युक्त्यनुशासन (आचार्य समन्तभद्र), हिन्दी अनुवाद सहित | Yuktyanushasan (Acharya Samantabhadra)

युक्त्यनुशासन (आचार्य समन्तभद्र), हिन्दी अनुवाद सहित

रचयिता: स्वामी समन्तभद्राचार्य
हिन्दी अनुवाद: पं॰ जुगलकिशोर मुख्तार “युगवीर”
प्रकाशक: वीर सेवा मन्दिर, सरसावा (सहारनपुर)
संस्करण: प्रथम, १९५१

भगवान् महावीर की स्तुति के रूप में युक्तियों से जिनशासन की स्थापना करने वाला ग्रन्थ। मूल कारिकाएँ हिन्दी अनुवाद सहित, कारिकाओं की अकारादि सूची के साथ।

Yuktyanushasan of Swami Samantabhadra: a hymn to Bhagwan Mahavir that establishes the Jain shasan through reasoning, with Hindi translation by Pt. Jugalkishore Mukhtar Yugveer.


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हर कारिका अलग, उसके नीचे उसका अर्थ, इसी ग्रन्थ के PDF से ज्यों का त्यों (स्कैन से टंकित, मिलान बाकी)।

युक्त्यनुशासन (भाग 1/2)

कीर्त्या महत्या भुवि वर्द्धमानं
त्वां वर्द्धमानं स्तुति-गोचरत्वम् ।
निनीषवः स्मो वयमद्य वीरं
विशीर्ण-दोषाऽऽशय-पाश-बन्धम् ॥१॥

अर्थ: 'हे वीरजिन !-इस युगके अन्तिम तीर्थप्रवर्त्तक परमदेव !-आप दोषों और दोषाऽऽशयोंके पाश-बन्धनसे विमुक्त हुए हैं-आपने अज्ञान-अदर्शन-राग-द्वेष-काम-क्रोधादि-विकारों अर्थात् विभावपरिणामरूप भावकर्मों और इन दोषात्मक भावकर्मोंके सस्कारक कारणों अर्थात् ज्ञानावरणा-र्शनावरण-मोहनीय-अन्तरायरूप द्रव्यकर्मोंके जालको छिन्न-भिन्न कर स्वतन्त्रता प्राप्त की है-, आप निश्चितरूपसे ऋद्धमान (प्रवृद्धप्रमाण) हैं–आपका तत्त्वज्ञानरूप प्रमाण (केवलज्ञान) स्याद्वाद-नयसे संस्कृत होनेके कारण प्रवृद्ध है अर्थात् सर्वोत्कृष्ट एव अबाध्य है–और (इस प्रवृद्धप्रमाणके कारण) आप महती कीर्तिसे भूमण्डलपर वर्द्धमान है–जीवादितत्त्वार्थोका कीर्तन (सम्यग्दर्शन) करनेवाली युक्ति-शास्त्राऽविरोधिनी दिव्यवाणीसे साक्षात् समवसरणकी भूमिपर तथा परम्परासे परमागमकी विषयभूत सारी पृथ्वीपर छोटे-बडे, ऊँच-नीच, निकटवर्ती-दूरवर्ती तत्कालीन और उत्तरकालीन सभी पर-अपर परीक्षकजनोके मनोंका संशयादिके निरसनद्वारा पुष्ट एव व्याप्त करते हुए आप वृद्धि-व्याप्तिको प्राप्त हुए है–सदा सर्वत्र और सबके लिये ‘युक्ति-शास्त्राऽविरोधिवाक्’ के रूपमें अवस्थित है, यह बात परीक्षा-द्वारा सिद्ध हो चुकी है । ( अत. ) अब–परीक्षाऽवसानके समय अर्थात् ( आप्तमीमांसाके द्वारा ) युक्ति-शास्त्राऽविरोधिवाक्त्व हेतुसे परीक्षा करके यह निर्णय कर चुकनेपर कि आप विशीर्ण-दोषाशय-पाशबन्धत्वादि तीन असाधारण गुणों (कर्मभेत्तृत्व, सर्वज्ञत्व, परमहितोपदेशकत्व) से विशिष्ट हैं-आपको स्तुतिगोचर मानकर-स्तुतिका विषयभूत आप्तपुरुष स्वीकार करके-हम-परीक्षाप्रधानी मुमुक्षुजन-आपको अपनी स्तुतिका विषय बनाना चाहते हैं-आपकी स्तुति करनेमे प्रवृत्त होना चाहते है ।’


याथात्म्यमुल्लङ्घ्य गुणोदयाऽऽख्या
लोके स्तुतिर्भूरि-गुणोदधेस्ते ।
अणिष्ठमप्यंशमशक्नुवन्तो
वक्तुं जिन ! त्वां किमिव स्तुयाम ॥२॥

अर्थ: ‘यथार्थताका-यथावस्थित स्वभावका-उल्लङ्घन करके गुणोंके-चौरासी लाख गुणोंमेसे किसीके भी-उदय-उत्कर्षकी जो आख्या-कथनी है-बढा चढाकर कहनेकी पद्धति है-उसे लोकमे ‘स्तुति’ कहते है । परन्तु हे वीरजिन ! आप भूरिगुणोदधि हैं-अनन्तगुणोंके समुद्र है-और उस गुणसमुद्रके सूक्ष्मसे सूक्ष्म अ्रं शका भी हम ( पूरे- तौरसे ) कथन करनेके लिये समर्थ नहीं हैं-बढा-चढा कर कहनेकी तो बात ही दूर है । अत. वह स्तुति तो हमसे बन नहीं सकती, तब हम छद्मस्थजन ( कोई भी उपमान न देखते हुए ) किस तरहसे आपकी स्तुति करके स्तोता बने, यह कुछ समझमे नहीं आता ।‘’


तथाऽपि वैधृष्ट्यमुपेत्य भक्त्या
स्तोताऽस्मि ते शक्त्यनुरूपवाक्यः ।
इष्टे प्रमेयेऽपि यथास्वशक्ति
किन्नोत्सहन्ते पुरुषाः क्रियाभिः ॥३॥

अर्थ: ‘( यद्यपि हम छद्मस्थजन आपके छोटे-से-छोटे गुणका भी पूरा वर्णन करनेके लिये समर्थ नहीं हैं ) तो भी मैं भक्तिके वश धृष्टता धारण करके शक्तिके अनुरूप वाक्योंको लिये हुए आपका स्तोता बना हूँ-आपकी स्तुति करनेमे प्रवृत्त हुआ हूँ । किसी वस्तुके इष्ट होनेपर क्या पुरुषार्थीजन अपनी शक्तिके अनुसार क्रियाओ-प्रयत्नो-द्वारा उसकी प्राप्तिके लिये उत्साहित एव प्रवृत्त नहीं होते ?-होते ही है । तदनुसार ही मेरी यह प्रवृत्ति है-मुझे आपकी स्तुति इष्ट है ।’


त्वं शुद्धि-शक्त्योरुदयस्य काष्ठां
तुला-व्यतीतां जिन ! शान्तिरूपाम् ।
अवापिथ ब्रह्म-पथस्य नेता
महानितीयत् प्रतिवक्तुमीशाः ॥४॥

अर्थ: ‘हे वीरजिन ! आप ( अपनी साधनाद्वारा ) शुद्धि और शक्तिके उदय-उत्कर्षकी उस काष्ठाको-परमावस्था अथवा चरमसीमाको-प्राप्त हुए है जो उपमा-रहित है और शान्ति-सुख-स्वरूप है-आपमे ज्ञानावरण और दर्शनावरणरूप कर्ममलके क्षयसे अनुपमेय निर्मल ज्ञान-दर्शनका तथा अन्तरायकर्मके अभावसे अनन्तवीर्यका आविर्भाव हुआ है, और यह सब आत्म-विकास मोहनीयकर्मके पूर्णतः विनाश-पूर्वक होनेसे उस विनाशसे उत्पन्न होनेवाले परम शान्तिमय सुखको साथमे लिये हुए है। ( इसीसे ) आप ब्रह्मपथके-आत्मविकास-पद्धति अथवा मोक्ष-मार्गके-नेता हैं-अपने आदर्श एव उपदेशादि-द्वारा दूसरोको उस आत्मविकासके मार्गपर लगानेवाले हैं-और महान् है-पूज्य परमात्मा है-, इतना कहने अथवा दूसरोंको सिद्ध करके बतलानेके लिये हम समर्थ है ।’


कालः कलिर्वा कलुषाऽऽशयो वा
श्रोतुः प्रवक्तुर्वचनाऽनयो वा ।
त्वच्छासनैकाधिपतित्व-लक्ष्मी-
प्रभुत्व-शक्तेरपवाद-हेतुः ॥५॥

अर्थ: ‘( इस तरह आपके महान् होते हुए, हे वीरजिन ! ) आपके शासन-मे-अनेकान्तात्मक मतमे-( निःश्रेयस और अभ्युदयरूप लक्ष्मीकी प्राप्ति-का कारण होनेसे ) एकाधिपतित्वरूप लक्ष्मीका-सभी अर्थ-क्रियार्थि-जनोके द्वारा अवश्य आश्रयणीयरूप सम्पत्तिका-स्वामी होनेकी जो शक्ति है-आगमान्विता युक्तिके रूपमे सामर्थ्य है-उसके अपवादका-एकाधिपत्य प्राप्त न कर सकनेका-कारण ( वर्तमानमे ) एकतो कलि-काल है-जो कि साधारण बाह्य कारण है, दूसरा प्रवक्ताका वचनाऽ-नय है-आचार्यादि प्रवक्तृवर्गका प्राय. अप्रशस्त-निरपेक्ष नयके साथ वचनव्यवहार है अर्थात् सम्यक्नय-विवक्षाको लिये हुए उपदेशका न देना है-जो कि असाधारण बाह्य कारण है, और तीसरा श्रोताका-श्राव-कादि-श्रोतृवर्गका-कलुषित आशय है-दर्शनमोहसे प्राय आक्रान्त चित्त है-जोकि अन्तरग कारण है ।’


दया-दम-त्याग-समाधि-निष्ठं
नय-प्रमाण-प्रकृताऽऽञ्जसार्थम् ।
अधृष्यमन्यैरखिलैः प्रवादै-
र्जिन ! त्वदीयं मतमद्वितीयम् ॥६॥

अर्थ: ‘हे वीरजिन ! आपका मत–अनेकान्तात्मक शासन–दया ( अहिंसा ), दम ( सयम ), त्याग ( परिग्रह-त्यजन ) और समाधि ( प्रशस्तध्यान ) को निष्ठा-तत्परताको लिये हुए है-पूर्णत. अथवा देशत. प्राणिहिंसासे निवृत्ति तथा परोपकारमे प्रवृत्तिरूप वह दयाव्रत जिसमे असत्यादिसे विरक्तिरूप सत्यव्रतादिका अन्तर्भाव ( समावेश ) है, मनोज्ञ और अमनोज्ञ इन्द्रिय-विषयोमे राग-द्वेषकी निवृत्तिरूप सयम, बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रहोका स्वेच्छासे त्यजन अथवा दान, और धर्म तथा शुक्ल-ध्यानका अनुष्ठान, ये चारो उसके प्रधान लक्ष्य हैं। ( साथ ही) नयो तथा प्रमाणोके द्वारा ( असम्भवद्बाधकविषय-स्वरूप ) सम्यक् वस्तुतत्त्वको बिल्कुल स्पष्ट (सुनिश्चित) करनेवाला है और ( नेकान्तवादसे भिन्न) दूसरे सभी प्रवादोंसे अबाध्य है-दर्शनमोहोदयके वशीभूत हुए सर्वथा एकान्तवादियोके द्वारा प्रकल्पित वादोमेसे कोई भी वाद ( स्वभावसे मिथ्यावाद होनेके कारण ) उसके ( सम्यग्वादात्मक ) विषयको बाधित अथवा दूषित करनेके लिये समर्थ नही है-( यही सब उसकी विशेषता है और इसीलिये वह ) अद्वितीय है-अकेला ही सर्वाधिनायक होनेकी क्षमता रखता है।’


अभेद-भेदात्मकमर्थतत्त्वं
तव स्वतन्त्राऽन्यतरत्ख-पुष्पम् ।
अवृत्तिमत्वात्समवाय-वृत्तेः
संसर्गहानेः सकलाऽर्थ-हानिः ॥७॥

अर्थ: ( हे वीरभगवन् ! ) आपका अर्थतत्त्व-आपके द्वारा मान्य-प्रतिपादित अथवा आपके शासनमे वर्णित जीवादि वस्तुतत्त्व-अभेद-भेदा- त्मक है-परस्परतन्त्रता ( अपेक्षा, दृष्टिविशेष ) को लिये हुए अभेद और भेद दोनो रूप है अर्थात् कथञ्चित् द्रव्य पर्यायरूप, कथञ्चित् सामान्य-विशेषरूप, कथञ्चित् एकाऽनेकरूप और कथञ्चित् नित्याऽनित्यरूप है, न सर्वथा अभेदरूप ( द्रव्य, सामान्य, एक अथवा नित्यरूप ) है, न सर्वथा भेदरूप ( पर्याय, विशेष, अनेक अथवा अनित्यरूप ) है और न सर्वथा उभयरूप ( परस्परनिरपेक्ष द्रव्य-पर्यायमात्र, सामान्य-विशेषमात्र, एक-अनेकमात्र अथवा नित्य-अनित्यमात्र ) है । अभेदात्मकतत्त्व (द्रव्यादिक) और भेदात्मकतत्त्व ( पर्यायादिक ) दोनोको स्वतन्त्र-पारस्परिक तन्त्रतासे रहित सर्वथा निरपेक्ष-स्वीकार करनेपर प्रत्येक-द्रव्य, पर्याय तथा उभय, सामान्य, विशेष तथा उभय, एक, अनेक तथा उभय, और नित्य, अनित्य तथा उभय-आकाशके पुष्प-समान (अवस्तु) हो जाता है-प्रतीयमान ( प्रतीतिक विषय ) न हो सकनेसे किसीका भी तब अस्तित्व नही बनता ।’ विशेष और समवाय इन छहोंको-सर्वथा स्वतन्त्र मानकर यह कहा जाय कि समवाय-वृत्तिसे शेष सब पदार्थ वृत्तिमान् है अर्थात् समवाय नामके स्वतन्त्र पदार्थ-द्वारा वे सब परस्परमे सम्बन्धको प्राप्त है, तो ) समवायवृत्तिके अवृत्तिमती होनेसे-समवाय नामके स्वतन्त्र पदार्थका दूसरे पदार्थोंके साथ स्वयंका कोई सम्बन्ध न बन सकनेके कारण उसे स्वयं असम्बन्धवान् माननेसे-संसर्गकी हानि होती है-किसी भी पदार्थका सम्पर्क अथवा सम्बन्ध एक दूसरेके साथ नही बनता । समवाय-समवायिकी तरह असंस्पृष्ट पदार्थोंके समवायवृत्तिसे संसर्गकी कल्पना न करके, पदार्थोंके अन्योऽन्य-संसर्ग ( एक दूसरेके साथ सम्बन्ध ) को स्वभावसिद्ध माननेपर स्याद्वाद शासनका ही आश्रय होजाता है, क्योंकि स्वभावसे ही द्रव्यका सभी गुण-कर्म-सामान्य-विशेषोंके साथ कथञ्चित् तादात्म्यका अनुभव करने वाले ज्ञानविशेषके वशसे यह द्रव्य है, यह गुण है, यह कर्म है, यह सामान्य है, यह विशेष है और यह उनका अविश्वग्भावरूप (अपृथग्भूत ) समवाय-सम्बन्ध है, इस प्रकार भेद करके सन्नयनिबन्धन ( समीचीन नय-व्यवस्थाको लिये हुए ) व्यवहार प्रवर्तता है और उससे अनेकान्तमत प्रसिद्ध होता है, जो वैशेषिकोंको इष्ट नही है और इसलिये वैशेषिकोंके मतमे स्वभावसिद्ध संसर्गके भी न बन सकनेसे संसर्गकी हानि ही ठहरती है । और संसर्गकी हानि होनेसे-पदार्थोंका परस्परमे स्वतः (स्वभावसे) अथवा परतः (दूसरेके निमित्तसे ) कोई सम्बन्ध न बन सकनेके कारण-सम्पूर्ण पदार्थोंकी हानि ठहरती है-किसी भी पदार्थकी तब सत्ता अथवा व्यवस्था बन नहीं सकती ।-अतः जो लोग इस हानिको नहीं चाहते उन आस्तिकोंके द्वारा वही वस्तुतत्त्व समर्थनीय है जो अभेद-भेदात्मक है, परस्पर तन्त्र है, प्रतीतिक विषय है तथा अर्थक्रियामें समर्थ है और इसलिये जिसमे विरोधके लिये कोई अवकाश नही है । वह वस्तुतत्त्व हे वीरजिन ! आपके मतमें प्रतिष्ठित है, इसीसे आपका मत अद्वितीय है-नयो तथा प्रमाणोंके द्वारा वस्तुतत्त्वको बिल्कुल स्पष्ट करनेवाला और दूसरे सभी प्रवादो ( सर्वथा एकान्तवादो ) से अबाध्य होनेके कारण सुव्यवस्थित है-दूसरा (सर्वथा एकान्तवादका आश्रय लेनेवाला ) कोई भी मत व्यवस्थित न होने-से उसके जोडका, सानी अथवा समान नही है, वह अपना उदाहरण आप है ।


भावेषु नित्येषु विकारहाने-
र्न कारक-व्यापृत-कार्य-युक्तिः ।
न बन्ध-भोगौ न च तद्विमोक्षः
समन्तदोषं मतमन्यदीयम् ॥८॥

अर्थ: ‘सत्तात्मक पदार्थोंको-दिक्-काल-आकाश-आत्माको,-पृथिव्यादि-परमाणु-द्रव्योंका, परम-महत्त्वादि गुणोंको तथा सामान्य-विशेष-समवाय-को-( सर्वथा ) नित्य माननेपर उनमे विकारकी हानि होती है-कोई भी प्रकारकी विक्रिया नही बन सकती-विकारकी हानिसे कर्त्तादि कारकोंका ( जो क्रियाविशिष्ट द्रव्य प्रसिद्ध है उनका ) व्यापार नही बन सकता, कारक-व्यापारके अभावमे ( द्रव्य-गुण-कर्मरूप ) कार्य नही बन सकता, और कार्यके अभावमे ( कार्यलिङ्गात्मक अनुमानरूप तथा योग-सम्बन्ध-ससर्गरूप ) युक्ति घटित नही हो सकती । युक्तिके अभावमे बन्ध तथा ( बन्ध-फलानुभवनरूप ) भोग दोनों नहीं बन सकते और न उनका विमोक्ष ही बन सकता है,-क्योंकि विमोक्ष बन्धपूर्वक ही होता है, बन्धके अभावमे मोक्ष कैसा ? इस तरह पूर्व-पूर्वके अभावमे उत्तरोत्तरकी व्यवस्था न बन सकनेसे संपूर्ण भावात्मक पदार्थोंकी हानि ठहरती है-किसीकी भी व्यवस्था नहीं बन सकती । और जब भावात्मक पदार्थ ही व्यवस्थित नही होते तब प्रागभाव-प्रध्वंसाभावादि अभावात्मक पदार्थोंकी व्यवस्था तो कैसे बन सकती है ? क्योकि वे भावात्मक पदार्थोंके विशेषण होते है, स्वतन्त्ररूपसे उनकी कोई सत्ता ही नही है । अतः ( हे वीरजिन ! ) आपके मतसे भिन्न दूसरोंका-सर्वथा एकान्तवादी वैशेषिक, नैयायिक मीमासक तथा सांख्य आदिका-मत ( शासन) सब प्रकारसे दोषरूप है-देश, काल और पुरुषविशेषकी अपेक्षासे भी प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम गम्य सभी स्थानोमे बाधित है ।’


अहेतुकत्व-प्रथितः स्वभाव-
स्तस्मिन् क्रिया-कारक-विभ्रमः स्यात् ।
आबाल-सिद्धे विविधार्थ-सिद्धि-
र्वादान्तरं किं तदसूत तां ते ॥६॥

अर्थ: ‘(यदि यह कहा जाय कि आत्मादि नित्य द्रव्योमे स्वभावसे ही विकार सिद्ध है अतः कारकव्यापार, कार्य और कार्ययुक्ति सब ठीक घटित होते हैं, और इस तरह सकल दोष असंभव ठहरते हैं-कोई भी दोषापत्ति नही बन सकती, तब यह प्रश्न पैदा होता है कि वह स्वभाव बिना किसी हेतुके ही प्रथित (प्रसिद्ध) है अथवा आबाल-सिद्धिसे विविधार्थ-सिद्धिके रूपमे प्रथित है ? (उत्तरमे) यदि यह कहा जाय कि नित्य पदार्थोमें विकारी होनेका स्वभाव बिना किसी हेतुके ही प्रथित है तो ऐसी दशामे क्रिया और कारकका विभ्रम ठहरता है-स्वभावसे ही पदार्थोका ज्ञान तथा आविर्भाव होनेसे ज्ञप्ति तथा उत्पत्तिरूप जो प्रतीयमान क्रिया है उसके भ्रान्तिरूप होनेका प्रसंग आता है, अन्यथा स्वभावके निर्हेतुकत्वकी सिद्धि नही बनती । और क्रियाके विभ्रमसे प्रतिभासमान कारक-समूह भी विभ्रमरूप हो जाता है, क्योकि क्रियाविशिष्ट द्रव्यका नाम ‘कारक’ प्रसिद्ध है, क्रियासे कारककी उत्पत्ति नही । और स्वभाववादीके द्वारा क्रिया कारकका विभ्रम मान्य नहीं किया जा सकता-विभ्रमकी मान्यतापर वादान्तरका प्रसंग आता है-सर्वथा स्वभाववाद स्थिर न रहकर एक नया विभ्रमवाद और खड़ा हो जाता है । परन्तु (हे वीरजिन !) क्या आपसे-आपके स्याद्वाद-शासनसे-द्वेष रखनेवालेके यहाँ यह वादान्तर बनता है ?-नही बनता, क्योकि ‘सब कुछ विभ्रम है’ ऐसा एकान्तरूप वादान्तर स्वीकार करनेपर यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि उस विभ्रममें अविभ्रम-अभ्रान्ति है या वह भी विभ्रम-भ्रान्तिरूप है ? यदि अविभ्रम है तो विभ्रम-एकान्त न रहा-अविभ्रम भी कोई पदार्थ ठहरा । और यदि विभ्रममे भी विभ्रम है तो सर्वत्र अभ्रान्तिकी सिद्धि हुई, क्योकि विभ्रममें विभ्रम होनेसे वास्तविक स्वरूपकी प्रतिष्ठा होती है । और ऐसी हालतमे स्वभावके निर्हेतुकत्वकी सिद्धि नही हो सकती ।’

‘यदि यह कहा जाय कि (बिना किसी हेतुके नही किन्तु) आबाल-सिद्धिरूप हेतुसे विविधार्थकी-सर्वथा नित्य पदार्थोमे विक्रिया तथा कारक-व्यापारादिकी-सिद्धिके रूपमे स्वभाव प्रथित (प्रसिद्ध) है- अर्थात् क्रिया-कारकादिरूप जो विविध अर्थ है उन्हे बालक तक भी स्वीकार करते है इसलिये वे सिद्ध है और उनका इस प्रकारसे सिद्ध होना ही स्वभाव है-तो यह वादान्तर हुआ, परन्तु यह वादान्तर भी ( हे वीर भगवन् ! ) आपके द्वेषियोके यहाँ बनता कहाँ है ?-क्योकि वह आबाल-सिद्धिसे होनेवाली निर्णीति नित्यादि सर्वथा एकान्तवादका आश्रय लेनेपर नहीं बन सकती, जिससे सब पदार्थो सब कार्यो और सब कारणोकी सिद्धि होती। कारण यह कि वह निर्णीति अनित्य होती है और बिना विक्रियाके बनती नही, इसलिये सर्वथानित्य एकान्तके साथ घटित नही हो सकती। प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे किसी पदार्थकी सिद्धिके न हो सकनेपर दूसरोके पूछने अथवा दूषणार्थ जिज्ञासा करनेपर स्वभाववादका अवलम्बन ले लेना युक्त नही है,क्योकि इससे अतिप्रसग आता है-प्रकृतसे अन्यत्र विपक्षमे भी यह घटित होता है। सर्वथा अनित्य अथवा क्षणिक एकान्तको सिद्ध करनेके लिये भी स्वभाव-एकान्तका अवलम्बन लिया जा सकता है। और यदि यह कहा जाय कि प्रत्यक्षादि प्रमाणोकी सामर्थ्यसे विविधार्थकी सिद्धिरूप स्वभाव है तो फिर स्वभाव-एकान्तवाद कैसे सिद्ध हो सकता है ?, क्योकि स्वभावकी तो स्वभावसे ही व्यवस्थिति है, उसका प्रत्यक्षादि प्रमाणोके बलसे व्यवस्थापित करनेपर स्वभाव-एकान्त स्थिर नही रहता। इस तरह हे वीर जिन ! आपके अनेकान्तशासनसे विरोध रखनेवाले सर्वथा एकान्तवादियोंके यहाँ कोई भी वादान्तर ( एकके साथ दूसरा वाद ) बन नही सकता-वादान्तर तो सम्यक् एकान्तके रूपमे आपके मित्रो-सपक्षियो अथवा अनेकान्तवादियोके यहाँ ही घटित होता है।’


येषामवक्तव्यमिहाऽऽत्म-तत्त्व
देहादनन्यत्व-पृथक्त्व-क्लृप्तेः ।
तेषां ज्ञ-तत्त्वेऽनवधार्यतत्त्वे
का बन्ध-मोक्ष-स्थितिरप्रमेये ॥१०॥

अर्थ: ‘नित्य आत्मा देहसे ( सर्वथा ) अभिन्न है या भिन्न इस कल्पनाके होनेसे ( और अभिन्नत्व तथा भिन्नत्व दोनोमेसे किसी एक भी विकल्पके निर्दोष सिद्ध न हो सकनेसे १ ) जिन्होंने आत्मतत्त्वको ‘अवक्तव्य’ -वचनके अगोचर अथवा अनिर्वचनीय- माना है उनके मतमे आत्मतत्त्व अनवधार्य ( अज्ञेय ) तत्त्व हो जाता है-प्रमेय नही रहता। और आत्मतत्त्वके अनवधार्य (अप्रमेय) होने पर तथा प्रत्यक्षादि किसी भी प्रमाणका विषय न रहनेपर बन्ध और मोक्षकी कौन-सी स्थिति बन सकती है ? वन्ध्या-पुत्रकी तरह कोई भी स्थिति नही बन सकती-न बन्ध व्यवस्थित होता है और न मोक्ष । और इसलिये बन्ध-मोक्षकी सारी चर्चा व्यर्थ ठहरती है।’


हेतुर्न दृष्टोऽत्र न चाऽप्यदृष्टो
योऽयं प्रवादः क्षणिकाऽऽत्मवादः ।
‘न ध्वस्तमन्यत्र भवे द्वितीये’
सन्तानभिन्ने न हि वासनाऽस्ति ॥११॥

अर्थ: ‘प्रथम क्षणमे नष्ट हुआ चित्त-आत्मा दूसरे क्षणमे विद्यमान नही रहता’ यह जो ( बौद्धोका ) क्षणिकात्मवाद है वह ( केवल ) प्रवाद है-प्रमाणशून्य वाद होनेसे प्रलापमात्र है, क्योंकि इसका ज्ञापक-अनुमान करानेवाला-कोई भी दृष्ट या अदृष्ट हेतु नही बनता ।’ ( यदि यह कहा जाय कि ‘जो सत् है वह सब स्वभावसे ही क्षणिक हैं’, जैसे शब्द और विद्युत आदि, अपना आत्मा भी चूंकि सत् है अतः वह भी स्वभावसे क्षणिक है, और यह स्वभावहेतु ही उसका ज्ञापक है, तो इस प्रकारके अनुमानपर-ऐसा कहने अथवा अनुमान लगानेपर-यह प्रश्न पैदा होता है कि वह हेतु स्वय प्रतिपत्ता ( ज्ञाता ) के द्वारा दृष्ट ( देखा गया ) है या अदृष्ट ( नही देखा गया अर्थात् कल्पनारोपित ) है ? दृष्टहेतु संभव नही हो सकता, क्योकि सब कुछ क्षणिक होनेके कारण दर्शनके अनन्तर ही उसका विनाश हो जानेसे अनुमान कालमे भी उसका अभाव होता है । साथही, चित्तविशेषके लिङ्ग-दर्शी उस अनुमाताका भी संभव नही रहता । इसी तरह कल्पनारोपित ( कल्पित ) अदृष्ट हेतु भी नही बनता, क्योकि उस कल्पनाका भी तद्क्षण विनाश हो जानेसे अनुमान-कालमें सद्भाव नहीं रहता । ) '( यदि यह कहा जाय कि व्याप्तिके ग्रहणकालमे लिङ्गदर्शनकी जो कल्पना उत्पन्न हुई थी उसके तद्क्षण विनाश हो जानेपर भी उसकी वासना ( सस्कार ) बनी रहती है अतः अनुमान-कालमें लिङ्ग-दर्शनसे प्रबुद्ध हुई उस वासनाके सामर्थ्यसे अनुमान प्रवृत्त होता है, तो ऐसा कहना युक्त नही है, क्योकि सन्तानभिन्न ( चित्त ) में-हेतु ( साधन ) और हेतुमद् ( साध्य ) के अविनाभाव-सम्बन्धरूप व्याप्तिके ग्राहक चित्तसे अनुमाताका चित्त ( सन्तानत. भिन्नकी तरह ) भिन्नसन्तान होनेसे उसमे-वासनाका अस्तित्व नही बन सकता । यदि भिन्न-सन्तानवालेके वासनाका अस्तित्व माना जाय तो भिन्नसन्तान देवदत्त-द्वारा साध्य-साधनकी व्याप्तिका ग्रहण होनेपर जिनदत्तके ( व्याप्तिका ग्रहण न होनेपर भी ) साधनको देखने मात्रसे साध्यके अनुमानका प्रसग आएगा, क्योकि दोनोमे कोई विशेष नही है । और यह बात सभव नही हो सकती, क्योकि व्याप्तिके ग्रहण-विना अनुमान प्रवर्तित नही हो सकता ।’


तथा न तत्कारण-कार्य-भावो
निरन्वयाः केन समानरूपाः ? ।
असत्खपुष्पं न हि हेत्वपेक्षं
दृष्टं न सिद्धयत्युभयोरसिद्धम् ॥१२॥

अर्थ: ‘( जिस प्रकार सन्तानभिन्न चित्तमे वासना नही बन सकती ) उसी प्रकार सतानभिन्न चित्तोंमे कारण-काये-भाव भी नहीं बन सकता-सन्तानभिन्न चित्तोमे भी कारण-कार्य-भाव मानने पर देवदत्त और जिनदत्तके चित्तोमे भी कारण-कार्य-भावके प्रवर्तित होनेका प्रसग आएगा, जो न तो दृष्ट है और न बौद्धोके द्वारा इष्ट है ।’ ‘(यदि यह कहा जाय कि एक सन्तानवर्ती समानरूप चित्तक्षणोके ही कारण कार्य-भाव होता है, भिन्नसन्तानवर्ती असमानरूप चित्तक्षणोंके कारण-कार्य-भाव नही होता,तो यह कहना भी ठीक नही है, क्योकि) जो चित्त-क्षण क्षणविनश्वर निरन्वय ( सन्तान-परम्परासे रहित ) माने गये हैं उन्हें किसके साथ समानरूप कहा जाय ?-किसी भी स्वभावके साथ वे समानरूप नही है, और इसलिए उनमे कारण-का ‘ भाव घटित नही हो सकता । सत्स्वभाव अथवा चित्स्वभावके साथ समानरूप माननेपर भिन्न-सन्तानवर्ती देवदत्त और जिनदत्तके चित्त-क्षण भी सत्स्वभाव और चित्स्वभावकी दृष्टिसे परस्परमें कोई विशेष न रखनेके कारण समानरूप ठहरेंगे और उनमे कारण-कार्य-भावकी उक्त आपत्ति बदस्तूर बनी रहेगी ।’ ‘( यदि हेत्वपेक्ष-स्वभावके साथ समानरूप माना जाय अर्थात् यह कहा जाय कि जो चित्त उपादान-उपादेय-भावको लिये हुए हैं-पूर्व-पूर्व-का चित्त जिनमे उत्तरोत्तरवर्ती चित्तका उपादान कारण है-वे ही एक-सन्तानवर्ति-चित्त परस्परमे समानरूप है और उन्हीके कारण-कार्य-भाव घटित होता है-सन्तानान्तरवर्ति-चित्तोके नहीं, तो इसमे यह विकल्प उत्पन्न होता है कि उत्तरवर्ती-चित्त उत्पन्न और सत् होकर अपने हेतुकी अपेक्षा करता है या अनुत्पन्न और असत् होकर । प्रथम पक्ष तो बनता नही, क्योकि सत्के सर्वथा निराशसत्व ( अवक्तव्यपना ) माननेसे उसे हेत्वपेक्षारूपमें नही कहा जा सकता । और उत्पन्नके हेत्वपेक्षत्वका विरोध है-जो उत्पन्न हो चुका वह हेतुकी अपेक्षा नही रखता । दूसरा पक्ष माननेपर ) जो ( कार्यचित्त ) असत् है-उत्पत्तिके पूर्वमे जिसका सर्वथा अभाव है-वह आकाशके पुष्प-समान हेत्वपेक्ष नही देखा जाता और न सिद्ध होता है, क्योंकि कोई भी असत्पदार्थ हेत्वपेक्षके रूपमे वादी-प्रतिवादी दोनोंमेसे किसीके भी द्वारा सिद्ध ( मान्य ) नही है, जिससे उत्तरोत्तर चित्तको अनुत्पन्न होनेपर भी तद्धेत्वपेक्ष सिद्ध किया जाता । हेतुके अभावमे कैसे कोई एक सन्तानवर्ती चित्तक्षण हेत्वपेक्षत्वके साथ समानरूप सिद्ध किये जा सकते हैं, जिससे उनके उपादान-उपादेय-रूपका कारण कार्य-भाव घटित हो सके ? नही किये जा सकते । वास्य-वासक भावरूप हेतु भी नही बनता, क्योकि एकसन्तानवर्ति-क्षणविनश्वर-निरन्वय-चित्तक्षणोमे, भिन्नसन्तानवर्ति-चित्तक्षणोकी तरह, वासनाका संभव नहीं होता ।’


नैवाऽस्ति हेतुः क्षणिकात्मवादे
न सन्नसन्वा विभवादकस्मात् ।
नाशोदयैकक्षणता च दुष्टा
सन्तान-भिन्न-क्षणयोरभावात् ॥१३॥

अर्थ: (परमार्थसे तो) क्षणिकात्मवादमे हेतु बनता ही नहीं । क्योंकि हेतुको यदि सद्रूप माना जाय-सद्रूप ही पूर्वचित्तक्षण उत्तरचित्त-क्षणका हेतु है ऐसा स्वीकार किया जाय-तो इससे विभवका प्रसंग आता है । अर्थात् एक क्षणवर्ती चित्तमे चित्तान्तरकी उत्पत्ति होनेपर उस चित्तान्तरके कार्यकी भी उसी क्षण उत्पत्ति होगी, और इस तरह सकलचित्त और चैत्तक्षणोके एकक्षणवर्ती हो जानेपर सकल जगत्-व्यापी चित्तप्रकारोकी युगपत् सिद्धि ठहरेगी । और ऐसा होनेसे, जिसे क्षणिक कहा जाता है वह विभुत्वरूप ही है-सर्व व्यापक है-यह कैसे निवारण किया जा सकता है ? नही किया जा सकता । इसके सिवाय, एकक्षणवर्ती सत्-चित्तके पूर्वकाल तथा उत्तरकालमे जगत् चित्तशून्य ठहरता है और सन्तान-निर्वाण-रूप जो विभवमोक्ष है वह सबके अनुपाय ( बिना प्रयत्नके ही ) सिद्ध होता है, और इसलिए सत् हेतु नही बनता । (इस दोषसे बचनेके लिये) यदि हेतुको असत् ही कहा जाय तो अकस्मात्-बिना किसी कारणके ही-कार्योत्पत्तिका प्रसग आएगा । और इस लिये असत् हेतु भी नही बनता ।’

'(यदि आकस्मिक कार्योत्पत्तिके दोषसे बचनेके लिये कारणके नाशके अनन्तर दूसरे क्षणमे कार्यका उदय-उत्पाद न मानकर नाश और उत्पादको एक क्षणवर्ती माना जाय अर्थात् यह कहा जाय कि जिसका नाश ही कार्यका उत्पाद है वह उस कार्यक हेतु है तो यह भी नही बनता, क्योकि संतानके भिन्न क्षणोंमे नाश और उदयकी एक-क्षणताका अभाव होनेसे नाशौदयैकक्षणतारूप युक्ति सदोष है-जैसे सुषुप्त सन्तानमे जाग्रत चित्तका जो नाश-क्षण (विनाश-काल,) है वही प्रबुद्ध चित्तका उदय-क्षण नहीं है, दोनोमे अनेकक्षणरूप मुहूर्तादि कालका व्यवधान है, और इसलिये जा त चित्तको प्रबुद्ध चित्तका हेतु नहीं कहा जा सकता । अत. उक्त सदोष युक्तिके आधारपर आकस्मिक कार्योत्पत्तिके दोषसे नहीं बचा जा सकता ।’


कृत-प्रणाशाऽकृत-कर्मभोगौ
स्यातामसञ्चेतित-कर्म च स्यात् ।
आकस्मिकेऽर्थे प्रलय-स्वभावे
मार्गो न युक्तो वधकश्च न स्यात् ॥१४॥

अर्थ: ‘यदि पदार्थको प्रलय स्वभावरूप आकस्मिक माना जाय- यह कहा जाय कि जिस प्रकार बौद्ध-मान्यतानुसार बिना किसी दूसरे कारणके ही प्रलय ( विनाश ) आकस्मिक होता है, पदार्थ प्रलय-स्वभावरूप हैं, उसी प्रकार कार्यका उत्पाद भी बिना कारणके ही आकस्मिक होता है-तो इससे कृत-कर्मके भोगका प्रणाश ठहरेगा-पूर्व चित्तने जो शुभ अथवा अशुभ कर्म किया उसके फलका भोगी वह न रहेगा और इससे किये हुए कर्मको करने वालेके लिये निष्फल कहना होगा-और अकृतकर्मके फलको भोगनेका प्रसङ्ग आएगा-जिस उत्तरभावी चित्तने कर्म किया ही नहीं उसे अपने पूर्वचित्त द्वारा किये हुए कर्मका फल भोगना पड़ेगा-; क्योकि क्षणिकात्मवादमे कोई भी कर्मका कर्ता चित्त उत्तर-क्षणमे अवस्थित नहीं रहता किन्तु फलकी परम्परा चलती है। साथ ही, कर्म भी असचेतित-अविचारित ठहरेगा-क्योकि जिस चित्तने कर्म करनेका विचार किया उसका उसी क्षण निरन्वय विनाश हो जानेसे और विचार न करनेवाले उत्तरवर्ती चित्तके द्वारा उसके सम्पन्न होनेसे उसे उत्तरवर्ती चित्तका अविचारित कार्य ही कहना होगा।’

‘( इसी तरह ) पदार्थके प्रलय-स्वभावरूप क्षणिक होनेपर कोई मार्ग भी युक्त नहीं रहेगा-सकल आस्रव-निरोधरूप मोक्षका अथवा चित्त-सन्ततिके नाशरूप शान्त-निर्वाणका मार्ग ( हेतु ) जो नैरात्म्य-भावना-रूप बतलाया जाता है वह भी नही बन सकेगा, क्योकि नाशके निर्हेतुक होनेसे सास्रव-चित्त-सन्ततिका नाश करनेके लिये किसी नाशकका होना विरुद्ध पडता है-स्वभावसे ही नाश मानने पर कोई नाशक नहीं बनता । और वधक भी कोई नही रहता-क्योकि वह भी प्रलय-स्वभावरूप आकस्मिक है, जिस चित्तने वधका-हिंसाका-विचार किया वह उसी क्षण नष्ट हो जाता है और जिसका वध हुआ वह उसके प्रलयस्वभावसे आकस्मिक हुआ, उसके लिये वधका विचार न रखने वाले किसी भी दूसरे चित्तको अपराधी नहीं ठहराया जा सकता ।’


न बन्ध-मोक्षौ क्षणिकैक-संस्थौ
न संवृतिः साऽपि मृषा-स्वभावा ।
मुख्यादृते गौण-विधिर्न दृष्टो
विभ्रान्त-दृष्टिस्तव दृष्टितोऽन्या ॥१५॥

अर्थ: ‘( पदार्थके प्रलय स्वभावरूप आकस्मिक होनेपर ) क्षणिक-एक-चित्तमे सस्थित बन्ध और मोक्ष भी नहीं बनते-क्योकि जिस चित्त का बन्ध है उसका निरन्वयविनाश हो जानेसे उत्तर-चित्त जो अबद्ध है उसीके मोक्षका प्रसग आएगा, और एक चित्त-सस्थित बन्ध मोक्ष उसे कहते है कि जिस चित्तका बन्ध हो उसीका मोक्ष होवे ।’ '( यदि यह कहा जाय कि पूर्वोत्तर-चित्तोमे एकत्वके आरोपका विकल्प करनेवाली ‘संवृति’ से क्षणिक एकचित्त-सस्थित बन्ध और मोक्ष बनते हैं, तो प्रश्न पैदा होता है कि वह संवृति मृषास्वभावा है या गौण-विधिरूपा है ?) मृषास्वभावा संवृति क्षणिक एक चित्तमे बन्ध-मोक्षकी व्यवस्था करनेमे समर्थ नही है-उससे बन्ध और मोक्ष भी मिथ्या ठहरते है । और गौणविधि मुख्यके बिना देखी नही जाती ( पुरुषसिंहकी तरह )-जिस प्रकार किसी पुरुषको मुख्य सिंहके अभावमे ‘पुरुषसिंह’ कहना नही बनता उसी प्रकार किसी चित्तमे मुख्यरूपसे बन्ध-मोक्षका सन्निष्ठान बतलाये बिना बन्ध-मोक्षकी गौणविधि नही बनती, और इससे मुख्यविधिके अभावमे गौणविधिरूप संवृति भी किसी एक क्षणिक चित्तमे बन्ध-मोक्षकी व्यवस्था करनेमे असमर्थ है ( अत हे वीरजिन ! ) आपकी ( स्याद्वादरूपिणी अनेकान्त ) दृष्टिसे भिन्न जो दूसरी (क्षणिक-आत्मवादियोकी सर्वथा एकान्त ) दृष्टि है वह विभ्रान्त दृष्टि है - सब ओरसे दोषरूप होनेके कारण वस्तुतत्त्वको यथार्थरूपसे प्रतिपादन करनेमे समर्थ नही है ।


प्रतिक्षणं भङ्गिषु तत्पृथक्त्वा-
न्मातृ-घाती स्व-पतिः स्व-जाया ।
दत्त-ग्रहो नाऽधिगत-स्मृतिर्न
न क्त्वार्थ-सत्यं न कुलं न जातिः ॥१६॥

अर्थ: ‘क्षण-क्षणमे पदार्थोंको भङ्गवान्-निरन्वय विनाशवान-मानने पर उनके पृथक्पनकी वजहसे-सर्वथा भिन्न होनेके कारण- कोई मातृ-घाती नहीं बनता-क्योकि तब पुत्रोत्पत्तिके क्षणमे ही माताका स्वय नाश हो जाता है, उत्तरक्षणमे पुत्रका भी प्रलय हो जाता है और अपुत्र का ही उत्पाद होता है, न कोई किसी ( कुलस्त्री ) का स्वपति बनता है, -क्योकि उसके विवाहित पतिका उसी क्षण विनाश हो जाता है, अन्य अविवाहितका उत्पाद होता है, और न कोई किसीकी स्वपत्नी ( विवाहिता स्त्री ) ठहरती है-क्योकि उसकी विवाहिता स्त्रीका उसी क्षण विनाश हो जाता है, अन्य अविवाहिताका ही उत्पाद होता है, और इससे परस्त्रीसेवनका भी प्रसङ्ग आता है ।’

‘( इसी तरह ) दिये हुए धनादिकका ( ऋणी आदिके पाससे ) पुन ग्रहण ( वापिस लेना ) नही बनता-क्योकि बौद्ध मान्यतानुसार जो ऋण देता है उसका उसी क्षण निरन्वय विनाश हो जाता है, उत्तर क्षणमे लेनेवालेका भी विनाश हा जाता है तथा अन्यका ही उत्पाद होता है और साक्षी-लेखादि भी कोई स्थिर नहीं रहता, सब उसी क्षण ध्वस्त हो जाते हैं । अधिगत किये हुए ( शास्त्रके ) अर्थकी स्मृति भी तब नही बनती-और इससे शास्त्राभ्यास निष्फल ठहरता है । ‘क्त्वा’ प्रत्ययका जो अर्थ-सत्य है-प्रमाणरूपसे स्वीकृत है-वह भी नहीं बनता-क्योंकि पूर्व और उत्तर-क्रियाका एक ही कर्ता होनेपर पूर्वकालकी क्रियाको ‘क्त्वा’ ( करके ) प्रत्ययके द्वारा व्यक्त किया जाता है, जैसे ‘रामो भुक्त्वा गतः’-राम खाकरके गया । यहाँ खाना और जाना इन दोनो क्रियाओका कर्ता एक ही राम है तभी उसकी पहली खानेकी क्रियाको ‘करके’ शब्दके द्वारा व्यक्त किया गया है, रामके क्षणभंगुर होनेपर वह दोनो क्रियाओका कर्ता नहीं बनता और दोनो क्रियाओके कर्ता भिन्न-भिन्न व्यक्ति होनेपर ऐसा वाक्य प्रयोग नहीं बनता ’ ‘( इसी प्रकार ) न कोई कुल बनता है और न कोई जाति ही बनती है-क्योंकि सूर्यवंशादिक जिस कुलमे किसी क्षत्रियका जन्म हुआ उस कुलका निरन्वय विनाश हो जानेसे उस जन्ममे उसका कोई कुल न रहा, तब उसके लिये कुलका व्यवहार कैसे बन सकता है ? क्षत्रियादि कोई जाति भी उस जातिके व्यक्तियोके बिना असम्भव है । और अनेक व्यक्तियोमेसे अतद्व्यावृत्तिके ग्राहक एक चित्तका असम्भव होनेसे अन्यापोह-लक्षणा ( अन्यसे भावरूप, अक्षत्रिय व्यावृत्तिरूप ) जाति भी घटित नहीं हो सकती ।’ ‘जो (विज्ञानाऽद्वैत) तत्त्व सकल विकल्पोंसे विशुद्ध (शून्य) है-कार्य-कारण, ग्राह्य-ग्राहक, वास्य वासक, साध्य-साधन, बाध्य-बाधक, वाच्य-वाचक भाव आदि कोई भी प्रकारका विकल्प जिसमे नहीं है-वह स्व-संवेद्य नही होसकता, क्योकि संवेदनावस्थामे योगीके अन्य सब विकल्पोंके दूर होनेपर भी ग्राह्य-ग्राहकके आकार विकल्पात्मक संवेदनका प्रतिभासन होता है, बिना इसके वह बनता ही नहीं, और जब विकल्पात्मक संवेदन हुआ तो सकल विकल्पोंसे शून्य विज्ञानाद्वैत तत्त्व न रहा। ‘(इसी तरह) जो विज्ञानाद्वैत तत्त्व सम्पूर्ण अभिलापों (कथन प्रकारो) की आस्पदता (आश्रयता) से रहित है-जाति, गुण, द्रव्य, क्रिया और यदृच्छा (स केत) की कल्पनाओसे शून्य होनेके कारण उस प्रकारके किसी भी विकल्पात्मक शब्दका उसके लिये प्रयोग नहीं किया जा सकता-वह निगद्य (कथनके योग्य) भो नहीं हो सकता-दूसरोको उसका प्रतिपादन नहीं किया जासकता।’ (अतः हे वीरजिन !) आपकी उक्तिसे-अनेकान्तात्मक स्याद्वादसे-जो बाह्य है वह सर्वथा एकान्तरूप विज्ञानाद्वैत-तत्त्व (सर्वथा विकल्प और अभिलापसे शून्य होनेके कारण) सुषुप्ति की अवस्थाको प्राप्त है-सुषुप्तिमे संवेदनकी जो अवस्था होती है वही उसकी अवस्था है। और इससे यह भी फलित होता है कि स्याद्वादका आश्रय लेकर ऋजुसूत्र नयावलम्बियोंके द्वारा जो यह माना जाता है कि विज्ञानका अर्थतत्त्व विज्ञानके अर्थपर्यायके आदेशसे ही सकल-विकल्पो तथा अभिलापोसे रहित है और व्यवहारनयावलम्बियोंके द्वारा जो उसे विकल्पों तथा अभिलापोका आश्रय स्थान बतलाया जाता है वह सब आपकी उक्तिसे बाह्य नहीं है-आपके सर्वथा नियम-त्यागी स्याद्वादमतके अनुरूप है ।’


न शास्तृ-शिष्यादि-विधि-व्यवस्था
विकल्पबुद्धिर्वितथाऽखिला चेत् ।
अतत्त्व-तत्त्वादि-विकल्प-मोहे
निमज्जतां वीत-विकल्प-धीः का ? ॥१७॥

अर्थ: ‘( चित्तोके प्रतिक्षण भगुर अथवा निरन्वय-विनष्ट होनेपर ) शास्ता और शिष्यादिके स्वभाव-स्वरूपकी (भी) कोई व्यवस्था नही बनती-क्योंकि तब तत्त्वदर्शन, परानुग्रहको लेकर तत्त्व-प्रतिपादनकी इच्छा और तत्त्वप्रतिपादन, इन सब कालोमे रहनेवाले किसी एक शासक (उपदेष्टा) का अस्तित्व नही बन सकता। और न ऐसे किसी एक शिष्यका ही अस्तित्व घटित हो सकता है जो कि शासन श्रवण (उपदेश सुनने) की इच्छा और शासनके श्रवण, ग्रहण, धारण तथा अभ्यसनादि कालोमें व्यापक हो। ‘यह शास्ता है और मै शिष्य हूँ’ ऐसी प्रतिपत्ति भी किसीके नहीं बन सकती। और इसलिये बुद्ध-सुगतको जो शास्ता माना गया है और उनके शिष्योकी जो व्यवस्था की गई है वह स्थिर नही रह सकती। इसी तरह (‘आदि’ शब्दसे) स्वामी सेवक, पिता-पुत्र और पौत्र-पितामह आदिकी भी कोई विधि व्यवस्था नही बैठ सकती, सारा लोक-व्यवहार लुप्त हो जाता अथवा मिथ्या ठहरता है।’

‘(यदि बौद्धोकी ओरसे यह कहा जाय कि बाह्य तथा आभ्यन्तररूपसे प्रतिक्षण स्वलक्षणों (स्वपरमाणुओ) के विनश्वर होनेपर परमार्थसे तो मातृघाती आदि तथा शास्ता-शिष्यादिकी विधि-व्यवस्थाका व्यवहार सम्भव नहीं हो सकता, तब १) यह सब विकल्प-बुद्धि है (जो अनादि-वासना से समुद्भूत होकर मातृघाती आदि तथा शास्ता-शिष्यादिरूप विधि व्यवस्था की हेतु बनी हुई है) और विकल्प-बुद्धि सारी मिथ्या होती है, ऐसा कहने वालों (बौद्धो) के यहा, जो (स्वय) अतत्त्व-तत्त्वादिके विकल्प-मोहमे डूबे हुए है, निर्विकल्प-बुद्धि बनती कौन-सी है?-कोई भी सार्थिका और सच्ची निर्विकल्प बुद्धि नही बनती, क्योकि मातृघाती आदि सब विकल्प अतत्त्वरूप है और उनसे जो कुछ अन्य हैं वे तत्त्वरूप हैं यह व्यवस्थिति भी विकल्पवासनाके बलपर ही उत्पन्न होती है। इसी तरह ‘संवृति’ (व्यवहार) से ‘अतत्त्व’ की और परमार्थसे ‘तत्त्व’ की व्यवस्था भी विकल्प-शिल्पीके द्वारा ही घटित की जा सकती है-वस्तुबलसे नही। इस प्रकार विकल्प-मोह बौद्धोके लिये महासमुद्रकी तरह दुष्पार ठहरता है। इस २ यदि यह कहा जाय कि बुद्धोकी धर्म-देशना ही दो सत्योको लेकर हुई है- एक ‘लोकसंवृति सत्य’ और दूसरा ‘परमार्थ सत्य’ तो यह विभाग भी विकल्पमात्र होनेसे तात्त्विक नहीं बनता। सम्पूर्ण विकल्पोंसे रहित स्वलक्षण-मात्र-विषया बुद्धिको जो तात्त्विकी कहा जाता है वह भी सम्भव नहीं हो सकती, क्योकि उसके इन्द्रियप्रत्यक्ष-लक्षणा, मानसप्रत्यक्षलक्षणा, स्वसवेदन-प्रत्यक्ष लक्षणा और योगिप्रत्यक्ष लक्षणा ऐसे चार भेद माने गये है, जिनकी परमार्थसे कोई व्यवस्था नहीं बन सकती। प्रत्यक्ष-सामान्य और प्रत्यक्ष-विशेषका लक्षण भी विकल्पमात्र होनेसे अवास्तविक ठहरता है। और अवास्तविक लक्षण वस्तुभूत लक्ष्यको लक्षित करनेके लिये समर्थ नहीं है। क्योकि इससे ‘अतिप्रसङ्ग’ दोष आता है, तब किसको किससे लक्षित किया जायगा ? किसीको भी किसीसे लक्षित नही किया जा सकता।’


अनर्थिका साधन-साध्य-धीश्चेद्-
विज्ञानमात्रस्य न हेतु-सिद्धिः।
अथाऽर्थवत्वं व्यभिचार-दोषो
न योगि-गम्यं परवादि-सिद्धम् ॥१८॥

अर्थ: '(यदि यह कहा जाय कि ऐसी कोई बुद्धि नही है जो बाह्य स्वलक्षण-के आलम्बनमे कल्पनासे रहित हो, क्योकि स्वप्नबुद्धिकी तरह समस्त बुद्धि-समूहके आलम्बनमे भ्रान्तपना होनेसे कल्पना करनी पडती है, अत. अपने अंशमात्ररूप तक सीमित-विषय होनेसे विज्ञान-मात्र तत्त्वकी ही प्रसिद्धि होती है उसीको मानना चाहिये। इसपर यह प्रश्न पैदा होता है कि विज्ञानमात्रकी सिद्धि ससाधना है या निःसाधना ? यदि ससाधना है तो साध्य-साधनकी बुद्धि सिद्ध हुई, विज्ञान-मात्रता न रही। और यदि साध्य-साधनकी बुद्धिका नाम ही विज्ञान-मात्रता है तो फिर यह प्रश्न पैदा होता है कि वह बुद्धि अनर्थिका है या अर्थवती ?) यदि साध्य साधनकी बुद्धि अनर्थिका है-उसका कोई अर्थ नही-तो विज्ञानमात्र तत्त्व- को सिद्ध करनेके लिये जो (प्रतिभासमानत्व) हेतु दिया जाता है उसकी (स्वप्नोपलम्भ-साधनकी तरह) सिद्धि नहीं बनती और जब हेतु ही सिद्ध नहीं तब उससे ( असिद्ध-साधनसे ) विज्ञप्तिमात्ररूप साध्यकी सिद्धि भी नहीं बन सकती । यदि साध्य-साधनकी बुद्धि अर्थवती है–अर्थावलम्बनको लिये हुए है-तो इसीसे प्रस्तुत हेतुके ‘व्यभिचार’ दोष आता है–‘सर्वज्ञान निरालम्बन है ज्ञान होनेसे’ ऐसा दूसरोके प्रति कहना तब युक्त नही ठहरता, वह महान् दोष है, जिसका निवारण नहीं किया जा सकता; क्योकि जैसे यह अनुमान-ज्ञान स्वसाध्यरूप आलम्बनके साथ सालम्बन है वैसे विवादापन्न (विज्ञानमात्र) ज्ञान भी सालम्बन क्यो नही ? ऐसा सशय उत्पन्न होता है। जब भी सर्ववस्तुसमूहको प्रतिभासमानत्व-हेतुसे विज्ञान-मात्र सिद्ध किया जाता है तब भी यह अनुमान परार्थप्रतिभासमान होते हुए भी वचनात्मक है-विज्ञानमात्रसे अन्य होनेके कारण विज्ञानमात्र नही है-अत. प्रकृत हेतुके व्यभिचार दोष सुघटित एव अनिवार्य ही है।’ ‘यदि (नि साधना सिद्धिका आश्रय लेकर) विज्ञानमात्रतत्त्वको योगि-गम्य कहा जाय-यह बतलाया जाय कि साध्यके विज्ञानमात्रात्मकपना होनेपर साधनका साध्यतत्त्वके साथ आनुषङ्ग है-वह भी साध्यकी ही कोटि-म स्थित है -इसलिये समाधि-अवस्थामे योगीको प्रतिभासमान होने वाला जो संवेदनाद्वैत है वही तत्त्व है, क्योकि स्वरूपकी स्वतः गति (ज्ञप्ति) होती है-उसे अपने आपसे ही जाना जाता है-तो यह कहना भी ठीक नही है, क्योकि यह बात परवादियोंको सिद्ध अथवा उनके द्वारा मान्य नही है-जो किसी योगीके गम्य हो वह परवादियोके द्वारा मान्य ही हो ऐसी कोई बात भी नहीं है, यह तो अपनी घरेलू मान्यता ठहरा। अत नि.साधना सिद्धिका आश्रय लेनेपर परवादियोको विज्ञानमात्र अथवा संवेदनाद्वैत तत्त्वका प्रत्यय (बोध) नहीं कराया जासकता ।’


तत्त्वं विशुद्धं सकलैर्विकल्पै-
र्विश्वाऽभिलापाऽस्पदतामतीतम् ।
न स्वस्य वेद्यं न च तन्निगद्यं
सुषुप्त्यवस्थं भवदुक्ति-बाह्यम् ॥१९॥


मूकात्म-संवेद्यवदात्म-वेद्यं
तन्म्लिष्ट-भाषा-प्रतिम-प्रलापम् ।
अनङ्ग संज्ञं तदवेद्यमन्यैः
स्यात् त्वद्द्विषां वाच्यमवाच्य-तत्त्वम् ॥२०॥

अर्थ: ‘गूंगे का स्वसंवेदन जिस प्रकार आत्मवेद्य है-अपने आपके द्वारा ही जाना जाता है-उसी प्रकार विज्ञानाद्वैततत्त्व भी आत्मवेद्य है -स्वयंके द्वारा ही जाना जाता है । आत्मवेद्य अथवा ‘स्वसंवेद्य’ जैसे शब्दोके द्वारा भी उसका अभिलाप (कथन) नहीं बनता-उसका कथन गूँगे की अस्पष्ट भाषाके समान प्रलाप-मात्र होनेसे निरर्थक है–वह अभिलापरूप नहीं है । साथ ही, वह अनङ्गसंज्ञ है-अभिलाप्य न होनेसे किसी भी अंगसंज्ञाके द्वारा उसका संकेत नहीं किया जासकता । और जब वह अनभिलाप्य तथा अनङ्गसंज्ञ है तब दूसरोंके द्वारा अवेद्य (अज्ञेय) है-दूसरोंके प्रति उसका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता । ऐसा ( हे वीरजिन ! ) आपसे-आपके स्याद्वादमतसे-द्वेष रखनेवाले जिन (संवेदनाद्वैतवादि बौद्धो) का कहना है उनका सर्वथा अवाच्य-तत्त्व इससे वाच्य होजाता है ।’ जो इतना भी नही समझते और यही कहते हैं कि वाच्य नही होता उनसे क्या बात की जाय ?-उनके साथ तो मौनावलम्बन ही श्रेष्ठ है ।’


अशासदङ्गानि वचांसि शास्ता
शिष्याश्च शिष्टा वचनैर्न ते तैः ।
अहो इदं दुर्गतमं तमोऽन्यत्
त्वया विना त्रायसमार्य ! किं तत् ॥२१॥

अर्थ: ‘शास्ता-बुद्धदेवने ही ( यथार्थ दर्शनादि गुणोंसे युक्त होनेके कारण) अनवद्य वचनोकी शिक्षा दी, परन्तु उन वचनोंके द्वारा उनके वे शिष्य शिक्षित नहीं हुए।’ यह कथन (बौद्धोका) अहो दूसरा दुर्गंतम अन्धकार है-अतीव दुष्पार महामोह है ॥-क्योंकि गुणवान शास्ताके होनेपर प्रतिपत्तियोग्य प्रतिपाद्य-शिष्योके लिये सत्य-वचनोंके द्वारा ही तत्त्वानुशासनका होना प्रसिद्ध है। बौद्धोके यहाँ बुद्धदेवके शास्ता प्रसिद्ध होनेपर भी, बुद्धदेवके वचनोंको सत्यरूपमे स्वीकार करनेपर भी और (बुद्ध-प्रवचन सुननेके लिये) प्रणिहितमन (दत्तावधान) शिष्योके मौजूद होते हुए भी वे शिष्य उन वचनोसे शिक्षित नही हुए, यह कथन बौद्धोका कैसे अमोह कहा जासकता है ?-नही कहा जासकता, और इस लिये बौद्धोका यह दर्शन (सिद्धान्त) परीक्षावानोंके लिये उपहासास्पद जान पडता है। (यदि यह कहा जाय कि इस शासनमे संवृतिसे-व्यवहारसे-शास्ता, शिष्य, शासन तथा शासनके उपायभूत वचनोंका सद्भाव स्वीकार किया जानेसे और परमार्थसे संवेदनाद्वैतके नि.श्रेयस-लक्षणकी-निर्वाण-रूपकी-प्रसिद्धि होनेसे यह दर्शन उपहासास्पद नही है, तो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योकि) हे आर्य-वीरजिन ! आपके विना-आप जैसे स्याद्वादनायक शास्ताके अभावमे-नि श्रेयस (कल्याण अथवा निर्वाण) बनता कौन-सा है, जिससे संवेदनाद्वैतको निःश्रेयसरूप कहा जाय ? सर्वथा एकान्त-वादका आश्रय लेनेवाले शास्ताके द्वारा कुछ भी सम्भव नहीं है, ऐसा प्रमाणसे परीक्षा किये जानेपर जाना जाता है। सर्वथा एकान्तवादमे संवृति और परमार्थ ऐसे दो रूपसे कथन ही नहीं बनता और दा रूपसे कथनमे सर्वथा एकान्तवाद अथवा स्याद्वादमत का विरोध स्थिर नहीं रहता।’


प्रत्यक्षबुद्धिः क्रमते न यत्र
तल्लिङ्ग-गम्यं न तदर्थ-लिङ्गम् ।
वाचो न वा तद्विषयेण योगः
का तद्गतिः ? कष्टमश्रद्दधतां ते ॥२२॥

अर्थ: ‘जिस (संवेदनाद्वैत) तत्त्वमे प्रत्यक्षबुद्धि प्रवृत्त नही होती-प्रत्यक्षतः किसीके जिसका तद्रूप निश्चय नहीं बनता-उसे यदि (स्वर्ग प्रापणशक्ति आदिकी तरह) लिङ्गगम्य माना जाय तो उसमे अर्थरूप लिङ्ग सम्भव नहीं हो सकता-क्योंकि वह स्वभावलिङ्ग उस तत्त्वकी तरह प्रत्यक्ष-बुद्धिसे अतिक्रान्त है, उसे, लिङ्गान्तरसे गम्य माननेपर अनवस्था दोष आता है तथा कार्यलिङ्गका सभव माननेपर द्वैतताका प्रसङ्ग आता है-और (परार्थानुमानरूप) वचनका उसके संवेदनाद्वैतरूप विषयके साथ योग नही बैठता-परम्परासे भी सम्बन्ध नहीं बनता, उस सं वेदनाद्वैत तत्त्वकी क्या गति है ?-प्रत्यक्षा, लैङ्गिकी और शाब्दीकी कोई भी गति न होनेसे उसकी प्रतिपत्ति (बोधगम्यता) नहीं बनती, वह किसीके द्वारा जाना नही जासकता । अत (हे वीरजिन !) आपको न सुननेवालोंका-आपके स्याद्वाद-शासनपर ध्यान न देने-वाले बौद्धोका-संवेदनाद्वैत दर्शन कष्टरूप है ।’


रागाद्यविद्याऽनल-दीपनं च
विमोक्ष-विद्याऽमृत शासनं च ।
न भिद्यते संवृति-वादि-वाक्यं
भवत्प्रतीपं परमार्थ-शून्यम् ॥२३॥

अर्थ: '(यदि संवृतिसे संवेदनाऽद्वैत तत्त्वकी प्रतिपत्ति मानकर बौद्ध दर्शनकी कष्टरूपताका निषेध किया जाय तो वह भी ठीक नहीं बैठता, क्योंकि संवृति वादियोंका रागादि-अविद्याऽनल-दीपन वाक्य और विमोक्ष-विद्याऽमृत-शासन-वाक्य परमार्थ-शून्य-विषयमे परस्पर भेदको लिये हुए नहीं बनता-अर्थात् जिस प्रकार संवृति-वादियोंके यहाँ ‘अग्निष्टोमेन यजेत स्वर्गकामः’ इत्यादि रागादि-अविद्याऽनलके दीपक वाक्य-समूहको परमार्थ-शून्य बतलाया जाता है उसी प्रकार उनका ‘सम्यग्ज्ञान-वैतृष्ण्य-भावनातो निःश्रेयसम्’ इत्यादि विमोक्षविद्याऽमृतका शासनात्मक-वाक्य-समूह भी परमार्थ-शून्य ठहरता है, दोनोमें परमार्थ-शून्यता-विषयक कोई भेद नही है, क्योकि ( हे वीर जिन ! ) उनमेसे प्रत्येक वाक्य भवत्प्रतीप है-आपके अनेकान्त-शासनके प्रतिकूल सर्वथा एकान्त-विषयरूपसे ही अङ्गीकृत है-और (इस लिये) परमार्थ शून्य है । (फलतः) आपके अनेकान्त-शासनका कोई भी वाक्य सर्वथा परमार्थ-शून्य नही है–मोक्ष विद्यामृतके शासनको लिये हुए वाक्य जिस प्रकार मोक्षकारणरूप परमार्थसे शून्य नही है उसी प्रकार रागाद्यविद्यानलका दीपक वाक्य भी बन्धकारणरूप परमार्थ से-वास्तविकतासे–शून्य नही है ।


विद्या-प्रसूतयै किल शील्यमाना
भवत्यविद्या गुरुणोपदिष्टा ।
अहो त्वदीयोक्त्यनभिज्ञ-मोहो
यज्जन्मने यत्तदजन्मने तत् ॥२४॥

अर्थ: ‘( हे वीर जिन ! ) आपकी उक्तिमे-स्याद्वादात्मककथन-शैलीसे-अनभिज्ञका–बौद्धोके एक सम्प्रदायका-यह कैसा मोह है–विपरीताभिनिवेश है-जो यह प्रतिपादन करता है कि ‘गुरुके द्वारा उपदिष्ट अविद्या भाव्यमान हुई निश्चयसे विद्याको जन्म देनेमे समर्थ होती है’, ( क्योकि ) इससे जो अविद्या अविद्यान्तरके जन्मका कारण सुप्रसिद्ध है वही उसके अजन्मका भी कारण होजाती है !! और यह स्पष्ट विपरीताभिनिवेश है जो दर्शनमोहके उदयाऽभावमे नही बन सकता । जो मदिरापान मदजन्मके लिये प्रसिद्ध है वही मदकी अनुत्पत्तिका हेतु होनेके योग्य नही होता ।’ विरोधकी कोई बात नहीं’ तो उसका यह कथन अपर्यालोचित है, क्योंकि भ्रम-दाह-मूर्छादि विकारको जन्म देने वाला जङ्गमविष अन्य है और उसे जन्म न देने वाला-प्रत्युत उस विकारको दूर कर देने वाला-- स्थावरविष अन्य ही है, जो कि उस विषका प्रतिपक्षभूत है, और इस लिये अमृत-कोटिमे स्थित है, इसीसे विषका ‘अमृत’ नाम भी प्रसिद्ध है। विष सर्वथा विष नही होता, उसे सर्वथा विष माननेपर वह विषान्तरका प्रतिपक्ष-भूत नही बन सकता। अतः विषका यह उदाहरण विषम है। उसे यह कह कर साम्य उदाहरण नहीं बतलाया जासकता कि अविद्या भी जो ससारकी हेतु है वह अनादि-वासनासे उत्पन्न हुई अन्य ही है और अविद्याके अनुकूल है, किन्तु मोक्षकी हेतुभूत अविद्या दूसरी है, जो अनादि-अविद्याके जन्मकी निवृत्ति करने वाली तथा विद्याके अनुकूल है, और इसलिये ससारकी हेतु अविद्याके प्रतिपक्षभूत है। क्योकि जो सर्वदा अविद्याके प्रतिपक्षभूत है उससे अविद्याका जन्म नही हो सकता, उसके लिये तो विद्यात्वका प्रसङ्ग उपस्थित होता है। यदि अनादि-अविद्याके प्रतिपक्षत्वके कारण उस अविद्याको कथञ्चित् विद्या कहा जायगा तो उससे संवृतिवादियोके मतका विरोध होकर स्याद्वादि-मतकै आश्रयका प्रसग आएगा। क्योकि स्याद्वादियोंके यहाँ केवल-ज्ञानरूप परमा विद्याकी अपेक्षा मतिज्ञानादिरूप क्षायोपशमिकी अपकृष्ट विद्या भी अविद्या मानी गई है–न कि अनादि-मिथ्याज्ञान-दर्शनरूप अविद्याकी अपेक्षा, क्योकि उसके प्रतिपक्षभूत होनेसे मतिज्ञानादिके विद्यापना सिद्ध है। अतः सर्वथा अविद्यात्मक भावना गुरुके द्वारा उपदिष्ट होती हुई भी विद्याको जन्म देनेमे समर्थ नही है। ऐसी अविद्याके उपदेशक गुरुको भी अगुरुत्व- का प्रसग आता है, क्योकि विद्याका उपदेशी ही गुरु प्रसिद्ध है। और इस लये पुरुषाद्वैतकी तरह सवेदनाद्वैत तत्त्व भी अनुपाय ही है–किसी भी उपाय अथवा प्रमाणसे वह जाना नहीं जा सकता ।)


अभावमात्रं परमार्थवृत्तेः
सा संवृतिः सर्व-विशेष-शून्या ।
तस्या विशेषौ किल बन्ध-मोक्षौ
हेत्वात्मनेति त्वदनाथवाक्यम् ॥२५॥

अर्थ: ‘परमार्थवृत्तिसे तत्त्व अभावमात्र है- न तो बाह्याभ्यन्तर निरन्वय क्षणिक परमाणुमात्र तत्त्व है, सौत्रान्तिक मतका निराकरण हो जानेसे, और न अन्तःसंवित्परमाणुमात्र या संवेदनाद्वैतमात्र तत्त्व है, योगाचारमतका निरसन हो जानेसे, किंतु माध्यमिक मतकी मान्यतानुरूप शून्यतत्त्व ही तत्त्व है-और वह परमार्थवृत्ति संवृत्तिरूप है-तात्त्विकी नहीं, क्योकि शून्यसंवित्ति तात्त्विकी होनेपर सर्वथा शून्य तत्त्व नहीं रहता, उसका प्रतिषेध हो जाता है-और संवृत्ति सर्वविशेषोंसे शून्य है-पदार्थसद्भाव-वादियोंके द्वारा जो तात्त्विक विशेष माने गये हैं उन सबसे रहित है-तथा उस अविद्यात्मिका एवं सकलतात्त्विक-विशेष-शून्या संवृत्तिके भी जो बंध और मोक्ष विशेष हैं वे हेत्वात्मक हैं-संवृतरूप हेतु-स्वभावके द्वारा विधीयमान हैं अर्थात् आत्मीयाभिनिवेशके द्वारा बंधका और नैरात्म्य-भावनाके अभ्यास-द्वारा मोक्षका विधान है, दोनोंमेंसे कोई भी तात्त्विक नहीं है । और इस लिये दोनो विशेष विरुद्ध नहीं पड़ते ।’-इस प्रकार ( हे वीर जिन ! ), यह उनका वाक्य है–उन सर्वथाशून्यवादि-बौद्धोका कथन है–जिनके आप (अनेकान्तवादी) नाथ नहीं हैं। (फलतः) जिनके आप नाथ हैं उन अनेकान्तवादियोका वाक्य ऐसा नहीं है किन्तु इस प्रकार है कि-स्वरूपादि चतुष्टयकी अपेक्षासे सद्रूप पदार्थ ही पर-रूपादि चतुष्टयकी अपेक्षासे अभाव (शून्य) रूप है । अभावमात्रके स्वरूप-से ही असत् होनेपर उसमे परमार्थिकत्व नही बनता, तब परमार्थवृत्तिसे अभावमात्र कहना ही असंगत है ।’


व्यतीत-सामान्य-विशेष-भावाद्
विश्वाऽभिलापाऽर्थ-विकल्प-शून्यम् ।
ख-पुष्पवत्स्यादसदेव तत्त्वं
प्रबुद्ध-तत्त्वाद्भवतः परेषाम् ॥२६॥

अर्थ: ‘हे प्रबुद्ध-तत्त्व वीरजिन ! आप अनेकान्तवादीसे भिन्न दूसरोका-अन्य एकान्तवादियोका-जो सर्वथा सामान्यभावसे रहित, सर्वथा विशेषभावसे रहित तथा ( परस्पर सापेक्षरूप ) सामान्य-विशेषभाव दोनोसे रहित जो तत्त्व है वह ( प्रकटरूपमे शून्य तत्त्व न होते हुए भी ) सम्पूर्ण अभिलापों तथा अर्थविकल्पोसे शून्य होनेके कारण आकाश-कुसुमके समान अवस्तु ही है ।’


अतत्स्वभावेऽप्यनयोरुपाया-
द्गतिर्भवेत्तौ वचनीय-गम्यौ ।
सम्बन्धिनौ चेन्न विरोधि दृष्टं
वाच्यं यथार्थं न च दूषणं तत् ॥२७॥

अर्थ: ‘यदि कोई कहे कि शून्यस्वभावके अभावरूप सत्स्वभाव तत्त्वके माननेपर भी इन (बन्ध और मोक्ष) दोनोकी उपायसे गति होती है-उपाय-द्वारा बन्ध और मोक्ष दोनो जाने जाते हैं-, दोनों वचनीय हैं और गम्य हैं-जब परार्थरूप वचन बन्ध-मोक्षकी गतिका ( जानकारी का ) उपाय होता है तब ये दोनों ‘वचनीय’ होते हैं और जब स्वार्थरूप प्रत्यक्ष या अनुमान बन्ध-मोक्षकी गतिका उपाय होता है तब ये दोनो ‘गम्य’ होते हैं। साथ ही, दोनों सम्बन्धी हैं-परस्पर अविनाभाव-सम्बन्धको लिये हुए हैं, बन्धके बिना मोक्षकी और मोक्षके बिना बन्धकी सम्भावना नहीं, क्योंकि मोक्ष बन्ध-पूर्वक होता है। और मोक्षके अभावमे बन्धको माननेपर जो पहलेसे अबद्ध है उसके पीछेसे बन्ध मानना पडेगा अथवा शाश्वतिक बन्धका प्रसग आएगा। अनादि बन्ध-सन्तानकी अपेक्षासे बन्धके बन्ध-पूर्वक होते हुए भी बन्धविशेषकी अपेक्षासे बन्धके अबन्ध-पूर्वकत्वकी सिद्धि होती है, प्राक् अबद्धके ही एकदेश मोक्षरूपता हानेसे बन्ध मोक्षके साथ अविनाभावी है और इस तरह दोनो अविनाभाव-सम्बन्धसे सम्बन्धित हैं-तो यह कहना ठीक नही है, क्योंकि इस प्रकार सत्स्वभावरूप तत्त्व दिखाई नही पड़ता, विरोध नज़र आता है-सर्वथा क्षणिक (अनित्य) और सर्वथा अक्षणिक ( नित्य ) आदिरूप मान्यताएँ विरोधको लिये हुए है। स्याद्वाद-शासनसे भिन्न परमतमे सत्त्व बनता ही नहीं-सर्वथा क्षणिक और सर्वथा अक्षणिककी मान्यतामें दूसरी जातिके ( परस्पर निरपेक्ष ) अनेकान्तका दर्शन, होता है, जो सदोष है अथवा वस्तुतः अनेकान्त नही हैं। सत्त्व सर्वथा एकान्तात्मक है ही नही, क्योकि प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे उसकी उपलब्धि नही होती ।’ ‘(इसपर यदि यह कहा जाय कि प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे भले ही सत्त्वकी उपलब्धि ( दर्शन-प्राप्ति ) न होती हो, परन्तु परपक्षके दूषणसे तो उसकी सिद्धि होती ही है, तो यह कहना भी ठीक नही है, क्योकि ) जो यथार्थ वाच्य होता है वह दूषणरूप नही होता-जिसको क्षणिक-एकान्त-वादी परपक्षमे स्वय दूषण बतलाता है उसमें यथा^-वाच्यता होनेसे अथवा परपक्षकी तरह स्वपक्षमे भी उसका सद्भाव होनेसे उसे दूषणरूप नही कह सकते, वह दूषणाभास है ! और जो दूषण परपक्षकी तरह स्वपक्षका भी निराकरण करता हो वह यथार्थ वाच्य नहीं हो सकता । वास्तवमे दोनो सर्वथा एकान्तोसे, विरोधके कारण, अनेकान्तकी निवृत्ति होती है, अनेकांतकी निवृत्तिसे क्रम और अक्रम निवृत्त होजाते हैं, क्रम-अक्रमकी निवृत्तिसे अर्थ-क्रियाकी निवृत्ति हो जाती है-क्रम अक्रमके बिना कही भी अर्थ-क्रियाकी उपलब्धि नही होती-और अर्थ-क्रियाकी निवृत्ति होनेपर वस्तुतत्त्वकी व्यवस्था नहीं बनती क्योकि वस्तुतत्त्वकी अर्थ-क्रियाके साथ व्याप्ति है। और इसलिये सर्वथा एकान्तमे सत्त्व की प्रतिष्ठा ही नही हो सकती ।’


उपेय-तत्त्वाऽनभिलाप्यता-वद्-
उपाय-तत्त्वाऽनभिलाप्यता स्यात् ।
अशेष-तत्त्वाऽनभिलाप्यतायां
द्विषां भवद्युक्त्यभिलाप्यतायाः ॥२८॥

अर्थ: ‘( हे वीर जिन ! ) आपकी युक्तीकी-स्याद्वादनीतिकी-अभिलाप्यताके जो द्वेषी हैं-सम्पूर्ण वस्तुतत्त्व स्वरूपादि-चतुष्टयकी (स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावकी ) अपेक्षा कथञ्चित् सत्-रूप ही है, पररूपादि-चतुष्टयकी ( परद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावकी ) अपेक्षा कथञ्चित् असत्-रूप ही है इत्यादि कथनीके साथ द्वेषभाव रखते है-उन द्वेषियोंकी इस मान्यतापर कि ‘सम्पूर्ण तत्त्व अनभिलाप्य ( अवाच्य ) है’ उपेयतत्त्वकी अवाच्यताके समान उपायतत्त्व भी सर्वथा अवाच्य ( अवक्तव्य ) हो जाता है-जिस प्रकार नि.श्रेयस ( निर्वाण-मोक्ष ) तत्त्वका कथन सर्वथा नही किया जा सकता उसी प्रकार उसकी प्राप्तिके उपायभूत निर्वाणमार्गका कथन भी सर्वथा नही किया जा सकता, क्योकि दोनोमे परस्पर तत्त्व-विषयक काई विशेषता नही है ।’


अवाच्यमित्यत्र च वाच्यभावा-
दवाच्यमेवेत्ययथाप्रतिज्ञम् ।
स्वरूपतश्चेत्पररूपवाचि
स्वरूपवाचीति वचो विरुद्धम् ॥२९॥

अर्थ: ‘(अशेष तत्त्व सर्वथा अवाच्य है ऐसी एकान्त मान्यता होने पर) तत्त्व अवाच्य ही है ऐसा कहना अयथाप्रतिज्ञ-प्रतिज्ञाके विरुद्ध-होजाता है; क्योंकि ‘अवाच्य’ इस पदमे ही वाच्यका भाव है-वह किसी बातको बतलाता है, तब तत्त्व सर्वथा अवाच्य न रहा । यदि यह कहा जाय कि तत्त्व स्वरूपसे अवाच्य ही है तो ‘सर्व वचन स्वरूपवाची है’ यह कथन प्रतिज्ञाके विरुद्ध पडता है । और यदि यह कहा जाय कि पररूपसे तत्त्व अवाच्य ही है तो ‘सर्ववचन पररूपवाची है’ यह कथन प्रतिज्ञाके विरुद्ध ठहरता है ।’ किया गया है । इसी निरसनके सामर्थ्यसे सदवाच्यादि शेष मिथ्याप्रवादोंका भा निरसन हो जाता है । अर्थात् न्यायकी समानतासे यह फलित होता है कि न तो सर्वथा सदवाच्य तत्त्व है, न असदवाच्य, न उभयाऽवाच्य और न अनुभयाऽवाच्य । ]


सत्याऽनृतं वाऽप्यनृताऽनृत वा-
ऽप्यस्तीह किं वस्त्वतिशायनेन ।
युक्तं प्रतिद्वन्द्व्यनुबन्धि-मिश्रं
न वस्तु तादृक् त्वदृते जिनेन्द्र ॥३०॥

अर्थ: ‘कोई वचन सत्याऽनृत ही है, जो प्रतिद्वन्द्वीसे मिश्र है-जैसे शाखाग्र चन्द्रमाको देखो, इस वाक्यमे ‘चन्द्रमाको देखो’ तो सत्य है और ‘शाखाग्र’ यह वचन विसंवादी होनेसे असत्य है । दूसरा कोई वचन अनृताऽनृत ही है, जो अनुबन्धिसे मिश्र है-जैसे पर्वतपर चन्द्रयुगलको देखो, इसमें ‘चन्द्रयुगल’ वचन जिस तरह असत्य है उसी तरह ‘पर्वतपर’ यह वचन भी विसंवादि-ज्ञानपूर्वक होनेसे असत्य है । इस प्रकार हे वीर जिन ! आप स्याद्वादीके बिना वस्तुके अतिशायनसे-सर्वथा प्रकारसे अभिधेयके निर्देश-द्वारा-प्रवर्तमान जो वचन है वह क्या युक्त है ?-युक्त नही है । (क्योकि) स्याद्वादसे शून्य उस प्रकारका अनेकान्त वास्तविक नही है -वह सर्वथा एकान्त है और सर्वथा एकान्त अवस्तु होता है ।’


सह-क्रमाद्वा विषयाऽल्प-भूरि-
भेदेऽनृतं भेदि न चाऽऽत्मभेदात् ।
आत्मान्तरं स्याद्विदुरं समं च
स्याच्चाऽनृतात्माऽनभिलाप्यता च ॥३१॥

अर्थ: 'विषय (अभिधेय) का अल्प-भूरि भेद-अल्पाऽनल्प विकल्प- होनेपर अनृत (असत्य) भेदवान् होता है-जैसे जिस वचनमें अभिधेय अल्प असत्य और अधिक सत्य हो उसे ‘सत्याऽनृत’ कहते हैं, इसमे सत्य विशेषणसे अनृतको भेदवान् प्रतिपादित किया जाता है। और जिस वचनका अभिधेय अल्प सत्य और अधिक असत्य हो उसे ‘अनृताऽनृत’ कहते हैं, इसमें अनृत विशेषणसे अनृतको भेदरूप प्रतिपादित किया जाता है। आत्मभेदसें अनृत भेदवान् नहीं होता-क्योकि सामान्य अनृतात्माके द्वारा भेद घटित नही होता। अनृतका जो आत्मान्तर-आत्मविशेष लक्षण-है वह भेद-स्वभावको लिये हुए है-विशेषणके भेदसे, और सम (अभेद) स्वभावको लिये हुए है-विशेषणभेदके अभावसे। साथ ही (‘च’ शब्दसे) उभयस्वभावको लिये हुए है-हेतुद्वयके अर्पणाक्रमकी अपेक्षा। (इसके सिवाय) अनृतात्मा अनभिलाप्यता (अवक्तव्यता) को प्राप्त है-एक साथ दोनो धर्मोका कहा जाना शक्य न होने के कारण, और (द्वितीय ‘च’ शब्दके प्रयोगम) भेदि अनभिलाप्य, अभेदि-अनभिलाप्य और उभय (भेदाऽभेद) अनभिलाप्यरूप भी वह है-अपने अपने हेतुकी अपेक्षा। इसतरह अनृतात्मा अनेकान्तदृष्टिसे भेदाऽभेदकी सप्तभंगीको लिये हुए है।’


न सच्च नाऽसच्च न दृष्टमेक-
मात्मान्तरं सर्व-निषेध-गम्यम् ।
दृष्टं विमिश्रं तदुपाधि-भेदात्
स्वप्नेऽपि नैतत्त्वदृशेः परेषाम् ॥३२॥

अर्थ: ‘तत्त्व न तो सन्मात्र-सत्ताद्वैतरूप-है और न असन्मात्र-सर्वथा अभावरूप-है, क्योंकि परस्पर निरपेक्ष सत्त्व और असत्त्व दिखाई नही पडता-किसी भी प्रमाणसे उपलब्ध न होनेके कारण उसका होना असम्भव है। इसी तरह (सत्, असत्, एक, अनेकादि) सर्वधर्मोके निषेधका विषयभूत कोई एक आत्मान्तर-- परमब्रह्म-तत्त्व भी नहीं देखा जाता–उसका भी होना असम्भव है। हाँ, सत्त्वाऽसत्त्वसे विमिश्र परस्पराऽपेक्षरूप तत्त्व ज़रूर देखा जाता है और वह उपाधिके-स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावरूप तथा परद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावरूप विशेषणोंके-भेदसे है अर्थात् सम्पूर्णतत्त्व स्यात् सद्रूप ही है, स्वरूपादिचतुष्टयकी अपेक्षा, स्यात् ‘असद्रूप ही है, पररूपादिचतुष्टयकी अपेक्षा, स्यात् उभयरूप ही है, स्व-पर-रूपादिचतुष्टय-द्वयके क्रमार्पणाकी अपेक्षा, स्यात् अवाच्यरूप ही है, स्व-पर-रूपादि-चतुष्टय-द्वयके सहार्पणाकी अपेक्षा, स्यात्सद्वाच्यरूप ही है, स्वरूपादि-चतुष्टयकी अपेक्षा तथा युगपत्स्व-पर-रूपादिचतुष्टयोके कथनकी अशक्तिकी अपेक्षा, स्यात् असद्वाच्य रूप ही है, पररूपादि-चतुष्टयकी अपेक्षा तथा स्व-पर-रूपादि-चतुष्टयोके युगपत् कहनेकी अशक्तिकी अपेक्षा, और स्यात् सदसद्वाच्यरूप है, क्रमार्पित स्व-पर-रूपादिचतुष्टय-द्वयकी अ पेक्षा तथा सहार्पित उक्त चतुष्टयद्वयकी अपेक्षा । इस तरह तत्त्व सत् असत् आदिरूप विमिश्रित देखा जाता है और इसलिये हे वीर जिन ! वस्तुके अतिशयनसे (सर्वथा निर्देशद्वारा) किञ्चित् सत्याऽनृतरूप वचन आपके ही युक्त हैं। आप ऋषिराजसे भिन्न जो दूसरे सर्वथा सत् आदि रूप एकान्तोंके वादी है उनके यह वचन अथवा इस रूप तत्त्व स्वप्नमे भी सम्भव नही है।’


प्रत्यक्ष-निर्देशवदप्यसिद्ध-
मकल्पकं ज्ञापयितुं ह्यशक्यम् ।
विना च सिद्धेर्न च लक्षणार्थो
न तावक-द्वेषिणि वीर ! सत्यम् ॥३३॥

अर्थ: '(यदि यह कहाजाय कि निर्विकल्पकप्रत्यक्ष निरंश वस्तुका प्रतिभासी ही है, धर्मि-धर्मात्मकरूप जो सांश वस्तु है उसका प्रतिभासी नहीं-उसका प्रतिभासी वह सविकल्पक ज्ञान है जो निर्विकल्पक प्रत्यक्षके अनन्तर उत्पन्न होता है, क्योकि उसीसे यह धर्मी है यह धर्म है ऐसे धर्मि-धर्म-व्यवहारकी प्रवृत्ति पाई जाती है । अतः सकल कल्पनाओंसे रहित प्रत्यक्षके द्वारा निरंश स्वलक्षणका जो अदर्शन बतलाया जाता है वह असिद्ध है, तब ऐसे असिद्ध अदर्शन साधनसे उस निरंश वस्तुका अभाव कैसे सिद्ध किया जासकता है ? ता इस बौद्ध प्रश्नका उत्तर यह है कि-)
'जो प्रत्यक्षके द्वारा निर्देशको प्राप्त ( निर्दिष्ट हानेवाला ) हो - प्रत्यक्ष ज्ञानसे देखकर ‘यह नीलादिक है’ इस प्रकारके वचन-विना ही अ गुलीसे जिसका प्रदर्शन किया जाता हो-ऐसा तत्त्व भी असिद्ध है, क्योकि जो प्रत्यक्ष अकल्पक है-सभी कल्पनाओंस रहित निर्विकल्पक है-वह दूसरोको (सशयित-विनेयो अथवा संदिग्ध व्यक्तियोका) तत्त्वके बतलाने-दिखलानेमे किसी तरह भी समथ नही होता है । ( इसके शिवाय) निर्विकल्पक प्रत्यक्ष भी असिद्ध है, क्योंकि (किसी भी प्रमाण-के द्वारा) उसका ज्ञापन अशक्य है । प्रत्यक्षप्रमाणसे तो वह इसलिये ज्ञापित नहीं किया जा सकता क्योकि वह परप्रत्यक्षके द्वारा असवेद्य है । श्रौर अनुमान प्रमाणके द्वारा भी उसका ज्ञापन नहीं बनता, क्योकि उस प्रत्यक्षके साथ अविनाभावी लिङ्ग ( साधन ) का ज्ञान असम्भव है-दूमरे लाग जिन्हें लिङ्ग-लिङ्गीके सम्बन्धका ग्रहण नही हुआ उन्हे अनुमानके द्वारा उसे कैसे बतलाया जा सकता है ? नही बतलाया जा सकता । और जा स्वय प्रतिपन्न है-निर्विकल्पक प्रत्यक्ष तथा उसके अविनाभावी लिङ्गको जानता है-उसके निर्विकल्पक प्रत्यक्षका ज्ञापन करानेके लिये अनुमान निरर्थक है । समारोपादिकी-भ्रमोत्पत्ति श्रोर अनुमानके द्वारा उसके व्यवच्छेदकी-बात कहकर उसे सार्थक सिद्ध नही किया जा सकता, क्योकि साध्य-साधनके सम्बन्धसे जो स्वय अभिज्ञ है उसके तो समारोपका होना ही असम्भव है और जो अभिज्ञ नही है उसके साध्य-साधन-सम्बन्धका ग्रहण ही सम्भव नही है, और इसलिये गृहीतकी विस्मृति जैसी कोई बात नहीं बन सकती । इस तरह अकल्पक प्रत्यक्षका कोई ज्ञापक न हानेसे उसकी व्यवस्था नहीं बनती, तब उसकी सिद्धि कैसे हा सकती है ? श्रौर जब उसकी ही सिद्धि नही तब उसके द्वारा निर्दिष्ट होनेवाले निरंश वस्तु-तत्त्वकी सिद्धि कैसे बन सकती है ? नहीं बन सकती । अतः दोनो ही असिद्ध ठहरते हैं ।’
‘प्रत्यक्षकी सिद्धिके बिना उसका लक्षणार्थ भी नहीं बन सकता-‘जो ज्ञान कल्पनासे रहित है वह प्रत्यक्ष है’ (‘प्रत्यक्षं कल्पनापोढम्’ ‘कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षम्’ ) ऐसा बौद्धोके द्वारा निर्दिष्ट प्रत्यक्ष-लक्षण-का जो अर्थ प्रत्यक्षका बोध कराना है वह भी घटित नही हो सकता । अतः हे वीर भगवन् ! आपके अनेकान्तात्मक स्याद्वादशासनका जो द्वेषी है- सर्वथा सत् आदिरूप एकान्तवाद है-उसमे सत्य घटित नहीं होता -एकान्ततः सत्यको सिद्ध नही किया जा सकता ।’


कालान्तरस्थे क्षणिके ध्रुवे वा-
ऽपृथक्पृथक्त्वादवचनीयतायाम् ।
विकारहानेर्न च कर्तृ कार्ये
वृथा श्रमोऽयं जिन ! विद्विषां ते ॥३४॥

अर्थ: ‘पदार्थके कालान्तरस्थायी होने पर-जन्मकालसे अन्यकालमे ज्योका त्यो अपरिणामी रूपसे अवस्थित रहने पर-, चाहे वह अभिन्न हो भिन्न हो या अनिर्वचनीय हो, कर्ता और कार्य दोनों भी उसी प्रकार नही बन सकते जिस प्रकार कि पदार्थके सर्वथा क्षणिक (अनित्य) अथवा ध्रुव (नित्य) होने पर नही बनते१, क्योंकि तब विकारकी निवृत्ति होती है–विकार परिणामको कहते है, जो स्वयं अवस्थित द्रव्यके पूर्वाकारके परित्याग, स्वरूपके अत्याग और उत्तरोत्तराकारके उत्पादरूप होता है । विकारकी निवृत्ति क्रम और अक्रमको निवृत्त करती है, क्योकि क्रम-अक्रमकी विकारके साथ व्याप्ति ( अविनाभाव सम्बन्धकी प्राप्ति) है। क्रम-अक्रमकी निवृत्ति क्रियाको निवृत्त करती है, क्योंकि क्रियाके साथ उनकी व्याप्ति है। क्रियाका अभाव होने पर कोई कर्त्ता नही बनता, क्योकि क्रियाधिष्ठ स्वतन्त्र द्रव्यके ही कर्तृत्वकी सिद्धि होती है। और कर्ताके अभावमे कार्य नही बन सकता-स्वय समीहित स्वर्गाऽपवर्गादिरूप किसी भी कार्यकी सिद्धि नही हो सकती। (अत.) हे वीर जिन ! आपके द्वेषियोंका-आपके अनेकान्तात्मक स्याद्वाद-शासनसे द्वेष रखनेवाले (बौद्ध, वैशेषिक, नैयायिक, सांख्य आदि) सर्वथा एकान्तवादियोंका-यह श्रम-स्वर्गाऽपवर्गादिकी प्राप्तिके लिये किया गया यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि आदिरूप सम्पूर्ण दृश्यमान तपोलक्षण प्रयास-व्यर्थ है-उससे सिद्धान्ततः कुछ भी साध्यकी सिद्धि नही बन सकती।’

युक्त्यनुशासन (भाग 2/2)

मद्याङ्गवद्भूत समागमे ज्ञः
शक्त्यन्तर-व्यक्तिरदैव-सृष्टिः ।
इत्यात्म-शिश्नोदर-पुष्टि-तुष्टै -
र्निर्ह्रीभयैर्हा ! मृदवः प्रलब्धाः ॥३५॥

अर्थ: ‘जिस प्रकार मद्याङ्गोंके-मद्यके अङ्गभूत पिष्टोदक, गुड, धातकी आदिके-समागमे (समुदाय) पर मदशक्तिकी उत्पत्ति अथवा आवि- र्भूति होती है उसी तरह भूतोंके-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तत्त्वोंके-समागमपर चैतन्य उत्पन्न अथवा अभिव्यक्त होता है-वह कोई जुदा तत्त्व नहीं है, उन्हींका सुख-दुःख हर्ष-विषाद-विवर्त्तात्मक स्वाभाविक परिणाम विशेष है। और यह सब शक्तिविशेषकी व्यक्ति है, कोई दैव-सृष्टि नहीं है। इस प्रकार यह जिनका-कार्यवादी अविद्धकर्णादि तथा अभिव्यक्तिवादी पुरन्दरादि चार्वाकोंका-सिद्धान्त है उन अपने शिश्न (लिङ्ग) तथा उदरकी पुष्टिमे ही सन्तुष्ट रहनेवाले निर्लज्जों तथा निर्भयोंके द्वारा हा ! कोमलबुद्धि-भोले मनुष्य–ठगे गये हैं ॥’ और पर लाकके भयका हृदयोसे निकालकर तथा लोक-लाजको भी उठाकर उनकी पापमे निरंकुश प्रवृत्ति कराते है, ऐसे लागोका आचार्यमहोदयने जो ‘निर्भय’ और ‘निर्लज्ज’ कहा है वह ठीक ही है । ऐसे लोग विवेक-शून्य होकर स्वय विषयोमे अन्धे हुए दूसरोका भी उन पापोमे फँसाते हैं, उनका अध.-पतन करते है और उसमे आनन्द मनाते है,-जो कि एक बहुत ही निकृष्ट प्रवृत्ति है । यहा भोले जीवोके ठगाये जानेकी बात कहकर आचार्य-महोदयने प्रकारान्तरसे यह भी सूचित किया है कि जो प्रौढ बुद्धिके धारक विचारवान् मनुष्य है वे ऐसे ठग वचनोके द्वारा कभी ठगाये नही जा सकते । वे जानते है कि परमार्थसे जो अनादि-निधन उपयोग-लक्षण चैतन्यस्वरूप आत्मा है वह प्रमाणसे प्रसिद्ध है और पृथिव्यादि भूतोके समागमपर चैतन्यका सर्वथा उत्पन्न अथवा अभिव्यक्त होना व्यवस्थापित नही किया जा सकता । क्योंकि शरीराकार-परिणत पृथिव्यादि भूतोके सगत, अविकल और अनुपहतवीर्य होनेपर भी जिस चैतन्यशक्तिके वे अभिव्यञ्जक कहे जाते हैं उसे या तो पहलेसे सत् कहना होगा या असत् अथवा उभयरूप । इन तीन विकल्पोके सिवाय दूसरी कोई गति नही है । यदि अभिव्यक्त होनेवाली चैतन्यशक्तिको पहलेसे सद्रूप (विद्यमान) माना जायगा ता सर्वदा सद्रूप शक्तिकी ही अभिव्यक्ति सिद्ध होनेसे चैतन्यशक्तिके अनादित्व और अनन्तत्वकी सिद्धि ठहरेगी । और उसके लिये यह अनुमान सुघटित होगा कि–‘चैतन्यशक्ति कथंचित् नित्य है, क्योकि वह सद्रूप और अकारण है ‘जैसे कि पृथिवी आदि भूतसामान्य ।’ इस अनुमानमे ‘सदकारणत्व’ हेतु व्यभिचारादि दोषोसे रहित होनेके कारण समीचीन है और इसलिये चैतन्यशक्तिका अनादि-अनन्त अथवा कथञ्चित् नित्य सिद्ध करनेमे समर्थ है । यदि यह कहा जाय कि पिष्टोदकादि मत्रागोसे अभिव्यक्त होनेवाली मदशक्ति पहलेसे सद्रूप होते हुए भी नित्य नही मानी जाती और इस- लिये उस सत् तथा अकारणरूप मदशक्ति के साथ हेतुका विरोध है, तो यह कहना ठीक नही, क्योकि वह मदशक्ति भी कथञ्चिन्नित्य है और उसका कारण यह है कि चेतनद्रव्यके ही मदशक्तिका स्वभावपना है, सर्वथा अचेतनद्रव्योंमे मदशक्तिका होना असम्भव है, इसीसे द्रव्यमन तथा द्रव्येन्द्रियोके, जो कि अचेतन है, मदशक्ति नही बन सकती-भावमन और भावेन्द्रियोके ही, जो कि चेतनात्मक हैं, मदशक्तिकी सम्भावना है। यदि अचेतन द्रव्य भी मदशक्तिको प्राप्त होवे तो मद्यके भाजनों अथवा शराबकी बोतलोको भी मद अर्थात् नशा होना चाहिये और उनकी भी चेष्टा शराबियो जैसी होनी चाहिये, परन्तु ऐसा नही है । वस्तुतः चेतनद्रव्यमे मदशक्तिकी अभिव्यक्तिका बाह्य कारण मद्यादिक और अन्तरङ्ग कारण मोहनीय कर्मका उदय है-मोहनीयकर्मके उदय-बिना बाह्यमें मद्यादिका संयोग होते हुए भी मदशक्तिकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती । चुनांचे मुक्तात्माओमे दोनों कारणोंका अभाव होनेसे मदशक्तिकी अभिव्यक्ति नही बनती । और इसलिये मदशक्तिक द्वारा उक्त सदकारणत्व, हेतुमें व्यभिचार दोष घटित नहीं हो सकता, वह चैतन्यशक्तिका नित्यत्व सिद्ध करनेमे समर्थ है । चैतन्यशक्तिका नित्यत्व सिद्ध होनेपर परलोकी और परलोकादि सब सुघटित होते है । जो लोग परलोकीको नही मानते उन्हे यह नहीं कहना चाहिए कि ‘पहलेसे सद्रूपमे विद्यमान चैतन्यशक्ति अभिव्यक्त होती है ।’
यदि यह कहा जाय कि अविद्यमान चैतन्यशक्ति अभिव्यक्त होती है तो यह प्रतीतिके विरुद्ध है, क्योकि जो सर्वथा असत् हो ऐसी किसी भी चीजकी अभिव्यक्ति नही देखी जाती । और यदि यह कहा जाय कि कथञ्चित् सद्रूप तथा कथचित् असद्रूप शक्ति ही अभिव्यक्त होती है तो इससे परमतकी-स्याद्वाद शासनकी-सिद्धि होती है, क्योकि स्याद्वादियोको उस चैतन्यशक्तिकी कायाकार-परिणत-पुद्गलोके द्वारा अभिव्यक्ति अभीष्ट है जो द्रव्यदृष्टिसे सद्रूप होते हुए भी पर्यायदृष्टिसे असत् बनी हुई है । और इसलिये सर्वथा चैतन्यकी अभिव्यक्ति प्रमाण-बाधित है, जो उसका जैसे तैसे वचक वचनोके रूपमे प्रतिपादन करते है उन चार्वाकोके द्वारा सुकुमारबुद्धि मनुष्य निःसन्देह ठगाये जाते है ।


दृष्टेऽविशिष्टे जननादि-हेतौ
विशिष्टता का प्रतिसत्त्वमेषाम् ।
स्वभावतः किं न परस्य सिद्धि-
रतावकानामपि हा ! प्रपातः ॥३६॥

अर्थ: ‘जब जननादि हेतु-चैतन्यकी उत्पत्ति तथा अभिव्यक्तिका कारण पृथिवी आदि भूतोका समुदाय-अविशिष्ट देखा जाता है-उसमे कोई विशेषता नही पाई जाती और दैवसृष्टि (भाग्यनिर्माणादि) को अस्वीकार किया जाता है-तब इन (चार्वाकों) के प्राणि प्राणि के प्रति क्या विशेषता बन सकती है ?-कारणमे विशिष्टताके न होनेसे भूतसमागमकी और तज्जन्य अथवा तदभिव्यक्त चैतन्यकी कोई भी विशिष्टता नही बन सकती, तब इस दृश्यमान बुद्ध्यादि चैतन्यके विशेषको किस आधारपर सिद्ध किया जायगा ? कोई भी आधार उसके लिये नही बनता ।’

‘(इसपर) यदि उस विशिष्टताकी सिद्धि स्वभावसे ही मानो जाय तो फिर चारों भूतोंसे भिन्न पाँचवें आत्मतत्त्वकी सिद्धि स्वभावमे क्यों नहीं मानी जाय ?-उसमें क्या बाधा आती है और इसे न मान कर ‘भूतोका कार्य चैतन्य’ माननेसे क्या नतीजा, जो किसी तरह भी सिद्ध नहीं हो सकता ? क्योकि यदि कायाकार-परिणत भूतोंका कार्य होनेसे चैतन्यकी स्वभावसे सिद्धि है तो यह प्रश्न पैदा हाता है कि पृथिवी आदि भूत उस चैतन्यके उपादान कारण है या सहकारी कारण ? यदि उन्हे उपादान कारण माना जाय तो चैतन्यके भूतान्वित होनेका प्रसङ्ग आता है-अर्थात् जिस प्रकार सुवर्णके उपादान होनेपर मुकट, कु डलादिक पर्यायोंमें सुवर्णका अन्वय (वश) चलता है तथा पृथिवी आदिके उपादान होनेपर शरीरमें पृथिवी आदिका अन्वय चलता है उसी प्रकार भूतचतुष्टयके उपादान होने पर चैतन्यमे भूतचतुष्टयका अन्वय चलना चाहिये-उन भूतोका लक्षण उसमे पायाजाना चाहिये । क्योकि उपादान द्रव्य वही कहलाता है जो व्यक्ताऽव्यक्त-आत्मरूप हो, पूर्वाऽपूर्वेके साथ वर्तमान हो और त्रिकालवर्ती जिसका विषय हो १ । परन्तु भूतसमुदाय ऐसा नही देखा जाता कि जा अपने पहले अचेतनाकारका त्याग करके चेतनाकारको ग्रहण करता हुआ भूतोके धारणा-ईरणा-द्रव-उष्णता-लक्षण स्वभावसे अन्वित (युक्त) हो । क्योकि चैतन्य धारणादि भूतस्वभावसे रहित जाननेमे आता है और कोई भी पदार्थ अत्यन्त विजातीय कार्य करता हुआ प्रतीत नही होता । भूतोका धारणादि-स्वभाव और चैतन्य ( जीव ) का ज्ञान-दर्शनापयोग-लक्षण दानो एक दूसरेसे अत्यन्त विलक्षण एव विजातीय हैं । अतः अचेतनात्मक भूतचतुष्टय अत्यन्त विजातीय चैतन्यका उपादान कारण नही बन सकता-दोनोमे उपादानोपादेयभाव सभव ही नही । और यदि भूतचतुष्टयको चैतन्यकी उत्पत्तिमे सहकारी कारण माना जाय ता फिर उपादान कारण कोई ओर बतलाना हागा, क्योकि बिना उपादानके कोई भी कार्य सभव नहीं । जब दूसरा काई उपादान कारण नही और उपादान तथा सहकारी कारणसे भिन्न तीसरा भी कोई कारण ऐसा नही जिससे भूत चतुष्टयको चैतन्यका जनक स्वीकार किया जा सके, तब चैतन्यकी स्वभावसे ही भूतविशेषकी तरह तत्त्वान्तरके रूपमे सिद्धि होती है । इस तत्त्वा- न्तर-सिद्धिको न माननेवाले जो अतावक हैं-दर्शनमोहके उदयसे आकुलित-चित्त हुए आप वीर जिनेन्द्रके मतसे बाह्य हैं-उन (जीविका-मात्र-तन्त्र-विचारकों) का भी हाय ! यह कैसा प्रपतन हुआ है, जो उन्हें संसार समुद्रके आवर्तमे गिराने वाला है !’


स्वच्छन्दवृत्तेर्जगतः स्वभावा-
दुच्चैरनाचार-पथेष्वदोषम् ।
निर्घुष्य दीक्षासममुक्तिमाना-
स्त्वद्दृष्टि-बाह्या बत ! विभ्रमन्ते ॥३७॥

अर्थ: ‘स्वभावसे ही जगतकी स्वच्छन्द-वृत्ति-यथेच्छ प्रवृत्ति-है, इस लिये जगत्‌के ऊँचे दर्जेके अनाचारमागोंमे-हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील (अब्रह्म) और परिग्रह नामके पाँच महापापोंमें-भी कोई दोष नहीं, ऐसी घोषणा करके-उनके अनुष्ठान-जैसी सदोष प्रवृत्तिको निर्दोष बतलाकर-जो लोग दीक्षाके समकाल ही मुक्तिको मानकर अभिमानी हो रहे हैं-सहजग्राह्य-हृदयमे मन्त्रविशेषारोपणके समय ही मुक्ति हो जाने (मुक्तिका सर्टिफिकेट मिल जाने) का जिन्हें अभिमान है-अथवा दीक्षाका निरास जैसे बने वैसे (दीक्षानुष्ठानका निवारण करनेके लिये ) मुक्तिको जो (मीमांसक) अमान्य कर रहे हैं और मासभक्षण, मद्यपान तथा मैथुनसेवन-जैसे अनाचारके मागोंके विषयमें स्वभावसे ही जगत्‌की स्वच्छन्द प्रवृत्तिको हेतु बताकर यह घोषणा कर रहे हैं कि उसमे कोई दोष नहीं है१ वे सब (हे वीर जिन !) आपकी दृष्टिसे-बन्ध, मोक्ष और तत्कारण-निश्चयके निबन्धनस्वरूप आपके स्याद्वाददर्शनसे-बाह्य हैं और (सर्वथा एकान्तवादी होनेसे) केवल विभ्रममे पडे हुए हैं-तत्त्वके निश्चयको प्राप्त नही होते-यह बड़े ही खेद अथवा कष्टका विषय है ॥’


प्रवृत्ति-रक्तैः शम-तुष्टि-रिक्तै -
रुपेत्य हिंसाऽभ्युदयाङ्ग-निष्ठा ।
प्रवृत्तितः शान्तिरपि प्ररूढं
तमः परेषां तव सुप्रभातम् ॥३८॥

अर्थ: ‘जो लोग शम और तुष्टिसे रिक्त है-क्रोधादिककी शान्ति और सन्तोष जिनके पास नही फटकते-(और इस लिये) प्रवृत्ति-रक्त हैं-हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील तथा परिग्रहमे कोई प्रकारका नियम अथवा मर्यादा न रखकर उनमे प्रकर्षरूपसे प्रवृत्त अथवा आसक्त है-उन (यज्ञ-वादी मीमासको) के द्वारा, प्रवृत्तिको स्वयं अपनाकर, ‘हिंसा अ+भ्युदय (स्वर्गादिकप्राप्ति) के हेतुकी आधारभूत है’ ऐसी जो मान्यता प्रचलित की गई है वह उनका बहुत बड़ा अन्धकार है-अज्ञानभाव है। इसी तरह (वेदविहित पशुवधादिरूप) प्रवृत्तिसे शान्ति होती है ऐसी जो मान्यताहै वह भी (स्याद्वादमतसे बाह्य) दूसरोंका घोर अन्धकार है-क्योकि प्रवृत्ति रागादिकके उद्रेकरूप अशान्तिकी जननी है न कि अरागादिरूप शान्तिकी । (अतः हे वीरजिन !) आपका मत ही (सकल-अज्ञान-अन्धकारको दूर करनेमे समर्थ होनेसे ) सुप्रभातरूप है, ऐसा सिद्ध होता है ।’


शीर्षोपहारादिभिरात्मदुःखै-
र्देवान् किलाऽऽराध्य सुखाभिगृद्धाः ।
सिद्ध्यन्ति दोषाऽपचयाऽनपेक्षा
युक्तं च तेषां त्वमृषिर्न येषाम् ॥३९॥

अर्थ: ‘जीवात्माके लिये दुःखके निमित्तभूत जो शीर्षोपहारादिक हैं-अपने तथा बकरे आदिके सिरकी बलि चढाना, गुग्गुल धारण करना, मकरको भोजन कराना, पर्वतपरसे गिरना जैसे कृत्य हैं-उनके द्वारा (यक्ष-महेश्वरादि) देवोंकी आराधना करके ठीक वे ही लोग सिद्ध होते हैं- अपनेको सिद्ध समझते तथा घोषित करते है-जो दोषोंके अपचय (विनाश) को अपेक्षा नहीं रखते-सिद्ध होनेके लिये राग-द्वेषादि-विकारोको दूर करनेकी जिन्हें पर्वाह नहीं है-और सुखाभिगृद्ध हैं–काम-सुखादिके लोलुपी हैं।। और यह (सिद्धिकी मान्यतारूप प्ररूढ अन्धकार) उन्हीके युक्त है जिनके हे वीरजिन ! आप ऋषि-गुरु नहीं है ।।-अर्थात् इस प्रकारकी घोर अज्ञानताको लिये हुए अन्धेरगर्दी उन्ही मिथ्यादृष्टियोके यहा चलती है जो आप जैसे वीतदोष-सर्वज्ञ-स्वामीके उपासक नहीं है । (फलतः) जो शुद्धि और शक्तिकी पराकाष्ठाको पहुँचे हुए आप जैसे दैवके उपासक है–आपको अपना गुरु-नेता मानते है-( और इसलिये ) जो हिंसादिकमे विरक्तचित्त है, दया-दम-त्याग-समाधिकी तत्परताको लिये हुए आपके अद्वितीय शासन (मत) को प्राप्त है और नय-प्रमाण द्वारा विनिश्चित परमार्थकी एव यथावस्थित जीवादि-तत्त्वार्थोंकी प्रतिपत्तिमे कुशलमना हैं, उन सम्यग्दृष्टियोके इस प्रकारकी मिथ्या-मान्यतारूप अन्धेरगर्दी ( प्ररूढतमता ) नहीं बनती, क्योकि प्रमादसे अथवा अशक्तिके कारण कही हिंसादिकका आचरण करते हुए भी उसमें उनके मिथ्या-अभिनिवेशरूप पाशके लिये अवकाश नही होता-वे उससे अपनी सिद्धि अथवा आत्मभलाईका होना नही मानते ।’


सामान्य-निष्ठा विविधा विशेषाः
पदं विशेषान्तर-पक्षपाति ।
अन्तर्विशेषान्त-र्वृत्तितोऽन्यत्-
समानभावं नयते विशेषम् ॥४०॥

अर्थ: ‘(७ वीं कारिकामे ‘अभेद-भेदात्मकमर्थतत्त्व’ इस वाक्यके द्वारा यह बतलाया गया है कि वीरशासनमे वस्तुतत्त्वको सामान्य-विशेषात्मक माना गया है, तब यह प्रश्न पैदा होता है कि जो विशेष है वे सामान्यमे निष्ठ ( परिसमाप्त ) है या सामान्य विशेषोमे निष्ठ है अथवा सामान्य और विशेष दोनो परस्परमें निष्ठ है ? इसका उत्तर इतना ही है कि ) जो विविध विशेष हैं वे सब सामान्यनिष्ठ है-अर्थात् एक द्रव्यमे रहने वाले क्रम भावी और सहभावीके भेद-प्रभेदको लिये हुए जो परिस्पन्द और अपरिस्पन्द-रूप नाना प्रकारके पर्याय हैं वे सब एक द्रव्यनिष्ठ होनेसे ऊर्ध्वता-सामान्य मे परिसमाप्त है । और इसलिये विशेषोमें निष्ठ सामान्य नहीं है, क्योकि तब किसी विशेष (पर्याय) के अभाव होनेपर सामान्य (द्रव्य) के भी अभाव का प्रसग आयेगा, जो प्रत्यक्षविरुद्ध है-किसी भी विशेषके नष्ट होनेपर सामान्यका अभाव नहीं होता, उसकी दूसरे विशेषो-पर्यायोमे उपलब्धि देखी जाती है और इससे सामान्यका सर्व-विशेषोमे निष्ठ होना भी बाधित पडता है । फलतः दोनोको निरपेक्षरूपसे परस्परनिष्ठ मानना भी बाधित है, उसमे दोनोका ही अभाव् ठहरता है और वस्तु आकाशकुसुमके समान अवस्तु हो जाती है ।’ ‘(यदि विशेष सामान्यनिष्ठ हैं तो फिर यह शंका उत्पन्न होती है कि वर्णसमूहरूप पद किसे प्राप्त करता है-विशेषको, सामान्यको, उभयको या अनुभयको, अर्थात् इनमेसे किसका बोधक या प्रकाशक होता है ? इसका समाधान यह है कि ) पद जो कि विशेषान्तरका-पक्षपाती होता है-द्रव्य, गुण, कर्म इन तीन प्रकारके विशेषोंमेंसे किसी एकमे प्रवर्तमान हुआ दूसरे विशेषोको भी स्वीकार करता है, अस्वीकार करनेपर किसी एक विशेष मे भी उसकी प्रवृत्ति नहीं बनती-वह विशेषको प्राप्त कराता है अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्ममेसे एक को प्रधानरूपसे प्राप्त कराता है तो दूसरेको गौणरूपसे । साथ ही विशेषान्तरोंके अन्तर्गत उसकी वृत्ति होनेसे दूसरे (जात्यात्मक) विशेषको सामान्यरूपमें भी प्राप्त कराता है-यह सामान्य तिर्यक्सामान्य होता है । इस तरह पद सामान्य और विशेष दोनोको प्राप्त कराता है-एक को प्रधानरूपसे प्रकाशित करता है तो दूसरेको गौणरूपसे । विशेषकी अपेक्षा न रखता हुआ केवल सामान्य और सामान्यकी अपेक्षा न रखता हुआ केवल विशेष दोनो अप्रतीयमान होनेसे अवस्तु है, उन्हे पद प्रकाशित नही करता । फलत. परस्पर निरपेक्ष उभयको और अवस्तुभूत अनुभयको भी पद प्रकाशित नही करता । किन्तु इन सर्वथा सामान्य, सर्वथा विशेष, सर्वथा उभय और सर्वथा अनुभयसे विलक्षण सामान्य-विशेषरूप वस्तुको पद प्रधान और गौणभावसे प्रकाशित करता हुआ यथार्थताको प्राप्त होता है, क्योकि ज्ञाताकी उस पदसे उसी प्रकारकी वस्तुमें प्रवृत्ति और प्राप्ति देखी जाती है, प्रत्यक्षादि प्रमाणोकी तरह ।’


यदेवकारोपहितं पदं तद्-
अस्वार्थतः स्वार्थमवच्छिनत्ति ।
पर्याय-सामान्य-विशेष-सर्व
पदार्थहानिश्च विरोधिवत्स्यात् ॥४१॥

अर्थ: ‘जो पद एवकारसे उपहित है-अवधारणार्थक ‘एव’ नामके निपातसे विशिष्ट है, जैसे ‘जीव एव’ (जीव ही)-वह अस्वार्थसे स्वार्थको ( अजीवत्वसे जीवत्वको ) [ जैसे ] अलग करता है-अस्वार्थ ( अजीवत्व ) का व्यवच्छेदक है-[ वैसे ] सब स्वार्थपर्यायो (सुख-ज्ञानादिक), सब स्वार्थसामान्यो (द्रव्यत्व-चेतनत्वादि) और सब स्वार्थविशेषों ( अभिधानाऽविषयभूत अनन्त अर्थपर्यायो ) सभीको अलग करता है-उन सबका भी व्यवच्छेदक है, अन्यथा उस एक पदसे ही उनका भी बोध होना चाहिये, उनके लिये अलग-अलग पदोका प्रयोग ( जैसे मै सुखी हूँ, ज्ञानी हूँ, द्रव्य हूँ, चेतन हूँ, इत्यादि ) व्यर्थ ठहरता है-और इससे ( उन क्रमभावी धर्मो-पर्यायों, सहभावी धर्मों-सामान्यो तथा अनभिधेय धर्मो-अनन्त अर्थ-पर्यायोका व्यवच्छेद-अभाव-होनेपर ) पदार्थकी ( जीवपदके अभिधेयरूप जीवत्वकी ) भी हानि उसी प्रकार ठहरती है जिस प्रकार कि विरोधी ( अजीवत्व’ ) की हानि होतीहै-क्योकि स्वपर्यायो आदिके अभावमे जीवादि कोई भी अलग वस्तु संभव नही हो सकती ।’


अनुक्त-तुल्यं यदनेवकारं
व्यावृत्त्यभावान्नियम-द्वयेऽपि ।
पर्याय-भावेऽन्यतरप्रयोग-
स्तत्सर्वमन्यच्युतमात्म-हीनम् ॥४२॥

अर्थ: ‘जो पद एवकारसे रहित है वह अनुक्ततुल्य है-न कहे हुएके समान है-क्योंकि उससे ( कर्तृ-क्रिया विषयक ) नियम-द्वयके इष्ट होनेपर भी व्यावृत्तिका अभाव होता है-निश्चयपूर्वक कोई एक बात न कहे जानेसे प्रतिपक्षकी निवृत्ति नही बन सकती-तथा ( व्यावृत्तिका अभाव होने अथवा प्रतिपक्षकी निवृत्ति न हो सकनेसे ) पदोंमें परस्पर पर्यायभाव ठहरता है, पर्यायभावके होनेपर परस्पर प्रतियोगी पदोंमे-से भी चाहे जिस पदका कोई प्रयोग कर सकता है और चाहे जिस पदका प्रयोग होनेपर संपूर्ण अभिधेयभूत वस्तुजात अन्यसे च्युत-प्रतियोगीसे रहित–होजाता है और जो प्रतियोगीसे रहित होता है वह आत्महीन होता है-अपने स्वरूपका प्रतिष्ठापक नही हो सकता । इस तरह भी पदार्थकी हानि ठहरती है ।’ ‘यदि (सत्ताद्वैतवादियो अथवा सर्वथा शून्यवादियोकी मान्यतानुसार सर्वथा अभेदका अवलम्बन लेकर) यह कहा जाय कि पद-अस्ति या नास्ति-(पने प्रतियागो पदके साथ सर्वथा) अभेदी है-और इसलिये एक पदका अभिधेय अपने प्रतियोगी पदके अभिधेयसे च्युत न होनेके कारण वह आत्महीन नही है-तो यह कथन विरोधी है अथवा इससे उस पदका अभिधेय आत्महीन ही नही, किन्तु विरोधी भी होजाता है, क्योकि किसी भी विशेषका-भेदका-तब अस्तित्व बनता ही नही।’


विरोधि चाऽभेद्यविशेष-भावात्-
तद्द्योतनः स्याद्गुणतो निपातः ।
विधाद्य-सन्धिश्च तथाऽङ्गभावा-
दवाच्यता श्रेयस-लोप-हेतुः ॥४३॥

अर्थ: ‘उस विरोधी धर्मका द्योतक ‘स्यात्’ नामका निपात (शब्द) है- जो (स्याद्वादियोके द्वारा प्रयुक्त किया जाता है और) गौणरूपसे उस धर्मका द्योतन करता है-इसीसे दोनो विरोधी-अविरोधी (नास्तित्व-अस्तित्व-जैसे) धर्मोका प्रकाशन-प्रतिपादन होते हुए भी जो विधिका अर्थी है उसकी प्रतिषेधमे प्रवृत्ति नही होती। साथ ही, वह ‘स्यात्’ पद विपक्षभूत धर्मकी सन्धि-संयोजनास्वरूप होता है-उसके रहते दोनो धर्मोमे विरोध नहीं रहता, क्योंकि दोनोमें अङ्गपना है और स्यात्पद उन दोनों अङ्गोंको जोडने वाला है।’ ‘सर्वथा अवक्तव्यता (युक्त नहीं हैं, क्योंकि वह) श्रायस-मोक्ष अथवा आत्महितके लोपकी कारण है-क्योंकि उपेय और उपायके वचन-बिना उनका उपदेश नही बनता, उपदेशके बिना श्रायसके उपाय का-मोक्षमार्गका-अनुष्ठान नही बन सकता और उपाय (मार्ग) का अनुष्ठान न बन सकनेपर उपेयरूप श्रायस (मोक्ष) की उपलब्धि नहीं होती। इस तरह अवक्तव्यता श्रायसके लोपकी हेतु ठहरती है। अतः स्यात्कार-लाञ्छित एवकारसे युक्त पद ही अर्थवान् है ऐसा प्रतिपादन करना चाहिए, यही तात्पर्यात्मक अर्थ है।’


तथा प्रतिज्ञाऽऽशयतोऽप्रयोगः
सामर्थ्यतो वा प्रतिषेधयुक्तिः ।
इति त्वदीया जिननाग ! दृष्टिः
पराऽप्रधृष्या परधर्षिणी च ॥४४॥

अर्थ: ‘(शास्त्रमे और लोकमें ‘स्यात्’ निपातका) जो अप्रयोग है-हरएक पदके साथ स्यात् शब्दका प्रयोग नही पाया जाता-उसका कारण उस प्रकारका-स्यात्पदात्मक - प्रयोग - प्रकारका-प्रतिज्ञाशय है-प्रतिज्ञामे प्रतिपादन करनेवालेका अभिप्राय सन्निहित है।-जैसे शास्त्रमे ‘सम्यग्दर्शन-ज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग.’ इत्यादि वाक्योमे कहीपर भी ‘स्यात्’ या ‘एव’ शब्दका प्रयोग नही है परन्तु शास्त्रकारोके द्वारा अप्रयुक्त होते हुए भी वह जाना जाता है, क्योकि उनके वैसे प्रतिज्ञाशयका सद्भाव है । अथवा (स्याद्वादियोके) प्रतिषेधकी - सर्वथा एकान्तके व्यवच्छेदकी - युक्ति सामर्थ्यसे ही घटित होजाती है-क्योकि ‘स्यात्’ पदका आश्रय लिये बिना कोई भी स्याद्वादी नही बनता और न स्यात्कारके प्रयोग बिना अनेकान्तकी सिद्धि ही घटित होती है, जैसे कि एवकारके प्रयोग बिना सम्यक् एकान्तकी सिद्धि नही होती । अतः स्याद्वादी होना ही इस बातको सूचित करता है कि उसका आशय प्रतिपदके साथ ‘स्यात्’ शब्दके प्रयोगका है, भले ही उसके द्वारा प्रयुक्त हुए प्रतिपदके साथमे ‘स्यात्’ शब्द लगा हुआ न हो, यही उसके पद-प्रयोगकी सामर्थ्य है ।’ (इसके शिवाय, “सदेव सर्व को नेच्छेत् स्वरूपादिचतुष्टयात्” इस प्रकारके वाक्यमे ‘स्यात्’ पदका अप्रयोग है, ऐसा नही समझना चाहिये, क्योकि ‘स्वरूपादि चतुष्टयात्’ इस वचनसे स्यात्कारके अर्थकी उसी प्रकार प्रतिपत्ति होती है जिस प्रकार कि ‘कथञ्चित् सदेवेष्ट’ इस वाक्यमें ‘कथञ्चित्’ वचनसे स्यात्पदका प्रयोग जाना जाता है। इसी प्रकार लोकमे ‘घट आनय’ (घडा लाओ ) इत्यादि वाक्यो मे जो ‘स्यात’ शब्दका अप्रयोग है वह उसी प्रतिज्ञाशयको लेकर सिद्ध है ।) ‘इस तरह हे जिन-नाग ! - जिनोमे श्रेष्ठ श्रीवीर भगवन् ! आपकी (नागदृष्टिसम अनेकान्त) दृष्टि दूसरोके - सर्वथा एकान्तवादियोके द्वारा अप्रधृष्य है - अबाधितविषया है - और साथ ही परधर्षिणी भी है - दूसरे भावैकान्तादि-वादियोंकी दृष्टिकी धर्षणा (तिरस्कृति) करनेवाली है - उनके सर्वथा एकान्तरूपसे मान्य सिद्धान्तोको बाधा पहुँचानेवाली है ।’


विधिर्निषेधोऽनभिलाप्यता च
त्रिरेकशस्त्रिद्विश एक एव ।
त्रयो विकल्पास्तव सप्तधाऽमी
स्याच्छब्द-नेयाः सकलेऽर्थभेदे ॥४५॥

अर्थ: ‘विधि, निषेध और अनभिलाप्यता - स्याद्रूपमेव, स्यान्नास्त्येव, स्यादवक्तव्यमेव - ये एक-एक करके ( पदके ) तीन मूल विकल्प हैं । इनके विपक्षभूत धर्मकी संधि-संयोजनारूपसे द्विसंयोगज विकल्प तीन - स्यादस्ति-नास्त्येव, स्यादस्त्यवक्तव्यमेव, स्यान्नास्त्यवक्तव्यमेव - होते हैं और त्रिसंयोगज विकल्प एक - स्यादस्ति-नास्त्यवक्तव्यमेव - ही होता है । इस तरहसे ये सात विकल्प हे वीर जिन ! सम्पूर्ण अर्थभेदमे - अशेष जीवादिस्तत्त्वार्थ-पर्यायोमे, न कि किसी एक पर्यायमे - आपके यहाँ ( आपके शासनमे ) घटित होते हैं, दूसरोके यहाँ नही - क्योकि “प्रतिपर्याय सप्तभङ्गी” यह आपके शासनका वचन है, दूसरे सर्वथा एकान्तवादियोके शासनमे वह बनता ही नही । और ये सब विकल्प ‘स्यात्’ शब्दके द्वारा नेय हैं - नेतृत्वको प्राप्त हैं - अर्थात् एक विकल्पके साथ स्यात् शब्दका प्रयोग होनेसे शेष छहों विकल्प उसके द्वारा गृहीत होते हैं, उनके पुन. प्रयोगकी जरूरत नहीं रहती, क्योकि स्यात्पदके साथमे रहनेसे उनके अर्थविषयमे विवादका अभाव होता है । जहाँ कहीं विवाद हो वहाँ उनके क्रमश: प्रयोगमे भी कोई दोष नही है, क्योकि एक प्रतिपाद्यके भी सप्त प्रकारकी विप्रतिपत्तियोका सद्भाव होता है - उतने ही सशय उत्पन्न होते हैं, उतनी ही जिज्ञासाओकी उत्पत्ति होती है और उतने ही प्रश्नवचनो ( सवालो ) की प्रवृत्ति होती है । और ‘प्रश्नके वशसे एक वस्तुमे अविरोधरूपसे विधि-निषेधकी जो कल्पना है उसीका नाम सप्तभङ्गी है’ । अत. नाना प्रतिपाद्यजनोकी तरह एक प्रतिपाद्यजनके लिये भी प्रतिपादन करनेवालोका सप्त-विकल्पात्मक वचन विरुद्ध नही ठहरता है ।’


स्यादित्यपि स्याद्गुण-मुख्य-कल्पै-
कान्तो यथोपाधि-विशेष-वीक्ष्यः ।
तत्त्वं त्वनेकान्तमशेषरूपं
द्विधा भवार्थ-व्यवहारवत्त्वात् ॥४६॥

अर्थ: ‘स्यात्’ (शब्द) भी गुण और मुख्य स्वभावोंके द्वारा कल्पित किये हुए एकान्तोंको लिये हुए होता है-नयोंके आदेशसे । अर्थात् शुद्ध द्रव्यार्थिकनयकी प्रधानतासे अस्तित्व एकान्त मुख्य है, शेष नास्तित्वादि-एकान्त गौण हैं, क्योंकि प्रधानभावसे वे विवक्षित नही होते और न उनका निराकरण ही किया जाता है । इसके सिवाय ऐसा अस्तित्व, गधेके सींगकी तरह असम्भव है जो नास्तित्वादि धर्मोंकी अपेक्षा नही रखता । ‘स्यात्’ शब्द प्रधान तथा गौणरूपसे ही उनका द्योतन करता है-जिस पद अथवा धर्मके साथ वह प्रयुक्त होता है उसे प्रधान और शेष पदान्तरो अथवा धर्मोंको गौण बतलाता है, यह उसकी शक्ति है । व्यवहार नयके आदेश ( प्राधान्य ) से नास्तित्वादि-एकान्त मुख्य हैं और अस्तित्व-एकान्त गौण है, क्योंकि प्रधानरूपसे वह तब विवक्षित नही होता और न उसका निराकरण ही किया जाता है, अस्तित्वका सर्वथा निराकरण करनेपर नास्तित्वादि धर्म बनते भी नही, जैसे कछुवेके रोम । नास्तित्वादि धर्मोंके द्वारा अपेक्ष्यमान जो वस्तुका अस्तित्व धर्म है वह ‘स्यात्’ शब्दके द्वारा द्योतन किया जाता है । इस तरह ‘स्यात्’ नामका निपात प्रधान और गौणरूपसे जो कल्पना करता है वह शुद्ध (सापेक्ष) नयके आदेशरूप सम्यक् एकान्तसे करता है, अन्यथा नहीं-क्योंकि वह यथोपाधि-विशेषणानुसार-विशेषका-धर्म-भेद अथवा धर्मान्तरका-द्योतक होता है, जिसका वस्तुमे सद्भाव पाया जाता है ।’ (यहाँपर किसीको यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि जीवादि तत्त्व भी तब प्रधान गौणरूप एकान्तको प्राप्त होजाता है, क्योकि) तत्त्व तो अनेकान्त है-अनेकान्तात्मक है-और वह अनेकान्त भी अनेकान्तरूप है, एकान्तरूप नही, एकान्त तो उसे नयकी अपेक्षासे कहा जाता है, प्रमाणकी अपेक्षासे नही, क्योकि प्रमाण सकलरूप होता है-विकलरूप नही, विकलरूप तत्त्वका एकदेश कहलाता है जो कि नयका विषय है और इसीसे सकलरूप तत्त्व प्रमाणका विषय है। कहा भी है–‘सकलादेशः प्रमाणाधीनः, विकलादेशो नयाधीनः ।’
‘और वह तत्त्व दो प्रकारसे व्यवस्थित है-एक भवार्थवान् होनेसे द्रव्यरूप, जिसे सद्द्रव्य तथा विधि भी कहते हैं, और दूसरा व्यवहारवान् होनेसे पर्यायरूप, जिसे असद्द्रव्य, गुण तथा प्रतिषेध भी कहते है। इनसे भिन्न उसका दूसरा कोई प्रकार नही है, जो कुछ है वह सब इन्हीं दो भेदोंके अन्तर्भूत है।’


न द्रव्य-पर्याय-पृथग्-व्यवस्था
द्वैयात्म्यमेकार्पणया विरुद्धम् ।
धर्मी च धर्मश्च मिथस्त्रिधेमौ
न सर्वथा तेऽभिमतौ विरुद्धौ ॥४७॥

अर्थ: सर्वथा द्रव्यकी (‘द्रव्यमेव’ इस द्रव्यमात्रात्मक एकान्तकी) कोई व्यवस्था नही बनती-क्योंकि सम्पूर्ण पर्यायोंसे रहित द्रव्यमात्रतत्त्व प्रमाणका विषय नहीं है-प्रत्यक्षादि किसी भी प्रमाणसे वह सिद्ध नही होता अथवा जाना नहीं जासकता, न सर्वथा पर्यायकी (‘पर्याय’ एव-एक मात्र पर्याय ही-इस एकान्त सिद्धान्तकी) कोई व्यवस्था बनती है-क्योंकि द्रव्य एकान्तकी तरह द्रव्यसे रहित पर्यायमात्र तत्त्व भी किसी प्रमाणका विषय नहीं है, और न सर्वथा पृथग्भूत-परस्परनिरपेक्ष-द्रव्य-पर्याय (दोनों) की ही कोई व्यवस्था बनती है-क्योंकि उसमे भी प्रमाणाभाव की दृष्टिसे कोई विशेष नही है, वह भी सकल प्रमाणोंके अगोचर है।’
‘(द्रव्यमात्रकी, पर्यायमात्रकी तथा पृथग्भूतद्रव्य-पर्यायमात्रकी व्यवस्था न बन सकनेसे ) यदि सर्वथा द्वयात्मक एक तत्त्व माना जाय तो यह सर्वथा द्वैयात्म्य एककी अर्पणाके साथ विरुद्ध पडता है-सर्वथा एकत्त्वके साथ द्वयात्मकता बनती ही नही-क्योंकि जो द्रव्यकी प्रतीतिका हेतु है और जो पर्यायकी प्रतीतिक़ा निमित्त है वे दोनो यदि परस्परमें भिन्नात्मा हैं तो कैसे तदात्मक एक तत्त्व व्यवस्थित होता है ? नही होता, क्योंकि अभिन्नका भिन्नात्माओंके साथ एकत्वका विरोध है। जब वे दोनो आत्माएँ एकसे अभिन्न हैं तब भी एक ही अवस्थित होता है, क्योकि सर्वथा एकसे अभिन्न उन दोनोके एकत्वकी सिद्धि होती है, न कि द्वैतात्म्य (द्वयात्मकता) की, जो कि एकत्वके विरुद्ध है। कौन ऐसा अमूढ (समझदार) है जो प्रमाणको अङ्गीकार करता हुआ सर्वथा एक वस्तुके दो भिन्न आत्माओंकी अर्पणा–विवक्षा करे ?–मूढके सिवाय दूसरा कोई भी नही कर सकता। अत. द्वयात्मक तत्त्व सर्वथा एकारर्पणाके–एक तत्त्वकी मान्यताके–साथ विरुद्ध ही है, ऐसा मानना चाहिये ।’

‘(किन्तु हे वीर जिन !) आपके मतमें–स्याद्वादशासनमे–ये धर्मी (द्रव्य) और धर्म (पर्याय) दोनों असर्वथारूपसे तीन प्रकार–भिन्न, अभिन्न तथा भिन्नाऽभिन्न–माने गये हैं और (इसलिये) सर्वथा विरुद्ध नहीं हैं।-क्योकि सर्वथारूपसे तीन प्रकार माने जानेपर भी ये प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे विरुद्ध ठहरते हैं और विरुद्धरूपमें आपको अभिमत नहीं हैं। अतः स्यात्पदात्मक वाक्य न तो धर्ममात्रका प्रतिपादन करता है, न धर्मीमात्रका, न धर्म-धर्मी दोनोको सर्वथा अभिन्न प्रतिपादन करता है, न सर्वथा भिन्न और न सर्वथा भिन्नाऽभिन्न । क्योकि ये सब प्रतीतिके विरुद्ध है। और इससे द्रव्य-एकान्तकी, पर्याय-एकान्तकी तथा परस्परनिरपेक्ष पृथग्भूत द्रव्य-पर्याय-एकान्तकी व्यवस्थाके न बन सकनेका समर्थन होता है। द्रव्यादिके सर्वथा एकान्तमें युक्त्यनुशासन घटित नहीं होता ।’


दृष्टाऽऽगमाभ्यामविरुद्धमर्थ-
प्ररूपणं युक्त्यनुशासनं ते ।
प्रतिक्षणं स्थित्युदय-व्ययात्म-
तत्त्व-व्यवस्थं यदिहाऽर्थरूपम् ॥४८॥

अर्थ: ‘प्रत्यक्ष और आगमसे अविरोधरूप-अबाधित-विषयस्वरूप-अर्थका जो अर्थसे प्ररूपण है-अन्यथानुपपत्त्येकलक्षण साधनरूप अर्थसे साध्यरूप अर्थका प्रतिपादन है-उसे युक्त्यनुशासन-युक्ति-वचन-कहते हैं और वही (हे वीर भगवान् !) आपको अभिमत है।’ ‘(यहाँ आपके ही मतानुसार युक्त्यनुशासनका एक उदाहरण दिया जाता है और वह यह है कि) अर्थका रूप प्रतिक्षण (प्रत्येक समय मे) ‘स्थिति (ध्रौव्य) उदय (उत्पाद) और व्यय (नाश) रूप तत्त्व-व्यवस्थाको लिये हुए है, क्योकि वह सत् है।’


नानात्मतामप्रजहत्तदेक-
मेकात्मतामप्रजहच्च नाना ।
अङ्गाङ्गि-भावात्तव वस्तु तद्यत्
क्रमेण वाग्वाच्यमनन्तरूपम् ॥४६॥

अर्थ: ‘( हे वीर जिन ! ) आपके शासनमे जो ( जीवादि ) वस्तु एक है ( सत्वरूप एकत्व-प्रत्यभिज्ञानका विषय होनेसे ) वह ( समीचीन नाना ज्ञानका विषय होनेसे ) नानात्मता ( अनेकरूपता ) का त्याग न करती हुई ही वस्तुतत्त्वको प्राप्त होती है-जो नानात्मताका त्याग करती है वह वस्तु ही नही, जैसे दूसरोके द्वारा परिकल्पित ब्रह्माद्वैत आदि । ( इसी तरह ) जो वस्तु ( अबाधित नानाज्ञानका विषय होनेसे ) नानात्मक प्रसिद्ध है वह एकात्मताको न छोड़ती हुई ही आपके मतमें वस्तुत्वरूपसे अभिमत है-अन्यथा उसके वस्तुत्व नही बनता, जैसे कि दूसरोके द्वारा अभिमत निरन्वय नानाक्षणरूप वस्तु । अतः जीवादिपदार्थ-समूह परस्पर एक दूसरेका त्याग न करनेसे एक-अनेक-स्वभावरूप है, क्योकि वस्तुत्वकी अन्यथा उपपत्ति बनती ही नहीं’ यह युक्त्यनुशासन है । '( इस प्रकारकी वस्तु वचनके द्वारा कैसे कही जा सकती है ? ऐसी शङ्का नही करनी चाहिए, क्योकि ) वस्तु जो अनन्तरूप है वह अङ्ग-अङ्गीभावके कारण-गुण-मुख्यकी विवक्षाको लेकर-क्रमसे वचन-गोचर है-युगपत् नही, युगपत् ( एक साथ ) एक रूपसे और अनेक-रूपसे वस्तु वचनके द्वारा कही ही नही जाती; क्योंकि वैसी वाणीका असंभव है-वचनमें वैसी शक्ति ही नही है । और इस तरह क्रमसे प्रवर्तमान वचन वस्तुरूप-सत्य-होता है उसके असत्यत्वका प्रसङ्ग नही आता, क्योकि उसकी अपने नानात्व और एकत्वविषयमें अङ्ग-अङ्गीभावसे प्रवृत्ति होती है। जैसे ‘स्यादेकमेव वस्तु’ इस वचनके द्वारा प्रधानभावसे एकत्व वाच्य है और गौणरूपसे अनेकत्व, ‘स्यादनेकमेव वस्तु’ इस वचनके द्वारा प्रधानभावसे अनेकत्व और गौणरूपसे एकत्व वाच्य है। इस तरह एकत्व और अनेकत्वके वचनके कैसे असत्यता होसकती है ? नही होसकती है। प्रत्युत इसके, सर्वथा एकत्वके वचन-द्वारा अनेकत्वका निराकरण होता है और अनेकत्वका निराकरण होनेपर उसके अविनाभावी एकत्वके भी निराकरणका प्रसङ्ग उपस्थित होनेसे असत्यत्वकी परिप्राप्ति अभीष्ट ठहरती है, क्योकि वैसी उपलब्धि नही है। और सर्वथा अनेकत्वके वचनद्वारा एकत्वका निराकरण होता है और एकत्वका निराकरण होनेपर उसके अविनाभावी अनेकत्वके भी निराकरणका प्रसग उपस्थित होनेसे सत्यत्वका विरोध होता है। और इसलिये अनन्त धर्मरूप जो वस्तु है उसे अग-अंगी ( अप्रधान-प्रधान ) भावके कारण क्रमसे वाग्वाच्य ( वचनगोचर ) समझना चाहिये ।’


मिथोऽनपेक्षाः पुरुषार्थ-हेतु-
र्नांशा न चांशी पृथगस्ति तेभ्यः ।
परस्परेक्षाः पुरुषार्थ-हेतु-
र्दृष्टा नयास्तद्वदसि-क्रियायाम् ॥५०॥

अर्थ: ‘ ( वस्तुको अनन्तधर्मविशिष्ट मानकर यदि यह कहा जाय कि वे धर्म परस्पर-निरपेक्ष ही हैं और धर्मी उनसे पृथक् ही है तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि ) जो अंश-धर्म अथवा वस्तुके अवयव-परस्पर-निरपेक्ष हैं वे पुरुषार्थके हेतु नहीं हो सकते, क्योकि उस रूपमें उपलभ्यमान नहीं हैं-जो जिस रूपमें उपलभ्यमान नहीं वह उस रूपमे व्यवस्थित भी नहीं होता, जैसे अग्नि शीतताके साथ उपलभ्यमान नहीं है तो वह शीततारूपमें व्यवस्थित भी नहीं होती । परस्परनिरपेक्ष सत्त्वादिक धर्म अथवा अवयव पुरुषार्थहेतुतारूपसे उपलभ्यमान नहीं हैं, अतः पुरुषार्थताहेतुरूपमे व्यवस्थित नही होते । यह युक्त्यनुशासन प्रत्यक्ष और आगमसे अविरुद्ध है ।’ ‘जो अंश-धर्म परस्पर-सापेक्ष हैं वे पुरुषार्थके हेतु हैं, क्योंकि उस रूपमें देखे जाते हैं-जो जिस रूपमें देखे जाते हैं वे उसी रूपमें व्यवस्थित होते हैं, जैसे दहन ( अग्नि ) दहनताके रूपमें देखी जाती है और इसलिये तद्रूपमे व्यवस्थित होती है, परस्परसापेक्ष अंशः स्वभावतः पुरुषार्थहेतुतारूपसे देखे जाते हैं और इसलिये पुरुषार्थहेतुरूपसे व्यवस्थित हैं। यह स्वभावकी उपलब्धि है ।’ ‘( इसी तरह ) अं’शी-धर्मी अथवा अवयवी-अं’शोंसे-धर्मो अथवा अवयवोंसे-पृथक् नहीं है, क्योंकि उसरूपमें उपलभ्यमान नहीं है-जो जिस रूपमें उपलभ्यमान नही वह उसमें नास्तिरूप ही है, जैसे अग्नि शीततारूपसे उपलभ्यमान नही है अतः शीततारूपसे उसका अभाव है । अंशोंसे अंशीका पृथक् होना सर्वदा अनुपलभ्यमान है अतः अंशोंसे पृथक् अंशीका अभाव है । यह स्वभावकी अनुपलब्धि है । इसमे प्रत्यक्षतः कोई विरोध नही है, क्योकि परस्पर विभिन्न पदार्थौं सह्याचल-विन्ध्याचलादि जैसोके अंश-अंशीभावका दर्शन नहीं होता । आगम-विरोध भी इसमें नहीं है, क्योंकि परस्पर विभिन्न अर्थोंके अंश-अंशीभावका प्रतिपादन करनेवाले आगमका अभाव है, और जो आगम परस्पर विभिन्न पदार्थोंके अंश-अंशीभावका प्रतिपादक है वह युक्ति-विरुद्ध होनेसे आगमाभास सिद्ध है ।’ 'अंश-अं’शीकी तरह परस्परसापेक्ष नय-नैगमादिक-भी ( सत्तालक्षणा ) असिक्रियामें पुरुषार्थके हेतु हैं, क्योंकि उस रूपमें देखे जाते हैं-उपलभ्यमान हैं।-इससे स्थितिग्राहक द्रव्यार्थिकनयके भेद नैगम, संग्रह, व्यवहार और प्रतिक्षण उत्पाद-व्ययके ग्राहक पर्यायार्थिकनयके भेद ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ, एवभूत ये सब परस्परमें सापेक्ष होते हुए ही वस्तुका जो साध्य अर्थक्रिया-लक्षणा-पुरुषार्थ है उसके निर्णयके हेतु हैं-अन्यथा नहीं । इस प्रकार प्रत्यक्ष और आगमसे अविरोधरूप जो अर्थका प्ररूपण सद्रूप है वह सब प्रतिक्षण ध्रौव्योत्पाद-व्ययात्मक है, अन्यथा सत्पना बनता ही नहीं । इस प्रकार युक्त्यनुशासनको उदाहृत जानना चाहिये ।’


एकान्त-धर्माऽभिनिवेश-मूला
रागादयोऽहंकृतिजा जनानाम् ।
एकान्त-हानाच्च स यत्तदेव
स्वाभाविकत्वाच्च समं मनस्ते ॥५१॥

अर्थ: ‘( जिन लोगोंका ऐसा ख्याल है कि जीवादि वस्तुका अनेकान्तात्मक-रूपसे निश्चय होनेपर स्वात्माकी तरह परात्मामें भी राग होता है-दोनोमे कथंचित् अभेदके कारण, तथा परात्माकी तरह स्वात्मामे भी द्वेष होता है-दोनोमे कथंचित् भेदके कारण, और राग-द्वेषके कार्य ईर्ष्या, असूया, मद, मायादिक दोष प्रवृत्त होते हैं, जो कि ससारके कारण हैं, सकल विक्षोभके निमित्तभूत है तथा स्वर्गाऽपवर्गके प्रतिबन्धक है । और वे दोष प्रवृत्त होकर मनके समत्वका निराकरण करते हैं-उसे अपनी स्वाभाविक स्थितिमे स्थित न रहने देकर विषम-स्थितिमें पटक देते हैं-, मनके समत्वका निराकरण समाधिको रोकता है, जिससे समाधि हेतुक निर्वाण किसीके नहीं बन सकता । और इसलिये जिनका यह कहना है कि ‘मोक्षके कारण समाधिरूप मनके समत्वकी इच्छा रखनेवालेको चाहिये कि वह जीवादि वस्तुको अनेकान्तात्मक न माने’ वह भी ठीक नहीं है, क्योकि) वे राग द्वेषादिक-जो मनकी समताका निराकरण करते हैं-एकान्तधर्माभिनिवेश-मूलक होते हैं-एकान्त-रूपसे निश्चय किये हुए (नित्यत्वादि) धर्ममें अभिनिवेश-मिथ्याश्रद्धान१ उनका मूलकारण होता है-और (मोही-मिथ्यादृष्टि) जीवोंकी अहंकृतिसे-अहंकार तथा उसके साथी ममकारसे२-वे उत्पन्न होते हैं । अर्थात् उन अहंकार-ममकार भावोसे ही उनकी उत्पत्ति है जो मिथ्यादर्शनरूप मोह-राजाके सहकारी हैं-मन्त्री हैं३, अन्यसे नहीं-दूसरे अहंकार-ममकारके भाव उन्हे जन्म देनेमे असमर्थ हैं । और (सम्यग्दृष्टि-जीवोके ) एकान्तकी हानि से-एकान्तधर्माभिनिवेशरूप मिथ्यादर्शनके अभावसे-वह एकान्ताभिनिवेश उसी अनेकान्तके निश्चयरूप सम्यग्दर्शनत्वको धारण करता है जो आत्माका वास्तविक रूप है, क्योंकि एकान्ताभिनिवेशका जो अभाव है वही उसके विरोधी अनेकान्तके निश्चयरूप सम्यग्दर्शनका सद्भाव है । और चूँकि यह एकान्ताभिनिवेशका अभावरूप सम्यग्दर्शन आत्माका स्वाभाविक रूप है अतः( हे वीर भगवान् ! ) आपके यहाँ-आपके युक्त्यनुशासनमे-( सम्यग्दृष्टिके ) मनका समत्व ठीक घटित होता है । वास्तवमे दर्शनमोहके उदयरूप मूलकारणके होते हुए चारित्रमोहके उदयमे जो रागादिक उत्पन्न होते हैं वे ही जीवोके अस्वाभाविक परिणाम हैं, क्योकि वे औदयिक भाव हैं । और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप जो परिणाम दर्शनमोहके नाश, चारित्रमोहकी उदयहानि और रागादिके अभावसे होते हैं वे आत्मरूप होनेसे जीवोके स्वाभाविक परिणाम है-किन्तु पारिणामिक नही, क्योकि पारिणामिक भाव कर्मोंके उपशमादिकी अपेक्षा नही रखते । ऐसी स्थितिमे असंयत सम्यग्दृष्टिके भी स्वानुरूप मनःसाम्यकी अपेक्षा मनका सम होना बनता है, क्योकि उसके संयमका सर्वथा अभाव नहीं होता । अतः अनेकान्तरूप युक्त्यनुशासन रागादिकका निमित्तकारण नहीं, वह तो मनकी समताका निमित्तभूत है ।


प्रमुच्यते च प्रतिपक्ष-दूषी
जिन ! त्वदीयैः पटुसिंहनादैः ।
एकस्य नानात्मतया ज्ञ-वृत्ते-
स्तौ बन्ध-मोक्षौ स्वमताद्बाह्यौ ॥५२॥

अर्थ: ‘(यदि यह कहा जाय कि अनेकान्तवादीका भी अनेकान्तमें राग और सर्वथा एकान्तमें द्वेष होनेसे उसका मन सम कैसे रह सकता है, जिससे मोक्ष बन सके ? मोक्षके अभावमे बन्धकी कल्पना भी नहीं बनती । अथवा मनका सदा सम रहना माननेपर बन्ध नहीं बनता और बन्धके अभावमे मोक्ष घटित नहीं हो सकता, जो कि बन्धपूर्वक होता है । अतः बन्ध और मोक्ष दोनो ही अनेकान्तवादीके स्वमतसे बाह्य ठहरते हैं-मनकी समता और असमता दोनो ही स्थितियोमे उनकी उपपत्ति नहीं बन सकती-तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि ) जो प्रतिपक्षदूषी है-प्रतिद्वन्द्वीका सर्वथा निराकरण करनेवाला एकान्ताग्रही है-वह तो हे वीर जिन ! आप (अनेकान्तवादी) के एकाऽनेकरूपता जैसे पटुसिंहनादोंसे-निश्चयात्मक एव सिंहगर्जनाकी तरह अबाध्य ऐसे युक्ति शास्त्राविरोधी आगमवाक्योंके प्रयोगद्वारा-प्रमुक्त ही किया जाता है-वस्तुतत्त्वका विवेक कराकर अतत्त्वरूप एकान्ताग्रहसे उसे मुक्ति दिलाई जाती है-क्योंकि प्रत्येक वस्तु नानात्मक है, उसका नानात्मकरूपसे निश्चय ही सर्वथा एकान्तका प्रमोचन है । ऐसी दशामे अनेकान्तवादीका एकान्तवादीके साथ कोई द्वेष नहीं हो सकता, और चूँकि वह प्रतिपक्षका भी स्वीकार करनेवाला होता है इसलिये स्वपक्षमें उसका सर्वथा राग भी नहीं बन सकता । वास्तवमें तत्त्वका निश्चय ही राग नहीं होता । यदि तत्त्वका निश्चय ही राग होवे तो क्षीणमोहीके भी रागका प्रसग आएगा, जोकि असम्भव है, और न अतत्त्वके व्यवच्छेदको ही द्वेष प्रतिपादित किया जा सकता है, जिसके कारण अनेकान्तवादीका मन सम न रहे। अतः अनेकान्तवादीके मनकी समताके निमित्तसे होनेवाले मोक्षका निषेध कैसे किया जा सकता है ? और मनका समत्व सर्वत्र और सदाकाल नहीं बनता, जिससे राग-द्वेषके अभावसे बन्धके अभावका प्रसग आवे, क्योंकि गुणस्थानोंकी अपेक्षासे किसी तरह, कहींपर और किसी समय कुछ पुण्यबन्धकी उपपत्ति पाई जाती है। अतः बन्ध और मोक्ष दोनों अपने (अनेकान्त) मतसे–जोकि अनन्तात्मक तत्त्व विषयको लिये हुए हैं–बाह्य नहीं हैं–उसीमे वस्तुतः उनका सद्भाव है–क्योंकि बन्ध और मोक्ष दोनों ज्ञवृत्ति हैं–अनेकान्तवादियोद्वारा स्वीकृत ज्ञाता आत्मामे ही उनकी प्रवृत्ति है। और इसलिये सांख्योंद्वारा स्वीकृत प्रधान (प्रकृति) के अनेकान्तात्मक होनेपर भी उसमें वे दोनो घटित नही हो सकते, क्योकि प्रधान (प्रकृति) के अज्ञता होती है–वह ज्ञाता नहीं माना गया है।’


आत्मान्तराऽभाव-समानता न
वागास्पदं स्वाऽऽश्रय-भेद-हीना ।
भावस्य सामान्य-विशेषवत्त्वा-
द्वैक्ये तयोरन्यतरन्निरात्म ॥५३॥

अर्थ: ’ (यदि यह कहा जाय कि एकके नानात्मक अर्थके प्रतिपादक शब्द पटुसिंहनाद प्रसिद्ध नही हैं, क्योंकि बौद्धोके अन्याऽपोहरूप जो सामान्य है उसके वागास्पदता-वचनगोचरता-है, और वचनोंके वस्तु-विषयत्वका असम्भव है, तो यह कहना ठीक नही है, क्योकि) आत्मान्तरके अभावरूप–आत्मस्वभावसे भिन्न अन्य-अन्य स्वभावके अपोहरूप–जो समानता (सामान्य) अपने आश्रयरूप भेदोंसे हीन (रहित) है वह वागास्पद–वचनगोचर–नहीं होती, क्योकि वस्तु सामान्य और विशेष दोनो धर्मोंको लिये हुए है।’ ‘( यदि यह कहा जाय कि पदार्थके सामान्य-विशेषवान् होने पर भी सामान्यके ही वागास्पदता यु है, क्योकि विशेष उसीका आत्मा है, और इस तरह दोनोकी एकरूपता मानी जाय, तो ) सामान्य और विशेष दोनोंकी एकरूपता स्वीकार करनेपर एकके निरात्म ( अभाव ) होनेपर दूसरा भी ( अविनाभावी होनेके कारण ) निरात्म ( अभावरूप ) हो जाता है-और इस तरह किसीका भी अस्तित्व नहीं बन सकता, अतः दोनोकी एकता नहीं मानी जानी चाहिए ।’


अमेयमश्लिष्टममेयमेव
भेदेऽपि तद्वृत्त्यपवृत्तिभावात् ।
वृत्तिश्च कृत्स्नांश-विकल्पतो न
मानं च नाऽनन्त-समाश्रयस्य ॥५४॥

अर्थ: ‘( यदि यह कहा जाय कि आत्मान्तराभावरूप-अन्यापोहरूप-सामान्य वागास्पद नहीं है, क्योकि वह अवस्तु है, बल्कि वह सर्वगत सामान्य ही वागास्पद है जो विशेषोसे अश्लिष्ट है-किसी भी प्रकारके भेदको साथमे लिये हुए नहीं है-तो ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योकि ) जो अमेय है-नियत देश, काल और आकारकी दृष्टिसे जिसका कोई अन्दाजा नही लगाया जासकता-और अश्लिष्ट है-किसी भी प्रकार के विशेष ( भेद ) को साथमें लिये हुए नही है-वह (सर्वव्यापी, नित्य, निराकाररूप सत्त्वादि ) सामान्य अमेय-अप्रमेय ही है-किसी भी प्रमाणसे जाना नहीं जासकता । भेदके मानने पर भी-सामान्यको स्वाश्रयभूत द्रव्यादिकोके साथ भेदरूप स्वीकार करने पर भी-सामान्य प्रमेय नहीं होता, क्योंकि उन द्रव्यादिकोंमें उसकी वृत्तिकी अपवृत्ति ( व्यावृत्ति ) का सद्भाव है-सामान्यकी वृत्ति उनमे मानी नहीं गई है, और जब तक सामान्यकी अपने आश्रयभूत द्रव्यादिकोमें वृत्ति नहीं है तब तक दोनोका संयोग, कुण्डीमे बेरोके समान ही होसकता है, क्योंकि सामान्यके अद्रव्यपना है तथा संयोगका अनाश्रयपना है और संयोगके द्रव्याश्रयपना है । ऐसी हालतमे सामान्यकी द्रव्यादिकमे वृत्ति नहीं बन सकती ।’ ‘यदि सामान्यको द्रव्यादिवस्तुके साथ वृत्ति मानी भी जाय तो वह वृत्ति भी न तो सामान्यको कृत्स्न ( निरंश ) विकल्परूप मानकर बनती है और न अशविकल्परूप ।-क्योंकि अशकल्पना-से रहित कृत्स्न विकल्परूप सामान्यकी देश और कालसे भिन्न व्यक्तियोमे युगपद्वृत्ति सिद्ध नहीं की जासकती । उससे अनेक सामान्यकी मान्यताका प्रसग आता है, जो उक्त सिद्धान्तमान्यताके साथ माने नहीं गये है, क्योंकि एक तथा अनंशरूप सामान्यका उन सबके साथ युगपत् योग नहीं बनता । यदि यह कहा जाय कि सामान्य भिन्न देश और कालके व्यक्तियोके साथ युगपत् सम्बन्धवान् है, क्योंकि वह सर्वगत, नित्य और अमूर्त है, जैसे कि आकाश, तो यह अनुमान भी ठीक नहीं है । इससे एक तो साधन इष्टका विघातक हो जाता है अर्थात् जिस प्रकार वह भिन्न देश-कालके व्यक्तियाके साथ सम्बन्धिनपनको सिद्ध करता है उसी प्रकार वह सामान्यके आकाशकी तरह साशपनको भी सिद्ध करता है जोकि इष्ट नहीं है, क्योकि सामान्यको निरंश माना गया है । दूसरे, सामान्यके निरंश होनेपर उसका युगपत् सर्वगत होना उसी प्रकार विरुद्ध पड़ता है जिस प्रकार कि एक परमाणुका युगपत् सर्वगत होना विरुद्ध है, और इससे उक्त हेतु (साधन) असिद्ध है तथा असिद्ध-हेतुके कारण कृत्स्नविकल्परूप ( निरंश ) सामान्यका सर्वगत होना प्रमाणसिद्ध नहीं ठहरता ।’ '(यदि यह कहा जाय कि सत्तारूप महासामान्य तो पूरा सर्वगत सिद्ध ही है, क्योंकि वह सर्वत्र सत्प्रत्ययका हेतु है, तो यह ठीक नहीं है, कारण ? ) जो अनन्त व्यक्तियोंके समाश्रयरूप है उस एक (सत्ता-महासामान्य ) के ग्राहक प्रमाणका अभाव है-क्योंकि अनन्त सद्-व्यक्तियोके ग्रहण विना उसके विषयमे युगपत् सत् इस ज्ञानकी उत्पत्ति असर्वज्ञो ( छद्मस्थो ) के नहीं बन सकती, जिससे सर्वत्र सत्प्रत्ययहेतुत्वकी सिद्धि हो सके । सर्वत्र सत्प्रत्यय- हेतुत्वकी सिद्धि न होनेपर अनन्त समाश्रयी सामान्यका उक्त अनुमान प्रमाण नही हो सकता । और इसलिये यह सिद्ध हुआ कि कृत्स्नविकल्पी सामान्यकी द्रव्यादिकोंमें वृत्ति सामान्यबहुत्वका प्रसङ्ग उपस्थित होनेके कारण नही बन सकती । यदि सामान्यकी अनन्त स्वाश्रयोंमे देशतः युगपद् वृत्ति मानी जाय तो वह भी इसीसे दूषित होजाता है, क्योकि उसका ग्राहक भी कोई प्रमाण नही है । साथ ही सामान्यके सप्रदेशत्वका प्रसङ्ग आता है, जिसे अपने उस सिद्धान्तका विरोध होनेसे जिसमे सामान्यको निरंश माना गया है, स्वीकार नही किया जा सकता । और इसलिये अप्रमेयरूप एक सामान्य किसी भी प्रमाणसे सिद्ध न होनेके कारण अप्रमेय ही है-अप्रामाणिक है ।’


नाना-सदेकात्म-समाश्रयं चेद्-
अन्यत्वमद्विष्ठमनात्मनोः क्व ।
विकल्प-शून्यत्वमवस्तुतश्चेत्
तस्मिन्नमेये क्व खलु प्रमाणम् ॥५५॥

अर्थ: ‘नाना सतों-सत्पदार्थोंका-विविध द्रव्य-गुण-कर्मोंका-एक आत्मा-एक स्वभावरूप व्यक्तित्व, जैसे सदात्मा, द्रव्यात्मा, गुणात्मा अथवा कर्मात्मा-ही जिसका समाश्रय है ऐसा सामान्य यदि (सामान्य-वादियोके द्वारा ) माना जाय और उसे ही प्रमाणका विषय बतलाया जाय-अर्थात् यह कहा जाय कि सत्तासामान्यका समाश्रय एक सदात्मा, द्रव्यत्व-सामान्यका समाश्रय एक द्रव्यात्मा, गुणत्वसामान्यका समाश्रय एक गुणात्मा अथवा कर्मत्व-सामान्यका समाश्रय एक कर्मात्मा जो अपनी क सद्व्यक्ति, द्रव्यव्यक्ति, गुणव्यक्ति अथवा कर्मव्यक्तिके प्रतिभासकालमें प्रमाणसे प्रतीत होता है वही उससे भिन्न द्वितीयादि व्यक्तियोंके प्रतिभास-कालमें भी अभिव्यक्तताको प्राप्त होता है और जिससे उसके एक सत् अथवा एक द्रव्यादि-स्वभावकी प्रतीति होती है, इतने मात्र आश्रयरूप सामान्यके ग्रहणका निमित्त मौजूद है अतः वह प्रमाण है, उसके अप्रमाणता नही है, क्योंकि अप्रमाणता अनन्तस्वभावके समाश्रयरूप सामान्यके घटित होती है-तो ऐसी मान्यतावाले सामान्यवादियोंसे यह प्रश्न होता है कि उनका वह सामान्य अपने व्यक्तियोंसे अन्य ( भिन्न ) है या अनन्य ( अभिन्न ) ? यदि वह एक स्वभावके आश्रयरूप सामान्य अपने व्यक्तियोंसे सर्वथा अन्य ( भिन्न ) है तो (उन व्यक्तियोके प्रागभावकी तरह असदात्मकत्व, अद्रव्यत्व, अगुणत्व अथवा अकर्मत्वका प्रसग आएगा और व्यक्तियोंके असदात्मकत्व, अद्रव्यत्व, अगुणत्व अथवा अकर्मत्व-रूप होनेपर सत्तासामान्य, द्रव्यत्वसामान्य, गुणत्वसामान्य अथवा कर्मत्वसामान्य भी व्यक्तित्वविहीन होनेसे अभावमात्रकी तरह असत् ठहरेगा, और इस तरह-) व्यक्तियों तथा सामान्य दोनोंके ही अनात्मा-अस्तित्वविहीन होनेपर वह अन्यत्वगुण किसमे रहेगा जिसे अद्विष्ठ- एकमे रहने वाला-माना गया है ? किसीमें भी उसका रहना नही बन सकता और इसलिए अपने व्यक्तियोसे सर्वथा अन्यरूप सामान्य व्यवस्थित नहीं होता ।’

( यदि वह सामान्य व्यक्तियोसे सर्वथा अनन्य (अभिन्न ) है तो वह अनन्यत्व भी व्यवस्थित नही होता, क्योकि सामान्यके व्यक्तिमे प्रवेश कर जानेपर व्यक्ति ही रह जाती है-सामान्यकी कोई अलग सत्ता नहीं रहती और सामान्यके अभावमे उस व्यक्तिकी सभावना नही बनती इसलिए वह अनात्मा ठहरती है, व्यक्तिका अनात्मत्व ( अनस्तित्व ) होनेपर सामान्यके भी अनात्मत्वका प्रसग आता है और इस तरह व्यक्ति तथा सामान्य दोनों ही अनात्मा ( अस्तित्व-विहीन ) ठहरते हैं, तब अनन्यत्व-गुणकी योजना किसमे की जाय, जिसे द्विष्ठ ( दोनोमे रहने वाला ) माना गया है ? किसीमे भी उसकी योजना नही बन सकती । और इसके द्वारा सर्वथा अन्य-अनन्यरूप उभय-एकान्तका भी निरसन हो जाता है, क्योकि उसकी मान्यतापर दोनो प्रकारके दोषोका प्रसग आता है । )

‘यदि सामान्यको ( वस्तुभूत न मान कर ) अवस्तु ( अन्याऽपोह-रूप ) ही इष्ट किया जाय और उसे विकल्पोंसे शून्य माना जाय- यह कहा जाय कि उसमे खरविषाणकी तरह अन्यत्व-अनन्यत्वादिके विकल्प ही नही बनते और इसलिए विकल्प उठाकर जो दोष दिये गये है उनके लिए अवकाश नही रहता-तो उस अवस्तुरूप सामान्यके प्रमेय होनेपर प्रमाणकी प्रवृत्ति कहाँ होती है ? अप्रमेय होनेसे वह सामान्य प्रत्यक्षादि किसी भी प्रमाणका विषय नही रहता और इसलिए उसकी कोई व्यवस्था नहीं बन सकती ।’ ( इस तरह दूसरोके यहाँ प्रमाणाभावके कारण किसी भी सामान्-यकी व्यवस्था नहीं बन सकती । )


व्यावृत्ति-हीनाऽन्वयतो न सिद्ध्येद्
विपर्ययेऽप्यद्वितयेऽपि साध्यम् ।
अतद्व्युदासाऽभिनिवेश-वादः
पराऽभ्युपेताऽर्थ-विरोध-वादः ॥५६॥

अर्थ: ‘यदि साध्यको-सत्तारूप परसामान्य अथवा द्रव्यत्वादिरूप अपर सामान्यका-व्यावृत्तिहीन अन्वयसे-असत्की अथवा अद्रव्यत्वादिकी व्यावृत्ति ( जुदायगी ) के बिना केवल सत्तादिरूप अन्वय-हेतुसे-सिद्ध माना जाय तो वह सिद्ध नही होता-क्योंकि विपक्षकी व्यावृत्तिके बिना सत्-असत् अथवा द्रव्यत्व अद्रव्यत्वादिरूप साधनोके सकरसे सिद्धिका प्रसग आता है और यह कहना नही बन सकता कि जो सदादिरूप अनुवृत्ति (अन्वय ) है वही असदादिकी व्यावृत्ति है, क्योकि अनुवृत्ति ( अन्वय ) भाव-स्वभावरूप और व्यावृत्ति अभाव-स्वभावरूप है और दोनोमे भेद माना गया है । यह भी नही कहा जा सकता कि सदादिके अन्वयपर असदादिककी व्यावृत्ति सामर्थ्यसे ही हो जाती है, क्योकि तब यह कहना नही बनता कि ‘व्यावृत्तिहीन अन्वयसे उस साध्यकी सिद्धि होती है’-सामर्थ्यसे असदादिककी व्यावृत्तिको सिद्ध माननेपर तो यही कहना होगा कि वह अन्वयरूप हेतु असदादिकी व्यावृत्तिसहित है, उसीसे सत्ता- मान्यकी अथवा द्रव्यत्वादि-सामान्यकी सिद्धि होती है। और इसीलिए उस सामान्यके सामान्य-विशेषाख्यत्वकी व्यवस्थापना होती है।’

‘यदि इसके विपरीत अन्वयहीन व्यावृत्तिसे साध्य जो सामान्य उसको सिद्ध माना जाय तो वह भी नही बनता-क्योंकि सर्वथा अन्वयरहित अतद्व्यावृत्ति-प्रत्ययसे अन्यापोहकी सिद्धि होनेपर भी उसकी विधिकी असिद्धि होनेसे-उस अर्थक्रियारूप साध्यकी सिद्धिके अभावसे-उसमे प्रवृत्तिका विरोध होता है-वह नही बनती। और यह कहना भी नही बनता कि दृश्य और विकल्प दोनोके एकत्वाऽध्यवसायसे प्रवृत्तिके होनेपर साध्यकी सिद्धि होती है, क्योकि दृश्य और विकल्पका एकत्वाध्यवसाय असम्भव है। दर्शन उस एकत्वका अध्यवसाय नही करता, क्योकि विकल्प उसका विषय नहीं है। दर्शनकी पीठपर होनेवाला विकल्प भी उस एकत्वका अध्यवसाय नही करता, क्योकि दृश्य विकल्पका विषय नही है और दोनोको विषय करनेवाला कोई ज्ञानान्तर सम्भव नही है, जिससे उनका एकत्वाध्यवसाय हो सके और एकत्वाध्यवसायके कारण अन्वयहीन व्यावृत्तिमात्रसे अन्यापोहरूप सामान्यकी सिद्धि बन सके। इस तरह स्वलक्षणरूप साध्यकी सिद्धि नही बनती।’

‘यदि यह कहा जाय कि अन्वय और व्यावृत्ति दोनोंसे हीन जो अद्वितयरूप हेतु है उससे सन्मात्रका प्रतिभासन होनेसे सत्ताद्वैतरूप सामान्यकी सिद्धि होती है, तो यह कहना ठीक नही है, क्योकि सर्वथा अद्वितयकी मान्यतापर साध्य-साधनकी भेदसिद्धि नहीं बनती और भेदकी सिद्धि न होनेपर साधनसे-साध्यकी सिद्धि नही बनती और साधनसे साध्यकी सिद्धिके न होनेपर अद्वितय-हेतु विरुद्ध पडता है।’

'यदि अद्वितयको संवित्तिमात्रके रूपमे मानकर असाधनव्यावृत्तिसे साधनको और असाध्यव्यावृत्तिसे साध्यको अतद्व्युदासाभिनिवेशवादके रूपमें आश्रित किया जाय तब भी (बौद्धोके मत में) पराभ्युपेतार्थके विरोधवादका प्रसङ्ग आता है, अर्थात् बौद्धोके द्वारा संवेदनावैतरूप जो अर्थ पराभ्युपगत है वह अतद्व्युदासाभिनिवेशवादसे-अतद्व्यावृत्तिमात्र आग्रहवचनरूपसे-विरुद्ध पड़ता है, क्योंकि किसी असाधन तथा असाध्यके अर्थाभावमे उनकी अव्यावृत्तिसे साध्य-साधन-व्यवहारकी उपपत्ति नही बनती और उनको अर्थ माननेपर प्रतिक्षेपका योग्यपना न होनेसे द्वैतकी सिद्धि होती है । इस तरह बौद्धोके पूर्वाभ्युपेत अर्थके विरोधवादका प्रसङ्ग आता है ’ ‘(यदि यह कहा जाय कि ‘साधनके बिना साध्यकी स्वय सिद्धि नहीं होती’ इस वाक्यके अनुसार संवेदनाद्वैतकी भी सिद्धि नही होती तो मत हो, परन्तु शून्यरूप सर्वका अभाव तो विचारबलसे प्राप्त हो जाता है, उसका परिहार नहीं किया जा सकता अतः उसे ही मानना चाहिये’ तो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ) हे वीर अर्हन् ! आपके मतमें अभाव भी वस्तुधर्म होता है-बाह्य तथा आभ्यन्तर वस्तुके असम्भव होनेपर सर्व-शून्यरूप तदभाव सम्भव नहीं हो सकता, क्योंकि स्वधर्मीके असम्भव होनेपर किसी भी धर्मकी प्रतीति नहीं बन सकती । अभावधर्मकी जब प्रतीति है तो उसका काई धर्मी (बाह्य-आभ्यन्तर पदार्थ) होना ही चाहिये, और इस लिये सर्वशून्यता घटित नहीं हो सकती । सर्व ही नहीं तो सर्व-शून्यता कैसी ? तत् ही नहीं तो तदभाव कैसा ? अथवा भाव ही नहीं तो अभाव किसका ? इसके सिवाय, यदि वह अभाव स्वरूपसे है तो उसके वस्तुधर्म-त्वकी सिद्धि है, क्योकि स्वरूपका नाम ही वस्तुधर्म है। अनेक धर्मोमेंसे किसी धर्मके अभाव होनेपर वह अभाव धर्मान्तर ही होता है और जो धर्मान्तर होता है वह कैसे वस्तुधर्म सिद्ध नहीं हाता ? होता ही है । यदि वह अभाव स्वरूपसे नहीं है तो वह अभाव ही नहीं है, क्योंकि अभावका अभाव हानेपर भावका विधान होता है । और यदि वह अभाव (धर्मका अभाव न होकर) धर्मीका अभाव है तो वह भावकी तरह भावान्तर होता है-जैसे कि कुम्भका जो अभाव है वह भूभाग है और वह भावान्तर (दूसरा पदार्थ) ही है, यौगमतकी मान्यताके अनुसार सकल-शक्ति-विरहरूप तुच्छ नहीं है । सारांश यह कि अभाव यदि धर्मका है तो वह धर्मकी तरह धर्मान्तर होनेसे वस्तुधर्म है और यदि वह धर्मीका है तो वह भावकी तरह भावान्तर (दूसरा धर्मी) होनेसे स्वयं दूसरी वस्तु है-उसे सकलशक्ति-शून्य तुच्छ नहीं कह सकते । और इस सबका कारण यह है कि अभावको प्रमाणसे जाना जाता है, व्यपदिष्ट किया जाता है और वस्तु-व्यवस्थाके अङ्गरूपमें निर्दिष्ट किया जाता है ।” (यदि धर्म अथवा धर्मीके अभावको किसी प्रमाणसे नहीं जाना जाता ता वह कैसे व्यवस्थित होता है ? नही होता । यदि किसी प्रमाणसे जाना जाता है तो वह धर्म-धर्मीके स्वभाव-भावकी तरह वस्तु-धर्म अथवा भावान्तर हुआ । और यदि वह अभाव व्यपदेशको प्राप्त नही होता तो कैसे उसका प्रतिपादन किया जाता है ? उसका प्रतिपादन नही बनता । यदि व्यपदेशका प्राप्त होता है तो वह वस्तुधर्म अथवा वस्त्वन्तर ठहरा, अन्यथा उसका व्यपदेश नही बन सकता । इसी तरह वह अभाव यदि वस्तु-व्यवस्थाका अंग नही तो उसकी कल्पनासे क्या नतीजा ? ‘घटमें पटादिका अभाव है’ इस प्रकार पटादिके परिहार-द्वारा अभावको घट-व्यवस्थाका कारण परिकल्पित किया जाता है, अन्यथा वस्तुमें सङ्कर दोषोंका प्रसग आता है-एक वस्तुको अन्य वस्तुरूप भी कहा जा सकता है, जिससे वस्तुकी कोई व्यवस्था नहीं रहती-अतः अभाव वस्तु-व्यवस्थाका अंग है और इस लिये भावकी तरह वस्तुधर्म है । )
‘जो अभाव-तत्त्व (सर्वशून्यता) वस्तु-व्यवस्थाका अङ्ग नहीं है वह (भाव-एकान्तकी तरह) अमेय (अप्रमेय) ही है-किसी भी प्रमाणके गोचर नहीं है ।’
(इस तरह दूसरोके द्वारा परिकल्पित वस्तुरूप या अवस्तुरूप सामान्य जिस प्रकार वाक्यका अर्थ नही बनता उसी प्रकार व्यक्तिमात्र परस्पर-निरपेक्ष उभयरूप सामान्य भी वाक्यका अर्थ नही बनता, क्योकि वह सामान्य अमेय है-सम्पूर्ण प्रमाणोंके विषयसे अतीत है अर्थात् किसी भी प्रमाणसे उसे जाना नहीं जा सकता । )


अनात्मनाऽनात्मगतेरयुक्ति-
र्वस्तुन्ययुक्तैर्यदि पक्ष-सिद्धिः ।
अवस्तुयुक्तैः प्रतिपक्ष-सिद्धिः
न च स्वयं साधन-रिक्त-सिद्धिः ॥५७॥

अर्थ: ‘(यदि बौद्धोकी तरफसे यह कहा जाय कि वे साधनको अनात्मक मानते हैं, वास्तविक नहीं और साध्य भी वास्तविक नही है, क्योकि वह संवृत्तिके द्वारा कल्पिताकाररूप है, अतः पराभ्युपेतार्थके विरोधवादका प्रसङ्ग नहीं आता है, तो ऐसा कहना ठीक नही है; (क्योंकि) अनात्मा-निःस्वभाव संवृत्तिरूप तथा असाधनकी व्यावृत्तिमात्ररूप-साधनके द्वारा उसी प्रकारके अनात्मसाध्यकी जो गति-प्रतिपत्ति (जानकारी) है उसकी सर्वथा अयुक्ति-अयोजना है-वह बनती ही नही ।’; यदि (संवेदनाद्वैतरूप) वस्तुमें अनात्मसाधनके द्वारा अनात्म-साध्यकी गतिकी अयुक्तिसे पक्षकी सिद्धि मानी जाय-अर्थात् संवेदनाद्वैतवादियोके द्वारा यह कहा जाय कि साध्य-साधनभावसे शून्य संवेदन-मात्रके पक्षपनेसे ही हमारे यहाँ तत्त्वसिद्धि है, तो (विकल्पिताकार) अवस्तुमें साधन-साध्यकी अयुक्तिसे प्रतिपक्षकी-द्वैतकी-भी सिद्धि ठहरती है । अवस्तुरूप साधन अद्वैततत्त्वरूप साध्यको सिद्ध नहीं करता है, क्योंकि ऐसा होनेसे अतिप्रसंग आता है-विपक्षकी भी सिद्धि ठहरती है ।’ ‘और यदि साधनके बिना स्वतः ही संवेदनाद्वैतरूप साध्यकी सिद्धि मानी जाय तो वह युक्त नही है-क्योकि तब पुरुषाद्वैतकी भी स्वय सिद्धिका प्रसग आता है, उसमे किसी भी बौद्धको विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती ।’


निशायितस्तैः परशुः परघ्नः
स्वमूर्ध्नि निर्भेद-भयाऽनभिज्ञैः ।
वैतण्डिकैर्यैः कुसृतिः प्रणीता
मुने ! भवच्छासन-दृक्-प्रमूढैः ॥५८॥

अर्थ: (इस तरह) हे वीर भगवन् ! जिन वैतण्डिकोंने-परपक्षके दूषणको प्रधानता अथवा एकमात्र धुनको लिए हुए संवेदनाद्वैतवादियोने-कुसृतिका-कुत्सिता गति-प्रतीतिका-प्रणयन किया है उन आपके (स्याद्वाद) शासनकी दृष्टिसे प्रमूढ एव निर्भेदके भयसे अनभिज्ञ जनोंने (दर्शनमोहके उदयसे आक्रान्त होनेके कारण) परघातक परशु-कुल्हाड़ेको अपने ही मस्तकपर मारा है !! अर्थात् जिस प्रकार दूसरेके घातके लिये उठाया हुआ कुल्हाड़ा यदि अपने ही मस्तकपर पड़ता है तो अपने मस्तकका विदारण करता है और उसको उठाकर चलानेवाले अपने घातके भयसे अनभिज्ञ कहलाते हैं उसी प्रकार परपक्षका निराकरण करने वाले वैतण्डिकोंके द्वारा दर्शनमोहके उदयसे आक्रान्त होनेके कारण जिस न्यायका प्रणयन किया गया है वह अपने पक्षका भी निराकरण करता है और इसलिये उन्हे भी स्वपक्षघातके भयसे अनभिज्ञ एव दृक्प्रमूढ समझना चाहिये ।’


भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मो
भावान्तरं भाववदर्हतस्ते ।
प्रमीयते च व्यपदिश्यते च
वस्तु-व्यवस्थाऽङ्गममेयमन्यत् ॥५६॥


विशेष-सामान्य-विभक्त-भेद-
विधि-व्यवच्छेद-विधायि-वाक्यम् ।
अभेद-बुद्धेरविशिष्टता स्याद्
व्यावृत्तिबुद्धेश्च विशिष्टता ते ॥६०॥

अर्थ: ‘वाक्य (वस्तुतः) विशेष (विसदृश परिणाम) और सामान्य (सदृश परिणाम) को लिये हुए जो (द्रव्यपर्यायकी अथवा द्रव्य-गुण-कर्मकी व्यक्तिरूप) भेद हैं उनके विधि और प्रतिषेध दोनोंका विधायक होता है ।-जैसे ‘घट लाओ’ यह वाक्य जिस प्रकार घटके लानेरूप विधिक्रा विधायक (प्रतिपादक) है उसी प्रकार अघटके न लानेरूप प्रतिषेधका भी विधायक है, अन्यथा उसके विधानार्थ वाक्यान्तरके प्रयोगका प्रसंग आता है और उस वाक्यान्तरके भी तत्प्रतिषेधविधायी न होनेपर फिर दूसरे वाक्यके प्रयोगकी जरूरत उपस्थित होती है और इस तरह वाक्यान्तरके प्रयोगकी कहीं भी समाप्ति न बन सकनेसे अनवस्था दोषका प्रसंग आता है, जिससे कभी भी घटके लानेरूप विधिकी प्रतिपत्ति नही बन सकती । अतः जो वाक्य प्रधानभावसे विधिका प्रतिपादक है वह गौणरूपसे प्रतिषेधका भी प्रतिपादक है और जो मुख्यरूपसे प्रतिषेधका प्रतिपादक है वह गौण-रूपसे विधिका भी प्रतिपादक है, ऐसा प्रतिपादन करना चाहिये ।
(हे वीर जिन !) आपके यहाँ-आपके स्याद्वाद-शासनमें-(जिस प्रकार) अभेदबुद्धिसे (द्रव्यत्वादि व्यक्तिकी) अविशिष्टता (समानता) होती है (उसी प्रकार) व्यावृत्ति ( भेद ) बुद्धिसे विशिष्टताकी प्राप्ति होती है ।’


सर्वान्तवत्तद्गुण-मुख्य-कल्पं
मर्वान्तशून्यं च मिथोऽनपेक्षम् ।
सर्वाऽऽपदामन्तकरं निरन्तं
सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव ॥६१॥

अर्थ: • ‘(हे वीर भगवन् !) आपका तीर्थ-प्रवचनरूप शासन, अर्थात् परमागमवाक्य, जिसके द्वारा ससार-महासमुद्रको तिरा जाता है-सर्वान्तवान् है-सामान्य-विशेष, द्रव्य-पर्याय, विधि-निषेध, एक-अनेक, आदि अशेष धर्मोंको लिये हुए है-और गौण तथा मुख्यकी कल्पनाको साथमें लिये हुए है-एक धर्म मुख्य है तो दूसरा धर्म गौण है, इसीसे सुव्यवस्थित है, उसमें असंगतता अथवा विरोधके लिये कोई अवकाश नहीं है। जो शासन-वाक्य धर्मोंमें पारस्परिक अपेक्षाका प्रतिपादन नहीं करता-उन्हें सर्वथा निरपेक्ष बतलाता है-वह सर्वधर्मोंसे शून्य है-उसमें किसी भी धर्मका अस्तित्व नहीं बन सकता और न उसके द्वारा पदार्थ-व्यवस्था ही ठीक बैठ सकती है। अत आपका ही यह शासनतीर्थ सर्व-दुःखोंका अन्त करनेवाला है, यही निरन्त है-किसी भी मिथ्यादर्शनके द्वारा खंडनीय नहीं है-और यही सब प्राणियोंके अभ्युदयका कारण तथा आत्माके पूर्ण अभ्युदय (विकास) का साधक ऐसा सर्वोदय-तीर्थ है।’


कामं द्विषन्नप्युपपत्तिचक्षुः
समीक्ष्यतां ते समदृष्टिरिष्टम् ।
त्वयि ध्रुवं खण्डित-मान-शृङ्गो
भवत्यभद्रोऽपि समन्तभद्रः ॥६२॥

अर्थ: (हे वीर जिन !) आपके इष्ट-शासनसे यथेष्ट अथवा भरपेट द्वेष रखनेवाला मनुष्य भी, यदि समदृष्टि (मध्यस्थवृत्ति) हुआ, उपपत्ति-चक्षुसे-मात्सर्यके त्यागपूर्वक युक्तिसङ्गत समाधानकी दृष्टिसे-- आपके इष्टका-शासनका-अवलोकन और परीक्षण करता है तो अवश्य ही उसका मानशृङ्ग खंडित होजाता है-सर्वथा एकान्तरूप मिथ्यामतका आग्रह छूट जाता है-और वह अभद्र अथवा मिथ्यादृष्टि होता हुआ भी सब ओरसे भद्ररूप एवं सम्यग्दृष्टि बन जाता है । अथवा यो कहिये कि आपके शासनतीर्थका उपासक और अनुयायी हो जाता है।।’


न रागान्नः स्तोत्रं भवति भव-पाश-च्छिदि मुनौ
न चाऽन्येषु द्वेषादपगुण-कथाऽभ्यास-खलता ।
किमु न्यायाऽन्याय-प्रकृत-गुणदोषज्ञ-मनसां
हिताऽन्वेषोपायस्तव गुण-कथा-सङ्ग-गदितः ॥६३॥

अर्थ: ‘(हे वीर भगवन् !) हमारा यह स्तोत्र आप-जैसे भव-पाश-च्छेदक मुनिके प्रति रागभावसे नहीं है, न हो सकता है-क्योंकि इधर तो हम परीक्षा-प्रधानी हैं और उधर आपने भव-पाशको छेदकर संसारसे अपना सम्बन्ध ही अलग कर लिया है; ऐसी हालतमें आपके व्यक्तित्वके प्रति हमारा राग-भाव इस स्तोत्रकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं हो सकता । दूसरोंके प्रति द्वेषभावसे भी इस स्तोत्रका कोई सम्बन्ध नहीं है-क्योंकि एकान्तवादियोंके साथ अर्थात् उनके व्यक्तित्वके प्रति हमारा कोई द्वेष नही है-हम तो दुर्गुणोंकी कथाके अभ्यासको खलता समझते हैं और उस प्रकारका अभ्यास न होनेसे वह ‘खलता’ हममे नही है, और इसलिये दूसरोंके प्रति द्वेषभाव भी इस स्तोत्रकी उत्पत्तिका कारण नहीं हो सकता । तब फिर इसका हेतु अथवा उद्देश ? उद्देश यही है कि जो लोग न्याय-अन्यायको पहचानना चाहते हैं और प्रकृत पदार्थके गुण-दोषोंको जाननेकी जिनकी इच्छा है उनके लिये यह स्तोत्र ‘हितान्वेषणाके उपायस्वरूप’ आपकी गुणकथाके साथ कहा गया है । इसके सिवाय, जिस भवपाशको आपने छेद दिया है उसे छेदना अपने और दूसरोंके संसारबन्धनोंको तोडना-हमे भी इष्ट है और इस लिये यह प्रयोजन भी इस स्तोत्रकी उत्पत्तिका एक हेतु है । इस तरह यह स्तात्र श्रद्धा और गुणज्ञताकी अभिव्यक्ति के साथ लोक-हितकी दृष्टिको लिये हुए है ।’


इति स्तुत्यः स्तुत्यैस्त्रिदश-मुनि-मुख्यैः प्रणिहितैः
स्तुतः शक्त्या श्रेयःपदमधिगस्त्वं जिन ! मया ।
'महावीरो वीरो दुरित-पर-सेनाऽभिविजये
विधेया मे भक्तिं पथि भवत एवाऽप्रतिनिधौ ॥६४॥

अर्थ: ‘हे वीर जिनेन्द्र ! आप चूंकि दुरितपरकी-मोहादिरूप कर्मशत्रुओं-की-सेनाको पूर्णरूपसे पराजित करनेमें वीर हैं-वीर्यातिशयको प्राप्त है-, निःश्रेयस पदको अधिगत (स्वाधीन) करनेसे महावीर हैं और देवेन्द्रों तथा मुनीन्द्रों (गणधरदेवादिको ) जैसे स्वयं स्तुत्योंके द्वारा एकाग्रमनसे स्तुत्य हैं, इसीसे मेरे-मुझ परीक्षाप्रधानीके-द्वारा शक्ति-के अनुरूप स्तुति किये गये हैं । अत ‘अपने ही मार्गमे-अपने द्वारा अनुष्ठित एव प्रतिपादित सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र-रूप मोक्षमार्गमें, जो प्रतिनिधिरहित है-अन्ययोगव्यवच्छेदरूपसे निर्णीत है अर्थात् दूसरा कोई भी मार्ग जिसके जोडका अथवा जिसके स्थानपर प्रतिष्ठित होनेके योग्य नहीं है-मेरी भक्तिको सविशेष रूपसे चरितार्थ करो-आपके मार्ग-की अमोघता और उससे अभिमत फलकी सिद्धिको देखकर मेरा अनुराग (भक्तिभाव) उसके प्रति उत्तरोत्तर बढे जिससे मैं भी उसी मार्गकी आराधना-साधना करता हुआ कर्मशत्रुओंकी सेनाको जीतनेमें समर्थ होऊँ और निःश्रेयस (मोक्ष) पदको प्राप्त करके सफल मनोरथ हो सकूँ । क्योकि सच्ची सविवेक-भक्ति ही मार्गका अनुसरण करनेमे परम सहायक होती है और जिसकी स्तुति की जाती है उसके मार्गका अनुसरण करना अथवा उसके अनुकूल चलना ही स्तुतिको सार्थक करता है, इसीसे स्तोत्रके अन्तमें ऐसी फलप्राप्तिकी प्रार्थना अथवा भावना की गई है ।’