चौबीस तीर्थंकर स्तवन
जो अनादि से व्यक्त नहीं था त्रैकालिक ध्रुव ज्ञायक भाव।
वह युगादि में किया प्रकाशित वन्दन ऋषभ जिनेश्वर राव।।1।।
जिसने जीत लिया त्रिभुवन को मोह शत्रु वह प्रबल महान्।
उसे जीतकर शिवपद पाया वन्दन अजितनाथ भगवान्।।2।।
काललब्धि बिन सदा असम्भव निज सन्मुखता का पुरुषार्थ।
संभव जिनवर ने स्वकाल में प्रकट किया सम्यक् पुरुषार्थ।।3।।
त्रिभुवन जिनके चरणों का अभिनन्दन करता तीनों काल।
वे स्वभाव का अभिनन्दन कर पहुँचे शिवपुर में तत्काल।।4।।
निज आश्रय से ही सुख होता यही सुमति जिन बतलाते।
सुमतिनाथ प्रभु की पूजन कर भव्य जीव शिवसुख पाते।।5।।
पद्मप्रभ के पद-पंकज की सौरभ से सुरभित त्रिभुवन।
गुण अनन्त के सुमनों से शोभित श्री जिनवर का उपवन।।6।।
श्री सुपार्श्व के शुभ सु-पार्श्व में जिनकी परिणति करे विराम।
वे पाते हैं गुण अनन्त से भूषित सिद्ध सदन अभिराम।।।7।।
चारु चन्द्र-सम सदा सुशीतल चेतन चन्द्रप्रभ जिनराज।
गुण अनन्त की कला विभूषित प्रभु ने पाया निजपद राज।।8।।
पुष्पदन्त-सम गुण आवलि से सदा सुशोभित हैं भगवान्।
मोक्षमार्ग की सुविधि बताकर भविजन का करते कल्याण।।9।।
चन्द्र-किरण सम शीतल वचनों से हरते जग का आताप।
स्याद्वादमय दिव्यध्वनि से मोक्षमार्ग बतलाते आप।।10।।
त्रिभुवन के श्रेयस्कर हैं श्रेयांसनाथ जिनवर गुणखान।
निज स्वभाव ही परम श्रेय का केन्द्र बिन्दु कहते भगवान्।।11।।
शत इन्द्रों से पूजित जग में वासुपूज्य जिनराज महान्।
स्वाश्रित परिणति द्वारा पूजित पंचम भाव गुणों की खान।।12।।
चौबीस तीर्थंकर वन्दना
निर्मल भावों से भूषित हैं जिनवर विमलनाथ भगवान्।
राग-द्वेष मल का क्षय करके पाया सौख्य अनन्त महान्।।13।।
गुण अनन्तपति की महिमा से मोहित है यह त्रिभुवन आज।
जिन अनन्त को वन्दन करके पाऊँ शिवपुर का साम्राज्य।।14।।
वस्तु-स्वभाव धर्मधारक है धर्म धुरन्धर नाथ महान्।
ध्रुव की धुनमय धर्म प्रकट कर वन्दित धर्मनाथ भगवान्।।15।।
रागरूप अंगारों द्वारा दहक रहा जग का परिणाम।
किन्तु शान्तिमय निजपरिणति से शोभित शान्तिनाथ भगवान्।।16।।
कुन्थु आदि जीवों की भी रक्षा का जो देते उपदेश।
स्व-चतुष्टय में सदा सुरक्षित कुन्थुनाथ जिनवर परमेश।।17।।
पंचेन्द्रियों विषयों से सुख की अभिलाषा है जिनकी अस्त।
धन्य-धन्य अरनाथ जिनेश्वर राग-द्वेष अरि किए परास्त।।18।।
मोह-मल्ल पर विजय प्राप्त कर जो हैं त्रिभुवन में विख्यात।
मल्लिनाथ जिन समवसरण में सदा सुशोभित हैं दिन रात।।19।।
तीन कषाय चौकड़ी जयकर मुनि-सु-व्रत के धारी हैं।
वन्दन जिनवर मुनिसुव्रत जो भविजन को हितकारी हैं।।20।।
नमि जिनवर ने निज में नमकर पाया केवलज्ञान महान्।
मन-वच-तन से करूँ नमन सर्वज्ञ जिनेश्वर हैं गुणखान।।21।।
धर्मधुरा के धारक जिनवर धर्मतीर्थ रथ संचालक।
नेमिनाथ जिनराज वचन नित भव्यजनों के हैं पालक।।22।।
जो शरणागत भव्यजनों को कर लेते हैं आप समान।
ऐसे अनुपम अद्वितीय पारस हैं पार्श्वनाथ भगवान्।।23।।
महावीर सन्मति के धारक वीर और अतिवीर महान्।
चरण-कमल का अभिनन्दन है वन्दन वर्धमान भगवान्।।24।।
।। मङ्गल पंचक ।।
(हरिगीतिका)
गुण-रत्न-भूषा, विगत-दूषाः, सौम्यभाव-निशाकराः ;
सद्बोधभानु-विभा-विभासित-दिक्चया विदुषां वराः।
निःसीम-सौख्यसमूह-मण्डित-योगखण्डित-रतिवराः ;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते श्री-वीरनाथ-जिनेश्वराः ।। 1।।
सद्ध्यान- तीक्ष्ण-कृपाणधारा-निहितकर्म-कदम्बका;
देवेन्द्र-वृन्द-नरेन्द्र-वन्द्याः प्राप्त-सुख-निकुरम्बकाः।
योगीन्द्र-योग-निरूपणीयाः, प्राप्त-बोध-कलापकाः;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते सिद्धाः सदा-सुख-दायकाः ।। 2।।
आचार-पञ्चक-चरण-चारण-चुञ्चवः समताधराः;
नाना-तपोभर-हेति-हापित कर्मकाः सुखिताकराः।
गुप्ति-त्रयी-परि-शीलनादि-विभूषिता वदताम्बराः;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते श्री-सूरयोऽर्जित-शम्भराः ।। 3।।
द्रव्याऽर्थ-भेद-विभिन्न - श्रुतभर-पूर्ण-तत्त्वनिभालिनो;
दुर्योग-योग-निरोध-दक्षाः सकल-वर-गुण-शालिनः।
कर्त्तव्य-देशन-तत्परा विज्ञान-गौरव-शालिनः ;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते गुरुदेव-दीधित-मालिनः ।। 4।।
संयम-समित्याऽऽवश्यका ऽपरिहाणि-गुप्ति-विभूषिताः;
पञ्चाऽक्ष-दान्ति-समुद्यताः समता-सुधा-परिभूषिताः।
भूपृष्ठ-विष्टर-शायिनो विविधर्द्धि-वृन्द-विभूषिताः;
कुर्वन्तु मङ्गलमत्र ते मुनयः सदा शम-भूषिताः।। 5।।
प्रतिमा प्रक्षाल पाठ
(पं. अभयकुमारजी कृत)
(दोहा)
परिणामों की स्वच्छता, के निमित्त जिनबिम्ब ।
इसीलिए मैं निरखता, इनमें निज प्रतिबिम्ब ।।
पंच प्रभु के चरण में, वन्दन करूँ त्रिकाल ।
निर्मल जल से कर रहा, प्रतिमा का प्रक्षाल ।।
अथ पौर्वाह्निकदेववन्दनायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजास्तवन -
वन्दनासमेतं श्री पंचमहागुरुभक्तिपूर्वककायोत्सर्ग करोम्यहम् ।
(नौ बार णमोकार मन्त्र पढ़ें)
(छप्पय)
तीन लोक के कृत्रिम और अकृत्रिम सारे ।
जिनबिम्बों को नित प्रति अगणित नमन हमारे ।।
श्री जिनवर की अन्तर्मुख छवि उर में धारूँ ।
जिन में निज का निज में जिन - प्रतिबिम्ब निहारूँ ।।
मैं करूँ आज संकल्प शुभ, जिन प्रतिमा प्रक्षाल का।
यह भाव सुमन अर्पण करूँ, फल चाहूँ गुणमाल का ।।
ॐ ह्रीं प्रक्षालप्रतिज्ञायै पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
(प्रक्षाल की प्रतिज्ञा हेतु पुष्प क्षेपण करें)
(रोला)
अन्तरंग बहिरंग सुलक्ष्मी से जो शोभित ।
जिनकी मंगल वाणी पर है त्रिभुवन मोहित ।।
श्री जिनवर सेवा से क्षय मोहादि विपत्ति ।
हे जिन ! श्री लिख पाऊँगा निज-गुण सम्पत्ति ।।
(थाली की चौकी पर केशर से श्री लिखें)
(दोहा)
अन्तर्मुख मुद्रा सहित, शोभित श्री जिनराज ।
प्रतिमा प्रक्षालन करूँ, धरूँ पीठ यह आज ।।
ॐ ह्रीं श्री पीठस्थापनं करोमि ।
(प्रक्षाल हेतु थाली स्थापित करें)
(रोला)
भक्ति रत्न से जड़ित आज मंगल सिंहासन ।
भेद-ज्ञान जल से क्षालित भावों का आसन ।।
स्वागत है जिनराज ! तुम्हारा सिंहासन पर।
हे जिनदेव पधारो श्रद्धा के आसन पर ।।
ॐ ह्रीं श्री धर्मतीर्थाधिनाथ भगवन्निह सिंहासने तिष्ठ तिष्ठ ।
(थाली में जिनबिम्ब विराजमान करें)
क्षीरोदधि के जल से भरे कलश ले आया।
दृग-सुख-वीरज ज्ञानस्वरूपी आतम पाया ।।
मंगल कलश विराजित करता हूँ जिनराजा ।
परिणामों के प्रक्षालन से सुधरें काजा ।।
ॐ ह्रीं अर्हं कलशस्थापनं करोमि ।
(चारों कोनों में निर्मल जल से भरे कलश स्थापित करें)
जल-फल आठों द्रव्य मिलाकर अर्घ्य बनाया ।
अष्ट अंग युत मानो सम्यग्दर्शन पाया ।।
श्री जिनवर के चरणों में यह अर्घ्य समर्पित ।
करूँ आज रागादि विकारी भाव विसर्जित ।।
ॐ ह्रीं श्री स्नपनपीठस्थिताय जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(पीठ स्थित जिनप्रतिमा को अर्घ्य चढ़ायें)
मैं रागादि विभावों से कलुषित हे जिनवर ।
और आप परिपूर्ण वीतरागी हो प्रभुवर ।।
कैसे हो प्रक्षाल, जगत् के अघ-क्षालक का।
क्या दरिद्र होगा पालक? त्रिभुवन पालक का ।।
भक्ति भाव के निर्मल जल से अघ-मल धोता ।
है किसका अभिषेक भ्रान्त चित खाता गोता ।।
नाथ! भक्तिवश जिन बिम्बों का करूँ न्हवन मैं ।
आज करूँ साक्षात् जिनेश्वर का पर्शन मैं ।।
ॐ ह्रीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपालसन्तं वृषभादिमहावीरपर्यन्तं चतुर्विंशतितीर्थंकर-
परमदेवमाद्यानामाद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे… नाम्निनगरे मासानामुत्तमे
…मासे… पक्षे…दिने मुन्यार्यिकाश्रावकश्राविकाणां सकलकर्मक्षयार्थं
पवित्रतर-जलेन जिनमभिषेचयामि ।
(चारों कलशों से अभिषेक करें तथा वादित्र नाद करायें एवं जय-जय शब्दोच्चारण करें)
प्रतिमा प्रक्षाल पाठ
(दोहा)
क्षीरोदधि-सम नीर से, करूँ बिम्ब प्रक्षाल ।
श्री जिनवर की भक्ति से, जानूँ निज पर चाल ।।
तीर्थंकर का न्ह्वन शुभ, सुरपति करें महान् ।
पंचमेरु भी हो गये, महातीर्थ सुखदान ।।
करता हूँ शुभ भाव से, प्रतिमा का अभिषेक ।
बचूँ शुभाशुभ भाव से, यही कामना एक ।।
जल-फलादि वसु द्रव्य ले, मैं पूजूँ जिनराज ।
हुआ बिम्ब अभिषेक अब, पाऊँ निज पदराज ।।
ॐ ह्रीं अभिषेकान्ते वृषभादिवीरान्तेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
श्री जिनवर का धवल यश, त्रिभुवन में है व्याप्त।
शान्ति करें मम चित्त में, हे परमेश्वर आप्त ।।
(पुष्पांजलि क्षेपण करें)
(रोला)
जिन प्रतिमा पर अमृतसम जल-कण अति शोभित ।
आत्म-गगन में गुण अनन्त तारे भवि मोहित ।।
हो अभेद का लक्ष्य भेद का करता वर्जन ।
शुद्ध वस्त्र से जल-कण का करता परिमार्जन ।।
(प्रतिमा को शुद्ध वस्त्र से पोंछें)
(दोहा)
श्री जिनवर की भक्ति से, दूर होय भव-भार ।
उर-सिंहासन थापिये, प्रिय चैतन्य कुमार ।।
(जिनप्रतिमा को सिंहासन पर विराजमान करें तथा निम्न छन्द बोलकर अर्घ्य चढ़ायें ।)
जल-गन्धादिक द्रव्य से, पूजूँ श्री जिनराज ।
पूर्ण अर्घ्य अर्पित करूँ, पाऊँ चेतनराज ।।
ॐ ह्रीं श्री पीठस्थितजिनाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
जिन संस्पर्शित नीर यह, गन्धोदक गुण खान ।
मस्तक पर धारूँ सदा, बनूँ स्वयं भगवान् ।।
(मस्तक पर गन्धोदक चढ़ायें । अन्य किसी अंग से गन्धोदक का स्पर्श वर्जित है ।)
विनय पाठ
(ब्र. रवीन्द्रजी आत्मन् कृत)
(दोहा)
सफल जनम मेरा हुआ, प्रभु दर्शन से आज।
भव-समुद्र नहीं दीखता, पूर्ण हुए सब काज।।1।।
दुर्निवार सब कर्म अरु, मोहादिक परिणाम।
स्वयं दूर मुझसे हुए, देखत तुम्हें ललाम।।2।।
संवर कर्मों का हुआ, शान्त हुए गृह-जाल।
हुआ सौख्य सम्पन्न मैं, नहिं आये मम काल।।3।।
भव-कारण मिथ्यात्व का, नाशक ज्ञान-सुभानु।
उदित हुआ मुझमें प्रभो, दीखे आप समान।।4।।
मेरा आत्मस्वरूप जो, ज्ञान सौख्य की खान।
आज हुआ प्रत्यक्ष-सम, दर्शन से भगवान्।।5।।
दीन भावना मिट गई, चिन्ता मिटी अशेष।
निज प्रभुता पाई प्रभो, रहा न दुख का लेश।।6।।
शरण रहा था खोजता, इस संसार मँझार।
निज आतम मुझको शरण, तुमसे सीखा आज।।7।।
निज स्वरूप में मगन हो, पाऊँ शिव अभिराम।
इसी हेतु मैं आपको, करता कोटि प्रणाम।।8।।
मैं वन्दों जिनराज को, धर उर समता भाव।
तन-धन-जन जगजाल से, धरि विरागता भाव।।9।।
यही भावना है प्रभो, मेरी परिणति माहिं।
राग-द्वेष की कल्पना, किंचित् उपजै नाहिं।।10।।
पूजा पीठिका
ॐ जय-जय-जय, नमोऽस्तु-नमोऽस्तु-नमोऽस्तु
अरहंतों को नमस्कार है, सिद्धों को सादर वन्दन।
आचार्यों को नमस्कार है, उपाध्याय को है वन्दन।।
और लोक के सर्वसाधुओं, को है विनय सहित वन्दन।
पंच परम परमेष्ठी प्रभु को, बार-बार मेरा वन्दन।।
ॐ ह्रीं श्रीअनादिमूलमन्त्रेभ्यो नमः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।
(वीरछन्द)
मंगल चार, चार हैं उत्तम, चार शरण में जाऊँ मैं।
मन-वच-काय त्रियोग पूर्वक, शुद्ध भावना भाऊँ मैं।।
श्री अरहंत देव मंगल हैं, श्री सिद्ध प्रभु हैं मंगल।
श्री साधु मुनि मंगल हैं, है केवलि कथित धर्म मंगल।।
श्री अरहंत लोक में उत्तम, सिद्ध लोक में हैं उत्तम।
साधु लोक में उत्तम हैं, है केवलि कथित धर्म उत्तम।।
श्री अरहंत शरण में जाऊँ, सिद्धशरण में मैं जाऊँ।
साधु शरण में जाऊँ, केवलिकथित धर्म शरणा जाऊँ।।
ॐ नमोऽर्हते स्वाहा। पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।
मंगल विधान
अपवित्र हो या पवित्र, जो णमोकार को ध्याता है।
चाहे सुस्थित हो या दुस्थित, पाप-मुक्त हो जाता है।।1।।
हो पवित्र-अपवित्र दशा, कैसी भी क्यों नहिं हो जन की।
परमातम का ध्यान किये, हो अन्तर-बाहर शुचि उनकी।।2।।
है अजेय विघ्नों का हर्ता, णमोकार यह मंत्र महा।
सब मंगल में प्रथम सुमंगल, श्री जिनवर ने एम कहा।।3।।
सब पापों का है क्षयकारक, मंगल में सबसे पहला।
नमस्कार या णमोकार यह, मन्त्र जिनागम में पहला।।4।।
अर्ह ऐसे परं ब्रह्म-वाचक, अक्षर का ध्यान करूँ ।
सिद्धचक्र का सद्बीजाक्षर, मन-वच-काय प्रणाम करूँ ।।5।।
अष्टकर्म से रहित मुक्ति-लक्ष्मी के घर श्री सिद्ध नमूँ।
सम्यक्त्वादि गुणों से संयुत, तिन्हें ध्यान धर कर्म वमूँ ।।6।।
जिनवर की भक्ति से होते, विघ्न समूह अन्त जानो ।
भूत शाकिनी सर्प शांत हों, विष निर्विष होता मानो ।।7 ।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि
जिनसहस्रनाम अर्घ्य
मैं प्रशस्त मंगल गानों से, युक्त जिनालय माहिं यजूं।
जल चंदन अक्षत प्रसून चरु, दीप धूप फल अर्घ्य सजूँ ।।
ॐ ह्रीं श्रीभगवज्जिनसहस्रनामेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पूजा प्रतिज्ञा पाठ
(ताटंक)
स्याद्वाद वाणी के नायक, श्री जिन को मैं नमन कराय।
चार अनंत चतुष्टयधारी, तीन जगत् के ईश मनाय ।।
मूलसंघ के सम्यग्दृष्टि, उनके पुण्य कमावन काज ।
करूँ जिनेश्वर की यह पूजा, धन्य भाग्य है मेरा आज ।।1।।
तीन लोक के गुरु जिन-पुंगव, महिमा सुन्दर उदित हुई।
सहज प्रकाशमयी दृग्-ज्योति, जग-जन के हित मुदित हुई ।।
समवशरण का अद्भुत वैभव, ललित प्रसन्न करी शोभा।
जग-जन का कल्याण करे अरु, क्षेम कुशल हो मन लोभा ।।2।।
निर्मल बोध सुधा-सम प्रकटा, स्व-पर विवेक करावनहार।
तीन लोक में प्रथित हुआ जो, वस्तु त्रिजग प्रकटावनहार ।।
ऐसा केवलज्ञान करे, कल्याण सभी जगतीतल का।
उसकी पूजा रचूँ आज मैं, कर्म बोझ करने हलका ।।3 ।।
द्रव्यशुद्धि अरु भाव-शुद्धि, दोनों विधि का अवलंबन कर।
करूँ यथार्थ पुरुष की पूजा, मन-वच-तन एकत्रित कर ।।
पुरुष-पुराण जिनेश्वर अर्हन्, एकमात्र वस्तु का स्थान।
उसकी केवलज्ञान वह्नि में, करूँ समस्त पुण्य आह्वान ।।4 ।।
ॐ ह्रीं यज्ञविधिप्रतिज्ञायै जिनप्रतिमाग्रे पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि।
स्वस्ति मंगलपाठ
(चौपाई)
ऋषभदेव कल्याणकराय, अजित जिनेश्वर निर्मल थाय।
स्वस्ति करें संभव जिनराय, अभिनंदन के पूजों पाय ।।1।।
स्वस्ति करें श्री सुमति जिनेश, पद्मप्रभ पद-पद्म विशेष।
श्री सुपार्श्व स्वस्ति के हेतु, चन्द्रप्रभ जन तारन सेतु ।।2 ।।
पुष्पदंत कल्याण सहाय, शीतल शीतलता प्रकटाय ।
श्री श्रेयांस स्वस्ति के श्वेत, वासुपूज्य शिवसाधन हेत ।।3 ।।
विमलनाथ पद विमल कराय, श्री अनंत आनंद बताय ।
धर्मनाथ शिव शर्म¹ कराय, शांति विश्व में शांति कराय ।।4।।
कुंथु और अरजिन सुखरास, शिवमग में मंगलमय आश।
मल्लि और मुनिसुव्रत देव, सकल कर्मक्षय कारण एव ।।5।।
श्री नमि और नेमि जिनराज, करें सुमंगलमय सब काज।
पार्श्वनाथ तेवीसम ईश, महावीर वंदों जगदीश ।।6 ।।
ये सब चौबीसों महाराज, करें भव्यजन मंगल काज।
मैं आयो पूजन के काज, राखो श्री जिन मेरी लाज ।।7 ।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि
श्री पंच परमेष्ठी पूजन: पंच परमेष्ठी पूजन | Panch Parmeshthi Puaja - Rajmal ji pavaiya
श्री सिद्ध पूजन: श्री सिद्ध पूजन (आचार्य पद्मनन्दि भावाष्टक, हिन्दी) | Shri Siddh Pujan (Acharya Padmanandi Bhavashtak, Hindi)
श्री पंच बालयति जिन-पूजन: श्री पंच बालयति जिन पूजन (पं. अभयकुमार) | Shri Panch Balyati Jin Pujan (Pt. Abhaykumar)
यन्त्राभिषेक करने का मंत्र
ॐ ह्रीं भूर्भुवः स्वरिह विघ्नौघवारकं यन्त्रं वयं परिषेचयामः।
अमृत स्नान करने का मंत्र
ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृतं द्रावय द्रावय सं सं
क्लीं क्लीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सं स्वाहा।
मंगल कलश स्थापना
ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादि ब्रह्मणे मतेऽस्मिन्
…मासे…पक्षे …तिथौ…वासरे …वर्षे
इह…नगरे…कार्यस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं मण्डपभूमिशुद्ध्यर्थं
पात्रशुद्धयर्थं शान्त्यर्थं पंचरत्नगन्धपुष्पाक्षततादिबीजपूरशोभितं मंगलकलश-
स्थापनं करोम्यहं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा।
रक्षासूत्र बाँधने का मंत्र
ॐ नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष हूँ फट् स्वाहा।
मंगलाचरण
(अनुष्टुप्)
मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ।।
(स्रग्धरा)
त्रैकाल्यं द्रव्य-षट्कं नव-पद-सहितं जीव-षट्काय-लेश्याः
पञ्चान्ये चास्तिकाया व्रत-समिति-गति-ज्ञान-चारित्रभेदाः ।
इत्येतन्मोक्ष-मूलं त्रिभुवन-महितैः प्रोक्तमर्हद्भिरीशैः
प्रत्येति श्रद्दधाति स्पृशति च मतिमान् यः स वै शुद्धदृष्टिः ।।
(हरिगीत)
हे मुक्ति-पथ-नायक महा! तुम जानते सब सृष्टि को।
हे कर्म-गिरि-भेदक ! नमूँ मैं, तव गुणों की प्राप्ति हो।।
काल त्रय अरु द्रव्य लेश्या काय छह छह जिन कहें।
अस्तिकाय-रु समिति व्रत गति ज्ञान पाँच जिनोक्त हैं।।
पदार्थ नव, चारित्र पाँच प्रकार शिवपथ मूल हैं।
श्रद्धा-प्रतीति-स्पर्श जो बुध करें शुद्ध सुदृष्टि हैं।।
चौबीस जिनवर और गुरुवर गणधरों को नमन कर।
कुन्दकुन्दाचार्य स्वामी समय के दाता प्रवर।।
ग्रन्थ-कर्ता उमास्वामी गृद्धपिच्छ कहें जिन्हें।
गणधरों-सम कार्य करते नमूँ उनके चरण मैं।।
अध्याय दश का ज्ञान हो तत्त्वार्थ का श्रद्धान हो।
चैतन्य में उपवास का फल मिले मुनिवर वच अहो।।
सभी टीकाकार मुनिवर चरण की अब लूँ शरण।
विधान रचना हेतु अब मैं करूँ मंगल आचरण।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि*
पीठिका
(दोहा)
चौबीसों जिन पद युगल, पंच प्रभू सिर नाय।
मोक्षशास्त्र इस ग्रन्थ की, पूजा महा रचाय।।
(हरिगीतिका)
शुद्धनय से जीव का, वर्णन समय के सार में।
किन्तु नय व्यवहार से, वर्णन किया इस शास्त्र में।।
प्रभो ! नय-व्यवहार से, परमार्थ का विज्ञान हो।
दृष्टि में ज्ञायक बसे, व्यवहार का बस ज्ञान हो।
कुन्दकुन्दाचार्य के हैं, शिष्य स्वामि-उमा गुरु।
निर्ग्रन्थ-गुरु के ग्रन्थ पढ़, चैतन्य में विचरण करूँ।।
तत्त्व एवं अर्थ का, श्रद्धान परिणति में बसे।
निर्विकल्प प्रतीति से, आनन्द धारा नित बहे।।
जीव की पहचान भेदों, और भावों से कही।
देह इन्द्रिय योनि अरु त्रय लोक का वर्णन सही।।
सदभूत नहिं व्यवहार यह, पर अनुपचरित इसे कहें।
परमार्थ समझाने अरे ! इस भाँति जिन वर्णन करें।।
* स्वयं सामग्री चढ़ाते समय ‘क्षिपामि’ एवं दूसरों को निर्देश देते समय ‘क्षिपेत्’ बोलना चाहिए।
बन्ध आस्रव कहे संवर, निर्जरा विस्तार से।
क्योंकि प्रतिपादन कहा, परमार्थ का व्यवहार से।।
अतः इस व्यवहार को, उपचार मात्र सुजान कर।
परमार्थ को भूतार्थ लख, आश्रय करूँ इसका प्रवर।।
इस ग्रन्थ की टीका लिखीं, गम्भीर बहु आचार्य ने।
सर्वार्थसिद्धि राजवार्तिक, श्लोकवार्तिक आदि हैं।।
सिद्धान्त जिनवरकथित, पद्धति-न्याय से वर्णन किये।
हे प्रभो! इस रूप में, अब तुम बसो मेरे हिये।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि
हे प्रभो चरणों में तेरे…
हे प्रभो ! चरणों में, तेरे आ गये;
भावना अपनी का फल, हम पा गये ।। टेक ।।
वीतरागी हो, तुम्हीं सर्वज्ञ हो;
सप्त तत्त्वों के, तुम्हीं मर्मज्ञ हो।
मुक्ति का मारग, तुम्हीं से पा गये;
हे प्रभु! चरणों में, तेरे आ गये ।। 1।।
विश्व सारा ही, झलकता ज्ञान में;
किन्तु प्रभुवर लीन हैं निज ध्यान में।
ध्यान में निज-ज्ञान को, हम पा गये;
हे प्रभु! चरणों में, तेरे आ गये ।। 2।।
तुमने बताया, जगत् के सब आत्मा;
द्रव्य-दृष्टि से, सदा परमात्मा ।
आज निज परमात्मा, पद पा गये;
हे प्रभु! चरणों में, तेरे आ गये।। 3।।
श्री तत्त्वार्थसूत्र पूजन
प्रूफरीडिंग बाकी है