वीर निर्वाणोत्सव २००४ (बाबू युगल जी) | Veer Nirvanotsav 2004 (Babu Yugal Ji)

वीर निर्वाणोत्सव २००४

रचयिता: बाबू ‘युगल’ जी (Jain Granth E Library की सूची के अनुसार; PDF पर नाम छपा नहीं है)

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वीर निर्वाणोत्सव २००४

भगवान महावीर का निर्वाण दिवस है। भगवान महावीर अपने संपूर्ण विकारों का नाश करके निर्वाण हुए। निर्वाण हुए - ये तो नास्ति का शब्द है; निर्वाण तो दीप बुझने को कहते हैं। पर सचमुच उनके सारे विकार बुझ गये, समाप्त हो गये और वे परम आनंद अवस्था में प्रतिष्ठित हो गये। सचमुच मुक्ति परम आनंद अवस्था को कहते हैं जहाँ-जिस अवस्था को पहुँचकर जीव अनंत काल तक अपने शुद्धात्म तत्त्व के भीतर भरे हुए अनंत अतीन्द्रिय आनंद का प्रतिसमय रसास्वादन किया करता है। वह आनंद कि जो इस लोक में कहीं भी नहीं है, इस लोक में कहीं भी किसी से प्राप्त नहीं होता। किंतु अंतर् में जो भगवान चैतन्य शुद्धात्म तत्त्व विराजमान है हर जीव के - उसके भीतर भरा हुआ अनंत शक्तिमय जो आनंद है, उस आनंद के फव्वारे मुक्तदशा में चलते हैं और भगवान प्रतिसमय हर पर्याय में ताज़ा आनंद का पान किया करते हैं। एक पर्याय गयी आनंद की, फिर दूसरी प्रकट होती है, फिर तीसरी प्रकट होती है - इस तरह अनंतानंत काल तक वह आनंद दशा उस जीव को उपलब्ध रहती है, कभी समाप्त नहीं होती। अन्य जैनेतर मन्तव्यों की तरह वे भगवान वापस संसार में नहीं आते क्योंकि विकार का संपूर्णरूप से अभाव, मोह-राग-द्वेष का संपूर्णरूप से अभाव हो चुका होता है। ऐसी ही स्थिति भगवान वर्धमान की हुई। भगवान संपूर्ण विकारों का नाश करके कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन ५ बजकर ३२ मिनट पर मोक्ष पधार गये। और मुक्ति में अनंतकाल तक विराजमान रहेंगे। (५:००)

भगवान का जन्म कुण्डलपुर कहा जाता है। पर अभी-अभी लगभग १ मास पूर्व की शोध के बाद विशेषज्ञों ने यह निर्णय किया कि भगवान का जन्म वैशाली के कुण्डग्राम में हुआ था, उसे ही कुण्डलपुर कहा जाता है। वैशाली उस समय एक बहुत बड़ा गणराज्य था। जैसे हमारा भारतवर्ष है - वह विश्व का बहुत बड़ा गणराज्य है, इसी तरह वैशाली उस समय देश का बहुत बड़ा गणराज्य था, अर्थात् वहाँ राजशाही नहीं थी। जैसे हमारे यहाँ भिन्न-भिन्न विभाग मंत्रियों को दिये जाते हैं, चुने जाते हैं और योग्य पुरुष के हाथों से शासन की परम्परा चलती है - वह स्थिति वैशाली की थी। उसके अधिपति राजा चेटक थे, कि जिनकी कन्या त्रिशला से भगवान महावीर के पिता सिद्धार्थ का विवाह हुआ था। कुण्डग्राम भी उस समय एक बहुत बड़ा नगर था और राजा सिद्धार्थ उसके शासनकर्ता थे। ये तो अभी की बात हुई। भगवान ने विवाह नहीं किया और ३० वर्ष की अवस्था में दीक्षा ले ली। १२ वर्ष तक तप किया, ४२ वर्ष की अवस्था में केवलज्ञान प्राप्त हुआ और ३० वर्ष तक विहार करते हुए अपनी दिव्यवाणी - शुद्धात्मा का, शुद्ध ध्रुव चैतन्य तत्त्व का उद्घाटन करनेवाली, उसके स्वरूप को दर्शानेवाली वाणी - ३० वर्ष तक चलती रही। उत्तर प्रदेश (उत्तर भारत) में भगवान का विहार अधिक हुआ और इसीलिए उस प्रान्त का नाम आज भी विहार (बिहार) है। ७२ वर्षीय अवस्था में भगवान निर्वाण पधार गये। भगवान महावीर के ये जो स्थल (घटनाएँ) हैं, ये हमारे लिए काफी प्रेरक हैं। (१०:००)

३० वर्ष की अवस्था में दीक्षा ले लेना, ४२ वर्ष की अवस्था में कैवल्य प्राप्त करना और ७२ वर्ष की अवस्था में निर्वाण प्राप्त करना, मोक्ष प्राप्त करना - ये आज के हमारे मुमुक्षु समुदाय के लिए काफी प्रेरणा की वस्तु है क्योंकि हममें से कई इन अवस्थाओं को पार कर चुकने पर भी वह उपलब्धि नहीं कर पाए जो भगवान ने की थी। सचमुच यह हमारे लिए भगवान के पुरुषार्थ के समक्ष एक बहुत बड़ी संकोच की बात है। भगवान तो ७२ वर्ष की अवस्था में मोक्ष पधार गये और हम उससे भी अधिक ६० और ८० वर्ष की अवस्था तक भी मुक्ति का जो प्रथम चरण है - सम्यग्दर्शन और आत्मानुभूति - वह भी नहीं ले पाते, यह काफी शोचनीय है। भगवान की पूजा करने से वह मिलता नहीं है; क्योंकि किसी की प्रशंसा और स्तुति करने से उसके गुण और उसकी शक्तियों की उपलब्धि हमको तबतक नहीं होती कि जबतक हम स्वयं अपनी शक्तियों के विकास के लिए उस प्रकार का पुरुषार्थ न करें।

२५०० वर्ष की ही तो बात है… अवसर्पिणी का चतुर्थ काल था जिसमें २४ तीर्थंकर हुए, भगवान आदिनाथ से लगाकर भगवान वर्धमान तक और ३१/२ वर्ष… ३ वर्ष और ८१/२ महीने चतुर्थ काल के शेष रहने पर भगवान निर्वाण पधार गये। इसके बाद गौतम - जिनकी कथा हम सबको मालूम है, वे गणधर बने और वे चतुर्थ काल समाप्त हो जाने पर भी और पंचम काल दुःखमा काल… अवसर्पिणी का ये दुखमा काल - इसके प्रारंभ हो जाने पर भी गौतम, सुधर्म और जम्बूस्वामी - ये मोक्ष पधारे पंचमकाल में। पर ये चतुर्थ काल में पैदा हो गये थे, तो पंचम काल में… क्योंकि ये अवसर्पिणी का हुण्डा-अवसर्पिणी है। इस हुण्डा-अवसर्पिणी में इस प्रकार के काम होते हैं। वीर निर्वाण का पर्व वास्तव में वैराग्य का पर्व है। (१५:००)

निर्वाण कोई सामान्य बात नहीं है, सदा के लिए अनंत सुख की, अनंत स्वाधीन सुख की प्राप्ति अपने पुरुषार्थ के बल पर… यह कोई सामान्य बात नहीं है। और अगर हम इस पर्व से या भगवान महावीर से प्रेरणा ही लेना चाहते हैं, तो सही स्थिति तो यह है - जितनी भी हमारी आयु बीत चुकी हो, पर शेष रही आयु में हमें उस शुद्धात्मा का दर्शन कर ही लेना चाहिए, तब तो हमने निर्वाण पर्व मनाया और भगवान की पूजा भी सार्थक हुई। सबसे बड़े दुःख की बात यह है कि निर्वाणपर्व दीपावली का पर्यायवाची बन गया है। निर्वाणपर्व जो वैराग्य का दिवस होना चाहिए… वैराग्य माने संपूर्ण विश्व से आसक्ति और ममत्व तोड़कर एकमात्र अपने शुद्ध चैतन्य का अनुभव करना और उसमें लीन हो जाना - इसका नाम वैराग्य है। घर-बार छोड़ने का नाम या वेश बदल लेने का नाम वैराग्य नहीं है। वैराग्य तो आनंदमय होता है… अतीन्द्रिय आनंदमय होता है। पर हुआ यह है परंपरा में… कि जिस निर्वाणदिवस पर हमें उस शुद्धात्मा का अनुसंधान करके और साक्षात् भगवान महावीर ने जिस आनंद का रसास्वादन किया, उसका रसास्वादन करना चाहिए। अगर यह होता है तो निर्वाणपर्व की सार्थकता है। लेकिन हम अपने जीवन में देखते हैं कि हम तो इस निर्वाणपर्व को दीपावली की संज्ञा देकर केवल लौकिक आनंद मनाते हैं और लौकिक आनंद से तो ज़रा भी, थोड़ा भी शुद्धात्मा के निकट नहीं पहुँचा जा सकता, बल्कि वह तो समूचा पाप है। केवल एक भगवान की प्रातःकाल पूजा करके और इसके बाद दिनभर मिष्टान्न की व्यवस्थाएँ, व्यंजनों की व्यवस्थाएँ करना, खाना-पीना, व्यवसाय के जो साधन हैं उन व्यवसाय के साधनों की व्यवस्था में लग जाना, उनकी पूजाएँ करना, इत्यादि इत्यादि यह सारा का सारा पापाचार है। (२०:००) और इस पापाचार से कभी भी निर्वाण के प्रथम चरण की उपलब्धि भी नहीं हो सकती। आज तक सारी दीपावलियाँ माने निर्वाण पर्व इसी तरह बीते हैं। सचमुच तो भगवान का जब निर्वाण हुआ, तो लोग हँसे नहीं, लोगों को - जो भगवान की दिव्यवाणी सुनते थे, उनको प्रसन्नता नहीं हुई। प्रसन्नता तो भगवान को हुई, भगवान हँसे; लेकिन भगवान के विरह में लोग रोये, लोगों ने भोजन भी नहीं किया होगा - यह कल्पना गलत नहीं है, सत्य कल्पना है।

आगम में यह मिलता है कि जब भगवान आदिनाथ का निर्वाण हुआ तो भरत जैसा यशस्वी चक्रवर्ती रो पड़ा। अरे! भगवान का निर्वाण जो प्रसन्नता का दिन है, तो ऐ भरत! ये रोने का क्या काम है? रोते क्यों हो? इन्द्र ने… सौधर्म इन्द्र ने कहा। लेकिन वास्तव में वे अपने पिता के विरह में नहीं रोये थे, लेकिन असंख्य जीवों को मुक्ति का वह आनंदमय मार्ग बताने वाले जो महापुरुष थे, जो श्रेष्ठ पुरुष थे, जो सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् के अवतार थे ऐसे भगवान आदिनाथ चले गये। तो उन भगवान के विरह में, उनकी वाणी के विरह में भरत रोये थे, पिता के विरह में नहीं। तो भरत जैसा चक्रवर्ती जब रो पड़ा तो हमारी क्या बिसात है? भगवान महावीर जब निर्वाण पधारे होंगे तो क्या लोगों ने दीपावलियाँ मनायी होंगी, दीपकों की पंक्तियाँ सजायी होंगी, मिठाइयाँ बनायी होंगी, लोगों को आमन्त्रित किया होगा, स्वयं आमन्त्रित होकर व्यञ्जन खाये होंगे, पकवान खाये होंगे? क्या यह बात संगति पाती है? क्या यह विसंगति नहीं है कि मुक्ति के पथ को एक दिन में ३-३ बार शुद्धात्मा के माध्यम से बरसाने वाले भगवान चले गये, अब हमें मुक्ति का मार्ग कौन बताएगा? - क्या यह चिंतन, यह विचार आँसू की धारा बहाने वाला नहीं है? पकवान खाने वाला है यह विचार? लेकिन हर पर्व का रूप बदल गया है, हर पर्व में विकृतियाँ आ गयी हैं। इसलिए हम सचमुच पर्व मनाते ही नहीं हैं। केवल पूजा करके और घर पर आनंद मनाते हैं, खाते-पीते मौज उड़ाते हैं। यह हमारा कर्तव्य नहीं है। (२५:०२)

कम से कम दो आँसू हमारी आँखों में भी आने चाहिए; क्या आज तक आए? भगवान वीर चले गये। अंतिम तीर्थंकर जिनके बाद कोई तीर्थंकर दिव्यवाणी की वर्षा करने वाला नहीं होगा। यह कोई बहुत बड़ा धन नहीं था क्या? इतना बड़ा धन, इतना बड़ा वैभव, तीन लोक का अधिपति - वो चला गया और हम आज हँसते हैं, मिष्टान्न खाते हैं, व्यवसाय की व्यवस्थाएँ बनाते हैं। व्यवसाय स्थानों पर जाकर सारे व्यवसाय के साधन फैलाकर, लक्ष्मी की वासना में झूलकर और सारा दिन व्यतीत करते हैं। वहाँ भी भगवान की पूजा करते हैं… व्यवसाय स्थानों पर भी। सारा पैसा लक्ष्मी के रूप में इकट्ठा करके और भगवान की पूजा… अरे! पूजा तो यहाँ हो चुकी। व्यवसाय के स्थान पर भगवान की पूजा का क्या मतलब है? क्या होता है? लेकिन मुझे काफी संकोच है यह बात कहने में - जिनवाणी आदि में भी यह सब जोड़ दिया गया। और लोग गुमराह हो गये। सचमुच यदि दीपावली निर्वाणपर्व की पर्याय (पर्यायवाची) होती तो फिर २४ ही तीर्थंकरों के जो निर्वाण हैं, वे दीपावली के नाम से प्रसिद्ध होते। केवल भगवान महावीर के जाने पर दीपकों की लाइनें जली हों, बल्बों की लाइनें जली हों तो फिर हर तीर्थंकर के जाने पर दीपावलियाँ होनी चाहिए। लेकिन आगम में तो यह बात कहीं भी मिलती नहीं है। दुःखभरी कथाएँ तो मिलती हैं - अरे! भगवान त्रिलोकाधिपति चले गये। अब हमें वो अमृतवाणी, वो सुधा-सीकर हमें कौन देगा, कौन बरसाएगा? इस तरह याद कर-करके लोग रोये, लोगों ने उपवास किये, मिष्टान्न नहीं खाये। क्योंकि हर तीर्थंकर का जो निर्वाण है, क्या हम उसमें दीपावली देखते हैं, पढ़ी है कहीं हमने? है नहीं… होता नहीं है। तो फिर भगवान महावीर का निर्वाण भी अन्य तीर्थंकरों की तरह हुआ। उसमें विशेषता क्या है कि हम दीपावली मनाते हैं और इसे दीपावली कहते हैं? दीपावली सचमुच हमारा पर्व नहीं है, वह विकृति है। और यदि वो वास्तव में हमारा पर्व होता, निर्वाणपर्व यदि दीपावली होता तो ये सारा देश दीपावली कैसे मनाता? वो तो जैन नहीं है, लेकिन वो… दीपावली वे मनाते हैं, हम दीपावली नहीं मनाते। हम तो निर्वाणपर्व मनाते हैं बड़े दुःखभरे हृदय से। इसलिए ये विकृतियाँ… इनका अंत होना चाहिए। मोदक की प्रथा है। क्या हर तीर्थंकर के निर्वाण में मोदक चढ़ाते हैं, लड्डू चढ़ाते हैं? यह भी एक रूढ़ी है। वैसे तो मोदक चढ़ाने लायक ही नहीं है घी-शक्कर का। (३०:००) लेकिन मोदक चढ़ाते हैं, लड्डू चढ़ाते हैं, तो क्या हर तीर्थंकर के निर्वाण में लड्डू चढ़ा था? तो फिर भगवान महावीर के निर्वाण में लड्डू क्यों? यह भी सब जोड़ दिया गया, सारा… सबकुछ… शास्त्रों में भर दिया गया। तो ये सारी बातें विचार करने की हैं। मेरे से पूछा जा सकता है - ‘आप ने यह बात पहले क्यों नहीं कही?’ ये प्रश्न तो हो सकता है। लेकिन सचमुच जो बात मैं सोच नहीं पाया, उसके गहरे में (जा नहीं पाया)…/… वह छूटता रहा लेकिन जब भगवान के निर्वाण पर मैंने गंभीरता से विचार किया तो मुझे विचार आया - अरे! घर में किसी का विरह हो जाए, तो क्या पकवान बनते हैं? लोग भोजन तक नहीं करते। और तीर्थंकर जैसे महापुरुष का निर्वाण हो और लोग मिठाइयाँ खावें और व्यवसाय चलावें, उसे नयावर्ष कहें - इत्यादि सारी झूठी बातें हैं, मिथ्या बातें हैं, गृहीत मिथ्यात्व है जो हमने दूसरे लोगों से उधार ले लिया है। इसलिए हमने पंचकल्याण में देखा होगा कि पाँचवें कल्याणक में जब भगवान का निर्वाण होता है तो उसके प्रतीकस्वरूप केवल एक दीपक जलाया जाता है… निर्वाण में… दीपावलियाँ नहीं की जाती हैं। और दीपावलियों में यह महाहिंसा - क्या श्रावक को इतना विवेक नहीं होता कि इसमें इतनी हिंसा होती है? और और… रूप तो बहुत बदल गये हैं न। उसमें व्यवसाय जुड़ गया है, खाना- पीना जुड़ गया है, आतिशबाजियाँ जुड़ गयी हैं, ये सारे के सारे… इतनी भयंकर विकृतियाँ हैं, हिंसाकाण्ड है। ये हिंसाकाण्ड है, निर्वाणपर्व नहीं है। निर्वाणपर्व ही यदि मनाना हो तो पूरे दिन… बल्कि उससे भी आगे… पूरे जीवन शुद्धात्मा का चिंतन;… लोक का चिंतन समाप्त होकर, लौकिक बातों का चिंतन समाप्त होकर एकमात्र हमारा उपयोग, हमारा ज्ञान शुद्धात्मा के चिंतन में अनुरक्त हो जाए तो यह कहा जा सकेगा कि हमने निर्वाणपर्व मनाया है और उससे यह संदेश लिया है। इस तरह और-और भी जो पर्व हैं, उनमें भी विकृतियाँ आयी हैं और उन पर्वों के समय यह बात कही जाती है। प्रश्न केवल यह है कि हम इस राह पर कितने चलते हैं? क्या यहाँ से जाने के बाद हम भगवान को याद भी करते हैं? क्या हम भगवान जैसा जो अपना भगवान है - शुद्ध चैतन्य, क्या उसका स्मरण करते हैं? यदि नहीं करते तो फिर यह स्वयं अपने साथ में धोखा है। यह निर्वाणपर्व वास्तव में नहीं है। भगवान ने… हमें मालूम है कि १०वें भव में वे सिंह की अवस्था में थे। और उस अवस्था में २ चारणऋद्धिधारी मुनि ऊपर से उतरे। वह सिंह तो हिरण को खा रहा था। देखिए दशा!.. (३५:००) और आत्मा के पुरुषार्थ की महिमा हम देखें तो उसके मुँह में तो हिरण था, उसके पेट में हिरण था। और चारणऋद्धिधारी मुनियों ने देखा कि ये तो भव्य है; बल्कि जल्दी मोक्ष जाने वाला है, तीर्थंकर होने वाला है। ऐसा देखकर निर्भय होकर मुनिराज सिंह के सामने आये और उन्होंने उसे शुद्धात्मा का संदेश दिया। सैनी पंचेन्द्रिय, मन वाला, जागृत प्राणी था… तत्काल हिंसा का भाव समाप्त हो गया, शुद्धात्मा की बात - अरे! ये जो देह तेरे साथ है, जिसके लिए हिरण का तू भक्षण कर रहा है, वह देह भी तेरी नहीं है। इस देह के भीतर एक हीरा पड़ा है। इस देह के भीतर एक कीमती तत्त्व पड़ा है, वो तू है। मृगराज! यह तू क्या करता है? यह बात सिंह को तत्काल समझ में आयी और उसकी आँखों से तुरन्त आँसू बहने लगे। वह तुरन्त समाधि में पहुँच गया और समाधि में पहुँचकर, उपयोग को शुद्धात्मा में लगाकर सम्यग्दर्शन और आत्मानुभूति प्राप्त की। सिंह की दशा… देखिए! ऐसा हिंसक जीव, ऐसे पाप परिणाम वाला… उसके पाप परिणाम तत्काल छूटकर… हम परिणामों से दुःखी होते हैं न कभी - ये परिणाम मुझे क्यों आते हैं? लेकिन हमारा पुरुषार्थ अत्यंत शिथिल है। अन्यथा परिणामों को अगर शुद्ध चैतन्य से बांध दिया जाए, केवल एक ज्ञान को, उपयोग को अगर शुद्ध चैतन्य से बांध दिया जाए तो परिणामों की धारा बदल जाएगी। वह विष के स्थान पर अमृत की धारा बन जाएगी और हमारे भीतर अमृत का प्रवाह चलने लगेगा। इसलिए… तो उस दशा से फिर भगवान त्रिशला के गर्भ में आए और वर्धमान तीर्थंकर, महावीर तीर्थंकर के नाम से फिर प्रसिद्ध हुए। भगवान ने दीक्षा लेने के बाद… जो ४२ वर्ष की अवस्था में केवलज्ञान हुआ और ३० वर्ष तक दिव्यध्वनि हुई, तो उसके बाद… जब आयु निकट होती है तो दिव्यध्वनि भी बंद हो जाती है। यह योग अवस्था है, वचन और काय का स्पंदन होता है। इस दिव्यध्वनि की अवस्था में वचन बोले जाते हैं न, तो वचन बोलने से भीतर जो वचनयोग है, उस वचनयोग में प्रदेशों का - आत्मप्रदेशों का स्पन्दन होता है। और वो विकार है क्योंकि आत्मा के प्रदेश सिद्धदशा में निष्कम्प होते हैं; और यहाँ आत्मा के प्रदेशों में कम्पन होता है, वचन और काय के द्वारा, मन के द्वारा नहीं। मन के द्वारा विचार नहीं होते। केवलज्ञान है, इसलिए विचार आदि, विकल्प आदि यहाँ नहीं होते। लेकिन वह जो कम्पन है, उसके लिए भगवान को अलग से कोई पुरुषार्थ करना पड़ता हो - वह नहीं है। लेकिन आयु की जब निकटता होती है तो फिर ये वचन और काय के जो योग हैं, ये बहुत मंद हो जाते हैं। माने दिव्यध्वनि बंद हो जाती है आयु की जब निकटता होती है। भगवान नहीं सोचते, भगवान तो पहले से जानते हैं (४०:००) कि मेरी आयु कब पूरी होने वाली है, किस क्षण में मेरी मुक्ति होने वाली है? भगवान ये जानते हुए भी मोक्ष नहीं जा पाते। जानते हैं न - ‘मेरा मोक्ष कब होने वाला है’, ऐसा केवलज्ञान में जानते हैं; लेकिन चाहें कि मैं अभी मोक्ष जाऊँ - वह नहीं होता है, न चाह होती है। अरे! वह तो ध्रुव चैतन्य है सचमुच तो। उस ध्रुव चैतन्य में लीनता रहकर भगवान सदा सुधा का पान किया करते हैं। इसके अतिरिक्त और कोई दशा भगवान की नहीं है। वाणी जो खिरती है, चलते-फिरते हैं, उठते-बैठते हैं - यह सब स्वतः होता है। वाणी पर भगवान का अधिकार नहीं है, वाणी के भगवान कर्त्ता नहीं हैं। शरीर का जो उठना-बैठना होता है उसके भगवान कर्त्ता नहीं हैं। लेकिन ये सारी क्रियाएँ स्वतः होती है। इसतरह बाहर की क्रिया भी बंद होती है और भीतर का स्पंदन भी… भीतर जो प्रदेशों का कम्पन है वह भी मंद हो जाता है तो उसे तीसरा शुक्लध्यान कहते हैं। चार शुक्लध्यान हैं न। पृथक्त्ववितर्कवीचार, एकत्ववितर्कअवीचार - ये तो बारहवें गुणस्थान तक हुआ। और इसके बाद केवलज्ञान होता है और केवलज्ञान होने के बाद जब दिव्यध्वनि बंद हो जाती है; योगनिरोध का - योग समाप्त होने का - काल आता है, तब सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती शुक्लध्यान १३वें गुणस्थान के अंत में होता है। उसमें योगों का, प्रदेशों का कम्पन मंद हो जाता है। इसके बाद भगवान… भगवान तो केवल शुद्धात्मा की अनुभूति में ही लीन रहते हैं। उनको अलग से कोई दूसरा उपाय, दूसरा साधन ये योग को समाप्त करने के लिए नहीं करना पड़ता। किन्तु यहाँ तो केवल एक ही है यह बात - चौदह जो गुणस्थान हैं, उसमें चौथे गुणस्थान से जो शुद्धात्मा का अनुभव करके सम्यग्दर्शन हुआ, सम्यग्ज्ञान हुआ, स्वरूपाचरण चारित्र हुआ, इसके बाद श्रावक के व्रत, मुनिराज की दशा और उसके बाद ८वाँ-९वाँ-१०वाँ-११वाँ-१२वाँ-१३वाँ-१४वाँ गुणस्थान - शुद्धात्मानुभूति में ही सब हो जाते हैं। अलग से भगवान को कोई प्रयत्न (नहीं करना पड़ता)… कितना सरल है मोक्षमार्ग देखा जाए तो! केवल एकमात्र अपने उपयोग को, अपने श्रुतज्ञान को शुद्धात्मा से बाँध दो, तो सारा का सारा गुणस्थानों का जो क्रम है, शुद्धी का जो विधान है वो अपने-आप आता जाएगा और मुक्ति का अवसर आएगा। तो जब सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती - ये १३वें गुणस्थान का शुक्लध्यान है; और उसके बाद व्युपरतक्रियानिवृत्ति माने क्रिया का सर्वथा (अभाव)… क्रिया माने वचन और काय के निमित्त से प्रदेशों का जो कम्पन होता था - वो कम्पन समाप्त हो जाता है। और समाप्त होकर भगवान अयोगदशा में पहुँच जाते हैं। अब अधिक विकार बाकी नहीं है, अब केवल असिद्धत्व बाकी है, चारित्र की थोड़ी कमी बाकी है क्योंकि प्रदेशों का कम्पन होता था, असिद्धदशा है - तो केवल ये बाकी है। ये सारा पूर्ण हो जाने पर चारित्र की दशा पूरी हो जाती है। क्योंकि क्रम है ना - सम्यग्दर्शन, फिर सम्यग्ज्ञान… तो सम्यग्ज्ञान हुआ पूरा १३वें गुणस्थान में, और सम्यक्चारित्र… ये सम्यक्चारित्र १४वें गुणस्थान में पूरा होकर, फिर भगवान मोक्ष पधार जाते हैं। इस तरह भगवान महावीर ने भी मुक्ति का जो वैभव प्राप्त किया - (४५:००) मुक्ति भी वैभवशालिनी है, वैभव है वहाँ; रात और दिन आनंद ही आनंद का पान… आनंद ही आनंद का… आनंदमय जीवन, एक-एक क्षण का… और कभी भी दुःख का नामनिशान भी जहाँ नहीं है - ऐसी अवस्था का नाम मुक्ति है। उसको आज भगवान ने प्रातःकाल प्राप्त किया और हमें भगवान प्रेरणा दे गये। ये जो रूप बदल गया है, उस रूप को बदलने की चेष्टा हमको करना चाहिए। हमें… जैसे दशलक्षण को लोग पर्यूषण कहना नहीं छोड़ते, जब.. वास्तव में दिगम्बर शासन में तो केवल दशलक्षण नाम का पर्व है, पर्यूषण नाम का कोई पर्व नहीं है। दशलक्षण को भी पर्यूषण शब्द कहना - यह भी गृहीत मिथ्यात्व का पाप है। लेकिन हम तत्त्वज्ञान सुनते हैं, शुद्धात्मा की बारीक चर्चा सुनते हैं, गहरी चर्चा सुनते हैं, तो अगर हम दशलक्षण के स्थान पर पर्यूषण को ही याद रखते हैं, और पर्यूषण को हम भुला नहीं पाते, उसके स्थान पर दशलक्षण का प्रयोग नहीं करते तो तत्त्वज्ञान की बारीक चर्चा हमारे कठोर हृदय में प्रवेश कैसे करेगी? इसलिए जो बड़े-बड़े विद्वान … अरे! छपाई में जो कार्ड आते हैं, जो अभी दीपावली के कार्ड आएँगे… दशलक्षण के कार्ड आते हैं उनमें पर्यूषण शब्द आता है। छपा हुआ ही… लोग दशलक्षण को ही भूल गये हैं। दशलक्षण की केवल किताबों से पूजा करना - इतना मात्र रह गया है, लकिन नाम अगर निकलेगा मुँह से तो पर्यूषण निकलता है। और पर्यूषण तो गृहीत मिथ्यात्व है। हमारा पर्व नहीं है, कल्पित है बिल्कुल, हमारा पर्व नहीं है, हमारे आगम में कहीं नहीं है। इसलिए जैसे वो हमने नहीं छोड़ा, उसी तरह हम इस निर्वाणपर्व को दीपावली कहते हैं - यह बहुत बड़ी भूल करते हैं। दीपावलियाँ करके, लाखों जीवों की हिंसा नहीं करना है। लेकिन वास्तव में अन्तर् का दीप, सम्यग्ज्ञान का दीप… भगवान के निर्वाण के जो विधान हैं, उन विधानों के अनुसार सम्यग्ज्ञान-भावश्रुतज्ञान का दीपक अन्तर् में जलाकर वास्तव में निर्वाणपर्व को हम मनावें तो यह इसकी सार्थकता है। विकृतियाँ काफी आयी हैं, उनको ज्यादा कहने से फायदा नहीं है। पहले भी यह बात आ चुकी है, लेकिन बार-बार अगर याद आती है हमको तो कम से कम हम ये मिठाइयाँ वगैरह खाना छोड़ें, इधर-उधर मिठाइयाँ भेजना छोड़ें। और केवल दुःख भरे हृदय से… अरे! आज अगर… २५०० वर्ष ही तो हुए… अरे! अगर आज वो तीर्थंकर परमात्मा होते तो क्या हमारी यह दशा होती? अरे! हमें भी वे निरंतर दिन में तीन-तीन बार वे अमृत की झड़ियाँ… उनसे हम स्नान करते, उनका पान करते। यह बात बार-बार याद आवे और वैराग्यमय हमारा दिवस व्यतीत हो तो वास्तव में निर्वाणपर्व की, भगवान महावीर के निर्वाणपर्व की सार्थकता है। हो गया ये। (४९:४४)


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स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/48504।