मंगलाचरण
(छंद-दोहा)
जयति पंचपरमेष्ठी जिनगृह चैत्य प्रधान ।
जय जगदम्बे दिव्यध्वनि जय जिनधर्म महान् ।।
भेदज्ञान विज्ञान ही वीतराग विज्ञान ।
भव प्रपंच के नाश से होता है निर्वाण ।।
मंगलोत्तम शरण है श्री जिनधर्म महान्
परम मोक्ष का मूल है भेदज्ञान विज्ञान।।
छन्द-अनुष्टुप
मंगलं पंचपरमेष्ठी, मंगलम् जिनध्वनि परम्।
मंगलं चैत्यचैत्यालय धर्म जिनवर मंगलम् ।।
(छंद-चामर)
वीतराग श्री जिनेन्द्र ज्ञान रूप मंगलम् ।
गणधरादि सर्वसाधु ध्यानरूप मंगलम् ।।
वस्तु का स्वभाव ही अनाद्यनंत मंगलम् ।
आत्मधर्म वस्तु धर्म सार्वधर्म मंगलम् ।।
(छन्द-सोरठा)
ज्ञान पयोनिधि रूप शुद्धात्मा मंगलमयम् ।
पाऊँ ज्ञान अनूप आत्मधर्म मंगलमयम् ।।
(छन्द-गीतिका)
अर्हत सिद्धाचार्य पाठक साधु जिनध्वनि मंगलम् ।
चैत्य चैत्यालय श्री जिनधर्म उत्तम मंगलम् ।।
देव नव मंगलमयम् तीर्थेश प्रभु मंगलमयम् ।
ज्ञानसम्यक् मंगलं परमात्मा मंगलमयम् ।।
पीठिका
(छंद-मत्तसवैया)
गुंजायमान हो योगसार अध्यात्म प्रेमियों के मन में।
आत्मीय सौख्य की प्राप्ति परम होती है निज के चिन्तन में ।।
योगीन्दु देव की परमकृपा परमात्म प्रकाश सहित पायी।
इकशत वसु दोहों में लिक्खा यह योगसार अतिसुखदायी ।।
इस पर विधान लिखकर मैंने अपना ही तो कल्याण किया।
जो इत उत मन चंचल भागा जाता था उसको थाम लिया।।
अवकाश समय कुछ क्षण इसका यदि आप भाव से पाठ करें।
तो निश्चित आत्मज्ञान पाके मन की कालुषता सकल हरे ।।
यह योगसार योगीन्दुरचित जय जिनवाणी जगकल्याणी।
वसु प्रवचन माता प्राप्त करूँ आशीष मुझे दो जिनवाणी ।।
शब्दार्थ तथा भावार्थ समझ मैं करूँ आत्म चिन्तन महान्।
परमात्म प्रकाश करूँ अपना कर योगसार पावन विधान।।
(छंद-दोहा)
छठी शताब्दी में हुए मुनि योगीन्दु महान्।
योगसार दोहे रचे किया विश्व कल्याण।।
योगसार जिनग्रंथ पढ़ करूँ आत्म कल्याण।
स्वपर विवेक जगा हृदय पाऊँ पद निर्वाण।।
पंच भेद मिथ्यात्व के कर दूँ चकनाचूर ।
अविरति भाव विनष्ट कर सुख पाऊँ भरपूर ।।
चिरप्रमाद को जीत लूँ श्रेणी चढूँ महान् ।
सर्वकषायें जीतकर पाऊँ केवलज्ञान।।
केवलज्ञान प्रकाश ले पाऊँ पद निर्वाण ।
सादि अनंतानंत सुख पाऊँ महा महान् ।।
यह विधान रचकर हुआ उर में हर्ष महान् ।
शब्द अर्थ श्रुतभाव का पाऊँ पावन ज्ञान।।
धन्य-धन्य योगीन्दु ऋषि सुकृत आपका धन्य ।
योगसार का पाठ रच हुआ आत्मा धन्य।।
योगसार की शक्ति से हो परमात्मप्रकाश ।
पूर्ण ज्ञान का स्रोत पा, पाऊँ मोक्ष निवास ।।
भक्ति भाव से मैं करूँ पावन परम विधान।
अष्ट द्रव्य प्रासुक चढ़ा करूँ भेद विज्ञान।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि
समुच्चय पूजन
स्थापना
(छंद-दोहा)
श्री योगीन्दु महान् का है महान् उपकार।
योगसार का सार दे दर्शाया भवपार ।।
(छंद-रोला)
दर्शाया भवपार बताया बहिरात्मा को।
अंतरात्मा होने का उपाय आत्मा को ।।
बहिरात्मापन छोड़ दिया फिर बहिरात्मा ने।
अन्तरात्मा दृष्टि बनायी निज आत्मा ने।।
(छंद-दोहा)
अब है यह परमात्मा तीन लोक का नाथ।
इसीलिए पूजन करूँ तजूँ न इसका साथ ।।
जो भी हैं परमात्मा सबको करूँ प्रणाम।
अन्तरात्मा बन प्रभो पाऊँ निजध्रुव धाम ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपकश्रीयोगसार ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्
आह्वाननं ।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपकश्रीयोगसार ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपकश्रीयोगसार ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
सन्निधिकरणम् ।
अष्टक
(छंद-वीर)
प्रासुक निर्मल नभ जल शीतल चरणों में अर्पित है नाथ।
जन्म जरादिक मरण व्याधि क्षय में सक्षम निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय जन्म जरा मृत्युविनाशनाय जलं।
सहज भाव चंदन सुगन्धमय मस्तक तिलक लगाऊँ नाथ।
भव ज्वाला शीतल करने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय संसारताप विनाशनाय चंदनं।
शुद्धभाव अक्षत अपूर्व ले अक्षयपद पाऊँ हे नाथ।
सहज अखंड स्वभाव प्राप्ति में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं ।
कामभाव विध्वंसक पावन शुद्धभाव अर्पित हैं नाथ।
महाशील गुण प्रगटाने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं ।
क्षुधाविनाशक अनुभव रस नैवेद्य समर्पित है हे नाथ।
तृप्त स्वभाव शाश्वत पाने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं।
मोह तिमिर हर ज्ञानदीप की सहज ज्योति अर्पित है नाथ।
स्वपर प्रकाशक केवलज्ञान प्रकाशूँ ले निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।। [ 13
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं।
अष्टकर्म विध्वंसक उत्तम शुक्लध्यान ही पाऊँ नाथ।
नित्य निरंजन पद देने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अष्टकर्म दहनाय धूपं ।
पुण्यभाव फल अब न चाहिए अतः तुम्हें अर्पित है नाथ।
महामोक्षफल के देने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय मोक्षफल प्राप्तये फलं।
शुद्ध भावनामयी अर्घ्य सादर सविनय अर्पित है नाथ।
निज अनर्घ्य पदवी देने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं ।
महार्घ्य
(छंद-दिग्पाल)
जो पाप में उलझे हैं वे नर्क में जाते हैं।
जो पुण्य में उलझे हैं वे स्वर्ग में जाते हैं।।
नर्कों के जीव नर हो फिर स्वर्ग में जाते हैं।
स्वर्गों में अशुभ करके फिर नर्क में जाते हैं।।
जो पाप-पुण्य दोनों में नहीं उलझते हैं।
संसार की उलझन से वे जीव सुलझते हैं।।
पाते हैं शाश्वत सुख निज शुद्धभाव द्वारा।
परमात्मा बनते हैं क्षय करते भवकारा।।
है योगसार का तो सर्वोच्चसार पावन।
जो आत्मा ध्याते हैं बन जाते आनंदघन।।
निज आत्मतत्त्व निर्णय हित महार्घ्य अर्पित।
शुद्धात्म का दर्शन ही है मोक्ष प्राप्ति के हित।।
(छंद-त्रिभंगी)
भव दुख नाशक ज्ञान प्रकाशक शिवसुखदायक शुद्धात्मा।
परमभाव संपदा प्रदायक एकमात्र निज परमात्मा।।
तज बहिरात्मापन हो जाऊँ अन्तरात्मा सुखदायी।
परमात्मा बन सिद्धात्मा बन निजपद पाऊँ शिवदायी।।
(दोहा)
योगसार का सार पा बनूँ अयोगीनाथ।
जब तक निजपद न मिले तजूँ न तुम पद साथ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(छंद-ताटंक)
योगसार का सार प्राप्त करने चरणों में आया हूँ।
पुण्य-पाप परभाव नाश का निश्चय उर में लाया हूँ।।
विविध वेशभूषा से सज्जित त्रययोगों का आश्रय कर।
आस्रव को आमंत्रित करके सतत बढ़ाया भवसागर ।।
आस्रव द्वारा कर्मबंध कर भव अटवी में ही भटका।
संवर भाव नहीं पहचाना कर्मास्रव में ही अटका ।।
सदगुरु का उपदेश सुना पर ध्यान नहीं देने पाया।
जिनवाणी की बात न मानी चारों गति में भ्रम आया ।।
पाप-पुण्य अवरोध बिना संवर कैसे आ सकता था।
बिन संवर निर्जरा भाव कैसे उर में ला सकता था।।
बिन निर्जरा कर्म क्षीण करना कैसे होता प्रारंभ।
रत अकाम निर्जरा हुआ तो फल में पाया पुण्यारंभ ।।
पुण्यारंभ क्षीण होते ही संचय पाप किए सारे ।
पापों का फल नर्क निगोदादिक दुख भव समुद्रखारे ।।
यह क्रम पंच परावर्तन मय निमिष मात्र भी रूका नहीं।
मैं भी अड़ियल टट्टू अपनी ओर कभी भी झुका नहीं ।।
पंच परावर्तन अनंत इस भाँति सदा मेरे बीते ।
पाप-पुण्य परभाव अनंतानंत किए प्रभु मन चीते।।
महाभाग्य त्रस हुआ नाथ मैं पायी फिर से नर पर्याय ।
आज अचानक योगसार पढ़ निज-पर बोध हुआ सुखदाय ।।
बहिरात्मा अरु अंतरात्मा दोनों का जाना प्रभु भेद।
द्रव्य दृष्टि से मैं परमात्मा शुद्ध त्रिकाली पूर्ण अभेद ।।
बस अब क्या करना है मुझको कृतकृत्य हो गया स्वयं।
कुछ ही भव में मोक्ष पाऊँगा तोड़ा मैंने भव विभ्रम ।।
कृपा मिली योगीन्दुदेव की उनका योगसार पाया।
यह दृढ़ निश्चय हुआ हृदय में भव का अंत निकट आया ।।
सम्यक्दर्शन प्राप्त हो गया झलका सम्यक्ज्ञान हृदय।
सम्यक्चारित्र को धारण कर पाऊँगा मैं मुक्ति निलय ।।
ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय जयमाला महाअर्घ्यं नि. स्वाहा।
(आशीर्वाद)
योगसार का सार ही तीन लोक में सार।
इसे प्राप्त कर जीव सब हो जाते भव पार ।।
(पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि)
अर्ध्यावलि
( 1 )
प्रथम, मंगल स्वरूप : श्री सिद्ध परमात्मा को नमस्कार करते हैं:
(छंद-दोहा)
णिम्मल-झाण-परिट्ठिया, कम्म-कलंक डहेवि।
अप्पा लद्धउ जेण परु, ते परमप्प णवेवि ।। 1 ।।
નિર્મળ ધ્યાનારૂઢ થઈ, કર્મકલંક ખપાય;
થયા સિદ્ધ પરમાત્મા, વંદું તે જિનરાય. ૧.
अर्थ :- जो निर्मल ध्यान में स्थित है और जिन्होंने कर्मों के मल को भस्म कर
उत्कृष्ट परमात्मपद को प्राप्त कर लिया है, उन परमात्माओं को नमस्कार करता हूँ।
1. ॐ ह्रीं कर्मकलंकरहित निरंजनस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
निर्मलपरमात्मस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-ताटंक)
निर्मल ध्यान अवस्थित हैं जो कर्म कलंक भस्म कर्त्ता।
परमात्मा पद पाया जिनने उनको नमस्कार करता ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।१।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(2)
श्री अरहंत भगवान् को नमस्कार :
घाइ-चउक्कहँ किउ विलउ-णंत-चउक्क पदिटठु ।
तहिं जिणइंदहँ पय णविवि, अक्खमि कब्बु सु-इट्ठु ।।2।।
ચાર ઘાતિયા ક્ષય કરી, લહ્યાં અનંત ચતુષ્ટ;
તે જિનવર ચરણે નમી, કહું કાવ્ય સુઈષ્ટ. ૨.
अर्थ :- जिसने चार घातिया कर्मों का नाश कर अनन्त चतुष्टय को प्रकट किया
है, उन जिनेन्द्रके चरणों को नमस्कार कर, यहाँ अभीष्ट काव्य को कहता हूँ।
2. ॐ ह्रीं स्वचतुष्टयस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
अनंतज्ञानस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-ताटंक)
चारघातिया कर्म नष्ट कर किया अनंत चतुष्टय प्राप्त।
उनको वंदन कर कहता हूँ योगसार वच जिनवर आप्त ।।
ज्ञान भुजाओं के बल से अब भव समुद्रको पार करूँ ।
तूफानों को नक्षत्रों से पूछे बिन संहार करूँ ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।2।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 3 )
ग्रन्थ को कहने का निमित्त व प्रयोजन :
संसारहँ भय-भीयाहँ, मोक्खहँ लालसियाहं ।
अप्पा-संबोहण-कयइ, कय दोहा एक्कमणाहं ।। 3 ।।
ઇચ્છે છે નિજ મુક્તતા, ભવભયથી ડરી ચિત્ત;
તે ભવી જીવ સંબોધવા, દોહા રચ્યા એકચિત્ત. ૩.
अर्थ :- जो संसार से भयभीत हैं और मोक्ष के लिए जिनकी लालसा है, उनके
संबोधन के लिए एकाग्र चित्त से मैंने इन दोहों की रचना की है।
3. ॐ ह्रीं संसारभयरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
निर्भयस्वरूपोऽहं ।
(छंद-ताटंक)
जो भव से भयभीत हुए हैं जिनको जगी मोक्ष की चाह ।
उनके ही संवर्धन के हित कहता हूँ भर उर उत्साह ।।
स्वपर विवेक दृष्टि सम्यक् ले सम्यक् पथ पर चला चलूँ ।
ज्ञायक भाव हृदय में लेकर राग-द्वेष सम्पूर्ण छलूँ ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।। 3 ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(4)
संसार का कारण-मिथ्यादर्शन :
काल अणाइ अणाइ जिउ, भव-सायरु जि अणंतु ।
मिच्छा-दंसण-मोहियउ, ण वि सुह दुक्ख जि पत्तु ।।4।।
જીવ, કાળ, સંસાર આ, કહ્યા અનાદિ અનંત;
મિથ્યામતિ મોહે દુ:ખી, કરી ન સુખ લહંત. ૪.
अर्थ :- काल अनादि है, जीव अनादि है और भवसागर अनन्त है। उसमें
मिथ्यादर्शन से मोहित जीव ने दुःख ही दुःख पाया है, सुख नहीं पाया।
4. ॐ ह्रीं अनाद्यनंतस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
आनंदघनस्वरूपोऽहं ।
(छंद-ताटंक)
काल अनादि अनंत जीव है भव सागर है नाथ अनंत ।
कभी न सुख पाया प्राणी ने पाए दुख ही दुख भगवंत ।।
निज संयम तरणी का लंगर खोलो कर में ले पतवार ।
भव लहरों से भय न करो तुम सम्यक् दिशा ग्रहो इस बार ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण । । 4 ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 5 )
मोक्षसुख का कारण : आत्म ध्यान :
जइ वीहउ चउ-गइ-गमणु, तउ परभाव चएवि।
अप्पा झायहि णिम्मलउ, जिम सिव-सुक्ख लहेवि ।।5।।
ચાર ગતિ દુઃખથી ડરે, તો તજ સૌ પરભાવ;
શુદ્ધાતમ ચિંતન કરી, લે શિવસુખનો લાભ. ૫.
अर्थ :- हे जीव ! यदि तू चर्तुगति के भ्रमण से भयभीत है, तो परभाव का त्याग
कर और निर्मल आत्मा का ध्यान कर, जिससे तू मोक्षसुख को प्राप्त कर सके।
5. ॐ ह्रीं परभावरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
निजज्ञानानंदस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
है भयभीत चतुर्गति दुख से तो परभावों का कर त्याग।
निर्मल आत्मध्यान कर अपना शिवसुख पाने को अब जाग।।
चारित्र स्वरूपाचरण साधकर निज को ही कर ले स्वीकार।
मिथ्याचरण सर्वथा तजदे राग-द्वेष सब कर परिहार ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।5।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(6)
आत्मा के तीन प्रकार :
तिपयारो अप्पा मुणहि, परु अंतरु बहिरप्पु ।
पर झांयहि अंतर-सहिउ, बाहिरु चयहि णिभंतु ।।6।।
ત્રિવિધ આત્મા જાણીને, તજ બહિરાતમ રૂપ;
થઈ તું અંતર આતમા, ધ્યા પરમાત્મસ્વ રૂપ. ૬.
अर्थ :- परमात्मा, अन्तरात्मा और बहिरात्मा इस तरह आत्मा के तीन प्रकार
समझने चाहिए। हे जीव ! अन्तरात्मा सहित होकर परमात्मा का ध्यान कर और भ्रान्ति
रहित होकर बहिरात्मा को त्याग।
6. ॐ ह्रीं बहिरात्माद्यवस्थारहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
शाश्वत्स्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
परमात्मा अरु अंतरात्मा अरु बहिरात्मा तीन प्रकार।
अन्तरात्मा को परमात्मा का कर ध्यान भ्रान्ति परिहार ।।
बहिरात्मापन त्याग अभी तू आत्म ध्यान में हो जा लीन।
एक मात्र अन्तर्मुहूर्त्त में हो जाएगा कर्म विहीन ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।6।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 7 )
बहिरात्मा का स्वरूप :
मिच्छा-दंसण-मोहियउ, परु-अप्पा ण मुणेइ ।
सो बहिरप्पा जिण-भणिउ, पुण संसारू भमेइ ।।7।।
મિથ્યા મતિથી મોહીજન, જાણે નહિ પરમાત્મા;
તે બહિરાતમ જિન કહે, તે ભમતો સંસાર. ૭.
अर्थ :- जो मिथ्यादर्शन से मोहित जीव परमात्मा को नहीं समझता, उसे जिन
भगवान् ने बहिरात्मा कहा है; वह जीव पुनः पुनः संसार में परिभ्रमण करता है।
7. ॐ ह्रीं दर्शनमोहरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
निर्मोहस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
मिथ्या दर्शन मोहित प्राणी नहीं जानता परमात्मा ।
अतः भव भ्रमण पुनः पुनः करता है ऐसा बहिरात्मा ।।
पाप भाव को पाप समझने का यदि तू प्रयत्न कर ले।
पुण्य भाव स्वयमेव प्रगट हो सारे पाप भाव हरले ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।7 ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 8 )
अन्तरात्मा का स्वरूप :
जो परियाणइ अप्पु परु जो परभाव चएइ ।
सो पंडिउ अप्पा मुणहिं सो संसार मुएइ ।।8।।
પરમાત્માને જાણીને, ત્યાગ કરે પરભાવ;
તે આત્મા પંડિત ખરો, પ્રગટ લહે ભવપાર. ૮.
अर्थ :- जो परमात्मा को समझता है और जो परभाव का त्याग करता है, उसे
पंडित आत्मा (अन्तरात्मा) समझो। वह जीव संसार को छोड़ देता है।
8. ॐ ह्रीं निर्मलनिजज्ञानस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
विज्ञानघनस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
जो परमात्मा समझ सभी परभावों का करता है त्याग।
वही जीव है अन्तरात्मा जो भव का करता परित्याग ।।
पुण्योदय में अन्तरंग भू स्वच्छ बना यदि लेगा तू।
शुद्ध भाव का बीज स्वयं ही पलभर में बो लेगा तू ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।8।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(9)
परमात्मा का स्वरूप :
णिम्मलु णिक्कलु सुद्ध जिण, विण्हु बुद्ध सिव संतु।
सो परमप्पा जिण-भणिउ, एहउ जाणि णिभंतु ।।9।।
નિર્મળ, નિકલ, જિનેન્દ્ર, શિવ, સિદ્ધ, વિષ્ણુ, બુદ્ધ શાંત,
તે પરમાત્મા જિન કહે, જાણો થઈ નિર્ભ્રાન્ત. ૯.
अर्थ :- जो निर्मल, निष्कल, शुद्ध, जिन, विष्णु, बुद्ध, शिव और शान्त है, उसे
जिन भगवान् ने परमात्मा कहा है-इसमें कुछ भी भ्रान्ति न करनी चाहिए।
9. ॐ ह्रीं निष्कलरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
शुद्ध स्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
निर्मल निश्चल शुद्ध विष्णु जिन बुद्ध शिव जिसके है नाम।
जिन प्रभु कहते वह परमात्मा नहीं भ्रान्ति का इसमें काम ।।
आहवाहन अपने स्वभाव का करके तिष्ठ तिष्ठ कर ले।
उसको ही सन्निहित बना तू सारे मोह दोष हर ले।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।9।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 10 )
इसके सिवाय और कोई सच्चा परमात्मा नहीं हो सकता :
देहादिउ जे परि कहिया, ते अप्पाणु मुणेइ ।
सो बहिरप्पा जिणभणिउ, पुणु संसारू भमेइ ।।10।।
દેહાદિક જે પર કહ્યાં, તે માને નિજરૂપ,
તે બહિરાતમ જિન કહે, ભમતો બહુ ભવકૂપ. ૧૦.
अर्थ :- देह आदि जो पदार्थ पर कहे गये हैं, उन पदार्थों को ही जो आत्मा
समझता है, उसे जिन भगवान् ने बहिरात्मा कहा है। वह जीव संसार में फिर-फिर से
परिभ्रमण करता है।
10. ॐ ह्रीं संसारपरिभ्रमणरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
निर्देहस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
देहादिक जो पर पदार्थ हैं उनको जाने जो आत्मा।
वह संसार भ्रमण करता जिन वचन वही है बहिरात्मा ।।
मन मस्तिष्क घृणा से पीड़ित जो मानवता दुर्लभ है।
ऋजुताभाव न अंतरंग हो फिर पशुता ही तो सुलभ है ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।10 ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 11 )
ज्ञानी पर को आत्मा नहीं मानता है :
देहादिउ जे परकहिया, ते अप्पाणु ण होहिं ।
इउ जाणेविणु जीव तुहुँ, अप्पा अप्प मुणेहिं ।।11 ।।
દેહાદિક જે પર કહ્યાં, તે નિજરૂપ ન થાય,
એમ જાણીને જીવ તું, નિજરૂપને નિજ જાણ. ૧૧.
अर्थ :- देह आदि जो पदार्थ पर कहे गये हैं, वे पदार्थ आत्मा नहीं होते-यह
जानकर, हे जीव ! तू आत्मा को आत्मा पहिचान।
11. ॐ ह्रीं निजानंतगुणवैभवस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
शान्तस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
देह आदि जो पर पदार्थ हैं वे न आत्मा हैं लो जान।
अतः जीव तू मात्र आत्मा को ही सदा आत्मा मान ।।
पर विभाव परिणति फिर तुझको कभी न बहका पाएगी।
फिर न पुण्य की आवश्यकता भी तुझे सताने आएगी ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।11।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 12 )
आत्मज्ञानी ही निर्वाण पाता है :
अप्पा अप्पइ जइ मुणहि, तउ णिव्वाण लहेहि।
पर अप्पा जइ मुणहि तुहुँ, सो संसार भमेहि ।।12।।
નિજને જાણે નિજરૂપ, તો પોતે શિવ થાય,
પરરૂપ માને આત્મને, તો ભવભ્રમણ ન જાય. ૧૨.
अर्थ :- हे जीव ! यदि तू आत्मा को समझेगा, तो निर्वाण प्राप्त करेगा तथा यदि तू
परपदार्थों को आत्मा मानेगा, तो तू संसार में परिभ्रमण करेगा।
12. ॐ ह्रीं अक्षयानंदस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
अविकलस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
यदि तू आत्मा को समझेगा तो होगा तेरा निर्वाण।
पर पदार्थ को माने आत्मा तो होगा भव दुःख महान् ।।
अन्यायों पर क्रोध न हो तो फिर तेरे पौरुष से क्या।
चिर प्रचलित रूढ़ियाँ न नाशीं तो उत्तम विचार से क्या ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।12।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 13 )
इच्छा रहित तप ही निर्वाण का कारण है :
इच्छा-रहिय तव करहि, अप्पा अप्पु मुणेहि।
तो लहु पावइ परम-गई, पुण संसार ण एहि ।।13।।
વિણ ઇચ્છા શુચિ તપ કરે, જાણે નિજરૂપ આપ;
સત્વર પામે પરમપદ, તપે ન ફરી ભવતાપ. ૧૩.
अर्थ :- हे आत्मन् ! यदि तू इच्छा रहित होकर तप करे और आत्मा को समझे तो
तू शीघ्र ही परमगति को पा जाय और तू निश्चय से फिर संसार में न आवे।
13. ॐ ह्रीं निरिच्छरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
निस्पृहस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
यदि इच्छा से रहित सुतप करके लेगा आत्मा को जान।
निश्चित शुद्ध परमगति होगी फिर भव भ्रमण न होगा मान।।
दृष्टि स्वयं केवल अपने ज्ञायक पर मेरी रीझेगी।
इस उपाय से ही निजात्मा इक मुहूर्त में सीझेगी ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।13 ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 14 )
परिणामों से ही बंध व मोक्ष होता है :
परिणामे बंधः जि कहिउ, मोक्ख वि तह जि वियाणि ।
इउ जाणेविणु जीव तुहुँ, तह भाव हु परियाणि ।।14।।
બંધ-મોક્ષ પરિણામથી, કર જિનવચન પ્રમાણ;
નિયમ ખરો એ જાણીને, યથાર્થ ભાવો જાણ. ૧૪.
अर्थ :- परिणाम से ही जीव को बंध कहा है और परिणाम से ही मोक्ष कहा है-
यह समझकर, हे जीव ! तू निश्चय से उन भावों को जान।
14. ॐ ह्रीं बंधयुक्तपरिणामरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
निर्बंधस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-ताटंक)
परिणामों से बंध कहा है परिणामों से मोक्ष कहा।
इसे जानकर निज परिणामों की सँभाल कर यही कहा ।।
स्वर्णिम वाक्य सुने मुनियों के किन्तु उतारे नहीं हृदय ।
अकर्मण्य जीवन जीता है कैसे पाए ज्ञान निलय ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।14।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 15 )
पुण्यकर्म मोक्षसुख नहीं दे सकता :
अह पुणु अप्पा णवि मुणहि पुण्णु जि करइ असेसु ।
तउ वि ण पावहि सिद्ध-सुहु, पुणु संसार भमेसु ।।15।।
નિજરૂપ જો નથી જાણતો, કરે પુણ્ય બસ પુણ્ય;
ભમે તો ય સંસારમાં, શિવસુખ કદી ન થાય. ૧૫.
अर्थ :- हे जीव ! यदि तू आत्मा को नहीं जानेगा और सब पुण्य ही पुण्य करता
रहेगा, तो भी तू सिद्ध सुख को नहीं पा सकता, किन्तु पुनः-पुनः संसार में ही भ्रमण
करेगा।
15. ॐ ह्रीं पुण्यकर्मरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
पवित्रस्वरूपोऽहं ।
(छंद-ताटंक)
यदि आत्मा को न जानेगा पुण्य-पुण्य में ही रह लीन।
पुनः पुनः भव में भटकेगा सिद्ध स्वसुख से सदा विहीन ।।
कब तक मूढ़ परिस्थिति बदले तू इस जड़ तन के द्वारा।
अगर मनः स्थिति बदलेगा तो क्षय होगी भवदधि कारा ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।15।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 16 )
आत्मदर्शन ही मोक्ष का कारण है :
अप्पा-दंसणु एक्कु परु, अण्णु ण किं पि वियाणि।
मोक्खह कारण जोईया, णिच्छइँ एहउ जाणि ।।16 ।।
નિજ દર્શન બસ શ્રેષ્ઠ છે, અન્ય ન કિંચિત્ માન;
હે યોગી! શિવ હેતુ એ, નિશ્ચયથી તું જાણ. ૧૬.
अर्थ :- ये योगिन् ! आत्मदर्शन ही मोक्ष का कारण है, अन्य कुछ भी मोक्ष का
कारण नहीं, यह तू निश्चय समझ।
16. ॐ ह्रीं निजपरमात्मस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
निजचैतन्यस्वरूपोऽहम् ।
(छंद-वीर)
परम आत्मदर्शन ही केवल मोक्ष प्राप्ति का कारण एक ।
अन्य न कारण मोक्ष प्राप्ति का कहीं कभी भी कोई एक ।।
सत्याचरण सहज अपना कर सारे पापों को हरले ।
त्वरित स्वरूपाचरण शक्ति से पुण्यों के कसबल हरले ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।16 ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( 17 )
मार्गणा व गुणस्थान आत्मा नहीं है :
मग्गण-गुण-ठाणइ कहिया, विवहारेण वि दिद्वि ।
णिच्छयणइँ अप्पा मुणहु, जिम पावहु परमेट्ठि ।।17 ।।
ગુણસ્થાનક ને માર્ગણા, કહે દૃષ્ટિ વ્યવહાર.
નિશ્ચય આતમજ્ઞાન તે, પરમેષ્ઠીપદકાર.
१७.
अर्थ :- मार्गणा और गुणस्थान का व्यवहार से ही उपदेश किया गया है।
निश्चयनय से तो तू आत्मा को ही (सब कुछ) समझ, जिससे तू परमेष्ठी पद को प्राप्त
कर सके।
17. ॐ ह्रीं मार्गणास्थानरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
गुणस्थानरहितोऽहम् ।
(छंद-वीर)
गुणस्थान मार्गणा आदि का कथन कहाता है व्यवहार ।
परमेष्ठी पद पाना है तो निज आत्मा का करो विचार ।।
मानव को तृष्णा का ओछापन ही पतित कराता है।
तृष्णाओं को जब जय करता हृदयकमल मुसकाता है।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।17 ।।
ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रूफरीडिंग बाकी है