तू ही चेतन चिदानन्द चिद्रूप है,
चित्त में न समाये तो मैं क्या करूँ?
ज्ञान गुण से भरा तेरा भंडार है,
कुछ समझ में न आये तो मैं क्या करूँ ।।टेक।।
सत्य की राह चलना तेरे हाथ है,
जबकि समता सुहागन तेरे साथ है ।
मोह की मस्ती में हस्ती को भूलकर,
तू कुमति संग जाये तो मैं क्या करूँ ।।1।।
योग पर योग कर तन को क्षीण किया,
शुद्ध उपयोग तूने लगाया नहीं ।
क्रोध की अग्नि ने ही जलाया तुझे,
बन के पशु तड़फड़ाये तो मैं क्या करूँ ।।2।।
पाँचों इन्द्रिय तेरे सामने जो खड़ी,
एक से एक बढ़कर न छोटी बड़ी ।
जानता है कैद करने को आई तुझे,
तो भी मन डगमगाये तो मैं क्या करूँ ।।3।।
शास्त्र पाठ किया पूजा जाप दिया,
मन से मैं का अहंकार छोड़ा नहीं ।
मरकर मैं मैं करे धरके बकरे का तन,
अपना सिर भी कटाये तो मैं क्या करूँ ।।4।।
झूठ चोरी कुशील हिंसा की बुरी,
घात आतम का करने को पैनी छुरी ।
इसको समझाने से भी न समझे अगर,
मार नरकों में खाये तो मै क्या करूँ ।।5।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ११४ से ११५