तर्ज : भक्ति का प्रसार है …
तीन भुवन में सार है, महिमा अपरम्पार है।
धन्य नित्य आनन्दमयी प्रभु, समयसार अविकार है ।। टेक ।।
अहो ! सहज निर्दोष ज्ञानमय, गुण अनन्त की खान है।
सब स्वांगों से न्यारा अनुपम, ध्रुव ज्ञायक भगवान् है।। 1 ।।
स्वानुभूतिमय महास्वाद पा सर्व द्वन्द्व मिट जाता है।
सहज उदासी होय स्वयं में, स्वयं सहज रम जाता है ।। 2 ।।
परम सरस चिद्रूप अहो, मंगलमय तृप्ति प्रदाता है।
चिदानन्द प्रभु का आश्रय ही, परम सिद्ध पद दाता है ।। 3 ।।
चाह मिटी चिन्ता सब टूटी, ज्ञायक में ही मग्न रहूँ।
जो कुछ होना हो सो होवे, मैं प्रभु ज्ञाता मात्र रहूँ ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७९ से १८०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’