसे द्विष्ठ ( दोनोमे रहने वाला ) माना गया है ? किसीमे भी उसकी योजना नही बन सकती । और इसके द्वारा सर्वथा अन्य-अनन्यरूप उभय-एकान्तका भी निरसन हो जाता है, क्योकि उसकी मान्यतापर दोनो प्रकारके दोषोका प्रसग आता है । )
‘यदि सामान्यको ( वस्तुभूत न मान कर ) अवस्तु ( अन्याऽपोह-रूप ) ही इष्ट किया जाय और उसे विकल्पोंसे शून्य माना जाय- यह कहा जाय कि उसमे खरविषाणकी तरह अन्यत्व-अनन्यत्वादिके विकल्प ही नही बनते और इसलिए विकल्प उठाकर जो दोष दिये गये है उनके लिए अवकाश नही रहता-तो उस अवस्तुरूप सामान्यके प्रमेय होनेपर प्रमाणकी प्रवृत्ति कहाँ होती है ? अप्रमेय होनेसे वह सामान्य प्रत्यक्षादि किसी भी प्रमाणका विषय नही रहता और इसलिए उसकी कोई व्यवस्था नहीं बन सकती ।’ ( इस तरह दूसरोके यहाँ प्रमाणाभावके कारण किसी भी सामान्-यकी व्यवस्था नहीं बन सकती । )
व्यावृत्ति-हीनाऽन्वयतो न सिद्ध्येद्
विपर्ययेऽप्यद्वितयेऽपि साध्यम् ।
अतद्व्युदासाऽभिनिवेश-वादः
पराऽभ्युपेताऽर्थ-विरोध-वादः ॥५६॥
अर्थ: ‘यदि साध्यको-सत्तारूप परसामान्य अथवा द्रव्यत्वादिरूप अपर सामान्यका-व्यावृत्तिहीन अन्वयसे-असत्की अथवा अद्रव्यत्वादिकी व्यावृत्ति ( जुदायगी ) के बिना केवल सत्तादिरूप अन्वय-हेतुसे-सिद्ध माना जाय तो वह सिद्ध नही होता-क्योंकि विपक्षकी व्यावृत्तिके बिना सत्-असत् अथवा द्रव्यत्व अद्रव्यत्वादिरूप साधनोके सकरसे सिद्धिका प्रसग आता है और यह कहना नही बन सकता कि जो सदादिरूप अनुवृत्ति (अन्वय ) है वही असदादिकी व्यावृत्ति है, क्योकि अनुवृत्ति ( अन्वय ) भाव-स्वभावरूप और व्यावृत्ति अभाव-स्वभावरूप है और दोनोमे भेद माना गया है । यह भी नही कहा जा सकता कि सदादिके अन्वयपर असदादिककी व्यावृत्ति सामर्थ्यसे ही हो जाती है, क्योकि तब यह कहना नही बनता कि ‘व्यावृत्तिहीन अन्वयसे उस साध्यकी सिद्धि होती है’-सामर्थ्यसे असदादिककी व्यावृत्तिको सिद्ध माननेपर तो यही कहना होगा कि वह अन्वयरूप हेतु असदादिकी व्यावृत्तिसहित है, उसीसे सत्ता- मान्यकी अथवा द्रव्यत्वादि-सामान्यकी सिद्धि होती है। और इसीलिए उस सामान्यके सामान्य-विशेषाख्यत्वकी व्यवस्थापना होती है।’
‘यदि इसके विपरीत अन्वयहीन व्यावृत्तिसे साध्य जो सामान्य उसको सिद्ध माना जाय तो वह भी नही बनता-क्योंकि सर्वथा अन्वयरहित अतद्व्यावृत्ति-प्रत्ययसे अन्यापोहकी सिद्धि होनेपर भी उसकी विधिकी असिद्धि होनेसे-उस अर्थक्रियारूप साध्यकी सिद्धिके अभावसे-उसमे प्रवृत्तिका विरोध होता है-वह नही बनती। और यह कहना भी नही बनता कि दृश्य और विकल्प दोनोके एकत्वाऽध्यवसायसे प्रवृत्तिके होनेपर साध्यकी सिद्धि होती है, क्योकि दृश्य और विकल्पका एकत्वाध्यवसाय असम्भव है। दर्शन उस एकत्वका अध्यवसाय नही करता, क्योकि विकल्प उसका विषय नहीं है। दर्शनकी पीठपर होनेवाला विकल्प भी उस एकत्वका अध्यवसाय नही करता, क्योकि दृश्य विकल्पका विषय नही है और दोनोको विषय करनेवाला कोई ज्ञानान्तर सम्भव नही है, जिससे उनका एकत्वाध्यवसाय हो सके और एकत्वाध्यवसायके कारण अन्वयहीन व्यावृत्तिमात्रसे अन्यापोहरूप सामान्यकी सिद्धि बन सके। इस तरह स्वलक्षणरूप साध्यकी सिद्धि नही बनती।’
‘यदि यह कहा जाय कि अन्वय और व्यावृत्ति दोनोंसे हीन जो अद्वितयरूप हेतु है उससे सन्मात्रका प्रतिभासन होनेसे सत्ताद्वैतरूप सामान्यकी सिद्धि होती है, तो यह कहना ठीक नही है, क्योकि सर्वथा अद्वितयकी मान्यतापर साध्य-साधनकी भेदसिद्धि नहीं बनती और भेदकी सिद्धि न होनेपर साधनसे-साध्यकी सिद्धि नही बनती और साधनसे साध्यकी सिद्धिके न होनेपर अद्वितय-हेतु विरुद्ध पडता है।’
'यदि अद्वितयको संवित्तिमात्रके रूपमे मानकर असाधनव्यावृत्तिसे साधनको और असाध्यव्यावृत्तिसे साध्यको अतद्व्युदासाभिनिवेशवादके रूपमें आश्रित किया जाय तब भी (बौद्धोके मत में) पराभ्युपेतार्थके विरोधवादका प्रसङ्ग आता है, अर्थात् बौद्धोके द्वारा संवेदनावैतरूप जो अर्थ पराभ्युपगत है वह अतद्व्युदासाभिनिवेशवादसे-अतद्व्यावृत्तिमात्र आग्रहवचनरूपसे-विरुद्ध पड़ता है, क्योंकि किसी असाधन तथा असाध्यके अर्थाभावमे उनकी अव्यावृत्तिसे साध्य-साधन-व्यवहारकी उपपत्ति नही बनती और उनको अर्थ माननेपर प्रतिक्षेपका योग्यपना न होनेसे द्वैतकी सिद्धि होती है । इस तरह बौद्धोके पूर्वाभ्युपेत अर्थके विरोधवादका प्रसङ्ग आता है ’ ‘(यदि यह कहा जाय कि ‘साधनके बिना साध्यकी स्वय सिद्धि नहीं होती’ इस वाक्यके अनुसार संवेदनाद्वैतकी भी सिद्धि नही होती तो मत हो, परन्तु शून्यरूप सर्वका अभाव तो विचारबलसे प्राप्त हो जाता है, उसका परिहार नहीं किया जा सकता अतः उसे ही मानना चाहिये’ तो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ) हे वीर अर्हन् ! आपके मतमें अभाव भी वस्तुधर्म होता है-बाह्य तथा आभ्यन्तर वस्तुके असम्भव होनेपर सर्व-शून्यरूप तदभाव सम्भव नहीं हो सकता, क्योंकि स्वधर्मीके असम्भव होनेपर किसी भी धर्मकी प्रतीति नहीं बन सकती । अभावधर्मकी जब प्रतीति है तो उसका काई धर्मी (बाह्य-आभ्यन्तर पदार्थ) होना ही चाहिये, और इस लिये सर्वशून्यता घटित नहीं हो सकती । सर्व ही नहीं तो सर्व-शून्यता कैसी ? तत् ही नहीं तो तदभाव कैसा ? अथवा भाव ही नहीं तो अभाव किसका ? इसके सिवाय, यदि वह अभाव स्वरूपसे है तो उसके वस्तुधर्म-त्वकी सिद्धि है, क्योकि स्वरूपका नाम ही वस्तुधर्म है। अनेक धर्मोमेंसे किसी धर्मके अभाव होनेपर वह अभाव धर्मान्तर ही होता है और जो धर्मान्तर होता है वह कैसे वस्तुधर्म सिद्ध नहीं हाता ? होता ही है । यदि वह अभाव स्वरूपसे नहीं है तो वह अभाव ही नहीं है, क्योंकि अभावका अभाव हानेपर भावका विधान होता है । और यदि वह अभाव (धर्मका अभाव न होकर) धर्मीका अभाव है तो वह भावकी तरह भावान्तर होता है-जैसे कि कुम्भका जो अभाव है वह भूभाग है और वह भावान्तर (दूसरा पदार्थ) ही है, यौगमतकी मान्यताके अनुसार सकल-शक्ति-विरहरूप तुच्छ नहीं है । सारांश यह कि अभाव यदि धर्मका है तो वह धर्मकी तरह धर्मान्तर होनेसे वस्तुधर्म है और यदि वह धर्मीका है तो वह भावकी तरह भावान्तर (दूसरा धर्मी) होनेसे स्वयं दूसरी वस्तु है-उसे सकलशक्ति-शून्य तुच्छ नहीं कह सकते । और इस सबका कारण यह है कि अभावको प्रमाणसे जाना जाता है, व्यपदिष्ट किया जाता है और वस्तु-व्यवस्थाके अङ्गरूपमें निर्दिष्ट किया जाता है ।” (यदि धर्म अथवा धर्मीके अभावको किसी प्रमाणसे नहीं जाना जाता ता वह कैसे व्यवस्थित होता है ? नही होता । यदि किसी प्रमाणसे जाना जाता है तो वह धर्म-धर्मीके स्वभाव-भावकी तरह वस्तु-धर्म अथवा भावान्तर हुआ । और यदि वह अभाव व्यपदेशको प्राप्त नही होता तो कैसे उसका प्रतिपादन किया जाता है ? उसका प्रतिपादन नही बनता । यदि व्यपदेशका प्राप्त होता है तो वह वस्तुधर्म अथवा वस्त्वन्तर ठहरा, अन्यथा उसका व्यपदेश नही बन सकता । इसी तरह वह अभाव यदि वस्तु-व्यवस्थाका अंग नही तो उसकी कल्पनासे क्या नतीजा ? ‘घटमें पटादिका अभाव है’ इस प्रकार पटादिके परिहार-द्वारा अभावको घट-व्यवस्थाका कारण परिकल्पित किया जाता है, अन्यथा वस्तुमें सङ्कर दोषोंका प्रसग आता है-एक वस्तुको अन्य वस्तुरूप भी कहा जा सकता है, जिससे वस्तुकी कोई व्यवस्था नहीं रहती-अतः अभाव वस्तु-व्यवस्थाका अंग है और इस लिये भावकी तरह वस्तुधर्म है । )
‘जो अभाव-तत्त्व (सर्वशून्यता) वस्तु-व्यवस्थाका अङ्ग नहीं है वह (भाव-एकान्तकी तरह) अमेय (अप्रमेय) ही है-किसी भी प्रमाणके गोचर नहीं है ।’
(इस तरह दूसरोके द्वारा परिकल्पित वस्तुरूप या अवस्तुरूप सामान्य जिस प्रकार वाक्यका अर्थ नही बनता उसी प्रकार व्यक्तिमात्र परस्पर-निरपेक्ष उभयरूप सामान्य भी वाक्यका अर्थ नही बनता, क्योकि वह सामान्य अमेय है-सम्पूर्ण प्रमाणोंके विषयसे अतीत है अर्थात् किसी भी प्रमाणसे उसे जाना नहीं जा सकता । )
अनात्मनाऽनात्मगतेरयुक्ति-
र्वस्तुन्ययुक्तैर्यदि पक्ष-सिद्धिः ।
अवस्तुयुक्तैः प्रतिपक्ष-सिद्धिः
न च स्वयं साधन-रिक्त-सिद्धिः ॥५७॥
अर्थ: ‘(यदि बौद्धोकी तरफसे यह कहा जाय कि वे साधनको अनात्मक मानते हैं, वास्तविक नहीं और साध्य भी वास्तविक नही है, क्योकि वह संवृत्तिके द्वारा कल्पिताकाररूप है, अतः पराभ्युपेतार्थके विरोधवादका प्रसङ्ग नहीं आता है, तो ऐसा कहना ठीक नही है; (क्योंकि) अनात्मा-निःस्वभाव संवृत्तिरूप तथा असाधनकी व्यावृत्तिमात्ररूप-साधनके द्वारा उसी प्रकारके अनात्मसाध्यकी जो गति-प्रतिपत्ति (जानकारी) है उसकी सर्वथा अयुक्ति-अयोजना है-वह बनती ही नही ।’; यदि (संवेदनाद्वैतरूप) वस्तुमें अनात्मसाधनके द्वारा अनात्म-साध्यकी गतिकी अयुक्तिसे पक्षकी सिद्धि मानी जाय-अर्थात् संवेदनाद्वैतवादियोके द्वारा यह कहा जाय कि साध्य-साधनभावसे शून्य संवेदन-मात्रके पक्षपनेसे ही हमारे यहाँ तत्त्वसिद्धि है, तो (विकल्पिताकार) अवस्तुमें साधन-साध्यकी अयुक्तिसे प्रतिपक्षकी-द्वैतकी-भी सिद्धि ठहरती है । अवस्तुरूप साधन अद्वैततत्त्वरूप साध्यको सिद्ध नहीं करता है, क्योंकि ऐसा होनेसे अतिप्रसंग आता है-विपक्षकी भी सिद्धि ठहरती है ।’ ‘और यदि साधनके बिना स्वतः ही संवेदनाद्वैतरूप साध्यकी सिद्धि मानी जाय तो वह युक्त नही है-क्योकि तब पुरुषाद्वैतकी भी स्वय सिद्धिका प्रसग आता है, उसमे किसी भी बौद्धको विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती ।’
निशायितस्तैः परशुः परघ्नः
स्वमूर्ध्नि निर्भेद-भयाऽनभिज्ञैः ।
वैतण्डिकैर्यैः कुसृतिः प्रणीता
मुने ! भवच्छासन-दृक्-प्रमूढैः ॥५८॥
अर्थ: (इस तरह) हे वीर भगवन् ! जिन वैतण्डिकोंने-परपक्षके दूषणको प्रधानता अथवा एकमात्र धुनको लिए हुए संवेदनाद्वैतवादियोने-कुसृतिका-कुत्सिता गति-प्रतीतिका-प्रणयन किया है उन आपके (स्याद्वाद) शासनकी दृष्टिसे प्रमूढ एव निर्भेदके भयसे अनभिज्ञ जनोंने (दर्शनमोहके उदयसे आक्रान्त होनेके कारण) परघातक परशु-कुल्हाड़ेको अपने ही मस्तकपर मारा है !! अर्थात् जिस प्रकार दूसरेके घातके लिये उठाया हुआ कुल्हाड़ा यदि अपने ही मस्तकपर पड़ता है तो अपने मस्तकका विदारण करता है और उसको उठाकर चलानेवाले अपने घातके भयसे अनभिज्ञ कहलाते हैं उसी प्रकार परपक्षका निराकरण करने वाले वैतण्डिकोंके द्वारा दर्शनमोहके उदयसे आक्रान्त होनेके कारण जिस न्यायका प्रणयन किया गया है वह अपने पक्षका भी निराकरण करता है और इसलिये उन्हे भी स्वपक्षघातके भयसे अनभिज्ञ एव दृक्प्रमूढ समझना चाहिये ।’
भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मो
भावान्तरं भाववदर्हतस्ते ।
प्रमीयते च व्यपदिश्यते च
वस्तु-व्यवस्थाऽङ्गममेयमन्यत् ॥५६॥
विशेष-सामान्य-विभक्त-भेद-
विधि-व्यवच्छेद-विधायि-वाक्यम् ।
अभेद-बुद्धेरविशिष्टता स्याद्
व्यावृत्तिबुद्धेश्च विशिष्टता ते ॥६०॥
अर्थ: ‘वाक्य (वस्तुतः) विशेष (विसदृश परिणाम) और सामान्य (सदृश परिणाम) को लिये हुए जो (द्रव्यपर्यायकी अथवा द्रव्य-गुण-कर्मकी व्यक्तिरूप) भेद हैं उनके विधि और प्रतिषेध दोनोंका विधायक होता है ।-जैसे ‘घट लाओ’ यह वाक्य जिस प्रकार घटके लानेरूप विधिक्रा विधायक (प्रतिपादक) है उसी प्रकार अघटके न लानेरूप प्रतिषेधका भी विधायक है, अन्यथा उसके विधानार्थ वाक्यान्तरके प्रयोगका प्रसंग आता है और उस वाक्यान्तरके भी तत्प्रतिषेधविधायी न होनेपर फिर दूसरे वाक्यके प्रयोगकी जरूरत उपस्थित होती है और इस तरह वाक्यान्तरके प्रयोगकी कहीं भी समाप्ति न बन सकनेसे अनवस्था दोषका प्रसंग आता है, जिससे कभी भी घटके लानेरूप विधिकी प्रतिपत्ति नही बन सकती । अतः जो वाक्य प्रधानभावसे विधिका प्रतिपादक है वह गौणरूपसे प्रतिषेधका भी प्रतिपादक है और जो मुख्यरूपसे प्रतिषेधका प्रतिपादक है वह गौण-रूपसे विधिका भी प्रतिपादक है, ऐसा प्रतिपादन करना चाहिये ।
(हे वीर जिन !) आपके यहाँ-आपके स्याद्वाद-शासनमें-(जिस प्रकार) अभेदबुद्धिसे (द्रव्यत्वादि व्यक्तिकी) अविशिष्टता (समानता) होती है (उसी प्रकार) व्यावृत्ति ( भेद ) बुद्धिसे विशिष्टताकी प्राप्ति होती है ।’
सर्वान्तवत्तद्गुण-मुख्य-कल्पं
मर्वान्तशून्यं च मिथोऽनपेक्षम् ।
सर्वाऽऽपदामन्तकरं निरन्तं
सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव ॥६१॥
अर्थ: • ‘(हे वीर भगवन् !) आपका तीर्थ-प्रवचनरूप शासन, अर्थात् परमागमवाक्य, जिसके द्वारा ससार-महासमुद्रको तिरा जाता है-सर्वान्तवान् है-सामान्य-विशेष, द्रव्य-पर्याय, विधि-निषेध, एक-अनेक, आदि अशेष धर्मोंको लिये हुए है-और गौण तथा मुख्यकी कल्पनाको साथमें लिये हुए है-एक धर्म मुख्य है तो दूसरा धर्म गौण है, इसीसे सुव्यवस्थित है, उसमें असंगतता अथवा विरोधके लिये कोई अवकाश नहीं है। जो शासन-वाक्य धर्मोंमें पारस्परिक अपेक्षाका प्रतिपादन नहीं करता-उन्हें सर्वथा निरपेक्ष बतलाता है-वह सर्वधर्मोंसे शून्य है-उसमें किसी भी धर्मका अस्तित्व नहीं बन सकता और न उसके द्वारा पदार्थ-व्यवस्था ही ठीक बैठ सकती है। अत आपका ही यह शासनतीर्थ सर्व-दुःखोंका अन्त करनेवाला है, यही निरन्त है-किसी भी मिथ्यादर्शनके द्वारा खंडनीय नहीं है-और यही सब प्राणियोंके अभ्युदयका कारण तथा आत्माके पूर्ण अभ्युदय (विकास) का साधक ऐसा सर्वोदय-तीर्थ है।’
कामं द्विषन्नप्युपपत्तिचक्षुः
समीक्ष्यतां ते समदृष्टिरिष्टम् ।
त्वयि ध्रुवं खण्डित-मान-शृङ्गो
भवत्यभद्रोऽपि समन्तभद्रः ॥६२॥
अर्थ: (हे वीर जिन !) आपके इष्ट-शासनसे यथेष्ट अथवा भरपेट द्वेष रखनेवाला मनुष्य भी, यदि समदृष्टि (मध्यस्थवृत्ति) हुआ, उपपत्ति-चक्षुसे-मात्सर्यके त्यागपूर्वक युक्तिसङ्गत समाधानकी दृष्टिसे-- आपके इष्टका-शासनका-अवलोकन और परीक्षण करता है तो अवश्य ही उसका मानशृङ्ग खंडित होजाता है-सर्वथा एकान्तरूप मिथ्यामतका आग्रह छूट जाता है-और वह अभद्र अथवा मिथ्यादृष्टि होता हुआ भी सब ओरसे भद्ररूप एवं सम्यग्दृष्टि बन जाता है । अथवा यो कहिये कि आपके शासनतीर्थका उपासक और अनुयायी हो जाता है।।’
न रागान्नः स्तोत्रं भवति भव-पाश-च्छिदि मुनौ
न चाऽन्येषु द्वेषादपगुण-कथाऽभ्यास-खलता ।
किमु न्यायाऽन्याय-प्रकृत-गुणदोषज्ञ-मनसां
हिताऽन्वेषोपायस्तव गुण-कथा-सङ्ग-गदितः ॥६३॥
अर्थ: ‘(हे वीर भगवन् !) हमारा यह स्तोत्र आप-जैसे भव-पाश-च्छेदक मुनिके प्रति रागभावसे नहीं है, न हो सकता है-क्योंकि इधर तो हम परीक्षा-प्रधानी हैं और उधर आपने भव-पाशको छेदकर संसारसे अपना सम्बन्ध ही अलग कर लिया है; ऐसी हालतमें आपके व्यक्तित्वके प्रति हमारा राग-भाव इस स्तोत्रकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं हो सकता । दूसरोंके प्रति द्वेषभावसे भी इस स्तोत्रका कोई सम्बन्ध नहीं है-क्योंकि एकान्तवादियोंके साथ अर्थात् उनके व्यक्तित्वके प्रति हमारा कोई द्वेष नही है-हम तो दुर्गुणोंकी कथाके अभ्यासको खलता समझते हैं और उस प्रकारका अभ्यास न होनेसे वह ‘खलता’ हममे नही है, और इसलिये दूसरोंके प्रति द्वेषभाव भी इस स्तोत्रकी उत्पत्तिका कारण नहीं हो सकता । तब फिर इसका हेतु अथवा उद्देश ? उद्देश यही है कि जो लोग न्याय-अन्यायको पहचानना चाहते हैं और प्रकृत पदार्थके गुण-दोषोंको जाननेकी जिनकी इच्छा है उनके लिये यह स्तोत्र ‘हितान्वेषणाके उपायस्वरूप’ आपकी गुणकथाके साथ कहा गया है । इसके सिवाय, जिस भवपाशको आपने छेद दिया है उसे छेदना अपने और दूसरोंके संसारबन्धनोंको तोडना-हमे भी इष्ट है और इस लिये यह प्रयोजन भी इस स्तोत्रकी उत्पत्तिका एक हेतु है । इस तरह यह स्तात्र श्रद्धा और गुणज्ञताकी अभिव्यक्ति के साथ लोक-हितकी दृष्टिको लिये हुए है ।’
इति स्तुत्यः स्तुत्यैस्त्रिदश-मुनि-मुख्यैः प्रणिहितैः
स्तुतः शक्त्या श्रेयःपदमधिगस्त्वं जिन ! मया ।
'महावीरो वीरो दुरित-पर-सेनाऽभिविजये
विधेया मे भक्तिं पथि भवत एवाऽप्रतिनिधौ ॥६४॥
अर्थ: ‘हे वीर जिनेन्द्र ! आप चूंकि दुरितपरकी-मोहादिरूप कर्मशत्रुओं-की-सेनाको पूर्णरूपसे पराजित करनेमें वीर हैं-वीर्यातिशयको प्राप्त है-, निःश्रेयस पदको अधिगत (स्वाधीन) करनेसे महावीर हैं और देवेन्द्रों तथा मुनीन्द्रों (गणधरदेवादिको ) जैसे स्वयं स्तुत्योंके द्वारा एकाग्रमनसे स्तुत्य हैं, इसीसे मेरे-मुझ परीक्षाप्रधानीके-द्वारा शक्ति-के अनुरूप स्तुति किये गये हैं । अत ‘अपने ही मार्गमे-अपने द्वारा अनुष्ठित एव प्रतिपादित सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र-रूप मोक्षमार्गमें, जो प्रतिनिधिरहित है-अन्ययोगव्यवच्छेदरूपसे निर्णीत है अर्थात् दूसरा कोई भी मार्ग जिसके जोडका अथवा जिसके स्थानपर प्रतिष्ठित होनेके योग्य नहीं है-मेरी भक्तिको सविशेष रूपसे चरितार्थ करो-आपके मार्ग-की अमोघता और उससे अभिमत फलकी सिद्धिको देखकर मेरा अनुराग (भक्तिभाव) उसके प्रति उत्तरोत्तर बढे जिससे मैं भी उसी मार्गकी आराधना-साधना करता हुआ कर्मशत्रुओंकी सेनाको जीतनेमें समर्थ होऊँ और निःश्रेयस (मोक्ष) पदको प्राप्त करके सफल मनोरथ हो सकूँ । क्योकि सच्ची सविवेक-भक्ति ही मार्गका अनुसरण करनेमे परम सहायक होती है और जिसकी स्तुति की जाती है उसके मार्गका अनुसरण करना अथवा उसके अनुकूल चलना ही स्तुतिको सार्थक करता है, इसीसे स्तोत्रके अन्तमें ऐसी फलप्राप्तिकी प्रार्थना अथवा भावना की गई है ।’