तीर्थंकर महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ
लेखक: डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
पूर्ण ग्रन्थ (201 पृष्ठ) नीचे संलग्न PDF में।
Tirthankar Mahaveer aur Unka Sarvodaya Tirth (Dr. Hukamchand Bharill). Full text (201 pages) in the attached PDF.
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Tirthankar_Mahaveer_aur_Unka_Sarvodaya_Tirth_Bharill.pdf (31.6 MB, 201 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/57680।
सार (शब्दों में)
पुस्तक के खण्ड क्रम से मुख्य बिन्दु, हर बिन्दु के साथ पुस्तक का पृष्ठ अंक।
प्रथम खण्ड
1. पूर्व परम्परा एवं पृष्ठभूमि
- भगवान् महावीर ने कोई नया धर्म नहीं चलाया। जो सदा से है, सनातन है, उसी का उद्घाटन किया। धर्म वस्तु का स्वभाव है, उसे बनाया नहीं जाता, जाना जाता है। (पृ. 3)
- जो जगत् का कर्ता नहीं, तटस्थ ज्ञाता दृष्टा है, वही भगवान् है। जिसके द्वारा संसार सागर तिरा जाए वह तीर्थ, और जो ऐसे धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करे वह तीर्थंकर। महावीर इस युग के चौबीसवें और अन्तिम तीर्थंकर हैं। (पृ. 3)
- उनसे पूर्व के तीर्थंकर पार्श्वनाथ, नेमिनाथ ऐतिहासिक महापुरुष माने जा चुके हैं, और वेद, भागवत आदि में भी ऋषभदेव आदि तीर्थंकरों के उल्लेख मिलते हैं। (पृ. 4 से 5)
- ऋषभदेव ने कर्मभूमि के आरम्भ में प्रजा को असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प, इन छह कर्मों से आजीविका सिखाई। (पृ. 10)
- कोई जन्म से भगवान् नहीं होता, मोह राग द्वेष को जीतकर बनता है। (पृ. 14)
2. पूर्व भव
- महावीर की आत्मा परमात्मा एक भव में नहीं, अनेक भवों में बनी; स्वर्ग, नरक, तिर्यंच सब गतियों में भ्रमण हुआ। (पृ. 26)
- ऋषभदेव के पौत्र मारीचि के भव में दीक्षा लेकर भी भ्रष्ट हुए और अपना अलग मत चलाया। (पृ. 27)
- विश्वनन्दी मुनि के भव में किए निदान के फल से त्रिपृष्ठ नारायण हुए, फिर भोग और हिंसा के कारण सातवें नरक गए, वहाँ से निकलकर सिंह हुए। (पृ. 30 से 31)
- सिंह की पर्याय में दो चारणऋद्धिधारी मुनियों का उपदेश सुनकर जातिस्मरण हुआ और आत्मानुभूति से सद्धर्म का आरम्भ हुआ। निमित्त से अधिक जीव की अपनी तैयारी (उपादान) निर्णायक है। (पृ. 32, 35)
- प्रियमित्र चक्रवर्ती के भव में छह खण्ड की विभूति तृण समान त्यागकर दिगम्बर मुनि हुए; नन्द राजा के भव में सोलहकारण भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया। (पृ. 39)
3. वर्तमान भव (महावीर का जीवन)
- जन्म वैशाली गणतन्त्र के कुण्डलपुर में, राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ; माता ने सोलह स्वप्न देखे। (पृ. 42 से 43)
- मदोन्मत्त हाथी को वश में करने के प्रसंग पर उनका भाव: सच्ची वीरता पशु को नहीं, अपने मोह राग द्वेष को जीतने में है। (पृ. 45 से 46)
- तीस वर्ष की आयु में गृहत्याग कर नग्न दिगम्बर दीक्षा। (पृ. 52)
- बारह वर्ष के घोर तपश्चरण के पश्चात्, बयालीस वर्ष की अवस्था में ऋजुकूला नदी के किनारे केवलज्ञान। (पृ. 59)
- केवलज्ञान के 66 दिन पश्चात् इन्द्रभूति गौतम के गणधर बनने पर दिव्यध्वनि खिरी। (पृ. 68)
- उपदेश का सार: हर आत्मा स्वतन्त्र और समान है, अपनी भूल सुधारकर स्वयं सुखी हो सकती है। (पृ. 73)
- कार्तिक अमावस्या को पावापुर से निर्वाण, जिसकी स्मृति में दीपावली मनाई जाती है। (पृ. 74)
द्वितीय खण्ड: सर्वोदय तीर्थ
4. सर्वोदय तीर्थ क्या है
- महावीर का तीर्थ किसी पर्वत या नदी तट पर नहीं, उनका उपदेश, उनकी वाणी ही तीर्थ है। उसमें जन जन की ही नहीं, कण कण की स्वतन्त्रता की घोषणा है। (पृ. 79)
- हर पदार्थ अपने परिणमन का कर्ता हर्ता स्वयं है; न कोई ईश्वर जगत् का कर्ता, न एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का। विश्व अनादि अनन्त और स्वयंसिद्ध है। (पृ. 79)
5. छह द्रव्य, धर्म और सात तत्त्व
- विश्व छह द्रव्यों का समुदाय है: जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल। जीव चेतन, शेष पाँच अजीव। (पृ. 80)
- उपदेश का केन्द्र आत्मा है, क्योंकि सुख दुःख का अनुभव चेतन जीव को ही होता है। (पृ. 82)
- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की एकता ही मोक्षमार्ग है, तीन अलग मार्ग नहीं। (पृ. 86)
- जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, इन सात तत्त्वार्थों का सच्चा श्रद्धान सम्यग्दर्शन है। (पृ. 87)
- पुण्य और पाप दोनों बन्धन हैं: पुण्य सोने की बेड़ी, पाप लोहे की बेड़ी। (पृ. 96)
- मोक्ष: मोह राग द्वेष आदि सब विकारों, कर्मों और शरीर से पूर्ण मुक्त अवस्था। (पृ. 101)
6. देव, शास्त्र, गुरु और भेदविज्ञान
- सच्चे देव वीतरागी और सर्वज्ञ हैं; वे किसी को सुख दुःख, धन, सन्तान नहीं देते लेते। (पृ. 104)
- सर्वज्ञ तीनों कालों के सब पदार्थ जानते हैं, पर वस्तु का परिणमन उनके ज्ञान के अधीन नहीं, स्वतन्त्र है। (पृ. 107)
- शास्त्र वीतरागी सर्वज्ञ की वाणी के आधार पर रचे गए, उनका तात्पर्य एक वीतरागता है। (पृ. 110)
- सच्चे गुरु आरम्भ परिग्रह रहित, ज्ञान ध्यान तप में लीन नग्न दिगम्बर सन्त हैं। (पृ. 112)
- भेदविज्ञान: स्व (आत्मा) को पर (शरीर, कर्म आदि) से भिन्न जानना; जितने सिद्ध हुए, इसी से हुए। (पृ. 116)
- सम्यग्दर्शन के लिए आत्मानुभूति अनिवार्य है, यही सब धर्मों का सार। (पृ. 123)
7. सम्यग्ज्ञान, अनेकान्त और स्याद्वाद, प्रमाण और नय
- ज्ञान का सम्यक् या मिथ्या होना लौकिक जानकारी के सच झूठ पर नहीं, आत्मानुभूति (सम्यग्दर्शन) के होने न होने पर निर्भर है। जो आत्मा को देह से भिन्न नहीं जानता, वह आगम पढ़कर भी शास्त्र को नहीं जानता। (पृ. 127, 131)
- अनेकान्त: हर वस्तु अनन्त गुण धर्मों वाली है; स्याद्वाद उसे कहने की सापेक्ष शैली है। (पृ. 132)
- “भी” दूसरे पक्षों की सत्ता बताता है और “ही” किसी एक अपेक्षा से कथन को दृढ़ करता है; दोनों का महत्त्व है। (पृ. 136)
- अनेकान्त में भी अनेकान्त: प्रमाण की अपेक्षा वस्तु अनेकान्तरूप, नय की अपेक्षा एकान्तरूप। (पृ. 138)
- सम्यग्ज्ञान ही प्रमाण है, जो वस्तु को समग्र जानता है; नय उसके एक अंश को ग्रहण करता है। नय के मूल भेद निश्चय और व्यवहार। (पृ. 146, 151)
8. सम्यक्चारित्र
- सम्यक्चारित्र: मोह राग द्वेष रहित आत्मा का साम्यभाव, आत्मस्वरूप में रमना। सम्यग्ज्ञान बिना आचरण अन्धे के दौड़ने जैसा है। (पृ. 157)
- आत्मा में रागादि भावों की उत्पत्ति हिंसा, उनका न होना अहिंसा। झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह सब मूल में हिंसा ही हैं। (पृ. 161 से 162)
- वास्तविक चारित्र वीतरागभाव है; सराग चारित्र से पुण्य बन्ध, वीतराग चारित्र से मोक्ष। (पृ. 167 से 168)
- सार यही: जिस प्रकार रागादि मिटें, वही आचरण सम्यक्चारित्र। (पृ. 169)
उपसंहार
- समस्या एक ही है, हम सब सुखी कैसे हों। दुःख का कारण भौतिक जगत् में नहीं, भीतर के मोह राग द्वेष में है। (पृ. 170)
- श्रावक धर्म भोग और योग के बीच मर्यादा का मार्ग है: गृहस्थ भोगों का पूर्ण त्यागी न होकर भी उनकी सीमा बाँधता है। (पृ. 173)
- हिंसा चार प्रकार की: संकल्पी, उद्योगी, आरम्भी, विरोधी; श्रावक संकल्पी हिंसा का पूर्ण त्याग करता है। (पृ. 173, 187)
- अहिंसा के सामाजिक प्रयोग के लिए सहिष्णुता और सह अस्तित्व आवश्यक है, आग्रह और हठ से संघर्ष होता है। (पृ. 176)
- अन्तिम सन्देश: केवल भक्त नहीं, भेदविज्ञान से आत्मा को जानकर उसी में लीन होकर स्वयं भगवान् बनो। (पृ. 177)
परिशिष्ट: अहिंसा
- अहिंसा केवल न मारना नहीं; आत्मा में राग द्वेष मोह का उत्पन्न न होना अहिंसा है। (पृ. 178)
- जीवों का जीवन मरण उनके अपने आयुकर्म से है; “मैं मारता हूँ, मैं बचाता हूँ” यह मान्यता अज्ञान है। (पृ. 180 से 181)
- हिंसा अहिंसा आत्मा के परिणामों से है: मारने का भाव ही हिंसा, प्राणी मरे या न मरे। (पृ. 182)
- बचाने के भाव से पुण्य, मारने के भाव से पाप; दोनों बन्ध के कारण। सच्ची अहिंसा वीतरागभाव है। (पृ. 186)
- रागादि भाव होना हिंसा है, और उन्हें ही धर्म मान लेना महाहिंसा। (पृ. 187)
सार पुस्तक के पाठ से लिया गया, पृष्ठ अंक पुस्तक के मुद्रित अंक हैं।
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