तुम ज्ञायक चेतन हो | Tum Jnayak Chetan Ho

तुम ज्ञायक चेतन हो

तुम ज्ञायक चेतन हो क्यों पर में रहते हो,
अब निज में आ जाओ जिनमें ही रम जाओ ।।
जाने कितनी बार यूं ही जीवन व्यथ गमाया है ।
पर्यायों में तन्मय हो, निज वैभव को भुलाया है
अपनी-अपनी भूलों को आप स्वयं में समा जाओ ।।तुम…।।

जो जिनेंद्र की वाणी है, बस वो ही जिनवाणी है ।
कुन्द-कुन्द से कहान गुरुवर, सबने यही बखानी है ।।
अपने की अपने में, आप स्वयं में पा जाओ ।।तुम…।।

सम्यक्दर्शन पाना है वेश दिगम्बर पाना है ।
पर्यायों से पार निकाली, ध्रुव को लक्ष्य बनाना है ।।
निग्रन्थों के पथ पर चलकर, शिवपथ को तुम पा जाओ ।।तुम…।।


स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २०४