बीसवां पर्व
बिलासपुर के राजभवन के समीप ही एक कन्या पाठशाला की इमारत है। यह इमारत यद्यपि बहुत बड़ी नहीं है, परन्तु देखने में बड़ी सुडौल और साफ है। इसके चारों तरफ एक सुन्दर बगीचा लगा हुआ है, जिसमें नानाप्रकार के सुगन्ध युक्त पुष्प खिल रहे हैं। यह बगीचा एक परकोटे से घिरा हुआ है। भीतर जाने के लिये परकोटे में एक द्वार है, वहाँ पर निरन्तर दो पहरेदारों का पहरा रहता है। द्वार में से भीतर जाते ही पाठशाला का मुख्य द्वार मिलता है। वहाँ पर एक षट्कोणा कृति चबूतरा बना हुआ है, जिसके बीचोंबीच एक संगमरमर के पत्थर पर बड़े-बड़े और सुन्दर अक्षरों में यह लेख खुदा हुआ है।
।। नमः सरस्वत्यै ।।।
श्री सरस्वती पाठशाला
बिलासपुर के स्वामी महाराजाधिराज 108 विक्रमसिंह जी की बुद्धिमती पुत्री सरस्वती (सुशीला) ने कुलीन कन्याओं और स्त्रियों के पठन-पाठन के लिये और उन्हें विद्या के आभूषण से यथार्थ में सुन्दर बनाने के लिये इस पाठशाला की स्थापना की है। बिलासपुर राज्य का जब तक संसार में अस्तित्व रहेगा, तब तक यह पाठशाला श्रीजैनशासन के प्रसाद से परिचालित रहेगी।
श्रीरस्तु। शुभम्भूयात् ।
कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा।
पाठशाला में प्रवेश करते ही पहले मुख्य अध्यापिका की कक्षा मिलती है। इस कक्षा का कमरा बड़ी सुन्दरता से सजाया हुआ है। सब प्रकार की मनोहर आरायश के अतिरिक्त इसकी दीवालों पर जो चित्र खिंचे हुए हैं, वे स्त्रियों के चित्तों पर एक विचित्र ही प्रकार का असर करते हैं। सीता, मनोरमा, गुणमाला, द्रोपदी, अन्जना, सुन्दरी आदि पतिव्रता स्त्रियों के चित्र चित्रकार ने इस खूबी से चित्रित किये हैं कि उनके दर्शनमात्र से उन पवित्रा पावना दिव्याङ्गनाओं का पूरा चरित्र सम्मुख होकर नृत्य करने लगता है।
नराधम रावण का वह अनुनय और पूजनीय सीता की वह घृणायुक्त फटकार जो सामने के चित्र में झलक रही है, किस स्त्री के चरित्र को आदर्श न बनावेगी! नृकीट कीचक के पैशाचिक कृत्य का प्रतिफल और द्रोपदी के उस प्रातः स्मरणीय शील की रक्षा किसे दुष्कृत्यों से पराङ्मुख और सत्कार्यों के सम्मुख न करेगी? अहा, हा! मनोरमा का वह वैजयन्ती नगरी के फाटक खोलने का दृश्य कैसा शिक्षाप्रद है। मनोरमा के पातिव्रत की वे दुःसह प्रभायें जो उसके मुखमण्डल पर प्रस्फुटित हो रही हैं और नगर की सहस्रावधि स्त्रियों की पापपूर्ण मलीन मुद्रायें जो श्रेणीबद्ध दिखाई दे रही हैं, एक बार ही चित्त को पतिव्रत-भक्त और दुश्चरित्र त्यागी बना देती है। प्रत्येक चित्र के नीचे चित्र के कथा विषय का संक्षिप्त रीति से उल्लेख किया गया है, उससे चित्र का भाव समझने में बड़ी सहायता मिलती है। चित्रों के ऊपर जो स्थान अवशेष है, उनमें सैकड़ों स्त्रियोपयोगी शिक्षायें लिखी हैं।
कहा जा सकता है कि इस पाठशाला में अन्य कुछ न पढ़कर केवल उन शिक्षाओं को हृदय में धारण कर लेने से ही प्रत्येक कन्या और स्त्री सुयोग्य गृहिणी बन सकती है। अपने पाठक और पाठिकाओं की प्रसन्नता के लिये उन शिक्षाओं के कुछ वाक्य यहाँ उद्धृत किये जाते हैं-
1-संसार में समाज रूपी शकट ( गाड़ी ) सुनियन्त्रित पद्धति से तब ही चल सकता है, जब उसके पुरुष और स्त्री रूपी दोनों चक्र एक सरीखे सुदृढ़ और सदाचारी होवें।
2-जैसे पुरुष का विद्वान होना आवश्यक है, उसीप्रकार किंबहुना उससे भी अधिक स्त्री का विदुषी होना आवश्यक है। क्योंकि स्त्री पुरुष की जननी है। विदुषी माता का पुत्र अवश्य ही विद्वान् होता है।
3-बालकों में अनुकरण करने की शक्ति बहुत तीव्र होती है। विदुषी माता का पुत्र अपनी माता के सम्पूर्ण सद्गुणों का अनुकरण करके जगत्मान्य हो जाता है।
4-गृह ( घर ) वही है, जिसमें सदाचारिणी और विदुषी गृहिणी ( घर वाली ) हो, काष्ठ मिट्टी के ढेर को गृह नहीं कहते हैं।
5-स्त्री की शोभा पतिव्रत है और उस पतिव्रत की सच्ची पालना तब तक नहीं हो सकती, जब तक कि वह सुशिक्षिता विद्यावती न हो, अतएव पतिव्रत धर्म से सुशोभित होने के लिये स्त्री का विद्या पढ़ना मुख्य कर्तव्य है।
6-शीलरत्न को जो स्त्री अपने हृदय में धारण किये है, उसे संसार के अन्य चमकते हुए रत्नों के आभूषणों की आवश्यकता नहीं है।
7-उस रति-रंभा के रूप को जीतने वाली स्त्री से जो कि पर पुरुषरत है, वह कुरूपिनी, दरिद्रा, भिखारिणी हजार गुणी अच्छी है, जो कि अपने पति को ही अपना सर्वस्व समझती है।
8-विचार दृष्टि से देखा जावे तो स्त्री के लिये पति सेवा के अतिरिक्त और कोई व्रत उपवासादि महत्फलप्रद नहीं है, जो स्त्री पतिव्रता है, उसके सम्पूर्ण व्रतों का पालन स्वयं हो जाता है, परन्तु जो दुराचारिणी है, वह नाना व्रत उपवास करती हुई भी दुर्गति की पात्र होती है।
9-स्त्री का परम सुन्दर आभूषण लज्जा है।
10-सदाचारिणी स्त्रियाँ स्वतन्त्रता का तिरस्कार करती हैं। वे बालपन में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धकाल में पुत्रों के आधीन ही रहती हैं। वह परतन्त्र स्त्रियों के शील रक्षा का अजेय किला है।
11-स्त्री को एक शरीर से दो जन्म धारण करने पड़ते हैं। जिस दिन पति के घर में प्रवेश होता है, स्त्री के द्वितीय जन्म का वही पहला दिन है। पहले जन्म की शिक्षा दूसरे जन्म में उसे सुखी और यशस्वी बनाती है। दूसरा जन्म बड़ी सावधानी से अतिवाहित करना चाहिये।
12-अपने पति के प्रत्येक कार्य में जो मंत्री का काम देती है, सेवा करने में जो दासी के समान है, भोजन कराने में माता का भाव धारण करती है। शय्या में जो रम्भा के तुल्य सुखदायिनी है। पृथ्वी के समान जिसमें क्षमा है और जो सम्पूर्ण गृह को धर्म-मार्ग पर चलाती है वही स्त्री-स्त्री है।
13-पति के प्रत्येक आचार, विचार और शरीर की व्यवस्था जो सहस्र नेत्रों से देखती है परन्तु पर पति की ओर देखने में जो नेत्रशक्ति हीन है, वही स्त्री सुदृशी है।
14-स्त्रियों के नष्ट होने के सात द्वार हैं। पिता के घर स्वतन्त्रता से रहना, मेलों में जाना, परपुरुषों के साथ वार्तालाप का सम्बन्ध रखना, पति का निरन्तर विदेश में रहना, पुंश्चली संवति रखना, अक्षरशत्रु रहना और पति का बुढ़ापा।
15-द्रोपदी, सीता, अंजनासुन्दरी, मनोरमा, सुलोचना आदि जितनी पुराण प्रसिद्ध सच्चरित्र स्त्रियाँ हुई हैं, वे पढ़ी-लिखी पंडिता थीं, अतएव कहा जा सकता है कि स्त्रियों को सच्चरित्र बनाने में निर्मल विद्या एक कारण है।
16-जब तक स्त्रियाँ शास्त्र विहित श्रावक कर्मों को अर्थात् गृहस्थ के आचार-विचारों में दक्ष नहीं होगी, तब तक पुरुष अपने धर्म को भलीभाँति रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकते।
17-स्त्रियाँ स्वभावतः पंडिता होती हैं। उनके कोमल कमनीय हृदय पर सद्विद्या बहुत शीघ्र अपना अधिकार जमा लेती है। स्त्रियों को धर्म-शिक्षा देना गृहस्थ धर्म का जीवन है।
18-स्त्री का अपने धर्म से एक बार ही पतित होना असह्य, अक्षम्य और कुल विप्लवकर है, इसलिये उसे अपने धर्म में स्थिर रहने के लिये अपने प्राणों से भी अधिक सचेत रहना चाहिये।
19-क्षण भर के सुख के लिए कामांध होकर जो स्त्रियाँ पतित हो जाती हैं, वे अपने को अपने हाथ से एक बड़े भारी भयानक समुद्र में पटक देती हैं। नरकों के घोर दुःखों में उन्हें अनेक सागर पड़े-पड़े विलविलाना पड़ता है।
20-स्त्री की पर्याय स्वभाव से ही निंद्य और पामर कही जाती है, परन्तु वह तद्विद्या, सदाचार और सुशीलता से जगद्वन्द्य और परम पवित्र भी मानी गई है। पुराण प्रसिद्ध स्त्रियों का लोग आज आदर दृष्टि से नामोच्चारण करते हैं।
मुख्य कक्षा के कमरे में जो कुछ सजावट है, वह इतनी अच्छी और अधिक है कि उसका वर्णन जितना किया जावे किसी प्रकार अरुचिकर नहीं हो सकता, परन्तु हमारी दृष्टि पर इन शिक्षाओं और सुन्दर दृश्यों के आगे वह सजावट कुछ प्रभाव न जमा सकी।
इस कमरे को अतिवाहित करके आगे चलने से एक प्रदर्शनी का कमरा मिलता है, जिसे देखते ही आँखें ठण्डी हो जाती हैं। स्त्रियों के हाथ से बनाये हुए नानाप्रकार के खिलौने, उनके वस्त्र, चित्रकारी के नमूने यथास्थान रक्खे हुए हैं। स्थान-स्थान पर सुन्दर दर्शनीय वर्णमाला-संगठित हाथ में लिखी हुई पोथियाँ रक्खी हुई हैं, ये पोथियाँ भी विद्यार्थिनीं बालागणों की लिखी हुई हैं और उनमें विशेषतः पुराण प्रसिद्ध पतिव्रता स्त्रियों के चरित्र लिखे गये हैं। जिन बालाओं ने अपनी लेखनकला में पारितोषिक प्राप्त किया है, यहाँ उन्हीं को पोथियों में स्थान मिला है। एक पोथी के मुखपृष्ठ पर लिखे हुए थोड़े से वाक्य हमको बहुत प्यारे लगे।
“स्त्री से जगत्पूज्य सर्वज्ञदेव उत्पन्न होते हैं। सर्वज्ञदेव तीर्थंकर से मोक्षमार्ग का प्रकाशक परम हितकारी शास्त्र उत्पन्न होता है। शास्त्र से संसार के पाप-समूह नष्ट होते हैं और पापों के नाश होने से बाधा रहित सुख की प्राप्ति होती है। इसप्रकार परम्परागत मोक्ष-सुख को देने वाली सदाचारिणी कुलीन स्त्री को पवित्र जान के सज्जन स्वीकार करते हैं।”
प्रदर्शनी के कमरे के आगे एक कमरा पाक-विधि (रसोई) और सामान्यतः कुटुम्बोपयोगी वैद्यक और धात्रीविद्या सिखलाने का है। यहाँ केवल वे स्त्रियाँ शिक्षा पाती हैं, जो प्रौढ़ वय की तथा अनुभवशीला हैं।
इसके आगे अन्य भागों में शेष कक्षायें हैं, जिनमें उत्तीर्ण होकर कन्या स्त्रियाँ उपर्युक्त मुख्य कक्षा में प्रवेश करती हैं। प्रत्येक कक्षा में एक-एक अध्यापिका है। अध्यापिकाओं में कुछ तो कुलीन घरों की प्रौढ़वयस्का स्त्रियाँ हैं, जो नियत समय के लिये परोपकार बुद्धि से पढ़ाने को आती हैं और कुछ ब्रह्मचारिणी साध्वी स्त्रियाँ हैं, जो आर्यिका धर्म स्वीकार करने के सन्मुख हैं।
सुशीला इस पाठशाला की मुख्य कक्षा में पढ़ती है और समय मिलने पर अन्य कक्षाओं की कन्याओं को पढ़ाती भी है। दिन-रात उसका ध्यान इसी पाठशाला की वृद्धि की ओर रहता है। पठन-पाठन के अतिरिक्त उसकी स्फटिक तुल्य निर्मल बुद्धि में अब लों किसी भी दूसरे रंग की परछाई नहीं पड़ी है। लोग कहते हैं, यह कोई देव कन्या है।