श्री योगसार महामण्डल विधान | Shri Yogsar Mahamandal Vidhan

मंगलाचरण

(छंद-दोहा)

जयति पंचपरमेष्ठी जिनगृह चैत्य प्रधान ।
जय जगदम्बे दिव्यध्वनि जय जिनधर्म महान् ।।
भेदज्ञान विज्ञान ही वीतराग विज्ञान ।
भव प्रपंच के नाश से होता है निर्वाण ।।
मंगलोत्तम शरण है श्री जिनधर्म महान्
परम मोक्ष का मूल है भेदज्ञान विज्ञान।।

छन्द-अनुष्टुप

मंगलं पंचपरमेष्ठी, मंगलम् जिनध्वनि परम्।
मंगलं चैत्यचैत्यालय धर्म जिनवर मंगलम् ।।

(छंद-चामर)

वीतराग श्री जिनेन्द्र ज्ञान रूप मंगलम् ।
गणधरादि सर्वसाधु ध्यानरूप मंगलम् ।।
वस्तु का स्वभाव ही अनाद्यनंत मंगलम् ।
आत्मधर्म वस्तु धर्म सार्वधर्म मंगलम् ।।

(छन्द-सोरठा)

ज्ञान पयोनिधि रूप शुद्धात्मा मंगलमयम् ।
पाऊँ ज्ञान अनूप आत्मधर्म मंगलमयम् ।।

(छन्द-गीतिका)

अर्हत सिद्धाचार्य पाठक साधु जिनध्वनि मंगलम् ।
चैत्य चैत्यालय श्री जिनधर्म उत्तम मंगलम् ।।
देव नव मंगलमयम् तीर्थेश प्रभु मंगलमयम् ।
ज्ञानसम्यक् मंगलं परमात्मा मंगलमयम् ।।

पीठिका

(छंद-मत्तसवैया)

गुंजायमान हो योगसार अध्यात्म प्रेमियों के मन में।
आत्मीय सौख्य की प्राप्ति परम होती है निज के चिन्तन में ।।
योगीन्दु देव की परमकृपा परमात्म प्रकाश सहित पायी।
इकशत वसु दोहों में लिक्खा यह योगसार अतिसुखदायी ।।
इस पर विधान लिखकर मैंने अपना ही तो कल्याण किया।
जो इत उत मन चंचल भागा जाता था उसको थाम लिया।।
अवकाश समय कुछ क्षण इसका यदि आप भाव से पाठ करें।
तो निश्चित आत्मज्ञान पाके मन की कालुषता सकल हरे ।।
यह योगसार योगीन्दुरचित जय जिनवाणी जगकल्याणी।
वसु प्रवचन माता प्राप्त करूँ आशीष मुझे दो जिनवाणी ।।
शब्दार्थ तथा भावार्थ समझ मैं करूँ आत्म चिन्तन महान्।
परमात्म प्रकाश करूँ अपना कर योगसार पावन विधान।।

(छंद-दोहा)

छठी शताब्दी में हुए मुनि योगीन्दु महान्।
योगसार दोहे रचे किया विश्व कल्याण।।
योगसार जिनग्रंथ पढ़ करूँ आत्म कल्याण।
स्वपर विवेक जगा हृदय पाऊँ पद निर्वाण।।
पंच भेद मिथ्यात्व के कर दूँ चकनाचूर ।
अविरति भाव विनष्ट कर सुख पाऊँ भरपूर ।।
चिरप्रमाद को जीत लूँ श्रेणी चढूँ महान् ।
सर्वकषायें जीतकर पाऊँ केवलज्ञान।।
केवलज्ञान प्रकाश ले पाऊँ पद निर्वाण ।
सादि अनंतानंत सुख पाऊँ महा महान् ।।

यह विधान रचकर हुआ उर में हर्ष महान् ।
शब्द अर्थ श्रुतभाव का पाऊँ पावन ज्ञान।।
धन्य-धन्य योगीन्दु ऋषि सुकृत आपका धन्य ।
योगसार का पाठ रच हुआ आत्मा धन्य।।
योगसार की शक्ति से हो परमात्मप्रकाश ।
पूर्ण ज्ञान का स्रोत पा, पाऊँ मोक्ष निवास ।।
भक्ति भाव से मैं करूँ पावन परम विधान।
अष्ट द्रव्य प्रासुक चढ़ा करूँ भेद विज्ञान।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि

समुच्चय पूजन

स्थापना

(छंद-दोहा)

श्री योगीन्दु महान् का है महान् उपकार।
योगसार का सार दे दर्शाया भवपार ।।

(छंद-रोला)

दर्शाया भवपार बताया बहिरात्मा को।
अंतरात्मा होने का उपाय आत्मा को ।।
बहिरात्मापन छोड़ दिया फिर बहिरात्मा ने।
अन्तरात्मा दृष्टि बनायी निज आत्मा ने।।

(छंद-दोहा)

अब है यह परमात्मा तीन लोक का नाथ।
इसीलिए पूजन करूँ तजूँ न इसका साथ ।।
जो भी हैं परमात्मा सबको करूँ प्रणाम।
अन्तरात्मा बन प्रभो पाऊँ निजध्रुव धाम ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपकश्रीयोगसार ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्

आह्वाननं ।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपकश्रीयोगसार ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपकश्रीयोगसार ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्

सन्निधिकरणम् ।

अष्टक

(छंद-वीर)

प्रासुक निर्मल नभ जल शीतल चरणों में अर्पित है नाथ।
जन्म जरादिक मरण व्याधि क्षय में सक्षम निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय जन्म जरा मृत्युविनाशनाय जलं।

सहज भाव चंदन सुगन्धमय मस्तक तिलक लगाऊँ नाथ।
भव ज्वाला शीतल करने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय संसारताप विनाशनाय चंदनं।

शुद्धभाव अक्षत अपूर्व ले अक्षयपद पाऊँ हे नाथ।
सहज अखंड स्वभाव प्राप्ति में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं ।

कामभाव विध्वंसक पावन शुद्धभाव अर्पित हैं नाथ।
महाशील गुण प्रगटाने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं ।

क्षुधाविनाशक अनुभव रस नैवेद्य समर्पित है हे नाथ।
तृप्त स्वभाव शाश्वत पाने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं।

मोह तिमिर हर ज्ञानदीप की सहज ज्योति अर्पित है नाथ।
स्वपर प्रकाशक केवलज्ञान प्रकाशूँ ले निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।। [ 13

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं।

अष्टकर्म विध्वंसक उत्तम शुक्लध्यान ही पाऊँ नाथ।
नित्य निरंजन पद देने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अष्टकर्म दहनाय धूपं ।

पुण्यभाव फल अब न चाहिए अतः तुम्हें अर्पित है नाथ।
महामोक्षफल के देने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय मोक्षफल प्राप्तये फलं।

शुद्ध भावनामयी अर्घ्य सादर सविनय अर्पित है नाथ।
निज अनर्घ्य पदवी देने में सक्षम है निश्चय भूतार्थ ।।
योगसार का सार ग्रहण कर आत्म ध्यानरत हो जाऊँ ।
परमशुद्ध परमात्मा पद पा उत्तम मोक्ष सौख्य पाऊँ ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं ।

महार्घ्य

(छंद-दिग्पाल)

जो पाप में उलझे हैं वे नर्क में जाते हैं।
जो पुण्य में उलझे हैं वे स्वर्ग में जाते हैं।।
नर्कों के जीव नर हो फिर स्वर्ग में जाते हैं।
स्वर्गों में अशुभ करके फिर नर्क में जाते हैं।।
जो पाप-पुण्य दोनों में नहीं उलझते हैं।
संसार की उलझन से वे जीव सुलझते हैं।।
पाते हैं शाश्वत सुख निज शुद्धभाव द्वारा।
परमात्मा बनते हैं क्षय करते भवकारा।।
है योगसार का तो सर्वोच्चसार पावन।
जो आत्मा ध्याते हैं बन जाते आनंदघन।।
निज आत्मतत्त्व निर्णय हित महार्घ्य अर्पित।
शुद्धात्म का दर्शन ही है मोक्ष प्राप्ति के हित।।

(छंद-त्रिभंगी)

भव दुख नाशक ज्ञान प्रकाशक शिवसुखदायक शुद्धात्मा।
परमभाव संपदा प्रदायक एकमात्र निज परमात्मा।।
तज बहिरात्मापन हो जाऊँ अन्तरात्मा सुखदायी।
परमात्मा बन सिद्धात्मा बन निजपद पाऊँ शिवदायी।।

(दोहा)

योगसार का सार पा बनूँ अयोगीनाथ।
जब तक निजपद न मिले तजूँ न तुम पद साथ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(छंद-ताटंक)

योगसार का सार प्राप्त करने चरणों में आया हूँ।
पुण्य-पाप परभाव नाश का निश्चय उर में लाया हूँ।।
विविध वेशभूषा से सज्जित त्रययोगों का आश्रय कर।
आस्रव को आमंत्रित करके सतत बढ़ाया भवसागर ।।
आस्रव द्वारा कर्मबंध कर भव अटवी में ही भटका।
संवर भाव नहीं पहचाना कर्मास्रव में ही अटका ।।
सदगुरु का उपदेश सुना पर ध्यान नहीं देने पाया।
जिनवाणी की बात न मानी चारों गति में भ्रम आया ।।
पाप-पुण्य अवरोध बिना संवर कैसे आ सकता था।
बिन संवर निर्जरा भाव कैसे उर में ला सकता था।।
बिन निर्जरा कर्म क्षीण करना कैसे होता प्रारंभ।
रत अकाम निर्जरा हुआ तो फल में पाया पुण्यारंभ ।।
पुण्यारंभ क्षीण होते ही संचय पाप किए सारे ।
पापों का फल नर्क निगोदादिक दुख भव समुद्रखारे ।।
यह क्रम पंच परावर्तन मय निमिष मात्र भी रूका नहीं।
मैं भी अड़ियल टट्टू अपनी ओर कभी भी झुका नहीं ।।
पंच परावर्तन अनंत इस भाँति सदा मेरे बीते ।
पाप-पुण्य परभाव अनंतानंत किए प्रभु मन चीते।।
महाभाग्य त्रस हुआ नाथ मैं पायी फिर से नर पर्याय ।
आज अचानक योगसार पढ़ निज-पर बोध हुआ सुखदाय ।।
बहिरात्मा अरु अंतरात्मा दोनों का जाना प्रभु भेद।
द्रव्य दृष्टि से मैं परमात्मा शुद्ध त्रिकाली पूर्ण अभेद ।।

बस अब क्या करना है मुझको कृतकृत्य हो गया स्वयं।
कुछ ही भव में मोक्ष पाऊँगा तोड़ा मैंने भव विभ्रम ।।
कृपा मिली योगीन्दुदेव की उनका योगसार पाया।
यह दृढ़ निश्चय हुआ हृदय में भव का अंत निकट आया ।।
सम्यक्दर्शन प्राप्त हो गया झलका सम्यक्ज्ञान हृदय।
सम्यक्चारित्र को धारण कर पाऊँगा मैं मुक्ति निलय ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय जयमाला महाअर्घ्यं नि. स्वाहा।

(आशीर्वाद)
योगसार का सार ही तीन लोक में सार।
इसे प्राप्त कर जीव सब हो जाते भव पार ।।
(पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि)
अर्ध्यावलि
( 1 )
प्रथम, मंगल स्वरूप : श्री सिद्ध परमात्मा को नमस्कार करते हैं:

(छंद-दोहा)

णिम्मल-झाण-परिट्ठिया, कम्म-कलंक डहेवि।
अप्पा लद्धउ जेण परु, ते परमप्प णवेवि ।। 1 ।।

નિર્મળ ધ્યાનારૂઢ થઈ, કર્મકલંક ખપાય;
થયા સિદ્ધ પરમાત્મા, વંદું તે જિનરાય. ૧.
अर्थ :- जो निर्मल ध्यान में स्थित है और जिन्होंने कर्मों के मल को भस्म कर
उत्कृष्ट परमात्मपद को प्राप्त कर लिया है, उन परमात्माओं को नमस्कार करता हूँ।

1. ॐ ह्रीं कर्मकलंकरहित निरंजनस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्मलपरमात्मस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

निर्मल ध्यान अवस्थित हैं जो कर्म कलंक भस्म कर्त्ता।
परमात्मा पद पाया जिनने उनको नमस्कार करता ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।१।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(2)
श्री अरहंत भगवान् को नमस्कार :
घाइ-चउक्कहँ किउ विलउ-णंत-चउक्क पदिटठु ।
तहिं जिणइंदहँ पय णविवि, अक्खमि कब्बु सु-इट्ठु ।।2।।

ચાર ઘાતિયા ક્ષય કરી, લહ્યાં અનંત ચતુષ્ટ;
તે જિનવર ચરણે નમી, કહું કાવ્ય સુઈષ્ટ. ૨.
अर्थ :- जिसने चार घातिया कर्मों का नाश कर अनन्त चतुष्टय को प्रकट किया
है, उन जिनेन्द्रके चरणों को नमस्कार कर, यहाँ अभीष्ट काव्य को कहता हूँ।

2. ॐ ह्रीं स्वचतुष्टयस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अनंतज्ञानस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

चारघातिया कर्म नष्ट कर किया अनंत चतुष्टय प्राप्त।
उनको वंदन कर कहता हूँ योगसार वच जिनवर आप्त ।।
ज्ञान भुजाओं के बल से अब भव समुद्रको पार करूँ ।
तूफानों को नक्षत्रों से पूछे बिन संहार करूँ ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।2।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 3 )
ग्रन्थ को कहने का निमित्त व प्रयोजन :
संसारहँ भय-भीयाहँ, मोक्खहँ लालसियाहं ।
अप्पा-संबोहण-कयइ, कय दोहा एक्कमणाहं ।। 3 ।।

ઇચ્છે છે નિજ મુક્તતા, ભવભયથી ડરી ચિત્ત;
તે ભવી જીવ સંબોધવા, દોહા રચ્યા એકચિત્ત. ૩.
अर्थ :- जो संसार से भयभीत हैं और मोक्ष के लिए जिनकी लालसा है, उनके
संबोधन के लिए एकाग्र चित्त से मैंने इन दोहों की रचना की है।

3. ॐ ह्रीं संसारभयरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्भयस्वरूपोऽहं ।

(छंद-ताटंक)

जो भव से भयभीत हुए हैं जिनको जगी मोक्ष की चाह ।
उनके ही संवर्धन के हित कहता हूँ भर उर उत्साह ।।
स्वपर विवेक दृष्टि सम्यक् ले सम्यक् पथ पर चला चलूँ ।
ज्ञायक भाव हृदय में लेकर राग-द्वेष सम्पूर्ण छलूँ ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।। 3 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(4)
संसार का कारण-मिथ्यादर्शन :
काल अणाइ अणाइ जिउ, भव-सायरु जि अणंतु ।
मिच्छा-दंसण-मोहियउ, ण वि सुह दुक्ख जि पत्तु ।।4।।

જીવ, કાળ, સંસાર આ, કહ્યા અનાદિ અનંત;
મિથ્યામતિ મોહે દુ:ખી, કરી ન સુખ લહંત. ૪.

अर्थ :- काल अनादि है, जीव अनादि है और भवसागर अनन्त है। उसमें
मिथ्यादर्शन से मोहित जीव ने दुःख ही दुःख पाया है, सुख नहीं पाया।

4. ॐ ह्रीं अनाद्यनंतस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

आनंदघनस्वरूपोऽहं ।

(छंद-ताटंक)

काल अनादि अनंत जीव है भव सागर है नाथ अनंत ।
कभी न सुख पाया प्राणी ने पाए दुख ही दुख भगवंत ।।
निज संयम तरणी का लंगर खोलो कर में ले पतवार ।
भव लहरों से भय न करो तुम सम्यक् दिशा ग्रहो इस बार ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण । । 4 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 5 )
मोक्षसुख का कारण : आत्म ध्यान :
जइ वीहउ चउ-गइ-गमणु, तउ परभाव चएवि।
अप्पा झायहि णिम्मलउ, जिम सिव-सुक्ख लहेवि ।।5।।

ચાર ગતિ દુઃખથી ડરે, તો તજ સૌ પરભાવ;
શુદ્ધાતમ ચિંતન કરી, લે શિવસુખનો લાભ. ૫.
अर्थ :- हे जीव ! यदि तू चर्तुगति के भ्रमण से भयभीत है, तो परभाव का त्याग
कर और निर्मल आत्मा का ध्यान कर, जिससे तू मोक्षसुख को प्राप्त कर सके।

5. ॐ ह्रीं परभावरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निजज्ञानानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

है भयभीत चतुर्गति दुख से तो परभावों का कर त्याग।
निर्मल आत्मध्यान कर अपना शिवसुख पाने को अब जाग।।

चारित्र स्वरूपाचरण साधकर निज को ही कर ले स्वीकार।
मिथ्याचरण सर्वथा तजदे राग-द्वेष सब कर परिहार ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।5।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(6)
आत्मा के तीन प्रकार :
तिपयारो अप्पा मुणहि, परु अंतरु बहिरप्पु ।
पर झांयहि अंतर-सहिउ, बाहिरु चयहि णिभंतु ।।6।।

ત્રિવિધ આત્મા જાણીને, તજ બહિરાતમ રૂપ;
થઈ તું અંતર આતમા, ધ્યા પરમાત્મસ્વ રૂપ. ૬.
अर्थ :- परमात्मा, अन्तरात्मा और बहिरात्मा इस तरह आत्मा के तीन प्रकार
समझने चाहिए। हे जीव ! अन्तरात्मा सहित होकर परमात्मा का ध्यान कर और भ्रान्ति
रहित होकर बहिरात्मा को त्याग।

6. ॐ ह्रीं बहिरात्माद्यवस्थारहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शाश्वत्स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

परमात्मा अरु अंतरात्मा अरु बहिरात्मा तीन प्रकार।
अन्तरात्मा को परमात्मा का कर ध्यान भ्रान्ति परिहार ।।
बहिरात्मापन त्याग अभी तू आत्म ध्यान में हो जा लीन।
एक मात्र अन्तर्मुहूर्त्त में हो जाएगा कर्म विहीन ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।6।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 7 )
बहिरात्मा का स्वरूप :
मिच्छा-दंसण-मोहियउ, परु-अप्पा ण मुणेइ ।
सो बहिरप्पा जिण-भणिउ, पुण संसारू भमेइ ।।7।।

મિથ્યા મતિથી મોહીજન, જાણે નહિ પરમાત્મા;
તે બહિરાતમ જિન કહે, તે ભમતો સંસાર. ૭.
अर्थ :- जो मिथ्यादर्शन से मोहित जीव परमात्मा को नहीं समझता, उसे जिन
भगवान् ने बहिरात्मा कहा है; वह जीव पुनः पुनः संसार में परिभ्रमण करता है।

7. ॐ ह्रीं दर्शनमोहरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्मोहस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

मिथ्या दर्शन मोहित प्राणी नहीं जानता परमात्मा ।
अतः भव भ्रमण पुनः पुनः करता है ऐसा बहिरात्मा ।।
पाप भाव को पाप समझने का यदि तू प्रयत्न कर ले।
पुण्य भाव स्वयमेव प्रगट हो सारे पाप भाव हरले ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।7 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 8 )
अन्तरात्मा का स्वरूप :
जो परियाणइ अप्पु परु जो परभाव चएइ ।
सो पंडिउ अप्पा मुणहिं सो संसार मुएइ ।।8।।

પરમાત્માને જાણીને, ત્યાગ કરે પરભાવ;
તે આત્મા પંડિત ખરો, પ્રગટ લહે ભવપાર. ૮.

अर्थ :- जो परमात्मा को समझता है और जो परभाव का त्याग करता है, उसे
पंडित आत्मा (अन्तरात्मा) समझो। वह जीव संसार को छोड़ देता है।

8. ॐ ह्रीं निर्मलनिजज्ञानस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

विज्ञानघनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जो परमात्मा समझ सभी परभावों का करता है त्याग।
वही जीव है अन्तरात्मा जो भव का करता परित्याग ।।
पुण्योदय में अन्तरंग भू स्वच्छ बना यदि लेगा तू।
शुद्ध भाव का बीज स्वयं ही पलभर में बो लेगा तू ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।8।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(9)
परमात्मा का स्वरूप :
णिम्मलु णिक्कलु सुद्ध जिण, विण्हु बुद्ध सिव संतु।
सो परमप्पा जिण-भणिउ, एहउ जाणि णिभंतु ।।9।।

નિર્મળ, નિકલ, જિનેન્દ્ર, શિવ, સિદ્ધ, વિષ્ણુ, બુદ્ધ શાંત,
તે પરમાત્મા જિન કહે, જાણો થઈ નિર્ભ્રાન્ત. ૯.
अर्थ :- जो निर्मल, निष्कल, शुद्ध, जिन, विष्णु, बुद्ध, शिव और शान्त है, उसे
जिन भगवान् ने परमात्मा कहा है-इसमें कुछ भी भ्रान्ति न करनी चाहिए।

9. ॐ ह्रीं निष्कलरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शुद्ध स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

निर्मल निश्चल शुद्ध विष्णु जिन बुद्ध शिव जिसके है नाम।
जिन प्रभु कहते वह परमात्मा नहीं भ्रान्ति का इसमें काम ।।

आहवाहन अपने स्वभाव का करके तिष्ठ तिष्ठ कर ले।
उसको ही सन्निहित बना तू सारे मोह दोष हर ले।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।9।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 10 )
इसके सिवाय और कोई सच्चा परमात्मा नहीं हो सकता :
देहादिउ जे परि कहिया, ते अप्पाणु मुणेइ ।
सो बहिरप्पा जिणभणिउ, पुणु संसारू भमेइ ।।10।।

દેહાદિક જે પર કહ્યાં, તે માને નિજરૂપ,
તે બહિરાતમ જિન કહે, ભમતો બહુ ભવકૂપ. ૧૦.
अर्थ :- देह आदि जो पदार्थ पर कहे गये हैं, उन पदार्थों को ही जो आत्मा
समझता है, उसे जिन भगवान् ने बहिरात्मा कहा है। वह जीव संसार में फिर-फिर से
परिभ्रमण करता है।

10. ॐ ह्रीं संसारपरिभ्रमणरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्देहस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

देहादिक जो पर पदार्थ हैं उनको जाने जो आत्मा।
वह संसार भ्रमण करता जिन वचन वही है बहिरात्मा ।।
मन मस्तिष्क घृणा से पीड़ित जो मानवता दुर्लभ है।
ऋजुताभाव न अंतरंग हो फिर पशुता ही तो सुलभ है ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।10 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 11 )

ज्ञानी पर को आत्मा नहीं मानता है :
देहादिउ जे परकहिया, ते अप्पाणु ण होहिं ।
इउ जाणेविणु जीव तुहुँ, अप्पा अप्प मुणेहिं ।।11 ।।

દેહાદિક જે પર કહ્યાં, તે નિજરૂપ ન થાય,
એમ જાણીને જીવ તું, નિજરૂપને નિજ જાણ. ૧૧.
अर्थ :- देह आदि जो पदार्थ पर कहे गये हैं, वे पदार्थ आत्मा नहीं होते-यह
जानकर, हे जीव ! तू आत्मा को आत्मा पहिचान।

11. ॐ ह्रीं निजानंतगुणवैभवस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शान्तस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

देह आदि जो पर पदार्थ हैं वे न आत्मा हैं लो जान।
अतः जीव तू मात्र आत्मा को ही सदा आत्मा मान ।।
पर विभाव परिणति फिर तुझको कभी न बहका पाएगी।
फिर न पुण्य की आवश्यकता भी तुझे सताने आएगी ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।11।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 12 )
आत्मज्ञानी ही निर्वाण पाता है :
अप्पा अप्पइ जइ मुणहि, तउ णिव्वाण लहेहि।
पर अप्पा जइ मुणहि तुहुँ, सो संसार भमेहि ।।12।।

નિજને જાણે નિજરૂપ, તો પોતે શિવ થાય,
પરરૂપ માને આત્મને, તો ભવભ્રમણ ન જાય. ૧૨.

अर्थ :- हे जीव ! यदि तू आत्मा को समझेगा, तो निर्वाण प्राप्त करेगा तथा यदि तू
परपदार्थों को आत्मा मानेगा, तो तू संसार में परिभ्रमण करेगा।

12. ॐ ह्रीं अक्षयानंदस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अविकलस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

यदि तू आत्मा को समझेगा तो होगा तेरा निर्वाण।
पर पदार्थ को माने आत्मा तो होगा भव दुःख महान् ।।
अन्यायों पर क्रोध न हो तो फिर तेरे पौरुष से क्या।
चिर प्रचलित रूढ़ियाँ न नाशीं तो उत्तम विचार से क्या ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।12।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 13 )
इच्छा रहित तप ही निर्वाण का कारण है :
इच्छा-रहिय तव करहि, अप्पा अप्पु मुणेहि।
तो लहु पावइ परम-गई, पुण संसार ण एहि ।।13।।

વિણ ઇચ્છા શુચિ તપ કરે, જાણે નિજરૂપ આપ;
સત્વર પામે પરમપદ, તપે ન ફરી ભવતાપ. ૧૩.
अर्थ :- हे आत्मन् ! यदि तू इच्छा रहित होकर तप करे और आत्मा को समझे तो
तू शीघ्र ही परमगति को पा जाय और तू निश्चय से फिर संसार में न आवे।

13. ॐ ह्रीं निरिच्छरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निस्पृहस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

यदि इच्छा से रहित सुतप करके लेगा आत्मा को जान।
निश्चित शुद्ध परमगति होगी फिर भव भ्रमण न होगा मान।।

दृष्टि स्वयं केवल अपने ज्ञायक पर मेरी रीझेगी।
इस उपाय से ही निजात्मा इक मुहूर्त में सीझेगी ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।13 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 14 )
परिणामों से ही बंध व मोक्ष होता है :
परिणामे बंधः जि कहिउ, मोक्ख वि तह जि वियाणि ।
इउ जाणेविणु जीव तुहुँ, तह भाव हु परियाणि ।।14।।

બંધ-મોક્ષ પરિણામથી, કર જિનવચન પ્રમાણ;
નિયમ ખરો એ જાણીને, યથાર્થ ભાવો જાણ. ૧૪.
अर्थ :- परिणाम से ही जीव को बंध कहा है और परिणाम से ही मोक्ष कहा है-
यह समझकर, हे जीव ! तू निश्चय से उन भावों को जान।

14. ॐ ह्रीं बंधयुक्तपरिणामरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्बंधस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

परिणामों से बंध कहा है परिणामों से मोक्ष कहा।
इसे जानकर निज परिणामों की सँभाल कर यही कहा ।।
स्वर्णिम वाक्य सुने मुनियों के किन्तु उतारे नहीं हृदय ।
अकर्मण्य जीवन जीता है कैसे पाए ज्ञान निलय ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।14।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 15 )
पुण्यकर्म मोक्षसुख नहीं दे सकता :
अह पुणु अप्पा णवि मुणहि पुण्णु जि करइ असेसु ।
तउ वि ण पावहि सिद्ध-सुहु, पुणु संसार भमेसु ।।15।।

નિજરૂપ જો નથી જાણતો, કરે પુણ્ય બસ પુણ્ય;
ભમે તો ય સંસારમાં, શિવસુખ કદી ન થાય. ૧૫.
अर्थ :- हे जीव ! यदि तू आत्मा को नहीं जानेगा और सब पुण्य ही पुण्य करता
रहेगा, तो भी तू सिद्ध सुख को नहीं पा सकता, किन्तु पुनः-पुनः संसार में ही भ्रमण
करेगा।

15. ॐ ह्रीं पुण्यकर्मरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

पवित्रस्वरूपोऽहं ।

(छंद-ताटंक)

यदि आत्मा को न जानेगा पुण्य-पुण्य में ही रह लीन।
पुनः पुनः भव में भटकेगा सिद्ध स्वसुख से सदा विहीन ।।
कब तक मूढ़ परिस्थिति बदले तू इस जड़ तन के द्वारा।
अगर मनः स्थिति बदलेगा तो क्षय होगी भवदधि कारा ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।15।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 16 )
आत्मदर्शन ही मोक्ष का कारण है :
अप्पा-दंसणु एक्कु परु, अण्णु ण किं पि वियाणि।
मोक्खह कारण जोईया, णिच्छइँ एहउ जाणि ।।16 ।।

નિજ દર્શન બસ શ્રેષ્ઠ છે, અન્ય ન કિંચિત્ માન;
હે યોગી! શિવ હેતુ એ, નિશ્ચયથી તું જાણ. ૧૬.

अर्थ :- ये योगिन् ! आत्मदर्शन ही मोक्ष का कारण है, अन्य कुछ भी मोक्ष का
कारण नहीं, यह तू निश्चय समझ।

16. ॐ ह्रीं निजपरमात्मस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निजचैतन्यस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

परम आत्मदर्शन ही केवल मोक्ष प्राप्ति का कारण एक ।
अन्य न कारण मोक्ष प्राप्ति का कहीं कभी भी कोई एक ।।
सत्याचरण सहज अपना कर सारे पापों को हरले ।
त्वरित स्वरूपाचरण शक्ति से पुण्यों के कसबल हरले ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।16 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 17 )
मार्गणा व गुणस्थान आत्मा नहीं है :
मग्गण-गुण-ठाणइ कहिया, विवहारेण वि दिद्वि ।
णिच्छयणइँ अप्पा मुणहु, जिम पावहु परमेट्ठि ।।17 ।।

ગુણસ્થાનક ને માર્ગણા, કહે દૃષ્ટિ વ્યવહાર.
નિશ્ચય આતમજ્ઞાન તે, પરમેષ્ઠીપદકાર.
१७.
अर्थ :- मार्गणा और गुणस्थान का व्यवहार से ही उपदेश किया गया है।
निश्चयनय से तो तू आत्मा को ही (सब कुछ) समझ, जिससे तू परमेष्ठी पद को प्राप्त
कर सके।

17. ॐ ह्रीं मार्गणास्थानरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

गुणस्थानरहितोऽहम् ।

(छंद-वीर)

गुणस्थान मार्गणा आदि का कथन कहाता है व्यवहार ।
परमेष्ठी पद पाना है तो निज आत्मा का करो विचार ।।
मानव को तृष्णा का ओछापन ही पतित कराता है।
तृष्णाओं को जब जय करता हृदयकमल मुसकाता है।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।17 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रूफरीडिंग बाकी है

( 18 )
गृहस्थी भी निर्वाण कार्य पर चल सकता है :
गिहि - वावार - परट्ठिया, हेयाहेउ मुणंति ।
अणुदिणु झायहिं देउ जिणु, लहु णिव्वाणु लहंति ।।18 ।।

ગૃહકામ કરતાં છતાં, હૈયાહેયનું જ્ઞાન;
ધ્યાવે સદા જિનેશપદ, શીઘ્ર લહે નિર્વાણ. ૧૮
अर्थ :- जो गृहस्थी के धंधे में रहते हुए भी हेयाहेय को समझते हैं और जिन
भगवान् का निरन्तर ध्यान करते हैं वे शीघ्र ही निर्वाण को पाते हैं।

18. ॐ ह्रीं गृहस्थव्यापारादिविकल्परहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्विकल्पस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

घर में रह जो उपादेय अरु हेय आदि सम जानेंगे।
वे ही शिवपद को पाएँगे जो जिनवर को ध्याएँगे ।।
मानवता की आभा के बिन मानवता का नाम नहीं।
मानव यदि सत्संगी हो तो फिर कुसंग का काम नहीं ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।18 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 19 )
श्री जिनेन्द्रदेव का स्मरण परम पद का कारण है :
जिणु सुमिरहु जिणु चिंतहु, जिणु झावहु सुमणेण।
सो झायंतहँ परम-पउ, लब्भइ एक्क-खणेण ।।19 ।।

જિન સમરો, જિન ચિંતવો, જિન ધ્યાવો મન શુદ્ધ;
તે ધ્યાતાં ક્ષણ એકમાં, લહો પરમપદ શુદ્ધ. ૧૯.
अर्थ :- शुद्ध मन से जिन का स्मरण करो, जिन का चिन्तवन करो और जिन का
ध्यान करो, उनके ध्यान से एक क्षण भर में परमपद प्राप्त हो जाता है।।19 ।।

19. ॐ ह्रीं निजसहजचैतन्यस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

ब्रह्मस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

आत्म देव का चिन्तन सुमिरण ध्यान सदा जो करते हैं।
क्षण भर में पद परम प्राप्त कर सारे भवदुख हरते हैं ।।
मिथ्या अहंकार क्षय हो तो मानव गरिमा पाता है।
सदाचरण से आत्म लोक के ही प्रकाश को पाता है।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।19 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 20 )
अपनी आत्मा में व जिनेन्द्रमें भेद नहीं
सुद्धप्पा अरु जिणवरहँ, भेउ म किंपि वियाणि।
मोक्खहँ कारणे जोईया, णिच्छइँ एउ विजाणि ।।20।।

જિનવર ને શુદ્ધાત્મમાં, કિંચિત્ ભેદ ન જાણ;
મોક્ષાર્થે હે યોગિજન! નિશ્ચયથી એ માન. ૨૦.

अर्थ :- हे योगिन ! मोक्ष प्राप्त करने में शुद्धात्मा और जिन भगवान् में कुछ भी
भेद न समझो यह निश्चय मानो।

20. ॐ ह्रीं निजशुद्धात्मस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शुद्धचैतन्यस्वरूपोऽहम्।

(छंद-ताटंक)

मोक्षमार्ग में हे योगीजन निश्चय से तुम यह जानो।
शुद्धात्मा में अरु जिनवर में भेद नहीं कुछ भी मानो ।।
इन्द्रधनुष की भांति विनश्वर दिवा स्वप्न कर्मों के तज।
तू तो केवल ज्ञायक ही है ज्ञायक के धर्मों को भज ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।20।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 21 )
आत्मा ही जिन है, यही सिद्धान्त का सार है :
जो जिणु सो अप्पा मुणहु, इह सिद्धं तहँ सारु ।
इउ जाणेविण जोई इहु, छंडहु मायाचारु ।।21 ।।

જિનવર તે આતમ લખો, એ સિદ્ધાન્તિક સાર;
એમ જાણી યોગીજનો, ત્યાગો માયાચાર. ૨૧.
अर्थ :- जो जिन भगवान् है वही आत्मा है-यही सिद्धान्त का सार समझो ! इसे
समझकर, हे योगीजनों ! मायाचार को छोड़ो।

21. ॐ ह्रीं मायाचाररहितविमलनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निःशल्योऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जिन आगम का सार श्रेष्ठ माया तज योगी जन जानो।
शुद्धातम अरु श्री जिनेन्द्रमें अन्तर नहीं सत्य मानो ।।

मोक्षमार्ग में मंथर गति से कार्य न होने पाता है।
सतत अनवरत गति हो तो ही लक्ष्य पूर्ण हो जाता है ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।21 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 22 )
मैं ही परमात्मा हूँ :
जो परमप्पा सो जि हउँ, जो हउँ सो परमप्पु ।
इउ जाणेविणु जोइया, अण्णु म करहु वियप्पु ।।22 ।।

જે પરમાત્મ તે જ હું, જે હું તે પરમાત્મ;
એમ જાણી હે યોગિજન! કરો ન કાંઈ વિકલ્પ. ૨૨.
अर्थ :- जो परमात्मा है वही मैं हूँ तथा जो मैं हूँ वही परमात्मा है-यह समझकर
हे योगिन् ! अन्य कुछ भी विकल्प मत करो।

22. ॐ ह्रीं परमानंदस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

सहजानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जो परमात्मा है वह मैं हूँ जो मैं हूँ वह परमात्मा।
हे योगी सब विकल्प छोड़ो जानो अपना परमात्मा ।।
एक मात्र अन्तर्मुहूर्त्त में हो जाता है केवलज्ञान।
फिर उसके पश्चात् प्राप्त कर एक समय में पद निर्वाण ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।22 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 23 )
आत्मा असंख्यात प्रदेशी लोक प्रमाण है :
सुद्ध - पएसहँ पूरियउ, लोयायास - पमाणु।
सो अप्पा अणुदिणु मुणहु, पावहु लहु णिव्वाणु ।।23।।

શુદ્ધ પ્રદેશી પૂર્ણ છે, લોકાકાશ પ્રમાણ;
તે આતમ જાણો સદા, શીઘ્ર લહો નિર્વાણ. ૨૩.
अर्थ :- जो शुद्ध प्रदेशों से पूर्ण लोकाकाश-प्रमाण है, उसे सदा आत्मा समझो
और शीघ्र ही निर्वाण प्राप्त करो।

23. ॐ ह्रीं चैतन्यधामस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निजानंदधामस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

लोकाकाश प्रमाण असंख्य प्रदेश पूर्ण है निज आत्मा ।
इसका श्रम निशदिन करते ही हो जाओगे परमात्मा ।।
केवलज्ञान दिशा प्राची से देखो उगने वाला है।
दर्शन अरु चारित्र मोह निज क्रम से उड़ने वाला है।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।23।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 24 )
व्यवहार से आत्मा शरीर प्रमाण है :
णिच्छइँ लोइ-पमाणु मुणि, ववहारइ-सुसरीरु ।
एहउ अप्प-सहाउ मुणि, लहु पावहु भव-तीरु ।।24।।

નિશ્ચય લોકપ્રમાણ છે, તનુપ્રમાણ વ્યવહાર;
એવો આતમ અનુભવો, શીઘ્ર લહો ભવપાર. ૨૪.

अर्थ :- जो आत्मस्वभाव को निश्चयनय से लोकप्रमाण और व्यवहारनय से स्व
शरीर प्रमाण समझता है, वह शीघ्र ही संसार से पार हो जाता है।

24. ॐ ह्रीं असंख्यातनिजात्मप्रदेशरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

चिदानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

निश्चय लोक प्रमाण आत्मा देह प्रमाण कथन व्यवहार ।
आत्म स्वभाव मनन करने से क्षय हो जाता है संसार ।।
पाप-पुण्य परभाव नाश में तो अन्तर्मुहूर्त्त जानो।
सर्व कषायों के ढहने में एक मुहूर्त्त शेष मानो।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।24 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 25 )
सम्यक्त्व के बिना 84 लाख योनि में भ्रमण :
चउरासी-लक्खह फिरिह, काल अणाइ अणंतु ।
पव सम्मत्तु ण लद्ध जिय, एहउ जाणि णिभंतु ।।25 ।।

લક્ષ ચોરાશી યોનિમાં, ભમિયો કાળ અનંત;
પણ સમકિત તે નવ લહ્યું, એ જાણો નિર્ભ્રાન્ત. ૨૫.
अर्थ :- यह जीव अनादि अनन्तकाल तक चौरासी लाख योनियों में भटकता है,
परन्तु इसने सम्यक्त्व नहीं पाया, हे जीव ! यह निस्सन्देह समझ ।

25. ॐ ह्रीं चतुरशीतिलक्षयोनिभ्रमणरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निश्चलस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

योनि लाख चौरासी में तो बीताकाल अनंतानंत।
पर पाया सम्यक्त्व न अब तक यह निर्भान्त कथन भगवंत ।

चारों घाति विनष्ट करो अब कुछ मत सोच विचार करो।
चउ अघाति के क्षय करते ही यह दुखमय संसार हरो।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।25 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 26 )
शुद्ध आत्मा का मनन ही मोक्षमार्ग है :
सुद्ध सचेयणु बुद्ध जिणु, केवल-णाण-सहाउ ।
सो अप्पा अणुदिणु मुणहु, जइ चाहहु सिव-लाहु ।।26 ।।

શુદ્ધ, સચેતન, બુદ્ધ, જિન, કેવળજ્ઞાનસ્વભાવ;
એ આતમ જાણો સદા, જો ચાહો શિવલાભ. ૨૬.
अर्थ :- यदि मोक्ष पाने की इच्छा करते हो तो निरन्तर ही आत्मा को शुद्ध,
सचेतन, बुद्ध, जिन और केवलज्ञान-स्वभावमय समझो।

26. ॐ ह्रीं शुद्धबुद्धरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः।

बुद्धस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

मुक्ति चाहते हो तो शुद्ध चेतनामयी ज्ञान जानो ।
केवल ज्ञानमयी निज आत्मा परम बुद्ध को पहचानो ।।
संग तुम्हारे निज परिणति ही मुक्ति भवन में जाएगी।
निजानंद रस लीन अवस्था शुद्ध आत्मा पाएगी।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।26 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 27 )
निर्मल आत्मा की भावना करके ही मोक्ष होगा :
जाम ण भावहु जीव तुहुँ, णिम्मल अप्प-सहाउ ।
ताम ण लब्भइ सिव-गमणु, जहिं भावहु तहि जाउ।।27 ।।

જ્યાં લગી શુદ્ધ સ્વરૂપનો, અનુભવ કરે ન જીવ;
ત્યાં લગી મોક્ષ ન પામતો, જ્યાં રુચે ત્યાં જાવ. ૨૭.
अर्थ :- हे जीव ! जब तक तू निर्मल आत्मस्वभाव की भावना नहीं करता, तब
तक मोक्ष नहीं पा सकता। अब जहाँ तेरी इच्छा हो वहाँ जा।

27. ॐ ह्रीं निर्मलात्मस्वभावरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अमलस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

निर्मल आत्म स्वभाव भावना जब तक जीव न भाएगा।
जी चाहे तू वहाँ चला जा मोक्ष नहीं तू पाएगा।।
शिवपुर के तोरण द्वारों पर स्वागत होने वाला है।
मुक्ति वधू सजधज आएगी कर में ले वरमाला है।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।। 27 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 28 )
त्रिलोक पूज्य जिन आत्मा ही है :
जो तइलोयहँ झेउ जिणु, सो अप्पा णिरु बुत्तु ।
णिच्छय-णइँ एमइ भणिउ, एहउ जाणि णिभंतु ।।28 ।।

ધ્યાનયોગ્ય ત્રિલોકના, જિન તે આતમ જાણ;
નિશ્ચયથી એમ જ કહ્યું, તેમાં ભ્રાન્તિ ન આણ. ૨૮.

अर्थ :- जो तीनों लोकों के ध्येय जिनभगवान् है, निश्चय से उन्हें ही आत्मा कहा
है यह कथन निश्चयनय से है। इसमें भ्रांति न करनी चाहिए।

28. ॐ ह्रीं संशयादिरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अभ्रान्तस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

संशय युक्त मनुष्य सदा परमार्थ भ्रष्ट हो जाता है।
निज हित भूल अहित करना है भ्रम भ्रम कर दुख पाता है।।
त्रिभुवन के जीवों के द्वारा ध्यान योग्य जिनदेव महान् ।
यह परमार्थ कथन निर्भान्त जान लेना भावना प्रधान ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।28 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 29 )
मिथ्यादृष्टि के व्रतादि मोक्षमार्ग नहीं :
वय-तव-संजम-मूल-गुण मूढ़हँ मोक्ख ण वुत्तु।
जाव ण जाणइ इक्क परु, सुद्धउ भाउ पवित्तु ।।29 ।।

જ્યાં લગી એક ન જાણિયો, પરમ, પુનીત શુદ્ધ ભાવ;
મૂઢ તણા વ્રત—તપ સહુ, શિવહેતુ ન કહાય. ૨૯.
अर्थ :- जब तक एक परम शुद्ध पवित्र भाव का ज्ञान नहीं होता, तब तक मूढ़ लोगों के
जो व्रत, तप, संयम और मूलगुण हैं, उन्हें मोक्ष (का कारण) नहीं कहा जाता।

29. ॐ ह्रीं परमशुद्धज्ञानरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

पवित्रज्ञानस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

क्षण क्षण करता भाव मरण मैं महाभयंकर दुखदायी।
द्रव्य मरण तो मात्र उसी भव का वह भी न सुखदायी ।।

इन दोनों में कोई भी तो मरण नहीं है सुखदायी।
भाव मरण क्षय हो जाए तो द्रव्य मरण न दुखदायी ।।
भाव मरण का मूल एक मिथ्यात्व भाव है दुखदायी।
एक मात्र निज शुद्ध भाव ही है ध्रुव शाश्वत सुखदायी ।।
जब तक केवल परम पवित्र आत्मा को न जाने जीव।
तब तक व्रत तप संयम शील मुक्ति के कारण नहीं कदीव ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।29 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(30)
व्रती को निर्मल आत्मा का अनुभव करना योग्य है :
जो णिम्मल अप्पा मुणइ, वय-संजम-संजुत्तु ।
तो लहु पावइ सिद्ध-सुहु, इउ जिणणाहहँ उत्तु ।।30 ।।

જે શુદ્ધાતમ અનુભવે, વ્રત-સંયમ સંયુક્ત;
જે શુદ્ધાતમ ભાખે જીવ તે, શીઘ્ર લહે શિવસુખ. ૩૦.
अर्थ :- जिनेन्द्रदेव का कथन है कि यदि व्रत और संयम से युक्त होकर जीव
निर्मल आत्मा को पहिचानता है तो वह शीघ्र ही सिद्धि-सुख को पाता है।

30. ॐ ह्रीं अनंतसुखस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

स्वरूपसिद्धोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

चारों गतियों के दुख से तो हुई परेशानी मुझको ।
फिर भी करता नहीं उपाय यही है हैरानी मुझको ।।
जिनवर कथन शील व्रत से संयुक्त आत्मा को ले जान।
जो जानेगा निजात्मा को पायेगा शिव पद निर्वाण ।।

योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।30।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 31 )

अकेला व्यवहार चारित्र वृथा है :
वय तव संजमु सीलु जिय, ए सव्वेई अकयत्थु ।
जाव ण जाणइ इक्क परु, सुद्धउ भाउ पवित्तु ।।31।।

જ્યાં લગી એક ન જાણિયો, પરમ, પુનીત, શુદ્ધ ભાવ;
વ્રત-તપ-સંયમ શીલ સહુ, ફોગટ જાણો સાવ. ૩૧.
अर्थ :- जब तक जीव को एक परम शुद्ध पवित्र भाव का ज्ञान नहीं होता, तब
तक व्रत, तप, संयम और शील ये सब कुछ भी कार्यकारी नहीं होते।

31. ॐ ह्रीं परमनिर्मलज्ञानरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

ज्ञानामृतस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जब तक केवल परम पवित्र आत्मा को न जाने जीव।
सभी शील व्रत संयम तब तक नहीं कार्यकारी है जीव ।।
महावीर के धर्म तीर्थ में शुद्ध धर्म क्यों प्राप्त नहीं।
शुद्ध परम अनुभूति आत्मा की अंतर में व्याप्त नहीं ।।
शुद्ध आत्म अनुभूति यही जिनधर्म श्रेष्ठ मंगलमय है।
आत्मा की अनुभूति यही शिव सौख्य प्रदाता शिवमय है।।
महावीर क्या करें भूल से चेतन पर में उलझा है।
बिना आत्म अनुभूति न कोई प्राणी भव से सुलझा है ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।31।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 32 )
पुण्य पाप दोनों संसार है :
पुण्णि पावइ सग्ग जिउ, पावइ णरय-णिवासु ।
बे छंडिवि अप्पा मुणइ, तउ लब्भइ सिव्वासु ।।32 ।।

પુણ્યે પામે સ્વર્ગ જીવ, પાપે નરક નિવાસ;
બે તજી જાણે આત્માને, તે પામે શિવવાસ. ૩૨.
अर्थ :- पुण्य से जीव स्वर्ग पाता है और पाप से नरक में जाता है। जो इन दोनों
को (पुण्य और पाप को) छोड़कर आत्मा को जानता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।

32. ॐ ह्रीं पुण्यपापरहितपवित्ररूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शुद्धबोधस्वरूपोऽहम्

(छंद-वीर)

वस्तु स्वभाव धर्म मंगलमय आत्मा का आनंद स्वरूप ।
निजानंद चैतन्य प्राणमय समभावी चेतन चिद्रूप ।।
पुण्य भाव से स्वर्गादिक सुख पाप भाव से नरक जु दुख।
आत्म ध्यान से मुक्ति वधू मिलती है जिससे शाश्वत सुख।
अपनी भूल मिटाने पर ही निज अनुभूति प्रकट होती।
कर्म पंक की सकल कलुषता पल भर में पूरी धोती ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।32 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 33 )
निश्चय चारित्र ही मोक्ष का कारण है :
वउ तउ संजमु सील जिय, इय सव्वइँ ववहारु ।
मोक्खह कारणु एक्कु मुणि, जो तइलोयहँ सारु ।।33 ।।

વ્રત—તપ—સંયમ—શીલ જે, તે સઘળાં વ્યવહાર;
શિવકારણ જીવ એક છે, જે ત્રિલોકનો સાર. ૩૩.
अर्थ :- व्रत, तप, संयम और शील ये सब व्यवहार से ही माने जाते हैं। मोक्ष का
कारण तो एक ही समझना चाहिए और वही तीनों लोकों में सार है।

33. ॐ ह्रीं शुद्धशिवस्वरूपनिर्योगस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शिवस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

अन्तस्थल शिव सुख समृद्धि से भरा हुआ है विमल विशाल ।
एक बार झुककर तो देखो पाओगे शिव सुख तत्काल ।।
रुचि अनुयायी वीर्य काम करता है निज रूचि को पा लो।
वाममार्ग को छोड़ बावरे अब तो भवदुख सुलझा लो ।।
तप व्रत संयम शील सभी हैं मुक्ति मार्ग व्यवहार कथन।
तीन लोक में सदा आत्मा निश्चय से चारित्र सघन ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।33 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 34 )
आपसे आपको ध्याओ :
अप्पा अप्पइँ जो मुणइ, जो परभाव चएइ ।
सो पावइ सिवपुरि-गमणु, जिणवर एउ भणेइ ।।34।।

આત્મસ્વભાવથી આત્મને, જાણે તજી પરભાવ;
જિનવર ભાખે જીવ તે, અવિચળ શિવપુર જાય. ૩૪.
अर्थ :- जो आत्मा को आत्मभाव से जानता है और जो परभाव को छोड़ देता है,
वह शिवपुरी को जाता है-ऐसा जिनवर ने कहा है।

34. ॐ ह्रीं परद्रव्यपरिणमनरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्विकारस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

भव्य जीव में मोक्ष प्राप्ति की है योग्यता सदैव त्रिकाल ।
यदि पुरुषार्थ करे तो प्राणी पा सकता शिवसुख तत्काल ।।
जिन को निज चैतन्य तत्त्व की सुन्दरता का अनुभव हो।
उदासीनता उनके उर हो उनका ही तो क्षय भव हो ।।
परभावों का परित्याग कर आत्मा में अपनत्व करो।
यह जिन वच है मुक्तिपुरी में हे योगी सिद्धत्व वरो ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।34 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 35 )
व्यवहार में नौ पदार्थों का ज्ञान आवश्यक है :
छह दव्वइँ जे जिण-कहिया, णव पयत्थ जे तत्त ।
ववहारे जिण उत्तिया, ते जाणियहि पयत्त।।35।।

ષટ દ્રવ્યો જિન—ઉક્ત જે, પદાર્થ નવ જે તત્ત્વ;
ભાખ્યાં તે વ્યવહારથી, જાણો કરી પ્રયત્ન. ૩૫.
अर्थ :- जिन भगवान् ने जो छह द्रव्य, नौ पदार्थ और (सात) तत्त्व कहे हैं, वे
व्यवहारनय से कहे हैं, उनका प्रयत्नशील होकर ज्ञान प्राप्त करो।

35. ॐ ह्रीं निजगुणवैभवस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अनंतगुणस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

प्राग्द्वार सम्यग्दर्शन का निर्मल भेदज्ञान विज्ञान ।
इसको पाने का प्रयत्न है स्वाध्याय अभ्यास महान्।।

तत्त्वों का निर्णय आल्हाद प्रदायक निज बल देता है।
विविध विभाव व्याधियों को यह पल भर में हर लेता है।।
नौ पदार्थ छह द्रव्य तत्त्व सातों की कथनी है व्यवहार।
यह तत्त्वार्थ सुविधि से जानो यह है जिनआगम का सार।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।35 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 36 )
सब पदार्थों में चेतना वाला एक जीव ही है :
सव्व अचेयण जाणि जिय एक्क सचेयणु सारु ।
जो जाणेविणु परम-मुणि, लहु पावइ भवपारु ।।36 ।।

શેષ અચેતન સર્વ છે, જીવ સચેતન સાર;
જાણી જેને મુનિવરો, શીઘ્ર લહે ભવપાર. ૩૬.
अर्थ :- जितने भी पदार्थ हैं वे सब अचेतन हैं, चेतन तो केवल एक जीव ही है,
और वही सारभूत है। उसको जानकर परममुनि शीघ्र ही संसार से पार होता है।

36. ॐ ह्रीं अचेतनद्रव्यरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

चिन्मयस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

शुद्ध स्वरूपाचरण स्वगति से शिवपथ पर बढ़ता जाता।
नहीं छलावा मिथ्याभ्रम का कहीं देखने में आता ।।
पुद्गलादि पांचों द्रव्यों को सदा अचेतन जड़ जानो।
इसे जानकर भवदधि तर लो मुक्ति मार्ग यह पहचानो ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।36 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 37 )
व्यवहार का मोह त्यागना जरूरी है :
जइ णिम्मलु अप्पा मुणहि, छंडिबि सहु ववहारु ।
जिण-सामिउ एमइ भणइ, लहु पावहु भवपारु ।।37 ।।

જો શુદ્ધાતમ અનુભવો, તજી સકલ વ્યવહાર.
જિનપ્રભુજી એમ જે જાણે, શીઘ્ર થશો ભવપાર. ૩૭.
अर्थ :- सर्व व्यवहार को त्याग कर यदि तू निर्मल आत्मा को जानेगा, तो तू
संसार से शीघ्र ही पार होगा-ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।

37. ॐ ह्रीं निर्मलात्मस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निष्कलंकोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जो भी सब व्यवहार छोड़कर निज आत्मा को भाएगा।
निज अनुभव कर सबल बनेगा महामोक्ष पद पाएगा ।।
तुनक मिजाजी पर परिणति को क्षय कर निज को जो ध्याता।
मिथ्यातम का धरणीधर भी खंड खंड फिर हो जाता ।।
धर्म आश्रय लेने वाला अपने में खो जाता है।
हार मान सारा विभाव पल भर में ही सो जाता है ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।37 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 38 )
जीव अजीव का भेद जानो :
जीवाजीवहँ भेउ जो, जाणइ तिं जाणियउ ।
मोक्खहँ कारण एउ भणइ, जोइ जोइहिं भणिउँ ।।38 ।।

જીવ—અજીવના ભેદનું જ્ઞાન તે જ છે જ્ઞાન;
કહે યોગીજન યોગી હે! મોક્ષ હેતુ એ જાણ. ૩૮.
अर्थ :- जो जीवाजीव के भेद को जानता है, वही (सब कुछ) जानता है तथा हे
योगिन् ! इसी को योगीजनों ने मोक्ष का कारण कहा है।

38. ॐ ह्रीं जीवाजीवादिभेदरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अभेदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जीव अजीव भेद को जो भी जानेगा सुख पाएगा।
मोक्षमार्ग को वह जानेगा शुद्ध मोक्ष पद पाएगा।।
गीत गुनगुनाती निज परिणति पंच ताल में गाती है।
रुन-झुन-रुन-झुन नाच-नाचकर निज छवि लखती जाती है।।
अंतिम ध्यान पूर्ण होते ही पाता है चेतन निर्वाण।
निमिष मात्र में हो जाते हैं चउ अघातिया भी अवसान ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।38 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 39 )
आत्मा केवलज्ञान स्वभावधारी है :
केवल-णाण-सहाउ सो, अप्पा मुणि जीव तुहुँ ।
जइ चाहहि सिव-लाहु भणइ, जोइ जोइहिं भणिउँ ।।39 ।।

યોગી કહે રે જીવ તું, જો ચાહે શિવલાભ;
કેવળજ્ઞાનીસ્વભાવી આ, આત્મતત્ત્વને જાણ. ૩૯.
अर्थ :- हे जीव ! यदि तू मोक्ष पाने की इच्छा करता है, तो तू केवलज्ञान-स्वभाव
आत्मा को पहिचान, ऐसा योगियों ने कहा है।

39. ॐ ह्रीं केवलज्ञानस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

ज्ञानपीयूषस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

यदि शिव लाभ चाहता है तो अभी प्राप्त कर केवलज्ञान ।
केवलज्ञान स्वभावी अपने आत्म तत्त्व को ही तू जान ।।
अब मिथ्यात्व हुआ है बौना इसके कसबल टूट गए।
पर परिणति दुष्टा के देखो भाग सदा को फूट गए।
राग-द्वेष-मोहादि विकारी भाव शून्य हो गए स्वयं।
परभावों के समुद्रसूखे आज अचानक देख स्वयं ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।39 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 40 )
ज्ञानी को हर जगह आत्मा ही दिखता है :
को (?) सुसमाहि करउ को अंचउ छोपु-अछोपुकरिवि की वंचउ।
हलसहि कलहु केण समाणउजहि कहि जोवउ तहिं अप्पाणउ ।।40 ।।

કોણ કોની સમતા કરે, સેવે, પૂજે કોણ;
કોની સ્પર્શાસ્પર્શતા, ઠગે કોઈને કોણ?
કોણ કોની મૈત્રી કરે, કોની સાથે ક્લેશ;
જ્યાં દેખું ત્યાં સર્વ જીવ, શુદ્ધ બુદ્ધ જ્ઞાનેશ. ૪૦.
अर्थ :- कौन तो समाधि करे, कौन अर्चन पूजन करे, कौन स्पर्शास्पर्श करके
वंचना करे, कौन किसके साथ मैत्री करे, और कौन किसके साथ कलह करे-जहाँ
कहीं देखो ! वहाँ आत्मा ही आत्मा दृष्टिगोचर होती है।

40. ॐ ह्रीं कलहादिपरिणामरहितसमतारूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निरंजनस्वरूपोहऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

कौन मैत्री कलह समाधि अर्चना मायाचार करे।
जित देखो तित ही है आत्मा आत्म वंचना कौन करे ।।
ज्ञान ज्योति की आभा पायी, पाया है सम्यग्दर्शन ।
ज्ञान चारित्र स्वयं आए हैं मुदित हो गया आनंदघन ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।40 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 41 )
अनात्मज्ञानी कुतीर्थों में भ्रमण है :
ताम कुतित्थिइँ परिभमइ, धुत्तिम ताम करेइ ।
गुरुहु पसाएँ जाम णवि, अप्पा-देउ मुणेई ।।41 ।।

સદ્ગુરુ વચન પ્રસાદથી, જાણે ન આતમદેવ;
ભમે કુતીર્થે ત્યાં સુધી, કરે કપટના ખેલ. ૪૧
अर्थ :- जब तक जीव गुरु-प्रसाद से आत्मदेव को नहीं जानता, तभी तक वह
कुतीर्थों में भ्रमण करता है और तभी तक धूर्तता करता है।

41. ॐ ह्रीं कुतीर्थभ्रमणरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

धूर्तत्वरहितोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

गुरु प्रसाद से आत्मा भी है देव नहीं पहचान सका।
मिथ्या तीर्थों में भ्रमता है नहीं धूर्तता त्याग सका।।
ज्ञान स्वरूपी स्वानुभूति ही जिनशासन का है मंतव्य ।
जीव मोक्ष जाने के पहिले निश्चित कर अपना गंतव्य ।।
तुझे पता है तू अनादि है तू अनंत है महिमावंत।
एक मात्र सुख बलधारी है ज्ञानवंत है निज भगवंत ।।

योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।41।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रूफरीडिंग बाकी है

( 42 )
निज शरीर ही निश्चय से तीर्थ व मंदिर है :
तित्थ हिं देवलि देउ णवि, इम सुइके वलि-वुत्तु ।
देहा-देवलि देउ जिणु, एहउ जाणि णिरुत्तु ।।42 ।।

તીર્થ—મંદિરે દેવ નહિ—એ શ્રુતકેવળી વાણ;
તન-મંદિરમાં દેવ જિન, તે નિશ્ચયથી જાણ. ૪૨.
अर्थ :- श्रुतकेवली ने कहा है कि तीर्थों में देवालयों में देव नहीं हैं, जिनदेव तो
देह-देवालय में विराजमान हैं, इसे निश्चित समझो।

42. ॐ ह्रीं निजदेवालयरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

स्वयंभूस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

देव नहीं मंदिर तीरथ में श्रुत केवली कथन जानो।
तन देवल में है जिनदेव कथन निश्चय स्वरूप मानो ।।
कहीं नहीं कोई बाधक है मुक्ति मार्ग में यह ले जान।
एकमात्र निज परिणति साधक मोक्षमार्ग में ले पहचान ।।
अपने स्वचतुष्टय में रहना ही तेरा उत्तम जीतव्य ।
इसका आश्रय है तो तेरा निश्चित अति उज्जवल भवितव्य ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।। 42 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 43 )
देवालय में साक्षात् देव नहीं है :
देहा-देवलि देउ जिणु, जणु देवलिहिं णिएइ ।
हासउ महु पडिहाइ इहु, सिद्धे भिक्ख भमेइ ।।43।।

तन-भंदिरमां देव जिन, जन देरे देखंत;
हास्य भनें देखाय आ, प्रभु भिक्षार्थे भमंत. ४३.
अर्थ :- जिनदेव देह-देवालय में विराजमान है, परन्तु जीव (ईंट पत्थरों के)
देवालयों में उनके दर्शन करता है यह मुझे कितना हास्यास्पद मालूम होता है। यह बात
ऐसी ही है, जैसे कोई मनुष्य सिद्ध हो जाने पर भिक्षा के लिए भ्रमण करे।

43. ॐ ह्रीं देहरहितनिष्कलरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्देहस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

तन मंदिर में जिनवर रहते खोज रहा तू मंदिर बीच।
हमें हँसी आती है जैसे, सिद्ध खोजते भोजन रीझ ।।
सहज तत्त्व का नाश न होता, सदा मलिन होती ध्रुव जोत ।
ज्ञान अनादि अनंत शाश्वत, सुख स्वभाव से ओत प्रोत ।।
अप्रतिहत शिवमार्ग पास है, सम्प्रदान की शक्ति सजोत ।
उपादान जिसका जाग्रत है वही स्वयं भवदधि का पोत ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान् ।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।। 43 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 44 )
समभाव से अपने देह में जिनदेव को देख :
मूढ़ा देवलि देउ णवि, णवि सिलि लिप्पइ चित्ति।
देहा -देवलि देउ जिणु, सो बुज्झहि समचिति ।।44।।

नथी देव मंदिर विषे, देव न मूर्ति, चित्र;
तन-मंदिરમાં देव जिन, समज थई समचित्त. ४४.
अर्थ :- हे मूढ़ ! देव किसी देवालय में विराजमान नहीं है, इसी तरह किसी
पत्थर, लेप अथवा चित्र में भी देव विराजमान नहीं। जिनदेव तो देह-देवालय में रहते
हैं-इस बात को तू समचित्त में समझ।

44. ॐ ह्रीं सरलज्ञानरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्माया स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

शुभ भावों की खेती करके साता के दिन पाए हैं।
अशुभ भाव की खेती करके कष्ट असाता पाए है।।
मिश्र भाव की खेती करके नर भव फिर से पाया है।
जिनश्रुत जिनकुल बड़े भाग्य से अबकी तूने पाया है।।
इसको यदि तू सफल बनाने का प्रयत्न कुछ कर लेगा।
भेदज्ञान कर निज पुरुषार्थ शक्ति से समकित निधि लेगा ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।। 44 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 45 )
ज्ञानी ही शरीर मंदिर में परमात्मा को देखता है :
तित्थइ देउलि देउ जिणु, सव्वु वि कोई भणेइ ।
देहा-देउलि जो मुणइ, सो बुहु को वि हवेइ ।।45 ।।

तीर्थ—मन्दिरे देव जिन, लोक कथे सहु एम;
विरला ज्ञानी जाणता, तन-मंदिरमां देव. ४૫.
अर्थ :- सब कोई कहते हैं कि जिनदेव तीर्थ में और देवालय में विद्यमान हैं।
परन्तु जो जिनदेव को देह-देवालय में विराजमान समझता है ऐसा पंडित कोई बिरला
ही होता है।

45. ॐ ह्रीं शिवधामरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शाश्वत्विरागधामस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

विश्व कह रहा श्री जिनदेव सदा देवल में रहते हैं।
विरले ही ज्ञानीजन कहते तन देवल में रहते हैं।।
दे उपदेश प्रशस्त राग का भरमाता जो प्राणी को।
पटक रहा भव्यों को भव में पता नहीं अज्ञानी को ।।
राग प्रशस्त अरु अप्रशस्त दोनों ही दुख के कारण हैं।
एक मात्र निज शुद्ध भाव ही भव सागर से तारण हैं ।।
गृह देवल में देव न रहता न रहता है वह चित्राम।
तन देवल में देव साम्य भावों से लख ले उसका धाम ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।। 45 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 46 )
धर्म रसायन को पीने से अमर होता है :
जइ-जर-मरण-करालियउ, तो जिय धम्म करेहि ।
धम्म-रसायणु पियहि तुहुँ, जिम अजरामर होहि ।।46 ।।

જરા—મરણ ભયભીત જો, ધર્મ તું કર ગુણવાન;
અજરામર પદ પામવા, કર ધર્મોષધિ પાન. ૪૬.
अर्थ :- हे जीव ! यदि तू जरा-मरण से भयभीत है तो धर्म कर, धर्मरसायन का
पान कर; जिससे तू अजर अमर हो सके।

46. ॐ ह्रीं जन्मजरामरणरहिताजरामररूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

चैतन्यरसरसायनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

आज अमर तू हो जाएगा धर्म रसायन पीले मान।
जरा मरण से यदि कुछ भय है तो धर्मामृत का कर पान ।।
आत्म अनुभवी निज को ध्याते दुख होता अज्ञानी को।
अहं भाव है तो शिवपथ कब मिल सकता अज्ञानी को।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।46 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 47 )
बाह्य क्रिया में धर्म नहीं है :
धम्मु ण पढियइँ होइ, धम्मु ण पोत्था-पिच्छियइँ ।
धम्मु ण मढिय- पएसि, धम्मु ण मत्था- लुंचियइँ ।।47 ।।

શાસ્ત્ર ભણે મઠમાં રહે, શિરના લુંચે કેશ;
રાખે વેશ મુનિ તણો, ધર્મ ન થાયે લેશ. ૪૭.
अर्थ :- पढ़ लेने से धर्म नहीं होता, पुस्तक और पिच्छी से भी धर्म नहीं होता; किसी
मठ में रहने से भी धर्म नहीं है तथा केशलोंच करने से भी धर्म नहीं कहा जाता।

47 ॐ ह्रीं पुस्तकपिच्छमठप्रवेशादिषु धर्मानुभूतिरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः।

आत्मधर्मस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

शुद्धातम के अनुभव के बिन शिवसुख कोई न पाता है।
स्वानुभूति का बल पाकर ही सदा मोक्ष में जाता है।।
पुण्य-पाप में जब तक उलझे तब तक आस्रव भाव न जाय।
बंध एक भी शुद्ध निर्जरा के बिन नहीं निर्जरा पाय ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।47 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 48 )
राग-द्वेष त्याग कर आत्मस्थ होना धर्म है :
राय-रोस बे परिहरिवि, जो अप्पाणि वसेइ ।
सो धम्मु वि जिण-उत्तियउ, जो पंचम-गइ णेंइ ।।48।।

રાગ-દ્વેષ બે ત્યાગીને, નિજમાં કરે નિવાસ;
જિનવરભાષિત ધર્મ તે, પંચમ ગતિ લઈ જાય. ૪૮.
अर्थ :- जो राग और द्वेष दोनो को छोड़कर निज आत्मा में वास करता है, उसे ही
जिनेन्द्रदेव ने धर्म कहा है। वह धर्म पंचमगति (मोक्ष) को ले जाता है।

48. ॐ ह्रीं रागद्वेषरहितनिद्वेषस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

नीरागस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

वीतराग बन राग द्वेष तज जो आत्मा में करता वास ।
वह धर्मात्मा पंचम गति पाता करता है मोक्ष निवास ।।
भेद ज्ञान बिन कोई चेतन पार नहीं भव सागर पाय।
यह उपाय यदि नहीं किया तो पाओगे चहुँगति दुखदाय ।।
आत्म भाव बिन तुमने चेतन भव सागर में गोते खाय।
अब तो आत्म ज्ञान कर लो तुम जिनवर की सौगंध उठाय ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।48 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 49 )
आशा-तृष्णा ही संसार भ्रमण का कारण है :
आउ गलइ णवि मणु गलइ, णवि आसा हु गलेइ ।
मोहु फुरइ णवि अप्प-हिउ, इम संसार भमेइ ।।49 ।।

મન ન ઘટે આયુ ઘટે, ઘટે ન ઇચ્છા-મોહ;
આત્મહિત સ્ફુરે નહિ, એમ ભમે સંસાર. ૪૯.
अर्थ :- आयु गल जाती है, पर मन नहीं गलता और न आशा ही गलती है। मोह
स्फुरित होता है, परन्तु आत्महित का स्फुरण नहीं होता-इस तरह जीव संसार में भ्रमण
किया करता है।

49. ॐ ह्रीं आयुकर्मरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निरपेक्षस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

निज अनुभूति सौख्य की दाता को हर्षित लो अभी बुलाय ।
निज आत्मा ही मंगलमय है ये ही है शाश्वत सुखदाय ।।
शुक्ल ध्यान की अग्नि जले जब सभी कर्म ईधन जल जाय।
अनुभव रस का सागर पावे महामोक्ष के सुख तू पाय ।।
आयु न गलती मन न गलता, न आशा तृष्णा गलती ।
मोह भाव संसार बढ़ाता भ्रमण दशा भी नहीं मिटती ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।49 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 50 )
आत्म प्रेमी ही निर्वाण का पात्र है :
जेहउ मणु विसयहँ रमइ, तिसु जइ अप्प मुणेइ ।
जोइउ भणइ हो जोइयहु, लहु णिव्वाणु लहेइ ।।50 ।।

જેમ રમતું મન વિષયમાં, તેમ જો આત્મ લીન;
શીઘ્ર મળે નિર્વાણપદ, ધરે ન દેહ નવીન. ૫૦.
अर्थ :- जिस तरह मन विषयों में रमण करता है, उस तरह यदि वह आत्मा को
जानने में रमण करें, तो योगिजनों ! शीघ्र ही निर्वाण पा जाय।

50. ॐ ह्रीं विषयचित्तरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

चित्कलास्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जैसे मन विषयों में रमता तैसे निज में रमण करे।
हे योगी वह शीघ्र मोक्ष पद पावे फिर न भ्रमण करे ।।
द्रव्य भाव नो कर्म रहित तू एकमात्र शुद्धात्मा है।
ध्रौव्य त्रिकाली गुण अनंतमय तू ही तो परमात्मा है ।।
अजर अमर अविकल अविनाशी दर्शन ज्ञान स्वरूपी है।
तू अभेद है तू अखंड है तू चिन्मय चिदूपी है ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।50 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 51 )
शरीर को नरक-घर जानो :
जेहउ जज्जरु णरय-धरु, तेहउ बुज्झि सरीरु ।
अप्पा भावहि णिम्मलउ, लहु पावहि भवतीरु ।।51 ।।

નર્કવાસ સમ જર્જરિત, જાણો મલિન શરીર;
કરી શુદ્ધાત્મ ભાવના, શીઘ્ર લહો ભવતીર. ૫૧.
अर्थ :- हे जीव, जैसे नरकवास सैकड़ों छिद्रो से जर्जरित है, उसी तरह शरीर को
भी (मलमूत्र आदि से) जर्जरित समझ । अतएव निर्मल आत्मा की भावना कर, तो शीघ्र
ही संसार से पार होगा।

51. ॐ ह्रीं नरकादिगृहवासरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

चैतन्यधामस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जैसे नरक वास दुख का घर वैसे ही शरीर का वास।
आत्म भावना से भवदधि तर पाएगा तू मुक्ति निवास ।।

जो परिणाम कषाय रहित होते वे लेश्या कहलाते।
कृष्ण नील कापोत अशुभत्रय ये दुखदायी कहलाते ।।
पीत पद्म शुक्ल शुभ तीनों सातादायी होते हैं।
किन्तु लेश्या रहित जीव ही सिद्ध चक्रपति होते हैं ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।51।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 52 )
जगत् प्रपंचों में उलझा प्राणी आत्मा को नहीं पहचानता :
धंधइ पडियउ सयल जगि, णवि अप्पा हु मुणंति ।
तहिं कारणि ए जीव फुडु, ण हु णिण्वाणु लहंति ।।52 ।।

વ્યવહારિક ધંધે ફસ્યા, કરે ન આતમજ્ઞાન;
તે કારણ જગજીવ તે, પામે નહિ નિર્વાણ. ૫૨.
अर्थ :- सब लोग संसार में अपने-अपने धंधे में फँसे हुए हैं और अपनी आत्मा को
नहीं पहिचानते। निश्चय से इसी कारण ये जीव निर्वाण को नहीं पाते, यह स्पष्ट है।

52. ॐ ह्रीं बाह्यारंभादिव्यापाररहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्व्यापारस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

कर्म नाश सामर्थ्य नहीं है इन शुभभावों में किञ्चित् ।
शुक्ल ध्यान ही कर्म नाश में है समर्थ पूरा निश्चित ।।
मोहाधीन कर्म सारे ही भव-भव तक दुखदायी है।
मोह नष्ट हो जाए तो फिर कर्म नहीं दुखदायी हैं ।।
जग के प्राणी अपने-अपने धंधो में रहते तल्लीन।
इसीलिए निर्वाण नहीं पाता है यह अज्ञानी दीन ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।52 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 53 )
आत्मज्ञान बिना शास्त्रपाठ निष्फल है :
सत्थ पढंतह ते वि जड, अप्पा जे ण मुणंति ।
तहिं कारणि ए जीव फुडु, ण हु णिव्वाणु लहंति ।।53।।

શાસ્ત્રપાઠી પણ મૂર્ખ છે, જે નિજતત્ત્વ અજાણ;
તે કારણ જગજીવ તે, પામે નહિ નિર્વાણ. ૫૩.
अर्थ :- जो शास्त्रों को तो पढ़ लेते हैं परन्तु आत्मा को नहीं जानते, वे लोग भी
जड़ ही हैं तथा निश्चय से इसी कारण ये जीव निर्वाण को नहीं पाते यह स्पष्ट है।

53. ॐ ह्रीं निजपरमज्ञानस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अवबोधसौधस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

शास्त्रों को पढ़ता है फिर भी नहीं आत्मा की पहचान ।
इसीलिए मूरख प्राणी पाता है कभी नहीं निर्वाण ।।
आत्म गुणों का अविर्भाव रोकने में समर्थ है मोह।
अतः जीव को करना होगा पहिले मोह कर्म से द्रोह ।।
उपादेय अरु हेय आदि का जो विचार कर सकते हैं।
वे मनु की संतान मनुज गुण दोष ज्ञान कर सकते हैं ।।
मन इन्द्रिय से छुटकारा पाए तो फिर कहना है व्यर्थ ।
राग-द्वेष सब रुक जाएंगे आत्मा होगा पूर्ण समर्थ ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।53।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 54 )
इन्द्रिय व मन के निरोध से सहज ही आत्मानुभव :
मणु-इंदिहि वि छोडियइ, ( ? ) बुहु पुच्छियइ ण कोइ।
रायहँ पसरु णिवारियइ, सहज उपज्जइ सोइ ।।54 ।।

મન-ઇન્દ્રિયથી દૂર થા, શી બહુ પૂછે વાત?
રાગ પ્રસાર નિવારતાં, સહજ સ્વરૂપ ઉત્પાદ. ૫૪.
अर्थ :- यदि पंडित, मन और इन्द्रियों से छुटकारा पा जाए, तो उसे किसी से
कुछ पूछने की जरूरत नहीं। यदि राग का प्रवाह रुक जाए तो वह (आत्मभाव) सहज
ही उत्पन्न हो जाता है।

54. ॐ ह्रीं इन्द्रियविषयरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

सहजचिद्रूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

लक्ष्मी अरु अधिकार बढ गया अरु कुटुम्ब परिवार बढ़ा।
नहीं एक क्षण विवेक जागा बतला तो क्या अरे बढ़ा ।।
शुक्ल ध्यान की पराकाष्ठा में ही खिलता रवि कैवल्य ।
केवल दर्शन सहित प्राप्त हो जाता पूर्ण ज्ञान कैवल्य ।।
चार घातिया के अभाव से हो जाता प्रगटित नैर्मल्य ।
निमिष मात्र में गुण अनंत लख क्षय हो जाता सब दौर्वल्य ।।
तब अरहंत दशा होती है सर्वज्ञत्व शक्ति उत्कट ।
फिर अघातिया भी जाते हैं हो जाता सिद्धत्व प्रकट ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।54 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 55 )
पुद्गल व जगत् के व्यवहार से आत्मा को भिन्न जानो :
पुग्गलु अण्णु जि अण्णु जिउ, अणु जि सहु ववहारु ।
चयहि वि पुग्गलु गहहि जिउ, लहु पावहि भवपारु ।।55 ।।

સ્પષ્ટ ન માને જીવને, જે નહિ જાણે જીવ;
છૂટે નહિ સંસારથી, ભાખે છે પ્રભુ જિન. ૫૬.
अर्थ :- पुद्गल भिन्न है और जीव भिन्न है तथा अन्य सब व्यवहार भिन्न है।
अतएव पुद्गल को छोड़ और जीव को ग्रहण कर-इससे तू शीघ्र ही संसार से पार
होगा।

55. ॐ ह्रीं पुद्गलादिसर्वव्यवहाररहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अखंडचित्स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

भिन्न भिन्न है जीव अरु पुद्गल भिन्न सर्व व्यवहार समझ ।
यदि पुद्गल तज ग्रहे आत्मा तो सीधा भव पार सहज ।।
ठकुर सुहाते वचन न बोलो सत्य वचन मीठे बोलो।
अपने ठाकुर की आँखों के पट सत्यांजन से खोलो ।।
सत्य वचन हो स्वपर दयामय हित मित प्रिय ही हो वाणी।
कभी किसी का अहित न होवे वाणी बोलो कल्याणी ।।
अपने वचनों को सदैव तुम ज्ञान तुला पर ही तोलो।
निजाचरण हो सदाचरणमय शुद्ध आत्मा को जोलो ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।55 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 56 )
आत्मानुभवी ही संसार से मुक्त होता है :
जे णवि मण्णहिं जीव फुडु, जे णवि जीउ मुणंति ।
ते जिण-णाहहँ उत्तिया, णउ संसार मुचंति ।।56।।

રત્ન દીપ રવિ દૂધ દહી, ઘી પત્થર ને હેમ;
સ્ફટિક રજત તે અગ્નિ નવ, જીવ જાણવો તેમ. ૫૭.
अर्थ :- जो जीव को स्पष्ट रूप से न समझते हैं और जो उसे न पहिचानते हैं, वे
संसार से कभी छुटकारा नहीं पाते-ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है।

56. ॐ ह्रीं संसारदुःखरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निजसौख्यस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

नहीं जानते जो निजात्मा अज्ञानी गहराई से।
जिनवर कहते वे न पार होते हैं भव दुख खाई से।।
शास्त्राभ्यास ज्ञान धन उत्तम अविनाशी है भव विरहित।
धर्म रूप है स्वर्ग मोक्ष का कारण है सावद्य रहित।।
अष्ट कर्म सामान्य रूप को असिद्धत्व कहता आगम।
अष्ट कर्म का उदय न हो तो है सिद्धत्व शिवम सत्यम्।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।56।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 57 )
आत्मा के ज्ञान के लिए नौ दृष्टान्त हैं :
रयण दीउ दिणयर दहिउ, दुध्दु घीव पाहाणु।
सुण्णउ रूउ फलिहउ अगिणि, णव दिटुंता जाणु ।।57।।

દેહાદિકને પર ગણે, જેમ શૂન્ય આકાશ;
તો પામે પરબ્રહ્મ ઝટ, કેવળ કરે પ્રકાશ. ૫૮.
अर्थ :- रत्नदीप, सूर्य, दही, दूध, घी, पाषाण, सोना, चांदी, स्फटिकमणि और
अग्नि ये (जीव के) नौ दृष्टान्त जानने चाहिए।

57. ॐ ह्रीं चैतन्यरत्नदीपस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

ज्ञानभास्करोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

रत्न दीप रवि दूध दही घृत पत्थर आग स्वर्ण रूपा।
मणि स्फटिक सभी से जानो निज आत्मा त्रिभुवन भूपा।।
अंतरंग तप स्वाध्याय है ज्ञानाभ्यास युक्त पावन ।
मन का होता दमन इसी से अंतरंग तप उत्तम धन।।
जो शरीर का दमन करे वह तप बहिरंग कहाता है।
बाह्य तपों से अंतरंग तप ही उत्कृष्ट कहाता है।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।57 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 58 )
देहादि रूप मैं नहीं हूँ-यही ज्ञान मोक्ष का बीज है :
देहादिउ जो परु मुणइ, जेहउ सुण्णु अयासु ।
सो लहु पावइ ( ? ) बंभु परु केवलु करइ पयासु ।।58 ।।

જેમ શુદ્ધ આકાશ છે, તેમ શુદ્ધ છે જીવ;
જડરૂપ જાણો વ્યોમને, ચૈતન્યલક્ષણ જીવ. ૫૯.
अर्थ :- जो शून्य आकाश की तरह देह आदि को पर समझता है, वह शीघ्र ही
परम ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है और वह केवलज्ञान प्रकाश करता है।

58. ॐ ह्रीं देहादिपरद्रव्यरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

परमब्रह्मस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

शून्याकाश समान भिन्न माने जो देह और आत्मा।
परमब्रह्म सर्वज्ञ स्वपद पा आत्मा होता परमात्मा ।।
प्रकृष्ट वचन ही प्रवचन है शेष सभी है वचनालाप।
प्रवचन वही कहाता है जो क्षय करता अज्ञान प्रताप ।।
कोटि भवों में जितने कर्मों का क्षय करता अज्ञानी।
वह त्रिगुप्ति से क्षणभर में ही क्षय कर देता है ज्ञानी ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।58 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 59 )
आकाश के समान होकर भी मैं सचेतन हूँ :
जेहउ सुद्ध अयासु जिय तेहउ अप्पा वुत्तु ।
आयासु वि जडु जाणि जिय अप्पा चेयणुवंतु ।।59।।

જેમ શુદ્ધ આકાશ છે, તેમ શુદ્ધ છે જીવ;
જડરૂપ જાણો વ્યોમને, ચૈતન્યલક્ષણ જીવ. ૫૯.
अर्थ :- हे जीव ! जैसे आकाश शुद्ध है वैसे ही आत्मा भी शुद्ध कही गई है।
दोनों में अन्तर केवल इतना ही है कि आकाश जड़ है और आत्मा चैतन्य लक्षण से
युक्त है।

59. ॐ ह्रीं शुद्धचैतन्यरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

सच्चिदानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

ज्यों आकाश शुद्ध है त्यों ही निजआत्मा है परमात्मा।
जड़ आकाश किन्तु है चेतन तत्त्व सचेतन निज आत्मा ।।

कलह द्वेष मात्सर्य क्रोध पैशून्य मान माया दुख रूप ।
सत्य अहिंसा क्षमाशील विनयादिक शुचि ऋजुता सुख रूप ।।
सिद्ध साक्षी होते सब ही पंडित करते मंत्रोच्चार।
जो इस विधि से आगे आते वे ही करते आत्मोद्धार ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।59 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 60 )
अपने भीतर ही मोक्षमार्ग है :
णासग्गिं अब्धिंतरहँ जे जीवहिं असरीरु ।
बाहुडि जम्मि ण संभवहि पिवहिं ण जणणी-खीरु ।।60 ।।

ધ્યાન વડે અભ્યંતરે, દેખે જે અશરીર;
શરમજનક જન્મો ટળે, પીએ ન જનનીક્ષીર. ૬૦.
अर्थ :- जो नासिका पर दृष्टि रखकर अभ्यंतर में शरीर को (आत्मा को) देखते
हैं वे इस लज्जाजनक जन्म को फिर से धारण नहीं करते और वे माता के दूध का पान
नहीं करते।

60. ॐ ह्रीं ज्ञानशरीररूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अशरीरोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जो नासाग्रदृष्टि रख तन से भिन्न आत्मा भीतर लखते ।
वे न जन्म धारण करते हैं जननी क्षीर न फिर चखते ।।
मिथ्यात्वादिक पंच भाव के द्वारा जो कार्माण पुद्गल ।
कर्म रूप जो होते वे कहलाते बध्यमान पुद्गल ।।
प्रकृति शील या स्वभाव से सब समानार्थक शब्द प्रसिद्ध ।
एक समय में जो बंध जाता वह कहलाता समय प्रबद्ध ।।

योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।60 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 61 )
निर्मोही होकर अपने अमूर्तिक आत्मा को देखे :
असरीरु वि सुसरीरु मुणि, इहु सरीरु जडु जाणि।
मिच्छा-मोहु परिच्चयहि, मुत्ति णियं वि ण माणि ।।61 ।।

તનવિરહિત ચૈતન્યતત્ત, પુદ્ગલ તન જડ જાણ;
મિથ્યા મોહ દૂરે કરી, તન પણ મારું ન માન. ૬૧.
अर्थ :- अशरीर (आत्मा) को ही सुन्दर शरीर समझो और इस शरीर को जड़
मानो, मिथ्या मोह का त्याग करो और अपने शरीर को भी अपना मत मानो।

61. ॐ ह्रीं मिथ्यामोहरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्ममत्वोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जड़ देही से भिन्न अमूर्तिक निज आत्मा को ही जानो।
तज कर मिथ्या मोह देह जड़ को तुम पर सदैव मानो ।।
आत्म अनुभवी दशा प्राप्ति की परंपरा है शास्त्राभ्यास ।
इसके बल से मोक्षरूप फल आता है जीवों के पास ।।
क्रोधादिक चारों कषाय भी स्वतः मंद हो जाती हैं।
पंचेन्द्रिय के विषय भोग की प्रवृत्तियाँ रुक जाती हैं ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।61 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 62 )
आत्मानुभव का फल केवलज्ञान व अविनाशी सुख है :
अप्पइँ अप्पु मुणंतयहँ, किं णेहा फलु होइ ।
केवल-णाणु वि परिणवइ, सासय-सुक्खु लहेइ ।।62 ।।

નિજને નિજથી જાણતાં, શું ફળ પ્રાપ્ત ન થાય;
પ્રગટે કેવળજ્ઞાન ને, શાશ્વત સુખ પમાય. ૬૨.
अर्थ :- आत्मा को आत्मा से जानने में यहाँ कौनसा फल नहीं मिलता ? और तो
क्या इससे केवलज्ञान भी हो जाता है और जीव को शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है।

62. ॐ ह्रीं शाश्वतसौख्यस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

सदानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

आत्मा को आत्मा के द्वारा अनुभव का फल केवलज्ञान ।
अविनाशी अक्षय आनंदमयी मिल जाता है निर्वाण ।।
अति चंचल मन जब एकाग्र दशा को हो जाता है प्राप्त।
तीन काल त्रय लोकों का भी अल्पज्ञान होता उर व्याप्त ।।
हेय मानता तज देता है उपादेय जानता उचित ।
आत्म ज्ञान सन्मुख होता है सिद्ध लोक पाता निश्चित ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।62 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 63 )
पर-भाव का त्याग-संसार त्याग का कारण है :
जे परभाव चएवि मुणि अप्पा अप्प मुणंति ।
केवल-णाण-सरूव लइ (लहि?) ते संसारु मुचंति ।।63 ।।

જો પરભાવ તજી મુનિ, જાણે આપથી આપ;
કેવળજ્ઞાનસ્વરૂપ લહી, નાશ કરે ભવતાપ. ૬૩.
अर्थ :- जो मुनि परभाव का त्याग कर अपनी आत्मा से अपनी आत्मा को
पहिचानते हैं, वे केवलज्ञान प्राप्त कर संसार से मुक्त हो जाते हैं।

63. ॐ ह्रीं सद्धर्ममणिरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

स्वाधीनानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

परभावों का परित्याग कर आत्मा में करते अपनत्व ।
केवल वे संसार समुद्रनाश कर पाते हैं सिद्धत्व ।।
श्रेष्ठ परम तप स्वाध्याय से मिथ्यामति तत्क्षण जाती ।
यह महिमा शास्त्राभ्यास की अंतरंग तप से आती।।
पुण्य सातिशय बंधता ही है बहु आनंद उठाता है।
जग में यश गौरव से भूषित यह विशेष हो जाता है ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।63 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(64)
त्यागी आत्मध्यानी महात्मा ही धन्य है :
धण्णा ते भवयंत बुह जे परभाव चयंति ।
लोयालोय-पयासयरू अप्पा विमल मुणंति । ।64 ।।
ધન્ય અહો ભગવંત બુધ, જે ત્યાગે પરભાવ;
લોકાલોક પ્રકાશકર, જાણે વિમળ સ્વભાવ. ૬૪.
अर्थ :- उन भगवान् पंडितों को धन्य हैं जो परभाव का त्याग करते हैं और जो
लोकालोक प्रकाशक निर्मल आत्मा को जानते हैं।

64. ॐ ह्रीं निजभगवानरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निजपरमेश्वरस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जो परभावों को तजते हैं लोकालोक प्रकाशक बन।
वे आत्मा का अनुभव करते वे ज्ञानी ज्ञायक धन धन ।।
ज्ञान चेतना के प्रताप से कर्म चेतना होती दूर।
फिर चेतना कर्म फल वाली हो जाती है चकनाचूर ।।
निज चैतन्य चिदंकित चिन्मय चिद्घन चिदानंद चिद्रूप।
ज्ञान चेतना अपनी भूला अतः बना है यह विद्रूप ।।
ज्ञान चेतना जगा हृदय में पलभर में कर निज कल्याण ।
ज्ञान चेतना बिना कभी भी होगें नहीं कर्म अवसान ।।
निज अनुभव के पंख लगाकर सिद्धदेश उड़ जा चेतन।
यह न देश तेरा परदेशी अपने से जुड़ जा चेतन ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।64 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रूफरीडिंग बाकी है

( 65 )
गृहस्थ या मुनि, दोनों के लिए आत्मरमणता ही सिद्धसुख का उपाय है :
सागारु वि णागारु कु वि जो अप्पाणि वसेइ ।
सो लहु पावइ सिद्धि-सुहु जिणवरु एम भणेइ ।।65 ।।

મુનિજન કે કોઈ ગૃહી, જે રહે આતમલીન;
શીઘ્ર સિદ્વિસુખ તે લહે, એમ કહે પ્રભુ જિન. ૬૫.
अर्थ :- गृहस्थ हो या मुनि हो, जो कोई भी निज आत्मा में वास करता है, वह
शीघ्र ही सिद्धि से सुख को पाता है, ऐसा जिन भगवान् ने कहा है।

65. ॐ ह्रीं सागारानगारविकल्परहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

परमशुद्धस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

गृहस्थ को अथवा होवे मुनि जो आत्मा में करता वास ।
जिनवर कहते अल्पावधि में पाता शिवसुख मुक्ति निवास ।।
नवप्रकाश हो गया उदित तो तिमिर कहाँ रह पाएगा।
समकित रवि का उदय हुआ तो मोह कहाँ रह पाएगा ।।
संयम पवन चलेगी तो फिर अविरति उड़ ही जाएगी।
चिर प्रमाद की दशा नष्ट कर निज से जुड़ ही जाएगी ।।
फिर कषाय अर्न्तमुहूर्त्त में स्वयं कहीं भग जाएगी।
केवलज्ञान चंद्रिका निर्मल अंतर में जग जाएगी।।
फिर ये योग न रहने पाएँगे ज्ञानी के अंतर में।
निज सिद्धत्व स्वसुख प्रकटेगा चेतन के अभ्यंतर में ।।
सादि अनंतानंत काल तक शिवसुख सरि लहराएगी।
त्रिभुवन वंदित की विरुदावलि स्वर्गपुरी भी गाएगी ।।
ज्ञान प्रकाश प्रकट करने का ही प्रयत्न है सर्वोत्तम ।
निज प्रकाश पा प्राणी हो जाता भव दुखक्षय में सक्षम ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।65 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 66 )
तत्त्वज्ञानी विरले होते हैं :
विरला जाणहिं तत्तु बुह, विरला णिसुणहिं तत्तु ।
विरला झायहिं तत्तु जिय, विरला धारहिं तत्तु ।।66 ।।

વિરલા જાણે તત્ત્વને, વળી સાંભળે કોઈ;
વિરલા ધ્યાવે તત્ત્વને, વિરલા ધારે કોઈ. ૬૬.
अर्थ :- विरले पंडित लोग ही तत्त्वों को समझते हैं, विरले ही तत्त्वों को
श्रवण करते हैं, विरले ही तत्त्वों का ध्यान करते हैं और विरले जीव ही तत्त्वों को धारण
करते हैं।

66. ॐ ह्रीं निजतत्त्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

सहजचिद्विलासस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

विरला आत्म तत्त्व को जाने विरला सुने तत्त्व की बात।
विरला ही निज ध्यान लीन हो विरला धारे तत्त्व प्रपात ।।
आधि व्याधि पर की उपाधि से विरहित है सच्चा ज्ञानी ।
रत्ती भर भी इनमें जो उलझा वह तो है अज्ञानी ।।
सर्वोत्तम सत्संग प्राप्त कर ज्ञान सिन्धु का जल पीले।
ज्ञान भावना का संबल ले निज में ही प्रतिपल जीले ।।
परभावों में बहक बहक कर मत अपना स्वभाव घाते।
जो स्वभाव भावों में रहते वे ही सच्चा सुख पाते ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।66 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 67 )
कुटुम्ब मोह त्यागने योग्य है :
इहु परियण ण हु महुतणउ, इहु सुहु-दुक्खहँ हेउ।
इम चितंतहँ किं करइ, लहु संसारहँ छेउ ।।67 ।।

ધ્યાન વડે અભ્યંતરે, દેખે જે અશરીર;
શરમજનક જન્મો ટળે, પીએ ન જનનીક્ષીર. ૬૭.
अर्थ :- यह कुटुम्ब परिवार निश्चय से मेरा नहीं है, यह मात्र सुख दुःख का ही
हेतु है, इस प्रकार विचार करने से शीघ्र ही संसार का नाश किया जा सकता है।

67. ॐ ह्रीं परिजनरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

एकोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

धन कुटुम्ब परिवार न मेरा निश्चय से जो जानेगा।
यह विचार तो नित्य करेगा वह भव भार उतारेगा ।।
प्रतिरोधित है आस्रव नित तू भी तो कर इसका प्रतिरोध ।
संवर का है शस्त्र पास में फिर क्यों करता नहीं निरोध ।।
संवर में इतना बल है जो कर सकता आस्रव प्रतिरुद्ध ।
किन्तु मूढ़ प्राणी अपनी भूलों के कारण है अवरुद्ध ।।
महामोह की माया में फँस करता है अपना ही घात।
भेदज्ञान से उसे जीत ले देख ज्ञान का पूर्ण प्रभात ।।
भाव कर्म से द्रव्य कर्म का करना होगा पूर्ण विरोध ।
द्रव्य कर्म के निरोध होने पर होगा संसार निरोध ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।67 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 68 )
संसार में कोई अपना नहीं है :
इंद-फणिंद-णरिंदय वि जीवहँ सरणु ण होंति ।
असरणु जाणिवि मुणि-धवला अप्पा अप्प मुणंति ।।68 ।।

ઈન્દ્ર, ફણીન્દ્ર, નરેન્દ્ર પણ, નહીં શરણ દાતાર;
શરણ ન જાણી મુનિવરો, નિજરૂપ વેદે આપ. ૬૮.
अर्थ :- इन्द्र, फणीन्द्रऔर नरेन्द्रभी जीवों को शरणभूत नहीं हो सकते; इस तरह
अपने को शरणरहित जानकर उत्तम मुनि निज आत्मा से निज आत्मा को जानते हैं।

68. ॐ ह्रीं परद्रव्याश्रयरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

स्वतंत्रोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

इन्द्रतथा धरणेन्द्रचक्रवर्ती न शरण हैं आत्मा को।
इसे जान उत्तम मुनि करते केवल शरण आत्मा को ।।
कौन घड़ी घिर आए बदरा कौन घड़ी आयी बरसात ।
कौन घड़ी भ्रम रजनी बीती कौन घड़ी आ गया प्रभात ।।
मुझे पता ही नहीं चला प्रभु सम्यग्दर्शन प्रगट हुआ।
सम्यक् ज्ञान सहज संग पाया निज चारित्र सुनिकट हुआ ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।68 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 69 )
जीव सदा अकेला है :
इक्क उपज्जइ मरइ कु वि दुहु सुहु भुजइ इक्कु ।
णरयहँ जाइ वि इक्क जिउ तह णिव्वाणहँ इक्कु ।।69 ।।

જન્મ-મરણ એક જ કરે, સુખ-દુઃખ વેદે એક;
નર્કગમન પણ એકલો, મોક્ષ જાય જીવ એક. ૬૯.
अर्थ :- जीव अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरता है और वह अकेला
ही सुख-दुख का उपभोग करता है। वह नरक में भी अकेला ही जाता है और निर्वाण
भी वह अकेला ही प्राप्त करता है।

69. ॐ ह्रीं एकत्वविभक्तनिजध्रुवनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निरालंबोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जन्म मरण सुखदुख नरकादिक जीव अकेला पाता है।
जीव अकेला ही कर्मों का क्षयकर शिवपुर जाता है ।।

नहीं प्रफुल्लित होता है मन बिना तत्त्व निर्णय किंचित् ।
हृदय तत्त्व निर्णय होता है तब होता प्रफुल्ल निश्चित ।।
ज्ञान ऊर्मियाँ अर्न्तनभ में केलि हेतु आ जाती है।
पुलक पुलक संगीत सुनाती गुनगुन गुनगुन गाती है ।।
हर्षित हो चेतन अनादि मिथ्यात्व भाव छोड़ देता।
सहज स्वभाव जाग्रत करके समकित पुष्प तोड़ लेता ।।
दृष्टि मुक्त होते ही होता इसके मन में सौख्य अपार ।
जीवन्मुक्त दशा प्रगटाकर हो जाता है भव से पार ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।69 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 70 )
निर्मोही हो आत्मा का ध्यान कर :
एक्कुलउ जइ जाइसिहि तो परभाव चएहि ।
अप्पा झायहि णाणमउ लहु सिव-सुक्ख लहेहि।।70 ।।

જો જીવ તું છે એકલો, તો તજ સૌ પરભાવ;
આત્મા ધ્યાવો જ્ઞાનમય, શીઘ્ર મોક્ષસુખ થાય. ૭૦.
अर्थ :- हे जीव ! यदि तू अकेला ही है तो परभाव का त्याग कर और आत्मा का
ध्यान कर, जिससे तू शीघ्र ही ज्ञानमय मोक्ष सुख को प्राप्त कर सके।

70. ॐ ह्रीं पूर्णज्ञानधामरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

परिपूर्णोऽहम् ।

(छंद-वीर)

अगर अकेला ही जाएगा तो परभाव सभी परित्याग।
ज्ञानमयी निज आत्मा ध्याले शीघ्र प्राप्त कर मुक्ति पराग ।।

ज्ञान सिन्धु में जो अवगाहन करते वे शिव सुख पाते।
अवगाहन भव सिन्धु करें जो वे चहुँगति के दुख पाते ।।
ज्ञान सिन्धु में आनंदामृत की लहरें ही उठती हैं।
भव समुद्रमें विषय भोग की आकांक्षाएँ उठती हैं।।
एक हेतु सच्चे सुख का है एक हेतु है भव दुख का।
जैसा तुझे रुचे वह करले तू निर्माता दुख-सुख का।।
भव पर्वत को वही तोड़ते जो निजात्मा को ध्याते।
वे ही शिव सुख शैय्या पर जा काल अनंत सौख्य पाते ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।70 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 71 )
पुण्य को पाप जाने वही ज्ञानी है :
जो पाउ वि सो पाउ मुणि सव्वु इ को वि मुणेइ ।
जो पुण्णु वि पाउ वि भणइ सो बुह (?) को वि हवेइ । ।71 ।।
પાપરૂપને પાપ તો, જાણે જગ સહુ કોઈ;
પુણ્યતત્ત્વ પણ પાપ છે, કહે અનુભવી બુધ કોઈ. ૭૧.
अर्थ :- जो पाप है उसको पाप जान, यह तो सब कोई जानता है, परन्तु जो कोई
पुण्य को भी पाप कहता है, ऐसा पंडित कोई बिरला ही होता है।

71. ॐ ह्रीं शुभाशुभभावरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शुद्धानंदस्वरूपोऽहम्।

(छंद-वीर)

पाप भाव तो सदा पाप है जान रहा सारा संसार ।
पुण्य भाव भी सदा पाप है विरला करता तत्त्व विचार ।।

अमर सुहागिन निज परिणति ही शाश्वत सौख्य प्रदायिनि है।
भोग जनित पर परिणति दुष्टा तो सदैव दुखदायिनि है।।
हित अनहित का जो विवेक करते वे ही होते सुखिया ।
जिन्हें विवेक नहीं निज पर का वे होते हैं दुखिया ।।
जो अनात्मा में रत रहते वे ही पाते हैं भवदुख ।
जो निजात्मा में रत रहते वे ही पाते हैं शिवसुख ।।
परम पारिणामिक स्वभाव अधिपति होकर भी पीड़ित है।
यह कैसा मिथ्यात्व भाव है जो अपने उर सीमित है।।
एक बार तो जिन स्वरूप सम निज छवि का चिन्तन कर ले।
सकल कर्म कालिमा निमिष में क्षय कर भव बंधन हर ले ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान् ।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।71 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(72)
पुण्य कर्म सोने की बेड़ी है :
जह लोहम्मिय णियड बुह तह सुण्णम्मिय जाणि।
जे सुहु असुह परिच्चयहिं ते वि हवंति हु णाणि ।।72 ।।

લોહબેડી બંધન કરે, સોનાની પણ તેમ;
જાણી શુભાશુભ દૂર કરે, તે જ જ્ઞાનીનો મર્મ. ૭૨.
अर्थ :- हे पंडित ! जैसे लोहे की सांकल को तू सांकल समझता है उसी तरह तू
सोने की सांकल को भी सांकल ही समझ । जो शुभ-अशुभ दोनों भावों का परित्याग
कर देते हैं, निश्चय से वे ही ज्ञानी होते हैं।

72. ॐ ह्रीं सुखदुःखविभावरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

नित्यानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

लोहे की बेड़ी जैसी ही सोने की बेड़ी मानो ।
त्यागो भाव शुभाशुभ इन दोनों में मत अंतर मानो ।।
निम्न दशा से उच्चदशा पा जो भी जन इतराते हैं।
उच्चदशा से गिर जाते हैं निम्न दशा फिर पाते हैं।।
उच्चदशा पायी है तो तुम शुद्ध दशा का यत्न करो।
शुद्ध दशा का यत्न किए बिन प्राणी अति दुख पाते हैं।।
पाप भाव से निम्न दशा है पुण्य भाव से उच्च दशा।
वीतराग भावों से शुद्ध दशा धारी तर जाते हैं ।।
परिणति जैसी होगी वैसा फल सदैव ही पाओगे।
निज परिणति ही सँभाल करने वाले शिवसुख पाते हैं।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।72 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 73 )
भाव निर्ग्रन्थ ही मोक्षमार्गी हैं :
जइया मणु णिग्गंथु जिय तइया तुहुँ णिग्गंथु ।
जइया तुहुँ णिग्गंथु जिय तो लब्भइ सिवपंथु । ।73 ।।
જો તુજ મન નિગ્રંથ છે તો તું છે નિગ્રંથ;
જ્યાં પામે નિગ્રંથતા, ત્યાં પામે શિવપંથ. ૭૩.
अर्थ :- हे जीव ! जब तेरा मन निर्ग्रन्थ हो गया तो तू भी निर्ग्रन्थ हो गया और जब
तू निर्ग्रन्थ हो गया तो उससे मोक्षमार्ग मिल जाता है।

73. ॐ ह्रीं मोहग्रन्थिरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्ग्रन्थोऽहम् ।

(छंद-वीर)

यदि निर्ग्रथ शुद्ध मन तेरा तब तू है सच्चा निर्ग्रथ।
मोक्षमार्ग जब पाया तूने तभी बना उत्तम निर्ग्रथ ।।
ज्ञाता-दृष्टा भाव तुम्हारा महामोक्ष सुख का दाता।
पाप-पुण्य का भाव तुम्हारा घोर कुगतियों का दाता ।।
एकमात्र ज्ञायक स्वभाव का आश्रय ही सुखकारी है।
अनात्मा का अवलंबन तो सदा सदा दुखकारी है।।
आत्मा की चर्चा करने वाले ही भव सागर तरते।
चर्चा से भी जिन्हें दुश्मनी वे न भवोदधि को तरते ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।73 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 74 )
देह में भगवान् होता है :
जं वडमज्झहँ बीउ फुडु बीयहं वडु वि हु जाणु।
तं देहउँ देउ वि मुणहि जो तइलोय-पहाणु ।।74 ।।

જેમ બીજમાં વડ પ્રગટ, વડમાં બીજ જણાય;
તેમ દેહમાં દેવ છે, જે ત્રિલોકપ્રધાન. ७४.
अर्थ :- जैसे बड़ के वृक्ष में बीज स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, वैसे ही बीज में भी
बड़ वृक्ष रहता है। इसी तरह देह में भी उस देवको विराजमान समझो, जो तीनों लोकों
में मुख्य है।

74. ॐ ह्रीं आत्मख्यातिरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः।

निजगुणमंदिरस्वरूपोऽहम्।

(छंद-वीर)

ज्यों वट में है बीज, बीज में वटतरु है यह करो विचार ।
त्यों निज आत्मा का अनुभव कर, तीन लोक में जो है सार ।।

अनुभव रस की गागर भरकर डालो निज परिणति में शीष ।
जब अभिषेक पूर्ण हो जाए उसे झुकाओ सादर शीष ।।
निज परिणति ही मुक्ति मार्ग पर हर्षित हो ले जाएगी।
शिवपथ में जितने विष कंटक होंगे उन्हें हटाएगी ।।
संयम की तरणी आयी है इस पर निःसंकोच चढ़ो।
यह तरणी अन्तर्मुहूर्त में तुम को पार लगाएगी।।
यथाख्यात् की वेला पायी केवलज्ञान स्वछवि दरसी ।
मुक्ति वधू स्वागत को आतुर सिद्ध शिला बिठलाएगी ।।
दशा शाश्वत् तब पाएंगे निज ध्रुव पर जब होगा लक्ष्य।
मनमोहक छवि निज परिणति की उनके मन को भाएगी ।।
जो है प्राप्त प्राप्ति उसकी होती है यह निश्चय जानो।
तन मंदिर में जो विराजता तन से भिन्न उसे जानो ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।74 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 75 )
"आप ही जिन है” यह अनुभव मोक्ष का उपाय है :
जो जिण सो हउँ सो जि हउ एहउ भाउ णिभंतु ।
मोक्खहँ कारण जोइया अण्णु ण तंतु ण मंतु ।।75 ।।

જે જિન તે હું, તે જ હું, કર અનુભવ નિર્ભ્રાન્ત;
હે યોગી! શિવહેતુ એ, અન્ય ન મંત્ર ન તંત્ર. ૭૫.
अर्थ :- जो जिनदेव हैं वह मैं हूँ, वही मैं हूँ-इसकी भ्रान्ति रहित होकर भावना
कर। हे योगिन् ! मोक्ष के कारण कोई अन्य मंत्र-तंत्र नहीं है।

75. ॐ ह्रीं निर्भान्तनिजदेवरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निःशड्कोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

भोले चेतन मत जाओ तुम पर तीर्थों की ओर कभी।
आत्म तीर्थ के दर्शन कर लो होकर हर्ष विभोर अभी ।।
चारों गतियों में भ्रम आए पल भर भी सुख नहीं मिला।
मिथ्याभ्रम में उलझ गए तुम प्रतिक्षण दुख पाए घनघोर ।।
अब तो चेतन निज को ध्याओ संयम की तरणी चढ़कर ।
निज से अपना परिचय कर लखो ज्ञान की उज्जवल भोर ।।
आत्म तीर्थ ही सर्वोत्तम है ज्ञान भाव ही परमोत्तम ।
गुण अनंत का यह समुद्रहै जिसका कोइ ओर न छोर ।।
जो जिनदेव वही तो मैं हूँ हो निर्भान्त भावना कर।
मोक्ष प्राप्ति में मंत्र तंत्र का कोई काम नहीं तिलभर ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण।।१।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 76 )
आत्मा के गुणों की भावना करे :
बे ते चउपंच वि णवह सत्तहँ छह पंचाहँ ।
चउगुण-सहियउ सो मुणह एयइँ लक्खण जाहँ ।।76।।

બે, ત્રણ, ચાર ને પાંચ, છ, સાત, પાંચ ને ચાર;
તવ ગુણયુત પરમાતમા, કર તું એ નિર્ધાર. ૭૬.
अर्थ :- दो, तीन, चार, पांच, नौ, सात, छह, पांच और चार गुण ये (परमात्मा
के) लक्षण समझने चाहिए।

76. ॐ ह्रीं अनंतगुणस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शाश्वत्ज्ञानमणिस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

निज आत्मा के द्वय त्रय चार पाँच सात नव छह अरु पाँच ।
तथा चार गुण जिसमें बसते वही आत्म लक्षण श्रुत वाँच ।।
स्थित प्रज्ञ जीव होता है तो विष अमृत बन जाता।
पर में स्थित होता है जो अमृत भी विष बन जाता ।।
पर समयी पर भव में जाता भ्रम-भ्रम भव दुख पाता है।
निज समयी स्व समय में रहकर शाश्वत शिव सुख पाता है।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।76 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 77 )
दो को छोड़कर दो गुण विचारे :
बे छंडिवि बे-गुण-सहिउ जो अप्पाणि वसेइ ।
जिणु सामिउ एमइँ भणइ लहु णिव्वाणु लहेइ ।।77 ।।

બે ત્યાગી બે ગુણ સહિત, જે આતમ રસલીન;
શીઘ્ર લહે નિર્વાણપદ, એમ કહે પ્રભુ જિન. ૭૭.
अर्थ :- जो दो (राग-द्वेष) का परित्याग कर, दो गुणों (सम्यग्ज्ञान-दर्शन) से
युक्त होकर आत्मा में निवास करता है, वह शीघ्र ही निर्वाण पाता है, ऐसा जिनेन्द्रभगवान्
ने कहा है।

77. ॐ ह्रीं ज्ञानदर्शनयुक्तनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अनंतदर्शनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

राग-द्वेष द्वय तज द्वय गुण युत दर्शन ज्ञान आत्म में बस ।
शीघ्र स्वपद निर्वाण प्राप्त करता है जिनवर कथन सरस ।।

मुनि बनने के पहिले मिथ्या भ्रम तम अविरति नाशकरो ।
प्रमाद नाशो तीन चौकड़ी हरो मुनित्व प्रकाश करो ।।
भवपथ शिवपथ खुले हुए हैं जैसा अच्छा लगे करो।
यदि कल्याण चाहते हो तो शिवपथ पर ही चरण धरो ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।77 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 78 )
तीन को छोड़कर तीन गुण विचारे :
तिहिं रहियउ तिहिं गुण सहिउ जो अप्पाणि वसेइ ।
सो सासय-सुह-भायणु वि जिणवरु एम भणेइ ।।78 ।।

ત્રણ રહિત ત્રણ ગુણ સહિત, નિજમાં કરે નિવાસ;
શાશ્વત સુખના પાત્ર તે, જિનવર કરે પ્રકાશ. ૭૮.
अर्थ :- जो तीन से (राग द्वेष मोह) रहित होकर तीन गुणों से (सम्यग्दर्शन ज्ञान
चारित्र) युक्त होता हुआ आत्मा में निवास करता है, वह शाश्वत सुख का पात्र होता है,
ऐसा जिनदेव ने कहा है।

78. ॐ ह्रीं अभेदगुणस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्भेदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

राग-द्वेष-मोह त्रय वर्जित दर्शन ज्ञान चारित्र सहित।
जो आत्मा में निवास करता वह पाता शिव सौख्य अमित ।।
स्वर्गों के गलियारों में भी क्षुधा दहकती रहती है।
कामबाण से देवों की भी बुद्धि बहकती रहती है।।
पर शुद्धोपयोग धारी को यह पीड़ा न सताती है।
उसकी परिणति निज स्वभाव में सदा चहकती रहती है।।

नर पशु गति में क्षुधा व्याधि की पीर सताती है दिनरात ।
प्रतिपल प्रतिक्षण इसी व्यथा से देह कसकती रहती है।।
जब स्वभाव में चेतन जगता भोर तभी हो जाती है।
बिन स्वभाव दर्शन विभाव मति सबको ठगती रहती है।।
शुद्ध बुद्ध चैतन्य ज्ञानघन स्वयं ज्योति सुखधाम स्वरूप ।
स्वयं स्वयं का गुरु है जानो प्रगटाओ निज आत्म अनूप ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।78 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 79 )
चार को छोड़कर चार गुण विचार :
चउ-कसाय-सण्णा-रहिउ, चउ-गुण सहियउ वुत्तु ।
सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ, जिम परु होहि पवित्तु ।।79 ।।

કષાય સંજ્ઞા ચાર વિણ, જે ગુણ ચાર સહિત;
હે જીવ! નિજરૂપ જાણે એ, થઈશ તું પરમ પવિત્ર. ૭૯.
अर्थ :- हे जीव ! जो चार कषायों संज्ञा से रहित होकर चार गुणों से (अनन्त दर्शन,
ज्ञान सुख, वीर्य) सहित होता है, उसे तू आत्मा समझ जिससे तू परम पवित्र हो सके।

79. ॐ ह्रीं आहारादिसंज्ञारहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अनशनस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

चार कषायों चारों संज्ञा रहित चार गुण युत आत्मा ।
उसको ही परमात्मा जानो परम पवित्र शुद्ध आत्मा ।।
द्रव्यलिंग तो भावलिंग के बिना सदैव अधूरा है।
सच्चा द्रव्य लिंग हो तो वह स्वर्गादिक की धूरा है ।।

अट्ठाईस मूलगुण में भी अगर एक गुण भी कम है।
मात्र नाम है द्रव्यलिंग का वह तो कचरा कूरा है।।
द्रव्यलिंग का यत्न छोड़कर भावलिंग पुरुषार्थ करो।
भावलिंग होते ही होता द्रव्यलिंग भी शूरा है ।।
इन दोनों के होने पर होता है आस्रव भाव अनाथ।
संवर सहित निर्जरा से होता कर्मों का चूरा है।।
भ्रम का कूप मोह को जानो शुद्ध चेतना सिंधु स्वरूप ।
ऐसी दृष्टि बने तो समझो सम्यक् दृष्टि हुई अनुरूप ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।79 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 80 )
पाँच के जोड़ों से रहित व दश गुण सहित आत्मा को ध्यावें :
बे-पंचहं रहियउ मुणहि बे-पंचहं संजुत्तु ।
बे-पंचहं जो गुणसहिउ सो अप्पा णिरु वुत्तु ।।80 ।।

દશ વિરહિત, દશથી સહિત, દશ ગુણથી સંયુક્ત;
નિશ્ચયથી જીવ જાણવો, એમ કહે જિનભૂપ. ૮૦.
अर्थ :- जो दस से रहित, दस से सहित और दस गुणों से सहित है, उसे निश्चय
से आत्मा कहा है।

80. ॐ ह्रीं पन्चेन्द्रियादिव्यापाररहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अत्यानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

पंच इन्द्रियवश पंच अव्रत तज पांचों संयम पांचों व्रत।
दशगुण क्षमा आदि ज्ञानादिक सद गुण सहित आत्म हो रत।।

सदाचार की परंपरा का पालन है श्रावक का धर्म।
श्रावक धर्म भूमिका पर ही आधारित है मुनि का धर्म ।।
अहिंसादि पांचों व्रत के तो सर्व देश पालक मुनिराज ।
ईर्या आदि समितियाँ पाँचों को धारण करते ऋषिराज ।।
मन-वच-काय त्रिगुप्ति त्रयोदश विधि चारित्र सुपालक हों।
अट्ठाईस मूल गुण पूरे बाह्य क्रिया के सम्यक् हों ।।
तब मुनि पद शोभा पाता है प्रतिपल होता है शुभकर्म ।
किन्तु मुनीश्वर निज स्वभाव में रत हो पाते सम्यक् धर्म ।।
शुद्धि वृद्धि होती है प्रतिक्षण अन्तर्मन निर्मल करते।
शुद्ध भावना बढ़ती जाती बाह्यान्तर उज्जवल करते ।।
मोक्षमार्ग तो भावलिंग से ही शोभित होता जानो ।
भावलिंग बिन मुक्ति मार्ग की महिमा कभी नहीं मानो ।।
यही धर्म शिव सुखदायक है शेष कर्म है सर्व अधर्म ।
अतः अधर्म मार्ग को तज दे पालन कर अपना सद्धर्म ।।
आत्म भ्रान्ति सम रोग नहीं है वैद्य न सदगुरु सम है कोय।
गुरुआज्ञा सम पथ्य नहीं है ध्यानौषधि बिन स्वस्थ न कोय ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान् ।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।80 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 81 )
आत्मरमण में तप-त्यागादि सब कुछ है :
अप्पा दंसणु णाणु मुणि, अप्पा चरणु वियाणि ।
अप्पा संजमु सील तउ अप्पा पच्चक्खाणि ।।81 ।।

આત્મા દર્શન-જ્ઞાન છે, આત્મા ચારિત્ર જાણ;
આત્મા સંયમ-શીલ તપ, આત્મા પ્રત્યાખ્યાન. ૮૧.

अर्थ :- आत्मा को ही दर्शन और ज्ञान समझो, आत्मा ही चारित्र है, और संयम,
शील, तप और प्रत्याख्यान भी आत्मा को ही मानो।

81. ॐ ह्रीं चिन्मयरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अनंतगुणार्णवस्वरूपोऽहम्।

(छंद-ताटंक)

आत्मा ही सम्यग्दर्शन है ज्ञान चारित्र यही आत्मा।
संयम शील तथा तप आत्मा प्रत्याख्यान यही आत्मा ।।
समिति गुप्ति बिन महाव्रतों की महिमा रहती सदा अपूर्ण ।
छठा सातवाँ अगर न झूला हो तो फिर है दुख सम्पूर्ण ।।
श्रेणी अगर न चढ़ पाएँ तो अप्रमत्त तो हों मुनिराज ।
सर्वदेश संयमी साधु ही पा लेते हैं निज पदराज ।।
जिनमुनि पद बिन कभी न होते क्षय सम्पूर्णतया वसु कर्म।
जिन आगम अनुसार सदा ही पालन करना निज मुनि धर्म ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।। 81 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 82 )
परभावों का त्याग ही सन्यास है :
जो परियाणइ अप्प परु, सो परु चयइ णिभंतु ।
सो सण्णासु मुणेहि तुहुँ, केवल-णाणिं उत्तु ।।82 ।।

જે જાણે નિજ આત્માને, પર ત્યાગે નિર્ભ્રાન્ત;
તે જ ખરો સંન્યાસ છે, ભાખે શ્રી જિનનાથ. ૮૨.
अर्थ :- जो निज को और पर को जान लेता है वह भ्रान्ति रहित होकर पर का
त्याग कर देता है। हे जीव ! तू उसे ही सन्यास समझ-ऐसा केवलज्ञानी ने कहा है।

82. ॐ ह्रीं ज्ञानार्णवरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

आनंदामृतस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जो भी निज अरु पर को जाने बिना भ्रान्ति दे पर को त्याग।
जिनवर कहते उसको ही सन्यास जान, जान तू त्याग ।।
चेतन ने निज अगड़ाई ले भ्रम की अंधियारी खोई ।
मिथ्यातम की सकल कलुषता पलभर में पूरी धोई ।।
स्वपर भेद विज्ञान पूर्वक दृष्टित हुआ ज्ञान दर्शन ।
सम्यग्दर्शन आया लखकर चेतन का निर्णय पावन ।।
जागी है चारित्र शक्ति निज पायी अनुभव अरुणायी।
चेतन के स्वभाव में आयी देखो निर्मल तरुणायी ।।
संसारिक वासनामयी संध्या भी अब तो बीत गई ।
संयम का गलियारा पाकर शुद्ध आत्मा जीत गई ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।82 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 83 )
रत्नत्रय धर्म ही उत्तम तीर्थ है :
रयणत्तय-संजुत्त जिउ, उत्तिमु तित्थु पवित्तु ।
मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु ण तंतु ण मंतु ।।83 ।।

રત્નત્રયયુત જીવ જે, ઉત્તમ તીર્થ પવિત્ર;
હે યોગી! શિવહેતુ એ, અન્ય ન તંત્ર ન મંત્ર. ૮૩.
अर्थ :- हे योगिन् ! रत्नत्रययुक्त जीव ही उत्तम पवित्र तीर्थ है और वही मोक्ष का
कारण है। अन्य कुछ मन्त्र तंत्र मोक्ष का कारण नहीं।

83. ॐ ह्रीं शुचिरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

विमलानंदस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

रत्नत्रय से मुक्त आत्मा पावन तीर्थ मानो ।
नहीं मोक्ष का कारण कोई मंत्र तंत्र है पहचानो ।।
जब तक है पर्याय दृष्टि तब तक ही है यह बहिरात्मा।
द्रव्य दृष्टि बनते ही यह हो जाता है अंतर आत्मा ।।
अंतरात्मा घातिकर्म क्षय कर हो जाता परमात्मा ।
फिर अघातिया भी क्षय करके हो जाता है सिद्धात्मा ।।
नित्य निरंजन गुण अनंतपति शुद्ध बुद्ध शिव परमात्मा ।
दोष अठारह रहित कर्म से विरहित है यह शुद्धात्मा ।।
चिदानंद चैतन्य ज्ञानघन परम पूज्य है परमात्मा।
सर्वश्रेष्ठ आनंद घन स्वयं शुद्ध त्रिकाली ज्ञानात्मा।।
ऐसे परमात्मा का पूजन वंदन है कल्याणमयी ।
त्रिविध व्याधि हरने में सक्षम हो जाऊँ मैं ज्ञानमयी ।।
अजर अमर अविकल अविनाशी परम पूज्य शिव परमात्मा।
पद अरहंत प्रगट करके प्रभु आप हुए हैं परमात्मा ।।
अनुभव चिन्तामणि सम जानो अनुभव ही सुख सागर जान।
अनुभव मोक्षमार्ग है मानो अनुभव मोक्ष स्वरूप पिछान।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।83 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रूफरीडिंग बाकी है

( 84 )
रत्नत्रय का स्वरूप :
दंसणु जं पिच्छियइ बुह, अप्पा विमल महंतु ।
पुणु पुणु अप्पा भावियए, सो चारित्त पवित्तु ।।84।।

દર્શન જે નિજ દેખવું, જ્ઞાન જે વિમળ મહાન;
ફરી ફરી આતમભાવના, તે ચારિત્ર પ્રમાણ. ૮૪.
अर्थ :- जिसके द्वारा देखा जाता है वह दर्शन है, जो निर्मल महान् आत्मा है वह
ज्ञान है, तथा आत्मा की जो पुनः पुनः भावना की जाती है वह पवित्र चारित्र है।

84. ॐ ह्रीं महान्चिद्रूपनिर्योगस्वरूपाय नमः।

बोधामृतस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

आत्मा की श्रद्धा दर्शन है उसे जानना सम्यक् ज्ञान।
सतत् भावना उसकी भाना ही तो है चारित्र महान्।।
आत्म ज्ञान की क्रीड़ाएँ हैं एकमात्र शिवसुख दाता।
भव पीड़ाएँ क्षय हो जाती दुख का अंत स्वतः आता।।
आतुर पुण्य चरण धोने को किन्तु नहीं रुकता ज्ञानी।
पुण्य भाव को सदा हेय समझा है चेतन विज्ञानी ।।
पापों का तो अणु अणु आज अदृश्य हुआ है हो भयभीत।
शुद्ध भाव से सहज हो गया अपना चेतन पुण्यातीत ।।
पुण्य भाव के क्षणिक सरोवर में करता है नहीं न्हवन।
निज अनुभव रस पीते पीते पा लेता है मुक्ति सदन ।।
आत्म स्वभाव अकर्त्ता और अभोक्ता है यह तुम जानो।
पर का कर्त्ता भोक्ता इसको कभी भूलकर मत मानो ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।84 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

88] [ श्री योगसार महामण्डल विधान

( 85 )

आत्मानुभव में सब गुण है :
जहिं अप्पा तहिं सयल-गुण, केवलि एम भणंति।
तिहिं कारणएँ जोइ फुडु, अप्पा विमलु मुणंति । ।85 ।।
જ્યાં ચેતન ત્યાં સકળ ગુણ, કેવળી એમ વદંત;
તેથી યોગી નિશ્ચયે, શુદ્ધાત્મા જાણંત. ૮૫.
अर्थ :- जहाँ आत्मा है समस्त गुण हैं-ऐसा केवलियों ने कहा है। इसलिए योगी
लोग निश्चय से निर्मल आत्मा को पहिचानते हैं।

85. ॐ ह्रीं चिदन्वयरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

सहजामलस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जहाँ सर्वगुण वहाँ आत्मा कहते हैं केवली महान्।
इसीलिए योगीजन ध्याते सदा आत्मा का ही ध्यान ।।
निज चैतन्य संपदा तेरे भीतर भरी हुई आपूर्ण।
परम ब्रह्म अपने स्वरूप का ही अनुभव करले तू पूर्ण ।।
असंयमित जीवन जीने से कर्म बंध बढ़ता ही है।
भव ज्वर का आताप आत्मा के ऊपर चढ़ता ही है।।
जो संयमित जीव होते हैं वे ही कर्म बंध हरते।
निज में ही मर्यादित रहकर निज का ही अनुभव करते ।।
अनियंत्रित मत रहो नियंत्रित रहकर दृढ़ संयम पालो ।
सदा संयमित जीवन में रह निज को ही देखो भालो ।।
यदि प्रवृत्ति स्वच्छंद रही तो उपल नाव सम डूबोगे।
पंच परावर्तन कुचक्र से कभी नहीं तुम ऊबोगे ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।85 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 86 )
एक आत्मा का ही मनन कर :
एक्कलउ इन्द्रिय-रहियउ, मण-वय-काय-ति-सुद्धि ।
अप्पा अप्पु मुणेहि तुहुँ, लहु पावहि सिव-सिद्धि ।।86 ।।

એકાકી, ઈન્દ્રિયરહિત, કરી યોગત્રય શુદ્ધ;
નિજ આત્માને જાણીને, શીઘ્ર લહો શિવસુખ. ૮૬.
अर्थ :- हे आत्मन् ! तू एकाकी, इन्द्रियरहित और मन, वचन, काय की शुद्धि से
आत्मा को जान, उससे तू शीघ्र ही मोक्ष सिद्धि को प्राप्त करेगा।

86. ॐ ह्रीं मनोवाक्कायरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्दण्डोऽहम् ।

(छंद-वीर)

परभावों से शून्य बनो तुम निजभावों से हो परिपूर्ण।
निज में ही अंतस्थ रहो तुम पियो सौख्य सागर आपूर्ण ।।
किसी विवशता में मत फँसना निज के ही गाना ध्रुव छंद ।
निमिष मात्र में द्वंद्व बंद कर हो जाओ पूरे निर्द्वद ।।
राग-द्वेष की विभीषिका फिर कभी न आने पाएगी।
निर्मल बुद्धिमान् चेतन की स्वगति न रुकने पाएगी ।।
पाँचों-इन्द्रिय मन-वच-काया से हो शुद्ध बनो निर्ग्रथ ।
एकाकी हो निज आत्मा को जान सिद्ध होलो भगवंत ।।
निश्चय धर्म आत्मा जानो अरु व्यवहार धर्म है पुण्य।
विघ्न ज्ञानधारा में करती सदा कर्मधारा परजन्य ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।86 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 87 )

सहज स्वरूप में रमण कर :
जइ बद्धउ मुक्कउ मुणहि, तो बंधियहिं णिभंतु ।
सहज-सरूवइ जइ रमहि, तो पावहि सिव सन्तु ।।87 ।।

બંધ મોક્ષના પક્ષથી, નિશ્ચય તું બંધાય;
સહજસ્વરૂપે જો રમે, તો શિવસુખરૂપ થાય. ૮૭.
अर्थ :- यदि तू बद्ध को मुक्त समझेगा तो निश्चय से तू बंधेगा तथा यदि तू
सहजस्वरूप में रमण करेगा तो शान्त निर्वाण को पावेगा।
87. ॐ हीं कर्मबन्धरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।
प्रशान्तस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

छोड़ पलायनवाद ऊर्जा रूपांतरित करो अपनी ।
मत मानो तुम परमात्मा को मानो परमात्मा की कथनी ।।
जो अवाध उपलब्ध उसे ही जानो जीवन में पर्याप्त।
लेकिन मान प्रतिष्ठा लोभादिक उर में हो कभी न व्याप्त ।।
ध्यानाकाश मध्य उड़ने की शक्ति स्वतः प्रगटाएगी।
कर्म बंध की सकल श्रृंखला अपना बल विघटाएगी ।।
बंध मोक्ष कल्पना करेगा तो निश्चित ही होगा बंध।
सहज स्वरूप आचरण हो तो शान्त स्वरूप मिले निर्बंध ।।
परमपारिणामिक स्वभाव बल शक्ति रूप है तेरे पास ।
हो एकाग्र अनंत शक्तियों का निज में कर अभी विकास ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।87 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 88 )
सम्यग्दृष्टि सुगति पाता है :
सम्माइट्ठी-जीवडहँ, दुग्गइ-गमणु ण होइ ।
जइ जाइ वि तो दोसु णवि, पुव्व-क्किउ खवणेइ ।। 88 ।।

સમ્યદૃષ્ટિ જીવને, દુર્ગતિ ગમન ન થાય;
કદી જાય તો દોષ નહિ, પૂર્વ કર્મ ક્ષય થાય. ૮૮.
अर्थ :- सम्यग्दृष्टि जीव कुगतियों में नहीं जाता है। यदि कदाचित् वह जाता भी
है तो इसमें सम्यक्त्व का दोष नहीं। इससे वह पूर्वकृत कर्म का ही क्षय करता है।

88. ॐ ह्रीं दुर्गतिगमनरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

नित्योऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

सम्यक्दृष्टि जीव कभी भी दुर्गति गमन न करता है।
यदि जाए तो दोष पूर्व का उसको भी क्षय करता है ।।
आत्म ज्ञान की वैज्ञानिकता हस्तांतरित नहीं होती।
राग गंध की मादकता तो कभी विकार नहीं खोती ।।
यह विभाव आधारित जीवन भी क्या कोई जीवन है।
कर्म श्रृंखलाओं में उलझा जड़ जैसा चेतन मन है ।।
वे न शान्ति पाएँगें जिनकी निज ऊर्जा सो जाएगी।
भवसागर दुख से निजात्मा मुक्त नहीं हो पाएगी ।।
सम्यक्दृष्टि प्रताप वंत है तथा अखंडित विद्यावंत ।
है यशवंत शुद्धि की करता वृद्धि सदा ही महिमावंत ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।। 88 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

92] [ श्री योगसार महामण्डल विधान
( 89 )
सम्यग्दृष्टि का श्रेष्ठ कर्त्तव्य :
अप्प-सरूवहँ जो रमइ, छंडिवि सहु ववहारु ।
सो सम्माइट्ठी हवइ, लहु पावइ भवपारु ।।89।।

આત્મસ્વરૂપે જે રમે, તજી સકળ વ્યવહાર;
સમ્યદૃષ્ટિ જીવ તે, શીઘ્ર કરે ભવપાર. ૮૯.
अर्थ :- जो सर्व व्यवहार को छोड़कर आत्मस्वरूप में रमण करता है, वह
सम्यग्दृष्टि जीव है और वह शीघ्र ही संसार से पार हो जाता है।

89. ॐ ह्रीं निजज्ञानानंदरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

विष्णुस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

तज व्यवहार सर्व आत्मा के स्वरूप में जो रमण करे।
वह है सम्यदृष्टि शीघ्र ही सिद्धपुरी में गमन करें ।।
ज्ञानपरिधि में रहने वाले आत्मा की निधि पाते हैं।
गुण समुद्रके अनंत मोती वे बटोरकर लाते हैं ।।
आत्म छोर माना है तो पहिले साक्षी बनना होगा।
ज्ञाता-दृष्टा बन परभावों से तुमको तनना होगा।।
हुआ प्रभावित नहीं किसी से ऐसा ज्ञान आश्रय लो।
अद्वितीय हो खोज तुम्हारी पलभर नहीं पराश्रय लो।।
अस्ताचल की ओर चले तो क्या उदयांचल पाओगे।
पश्चिम दिशा ओर जाने पर पूर्व दिशा क्या जाओगे ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।89।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 90 )
सम्यक्त्वी ही पंडित और प्रधान है :
जो सम्मत्त-पहाण बुहु सो तइलोय-पहाणु ।
केवल णाण वि लहु लहइ, सासय-सुक्ख-णिहाणु ।।90 ।।

જે સમ્યક્ત્વપ્રધાન બુધ, તે જ ત્રિલોકપ્રધાન;
પામે કેવળજ્ઞાન ઝટ, શાશ્વત સૌખ્યનિધાન. ૯૦.
अर्थ :- जिसके सम्यक्त्व प्राधान्य है वही पंडित है और त्रिलोक में प्रधान है।
वह जीव शाश्वत सुख के निधान केवलज्ञान को भी शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।

90. ॐ ह्रीं अक्षयसौख्यार्णवरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अक्षयचित्स्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जो सम्यग्दर्शन का स्वामी तीन लोक में वही प्रधान।
वह पंडित सुख निधि पाता है वह पाता है केवलज्ञान ।।
शुद्ध भाव अभिव्यक्ति तुम्हारी अनुभव से प्रगटित होगी।
सकल कलुषता भव विभ्रम की पल में ही विघटित होगी ।।
अनायास शिवमार्ग मिलेगा अनायास शिवतट पावन।
ध्यानाकाश मध्य विचरण करते ही होगा शिव उपवन ।।
जड़ पुद्गल की नाव पार जाते ही त्वरित छोड़ देना।
निज निश्चय भूतार्थ प्राप्त होते ही दृष्टि मोड़ देना ।।
जो न मानसिक अस्वस्थ होते वही स्वस्थ हो जाते हैं।
पूर्ण स्वस्थ बन आत्मस्थ हो अपना पद प्रगटाते हैं।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।90 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 91 )

आत्मा में स्थिरता संवर व निर्जरा का कारण है :
अजरु अमरु गुण-गण-णिलउ, जहिं अप्पा थिरु ठाइ ।
सो कम्मेहिं ण बंधियउ, संचिय-पुव्व विलाइ ।।91।।

અજર, અમર, બહુ ગુણનિધિ, નિજરૂપે સ્થિર થાય;
કર્મબંધ તે નવ કરે, પૂર્વબદ્ધ ક્ષય થાય. ૯૧.
अर्थ :- जहाँ अजर-अमर तथा गुणों की आगारभूत आत्मा स्थिर हो जाती है, वहाँ
जीव कर्मों से बद्ध नहीं होता, वहाँ पूर्व में संचित किए हुए कर्मों का ही नाश होता है।

91. ॐ ह्रीं अजरामररूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

चैतन्यामृतस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जब जब ज्वार उठें विभाव के तुम उनको बह जाने दो।
उनके पीछे जो निज भाव आ रहा उसको आने दो।।
मानव धर्म मानते सब ही निज निज आस्था के अनुसार।
किन्तु धर्म की नहीं मानते कोई देखो आँख पसार।।
अतः पंच परावर्तन की माया नाश न हो पाएगी।
निजता से जीवन जीने की कला न तब तक आएगी।।
भाव पराश्रय बंध भाव है स्वाश्रय भाव सदा निर्बंध ।
तीन काल तीनों लोकों में यही भाव ही है निर्बंध ।।
अजर अमर गुण निलय आत्म में थिर हो तो फिर बंध नहीं।
संचित कर्मपूर्व क्षय करता, करता नूतन बंध नहीं।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।91।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्री योगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 92 )
आत्म-रमी जीव कर्मों से नहीं बंधता :
जह सलिलेण ण लिप्पियइ कमलणि-पत्त कया वि।
तह कम्मेहिं ण लिप्पियइ जइ रइ अप्प-सहावि ।।92 ।।

પંકજ જ્યમ પાણી થકી, કદાપિ નહીં લેપાય;
લિપ્ત ન થાયે કર્મથી, જે લીન આત્મસ્વભાવ. ૯૨.
अर्थ :- जिस तरह कमलिनी का पत्र कभी भी जल से लिप्त नहीं होता, उसी
तरह यदि आत्म स्वभाव में रति हो, तो जीव कर्मों से लिप्त नहीं होता।

92. ॐ ह्रीं निर्लिप्तरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अलिप्तस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जैसे जल से लिप्त कमलिनी पत्र नहीं होता चेतन।
त्यों स्वभाव रत लिप्त कर्म मल से न कभी होता चेतन ।।
पर भावों का कूड़ा कचरा कब तक अरे संजोओगे।
शुद्ध ज्ञान का दीप शाश्वत बोलो कब तक जोओगे ।।
यह भव विभ्रम तो अनादि से संग रहा है सदा निकृष्ट ।
इसे क्षय किए बिना न कोई प्राणी पाता मार्ग प्रकृष्ट ।।
जीवन ज्योति जलाओ उर में जो भव भ्रान्ति जलाएगी।
विगत मान्यताओं की उलझन पलभर में उड़ जाएगी ।।
मोह नींद पर राग द्वेष के महल बनाए बहुतेरे ।
क्रोधमान मायादि लोभ के द्वारा सजाए बहुतेरे ।।
जप तप व्रत संयम को आने देता कभी न अविरत भाव।
मिथ्यादर्शन द्वारे बैठा घात रहा है आत्म स्वभाव ।।
भेदज्ञान की दामिनि जब जब गड़गड़ाट करती नभ में।
तब तक चमक-चमक उजियारा भरती है अंतर्मन में ।।

अल्पावधि के इस प्रकाश में जब चेतन जग जाता है।
तब इसका मिथ्यात्व मोह पूरा पूरा भग जाता है।।
उपशम भाव भूमिका में सम्यक्त्व भाव प्रगटित होता।
दर्शन मोह दुष्ट तत्क्षण ही चुपके से विघटित होता ।।
फिर संयम की पवन प्राप्त कर जीव संयमित होता है।
सहज स्वरूपाचरण प्राप्त कर चेतन पुलकित होता है।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।92 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 93 )
समसुख भोगी निर्वाण का पात्र हैः
जो सम-सुक्ख-णिलीणु बुहु पुण पुण अप्पु मुणेइ ।
कम्मक्खउ करि सो वि फुडु लहु णिव्वाणु लहेइ ।।93 ।।

શમ-સુખમાં લીન જે કરે ફરી ફરી નિજ અભ્યાસ;
કર્મ ક્ષય નિશ્ચય કરી, શીઘ્ર લહે શિવવાસ. ૯૩.
अर्थ :- जो सम और सुख में लीन हुआ पंडित बार-बार आत्मा को जानता है,
वह निश्चय ही कर्मों का क्षयकर शीघ्र ही निर्वाण पाता है।

93. ॐ ह्रीं ज्ञानशमरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

समतास्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

समतालीन जीव आत्मा का बारबार अनुभव करता।
वह निर्वाण स्वपद को पाता कर्मों का भी क्षय करता ।।
रागों का उत्पाद अगर कुछ उपशम हो तो करो विचार ।
मैं हूँ कौन कहाँ से आया यह चिन्तन हो बारंबार ।।

मंद कषाय भाव में ऐसे प्रश्नोत्तर करते रहना।
जितनी जितनी विशुद्धि वृद्धिंगत हो उसके संग बहना ।।
कर्मोदय में साता और असाता के दृष्टा रहना।
मौन हृदय से ज्ञाता बनना नहीं किसी से कुछ कहना ।।
इसी सुविधि से तुम पाओगे एक दिवस सुख अपरंपार ।
रागों का उत्पाद अगर उपशम हो तो यह करो विचार ।।
“दंसण मूलो धम्मो” जानो द्रव्यदृष्टि वह सम्यक् दृष्टि ।
दर्शन शुद्धि आत्म सिद्धि है लक्ष्य पूर्णता का सुख सृष्टि ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।93 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 94 )
आत्मा को पुरुषाकार ध्यावे :
पुरिसायार-पमाणु जिय अप्पा एहु पवित्तु ।
जो इज्जइ गुण-गण-णिलउ णिम्मल-तेय-फुरंतु ।।94 ।।

પુરુષાકાર પવિત્ર અતિ, દેખો આતમરામ;
નિર્મળ તેજોમય અને, અનંત ગુણગણધામ. ૯૪.
अर्थ :- हे जीव ! पुरुषाकार यह आत्मा पवित्र है, यह गुणों की राशि है और यह
निर्मल तेज को स्फुरित करती हुई दिखाई देती है।

94. ॐ ह्रीं परमपूतरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निजगुणगणस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

शुभ या अशुभ भाव के प्राणायाम तुम्हारे दुश्मन हैं।
कभी नर्क के कभी स्वर्ग के दिग्दर्शक हैं बंधन हैं ।।

जब तक उर समभाव न होगा तब तक दुख का अंत नहीं।
बिन श्रद्धा कोई भी होता मुक्ति वधू का कंत नहीं ।।
ज्ञान सिन्धु का बिन्दु नहीं पी सकते तो तुम को धिक्कार ।
वर्त्तमान पर्याय तुम्हारी होने वाली है बेकार ।।
सम्यक् दृष्टि चण्डाल भी देवों से पूजा जाता।
अल्पकाल में धारण कर चारित्र मोक्ष पद को पाता ।।
पुरुषाकार प्रमाण आत्मा गुणगण निलय पवित्र महान्।
निर्मल तेजोस्फुरित देख ले जीव यही है प्रकाशमान ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।94 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 95 )
आत्मज्ञानी ही सब शास्त्रों का ज्ञाता है :
जो अप्पा सुद्ध वि मुणइ, असुइ-सरीर-विभिण्णु ।
सो जाणइ सत्थहँ सयल, सासय-सुक्खहँ लीणु । ।95 ।।
જે જાણે શુદ્ધાત્મને, અશુચિ દેહથી ભિન્ન;
તે જ્ઞાતા સૌ શાસ્ત્રનો, શાશ્વત સુખમાં લીન. ૯૫.
अर्थ :- जो शुद्ध आत्मा को अशुचि शरीर से भिन्न समझता है, वह शाश्वतसुख
में लीन होकर समस्त शास्त्रों को जान जाता है।

95. ॐ ह्रीं सनातनशुद्धरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

टंकोत्कीर्णस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

अशुचि देह से भिन्न आत्मा जो अपनी लेता है जान।
वह अविनाशी सुख में लय हो करता सकल जिनागम ज्ञान ।।

समकित पाने का ही श्रम सर्वोत्तम सर्व श्रेष्ठ जानो ।
इस श्रम के बिन कोटि कोटि मानव भव अरे नेष्ठ मानो ।।
स्वपर विवेक न जगा निजंतर जो पशु सम खोयी पर्याय ।
इधर उधर भटके जीवन भर भ्रम अज्ञान रहा दुखदाय ।।
अब तो अपना विरद निहारो निज स्वरूप को करो जुहार।
अब तो परभावों को तज जाग्रत होकर लो आत्म विचार ।।
भव जंजाल जीतना है तो शुद्ध भाव के लो निज शस्त्र ।
युद्ध स्थल में चलो सजग हो पहनो निज परिणति के वस्त्र ।।
ये ही वस्त्र राग रक्षक हैं ये ही मोह शत्रु रक्षक ।
पर विभाव सारे अब छोड़ों ये सारे स्वभाव भक्षक ।।
आत्म ध्यान से चलित न होना यही ध्यान उत्तम सम्यक् ।
यदि चूके तो भव अटवी में डस लेगें संशय तक्षक ।।
अनुभव रस तूणीर ज्ञान लो धनुष ध्यान ले बनो सशस्त्र ।
भव जंजाल जीतना है तो शुद्ध भाव के लो निज शस्त्र ।।
मोह धराशायी करने को उसका राग पुत्र मारो।
शुक्ल ध्यान से उसका मस्तक निर्मम होकर संहारो ।।
ज्ञानावरण दर्शनावरणी अंतराय भी क्षय होंगे ।
आत्मज्ञान की विजय पताका जय कारों द्वारा धारो ।।
अब न जरूरत रही ध्यान की जप तप व्रत के फेंको अस्त्र ।
भव जंजाल जीतना है तो शुद्ध भाव के लो निजशस्त्र ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।95 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 96 )
परभाव का त्याग कार्यकारी है :
जो णवि जाणइ अप्पु परु णवि परभाउ चएइ ।
सो जाणउ सत्थइँ सयल ण हु सिवसुक्खु लहेइ ।।96 ।।

નિજ-પરરૂપથી અન્ન જન, જે ન તજે પરભાવ;
જાણે કદી સૌ શાસ્ત્ર પણ, થાય ન શિવપુર રાવ. ૯૬.
अर्थ :- जो न तो परमात्मा को जानता है और न परभाव का त्याग ही करता है,
वह भले ही समस्त शास्त्रों को जान जाय, परन्तु वह मोक्ष सुख को प्राप्त नहीं करता।।

96. ॐ ह्रीं परमात्मस्वरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

नित्यसौख्यस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

स्वपर भेद जो नहीं जानता नहीं त्यागता है परभाव।
ज्ञान सकल श्रुत का करके भी करता निज शिव सौख्य अभाव ।।
दोष नहीं जन्मांध जीव को क्योंकि देखने में असमर्थ ।
पर यह मिथ्यादृष्टि जानकर भी करता है अर्थ अनर्थ ।।
पर परिणति की नियत डोलती तो चेतन घबराता है।
निज परिणति निजभाव तोलती तो कुछ साता पाता है।।
खरा उतरता है काँटे पर तभी भाव बढ़ जाता है।
फिर तो चेतन निज स्वभाव की शुद्ध तुला चढ़ जाता है।।
परभावों के बंधन तज निज भावों में जुड़ जाता है।
औदारिक आदिक पाँचों तन तत्क्षण पूर्ण मिटाता है।।
तभी सिद्धपुर इसको मिलता तीन लोक हर्षाता है।
शत-शत इन्द्रवंदना करते त्रिभुवन गाथा गाता है।।
लोकालोक प्रकाशक निज पर ज्ञायक जग विख्यात है।
सिद्धचक्र से सर्वाधिक है केवल दृष्टा ज्ञाता है ।।

योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।96 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 97 )
परमसमाधि शिवसुख का कारण है :
वज्जिय सयल-णियप्पइँ, परम-समाहि लहंति ।
जं विंदहिं साणंदु क वि सो सिव-सुक्ख भणंति ।।97 ।।

તજી કલ્પના જાણ સૌ, પરમ સમાધિલીન;
વેદે જે આનંદને, શિવસુખ કહેતા જિન. ૯૭.
अर्थ :- जो समस्त विकल्पों से रहित होकर परमसमाधि को प्राप्त करते हैं, वे
आनंद का अनुभव करते हैं, वही मोक्षसुख कहा जाता है।

97. ॐ ह्रीं समस्तविकल्परहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अविकल्पस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

सर्व विकल्प वमन कर अपनी परम समाधि मध्य जमजा ।
यह शिव सुख आनंद अतीन्द्रिय पाले जिन वच में थम जा ।।
कर्मोपाधि विहीन पारिणामिक स्वभाव का आश्रय हो ।
नित्य शुद्ध संपदा स्रोत ध्रुव उर में रंच न संशय हो ।।
औपशमिक दो भेद जान लो क्षायिक के जानो नौ भेद।
भेद अठारह क्षयोपशम के भाव औदयिक इक्कीस भेद ।।
तीन भेद हैं भाव पारिणामिक के ऐसे त्रेपन भेद।
किन्तु आत्मा तो अखंड है यह तो शाश्वत सदा अभेद ।।
वस्तु स्वभाव सदा निर्दोषी है सदोष केवल पर्याय ।
जीव स्वानुभव से ही पाता शाश्वत सुख आनंद प्रदाय ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।97 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 98 )
आत्म ध्यान के चार प्रकार :
जो पिंडत्थु पयत्थु बुह रूवत्थु वि जिण-उत्तु ।
रूवातीतु मुणेहि लहु जिम परू होहि पवित्तु ।।98 ।।

જે પિંડસ્થ, પદસ્થ ને રૂપસ્થ, રૂપાતીત;
જાણી ધ્યાન જિનોક્ત એ, શીઘ્ર બનો સુપવિત્ર. ૯૮.
अर्थ :- हे बुध ! जिन भगवान् द्वारा कहे हुए पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और
रूपातीत ध्यान को समझ, जिससे तू शीघ्र ही परम पवित्र हो सके।

98. ॐ ह्रीं आर्तरौद्रादिध्यानरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

शंकरोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

जो पिंडस्थ पदस्थ ध्यान रूपस्थ और हैं रूपातीत ।
उनका मनन करो जिन वच सुन हो जाओगे दोषातीत ।।
नित्य निरंजन निज परमात्म तत्त्व में पर का नहीं निवास ।
प्रकृति प्रदेश स्थिति अनुभाग बंध को रंच नहीं अवकाश ।।
मान नहीं अपमान नहीं है नहीं विभाव स्थान कहीं।
हर्ष अहर्ष स्थान नहीं है नहीं मार्गणा स्थान कहीं ।।
निरुप राग जिसका स्वरूप है उसको कोई बंध नहीं।
नित्य निरंजन सतत् जाग्रत पर में होता अंध नहीं ।।
द्वार-द्वार तू भटक रहा है बनकर आशाधारी श्वान।
अनुभव रस का रसिया बनजा करले अपना ही कल्याण ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान् ।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।98 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 99 )
सामायिक चारित्र कथन :
सव्वे जीवा णाणमया जो सम-भाव मुणेइ ।
सो सामाइउ जाणि फुडु जिणवर एम भणेइ ।।99 ।।

સર્વ જીવ છે જ્ઞાનમય, એવો જે સમભાવ;
તે સામાયિક જાણવું, ભાખે જિનવરરાવ. ૯૯.
अर्थ :- समस्त जीव ज्ञानमय है, इस प्रकार जो समभाव है, उसे निश्चय से
सामायिक समझो, ऐसा जिन भगवान् ने कहा है।

99. ॐ ह्रीं ज्ञानमयनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

ज्ञानाब्धिस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

ज्ञान स्वरूपी सभी जीव हैं ऐसा ही समभाव विचार।
उसको ही सामायिक जानो यह जिनवचन परम हितकार ।।
सहज ज्ञान जयवंत सदा ही है चारित्र सदा जयवंत ।
शुद्ध सहज परमात्म तत्त्व में संस्थित चेतन महिमावंत ।।
दोष अठारह रहित अनाकुल अच्युत समयसार गुणवंत ।
समरस द्वारा सदा पूजने योग्य महान् अनादि अनंत ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान् ।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।99 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 100 )
राग-द्वेष का त्याग सामायिक है :
राय-रोस बे परिहरिवि, जो समभाउ मुणेइ ।
सो सामाइउ जाणि फुडु, केवलि एम भणेइ ।।100 ।।

રાગ-દ્વેષ બે ત્યાગીને ધારે સમતાભાવ;
તે સામાયિક જાણવું, ભાખે જિનવરરાવ. ૧૦૦.
अर्थ :- राग और द्वेष इन दोनों को छोड़कर जो समभाव होता है, उसे निश्चय से
सामायिक समझो ऐसा जिन भगवान् ने कहा है।

100. ॐ ह्रीं साम्यरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अक्षोभस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

राग-द्वेष परिहार पूर्वक जो सामायिक वह समभाव।
उसको ही सामायिक जानो श्री केवली वच का भाव ।।
वचन दंड मन दंड काय दंडों से विरहित है निर्दंड।
निर्भय निरालंब निर्दोषी निर्मल निश्चय एक अखंड ।।
पंचम भाव भावना से पंचमगति पाते हैं प्राणी।
पंचाचार युक्त होता जो वही शुद्ध होता ज्ञानी ।।
सदा परिग्रह प्रपंच विरहित ज्ञानारूढ़ तत्त्व निष्णात ।
अन्तस्तत्त्व दुर्ग में रहता परम भाव सम्पदा प्रशान्त ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।100 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 101 )

छेदोपस्थापना चारित्र :

हिंसादिउ-परिहारू करि जो अप्पा हु ठवेइ ।
सो बियऊ चारित्तु मुणि जो पंचम-गइ णेइ ।।101 ।।

હિંસાદિકના ત્યાગથી, આત્મસ્થિતિકર જેહ;
તે બીજું ચારિત્ર છે, પંચમ ગતિકર તેહ. ૧૦૧.

अर्थ :- हिंसादि का त्याग कर जो आत्मा को स्थिर करता है, उसे दूसरा चारित्र
(छेदो-पस्थापना) समझो-यह पंचमगति को ले जाने वाला है।

101. ॐ ह्रीं हिंसादिपरिणामरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अचलस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

हिंसादिक के त्याग पूर्वक जो आत्मा को थिर करता।
छेदोपस्थान चारित्र धारता वह निज पंचमगति वरता ।।
दर्शन मोहमयी मिथ्यात्व वासना का कर दो संहार।
अनंतानुबंधी कषाय की भूल अभी लो आप सुधार।।
फिर अप्रत्याख्यानावरणी कषाय का कर डालो परिहार ।
फिर प्रत्याख्यानावरणी को नाश करो संयम साकार ।।
यह प्रमाद स्वयमेव उड़ेगा पाएगा मुनि पद अविकार।
शेष संज्जवलन भी क्षय होगी होगा केवलज्ञान अपार ।।
फिर योगों का भी अभाव हो जाएगा तू होगा सिद्ध ।
बंध भेद पाँचों क्षय होंगे होगा त्रिभुवन कंत प्रसिद्ध ।।
यही प्रक्रिया बंध नाश की जो अपना लेगा इस बार ।
यह सिद्धत्व प्रगटकर अपना हो जाएगा भव के पार ।।
आत्मा अरु आस्रव का अब भिन्नत्व सिद्ध करना होगा।
मात्र एक आत्माश्रय द्वारा कर्म बंध हरना होगा।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।101 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रूफरीडिंग बाकी है

( 102 )
परिहार विशुद्धि चारित्र :
मिच्छादिउ जो परिहरणु सम्मदंसण-सुद्धि ।
सो परिहार-विसुद्धि मुणि लहु पावहि सिव-सिद्धि ।।102 ।।

મિથ્યાત્વાદિક પરિહરણ, સમ્યગ્દર્શન શુદ્ધિ;
તે પરિહારવિશુદ્ધિ છે, શીઘ્ર સહો શિવસિદ્ધિ. ૧૦૨.
अर्थ :- मिथ्यात्व आदि के परिहार से जो सम्यग्दर्शन की विशुद्धि होती है, उसे
परिहार विशुद्धि समझो, उससे जीव शीघ्र ही मोक्षसिद्धि को प्राप्त करता है।

102. ॐ ह्रीं मिथ्यात्वकर्मरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अकलंकोऽहम् ।

(छंद-वीर)

मिथ्यात्वादिक के तजने पर जो दर्शन विशुद्धि बढ़ती।
वह परिहार विशुद्धि चारित्र है आत्म सिद्धि उससे मिलती ।।
जो स्वभाव है उसे प्रगट करने में क्या कठिनाई है।
फिर क्यों उसको प्रगट न करता कैसी निद्रा पायी है ।।
भार अनंतानंत भवों का तूने सिर पर लादा है।
भाव शुभाशुभ का तूने क्यों ओढ़ा घृणित लबादा है।।
हो जा तू निर्भार बाबरे सौख्य अतीन्द्रिय पाएगा।
निज स्वभाव सरिता में अवगाहन कर ले सुख पाएगा ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।102 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 103 )
सूक्ष्मसांपराय चारित्र :
सुहुमहँ लोहहँ जो विलउ, जो सुहुमु वि परिणामु।
जो सुहुमु वि चारित्त मुणि, सो सासय-सुह-धामु ।।103 ।।

સૂક્ષ્મ લોભના નાશથી, જે સૂક્ષ્મ પરિણામ;
જાણો સૂક્ષ્મ-ચારિત્ર તે, જે શાશ્વત સુખધામ. ૧૦૩.

अर्थ :- सूक्ष्म लोभ का नाश होने से जो सूक्ष्म परिणामों का अवशेष रह जाता है,
वह सूक्ष्म चारित्र है, वह शाश्वत सुख का स्थान है।

103. ॐ ह्रीं लोभकषायरहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

निर्लोभस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

सूक्ष्म लोभ जब क्षय होता है तभी शुद्ध होते परिणाम।
है सूक्ष्म सांपराय चारित्र अविनाशी सुख का सुस्थान ।।
साक्षी बनकर देख बावरे जो होता है होने दे।
भवितव्यता अवश्यंभावी उसे रोक मत होने दे ।।
आत्म ज्ञान से तेजस्वी बन सर्व विकार भाव हर ले।
शुद्ध स्वभाव भाव जैसा है वैसा अभी प्रगट कर ले ।।
रागादिक भावों के सर्व बवंडर अब क्षय करना है।
तृष्णा से मन शुष्क बनाकर निज अनुभव रस भरना है।।
मत अज्ञान भाव में जी तू ज्ञान भाव रस ही पी ले।
शुद्धात्मा के ज्ञान सिन्धु में अवगाहन करके जी ले ।।
यथाख्यात् चारित्र यही है यही वीतरागी चारित्र ।
यह कारण साक्षात् मुक्ति का यह चारित्र महान् पवित्र ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।103 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 104 )
आत्मा ही पंच परमेष्ठी है :
अरहंतु वि सो सिद्ध फुडु सो आयरिउ वियाणि।
सो उवझायउ सो जि मुणि णिच्छइँ अप्पा जाणि ।।104 ।।

આત્મા તે અર્હત છે, સિદ્ધ નિશ્ચયે એ જ;
આચરજ, ઉવઝાય ને, સાધુ નિશ્ચય તે જ. ૧૦૪.
अर्थ :- निश्चयनय से आत्मा ही अर्हत है, वही निश्चय से सिद्ध है और वही
आचार्य है और उसे ही उपाध्याय तथा मुनि समझना चाहिए।

104. ॐ ह्रीं चिन्तारहितनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

परमज्ञानदेवस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

अरहंत सिद्धाचार्य सुपाठक साधु पंच परमेष्ठीजान।
निश्चय सब ही तो आत्मा हैं श्री केवली कथन महान् ।।
चित्र विचित्र भावना तजदे शून्यविभाव भावना भा।
कर्मादिक के छल प्रपंच से रहित आत्मा अपनी ध्या ।।
यह संसार शोक का सागर यहाँ नहीं मिलता आनंद ।
नर नारक सुर पशु गति वाले यहाँ किया करते बहु द्वंद ।।
क्षणिक पुण्य पर इतराकर तू प्रति पल परिवर्तित होता ।
जड़ की महिमा के आगे तू निज महिमा को क्यों खोता ।।
प्रातः पुष्प खिला करते हैं संध्या मुरझा जाते हैं।
सूर्यास्त लख कमल स्वयं ही स्वतः-बंद हो जाते हैं ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।104 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 105 )
आत्मा ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं :
सो सिउ संकरु विण्हु सो सो रुद्द वि सो बुद्ध ।
सो जिणु ईसरु बंभु सो सो अणंतु सो सिद्ध ।।105 ।।

ते शिव, शंकर, विष्णु ने, रुद्र, बुद्ध पण ते ज;
ब्रह्मा, ईश्वर, जिन ते, सिद्ध, अनंत पण ते ज. १०५.
अर्थ :- वही शिव है, वही शंकर है, वही विष्णु है, वही रूद्रहै, वही बुद्ध है, वही
जिन है, वही ईश्वर है, वही ब्रह्मा है, वही अनन्त है और सिद्ध भी उसे ही कहना चाहिए।

105. ॐ ह्रीं निजज्ञानेश्वररूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

आत्मभूस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

यह आत्मा ही विष्णु बुद्ध शिव ब्रह्मरुद्रसिद्ध शंकर ।
जिन ईश्वर भगवंत यही है इसका ही तू चिन्तन कर ।।
राग रोग से ग्रसित आत्मा गहन चिकित्सा के है योग्य ।
जब तक है मिथ्यात्व हृदय में, सुख पाने में पूर्ण अयोग्य ।।
द्रव्य कर्म नो कर्म भाव कर्मों से रहित स्वरूप सहित ।
फिर भी कर्मों से आच्छादित दर्शन ज्ञान समुद्रअमित ।।
यदि पुरुषार्थ जाग जाए तो हो जाए पूरा निर्दोष ।
सिद्ध स्वपद पाते ही होगा प्राप्त इसे अनंत गुणकोष ।।
अगणित दीपमालिकाओं के दीप जलाए हैं पावन।
देवों ने भी सुर वीणा के तार बजाए मन भावन।।
मोक्षोत्सव की महान् महिमा तीन लोक ने गायी है।
मुक्ति वधू ने शाश्वत सुख के तूर्य बजाये हैं चिदघन ।।
शुद्ध भाव फल स्वयं फले हैं चेतन के अर्न्तमन में।
पापों की क्या बात पुण्य भी स्वतः लजे हैं इस मन में।।
मोह राग द्वेषादि भाव का नाम कहीं भी शेष नहीं।
अनुभव रस के कलश आत्म परिणति ने जाए हैं धन-धन।।

योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।105 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 106 )
परमात्म देव अपने देह में भी है :
एव हि लक्खण-लक्खियउ जो परु णिक्कलु देउ।
देहहँ मज्झहिं सो वसइ तासु ण विज्जइ भेउ।।106।।

એવા લક્ષણયુક્ત જે, પરમ વિદેહી દેવ;
દેહવાસી આ જીવમાં, ને તેમાં નથી ફેર. ૧૦૬.
अर्थ :- इन लक्षणों से युक्त परम निष्कल देव जो देह में निवास करता है उसमें
और आत्मा में कोई भी भेद नहीं।

106. ॐ ह्रीं निजाकलदेवरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

चिन्मयवपुःस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जो उपरोक्त लक्षणों से लक्षित है नित्य निरंजन देव ।
देहमध्य रहने वाला जो उसमें इसमें कोई न भेद ।।
अब तक जो स्व विरोधी रहकर किया अनात्मा का ही संग।
हो स्वच्छंद स्वयं को भूला मैं हूँ एकाकी निस्संग ।।
फिर भी परकी संगति में पड़ पुण्य-पाप करता संचय ।
चारों गति के मध्य भटकता चढ़ा मोह का खोटा रंग ।।
राग द्वेष की मादक मदिरा मैं दिन-रात पिया करता।
कभी न जाना मैंने स्वामी ये विभाव करते हैं तंग ।।
परभावों की फटी बांसुरी सदा बजाया करता हूँ।
कभी न निज की बीन बजायी नहीं बजायी निज की चंग ।।

आज सुअवसर अनायास ही पाया मैंने पहिली बार।
उठी हृदय में पहिली बार ज्ञान की उत्तम मधुर तरंग ।।
अब न किसी बहकावे में आ अपना अहित करूँगा मैं।
कर्मजयी पुरुषार्थ जगा है कर्मों से करने को जंग।।
जीतूंगा आठों कर्मों को नित्य निरंजन बनने हेतु ।
बहुरंगी मैं नहीं रहूँगा मुझको भाया शुद्ध स्वरंग ।।
घाति नाशकर अर्हत् पद ले फिर अघातिया नाशूँगा।
सिद्ध शिला पाऊँगा मैं तो त्रिलोकाग्र पर परम स्वरंग ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।106 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 107 )
आत्मा का दर्शन ही सिद्ध होने का उपाय है :
जे सिद्धा जे सिज्झिहिहिं, जे सिज्झहिं जिण उत्तु ।
अप्पा-दंसणिं ते वि फुडु एहउ जाणि णिभंतु ।।107 ।।

જે સિદ્ધયા ને સિદ્ધસે, સિદ્ધ થતા ભગવાન;
તે આતમદર્શન થકી, એમ જાણ નિર્ભ્રાન્ત. ૧૦૭.
अर्थ :- जो सिद्ध हो चुके हैं, भविष्य में होंगे और वर्तमान में होते हैं, वे सब
निश्चय से आत्मदर्शन से ही सिद्ध हुए हैं-यह भ्रान्तिरहित समझो ।

107. ॐ ह्रीं नित्यनिजपरमात्मरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

अपूर्वात्मस्वरूपोऽहम् ।

(छंद-वीर)

जो भी सिद्ध हुए या होंगे अथवा वर्तमान में सिद्ध ।
निःसंदेह सभी होते हैं मात्र आत्मदर्शन से सिद्ध ।।

शिवपथ को पहिचाने बिन जो चले जा रहे भव पथ पर ।
पलभर को भी कैसे आ पाऐंगे वे सम्यक् पथ पर ।।
भवपथ शिवपथ में जो भेद न कर पाते हैं अज्ञानी।
आत्मज्ञान के बिना बताओ कैसे वे होंगे ज्ञानी ।।
इनके अन्तर में बैठा है महामोहमय मिथ्यातम ।
अनात्मा को मान आत्मा करते हैं खोटे उद्यम ।।
नकली संयम के पीछे ये जीवन व्यर्थ गँवाते हैं।
सम्यग्दर्शन लिए बिना अविरति को दूर भगाते हैं।।
वे आकाश कुसुम लाने को चारित्राभासी बनते ।
क्रियाकांड के आडंबर में रत होते निज से तनते।।
तत्त्वों के निर्णय बिन कैसे आएँगे संयम रथ पर।
सम्यक् पथ कैसे पाएँगे चले जा रहे दुष्पथ पर ।।
दूज चंद्रसम गुणस्थान चौथे में आंशिक अनुभव है।
पूर्ण चंद्रका अंश यही है नहीं स्वाद में अंतर है ।।
एक बिन्दु है एक सिन्धु है पर है जाति नीर की एक।
जो पुरुषार्थ करेगा तत्क्षण पाएगा वह सौख्य अनेक ।।
परम पारिणामिक ध्रुव भावी भाव शाश्वत पूर्ण त्रिकाल ।
पूर्णानंद स्वभाव आत्म का जिसमें शिवसुख भरा विशाल ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।107 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

( 108 )
ग्रन्थकर्त्ता की अन्तिम भावना :
संसारह भय-भीयएण जोगिचंद्र-मुणिएण।
अप्पा-संबोहण कया दोहा इक्क-मणेण ।।108 ।।

સંસારે ભયભીત જે, યોગીન્દુ મુનિરાજ;
એકચિત્ત દોહા રચે, નિજસંબોધન કાજ. ૧૦૮.
अर्थ :- संसार के दुःखों से भयभीत ऐसे योगीन्दुदेव मुनि ने आत्मसंबोधन के
लिए एकाग्र मन से इन दोहों की रचना की है।

108. ॐ ह्रीं सत्चित्धनपिण्डरूपनिर्योगस्वरूपाय नमः ।

आनंदसागरोऽहम् ।

(छंद-ताटंक)

भव दुख से भयभीत श्री योगीन्दुदेव ने निज के हित।
हो एकाग्र रचे सब दोहे सबके हुए सुनिर्मल चित्त ।।
ज्ञानभाव की बजी बाँसुरी आयी सहजानंदी भोर।
सुर दुन्दुभियों की ध्वनि गूंजी नाच रहा है हृदय चकोर ।।
विलय हो गई मोह मूर्छा अनहदनाद बजे घर-घर।
ज्ञाता दृष्टा भाव जगा है पायी ज्ञानचंद्रकी कोर ।।
निष्कंटक सम्यक् पद पाने में सम्यग्दर्शन सक्षम ।
स्वपर विवेक शक्ति दृष्ट है इस चेतन के चारों ओर ।।
मोह वारुणी के घट फूटे अनुभव रस के कलश भरे।
जाग गया पुरुषार्थ सहज ही दशों दिशा में इसका शोर ।।
समकित की पुरवाई आयी धीरे-धीरे सन-सन-सन।
दर्शन ज्ञान स्वभाव मनोहर चेतन ने पाया पावन ।।
चेतन से परिणय को आतुर, है स्वभाव परिणति अब तो।
कोई नहीं रोक पाएगा दृढ़ निश्चय इसके मन को ।।
अनुभव रस की बूंदाबांदी ज्ञान गगन से हुई सहज ।
साम्य भाव की वर्षा आयी झूम-झूम चल पड़ी पवन ।।
भव सागर की लोल तरंगे झंझावत रहित हैं अब।
निष्कटंक जिनमार्ग मिल गया अति हर्षित है आनंदघन ।।

भ्रम के बादल सभी छट गए आत्म गगन अब स्वच्छ हुआ।
नयातीत पक्षातिक्रान्त है राग रहित है अन्तर्मन ।।
योगसार का सार पा लिया हुए धन्य वे योगीजन।
अल्पावधि में कटने वाले हैं सारे ही भव बंधन ।।
योगसार की पावन महिमा उर अंतर में जगे महान्।
आत्म तत्त्व का आश्रय लेकर मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।108 ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महाअर्घ्य

(छंद-वीर)

निज संबोधन हेतु रचे ये दोहे मात्र कथन व्यवहार।
अक्षर खंड पदों वाक्यों से रचना स्वयं हुई साकार ।।
आत्मानंद स्वरूप आत्मा से बाहर शुभ-अशुभ विभाव ।
उनका फल संसार भ्रमण है सबके सब ही हैं परभाव ।।
भव प्रपंच क्षय करने का उत्तम उपाय मात्र निष्कर्म।
भव प्रपंच को सतत् बढ़ाने वाला एक मात्र है कर्म ।।
धर्म अहिंसा रूपी पालन करके धर्म प्रगट कर लूँ।
हिंसादिक भावों को क्षयकर यह संसार भाव हर लूँ ।।
तज हिंसा नव कोटि पूर्वक वस्तु स्वरूप विचार करूँ ।
यह उत्कृष्ट त्याग अपनाकर फिर भवसागर पार करूँ ।।
भेदज्ञान विज्ञान पूर्वक जो पाते सम्यग्दर्शन ।
उनका ही निर्वाण लोक हो गया सुरक्षित इस ही क्षण ।।
जो निज श्रद्धा से विचलित हैं वे करते संसार प्रपंच ।
उन्हें नहीं श्रद्धान तत्त्व का पलभर को भी होता रंच ।।
ये ही जीव अनादि अनंतोंकालों से भव भ्रमता है।
पुद्गल की संगति करके संसार मध्य में जमता है।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(छंद-मानव)

जिय पवन बबूले जैसा चारों गतियों में भ्रमता।
परभावों के तूफानों के कारण कहीं न थमता।।
जब तत्त्व ज्ञान करता है तब भेद ज्ञान निधि पाता।
उपशम समकित भी पाता फिर मूरख उसे गँवाता ।।
योगों की पवन चली तो चारों गति में भरमाया।
योगों की पवन रुकी तो निज सिद्ध स्वपद दर्शाया ।।
कार्माण योग होता है तो आस्रव मुसकाता है।
कर्मों का बंध त्वरित ही चेतन को हो जाता है।।
कार्माण वर्गणा ही तो सर्वाधिक दुखदायी है।
तेईस वर्गणाओं में यह सब से विषपायी है ।।
बिन योग आस्रव का तो होना सर्वथा असंभव ।
मन-वचन-काय योगों के द्वारा ही होता आस्रव ।।
आस्रव निरोध होता है संवर आने पर हरदम ।
बन्धों को क्षय करने में संवर न कभी भी सक्षम ।।
संवर बिन कभी न रुकता पलभर को भी यह आस्रव ।
निर्जरा भाव लाने में संवर का बल ही अभिनव ।।
संवर यदि सजग न हो तो फिर नहीं निर्जरा होती।
होते ही भाव निर्जरा कर्मों की गति न होती ।।
वसुकर्म अनादि सांत हैं इक दिन जाते अपने घर ।
संवर भी सादि सांत है चल देता है अपने घर ।।
निर्जरा सादि सांत है वह भी जाती अपने घर ।
बंधों का महल गिराकर पद देती है अविनश्वर ।।
ये परम मित्र चेतन के आहवाहन पर आते हैं।
चेतन को शुद्ध बनाकर ये अपने घर जाते हैं।।

फिर मोक्ष तत्त्व पाता है जो सादि अनंत स्वरूपी ।
त्रैकालिक मोक्ष स्वरूपी चेतन आनंद स्वरूपी ।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसाराय जयमाला अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

आशीर्वाद
(अर्ध कुन्डली)
योगसार का सार ही तीन लोक में सार।
इसे प्राप्त कर जीव सब हो जाते भवपार ।।
हो जाते भवपार शाश्वत् सुख पाते हैं।
फिर न लौट कर कभी जगत् में ये आते हैं ।।
ऐसे योगसार की महिमा उर में लाओ ।
श्री योगीन्दुदेव चरणों में शीष झुकाओ ।।
इत्याशीर्वाद :

समुच्चय महाअर्घ्य

(छंद-वीर)

पुण्योदय से भौतिक सुख सुविधाएँ मिलती है अनुकूल।
पापोदय से भवदधि दुख व्याधियाँ मिला करती प्रतिकूल ।।
पापोदय में दुख से व्याकुल पुण्य बंध कर लेता है।
पुण्योदय में सुख में रत हो पाप बंध कर लेता है ।।
यह क्रम नहीं टूटने पाता भव कुचक्र चलता रहता।
भव सागर में पंच परावर्तन करके बहता रहता ।।
जब स्वकाल आता है इसका पंचलब्धि पा जाता है।
सम्यग्दर्शन को पा करके शिव पथ पर आ जाता है।।
फिर उपशम वेदक यह पाकर आगे बढ़ता जाता है।
एक दिवस क्षायिक समकित पा गुण श्रेणी चढ़ जाता है ।।

केवल ज्ञान प्राप्त करता है घाति कर्म नाश करता ।
फिर अघातिया क्षय करके सिद्धों के संग निवास करता ।।
इस प्रकार से अनंत जीवों ने पाया है पद निर्वाण।
भव सागर दुख को क्षय करके पाया शिवसुख परम महान् ।।
जो पुरुषार्थ नहीं कर पाता वह रहता है पर आधीन ।
एकमात्र शिव सुख पाना तो केवल है पुरुषार्थधीन ।।
चारलब्धियाँ मिली अनंतानंत बार इस प्राणी को।
करणलब्धि मिल सकी न बिन पुरुषार्थ कभी भी प्राणी को ।।
जब पुरुषार्थ स्वसन्मुख होता तब ही करणलब्धि मिलती।
मिथ्यादर्शन को क्षय करके समकित कली हृदयी खिलती ।।
फिर कुछ करना धरना शेष नहीं रहता है प्राणी को।
संयम की महिमा आती है स्वतः पूर्णतः ज्ञानी को ।।
लक्ष्य पूर्णता का होता है शुद्ध आत्मदर्शन पावन ।
मुक्ति स्वपद उर में झिलता है इस प्राणी को मन भावन ।।
इसी स्वपद की प्राप्ति हेतु हे प्रभु चरणों में आया हूँ।
केवल निज भावों की पुष्पांजलि हे स्वामी लाया हूँ ।।
आँखों की किरकिरी सरीखा मिथ्यादर्शन दुख देता।
उसके संग में क्रूर असंयम शिव पथ न पाने देता।।
आंखों की किरकिरी मिटाने में है जीव सदैव समर्थ ।
त्यों मिथ्यादर्शन क्षय करने में है समकित पूर्ण समर्थ ।।
अब समर्थ को ही संग में ले मिथ्यादर्शन नष्ट करूँ ।
संयम भाव हृदय में धरकर सकल असंयम भ्रष्ट करूँ ।।

(दोहा)

महाअर्घ्य अर्पित करूँ परम भक्ति से आज ।
योगसार का सार पा पाऊँ निजपद राज ।।

ॐ ह्रीं स्वपरप्रकाशकभेदविज्ञानप्ररूपक श्रीयोगसार इति समुच्चय महाअर्घ्य नि. ।

महाजयमाला

(छंद-मत्तसवैया)

सर्वज्ञ कथित अमृत स्वरूप शिवपथ में सुस्थित हो जाऊँ।
अपने स्वभाव का दर्शन कर अपने स्वभाव में खो जाऊँ ।।
भव रोगों की यह है अचूक औषधि भव दुख हरणी तत्क्षण।
आनंद अतीन्द्रिय का समुद्रउर में बहता रहता क्षण-क्षण ।।
समकित उर में होते ही होता सिद्ध स्वपद का आरोहण ।
बाधक न कहीं कोई होता क्षय हो जाता है भाव मरण।।
चैतन्य अनादि अनंत शक्ति से मंडित निज को ध्याता है।
क्षायिक स्वज्ञान की गरिमा से आनंद शाश्वत पाता है।।
जब अंतरंग रुचि जगती है उपयोग पलट ही जाता है।
चैतन्य स्वभाव प्राप्त करके यह जीव सुलझ ही जाता है।।
जब अन्तर दृष्टि नहीं होती तब आत्म स्वभाव न भाता है।
चैतन्य प्राण की महिमा से परिचय न कभी कर पाता है।।
कर्त्ता अरु कर्म करण कारक अरू संप्रदान अरु अपादान ।
अधिकरण यही षटकारक का परिणमन सदा होता महान् ।।
यदि भाव णमो अरिहंताणं का अंतरंग में आ जाए।
तो मोह क्षोभ सब क्षय होवे प्राणी शुद्धात्म तत्त्व पाए।।
अनुभूति आत्मा की हो तो सच्चा मुमुक्षु बन जाता है।
अनुभूति बिना कोई मुमुक्षु तो न मुमुक्षु कहलाता है ।।
निरूपाधि स्वरूप अगर है तो निरूपाधिमयी जीवन जी ले।
आनंद अतीन्द्रिय भीतर है तो थोड़ा अनुभव रस पी ले ।।
चैतन्य समृद्धि न भूलूँ निज भव संपति लख मूर्छित न बनूँ ।
अपने स्वरूप को ही निरखूँ परभावों से दूषित न बनूँ ।।
आनंद समुद्रउल्लसित कर निज आत्म बुद्धि को दूँ उछाल ।
शाश्वत परमात्मा मैं ही हूँ शाश्वत जीवन जीलूँ त्रिकाल ।।

शुद्धात्म ऋद्धि पाना है तो बहिरात्मापन तजना होगा।
निज आत्म स्वभाव शाश्वत से अब तो दूरी तजना होगा ।।
यह आधिव्याधि पर की उपाधि निज ध्यान न करने देती है।
शाश्वत आनंद निजात्मा का रस कलश न करने देती है ।।
सम्यक्त्व रूप जिनदशा झाँक फिर पर से तू अलिप्त हो जा।
अपने स्वभाव की मस्ती में हे प्राणी अभी लुप्त हो जा ।।
क्षण-क्षण के क्रूर भयंकर भाव मरण से तू रहना सुदूर ।
निजआत्म भावना ही तू भा जिसमें है सुख का सलिलपूर ।।
विषयानुरागियों की संगति दुष्टानुरागियों के कुसंग।
तज दे तत्काल अरे सब ही सत्पुरुषों का कर अभी संग ।।
तू परमाराध्य आत्मा को अपने स्वभाव साधन से पा।
अपने चेतन पद का विकास रत्नत्रय आराधन से पा।।
निज मुक्ति भवन का प्रथम दिव्य सोपान मिला है चरण बढ़ा।
अपने ज्ञायकस्वभाव को ले अपने स्वभाव को पुष्प चढ़ा ।।
चैतन्य लक्ष्मी का अचिन्त्य वैभव मेरे ही भीतर है।
दर्शनमय ज्ञान भावना का आधार स्वयं के भीतर है।।
जब भी एकाग्र हृदय होता तब ही एकत्व भाव आते।
एकाकी चेतन को अपनी निज निधि के दर्शन हो जाते ।।
समभावी भावों का सागर निज चेतन के ही भीतर है।
यदि निज को ही निरखे प्रतिपल जो शाश्वत शिवसुख सागर है।।
भव सागर तो प्रभु है अथाह कैसे इसको मैं पार करूँ ।
कर्मों की गति भी है विचित्र कैसे इनका संहार करूँ ।।
संयम की तरणी दे दो प्रभु दोनों का मैं अवसान करूँ ।
निज आत्म शक्ति से समकित पा ध्रुव शाश्वत शुद्ध स्वभाव वरूँ ।।

(छंद-गीतिका)

चिदानंद स्वरूप में उपयोग को एकाग्र कर।
आत्मा को देख रुचि से आत्मा को प्यार कर।।
निजानंदी निज स्वभावी आत्म का सत्कार कर।
मोहरागादिक विकारी भाव का परिहार कर ।।
वीतराग स्वभाव परिणति आत्मा का धर्म है।
आत्मा से बाह्य जो भी भाव है वह कर्म है ।।
छोड़ मिथ्यामार्ग को निज आत्मा का ध्यान कर।
भेदज्ञान महान् पाकर आत्मा का भान कर ।।
अमृतमयी शिवमार्ग से जो भ्रष्ट है वह मूढ़ है।
नहीं निश्चय आत्मा का तभी तो सुख गूढ़ है।।
द्रव्य-गुण-पर्याय निज चैतन्य सुख भरपूर है।
किन्तु फिर भी मूढ़ अपने भाव से ही दूर है।।
अभिप्राय यदि विपरीत है तो मोहमय है आत्मा।
अभिप्राय यदि अनुकूल है तो यही है परमात्मा ।।
मुक्ति पथ की विधि यथार्थ न जान पाया आज तक।
इसलिए तू दुखी है संसार में ही आज तक ।।
यदि कौतुहल जगे तो फिर तत्त्व का अभ्यास कर।
ज्ञान ज्ञाता ज्ञेय तू ही है यही विश्वास कर।।
छोड़ दे पर आश्रय को आत्म आश्रय प्राप्त कर।
सुख अनंतानंत कालों तक हृदय में व्याप्त कर ।।

(छंद-मत्तसवैया)

जीवन में यदि सम्यक्त्व न हो तो संयम न सुख दायक है।
जप तप व्रत युत आचरण शून्य मानव जीवन दुखदायक है ।।
सम्यक्त्व भेद विज्ञान बिना होता न कभी निश्चित जानो।
महिमा है भेदज्ञान निधि की इस महिमा को तो पहिचानो ।।

जब निजपरिणति जगती उर में जो सदा सौख्य शिवदायी है।
लो स्वपर विवेक जगा उर में जो आत्मीय सुखदायी है ।।
समकित बिन जो संयम धरता वह भ्रमण चर्तुगति करता है।
कर्मों की एक प्रकृति का भी वह कभी नाश ना करता है ।।

(दोहा)

विनय भाव पूर्वक हुआ पूरा आज विधान।
योगसार के रचयिता ऋषि योगीन्दु महान् ।।

ॐ ह्रीं शाश्वत्चित्साम्राज्यरूपनिर्योगस्वरूपाय जयमाला पूर्णार्घ्यं नि. ।

आशीर्वाद
(कुन्डली)
योगसार का सार ही तीन लोक में सार।
इसे प्राप्त कर जीव सब हो जाते भव पार।।
हो जाते भव पार सिद्ध पद मिल जाता है।
सिद्धचक्र का द्वार स्वतः ही खुल जाता है।।
त्रिभुवन में तो है महत्व निज ज्ञानधार का।
पूर्ण हो गया है विधान अब योगसार का।।

(दोहा)

योगसार को समझकर करो आत्म कल्याण।
कुछ भव में ही मिलेगा उत्तम पद निर्वाण ।।
(पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि)

अन्तिम समुच्चय महार्घ्य

(छंद-ताटंक)

निज भावों का महाअर्घ्य ले, पाँचों परमेष्ठी ध्याऊँ ।
जिनवाणी जिनधर्म शरण पा, देव शास्त्र गुरु उर लाऊँ ।।
तीस चौबीसी बीस जिनेश्वर, कृत्रिम अकृत्रिम गृह ध्याऊँ।
सर्व सिद्ध प्रभु पंचमेरु नंदीश्वर गणधर गुण गाऊँ ।।
सोलह कारण रत्नत्रय दशलक्षण नवसुदेव पाऊँ।
चौबीसों जिन भूत भविष्यत वर्तमान जिनवर ध्याऊँ ।।
तीन लोक के सर्व बिम्ब जिन वन्दूँ जिनवर गुण गाऊँ।
अविनाशी अनर्घ्य पद पाऊँ, शुद्ध आत्म गुण प्रगटाऊँ ।।

(दोहा)

महाअर्घ्य अर्पण करूँ, पूर्ण विनय से देव।
आप कृपा से प्राप्त हो, परम शान्ति स्वयमेव ।।

ॐ ह्रीं श्री अरहन्तसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो द्वादशांगजिनवाणीभ्यो उत्तम

क्षमादिदशलक्षणधर्माय, दर्शनविशुद्धयादि षोडशकारणेभ्यो, सम्यग्दर्शनज्ञान, चारित्रेभ्यो,
त्रिलोकसम्बन्धि कृत्रिमाकृत्रिमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो, पंचमेरौ अस्सी चैत्यालयेभ्यो
नन्दीश्वरदीपस्थद्विपंचाशज्जिनालयेभ्यो श्री सम्मेदशिखर, गिरनारगिरी, कैलाशगिरी,
चम्पापुर, पावापुर आदि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो, अतिशय क्षेत्रेभ्यो, सीमंधरादि विद्यमानविंशति
तीर्थंकरेभ्यो ऋषभादिचतुर्विंशति तीर्थंकरेभ्यो भगवज्जिन सहस्राष्टनामेभ्यश्च अनर्घ्यपद

प्राप्तये महाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शान्ति पाठ

(छंद-गीतिका)

विश्व में प्रभु शान्ति हो कोई न प्राणी हो दुखी।
ज्ञानगंगा में न्हवन कर बनें सब प्राणी सुखी ।।
सहजता का सिन्धु सबके हृदय में हो विद्यमान।
शान्ति हो आनंद हो कल्याण हो सबका महान्।।
विनय है परमात्मा से सुनो मेरी प्रार्थना ।
सिद्ध पद अतिरिक्त कोई नहीं मेरी याचना ।।
शान्ति हो प्रभु शान्ति हो परिपूर्ण सुख सबको मिले।
ज्ञान अम्बुज ज्ञान रवि पा सभी का पूरा खिले ।।
(पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि) नौ बार णमोकार मंत्र का जाप कर कायोत्सर्ग करें।

क्षमापना

(दोहा)

आप कृपा से दूर हो भूल चूक भगवान्।
आत्मज्ञान बल दो प्रभो पायें सम्यक्ज्ञान ।।
सम्यग्दर्शन प्राप्त हो हे जिनराज महान् ।
रत्नत्रय की युक्ति से पाएँ पद निर्वाण ।।
(पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि)
मंगल भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ।।
सर्व मंगलमांगल्यं सर्वकलणाकारकं ।
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम् ।।
ॐ शांति… शांति…शांति…

जाप्य मंत्र - ॐ ह्रीं श्री योगसाराय नमः ।

विधान समापन पाठ
तर्ज : श्री सिद्धचक का पाठ…
मैं चिदानन्द चिद्रूप सहज सुखरूप ।

परम अविकारी, समझो भवि मंगलकारी । ।टेक ।।

अब तक नहिं निज को पहिचाना, पर में ही अपनापन जाना।
पर्यायदृष्टि से सहे दुःख अतिभारी, समझो भवि मंगलकारी ।।1।।

तुम करो व्यर्थ ही रोष नहीं, पर का किंचित भी दोष नहीं।
निज भूल छोड़कर हो चैतन्य विहारी, समझो भवि मंगलकारी ।।2।।

अति उत्तम अवसर आया है, श्री जिनवर दर्शन पाया है।
अब करो भेद विज्ञान सहज सुखकारी, समझो भवि मंगलकारी ।।3।।

जड़ देह कर्म रागादि अरे, सबसे न्यारा चिद्रूप धरे ।
है स्वयंसिद्ध परमातम आनन्दकारी, समझो भवि मंगलकारी ।।4।।

स्वाभाविक शक्ति अनंत अहो, प्रभुता का भी कहीं अन्त न हो।
अद्भुत से भी अद्भुत वैभव का धारी, समझो भवि मंगलकारी ।।5।।

ध्रुव मंगल उत्तम शरण यही, श्रद्धेय यही है ध्येय यही।
निज प्रभु ध्याता ही पावे शिव सुखकारी, समझो भवि मंगलकारी ।।6।।



Artist: कविवर राजमल पवैया, भोपाल
स्रोत: श्री योगसार महामण्डल विधान

प्रूफरीडिंग बाकी है