(हरिगीतिका)
गिरि पर प्रवाहित नीर कल-कल करे जिन गुणगान है।
जिन-गुण प्रतीति से अमरता का मिले वरदान है।।
इस भूमि पर निज ध्यान धर अगणित हुए भवि पार हैं।
लोकाग्र में गिरि पर विराजे वन्दना शत बार है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-शाश्वतसिद्धक्षेत्रात् सिद्धत्वप्राप्तेभ्यः
समस्त-सिद्धेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
यह वायु शीतल कह रही जिनवचन शीतल समरसी।
भवताप नाशक दिव्यध्वनि सम्मेद के कण-कण बसी।।
इस भूमि पर निज ध्यान धर अगणित हुए भवि पार हैं।
लोकाग्र में गिरि पर विराजे वन्दना शत बार है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-शाश्वतसिद्धक्षेत्रात् सिद्धत्वप्राप्तेभ्यः
समस्त-सिद्धेभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
यह क्षेत्र त्रैकालिक अखंडित साधकों का धाम है।
चिद्रूप अक्षत आत्मा में वे करें विश्राम हैं।।
इस भूमि पर निज ध्यान धर अगणित हुए भवि पार हैं।
लोकाग्र में गिरि पर विराजे वन्दना शत बार है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-शाश्वतसिद्धक्षेत्रात् सिद्धत्वप्राप्तेभ्यः
समस्त-सिद्धेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
गिरि पर सुविकसित सुमन लख सब कामनायें नाशती।
निष्काम जिन-आराधना ही पुण्य-पाप विनाशती।।
इस भूमि पर निज ध्यान धर अगणित हुए भवि पार हैं।
लोकाग्र में गिरि पर विराजे वन्दना शत बार है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-शाश्वतसिद्धक्षेत्रात् सिद्धत्वप्राप्तेभ्यः
समस्त-सिद्धेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
गिरि वंदना में भक्तिरस का हो प्रकर्ष¹ विपाक है।
क्यों हो क्षुधा की वेदना आनंद का परिपाक है।।
इस भूमि पर निज ध्यान धर अगणित हुए भवि पार हैं।
लोकाग्र में गिरि पर विराजे वन्दना शत बार है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-शाश्वतसिद्धक्षेत्रात् सिद्धत्वप्राप्तेभ्यः
समस्त-सिद्धेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
घोर तम जब हो निशा का भक्त करते वंदना।
लघु दीप² कर में हो तथा उर मोह-क्षय की कामना।।
इस भूमि पर निज ध्यान धर अगणित हुए भवि पार हैं।
लोकाग्र में गिरि पर विराजे वन्दना शत बार है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-शाश्वतसिद्धक्षेत्रात् सिद्धत्वप्राप्तेभ्यः
समस्त-सिद्धेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
निर्दोष दश विधि धूप गिरि पर सहज ही महके सदा।
मानो भविक से कह रही तुम भी दशांगी³ सर्वदा।।
इस भूमि पर निज ध्यान धर अगणित हुए भवि पार हैं।
लोकाग्र में गिरि पर विराजे वन्दना शत बार है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-शाश्वतसिद्धक्षेत्रात् सिद्धत्वप्राप्तेभ्यः
समस्त-सिद्धेभ्यो अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
गिरि करे अपने ही फलों से अर्चना जिनराज की।
किन्तु भव्यों को विषय-सुख-कामना न हो कभी।।
इस भूमि पर निज ध्यान धर अगणित हुए भवि पार हैं।
लोकाग्र में गिरि पर विराजे वन्दना शत बार है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-शाश्वतसिद्धक्षेत्रात् सिद्धत्वप्राप्तेभ्यः
समस्त-सिद्धेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
- उत्कृष्ट 2. टॉर्च 3. क्षमा आदि दश धर्म स्वभाव वाले शुद्धात्मा।
हम तो अकिंचन क्या समर्पण कर सकें जिनराज को।
अर्घ्य अर्पित योग त्रय है परम योगीराज को।।
इस भूमि पर निजध्यान धर अगणित हुए भवि पार हैं।
लोकाग्र में गिरि पर विराजे वन्दना शत बार है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-शाश्वतसिद्धक्षेत्रात् सिद्धत्वप्राप्तेभ्यः
समस्त-सिद्धेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
।। अर्ध्यावली ।।
(दोहा)
भूतल पर भी हैं अहो, जिनमन्दिर अभिराम।
भाव सहित वन्दन करें, पाऊँ शाश्वत धाम।।
(अडिल्ल)
गिरि पर शोभित कूट उच्च लोकाग्र में।
सिद्ध अनन्तानन्त अन्त आकाश में।।
प्रभो ! पधारो मम निर्मल परिणाम में।
पुष्पांजलि अर्पित समग्र गिरिधाम में।।
(पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
भूतल पर विराजमान जिनमन्दिर एवं जिनबिम्बों के लिए अर्घ्य
(वीरछन्द)
गिरि सम्मेदशिखर को वंदन करने के भी पूर्व अहो।
भूतल पर हो रहे सुशोभित जिनमंदिर जग शोभित हो।।
अंतर्मुख नासाग्र दृष्टि जिनमुद्रा का संदेश यही।
शाश्वत सुख अपने में ही है विषयों में नहिं मिले कभी।।
(दोहा)
परम शान्त मुद्रा अहो ! आत्मतत्त्व दरशाय।
भक्ति अर्घ्य अर्पित करूँ जो शाश्वत सुखदाय।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रे भूतलोपरि-विराजित-
जिनमन्दिरजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
।। चौबीस कूट अर्ध्यावली।।
..1..
।। ज्ञानधर कूट ।।
(तीर्थंकर कुंथुनाथजी)
(रोला)
अहो ! कुंथु प्रभु कूट ज्ञानधर आप पधारे।
सहज अयोगी दशा चतुर्थ ध्यान शुभ धारे।।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरण शिवपंथ कहाये।
अर्घ्य समर्पित करें आज हम धन्य हो गये।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित ज्ञानधर कूट
से कुन्थुनाथ-जिनेन्द्रादि 96 कोड़ाकोड़ी 96 करोड़, 32 लाख
96 हजार 742 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।।1।।
..2..
।। चौबीस तीर्थंकरों के गणधरों की कूट ॥
स्वसंवेदी ज्ञान जानता आत्मतत्त्व को।
अतः भाव-श्रुतकेवलि चिदानंद रस पीते।।
दिव्यध्वनि सुन द्वादशांग श्रुत रचना करते।
वृषभसेन से इन्द्रभूति गुरु को हम नमते।।
ॐ ह्रीं श्री वृषभसेन-इन्द्रभूतिपर्यन्त 1459 गणधरगुरुभ्यो
सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।2।।
..3..
।। मित्रधर कूट ।।
(तीर्थंकर नमिनाथजी)
सकल जीव प्रति मैत्री धर नमिनाथ जिनेश्वर।
कूट मित्रधर आय विराजे शुक्ल ध्यान धर।।
तज कर भेद विकल्प अभेद स्वरूप हो गये।
अर्घ्य समर्पित कर प्रभुवर हम धन्य हो गये।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित मित्रधर कूट से श्री
नमिनाथ-जिनेन्द्रादि 900 कोड़ाकोड़ी 1 अरब 45 लाख 7 हजार
942 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपद-प्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।।३।।
..4..
।। नाटक कूट ।।
(तीर्थंकर अरनाथजी)
यह संसार विचित्र लखा नाटक-सम जिनवर।
ना अटके तुम पर में हे अरनाथ जिनेश्वर।।
नव तत्त्वों का भेद महा नाटक बतलाया।
नाटक कूट पधारे हमने अर्घ्य चढ़ाया।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित नाटक कूट से श्री
अरनाथ-जिनेन्द्रादि 99 करोड़ 99 लाख 99 हजार (यानि 1 कम
1 अरब मुनि) मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।4।।
..5..
।। संवल कूट ।।
(तीर्थंकर मल्लिनाथजी)
सहज शुद्ध ज्ञायक स्वभाव में दृष्टि धरकर।
मल्लिनाथ जिन मोह-मल्ल पर विजय प्राप्त कर।।
विषय-कषायों से पीड़ित जग के संबल हो।
संवल कूट विराजे प्रभु हमको शिवपद हो।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित संवल कूट से श्री
मल्लिनाथ-जिनेन्द्रादि 96 करोड़ मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।5।।
..6..
।। संकुल कूट ।।
(तीर्थंकर श्रेयांसनाथजी)
श्रेयोमार्ग प्रदर्शक श्री श्रेयांस जिनेश्वर।
संकुल कूट पधारे योग निरोधी प्रभुवर।।
उभय नयों के कथनों में अविरोध दिखाया।
आज धन्य हम हुए भक्तिमय अर्घ्य चढ़ाया।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित संकुल कूट से श्री
श्रेयांसनाथ-जिनेन्द्रादि 96 कोड़ा-कोड़ी 96 करोड़ 96 लाख 9
हजार 542 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।6।।
..7..
।। सुप्रभकूट ।।
(तीर्थंकर पुष्पदंतजी)
चैतन्य प्रभा से हुए प्रभावित सुविधिनाथ प्रभु।
गुण अनंतमय दंतपंक्ति-सम पुष्पदंत हैं।।
सुप्रभकूट भी धन्य हुई पा प्रभा आपकी।
हम भी हुए कृतार्थ आपको पाकर निज में।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित सुप्रभ कूट से श्री
पुष्पदन्तजिनेन्द्रादि 1 कोड़ाकोड़ी 99 लाख 7 हजार 780 मुनीश्वरेभ्यः
सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।7।।
..8..
।। मोहन कूट ।।
(तीर्थंकर पद्मप्रभजी)
मोह न किंचित् रहा शेष प्रभु की परिणति में।
खिले अष्टगुण-पद्म पद्मप्रभ के सरवर में।।
मोहनकूट हुई विकसित जिस पर जग मोहित।
खिले पद्म परिणाम हमारे अर्घ्य समर्पित।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित मोहन कूट से श्री
पद्मप्रभजिनेन्द्रादि 99 करोड़ 87 लाख 43 हजार 757 मुनीश्वरेभ्यः
सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८।।
..9..
निर्जर कूट
(तीर्थंकर मुनिसुव्रतजी)
(हरिगीतिका)
निर्जरा की पथप्रदर्शक कूट-निर्जर है अहो।
स्वानुभव में शुद्ध परिणति प्रबल होती यह लखो।।
मुनिसुव्रतनाथ जिन ने निर्जरा फल पा लिया।
अर्घ्य अर्पित कर भविक ने मोक्षपथ अपना लिया।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित निर्जर कूट से श्री
मुनिसुव्रत-जिनेन्द्रादि 99 कोड़ाकोड़ी 99 करोड़ 99 लाख 999
मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा।।9।।
..10..
।। ललित कूट ।।
(तीर्थंकर चंद्रप्रभजी)
पूर्णमासी चन्द्र-सम परिपूर्ण चन्द्रप्रभ प्रभो।
कैवल्य-किरणों में निरखते ललित चेतनघन विभो।।
कूट अनुपम ललित पर आकर प्रभो! निज ध्यान धर।
अर्घ्य अर्पित कर रहे हम चिदानंद भोगें प्रवर।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित ललित कूट से श्री
चन्द्रप्रभ-जिनेन्द्रादि 984 अरब 2 करोड़ 80 लाख 4 हजार 595
मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।।10।।
..11..
।। सर्वसिद्धवर कूट ।।
(तीर्थंकर आदिनाथजी)
नव तत्त्व में जो गुप्त था युग-आदि में दिखला दिया।
हे आदि जिनवर आद्य तीर्थंकर हुए शिवपंथ पा।।
सर्व सिद्धि वरण कर कैलाश पर निज योग धर।
सम्मेद गिरि पर भी प्रभो! यह अर्घ्य अर्पित है प्रवर।।
ॐ ह्रीं श्री अष्टापद-कैलास-सिद्धक्षेत्रे श्रीऋषभनाथ-
जिनेन्द्रादि-बालि-महाबालि-नाग-कुमारादि 10 हजार मुनीश्वरेभ्यः
सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।11।।
..12..
।। विद्युतवर कूट ।।
(तीर्थंकर शीतलनाथजी)
चन्द्र-सम चैतन्य शीतलनाथ की वाणी अहो।
स्वानुभव शीतल सुरसमय चिदानन्द झरता प्रभो!
कूट विद्युतवर विराजे ध्यान-ध्येय अखंड हैं।
अर्घ्य अर्पित हे प्रभो ! अब निकट भव का अंत है।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित विद्युतवर कूट से
श्री शीतलनाथ-जिनेन्द्रादि 18 कोड़ाकोड़ी 42 करोड़ 32 लाख
42 हजार 905 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।12।।
..13..
।। स्वयंभू कूट ।।
(तीर्थंकर अनंतनाथजी)
स्वयंभू जो हैं सदा निज द्रव्य-गुण-पर्याय में।
आत्मबल से स्वयं पाया अनंत सुख क्षणमात्र में।।
गुण अनंतानंत के हो नाथऽनंत जिनेश्वरम्।
स्वयंभू इस कूट ने भी पा लिया गौरव परम।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित स्वयंभू कूट से श्री
अनन्तनाथ-जिनेन्द्रादि 96 कोड़ाकोड़ी 70 करोड़ 70 लाख 70
हजार 700 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।।13।।
..14..
।। धवल कूट ।।
(तीर्थंकर सम्भवनाथ)
अपने समय में प्रकट हो पर्याय संभव है यही।
संभव जिनेन्द्र स्वकाल में पुरुषार्थ प्रकटाया सही।।
यह धवल कूट कहे प्रभो! शुद्धात्म है उज्ज्वल धवल।
हम अर्घ्य अर्पित कर रहे प्रकटे हमारा आत्मबल।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित धवल कूट से श्री
सम्भवनाथ-जिनेन्द्रादि मुनि 9 कोड़ाकोड़ी 2 लाख 42 हजार 500
मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।।14।।
..15..
।। मंदारगिरि कूट ।।
(तीर्थंकर वासुपूज्य भगवान्)
मंदार गिरि यह कूट है मंदर सुमन सुगंधमय।
चंपापुरी में वासुपूज्य जिनेन्द्र चेतन गंधमय।।
शत इन्द्र पूजित हो प्रभो! पर स्वयं से ही पूज्य हो।
हम अर्घ्य अर्पित कर रहे प्रभु! आप ही जगपूज्य हो।।
ॐ ह्रीं श्री चम्पापुरसिद्धक्षेत्रे श्री वासुपूज्यजिनेन्द्रादि-अनेक-
मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।।15।।
..16..
।। आनंद कूट ।।
(तीर्थंकर अभिनंदननाथजी)
हे नाथ! अभिनंदन किया चैतन्य का श्रुतज्ञान में।
झलकी तभी यह सृष्टि सारी प्रभो! केवलज्ञान में।।
निज आत्म आनंदकूट है यह कूट भी बतला रही।
अर्पित करें यह अर्घ्य परिणति आप-सम होगी कभी।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित आनन्द कूट से श्री
अभिनन्दननाथ-जिनेन्द्रादि 72 कोड़ाकोड़ी 70 करोड़ 36 लाख
42 हजार 700 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।16।।
..17..
।। सुदत्तवर कूट ।।
(तीर्थंकर धर्मनाथजी)
(रोला)
धर्म जिनेश्वर धर्म धुरन्धर धर्मप्रदाता।
कूट सुदत्तवर हुए विराजित आनंददाता।।
वीतरागता मात्र धर्म है यह सिखलाया।
अर्घ्य समर्पित हम करते हे मुक्ति-प्रदाता।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित सुदत्तवर कूट से
श्री धर्मनाथ-जिनेन्द्रादि 29 कोड़ा-कोड़ी 19 करोड़ 9 लाख 9
हजार 795 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।17।।
..18..
।। अविचल कूट ।।
(तीर्थंकर सुमतिनाथजी)
सुमतिनाथ प्रभु सकल जगत् को सुमति प्रदाता।
भेदज्ञान परमार्थ सुमति है आनन्ददाता।।
यहीं आप लोकाग्र विराजे अविचल होकर।
अर्घ्य समर्पित करते हैं हे मुक्ति-प्रदाता ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित अविचल कूट से
श्री सुमतिनाथ-जिनेन्द्रादि 1 कोड़ाकोड़ी 84 करोड़ 72 लाख 81
हजार 781 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।18।।
..19..
।। कुंदप्रभ कूट ।।
(तीर्थंकर शांतिनाथजी)
सहज शांतिमय निज स्वभाव के अवलंबन से।
सकल कषाय विलय कर परम शांति प्रकटाई।।
कूट कुंदप्रभ आप विराजे शांति प्रदायक।
अर्घ्य समर्पित करते हैं हम हे जगनायक।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित कुन्दप्रभ कूट से
श्री शान्तिनाथ-जिनेन्द्रादि 9 कोड़ा-कोड़ी 9 लाख 9 हजार 999
मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपद-प्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा।।19।।
..20..
।। महावीर कूट ।।
(तीर्थंकर महावीर भगवान्)
वीर जिनेश्वर अंतिम तीर्थंकर जग-नायक।
परम अहिंसक महावीर हैं शासन-नायक।।
पावापुर है मोक्षधाम शाश्वत सुखकारी।
अर्घ्य समर्पित करें आज हम हर्षित भारी।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर-सिद्धक्षेत्रे श्री महावीर-जिनेन्द्रादि पावापुर
से पद्म-सरोवर स्थान से 26 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।20।।
..21..
।। प्रभास कूट ।।
(तीर्थंकर सुपार्श्वनाथजी)
प्रभु सुपार्श्व की निर्मल परिणति निज सुपार्श्व में।
चिदानंद रस भोगे ज्ञायक के सुपार्श्व में।।
कूट प्रभास विराजे सिद्धों के सुपार्श्व में।
अर्घ्य समर्पित कर हम तिष्ठें प्रभु-सुपार्श्व में ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित प्रभास कूट से श्री
सुपार्श्वनाथ-जिनेन्द्रादि 49 कोड़ा-कोड़ी 84 करोड़ 72 लाख 7
हजार 742 मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपद-प्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।21।।
..22..
।। सुवीरकुल कूट ।।
(तीर्थंकर विमलनाथजी)
विमलनाथ जिन मोहमल रहित निर्मल होकर।
परिणति में प्रकटाया ज्ञानस्वभाव विमलवर।।
यह सुवीरकुल कूट आज प्रभु धन्य हो गई।
अर्घ्य समर्पित कर परिणति भी निर्मल हो गई।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित सुवीरकुल कूट से
श्री विमलनाथजिनेन्द्रादि 70 कोड़ा-कोड़ी 60 लाख 6 हजार 742
मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपद-प्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा।।22।।
..23..
।। सिद्धवर कूट ।।
(तीर्थंकर अजितनाथजी)
मोह-शत्रु से भी अविजित हैं अजित जिनेश्वर।
योग-निरोधी हुए सिद्धवर कूट पधारे।।
यहीं आप लोकाग्र विराजे सिद्धालय में।
अर्घ्य समर्पित कर जागे हैं भाग्य हमारे।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित सिद्धवर कूट से
श्री अजितनाथजिनेन्द्रादि एक अरब 80 करोड़ 54 लाख मुनीश्वरेभ्यः
सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।।23।।
..24..
।। ऊर्जयंत कूट ।।
(तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान्)
भोग-रोग तज नेमि प्रभु गिरनार पधारे।
करके योग-निरोध ध्यान में ध्येय विराजे ।।
ऊर्जयंत यह कूट शिखर सम्मेद सुशोभित।
अर्घ्य समर्पित कर प्रभु को मम परिणति मोहित।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार-सिद्धक्षेत्र-स्थित ऊर्जयन्त कूट से श्री
नेमिनाथ-जिनेन्द्रादि शम्भू, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध इत्यादि 72 करोड़ सात
सौ मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा।।24।।
..25..
।। स्वर्णभद्र कूट ।।
(तीर्थंकर पार्श्वनाथजी)
(वीरछन्द)
स्वर्ण-समान किट्ट कालिमा विरहित स्वर्णकूट अभिराम।
तप्त स्वर्ण-सम पार्श्व जिनेश्वर योगरहित योगीश ललाम।।
त्रैकालिक चिद्रूप अबद्ध-स्पृष्ट एक ज्ञायक ध्रुवधाम-
को निरखे प्रभु की परिणति अतः स्वयं पारस गुणखान।।
स्वयं सुरक्षित स्व-चतुष्टय में अतः अरक्षा का क्या काम।
जिनकी शरणागत पा भविजन निज को करते पार्श्व समान।।
स्वर्णकूट पर सिद्ध हुए प्रभु काल अनंतानंत सुधाम।
ऐसे अनुपम अद्वितीय पारस हैं पार्श्वनाथ भगवान्।।
(दोहा)
हे प्रभु! जग को आपने दिखलाया शिवपन्थ।
स्वयं सदा शिवमय प्रभो! धन्य मार्ग निर्ग्रन्थ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर-सिद्धक्षेत्र में स्थित स्वर्णभद्र कूट से
श्री पार्श्वनाथ-जिनेन्द्रादि 82 करोड़ 84 लाख 45 हजार 742
मुनीश्वरेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।।25।।
।। समुच्चय अर्घ्य ।।
(दोहा)
हुई वन्दना भाव से कर जिनवर गुणगान।
निज निर्मल परिणाम में बसें सिद्ध भगवान्।।
प्रथम ज्ञानधर कूट से स्वर्णकूट पर्यन्त।
लघु धी लघु बल भक्ति से कार्य हुआ संपन्न।।
जिनवर का संदेश यह सदा अकर्ता आत्म।
होते स्वयं स्वकाल में जग के सब परिणाम।।
अतः सहज ही हो गये वन्दन के शुभ भाव।
भाव वन्दना कर हुए धन्य हमारे भाव।।
पुनः पुनः वंदन सभी कूट जिनालय बिम्ब।
सहज प्रकट हो ज्ञान में सिद्ध अमूर्तिक बिम्ब ।।
ॐ ह्रीं श्री गिरिराजसम्मेदशिखरोपरि विराजमान पञ्च-
विंशतिकूटेभ्यः सिद्धपदप्राप्तेभ्यः अनन्तानन्तसिद्धपरमेष्ठि-
भगवद्भ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।26।।
जयमाला
(दोहा)
सिद्धक्षेत्र स्पर्श कर उछलें अद्भुत भाव।
किंचित् भाव समेट कर लिपिबद्ध कुछ भाव।।1।।
किस विधि से हम सिद्ध हों कैसे सिद्ध महंत।
इसका करें विचार अब नमो सिद्ध भगवंत।।2।।
(मानव)
ज्यों तीर्थ शाश्वत प्यारा मैं भी ध्रुव चिन्मय न्यारा।
बहु पुष्प-फलों सम मैं हूँ गुणमय अनंत भंडारा।।3।।
उत्पाद-ध्रौव्य-व्ययरूपा सब सत् सामान्य स्वरूपा।
चित् दर्श-ज्ञान-सुखमय हूँ मैं शक्ति अनंत स्वरूपा।।4।।
गिरि के कण-कण में देखो निर्ग्रन्थ साधना महके।
निर्जन वन में साधक की परिणति में अनुभव चहके।।5।।
चेतन अनादि से जड़वत् मद-मोह पान में डूबा।
संसार भ्रमण करता है निज चित् सत्ता को भूला।।6।।
जब काललब्धि है आती योग्यता स्वयं पक जाती।
चलते-फिरते तीरथ-सम गुरु गिरा तत्त्व बरसाती।।7।।
मोही जीवों को देते गुरु भेदज्ञान की औषधि।
मिथ्यात्व रोग क्षय होता परिणति निज वैभव लखती।।8।।
निज को ज्ञायक लखने से पुरुषार्थ स्वयं जगता है।
रत्नत्रय पथ पर चेतन क्रमशः आगे बढ़ता है।।9।।
आरम्भ परिग्रह तजकर निर्ग्रन्थ पन्थ अपनाकर।
सिद्धत्व स्वभावी चेतन पर दृष्टि अखंड जमा कर।।10।।
तब मोह स्वयं क्षय होता केवल रवि जगमग करता।
प्रकटें अनंत सुख दृग बल अरु लोकालोक झलकता।।11।।
ध्रुव अनुपम अचल गतिमय सिद्धत्व आपने पाया।
परिणति में शाश्वत सुखमय चैतन्य सिंधु लहराया।।12।।
प्रभु द्रव्य-भाव वचनों से मैं स्तुति करूँ तुम्हारी।
तुममें मेरे शुद्धातम की छवि प्रतिबिम्बित न्यारी।।13।।
पंचम स्वतत्त्व परिणामिक से पंचम गति प्रकटाई।
जैसा स्वभाव ध्रुव ज्ञायक वैसी शिवमय गति पाई।।14।।
गुणथान मार्गणा भेदों से पार अभेद स्वरूपी।
गुण-पर्यायें विलसित हों हे भेदाभेद स्वरूपी।।15।।
हे अष्टगुणालंकृत प्रभु कृतकृत्य पूर्ण हो स्वामी।
मैं अज्ञ अकिंचन लघु धी क्या कह सकता जगनामी।।16।।
(दोहा)
सिद्ध बसें लोकाग्र में भोगें सौख्य अनंत।
भेदज्ञान से सिद्ध हों होय अन्यथा बंध।।17।।
सर्व सिद्ध अरु सिद्ध भू को वंदन शतबार।
सिद्धस्वभावी दृष्टि हो यह विधान का सार।।18।।
ॐ ह्रीं श्री अनन्तानन्दभोगी-शाश्वतसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्य-
पदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(सोरठा)
वर्ते सिद्ध स्वभाव मम लघु मति-श्रुतज्ञान में।
नष्ट होंय परभाव अर्पित हैं श्रद्धा-सुमन।।
इत्याशीर्वादः पुष्पांजलिं क्षिपेत्/क्षिपामि
।। जाप्यमंत्र ।।
ॐ ह्रीं श्री अनन्तानन्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः।
Artist: पण्डित अभयकुमार शास्त्री, देवलाली
स्रोत: श्री सम्मेदशिखर विधान
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