तीर्थक्षेत्र-समवशरण-मानस्तंभ-समुच्चय अर्घ्य | Teerthkshetra-Samavsharan-Manasthambh-Samuchchay Arghya

श्री तीर्थक्षेत्रों को अर्घ्य

तीर्थ तत्त्वमय है सदा, ज्ञायक शाश्वत तीर्थ।
अभेद ज्ञायक भावना, है व्यवहार सुतीर्थ ।।
ज्ञायक भावना भावते, संत जहाँ तिष्ठांय ।
ते ही क्षेत्र सु जगत् में, तीर्थक्षेत्र कहलाय ।।

ॐ ह्रीं श्री सर्वतीर्थक्षेत्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री समवशरणजी को अर्घ्य

अद्भुत रचना समवसरण की, प्रभु स्वरूप अविकार है।
दिव्यध्वनि में ध्वनित हो रहा, अहो समय का सार है।।
वीतराग प्रभु के दर्शन से, खुला मुक्ति का द्वार है।
भक्ति भाव से अर्घ्य, चढ़ाऊँ, आनन्द अपरम्पार है।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरणाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री मानस्तम्भजी को अर्घ्य

देखत मान गले मानी का, मानस्तम्भ सार्थक नाम।
चतुर्मुखी जिनबिम्ब विराजे, भक्ति सहित मैं करूँ प्रणाम ॥
द्रव्य-भावमय अर्घ्य चढ़ाकर, भाऊँ भावना मंगलकार।
ज्ञानमयी निर्मान अवस्था, हे जिनवर पाऊँ अविकार ॥

ॐ ह्रीं श्री मानस्तम्भाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

समुच्चय महाऽर्घ्य

पूजूँ मैं श्री पञ्च परम गुरु, उनमें प्रथम श्री अरहन्त।
अविनाशी अविकारी सुखमय, दूजे पूजूँ सिद्ध महन्त ॥१॥

तीजे श्री आचार्य तपस्वी, सर्व साधु नायक सुखधाम।
उपाध्याय अरु सर्व साधु प्रति, करता हूँ मैं कोटि प्रणाम ॥२॥

करूँ अर्चना जिनवाणी की, वीतराग-विज्ञान स्वरूप।
कृत्रिमाकृत्रिम सभी जिनालय, वन्दूँ अनुपम जिनका रूप ॥३॥

पंचमेरु नन्दीश्वर वन्दूँ, जहाँ मनोहर हैं जिनबिम्ब ।
जिसमें झलक रहा है प्रतिपल, निज ज्ञायक का ही प्रतिबिम्ब ॥४॥

भूत भविष्यत् वर्तमान की, मैं पूजूँ चौबीसी तीस।
विदेह क्षेत्र के सर्व जिनेन्द्रों के, चरणों में धरता शीश ॥५॥

तीर्थङ्कर कल्याणक वन्दूँ, कल्याणक अरु अतिशय क्षेत्र।
कल्याणक तिथियाँ मैं चाहूँ, और धार्मिक पर्व विशेष॥६॥

सोलहकारण दशलक्षण अरु, रत्नत्रय वन्दूँ धर चाव।
दयामयी जिनधर्म अनूपम, अथवा वीतरागता भाव॥७॥

परमेष्ठी का वाचक है जो, ओंकार वन्दूँ मैं आज।
सहस्रनाम की करूँ अर्चना, जिनके वाच्य मात्र जिनराज ॥८॥

जिसके आश्रय से ही प्रगटें, सभी पूज्यपद दिव्य ललाम।
ऐसे निज ज्ञायक स्वभाव की, करूँ अर्चना मैं अभिराम ॥९॥

(दोहा)

भक्तिमयी परिणाम का, अद्भुत अर्घ्य बनाय ।
सर्व पूज्य पद पूजहूँ, ज्ञायकदृष्टि लाय ॥

ॐ ह्रीं भावपूजा भाववंदना त्रिकालपूजा त्रिकालवंदना करे-करावे भावना भावे श्री अरहन्तजी सिद्धजी आचार्यजी उपाध्यायजी सर्वसाधुजी पंचपरमेष्ठिभ्यो नमः, प्रथमानुयोग करणानुयोग चरणानुयोग द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः,
दर्शनविशुद्ध्यादि षोड़शकारणेभ्यो नमः, उत्तमक्षमादि दशलाक्षणिक धर्माय नमः, सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रेभ्यो नमः, जलविषै थलविषै आकाशविषै
गुफाविषै पहाड़विषै नगर-नगरीविर्षं ऊर्ध्वलोक-मध्यलोक-पाताललोकविषै विराजमान कृत्रिम-अकृत्रिम जिन-चैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो नमः, विदेहक्षेत्रे विद्यमान विंशति तीर्थङ्करेभ्यो नमः, पाँच भरत पाँच ऐरावत दशक्षेत्र सम्बन्धी तीस चौबीसी के सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो नमः, नन्दीश्वरद्वीप सम्बन्धी
बावन जिन-चैत्यालयेभ्यो नमः, पंचमेरु सम्बन्धी अस्सी जिन-चैत्यालयेभ्यो नमः, सम्मेदशिखर कैलाशगिरि चम्पापुर पावापुर गिरनार शत्रुञ्जय आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः, अयोध्या हस्तिनापुर राजगृही आदि तीर्थक्षेत्रेभ्यो नमः, जैनबद्री मूडबद्री आदि अतिशय क्षेत्रेभ्यो नमः, श्री चारणऋद्धिधारी सप्तपरमर्षिभ्यो नमः अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

Artist: आ.बा.ब्र.रवींद्र जी आत्मन्