तुम्हारा चंद मुख निरखे सुपद रुचि मुझको आई है
तुम्हारा चंद मुख निरखे सुपद रुचि मुझको आई है।
ज्ञान चमका परापर की मुझे पहिचान आई है ॥
कला बढ़ती है दिन दिन काम की रजनी बिलाई है।
अमृत आनंद शासन ने शोक तृष्णा बुझाई है ॥
जो इष्टानिष्ट में मेरी कल्पना थी नशाई है।
मैंने निज साध्य को साधा उपाधी सब मिटाई है ॥
धन्य दिन आज का न्यामत छबी जिन देख पाई है।
सुधर गई आज सब बिगड़ी अचल ऋधि हाथ आई है ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ६३ (विभिन्न कवियों के भजन)
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