12. भगवान महावीर एवं सर्वोदय तीर्थ
भगवान महावीर का शासन (उनका उपदेश) ही “सर्वोदय तीर्थ” कहलाता है। दोनों ग्रंथ PDF सहित, और उनका सार, एक ही जगह।
सर्वोदय तीर्थ के ग्रंथ (PDF सहित):
- तीर्थंकर महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ (डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल): पूर्ण PDF, 201 पृष्ठ
- महावीर का सर्वोदय तीर्थ (पं. जुगलकिशोर मुख़्तार ‘युगवीर’): पूर्ण PDF, 45 पृष्ठ
- युक्त्यनुशासन (आचार्य समन्तभद्र), हिन्दी अनुवाद सहित: “सर्वोदय तीर्थ” शब्द का मूल स्रोत
सार
आचार्य समन्तभद्र ने युक्त्यनुशासन में भगवान महावीर की स्तुति करते हुए उनके शासन को “सर्वोदय तीर्थ” कहा है:
सर्वान्तवत्तद्गुणमुख्यकल्पं सर्वान्तशून्यं च मिथोऽनपेक्षम्।
सर्वापदामन्तकरं निरन्तं सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव॥ ६१॥
पं. जुगलकिशोर मुख़्तार ‘युगवीर’ इसका भाव इस प्रकार बताते हैं:
- शब्द का अर्थ: “सर्व” यानी सब और पूर्ण, “उदय” यानी ऊपर उठना या विकास, और “तीर्थ” वह जिसके निमित्त से संसार सागर को पार किया जाए। जो आगम वाक्य आत्मा के पूर्ण विकास में और सब जीवों के विकास में सहायक है, वही सर्वोदय तीर्थ है।
- अनेकान्त ही इसका आधार: यह शासन वस्तु के सभी धर्मों (सामान्य और विशेष, द्रव्य और पर्याय, एक और अनेक) को मुख्य और गौण की अपेक्षा से साथ रखता है, इसलिए इसमें कोई विरोध नहीं। जो मत किसी एक धर्म का सर्वथा एकान्त पकड़ते हैं, वे सर्वोदय तीर्थ नहीं हो सकते।
- सब दुःखों का अन्त करने वाला: यह शासन किसी मिथ्यादर्शन से खण्डित नहीं होता और सब प्राणियों के अभ्युदय का कारण है।
- विकास कैसे होता है: आत्मा का उदय यानी उसके ज्ञान, दर्शन, सुख आदि गुणों का विकास, जो अज्ञान आदि दोषों और ज्ञानावरणादि कर्मों के नाश बिना नहीं होता। यहाँ तीर्थ (जिनवाणी) निमित्त कारण है और सम्यग्दर्शन आदि आत्मगुण उपादान कारण हैं।
- धर्मतीर्थ: यह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रय का हेतु है, इसलिए इसे धर्मतीर्थ कहते हैं और भगवान महावीर धर्मतीर्थ के कर्ता (प्रवर्तक) कहलाते हैं।
डॉ. भारिल्ल के ग्रंथ का सार (संक्षेप में):
- प्रथम खण्ड: महावीर ने नया धर्म नहीं चलाया, सनातन वस्तुस्वभाव का उद्घाटन किया (पृ. 3)। मारीचि, त्रिपृष्ठ, सिंह, प्रियमित्र चक्रवर्ती, नन्द राजा आदि पूर्व भवों से होकर (पृ. 26 से 39) कुण्डलपुर में जन्म, तीस वर्ष में दिगम्बर दीक्षा, बयालीस वर्ष में ऋजुकूला तट पर केवलज्ञान, 66 दिन पश्चात् गौतम गणधर के आने पर दिव्यध्वनि, और कार्तिक अमावस्या को पावापुर से निर्वाण (पृ. 42 से 74)।
- द्वितीय खण्ड, सर्वोदय तीर्थ: उनकी वाणी ही तीर्थ है, जिसमें कण कण की स्वतन्त्रता है; कोई द्रव्य किसी का कर्ता नहीं (पृ. 79)। छह द्रव्य, सात तत्त्व, देव शास्त्र गुरु, भेदविज्ञान और आत्मानुभूति, अनेकान्त और स्याद्वाद, प्रमाण और नय, और सम्यक्चारित्र: जिस प्रकार रागादि मिटें वही आचरण चारित्र है (पृ. 80 से 169)।
- उपसंहार और अहिंसा: दुःख का कारण भीतर के मोह राग द्वेष हैं (पृ. 170); रागादि भावों का न होना ही अहिंसा है, और अन्तिम सन्देश: आत्मा को जानकर स्वयं भगवान् बनो (पृ. 177 से 187)।
पूरा सार, खण्ड क्रम से पृष्ठ अंकों सहित: तीर्थंकर महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ, सार
भगवान महावीर पर और ग्रंथ:
स्रोत: सार पं. युगवीर जी की पुस्तक “महावीर का सर्वोदय तीर्थ” (वीर सेवा मन्दिर) के “सर्वोदय तीर्थ” अध्याय से; भारिल्ल जी के ग्रंथ का सार उसी ग्रंथ के पाठ से।