सुशीला उपन्यास (पं. गोपालदास बरैया) | Sushila Upanyas (Pt. Gopaldas Baraiya)

सुशीला उपन्यास

सहयोगी :

  1. सौरभ जैन पिताश्री प्रशांत जैन, वर्द्धमान कुंज न्यू मार्केट, भोपाल
  2. पायल वाला ज्वेलर्स, छिंदवाड़ा

सुशीला उपन्यास
पं. गोपालदास जी बरैया

प्रकाशक :
श्री वर्द्धमान न्यास (पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट)
अमायन, भिण्ड (म.प्र.)-477227
मो. 9826225580

संस्करण : 2026


न्यौछावर राशि : 50/-


Sushila Upanyas
Pandit Gopal Das Ji Baraiya

Published by :
Vardhman Nyas
Amayan, Bhind (M.P.)

Edition : 2026
Price : Rs. 50/-

प्रकाशकीय

शील दुर्गति के दुःख को हरने वाला है, व्रत, तप, संयम का जीवन है। शील बिना तप करना, व्रत धारण करना, संयम पालना मृतक के शरीर समान देखने मात्र का है, कार्यकारी नहीं है।

शीलवती सुशीला का जीवन एवं जयदेव का शील आदर्श दम्पति वर्तमान परिपेक्ष्य में अनुकरणीय है।

मोबाइल / इंटर नेट / फेस बुक जो सदुपयोग से अधिक विकृति का निमित्त बना हुआ है। क्षयोपशम वृद्धि के साधन दिखने पर भी विशुद्धि के घातक हैं।

उपन्यास रचनाकार पं. गोपालदास जी बरैया एक गृहस्थ विद्वान थे। जिनका जीवन ईमानदारी, सहनशीलता, नैतिकता, शील-सदाचार का पर्यायवाची रहा। मात्र वाणी, कलम से ही नहीं अपितु नीति और धर्म का जीवंत उदाहरण जीवन से प्रस्तुत किया। स्थान-स्थान पर इस चर्चा का उल्लेख इस कृति में है।

रामकुमारी-हीरालाल में यद्यपि माँ-पुत्र का सम्बन्ध होने पर भी समवयस्क होने से पतन की हद पार कर दी। घृत-अग्नि का उदाहरण देकर आचार्यों ने शील संरक्षण के लिए नव बाढ़ बताई, आज के समय में इसकी महत्ता विशेष है।

पर नारी पैनीछुरी, तीन ठौर सों खाय।
धन छीने, यौवन हरे, मरे नरक ले जाय।।

कुसंग का दण्ड, अपयश व युक्ति द्वारा सुरक्षा प्रदान कर, संसार भोगों का विचार कर पुत्र हीरालाल का व्यामोह तज संपत्ति के सदुपयोग निमित्त वसीयतनामा जयदेव के नाम लिख जौहरी रतनचंद विरक्ति के पथ पर बढ़ गये।

यह कथानक वर्तमान पीढ़ी को शील, सदाचार की प्रेरणा देकर जैन तत्त्वज्ञान में एक नई दिशा देगा। अब तक के सभी प्रकाशन, लेखक के मनोभाव-तत्त्वज्ञान से विभूषित नवीन पीढ़ी का उदय व संस्कारों की पाठशाला जीवंत रहे, निर्बाध रख इस प्रयास को गति दी है, उनका यह उत्तरदायित्व वर्तमान पीढ़ी को सत्पथ की दिशा आलोकित करे।

इसी भावना से ‘सुशीला उपन्यास’ प्रस्तुत है। सभी सहयोगियों का हृदय से आभारी हूँ।

-अखिल जैन
मंत्री, श्री वर्द्धमान न्यास, अमायन, भिण्ड (म.प्र.)

भूमिका

यह ‘सुशीला उपन्यास’ है । इसकी रचना गुरुणांगुरु पंडित गोपालदासजी बरैया ने आज से लगभग 120 वर्ष पूर्व की थी । यह अपने समय का एक अत्यधिक लोकप्रिय उपन्यास है । इसने अपने समय में लाखों लोगों को प्रभावित किया है । आज के शब्दों में कहें तो यह उस समय की ‘बेस्ट सेलर बुक’ है । इस पुस्तक में आधुनिक उपन्यास की कथात्मक शैली का सहारा लेकर बड़े ही रोचक ढंग से जैन तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया गया है । विशेषकर शील, संयम, सदाचार की महिमा को उजागर किया गया है ।

यह उपन्यास पूजनीय बड़े पंडितजी ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’ को बहुत अधिक प्रिय था। वे यदा-कदा इसका संदर्भ देते ही रहते थे और सभी को इसे पढ़ने की मार्मिक प्रेरणा भी देते थे तथा यह भी कहते थे कि इसी तरह की पुस्तकें वर्तमान में भी और लिखनी चाहिए ताकि लोग शील, संयम आदि उत्तम गुणों का महत्त्व समझें । वर्तमान काल में ऐसी पुस्तकों की विशेष आवश्यकता है, क्योंकि आज लोग इसे भूलकर विषय-भोगों में डूबते जा रहे हैं ।

पूजनीय पंडितजी की भावना के अनुरूप आज पुनः इस ग्रंथ का प्रकाशन किया जा रहा है । आशा है कि सभी लोग इस ग्रंथ का अध्ययन करेंगे और इसके द्वारा शील, संयम, सदाचार आदि उत्तम गुणों में स्वयं को और साथ में पर को भी दृढ़तापूर्वक स्थापित करेंगे।

इस ग्रंथ के लेखक पंडित गोपालदासजी बरैया बहुत बड़े विद्वान थे । उनका जन्म सन् 1866 में आगरा में हुआ था और सन् 1917 में 51 वर्ष की अल्पायु में ही देहांत भी हो गया था, परन्तु इतनी अल्पायु में भी उन्होंने न्याय, व्याकरण, दर्शन, अध्यात्म आदि विविध विषयों का गहरा अभ्यास किया था । उन्होंने मुंबई, मुरैना आदि अनेक स्थानों पर जैन विद्यालयों की स्थापना की थी जिनमें अनेकानेक धुरंधर विद्वान तैयार हुए । उनकी परिस्थितियाँ बड़ी प्रतिकूल थीं, फिर भी वे शांत भाव से नियमित स्वाध्याय आदि करते थे । उनकी तीन कृतियाँ बड़ी महत्त्वपूर्ण हैं-जैन सिद्धांत प्रवेशिका, जैन सिद्धांत दर्पण और सुशीला उपन्यास।

ऐसे परमविद्वान पण्डितजी को मैं विनम्र प्रणाम करता हूँ। आदरणीय बड़े पंडितजी का भी मेरे ऊपर विशेष उपकार है, इसलिए उन्हें भी हार्दिक प्रणाम करता हूँ और इस उपन्यास को प्रकाशित करने के लिए ‘श्री वर्द्धमान ट्रस्ट, अमायन’ को हृदय से धन्यवाद देता हूँ। इस ग्रंथ के अध्ययन से सबका मंगल हो, यही मेरी भावना है। यदि कुछ लोग भी इस ग्रंथ के अध्ययन से निम्नलिखित श्लोक के भाव को जीवन में उतार लेंगे तो यह प्रकाशन सार्थक हो जाएगा-

मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति स पण्डितः।।

अर्थ-जो परस्त्री को माता के समान, पर द्रव्य (पर धन) को लोष्ठ (मिट्टी के ढेले) के समान और सर्व प्राणियों को अपने समान समझता है, वही सच्चा पंडित (समझदार व्यक्ति) है ।

-प्रो. वीरसागर जैन, दिल्ली

प्रस्तावना

जहाँ तक उपन्यास का प्रश्न है सुशीला उपन्यास अपनी रीति नीतियों के आधार पर सही उतरा है। लेखक पंडित गोपालदासजी बरैया ने जनसाधारण की रुचि के अनुरूप ही इसे रचा है। वे मानव प्रकृति के सच्चे अध्येता एवं परीक्षक थे। उन्होंने पताशे में कुनैन देने जैसी बात सोची और कथा साहित्य के माध्यम से जैन धर्म एवं दर्शन के मुद्दों को पाठकों के समक्ष रखा।

यद्यपि जैन साहित्य के मर्मज्ञ, सिद्धान्त के प्रणेता बरैया जी को उपन्यास जैसी हल्की रचना शोभा नहीं देती किन्तु फिर भी दृष्टिकोण उत्तम होने से जन साधारण के हित के लिये रची गई यह रचना उत्तम कही जा सकती है। कथा एक शीलवान महिला की और शीलवान पुरुष की है जिन्होंने कि कुशील पर विजय पाई है। शील के महत्व को उभारने के लिए उसके विपक्षी कुशील पात्रों को घसीटा गया है ताकि पाठकों की अभिरुचि कुशील से हटकर शील में आरूढ़ हो।

मूलभूत उपन्यास को हम चार भागों में बाँट सकते हैं। 1. कथाभाग, 2. धार्मिक चर्चा, 3. प्राकृतिक दृश्य और 4. चरित्र-चित्रण।

कथा भाग में सात प्रमुख पात्र हैं। जयदेव, भूपसिंह, उदयसिंह, बलवन्तसिंह, हीरालाल, रामकुमारी और सुशीला। शेष पात्र इन्हीं के सहायक हैं। रतनचन्द जौहरी रामकुमारी का पति और हीरालाल का पिता है। रामकुमारी हीरालाल की विमाता है। भूपसिंह जयदेव का मित्र और सुशीला जयदेव की पत्नी है। उदयसिंह सुशीला का इच्छुक और बलवन्तसिंह उदयसिंह का मित्र है।

सुशीला शीलवान जयदेव की शीलवती पत्नी है। उदयसिंह बलवन्तसिंह की सहायता से इसे पाना चाहता है। इसी कारण उसने भूपसिंह सहित जयदेव और सुशीला को समुद्र में डुबो दिया है, किन्तु शील के प्रताप से वे सब बच गये हैं। उदयसिंह एवं बलवन्तसिंह को अपने किये का फल मिल गया है।

दूसरे कुशील पात्र हीरालाल और रामकुमारी हैं जो परस्पर सौतेली माँ और सौतेले पुत्र का सम्बन्ध रखते हैं। रतनचंद रामकुमारी का पति दूजवर है, उम्र में बड़ा है। सौत का पुत्र हीरालाल उससे कम उम्र का है, अतः दोनों में वासनामय प्रेम जाग्रत हो उठता है। लेखक ने इसी कुशील का दण्ड अपनी चातुरीपूर्ण रचना द्वारा दिलाया है। जौहरी रतनचन्द का वैराग्य इसी घटना के साक्षात् देखने से हुआ है। सारा उपन्यास हीरालाल रामकुमारी के कुशील की निन्दा, उदयसिंह, बलवन्तसिंह के दुष्कृत्यों का फल तथा जयदेव, भूपसिंह और सुशीला के साहस, धैर्य एवं शील की प्रशंसा से भरा पड़ा है।

2. धार्मिक चर्चा-

इस विषय में पंडितजी ने गागर में सागर भरा है। छोटे से उपन्यास में गुणस्थान, जीवसमास, आठ कर्म, सप्ततत्त्व, नौ पदार्थ, रत्नत्रय धर्म, दशलक्षण धर्म, स्वर्ग, नरक, गति, अगति, स्वर्ग, मोक्ष आदि सारे ही जैन धर्म के मूलभूत विषयों की चर्चा की है। कहना न होगा पंडितजी का मूल उद्देश्य भी इसी धार्मिक चर्चा के जन-साधारण तक पहुँचाना था। वे जानते थे कि व्यक्ति रागानुरागवृत्ति वाला है, धार्मिक चर्चा इसी वृत्ति द्वारा ग्रहण कर सकता है, अतः उन्होंने इसी को उसका माध्यम बनाया।

3. प्रकृति चित्रण -

पंडितजी प्रकृति के प्रेमी थे। उन्होंने इसी का परिचय अपने उपन्यास में दिया। नदी, सरोवर, संध्या, रात्रि, वर्षा ऋतु, शरद ऋतु, पशु, पक्षी, वन, उपवन आदि सभी का वर्णन शास्त्रोक्त विधि तथा साहित्यिक ढंग से किया।

4. चरित्र-चित्रण -

चरित्र-चित्रण भी औपन्यासिक शैली का ही बन पड़ा है। स्त्री पात्रों के चरित्र-चित्रण उनके स्वभावानुरूप और पुरुष पात्रों के चरित्र उनके अनुरूप बन पड़े हैं। शीलवान का स्वभाव और कुशीलवान का स्वभाव जैसा होना चाहिए, किया गया है। राजा को, सेठ को तथा सैनिक को जैसा होना चाहिए, चित्रित किया है।

भाषा एवं शैली

पंडितजी की भाषा संस्कृत मिश्रित हिन्दी है। मध्य प्रदेश के होने के नाते उर्दू व देशज शब्द भी काफी मात्रा में पाये जाते हैं। मुहावरों का प्रयोग भी खूब मिलता है। संस्कृत के श्लोक और हिन्दी की कहावतें उपन्यास के प्राण हैं। नीति की बातें तथा उपदेशी उदाहरण भी काफी मात्रा में पाये जाते हैं।

शैली नाटकीय कथोपकथन लिये हुए है। छोटे-छोटे वाक्य प्रश्नोत्तर ढंग से लिखे गये हैं ताकि पाठक का मन लगा रहे और ऊबे नहीं।

5. उपसंहार -

उपन्यास को तात्विक दृष्टि से और धार्मिक दृष्टि से देखने पर ज्ञात होता है कि यह लेखक की सफल कृति है, उनकी धार्मिक अनुराग, साहित्य की सेवा और जिनवाणी का प्रचार एवं प्रसार में अभिरुचि सराहनीय है।

हमें कुशील से मुख मोड़ कर शील की ओर अग्रसर होना चाहिए, यही इस कृति का सदुपयोग है। मेरी पाठकों से यही विनय है कि वे हंस की भांति अपनी प्रकृति बनावें, दुग्ध को ग्रहण करें, पानी को छोड़ दें।

इति शुभम्

मंगलाचरण

सकल व्रतनि में अग्रसर, सकल कर्म क्षयकार।
सकल निकल जासों भये नमों शील शिवद्वार।।

विषय-अनुक्रमणिका

क्र. भाग विषय
1 पूर्वार्द्ध प्रथम पर्व
2 पूर्वार्द्ध द्वितीय पर्व
3 पूर्वार्द्ध तृतीय पर्व
4 पूर्वार्द्ध चतुर्थ पर्व
5 पूर्वार्द्ध पंचम पर्व
6 पूर्वार्द्ध षष्ठ पर्व
7 पूर्वार्द्ध सप्तम पर्व
8 पूर्वार्द्ध अष्टम पर्व
9 पूर्वार्द्ध नवम पर्व
10 पूर्वार्द्ध दशम पर्व
11 पूर्वार्द्ध ग्यारहवां पर्व
12 पूर्वार्द्ध द्वादशवां पर्व
13 पूर्वार्द्ध त्रयोदशवां पर्व
14 पूर्वार्द्ध चौदहवां पर्व
15 पूर्वार्द्ध पन्द्रहवां पर्व
16 पूर्वार्द्ध सोलहवां पर्व
17 पूर्वार्द्ध सत्रहवां पर्व
18 पूर्वार्द्ध अठारहवां पर्व
19 पूर्वार्द्ध उन्नीसवां पर्व
20 पूर्वार्द्ध बीसवां पर्व
21 पूर्वार्द्ध इक्कीसवां पर्व
22 पूर्वार्द्ध बाईसवां पर्व
23 पूर्वार्द्ध तेईसवां पर्व
24 पूर्वार्द्ध चौबीसवां पर्व
25 पूर्वार्द्ध पच्चीसवां पर्व
26 पूर्वार्द्ध छब्बीसवां पर्व
27 पूर्वार्द्ध सत्ताईसवां पर्व
28 पूर्वार्द्ध अट्ठाईसवां पर्व
29 पूर्वार्द्ध उनतीसवां पर्व
30 पूर्वार्द्ध तीसवां पर्व
31 उत्तरार्द्ध उत्तरार्द्ध
32 उत्तरार्द्ध दूसरा पर्व
33 उत्तरार्द्ध तीसरा पर्व
34 उत्तरार्द्ध चौथा पर्व
35 उत्तरार्द्ध पांचवां पर्व
36 उत्तरार्द्ध छट्ठा पर्व
37 उत्तरार्द्ध सातवां पर्व
38 उत्तरार्द्ध आठवां पर्व
39 उत्तरार्द्ध नवां पर्व
40 उत्तरार्द्ध दसवां पर्व
41 उत्तरार्द्ध ग्यारहवां पर्व
42 उत्तरार्द्ध बारहवां पर्व
43 उत्तरार्द्ध तेरहवां पर्व
44 उत्तरार्द्ध चौदहवां पर्व
45 उत्तरार्द्ध पंद्रहवां पर्व
46 उत्तरार्द्ध सोलहवां पर्व
47 उत्तरार्द्ध सत्रहवां पर्व
48 उत्तरार्द्ध अठारहवां पर्व
49 उत्तरार्द्ध उन्नीसवां पर्व
50 उत्तरार्द्ध बीसवां पर्व
51 उत्तरार्द्ध इक्कीसवां पर्व
52 परिशिष्ट

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प्रथम पर्व

अर्द्धरात्रि का समय है, चारों तरफ सन्नाटा छा रहा है। पूर्णमासी का चन्द्रमा पूर्ण रूप से आकाश के मध्यभाग में तिष्ठ अपनी किरणों से समुद्र को क्षोभित कर रहा है। कभी समुद्र की लहरें किसी चट्टान से टकरा कर तूफान की आशंका उत्पन्न कर देती हैं और कभी जलचर जीव पानी में से अपना भयानक मुख निकाल ऐसा भाव दिखाते हैं, मानों हाथ से निकली हुई शिकार की खोज में व्यग्र हो रहे हैं। देखते-देखते पूर्व की ओर से एक घनघोर काली घटा ने धीरे-धीरे बढ़कर चन्द्रमा को ढक लिया। सर्व जगत अन्धकारमय भासने लगा। मेघराज घोर रूप से गरजने लगे और इस श्यामवर्ण रूप विश्वव्यापी अन्धकार में कभी-कभी चपला अपने चंचल चमत्कार की विचित्र छटा दिखाने लगी।

ऐसे समय में समुद्र के बीच में एक छोटा-सा जहाज अपनी मन्द गति से गमन कर रहा है, जिसमें एक स्त्री और दो पुरुष तो प्रधान हैं, बाकी चार-पाँच सेवक तथा आठ-दस मल्लाह हैं, जो बारी-बारी से जहाज को खे रहे हैं। थोड़ी देर में पवन ने जोर पकड़ा और समुद्र की लहरों के झकोरों से जहाज डगमगाने लगा और धीरे-धीरे जहाज में पानी भरने लगा। इतने में एक छोटे-से चट्टान से टकरा कर जहाज फट गया और उसके डूबने में अब कुछ सन्देह नहीं रहा।

मल्लाहों ने बड़ी फुर्ती के साथ एक छोटी-सी डोंगी में उस स्त्री को बिठाया और जल्दी-जल्दी खे कर डोंगी को एक तरफ को चलाना शुरु किया। इतने में जहाज डूब गया और सब मनुष्य पानी में गोते खाने लगे।

इन तीन प्रधान व्यक्तियों में से एक पुरुष का नाम जयदेव, दूसरे का नाम भूपसिंह और स्त्री का नाम सुशीला था। जयदेव सुशीला का पति और भूपसिंह जयदेव का मित्र था। जयदेव की अवस्था अनुमान बीस वर्ष के और भूपसिंह की पच्चीस वर्ष के होगी।

सुशीला अभी नवयौवना है। उसकी अवस्था लगभग पन्द्रह व सोलह वर्ष के होगी। नागिन के समान काले केशों की लट मुख के ऊपर छिटक रही है, जिसको देखकर चन्द्रमा भी लज्जित हो जाता है। मृगों के समान चंचल नेत्रों की शोभा ही निराली है।

कुच कलशों की शोभा देखकर चक्रवाकयुगल शरमा जाता है। उदर की त्रिवली त्रिवेणी की शोभा को धारण कर रही है। केले के स्तम्भ समान जंघा वाली, गजगामिनी, कोमलांगी, पिकबयनी, उस अबला को एक डोंगी में बिठाकर कितने ही मल्लाह किनारे की तरफ ले चले। मार्ग में सुशीला मल्लाहों से पूछती है कि जयदेव और भूपसिंह कहाँ हैं? तब मल्लाह कह देते हैं कि पीछे से दूसरी डोंगी में आ रहे हैं।

मल्लाहों के वचन को सुनकर कुछ देर के वास्ते सुशीला आश्वासन पाकर फिर पीछे को देखती है, परन्तु अपने साथियों के आगमन चिह्न न देखकर फिर व्याकुल-चित्त हो जाती है।

इस तरह नाना विकल्प जालों में उलझती हुई, कभी नेत्रों से अश्रुधारा बहाती है और कभी अपने साथियों के शीघ्र आ पहुँचने की आशा से धैर्य धारण कर लेती है। डोंगी बड़े वेग से चली जा रही है। सबेरा होते-होते समुद्र के एक तट के निकट जाकर ठहर गई। तब मल्लाहों ने सुशीला को डोंगी से उतार कर एक म्याने में बिठाया और दरवाजा बन्द करके उसे रवाना किया। यह सब व्यवस्था को देखकर सुशीला भयचकित हो पूछने लगी-यह म्याना कहाँ जाता है? और हमारे साथी कहाँ हैं? परन्तु सुशीला को इन प्रश्नों का कुछ भी उत्तर नहीं मिला। धीरे-धीरे सुशीला का कोमल चित्त भय से कम्पायमान होने लगा। अश्रुधारा की झड़ी से सब वस्त्र भींग गये। निदान एक दीर्घ उश्वास लेकर हाय जयदेव!

कहती हुई सुशीला मूर्च्छित हो गई। थोड़ी देर में म्याने के झरोखों में आती हुई ठण्डी हवा के लगने से होश में आई, फिर भी जयदेव और भूपसिंह की याद करके रोने लगी। दोपहर के समय म्याना एक बाग में पहुँचा। म्याने से उतार कर सुशीला बाग के बीच में बने दुमंजले बंगले में पहुँचाई गई।

बंगले के उस दूसरे मंजिल के बीचों-बीच झाड़, फानूस, आईने, पलंग बगैरह ऐशोआराम के सब सामानों से सजा हुआ एक खूबसूरत दीवानखाना कमरा बना है। दीवानखाने के चारों तरफ एक चाली है और चाली की दूसरी तरफ चारों ओर कोठरियाँ बनी हैं, जिनमें हर तरह के जरूरत के सामान मौजूद हैं। वहाँ पहुँचते ही एक दासी स्नान के वास्ते गरम जल तथा दूसरी एक सुवर्ण के थाल में नानाप्रकार के भोजन और व्यंजन ले आई, परन्तु सुशीला ने जयदेव और भूपसिंह की याद में भोजन की ओर झांका तक नहीं। कभी सोचती है कि, यह देश किसका है और ये मनुष्य कौन हैं ? कभी विचारती है कि कहीं यह देश मेरे श्वसुर का न हो क्योंकि, बंदर पर म्याने वगैरह की सब तय्यारी ठीक थी, उस ही प्रकार यहाँ भी रहने को मकान तथा भोजनादिक समस्त सामग्री यथोचित हैं, परन्तु वे दोनों अब तक क्यों नहीं आये ? फिर हृदय में विचार उठता है कि यदि यह हमारा देश होता, तो समस्त सेवक वगैरह हमारी आज्ञा का पालन करते, परन्तु वैसा कुछ दीखता नहीं है। बड़े ही सोच-विचार में पड़ी। भय से सर्व अंग कांपने लगे। सुशीला के संग सदा कितनी ही सहेलिया रहा करती थीं, परन्तु आज इस जंगले में बेचारी अकेली बैठी हुई प्रिय जयदेव तथा भूपसिंह की याद कर करके आँसू बहा रही है।

इतने ही में अकस्मात् एक मनुष्य आया और कहने लगा-हे प्रिये ! तुम्हारे विरह में मैं इतने दिनों से अत्यन्त व्याकुल हो रहा हूँ। आज तुम्हारे दर्शन से मैं अपने को धन्य समझता हूँ। कृपा करके अब शीघ्र ही मेरे हृदय से लगकर विरह ज्वाला को शान्त करो। बड़े परिश्रम और सौभाग्य से यह आज का दिन प्राप्त हुआ है। तुम्हारे विरह में मैंने जो कुछ दुःख सहे हैं, उनका वर्णन नहीं कर सकता। अब कृपा करके शीघ्र ही प्रणयदान देकर मुझे कृतार्थ करो। सुशीला इस मनुष्य के चेहरे को देखकर और उसकी बातों को सुनकर न मालूम क्या स्मरण करके भयभीत स्वर से एक चीख मारकर मूर्छित हो गई।

द्वितीय पर्व

प्रातःकाल का समय है। पूर्व दिशा की ओर कुछ-कुछ लालिमा दिखाई पड़ रही है। थोड़ी देर में सूर्यदेव का उदय होने वाला है। जिसप्रकार करणलब्धि के प्रभाव से मिथ्यात्व दूर भाग जाता है और सम्यक्त्व का प्रादुर्भाव हो जाता है, उसीप्रकार सूर्योदय के सन्ध्या की लालिमा से अन्धकार विदा हो गया। समुद्र के तट के वृक्षों पर घोंसलों में से चिड़ियाँ निकल-निकल कर इधर-उधर फुदक-फुदक कर चुहचुहा रही हैं। दाने की खोज में जाते समय अपने घोंसलों के द्वार पर अपने बच्चों की चोंच से चोंच मिलाकर निसर्गज मातृप्रेम का नमूना दिखा रही हैं।

ऐसे समय में एक तख्ते पर बैठा हुआ जयदेव कभी डूबता कभी उछलता सूर्य के निकलते-निकलते समुद्र के किनारे जा लगा। समुद्र तट की भूमि की शोभा देखते ही जयदेव का चित्त हरा भरा-सा हो गया। वह बड़ी शीघ्रता के साथ तख्ते को छोड़कर पास ही एक वृक्ष के नीचे एक सुन्दर शिला पर जा लेटा।

तीन दिन की भूख प्यास के मारे सब शरीर और इन्द्रियाँ शून्य हो गई थीं, अतः वह समुद्र में बहने के दुःखों को याद करके मूर्च्छित हो गया। समुद्र तट की ठण्डी-ठण्डी हवा लगने से कुछ देर में होश हुआ, तो सुशीला और भूपसिंह की याद करके जोर-जोर से रोने लगा। थोड़ी देर में स्वयं धीरज बांधकर चुप हुआ। चुप होते ही निद्रा ने धर दबाया और दो तीन घण्टे खूब सोया।

आँखें खुलने पर थका हुआ शरीर हलका मालूम होने लगा। परंतु साथ ही क्षुधा की वेदना से चित्त व्याकुल होने लगा। धीरे-धीरे शौच स्नान से निवृत्त होकर संक्षेप में सन्ध्यावन्दन सामायिकादि क्रियाकाण्ड पूर्वक मन में पंचपरमेष्ठी का ध्यान करके वृक्ष के नीचे से उठकर आहार की चिन्ता में एक ओर को गमन करने लगा, परन्तु शरीर शिथिल होने के कारण थोड़ी दूर चलता है। फिर किसी वृक्ष के नीचे बैठकर विश्राम लेता है और इसप्रकार बड़ी कठिनता से दुपहर तक धीरे-धीरे चलकर समुद्र तट से दो कोस की दूरी पर एक छोटे से ग्राम में पहुँचा। तलाश करते-करते जिन चैत्यालय में पहुँच भगवत् के दर्शन करके बैठा ही था कि इतने में एक वृद्ध पुरुष दर्शनार्थ चैत्यालय में आया और दर्शन करके जयदेव से पूछने लगा कि आपका निवास कहाँ है? और यहाँ पर किस प्रयोजन से आपका आना हुआ?

जयदेव ने उत्तर दिया कि मैं एक मुसाफिर हूँ और मार्ग भूलकर यहाँ आ निकला हूँ। यह सुनकर वृद्ध पुरुष ने जयदेव से प्रीतिपूर्वक अपने स्थान पर चलने को कहा। जयदेव ने स्वीकार भी किया। वृद्ध पुरुष जयदेव को अपने घर पर लाया और भोजन कराकर एक झोंपड़ी में चारपाई बिछा दी जिस पर कई दिन का थका हुआ जयदेव आनन्द के साथ फिर सो गया। चार घण्टे में जयदेव की नींद खुली। चारपाई से उठकर हाथ-मुँह धोकर जल पी, पुरुष से विदा माँग पश्चिम दिशा को रवाना हुआ। धीरे-धीरे एक मंजिल पूरी करके कंचनपुर पहुँचा। शहर के बाहर ही धर्मशाला में उतर कर शौच स्नान सन्ध्यावन्दन से निवृत्त होकर श्रीमन्दिरजी में इष्टदेव के दर्शन करके बाजार में सैर करने को चला। पैसा गांठ में नहीं है, जठराग्नि उद्विग्न कर रही है, सुशीला और भूपसिंह की याद के मारे चित्त जुदा व्याकुल हो रहा है, अतः कभी इधर जाता है, कभी उधर जाता है और कभी खड़ा होकर आँसू बहाने लगता है।

इसकी ऐसी अवस्था देखकर एक जौहरी ने अपनी दुकान पर बुलाकर प्रेमपूर्वक पूछा-तुम ऐसे उदास होकर क्यों इधर-उधर घूम रहे हो ? जयदेव ने उत्तर दिया कि-रोजगार की तलाश में। फिर जौहरी ने पूछा कि-क्या तनख्वाह लोगे ? जयदेव ने उत्तर दिया कि- रोटी-कपड़े।

यह बात जौहरी ने स्वीकार की और जयदेव भी हर्षपूर्वक उसके पास रहने लगा। जयदेव रत्न परीक्षा में बहुत निपुण था। उसने धीरे-धीरे जौहरी की दुकान का सब काम का भार अपने ऊपर उठा लिया। जयदेव की इस योग्यता को देखकर रतनचन्द जौहरी ऐसा प्रसन्न हुआ कि जयदेव को अपने निजपुत्र हीरालाल से भी अधिक प्यार करने लगा, परन्तु हीरालाल को यह बात सह्य न हुई और उसके चित्त में जयदेव की ईर्ष्या का अंकुर जड़ पकड़ गया। वह इस बात की चिन्ता में लगा कि, जयदेव को किस प्रकार घर से बाहर करूँ।

रतनचन्द कंचनपुर के जौहरियों में बड़ा श्रीमंत समझा जाता था। उसकी पहिली स्त्री रामप्यारी अपने एक हीरालाल को छोड़कर दस वर्ष पहिले ही परलोक को गमन कर चुकी थी। इस समय रतनचन्द की उम्र 40 वर्ष के और हीरालाल की उमर करीब पन्द्रह वर्ष की होगी। पाँच वर्ष पहिले रतनचन्द का दूसरा विवाह हो चुका है।

उसकी दूसरी स्त्री रामकुमारी की अवस्था इस समय अनुमान अठारह वर्ष की है। जयदेव रतनचन्द के चौके में ही भोजन करता था। इसके स्वरूप और लावण्य को देखकर रामकुंवरि मोहित हो गई। निरन्तर जयदेव का ही ध्यान करने लगी, परन्तु क्या करे ? क्योंकि, जयदेव केवल भोजन करने मात्र को कभी रतनचन्द के साथ और कभी हीरालाल के साथ आया करता था, अतः उसे कभी एकांत का मौका ही नहीं मिलता था। अकस्मात् एक दिन रतनचन्द और हीरालाल शीघ्र ही व्यालू कर आये, परन्तु जयदेव को कार्यवश विलम्ब हो गया और व्यालू करने को सबके पीछे गया। व्यालू करने के बाद एकान्त पाकर रामकुंवरि ने जयदेव का हाथ पकड़ लिया और उसके साथ कामचेष्टा करने लगी।

यह अवस्था देखकर जयदेव चकित हो गया और धीमे स्वर से विनयपूर्वक कहने लगा कि, आप मेरी धर्म की माता हैं। यह अनुचित व्यवहार मुझसे कदापि नहीं हो सकता। इसप्रकार निराशा के वचन सुनकर रामकुंवरि लज्जित होने के बदले धृष्टतापूर्वक कहने लगी कि, यदि तुम मेरी अभिलाषा पूर्ण नहीं करोगे, तो मैं तुम पर उल्टा दोषारोपण करके तुम्हारा फजीता करूँगी और तुमको घर से निकलवा दूँगी। यह सुनकर जयदेव ने गम्भीर स्वर से कहा कि, आप उचित समझें सो करें, परन्तु मैं यह अधर्म कार्य कदापि नहीं करूँगा-ऐसा कह बलपूर्वक अपना हाथ छुड़ा घर से बाहर निकल आया और दुकान पर जाकर अपना मामूली काम करने लगा।

इसकी इस चालाकी को देखकर रामकुंवारि हाथ मलती रह गई और अपनी आशा की पूर्णता दुःसाध्य समझकर इसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचने का विचार करने लगी। घर के सब कामकाज यों ही छोड़कर पलंग पर पड़ रही। रात्रि को जब रतनचन्द आया, तो फूट-फूट कर रोने लगी। इस अवस्था को देखकर रतनचन्द घबड़ाया और रामकुंवरि से रोने का कारण पूछने लगा।
ज्यों-ज्यों वह पूछता था, त्यों-त्यों रामकुंवरि हिचकियाँ लेकर रतनचन्द की घबड़ाहट को बढ़ाती जाती थी। आखिरकार बहुत कुछ समझाने बुझाने पर उसने इसप्रकार कहना प्रारम्भ किया कि, यह जयदेव जिसको आपने अपने घर में रख छोड़ा है और जिसके ऊपर आपका बहुत बड़ा विश्वास है, बड़ा ही धूर्त और बदमाश है। प्रतिदिन जब तक आपके साथ भोजन करने को आता था, तब तिरछी निगाहों से मेरी तरफ देखा करता था, परन्तु अब तक आपके भय से वह कुछ साहस नहीं कर सका।
दैवयोग से आज शाम को कुछ कार्यवश व्यालू करने के लिये वह सबसे पीछे आया और व्यालू करने के बाद एकांत पाकर मुझ अबला पर बलात्कार पूर्वक शील भ्रष्ट करने की चेष्टा करने लगा। मेरी चोली फाड़ डाली और पशु कर्म करने को उपस्थित हुआ। जब मैं चिल्लाई और पड़ोसियों को बुलाने की उसको धमकी दी, तब वह अधर्मी शीघ्र ही भाग गया। अब मैं अत्यन्त लज्जित हो रही हूँ। मेरी लाज आपके हाथ है। या तो इस घर में मैं ही रहूँगी, या वह ही रहेगा। यदि आप इसका ठीक-ठीक प्रबंध नहीं करेंगे, तो मैं कुँए में गिर पड़ूँगी अथवा विष खाकर मर जाऊँगी। इतना कहकर रामकुंवरि बिलख-बिलख कर रोने लगी।

इस अवस्था को देखकर रतनचन्द बड़े चक्कर में पड़ा। वह कभी अपनी प्रिया की दुःख भरी बातों को सुनकर भ्रम में पड़ जाता है और कभी जयदेव की योग्यता और सौजन्य का स्मरण करके स्तंभित हो जाता है। रतनचन्द विचार-शक्ति और नीति-निपुण था, अतः उसकी विचार-शक्ति ने असली बात को खोज निकाला, तब रामकुंवरि के षड्यन्त्र को समझ गया, परन्तु मौका देख के उस समय जयदेव को धमकाने का वचन देकर गुस्सा दबा के रह गया।

परन्तु रामकुंवरि को इससे सन्तोष नहीं हुआ। उसने रतनचन्द को इस विषय में उदासीन देखकर हीरालाल को जयदेव के विरुद्ध भड़काने का प्रयत्न किया। हीरालाल पहिले से ही जयदेव के विरुद्ध था, अब रामकुंवरि की सहायता पाकर उसका साहस द्विगुणित हो गया और इसप्रकार वह जयदेव का जानी दुश्मन बन गया। मौका पाकर एक दिन आधी रात के समय खड्ग लेकर जयदेव के पलंग के पास जा खड्ग म्यान से बाहर करके जयदेव पर चलाने को ही था कि इतने ही में पीछे से आकर किसी ने हीरालाल का हाथ पकड़ लिया और हीरालाल भय चकित होकर हाथ पकड़ने वाले की सूरत देखने लगा।

तृतीय पर्व

मध्याह्न का समय है। सूर्य अपने पूर्ण प्रताप से पृथ्वी को संतप्त कर रहा है। पशु पक्षी छाया की खोज में इधर-उधर व्याकुल हो रहे हैं। भोले जीव सांसारिक दुःखदावाग्नि से भयभीत होकर संसार में इसीप्रकार सुख की छाया खोजने में आकुलित रहते हैं। तृषातुर पांथजन आसपास जलाशयों के न मिलने से भटकते फिरते हैं। उन बेचारों को उस प्रचंड ग्रीष्म में किसी बतलाने वाले के भी दर्शन नहीं होते। सम्यक्त्व सलिल के न मिलने से मिथ्यात्व-आतप-दग्ध-दूरभव्य भी संसार में इसीप्रकार चक्कर खाते रहते हैं।

उस समय उन्हें किसी सम्यग्दृष्टि का समागम भी नहीं मिलता। प्यासे मृगों के समूह मृगतृष्णा में जल का संकल्प करके दौड़े जा रहे हैं, पर बेचारे उस प्रयत्न में कृतकार्य नहीं होते। दुःखोतप्त संसारी जीव विषयों में इसीप्रकार सुख का संकल्प करते हैं और उनके आसेवन से परिपाक में निराश होते हैं। तप्त पवन के झकोरों से छोटे-छोटे वृक्षों की सुकुमार कोपलें मुरझाकर खिन्न हो रही हैं। व्याघ्रादिक हिंस्रजीव कहीं झाड़ियों में पड़े हुए जोर से हांफ रहे हैं। उनके भयावने शब्द मार्गक्रमण करने वाले पथिकजनों को भयभीत कर देते हैं। चारों तरफ सन्नाटा खिंच रहा है।

जंगल बड़ा डरावना है। दूर-दूर तक मनुष्यों की आबादी नजर नहीं आती। जिधर देखते हैं, उधर विस्तृत पर्वतमालायें दूर तक पैर फैलाये पड़ी हैं।

एक छोटी-सी पगडंडी पर ऐसे समय में एक भाग्य का मारा हुआ पथिक चल रहा है। उसके चंचल नेत्र चारों तरफ का दृश्य देख रहे हैं, परन्तु न जाने क्यों आँसुओं की धारा बहा रहे हैं। वह पथिक अश्रुधारा को दस-पाँच कदम चल के दुपट्टे से पोंछ लेता है, परन्तु धारा बन्द नहीं होती।

पाठको! यह और कोई नहीं आफत का मारा हुआ बेचारा भूपसिंह है। कई दिन का भूखा प्यासा जयदेव और सुशीला की खोज में इस जंगल में आ फंसा है।

जंगल की विस्तीर्णता देखकर भूपसिंह को उससे शीघ्र पार होने की चिन्ता हुई, अतः वह द्रुतगति से चलने लगा और संध्या होने के कुछ पहिले एक नगर में जा पहुँचा। वहाँ भोजनादि की चिन्ता से निवृत्त होकर नगर के बाहिर एक सुन्दर उद्यान में कुछ लोगों को आपस में वार्ता करते देखकर उनके पास जा खड़ा हुआ और बातचीत सुनने लगा। उनके द्वारा जो कुछ सुना उसे भूपसिंह ने आँखों से भी देख लिया। अर्थात् देखा कि एक चतुरंग सेना बड़े वेग से इस नगर की ओर चली आ रही है। रथ, सैनिक, पदातियों का महासमुद्र उमड़ा आ रहा है। भगवती पृथ्वी विपुल धूल उड़ाकर उसका स्वागत कर रही है।

यह खबर विद्युत वेग से सुवर्णपुर नगर भर में फैल गई। वहाँ के महाराजा ने परचक्र से अपनी रक्षा करने के लिये अपने सेनापति को सचेत किया। सेनापति तत्काल ही सेना तैयार करके मुकाबला करने के लिये सुसज्जित होकर नगर के बाहर पड़ाव में आ डटा।

इन दोनों चक्रों में रणचण्डी को नृत्य करते हुए देखकर घोर हिंसा के दृश्य का अनुमान कर अनुकम्पा कम्पित सूर्यदेव अस्ताचल की ओट में हो गये। उनके अस्त होते ही पश्चिम दिशा में संध्या की लालिमा युद्धस्थलवाहिनी रक्त नदी का नमूना दिखाने लगी। धीरे-धीरे लालिमा विलायमान हो गई और चारों ओर अन्धकार ने अपना राज्य जमा लिया। मिथ्यात्व उपशमसम्यक्त्व के अस्त होने से इसी तरह अपना अधिकार जमाता है। विषय-कषायरूपी चोर और व्यभिचारी क्षमाशीलादि रत्नों की लूट करने में दत्तचित्त होने लगे।

भूपसिंह यह सब चरित्र देख सुनके नगर में लौट आया। एक सराय की कोठरी में नाना चिन्ताओं में रात पूरी की और सबेरे प्रातःकालीन क्रियाओं से निवृत्त होकर समर-समाचार पाने की इच्छा से नगर में घूमने लगा।

आज सबेरे ही सुवर्णपुर के महाराज का आलीशान दरबार भरा हुआ है। सम्पूर्ण राज्य कर्मचारी यथास्थान बैठे हुए हैं, परन्तु किसी के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकलता-ध्यानस्थ हो रहे हैं। इतने में एक सांडनी सवार ने आकर इस शांति को भंग किया। सब लोग उसकी तरफ देखने लगे। उसने महाराज को अदब के साथ प्रणाम करके एक चिट्ठी दी और एक ओर जा खड़ा हुआ। महाराज ने चिट्ठी मंत्री को देकर पढ़ने को कहा। मन्त्री पढ़ के सुनाने लगे। उसमें यह लिखा हुआ था-।। श्री वीतरागाय नमः ।।

स्वस्ति श्री सुवर्णपुर शुभस्थाने विराजमान राजनीति-नैपुण्यादि विविध-गुण सम्पन्न राजेश्री विजयसिंहजी योग्य रामनगर नरेश नाहर सिंह का यथायोग्य बंचना। अपरंच आपको इस विषय में अनेक बार लिखा गया कि, आप अपनी कन्या मदनमालती का विवाह हमारे कुमार प्रतापसिंह के साथ कर देंवे, परन्तु आपने हमारे पत्रों का कुछ भी सत्कार नहीं किया। आप विचारशील और दूरदर्शी हैं। चाहें, तो अब भी चेत सकते हैं। इसलिये एक बार पुनः सूचना दी जाती है कि, आप मदनमालती का सम्बन्ध हमारे पुत्र के साथ करने का शीघ्र ही प्रबन्ध करें। अन्यथा बलात्कार विवाह कराया जायेगा और तब आपको व्यर्थ लज्जित होना पड़ेगा। इत्यलं विस्तरे-

शुभमिति : ज्येष्ठशुक्ला- 6 भवदीय-हितैषी

गुरुवार नाहरसिंह

पत्र के सुनते ही विजयसिंह के नेत्र लाल हो गये। भुजा फड़कने लगी। भृकुटी वक्र हो गई। क्रोध को संभाल के वहाँ बैठना कठिन हो गया, अतः बुद्धसेन मंत्री को उत्तर लिखने की आज्ञा देकर वे राजभवन को चले गये। मंत्री ने महाराज की आज्ञानुसार पत्र लिख के मोहर हस्ताक्षर पूर्वक दूत के हवाले किया। सांडनी सवार पत्र लेकर अपने दरबार में पहुँचा। सब लोग उत्कंठित हो रहे थे कि देखें क्या उत्तर मिलता है। महाराज ने चिट्ठी लेकर मंत्री को पढ़ने के लिये दी। उसमें लिखा था -।। नमः श्रीजिनाय ।।

स्वस्ति श्री रामनगर नरेश नाहरसिंह जी योग्य सुवर्णपुर से
विजय सिंह का यथायोग्य बंचना। आपका अत्यन्त अविचारितरम्य
पत्र मिला, वृत्त अवगत हुए। हमारी मदनमालती कन्या का विवाह
आपके पुत्र के साथ नहीं हो सकता। यह सम्बन्ध मुझे सर्वथा इष्ट
नहीं है। आपकी बलात्कार की धमकी का उत्तर युद्धस्थल में देना
ही हम समुचित समझते हैं। इत्यलम्।

शुभमिति : ज्येष्ठ शुक्ला- 6
भवदीय
गुरुवार
विजयसिंह

पत्र के पूर्ण होते ही नाहरसिंह क्रोध के मारे उछल पड़ा।
सेनापति को उसी समय युद्ध आरम्भ करने की आज्ञा दी। आज्ञा
पाते ही रामसेन सेनापति की दस हजार सेना तैयार हो गई और कूच
का डंका बजते ही रवाना होकर मैदान में आ डटी।

इधर विजयसिंह महाराज का सेनापति कुंवरसिंह भी गाफिल
नहीं था, पाँच हजार सेना लेके पहिले से ही आ जमा था। अब क्या
था, रणदुन्दुभि बजने लगी। दोनों ओर से अस्त्र से मारकाट होने
लगी। दो घण्टे तक भयानक युद्ध हुआ। रणभूमि मुर्दों के मारे
श्मशान सी दिखने लगी।

इन दो घंटे की घमासान लड़ाई के बाद अपने पक्ष के बहुत
लोगों को मृत देखकर कुंवरसेन की सेना पीछे हटने की चेष्टा
करने लगी और उधर प्रतिपक्षियों का बल आगे बढ़ने लगा। यह देख कुंवरसिंह ने अपने शूरवीरों को ललकार कर कहा “खबरदार बहादुरो ! यह पीछे हटने का समय नहीं है, देखो हम थोड़ी देर में विजय पाने वाले हैं।” स्वामी की ललकार से शूरवीरों ने अपना दल फिर आगे बढ़ाया, परन्तु आखिर पीछे हटना पड़ा। शत्रु की दस हजार सेना के सामने विजय पा लेना खेल नहीं था। दो हजार सेना कट मरी और शेष तीन हजार के पैर उखड़ गये, अतः रामसिंह ने विजय पाई। यह देखकर नाहरसिंह फूल के कुप्पा हो गया। उसकी सेना में आनन्द भेरी बजने लगी।

दिन भर के थके मांदे सूर्यदेव अस्ताचल शिखरशायी हो गये। प्रतीची देवी का कपोल मण्डल अपने नाथ के स्वागत में मनोहर रक्तिमायुक्त हो गया। इसे देख कुटिल चिड़ियाँ चुहचुहाहट मचाने लगीं, और कुन्दकलिकाओं ने दाँत निकाल दिये।

थोड़ी देर में चारों ओर से अन्धेरा दौड़ आया। गगन-मण्डल में षष्ठी का खंडित चन्द्रमा और उसके साथ तारागणों ने अपने आसन आ जमाये। दिनभर की गर्मी से जिस जगत ने पजाबे का रूप धारण किया था, उसमें इन थोड़ी-सी मूर्तियों के कारण शीतलता का संचार होने लगा। उधर निद्रादेवी का दौरा शुरू हुआ और क्रम-क्रम से सारे जगत ने उनकी गोद में अपना सिर रख दिया। कुंवरसिंह के लश्कर के सैकड़ों योद्धाओं को आज रात्रि भर निद्रा नहीं आई।

चतुर्थ पर्व

दूसरा दिवस हुआ। प्रातः काल होते ही दिवाकर महोदय युद्धकांड के दर्शक बनकर आ विराजे। उनके इस निष्ठुर दर्शक कार्य से प्राची देवी अतिशय अप्रसन्न थीं, परन्तु ये मानने वाले देवता नहीं थे। देवी लाल-लाल नेत्र करती ही रह गई, पर ये अपनी इष्ट सिद्धि में नहीं चूके। दोनों ओर के योद्धा अपनी-अपनी प्रातः क्रियाओं से निश्चिन्त होकर और सर्व प्रकार से सुसज्जित हो, स्वामी आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे।

आज महाराज विजयसिंह की बारह हजार और नाहरसिंह की बीस हजार सेना युद्ध क्षेत्र में अवतीर्ण हुई और रणदुन्दुभि बजते ही आपस में भिड़ गई। कुंवरसिंह और उसकी सेना कल की हार से बहुत लज्जित हो रही थी, इस कारण आज भूखे सिंह की तरह शत्रु पर टूट पड़ी। इधर रामसिंह और उसकी सेना कल के घमण्ड में जैसी चाहिये वैसी सावधान नहीं थी, इस कारण सम्मुख की मार न झेल सकी, इसलिये पीछे हटने लगी। अवसर पाकर कुंवरसेन ने सिपाहियों को उत्साहित करते हुए दबाना शुरू किया। रामसिंह की फौज भागने लगी, यह देखकर नाहरसिंह ने अपने पुत्र प्रतापसिंह को मदद के लिये भेजा। रामसिंह की सेना अपने पक्ष की वृद्धि देखकर लौट पड़ी और जोश से मार करने लगी। इस बार प्रतापसिंह के खड्ग से कुंवरसेन घायल होकर धराशायी हो गया। सेनापति के गिरने से सेना कुछ शिथिल हुई, परन्तु तत्काल ही कुंवर रणजीतसिंह को दस हजार फौज के साथ सहायता को आया देखकर जी तोड़कर लड़ने लगी।

रणजीत और प्रतापसिंह का एक प्रहर युद्ध हुआ। अन्त में लड़ते लड़ते प्रतापसिंह की तलवार मूठ से निकल कर गिर पड़ी। यह देख रणजीतसिंह भी अपनी तलवार फेंक शस्त्रयुद्ध छोड़ मल्ल युद्ध करने में प्रवृत्त हुआ। कुछ लड़ने के पश्चात् रणजीतसिंह ने प्रतापसिंह को निष्प्रताप कर छाती पर सवार होकर उसकी मुश्कें बांध ली और कैद कर लिया।

प्रताप के कैद हो जाने की खबर पाते ही नाहरसिंह अपनी पचास हजार फौज एक साथ लेकर रणजीत पर आ कूदा और उसे चारों ओर से घेर लिया। रणजीत दो घण्टे तक बहादुरी से लड़ता रहा, परन्तु अन्त में शस्त्रहीन होकर नाहरसिंह के द्वारा कैद हो गया। प्रतापसिंह छुड़ा लिया गया। नाहरसिंह का लश्कर विजय का डंका बजाता हुआ पड़ाव को लौट गया। आज नाहरसिंह और प्रताप के आनन्द का ठिकाना नहीं था। प्रतापसिंह मदनमालती के समागम के मीठे-मीठे स्वप्न देखने लगा और नाहरसिंह पुत्र विवाह की तैयारियों की उधेड़बुन में लग गया।

पुण्योदय के क्षय होने पर प्रतापवानों की अधोदशा होती है। ऐसा उपदेश देते हुए मरीचिमाली सूर्य अस्ताचल की ओट में हो गये। संध्यादेवी चारों ओर से खिलखिला के हँस पड़ी। उसकी हास्य प्रभा से थोड़े समय के लिये संसार में पीताम्बर-सा बिछ गया। उधर मानों ताक ही में बैठे थे, इस तरह अन्धकार के देव आ धमके। आप संसार को दिखाने लगे कि अन्यायी और जुल्मी राजाओं का भी अस्तित्व कुछ समय पृथ्वी पर रहता है। थोड़ी देर में गगन मण्डप में चन्द्र ज्योत्स्ना और तारिकाओं की प्रभा खिलने लगी।

आज रात्रि को ही विजयसिंह का प्रतापशाली दरबार भर रहा है। सम्पूर्ण मंत्री सरदार योद्धा और नागरिक धीमान और लक्ष्मीवान यथास्थान विनय सहित बैठे हुए हैं। महाराज की मूर्ति किसी घोर चिन्ता-मग्न होने की साक्षी दे रही है। सब लोग चुपचाप बैठे हैं। थोड़ी देर में मंत्री ने महाराज की आज्ञानुसार घोषणा की कि, जो शूरवीर कल ही नाहरसिंह को जीवित कैद करके रणजीत को छुड़ा लावेगा,उसको मैं अपनी कन्या मदनमालती ब्याह दूँगा और दहेज में आधा राज्य देके उसे सन्तुष्ट करूँगा।

इस घोषणा को सुनके अनेक शूरों के मन राज्य कन्या की ललित लालसा से फड़कने लगे, परन्तु नाहरसिंह के पराक्रम को देखकर ज्वर चढ़ आता था, इस कारण घन्टे भर तक दरबार में सन्नाटा खिंचा रहा, कोई भी साहस करके आगे नहीं आया।

पाठको ! याद होगा कि भूपसिंह सुवर्णपुर में ही है। रण समाचारों के पाने की इच्छा उसे निरन्तर ही रहती थी, इसलिये आज के दरबार में भी वह दर्शकों के साथ आ खड़ा हुआ था।

सभा की इस अवस्था को देखकर उससे रहा नहीं गया। चट
सभा में प्रवेश करके महाराज के रक्खे हुए उक्त घोषणा के
बीड़े को चाब गया।

दरबार के लोग आश्चर्य दृष्टि से उसकी ओर देखने लगे।
महाराज इस क्षत्रिय पुत्र के साहस को देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने
उठके उसे छाती से लगा लिया और आशीर्वाद देके दरबार को
बर्खास्त किया। मंत्री और सेनापति को युद्ध की उचित व्यवस्था
कर देने की आज्ञा देकर राजभवन को चले गये।

बुद्धसेन मंत्री भूपसिंह को अपने साथ ले गये और एक
पृथक् महल में उनके रहने की राज्योचित व्यवस्था कर दी।
भूपसिंह भावी युद्ध की उत्साह की तरंगों में डूबता उछलता हुआ
सुखशैय्या पर सो गया।

पंचम पर्व

प्रातःकाल हुआ। सूर्यदेव नाहरसिंह को विजय लाभ से
उन्मत्त देखकर व्यंगरूप में हंसने लगे। अभ्रपटल फट के इधर-
उधर बिखर गये, परन्तु नाहरसिंह ने नहीं जाना कि, ये मुझे भावी
पराभव की सूचना देते हैं।

सब लोग प्रातःकालीन क्रियाओं के करने में दत्तचित्त हुए।
दोनों ओर का सैन्य सुसज्जित हो गया। भूपसिंह पच्चीस हजार
सेना के साथ युद्धक्षेत्र में पहुँचा। उसने सम्पूर्ण सेना को 5 टुकड़ों में
विभक्त किया जिनमें से तीन टुकड़े तीन दिशाओं में कर दिये, एक टुकड़ा अपने साथ लिया और एक अपनी रक्षा के लिये कुछ पीछे रक्खा। उधर से नाहरसिंह का प्रधान सेनापति रामसिंह दस हजार सैन्य के साथ युद्ध को प्रस्तुत था।

रणभेरी बजते ही युद्धारम्भ हुआ। भूपसिंह ने घन्टे भर में रामसिंह की सेना को विह्वल कर दिया। वह जिस ओर को अपना धावा करता था, उसी ओर से फौज की काई-सी फट जाती थी। आज नवीन संचालक के मिलने से उनकी सेना में भी अपूर्व उत्साह था, रामसिंह की सेना हिम्मत हार के पलायनोन्मुख हो गई। यह देख रामसिंह अपना घोड़ा बढ़ाकर भूपसिंह के सन्मुख हुआ और ललकार के बोला-यदि तुझ में कुछ शक्ति है, तो मेरे सन्मुख आ देख ! मैं कैसी शीघ्रता से तुझे यमपुर का रास्ता बतलाता हूँ। इन शब्दों को सुनते ही भूपसिंह का शौर्य भभक उठा। वह घोड़े पर से कूद के रामसिंह पर जा टूटा। वार को बचाकर उसने रामसिंह को ऐसी ठोकर लगाई कि वह जमीन पर आ रहा, परन्तु फिर सम्भल के उठ बैठा और लड़ने लगा। दो ही हाथों में रामसिंह की तलवार बेकार हो गई, तब उसने भूपसिंह पर सेल चलाया, परन्तु भूपसिंह उसे बचा गया और बदले में एक हाथ तलवार का ऐसा मारा कि, सिर धड़ से जुदा हो गया।

सेनापति के गिरते ही सेना भागने लगी, परन्तु पन्द्रह हजार सेना सहित प्रतापसिंह के आ जाने से फिर जम गई। एक घन्टे के युद्ध में प्रतापसिंह कैद हो गया, भूपसिंह की विजय हुई, अब नाहरसिंह स्वयं की बारी आई। वह आग बबूला होकर अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ भूपसिंह पर आ टूटा, परन्तु भूपसिंह गाफिल नहीं था, इस समय इशारा पाकर उसकी सेना के तीन टुकड़ों ने तीन तरफ से नाहरसिंह को घेर लिया और पीछे का टुकड़ा भी खास सेना में आ मिला। घनघोर युद्ध होने लगा।

एक प्रहर तक बराबर युद्ध होता रहा। ग्रीष्म से चिरसन्तप्त रणभूमि नररक्त से प्लावित हो गई। भूपसिंह की बहादुरी देखकर शत्रु सेना के छक्के छूट गये। आखिर नाहरसिंह को स्वयं सम्मुख होना पड़ा। भूपसिंह का एक तलवार का वार ढाल को फोड़कर नाहरसिंह के कन्धे में गहरा घाव कर गया, उसकी कुछ परवाह न करके नाहरसिंह ने भूपसिंह पर सेल चलाया, परन्तु उसके पहिले ही भूपसिंह का सेल माथे पर जा धमका। जिसकी चोट से वह तिलमिला कर धराशायी होकर भूपसिंह की कैद में हो गया।

मालिक के परतन्त्र हो जाने से सेना ने हथियार डाल दिये और अधीनता स्वीकार कर ली। रणजीतसिंह को बन्धन से छुड़ाकर और प्रताप तथा नाहर दोनों कैदियों को लेकर भूपसिंह ने विजय पताका उड़ाते हुए और आनन्द दुन्दुभि बजाते हुए सुवर्णपुर में प्रवेश किया। भूपसिंह की विजयध्वनि नगरभर में गूँजने लगी। उनकी बहादुरी की यत्र-तत्र प्रशंसा सुनाई देने लगी। सुवर्णपुर आनन्द कलरव से आकीर्ण हो गया।

महाराज विजयसिंह विजयध्वनि सुनकर स्वयं अगवानी के लिये आये। भूपसिंह ने महाराज को प्रणाम किया और रणजीत चरणों पर गिर पड़ा। महाराज ने दोनों को छाती से लगा लिया और आनन्दाश्रुओं से उनका अभिषेक किया। भूपसिंह को सम्बोधन करके कहा “आज का यह सौभाग्य तुम्हारे निमित्त से ही प्राप्त हुआ है।” इस राज्य की लज्जा आज तुम्हीं ने रक्खी है। तुम्हारे समान हितु दूसरा नहीं है। भूपसिंह ने इसके उत्तर में नम्र होके कहा, “महाराज यह सब आपके पुण्य का प्रताप है।” इसप्रकार वार्तालाप होने के पश्चात् सब लोग अपने-अपने स्थान पर गये। नाहरसिंह वगैरह कैदखाने में भेज दिये गये। यह देखकर महाराज को बड़ा वैराग्य हुआ। “जो कल आनन्द से अंग में नहीं समाता था, वह आज कैदखाने की हवा खा रहा है। छिः ऐसा संसार मुझे नहीं चाहिये, ऐसा सोच निशानाथ को राज्य देकर अस्ताचल की गह्वर गुफाओं में एकाकी विहार करने लगे।”

षष्ठ पर्व

सुवर्णपुर में घर-घर आनन्द मंगल हो रहे हैं। जहाँ तहाँ सदावर्त लग रहे हैं। जिनालयों में मंगलविधानों की मनोहर ध्वनि गूँज रही है। सब लोग उज्ज्वल वस्त्र भूषाभूषित गलियों में आते जाते दिखाई देते हैं। आज महाराज विजयसिंह की प्रतिज्ञानुसार मदनमालती का विवाह भूपसिंह के साथ होगा। प्रजा आज इसी आनन्द से उत्फुल्ल हो रही है।

मदनमालती भूपसिंह के गुण और रूप सुनकर पहिले से ही मुग्ध हो रही थी, आज उसी अभीष्ट युवा के साथ शुभ लग्न में आर्षविधि पूर्वक उसका पाणिग्रहण हो गया। तब मदनमालती के आनन्द की सीमा का अनुमान पाठक ही कर सकते हैं।

इधर मदनमालती के स्वरूप और लावण्य को देखकर भूपसिंह का मन उनके हाथ से ही निकल गया। उन्हें मदनमालती के बिना, अब एक घड़ी वर्ष-सी सूझने लगी, पर क्या करते लोक बंधन दुर्निवार है!

विवाह होने के तीसरे दिन सुहाग रात्रि की तैयारी होने लगी। एक स्वतन्त्र राजप्रासाद एशो आराम के सम्पूर्ण सामानों से सुसज्जित सखीजनों के साथ मदनमालती उस एकान्त महल में पहुँचाई गई, जैसे चातक मेघ की आशा में विह्वल हो जाता है, मदन मालती उसी तरह भूपसिंह के दर्शन को विह्वल हो रही है। उसके चंचल नेत्र द्वार मार्ग पर अचल हो रहे हैं, कर्ण आने की आहट की प्रतीक्षा में है और शरीर स्पर्श सुख की वांछा से बाह्यज्ञान शून्यसरीखा स्थिर हो रहा है। अब आते हैं, अब आते हैं, इसप्रकार बहुत समय बीत गया, परन्तु भूपसिंह नहीं आये। नगर में शोध खोज होने लगी, परन्तु कहीं भी कुछ पता नहीं लगा। इतने में एक दासी ने आकर मदनमालती के हाथ में एक पत्र दिया। वह उसे खोलकर बांचने लगी। न जाने उसमें क्या लिखा हुआ था कि, उसको बांचते ही मदनमालती एक बड़ी आह खींचकर बेहोश हो गई।

सप्तम पर्व

वर्षा ऋतु का समय है। आकाश में चारों ओर मेघपटल उथल-पुथल मचा रहे हैं। छोटी-छोटी बूँदें पड़ रही हैं। हरियाली के सब्ज गलीचे पर पानी के कण एक विलक्षण शोभा को उत्पन्न कर रहे हैं। विरहीजनों के हृदय में लगकर झंझावायु तीर का काम कर रही है और पीछे से मयूरों की कूक तो गजब ही ढा रही है। इधर पपीहा का “पी ! पी !” शब्द विरहिणी मुग्धाओं को उद्विग्न कर रहा है। उनके हृदय में इन दो शब्दों से न मालूम कैसे-कैसे आशा-निराशा, संयोग-वियोग, अनुनय-अभिमान आदि विकारों के विचित्र चित्र खिंच रहे हैं।

दिन के तीन बज चुके हैं, परन्तु सूर्यदेव का आसमान में पता नहीं है। उनकी दो चार किरणें कभी-कभी किसी अभ्रपटल में से फूटकर बड़ी मनोहर लालिमा फैलाकर तत्काल ही छिप जाती है। कुलबालाओं की प्यारी हास्य रेखा अरुणरुचिर ओष्ठों के बाहर समय तक नहीं ठहरती।

हम अपने पाठकों को इस समय बिलासपुर के समीपवर्ती एक उद्यान में लिये चलते हैं। उद्यान की शोभा वर्णनीय है, परन्तु हम आज उसकी सौन्दर्य-कथा में उलझ कर व्यर्थ समय नहीं खोना चाहते और उद्यान के उस हिस्से में पैर रखते हैं, जहाँ रूप की एक अपूर्व हाट लग रही है। वहाँ एक नवयौवना बाला कोकिलकंठविनिन्दित मनोहर स्वर से मल्हार गाती हुई झूला झूल रही है और उसके चारों ओर खड़ी हुई अनेक कमनीय-कामिनियाँ उसके गाने तथा झूलने में मदद करती हैं। उद्यान में चारों ओर सन्नाटा खिंच रहा है। मानो उद्यान के सम्पूर्ण जीवजन्तु उस गान्धर्व अभिनय में सर्वथा मग्न हो रहे हैं। केवल दो चार झिल्लियाँ इधर-उधर से अपनी तान लगा रही हैं। शायद ये अपने कंठों को मनोहर समझती हैं, इसलिये बिना आह्वान ही दम भर रही हैं।

पाठक! आज बालिकाओं का प्यारा तीज का त्यौहार है। इसलिये यह बिलासपुर के महाराजा की लाड़ली कन्या अपनी समवयस्क सहेलियों के साथ इस उद्यान में दोला-क्रीड़ा कर रही है। बुद्धिमान पिता ने कन्या की रक्षा के लिये थोड़ी सी सेना भी भेज दी है, जो समीप ही के एक जलाशय के किनारे सचेत और सन्नद्ध है।

बिलासपुर के महाराज का नाम विक्रमसिंह है। उनकी महारानी मदनवेगा के इस एक कन्या के अतिरिक्त जिसका नाम सुशीला है, कोई दूसरी सन्तान नहीं है। सुतरां सुशीला पर राजदम्पति का असाधारण प्रेम होना चाहिए, इसके अतिरिक्त सुशीला के रूप और स्वाभाविक गुणों ने उन्हें और सम्पूर्ण राजपरिवार को मुग्ध कर लिया है।

सुशीला जिस समय 6-7 वर्ष की थी, उस समय अध्यापिका ने उसकी बुद्धि प्रखरता को देखकर सरस्वती की उपाधि दी थी और अब तो सुशीला यथार्थ में सरस्वती है, न्याय-व्याकरण, धर्मशास्त्रादि विविध विद्याओं में वह असाधारण बुद्धि रखती है। अच्छे-अच्छे विद्वान् उसके पांडित्य को देखकर चकराते हैं। इस समय बालिका सुशीला ने यौवनावस्था में पदारोपण किया है, उसके अंङ्ग प्रत्यंगों में से यौवन की प्रभा फूट रही है।

सुशीला में केवल रूप तथा विद्या ही नहीं है, किन्तु उसने लोकोत्तर शीलव्रत को धारण करके “सोने में सुगन्ध की” कहावत चरितार्थ की है। वह जानती है कि स्त्रियों के सम्पूर्ण गुणों की प्रतिष्ठा इसी शीलव्रत से है।

इस उद्यान के सामने से ही एक छोटी-सी सड़क बिलासपुर की ओर चली गई है। उस पर से चलने वाले को यह दोला क्रीड़ा अभिनय अच्छी तरह दीख सकता है, परन्तु हम देखते हैं कि आज उस सड़क पर से कोई आता जाता नहीं है। उद्यान के बीचों-बीच में एक छोटा-सा परन्तु सुन्दर बंगला बना हुआ है।

परमसुशीला सुशीला अपनी सहेलियों सहित क्रीड़ा में मग्न हो रही है। उसे खबर नहीं है कि, मेरी यह सरल बाल-क्रीड़ा किसी के हृदय में कुछ कुटिलता का असर कर रही है। वह यह भी नहीं जानती कि, इस उद्यान में मेरे और सखियों के सिवाय और भी कोई है। पाठक ! इस समय उस सड़क पर एक युवा घोड़े को रोककर खड़ा हो रहा है और अपने अनिमिष-नेत्रों से सुशीला को देख रहा है। जैसे योगीश्वर परमसमाधि के समय आत्मध्यान में तल्लीन हो जाते हैं, वह नवयुवक सुशीला के ध्यान में उसीप्रकार मग्न है। सुशीला के अलौकिक रूप लावण्य को देखकर उसका मन उसके हाथ से चला गया है, जान पड़ता है, वह मुग्ध उसी के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा है, पर क्या गया हुआ मन फिर के आता है ?

युवा की यह अवस्था मेघ महाराज से देखी नहीं गई, वे लगे मूसलाधार पानी बरसाने। अब क्या था रंग में भंग हो गया। सुशीला अपनी सहेलियों के सहित बागबंगले में जा छुपी। इधर नवयुवक के ध्यान की कली खुल गई। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उधर सायंकाल भी समीप आया, इसलिये सुशीला सखीजनों के साथ रथ पर सवार होके महलों की ओर चल पड़ी। रक्षक सेना रथ के आगे-पीछे हो ली। युवा किंकर्तव्यविमूढ़ की नाई देखते ही रह गया और थोड़ी देर में घोर अंधकार ने आकर समग्र पृथ्वी को काली चादर से ढक दिया।

अष्टम पर्व

सूर्यपुर के एक राजप्रासाद में एक कमरा ऐशोआराम के सब सामान से सजा हुआ है। कमरे के बीचों-बीच एक पलंग बिछा हुआ है। उस पर पड़ा हुआ एक युवा करवटें बदल रहा है। आँखों से आँसुओं की धारा बह रही है, बदन में जौफ आ गया है। लबों पर खुश्की और चेहरे पर पीलाई झलक रही है। पलंग के पास ही कुर्सी पर एक दूसरा युवक बैठा हुआ है। दोनों में इसप्रकार की बातचीत हो रही है।

मित्र बलवन्तसिंह ! सुशीला प्यारी सुशीला का वियोग अब सहा नहीं जाता। हाय ! वह भोली-भोली सूरत अब तक आँखों के सामने नृत्य करती है। यदि शीघ्र ही उसके मिलने का उपाय न होगा, तो प्यारे मित्र अब यह प्राणपखेरू इस तन पंजर में बहुत समय तक नहीं ठहर सकेंगे।
अजी उदयसिंह जी ! आप यह क्या कह रहे हैं ? होश को ठिकाने लाइये। आप राजपुत्र हैं, आपके लिये एक दो क्या दस सुशीला आ सकती हैं, क्षत्रिय पुत्र क्या स्त्रियों के लिये प्राण पखेरू उड़ाते फिरते हैं ? छिः धैर्य्य धारण कीजिये। इस तरह आतुरता से कुछ नहीं होगा। मुझे उसका पता ठिकाना ठीक-ठीक बतलाइये। मैं अभी जाता हूँ।
(उछल के और खुश होके) क्या आप सचमुच मेरी सुशीला से मुझे मिला देंगे ? अच्छा तो लीजिये, उसका पता ठिकाना मेरी इस नोट बुक में लिखा है, आप भी लिख लीजिये।
“बहुत अच्छा” ! कहके बलवन्तसिंह ने सुशीला का पता लिख लिया और उसी समय वहाँ से रवाना हो गया। उसके चले जाने पर उदयसिंह फिर वियोगाग्नि में जलने लगा।
पाठक जान गये होंगे कि, यह वही युवा है, जो सुशीला को बिलासपुर के उद्यान में झूला झूलती हुई देखके ध्यानस्थ हो रहा था। यह सूर्यपुर के राजा निहालसिंह का पुत्र है। इसका नाम उदयसिंह है और वह दूसरा युवक को जो बातचीत कर रहा था इसका अभिन्न-हृदय मित्र बलवन्तसिंह है।

उदयसिंह की अवस्था मित्र के जाते ही और भी शोकप्रद हो उठी। कुसुमशर ने अकेला पाकर उसकी खूब खबर लेना शुरू की। उसके साथ सुकोमल पुष्पशय्या शूल का काम करने लगी। व्यजन समीर और चन्दनलेप ग्रीष्म की उष्ण लूओं और अग्निताप से भी अधिक दुःखदायी प्रतीत होने लगा।

अहो ! यह जीव रंचमात्र विषयसुख की लालसा से कैसे-कैसे उग्र दुःख भोगता है, परन्तु जिन्होंने इसमें सुख मान रक्खा है, उन विषयों में वास्तविक सुख का नाम निशान भी नहीं है। जो दुःख अत्यन्त क्रूर व्याघ्रादि जीवों के कारण से होता है, उससे भी अधिक दुःख इस विषयशत्रु के संसर्ग से सहने पड़ते हैं।

अत्यन्त रुष्ट राजा जो कुछ दण्ड दे सकता है, विषयशत्रु का दण्ड उससे कहीं बढ़कर है। अतिरुद्र कालकूट के विपाक से भी विषयों का विपाक अतिभयानक है। इस विषयशत्रुजनित दुःखों को भोगने की अपेक्षा काल के गाल में प्रवेश करना उत्तम है। दहदहाती अग्नि का दाह भी विषय दाह के सामने झक मारता है। आशी विष जाति के सर्पों के विष से भी इन विषम विषयों का विष उग्रतर है। जिन भोगों से बड़े-बड़े इन्द्र और चक्रवर्ती भी तृप्त नहीं हुए, उनसे हीनपुण्य इतर मनुष्य किस प्रकार तृप्त हो सकते हैं ? जिस नदी के प्रवाह में बड़े-बड़े उन्मत्त हाथी भी बह गये हैं, उसमें विचारे शशक की क्या अवस्था होगी ? जिन विषयों के सेवन से बड़े-बड़े ऋद्धिधारी देव भी सुख लाभ नहीं कर सके, उन विषयों के आसेवन से यह बिचारा क्षुद्र मनुष्य किस प्रकार से सुखी होगा ? जिस केशरीसिंह के सन्मुख बड़े-बड़े मदोन्मत्त हस्ती भी गलितमद हो जाते हैं, उस क्रूर सिंह के सामने पददलित मृग की क्या दशा होगी ? यदि नदियों के जल से समुद्र तृप्त हो जावे और ईन्धन से अग्नि तृप्त हो जावे तो कदाचित् यह प्राणी भी विषयों से तृप्त हो सकता है, परन्तु जब यह जीव भोग-भूमि और स्वर्गों के सुख से ही तृप्त नहीं हुआ तो काने गन्ने के समान मनुष्य जन्म के सुखों से किस प्रकार तृप्त हो सकता है। समुद्र के जल से जिसकी प्यास नहीं बुझी, तो भला छोटे-छोटे क्षित्यंकुरों की ओस से उसकी प्यास किस प्रकार बुझेगी।

जो प्राणी इस विषय-शत्रु से प्रेरित हो अपने शरीर तथा कुटुम्ब के अर्थ घोर पापाचरण करते हैं, वे नरकों की घोर वेदना के पात्र होते हैं। यहाँ यह प्राणी घोर पापाचरण से जिस द्रव्य का सम्पादन करता है, उस द्रव्य का परिजन पुत्रकलत्रादि सब उपभोग करते हैं, परन्तु जब उस घोर पाप के फल भोगने का समय आता है, तब उस दुःख का बँटबारा करने को कोई पास भी नहीं फटकता है। नरकादिक के दुःखों की कथा को रहने दीजिये, यहीं पर चोर जिस धन को चोरी करके लाता है उसका उपयोग तो उसके समस्त कुटुम्बीजन करते हैं, परन्तु जेलखाने की हवा उस बिचारे अकेले को ही खानी पड़ती है, परन्तु बड़े आश्चर्य की बात है कि, यह सब बात प्रत्यक्ष देखता हुआ भी यह जीव पापाचरण से उपेक्षित नहीं होता।

प्यारे पाठको ! विषय भोगों से विरक्त महात्माओं को जो सुख होता है, इन्द्र और चक्रवर्तियों का विषयजन्य सुख उसके अनन्तवें भाग भी नहीं है। इसीकारण यदि सच्चे सुख की वांछा है, तो शिव सुख के कारण भूत धर्म का साधन करो।

बड़े कष्ट से प्राप्त हुए कल्पवृक्ष सदृश मनुष्य जन्म को यदि भोगों में नष्ट कर दोगे तो फिर मनुष्य जन्म का संयोग दुर्लभ हो जायेगा, परन्तु यदि यह मनुष्य दीर्घसंसार के कारणभूत विषम विष समान विनश्वर काम भोगों को छोड़ देता है तो नरक भूमि के घोर दुःखों को किस प्रकार प्राप्त होता ? कामिनी संभोग में जो इस जीव ने सुख मान रखा है, वह भी इसका भ्रम है, क्योंकि जब श्वान हड्डी को मुख में डाल कर चूसता है, तब हड्डी की तीक्ष्ण नोंक से छिदकर उसके मुख से ही रुधिर निकलता है। जिसके आस्वादन से अपने को सुखी मानता है। ठीक वैसी ही अवस्था कामिनी संभोग में है। कामिनी संसर्ग से निज तनुजनित-स्वेद विशेष के निकलने से ही यह प्राणी अपने को सुखी मानता है।

यदि वास्तव में देखा जावे तो सन्तोष के समान जगत् में कोई सुख नहीं है और तृष्णा के समान कोई दुःख नहीं है। इस कारण जिन महानुभावों ने इन विषयों में तृष्णा का त्याग करके दिगम्बरीय दीक्षा का अवलम्बन किया है वे ही धन्य हैं और मद मदन कषाय शत्रुओं के वशीभूत होकर विषय विसर्जन नहीं किया और नरकादिक के घोर दुखों से भयभीत नहीं हुए तथा संसार शरीर और भोगों से जिनको विरक्तता नहीं हुई उनका मनुष्य जन्म पाना ही निष्फल है।

स्वजन, पुत्रकलत्र, माता-पिता, भाई, मित्र, धन, यौवन, बल, वीर्य, आयु और शरीर इत्यादि समस्त सामग्री को चपला चमत्कारवत् क्षणभंगुर देखता हुआ भी यह मूढ़ात्मा आत्मकृत्य से विमुख हो रहा है यह बड़े दुख की बात है। इसकारण जो सच्चे सुख की अभिलाषा है, तो संसार मार्ग से विरक्त होकर मोक्षमार्ग में रमण करो ! विषयों का सङ्ग करो, युवति-सुख को छोड़कर शमसुख का अवलम्बन करो। धर्म्यकृत्य को दैव के ऊपर छोड़कर पौरुषहीन हो जाना, कदापि न्यायसङ्गत नहीं हो सकता। यत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्धि नहीं होय तब ही दैवापराध मानना उचित है। इसकारण सुख के वांछकों को उचित है कि, निरन्तर भगवत्पादारविन्द में भक्तिपूर्वक आत्मतत्व की भावना भावें। विषय सुख से विरक्ति-पूर्वक समस्त सत्त्व वर्ग में मित्रता धारण करें। शास्त्राभ्यास कषायों के उपशम और संयम के धारण करने में अपनी शक्ति का उपयोग करें और दूसरों के दोष सम्बन्ध में एकता का अवलम्बन करें।

नवम पर्व

पहर भर दिन चढ़ चुका है। पथिक जन मार्ग-क्रमण कर रहे हैं। छोटे-छोटे व्यापारी आस-पास के ग्रामों से नानाप्रकार की व्यापारी वस्तुयें घोड़े, बैलों तथा गाड़ियों पर लादे हुए गंवारी गीत गाते हुए नगर की ओर जा रहे हैं। मार्ग के दोनों ओर छोटे-छोटे बरसाती जलाशय भर रहे हैं। उनमें मेढकों ने अपना बाजार गर्म कर रक्खा है, वृक्षलता पर इस समय विशेष सजीवता दृष्टि-गोचर होती है। उनमें छिपी हुई झिल्लियों की झनकार ग्राम-वासियों को बड़ी प्रियकर लगती है।

इस समय एक युवती भगवा वस्त्र परिधान किये हुए बिलासपुर की ओर जा रही है। उसके कन्धे पर एक भिक्षा की झोली और हाथ में एक सितार है। कभी-कभी मौज में आकर वह सितार के एक दो तारों पर ठोकर लगा देती है, तो पथिकजन आशान्वित नेत्रों से उसकी ओर देखने लगते हैं। वह युवती वस्त्रभूषादि तथा रंग-ढंग से जोगिन-सी जान पड़ती है, इसलिये हम इसे कुछ समय तक जोगिन ही कहेंगे।

जोगिन मार्गातिक्रमण करके बिलासपुर में पहुँची और नगर में दो चार गलियों में थोड़ी देर घूमघाम कर सुशीला के महल के नीचे पहुँच कर गाने लगी। जोगिन ने ऐसी बढ़िया ठुमरी गाई कि सुशीला उसको सुनकर चकित हो गई। उसने शीघ्र ही एक लड़की को भेजकर जोगिन को महल में बुला लिया और और गाना सुनने की इच्छा प्रकट की। आज्ञा पाते ही जोगिन ने दो चार अच्छी-अच्छी ठुमरी सुनाई। सुशीला अतिशय प्रसन्न होकर इसे एक अशरफी देने लगी, परन्तु जोगिन ने अशरफी नहीं ली। झुक के प्रणाम कर बड़ी लापरवाही के साथ खाली हाथ महल के बाहर हो गई।

जोगिन की इस निस्पृहता को देखकर सुशीला और उसकी सखियाँ चकित हो रही थीं, परन्तु रेवती नाम की मुख्य सखी ने उसकी चाल-ढाल पर एक भेद भरी विलक्षण दृष्टि फेंकी और उसके चले जाने पर उसके विषय में बड़े गौर से विचार करने लगी। इसको इसप्रकार गंभीर विचार में डूबी हुई देखकर सुशीला से नहीं रहा गया। वह पूछ बैठी-
सुशीला - क्यों रेवती ! आज तू किस विचार में डूब रही है ?
रेवती- कुछ नहीं, ऐसे ही कुछ सोच रही थी।
सुशीला -आखिर उसका कुछ नाम भी तो होगा ?
रेवती-मैं इस जोगिन के विषय में ही कुछ विचार कर रही थी।
सुशीला-क्यों इस पर भी कुछ सन्देह हो गया क्या ?
रेवती-हाँ मेरी समझ में इस जोगिन के वेष में कुछ गुप्त रहस्य है।
सुशीला-( आतुरता से) सो क्या ?
रेवती-जान पड़ता है, कोई पुरुष जोगिन के वेष में किसी गुप्त मतलब से यहाँ आया था ?
सुशीला-रेवती ! तुझे बैठे बिठाये खूब मतलब सूझा करते हैं। भला ! तुझे कैसे मालूम हुआ कि वह पुरुष था ?
रेवती-उसके रंग-ढंग कुछ ऐसे ही नजर आते थे, परन्तु कुछ चिन्ता नहीं है। जब एक बार आया है, तो फिर भी आवेगा। अब की बार ऐसा छकाऊँ, कि वह भी याद करे।

इसप्रकार कह कर रेवती वहाँ से उठ खड़ी हुई और जोगिन के विषय में छानबीन करने लगी। उधर जोगिन महल से निकलते ही छुमन्तर हो गई और फिर बिलासपुर में कहीं उसकी शकल नजर नहीं आई।

दशम पर्व

दूसरे दिन प्रातःकाल ही सुशीला सुखशय्या से उठकर बैठी हुई पंच नमस्कार मंत्र का स्मरण कर रही थी कि, अचानक उसकी नजर पलंग पर पड़े हुए बन्द लिफाफे पर पड़ी। जिस पर उसका नाम और राजकुमार उदयसिंह की मुहर लगी हुई थी। उसे देखते ही वह चौंक पड़ी और घबड़ा कर रेवती ! रेवती ! इसप्रकार जोर से पुकारने लगी। सुशीला के जीवन में यह एक नवीन और अस्वाभाविक घटना थी।

सुशीला की घबड़ाई आवाज सुनकर रेवती दौड़ती हुई आई और बड़ी शीघ्रता से बोली-

रेवती - क्यों बाई ! तुम इतनी घबड़ा क्यों रही हो ?

सुशीला-देख तो सही ! बात ही घबड़ाने की है, इस लिफाफे को तो देख ?

रेवती ने सुशीला के हाथ से लिफाफा ले लिया और खोलकर आद्योपान्त बांच चुकने पर फिर सुशीला के हाथ में दे दिया। पत्र में इसप्रकार लिखा हुआ था।

।। श्री जिनाय नमः ।।

प्रिय-सुशीले ! जिस दिन से तुम्हारी मनोहर-मूर्ति को उस बाग में झूलते हुए देखा है, उस दिन से मेरा मन मेरे हाथ में नहीं रहा है। रात्रि-दिन तुम्हारी त्रिभुवन मोहिनी मूर्ति मेरे नेत्रों के सामने झूलती रहती है। क्या इस समय जैसे तुम मेरे हृदय और नेत्रों के सन्मुख विराजमान रहती हो, उस तरह कृपा कर मेरे शरीर के समीप भी बैठोगी ? हाय ! तुम्हारे शीतल शरीर की वियोग ज्वाला मुझे झुलसाये डालती है, क्या उसकी शान्ति करके अपनी स्वाभाविक कोमलता का परिचय दोगी ? इत्यलम्। अधिक क्या लिखूँ ? तुम स्वयं बुद्धिमती हो।

शुभमिति : श्रावण सुदी-14
प्रणयाभिलाषी
उदय

इस पत्र को पढ़कर सुशीला छक्क हो गई। रेवती के नेत्र क्रोध के मारे अरुण हो गये और होठ फड़कने लगे। कोमलाङ्गी सरला रेवती की उस समय की वीरमूर्ति देखने योग्य थी। वह हाथ मल-मल के सुशीला से कहने लगी-क्या करूँ, अबकी बार गफलत में मारी गई लेकिन फिर भी कुछ चिन्ता नहीं है। अब की बार उस हरामजादे को सजा दिये बिना नहीं रह सकती। ऐसा कहकर अपने प्रयत्नों में दत्तचित्त हुई। भोली सुशीला इस मामले को कुछ न समझ सकी और चकित नेत्रों से देखती ही रह गई। रेवती से कुछ विशेष वार्तालाप न कर सकी।

हमारे दूरदर्शी पाठक समझ गये होंगे कि यह सब कार्यवाही बलवन्तसिंह की है। जोगिन के वेष में यही बलवन्त सुशीला के महल में भेद लेने को आया था और दूसरी बार उदयसिंह की मुद्रायुक्त चिट्ठी भी सुशीला के पलंग तक इसी ने पहुँचाई थी। आजकल उदयसिंह भी बिलासपुर में आ गया है। दोनों एक कोठरी किराये से लेकर गुप्त वेष से नगर में रहते हैं और अपने षड्यन्त्र चला रहे हैं।

आधी रात बीत चुकी है। चारों ओर अन्धेरा छाया हुआ है। मेघों ने आसमान को सर्वथा ढक रक्खा है, अतः चेष्टा करने पर भी कहीं कुछ नजर नहीं आता, कभी-कभी उस अविरल अन्धकार को फाड़कर बिजली चमक कर लुप्त हो जाती है। ऐसी भयावनी रात्रि में बलवन्तसिंह और उदयसिंह दोनों सुशीला के महल के पीछे आये और एक कमन्द लगाकर खिड़की के मार्ग से सुशीला के शयन-गृह में पहुँच गये।

सुशीला एक सुन्दर सुसज्जित पलंग पर दुशाला ओढ़े सो रही है। मनोहर मुख मण्डल का कुछ भाग उघड़ रहा है। उस पर केशकलापों की एक लट पड़कर ‘लोभते अमियके अहि चढ़्यो चन्द्रपे’ की कल्पना उद्भूत कर रही है। उदयसिंह का हृदय आनन्द से उत्फुल्ल हो गया। सत्-असत् का विचार किये बिना ही वह उस सरला निष्पाप-निष्कलंक कन्या को हाथ पकड़ के उठाने लगा, परन्तु उठा नहीं सका! सुशीला का बदन सर्वथा शीतल और ढीला-सा देख के वह चौंक पड़ा और बलवन्त को नजदीक बुलाके कहने लगा।

उदय-बलवन्त ! देखो तो सही ! इसका बदन ठण्डा क्यों पड़ गया है。

बलवन्त-(नाड़ी पर हाथ रख के) अरे ! यहाँ तो नाड़ी का भी पता नहीं है。

उदय-और ये देखो तो श्वास भी तो नहीं, परन्तु इसके शरीर में से सुगन्ध बड़ी मजेदार आ रही है。

बलवन्त-ठीक कहते हो ! पर मुझे तो इसमें कुछ सन्देह होता है。

उदय-ए ! और मेरा मस्तक क्यों घूमता है ?

इतना कहते-कहते उदयसिंह जमीन पर ढुलक पड़ा और उसके कुछ ही पीछे बलवन्त ने अपने पैर फैला दिये। दोनों की चेतना विदा हो गई。

ग्यारहवां पर्व

प्रातःकाल का समय है। उदयाचल पर्वत की ओट में से निकलकर ज्यों ही सूर्यदेव ने झुक के देखा कि अन्धकार महात्मा रफूचक्कर हुए, उन्होंने लौट के पीछे को देखा भी नहीं। उनके साथ चोर व्यभिचारी और उलूक भी नौ दो ग्यारह हो गये। मरीचिमाली सूर्य गगन मण्डप के सिंहासन पर आ विराजे। उनके आते ही अराजकता से सन्त्रस्त संसार प्रसन्नचित्त दिखलाई देने लगा और लोग अपने-अपने इष्ट कार्यों में दत्तचित्त हुए राज मार्गों पर आने जाने लगे।

इस समय बिलासपुर के राज भवन के एक बड़े कमरे में राजा विक्रमसिंह का दरबार लगा हुआ है। दरबार मामूली है और उसमें मंत्री, सेनापति आदि खास-खास आदमी यथास्थान बैठे हुए हैं। एक ओर रेवती हाथ जोड़े निम्न दृष्टि किये हुए खड़ी है, सामने चार सिपाही हथकड़ी बेड़ियों से विवश दो कैदियों को लिये खड़े हैं, उनके हाथ में नंगी तलवारें चमक रही हैं। कैदी बड़ी घृणा के साथ रेवती की ओर देख रहे हैं। इसी कमरे की दाहिनी ओर एक चिक पड़ी हुई है, उसके भीतर से रानी मदनवेगा और कन्या सुशीला इस दृश्य को देख रही हैं, दरबार में मानसिक उछल कूद के सिवाय सब प्रकार सब तरह से शांतिता विराजमान है। थोड़ी देर में महाराज ने रेवती की ओर देख के पूछा-क्यों रेवती ! इन लोगों के विषय में तू क्या कहना चाहती है ?

रेवती-महाराज ! आज रात को श्रीमती सुशीला के महल में मैंने इन दोनों को गिरफ्तार किया है। ये लोग बदनियत से महल में घुसे थे, उसे मैं पहले से जानती थी, इस कारण सब प्रकार से सचेत थी। यही कारण है कि आज मैंने बड़ी सरलता से महाराज के चरणों के प्रसाद से इन्हें गिरफ्तार कर लिया। मैं आशा करती हूँ कि इनकी गुस्ताखी का इन्हें उचित दण्ड दिया जावेगा।

महाराज-(रेवती से) ठीक है, इनकी करतूतों का फल इन्हें चखाया जावेगा। (मंत्री से) शूरसेन ! इन महात्माओं से इनका परिचय तो पूछो ?

शूरसेन-( एक से ) क्यों तुम्हारा नाम क्या है ?

एक-कुछ नहीं।

शूरसेन-( दूसरे से ) और तुम्हारा ?

दूसरा- सब कुछ।

रेवती-महाराज ! इससे कुछ लाभ नहीं निकलेगा। ये इस तरह कुछ नहीं बतावेंगे। मैं इनका सब भेद जान चुकी हूँ। इनमें से ये ( एक की ओर इशारा करके ) तो सुवर्णपुर के महाराज निहालसिंह के सुपुत्र उदयसिंह हैं और ये ( दूसरे की ओर इशारा करके ) इन्हीं के मित्र बलवन्तसिंह हैं। दोनों ने ही बड़े अच्छे कार्य पर कमर कसी है। बड़ों की शोभा इसी में है।

महाराज-( मंत्री से ) अच्छा तो इन्हें अब होशियारी से कैदखाने की हवा खिलाओ। महलों की गन्दी हवा खाते-खाते बेचारों की नाकों में दम आ रही होगी।

शूरसेन-बहुत अच्छा।

इतना कहकर शूरसेन दोनों कैदियों को अपने साथ लेकर वहाँ से उठ खड़े हुए और उनको बन्दोबस्त के साथ कैदखाने में भेज दिया। इसके बाद दरबार बरखास्त कर दिया गया। महाराज अन्तःपुर में चले गये। सुशीला अपनी सखी रेवती के साथ अपने महल को चली गई।

द्वादशवां पर्व

रात्रि को 10 बजे हैं। महाराज अपने शयनागार में महारानी मदनवेगा के साथ एक सुसज्जित पलंग पर तकिये के सहारे से बैठे हुए एक बड़े गम्भीर विषय में बातचीत कर रहे हैं।

मदनवेगा-महाराज ! सुशीला निरी बालिका नहीं रही है। यह मैं आप से कई बार कह चुकी हूँ, परन्तु खेद है कि आप ध्यान नहीं देते। हम स्त्रियों की बुद्धि ओछी गिनी जाती है, इसलिये हमें आपके अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। यह ठीक है, परन्तु इस विषय का अनुभव जितना स्त्रियों को होता है, मैं समझती उतना आपको नहीं होगा, इसलिये पुनः-पुनः प्रार्थना करती हूँ। सुशीला की अवस्था 14 वर्ष की हो चुकी है। उसके साथ की अनेक लड़कियों को मैंने देखा है कि वे पूरी गृहिणी हो चुकी हैं, उनकी गोद में छोटे-छोटे बालकों को देखकर उनकी माताओं को कितना हर्ष न होता होगा ? क्या मैं अपनी सुशीला को भी इसी भाव से देखूँगी ? नगर की अनेक बड़े-बड़े घरों की स्त्रियाँ मुझे प्रतिदिन उलाहना देती और ताने मारती हैं कि सुशीला के विवाह की अपने यहाँ अभी तक चर्चा भी नहीं है।

विक्रमसिंह- प्रिये ! मैं आज तुम्हारे प्रस्ताव पर प्रसन्न हूँ और बहुत शीघ्र सुशीला के योग्य वर की तलाश करूँगा, परन्तु अभी तक तुम्हारा और तुम्हारे नगर की स्त्रियों का आक्षेप व्यर्थ ही है, क्योंकि शास्त्र में व्यवहार प्राप्त होने पर ही कन्याओं का विवाह करना योग्य कहा है और इस बात को तुम स्वयं जानती हो कि सुशीला में अभी तक व्यवहार की योग्यता नहीं आई है। अपनी सुशीला बड़ी बुद्धिमती कन्या है, उसमें किसी के भी आक्षेप को जगह नहीं है।

मदनवेगा-महाराज ! यह ठीक है, अपनी सुशीला सचमुच एक देव कन्या है। उसे अपने पढ़ने-लिखने से कभी फुरसत ही नहीं मिलती, नित्य नवीन ग्रन्थों को लिखवा कर मंगाने और स्वतः लिखने पढ़ने के सिवाय उसे मैंने कभी सखी सहेलियों में हँसी ठठोली करते नहीं सुना और ऐसी वैसी सखियों का उसके पास निर्वाह भी तो नहीं है। अभी कल ही एक सखी को उसने मर्यादा रहित हँसी करते देख महलों से निकलवा दिया है। मैं देखती हूँ, नगर की जितनी पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ हैं वे उसके पास रोज आती हैं और घड़ी दो घड़ी ग्रन्थ चर्चा करके प्रसन्नता से जाती हैं।

विक्रमसिंह- इसके सिवाय तुम्हें यह भी जानना चाहिये कि छोटी उमर में विवाह कर देने से भावी सन्तान बहुत कमजोर होती है, जिससे संसार का अकल्याण होता है। जिन बालक बालिकाओं के छोटी उमर में ही विवाह हो जाते हैं, उनका पारस्परिक स्नेह नष्ट हो जाता है और वे प्रायः आरोग्यता से हाथ धो बैठते हैं। हमारे क्षत्रिय कुल में सदा से प्रौढ़ विवाह होते आये हैं। यही कारण है कि हम में अब तक वीरता बनी हुई है। तुमने जिन बालिकाओं के सन्तान सुख को देखकर सुखी होना चाहा है, वह सुख दिखावटी और अविचारितरम्य है। यदि प्रौढ़ विवाह के मर्म को समझ जाओगी तो शीघ्र ही तुम्हारा वह भ्रम भी दूर हो जावेगा। बालकों के माता-पिता ही अपनी सन्तानों को सुखी-दुःखी करने के कारण है। विवाह कार्य गुड़ियों का खेल नहीं है, यह बड़ा गम्भीर और विचारणीय कार्य है। बालकों के लालन-पालन पर जितना ध्यान देने की आवश्यकता है, उससे कई गुना इस ओर ध्यान देना चाहिये। सुशीला के विवाह के विषय में मैंने कभी विचार नहीं किया अथवा ध्यान नहीं दिया, ऐसा समझना तुम्हारी भूल है। मैं निरन्तर इसकी चिन्ता रखता हूँ, परन्तु अभी तक किसी स्थान और योग्य वर के न मिलने से ही मैं चुप हो रहा था।

मदनवेगा- प्राणनाथ ! यह सचमुच मेरा भ्रम था। मैंने नहीं जाना कि आप स्वयं इस विषय में इतना मनन कर रहे हैं, परन्तु दासी की हीन बुद्धि में यह बात नहीं आती कि देश भर में कोई योग्य वर और स्थान नहीं मिला सो कृपा करके समझा दीजिये।

विक्रमसिंह-(मुस्करा के) स्त्रियों की बुद्धि बाहरी दृश्यों में जल्दी अनुरक्त हो जाती है। वस्त्राभूषणों से लदा हुआ और हाथ पैर से सुडौल पुरुष देखा कि उनका जी पानी-पानी हो जाता है, परन्तु किसी पदार्थ के बाह्य सौन्दर्य पर रीझ के उसकी उत्तमता-अनुत्तमता का निर्णय कर बैठना बड़ी भारी भूल है। इन्द्रायण का
फल देखने में बड़ा प्यारा होता है, परन्तु उससे कई गुना कड़ुआपन
भी उसमें रहता है, अतएव स्थान और वर की योग्यता अयोग्यता
की जाँच लक्ष्मी और सुन्दरता से नहीं, किन्तु शिष्टता और बुद्धिमत्ता
से करना चाहिये, यही कारण है कि मैं अभी तक सुशीला के योग्य
वर और स्थान का अन्वेषण नहीं कर सका। सुशीला के समान ही
गुणवान रूपवान वर और सब प्रकार से सुख सम्पन्न घर ढूँढना
हमारा परम कर्तव्य है और अब तुम समझ सकती हो कि ऐसे योग्य
वर और घर को शोधना कितना मुश्किल कार्य है।

मदनवेगा-महाराज! आपका विचार बड़ा सुन्दर है। मेरी
सुशीला बड़ी पंडिता है, उसे उसी के समान विद्वान् पति मिलेगा
तब ही वह सुखी हो सकेगी, इसमें सन्देह नहीं है। कल सुशीला की
अध्यापिका को बुलाकर मैंने इस विषय में बातचीत की थी, सो
उन्होंने भी कहा था कि हमारी सरस्वती* को बृहस्पति के समान ही
वर ढूँढना चाहिये। वे और भी कहती थीं कि सरस्वती कोई
साधारण बालिका नहीं है, उसके पांडित्य को देखकर दाँतों में
अंगुली दबानी पड़ती है।

विक्रमसिंह-अध्यापिका का कहना असत्य नहीं है,
सरस्वती साक्षात् सरस्वती ही है। यदि तुम्हारी सम्मति हो तो
सुशीला का स्वयंवर मंडप रचने की इच्छा है। मेरे एक वृद्ध मंत्री ने

  • पाठकों को याद होगा कि सरस्वती सुशीला की उपाधि थी।

कहा है कि स्वयंवर मण्डप में सुशीला को शास्त्रार्थ करके जो राजकुमार जीत लेवे, उसी को वरमाला पहनाई जावे। मंत्री की उक्त सम्मति बहुत योग्य समझता हूँ, अब केवल तुम्हारी आज्ञा लेने की आवश्यकता है क्योंकि तुम सुशीला की माता हो।
मदनवेगा-(मुस्करा के लज्जित होके) धन्य है! मैं सुशीला की माता हुई पर आप कोई नहीं। हँसी को आप से कभी छुट्टी भी मिलती है।
विक्रमसिंह-जी! जहाँ श्रीमती विराजमान है, वहाँ कमबख्त हँसी खुशी को छुट्टी कहाँ? आपकी नजर ओट में हुई कि वह भी रफूचक्कर होती है।
मदनवेगा-बस! रहने दो जी ये चोचले, मुझे इसप्रकार की बड़ाई करके कीचड़ में न घसीटा करो। मैं आपकी चरणदासी हूँ। मेरे शरीर पर भी आपका पूरा अधिकार है, तब अन्य विषयों के अधिकार का छप्पर मेरे सिर पर रखना मुझे खिजाना ही है।
विक्रमसिंह-(रानी की ठोड़ी पकड़ के मुस्कुराते हुए) अच्छा देवी जी! तो आप क्रोध न करें, आप ही की जीत सही। क्षमा कीजिये अब रात्रि बहुत बीत गई है, अतः शयन करने की आज्ञा दीजिये।
मदनवेगा-(पाँवों में पड़के और खीज के) भगवान जाने आप कभी ताने मार-मार के तृप्त होंगे कि नहीं, मैं तुम्हारे पाँव पड़ती हूँ, मुझे यों पाप में मत घसीटो।

त्रयोदशवां पर्व

रात्रि के दो बज चुके हैं। चारों ओर प्रकृति देवी की शान्तिता विराजमान है। कंचनपुर की गलियों में पुलिस के सिपाही आवाज लगा-लगा कर पहरा दे रहे हैं और कहीं-कहीं उनका अनुकरण करके कुत्ते भौंक रहे हैं। इन बेचारों को अभी तक इन नौकरी के वेतन का कहीं से प्रबंध हुआ कि नहीं सो किसी अखबार में नहीं पढ़ा। पराधीन पहरुओं के सिवाय नगर के सब अमीर-गरीब सुखनिद्रा ले रहे हैं। इस समय रतनचन्द्रजी के कमरे में हम उसकी स्त्री रामकुंवरि को पेट के दर्द से व्याकुल देखते हैं। रतनचन्द्र पलंग पर एक ओर सो रहा है। रामकुंवरि का दर्द बहुत बढ़ गया, इसलिये वह धैर्य नहीं बांध सकी और जोर-जोर से चिल्लाने लगी। उसके चिल्लाने से रतनचन्द्र जाग के उठ बैठा और हक्का बक्का-सा होके वैद्य को बुलाने की तजवीज करने लगा। नौकर को पुकारा, परन्तु कुछ उत्तर न मिलने से वह स्वयं अपने हाथ में एक लकड़ी लेके वैद्य के यहाँ जाने को चल खड़ा हुआ।

वैद्य के घर का रास्ता रतनचन्द्रजी की दुकान के पास से होकर ही गया है। सो ज्यों ही रतनचन्द अपनी दुकान के सामने पहुँचा कि उसने एक आदमी को अपनी दुकान के जीने पर से ऊपर जाते हुए देखा। उस आदमी का सारा शरीर काले कम्बल से ढका हुआ था और हाथ में कोई हथियार चमक रहा था। इस दृश्य को देखकर रतनचन्द्र अपनी श्रीमती की पीड़ा को भूल गये और कुछ सोच के तत्काल ही धीरे-धीरे दबे पैर उस आदमी के पीछे-पीछे जीने पर चढ़ गये। वह आदमी दुकान के कमरे में पलंग पर सोते हुए पुरुष का काम तमाम करने को ही था कि पीछे से लपक कर रतनचन्द्र ने उसका हाथ पकड़ लिया। हाथ पकड़ते ही उस घातक ने रतनचन्द्र की ओर फिर के देखा। देखते ही उसके देवता कूच कर गये और इधर घातक की सूरत देखते ही रतनचन्द्र के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।

पाठक ! आप चिन्तातुर न होइये, हम आपको बतलाये देते हैं कि ये घातक महाशय और कोई नहीं, रतनचन्दजी के सपूत हीरालालजी हैं। आप निरपराधी जयदेव का सिर काटने को आये थे, परन्तु उसमें रतनचन्द्र ने आकर विघ्न डाल दिया। पलंग पर बेचारा जयदेव सो रहा है, उसको खबर ही नहीं कि मेरे लिए कैसे-कैसे चक्र चल रहे हैं।

रतनचन्द्र हीरालाल के हाथ से तलवार छीनकर फिर उसे नीचे की दुकान में ले आया और कहने लगा-

रतनचन्द्र- रे पापात्मन ! तूने यह कैसा अधम विचार किया था ? छिः ! जयदेव सरीखे धर्मपरायण पुरुषरत्न पर भी तेरा यह हिंसक हाथ उठ सकता है ?

हीरालाल-जयदेव धर्मपरायण नहीं, अत्यन्त पापी और नराधम है और मैंने शीघ्र ही उसे यमपुर पहुँचाना अपना कर्तव्य समझा है।

रतनचन्द्र-(विस्मित होके) तेरे पास उसके अधर्मी साबित करने का कुछ सबूत है?

हीरालाल-हाँ। है और उसे आप भी जानते हैं, परन्तु आप जानबूझ के अंजान बन रहे हैं। उस दिन मौसी विमाता ने इसके अत्याचार का आपसे सब हाल कहा था, परन्तु जब आप उसे बिल्कुल पानी के घूंट पी गये, तब मैंने स्वयं ही उसको दण्ड देना उचित समझा।

रतनचन्द्र- क्या तुझे स्वयं जयदेव के अत्याचार का विश्वास है?

हीरालाल- हाँ। पूरा-पूरा विश्वास है और आपसे आज शपथ पूर्वक कहता हूँ कि यदि आप उसे घर से नहीं निकालेंगे तो मैं उसकी जान लिये बिना नहीं रहूँगा।

रतनचन्द्र-(कुछ सोचकर) अच्छा, आठ दिन के पहले-पहले मैं इसका निबटारा कर दूँगा, परन्तु याद रखना, तब तक कोई वारदात न होवे। यदि मेरी इस बात का कोई उल्लंघन करेगा तो अपने किये का फल पावेगा। इतना कहकर रतनचन्द वैद्य के यहाँ गया और कुछ औषधि लाकर उसने रामकुंवरि को खिलाई। खिलाते ही थोड़ी देर में उसकी पीड़ा शांत हो गई और तब दोनों सुख से सो रहे।

चौदहवां पर्व

जयदेव को कंचनपुर में रहते हुए बहुत दिन बीत गये। सुशीला के विरह और भूपसिंह के विछोह का कांटा उसके हृदय में उठते-बैठते, चलते-फिरते निरन्तर चुभा ही करता था और इधर रतनचन्द के घर की घटनाओं से, जो आजकल हुआ करती थी, उसका चित्त और भी चिन्तित रहता था, सो जयदेव के शरीर की दशा में परिवर्तन हो गया था। उसका निष्कलंक मुखमण्डल यद्यपि खूब तेजस्वी और कांतिमान था, परन्तु शोक चिन्ताओं की पीली कलई उस पर चढ़ गई थी। बड़ा भारी विद्वान् होकर भी जयदेव शोक चिन्ताओं से अलिप्त नहीं रह सका। यह ठीक है, परन्तु उसको कभी किसी ने चिन्तित और अन्यमनस्क नहीं देखा। वह सदा प्रसन्नमुख रहता था और अपने कार्य को बड़ी बुद्धिमत्ता से सम्पादित करता था। उसकी एकवाक्यता, सत्यता और सरलता से रतनचन्द की दुकान पहले से चौगुनी चल पड़ी थी।

आज प्रातः ही जयदेव की शरीर चेष्टा बहुत कुछ शोकाच्छन्न दीखती है। वह अभी शय्या त्याग कर उठा है, परन्तु ऐसा जान पड़ता है कि उसने रात्रि भर निद्रा नहीं ली। आज वह अपने मुख की शोकच्छाया को छुपाने की बहुत चेष्टा में है, परन्तु छुपा नहीं सकता। पुस्तकादि पढ़कर भी अपने चित्त को बहलाने का प्रयत्न किया, परन्तु निष्फल हुआ, आखिर पलंग से उठके बाहर आया और आवश्यक कार्यों से छुट्टी पाकर उसी समय रतनचन्द जी से एकान्त में जाकर मिला। दोनों में इसप्रकार बातचीत होने लगी-जयदेव-सेठ जी! मैं आपकी कृपा का बहुत आभारी हूँ। आपने बड़े संकट के समय आश्रय देके मेरा उपकार किया है, मैं उसे कभी भूल नहीं सकता। आज प्रार्थना यह है कि अनेक कारणों से अब मेरा यहाँ चित्त नहीं लगता है, इसलिये मुझे घर जाने की आज्ञा दीजिये।

रतनचन्द -जयदेव ! तुम सरीखे सच्चे सदाचारी पुरुष को मैं छोड़ नहीं सकता। न जाने क्यों मेरा जी तुम्हें बहुत चाहता है, परन्तु इधर कुछ दिनों से जब मैं तुम्हें एकांत में देखता हूँ तब तुम कुछ विशेष चिन्तित दीखते हो। तुम स्वयं बुद्धिमान हो, इसलिये चिन्ता नहीं करना चाहिये, यह शिक्षा भी नहीं दे सकता और दूसरी क्या चिन्ता है? यह जान भी नहीं सकता, जो कुछ कहूँ।

जयदेव-(नीचा मस्तक करके) सेठजी! आपकी कृपा और प्रेम को मैं जानता हूँ, और चिन्ता के फल को जानता हूँ, परन्तु क्या करूँ विवश हूँ। चित्त किसी तरह नहीं लगता और न आगे लगने का कुछ उपाय ही सूझता है, अतः लाचार प्रार्थना करता हूँ।

रतनचन्द-अस्तु, अब मैं इस विषय में कुछ आग्रह नहीं कर सकता, परन्तु एक जरूरी काम के लिये मुझे खेटपुर जाना है। वहाँ मुझे 8-10 दिन लगेंगे, तब तक ज्यों त्यों और भी तुम्हें रहना चाहिये। वहाँ से आते ही तुम्हारी विदा अवश्य कर दूँगा।

जयदेव-(चिन्तित होके) आपकी इच्छा! परन्तु जहाँ तक बने आप वहाँ अधिक दिन न लगावें क्योंकि मैं बहुत दुःखी हूँ।

रतनचन्द-नहीं! ऐसा नहीं होगा, मैं बहुत जल्दी आऊँगा। यह सुनके जयदेव वहाँ से चला आया और सेठजी ने अपने चलने की तैयारी की। आवश्यक सामग्री, दो घोड़े और दो सेवकों को लेकर रतनचन्द कंचनपुर से चल पड़े। कुछ दूर चलके उन्होंने सेवकों से कहा कि मुझको नजदीक के गाँव में कुछ काम है, सो मैं गाँव में से होता हुआ दूसरे रास्ते से खेटपुर पहुँचूँगा। तुम दोनों सड़क पर से सीधे चले जाओ और खेटपुर के बाहर जो पक्की सराय है, वहाँ ठहरना। मैं तुम से वहीं मिलूँगा। इतना कहकर रतनचन्द एक पगडण्डी पर से चल दिया। सेवक लोग सड़क पकड़े हुए चले गये।

पन्द्रहवां पर्व

“जागो! जागोरे! बटोही यहाँ चोरनि को डर है।”

सेठ रतनचन्द जी के चले जाने के कारण आज उनकी श्रीमती रामकुंवरि जी अकेली हैं। आपने भोजन के समय हीरालाल से कहा-देखो जी! इतनी बड़ी हवेली में मैं अकेली रहने वाली नहीं हूँ। यहाँ जब दिन में ही डर लगता है तब भला तुम ही कहो रात को मेरी क्या गति होगी? मैं जरूर मर जाऊँगी। सो यदि तुम्हें मेरे प्राण बचाना अभीष्ट हो तो यहीं आकर सोना। रामकुंवरि का यह प्रस्ताव हीरालाल को बिना कुछ हीलेके उसी समय स्वीकार करना पड़ा।

प्रतिज्ञानुसार रात के दस बजने पर हीरालाल दुकान से आया और ऊपर के एक सजे सजाये कमरे में जहाँ कि रतनचन्द सोया करते थे, जाके एक पलंग पर लेट गया। इस पलंग पर से दो तीन
गज के अन्तर पर एक और मसहरीदार पलंग बिछा हुआ था, उस
पर रामकुंवरि लेटी थी। सामने कमरे के बीचों-बीच एक सुन्दर
शमादान जल रहा था, उसके प्रकाश से कमरे के शृंगार की सम्पूर्ण
चीजें हँसती हुई मालूम पड़ती थीं। कमरे के चारों ओर की
खिड़कियाँ खुली हुई थीं। उनमें से हवा के मीठे-मीठे झोंके शरीर
से लग कर गुदगुदी पैदा कर रहे थे।

हीरालाल और रामकुंवरि दोनों की चढ़ती जवानी है, दोनों
के शरीर में उन्मत्तता की लालिमा रोम-रोम से फूट रही है और
दोनों ही संसार के अत्यन्त दुःखित परिपाक फल के स्वाद से
अपरिचित हैं। अतएव नहीं कह सकते कि आज इन दोनों का
सन्निकट शयन दोनों के लिये कैसा सुखकर तथा दुःखकर है।
कंचनपुर नगर के निवासी इस समय सुख की नींद सो रहे हैं। वे
इस बात से बिल्कुल बेसुध हैं कि हमारे नगर के एक एकांत कमरे
में संसार पथ के ये मुग्ध पथिक एक भयानक डाकू की नजर के
नीचे आ गये हैं। न जाने आज उनके परमधन की रक्षा होती है कि
नहीं, इस समय लज्जा और लोकमर्यादा ये दोनों पूज्य देवी इन
दोनों की रक्षा में सन्मुख उपस्थित हैं, परन्तु कौन कह सकता है कि
मूर्ख पथिकों को वह प्रबल पराक्रांत डाकू अछूते छोड़ देगा?
लज्जा और लोकमर्यादा क्या मदनसिंह डाकू के बाण के आगे ठहर
सकेंगी? नहीं, कदापि नहीं। आज मदनसिंह बड़े प्रबल हैं, यौवन, संपत्ति और अविवेकादि बड़े योद्धा उनके सहायक हैं। हाय ! आज बेचारे पान्थ अवश्य लुट जावेंगे। रतनचन्दजी की हवेली के सामने से चले जाते हुए एक पुरविये ने इसी समय एक कविता पढ़ी-

“जागो ! जागो रे बटोही! यहाँ चोरनि को डर है।”

परन्तु खेद है कि उन्मत्त पथिकों ने कवित्त के उक्त अन्तिम चरण पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। वह परम शिक्षाजनक पद कंचनपुर के ऊँचे-ऊँचे मकानों की दीवालों से टकरा कर वायुमंडल में विलीन हो गया।

हीरालाल के आने के बाद प्रायः एक घण्टे तक कमरे में सन्नाटा खिंचा रहा, मानों पड़ते ही दोनों को घोर निद्रा ने दबा लिया, परन्तु यथार्थ में उन दोनों के दिलों में बड़ी उछल कूद मच रही थी, केवल बाहिरी मौनावलम्बन था। लज्जा और मदन का द्वन्द्व-युद्ध बहुत समय तक चला। आखिर देखते ही देखते लज्जा की पक्ष के विवेक, विचार, सन्तोष आदि योद्धा पुष्पहार (काम) के तीक्ष्ण बाण से घायल होकर धराशायी हो गये और लज्जादेवी पलायोन्मुख हुई। हीरालाल ने लड़खड़ाती हुई जीभ से कहा- चाची ! जागती हो कि सोती ?

रामकुंवरि-हत्यारी नींद ने अभी कहाँ खबर ली है। क्यों ! कुछ काम हो तो उठूँ।

हीरालाल- हाँ ! मुझे इस समय खूब प्यास लग रही है। दया कर के थोड़ा सा शीतल जल पिला दो तो हृदय शीतल हो जावे।

रामकुंवरि-अजी, इसमें दया की कौनसी बात है, मैं अभी लाई। ( इतना कह कर रामकुंवरि पलंग पर से उठी और एक सुन्दर गिलास में जल भर के लाई और बोली ) लो पियो, मैं कैसा प्यारा ठंडा जल लाई हूँ।

हीरालाल-बड़ी दया की। ( पानी पीकर ) आज न जाने मुझे क्यों नींद नहीं आती।

रामकुंवरि-और यही हाल मेरा है, जब से पड़ी हूँ करवट बदल रही हूँ।

हीरालाल-तो फिर थोड़ी देर के लिये यहीं बैठ जाओ। कुछ बातचीत करके ही रात काटें।

रामकुंवरि-क्या हर्ज है ? ( ऐसा कहके हीरालाल के पलंग के पास ही एक कुर्सी पर बैठ गई और किंचित् मुस्करा के बोली ) तुम पीहर से अपनी बहू को क्यों नहीं लिवा लाते ! बहुत दिन हो गये, बेचारी तरसती होगी और इधर तुम भी तकलीफ उठाते हो।

हीरालाल-क्या करूँ ! काकाजी से लाचार हैं, उन्हें इस बात का कुछ ख्याल ही नहीं है।

रामकुंवरि-अजी ! उनकी मत कहो, वे तो अपनी माफिक सबको ही मिट्टी के समझते हैं। जरा कभी छेड़छाड़ की कि ज्ञान सुझाने बैठ जाया करते हैं। यह नहीं सोचते की नई उमर भी कोई चीज है ?

हीरालाल-(अंगड़ाई लेके) अजी। और नई उमर भी कैसी? जिसने दुनियादारी का कुछ भी नहीं देखा। दिल के हौंसले दिल में ही मार के रह जाना पड़ता है।

रामकुंवरि-परन्तु हौसले दबाने से दब नहीं सकते, जान पड़ता है, आज तुम इसी उधेड़बुन में लगे होंगे, इसी से नींद नहीं आई।

हीरालाल-अजी! कुछ मत पूछो, आज बड़ी तकलीफ है, न मालूम जी कहाँ-कहाँ जाता है।

रामकुंवरि-(जम्हाई लेके) जाता कहाँ होगा, बहुत दूर तो ससुराल तक।

हीरालाल-और क्यों जी! आपका!

रामकुंवरि-(धीमे स्वर से शरमा के) बस! अपने सरीखा मेरा भी समझो। हम तुम दोनों एक ही रोग से पीड़ित हैं।

हीरालाल-यह रोग की खूब सुनाई! भला इस रोग की चिकित्सा करने की भी इच्छा है या नहीं!

रामकुंवरि-(आँखें नीची करके) सो तो तुम ही जानो !

विचारशील पाठक! इसके आगे क्या हुआ? सो कहलाने की जरूरत नहीं है। जो सोचा था, वही हुआ। बेचारे अपक्व बुद्धि के पथिक प्रेम का प्याला पी के ज्यों ही आपको भूले कि उस चाण्डाल काम ने उन्हें लूट डाला। वे क्षणभर में शील-संयमादि रत्नों को खोकर राजा से रंक हो गये। दोनों के मुख पर कालिख फिर गई।

यह देख कमरे में जो शमादान जल रहा था, वह एक हवा के झोंके से गुल हो गया। उसने अपने प्रकाश में यह अन्धकार होना उचित नहीं समझा। कमरे की खिड़कियाँ भी फटफटाने लगी। यदि उनका वश होता तो शायद वे भी यह दुष्कृत्य देखने को वहाँ न लगी रहती। इतने में कमरे के पश्चिम की ओर से एक बड़ा भयानक शब्द हुआ, जिसे सुनके हीरालाल और रामकुंवरि दोनों चौंक पड़े। घबड़ा के ज्यों ही उन्होंने देखा कि सामने एक विकटाकार मूर्ति को देखा। उसका सारा शरीर एक काले कम्बल से ढका हुआ था और हाथ में एक तीक्ष्ण धार वाली तलवार थी। इस भयानक पुरुष को देखते ही दोनों एक बड़ी चीख मारके बेहोश हो गये।

मूर्ख पथिकों ! तुमने बिना विचारे ऐसे स्थान में डेरा किया, जहाँ एक क्षण भर भी कुशलता से नहीं बीत सकता था। हाय ! तुम लूट लिये गये। अब तुम अपने खोये हुए शीलरत्न को संसार का समस्त द्रव्य न्यौछावर करके भी नहीं पा सकते। अब संसार में तुम्हारा जीवन केवल भार रूप है। एक कवि कहता है-

“आपकी रति छाय रही जग में,
तो वृथा दिन चार जिये न जिये।”

सोलहवां पर्व

कंचनपुर से पाँच-छः कोस पश्चिम की ओर खेटपुर एक अच्छा कस्बा है। वहाँ सेठ रतनचन्दजी के एक परम-मित्र रहते हैं, जिनका नाम सेठ धनपालजी है। धनपालजी बड़े सौम्य और दूरदर्शी पुरुष हैं। रतनचन्दजी को वे बहुत मानते हैं और हृदय में प्रीति भी रखते हैं। दोनों का बहुत बड़ा घरोबा है, इसलिये दोनों के कार्य दोनों की सम्मति से हुआ करते हैं।

आज रतनचन्दजी उक्त सेठजी से मिलने को चले थे और यह विचार किया था कि उन्हें लौटते समय साथ में लेता आऊँगा। जब से उन्हें रामकुंवरि के चालचलन पर शक हुआ था और जब से जयदेव को व्यर्थ कलंक लगाने का रामकुंवरि की ओर से प्रपंच रचा गया था, तब से रतनचन्दजी का चित्त ठिकाने नहीं रहता था, उसे गृहस्थाश्रम से बहुत कुछ विरक्तता आ गई थी और इसलिये तत्सम्बन्धी विचार करने के लिये वह अपने मित्र से मिलना चाहता था, परन्तु कार्याधिकता से अब तक उसकी वह इच्छा पूर्ण नहीं हुई थी। आज सबेरे जब जयदेव ने उससे विदा मांगने का प्रस्ताव किया तब उसे मित्र से मिलने का विचार सहसा करना पड़ा, क्योंकि जयदेव के चले जाने पर दुकान का कार्य कैसे चलेगा? यह उसे बड़ी भारी चिन्ता चढ़ गई। हीरालाल में इतनी योग्यता और गुरुता नहीं थी कि वह दुकान चला सके, परन्तु कंचनपुर निकलते ही एक दो अपशकुन ऐसे हुए कि उनके फलों के विचार में रतनचन्द का हृदय धड़कने लगा। उसका साहस नहीं हुआ कि आज कंचनपुर छोड़ के अन्यत्र चला जाऊँ, परन्तु घर से निकल पड़ा था, इसलिये ज्यों का त्यों लौटना योग्य नहीं समझा और तब नौकरों को खेटपुर की धर्मशाला में ठहरने की आज्ञा देकर एक पगडंडी से चल पड़ा इसके पहले पर्व में पाठक यह बात जान चुके हैं।

यह पगडंडी वायव्य की ओर जो एक छोटा-सा ग्राम था, वहाँ को गई थी। रतनचन्द वहीं को चल पड़ा और ग्राम के बाहर एक अमराई की सघन और शीतल छाया देखकर ठहर गया। एक झाड़ से घोड़े को बांध दिया और आप एक कम्बल बिछा के पास ही एक झाड़ की छाया में बैठ गया। यह स्थान कंचनपुर से केवल दो कोस के फासले पर था।

गृहजंजाल में फंसे हुए जीव को एकान्त मिलने से आनन्द की जगह निरानन्द का अनुभव होता है। जहाँ योगियों को शान्ति मिलती है, वहीं गृह-जंजालियों पर अशांति का पहाड़ टूट पड़ता है। जहाँ योगी आत्म-स्वरूप का अनुभव करते हुए अनन्त कर्मों की निर्जरा करते हैं, वहीं परिग्रह पिशाच के पंजे में फंसे हुए प्राणी जड़रूप संसार को भयानक रूप धारण किये हुए देखते हैं और जहाँ उन्हें सर्वथा निराकुलता प्राप्त होती है, वहीं संसारी जीवों को तमाम चिन्तायें एक दम आ दबाती हैं। रतनचन्द की उस एकांत आराम में यही दशा हुई। अपने कलंकी संसार की नाना विचार तरंगों में वह डूबने उछलने लगा। वैराग्य भावनाओं से सहारा लेकर उसने बहुत कुछ चाहा कि इन तरंग मालाओं से पार हो जाऊँ, परन्तु कुछ फल नहीं हुआ। धीरे-धीरे संध्या हो गई। प्रभाकर महाराज आँखें मिलाते-मिलाते मुँह ढकने की ताक में लगे। प्रतीचीदेवी उनकी यह दशा देख धीरे-धीरे विकट रूप धारण करके कोप परिस्फुटित लाल-लाल आँखें दिखाने लगी, परन्तु इस ललाई का फल कुछ भी नहीं हुआ, वे धृष्ट नायक बनके चल ही दिये।

उनके जाने की देर थी कि अन्धकार महाशय भूमि, वृक्ष, लता, पत्रादिकों पर क्रम से काले परदे पड़ गये। ऐसा जान पड़ने लगा, मानों यामिनी कामिनी को वैधव्य दीक्षा देने के लिये काली साड़ी पहिनाई गई है। इस समय रतनचन्द सेठ को बड़ा वैराग्य उत्पन्न हुआ। उनके देखते-देखते जिस संसार में प्रकाश ही प्रकाश था, अन्धकार ही अन्धकार दीखने लगा। यद्यपि ये प्राकृतिक घटनायें प्रतिदिन हुआ करती हैं और देखने में भी प्रतिदिन ही आती हैं, परन्तु आज रतनचन्द के खिन्न हृदय पर उन्होंने बहुत असर किया। उस अन्धकार पूर्ण रात्रि में उसके मुख से अचानक निकल पड़ा कि ‘नहीं! अब इस असार संसार में रहने की आवश्यकता नहीं है। कल ही इसका निबटारा कर डालना चाहिये’। इस वाक्य के निकलते ही तारागणों के ब्याज से गगन-मण्डल ने हँस दिया। उसके सामने जो एक बादल का काला टुकड़ा पड़ा था, वह उसी समय अलग हो गया। रतनचन्द जी की बुद्धि का परदा भी हम समझते हैं, इसी समय अलग हट गया।

यद्यपि रतनचन्द को घर जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी और वह जाना भी नहीं चाहता था, परन्तु शल्य का एक छोटा सा कांटा उसके हृदय में ऐसा चुभ रहा था कि उसके निकले बिना उसकी वृत्ति में निश्चलता नहीं आ सकती थी। वहा कांटा वही था कि रामकुंवरि को वह दुराचारिणी जानता था, परन्तु अपनी आँख से उसने उसमें कोई दुश्चरित्र का लक्षण नहीं देखा था और यथार्थ में रामकुंवरि थी भी ऐसी ही चालाक कि उसकी मुख चेष्टा से उसके चारित्र का अनुमान रतनचंद सरीखे सरल पुरुष के द्वारा होना कठिन था, अतएव आज रतनचन्द ने अपनी उस शल्य को स्वयं जाकर निकाल डालना उचित समझा, क्योंकि बुद्धिमान जो कोई कार्य करते हैं, वह भलीभाँति विचारपूर्वक ही करते हैं।

घोड़े को उसी अमराई में छोड़कर रतनचंद कंचनपुर की ओर चल पड़ा। लोगों की नजरों से बचने के लिये उसने अपना शरीर कम्बल में ढक लिया था और शरीर की रक्षा के लिए एक तलवार भी उसी में छिपा ली थी। मुख्य मार्ग को छोड़कर घूमते-फिरते हुए चलने में बहुत विलम्ब हो गया, अतः अनुमान ग्यारह बजे बड़ी कठिनता से अपनी हवेली के निकट पहुँचा। नगर भर घोर निद्रा में तल्लीन था। केवल दो चार पुरुषों के आने-जाने की आहट राजमार्ग पर सुनाई पड़ती थी अथवा कभी-कभी अपरिचित शब्द सुनकर कूँचों में भोंकते हुए कुत्तों की आवाज सुनाई पड़ती थी, शेष सर्व प्रकार से शान्ति थी।

हवेली के पश्चिम में जो गली थी, वहाँ जाकर रतनचंद ने देखा तो उसके कमरे की खिड़कियों में से रोशनी आ रही थी, किसी की बातचीत की आहट मिलती थी, इसलिये वह वहीं ठिठक के खड़ा हो गया और ध्यान लगाके सुनने लगा। नगर भर में उस समय बिल्कुल शांति थी, इसलिये उस समय वह बातचीत यद्यपि बहुत धीमे-धीमे स्वरों में होती थी, परन्तु रतनचंद को इतना अनुमान कराने के लिये बस थी, एक पुरुष और एक स्त्री का वह वार्तालाप है। रतनचंद के चित्त में उसे सुनकर बड़ी व्यथा होने लगी।

उस गली में हवेली पर चढ़ने के लिये पहले एक जीना था, परन्तु इधर कुछ दिनों से अनावश्यक समझ कर उसका द्वार एक ताला डाल के बन्द कर दिया था। दैवयोग से रतनचंद के पास इस समय चाबियों के गुच्छे में उसकी चाबी निकल आई, अतः शीघ्र ही उसके द्वारा ताला खोल के वह जीने पर चढ़ गया, परन्तु ऊपर के किवाड़ बन्द थे। जाके देखा तो दरवाजा बन्द था। किवाड़ों के सन्धों में से भीतर कमरे के भीतर जो कुछ देखा, उससे वह एकदम आवाक् हो गया। जिसका स्वप्न में भी विचार नहीं किया जा सकता था, उस पाशव कर्म को देखकर उसका हृदय शून्य हो गया, चेतना जाती रही। क्षण भर के लिये धरती पर बैठ गया। पश्चात् थोड़ी देर में चेतना लाभ होते ही उसका क्रोध यकायक उबल उठा, बड़े जोर से बोला ‘भगवती पृथ्वी ! ऐसे अधर्मी पशुओं का भार भी तू सम्हालती है ? धिक्कार है तुझे’ और जोर से किवाड़ों में लात मारी कि किवाड़ फट से अलग हो गये। पापी उसके शब्द से चौंक पड़े और सामने काले कम्बल से ढकी हुई इसी विकटाकार मूर्ति को देखकर चीख मार के बेहोश हो गये।

नृकीटो ! पापियो ! तुम जानते हो कि हमारे पापों को देखने वाला कोई नहीं है, इसलिये इच्छित पाप करने के लिये उतारू हो जाते हो। मदोन्मत्त होकर लोकमर्यादा, विवेक, शीलादि सबको तिलांजलि देकर स्वतंत्रता से विचरते और अपने स्वरूप को भूल जाते हो, परन्तु स्मरण रक्खो, तुम्हारे कर्म तुमसे एक क्षणभर भी पृथक् नहीं रहते, वे बड़े कठिन प्राहरिक हैं। तुम्हारी प्रत्येक कृति का फल तुम्हें मिलेगा। हाय ! थोड़े से विषय सुख के लिये तुम्हें घोर नरक में असह्य दुःख झेलने पड़ेंगे। सचेत रहो।

सत्रहवां पर्व

बड़ी भयानक रात है। अन्धेरे के मारे कुछ भी नजर नहीं आता। बादल न केवल उमड़े हुए हैं, परन्तु उदार पुरुषों की नाईं बरस रहे हैं, परन्तु लोग संसार की अस्थिरता नहीं देखते, गहरी नींद में सो रहे हैं। थोड़े-थोड़े जल का आश्रय पाकर मेंढ़कगण पौराणिक पंडितों की तरह अपनी टर्र-टर्र में मस्त हैं। शीतल समीर बारीक-बारीक जलकणों के सहित इतस्ततः भ्रमण कर रहा है, परन्तु बिलासपुर की रमणीय बस्ती में उसे ठहरने को जगह नहीं देता। उसका आगमन होते ही लोग अपने-अपने घरों के द्वार झरोखे बन्द कर देते हैं। वह उनसे टकरा कर जब खिन्न हो जाता है तब फिर आगे चलता है।

इस समय बिलासपुर के जेलखाने में जो कि शहर के पूर्व की ओर है, हम अपने पाठकों को ले चलते हैं। एक कोठरी में उदयसिंह और बलवन्तसिंह हथकड़ी और बेड़ियों से विवश पड़े हुए हैं। उदयसिंह के चेहरे पर मुर्दनी छाई हुई है। लम्बी-लम्बी आहें खींचने और आँखों से आंसुओं की धारा बहने के अतिरिक्त वह सर्वथा निश्चेष्ट हैं। बलवन्तसिंह अपने मित्र की इस दशा के विचार में अन्यमनस्क हुआ कुछ विचार कर रहा है। अफसोस! राजकुमार की दशा बड़ी शोचनीय है। सुशीला की मुहब्बत ने बरबाद कर दिया, तो भी वे सुशीला और उसकी मुहब्बत छोड़ना नहीं चाहते। हजार समझाने पर भी इनके हृदय पर कुछ असर नहीं होता। क्या करूँ, महाराज साहब जब यह बात सुनेंगे तो क्या कहेंगे? मेरे साथ होते हुए भी विपत्ति से रक्षा नहीं हो सकी। रेवती भी कैसी चालाक लौंडी है। कौन जानता था कि उसके सुडौल और सीधे शरीर के भीतर ऐसी बेडौल और टेढ़ी चालाकी निकलेगी। खूब फंसाया। हमारे हुजूर जब तक यहाँ जेलखाने की हवा खावेंगे, तब तक वहाँ उनकी सुशीला किसी भाग्यशाली के हृदय का हार बन जावेगी। सुनते हैं, दो ही चार दिन में सुशीला का स्वयंवर होने वाला है। चलो छुट्टी हुई, तब तो उदयसिंह हत्यारी मुहब्बत को छोड़ेंगे। अच्छा हुआ जो इनके कानों तक यह स्वयंवर की भनक नहीं पड़ी, नहीं तो अभी तक न जाने क्या गजब मचाते, परन्तु नहीं, ये इसी में मर जावेंगे। मुहब्बत बहुत बुरी बला है, अब भी मुझे प्रयत्न करने से न चूकना चाहिये। यदि इस जेलखाने से छुट्टी हो जावे तो हम लोग अब भी बहुत कुछ कर सकते हैं और अपने अभीष्ट की सिद्धि को पा सकते हैं। इसप्रकार विचार जाल में उलझे हुए बलवन्तसिंह को दरवाजे के बाहर कुछ आहट मिली? वह धीरे-धीरे द्वार पर आया और दालान में टहलते हुए एक पहरेदार को देख के बोला, क्यों भाई! इस समय भी क्या तुम पहरा दे रहे हो? यह रात तुम इसी तरह निकाल दोगे और विश्राम नहीं करोगे?
पहरेदार-नहीं, हम लोगों की यही नौकरी है। नौकरी में आराम नहीं है। मेहनत से जी चुराकर आराम करना, आराम नहीं हराम है। थोड़े से आराम के लिये अपना ईमान नहीं बिगाड़ना चाहिये। बेईमान के दोनों लोक बिगड़ते हैं।
बलवन्तसिंह-तब तो तुम बड़े समझदार और द्यानतदार नौकर मालूम होते हो। पर भाई? हमने सुना है तुम्हारा राजा कदरदां नहीं है। यदि तुम हमारे महाराज के नौकर होते तो अभी तक एक अच्छे औहदे पर पहुँच जाते। क्या कहूँ, इससमय मैं विवश हूँ, नहीं तो तुम्हें बतला देता कि हमारी सरकार कैसी गुणज्ञ और दयावान है।
पहरेदार-भाई! “गई बहुत और रही थोड़ी” अब साल छह महीने के लिये क्या जरूरत है कि गैरों के द्वारों पर टकराता फिरूँ। हमारी सरकार में गुणज्ञता, उदारता और दया की कमी नहीं है। जिसने तुमसे हमारे राजा के विषय में कुछ कहा है, उसने गलती की है ! वह कोई नमक हराम होगा। यथार्थ में इसमें महाराज का दोष नहीं है। मेरे पूर्व जन्म की कमाई ही इतनी थी कि बुढ़ापे तक पाँच रुपये से छह नहीं हुए और अब तो होवेंगे ही क्यों ? मेरे भाग्य में नहीं है, तब आपके महाराज भी मेरे लिये अनुदार बन जावेंगे !
बलवन्तसिंह-नहीं ! ऐसा नहीं है। भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाले कुछ नहीं कर सकते। भाग्यवादी बड़ी भूल करते हैं। पुरुषार्थ से सब कुछ हो सकता है और पुरुषार्थ करना हम लोगों का परम धर्म है। भाग्य कोई चीज नहीं है।
पहरेदार-अच्छा, भाग्य कोई चीज नहीं है तो इतने बड़े महाराज के वीर पुत्र होके ये तुम्हारे मालिक क्यों भाग्य को रो रहे हैं और तुम भी तो बड़े पुरुषार्थी हो, भला निकलो तो इस कोठरी में से ? देखें।
बलवन्तसिंह-तो क्या हमारे यहाँ से निकल जाने में तुमको शंका है ? तुम्हारे देखते हुए हम यहाँ से पुरुषार्थ से निकल जावेंगे और उसमें तुम्हीं से हमको सहायता भी मिलेगी। (उदयसिंह की ओर उंगली करके) देखो ! भाग्यवादियों की यह दशा होती है। ये तुम्हारे ही जोड़ीदार हैं, हजरत मुहब्बत तो लगाने चले परी से और सूंघ रहे हैं जमीन !
पहरेदार-(सचिन्त होके) तुमने यह क्या कहा कि तुमसे मदद मिलेगी ? क्या तुम मुझसे ऐसी आशा रखते हो ?

बलवन्तसिंह-हाँ, क्यों नहीं! संसार के सब ही कार्य एक दूसरे की सहायता से चलते हैं। सच कहते हैं, यदि तुम मुझे थोड़ी देर के लिये यहाँ से छुटकारा दे दो, तो कल ही अपने महाराज के राज्य में तुम्हें किसी अच्छे ओहदे पर बैठा दूँ और लो, हम लोगों के शरीर पर इस समय जो कुछ है सब तुम्हारा है।

पहरेदार-छिः! इसी को पुरुषार्थ कहते हैं! यदि धोखेबाजी, बेईमानी, फरेब और रिश्वत देने को ही पुरुषार्थ कहते हैं तो धिक्कार है उस पुरुषार्थ को? तुम नीच बातें करके अपने नामी राजा के नाम पर और अपने क्षात्र धर्म को बट्टा लगाते हो, लानत है तुम पर? यदि तुम्हारा राजा तुम सरीखे पुरुषों की बात पर विश्वास करता है तो समझना चाहिये कि वह कोई अच्छा राजा नहीं होगा। जिस राज्य में योग्यायोग्य की पहचान नहीं है, वह राज्य बड़े अन्धकार में ग्रस्त है और उसकी जड़ बहुत कच्ची है। राजा दूसरे देव के तुल्य हैं, उसके साथ विश्वासघात करने से हम लोगों का कदापि कल्याण नहीं हो सकता। जाओ! अब मैं तुमसे बातचीत नहीं करना चाहता, तुम सरीखे एक सरदार से मेरे सरीखे एक सिपाही को इतनी घृणा उत्पन्न हो जाना बड़े दुःख की बात है।

बलवन्तसिंह का मुँह बन्द हो गया। उस निष्कपट, विश्वस्त सिपाही के सन्मुख उसे एक शब्द कहने का भी साहस नहीं हुआ। वह धीरे-धीरे खिसक के अपने स्थान पर आ बैठा। सिपाही दूसरी ओर को टहलने लगा।

अनुमान आधे घण्टे के सन्नाटे के बाद द्वार पर फिर किसी की आहट हुई। बलवन्तसिंह कान लगाके सुनने लगा। आवाज से जान पड़ा कि वही पहरेदार है, जिससे बातचीत हुई थी। निकट जाके पूछा- क्यों क्या कहते हो ? बोला-क्या किया जावे पेट बड़ी बुरी बला है, तुम्हारा मंत्र मुझ पर चल गया और सचमुच तुम्हारा पुरुषार्थ काम का है, भाग्य कोई चीज नहीं है। लाओ, तुम अपने शरीर पर का जेवर निकाल के मुझे दो, मैं तुम्हें अभी यहाँ से निकाले देता हूँ, परन्तु स्मरण रखना, तुम्हें अपनी प्रतिज्ञा पूरी करनी होगी।

यह सुनते ही बलवन्त के मुँह में पानी आ गया, वह आनन्द के मारे उछल पड़ा और बोला-विश्वास रक्खो ! हम अपनी प्रतिज्ञा अवश्य ही पूरी करेंगे और तुम्हें निहाल कर देंगे। लो, हम लोगों की हथकड़ी बेड़ी काट दो और ये जेवर उतार लो। यहाँ से भागकर तुम हमारे राज्य में चलो, वहाँ तुम्हें कोई भय नहीं है। यह सुनके पहरेदार ने धीरे से द्वार खोल दिया और भीतर आके दोनों की हथकड़ी बेड़ी काट दी। शरीर पर का जेवर ले लिया, पश्चात् कहा- लो शीघ्रता से भागो, यदि किसी को मालूम हो जावेगा तो जान पर आ बनेगी। आखिर तीनों ने सिर पर पैर रख के भागना शुरू किया, परन्तु एक मील ही न भागे थे कि पीछे से किसी की आवाज आई, खबरदार ! कायरों ! मैं आ पहुँचा तुम तीनों जवान हो, मुझ बूढ़े की तलवार का जरा मजा भी चखे जाओ, नहीं तो पीछे शेखियाँ मारोगे। यह सुनते ही तीनों के पैर जहाँ के तहाँ जम गये, शरीर शून्य हो गया। आने वाला तीनों के आगे भीम मूर्ति धारण करके आ खड़ा हुआ। पहरेदार सिपाही के पैर थर-थर कांपने लगे। चाहा कि भाग जाऊँ, परन्तु ऐसा नहीं कर सका। आने वाले का पहिला हाथ उसी पर पड़ा जिससे उसकी बाँह कटके अलग गिर पड़ी, गहरे घाव की वेदना से वह मूर्छित हो गया। खून की धारा बहने लगी।

बलवन्तसिंह और उदयसिंह दोनों के पास इस समय हथियार नहीं थे। मददगार सिपाही को बात की बात में गिरते देख के और अपने पर आई हुई विपत्ति को सन्मुख देखके दोनों झपटे और चाहा कि तलवार बचा के इसे बहुपाश में बांध लेवें, परन्तु वह भी असावधान नहीं था, उछल के अलग हो गया और दाव बचाके एक हाथ ऐसा मारा कि बलवन्तसिंह के कंधे पर जाके पड़ा। लगते ही वह भी बेहोश हो गया। गिरे हुए सिपाही की तलवार, उदयसिंह के हाथ में पड़ गई, इसलिये वह बड़े बल के साथ सम्मुख हुआ और अनुमान आधे घण्टे तक दोनों में खूब युद्ध हुआ।

उदयसिंह ने अपने प्रतिद्वन्दी को बल और शस्त्र-कौशल में सब प्रकार से अजेय देखकर और पूर्व दिशा में ऊषादेवी का आगम जानकर और अधिक समय तक उससे भिड़े रहना उचित नहीं समझा, अतएव वह उससे किसी तरह पीछा छुड़ाने की चिन्ता में लगा। उधर प्रतिद्वन्दी भी घण्टों के परिश्रम के कारण कुछ शिथिल हुआ कि मौका पाकर उदयसिंह ने पीठ फेर दी और पलायन किया! प्रतिद्वन्दी ने अब उसका पीछा करना उचित नहीं समझा और उसी स्थान पर बैठ गया।

ऊषा अपने अरुण होठों पर मन्द मन्द हँसी झलकाती हुई आ पहुँची और उस वीर पुरुष का अपने किरणरूपी करों से आलिंगन करने को दौड़ी।

प्रभात हो गया, अनेक राज्य कर्मचारी इस घटना की सुधि पाकर दौड़े आये और मूर्छपन्न बलवन्त और सिपाही को कैद करके ले गये, वीर पुरुष बड़े सत्कार के साथ नगर में लाया गया।

पाठक ! यह वीर पुरुष और कोई नहीं, वही राजभक्त पहरेदार है, जिसके साथ बलवन्तसिंह की पहले बातचीत हुई थी और वह आदमी जो बलवन्तसिंह को छुड़ाकर भागा था तथा पीछे से अपनी एक बाँह खो बैठा था, एक दूसरा पहरेदार था। जिस समय बलवन्त और पहले पहरेदार की बातचीत हो रही थी, दूसरा छुपे हुए दोनों की बातचीत सुन रहा था। बलवन्तसिंह के दिये हुए लालच से वह अपनी ईमानदारी खो बैठा और यह राजद्रोह करने को उद्यत हो गया।

यह पहले पहरेदार की बदली पर आया था क्योंकि तीन बजे रात्रि के पश्चात् प्रतिदिन इसी का पहरा रहता था। पहले पहरेदार के चले जाने पर इसने अपनी घात लगाई और बलवन्तसिंह से छुड़ा देने की बातचीत कही। उसकी बनावटी बोली और धूर्तता को बलवन्तसिंह नहीं समझ सका। उसने यही जाना कि यह वही पहरेदार है, जिससे पहले बातचीत हुई थी। मेरा दिखाया हुआ लालच इस पर असर कर गया है। पहले का नाम वीरसिंह और दूसरे पहरेदार का नाम अजानसिंह था।

वीरसिंह अपनी नौकरी पूरी करके घर गया, परन्तु उसे निद्रा नहीं आई। उसके हृदय में बलवन्तसिंह की धूर्तता का बड़ा खटका बैठ गया था और उसका असर इस कारण और भी अधिक हुआ कि अजानसिंह का स्वभाव लालची बहुत था, वह इस बात को जानता था कि यदि बलवन्तसिंह उस मंत्र का प्रयोग जो कि मुझ पर निरर्थक हुआ है, अजान पर करेगा तो सचमुच वह अकार्य कर बैठेगा।

जब उसे किसी प्रकार निद्रा नहीं आई और पूर्व सन्देह बढ़ता ही गया, तब तो वह एक हथियार लेकर कारागृह की ओर फिर चला। वहाँ जाके देखा तो जिस कोठरी में उक्त कैदी थे, उसे खुली हुई और खाली पाई और दोनों कैदियों की भागने की आहट कुछ दूर पर पाई, इस पर तत्काल ही उनकी ओर शक्तिभर दौड़ा और इसके पश्चात् जो कुछ हुआ, वह कहा जा चुका है।

अठारहवां पर्व

अनुमान सात बजे महाराज विक्रमसिंह के दरबार में दोनों कैदी और वीरसिंह उपस्थित किये गये। कैदियों के घावों पर मलहम और पट्टियाँ लगा दी गई थीं और इससे उनका शरीर बहुत स्वस्थ था। इसीप्रकार वीरसिंह के भी जो दो चार घाव लगे थे, उनका इलाज करा दिया गया था। इस समय वह अत्यन्त प्रसन्नचित्त दिखाई देता था।
आज्ञा पाकर वीरसिंह ने अपनी बीती घटना का हाल महाराज से निवेदन किया, जिसे सुनकर महाराज अत्यन्त प्रसन्न हुए। वृद्ध वीरसिंह की वीरता और ईमानदारी सुनके समस्त दरबार में एक अतिशय उल्लास प्रगट होने लगा। बलवन्तसिंह ने स्वयं उठकर कहा-
महाराज ! यद्यपि मैं इस समय आपका कैदी हूँ और पुनः इस कैद में पड़ने का कारण वीरसिंह होने से वह मेरा शत्रु है, परन्तु शत्रोरपि गुणाः वाच्याः अर्थात् शत्रु के भी गुण वर्णनीय होते हैं, इस नीति से मैं वीरसिंह की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। आप धन्य हैं, जिनके यहाँ ऐसे सच्चे वीर, धार्मिक और राजभक्त सेवक हैं। ऐसे क्षत्री पुत्रों के कारण ही यह पृथ्वी भाग्यशालिनी है।
वीरसिंह को अपने वश में लाने के लिये मैंने हजार प्रयत्न किये और बातें बनाई, परन्तु वे सब निष्फल हुईं। वीरसिंह का सुदृढ़ मानस तनिक भी चलविचल नहीं हुआ, उल्टी मुझे ही वह फटकार सुननी पड़ी जिसका घाव मेरे हृदय पर अभी तक है। मैं महाराज से प्रार्थना करता हूँ कि वीरसिंह सरीखे वीर को कोई अच्छा वीरोचित पद दिया जावे और इस नीचातिनीच अजानसिंह को कोई ऐसा दण्ड दिया जावे जिसे संसार को फिर कभी ऐसा विश्वासघात करने का साहस न होवे। ऐसे पुरुषों के प्रसाद से ही
बड़े-बड़े राज्य नष्ट हो जाते हैं।

संसार में राजद्रोह सरीखा कोई पाप नहीं है। थोड़े से धन के
लोभ में पड़कर जो राज्य कर्मचारी इस तरह राज्य का अपकार
करने को तैयार हो जाते हैं, वे बड़े कृतघ्न हैं।

महाराज विक्रमसिंह यह सुनके कुछेक मुस्कराये और बोले -आपकी सम्मति माननीय है, जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही होगा, परन्तु यह तो कहिये कि वीरसिंह की फटकार से भी आप अजान के अनुगामी क्यों बने और इसका दण्ड आपको क्या दिया जावे ?

बलवन्त-अवश्य ही वीरसिंह की शिक्षा का मुझ पर असर हुआ है, परन्तु अपने मालिक की ओर देखके सहसा मुझे अजान का साथी अजान बनना पड़ा था, जिसके लिये कि मुझे इस समय बड़ी घृणा हो रही है। उस विषय में मैं आपका पूर्णतः अपराधी हूँ, आप जो चाहें दण्ड दें, मैं सहने को तैयार हूँ।

महाराज-अस्तु ! आप अपने अपराध के बदले में छोड़ दिये जाते हैं। आप जहाँ चाहें, वहाँ स्वतन्त्रता से जा सकते हैं, यही आपके लिये दण्ड है।

बलवन्त-(गद्गद् और नतमस्तक होके) धन्यवाद है! सहस्र धन्यवाद है! परन्तु महाराज! मेरे साथ इतना उपकार और करें कि मैं सेवक बना लिया जाऊँ। मैं आप सरीखे नरनाथ की सेवा छोड़के अब अन्यत्र नहीं जाना चाहता। मेरे लिये यही स्वतंत्रता है। यही सब कुछ है।

महाराज ने बलवन्तसिंह की प्रार्थना स्वीकार की। बंधनमुक्त होके उन्हें उसी समय दरबार में उनके योग्य स्थान दिया गया, लोग विस्मित होके महाराज की ओर देखने लगे। वीरसिंह के लिये आज्ञा हुई कि आज से ये नौकरी से विमुक्त किये जावें और सौ रु. पेंशन मुकर्रर कर दी जावे।

इसके पश्चात् अजानसिंह के दण्ड की बारी आई, परन्तु इसके पहले ही देखा कि उसका शरीर प्राणहीन होके धराशायी हो गया। लोगों ने समझा, मूर्च्छा आई, परन्तु यथार्थ में वह उसकी अंतिम मूर्च्छा थी। अपने कार्य किये हुए दुष्कर्म से उसका हृदय वैसे ही विदीर्ण हो रहा था कि महाराज की दया, अपने साथी वीरसिंह की बड़ाई और बलवन्तसिंह की निष्कपटता के तीक्ष्ण दृश्यों ने एक के पीछे एक आकर उसे निर्जीव ही कर डाला। अजानसिंह अपनी अजानता से पश्चाताप की अग्नि में दग्ध हो गये। दरबार के सम्पूर्ण सभ्यों के चित्त पर इस दृश्य का बड़ा असर हुआ। महाराज का चित्त दया से आर्द्र हो गया। दुःखी होकर वे दरबार बर्खास्त करके शीघ्र ही अन्तःपुर में चले गये। लोग हर्ष विषाद करते हुए अपने-अपने स्थान पर गये।

उन्नीसवां पर्व

क्रोध में उन्मत्त हुए रतनचन्द ने बेहोश रामकुंवरि और हीरालाल को पलंग से जकड़ के बाँध दिया और चाहा कि होश में लाकर इनकी खूब खबर लूँ, परन्तु तत्काल ही उसका वह भीषण क्रोध वैराग्य के शीतल विचार-प्रवाह से शांत हो गया। उसके फड़कते हुए होंठ स्थिर हो गए, नेत्रों की लालिमा का परिवर्तन हो गया। चढ़ी हुई भोंह कमान वक्रत छोड़के सीधी हो गई और कांपता हुआ सारा शरीर क्षणभर के लिये स्तंभ रूप में स्थिर हो गया, हृदय में शान्तरस का समुद्र लहरें लेने लगा। सो थोड़ी ही देर में रतनचन्द के मुँह में से निकल पड़ा, 'जब असार संसार में रहना ही नहीं है तो यह विडम्बना किसलिये करूँ ? इन दुष्कर्मों के वश में पड़े हुए दीन जीवों को व्यर्थ ही क्यों कष्ट पहुँचाऊँ ? उन्हें मारने से मुझे क्या लाभ होगा ? और अब वे मेरे हैं हीं कौन ? कोई नहीं। पाठक ! ये उस शांतरस के गम्भीर समुद्र की तरल तरंगों का मनोहर नाद था, जो रतनचन्द के हृदय में प्लावित हो रहा था। पापपूर्ण निंद्य संसार में ऐसे सुन्दर शब्द बहुत थोड़े भाग्यवान् सुन सकते हैं।

आगे रतनचन्द का कोमल हृदय रामकुंवरि और हीरालाल को देखकर करुणा से परिप्लावित होने लगा। वह सोचने लगा, हाय ! ये बेचारे दीन प्राणी कर्मों के चक्कर में पड़े हुए कैसे-कैसे अनर्थ करते हैं और अपने अनन्त शक्तिशाली स्वरूप को भूले हुए हैं। इन्हें यह भी ज्ञान नहीं है कि हमारा हित क्या है फिर हितरूप प्रवृत्ति करना तो दूर की बात है।

बेचारों ने बड़े कष्ट से अनन्तकाल भ्रमण करते-करते यह मनुष्य जन्म पाया था, परन्तु इसमें भी ये अपना कल्याण न कर सके और अब दुष्कर्म में मग्न हो रहे हैं, न जाने कब ठिकाने लगेंगे। बेचारे क्या करें? स्वयं कुछ ज्ञान नहीं रखते और सच्चे उपदेशों का साधन नहीं है, इससे मार्ग भूले हुये हैं। जी चाहता है कि कुछ उपदेश देकर इन्हें मार्ग पर लाने की चेष्टा करूँ, परन्तु ऐसा न हो कि उसका इन पर उल्टा असर पड़े, क्योंकि “पित्तज्वरवतः क्षीरं तिक्तमेव हि भासते” सो यह भी असाध्य रोगी जान पड़ते हैं, इन्हें मेरा एक-एक शब्द कड़ुआ लगेगा।

अतएव अब इन्हें इनके भाग्य पर छोड़ के अपना कल्याण करना चाहिए। रात्रि थोड़ी ही बाकी रह गई है और इसके पहले ही मुझे कंचनपुर छोड़ देना है, सो अब शीघ्रता करना चाहिये। ऐसा सोचकर रतनचन्द अपराधियों को वहीं छोड़कर एक पृथक् कोठरी में गया, जहाँ लिखने-पढ़ने का सामान रक्खा रहता था। वहाँ जाकर तीन चिट्ठियाँ और एक वसीयतनामा लिखा। पहली दो चिट्ठियाँ रामकुंवरि और हीरालाल के नाम की थीं। उन्हें उसने दोनों के सिराहने रखके हवेली को चारों तरफ से बन्द करके ताला लगा दिया, पश्चात् सीढ़ियों से नीचे उतर कर एक ओर चल दिया। इस समय भी उसका वही वेष था जो उसने इस घर में प्रवेश करते समय धारण किया था।

घर से निकल कर रतनचन्द गलियों में से होता हुआ अपनी दुकान पर पहुँचा और जीने से चढ़ के वहाँ गया, जहाँ जयदेव सोता था। यह वही जगह थी, जहाँ उस दिन हीरालाल के हाथों से जयदेव की जान बचायी गई थी। जयदेव भीतर से सांकल दिये हुए गहरी निद्रा ले रहा था, उसे खबर नहीं थी कि आज मेरा सच्चा हितैषी अन्तिम विदाई लेने को आया है। कमरे की एक खिड़की खुली हुई थी, रतनचन्द ने उसी में से वह वसीयतनामा, चिट्ठी और चाबियों का गुच्छा एक रुमाल में लपेटकर भीतर फैंक दिया और बड़ी देर तक जयदेव के उघड़े हुये निष्कलंक मुख को देखकर एक लम्बी सांस लेकर वहाँ से चल दिया।

दिन निकल आने के भय से उसने बड़ी शीघ्रता से उस अमराई की ओर गमन किया, जहाँ घोड़ा छोड़ दिया था। जाकर देखा तो स्वामी भक्त घोड़ा जहाँ का तहाँ खड़ा है और अपने स्वामी के आने का मार्ग देख रहा है। रतनचन्द ने पास पहुँच पुचकार के उसकी पीठ पर हाथ फेरा और फिर सवार होके एक जंगल की ओर उसे दौड़ाया। सबेरा होते-होते रतनचन्द को कंचनपुर से बहुत फासले पर उसने पहुँचा दिया।

रतनचन्द के घर से निकलते ही रामकुंवरि और हीरालाल की बेहोशी दूर हुई तो उन्होंने अपने को बेहोशी की हालत में पलंग से जकड़े हुए पाया, चारों तरफ के किवाड़ बन्द थे, भय के मारे कपकपी लगने लगी। दोनों एक दूसरे के मुँह की ओर देख के अपनी-अपनी चेष्टा से अपने दुष्कर्म की ओर घृणा और बेबसी पर दुःख प्रकट करने लगे, परन्तु लज्जा, दुःख और भय के मारे दोनों के मुँह से एक शब्द भी न निकला। इतने में सबेरा हुआ, झरोखों में से सूर्य का प्रकाश आने लगा। समदृष्टि सूर्यदेव पापी और पुण्यात्मा दोनों के घरों की ओर एक रूप में अपने कर (किरण) फैलाते हैं, इस बात का परिचय उसी दिन मिला। एक ही साथ दोनों पामरों की दृष्टि अपने-अपने सिरहाने पर पड़ी हुई चिट्ठियों पर गई, दोनों मन ही मन में उन्हें बांचन लगे। चिट्ठियों में लिखा था-
रामकुंवरि,
तेरा अनन्त उपकार मानना चाहिये, जो तेरे कारण से मुझे आज इस गृह जंजाल से छुट्टी मिली। स्त्रियाँ ऐसी ही होनी चाहिये, जिनसे उनके पति इस घोर विपत्ति से मुक्त होने के सम्मुख हो जावें। मैं तुझे अपनी आँखों से तृप्त होकर देखे जाता हूँ, सो अब पुनर्दर्शन की लालसा नहीं रहेगी। मैं तेरी कृति का फल दिये बिना ही जाता हूँ, इसमें आश्चर्य नहीं करना, क्योंकि मेरा चित्त अब ऐसे ही मार्ग पर लग गया है।
तू अपने दुर्लभ मनुष्य जन्म का दुरुपयोग कर रही है, इस बात का खेद है सो यदि हो सके तो मेरी इस बात पर विचार करना कि सुख का मार्ग कौन सा है ? अधिक कुछ नहीं, क्षमाभाव रखना।
-रतनचन्द्र हीरालाल,

दुर्लभ मनुष्य जन्मरूपी हीरा, हाय ! हाय ! तूने कौड़ी के बदले में दे दिया। जौहरी का पुत्र होकर तू ऐसी भूल कर बैठा जो एक घसकटा भी नहीं कर सकता। तुझे ऐसी भिखारी अवस्था में मैं अब नहीं देखना चाहता, इसलिये आज अन्तिम… है। हो सके तो फिर से उसके पाने का प्रयत्न करना। इत्यलम्।

-रतनचन्द्र

चिट्ठियों के पूरे होते-होते दोनों की अजीब हालत हुई। अभी तक तो वे जानते थे कि यह कोई दैव कोप है अथवा किसी शत्रु ने हमको गिरफ्तार किया है, परन्तु चिट्ठियों पर रतनचन्द्र की सही देखते ही उनकी घबराहट का ठिकाना न रहा। खेटपुर को गये हुए जिस रतनचन्द्र का उन्हें स्वप्न में भी स्मरण नहीं था और जिसे वे सर्वथा भूल कर निश्चिंत हो दुराचार में प्रवृत्त हुए थे, उसी को उन्होंने चिट्ठी के रूप में सम्मुख देखकर उस घटना का अनुभव किया, जिसे दावाग्नि से तीन ओर से घिरे हुए मृग समूह चौथी ओर से आते हुए सिंह की भीषण गर्जना को सुनकर करते हैं। खेद है कि रतनचन्द्र की सरल और शिक्षाप्रद चिट्ठियाँ जिनमें किसी प्रकार के भय की सम्भावना नहीं थी, पापियों को पापयुक्त दृष्टि में बड़ी भयंकर दिखलाई देने लगी। नानाप्रकार की चिन्ताओं में उनके प्राण सूख गये।

उधर सूर्यदेव ने हँसते हुए जयदेव के कमरे में भी प्रवेश किया। खुले हुए झरोखे में से उन्होंने अपने कर फैलाकर जयदेव को मानों यह कहते हुए जगाया कि उठो, संसार की कुछ और भी विचित्रता देखो और हो सके तो उससे कुछ शिक्षा प्राप्त करो। जयदेव पंचनमस्कार मंत्र का पाठ करता हुआ शय्या से उठ बैठा और क्षणार्ध को नेत्र बन्द करके ध्यानस्थित हो उसने कमरे में चारों तरफ अपनी दृष्टि फेंकी। झरोखे के पास ही पड़े हुए रूमाल को उसने विस्मित होकर उठा लिया और उसमें लपेटी हुई चिट्ठियों को बड़ी आतुरता से बांचना शुरू किया। पहली चिट्ठी में यह लिखा हुआ था-
प्रिय जयदेव,
काल की गति विचित्र होती है। कल क्या होगा? सो कोई नहीं जानता। तुम मुझसे विदा लेना चाहते थे परन्तु आज मैं तुमसे ही विदा लेता हूँ, जी चाहता था कि तुमसे एकबार और मिल लूँ, परन्तु कई बातें सोचकर न मिल सका और अब मिलने की भी क्या आवश्यकता है? मैं आज सब दुःखों से छूटकर सुख के मार्ग में प्रवेश करता हूँ, तुम्हें इस बात से कुछ परिताप होगा, परन्तु नहीं, तुम बुद्धिमान् और दूरदर्शी हो, परमार्थ दृष्टि से देखोगे तो निश्चय ही प्रसन्न होओगे। मैं आज उस मार्ग पर पैर रखता हूँ, जिससे यह दुर्लभ मनुष्य जन्म सफल होता है और जहाँ से जाने में फिर बार-बार लौटना नहीं होता।

दूरदर्शी-जयदेव! एकाएक मैंने ऐसा क्यों किया, इसके जानने के लिये तुम्हारा चित्त उद्विग्न होगा, अतःमैं भी उसे छिपाना नहीं चाहता। कल मैं खेटपुर नहीं गया। मार्ग से लौट के आया और एक अमराई में चिन्ता में पड़े-पड़े दिन पूरा किया, रात्रि को मेरी इच्छा अपने घर के चरित्र को देखने की हुई, और प्यारे जयदेव! जिस चरित्र को देखने का कोई स्वप्न में भी विश्वास नहीं कर सकता, उसे मैं अपने आँखों से देख भी चुका। पाप की सीमा देख चुका, लोक-मर्यादा और धर्म को सम्मुख भस्म होते देख चुका और देख चुका सम्पूर्ण संसार को सर्वथा अजानांधकार में आविर्भूत। सो अब यहाँ (संसार में) एक घड़ी भी कल नहीं पड़ती, बहुत जल्दी तारणतरण श्री गुरुदेव की चरण शरण को प्राप्त होता हूँ।

मैंने क्या देखा, उसे लिखके इस पत्र को घृणास्पद और कलंकित नहीं बनाना चाहता हूँ, तुम स्वयं सब कुछ देख और समझ लोगे। यह चाबियों का गुच्छा तुम्हें सौंपे जाता हूँ और साथ ही एक वसीयतनामा लिखे जाता हूँ कि आज से मेरे घर के तुम सब प्रकार के स्वामी हुए। अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए मैं तुमसे अधिक सुयोग्य किसी को नहीं देखता। मेरे परिश्रम से कमाये हुए धन के भोगने का पात्र मैं तुम्हें ही समझता हूँ। यह धन तुम जैसे सदाचारी, धर्मात्मा और विचारशील पुरुष के हाथ में पड़कर अवश्य ही सन्मार्ग पर लगेगा, यह निश्चय है।

वसीयतनामे में जिस धन का अधिकार तुम्हें दिया गया है, उसके सिवाय मेरी खास तिजोरी में कुछ रुपया नगद रक्खा है, उसके विषय में मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि वह किसी ऐसे कार्य में लगाया जावे, जिससे सद्धर्म की सच्ची प्रभावना और सच्चा दान हो।

मैं जाता हूँ, परन्तु मेरे लिये तुम खेद नहीं करना। अब मैं अपने आत्मा को और मलिन नहीं रखना चाहता। सर्व जीवों के प्रति आत्मा को और मलीन नहीं रखना चाहता। सर्व जीवों के प्रति मेरा मैत्री-भाव है। मेरे हृदय में यह श्लोकार्थ बार-बार उठा करता है “कदाऽहं समभविष्यामि पाणिपात्री दिगम्बरः।” इत्यलम् ।

तुम्हारा हितैषी : रतनचन्द्र

इस चिट्ठी के बांचते ही जयदेव की आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वह इसका कुछ भी निश्चय नहीं कर सका कि अब मुझे क्या करना चाहिये ? चिट्ठी में लिखी हुई घटना के आभास को आँखों से देखने के लिए एकाएक घर से निकल पड़ा। हवेली के पास जाकर देखा तो चारों तरफ से किवाड़ बन्द हैं और ताले पड़े हुए हैं। उन्हें देखकर जयदेव बड़े संशय में पड़ा कि हे विधाता ! यह क्या लीला है ? आज क्या हुआ ?

रामकुंवरि कहाँ चली गई ? किवाड़ किसने बन्द किये ? क्या सेठजी की चिट्ठी का यही अर्थ है ?
इसप्रकार बहुत से प्रश्न मन में ही करके जयदेव ने उन सबका उत्तर पाने के लिये हवेली का मुख्य द्वार खोलकर रतनचन्द्र के सोने के कमरे में प्रवेश किया और देखा कि रामकुंवरि तथा हीरालाल दोनों एक पलंग से जकड़े हुए पड़े हैं और दोनों के सिरहाने अपनी चिट्ठी की नाई रतनचन्द्र की कलम से लिखा हुआ एक-एक कागज का पुर्जा पड़ा हुआ है। उन्हें इस अवस्था में देखते ही जयदेव अपनी चिट्ठी का आशय साफ समझ गया।
हाय ! अब न जाने ये दुष्ट हम लोगों के साथ कैसा वर्ताव करेगा। क्या हमारे दुष्कर्मों की खबर इसको भी लग चुकी ? और वे (रतनचन्द्र) इसी को सब अधिकार सौंप के चल दिये हैं ? यदि ऐसा हुआ तो बड़ी कठिनता हुई, हमने इसके साथ कभी भलाई की इच्छा नहीं की है, सदा इसके मार डालने की तथा घर से निकलवा देने की चिन्ता की है, तब फिर इससे छुटकारा पाने की कैसे आशा की जा सकती है ? अफसोस ! हमारे ऐशोआराम के दिनों में धूल पड़ गई और अब ये जब हमारे कृत्य को प्रगट करेगा तब हम कैसे किसको मुँह दिखावेंगे ? उन दोनों दुराचारियों के हृदय में ऐसे भयानक विचार आ आके डराने लगे और शरीर फिर कम्पायमान होने लगा। जयदेव क्षणार्ध उनके सामने स्तब्ध खड़ा रहा।