सम्यक दर्शन के प्रकार

सम्यक्त्व
#1
  • सम्यक् दर्शन के कितने प्रकार होते हैं ? कृपया प्रत्येक को सामान्य भाषा में समझाइये |
  • जब किसी जीव को एक प्रकार का सम्यक्त्व हुआ तो क्या उसको पता चलता है की मुझे ये वाला सम्यक है ?
  • क्या हर एक प्रकार के सम्यक्त्व में अनुभूति का काल व् माप अलग होता है?
  • आज तक हमे अनंत बार सम्यक् दर्शन हुआ, तो वह सम्यक्त्व छूट क्यों गया?
  • आगे ऐसा क्या करें जिससे सम्यक्त्व प्राप्त हो पर छूटे नहीं ?
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#2

औपशमिक. क्षयोपक्षमिक. क्षायिक.

Refer MMP, chap 9 for detailed description.

The person can’t even accurately say that s/he attained सम्यक्त्व or not. Here’s what MMP says:

Chap 7. Pg 265.

I guess, NO. कर्म की different अवस्था इन different सम्यक्त्व से अनुभूति का different होना जरुरी नहीं। Consider rechecking this from different sources as well.

How can you say that?

Consider reading MMP chap 7 (सम्यक्त्व सन्मुख मिथ्यादृष्टि) and chap 9 (full).

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#3

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:slight_smile:

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#4

अनंत का तो नहीं पता, परंतु असंख्यात बार का अवश्य पढ़ने में आया है। क्यूंकि एक बार सम्यक दर्शन होने के बाद संसार में रहने का उत्कृष्ट काल अर्द्ध पुद्गल परावर्तन काल है जो कि अनंत काल है।
मोक्ष मार्ग प्रकाशक जी के दूसरे अधिकार में कहा है कि एक पुद्गल परावर्तन के असंख्यात्वे भाग में असंख्य कल्प काल(१कल्प काल=२० कोड़ा कोड़ी सागर) होते हैं।
३ प्रकार के सम्यक दर्शन के कथन में भी आता है कि -
औपशामिक और क्षायोपशामिक सम्यक दर्शन असंख्यात बार हो सकते है।
एक औपशमिक के बाद दोबारा औपशमिक होने में असंख्य वर्षों का अंतराल होता है, और उस बीच में क्षयोपशामिक सम्यक दर्शन असंख्य बार हो सकता है।

छूट क्यों गया?
यदि क्षायिक सम्यक दर्शन नहीं हुआ हो, तो उस स्थिति में श्रद्धा के विपरीत होने के अवसर विद्धमान हैं; दर्शन मोहनीय का उदय तो चल ही रहा है, भले सम्यक प्रकृति का ही हो, अतः कर्म निमित्त की अपेक्षा दर्शन मोहनीय की तीव्रता और अंतरंग श्रद्धान में ‘देव-शास्त्र-गुरु, सात तत्व और आत्म तत्व की विपरीत श्रृद्धा’ के कारण सम्यक्तव छूट जाता है। मूल कारण तो यही हैं, बाह्य निमित्त की अपेक्षा अन्य और भी कारण देखें का सकते हैं। परिणामों की विचित्रता का, पांच समवाय का और क्रमबद्ध पर्याय का भी विचार कर सकते हैं।

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#5

सम्यक्त्व के प्रकार का आधार क्या है? किस कारण से 3 प्रकार बने? क्या 3नो प्रकार का सम्यक्त्व होने में समान प्रकार के निमित्त बनते हैं?

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#6

उपादान कारण की अपेक्षा - जीव का पुरुषार्थ, तथा अंतरंग निमित्त की अपेक्षा - दर्शन मोहनीय कर्म की अवस्था (उपशम, क्षायोपशम और क्षायिक रूप), बहिरंग निमित्त के रूप में - देव शास्त्र गुरु… आदि (१० प्रकार के सम्यक दर्शन भेद भी इसके लिए देखे सकते हैं।

अंतरंग निमित्त में समानता नहीं हो सकती, परन्तु बहिरंग निमित्त समान और असमान दोनों हो सकते है।

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#7

Do you know any reference?

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#8

ये अवस्थाये किस प्रकार बनती हैं? उनके कोई लक्षण भी होते हैं क्या? कौनसी दर्शन मोहनीय अवस्था के क्षय से कौनसा सम्यक होगा?

कृपया वे 10 प्रकार बताएं। और उनका क्या स्वरूप है ये भी स्पष्ट करें।

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#9

क्षयोपक्षमिक - मिथ्यात्व, सम्यक्त्व मिथ्यात्व (मिश्र) का सदावस्था रूप उपशम & उदयभावी क्षय.
सम्यक प्रकृति का उदय.

औपशमिक - तीनो प्रकृति का उपशम.

क्षायिक - तीनो प्रकृति का क्षय.

MMP. Chap 9. Pg 332.

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#10

मिथ्यात्व = मिथ्या-मान्यता
मिथ्यात्व भाव में निमित्तभूत कर्म = 3 दर्शन मोहनीय + 4 अनन्तानुबन्धी

अतः सम्यक्त्व = 7तों की उदय से भिन्न अवस्था।

औपशमिक - 7 का उपशम
क्षायिक - 7 का क्षय
क्षायोपशमिक - 7 का क्षयोपशम

अब,

इन सातों में उपशम की अपेक्षा विशेष

अनादि प्रथमोपशम - 5
सादि प्रथमोपशम - 6/7
द्वितीयोपशम - (क्षायोपाशमिक + 1 का उपशम)

इन सातों में क्षय की अपेक्षा विशेष

7 होने पर ही होता है।
4 की विसंयोजन
मिथ्यात्व to सम्यग्मिथ्यात्व to सम्यक संक्रमण
सम्यक में उदय से ख़िरना

इनमें क्षयोपशम की अपेक्षा विशेष

उपशमित प्रकृतियों में से 1 का उदय होकर 2 का उसरूप क्रमशः संक्रमित होकर उदय में आकर क्षय होना।
(You already know about the remaining 4)

6 सर्वघाति प्रकृतियों को अलग से समझाया और 1 को अलग से।

Now,

अनन्तानुबन्धी 4 -
उदय/बन्ध/अप्रशस्त उपशम/विसंयोजन :+1:t3:
क्षयोपशम :-1:t3:

मिथ्यात्व प्रकृति -
उदय/प्रशस्त उपशम/क्षय/बन्ध :+1:t3:
क्षयोपशम :-1:t3:

सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति -
उदय/प्रशस्त उपशम/क्षय :+1:t3:
बन्ध/क्षयोपशम :-1:t3:

सम्यक प्रकृति -
उदय/प्रशस्त उपशम/क्षय/क्षयोपशम :+1:t3:
बन्ध :-1:t3:

I have tried to explain all the situations (Hopefully!)

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#12

Iska mtlab, smayak darshan prapt krne per bhi jeev ko ananat kaal tak, bhav braman krna padta he. Esa kese, kyuki mene toh suna heki, ek baar usse samayk darshan ka ras aa jata he, uske baad, samyak darshan apko moksh me lejaye bina nhi rehta.
Kya samyak darshan prapt krne ke baad, jeev nigod ya narak jaa skta he.
Itna bada kaal, samyaktv prapt krne baad toh srf, bhagwaan mahaveer ko laga tha

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