तीर्थराज पहिचान हमारी, तीर्थराज है शान हमारी | tirtharaja pahichana hamari tirtharaja hai shana hamari

तीर्थराज पहिचान हमारी, तीर्थराज है शान हमारी।

भाव वंदना मंगलकारी ॥ टेक ॥
सम्यक् श्रद्धा से हम आवें, भक्ति भाव से प्रभु को ध्यावें।
हो विशुद्ध परिणति हमारी ॥ 1 ॥

सहज शांत है तीर्थ हमारा, परम शांत है रूप हमारा।
शांत दशा होवे अविकारी ॥ 2 ॥

आत्महित का लक्ष्य धरें हम, प्रभुवर का अनुसरण करें हम।
हो निर्ग्रन्थ दशा सुखकारी ॥ 3 ॥

नहीं इन्द्रियों के वश होवें, अपना संयम नियम न खोवें ।
अन्तर बाह्य शुद्धि हितकारी ॥ 4 ॥

नहीं प्रदर्शन मात्र करें हम, अन्तर शोधन सदा करें हम ।
सहज पवित्र दशा अविकारी ॥5॥

लोक-विरुद्ध आचरण टालें, पद के योग्य क्रिया सब पालें।
हो प्रभावना आनंदकारी ॥ 6 ॥

अंग सहित सम्यग्दर्शन हो, ज्ञान सहित मंगलाचरण हो।
परम्परा निर्दोष हमारी ॥ 7 ॥

भावों का हो सहज समर्पण, तन-मन-धन जीवन हो अर्पण।
ऊँची रहे सु-ध्वजा हमारी ॥ 8 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २९४ से २९५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’