सुशीला उपन्यास (पं. गोपालदास बरैया) | Sushila Upanyas (Pt. Gopaldas Baraiya)

बीसवां पर्व

बिलासपुर के राजभवन के समीप ही एक कन्या पाठशाला की इमारत है। यह इमारत यद्यपि बहुत बड़ी नहीं है, परन्तु देखने में बड़ी सुडौल और साफ है। इसके चारों तरफ एक सुन्दर बगीचा लगा हुआ है, जिसमें नानाप्रकार के सुगन्ध युक्त पुष्प खिल रहे हैं। यह बगीचा एक परकोटे से घिरा हुआ है। भीतर जाने के लिये परकोटे में एक द्वार है, वहाँ पर निरन्तर दो पहरेदारों का पहरा रहता है। द्वार में से भीतर जाते ही पाठशाला का मुख्य द्वार मिलता है। वहाँ पर एक षट्कोणा कृति चबूतरा बना हुआ है, जिसके बीचोंबीच एक संगमरमर के पत्थर पर बड़े-बड़े और सुन्दर अक्षरों में यह लेख खुदा हुआ है।

।। नमः सरस्वत्यै ।।।

श्री सरस्वती पाठशाला

बिलासपुर के स्वामी महाराजाधिराज 108 विक्रमसिंह जी की बुद्धिमती पुत्री सरस्वती (सुशीला) ने कुलीन कन्याओं और स्त्रियों के पठन-पाठन के लिये और उन्हें विद्या के आभूषण से यथार्थ में सुन्दर बनाने के लिये इस पाठशाला की स्थापना की है। बिलासपुर राज्य का जब तक संसार में अस्तित्व रहेगा, तब तक यह पाठशाला श्रीजैनशासन के प्रसाद से परिचालित रहेगी।

श्रीरस्तु। शुभम्भूयात् ।

कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा।

पाठशाला में प्रवेश करते ही पहले मुख्य अध्यापिका की कक्षा मिलती है। इस कक्षा का कमरा बड़ी सुन्दरता से सजाया हुआ है। सब प्रकार की मनोहर आरायश के अतिरिक्त इसकी दीवालों पर जो चित्र खिंचे हुए हैं, वे स्त्रियों के चित्तों पर एक विचित्र ही प्रकार का असर करते हैं। सीता, मनोरमा, गुणमाला, द्रोपदी, अन्जना, सुन्दरी आदि पतिव्रता स्त्रियों के चित्र चित्रकार ने इस खूबी से चित्रित किये हैं कि उनके दर्शनमात्र से उन पवित्रा पावना दिव्याङ्गनाओं का पूरा चरित्र सम्मुख होकर नृत्य करने लगता है।

नराधम रावण का वह अनुनय और पूजनीय सीता की वह घृणायुक्त फटकार जो सामने के चित्र में झलक रही है, किस स्त्री के चरित्र को आदर्श न बनावेगी! नृकीट कीचक के पैशाचिक कृत्य का प्रतिफल और द्रोपदी के उस प्रातः स्मरणीय शील की रक्षा किसे दुष्कृत्यों से पराङ्मुख और सत्कार्यों के सम्मुख न करेगी? अहा, हा! मनोरमा का वह वैजयन्ती नगरी के फाटक खोलने का दृश्य कैसा शिक्षाप्रद है। मनोरमा के पातिव्रत की वे दुःसह प्रभायें जो उसके मुखमण्डल पर प्रस्फुटित हो रही हैं और नगर की सहस्रावधि स्त्रियों की पापपूर्ण मलीन मुद्रायें जो श्रेणीबद्ध दिखाई दे रही हैं, एक बार ही चित्त को पतिव्रत-भक्त और दुश्चरित्र त्यागी बना देती है। प्रत्येक चित्र के नीचे चित्र के कथा विषय का संक्षिप्त रीति से उल्लेख किया गया है, उससे चित्र का भाव समझने में बड़ी सहायता मिलती है। चित्रों के ऊपर जो स्थान अवशेष है, उनमें सैकड़ों स्त्रियोपयोगी शिक्षायें लिखी हैं।

कहा जा सकता है कि इस पाठशाला में अन्य कुछ न पढ़कर केवल उन शिक्षाओं को हृदय में धारण कर लेने से ही प्रत्येक कन्या और स्त्री सुयोग्य गृहिणी बन सकती है। अपने पाठक और पाठिकाओं की प्रसन्नता के लिये उन शिक्षाओं के कुछ वाक्य यहाँ उद्धृत किये जाते हैं-

1-संसार में समाज रूपी शकट ( गाड़ी ) सुनियन्त्रित पद्धति से तब ही चल सकता है, जब उसके पुरुष और स्त्री रूपी दोनों चक्र एक सरीखे सुदृढ़ और सदाचारी होवें।

2-जैसे पुरुष का विद्वान होना आवश्यक है, उसीप्रकार किंबहुना उससे भी अधिक स्त्री का विदुषी होना आवश्यक है। क्योंकि स्त्री पुरुष की जननी है। विदुषी माता का पुत्र अवश्य ही विद्वान् होता है।

3-बालकों में अनुकरण करने की शक्ति बहुत तीव्र होती है। विदुषी माता का पुत्र अपनी माता के सम्पूर्ण सद्गुणों का अनुकरण करके जगत्मान्य हो जाता है।

4-गृह ( घर ) वही है, जिसमें सदाचारिणी और विदुषी गृहिणी ( घर वाली ) हो, काष्ठ मिट्टी के ढेर को गृह नहीं कहते हैं।

5-स्त्री की शोभा पतिव्रत है और उस पतिव्रत की सच्ची पालना तब तक नहीं हो सकती, जब तक कि वह सुशिक्षिता विद्यावती न हो, अतएव पतिव्रत धर्म से सुशोभित होने के लिये स्त्री का विद्या पढ़ना मुख्य कर्तव्य है।

6-शीलरत्न को जो स्त्री अपने हृदय में धारण किये है, उसे संसार के अन्य चमकते हुए रत्नों के आभूषणों की आवश्यकता नहीं है।

7-उस रति-रंभा के रूप को जीतने वाली स्त्री से जो कि पर पुरुषरत है, वह कुरूपिनी, दरिद्रा, भिखारिणी हजार गुणी अच्छी है, जो कि अपने पति को ही अपना सर्वस्व समझती है।

8-विचार दृष्टि से देखा जावे तो स्त्री के लिये पति सेवा के अतिरिक्त और कोई व्रत उपवासादि महत्फलप्रद नहीं है, जो स्त्री पतिव्रता है, उसके सम्पूर्ण व्रतों का पालन स्वयं हो जाता है, परन्तु जो दुराचारिणी है, वह नाना व्रत उपवास करती हुई भी दुर्गति की पात्र होती है।

9-स्त्री का परम सुन्दर आभूषण लज्जा है।

10-सदाचारिणी स्त्रियाँ स्वतन्त्रता का तिरस्कार करती हैं। वे बालपन में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धकाल में पुत्रों के आधीन ही रहती हैं। वह परतन्त्र स्त्रियों के शील रक्षा का अजेय किला है।

11-स्त्री को एक शरीर से दो जन्म धारण करने पड़ते हैं। जिस दिन पति के घर में प्रवेश होता है, स्त्री के द्वितीय जन्म का वही पहला दिन है। पहले जन्म की शिक्षा दूसरे जन्म में उसे सुखी और यशस्वी बनाती है। दूसरा जन्म बड़ी सावधानी से अतिवाहित करना चाहिये।

12-अपने पति के प्रत्येक कार्य में जो मंत्री का काम देती है, सेवा करने में जो दासी के समान है, भोजन कराने में माता का भाव धारण करती है। शय्या में जो रम्भा के तुल्य सुखदायिनी है। पृथ्वी के समान जिसमें क्षमा है और जो सम्पूर्ण गृह को धर्म-मार्ग पर चलाती है वही स्त्री-स्त्री है।

13-पति के प्रत्येक आचार, विचार और शरीर की व्यवस्था जो सहस्र नेत्रों से देखती है परन्तु पर पति की ओर देखने में जो नेत्रशक्ति हीन है, वही स्त्री सुदृशी है।

14-स्त्रियों के नष्ट होने के सात द्वार हैं। पिता के घर स्वतन्त्रता से रहना, मेलों में जाना, परपुरुषों के साथ वार्तालाप का सम्बन्ध रखना, पति का निरन्तर विदेश में रहना, पुंश्चली संवति रखना, अक्षरशत्रु रहना और पति का बुढ़ापा।

15-द्रोपदी, सीता, अंजनासुन्दरी, मनोरमा, सुलोचना आदि जितनी पुराण प्रसिद्ध सच्चरित्र स्त्रियाँ हुई हैं, वे पढ़ी-लिखी पंडिता थीं, अतएव कहा जा सकता है कि स्त्रियों को सच्चरित्र बनाने में निर्मल विद्या एक कारण है।

16-जब तक स्त्रियाँ शास्त्र विहित श्रावक कर्मों को अर्थात् गृहस्थ के आचार-विचारों में दक्ष नहीं होगी, तब तक पुरुष अपने धर्म को भलीभाँति रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकते।

17-स्त्रियाँ स्वभावतः पंडिता होती हैं। उनके कोमल कमनीय हृदय पर सद्विद्या बहुत शीघ्र अपना अधिकार जमा लेती है। स्त्रियों को धर्म-शिक्षा देना गृहस्थ धर्म का जीवन है।

18-स्त्री का अपने धर्म से एक बार ही पतित होना असह्य, अक्षम्य और कुल विप्लवकर है, इसलिये उसे अपने धर्म में स्थिर रहने के लिये अपने प्राणों से भी अधिक सचेत रहना चाहिये।

19-क्षण भर के सुख के लिए कामांध होकर जो स्त्रियाँ पतित हो जाती हैं, वे अपने को अपने हाथ से एक बड़े भारी भयानक समुद्र में पटक देती हैं। नरकों के घोर दुःखों में उन्हें अनेक सागर पड़े-पड़े विलविलाना पड़ता है।

20-स्त्री की पर्याय स्वभाव से ही निंद्य और पामर कही जाती है, परन्तु वह तद्विद्या, सदाचार और सुशीलता से जगद्वन्द्य और परम पवित्र भी मानी गई है। पुराण प्रसिद्ध स्त्रियों का लोग आज आदर दृष्टि से नामोच्चारण करते हैं।

मुख्य कक्षा के कमरे में जो कुछ सजावट है, वह इतनी अच्छी और अधिक है कि उसका वर्णन जितना किया जावे किसी प्रकार अरुचिकर नहीं हो सकता, परन्तु हमारी दृष्टि पर इन शिक्षाओं और सुन्दर दृश्यों के आगे वह सजावट कुछ प्रभाव न जमा सकी।

इस कमरे को अतिवाहित करके आगे चलने से एक प्रदर्शनी का कमरा मिलता है, जिसे देखते ही आँखें ठण्डी हो जाती हैं। स्त्रियों के हाथ से बनाये हुए नानाप्रकार के खिलौने, उनके वस्त्र, चित्रकारी के नमूने यथास्थान रक्खे हुए हैं। स्थान-स्थान पर सुन्दर दर्शनीय वर्णमाला-संगठित हाथ में लिखी हुई पोथियाँ रक्खी हुई हैं, ये पोथियाँ भी विद्यार्थिनीं बालागणों की लिखी हुई हैं और उनमें विशेषतः पुराण प्रसिद्ध पतिव्रता स्त्रियों के चरित्र लिखे गये हैं। जिन बालाओं ने अपनी लेखनकला में पारितोषिक प्राप्त किया है, यहाँ उन्हीं को पोथियों में स्थान मिला है। एक पोथी के मुखपृष्ठ पर लिखे हुए थोड़े से वाक्य हमको बहुत प्यारे लगे।

“स्त्री से जगत्पूज्य सर्वज्ञदेव उत्पन्न होते हैं। सर्वज्ञदेव तीर्थंकर से मोक्षमार्ग का प्रकाशक परम हितकारी शास्त्र उत्पन्न होता है। शास्त्र से संसार के पाप-समूह नष्ट होते हैं और पापों के नाश होने से बाधा रहित सुख की प्राप्ति होती है। इसप्रकार परम्परागत मोक्ष-सुख को देने वाली सदाचारिणी कुलीन स्त्री को पवित्र जान के सज्जन स्वीकार करते हैं।”

प्रदर्शनी के कमरे के आगे एक कमरा पाक-विधि (रसोई) और सामान्यतः कुटुम्बोपयोगी वैद्यक और धात्रीविद्या सिखलाने का है। यहाँ केवल वे स्त्रियाँ शिक्षा पाती हैं, जो प्रौढ़ वय की तथा अनुभवशीला हैं।

इसके आगे अन्य भागों में शेष कक्षायें हैं, जिनमें उत्तीर्ण होकर कन्या स्त्रियाँ उपर्युक्त मुख्य कक्षा में प्रवेश करती हैं। प्रत्येक कक्षा में एक-एक अध्यापिका है। अध्यापिकाओं में कुछ तो कुलीन घरों की प्रौढ़वयस्का स्त्रियाँ हैं, जो नियत समय के लिये परोपकार बुद्धि से पढ़ाने को आती हैं और कुछ ब्रह्मचारिणी साध्वी स्त्रियाँ हैं, जो आर्यिका धर्म स्वीकार करने के सन्मुख हैं।

सुशीला इस पाठशाला की मुख्य कक्षा में पढ़ती है और समय मिलने पर अन्य कक्षाओं की कन्याओं को पढ़ाती भी है। दिन-रात उसका ध्यान इसी पाठशाला की वृद्धि की ओर रहता है। पठन-पाठन के अतिरिक्त उसकी स्फटिक तुल्य निर्मल बुद्धि में अब लों किसी भी दूसरे रंग की परछाई नहीं पड़ी है। लोग कहते हैं, यह कोई देव कन्या है।

इक्कीसवां पर्व

जगत्प्रकाशक सूर्यदेव अपने समग्र दिन का प्रवास पूर्ण करके अस्ताचल की गुहाओं में विश्रांति पाने के प्रयत्न में थे। जैसे कोई पुरुष प्रयास के परिश्रम से अत्यन्त व्याकुल हो जाता है, उसीप्रकार चार पहर अखण्ड प्रवास के श्रम से पीड़ित प्रभाकर एक लाल रङ्ग के गोले के समान दिखाई देते थे और संकेत से संसारी जनों को उपदेश देते थे कि जैसे मैं अपने कार्य में सदैव तत्पर रहके परिश्रम करता हूँ और विश्रांति पाकर पुनः कर्म में प्रवृत्त हो जाता हूँ, उसीप्रकार तुम्हें भी करना चाहिये अर्थात् आलस्य को छोड़ देना चाहिये।

इस समय एक प्रौढ़ वय का पुरुष एक वृक्ष की डाल से घोड़े को बांधे हुए उसकी छाया के सहारे बैठा हुआ है, वह पुरुष पचास को उल्लंघन कर चुका है, परन्तु उसके सुदृढ़ शरीर, काले केश और रक्तवर्ण मुखमण्डल को देखकर कह सकते हैं कि अभी वह चालीस से बहुत पीछे है। उसके सामने एक काला हरिण बाणों से विद्ध हुआ अचेतन अवस्था में पड़ा है, उस बेचारे के मुँह में घास के कुछ तृण उलझे हुए हैं। बड़ा विस्तृत जंगल है, बड़ी-बड़ी पर्वतमालायें सुदूर तक पैर फैलाये पड़ी हैं, इतस्ततः जंगली जानवर अपने भयानक शब्दों से चित्त को उद्विग्न कर रहे हैं।

संध्याकाल पूर्व की ओर से दौड़ता आ रहा था, वृक्ष-लता-पताओं पर शनैः-शनैः उसका अधिकार हो रहा था कि उसके साथ ही एक नवयुवक शुभ्र वस्त्र धारण किये हुए आया और उस प्रौढ़ पुरुष के सम्मुख आ के खड़ा हो गया। इस आगन्तुक की वय अधिक से अधिक अठारह वर्ष की होगी। मुख पर श्मश्रुओं की रेखा आ रही थी, उन्नत मस्तक और गम्भीर मुख मुद्रा से जान पड़ता था कि यह कोई परम विद्वान् क्षत्रिय युवा है।

इस युवा को सामने खड़ा देखकर जीन का सहारा छोड़कर पूर्वोल्लिखित पुरुष बैठ गया और उसके पास ही पड़े हुए कम्बल पर बैठने के लिए युवा से कहा। युवा विनयपूर्वक बैठ गया और बोला, क्या मैं आपका परिचय पा सकता हूँ? जान पड़ता है कि आप कोई क्षत्रिय श्रेष्ठ हैं। प्रौढ़ पुरुष ने कहा-मैं बिलासपुर का राजा हूँ, मेरा नाम विक्रमसिंह है। मैं आज बिलासपुर से आखेट के लिये निकला था, परन्तु इस हरिण का पीछा करने से सम्पूर्ण साथियों को छोड़कर इस जंगल में आ फँसा हूँ। मार्ग का पता नहीं लगता, प्यास के मारे बड़ी विकलता हो रही है। देखिये ! वह घोड़ा भी जीभ निकाल रहा है। " अब कर्तव्य क्या है" यही सोच रहा था कि आप अचानक आ पहुँचे।
युवा-(आखेट की बात से जो घृणा हुई थी, उसे दबाकर) तो आप थोड़ी देर यहाँ ठहरें। पास ही एक जलाशय है, मैं आपके लिये वहाँ से जल लिये आता हूँ। आपकी विकलता से मुझे दुःख होता है।
विक्रम-नहीं ! आपको कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है, मैं स्वयं वहाँ चलूँगा। आपकी इतनी सहायता बहुत है कि जलाशय बतला दें।
ऐसा कहकर विक्रमसिंह वहाँ से उठ खड़े हुए और घोड़े की बाग पकड़कर धीरे-धीरे आगत युवा के साथ एक ओर चल पड़े, जहाँ से कि वह युवा आया था। थोड़ी देर चलने पर एक टीले का उल्लंघन करते ही कुछ दूरी पर हरियाली की आभा दिखलाई दी, जिसके दर्शन मात्र से विक्रमसिंह का चित्त हरा हो गया। आगे वही हरियाली एक सुन्दर बगीचे का रूप धारण करके दिखलाई देने लगी जिसके बीच में एक छोटासा सुडौल बंगला बना हुआ था। बंगले के मस्तक पर एक ध्वजा फहरा रही थी जिसमें स्पष्ट और सुन्दर अक्षरों में “अहिंसा परमो धर्मः” का सिद्धान्त लिखा हुआ था। विक्रमसिंह ने उसे बड़े ध्यान से बांचा और कुछ संकुचित होके अपने पीछे की ओर देखा।

बगीचे के द्वार पर पहुँचते ही कुछ आगे बढ़कर युवा ने आवाज दी, जिसे सुनते ही दो-तीन सेवक आ गये। फाटक खोल दिया गया और इशारा पाकर एक ने महाराज के घोड़े को थाम लिया, दूसरे ने दो-तीन कुर्सियाँ लाकर बाग के बीच में डाल दीं। युवा और विक्रमसिंह दोनों उन पर बैठ गये। नानाप्रकार के सुगन्धित फूलों का सौरभ ले लेकर बाग का समीर अपने अतिथि का स्वागत करने लगा। एक सेवक आकर पंखा झलने लगा और दूसरा कुछ थोड़े से मेवे, फल और शीतल जल की एक झारी सामने रखके चला गया।

युवा-राजन् ! आप सब दिन के थके हुए हैं। इस समय यदि एकाएक जल पियेंगे तो हानि होगी, इसलिये मेरी प्रार्थना है कि इस समय थोड़े मेवे और फलादि खाकर ही आप तृप्ति लाभ करें, जलपान पीछे करें।

विक्रम.-इस समय मैं आपका बहुत आभारी हूँ, परन्तु इसके पहले कृपा करके यदि कुछ हानि न हो तो आप अपना परिचय दे देवें।

युवा-हाँ ! राजनीति के अनुसार तो यह अवश्य है कि राजा लोग सदा सशंकित-चित्त रहके कार्य करें क्योंकि “हृदयं च न विश्वास्यं राजभिः किं परो नरः” अर्थात् राजाओं को अपने हृदय
पर भी विश्वास नहीं करना चाहिये, दूसरे पुरुषों की बात ही क्या
है? परन्तु यहाँ आप वह चिन्ता छोड़ दें। यह स्थान आपके लिए
सब प्रकार से निर्विघ्न है। मैं आपके शुभचिंतक विजयपुर राज्य
के एक वणिक का पुत्र हूँ। मेरे पिता का नाम श्रीचन्द्र है और
लोग मुझे जयदेव कहा करते हैं। यह बंगला मैंने अपने चित्त को
बहलाने और विद्याभ्यास करने के लिये बनवाया है। बस! यही
मेरा सामान्य परिचय है।

विक्रम.-नहीं! शंका की कोई बात नहीं थी। तुम्हारे जैसे
सौम्याकृति सुशील पुरुष को देखते ही वह राजनीति की बात
कोसों दूर भाग गई थी, परन्तु परिचय पाये बिना प्रेम-बन्धन दृढ़
नहीं होते, इस हेतु सहज स्वभाव से पूछ लेना ही मैंने योग्य समझा
और अपने उपकारी का परिचय पा लेना है भी उचित। अच्छा तो
अब तुम्हें भी इस प्रसाद में मेरा साथ देना चाहिये।

जयदेव-राजन्! आप क्षुधित हैं, तृषित हैं और इस समय मेरे
अतिथि हैं, इसलिये आपको इतना संकोच करने की आवश्यकता
नहीं है, परन्तु जब आपका आग्रह है तो मैं उसको अमान्य भी नहीं
कर सकता। लीजिये!

ऐसा कहकर जयदेव विक्रमसिंह के साथ थाल में से फल
उठाके खाने लगा। विक्रमसिंह ने प्रसन्नता से सन्तुष्ट होके फलाहार
किया और पश्चात् शीतल जल का पान करके तृप्ति लाभ की।

संध्या हो गई। प्रतीची के मुखमण्डल की रक्तिमा जो कुछ समय के लिये हुई थी, वह भी विलीन हो गई। समीर के धीमे-धीमे, परन्तु ठण्डे-ठण्डे झोंके आने लगे। दिन भर के ताप से व्याकुल हुई चिड़ियाँ चुहचुहाती हुई अपने-अपने बसेरे ढूँढ़ने लगीं। अन्धकार ने अपनी काली चादर से समस्त जगत को ढककर अपना एकाधिपत्य प्रकट किया। यह देख गम्भीराशय आकाश ने उसकी मूर्खता पर मुस्करा दिया। तारागण खिल उठे। एक सेवक ने आके निवेदन किया, क्या आज्ञा होती है? मैं उपस्थित हूँ। बैठकखाने में सब प्रबन्ध हो चुका है।

जयदेव-महाराज! यदि इच्छा हो तो बैठकखाने में चलिये और कुछ आवश्यकता हो तो इस सेवक को आज्ञा दीजिये।

विक्रम.-अच्छा! चलिये। (सेवक से) यहाँ से अनुमान आध कोस उत्तर की ओर एक हरिण पड़ा हुआ है, तुम उसे उठा लाओ।

सेवक आश्चर्ययुक्त होके अपने मालिक की ओर देखता हुआ और कुछ सकपकाता हुआ “जो आज्ञा” कहकर वहाँ से चल दिया। इधर जयदेव उसे सुनते ही एक दीर्घ चिन्ता तथा शोक में निमग्न हो गया और उसकी आकृति में तत्काल ही बड़ा भारी परिवर्तन हो गया। यह देख दूरदर्शी राजा एक बड़े विचार में पड़ गया। बंगले की वह ‘अहिंसा परमो धर्म:’ वाली ध्वजा उसकी आँखों के सामने फिर लहराने लगी। वह जान गया, दयालु जयदेव के चित्त पर मेरे मृग वध के कृत्य से बड़ा भारी आघात पहुँचा है।

हरिण की लाश पर जब इसकी दृष्टि पड़ी थी, तब ही यह दुःखी हुआ था, परन्तु अपनी सज्जनता से घृणा प्रकाश न करके इसने मुझे अपना अतिथि बनाया था। इस समय मेरे उसी मृगया मोह ने उसके हृदय के घाव पर नमक का काम किया है। मैंने बहुत बुरा किया, जो पुनः उस कृत्य को उसके सम्मुख लाने का उद्योग (प्रगट) किया। प्रिय जयदेव ! क्या मैं जान सकता हूँ कि इस समय आपकी मुद्रा पर एकाएक शोक छा जाने का क्या कारण है ?

महाराज का उक्त प्रश्न जयदेव ने सर्वथा नहीं सुना वह उस समय इस उधेड़ बुन में लगा हुआ था कि "इन आँखों से अब वह उस दीन मृग का कलेवर पुनः कैसे देखा जावेगा ? हाय ! उसके मुँह में उलझे हुए उन छोटे-छोटे तृणों के स्मरण से मुझे रुलाई आती है। यह मुझसे कैसे हो सकेगा कि अपने अतिथि से इस विषय में कुछ कटुक व्यवहार करूँ और यह भी कैसे हो सकता है कि मेरा सुकोमल हृदय उस दया के वेग को रोक सके जो हरिण के देखते ही उत्तेजित हो जावेगा।

हाय ! तो क्या मेरे द्वारा महाराज विक्रमसिंह का जिन्हें कि मैं बड़ा मान चुका हूँ, अपमान होगा ? नहीं मैं उन्हें समझाऊँगा। समझाने में अपमान की कौनसी बात है ?" जयदेव की विचार-तरंगें यहाँ तक पहुँची थीं कि महाराज ने अपने प्रश्न का उत्तर न पाकर उसे फिर दुहराया और उसे सुनते ही जयदेव चौंक पड़ा। “क्या उत्तर दिया जावे”, बड़ी कठिनता से इसका निश्चय करके उसने कहा-पृथ्वीपाल ! आपके मुँह से हरिण शब्द निकलते ही मुद्रा पर उस दीन-हीन हरिण के दयार्द्र कलेवर का असर हो गया होगा और कुछ नहीं।

विक्रम.- यदि ऐसा है तो उस सेवक को लौटा लेना चाहिये। जिस कार्य से किसी को कष्ट हो, मैं उसे कभी नहीं करूँगा। (दूसरे सेवक से) अच्छा, तुम उसे दौड़ाकर लौटा लाओ।

जयदेव- राजन् ! क्या आप इस पूज्य वाक्य के दृढ़ प्रतिज्ञ होते हैं कि “जिस कार्य से किसी (आत्मा) को कष्ट होता हो, मैं उसे कभी नहीं करूँगा।” अहा कैसा सुन्दर वाक्य है। प्रत्येक मनुष्य का यही धर्म है और हे पृथ्वीपाल ! आप जब पृथ्वी के पालक हैं तब आपको कभी यह अधिकार नहीं है कि किसी की आत्मा को कष्ट दें। अपराध क्षमा हो, महाराज ! जो राजा निरपराधी दीन, हीन, स्वेच्छा-विहारी जीवों को बिना कारण कष्ट देता है, वह पृथ्वी का रक्षक नहीं, किन्तु भक्षक है।

क्षत्रियों का धर्म रक्षण करने का है, न कि भक्षण करने का। नरनाथ ! किंचित् विचार कीजिये कि सम्पूर्ण प्राणी दुष्टों से संत्रस्त होकर अपने राजा के द्वार पर जाके पुकार करते हैं और रक्षा पाते हैं, परन्तु जब राजा ही शत्रु बन जावे तो वे बेचारे अपनी पुकार किसको जाकर सुनावें। धर्मावतार ! लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि जब कोई दाँतों में तिनका दबा के किसी के सम्मुख जाता है तो वह अवश्य ही रक्षा पाता है, परन्तु हाय ! यह बड़े दुःख की बात है कि बेचारे वनवासी हरिण जिनके मुख में निरन्तर तृण समूह रहता है और जो किसी का कुछ भी अपराध नहीं करते हैं, वे भी पृथ्वी रक्षक राजाओं के बाणों का निशाना बनते हैं। हाय ! उस झुंड के हरिणों की क्या दशा होती होगी, जिसका एक सरताज अकाल ही में काल के गाल में जा फंसा है।

महाराज ! मैं आपसे हाथ जोड़ के पूछता हूँ कि क्या इस एक समनस्क पंचेन्द्रिय पशु के सब से प्यारे प्राणों का घात कर के आपको एक छोटी सी हवस मारने के अतिरिक्त और कुछ लाभ हुआ है ? आप चाहते तो उस हवस को और किसी तरह पूर्ण कर लेते, परन्तु न्यायाधीश ! उस बेचारे पशु के प्यारे प्राण अब पुनः लौट आवें इसके लिये संसार में कोई उपाय है ?

विक्रम.-नहीं ! दयालु जयदेव ! बस करो। अब मुझे अधिक लज्जित न करो। तुम्हारे वचन बाणों से मेरा हृदय विद्ध हो गया है और उसमें से दयामृत का प्रवाह निकल कर सारे शरीर को तर कर रहा है। यदि विश्वास न हो तो देख लो, मेरे नेत्रों में वह परमामृत बाहर भी निकल रहा है।

जयदेव-जय हो महाराज की ! जिनशासन के प्रसाद से आपकी विजय हो भगवति दये ! इस पराक्रमी क्षत्रिय के हृदय में तू सतत् निवास कर, ऐसा विस्तृत स्थान अब तुम्हें अन्यत्र नहीं मिलेगा। ऐसा कहते-कहते जयदेव गद्गद् हो गया और यह कहते हुए विक्रमसिंह के पैरों में गिर पड़ा कि नरनाथ ! आज आप मेरे पूज्य हुए। राजत्व, क्षत्रियत्व और ईश्वरत्व तीनों को मैं इस समय आप में देख रहा हूँ। आपके आने से आज मेरा स्थान पवित्र हो गया।
विक्रमसिंह ने जयदेव को उठाकर छाती से लगा लिया और प्रेमाश्रु बहाते हुए कहा-प्यारे जयदेव ! तुम्हारे माता-पिता धन्य हैं जिनके तुम सरीखा पुत्र है। यदि पुत्र हो तो तुम्हारे ही जैसा हो। आज मुझ पर जो तुम्हारा उपकार है, मैं उसे आजन्म नहीं भूल सकता। भूतकाल में दया के बिना मनुष्य होकर भी मुझमें मनुष्यत्व नहीं था, जिसे मैंने तुम्हारे प्रताप से पा लिया है। तुम्हें यह सुनकर आश्चर्य होगा कि मेरा कुल परंपरागत वही धर्म है. जिससे अधिक जीवदया पालन का दावा करने वाला संसार में दूसरा धर्म नहीं है। मेरे सम्पूर्ण कुटुम्ब की श्रद्धा उसी जिनधर्म में ही है और मैं भी जिन धर्म का उपासक हूँ परन्तु कहते हुए लज्जा होती है कि इतने पर भी मैं इस मृगया के दुर्व्यसन का त्यागी नहीं था, जिसे तुमने सहज ही छुड़ा दिया।
जयदेव-महाराज ! इस विषय में काललब्धि का ही उपकार समझना चाहिये। मैंने दो-चार प्रार्थनाओं के अतिरिक्त और किया ही क्या है ? अस्तु, अब समय हो गया है, भीतर चल के विश्राम कीजिये, क्योंकि आप दिन भर के थके मान्दे हैं और मुझे आज्ञा दीजिये, मैं संध्यावन्दनादि क्रियाओं से निवृत्ति पालूँ। महाराज, बहुत अच्छा कह के विश्रामगृह में गये और जयदेव अपने विद्यागृह की ओर गया।

अनुमान दो घन्टे के पश्चात् जयदेव अपने संध्या-कर्म से निवृत्ति पाकर विश्रामगृह की ओर गया। देखा तो महाराज जाग रहे हैं। जयदेव के पाँवों की आहट पाकर वे उठ बैठे और बोले- आओ, न जाने क्यों आज निद्रा नहीं आती। कुछ समय तुम्हारे साथ बातचीत करके ही चित्त को प्रसन्न करें। आज्ञा पाकर जयदेव बैठ गया और दोनों में ज्ञान विषयक चर्चा छिड़ गई। धर्म, न्याय, व्याकरण, साहित्य, राजनीति आदि जिन-जिन विषयों में विक्रमसिंह ने देखा जयदेव को परिपूर्ण पाया। इसके अतरिक्त जयदेव के सुदृढ़, पराक्रमी और सुन्दर शरीर, मनोहर लावण्य तथा स्वाभाविक नम्रतादि विशेष गुणों की भी न्यूनता नहीं थी, इसलिए विक्रमसिंह के हृदय में प्रेम का संचार होकर एकाएक यह बात प्रतिध्वनित हुई कि सर्वगुण सम्पन्न सुशीला के लिये क्या कोई इससे बढ़कर वर मिल सकता है ? (ग्रन्थकार) नहीं ! नहीं ! नहीं !

रात्रि अधिक बीत गई थी, इसलिये जयदेव ने निद्रा लेने का प्रस्ताव किया, जिसका विक्रमसिंह ने अनुमोदन किया, परन्तु अपने प्रयोजन की सिद्धि-असिद्धि जानने के लिये चलते-चलते जयदेव से यह पूछ ही लिया कि अभी तुम्हारा विवाह हुआ है कि नहीं ? लज्जित होता हुआ जयदेव ‘नहीं’ कहकर अपने शयनगृह को चला गया। महाराज विक्रमसिंह ने “सरस्वती कन्या के साथ जयदेव का पाणिग्रहण होना समुचित है कि नहीं।” इसी विचार में उछलते-कूदते हुए निद्रादेवी की गोद में सिर रख दिया। इधर जयदेव एक नवीन ही उधेड़ बुन में लगा। जब तक निद्रा नहीं आई, वह तर्क, अनुमान और युक्तियों से इस बात का निर्णय करने में अपनी बुद्धि को लड़ाता रहा कि, “तुम्हारा विवाह हुआ है कि नहीं, यह पूछने में महाराज का क्या अभिप्राय है?” निद्रा आने पर जयदेव ने आज अनेक शुभ स्वप्न देखे।

बाईसवां पर्व

बसन्त का प्रभाव बड़ा सुहावना होता है। शय्या से उठते ही णमोकार मंत्र का उच्चारण करके “मैं कौन हूँ? यह आँख, कान, नाकवाला कौन है? मुझ चैतन्यनाथ से इस जड़रूप पुद्गल का संबंध क्यों हुआ? और संसार क्या है!” आदि प्रश्नों के उत्तर अन्यान्य विचार तरंगों को रोककर जब शांतिता के साथ मनन किये जाते हैं, विश्राम पाई हुई निर्मल बुद्धि जब सब ओर से क्षोभरहित होती है और जब दु:खोत्तप्त संसार की आँच कुछेक दूर रहती है तब बसन्त का अत्यन्त प्यारा शीतल मलयसमीर अपने मन्द-मन्द प्रवाह से एक विचित्र ही प्रकार का आनन्दानुभवन कराता है। हतप्रभ होता हुआ चन्द्रमा कहता है-देखो सचेत रहो! मेरे सरीखे श्रीमान्, कान्तिमान् और लोकोपकारी की भी इस संसार में यह दुर्दशा हो रही है, तुम किस खेत की मूली हो? आम्रवृक्षों के भौरों पर गुंजार करते हुए भौंरे उपदेश देते हैं-इन्द्रिय के विषयों की लालसा विषयों के प्राप्त होने पर घटती नहीं है, प्रत्युत बढ़ती ही जाती है।

एक कली का सौरभ लेकर दूसरी पर मंडराये बिना हमें चैन ही नहीं पड़ता। सरोवरों में जो कमलपुष्प शांतिता के साथ मुँह छुपाये हुए थे, बड़े जोश खरोश के साथ निकलते हुए अंशुमाली (सूरज) को देखकर हँसते हैं और मानों कहते हैं-अच्छा आपकी भी कला देखें। एक महाशय तो ढाक के पत्ते के समान मुँह बनाये हुए रो रहे हैं। अब आप भी अपना होंसला निकाल लीजिये। उधर कोयल अपनी मधुर ध्वनि से सबके चित्तों को रंजायमान करके इस विरक्तता के सब विचारों पर हड़ताल फेरना चाहती है।

कंचनपुर से पाँच-छः कोस उत्तर की ओर एक जंगल के बीचों-बीच एक मनोरम सरोवर है। उसके आसपास आम्रादि छायादार वृक्षों की श्रेणी लगी हुई है, जहाँ पर थके हुए पथिक घड़ी भर लेट के विश्राम पाते हैं, यह स्थान किसी धर्मात्मा ने पथिकजनों को आराम पहुँचाने के लिए तैयार कराया था।

रतनचन्द यहीं पर एक वृक्ष की छाया में एक पत्थर के सहारे बैठा हुआ ऊपर कही हुई बसन्त की प्रभाति की शोभा से अपने चित्त को शांत कर रहा है। वह इस समय अकेला है। उसके शरीर पर एक सादी अङ्गरखी, पगड़ी और धोती के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

अभी एक भिक्षुक को अपना घोड़ा सामान सहित देकर वह अपने सिर का एक बड़ा भारी भार उतार के यहाँ आ बैठा है। उसके पास वर्तमान में शरीर पर के कपड़ों के अतिरिक्त बाह्यपरिग्रहों में और कुछ शेष नहीं है। उस समय रात्रिभर के जागरण से और उसमें शारीरिक तथा मानसिक अश्रान्त परिश्रम करने से रतनचन्द की शिथिल इन्द्रियाँ विश्राम की प्रतीक्षा करती थीं, परन्तु चित्त की अनेकाग्रता से निद्रा नहीं आ सकी। सैकड़ों विचारों का उदय हो होकर उनका अस्त होने लगा।

रामकुंवरि और हीरालाल को पलंग से जकड़े हुए छोड़कर वह चला आया था। चलते समय उन्हें जिसप्रकार अपराध-मुक्त कर दिया था, बंधनमुक्त करने का उसे स्मरण नहीं रहा था, इसका स्मरण हो आने से रतनचन्द को इस समय बहुत व्याकुलता होने लगी।

वह सोचने लगा, हाय ! हतभाग्य दीन जीवों को मेरे कारण से व्यर्थ ही कष्ट होगा। कामादि विकार से बेचारे वैसे ही सताये हुए थे और अब मेरे बन्धनों से दुःखी होंगे। जब लोग उन्हें उस अवस्था में देखेंगे तो अवश्य ही दुष्कर्म करने की उनमें शंका करेंगे तब उन्हें कितना हृदयवेदी दुःख न होगा ? स्वयं घृणा, लज्जा और मूर्खता के कारण आश्चर्य नहीं कि बेचारे आत्मघात कर लेवें। ओफ ! यह मैंने बहुत बुरा किया। दो युवा मनुष्यों के प्राणों का व्यर्थ ही मेरे द्वारा घात होगा, परन्तु हवेली की चाबियाँ तो मैं जयदेव को दे आया हूँ।

जयदेव ऐसा निर्दय-हृदय नहीं है। वह अवश्य ही उन पर दया करेगा। मुझे निश्चय है कि दयालु हृदय जयदेव उन्हें अवश्य क्षमा कर देगा। हाय ! अब पीछे-पीछे विचार होते हैं, तब निश्चय होता है कि मैंने एक ही नहीं बहुत सी भूलें की हैं। जब संसार से मुझे सरोकार ही नहीं था तब हीरालाल, रामकुंवरि और जयदेव को चिट्ठी लिखने की क्या आवश्यकता थी? उन्हें दंडार्ह बतलाकर धन सम्पत्ति का स्वामी जयदेव बनाया जावे, यह प्रयत्न भी मैंने क्यों किया? मेरा जयदेव मित्र क्यों और हीरालाल शत्रु क्यों? मुझे सबको एक दृष्टि से देखना था, परन्तु नहीं देखा, हाय! इस अवस्था में भी मोह मेरा पीछा नहीं छोड़ता।

रामकुंवरि! मैंने नहीं जाना था कि तू शहद से भरी हुई तीक्ष्ण छुरी है। तेरे स्त्रीजन-सुलभ हावभावों में मुग्ध होकर मैं तुझे सर्वस्व अर्पण कर चुका था, परन्तु आखिर तू मेरी नहीं हुई। यह कैसी बुरी घड़ी थी, जिस दिन मैंने अपनी ढलती हुई उमर पर शिथिल होती हुई अंगयष्टि पर और शान्तप्राय होती हुई प्रकृष्ट विषय वासनाओं पर विचार न करके तेरा पाणिग्रहण किया था। हाय! तेरी धधकती हुई नवीन कामज्वाला शान्त न हो सकी और आज उसने अपने अनर्थ से निर्मल कुलकीर्ति को भस्म कर डाला। यौवन और वृद्धावस्था इन दोनों के पारस्परिक विरोध पर मैंने कुछ भी विचार नहीं किया, यह उसी का फल है।

स्त्रियों पर विश्वास करना सचमुच बड़ी भारी भूल है। वे कपट और कुटिलता की साक्षात् प्रतिमूर्तियाँ हैं। एक कवि ने सच कहा है कि-“स्त्रियों के वचनों में, भौंहों में, कटाक्षों में, गमन में और अलकावलियों में जो कुटिलता दिखलाई देती है वह और कुछ नहीं उनके हृदयों की कुटिलता है, जो भीतर न समा सकने के कारण शरीर के बाहर भी फूट निकली है।” ये स्त्रियाँ संसार रूपी विषवृक्ष की मूल हैं। इन्द्रायण के फल के समान ये केवल बाहर से मनोहर दीखती हैं, परन्तु यथार्थ में इनका आस्वाद बड़ा भयंकर है। कामदेव के समान सुन्दर शरीर वाले युवा पुरुष को भी छोड़कर ये कुरूप कुकर्मी नीचों के साथ रमण करती हैं, इनकी रुचि का पता पाना बड़ा कठिन है।

जयदेव जैसे सत्यनिष्ठ और जितेन्द्रिय पुरुष को भी जो स्त्रियाँ कलङ्कित कर सकती हैं उनकी मलीनता कलङ्किता का क्या ठिकाना है? रामकुंवरि! तूने अपने चरित्र से इस बात की मुझे अच्छी शिक्षा दे दी है। इस विषय में तेरा मुझ पर बड़ा उपकार है।

अहा! अब मैं कैसे अच्छे मार्ग पर आ रहा हूँ, जिसमें एक भी कंटक नहीं है। सम्पूर्ण चिन्ताओं से रहित होकर और सब ओर से अपनी कामनाओं को खींचकर श्रीगुरु के वचनों के सहारे से जब मैं उस सरल मार्ग पर चलने लगूँगा, आशा है कि तब आत्मा के अभीष्ट-स्थान की प्राप्ति में अधिक विलम्ब न होगा।

परन्तु अब मैं यहाँ निशिंचत क्यों पड़ा हुआ हूँ। अभी तक कोई महात्मा मुनि के दर्शन नहीं हुए। ये हृदय के नाना संकल्प-विकल्प जो छोड़ देने पर भी पीछे पड़े हुए हैं, बिना श्रीगुरु का उपदेश पाये नष्ट नहीं होंगे, सो मुझे अब शीघ्र ही उनका अन्वेषण करना चाहिये और संसार-समुद्र से पार होने के लिये उनके वचनरूपी जहाज का आश्रय अवश्य लेना चाहिये। यह मोह का सघन अन्धकार जो सब कुछ छोड़ देने पर भी बार-बार हृदय पर अपना अधिकार जमा लेता है, श्रीगुरु की वचन किरणों के प्रकाश
बिना नष्ट नहीं होगा।

रतनचन्द के मन में इसप्रकार की अनन्त भावनायें एक के
पीछे एक उठ रही थीं, परन्तु उनमें नियम का प्रतिबन्ध नहीं था। यह
अनियमितता का ही कारण था, जो पहले रामकुंवरि में राग-द्वेष
छोड़कर तटस्थ होने के लिये तत्पर होकर पश्चात् उसी की एक
प्रकार से निन्दा करने और अन्त में उपकार मानने में रतनचन्द का
वैकल्पिक चित कुछ आगे-पीछे न सोच सका। अस्तु ! थोड़ी ही
देर में पास की एक पगडंडी पर से एक परम निर्ग्रन्थ मुनि को जाते
हुए देखकर रतनचन्द उठ बैठा और हर्षोत्फुल्ल होकर दौड़ता हुआ
उनके सन्मुख जाकर चरणों पर गिर पड़ा।

मुनिराज ने ठहरकर ‘धर्मवृद्धि’ दी और पूछा*-रतनचन्द !
कुशल तो है ? सुनकर आश्चर्य स्फुरित नेत्रों से रतनचन्द ने उत्तर
दिया, आपके पुनीत दर्शनों के सन्मुख अकुशल कहाँ ? सब
प्रकार से आनन्द है।

मुनिराज-भैया ! तुम बड़े भाग्यशाली हो, तुम्हारा संसार अब
बहुत थोड़ा अवशेष रहा है। अच्छा किया जो इस संसार को
तुमने पानी के बुदबुदे के समान अनित्य समझा और उससे मोह
छोड़ दिया। संसार में कहीं भी सुख नहीं है। इन्द्रिय जनित सुख
पराधीन, परिणाम में दुःखदाई और केवल अविचारित-रम्य है।


  • एक अपरिचित अदृष्ट-पूर्व मुनि के द्वारा अपना नाम सुनकर रतनचन्द को
    आश्चर्य हुआ-मुनिराज को अवधिज्ञान प्राप्त हुआ था।

सच्चा सुख मोक्ष में है, वह सर्वथा नित्य, शुद्ध और स्वाधीन है। वह आत्मा का स्वभाव है।

संसार के सम्पूर्ण विभावों को परित्याग करके केवल आत्म स्वभाव में तल्लीन होने से उस अतीन्द्रिय-सुख की प्राप्ति हो सकती है और ऐसा करने के लिये अर्थात् केवल आत्मस्वभाव में तल्लीन होने के लिये जैनेश्वरी दीक्षा ही एक मात्र साधन है।

यह नित्य-शुद्ध आत्मा अनादिकाल से पुद्गल का सम्बन्ध पाकर मलिन हो रहा है। संसार के मूलभूत आठ कर्मों ने इस तरह ढक रक्खा है कि उनके कारण इसका असली ज्ञान-दर्शन स्वभाव प्रगट ही नहीं होने पाता है और निरन्तर चारों गतियों में नाना स्वांग धारण करके भ्रमण करना पड़ता है। जैनेश्वरी दीक्षा के अतिरिक्त इन कर्मों का सम्बन्ध आत्मा से छुड़ाने के लिये और यह संसार की विडम्बना के लिये और कोई साधन नहीं है।

परन्तु यह जैनेश्वरी-दीक्षा बड़ी कठिन है। इसको वे ही धारण कर सकते हैं, जिनका संसार से मोह घट गया है और जिन्हें यथार्थ में विषय सुखों से विरागता आ गई है। इस स्वतन्त्र स्वाधीन और निर्भयवृत्ति को धारण करना अच्छे पुरुष सिंहों का कार्य है, न कि इन्द्रियों के आधीन रहने वाले कायर पुरुषों का।

रतनचन्द-(हाथ जोड़ के) धन्य भगवन्! आज मैं आपके दर्शनों से कृतार्थ हो गया। संसार ज्वाला से व्याकुल हुए मुझ क्षुद्र जीव को जो कि अपने यथार्थ दर्शन-ज्ञान स्वभाव को भूला हुआ दुःखी हो रहा है, उस अर्हती-दीक्षा की सघन शीतल छाया में पहुँचा के शान्त कीजिये। हाय! अब मुझसे संसार के वे भयंकर, घृणित, असेवितरम्य, और दुरंगे दृश्य देखे नहीं जाते हैं। कृपा करके अब मेरी रक्षा कीजिये। मुझे पूरा विश्वास है कि आपके चरणों के प्रसाद से दुर्धर जिन दीक्षा भी सहज हो जावेगी। मुझे शीघ्र ही उन पुरुष सिंहों की श्रेणी में विचरने योग्य बना दीजिये, जो भयानक वनों की गह्वर गुफाओं में असह्य शीतोष्णता युक्त पर्वतों के मस्तकों पर सहस्रों हिंस्र जीवों के समूह में सम्पूर्ण चिन्ताओं से रहित, निर्भय और निष्परिग्रह होकर स्याद्वाद-वाणी की गर्जना करते हुए स्वच्छन्द विहार करते हैं और जिन्हें देखते ही परवादिमृग गण थरथर कांपने लगते हैं।

मुनिराज-आत्मार्थी रतनचन्द! तुम्हारे सच्चे उत्साह को देखकर प्रसन्नता होती है। श्री जैनेन्द्र धर्म के प्रसाद से तुम्हारा अभीष्ट ही सिद्ध होगा। तुम्हें अब संसार सम्बन्धी विकल्प जालों को छोड़ देना चाहिये। तुम पर जो कुछ बीता है, वह कुछ आश्चर्य नहीं है।

भयावह संसार में इससे भी सहस्र गुणे दुष्कृत्य अहर्निश होते रहते हैं, परन्तु आत्मज्ञान से जो लोग कोरे हैं, उन्हें इससे कुछ उद्वेग नहीं होता। विष्टा के कीड़ों की नाई वे उस विष्टा को ही अपना क्रीड़ा स्थान समझते रहते हैं। तुम्हारी काललब्धि निकट आ गई थी, इसलिये उस कृत्य से तुम्हें संवेग और निर्वेद प्राप्त हो गया, अन्यथा विचार करके देखो ! संसार का कौनसा कृत्य घृणित और वैराग्य का करने वाला नहीं है ? सो अब उस ओर अपने चित्त को सर्वथा मत जाने दो।

तुम्हारा संसार में अब कोई नहीं है, जो है वह तुम्हारे साथ है। वह तुमसे पृथक् नहीं है, उसी का निरन्तर ध्यान करो। अनन्तदर्शन, अनन्तज्ञान, अनन्तवीर्य, अनन्तसौख्य जो उसके स्वभाव हैं, देखोगे कि तुम्हें अतिशीघ्र प्राप्त हो जावेंगे।

तेईसवां पर्व

प्रातःकाल हुआ। अन्धकार अपने पराक्रमी शत्रु को पूर्व की ओर उदय होते हुए देख भागा। कौए “वयं काकाः तयं काकाः” कहते हुए लगे गुहार मचाने कि कहीं अन्धकार के धोखे अपने काले रङ्ग के कारण हम लोग न सताये जावें । चिड़ियाँ चुहचुहाने लगीं। महाराज विक्रमसिंह की आँख खुल गई। वे शय्या का परित्याग करके प्रभाति की क्रियाओं से निवृत्त हो शीघ्र ही तैयार हो गये। आज्ञा पाकर सेवकों ने घोड़ा कसके सम्मुख खड़ा कर दिया। जयदेव भी आ पहुँचे। प्रणाम करके बोले-महाराज ! आपके आगमन से मैं धन्य हुआ हूँ, परन्तु इस थोड़े से रात्रि काल के समागम से मैं संतुष्ट नहीं हो सका सो कृपा करके आज का आतिथ्य और भी स्वीकार करें।

विक्रमसिंह-(प्रेमाश्रु भरके) प्रिय जयदेव ! न जाने तुम्हारी ओर मेरा चित्त इतना आकर्षित क्यों हुआ है कि तुम्हें छोड़ने को स्वयं जी नहीं चाहता और न तुम्हारे सुकोमल वचनालाप से तृप्ति होती है, परन्तु क्या किया जावे, उधर लोग मेरे लिये घबड़ा रहे होंगे, इसलिये विवश तुमसे विदा लेता हूँ, अन्यथा एक दिन क्या तुम्हारे पास अनेक दिन रहने में भी मुझे कोई संकोच नहीं था।
जयदेव-नरनाथ! मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ, जो आप जैसे महत्पुरुषों के प्रेम का पात्र हुआ हूँ। श्रीजी करें, आपका यह प्रेम इस बालक पर सदा बना रहे। इस समय आप सकारण जाते हैं, इसलिये अब रोकने के लिये अधिक आग्रह नहीं किया जा सकता, परन्तु इसका अवश्य खेद रहेगा कि मुझसे आपकी कुछ उचित सेवा नहीं हो सकी।
विक्रमसिंह-नहीं जयदेव! खेद की कोई बात नहीं है। तुम्हारे समागम से मुझे जो सुख हुआ है वह असामान्य है। तुमने कल उपदेश देकर मुझ पर जो उपकार किया है, उसके ऋण से मैं कभी मुक्त नहीं हो सकूँगा। अहिंसा का तुम्हारा बतलाया हुआ वह सुन्दर रूप मेरे हृदय पर ज्यों का त्यों अङ्कित है। अब मैं जाता हूँ, परन्तु चलते-चलते एक बात कहे बिना नहीं रह सकता कि यदि मुझ पर तुम्हारा कुछ भी आन्तरिक स्नेह हो, तो कोई अवसर निकाल कर बिलासपुर आना और मुझे दर्शन देके सुखी करना।
जयदेव-(नतमस्तक होके) बहुत अच्छा। आपकी आज्ञा की पालना मैं यथाशक्ति प्रयत्न करूँगा।

इसके पीछे परस्पर आलिंगन करके विक्रमसिंह तो घोड़े पर सवार हो गये और जयदेव शिष्टाचार की पालना के लिये थोड़ी दूर तक उनके साथ-साथ गया, परन्तु आगे विक्रमसिंह के आग्रह से लौट आना पड़ा। एक पथ दर्शक सेवक के साथ महाराज बिलासपुर की ओर रवाना हो गये।

जयदेव लौट के अपने बङ्गले में पहुँचा। वहाँ जाके देखा, तो एक आराम कुर्सी पर भूपसिंह पड़े थे जो कि इसे देखते ही उठ खड़े हुए। दोनों के चेहरे खिल उठे और आनन्द के उद्वेग से दोनों परस्पर लिपट गये। जयदेव के हृदय का दुःख जो कि, विक्रमसिंह के वियोग से हुआ था, आनन्द रूप में परिणत हो गया, पश्चात् कुशल प्रश्न हो चुकने पर इस प्रकार बातचीत होने लगी-

जयदेव-यदि आप कुछ समय पहले आ जाते तो अच्छा होता। सहज ही बिलासपुर नरेश से भेंट हो जाती। मैं उन्हें अभी पहुँचा के आ रहा हूँ। बड़े सज्जन नरेश हैं।

भूपसिंह-बिलासपुर नरेश के दर्शन तो मुझे कभी नहीं हुए, परन्तु पिताजी से उनकी बहुत सी प्रशंसा सुनी है। कहते हैं, बड़े उदार हृदय, दृढ़-प्रतिज्ञ और पराक्रमी राजा हैं। खेद है कि मैं ऐसे अच्छे एकान्त अवसर में उनसे न मिल सका। अस्तु, पर यह तो कहिये कि आप इस एकान्त विद्या-कुटीर में आये कैसे ?

जयदेव-कल कुछ दिन रहे, यहाँ बैठे-बैठे चित्त ऊब जाने से मैं टहलते-टहलते इस पास की पहाड़ी की तलैटी में समीर-सेवन कर रहा था कि एक झाड़ के नीचे आप दिखलाई दिये। निकट जाकर पूछने से ज्ञात हुआ कि आप शिकार के लिये आये हैं और एक हरिण के कारण मार्ग भूलकर तृषा के मारे वृक्ष में स्थगित पड़े हैं, तब मैं अपना कर्तव्य वश ढाढ़स देकर उन्हें यहाँ ले आया था।

भूपसिंह-(मुस्करा के) पर दयानिधान! यह तो बतलाइये कि शिकार की अभ्यर्थना करके आपने कौनसा पुण्य कमाया?

जयदेव-वही, जो कि आपकी मित्रता करके कमा चुका हूँ। कहिए स्मरण तो है! महाराज! उपहास न कीजिये, मेरा प्रयत्न निष्फल नहीं हो सकता। आपको सुनकर हर्षित होना चाहिये की मृगया प्रेमी विक्रमसिंह सदा के लिये अहिंसाणुव्रत के धारी हो गये।

भूपसिंह-(हँस के) शाबास। मैं तो पहले ही से जानता हूँ कि आप जीते रहेंगे, तो बहादुरी का नाम ही मिटा देंगे।

जयदेव-तो क्या बेचारे निरपराधी वन्य पशुओं को सताना छोड़ने से ही बहादुरी चली जाती है? जान पड़ता है, अभी आप सूर्यपुर से हार के आ रहे हैं, इसलिये यह उलटी धुनि समाई है।

भूपसिंह-नहीं मित्र! चिन्ता मत करो। अहिंसा धर्म के प्रसाद से विजयपताका उड़ा के ही आया हूँ और एक दिन सर्वत्र अहिंसा की ही विजयपताका उड़ेगी, यह मेरा पक्का विश्वास है। निरपराधी जीवों पर घात से और पराक्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि ऐसा न होता तो मृगया प्रेमी निहालसिंह और उसके पुत्र उदयसिंह को मैं लीला मात्र में कैद करके न लाया होता।

जयदेव-अच्छा तो आप विजयपुर कब आये ? और झगड़े का फैसला क्या हुआ ?

भूपसिंह-मैं कल संध्या को ही लौट के आया हूँ। झगड़ा अब नहीं रहेगा। निहालसिंह हमारी रियासत छोड़ने के लिये राजी है, परन्तु मित्र ! उस सिलसिले को न छोड़ दीजिये। महाराज विक्रमसिंह से और आपसे कोई विशेष वार्ता हुई हो, तो और सुनाइये ?

जयदेव-और तो कुछ नहीं हुई। चलते समय उन्होंने बिलासपुर आने के लिये आग्रह अवश्य किया है, सो अच्छा हुआ। आपकी भी उनसे भेंट हो जावेगी।

भूपसिंह-हाँ ! अवश्य और आपकी सगाई की बातचीत भी तय हो जावेगी।* बड़ी खुशी की बात है।

जयदेव- यह क्या जी, कहाँ की सगाई ?

भूपसिंह-मानो आप कुछ जानते ही नहीं हैं-बड़े भोले हैं।

जयदेव-कुछ कहोगे भी ?

भूपसिंह-महाशय ! छुपाइये नहीं, क्या आपसे महाराज ने यह नहीं पूछा कि “तुम्हारा विवाह हुआ है कि नहीं ?” और फिर चलते समय क्या बिलासपुर आने का आमंत्रण नहीं दिया ? तो अब इन दोनों को मिलाके समझ लीजिये क्या अभिप्राय निकलता है ? आप तो नैयायिक पंडित हैं।

  • यह बात जयदेव के एक सेवक ने आने के साथ ही भूपसिंह को सुना दी थी।

जयदेव-भाई ! तुम्हें भी खूब हवाई किले बांधना आता है, कहीं भांग खाके तो नहीं आये हो ?

भूपसिंह-भांग खाके मैं आया हूँ, या आप खाए हुए हैं, यह तो समय पर प्रगट होगा, परन्तु अब तो कहिये कि ससुराल नहीं बिलासपुर कब चलियेगा, मैं जरूर आपके साथ चलूँगा।

जयदेव-(हँस के) जिस समय आप चलें मैं उसी समय तैयार हूँ। इसप्रकार हास्यविनोद की वार्ता करते-करते भोजन का समय हो गया। भूपसिंह ने अभी तक स्नानादिक नहीं किये थे, इसलिये यह स्ननागार की ओर गया और जयदेव विद्या मन्दिर में जाकर तब तक पुस्तकावलोकन में लगा।

उचित होगा कि यहाँ पर जयदेव भूपसिंह के विषय में कुछ परिचय देकर पाठकों का सन्देह निवारण कर दिया जावे।

बिलासपुर से दक्षिण की ओर अनुमान बीस कोस पर विजयपुर नगर है। बिलासपुर के समान यह भी समुद्र तट पर बसा हुआ है, इसकारण बिलासपुर से विजयपुर आने के लिये जल तथा स्थल दोनों मार्गों से लोग आ जा सकते हैं। बीच में एक सूर्यपुर छोटा सा राज्य है। सो आने-जाने वालों को सूर्यपुर राज्य की सरहद पर से जाना पड़ता है।

विजयपुर बिलासपुर का मित्र राज्य है और विस्तार आदि में प्रायः उसके बराबर है। यहाँ के राजा रणवीरसिंह बड़े प्रतापी तेजस्वी और प्रजावत्सल क्षत्रिय हैं। इस समय उनकी आयु पचास के अनुमान है। कुछ कम बारह वर्ष पहले उनकी महारानी धारिणी अपने एक मात्र पुत्र भूपसिंह को छोड़कर परलोक को कूच कर चुकी थी, परन्तु उसके पीछे जितेन्द्रिय महाराज ने दूसरा विवाह नहीं किया। पुत्र की शिक्षा-दीक्षा में ही उन्होंने तन, मन, धन से परिश्रम किया। इस समय भूपसिंह की आयु चौबीस वर्ष के अनुमान है। वह पिता की शिक्षा से ऐसे सांचे में ढाला गया है कि श्रेष्ठ से श्रेष्ठ राजाओं में जो गुण आवश्यक हैं, वे सब इस समय उसमें वर्तमान हैं। राजनीति, धर्मनीति, युद्धनीति, समाजनीति आदि सम्पूर्ण विषयों में वह असाधारण ज्ञान रखता है।

इसके अतिरिक्त काव्य, कोष, व्याकरण, न्यायादि विषयों में भी उसका अच्छा प्रवेश है। वह इस समय राज्य का कार्य बड़ी कुशलता से चलाता है। महाराज रणवीरसिंह उदासीन वृत्ति धारण किये हुए एकान्तवास सेवन करते हैं। अभी तक भूपसिंह का विवाह नहीं हुआ है।

विजयपुर में एक श्रीचन्द नामक प्रसिद्ध धनाढ्य है। उनके यहाँ जवाहरात का व्यापार होता है। कहते हैं श्रीचन्द के पिता एक सिपाही के वेष में विजयपुर में आये थे और उन्होंने एक जौहरी की दुकान पर नौकरी की थी। उसी नौकरी में अपनी ईमानदारी और तीक्ष्ण बुद्धि से उन्होंने इतनी सफलता प्राप्त की कि थोड़े समय में वे एक अद्वितीय रत्नपरीक्षक हो गये और उसके द्वारा उन्हें लक्षावधि द्रव्य प्राप्त हो गया। श्रीचन्द उन्हीं के सुयोग्य पुत्र हैं।

श्रीचन्द की विद्यादेवी नामक सुयोग्य गृहिणी से जयदेव और विजयदेव नाम के दो प्यारे पुत्र उत्पन्न हुए हैं। जयदेव की आयु बीस वर्ष और विजयदेव की आयु अठारह वर्ष के अनुमान है। छोटे पुत्र विजयदेव ने सामान्य विद्याभ्यास करके व्यापार कार्य की ओर चित्त लगाया है, परन्तु ज्येष्ठ जयदेव विद्याभ्यास में अब भी अहर्निश दत्तचित्त रहता है। आजकल वह पाठशाला का अभ्यास पूर्ण करके एकान्त में पठित विषयों का मनन करता है। जिस बंगले का वर्णन ऊपर आ चुका है, वह जयदेव ने इसीलिये (विद्याभ्यास के लिये) तैयार करवाया है। जयदेव की राजकुमार भूपसिंह के साथ असाधारण मैत्री है। संसार में वे एक दूसरे के अनन्य मित्र हैं।

जयदेव जन्म से ही दयालु-हृदय और शांत-प्रकृति के हैं। विजयपुर निवासियों ने उसे कभी किसी से लड़ते-झगड़ते अथवा कटुवचन कहते नहीं सुना। किसी को रोते पीटते देखकर उसे बड़ा त्रास होता था। एक बार एक निरपराधी जीव को पिटते देखकर उसे मूर्च्छा आ गई थी। कहते हैं, सुयोग्य महाराज रणवीरसिंह के कान तक जब यह बात गई, तब उन्होंने उसी दिन अपने पुत्र भूपसिंह को जयदेव के साथ रहने का आदेश दिया।

भूपसिंह को आखेट का शौक था परन्तु, क्षत्रिय धर्म किसे कहते हैं? इस विषय पर अवसर पाके जब जयदेव ने एक व्याख्यान सुनाया, तब भूपसिंह के टप-टप आँसू पड़ने लगे, सिर नीचे से ऊपर नहीं किया गया। उसी समय उसने निरपराधी जीवों को न सताने की प्रतिज्ञा कर ली। गुणज्ञ भूपसिंह उसी दिन से जयदेव को आदर की दृष्टि से देखने लगा।
कुछ दिन पहले विजयपुर और सूर्यपुर के सीमा प्रान्त के कुछ ग्रामों के विषय में असमंजस हो गया था, परन्तु चतुर रणवीरसिंह ने अपनी उपेक्षा से, उस समय दबा दिया था, तो भी वह दब न सका। सूर्यपुर के राजकुमार उदयसिंह की करतूत से विरोधाग्नि धधक उठी और आखिर भूपसिंह को सूर्यपुर पर चढ़ाई करनी पड़ी। फल यह हुआ कि घोर युद्ध के पश्चात् उदयसिंह और महाराज निहालसिंह कैद कर लिये गये। इसी लड़ाई में विजय पाकर भूपसिंह जयदेव के बंगले पर गया था, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है।

चौबीसवां पर्व

जयदेव को देखते ही चित्त कहने लगा कि वह कोई क्षत्रिय पुत्र है। उन्नत ललाट, विशाल वक्षःस्थल, प्रलम्ब भुजायें, सुदृढ़, सुपुष्ट शरीर और प्रफुल्ल मुखमण्डल आदि उसके असाधारण पराक्रमी और प्रतापी होने के स्पष्ट लक्षण हैं। कैसा ही अनुभवी और चेष्टा परीक्षक क्यों न हो वह एकाएक जयदेव को वणिक पुत्र कहने में अचकचा जावेगा, इसलिये मुझे उसके वणिक होने में विश्वास नहीं होता। जान पड़ता है कि उसके जीवन में किसी कारण से क्षत्रियत्व का रहस्य गुप्त रक्खा गया है, परन्तु नहीं, वह वणिक ही क्यों न हो, अब तो सुशीला का भाग्य उसके हाथ में समर्पण किया जावेगा। नीति में कहा है कि अयोग्य वर को कन्या देने की अपेक्षा उसे एक कुँए में पटक देना अच्छा है, इसलिये सुयोग्य वर की अप्राप्ति में यदि सुशीला का पाणिग्रहण एक परम सुयोग्य वणिक के साथ जिसमें कि सम्पूर्ण क्षत्रिय पुत्रोचित लक्षण मिलते हैं, कर दिया जावे, तो कोई अन्याय नहीं होगा। यद्यपि ऐसे सम्बन्ध से लोग विरोध करेंगे, परन्तु पिता के यथार्थ कर्तव्य की पूर्ति ऐसा किये बिना नहीं हो सकती। जयदेव जैसा वर मिले बिना मेरी प्राणाधिक प्रिय सुशीला सुखी नहीं हो सकती।

मैं अनेक राजकुमारों को देख चुका हूँ, परन्तु अभी तक उनमें से किसी ने मुझे सन्तोष नहीं पहुँचाया है। उन सबमें बहुत थोड़े और विरले गुण पाये गये हैं, परन्तु जयदेव के गुणों की गिनती नहीं हो सकी। एक दया ही उसके हृदय में ऐसी शक्तिशालिनी और सुन्दर है कि अन्य गुणों की उसमें अपेक्षा ही नहीं है। वीरपुरुष का उन्नत हृदय ऐसी दशा में शोभायमान रहना चाहिये, जिसका कि जयदेव ने मुझे उपदेश दिया था और जिसे वह स्वयं अहर्निश धारण किये रहता है।

उस रात जयदेव के वार्तालाप में तर्क बुद्धि की प्रखरता, काव्य की रुचिरता, और व्यवहार-कुशलता के साथ-साथ राजनीति की जैसी योग्यता प्रकट हुई थी, वैसी योग्यता वर्तमान में अन्य किसी राजकुमार में भी प्राप्त होगी, यह कल्पना मात्र है।

ऐसी अवस्था में मैं अपने विरोधियों से पूछ सकता हूँ कि जिस पुरुष पुङ्गव में सम्पूर्ण क्षत्रिय-गुण पाये जाते हों, वह वणिक क्षत्रिय क्यों नहीं है? और अनेकान्त-मत के मानने वाले हम लोग क्या एकान्तपूर्वक जन्म से ही वर्ण मान बैठेंगे, गुणकर्मों से नहीं? इसके अतिरिक्त अनेक प्राचीन कथाओं के ऐसे प्रसंग सुने जाते हैं, जिनमें राजकन्याओं का सुयोग्य वणिकपुत्रों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध हुआ है, फिर मेरे इस कार्य में ही विरोध क्यों किया जाता है?
परन्तु प्रत्येक कार्य जहाँ तक हो, लोक को अपने अनुकूल बनाकर ही करना चाहिये, इसलिये इस कार्य में अभी से इतनी शीघ्रता करनी ठीक नहीं है। शान्तिता के साथ अपने गुरुजनों और मंत्री सुहृद्गणों में यह विषय उठाकर अपना अभिप्राय उन्हें समझाना चाहिये। संभव है कि अपनी सुयोग्य युक्तियाँ उनके चित्तों पर प्रभाव डाल के अपने इष्ट साधन में समर्थ हो जावें।
इसके अतिरिक्त अभी उस ओर से भी सर्वथा निराश नहीं होना चाहिये। विजयपुर को जो सवार चिट्ठी लेकर दौड़ाये गये हैं, क्या आश्चर्य है कि वे ही अपने अभिलषित उत्तर को लेकर आवें और इन नाना चिन्ताओं के स्थान में आनन्द का स्रोत बहाने लगे।
एक चिन्ता सुशीला की माता की थी, परन्तु अच्छा हुआ कि वह निवृत्त हो गई। मेरी अभिप्राय वे समझ गई और जयदेव को जामाता बनाने को राजी हो गई। बेचारी स्त्रियों की बुद्धि ही कितनी ! नहीं रहा गया, अन्त में पूछ ही बैठी कि जयदेव का पिता कितना बड़ा धनी है, परन्तु बड़ी खैर हुई कि जयदेव किसी कंगाल का पुत्र नहीं हुआ, अन्यथा यहाँ बड़ी कठिनता पड़ती।
क्या ही अच्छा हो, यदि जयदेव इस समय जैसा कि उसने स्वीकार किया है, यहाँ आ जावे और सब लोग उसे समक्ष में देखकर मेरे विचारों का तत्व समझ जावें। मुझे पूर्ण विश्वास है कि उसके मिलाप से ही सब ही आप्तवर्ग मेरे अनुमोदक हो जावेंगे और तब मेरी अभिलाषा के पूर्ण होने में कुछ भी विलम्ब न होगा।
अस्तु, अब रात बहुत बीत गई है। आज का सारा दिन इसीप्रकार की नाना चिन्ताओं में गत हुआ है, उचित है कि कुछ विश्राम कर लिया जाए। यदि उदय अच्छा है तो श्रीजी की कृपा से कल ही इन सब चिन्ताओं का अवसान हो जावेगा।
इसप्रकार विचार तरंगों का अवरोध करके महाराज विक्रमसिंह उस दिन की थकावट मिटाने के प्रयत्न में लगे। उस समय सारा संसार निद्रा के यौवन कानन में विहार कर रहा था। निजत्व को तो पहले ही भूला हुआ था। इसप्रकार एक से परत्व-ज्ञान को भी खो चुका था।
दूसरे दिन आठ बजे के अनुमान राजभवन के एक साफ सुन्दर कमरे में खास बैठक की व्यवस्था की गई। महाराज, उनके वृद्ध दूरदर्शी काका, मंत्री, पुरोहित और चुने हुए दो चार मुख्य राज्य-कर्मचारी आदि खास-खास पुरुष एकत्र हुए। सबके स्वस्थचित्त होकर बैठ जाने पर महाराज विक्रमसिंह ने थोड़े से शब्दों में अपना इसप्रकार का अभिप्राय प्रकट किया कि- राजकन्या सुशीला जिसे कि आप लोग सरस्वती कहके पुकारते हैं, व्यवहार प्राप्त हो चुकी है, इसलिये उसका विवाह करना आवश्यक है। विवाह सम्बन्ध से दो प्राणियों के बहुमूल्य जीवन के सुख-दुःखों की डोरी परस्पर जोड़ी जाती है, इसलिये यह कार्य मेरी समझ में अतिशय विचारणीय तथा उत्तरदायित्व का है और आप लोग इस विषय में मेरी अपेक्षा विशेष अनुभवी और दूरदर्शी हैं, इसलिये मैं चाहता हूँ कि इस विषय में जो कुछ किया जावे, आप लोगों के विशेष परामर्श से किया जावे।

सुशीला जैसी सुशील और विदुषी कन्या के लिये बहुत दिन की शोध के पश्चात् मैंने एक वर खोजा है, बाहरी रूपलावण्य वेषविन्यास के समान जिसका अन्तरङ्ग भी अतिशय सुन्दर है। विद्वत्ता, शूरता, उदारता, दूरदर्शिता, सहनशीलता सब ही लोकोत्तर गुणों ने उसके हृदय को अपना निवास स्थान बनाया है, परन्तु इस प्रकार क्षत्रियों के योग्य सम्पूर्ण लक्षण होने पर भी उसने अपने को वणिकपुत्र बतलाया है, यह एक चिन्तनीय बात उपस्थित हुई है, इसलिये अब आप लोगों से सम्मति माँगता हूँ कि यह कार्य कुछ अनुचित तो नहीं होगा ?

पुरोहित-राजन् ! वर के गुणों की ओर विचार करते हुए यद्यपि आपका विचार अनुचित नहीं जान पड़ता, परन्तु लोकमर्यादा और आचारग्रन्थों की आज्ञा से यह विरुद्ध नहीं है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता।

मंत्री-पुरोहितजी का कहना ठीक है, परन्तु जिस कुमार की महाराज ने प्रशंसा की है, वह वणिक है न कि वैश्य, इसलिये यदि जन्म की अपेक्षा वर्णव्यवस्था माननी ठीक है, तो वणिकवृत्ति से उसको वैश्य मान लेना सन्देह से शून्य नहीं है और यदि गुणकर्मों की अपेक्षा वर्णव्यवस्था है, तो उस कुमार के क्षत्रिय होने में जैसा कि महाराज कहते हैं, कुछ सन्देह ही नहीं है।

पृथ्वीसिंह- (महाराज के वयोवृद्ध काका) विक्रमसिंह! इस वाद-विवाद के पहले तुम्हें उस कुमार का परिचय देना चाहिये कि वह कहाँ का है और किसका पुत्र है? और यदि उसके वर्णविषय में तुम्हें सचमुच सन्देह है, तो सेवक भेजकर पहले उसे मिटा लेना चाहिये।

विक्रमसिंह-(हाथ जोड़कर) महाराज! यह विजयपुर के श्रीचन्द नामक वणिक का पुत्र है। बस इतना ही परिचय मुझे उसके विषय में मिला है, परन्तु आपकी इच्छानुसार विजयपुर को मैं सेवकों को भेज चुका हूँ, वे लोग आते ही होंगे।

पुरोहित-उनके द्वारा उस कुमार की जन्मपत्रिका आदि आपने मँगाई ही होगी, क्योंकि विवाह सम्बन्ध में तद्विषयक विचार भी अत्यावश्यक कार्य है। वर और कन्या की जन्मकुंडली से जब तक यथोचित विधि न मिला ली जावे तब तक वह विवाह सम्बन्ध सुखकर नहीं होता।

विक्रमसिंह-परन्तु यह कार्य पीछे का है। मैंने विजयपुर नरेश से केवल उसके वर्णकुलादि विषय में पूछा है। वह सचमुच क्षत्रिय-पुत्र है जब तक यह निर्णय न हो ले, तब तक अन्य बातों की चर्चा करनी मैंने उचित नहीं समझी।

मंत्री-परन्तु मेरी समझ में इस समय यदि किसी बहाने से वह कुमार यहाँ बुला लिया जावे, तो अच्छा होगा। ये सब लोग उसे समक्ष में देखकर आपकी सम्मति के बहुत कुछ अनुगामी हो जावेंगे।

विक्रमसिंह-ठीक है। कुमार ने मुझसे यहाँ शीघ्र ही आने का वादा किया है तथा आज एक सेवक और भी लेने के लिए भेज दो। शेष विचार पीछे होगा।

मंत्री-जो आज्ञा।

पच्चीसवां पर्व

पाठक! आइये, आज हम आपको एक रमणीय बगीचे की सैर करावें, जो बिलासपुर के पूर्व की ओर बना हुआ है, इसके आसपास एक सुदृढ़ परिखा बनी हुई है, जिसे लांघकर वायु का भी साहस भीतर जाने का नहीं पड़ता। भीतर जाने के लिये केवल एक ही द्वार है, जहाँ पर शस्त्रधारी सिपाहियों का सदा पहरा रहता है। किसी परिन्दे की मजाल नहीं, जो बिना आज्ञा पर मार जाय। वह द्वार रमणीय पत्थर का बना हुआ है, जिस पर चतुर शिल्पकार ने सुन्दर बेलें खोदी हैं, जो देखने में ऐसी जान पड़ती हैं, मानों पत्थर के साथ ढालकर निकाली गई हैं। उसमें जो पच्चीकारी के फल बने हैं वे ऐसे जान पड़ते हैं कि मानों माली ने अभी-अभी तोड़कर लगाये हैं। किवाड़ों पर भी नक्शागिरी का काम देखने वालों को चकित करता है। ये किवाड़ चन्दन के हैं, जिन्हें खोलने पर उद्यान में प्रवेश होता है। प्रवेश करते ही एक संगमरमर का बना हुआ विशाल प्राङ्गण मिलता है, जो दूर से ऐसा भासता है, मानों दूध का सरोवर भरा हो। बीच-बीच में चतुर कारीगरों ने लाल पत्थर के ( लाल वर्द के ) फूल ऐसी खूबी के साथ बनाये हैं, कि उन्हें देखकर असली कमलों का धोखा हो जाता है। आंगन के आस-पास करीने से छोटी-छोटी हरी दूब जमाई है जिसके बीच-बीच में छोटे-छोटे वृक्षों के गमले रक्खे हुए हैं। खिले हुए फूलों पर रंग-बिरंगी मक्खियाँ उड़ती बैठती हुईं एक अलौकिक छटा उत्पन्न कर रही हैं।

समीप ही एक तालाब से लाई हुई नहर बह रही है, जिसके दोनों किनारे पक्के बन्धे हुए हैं और एक प्रकार की सुन्दर फूल और पत्ते वाली लता से ढके हुए हैं। सारा बगीचा इसी से सींचा जाता है। नहर के उस पार बड़े-बड़े मेवेदार वृक्षों की श्रेणी है। बगीचे में घूमने के लिये जो छोटे-छोटे मार्ग हैं, उनके दोनों ओर नन्हीं-नन्हीं हरी सुकोमल घास लगाई गयी है और उनके पश्चात् जुही, मालती, बेला, गुलाब, चमेली आदि अनेक प्रकार के सुगंधित फूलों की क्यारियाँ बनी हैं। नहर से नल लगाकर बगीचे के चारों कोनों पर चार बड़े-बड़े होज फव्वारा लगाकर बनाये गये हैं, जिनके किनारे सुन्दर संगमरमर की बैठकें बनी हुई हैं। कभी-कभी यहाँ बैठकर महाराज विक्रमसिंह की प्यारी कन्या सुशीला प्रकृति की शोभा देखती हुई संसार की विचित्रता का अनुचिंतन करती है। वह किसी भी पुष्प अथवा उसकी कलिका को हाथ में लेकर विचार सागर में घण्टों गोते लगाया करती है। वह सोचने लगती है कि देखो कल जिसे निरा कली देखा था, आज वही अधखिली कलिका है और कल यही फूलकर परसों धराशायी होकर धूलिसात् हो जावेगी, फिर न कली का पता लगेगा और न पुष्प का।

सुशीला के विचार अत्युत्कृष्ट हैं। वह प्रत्येक बात में से जो सिद्धान्त शोध के निकालती है, वे कुछ अपूर्व ही होते हैं। वह यद्यपि अभी अविवाहित है, परन्तु विवाहित स्त्रियों का क्या धर्म है, उसे वह भलीभाँति जानती है। कुलीनवंशोद्भव पतिपरायणता स्त्रियों के धर्म का उसे खूब परिचय है। क्षमा, शील, संतोष प्रभृति धर्मों ने उसके हृदय को अपना विश्रामास्पद बना लिया है। सांसारिक नाना प्रपंचों के समीप ने उसके शरीर को कभी स्पर्श भी नहीं किया।

आज वह सरस्वती सुशीला अपनी रेवती आदि सखियों के साथ इस उद्यान में क्रीड़ा करने को आई है। नहर के किनारे टहलते-टहलते रेवती ने चंद्रिका से कहा, चन्द्रिके ! इस पारावत की जोड़ी को तो देख, प्रमोदमग्न हुई कैसा नृत्य-सा करती है और कुछ अस्पष्ट शब्दों के कहने को गला फुला रही है।
चन्द्रिका-सखी ! क्या तू नहीं जानती, वह अपनी जीवन मूर्ति सुशीला को बधाई देने के लिये उत्सुक और प्रफुल्लित हो रही है।
सुशीला-क्या कहा चन्द्रिके ! कैसी बधाई ?
रेवती-(बात काटकर) इधर देखिए इधर ! यह दूसरी जोड़ी आपके आगमन की मानों प्रतीक्षा में है।
सुशीला-भला वह पक्षी जाति के सीधे-साधे जीव मेरे आगमन की प्रतीक्षा क्यों करने लगे ?
चन्द्रिका-(रेवती से) सखी ! रहने भी दे, अभी इनके दूध के दाँत भी तो नहीं गिरे हैं, फिर ये भला इस मर्म को क्या जानें ?
सुशीला-(मुस्कराकर) चन्द्रिके ! तुझे मेरी शपथ है। सच-सच बतला, मैं कुछ नहीं समझी।
चन्द्रिका-हाँ ! आप क्यों समझने चलीं ? अब जब हम लोगों के भाग्य से पारितोषिक के मिलने का समय आया, तब आप स्वयं ही अनसमझ बनेंगी।
सुशीला-(रेवती से) भला सखी ! तू यह बता दे, यह चन्द्रिका क्या बक रही है ?
रेवती-वही कल की बात ! बक क्या रही है, जिसे सरकार भी सुनकर मन ही मन खिल चुकी हैं।

सुशीला-(समझकर और कुछ रूखा-सा मुँह बनाकर) चल रहने दे, तुझे सदा हँसी ही सूझा करती है।
रेवती-क्यों-क्यों सरकार! क्या यों खफा होकर ही हमें टालना चाहती हो? उसमें मेरा भी हक है।
चन्द्रिका-और मेरा?
सुशीला इसका और उत्तर न दे सकी। लज्जा से उसका सिर नीचा हो गया, परन्तु मुख मण्डल पर एक मन्द मुस्कान की रेखा झलक आई।
सुशीला ने सोचा था कि अब इतने में ही चुक जाऊँगी, परन्तु सखियाँ कब मानने वाली थीं, उन्होंने हँसी का दूसरा ढंग निकाला। रेवती जासूसी के कामों में बड़ी चतुर है और चन्द्रिका भी कुछ कम नहीं है, परन्तु चन्द्रिका रेवती से ठठोलपन में दो कदम आगे है।
बेचारी भोलीभाली सुशीला एक कुसुममयी वनलतिका के समीप खड़ी-खड़ी पीले-पीले पत्ते चुन रही थी कि अचानक सामने से चन्द्रिका को थोड़ा सा घूंघट निकाले मुस्कुराते हुए आते देखा। सुशीला ने पूछा, क्यों क्या है?
चन्द्रिका-वाह सरकार! क्या देखती नहीं हो, विजयपुर वाले सेठजी आ रहे हैं।
सुशीला ने जो लौटकर पीछे देखा तो एक नवयुवक को आते देखा। सिर पर छोटी सी कुसमानी पगड़ी है, जिसमें मोतियों की सुन्दर कलङ्गी लगी हुई है। चमका हुआ जरदोजी के काम का रेशमी अङ्गरखा और उस पर खासी महाजनी चाल का दुपट्टा पड़ा हुआ है। अंगूठे को छूने वाली नीची धोती सीधे जूता पहिने हाथ में एक फूलों का गुच्छा लिये हुए है। सुशीला देखते ही सहम गई। शरीर पसीने-पसीने हो गया। थोड़ी देर अवाक् सी हो रही। पश्चात् कुछ रुखी सी पड़के पुकार कर बोली, रेवती ! रेवती ! देख तो यह कौन ढीठ पुरुष इधर चला आ रहा है। एक अज्ञात पुरुष को यहाँ आने का कैसे साहस हुआ ? और भला यह आया ही किस मार्ग से होगा ? ठहरो, पिताजी से आज द्वाररक्षकों को कैसा इनाम दिलाती हूँ कि वे भी याद करें।

जब रेवती का न तो उत्तर मिला और न वह इधर-उधर दिखाई दी और उस पुरुष को बराबर आगे बढ़ते हुए देखा, तब तो सुशीला डर के चन्द्रिका के पास दौड़ी। चन्द्रिका बोली-हैं ! हैं ! ऐसी भाग-भाग कर कब तक रहोगी ? यों भागती हो कि आदर स्वागत करके अपने अतिथि को प्रसन्न करती हो। सुशीला क्रोध करके बोली-चन्द्रिका ! चुप रह। ये तेरी हँसी का समय नहीं है, रेवती को बुला, वह कहाँ गई ? इस असमसाहसी पुरुष को उसकी ढीठता का मजा चखावें और द्वार रक्षकों को बुला दे कि इसे पकड़ कर पिता के पास ले जावें। चन्द्रिका बोली-हैं ! हैं ! चुप भी रहो। ये मुझे विजयपुर वाले जैसे लगते हैं। कदाचित् पिताजी की आज्ञा से ही यहाँ आये होंगे अन्यथा किसकी मजाल थी, जो यहाँ आता।

अब जी खोलकर बातें कर लो और खोटा खरा भी परख लो जिससे पछताना नहीं पड़े।
यों चन्द्रिका बराबर छेड़ती जाती थी और सुशीला का भय बढ़ता जाता था। उसे एक बड़ा भारी भय यह लगा था कि कहीं उदयसिंह कोई चालाकी न करे। साथ ही रेवती के कथनानुसार बलवन्तसिंह के नौकर होकर बिलासपुर में रहने का भय उसे कम न था। सुकुमार हृदय सुशीला के हृदय में अनेक संकल्प-विकल्प उठकर उसे डरा रहे थे कि वह अज्ञात पुरुष पास ही आकर खड़ा हुआ और बोला-
देवकन्याओं! आज्ञा हो तो (हाथ से इशारा करके) इस लतामण्डप के नीचे कुछ समय ठहर कर विश्राम ले लूँ-यह सुनके सुशीला तो मुँह फेर कर बैठ गई। उसका हृदय धकधक करने लगा, मुख मण्डल पर स्वेदबिन्दु झलक आये, पाषाण हृदय चन्द्रिका को उसकी इस दशा पर कुछ भी दया न आई बोली,-हाँ हाँ पथिक! चैन से विश्राम लो। पर यह तो कहो कि आपका आगमन कहाँ से हुआ।
आगन्तुक-विजयपुर से।
चन्द्रिका-आपके नाम का परिचय क्या हम लोग पा सकतीं हैं?
आगन्तुक-मेरा नाम जयदेव है। मैं वणिक पुत्र हूँ। मार्ग भूल के यहाँ आ निकला हूँ। मुझे बिलासपुर के महाराज के निकट जाना है। यहाँ थोड़ी देर ठहर के अपनी राह लगूँगा। कृपा करके आप लोग भी अपना परिचय मुझे देंगी।
चन्द्रिका (हँसी को रोक के) हो तो बड़े भाग्यवान् ! आपका शकुन अच्छा हुआ। जिसे आप मार्ग भूलना कहते हो, सो देव ने हाथ पकड़ के आपको अभीष्ट स्थान तक पहुँचा दिया है। यह उद्यान उन्हीं महाराज की कन्या का है कि जिनके पाहुने आप आये हैं। (सुशीला से) सखी ! रेवती जब तक आवे, तब तक इनका तू और नहीं तो वचनों से ही सत्कार कर।
सुशीला-(खीजकर) चन्द्रिका ! देख, आज मैं माता से कहकर तुझे और रेवती को कैसा दण्ड दिलाती हूँ। एक सर्वथा अपरिचित परपुरुष जान पड़ता है, तू या रेवती ही बुला आई होगी।
चन्द्रिका-लो भला ! अपनी बलाय पराये सर। तुम्हारे पिता ही बेचारे को बुला आये हैं और दंड दिलाने की धमकी मुझ पर। अच्छा खैर विजयपुर पहुँचने पर तुम्हें आज की बात का उत्तर मिलेगा।
आगन्तुक-क्यों ये तुम्हारी कौन हैं, जो पीठ दिये बैठी हैं। क्या मेरे यहाँ आ निकलने से उन्हें कुछ खेद पहुँचा है ?
चन्द्रिका-महाशय ! यह बिलासपुर नरेश की कन्या है। नाम इनका सुशीला ‘यथा नाम तथा गुण’ है और मैं इनकी दासी हूँ। माता की आज्ञा से यहाँ घूमने आई हैं।

आगन्तुक-इनके पिता तो बड़े उदार हैं, पर यहाँ तो संकीर्णता की पराकाष्ठा है, जो एक गरीब मुसाफिर पर इतनी रुष्टता दिखला रही हैं।

इतना सुनकर सुशीला अत्यन्त रुष्ट होकर कुछ कहना ही चाहती थी कि उस नवयुवक ने अपने ऊपर का लिबास उतार कर फेंक दिया। जिसके फेंकते ही हँसता हुआ एक स्त्री का रूप निकल आया और पास आके सुशीला के पैरों में पड़ गया। सुशीला आश्चर्य-विस्फारित नेत्रों से उसको देखने लगी।

पाठक ! यह स्त्री और कोई नहीं, वही रेवती थी, जो किसी कार्य का बहाना करके वहाँ से चली गई थी और फिर जयदेव का रूप धारण करके आई थी।

इसके पश्चात् वे तीनों हँसती हुई वहाँ से उठ खड़ी हुईं।

छब्बीसवां पर्व

संध्या हुई। वरुणदिशा के पास सूर्यदेव आये। देखते ही उसके गालों पर ललाई दौड़ आई। बड़े प्रेम से उसने उनकी गुलाल से अभ्यर्थना की। क्षितिजमंडल पर दूर-दूर तक गुलाल ही गुलाल नजर आने लगी।

अस्ताचल पर्वत सूर्य देव को मस्तक पर धारण करके संसार को समझाने लगा कि जो निरन्तर परोपकार करने में अपना जीवन व्यतीत करते हैं, व क्षीणपुण्यी होकर भी महापुरुषों के द्वारा पूजे जाते हैं।

इस समय बिलासपुर से नैर्ऋत की ओर एक टीले पर कोई युवा खड़ा होकर बिलासपुर की ओर अनिमिष नेत्रों से देख रहा है। जान पड़ता है कि किसी के आने की प्रतीक्षा कर रहा है। उसके हाथ में एक घोड़े की बागडोर है, जो पास ही कसा कसाया खड़ा है, और अपने मालिक का अनुकरण कर रहा है。

पूर्व दिशा की ओर से अन्धकार को दौड़े हुए आते देखकर सूर्यदेव यह कहकर अस्त हो गये कि मैं अपने रहते इस संसार को इस मलिनात्मा से दुःखी नहीं देख सकता, प्रकाश लुस हो गया। पक्षीगण शोर मचाने लगे। मानों प्राणपति दिवानाथ के वियोग में दिगङ्गनायें रोने लगीं。

युवा को खड़े-खड़े बहुत समय हो गया। अतएव वह थककर यह कहता हुआ बैठ गया कि चलो थोड़ी देर और राह देख लूँ कहीं ऐसा न हो कि मैं यहाँ से जाऊँ और पीछे बलवन्त आकर मेरे लिये दुःखी हो। वह अवश्य ही आता होगा। किसी कारण विशेष से ही अभी तक नहीं आ सका है。

थोड़े ही समय में अन्धकार ने सम्पूर्ण संसार को अपने रंग रूप जैसा बनाकर स्पष्ट कर दिया ‘गुणदोषाः सदसत्प्रसङ्गजा’ अर्थात् गुण-दोष सज्जन और दुर्जनों के प्रसंग से ही होते हैं。

इतने ही में किसी ने पीछे से आकर उस युवा के नेत्र अपने दोनों हाथों से बन्द कर दिये और एक बड़े जोर की हँसी हँसकर कहा “लो, मैं तुम्हारी इच्छा को पूर्ण करने वाला आ गया, अधीर मत होओ।” युवा ने समझा बलवन्त आ गया, परन्तु बलवन्त की और इसकी आवाज में तो जमीन आसमान का फर्क है, तो क्या कोई दुश्मन मेरा भेद जानकर प्रतारणा के लिये आया है? इस प्रकार के विचार ने युवा को अधीर कर दिया। उसने बड़े बल के साथ उस पुरुष के हाथों को झटका देकर अलग कर दिया और सम्मुख होकर कहा-कौन बलवन्त? आगत पुरुष ने हँस करके कहा-हाँ।
अन्धकार के आने के पश्चात् ही तारागण ऐसे दिखलाई देने लगे, मानों मित्र (सूर्य) वियोग के दारुण दुःख से आकाश मण्डल से आँसुओं के चमकते हुए बिन्दु झड़ रहे हैं। उन्होंने अन्धकारमय संसार में थोड़ा सा प्रकाश कर दिया। युवा ने तारागणों के प्रकाश में देखा, हाँ करने वाला बलवन्त नहीं है, एक विकटाकार पुरुष है, जिसकी हाथ भर की लम्बी सफेद दाढ़ी लटक रही है। सिर पर एक बड़ा भारी सफेद फैंटा बन्धा हुआ है। सारा शरीर नीचे से ऊपर तक एक सफेद चादर से ढका हुआ है। युवा विस्मित होकर उसकी ओर ज्यों-ज्यों घूर के देखता था, त्यों-त्यों वह सफेद पोश उसे चिढ़ाने के लिये बार-बार हँसता था। आखिर युवा ने तलवार खींच ली और कड़क के कहा, सच-सच बता तू कौन है? नहीं तो तेरी ढिठाई का तुझे अभी मजा चखाता हूँ।

सफेद पोश- (निडर होकर) मजा चखोगे तो आप, मैं तो यों ही उल्टी सीधी सुनूँगा और मेहनत करूँगा।
युवा- (गुस्से से) तो क्या तू मुझे मजा चखावेगा ?
सफेद पोश- (मुस्कराते हुए) जी हाँ !
युवा-आखिर तेरा नाम क्या है ?
सफेद पोश-वही, जो आपने लिया था !
युवा-मैं तुझ जैसे पिशाच का नाम क्यों लेने लगा ?
सफेद पोश -एक बार क्या आप तो नित्य हजार बार लेते हैं।
युवा-मुझे मालूम पड़ता है, धोखा देकर तू बलवन्त बनना चाहता है, परन्तु पहले जरा अपनी शकल तो देख, तब यह होंसला करना।
सफेदपोश-मैं अपनी शकल तो देखता हूँ, परन्तु हुजूर भी तो जरा अपनी ओर होश सम्भाल के देखें।
युवा ने घबड़ा कर आश्चर्य से ज्यों ही अपनी ओर देखा, त्यों ही वह विकट पुरुष अपने ऊपर की चादर और फैंटा फेंक के खड़ा हो गया। फैंटे के साथ ही दाढ़ी भी न जाने कहाँ चली गई। युवा ने फिर से देखा तो उसके सामने उसका मित्र बलवन्तसिंह खड़ा हुआ मुस्करा रहा है। युवा आश्चर्यान्वित होकर बोला-हैं ! बलवन्त ! तुम कहाँ थे, मैं तो तुम्हारे लिये बड़ा व्यग्र हो रहा था।

बलवन्त-मैं तो हुजूर के सामने कभी का खड़ा हूँ, परन्तु मेरे आगे एक बुड्ढा खड़ा था इससे शायद आपकी नजर मुझ पर नहीं पड़ी होगी। देखिये ! अब मैंने उस बुड्ढे की क्या दशा की है, वह जमीन पर पड़ा हुआ सिसक रहा है। आप से गुस्ताखी करने का मजा उसे मिल चुका है।

युवा-(लज्जित होकर, हँसते हुए) भाई बलवन्त ! तुम्हारी छोटेपन की शरारत अभी तक नहीं गई। आज तो तुमने मुझे खूब ही छकाया, परन्तु तारीफ है, मैं बिल्कुल नहीं पहिचान सका। वाह ! उस वक्त तुम बोली भी क्या विचित्र प्रकार की बोले थे, पर यह तो कहो कि तुम अभी कहाँ से आ रहे हो ? मैं तो बिलासपुर की ओर न जाने कब से टकटकी लगाये बैठा हूँ।

बलवन्त-ठीक है आप बिलासपुर की ओर टकटकी न लगायेंगे, सुशीला देवी का ध्यान न करेंगे, तो भक्त पुरुषों की श्रेणी में से आपका नाम ही न निकाल दिया जावेगा ? मैं बिलासपुर की ओर से ही आ रहा हूँ, परन्तु सीधा मार्ग छोड़कर जिसमें कोई पहिचान न सके, यहाँ टीले के नीचे से आपको देखकर मुझे आपको छकाने की सूझ आई, इससे चक्कर लगाकर पीछे की ओर से आ खड़ा हुआ था, पर आपका ध्यान भङ्ग नहीं हुआ।

युवा-(प्रसन्न होकर) अस्तु। अब यह कहो, तुमने इतने दिन बिलासपुर में रहके क्या किया और अपनी इष्ट सिद्धि में क्या विलम्ब है ?

बलवन्त-यह तो आप मेरी चिट्ठी से जान ही चुके हैं कि मैं विक्रमसिंह का अत्यन्त विश्वासपात्र नौकर हो चुका हूँ और उनके दरबार में निरन्तर रहता हूँ, तब से अब मैं अहर्निश इसी प्रयत्न में रहा हूँ, किसी प्रकार से आपकी प्यारी सुशीला गायब कर दी जावे परन्तु इस तरह से कि महाराज को किसी प्रकार से हम लोगों पर सन्देह न हो कि यह शरारत उदयसिंह की है, नहीं तो वे सूर्यपुर राज्य को गारत कर डालेंगे। सूर्यपुर राज्य में अभी इतना बल नहीं है कि वह बिलासपुर से विरोध कर सके। सिवाय इसके यदि आपके पिता को (निहालसिंह को) आपका यह चरित्र मालूम हो जावेगा तो और बड़ी विपत्ति आवेगी। इन सब बातों को सोच कर मैंने अनेक प्रयत्न किये और वे सिद्ध भी हो जाते, परन्तु अफसोस है, उस हरामजादी रेवती के मारे सब पर पानी फिर गया। बिलासपुर में एक रेवती ही ऐसी है, जो मुझ से चौकन्ना रहती है और जानती है कि यह कुछ दगा करेगा। अन्य सब ही मुझे राज्य का सच्चा शुभचिन्तक समझते हैं और तो क्या आपकी प्राणप्यारी सुशीला भी मुझे विश्वस्त समझती है और रेवती को मेरी ओर से सशंकित रहते देख उसे चिढ़ाया करती है। यदि रेवती को मैं अपने हाथ में ले पाऊँ, तो समझिये ‘पौबारह’ है। वह ऐसी विचित्र जासूस है कि पत्ते के खड़कने से भी चौकन्ना हो जाती है। उस दिन मैंने हरिहर को आपके पास एक चिट्ठी लेकर भेजा था कि उसने रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया। न जाने उसे उस पर क्यों सन्देह हो गया। बड़ी खैर हुई कि वह चिट्ठी उसके हाथ नहीं पड़ी। हरिहर अपनी चतुराई से उसे स्वयं निगल गया और बड़ी सफाई के साथ बच गया। इस तरह अपने मार्ग में वही काँटा बन रही है, पर क्या चिन्ता है, मैं रेवती की सब चालाकियों का बदला एक ही दिन में चुका दूँगा।
उदयसिंह-(एक दीर्घ निःस्वास लेकर) अफसोस, बलवन्त ! न जाने तुम कब बदला चुकाओगे। मैं अभी तक तुम्हारे ढाढ़स से ही जी रहा हूँ। आज मुझे बड़ी उम्मीद थी कि तुम कोई ऐसी बात सुनाओगे, जिससे मैं फूला अंग नहीं समाऊँगा, परन्तु तुम्हारी बातों से तो उलटे मेरे हाथ-पैर टूट गये। हाय ! अब निश्चय हो गया कि प्यारी सुशीला के सौन्दर्य-यज्ञ में मेरा निःसन्देह हवन होगा। अब ये प्राण अपनी प्यारी के वियोग में अधिक समय तक सहन नहीं कर सकेंगे। अब तो एक-एक दिन कल्पकाल जैसा बीतता है। “हा ! हन्त प्रमदा-वियोग समयः कल्पान्तकालायते” कहाँ तक धैर्य्य धारण किया जावे। (आँखों में आँसू लाकर) हाय ! सुशीले ! तुम्हारी उस दिन की दोला क्रीड़ा वाली छवि यद्यपि सुहावनी और मनोहारी थी और इसलिये वह हृदय में धारण की गई थी, परन्तु उससे चित्त को शान्तिता मिलने के बदले उत्ताप मिल रहा है ! यदि मैं यह जानता कि तुम्हारे जगन्मनोहारी रूपामृत का पान करने से आनन्द के स्थान पर दाह उत्पन्न होगी, तो मैं उस उद्यान में एक क्षण भर भी खड़ा नहीं रहता। यदि कामदेव तुम्हारी रूपराशि का सचमुच रक्षक हुआ है और मैंने उस रूपराशि को अपने हृदय से लगाने की इच्छा की थी, इस कारण वह कुपित होकर अपने पंचबाणों से मेरे हृदय को जर्जर कर रहा है, तो अब कृपा करके उसे रोक दें। मैं उन बाणों को सहने के योग्य नहीं हूँ। मेरा जीना अब कठिन है। इस संसार में अब मेरा कोई सहायक नहीं है। प्यारे बलवन्त ! एक तुमसे आशा थी, परन्तु अफसोस ! तुमसे भी कुछ नहीं हुआ। बस, मेरा डेरा कूच है। जब प्यारी सुशीला ही नहीं मिली, तो अब संसार में जी कर क्या करना है ?

बलवन्त-(हाथ पकड़ कर) उदयसिंह जी ! आप इतने अधीर क्यों हो रहे हैं ? मेरे जीते जी आपको इस प्रकार दुर्दशा के चक्कर में नहीं पड़ना होगा। आप शीघ्र ही अपनी प्यारी को पाकर प्रसन्न होंगे। बहुत करके इसी महीने में उसका विवाह हो जावेगा और वह अपनी ससुराल को विजयपुर चली जावेगी। फिर वहाँ (विजयपुर में) हम बड़ी सरलता से अपना काम कर सकेंगे।

उदयसिंह-(एक और बड़ी आह खींचकर) हाय ! तो क्या अब सुशीला किसी दूसरे की हो जावेगी ? बलवन्त ! पत्थर पड़े, तुम्हारी समझ पर। तुम्हें ऐसी दशा में भी आशा नहीं छोड़ती ? अफसोस !

बलवन्तसिंह-अच्छा, तो मैं आशा से पीछा छुड़ाये लेता हूँ, अर्थात् निराश हुआ जाता हूँ। चलिये आप भी अपने घर चलकर आनन्द कीजिये। सुशीला तो दूसरे की होती ही है।

उदयसिंह-प्यारे मित्र ! इस तरह ताने मारकर मुझे दुःखी मत करो। अभी मैं इस योग्य नहीं हूँ। इस समय ऐसी सलाह दो, जिससे मेरे सन्तप्त चित्त को कुछ शांतिता मिले। क्या विवाह मुहूर्त के पहले हम लोगों के लिये कोई ऐसा प्रयत्न नहीं हो सकता कि वह दुःखकर विवाह ही न होवे अथवा जैसा तुम कहते हो, विवाह होने पर क्या विजयपुर से हम अपने मनोरथ को सफल कर सकेंगे, ऐसी पूर्ण आशा है ?
बलवन्तसिंह-मित्रवर ! परिश्रम करने से जो कुछ होगा, उसमें तो किसी प्रकार की कमी की नहीं जावेगी, यथासाध्य करूँगा ही, तो भी बिलासपुर के रंग-ढंग देखकर सफलता की आशा नहीं की जा सकती, परन्तु विजयपुर पहुँचने पर तो निश्चय ही समझिये। वहाँ पर मैंने एक ऐसे मौके की बात सोच रक्खी है कि उसमें कोई विघ्न ही नहीं आ सकता। सुशीला आपके घर आ जावेगी और किसी को गुमान भी नहीं होगा कि वह कहाँ गई। फिर क्या है ? आपके विहार के लिये इन्द्रकानन मिलेगा, मुझे धन्यवादों का ढेर।
उदयसिंह-(प्रसन्नता से बलवन्त को हृदय से लगाकर) प्यारे मित्र ! क्या वह दिन मुझे इस जीवन में प्राप्त होगा ?
बलवन्तसिंह-अवश्य ही होगा, बहुत शीघ्र होगा। (कुछ सोचकर) अच्छा तो अब मुझे जाने की आज्ञा दीजिये। क्योंकि मैं किसी से कुछ बिना कहे सुने ही चला आया हूँ। ऐसा न हो कि मेरी ओर से किसी को कुछ सन्देह करने का अवकाश मिल जावे। हाँ! एक बात आपसे पूछने को रह गई। मैंने सुना था कि आपको विजयपुर नरेश ने कैद कर लिया था, क्या यह सच है?
उदयसिंह-हाँ! वही सीमा प्रान्त का झगड़ा उठ खड़ा हुआ था। आखिर उसका निबटारा हो गया। दूसरे दिन ही संधिपत्र पर हस्ताक्षर करके हम लोग सूर्यपुर लौट आये थे, किन्तु मित्र! यदि जीते रहे, तो भूपसिंह से इस कैद का बदला अवश्य ही चुकावेंगे। बड़े धोखे से उसने हमको कैद किया था, नहीं तो बेचारे की क्या ताकत थी, जो मेरे सामने आता। अस्तु, इस विषय में तुमसे बहुत कुछ बातचीत करना है, जो कभी समय पर करूँगा। अभी तुम्हें समय नहीं है। जाओ, परन्तु अब आगे कब और कहाँ मिलोगे, इसकी प्रतिज्ञा किये जाओ। तुमसे मिलने से मुझे बहुत कुछ धीरज बंध जाता है।
बलवन्तसिंह-अच्छा तो लीजिये जुहारू, मैं जाता हूँ। इसी टीले पर फिर मिलूँगा। समय की सूचना और उस ओर के सब समाचार आपको हरिहर के द्वारा ही मिला करेंगे।
इसके पश्चात् दोनों मित्र एक दूसरे से विदा हुए। कृष्ण तृतीया का चन्द्रमा पूर्व दिशा की ओर से आरक्त वर्ण धारण किये हुए निकल आया। दोनों पापी और मलिनात्माओं के साथ-साथ अन्धकार भी वहाँ से खिसकने की तैयारी में लगा।

सत्ताईसवां पर्व

दिन के 11 बज चुके हैं। बिलासपुर नरेश का दरबार भरा हुआ है। सब लोग यथास्थान बैठे हुए अपने-अपने कार्यों में लग रहे हैं। इतने में एक सेवक ने आकर महाराज के हाथ में अदब के साथ एक पत्र दिया। महाराज ने उस पर विजयपुर नरेश की मुहर देखकर उत्कण्ठा से मंत्री के हाथ में देकर उच्च स्वर से पढ़ने को कहा। आज्ञा पाकर मंत्री ने इसप्रकार पढ़ना प्रारम्भ किया -

।। नमः श्रीगणधर देवाय।।

स्वस्ति श्री विविधवैभवसम्पन्न बिलासपुर मनोज्ञराजधान्यां विराजमान सकलकलाकुशल न्यायमूर्ति धीरवीर महाराज विक्रमसिंहप्रति, विजयपुर भूपाल रणवीरसिंह का प्रेमतुरस्सर ‘जुहारु’ प्रवेश हो। शमुभयत्रापि। अपरंच-

बहुकाल के पश्चात् भवदीय पत्र प्राप्त हुआ। उत्तर में निवेदन है कि हमारे यहाँ के श्रीचन्द जौहरी एक प्रसिद्ध व्यवसायी हैं। इनके पिता एक क्षत्रिय कुल के वीर थे और विजयपुर में नौकरी के लिये आये थे। एक जौहरी की नौकरी में उनके भाग्य का सितारा ऐसा चमका कि थोड़े ही दिनों में वे लक्षावधि द्रव्य के स्वामी होकर प्रसिद्ध रत्नपरीक्षक हो गये। समय ऐसा पलटा कि आज बहुत थोड़े लोग इस बात को जानते हैं कि श्रीचन्द वणिक हैं, अथवा क्षत्री पुत्र।

श्रीचन्द्र का पुत्र जयदेव हमारे राज्य का एक आभूषण है, यदि उस पर किसी सम्बन्ध के अभिप्राय से आपकी दृष्टि गई है तो कहना होगा कि आप भी एक सच्चे रत्नपरीक्षक हैं। विज्ञेष्वलमिति।

पत्र सुनते ही सब लोगों का हृदय आनन्द से उछलने लगा, महाराज की नेत्रों में से प्रेमाश्रु निकल पड़े। इतने में ही द्वारपाल ने आकर निवेदन किया कि द्वार पर दो सैनिक खड़े हुए भीतर आने की आज्ञा चाहते हैं। कहते हैं हमको महाराज से मिलना है। आज्ञा हुई कि उन्हें आने दो। थोड़े समय में दो नवयुवक सैनिक वेष में आते हुए दिखलाई दिये, जिन्हें देखते ही महाराज प्रफुल्लित होकर अपने आसन से उठ बैठे और यह कहते हुए आगे जाकर उन्होंने एक युवा का हाथ पकड़ लिया “प्रिय जयदेव! तुम आगये? अच्छा हुआ।” दोनों युवाओं ने पूज्यदृष्टि से महाराज को मस्तक नवाया। महाराज ने आशीर्वाद देकर अपना आसन ग्रहण किया और पास ही दोनों युवाओं को बैठने का अनुरोध किया। युवा विनयपूर्वक बैठ गये।

महाराज-जयदेव! सबसे पहले मैं यह जानना चाहूँगा कि ये तुम्हारे साथ कौन महाशय हैं?

जयदेव-(नम्रता से) ये विजयपुर नरेश महाराज रणवीर सिंह के पुत्र और मेरे परम मित्र भूपसिंहकुमार हैं। आपके दर्शनों की अभिलाषा में ये भी मेरे साथ चले आये हैं।

महाराज-( भूपसिंह की ओर स्नेह दृष्टि से देखकर ) तब तो महाराज मेरे अहोभाग्य समझना चाहिए, जो आज मेरे परममित्र महाराज रणवीरसिंह के सर्वकलाकुशल और शूरवीर पुत्र भूपसिंह अतिथि हुये हैं।

भूपसिंह-मैं तो आपका पुत्र स्थानीय सेवक हूँ। मेरे अहोभाग्य हैं, जो आज आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ।

महाराज-परन्तु तुम जैसे सत्पुत्रों की सेवकाई पाना भी तो अहोभाग्य है।

इसके पश्चात् कुशलप्रश्न हो चुकने पर महाराज ने मंत्री को इशारा किया कि समय अधिक हो गया है, ये बाहर से थके हुए आ रहे हैं। शीघ्र ही इनके ठहरने का राज्योचित प्रबन्ध करो। मंत्री दोनों कुमारों को लेकर दरबार से उठ खड़े हुए और एक सुन्दर सजे सजाये महल में जिसमें अनेक दास दासियाँ सेवकाई के लिये प्रस्तुत थीं, ले जाकर उन्हें ठहरा दिया। उस समय भूपसिंह ने मुस्कराकर जयदेव से कहा-मित्रवर मेरे अनुमान में सन्देह नहीं है बस “पौ बारह” है।

कुमारों के चले जाने पर महाराज ने अपने वयोवृद्ध काका महाराज पृथ्वीसिंह से हाथ जोड़के कहा-महाराज! यही जयदेव सुशीला का भावी पति हो, ऐसी मेरी इच्छा है। यह क्षत्रियपुत्र है, यह तो आप विजयपुर की चिट्ठी से जान ही चुके हैं। प्रत्यक्ष दर्शन शेष था, सो भी आज हो गया। अब कृपा करके सम्मति दीजिये कि यह सम्बन्ध किया जावे या नहीं ? यदि इस विषय में और भी कुछ अन्वेषण करने की आवश्यकता हो तो वह भी कहिये।

पृथ्वीसिंह-विक्रम ! मेरी तुष्टि हो चुकी। कुल और वर दोनों देख लिये, दोनों ही उत्कृष्ट और सुन्दर हैं। वर की विद्वत्ता की प्रशंसा जो तुम्हारे द्वारा पहिले बहुत कुछ सुनी जा चुकी है, वह वर की मुखमुद्रा से स्पष्ट प्रकट होती है। अब इससे अधिक छानबीन करना ही क्या है ? बस, मेरी आज्ञा है कि अब विलम्ब मत करो, शीघ्र ही विवाह का मुहूर्त निश्चित कराओ। इस भाग्यशाली जोड़ी की कुण्डली हम समझते हैं, विधाता ने पहले ही से मिलाके रक्खी होगी। पुरोहितजी को अधिक कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा।

पुरोहित-महाराज ! मेरा भी ऐसा ही अनुभव है। प्रायः जब एक से रूप गुण सम्पन्न वर कन्याओं के सम्बन्ध होते हैं, तब जन्म कुण्डली स्वयं मिल जाती है।

विक्रमसिंह-( पृथ्वीसिंह से ) और वर के पिता से आज्ञा लेने के लिये क्या करना होगा ?

पृथ्वीसिंह-दस-पाँच सेवकों के साथ पुरोहित जी को विजयपुर भेज देना होगा। बस यह ही सब कार्य सिद्ध कर लावेंगे। तब तक यहाँ विवाह की तैयारियाँ होनी चाहिये और विवाह की खुशी में अपने राज्य में स्थान-स्थान पर सदावर्त और औषधालय खोल देना चाहिये तथा बंदीगृह के सम्पूर्ण कैदियों को छोड़ देना चाहिये। सम्पूर्ण जिन मन्दिरों में भगवज्जिनदेव के (पंचकल्याणक) महोत्सव होना चाहिये। मुनि, आर्यिका और श्रावक, श्राविकाओं को शास्त्र-कार्यालय में से नवीन ग्रन्थ लिखवा-लिखवा कर अथवा छपवा-छपवा कर दान करना चाहिये।
विक्रमसिंह-ऐसा ही किया जावेगा।
इसके पश्चात् दरबार बरखास्त हुआ। सब लोग आपस में आनंद वार्ता करते हुए अपने-अपने स्थान पर गये। दरबारी लोग अनेक दिनों की छुट्टी और नानाप्रकार के पारितोषिक मिलने के स्वप्न देखने लगे। थोड़े ही समय में सुशीला और जयदेव के विवाह समाचार नगर भर में फैल गये।
महाराज विक्रमसिंह के आनन्द की कुछ सीमा नहीं रही। विजयपुर से इच्छित पत्र का आना, तत्काल ही जयदेव और भूपसिंह के दर्शन होना, साथ ही वृद्ध काका की सम्मति मिल जाना, इसप्रकार एक से एक अधिक हर्ष के विषय एक पर एक उपस्थित होने से हर्षोत्फुल्ल होकर वे अपने आपको भूल गये। महाराज के इस हर्ष का अनुभव वही कर सकते हैं, जिन्हें ऐसे अवसर एक पर एक प्राप्त हुए हैं। संसार में अभीप्सित विषयों के मिलने पर किसको हर्ष नहीं होता? महाराज की एक अघटनीय इच्छा आज पूर्ण हो गई, अतः उनके हर्ष का पता लगाना सचमुच कठिन है।

अट्ठाईसवां पर्व

बिलासपुर में विद्युत् वेग से चारों ओर यह खबर फैल गई कि महाराज की कन्या सुशीला का विवाह विजयपुर के श्रीचन्द्र जौहरी के पुत्र जयदेव के साथ होना निश्चय हो गया है और जयदेव अपने मित्र के साथ बिलासपुर आये हुए हैं। बस इस बात की चर्चा घर-घर होने लगी। युवा पुरुषों में वरकन्या के रूप और गुणों की तुलना होने लगी, बहुदर्शियों में दोनों कुलों के इतिहास की छिड़ी और विद्वानों में दोनों की विद्याविलासिता सम्बन्धी वादविवाद होने लगा, परन्तु एक ओर मूर्ख स्त्री समाज में जो आलोचना का स्टीम चला वह सर्वोपरि था।

सुशीला का पिता कितना धनी है, सुशीला के शरीर पर कितने आभूषण हैं, महाराज विक्रमसिंह अपने जमाई को कितना दहेज देंगे, अमुक राजकुमारी सरीखा विवाह अब काहे को किसी का होता है, श्रीचन्द्र एक साधारण बनिया है, वह महाराज की होड़ कैसे कर सकेगा? बहिन! सुशीला पढ़ी-लिखी है तो क्या हुआ, पर उसका भाग्य अच्छा नहीं निकला। राजकुमारी होकर बेचारी एक बनिये के घर पर जावेगी।

बीच में एक दूसरी बुद्धिमती ने उत्तर दिया-वाह! तू भी बावली हुई है। महाराज के अब दूसरा है ही कौन? जयदेव को ही घर जमाई बनाने लगे, फिर सुशीला को दुःख ही क्या होगा? दूसरी ने कहा-वाह! ऐसा क्या श्रीचन्द्र कंगाल है जो कि अपने बेटे को दूसरे का कर देगा? वह भी तो एक जौहरी है, जौहरी के धन का
क्या पार है? इसप्रकार जगह-जगह मनोरथों के घोड़े दौड़ने लगे।

जयदेव अपने मित्र भूपसिंह सहित एक स्वतन्त्र राजभवन में
ठहराये गये थे। दूसरे ही दिन से दर्शकों की, आलोचकों की और
परीक्षकों की असीम भीड़ उनके निकट रहने लगी। जितने लोग
आते थे, सब ही इन कुमारों से मिलकर प्रसन्न होते थे। जो जिस
स्वभाव का पुरुष आता था, ये दोनों उसी के अनुकूल हो जाते थे।
बड़े-बड़े विद्वानों के मुख से द्वार पर लौटते हुए साधु! साधु! शब्द
ही सुनाई पड़ता था। काव्य, अलंकार, व्याकरण, न्यायादि सब
विषयों की प्रासंगिक आलोचना से सब ही को उनके पास आनन्द
प्राप्त होता था।

तीसरे दिन पुरोहित महाशय विजयपुर से विवाह की
स्वीकारता लेकर वापिस आ गये अर्थात् श्रीचन्द जी ने यह सम्बन्ध
प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लिया। थोड़ा-सा सन्देह था वह भी
दूर हो गया। इससे महाराज विक्रमसिंह को सीमाधिक आनन्द
हुआ। चारों ओर आनन्द के बाजे बजने लगे, विवाह की तैयारियाँ
होने लगीं। वैशाख शुक्ला दूज के शुभ मुहूर्त्त में पाणिग्रहण का
निश्चय हुआ। जयदेव और भूपसिंह की विदाई की गई, बड़े ठाठ-
बाट से वे विजयुर पहुँचाये गये।

अब यहाँ पर हम दोनों ओर की विविध तैयारियों का हाल
लिखकर पाठकों का समय नष्ट नहीं करना चाहते। पाठक स्वयं विचार लेवें कि एक पराक्रमी नरेश और दूसरे एक धनकुबेर जौहरी ने इस कार्य में कितनी उदारता न दिखलाई होगी ? विजयपुर से बड़ी प्रभावशाली बारात आई। विजयपुर के नरेश स्वयं महाराज रणवीरसिंह जिस बारात में आयें, फिर उस बारात में त्रुटि ही किस बात की होगी ?

जिसप्रकार महाराज विक्रमसिंह की उदारता से उनके राज्य में चारों ओर आनन्द ही आनन्द की मूर्तियाँ दृष्टिगोचर होती थीं, उसीप्रकार श्रीचन्द की उदारता से विजयपुर राज्य हरा-भरा हो गया था। यों तो श्रीचन्द की ओर से विजयपुर राज्य में पहले से अनेक सदावर्त चलते हैं, परन्तु पुत्र विवाह की खुशी में उन्होंने धन को पानी से भी हलका बना दिया था।

शुभ दिन और शुभ मुहूर्त में ऋषिप्रणीत वैवाहिक विधि के अनुसार पाणिग्रहण हुआ। कन्या के माता-पितादिक ने जिस समय कहा कि हे कुमार ! यह कन्या हम लोग आपके चरण सेवा के लिये देते हैं, इसको ग्रहण कीजिये और इसकी धर्मपूर्वक पालना कीजिये और उत्तर में लज्जावनत मस्तक जयदेव ने “वृणेऽहम्” कहकर “धर्मेणार्थेन कामेन पालयामि” यह वाक्य कहे, उसी समय प्रायः सभी दर्शकों के नेत्रों से दो-दो चार-चार प्रेमाश्रु झड़ पड़े।

अहा ! दोनों ही ओर के कैसे सुन्दर वाक्य थे, जिनसे आर्यकुल के पुरुष स्त्रियों के कर्तव्य क्या हैं, सर्वथा स्पष्ट हो जाता था। स्त्री का धर्म है कि वह अपने पति की चरण सेवा करके अपना जीवन व्यतीत करे और पुरुष का कर्तव्य है कि धर्म, अर्थ और काम पूर्वक उसका पालन करे। जो स्त्री और जो पुरुष विवाह-समय में कहे हुए उपर्युक्त वाक्यों का स्मरण नहीं रखते हैं, वे न केवल अपनी प्रतिज्ञा का ही घात करते हैं, वरन् भगवद्वाक्यों का निरादर करके पापोपार्जन भी करते हैं, क्योंकि भगवान का शासन यही है कि गृहस्थ जीवन में पुरुष और स्त्रियों को एक दूसरे का सहायक होकर कालक्षेप करना चाहिये। गृहवासियों का यही धर्म है और इसी में उनका कल्याण है।

विवाह कार्य समाप्त हो गया। श्रीचन्द ने महाराज विक्रमसिंह के हृदय से लगकर विदाई माँगी। उस समय विक्रमसिंह ने महाराज रणवीरसिंह से और श्रीचन्द से अतिशय नम्र होकर यह प्रार्थना की कि आप लोग कृपा करके अपने दोनों पुत्रों को थोड़े दिन के लिये यहाँ और छोड़ जावें, तो बहुत अच्छा हो, अन्तःपुर की ओर से इस विषय का विशेष आग्रह हो रहा है। मैं बहुत शीघ्र ही उनके भेजने का प्रबन्ध कर दूँगा। महाराज की प्रार्थना अस्वीकार नहीं हो सकी, बड़े स्नेह से दोनों ओर से सम्बन्धीगण गले लगकर मिले और पीछे विदा हुए। धूमधाम के साथ बारात विजयपुर की ओर लौटी।

जयदेव और भूपसिह स्वतंत्र राजभवन में ठहराये गये। सुशीला की समवयस्क सहेलियों ने दोनों कुमारों से आमोद-प्रमोद की मीठी-मीठी छेड़छाड़ शुरू की। रेवती ने एक दिन बाग में टहलते हुए सुशीला से कहा-क्यों सरस्वती जी ! अब तो आप विजयपुर के सेठजी के नाम से नहीं चिढ़ोगी। यदि आज्ञा हो, तो उस दिन की बात सेठजी को बुलाकर कह दूँ। सुशीला ने इसके उत्तर में मुस्कराकर रेवती के गाल पर एक चपत जमा दी। सबकी सब सखियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ी।

उनतीसवां पर्व

जयदेव और भूपसिंह एक महीने बिलासपुर में रहे। ऐसा न समझना चाहिये कि दोनों ने ये दिन केवल आमोद-प्रमोद में ही खो दिये। इस बीच में उन्होंने बिलासपुर में नामी-नामी पण्डितों, राजनीतिज्ञों और दार्शनिकों से खूब परिचय कर लिया। उनसे वार्तालाप करके उन्होंने अपरिचित कीर्ति का सम्पादन किया।

राज्य मन्त्रियों से, सेनापतियों से और विविध कार्याध्यक्षों से मिलकर उन्होंने राज्यव्यवस्था की खूब ही पर्यालोचना की और जो जो त्रुटियाँ राज्य कार्यों में जान पड़ीं उन्हें बड़ी सरलता से मंत्रियों को समझा दी। सरस्वती पाठशाला का दो बार निरीक्षण किया और प्रसन्न होकर बालिकाओं को पारितोषिक दिये। तीसरी बार पाठशाला में फिर जाने की इच्छा थी, परन्तु एक दिन बगीचे में टहलते समय सुशीला की सखी चन्द्रिका जयदेव से छेड़ बैठी कि कुंवरजी ! सरस्वती (पाठशाला) के देखने के लिये बार-बार आप इतने अधीर क्यों होते हैं, अब वह किसी दूसरे की थोड़े ही हो जावेगी। बस, जयदेव फिर सरस्वती पाठशाला को देखने के लिये नहीं गये।

एक महीना बीत चुका, भूपसिंह ने महाराज से विदाई की प्रार्थना की और कहा-महाराज! यद्यपि हम लोग यहाँ आपकी सेवा में रह कर अपने माता-पिता के लाड़ चाव को भूल गये हैं, तथापि बहुत दिन हो चुके हैं, वहाँ के लोग भी उत्सुक हो रहे होंगे, इसलिये अब हम लोगों को जाने की आज्ञा दीजिये। महाराज ने आत्मभाव से कुमारों की इच्छा रोकना ठीक नहीं समझा, इसलिये उन्होंने दूसरे ही दिन महारानी की सम्मति पूर्वक विदाई का दिन निश्चित कर दिया।

विदाई का समय आ पहुँचा। महारानी मदनवेगा ने सम्पूर्ण सौभाग्यालंकारों से सुसज्जित सुशीला को अपने पास बिठाया और गले से लगाकर कहा-प्यारी बेटी! लोक रीति के अनुसार मुझे अपने प्राण को आज अपने से अलग करना पड़ता है। तुझे अब एक नवीन संसार में जाकर अपना जीवन व्यतीत करना होगा। यदि लोक रीति दुर्निवार न होती, तो बेटी! तुझे मैं अपनी आँखों के सामने से कभी नहीं टलने देती, परन्तु क्या करूँ, कुछ वश नहीं है। अब तू जाती है, अतः इस समय माता का जो धर्म है, उसके अनुसार मेरा कर्तव्य है कि तुझे कुछ उपदेश दूँ, परन्तु यथार्थ में तुझे समझाने की कुछ आवश्यकता नहीं है क्योंकि तू स्वयं पंडिता है।

माता को सबसे बड़ी चिन्ता इस बात की रहती है कि मेरी लड़की अपने ससुराल में न जाने किस तरह से रहेगी, परन्तु सरस्वती बेटी! मुझे इसकी सर्वथा चिन्ता नहीं है। तुझ जैसी सुशिक्षित पुत्री से दोनों ही कुल शोभायमान होंगे, यह मैं अच्छी तरह से जानती हूँ। तेरे दूरदर्शी पिता ने जिसप्रकार से पढ़ा-लिखाकर विद्यावती बनाया है और निर्दोष संगति में रखकर जिस प्रकार सदाचार के सांचे में तुझे ढाला है, सौभाग्य की बात है कि उसीप्रकार का बल्कि उससे बढ़कर विद्वान और निष्कलंक पति भी तुझे मिला है।

श्री जिनेन्द्रदेव के प्रसाद से तेरे आगामी संसार में मुझे किसी प्रकार की त्रुटि नहीं दिखाई देती है। गृहस्थ जीवन की सफलता, पति की अनुकूलता, गृहकार्यों में सुदक्षता, गुरुजनों की सेवा और देव-गुरु-शास्त्र की सच्ची भक्ति में है।

सांसारिक दृष्टि से स्त्री का मुख्य प्राण पति है और पति का मुख्य प्राण पतिप्राणा स्त्री है। जहाँ ये दोनों भाव नहीं हैं, वहाँ सुख नहीं है। स्त्री की अन्वर्थ संज्ञा गृहिणी है और उसे गृहिणी तभी कह सकते हैं, जब वह गृहकार्यों में दक्ष होकर गृह की अधिकारिणी हो। गुरुजनों की सेवा करना स्त्री का परम धर्म है, क्योंकि सेवा से वे प्रसन्न होते हैं, उनकी प्रसन्नता प्रत्येक व्यक्ति को आशीर्वाद स्वरूप होती है। जो स्त्री गुरुजनों की सेवा नहीं जानती है, वह अतिशय कृतघ्नी है।

सच्चा सुख मोक्ष में है और उसकी प्राप्ति का एक मात्र उपाय देव-गुरु और शास्त्र की भक्ति है। गृहस्थ धर्म में इस भक्ति की पालना करने से परम्परारूप मोक्षमार्ग की प्राप्ति होती है। सुशीला बेटी ! बस, यही मेरा उपदेश है। अब तू जा और आज से अपने पति को अपने प्राणों का स्वामी समझ। अपने माता-पिता के स्थान में अपने सास-ससुर को नवीन माता-पिता समझकर उनकी आज्ञाकारिणी होकर रहे।

इसके पश्चात् महारानी का गला भर आया, अधिक नहीं बोला गया। सुशीला ने अपनी माता की गोद में सिर रख दिया। इतने में महाराज ने आकर सुशीला को उठा लिया और समझाकर कहा-बेटी ! मूर्ख लड़कियों के समान क्या तू भी रोती है ? छिः ! रोने से अमंगल होता है। इस समय तो हम लोगों का आशीर्वाद लेकर तुझे अतिशय प्रसन्नमुख होकर जाना चाहिये।

यह सुनते ही सुशीला सन्न हो गई। आँसुओं को पोंछकर उसने माता के चरणों को छुआ। माता ने भी महाराज के भय से आँसुओं का संवरण करके आशीर्वाद दिया। पश्चात् सुशीला ने पिता को नमस्कार किया। पिता ने कहा-बेटी ! तू बुद्धिमती है, जो बुद्धि तूने प्राप्त की है, उसका यथोचित उपयोग करके पतिपरायणा होवे, मेरा यही आशीर्वचन है। इसके पश्चात् अन्य सम्पूर्ण गुरुजनों की आशीष पा चुकने पर सुशीला को रेवती आदि सखियाँ बाहर लाई और वहाँ एक सजे सजाये रथ पर सवार कराके आप भी उसी में बैठ गई।

इसके पश्चात् दोनों कुमारों ने आकर महाराज को नमस्कार किया और आज्ञा चाही। महाराज ने आशीर्वाद दिया और कहा कि जिनधर्म के प्रसाद से आप लोगों में पराक्रम, साहस, धैर्य और
विद्या, कला, कुशलताओं की दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो। आप
लोग जाते हैं और मुझे इच्छा न रहते भी आप लोगों से अलग होना
पड़ता है, यह खेद है।

अस्तु, मैं अपने गृह का प्राणों से प्यारा एक अमूल्य रत्न
आपकी सेवा के लिये आपके साथ भेजता हूँ। यह रत्न ही नहीं
किन्तु मेरा एक प्राण है। अब इसकी रक्षा का पालन करना आपका
धर्म है। बस, अब मैं अधिक कुछ नहीं कहना चाहता हूँ, विलम्ब
हो रहा है, इसलिये आप लोग जाइये, परन्तु स्नेह बनाये रखिये।

इसके पश्चात् ही रथ हांक दिया गया। दोनों कुमार भी अपने
घोड़ों पर सवार होके चलने लगे। नगर के हजारों मनुष्य और राज्य
के अनेक कार्यकर्तागण बहुत दूर तक पहुँचाने गये। दहेज का माल
असबाब पीछे से गाड़ियों पर लदवा दिया गया और उसको
निर्विघ्न पहुँचाने के लिये बलवन्तसिंह गाड़ियों के साथ गया।

तीसवां पर्व

सूर्यपुर राज्य की सरहद में एक छोटा सा ग्राम है उसके निकट
एक बगीचा है, जिसमें आम और बड़ के अनेक सघन वृक्ष लगे हैं।
यहाँ से विजयपुर चार-पाँच कोस दूर है। आज यहीं पर भूपसिंह,
जयदेव आदि का डेरा पड़ा हुआ है।

रात्रि के 12 बजने में 10-5 मिनट की देर होगी। दिनभर के
थके मान्दे लोग आनन्द से नींद के खुर्राटे लगा रहे हैं। यद्यपि शुक्ल पक्ष की रात्रि है, परन्तु आकाश को बादलों ने घेर रक्खा है इससे चन्द्रमा कहाँ है इसका ठीक-ठीक निश्चय नहीं हो सकता है।

ग्रीष्मकाल की ऊष्मा के मारे लोग पसीने में तर हो जाते हैं, परन्तु ज्यों ही सामुद्रिक हवा का एकाध झोंका आता है कि, फिर ध्यानस्थ हो जाते हैं। पहरा देने वाले सिपाही भी निद्रा से झुक-झुक जाते हैं। कभी-कभी अचेतता के कारण उनके हाथों में से बन्दूकें गिरकर लोगों को चौंका देती है।

इसी समय बलवन्तसिंह ने भूपसिंह को तम्बू में जाकर उन्हें जगाया और कहा कि सबेरा होने में अब बहुत थोड़ा विलम्ब है। यदि सामुद्रिक यात्रा की इच्छा हो तो चलिये, मैं किनारे पर जाकर सब बन्दोबस्त कर आया हूँ। यहाँ से सिर्फ एक मील पर समुद्र किनारा है वहाँ पर एक छोटा सा जहाज उपस्थित है। मल्लाहों से मैं उसका किराया वगैरह ठहरा आया हूँ। वे लोग कहते हैं कि सबेरे 7-8 बजे तक आप लोग विजयपुर खुशी से पहुँच जावेंगे।

भूपसिंह बलवन्तसिंह की बातों में आ गये, उन्होंने जयदेव को भी जगवाया और एक सम्मति होकर घोड़े कसवा लिये। सुशीला के लिये रथ तैयार हो गया, रेवती को भी साथ चलने को कहा, परन्तु वह कोई विशेष कारण बतला के समुद्र यात्रा के लिये राजी नहीं हुई।

आखिर एक सखी और आठ-दस सेवकों को लेकर जयदेव आदि तीनों व्यक्ति किनारे पर पहुँचे, वहाँ मल्लाह लोग बाट देख रहे थे। दो-तीन सेवकों को घोड़े और रथ के साथ वापिस भेजकर बाकी सेवकों के साथ वे जहाज पर सवार हो गये। बलवन्तसिंह के प्रयत्न से जहाज अच्छी तरह से सजाया गया था, बैठने के लिये गद्दे वगैरह बिछा दिये गये थे जिनसे बैठने में कष्ट न हो। सुशीला के लिये एक पृथक् बैठक बनाई गई थी, उसमें सुशीला और उसकी सखी चन्द्रिका बैठ गई।

इसके बाद ही जहाज छोड़ दिया गया। सामुद्रिक वायु के शीतल झोकों से निद्रादेवी का पुनराह्वान होने लगा। सब लोग सिर झुका झुकाकर उसका सत्कार करने लगे। थोड़ी देर में बादलों के बिखरने से चाँदनी निकल आई तब मालूम हुआ कि अभी आधी रात ही हुई है। भूपसिंह ने चौंक कर कहा, अरे ! बलवन्त तो कहता था कि सबेरा होना ही चाहता है।

पाठकगण ! इसके बाद क्या हुआ सो आप पहले पर्व में पढ़ ही चुके हैं कि थोड़ी देर में मेघ गरजने लगे, आँधी चलने लगी और जहाज एक छोटी चट्टान से टकरा कर डूब गया, परन्तु शायद आप यह नहीं जानते कि एक छोटी-सी चट्टान से टकराकर जहाज इतनी जल्दी क्यों डूब गया, इसलिये यहाँ प्रगट कर दिया जाता है कि यथार्थ में इसमें एक गुप्त रहस्य था, वह यह कि जब उस दिन जयदेवादि बिलासुपर से चले थे उस समय इतनी गर्मी हो रही थी कि वह सहन नहीं हो सकती थी।

पृथ्वी ने पजावे का रूप धारण किया था, इसलिये उससे व्याकुल होकर जयदेव और भूपसिंह ने प्रस्ताव किया था, अब शेष यात्रा यदि समुद्र से की जावे, तो इस कष्ट से बच सकते हैं, अन्यथा कल फिर यही व्यथा भोगनी पड़ेगी। दो घण्टे रात शेष रहने पर कूच कर दिया जावेगा, तो जलमार्ग से सबेरे सात-आठ बजे तक विजयपुर पहुँच जावेंगे। यह प्रस्ताव कई सेवकों के द्वारा अनुमोदित होने पर यह निश्चय किया गया था कि बलवन्तसिंह किनारे पर जाकर जहाज वगैरह का बन्दोबस्त कर आवे और दो घण्टा रात्रि शेष रहने पर सबको जगा देवे।
ऐसा ही हुआ। बलवन्तसिंह ने किनारे पर जाकर जहाज को किराये पर ठहराया और पापी ने उन्हें दस-दस बीस-बीस रुपये देकर मार्ग में जहाज डुबा देने की बात भी पक्की कर ली। वह समुद्र किनारा सूर्यपुर राज्य में ही था और बलवन्तसिंह सूर्यपुर के महाराज का नौकर था, इसलिये मल्लाहों ने उस समय बिल्कुल आनाकानी नहीं की और आखिर बादलों के घिर आने और आँधी चलने का अच्छा मौका देखकर उन्होंने सर्वनाश कर दिया।
रेवती इस कारण से सुशीला के साथ-साथ जहाज पर नहीं गई कि यदि मैं बलवन्त का साथ छोड़ दूँगी तो यह मार्ग में जो गुप्त मंत्रणायें करेगा, वे मुझे मालूम नहीं होगी, जिनके न मालूम होने से आपत्ति आने की संभावना है, परन्तु रेवती चूक गई और बलवन्त का उपाय काम कर गया। अफसोस ।
।। पूर्वार्द्ध समाप्त ।।

उत्तरार्द्ध

पहला पर्व

कर्मों की गति बड़ी विचित्र है। जिन बातों की कल्पना भी किसी के हृदय में उत्पन्न नहीं हो सकती, वे बातें हम कर्मों की कृपा से प्रति दिन होती हुई देखते हैं। राजा से रंक बनाना और रंक से छत्रधारी बनाना कर्मों का ही कृत्य है। कर्मों की दृष्टि में धनवान, दरिद्री, विद्वान, मूर्ख, बलवान और शक्तिहीन सब एक हैं। वे सबके ही गले में एक-एक रस्सी डालकर नृत्य कराते हैं। कोई इस नृत्य से सुखी हो अथवा दुखी हो इसकी उन्हें परवाह नहीं है। उनका कार्य एक क्षणभर भी बन्द नहीं होता।

सूर्यपुर के एकान्त बाग के बंगले में सुशीला मूर्च्छित पड़ी है। दो तीन दासियाँ उसको सचेत करने की चिन्ता में लगी हुई हैं। कोई पंखा झलती है, कोई गुलाबजल छिड़कती है, कोई उसके बिखरे हुए केशकलाप को सम्हाल कर, मुखमण्डल पर के मोती से चमकते हुए पसीने के बिन्दुओं को रूमाल से साफ करती है।

सामने खड़ा हुआ उदयसिंह विषाद, किन्तु हर्षोन्मीलित अनिमिष नेत्रों से उसकी ओर देख रहा है, परन्तु सुशीला के जगज्जयी रूप को देखते हुए उसके नेत्र तृप्त नहीं होते। शरीर कंटकित हो रहा है, पैर स्तम्भित हो रहे हैं और वाक्शक्ति पलायमान हो गई है। ऐसा जान पड़ता है, मानों एक जड़मूर्ति ही वहाँ स्थिर हो रही है।

थोड़ी देर में सुशीला ने आँखें खोली, परन्तु उदयसिंह की ओर एक घृणायुक्त दृष्टि डालकर बन्द कर ली। मूर्छित होने के पहले उसे जो भय हुआ था, उस भय से बचने का अपने सामर्थ्य के सिवाय अब दूसरा उपाय नहीं है, वह इसी का विचार करने लगी। उदयसिंह की जड़मूर्ति में चेतनता आई। दासियाँ अलग हो गईं। उदयसिंह ने कोमल स्वर में कहा-प्रिये! अब वियोग नहीं सहा जाता। इस दास पर और कुछ नहीं तो इस समय एक प्रेमकटाक्ष की ही कृपा करो।

सुशीला ने फिर आँखें खोली और एक तिरस्कार भरी हुई दृष्टि उदयसिंह पर डालकर बन्द कर ली। अब की बार उदयसिंह ने यह कहकर कि ‘हृदयेश्वरी! अब यह प्रेमसमाधि कब तक लगाये रहोगी? मुझसे कुछ अपराध हुआ हो, तो क्षमा करो। इन तीखे कटाक्षों के सहन करने की शक्ति मुझमें नहीं है’ अपना हाथ साहस करके सुशीला की ओर बढ़ाया, परन्तु वह हाथ उस दिव्यमूर्ति से निकलती हुई पुण्यप्रभा को भेद करके आगे न जा सका। सुशीला चमक के उठ बैठी और बोली-उदयसिंह, मुझे निश्चय हो गया है कि तुम्हारे मित्र बलवन्तसिंह ने तुम्हारे लिये ही ये सब चक्र चलाये थे। तुम समझते होंगे कि ऐसा करने से मेरी इष्टसिद्धि हो जावेगी और दोनों कुमारों के न रहने से मेरे सुख में कोई कांटा नहीं रहेगा, परन्तु यह सब तुम्हारी भूल है। पापियों को कभी सुख नहीं मिलता और पाप में सुख नहीं। यद्यपि मैं इस समय अबला हूँ, असहाय हूँ, इस समय मेरा कोई रक्षक नहीं है, परन्तु स्मरण रखो कि स्त्री को अपने सतीत्व की रक्षा कर लेना कोई कठिन कार्य नहीं है। स्त्री के पास एक ऐसा विषम शस्त्र है कि उसके आगे तुम्हारे जैसे कामार्त्त पुरुषों का कोई बल नहीं चल सकता है। तुम्हारी सब विडम्बनायें व्यर्थ हैं। तुमने जो पाप विचार किया है, उसकी पूर्ति सर्वथा असम्भव है। व्यर्थ ही तुम एक भ्रम में पड़े हुए कर्मबन्ध कर रहे हो, जिसका परिपाक बहुत बुरा होगा।

राजा निहालसिंह जैसे सदाचारी और धर्मज्ञ पुरुष रत्न के पुत्र होकर ऐसे दुराचारों और पाप कार्यों में प्रवृत्त होते हुए तुम्हें लज्जा आनी चाहिये। तुम मेरे भाई के समान हो इसलिये समझाती हूँ कि अब भी इस पाप वासना को छोड़ दो और मुझे जहाँ की तहाँ पहुँचा दो, तुम्हारा इसी में कल्याण है।

उदयसिंह-वाह ! वाह ! आखिर सरस्वती ही तो ठहरी। क्यों न हो ? अहा ! कैसा बढ़िया व्याख्यान हुआ है, परन्तु जान पड़ता है कि व्याख्यात्री महाशया ने अभी प्रेमशास्त्र का अध्ययन नहीं किया है, यही कारण है कि आप प्रेम को पापवासना समझती हैं और उसका परिपाक बुरा बतलाती हैं, परन्तु यथार्थ में प्रेम एक स्वर्गीय पदार्थ है यह तभी तक बुरा जान पड़ता है, जब तक कि अनुभव में आ न जावे।
प्रेम का आस्वादन करने पर समस्त संसार प्रेम ही प्रेममय दिखलाई देता है और सच पूछो तो प्रेम के बिना संसार का कोई काम ही नहीं हो सकता, इसलिये मैं प्रेमपूर्वक प्रार्थना करता हूँ कि आप प्रेम करना और सीख लें, जिसमें आपकी पढ़ी हुई विद्या परिपूर्ण तथा सफल हो जावे। देखिये! जरा मेरी ओर दृष्टिपात कीजिये। मुझमें आपको प्रेम के साक्षात् दर्शन होंगे।
सुशीला-उदयसिंह! जान पड़ता है कि इस उन्मत्तता की दशा में तुम्हारे हृदय पर मेरी बातों का कुछ भी असर न होगा। तुम उपदेश के पात्र नहीं हो मोह ने तुम्हें अन्धा कर दिया है। यही कारण है कि भाई! भाई कहने वाली इस भगिनी को भी तुम पापवासना से देख रहे हो और अधम की नाई उसके आगे भी प्रेम! प्रेम! बकते हुए नहीं लजाते। छि:! छि!! धिक्कार है तुम्हें, हजार बार धिक्कार है। मैं अब भी कहती हूँ कि तुम विवेक को सर्वथा तिलांजली मत दे दो और अपने हित और अहित का कुछ विचार करो।
उदयसिंह-प्यारी ! मैं अपना हित खूब विचार चुका हूँ। तुम चाहे मेरा तिरस्कार करो, चाहे धिक्कार दो, मुझे अविवेकी कहो, हिताहित-विचार-शून्य कहो और चाहे जो कहो, परन्तु मैंने अपना कल्याण एक तुम्हारे प्रेम में ही समझा है। तुम्हारा प्रेम ही मेरा जीवन है। तुम्हारा प्रेम ही मेरे प्राण हैं और तुम्हारा प्रेम ही मेरे सुख की पराकाष्ठा है। आज तक जो कुछ मैंने विरह दुःख सहे हैं, वे सब एक तुम्हारे प्रेम के लिये सहे हैं। अपने हृदयमन्दिर में तुम्हारी इस मनोमोहिनी मूर्ति की स्थापना मैंने इसी प्रेमफल के लिये की है। तब से अब तक मैं प्रतिदिन चार-चार, छह-छह घन्टे नेत्र बन्द किये हुए अविश्रान्त आँसुओं से तुम्हारा अभिषेक किया करता हूँ।
पाषाण की मूर्तियाँ सुनते हैं कि सेवकजनों की अर्चना से प्रसन्न होकर उनके अभीष्ट मनोरथों को पूर्ण करती हैं, परन्तु हाय ! तुम्हारी यह सजीव सदयहृदय मूर्ति उस पाषाण से भी कठोर हो रही है, जो अपने इस अनन्य भक्त पर तनिक भी दया नहीं करती है। मेरा हृदय तुम्हारी वियोगाग्नि से जल रहा है, दया करके अब भी उसे अपने प्रेमवारि से सिंचन करके शान्त करो, नहीं तो ये प्राण नहीं बचेंगे।
सुशीला-देखो उदयसिंह ! मैं एकबार फिर कहती हूँ कि तुम अभी तक समझ जाओ और ये पागलों जैसी बातें छोड़ दो। इन चाटुकारों से मेरे द्वारा तुम्हारी इष्ट सिद्धि कदापि नहीं हो सकती। सूर्य पूर्व से पश्चिम में उग सकता है, अग्नि शीतल हो सकती है, पानी पर पत्थर तैर सकते हैं और समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ सकता है, परन्तु वीरकुल शिरोमणि महाराज विक्रमसिंह की पुत्री और पंडितमुकुट श्री जयदेव की सहधर्मिणी सुशीला के जीते जी उसका पातिव्रत पूर्ण शरीर कोई स्पर्श नहीं कर सकता है। जो शरीर अपने आराध्य देव जयदेव के लिये समर्पित हो चुका है, संसार में उस निर्माल्य द्रव्य के पाने का कोई अधिकारी नहीं है।

उदयसिंह-बस ! बस ! अब यह नखरे रहने दीजिये। तुम्हारी इस ज्ञान गुदड़ी को फिर कभी देखूँगा। इस समय तो केवल प्रेम की पिपासा है, सो एकबार अपने अधरामृत का पान करके उसको शान्त करने दीजिये।

यह कहकर उदयसिंह ने अपना बाहुपाश सुशीला की ओर ज्यों ही बढ़ाया, त्यों ही सुशीला ने उसे झिड़क कर उच्च स्वर में कहा-मूर्ख कामान्ध ! खबरदार। मुझे स्पर्श नहीं करना।

यह कठोर कंठ स्वर तीक्ष्ण धार वाले बाण की तरह उदयसिंह की छाती पर जाके लगा कि उदयसिंह उस क्रोध-प्रज्वलित मूर्ति के आगे से कांपते-कांपते दो तीन हाथ पीछे हट गया।

सुशीला ने भृकुटिसंचालन करते हुए कहा कि-चांडाल ! तेरे घर में जो माता है, मैं तेरी वही माता हूँ, तेरी जो कन्या है, मैं तेरी वही कन्या हूँ और तेरी जो बहिन है, मैं तेरी वही बहिन हूँ ? क्या अपनी माता, कन्या और बहिन से तू प्रणय की याचना करता है ?

छिः पापी ! मुझे जहाँ की तहाँ पहुँचा दे और अपने पाप का प्रायश्चित्त कर।

उदयसिंह-ओह ! क्या श्रीमतीजी रुष्ट हो गई हैं। हाँ ! हाँ ! मानिनी हुई हैं। अच्छा, तो मैं हाथ जोड़ता हूँ, पाँव पड़ता हूँ, मेरी धृष्टता क्षमा कीजिये और आलिङ्गन दे।

सुशीला बीच में रोक कर बोली-रे पशु ! मैं तेरी माता हूँ, अपनी जिह्वा को रोक।

उस समय सुशीला की अवस्था दर्शनीय थी। क्रोध की प्रचण्ड ज्वाला लज्जालु, कोमल, सरल और सदय मूर्ति को कैसा बना देती है, सुशीला उसका उदाहरण थी। उसके आकर्ण-विस्फारित नेत्र नील-कमल की उपमा को छोड़ रक्तकमल बन रहे थे, बिम्बाफलसे फड़क रहे थे, भृकुटियाँ खींचे हुए धनुष की तरह वक्र हो रही थीं और सारे शरीर में से एक प्रकार की तेजः प्रभा निकल रही थी।

“अब चाटुकारी और अनुनयों से कार्य सिद्धि होनी कठिन है। स्त्रीजाति बिना थोड़े बहुत भय के वश में नहीं आती।” उदयसिंह ने यह सोचकर दासियों को पुकार कर कहा कि इसके दोनों हाथ पकड़ लो क्योंकि ऐसा किये बिना अब यह प्रसन्न होती नहीं दिखती। आज्ञा के साथ ही दो दासियाँ दौड़ी आईं और सुशीला की ओर पकड़ने के लिये झपटीं, परन्तु उस समय सुशीला के सुकोमल शरीर में अमानुषीय बल आ गया। उसने हाथ लगाने के साथ ही ऐसा झटका दिया कि दोनों दासियाँ चार-चार हाथ के अन्तर पर जा पड़ीं।

उनके पड़ने पर सुशीला ने चोट खाई हुई भुजङ्गनी के समान चंचल होकर और उदयसिंह की ओर तर्जनी उठाकर कहा- पापात्मन् ! अब क्या तू मुझे भय दिखलाकर वश में करने का स्वप्न देख रहा है ? छिः एकबार साक्षात् यमराज भी मेरे सन्मुख आ जावे तो उससे डरने वाली नहीं हूँ, तुझ नर कीट की तो बात ही क्या है ? जिस सच्चे पतिव्रत को रावण जैसा पराक्रमी और प्रचंड पृथ्वीपति भङ्ग नहीं कर सका है और जिस स्त्री मर्यादा को दुर्योधन जैसा वैभवशाली तोड़ नहीं सका है और जिस शीलरत्न के लेने के लिये अनेकानेक राजा अपनी सम्पूर्ण राज्यलक्ष्मी नष्ट कर देने पर भी नहीं पा सके हैं। छिः ! उस पातिव्रत, मर्यादा और शीलरत्न का तेरे जैसे कायर पुरुष और रंक क्या बिगाड़ सकते हैं ? तू किस खेत की मूली है ?

जिस पुण्य कर्म ने सीता, द्रोपदी, मनोरमा, गुणमाला आदि नारीरत्नों की रक्षा की थी, पापी ! तेरे हाथ से वही पुण्य आज मेरी भी रक्षा करेगा। तू समझता होगा कि इस समय सुशीला मेरे अधिकार में है, मैं भय दिखाकर चाहे जो कर सकता हूँ। मूर्ख ! जरा विचार के देख कि पहरेदारों और दास दासियों से घिरे हुए इस एकान्त भवन में जिस तरह तू मेरे शरीर को कैद रख सकता है क्या उस तरह मेरे इस अदृश्यभूत अन्तरात्मा पर भी तू कुछ बल चला सका है? नहीं, मेरा निष्पाप और निर्लेप आत्मा सब प्रकार से स्वतंत्र है, उस पर किसी का अधिकार नहीं है।

तेरे पापपंकलित घृणित शरीर के स्पर्श होने के पहले ही मेरे प्राण कूच कर देंगे। फिर पिशाच! खूब प्रेम से इस रक्त, मांस और हड्डियों के पिंड को श्वान की तरह चाट-चाट के प्रसन्न होना! तू यह न जानना कि प्राण निकलना कोई असम्भव कार्य है। नहीं, देखते ही देखते केवल एक ही उच्चोश्वास में यह शरीर प्राणहीन हो जावेगा। तुझ जैसे नराधमों को सन्मुख देखने की अपेक्षा मर जाना अच्छा है, हजार बार अच्छा है।

उदयसिंह सन्न हो गया। सुशीला की रुद्रमूर्ति और साहस देखकर वह हक्काबक्का सा हो गया। फिर उसका साहस नहीं हुआ कि कुछ अधिक कहे। उसी समय बंगले से उतर कर नीचे बाग में आया और एक लतामंडप के नीचे पड़ी हुई बेंत की आराम कुर्सी पर हाथ रख के लेट गया। फूलों की भीनी हुई सुगंधित पवन ने कोमल-कोमल थपकियाँ देकर बहुत चाहा कि उसे सुला दूँ, परन्तु फल उलटा हुआ। उसकी कामाग्नि और भी सुलगने लगी। मुँह से रह रह के निकलती हुई गरम उश्वासों से कामाग्नि का अनुमान अच्छी तरह से होता था। इस समय रात के 10 बज चुके थे।

दूसरा पर्व

जहाँ तक नजर उठाकर देखते हैं, पानी ही पानी दिखलाई देता है। विस्तृत समुद्र लहरा रहा है। अपने ज्वार को बढ़ाता हुआ और घर-घर शब्द करता हुआ जान पड़ता है कि वह अपने मार्ग के रोकने वाले किनारे पर बड़बड़ाता हुआ क्रोध का उबाल निकाल रहा है। मल्लाहों के छोटे-छोटे लड़के आनन्दक्रीड़ा कर रहे हैं। कोई-कोई छोटी-छोटी डोंगियों पर चढ़कर उन्हें अपना भरपूर जोर लगाकर यहाँ वहाँ फिरा रहे हैं। कोई-कोई यों ही उथले पानी में अपनी तरण-चातुरी दिखला रहे हैं।

वे ज्यों ही कुछ भीतर प्रवेश करते हैं कि समुद्र उन्हें उछाल कर बाहर फेंक देता है। तब बेचारे हतप्रभ होकर भी फिर भीतर को दौड़ते हैं, परन्तु फिर वैसे ही उछाल दिये जाते हैं। कोई-कोई लड़के किनारे की कोमल रेत में खूब उछल कूद मचाकर व्यायाम कर रहे हैं और कोई कोई शान्तमूर्ति और कुछ नहीं तो मुट्ठी भर-भर रेत ही एक दूसरे पर उछाल कर फाग की धुलंडी का दर्श दिखला रहे हैं, परन्तु जो लड़के चतुर और उद्योगी हैं, वे यहाँ वहाँ घूमते हुए शंख, शुक्ति, अभ्रक, प्रवालादि पदार्थों का अन्वेषण कर रहे हैं।

किनारे पर पानी से 30-35 गज के फासले पर कुछ ऊँची जगह पर 10-12 फूस की झोपड़ियाँ बनी हुई हैं। इनमें मल्लाह लोग रहते हैं। अनेक झोपड़ियों के द्वारों पर चारपाइयाँ पड़ी हुई हैं। उन पर दो-दो चार-चार मल्लाह बैठे हुए बातचीत कर रहे हैं।

मल्लाहों की स्त्रियाँ गृह सम्बन्धी कामकाजों में लगी हुई हैं। चमकते हुए उज्ज्वल शंख, शुक्ति आदि के गहने उनके श्यामवर्ण शरीर पर बड़े सुहावने जान पड़ते हैं।
संध्या निकट आ रही है। सूर्य की विदाई का समय समीप जानकर प्राची (पूर्वदिशा) विवर्ण होकर शोक करने लगी। पुत्र स्नेह ऐसा ही अपूर्व होता है। प्राची दिशा सूर्य की जननी है, इसी कारण उसको इतना दुःख हुआ अन्यथा और दिशाओं को भी होना चाहिये था। सचमुच संसार में माता के स्वर्गीय स्नेह की समता करने वाला दूसरा प्रेम नहीं है।
सूर्य का अरुणवर्ण प्रतिबिम्ब समुद्र की उछलती हुई जल कल्लोलों में तितर वितर होता हुआ ऐसे भ्रम को उत्पन्न करता है, मानों तपाये हुए सुवर्ण की धाराएँ ही लहरा रही हैं।
थोड़ी देर पीछे विधाता रूपी सुनार ने अपने संसार का एक आभूषण बनाने के लिये सूर्यरूपी गोले को किरणरूपी संडासी से पकड़े हुए समुद्र के पानी में डाल दिया। आकाश में एक के पीछे एक इधर-उधर चमकते हुए तारागण ऐसे जान पड़ने लगे मानों सूर्य समुद्र में डुबकी लगाकर नाना प्रकार के प्रकाश के रत्नों को पाकर बाहर फेंक रहा है।
अन्धकार को सम्पूर्ण संसार के राज्य का चार्ज मिला। जान पड़ता था कि अब कुछ समय आपके ही अनबूझ राज्य में सबको रहना होगा, परन्तु सर्वथा ऐसा नहीं हुआ। थोड़ी ही देर में लाल पीले होते हुए चन्द्रदेव निकलते दिखलाई दिये जिससे बेचारे अन्धकार को यहाँ वहाँ छुपने के प्रयत्न में लगना पड़ा। इस समय दो साधु मल्लाहों की ओर आये। दोनों के सिर पर बड़ी-बड़ी भारी जटायें थीं। शरीर पीले वस्त्रों से ढका हुआ था। बगल में एक-एक मृगछाला थी। हाथ में एक-एक लोहे का चिमटा तथा कमंडल था।

एक साधु के कंधे पर एक झोला भी था, जिसमें कुछ आवश्यक सामान जान पड़ता था। यह साधु दूसरे साधु को अपना गुरु मानता था। साधुओं को देखकर मल्लाहों ने उठकर प्रणाम किया। साधुओं ने आशीर्वाद देकर इच्छा प्रकट की कि आज रातभर टिककर हम लोग सबेरे यहाँ से कूच कर देंगे। मल्लाहों ने भक्तिपूर्वक उनके ठहरने के लिये चबूतरे पर कम्बल बिछा दिया, एक ओर धूनी लगा दी और भी, जिन-जिन पदार्थों की आवश्यकता थी, लाके रख दिये। एक मल्लाह एक थाली में सीधा लेकर आया और हाथ जोड़ के बोला-महाराज! इसको स्वीकार कीजिये, परन्तु साधुओं ने अनिच्छा प्रगट करके उसे स्वीकार नहीं किया, कहा- हमारे भगवत् का भोग दिन में एक ही बार लगता है, तुम लोग कुछ चिन्ता मत करो। हम तुम्हारी सुश्रुषा से सन्तुष्ट हुए हैं। मल्लाहगण चबूतरे पर साधुओं की धूनी के पास घेर कर इधर-उधर बैठ गये। एक साधु कूप में से कमण्डलु भरकर लाया। उससे गुरु महाराज ने हाथ-पैर मुखमार्जन करके मृगछाला पर आसन जमाके ध्यान लगा दिया? चेलाजी मल्लाहों को गप्पशास्त्र का अध्ययन कराने लगा।
यहाँ वहाँ की जमीन आसमान के कुलावे मिलाने वाली बातों का कांड पूरा होने पर गुरु माहात्म्य का आल्हा शुरू हुआ। एक मल्लाह ने पूछा-जब आपके गुरुजी ऐसे-ऐसे मंत्र-तंत्रों को जानने वाले हैं, तो वे भविष्य की तथा दूसरों के मन की बातें भी जानते होंगे?
चेला-अजी! एक भविष्य ही क्या चीज है, वे सर्वज्ञ हैं। सब संसार उनकी हथेली पर रक्खा हुआ है। इस समय ध्यान में वे और करते ही क्या हैं? नेत्र बन्द करके सब जगत को हस्तामलकवत् देखते हैं। उसी जगत में उन्हें आनन्दकन्द भगवत् का दर्शन होता है, जो परम दुर्लभ है। मुझे बारह वर्ष सेवा करते हो गये, परन्तु अब तक भी मेरी वैसी विशद दृष्टि नहीं हुई है।
एक मल्लाह-हम लोगों को कैसे विश्वास हो कि गुरु महाराज सब कुछ जानते देखते हैं?
चेला-कोई बात पूछ कर देख लो, चट विश्वास हो जायेगा। कर कंगन को आरसी की क्या जरूरत है?
एक मल्लाह-परन्तु आगे की बात पर विश्वास कैसे हो सकता है? क्या तब तक आप यहाँ बने रहेंगे?
चेला-साधु सन्यासी एक जगह कहीं नहीं रह सकते। नदी का पानी एक स्थान में ठहर कर जैसे गंदला हो जाता है, एक स्थान में रहने से साधुओं का चरित्र भी वैसा ही गंदला हो जाता है और हम लोग तो संसार को एक दृष्टि से देखते हैं, किसी पर न्यूनाधिक मोह नहीं रखते। यदि एक स्थान पर ठहर जावें, तो दूसरे स्थान के लोगों का उपकार कैसे हो ? यदि इतना अविश्वास है और परीक्षा करना ही है, तो क्या हर्ज है। कोई पिछली बात पूछ लो, जो बीत चुकी हो और मत पूछो तो उन्हें कुछ इसकी गरज भी नहीं है ! उन्हें अपनी प्रशंसा बिल्कुल ही नहीं भाती है, जाने दो।

दूसरा मल्लाह-हाँ महाराज ! आप ठीक कहते हैं। साधुओं को इन संसारी झगड़ों से प्रयोजन ही क्या है ? उन्हें भगवद्भजन से काम है। गरज तो हम लोगों की है। सो हम महाराज से अवश्य ही कुछ पूछेंगे।

चेला-हाँ पूछना, परन्तु इतना ख्याल रखना कि महाराज दो चार प्रश्नों का ही उत्तर देते हैं, जब तक उनकी मौज रहती है और सो भी तभी जब उनका ध्यान खुलता है। पीछे हजार प्रश्न करने पर भी वे कुछ नहीं कहते। उनकी लीला ऐसी विचित्र है।

एक मल्लाह-क्या हर्ज है, एक दो के पूछने से ही विश्वास दृढ़ हो जावेगा।

अनुमान दो घन्टे में महाराज की समाधि पूर्ण हुई। मल्लाह उत्सुक होकर उनके सम्मुख हुए। डरते-डरते एक मल्लाह ने हाथ जोड़ के कहा-गुरु महाराज ! हम लोग कुछ पूछना चाहते हैं ?

गुरु.- (आँख उठाकर) पूछो ! क्या पूछते हो ?

मल्लाह-हम लोगों पर जो बीत चुकी हो, ऐसी कोई बात बतलाइये !

गुरु.-अच्छा, बतलाते हैं ! बोलो, नवीन बतलावें या पुरानी !

मल्लाह-जो आपकी इच्छा हो।

गुरु.- (उदासीनता से) हमारी इच्छा कभी नहीं है, जाओ।

मल्लाह-नहीं, महाराज। हम सब लोग बहुत उत्कण्ठित हो रहे हैं, कुछ तो बतलाइये।

गुरु.-जो तुम लोग पूछो, वही बतलावें।

मल्लाह- (एक दूसरे के कान के पास कुछ गुनगुना कर मस्तक हिलाते हुए) अच्छा, आज हम लोग समुद्र में किस ओर गये थे ?

गुरु.- (नेत्र बन्द करके) दक्षिण की ओर।

मल्लाह- (मुस्कराते हुए और एक दूसरे के मुँह की ओर देखते हुए) हम लोगों के हाथ आज कुछ शिकार लगी या नहीं ?

गुरु.- हाँ ! बहुत ही।

मल्लाह-कितनी ।

गुरु.-खूब मुट्ठी भर-भर।

इस उत्तर को सुनकर मल्लाहगण बहुत सिटपटाये। अनेक लोगों को भय होने लगा कि कहीं हम पर इस बात के प्रकाशित होने से कोई विपत्ति न आवे, परन्तु जो मुखिया लोग थे, उन्होंने एक बार गुरु महाराज की ओर कड़ी दृष्टि डालकर देखा, परन्तु उनकी चेष्टा निर्विकार दीख पड़ी, इससे सबको अपनी भावभंगी से समझा दिया कि कोई डरने की बात नहीं है। तब एक ने और प्रश्न किया कि आज हमारे जहाज पर कितने आदमी थे ?
गुरु-(उंगलियाँ गिनकर) तुम्हारे सिवाय दो स्त्रियाँ और दस पुरुष
मल्लाह-वे यहाँ से कहाँ जाने वाले थे ?
गुरु.-(आँख बन्द करके) जहन्नुम को।
मल्लाह-(परस्पर देखते हुए) महाराज ! जहन्नुम कहाँ है ?
गुरु.-बस, तुम्हारे बहुत प्रश्न हो चुके। अब हम नहीं बतलावेंगे।
मल्लाह-(सब मिलके) फिर हमको विश्वास कैसे होगा ?
गुरु.-न हो, हमको परवाह नहीं है।
चेला-बस, अब महाराज कुछ नहीं बोलेंगे। बड़ा भाग्य समझो कि तुम्हारे कई प्रश्न उन्होंने बतला दिये। इतनी बातचीत वे किसी से भी नहीं करते हैं। भगवद्भजन ही उन्हें सबसे प्यारा है।
इसके पश्चात् मल्लाह लोग ब्यालू की आज्ञा लेकर अपनी-अपनी झोपड़ियों में चले गये। एकान्त पाकर गुरु चेला की बहुत देर तक गुप्त बातचीत होती रही।

तीसरा पर्व

विजयपुर के जौहरी बाजार में सेठ श्रीचन्द अपनी दुकान पर तकिये के सहारे बैठे हुए हैं। सामने की ओर उनका पुत्र विजयदेव किसी हिसाब की बही में अपने चित्त को जमाये हुए है। मुनीम गुमाश्ते लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए हैं। ग्राहकगण भाव की पूछताछ कर रहे हैं।

झाड़, फानूस, हांडी, आइने आदि सामानों से दुकान की खूब सजावट हो रही है। छोटी-छोटी किन्तु चौड़ी चौकियों पर जिन पर लाल मखमल और गोटे की किनारी सिली हुई हैं, मोती, माणिक, हीरा, पन्ना, नीलम आदि नानाप्रकार के रत्न ढेर शोभायमान हो रहे हैं। उनकी शीतल प्रभा से दर्शकों के नेत्र तर हो जाते हैं।

एक ओर अनेक कारीगर रेशम और कलाबत्तू से हार गूंथ रहे हैं, दूसरी ओर जवाहरात के सुन्दर सुवर्णमयी जड़ाऊ जेवर तैयार हो रहे हैं। कहीं-कहीं अनाज की तरह चलनियों में मोती चलाये जा रहे हैं और कहीं-कहीं बड़े-बड़े ढेरों में से एक-एक जाति के रत्नों का चुनाव हो रहा है। एक ओर अनेक परीक्षक चुने हुए रत्नों पर एकटक दृष्टि लगाये हुए उनकी कांति और पानी की परीक्षा से अन्तिम चुनाव कर रहे हैं।

इस समय दिन के ग्यारह बजे होंगे। सेठ जी अपनी बायीं आँख फड़कने की चिन्ता में मग्न थे कि इतने ही में एक उदासीनमुख आदमी ने आकर उन्हें प्रणाम किया और एक बन्द चिट्ठी सेठजी के हाथ में दी, जिस पर सेठजी का सिरनामा किया हुआ था। सेठजी ने आतुरता से चिट्ठी खोलकर विजयदेव को पढ़ने के लिये दी। वह इस प्रकार पढ़ने लगा-
पूज्यवर श्रेष्ठि श्रीचन्दजी,
बड़ा धोखा हुआ। बलवन्त सर्प ने, जिसका जिकर आपने सुना होगा, आखिर काट ही खाया। कल रात्रि को हम सब लोग-बगीचे में ठहरे हुए थे। दिन की ऊष्मा से विकल होकर एकाएक कुमारों का विचार हुआ कि स्थल की अपेक्षा जलमार्ग से जाना सुखकर होगा। बलवन्त ने अपने प्रयोजन की सिद्धि की आशा से इस विचार की पुष्टि की और वह स्वयं किनारे पर जहाज का प्रबन्ध करने के लिये गया। पीछे उसकी सम्मति से दोनों कुमार, सुशीला, चन्द्रिका और आठ-दस सेवक आधी रात के अनुमान जहाज पर सवार हो गये। शेष आदमी सामान और गाड़ियों के साथ रहे।
मैं बलवन्त की ओर से सदा सशंकित रहती थी, इसलिये उस पर कड़ी दृष्टि रखने के लिये मैंने उसका साथ छोड़ना ठीक नहीं समझा, परन्तु यथार्थ में वह गलती हुई। जहाज का प्रबन्ध करते समय वह कुछ दुष्टता करेगा इसका मुझे ख्याल भी नहीं हुआ। कुमारों को पहुँचा कर हम लोग डेरे में आकर सो रहे। सबेरे मालूम हुआ कि बलवन्त पाखाना जाने के बहाना करके, जाकर वापिस नहीं लौटा।

बस, मेरा माथा ठनक उठा कि कुमारों के साथ अवश्य ही धोखा हुआ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके कुमार सकुशल विजयपुर नहीं पहुँचे। उनके ऊपर अवश्य ही कोई बड़ी भारी विपत्ति आई है। आपके कुमार वीर क्षत्रिय पुरुष हैं, इसलिये चिन्ता होने पर भी उनका इतना खटका नहीं है, जितना कोमलांगी सुशीला का है। इस समय की एक-एक घड़ी उसके लिये बड़ी जोखिम की है, इसलिये मैं आपके पास नहीं आकर यहीं से सुशीला की रक्षा के लिये जाती हूँ। आप विचारशील और दूरदर्शी हैं। चिन्ता न करें, श्री जिनेन्द्रदेव की कृपा से शीघ्र ही इस विपत्ति का अन्त आवेगा।
उचित समझें तो महाराज रणवीरसिंह जी को भी इसकी खबर करा दें, परन्तु इतना स्मरण रक्खें कि यद्यपि ये सब कर्म सूर्यपुर के राजकुमार उदयसिंह के हैं, परन्तु सूर्यपुर नरेश महाराज निहालसिंह को इसकी कुछ खबर नहीं है, इसलिये कहीं ऐसा न हो कि सूर्यपुर राज्य पर महाराज का क्रोध उबल उठे और चढ़ाई कर दी जावे। ऐसा करने से आपकी पुत्रवधू की जान जोखिम में आ जावेगी। ‘मरता क्या न करता’ इस लोकोक्ति के अनुसार दुष्ट हृदय उदयसिंह न जाने उस समय क्या कर डालेगा, इसलिये जो कुछ प्रयत्न किया जावे, गुप्त रीति से किया जावे।
आपकी पुत्रवधू की दासी-रेवती
चिट्ठी सुनते-सुनते श्रीचन्द की अजीब हालत हो गई। वे इसके सिवाय कि जयदेवादि भयंकर आपत्ति में फंस गये हैं और कुछ न समझ सके। पुत्रशोक के असीम उद्वेग से उन्हें मूर्छा आ गई। सब लोग घबड़ा उठे कि इन्हें यह क्या हो गया? विजयदेव-पिता! पिता! कहकर चिल्लाने लगा, पर कुछ उत्तर नहीं मिला। आखिर वह घबड़ाकर रोने लगा। हाय! हाय! यह क्या हुआ? आज का सुखमय दिन घोर दुःखरूप हो गया, न जाने अब प्यारे बंधुओं के दर्शन कब होंगे? वह दुष्ट उदयसिंह न जाने मेरी सुकुमार भावज के साथ कैसा क्रूर बर्ताव करेगा, इत्यादि। बड़ा कोलाहल मचा। दुकान के सब ही लोग हाय! हाय! करने लगे。

कोई-कोई श्रीचन्द को मूर्छामुक्त करने के लिये शीतोपचार करने लगे। किसी ने अन्तःपुर में जाकर भी यह दुःखद वार्ता सुना दी। विद्यादेवी पछाड़ खाके गिर पड़ी। सिर में से चोट लगने से खून बहने लगा। दासियाँ घबड़ा गईं। इधर किसी ने महाराज रणवीरसिंह को भी जाकर यह समाचार निवेदन किये। उनके हृदय पर भी इसकी बड़ी भारी चोट लगी, परन्तु वे घबड़ाये नहीं। उसी समय अपने गुप्तचरों को सूर्यपुर की ओर जयदेवादि का अनुसंधान करने के लिये भेजकर आप श्रीचन्द जौहरी की दुकान पर दौड़े हुए आये。

देखा तो श्रीचन्द तकिये के सहारे पड़े हैं, आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही है। अभी तक उन्हें अपनी सुधि नहीं है। विजयदेव भी रो रहा है। महाराज के पहुँचते ही सब लोग उठ खड़े हुए, कोलाहल यकायक शांत हो गया। महाराज ने श्रीचन्द को सचेत करके समझाया। शोक करने का यह कोई समय नहीं है। अपने पुत्र जीते जागते बहुत जल्दी आकर मिलेंगे। हमें शोक की जगह उनके पता लगाने का प्रबन्ध करना चाहिए। एक साधारण कष्ट के सिवाय, विपत्ति के सिवाय उनके प्राणों का भय सर्वथा नहीं करना चाहिये, क्योंकि वे क्षत्रियपुत्र हैं। उदयसिंह का बल उनके सामने कोई चीज नहीं है। हाँ! यदि चिन्ता है, तो आपकी बहू की है। सो उसकी रक्षा के लिये मैं कई गुप्तचर भेजकर आ रहा हूँ और भी जो आप कहें प्रबन्ध किया जावे, सिवाय इसके रेवती बड़ी चतुर दासी है, वह सुशीला की रक्षा के लिये कोई भी उपाय शेष नहीं रक्खेगी।

श्रीचन्द ने कहा-महाराज मेरा हृदय कोमल है। वह एक सामान्य दुख से ही छिन्न हो जाता है, यह तो असह्य शोक है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं? यह सब आप ही सोच सकते हैं, मैं तो अब कर्तव्यविमूढ़ हो गया हूँ। जिस तरह और जितनी जल्दी हो सके जयदेव, भूपसिंह को लाकर मेरे हृदय से लगा दीजिए नहीं तो मेरे प्राण अब नहीं बचेंगे। इतना कहते-कहते श्रीचन्द का गला भर आया। महाराज ने उनका हाथ पकड़ लिया और फिर यथाशक्ति समझाया। बड़ी कठिनाई से श्रीचन्द का चित्त कुछ स्वस्थ हुआ। फिर महाराज बहुत-सा आश्वासन देकर राजमहल की ओर गये और श्रीचन्द दुकान से उठकर अन्तःपुर की ओर।

विजयपुर में घर-घर जयदेव भूपसिंह की शोकवार्ता होने लगी। जिसने सुना, उसी ने शोक किया। कीर्तिमान् पुरुषों के वियोग का शोक किसको नहीं होता ?

चौथा पर्व

घन्टे भर पीछे धीरे-धीरे एक के पश्चात् एक इस तरह सब मल्लाह धूनी पर आ जमे। नशा पानी की उड़ने लगी। साथ ही चेला महाशय के साथ फिर गप्पों का बाजार गरम हुआ। गुरु महाराज का बकध्यान लगा हुआ था। एक थैली में पड़ी हुई बड़े-बड़े गुरियों की माला उंगलियों के सहारे से चक्कर खा रही थी।

एक बजे के अनुमान झोपड़ियों की बगल से जो पगडंडी आई है, उस पर से जाता हुआ एक सिपाही दिखलाई दिया। बड़े ऊँचे कद का आदमी था। सिर पर बड़ा ऊँचा पंजाबी फेंटा बंधा था, जिससे ऊँचाई और भी ज्यादा दिखलाई देती थी। रंग गेहुँआ था, बड़ी-बड़ी मूछों और दाढ़ी से चेहरा भरा हुआ था। उसके हाथ में बरछी, बगल में तलवार और कंधे पर बटुआ लटक रहा था। कपड़े पसीने से भीग गये थे, जान पड़ता था, बड़ी लम्बी सफर करके आ रहा है। चाल-ढाल से बड़ा जवांमर्द जान पड़ता था। एक झोंपड़ी के सामने आकर उसने एक भारी आवाज से मल्लाह को पुकारा।

सुनते ही धूनी पर जो मल्लाह बैठे थे, उनमें से दो तीन मल्लाह उस ओर दौड़े। जो धूनी पर रहे, उन्होंने वहीं बैठे-बैठे अपनी दृष्टि और कान उस ओर को दौड़ाये। बकव्रती गुरुजी के कान उसके निकट पहले ही पहुँच गये थे, इसलिये उनके मुँह से अचानक निकल पड़ा- “हरी! हर!” मल्लाहों ने समझा, महाराज भगवान का नाम ले रहे हैं, पर चेलाजी सुनते ही सिपाही की ओर यह कहते हुए झपटे कि देखें तो सही कौन आया है? वहाँ जाके देखा, तो सिपाही से इसप्रकार वार्ता हो रही थी-
सिपाही-महाराज निहालसिंह की आज्ञा से मैं बलवन्तसिंह की खोज के लिये आया हूँ। तुम्हें उसका पता जरूर मालूम होगा, जल्दी बतलाओ। मुझे उससे मिलकर वापिस सूर्यपुर पहुँचना है।
एक मल्लाह-(सकपकाता हुआ) बलवन्त कल रात को यहीं थे, परन्तु कहाँ गये, हमको मालूम नहीं है। कहते थे, एक काम के लिये बिलासपुर जाना है। सो बहुत करके वे वहीं गये होंगे, परन्तु अब रात थोड़ी रह गई है, थक भी गये होंगे, इसलिये हमारी समझ से दो घन्टे यहाँ विश्राम करके सबेरे चार बजे के पहले कूच कर देना। आगे बहुत दूर तक इससे अच्छा स्थान आपको नहीं मिलेगा। सिपाही को आशा थी कि बलवन्तसिंह यहाँ अवश्य मिल जायेगा अथवा उसका ठीक-ठीक पता लग जावेगा, परन्तु यहाँ कुछ भी नहीं हुआ, इससे कुछ उदास-सा हो गया, परन्तु क्या करता? पास की पड़ी हुए चारपाई पर मल्लाहों की बात मान कर बैठ गया। पश्चात् कपड़े वगैरह खोलकर थोड़ा-सा जल मंगाकर हाथ-मुँह धो सफेद चादर तानकर सो गया। थक बहुत गया था, चाँदनी खिली हुई थी। सामुद्रिक हवा के झोकों ने पड़ते ही मुरदे का जोड़ीदार बना दिया।

चेला महाशय आगत मनुष्य को खूब बारीकी से देखकर और उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनकर लौट आये। आते आते एक जमुहाई ली और जोर से कहा-“हरी हर नाम सच्चा है।” गुरुजी महाराज यह सुनकर मुस्करा दिये। धूनी पर से बहुत से मल्लाह धीरे-धीरे खिसक गये थे, जो रहे सहे थे वे भी भोजन के नशे में झूम रहे थे।

चेलाराम ने कहा-भाई ! अब तुम सो जाओ, रात बहुत थोड़ी रह गई है, हम लोगों के साथ कहाँ तक जागोगे ? हम तो रात-दिन को एक ही सा समझते हैं, जितना भगवद्भजन हो सके, उतना ही अच्छा है। बस मल्लाह लोग तो यह चाहते ही थे, मन की कह दी, प्रणाम दंडवत करके वे अपने-अपने शयनस्थान में गये। विलम्ब हो जाने से उनकी युवतियों ने बड़े उलाहने दिये। किसी-किसी को तो रूठी हुई लक्ष्मियों के मानमोचन के लिये विनय अनुनयों की चक्की चलाते-चलाते ही सबेरा हो गया।

दो की घण्टी हुए कुछ ही देर हुई होगी। सब लोग निद्रा की एकान्त उपासना में दीन दुनियाँ की खबर भूले हुए थे। एक आदमी काले कम्बल में अपने शरीर को छुपाये हुए सिपाही की चारपाई के पास खड़ा हुआ, उसके कपड़े लत्ते टटोल रहा था। वह यहाँ वहाँ नजर फैलाता हुआ बड़ी सावधानी से यह काम कर रहा था। बहुत देर के पीछे उसे सिपाही के झोले में एक कागज मिला, जिसे लेकर वह साधुओं की धूनी के पास आया और आग के उजाले में उक्त चिट्ठी को पढ़कर बहुत प्रसन्न हुआ। उसमें लिखा हुआ था -

"प्यारे मित्र ! तुम्हारी तारीफ मैं किस मुँह से करूँ। संसार में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे देकर मैं तुम्हारे ऋण से उऋण हो सकूँगा। तुमने मेरे लिये अपनी जान पर खेलकर जो परिश्रम किया है वह वर्णनातीत है, परन्तु मेरे सुख-दुख के साथी बन्धु ! मैं अभागा इतने पर भी सुखी नहीं हुआ। प्राणप्यारी सुशीला हजार समझाने पर भी मेरी ओर नजर नहीं उठाती। मैं गिड़गिड़ाता हूँ, वह घृणा करती है। मैं भय दिखलाता हूँ, वह जान देने को तैयार है। मैं बलात्कार का उपक्रम करता हूँ, वह वीररूप धारण करती है और मैं प्रार्थना करता हूँ तो वह धर्मोपदेश करती है। इस तरह कुछ भी वश नहीं चलता है, जब से आई है, अन्न-पानी की ओर देखा भी नहीं है। क्या करूँ ? कुछ समझ नहीं आता। मेरे दुःख का कुछ ठिकाना नहीं है। तुमसे साक्षात् करने की बहुत अभिलाषा है। मुझसे एक बार मिलो, तो कुछ सम्मति-पूर्वक उपाय निश्चित किया जाए।

पिताजी की वर्तमान में इस ओर कुछ कड़ी नजर जान पड़ती है, इससे बड़ा भय रहता है। यदि उन्हें इस बात का पता लगेगा, तो बड़ी कठिनाई होगी। वर्तमान में सुशीला को बगीचे वाले बंगले में रख छोड़ा है। विशेष सम्मुख कहूँगा। मेरा मस्तिष्क बिगड़ रहा है। यदि मुझे सकुशल देखना चाहते हो, तो शीघ्र आकर मिलो ।

-तुम्हारा कृतज्ञ मित्र-उदय इस चिट्ठी को उसने सन्मुख रखकर शीघ्र ही एक दूसरे
कागज में नकल करली और फिर असली चिट्ठी को जहाँ की तहाँ
रख आया। ऐसी सावधानी से कि किसी को झोले के खोले जाने
का गुमान भी न हो।

प्रातःकाल समीप हुआ। पक्षियों का कलरव सुनाई पड़ने
लगा। चन्द्रमा का प्रकाश मन्द हो गया। तारे एक-एक करके विदा
लेने लगे। गुरु महाराज ने सिपाही की चारपाई की ओर देखकर
एक प्रभाती गाई-

हे नर ! भ्रम नींद क्यों न छांड़त दुखदाई।
सोचत चिरकाल सोंज, आपनी ठगाई।। हे नर. ।।

प्रभाती के पूरे होते-होते सिपाही जाग उठा। देखा उजेला हो
गया था। चटसे उठ बैठा और “आज बड़ी नींद आई। बड़ी
मुश्किल हुई, बिलासपुर बहुत दूर है, वहाँ जाकर आज ही सूर्यपुर
पहुँचना है।” इस तरह बड़बड़ाता हुआ कपड़े लत्ते सम्हाल कर
बिलासपुर की ओर चल पड़ा और थोड़ी ही देर में अदृष्ट हो गया।

इधर गुरुदेव भी उठ बैठे और चेले को सम्बोधन करके बोले -बच्चा गोवर्धनदास ! रात भर सोया तो भी पेट नहीं भरा क्या ? अरे ! क्या इसी तरह भगवद्भजन करेगा ? त्रिलोकीनाथ क्या इसी तरह सोते सोते मिल जावेंगे ? संसार-समुद्र में आकंठ निमग्न हुए गृहस्थ लोग भी इस समय राम नाम का जप कर रहे हैं। देख तो कैसा अमूल्य समय जा रहा है? वे अपना आत्म कल्याण कभी नहीं कर सकते। चेलाराम राम नाम की झड़ी लगाते हुए छटपटा कर उठ बैठे।

कमंडलु में रक्खे हुए पानी से हाथ-मुँह धोकर आशीर्वाद देकर कहा-देखो गोवर्द्धन! अब विलम्ब मत करो, आगे धूप हो जावेगी तो कष्ट होगा, चलने के लिये यही समय अच्छा है। यह सुनकर गोवर्द्धन दंड-कमंडलु, चिमटा वगैरह उठाकर आगे हो गया और बोला-चलिये। गुरु महाराज भी उठकर साथ हो लिये। इतने में कई मल्लाह दौड़े हुए आये और हाथ जोड़कर बोले महाराज! कहते हैं कि साधुओं की सब पर सदा कृपा रहती है, परन्तु आप हम लोगों के यहाँ एक दिन भी न ठहरे इससे हम लोग क्या समझें? यदि आप चले जावेंगे, तो हमको बड़ा दुःख होगा।

गुरुजी ने कहा-भाइयों! हमारी सब पर एकसी ही कृपा रहती है, तुम लोगों से हम बहुत प्रसन्न हैं, परन्तु हमको रामेश्वर भगवान के दर्शन की बड़ी उत्कंठा है, इससे ठहर नहीं सकते हैं और एक स्थान पर एक रात्रि से अधिक रहना साधुओं का धर्म भी नहीं है। तुम सबको हमारा आशीर्वाद है कि खुश रहो परन्तु हमको रोको मत। यह सुनकर मल्लाह चुप रहे और गुरु और चेला सूर्यपुर की राह लग गये।

पांचवां पर्व

सुवर्णपुर से अनुमान दो मील ईशान की ओर एक सुन्दर सरोवर है। चारों ओर साफ और सुव्यवस्थित सड़क बनी हुई है। सरोवर का किनारा कहीं-कहीं कच्चा और कहीं-कहीं पक्का बंधा हुआ है और किनारे के बीच में चारों ओर जो थोड़ी सी जगह है, उसमें एक सुन्दर फुलवारी लगी हुई है। फुलवारी नाना प्रकार के सुन्दर-सुन्दर फूलों के गमलों, लहलही लताएँ, हरे-भरे खूबसूरत वृक्षों और हरी दूब से बहुत भली जान पड़ती है। स्थान-स्थान पर छूटते हुए अनेक हरे फब्बारों से तो उसकी श्री और द्विगुणित हो रही है।

सड़क के दूसरी ओर आम्र, बकुल, अर्जुन, जामुन, निम्ब आदि बड़े-बड़े वृक्षों की एक श्रेणी है, जो इस मनोहर स्थान की रक्षा करने वाली सन्नद्ध सेना सी जान पड़ती है। यह रम्य सरोवर और उसकी चतुर्दिग्वर्ती सम्पत्ति महाराज विजयसिंह की स्थापित की हुई है। जी बहलाने और समीर सेवन करने के लिये सुवर्णपुर में इसके अतिरिक्त दूसरा अच्छा स्थान नहीं है।

आज सूर्य अस्त होने के कुछ पहले हम राजकुमार भूपसिंह को यहाँ पर टहलते हुए देखते हैं। यद्यपि अभी तक ग्रीष्म की ऊष्मा समाप्त नहीं हुई है और ग्रीष्मकाल भी अवशेष ही है, तथापि दो तीन दिन लगातार पानी बरसने से इस समय उस रात-दिन बरसने वाली प्रचण्ड अग्नि से, पिंड छूटा हुआ जान पड़ता है।

समस्त पशु पक्षी प्रसन्न चित्त दिखलाई देते हैं। सूखे पड़े हुए मेंढ़कों के शरीर में जीव आ गये हैं। वे इधर-उधर उछलते हुए बड़े-बड़े बक्कियों के मद को मात कर रहे हैं। सारस, हंस, मयूर आदि पक्षी चैन से क्रीड़ा कर रहे हैं। पानी के बहुत ही समीप बकगणों का ध्यान लग रहा है। पाँव के नीचे कोई जीव न मर जावे, इसलिये धीरे-धीरे पाँव रखते हुए वे बाह्य से ईर्यापथ शोध के चलने वाले मुनियों का भी नम्बर ले रहे हैं, परन्तु उनका यह बकव्रत तब ही तक रहता है जब तक कोई मछली सामने नहीं आ जाती।

एक साथ चलते हुए एक साथ मधुर शब्द करते हुये और एक साथ उड़ते हुए स्नेहमय सारस के सरस जोड़ों को देखकर भूपसिंह के हृदय में शीघ्र ही प्राप्त होने वाले दाम्पत्य प्रेम की मीठी कल्पनायें उठने लगीं, कोकिला के कोमलालाप से चित्त उत्कंठित होने लगा और मयूरों के आनन्द नृत्य से मुख पर स्वेद झलकने लगा। आगे चलने को जी नहीं हुआ, शरीर स्तब्ध सा हो गया, इसलिये टहलने से विरत होकर तालाब की एक सीढ़ी पर जा बैठे। विचारा था कि यहाँ जी बहला लेंगे और पूर्व विचारों को भुला देंगे, परन्तु चक्रवाक के जोड़ों को एक दूसरे के समागम के लिये व्याकुल देखकर और भी उत्तेजना हुई।

उस समय वीर पुङ्गव भूपसिंह का हृदय डगमगाने लगा। पाणिग्रहण के समय की मदनमालती की प्रतिमा सामने आ गई। रूपामृत का पान करने के लिये उन्होंने नेत्र बन्द कर लिये। उस समय ऐसा जान पड़ा मदनमालती हाथ जोड़ के कह रही है, “प्राणनाथ, बहुत विलम्ब तक बाट देखी, पर आपके दर्शन न हुए, इसलिये विरह-सन्ताप के सहन करने में असमर्थ होकर यह दासी स्वयं आई है।” भूपसिंह इसका कुछ उत्तर देना ही चाहते थे कि कोयल की कूक से आँखें खुल गई। देखा, सूर्य अस्त हो गया है और सबके सब कमल जो थोड़ी देर पहले खिले हुए थे, संकुचित होकर प्रभाहीन हो गये हैं। भूपसिंह विचारने लगे, मित्र (सूर्य) के वियोग में जो उदासीन और हतप्रभ हो जाते हैं, वही सच्चे मित्र हैं। धिक्कार है मुझे, जो एक सर्वश्रेष्ठ मित्र को खोकर विषय वासनाओं की कल्पनाओं में उलझा हूँ।

हाय! जयदेव जैसे मित्र को भूलने वाला मुझ जैसा कृतघ्न और कौन होगा? वह देखो हँसता हुआ चन्द्रमा गगनमंडल में आ विराजा है। अहो पामर चन्द्र? तुम्हें सहस्रवार धिक्कार है जो अपने मित्र (सूर्य) के अस्त होने पर प्रफुल्लित होते हो और उदय होने पर हतप्रभ हो जाते हो। लोग कहते हैं, तुम मित्र के प्रताप से चमकते हो और मित्र की कृपा से तुममें प्रकाश है, इतने पर भी मित्र के साथ तुम्हारा ऐसा निंद्य बर्ताव है? अतएव कृतघ्नी चन्द्र! तुम्हें लाख बार धिक्कार है। अस्ताचल पर्वत की गह्वर गुफाओं में मित्र (सूर्य) पर न जाने कैसी बीती होगी। इसका कुछ भी सोच न करके तुम अपनी ज्योत्स्ना प्रिया के साथ क्रीड़ा कर रहे हो एवं कुमोदनी को मुदित कर रहे हो, अतः कलङ्की चन्द्र? तुम्हें अनन्तबार धिक्कार है। तुम्हारे इन गुणों के कारण ही कदाचित् तुम्हारे निर्मल शरीर में ये कलंक के चिन्ह दिखलाई दे रहे हैं।

परम अहिंसा धर्म के उपदेशक प्यारे जयदेव! सुशीला जयदेव! विद्वान् जयदेव! न जाने इस पापी को तुम्हारे दर्शन कब होंगे! तुम्हारा वियोग असह्य हो उठा है क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, तुम्हें कहाँ ढूंढूं, तुम्हारे लिये अब मैं सब कुछ परित्याग कर सकता हूँ। मेरा अपराध क्षमा करो। न जाने मुझे क्या हुआ था जो मैंने तुम्हें सर्वथा भुला दिया। हाय! तुम्हारी कोमलांगी सुशीला पर न जाने क्या क्या विपत्तियाँ पड़ी होंगी और न जाने बेचारी अपने शरीर की रक्षा किस तरह से कर रही होगी। तुम्हारी ऐसी विपत्ति में भी यदि मैं कुछ सहायता न कर सका तो मेरा यह शरीर और किस काम में आवेगा?

बस! अब मैं इस सुवर्णपुर में एक क्षणभर भी नहीं ठहर सकता। तुम्हारे लिये मैं अपना जीवन उत्सर्ग करने को प्रस्तुत हूँ! मन की गति बड़ी विचित्र है। कुछ क्षण पहले जो मन मदनमालती के समागम संकल्पों में मग्न हो रहा था, जिसे प्रहर दो प्रहर का वियोग भी असह्य हो उठा था और जो अपनी प्रिया के रूपामृत का पान करके सुखी हो रहा था वही मन चिरकाल के लिये वन-वन भटकने को तैयार है, कष्ट सहने को प्रस्तुत है और सब सुखों को तिलांजली देने को उद्यत है। इसके पश्चात् भूपसिंह ने खीसे में से कागज कलम निकाल कर निम्नलिखित चिट्ठी लिखी-“प्रिय मदनमालती ! यहाँ सरोवर पर बैठे हुए अचानक मुझे अपने मित्र का स्मरण हो आया है। मेरे मित्र किसी विपत्ति में फंसे हुए हैं, उनकी सहायता करना मेरा परम धर्म है। इसलिये मैं तुमसे बिना मिले ही उनकी खोज में जाता हूँ। आज के सुहाग रात्रि जैसे सुख के समय में मेरे वियोग से तुम्हें दुःख अवश्य होगा, परन्तु क्या किया जाय, विवश हूँ। मित्र का जब तक पता न लगा लूँगा तब तक सुखों की ओर देखूँगा भी नहीं यह मेरी प्रतिज्ञा है, इसीलिये जाता हूँ। कहाँ जाऊँगा कह नहीं सकता, परन्तु मित्रों के दर्शन करके जितनी जल्दी हो सकेगा तुमसे आकर मिलूँगा। तुम्हें मैं जी से चाहता हूँ। इस हृदय का अधिकारी तुम्हारे सिवाय और कोई नहीं है। व्याकुल नहीं होना, धैर्य्य से समय व्यतीत करना। अधिक क्या लिखूँ तुम स्वयं बुद्धिमती हो।”

चिट्ठी बन्द करके भूपसिंह ने मदनमालती का सिरनामा किया और सड़क पर आकर अपने सेवक के हाथ में देकर जो कि घोड़े की बागडोर पकड़े हुए था, कहा-भवानी, इस चिट्ठी को तुम महलों में पहुँचा देना। मैं किसी काम के लिये पास ही के इस गाँव को जाता हूँ। घोड़े को भी तुम लिये आओ, क्योंकि मेरी इच्छा पैदल जाने की है। बहुत जल्दी मैं वहाँ से लौट आऊँगा। बेचारा सेवक हक्काबक्का सा हो गया। कुछ पूछना चाहता था, परन्तु भूपसिंह के रौब के मारे कुछ न पूछ सका और “जो आज्ञा !” कहकर सुवर्णपुर की ओर चल पड़ा। इधर भूपसिंह भी उसके चले जाने पर एक ओर को चल दिया।

छट्ठा पर्व

हीरालाल और रामकुंवरि को पलंग से जकड़े हुए छोड़े बहुत दिन हो गये, पाठकों को अब उनकी भी खबर लेनी चाहिये। जयदेव ने पूछा हीरालाल तुम लोगों को इस दशा में देखकर मैं अवाक् हूँ। कुछ अनुमान नहीं कर सकता कि तुम्हें इस तरह विवश किसने किया ? जल्दी कहो, तुम्हारे साथ यह अत्याचार किसने किया ? हीरालाल ने मुख की चेष्टा बदलकर कहा-“हाय ! हाय ! हम लोग चिल्ला चिल्ला कर मर गये पर किसी ने कुछ नहीं सुना। डाकुओं ने हमारी बड़ी दुर्दशा की, मारा पीटा और जकड़ के बांध दिया।”

इतने में रामकुंवरि ने आँखों से आँसू बहाते हुए कहा-और हाय ! मेरा तो सर्वस्व ही लूट लिया। वे (रतनचन्द) खेटपुर से रात को लौट आये थे, सो उन्हें तो वे दुष्ट बांध ही ले गये। मैं जीती ही मर गई अब इस संसार में किसका मुँह देख के जीऊँगी। हाय ! हाय !! वे दुष्ट न जाने उनकी क्या दुर्दशा करेंगे ? यह सुनकर जयदेव ने पूछा हीरालाल क्या यह सच है कि वे सब डाकू थे ?

हीरालाल-हाँ, वे डाकू ही थे।

जयदेव-यदि वे डाकू थे, तो उन्होंने चोरी भी अवश्य की होगी ?

हीरालाल-हाँ ! तिजोरी के कोठे में वे बहुत देर तक घुसे रहे थे। न जाने वहाँ से क्या ले गये और क्या छोड़ गये ?

जयदेव-परन्तु तुम्हारी चाची के शरीर पर जो कीमती जेवर हैं, उसको वे क्यों नहीं ले गये ? और तुम्हारे गले में जो यह जड़ाऊ गोप और रत्नों की माला है, क्यों छोड़ गये ?

रामकुंवरि-नहीं जी। वे डाकू नहीं थे। कोई बस्ती के ही दुश्मन थे। उन्हें चोरी से मतलब नहीं था। हम लोगों को तकलीफ देने और सेठजी को ले जाने के अभिप्राय से ही वे आये थे। सो पापियों की इच्छा पूर्ण हो गई। अब सेठजी की जान बचना कठिन है। हाय ! यदि तुमसे कुछ हो सके तो उन्हें बचाओ। (रोती है)

जयदेव-परन्तु जब सेठजी सबेरे खेटपुर को चले गये थे, तब डाकुओं को यह मालूम कैसे हो गया कि वे आ गये हैं और मैं देखता आया हूँ कि घुड़शाला में घोड़ा नहीं है। यदि सेठजी रात को आ गये होते तो घोड़ा अवश्य होता। यदि कहो कि वे लोग ले गये होंगे, तो जब वे चोरी करने के अभिप्राय से नहीं आये थे, तब अकेले घोड़े को ही क्यों ले जाते ? और बस्ती में घोड़े की चोरी छुप नहीं सकती, इतना क्या उन लोगों को ज्ञान नहीं होगा ?

इसके सिवाय इस बात पर भी तो सर्वथा विश्वास नहीं होता कि सेठ रतनचन्दजी के इस बस्ती में क्या इस संसार में भी कोई दुश्मन हो, मैं उनके स्वभाव को भलीभाँति जानता हूँ। उनके दुश्मनों का अस्तित्व बतलाना, एक प्रकार से उनको गालियाँ देना है और यह तो बताओ, तुम दोनों को उन्होंने इकट्ठा एक पलङ्ग पर एक साथ क्यों बांधा तथा ये दो चिट्ठियाँ कौन लिखके डाल गया है यह कहकर जयदेव ने वे चिट्ठियाँ उठा ली और बाँचकर अपने प्रश्नों का उत्तर पाने के लिये उन दोनों पापियों की ओर देखा, परन्तु उन्हें अधोवदन और सर्वथा मौन युक्त पाया। आखिर झूठ झूठ है और सच सच है। काठ की हांडी बहुत देर तक नहीं चढ़ती। अन्तिम पोल खुल ही जाती है। हीरालाल शायद पलंग से जकड़े जाने का कुछ उल्टा सीधा उत्तर दे देता, परन्तु चिट्ठी की बात पर तो मौन के सिवाय कोई रास्ता ही नहीं था। प्रत्यक्ष के लिये प्रमाण की जरूरत ही नहीं रही। उन्हें इस प्रकार निःशब्द देखकर जयदेव ने कहा - कहो हीरालाल ! चुप क्यों हो गये ? और भी कुछ झूठ बोलो ? रामकुंवरि से भी कुछ मदद मांगो। एक महापाप कर चुके हो अब उसको छुपाने के लिये और भी पाप करो।

अरे पापियों ! क्या तुम मुझे अन्धा समझते हो ! जो इस तरह बे सिर पैर की बातें सुनाकर भुलाना चाहते हो। शायद अब भी तुम्हें पवित्र पुण्यात्मा बनने का हौसला है, परन्तु जरा दर्पण लेकर अपना मलिन मुख तो देखो, वह क्या कह रहा है ? याद रक्खो, तुम्हारे सब पाप प्रगट हो चुके हैं, तुम्हारे हृदय की कालिमा बाहिर निकल आई है, अब वह छुपाने से नहीं छुपेगी ! सच कहो, क्या तुमने इन चिट्ठियों को नहीं पढ़ा है ? और क्या तुम लोग यह नहीं जानते कि तुम लोगों के घोर नारकी कर्म को देखकर रतनचन्द जी संसार से वैराग्य को प्राप्त हो गये हैं।

अरे नारकियों ! सेठ रतनचन्द जी तो वैसे ही सौम्य प्रकृति के संवेगी सज्जन थे, यदि कोई पाषाण हृदय दीर्घमोही पुरुष भी तुम्हारी अयोग्य, अघट और अश्रुतपूर्व नारकी लीला को देखता, तो संसार से भयभीत हो जाता। हाय ! दुर्लभ मनुष्य जन्म का तुमने ऐसा दुरुपयोग किया जिसका प्रायश्चित्त नहीं है ! नराधमों ! जिस शरीर में देवदुर्लभसंयम की पालना होती है, उससे तुमने पशुओं से भी नीचतर कर्म किया है। काक के उड़ाने के लिये तुमने अमूल्य रत्न खोकर यह दीनातिदीन अवस्था प्राप्त की है जिसे देखकर दया उत्पन्न होती है।

शोक है कि मैंने दूसरों जैसा क्रूर और कठिन हृदय नहीं पाया, नहीं तो तुम्हारे पाप के प्रायश्चित्त का फैसला यहीं कर देता। सचमुच तुम्हारा अपराध अक्षम्य और असह्य है, परन्तु शायद तुम्हें अपने जीवन में और भी कुछ पुण्य कमाना है, इसलिये मेरे हृदय में ग्लानि तथा विरक्ति के सिवाय क्रोध का अंश भी उद्भावित नहीं होता।

यदि मैं सेठ रतनचन्द जी को पूज्य बुद्धि से नहीं मानता और उनके 'आदेश की पालना अपना कर्तव्य नहीं समझता, तो तुम्हारा मुँह देखे बिना ही आज इस नगर को छोड़ देता। क्योंकि तुम जैसे नरपिशाचों के दर्शन से अपरिमित दुःख होता है, परन्तु क्या करूँ अपने हितचिन्तक के अनुरोध की अवेहलना करते नहीं बनती। शायद तुम्हें भरोसा नहीं होगा कि तुम्हारी सम्पूर्ण सम्पत्ति का एक मात्र अधिकारी मैं बनाया गया हूँ, इसलिये एक बार तुम दोनों इस वसीयतनामे को पढ़लो, और देख लो तुम्हें तुम्हारे पापों का फल मिलना प्रारम्भ हो गया है।

ऐसा कहकर जयदेव ने उसी बेबसी की हालत में उन दोनों के सामने यह वसीयतनामा रख दिया। उसके बांचते समय उन पापियों के हृदय की जो दशा थी, उसका चित्र इस लेखनी से नहीं खींचा जा सकता। पाठकगण अनुमान से जानलें। एक तो वे अपने पापों का भण्डाफोड़ होने से वैसे ही सूख रहे थे, दूसरे वसीयतनामे की सूरत देखकर तो बेचारे अधमरे हो गये। कर्तव्यविमूढ़ होकर चित्र लिखे से रह गये।

जयदेव ने वसीयतनामे को अपने खीसे में सम्हाल के रख लिया और उन दोनों को बेबसी से मुक्त करके कहा-तुम लोग यह मत समझो कि तुम्हारी इस सम्पत्ति का मैं उपभोग करूँगा। नहीं, मैं इससे सर्वथा पृथक् रहूँगा। मुझे इसकी जरूरत भी नहीं है, परन्तु तुम जैसे दुराचारियों के हाथ इसे न लगने दूँगा। किसी सत्कार्य में लगाकर महानुभाव रतनचन्दजी के परिश्रम को सफल करूँगा। हाँ! तुम लोग यदि अपने आचारों को सुधार सको, अपने पापों का प्रायश्चित्त कर सको, अपने मनुष्य जन्म के गौरव को समझ सको और सत्कार्यों के लिये अपना जीवन उत्सर्ग करके संसार में कीर्ति सम्पादन कर सको तो मैं सच कहता हूँ, इस सम्पूर्ण सम्पत्ति के अधिकारी तुम्हीं हो।

एक बात और है। वह यह कि तुम अपने मलीन जीवन से निराश न हो जाओ और यश प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने में उत्साह दिखलाते रहो, इसलिये सिवाय मेरे तुम्हारे इस दुष्कृत्य को कोई भी नहीं जान सकेगा।

प्रायः ऐसा देखा गया है कि जिनका पापकर्म एक बार संसार में प्रगट हो जाता है, वे निर्लज्ज होकर उससे भी अधिक घोर कर्म करने लगते हैं। इसी विचार से तुम पर यह दया की जाती है। आशा है कि तुम अपना चरित्र दिन पर दिन उन्नत करके इस कलंक को धोकर उज्ज्वल बनने का प्रयत्न करोगे। जाओ और आज ही से पश्चात्ताप आदि से अपने पापों का प्रायश्चित्त करना प्रारम्भ कर दो। लोगों को किसी प्रकार का सन्देह न हो, इसलिये मैं इस समय तुम्हारे रहने के स्थानादि का परिवर्तन नहीं कर सकता। जिस तरह पहले रहते थे, उसी प्रकार से रहो। दुकान की सम्पूर्ण व्यवस्था मैं अपने हाथ में रक्खूँगा।

इसके पश्चात् जयदेव ने तिजोरी वगैरह की सम्पूर्ण सम्पत्ति सम्भालकर उसकी एक फहरिस्त तैयार की और ताले आदि की सब व्यवस्था करके दुकान की राह ली। उस दिन रामकुंवरि और हीरालाल ने शोक सन्ताप में भोजन नहीं किया।

सातवां पर्व

हीरालाल और रामकुंवरि की इस घटना को बहुत दिन हो गये। जयदेव को आशा थी कि ये सुधर जावेंगे, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। हीरालाल ने दुराचार नहीं छोड़े। कदाचित् सस्त्रीक रहने से यह सम्हल जावेगा ऐसा विचार कर जयदेव ने पीहर से हीरालाल की बहू को भी बुलवा दिया, परन्तु नीम न मीठो होय खावे गुड़ घीसे के अनुसार वह ज्यों का त्यों बना रहा। हीरालाल की स्त्री सुभद्रा बड़ी सुशीला और बुद्धिमती थी। उसने अपने पति को सदाचारी बनाने के लिये शक्ति भर प्रयत्न किये। मन वचन कार्य से सेवा की, नानारूप में प्रार्थनायें की, पर स्त्रियों की वेश्याओं की निन्दा की, उनके समागम के दोष बतलाये, तज्जनित पापों के नरक निगोदादि फल बतलाये, और लोकापवाद का भय बतलाया, परन्तु यह सब चिकने घड़े पर का पानी हुआ। हीरालाल का वज्र हृदय किसी प्रकार से नरम नहीं हुआ। उस बेचारी को उलटा अपमानित और तिरस्कृत होना पड़ा।

रामकुंवरि भी यद्यपि प्रगट रूप में पतिव्रता बनी रहती थी, परन्तु दुराचार सेवन की ओर उसकी प्रवृत्ति पहले की अपेक्षा कई-गुनी अधिक हो गई थी। हीरालाल से भी उसका सम्बन्ध नहीं छूटा था, यद्यपि रामकुंवरि और हीरालाल जानते थे कि हमारे दुराचारों को जानने वाला कोई नहीं, परन्तु जयदेव उसके कृत्यों को रत्ती-रत्ती जानता था।

एक दिन जब विश्वस्त मार्ग से यह मालूम हुआ कि हीरालाल और उसके सहकारी इस बात की गुप्त मंत्रणा कर रहे हैं कि जयदेव को किसी प्रकार से खपा डालना। तब जयदेव को बहुत दुःख हुआ। यद्यपि उसे यह आशा बहुत कम थी कि हीरालाल और रामकुंवरि के चरित्र अच्छे हो जावेंगे तो भी उसे स्वप्न में भी ख्याल नहीं था कि मुझे उस चिरस्मरणीय अपरिमित उपकार का बदला पापियों की ओर से इस रूप में मिलेगा।

उस दिन इन्हीं सब बातों का विचार करता हुआ और दुःख रूपी संसार का भयानक चित्र देखता हुआ जयदेव सो गया। आँख लगते ही वह देखता क्या है कि एक विकटाकार पुरुष सुशीला का आंचल पकड़ के खींच रहा है, जिससे उसका आधा शरीर उघड़ गया है और आधे को वह अपने हाथ से बड़ी कठिनाई से सम्भाले हुये हैं। बाल खुले हैं। आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही है। जोर जोर से चिल्लाकर कह रही है-नाथ। मुझे बचाओ। देखो, तुम्हारे देखते हुये यह दुष्ट मेरी लज्जा हरण कर रहा है।

हाय! हाय! तुम्हारा पुरुषत्व, तुम्हारा क्षत्रिय धर्म आज क्या लुप्त हो गया, जो मेरी ओर देखते भी नहीं हो। हाय! आप जैसे जगत्शिरोमणि विद्वान् वीररत्न की पत्नी क्या मैं इसीलिये हुई थी कि मेरा सतीत्व संकट में आ पड़ेगा और कोई सहायता नहीं करेगा। हे प्राणेश्वर! क्या मुझ वीर बाला को अब यह समझकर कि संसार में क्षत्रियों का पराक्रम विदा ले चुका है। स्वयं अपने प्राणोत्सर्ग कर देना चाहिये।

अच्छा, जीवनाधार ! तुम कुछ उत्तर नहीं देते हो, तो लो मैं चली। हो सकेगा और अटल प्रेम कुछ सहायता करेगा तो दूसरे जन्म में आपसे मिलूँगी। नहीं तो…इतना कहते-कहते उस कल्पनामूर्ति ने अपने आन्तरीय वस्त्र में से एक तीक्ष्ण छुरी निकाली और चाहा कि पेट में पेराकर पार हो जाऊँ कि जयदेव चिल्लाकर उठ खड़ा हुआ और छुरी पकड़ने के लिये सामने की ओर उसने हाथ फैलाये, परन्तु वहाँ था क्या ? जो पकड़ लेता। पहरे पर टहलते हुए सिपाही का हाथ पकड़ लिया। वह घबड़ाकर बोला, मुनीमजी ? आप यह क्या कर रहे हैं ? यह तो मैं आपका सिपाही हूँ। जान पड़ता है इस समय आप कोई स्वप्न देखकर बहक गये हैं। सचेत होकर अपने को सम्भालिये।

जयदेव ने आँख खोलकर देखा तो सचमुच सिपाही का हाथ उनके हाथ में है और कमरे में चिराग जल रहा है जिसमें वहाँ की सब चीजें साफ-साफ दिखलाई दे रही है। न सुशीला है, न विकटाकार पुरुष है और न वह स्थान है। जयदेव इससे कुछेक लज्जित होकर सिपाही का हाथ छोड़कर बैठ गया और हाथ-मुँह धोकर चादर ओढ़कर फिर लेट गया, परन्तु बहुत समय तक नींद नहीं आई। स्वप्न के ध्यान से वह विफल होने लगा।

सुशीला की बेबसी उसके हृदय के टुकड़े-टुकड़े करने लगी। उसकी अत्यन्त करुणध्वनि कानों के पास बार-बार गूँजकर दुखी करने लगी। जयदेव ने सोचा, क्या सचमुच सुशीला ऐसी विपत्ति में होगी? हाय! मैं कैसा निर्दयी हूँ, जो उसे भूलकर यहाँ दूसरों की चिन्ता में दुर्बल हो रहा हूँ। भला मुझे, इन व्यर्थ की चिन्ताओं से क्या? यह संसार है। घर-घर ऐसी ही मठियारे चूल्हे हो रहे हैं। मुझे अपनी चिन्ता करनी चाहिये।
प्यारे भूपसिंह! तुम न जाने कहाँ होओगे। हाय! मैं तुम जैसे सच्चे मित्र को भी भूल गया। न जाने समुद्र से तुम्हारा उद्धार हुआ होगा, या नहीं। तुम्हारे वृद्ध पिता तुम्हारे वियोग से कितने दुखी होंगे, हाय! मुझ अभागे के कारण तुम्हें अपने प्राणों का संकट सहना पड़ा।
इसप्रकार नाना प्रकार के विचारों में गोते खाते-खाते रात पूरी हो गई। जयदेव ने उठकर नमस्कार मंत्र का स्मरण किया और अपने दिन के कर्तव्यों का निश्चय करके शय्या का त्याग किया। पश्चात् शौच, मुखमार्जन, स्नान, संध्या, भोजनादि कार्यों से निवृत्त होकर उसने अपने एक सदाचारी विश्वस्त मित्र को बुलाकर दुकान का सम्पूर्ण कार्य समझा दिया और उचित वेतन नियत करके उस दुकान का कार्यवाहक मैनेजर बना दिया।
इसके पश्चात् नगर के सम्पूर्ण प्रतिष्ठित पुरुषों को और कंचनपुर नरेश को आमंत्रित करके जयदेव ने एक सभा की। उसमें सबका यथोचित सत्कार करके उसने कहा-महाराजाधिराज! आप लोग जानते हैं कि मैं एक परदेशी व्यक्ति हूँ। सुनामधेय सेठ रतनचन्दजी विश्वास करके मुझे अपनी दुकान सौंप गये थे, तदनुसार आज तक जिस तरह बना, मैंने इस दुकान का प्रबन्ध किया, परन्तु अब मैं स्वदेश जाना चाहता हूँ। चूंकि सेठजी के पुत्र हीरालाल इस योग्य नहीं है कि दुकान का कार्य चला सके, इस प्रतिष्ठित दुकान की देखरेख आप लोगों के जिम्मेवार करके और इसकी उन्नति की अवनति की लज्जा आपके हाथ देकर निश्चिन्तता से जाता हूँ।

वर्तमान में मैंने दुकान का प्रबंध अपने विश्वस्त मित्र विनीतचन्द्र को सौंपा है, आशा है कि आपकी देख-रेख में वे उत्तम रीति से कार्य सम्पादन करेंगे। सेठ रतनचन्दजी आपके नगर के एक यशस्वी और प्रतिष्ठित वणिक थे, इसलिये मुझे सम्पूर्णतया आशा है कि आप लोग उनकी इस दुकान को चिरकाल तक रक्षित रखके उनका कीर्तिस्तंभ बनाये रक्खेंगे। इसके सिवाय दीक्षित होने के समय सेठ रतनचन्दजी मुझे एक लाख रुपया इसलिये सौंप गये हैं कि उससे कोई लोकोपकारी धर्मकार्य सम्पादन किया जावे।

सो यह रुपया मैं महाराज के हस्तगत करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि शीघ्र ही इस रुपये से एक पाठशाला खोल दी जावे और उसका नाम सेठ रतनचन्द पाठशाला रक्खा जावे। उसमें ऐसे विद्यार्थी पढ़ाये जावें जो 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक विद्याध्ययन करें और उत्तीर्ण होकर देश तथा धर्म की सेवा करें। असमर्थ विद्यार्थियों को पाठशाला की ओर से भोजन वस्त्र का प्रबंध किया जावे। मुझे खेद है कि उक्त भावी पाठशाला की ओर मैं कुछ भी सेवा न कर सका और जाता हूँ तो भी यह संतोष है कि आप जैसे विद्वान नरनाथ के हाथ से उसका कार्य बहुत उत्कृष्ट रीति से संपादन होगा।

अन्त में विदाई की क्षमा प्रार्थना करके मैं आप लोगों की आज्ञा लेता हूँ। जयदेव का वक्तव्य समाप्त होने पर महाराज ने उसका अनुमोदन किया और अपनी प्रसन्नता प्रगट की। साथ ही अन्यान्य सभ्यगणों ने भी करतल ध्वनि से उसमें सम्मति प्रदर्शित की। इसके पश्चात् महाराज की आज्ञानुसार उनके मंत्री ने दुकान से संपूर्ण बही-खातों की जाँच करके कोष की संभाल की और सबको यथावस्थित पाया।

तदनन्तर सभा विसर्जन करके जयदेव ने महाराज को एकान्त स्थल में ले जाकर सेठ रतनचन्द का लिखा हुआ वसीयतनामा सौंप दिया और हीरालाल रामकुंवरि के कच्चे चिट्ठे को सुनाकर कहा- इस जायदाद पर हीरालाल का कोई स्वत्व नहीं है और अपने दुराचारों से वह दया का पात्र भी नहीं है तो भी यदि आपकी सम्मति हो तो मैं चाहता हूँ कि कुछ पूँजी देकर उसे एक दुकान करा दी जावे, जिसमें वह अपना उदर निर्वाह कर सके और रामकुंवरि को भी कुछ निर्वाह योग्य द्रव्य दे दिया जावे।

महाराज ने जयदेव के करुण हृदय पर आश्चर्य करते हुए इस विषय में स्वीकारता दे दी और पूछा-करुणामूर्ति जयदेव। यह तो सब हो चुका, परन्तु अभी तक यह प्रगट नहीं हुआ कि तुम कहाँ जाते हो, क्यों जाते हो और इस विपुल सम्पत्ति का उपभोग कब करोगे? जयदेव ने नम्र होकर कहा-महाराज! आपकी कृपा से मैं स्वयं एक विपुल लक्ष्मी का स्वामी हूँ। मेरे भोगने के लिये वही यथेष्ठ है। एक आकस्मिक घटना से मैं इस नगर में आ गया था, सो रतनचन्द जी के स्नेह से इतने दिन तक यहाँ ठहरा रहा। अब बन्धुजनों का मोह अतिशय व्याकुल कर रहा है, इसलिये जाता हूँ।
रतनचन्द जी मुझे अपनी सम्पत्ति का अधिकारी बना गये हैं, यह सच है, परन्तु मैं स्वयं उस पर अपना अधिकार नहीं समझता, इसलिये उसे आप लोगों को सौंप जाता हूँ। आप जो चाहें सो करें। यद्यपि मित्रता के सम्बन्ध से मैं यह सलाह दे सकता हूँ कि आप उसे किसी धर्मकार्य में लगाते रहें, परन्तु स्वार्थी बनकर उसका स्वयं दान नहीं कर सकता, क्योंकि उस पर मेरा उतना ही स्वत्व है, जितना आपका। कंचनपुर नरेश जयदेव के उदार विचारों को सुनकर अवाक् हो रहे। आँखों से स्नेह के आनन्द आँसू टपकने लगे। खड़े होकर उन्होंने उसे हृदय से लगा लिया और कहा-जयदेव! अफसोस है कि तुम जैसे पुरुषरत्न अभी तक हमसे अप्रकट रहे और आज जब प्रकट हुए तब वियोग सन्मुख खड़ा है। जी कहता है कि तुम्हें अपने नेत्रों के सामने से अलग न होने दूँ, परन्तु तुम्हारे असह्य बन्धु वियोग को भी मैं सहन नहीं कर सकता।

अस्तु ! तुम सज्जन हो, विद्वान हो और हृदय के परीक्षक हो। मेरे नवीन स्नेह की अवहेलना न करोगे और अपना सम्पूर्ण परिचय देकर बहुत शीघ्र मुझसे मिलोगे, इसलिये इस समय मैं तुम्हें नहीं रोकता हूँ। जाओ प्रसन्नता से जाओ, परन्तु चलते समय एक बार मुझसे फिर मिलते जाना, महाराज के प्रेमपूरित वाक्यों से जयदेव का गला भी भर आया। एक कागज पर अपने ग्रामादि का पता लिखकर देने के सिवाय मुँह से वह कुछ भी न कह सका। महाराज ने अपने महलों की ओर गमन किया, सत्कार के लिये जयदेव उन्हें कुछ दूर तक पहुँचाने के लिये गया।

इसके पश्चात् उस दिन और कुछ नहीं हो सका, क्योंकि चारों ओर यह खबर फैल गई कि “जयदेव स्वदेश जाने वाले हैं” इसलिये झुंड के झुंड लोग उनसे मिलने के लिये आने लगे और जयदेव उन्हें आश्वासन देकर विदा करने लगे। कंचनपुर में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो जयदेव को न चाहता हो। उसके प्रत्येक गुण की घर-घर प्रशंसा होती थी, इसलिये आज उसके गमन समाचार से सब ही को दुःख हुआ। लोगों के आवागमन की भीड़ उस दिन आधी रात तक कम नहीं हुई।

दूसरे दिन प्रातःकाल ही जयदेव कंचनपुर नरेश से मिलने गये। वहाँ जाकर देखा तो लोगों की अगणित भीड़ एकत्र थी। मालूम हुआ यह सब उन्हीं की विदाई की तैयारी हो रही है। महाराज ने बड़े स्नेह से उन्हें बिठाया, पश्चात् राजपुरोहित ने जयदेव के ललाट पर मंगल तिलक करके अक्षत डालते हुए एक आशीर्वादात्मक श्लोक पढ़ा और महाराज ने एक श्रीफल और बहुत सी भेंट दी।

तदनन्तर बड़ी धूमधाम से जयदेव की विदाई हुई। गाजे बाजे के साथ सब लोग अनुमान 1 मील तक पहुँचाने के लिये गये। अन्त में अश्रुबिन्दुओं के पुष्प समर्पित करते हुए और जुहारादि के लिये कर व्यंजन संचालन करते हुए, सब लोगों ने उन्हें जाने की आज्ञा दी। महाराज ने एक बार फिर भी हृदय से लगाकर आशीर्वाद दिया और जयदेव ने प्रणाम करके अपने अभीष्ट स्थान की ओर गमन किया। लोगों के बहुत आग्रह करने पर भी एक घोड़े के सिवाय जयदेव ने और कुछ भी साथ में नहीं लिया।

आठवां पर्व

पृथ्वी का सार प्राणिवर्ग, प्राणी जगत का सार मनुष्य समाज, मानव समाज का सार रमणी और रमणी का सार रूप है। रूप ही स्वर्ग, रूप ही सम्पत्ति और रूप ही सम्पूर्ण सुखों का प्रस्रवण है, परन्तु रूप भी सारहीन नहीं है, रूप का भी सार है। यदि रूप सुखों का निर्झर है तो उसके सार को सुखों के सार का निर्झर कहना चाहिये।

इस सार का नाम सुनते ही हृदय में आनन्दामृत प्लावित होने लगता है, सम्पूर्ण दुख भूल जाते हैं, योगियों की नाईं चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं और सांसारिक लज्जा, भय, तिरस्कार, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, क्रोधादि विकार भावों का लय हो
जाता है। मानवीय भाषा में उस सार को प्रेम-स्वर्गीय प्रेम-
स्वच्छन्द प्रेम कहते हैं। यह समस्त चेतनात्मक जगत इसी प्रेम का
फल है। प्रेम न होता तो संसार भी नहीं होता।

प्रेम के बिना जीवन भारभूत है, मर्कट के गले का हार है
अथवा शव का शृंगार है। जो प्रेम की उपासना नहीं करता है, वह
मानव जन्म का तिरस्कार करता है। प्रेम की पूजा करना प्राणी का
पवित्र पुण्य कर्म है। उसमें दोष कलंक का प्रवेश नहीं है जो प्रेम
को पाप की दृष्टि से देखते हैं, वे स्वयं पापी हैं। प्रेम से पाप का
सम्बन्ध नहीं है। बल्कि प्रेम का प्रतिपक्षी अप्रेम ही पाप है।
जिन्होंने यौवन के साथ-साथ जगन्मनोहारी रूप और लावण्य
पाया है, उन्हें इस पाप से बचना चाहिये और सुखरूप स्वच्छन्द प्रेम
के एकान्त उपासक बनना चाहिये।

प्रेम में द्वित्व नहीं है। प्रेम सबको एक दृष्टि से देखता है। एक
कौपीनावशेष दरिद्री और कुबेर सदृश धनिक में प्रेम एक रूप से
प्रवेश करता है। विद्वान, मूर्ख, बलवान, निर्बल तथा रूपवान और
कुरूप सब ही प्रेम के समान अधिकार-प्राप्त मित्र हैं।

प्रेम के सम्यग्दृष्टि ‘राज्य में’ निज और ‘पर’ का भेद नहीं है।
प्रेम राज्य की सीमा में आते ही पर को निजत्व प्राप्त हो जाता है।
बल्कि यों कहना चाहिये कि निजत्व का भी लोप होकर एकत्व
एक प्राणत्व हो जाता है। पर शब्द की व्युत्पत्ति ही प्रेमशास्त्र में नहीं है। जो प्रेम का उपासक है सच्चा सेवक है, वह परत्व बुद्धि को
सर्वथा छोड़कर एकत्व के एक प्राणत्व के आनन्द राज्य में विहार
करता हुआ स्वर्ग सुख का परिहास करता है।

तुम स्वयं विदुषी हो, प्रेम की उक्त व्याख्या करने की तुम्हारे
सन्मुख आवश्यकता नहीं थी, स्मरणमात्र कराने के लिये मैंने यह
सब किया है। यदि तुमने अपने चित्त को स्थिर करके मेरे यह चार
शब्द सुन लिये हैं, तो मैं ‘सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ’ के सिद्धान्त के
अनुसार कह सकती हूँ कि अब तुम्हारे हृदय से परत्वरूपी पिशाच
निकल गया होगा और एकत्व के लिये व्याकुलता होने लगी होगी।
बाह्य दृष्टि से भी देखो, उदयसिंह में किस बात की त्रुटि है?

ईश्वर कृपा से रूप, लावण्य, पराक्रम, प्रतिभा, वैभव सब ही
कुछ उनमें मौजूद है। वे अपनी विपुल सम्पत्ति के एक मात्र
अधिकारी हैं। सैंकड़ों रूप गर्विता सुन्दरियाँ उनके लिये तरस रही
हैं, जीवन दे रही हैं, पर वे आँख उठाकर भी नहीं देखते। तुम्हारा
परम सौभाग्य है, जो तुम पर उनका जी लग गया है। समझ लो कि
इस समय तुम्हारे हाथ में तीन लोक का मुकुटमणि आ गया है।
अतएव उसकी अवहेलना मत करो। उसे हृदय से लगाकर जीवन
सफल करो।

यह दुर्लभ मनुष्य जन्म बार-बार नहीं मिलता। सूर्यपुर के पूर्व
परिचित बाग के कमरे में शोकाकुला सुशीला के सम्मुख एक स्त्री
उपर्युक्त प्रेमशास्त्र का व्याख्यान कर रही है। यह स्त्री उमर 30 वर्ष से कम न होगी, तो भी यौवन सौन्दर्य उसके अंग-अंग में निवास कर रहा था। वह बड़ी सज धज से बैठी हुई, कटीली-कटीली आँखों से भावभंगी प्रगट करती हुई और ताम्बूल रंजित अधर पल्लवों में कुन्दकलिका सदृश दन्तपंक्ति की प्रभा प्रस्फुटित करती हुई अपना व्याख्यान दे रही थी।
सुशीला एक चटाई पर भीत के सहारे बैठी हुई सिर नीचा किये यह सब कुछ सुन रही थी। व्याख्याता स्त्री सूर्यपुर की एक प्रसिद्ध दूती है। अपने सम्पूर्ण प्रयत्नों को निष्फल देखकर उदयसिंह ने इसकी शरण ली है। ऐसा प्रसिद्ध है कि इस दूति के द्वारा अशक्य से भी अशक्य कार्य सिद्ध हुए हैं। जहाँ इसके हाथ लगे हैं, वहाँ सफलता अवश्य हुई है। दूती प्रत्येक विषय में असाधारण पांडित्य रखती है। बड़े-बड़े वाचाल उसके सामने चुप हो जाते हैं, चालाक चूक जाते हैं और दृढ़प्रतिज्ञ प्रतिष्ठाभ्रष्ट हो गुलाम बने हैं।
बड़ी-बड़ी पतिव्रता कुलांगनायें उसकी कृपा से आज पर पुरुषों को गले लगा रही हैं, बड़े विचारशील एक पत्नी व्रतधारी पर रमणियों के एकान्त प्रेमी हो रहे हैं और जितेन्द्रिय ब्रह्मचारीगण भी कुलटा तथा वेश्याओं के क्रीतदास बने हुए जीवन सार्थक कर रहे हैं। उदयसिंह को खूब आशा है कि आज इसके द्वारा हम सफल-मनोरथ होंगे और बहुत शीघ्र इन्द्रकानन में विहार करने का आनन्द लूटेंगे।

दूती का व्याख्यान समाप्त होने पर सुशीला ने कहा-मैं तुम्हारा उपदेश सुन चुकी, अब विशेष परिश्रम मत करो। तुम्हारा पांडित्य यहाँ काम न देगा। आकाश पुष्पों को तोड़ने के लिये हाथ मत फैलाओ। रेत को पेलकर तेल की आशा छोड़ दो। यहाँ वे चने नहीं हैं, जो दाँतों से पीसकर चूर्ण हो जाते हैं, ये दाँतों को भी चूर्ण करने वाले लोहे के चने हैं। प्रेम की मीमांसा करने के लिये तुमने जो बुद्धि खर्च की है, उस पर हँसी आती है। भेद ज्ञान पर तुमने खूब ही कुठार चलाया है।

जिस निज-पर के भेदज्ञान बिना यह जीव अनादिकाल से चारों गतियों में भ्रमण करता हुआ नाना प्रकार के दुःख भोग रहा है, उस ही को समूल नष्ट करने के लिये तुम्हारा प्रयत्न हुआ है। तुम्हारा प्रतिपादन किया हुआ प्रेम नहीं, पैशाचिक, पाशविक किंवा अमानुषिक कर्म है। पशुओं में ऐसा ही प्रेम देखा जाता है।

माता, बहिन, स्त्री के भेदज्ञान बिना वे ही प्रेम की उपासना करते हैं, मनुष्य नहीं। मनुष्य और पशुओं में यही भेद है। तुम्हारे प्रेम राज्य की दुहाई पशु समाज में ही फिर सकती है, मानव समाज में नहीं। जिस दिन तुम्हारे प्रेम का राज्य मानव समाज में होगा, उस दिन पृथ्वी कांप उठेगी, प्रलय हो जावेगी।

दूती-ओ ! हो ! बड़ा उलाहना दे डाला। खैर ऐसा ही सही, परन्तु मेरी पिछली बात का भी उत्तर दे दो। यों तो तुम पण्डिता हो, मैं शास्त्रार्थ में तुमसे कब जीत सकती हूँ ?

सुशीला-क्या इतने से तुम्हारी बात का उत्तर नहीं हुआ ? अस्तु अब सुनलो और खूब ध्यान लगाकर सुनलो कि तुम जैसी हजार उपदेशिका भी आजावें, परन्तु मेरा बाल बांका नहीं कर सकोगी। तुम क्यों व्यर्थ ही प्रयत्न करती हो ? ‘बाज पराये पाणि परि, तू पंछिन न मार’ की उक्ति पर जरा तुम भी विचार करो और इस पापरूप व्यवसाय को तिलांजलि दे दो।
उदयसिंह से कह दो, सूर्य पूर्व से पश्चिम में उग सकता है, अग्नि शीतल हो सकती है, पाषाण पर कमल जम सकता है, पृथ्वी पर जहाज चल सकते हैं, परन्तु सुशीला के हृदय का अधिकारी महामति जयदेव के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं हो सकता।
प्राण चले जावेंगे पर यह प्रतिज्ञा नहीं जावेगी, सदा स्थिर एक-स्वरूप रहेगी। साथ में यह भी कहे देती हूँ कि स्त्रियाँ स्वभावतः लज्जा शीला होती हैं, परन्तु तुम में यह गुण सर्वथा नहीं है, यह देख मुझे दुःख और ग्लानि होती है, इसलिये जाओ और अब मेरे सन्मुख नहीं आना।
दूती-(नखरे से) भला मुझ पर इतनी खफगई क्यों ? तुम्हारे मिलाने की कोशिश का मुझे यही इनाम मिलेगा ? मेरे सरीखा परोपकार का व्यापार करने वाला और दूसरा कौन है ! तुम जैसे हजार तरसते हुओं को मिलाना और प्रेम के सूत्र में बांधना जिसका पवित्र कर्म है, उसे बुरा व्यवसाय कौन कह सकता है ? मुझ से घृणा करना तुम्हारी गलती है। अस्तु ! अब यह कहो कि ये नाज नखरे दिखला-दिखला कर उन्हें कब तक तरसाओगी। बहुत तो हो चुका, अब जाने दो। परीक्षा हो चुकी। कहीं ऐसा न हो कि परीक्षा में बेचारों की जान पर आ बने। तुमने तो वही मसल कर रक्खी है कि मेंड़कों की जान जावे, लड़कों का खेल। तुम्हें विश्वास न हो, तो चलो, मैं चलके दिखला दूँ कि उदयसिंह तुम्हारे वियोग में कैसे कराह रहे हैं?
इतना कहकर दूती हाथ पकड़ के उठाने को अग्रसर हुई कि वह शांतिमूर्ति सुशीला क्रोध से कांप उठी। एकाएक सिंहनी सी गरज कर क्रोध स्फुरित कण्ठ से बोली-खबरदार पापिन! एक शब्द भी मर्यादा से बाहर उच्चारण करेगी तो जिह्वा खींच लूँगी। यदि कुशल चाहना है तो चुपचाप यहाँ से चली जा।
दूती बिल्कुल नहीं डरी, उल्टी सिर मटकाकर कहने लगी- ऊँह! बड़ी मर्यादा वाली हो कहीं वहाँ भी मर्यादा पकड़े न बैठी रहना। इतना कहा ही था कि सुशीला के नेत्रों से क्रोध की चिनगारियाँ निकलने लगीं। दिवाल पर लटकते हुए कोड़े को निकाल कर वह दूती देवी की पूजा करने लगी। दूती चिल्लाकर भागी तो भी दरवाजे तक जाते-जाते अच्छे ताजे-ताजे पच्चीस तीस कोड़ों से कम का प्रसाद नहीं चढ़ा। कोलाहल सुनकर चारों ओर से दासियाँ दौड़ आईं। देखा, तो दूती भागी जा रही है और सुशीला सुकुमार रौद्र रूप धारण किये खड़ी है।

नवां पर्व

आज सूर्यपुर में घर-घर गली-गली इस बात की चर्चा हो रही है कि तालाब के समीप बगीचे में एक बड़े महात्मा योगी ठहरे हुए हैं। वे पंचाग्नि तपते हैं, अधोमुख झूलते हैं, कंटकशय्या पर सोते हैं और केवल फलाहार करते हैं。

वे न किसी से कुछ याचना करते हैं और न किसी के यहाँ भोजन करते हैं। निरन्तर मौन धारण किये रहते हैं, परन्तु कभी-कभी किसी पर प्रसन्न होते हैं, तो एक दो बातें करते हैं, उनकी कृपा से सैकड़ों अन्धों को सूझने लगा है, सैकड़ों जन्म रोगी नीरोग हो गये हैं, पागल चतुर हो गये हैं, लंगड़े दौड़ने लगे हैं, बहरे सुनने लगे हैं और निर्धन धनी हो गये हैं। मारन, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन आदि सम्पूर्ण विद्याओं के वे पारगामी हैं। कहाँ तक कहें, जहाँ सुनिये वहाँ ही उनकी महिमा की एक नई बात सुनाई देती है। बालक, युवा, वृद्ध, पुरुष, स्त्रियाँ सब ही इसी कथा के प्रेमी बन रहे हैं。

जिस जगह योगी जी ठहरे हैं, वहाँ हजारों पुरुष स्त्रियों की भीड़ हो रही है। साधु महाशय झाड़ की डाली से उलटे लटके हुए धूम्रपान कर रहे हैं। एक चेला उनके पास ही हाथ जोड़े खड़ा है। दर्शकगण वंदना नमस्कारादि कर रहे हैं। दस-पन्द्रह अन्धे, लंगड़े, बहरे, धूनी के चारों तरफ जम रहे हैं, एक घन्टे के पश्चात् योगीजी झाड़ से उतरे।

लोगों ने जय जय शब्द करके उनका अभिवादन किया। पश्चात् एक-एक करके लोग प्रार्थना करने लगे और योगीजी धूनी में से थोड़ी थोड़ी भस्म उठाकर देने लगे। अन्धों से कहा-घी में घिसकर आंजो, लंगड़ों से कहा, पानी में घिसकर लेप करो, बहरों से कहा-पानी में घिसकर कान में डालो, सारांश यह कि सब प्रकार की आधि-व्याधियों पर योगीजी एक मात्र धूनी की राख देते थे। दूसरी ओर से अनेक पुरुष धन्य-धन्य जय-जय करते हुए आ रहे थे।

कोई कहता था, महाराज ! एक ही बार लगाने से मैं सूझता हो गया, कोई कहता था मेरे पैर अच्छे हो गये और कोई कहता था मेरा कुष्ट जाता रहा। इस तरह कोई कुछ और कोई कुछ कहते थे और आकर महात्मा के चरणों से लिपट जाते थे और दर्शकगण आश्चर्यान्वित होते हुए अपने-अपने घर जाते थे और उनके द्वारा आश्चर्यजनक प्रशंसा सुनके दूसरे दर्शक आते थे। इस तरह सारे दिन आवागमन जारी रहता था। योगीजी कभी धूनी पर बैठ के भस्म वितरण करते थे, कभी कंटकशय्या पर लेटते थे और कभी पंचाग्नि तपते थे।

योगीजी की कला को फैले महीने भर से ज्यादा हो गया। एक दिन उदयसिंह अपने दो चार मित्रों के साथ बैठा हुआ था, बलवन्तसिंह भी उपस्थित था, उनमें यहाँ वहाँ की गपोड़ेबाजी होते-होते इस विषय पर चरचा छिड़ी। बातों ही बातों में वशीकरण की बात चली। एक ने कहा अन्यान्य कलाओं की नाई इस विषय में भी योगी जी बड़े सिद्धहस्त हैं। अनेक लोगों को उनके वशीकरण से प्रत्यक्ष फल मिले हैं।

दूसरे ने कहा-उस दिन दो तीन पनिहारियों को देखो न उन्होंने धूल फेंककर कैसा मंत्र-मुग्ध कर दिया था कि घण्टों टकटकी बांधे हुए खड़ी रही थी। जब दूसरी धूल फेंकी थी, तब कहीं बेचारी वहाँ से टली थी। तीसरे ने कहा भाई ! उनकी सब बातें विचित्र होती हैं, सच तो यह है कि आज तक न कोई ऐसा महात्मा आया है और न आवेगा। क्यों उदयसिंहजी आपने तो उनके दर्शन किये ही होंगे ! उदयसिंह ने कहा- नहीं, अभी तक तो मैं वहाँ नहीं गया हूँ, परन्तु अब विचार है कि जरूर जाऊँगा। बल्कि बलवन्त सिंह यदि सम्मति देंगे तो आज ही जाके दर्शन करूँगा।

इसके पश्चात् सब लोग अपने-अपने घर चले गये और बलवन्तसिंह तथा उदयसिंह परस्पर सम्मति मिलाकर योगीराज के दर्शन के लिये गये। इन्हें दूर से आते देखकर चेलाराम ने जम्हाई लेते हुए कहा-निश्चय ही “उदय बलवान” है। योगीजी ने अभिप्राय समझ के मुस्करा दिया।

रात्रि का समय था। दस-पाँच आदमियों के सिवाय योगीराज के यहाँ अधिक भीड़ न थी। सो भी जब उदयसिंह ने एकान्त में कुछ प्रार्थना करने की इच्छा प्रगट की तब वे वहाँ से हटा दिये गये। जब उदय, बलवन्त, योगी और शिष्य के सिवाय वहाँ कोई न रहा, तब उदय ने अतिशय नम्र होकर वशीकरण मन्त्र की याचना की।

योगी-ओह! इस जरा से कार्य के लिये तूने इतना ढोंग फैलाया, उन लोगों को वृथा कष्ट दिया! सबके सामने इशारा करने में क्या हर्ज था। वशीकरण कोई बुरा कर्म नहीं है, जो इतना छुपाया जाय। यह तो प्रत्येक पुरुष के पास रहने योग्य विद्या है। अच्छा तो उसके पहले कि तुम्हें वशीकरण सिखलाया जावे हमको इस बात का विश्वास होना चाहिये कि तुम किसी उच्च कुल के पुरुष हो क्योंकि यह विद्या अपात्र या अयोग्य को नहीं दी जाती।

बलवन्तसिंह-महाराज! ये यहाँ के राजकुमार हैं, बड़े ही योग्य हैं, इनकी पात्रता के विषय में आप कुछ भी शंका न करें। यहाँ का प्रत्येक पुरुष इसकी साक्षी दे सकता है।

योगी-अच्छा! (झोरे में से एक पोटरी निकाल कर) यह थोड़ी सी धूप ले जाओ। इसे रविवार को रात्रि को 12 बजे के पश्चात् किसी निर्जन स्थान के मन्दिर में जलाओ, और पद्मासन से बैठकर (एक कागज पर लिखकर).

इस मंत्र को 1008 बार पढ़ो। अन्त में धूप के साथ ही इस कागज को जला दो। बस मन्त्र सिद्ध हो जावेगा। जिसकी ओर एक दृष्टि से तुम देख लोगे वह तुम्हारा चेला हो जावेगा पर बच्चा किसी बुरे कर्म में इसका उपयोग नहीं करना।

उदयसिंह-(हाथ जोड़ के) महाराज! आपकी आज्ञा के विरुद्ध कुछ नहीं होगा, परन्तु यह तो बतलाइये कि मंत्र सिद्ध करते समय इन्हें (बलवन्त को) पास रख सकूँगा या नहीं? और आपने शायद देखा होगा वह नदी के पास फूटा मन्दिर इस कार्य के योग्य है या नहीं?

योगी-मंत्र का जाप करते समय नहीं, परन्तु यदि तेरी इच्छा है तो धूप जलाते समय तक इसे पास रख सकता है। उस मन्दिर को हमने देखा है, बहुत अच्छा है। हम स्वयं वहाँ मंत्र सिद्ध करने को जाया करते हैं। अन्य स्थानों की अपेक्षा वहाँ सिद्धि भी शीघ्र होती है। अच्छा जाओ हम लोगों के ध्यान का समय हो गया है।

यह सुनकर दोनों मित्र प्रसन्नता से साष्टांग नमस्कार करके वहाँ से चले गये। उदयसिंह को उस रात खूब नींद आई।

दूसरे ही दिन रविवार था। आधी रात होते ही दोनों मित्र खुशी खुशी फूटे मन्दिर में जा पहुँचे; अग्नि साथ ही लिये गये थे; नदी में हाथ-मुँह धोकर शुद्ध वस्त्र परिधान करके उदयसिंह ने धूप जलाना प्रारम्भ किया जिससे थोड़ी ही देर में मंदिर का गर्भगृह धुएँ से परिपूर्ण हो गया, वह धुआँ खूब खुशबूदार था, इसलिये पहले तो अरुचि नहीं हुई, परन्तु पीछे उसके असर से दोनों के मस्तक घूमने लगे। उदयसिंह ने कहा न जाने क्यों मुझे स्मृति भ्रम सा होता जाता है। बलवन्त ने कहा-और मेरी भी यही दशा है।

इसके पश्चात् उदय कुछ कहना ही चाहता था कि बेहोश होकर गिर पड़ा और तब तक बलवन्त ने भी पैर फैला दिये। उन दोनों के गिरते ही मानों ताक ही में बैठे थे, इस तरह से दो मनुष्यों ने आकर उन्हें बांध लिया और एक एक की गठरी पीठ पर लाद दी। बाहर दो साधु भगवां वस्त्र पहने खड़े थे। उनसे गठरी वालों ने आकर कहा कहिये अब हम लोगों के लिये क्या आज्ञा है ?
एक साधु-जितनी जल्दी हो सके, तुम दोनों को सीधे विजयपुर ले जाओ और वहाँ इन्हें खूब बन्दोबस्त के साथ कैद करा दो।
एक मनुष्य-और आप लोगों के विषय में क्या कह दूँ ?
एक साधु-यही कि दूसरा कार्य सिद्ध करके शीघ्र ही आते हैं। बहुत करके कल ही अपनी माया समेट कर हम लोग यहाँ से चल देंगे।
इतनी बातचीत के पश्चात् वे दोनों पुरुष गठरी लादे हुए विजयपुर की ओर रवाना हो गये और दोनों साधु वहाँ से चलकर सीधे उदयसिंह के बंगले पर पहुँचे, परन्तु वहाँ जाकर जो कुछ सुना, उससे वे चकित स्तंभित हो गये। महल के दास, दासी, पहरेदार घबड़ाये हुए फिर रहे हैं और कह रहे हैं-“हाय ! सुशीला न जाने कहा लोप हो गई ?” सब लोगों की आँखों में धूल डालकर न जाने कहाँ अन्तर्धान हो गई।

              • पाठकों की उत्कण्ठा मिटाने के लिये यहाँ कह देना अनुचित न होगा कि ये दोनों साधु वही थे, जो कुछ दिनों पहले समुद्र के किनारे मल्लाहों के मेहमान बने थे और जिन्होंने सूर्यपुर में अपनी योगमाया फैलाकर लोगों को चकित स्तंभित कर दिया था।

इनमें से एक गुरुजी के वेष में है, विजयपुर के मंत्री का पुत्र बलदेवसिंह और दूसरा जो चेला बना हुआ है, सुशीला की प्यारी सखी रेवती है। ये दोनों ही सुशीला का पता लगाने के लिये घर से निकले थे। रास्ते में भेंट हो जाने से दोनों ने साथ रहकर पारस्परिक सहायता से अपने अभीष्ट को सिद्ध करने का निश्चय कर लिया था। मल्लाहों के आश्रम में उदयसिंह की चिट्ठी जो बलवन्तसिंह के लिये उसका एक सेवक लिये जा रहा था, चालाकी से बांचकर उन्होंने यह जान लिया था कि सुशीला अमुक स्थान पर रक्खी गई है। उदयसिंह उसे किसी ओर प्रकार से वश में करने के प्रयत्न में है, इसीलिये उन्होंने सूर्यपुर में अपनी योगमाया फैलाई थी। सो उसके प्रभाव से उन्होंने उदय और बलवन्त को कैद कर लिया, परन्तु सुशीला हाथ न आई।

योगलीला में जो नाना प्रकार के चमत्कार दिखलाये थे वे सब जाली थे। विजयपुर और बिलासपुर के जो जासूस सुशीला का पता लगाने को आये थे, वे ही नाना प्रकार का वेश धारण करके अन्धे, लंगड़े, बहरे बनकर आते थे और फिर भस्ममात्र से अपने को अच्छे हुए बतलाते थे। अनेक लोग ऐसे भी चारों ओर फैल गये थे, जो लोगों से मिलकर योगीराज की झूठी प्रशंसा करते थे। इसी विलक्षण चालाकी से बलदेवसिंह और रेवती ने सूर्यपुर को अन्धा बना दिया था, परन्तु अफसोस है कि जिस कार्य के लिये उन्होंने इतने सब आडम्बर किये थे, वह सिद्ध न हुआ। सुशीला फिर लापता हो गई।