सोलहवां पर्व
तीसरे दिन मुनि परिषद् के एकत्र होने पर रतनचन्द ने विनय पूर्वक प्रश्न किया कि महाराज ! आज कृपा करके यह बतलाइये कि मोक्षमार्ग के पूर्ण होने का क्रम क्या है ? यह सुनकर आचार्य भगवान ने कहा रतनचन्द ! आज का तुम्हारा प्रश्न बहुत ही अच्छा हुआ। इसके उत्तर को सुनकर तुम्हें बहुत समाधान तथा संतोष होगा। जैन मार्ग का सच्चा गौरव इसी विषय के सुनने से प्रगट होगा।
कारण के दो भेद हैं-एक समर्थ कारण है और दूसरा असमर्थ कारण। सहकारी समस्त सामग्री के सद्भावपूर्वक सम्पूर्ण प्रतिबंधकों के अभाव को समर्थ कारण कहते हैं, कार्य की सिद्धि असमर्थ कारण से नहीं होती, किन्तु समर्थ कारण के सद्भाव होते ही हो जाती है। मोक्ष का समर्थ कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र की एकता तथा पूर्णता है। उसके होते ही तत्काल मोक्ष होता है, परन्तु इन तीनों की एकत्रता पूर्णता युगपत् नहीं होती, क्रमपूर्वक होती है। तुम्हारा प्रश्न इसी क्रम के विषय में है। अच्छा, तो मैं अब इसके उत्तर का प्रारम्भ करता हूँ।
अनादिकाल से चतुर्गति में परिभ्रमण करते हुए जीवों में से जिस जीव का अर्धपुद्गलपरावर्तन प्रमाण काल शेष रहता है, वह जीव सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का पात्र होता है। क्षयोपशम, देशना, विशुद्धि, प्रायोगिक तथा करण इन पाँच लब्धियों का सन्निधान होते ही सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षी मिथ्यात्व (दर्शनमोह) तथा अनन्तानुबंधी चार कषाय इन पाँच प्रकृतियों का उपशम होता है। उस समय आत्मा में जो सम्यग्दर्शन परिणाम प्रगट होता है, वह प्रथमोपदेश सम्यग्दर्शन है। इस सम्यग्दर्शन के लाभ से आत्मा में जो विशुद्ध परिणाम होते हैं, उनसे मिथ्यात्व प्रकृति के तीन खण्ड हो जाते हैं इससे पहले अनादि मिथ्यादृष्टि जीव के दर्शनमोहनीय कर्म की एक मिथ्यात्व प्रकृति ही थी।
उक्त तीन खण्डों में से एक खण्ड को सम्यक्त्व प्रकृति कहते हैं। विशुद्धि परिणामों के बल से इन परमाणुओं में अनुभाग शक्ति इतनी क्षीण हो जाती है कि वे सम्यक्त्व का निर्मूल घात तो नहीं कर सकते, परन्तु शङ्का आदिक मल उत्पन्न करते हैं। दूसरे खण्ड का नाम मिश्र प्रकृति है। इसके परमाणुओं का अनुभाग इसप्रकार क्षीणाक्षीण हो जाता है कि इसके उदय से आत्मा में मिश्रित दही-गुड़ के स्वर की तरह सम्यक्त्व तथा मिथ्यात्वरूप जुदे-जुदे परिणाम नहीं होते, किन्तु मिश्रित परिणाम होते हैं। तीसरा खण्ड मिथ्यात्व प्रकृति स्वरूप ही है। अब इस जीव के सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षभूत दर्शनमोह की प्रकृति तीन तथा चारित्र मोह की अनन्तानुबन्धी कषाय चतुष्टय इसप्रकार सात प्रकृति हुई। इन सात प्रकृतियों में से यदि मिथ्यात्व प्रकृतियों का उदय हो जाय तो यह जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्व को छोड़कर मिथ्यादृष्टि संज्ञक प्रथम गुणस्थानवर्ती हो जाता है। यदि मिथ्यात्व का उदय न हो और अनन्तानुबन्धियों में से किसी एक का उदय हो जाये, तो सम्यक्त्व का घात हो जाता है और जीव सासादन सम्यग्दृष्टि बन जाता है।
जिस जीव की मिश्र प्रकृति का उदय हो जाता है वह मिश्र परिणामों का अनुभव करने से तीसरा मिश्र गुणस्थानवर्ती कहलाता है और जिस जीव के सम्यक्त्व प्रकृति का उदय होता है, उसको दर्शनमोह का क्षयोपशम होने से क्षयोपशम अथवा वेदक सम्यक्त्व कहा जाता है।
यही वेदक सम्यग्दृष्टि जीव के केवली अथवा श्रुतकेवली के पाद मूल में अनन्तानुबन्धी का विसंयोजन (अप्रत्याख्यानादि बारह प्रकृति रूप परिणमावना) कर दर्शनमोह की तीन प्रकृतियों का क्षय करके क्षायिक सम्यक्त्व को प्राप्त होता है। प्रथमोपशम सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक तथा क्षायिक ये तीनों ही सम्यक्त्व सहित जीव चतुर्थ गुणस्थानवर्ती कहलाते हैं। चौथे गुणस्थान के ऊपर सम्यग्दृष्टि जीव ही होते हैं तथा सम्यग्दर्शन के सद्भाव से ज्ञान भी सम्यग्ज्ञान हो जाता है। यहाँ इतना विशेष है कि प्रथमोपशम तथा क्षायोपशमिक सम्यक्त्व चौथे गुणस्थान से सातवें गुणस्थान पर्यन्त ही होते हैं और क्षायिक सम्यक्त्व की उत्पत्ति चौथे, पाँचवे, छट्ठे, सातवें इनमें से किसी एक में होती है।
सम्यग्दर्शन ग्रहण करने के पश्चात् कोई जीव प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से हिंसादिक पाँच पापों का सर्वथा त्याग करने में असमर्थ होकर उनका एकदेश त्याग करके श्रावक के व्रतों को धारण करता हुआ देशविरत संज्ञक पंचम गुणस्थानवर्ती होता है तथा जिस जीव के प्रत्याख्यानावरण कषाय का उपशम हो जाता है और संज्वलन और नो कषाय रूप* चारित्र मोहनीय कर्म का मन्द
उदय होता है, वह चौथे अथवा पाँचवें गुणस्थान को त्यागकर
हिंसादिक पंच पापों को सर्वथा छोड़ अप्रमत्त संज्ञक सातवें
गुणस्थान को धारण करता है, पश्चात् संज्वलन तथा नो कषाय के
तीव्र उदय से विकथादिक प्रमादों को प्राप्त होकर प्रमत्त संज्ञक छठे
स्थान में पदार्पण करता है।
छठे और सातवें इन दोनों ही गुणस्थानों का जघन्य और
उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त मात्र है और इन दोनों ही गुणस्थानों को यह
जीव अनेक बार छोड़ता तथा ग्रहण करता है। जब तक सातवें
गुणस्थान में से यह जीव छठे गुणस्थान को जाया करता है तब तक
उसके सातवें गुणस्थान को स्वस्थान अप्रमत्त कहते हैं और जब यह
जीव श्रेणी चढ़ने को सन्मुख होता है, तब इस गुणस्थान को
सातिशय अप्रमत्त कहते हैं। श्रेणी शब्द का अर्थ नसेनी है, यहाँ
उपमार्थ में श्रेणी शब्द का ग्रहण है अर्थात् मोक्षरूपी महल के
*चारित्र मोहनीय कर्म के 25 भेद हैं। जिनमें से अनंतानुबन्धी क्रोध,
मान, माया, लोभ, सम्यक्त्व के घातक हैं। अप्रत्याख्यानावरण क्रोधादिक
4 देश चारित्र के घातक हैं। प्रत्याख्यानावरण क्रोधादिक 4 सकल चारित्र
के घातक हैं। संज्वलन क्रोधादिक 4 तथा हास्य, रति, अरति, शोक, भय,
जुगुप्सा, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, वेद-9 सब मिलकर 13 यथाख्यात चारित्र
के घातक हैं।
शिखर पर चढ़ने के लिये जो नसेनी का काम देवे, उसे श्रेणी कहते हैं। अष्ट कर्मों का सरदार मोहनीय कर्म है। मोहनीय कर्म का नाश किये बिना शेष सात कर्मों का नाश नहीं होता।
इसलिये सबसे पहले मोहनीय कर्म नाश किया जाता है। इस मोहनीय कर्म के 28 भेद हैं। जिनमें से दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृति और चारित्र मोहनीय की अनन्तानुबन्धी क्रोधादिक चार इसप्रकार 7 प्रकृति सम्यग्दर्शन का घात करती हैं। शेष चारित्र मोहनीय की 21 प्रकृतियाँ चारित्र की घातक हैं।
प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टि श्रेणी चढ़ने का अधिकारी नहीं है और वेदक सम्यग्दृष्टि श्रेणी चढ़ने से पहले अनन्तानुबन्धी चतुष्क का विसंयोजन करके दर्शनमोह की तीन प्रकृतियों का क्षय करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि होता है अथवा उन तीनों का उपशम करके द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि होता है।
श्रेणी के दो भेद हैं-एक उपशम श्रेणी और दूसरी क्षपक श्रेणी। जिसमें चारित्र मोहनीय की 21 प्रकृतियों का उपशम किया जाय, उसको उपशम श्रेणी कहते हैं। श्रेणी का प्रारम्भ आठवें गुणस्थान से होता है। सातिशय अप्रमत्त में श्रेणी की सम्मुख अवस्था है। दसवें गुणस्थान के अन्त में उपशम श्रेणी वाला 21 प्रकृतियों का उपशम कर चुकता है और क्षपक श्रेणी वाला क्षय कर चुकता है।
इसके पश्चात् चारित्र मोहनीय कर्म की उपशांत अवस्था को भोगने वाले जीव को उपशांत कषाय संज्ञक ग्यारहवें गुणस्थान का धारक कहते हैं और क्षय अवस्था को भोगने वाले जीव को क्षीणमोह संज्ञक बारहवें गुणस्थान का धारक कहते हैं। इन दोनों गुणस्थान वाले जीवों के उदय की अपेक्षा विशुद्धता में कुछ भी अन्तर नहीं है।
केवल इतना विशेष है कि ग्यारहवें गुणस्थान वाला जीव अपने स्थान से च्युत होकर नीचे के गुणस्थानों में आता है और बारहवें गुणस्थान वाला अपने स्थान से नीचे न गिरकर ऊँचा चढ़ता हुआ नियम से मोक्ष को जाता है। ये दोनों ही गुणस्थान वाले समस्त कषायों के उदय के अभाव से अथवा क्षय की अपेक्षा से वीतराग छद्मस्थ कहलाते हैं।
क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव उपशम और क्षपक दोनों ही श्रेणी चढ़ सकता है, किन्तु द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि केवल उपशम श्रेणी ही चढ़ सकता है, क्षपक श्रेणी नहीं चढ़ता। क्षपक श्रेणी चढ़ने का अधिकार केवल क्षायिक सम्यग्दृष्टि को ही है।
चारित्र मोहनीय की 21 प्रकृतियों को उपशमावने तथा क्षपावने के लिये जीव अधःप्रवृत्त करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तकरण संज्ञक तीन करणों को करता है। उनमें से अधःप्रवृत्तकरण सातवें, अपूर्वकरण आठवें, और अनिवृत्तकरण नवें गुणस्थान में होता है। करण नाम परिणामों का है। इन परिणामों के प्रति समय अनन्तगुणी विशुद्धता होती जाती है, जिससे कर्मों का उपशम तथा क्षय और स्थिति खंडन तथा अनुभाग खंडन होते हैं। इन तीनों करणों का काल यद्यपि सामान्यालाप से अन्तर्मुहूर्त मात्र है तथापि अधःकरण के काल के संख्यातवें भाग अपूर्वकरण का काल है। अपूर्वकरण काल के संख्यातवें भाग अनिवृत्तकरण का काल है। अधःकरण के परिणाम असंख्यात लोक प्रमाण हैं।
अपूर्वकरण के परिणाम अधःकरण के परिणामों से असंख्यात लोकगुणित हैं और अनिवृत्तकरण के काल के जितने समय हैं उतने ही उसके परिणाम हैं। इन सबका खुलासा अंक संदृष्टि द्वारा करते हैं
कल्पना करो कि अधःकरण के काल के समयों का प्रमाण 16, अपूर्वकरण के काल के समयों का प्रमाण 8 और अनिवृत्तकरण के काल के समयों का प्रमाण 4 है। अधःकरण के परिणामों की संख्या 3072, अपूर्वकरण के परिणामों की संख्या 4096 और अनिवृत्तकरण के परिणामों की संख्या 4 है। एक समय में एक जीव के एक परिणाम होता है, इसलिये एक जीव अधःकरण के 16 परिणामों को ही धारण कर सकता है।
अधःकरण के परिणाम जो 16 से अधिक कहे हैं वे नाना जीवों की अपेक्षा से कहे हैं। वहाँ इतना विशेष है कि अधःकरण के 16 समयों में से प्रथम समय में यदि कोई भी जीव अधःकरण मांडेगा तो उसके अधःकरण के समस्त परिणामों में से पहले 162 परिणामों में से कोई एक परिणाम होगा अर्थात् तीन काल में चाहे जब चाहे जो जब कभी अधःकरण मांडेगा, तो उसके पहले समय में नम्बर 1 से लगाकर नं. 162 तक के परिणामों में से उसकी योग्यता अनुसार कोई एक परिणाम होगा।
इस ही प्रकार किसी भी जीव के उसके अधःकरण मांडने के दूसरे समय में नं. 40 से लगाकर नं. 205 तक 166 परिणामों में से कोई एक परिणाम होगा। इस ही प्रकार आगे के समयों में भी मेरे हाथ में जो यह यंत्र है (देखो पृष्ठ-282) इसके अनुसार जान लेना चाहिये कि अधःकरण के अपुनरुक्त परिणाम केवल 912 हैं और समस्त समयों में संभव पुनरुक्त और अनुरुक्त परिणामों का जोड़ 3072 है।
इस अधःकरण के परिणाम चय (समानवृद्धि) वर्द्धित है अर्थात् पहले समय के परिणाम से द्वितीय समय के परिणाम जितने अधिक हैं उतने ही उतने द्वितीयादिक समयों के परिणामों से तृतीयादिक समयों के परिणाम अधिक हैं।
इस दृष्टांत में चय का प्रमाण 4 है, स्थान का प्रमाण 16 और सर्व धन का प्रमाण 3072 है। प्रथम स्थान में वृद्धि का अभाव है, इसलिये अन्तिम स्थान में एक घाटि पद (स्थान) प्रमाण चयवर्धित हैं। एक घाटि पद के आधे को चय और पद से गुणा करने से 15×4×16/2=480 चय धन का प्रमाण होता है।
भावार्थ-प्रथम समय के समान समस्त समयों में परिणामों को भिन्न समझ कर वर्धित प्रमाण के जोड़ को चयधन वा उत्तरधन कहते हैं। सर्व धन में से चयधन को घटाकर शेष में पद का भाग देने से प्रथम समय सम्बन्धी परिणाम पुंज का प्रमाण 3072-480/16=162 होता है। इसमें क्रम से एक-एक चय जोड़ने से द्वितीयादिक समयों के परिणाम पुंज का प्रमाण होता है। एक घाटिपद प्रमाण चय मिलने से अन्त समय सम्बन्धी परिणाम पुंज का प्रमाण 162+150×4=222 होता है।
एक समय में अनेक परिणामों की संभावना है, इसलिये एक समय में अनेक जीव अनेक परिणामों को ग्रहण कर सकते हैं, अतएव एक समय में नाना जीवों की अपेक्षा से परिणामों में विसदृशता है। एक समय में अनेक जीव एक ही परिणाम को ग्रहण कर सकते हैं, इसलिये एक समय में नाना जीवों की अपेक्षा से परिणामों में सदृशता है।
भिन्न समयों में अनेक जीव अनेक परिणामों को ग्रहण कर सकते हैं, इसलिये भिन्न समयों में नाना जीवों की अपेक्षा से परिणामों में विसदृशता है। जो परिणाम किसी एक जीव के प्रथम समय में हो सकता है, वही किसी जीव के दूसरे समय में, किसी तीसरे जीव के तीसरे समय में और किसी चौथे जीव के चौथे समय में हो सकता है। जैसे कि 162 नम्बर के परिणाम की प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ समय में सम्भावना है।
इतना कहकर मुनिराज ने एक पत्र पर लिखा हुआ यंत्र सबको दिखलाया-देखो पृष्ठ-282।
इन सब बातों को ध्यान में रखकर पूर्वाचार्यों ने अधःप्रवृत्तकरण का लक्षण इस प्रकार कहा है-
जम्हा उवरिमभावा हेट्ठिम भावेहि सरिसगा होंति।
तम्हा पढमं करणं अधापवत्तेति णिद्दिट्ठं।।
अर्थात्-क्योंकि इस करण में उपरितन और अधस्तन (ऊपर और नीचे के) समय सम्बन्धी परिणामों की सदृशता होती है, इसलिये इस करण का नाम अधःप्रवृत्तकरण कहा है। इस अधःकरण में रचना का अभिप्राय ऐसा है कि ऊपर और नीचे के समय सम्बन्धी परिणामों में जितने समय तक सदृशता की संभावना है, उतने ही उतने खंड समस्त समय सम्बन्धी परिणामों के किये गये हैं और उनमें से प्रत्येक खण्ड में परिणामों की संख्या इतनी इतनी है कि जितने जितने परिणाम क्रम से अनन्तर अनन्तर समयों में सदृश हैं।
भावार्थ-जैसे प्रथम समय सम्बन्धी परिणामपुंज 162 के 39, 40, 41 और 42 ये चार खण्ड इस क्रम में किये गये हैं कि नम्बर 139 तक 39 ऐसे परिणाम हैं जो ऊपर किसी भी समय में नहीं पाए जाते, इतने ही परिणामपुंज का नाम प्रथम खण्ड है। दूसरे खण्ड में नम्बर 40-79 तक 40 परिणाम ऐसे हैं, जो प्रथम और द्वितीय दोनों समयों में पाये जाते हैं। तीसरे खण्ड में नम्बर 80-120 तक 41 परिणाम ऐसे-
अधःकरण यंत्र
| परिणामों की संख्या और नं. |
अनुकृष्टि रचना |
|
|
|
| 222 |
54 |
55 |
56 |
57 |
| नं. 691-912 |
691-744 |
745-799 |
800-855 |
856-912 |
| 218 |
53 |
54 |
55 |
56 |
| नं. 638-855 |
638-690 |
691-744 |
745-799 |
800-885 |
| 214 |
52 |
53 |
54 |
55 |
| 586-799 |
586-637 |
638-690 |
691-744 |
745-799 |
| 210 |
51 |
52 |
53 |
54 |
| 535-744 |
535-585 |
586-637 |
638-690 |
691-744 |
| 206 |
50 |
51 |
52 |
53 |
| 485-690 |
485-534 |
535-585 |
585-637 |
638-690 |
| 202 |
49 |
50 |
51 |
52 |
| 436-630 |
436-484 |
485-534 |
535-585 |
546-637 |
| 198 |
48 |
49 |
50 |
51 |
| 388-585 |
388-435 |
436-484 |
485-534 |
535-585 |
| 194 |
47 |
48 |
49 |
50 |
| 341-534 |
341-387 |
388-435 |
436-484 |
485-534 |
| 190 |
46 |
47 |
48 |
49 |
| 295-484 |
295-340 |
341-387 |
388-435 |
436-484 |
| 186 |
45 |
46 |
47 |
48 |
| 250-435 |
250-294 |
295-340 |
341-387 |
388-435 |
| 182 |
44 |
45 |
46 |
47 |
| 206-387 |
206-249 |
250-294 |
295-340 |
341-387 |
| 178 |
43 |
44 |
45 |
46 |
| 163-340 |
163-205 |
206-249 |
250-294 |
295-340 |
| 174 |
42 |
43 |
44 |
45 |
| 121-294 |
121-162 |
163-205 |
206-249 |
350-294 |
| 170 |
41 |
42 |
43 |
44 |
| 80-249 |
80-120 |
121-162 |
163-205 |
206-249 |
| 166 |
40 |
41 |
42 |
43 |
| नं. 40-205 |
40-79 |
80-120 |
121-162 |
163-205 |
| 162 |
39 |
40 |
41 |
42 |
| नं. 1-162 |
1-38 |
40-79 |
80-120 |
121-162 |
हैं जो प्रथम, द्वितीय और तृतीय इन तीन समयों में पाये जाते हैं और
चतुर्थ खंड में नम्बर 121-162 तक 42 परिणाम ऐसे हैं, जो प्रथम,
द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ इन चारों समयों में पाये जाते हैं।
इसीप्रकार अन्य समयों में भी जानना। अधःकरण के ये समस्त
परिणाम ऊपर पूर्व पूर्व परिणाम से उत्तर उत्तर परिणाम अनंत
अनन्त गुणी विशुद्धता लिये हुए हैं।
जिसप्रकार अधःकरण में ऊपर और नीचे के समय सम्बन्धी
परिणामों में सदृशता पाई जाती है, उसीप्रकार अपूर्वकरण के
परिणामों में सदृशता नहीं पाई जाती, किन्तु प्रति समय अपूर्व
अपूर्व ही परिणाम होते हैं, इसीलिये इस करण का नाम अपूर्वकरण
है अर्थात् ऐसे परिणाम पहले संसार अवस्था में कदापि नहीं हुए थे।
अंकसंदृष्टि से अपूर्व करण की रचना इसप्रकार है -
नम्बर समय परिणामों की संख्या परिणामों के नम्बर
8 568 3529-4096
7 552 2977-3528
6 536 2441-2976
5 520 1921-2440
4 504 1417-1920
3 488 929-1416
2 472 457-928
1 456 1-456
सर्वथा जोड़ - 4096 होता है।
इस यंत्र में सर्वधन 4096 चय का प्रमाण 16 स्थान का प्रमाण 8 है। चय धन का प्रमाण 7×16×8/2=448। प्रथम समय सम्बन्धी परिणाम पुंज का 4096-448/8=456 है। एक-एक चय जोड़ने से द्वितीयादिक समय सम्बन्धी परिणामपुंज का प्रमाण होता है। एक घटि पद प्रमाण चय जोड़ने से अन्त समय सम्बन्धी परिणाम पुंज का प्रमाण 456+7×16=568 होता है। इस यंत्र से सर्वथा स्पष्ट है कि एक समय में अनेक परिणामों की सम्भावना होने से अनेक जीव अनेक तथा एक परिणाम को ग्रहण कर सकते हैं। इसलिये एक समय में नाना जीवों की अपेक्षा से सदृशता तथा विसदृशता दोनों हो सकती है, किन्तु जो परिणाम निम्न समय में सम्भव है, वे परिणाम ऊपर के समय में कदापि सम्भव नहीं है इसलिये निम्न समयों में नाना जीवों की अपेक्षा विसदृशता ही है, सदृशता नहीं है।
जिसप्रकार नाना जीवों के एक समय में संस्थानादिक की अपेक्षा से भेद हैं, उसीप्रकार एक समय में नाना जीवों के परिणामों में जहाँ भेद नहीं हो, उसे अनिवृत्तकरण कहते हैं। उसकी अंकसद्दृष्टि से रचना इस प्रकार है-
नम्बर। समय परिणाम संख्या परिणाम नम्बर
4 1 4
3 1 3
2 1 2
1 1 1 भावार्थ-इसके अनिवृत्तकरण के काल के 4 समय हैं और चार ही इसके समस्त परिणामों का प्रमाण है, इसलिये एक समय में एक ही परिणाम है। अतएव एक समय में अनेक जीवों के परिणाम सदृश ही होते हैं, विसदृश नहीं होते तथा भिन्न समयों में विसदृश होते हैं, सदृश नहीं होते। जिसप्रकार यह स्वरूप दृष्टान्त द्वारा कहा है, उसीप्रकार यथार्थ में लगा लेना चाहिए। दृष्टान्त को ही यथार्थ न समझ लेना चाहिये। इसप्रकार नववें गुणस्थान का स्वरूप कहकर अब आगे दसवें गुणस्थान का स्वरूप कहते हैं।
अनेक प्रकार अनुभागशक्ति को धारण करने वाली कर्मवर्गणाओं के समूह को स्पर्द्धक कहते हैं। नववें गुणस्थान से पहले संसार अवस्था में जो स्पर्द्धक पाये जाते हैं, उनको पूर्व स्पर्द्धक कहते हैं। अनिवृत्तकरण के परिणामों से जिनका अनुभाग क्षीण हो गया है, उनको अपूर्व स्पर्द्धक कहते हैं।
इसीप्रकार अनिवृत्तकरण के परिणामों से जिनका अनुभाग अपूर्व स्पर्द्धक से भी क्षीणतर हो गया है, उसको वादरकृष्टि कहते हैं तथा जिनका अनुभाग वादरकृष्टि से भी क्षीणतर हो गया है, उसको सूक्ष्मकृष्टि कहते हैं। तीन करण के परिणामों से क्रम से लोभकषाय के बिना चारित्र मोहनीय की शेष बीस प्रकृतियों का उपशम अथवा क्षय होने पर सूक्ष्मकृष्टि को प्राप्त लोभ कषाय के उदय को अनुभव करते हुए जीव के सूक्ष्मसांपराय संज्ञक दसवां गुणस्थान होता है। ग्यारहवें और बारहवें गुणस्थान के स्वरूप पहले कह चुके हैं। अब आगे तेरहवें गुणस्थान का स्वरूप कहते हैं।
इस जीव के अनादिबद्ध अष्टकर्मों की 148 प्रकृति हैं। उनमें से तद्भवमोक्षगामी जीव के नरक, तिर्यंच और देव आयु इन तीन प्रकृतियों की सत्ता ही नहीं होती है। जिस काल में यह जीव क्षायिक सम्यक्त्व को प्राप्त होता है, तब पूर्वोक्त सात प्रकृतियों का क्षय कर लेता है। इसप्रकार तद्भवमोक्षगामी जीव के सातवें गुणस्थान के अन्त में दश प्रकृतियों की सत्ता नष्ट हो गई, तथा नववें गुणस्थान में 36 प्रकृतियों का नाश करके दसवें गुणस्थान लोभप्रकृति का नाश पूर्वक बारहवें गुणस्थान के अन्त में 16 प्रकृतियों का नाश करता है।
इसप्रकार चार घातिया कर्मों की 47 और अघातिया कर्मों की 16 कुल मिलाकर 63 प्रकृतियों के नाश से इस जीव से इस जीव के केवलज्ञान की उत्पत्ति होती है तथा योगों का इसके सद्भाव है। इस कारण यह जीव संयोग केवली संज्ञक तेरहवें गुणस्थानवर्ती कहलाता है।
इस तेरहवें गुणस्थानवर्ती जीव को सकल परमात्मा तथा अर्हन्त कहते हैं। इनके अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख और अनन्तवीर्य रूप अनन्तचतुष्टय प्रगट होते हैं। ये अपनी दिव्यध्वनि द्वारा भव्य जीवों को धर्मोपदेश देकर संसार में मोक्षमार्ग की प्रवृत्ति करते हैं।
यहाँ इस जीव के मोक्ष के कारणभूत सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान की तो पूर्णता हो गई है, परन्तु कषायों का सर्वथा नाश होने पर भी योगों का सद्भाव होने से योग और कषाय के अभावस्वरूप चारित्र की पूर्णता नहीं हुई है। इसीकारण अभी मोक्ष भी नहीं हुआ है। मूल शरीर को बिना छोड़े आत्म प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलने का नाम समुद्घात है।
उस समुद्घात के सात भेद हैं। 1-वेदनासमुद्घात 2-कषायसमुद्घात, 3-आहारकसमुद्घात, 4-वैक्रियिकसमुद्घात, 5-मारणांतिकसमुद्घात, 6-तैजससमुद्घात और 7-केवलिसमुद्घात । वेदना के निमित्त से आत्म प्रदेशों के बाहर निकलने का नाम वेदना समुद्घात है। कषाय के निमित्त से आत्म प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलने का नाम कषाय समुद्घात है।
छठे गुणस्थानवर्ती मुनि के शंका उत्पन्न होने पर जो आहारक शरीर का पुतला मस्तक में से निकलकर केवली के निकट शंका दूर करने को जाता है, उसके साथ आत्म प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलने का नाम आहारक समुद्घात है। देवादिक अनेक शरीर धारणादिक रूप जो विक्रिया करते हैं, उसके निमित्त से आत्म प्रदेशों का शरीर से निकलने का नाम वैक्रियिक समुद्घात है। मरण से पहले उत्पत्तिस्थान को स्पर्श करने के लिये आत्म प्रदेशों का शरीर से बाहर निकलने का नाम मारणांतिक समुद्घात है। शुभाशुभ तैजसशरीर के साथ आत्म प्रदेशों के बाहर निकलने का नाम तैजससमुद्घात है।
तेरहवें गुणस्थानवर्ती जीव के आयुकर्म की स्थिति से शेष कर्मों की स्थिति जब हीनाधिक होती है तब उन कर्मों की स्थिति समान करने के लिये केवलिसमुद्घात करता है। इस केवलिसमुद्घात के चार भेद हैं - दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूर्ण। प्रथम समय में आत्मा के प्रदेश चौदह राजू ऊँचे तथा शरीर की चौड़ाई के प्रमाण व्यास वाले गोल दण्डाकार हो जाते हैं। इसको दण्डकेवलि समुद्घात कहते हैं।
दूसरे समय में जब आत्मा के प्रदेश पूर्व पश्चिम अथवा उत्तर और दक्षिण दिशा में लोकांत को स्पर्श करें और चौड़ाई में शरीर की चौड़ाई के प्रमाण हों, ऐसी अवस्था को कपाटसमुद्घात कहते हैं। वातवलय के बिना समस्त लोक में जब तीसरे समय आत्मप्रदेश व्याप्त हो जाते हैं, ऐसी अवस्था को प्रतरसमुद्घात कहते हैं। चौथे समय में जब आत्मा के प्रदेश वातवलय सहित समस्त लोक में व्याप्त हो जाते हैं, ऐसी अवस्था को लोकपूर्णसमुद्घात कहते हैं। इसके पश्चात् पुनः पाँचवें समय में आत्मा के प्रदेश प्रतररूप होते हैं। छठे समय में कपाटरूप, सातवें समय में दंडरूप और आठवें समय में पुनः शरीराकार हो जाते हैं।
इसप्रकार केवली समुद्घात करने के पश्चात् अपने गुणस्थान के अन्त में योगों का निरोध करके अयोगकेवली संज्ञक चौदहवें गुणस्थान को प्राप्त होता है। इस गुणस्थान का काल ‘अ इ ऊ ऋ लृ’ इन पाँच ह्रस्व अक्षरों के उच्चारण काल के समान है।
इस गुणस्थान के उपान्त समय में 72 और अन्त समय में 13 इसप्रकार 85 प्रकृतियों का नाश करके ऊर्ध्वगमन स्वभाव से मोक्षधाम को प्रस्थान करता है।
इस व्याख्यान के समाप्त होने पर उस दिन की सभा विसर्जन की गई।