पाँच समवाय के सम्बन्ध में विचारणीय बिन्दु

पाँच समवाय के सम्बन्ध में विचारणीय बिन्दु
By- Pt. Shri @Rakesh_Shastri

  1. सबकुछ स्वभाव के आश्रित - निमित्त भी, काललब्धि भी, होनहार भी और पुरुषार्थ भी।

  2. सबकुछ निमित्त के आश्रित - स्वभाव भी, काललब्धि भी, होनहार भी और पुरुषार्थ भी।

  3. सबकुछ काललब्धि के आश्रित - निमित्त भी, स्वभाव भी, होनहार भी और पुरुषार्थ भी।

  4. सबकुछ होनहार या भवितव्यता के आश्रित - निमित्त भी, काललब्धि भी, स्वभाव भी और पुरुषार्थ भी।

  5. सबकुछ पुरुषार्थ के आश्रित - निमित्त भी, काललब्धि भी, होनहार भी और स्वभाव भी।

जैसे, किसी जीव को सम्यग्दर्शन हुआ। अब विचार करो कि उसे सम्यग्दर्शन कैसे हुआ तो ----

  • स्वभाव कहेगा कि उस जीव का या उस पर्याय का ऐसा ही स्वभाव था।

  • निमित्त कहेगा कि निमित्त मिला, इसलिए हुआ।

  • काललब्धि कहेगी कि काललब्धि आ गई तो हो गया।

  • होनहार या भवितव्यता से पूछो तो वह कहेगी होनहार ऐसी ही थी।

  • जबकि पुरुषार्थ कहेगा, उसने पुरुषार्थ किया, इसलिए हुआ।

अब किसकी सही मानें तो सबकी व्यक्तिगत भी सही और सामूहिक रूप में सबके समवाय से हुआ, यह भी सही।

इसे कहते हैं - व्यक्तिगत नयदृष्टि और सामूहिक प्रमाणदृष्टि।

यही कारण है कि आचार्यों ने नयदृष्टि से जब जिस समवाय के गीत गाए हैं तो ऐसा लगता है कि यही मुख्य है। जैसे,

प्रमाणदृष्टि का आगमानुकूल सन्दर्भ -

जं जस्स ज़म्मि देसे जेण विहाणेण ज़म्मि कालम्मि …

नयदृष्टि के आगमाधार -

  • अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेहं

  • पुरुषार्थ से ही मोक्ष प्राप्ति

  • काललब्धि के बिना कुछ नहीं

  • स्वभावमात्रं किल वस्तु

  • हेतुर्द्वयाविष्कृतकार्यलिंगा - प्रमाणदृष्टि या निमित्तदृष्टि

  • स्वभाव या उपादान को भी अन्तरंग निमित्त कहा गया है।

एक समवाय की मुख्यता करने पर अन्य की गौणता जैसे, काललब्धि और होनहार किछु वस्तु नाहीं। आदि।

समवाय से तात्पर्य = सामग्री, सहयोगी, समूह, संयोगी या सम्मिलित रूप से कार्यकारी

A reply on this post by Dr. Veer sagar ji Delhi -
यही तो जैन दर्शन है। मुख्य-गौण-विवक्षा से कहा जाए तो सब सही है और निरपेक्ष कहा जाए तो सब शून्य है। “सर्वान्तवद् तद्गुणमुख्यकल्पम्, सर्वान्तशून्यं च मिथोनपेक्षम्।”

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