सुशीला उपन्यास
सहयोगी :
- सौरभ जैन पिताश्री प्रशांत जैन, वर्द्धमान कुंज न्यू मार्केट, भोपाल
- पायल वाला ज्वेलर्स, छिंदवाड़ा
सुशीला उपन्यास
पं. गोपालदास जी बरैया
प्रकाशक :
श्री वर्द्धमान न्यास (पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट)
अमायन, भिण्ड (म.प्र.)-477227
मो. 9826225580
संस्करण : 2026
न्यौछावर राशि : 50/-
Sushila Upanyas
Pandit Gopal Das Ji Baraiya
Published by :
Vardhman Nyas
Amayan, Bhind (M.P.)
Edition : 2026
Price : Rs. 50/-
प्रकाशकीय
शील दुर्गति के दुःख को हरने वाला है, व्रत, तप, संयम का जीवन है। शील बिना तप करना, व्रत धारण करना, संयम पालना मृतक के शरीर समान देखने मात्र का है, कार्यकारी नहीं है।
शीलवती सुशीला का जीवन एवं जयदेव का शील आदर्श दम्पति वर्तमान परिपेक्ष्य में अनुकरणीय है।
मोबाइल / इंटर नेट / फेस बुक जो सदुपयोग से अधिक विकृति का निमित्त बना हुआ है। क्षयोपशम वृद्धि के साधन दिखने पर भी विशुद्धि के घातक हैं।
उपन्यास रचनाकार पं. गोपालदास जी बरैया एक गृहस्थ विद्वान थे। जिनका जीवन ईमानदारी, सहनशीलता, नैतिकता, शील-सदाचार का पर्यायवाची रहा। मात्र वाणी, कलम से ही नहीं अपितु नीति और धर्म का जीवंत उदाहरण जीवन से प्रस्तुत किया। स्थान-स्थान पर इस चर्चा का उल्लेख इस कृति में है।
रामकुमारी-हीरालाल में यद्यपि माँ-पुत्र का सम्बन्ध होने पर भी समवयस्क होने से पतन की हद पार कर दी। घृत-अग्नि का उदाहरण देकर आचार्यों ने शील संरक्षण के लिए नव बाढ़ बताई, आज के समय में इसकी महत्ता विशेष है।
पर नारी पैनीछुरी, तीन ठौर सों खाय।
धन छीने, यौवन हरे, मरे नरक ले जाय।।
कुसंग का दण्ड, अपयश व युक्ति द्वारा सुरक्षा प्रदान कर, संसार भोगों का विचार कर पुत्र हीरालाल का व्यामोह तज संपत्ति के सदुपयोग निमित्त वसीयतनामा जयदेव के नाम लिख जौहरी रतनचंद विरक्ति के पथ पर बढ़ गये।
यह कथानक वर्तमान पीढ़ी को शील, सदाचार की प्रेरणा देकर जैन तत्त्वज्ञान में एक नई दिशा देगा। अब तक के सभी प्रकाशन, लेखक के मनोभाव-तत्त्वज्ञान से विभूषित नवीन पीढ़ी का उदय व संस्कारों की पाठशाला जीवंत रहे, निर्बाध रख इस प्रयास को गति दी है, उनका यह उत्तरदायित्व वर्तमान पीढ़ी को सत्पथ की दिशा आलोकित करे।
इसी भावना से ‘सुशीला उपन्यास’ प्रस्तुत है। सभी सहयोगियों का हृदय से आभारी हूँ।
-अखिल जैन
मंत्री, श्री वर्द्धमान न्यास, अमायन, भिण्ड (म.प्र.)
भूमिका
यह ‘सुशीला उपन्यास’ है । इसकी रचना गुरुणांगुरु पंडित गोपालदासजी बरैया ने आज से लगभग 120 वर्ष पूर्व की थी । यह अपने समय का एक अत्यधिक लोकप्रिय उपन्यास है । इसने अपने समय में लाखों लोगों को प्रभावित किया है । आज के शब्दों में कहें तो यह उस समय की ‘बेस्ट सेलर बुक’ है । इस पुस्तक में आधुनिक उपन्यास की कथात्मक शैली का सहारा लेकर बड़े ही रोचक ढंग से जैन तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया गया है । विशेषकर शील, संयम, सदाचार की महिमा को उजागर किया गया है ।
यह उपन्यास पूजनीय बड़े पंडितजी ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’ को बहुत अधिक प्रिय था। वे यदा-कदा इसका संदर्भ देते ही रहते थे और सभी को इसे पढ़ने की मार्मिक प्रेरणा भी देते थे तथा यह भी कहते थे कि इसी तरह की पुस्तकें वर्तमान में भी और लिखनी चाहिए ताकि लोग शील, संयम आदि उत्तम गुणों का महत्त्व समझें । वर्तमान काल में ऐसी पुस्तकों की विशेष आवश्यकता है, क्योंकि आज लोग इसे भूलकर विषय-भोगों में डूबते जा रहे हैं ।
पूजनीय पंडितजी की भावना के अनुरूप आज पुनः इस ग्रंथ का प्रकाशन किया जा रहा है । आशा है कि सभी लोग इस ग्रंथ का अध्ययन करेंगे और इसके द्वारा शील, संयम, सदाचार आदि उत्तम गुणों में स्वयं को और साथ में पर को भी दृढ़तापूर्वक स्थापित करेंगे।
इस ग्रंथ के लेखक पंडित गोपालदासजी बरैया बहुत बड़े विद्वान थे । उनका जन्म सन् 1866 में आगरा में हुआ था और सन् 1917 में 51 वर्ष की अल्पायु में ही देहांत भी हो गया था, परन्तु इतनी अल्पायु में भी उन्होंने न्याय, व्याकरण, दर्शन, अध्यात्म आदि विविध विषयों का गहरा अभ्यास किया था । उन्होंने मुंबई, मुरैना आदि अनेक स्थानों पर जैन विद्यालयों की स्थापना की थी जिनमें अनेकानेक धुरंधर विद्वान तैयार हुए । उनकी परिस्थितियाँ बड़ी प्रतिकूल थीं, फिर भी वे शांत भाव से नियमित स्वाध्याय आदि करते थे । उनकी तीन कृतियाँ बड़ी महत्त्वपूर्ण हैं-जैन सिद्धांत प्रवेशिका, जैन सिद्धांत दर्पण और सुशीला उपन्यास।
ऐसे परमविद्वान पण्डितजी को मैं विनम्र प्रणाम करता हूँ। आदरणीय बड़े पंडितजी का भी मेरे ऊपर विशेष उपकार है, इसलिए उन्हें भी हार्दिक प्रणाम करता हूँ और इस उपन्यास को प्रकाशित करने के लिए ‘श्री वर्द्धमान ट्रस्ट, अमायन’ को हृदय से धन्यवाद देता हूँ। इस ग्रंथ के अध्ययन से सबका मंगल हो, यही मेरी भावना है। यदि कुछ लोग भी इस ग्रंथ के अध्ययन से निम्नलिखित श्लोक के भाव को जीवन में उतार लेंगे तो यह प्रकाशन सार्थक हो जाएगा-
मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति स पण्डितः।।
अर्थ-जो परस्त्री को माता के समान, पर द्रव्य (पर धन) को लोष्ठ (मिट्टी के ढेले) के समान और सर्व प्राणियों को अपने समान समझता है, वही सच्चा पंडित (समझदार व्यक्ति) है ।
-प्रो. वीरसागर जैन, दिल्ली
प्रस्तावना
जहाँ तक उपन्यास का प्रश्न है सुशीला उपन्यास अपनी रीति नीतियों के आधार पर सही उतरा है। लेखक पंडित गोपालदासजी बरैया ने जनसाधारण की रुचि के अनुरूप ही इसे रचा है। वे मानव प्रकृति के सच्चे अध्येता एवं परीक्षक थे। उन्होंने पताशे में कुनैन देने जैसी बात सोची और कथा साहित्य के माध्यम से जैन धर्म एवं दर्शन के मुद्दों को पाठकों के समक्ष रखा।
यद्यपि जैन साहित्य के मर्मज्ञ, सिद्धान्त के प्रणेता बरैया जी को उपन्यास जैसी हल्की रचना शोभा नहीं देती किन्तु फिर भी दृष्टिकोण उत्तम होने से जन साधारण के हित के लिये रची गई यह रचना उत्तम कही जा सकती है। कथा एक शीलवान महिला की और शीलवान पुरुष की है जिन्होंने कि कुशील पर विजय पाई है। शील के महत्व को उभारने के लिए उसके विपक्षी कुशील पात्रों को घसीटा गया है ताकि पाठकों की अभिरुचि कुशील से हटकर शील में आरूढ़ हो।
मूलभूत उपन्यास को हम चार भागों में बाँट सकते हैं। 1. कथाभाग, 2. धार्मिक चर्चा, 3. प्राकृतिक दृश्य और 4. चरित्र-चित्रण।
कथा भाग में सात प्रमुख पात्र हैं। जयदेव, भूपसिंह, उदयसिंह, बलवन्तसिंह, हीरालाल, रामकुमारी और सुशीला। शेष पात्र इन्हीं के सहायक हैं। रतनचन्द जौहरी रामकुमारी का पति और हीरालाल का पिता है। रामकुमारी हीरालाल की विमाता है। भूपसिंह जयदेव का मित्र और सुशीला जयदेव की पत्नी है। उदयसिंह सुशीला का इच्छुक और बलवन्तसिंह उदयसिंह का मित्र है।
सुशीला शीलवान जयदेव की शीलवती पत्नी है। उदयसिंह बलवन्तसिंह की सहायता से इसे पाना चाहता है। इसी कारण उसने भूपसिंह सहित जयदेव और सुशीला को समुद्र में डुबो दिया है, किन्तु शील के प्रताप से वे सब बच गये हैं। उदयसिंह एवं बलवन्तसिंह को अपने किये का फल मिल गया है।
दूसरे कुशील पात्र हीरालाल और रामकुमारी हैं जो परस्पर सौतेली माँ और सौतेले पुत्र का सम्बन्ध रखते हैं। रतनचंद रामकुमारी का पति दूजवर है, उम्र में बड़ा है। सौत का पुत्र हीरालाल उससे कम उम्र का है, अतः दोनों में वासनामय प्रेम जाग्रत हो उठता है। लेखक ने इसी कुशील का दण्ड अपनी चातुरीपूर्ण रचना द्वारा दिलाया है। जौहरी रतनचन्द का वैराग्य इसी घटना के साक्षात् देखने से हुआ है। सारा उपन्यास हीरालाल रामकुमारी के कुशील की निन्दा, उदयसिंह, बलवन्तसिंह के दुष्कृत्यों का फल तथा जयदेव, भूपसिंह और सुशीला के साहस, धैर्य एवं शील की प्रशंसा से भरा पड़ा है।
2. धार्मिक चर्चा-
इस विषय में पंडितजी ने गागर में सागर भरा है। छोटे से उपन्यास में गुणस्थान, जीवसमास, आठ कर्म, सप्ततत्त्व, नौ पदार्थ, रत्नत्रय धर्म, दशलक्षण धर्म, स्वर्ग, नरक, गति, अगति, स्वर्ग, मोक्ष आदि सारे ही जैन धर्म के मूलभूत विषयों की चर्चा की है। कहना न होगा पंडितजी का मूल उद्देश्य भी इसी धार्मिक चर्चा के जन-साधारण तक पहुँचाना था। वे जानते थे कि व्यक्ति रागानुरागवृत्ति वाला है, धार्मिक चर्चा इसी वृत्ति द्वारा ग्रहण कर सकता है, अतः उन्होंने इसी को उसका माध्यम बनाया।
3. प्रकृति चित्रण -
पंडितजी प्रकृति के प्रेमी थे। उन्होंने इसी का परिचय अपने उपन्यास में दिया। नदी, सरोवर, संध्या, रात्रि, वर्षा ऋतु, शरद ऋतु, पशु, पक्षी, वन, उपवन आदि सभी का वर्णन शास्त्रोक्त विधि तथा साहित्यिक ढंग से किया।
4. चरित्र-चित्रण -
चरित्र-चित्रण भी औपन्यासिक शैली का ही बन पड़ा है। स्त्री पात्रों के चरित्र-चित्रण उनके स्वभावानुरूप और पुरुष पात्रों के चरित्र उनके अनुरूप बन पड़े हैं। शीलवान का स्वभाव और कुशीलवान का स्वभाव जैसा होना चाहिए, किया गया है। राजा को, सेठ को तथा सैनिक को जैसा होना चाहिए, चित्रित किया है।
भाषा एवं शैली
पंडितजी की भाषा संस्कृत मिश्रित हिन्दी है। मध्य प्रदेश के होने के नाते उर्दू व देशज शब्द भी काफी मात्रा में पाये जाते हैं। मुहावरों का प्रयोग भी खूब मिलता है। संस्कृत के श्लोक और हिन्दी की कहावतें उपन्यास के प्राण हैं। नीति की बातें तथा उपदेशी उदाहरण भी काफी मात्रा में पाये जाते हैं।
शैली नाटकीय कथोपकथन लिये हुए है। छोटे-छोटे वाक्य प्रश्नोत्तर ढंग से लिखे गये हैं ताकि पाठक का मन लगा रहे और ऊबे नहीं।
5. उपसंहार -
उपन्यास को तात्विक दृष्टि से और धार्मिक दृष्टि से देखने पर ज्ञात होता है कि यह लेखक की सफल कृति है, उनकी धार्मिक अनुराग, साहित्य की सेवा और जिनवाणी का प्रचार एवं प्रसार में अभिरुचि सराहनीय है।
हमें कुशील से मुख मोड़ कर शील की ओर अग्रसर होना चाहिए, यही इस कृति का सदुपयोग है। मेरी पाठकों से यही विनय है कि वे हंस की भांति अपनी प्रकृति बनावें, दुग्ध को ग्रहण करें, पानी को छोड़ दें।
इति शुभम्
मंगलाचरण
सकल व्रतनि में अग्रसर, सकल कर्म क्षयकार।
सकल निकल जासों भये नमों शील शिवद्वार।।
विषय-अनुक्रमणिका
| क्र. | भाग | विषय |
|---|---|---|
| 1 | पूर्वार्द्ध | प्रथम पर्व |
| 2 | पूर्वार्द्ध | द्वितीय पर्व |
| 3 | पूर्वार्द्ध | तृतीय पर्व |
| 4 | पूर्वार्द्ध | चतुर्थ पर्व |
| 5 | पूर्वार्द्ध | पंचम पर्व |
| 6 | पूर्वार्द्ध | षष्ठ पर्व |
| 7 | पूर्वार्द्ध | सप्तम पर्व |
| 8 | पूर्वार्द्ध | अष्टम पर्व |
| 9 | पूर्वार्द्ध | नवम पर्व |
| 10 | पूर्वार्द्ध | दशम पर्व |
| 11 | पूर्वार्द्ध | ग्यारहवां पर्व |
| 12 | पूर्वार्द्ध | द्वादशवां पर्व |
| 13 | पूर्वार्द्ध | त्रयोदशवां पर्व |
| 14 | पूर्वार्द्ध | चौदहवां पर्व |
| 15 | पूर्वार्द्ध | पन्द्रहवां पर्व |
| 16 | पूर्वार्द्ध | सोलहवां पर्व |
| 17 | पूर्वार्द्ध | सत्रहवां पर्व |
| 18 | पूर्वार्द्ध | अठारहवां पर्व |
| 19 | पूर्वार्द्ध | उन्नीसवां पर्व |
| 20 | पूर्वार्द्ध | बीसवां पर्व |
| 21 | पूर्वार्द्ध | इक्कीसवां पर्व |
| 22 | पूर्वार्द्ध | बाईसवां पर्व |
| 23 | पूर्वार्द्ध | तेईसवां पर्व |
| 24 | पूर्वार्द्ध | चौबीसवां पर्व |
| 25 | पूर्वार्द्ध | पच्चीसवां पर्व |
| 26 | पूर्वार्द्ध | छब्बीसवां पर्व |
| 27 | पूर्वार्द्ध | सत्ताईसवां पर्व |
| 28 | पूर्वार्द्ध | अट्ठाईसवां पर्व |
| 29 | पूर्वार्द्ध | उनतीसवां पर्व |
| 30 | पूर्वार्द्ध | तीसवां पर्व |
| 31 | उत्तरार्द्ध | उत्तरार्द्ध |
| 32 | उत्तरार्द्ध | दूसरा पर्व |
| 33 | उत्तरार्द्ध | तीसरा पर्व |
| 34 | उत्तरार्द्ध | चौथा पर्व |
| 35 | उत्तरार्द्ध | पांचवां पर्व |
| 36 | उत्तरार्द्ध | छट्ठा पर्व |
| 37 | उत्तरार्द्ध | सातवां पर्व |
| 38 | उत्तरार्द्ध | आठवां पर्व |
| 39 | उत्तरार्द्ध | नवां पर्व |
| 40 | उत्तरार्द्ध | दसवां पर्व |
| 41 | उत्तरार्द्ध | ग्यारहवां पर्व |
| 42 | उत्तरार्द्ध | बारहवां पर्व |
| 43 | उत्तरार्द्ध | तेरहवां पर्व |
| 44 | उत्तरार्द्ध | चौदहवां पर्व |
| 45 | उत्तरार्द्ध | पंद्रहवां पर्व |
| 46 | उत्तरार्द्ध | सोलहवां पर्व |
| 47 | उत्तरार्द्ध | सत्रहवां पर्व |
| 48 | उत्तरार्द्ध | अठारहवां पर्व |
| 49 | उत्तरार्द्ध | उन्नीसवां पर्व |
| 50 | उत्तरार्द्ध | बीसवां पर्व |
| 51 | उत्तरार्द्ध | इक्कीसवां पर्व |
| 52 | परिशिष्ट |
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