श्री तत्त्वार्थसूत्र मंडल विधान एवं श्री रत्नत्रय मंडल विधान | Shri Tattvarthsutra Mandal Vidhan evam Shri Ratnatraya Mandal Vidhan

चौबीस तीर्थंकर स्तवन
जो अनादि से व्यक्त नहीं था त्रैकालिक ध्रुव ज्ञायक भाव।
वह युगादि में किया प्रकाशित वन्दन ऋषभ जिनेश्वर राव।।1।।
जिसने जीत लिया त्रिभुवन को मोह शत्रु वह प्रबल महान्।
उसे जीतकर शिवपद पाया वन्दन अजितनाथ भगवान्।।2।।
काललब्धि बिन सदा असम्भव निज सन्मुखता का पुरुषार्थ।
संभव जिनवर ने स्वकाल में प्रकट किया सम्यक् पुरुषार्थ।।3।।
त्रिभुवन जिनके चरणों का अभिनन्दन करता तीनों काल।
वे स्वभाव का अभिनन्दन कर पहुँचे शिवपुर में तत्काल।।4।।
निज आश्रय से ही सुख होता यही सुमति जिन बतलाते।
सुमतिनाथ प्रभु की पूजन कर भव्य जीव शिवसुख पाते।।5।।
पद्मप्रभ के पद-पंकज की सौरभ से सुरभित त्रिभुवन।
गुण अनन्त के सुमनों से शोभित श्री जिनवर का उपवन।।6।।
श्री सुपार्श्व के शुभ सु-पार्श्व में जिनकी परिणति करे विराम।
वे पाते हैं गुण अनन्त से भूषित सिद्ध सदन अभिराम।।।7।।
चारु चन्द्र-सम सदा सुशीतल चेतन चन्द्रप्रभ जिनराज।
गुण अनन्त की कला विभूषित प्रभु ने पाया निजपद राज।।8।।
पुष्पदन्त-सम गुण आवलि से सदा सुशोभित हैं भगवान्।
मोक्षमार्ग की सुविधि बताकर भविजन का करते कल्याण।।9।।
चन्द्र-किरण सम शीतल वचनों से हरते जग का आताप।
स्याद्वादमय दिव्यध्वनि से मोक्षमार्ग बतलाते आप।।10।।
त्रिभुवन के श्रेयस्कर हैं श्रेयांसनाथ जिनवर गुणखान।
निज स्वभाव ही परम श्रेय का केन्द्र बिन्दु कहते भगवान्।।11।।
शत इन्द्रों से पूजित जग में वासुपूज्य जिनराज महान्।
स्वाश्रित परिणति द्वारा पूजित पंचम भाव गुणों की खान।।12।।

चौबीस तीर्थंकर वन्दना
निर्मल भावों से भूषित हैं जिनवर विमलनाथ भगवान्।
राग-द्वेष मल का क्षय करके पाया सौख्य अनन्त महान्।।13।।
गुण अनन्तपति की महिमा से मोहित है यह त्रिभुवन आज।
जिन अनन्त को वन्दन करके पाऊँ शिवपुर का साम्राज्य।।14।।
वस्तु-स्वभाव धर्मधारक है धर्म धुरन्धर नाथ महान्।
ध्रुव की धुनमय धर्म प्रकट कर वन्दित धर्मनाथ भगवान्।।15।।
रागरूप अंगारों द्वारा दहक रहा जग का परिणाम।
किन्तु शान्तिमय निजपरिणति से शोभित शान्तिनाथ भगवान्।।16।।
कुन्थु आदि जीवों की भी रक्षा का जो देते उपदेश।
स्व-चतुष्टय में सदा सुरक्षित कुन्थुनाथ जिनवर परमेश।।17।।
पंचेन्द्रियों विषयों से सुख की अभिलाषा है जिनकी अस्त।
धन्य-धन्य अरनाथ जिनेश्वर राग-द्वेष अरि किए परास्त।।18।।
मोह-मल्ल पर विजय प्राप्त कर जो हैं त्रिभुवन में विख्यात।
मल्लिनाथ जिन समवसरण में सदा सुशोभित हैं दिन रात।।19।।
तीन कषाय चौकड़ी जयकर मुनि-सु-व्रत के धारी हैं।
वन्दन जिनवर मुनिसुव्रत जो भविजन को हितकारी हैं।।20।।
नमि जिनवर ने निज में नमकर पाया केवलज्ञान महान्।
मन-वच-तन से करूँ नमन सर्वज्ञ जिनेश्वर हैं गुणखान।।21।।
धर्मधुरा के धारक जिनवर धर्मतीर्थ रथ संचालक।
नेमिनाथ जिनराज वचन नित भव्यजनों के हैं पालक।।22।।
जो शरणागत भव्यजनों को कर लेते हैं आप समान।
ऐसे अनुपम अद्वितीय पारस हैं पार्श्वनाथ भगवान्।।23।।
महावीर सन्मति के धारक वीर और अतिवीर महान्।
चरण-कमल का अभिनन्दन है वन्दन वर्धमान भगवान्।।24।।

।। मङ्गल पंचक ।।

(हरिगीतिका)

गुण-रत्न-भूषा, विगत-दूषाः, सौम्यभाव-निशाकराः ;
सद्बोधभानु-विभा-विभासित-दिक्चया विदुषां वराः।
निःसीम-सौख्यसमूह-मण्डित-योगखण्डित-रतिवराः ;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते श्री-वीरनाथ-जिनेश्वराः ।। 1।।
सद्ध्यान- तीक्ष्ण-कृपाणधारा-निहितकर्म-कदम्बका;
देवेन्द्र-वृन्द-नरेन्द्र-वन्द्याः प्राप्त-सुख-निकुरम्बकाः।
योगीन्द्र-योग-निरूपणीयाः, प्राप्त-बोध-कलापकाः;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते सिद्धाः सदा-सुख-दायकाः ।। 2।।
आचार-पञ्चक-चरण-चारण-चुञ्चवः समताधराः;
नाना-तपोभर-हेति-हापित कर्मकाः सुखिताकराः।
गुप्ति-त्रयी-परि-शीलनादि-विभूषिता वदताम्बराः;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते श्री-सूरयोऽर्जित-शम्भराः ।। 3।।
द्रव्याऽर्थ-भेद-विभिन्न - श्रुतभर-पूर्ण-तत्त्वनिभालिनो;
दुर्योग-योग-निरोध-दक्षाः सकल-वर-गुण-शालिनः।
कर्त्तव्य-देशन-तत्परा विज्ञान-गौरव-शालिनः ;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते गुरुदेव-दीधित-मालिनः ।। 4।।
संयम-समित्याऽऽवश्यका ऽपरिहाणि-गुप्ति-विभूषिताः;
पञ्चाऽक्ष-दान्ति-समुद्यताः समता-सुधा-परिभूषिताः।
भूपृष्ठ-विष्टर-शायिनो विविधर्द्धि-वृन्द-विभूषिताः;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते मुनयः सदा शम-भूषिताः।। 5।।
प्रतिमा प्रक्षाल पाठ
(पं. अभयकुमारजी कृत)

(दोहा)

परिणामों की स्वच्छता, के निमित्त जिनबिम्ब ।
इसीलिए मैं निरखता, इनमें निज प्रतिबिम्ब ।।
पंच प्रभु के चरण में, वन्दन करूँ त्रिकाल ।
निर्मल जल से कर रहा, प्रतिमा का प्रक्षाल ।।
अथ पौर्वाह्निकदेववन्दनायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजास्तवन -
वन्दनासमेतं श्री पंचमहागुरुभक्तिपूर्वककायोत्सर्ग करोम्यहम् ।
(नौ बार णमोकार मन्त्र पढ़ें)
(छप्पय)
तीन लोक के कृत्रिम और अकृत्रिम सारे ।
जिनबिम्बों को नित प्रति अगणित नमन हमारे ।।
श्री जिनवर की अन्तर्मुख छवि उर में धारूँ ।
जिन में निज का निज में जिन - प्रतिबिम्ब निहारूँ ।।
मैं करूँ आज संकल्प शुभ, जिन प्रतिमा प्रक्षाल का।
यह भाव सुमन अर्पण करूँ, फल चाहूँ गुणमाल का ।।
ॐ ह्रीं प्रक्षालप्रतिज्ञायै पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
(प्रक्षाल की प्रतिज्ञा हेतु पुष्प क्षेपण करें)

(रोला)

अन्तरंग बहिरंग सुलक्ष्मी से जो शोभित ।
जिनकी मंगल वाणी पर है त्रिभुवन मोहित ।।
श्री जिनवर सेवा से क्षय मोहादि विपत्ति ।
हे जिन ! श्री लिख पाऊँगा निज-गुण सम्पत्ति ।।
(थाली की चौकी पर केशर से श्री लिखें)

(दोहा)

अन्तर्मुख मुद्रा सहित, शोभित श्री जिनराज ।
प्रतिमा प्रक्षालन करूँ, धरूँ पीठ यह आज ।।
ॐ ह्रीं श्री पीठस्थापनं करोमि ।
(प्रक्षाल हेतु थाली स्थापित करें)

(रोला)

भक्ति रत्न से जड़ित आज मंगल सिंहासन ।
भेद-ज्ञान जल से क्षालित भावों का आसन ।।
स्वागत है जिनराज ! तुम्हारा सिंहासन पर।
हे जिनदेव पधारो श्रद्धा के आसन पर ।।
ॐ ह्रीं श्री धर्मतीर्थाधिनाथ भगवन्निह सिंहासने तिष्ठ तिष्ठ ।
(थाली में जिनबिम्ब विराजमान करें)
क्षीरोदधि के जल से भरे कलश ले आया।
दृग-सुख-वीरज ज्ञानस्वरूपी आतम पाया ।।
मंगल कलश विराजित करता हूँ जिनराजा ।
परिणामों के प्रक्षालन से सुधरें काजा ।।
ॐ ह्रीं अर्हं कलशस्थापनं करोमि ।
(चारों कोनों में निर्मल जल से भरे कलश स्थापित करें)
जल-फल आठों द्रव्य मिलाकर अर्घ्य बनाया ।
अष्ट अंग युत मानो सम्यग्दर्शन पाया ।।
श्री जिनवर के चरणों में यह अर्घ्य समर्पित ।
करूँ आज रागादि विकारी भाव विसर्जित ।।
ॐ ह्रीं श्री स्नपनपीठस्थिताय जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(पीठ स्थित जिनप्रतिमा को अर्घ्य चढ़ायें)
मैं रागादि विभावों से कलुषित हे जिनवर ।
और आप परिपूर्ण वीतरागी हो प्रभुवर ।।
कैसे हो प्रक्षाल, जगत् के अघ-क्षालक का।
क्या दरिद्र होगा पालक? त्रिभुवन पालक का ।।
भक्ति भाव के निर्मल जल से अघ-मल धोता ।
है किसका अभिषेक भ्रान्त चित खाता गोता ।।
नाथ! भक्तिवश जिन बिम्बों का करूँ न्हवन मैं ।
आज करूँ साक्षात् जिनेश्वर का पर्शन मैं ।।
ॐ ह्रीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपालसन्तं वृषभादिमहावीरपर्यन्तं चतुर्विंशतितीर्थंकर-
परमदेवमाद्यानामाद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे… नाम्निनगरे मासानामुत्तमे
…मासे… पक्षे…दिने मुन्यार्यिकाश्रावकश्राविकाणां सकलकर्मक्षयार्थं
पवित्रतर-जलेन जिनमभिषेचयामि ।
(चारों कलशों से अभिषेक करें तथा वादित्र नाद करायें एवं जय-जय शब्दोच्चारण करें)

प्रतिमा प्रक्षाल पाठ

(दोहा)

क्षीरोदधि-सम नीर से, करूँ बिम्ब प्रक्षाल ।
श्री जिनवर की भक्ति से, जानूँ निज पर चाल ।।
तीर्थंकर का न्ह्वन शुभ, सुरपति करें महान् ।
पंचमेरु भी हो गये, महातीर्थ सुखदान ।।
करता हूँ शुभ भाव से, प्रतिमा का अभिषेक ।
बचूँ शुभाशुभ भाव से, यही कामना एक ।।
जल-फलादि वसु द्रव्य ले, मैं पूजूँ जिनराज ।
हुआ बिम्ब अभिषेक अब, पाऊँ निज पदराज ।।
ॐ ह्रीं अभिषेकान्ते वृषभादिवीरान्तेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
श्री जिनवर का धवल यश, त्रिभुवन में है व्याप्त।
शान्ति करें मम चित्त में, हे परमेश्वर आप्त ।।

(पुष्पांजलि क्षेपण करें)

(रोला)

जिन प्रतिमा पर अमृतसम जल-कण अति शोभित ।
आत्म-गगन में गुण अनन्त तारे भवि मोहित ।।
हो अभेद का लक्ष्य भेद का करता वर्जन ।
शुद्ध वस्त्र से जल-कण का करता परिमार्जन ।।
(प्रतिमा को शुद्ध वस्त्र से पोंछें)

(दोहा)

श्री जिनवर की भक्ति से, दूर होय भव-भार ।
उर-सिंहासन थापिये, प्रिय चैतन्य कुमार ।।
(जिनप्रतिमा को सिंहासन पर विराजमान करें तथा निम्न छन्द बोलकर अर्घ्य चढ़ायें ।)
जल-गन्धादिक द्रव्य से, पूजूँ श्री जिनराज ।
पूर्ण अर्घ्य अर्पित करूँ, पाऊँ चेतनराज ।।
ॐ ह्रीं श्री पीठस्थितजिनाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)

जिन संस्पर्शित नीर यह, गन्धोदक गुण खान ।
मस्तक पर धारूँ सदा, बनूँ स्वयं भगवान् ।।
(मस्तक पर गन्धोदक चढ़ायें । अन्य किसी अंग से गन्धोदक का स्पर्श वर्जित है ।)

विनय पाठ
(ब्र. रवीन्द्रजी आत्मन् कृत)

(दोहा)

सफल जनम मेरा हुआ, प्रभु दर्शन से आज।
भव-समुद्र नहीं दीखता, पूर्ण हुए सब काज।।1।।
दुर्निवार सब कर्म अरु, मोहादिक परिणाम।
स्वयं दूर मुझसे हुए, देखत तुम्हें ललाम।।2।।
संवर कर्मों का हुआ, शान्त हुए गृह-जाल।
हुआ सौख्य सम्पन्न मैं, नहिं आये मम काल।।3।।
भव-कारण मिथ्यात्व का, नाशक ज्ञान-सुभानु।
उदित हुआ मुझमें प्रभो, दीखे आप समान।।4।।
मेरा आत्मस्वरूप जो, ज्ञान सौख्य की खान।
आज हुआ प्रत्यक्ष-सम, दर्शन से भगवान्।।5।।
दीन भावना मिट गई, चिन्ता मिटी अशेष।
निज प्रभुता पाई प्रभो, रहा न दुख का लेश।।6।।
शरण रहा था खोजता, इस संसार मँझार।
निज आतम मुझको शरण, तुमसे सीखा आज।।7।।
निज स्वरूप में मगन हो, पाऊँ शिव अभिराम।
इसी हेतु मैं आपको, करता कोटि प्रणाम।।8।।
मैं वन्दों जिनराज को, धर उर समता भाव।
तन-धन-जन जगजाल से, धरि विरागता भाव।।9।।
यही भावना है प्रभो, मेरी परिणति माहिं।
राग-द्वेष की कल्पना, किंचित् उपजै नाहिं।।10।।

पूजा पीठिका

ॐ जय-जय-जय, नमोऽस्तु-नमोऽस्तु-नमोऽस्तु
अरहंतों को नमस्कार है, सिद्धों को सादर वन्दन।
आचार्यों को नमस्कार है, उपाध्याय को है वन्दन।।
और लोक के सर्वसाधुओं, को है विनय सहित वन्दन।
पंच परम परमेष्ठी प्रभु को, बार-बार मेरा वन्दन।।
ॐ ह्रीं श्रीअनादिमूलमन्त्रेभ्यो नमः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।

(वीरछन्द)

मंगल चार, चार हैं उत्तम, चार शरण में जाऊँ मैं।
मन-वच-काय त्रियोग पूर्वक, शुद्ध भावना भाऊँ मैं।।
श्री अरहंत देव मंगल हैं, श्री सिद्ध प्रभु हैं मंगल।
श्री साधु मुनि मंगल हैं, है केवलि कथित धर्म मंगल।।
श्री अरहंत लोक में उत्तम, सिद्ध लोक में हैं उत्तम।
साधु लोक में उत्तम हैं, है केवलि कथित धर्म उत्तम।।
श्री अरहंत शरण में जाऊँ, सिद्धशरण में मैं जाऊँ।
साधु शरण में जाऊँ, केवलिकथित धर्म शरणा जाऊँ।।
ॐ नमोऽर्हते स्वाहा। पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।
मंगल विधान
अपवित्र हो या पवित्र, जो णमोकार को ध्याता है।
चाहे सुस्थित हो या दुस्थित, पाप-मुक्त हो जाता है।।1।।
हो पवित्र-अपवित्र दशा, कैसी भी क्यों नहिं हो जन की।
परमातम का ध्यान किये, हो अन्तर-बाहर शुचि उनकी।।2।।
है अजेय विघ्नों का हर्ता, णमोकार यह मंत्र महा।
सब मंगल में प्रथम सुमंगल, श्री जिनवर ने एम कहा।।3।।
सब पापों का है क्षयकारक, मंगल में सबसे पहला।
नमस्कार या णमोकार यह, मन्त्र जिनागम में पहला।।4।।

अर्ह ऐसे परं ब्रह्म-वाचक, अक्षर का ध्यान करूँ ।
सिद्धचक्र का सद्बीजाक्षर, मन-वच-काय प्रणाम करूँ ।।5।।
अष्टकर्म से रहित मुक्ति-लक्ष्मी के घर श्री सिद्ध नमूँ।
सम्यक्त्वादि गुणों से संयुत, तिन्हें ध्यान धर कर्म वमूँ ।।6।।
जिनवर की भक्ति से होते, विघ्न समूह अन्त जानो ।
भूत शाकिनी सर्प शांत हों, विष निर्विष होता मानो ।।7 ।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

जिनसहस्रनाम अर्घ्य

मैं प्रशस्त मंगल गानों से, युक्त जिनालय माहिं यजूं।
जल चंदन अक्षत प्रसून चरु, दीप धूप फल अर्घ्य सजूँ ।।
ॐ ह्रीं श्रीभगवज्जिनसहस्रनामेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पूजा प्रतिज्ञा पाठ

(ताटंक)

स्याद्वाद वाणी के नायक, श्री जिन को मैं नमन कराय।
चार अनंत चतुष्टयधारी, तीन जगत् के ईश मनाय ।।
मूलसंघ के सम्यग्दृष्टि, उनके पुण्य कमावन काज ।
करूँ जिनेश्वर की यह पूजा, धन्य भाग्य है मेरा आज ।।1।।
तीन लोक के गुरु जिन-पुंगव, महिमा सुन्दर उदित हुई।
सहज प्रकाशमयी दृग्-ज्योति, जग-जन के हित मुदित हुई ।।
समवशरण का अद्भुत वैभव, ललित प्रसन्न करी शोभा।
जग-जन का कल्याण करे अरु, क्षेम कुशल हो मन लोभा ।।2।।
निर्मल बोध सुधा-सम प्रकटा, स्व-पर विवेक करावनहार।
तीन लोक में प्रथित हुआ जो, वस्तु त्रिजग प्रकटावनहार ।।
ऐसा केवलज्ञान करे, कल्याण सभी जगतीतल का।
उसकी पूजा रचूँ आज मैं, कर्म बोझ करने हलका ।।3 ।।

द्रव्यशुद्धि अरु भाव-शुद्धि, दोनों विधि का अवलंबन कर।
करूँ यथार्थ पुरुष की पूजा, मन-वच-तन एकत्रित कर ।।
पुरुष-पुराण जिनेश्वर अर्हन्, एकमात्र वस्तु का स्थान।
उसकी केवलज्ञान वह्नि में, करूँ समस्त पुण्य आह्वान ।।4 ।।
ॐ ह्रीं यज्ञविधिप्रतिज्ञायै जिनप्रतिमाग्रे पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।
स्वस्ति मंगलपाठ

(चौपाई)

ऋषभदेव कल्याणकराय, अजित जिनेश्वर निर्मल थाय।
स्वस्ति करें संभव जिनराय, अभिनंदन के पूजों पाय ।।1।।
स्वस्ति करें श्री सुमति जिनेश, पद्मप्रभ पद-पद्म विशेष।
श्री सुपार्श्व स्वस्ति के हेतु, चन्द्रप्रभ जन तारन सेतु ।।2 ।।
पुष्पदंत कल्याण सहाय, शीतल शीतलता प्रकटाय ।
श्री श्रेयांस स्वस्ति के श्वेत, वासुपूज्य शिवसाधन हेत ।।3 ।।
विमलनाथ पद विमल कराय, श्री अनंत आनंद बताय ।
धर्मनाथ शिव शर्म¹ कराय, शांति विश्व में शांति कराय ।।4।।
कुंथु और अरजिन सुखरास, शिवमग में मंगलमय आश।
मल्लि और मुनिसुव्रत देव, सकल कर्मक्षय कारण एव ।।5।।
श्री नमि और नेमि जिनराज, करें सुमंगलमय सब काज।
पार्श्वनाथ तेवीसम ईश, महावीर वंदों जगदीश ।।6 ।।
ये सब चौबीसों महाराज, करें भव्यजन मंगल काज।
मैं आयो पूजन के काज, राखो श्री जिन मेरी लाज ।।7 ।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

श्री पंच परमेष्ठी पूजन: पंच परमेष्ठी पूजन | Panch Parmeshthi Puaja - Rajmal ji pavaiya

श्री सिद्ध पूजन: श्री सिद्ध पूजन (आचार्य पद्मनन्दि भावाष्टक, हिन्दी) | Shri Siddh Pujan (Acharya Padmanandi Bhavashtak, Hindi)

श्री पंच बालयति जिन-पूजन: श्री पंच बालयति जिन पूजन (पं. अभयकुमार) | Shri Panch Balyati Jin Pujan (Pt. Abhaykumar)

यन्त्राभिषेक करने का मंत्र
ॐ ह्रीं भूर्भुवः स्वरिह विघ्नौघवारकं यन्त्रं वयं परिषेचयामः।
अमृत स्नान करने का मंत्र
ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृतं द्रावय द्रावय सं सं
क्लीं क्लीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सं स्वाहा।

मंगल कलश स्थापना

ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादि ब्रह्मणे मतेऽस्मिन्
…मासे…पक्षे …तिथौ…वासरे …वर्षे
इह…नगरे…कार्यस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं मण्डपभूमिशुद्ध्यर्थं
पात्रशुद्धयर्थं शान्त्यर्थं पंचरत्नगन्धपुष्पाक्षततादिबीजपूरशोभितं मंगलकलश-
स्थापनं करोम्यहं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा।
रक्षासूत्र बाँधने का मंत्र
ॐ नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष हूँ फट् स्वाहा।

मंगलाचरण

(अनुष्टुप्)

मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ।।

(स्रग्धरा)

त्रैकाल्यं द्रव्य-षट्कं नव-पद-सहितं जीव-षट्काय-लेश्याः
पञ्चान्ये चास्तिकाया व्रत-समिति-गति-ज्ञान-चारित्रभेदाः ।
इत्येतन्मोक्ष-मूलं त्रिभुवन-महितैः प्रोक्तमर्हद्भिरीशैः
प्रत्येति श्रद्दधाति स्पृशति च मतिमान् यः स वै शुद्धदृष्टिः ।।

(हरिगीत)

हे मुक्ति-पथ-नायक महा! तुम जानते सब सृष्टि को।
हे कर्म-गिरि-भेदक ! नमूँ मैं, तव गुणों की प्राप्ति हो।।
काल त्रय अरु द्रव्य लेश्या काय छह छह जिन कहें।
अस्तिकाय-रु समिति व्रत गति ज्ञान पाँच जिनोक्त हैं।।
पदार्थ नव, चारित्र पाँच प्रकार शिवपथ मूल हैं।
श्रद्धा-प्रतीति-स्पर्श जो बुध करें शुद्ध सुदृष्टि हैं।।
चौबीस जिनवर और गुरुवर गणधरों को नमन कर।
कुन्दकुन्दाचार्य स्वामी समय के दाता प्रवर।।
ग्रन्थ-कर्ता उमास्वामी गृद्धपिच्छ कहें जिन्हें।
गणधरों-सम कार्य करते नमूँ उनके चरण मैं।।

अध्याय दश का ज्ञान हो तत्त्वार्थ का श्रद्धान हो।
चैतन्य में उपवास का फल मिले मुनिवर वच अहो।।
सभी टीकाकार मुनिवर चरण की अब लूँ शरण।
विधान रचना हेतु अब मैं करूँ मंगल आचरण।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि*

पीठिका

(दोहा)

चौबीसों जिन पद युगल, पंच प्रभू सिर नाय।
मोक्षशास्त्र इस ग्रन्थ की, पूजा महा रचाय।।

(हरिगीतिका)

शुद्धनय से जीव का, वर्णन समय के सार में।
किन्तु नय व्यवहार से, वर्णन किया इस शास्त्र में।।
प्रभो ! नय-व्यवहार से, परमार्थ का विज्ञान हो।
दृष्टि में ज्ञायक बसे, व्यवहार का बस ज्ञान हो।
कुन्दकुन्दाचार्य के हैं, शिष्य स्वामि-उमा गुरु।
निर्ग्रन्थ-गुरु के ग्रन्थ पढ़, चैतन्य में विचरण करूँ।।
तत्त्व एवं अर्थ का, श्रद्धान परिणति में बसे।
निर्विकल्प प्रतीति से, आनन्द धारा नित बहे।।
जीव की पहचान भेदों, और भावों से कही।
देह इन्द्रिय योनि अरु त्रय लोक का वर्णन सही।।
सदभूत नहिं व्यवहार यह, पर अनुपचरित इसे कहें।
परमार्थ समझाने अरे ! इस भाँति जिन वर्णन करें।।
* स्वयं सामग्री चढ़ाते समय ‘क्षिपामि’ एवं दूसरों को निर्देश देते समय ‘क्षिपेत्’ बोलना चाहिए।

बन्ध आस्रव कहे संवर, निर्जरा विस्तार से।
क्योंकि प्रतिपादन कहा, परमार्थ का व्यवहार से।।
अतः इस व्यवहार को, उपचार मात्र सुजान कर।
परमार्थ को भूतार्थ लख, आश्रय करूँ इसका प्रवर।।
इस ग्रन्थ की टीका लिखीं, गम्भीर बहु आचार्य ने।
सर्वार्थसिद्धि राजवार्तिक, श्लोकवार्तिक आदि हैं।।
सिद्धान्त जिनवरकथित, पद्धति-न्याय से वर्णन किये।
हे प्रभो! इस रूप में, अब तुम बसो मेरे हिये।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

हे प्रभो चरणों में तेरे…
हे प्रभो ! चरणों में, तेरे आ गये;
भावना अपनी का फल, हम पा गये ।। टेक ।।
वीतरागी हो, तुम्हीं सर्वज्ञ हो;
सप्त तत्त्वों के, तुम्हीं मर्मज्ञ हो।
मुक्ति का मारग, तुम्हीं से पा गये;
हे प्रभु! चरणों में, तेरे आ गये ।। 1।।
विश्व सारा ही, झलकता ज्ञान में;
किन्तु प्रभुवर लीन हैं निज ध्यान में।
ध्यान में निज-ज्ञान को, हम पा गये;
हे प्रभु! चरणों में, तेरे आ गये ।। 2।।
तुमने बताया, जगत् के सब आत्मा;
द्रव्य-दृष्टि से, सदा परमात्मा ।
आज निज परमात्मा, पद पा गये;
हे प्रभु! चरणों में, तेरे आ गये।। 3।।

श्री तत्त्वार्थसूत्र पूजन

प्रूफरीडिंग बाकी है

स्थापना

(मरहठा माधवी)

वन्दन श्री चौबीस जिनेश्वर, विचरें मम श्रद्धान में।
जिनका केवलज्ञान सुशोभित, होता मम श्रुतज्ञान में।।
आओ श्री जिनराज पधारो, मम अन्तर्मुख ज्ञान में।
मम परिणति में सदा विराजो, स्व-संवेदन ज्ञान में।।
तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता श्री गुरुवर, उमास्वामि आचार्य हैं।
पूज्यपाद अकलंक देव, विद्यानन्दि मुनिराज ने।।
अति गम्भीर लिखी टीकाएँ, वनवासी निर्ग्रन्थ ने।
भाव सहित उर में धारण कर, विचरूँ मैं शिवपंथ में।।
प्रभो आज मैं अन्तर्मुख हो, नित्य निरंजन नाथ को।
निरखूँ और निहारूँ निज में, निज परिणति का वास हो।।
दश अध्यायों से शोभित, तत्त्वार्थसूत्र इस ग्रन्थ का।
आह्वानन स्थापन सन्निधि-करण करूँ शिवपन्थ का।।
ॐ ह्रीं महाशास्त्र-श्रीतत्त्वार्थसूत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (इत्याह्वानम्)
ॐ ह्रीं महाशास्त्र-श्रीतत्त्वार्थसूत्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (इति स्थापनम्)
ॐ ह्रीं महाशास्त्र-श्रीतत्त्वार्थसूत्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (इति
सन्निधिकरणम्) परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।

अष्टक

(वीरछन्द)

चिर मिथ्यात्व महा मल से मेरी परिणति में भव-जंजाल।
सप्त तत्त्व श्रद्धानरूप जल से अब करूँ मोह प्रक्षाल।।

समुच्चय पूजन

वीतराग सर्वज्ञ और हित-उपदेशी को करूँ नमन।
अहो ! ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता के वन्दूँ युगल-चरण।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा।
पर से सुखी-दुखी मैं होता, यह अनादि दुर्गन्ध रही।
अब सम्यक् प्रतीति बल से प्रभु, चिर कुवासना शीघ्र नशी।।
वीतराग सर्वज्ञ और हित-उपदेशी को करूँ नमन।
अहो ! ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता के वन्दूँ युगल-चरण।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं
निर्वपामीति स्वाहा।
क्षत-विक्षत परिणामों में, एकत्व बुद्धि से दुखी हुआ।
प्रभो ! आज अक्षत निजात्म-दर्शन से सुख का बिन्दु चखा।।
वीतराग सर्वज्ञ और हित-उपदेशी को करूँ नमन।
अहो ! ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता के वन्दूँ युगल-चरण।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान्
निर्वपामीति स्वाहा।
यह अत्यन्त अतृप्त वासना, है अनादि से व्याप रही।।
अब यथार्थ श्रद्धान-सुमन की, गन्ध ज्ञान में प्रकट हुई।।
वीतराग सर्वज्ञ और हित-उपदेशी को करूँ नमन।
अहो ! ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता के वन्दूँ युगल-चरण।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं
निर्वपामीति स्वाहा।
भोगे भोग अनन्त प्रभो! पर, भोग-वासना नहीं मिटी।
चिदानन्द रस स्वाद चखूँ अब, परम तृप्ति की राह मिली।।

वीतराग सर्वज्ञ और हित-उपदेशी को करूँ नमन।
अहो ! ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता के वन्दूँ युगल-चरण।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय क्षुधारोगविध्वंसनाय नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा।
मोह-तिमिर से ग्रस्त ज्ञान में, ज्ञान-स्वभाव न भासित हो।
अब यथार्थ श्रद्धान ज्योति में, ज्ञायकभाव प्रकाशित हो।।
वीतराग सर्वज्ञ और हित-उपदेशी को करूँ नमन।
अहो ! ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता के वन्दूँ युगल-चरण।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं
निर्वपामीति स्वाहा।
राग-द्वेष के कीट पतंगों से, मम परिणति त्रस्त हुई।।
प्रभो! आज चैतन्य-सुरभि की, अनुभूति में मस्त हुई।।
वीतराग सर्वज्ञ और हित-उपदेशी को करूँ नमन।
अहो ! ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता के वन्दूँ युगल-चरण।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं
निर्वपामीति स्वाहा।
मिथ्या श्रद्धा के फल में प्रभु ! दुख अनन्त मैं भोग रहा।
दर्शन-मूल धर्म-तरु के फल में प्रभु ! सुख अनन्त देखा।।
वीतराग सर्वज्ञ और हित-उपदेशी को करूँ नमन।
अहो ! ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता के वन्दूँ युगल-चरण।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय मोक्षफलप्राप्तये फलं
निर्वपामीति स्वाहा।
जड़ वैभव में सुख की मधुर कल्पना वर्त रही जिनराज।
प्रभु ! निज वैभव निज में लखकर, पाऊँ निज अनर्घ्य पद आज।।

वीतराग सर्वज्ञ और हित - उपदेशी को करूँ नमन।
अहो ! ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र-कर्ता के वन्दूँ युगल-चरण।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

(हरिगीतिका)

अध्याय दश में तत्त्व का, वर्णन किया आचार्य ने।
व्यवहार से दिखला दिया है, मुक्ति-पथ आचार्य ने।।
उसमें छिपे परमार्थ को, अर्पण करूँ यह अर्घ्य है।
क्योंकि उसके लक्ष्य से ही, प्रकट पद अन्-अर्घ्य है।।
ॐ ह्रीं श्री उमास्वामिविरचित-तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।
अर्ध्यावलि
(यदि समय की अनुकूलता होवे तो विधान के समय मूल सूत्रों का भी
पाठ किया जाये।)

(दोहा)

नव तत्त्वों के भेद को, जीव कहे व्यवहार।
किन्तु शुद्ध चैतन्य ही, नव तत्त्वों में सार।।
यही शुद्ध परमार्थ ही, पद अनर्घ्य सुखदाय।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, चरणन शीश नवाय।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

।। अथ प्रथमोऽध्यायः ।।

जीव तत्त्व के अन्तर्गत मतिज्ञान आदि पाँच ज्ञानों का
संक्षिप्त वर्णन

(दोहा)

चेतन लक्षण ज्ञान के, भेद अनेक दिखाय।
किन्तु अभेद स्वभाव के, आश्रय से शिव पाय।।
स्याद्वाद से शोभता, जिन-शासन जयवन्त।
अनेकान्तमय आत्मा, जान लहूँ भव-अन्त।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

मोक्षमार्ग, सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति, सात तत्त्व एवं चार निक्षेपों के नाम
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि-मोक्षमार्गः ।।1।।
तत्त्वार्थ-श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ।।2।। तन्निसर्गादधिगमाद्वा ।।3।।
जीवाजीवास्रव-बन्ध-संवर-निर्जरा-मोक्षास्तत्त्वम्।।4।।
नाम-स्थापना-द्रव्य-भावतस्तन्न्यासः ।।5।।

(वीरछन्द)

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरणमय एक मात्र शिवपुर का पंथ।
तत्त्वार्थों की श्रद्धा समकित अधिगम से या होय स्वयं।।
जीव अजीव आस्रव बन्ध-रु संवर निर्जर मोक्ष सुतत्त्व।
नाम स्थापन द्रव्य भाव ये चार प्रकार कहे निक्षेप।।1।।
ॐ ह्रीं श्री मोक्षमार्ग-सम्यग्दर्शनोत्पत्ति-तत्त्व-निक्षेप-स्वरूप-प्रकाशकाय
तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

तत्त्वार्थों के जानने के विभिन्न उपाय
प्रमाणनयैरधिगमः।।6।।
निर्देश-स्वामित्व-साधनाधिकरण-स्थिति-विधानतः ।।7।।
सत्संख्या-क्षेत्र-स्पर्शन-कालान्तर-भावाल्पबहुत्वैश्च ।।8।।
नय-प्रमाण एवं निर्देश तथा स्वामित्व-रु साधन से।
काल और आधार तथा भेदों से ये जाने जाते।।
सत् संख्या अरु क्षेत्र स्पर्शन काल और अन्तर से जान।
भाव और हीनाधिकता से होता है तत्त्वों का ज्ञान।।2।।
ॐ ह्रीं श्री तत्त्वार्थाधिगमोपाय-प्रकाशकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।

प्रमाण ज्ञान के भेद, मतिज्ञान के नामान्तर एवं निमित्त का कथन
मति-श्रुतावधि-मनःपर्यय-केवलानि ज्ञानम्।।9।।
तत्प्रमाणे।।10।। आद्ये परोक्षम्।।11।। प्रत्यक्षमन्यत्।।12।।
मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताऽभिनिबोध इत्यनर्थान्तरम्।।13।।
तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ।।14।।
मति-श्रुत-अवधि-मनःपर्यय अरु केवल – ये हैं ज्ञान प्रमाण।
मति-श्रुत उभय परोक्ष ज्ञान हैं, शेष तीन प्रत्यक्ष सुजान।।
मति-स्मृति-संज्ञा-चिन्ता अरु अभिनिबोध जानो मतिज्ञान।
मन अरु इन्द्रिय के निमित्त से भी हो जाता है मतिज्ञान।।3।।
ॐ ह्रीं श्री प्रमाणभेद-मतिज्ञाननामान्तर-निमित्त-प्रकाशकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

मतिज्ञान की उत्पत्ति, विषय और भेदों का वर्णन

अवग्रहेहावाय-धारणाः।।15।।
बहु-बहुविध-क्षिप्रानिःसृतानुक्त-ध्रुवाणां सेतराणाम्।।16।।
अर्थस्य ।।17।। व्यञ्जनस्यावग्रहः ।।18।।
न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ।।19।।
अवग्रह ईहा अवाय धारणा – इस क्रम से होता मतिज्ञान।
बहु बहुविध अरु शीघ्र अप्रकट अकथित ध्रुव छह भेद सुजान।।
इन सबके प्रतिपक्ष स्वरूपी सब मिल बारह भेद जु अर्थ।
अस्पष्ट का मात्र अवग्रह, चक्षु और मन से नहिं ज्ञात।।4।।
ॐ ह्रीं श्री मतिज्ञानोत्पत्ति-विषय-भेद-प्रकाशकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

श्रुतज्ञान की उत्पत्ति और भेद तथा अवधि और मनःपर्ययज्ञान के भेद

श्रुतं मतिपूर्वं द्व्यनेक-द्वादशभेदम् ।।20।।
भवप्रत्ययोऽवधिर्देव-नारकाणाम्।।21।।
क्षयोपशम-निमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम् ।।22।।
ऋजु-विपुलमती मनःपर्ययः ।।23।।
मतिपूर्वक ही श्रुत होता है, दो अनेक अरु बारह भेद ।
सुर-नारक के अवधिज्ञान में, भव ही कारण कहें जिनेश।।
नर-पशुओं को क्षयोपशम से, होता है छह भेदों युक्त।
ऋजुमति और विपुलमति दो हैं, मनपर्यय के भेद सुयुक्त।।5।।
ॐ ह्रीं श्री श्रुतावधि-मनःपर्ययभेद-प्रकाशकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।

अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान में विशेषता तथा मति, श्रुत, अवधि और
मनःपर्ययज्ञान के विषय

विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ।।24।।
विशुद्धि-क्षेत्र-स्वामि-विषयेभ्योऽवधि-मनः पर्यययोः ।।25।।
मति-श्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ।।26।।
रूपिष्ववधेः ।।27।।
तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ।।28।।
सुविशुद्धि अरु अप्रतिपाती से विशेषता है इनमें।
क्षेत्र विशुद्धि स्वामी अरु विषय अपेक्षा भिन्न कहे दोनों।।
कुछ पर्यायों सहित सभी द्रव्यों को जाने मति-श्रुतज्ञान।
अवधिज्ञान रूपी को जाने भाग अनन्ता चौथा ज्ञान।।6।।
ॐ ह्रीं श्री अवधिमनःपर्ययविशेष-क्षयोपशमज्ञानविषय-प्रकाशकाय
तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

केवलज्ञान का विषय, एक साथ होनेवाले ज्ञानों का नियम तथा
मिथ्याज्ञान का वर्णन

सर्वद्रव्य-पर्यायेषु केवलस्य ।।29।।
एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्थ्यः ।।30।।
मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ।।31।।
सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत्।।32।।
सकल द्रव्य-गुण-पर्यायों को विषय बनाता केवलज्ञान।
एक जीव को एक साथ हो सकें एक दो त्रय चउ ज्ञान।।
मति-श्रुत-अवधि विपर्यय भी हों मानें असत् और सत् एक।
मनमानी से ग्रहण करें उन्मत्त समान लहें बहु खेद।।7।।

ॐ ह्रीं श्री केवलज्ञानविषय-युगपत्ज्ञान-सद्भाव-मिथ्याज्ञान-
स्वरूप-प्रकाशकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

नैगमादि सप्त नयों के नाम
नैगम-संग्रह-व्यवहारर्जुसूत्र-शब्द-समभिरूढैवंभूता नयाः।।33।।

(हरिगीत)

नैगम तथा संग्रह सहित व्यवहार अरु ऋजुसूत्र नय।
शब्द समभिरूढ़ एवंभूत जानो सप्त नय।।४।।
ॐ ह्रीं श्री सप्तनयाभिधानप्रकाशकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।।7।।

महाऽर्घ्य

मति श्रुत अवधि मनःपर्यय अरु केवल, भेद कहे जिसके।
किन्तु सभी ये अभिनन्दन में अर्पित एक ज्ञान पद के।।
पाँच भेद का अर्घ्य समर्पित करके लखूँ शुद्ध चिद्रूप।
दर्श-ज्ञान-चारित्र अर्घ्य अर्पित कर लखूँ अनर्घ्य स्वरूप।।
ॐ ह्रीं श्री प्रमाण-नय-निक्षेप-स्वरूपप्ररूपकाय प्रथमाधिकारसमन्वित-
तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

नय प्रमाण निक्षेप से, जानूँ सकल पदार्थ।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, भासे निज परमार्थ।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।

द्वितीय अध्याय

।। अथ द्वितीयोऽध्यायः।।

जीव के पाँच भाव तथा जन्मस्थान आदि का वर्णन

(दोहा)

चार भाव से भिन्न है, पावन पंचम भाव।
जन्म-मरण जिसमें नहीं, ज्ञायक एक स्वभाव।।
मैं ज्ञायक चैतन्य हूँ, परम-अकर्ता नाथ।
परिणति में निज भाव का, कभी न छूटे साथ।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

जीव के पाँच भाव एवं प्रथम दो भावों के भेदों के नाम
औपशमिक-क्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिक-
पारिणामिकौ च।।१।।
द्वि-नवाष्टादशैकविंशति-त्रिभेदाः यथाक्रमम्।।२।।
सम्यक्त्व-चारित्रे।।३।।
ज्ञान-दर्शन-दान-लाभ-भोगोपभोग-वीर्याणि च।।४।।
उपशम क्षायिक मिश्र और औदयिक पारिणामिक निज भाव।
क्रमशः दो नौ भेद अठारह एकबीस त्रय चेतन भाव।।
उपशम के समकित चारित द्वय क्षायिक के हैं दर्शन ज्ञान-
दान लाभ भोगोपभोग बल समकित चारित भेद सुजान।।१।।
ॐ ह्रीं श्री जीवभावभेदप्रभेदौ-औपशमिक-क्षायिकभाव-भेदाभिधान-
प्रतिपादकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

क्षायोपशमिक और औदयिक भाव के भेदों के नाम
ज्ञानाज्ञान-दर्शन-लब्धयश्चतुस्त्रि-त्रि-पंचभेदाः
सम्यक्त्व-चारित्र-संयमासंयमाश्च।।5।।
गति-कषाय-लिंग-मिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्ध-लेश्याश्चतु-
श्चतुस्त्र्येकैकैकैक-षड्भेदाः।।6।।
ज्ञान चार अज्ञान तीन त्रय दर्शन और लब्धियाँ पाँच।
समकित चारित और संयमासंयम भाव क्षयोपशम जान।।
गति कषाय लिंग चार चार त्रय मिथ्यादर्शन इक अज्ञान।
एक असंयम असिद्धत्व लेश्या छह उदयिक इक्किस मान।।2।।
ॐ ह्रीं श्री क्षायोपशमिक-औदयिकभाव-भेदाभिधान-प्रतिपादकाय
तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पारिणामिक भाव के भेद तथा जीव का लक्षण और भेद-प्रभेद
जीवभव्याभव्यत्वानि च।।7।। उपयोगो लक्षणम्।।8।।
स द्विविधोऽष्ट-चतुर्भेदः।।9।। संसारिणो मुक्ताश्च।।10।।
समनस्काऽमनस्काः।।11।। संसारिणस्त्रस-स्थावराः।।12।।
पृथिव्यप्तेजो-वायु-वनस्पतयः स्थावराः।।13।।
भव्य अभव्य तथा जीवत्व भेद पारिणामिक के तीन।
दर्शन-ज्ञान जीव का लक्षण चार-आठ हैं भेद सही।।
संसारी अरु मुक्तजीव हैं संसारी मन सहित-अमन।
संसारी त्रस, थावर-भू जल अग्नि वनस्पति और पवन।।3।।
ॐ ह्रीं श्री पारिणामिकभाव-भेदाभिधान-जीवलक्षण-भेदप्रभेद-प्रतिपादकाय
तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

त्रसजीव एवं इन्द्रियों के भेद-प्रभेदों का कथन
द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः।।14।। पंचेन्द्रियाणि।।15।। द्विविधानि।।16।।
निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम्।।17।। लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम्।।18।।
स्पर्शन-रसन-घ्राण-चक्षुः-श्रोत्राणि।।19।।
दो त्रय चार पाँच इन्द्रिययुत त्रस हैं, इन्द्रिय होती पाँच।
दो प्रकार की हैं, द्रव्येन्द्रिय, निर्वृत्ति और उपकरण सुजान।
लब्धि और उपयोग जानिये भावेन्द्रिय के भेद अहो।
पर्शन रसना घ्राण चक्षु अरु श्रोत्र पाँच इन्द्रियाँ कहो।।4।।
ॐ ह्रीं श्री त्रसभेद-इन्द्रिय-भेदप्रभेद-प्रतिपादकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

इन्द्रियों के विषय, स्वामी तथा विग्रहगति का उल्लेख
स्पर्श-रस-गन्ध-वर्ण-शब्दास्तदर्थाः।।20।।
श्रुतमनिन्द्रियस्य।।21।। वनस्पत्यन्तानामेकम्।।22।।
कृमि-पिपीलिका-भ्रमर-मनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि।।23।।
संज्ञिनः समनस्काः।।24।। विग्रहगतौ कर्मयोगः।।25।।
फरस तथा रस गन्ध वर्ण अरु शब्द विषय हैं इन्द्रिय के।
श्रुत को विषय बनाता है मन थावर की हैं इन्द्रिय एक।।
एक-एक इन्द्रिय बढ़ती कृमि चींटी भँवरा मनुजों में।
संज्ञी हैं मन सहित और हो कर्म योग विग्रह गति में।।5।।
ॐ ह्रीं श्री इन्द्रियाणां विषय-स्वामी-विग्रहगति-प्रतिपादकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जीवों की गति अनाहारकत्व एवं जन्म के भेदों का कथन
अनुश्रेणि गतिः।।26।। अविग्रहा जीवस्य।।27।।
विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्थ्यः।।28।।
एक समयाऽविग्रहा।।29।। एकं द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः।।30।।
सम्मूर्छन-गर्भोपपादा जन्म।।31।।
नभ प्रदेश श्रेणी में गति हो मुक्त जीव की सरल गति।
संसारी की वक्र, सरल भी, चार समय के पूर्व कही।
एक समय में सरल गति है इक दो त्रय तक अनहारी।
सम्मूर्छन अरु गर्भ तथा उपपाद जन्म लें संसारी।।6।।
ॐ ह्रीं श्री जीवस्य गतिभाव-जन्मभेदप्रभेदान् प्रतिपादकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जीवों की योनि, जन्म प्रक्रिया एवं शरीर के भेदों का कथन
सचित्त-शीत-संवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः।।32।।
जरायुजाण्डज-पोतानां गर्भः।।33।।
देव-नारकाणामुपपादः।।34।।
शेषाणां सम्मूर्छनम्।।35।।
औदारिक-वैक्रियिकाहारक-तैजस-कार्मणानि शरीराणि।।36।।
शीत-सचित्त-ढँकी, अरु इनसे इतर, मिश्र नौ योनि कही।
अण्डज पोत जरायुज - ये सब जीव जन्मते गर्भ सहित।
सुर-नारक उपपाद जन्म लें सम्मूर्छन हैं शेष सभी।
औदारिक वैक्रिय आहारक तैजस अरु कार्माण शरीर।।7।।
ॐ ह्रीं श्री योनि-जन्म-शरीर-भेदप्रतिपादकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।

शरीरों की सूक्ष्मता एवं एक साथ होने का नियम
परं परं सूक्ष्मम्।।37।।
प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक् तैजसात्।।38।।
अनन्तगुणे परे।।39।। अप्रतीघाते।।40।।
अनादिसम्बन्धे च।।41।। सर्वस्य।।42।।
तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्थ्यः।।43।।
क्रमशः अधिक सूक्ष्म हैं सब तन, प्रदेश असंख्यगुणे तन तीन।
अन्तिम दो तन के प्रदेश अनन्त गुणे अप्रतिघाती।।
हैं अनादि से ये दोनों तन सभी जीव के रहते संग।
कम से कम ये दो तन और अधिकतम चार रहें इक संग।।8।।
ॐ ह्रीं श्री शरीरसूक्ष्मत्व-युगपत्सद्भाव-प्रतिपादकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
शरीरों की विशेषता एवं स्वामित्व का वर्णन
निरुपभोगमन्त्यम्।।44।। गर्भ-सम्मूर्छनजमाद्यम्।।45।।
औपपादिकं वैक्रियिकम्।।46।। लब्धि-प्रत्ययं च।।47।।
तैजसमपि।।48।।
शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव।।49।।
निरुपभोग है अन्तिम तन गर्भज सम्मूर्छन को पहला।
उपपाद जन्म में वैक्रिय तन, यह लब्धि विशेष से भी होता।।
तैजस भी लब्धि से होता आहारक शुभ और विशुद्ध।
होता है प्रमत्त संयत मुनिवर को यह व्याघात रहित।।9।।
ॐ ह्रीं श्री शरीराणां वैशिष्ट्यप्रतिपादकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।

तीनों वेदों के स्वामी और अनपवर्त्य आयु वाले जीवों का वर्णन
नारक-सम्मूच्छिनो नपुंसकानि।।50।।
न देवाः।।51।। शेषास्त्रिवेदाः।।52।।
औपपादिक-चरमोत्तमदेहाऽसंख्येय-वर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः।।53।।

(हरिगीतिका)

नारकी - सम्मूर्छन होते नपुंसक, सुर नहीं।
शेष सबको तीन लिंग हो सकें कहते जिन यही।।
औपपादिक, चरम-उत्तम तन, असंख्यों वर्ष की।
हो आयु जिनकी उन्हें अपवर्तन नहीं होता कभी।।10।।
ॐ ह्रीं श्री त्रिवेद-अनपवर्त्यायुषविशिष्टजीवप्रतिपादकाय तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

औपशमिक क्षायिक क्षयोपशम औदायिक ये चारों भाव।
पर-स्वभाव पर-द्रव्य कहे हैं मैं तो पूजित पंचम भाव।।
नहिं प्रमत्त-अप्रमत्त सदा जो भेदों से भी भिन्न स्वरूप।
दर्श-ज्ञान-चारित्र अर्घ्य अर्पित कर लखूँ अनर्घ्य स्वरूप।।
ॐ ह्रीं श्री जीवतत्त्वार्थभेद-प्रभेदप्ररूपकाय द्वितीयाध्यायसमन्वित-
तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

पाँच भाव में श्रेष्ठ इक, त्रैकालिक ध्रुव भाव।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, रमूँ सदा निज भाव।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।

तृतीय अध्याय

।। अथ तृतीयोऽध्यायः।।

अधोलोक एवं मध्यलोक का परिचय

(दोहा)

निज विस्मृति से प्राप्त हों, नर-नारक पर्याय।
निज दर्शन से शीघ्र हो, शाश्वत शिव पर्याय।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

सात नरकों के नाम एवं बिलों की संख्या
रत्न-शर्करा-बालुका-पंक-धूम-तमो-महातमःप्रभा भूमयो
घनाम्बु-वाताकाश-प्रतिष्ठाः सप्ताऽधोऽधः।।1।।
तासु त्रिंशत्पञ्चविंशति-पञ्चदश-दश-त्रि-पञ्चोनैक-नरक-शत-
सहस्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम्।।2।।
रत्न शर्करा बालु पंक अरु धूमप्रभा तम महातमा।
घन अम्बु तनु-वात वलय नीचे-नीचे भू सप्त कहा।।
तीस पचीस पन्द्रह, दस अरु तीन लाख बिल पंचम तक।
छठवें में कम पाँच लाख इक, सप्तम में बिल पाँच निरख।।11।।
ॐ ह्रीं अधोलोकस्थित-सप्तभूमयः तेषां बिलसंख्या-प्ररूपकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नारकियों की उत्कृष्ट आयु और मध्यलोक का वर्णन
नारका नित्याशुभतरलेश्या-परिणाम-देह-वेदना-विक्रियाः।।3।।
परस्परोदीरित-दुःखाः।।4।।

संक्लिष्टाऽसुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः।।5।।
तेष्वेक-त्रि-सप्त-दश- सप्तदश-द्वाविंशति-त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा
सत्त्वानां परा-स्थितिः ।।6।।
जम्बूद्वीप-लवणोदादयः शुभनामानो द्वीप-समुद्राः।।7।।
द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्व-पूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः।।8।।
तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजन-शत-सहस्र-विष्कम्भो जम्बूद्वीपः।।9।।

  • नित्य अशुभतर लेश्या अरु परिणाम देह वेदना अहो।
    तथा विक्रिया इनकी होती दुख दें एक दूसरे को।।
    तीजे तक इनको दुख देते असुर कुमार महासंक्लिष्ट।
    एक तीन अरु सात तथा दस सत्रह अरु बाइस तेतीस।।2।।
  • सागर नारकियों की आयु कही जिनागम में उत्कृष्ट।
    मध्य लोक में जम्बू लवणोदधि आदि शुभ द्वीप समुद्र -
    पूर्व पूर्व को घेर रहे दूने विस्तृत चूड़ीवत् जान।
    सब द्वीपों के बीच लाख योजन का मेरु नाभि समान।।3।।
    ॐ ह्रीं नारकवैशिष्ट्य-दुःख-उत्कृष्टायुप्ररूपकाय मध्यलोकप्ररूपकाय च
    श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
    जम्बूद्वीप के सात क्षेत्र और छह पर्वतों के नाम
    भरत-हेमवत-हरि-विदेह-रम्यक-
    हैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि।।10।।
    तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषध-नील-रुक्मि-
    शिखरिणो वर्षधर-पर्वताः ।।11।।
    भरत हैमवत् हरि विदेह रम्यक हैरण्य-रु ऐरावत।
    सात क्षेत्र जम्बू सुद्वीप में इन्हें बाँटते छह पर्वत।।

तृतीय अध्याय

हिमवन तथा महाहिमवन गिरि निषध नील रुक्मि शिखरी।
पूरब से पश्चिम तक फैले सदा सुशोभित उन्नत गिरि।।4।।
ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्य सप्तक्षेत्र-षट्पर्वतप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
छह पर्वतों का स्वरूप
हेमार्जुन-तपनीय-वैडूर्य-रजत- हेममयाः ।।12।।
मणिविचित्र-पार्वा उपरि-मूले च तुल्य-विस्ताराः।।13।।
स्वर्ण रजतमय और तप्त सोने के हैं शोभित गिरि तीन।
नीलमणि चाँदी सोने के शोभित होते हैं गिरि तीन।।
ऊपर नीचे और मध्य में है विस्तार एक जैसा,
सभी पर्वतों का तट चित्र-विचित्र सुशोभित मणियों का।।5।।
ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्य षट्पर्वत-स्वरूपप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
छह सरोवरों के नाम एवं पद्म सरोवर का क्षेत्रफल
पद्म-महापद्म-तिगिञ्छ- केसरि-महापुण्डरीक-पुण्डरीका
हृदास्तेषामुपरि ।।14।।
प्रथमो योजन-सहस्रायामस्तदर्ध-विष्कम्भो हृदः ।।15।।
दशयोजनावगाहः।।16।। तन्मध्ये योजनं पुष्करम्।।17।।
पद्म सरोवर महापद्म अरु तिगिंछ केसरी महापुण्डरीक।
पुण्डरीक नामक छह सरवर से शोभित ये छहों गिरि।।
पद्म सरोवर इक सहस्र योजन लम्बा आधा चौड़ा।
दश योजन गहरा है उसके बीच कमल इक योजन का।।6।।
ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थ-षट्पर्वतोपरि पद्मसरोवर-क्षेत्रफल-प्ररूपकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

शेष सरोवरों के नाम, कमलों का विस्तार तथा देवियों के नाम
तद्विगुणद्विगुणा हृदाः पुष्कराणि च।।18।।
तन्निवासिन्यो देव्यः श्री-ह्री-धृति-कीर्ति-बुद्धि-लक्ष्म्यः पल्योपम-
स्थितयः ससामानिक-पारिषत्काः।।19।।
शेष सरोवर और कमल हैं दूने-दूने पिछले से।
श्री ही धृति कीर्ति बुद्धि अरु लक्ष्मी देवी हैं इनमें।।
ये सामानिक और पारिषद देवों के संग रहती हैं।
मात्र एक पल्योपम आयु इनकी कही जिनागम में।।7।।
ॐ ह्रीं शेषसरोवर-क्षेत्रफल-षट्देव्यभिधान-प्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चौदह नदियों के नाम और उनके बहने की दिशा का वर्णन
गंगा-सिन्धु-रोहिद्रोहितास्या-हरिद्धरिकान्ता-सीता-सीतोदा-नारी-
नरकान्ता-सुवर्ण-रूप्यकूला-रक्ता-रक्तोदाः
सरितस्तन्मध्यगाः।।20।।
द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः।।21।।
शेषास्त्वपरगाः।।22।।
गंगा-सिन्धु रोहित-रोहितास्या हरित-हरिकान्ता।
सीता-सीतोदा नारी-नरकान्ता स्वर्ण-रूप्यकूला।।
रक्ता-रक्तोदा ये चौदह नदियाँ बहती सरवर से।
पहली बहती पूर्व दिशा में दूजी बहती पश्चिम में।।8।।
ॐ ह्रीं चतुर्दशनदी-प्रवाहप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा।

तृतीय अध्याय

सहायक नदियों का कथन एवं भरत आदि क्षेत्रों का विस्तार
चतुर्दश-नदी-सहस्र-परिवृता गंगा-सिन्ध्वादयो नद्यः।।23।।
भरतः षड्विंशति-पञ्चयोजन-शतविस्तारः षट् चैकोनविंशति-
भागा योजनस्य।।24।।
तद्-द्विगुण-द्विगुणविस्तारा वर्षधर-वर्षा विदेहान्ताः।।25।।
सहस चतुर्दश नदियों से हैं घिरी गंग-सिन्धु नदियाँ।
पाँच शतक छब्बिस योजन अरु उन्नीस में से भाग छठा-
भरत क्षेत्र का इतना है विस्तार वचन जिन आगम का।
क्षेत्र विदेह तक है विस्तार जानिये सब दूना-दूना।।9।।
ॐ ह्रीं चतुर्दशनदीपरिवार-भरतक्षेत्रादि-विस्तारप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जम्बूद्वीप का विभाग एवं काल परिवर्तन
उत्तरा दक्षिणतुल्याः।।26।।
भरतैरावतयोर्वृद्धिह्वासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम्।।27।।
ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः।।28।।
उत्तर दक्षिण में क्षेत्रादिक सबका है विस्तार समान।
भरतैरावत में होती है हानि-वृद्धि छह काल सुजान।।
अवसर्पिणि-उत्सर्पिणि कालों द्वारा होता परिर्वतन।
भरतैरावत के अतिरिक्त कहीं नहिं होता परिवर्तन।।10।।
ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्य उत्तरदक्षिणविभाग-कालप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सात क्षेत्रों में जीवों की उत्कृष्ट आयु और जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र का विस्तार
एक-द्वि-त्रि-पल्योपमस्थितयो हैमवतक-
हारिवर्षक-दैवकुरवकाः।।29।।
तथोत्तराः।।30।।
विदेहेषु संख्येयकालाः।।31।।
भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः।।32।।
हैमवतक हरि देवकुरु में इक द्वय त्रय पल्योपम आयु।
हैरण्यवतक रम्यक् उत्तर कुरु में भी इसी तरह की आयु।।
नर-तिर्यंचों की विदेह में आयु वर्ष कही संख्यात।
इक शत नब्बे भाग द्वीप जम्बू का भरतक्षेत्र विस्तार।।11।।
ॐ ह्रीं सप्तक्षेत्रनिवासिनः जीवानामायुप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अन्य क्षेत्रों का विस्तार, मनुष्यों की उत्पत्ति एवं भेदों का वर्णन
द्विर्धातकीखण्डे।।33।। पुष्करार्द्धे च।।34।।
प्राङ् मानुषोत्तरान्मनुष्याः।।35।।
आर्या म्लेच्छाश्च।।36।।
खण्ड धातकी में सब रचना जम्बूद्वीप से दूनी हैं।
पुष्करार्ध में भी सब रचना जम्बूद्वीप से दूनी हैं।।
मानुषोत्तर के पहले तक ही मानव हो सकते हैं।
आर्य-म्लेच्छ - इन दो रूपों में मनुजों के दो भेद कहे।।12।।
ॐ ह्रीं धातकी-पुष्करार्धद्वीपरचना-मनुष्यगमननियम-भेदप्ररूपकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मनुष्य-तिर्यंचों की उत्कृष्ट और जघन्य आयु का वर्णन
भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः।।37।।
नृस्थिती परावरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते।।38।।
तिर्यग्योनिजानां च।।39।।
भरतैरावत अरु विदेह में कर्मभूमि पन्द्रह मानो।
देवकुरु-उत्तरकुरु में नहिं कर्मभूमि होती जानो।।
मनुजों की उत्कृष्ट पल्य त्रय आयु जघन अन्तर्मुहुरत।
तिर्यंचों की भी आयु इतनी ही होती मानववत्।।13।।
ॐ ह्रीं कर्मभूमि-भोगभूमिनिवासिनः मनुष्यतिर्यंचानां जघन्योत्कृष्टायुप्ररूपकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

मध्य लोक में द्वीप असंख्यों ढाई द्वीप में है नर लोक।
दुर्लभ नर भव पाकर हे जिन ! लखूँ ज्ञान में लोकालोक।।
प्रभो ! अनुभवँ मात्र ज्ञान को ज्ञेयों से मैं भिन्न स्वरूप।
दर्श ज्ञान चारित्र अर्घ्य अर्पित कर लखूँ अनर्घ्य स्वरूप।।
ॐ ह्रीं मध्याऽधोलोक-रचनाप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय अनर्घ्यपदप्राप्तये
महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

ढाई द्वीप पर-क्षेत्र में, पाते नर-पर्याय।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, अब निज क्षेत्र सुहाय।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।

।। अथ चतुर्थोऽध्यायः।।

देवगति के जीवों का वर्णन

(दोहा)

सुरगति हो शुभभाव से, किन्तु नहीं शिवमार्ग।
दर्श-ज्ञान अरु लीनता, मात्र एक शिवमार्ग।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

चार प्रकार के देव, उनके भेद और लेश्या का वर्णन
देवाश्चतुर्णिकायाः ।।1।।
आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्याः ।।2।।
दशाष्ट-पंच-द्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः ।।3।।
भवनवासि व्यन्तर ज्योतिष अरु कल्पवासि सुर चार प्रकार।
भवनत्रिक में कृष्ण नील कापोत पीत लेश्यायें चार।।
कल्पोपन्न देव तक चारों के दश आठ पाँच बारह।
सभी निकायों के देवों के होते हैं दश भेद प्रवर।।1।।
ॐ ह्रीं चतुर्णिकायदेवानां भेदलेश्याप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
देवों की विशेष जातियों का कथन
इन्द्र-सामानिक-त्रायस्त्रिंश-पारिषदात्मरक्ष-लोकपालानीक-
प्रकीर्णकाभियोग्य-किल्विषिकाश्चैकशः ।।4।।
त्रायस्त्रिंश-लोकपाल-वर्ज्या व्यन्तर-ज्योतिष्काः ।।5।।
इन्द्र तथा सामानिक त्रायस्त्रिंश अरु भेद पारिषद हैं।
आत्मरक्ष अरु लोकपाल, अनीक प्रकीर्णक भेद कहें।।

आभियोग्य अरु किल्विष ये दश भेद सभी हैं देवों में।
त्रायस्त्रिंश अरु लोकपाल नहिं होते व्यन्तर ज्योतिष में।।2।।
ॐ ह्रीं कल्पोपन्नपर्यन्तचतुर्णिकायदेवानां विशेषजाति-प्ररूपकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
देवों में काम-सेवन का वर्णन
पूर्वयोर्द्वन्द्राः ।।6।।
कायप्रवीचारा आ ऐशानात्।।7।।
शेषाः स्पर्श-रूप-शब्द-मनः-प्रवीचाराः।।8।।
परेऽप्रवीचाराः ।।9।।
भवनवासि व्यन्तर में दो दो इन्द्र कहे जिन आगम में।
काया से हो काम-क्रिया ऐशान स्वर्ग तक देवों में।।
शेष सुरों में स्पर्श रूप अरु शब्द तथा मन से होती।
सोलह स्वर्गों से ऊपर नहिं काम क्रिया सुर में होती ।।3।।
ॐ ह्रीं देवानां प्रवीचाराऽप्रवीचारप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
भवनवासियों के दस और व्यंतरों के आठ प्रकारों का वर्णन
भवनवासिनोऽसुर-नाग-विद्युत्सुपर्णाग्नि-वात-स्तनितोदधि-द्वीप -
दिक्कुमाराः ।।10।।
व्यन्तराः किन्नर-किम्पुरुष-महोरग-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-भूत-
पिशाचाः ।।11।।
भवनवासि में असुर-नाग-विद्युत्-सुपर्ण अरु अग्निकुमार।
वात-स्तनित-रु उदधि, द्वीप मिल दिक्कुमार दश भेद विचार।।

किन्नर अरु किंपुरुष महोरग हैं गंधर्व यक्ष राक्षस।
भूत पिशाच मिलाकर आठ प्रकार जानिये सब व्यन्तर।।4।।
ॐ ह्रीं भवनवासि-व्यन्तराणां क्रमशः दशाष्टभेद-प्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

ज्योतिषी देवों के भेद तथा गति और वैमानिक देवों के भेदों का कथन
ज्योतिष्काः सूर्या-चन्द्रमसौ ग्रह-नक्षत्र-प्रकीर्णक-तारकाश्च।।12।।
मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके।।13।।
तत्कृतः कालविभागः।।14।।
बहिरवस्थिताः।।15।।
वैमानिकाः।।16।।
कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च।।17।।
सूर्य चन्द्रमा ग्रह नक्षत्र प्रकीर्णक ज्योतिष देव कहे।
सदा मेरु की प्रदक्षिणा कर मध्य लोक में गमन करें।
इनसे काल भेद है, ढाई द्वीप परे सब हैं स्थिर।
वैमानिक के भेद लखो कल्पोपन्न अरु कल्पातीत।।5।।
ॐ ह्रीं ज्योतिष्क-वैमानिकानां भेदप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

वैमनिक देवों के विमानों के नाम
उपर्युपरि।।18।।
सौधर्मैशान-सानत्कुमार-माहेन्द्र-ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर-लान्तव-कापिष्ठ-
शुक्र-महाशुक्र-शतार-सहस्रारेष्वानत-प्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु
ग्रैवेयकेषु विजय-वैजयन्त-जयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च।।19।।

ऊपर-ऊपर स्वर्ग लोक सौधर्मेशान कुमार-सनत्।
माहेन्द्र ब्रह्म ब्रह्मोत्तर लान्तव कापिष्ठ शुक्र अरु महाशुक्र।।
शतार सहस्रार आनत प्राणत आरण अच्युत शुभ नाम।
नव ग्रैवेयक नव अनुदिश पर पाँच अनुत्तर कहें विमान।।6।।
ॐ ह्रीं वैमानिकदेवानां विमानप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

ऊपर-ऊपर के देवों के लेश्या और सुख का वर्णन
स्थिति-प्रभाव-सुख-द्युति-लेश्या-विशुद्धीन्द्रियावधि-
विषयतोऽधिकाः।।20।।
गति-शरीर-परिग्रहाभिमानतो हीनाः।।21।।
पीत-पद्म-शुक्ल-लेश्या द्वि-त्रि-शेषेषु।।22।।
विजय वैजयन्त-रु जयन्त अपराजित अरु सर्वार्थसिद्धि।
थिति प्रभाव द्युति सुख लेश्या सुविशुद्धि इन्द्रियाँ अवधि अधिक।।
गति शरीर परिग्रह अभिमान कहे हैं ऊपर-ऊपर हीन।
दो युगलों में पीत तीन में पद्म शेष में शुक्ल कही।।7।।
ॐ ह्रीं उपर्युपरि-देवानां विशेषसुख-लेश्यादिप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

लौकान्तिक देवों के भेद और अनुत्तर विमानवासियों के शेष भवों का कथन
प्राग्ग्रैवेयकेभ्यः कल्पाः।।23।।
ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः।।24।।
सारस्वतादित्य-वह्न्यरुण-गर्दतोय-तुषिताव्याबाधारिष्टाश्च।।25।।
विजयादिषु द्विचरमाः।।26।।

कल्प कहें सोलह स्वर्गों को ऊपर के हैं कल्पातीत।
ब्रह्म लोक में लौकान्तिक के आठ भेद सारस्वत आदित्य-
वह्नि अरुण अरु गर्दतोय हैं तुषित अव्याबाध अरिष्ट
विजयादिक दो अन्तिम नरभव मात्र एक सर्वार्थसिद्धि।।8।।
ॐ ह्रीं लौकान्तिकानां भेदप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा।
तिर्यंचों का स्वरूप तथा भवनवासी और सौधर्म-ईशान स्वर्ग में
उत्कृष्ट आयु का वर्णन
औपपादिक-मनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः।।27।।
स्थितिरसुर-नाग-सुपर्ण-द्वीप-शेषाणां सागरोपम-त्रिपल्योपमार्द्ध-
हीनमिताः।।28।।
सौधर्मैशानयोः सागरोपमेऽधिके।।29।।
देव नारकी और मनुष्यों के अतिरिक्त सभी तिर्यंच।
असुरकुमार एक सागर थिति नागकुमार आयु त्रय पल्य।।
ढाई अरु दो पल्य सुपर्ण-द्वीप की शेष सभी की डेढ़।
सौधर्म और ऐशान स्वर्ग में दो सागर कुछ अधिक कहें।।9।।
ॐ ह्रीं भवनवासि-सौधर्मेशानदेवानाम् उत्कृष्टायुःप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तरोत्तर वैमानिक देवों की उत्कृष्ट आयु का वर्णन
सानत्कुमार-माहेन्द्रयोः सप्त।।30।।
त्रि-सप्त-नवैकादश-त्रयोदश-पञ्चदशभिरधिकानि तु।।31।।
आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकेन नवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु-
सर्वार्थसिद्धौ च।।32।।

चतुर्थ अध्याय

सानत अरु माहेन्द्र स्वर्ग में सप्तोदधि कुछ अधिक थिति।
तीन सात नव ग्यारह तेरह पन्द्रह अधिक शेष की थिति।।
नव ग्रैवेयक नव अनुदिश विजयादिक पाँच विमानों में।
एक-एक सागर बढ़ती है आयु कल्पातीतों में।।10।।
ॐ ह्रीं उत्तरोत्तरवैमानिकदेवानाम् उत्कृष्टायुःप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
देवों और नारकियों की जघन्य आयु का वर्णन
अपरा पल्योपममधिकम्।।33।।
परतः परतः पूर्वा पूर्वाऽनन्तरा।।34।।

नारकाणां च द्वितीयादिषु।।35।।

दश-वर्ष-सहस्राणि प्रथमायाम्।।36।।
भवनेषु च।।37।।
व्यन्तराणां च।।38।।
सौधर्म और ईशान स्वर्ग में एक पल्य कुछ अधिक जघन्य।
पहले-पहले की उत्कृष्ट, वही आगे की आयु जघन्य।।
द्वितियादिक नरकों की है उत्कृष्ट, जघन आगामी की।
वर्ष सहस्र दस प्रथम नरक की भवनवासि अरु व्यन्तर की।।11।।
ॐ ह्रीं देवनारकाणां जघन्यायुःप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
व्यन्तर और ज्योतिषी देवों की उत्कृष्ट तथा ज्योतिषी देवों की जघन्य आयु
और लौकान्तिक देवों की आयु का वर्णन
परा पल्योपममधिकम्।।39।।

ज्योतिष्काणां च।।40।।
तदष्टभागोऽपरा।।41।।
लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम्।।42।।
इक पल्योपम से कुछ ज्यादा व्यन्तर ज्योतिष की उत्कृष्ट-
पल्योपम का भाग आठवाँ ज्योतिष की ही आयु जघन।।
सब लौकान्तिक देवों की है आयु जघन एवं उत्कृष्ट।
सागर आठ जानिये यह सब जिन आगम के वचन प्रकृष्ट।।12।।
ॐ ह्रीं व्यन्तरज्योतिष्कानाम् उत्कृष्टायुः ज्योतिष्कानां जघन्यायुः लौकान्तिकानां
च सामान्यायुःप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रूफरीडिंग बाकी है

महाऽर्घ्य

तीव्र शुभाशुभ के फल में सुर नारक में जन्मे यह जीव।
इन भावों अरु गतियों से भी भिन्न रहे चैतन्य सदीव।।
भेद ज्ञान की कला कुशलता से निरखूँ अब अपना रूप।
दर्श ज्ञान चारित्र अर्घ्य अर्पित कर लखूँ अनर्घ्य स्वरूप।।
ॐ ह्रीं चतुर्णिकायदेवानां भेदप्रभेदजाति-वैशिष्ट्य-आयुःलेश्यादिप्ररूपकाय
चतुर्थाध्यायसमन्वित-श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

स्वर्गों में भी सुख नहीं, कहते श्री जिनराय।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, चहुँ गति दुक्ख नशाय।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।

।। अथ पञ्चमोऽध्यायः ।।
अजीव तत्त्व का वर्णन

(दोहा)

पाँच अचेतन द्रव्य को, निज से भिन्न सुजान।
चेतन लक्षण से सदा हो, निज की पहचान।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

पंचास्तिकाय का स्वरूप, संख्या आदि का वर्णन
अजीवकाया धर्माधर्माकाश-पुद्गलाः।।1।। द्रव्याणि।।2।।
जीवाश्च।।3।। नित्यावस्थितान्यरूपाणि।।4।।
रूपिणः पुद्गलाः।।5।। आ आकाशादेकद्रव्याणि।।6।।
निष्क्रियाणि च।।7।। असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मैकजीवानाम्।।8।।
धर्म अधर्म आकाश और पुद्गल अजीव हैं द्रव्य कहे।
अधिक प्रदेशी द्रव्य जीव भी नित्य अवस्थित द्रव्य कहे।।
पुदगल रूपी शेष अरूपी एक-एक हैं नभ पर्यन्त।
निष्क्रिय, धर्माधर्म जीव के हैं प्रदेश जानिये असंख्य।।1।।
ॐ ह्रीं पंचास्तिकाय-द्रव्य-स्वरूप-संख्या-प्रदेशप्रतिपादकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुद्गल आदि द्रव्यों के प्रदेशों का वर्णन
आकाशस्यानन्ताः।।9।। संख्येयाऽसंख्येयाश्च पुद्गलानाम्।।10।।
नाणोः।।11।। लोकाकाशेऽवगाहः।।12।।
धर्माधर्मयोः कृत्स्ने।।13।। एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम्।।14।।
है आकाश अनन्त प्रदेशी संख्यासंख्य अनन्त पुद्गल।
परमाणु है एक प्रदेशी लोकाकाश रहें सब द्रव्य।।

धर्म-अधर्म समस्त लोक में व्याप्त तिलों में तेल समान।
पुद्गल एक तथा संख्यात असंख्य प्रदेश विभाग सुजान।।2।।
ॐ ह्रीं आकाशपुद्गलानां प्रदेशाऽवगाहप्रतिपादकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जीवों की अवगाहना तथा गति आदि में निमित्त का कथन
असंख्येय-भागादिषु जीवानाम् ।।15।। प्रदेश-संहार-विसर्पाभ्यां
प्रदीपवत्।।16।। गति-स्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ।।17।।
आकाशस्यावगाहः ।।18।।
जीवों का अवगाह लोक में, असंख्यातवें भाग प्रमाण।
हो संकोच तथा विस्तार प्रदेशों में दीपकवत् जान।।
गति स्थिति जीव-रु पुद्गल की क्रमशः धर्म-अधर्म उपकार।
सब द्रव्यों को अवगाहन दे यह उपकार करे आकाश।।3।।
ॐ ह्रीं जीवाऽवगाह-संकोचविस्तारविशेषः धर्माधर्माकाशानामुपकारश्च
प्रतिपादकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जीवों का परस्पर एवं अन्य द्रव्यों के साथ निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध
शरीर-वाङ्-मनः-प्राणापानाः पुद्गलानाम्।।19।।
सुख-दुःख-जीवित-मरणोपग्रहाश्च ।।20।।
परस्परोपग्रहो जीवानाम् ।।21।।
वर्तना-परिणाम-क्रिया-परत्वापरत्वे च कालस्य ।।22।।
तन मन वाणी श्वासोच्छ्वास रचे जाते हैं पुद्गल से।
इन्द्रिय सुख दुख जन्म मरण में भी पुद्गल निमित्त होते।।
एक दूसरे का आपस में करते जीव द्रव्य उपकार।
वर्तन क्रिया और परिणाम परत्वापरत्व काल उपकार।।4।।
ॐ ह्रीं पुद्गलजीवकालानामुपकारप्रतिपादकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

पंचम अध्याय

पुद्गल का स्वरूप, भेद और अणु की उत्पत्ति का कथन
स्पर्श-रस-गन्ध-वर्णवन्तः पुद्गलाः ।।23।।
शब्द-बन्ध-सौक्ष्म्य - स्थौल्य-संस्थान-भेद-
तमश्छायाऽऽतपोद्योतवन्तश्च ।।24।। अणवः स्कन्धाश्च ।।25।।
भेद-संघातेभ्य उत्पद्यन्ते ।।26।। भेदादणुः ।।27।।
भेद-संघाताभ्यां चाक्षुषः।।28।।
स्पर्श-गन्ध-रस-वर्णमयी अरु शब्द बन्ध सूक्षम स्थूल-
संस्थान भेद तम छाया आतप अरु उद्योतवन्त पुद्गल।।
अणु एवं स्कन्ध, भेद-संघात तथा हों दोनों से।
अणु भेद से एवं चक्षुगम्य खंध हो दोनों से।।5।।
ॐ ह्रीं पुद्गलानां स्वरूपस्थूल-पर्याया-भेद-स्कन्धोत्पत्ति-प्रतिपादकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

द्रव्य का लक्षण, कथन शैली एवं बन्धपद्धति के नियम
सद् द्रव्यलक्षणम्।।29।। उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-युक्तं सत्।।30।।
तद्भावाऽव्ययं नित्यम्।।31।। अर्पितानर्पितसिद्धेः ।।32।।
स्निग्ध-रूक्षत्वाद् बन्धः ।।33।। न जघन्यगुणानाम् ।।34।।
गुणसाम्ये सदृशानाम् ।।35।
सत् लक्षण है द्रव्य तथा सत् व्यय-उत्पाद-ध्रौव्य संयुक्त।
निज भावों के अव्यय होने को ही जिन कहते हैं नित्य।।
मुख्य-गौण से सिद्धि होती, बन्ध स्निग्धता रूक्षपने।
नहिं जघन्यगुण से एवं गुण हों सादृश तो नहीं बँधे ।।6।।
ॐ ह्रीं द्रव्यसत्-नित्य-नय-बन्धलक्षणप्रतिपादकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

बन्ध प्रक्रिया एवं द्रव्य, गुण, पर्याय का सामान्य स्वरूप
दूयधिकादिगुणानां तु।।36।।
बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च।।37।।
गुण-पर्ययवद् द्रव्यम्।।38।।
कालश्च।।39।। सोऽनन्तसमयः।।40।।
द्रव्याश्रया निर्गुणाः गुणाः।।41।। तद्भावः परिणामः।।42।।
यदि दो गुण हों अधिक तभी बँधते हैं आपस में पुद्गल।
ज्यादा गुण वाले कर लेते कम गुण वाले को निज सम।।
गुण-पर्यायों युक्त द्रव्य है काल अनन्त समययुत द्रव्य।
गुण द्रव्याश्रित निर्गुण जानो भाव द्रव्य का है परिणाम।।7।।
ॐ ह्रीं बन्ध-काल-द्रव्य-गुण-पर्यायस्वरूपप्रतिपादकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

पाँच अचेतन द्रव्यों में भी व्यय उत्पाद ध्रौव्य सत् भाव।
अतः सभी का अपने अपने परिणामों का कर्तृ स्वभाव।।
पर से दृष्टि हटे प्रभु मेरी निरखूँ निज चैतन्य स्वरूप।
दर्श ज्ञान चारित्र अर्घ्य अर्पित कर लखूँ अनर्घ्य स्वरूप।।
ॐ ह्रीं श्रीपंचास्तिकाय-षद्रव्यप्रतिपादकाय पंचमाध्यायसमन्वित-
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

पाँच अचेतन द्रव्य में, नहीं चेतना भाव।
श्रद्धा-सुमनों में बसे, चेतन गंध स्वभाव।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।

।। अथ षष्ठोऽध्यायः ।।

आस्रव तत्त्व का वर्णन

(दोहा)

अशुचि और विपरीत ये, आस्रव हैं दुखरूप।
परम पवित्र निजात्मा, का अनुभव सुखरूप।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

आस्रव का लक्षण तथा भेद-प्रभेद आदि का कथन
काय-वाङ्-मनःकर्म योगः।।1।। स आस्रवः।।2।।
शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य।।३।।
सकषायाकषाययोः साम्परायिकेर्यापथयोः।।4।।
इन्द्रिय-कषायाव्रत-क्रियाः पञ्च-चतुः-पञ्च-पञ्चविंशति-
संख्याः पूर्वस्य भेदाः।।5।।
तीव्र-मन्द-ज्ञाताज्ञात-भावाधिकरण-वीर्य-
विशेषेभ्यस्तद्विशेषः।।6।। अधिकरणं जीवाजीवाः।।7।।
मन-वच-तन की क्रिया योग है उसको आस्रव कहते हैं।
शुभ से पुण्य अशुभ से पाप-कर्म आस्रव नित होते हैं।।
सकषायी को साम्परायिक अकषायी को ईर्यापथ है।
इन्द्रिय कषाय अव्रत अरु क्रिया भेदरूप साम्परायिक है।।1।।
पाँच चार अरु पाँच तथा पच्चीस भेद क्रमशः इनके।
तीव्र मन्द अज्ञात ज्ञात भावाधिकरण अरु वीर्य विशेष-
होते हैं तो इस निमित्त से कर्मास्रव भी होय विशेष।
आस्रव के आधार जीव एवं अजीव दोनों होते।।2।।
ॐ ह्रीं आस्रवलक्षणभेदप्रभेद-स्वामि-विशेषाधिकरणद्योतकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जीवाजीवाधिकरण के भेदों का वर्णन
आद्यं सम्रम्भ-समारम्भारम्भ-योग-कृत-कारितानुमत-कषाय-
विशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः।।8।।
निर्वर्तना-निक्षेप-संयोग-निसर्गा द्वि-चतु-र्द्वि-त्रिभेदाः परम्।।9।।
पहला है संरम्भ समारम्भ आरम्भ एवं तीनों योग।
कृत कारित अनुमोदन चार कषाय रूप शत आठ कहो।।
निवर्तन द्वय चौ निक्षेप द्वय संयोग निसर्गत्रय।
ये अजीव-अधिकरण भेद ग्यारह कहते हैं श्री जिनवर।।3।।
ॐ ह्रीं जीवाजीवाधिकरणभेदद्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।

ज्ञान-दर्शनावरण तथा असाता वेदनीय कर्म के आस्रव का कारण
तत्प्रदोष-निह्नव-मात्सर्यान्तरायासादनोपघाता
ज्ञान-दर्शनावरणयोः।।10।।
दुःख-शोक-तापाक्रन्दन-वध-परिवेदनान्यात्मपरोभय-
स्थानान्यसद्वेद्यस्य।।11।।
दर्श-ज्ञान में दोष तथा निह्नव मात्सर्य और अन्तराय।
आसादन-उपघात भाव से ज्ञान-दर्शनावरणास्रव।।
दुःख शोक तापाक्रन्दन वध एवं ऐसा करे रुदन।
जिससे करुणा हो निज-पर को होय असाता प्रकृति बन्ध।।4।।
ॐ ह्रीं अष्टकर्मान्तर्गत-ज्ञानदर्शनावरण-असातावेदनीय-कर्मास्रवकारण-
भावास्रव-द्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

साता वेदनीय तथा मोहनीय कर्म के आस्रव का कारण
भूत-व्रत्यनुकम्पा-दान-सरागसंयमादि-योगः

क्षान्तिः शौचमिति सद्वेद्यस्य।।12।।
केवलि-श्रुत-संघ-धर्म-देवावर्णवादो दर्शनमोहस्य।।13।।
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य।।14।।
जीवों व्रतियों में अनुकम्पा दान तथा संयमयुत राग।
क्रोध-मान-माया-निवृत्ति अरु शौच भाव से सातास्रव।।
केवलि संघ धर्म श्रुत देव अवर्णवाद से दर्शनमोह।
हो कषाय का तीव्र उदय इन परिणामों से चारित मोह।।5।।
ॐ ह्रीं सातावेदनीय-दर्शनचारित्रमोहनीय-कर्मास्रवकारण-भावास्रवद्योतकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

आयु कर्म के आस्रव का कारण
बह्वारम्भ-परिग्रहत्वं नारकस्यायुषः।।15।।
माया तैर्यग्योनस्य।।16।।
अल्पारम्भ-परिग्रहत्वं मानुषस्य।।17।। स्वभावमार्दवञ्च।।18।।
निश्शील-व्रतत्वञ्च सर्वेषाम्।।19।।
बहु आरम्भ परिग्रह से नरकायु का होता आस्रव।
माया से तिर्यंच, अल्प आरम्भ परिग्रह से नरभव।।
मृदु स्वभाव से भी नर होते सुरगति में भी जाते हैं।
शील व्रतों से रहित जीव चारों गतियों में जाते हैं।।6।।
ॐ ह्रीं नारकतिर्यग्-सुर-मनुष्यायुःकर्मास्रवकारण-भावास्रवद्योतकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

देवायु तथा नाम कर्म के आस्रव का कारण
सरागसंयम-संयमासंयमाकामनिर्जरा-बालतपांसि दैवस्य।।20।।
सम्यक्त्वं च।।21।।

योगवक्रता-विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ।।22।।
तद्विपरीतं शुभस्य।।23।।
यदि सराग संयम हो एवं संयम सहित असंयम भाव।
हो अकाम निर्जरा बालतप समकित से भी देवास्रव।।
योग वक्रता, विसंवाद से अशुभ नाम कर्मास्रव हो।
इनसे हो विपरीत भाव तो नाम कर्म शुभ आस्रव हो।।7।।
ॐ ह्रीं देवायुः-शुभाशुभनामकर्मास्रव-कारण-भावास्रवद्योतकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
तीर्थंकर नाम कर्म एवं नीच गोत्र कर्म के आस्रव का कारण
दर्शनविशुद्धिर्विनयसम्पन्नता-शीलव्रतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्ण-
ज्ञानोपयोग-संवेगौ शक्तितस्त्याग - तपसी
साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरण - मर्हदाचार्य-बहुश्रुत-प्रवचन-भक्ति-
रावश्यकापरिहाणि-र्मार्गप्रभावना-
प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ।।24।।
परात्म-निन्दा-प्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च
नीचै-र्गोत्रस्य ।।25।।
दर्श विशुद्धि विनय सम्पन्न शीलव्रत में अतिचार न हो-
हो अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग संवेग शक्तितः त्याग कहो-
तप भी, साधु समाधि और वैयावृत्ति अर्हत् भक्ति-
आचार्यों बहुश्रुत प्रवचन में भक्ति और आवश्यक भी।।8।।
-जिनशासन की हो प्रभावना अरु प्रवचन वात्सल्य रखे।
सोलह भावों से तीर्थंकर प्रकृति नाम का कर्म बँधे ।।

परनिन्दा अरु आत्मप्रशंसा सद्‌गुण का जो लोप करे।
असद्गुणों को प्रकटावे तो नीच गोत्र की प्रकृति बँधे।।9।।
ॐ ह्रीं तीर्थंकरनाम-नीचगोत्र-कर्मास्रवकारण-भावास्रवद्योतकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
उच्च गोत्र एवं अन्तराय कर्म के आस्रव का कारण
तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य ।।26।।
विघ्नकरणमन्तरायस्य ।। 27।।

(हरिगीत)

उक्त भावों से विपर्यय नम्र निर-अभिमान हो।
तो उच्च गोत्र-रु विघ्न करने से प्रकृति अन्तराय हो।।10।।
ॐ ह्रीं उच्चगोत्राऽन्तराय कर्मास्रवकारण-भावास्रव-द्योतकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

भाव शुभाशुभ के निमित्त से द्रव्य कर्म आस्रव होता।
मोह महामद पी चेतन निज वैभव की सुध बुध खोता।।
द्रव्यास्रव भावास्रव से भी भिन्न निहारूँ निज चिद्रूप।
दर्श ज्ञान चारित्र अर्घ्य अर्पित कर लखूँ अनर्घ्य स्वरूप।।
ॐ ह्रीं आस्रवसामान्यभेद-द्रव्यास्रवकारण-भावास्रवद्योतकाय षष्ठाध्याय-
समन्वितश्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

आस्रव दुख कारण लखूँ, सुखमय चेतन भाव।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, रचूँ निरास्रव भाव।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।

।। अथ सप्तमोऽध्यायः ।।

व्रतों का स्वरूप, भेद, भावना तथा अतीचार आदि का वर्णन

(दोहा)

सम्यग्दर्शन पूर्वक, होंय व्रतादिक भाव।
शिवपथ है व्यवहार से, आस्रव दुखमय भाव।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

व्रतों का स्वरूप, भेद और अहिंसाव्रत की भावनाओं का वर्णन
हिंसाऽनृत-स्तेयाब्रह्म-परिग्रहेभ्यो विरतिव्रतम्।।1।।
देश-सर्वतोऽणु-महती ।।2।।
तत्स्थैर्यार्थं भावनाः पञ्च पञ्च।।3।।
वाङ्-मनो-गुप्तीर्यादाननिक्षेपण-समित्यालोकितपान-
भोजनानि पञ्च।।4।।
हिंसा अनृत अरु चोरी अब्रह्म परिग्रह का हो त्याग।
व्रत कहलाते हैं ये अणुव्रत और महाव्रत भेद कहा।।
उनमें थिरता हेतु भावना पाँच पाँच होती सबकी।
मन-वच गुप्ति, समिति ईर्या, आलोकित अशन अहिंसा की।।1।।
ॐ ह्रीं शुभास्रवान्तर्गत-व्रतस्वरूप-भेद-भावना अहिंसाव्रतस्य पंचभावना-
द्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
शेष चार व्रतों की भावनाएँ
क्रोध-लोभ-भीरुत्व-हास्य-प्रत्याख्यानान्यनुवीचिभाषणं च
पञ्च।।5।। शून्यागार-विमोचितावास-परोपरोधाकरण-भैक्ष्यशुद्धि-
सधर्मा-विसंवादाः पञ्च।।6।।
स्त्रीरागकथाश्रवण-तन्मनोहरांगनिरीक्षण-पूर्वरतानुस्मरण-
वृष्येष्टरस-स्वशरीर-संस्कारत्यागाः पञ्च।।7।।
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषय-राग-द्वेष-वर्जनानि पञ्च।।8।।
हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम्।।9।।
दुःखमेव वा।।10।।
क्रोध-लोभ-भय-हास्य वचन नहिं कहे, वचन निर्दोष कहे।
दूजे व्रत में; शून्य त्यक्त आवास अन्य अवरोध तजे-
भिक्षा-शुद्धि साधर्मी से अविसंवाद तीसरे की।
नारी-राग कथा सुनना सु-अंग निरखने का त्यागी।।2।।
पूर्व भोग स्मरण करे नहिं, इष्ट रसों का त्याग करे।
तन का भी संस्कार करे नहिं, ब्रह्मचर्य भावना कहें।
पंचेन्द्रिय विषयों में राग न द्वेष न हो अपरिग्रह की।
पापों से हो उभय लोक में भय निन्दा एवं दुःख भी।।3।।
ॐ ह्रीं सत्याचौर्यब्रह्मचर्यापरिग्रहव्रतभावना पंचपापत्यागविशेषभावना च
द्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
मैत्री आदि भावनाओं तथा हिंसा का कथन
मैत्री-प्रमोद-कारुण्य-माध्यस्थ्यानि च सत्त्व-गुणाधिक-
क्लिश्यमानाविनेयेषु ।।11।।
जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम्।।12।।
प्रमत्तयोगात्प्राण-व्यपरोपणं हिंसा।।13।।
मैत्री भाव सभी जीवों में गुणी जनों में होय प्रमोद।
दुखियों के प्रति करुणा एवं दुर्जन में मध्यस्थ रहो।

संवेग और वैराग्य हेतु जग-तन स्वभाव का हो चिन्तन।
हिंसा होती है प्रमादवश करे प्राण का व्यपरोपण।।4।।
ॐ ह्रीं मैत्रीप्रमोदादिसंवेगादिभावनाद्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

शेष चार पापों तथा व्रती का स्वरूप एवं भेदों का कथन
असदभिधानमनृतम्।।14।। अदत्तादानं स्तेयम्।।15।।
मैथुनमब्रह्म ।।16।। मूर्च्छा परिग्रहः ।।17।। निश्शल्यो व्रती ।।18।।
अगार्यनगारश्च ।।19।। अणुव्रतोऽगारी।।20।।
असत् कथन में झूठ पाप अरु ग्रहण अदत्त कहें चोरी।
मैथुन क्रिया अब्रह्म तथा मूर्च्छा का भाव परिग्रह ही।।
व्रती रहें निःशल्य, भेद द्वय देशव्रती अरु सकलव्रती।
पाँच पाप के एकदेश त्यागी होते हैं अणुव्रती।।5।।
ॐ ह्रीं अनृतादि-पापस्वरूपं व्रतिनः निश्शल्यत्वं भेदं च द्योतकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

गुणव्रत और शिक्षाव्रतों का तथा सम्यक्त्व और अहिंसाणुव्रत के
अतिचारों का कथन
दिग्देशानर्थदण्डविरति-सामायिक-प्रोषधोपवासोपभोग-परिभोग-
परिमाणातिथिसंविभागव्रत-संपन्नश्च।।21।।
मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता।।22।।
शंकाकांक्षा-विचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसा-संस्तवाः
सम्यग्दृष्टेरतिचाराः।।23।।
व्रतशीलेषु पञ्च-पञ्च यथाक्रमम्।।24।।
बन्ध-वधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः।।25।।

दिग्व्रत देश अनर्थदण्ड विरति समता प्रोषध उपवास।
सीमित हों भोगोपभोग अरु अतिथि विभाग कहे व्रत सात।
मरण समय में प्रीति पूर्वक श्रावक सल्लेखना गहो।
जिनवच में शंका विचिकित्सा अरु भोगों की आकांक्षा।।6।।

  • अन्य दृष्टि की करे प्रशंसा-स्तुति समकित के अतिचार।
    अणुव्रत गुणव्रत शिक्षाव्रत के होते पाँच पाँच अतिचार।।
    वध बन्धन छेदन जीवों का और रखे उन पर अतिभार।
    अन्न-पान नहिं देवे उनको पाँच अहिंसा व्रत अतिचार।।7।।
    ॐ ह्रीं अणु-गुण-शिक्षा-सल्लेखनाव्रतिनः सम्यक्त्वाऽहिंसाणुव्रत-अतिचार-
    द्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सत्य और अचौर्याणुव्रतों के अतिचारों का कथन
मिथ्योपदेश-रहोभ्याख्यान-कूटलेखक्रिया-न्यासापहार-
साकार-मन्त्रभेदाः।।26।।
स्तेनप्रयोग-तदाहृतादान-विरुद्धराज्यातिक्रम-हीनाधिक-मानो-
न्मान-प्रतिरूपक-व्यवहाराः।।27।।
दे मिथ्या उपदेश, गुप्त को करे प्रकट, झूठा लिखना।
रखी अमानत को हड़पे, साकार मन्त्र, सत् का अतिचार।।
चौर्य कर्म की करे प्रेरणा चौर्य वस्तुओं का आदान।
राज्य विरुद्ध-रु प्रतिरूपक हीनाधिक वस्तु मानोन्मान।।8।।
ॐ ह्रीं सत्याचौर्याणुव्रत-अतिचार-द्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहाणुव्रत के अतिचारों का कथन
परविवाहकरणेत्वरिका-परिगृहीतापरिगृहीता-गमनानंगक्रीडा-

कामतीव्राभिनिवेशाः।।28।।
क्षेत्र-वास्तु-हिरण्य-सुवर्ण-धन-धान्य-दासी-दास-कुप्य-
प्रमाणातिक्रमाः।।29।।
अन्य विवाह कराना, परनारी-विधवा-त्यक्ता का संग।
रमे अन्य अंगों से अति कामुकता करे ब्रह्मचर्य भंग।।
खेत मकान स्वर्ण चाँदी धन-धान्य तथा दासी अरु दास।
वस्त्रादिक परिग्रह की सीमा का उल्लंघन है अतिचार।।9।।
ॐ ह्रीं ब्रह्मचर्याऽपरिग्रहाणुव्रत-अतिचारद्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दिग्व्रत और देशव्रत के अतिचारों का कथन
ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रम-क्षेत्रवृद्धि-स्मृत्यन्तराधानानि।।30।।
आनयन-प्रेष्यप्रयोग-शब्दरूपानुपात-पुद्गलक्षेपाः।।31।।
ऊपर नीचे तिर्यक् दिशि में सीमा का हो उल्लंघन।
क्षेत्र वृद्धि अरु सीमा विस्मृति अतीचार दिग्व्रत के पंच।
सीमा के बाहर से वस्तु मँगाना, सेवक को भेजें।
शब्द-रूप से करे इशारा, पुद्गल क्षेपण जानो पंच।।10।।
ॐ ह्रीं दिग्देशव्रत-अतिचारद्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।

अनर्थदण्डव्रत और सामायिक व्रत के अतिचारों का कथन
कन्दर्प-कौत्कुच्य-मौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोग-
परिभोगानर्थक्यानि।।32।।
योग-दुष्प्रणिधानानादर-स्मृत्यनुपस्थानानि।।33।।

हँसी मजाक अश्लील चेष्टा बहुत बोलना सोचे व्यर्थ।
व्यर्थ वचन अरु क्रिया, कीमती वस्तु रखे ये पाँच अनर्थ।।
मन-वच-तन की अनुचित वृत्ति सामायिक में नहिं उत्साह।
पाठ भूलना ये पाँचों हैं सामायिक व्रत के अतिचार।।11।।
ॐ ह्रीं अनर्थदण्ड-सामायिक-व्रत-अतिचार-द्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रोषधोपवास और भोगोपभोगपरिमाण व्रत के अतिचारों का कथन
अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गाऽऽदान-संस्तरोपक्रमणानादर-
स्मृत्यनुपस्थानानि।।34।।
सचित्त-सम्बन्ध-सम्मिश्राभिषव-दुष्पक्वाहाराः।।35।।
देखे शोधे बिना उठाना धरना शय्या पर सोना।
धर्म कार्य में रखे अनादर विस्मृति प्रोषध के अतिचार।।
वस्तु सचित्त तथा सम्बन्धित मिश्रित या कामोत्तेजक।
जला अधपका खाना, ये परिमाण-भोग के हैं अतिचार।।12।।
ॐ ह्रीं प्रोषधोपवासोपभोग-परिभोगव्रत-अतिचारद्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अतिथि संविभाग और संल्लेखना व्रत के अतिचारों का कथन
सचित्तनिक्षेपापिधान-परव्यपदेश-मात्सर्य-कालातिक्रमाः।।36।।
जीवितमरणाशंसा-मित्रानुराग-सुखानुबन्ध-निदानानि।।37।।
सचित पात्र में रखे सचित से ढके अन्य द्वारा देना।
करे अनादर समय टाल दे अतिथि-भाग व्रत के अतिचार।।

जीने-मरने की वांछा एवं मित्रों से हो अनुराग।
पूर्व भोग स्मृति, निदान, ये सल्लेखन व्रत के अतिचार।।13।।
ॐ ह्रीं अतिथिसंविभागसल्लेखनाव्रत-अतिचारद्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दान का स्वरूप और विशेषताएँ
अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम्।।38।।
विधि-द्रव्य-दातृ-पात्र-विशेषात्तद्विशेषः।।39।।

(हरिगीतिका)

निज वस्तुओं को स्व-पर अनुग्रह हेतु देना दान है।
विधि द्रव्य दाता पात्र से हों विशेषतायें दान में।।14।।
ॐ ह्रीं दानस्वरूप-वैशिष्ट्य-द्योतकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

बारह व्रत के अतीचार हैं पाँच पाँच, नहिं ज्ञानी को।
किन्तु निजातम दृष्टि बिना व्रत क्रिया मात्र अज्ञानी को।।
बाह्य क्रिया शुभ राग भाव से भिन्न लखूँ चैतन्य स्वरूप।
दर्श ज्ञान चारित्र अर्घ्य अर्पित कर निरखूँ ज्ञायक रूप।।
ॐ ह्रीं श्री शुभाशुभास्रवकारणव्रतभावनाव्रतातिचारं च द्योतकाय सप्तमाध्याय-
समन्विततत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

बाह्य व्रतादिक जिन कहें, चारित का व्यवहार।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, विनशें शीघ्र विकार।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।

।। अथ अष्टमोऽध्यायः ।।

बन्ध तत्त्व का वर्णन

(दोहा)

बन्ध-भाव दुखरूप हैं, यही बन्ध का ज्ञान।
निज निरखे निर्बन्ध जब, होय बन्ध की हानि।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

बन्ध के कारण, भेद एवं ज्ञानावरण के भेदों का वर्णन
मिथ्यादर्शनाविरति-प्रमाद-कषाय-योगा बन्धहेतवः।।1।।
सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः।।2।।
प्रकृति-स्थित्यनुभव-प्रदेशास्तद्विधयः।।3।।
आद्यो ज्ञानदर्शनावरण-वेदनीय-मोहनीयायुर्नाम-
गोत्रान्तरायाः।।4।।
पञ्च-नव-द्व्यष्टाविंशति-चतुर्द्विचत्वारिंशद्-द्वि-पञ्च-भेदा
यथाक्रमम्।।5।।
मति-श्रुतावधि-मनःपर्यय-केवलानाम्।।6।।
मिथ्यादर्शन अविरति और प्रमाद कषाय योग से बन्ध।
सकषायी होने से कर्म योग्य पुद्गल का आना बन्ध।।
प्रकृति स्थिति एवं अनुभाग प्रदेश, बन्ध के चार प्रकार।
ज्ञानदर्शनावरण वेदनी मोहनीय - ये प्रकृति चार।।1।।।
-पुनः आयु अरु नाम गोत्र फिर अन्तराय भी मिलकर आठ।
पाँच तथा नव दो अट्ठाइस चार ब्यालिस दो अरु पाँच।।

क्रमशः सभी प्रकृतियों के भेदों की यह संख्या जानो।
ज्ञानावरणी मति श्रुत अवधि मनपर्यय केवल मानो।।2।।
ॐ ह्रीं बन्धहेतुस्वरूपभेद-प्रभेदसंख्या-प्रकृतिबन्ध-अन्तर्गत-ज्ञानावरण-
प्रकाराभिधानं च विवेचकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

दर्शनावरण एवं वेदनीय कर्म के भेद
चक्षुरचक्षुरवधि-केवलानां निद्रा-निद्रानिद्रा-प्रचला-
प्रचलाप्रचला-स्त्यानगृद्धयश्च ।।7।।
सदसद्वेद्ये ।।8।।
चक्षु अचक्षु अवधि केवल निद्रा निद्रानिद्रा प्रचला।
प्रचलाप्रचला स्त्यानगृद्ध ये दर्शनावरणी भेद कहा।।
साता और असाता दो हैं वेदनीय के भेद कहो।
दर्शन अरु चारित्र मोहनी मोह प्रकृति के भेद लखो।।3।।
ॐ ह्रीं दर्शनावरण-वेदनीय-भेदप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।

मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय कर्म के भेद
दर्शन-चारित्र-मोहनीयाकषाय-कषायवेदनीयाख्यास्त्रि-द्वि-नव-
षोडशभेदाः सम्यक्त्व-मिथ्यात्व-तदुभयान्यकषाय-कषायौ हास्य-
रत्यरति-शोक-भय-जुगुप्सा-स्त्रीपुन्नपुंसकवेदा
अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यान-प्रत्याख्यान-
संज्वलन-विकल्पाश्चैकशः क्रोध-मान-माया-लोभाः।।9।।
नारक-तैर्यग्योन-मानुष-दैवानि ।।10।।
गति-जाति-शरीरांगोपांग-निर्माण-बन्धन-संघात संस्थान-संहनन-

स्पर्श-रस-गन्ध-वर्णानुपूर्व्यागुरुलघूपघात-
परघातातपोद्योतोच्छ्वास-विहायोगतयः प्रत्येक शरीर-त्रस-सुभग-
सुस्वर-शुभ-सूक्ष्म-पर्याप्ति-स्थिरादेय-यशःकीर्तिः सेतराणि
तीर्थकरत्वं च ।।11।।
उच्चैर्नीचैश्च ।।12।।
दान-लाभ-भोगोपभोग-वीर्याणाम्।।13।।
समकित अरु मिथ्यात्व मिश्र ये तीनों दर्शनमोह प्रकृति।
हास्य अरति रति शोक भीति अरु घृणा नपुंसक नर-नारी-
नौ प्रकार अकषाय वेदनी सोलह भेद कषाय कही।
अनन्तानुबन्धी अप्रत्याख्यानी अरु प्रत्याख्यानी।।4।।
पुनः संज्वलन भेदरूप हैं क्रोध मान अरु माया लोभ।
नारक तिर्यक् नर सुर चारों आयु कर्म के भेद लखो।।
गति जाति तन अंगोपांग और निर्माण तथा बन्धन।
संघात और संस्थान संहनन फरुस गन्ध रस एवं वर्ण।।5।।

  • आनुपूर्वी अगरुलघु उपघात तथा परघात लखो।
    आतप अरु उद्योत तथा उच्छ्वास विहायोगति जानो।।
    प्रत्येक देह साधारण त्रस थावर अरु सुभग और दुर्भग।
    सुस्वर दुःस्वर सूक्ष्म स्थूल शुभाशुभ प्रकृति नाम की लख।।6।।
  • पर्याप्ति अरु अपर्याप्ति स्थिर अस्थिर आदेय कही।
    अनादेय यश-अयश कीर्ति अरु तीर्थंकर भी प्रकृति लखी।।
    ऊँच नीच है गोत्र तथा अब पाँच प्रकार लखो अन्तराय।
    दान लाभ अरु भोग तथा उपभोग वीर्य ये भेद बताय।।7।।
    ॐ ह्रीं मोहनीय-आयु-नाम-गोत्र-अन्तराय-कर्मभेद-प्ररूपकाय
    श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

कर्मों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति का वर्णन
आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्-सागरोपम-कोटीकोट्यः
परा स्थितिः।।14।।
सप्ततिर्मोहनीयस्य।।15।।
विंशतिर्नाम-गोत्रयोः।।16।।
त्रयस्त्रिंशत् सागरोपमाण्यायुषः।।17।।
अपरा द्वादशमुहूर्ता वेदनीयस्य।।18।।
नामगोत्रयोरष्टौ।।19।।
शेषाणामन्तर्मुहूर्ता।।20।।
प्रथम तीन अरु अन्तराय की उत्कृष्ट थिति है सागर तीस-
कोड़ाकोड़ी, मोहनीय की सत्तर, गोत्र-नाम की बीस।।
आयु कर्म की तेतीस सागर, वेदनी जघन मुहूर्त बारह।
नाम-गोत्र की आठ मुहूर्त-रू शेष सभी मुहूर्त अन्तर।।18।।
ॐ ह्रीं कर्मणां जघन्योत्कृष्ट-स्थितिप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।
अनुभाग एवं प्रदेश बन्ध का स्वरूप
विपाकोऽनुभवः।।21।। स यथानाम।।22।।
ततश्च निर्जरा।।23।।
नाम प्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः सर्वात्म-
प्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः।।24।।
कर्मों का विपाक अनुभव होता उनके नामों अनुसार।
फल देकर उन कर्म प्रकृतियों की निर्जरा कही सविपाक।

नाम-गुणों के प्रत्यय परमाणु प्रदेश में स्थित हैं।
योगों की विशेषता से प्रतिसमय जीव से बँधते हैं।।9।।
ॐ ह्रीं अनुभाग-प्रदेश-बन्धस्वरूप-प्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।
पुण्य एवं पाप प्रकृतियों का संक्षिप्त परिचय
सद्वेद्य-शुभायुर्नाम-गोत्राणि पुण्यम्।।25।।
अतोऽन्यत्पापम्।।26।।

(हरिगीतका)

वेदनी साता तथा शुभ आयु नाम-रु गोत्र की।
प्रकृतियाँ हैं पुण्य, इनके अलावा सब पाप ही।।10।।
ॐ ह्रीं पुण्य-पाप-प्रकृतिस्वरूपप्ररूपकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

प्रकृति प्रदेश स्थिति अनुभागी द्रव्य बन्ध के चार प्रकार।
अबद्धस्पृष्ट निर्बन्ध निजातम दर्श ज्ञान में करे विहार।।
प्रभो बन्ध से भिन्न सदा मैं निरखूँ निज चैतन्य स्वरूप।
दर्श ज्ञान चारित्र अर्घ्य अर्पित कर निरखूँ ज्ञायकरूप।।
ॐ ह्रीं बन्धतत्त्वस्वरूपभेद-प्रभेदाभिधानं विवेचकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

जीव-कर्म के बन्ध को, कहते जिन व्यवहार।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, नाशूँ सकल विकार।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे अष्टमोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।

।। अथ नवमोऽध्यायः।।

संवर और निर्जरा तत्त्व का वर्णन

(दोहा)

शुद्धि की उत्पत्ति ही, संवर भाव सुजान।
अनुभव रस में वृद्धि हो, यह निर्जरा महान्।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

संवर, निर्जरा और संवर के कारणों का कथन
आस्रव निरोधः संवरः।।1।।
स गुप्ति-समिति-धर्मानुप्रेक्षा-परिषहजय-चारित्रैः।।2।।
तपसा निर्जरा च।।3।। सम्यग्योग-निग्रहो गुप्तिः।।4।।
ईर्या-भाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः ।।5।।
उत्तमक्षमा-मार्दवार्जव-शौच-सत्य-संयम-तपस्त्यागाकिञ्चन्य-
ब्रह्मचर्याणि धर्मः ।।6।।
अनित्याशरण-संसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रव-संवर-निर्जरा-लोक-
बोधिदुर्लभ-धर्मस्वाख्या तत्त्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ।।7।।
मार्गाच्यवन-निर्जरार्थं परिषोढव्याः परिषहाः।।8।।
आस्रव का निरोध संवर है गुप्ति समिति अरु धर्म कहो।
अनुप्रेक्षा परिषह जय एवं चारित - इनसे संवर हो।।
तप से संवर और निर्जरा, सम्यक् योग निरोध गुप्ति।
ईर्या भाषा निक्षेपण-आदान एषणा समिति कही।।1।।

  • पंचम है उत्सर्ग समिति अरु कहे धर्म के लक्षण दश।
    उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव सत्य शौच संयम अरु तप -
    त्याग और आकिंचन एवं ब्रह्मचर्य को धर्म कहो।
    अनुप्रेक्षा बारह अनित्य अशरण संसारैकत्व लखो।।2।।

  • अन्यत्व अशुचि आस्रव संवर निर्जरा लोक बोधिदुर्लभ ।
    तथा धर्म का चिन्तन अनुप्रेक्षा है जिससे मुक्ति सुलभ ।।
    संवर पथ पर रहे अडिगता और कर्म क्षय हेतु कहें।
    सहने योग्य परीषह बाइस जंगल में मुनिराज सहें।।3।।
    ॐ ह्रीं संवरनिर्जरातत्त्वयोः स्वरूपस्य संवरस्य हेतुबोधकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
    नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

बाईस परीषहों के नाम
क्षुत्पिपासा-शीतोष्ण-दंशमशक-नाग्न्यारति-स्त्री-चर्या-निषद्या-
शय्याऽऽक्रोश-वध-याचनाऽलाभ-रोग-तृणस्पर्श-मल-सत्कार-
पुरस्कार-प्रज्ञाज्ञानादर्शनानि ।।9।।
क्षुधा तृषा शीतोष्ण दंशमश नाग्न्य अरति स्त्री चर्या-
निषद्या शय्याक्रोश याचना वध अलाभ अरु रोग कहा-
तृणस्पर्श सत्कार तथा मल पुरस्कार प्रज्ञा अज्ञान-
और अदर्शन मिल सब होते हैं बाईस परीषह जान।।4।।
ॐ ह्रीं द्वाविंशतिपरीषह-अभिधानबोधकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
गुणस्थानों में परीषहों की संख्या तथा उनमें निमित्तभूत कर्म का कथन
सूक्ष्मसाम्परायच्छद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश ।।10।।
एकादश जिने।।11।।
बादर-साम्पराये सर्वे ।।12।। ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने।।13।।
दर्शनमोहान्तराययोरदर्शनालाभौ ।।14।।
दसवें से बारहवें तक हो सकते हैं चौदह परिषह।
तेरहवें में ग्यारह एवं छह से नौ तक सब परिषह।।

प्रज्ञा अरु अज्ञान परीषह ज्ञानावरण निमित्त से हों।
दर्श-मोह से होय अदर्शन अन्तराय से लाभ न हो।।5।।
ॐ ह्रीं परीषहाणां विशेषास्तित्वं ज्ञानावरण-दर्शन-मोहान्तरायनिमित्तत्वं च
बोधकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चारित्रमोह और वेदनीय कर्म निमित्तक परीषह तथा
चारित्र और तप के भेदों का कथन

चारित्रमोहे नाग्न्यारति-स्त्री-निषद्याऽऽक्रोश-याचना-सत्कार-
पुरस्काराः ।।15।। वेदनीये शेषाः ।।16।।
एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नैकोनविंशतेः ।।17।।
सामायिक-च्छेदोपस्थापना - परिहारविशुद्धि-सूक्ष्मसाम्पराय -
यथाख्यातमिति चारित्रम्।।18।।
अनशनावमौदर्य-वृत्तिपरिसंख्यान-रसपरित्याग-विविक्त-शय्यासन -
कायक्लेशा बाह्यं तपः।।19।।
प्रायश्चित्त-विनय-वैयावृत्त्य-स्वाध्याय-व्युत्सर्ग-ध्यानान्युत्तरम् ।।20।।
नाग्न्य अरति स्त्री निषद्या अरु आक्रोश याचना भी।
होते हैं सत्कार पुरस्कार चारित-मोह उदय में ही।।
वेदनीय से शेष, अधिकतम एक साथ होते उन्नीस।
सामायिक छेदोपस्थापन अरु परिहार विशुद्धि भी।।6।।
सूक्ष्म साम्पराय-रु यथाख्यात पाँच चारित्र सही।
अनशन अवमौदर्य और वृत्ति परिसंख्या रस त्यागी -
विविक्तशय्यासन अरु कायक्लेश बाह्य तप, अरु अन्तरंग-
प्रायश्चित विनय वैयावृत स्वाध्याय व्युत्सर्ग सुध्यान।।7।।
ॐ ह्रीं चारित्रमोह-वेदनीय-निमित्तक-परीषहं चारित्र-तपोभेदाभिधानं च
बोधकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

प्रायश्चित्त और विनय तप के भेद
नव-चतुर्दश-पञ्च-द्विभेदा यथाक्रमं प्राग् ध्यानात्।।21।।
आलोचना-प्रतिक्रमण-तदुभय-विवेक-व्युत्सर्ग-तपश्छेद-

प्रूफरीडिंग बाकी है

परिहारोपस्थापनाः ।।22।।

ज्ञान-दर्शन-चारित्रोपचाराः ।।23।।
ध्यान पूर्व नौ चार और दश पाँच तथा दो भेद कहे।
प्रायश्चित के आलोचन प्रतिक्रमण और तदुभय कहते-
तपश्छेद व्युत्सर्ग विवेक-रु परिहारोपस्थापन है।
ज्ञान दर्श चारित्र और उपचार विनय के भेद कहे।।8।।
ॐ ह्रीं अन्तरंगतपोभेद-संख्या प्रायश्चित्त-विनयभेदाभिधानं च बोधकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

वैयावृत्त्य, स्वाध्याय और व्युत्सर्ग तप के भेद
आचार्योपाध्याय-तपस्वि-शैक्ष्य-ग्लान-गण-कुल-संघ-साधु-
मनोज्ञानाम् ।।24।।
वाचना-पृच्छनाऽनुप्रेक्षाऽम्नाय - धर्मोपदेशाः ।।25।।
बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ।।26।।
आचार्योपाध्याय तपस्वी शैक्ष्य ग्लान गण कुल अरु संघ-
साधु मनोज्ञ – इन दश प्रकार के मुनि सेवा वैयावृत्त अंग।।
वाचन पृच्छा अनुप्रेक्षा आम्नाय सुनाना है स्वाध्याय।
बाह्याभ्यन्तर उपधि त्याग यह दो प्रकार व्युत्सर्ग कहा।।9।।
ॐ ह्रीं वैयावृत्त्य-स्वाध्याय-व्युत्सर्गभेदाभिधानबोधकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

ध्यान का स्वरूप, भेद तथा आर्त ध्यान के भेद
उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात्।।27।।
आर्त्त-रौद्र-धर्म्य शुक्लानि।।28।। परे मोक्षहेतू।।29।।
आर्त्तममनोज्ञस्य सम्प्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृति-समन्वाहारः।।30।।
अन्तर्मुहूर्त होकर एकाग्र करे चिन्ताओं का परिहार।
उत्तम संहनन युक्त जीव जब होता उसे ध्यान तप सार।।
आर्त रौद्र अरु धर्म शुक्ल चौ भेद अन्तद्वय हैं शिवपंथ।
हो अनिष्ट संयोग दूर करने का चिन्तन आर्त प्रथम।।10।।
ॐ ह्रीं ध्यानस्वरूपभेदहेतुत्वं प्रथमार्तध्यानस्वरूपं च बोधकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

आर्तध्यान एवं रौद्रध्यान के भेद
विपरीतं मनोज्ञस्य।।31।।
वेदनायाश्च।।32।। निदानं च।।33।।
तदविरत-देशविरत-प्रमत्तसंयतानाम्।।34।।
हिंसानृत-स्तेय-विषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरत-देशविरतयोः।।35।।
इष्ट प्राप्ति का चिन्तन दूजा वेदन निग्रह तीजा आर्त।
चौथा है निदान, हो अविरति देशविरत प्रमत्त तक आर्त।।
हिंसा अनृत अरु स्तेय विषय संरक्षण रौद्र कहा।
अविरत चारों, देशविरत को रौद्र ध्यान है हो सकता।।11।।
ॐ ह्रीं शेषार्तध्यानं चतुर्विधरौद्रध्यानं तेषां स्वामी च बोधकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

धर्मध्यान और शुक्लध्यान के भेद
आज्ञापाय-विपाक-संस्थान-विचयाय धर्म्यम्।।36।।
शुक्ले चाद्ये पूर्वविदः।।37।। परे केवलिनः।।38।।
पृथक्त्वैकत्ववितर्क-सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति-व्युपरतक्रिया-
निवर्तीनि।।39।।
त्र्येकयोग-काययोगायोगानाम्।।40।।
एकाश्रये सवितर्क-वीचारे पूर्वे।।41।। अवीचारं द्वितीयम्।।42।।
आज्ञा विचय अपाय विपाक और संस्थान धर्म चौ ध्यान।
पूर्वज्ञानधर को होते हैं प्रथम द्वितीय भेद शुक्ल ध्यान।।
अन्तिम दो केवलि को होते चार भेद जानो यह ध्यान।
पृथक्त्व और एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति सुध्यान।।12।।
व्युपरत क्रिया निवृति चतुर्थम पहला तीनों योग सहित-
किसी एक योगी को दूजा- तीजा काया योग सहित।।
चौथा ध्यान अयोगी को है पहले दो सवितर्क विचार-
पूर्व ज्ञानधारी को होते, दूजे में हों नहीं विचार।।13।।
ॐ ह्रीं धर्म्यशुक्लध्यानभेद-अभिधान-वैशिष्ट्यबोधकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

वितर्क और विचार का स्वरूप, असंख्य गुणश्रेणी निर्जरा के ग्यारह स्थान
एवं निर्ग्रन्थों के भेद
वितर्कः श्रुतम्।।43।। वीचारोऽर्थ-व्यंजन-योगसंक्रान्तिः।।44।।
सम्यग्दृष्टि-श्रावकविरतानन्तवियोजक-दर्शनमोह-
क्षपकोपशमकोपशान्तमोह-क्षपक-क्षीणमोह-जिनाः
क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः।।45।।

पुलाक-बकुश-कुशील-निर्ग्रन्थ-स्नातका निर्ग्रन्थाः।।46।। संयम-श्रुत-
प्रतिसेवना-तीर्थ-लिंग-लेश्योपपादस्थान-विकल्पतः साध्याः।।47।।
श्रुत वितर्क है व्यंजन अर्थ-रु योगों की संक्रान्ति वीचार।
गुण असंख्य निर्जरा कही है इन सबकी क्रमशः अनिवार-
सम्यग्दृष्टि श्रावक विरतानन्त-वियोजक दृगमोह क्षपक।
चरितमोह उपशामक अरु उपशान्तमोहयुत तथा क्षपक-।।14।।
-क्षीण मोह एवं जिनेन्द्र क्रम से करते निर्जरा महान्।
पुलाक बकुश कुशील और निर्ग्रन्थ स्नातक मुनि भगवान्।।
संयम श्रुत प्रतिसेवन तीर्थ लिंग लेश्या उपपाद स्थान।
इन आठों अनुयोगों से हो पाँचों मुनि में भेद सुजान।।15।।
ॐ ह्रीं वितर्कवीचारस्वरूपम् असंख्यगुणश्रेणीनिर्जरा-एकादशस्थानं निर्ग्रन्थानां
भेदं च बोधकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

संवर और निर्जरा निर्मल परिणति शिव के साधक भाव।
गुप्ति समिति तप ध्यान परीषह हैं व्यवहार कहें जिनराव।।
भूल स्वयं को यह परिणति बस ज्ञायक में ही हो तद्रूप।
दर्श ज्ञान चारित्र अर्घ्य अर्पित कर लखूँ अनर्घ्य स्वरूप।।
ॐ ह्रीं नवमाध्यायसमन्वित-श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

चेतन रस में प्रकट हों, संवर निर्जर भाव।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, ध्याऊँ निज ध्रुव भाव।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे नवमोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।

।। अथ दशमोऽध्यायः ।।

मोक्ष तत्त्व का वर्णन

(दोहा)

द्रव्य भाव नोकर्म से, रहित अवस्था जान।
अशरीरी आनन्दमय, शाश्वत मोक्ष निधान।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

अरहन्त एवं सिद्ध दशा का स्वरूप
मोहक्षयाज्ज्ञान-दर्शनावरणान्तराय-क्षयाच्च केवलम्।।1।।
बन्धहेत्वभाव-निर्जराभ्यां कृत्स्न-कर्मविप्रमोक्षो मोक्षः।।2।।
औपशमिकादि-भव्यत्वानां च।।3।।
अन्यत्र केवलसम्यक्त्व-ज्ञान-दर्शन-सिद्धत्वेभ्यः।।4।।
मोहक्षय एवं त्रिघाति के क्षय से होता केवलज्ञान।
संवर और निर्जरा से सम्पूर्ण कर्मक्षय है निर्वाण।।
उपशम उदय क्षयोपशम भाव तथा भव्यत्व नष्ट होते।
क्षायिक समकित दर्शन ज्ञान और सिद्धत्व सदा रहते।।1।।
ॐ ह्रीं श्री अरहन्तसिद्धावस्थालक्षण-वैशिष्ट्यज्ञापकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मुक्त जीवों का ऊर्ध्वगमन स्वभाव
तदनन्तरमूर्ध्वं गच्छत्यालोकान्तात्।।5।।
पूर्वप्रयोगादसंगत्वाद्बन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च।।6।।
आविद्ध-कुलाल-चक्रवद् व्यपगत-लेपालाम्बुवदेरण्डबीजवदग्नि-
शिखावच्च।।7।।

कर्मक्षय होने पर ऊपर जीव गमन करता लोकान्त।
पूर्व प्रयोग असंग बन्ध का छेद स्वभावी-ऊर्ध्वगमन।।
ज्यों कुम्हार का चक्र घूमता तूंबी से मिट्टी हटती।
एरण्ड बीज ऊपर जाता अरु अग्नि शिखा ऊपर जाती।।2।।
ॐ ह्रीं श्री मुक्तजीवानामूर्ध्वगमनस्वभावज्ञापकाय श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सिद्ध भगवन्तों की लोकाग्र में स्थिति तथा व्यवहार नय से
सिद्धों के भेदों का वर्णन
धर्मास्तिकायाभावात् ।।४।।
क्षेत्र-काल-गति-लिंग-तीर्थ- चारित्र-प्रत्येकबुद्ध-बोधित-
ज्ञानावगाहनान्तर-संख्याल्पबहुत्वतः साध्याः।।9।।
नहिं अलोक में धर्मद्रव्य है अतः जीव रहता लोकाग्र।
क्षेत्र काल गति लिंग तीर्थ चारित्र और बोधित प्रत्येक-
बोधित बुद्ध ज्ञान अवगाहन अन्तर संख्या अल्प बहुत्व-
इन बारह बिन्दु के द्वारा सिद्ध जीव हो सकें विभक्त।।3।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धजीवानां लोकाग्रे विराजमानत्वं व्यवहारेण च सिद्धभेदज्ञापकाय
श्रीतत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महाऽर्घ्य

द्रव्य भाव नोकर्म रहित शिव पद रहता है काल अनन्त।
सदा मुक्त चैतन्य तत्त्व शाश्वत ध्रुव एक अनादि अनन्त।।
दृष्टि सदा निरखे निज को प्रभु ! बन्ध-मोक्ष बिन चेतनरूप।
दर्श ज्ञान चारित्र अर्घ्य अर्पित कर लखूँ अनर्घ्य स्वरूप।।
ॐ ह्रीं श्री अरहन्तसिद्धपर्याययुक्तमोक्षतत्त्वज्ञापकाय दशमाध्यायसमन्वित-
तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

निज चैतन्य स्वभाव में, नहीं मोक्ष का वेश।
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन, करूँ निजात्म प्रवेश।।
।। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे दशमोऽध्यायः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।।
पूर्णाऽर्घ्य
दश अध्यायों से शोभित, तत्त्वार्थसूत्र यह ग्रन्थ महान्।
इसे समझने हेतु करें हम, नय-प्रमाण का सम्यग्ज्ञान।।
सात-तत्त्व के भेदों में है, विलसित चेतन तत्त्व महान्।
प्रभो ! अर्घ्य अर्पित करता हूँ, पद अनर्घ्य हो शिवसुखदान।।
ॐ ह्रीं तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

समुच्चय महाऽर्घ्य

(दोहा)

महाशास्त्र तत्त्वार्थ का, करता हूँ गुणगान।
विषय वस्तु संक्षेप में, किंचित् करूँ बखान।।

(वीरछन्द)

रत्नत्रय ही मुक्ति-मार्ग है नय-प्रमाण से कहा गया।
ज्ञान तत्त्व के भेद प्रभेदों का कुछ वर्णन किया गया।।
पाँच भाव स्व तत्त्व जीव के गति इन्द्रिय तन आदि कहे।
किन्तु अचेतन संयोगों में चेतन तत्त्व विराज रहे।।1।।
सुर नारक के भेदों आवासों अरु आयु आदि वर्णन।
मध्य लोक के द्वीप समुद्रों सरित सरोवर आदि कथन।।
कहाँ कहाँ यह जीव जन्मता चतुर्गति में भ्रमण करे।
जन्म-मरण से रहित अजन्मा चेतन तत्त्व विराज रहे।।2।।

पाँच अचेतन द्रव्यों का गुण द्रव्य और पर्यायों का।
सत् लक्षण उत्पाद ध्रौव्य व्यय का स्वरूप भी बतलाया।।
कर्मास्रव के कारण एवं आस्रव के सब भेद कहे।
आस्रव से है भिन्न सदा जो चेतन तत्त्व विराज रहे।।3।।
बारह व्रत वर्णन एवं समकित-व्रत-सामायिक अतिचार।
पाँच पाँच भावना पाँच का वर्णन है आस्रव अधिकार।।
चार प्रकार बन्ध का वर्णन हेय तत्त्व मुनिराज कहें।
आस्रव-बन्ध विहीन सदा जो चेतन तत्त्व विराज रहे।।4।।
संवर और निर्जरा के भी भेद प्रभेद कहे इसमें।
बाइस परिषह चार ध्यान का भी वर्णन मुनिराज करें।।
मुक्ति स्वरूप ऊर्ध्व गति वर्णन सिद्धों के भी भेद कहे।
बन्ध-मोक्ष से रहित सदा जो चेतन तत्त्व विराज रहे।।5।।
ॐ ह्रीं तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय समुच्चयमहार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(दोहा)

जो श्री जिनमुख-कमल का, वाहन है अभिराम।
दो नय से सबकुछ कहे वाणी उसे प्रणाम।।

(वीरछन्द)

गुणभूषण गणधर से विरचित श्रुतधर परम्परा से व्यक्त।
परमागम के अर्थकथन में मन्द बुद्धि हम तो असमर्थ।।
इष्ट प्राप्ति होती सुबोध से, बोध शास्त्र से होता है।
और सुशास्त्रों का उद्भव भी, आप्त पुरुष से होता है।।1।।

समुच्चय जयमाला

अतः ज्ञानियों द्वारा पूज्य सदा, होते हैं आप्त प्रभो।
किया हुआ उपकार कभी भी, नहीं भूलते सज्जन जो।।
जो अत्यंत मनोहर शुद्ध तथा शिवपथ के कारण हैं।
भव्यों के कर्णों को अमृत दावानल को जल-सम हैं।।2।।
जैन योगियों द्वारा वन्द्य सदा ऐसे जिनराज वचन।
मन-वच-तन से नितप्रति करता मैं उन वचनों को वन्दन।।
भक्त अमर नत मुकुट रत्न से पूज्य चरण वे वीर जिनेश।
जन्म मृत्यु अरु जरा विनाशक देते अघ नाशक उपदेश।।3।।
महावीर तीर्थाधिनाथ वच सन्त जिसे उर में धरते।
सत्य शील नौका द्वारा वे पार भवोदधि को पाते।।*4।।

(दोहा)

पद्मप्रभमल मुनि करें, जिनवर का गुणगान।
अर्घ्य समर्पित मैं करूँ, पाऊँ शाश्वत धाम।।
ॐ ह्रीं तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थाय जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

जिन गुरु जिनश्रुत भक्ति से, प्रेरित हुआ विधान।
पढ़ें सुनें भविजन सदा, पावें पद निर्वाण।।
भाव-द्रव्य की दृष्टि से, यदि हो कोई भूल।
ध्यानाकर्षण बुध करें, शीघ्र लहूँ भव-कूल।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि

* नियमसार कलश2,5,15 एवं 61 का पद्यानुवाद

शान्ति पाठ*

(वीरछन्द)

शशि-सम निर्मल वदन, शीलगुण व्रतधारी हे शान्ति जिनेन्द्र।
शत-अठ लक्षण से शोभित तन, नमूँ जिनोत्तम कमलनयन।।1।।
मन-वांछित, पंचम चक्री हो, पूजित इन्द्र नरेन्द्रों से।
शान्ति प्रदायक, शान्ति हेतु मैं सोलहवें जिननाथ नमूँ।।2।।
तरु-अशोक, सुर पुष्पवृष्टि दुन्दुभि सिंहासन दिव्यवचन।
छत्रत्रय, भामण्डल, चौंसठ चँवर, प्रातिहार्य अनुपम।।3।।
जगत्-पूज्य हे शांति प्रदायक, शीश झुकाऊँ शान्ति जिनेन्द्र।
सर्व गणों को शान्ति करो, मुझ पाठक को दो शान्ति परम।।4।।
कुण्डल, मुकुट हार रत्नोंयुत, इन्द्रों द्वारा पूज्य हुए।
उत्तम वंश, प्रदीप जगत् के, सतत शान्ति दो प्रभो मुझे।।5।।
सम्यक् पूजक, प्रतिपालक सामान्य तपोधन यतियों को।
देश, राष्ट्र अरु नगर भूप को, हे जिन ! शान्ति प्रदान करो।।6।।
राजा हो बलवान, धार्मिक, सर्व जनों का हो कल्याण।
बरसें मेघ समय पर, होवें सर्व व्याधियाँ क्षय को प्राप्त।।
जीवों को पल भर भी चोरी मारी अरु दुर्भिक्ष न हो।
सबको सुखदायी जिनवर का धर्मचक्र जयवन्त रहो।।7।।
रत्नत्रय हो सदा प्रकाशित, ऐसा द्रव्य सुदेश मिले।
समीचीन तप की वृद्धि हो, ऐसा उत्तम काल मिले।।
* प्रचलित संस्कृत शान्तिपाठ का पद्यानुवाद

निर्मल परिणति हो प्रसन्न, प्रभु! ऐसा उत्तम भाव मिले।
मोक्षार्थी मुनिगण की परिणति में रत्नत्रय सुमन खिलें।।8।।
घातिकर्म क्षय किये जिन्होंने उदित हुआ कैवल्य प्रकाश।
शान्ति प्रदान करें जग को वृषभादिक चौबीसों जिनराज।।9।।
(नौ बार णमोकार मन्त्र के माध्यम से पंच परमेष्ठी का स्मरण करें।)

क्षमापना - आत्मभावना

अक्षर पद मात्रा स्वर व्यंजन रेफ आदि की यदि हो भूल।
शास्त्र सिन्धु में कौन न डूबे क्षमा करो पाऊँ भव-कूल।।1।।
हे प्रभु! निज संवेदन लक्षण भूषित श्रुत चक्षु द्वारा।
केवलज्ञान चक्षु से मंडित, आज आपको देख रहा।।2।।
शास्त्राभ्यास जिनेन्द्र भक्ति संगति आर्यों की रहे सदा।
सज्जन का गुणगान करूँ मैं दोष कथन नहिं करूँ कदा।।
हित-मित-प्रिय वाणी हो सबसे आत्म-भावना ही भाऊँ।
गति अपवर्ग न होवे जब तक भव-भव में यह वर पाऊँ।।3।।
जिनपथ में रुचि विरति अन्य से जिनगुण स्तवन मैं अति लीन।
निष्कलंक निर्दोष भावना हो मेरी भव-भव में पीन।।4।।

(अनुष्टुप्)

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्।।
सर्वमंगल-मांगल्यं सर्वकल्याण-कारकम्।
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम्।।

पीठिका

(हरिगीतिका)

श्री वर्धमान प्रभो तथा गुरु गौतमादिक को नमूँ।
आम्नाय के अनुसार कहता रत्नत्रय-विधि भव तरूँ।।1।।
परम ज्ञानी जग-गुरु परमात्मा परमेष्ठि जो।
ज्ञान-मूर्ति किन्तु बिन-मूरत हमारे दुख हरो।।2।।
निर्विकल्पी निराबाधी शाश्वत सुखधाम जो।
चिन्मय निजातम को नमूँ मैं स्वानुभूति प्राप्त हो।।3।।
जिस ज्ञानरूपी गगन में त्रय लोक की सब वस्तुएँ।
नक्षत्रवत् प्रतिभासती उस परम-आतम को नमें।।4।।
मन और वाणी से अगोचर स्वानुभूति सुगम्य जो।
चिद्रूप और विशुद्ध उस परमात्मा को नमन हो।।5।।
इस अनन्तानन्त भवदधि से अहो जो तारते।
अव्यक्त उस परमात्मा का ध्यान हम नित धारते।।6।।
परमात्मा की ही शरण ले साम्य रस का पान कर।
उन-सम गुणों की प्राप्ति हेतु चिदातम को नमन कर।।7।।
विष-सम विषय नरकादि के कारण कहें जिनवर अहो।
उनसे विमुख हो चित्त यह परमात्मा में लीन हो।।8।।
संसार-ज्वर दुखमय अहो! जिस नाम मंत्र सुजाप से।
शीघ्र होता नष्ट, उस परमात्मा को नमन हो।।9।।
चिरकाल का अज्ञान जिसके सुस्मरण से ही नशे –
क्षणमात्र में, हो नमन मेरा नित्य उस परमात्म को।।10।।
अनन्त दर्शन-ज्ञान-वीर्य अनन्त आनन्दमय अहो !
वन्दन करूँ मैं समयसार स्वरूप उस परमात्म को।।11।।
जो स्वसंवेद्य अव्यक्त है सत् तत्त्व सुखदायक अहो।
चिद्रूप और विशुद्ध उस परमात्मा को नमन हो।।12।।
ध्रुवरूप होकर भी अहो उत्पाद अरु व्ययरूप जो।
चिद्रूप और विशुद्ध उस परमात्मा को नमन हो।।13।।
जिसको महर्षिगण बताते हैं रतनत्रयरूप जो।
चिद्रूप और विशुद्ध उस परमात्मा को नमन हो।।14।।
जिसका अनन्त सुशाश्वत सुख वचनगम्य नहीं अहो।
चिद्रूप और विशुद्ध उस परमात्मा को नमन हो।।15।।
निज आत्मगत है किन्तु बुधजन सर्वगत कहते जिसे।
चिद्रूप और विशुद्ध उस परमात्म को वन्दन करें।।16।।
जिसका उदय बलपूर्वक मोहान्धकार विनाशता।
चिद्रूप और विशुद्ध उस परमात्म को वन्दन सदा।।17।।
मुक्ति-सखी विद्या मिले जिसकी सुसेवा से अहो।
चिद्रूप और विशुद्ध उस परमात्मा को नमन हो।।18।।
जो स्वयं आनन्दरूप है त्रय लोक परमेश्वर अहो।
चिद्रूप और विशुद्ध उस परमात्मा को नमन हो।।19।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

समुच्चय पूजन

स्थापना

(वीरछन्द)

निज-पर भेदज्ञान कर जिसने मोह शत्रु को नष्ट किया।
शिवपथ दर्शक परम तेजमय रत्नत्रय को नमूँ सदा।।1।।
चेतन और अचेतन का सम्यक् निश्चय, सम्यग्दर्शन।
जीवादिक तत्त्वों का परम बोध, जिन कहते सम्यग्ज्ञान।।2।।
पाप क्रियाओं को तजना ही कहलाता सम्यक्चारित्र।
यह व्यवहार-रत्नत्रय इसको उर में धारूँ परम पवित्र।।3।।
आत्म-विनिश्चय सम्यग्दर्शन आत्मज्ञान ही सम्यग्ज्ञान।
आत्मलीनता सम्यक्चारित निश्चय शिवपथ को वन्दन।।4।।
जिन मुनि ने शाश्वत शिव पाया, प्राप्त कर रहे, पायेंगे।
वे अखण्ड रत्नत्रय आराधन से ही शिव जायेंगे।।5।।
जन्म-जरा-अरु मरण सर्पत्रय-दर्प विनाशक रत्नत्रय।
इस आभूषण से विरूप भी होते मुक्ति वधू के वर।।6।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रस्वरूपरत्नत्रय! अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इत्याह्वानम्)
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रस्वरूपरत्नत्रय! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
(इति स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रस्वरूपरत्नत्रय! अत्र मम सन्निहितो भव भव

वषट् (इति सन्निधिकरणम्)

पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

अष्टक

(वीरछन्द)

भक्ति भाव से गंगा जल की धार समर्पित करता हूँ।
द्वय विध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित आराधन करता हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति…
हरि चन्दन से दस दिश महकें, काश-पुष्प लज्जित होता।
द्वय विध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित की मैं पूजा करता।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति…
अलिगण गुंजित स्वच्छ अखंडित पुंज समर्पित करता हूँ।
द्वय विध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित आराधन करता हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति…
पूर्ण सुगन्धित दुर्लभ गुणमय पुष्प समर्पित करता हूँ।
द्वय विध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित आराधन करता हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यः कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति…
उत्तम घृतमय बहुगुण संयुत यह नैवेद्य समर्पित है।
द्वय विध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित का नित आराधन है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति…
आलोकित हैं सर्व दिशायें लोचन-प्रिय यह दीप धरूँ।
द्वय विध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित को परिणति में पूजूँ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति…
धूम्र-पटलमय धूप प्रज्वलित गन्ध नासिका तृप्त करे।
द्वय विध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित सौरभ मुझमें महके।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यो अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति…

उत्तम गन्ध-स्पर्श-वर्ण-रसमय फल अर्पित करता हूँ।
द्वय विध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित आराधन करता हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति…
जल गन्धाक्षत आदि मनोहर द्रव्यमयी यह अर्घ्य धरूँ।
द्वय विध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित को परिणति में पूजूँ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति…
भेदाभेद सुरत्नत्रय को भक्ति भाव से जो पूजें।
वे मोक्षार्थी अल्प काल में अविनाशी शिववधू वरें।।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति…

सम्यग्दर्शन पूजन

पीठिका (हरिगीतिका)

उत्पाद-व्यय अरु ध्रौव्यमय तत्त्वार्थ के श्रद्धान को।
विद्वानजन व्यवहार सम्यग्दर्श कहते हैं अहो।।1।।
चैतन्यमय आनन्दमय परमात्म का श्रद्धान जो।
शिव प्राप्ति हेतु हो हमें, सम्यक्त्व निश्चय वह अहो।।2।।
अल्प फल भी बहुत फल की प्राप्ति का कारण बने।
मल रहित और महान् इस सम्यक्त्व को हम नित नमें।।3।।
ज्यों जल बिना कृषि व्यर्थ है, त्यों शुभक्रिया सम्यक्त्व बिन।
इसलिये मुझको हे सदा सम्यक्त्व की ही शरण जिन।।4।।
जिससे लहें सत्पुरुष काम अरु अर्थ बोध-चरित्र को।
इसलिये इनसे पूर्व ही सम्यक्त्व मुझको प्राप्त हो।।5।।
जो हो चुके हैं सिद्ध और भविष्य में भी होंयगे।
जो हो रहे हैं, यह सभी सम्यक्त्व की महिमा अहो।।6।।

सम्यग्दर्शन पूजन

दो सहस जिह्वा सहित जो शेषनाग समान है।
वह पुरुष भी नहिं कह सके सम्यक्त्व की महिमा अहो।।7।।
प्राणियों को शुद्ध चेतनरूप की उपलब्धि हो।
माहात्म्य यह सम्यक्त्व का उसको हमारा नमन हो।।8।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

स्थापना

(वीरछन्द)

शुद्ध बुद्ध चेतन स्वरूप अरु अन्य पदार्थों का श्रद्धान।
समकित है व्यवहार तथा निश्चय निज आत्मा का श्रद्धान।।
जिसमें प्रतिदिन मोक्ष सम्पदा अति प्रसन्न होकर विकसे।
समयसार रसमय समकित-पंकज मम उर-सर में विकसे।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः अष्टांगसम्यग्दर्शन! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (इत्याह्वानम्)
दुर्निवार दुखरूप अग्नि के शमन हेतु जो शीतल है।
अष्ट अंगमय सम्यग्दर्शन शुद्धि हेतु स्थापित है।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः अष्टांगसम्यग्दर्शन! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (इति स्थापनम्)
जिससे प्राणी भव-विपत्ति हर शिव-लक्ष्मी के अधिपति हों।
पाप-विनाशक उत्तम सम्यग्दर्शन मम निकटस्थ रहो।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः अष्टांगसम्यग्दर्शन! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

अष्टक

(वीरछन्द)

जिसके प्रभाव से भव्य जीव स्वात्मोपलब्धि सत्वर पाते।
उस अष्टांग सुदर्श-रत्न को गंगाजल से हम पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टांगसम्यग्दर्शनाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

भव्यों को बारह* मिथ्यामत की श्रद्धा से जो रोके।
उस अष्टांग सुदर्श-रत्न को मनहर चन्दन से पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टांगसम्यग्दर्शनाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
जिसके प्रताप से सपने में भी दुखमय नरकगमन नहिं हो।
मनहर अक्षत से हम पूजें, उस अष्टांग सुदर्शन को।।
ॐ ह्रीं अष्टांगसम्यग्दर्शनाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञानश्री का मूल और चारित्र-लता-वन को जल-सम।
उस अष्टांग सुदर्शन को नित कमल पुष्प से पूजें हम।।
ॐ ह्रीं अष्टांगसम्यग्दर्शनाय कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
सात तत्त्व श्रद्धान रूप अरु मोह तिमिर का नाशक है।
उस अष्टांग सुदर्श-रत्न को शिव हेतु चरु से पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टांगसम्यग्दर्शनाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
काललब्धि आने पर होता अधिगम से या स्वतः अहो।
उस अष्टांग सुदर्श-रत्न को रत्न-दीप से हम पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टांगसम्यग्दर्शनाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
संवेगादि गुणों से भूषित ध्वस्त करे सब पापों को।
धूप सुवासित से मैं पूजूँ उस अष्टांग सुदर्शन को।।
ॐ ह्रीं अष्टांगसम्यग्दर्शनाय अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
मुख्यरूप से शिवफलदायी गौण रूप से राज्यश्री।
उस अष्टांग सुदर्श-रत्न को प्रमुख फलों से मैं पूजूँ।।
ॐ ह्रीं अष्टांगसम्यग्दर्शनाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
पापरूप दावानल को जो शान्त करे नित मेघ समान।
चहुँगति भ्रमण निवारण हेतु रहे सर्वदा तत्पर ज्ञान।।
* संभव है, पण्डित आशाधरजी के समय में बारह प्रकार के मिथ्यामत प्रचलित होंगे।

अद्भुत निःश्रेयस सुख पाने की वांछा उर रही विराज।
दोष रहित सम्यग्दर्शन को अर्घ्य समर्पित करता आज।।
ॐ ह्रीं अष्टांगसम्यग्दर्शनाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
अष्टांग पूजा

(दोहा)

अष्ट अंग पूजा रचूँ, मनहारी जल लाय।
निज स्वरूप प्राप्त्यर्थ मैं, भक्ति भाव उर धार।।
ॐ ह्रीं निःशंकिताद्यष्टांगेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्ट अंग पूजा रचूँ, शीतल चन्दन लाय।
निज स्वरूप प्राप्त्यर्थ मैं, भक्ति भाव उर धार।।
ॐ ह्रीं निःशंकिताद्यष्टांगेभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्ट अंग पूजा रचूँ, निर्मल अक्षत लाय।
निज स्वरूप प्राप्त्यर्थ मैं, भक्ति भाव उर धार।।
ॐ ह्रीं निःशंकिताद्यष्टांगेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
अष्ट अंग पूजा रचूँ, अनुपम पुष्प चढ़ाय।
निज स्वरूप प्राप्त्यर्थ मैं, भक्ति भाव उर धार।।
ॐ ह्रीं निःशंकिताद्यष्टांगेभ्यः कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्ट अंग पूजा रचूँ, रसमय चरु ले आय।
निज स्वरूप प्राप्त्यर्थ मैं, भक्ति भाव उर धार।।
ॐ ह्रीं निःशंकिताद्यष्टांगेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्ट अंग पूजा रचूँ, जगमग ज्योति जगाय।
निज स्वरूप प्राप्त्यर्थ मैं, भक्ति भाव उर लाय।।
ॐ ह्रीं निःशंकिताद्यष्टांगेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

अष्ट अंग पूजा रचूँ धूप सुगन्धित लाय।
निज स्वरूप प्राप्त्यर्थ मैं भक्ति भाव उर लाय।।
ॐ ह्रीं निःशंकिताद्यष्टांगेभ्यो अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्ट अंग पूजा रचूँ, उत्तम फल ले आय।
निज स्वरूप प्राप्त्यर्थ मैं, भक्ति भाव उर लाय।।
ॐ ह्रीं निःशंकिताद्यष्टांगेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

(वीरछन्द)

जल चन्दन अक्षत अखण्ड से शोभित कुसुमांजलि द्वारा।
अपुनर्भव सुख प्राप्ति हेतु मैं अष्ट अंग को यजूं सदा।।
ॐ ह्रीं निःशंकिताद्यष्टांगेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्टांग अर्ध्यावलि
जिससे भव्यों को जिनभाषित तत्त्वों में नहिं संशय हो।
शिवसुखदायक समकित का यह अंग निःशंकित हृदय बसो।।
ॐ ह्रीं निःशंकितांगाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
इन्द्र नरेन्द्रों का वैभव पहले आने की होड़ करे।
ऐसे सम्यग्दर्शन का निःकांक्षित अंग मम हृदय बसे।।
ॐ ह्रीं निःकांक्षितांगाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो विद्या विलास से होता उस विवेक द्वारा उत्पन्न।
मेरे उर में सदा बसे समकित का निर्विचिकित्सा अंग।।
ॐ ह्रीं निर्विचिकित्सांगाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिसके वशीभूत यह चेतन पर में मोह नहीं करता।
समकित का निर्दोष अमूढ़दृष्टि अंग मम उर रहता।।
ॐ ह्रीं अमूढदृष्ट्यंगाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सम्यग्दर्शन पूजन

ज्यों रवि से तम का विनाश हो त्यों जिससे दुख होय विनष्ट।
सम्यग्दर्शन का उपगूहन अंग हृदय में करे निवास।।
ॐ ह्रीं उपगूहनांगाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
न्याय मार्ग से डिगे अन्य या स्वयं पुनः पथ पर आये।
स्थितिकरण अंग समकित का सदा हमारे मन भाये।।
ॐ ह्रीं स्थितिकरणांगाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो त्रिभुवन के सभी प्राणियों को निजवश में कर लेता।
आत्मा का अभ्युदय करे, वात्सल्य अंग मम उर रहता।।
ॐ ह्रीं वात्सल्यांगाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिससे शशिसम उज्ज्वल यश हो स्वर्ग लोक में मिले निवास।
अति प्रभावशाली प्रभावना अंग हृदय में करे विलास।।
ॐ ह्रीं प्रभावनांगाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पूर्णाऽर्घ्य

(वीरछन्द)

जो अतिशय विवेकमति भक्ति सहित दर्शन-स्तुति करता।
अखिल धरा का अधिपति होकर त्वरित मुक्तिलक्ष्मी वरता।।
जो निर्भय है निर्वांछक है नहीं किसी पर क्रोध करे।
निर्मोही हो मात्र निरन्तर आत्म-शक्तियाँ पुष्ट करे।।1।।
कभी मार्ग से च्युत नहिं होता अपना मुक्त स्वरूप लखे।
निज-महिमा को करे प्रकाशित अष्टांगी सम्यक्त्व वरे।।
शंका कांक्षा और मूढ़ता की निवृत्ति में तत्पर हो।
निर्विचिकित्सा वात्सल्य अरु धर्म-वृद्धि में उद्यम हो।।2।।
शिवपथ से च्युत भविजन को शिवपथ में स्थापित करता।
ऐसे आठ अंगमय सम्यग्दर्शन को मस्तक नमता।।

जो रागादि शत्रुओं पर जय कर निर्मलता प्राप्त करे।
भूषित है संवेग भाव से कृपा कमलिनी विकसाये।।3।।
व्यक्त करे आस्तिक्य मार्ग को शिवसेवी को मार्ग स्वरूप।
वे प्रभु रक्षा करो हमारी त्रिभुवन पूजित समकित सूर्य।।4।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टांगसम्यग्दर्शनाय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

जयमाला*

(घत्ता)
जय जय सद्दर्शन, भव-भय निरसन, मोह-महातम-वारण हो।
जय उपशम-कमल-दिवाकर गुणकर, परम मुक्ति-सुखकारण हो।।1।।

(पद्धरि)

जय दर्शन भुवन सरोज सूर दूरीकृत दुर्नय तिमिर पूर।
जय विषम मदाष्टक विटपि नाग जय वांछितार्थ वितरण सुराग।।2।।
अष्टांग समन्वित दुरित हरण भव भीत यतीश समूह शरण।
दुर्वार नरक भूरुह कुठार जय मुक्ति-कामिनी कण्ठ-हार।।3।।
उद्घासित बहु मिथ्या निवास जिन गदित सप्त तत्त्वाभ्यास।
सेवाभर निर्भर सदवनीप निर्वाण मार्ग भासन सुदीप।।4।।
जय दुष्ट कर्म कानन हुताश संछिन्न मदोद्धत मोह पाश।
आनन्द सान्द्र परमात्मरूप उद्वारित घन जननान्ध-कूप।।5।।
जय राग-भुजंग मद-दमन मंत्र मुनिगण भूषण शिवसौख्य सन्न।
विद्वेष सिन्धु बड़वा निवास निश्शेष लोक सफली कृताश।।6।।
चिन्तामणि संनिभ लोक शरण, वारित दुर्गति कर पाप हरण।
जय विमल बोध संभव निमित्त आनन्दित निखिल मुमुक्षु चित्त।।7।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टांगसम्यग्दर्शनाय जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
* मूल लेखक द्वारा रचित इस जयमाला का भावार्थ पृष्ठ 125 पर देखें।

(गीतिका)

अतुल सुख आगार सब कल्याण का जो बीज है।
जो भव-जलधि का पोत जिसके भव्यजन आधार हैं।।
पुण्य तीर्थों में प्रमुख, अघ-वृक्ष हेतु कुठार है।
अरि-विजय में सक्षम, सुधा-सम्यक्त्व अनुपम पेय है।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

सम्यग्ज्ञान पूजन

पीठिका (हरिगीतिका)

जो अनन्तानन्त गुण पर्याययुत सब द्रव्य को।
नित जानता है मैं करूँ वन्दन सु-केवल बोध को।।1।।
उत्पन्न होता मोह क्षय से, ज्ञान-दर्शन आवरण
अरु अन्तराय त्रिघाति क्षय से, मैं लहूँ उसकी शरण।।2।।
ज्यों रवि उदय से निशातम अरु निशाचर होते विलय।
सद्ज्ञान से हो मोह-संशय और विभ्रम का विलय।।3।।
त्रिभुवन गुरु परमात्मा का ज्ञान ही सत् रूप है।
यह अभ्युदय साधक अहो किससे नहीं अभिवन्द्य है।।4।।
सम्यक्त्व के ही साथ होता अहो सम्यग्ज्ञान है।
क्रम से करे चारित्र को उत्पन्न, मुझको शरण है।।5।।
यह ज्ञान-लोचन जगत् के सम्पूर्ण तत्त्वों को लखे।
यदि हो सुलोचन, किन्तु इससे रहित हो तो अन्ध है।।6।।
यदि घोर तप भी आचरे, पर ज्ञान बिन मुक्ति नहीं।
अतएव सम्यग्ज्ञान ही है, मुक्ति का कारण सही।।7।।

इस लोक में महिमा प्रदायक मुक्ति दे पर-लोक में।
सुख चाहते हो तो सदा कैवल्य आराधन करो।।8।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

स्थापना

पर के ग्रहण की मुख्यता नहिं निर्विकल्पक ज्ञान में।
सज्ञान निश्चय से वही, जो अन्य वह व्यवहार है।।
जो त्रिजग गुरु परमात्मा को भी प्रकाशित नित करे।
प्राणियों को भव्य लोचन ज्ञान हमको प्राप्त हो।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं हः अष्टांगसम्यग्ज्ञान! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (इत्याह्वानम्)
जो प्राप्त हो शुक्ल ध्यान से भूषित परम आनन्द से।
वह कर्म-भर्म विनाशकर्ता ज्ञान स्थापित करे।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः अष्टांगसम्यग्ज्ञान ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (इति स्थापनम्)
जिस शुद्ध दर्पण में झलकते हैं जगत् के द्रव्य सब।
वह ज्ञान-सम्यक् विभवशाली मम निकटवर्ती रहे।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः अष्टांगसम्यग्ज्ञान! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

अष्टक

(वीरछन्द)

जो जग की समस्त वस्तुओं को लखने में नेत्र तृतीय।
ऐसे ज्ञान-रत्न को शिवसुख हेतु नीर से हम पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
जिसे प्राप्त करने हेतु मुनिगण इन्द्रियजय तप करते।
ऐसे ज्ञान-रत्न को शिव सुख प्राप्ति हेतु चन्दन अरचें।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

योगी जिससे चित् स्वरूप को तन से भिन्न सदा निरखें।
ऐसे ज्ञान-रत्न को शिवसुख हेतु अक्षतों से पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
जिसके आराधन से तीर्थंकर पद पाना कठिन नहीं।
ऐसे ज्ञान-रत्न को शिव सुख हेतु सुमन से हम पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
जिससे भूषित योगी को समर्थ शिवश्री भी स्वयं वरे।
ऐसे ज्ञान-रत्न को शिव सुख प्राप्ति हेतु चरु से पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय क्षुधारोगविध्वंसनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उद्धत मोह-लक्ष्मी लूटें, मुनिगण, यह सामर्थ्य लहें।
ऐसे ज्ञान-रत्न को शिवसुख हेतु दीप से हम पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
रवि न हर सके ऐसे तम को दर्श-नेत्र से तुरत हरें।
ऐसे ज्ञान-रत्न को शिव सुख प्राप्ति हेतु हम धूप धरें।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
जिससे यति निज तत्त्व पिछानें आस्रव बन्ध विनष्ट करें।
ऐसे ज्ञान-रत्न को शिव सुख प्राप्ति हेतु फल से पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जिससे हुए स्वयंभू पद धारी सुरपूजित ऋषभ जिनेश।
ऐसे ज्ञान-रत्न को सादर कुसुमांजलि दे हम पूजें।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

अष्टांग पूजा

(दोहा)

व्यंजनादि अष्टांगमय निर्मल ज्ञानाचार।
तीर्थोदक ले पूजहूँ चित् स्वरूप प्राप्त्यर्थ।।
ॐ ह्रीं व्यंजनोर्जितादिकेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा।
व्यंजनादि अष्टांगमय निर्मल ज्ञानाचार।
मलयज से पूजा करूँ जन्म-जरा शान्त्यर्थ।।
ॐ ह्रीं व्यंजनोर्जितादिकेभ्यः चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
व्यंजनादि अष्टांगमय निर्मल ज्ञानाचार।
अक्षत से पूजा करूँ सुख अनन्त प्राप्त्यर्थ।।
ॐ ह्रीं व्यंजनोर्जितादिकेभ्यो अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
व्यंजनादि अष्टांगमय निर्मल ज्ञानाचार।
पुष्पों से पूजा करूँ रागादिक शान्त्यर्थ।।
ॐ ह्रीं व्यंजनोर्जितादिकेभ्यः पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
व्यंजनादि अष्टांगमय निर्मल ज्ञानाचार।
विविध चरु ले पूजहूँ चिदानन्द प्राप्त्यर्थ।।
ॐ ह्रीं व्यंजनोर्जितादिकेभ्यः नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
व्यंजनादि अष्टांगमय निर्मल ज्ञानाचार।
भक्ति दीप ले पूजहूँ परम ज्योति दृश्यार्थ।।
ॐ ह्रीं व्यंजनोर्जितादिकेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
व्यंजनादि अष्टांगमय निर्मल ज्ञानाचार।
विविध धूप से पूजहूँ अपुनर्भव प्राप्त्यर्थ।।
ॐ ह्रीं व्यंजनोर्जितादिकेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
व्यंजनादि अष्टांगमय निर्मल ज्ञानाचार।
बहुविध फल पूजा करूँ अंगसहित शिर नाय।।
ॐ ह्रीं व्यंजनोर्जितादिकेभ्यो फलं निर्वपामीति स्वाहा।

(वीरछन्द)

जल गन्धाक्षत द्रव्य सुचरुमय दीप धूपमय अर्घ्य करूँ।
ज्ञानमयी क्रीड़ाथल की पुष्पांजलि रच आरती करूँ।।
ॐ ह्रीं अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अष्टांग अर्ध्यावलि
जो जन्मा अष्ट स्थानों में ऐसा यह श्रुत-देव शरीर।
सम्यग्ज्ञान सुसूचक पहला अंग व्यंजनाचार नमूँ ।।1।।
ॐ ह्रीं व्यंजनोर्जिताय सम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिससे वाणी कामधेनुवत् त्रिभुवन का कल्याण करे।
भविजन आनन्दकारी सम्यग्ज्ञान अर्थ अंग हृदय रहे।।2।।
ॐ ह्रीं अर्थसमग्राय सम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिससे यह नर शीघ्र लहे त्रिभुवन में अविजित महिमा को।
विश्व-तत्त्व दर्शक उभयांगी ज्ञान-रत्न को नमो नमो।।3।।
ॐ ह्रीं तदुभयसमग्राय सम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
ग्रन्थारम्भ करें प्राणी जिससे निर्विघ्न सुपूर्ण करें।
उस इष्टार्थ विधायी कालाचार अंगमय ज्ञान नमें।।4।।
ॐ ह्रीं कालाचारसम्पन्न-सम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिससे जग की चित्तवृत्ति होती न कदापि कुपित अहो।
ज्ञान प्रदायक विनय अंगमय ज्ञानरत्न को नमो नमो।।5।।
ॐ ह्रीं विनयाचारसम्पन्न-सम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिससे ज्ञानी नहीं भूलते, ज्ञान धारणा सहित करें।
ज्ञानाराधन में रमते नित, अंग उपधानाचार नमें।।6।।
ॐ ह्रीं उपधानाचारसम्पन्न-सम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जिससे नर को मुनि-सम मानें, जो अद्भुत फलदायी है।
उस बहुमान अंग की पूजा नय-प्रमाण से करता हूँ।।7।।
ॐ ह्रीं बहुमानाचारसम्पन्न-सम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिससे योगी शास्त्र-ज्ञान पा, जानें शिव हेतुक श्रुत भाव।
गुरु महिमा न छिपायें, अंग-अनिह्नवमय यह सम्यग्ज्ञान।।8।।
ॐ ह्रीं गुर्वाद्यनिह्नवाय सम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

प्रूफरीडिंग बाकी है

जयमाला*

(आर्या छन्द)
जय जय जिनवर लोचन, चेतन गुण परम केवलज्ञान।
निखिल द्रव्य प्रदर्शक, विगतोपम सुख सुधारस कुण्ड।।1।।

(त्रोटक)

जिननाथ सुलोचनमात्महितं निरुपाधि सुखामृत पूर चितम्।
दृढ़ मोह महातरु वायु समं भव सम्भव दुक्ख विपद् विमुखम्।।2।।
मति शान्त महावधि भेद युतं सुमनोऽद्भुत पर्यय संविततम्।
उचितोचित काल सुपाठ वरं, गुरुभक्ति पुराकृत पापहरम्।।3।।
उपधान विदूरित विघ्न घनं बहु मान निराकृत कर्म रणम्।
निज पाठक निह्नव मुक्ति भरं विशदाक्षर पूर समग्रतरम।।4।।
अभिधेय परम्परया सहितं शुचि तद्वय शुद्धतरं महितम्।
कुसुमायुध दुर्धर वह्नि वनं प्रतिबोधित भव्य यतीश जनम्।।5।।
बहु लोभ महीधर सत् द्विरदं अपहस्तित राग-रुजा प्रसरम्।
अखिलात्म दया कथकं विशदं परिखण्डित दुर्जय मान मदम्।।6।।
* मूल लेखक द्वारा रचित इस जयमाला का भावार्थ पृष्ठ 126 पर देखें।

सुविवेक सरोरुह तिग्मिकरं परमात्म विकाशक युक्ति-करम।
प्रणमामि जडत्व रजः शमकं शुचि बोधानन्त रमाजनकम्।।7।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टांगसम्यग्ज्ञानाय जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पूर्णाऽर्घ्य

(वीरछन्द)

दोष रहित, वृद्धिंगत, मोह विनाशक, शिवपथ करे प्रकाश।
विकसित करे विवेक कमल को निज वैभव में करे विलास।
लोकालोक प्रकाशक श्रीयुत निर्मल कीर्ति करे विस्तार।
ऐसा ज्ञान दिवाकर शोभित पुण्य-पुरुष नभ में सुखकार।।1।।
व्यंजन अर्थाचार उभय अरु विनय काल उपधानाचार।
बहुमान अनिह्नव अंग ज्ञान के भेद कहे जिनवर मनहार।।
ज्ञात वंश के शशि-सम सन्मति अन्तिम तीर्थंकर भवतार।
सकल कर्मक्षय हेतु प्रभु को त्रिधा नमन हो शत-शत बार।।2।।
जो एकान्त नयान्धकार को सुनय किरण से करता दूर।
रखे सुरक्षित जग को विश्व प्रकाशक अनेकान्तमय सूर्य।।
जो है पाप तिमिर नाशक रवि शिवकामिनि को कमलसमान।
काम-सर्प को महामंत्र है मन-मतंग को सिंह-समान।।3।।
व्यसनरूप जलधर को वायु, विश्व प्रकाशक दीप महान्।
विषय-मीन को जाल अहो हम करें ज्ञान का आराधन।। 4।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

(दोहा)

भक्ति सहित अष्टांगमय, ज्ञान हृदय में धार।
करें संस्तवन शीघ्र वह, पावे सौख्य अपार।।5।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सम्यक्चारित्र पूजन

पीठिका

(हरिगीतिका)

आनन्दमय निष्कर्म शाश्वत ज्ञानरूप सुभाव है।
नहिं वचनगोचर जो अचिन्त्य पुराण अरु सुखकार है।।1।।
दुर्गति निवारक स्वर्ग एवं मोक्ष सुखदायक वरूँ।
निवृत्त पाप-कलाप से चारित्र का स्तवन करूँ।।2।।
सामायिकादि पाँच भेद स्वरूप जिन-भाषित अहो।
जो मुक्ति का कारण कहा, चारित्र की मैं शरण लूँ।।3।।
पाँच व्रत अरु पाँच समिति तीन गुप्ति स्वरूप जो।
है आप्त पुरुषों ने कहा तेरह प्रकार चरित्र जो।।4।।
संसार-सरवर में हुए इस कर्ममल से लिप्त जो।
यह आत्मा चारित्र जल से नियम से परिशुद्ध हो।।5।।
पञ्च सम्यग्ज्ञान वैभव को मुनीश्वर प्राप्त हैं।
मैं मानता हूँ यह अहो चारित्र का विस्तार है।।6।।
इससे अधिक क्या कहूँ जो मन-वचन गोचर है नहीं।
उस आत्मा की साधना चारित्र बिन होती नहीं।।7।।
जो मनुज होकर भी सुरेन्द्रों से सदा ही पूज्य है।
यह जानिये चारित्र का वैभव जगत् में पूज्य है।।8।।
चारित्र कारण देवगति का मुक्ति का कारण कहा।
यह धर्म का सर्वस्व है अरु श्रेष्ठ मंगल है अहा।।9।।
यह आत्मा क्षणमात्र में जिससे अनन्तानन्द लहे।
उस परम पावन चरित को हम बार-बार नमन करें।।10।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

स्थापना

(हरिगीतिका)

पापमय अप्रशस्त कार्यों से स्वयं हो दूर जब।
व्यवहार सम्यक् चरित है यह सकल कर्म विनाशकर।।
आत्मज्ञानी जिसे पा, पर में कभी मोहित न हों।
राग-द्वेष करें न वह चारित्र हममें प्रकट हो।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः त्रयोदशप्रकारचारित्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (इत्याह्वानम्)

(वीरछन्द)

जो अनादि से कर्म कालिमा से मैले इस प्राणी को।
करे विशुद्ध, उच्च पद स्थित, पाप विनाशक चारित है।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः त्रयोदशप्रकारचारित्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (इति स्थापनम्)
जो अनन्त कैवल्य और सुख-लक्ष्मी को जीवित करता।
उस अपार महिमामय चारित औषधि की वांछा करता।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः त्रयोदशप्रकारचारित्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

अष्टक

(वीरछन्द)

केवलज्ञान नेत्र से जग-दृष्टा जिनभाषित अमित प्रभाव।
पाप रहित तेरह विध चारित को मैं पूजूँ जल से आज।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
निर्दय भव-सागर में डूबे जीवों को जो आलम्बन।
पाप रहित तेरह विध चारित को अर्पित करता चन्दन।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
जिसका निरतिचार पालन कर भविजन होते जग-भूषण।
तेरह विध निष्पाप चरित की अक्षत से करता पूजन।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

जग-मरु भू में स्वच्छ सरोवरवत् हरता जीवों का ताप।
पुष्पों से मैं पूजूँ तेरह विध चारित को जो निष्पाप।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
दुर्गति मूल अष्ट कर्मेन्धन भस्म करे जो अग्नि समान।
करूँ शुद्ध नैवेद्य समर्पित तेरह विध चारित्र महान्।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राय क्षुधारोगविध्वंसनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिनने पहले प्राप्त किया, कर रहे, करेंगे केवलज्ञान।
जजूँ दीप से पाप रहित यह तेरह विध चारित्र महान्।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
नव मेघों से अंकुरवत् जो करे ऋद्धियों को उत्पन्न।
पाप रहित तेरह विध चारित को मैं धूप करूँ अर्पण।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
भव-सन्तति-क्षय सुख अनन्त की प्राप्ति हेतु ज्ञानी चाहें।
पाप रहित तेरह विध चारित को उत्तम फल से पूजें।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्धोपयोगमय, धर्म मर्म लहि, सुख अनन्तमय मुक्ति लहें।
जिससे ज्ञानी, उस चारित को हम कुसुमांजलि से पूजें।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
त्रयोदशांग पूजा

(वीरछन्द)

जड़ता क्षय-वांछा से मानो तीन बार जलधार करूँ।
पंच महाव्रत पंच समिति त्रय गुप्ति हर्ष से मैं पूजूँ ।।
ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रतादिकांगेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चहुँ दिश करे सुगन्धित श्वेत श्रेष्ठ लेकर चन्दन लाऊँ।
पंच महाव्रत पंच समिति त्रय गुप्ति हर्ष से मैं पूजूँ ।।
ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रतादिकांगेभ्यः चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

चन्द्र-किरण सम उज्ज्वल तन्दुल पुण्य-पुंज मैं ले आऊँ।
पंच महाव्रत पंच समिति त्रय गुप्ति हर्ष से मैं पूजूँ ।।
ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रतादिकांगेभ्यो अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
सुन्दर और सुगन्धित पुष्पों से, भव-ताप नाशकारी।
पंच महाव्रत पंच समिति त्रय गुप्ति हर्ष से मैं पूजूँ ।।
ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रतादिकांगेभ्यः पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
सभी प्राणियों को अमृत-सम सर्वोत्तम नैवेद्य धरूँ।
पंच महाव्रत पंच समिति त्रय गुप्ति हर्ष से मैं पूजूँ ।।
ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रतादिकांगेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वाद्यनाद जय-जय ध्वनि गूंजे, मणियों के दीपक लाऊँ।
पंच महाव्रत पंच समिति त्रय गुप्ति हर्ष से मैं पूजूं ।।
ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रतादिकांगेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
एकेन्द्रिय में जन्म न लूँ मैं अतः अग्नि में धूप धरूँ।
पंच महाव्रत पंच समिति त्रय गुप्ति हर्ष से मैं पूजूँ ।।
ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रतादिकांगेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
परम शुद्ध प्रासुक रसमय उत्तम फल लेकर मैं आऊँ।
पंच महाव्रत पंच समिति त्रय गुप्ति हर्ष से मैं पूजूँ ।।
ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रतादिकांगेभ्यः फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल चन्दन अक्षत पुष्पों से शोभित कुसुमांजलि लाऊँ।
शिव सुख पाने हेतु भक्ति से तेरह विध चारित धारूँ।।
ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रतादिकांगेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
त्रयोदशांग अर्ध्यावलि
जन्म-जरा-पीड़ा से रहित, निरामय निर्भय सुखदाता।
करुणामय व्रत-महा अहिंसा का मैं नित आश्रय करता।।11।।

ॐ ह्रीं अहिंसामहाव्रताय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सरस कवित्व, सुश्रुत अभ्यास, गिरा गम्भीर सुफल दाता।
अद्भुत वचनरूप उस सत्य महाव्रत का आश्रय दाता।।2।।
ॐ ह्रीं सत्यमहाव्रताय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सब अनर्थ का मूल अदत्तादान तजूँ मन-वच-काया।
इस अद्भुत अचौर्य महाव्रत का मैं नित आश्रय करता।।3।।
ॐ ह्रीं अचौर्यमहाव्रताय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
यथा ग्रहों में सूर्य तथैव व्रतों में जो सरताज अहो।
ऐसे अद्भुत ब्रह्मचर्य व्रत का मुझको नित आश्रय हो।।4।।
ॐ ह्रीं ब्रह्मचर्यमहाव्रताय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दुर्निवार कर्मास्रव रोके, कर्म-निर्जरा का साधन।
ऐसे मूर्च्छा-त्याग महाव्रत का मैं करता अवलम्बन।।5।।
ॐ ह्रीं आकिंचन्यमहाव्रताय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिसके बिना समस्त शील अरु व्रत निष्फल सर्वथा कहे।
परम ब्रह्म पद प्राप्ति हेतु हम मनोगुप्ति का आश्रय लें।।6।।
ॐ ह्रीं मनोगुप्तये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
असत्यादि विनशें जिससे अरु अगणित गुण हों प्रकट अहो।
भव-विपत्ति-क्षय वांछक मेरे मन में वचन गुप्ति प्रकटो।।7।।
ॐ ह्रीं वचनगुप्तये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिसके द्वारा पुरुष जितेन्द्रिय, ज्ञान अतीन्द्रिय प्राप्त करें।
करुणा सागर मम तमहारक, काय गुप्ति हम भी पायें।।8।।
ॐ ह्रीं कायगुप्तये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
रवि-किरणों में चौ कर भू लखि, निष्प्रमाद हो गमन करें।
मुनि भगवन्तों द्वारा मान्य, समिति-ईर्या हम प्रकट करें।।9।।
ॐ ह्रीं ईर्यासमितये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सम्यक्चारित्र पूजन

जो जिनेन्द्र स्तवन से पावन, दस दोषों से रहित अहो।
तत्त्व निरूपक शिवपददायक, वचनसमिति मम हृदय रहो।।10।।
ॐ ह्रीं भाषासमितये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोष हजार विहीन, अयाचित-भोजन जो नर ग्रहण करें।
नव कोटि से शुद्ध एषणा-समिति हमारे हृदय रहे।।11।।
ॐ ह्रीं एषणासमितये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पहले शोधन करें वस्तु का, फिर निक्षेपण ग्रहण करें।
यह प्रसिद्ध आदान-निक्षेपण समिति हमारे हृदय रहे।।12।।
ॐ ह्रीं आदान-निक्षेपणसमितये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रासुक भू पर निष्प्रमाद हो, श्लेष्मादिक परित्याग करें।
यह व्युत्सर्ग समिति भविजन, रक्षार्थ अहिंसाव्रत पालें।।13।।
ॐ ह्रीं व्युत्सर्गसमितये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
पूर्णाऽर्घ्य

(वीरछन्द)

शुद्धात्मा ही उपादेय है यह श्रद्धा निश्चय सम्यक्त्व।
स्वानुभूति से तन से भिन्न निजानुभूति निश्चय सत्ज्ञान।।
चित् निरोध कर निज में थिर हो पूर्ण तृप्ति निश्चय चारित्र।
भेद रत्नत्रय में तत्पर तुम निज को शुद्ध लखो हे मित्र।।
परिग्रह से हो विरत-विरत तुम त्यागो-त्यागो सर्व प्रपंच।
छोड़ो-छोड़ो मोह भाव को जानो-जानो निज चैतन्य।।
निज स्वरूप को देख-देखकर करो-करो सम्यक् पुरुषार्थ।
निज स्वरूप में थिर होकर धारो-धारो सम्यक्चारित्र।।
ॐ ह्रीं व्यवहाररत्नत्रयैकसाध्याय निश्चयरत्नत्रयाय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला*

(त्रिभंगी)
जय शिवसुख कारण दुर्गति वारण सकल सत्व सूचित करणम्।
पर-नय कृत दूषण मुनिगण भूषण भव्य निवहे संस्तुत चरणम्।।1।।

(त्रोटक)

करुणारस पूरित आत्महितं, बहु भक्ति परमरनाथ नुतम्।
परमं शिव-सौध निवासकरं, चरणं प्रणमामि विशुद्धतरम्।।2।।
शुचि केवल केलि कला-सदनं, जितसूचित विश्व विपन्मदनम्।
परमं शिव-सौध निवासकरं, चरणं प्रणमामि विशुद्धतरम्।।3।।
विशदागम विद्मुनिनाथ धनं दुरितौघ धनंजय चण्डघनम्।
परमं शिव-सौध निवासकरं, चरणं प्रणमामि विशुद्धतरम्।।4।।
रमणीय विमुक्त रमा कमलं सुविवेककरं हत दुःखमलम्।
परमं शिव-सौध निवासकरं, चरणं प्रणमामि विशुद्धतरम्।।5।।
ममता रजनी दिवसाधिपतिं प्रकटीकृत सत्य परात्म हितम्।
परमं शिव-सौध निवासकरं, चरणं प्रणमामि विशुद्धतरम्।।6।।
घन कर्म पयोद समीर समं, सुतरीकृत शोक-पयोधि जलम्।
परमं शिव-सौध निवासकरं, चरणं प्रणमामि विशुद्धतरम्।।7।।
जनताभिमतार्थकरं सुखदं, भव भीति हरं कृत सिद्ध पदम्।
परमं शिव-सौध निवासकरं, चरणं प्रणमामि विशुद्धतरम्।।8।।
मद राग कषाय रजः शमनं, भव दुर्जय दानव संदमनम्।
परमं शिव-सौध निवासकरं, चरणं प्रणमामि विशुद्धतरम्।।9।।

(दोहा)

इस प्रकार चारित रतन का करता गुण-गान।
जो निर्मल-मति नर अहो, शीघ्र लहे निर्वाण।।
* मूल लेखक द्वारा रचित इस जयमाला का भावार्थ पृष्ठ 127 पर देखें।

(वीरछन्द)

जिसने तीन चार या पाँच चरित्रों को संप्राप्त किया।
शिव-वनिता के आलिंगन से दश में से इक भाव लहा।।
उसने अन्त किया विपदा का जो निज में ही लीन रहें।
भव का अन्त करें चारित से, सबकी रक्षा सिद्ध करें।।
मन-वच-काया के निमित्त से तीन गुप्ति उत्पन्न हुईं।
पंच महाव्रत, पाँच समितियाँ ईर्यादिक भी प्रकट हुईं।।
जिसको वीर प्रभू के पहले अन्य किसी ने नहीं कहा*।
ऐसे तेरह विध चारित को वन्दन करते शीश झुका।।
ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारसम्यक्चारित्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिस प्रभाव से जात-विरोधी जीव तजें निज बैर-विरोध।
सुरपति पूजें, इन्द्र-चक्रवर्ती पद का होता संयोग।।
तप कर शिवसुख अमृत पीते, मुक्ति-वधू से करें विलास।
ऐसा चारित्र-रत्न सर्वदा हृदय हमारे करे प्रकाश।।
तत्त्वार्थों की सम्यक् श्रद्धा-ज्ञान और तप चेष्टा हो।
कालबब्धिवश भव्य जीव प्रकटाते आंशिक शुद्धि अहो।।
निश्चय श्रद्धा-ज्ञान-चरित से प्रकट शुद्धि सम्पूर्ण लंहें।
निश्चय अरु व्यवहार रत्नत्रय भविजन का कल्याण करें।।

(दोहा)

मोह-मल्ल को जय किया, गज पर सिंह समान।
हम सबके दुख क्षय करें, मल्लिनाथ भगवान्।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
* यद्यपि तेईस तीर्थंकर यह बात कह चुके हैं, परंतु वर्तमान में भगवान् महावीर का
शासन चल रहा है - इस अपेक्षा से पण्डित आशाधरजी ने ऐसा लिखा है।

महाऽर्घ्य

(हरिगीत)

मैं देव श्री अरहंत पूजूं, सिद्ध पूजूँ चाव सों ।
आचार्य श्री उवझाय पूजूँ, साधु पूजूँ भाव सों ।।
अरहन्त भाषित बैन पूजूँ, द्वादशांग रची गनी ।
पूजूँ दिगम्बर गुरुचरण, शिवहेत सब आशा हनी ।।
सर्वज्ञ भाषित धर्म दशविधि, दयामय पूजूं सदा ।
जजि भावना षोडश रत्नत्रय, जा बिना शिव नहिं कदा ।।
त्रैलोक्य के कृत्रिम-अकृत्रिम, चैत्य-चैत्यालय जजूँ।
पंचमेरु-नन्दीश्वर जिनालय, खचर सुर पूजित भजूँ ।।
कैलाश श्री सम्मेदगिरि, गिरनार मैं पूजूं सदा ।
चम्पापुरी पावापुरी पुनि, और तीरथ शर्मदा ।।
चौबीस श्री जिनराज पूजूँ, बीस क्षेत्र विदेह के ।
नामावली इक सहस वसु जय, होय पति शिव गेह के ।।

(दोहा)

जल गंधाक्षत पुष्प चरु, दीप धूप फल लाय।
सर्व पूज्य पद पूजहूँ, बहु विधि भक्ति बढ़ाय ।।
ॐ ह्रीं श्री अरहन्तसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो, द्वादशांग-
जिनवाणीभ्यो उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय, दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यो,
सम्यग्दर्शनज्ञान-चारित्र-रत्नत्रयेभ्यः, त्रिलोकसम्बन्धीकृत्रिमाकृत्रिमजिन-
चैत्यालयेभ्यः, पंचमेरौ अशीति-चैत्यालयेभ्यो, नन्दीश्वरद्वीपस्थद्वि-
पंचाशज्जिनालयेभ्यः, श्री सम्मेदशिखर, गिरनारगिरि, कैलाशगिरि, चम्पापुर,
पावापुर-आदिसिद्धक्षेत्रेभ्यो, अतिशयक्षेत्रेभ्यो, विदेहक्षेत्रस्थितसीमन्धरादि-
विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यो, ऋषभादिचतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यो, भगवज्जिन-
सहस्राष्टनामेभ्यश्च अनर्घ्यपदप्राप्तये महाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पुण्याहवाचन
विधान में सम्मिलित सभी साधर्मी जन शान्तिधारा करते हुए
निम्नानुसार पुण्याहवाचन करें –
ॐ पुण्याहं पुण्याहं लोकोद्योतनकरा अतीतकालसंजाता
निर्वाणसागरप्रभृतयः चतुर्विंशतिः परमदेवाः! वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्।
(धारा)
ॐ सम्प्रतिकालसम्भवाः वृषभादिवीरान्ताः चतुर्विंशतिः
परमदेवाः! वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ भविष्यत्कालाभ्युदयप्रभवाः महापद्मादिचतुर्विंशतिः
भविष्यत् परमदेवाः ! वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ सप्तर्द्धिविशोभिताः कुन्दकुन्दादि-अनेकदिगम्बरसाधुचरणाः!
वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
इह वान्यनगरग्रामदेवतामनुजाः सर्वे जिनधर्मपरायणाः भवन्तु।
दानतपोवीर्यानुष्ठानं नित्यमेवास्तु। सर्वे जिनधर्मभक्तानां धनधान्यैश्वर्य-
बलद्युतियशः प्रमोदोत्सवाः प्रवर्तन्ताम्।
तुष्टिरस्तु, पुष्टिरस्तु, कल्याणमस्तु, अविघ्नमस्तु, आयुष्यमस्तु,
आरोग्यमस्तु, कर्मसिद्धिरस्तु, इष्टसम्पत्तिरस्तु काममांगल्योत्सवाः सन्तु,
पापानि शाम्यन्तु, घोराणि शाम्यन्तु, पुण्यं वर्धताम्, धर्मः वर्धताम्, श्रीः
वर्धताम्, कुलं गोत्रं चाभिवर्धेताम्, स्वस्तिः भद्रं चास्तु, क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः
स्वाहा।
श्री मज्जिनेन्द्रचरणारविन्देष्वानन्दभक्तिः सदास्तु।
(इसके पश्चात् शान्ति पाठ एवं विसर्जन पाठ पढ़ें।)

शान्ति पाठ

हूँ शान्तिमय ध्रुव-ज्ञानमय, ऐसी प्रतीति जब जगे।
अनुभूति हो आनन्दमय, सारी विकलता तब भगे।।।1।।
निज भाव ही है एक, आश्रय शान्तिदाता सुखमयी।
भूल स्व दर-दर भटकते, शान्ति कब किसने लही।।2।।
निज घर बिना विश्राम नाहीं, आज यह निश्चय हुआ।
मोह की चट्टान टूटी, शान्ति-निर्झर बह रहा।।3।।
यह शान्ति धारा हो अखंडित, चिरकाल तक बहती रहे।
होवे निमग्न सुभव्यजन, सुख-शान्ति सब पाते रहें।।4।।
पूजोपरान्त प्रभो यही, इक भावना है हो रही।
लीन निज में ही रहूँ, प्रभु और कुछ वांछा नहीं।।5।।

(दोहा)

सहज परम आनन्दमय, निज ज्ञायक अविकार।
स्व में लीन परिणति विषै, बहती समरस धार।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
(नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें।)

क्षमापना

(दोहा)

बिन जाने वा जान के, रही टूट जो कोय।
तुम प्रसाद तैं परम गुरु, सो सब पूरन होय ।।१।।
पूजन-विधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान ।
और विसर्जन हू नहीं, क्षमा करहु भगवान् ।।२।।
मन्त्रहीन धनहीन हूँ, क्रियाहीन जिनदेव ।
क्षमा करहु राखहु मुझे, देहु चरण की सेव ।।३।।
तुम चरणन ढिंग आयके, मैं पूजूँ अति चाव।
आवागमन रहित करो, मेटो सकल विभाव ।।४।।

सम्यग्दर्शन पूजन की जयमाला का भावार्थ
संसार का भय दूर करने वाले, मोहरूपी महान् अन्धकार को न
करने वाले, समतारूपी कमल को खिलाने के लिए सूर्य के समान,
सम्पूर्ण गुणों के निधि और उत्कृष्ट मुक्ति-सुख के कारण हे सम्यग्दर्शन !
तुम जयवन्त होओ।।1।।
मिथ्यामतरूपी अन्धकार के पूर को दूर करने वाले त्रैलोक्य के
भव्य कमलों को सूर्य के समान हे सम्यग्दर्शन ! तुम जयवन्त होओ !
आठ मदरूपी विषम वृक्षों के लिए हाथी के समान तथा इच्छित पदार्थ
देने के लिए कल्पवृक्ष के समान हे सम्यग्दर्शन ! तुम जयवन्त होओ।।2।।
आठ अंग सहित, पाप-निवारक, संसार से भयभीत साधुओं
के लिए शरणभूत, दुर्वार नरकरूपी वृक्षों के लिए कुठार के समान और
मुक्तिरूपी स्त्री के लिए कण्ठ के हार के समान हे सम्यग्दर्शन ! तुम
जयवन्त होओ।।3।।
मिथ्यात्व के बहुविध आयतनों को उद्घासित करने वाले, जिनेन्द्र
देव द्वारा प्रतिपादित सात तत्त्वों का अभ्यास करने वाले, अपनी सेवा
करने वाले को राजा के समान पुरस्कार देने वाले और मोक्षमार्ग दिखाने
के लिए दीपक के समान हे सम्यग्दर्शन! तुम जयवन्त होओ।।4।।
दुष्ट कर्मरूपी वनों के लिए अग्नि के समान, बलवान मोहरूपी
जाल को नष्ट करने वाले, आनंद से परिपूर्ण परमात्मस्वरूप तथा प्रगाढ़
संसाररूपी अन्ध-कूप से उद्धार करने वाले हे सम्यग्दर्शन ! तुम जयवन्त
होओ।।5।।
रागरूपी सर्प के मद को दमन करने के लिए मन्त्र के समान,
मुनियों के भूषण, मोक्ष सुख देने वाले, द्वेषरूपी समुद्र के लिए बड़वानल

के समान और समस्त लोक की आशा को सफल करने वाले हे
सम्यग्दर्शन! तुम जयवन्त होओ।।6।।
चिन्तामणि के समान सबको शरण देने वाले, दुर्गति का वारण
करने वाले, ताप का हरण करने वाले, सम्यग्ज्ञान की उत्पत्ति के कारण
तथा मोक्ष के इच्छुक प्राणियों के चित्त को आनंदित करने वाले हे
सम्यग्दर्शन! तुम जयवन्त होओ।।7।।
अनुपम सुख के खजाने, सम्पूर्ण सुखों के बीज, संसार-समुद्र
के लिए जहाज के समान, मात्र भव्य जीवों के आश्रय से होने वाले,
पापरूपी वृक्षों के लिए कुठार के समान, पुण्य तीर्थों में प्रधान
और विपक्ष को जीतने में समर्थ सम्यक्त्वरूपी अमृत का सब लोग
पान करें।।8।।

सम्यग्ज्ञान पूजन की जयमाला का भावार्थ
हे जिनवर के लोचन, समस्त द्रव्यों को प्रकाशित करने वाले
और अनुपम सुखरूपी अमृत के कुण्ड, आत्मा के उत्तम गुणरूप
केवलज्ञान! तुम जयवन्त होओ।।1।।
जिनेन्द्र देव का ज्ञानरूपी उत्तम लोचन आत्मा का हित करने
वाला है, उपाधिरहित सुखरूपी अमृत के पूर से परिपूर्ण है, दृढ़ मोहरूपी
वृक्ष के लिए अग्नि के समान है और संसारजन्य दुख और विपदाओं से
रहित है।।2।।
मतिज्ञान और परम शान्त महान् अवधिज्ञान के भेदों से युक्त
है, उत्तम मन की अद्भुत पर्यायरूप मनःपर्ययज्ञान से विस्तृत है, अत्यन्त
योग्य काल में द्रव्यश्रुत का पाठ करने से श्रेष्ठता को प्राप्त है और
गुरुभक्ति के फलस्वरूप पुराकृत पापों को हरण करने वाला है।।3।।
उपधानाचार के कारण जो विघ्नों को दूर करने वाला है,
बहुमानाचार के कारण जो आत्मा को कर्मों की रणस्थली नहीं बनने

देता, अपने पाठक का निह्नव न करने के कारण जो अनिह्नवाचार से
युक्त है और विशद अक्षरपूर अर्थात् अक्षराचार के कारण जो परिपूर्णता
को प्राप्त है।।4।।
जो अभिधेय की परम्परा अथात् अर्थाचार से युक्त है, शब्द
और अर्थरूप उभयाचार के कारण शुद्धतर और पूज्य है, दुर्धर काम का
नाश करने के लिए उत्कृष्ट अग्नि के समान है और भव्य यतिजनों को
प्रतिबोध करने वाला है।।5।।
जो बहुत लोभरूपी वृक्ष के लिए उत्तम हाथी के समान है,
रागरूपी रोगों के प्रसार को रोकने वाला है, सम्पूर्ण प्राणियों की दया
का उपदेश करने वाला है, विशद है और कठिनता से जीते जाने वाले
मान और मद का खण्डन करने वाला है।।6।।
जो विवेकरूपी कमल को विकसित करने के लिए सूर्य की
किरणों के समान है, जिससे परमात्मा का प्रकाश होता है, ऐसी अनेक
युक्तियों से सम्पन्न है, जड़ ज्ञानावरणादि कर्मों का नाश करने वाला है
और अनन्त मोक्षरूपी लक्ष्मी का जनक है, उस पवित्र ज्ञान को मैं
नमस्कार करता हूँ।।7।।
इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक अष्टांग ज्ञान की स्तुति करता है,
वह संसार से रहित अद्भुत सुख को प्राप्त करता है।

सम्यक्चारित्र पूजन की जयमाला का भावार्थ
जो मोक्ष-सुख का कारण है, दुर्गति का वारण करता है, समस्त
जीवों के परिणामों का सूचन करने वाला है, मिथ्या नयों का खण्डन
करता है, मुनिसंघ का भूषण है और भव्य जीव जिसकी स्तुति करते
हैं, ऐसे हे सम्यक्चारित्र! तुम जयवन्त होओ।।1।।


Artist: पण्डित अभयकुमार जैन
स्रोत: श्री तत्त्वार्थसूत्र मंडल विधान एवं श्री रत्नत्रय मंडल विधान

प्रूफरीडिंग बाकी है