तीन लोक के स्वामी, सहज सुख रूप हो | tina loka ke svami sahaja sukha rupa ho

तर्जः जिनवाणी जग मैया जनम दुख मेट दो…

तीन लोक के स्वामी, सहज सुख रूप हो।

तीन लोक के स्वामी, शुद्ध चिद्रूप हो।। टेक ।।

रागादिक कर्मों से न्यारे, वीतराग अविकारी।
दर्शन ज्ञान अनन्त विराजे, सुख अनन्त बलधारी।। 1।।

ज्ञायक हुए विश्व के प्रभुवर, कर्त्ता भाव नशाया।
ज्ञायक रूप सहज अपनो लखि, आनंद उर न समाया।। 2 ।।

तृप्त हुआ, बाहर का वैभव प्रभु निस्सार दिखावे।
दर्शन पाकर अहो जिनेश्वर ! चाह दाह विनशावे ।। 3।।

कैसे भक्ति करूँ आपकी, गुण अनन्त विलसन्त।
सहज नमन हो, भाव नमन हो, होवे भव का अन्त ।। 4 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’