तू काहेको करत रति तनमें, यह अहितमूल जिम कारासदन
तू काहेको करत रति तनमें, यह अहितमूल जिम कारासदन ।।टेक।।
चरमपिहित पलरुधिरलिप्त मल, - द्वार स्रवै छिन छिन में ।।१।।
आयु-निगड फंसि विपति भरै, सो क्यों न चितारत मनमें ।।२।।
सुचरन लाग त्याग अब याको, जो न भ्रमै भववनमें ।।३।।
‘दौल’ देहसों नेह देहको, - हेतु कह्यौ ग्रन्थनमें ।।४।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १७५
अर्थ
अर्थ- हे जीव तू इस शरीर से अनुराग क्यों करता है? यह शरीर तो कारागार की भाँति तेरे अकल्याण का मूल है। यह शरीर चर्म से ढके हुए खून-मॉस से बना हुआ है। इससे निरन्तर मल के द्वार बहते रहते हैं। हे जीव ! तू अपने मन में ऐसा विचार क्यों नहीं करता कि तू इसमें आयु कर्मरूपी सॉकल से बँधकर अनेक कष्टो को सहन कर रहा है ? हे जीव अब तू सच्चे देव-गुरु के श्रीचरणों में लग जा और इस देह के अनुराग का त्याग कर दे, ताकि तुझे संसार में भ्रमण न करना पड़े। कविवर दौलतराम कहते हैं कि देह का अनुराग ही शास्त्रों में देह का कारण बताया गया है।
स्रोत: दौलत विलास।
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