सुशीला उपन्यास (पं. गोपालदास बरैया) | Sushila Upanyas (Pt. Gopaldas Baraiya)

दसवां पर्व

जिस दिन से सुशीला, जयदेव तथा भूपसिंह की किसी विपत्ति में फंस जाने की वार्ता सुनी है, उस दिन से महाराज विक्रमसिंह निरन्तर उदास और सचिंत्य रहा करते हैं। किसी भी राज्यकार्य में उनका जी नहीं लगता। सदा एकान्तवास में बैठे हुए वे अपने भाग्य की गति पर विचार किया करते हैं। उनकी पुत्री स्थानीया प्राणप्यारी सरस्वती सुशीला क्या खोई है, ऐसा जान पड़ता है कि उनकी सरस्वती (बुद्धि) भी उसके साथ खो गई है। वे बड़े दूरदर्शी और विद्वान समझे जाते थे, परन्तु इस समय मोह के वश से उनमें न धीरता रही है और न दृढ़ता। यद्यपि सुशीला आदि की खोज के लिये उनके बुद्धिमान मंत्री अनेक गुप्तचर भेज चुके हैं और प्रतिदिन आश्वासन दिया करते हैं, परन्तु इससे उन्हें संतोष नहीं होता है।

एक दिन उन्होंने यह विचार कर कि “बैठे रहने की अपेक्षा कुछ करना अच्छा है” अपने सूरसेन मंत्री और दो चार वयोवृद्ध तथा विशेषज्ञ राज्य कर्मचारियों को एकान्त में बुलाकर एक बैठक की। उसमें प्रस्ताव किया गया कि रेवती तथा रणवीरसिंह की चिट्ठियों से अब इसमें तो सन्देह रहा ही नहीं कि सुशीला आदि पर जो विपत्ति आई है उसका कर्त्ता उदयसिंह है।
ऐसी अवस्था में सूर्यपुर पर चढ़ाई क्यों न की जावे ? और उसे कैद करके सुशीला आदि का पता उसी से क्यों न लगाया जाय ? सूर्यपुर का राज्य हमसे कुछ जबर्दस्त नहीं है और न वहाँ कुछ ऐसी तैयारी है, जिसमें हमें डरने का कोई कारण हो। इसके सिवाय यदि हम चढ़ाई करेंगे तो विजयपुर राज्य से भी हमें सहायता मिले बिना न रहेगी और जहाँ तक मेरा ख्याल है, अपनी सेना भी किसी प्रकार शिथिल नहीं है।
शूरसेन मन्त्री-महाराज ! आपका प्रस्ताव बहुत बहुत उचित है, परन्तु वह तब काम में लाया जाता, जब सूर्यपुर राज्य ने अपने साथ खुले मैदान में शत्रुता की होती। यह कार्य केवल एक गीदड़ का है, जो एक बार अपने यहाँ कैद रह चुका है। उसमें महाराज निहालसिंह की सर्वथा सम्मति नहीं है। वे स्वयं बड़े न्यायी और सज्जन राजा हैं। मुझे विश्वास है कि यदि वे अपने पुत्र का यह दुराचार सुन पाते, तो उसे अवश्य ही दंड देते। ऐसी अवस्था में सूर्यपुर पर चढ़ाई करना न्यायसंगत नहीं है।
विक्रमसिंह-यदि ऐसा है और निहलसिंह पर तुम्हारा बड़ा विश्वास है, तो फिर उन्हें एक पत्र के द्वारा इस विषय की सूचना क्यों नहीं दी जाती, जिसमें वे उदयसिंह को दण्डित करके यदि उसकी कैद में सुशीला हो, तो छुड़ाकर हमारे यहाँ भिजवा दें।

शूरसेन-परन्तु ऐसा करने में एक बड़ा भारी डर यह है कि यदि उदयसिंह को यह बात मालूम हो जावेगी और उसके अधिकार में सरस्वती होगी “मरता क्या न करता” की नीति के अनुसार न जाने वह क्या अनर्थ करने पर उतारू हो जावे ? और यह संभव नहीं है कि उसे इस बात की खबर न हो, क्योंकि राज्य के प्रधान-प्रधान कर्मचारी उनसे मिले हुये हैं। इसलिये मेरी समझ में जब तक खूब विचार न कर लिया जावे, पत्रादि लिखना भी उचित नहीं है।

विक्रमसिंह-प्रत्येक कार्य विचार करके करना चाहिये, यह ठीक है, क्योंकि अविचार पूर्वक कार्य करने का ही यह फल है, जो आज इस दुःख के देखने का समय आया है। हाय ! वह कितनी बड़ी राजनैतिक भूल थी, जिससे एक विदेशी पुरुष को जो एकबार अक्षम्य अपराध कर चुका था, मैंने अपना विश्वासपात्र सेवक बना लिया था, परन्तु “यह भी नहीं करना” “वह भी नहीं करना” तब क्या हमेशा इसी प्रकार निश्चेष्ट बैठे रहना चाहिये ? तुम्हारे जासूसों ने भी कोई आशाप्रद कार्य करके नहीं दिखलाया, जिससे कुछ धैर्य हो। भला ! तुम ही कुछ कहो, उन्होंने कुछ किया है ?

शूरसेन-नहीं महाराज ! ऐसा न समझिये। जासूस लोग बराबर काम कर रहे हैं। सुशीला का पता लग चुका है। रेवती बहुत जल्दी उसको छुड़ा के लावेगी। वहाँ उसकी माया अच्छी तरह से फैल रही है, मुझे वहाँ की रिपोर्ट दूसरे तीसरे दिन बराबर मिला करती है।

विक्रमसिंह -देखो शूरसेन ! तुम्हारी बातों पर मुझे बड़ा भारी भरोसा है और अभी जो कुछ तुमने कहा है, वह सन्तोष योग्य है, परन्तु वर्तमान में मेरा चित्त ऐसा उद्विग्न और आकुलित रहता है कि प्रयत्न करने पर भी स्थिर नहीं हो सकता। यदि तुम्हारी सम्मति हो तो इस समय विजयपुर जाकर महाराज रणवीरसिंह तथा अपने सम्बन्धी से मिल आऊँ। उनके परामर्श से चित्त कुछ स्थिर होगा और जी भी बहला रहेगा। सिवाय इसके उनकी सम्मति से कुछ प्रयत्न भी हो सकेगा।

शूरसेन-महाराज ! विचार उत्तम है। मेरी भी राय है कि आप थोड़े दिनों के लिये विजयपुर जा आवें। ईश्वर ने चाहा तो आपके लौटने के पहले ही सुशीला बिलासपुर में आ जावेगी। साथ ही उदयसिंह और बलवन्तसिंह भी अपने चेहरे पर कालिख लगाये हुए आ जावेंगे।

अन्यान्य कर्मचारियों ने भी महाराज के विचार का अनुमोदन किया और बैठक समाप्त की गई। सब लोग अपने-अपने घर गये और महाराज शयनागार की ओर चले गये। बहुत दिन के पीछे उस दिन उन्होंने महारानी मदनवेगा के साथ प्रेम संभाषण किया।

दूसरे दिन थोड़े से सवारों को साथ लेकर विक्रमसिंह मामूली ढंग से विजयपुर पहुँचे। उनके एकाएक आने से महाराज रणवीरसिंह को आश्चर्य और हर्ष हुआ। उन्होंने बड़े प्रेम से उनका स्वागत सत्कार किया और दूसरे दिन सबेरे ही उनके आगमन की खुशी में एक बड़ा भारी दरबार किया।

उस समय अपने सम्बन्धी जौहरी श्रीचन्द, तथा सम्पूर्ण राज्यकर्मचारियों और नगर के प्रतिष्ठित पुरुषों से मिलकर विक्रमसिंह ने प्रसन्नता प्रगट की और यथोचित वार्तालाप किया। इसके पश्चात् वे सुशीला, जयदेव तथा भूपसिंह की चर्चा का उपक्रम करना ही चाहते थे कि इतने में दो पुरुष दो गठरी पीठ पर लादे हुए दरबार में उपस्थित हुए।

गठरियों में क्या है और ये लोग क्या कहते हैं? यह जानने के लिये लोग अतिशय उत्कंठित हुए। महाराज रणवीरसिंह आगत पुरुषों को पहिचान कर प्रसन्न हुए और बोले क्यों! कुशल तो है? तब उनमें से एक ने कहा-हाँ, महाराज! आपकी कृपा से उदयसिंह और बलवन्त दोनों ही आज अपनी कैद में आ गये हैं और ईश्वर ने चाहा, आज संध्या तक श्रीमती सुशीलादेवी भी बंधन मुक्त होकर यहाँ आ जावेगी। यह सुनते ही विशेष कर पिछले वाक्यों को सुनकर महाराज विक्रमसिंह आनन्द से उछल पड़े। मेघ पटलों के फट जाने से चन्द्रमा का बिम्ब जिस तरह खिल उठता है, उसीप्रकार उनका शोकग्रस्त मुख प्रसन्नता से खिल उठा। इतने में दूसरे पुरुषों ने दोनों गठरी खोल दी, दोनों कैदियों ने अपने को एक अचिन्त्य स्थान में हथकड़ी बेड़ियों से विवश देखा। विक्रमसिंह ने कहा-क्यों उदयसिंह! अब भी तुम अपनी बुराइयों से संतृप्त हुए कि नहीं ? परन्तु उसने उत्तर नहीं दिया। इसीप्रकार बलवन्त से भी कई प्रश्न किये, परन्तु कुछ उत्तर नहीं पाया। तब महाराज रणवीरसिंह की आज्ञा से वे दोनों कारागृह में भेज दिये गये। वहाँ उनके कारण पहरे का जबर्दस्त प्रबन्ध किया गया।

इसके पश्चात् दरबार बर्खास्त किया और एक एकान्त स्थान में दोनों नरेशों, मंत्रियों और श्रेष्ठी श्रीचन्द ने मिलकर सूर्यपुर राज्य के और कैदियों के सम्बन्ध में बहुत कुछ विचार किये। इस पर भी विचार किया गया कि भूपसिंह तथा जयदेव के अन्वेषण करने के लिये और क्या-क्या उपाय किये जावें ?

सुशीला के आने के समाचार से श्रेष्ठि श्रीचन्द और उनके कुटुम्बीजन प्रसन्न हुए, परन्तु जयदेव के वियोग के कारण से उनकी वह प्रसन्नता फीकी रही।

ग्यारहवां पर्व

रतनचन्द मुनिराज के साथ-साथ जा रहे हैं। आगे मुनिराज हैं, पीछे रतनचन्द हैं। मुनिराज ईर्यापथ शोधन करते हुए अर्थात् यह देखते हुए कि मार्ग में कोई जन्तु तो नहीं है जिसका प्रमाद से घात हो जावे, गमन कर रहे हैं।

रतनचन्द विचारता है, अहो ! मुनिराजों की दया कैसी अपूर्व और लोकोत्तर है। भला जीवों का परमबन्धु इनके समान और कौन होगा ? जिनकी दृष्टि में शत्रु, मित्र, तृण, कंचन, राजा, रंक, मूर्ख, विद्वान सब एक समान हैं। पंचमहाव्रत रूप इनके एक अपूर्व सम्पत्ति है। अन्य कोई भी परिग्रह इनके पास नहीं है। शरीर से ऐसी निस्पृहता कहीं भी नहीं देखी जाती। नग्नपरीषह को सहन करते हुए काम के बाणों को विफल करना इन्हीं का काम है।
यद्यपि नानाप्रकार की तपस्याओं से इनका शरीर क्षीण हो गया है, परन्तु प्रभा चतुर्गुणी है। सामान्य पुरुषों में यह दिव्यप्रभा दिखाई नहीं देती। तप के प्रभाव से इन्हें अवधिज्ञान प्राप्त हो गया है, इसी से इन्होंने मुझे रतनचन्द कहकर सम्बोधित किया था। वाह! यह भी कैसी दिव्य शक्ति है, इससे दूर-दूर के विषय स्मरण मात्र से प्रत्यक्षवत् हो जाते हैं।
इसी से अनुमान होता है कि एक ज्ञान ऐसा भी है, जिसमें तीन लोक के त्रिकालगत पदार्थ हस्तामलक हो जाते हैं। आत्मा पर एक प्रकार का आवरण होता है, जिससे कोई आत्मा को अधिक ढका रहता है, कोई उससे कम और कोई उससे भी कम अर्थात् किसी पुरुष को कम ज्ञान होता है, किसी को उससे अधिक। तब बुद्धि स्वयं स्वीकार करती है कि कोई आत्मा ऐसा भी है, जो इस आवरण से सर्वथा रहित है, उसको सर्वज्ञ कहते हैं। इसी अवस्था और इसी ज्ञान को प्राप्त करने के लिये मुनियों का यह प्रयत्न है। इसी को जैनमार्ग कहते हैं। यही आत्मा का स्वभाव है। जब मुनिराजों की कृपा से मैं भी इस स्वभाव को प्राप्त करने का उद्योग करूँगा। अहा! वह समय कब आवेगा, जब मैं मुनिव्रत अंगीकार करके अपने आत्मकल्याण में लगूँगा।

मेरे कब ह्वै है वा दिन की सुघरी, मेरे कब ह्वै है।। टेक।।
तन विन बसन असनविन वन में, निवसों नासादृष्टि धरी।।1।।
पुण्य पाप परसों कब विरचों, परचों निजनिधि चिर विसरी।
तज उपाधि सज सहज समाधी, सहो घाम हिम मेघ-झरी।।2।।
कब थिर जोग धरों ऐसो मुहि, उपल जान मृग खाज हरी।
ध्यान कमान तान अनुभव सर, छेदों किंह दिन मोह अरी।।3।।
कब तृन कंचन एक गनों अरु, मणि जड़तालय शैलदरी।
“दौलत” सतगुरु चरनसेव जो, पुरवो आश यहै हमरी।।4।।

इसप्रकार के नाना विचारों में मग्न हुये रतनचन्द ने देखा कि
मैं एक उद्यान में पहुँच गया हूँ। इसके पहले अन्यमनस्क रहने के
कारण उसे यह मालूम नहीं था कि मैं कहाँ चल रहा हूँ, परन्तु
मुनिराज जिनके साथ वह आया था, जब खड़े हो रहे; तब वह भी
खड़ा हो गया उस समय उसने देखा कि एक ऊँची शिला पर एक
महामुनि विराजमान हो रहे हैं और आगत मुनि मस्तक नम्र किये
उन्हें नमस्कार कर रहे हैं। शिला के चारों ओर भी बहुत से मुनि बैठे
हुए हैं, जिनकी संख्या 50 से कम नहीं है।

ऐसा जान पड़ता है, शिलास्थित महामुनि किसी व्याख्यान का
प्रारंभ करना चाहते हैं और यह मुनिपरिकर उसके सुनने के लिये
उत्कंठित हो रहा है। महामुनि संघाधीश आचार्य और मुनिगण
शिष्यसम्प्रदाय में हैं। महामुनि के शरीर से एक विलक्षण प्रभा प्रस्फुटित हो रही है, जिसके दर्शन मात्र से उनका मुख्यत्व तथा महत्व प्रगट होता है। उनके मुखमण्डल की सौम्यता, शीलता, प्रसन्नता और सरलता देखते ही बनती है।

मौन धारण किये हुए भी उनका शांत शरीर संसार को वैराग्य तत्त्व का निरूपण करता हुआ सा दीख पड़ता है। उनके चारों ओर जो मुनिपरिकर हैं, वह भी एक शांतता की श्रेणी है। सब ही दिगम्बर मुद्रा धारण करने वाले मोक्षमार्ग के पथिक हैं। सारांश उस पुण्य परिषद में सर्वतः शान्ति वैराग्य की अनुपम धारा बह रही है।

जिस स्थान में यह परिषद विराजमान थी, वह स्थान बड़ा ही सुहावना जान पड़ता था। नाना प्रकार के सुन्दर वृक्षों की पंक्ति चहुँ ओर धीर गंभीर भाव से खड़ी थी। मानों मुनियों के संसर्ग से उसने ये गुण प्राप्त किये हों। बीच में थोड़े-थोड़े अन्तर पर अनेक वसतिकायें बनी हुई थीं जो किसी धर्मात्मा ने मुनियों के विश्राम के लिये बनवाई थीं। सैकड़ों बड़ी शिलायें यत्र-तत्र पड़ी थीं, जिन पर बैठकर मुनिगण ध्यानस्थ होते थे।

वसतिकाओं के आस पास छोटी-छोटी हरी-हरी दूब जो कमंडलुओं के जल से उग आई थी, मृगगण निडर होकर उसे चरते थे। मानों मुनियों के उस रक्षित राज्य में उन्होंने अपना स्वाभाविक डरपोकपन भुला दिया था। जो हरिण जरासी आहट पाते ही सिर पर पैर रख के चौकड़ी भरने लगते हैं, वे ही उस निर्भय स्वर्गभूमि से टाले नहीं टलते थे। पक्षीगण भी आनन्दकलरव करते हुए स्वच्छन्दता से यहाँ वहाँ उड़ते फिरते थे।

रतनचन्द ने उस दिव्यमण्डली को देखकर तत्काल ही साष्टांग नमस्कार किया और कहा “नाथ! इस शरणागत की रक्षा करो। दुर्जय कर्मों के पंजे में फंसे हुए इस दीनातिदीन को बचाओ! अनन्तकाल बीत गया; अब ये कर्मों के अत्याचार सहे नहीं जाते।”
यह सुनकर महामुनि ने आसन्न भव्य जानकर रतनचन्द को दयादृष्टि से निरीक्षण करते हुए धर्मवृद्धि दी और कहा-भव्य! शान्त हो चित्त स्थिर कर, तेरी इच्छा बहुत जल्दी पूर्ण होगी। तुझे अपने घर का विषम चरित्र देखकर जो वैराग्य प्राप्त हुआ है, वह अडोल रहेगा और उसके कारण संसार कारागृह से तुझे थोड़े ही समय में छुट्टी मिल जावेगी। योगीश्वर का आशीर्वाद सुनकर उत्तप्त उद्विग्नचित्त रतनचन्द को कुछ सन्तोष हुआ। नवागत मुग्धवधू के अननुभूत पति समागम-सुख की कल्पनाओं के समान जैनेश्वरी दीक्षा प्राप्ति के सुख की विचारतरंगों में यह फिर गोते खाने लगा।
इधर योगीश्वर ने अपना व्याख्यान प्रारम्भ किया। अत्याचार सम्बन्धी अनेक गूढ़ विषयों को बड़ी सुगम भाषा में नाना प्रकार के दृष्टान्त द्राष्टान्तों से उन्होंने सबके हस्तामलकवत् कर दिया। उनकी अपूर्व उपदेश शक्ति के प्रभाव से सम्पूर्ण श्रोताओं के हृदयकपाट खुल गये। सब ही धन्य धन्य कहने लगे। तदनन्तर रतनचन्द ने हाथ जोड़कर निवेदन किया-भगवन्! अब इस जिज्ञासु की ओर भी दृष्टि कीजिये और कृपाकर बतलाइये कि आत्मा का हित क्या है?

योगीश्वर-भव्यात्मन् ! आत्मा का यथार्थ हित आत्मा में निजस्वभाव की प्राप्ति है। जैसे अपनी विपुल सम्पत्ति के खो जाने से लोग दुःखी होते हैं और जब तक वह फिर न मिल जावे तब तक खुश नहीं हो सकते। उसीप्रकार निजस्वभाव रूप सम्पत्ति के लुप्त हो जाने से ये सम्पूर्ण प्राणी दुःखी हो रहे हैं और उस सम्पत्ति को पुनः प्राप्त किये बिना कदापि सुखी नहीं हो सकते।

यद्यपि संसार के सब ही प्राणियों की यह इच्छा रहती है कि हमें सुख की प्राप्ति हो और दुःख हमारे पास कभी न फटकने पावे, परन्तु हजार प्रयत्न करने पर हजार सिर पटकने पर भी वे सुखी नहीं हो सकते। जिसको देखिये वही दुःखी दिखलाई देता है। जिससे पूछिये वही दुःखी दिखलाई देता है। जिससे पूछिए वही आपको दुखियों का शिरोमणि बतलाता है और जहाँ सुनिये वहाँ दुःख ही दुःख सुनाई पड़ता है।

जानते हो, इसका कारण क्या है ? यही कि वे सुख के यथार्थ स्वरूप को नहीं जानते हैं और दुःख में ही सुख की कल्पना किया करते हैं, परन्तु जो अज्ञानी अंगार को सुन्दर शीतल मानकर हाथ में ले लेता है, क्या वह उससे जलकर दुःखी नहीं होता ? अवश्य होता है। इसीप्रकार दुःख में सुख की कल्पना करने से उन्हें दुःख सुखरूप नहीं हो जाता, दुःख ही रहता है। सो ये प्राणी इस भ्रामक सुख की प्राप्ति का प्रयत्न तो करते रहते हैं, परन्तु यथार्थ सुखरूप निजस्वभाव सम्पत्ति को सर्वथा भूल गये हैं, जो कि आत्मा का सच्चा हित है।

रतनचन्द- नाथ! तो उस आत्महित आत्मसुख अथवा आत्म-स्वभाव को हम लोग क्यों भूल रहे हैं? एक दो चार नहीं, किन्तु जब सब ही प्राणी उसे पाने का प्रयत्न नहीं करते, तब इसका कोई असाधारण कारण होना चाहिये।

योगीश्वर-हाँ ! उस आत्मस्वभाव पर एक प्रकार का दुर्निवार परदा पड़ा हुआ है, जिससे हम उसे देख नहीं सकते, विचार नहीं सकते और बिना गुरु के उपदेश के समझ नहीं सकते। यही कारण है कि सामान्य जीवों की प्रवृत्ति उसकी ओर नहीं होती। प्रत्येक पदार्थ में स्वभाव और विभाव दो प्रकार के परिणमन करने की शक्ति रहती है। स्वभाव स्वकृत शक्ति है विभाव परकृत विकार शक्ति है। स्वभाव शक्ति कभी नष्ट नहीं होती, परन्तु विभाव रूप परिणमन शक्ति विकार कारणों के पृथक् होते ही नष्ट हो जाती है और जब तक विभाव शक्ति व्यक्त रहती है, तब तक स्वभाव शक्ति अव्यक्त रहती है और उस अव्यक्त अवस्था में ही अल्पबुद्धि समझ नहीं सकते कि उसका अस्तित्व है या नहीं।

जैसे जल का शीतलपना उसका स्वभाव है और उष्णपना विभाव है। शीतलपना स्वयं होता है, परन्तु उष्णपना अग्नि के संयोग में होता है। जब तक उष्णपना रहता है, तब तक शीतलपना अव्यक्त रहता है, परन्तु शीतलपना के व्यक्त होते ही उष्णपना नष्ट हो जाता है।

इस उष्ण जल में हाथ डालने से जैसे वह आदमी जिसने कभी शीतल जल नहीं देखा सुना है, यह अनुमान नहीं कर सकता कि जल में शीतलपना भी होता है, उसीप्रकार स्वभाव शक्ति को भूले हुए जीव उसके प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं कर सकते हैं, क्योंकि विभाव के कारण वह शक्ति अव्यक्त रहती है। यह विभाव ही एक प्रकार का परदा है, जिसका अनादि काल से आत्मा के साथ सम्बन्ध है। इसी के कारण आत्मा, पराधीन, दुःखान्तरित और पाप बीजरूप क्षणभंगुर सांसारिक सुखों को सुख मान करके संसार में भटकता फिरता है और स्वतन्त्र, सदास्थिर एक स्वभावी सुख से अभी तक वंचित है। जब तक वह परदा आत्मा के आगे से र्स्वथा न हट जावेगा तब तक उसका निज स्वभाव प्रकट नहीं हो सकता।

रतनचन्द-योगिनाथ! मुझ अल्पज्ञ की समझ में सामान्य कथन से यह बात नहीं आई कि सचेतन आत्मा के साथ उस जड़ रूप परदे का सम्बन्ध कैसे हो सकता है? इसलिये कृपा करके उस परदे का और उसके सम्बन्ध का स्वरूप विस्तृत रूप से समझाने की कृपा कीजिये।

योगिश्वर-रतनचन्द! जल्दी समझ में आने के लिये सामान्य विविक्षा से यह विषय कह दिया है, परन्तु परदा कहने का अभिप्राय यहाँ केवल इतना है कि आत्मा के स्वभाव पर एक प्रकार का कोई आवरण पड़ा हुआ है जिससे उसके सम्पूर्ण गुण ढके हैं। इसी को जैनशासन में कर्मावरण कहते हैं। अब यह जानना चाहिये कि कर्मावरण क्या चीज है?

अनन्त आकाश के ठीक बीच में जैसे एक पूरे मृदंग के ऊपर आधामृदंग रक्खा हो, इस आकार का लोक संस्थित है। यह स्वयं सिद्ध है इसका न कोई बनाने वाला है और न अन्त करने वाला। अनादि काल से ऐसा है और ऐसा ही रहेगा। इसकी ऊँचाई चौदह राजू और विस्तार 7.1.5.1 राजू अर्थात् मूल में 7 राजू, मध्य में 1 राजू, ब्रह्मस्वर्ग के अन्त में 5 राजू और अन्त में 1 राजू है। घनवात घनोदधिवात और तनुवात इन तीन वायु मंडलों से वेष्टित हुआ उन्हीं की शक्ति विशेष से आकाश में ठहर रहा है।

इस लोक में जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल ये पाँच द्रव्य हैं। इनमें पूर्व कथित अनन्त आकाश द्रव्य सर्वव्यापी तथा सम्पूर्ण द्रव्यों का आधार स्वरूप है अर्थात् पहले कहे जीवादि पाँचों द्रव्यों के ठहरने का स्थान है और शेष पाँचों द्रव्य अल्प क्षेत्र व्यापी तथा आधेय स्वरूप हैं अर्थात् जितने आकाश में शेष पाँच द्रव्य विद्यमान हैं, उसको तथा उन पाँच द्रव्यों को मिलाकर लोक कहते हैं।

रतनचन्द-भगवन्! लोक का स्वरूप मैं समझ गया हूँ, परन्तु द्रव्य का स्वरूप अभी तक नहीं जाना है, सो कृपा करके समझाइये।

योगीश्वर-अनन्त गुणों के समुदाय को द्रव्य कहते हैं अर्थात् प्रत्येक द्रव्य में अनन्त गुण होते हैं। इनमें कुछ तो सामान्य गुण हैं और कुछ विशेष गुण हैं। जो गुण दूसरे द्रव्यों में पाये जावें अर्थात् एक द्रव्य में जो गुण हों, वे दूसरे द्रव्यों में भी पाये जावें, उन गुणों को एक सामान्य गुण कहते हैं और जो गुण अन्य द्रव्यों में न पाये जावें, केवल एक ही द्रव्य में हों उन्हें विशेषगुण कहते हैं। जैसे जीव का प्रदेशत्व सामान्य गुण है, क्योंकि जीव के सिवाय पुद्गलादिक द्रव्यों में भी यह पाया जाता है अर्थात् पुद्गल, धर्म, अधर्मादि द्रव्य भी प्रदेशवान् होते हैं और चेतना असाधारण विशेष गुण है। क्योंकि जीव के सिवाय अन्य कोई भी द्रव्य चेतनावान् नहीं है।

यद्यपि प्रत्येक द्रव्य में विशेष गुण भी अनन्त होते हैं, परन्तु उनमें एक विशेष गुण ऐसा होता है जो लक्षण स्वरूप होता है। मिले हुए अनेक पदार्थों में से किसी एक पदार्थ को भिन्न करने के हेतु को लक्षण कहते हैं। जैसे कि चैतन्य कहने से अनेक द्रव्यों में से वह जीव द्रव्य भिन्न करके समझ लिया जाता है, जो चेतनायुक्त है। जिस गुण से जीव (आत्मा) प्रतिभासित होता है, उसको चेतना कहते हैं। अतएव जीव का निर्दोष असाधारण लक्षण चेतना है। इसीप्रकार पुद्गल का लक्षण मूर्तत्व अर्थात् स्पर्श-रस-गन्ध-वर्ण-वन्त हैं।

धर्म द्रव्य का लक्षण जीव पुद्गल के गमन करने में सहकारित्व (सहायक) रूप है। अधर्म द्रव्य का लक्षण जीव पुद्गल की स्थिति में सहकारित्व रूप है। आकाश का लक्षण जीवादिक द्रव्यों को अवकाशदातृत्व रूप है और कालद्रव्य का लक्षण जीवादिक पदार्थों के परिणमन कराने में सहकारित्व रूप है। द्रव्यों का संक्षेप में यही स्वरूप है।

इन छह द्रव्यों में एक जो पुद्गल द्रव्य है, जिसे कि जड़ तथा अजीव भी कहते हैं और जिसका लक्षण ऊपर कह दिया गया है, उसके मुख्य दो भेद हैं-एक अणु और दूसरा स्कन्ध। पुद्गल के सबसे छोटे खंड को अणु तथा परमाणुओं के समूह को स्कन्ध कहते हैं।

इनके अनेक भेद हैं, जिसमें से एक स्कन्ध-विशेष को कार्माणवर्गणा कहते हैं, जो कि संसार में प्रायः सर्वत्र भरी हुई है और जिनकी संख्या अनंत है। जिसप्रकार आग में तपाया हुआ लोहे का गोला जल में डालने से वह अपने चारों तरफ के जल को खींचता है, उसीप्रकार यह आत्मा राग-द्वेष से संतप्त होकर कार्माण वर्गणाओं को अपने चारों ओर से आकर्षित करता है।

इस कार्माणवर्गणा और जीव के सम्बन्ध को बंध कहते हैं और जीव से सम्बन्ध प्राप्त कार्माणवर्गणा को ही कर्म कहते हैं। इनके कारण आत्मा के ज्ञानादिक गुणों का घात होता है अर्थात् ज्ञानादिक गुण ढक जाते हैं, इसी से इन्हें कर्मावरण अथवा कर्मरूपी परदा कहते हैं।

रतनचन्द-मुनिनाथ! आत्मा रागद्वेषादि के कारण संतप्त होकर कर्मबन्ध करता है, यह ठीक है, परन्तु रागद्वेषादि भी तो आत्मा के स्वभाव नहीं हैं-विभाव हैं, जो कि परकृत होते हैं अतएव यह बतलाइये कि उनका उत्पन्न करने वाला कौन है?
योगीश्वर-जीव और कर्म का सम्बन्ध अनादि काल से बीज वृक्ष के समान चला आता है अर्थात् जैसे बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है और वृक्ष से बीज उत्पन्न होता है, उसीप्रकार से आत्मा और कर्म का निरन्तर से अनादि सन्तान रूप कर्मबन्ध है। कोई समय ऐसा नहीं था, जब बिना वृक्ष बीज उत्पन्न हुआ हो, इसीप्रकार कर्म के निमित्त से रागद्वेषादि भाव उत्पन्न होते हैं। रागद्वेषादिक भावों के कारण कर्मबन्ध होता है अर्थात् रागद्वेष होने में पुरातन कर्मबन्ध हेतु है, और नवीन कर्मबन्ध होने में रागद्वेष हेतु हैं। कभी ऐसा नहीं हुआ जबकि, बिना रागद्वेषों के कर्मबन्ध हुआ हो अथवा पूर्व कर्म बन्ध के बिना रागद्वेष उत्पन्न हुए हों। सारांश यह है कि यह संसारी आत्मा अनादिकाल से कर्मबन्ध सहित है अर्थात् प्रारंभ से ही उस पर कर्मावरण पड़ा हुआ है। यह कर्मावरण आत्मा के स्वभाव में अनेक प्रकार के विकार करता है, जिसके कारण वह नाना प्रकार के दुःख भोगता है और भ्रामक कल्पना में पड़ कर उस स्वभाव सुख से वंचित रहता है, जो अचिंत्य अनुपम और अनंत है।
इतना कहकर मुनिराज ने सामायिक का समय समीप आया जानकर उस दिन का व्याख्यान समाप्त किया।

बारहवां पर्व

सुवर्णपुर के अन्तःपुर में खलबली मच रही है। सखियाँ घबड़ाई हुई भाग रही हैं। कोई महारानी को खबर देने के लिये दौड़ी है, कोई महाराज को बुला लाने के लिये जा रही है और कोई शीतोपचार की सामग्री जुटा रही है। अनेक सखियाँ मदन मालती को चारों ओर से घेरे हुए खड़ी हैं। उनमें कोई पंखा झुला रही है, कोई शीतल जल के छींटे दे रही है, किसी का हाथ नब्ज (नाड़ी) पर है, कोई मुख कमल पर बिखरे हुए पसीने के कनूकों को रूमाल से पोंछ रही है और कोई निश्चल निस्तब्ध है। सबके चेहरों पर एक प्रकार का आश्चर्य भाव झलक रहा है।

मदन मालती मूर्छित अचेत है। आज उसकी सुहागरात्रि थी, इसलिये उसका नख से शिख पर्यन्त सारा शरीर रत्न जड़ित आभूषणों और अनुपम शृङ्गारों से सुसज्जित हो रहा है। ऐसा जान पड़ता है मानों तारागणों का एक स्वरूपवान सुडौल पिण्ड है। उसके खुले हुए मुखकमल की शोभा देखते ही बनती है।

बड़े-बड़े खंजन मद भंजन नेत्र, धनुषाकार भ्रूयुगुल, लाली लिये हुए गोलकपोल, और कुंदरु के फल सरीखे सुन्दर अधर देखकर जी चाहता है कि इसे देखते ही रहें। वामकपोल पर सुन्दर तिल ऐसा जान पड़ता है मानों विधि चित्रकार की कलम में से मुखचन्द्र का चित्र खींचते हुए स्याही का एक बिन्दु गिर पड़ा हो। वक्ष स्थल पर से आंचल अलग हो गया है, इसलिये उसके कमनीय कुचयुगलों पर पड़ी हुई मोतियों की माला कमल कलिकाओं पर पड़े हुए जल के कनूकों की शंका उत्पन्न करती है।

थोड़ी देर में महारानी दौड़ी आई। तब तक प्रयत्न करने से मदनमालती की मूर्छा दूर हो गई, सचेत होने पर पूछा-बेटी ! तुझे अचानक यह क्या हो गया था ? परन्तु कुछ उत्तर नहीं मिला। लज्जा के मारे सिर नीचा करके वह चुप हो रही। इतने में एक चन्द्रलेखा नाम की एक सखी वहीं पर पड़ी हुई एक चिट्ठी जो मदनमालती की असावधानी से गिर गई थी, उठाकर बांचने लगी, उसे पढ़कर वह एक आह खींचकर रह गई।

यह देखकर महारानी ने पूछा चन्द्रलेखा ! तू अभी यह क्या पढ़ रही थी ? और यह आह क्यों खींची ? चन्द्रलेखा जी के दुःख को छुपा न सकी, इसलिये भूपसिंह की चिट्ठी उनके हाथ में देकर वह बोली-मात यह पढ़िये, कुमार भूपसिंह कैसे कठोर हृदय के निकले ? कैसे समय में प्रवंचना करके वे चले गये ! कुमारी की मूर्छा का यही कारण था। अफसोस कि बिना कहे सुने ही चला जाना उन्होंने अच्छा समझा।

क्या हर्ज था, सबसे विदाई लेकर हँसी खुशी से जाते। उन्हें कौन रोक सकता था ? महारानी ने भी चिट्ठी पढ़कर एक दीर्घ निश्वास ली, आँखों में आँसू भर लाई, उन्हें अंचल से पोंछते हुए उन्होंने कहा चन्द्रलेखा ! क्या लिखा जावे, भाग्य की बात है। उस पर किसी का वश नहीं है। कुछ विचारा था, कुछ हो गया। कठिनाई से सुख के दिन आये थे, सो विधि की गति से दुःख में परिणत हो गये, परन्तु अब खेद करने से क्या ? मदनमालती स्वयं बुद्धिमती है। वह इन सब बातों का विचार कर सकती है और यह भी तो सोचो कि भूपसिंह ने अपनी चिट्ठी में जो कुछ लिखा है, उससे कृतज्ञता, उदारता, इन्द्रियनिग्रहता आदि गुणों की कितनी अधिकता प्रतीत होती है ? अपने मित्र के लिये जो अपने सम्पूर्ण सुखों पर छार डाल सकता है, उसे एक महापुरुष ही समझना चाहिये और इससे मदन मालती को इस बात का अभिमान होना चाहिये कि मुझे कैसा गुणवान पति मिला है। बल्कि एक प्रकार का शोक के स्थान में उसे हर्ष होना चाहिये, जो मोह की सबसे कठिन परीक्षा में उसका पति उत्तीर्ण हो गया और परोपकार के अद्वितीय सत्कार का भाजन हुआ। जो दूसरे के दुःख से दुःखी होता है, उसी पुरुष का जीवन सफल है, नहीं तो अपने सुख की खोज में अपना पापमय जीवन कौन समाप्त नहीं करता और भूपसिंह ने आश्वासन भी तो दिया है, वे बहुत जल्दी आयेंगे।

तुम सबको चाहिये कि निरन्तर उनकी मंगलकामना करती रहो और भगवान से इस विषय में प्रार्थी रहो। अच्छा, तो अब मैं जाती हूँ, तुम सब लड़की को समझा बुझाकर ऊपर ले जाओ और उसका मन बहलाओ, मैं महाराज को कहकर भूपसिंह की खोज के लिये यदि उचित समझा गया, तो एक दो चतुर पुरुष भिजवाऊँगी।

महारानी चली गईं। सखीगण मदनमालती को उनकी आज्ञानुसार महल की छत पर ले गई। आकाश स्वच्छ था। तारिका प्रभा और चाँदनी छिटक रही थी। खसखस की टट्टियों से और चारों तरफ रक्खे हुए फूलों के सुन्दर गमलों में से शीतल सुगन्धित हवा के झोंके आ रहे थे और भी नाना प्रकार की शीतल सामग्रियों से उस ग्रीष्म को शिशिर ऋतु बना रक्खी थी।

ऐसे नहीं जान पड़ता था कि यह वही ग्रीष्मकाल है, जो बेचारे दीनहीन पुरुषों को उनकी जर्जर कुटीरों में झुलसा रहा है। कैसा अन्याय है।

जिसके राज्य में रहकर पुरुष स्वर्गसुखों का अनुभव करता है, उसी के राज्य में दूसरा नारकीय वेदनायें सहता हुआ दिन काटता है। जबर्दस्त के दो हिस्से होते हैं। जुलमी से भी जुलमी राजाओं को जबर्दस्त लोग शीतल बना लेते हैं, इसका अनुभव वहाँ अच्छी तरह से होता था। मदनमालती वहीं पर पड़े हुए एक पलंग पर लेट गई, जिस पर सुन्दर पुष्पों की शय्या बिछी हुई थी। सखीजन चारों ओर घेरकर बैठ गईं। कोई पंखा झलने लगी, कोई गुलाबपाश लाकर उसके उदास मुख पर गुलाब जल छिड़कने लगी और कोई-कोई नखरेबाज मीठी चुटीली कहानियाँ कहकर आनन्द और हास्य की वर्षा करने लगीं, परन्तु कुछ भी फल नहीं हुआ।

मदनमालती का मुरझाया हुआ मन फिर डहडहा नहीं हुआ। वह चाँदनी में चुरने लगी, शीतल समीर में झुलसने लगी और सखियों की कहानियों से ऊब उठी। ऊँची-ऊँची उसासें लेने के सिवाय वह सब प्रकार से निश्चेष्ट हो रही। भाग्य के फेर से सुखदाई पदार्थ भी दुखदाई हो जाते हैं, परन्तु यथार्थ में पदार्थों में सुख-दुःख रूप कोई भी शक्ति नहीं है। सुख और दुःख मान लेना आत्मा का कार्य है। जिसे आत्मा सुखरूप मान लेता है, वह सुखदाता हो जाता है और जिसे दुःख रूप मान लेता है, वह दुःख दाता हो जाता है। पानी को बरसता हुआ देखकर किसान सुखी होता है, परन्तु पथिक दुःखी होता है। क्यों ? इसलिये कि वह उसमें सुखरूप कल्पना कर लेता है और वह दुःखरूप अस्तु, इस वेदान्तज्ञान के लिखने का हमको अवकाश नहीं है। अभिप्राय केवल इतना है कि वे सब सुख की सामग्री मदनमालती को वियोगकल्पना से दुःख ही दुःखरूप दिखने लगी। बेचारी सखियों का कुछ भी उपाय सफलीभूत नहीं हुआ।

अनुमान दो घण्टे तक मदनमालती का यही हाल रहा। इतने में एक शान्तरूपा ब्रह्मचारिणी वहाँ आई, जिसे देखते ही मदनमालती सम्हलकर खड़ी हुई और अपनी विरहदशा को छुपाती हुई प्रणाम करके ब्रह्मचारिणी के बैठ जाने पर विनय के साथ बैठ गई। वह ब्रह्मचारिणी मदन मालती की अध्यापिका थी। बालकपन से इसी के साथ वह पढ़ती-लिखती है। इसी कारण मदन मालती उसका इतना विनय करती है।

ब्रह्मचारिणी ने कुशल प्रश्न के पश्चात् कहा-मालती ! महारानी के द्वारा चिरन्जीवी भूपसिंह दुःख के समाचार सुनकर मैं तुम्हारे पास दौड़ी आई हूँ। तुम्हें मैं बहुत बुद्धिमती और सुशीला बालिका समझती हूँ, इसलिये इस विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं देखती। संसरणरूप संसार में ऐसे सैकड़ों उलट पुलट प्रतिदिन हुआ करते हैं, और विचारशील पुरुष उन्हें सदा धैर्य से सहन करते हैं। यह सब अपने पूर्व कर्म के पापों का उदय है। इनका फल भोगे बिना छुटकारा नहीं है। धैर्य धारण करके भोगोगी, तो भोगना पड़ेंगे, और विचलित शोकित होकर भोगोगी, तो भोगना पड़ेगा। परन्तु जो धीरता से सहन कर लोगी तो इतना लाभ होगा, कि आर्तध्यान से नवीन कर्मों का बन्ध नहीं होवेगा। अन्यथा यह तो भोगना ही है और इससे नवीन कर्मबन्ध करके आगामी काल में फिर उनके उदय फल के भोगने की अधिकारिणी होओगी।

इसलिये प्यारी बेटी ! दुःख को विस्मरण करके जितने दिन तक यह वियोग-रात्रि रहें, और पति संयोग रूपी दिवस का उदय न हो तब तक एक भुक्ता होकर रह और सौभाग्य मात्र शृंगार को रखकर निरन्तर जिनेन्द्र देव का स्मरण किया कर। अपने प्राणनाथ के गुणों का सदा चिन्तवन और उसकी मङ्गल कामना करना प्रत्येक कुलीन स्त्री का धर्म है।

पति के वियोग में दुःखी होने से ही कोई स्त्री पतिव्रता नहीं कहला सकती, क्योंकि उसमें उसका सुख स्वार्थ है। सुख स्वार्थ के नष्ट होने पर कौन दुःखी नहीं होता? परन्तु जिस स्त्री के वियोगावस्था में ऐसे उच्च विचार रहते हैं कि “मैं दुःखी हूँ, सो तो अपने कर्म के उदय से हूँ, परन्तु मेरे जीवनाधार को किसी प्रकार का कष्ट न हो। वे सुख से रहें। मेरे वियोग का दुःख भी उन्हें न सतावे। क्योंकि जो उनका सुख है वही मेरा सुख है।” वही सच्ची पतिपरायणा स्त्री है।

जो स्त्रियाँ प्रतिदिन जिनदेव की पूजा करती हैं, संयम से रहती हैं, धर्मध्यान में लगी रहती हैं और दुखिया भूखे जीवों पर दया करके दान दिया करती हैं, उन्हें उनके पति बहुत शीघ्र आकर मिलते हैं। क्योंकि सम्पूर्ण सुखों की जड़ धर्म है। धर्म की महिमा वचन से नहीं की जा सकती।

मदनमालती यह सब सुनकर रह गई, उसने उत्तर नहीं दिया। परन्तु उसकी मुखमुद्रा देखकर ब्रह्मचारिणी जान गई कि मेरे कहने का इस पर कुछ असर हुआ है और उसी समय दासियों को समझा बुझाकर वहाँ से चली गई। इसके पश्चात् मदन मालती ने शोक का परित्याग कर दिया और वह अपनी गुरानी की आज्ञानुसार उसी दिन से व्रतनियम संयमपूर्वक रहने लगी। एक सदावर्त भी उसने शीघ्र खोल दिया, जिसमें सम्पूर्ण दीन दुखियों को भोजन वस्त्र दिये जाने की व्यवस्था हो गई।

तेरहवां पर्व

दूसरे दिन फिर मुनिपरिषद् एकत्र हुई। सामान्य व्याख्यान हो चुकने पर रतनचन्द्र ने खड़े होकर विनयपूर्वक पूछा-भगवान्! आज कृपा करके यह बतलाइये कि कर्म कितने प्रकार के हैं? उनका आत्मा से सम्बन्ध किस प्रकार का होता है? वे फल किस प्रकार देते हैं? और फिर आत्मा से उनका सम्बन्ध किस प्रकार से छूटता है?

मुनिराज-कर्म के मुख्य भेद आठ हैं-ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय। इनमें से पहला ज्ञानावरणी कर्म आत्मा के ज्ञान गुण का घात करता है अर्थात् जब ज्ञानावरणी जाति के कर्मवर्गणाओं से आत्मा का सम्बन्ध होता है, तब उसकी ज्ञानरूप शक्ति पर एक प्रकार का परदा पड़ जाता है, जिससे वह शक्ति अपना काम नहीं कर सकती। आत्मा की स्वाभाविक ज्ञानशक्ति इतनी है कि यदि उस पर कोई आवरण न हो, तो वह संसार के तीनकाल सम्बन्धी समस्त पदार्थों को एक समय में जान सकता है, परन्तु इन कर्मों से ढके रहने के कारण वह उतना नहीं जान सकता अथवा थोड़ा बहुत उपशम होने से अर्थात् आवरण के न्यूनाधिक होने से थोड़ा बहुत जान सकता है।

दूसरा दर्शनावरणी कर्म आत्मा के दर्शनगुण का घात करता है अर्थात् उसके कारण आत्मा की अनन्त दर्शन शक्ति ढकी हुई रहती है।

तीसरा वेदनीय कर्म आत्मा के अव्याबाध गुण का घात करता है अर्थात् वेदनीय जाति की कार्माणवर्गणाओं के सम्बन्ध से आत्मा की बाधारहित शक्ति ढक जाती है।

चौथे मोहनीय कर्म के दो भेद हैं-एक दर्शनमोहनीय और दूसरा चारित्रमोहनीय। दर्शनमोहनीय की कर्मवर्गणाओं से आत्मा का सम्यग्दर्शन गुण दब जाता है और चारित्र मोहनीय से चारित्र गुण ढक जाता है।

आयुकर्म आत्मा के अवगाहन का घात करता है। गोत्रकर्म अगुरुलघु का घातक है और अन्तराय कर्म वीर्य (पराक्रम) गुण का घातक है।

उदाहरण के लिये ज्ञानावरणी का स्वभाव परदे के समान है। जिसप्रकार परदा पदार्थ नहीं देखने देता, उसीप्रकार ज्ञानावरणी कर्म पुद्गल आत्मा के प्रदेशों से सम्बन्ध करके तत्त्वज्ञान नहीं होने देते। दर्शनावरणी का स्वभाव द्वारपाल के समान है अर्थात् जिसप्रकार द्वारपाल पर का दर्शन नहीं होने देते, उसीप्रकार इस कर्म के परमाणु पर का दर्शन नहीं होने देते।

मोहनीय का स्वभाव मदिरा के समान है अर्थात् जिसप्रकार मदिरा जीवों को असावधान कर देती है, उसीप्रकार मोहनीयकर्म आत्मा को संसार में पागल-सा बना देता है।

वेदनीय का स्वभाव शहद लपेटी छुरी के समान है। जैसे छुरी चाटने से मीठी लगती है, परन्तु आखिर जीभ का छेदन करती है उसीप्रकार वेदनीय थोड़े समय के लिये साता दिखाकर असाता से पीड़ित रखता है।
आयु का स्वभाव खोड़े (काठ) के समान है। जैसे खोड़े में चोर का पाँव अटका देते हैं और जिसप्रकार उसके रहते चोर नहीं निकल सकता उसीप्रकार आयुकर्म के पूर्ण हुए बिना आत्मा नरकादि से नहीं निकल सकता।
नामकर्म का स्वभाव चित्रकार के समान है। जिसप्रकार चित्रकार नानाप्रकार के आकार बनाता है, उसीप्रकार नामकर्म आत्मा से सम्बन्ध करके नानाप्रकार मनुष्य तिर्यंचादि आकार बनाता है।
गोत्रकर्म का स्वभाव कुंभकार के समान है। जिसप्रकार कुंभकार छोटे-बड़े नानाप्रकार के बर्तन बनाता है उसीप्रकार गोत्रकर्म नीचे ऊँचे गोत्रों में उत्पन्न करता है और अन्तराय का स्वभाव उस राजभंडारी के समान है, जो राजा के दिलाने पर भी किसी को दान नहीं देता। जैसे भंडारी भिक्षुकों को लाभ नहीं होने देता उसीप्रकार अन्तराय कर्म आत्मा के दान-लाभादि में विघ्न डाल देता है।
यह तो पहले ही कह चुके हैं कि जिस समय आत्मा राग-द्वेष से सन्तप्त होता है उस समय उसके साथ कार्माण वर्गणाओं का सम्बन्ध होता है। इस सम्बन्ध को ही बन्ध कहते हैं। यह बन्ध चार प्रकार का है-प्रकृतिबन्ध, प्रदेशबन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध। कर्म में आत्मा के गुणों के घात करने की शक्ति का नाम प्रकृतिबन्ध है अर्थात् सामान्य कर्मवर्गणा के परमाणुओं में जब ऊपर कहे अनुसार ज्ञान-दर्शन आदि आत्मा के गुणों के घात करने रूप पृथक्-पृथक् स्वभाव उत्पन्न हो जाते हैं, तब वह प्रकृतिबन्ध कहलाता है।

आत्मा के असंख्य प्रदेशों में से एक-एक प्रदेश पर अनन्तानन्त कर्मवर्गणाओं, संसारी जीव के प्रदेशों और पुद्गल के प्रदेशों के एक-क्षेत्रावगाही होने को प्रदेशबन्ध कहते हैं।

कार्मण वर्गणाओं का उनके स्वभाव से च्युत न होने को अर्थात् कौन वर्गणा कितने समय तक आत्मा के साथ बन्धरूप रहेगी, इसप्रकार की स्थिति का प्रमाण बन्धन को स्थितिबन्ध कहते हैं और कर्मों की हीनाधिक फलदान शक्ति को अनुभागबन्ध कहते हैं।

इन चार प्रकार के कर्मबन्धों में प्रकृति और प्रदेशबन्ध योगों से होते हैं और स्थिति तथा अनुभाग बन्ध कषायों से होते हैं। यहाँ तुम्हें यह भी जान लेना चाहिये कि पुद्गलविपाकी शरीर नामक नामकर्म के उदय से मन-वचन-काय संयुक्त जीव की उस शक्ति विशेष को योग कहते हैं जो कर्मों के आगमन में कारणस्वरूप होती है और आत्मा के क्रोध, मान, माया और लोभ रूप परिणामों को कषाय कहते हैं।

प्रत्येक कर्म की मुख्य चार अवस्था होती है-उदय, उपशम, क्षय और क्षयोपशम। कर्म अपनी बन्धी हुई स्थिति को पूर्ण करके जिस समय फल देता है, उस समय की फलदान अवस्था को उदय कहते हैं। जैसे किसी जीव ने पाँच वर्ष के लिये कोई कर्म बाँधा और वह पाँच वर्ष के योग्य आबाधा स्थिति पूरी करके जब कर्मफल देने के सम्मुख हुआ तब उसकी अवस्था को उदय अवस्था कहते हैं।
कारणवश कर्मशक्ति की अनुभूति होने को उपशम कहते हैं। जैसे मैले जल से भरे हुए गिलास में निर्मली डाल देने से उसका मैल नीचे बैठ जाता है और स्वच्छ जल हो जाता है, उसीप्रकार से जीव के परिणामों के निमित्त से कर्मरूपी मल कुछ काल तक फल देने योग्य नहीं रहता है, उस अवस्था को उपशम कहते हैं।
आत्मा से किसी कर्म के सर्वथा छूट जाने को क्षय कहते हैं। कर्म के जो आठ भेद पहले कह चुके हैं, वे मुख्यता से दो प्रकार के हैं-एक घाति और दूसरे अघाति। जो जीव के गुणों का घात करते हैं, उन्हें घाति कहते हैं और जो घात नहीं करते उन्हें अघाति कहते हैं। इसीप्रकार घाति के दो भेद हैं-एक देशघाति और दूसरा सर्वघाति। कर्म के समूह के स्पर्धक और जितने कर्मपरमाणु एक समय में उदय आवे, उतने परमाणुओं के समूह को निषेक कहते हैं। वर्तमान निषेक में सर्वघाति स्पर्धकों का उदयाभावक्षय अर्थात् बिना फल दिये ही आत्मा से छूट जाना, देशघाति स्पर्धकों का उदय और वर्तमान निषेक को छोड़ आगे के निषेकों का सत्ता अवस्थारूप उपशम कर्म की ऐसी मिश्रित अवस्था को क्षयोपशम कहते हैं।

कर्म और जीव का सम्बन्ध हम समझते हैं तुम्हें अवगत हो चुका होगा। अब यह बतलाना है कि अनादिकाल से इन कर्मों के पंजे में फंसा हुआ आत्मा उनसे छुटकारा किसप्रकार से पाता है। पहले कहा जा चुका है कि बन्ध के कारण योग और कषाय हैं, इसलिये यह बात हर कोई की समझ में आ सकती है कि मोक्ष का उपाय-योग कषाय के अभावरूप होगा, क्योंकि कारण के अभाव से कार्य का भी अभाव हो जाता है, इसलिये यह विचारना होगा कि योग-कषाय का अभाव किसप्रकार से होता है।

यह तो निश्चय ही है कि योग-कषाय का अभाव सम्यग्ज्ञान के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि किसी कार्य के करने का जब तक यथार्थ ज्ञान न होगा, तब तक उसका सिद्ध होना असम्भव है और सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन पूर्वक होता है अर्थात् जब सम्यग्दर्शन होता है, तब ही सम्यग्ज्ञान होता है। इसीकारण पूर्वाचार्यों ने सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान सहित योग-कषाय के अभाव रूप चारित्र को मोक्ष का मार्ग बतलाया है।

सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान ये दोनों ही जीव के भिन्न-भिन्न गुण हैं। जिसप्रकार अन्धकार का नाश होने पर सूर्य की किरणों से समस्त दिशायें एक प्रकार की निर्मलता धारण करती हैं, उसीप्रकार दर्शन मोह के उपशम होने पर जीव के एक प्रकार की निर्मलता होती है और उसी को सम्यग्दर्शन कहते हैं अथवा जैसे कोई मनुष्य मद्य अथवा धतूरे के नशे से मूर्च्छित हो जाता है, परन्तु कुछ काल पीछे उसे नशे के दूर होने पर उसका चित्त एक प्रकार के उल्लास (नीरोगता) रूप होता है, उसीप्रकार अनादिकाल से यह जीव दर्शन मोहनीय के हित के विषय में मूर्च्छित सा हो रहा है, परन्तु कारण विशेष से दर्शन मोहनीय का उपशम होने पर उस जीव के आत्महित के विषय में कपाट से खुल जाते हैं। उस समय उसके एक प्रकार का जो प्रासाद (नैर्मल्य) प्रगट होता है, उसी को सम्यग्दर्शन कहते हैं।

जिसको एक सम्यग्दर्शन प्राप्त हो गया, वही जीव अपने आत्मा का अनुभव कर सकता है। इस अनुभव को स्वानुभूति कहते हैं। यद्यपि स्वानुभूति ज्ञान का ही परिणाम विशेष है, तथापि वह सम्यग्दर्शन के बिना किसी जीव के नहीं होता, इसीलिये किसी-किसी आचार्य ने स्वानुभूति को ही उपचार से सम्यग्दर्शन कहा है। श्रद्धा, रुचि और प्रतीति ये तीनों ज्ञान की पर्याय हैं। तत्त्वार्थ के सन्मुख बुद्धि को श्रद्धा कहते हैं, तत्त्वार्थ के ग्रहण को रुचि कहते हैं और तत्त्वार्थ के विश्वास को प्रतीति कहते हैं। शुभकर्म में मन-वचन-काय के व्यापार को आचरण कहते हैं। इन श्रद्धादिक गुणों में से किसी जीव के एक, किसी के दो, किसी के तीन और किसी के चारों गुण होते हैं। जब ये श्रद्धादि गुण स्वानुभूति सहित होते हैं, तब तो गुण रूप ही होते हैं, परन्तु जब स्वानुभूति रहित होते हैं, तब वे तदाभास अर्थात् मिथ्यात्वरूप होते हैं, इसलिये स्वानुभूति सहित श्रद्धा आदि को उपचार से सम्यग्दर्शन कहते हैं।
रतनचन्द-भगवन्! आपकी कृपा से मैंने कर्म विषय को ठीक-ठीक जान लिया। अब जैनशासन में सप्त तत्त्व कौन-कौन से माने हैं और उनका स्वरूप क्या है, यह जानने की मेरी उत्कट (तीव्र) इच्छा है।
मुनिराज-रतनचन्द! जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष-ये सात तत्त्व हैं। इनमें से तुम्हें जीव, अजीव, बन्ध का स्वरूप सामान्यतः बतला दिया जा चुका है, शेष चार के विषय में कहना बाकी है। तो भी यहाँ पर प्रकरण के सम्बन्ध से सबको ही कह देना उचित होगा।
दो प्रकार के हेतुओं का सन्निधान होने पर उत्पन्न हुए चैतन्यरूप परिणाम को उपयोग कहते हैं और यह उपयोग ही जीव का लक्षण है। इसके दो भेद हैं-एक दर्शनोपयोग और दूसरा ज्ञानोपयोग। आत्मा के प्रतिभास का नाम ज्ञान है। ये दर्शनोपयोग तथा ज्ञानोपयोग दोनों ही एक चेतना गुण की पर्याय हैं।
जीव के दो भेद हैं-मुक्त और संसारी। जो कर्मबन्ध से छूट करके स्वाधीन, शाश्वत, अविनाशी सुख का अनुभव करते हैं, उन्हें मुक्त कहते हैं और जो दुःख-रूप संसार में परिभ्रमण किया करते हैं, उन संसारी जीवों के दो भेद हैं-त्रस और स्थावर। जिनमें से त्रस-द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय ऐसे चार प्रकार के हैं।

पंचेन्द्रिय के समनस्क (मनसहित) और अमनस्क (मनरहित) दो भेद होते हैं और समनस्क जीवों के देव, मनुष्य, तिर्यञ्च और नारकी ये चार भेद हैं। स्थावर जीवों के पाँच भेद हैं-पृथ्वी, जल, तेज, वायु और वनस्पति। वनस्पति के दो भेद हैं-प्रत्येक और साधारण। जिस वनस्पति में एक शरीर का एक स्वामी हो, उसे प्रत्येक और जिसमें एक शरीर के अनेक स्वामी हों, उसे साधारण कहते हैं।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और साधारण वनस्पति के वादर और सूक्ष्म-ये दो-दो भेद हैं। पृथ्वी आदि से जिनका अवरोध (रुकावट) न हो सके, उन्हें सूक्ष्म कहते हैं और जिनका अवरोध हो जावे, अर्थात् जो पृथ्वी आदि को पार करके न जा सकें, उन्हें वादर कहते हैं। चेतना रहित द्रव्यों को अजीव कहते हैं। उनके पुद्गल, धर्म, अधर्मादि पाँच भेद हैं, जिन्हें छह द्रव्यों के वर्णन में कह चुके हैं।

आत्मा और कर्म के परस्पर प्रवेश होने को बन्ध कहते हैं। कर्म के द्रव्यकर्म और भावकर्म दो भेद हैं। पुद्गलपिंड को द्रव्यकर्म कहते हैं और उस कर्म के सम्बन्ध से उत्पन्न हुए रागादि परिणामों को भावकर्म कहते हैं। बन्ध के तीन भेद हैं-भावबन्ध, द्रव्यबंध और उभयबन्ध। रागरूप परिणाम होने को भावबन्ध, कार्मणवर्गणा के स्कंधों में आत्मा के साथ बंधने की शक्ति को द्रव्यबंध और आत्मप्रदेश तथा कर्मरूप हुए पुद्गल प्रदेशों के परस्पर सम्बन्ध होने को उभयबंध कहते हैं。

बंध के कारण को आस्रव कहते हैं। इनके चार भेद हैं- द्रव्यबंध का उपादानकारण, द्रव्यबंध का निमित्तकारण, भावबंध का उपादानकारण और भावबंध का निमित्तकारण। जिससे कार्य की उत्पत्ति होती है अथवा जो कार्य की उत्पत्ति में सहायक होता है, उसे कारण कहते हैं। यह निमित्त और उपादान-इसप्रकार दो भेदरूप होता है। जो पदार्थ स्वयं कार्यरूप परिणमे, उसे उपादान कारण कहते हैं, जैसे मिट्टी घड़े की उपादान कारण है, क्योंकि वह स्वयं घटरूप हो जाती है और जो पदार्थ दूसरे की उत्पत्ति में सहायक होता है, उसे निमित्त कारण कहते हैं। जैसे घड़े के बनने में कुम्हार के दण्ड, चक्र आदि कारण हैं। अभिप्राय यह है कि द्रव्य अनादिकाल से जो अनन्त पर्यायें धारण करता रहता है, उन पर्यायों में पूर्व क्षणवर्ती पर्याय को उपादान कारण और उत्तरक्षणवर्ती (आगामी) पर्याय को कार्य कहते हैं। घड़े की पूर्वक्षणवर्ती मिट्टी पर्याय उपादान कारण और उत्तरक्षणवर्ती घड़े की पर्याय कार्य है。

जिस समय आत्मा और कर्म ये दोनों बन्ध पर्याय को पाते हैं, उससे पहले क्षण में जो कार्माण वर्गणाओं के स्कन्ध बन्ध के सम्मुख थे अर्थात् बंधना चाहते थे, वे द्रव्यबन्ध के उपादान कारण और आत्मा के रागादि परिणाम द्रव्यबन्ध के निमित्त कारण हैं।

इसीप्रकार जिस समय आत्मा भावबन्ध पर्याय में परिणत है, उसके पूर्व क्षण में आत्मा की जो कुछ पर्याय हैं, वे भावबन्ध के उपादान कारण और उदय तथा उदीरणा अवस्था को प्राप्त पूर्व के बंधे हुए कर्म भावबंध के निमित्त कारण हैं, क्योंकि यह आत्मा उन्हीं कर्मों के निमित्त से रागादिस्वरूप भावबन्ध पर्याय को प्राप्त होता है।

आस्रव के रुकने को संवर कहते हैं। यह दो प्रकार का है- द्रव्यसंवर और भावसंवर। आते हुए कर्म के रुकने को द्रव्यसंवर और आत्मा के गुप्ति, समिति, धर्म, परीषहजय, तप, अनुप्रेक्षा तथा चारित्ररूप भावों को भावसंवर कहते हैं। भावसंवर कारण है और द्रव्यसंवर कार्य है।

मन-वचन-काय के योगों के भलीभाँति निग्रह को गुप्ति, प्रमाद के रोकने को समिति, उत्तमक्षमा आदि आत्मा के दस स्वभावों को धर्म, भूख-प्यास आदि बाईस परीषहों के जीतने को परीषहजय, इच्छा के निरोध को तप, अनित्यादि बारह भावनाओं के चिंतवन को अनुप्रेक्षा और सामायिकादि पाँच संयमों को चारित्र कहते हैं।

कर्म के एकदेश क्षय को (खिरने को) निर्जरा कहते हैं। इसके भी दो भेद-द्रव्य निर्जरा और भाव निर्जरा। आत्मा से एकदेश कर्मों के छूट जाने को द्रव्य निर्जरा और जिन भावों से वे कर्म छूटते हैं, उन्हें भाव निर्जरा कहते हैं। निर्जरा के सविपाक और अविपाक ये भी दो भेद हैं। अनादिकाल से जिनका आत्मा के साथ बीज वृक्ष का सा सम्बन्ध है, उन कर्मों का अपनी स्थिति पूरी होने पर फल देकर खिर जाने को सविपाक निर्जरा कहते हैं और जो कर्म उदय में न आये हों, उन्हें तप के बल से उदयावलि में आकर खिर जाने को अविपाक निर्जरा कहते हैं।

बन्ध के कारणों के अभाव और निर्जरा के सद्भाव से समस्त कर्मों से मुक्त हो जाने को मोक्ष कहते हैं। मोक्ष के भी दो भेद हैं- द्रव्य मोक्ष और भाव मोक्ष। आत्मा तथा कर्म के परस्पर सम्बन्ध छूटने को द्रव्य मोक्ष और द्रव्य मोक्ष के कारणभूत परिणामों को भाव मोक्ष कहते हैं।

समस्त कर्मों से रहित होने पर यह आत्मा अपने उर्ध्वगति स्वभाव से ऊपर गमन करके लोक के अन्त में विराजमान हो जाता है। धर्म द्रव्य का अभाव होने के कारण उसकी लोक के बाहर गति नहीं होती और उस मुक्तात्मा के राग-द्वेषादिकों का सर्वथा अभाव हो जाता है, इसीलिये फिर कर्मबन्ध नहीं होता और इस कारण चतुर्गतिरूप संसार में उसका परिभ्रमण नहीं होता। मोक्षमहल में वह सदाकाल अविनाशी अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करता है।

सप्त तत्त्व का स्वरूप समाप्त हो चुकने पर उस दिन की व्याख्यान सभा भी समाप्त की गई।

चौदहवां पर्व

हीरालाल जौहरी रतनचन्द का इकलौता पुत्र था। जब हीरालाल उत्पन्न हुआ था, तब रतनचन्द की माता जीवित थी। नाती का जन्म सुनकर उसके आनन्द का पार नहीं रहा था, अपनी एक पड़ोसिन ब्राह्मणी को बहुत सी दान दक्षिणा देकर उसने कहा था-राधा ! आज मेरा अंधेरा घर प्रकाशमान हो गया। तुम्हारे सबके पुण्यप्रताप से मेरा यह दीपक जगमगाता रहे, मेरी यही लालसा है। अब मैं अपने नाती को गोदी में लिये हुए बड़े आनन्द से मरूँगी। अब मुझे किसी बात की अभिलाषा नहीं है।

रतनचन्द की माता बड़ी भोली और सीधी-साधी थी। अपने पुत्र के समान अपनी बहू रामप्यारी के सिर में जरा-सा दर्द भी होता था, तो बुढ़िया विकल हो जाती थी। बीसों वैद्यों और मंत्रवादियों के घर उसके बुलावा पहुँचते थे और उनके भले होते थे। रामप्यारी बहुत बुद्धिमती स्त्री थी, इसलिये ऐसी जरा-जरा सी बातों में वैद्यों को बुलाने के लिये वह निषेध करती, परन्तु उस बेचारी की सुनता कौन था। बुढ़िया के आगे किसी की भी दाल नहीं गलने पाती थी। आखिर रामप्यारी ने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि छोटी मोटी तकलीफों को किसी पर प्रगट ही नहीं किया करूँगी।

रामप्यारी एक सुशिक्षित घर की लड़की थी, इसलिये सम्पूर्ण गृहकार्यों में दक्ष होने के सिवाय वह भलीप्रकार पढ़ी-लिखी भी थी। वह जानती थी कि बालक छोटी अवस्था में जैसे सांचे में ढाला जावेगा, उसका आगामी जीवन उसीप्रकार का होगा, इसलिये बालक हीरालाल को वह सदा अपने ही पास रखना चाहती थी और इस बात से बड़ी सावधान रहती थी कि उसके हृदय पर बुरे बालकों के दुर्गुणों की छाया न पड़ने पावे, परन्तु रतनचन्द की भोली माता प्रेमाधिक्य के कारण उसके इस कार्य में बाधक होती थी। प्रायः वह उसे अपनी गोद में लेकर दीवानखाने में जा बैठती थी और मुहल्ला के बुरे-भले बालक बालिकाओं को बुलाकर उनके साथ विनोद करती और मोदक बाँटती थी।

इस कौतुक से और क्या हानि हुई सो तो हम नहीं कह सकते, परन्तु एक दिन दूध पिलाने में देरी हो जाने के कारण बालक हीरालाल ने रामप्यारी को तोतले अस्पष्ट अक्षरों में अश्लील गाली दी थी, जिसे सुनकर बुड़िया बड़ी प्रसन्न हुई थी।

हीरालाल जब पाँच वर्ष का हुआ, तब एक दिन रामप्यारी ने गुप्तरूप से शुभमुहूर्त निकलवाकर विद्यारम्भ करा दिया था। खेल के बहाने से वे प्रतिदिन घन्टा आध घन्टा उसे कुछ न कुछ बतला दिया करती थी, इसके 10-15 दिन में ही हीरालाल वर्णमाला सीख गया था।

उस समय तो रतनचन्द की माँ के कानों तक यह बात नहीं पहुँची, परन्तु एक दिन किसी खिलाड़ी लड़के के मुँह से यह बात सुनकर बुढ़िया बड़ी अप्रसन्न हुई। उसने रामप्यारी से कहा-बहू! तेरे सिर पर तो कलियुग सवार हो गया है। तुझे यह नहीं मालूम है कि छोटी अवस्था में पढ़ाने से लड़के कमजोर हो जाते हैं। अभी ये उनके खेलने खाने के दिन हैं। अभी से उनके सिर पर यह पढ़ने की चिन्ता का पत्थर रख दिया जावेगा तो इसका शरीर कैसे बढ़ेगा ? और हमारा हीरा क्या किसी कंगाल का लड़का है, जो बिना पढ़े भूखों मर जावेगा ? उसे किस बात की कमी है ! बैठा-बैठा खावेगा और गुमास्तों पर हुक्म किया करेगा। खबरदार ! अब यदि मैंने कभी पढ़ाने की बात सुनी, तो तुझसे बोलना छोड़ दूँगी और रोटी नहीं खाऊँगी।

इस पर रामप्यारी ने अपनी शक्तिभर बहुत कुछ समझाया कि मैं इस तरह से पढ़ाती हूँ कि इसे कुछ परिश्रम न पड़े, खेल ही खेल में बतलाती रहती हूँ, परन्तु बुढ़िया ने एक न सुनी। लाचार मन ही मन दुःखी होकर रामप्यारी ने उस समय पढ़ाना छोड़ दिया और विचार किया कि अस्तु, पढ़ना नहीं, तो न सही। कुछ नैतिक शिक्षा ही इसे देती रहूँगी, परन्तु उसकी यह इच्छा भी पूर्ण नहीं हुई।

थोड़े ही दिन में उसके एक दूसरा बालक उत्पन्न हुआ और दो-तीन दिन जीकर मर गया। साथ ही वह भी बीमार हो गई। रतनचन्द ने बड़े-बड़े वैद्यों से दवाई कराई, परन्तु कुछ भी लाभ न हुआ। खाना-पीना सब छूट गया। एक मात्र हड्डियों का पंजर रह गया। रामप्यारी की यह दशा देखकर रतनचन्द को जो कष्ट होता था उसका वर्णन नहीं हो सकता। उस दुःख का अनुभव वे ही कर सकते हैं, जिन पर कभी ऐसा अवसर आ चुका हो। रतनचन्द से उस घर में जहाँ कि रामप्यारी का पलंग बिछा था खड़ा नहीं रहा जाता। जो और अन्यत्र कहीं जाते थे, तो जी उथल-पुथल हुआ जाता था।

एक दिन वृद्धा माता हीरालाल को बाहर बहला रही थी और दूसरे सेवक लोग अपने काम में लगे हुए थे कि रतनचन्द को एकान्त में पलंग के पास खड़े हुए देखकर रामप्यारी ने कठिनता के साथ धीरे से कहा-'प्राणनाथ! मैं आपके समक्ष प्राणत्याग करूँगी, इससे बढ़कर सुख सौभाग्य और मेरा क्या हो सकता है? परन्तु मेरे पीछे न जाने हीरालाल की क्या गति होगी? यह चिन्ता मुझे बहुत सताती है। वह छह-सात वर्ष का हो गया तो भी उसके पढ़ने की ओर किसी का ध्यान नहीं है। अब भी यदि वह न पढ़ा, तो और कब पढ़ेगा?

अब मैं बहुत समय तक न जीऊँगी। एक बात मैं बहुत दिन से कहना चाहती हूँ, परन्तु कही नहीं जाती। इतना कहते-कहते रामप्यारी के नेत्रों से आँसू के दो बूँद निकल पड़े। रतनचन्द ने उन्हें अपने दुपट्टे से पोंछकर उस भाग्यवती के मुँह पर हाथ फेरा और कठिनाई से हृदय को सम्हालकर कहा-प्रिये कहो, क्या कहती हो?

रामप्यारी ने उस समय रतनचन्द के मुख का एक अपूर्व भाव से निरीक्षण करते हुए कहा-जीवन सर्वस्व कहीं इससे मेरे हृदय को छोटा नहीं समझ लेना, वह बहुत विस्तृत है, परन्तु संसार की अवस्था का विचार करके कहना पड़ता है कि अब तुम दूसरा विवाह नहीं करना। हीरालाल की कुशल चाहना हो, तो रामप्यारी के नाथ ! अब किसी दूसरी के नाथ नहीं बनना।

रामप्यारी से और अधिक न बोला गया, गला भर आया, आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। तब रतनचन्द ने रामप्यारी का सिर अपनी गोद में रख लिया और मुँह पर हाथ फेरते हुए रोते-रोते कहा-प्राणवल्लभे ! ऐसा ही होगा। तुम्हारी सम्मति का पालन करने के लिये मैं सर्वतोभाव से तैयार हूँ, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं समझना। रतनचन्द रामप्यारी को छोड़कर अब किसी को प्यारी कह के संबोधन नहीं करेगा।

यह सुनकर रामप्यारी के क्षीण मुख पर एक प्रकार की आभा सी झलक आई, एक बार पति की ओर लालायित नेत्रों से देखकर उसने कृतज्ञता प्रगट की। उसीसमय वृद्ध माता के आ जाने से रतनचन्द पलंग पर से उतर पड़ा और बाहर चला गया।

उसी रात को रामप्यारी की अस्वस्थता अधिक बढ़ी और प्रातःकाल होने के पहले अपने पति और पंचपरमेष्ठी का नाम स्मरण करते हुए उसने प्राणोत्सर्ग किया। चारों ओर हाहाकार मच गया। उस समय वृद्धा बेहोश होकर गिर पड़ी। रतनचन्द को घर बाहर अन्धकार ही अन्धकार दिखने लगा।

धीरे-धीरे रामप्यारी को मरे हुए चार वर्ष बीत गये। रतनचन्द बहुत दिन से दुकानादि के कार्यों से उदासीन हो गये थे, वह भी काम करने लगे। मित्र दोस्तों में उठने-बैठने लगे, हंसी मजाक करने लगे। सारांश कि सांसारिक कार्यों में पहले की नाई अस्तव्यस्त रहने लगे, परन्तु रामप्यारी को नहीं भूले। हीरालाल के मुँह को देखते ही उन्हें उसका स्मरण हो आता था।
वृद्धा माता प्रतिदिन समझाती थी, नगर के प्रतिष्ठित लोगों को ला लाकर समझाने को कहती थी, जाति की विवाह योग्य कन्याओं के रूप गुणों की अवसर पाकर स्वयं प्रशंसा करती थी और बराबर की स्त्रियों से कराती थी, परन्तु रतनचन्द दूसरा विवाह करना स्वीकार नहीं करते थे। रामप्यारी के कहे हुए वचन उनके हृदय पर अच्छी तरह से अंकित हो रहे थे। उस समय उन्हें भूल जाना उनकी शक्ति से बाहर था।
हीरालाल अपनी दादी के लाड़-प्यार में धनवानों के जैसे लड़के हुआ करते हैं, वैसा ही हो गया। रामप्यारी की अंकित की हुई थोड़े बहुत गुणों की छाया जो कुछ उसके हृदय पर थी, वह भी साफ हो गई। खेलकूद और तत्सम्बन्धी पदार्थों के एकत्र करने के सिवाय उसे नहीं रुचता था और रतनचन्द को अपनी अन्यमनस्कता तथा प्रपंचों के मारे इतना अवकाश नहीं मिलता था कि हीरालाल की देख-रेख रख सके अथवा उसके विद्याभ्यास में सहायक हो। नगर की एक पाठशाला में नाम लिखाकर ही निश्चिन्त हो चुके थे कि हीरालाल पढ़ता है, परन्तु हीरालाल बुरे लड़कों के दुर्गुण सीखने के सिवाय और कुछ नहीं करता था।

पाठशाला के अध्यापक का विद्यार्थियों को प्रायः भय रहा करता है, परन्तु हीरालाल को वह भी नहीं था, क्योंकि उसकी दादी के द्वारा अध्यापक महाशय को बहुत कुछ प्राप्ति हुआ करती थी। दादी हाथ जोड़ के कह दिया करती थी कि पंडितजी! मेरे हीरालाल को मत मारियो। उसे प्यार से पढ़ा दिया कीजियो। सारांश यह कि हीरालाल के पठन-पाठन की व्यवस्था आजकल के धनवानों के लड़कों से बहुत कुछ मिलती-जुलती थी।

खेटपुर में एक धनपाल नाम के सेठ से रतनचन्द की गाढ़ी मित्रता थी। रतनचन्द को अपने हृदय पर भी जितना विश्वास नहीं था, उतना अपने मित्र पर था। धनपाल उमर में कुछ बड़े थे, इसलिये रतनचन्द उन्हें बहुत मानते थे और उनकी दी हुई सम्मति का बहुत आदर करते थे। बुढ़िया ने अपने सब उपायों को विफल देखकर अन्त में इन्हीं धनपाल से अपनी इच्छा प्रगट करने का मनसूबा किया और एक आदमी भेजकर एक दिन उन्हें बुला भेजा।

धनपाल से वृद्धा ने कहा-बेटा! तुझे इसलिये बुलवाया है कि रतनचन्द को विवाह करने के लिये राजी कर ले। मैंने बहुत उपाय किये, परन्तु वह नहीं मानता है। भला तू ही कह, स्त्री के बिना घर की क्या शोभा है? भला, मेरे किस बात की कमी है, जो विवाह न करूँ। देख न, नगर में लोगों की चर्चा के मारे कान नहीं दिये जाते हैं। मुझसे तो मुँह भी नहीं दिखलाया जाता है और न अब इस घर में खड़ा रहा जाता है। यदि तेरे कहने से भी वह नहीं मानेगा, तो देख लेना मैं आत्महत्या कर लूँगी। इसके बाद बुढ़िया रोने लगी। धनपाल ने उसे जैसे तैसे समझा बुझाकर उस समय शान्त किया और उसकी इच्छा में सहमत होकर पीछा छुड़ाया।
इसके पश्चात् धनपाल की रतनचन्द से भेंट हुई। एकान्त में बहुत समय तक दोनों में शास्त्रार्थ होता रहा और अन्त में धनपाल के पक्ष की इसप्रकार से विजय हुई। उन्होंने कहा-तुम्हारी अवस्था विवाह के योग्य अर्थात् लोक और शास्त्र दोनों की मर्यादा के भीतर है। वृद्धा माता का अतिशय आग्रह है सिवाय इसके तुम्हारे यहाँ कोई दूसरा घर द्वार को सम्हालने वाली भी तो कोई नहीं है।
माँ के जीवन का ठिकाना ही क्या है? न जाने कब कूच कर दें। फिर भला तुम ही कहो; हीरालाल का कौन होगा? और तुम क्या समझते हो कि जैसी तुम्हारी परिणति आज है, वैसी ही सदा नहीं बनी रहेगी? ऐसा स्वप्न में भी ख्याल न करो, क्योंकि संसारबद्ध पुरुष के समय-समय पर भाव बदला करते हैं। बाह्य कारणों के मिलने से कब कैसे परिणाम होंगे? इसका निश्चय नहीं है। गृहवास में रहकर विषय-वासनाओं को दबाये रखना सबका कार्य नहीं।
नीति में कहा है-‘बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति’ अर्थात् बलवान् इन्द्रियों के समूह विद्वानों को भी आकर्षित करते हैं, इसलिये विचार करो कि अभी तुम इसप्रकार से वैरागी बने रहे और पीछे अवस्था पक जाने पर किसी कारण से तुम्हें विवाह करने के लिये बाध्य होना पड़े, तो संसार में कितना परिहास होगा?

अतएव अच्छा हो, यदि तुम इस सोहती अवस्था में ही संसार के एक ऋण से मुक्त हो जाओ और भी जहाँ तक मैं जानता हूँ, यदि योग्य अवस्था में एक स्त्री के मृत्यु हो जाने पर दूसरा विवाह करना हो, तो कुछ अनुचित कर्म नहीं है।

गृहस्थ धर्म का निर्वाह बिना स्त्री के नहीं हो सकता। जिस घर में स्त्री नहीं है, उस घर में शांति नहीं है, सुख नहीं है, विश्राम नहीं है और सच पूछो तो उस घर में लक्ष्मी का निवास ही नहीं हो सकता है। जैसा कि लोग समझते हैं, यह स्त्रीरत्न विषयवासना की निवृत्ति का उपकरण मात्र नहीं है, परन्तु परम्परा मोक्षस्वरूप गृहस्थमार्ग का पथदर्शक दीपक है। संसार में रहकर जो इस रत्न की अवहेलना करते हैं, उन्हें प्रायः सुख-शान्ति मिलती ही नहीं है।

स्त्री के समान सुदक्ष मंत्री, स्त्री के समान सच्चा स्वामिभक्त सेवक, स्त्री के समान सुस्वादु भोजन कराने वाला पाचक, स्त्री के समान परिश्रमनिवारक दिव्यमंत्र, स्त्रीकंठ के समान जगन्मनोहर वाद्य, स्त्री के प्रसन्नमुख के समान चिन्ताखेदनाशक नन्दनवन और स्त्री के रमणीय समागम के समान स्वर्ग, संसार में दूसरा नहीं है! नहीं है!! इसलिये यदि तुम स्त्री का परिग्रह नहीं करते हो तो इस संसार को ही क्यों नहीं छोड़ देते ? और यदि संसार को छोड़ने की तुम्हारी शक्ति नहीं है, तो भाई मेरा कहना मान लो और अपनी माता की इच्छा पूर्ण करने में अब विलम्ब मत करो।

रतनचन्द इसका कुछ उत्तर देना ही चाहते थे कि इतने में एक आदमी घबराया हुआ आया और बोला-सेठजी नेमिचन्द सेठ ने आपको इसी समय बुलाया है। उनकी अवस्था बहुत खराब हो रही है। यह सुनते ही रतनचन्द और धनपाल दोनों उस आदमी से कुछ पूछताछ करते हुए नेमिचन्द सेठ के घर जा पहुँचे।

पंद्रहवां पर्व

नेमिचन्द एक साधारण श्रेणी के वणिक हैं। वे बहुत धनवान तो नहीं हैं, परन्तु सत्यनिष्ठा के कारण उनकी प्रतिष्ठा वहाँ के बड़े-बड़े धनवानों से किसीप्रकार कम नहीं है। इस समय वे मृत्युशय्या पर पड़े हुए हैं। उनकी एक मात्र कन्या रामकुमारी उनके सिराहने के पास उदासमुख बैठी है। उसकी अवस्था इस समय अनुमान 13 वर्ष के होगी। यों तो वह वैसे ही सुरूपवती थी, परन्तु इस समय यौवन के प्रारम्भ की आभा से उसका शरीर बहुत ही मनोहर हो गया है। जो एक बार उसे देख लेता है वह फिर भी उसे देखना चाहता है। उसके प्रत्येक अंग की शोभा का वर्णन करके हम अपने पाठकों को चलचित्त नहीं बनाना चाहते और इतना ही कहकर हम आगे चलते हैं कि वह सुन्दर थी। जिस समय रामकुमारी तीन चार वर्ष की थी, उसी समय उसकी माता ने उससे विदा माँग ली थी। पिता ने बड़ी कठिनाई से उसका पालन किया है। दूसरी कोई सन्तान न होने के कारण नेमिचन्द ने उसे ही अपनी आँखों की तारा बना रक्खी थी।

नेमिचन्द की उमर इस समय 60 वर्ष के अनुमान है। आज वे अपनी दुलारी रामकुमारी को अकेली छोड़कर जाने की तैयारी कर रहे हैं। इस समय उन्हें अपने मरने का उतना दुःख नहीं है जितना रामकुमारी को कुमारी छोड़कर जाने का है। कई वर्ष से वे उसके विवाह का विचार करते थे, परन्तु जिस समय उन्हें इस बात का स्मरण होता था कि हमारी दुलारी बेटी विवाह होते ही हमसे अलग हो जावेगी उस समय उनके सब विचार आँसुओं के द्वारा बह जाते थे।

वे नहीं जानते थे कि मेरा जीवन कितना बड़ा है? इसी भूल के कारण आज नेमिचन्द का हृदय उत्तप्त उद्विग्न हो रहा है, शरीर की शक्ति अधिकाधिक क्षीण होती जाती है। न जाने कितने श्वांस बाकी रह गये हैं, यह समझ करके और अधिक विचारपूर्वक निश्चय करने का अवसर न देखकर उन्होंने रतनचन्द को बुलाया है। रतनचन्द के चरित्रों को वे बालकपन से जानते हैं और इस कारण उस पर प्रीति भी रखते हैं।

नेमिचन्द के घर रतनचन्द प्रायः आया जाया करते थे और जरूरत होने पर रामकुमारी से बातचीत भी करते थे। रामकुमारी भी उनके साथ वार्तालाप करने में कुछ संकोच नहीं करती थी, परन्तु आज न जाने क्यों रतनचन्द के आते ही वह वहाँ से भाग गई। बहुत देर से अपने पिता की चिन्ताव्यग्रता पर विचार करते-करते शायद उसने इसी तत्त्व का शोध किया था।

रतनचन्द और धनपाल ने आते ही शरीर-कुशलता पूँछी। मुमूर्षु नेमिचन्द ने एकबार रतनचन्द को सिर से पैर तक देखा और थोड़ी देर तक नेत्र बन्द करके कुछ विचार किया, पश्चात् बहुत धीमी आवाज में कहा-रतनचन्द ! मेरी यह अन्तिम दशा है। अच्छा हुआ, जो तुम आ गये-यह कहकर नेमिचन्द ने सिराहने के पास रामकुमारी को न देख कर पूछा-दुलारी कहाँ चली गई ?

रामकुमारी पास ही दीवाल की ओट में खड़ी थी। उसने पिता की आवाज सुन ली, परन्तु आई नहीं। तब रतनचन्द स्वयं उसका नामोच्चारण करते हुए बुला लाने को उठे, बड़ी मुश्किल हुई। रामकुमारी ने देखा, नहीं जाऊँगी, तो अब हाथ पकड़ा जावेगा, इसलिये तत्काल ही लज्जित होती हुई,नीची दृष्टि किये हुए पिता के समीप आ खड़ी हुई। एक ओर उसके आगे पिता की मृत्यु के पश्चात् का वियोग-विपत्ति का दृश्य नाचता था और दूसरी ओर एक नवीन विचार की उथल-पुथल उसके हृदय को अस्थिर बना रही थी। पिता की मुमूर्ष मूर्ति को देखकर उस समय उसके नेत्रों में आँसू भर आये, वह गद्गद्-कंठ से बोली-पिताजी क्या आज्ञा है ?

रतनचन्द और धनपाल पलंग के पास ही पड़ी हुई कुर्सियों पर बैठे थे। उनमें से रतनचन्द की कुर्सी सिरहाने की ओर थी और धनपाल की कुर्सी उसी से लगी हुई दाहिनी ओर थी। नेमिचन्द का मस्तक एक तकिये के सहारे कुछ ऊँचा हो रहा था। यद्यपि वे चाहते थे, मैं थोड़े समय के लिये टिकके बैठ जाऊँ, परन्तु अशक्तता बहुत बढ़ गई थी। मस्तक ही बड़ी कठिनता से तकिये के सहारे रह सकता था।

अपनी प्यारी बेटी के मुँह से ‘क्या आज्ञा है?’ यह प्रश्न सुनकर उन्होंने कहा-जरा मुझे अपना बायां हाथ तो बतला। उस समय रामकुमारी का शरीर कंटकित हो गया। न जाने क्यों डरते-डरते उसने हाथ आगे को बढ़ाया। उसी समय नेमिचन्द ने कहा-रतनचन्द ! तुम मुझे सदा से मानते आये हो। क्या आज भी मेरी बात मानकर तुम मुझे सुखी कर सकते हो ? कहिये, क्या बात है, मैं उसे मानने के लिये सब प्रकार से तैयार हूँ।

इसप्रकार कहते हुए रतनचन्द कुर्सी से उठकर बात सुनने की उत्कंठा से आगे की ओर झुके। उसी समय नेमिचन्द ने रामकुमारी का हाथ पकड़ के रतनचन्द के हाथ में दिया और कहा ‘बस, इस कन्या का पाणिग्रहण करो, यही मेरी अन्तिम वासना है। मुझे इसी से सीमाधिक सुख प्राप्त होगा। मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति का स्वामी तुम्हें ही बनाता हूँ।’

रतनचन्द अवाक् । एक क्षण भर पहले जिसका स्वप्न में भी ख्याल नहीं था, वह बात कार्य में परिणत होने के सम्मुख हो गई। जिसका कभी विचार ही नहीं किया, उसका क्या उत्तर दें ? और ऐसे महत्त्व के विषय का जिससे जीवन के सुख-दुःखों का सारा फैसला होता है। क्या इतनी जल्दी विचार करके उत्तर दिया जाना संभव है ! बड़ा ही कठिन प्रश्न था। मृत्युशय्या पर पड़े हुए वृद्ध पुरुष की आज्ञा का उल्लंघन करूँ अथवा स्वर्गीय रामप्यारी से हारे हुए वचनों की अवहेलना करूँ। लज्जावनता सुन्दरी का सुकोमल कर पल्लव छोड़ दूँ अथवा साध्वी का दिया हुआ व्रत तोड़ दूँ?
इस विकट द्वन्द युद्ध में पड़कर रतनचन्द चकित स्तम्भित हो रहा। अपना कर्तव्य क्या है? यह विचारने की शक्ति ही उसमें न रही। मूर्तिमन्त पाषाण के समान वह खड़ा का खड़ा रह गया। उसके दाहिने हाथ में रामकुमारी का दाहिना हाथ ज्यों का त्यों थमा हुआ था।
धनपाल इस अपूर्व दृश्य को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। वह एवमस्तु-एवमस्तु कहकर उठ खड़ा हुआ और रतनचन्द की समाधि भंग करके उसने कहा-वाहजी! तुमने भी खूब ध्यान लगाया। अब उस बेचारी का हाथ छोड़ोगे भी, या यों ही खड़े रहोगे? लज्जा आती हो तो उत्तर देने की भी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एक तो इसका कुछ उत्तर ही नहीं है और जो है वह इतनी देर तक मौन धारण करके प्रगट भी तो कर चुके हो, क्योंकि ‘मौन सम्मतिलक्षण’ कहा है।
इसके पश्चात् धनपाल ने अपना लक्ष्य बदल कर नेमिचन्द से कहा-आपने बहुत उत्तम विचार किया और यही आपका कर्तव्य था। रतनचन्द की ओर से मैं इस सम्बन्ध को स्वीकार करता हूँ। इनकी माता भी इस सम्बन्ध को बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार करेंगी। आप निश्चिन्त होकर शान्तिलाभ कीजिये।

नेमिचन्द ने यह सुनकर एक बार रतनचन्द और रामकुमारी की ओर देखकर नेत्र बन्द कर लिये और फिर नहीं खोले।

नेमिचन्द की अन्तः क्रिया की गई। रामकुमारी ने कई दिन तक पितृवियोग का शोक मनाया और कुछ दिन पीछे रतनचन्द द्वितीय विवाह के बन्धन से जकड़ दिये गये। उनकी माता नववधु को पाकर आनन्द से मग्न हो गई। हीरालाल को उसके साथ में खिलाड़ी लड़के ‘मैया नई पुराना बाप, हीरा बेटा सूत कात’ आदि तुकबन्दियाँ बना बनाकर चिढ़ाने लगे।

जिस रात को रतनचन्द का रामकुंवरि के साथ प्रथम समागम हुआ उसी रात के पिछले पहर में उन्होंने स्वप्न में देखा कि एक दिव्य विमान धीरे-धीरे आकाश से नीचे उतरा है। उसमें बैठी हुई एक त्रैलोक्यमोहनी सुन्दरी परिहासपूर्वक कहती है-'रामप्यारी के नाथ! अन्त में तुम प्रतिज्ञा का पालन न कर सके और एक नवमुग्धा के नाथ बन गये। कहते थे-संसार में अब किसी से प्यारी नहीं कहूँगा, परन्तु वह भी भूल गये। सच तो कहो-आज तुमने कितनी बार ‘प्यारी ! प्राणप्यारी’ मंत्र का जाप्य किया है। अस्तु क्या चिन्ता है ?

कुछ दिन इस मन्त्र का फल भी अनुभव करके देखलो कि कितनी शांति मिलती है। अन्त में तो तुम मेरे ही होओगे। एक दिन इसी दिव्यविमान में मैं तुम्हारे साथ विहार करूँगी। पति सेवा का फल मुझे अवश्य मिलेगा। कृत्रिम प्रेम थोड़े ही दिन टिकता है, परन्तु अकृत्रिम प्रेम अगाध प्रेम अन्त तक एक रूप में स्थिर रहता है। इतना कहकर वह अप्सरा वहाँ से अन्तर्ध्यान हो गई। रतनचन्द को पीछे-पीछे भान हुआ कि वह उनकी पतिप्राणा साध्वी रामप्यारी थी।

रतनचन्द का विवाह समाप्त होते ही बुढ़िया माता ने हीरालाल के विवाह का सूत्रपात किया और आखिर दूसरे वर्ष वह भी चतुर्भुज बना दिया गया। उस समय उसकी अवस्था 12 वर्ष की थी। अब यह कहने की जरूरत नहीं रही कि वह जो कुछ थोड़ा बहुत विद्याभ्यास करता था उसकी भी इतिश्री यहीं हो गई। इधर पौत्रवधु का मुख देखकर कुछ दिन में बुढ़िया दादी चल बसी। रतनचन्द अपनी जननी के अकृत्रिम स्नेह का स्मरण करके बहुत दुखी हुए।

बस, रतनचन्द और हीरालाल की पूर्वकथा का सार यही है। यहाँ इसे प्रगट करना हमने इसलिये उचित समझा कि पाठकगण इस बात का विचार कर सकें कि मनुष्य का चरित्रगठन कब और कैसे होता है तथा उसका परिपाक कब और किस रूप में होता है। इस परिचय से और भी अनेक बातों की शिक्षा मिलने की संभावना है।

सोलहवां पर्व

तीसरे दिन मुनि परिषद् के एकत्र होने पर रतनचन्द ने विनय पूर्वक प्रश्न किया कि महाराज ! आज कृपा करके यह बतलाइये कि मोक्षमार्ग के पूर्ण होने का क्रम क्या है ? यह सुनकर आचार्य भगवान ने कहा रतनचन्द ! आज का तुम्हारा प्रश्न बहुत ही अच्छा हुआ। इसके उत्तर को सुनकर तुम्हें बहुत समाधान तथा संतोष होगा। जैन मार्ग का सच्चा गौरव इसी विषय के सुनने से प्रगट होगा।

कारण के दो भेद हैं-एक समर्थ कारण है और दूसरा असमर्थ कारण। सहकारी समस्त सामग्री के सद्भावपूर्वक सम्पूर्ण प्रतिबंधकों के अभाव को समर्थ कारण कहते हैं, कार्य की सिद्धि असमर्थ कारण से नहीं होती, किन्तु समर्थ कारण के सद्भाव होते ही हो जाती है। मोक्ष का समर्थ कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र की एकता तथा पूर्णता है। उसके होते ही तत्काल मोक्ष होता है, परन्तु इन तीनों की एकत्रता पूर्णता युगपत् नहीं होती, क्रमपूर्वक होती है। तुम्हारा प्रश्न इसी क्रम के विषय में है। अच्छा, तो मैं अब इसके उत्तर का प्रारम्भ करता हूँ।

अनादिकाल से चतुर्गति में परिभ्रमण करते हुए जीवों में से जिस जीव का अर्धपुद्गलपरावर्तन प्रमाण काल शेष रहता है, वह जीव सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का पात्र होता है। क्षयोपशम, देशना, विशुद्धि, प्रायोगिक तथा करण इन पाँच लब्धियों का सन्निधान होते ही सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षी मिथ्यात्व (दर्शनमोह) तथा अनन्तानुबंधी चार कषाय इन पाँच प्रकृतियों का उपशम होता है। उस समय आत्मा में जो सम्यग्दर्शन परिणाम प्रगट होता है, वह प्रथमोपदेश सम्यग्दर्शन है। इस सम्यग्दर्शन के लाभ से आत्मा में जो विशुद्ध परिणाम होते हैं, उनसे मिथ्यात्व प्रकृति के तीन खण्ड हो जाते हैं इससे पहले अनादि मिथ्यादृष्टि जीव के दर्शनमोहनीय कर्म की एक मिथ्यात्व प्रकृति ही थी।

उक्त तीन खण्डों में से एक खण्ड को सम्यक्त्व प्रकृति कहते हैं। विशुद्धि परिणामों के बल से इन परमाणुओं में अनुभाग शक्ति इतनी क्षीण हो जाती है कि वे सम्यक्त्व का निर्मूल घात तो नहीं कर सकते, परन्तु शङ्का आदिक मल उत्पन्न करते हैं। दूसरे खण्ड का नाम मिश्र प्रकृति है। इसके परमाणुओं का अनुभाग इसप्रकार क्षीणाक्षीण हो जाता है कि इसके उदय से आत्मा में मिश्रित दही-गुड़ के स्वर की तरह सम्यक्त्व तथा मिथ्यात्वरूप जुदे-जुदे परिणाम नहीं होते, किन्तु मिश्रित परिणाम होते हैं। तीसरा खण्ड मिथ्यात्व प्रकृति स्वरूप ही है। अब इस जीव के सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षभूत दर्शनमोह की प्रकृति तीन तथा चारित्र मोह की अनन्तानुबन्धी कषाय चतुष्टय इसप्रकार सात प्रकृति हुई। इन सात प्रकृतियों में से यदि मिथ्यात्व प्रकृतियों का उदय हो जाय तो यह जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्व को छोड़कर मिथ्यादृष्टि संज्ञक प्रथम गुणस्थानवर्ती हो जाता है। यदि मिथ्यात्व का उदय न हो और अनन्तानुबन्धियों में से किसी एक का उदय हो जाये, तो सम्यक्त्व का घात हो जाता है और जीव सासादन सम्यग्दृष्टि बन जाता है।

जिस जीव की मिश्र प्रकृति का उदय हो जाता है वह मिश्र परिणामों का अनुभव करने से तीसरा मिश्र गुणस्थानवर्ती कहलाता है और जिस जीव के सम्यक्त्व प्रकृति का उदय होता है, उसको दर्शनमोह का क्षयोपशम होने से क्षयोपशम अथवा वेदक सम्यक्त्व कहा जाता है।

यही वेदक सम्यग्दृष्टि जीव के केवली अथवा श्रुतकेवली के पाद मूल में अनन्तानुबन्धी का विसंयोजन (अप्रत्याख्यानादि बारह प्रकृति रूप परिणमावना) कर दर्शनमोह की तीन प्रकृतियों का क्षय करके क्षायिक सम्यक्त्व को प्राप्त होता है। प्रथमोपशम सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक तथा क्षायिक ये तीनों ही सम्यक्त्व सहित जीव चतुर्थ गुणस्थानवर्ती कहलाते हैं। चौथे गुणस्थान के ऊपर सम्यग्दृष्टि जीव ही होते हैं तथा सम्यग्दर्शन के सद्भाव से ज्ञान भी सम्यग्ज्ञान हो जाता है। यहाँ इतना विशेष है कि प्रथमोपशम तथा क्षायोपशमिक सम्यक्त्व चौथे गुणस्थान से सातवें गुणस्थान पर्यन्त ही होते हैं और क्षायिक सम्यक्त्व की उत्पत्ति चौथे, पाँचवे, छट्ठे, सातवें इनमें से किसी एक में होती है।

सम्यग्दर्शन ग्रहण करने के पश्चात् कोई जीव प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से हिंसादिक पाँच पापों का सर्वथा त्याग करने में असमर्थ होकर उनका एकदेश त्याग करके श्रावक के व्रतों को धारण करता हुआ देशविरत संज्ञक पंचम गुणस्थानवर्ती होता है तथा जिस जीव के प्रत्याख्यानावरण कषाय का उपशम हो जाता है और संज्वलन और नो कषाय रूप* चारित्र मोहनीय कर्म का मन्द
उदय होता है, वह चौथे अथवा पाँचवें गुणस्थान को त्यागकर
हिंसादिक पंच पापों को सर्वथा छोड़ अप्रमत्त संज्ञक सातवें
गुणस्थान को धारण करता है, पश्चात् संज्वलन तथा नो कषाय के
तीव्र उदय से विकथादिक प्रमादों को प्राप्त होकर प्रमत्त संज्ञक छठे
स्थान में पदार्पण करता है।

छठे और सातवें इन दोनों ही गुणस्थानों का जघन्य और
उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त मात्र है और इन दोनों ही गुणस्थानों को यह
जीव अनेक बार छोड़ता तथा ग्रहण करता है। जब तक सातवें
गुणस्थान में से यह जीव छठे गुणस्थान को जाया करता है तब तक
उसके सातवें गुणस्थान को स्वस्थान अप्रमत्त कहते हैं और जब यह
जीव श्रेणी चढ़ने को सन्मुख होता है, तब इस गुणस्थान को
सातिशय अप्रमत्त कहते हैं। श्रेणी शब्द का अर्थ नसेनी है, यहाँ
उपमार्थ में श्रेणी शब्द का ग्रहण है अर्थात् मोक्षरूपी महल के


*चारित्र मोहनीय कर्म के 25 भेद हैं। जिनमें से अनंतानुबन्धी क्रोध,
मान, माया, लोभ, सम्यक्त्व के घातक हैं। अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादिक
4 देश चारित्र के घातक हैं। प्रत्याख्यानावरण क्रोधादिक 4 सकल चारित्र
के घातक हैं। संज्वलन क्रोधादिक 4 तथा हास्य, रति, अरति, शोक, भय,
जुगुप्सा, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, वेद-9 सब मिलकर 13 यथाख्यात चारित्र
के घातक हैं।

शिखर पर चढ़ने के लिये जो नसेनी का काम देवे, उसे श्रेणी कहते हैं। अष्ट कर्मों का सरदार मोहनीय कर्म है। मोहनीय कर्म का नाश किये बिना शेष सात कर्मों का नाश नहीं होता।

इसलिये सबसे पहले मोहनीय कर्म नाश किया जाता है। इस मोहनीय कर्म के 28 भेद हैं। जिनमें से दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृति और चारित्र मोहनीय की अनन्तानुबन्धी क्रोधादिक चार इसप्रकार 7 प्रकृति सम्यग्दर्शन का घात करती हैं। शेष चारित्र मोहनीय की 21 प्रकृतियाँ चारित्र की घातक हैं।

प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टि श्रेणी चढ़ने का अधिकारी नहीं है और वेदक सम्यग्दृष्टि श्रेणी चढ़ने से पहले अनन्तानुबन्धी चतुष्क का विसंयोजन करके दर्शनमोह की तीन प्रकृतियों का क्षय करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि होता है अथवा उन तीनों का उपशम करके द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि होता है।

श्रेणी के दो भेद हैं-एक उपशम श्रेणी और दूसरी क्षपक श्रेणी। जिसमें चारित्र मोहनीय की 21 प्रकृतियों का उपशम किया जाय, उसको उपशम श्रेणी कहते हैं। श्रेणी का प्रारम्भ आठवें गुणस्थान से होता है। सातिशय अप्रमत्त में श्रेणी की सम्मुख अवस्था है। दसवें गुणस्थान के अन्त में उपशम श्रेणी वाला 21 प्रकृतियों का उपशम कर चुकता है और क्षपक श्रेणी वाला क्षय कर चुकता है।

इसके पश्चात् चारित्र मोहनीय कर्म की उपशांत अवस्था को भोगने वाले जीव को उपशांत कषाय संज्ञक ग्यारहवें गुणस्थान का धारक कहते हैं और क्षय अवस्था को भोगने वाले जीव को क्षीणमोह संज्ञक बारहवें गुणस्थान का धारक कहते हैं। इन दोनों गुणस्थान वाले जीवों के उदय की अपेक्षा विशुद्धता में कुछ भी अन्तर नहीं है।

केवल इतना विशेष है कि ग्यारहवें गुणस्थान वाला जीव अपने स्थान से च्युत होकर नीचे के गुणस्थानों में आता है और बारहवें गुणस्थान वाला अपने स्थान से नीचे न गिरकर ऊँचा चढ़ता हुआ नियम से मोक्ष को जाता है। ये दोनों ही गुणस्थान वाले समस्त कषायों के उदय के अभाव से अथवा क्षय की अपेक्षा से वीतराग छद्मस्थ कहलाते हैं।

क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव उपशम और क्षपक दोनों ही श्रेणी चढ़ सकता है, किन्तु द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि केवल उपशम श्रेणी ही चढ़ सकता है, क्षपक श्रेणी नहीं चढ़ता। क्षपक श्रेणी चढ़ने का अधिकार केवल क्षायिक सम्यग्दृष्टि को ही है।

चारित्र मोहनीय की 21 प्रकृतियों को उपशमावने तथा क्षपावने के लिये जीव अधःप्रवृत्त करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तकरण संज्ञक तीन करणों को करता है। उनमें से अधःप्रवृत्तकरण सातवें, अपूर्वकरण आठवें, और अनिवृत्तकरण नवें गुणस्थान में होता है। करण नाम परिणामों का है। इन परिणामों के प्रति समय अनन्तगुणी विशुद्धता होती जाती है, जिससे कर्मों का उपशम तथा क्षय और स्थिति खंडन तथा अनुभाग खंडन होते हैं। इन तीनों करणों का काल यद्यपि सामान्यालाप से अन्तर्मुहूर्त मात्र है तथापि अधःकरण के काल के संख्यातवें भाग अपूर्वकरण का काल है। अपूर्वकरण काल के संख्यातवें भाग अनिवृत्तकरण का काल है। अधःकरण के परिणाम असंख्यात लोक प्रमाण हैं।
अपूर्वकरण के परिणाम अधःकरण के परिणामों से असंख्यात लोकगुणित हैं और अनिवृत्तकरण के काल के जितने समय हैं उतने ही उसके परिणाम हैं। इन सबका खुलासा अंक संदृष्टि द्वारा करते हैं
कल्पना करो कि अधःकरण के काल के समयों का प्रमाण 16, अपूर्वकरण के काल के समयों का प्रमाण 8 और अनिवृत्तकरण के काल के समयों का प्रमाण 4 है। अधःकरण के परिणामों की संख्या 3072, अपूर्वकरण के परिणामों की संख्या 4096 और अनिवृत्तकरण के परिणामों की संख्या 4 है। एक समय में एक जीव के एक परिणाम होता है, इसलिये एक जीव अधःकरण के 16 परिणामों को ही धारण कर सकता है।
अधःकरण के परिणाम जो 16 से अधिक कहे हैं वे नाना जीवों की अपेक्षा से कहे हैं। वहाँ इतना विशेष है कि अधःकरण के 16 समयों में से प्रथम समय में यदि कोई भी जीव अधःकरण मांडेगा तो उसके अधःकरण के समस्त परिणामों में से पहले 162 परिणामों में से कोई एक परिणाम होगा अर्थात् तीन काल में चाहे जब चाहे जो जब कभी अधःकरण मांडेगा, तो उसके पहले समय में नम्बर 1 से लगाकर नं. 162 तक के परिणामों में से उसकी योग्यता अनुसार कोई एक परिणाम होगा।

इस ही प्रकार किसी भी जीव के उसके अधःकरण मांडने के दूसरे समय में नं. 40 से लगाकर नं. 205 तक 166 परिणामों में से कोई एक परिणाम होगा। इस ही प्रकार आगे के समयों में भी मेरे हाथ में जो यह यंत्र है (देखो पृष्ठ-282) इसके अनुसार जान लेना चाहिये कि अधःकरण के अपुनरुक्त परिणाम केवल 912 हैं और समस्त समयों में संभव पुनरुक्त और अनुरुक्त परिणामों का जोड़ 3072 है।

इस अधःकरण के परिणाम चय (समानवृद्धि) वर्द्धित है अर्थात् पहले समय के परिणाम से द्वितीय समय के परिणाम जितने अधिक हैं उतने ही उतने द्वितीयादिक समयों के परिणामों से तृतीयादिक समयों के परिणाम अधिक हैं।

इस दृष्टांत में चय का प्रमाण 4 है, स्थान का प्रमाण 16 और सर्व धन का प्रमाण 3072 है। प्रथम स्थान में वृद्धि का अभाव है, इसलिये अन्तिम स्थान में एक घाटि पद (स्थान) प्रमाण चयवर्धित हैं। एक घाटि पद के आधे को चय और पद से गुणा करने से 15×4×16/2=480 चय धन का प्रमाण होता है।

भावार्थ-प्रथम समय के समान समस्त समयों में परिणामों को भिन्न समझ कर वर्धित प्रमाण के जोड़ को चयधन वा उत्तरधन कहते हैं। सर्व धन में से चयधन को घटाकर शेष में पद का भाग देने से प्रथम समय सम्बन्धी परिणाम पुंज का प्रमाण 3072-480/16=162 होता है। इसमें क्रम से एक-एक चय जोड़ने से द्वितीयादिक समयों के परिणाम पुंज का प्रमाण होता है। एक घाटिपद प्रमाण चय मिलने से अन्त समय सम्बन्धी परिणाम पुंज का प्रमाण 162+150×4=222 होता है।

एक समय में अनेक परिणामों की संभावना है, इसलिये एक समय में अनेक जीव अनेक परिणामों को ग्रहण कर सकते हैं, अतएव एक समय में नाना जीवों की अपेक्षा से परिणामों में विसदृशता है। एक समय में अनेक जीव एक ही परिणाम को ग्रहण कर सकते हैं, इसलिये एक समय में नाना जीवों की अपेक्षा से परिणामों में सदृशता है।

भिन्न समयों में अनेक जीव अनेक परिणामों को ग्रहण कर सकते हैं, इसलिये भिन्न समयों में नाना जीवों की अपेक्षा से परिणामों में विसदृशता है। जो परिणाम किसी एक जीव के प्रथम समय में हो सकता है, वही किसी जीव के दूसरे समय में, किसी तीसरे जीव के तीसरे समय में और किसी चौथे जीव के चौथे समय में हो सकता है। जैसे कि 162 नम्बर के परिणाम की प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ समय में सम्भावना है।

इतना कहकर मुनिराज ने एक पत्र पर लिखा हुआ यंत्र सबको दिखलाया-देखो पृष्ठ-282।

इन सब बातों को ध्यान में रखकर पूर्वाचार्यों ने अधःप्रवृत्तकरण का लक्षण इस प्रकार कहा है-

जम्हा उवरिमभावा हेट्ठिम भावेहि सरिसगा होंति।
तम्हा पढमं करणं अधापवत्तेति णिद्दिट्ठं।।

अर्थात्-क्योंकि इस करण में उपरितन और अधस्तन (ऊपर और नीचे के) समय सम्बन्धी परिणामों की सदृशता होती है, इसलिये इस करण का नाम अधःप्रवृत्तकरण कहा है। इस अधःकरण में रचना का अभिप्राय ऐसा है कि ऊपर और नीचे के समय सम्बन्धी परिणामों में जितने समय तक सदृशता की संभावना है, उतने ही उतने खंड समस्त समय सम्बन्धी परिणामों के किये गये हैं और उनमें से प्रत्येक खण्ड में परिणामों की संख्या इतनी इतनी है कि जितने जितने परिणाम क्रम से अनन्तर अनन्तर समयों में सदृश हैं।

भावार्थ-जैसे प्रथम समय सम्बन्धी परिणामपुंज 162 के 39, 40, 41 और 42 ये चार खण्ड इस क्रम में किये गये हैं कि नम्बर 139 तक 39 ऐसे परिणाम हैं जो ऊपर किसी भी समय में नहीं पाए जाते, इतने ही परिणामपुंज का नाम प्रथम खण्ड है। दूसरे खण्ड में नम्बर 40-79 तक 40 परिणाम ऐसे हैं, जो प्रथम और द्वितीय दोनों समयों में पाये जाते हैं। तीसरे खण्ड में नम्बर 80-120 तक 41 परिणाम ऐसे-

अधःकरण यंत्र

परिणामों की संख्या और नं. अनुकृष्टि रचना
222 54 55 56 57
नं. 691-912 691-744 745-799 800-855 856-912
218 53 54 55 56
नं. 638-855 638-690 691-744 745-799 800-885
214 52 53 54 55
586-799 586-637 638-690 691-744 745-799
210 51 52 53 54
535-744 535-585 586-637 638-690 691-744
206 50 51 52 53
485-690 485-534 535-585 585-637 638-690
202 49 50 51 52
436-630 436-484 485-534 535-585 546-637
198 48 49 50 51
388-585 388-435 436-484 485-534 535-585
194 47 48 49 50
341-534 341-387 388-435 436-484 485-534
190 46 47 48 49
295-484 295-340 341-387 388-435 436-484
186 45 46 47 48
250-435 250-294 295-340 341-387 388-435
182 44 45 46 47
206-387 206-249 250-294 295-340 341-387
178 43 44 45 46
163-340 163-205 206-249 250-294 295-340
174 42 43 44 45
121-294 121-162 163-205 206-249 350-294
170 41 42 43 44
80-249 80-120 121-162 163-205 206-249
166 40 41 42 43
नं. 40-205 40-79 80-120 121-162 163-205
162 39 40 41 42
नं. 1-162 1-38 40-79 80-120 121-162

हैं जो प्रथम, द्वितीय और तृतीय इन तीन समयों में पाये जाते हैं और
चतुर्थ खंड में नम्बर 121-162 तक 42 परिणाम ऐसे हैं, जो प्रथम,
द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ इन चारों समयों में पाये जाते हैं।
इसीप्रकार अन्य समयों में भी जानना। अधःकरण के ये समस्त
परिणाम ऊपर पूर्व पूर्व परिणाम से उत्तर उत्तर परिणाम अनंत
अनन्त गुणी विशुद्धता लिये हुए हैं।
जिसप्रकार अधःकरण में ऊपर और नीचे के समय सम्बन्धी
परिणामों में सदृशता पाई जाती है, उसीप्रकार अपूर्वकरण के
परिणामों में सदृशता नहीं पाई जाती, किन्तु प्रति समय अपूर्व
अपूर्व ही परिणाम होते हैं, इसीलिये इस करण का नाम अपूर्वकरण
है अर्थात् ऐसे परिणाम पहले संसार अवस्था में कदापि नहीं हुए थे।
अंकसंदृष्टि से अपूर्व करण की रचना इसप्रकार है -
नम्बर समय परिणामों की संख्या परिणामों के नम्बर
8 568 3529-4096
7 552 2977-3528
6 536 2441-2976
5 520 1921-2440
4 504 1417-1920
3 488 929-1416
2 472 457-928
1 456 1-456
सर्वथा जोड़ - 4096 होता है।

इस यंत्र में सर्वधन 4096 चय का प्रमाण 16 स्थान का प्रमाण 8 है। चय धन का प्रमाण 7×16×8/2=448। प्रथम समय सम्बन्धी परिणाम पुंज का 4096-448/8=456 है। एक-एक चय जोड़ने से द्वितीयादिक समय सम्बन्धी परिणामपुंज का प्रमाण होता है। एक घटि पद प्रमाण चय जोड़ने से अन्त समय सम्बन्धी परिणाम पुंज का प्रमाण 456+7×16=568 होता है। इस यंत्र से सर्वथा स्पष्ट है कि एक समय में अनेक परिणामों की सम्भावना होने से अनेक जीव अनेक तथा एक परिणाम को ग्रहण कर सकते हैं। इसलिये एक समय में नाना जीवों की अपेक्षा से सदृशता तथा विसदृशता दोनों हो सकती है, किन्तु जो परिणाम निम्न समय में सम्भव है, वे परिणाम ऊपर के समय में कदापि सम्भव नहीं है इसलिये निम्न समयों में नाना जीवों की अपेक्षा विसदृशता ही है, सदृशता नहीं है।

जिसप्रकार नाना जीवों के एक समय में संस्थानादिक की अपेक्षा से भेद हैं, उसीप्रकार एक समय में नाना जीवों के परिणामों में जहाँ भेद नहीं हो, उसे अनिवृत्तकरण कहते हैं। उसकी अंकसद्दृष्टि से रचना इस प्रकार है-

नम्बर। समय परिणाम संख्या परिणाम नम्बर

4 1 4

3 1 3

2 1 2

1 1 1 भावार्थ-इसके अनिवृत्तकरण के काल के 4 समय हैं और चार ही इसके समस्त परिणामों का प्रमाण है, इसलिये एक समय में एक ही परिणाम है। अतएव एक समय में अनेक जीवों के परिणाम सदृश ही होते हैं, विसदृश नहीं होते तथा भिन्न समयों में विसदृश होते हैं, सदृश नहीं होते। जिसप्रकार यह स्वरूप दृष्टान्त द्वारा कहा है, उसीप्रकार यथार्थ में लगा लेना चाहिए। दृष्टान्त को ही यथार्थ न समझ लेना चाहिये। इसप्रकार नववें गुणस्थान का स्वरूप कहकर अब आगे दसवें गुणस्थान का स्वरूप कहते हैं।
अनेक प्रकार अनुभागशक्ति को धारण करने वाली कर्मवर्गणाओं के समूह को स्पर्द्धक कहते हैं। नववें गुणस्थान से पहले संसार अवस्था में जो स्पर्द्धक पाये जाते हैं, उनको पूर्व स्पर्द्धक कहते हैं। अनिवृत्तकरण के परिणामों से जिनका अनुभाग क्षीण हो गया है, उनको अपूर्व स्पर्द्धक कहते हैं।
इसीप्रकार अनिवृत्तकरण के परिणामों से जिनका अनुभाग अपूर्व स्पर्द्धक से भी क्षीणतर हो गया है, उसको वादरकृष्टि कहते हैं तथा जिनका अनुभाग वादरकृष्टि से भी क्षीणतर हो गया है, उसको सूक्ष्मकृष्टि कहते हैं। तीन करण के परिणामों से क्रम से लोभकषाय के बिना चारित्र मोहनीय की शेष बीस प्रकृतियों का उपशम अथवा क्षय होने पर सूक्ष्मकृष्टि को प्राप्त लोभ कषाय के उदय को अनुभव करते हुए जीव के सूक्ष्मसांपराय संज्ञक दसवां गुणस्थान होता है। ग्यारहवें और बारहवें गुणस्थान के स्वरूप पहले कह चुके हैं। अब आगे तेरहवें गुणस्थान का स्वरूप कहते हैं।

इस जीव के अनादिबद्ध अष्टकर्मों की 148 प्रकृति हैं। उनमें से तद्भवमोक्षगामी जीव के नरक, तिर्यंच और देव आयु इन तीन प्रकृतियों की सत्ता ही नहीं होती है। जिस काल में यह जीव क्षायिक सम्यक्त्व को प्राप्त होता है, तब पूर्वोक्त सात प्रकृतियों का क्षय कर लेता है। इसप्रकार तद्भवमोक्षगामी जीव के सातवें गुणस्थान के अन्त में दश प्रकृतियों की सत्ता नष्ट हो गई, तथा नववें गुणस्थान में 36 प्रकृतियों का नाश करके दसवें गुणस्थान लोभप्रकृति का नाश पूर्वक बारहवें गुणस्थान के अन्त में 16 प्रकृतियों का नाश करता है।

इसप्रकार चार घातिया कर्मों की 47 और अघातिया कर्मों की 16 कुल मिलाकर 63 प्रकृतियों के नाश से इस जीव से इस जीव के केवलज्ञान की उत्पत्ति होती है तथा योगों का इसके सद्भाव है। इस कारण यह जीव संयोग केवली संज्ञक तेरहवें गुणस्थानवर्ती कहलाता है।

इस तेरहवें गुणस्थानवर्ती जीव को सकल परमात्मा तथा अर्हन्त कहते हैं। इनके अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख और अनन्तवीर्य रूप अनन्तचतुष्टय प्रगट होते हैं। ये अपनी दिव्यध्वनि द्वारा भव्य जीवों को धर्मोपदेश देकर संसार में मोक्षमार्ग की प्रवृत्ति करते हैं।

यहाँ इस जीव के मोक्ष के कारणभूत सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान की तो पूर्णता हो गई है, परन्तु कषायों का सर्वथा नाश होने पर भी योगों का सद्भाव होने से योग और कषाय के अभावस्वरूप चारित्र की पूर्णता नहीं हुई है। इसीकारण अभी मोक्ष भी नहीं हुआ है। मूल शरीर को बिना छोड़े आत्म प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलने का नाम समुद्घात है।
उस समुद्घात के सात भेद हैं। 1-वेदनासमुद्घात 2-कषायसमुद्घात, 3-आहारकसमुद्घात, 4-वैक्रियिकसमुद्घात, 5-मारणांतिकसमुद्घात, 6-तैजससमुद्घात और 7-केवलिसमुद्घात । वेदना के निमित्त से आत्म प्रदेशों के बाहर निकलने का नाम वेदना समुद्घात है। कषाय के निमित्त से आत्म प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलने का नाम कषाय समुद्घात है।
छठे गुणस्थानवर्ती मुनि के शंका उत्पन्न होने पर जो आहारक शरीर का पुतला मस्तक में से निकलकर केवली के निकट शंका दूर करने को जाता है, उसके साथ आत्म प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलने का नाम आहारक समुद्घात है। देवादिक अनेक शरीर धारणादिक रूप जो विक्रिया करते हैं, उसके निमित्त से आत्म प्रदेशों का शरीर से निकलने का नाम वैक्रियिक समुद्घात है। मरण से पहले उत्पत्तिस्थान को स्पर्श करने के लिये आत्म प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलने का नाम मारणांतिक समुद्घात है। शुभाशुभ तैजसशरीर के साथ आत्म प्रदेशों के बाहर निकलने का नाम तैजससमुद्घात है।

तेरहवें गुणस्थानवर्ती जीव के आयुकर्म की स्थिति से शेष कर्मों की स्थिति जब हीनाधिक होती है तब उन कर्मों की स्थिति समान करने के लिये केवलिसमुद्घात करता है। इस केवलिसमुद्घात के चार भेद हैं - दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूर्ण। प्रथम समय में आत्मा के प्रदेश चौदह राजू ऊँचे तथा शरीर की चौड़ाई के प्रमाण व्यास वाले गोल दण्डाकार हो जाते हैं। इसको दण्डकेवलि समुद्घात कहते हैं।

दूसरे समय में जब आत्मा के प्रदेश पूर्व पश्चिम अथवा उत्तर और दक्षिण दिशा में लोकांत को स्पर्श करें और चौड़ाई में शरीर की चौड़ाई के प्रमाण हों, ऐसी अवस्था को कपाटसमुद्घात कहते हैं। वातवलय के बिना समस्त लोक में जब तीसरे समय आत्मप्रदेश व्याप्त हो जाते हैं, ऐसी अवस्था को प्रतरसमुद्घात कहते हैं। चौथे समय में जब आत्मा के प्रदेश वातवलय सहित समस्त लोक में व्याप्त हो जाते हैं, ऐसी अवस्था को लोकपूर्णसमुद्घात कहते हैं। इसके पश्चात् पुनः पाँचवें समय में आत्मा के प्रदेश प्रतररूप होते हैं। छठे समय में कपाटरूप, सातवें समय में दंडरूप और आठवें समय में पुनः शरीराकार हो जाते हैं।

इसप्रकार केवली समुद्घात करने के पश्चात् अपने गुणस्थान के अन्त में योगों का निरोध करके अयोगकेवली संज्ञक चौदहवें गुणस्थान को प्राप्त होता है। इस गुणस्थान का काल ‘अ इ ऊ ऋ लृ’ इन पाँच ह्रस्व अक्षरों के उच्चारण काल के समान है।

इस गुणस्थान के उपान्त समय में 72 और अन्त समय में 13 इसप्रकार 85 प्रकृतियों का नाश करके ऊर्ध्वगमन स्वभाव से मोक्षधाम को प्रस्थान करता है।

इस व्याख्यान के समाप्त होने पर उस दिन की सभा विसर्जन की गई।

सत्रहवां पर्व

जब तक जयदेव कंचनपुर में रहा, तब तक हीरालाल अपनी सम्पत्ति आदि के विषय में चूँ तक न कर सका। यद्यपि संसार में यही प्रसिद्ध था कि रतनचन्द का उत्तराधिकारी हीरालाल है, परन्तु अपने उस दिन के दुराचार से वह इतना डरपोक हो गया था कि अपनी दुकान में भी जाने का साहस नहीं कर सकता था। उस दुर्दिन के पश्चात् जिस दिन जयदेव ने रामकुंवरि के साथ उसे रिहाई दी थी, चार-छह दिन तो वह कुछ श्मशान वैराग्य के समान विरक्त तथा उदास रहा था, परन्तु पीछे पापिनी रामकुंवरि की छेड़छाड़ से तथा सम्पत्ति आदि के प्राप्त करने की चिन्ताओं से वह अपने दुष्कृत्यों को भूल गया। उसके हृदय पर थोड़ी बहुत पश्चात्ताप की रेखा थी, ज्यों-ज्यों दिन बीते, वह भी विलीन हो गई।

उसीसमय एक दो दर्शनीय मित्र भी जैसे कि पापियों को प्रायःमिल जाया करते हैं, हीरालाल को आ मिले। उन्होंने चार ही छह दिन में अपनी वाक्पटुता से आशा के बड़े-बड़े दृश्य दिखलाकर हीरालाल को चेला बना लिया और उसके अन्तरङ्ग की सब बातें पूछ लीं। उनकी दर्शनीय मित्रता के प्रबल प्रवाह में हीरालाल ने अपने अपयश के भय को निशङ्क बता दिया। उसे इस बात का भान भी न रहा कि यदि ये लोग मुझसे विरुद्ध हो जावेंगे, तो मैं मुँह दिखाने के योग्य भी न रहूँगा।
जयदेव की दृष्टि बहुत विस्तृत थी। वह बहुत दूर तक देखता था और तदनुसार बहुत दूर तक विचारता भी था। हीरालाल को एक दो बार उक्त मित्रों के साथ बैठा देखकर वह समझ गया कि इन लोगों के द्वारा कोई अघटित घटना अवश्य होगी और इसीलिये गुप्तरूप से वह उनकी गति पर ध्यान रखने लगा। एक रात्रि को रामकुंवरि हीरालाल और उसके मित्रों की गुप्तमंत्रणा हुई कि जयदेव को यमालय पहुँचाये बिना हम लोगों का कार्य सिद्ध न होगा, इसलिये उसको शीघ्र खपा डालने का कोई प्रयत्न करना चाहिये। दूसरे दिन सबेरे ही जयदेव के गुप्तचर ने उसे इस मंत्रणा का समाचार सुनाया और उसे सुनकर जयदेव ने जो कुछ किया, सो पहले कहा जा चुका है।
जयदेव के चले जाने पर हीरालाल को इस बात की प्रसन्नता हुई कि अब मुझे अपनी सम्पत्ति का अधिकार मिल जावेगा। यद्यपि वह यह जानता था कि जयदेव मुझे दुकान के प्रबन्ध करने के अयोग्य ठहरा गया है, इसलिये तत्काल ही मुझे अपना अधिकार नहीं मिलेगा, परन्तु उसे यह आशा अवश्य थी कि आज नहीं, चार छह महीने पीछे आखिर में उसे प्राप्त कर ही लूँगा। सर्वथा ही अधिकारच्युत कर दिया जाऊँगा, इसका उसे स्वप्न में भी ध्यान नहीं था क्योंकि उसे यह विश्वास था कि जयदेव के सिवाय मेरा दुष्कृत्य अन्य कोई नहीं जानता है और वह अपनी सज्जनता के कारण मेरे दोषों को अपने साथ ही ले गया होगा।

वसीयतनामा भी उसी के नाम का था, इसलिये उसका भी अब कुछ भय नहीं रहा क्योंकि अब वह वापिस नहीं आवेगा। बड़ा ही निस्पृह तथा निर्लोभी पुरुष था। द्रव्य प्राप्ति की लालसा उसमें कभी थी ही नहीं, इसलिये या तो वसीयतनामा को वह फाड़ चीर के फैंक गया होगा अथवा अपने साथ ही ले गया होगा।

इसप्रकार के मनोरथ के घोड़े दौड़ाते हुए हीरालाल ने उस दिन जबकि सारा नगर जयदेव के शोक में व्याकुल हो रहा था, बड़ी खुशी मनाई और अपनी मित्रमंडली का उस दिन खूब सत्कार किया।

इस खुशी की चहल-पहल कई दिन तक रही। मित्रों की मिजवानी में, नाचरंग में और यहाँ वहाँ के खुशामदखोरों को पारितोषिक देने में हीरालाल ने सैकड़ों रुपये फूंक दिये। यद्यपि उसके पास अधिक पूँजी नहीं थी। जो कुछ जयदेव ने निर्वाह के लिये दिया था, वही था, परन्तु सारी सम्पत्ति का अधिकार मिलने की आशा में इसका उसे कुछ ख्याल ही नहीं रहा। रामकुंवरि भी इसी आनन्द में मग्न थी। स्त्रियों को जेवर प्राणों से भी प्यारा होता है, परन्तु उसने उस समय हीरालाल से कह दिया कि जरूरत हो तो इसे भी काम में ले लेना।

हीरालाल के पास जो कुछ द्रव्य था, वह खर्च हो चुका। नवीन आमदनी का कुछ ठिकाना नहीं था, परन्तु मित्रमंडली बढ़ती जाती थी और साथ-साथ खर्च के नवीन-नवीन द्वार भी खुलते जाते थे। यद्यपि भावी अधिकार की प्राप्ति की प्रसन्नता में हीरालाल को वह खर्च एक सामान्य बात मालूम पड़ती थी, परन्तु उस सरीखी आशा अन्य लोगों के नहीं थी, इसलिये प्रतिष्ठित महाजनों की तो बात ही क्या, साधारण दुकानदार भी उसके साथ कागजी लेन-देन करने को हिचकते थे। सब ही ‘आज नगद कल उधार’ का व्यवहार रखते थे।
सारांश यह कि बिना नकदी हीरालाल को बाजार में एक पैसे की भी वस्तु नहीं मिलती थी। एक दिन किसी राजकीय कर्मचारी की सम्भावना करने के लिये हीरालाल को रुपयों की आवश्यकता हुई, परन्तु घर में रुपये नहीं थे सिवाय जेवर के कोई ऐसी वस्तु भी नहीं थी, जिसे बेचकर काम चलाया जाय। लाचार वह जेवर बेचने के लिये ही तैयार हुआ यद्यपि रामकुंवरि ने अपने अलंकार देने के लिये कह दिया था, परन्तु हीरालाल का साहस नहीं हुआ कि उससे बिक्री के लिये जेवर मांगे क्योंकि निरन्तर ही उसे यह भय लगा रहता था कि कहीं रामकुंवरि अप्रसन्न न हो जावे।
केवल प्रेमपिपासा की पूर्ति के लिये ही वह रामकुंवरि को प्रसन्न रखने के प्रयत्न में नहीं रहता था, किन्तु दुकान का अधिकार पाने में भी रामकुंवरि को एक बड़ा भारी साधन समझता था क्योंकि रामकुंवरि की स्वीकारता के बिना उसके पति की जायदाद का सम्पूर्ण अधिकारी हीरालाल नहीं हो सकता था।

उन दिनों हीरालाल की परिणीता स्त्री सुभद्रा कंचनपुर में ही थी। जयदेव ने उसे इसलिये बुलवाया था कि शायद उसके संसर्ग में हीरालाल सुधर जावेगा। यद्यपि सुभद्रा ऐसी बुद्धिमती और रूपवती स्त्री थी कि हीरालाल को सदाचारी बना लेना उसके लिये कोई कठिन कार्य नहीं था, परन्तु रामकुंवरि की कृपा से और भी अनेक कुत्सित पुरुषों की संगति के प्रताप से उसे अपने पतिसंसर्ग का बहुत कम सौभाग्य प्राप्त होता था।

वह बहुत प्रयत्न करती थी कि कभी पति से एकान्त में वार्तालाप करने का अवसर प्राप्त हो, परन्तु रामकुंवरि के षड्यंत्र के कारण वह बहुधा उससे वंचित रहती थी। कभी-कभी तो उसे दर्शनों का भी लाभ नहीं होता था।

जब तक कंचनपुर में जयदेव रहा, तब तक हीरालाल सुभद्रा से मिलता था और रामकुंवरि भी उसके इस कार्य में बाधा नहीं डाल सकती थी, परन्तु जब से उसने कंचनपुर छोड़ा, तब से तो सुभद्रा का भाग्य सर्वथा ही फूट गया। रात-दिन एकान्त में बैठी हुई वह अपने भाग्य पर रोती थी और अपने सुकोमल शरीर को इस विषयवेदना की अग्नि में झुलसाती रहती थी।

सावन का महीना है। रात्रि के बारह बज चुके हैं। पानी रिमझिम-रिमझिम बरस रहा है। अन्धकार का अटल अधिकार हो रहा है। कभी-कभी चंचला चमककर संसार की क्षणभंगुरता का ज्ञान करा रही है। सड़कों पर आवागमन सर्वथा बन्द है। सारा नगर घोर निद्रा में मग्न हो रहा है। कहीं-कहीं संयोगी नायक-नायिकाओं के प्रणय कलह की विनय अनुनयों की घुसफुस सुनाई देती है, परन्तु इतनी अस्पष्ट कि मकानों की दीवालों से कान लगाये बिना उनका कुछ अर्थ भान नहीं होता। वियोगी नायक करवटें बदल रहे हैं और नायिकायें मेघों को, मयूरों को, झिल्लियों को जिनके शब्द सुनती हैं, उन्हीं को कोस रही हैं। गलियाँ कर्दममय और मुख्य मार्ग जलमय हो रहे हैं।
ऐसे समय में घर से निकलना सबका काम नहीं है, तो भी ‘मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखं’ की उक्ति के अनुसार एक अज्ञातपुरुष एक बड़े भारी कम्बल से अपने शरीर को छुपाये हुए रतनचन्द जोहरी की हवेली के पास पहुँचा, और पश्चिम की ओर गली में जाकर एक खिड़की के नीचे भीत के सहारे खड़ा हो गया। खिड़की में से एक टिमटिमाते हुए दीप का प्रकाश बाहर आता था। खिड़की जमीन से इतनी ऊँची थी कि मनुष्य खड़ा होकर उसमें से भीतर का दृश्य कठिनाई से देख सकता था। उसमें लोहे के सींकचे लगे हुए थे। खिड़की के पास ही एक दरवाजा था, जिसके किवाड़ बन्द थे।
भीतर एक युवा पलंग पर बैठा हुआ है और एक अबला उसके पैरों से लिपट रही है। युवा अपने हाथों से निवारण करना चाहता है, परन्तु अबला पैर नहीं छोड़ती है। उसके नेत्रों से अविरल आँसुओं की धारा बह रही है, जिससे युवा के पैरों का अभिषेक हो रहा है। अबला कह रही है कि 'प्राणेश्वर ! दासी और कुछ नहीं चाहती है। रात-दिन 24 घन्टों में केवल एक बार दर्शन चाहती है, परन्तु हाय ! आप उसमें भी कंजूसी करते हैं। अब कुछ दिन से उसकी भी प्राप्ति दुर्लभ हो गई है।

मैं मानती हूँ कि आपको कुमार्ग में जाते हुए रोककर बुरी संगति के दोष दिखाकर मैंने एक अपराध किया है, आपके हृदय को दुःख पहुँचाया है, परन्तु जीवनधन ! इतना वह अपराध बड़ा नहीं है, जिस पर मुझे यह दण्ड दिया जावे ? यद्यपि स्वामिकार्य में बाधा उपस्थित करना सेविका का कर्तव्य नहीं है, तथापि यदि वह कार्य देखकर दोषास्पद हो तो उसका निवारण करना अपराध भी नहीं गिना जा सकता। इसके सिवाय नाथ ! मैं आपकी अर्धाङ्गिनी हूँ। नीति के अनुसार आपके सम्पूर्ण सुख-दुःख तथा पाप और पुण्य की भागिनी हूँ।

इसलिये विचार कीजिये कि आपको उस मार्ग में ले जाते हुए देखकर आपकी तथा आपके कुल की कीर्ति पर कालिमा फिरते हुए देखकर और अपने सुख सौभाग्य को नष्ट होते देखकर मैं कैसे चुप रहूँ ? मैं बहुत चाहती हूँ कि आपसे इस विषय में कुछ भी नहीं कहूँ, क्योंकि इससे लाभ के स्थान में हानि होती है, आप अधिकाधिक अप्रसन्न होते जाते हैं, परन्तु क्या करूँ, यह मूर्ख हृदय नहीं मानता है और फिर भी कहने के लिये अधीर होता है। इसे बहुत समझाया कि ‘मूर्ख ! तुझे प्राणनाथ के गुण दोषों से क्या ? उनकी आलोचना करने वाला तू कौन ? वे दूसरी हजार स्त्रियों से प्रसन्न रहें और मुझ पर अप्रसन्न रहें, इससे तुझे क्या ? पूर्व जन्म में जिसने जैसे कर्म कमाये हैं, उसे उनके वैसे ही फल मिलते हैं, इसमें हर्ष विषाद क्यों ? तुझे तो उनका प्रतिबिंब स्थापित करके अहर्निश पूजन करना चाहिये, भक्ति करना चाहिये और उसके द्वारा उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। यही तेरा कर्तव्य है।’

परन्तु जड़हृदय नहीं समझता है और बार-बार मुझे आपसे प्रार्थना करने के लिये अधीर करता है। मेरे सच्चे उपास्य देव ! एक बार मेरी परीक्षा करके देखो कि आपके चरणों में मेरी कैसी अनन्य भक्ति है। मेरे हृदय को चीर कर देखो कि आपकी मनोमोहनी मूर्ति उसमें कैसे आदर भाव से चित्रित है और एक बार आज्ञा देकर देखो कि दासी आपके लिये किस प्रकार क्षण भर में अपने प्राणों का उत्सर्ग करती है।

नाथ ! इतने पर भी मैं अपने सौभाग्य सुख की अधिकारिणी नहीं हूँ, आपको प्रसन्न करने में समर्थ नहीं हूँ, तो मेरा दुर्दैव ! परन्तु जीवन सर्वस्व ! एक बार यह भी तो बतलाओ कि अन्यत्र आपको कितना सुख मिलता है ? कितनी शान्ति मिलती है ? और जिन्हें आपने सुख-शान्ति का उपकरण माना है, वे आपको कितने दिन उस शान्ति का दान करता रहेगा ? यदि इन प्रश्नों का आप यथार्थ उत्तर दे देवेंगे, तो मुझे मालूम हो जावेगा कि आगे आपका जीवन सुख शान्तिता के साथ व्यतीत होगा, तो मुझे प्रसन्नता होगी फिर मुझे कोई चिन्ता नहीं रहेगी। आनन्द से मैं अपनी जीवनलीला समाप्त कर दूँगी। मुझे जो कुछ चिन्ता है, वह आपके आगामी जीवन की है। मुझे सुख हुआ तो क्या ? और दुःख हुआ तो क्या ? उसकी कुछ गिनती नहीं है।

यथार्थ में आपका सुख-दुःख ही मेरा सुख-दुःख है, इसलिये आपको दुःख के मार्ग पर चलते हुए देखकर मैं अधीर हो जाती हूँ। आप यदि कल से उन्मार्ग छोड़कर सुमार्ग से लग जावें, तो फिर चाहे मुझे अपनी स्नेहपात्री बनावें चाहे नहीं, मुझे कोई दुःख नहीं रहेगा और साथ ही यदि आप दिन में एक बार दर्शन देना स्वीकार कर लेंगे तो संसार में मैं अपने बराबर किसी को सुखी नहीं समझूँगी।

इसके पश्चात् युवती ने आँसू पोंछते हुए कहा 'नाथ ! इतनी रात को आज अचानक दासी पर कृपा की यह सौभाग्य का विषय है, परन्तु न जाने क्यों इस समय आपका मुख कुछ चिन्ताग्रस्त तथा उद्विग्न दिख रहा है। यदि दासी से कहने में कुछ हानि न हो तो इसका कारण कहिये।

जब तक युवती उपर्युक्त बातें करती रही, तब तक युवा निस्तब्ध भाव से सुनता रहा। बाहर खड़े हुए अज्ञात पुरुष के हृदय पर उस अबला के वाक्यों का इतना असर हुआ कि आँसू भर आये और हृदय उमड़ आया। वह समझता था कि युवा के हृदय पर भी ऐसा ही असर होगा क्योंकि अबला की बातें पत्थर को भी पिघलाने वाली थीं, परन्तु यथार्थ में उस युवा के हृदय पर शतांश असर भी न हुआ।

वह बोला-आजकल दुकान का अधिकार पाने के प्रयत्न से रात-दिन शरीर को चैन नहीं मिलता है। इसी से शायद तुम्हें मेरा मुँह उदास दिखा होगा और कोई बात नहीं है। इस समय मुझे कुछ रुपयों की आवश्यकता हुई है, इसलिये तुम्हारे पास आया हूँ। यदि तुम अपना गहना दे दो तो काम निकल सकता है।

सुभद्रा-जीवनधन ! जब यह शरीर ही आपका है इन प्राणों पर भी आपका अधिकार है, तब फिर तुच्छ गहना तो किस गिनती में है ? लीजिए ले जाइये ! परन्तु जीवितेश्वर ! मैंने जो अनेक प्रार्थनायें कीं उनका आपने एक भी उत्तर न दिया, एक शब्द भी नहीं कहा, जिससे आत्मा को कुछ सन्तोष होता।

हाय ! अरण्य में पड़े हुए अशरण्य जीव के रोदन के समान मेरी सब प्रार्थनायें विफल हुईं। वायुमण्डल में टकराकर नष्ट हो गईं। अस्तु, मेरी उक्त बातें आपको उचित नहीं जंची तो जाने दीजिये।

‘दूध पिला पिलाकर पाले हुए काले सांप अमृत सेवन करेंगे ?’ भले ही आप अपने इन विचारों को ब्रह्मवाक्य समझिये। अब मैं आगे कभी उनकी चरचा नहीं करूँगी। आपकी जो इच्छा हो।

प्रसन्नता से यहाँ यह कह देना उचित होगा कि रतनचन्द की रहने की हवेली में नीचे के एक कमरे में जिसका अभी हम वर्णन कर चुके हैं, सुभद्रा रहती थी और हवेली के ऊपर पूर्व की ओर के कमरे में जिसका कि जीना पूर्व को ही था, रामकुंवरि रहती थी। लोगों के हृदय में किसी प्रकार की शंका उत्पन्न न हो इस विचार से जयदेव ने रामकुंवरि तथा हीरालाल को उक्त हवेली में से निकालना उचित नहीं समझा था। आज हीरालाल ऊपर रामकुंवरि के निकट से सुभद्रा के कमरे में आया था क्योंकि जयदेव के जाने के पश्चात् उसका और उसके मित्रों का अड्डा रात-दिन ऊपर के कमरे में ही रहता था।

यद्यपि सुभद्रा हीरालाल को समझाती थी और उसे बुरे मार्ग पर चलने से रोकती थी तथापि हीरालाल उससे अप्रसन्न नहीं रहता था। वह रात को उसी के कमरे में जाकर विश्राम करता था, परन्तु रामकुंवरि को जब यह बात मालूम हुई कि सुभद्रा अपने पति को अच्छी शिक्षा देती है, तब उसे अपनी माया के नष्ट हो जाने की चिन्ता हो गई, इसलिये उसने थोड़े ही दिन पीछे हीरालाल के कृत्रिम मित्रों के द्वारा एक षड्यन्त्र रचकर सुभद्रा की ओर से उसका चित्त बदल दिया और तब से हीरालाल ने सुभद्रा के पास जाना आना सर्वथा बन्द कर दिया, परन्तु बेचारी सुभद्रा षड्यन्त्र की बात से सर्वथा अज्ञात रही।

अठारहवां पर्व

आज कंचनपुर में बड़ा कोलाहल मच रहा है। जहाँ-तहाँ से लड़कों के झुंड हाथों में कंकर पत्थर लिये दौड़े जा रहे हैं। प्रौढ़ नर-नारी भी कौतुक देखने की लालसा से जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाये जा रहे हैं। दिन के 11 बजे हैं, काम समय का है, थोड़ा-थोड़ा पानी बरस रहा है तो भी लोग इस विचित्र सम्मेलन में शामिल होने के लिये आकुल-व्याकुल हो रहे हैं।

बात की बात में राजद्वार के सम्मुख हजारों आदमियों की भीड़ इकट्ठी हो गई। देखा, दो गधे एक विलक्षण प्रकार से सजाये गये हैं और उनमें से एक पर एक पुरुष और दूसरे पर एक स्त्री की सवारी कराई गई है। दोनों के सिर तत्काल ही सफाचट किये गये हैं और उन पर अतिशय काला तैल मिश्रित रंग पोतकर कलङ्गी के स्थाने में एक-एक बुहारी बांध दी गई है। वस्त्र भी दोनों को काले पहनाये गये हैं। लोहे के बड़े-बड़े बेढंगे आभूषण पहनाकर तो दोनों को साक्षात् राक्षस ही बना दिया है। बड़ा ही भयावना दृश्य था। लोग देखने के लिये टूटे पड़ते थे।

थोड़ी देर में यह सवारी राजमार्ग पर से अग्रसर हुई। चारों ओर से धिक्कार ! धिक्कार ! छिः ! छिः ! के शब्दों की बौछार होने लगी। पीछे-पीछे एक विचित्र ही प्रकार के शब्द करने वाले बाजे बजने लगे। आगे-आगे काली ध्वजा पताकायें चलने लगीं, जिन पर मोटे-मोटे अक्षरों में इसप्रकार के अनेक वाक्य लिखे हुए थे-किये हुए कर्मों का फल, जो ‘जैसा करै सो तैसा फल चाखा’, इस
लोक में पाप का फल इस प्रकार से मिलता है ‘आगे भी भयंकर
फल भोगने पड़ेंगे।’ उदंड लड़के चारों ओर से कंकर फेंकने लगे
और आनन्द में उछल-उछल कर नानाप्रकार की तुकबंदियाँ जोड़-
जोड़ कर गाने लगे। पाठकों के विनोद के लिये उनकी एक
तुकबंदी का नमूना हम यहाँ पर देते हैं :-

रामकुंवरि हीरा का जल्सा, देखो लड़कों! दौड़।
किये कर्म का मजा चखाओ, यारो! करो न देर।।
मारो कंकर मारो पत्थर, मारो कंडे ईंट।
धूल उड़ाओ देओ गाली गाओ बांके गीत।।

थोड़ी दूर चलकर प्रौढ़ लोग हर्ष, विषाद, आश्चर्य, ग्लानि,
पश्चात्ताप आदि नानाप्रकार के भावों में तन्मय होते हुए और
परस्पर रामकुंवरि हीरालाल की चर्चा करते हुए अपने-अपने घरों
को लौटने लगे। कोई कहता था, अफसोस हीरालाल ने रतनचन्द
जौहरी के नाम को डुबा दिया। कोई कहता था, मालूम नहीं हुआ,
महाराज ने एकाएक किस अपराध पर इन दोनों की ऐसी दुर्दशा
की। कहीं ऐसा न हो कि ये विचारे निर्दोष हों और लोगों के कहने
से इन्हें यह दण्ड दिया हो। कोई कहता था, सन्देह तो मुझे भी बहुत
दिन से था, परन्तु विश्वास नहीं था।

अब निश्चय हो गया कि अवश्य ही ये दोनों परस्पर पाप पंक में लिप्त थे। कोई कहता था, मैं भी बहुत दिनों से हीरालाल को बुरी संगति में देखता था। यह उसी का फल है। सारांश यह कि सब ही लोग इस समय अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार फैसला देकर अपने-अपने घर जा रहे थे। केवल बालकगण उस जुलूस की शोभा बढ़ाने वाले रह गये। नगर के प्रत्येक मार्ग से चारों ओर हीरालाल रामकुंवरि की सवारी निकाली गई और अन्त में उन दोनों को उसी ठाठ से राज्य सेवक कंचनपुर राज्य की सीमा के बाहर करने के लिये ले गये। यह समाचार ज्यों ही सुभद्रा के पास पहुँचे कि शोक के उद्वेग से वह अचेत हो गई और थोड़ी देर में जब सचेत हुई, तब अपने भाग्य पर बड़ी करुणध्वनि से रोने लगी। हाय ! संसार में अब मैं जीकर क्या करूँगी ? जब नाथ ही चले गये, तब मैं किसके लिये जीऊँ ? हाय हाय ! मैंने कितना समझाया, पर प्राणनाथ ने कुछ भी ध्यान नहीं दिया और अन्त में मुझ पर यह चिरवियोग का पहाड़ लाकर पटक दिया।

नाथ ! तुम्हारे सम्मुख रहते हुए मैं सब कुछ दुख सह सकती थी, परन्तु अब तुम्हारे वियोग में मैं तीन लोक के सम्पूर्ण सुख भी नहीं सह सकती। हे कंचनपुर नरेश ! तुमने यह क्या अनर्थ किया ! हाय मुझ अबला पर तुम्हें कुछ भी दया न आई। ऐसा ही करना था तो मुझे भी उनके साथ कर दिया होता। इससे मैं बहुत प्रसन्न होती।

हाय! अब मैं अन्त समय में पति का मुख निरीक्षण किये बिना भी कैसे मरूँ! और उनके वियोग में जीऊँ भी कैसे? हाय! मैं कहीं की भी न हुई। इस अभागे गर्भ का अब मैं क्या करूँ! इसका रक्षण कैसे होगा? हा हन्त! यदि अब मैं अपने प्राण देती हूँ, तो अपने और तेरे घात करने के पातक की भागिनी होती हूँ और जो रक्षा करती हूँ तो प्राणनाथ की असह्य वियोगता से उत्तप्त होना पड़ेगा। तू न होता तो आज प्रसन्नता के साथ मैं उनकी अनुगामिनी हो जाती अथवा इस पापमयी संसार से छुटकारा पाने के लिये तथा मनुष्य जन्म को सफल करने के लिये जैनेश्वरी दीक्षा ले लेती, परन्तु दोनों में से एक भी नहीं हुआ।
सुभद्रा इसप्रकार रो-रोकर अपने दुःखों को किसी तरह हलका कर रही थी कि इतने में रतनचन्द जी की दुकान का प्रधान मुनीम विनीतचन्द आया और बोला-मैं श्रीमान कंचनपुर नरेश की आज्ञानुसार आपके पास आया हूँ क्योंकि आप सेठ रतनचन्दजी की दुकान की स्वामिनी बनाई गई हैं। आज से उक्त दुकान का कामकाज आपकी इच्छानुसार चलाया जाएगा। मैं दुकान का प्रधान मुनीम हूँ, इसलिये सूचना देने के लिये आया हूँ। जो कुछ उचित समझें, मुझे आज्ञा दें। महाराज ने यह भी संदेशा भेजा है कि गत बातों को भूलकर आप सन्तोषपूर्वक अपने चरित्र की रक्षा करते हुए रहें।

महाराज की ओर से इस बात का सविशेष ध्यान रहेगा कि आपको किसी की ओर से किसी प्रकार का कष्ट न पहुँचे। आप निशंक होकर अपनी हवेली में निवास करें। इसके सिवाय मैं एक विश्वासपात्र नौकर और दो तीन सदाचारिणी दासियों की तजबीज करके आया हूँ। वे आज संध्या तक आपकी सेवा में उपस्थित हो जावेंगी। उनके आ जाने से आपको शारीरिक कष्ट न उठाना पड़ेगा। यह सच है कि आप पर एक असह्य कष्ट आकर पड़ा है और उसके आगे यह सब वैभव तुच्छ है, परन्तु अपनी शारीरिक अवस्था देखकर इस समय सन्तोष किये बिना और दुःख को भुलाये बिना गत्यन्तर ही नहीं है। इससे अधिक और मैं क्या कहूँ? आप स्वयं बुद्धिमती हैं, सब कुछ सोच समझ सकती हैं। इसके उत्तर में सुभद्रा ने कुछ भी नहीं कहा और मुनीम ने भी उत्तर की आवश्यकता न समझकर अपनी राह ली।
यहाँ पाठक बड़ी उलझन में पड़े होंगे कि एकाएक हीरालाल तथा रामकुंवरि की ऐसी दुर्दशा क्यों की गई और सुभद्रा दुकान की अधिकारिणी क्यों बनाई गई, इसलिये हम उनके समाधान के लिये लिखना उचित समझते हैं कि गत रात्रि को सुभद्रा के कमरे के पास जो अज्ञातपुरुष कम्बल ओढ़े हुए खड़ा था, वह और कोई नहीं स्वयं कंचनपुर नरेश थे।
प्रजा के सुख-दुःख की सुधि लेने के लिये निरन्तर दूसरे, चौथे दिन गुप्त रूप से नगर में घूमा करते थे और इसलिये उनका सम्पूर्ण राज्यकार्य केवल तिल का पहाड़ बनाने वाले अथवा सुमेरु को राई बनाने वाले राज्य कर्मचारियों के भरोसे पर नहीं चलता था। जिस विषय में उन्हें सन्देह होता था, उसका वे स्वयं अपनी दृष्टि से निवारण करते थे। छोटे से छोटे और बड़े से बड़े आदमी से मिलने में उन्हें संकोच नहीं होता था। सबके साथ वे एक सी दया और शिष्टता का बर्ताव करते थे।
खेद है कि वर्तमान में भारतवासियों को ऐसे राजाओं की प्राप्ति स्वप्न हो गई। यहाँ तो अब राज्य कर्मचारी ही सब कुछ हैं। जैसा चाहे, वैसा सफेद स्याह करने का उन्हें अधिकार है, जिसका परिणाम यह हुआ है कि प्रजा अत्याचार की चक्की में पिसी जाती है और राजेश्वर के कानों-तक उसकी भनक भी नहीं पहुँचती।
कंचनपुर नरेश उसी भेष में हीरालाल के साथ-साथ चले गये। थोड़ी दूर चलकर हीरालाल एक मकान में प्रवेश करके अपने एक मित्र के साथ बाहर निकला। इस समय उसके हाथ में गहने की पेटी नहीं, किन्तु रुपयों की एक थैली थी। पश्चात् सौ डेढ़सौ कदम चलकर वह एक दूसरे मकान में गया। उसके तीसरे मंजिल के एक दीवान खाने में एक शमादान जल रहा था और पाँच-सात आदमी बैठे हुए थे। हीरालाल के पहुँचते ही वे सबके सब प्रसन्न हुये, मानों इसके आने की राह देख रहे थे। कंचनपुर नरेश एक किवाड़ की ओट में छुपकर भीतर की बातें सुनने लगे।

यह दीवानखाना एक प्रतिष्ठित राजकर्मचारी का था, जिसके हाथ में सब प्रकार के आज्ञापत्र, योग्यतापत्र आदि लिखने का अधिकार था। थोड़े ही दिन हुए पुराने कर्मचारी के मरने से इसकी नियुक्ति की गई थी।

इसका नाम सुन्दरलाल था। इसका बाहरी रंग-ढंग, बोल-चाल तथा कार्य करने की और उसमें सम्मति देने की शैली ऐसी अच्छी थी कि प्रत्येक पुरुष उसे विश्वास की दृष्टि से देखता था। महाराज भी इसको विश्वस्त कर्मचारी समझते थे, परन्तु यथार्थ में इसका हृदय बहुत काला था। हीरालाल ने अपने मित्रों के जरिये जो कि वहाँ पहले ही से जमे हुए थे, पाँचसौ रुपये की एक थैली सुन्दरलाल को भेंट की और अपनी इच्छा प्रगट की।

इस विषय में बहुत सा वार्तालाप हुआ, जिसे महाराज ने खूब ध्यान देकर सुना। सबका सारांश केवल इतना था कि सुन्दरलाल ने सबके सम्मुख प्रतिज्ञा की कि मैं महाराज से हीरालाल की योग्यता और चलन की सिफारिश करके जैसे बनेगा तैसे उसे दुकान का सम्पूर्ण स्वत्व दिलवा दूँगा।

सुन्दरलाल की प्रतिज्ञा सुनकर महाराज को इतना क्रोध आया कि उसके आवेश में वे उसे उसी समय दण्ड देने को तैयार हो गये, परन्तु तत्काल ही कुछ सोचकर और योग्य अवसर न देखकर वे वहाँ से दवे पैर चुपचाप चल दिये।

राजमहल में लौटकर उन्होंने उसी समय दो तीन गुप्तचरों को बुलाया और उन्हें आज्ञा दी कि आज रात भर में जिस तरह बन सके उस तरह रामकुंवरि और हीरालाल के चाल-चलन का सच्चा-सच्चा अनुसंधान करके प्रातःकाल हमको सूचित करो।

गुप्तचर (जासूस) ‘जो आज्ञा’ कहकर उसी समय चले गये और महाराज विश्राम करने के लिये शयनागार में गये। प्रातःकाल सोकर उठते ही महाराज को जासूसों ने अपनी-अपनी विज्ञप्ति पृथक्-पृथक् सुनाई, जिसे सुनकर महाराज ने जयदेव के कथन को और अपने अनुमान को यथार्थ पाया।

उस दिन दरबार में सुन्दरलाल ने मौका पाकर महाराज से हीरालाल की सिफारिश की और उसका हक उसे देने के लिये भी प्रार्थना की। महाराज उस समय अपने क्रोध को संवरण न कर सके। उन्होंने उच्च स्वर से कहा-इस पापी को इसी समय हथकड़ी डालकर ले जाओ, एक साल के लिये जेल में ठूंस दो। हीरालाल के मित्रों का भी यही सत्कार करो। इसके सिवाय हीरालाल और रामकुंवरि को राजकीय पद्धति के अनुसार काला मुँह करके देश से निकाल दो। रतनचन्द की दुकान का सम्पूर्ण अधिकार हीरालाल की साध्वी स्त्री सुभद्रा को दे दो। इस आज्ञा को सुनते ही दरबार में सन्नाटा छा गया। लोग एक दूसरे के मुँह की ओर देखने लगे। एकाएक विद्युत्पात होने से मनुष्य की जो दशा होती है, सुन्दरलाल की वही दशा हुई। महाराज क्रोध से आरक्त नेत्र किये हुये उसी समय अन्तःपुर में चले गये।

उन्नीसवां पर्व

रात्रि के ग्यारह बज चुके हैं। सूर्यपुर के उद्यान वाले राजमहल के फाटक पर एक बलिष्ठकाय सिपाही पहरा दे रहा है। उसकी उम्र 35 वर्ष के अनुमान होगी। शरीर ऊँचा, परन्तु सुडौल है। सिर पर एक बड़ा भारी सफेद साफा बंधा हुआ है। कमर में तलवार लटक रही है। एक हाथ में बरछी लिये हुए है और दूसरा हाथ मूंछों पर है। साफे को छोड़कर सब पोशाक खाकी रंग की है। पैरों में दूर तक सुनाई देने वाले आवाजदार जूते हैं।

समीप ही एक सुन्दर स्त्री द्वार के सहारे बैठी हुई है। उसके दोनों हाथ रस्सी से बंधे हुए हैं। स्त्री का नाम मालती है। यह दो-तीन दिन से राजमहल में सुशीला के पास जाया करती थी और उसे घण्टों तक गुप्त रूप से वार्तालाप किया करती थी। आज किसी चालाक दासी ने दोनों के कथोपकथन में यह सन्देह करके कि ये दोनों भाग जावेंगी, उदयसिंह को सूचना दी थी, जिससे उन्होंने मुश्क बांधकर रातभर पहरे में रखने की और सबेरे समक्ष में उपस्थित करने की आज्ञा दी थी। तदनुसार कैद करके यह पहरेदार की रक्षा में सौंपी गई है।

मालती नवीन नहीं प्रवीन प्रौढ़ा स्त्री जान पड़ती है। तो भी बाहरी वेशभूषा से, चमक-दमक से, रंग-ढंग से अपने सौन्दर्य को ऐसा बनाये है कि हजार नवीनाओं को नीचा दिखलाती है। उसके कज्जल रेखारंजित, आकर्ण विस्तृत, बड़े-बड़े चंचल नेत्र और ताम्बूलरागलिप्त पक्वबिम्बाधरोष्ठ ही उसकी सम्पूर्ण शोभा के
अनुमान के लिये सब है।

पहरेदार इधर-उधर टहलता अवश्य है, परन्तु उसकी दृष्टि
मालती को बराबर अपना केन्द्र बनाये हुये है। यह देखकर मालती
के हृदय में छुटकारे की आशा का संचार हो रहा है।

थोड़ी देर में अवसर पाकर उसने पहरेवाले के साथ वार्तालाप
करना प्रारम्भ किया। पहरेवाला हो, चाहे यमदूत हो, सुन्दर रमणी
के साथ वार्तालाप करने की इच्छा किसे नहीं होती ? मालती पहले
यहाँ वहाँ की सामान्य बात करके उसके नाम, धाम, गृहकर्म,
सुख-दुःख आदि की बातें पूछने लगी।

अपने विषय में मालती की इतनी उत्सुकता देखर पहरेवाला
बहुत प्रसन्न हुआ। मालती भी अवसर देखकर अपने अस्त्र-शस्त्र
बाहिर निकाल के रखने लगी। एक ओर मालती का अमृतमय
रसालाप और दूसरी ओर उसके साथ-साथ उन विशाल नेत्रों का
अव्यर्थ कटाक्षपात ! बेचारा पहरेवाला पानी-पानी हो गया। जब
मालती ने देखा, मेरे शस्त्र बराबर काम कर रहे हैं, तब वह कोमल
स्वर में बोली-“मुझे न जाने क्यों डर लगता है। इस समय ठाकुर
साहब ! जरा आप मेरे पास आकर न बैठ जावें ?”

पहरेदार चट से मालती के समीप जा बैठा। कुछ देर यहाँ
वहाँ की बातें हो चुकने पर मालती ने ठाकुर साहब पर दो-चार कटाक्ष संधान कर कहा- “आपके मस्तक पर पसीना बहुत आ रहा है, एक बार मेरे बन्धन खोल दो, तो मैं हवा कर दूँ। पीछे फिर बाँध देना।”
ठाकुर साहब के मस्तक पर पसीने की एक बूँद भी नहीं थी, परन्तु मालती, ‘बिना पसीना देखे कैसे कह देगी और इन सुकोमल हाथों की हवा भला किसको नसीब हो सकती है ?’ यह विचार कर ठाकुर साहब ने तत्काल ही बन्धन खोल दिये। तब मालती अपने अंचल के द्वारा कुछ देर तक हवा करके थम रही। पीछे ठाकुर साहब का साहस नहीं हुआ कि उस लावण्यवती से बन्धन के लिये फिर कहे ! बेचारे स्वयं ही उसके बन्धन में बन्द हो चुके थे।
थोड़े समय के पश्चात् मालती ने कहा-ठाकुर साहब ! तुम्हारी स्त्री क्या तुमसे प्यार नहीं करती ?
पहरेवाले ने किंचित् विस्मित होकर पूछा-क्यों ?
मालती ने कहा-“यदि करती होती, तो ऐसी पावस की रात्रियों में तुम सरीखे स्वामी को घर से बाहर जाने देती ?”
ठाकुर साहब ने एक लम्बी सांस ली।
मालती ने शस्त्र संधानकर कहा-‘ठाकुर साहब ! क्या कहूँ, कहने में लज्जा आती है, किन्तु यदि तुम मेरे स्वामी होते, तो ऐसे समय में मैं तुम्हें कभी बाहर नहीं जाने देती।’
पहरेवाले ने फिर एक लम्बी सांस ली।

" अहा ! यदि तुम प्राणनाथ होते तो " इतना कहकर मालती
अटक रही और उसने भी एक श्वाँस ली। साथ ही पहरेवाले को
अपनी तीक्ष्ण-कुटिल कटाक्षों का निशाना बनाया। बेचारे का
मस्तक चकरा गया। वह धीरे-धीरे मालती के ओर भी पास
खिसक गया। मालती भी थोड़ी सी उसकी ओर खिसक आई और
इसी समय उसने पहरेवाले के हाथ पर अपने कोमल करपल्लव
स्थापित कर दिये। तब क्या था ?

ठाकुर साहब की अकल कूचकर गई।

मालती कहने लगी-पूछने में संकोच तो होता है, परन्तु पूछती
हूँ, कि क्या तुम पीछे कभी मेरा स्मरण करोगे ?

पहरेदार-तुम्हारा स्मरण नहीं करूँगा ? नहीं ऐसा कभी नहीं
हो सकता।

मालती-क्या तुमसे एक मन की बात कहूँ ?

पहरेदार-कहो न कहो।

मालती-नहीं, अब नहीं कहूँगी। न जाने तुम उससे मेरे
विषय में क्या समझो।

पहरेदार-नहीं ! नहीं ! कहो, कहने में क्या हर्ज है ? मैं तो
तुम्हारा दास हूँ।

मालती-मेरा जी होता है कि अपने पापी पति का मुँह काला
करके तुम्हारे साथ रहने लगूँ।

इतना कहकर मालती ने फिर एक कटाक्षपात किया। पहरेदार आल्हाद से उछल पड़ा।
पहरेदार-रहोगी ?
मालती-रक्खोगे, तो रहूँगी।
पहरेदार-तुम्हें रक्खूँगा नहीं ! किन्तु प्यारी ! तुम्हारा दास हो रहूँगा।
‘इस अपूर्व प्रेम का तुम्हें क्या पारितोषिक दूँ ? अच्छा यही ग्रहण करो।’ यह कहकर मालती ने अपने गले का एक स्वर्णहार उतारकर पहरेदार के गले में पहना दिया। उस समय ठाकुर साहब सशरीर स्वर्ग में जा पहुँचे। मालती बोली- शास्त्र में कहा है कि “अपने गले की माला दूसरे के गले में डालना विवाह कहलाता है।”
पहरेदार ने हँसते-हँसते कहा-‘तब तो तुम्हारे साथ मेरा विवाह हो गया।’
“इसमें अब सन्देह ही क्या रहा ?” यह कहकर मालती कुछ देर तक निस्तब्ध सी हो रही, मानों किसी गहन चिन्ता में मग्न है। पहरेदार बोला-क्या सोच रही हो ?
मालती-जान पड़ता है, मेरे ललाट में सुख नहीं लिखा है। मैंने अच्छा नहीं किया, मेरे लिये तुम अपने बाल-बच्चों को नहीं छोड़ सकोगे और यहाँ तुम्हारे साथ रहकर मुझे सुख नहीं मिल सकता।

पहरेदार ने गर्व के साथ कहा-क्यों क्या अड़चन है? हमारे सुख में कौन बाधा डाल सकता है?
मालती-बाधा डालने वाला वही जले मुँह का मेरा पति है। वह बड़ा विकट है। यदि सुन पावेगा, तो हम दोनों को रसातल में पहुँचाये बिना न रहेगा। उसका नाम याद कर मुझे तो कंपकपी छूटती है। इसके सिवाय सबेरे मुझे राजकुमार के समक्ष भी तो तुम्हें पेश करना पड़ेगा। उस समय क्या करोगे? स्त्रियों के लिये उनकी जैसी कुछ नियत रहती है, सो तो तुम जानते ही हो।
पहरेदार-सो तो कुछ बात नहीं है। (मूँछ पर हाथ फेरते हुए) मेरे जीते जी वह तुम्हारा मनहूस पति कुछ नहीं बिगाड़ सकता और राजकुमार की भी मजाल नहीं है कि तुम्हारी ओर नजर उठाकर देख सके। बहुत करेगा, अपनी नौकरी छीन लेगा।
मालती-सो तो मुझे भी तुम्हारे बल पौरुष का भरोसा है, परन्तु आखिर विडम्बना ही रही। जिस स्वातन्त्र्य सुख के लिये मैं तरसती थी, वह तो नहीं मिला।
पहरेदार-(बहुत देर तक सोचकर) तब क्या करना चाहिये?
मालती-(उदास होकर) कुछ नहीं। मेरे पीछे तुम कष्ट में क्यों पड़ते हो। मेरा जो कुछ होगा, होता रहेगा। समझ लूँगी, मेरे भाग्य में सुख लिखा नहीं है। (आँखों में आँसू भरकर) हाथ जोड़ती हूँ। अब तुम इस विषय को छोड़ दो अपना काम करो। अभी जो बातें हुई हैं, उन्हें भूल जाओ।
इस समय मालती ने ऐसी विलक्षण मुद्रा बनाई और इतना शोक का उद्रेक दिखलाया कि ठाकुर साहब का जी मोम हो गया।
पहरेदार-(हाथ पकड़कर) प्यारी! ऐसी बात मत करो। तुम्हें अब मैं कभी नहीं छोड़ सकता। जैसा तुम कहो, मैं वैसा करने के लिये राजी हूँ। तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं अभी साथ चलने को तैयार हूँ। तुम्हारा शोक मुझसे देखा नहीं जाता, तुम्हारे लिये मैं सब कुछ कर सकता हूँ।
यह सुनकर मालती अपने प्रयत्न को सफलता के मार्ग पर आया समझकर मन ही मन प्रसन्न हुई, परन्तु ऊपर उदासीनता की छाया दिखलाती हुई बोली-नहीं, मुझे तो दृढ़ विश्वास हो चुका है कि विधाता ने मेरे ललाट में सुख नहीं लिखा। क्या आश्चर्य कि मेरे साथ तुम्हें भी दुःख भोगना पड़े, इसलिये तुम इस प्रपंच में मत पड़ो।
इस समय ठाकुर साहब को अपनी पिछली बात पर दृढ़ता दिखाने का जोश चढ़ा। आप खड़े होकर बोले नहीं, मैं निश्चय कर चुका हूँ जहाँ तुम कहो, अभी चलने के लिये तैयार हूँ। अच्छा, तो तुम यहीं बैठना, मैं घर जाकर रास्ते के खर्च के लिये कुछ रुपये और जरूरी सामान लेकर आता हूँ।

मालती-कटाक्ष संधान कर अजी, मुझे धोखा क्यों देते हो ? साफ क्यों नहीं कहते कि ठकुराइन से मिलने को जाता हूँ।

पहरेदार- नहीं ! प्यारी। सचमुच अब मैं तुम्हारा दास हो चुका हूँ। इसमें धोखा नहीं है। मैं बहुत जल्दी लौट के आता हूँ।

मालती-मुस्कराकर और तब तक मैं कहीं भाग गई तो ? रस्सी से बांध जाओ न ?

पहरेदार-खैर, ये हंसी मजाक की बातें फिर करना। अभी काम सिद्ध करने दो।

मालती- लौट के आवोगे, तो सही ?

पहरेदार-क्या दो चार दिन में आऊँगा, जो ऐसा कहती हो ? बस गया और आया।

मालती-देखो ! तुम्हें मेरे सिर की कसम है। कहीं ठकुराइन के प्रेम में न उलझ जाना।

पहरेदार- नहीं ! नहीं ! प्यारी ! तुम मुझे इतना अविश्वासी मत समझो।

मालती-अच्छा जाओ, परन्तु यह तो कहो कि मुझे अकेले यहाँ डर नहीं लगेगा ? हाय ! मेरी तो छाती धड़कती है।

पहरेदार-नहीं, यहाँ डर किस बात का है ? मुझे देर नहीं लगेगी।

ठाकुर साहब के जी में मालती के विषय में तिलार्द्ध भी संशय नहीं रहा। बच्चा जी ऐसे उल्लू बने कि आगा पीछा सब भूल गये।

यह भी नहीं सोचा कि यह वही स्त्री है जिसे घन्टे भर पहले रस्सी से कसके बांधा था।

पहरेवाले ने पीठ फेरी कि मालती ने अपनी सफलता पर प्रसन्न होते हुए बंगले के भीतर प्रवेश किया। रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी, इसलिये बंगले की प्रायः सम्पूर्ण दासियाँ अचेत होकर खुर्राटे ले रही थीं। आज विशेष निश्चिन्तता से सोने का कारण भी था। सुशीला मालती के पकड़े जाने से बहुत व्याकुल थी। कभी बाहर जाती थी और कभी भीतर आती थी। अभी तक उसकी आँखों में निद्रा का आभास भी नहीं आया था। यद्यपि उसे अपनी प्यारी सखी मालती की बुद्धिमानी का बड़ा भारी विश्वास था, तो भी उसके पकड़े जाने से सचिन्त्य हो गई थी।

जिस दिन से सुशीला के यहाँ मालती का आवागमन प्रारम्भ हुआ है, उसी दिन से उसकी चर्चा में एक विलक्षण प्रकार का परिवर्तन हो गया है। मुखमण्डल पर दीप्ति आ गई है, नेत्र प्रफुल्लित रहते हैं, शरीर में स्फूर्ति चंचलता दिखलाई देती है और उदासी विदा ले गई है। यद्यपि वह अपने इस परिवर्तन को छुपाने का बहुत कुछ प्रयत्न करती है, परन्तु उसमें सफल नहीं होती।

समय-समय पर उसके मुखमण्डल पर जो हँसी की रेखा झलक आती है, उससे वहाँ की दासियाँ इस परिवर्तन का कारण जानने के लिये उत्कण्ठित हो जाती हैं। मालती के पैर की आहट सुनकर सुशीला कमरे से बाहर दौड़ आई और यह पूछने के लिये आतुर हुई कि तुम कैसे छूट आई, परन्तु इसके पहले ही मालती ने कहा-तो अब देर मत करो। इस समय थोड़ा भी विलम्ब होगा तो सर्वनाश हो जावेगा।

पहले बंगले भर के दीपकों को बुझा देना चाहिये, पीछे यहाँ से चलना चाहिये। यह कहकर मालती शीघ्रता से दीपनिर्वाण करने लगी। सुशीला ने भी उसे इस कार्य में सहायता दी। जब बंगला सर्वथा अन्धकारमय हो गया, तब दोनों की दोनों उसी फाटक पर से बाहर निकल गईं, जहाँ कि पहले पहरेदार का पहरा था।

फाटक पार करते ही एक युवा ने आकर मालती का हाथ पकड़ लिया और कहा-मालती महाशया ! अब कहाँ जाती हो ? मैं तुम्हारे साथ भाग चलने के लिये तैयार हूँ। तुम्हारी बाट ही देख रहा था। देखो तुम्हारे लिये मैं अपने बाल बच्चे सब छोड़ आया। राहखर्च के लिये जो कुछ रुपयों पैसों की आवश्यकता थी, सो भी ले आया हूँ। युवा के ये वाक्य सुनकर सुशीला कांप उठी कि हाय ! यह क्या विपत्ति आई। मालती भी चमक उठी, परन्तु तत्काल ही प्रसन्न होकर बोली हाँ ! हाँ ! चलिये, परन्तु याद रखिये, मालती के लिये मदनमालती छोड़ देनी पड़ेगी। सुनते ही युवा खिलखिला उठा और बोला-वाह ! क्या अच्छा अनुपास मिलाया है।

मालती-जान पड़ता है, आप यहाँ बहुत देर से आये हैं।

युवा-हाँ ! जिस समय ठाकुर साहब से आपका वार्तालाप प्रारम्भ हुआ था, उसी समय मैं यहाँ आ गया था। जब आज 11 बज चुके और आपका आगमन न हुआ तब मुझे चिन्ता हुई और आखिर बात क्या है, यह जानने के लिये मुझे यहाँ तक आना पड़ा।
मालती-अच्छा, तो अब देरी करने का समय नहीं है। जिस तरह बने रात ही रात यहाँ से दो तीन कोस निकल चलना है। इस समय डेरे पर जाने की आवश्यकता तो नहीं थी, परन्तु मालिन को सचेत कर चलना अच्छा है, इसलिये आप डेरे पर से होकर आ जाइये, हम धीरे-धीरे चलते हैं।
उधर थोड़ी देर में मन के लड्डू पागते हुए ठाकुर साहब घर से लौटे, परन्तु फाटक पर आके देखते हैं तो कोई नहीं है। एक बार पुकारा-‘मालती !’ यहाँ वहाँ देखा, परन्तु कुछ भी उत्तर नहीं मिला और न कोई दिखाई दिया। सोचा, शायद बंगले में चली गई होगी। भीतर जाके देखा, बंगला अन्धकारमय हो रहा है।
वहाँ भी डरते-डरते पुकारा-‘मालती !’ परन्तु किसी ने उत्तर नहीं दिया। उस समय ठाकुर साहब का माथा ठनका। समझ आई कि मालती ने धोखा दिया। अब तो वह दासियों का नाम लेकर जोर-जोर से पुकारने लगा, जिसे सुनते ही दासियाँ घबड़ाकर उठ बैठीं और चारों ओर अन्धकार का राज्य देखकर कर्तव्यविमूढ़ हो यहाँ वहाँ दौड़ने लगीं।
एक दासी ने सुशीला के कमरे में जाकर आतुरता से पुकारा “सुशीला ! सुशीला !” परन्तु वहाँ कौन था, जो उत्तर देता। बस सबकी सब दासियाँ रोने चिल्लने लगी कि हाय ! सुशीला भाग गई। सुशीला को कोई ले गया। दौड़ो ! दौड़ो !

यह सुनते ही ठाकुर साहब के रहे सहे प्राण और भी सूख गये। इसी समय रेवती और बलदेवसिंह साधुओं के वेष में सुशीला को छुड़ाने के लिये आकर, चकित स्तंभित हो गये थे।

बीसवां पर्व

भूपसिंह सुवर्णपुर छोड़कर अपने प्राणप्रिय मित्र जयदेव का पता लगाता हुआ गाँव-गाँव नगर-नगर घूम रहा था कि अचानक एक दिन एक ग्राम में उसे साधु के वेष में फिरते हुए जयदेव से मिलाप हो गया। जयदेव को कंचनपुर छोड़े हुए उस समय अधिक दिन नहीं हुए थे, परन्तु भूपसिंह को महीनों बीत गये थे।

उस समय एकाएक मिलाप होने से दोनों मित्रों को जो आनन्द प्राप्त हुआ, वह अकथनीय है। कलम में इतनी शक्ति नहीं है कि वह वांचने वालों को उसका अनुभव करा सके। उस संयोग सुख का अनुमान वही कर सकते हैं, जो कभी अपने सच्चे मित्र से बिछुड़कर मिले हैं।

जयदेव भूपसिंह की मित्रता का वर्णन बहुत पहले किया जा चुका है, इसलिये हम यहाँ इस विषय को फिर से पल्लवित नहीं करना चाहते, क्योंकि शायद ऐसा करने से हमें कथा का परिणाम जानने की उत्कंठा वाले पाठकों का अप्रसन्नता का भाजन बनना पड़े।

दोनों मित्र सुशीला का पता लगाने के लिये चले। दोनों की यही सम्मति हुई कि पहले सूर्यपुर में जाकर शोध करना चाहिये, क्योंकि उदयसिंह की ओर से उन दोनों को ही शंका थी। यदि वहाँ पता न चलेगा तो फिर कोई दूसरा प्रयत्न करेंगे। सूर्यपुर पहुँचकर वे दोनों एक मालिन के घर जाकर ठहरे। मालिन बड़ी ही चतुरा और चालाक थी वह सूर्यपुर के राजमहल में निरन्तर आया जाया करती थी और वहीं से जो कुछ प्राप्ति होती थी, उसी के द्वारा अपना उदर निर्वाह करती थी।

जिस समय उदयसिंह सुशीला को लाया था, अन्तःपुर में इस बात की चर्चा चली थी और मालिन को स्मरण थी। भूपसिंह ने बातों ही बातों में उससे इस बात का पता लगा लिया कि राजकुमार ने कई महीने हुए उद्यान वाले बंगले में कहीं से एक सुन्दर स्त्री लाके रक्खी है।

इसके पश्चात् भूपसिंह ने मालिन को पारितोषिकादि देकर धीरे-धीरे अपने हाथ में कर ली और उसे यह निश्चय करा दिया कि मैं विजयपुर का राजकुमार हूँ। जिस समय भूपसिंह ने उदयसिंह और निहालसिंह को लड़ाई में कैद किया था, उस समय मालिन ने भूपसिंह का नाम सुना था। उस समय उसी शूरवीर भूपसिंह को अपना पाहुना जानकर वह बहुत प्रसन्न हुई और उसे वह बहुत आदर की दृष्टि से देखने लगी। भूपसिंह को भी उसके द्वारा अपने कार्य के सिद्ध होने की आशा होने लगी।

भूपसिंह ने जब यह विश्वास कर लिया कि मालिन अपनी सर्वथा आज्ञाकारिणी दासी बन गई है, तब एक दिन उससे कहा- यदि तुम हमारे मित्र को उस स्त्री के साथ जिसे कि राजकुमार ने अपने बंगले में लाके रक्खा है, साक्षात् करा दो, तो तुम्हें बहुतसा पारितोषिक दिया जावेगा।
मालिन पहले तो डरी, परन्तु पीछे भूपसिंह के आश्वासन से राजी हो गई। उसने कहा-साक्षात् तो करा दूँगी, परन्तु आप में से किसी एक को मेरे साथ स्त्री रूप में बनाकर चलना होगा।
यह सुनकर भूपसिंह ने जयदेव की ओर देखा और संकेत मात्र से अपनी इच्छा प्रगट की कि आपका जाना अच्छा होगा। जयदेव पहले तो स्त्री वेष बनाने के लिये संकुचित हुए, परन्तु पीछे राजनीति के चार समुद्देश का स्मरण होने से और भूपसिंह के आग्रह से उन्हें तैयार होना पड़ा। मालिन बड़ी ही चतुरा थी। उसने अपनी रुचि के अनुसार जयदेव को ऐसा सजधज के तैयार कर दिया कि उसे स्वयं भ्रम होने लगा कि यह स्त्री है अथवा स्त्री रूप पुरुष।
यहाँ हम पाठकों की यह शंका भी दूर कर देना चाहते हैं कि जयदेव भूपसिंह जैसे वीर पुरुषों को यह स्वांग रचने की क्या आवश्यकता थी ?
यथार्थ में सुशीला को संकट मुक्त करने का कार्य बड़ा ही जोखिम का काम था। यदि उसमें जरा भी बल से काम लिया जाता तो उसके प्राणों पर आ बनने का डर था। इसके सिवाय राजा निहालसिंह इस षड्यंत्र से सर्वथा अलिप्त और अनजान थे। उन्हें व्यर्थ ही सताना अनुचित था। यदि ऐसा न होता तो भूपसिंह जयदेव के आने के पहले ही राजा विक्रमसिंह तथा रणवीरसिंह सूर्यपुर जैसे कई राज्यों को नष्ट करके सुशीला को छुड़ा ले जाते और जासूसादि भेजने की विडम्बना में न पड़ते।

पाठकों को स्मरण होगा कि राजा विक्रमसिंह ने बल प्रयोग करने का विचार किया भी था, परन्तु इन्हीं कारणों से उनके शूरसेन मंत्री ने उन्हें रोक दिया था।

रात को अनुमान ग्यारह बजे मालिन ने मालती को साथ लेकर और अनेक उपयोगी बातें समझाकर उद्यान की ओर प्रस्थान किया। उस समय नगर में धीरे-धीरे नीरवता तथा निश्चेष्टता का साम्राज्य जम रहा था। लोगों के आवागमन के बिना मार्ग शून्य हो रहे थे।

बंगले के द्वार पर पहुँचते ही मालिन ने पहरेदार से हँसते हुए कहा-अच्छा! आजकल आप हैं यहाँ? खैर मुझे बड़ी चिन्ता हो रही थी कि न जाने पहरे पर कौन उज्जड़ होगा? और मुझे भीतर जाने देगा या नहीं?

ठाकुर साहब! आप तो पुराने नौकर हैं, इसलिये मुझे पहिचानते हैं कि राजमहल में मेरी कैसी कदर रही है, परन्तु आजकल तो ऐसे नालायक भरती हुए हैं कि किसी को कुछ समझते ही नहीं हैं। अच्छा हुआ, जो आप मिल गये, नहीं तो यह बेचारी बंगला न देख पाती। ले बेटी, चली जा, मैं सीधी राजमहल को जाती हूँ। न जाने क्यों इतनी रात को महारानी ने याद किया है। वहाँ से लौटकर तुझे लेती जाऊँगी नहीं तो यहीं चम्पा के अथवा और किसी के पास सो जाना। ठाकुर साहब! यह मेरी बहन की लड़की है। बेचारी देहात की रहने वाली है।

इसने काहे को कभी ऐसे बंगले देखे होंगे। कल या परसों चली जावेगी। अच्छा है, आज देख लेगी और रहेगी, तो एकाध बार और देख जावेगी। इतना कहकर मालिन ने एक रुपया निकाल कर पहरेवाले के हाथ पर रख दिया और उत्तर की प्रतीक्षा न करके वहाँ से चल दी।

मालती छमाके मारती हुई फाटक लाँघकर बंगले में जा पहुँची। ठाकुर साहब मालिन की बातों में ऐसे उल्लू बने कि कुछ भी न कह सके और उसने भी ऐसी चालाकी से बातचीत की कि बोलने का मौका ही न आने दिया। ठाकुर साहब शायद पीछे कुछ कहने का साहस करते, परन्तु तब तक वह एक चाँदी की जूती लगाकर चल ही दी। बेचारे रुपये को जेब में रखकर कठपुतली की नाई खड़े रहे।

नगर के बाह्य प्रदेशों में होने से बंगले में एक तो यूँ ही सूना-सूना मालूम पड़ता है। दूसरे कई दिन से उस ओर उदयसिंह का आगमन नहीं होता है, इसलिये दास दासियों की चहल पहल भी जरा कम रहती है। मालती ने जाकर देखा, दासियाँ चैन से खुर्राटे लगा रही हैं, सबकी सब अचेत हैं। बीच के विशाल कमरे में एक कोने में एक चटाई पर हाथ का सिराहना लगाये हुए सुशीला लेटी है। आँखों में निद्रा की छाया नहीं है तो भी वे मुद्रित हैं।

शरीर पर एक मलिन धोती, मस्तक पर सौभाग्यतिलक और हाथों में चूड़ियों के सिवाय और कुछ शृंगार नहीं है। वियोग के दुःसह ताप से उसके सम्पूर्ण अंगोपांग झुलस गये हैं। ऐसा जान पड़ता है, मानों संयोग स्वर्ग की प्राप्ति के लिये उसने विभूतिभूषित शरीर से तपस्या करने का उपक्रम किया है।

मुख की कान्ति क्षीण होकर उदासीनता में परिणत हो रही है। कपोलमण्डल पर धवलिमा छा रही है। आँखों में बही हुई अश्रुधाराओं की शुष्क रेखायें कंठपर्यन्त दिखाई देती हैं। भ्रमरराशि के समान श्याम सच्चिकण केश योगियों की जटाओं के समान रूक्ष होकर बिखर रहे हैं। सारांश यह कि सुशीला का मनोहर शरीर विरह वेदना के कारण सर्वथा परिवर्तित हो गया है।

मालतीरूपधारी जयदेव पहले तो यह सन्देह करके कि यह सुशीला नहीं है, द्वार पर ठिठक रहे, परन्तु किंचित् बारीकी से देखने पर जब उन्हें विश्वास हो गया कि यही मेरी प्रियतमा है, तब भी वे समीप जाने को अग्रसर न हो सके। जहाँ खड़े थे वहीं स्तम्भित हो रहे। कंठ रुद्ध हो गया। मस्तक पर पसीना आ गया, जी उमड़ आया, हर्ष, शोक और करुणा का एक अपूर्व सम्मिलन हुआ, हृदय सब प्रकार के विचारों से शून्य होकर जड़ीभूत हो गया। कुछ क्षण के पश्चात् हवा के एक झोंके से उस कमरे की खिड़कियाँ बन्द हो गईं और उनकी आहट पाकर सुशीला ने नेत्र खोल दिये। उनमें निद्रा का नाम नहीं था। अपने समीप एक अपरिचित स्त्री को खड़ी देखकर उसने पूछा, क्यों खड़ी हो ?

जयदेव अवाक् हो रहे। बहुत विचार किया, परन्तु कंठ से एक अक्षर भी नहीं निकला। उत्तर न पाकर सुशीला ने फिर पूछा, क्यों बोलती क्यों नहीं हो ? कहो, उस पापात्मा का सन्देशा हो तो वह भी कहो ! मैं दया की पात्रा नहीं हूँ। तुम कौन हो, जो मेरे लिये इस तरह संकोच कर रही हो ! मैं मरी तो क्या और जीती तो क्या !

यदि तुम मेरे मारने की आज्ञा लाई हो तो मैं उससे बहुत प्रसन्न होऊँगी। मैं कल ही से उसकी बाट देख रही हूँ। उस दिन वह दुरात्मा 3 दिन की अवधि देकर गया था, परन्तु आज 4-5 दिन हो गये।

जयदेव ने बड़ी कठिनाई से बड़ी दृढ़ता से अपने मन को वश में करके और आगामी कर्तव्य का निश्चय करके कहा-मैं तुम्हारे पति का सन्देशा लाई हूँ।

सुशीला-मुझे क्यों व्यर्थ कष्ट देती हो ! ऐसे सन्देश देने वाली तो मेरे पास प्रतिदिन ही आया करती हैं। यह कहो कि सन्देशा का कुछ प्रमाण भी तुम्हारे पास है या नहीं ?

जयदेव-हाँ ! देखो यह मुद्रिका किसकी है ?

मुद्रिका का नाम सुनते ही सुशीला बिछौने पर से उठ बैठी और उसे हाथ में लेकर बड़े गौर से देखने लगी। यह मुद्रिका सुशीला ने प्रथम समागम के समय अपने पति को प्रेमोपहार स्वरूप समर्पण की थी। उस पर सुशीला का द्वितीय नाम “सरस्वती” खुदा हुआ था। मुद्रिका पहिचान लेने के पश्चात् सुशीला ने उस स्त्री के मुँह की ओर खूब बारीकी से देखा और जी में यह कहते हुए कि इस रूप को तो कभी देखा है पूछा-तुम और भी कोई ऐसा प्रमाण दे सकती हो जिससे मुझे तुम्हारे विषय में कुछ भी सन्देह न रहे!

मालती-हाँ जितने कहिये, उतने प्रमाण दे सकती हूँ। यह देखो मैं तुम्हारे नाम की चिट्ठी भी लाई हूँ-ऐसा कहकर मालती ने एक बटुये में से चिट्ठी निकाल कर दे दी। सुशीला ने उसे खोलकर बांचा-ठीक जयदेव के अक्षरों से मिलते हुए अक्षर थे। उसमें लिखा हुआ था -

प्रिये! जिस स्त्री के साथ यह पत्र भेजता हूँ यह बड़ी विश्वासपात्रा है। दुख के दिन समाप्त होंगे। प्रयत्न कर रहा हूँ। प्रिय भूपसिंह भी मेरे साथ हैं, धैर्य्य रखना। तुम्हारे दर्शन के लिये व्याकुलता बढ़ रही है इस समय इतना ही…।

-तुम्हारा जयदेव इस चिट्ठी को पढ़कर सुशीला के हृदय की जो दशा हुई होगी उसका पाठक अनुमान कर सकते हैं। एक ओर चिरवियोग के अन्त होने का सीमाधिक हर्ष दूसरी ओर एक नगर में रहते हुए भी जीवन सर्वस्व के अदर्शन का शोक; एक ओर संदेशा भेजने की कृतज्ञता दूसरी ओर स्वयं दर्शन न देने का स्नेहरंजित ईषत्कोप; एक ओर चिर रोधित-शोकाश्रुओं का प्रवाह, दूसरी ओर संकटमुक्त होने के पश्चात् का भावी आनन्द। भिन्न-भिन्न प्रकार के भावों के चित्र उसके हृदय पर एक के पीछे एक खिंचने लगे।

चिट्ठी पढ़कर एक बार मालती की ओर देखा, फिर चिट्ठी को पढ़ा, फिर देखा और फिर पढ़ा। इसप्रकार कई बार देखा, कई बार पढ़ा। चिट्ठी के पढ़ने से सुशीला की मुद्रा में क्या-क्या फेरफार होता है मालती का इस ओर सविशेष ध्यान था। उस समय वह अपने हृदय पर जो शासन कर रही थी वह बड़े ही साहस, धैर्य और जितेन्द्रियता का कार्य था।

परन्तु अपने अभिन्न शरीर को-अपने अर्धांग को इसप्रकार से कौन कब तक पृथक् रख सकता है! जयदेव को ( अब मालती कहना छोड़ दीजिये ) धैर्य्यस्तम्भ खिसकने लगा।

सुशीला को चकित विस्मित दृष्टि से अपनी ओर बार-बार निहारते देखकर उसने कहा-क्या अभी तक आपकी शंका दूर नहीं हुई।

सुशीला-नहीं, शंका तो अब नहीं रही, किन्तु ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हें मैंने कभी देखा है, परन्तु स्मरण नहीं आता। अस्तु, इस बात को जाने दो और यह कहो कि तुम्हारा डेरा यहाँ से कितनी दूर है ?

जयदेव-इसके पूछने से आपका अभिप्राय क्या है ?

सुशीला ने एक दीर्घ निःश्वास खींचकर उत्तर दिया-यों ही पूछती हूँ।

जयदेव-नहीं, ठीक कहिये यदि इच्छा हो, तो मैं उनसे इसी समय मिला सकती हूँ। सशीला का मुखकमल खिल उठा। उसने बड़ी उत्कंठा से पूछा -क्या ऐसा हो सकता है ?

जयदेव-हाँ, यदि मैं चाहूँ तो सब कुछ हो सकता है।

सुशीला-(विनम्र होकर) तो कृपा करके मुझे उनके पास ले चलो।

जयदेव-उन्हें ही यहाँ न ले आऊँ।

सुशील-वे क्या यहाँ आ सकते हैं ?

जयदेव-क्यों नहीं।

सुशीला-तो बुला दो।

जयदेव-कितनी जल्दी बुलाऊँ।

सुशीला-जितनी जल्दी हो सके।

जयदेव-मुझे क्या दोगी ?

सुशीला-जो तुम माँगोगी।

जयदेव-देखो, भूलना नहीं।

सुशीला-नहीं। खूब स्मरण है।

जयदेव-तो, लो ये आ गये।

सुशीला-रोमांचित होकर यहाँ वहाँ बड़ी व्याकुलता से देखने लगी, परन्तु जब कोई नहीं है, तब दीन कातर होकर मालती के मुँह की ओर देखने लगी और बोली-कहाँ है ? जयदेव उस समय बड़ी कठिनता से चित्त को वश में किये हुए मुस्करा रहे थे। उन्होंने कहा-तुम्हारे समक्ष ही तो है।

सुशीला ने मालती की ओर लालायित लोचनों से देखा। बस, मालती जयदेव का चित्त उस अपूर्व दृष्टिपात से धैर्य्यच्युत् हो गया। उसी समय उसने सुशीला को अपने बाहु पाश में बद्ध करके मुख-चुम्बन करते हुए कम्पितस्खलित स्वर से कहा-यह देखो, मैं उपस्थित हूँ। मैं ही तुम्हारा अभागा पति हूँ।

सुशीला का कोमल हृदय एकाएक उस अचिन्त्य हर्ष की चोट को नहीं सम्भाल सका, इसलिये उसी पाशबद्ध अवस्था में वह चेतना विहीन हो गई। जयदेव भी अपने शरीर को अधिक समय तक नहीं सम्भाल सके। दोनों एक दूसरे की ओर अनिमिष नेत्रों से देखने लगे। स्नेह की अविरल अश्रुधारा बहने लगी। दोनों आक्रन्दन करने लगे। पाठक ! बतलाइये, संयोग सुख में यह रोना और आँसू बहाना क्यों होता है ?

मालती रूपधारी जयदेव उस दिन रातभर सुशीला के पास रहे। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि वह रात दोनों की व्यथा वार्ताओं में, पारस्परिक उलाहनों में और कष्टमुक्त होने के विचारों में ही व्यतीत हो गई। प्रातःकाल होने के पहले जयदेव बड़े कष्ट से विदा लेकर अपने डेरे पर चले गये। उस समय तक बंगले की दासियाँ चैन से नींद ले रही थीं। पहरे वाले ठाकुर साहब प्रातः काल की ठण्डी हवा के झोकों में फाटक पर बैठे हुए नींद में आगे को झुके जा रहे थे।

दूसरे दिन रात को ठीक बारह बजे श्रीमती मालतीजी फिर बंगले के फाटक पर पहुँची और ठाकुर साहब को एक चिदानन्द तथा एक तिरछे कटाक्ष का दान करती और कमर को बल देती हुई अपने अभीष्ट स्थान पर चली गई। तीसरे दिन भी उन्होंने ऐसा ही किया, परन्तु आज एक दासी ने जिसका नाम चम्पा था, मालती को आते हुए देख लिया।

उस समय वह लेटी हुई थी, परन्तु उसे निद्रा नहीं आई थी। एक अपरिचित स्त्री को आते हुए देखकर उसे सन्देह हुआ और इसलिये वह धीरे से उठकर कमरे की एक खिड़की के पास ओट में खड़ी हो गई। यहाँ से सुशीला और जयदेव की बातें अस्पष्ट रीति से सुनने में आती थीं।

उस समय वे दोनों वहाँ से निकल चलने की बातचीत कर रहे थे। उससे चम्पा यह तो नहीं समझ सकी कि यह कोई पुरुष है, परन्तु इस विषय में उसे कुछ सन्देह नहीं रहा कि यह कोई धूर्ता स्त्री उसे छुड़ाने के लिये आई है। बस, उसी समय उसने एक कोठरी में जाकर एक कागज पर कुछ लिखा और दासी को जगाकर उसके हाथ में देकर कहा-इसी समय राजकुमार के पास ले जाकर इस पुरजे का जवाब लाओ। दासी तत्काल ही उदयसिंह के पास गई।

उदयसिंह उस समय अपने मित्र के साथ फूटे मन्दिर में जाने को तैयार था, क्योंकि उस दिन रविवार था। पुरजे को बांचकर उसने मुँह जबानी कह दिया कि अच्छा कुछ डर नहीं है। उसको मुश्कें बांधकर कैद कर लो और पहरेदार की निगरानी में छोड़ दो। मैं प्रातःकाल आकर उसका निपटारा कर दूँगा।

दासी ने लौटकर यह समाचार चम्पा को आके सुना दिया। तदनुसार दासियों ने मिलकर मालती को पकड़ कर कैद कर लिया और ठाकुर साहब के हवाले कर दिया। मालती ने उस समय जरा भी बल से काम नहीं लिया। उसने बड़ी सरलता से अपनी मुश्कें बांध लेने दीं। सुशीला अवश्य ही घबड़ा गई, परन्तु पीछे मालती के सांकेतिक आश्वासन से उसे बहुत कुछ ढाढ़स बंध गया।

इसके पीछे क्या हुआ, सो पहले ही कहा जा चुका है।

इक्कीसवां पर्व

जब से एक राह चलते पथिक से जयदेव, भूपसिंह और सुशीला के विजयपुर को लौट आने के समाचार नगरवासियों ने सुने हैं, तब से विजयपुर में आनन्द की लहरें उच्छलित हो रही हैं। प्रत्येक बालक के, प्रत्येक युवा के, प्रत्येक वृद्ध के, प्रत्येक भिक्षुक के, प्रत्येक धनिक के, जिसका मुँह देखा उसी के मुँह पर आज मूर्तिमान आनन्द विराजमान है।

प्रत्येक वीथी में, प्रत्येक मार्ग में, प्रत्येक घर में, प्रत्येक महल में, प्रत्येक उद्यान में, प्रत्येक सरोवर में, जहाँ देखो वहाँ आनन्द की मनोहारिणी प्रभा स्फुट हो रही है। राजमार्ग ध्वजा पताकाओं से सुसज्जित हो रहे हैं। महलों के द्वार मणिमुक्तावेष्टित बंधनवारों से और साधारण स्थिति के गृहस्थों के द्वार पत्रपुष्प बंधनवारों से सजाये गये हैं। मन्दिरों के द्वारों पर मधुर वाद्यध्वनि हो रही है। नृत्य गायन हो रहे हैं। सजे हुए पुरुषों के झुंड के झुंड आनन्द कलरव करते हुए इधर-उधर आते जाते दिखाई देते हैं।

मकानों की छतों पर बैठी हुई स्त्रियाँ मङ्गल गीत गा रही हैं। जगह-जगह सदावर्त खुल रहे हैं। आहार-वस्त्रादि जिसे जो कुछ चाहिये, वह मिलता है। देव मन्दिरों में पूजन हवनादि पुण्य कर्म हो रहे हैं। सारांश यह कि आज विजयपुर साक्षात् स्वर्ग बन रहा है।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह आनन्द कोलाहल विजयपुर की गई हुई शोभा के, गई हुई विद्या के, गई हुई वीरता के, किंबहुना गये हुए प्राणों के लौट आने से हो रहा है। आज विजयपुर और बिलासपुर के जीवन सर्वस्व जयदेव, भूपसिंह और सरस्वती के आने के समाचार जहाँ-तहाँ सुनाई पड़ते हैं। विचारशील हृदय लोग कह रहे हैं, आज उजड़ा हुआ विजयपुर फिर बस गया। विजयपुर की अनाथ प्रजा सनाथ हो गई। विद्वानों के ग्राहक, वीरों के चाहक और अनाथों के नाथ आ गये। महाराज रणवीरसिंह और विक्रमसिंह के शुष्क तनपिंजर में उनकी कीर्ति का यशः पाठ करने वाले विहङ्ग फिर से आ गये।

रात-दिन-प्यास-प्यास रटने वाले पपीहों की करुण ध्वनि सुनकर मेघों को दया आ गई। भीषण ग्रीष्म संतप्त भूमि फिर हरी भरी हो गई। शोकाकुलित अयोध्या रामचन्द्र, जानकी और लक्ष्मण के प्रत्यागमन से हर्षोत्फुल्ल हो गई।

राजमार्ग पर से एक बड़ा भारी जनसमूह उत्तर की ओर उमड़ा जा रहा है। शंख, घंटा, तुरही, भेरी, दुंदुभी आदि नानाप्रकार के बाजों का अपार नाद हो रहा है। हाथी, घोड़ों और रथ, पालकियों के मारे मार्ग चलना कठिन दिखता है। बन्दीजन विरद गायन करते जाते हैं। आगे-आगे प्रधानमंत्री आदि राज्य कर्मचारी और नगर के धनिक जा रहे हैं।

थोड़ी देर में यह महासमुद्र अपने रंग-बिरंगे वस्त्रों की लहरों से लहराता हुआ, कोलाहल स्वरूप शब्द करता हुआ उस उद्यान के समीप पहुँचा, जहाँ जयदेव, भूपसिंह और सुशीला के ठहरने की खबर सुनी थी।

यह उद्यान विजयपुर से अनुमान 2 मील उत्तर की ओर है। देखने में उद्यान छोटा है, परन्तु बड़ा ही मनोहर है। विजयपुर के सैकड़ों विनोदप्रिय जीव यहाँ जी बहलाने को आया करते हैं। उद्यान के बीच में एक छोटा सा सरोवर है, जिसके चारों ओर सीढ़ियाँ बंधा हुआ पक्का घाट है। एक ओर एक छोटी दालान है। वर्षा के दिनों में प्रायः लोग उसी में बैठकर विश्राम पाते हैं।

उसी दालान में इस समय एक बड़ा ही मनोवेधक करुणापूर्ण दृश्य उपस्थित है। महाराज रणवीर भूपसिंह को छाती से लगाये हुए अचेत हैं, भूपसिंह अचेत हैं, श्रीचन्द अचेत हैं, विद्यादेवी अचेत है, दोनों के चरणों में लिपटा हुआ जयदेव अचेत है, विनयचन्द्र अचेत है, विक्रमसिंह अचेत है और उनकी गोद में सिर रक्खे सुशीला अचेत है।

दूसरी ओर उद्यान के वृक्ष, बल्लरी, पुष्पमञ्जरी अचेत हैं, सरोवर का निर्मल जल स्थिर अचेत है, हजारों दर्शक जो उस स्थान को घेरे हुए हैं, सब के सब कठपुतलियों के समान नीरव निस्तब्ध तथा अचेत हैं। जहाँ देखो, तहाँ अचेतन का साम्राज्य है।

थोड़ी देर में इस गम्भीर शान्ति का भंग हुआ। शीतल जल सेवन से उन सबकी मूर्च्छा दूर हुई। साथ ही आक्रन्दन शुरू हो गया। विचित्र रोदन ! किसी को विराम नहीं है।

रणवीरसिंह रोदन करते हैं, विक्रमसिंह अश्रुधारा से पृथ्वी परिप्लुत कर रहे हैं। जयदेव की हिचकी बंध गई है, भूपसिंह कातर हो उठे हैं, श्रीचन्द आक्रन्दन करते हैं, विद्यादेवी नीरव होकर आँसू बहाती है, सुशीला रोती है, दर्शकगणों की भी यही दशा है। किसी के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकलता है। सबके सब मौन धारण किये हुए हैं। अपूर्व मूकाभिनय है। विलक्षण दृश्य है। विचित्र शोभा है। इस सुख के समय, इस शुभ सम्मिलन के समय रोदन का इतना कोलाहल क्यों ? क्या कोई इसका उत्तर दे सकता है ?

सुशीला विद्यादेवी के चरण पकड़े हुए हैं, रणवीर भूपसिंह को छाती से लगाये हुए हैं, श्रीचन्द जयदेव का आलिंगन कर रहे हैं, पर आक्रन्दन कम नहीं होता। वियोग समय में संचित हुआ शोकवारि इस शुभ समय को पाकर हृदय सरोवर के किनारे तोड़कर नयन प्रणालियों से प्रबल वेग द्वारा बह रहा है, परन्तु क्या इस रोदन को शोक कह सकते हैं ? नहीं ! रोदन ही सुख है। चिर वियोग के पश्चात् शुभ सम्मिलन के समय रोदन ही सुख है। इस शुभ सम्मिलन का रोदन पृथ्वी का नहीं है, स्वर्ग का है। यह आक्रन्दन लवणाक्त अश्रुधारा नहीं, किन्तु पवित्र प्रेम-रसकी स्वर्गीय सुधाधारा है। इस प्रेम गङ्गा के जल में जिन्होंने कभी अवगाहन किया है, वे धन्य हैं।

कुछ समय के पश्चात् आक्रन्दन कम हुआ। जयदेव ने महाराज रणवीरसिंह को और विक्रमसिंह को नमस्कार किया। भूपसिंह ने श्रीचन्द को तथा बिलासपुर नरेश को नमस्कार किया और सुशीला ने तीनों को प्रणाम किया। सबने यथायोग्य आशीर्वाद दिया। साथ ही बन्दीजनों ने उच्च कण्ठ से गाया।

“जियै यह रामलखन की जोरी, सङ्ग में सीता वयस किशोरी।”

इसके पश्चात् मंत्री आदि सब लोग आ गये। भूपसिंह और जयदेव सबसे योग्यतानुसार मिले और किसी को कुशल प्रश्न से, किसी को मिष्ठ भाषण से, किसी को मन्दमुस्कान से तथा किसी को दृष्टिनिक्षेप मात्र से ही प्रसन्न करते हुए विजयपुर की ओर चलने लगे। पीछे-पीछे वह विस्तृत जन-सागर लहराता तथा आनन्द कलरव करता हुआ चला। मंत्री आदि ने बहुत कुछ कहा कि आप लोग हाथियों पर, घोड़ों पर अथवा रथ पर जावें, परन्तु ऐसा करने के लिये वे राजी न हुए और पैदल ही चलने में प्रसन्न हुए।

उस समय रणवीरसिंह, विक्रमसिंह तथा श्रीचन्द की हर्ष के मारे कुछ विलक्षण ही दशा हो गई थी। उस समय वे अपने आपको विस्मृत थे। पगड़ी थी, तो जूते नहीं थे, दुपट्टा था, तो पगड़ी नहीं थी। दूसरे आभूषणों को तो पूछता ही कौन है? कभी सबके आगे चलने लगते तो कभी सबके पीछे हो जाते थे। कभी जयदेव को भूपसिंह कहते तो कभी भूपसिंह को जयदेव।

थोड़ी देर में नगर प्रवेश हुआ। छज्जों पर बैठी हुई कुलवधुओं ने भूपसिंह-सुशीला पर पीत अक्षतों और मांगलिक पुष्पों को बालिकाओं ने हँसकर, मुग्धाओं ने मुस्काकर, प्रौढ़ाओं ने हर्ष के आँसू डालकर और वृद्धाओं ने आशीर्वाद देकर उन तीनों महाभाग्यों का सत्कार किया।

राजमहल के द्वार पर अनेक सौभाग्यवती स्त्रियाँ जलपूर्ण घट लिये हुए जिन पर कि घृत के दीपक जल रहे हैं, खड़ी हैं और परमाल्हाद के करने वाले मंगलगीत गा रही हैं।

वहाँ पहुँचते ही भूपसिंह, जयदेव तथा सुशीला की मंगल आरती उतारी गई। इसके पश्चात् और भी राजकीय रीतियाँ थीं, उनकी पूर्ति की गई। राज्य के सम्पूर्ण सेवकों को तथा बन्दीजनों को भरपूर पारितोषिक बांटा गया। ब्राह्मणों को, विद्वानों को इच्छित दक्षिणा दी गई। उसी समय दरबार किया गया और सम्पूर्ण आगत पुरुषों को ताम्बूलादि से सत्कार करके हर्ष प्रकाशित किया गया।

उस दिन महाराज रणवीरसिंह तथा विक्रमसिंह ने जयदेव तथा सुशीला को राजमहल में ही रक्खा। श्रीचन्द, विद्यादेवी तथा विनयचन्द्र भी वहीं रहे। वह दिन बड़े ही आनन्द से व्यतीत हुआ। सारा नगर सुखसागर में आन्दोलित होता रहा।

दूसरे दिन श्रीचन्दजी, जयदेव व सुशीला को अपने घर लिवा ले गये। उस दिन जौहरी श्रीचन्द ने भी अपनी शक्ति भर उत्सव करने में कोई कसर नहीं रक्खी।

परिशिष्ट

जयदेव, भूपसिंहादि की दुःख रजनी समाप्त हो गई। सौख्य सूर्य का सुहावना उदय हो गया। विजयपुर राज्य की पंकज प्रजा उस अपूर्व प्रकाश से प्रफुल्लित हो गई। इधर बिलासपुर भी उसी दिन सुशीलादि के आगमन समाचार सुनकर उत्सवमय बन गया।

जयदेव की सम्मति से महाराजा रणवीरसिंह ने सुवर्णपुर नरेश के समीप अपने एक मंत्री को यह समाचार लेकर भेजा कि भूपसिंह मेरे पुत्र हैं। वे प्रसन्नता से विजयपुर आ पहुँचे हैं। आप किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करें। यह समाचार फैलते ही सुवर्णपुर भी हर्षोल्लसित हो उठा।

महाराजा विजयसिंह बड़े भारी ठाट-वाट के साथ मदनमालती को साथ लेकर विजयपुर आये और अपने सम्बन्धियों के सत्कार से सन्तुष्ट हुए। मदनमालती अपने प्राणनाथ को पाकर प्रमुदित हो गई। पुत्रवधु सहित भूपसिंह को देखकर महाराज रणवीरसिंह के नेत्र शीतल हो गये।

महाराज विक्रमसिंह की तथा रणवीरसिंह की इच्छा थी कि उदयसिंह तथा बलवन्तसिंह को उचित दण्ड दिया जावे, परन्तु दयावान जयदेव और वीर्यवान भूपसिंह के आग्रह से वे दोनों सर्वथा क्षमा करके छोड़ दिये गये।

महाराज निहालसिंह (उदयसिंह के पिता) को अपने पुत्र के उक्त काले कृत्यों को सुनकर बहुत दुःख हुआ। उन्होंने आज्ञा जारी कर दी कि उदयसिंह और बलवन्त हमारे राज्य भर में कहीं भी आश्रय न पावें।

सूर्यपुर की मालिन को बुलाकर बहुत सा पारितोषिक दिया गया और विजयपुर में ही सदा के लिये उसकी जीविका का प्रबन्ध कर दिया गया।

जिस समय रेवती ने योगी का वेष धारण किया था और बलदेव सिंह उसका शिष्य बना था, उसी समय उन दोनों के हृदय में स्नेह ने अपना स्थान बना लिया था, यह बात किसीप्रकार महाराज रणवीरसिंह के कानों तक पहुँच गई, इसलिये उन्होंने प्रसन्नता के साथ उन दोनों को सदा के लिये स्नेहबन्धन में बांध दिया। विवाह के पश्चात् एक दिन रेवती के आने पर सुशीला ने मुस्कराते हुए पूछा-आईये ठकुराइनजी! कहिये आपके शिष्य महाशय तो प्रसन्न हैं? रेवती ने चट से उत्तर दिया-जी! आपकी मालती जी की कृपा चाहिये, फिर अप्रसन्नता का क्या काम है?

हीरालाल की स्त्री सुभद्रा को एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। गुणवती सुभद्रा ने बहुत उत्तम रीति से लालन-पालन करके उसको बड़ा किया। 4-5 वर्ष का होने पर उसकी शिक्षा पर कंचनपुर नरेश स्वयं देख-रेख रखने लगे। पश्चात् समर्थ होने पर रतनचन्द्र की दुकान का वह स्वामी बनाया गया। सुभद्रा ने पुत्र की चिन्ता से निवृत्त होकर एक बुद्धिशालिनी आर्यिका के निकट जिनदीक्षा ले ली।

जयदेव के चले जाने पर कंचनपुर नरेश ने रतनचन्द के दानद्रव्य से एक पाठशाला खोल दी और अच्छे-अच्छे विद्वान अध्यापकों की उसमें नियुक्ति कर दी। प्रतिज्ञानुसार कई वर्ष के बाद जयदेव ने कंचनपुर नरेश से जाकर भेंट की और श्रीरतनचन्द पाठशाला का अवलोकन करके सन्तोष प्रकट किया। कंचनपुर नरेश ने जयदेव को स्नेहवश बहुत दिन तक अपने यहाँ रक्खा।

कुछ दिन में भूपसिंह और जयदेव को एक-एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। बड़े आनन्द से उनके जीवन के दिन अतिवाहित होने लगे। महाराज रणवीरसिंह और जौहरी श्रीचन्द पौत्रों के मुख देखकर स्वर्ग-सुखों का अनुभव करने लगे।

रतनचन्द दीक्षित हो गये। उनका दीक्षा नाम ‘श्रीविमल कीर्तिमुनि’ रखा गया। गुरु के पास विद्याभ्यास करके कुछ दिनों में उन्होंने असाधारण विद्वत्ता प्राप्त कर ली। तपस्या करने से भी वे अद्वितीय हो गये। इन्द्रियों की विषयलालसाओं का उन्होंने खूब दमन किया। अन्तरंग तप के शृंगार से भूषित होकर वे संघ के साथ विहार करने लगे और अपने अपूर्व उपदेशामृत से चिरसंतप्त प्राणियों के चित्तों को शान्तिता प्रदान करने लगे।

जयदेव सरस्वती पाठशाला का निरीक्षण करने के लिये बिलासपुर गये थे। महाराज विक्रमसिंह ने उन्हें बुला भेजा था और उसी समय श्री विमलकीर्ति मुनि का भी अचानक आगमन हुआ था।

उस दिन महाराज उनके दर्शन के लिये गये थे कि मुनिराज के व्याख्यान से उनके हृदय पट पर संसार का भयानक चित्र खिंच गया। लौट के घर आने पर भी वे उस चित्र को हृदय से दूर नहीं कर सके। आखिर अपने राज्य का सम्पूर्ण भार जयदेव को सौंप करके वे दूसरे ही दिन दीक्षित हो गये। महारानी मदनवेगा भी अपने पति की अनुगामिनी हो गई।

उधर विजयपुर में यह खबर सुनकर महाराज रणवीरसिंह और श्रीचन्द को भी वैराग्य उत्पन्न हुआ, इसलिए वे भी गृह का सम्पूर्ण भार भूपसिंह और जयदेव को सौंप करके दीक्षित हो गये। विद्यादेवी ने भी एक आर्यिका के निकट आर्यिका के व्रत ग्रहण कर लिये।

इस लोक सम्बन्धी सम्पूर्ण सुखों को भोगकर के जो लोग परलोक के लिये भी यहीं प्रयत्न कर लेते हैं, उनके समान भाग्यशाली और बुद्धिमान कौन है ?

:: इति समाप्त ::

श्री वर्द्धमान न्यास, अमायन (भिण्ड, म.प्र.) द्वारा प्रकाशित, उपलब्ध सत्साहित्य-
(श्री ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’ विरचित)

क्र. नाम न्यौछावर राशि

  1. अमृत वचन (सजिल्द) 50/-
  2. स्वानुभव पत्रावलि (सजिल्द) 50/-
  3. जीवन पथ दर्शन (सजिल्द) 50/-
  4. जीवन पथ दर्शन (संक्षिप्त) 20/-
  5. लघु बोध कथाएँ 30/-
  6. जिनवर स्तवन (सजिल्द) 30/-
  7. स्वरूप-स्मरण (सजिल्द) 40/-
  8. जिन-भक्ति सिंधु (सजिल्द) 50/-
  9. वर्द्धमान पूजाञ्जलि (सजिल्द) 60/-
  10. सहज पाठ संग्रह (सजिल्द) 50/-
  11. वैराग्य पाठ संग्रह (सजिल्द) 40/-
  12. दृष्टांत-सिद्धांत (सजिल्द) 40/-
  13. नीति वचन (सजिल्द) 50/-
  14. जिनवर-गुणगान (सजिल्द) 50/-
  15. अमृत सागर (सजिल्द) 50/-
  16. श्री सम्मेदशिखर मण्डल विधान 20/-
  17. श्री रत्नत्रय विधान एवं चौंसठ ऋद्धि विधान 20/-
  18. श्री पंच बालयति तीर्थंकर मण्डल विधान 20/-
  19. श्री चौबीस तीर्थंकर मण्डल विधान 30/-
  20. उन्नति 30/-
  21. प्रेरणा 30/-
  22. बाल भावना 40/-
  23. दशलक्षण धर्म देशना 30/-
  24. प्रेरणा-दीप (ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’-संस्मरण) 30/-
    अन्य -
  25. अनुबंध-श्रीमती रूपवती ‘किरण’ 30/-
  26. पावन मन-श्रीमती रूपवती ‘किरण’ 30/-
  27. जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (सजिल्द)-श्रीमती रूपवती ‘किरण’ 50/-
  28. वसंततिलका-श्रीमती रूपवती ‘किरण’ 25/-
  29. पूर्णिमा-श्री भगवत् जैन 30/-
  30. अमर विश्वास (कहानी संग्रह) 30/-
  31. विराग सरिता-श्रीमद् राजचंद्रजी के वचनामृत 30/-
  32. शीलवती सीता 20/-
  33. सुशीला उपन्यास (सजिल्द)-पं. गोपालदास जी बरैया 50/-

सम्पर्क सूत्र- प्रवीण भैया, अमायन, मोबा.- 9926316216
नोट :- पी.डी.एफ. फाइल भी उपलब्ध है।