तीन भुवन के स्वामी | tina bhuvana ke svami

तीन भुवन के स्वामी मेरे, आया सुखद सबेरा।

आनन्द उर न समाये, प्रभुवर दर्शन पाया तेरा ॥ टेक ॥
वीतराग सर्वज्ञ प्रभो, हम सुनी नहीं जिनवाणी।
कर्ता-धर्ता तुमको माना, कर बैठा नादानी ॥
तुम तो साक्षीभूत जगत् के, दूर हुआ भ्रम मेरा ॥1 ॥

कण-कण है स्वाधीन जगत् का तुमने प्रभु बतलाया।
निज-पर के कर्तापन का भ्रम जिनवर दर्शन तेरा॥
सर्व विकल्प शून्य आनन्दमय, जिनवर दर्शन तेरा ॥2॥

तन-मन कर्म रंग-रागादिक देते भिन्न दिखाई।
सम्यग्ज्ञान कला उर जागी, निज प्रभुता मैं पाई ॥
मुक्त स्वरूप अहो प्रगटा अब, सफल हुआ भव मेरा ॥3 ॥

सम्यक् हुई प्रतीति प्रभुवर, तुम सम ही प्रभु मैं हूँ।
हूँ गुणधाम सहज अभिराम, सु आनन्द धाम सदा हूँ ॥
निज में ही रम जाऊँ विभुवर, अभिनन्दन है तेरा ॥4॥


स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ५५ से ५६