तन पिंजरे के अन्दर बैठा | Tan Pinjare Ke Andar Baitha

तन पिंजरे के अन्दर बैठा

तन पिंजरे के अन्दर बैठा आतमराम कहे
पिंजरा दिन दिन होत पुराना पंछी वही रहे ॥

इस पिंजरे के नौ दरवाजे न सांकल ना ताला
खुले हुए पिंजरे में रहता पंछी उड़ने वाला
पिंजरा जन्मे पिंजरा पनपे पिंजरा जरे बहे ॥१॥

ना जाने कितने युग से है पिंजरे पंछी का नाता
पञ्च तत्त्व से निर्मित पिंजरा बिखर बिखर जुड़ जाता
हानि लाभ सुख दुःख पिंजरे का पंछी आप सहे ॥२॥

लाख चौरासी भाँती के पिंजरे पंछी सब एक जैसे
ज्ञानी सोचे इस पिंजरे से मुक्ति मिलती कैसे
पिंजरा पंछी भिन्न जानने से ही मुक्ति मिलती ॥३॥


स्रोत: nikkyjain.github.io (अध्यात्म भजन)

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