त्यागेंगो त्यागो मिथ्यातम, दूजो नहीं जाकी सम
त्यागेंगो त्यागो मिथ्यातम, दूजो नहीं जाकी सम,
तोह दुख दाता तिहूँ, लोक तिहूँ काल ॥त्यागो. ॥
चेतन अमलरूप, तीन लोक ताको भूप,
सो तो डार्यो भवकूप, दे नहिं निकाल ॥त्यागो. ॥१॥
एकसौ चालीस आठ, प्रकृतिमें यह गाँठ,
जाके त्या पावै शिव, गहैं भव जाल ॥त्यागो. ॥२॥
‘द्यानत’ यही जतन, सुनो तुम भविजन,
भजो जिनराज तातैं, भाज जै है हाल ॥त्यागो. ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ९५
खोज: Tyagengo Tyago Mithyatam, Dujo Nahin Jaki Sam
अर्थ
अरे भाई! मिथ्यात्व के अंधकार को, अज्ञान को छोड़ो। तीनों लोक व तीनों काल में इसके समान दुःख देनेवाला कोई नहीं है।
चेतन अमलरूप, तीन लोक ताको भूप,
यह चेतन मलरहित है, तीन लोक का स्वामी है, ज्ञाता है। उसको यह मिथ्यात्व भवरूपी कुएँ में डाल देता है और निकलने नहीं देता।
एकसौ चालीस आठ, प्रकृतिमें यह गाँठ,
यह मिथ्यात्व जीव को एक सौ अड़तालीस कर्म-प्रकृतियों की जकड़न में जकड़े रखता है, बाँधे रखता है, जिनको छोड़ने पर ही मोक्ष की प्राप्ति होती है और यह भव-जाल समाप्त हो जाता है।
‘द्यानत’ यही जतन, सुनो तुम भविजन,
द्यानतराय कहते हैं कि ओ भव्य पुरुष ! सुनो! मिध्यात्व को दूर करने का एक यही उपाय है, यही एक यत्न है कि तुम श्री जिनराज का भजन करो जिससे यह मिथ्यात्व की दशा (स्थिति/हाल) दूर हो जावे।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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