तीर्थराज है हृदय हमारा, तीर्थराज प्राणों से प्यारा।
द्रव्य वंदना-भाव वंदना, सहज करे भव सागर पार ॥ टेक ॥
आकर आतम ध्यान लगाया, सहज परम पद यहाँ से पाया।
भगवंतों की याद दिलाता, मुक्तिमार्ग दर्शावन हारा॥ 1 ॥
उनका ही हम करें अनुकरण, निज आतम का करें अनुभवन ।
पर भावों से भिन्न सहज ही, आतम देखन जाननहारा ॥ 2 ॥
शुद्धातम परमार्थ तीर्थ है, रत्नत्रय व्यवहार तीर्थ है।
एक देश है अन्तर साधन, पूर्ण भाव ही साध्य हमारा ॥ ३॥
श्रद्धा भक्ति विनय करेंगे, ये सेवा रक्षा सहज करेंगे।
आत्म साधना यहाँ करेंगे, ये पावन संकल्प हमारा ॥ 4 ॥
आओ भविजन मिलकर आओ, अंतर में उत्साह बढ़ाओ ।
आराधनमय हो प्रभावना, गूँजे जग में जय-जयकारा ॥ 5॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २९५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’