सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए श्रावकाचार
-प्रो. वीरसागर जैन
सोनागिर संगोष्ठी में प्रस्तुत आलेख
वैसे तो सम्पूर्ण श्रावकाचार ही सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए है, क्योंकि उसका नाम ही श्रावकाचार है, गृहस्थाचार है, सद्गृहस्थ का आचार है; किन्तु फिर भी आइए, देखते हैं कि सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए जैनाचार्यों ने क्या विशेष श्रावकाचार कहा है |
यह विषय आज के समय में अत्यधिक उपयोगी भी है, क्योंकि आज लोगों का दाम्पत्य जीवन बहुत बिगड़ता जा रहा है, आज पति-पत्नी में आपस में ही नहीं बन रही है, उनमें बात-बात पर बहुत अधिक कलह होने लगी है | आज हमारी ‘परिवार’ नामक संस्था खतरे में पड़ गयी है | समाज में नित नई संस्थाओं का जन्म हो रहा है, किन्तु जब ‘परिवार’ नामक संस्था ही नहीं बचेगी तो अन्य संस्थाओं का क्या करेंगे ? सर्वप्रथम तो परिवार बचना चाहिए, उसी से आदर्श समाज, ग्राम, नगर, राष्ट्र आदि बनते हैं |
सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए जैनाचार्यों ने जो विशेष निर्देश दिए हैं, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं -
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पति-पत्नी दोनों बचपन से ही उत्तम संस्कारों में पले हुए होने चाहिए | उनकी आयु, शिक्षा, रुचि, धन आदि भी सब समान स्तर के ही होना चाहिए | असंस्कारित और असमान स्तर के लोगों का विवाह आजीवन सन्ताप का कारण बनता है | यथा - “वित्तं ययोरेव समं जगत्यां, कुलं ययोरेव समं प्रतीतम् | मैत्री तयोरेव तयोर्विवाहस्तयोर्विवादश्च निरूपितोऽस्ति ||" (-शान्तिनाथचरित) अथवा- “जं विसरस-धम्माणं ण होइ परिणाम सुंदरो णेहो | णेहं विणा विवाहो आजम्मं कुणइ परिदाहं ||" (-णम्मयासुंदरीकहा, 39 )
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दाम्पत्य जीवन का मूल आधार विवाह है, अतः विवाह विधिपूर्वक ही सम्पन्न होना चाहिए | यदि विवाह ही दोषयुक्त होगा तो दाम्पत्य जीवन कैसे सुखमय होगा ? महापुराण (पर्व 38, श्लोक 127 से 134तक ) आदि शास्त्रों में जिनसेन आदि आचार्यों ने विवाह की विधि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उसका अवश्य पालन करना चाहिए | जैसे कि उन्होंने कहा है कि विवाह जिनप्रतिमा के समक्ष होना चाहिए, वर-वधू दोनों को सावधानीपूर्वक सोच-समझकर विवाह की प्रतिज्ञा करनी चाहिए | विवाह कोई मजाक नहीं है, एकदेश दीक्षा ही है |
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पति-पत्नी दोनों को स्त्री-पुरुष-स्वभाव का भी भलीभांति ज्ञान होना चाहिए | जैसे - स्त्रियों को पुरुष की निर्धनता, क्रूरता आदि से भी उतनी पीड़ा नहीं होती, जितनी कि उनकी अवज्ञा/उपेक्षा से होती है - “स्त्रीष्वज्ञा हि दुःसहा”, अतः पुरुषों को कभी भी स्त्री की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए | इसीप्रकार पुरुषों को अहंकार विशेष प्रिय होता है, वे उस पर चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते, वह भी स्त्री के द्वारा, अतः स्त्रियों को पुरुष के अहंकार पर चोट नहीं मारना चाहिए | (स्त्रीणां पत्युपेक्षैव परं वैरस्य कारणम् | तन्नोपक्षेत जातु स्त्रीं वांछल्लोकद्वये हितम् || -सागारधर्मामृत, 3/27 )
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स्त्री-पुरुष दोनों को एक-दूसरे के स्वभाव को पहचान कर येन-केन प्रकारेण एक-दूसरे को अनुकूल/प्रसन्न रखने का भी प्रयास करना चाहिए और एक-दूसरे को धर्ममार्ग पर भी लगाए रखना चाहिए, ताकि धर्ममय गृहस्थजीवन की गाड़ी ठीक से चलती रहे | ( “व्युत्पादयेत्तरां धर्मे पत्नीं प्रेमपरं नयन् | सा हि मुग्धा विरुद्धा वा धर्माद्धंश्यते तराम् ||” - सागारधर्मामृत 3/26 )
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पति-पत्नी में कलह के मुख्य कारण प्रायः निम्नलिखित होते हैं - मद्यपान आदि का नशा, हाथ या हथियार से मारना-पीटना, झूठ बोलना, विश्वासघात करना, विवाहेतर सम्बन्ध रखना (extra-marital affairs) | यदि पति-पत्नी सप्त व्यसनों को त्याग कर अष्ट मूलगुणों ( "मद्यमांसमधुत्यागैः सहाणुव्रतपंचकम्”) को धारण कर लें तो उक्त सभी कारण उनके जीवन से बाहर हो जाएँगे और उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय हो जाएगा |
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दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए आहार पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए | आहार का हमारे तन, मन और जीवन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है | आज तो इस बात को वैज्ञानिक भी सिद्ध कर चुके हैं, अतः सुखी दाम्पत्य जीवन के अभिलाषियों को आहारशुद्धि पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए | तथा यह आहारशुद्धि भी सर्वांग हो तो कहना ही क्या, उनका दाम्पत्य जीवन तो अवश्य ही सुखमय होगा | सर्वांग शुद्ध आहार का अर्थ है - जो न्यायपूर्वक कमाया गया हो, यत्नाचारपूर्वक बनाया गया हो, वात्सल्यपूर्वक खिलाया गया हो और अनासक्तिपूर्वक खाया गया हो, उसे सर्वांग शुद्ध आहार कहते हैं ।
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वैसे तो पति-पत्नी समान रुचि के होते हैं अतः उनमें मतभेद ही नहीं होते, परन्तु कदाचित् कुछ हो तो भी उन्हें एकमत होने का पूरा प्रयास करना चाहिए | इसी से उन्हें सुख मिल सकता है,अन्यथा नहीं | जैसा कि आचार्य वादीभसिंहसूरि ने कहा है - “संसारोऽपि हि सारः स्यात् दम्पत्योरेककण्ठयोः” ।
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दम्पति (पति-पत्नी दोनों) को ‘गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो निर्मोहो नैव मोहवान्’ का पाठ अच्छी तरह पढ़ना-समझना चाहिए | अनासक्ति ही सुख का और आसक्ति ही दुःख का कारण होती है ।
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षट् आवश्यकों (देवपूजा(राजाभोज), गुरूपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान) के पालन पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए | सुखी दाम्पत्य जीवन में इनकी भी बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, जिसे सरलता से समझाना कठिन है | इनमें से एक आवश्यक भी पालकर देखो तो पता चलता है | जैसे एक दान भी शुरू करो तो जीवन सुखमय हो जाता है | जैन श्रावकाचार दान की बहुत गहरी प्रेरणा देते हैं | पद्मनंदी पंचविंशति में कहा है कि जो श्रावक पुण्योदय से प्राप्त लक्ष्मी को दान में नहीं देता वह कौए से भी गया बीता है, क्योंकि कौआ भी प्राप्त खुरचन को बाँटकर ही खाता है |
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ऋषभदेव की पांच बातें सदा ध्यान में रखनी चाहिए- स्वतन्त्रता, अस्वच्छन्दता, स्वावलंबन, स्वयं को बदलो दूसरे को नहीं, सदा प्रसन्न रहो |
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ध्यान, सामायिक, प्रतिक्रमण, आलोचना आदि क्रियाओं का भी नित्य अभ्यास करना चाहिए | सुखी दाम्पत्य जीवन में इनकी बड़ी भूमिका होती है | इसी प्रकार बारह भावना का भी नित्य चिन्तन करना चाहिए | इससे कहीं आसक्ति नहीं होती, जो कि कलह का मूल कारण होती है | (सांप-नेवला-लड़ाई )
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बच्चों को भी धर्म के मार्ग पर लगाना चाहिए | (इस विषय में मेरा अन्य लेख द्रष्टव्य है - ‘परिवार को भी धर्म के मार्ग पर लगाओ’।)
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महापुराण पर्व 38, श्लोक 136 से 141 तक में वर्णित वर्णलाभक्रिया का भी सबको पालन करना चाहिए | वह बहुत आवश्यक है, उसके बिना भी दम्पति को स्वातंत्र्यसुख नहीं मिल सकता | वर्णलाभ क्रिया के अनुसार विवाह के बाद पति-पत्नी को उनका हिस्सा देकर अलग कर दिया जाता है, स्वतंत्र कर दिया जाता है, स्वावलम्बी बना दिया जाता है ।
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साधारण जीवों को जिन्हें अभी सकल संयम नहीं धारण करना है उन्हें विवाह कर ही लेना चाहिए, क्योंकि इससे धर्मसन्तति को आगे बढ़ाया जा सकता है और श्रावकाचार-निरूपित गृहस्थजीवन का भलीभांति पालन किया जा सकता है | यह कामविजय का भी उत्कृष्ट साधन है | (“धर्मसन्ततिमक्लिष्टां रतिं वृत्तकुलोन्नतिम् | देवादिसत्कृतिं चैच्छन् सत्कन्यां यत्नतो वहेत् ||” - सागारधर्मामृत, 10)
इसप्रकार हमने यहाँ सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए निरूपित श्रावकाचार के कुछ बिन्दुओं का संक्षेप में संकेत किया | विस्तार से जानने के लिए मूल शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिए | सबका दाम्पत्य जीवन सुखमय हो, परम्परा मुक्ति का कारण बने - इसी मंगल भावना के साथ मैं यहाँ विराम लेता हूँ |
उक्तञ्च
“वरं गणपवेसादो विवाहस्स पवेसणं | विवाहे राग उप्पत्ति गणो दोसाणमागरो ||”