तुमको कैसे सुख ह्वै मीत
तुमको कैसे सुख ह्वै मीत! …
जिन विषयनि सँग बहु दुख पायो, तिनहीसों अति प्रीति॥तुमको. ॥
उद्यमवान बाग चलनेको, तीरथसों भयभीत ।
धरम कथा कथनेको मूरख, चतुर मृषा-रस-रीत ॥तुमको. ॥१॥
नाट विलोकनमें बहु समझौ, रंच न दरस-प्रतीत ।
परमागम सुन ऊंघन लागौ, जागौ विकथा गीत ॥तुमको. ॥२॥
खान पान सुनके मन हरषै, संजम सुन ह्वै ईत ।
‘द्यानत’ तापर चाहत हौगे, शिवपद सुखित निचीत ॥तुमको. ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन २७
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