(श्री पद्मनन्दि आचार्य विरचित सिद्धपूजा के भावाष्टक का हिंदी अनुवाद, पण्डित द्यानतरायजी कृत भावाष्टक सहित)
(वीरछन्द)
ऊपर नीच रेफ बिन्दुयुत ब्रह्म-स्वरावेष्टित ह्रींकार।
अष्ट वर्ग अंबुज-पत्रों पर अष्ट संधि में तत्त्वविचार।।
ह्रींकार से वेष्टित अन्तः पत्र तटों पर ओम् महान्।
सिद्धों का ध्याता शिव पाता कर्म-गजों को सिंह समान।।
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि
(दोहा)
कर्मबंध से मुक्त जो, सूक्ष्म निरामय नित्य।
नमन करूँ परमात्म को, शांत अमूर्त सुसिद्ध।।
(सिद्ध यंत्र स्थापित करें।)
अष्टक
(वीरछंद-सोरठा)
निजमणिमय भाजन में भरकर समता रसमय अमृत धार।
केवलज्ञान कलामय मनहर सहज सिद्ध पूजूँ सुखकार।।
हमें तृषा दुख देत, सो तुमने जीती प्रभु।
जल सों पूजूँ तोहि, मेरो रोग निवारिये।।
ॐ ह्रीं श्री क्षायिकसम्यक्त्व-अनन्तदर्शन-अनन्तज्ञान-अनन्तवीर्य-अगुरुलघुत्व-
अवगाहनत्व-सूक्ष्मत्व-निराबाधत्वगुणसम्पन्न-सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्म-
जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्मकलंक विनाशक निर्मल भाव सुवासित चंदन लाय।
अनुपम गुण अनन्त के नायक सहज सिद्ध पूजूँ मन लाय।।
हम भव-आतप माहिं, तुम न्यारे संसार सों।
कीजे शीतल छाँह, चंदन से पूजा करूँ।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिने संसारतापविनाशनाय चन्दनं नि. ।
सहज भावमय निर्मल तंदुल दोष विलास विशोधनकार।
अनुपम बोध निधानपति श्री सहज सिद्ध पूजूँ सुखकार।।
हम अवगुण समुदाय, तुम अक्षय गुण से भरे।
पूजूँ अक्षत लाय, दोष नाश गुण कीजिए।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि.।
सहज क्रिया से शुद्ध की गई समयसार पुष्पों की माल।
परम योगग बल से वश करके, सहज सिद्ध को नमता भाल।।
काम-अग्नि तन मोहि, निश्चय शीलस्वभाव तुम।
फूल चढ़ाऊँ तोहि, मेरो रोग निवारियो।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि. ।
सहज ज्ञान नैवेद्य अहो यह जन्म-जरा-मृत्यु क्षयकार।
निरवधि आत्मगुणालय प्रभुवर सहज सिद्ध पूजूँ सुखकार।।
हमें क्षुधा दुख भूरि, ध्यानखड्ग करि तुम हती।
मेरी बाधा चूरि, नेवज से पूजा करूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि.।
सहज निजात्म रत्न रुचि दीपक जड़वैभव-रुचि-तम-क्षयकार।
निरवधि आत्मप्रकाश विकासित सहज सिद्ध पूजूँ सुखकार।।
मोह-तिमिर हम पास, तुम चेतनमय ज्योति हो।
पूजूँ दीप प्रकाश, मेरो तिमिर निवारियो।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि.।
निजगुण अक्षय धूप सुगंधित स्वगुण घाति-मल नाशनहार।
ज्ञान अनंत सुखामृत सागर सहज सिद्ध पूजूं सुखकार।।
अष्ट कर्ममल जारि, मुक्ति माहिं सब सुख करो।
खेऊँ धूप रसाल, मेरे कर्म निवारियो।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मदहनाय धूपं नि. स्वाहा।
निर्मल भाव फलावलि लाया सहज कुभाव विनाशनहार।
निजगुण विकसित हुए निरंजन सहज सिद्ध पूजूँ सुखकार।।
अंतराय दुख टारि, तुम अनंत थिरता लही।
पूजूँ फल दरशाय, विघन टारि शिवसुख करो।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफलप्राप्तये फलं नि. स्वाहा।
विकसित भेदज्ञान भावों से चिंतामणि सम उत्तम शुद्ध।
ज्ञानस्वरूपी जल गंधाक्षत पुष्पजाल नैवेद्य विशुद्ध।।
दीप-फलों से अव्याबाधी निजरस स्वादी अचल सुसिद्ध-
पूजा से हो विशद ज्ञान हम भी पूजें परमातम सिद्ध।।
हममें आठों दोष, जजूँ अर्घ्य ले सिद्धजी।
दीजे वसुगुण मोहि, कर जोड़े द्यानत खड़े।।
समकित दर्शन ज्ञान, अगुरुलघु अवगाहना।
सूक्षम वीरज भान, निराबाध गुण सिद्ध के।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि. स्वाहा ।
जिनके चरणों में झुकते हैं तीन लोक के जीव महान्।
वे तीर्थंकर भी जिन को ध्याकर पाते हैं शिवसुख धाम।।
क्षायिक समकित ज्ञान वीर्य अव्याबाधी शिव सौख्य अपार।
गुण अनंतमय सिद्धों की मैं स्तुति करता बारंबार।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि
जयमाला
(त्रोटक, जय केवल-भानु कला सदनं)
विराग सनातन शान्त निरंश, निरामय निर्भय निर्मल-हंस ।
सुधाम विबोध-निधान विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।1।।
विदूरित-संसृतिभाव निरङ्ग, समामृत-पूरित देव विसंग ।
अबन्ध-कषाय-विहीन विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।2।।
निवारित-दुष्कृत-कर्म-विपाश, सदामल-केवल-केलि-निवास ।
भवोदधि-पारग शांत विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।3।।
अनन्त-सुखामृत-सागर धीर, कलंक रजो-मल-भूरि-समीर ।
विखण्डित काम विराम विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।4।।
विकार-विवर्जित तर्जित-शोक, विबोध सुनेत्र-विलोकित-लोक।
विहार विराव विरंग विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।5।।
रजोमल-खेद-विमुक्त विगात्र, निरन्तर नित्य सुखामृत-पात्र ।
सुदर्शन-राजित नाथ विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।6।।
नरामर-वन्दित निर्मल-भाव, अनन्त मुनीश्वर-पूज्य-विहाव ।
सदोदय विश्व महेश विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।7।।
विदम्भ वितृष्ण विदोष विनिन्द्र परात्पर शंकर सार वितन्द्र ।
विकोप विरूप विशंक विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।8।।
जरा-मरणोज्झित वीत-विहार, विचिन्तित निर्मल निरहंकार ।
अचिन्त्य-चरित्र विदर्प विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।9।।
विवर्ण विगंध विमान विलोभ, विमाय विकाय विशब्द विशोभ ।
अनाकुल केवल सर्व विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।10।।
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जयमालामहार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
(रोला)
अनुपम समयसार सुंदर चेतन से चिह्नित,
पर-परिणति से रहित पद्मनंदि से वंदित।
सिद्ध समूह विशुद्ध अनंत गुणों के स्वामी,
वंदे सुमरे ध्यावे जो वह हो शिवगामी।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि
Artist: आचार्य पद्मनन्दि (मूल भावाष्टक), पण्डित द्यानतराय (भावाष्टक)
स्रोत: श्री तत्त्वार्थसूत्र मंडल विधान एवं श्री रत्नत्रय मंडल विधान, श्री तत्त्वार्थसूत्र मंडल विधान एवं श्री रत्नत्रय मंडल विधान | Shri Tattvarthsutra Mandal Vidhan evam Shri Ratnatraya Mandal Vidhan