🔥कथनी vs करनी OR चर्चा vs चर्या

अक्सर हम ऐसा देखते हैं की प्रवचन की गद्दी पर बैठकर न जाने हम कितनी बड़ी-बड़ी बातें बोल जाते हैं जो शायद सच्ची भी होती हैं, अच्छी भी होती हैं किंतु हमारे जीवन से वह अनछुई रह जाती हैं।
तब मस्तिष्क में एक पुरानी कहावत गूंजती है कि “मुंह मे राम और बगल में छुरी” अर्थात कि हमारी कथनी में कुछ और होता है और हम करते कुछ और हैं , हमारी चर्चा में तो समयसार जी ग्रंथाधिराज है किंतु चर्या में बालबोध पाठमाला का भाग एक भी नहीं है।

यह मेरा स्वयं का अनुभव है कि मैं 10 लक्षण के हेतु 10 धर्मों की व्याख्या तो आगम आधार पूर्वक बहुत सुंदर रीति से कर देता हूं किंतु वही जब मैं अपने जीवन की ओर झांकता हूं तो मुझे उसका अंश मात्र भी दिखाई नहीं देता।।

शायद यही कारण है कि हम जैन धर्म की का प्रचार प्रसार तो खूब जोरों शोरों से कर रहे हैं किंतु जैन धर्म की प्रभावना में हमारा योगदान नगण्य है, शून्य है।
क्योंकि जो प्रयत्न पूर्वक किया जाए वह प्रचार प्रसार है और जो हमारे जीवन को देखकर स्वयं हो जाए, वह प्रभावना है।

महान पंडित सदासुखदास जी की वो पंक्तियां जिसमें वह कहते हैं की पचास पचास वर्ष हो गए जिन्हें स्वाध्याय सुनते सुनते फिर भी आत्मज्ञान नहीं हुआ, सुख की किरण नहीं जागी, उसका सिर्फ एक ही कारण है और वह है अन्याय अनीति और अभक्ष्य भक्षण

“श्री महावीर पुराण” के रचयिता आचार्य श्री सकल कीर्ति स्वामी वक्ता के लक्षण बताते हुए लिखते हैं कि धर्म उपदेश देने वाले और शास्त्र लिखने वाले में ज्ञान एवं आचरण दोनों ही गुण पूर्ण मात्रा में होने चाहिए

बहुत विचार कर मैंने स्वयं के लिए एक छंद रचा जो मुझे पग पग पर मेरी कथनी और करनी में संतुलन प्रदान करता है।

(छन्द- सवैया इकतीसा)

अस्सी-सौ बरस बीते सुख की न रेख दीखे,
आतम को पढ़ो पर नज़र ना मुरी है।
न्याय-नीति करि न अभक्ष्य भोज खाय रहे,
बोल कछु चाल कछु बात बहु बुरी है।
बहु पढो सुनो पर हिय में न नैक धरो,
ग्रंथ निपटाए जैसे सांप की कांचुरी है।
सब देख जान मौन धारि काल दोष यह,
रे! मुख में राम और बगल में छुरी है।

मेरा यह प्रश्न है कि मेंरे जीवन में जो बातें मैंने स्वयं धारण नहीं की हैं क्या उस चीज का उपदेश मैं गणधर देव की गद्दी पर बैठ कर अन्य लोगों को दे सकता हूँ।

यह मेरा व्यक्तिगत प्रश्न है जो कि मैं स्वयं के लिए पूछ रहा हूं ।किसी अन्य पर आरोप लगाना मेरा प्रयोजन नहीं है क्योंकि दूसरों को देखते हुए तो द्यानतराय जी की 2 पंक्तियां याद आती हैं।
वे कहते हैं-

जैनी जैन धर्म के निंदक, हुंडा अवसर्पिणी जोरा।
द्यानत देख जान चुप रहिए जीवन जग में थोरा।।

कृपया उचित समाधान देकर मेरी जिज्ञासा को अवश्य शांत करें।।

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आपकी जिज्ञासा को समझने का प्रयास किया है। निम्न बातों पर विचार कर सकते हैं -
1. धर्मोपदेश भी एक स्वाध्याय ही है, जैसा कि स्वाध्याय के पाँच अंगों में स्पष्ट कहा है।

वाचनापृच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशाः

तत्त्वार्थ सूत्र, 9/25
अतः इसमें मात्र परहित नहीं, अपितु स्व-पर हित दोनों साधे जाते है। उसमें भी स्व-हित मुख्य और पर-हित गौण होता है। जैन दर्शन में आत्महित की कितनी मुख्यता है इसे प्रो. वीरसागर जी के इस लेख से देख सकते हैं।

2. यद्यपि जिनागम में वक्ता के स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है, किन्तु उन सभी के सार रूप पण्डित श्री टोडरमल जी की बातों पर विचार करना चाहिए (emphasis added)-
और वहां विस्तार से कहा है, तीव्र कषायी नहीं होना चाहिए, लोक निंद्य पापों का त्यागी हो इत्यादि; किन्तु अंतिम बिंदु (आत्मज्ञानी) उस प्रकरण में अवश्य देखने योग्य है।

कथनी और करनी के संदर्भ में उपर्युक्त post में स्वामी जी के विचार दृष्टव्य है।


4. शायद इससे आपको अच्छा समाधान मिलेगा - आज ही एक WhatsApp group पर यह संदेश प्राप्त हुआ -
गुरुवाणी मंथन शिविर में आज शांति जी भाईसाहब के व्याख्यान में सुंदर बात आई (have added the time stamp - do watch this video for a few minutes) :-

धर्मप्रचार भी तीन तरह का हो गया है-
i. धर्म प्रचार के नाम पर अपना प्रचार करना जो कि अशुभ भाव है।

ii. धर्म को, तत्त्व को ईमानदारी से सिर्फ दूसरों के हृदयंगत करने के लिए प्रचार करना, जो कि शुभ भाव रूप है।

iii. धर्म को तत्त्व को स्वयं के हृदयंगत करना और उसके जरिये स्वयं में वीतराग भाव की वृद्धि करना, ये प्रचार शुद्ध भाव रूप है ज्ञानी का प्रचार या प्रभावना इसी रूप है।

-स्रोत: पण्डित अंकुर जी शास्त्री, भोपाल द्वारा श्री टोडरमल स्नातक परिषद् नामक WhatsApp group पर प्रेषित (17.08 hrs., 31st May, 2020)

तत्त्व का उपदेश देना सौभाग्य भी है और बहुत जिम्मेदारी वाला कार्य भी है पद की गरिमा समझना चाहिए। लेकिन सर्वथा कथनी और करनी के अंतर को दूर करना असंभव है। वह मात्र केवलियों के हो सकता है, लेकिन वहाँ तो मात्र करनी मुख्य है, उपदेश बिना विकल्प के ‘भवि भागन और वचन योग’ के कारण होता है। अतः स्व हित को मुख्य रखते हुए जिनागम के चारों अनुयोगों का अध्ययन-मनन-चिंतन हो, तथा नयों की शैली को समझते हुए उपदेश आदि कार्य हो सो कोई विशेष बाधा नहीं है।
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इतने सटीक सुगठित तर्कसंगत युक्तिसंगत समाधान के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।।

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