अर्थ
संसारी मानवकी मनोगति बड़ी स्वच्छन्द होती है। वह किसी प्रकारके भी अंकुश एवं नियन्त्रणको स्वीकार नहीं कर सकती। धर्म, ज्ञान एवं विरागकी बातें उसे निरर्थक जान पड़ती हैं और तन्मयताके साथ अपनी भाव-धारामें बहते जानेमें ही उसे रस आता है। कदाचित् सुयोगसे धर्माचरणकी ओर प्रवृत्त भी होता है तो उसमें हृदयका योग न होनेसे उस दिशामें भी वह सफल नहीं हो पाता है। वह अन्तस्में समत्व-भाव जाग्रत् करनेके लिए हाथमें माला लेता है; परन्तु आत्म-स्वरूपका यथार्थ बोध न होने एवं उस ओर आकर्षण न होनेके कारण उसका चित्त वहाँ नहीं रम पाता और उन्हीं पर-पदार्थोंमें रमण करने लगता है, जिनसे उसे समत्व का लाभ न होकर अशान्ति एवं आकुलताकी ही वृद्धि होती है। फलतः आत्म-शान्ति लाभकी दृष्टिसे किया गया यह बाह्य धर्माचरण भी केवल प्रदर्शनकी वस्तु बनकर रह जाता है। वह महीने-महीनेके उपवास कर कठिनतम कायक्लेश भी करता है; परन्तु अन्तस्की कषायपर विजय प्राप्त न कर सकनेके कारण उससे भी उसे आत्म-सुख प्राप्त नहीं होता है। इस प्रकार स्व-परका विवेक तथा स्वात्म-रुचि न होनेके कारण संसारी मानव निरन्तर पर-वस्तुओंमें रमण करता हुआ अशान्त बना रहता है। कविवर द्यानतरायजीको संसारी मानवकी इस प्रवृत्तिकी सम्यक् जानकारी है। उन्हें इस बातका यथार्थ बोध है कि मनुष्य इस स्थलपर मलमें भूल कर रहा है और इसी कारण उसे यथार्थ आत्म-शान्ति नहीं प्राप्त हो रही है। संसारी आत्माकी दुर्दशासे उनका हृदय दया-द्रवित हो जाता है और उसे सन्मार्गपर आरूढ़ करनेकी दृष्टिसे उनका लोकमङ्गल- कारी कवित्व जागृत हो उठता है। वह गुनगुनाते लगते हैं।
तू तो समझ समझ रे भाई ।
हे भाई ! तुम इस बातको अच्छी तरहसे समझ लो । हे आत्मन् ! तुम निरन्तर विषय-भागमें उलझे रहे और एक क्षणके लिए भी तुम्हें धर्मकी बात अच्छी न लगी । हे भाई ! तुम इस बातको अच्छी तरह समझ लो । संसारी मानव किसी शुभयोगसे धर्माचरणकी ओर प्रवृत्त भी होता है तो लक्ष्यके प्रति मन स्थिर न रहने के कारण और आत्म-स्वरूपका यथार्थ बोध न होनेसे वह लक्ष्यमें कृतकार्य नहीं हो पाता – सम्यक् शान्ति-लाभ नहीं कर पाता । कविवरने अपनी कुशल-लेखनीसे इसी तत्त्वको बड़ी सुन्दरताके साथ अंकित किया है। वह कहते हैं:-
कर मनका लै आसन मारचो, बाहिज लोक रिझाई ।
हे आत्मन् ! तुमने आत्म-शान्ति प्राप्त करनेके लिए हाथमें माला लेकर आसन लगाया और यह दिखलाकर लोगोंको अनुरंजित करनेका प्रयत्न किया कि तुम कैसे धर्मात्मा हो। परन्तु मानसिक स्थिरता के अभावमें यह आत्म-ध्यान वक-ध्यान जैसा ही है, जिसमें आत्म-पर-वंचना के सिवाय तनिक भी आत्म-शान्ति उपलब्ध नहीं होती । हे भाई ! तुम इस बातको अच्छी तरहसे समझ लो । जिन व्यक्तियोंको स्व-परका तनिक भी विवेक नहीं है और क्षणभरके लिए भी जिन्हें स्वानुभूतिका रस नहीं मिला है, वे महीनों तक उपवास कर डालते हैं और घोरतम कायक्लेशके आचरणसे स्वयंको दीर्घ तपस्वी सिद्ध करना चाहते हैं। परन्तु क्रोध, मान, माया, लोभपर ये तनिक भी
नियन्त्रण नहीं कर पाते हैं। परिणाम यह होता है कि लोक-दृष्टि भले ही इन्हें उग्र तपस्वी मान ले; परन्तु आन्तरिक शान्ति न मिलनके कारण इनका यह कायक्लेश निरर्थक ही रहता है। कविवरकी काव्य-वाणीमें यही तथ्य बड़ी सुन्दरतासे ग्रथित दिखलाई देता है। देखिए:-
“मास मास उपवास किये तें, काया बहुत सुखाई ।
हे आत्मन् ! तुमने महीनों उपवास करके शरीरको एकदम सुखा डाला; परन्तु अन्तरङ्ग शत्रु क्रोध, मान, माया और लोभपर तुम विजय प्राप्त नहीं कर सके । अतः तुम्हारे इस घोर कायक्लेशसे क्या अर्थ निकला ? इससे तो तुम्हें तनिक भी आत्म-शान्ति नहीं मिली । हे भाई ! तुम इस बातको अच्छी तरहसे समझ लो । सम्पूर्ण आत्म-सुख एवं शान्ति प्राप्त करनेका केवल एक ही मार्ग है और वह यह है कि मनुष्य मन, वचन, काय रूपी योगोंका निरोध कर विषय-कषायोंकी ओरसे अपनी रुचिको हटा ले और शुद्धात्म-स्वरूप के अनुभवनमें तन्मय हो जाय। कविवर कहते हैं:-
“मन, वच, काय जोग थिर कर कें, त्यागो विषय कषाई ।
हे आत्मन् ! तुम मन, वचन कायको स्थिर करके विषय-कषायोंकी ओरसे अपनी परणतिको हटा लो। सद्गुरुओंने भी इसी मार्गको स्वर्ग और मोक्षका सुख देनेवाला बतलाया है । हे भाई ! तुम इस बातको अच्छी तरहसे समझ लो ।
मनुष्यकी अच्छाई और बुराईका दूसरेके मनपर अवश्य प्रभाव पड़ता है। इसलिए गुणी व्यक्तिका यही कर्त्तव्य है कि दूसरे व्यक्तिकी अवांछनीय प्रवृत्तिको रोकनेके लिए वह क्रोध न करके अपने सद्गुणोंके द्वारा ही उसे सुमार्गपर लावे । देखिए, कविवरने इसी भावको कितनी सरल भाषामें व्यक्त किया है। वह कहते हैं:–
स्रोत: अध्यात्म पदावली।
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