त्यागो लोभ महा दुखकार, पाओ लाभ महा अविकार ॥ टेक ॥
जड़ विषयों के लोभी होकर, पायो क्लेश अपार ।
अब तो अपना विषय पिछानो, सहजहिं जाननहार ॥ 1 ॥
रे! चैतन्य प्राणमय जीवन, नहिं जानो सुखकार।
पर जीवन का मोही होकर, भ्रमत फिरो संसार ॥ 2 ॥
ज्ञायक को ही ज्ञेय न जाना, तीन भुवन में सार।
ज्ञेय लुब्ध होकर रे मूरख, पाया सुख न लगार ॥ ३॥
पुण्योदय में सुख मानकर, उलझा रहा गँवार।
दिन-दूनी तृष्णा ही बढ़ती, सब संसार असार ॥ 4 ॥
महाभाग्य से अवसर आया, ध्याओ निज पद सार।
अपने में ही तुष्ट तृप्त हो, होओ भव से पार ॥ 5॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४०१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’