तौरी सी निधि दे, जिनन्द वा
(राग धनश्री)
तौरी सी निधि दे, जिनन्द वा ॥टेर ॥
अनन्त ज्ञान सुख वीरज जामें कछु दुःख नाहीं ये ॥१॥
अग्नि चौर जलतैं विनशै नहीं, पर वश कबहुँ न होय ॥२॥
‘नयन’ देख उर आनन्द उपजे, आकुलता मिट जैहै ॥३ ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ४८ (विभिन्न कवियों के भजन)