तुम सुनियो श्रीजिननाथ, अरज इक मेरी जी | Tum Suniyo Shrijinanath Araj Ik Meri Ji

तुम सुनियो श्रीजिननाथ, अरज इक मेरी जी

तुम सुनियो श्रीजिननाथ, अरज इक मेरी जी ।।टेक।।

तुम बिन हेत जगत् उपकारी, वसुकर्मन मोहि कियो दुखारी,
ज्ञानादिक निधि हरी हमारी, द्यावौ सो मम फेरी जी ।।१।।

मैं निज भूल तिनहि संग लाग्यो, तिन कृत करन विषय रस पाग्यौ,
तातैं जन्म-जरा दव-दाग्यौ, कर समता सम नेरी जी ।।२।।

वे अनेक प्रभु मैं जु अकेला, चहुँगति विपतिमांहि मोहि पेला,
भाग जगे तुमसौं भयो भेला, तुम हो न्यायनिवेरी जी ।।३।।

तुम दयाल बेहाल हमारो, जगतपाल निज विरद समारो,
ढील न कीजे बेग निवारो, ‘दौलतनी’ भवफेरी जी ।।४।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ३३

अर्थ

अर्थ-हे जिननाथ आप अकारण स्वार्थ एवं राग के विना जगत का उपकार करनेवाले है, अतः मेरी एक प्रार्थना सुनिए। मुझे इन अष्ट कर्मों ने बहुत दुःखी कर रखा है, मुझसे मेरी ज्ञानादि सम्पत्ति को छीन लिया है। अतः आप उसे मुझे वापिस दिलाइए, क्योकि वह सम्पत्ति वास्तव में मेरी है। हे प्रभी मैं स्वय को भूलकर इन अष्टकर्मो के साथ लग गया और उनके द्वारा दिये गये इन्द्रिय विषयों के रस में मग्न हो गया; अत. जन्म-जरा-मरण की अग्नि में जलता रहा। हे प्रभो अब मुझे समताम्पा सुख प्रदान कीजिए। हे प्रभो। ये कर्म तो अनेक है ओर में अकेला ही हूं, अन इन सवने मिलकर मुझ अकेले को चतुर्गति की विपत्ति में बहुत पेला है। किन्तु अव मेरे वडे भाग्य जागे है जो आपसे मिलना हुआ है। अत. अब आप ही मेरा न्याय कीजिए। कविवर दोलतराम कहते हे कि हे दयालु प्रभी मंग यहाँ, इस ससार मे बहुत बुरा हाल हो रहा हे, अत आप अपने जगतपालक के रूप में प्रसिद्ध यश को संभालिए-स्मरण कीजिए और शीघ्र ही मेरे ससार-भ्रमण को दूर कीजिए, देर मत कीजिए।

स्रोत: दौलत विलास, पद 53।

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