तीर्थं वंदना करें भव्यजन, चलो परम आनन्दमय | tirtham vamdana karem bhavyajana chalo parama anandamaya

तीर्थं वंदना करें भव्यजन, चलो परम आनन्दमय।

शाश्वत तीर्थ अहो ! अंतर में, सहज परम आनंदमय ॥ टेक ॥
तीर्थ रूप शुद्धातम का, श्रद्धान-ज्ञान-आचरण अहो ।
भाव तीर्थ व्यवहार तिरावे, दुखमयी भव सिन्धु अहो ॥
भाव तीर्थ प्रगटा संतों को, ले जीवन्त तीर्थ सुखमय ॥ 1 ॥

उनके चरण स्पर्शन से, जो क्षेत्र तीर्थ कहलाते हैं।
अहो ! आज भी उन गुरुओं की, पावन याद दिलाते हैं ॥
हम भी आत्माराधन करते, रहें निःशल्य सहज निर्भय ॥ 2 ॥

तज कर गृह जंजाल पापमय, चलें परम उल्लास से ।
उन संतों का निर्मल जीवन, देखें हम भी पास से ॥
धन्य-धन्य निर्मोही पावन, जीवन ज्ञान-विरागमय ॥ 3 ॥

महाभाग्य से तीर्थ वंदना, का सुयोग यह पाया है।
दीखे जगत् स्वांग सब दुखमय, आतम तत्त्व सुहाया है ॥
विषय-कषायारम्भ रहित हो, पावें मुनि जीवन चिन्मय ॥ 4 ॥

रहकर नित स्वाधीन शांत चित्त, निज शुद्धातम ध्यावें हम।
मोहादिक दुर्भाव नशावें, परमातम पद पावें हम ॥
साध्य हमारा यही एक है, पावें शिवपद ज्ञानमय ॥ 5॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २९३ से २९४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’